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सर्जन का हुनर, वैद्य का ज्ञान, मरीज परेशान
30-Nov-2020 1:30 PM 171
सर्जन का हुनर, वैद्य का ज्ञान, मरीज परेशान

-चैतन्य नागर 

कोविड-19 संक्रमण के इस मुसीबत भरे, अनिश्चित समय में लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि दुर्भाग्य से जो इसकी चपेट में आ जाएँ, तो किस अस्पताल में, किस डॉक्टर में पास जाएँ और कैसे उनका इलाज होगा। इसी अफरातफरी के बीच आयुर्वेद और एलोपैथी की सर्जरी की पद्धतियों को लेकर उठा विवाद अनावश्यक और ध्यान भटकाने वाला है। पर विवाद पुराना है और कई आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों से जुड़ा हुआ है, इसलिए एक बार इसकी गंभीर पड़ताल जरुरी भी है।   

सरकार ने करीब एक हफ्ते पहले एक अधिसूचना जारी की है जिसके तहत आयुर्वेद की कुछ शाखाओं के स्नातोकोत्तर छात्रों को सुदम्य ट्यूमर, गैंगरीन को हटाने, मोतियाबिंद, कान, नाक, गले संबंधी कुछ ऑपरेशन करने की अनुमति दी जाएगी। इस फैसले के पीछे एक सक्रिय आयुर्वेदिक लॉबी भी है। अक्सर एमबीबीएस करने की कोशिश में विफल छात्र बीएएमएस करके आयुर्वेदिक डॉक्टर बन जाते हैं। एम बी बी एस की तुलना में उनकी प्रतिष्ठा और आय भी काफी कम होती है। आयुर्वेद के प्राइवेट कॉलेज के मालिक अक्सर बड़े नेता और धनी लोग होते हैं। आयुर्वेद और खासकर इसकी सर्जरी को लोकप्रिय बनाने से उन्हें सीधा फायदा यह होगा। शल्ययन को इसमें शामिल करने से ज्यादा छात्र इन कॉलेजों में भर्ती होने के लिए लालायित होंगे और आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों की लोकप्रियता बढ़ेगी। डोनेशन के रूप में भी मोटी रकम आने की संभावनाएं भी बनती है। चिकित्सा की दुनिया में आयुर्वेदिक डॉक्टर एक निरीह, दोयम दर्जे के नागरिक सा है। अक्सर इन आयुर्वेदिक डॉक्टर को बहुत ज्यादा कामयाबी न मिल पाने के कारण एलोपैथी अस्पतालों के आईसीयू में सहायक चिकित्सकों के रूप में नियुक्ति भी दी जाती है, पर वे एमडी या एमएस के मातहत के रूप में ही काम करते हैं।     

आयुर्वेद को अधूरा और अपर्याप्त इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इसमें शल्य चिकित्सा विकसित नहीं हुई। ऐसी मशीनें नहीं बनीं जिनकी मदद से अंदरूनी अंगों को देखा-समझा जा सके। एलोपैथी में अल्ट्रा साउंड, एक्स रे, एमआरआई जैसे कई तरीके हैं जिनकी मदद से उसने काफी विकास किया है। आयुर्वेद में संज्ञाहरण या अनेस्थेशिया को लेकर भी कई विवाद हैं क्योंकि आयुर्वेदिक डॉक्टर और एलोपैथी के सर्जन ऑपरेशन के लिए एक ही तरह की संज्ञाहरण दवा का इस्तेमाल करते हैं। बगैर कुशल संज्ञाहरण विशेषज्ञ के कोई भी सर्जरी संभव नहीं। एलोपैथी में इस पर कई शोध हुए हैं, जो आयुर्वेद में नहीं हो सके हैं।   

आयुर्वेद के वैद्य और छात्र आयुर्वेद की तारीफ करते नहीं थकते। ईसा से करीब 600 साल पहले जन्मे सुश्रुत प्राचीन भारत के चिकित्साशास्त्री एवं शल्यचिकित्सक थे जिन्हें आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा का जनक भी कहा जाता है। ऋषि सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा को लेकर कई प्रयोग किए। ऑपरेशन के उपकरणों को लेकर सुश्रुत ने कटहल, खीरा और कद्दू जैसे फलों और सब्जियों पर प्रयोग किये। मृत पशुओं के अलावा लकड़ी और मोम से बने कृत्रिम मानव अंगों को चीरने-फाडऩे के प्रयोग भी किये। किसी भी शल्य चिकित्सक को मानव देह के बारे में गहरी जानकारी होनी चाहिए और इसके लिए सुश्रुत ने मृत देह पर प्रयोग किये। मृत देह को बहते हुए पानी में करीब दस या पन्द्रह दिन के लिए छोड़ दिया जाता था और इसके बाद उस पर प्रयोग किये जाते थे। सर्जरी के समय कोई इन्फेक्शन न हो इसके लिए उनका सुझाव था कि यह काम इंसानों की बस्ती से दूर किया जाए, वहां वातावरण साफ हो, पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी उपलब्ध रहे। दिलचस्प बात यह है कि भारत में सर्जरी का अच्छा विकास न हो पाने का एक बड़ा कारण है जाति प्रथा। ऑपरेशन की बारीकियां सीखने के लिए मृत देह को छूना जरूरी था और मृत देह को छूना ब्राह्मणों के लिए वर्जित था, जबकि वैद्य और चिकित्सक बनने का काम, स्वास्थ्य दान देने का काम उन्हीं के हिस्से में आता था।      

आज के समय में आयुर्वेद को लेकर मरीज के भरोसे का प्रश्न बहुत बड़ा है। ऐसा कोई मरीज शायद ही मिले जो अपनी मोतियाबिंद जैसी मामूली सर्जरी के लिए भी किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर के पास जाना पसंद करेगा। पहले मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए अस्पताल में पूरा कुनबा इकठ्ठा हो जाता था। परिवार वाले ऑपरेशन के लिए सर्दी के मौसम की प्रतीक्षा करते थे और प्रार्थना करते थे कि रोगी ईश्वर की कृपा से सकुशल घर लौट आए। अब जब तक रोगी ऑपरेशन टेबल पर लेटता है, उसके नीचे उतरने, और वापस घर जाने का समय हो जाता है। अलबत्ता, आप जरुर इस बात से वाकिफ होंगे कि मोतियाबिंद जैसी मामूली दिखने वाली सर्जरी ह्रदय संबंधी जटिलताओं को भी जन्म दे सकती हैं। कोई भी ऑपरेशन सरल नहीं होता, और इसलिए हर ऑपरेशन के जोखिम को समझाते हुए रोगी के निकट संबंधियों से लिखित अनुमति ले ली जाती है। पित्ताशय में पथरी के लिए अब सिर्फ की-होल सर्जरी की जाती है, न कोई लंबा चीरा लगता है, न ही ढेरों टांकें। यह मामूली ऑपरेशन भी पित्ताशय के संकुचित हो जाने की वजह से बहुत जटिल हो जाता है। यह जानना जरूरी है कि हर सर्जरी एक गंभीर घटना है, भले ही वह बहुत ही साधारण सी दिखती हो। 

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आयुर्वेद में लगातार शोध होते रहे हैं जो शल्य चिकित्सा पर ही केन्द्रित हों। एलॉपथी में आज से डेढ़ सौ साल पहले तक ही बगैर किसी संज्ञाहरण के सर्जरी की जाती थी। आज अनेस्थेशिया एलोपैथी की एक अलग विधा है और किसी भी सर्जरी के दौरान एक संज्ञाहरण विशेषज्ञ की निरंतर उपस्थिति लगातार बनी रहती है, रोगी को बेहोश करने के क्षण से लेकर उसके होश में आने तक। 

इससे पहले कि आयुर्वेदिक वैद्य को सर्जरी जैसी गंभीर विधा में प्रवेश की अनुमति दी जाए, यह आवश्यक है कि इस चिकित्सा पद्धति के बारे में आम लोगों के प्रश्नों और दुविधाओं के समाधान किये जाएँ। जैसे एलोपैथी दवाइयों के साइड इफेक्ट को लेकर लोग चिंतित रहते हैं, वैसे ही आयुर्वेदिक औषधियों के भी साइड इफेक्ट होते हैं। इनमे धातु आयनों के कारण होने वाली विषाक्तता एक बहुत ही सामान्य बात है। सीसा, पारा और आर्सेनिक की विषाक्तता काफी सामान्य है और इनका आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग किया जाता है। आर्सेनिक का उपयोग कैंसर के इलाज में होता है जबकि यह खुद ही त्वचा, फेफड़े और ब्लैडर के कैंसर का कारण बनता है। साथ ही पारे का उपयोग एंटी बायोटिक की तरह किया जाता है जबकि इसकी अपनी खुद की ही विषाक्तता है। स्वर्ण भस्म और अन्य धातुओं की भस्म का उपयोग भी आयुर्वेद में किया जाता है, और अधिक मात्रा में यह देह को नुकसान पहुंचाती हैं। कई औषधियां दूषित मिटटी में ही पैदा होती हैं, मिटटी के हानिकारक रसायन उन जड़ी बूटियों में भी पहुँच जाते हैं, खासकर ऐसे समय में जब इन जड़ी बूटियों का बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्पादन हो रहा हो। इस संबंध में आयुर्वेद में गंभीर काम होना चाहिए।   
      
गौरतलब है कि बीमारी में चिकित्सक का चयन बड़ा ही व्यक्तिगत मामला है जिसका संबंध मरीज के भरोसे, और डॉक्टर के साथ उसके पीढिय़ों के साथ चलते आ रहे रिश्तों के साथ भी है। डॉक्टर किसी पर थोपे नहीं जा सकते। आयुर्वेदिक चिकित्सकों की विशेष जिम्मेदारी है कि वे मरीजों का भरोसा जीतें, और इसके लिए उन्हें पहले से स्थापित एलोपैथी के डॉक्टर की सामने अपनी कुशलता को साबित करना कोई आसान बात नहीं होगी। और भी कई सवाल होंगे जिनका जवाब आयुर्वेद के विशेषज्ञों और सरकार को भी देना होगा- मसलन, आयुर्वेदिक सर्जन किस तरह के संज्ञाहरण के तरीकों या अनेस्थेशिया का उपयोग करेंगे, वे आयुर्वेदिक होंगे या एलोपैथिक; सर्जरी से पहले और बाद में मरीज की देखभाल के कौन से तरीके अपनाये जायेंगे, ऑपरेशन के बाद दर्द निवारक दवाएं आयुर्वेदिक या एलोपैथिक होंगी; क्या मरीज को एंटी-बायोटिक दी जाएंगी, यदि हाँ, तो आयुर्वेद में सर्जरी के बाद दी जाने वाली कौन सी एंटी-बायोटिक हैं; मरीज को ऑपरेशन की जरुरत है, इस नतीजे तक पहुँचने के लिए आयुर्वेदिक सर्जन जांच के कौन से तरीके अपनायेंगें? पिछले दो दशकों में सभी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में आयुर्वेदिक सर्जन द्वारा किये गये ऑपरेशन की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए; आयुर्वेदिक सर्जन को प्रशिक्षण देने वाले क्या एलोपैथिक सर्जन होंगे या आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सक? क्या देश के अमीर लोग और नेता, राजनीतिज्ञ भी आयुर्वेदिक सर्जरी के लिए तैयार होंगे या फिर यह सिर्फ गरीबों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए ही होगी? 

एलोपैथी की तकनीक और विज्ञान पर भी पांच-सितारा दवाई कम्पनियों की मजबूत पकड़, शुद्ध वाणिज्यिक तौर-तरीके और अमानवीय मुनाफाखोरी भी लोगों को इसके प्रति प्रश्न उठाने पर बाध्य करती है। आने वाले समय में अलग-अलग चिकित्सकीय तरीकों के संश्लेषण पर जरूर कुछ लोग गंभीरता से काम करेंगे। हर विधा में कुछ है जो अनूठा है, गंभीर शोध का परिणाम है। तिब्बती चिकित्सकीय पद्धति की कई अद्भुत विशेषताएं हैं। एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर की भी अपनी खूबियाँ हैं। प्राकृतिक चिकित्सा का अपना सौन्दर्य है। गांधी जी का दृष्टिकोण इस मामले में बहुत ही वैज्ञानिक था। शुरू से ही वे प्राकृतिक चिकित्सा के हिमायती थे पर गांधीजी को 1919 में पाइल्स के लिए डॉ. दलाल से और 1924 में डॉ. मैडोक से अपेंडिसाइटिस का ऑपरेशन करवाना पड़ा था। 1921 में दिल्ली में एक मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन करते हुए उन्होंने आधुनिक एलोपैथी प्रणाली के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया और इस बात पर बहुत खुश हुए कि नए अस्पताल में आयुर्वेद और यूनानी दवाओं के अलावा एलोपैथी का भी इंतजाम है। वे चाहते थे कि चिकित्सा की सभी विधाएं मिलजुल कर समरसता के साथ काम करें।  चिकित्सा का भविष्य शायद सभी तरह की पद्धतियों के संश्लेषण में ही है। एक तरह की चिकित्सकीय मतनिरपेक्षता में, या चिकित्सकीय दृष्टि से सर्वधर्म-समभाव में। 

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