संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : विविधता वाली सोच के बिना व्यापक जनकल्याण असंभव
08-Dec-2020 4:06 PM 225
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : विविधता वाली सोच के बिना  व्यापक जनकल्याण असंभव

अमरीका के निर्वाचित-राष्ट्रपति जो बाइडन ने आज अमरीकी फौज के एक रिटायर्ड जनरल लॉयर्ड ऑस्टिन को अपना रक्षामंत्री चुना है। उनका कार्यकाल शुरू होने में अभी समय है, लेकिन अमरीका में निर्वाचित-राष्ट्रपति अपनी सरकार के तमाम ओहदों पर पहले से लोगों को मनोनीत करने की परंपरा पर चलते आए हैं। जनरल ऑस्टिन सैकड़ों बरस के अमरीकी लोकतंत्र में पहले अफ्रीकी-अमरीकी रक्षामंत्री होंगे। हालांकि एक अफ्रीकी-अमरीकी बराक ओबामा अमरीका के राष्ट्रपति भी हो चुके हैं, और इस बार उपराष्ट्रपति चुनी गई कमला हैरिस भी काली महिला हैं। अमरीका में दो ही पार्टियों का राज चलता है, उनमें से इस बार जीते राष्ट्रपति जो बाइडन डेमोक्रेटिक पार्टी के हैं जो कि इन दोनों पार्टियों में अधिक उदार मानी जाती है, जो अप्रवासियों, यौन-विविधताओं वाले लोगों, महिलाओं, गरीबों, बेरोजगारों, बेघरों के प्रति अधिक हमदर्दी रखती है। 

आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यह है कि निर्वाचित-राष्ट्रपति ने अभी कुछ दिन पहले ही यह घोषणा की है कि उनकी सरकार सर्वाधिक विविधता से भरी हुई होगी। आज हिन्दुस्तान जैसे दकियानूसी देश को छोड़ दें, तो पश्चिम के बहुत से विकसित लोकतंत्र ऐसे हैं जिनमें अब एक-एक करके बहुत से नेता अपनी लीक से हटकर यौन-प्राथमिकता घोषित भी करने लगे हैं। बहुत से ऐसे मंत्री होने लगे हैं जो कि समलैंगिक हैं। बहुत से ऐसे प्रधानमंत्री हो गए हैं जो कि शादी के बिना मां-बाप बने हैं, और जिन्हें शादी की कोई जरूरत नहीं लगती है। लोग अब पहले के मुकाबले बहुत खुलकर अपने निजी जीवन को लोगों के सामने रखने लगे हैं, और हिन्दुस्तान में यहां के नेताओं के बारे में अभी ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। 

दुनिया भर में जो संकीर्णतावादी राजनीतिक दल होते हैं, वे अपने उम्मीदवार चुनते हुए, या अपने ओहदों पर लोगों को मनोनीत करते हुए बहुत तंगदिली और तंगनजरिए से काम लेते हैं। वे धर्म के आधार पर, नस्ल और रंग के आधार पर, जाति के आधार पर अपने बहुमत से मेल खाते हुए लोगों को ही बढ़ावा देते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी जनकल्याणकारी सरकार के भीतर विचार-विमर्श के वक्त जो विविधता रहनी चाहिए, वह नहीं रह पाती। लोग अपने आपको दलितों और आदिवासियों का मसीहा ही क्यों न मान लें, अपने आपको अल्पसंख्यकों का बहुत बड़ा मददगार क्यों न मान लें, हकीकत यह रहती है कि उन तबकों की बुनियादी दिक्कतों को समझने के लिए उन्हीं के बीच से आए हुए ऐसे प्रतिनिधि ही मददगार होते हैं जो कि सचमुच ही उन तबकों की चुनौतियों और महत्वाकांक्षाओं से वाकिफ होते हैं। हिन्दुस्तान में भी देश-प्रदेश के मंत्रिमंडलों में अगर सत्तारूढ़ पार्टी उदारवादी है, तो सभी धर्म, जाति, और तबकों को जगह देने की कोशिश होती है। यह एक अलग बात है कि इन तबकों से अक्सर ही ऐसे लोग आ जाते हैं जो कि राजनीति में बने रहकर अपने तबकों की जड़ों से दूर हो चुके रहते हैं, और वे सत्ता की ताकत से ताकतवर हो चुके रहते हैं। नतीजा यह होता है कि वे अपने डीएनए की वजह से सत्ता में अपने तबके के प्रतिनिधि मान लिए जाते हैं, और वे तबके से ऊपर उठ चुके रहते हैं। 

अमरीका ने पिछले चार बरस में डोनल्ड ट्रंप नाम के बेदिमाग और बददिमाग कट्टरपंथी राष्ट्रपति को देखा है, और अपनी तमाम ताकत के बावजूद वह दूसरा कार्यकाल नहीं पा सका, और राष्ट्रपति भवन से अब चल बसने का वक्त आ गया है। अमरीका जिन सस्ते मैक्सिकन मजदूरों पर चलता है, उनको रोकने के लिए बंदूक की नोंक पर सरहदी दीवार बनाने की मुनादी टं्रप ने तानाशाह के अंदाज में की थी, और यह भी कहा था कि इसका खर्च मैक्सिको को देना पड़ेगा। ट्रंप के इस कार्यकाल के साथ ही भेदभाव की ऐसी नीतियां खत्म होने का समय आ गया है, ऐसा बददिमाग राष्ट्रपति भी ऐसी कोई दीवार नहीं बनवा सका। ट्रंप के दिमाग में अमरीकी ताकत और उसकी श्रेष्ठता ऐसे बैठी हुई थी कि वह हिन्दुस्तान जैसे दोस्त देशों को भी जब चाहे तब धिक्कारता रहता था, और अपने स्वागत में पलकें बिछाने वाले हिन्दुस्तान को एक गंदा देश करार देता था। उससे छुटकारा मिलने के बाद अब अमरीका एक बेहतर कल की तरफ बढ़ेगा लेकिन एक पिछले राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यह कहा कि ट्रंप ने देश को जिस हद तक बांट दिया है, उस हालत को सुधारना शायद अगले चार बरस में नए राष्ट्रपति के लिए भी मुमकिन नहीं होगा। 

दुनिया के लोगों को यह समझना चाहिए कि सत्ता पर बैठे हुए लोग बर्बादी महज अपने कार्यकाल के रहते हुए नहीं करते हैं, वे कई किस्म की ऐसी बर्बादी कर जाते हैं जिन्हें कि आने वाली सरकार अपने कार्यकाल में भी पूरी तरह सुधार नहीं पाती। नफरत और अलगाव को अपने कार्यकाल में बढ़ावा देकर फिर उसे बंद नहीं किया जा सकता। नफरती-सरकारें चली जाती हैं, लेकिन नफरत और हिंसा का सिलसिला छोड़ जाती हैं, जो कि बाद में बरसों तक चलते रहता है। ट्रंप ने अमरीकी विविधता को खत्म करने की जितनी कोशिश की थी, शायद अमरीकी उसी से दहल गए, और उन्होंने ट्रंप से छुटकारा पा लिया। ट्रंप की सोच और उसके फैसले अमरीकी संस्कृति और चरित्र के खिलाफ थे। ऐसा रहते हुए भी उसने एक चुनाव तो जीत लिया था, और दूसरे चुनाव में उसे पूरी तरह खारिज नहीं समझा जा रहा था। लेकिन लोगों ने एक उदारवादी और विविधतावादी जो बाइडन को, डेमोक्रेटिक पार्टी को चुन लिया। आज इस मुद्दे पर लिखना इसलिए जरूरी लग रहा है कि न सिर्फ सरकारों में बल्कि अखबारों और टीवी चैनलों में भी काम करने वाले लोगों की अगर विविधता नहीं रहेगी, तो उनके फैसले कभी जनकल्याणकारी नहीं रहेंगे। अमरीका के कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशनों में यह घोषित नीति है कि उनके समाचार-विचार के विभागों में देश की आबादी के हर तबके के लोगों का अनुपातिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए। जब कभी किसी कुर्सी को भरना होता है, तो देखा जाता है कि किस तबके के लोग कम हैं, या नहीं हैं, और फिर उन तबकों के लोगों को छांटा जाता है। 

हिन्दुस्तान के माहौल में ऐसी विविधता की बात करना कुछ अटपटा लगेगा, लेकिन किसी विकसित और सभ्य लोकतंत्र की बात अलग होती है।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

 

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