संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बेहतर या बदतर बनने की अपार संभावनाओं की जगह
29-Nov-2020 5:56 PM 174
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बेहतर या बदतर बनने की अपार संभावनाओं की जगह

तमाम लोकतांत्रिक दुनिया में आज लोग सोशल मीडिया पर अपनी सोच सामने रखते हैं, और वह बहुतों के लिए बहुत मायने भी रखती है। पहले किसी औपचारिक समारोह में लोगों को सुनना-देखना हो पाता था, या बहुत करीबी 5-10 लोगों से रूबरू मुलाकात होने पर उनसे कोई बहस हो जाती थी, तर्क-वितर्क चलता था। लेकिन अब सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोग अनजाने लोगों की बातें भी देख-सुन लेते हैं, और उनके साथ किसी बहस में भी शामिल हो जाते हैं। सोशल मीडिया का मिजाज इस हद तक लोकतांत्रिक है कि बहुत से लोग उसे अराजक भी मानते हैं कि उस पर न तो किसी देश का कानून लागू होता है, और न ही किसी समाज के सांस्कृतिक नियम। लोग इन सबसे परे जाकर किसी की तारीफ लिखते हैं, तो किसी को धमकियां। 

ऐसे सोशल मीडिया की वजह से आज सुबह एक राजनीतिक व्यक्ति ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा कि अनजाने लोग उनके पेज पर अपनी राय पोस्ट न करें। सोशल मीडिया को एक मेला है जिसमें जो जैसे नियम चाहें वे अपने पेज के लिए लागू कर सकते हैं। और इन नियमों को तोडऩे वाले लोगों को ब्लॉक कर सकते हैं, उनका लिखा मिटा सकते हैं, या निजी मैसेज बॉक्स में उनके भेजे संदेश की फोटो अपने पेज पर सभी लोगों के देखने के लिए पोस्ट कर सकते हैं। अमूमन महिलाओं को निजी मैसेज बॉक्स में बहुत से लोग प्यार का इजहार करने लगते हैं, और पकडऩे को जब उंगली नहीं मिलती तो कंधे तक को कोसने लगते हैं। कभी गिड़गिड़ाने लगते हैं, तो कभी धमकाने लगते हैं। अब महिलाएं हिम्मत करके ऐसे संदेश भेजने वालों का भांडाफोड़ भी करने लगी हैं, और उनकी शिनाख्त के साथ उनके प्रेम-प्रदर्शन या सेक्स-प्रदर्शन को पोस्ट भी करने लगी हैं। इसलिए सोशल मीडिया ने महिलाओं को एक नया हक दिया है जो कि इसके आने के पहले तक हासिल नहीं सरीखा था। जैसे किसी मनचले ने नोटों पर एक लडक़ी का नाम लिखकर यह लिखना शुरू कर दिया कि फलां-फलां बेवफा है, जिस तरह लोग सार्वजनिक शौचालयों के दरवाजों के भीतर या पर्यटन केन्द्रों की दीवारों और पेड़ों पर किसी लडक़ी का नाम लिखकर भद्दी बातें लिख दिया करते थे, वह गुमनाम हरकत अब सोशल मीडिया पर मुमकिन नहीं है, और अब यहां शिनाख्त उजागर हो सकती है, और अगर झूठी शिनाख्त से किसी ने खाता खोला है, तो पुलिस बड़ी आसानी से उसका भांडाफोड़ कर सकती है। 

ऐसे सोशल मीडिया पर कल एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता ने लिखा- ‘विद्वान से विमर्श कीजिए, बराबर वाले से बहस, और मूर्ख से हाथ जोडक़र क्षमा मांग लीजिए।’ बात एकदम सही है और लोगों की अपनी मानसिक तरक्की के लिए जरूरी भी है। किसी को भी किसी बेवकूफ के साथ बहस करके अपना वक्त जाया नहीं करना चाहिए। मूर्खों के बारे में किसी ने बहुत पहले यह लिखा था कि वे आपको बहस में खींचकर एक तर्कहीन बात करने लगते हैं, आपको अपने स्तर तक ले आते हैं, और फिर आसानी से परास्त कर देते हैं क्योंकि वे उस स्तर की बहस के आदी हैं, उसमें उन्हें महारथ हासिल है। आज जिस तरह सोशल मीडिया पर लोगों का रोज खासा वक्त गुजरता है, उससे समझदारों का फायदा होता है क्योंकि वे अपने से अधिक समझदार को पढ़ते-सुनते हैं, और उनसे विचार-विमर्श करते हैं। लेकिन बहुत से लोग नफरती बातों में उलझे रहते हैं, और वे हर दिन अधिक हिंसक, और अधिक घटिया होते जाते हैं क्योंकि अपने से बेहतर सोच और समझ रखने वाले से किसी बहस में उलझने से मेहनत करनी पड़ती है, और अपनी बेवकूफी तुरंत उजागर भी हो जाती है। इसलिए बहुत से लोग अपनी किस्म की सोच रखने वाले लोगों के साथ नफरत और हिंसा का कीर्तन करते हुए सक्रिय रहते हैं जिसमें महज सिर हिलाना पड़ता है, और सिर के भीतर के दिमाग का कोई इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। 

सोशल मीडिया की इन्हीं खूबियों, और मजबूरियों की वजह से लोग वहां पर सावधानी से दोस्त बनाते हैं, और सावधानी से ही उनसे बात करते हैं। लेकिन यह रवैया उन्हीं लोगों का रहता है जो जिम्मेदार रहते हैं, जो गैरजिम्मेदार रहते हैं वे सोशल मीडिया पर किसी एक व्यक्ति, पार्टी, संगठन, या सोच के पक्ष में, या किसी के खिलाफ जिंदाबाद-मुर्दाबाद किस्म की नारेबाजी में लगे रहते हैं। जो लोग सोचे-विचारे बिना, दिमाग पर जोर डाले बिना किसी जुलूस में या भीड़ में नारे लगाते चलते हैं, उनके लिए भी सोशल मीडिया पर काफी जगह है, और उन्हीं के गुरूभाई, उन्हीं की गुरूबहनें वहां पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं। 

इस बारे में आज यहां लिखने का मकसद यह है कि लोग सोशल मीडिया पर रोज अपने पढऩे-लिखने, सोचने-विचारने में खासा वक्त खर्च करते हैं। अगर रोज के चौबीस घंटों में से एक घंटा भी लोग सोशल मीडिया पर लगाते हैं, तो वह जिंदगी का करीब चार फीसदी वक्त हो जाता है, और कामकाजी जिंदगी में इस एक घंटे का अनुपात और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि दिन के सोलह घंटे तो लोग सोने और काम करने में खर्च करते हैं, और उनके पास खुद के लिए आठ घंटे से ज्यादा अमूमन नहीं बचते। इस नजरिए से देखें तो यह एक घंटा उनकी सोचने-विचारने वाली जिंदगी का पन्द्रह फीसदी से ज्यादा हो जाता है। यह ध्यान में रखते हुए लोगों को अपने को बेहतर बनाने, या अपने को बदतर बनाने, दोनों किस्म की संभावनाओं वाले सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना चाहिए। वैचारिक हुआ-हुआ, या वैचारिक कीर्तन से किसी का कुछ भला नहीं होता, और न ही बेवकूफों से दिमागी कुश्ती करने का। इसलिए लोगों को सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी जानकारी और समझ बढ़ाने के लिए करना चाहिए, और ऐसा करने की अपार संभावना इस पीढ़ी से ही शुरू हुए इस सोशल मीडिया में है। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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