संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : किसान आंदोलन पर क्यों है केन्द्र का यह रूख ?
27-Nov-2020 2:31 PM 213
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : किसान आंदोलन पर क्यों  है केन्द्र का यह रूख ?

painting by mir suhail

दिल्ली के आसपास ही कई प्रदेशों से किसान देश की राजधानी पहुंच रहे हैं। वे केन्द्र सरकार के बनाए हुए किसान कानूनों के खिलाफ लंबा डेरा डालने की तैयारी से दिल्ली आ रहे हैं। लेकिन पिछले डेढ़-दो दिनों से उन्हें हरियाणा और यूपी में वहां की भाजपा सरकारों द्वारा जिस तरह से रोकने की खबरें आ रही हैं, वे हैरान करने वाली हैं। एक तरफ तो उत्तर भारत अभूतपूर्व ठंड की चपेट में हैं, दूसरी तरफ किसानों को रोकने के लिए पानी की तोप से धार मारकर उन्हें पीछे किया जा रहा है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी पोस्ट किया है कि इसके लिए टैंकरों में भरकर नालों का पानी लाया गया है ताकि उससे भीगे हुए किसान और न ठहर सकें। लेकिन पंजाब के किसानों के साथ महिलाएं भी आई हैं, और लंगर का लंबा इंतजाम रखा गया है। किसानों की भीड़ अब तक सरकारी जुल्म के सामने भी शांत बनी हुई है, और बहुत से ऐसे फोटो-वीडियो तैर रहे हैं जिनमें वहां तैनात पुलिसवालों को भी खाना-पानी किसान ही बांट रहे हैं। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर दशकों पहले की वे तस्वीरें पोस्ट की हैं जब किसानों के एक सबसे बड़े नेता टिकैत ने दिल्ली में किसानों की सभा की थी, उसमें पांच लाख लोग जुटे थे, और उस वक्त की केन्द्र सरकार ने उस सभा को रोकने की कोई कोशिश नहीं की थी। आज लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि जय किसान को रोकने के लिए जय जवान तैनात करके मोदी सरकार क्या साबित कर रही है? यह बात इसलिए भी उठ रही है कि राज्यों की पुलिस के साथ-साथ केन्द्रीय सुरक्षाबलों के जवान भी किसानों को रोकने के लिए तैनात किए गए हैं।

केन्द्र सरकार ने किसानों से तीन दिसंबर को बात करने की बात कही है। लेकिन बहुत से लोगों ने यह सवाल उठाया है कि किसानों को जितने खराब तरीके से, और पुलिसिया हिंसा से रोका जा रहा है, यह बातचीत करने वाली सरकार का रूख नहीं है। लोग यह भी कह रहे हैं कि अगर केन्द्र सरकार को तीन दिसंबर को बात करनी ही है, तो अभी क्यों नहीं कर सकती? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनके आसान जवाब नहीं हैं। 

यह भी बड़ी अजीब सी नौबत है कि पंजाब में भाजपा को छोड़ बाकी तमाम पार्टियां किसानों के आंदोलन के साथ हैं। भाजपा के एक सबसे पुराने गठबंधन-साथी अकाली दल, ने किसान कानूनों का ही विरोध करते हुए एनडीए गठबंधन से रिश्ता तोड़ा था, आज अकाली दल पूरी तरह किसानों के साथ खड़ा है, और पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी भी किसानों से बातचीत करने के लिए केन्द्र सरकार से बार-बार कह रही है। पंजाब में चुनावी जीत न पाने वाली आम आदमी पार्टी भी किसानों के साथ दिख रही है क्योंकि दिल्ली में उसकी सरकार ने पुलिस को स्टेडियम देने से मना कर दिया है जहां वह खुली जेल बनाना चाहती है। मोदी सरकार के छह बरसों में भाजपा के दो सबसे पुराने साथी-दल अलग हो गए हैं, महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा से खासी दूर चली गई है, और किसानों के मुद्दे पर अकाली दल अलग हो गया है। किसानों के बारे में केन्द्र सरकार के बनाए गए तीन कानूनों पर सत्तारूढ़ लोगों को छोडक़र किसी का भरोसा नहीं दिख रहा है, और लोगों के बीच यह आम धारणा है कि इनसे किसान बड़ी कंपनियों के हाथों का खेतिहर-मजदूर बनकर रह जाएगा, और हिन्दुस्तान की खेती कार्पोरेट सेक्टर के हाथों चली जाएगी। कुल मिलाकर केन्द्र के इन कानूनों के खिलाफ पूरे देश से इतने अधिक दल एकजुट हो गए हैं कि कई परस्पर विरोधी दल भी इस मुद्दे पर किसानों के साथ हैं।

कहां तो एक तरफ मोदी सरकार किसानों की कमाई को दोगुना करने का दावा कर रही थी, और कहां आज देश भर में किसानों का रहा-सहा भरोसा भी मोदी सरकार से उठ गया दिखता है। आज जिस तरह महीनों के रेल रोको आंदोलन के बाद पंजाब के किसान दिल्ली पहुंच रहे हैं, बाकी देश भर में जगह-जगह किसान संगठन अपने-अपने तरीके से आंदोलन कर रहे हैं, वह किसी भी केन्द्र सरकार के लिए बड़ी फिक्र की बात होनी थी। लेकिन दो चीजें हैं जो मोदी सरकार को किसी भी फिक्र से अछूता रख रही हैं। एक तो यह कि संसद में उसके पास किसी भी कानून को बनाने के लिए अपार बाहुबल है, और तमाम गैरएनडीए पार्टियां मिलकर एक भी हो जाएं, तो भी वे केन्द्र सरकार का कोई प्रस्ताव नहीं रोक सकतीं, अब तो बिना बहस महज ध्वनिमत से ही संसद में कानून बन जा रहे हैं। दूसरी बात यह कि तमाम नकारात्मक चर्चाओं के बीच भी, सरकार की बड़ी आलोचना के बीच भी देश में जब चुनाव होते हैं, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में या तो भाजपा और उसके गठबंधन-साथी वोटरों के वोट से चुनाव जीत जाते हैं, या फिर वे दूसरी पार्टियों के विधायकों के वोट से सरकार बना लेते हैं। ऐसे सिलसिले के चलते हुए भला किसको किसानों, या किसी दूसरे तबके की फिक्र हो सकती है? लोकतंत्र में इतनी बेफिक्री किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी, गठबंधन, या नेता को तानाशाह बना सकती है, उसे लोगों को अनसुना करने की आदत हो सकती है, और किसानों के मामले में, कई दूसरे मामलों में, केन्द्र सरकार का ऐसा ही रूख दिख भी रहा है। अपने दूसरे कार्यकाल में केन्द्र सरकार का ऐसा रूख देश के अलावा सत्तारूढ़ गठबंधन के भी खिलाफ है क्योंकि सरकार को जनता के मुद्दों पर गौर करना अब जरूरी नहीं रह गया है। भारत जैसे निर्वाचित लोकतंत्र में सत्तारूढ़ पार्टी की बड़ी फिक्र सत्ता पर दुबारा जीतकर आना रहती है। लेकिन यहां ऐसी कोई फिक्र चुनावों को लेकर नहीं हैं क्योंकि पिछले छह बरस में देश ने केन्द्र सरकार के बहुत से ऐसे फैसले देखे जिनकी वजह से एनडीए को आम चुनाव या प्रदेशों का चुनाव हारने का खतरा हो सकता था, लेकिन केन्द्र के फैसलों से आहत लोग भी जब मोदी के नाम पर वोट देने को टूट पड़ते हैं, तो फिर केन्द्र सरकार किसी मुद्दे की परवाह क्यों करे? इसकी ताजी मिसाल अभी बिहार में सामने आई जहां पूरे देश से तकलीफ में बिहार पैदल लौटने वाले मजदूरों ने भी कुछ इस अंदाज में दौड़-दौडक़र मोदी के नाम पर वोट दिया कि वे लॉकडाऊन की वजह से घर नहीं लौट रहे थे, वे चुनाव के पहले लौटकर मोदी को वोट देने पोलिंग बूथ पर कतार में लगने की हड़बड़ी में थे। यह एक बहुत रहस्यमय करिश्मा है, और इसके चलते हुए ही केन्द्र सरकार किसी भी मुद्दे की अनदेखी करने की हालत में है। फिलहाल किसानों का मुद्दा दिल्ली के इर्द-गिर्द के राज्यों से आगे बढक़र बाकी देश में कितना चल सकता है यह देखने की बात है। किसानों के साथ भाजपा-राज्यों की पुलिस जो बर्ताव कर रही है, वह बहुत ही खराब है, और उसे लोकतंत्र में बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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