संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कोरोना का नया अंग्रेज अवतार, और दुनिया को उससे सबक की जरूरत
21-Dec-2020 4:31 PM 277
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कोरोना का नया अंग्रेज  अवतार, और दुनिया को उससे सबक की जरूरत

कोरोना के खतरों को लेकर यह अखबार इस जगह पर जितनी बार लोगों को आगाह कर चुका है, उससे बहुत से लोग थक भी चुके होंगे। लेकिन हर कुछ हफ्तों में ऐसी बात सामने आती है कि हमारा लिखा हुआ जायज साबित होता है। पिछले एक पखवाड़े में कम से कम दो-तीन बार हमने लोगों को सावधान रहने के लिए आगाह किया, और अब ब्रिटेन की ताजा खबर है कि वहां कोरोना ने अपने आपमें एक ऐसा बदलाव कर लिया है कि वह मौजूदा दवाओं और वैक्सीन के काबू से परे का हो गया है। साल के सबसे बड़े त्यौहार, क्रिसमस के ठीक पहले ब्रिटेन ने न सिर्फ लॉकडाऊन किया है बल्कि वहां सरकार की इमरजेंसी बैठकें चल रही हैं। बाकी योरप और दुनिया के बहुत से और देशों ने ब्रिटेन से अपने यहां विमानों की आवाजाही बंद करवा दी है। एक बार फिर ब्रिटेन को एक नए सुरक्षाचक्र में टापू की तरह जीना पड़ेगा। यह हाल दुनिया के एक विकसित देश के संपन्न समाज का है, इसलिए यह खतरा कब किसी और देश पर किसी और तरह से नहीं पहुंच पाएगा इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। यह लड़ाई अब तक प्रचलित कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीन के भरोसे चल रही थी, लेकिन जिस तरह ब्रिटेन में कोरोना ने एक नया अवतार धर लिया है, उससे यह वैक्सीन भी वहां बेअसर हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो कोरोना की इस नई नस्ल के खिलाफ वैक्सीन विकसित करने की एक नई लड़ाई सिरे से शुरू करनी पड़ेगी, और वह जाने कितना वक्त लेगी।

हिन्दुस्तान में सार्वजनिक जगहों पर लोगों को देखें तो लगता है कि वे कोरोना से जंग जीत चुके हैं, और दशहरे के रावण की तरह उसे जलाकर अब सोनपत्ती बांटने के लिए निकले हैं। लोगों के चेहरों से मास्क गायब हैं, सार्वजनिक जगहों पर लोग गैरजरूरी चीजें खाने-पीने के लिए टूट पड़े हैं, कमसमझ सरकारों ने बाजार के खुलने के घंटों को सीमित करके यह मान लिया है कि दुकानों पर होने वाली धक्का-मुक्की के बजाय दुकानों के बंद शटर अधिक महत्वपूर्ण हैं। तम्बाकू के शौकीन हिन्दुस्तान में आधी आबादी सार्वजनिक जगहों पर तम्बाकू की पीक उगलते दिखती है, और इसे देख-देखकर तम्बाकू न खाने वाले भी सडक़ों पर हर कुछ मिनट में थूककर यह गारंटी कर लेते हैं कि सार्वजनिक सम्पत्ति उनकी अपनी है, और उन्हें कोई रोक नहीं सकते। लोगों ने शादी-ब्याह, राजनीतिक जलसे, और धार्मिक भीड़ में महीनों की कसर पूरी करना शुरू कर दिया है। लोगों को वैक्सीन की घोषणा सुनकर ही बदन में वैक्सीन लग जाने का एहसास हो रहा है। यह लग ही नहीं रहा है कि आखिरी व्यक्ति को वैक्सीन लगते हुए 2024 पूरा गुजर जाने का एक अंदाज अभी सामने आया है। और अंग्रेजों पर आई इस नई मुसीबत से हिन्दुस्तानियों का भल क्या लेना-देना कि कोरोना का यह नया अवतार इस वैक्सीन की ताकत से बाहर का हो सकता है।

जब किसी देश की सोच अवैज्ञानिक होने लगती है, तो वहां पर लोगों का बर्ताव ऐसा ही गैरजिम्मेदारी का रहता है। जिस वक्त चेचक का टीका इस देश में हर बच्चे को लग रहा था, उस वक्त भी चेचक से बचाव के लिए लोग माता पूजा करने में लगे हुए थे। तब से अब तक धर्म पर आस्था बढ़ते-बढ़ते धर्मान्धता पर आस्था की शक्ल ले चुकी है, और लोग कोरोना के खतरे से बेफिक्र हो गए हैं। पूरे हिन्दुस्तान में अगर कोई अकेली जगह कोरोना की दहशत से सहमी हुई है, तो वह संसद है जो कि टल गई है। बाकी तो हैदराबाद से लेकर बंगाल तक आमसभाओं की जंगी भीड़ और धक्का-मुक्की तक देश के लिए फिक्र की बात नहीं है। आज इस वक्त छत्तीसगढ़ में विधानसभा चल रही है, दूसरे कई प्रदेशों में संसदीय काम चल रहा है, महज इस देश की संसद कोरोना की फिक्र में डूबी हुई है, और काम करने से कतरा रही है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह संसद काम करने से नहीं, देश के जलते-सुलगते मुद्दों का सामना करने से कतरा रही है, और किसानों से बचने के लिए कोरोना एक सहूलियत बनकर आ गया है। खैर, जब संसद चल भी रही थी, तब भी किसानों के हक कुचलने वाले कानून बनने से कौन रोक पाए?

मुद्दे से भटकना ठीक नहीं है, इसलिए हम भयभीत संसद छोडक़र वापिस कोरोना पर आते हैं, और हिन्दुस्तानी मिजाज की बात करते हैं। हिन्दुस्तानी अंधविश्वास में जिस तरह डूबे हुए हैं, वैज्ञानिक सोच से जितने दूर हो गए हैं, दूसरों के हक को कुचलने के लिए जिस तरह बेताब रहते हैं, जिस तरह सार्वजनिक जगहों को गंदा करना उन्हें राष्ट्रवाद लगता है, उससे यह जाहिर है कि कोरोना का मौजूदा दौर चाहे नीचे चला गया हो, कोरोना का अगला कोई दौर अगर आएगा, तो हो सकता है कि वह समंदर की अगली लहर की तरह मौतों को बहुत ऊपर भी ले जाएगा। कोरोना की वैक्सीन हिन्दुस्तान में अगले महीने से लगना शुरू हो सकती है, लेकिन आबादी का बहुत थोड़ा हिस्सा शुरू में इसे पा सकेगा। फिर वैज्ञानिक सोच यह भी कहती है कि मौजूदा वैक्सीन जितनी आपाधापी में बनाई गई हैं, उससे हो सकता है कि वे उम्मीद पर खरी न भी उतरें। यह सब साबित होते-होते साल-दो साल का वक्त लग सकता है, और इस बीच हो सकता है कि कोरोना के कई नए अवतार आ जाएं। इसलिए सावधानी का जो दर्जा हिन्दुस्तानियों को बचाने के लिए चाहिए, इस देश के राजनेता उस सावधानी को कचरे की टोकरी में डालने की मिसालें रात-दिन पेश कर रहे हैं। ऐसे में आसपास के लोग, परिचित और रिश्तेदार चाहे कितनी ही खिल्ली उड़ाएं, लोगों को बहुत अधिक सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि हिन्दुस्तान जैसे देश में सरकारें खतरे को आसानी से मानने को भी तैयार नहीं होंगी।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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