संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आपदा से सबक लेकर दूसरे मोर्चों पर भरपाई..
25-Dec-2020 4:59 PM 182
 दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आपदा से सबक लेकर  दूसरे मोर्चों पर भरपाई..

अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका मतलब है कि हर काले बादल में चांदी की तरह चमकती एक लकीर भी होती है। हिन्दुस्तान में इन दिनों उसे आपदा में अवसर भी कहा जा रहा है। पिछले पौन बरस से बाकी दुनिया के साथ-साथ हिन्दुस्तान पर कोरोना का जितना खतरा मंडराया है, और अभी जारी भी है, उसे अगर लॉकडाऊन के साथ जोड़ दिया जाए तो यह एक सदी का इस देश का सबसे बुरा दौर चल रहा है। 1920 के पहले की महामारी भी शायद इससे अधिक बुरा वक्त था। लेकिन हिन्दुस्तान, और बाकी दुनिया के लिए इस अवांछित बीमारी और खतरे के बीच भी कई ऐसी बातें हो रही हैं जो कि कम से कम जिंदगी और सेहत के मामले में कोरोना से हुए नुकसान की भरपाई भी कर सकती हैं।

दुनिया में हिन्दुस्तान जैसे लापरवाह और भी बहुत से देश होंगे जहां या तो सरकार ने लोगों के हाथ धोने लायक बहते पानी का इंतजाम नहीं किया है, या लोग खुद ही लापरवाह हैं, और अधिक हाथ धोने में उनका भरोसा नहीं है। कोरोना के इस दौर में बहुत से लोगों ने हाथ धोना शुरू किया है, और इससे कोरोना से परे की और भी बहुत सी छोटी-मोटी बीमारियां टल सकती हैं, कम हो सकती हैं। दूसरी अच्छी बात जो कि इस दौर में हुई है, हिन्दुस्तान में जांच और इलाज का ढांचा 9 महीने पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ चुका है। हर प्रदेश ने अपनी-अपनी क्षमता और सोच के मुताबिक जांच की सहूलियतें बढ़ाईं, अस्पतालों में सावधानी बढ़ाईं, और कोरोना जैसे संक्रमण के मरीजों के इलाज के लिए साधन-सुविधाएं जुटाए। यह काम सरकारी अस्पतालों में भी हुआ, और निजी अस्पतालों में भी बढ़ा। इस बढ़े हुए ढांचे का नियमित और स्थाई इस्तेमाल अगर तय किया जाए तो आने वाली जिंदगी में अधिक जिंदगियां बचाई जा सकेंगी।

यह दौर अस्पतालों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए एक अभूतपूर्व प्रशिक्षण का भी रहा, और सबने एक बुरे संक्रामक रोग से बचते हुए अधिक से अधिक काम करना सीखा है। यह कहा जा सकता है कि अस्पताल और स्वास्थ्यकर्मी पौन बरस पहले के मुकाबले अधिक तजुर्बेकार हो चुके हैं, उन्होंने लगातार विपरीत परिस्थितियों में काम करने की अपनी ताकत को तौल लिया है, और उनकी बाकी कामकाजी जिंदगी में अगर ऐसी कोई और नौबत आती है, तो वे बेहतर तैयार रहेंगे। किसी मरीज के दिल की क्षमता की एक जांच स्ट्रेस टेस्ट (टीएमटी) भी होती है जिसमें मशीन के एक दौड़ते हुए पट्टे पर मरीज को चलाकर उसकी क्षमता आंकी जाती है। हिन्दुस्तान के अच्छे या बुरे, जैसे भी हो, चिकित्सा-ढांचे का स्ट्रेस टेस्ट इन 9 महीनों में हो गया है, और अब राज्य सरकारों को चाहिए कि वे इन महीनों के तजुर्बे का एक ऑडिट करवाएं, अपनी खूबियों को पहचानें, और खामियों को, कमियों को दूर करने की योजना बनाएं।

कारोबार ने भी इस दौर में मंदी भी देखी, कच्चे माल और पुर्जों की कमी झेली, कामगारों और मजदूरों के न रहने की नौबत भी देखी, और बाजार में ग्राहकी की कमी, और ग्राहकों में खपत की कमी भी देखी। बैंकों से मिली मामूली तात्कालिक रियायतों से परे भी भारतीय कारोबार ने बहुत कुछ सीखा है, और यह सबक आगे के बुरे वक्त उसके बड़े काम आएगा। सरकारी दफ्तरों, जनसुविधाओं के दूसरे दफ्तरों, बैंकों और सार्वजनिक जगहों के मैनेजमेंट ने भी संक्रामक रोग की हालत में काम करना सीखा है, और दुबारा ऐसी किसी नौबत में इन तमाम लोगों के सामने छोटी और बड़ी सभी बातों के लिए एक सबक और मिसाल साथ रहेंगे।

हिन्दुस्तान पिछले कई बरस से डिजिटल इंडिया का ढिंढोरा पीटते आ रहा है। लेकिन इस पौन बरस ने यह साबित कर दिया कि हिन्दुस्तान में डिजिटल समानता की कितनी कमी है, और संपन्न और विपन्न तबकों के बीच कितनी चौड़ी और गहरी डिजिटल खाई है। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई को ऑनलाईन करने की कोशिश ने यह साबित किया है कि देश के अधिकतर शिक्षकों को ऑनलाईन पढ़ाई करवाने की तकनीकी दक्षता हासिल नहीं है, और इनमें से अधिकतर के पास ऑनलाईन पढ़ाई के लिए जरूरी औजार भी नहीं है। दूसरी तरफ आबादी के तीन चौथाई से अधिक लोग ऐसे हैं जिनके पास परिवार के बच्चों की रोजाना घंटों की ऑनलाईन पढ़ाई के लिए अलग से स्मार्टफोन नहीं है, इंटरनेट की सहूलियत नहीं है, और बच्चे डिजिटल-अनाड़ी शिक्षकों से ऑनलाईन पढक़र समझने के लायक भी नहीं हैं। इस नौबत को सुधारने के लिए अगली ऐसी किसी नौबत के आने के पहले केन्द्र और राज्य सरकारों को देश के सबसे गरीब बच्चों के बारे में तैयारी करनी होगी, सबसे कम सहूलियतों वाले स्कूली-शिक्षकों को तैयार करना होगा, सबसे दूर बसे इलाकों तक डिजिटल कनेक्टिविटी की तैयारी करनी पड़ेगी, और पढ़ाई की सामग्री का डिजिटलीकरण करके रखना होगा। अब इन महीनों के खराब तजुर्बे का यह फायदा भी उठाया जा सकता है कि देश की हर पढ़ाई की सामग्री का डिजिटल रूपांतरण करके रखा जाए, और ऐसी सामग्री कोरोना के किसी भाई-बहन के आने के अलावा भी किसी भी नौबत में या नियमित रूप से काम आ सकती है। इस बरस ने हिन्दुस्तान के सामने एक बड़ी डिजिटल चुनौती पेश की है, और एक बहुत बड़ी संभावना भी सामने रखी है कि स्कूल के स्तर पर, गांव या कस्बे के स्तर पर, पंचायत भवन या किसी सामुदायिक केंद्र के स्तर पर अलग-अलग पालियों में अलग-अलग बच्चों को बड़ी स्क्रीन पर किस तरह पढ़ाया जा सकता है, और कैसे उन्हें स्थानीय क्लासरूम की संभावनाओं से ऊपर जाकर ऊंची तकनीकी तरकीबों वाली पढ़ाई करवाई जा सकती है। ऐसी डिजिटल पढ़ाई किसी भी तरह स्थानीय स्कूल और क्लास का विकल्प नहीं रहेगी, लेकिन उसमें वेल्यूएडिशन जरूर कर सकेगी।

कोरोना और लॉकडाऊन के इस दौर ने लोगों को कम सफर करके भी काम चलाने का कुछ तजुर्बा दिया है। लोगों ने घरों से काम किया है, ऑनलाईन काम किया है, दफ्तर में एक वक्त पर कम लोगों ने मौजूद रहकर भी दफ्तर का काम चलाया है। आज सरकारों और दूसरे गैरसरकारी संस्थानों को चाहिए कि ऐसे अनुभव का अध्ययन करके कटौती और किफायत के सबक लें, और अपने खर्च घटाएं।

इस दौर में यह जरूर हुआ है कि लोगों का बाहर घूमना-फिरना एकदम ही खत्म हो गया, बाहर खाना-पीना बहुत ही कम हो गया, अपने पर खर्च करना भी खासा कम हो गया है, और इससे बाजार की अर्थव्यवस्था बुरी तरह तबाह हुई है। लेकिन लोगों की निजी अर्थव्यवस्था खर्च के मामले में सम्हली है, और लोगों ने पहली बार यह पहचाना है कि उनके कौन-कौन से खर्च गैरजरूरी हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि लोग आगे भी फिजूलखर्ची से बच सकते हैं, और इससे धरती पर खपत का बोझ भी घटेगा। यह बात अर्थव्यवस्था का चक्का घूमने के हिसाब से तो कुछ नुकसान की लगती है, लेकिन किफायत से पर्यावरण का बड़ा फायदा भी हो सकता है। इसलिए पर्यावरण और कारोबार के बीच एक नए संतुलन का भी यह वक्त है, और यह तय है कि दुनिया इस अनुभव का कम या अधिक हद तक फायदा उठाएगी।

यह लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है, और जिस तरह हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में बहुत सारी चीजों को विभाजन के पहले और विभाजन के बाद के अलग-अलग दौर में बांटकर देखा जाता है, उसी तरह कोरोना के पहले, और कोरोना के बाद के दौर में यह दुनिया बंटी रहेगी, और लोगों को अगली किसी बुरी नौबत के लिए अच्छी तरह तैयार करके रखेगी। आपदा से होने वाले नुकसान को तो कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन उससे सबक लेकर कुछ दूसरे मोर्चों पर एक अलग भरपाई की जा सकती है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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