संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : एसटी-एससी क्रीमीलेयर, बेइंसाफी का इंतजाम
10-Dec-2020 4:31 PM 191
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : एसटी-एससी क्रीमीलेयर, बेइंसाफी का इंतजाम

सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर इस बात पर बहस छिड़ी है कि क्या देश के आरक्षित तबकों में, खासकर अनुसूचित जाति, और अनुसूचित जनजाति में किसी तरह की क्रीमीलेयर लागू करनी चाहिए ताकि उन समुदायों के बीच आरक्षण के फायदे उन लोगों तक भी पहुंच सकें जो कि समान अवसरों को पाने की तैयारी में बहुत अधिक पिछड़े हुए हैं। इनमें से पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए तो क्रीमीलेयर लागू है ताकि उनमें सबसे संपन्न लोग, उन्हीं के बच्चे ओबीसी आरक्षण के फायदों के अकेले हकदार न रह जाएं, और उन समुदायों के कमजोर तबकों के लोगों को इस आरक्षण का अधिक फायदा मिले। दूसरी तरफ जब एसटी-एससी तबकों के लिए आरक्षण की बात आती है, तो इन्हीं तबकों के हिमायती नेता एक बवाल खड़ा करते हैं कि दलितों और आदिवासियों में सामाजिक परिस्थितियां इतनी अलग हैं कि एक पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देकर उसके बाद उसे फायदे से बाहर कर देने से वह सामाजिक बराबरी की नौबत में नहीं पहुंच जाती। एक प्रमुख दलित-आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता का यह मानना है कि आरक्षण का यह फायदा कम से कम तीन पीढ़ी तक जारी रहना चाहिए तब कोई दलित-आदिवासी परिवार सदियों के सामाजिक अन्याय से बाहर आ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने जो सवाल उठाया है उसके 10-20 बरस पहले से मैं दलित-आदिवासी तबकों के भीतर से क्रीमीलेयर को पढ़ाई और नौकरी के आरक्षण से बाहर करने की वकालत करते आया हूं। इसके पीछे सरल और सहज तर्क यह है कि इन दोनों किस्म के आरक्षणों में इन तबकों के एक फीसदी लोगों को भी मिलने जितने मौके नहीं रहते हैं। अगर किसी दलित के लिए एक सीट है, तो शायद कई सौ या कई हजार दलित उम्मीदवार उसके लिए रहते हैं। ऐसे में एक परिवार जिसे एक बार नौकरी का फायदा मिल चुका है, जो एक दर्जे से ऊपर के सार्वजनिक, सरकारी, अदालती, या किसी और किस्म के जनसेवक के ओहदे पर पहुंच चुके हैं, उनके बच्चों को आरक्षण के फायदे से बाहर करना चाहिए। वे ऐसी हालत में पहुंच चुके रहते हैं कि वे अपने बच्चों को आगे की पढ़ाई और नौकरी के मुकाबलों के लिए बेहतर तैयार कर सकते हैं। अब अगर हम यहां पर तीन पीढ़ी के तर्क को लागू करें, तो क्रीमीलेयर में पहुंच चुके और ताकतवर हो चुके दलित या आदिवासी की अगली दो पीढिय़ां भी आरक्षण का फायदा पाने की हकदार रहेंगी। हकदार रहने के साथ-साथ वे ताकतवर भी होती जाएंगी ताकि वे अपनी बिरादरी के बाकी लोगों के साथ होने वाले मुकाबले में बेहतर तैयार रहें, अधिक मजबूत रहें। करोड़पति हो चुके एक दलित या आदिवासी के बच्चों को आगे भी ऐसे मौके देना उनके साथ तो इंसाफ हो सकता है, लेकिन यह उन्हीं आरक्षित तबकों के तीन चौथाई, या उससे भी अधिक 90 फीसदी कमजोर लोगों के साथ बेइंसाफी ही रहेगी जो कि समान मौकों के मुकाबले के लिए तैयार ही नहीं हो पाते हैं। इस तरह आज आरक्षित तबकों के भीतर संपन्न, ताकतवर, और बेहतर शिक्षित लोगों का एक ऐसा आभिजात्य वर्ग तैयार हो गया है जो कि एक फौलादी मलाई की शक्ल में मौकों और तबके के लोगों के बीच जमकर बिछ गया है। इस फौलादी मलाई को चीरकर नीचे के कमजोर और विपन्न लोग, पहली पीढ़ी के शिक्षित लोग, किसी भी मुकाबले में बराबरी की तैयारी नहीं कर पाते।

जो लोग यह सोचते हैं कि तीन पीढ़ी तक आरक्षण का फायदा मिले बिना किसी परिवार का सामाजिक पिछड़ेपन से, सामाजिक शोषण से उबर पाना मुमकिन नहीं है, वे लोग महज क्रीमीलेयर के लिए फिक्रमंद शहरी, शिक्षित, संपन्न, और ताकतवर लोगों के हिमायती लोग हैं। आरक्षण की पूरी सोच जिस सामाजिक और आर्थिक शोषण से तबकों को उबारने के लिए है, उन तबकों के भीतर ही लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी पिछड़ते चले जाएं, यह सामाजिक न्याय नहीं होगा, यह आर्थिक न्याय नहीं होगा, यह किसी भी किस्म का न्याय होगा।

दिक्कत वहां खड़ी होती है जहां आरक्षित तबकों के बाहर के लोग (जिनमें यह लेखक भी शामिल है) इस बात को उठाते हैं, उस वक्त गैरगंभीर बहस में तो कुछ लोग इसे ऐसा भावनात्मक नारा भी बनाने की कोशिश करते हैं कि मानो आरक्षण को खत्म करने की कोई बात हो रही है। इसलिए इस बहस के बीच भी इस बात का खुलासा जरूरी है कि यह तमाम तर्क आरक्षण को किसी भी तरह से घटाने की बात नहीं कर रहा है, यह महज आरक्षित तबकों के भीतर एक अधिक तर्कसंगत और न्यायसंगत बंटवारे की बात कर रहा है।

आज दिक्कत यह है कि जब कभी संसद में दलित-आदिवासी तबकों में से क्रीमीलेयर को आरक्षण के फायदों से बाहर करने की बात होगी, संसद में कानून बनाने वाले सांसदों के अपने बच्चे ऐसे किसी प्रतिबंध से फायदे से बाहर हो जाएंगे। जिन अफसरों को सरकार में बैठकर प्रस्ताव तैयार करने होते हैं, उनके बच्चे भी क्रीमीलेयर में गिनाकर फायदे से बाहर हो जाएंगे। इसलिए दलित-आदिवासी तबकों की क्रीमीलेयर के वर्गहित में यह नहीं है कि उस क्रीमीलेयर पर किसी तरह की रोक लगे, उसे आरक्षण के फायदों से किसी तरह बाहर किया जाए। यह सीधे-सीधे हितों के टकराव का एक मामला है जिसमें क्रीमीलेयर यह तर्क देने लगती है कि आरक्षण का फायदा कम से कम तीन पीढ़ी जारी रहना चाहिए।

जिस सामाजिक-आर्थिक अन्याय के खिलाफ आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई थी, उसी अन्याय को अब आरक्षित तबकों के भीतर बढ़ावा दिया जा रहा है, और समाज के नेता बने हुए लोग, समाज के ताकतवर लोग यह काम कर रहे हैं। अन्याय के शिकार आरक्षित तबकों के तीन चौथाई लोग तो कभी भी ऐसी फौलादी क्रीमीलेयर में छेद करके अवसरों के आसमान तक नहीं पहुंच पाएंगे, वे महज सतह के नीचे रह जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट में भी आज जो बहस चल रही है, वह इन आरक्षित तबकों के भीतर के कमजोर वर्गों के बारे में बात कर रही है। लेकिन हम जातियों के आधार पर आरक्षित तबकों के भीतर बंटवारा करने के बजाय आर्थिक और ताकतवर ओहदों के आधार पर अवसरों के बंटवारे की वकालत बेहतर समझते हैं। जाति के आधार पर आरक्षण तो हो चुका है, अब ओबीसी की तरह जाति के भीतर अधिक पिछड़ी जाति जैसी बात दलित और आदिवासी तबकों पर अगर लागू की जाती है, तो वह एक बहुत जटिल चुनौती रहेगी। शायद आरक्षित तबकों के भीतर यह तरीका अकेला मुमकिन और कारगर तरीका रहेगा कि संपन्नता और सरकारी-सार्वजनिक ओहदों को क्रीमीलेयर का पैमाना बनाया जाए, आरक्षण पाई हुई एक पीढ़ी अगर ऐसे ओहदों तक पहुंच गई है, ऐसी संपन्नता तक पहुंच गई है कि वह अपने बच्चों को बेहतर तैयार करने की हालत में हैं, तो उसे नौकरी और पढ़ाई के आरक्षण से बाहर करना चाहिए। तभी एक सामाजिक न्याय की बात हो सकेगी। और अगर, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है, आरक्षित जातियों के भीतर अधिक पिछड़ी और अधिक कमजोर जातियों के आधार पर इन तबकों के आरक्षण-ढांचे में फेरबदल किया जाता है, तो उस फेरबदल के साथ भी क्रीमीलेयर की शर्त जोड़ी जानी चाहिए। हम गिने-चुने परिवारों को बार-बार आरक्षण का फायदा देकर आरक्षित जातियों के भीतर एक अनारक्षित जैसी ताकत के हिमायती नहीं हैं।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

 

 

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