संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : वफादार लड़ाकू कौम के किसानों पर तोहमतों के वार से उपजा भारत बंद
07-Dec-2020 5:02 PM 267
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : वफादार लड़ाकू कौम के किसानों पर तोहमतों के वार से उपजा भारत बंद

दिल्ली को घेरे हुए चल रहे किसान आंदोलन के समर्थन में कल हिन्दुस्तान बंद का आव्हान किया गया है। बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि यह पंजाब का किसान आंदोलन है, और बाकी देश का इससे क्या लेना-देना है? इसी वजह से आंदोलन के विरोधी इसके किसी एक लापरवाह बकवासी के असली या नकली वीडियो को लेकर आंदोलन को खालिस्तानी साबित कर रहे हैं। सोशल मीडिया इन तोहमतों से भी भरा है कि इस आंदोलन को मुसलमानों का साथ है। जवाब में सोशल मीडिया पर दूसरे लोग यह भी गिना रहे हैं कि तोहमत लगाने वालों के तो बहनोई ही मुस्लिम हैं, तो वे किसान आंदोलन को मुस्लिमों के समर्थन को बुरा कैसे कह सकते हैं? हरियाणा के कृषि मंत्री का औपचारिक बयान और अधिक दिलचस्प और सनसनीखेज था कि किसानों का यह आंदोलन चीन और पाकिस्तान की साजिश का नतीजा है। अब तक हिन्दुस्तान में सबसे विख्यात विदेशी हाथ वाली तोहमत इमरजेंसी लगाने के लिए इंदिरा गांधी के तर्क की थी, अब किसान आंदोलन पर दो दुश्मन देशों की साजिश होने की तोहमत लग रही है। दूसरी तरफ कनाडा के प्रधानमंत्री से लेकर संयुक्त राष्ट्र महासचिव तक, और ब्रिटेन के दर्जनों सांसदों तक ने किसान आंदोलन पर भारत सरकार के रूख का विरोध किया है। कुल मिलाकर तस्वीर ऐसी बनी है कि दुनिया की कई सरकारें तो भारत के किसान आंदोलन के साथ हैं, और इस देश की सरकार, इसके हरियाणा जैसे प्रदेशों की सरकारें, इस देश की साइबर-फौज इस आंदोलन को विदेशी साजिश करार देने पर आमादा हैं।

देश के एक बड़े सीनियर और मोदी के विरोधी न समझे जाने वाले पत्रकार ने लिखा है कि मोदी सरकार और भाजपा इस आंदोलन से सीधे जुड़े हुए पंजाब के सिक्ख किसानों की फितरत नहीं समझ पाए, और उनसे एक गैरजरूरी लड़ाई मोल ले बैठे हैं। उन्हें यह भी समझ नहीं पड़ रहा कि सिक्ख ऐसी लड़ाई लाद दिए जाने पर उससे पीछे नहीं हटते क्योंकि वे लड़ाकू मिजाज के रहते हैं। बात सही है। मुगलों के समय से लेकर अंग्रेजों के समय तक, और पाकिस्तान से लेकर चीन के समय तक सिक्खों ने लड़ाईयों में सबसे बड़ी शिरकत की है, और सबसे बड़ी शहादत भी दी है। पंजाब के हर कुछ एकड़ के खेतों से एक सैनिक निकलता है, और घर में खेती की संपन्नता होने के बाद भी पंजाबी किसान इस बात पर गर्व महसूस करता है कि उसकी औलाद मुल्क की हिफाजत के लिए सरहद पर डटी है। दरअसल सिक्ख गुरूओं ने अपने बच्चों की जितनी शहादतें दी हैं, वे मिसालें सिक्खों के दिमाग से कभी हटती नहीं हंै, इसीलिए वे न फौज में जाने से पीछे हटते, न ही किसी आंदोलन से। और तो और इस धर्म ने उनमें सेवाभाव इतना कूट-कूटकर भरा है कि वे किसी भी मुसीबतजदा के साथ खड़े हो जाते हैं, बात की बात में लंगर खोल लेते हैं, और अपनी नजरों की जद में किसी को भूखा नहीं रहने देते। ऐसा सब करते हुए इस लड़ाकू कौम के किसानों को रोकने के लिए केन्द्र सरकार की पानी की तोपें एक हास्यास्पद हथियार रही।

अब देश के करीब एक दर्जन राजनीतिक दल किसानों के साथ खड़े हो गए हैं, और केन्द्र सरकार के कृषि कानूनों का खुलकर विरोध कर रहे हैं। यहां पर भारत के संसदीय लोकतंत्र को कुछ समझने की जरूरत है। जिस वक्त संसद में ये किसान कानून आए, और विपक्ष के तकरीबन तमाम हिस्से ने इसका विरोध किया तो सरकार ने इन्हें ध्वनिमत से पारित करा लिया। ध्वनिमत से किसी विधेयक को कानून बनाना एक सबसे आखिरी हथियार होना चाहिए। ऐसा हथियार संसद में सर्वानुमति या आमसहमति की संभावना को खत्म करने के बाद ही इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन भारत की आधी आबादी को प्रभावित करने वाली कृषि के पूरे ढांचे को बदलने वाले इन कानूनों को बनाते हुए केन्द्र सरकार ने विपक्ष को अपनी बात रखने का मौका ही नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि आज वह बात सडक़ों पर नारों की शक्ल में गूंज रही है, और संसद में जितनी फजीहत होती, उससे बहुत अधिक फजीहत सरकार आज सडक़ पर करवा रही है। सडक़ के काम संसद में करना या संसद के काम सडक़ पर करना कोई समझदारी नहीं है। आज अगर दिल्ली के इर्द-गिर्द केन्द्र सरकार को यह आंदोलन महज पंजाब के सिक्ख किसानों का आंदोलन दिख रहा है, तो यह उसके तंगनजरिए से पैदा नुकसान है। देश के बाकी हिस्सों के अधिकतर किसानों की माली हालत इतनी अच्छी नहीं है कि वे अपने खेत-खलिहान छोडक़र, मंडी में उपज बेचने की कतार छोडक़र दिल्ली जाकर डेरा डालें। वे अपने जिंदा रहने की लड़ाई में इस कदर फंसे हुए हैं कि वे पंजाब के अपेक्षाकृत संपन्न किसानों की तरह दिल्ली में डेरा डालो-घेरा डालो जैसी मजबूती नहीं दिखा पा रहे हैं। लेकिन इसका कहीं भी यह मतलब  नहीं है कि वे केन्द्र के कृषि कानूनों से खुश हैं। देश के मीडिया का जो हिस्सा मोदी सरकार, हिन्दुत्व, और भाजपा के प्रति समर्पित और पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं है, वह पूरे का पूरा मीडिया किसान कानूनों की आलोचना कर रहा है, किसानों के साथ है। अब यह एक अलग बात है कि देश के मीडिया का कितना हिस्सा इन दो तबकों में किस अनुपात में बंटा हुआ है। प्रतिबद्ध मीडिया, और प्रतिबद्ध समर्थकों की फौज केन्द्र सरकार को जमीनी हकीकत का एहसास नहीं होने दे पा रही है, और लोगों को याद रखना चाहिए कि आपातकाल के बाद ऐसा प्रतिबद्ध मीडिया और प्रतिबद्ध खुफिया एजेंसियों ने ही इंदिरा गांधी को यह भरोसा दिलाया था कि 1977 के चुनाव में वे बहुमत से जीतकर आएंगी।

खैर, किसी चुनाव और किसी की हार-जीत से आज की इस चर्चा का कोई लेना-देना नहीं है। बात महज इतनी है कि अगर देश के किसानों पर खतरा रहेगा, तो वह खतरा खेतिहर मजदूरों तक अनिवार्य रूप से पहुंचेगा, और खेती से जुड़े दूसरे कारोबारों तक पर वह मंडराएगा। हिन्दुस्तान में कल 8 दिसंबर को किसानों के समर्थन में भारत बंद रखा गया है। हो सकता है कि जिस बाजार के बंद होने की उम्मीद किसानों के हिमायती कर रहे होंगे वे बाजार अपने-आपको किसानों से अछूते मानकर चल रहे होंगे, और उन्हें लगेगा कि उनका भला किसानों से क्या लेना-देना? लेकिन इतिहास गवाह है कि हिन्दुस्तान में किसी बरस की खुशहाली इस बात से जुड़ी रहती है कि उस बरस मानसून कैसा आया, फसल कैसी हुई। बम्पर पैदावार, ये दो शब्द ही बाजार के लिए भी बम्पर कारोबार बनकर आते हैं। कल यह देखना है कि इस देश का बाजार अपने कारोबार की बुनियाद के साथ है कि राष्ट्रवाद के खोखले नारों पर बैठकर धंधा कर रहा है।

यह भारत बंद देश भर के किसान संगठनों और एक दर्जन राजनीतिक दलों का मिलाजुला कदम है। एक घायल सिक्ख-किसान चेतना ऐसे एक आक्रोश के लिए मजबूर हुई है। जब 80 बरस की दोहरी हो चुकी काया के साथ लाठी टेककर चलती एक बुजुर्ग सिक्ख किसान महिला को सौ-सौ रूपए में चलने वाली शाहीन बाग की आंदोलनकारी मुस्लिम महिला करार देकर उसे एक गाली की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की गई, तो जाहिर है कि कोई भी बिरादरी उससे जख्मी होगी। जब किसी को देशद्रोही, पाकिस्तानी, खालिस्तानी, राष्ट्रविरोधी, और चीनी साजिश का हिस्सा करार दिया जा रहा है, तो जाहिर है कि एक वफादार कौम इससे घायल होगी। इन सबका मिलाजुला नतीजा देश में यह नौबत है। आगे-आगे देखें, होता है क्या। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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