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श्रवण गर्ग लिखते हैं - ज्यादा बड़ा खतरा किससे ? ट्रम्प से या टेक कम्पनियों से ?
14-Jan-2021 12:49 PM 48
श्रवण गर्ग लिखते हैं - ज्यादा बड़ा खतरा किससे ? ट्रम्प से या टेक कम्पनियों से ?

भाजपा के तेजी से उभरते सांसद तेजस्वी सूर्या ने जब कैपिटल हिल कांड के बाद डॉनल्ड ट्रम्प का ट्विटर अकाउंट बंद किए जाने पर रोष जाहिर करते हुए कहा कि टेक कम्पनी का फैसला लोकतंत्रों के लिए सजग होने का संकेत है तो उनकी प्रतिक्रिया को इस डर के साथ जोडक़र देखा गया कि भारत के संबंध में भी ऐसा हो गया तो उसकी सबसे ज़्यादा मार सत्तारूढ़ दल के कट्टरपंथी समर्थकों पर ही पड़ेगी। ट्विटर द्वारा ट्रम्प के अकाउंट को बंद करने का आधार यही बनाया गया है कि पदासीन राष्ट्रपति के उत्तेजक विचारों से हिंसा और ज़्यादा भडक़ सकती है।

तेजस्वी सूर्या के साथ ही भाजपा के आई टी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने भी ट्विटर कम्पनी के कदम को खतरनाक बताया था। तेजस्वी अपने कट्टर हिंदुत्व और अल्पसंख्यक-विरोधी विचारों के लिए जाने जाते हैं। पिछले दिनों ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कार्पोरेशन के प्रतिष्ठापूर्ण चुनावों के प्रचार में वे मुस्लिम नेता ओवैसी के खिलाफ भी काफी उत्तेजना भरे बयान दे चुके हैं। मालवीय का जिक्र ट्विटर पर विवादास्पद टिप्पणियों के सिलसिले में आए दिन होता रहता है। ट्रम्प को लेकर भाजपा की संवेदनशीलता किसी से छिपी नहीं है। कैपिटल हिल की हिंसा की तो प्रधानमंत्री ने आलोचना की थी पर उसकी जिम्मेदारी को लेकर किसी पर कोई दोषारोपण नहीं किया था।

तेजस्वी सूर्या की प्रतिक्रिया के राजनीतिक-राष्ट्रीय निहितार्थ चाहे जो रहे हों, अंतरराष्ट्रीय खरबपति कम्पनियों—ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब आदि—की एक निर्वाचित राष्ट्रपति के खिलाफ प्रतिबंधों की कार्रवाई से उत्पन्न होनेवाले उन अन्य खतरों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक रूप से चिंता प्रारंभ हो गई है जिनका उल्लेख भाजपा नेता ने नहीं किया। मसलन, भय जताया जा रहा है कि ट्विटर जैसी कम्पनियों द्वारा ट्रम्प के खिलाफ की गई कार्रवाई का दुरुपयोग वे सब हुकूमतें करने लगेंगी जो प्रजातंत्र की रक्षा के नाम पर एकतंत्रीय शासन व्यवस्था कायम करने के बहाने तलाश रही हैं। ये व्यवस्थाएँ ट्विटर-फेसबुक आदि के हिंसा भडक़ाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट्स संबंधी तर्कों को आधार बनाकर अब अपने देशों के मीडिया और नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित अथवा स्थगित कर सकती हैं।

कहा जा सकता है कि अगर ट्विटर और फेसबुक हिंसा को भडक़ने से रोकने के लिए एक राष्ट्रपति के विचारों को भी अपने प्लेटफाम्र्स पर प्रतिबंधित कर सकते हैं तो फिर सरकारें स्वयं भी ऐसा क्यों नहीं कर सकतीं! वैसी स्थिति में एक प्रजातांत्रिक तानाशाह को हिंसा फैलाने से रोकने के इस गैर-प्रजातांत्रिक तरीके और हकीकत में भी अधिनायकवादी तंत्रों में प्रतिबंधित आजादी के बीच कितना फर्क बचेगा? पर अंत यहीं नहीं होता! टेक कम्पनियों की ट्रम्प के विरुद्ध ‘निर्विरोध’ कार्रवाई से उपज सकने वाले कुछ और भी खतरे हैं जो कहीं ज़्यादा गम्भीर हैं।

कोई पूछना नहीं चाहेगा कि एक राष्ट्राध्यक्ष जब सत्ता से हटाए जाने की निराशा के क्षणों में समर्थकों को कैपिटल हिल पर शक्ति-प्रदर्शन के लिए कूच करने के लिए भडक़ा रहा था तो क्या उसे ऐसा करने से रोकने के उपाय अमेरिका जैसी बड़ी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भी वे ही बचे थे जो एकदलीय शासन प्रणालियों में उपस्थित हैं ? मतलब कि ट्रम्प के कथित हिंसक इरादों पर क़ाबू पाने में एकाधिकारवादी सोशल मीडिया कम्पनियों की क्षमता ज़्यादा प्रभावी साबित हुई! अमेरिका के बाक़ी प्रजातांत्रिक संस्थानों, नागरिक प्रतिष्ठानों, आदि के साथ ही विजयी होकर सत्ता में काबिज होने तैयार बैठी डेमोक्रेटिक पार्टी के करोड़ों मतदाताओं की ताकत भी ट्विटर, फेसबुक के सामने आश्चर्यजनक ढंग से बौनी पड़ गई!

अमेरिका में जब एक दिन सब कुछ शांत हो जाएगा तब यह सवाल नहीं पूछा जाएगा कि ट्रम्प प्रशासन  के अंतिम दिनों में हिंसा की आग को फैलने से रोकने का पूरा श्रेय क्या ट्विटर के जैक डोर्सी और फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग को दे दिया जाए? अगले चुनावों में अगर ट्रम्प अथवा उनका कोई मुखौटा रिपब्लिकन पार्टी की सत्ता में वापसी करा देता है तो सोशल मीडिया प्लेटफाम्र्स के विस्तारित एकाधिकारवाद को लेकर किसी तरह की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की जाएगी या नहीं? और यह भी कि ट्रम्प अगर देश में घृणा और हिंसा के बल पर चुनाव जीत जाने में सफल हो जाते तब क्या ये कंपनियां उनके खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई करने की हिम्मत दिखातीं?

टेक कम्पनियों को लेकर तेजस्वी सूर्या जैसे नेताओं की चिंताओं का दायरा सीमित है जबकि वास्तविक ख़तरों का अंधकार कहीं ज़्यादा व्यापक और डरावना है। वह इसलिए कि अमेरिका के अपने सफल प्रयोग के बाद ये कम्पनियाँ अन्य प्रजातांत्रिक राष्ट्रों की संप्रभुताओं का अतिक्रमण करते हुए उनकी नियतियों को भी नियंत्रित करने से बाज नहीं आएंगी। तब फिर नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी के साथ-साथ राष्ट्रों की संप्रभुता और सार्वभौमिकता के सौदे भी किए जाने लगेंगे, वैश्विक सेंसरशिप के हथियार का इस्तेमाल कर उन्हें ब्लैकमेल किया जा सकेगा।

सवाल यह भी है कि जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नागरिक अभी अपनी आज़ादी की लड़ाई के लिए कर रहे हैं उनकी ही विश्वसनीयता अगर चुनौती बन जाएगी तो तय करना मुश्किल हो जाएगा कि ज़्यादा बड़ा ख़तरा किससे था—राजनीतिक ट्रम्प या इन व्यावसायिक कम्पनियों से! अंत में यह कि अपने समर्थकों को शक्ति-प्रदर्शन के लिए कैपिटल हिल पर कूच करने के आह्वान को ट्रम्प ने पूरी तरह से उचित ठहरा दिया है और बायडन-हैरिस के शपथ-ग्रहण के अवसर पर कैपिटल हिल के दिन से भी बड़ी हिंसा की आशंकाएँ अमेरिका में व्यक्त की जा रही हैं। ट्विटर अब क्या करेगा?

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