सामान्य ज्ञान

मेघदूत
30-Nov-2020 12:33 PM 55
 मेघदूत

मेघदूत महाकवि कालिदास की अप्रतिम रचना है। अकेली यह रचना ही उन्हें  कविकुल गुरु  उपाधि से मण्डित करने में समर्थ है। भाषा, भावप्रवणता, रस, छन्द और चरित्र-चित्रण समस्त द्दष्टियों से मेघदूत अनुपम खण्डकाव्य है। सह्रदय रसिकों ने मुक्त कण्ठ से इसकी सराहना की है। समीक्षकों ने इसे न केवल संस्कृत जगत में , बल्कि विश्व साहित्य में श्रेष्ठ काव्य के रूप में अंकित किया है। मेघदूत में कथानक का अभाव सा है। वस्तुत: यह प्रणयकार ह्रदय की अभिव्यक्ति है।

मेघदूत के दो भाग हैं -   पूर्वमेघ और उत्तरमेघ। 
इस रचना की पृष्मभूमि में बताया गया है- अलका नगरी के अधिपति धनराज कुबेर अपने सेवक यक्ष को कर्तव्य-प्रमाद के कारण एक वर्ष के लिए नगर - निष्कासन का शाप दे देते हैं। वह यक्ष अलका नगरी से सुदूर दक्षिण दिशा में रामगिरि के आश्रमों में निवास करने लगता है। सद्यविवाहित यक्ष जैसे - तैसे आठ माह व्यतीत कर लेता है, किंतु जब वह आषाढ़ मास के पहले दिन रामगिरि पर एक मेघखण्ड को देखता है, तो पत्नी यक्षी की स्मृति से व्याकुल हो उठता है। वह यह सोचकर कि मेघ अलकापुरी पहुंचेगा तो प्रेयसी यक्षी की क्या दशा होगी, अधीर हो जाता है और प्रिया के जीवन की रक्षा के लिए सन्देश भेजने का निर्णय करता है।
यक्ष  मेघ को ही सर्वोत्तम पात्र के रूप में पाकर यथोचित सत्कार के अनंतर उससे दूतकार्य के लिए निवेदन करता है। वह  रामगिरि से विदा लेने का अनुरोध करने के पश्चात यक्ष मेघ को रामगिरि से अलका तक का मार्ग सविस्तार बताता है। मार्ग में कौन-कौन से पर्वत पड़ेंगे जिन पर कुछ क्षण के लिए मेघ को विश्राम करना है, कौन-कौन सी नदियां जिनमें मेघ को थोड़ा जल ग्रहण करना है और कौन-कौन से ग्राम अथवा नगर पड़ेंगे, जहां बरसा कर उसे शीतलता प्रदान करना है या नगरों का अवलोकन करना है। उज्जयिनी, विदिशा, दशपुर आदि नगरों, ब्रह्मावर्त, कनखल आदि तीर्थों तथा वेत्रवती, गम्भीरा आदि नदियों को पार कर मेघ हिमालय और उस पर बसी अलका नगरी तक पहुंचने की कल्पना यक्ष करता है। उत्तरमेघ में अलकानगरी, यक्ष का घर, उसकी प्रिया और प्रिया के लिए उसका सन्देश- यह विषयवस्तु है।
मेघदूत में आद्यंत केवल  मन्दाक्रांता छंद का ही प्रयोग है। इस छन्द की विशिष्ट लय तथा यति से यह समग्र काव्य वेदना, उच्छवास-नि:श्वास तथा मेघ की द्रुतविलम्बित गति का अनुभव देता है। 
 

किशनगढ़

किशनगढ़ राजस्थान का एक प्रमुख नगर है। यह जयपुर के दक्षिण-पश्चिम में 80 किमी की दूरी पर एक झील के किनारे स्थित है। इस नगर में प्राचीन महल और किले हैं। इस नगर की स्थापना 1611 में एक राजपूत योद्धा किशन सिंह ने की थी।  किशन सिंह राजपूताना ऐतिहासिक क्षेत्र के एक योद्धा शासक थे।  किशनगढ़ भूतपूर्व  किशनगढ़ रियासत की राजधानी था।  वर्ष 1948 में यह क्षेत्र राजस्थान राज्य का हिस्सा बन गया। 

किशनगढ़ ,अजमेर और जयपुर से सडक़ और रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है।  सूती वस्त्र और कृषि उत्पादों का यह एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र है।  यहां पर साबुन ऊनी कालीन और शॉल बनाए जाते हैं।  हथकरघा बुनाई कपड़े की रंगाई और कीमती पत्थरों की कटाई यहां के प्रमुख कुटीर उद्योग हैं।  वर्ष 2001 की जनसंख्या के अनुसार इस नगर की जनसंख्या  1 लाख 16 हजार 156 है। 
 

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