संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सोचे-समझे संदेशों की भाषा बहुत सोची-समझी होना जरूरी है, वरना...
06-Dec-2020 3:24 PM 225
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सोचे-समझे संदेशों की  भाषा बहुत सोची-समझी  होना जरूरी है, वरना...

जब किसी बात को एक जिम्मेदार तबका सोच-समझकर योजना के साथ लोगों पर असर डालने के लिए कहता है, और अच्छी नीयत से कहता है तो उस बात के शब्द बड़ी बारीकी से चुने जाने चाहिए। कुछ बरस पहले मोदी सरकार ने देश में नोटबंदी की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद ही पहले अपने इस ऐतिहासिक फैसले की सूचना केन्द्रीय मंत्रिमंडल को दी, और मिनटों के भीतर वे राष्ट्र के नाम संदेश देकर नोटबंदी के फायदे गिना रहे थे। इस बात को बरसों हो गए हैं लेकिन सच तो यह है कि अटपटे शब्द की तरफ किसी ने भी ध्यान नहीं खींचा। वह नोटबंदी नहीं थी, नोटबदली थी। नोट बंद नहीं हो रहे थे, उन्हें बदला जाना था। जिनके पास कानूनी नोट थे जो कि कालाधन नहीं थे, उनके तो बंद होने का सवाल नहीं उठता था, और उन्हें बैंकों से बदलाया जा सकता था, और बदलाया गया था। यह एक अलग बात है कि बंदी, या बदली, जो कुछ भी हुआ वह इस देश के ऊपर एक ऐतिहासिक यातना को थोपने का फैसला भी था जिससे देश का भयानक आर्थिक नुकसान हुआ, कालेधन का एक धेला भी उजागर नहीं हुआ, और निहायत गैरजरूरी और नाजायज इस मशक्कत से देश के दसियों करोड़ गरीब लोगों की जिंदगी महीनों तक बर्बाद हुई क्योंकि काम-धंधे ठप्प हो गए, लोगों को रोजी-मजदूरी छोडक़र बैंकों की कतार में लगना पड़ा। लेकिन बहुत ही सोच-समझकर बनाई गई बहुत ही नासमझी की इस अहंकारी योजना का नाम ही गलत रखा गया, और उसने सरकार के अपने मकसद का नुकसान किया कि मानो यह नोट बंद हो रहे थे, जबकि नोट महज बदले जाने थे। 

इसी तरह अभी कोरोना को लेकर कुछ शब्द इस्तेमाल हो रहे हैं जिनका मनोवैज्ञानिक असर पड़ रहा है, और जिन्हें अधिक सावधानी से गढऩे की जरूरत थी। जब प्रधानमंत्री के स्तर से राष्ट्र के नाम संदेश में कहा गया कि कोरोना के खतरे को देखते हुए लोग सामाजिक दूरी बरतें, तो उसका मतलब सामाजिक छोड़ भला और क्या हो सकता था? लेकिन सच तो यह है कि आज लोगों की दुनिया जितनी शरीर की है उतनी की उतनी वह सोशल मीडिया और इंटरनेट के रास्ते, टेलीफोन और कम्प्यूटरों के रास्ते आभासी भी है। वर्चुअल वल्र्ड आज किसी भी तरह भौतिक दुनिया से छोटा अस्तित्व नहीं रखता, और लोग एक-दूसरे से शारीरिक रूप से तो कम मिलते हैं, अधिक मुलाकातें तो वैसे भी संचार माध्यमों से होती हैं, सोशल मीडिया पर होती हैं। इस तरह आज समाज शरीर से परे की एक दुनिया भी बन गया है जो कि शरीर के संपर्क के बिना भी एक-दूसरे के लिए मायने रखते हुए इंसानों की जगह है। ऐसे में कई हफ्तों की तैयारी के बाद गढ़े गए प्रधानमंत्री के शब्द अगर शारीरिक दूरी जैसे शब्द की जगह सामाजिक दूरी बनाए रखने की बात कहते हैं, तो जाहिर है कि इन शब्दों को या तो गढऩे वाली समझ कमजोर थी, या फिर लापरवाही से इन्हें गढ़ दिया गया था। जो बात चिकित्सा विज्ञान की सलाह के मुताबिक शारीरिक दूरी की होनी चाहिए थी, उसे सामाजिक दूरी बनाए रखने की बात बना दिया गया। 

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होतीं, आज टेलीफोन उठाते ही अमिताभ बच्चन की आवाज में लोगों के लिए कोरोना-बीमारी के खतरे बताते हुए सावधानी बरतने की नसीहत सुनाई पड़ती है। ऐसा भी सुनाई पड़ा है कि जया बच्चन ने तंग आकर टेलीफोन का इस्तेमाल ही बंद कर दिया है कि निजी जिंदगी में घर पर जो आवाज सुनना पड़ता है, वही आवाज कोई कॉल लगाते ही फोन से भी सुनाई पड़ती है। इतनी बार दुहराई जाने वाली बात के शब्द तो जाहिर तौर पर बहुत चुनकर लिखे जाने चाहिए थे। लेकिन टेलीफोन की घोषणा से लेकर ईश्तहारों तक अमिताभ बच्चन सरकारी संदेश बोलते दिखते हैं कि जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं। अब सच तो यह है कि कोरोना की कोई दवाई तो तलाशी भी नहीं जा रही है, उसकी तो वैक्सीन ढूंढी जा रही है, टीका बनाया जा रहा है। और वैक्सीन किसी बीमारी का इलाज नहीं है, वह तो बीमारी होने से बचाने के लिए लगाया जाने वाला टीका है, ठीक उसी तरह जिस तरह का ईश्तहार अमिताभ बच्चन दशकों से करते आ रहे हैं- दो बूंद जिंदगी की। पोलियो से बच्चों को बचाने के लिए जिस वैक्सीन की दो बूंदें पिलाई जाती हैं, वह पोलियो की दवाई नहीं है, वह महज पोलियो से बचाने का टीका है। अब अमिताभ बच्चन रात-दिन एक अवैज्ञानिक बात दोहरा रहे हैं- जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं। 

इसका एक मतलब तो यह भी हुआ कि दवाई (या वैक्सीन) बन जाने के बाद ढिलाई करने में कोई बुराई नहीं रहेगी। जिस बात को अमिताभ बच्चन की आवाज में दिन में कई-कई बार सुनना पड़ रहा है, उसका एक मनोवैज्ञानिक असर होता है, और वह यह है कि कोरोना की एक दवाई बन रही है, और दूसरा असर यह है कि इस दवाई के बन जाने के बाद ढिलाई करने में कोई बुराई नहीं रहेगी। ये दोनों ही बातें अवैज्ञानिक सोच को स्थापित करती हैं। कोरोना की दवा न तो आज है, और न ही बनाई जा रही है। फिर यह है कि कोरोना का जो टीका बन रहा है, वह भी सबको मिलने वाला नहीं है, सौ फीसदी असर वाला नहीं है, और उसकी एक खुराक के बाद भी हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री पखवाड़े बाद कोरोनाग्रस्त हो चुके हैं। इसलिए जिस सावधानी को बाकी तमाम जिंदगी के लिए सुझाना चाहिए, ढिलाई से हमेशा के लिए बचने को कहना चाहिए, उसे महज दवाई (वैक्सीन) आ जाने तक के लिए सुझाना, बिना कहे एक लापरवाही को बढ़ाने सरीखा है। राजनीति के चुनावी नारों में तो हर किस्म की लापरवाही खप जाती है क्योंकि उन्हें चुनावी या राजनीतिक उत्तेजना में कही गई बात कहा जाता है, और आमसभाओं में कई बार ऐसा होता भी है। किसी को मौत का सौदागर कह दिया जाता है, और किसी की सौ करोड़ की गर्लफ्रेंड पर तंज कस दिया जाता है। राजनीति में तो लापरवाही कई बार योजनाबद्ध तैयारी से भी की जाती है, और कई बार हो जाती है। लेकिन राष्ट्रीय महत्व के, जनहित के, जनशिक्षण के जो मुद्दे हैं, उनमें एक-एक शब्द को समाज पर व्यापक असर वाला मानकर सावधानी से छांटना चाहिए। अगर स्कूल की कोई किताब अमर घर चल, कमला जल भर जैसे मासूम लगने वाले शब्दों से अक्षर और भाषा ज्ञान करवा रही है, तो वह बिना कहे हुए भी बच्चों के दिमाग में यह भर रही है कि अमर, यानी लडक़ा, पानी भरने का काम नहीं करेगा, और यह काम कमला, यानी लडक़ी का है। जो देश जितना सभ्य और लोकतांत्रिक होता है, वह उतना ही अधिक सावधान भी होता है। जब भाषा की लापरवाही लोगों को वैज्ञानिक सोच या सामाजिक न्याय, या लैंगिक समानता से दूर ले जाती है, तो उसके खिलाफ जमकर आवाज उठनी चाहिए। अगर यह किसी मासूम गलती से हुई है, तो वह सुधार ली जाए, और अगर यह किसी लापरवाही से हुई है, तो उसका जिम्मा भी किसी न किसी सर पर मढ़ा जाए। फिलहाल भारत सरकार और प्रदेश सरकारों को, और इनकी भाषा दुहराने वाले मीडिया को भी अपनी भाषा में सुधार करना चाहिए। संक्रमण से बचने की सावधानी वैक्सीन आ जाने के बाद भी जारी रहनी चाहिए क्योंकि कुंभ के मेले में खोया हुआ कोरोना का कोई भाई साल-दो साल में आकर अगला हमला नहीं करेगा, ऐसी कोई गारंटी तो है नहीं। दूसरी बात यह कि आज जिस वैक्सीन से चमत्कार की उम्मीद की जा रही है, उस वैक्सीन को चखकर मौजूदा कोरोना ही अपने हथियार बदल न डाले इसकी कोई गारंटी तो है नहीं। इसलिए अमिताभ बच्चन को पढऩे के लिए जो संदेश दिया गया है, उसमें सुधार की जरूरत है, और दुनिया को महज शारीरिक दूरी की जरूरत है, सामाजिक संबंधों में शरीर से परे और किसी दूरी की जरूरत नहीं है। हिन्दुस्तान में वैसे भी पिछले बरसों में लोग लगातार एक-दूसरे से दूर, और दूर होते गए हैं, अब उन्हें और कितना दूर करना चाहते हैं?  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

 

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