विचार / लेख

लोकतंत्र के लिए कितनी सही हैं कॉरपोरेट पंचायत?
18-Jan-2021 1:44 PM 43
लोकतंत्र के लिए कितनी सही हैं कॉरपोरेट पंचायत?

-जिनॉय जोस पी

वर्गीज चेत्तन ने साल 1884 में अमेरिका के दक्षिणी शिकागो में विकसित हुए पुलमैन शहर के बारे में कभी नहीं सुना। लेकिन, दक्षिणी केरल के गॉड विला रोड पर उनकी चाय की दुकान जिस गांव के प्रवेशद्वार के पास है, वो गांव अमेरिका के एक करोड़पति कारोबारी जॉर्ज पुलमैन द्वारा उसकी कंपनी के कर्मचारियों के लिए विकसित किए गए कंपनी टाउन से हूबहू मिलता है। यह शहर अमेरिका के कारोबारी घराना समर्थित महात्वाकांक्षी सामाजिक प्रयोगों में एक था।

केरल के एर्नाकुलम जिले में स्थित किजहाकम्बलम गांव इसी तरह के महात्वाकांक्षी सामाजिक प्रयोग का गवाह है। वर्ष 2015 में गांव के लोगों ने कारोबारी घराने की तरफ से स्थापित किए गए एक गैर-राजनीतिक संगठन ट्वेंटी20 को चुनाव में जिताकर सबको चौंका दिया और इस तरह यह गांव पहला कॉरपोरेट-संचालित ग्राम पंचायत बना। पंचायत में कुल 19 सीटें थीं, जिनमें से 17 सीटों पर ट्वेंटी20 के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की।

ट्वेंटी20 की स्थापना काइटेक्स गारमेंट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर साबु एम जैकब ने की थी। काइटेक्स गार्मेंट्स, अन्ना-काइटेक्स ग्रुप की एक इकाई है। अन्ना-काइटेक्स ग्रुप केरल में निजी क्षेत्र में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाली कंपनियों में एक है। इस कंपनी में करीब 12,500 कर्मचारी काम करते हैं और इनमें से एक बड़ा हिस्सा गांव और इसके आसपास रहता है। जैकब कहते हैं, ‘डांवाडोल राजनीति और समाज कल्याण व सामूहिक स्वास्थ्य को लेकर मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों की उदासीनता से लोग तंग आ चुके हैं।’

सब ठीक नहीं है

यह संगठन इस वादे के साथ सत्ता में आया कि वह साल 2020 तक गांव को अति विकसित बना देगा। तब से यहां सुपर मार्केट समेत कुछ प्रोजेक्ट शुरू हो चुके हैं। सुपर मार्केट 1,300 वर्ग मीटर में फैला हुआ है और भारी छूट पर सामान बेचता है। इस मार्केट में सस्ती दरों पर सामान केवल गांव के लोगों के लिए ही उपलब्ध है। इसके लिए गांव के लोगों को पहचान पत्र भी दिए गए हैं।

कारपोरेट सोशल रेस्पांसिब्लिटी (सीएसआर) फंड की मदद से ट्वेंटी20 ने प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की नियुक्ति की है। इनमें से ज्यादातर स्वंयसेवक सामाजिक कार्य में पोस्ट-ग्रैजुएट हैं। पंचायत के हर वार्ड में हो रहे कार्यों की निगरानी करना इनकी जिम्मेवारी है। ‘उनकी सूचनाएं हमें लोगों की समस्याओं को तेजी व प्रभावी तरीके से समझने में मदद करती हैं ताकि हम असल और प्रभावी हल ढूंढ सकें,’ जैकब कहते हैं।

स्थानीय निकाय के जनप्रतिनिधियों को उनकी सेवा के लिए सरकार की तरफ से तनख्वाह के अलावा कॉरपोरेट समूह की तरफ से बतौर मानदेय 15,000 रुपए तक माहवार दिया जाता है। उनका लक्ष्य व्यापारिक अवसर में सुधार व बुनियादी ढांचा तैयार कर पंचायत को सिंगापुर की तरह विकसित बनाना है। जैकब कहते हैं, ‘ज्यादातर वादे हम पूरे कर चुके हैं। बाकी वादे भी स्थाई और प्रभावी तरीके से जल्द पूरे कर दिये जाएंगे। हम उसी राह पर हैं।’

ग्रामीण बताते हैं कि वे पिछले पांच वर्षों में विकास की रफ्तार स्पष्ट रूप से देख रहे हैं। किजहाकम्बलम की स्कूल टीचर अबीदा मुनीर कहती हैं, ‘सडक़ें बेहतर हैं, अपराध काफी कम हो गए हैं और शराबखोरी तथा असामाजिक गतिविधियां भी कम हो रही हैं।’ मीडिया रिपोर्ट और सरकारी आंकड़े भी इन दावों की पुष्टि करते हैं। एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015 के बाद से इस गांव में आपराधिक घटनाओं में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी आई है।

गड़बड़ी और प्रदूषण

फरवरी में ट्वेंटी20 में अंतर-पार्टी कलह शुरू हो गई और पंचायत के तत्कालीन अध्यक्ष केवी जैकब ने नेतृत्व व खासकर अन्ना-काइटेक्स प्रबंधन के साथ मतभेद का हवाला देकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। जैकब पहले कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि पंचायत बॉडी फंड का इस्तेमाल आवश्यकता के अनुसार नहीं करती है, बल्कि फंड का इस्तेमाल उन प्रोजेक्ट्स व सेवाओं के लिए करती है, जिनकी मंजूरी ट्वेंटी20 नेतृत्व देता है।

साल 2015 के चुनाव में इस पंचायत में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था। कांग्रेस का आरोप है कि यह अभियान काइटेक्स के प्रदूषण फैलाने वाले कारोबारों को छिपाने के लिए है। स्थानीय कांग्रेस नेता अलियास करिप्रा कहते हैं, ‘गड़बड़ी और प्रदूषण के कई मामले थे, जिसके चलते पूर्ववर्ती कांग्रेस प्रशासन ने कंपनी को किजहाकम्बलम में स्थित फैक्टरियां बंद करने का आदेश दिया था। इससे काइटेक्स प्रबंधन खासा नाराज हो गया और उसने सीएसआर के पैसे का इस्तेमाल कर गैर-लोकतांत्रिक कदम उठाने का निर्णय लिया।’ आश्चर्यजनक रूप से ट्वेंटी20 को जिन दो सीटों पर साल 2015 के पंचायत चुनाव में हार मिली, वे कवुंगा-परम्बु और चेराकूलम हैं। इन दोनों क्षेत्रों में ही काइटेक्स की फैक्टरियां हैं।

लोकतंत्र को नुकसान

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) के किजहाकम्बलम डिविजन के सचिव जिंस टी मुस्तफा ने कहा कि ट्वेंटी20 लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने वाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि दीर्घकाल में इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ‘यह पंचायती राज एक्ट व नये कानूनों की खामियों का दोहन कर संवैधानिक संस्थानों पर कब्जा कर रहा है,’ मुस्तफा कहते हैं। हालांकि, मुस्तफा यह भी बताते हैं कि उनकी पार्टी विकास और व्यवसाय के खिलाफ नहीं है। उन्होंने आगे कहा, ‘हम सिर्फ ट्वेंटी20 के अस्तित्व में आने, इसके उभार और काम के पीछे के कॉरपोरेट एजेंडे को बेनकाब करना चाहते हैं।’

जैकब इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं, ‘राजनीतिज्ञों ने कभी हमें पसंद नहीं किया, क्योंकि हम उनके लुभावने तरीके और बनावटी विकास की राह में बाधक हैं।’

केरल के सामाजिक मामलों के जानकारों का कहना है कि ट्वेंटी20 राज्य में उभरी नई सामाजिक सच्चाइयों का प्रतिबिंब है। ‘केरल एक लोक हितकारी सूबा (वेलफेयर स्टेट) है। लेकिन कल्याणवाद हर जगह महसूस नहीं किया जा सकता है। इन जगहों पर लोग सत्ताधारी लेफ्ट डेमेक्रेटिक फ्रंट या अभी विपक्ष की भूमिका निभा रहे कांग्रेस-नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का विकल्प चाहेंगे। बहुत लोगों के लिए भारतीय जनता पार्टी की धार्मिक नफरत भी विकल्प नहीं है। लोग शांति चाहते हैं,’ कोच्चि के पर्यावरणविद व एक्टिविस्ट हरीश वासुदेवन कहते हैं।

हालांकि, यह ट्रेंड अच्छा है या खराब इसको लेकर निर्णायक तौर पर कुछ कहना बहुत जल्दबाजी है, मगर सच यह है कि यह मॉडल लोगों को आकर्षित कर रहा है। वासुदेवन कहते हैं, राजनीतिक पार्टियों के लिए ये चेतावनी होनी चाहिए।

सामाजिक टिप्पणीकार व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी-लेनिनवादी) (रेडफ्लैग) के वरिष्ठ नेता फ्रेडी के थजहथ चेतावनी देते हैं कि इस तरह के मॉडल के साथ बड़े मुद्दे जुड़े हुए हैं। ये (ट्वेंटी20) कानून को दो पार्टियों के बीच अनुबंध से प्रतिस्थापित करते हैं। उन्होंने कहा, ‘दोनों एक समान नहीं हैं। अनुबंध में संशोधन हो सकता है, इसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है और बहुत आसानी से खत्म भी किया जा सकता है। लेकिन कानून के साथ ऐसा नहीं है।’ इसका मतलब है कि कंपनी द्वारा संचालित लोकतंत्र में लोगों का भला उनकी मदद करने वाली कंपनी के हित व आर्थिक लाभ से जुड़ा हुआ है।

गैर-लोकप्रिय श्रम कानून

ऐतिहासिक रूप से शिकागो में पुलमैन की यूटोपिया या चॉकलेट कंपनी मिल्टन हर्से के पेनिंसिलवानिया के कॉरपोरेट गांव के उदाहरण बताते हैं कि इस तरह के प्रयोगों की सफलता प्रायोजक कंपनी के भविष्य से जुड़ी हैं। कुछ वक्त के बाद वे (प्रायोजक कंपनियां) गैर-लोकप्रिय श्रम नियम लागू करते हैं और सामंती अड्डा बन जाते हैं। ज्यादातर कंपनियां श्रमिकों की यूनियनों को तवज्जो नहीं देती हैं या वर्करों जिनको ये सुरक्षा देती हैं, उनके सामूहिक अधिकारों की मांग का सम्मान नहीं करती हैं। अंतत, आंतरिक असंतुलन और बढ़ता असंतोष इसे धराशाही कर देता है।

मिसाल के तौर पर पुलमैन के प्रयोग को लिया जा सकता है। ये प्रयोग जल्द ही विफल हो गया और वर्ष 1957 में फैक्टरी में ताला लग गया। ज्यादातर कंपनी टाउनों का अंत भी कमोबेश इसी तरह हुआ। थजहथ कहते हैं, ‘विशुद्ध लोकतंत्र में निश्चित तौर पर ये नहीं होना चाहिए।’

लेकिन जैकब इसको लेकर आश्वस्त नजर आते हैं। उन्होंने कहा, ‘हम लोग लोकतंत्र के दायरे में काम कर रहे हैं और लोगों के कल्याण के लिए समर्पित हैं।’ (downtoearth.org.in)

अन्य पोस्ट

Comments