संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : चिकित्सा-विज्ञान तो पूरी तरह बेदिमाग है इसलिए...
10-Jan-2021 5:55 PM 250
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : चिकित्सा-विज्ञान तो पूरी तरह बेदिमाग है इसलिए...

आन्ध्रप्रदेश में 74 साल की एक महिला ने कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से जुड़वां बेटियों को जन्म दिया है। खुद की शादी के 57 साल हो चुके थे, लेकिन बच्चे नहीं हुए थे। अब यह महिला इन बच्चों के साथ बीबीसी की एक वीडियो रिपोर्ट में खुश दिख रही है। बच्चों के जन्म के बाद 6 महीने तक उनके साथ इस बुजुर्ग महिला को भी अस्पताल में ही रखा गया था, और अब वह खेलती-दौड़ती बेटियों संग खुश है। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस महिला के पति को बच्चों का सुख हासिल नहीं हुआ क्योंकि वे गुजर गए। बाकी परिवार का कहना है कि विश्व रिकॉर्ड बना चुकी उनकी यह बुजुर्ग सदस्य 4-5 बरस और जी जाए, तो बच्चियों की अच्छे से परवरिश हो जाएगी। 

भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है कि वह लोगों को कोई उम्र गुजर जाने के बाद मां-बाप बनने से रोके। और चिकित्सा विज्ञान की अपनी कोई समझ नहीं है, उसके पास महज तकनीक है, और खासकर आज तो चिकित्सा-कारोबार के हाथ इतनी महंगी-महंगी तकनीकें हैं कि उसका बाजारू इस्तेमाल रोक पाना मुमकिन नहीं है। चौहत्तर बरस की जिस उम्र में यह महिला डेढ़ बरस उम्र की जुड़वां बेटियों के साथ है, वह उम्र हिन्दुस्तान की औसत उम्र से खासी अधिक हो चुकी है। और इस बात की गणितीय संभावना कम है कि वह इन बच्चियों के बालिग होने तक रह सके, और रहे भी तो उनकी देखभाल करने के लायक रह सके। जिस हिन्दुस्तान में अंग-प्रत्यारोपण को लेकर एक बहुत ही कड़ा कानून है जो कि लोगों के अंगदान करने और दूसरों के उन अंगों को पाने को बरसों लंबी जटिल प्रक्रिया बना देता है। उसी हिन्दुस्तान में संतान पाने के लिए कोई कानून नहीं है। कम से कम उम्र की कोई रोक इस पर नहीं है। संविधान में जो बुनियादी हक दिए गए हैं, उन पर चिकित्सा-विज्ञान को लेकर भी कोई रोक नहीं है जबकि संविधान के मूलभूत अधिकारों के तहत किसी को अंग देने और किसी से अंग लेने के फैसलों पर चिकित्सा-विज्ञान की जटिल औपचारिकताएं लागू की गई हैं जो कि अंग देने और पाने पर रोक तो नहीं लगाती हैं, लेकिन उन्हें बरसों की थका देने वाली जटिल प्रक्रिया जरूर बना देती हैं। 

ऐसे में आज की यह बात कुछ तो लोगों के निजी फैसले पर है कि वे 74 बरस की उम्र में मां बनना तय करते हैं। इस अकेली महिला ने ही नहीं, बल्कि बाकी परिवार ने भी इस फैसले में चाहे अनमने ढंग से, साथ तो दिया, और हसरत पूरी करने का बाकी काम चिकित्सा-विज्ञान ने कर दिया। लेकिन जिस कृत्रिम गर्भाधान तकनीक को चिकित्सा-विज्ञान ने विकसित किया है, वह चिकित्सा-विज्ञान न तो पौन सदी पर पहुंच रही इस बुजुर्ग महिला की उम्र बढ़ा सकता है, न ही उसे उम्र से जुड़ी, या दूसरी, बीमारियों से बचा सकता है। क्या ऐसे में गर्भाधान के लिए किसी उम्र की शर्त लगाना एक अधिक जिम्मेदारी की सामाजिक व्यवस्था होगी? जो बच्चे ऐसी तकनीक से, इस उम्र में, पैदा हुए हैं, उनका तो कोई बस अपने पैदा होने पर चल नहीं सकता था। वे तो अपनी मर्जी के बिना, अपने किसी फैसले के बिना ऐसे बुजुर्ग मां-बाप की संतान बनी हैं जिनकी अपनी जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं है। एक बहुत बड़ी आशंका यह है कि ये बच्चियां बालिग होने, और उसके बाद के भी खासे बरस तक रिश्तेदारों की मोहताज रहेंगी। महज रूपए-पैसे का इंतजाम, अगर हो तो भी, काफी नहीं होता क्योंकि बिना मां-बाप के बच्चों की हालत बहुत से मामलों में बदहाल ही रहती है। 

चूंकि लोगों के निजी फैसलों पर परिवार के, या आसपास के लोगों का भी अधिक बस तो चलता नहीं है, इसलिए जब तक कोई कानून न रहे, तब तक किसी को ऐसी असाधारण बातों से रोका नहीं जा सकता। भारत में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से दूसरी मां की कोख से बच्चों के जन्म पर एक सरोगेसी-कानून बनाकर बहुत ही कड़ी रोक लगाई गई है। यह भी सोचने की जरूरत है कि इतनी उम्र में कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से मां-बाप बनने पर क्या कोई रोक नहीं लगाई जानी चाहिए? यह बात ऐसे मां-बाप के अधिकारों की बात नहीं है, यह बात अजन्मे बच्चों के अधिकार की बात है, और चूंकि उनकी तरफ से कोई दूसरे लोग बुजुर्ग दम्पत्ति के ऐसे फैसले के खिलाफ अदालत जाने में दिलचस्पी नहीं रखते होंगे, इसलिए ऐसी नौबत की सोचकर सरकार को ही किसी रोक की बात सोचनी चाहिए कि बच्चों को दुनिया में लाकर मां-बाप जल्द चल बसें, तो उनकी जवाबदेही किसकी होगी, और सरकार को ऐसी नौबत को देखते हुए कैसी रोक लगानी चाहिए।  

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 

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