संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आंदोलनों को खत्म करवाने का सत्ता का पुराना मिजाज..
28-Jan-2021 5:00 PM 283
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आंदोलनों को खत्म करवाने का सत्ता का पुराना मिजाज..

दिल्ली के लालकिले पर कुछ लोगों द्वारा किया गया हंगामा अब साफ होते चल रहा है, और गणतंत्र दिवस की शाम देश भर में फैलाई गई यह खबर पूरी तरह झूठी साबित हो चुकी है कि लालकिले पर तिरंगे झंडे को हटाकर उसकी जगह खालिस्तानी झंडा फहराया गया था, और यह काम किसानों ने किया था। अब यह जाहिर हो चुका है कि लालकिले पर सिक्ख पंथ का झंडा फहराने का फतवा भाजपा के प्रचारक रहे हुए एक पंजाबी फिल्म अभिनेता दीप सिद्धू ने दिया था, और तिरंगे झंडे को छुआ भी नहीं गया था। लेकिन इस साजिश के पीछे चाहे जिसकी बदनीयत रही हो, इसे अपना असर दिखा दिया, और किसान आंदोलन में फूट पड़ गई, वह कमजोर हो गया, कुछ संगठनों ने डेरा उठा लिया, और मौके की कमजोरी को भांपकर कुछ जगहों पर भाजपा की राज्य सरकारों ने आंदोलन खत्म करवाने के हिसाब से कार्रवाई शुरू कर दी। किसानों के एक मोर्चे पर बीती आधी रात से बिजली काट दी गई, और कुछ दूसरी जगहों पर दूसरी असुविधा खड़ी की गई। आज किसानों के बीच आपस में तू-तू-मैं-मैं शुरू हो गई कि लालकिले पर हुए हंगामे के बाद अब आंदोलन कैसे चलाया जाए? 

हिन्दुस्तान में लंबे चलने वाले आंदोलनों को कमजोर करना सत्ता की पहली नीयत होती है। और यह बात किसी एक पार्टी की नहीं होती, बल्कि यहां जिसकी सरकार रहे, वहां उसकी यही नीयत होती है। पार्टियां तो आती-जाती रहती हैं लेकिन किसी भी सरकार में जो हमेशा बने रहते हैं वो अफसर रहते हैं। अफसरों का लोकतंत्र से वैसे भी बहुत कम लेना-देना होता है, और आमतौर पर वे सत्तारूढ़ पार्टी के वफादार बने रहते हैं, और इस नाते भी वे सरकार के लिए दिक्कत बने हुए किसी भी आंदोलन के खिलाफ रहते हैं। नेताओं के मुकाबले अफसरों को यह हुनर कुछ अधिक हासिल रहता है कि आंदोलन को कैसे तोड़ा जाए। सत्ता पर बैठे नेता अपनी खूबियों का इस्तेमाल करते हुए, और अफसर अपने तजुर्बे का इस्तेमाल करते हुए आंदोलन तुड़वाने में लगे रहते हैं, और आमतौर पर कामयाब भी होते हैं। फिर इस बार तो आंदोलनकारी किसानों के इतने सारे अलग-अलग संगठन एक ढीला-ढाला ढांचा बनाकर चल रहे थे जो कि अपने आपमेें बहुत मजबूत नहीं था। इन किसानों का आंदोलनों का लंबा इतिहास भी नहीं था, और न ही ये किसी संगठित मजदूर संगठन या राजनीतिक दल के मातहत थे। इनके बीच  सिक्ख पंथ को सब कुछ मानने वाले कट्टर धार्मिक लोग भी थे, और लाल झंडे वाले कम्युनिस्ट नेता भी थे। परस्पर वैचारिक असहमति के बावजूद ये महीनों से कामयाबी सहित आंदोलन को चला रहे थे कि गणतंत्र दिवस पर टै्रक्टर रैली राह से भटक गई, या भटका दी गई, और लालकिले पर झंडे-डंडे लेकर एक फतवेबाज नेता की अगुवाई में यह आंदोलन, या इसके नाम पर साजिश कर रहे कुछ लोग टूट पड़े, और लालकिले को खबरों में ले आए। यह एक और बात है कि लालकिले पर हंगामे का जो सबसे बड़ा खलनायक रहा वह भाजपा के फिल्मी, और गैरफिल्मी नायकों के साथ अपनी तस्वीरें फैलने का मजा ले रहा है, और किसान नेताओं को सार्वजनिक रूप से धमका रहा है, लालकिले पर हमले या हंगामे का लीडर खुद होने का दावा भी खुद ही कर रहा है। 

किसान आंदोलन को हिंसक और मुल्क का गद्दार साबित करने की जो मीडिया-मुहिम गणतंत्र दिवस के नाजुक मौके पर शुरू हुई, तो वह अब तक जारी है, और वे तमाम लोग जो अपनी हर किस्म की कमीनगी के साथ भागकर तिरंगे झंडे के पीछे छुपते आए हैं, आज तिरंगे झंडे के सबसे बड़े हमदर्द हो गए हैं, और उनकी भावनाएं इस तरह उबल रही है कि लालकिले के पत्थर गारे से नहीं जोड़े गए, इन्हीं लोगों के लहू से जोड़े गए थे। ऐसा करते हुए देश के झंडे के झूठे अपमान से लेकर सिक्ख पंथ के झंडे को खालिस्तानी झंडा बताने के सच्चे अपमान तक सब कुछ किया जा रहा है। यह सिलसिला एक आंदोलन को ऐसे बूटों से कुचलने का है जो कि दिख भी नहीं रहे हैं। 

सैकड़ों मील के इलाकों में बिखरे हुए इस आंदोलन को राजधानी में बैठी सत्ता ने घेरकर मारा दिखता है। राजधानी उनका अपना इलाका है, वहां की पुलिस केन्द्र सरकार की अपनी है, और संगीनों के साए में रहने वाला लालकिला भी उनकी ही अपनी हिफाजत में था। ट्रैक्टरों को कहां रोका गया, और कहां से आगे बढऩे दिया गया, यह सब भी दिल्ली की पुलिस के हाथ था। इसलिए किसानों की इस तोहमत की जांच भी जरूरी है कि रैली के लिए जो सडक़ें तय की गई थीं, उन पर बैरियर लगे थे, और जिन सडक़ों पर नहीं जाना था, उन सडक़ों को खोलकर रखा गया था। अगर सच में ही ऐसा हुआ है, तो इसमें कुछ भी अविश्वसनीय नहीं है क्योंकि सत्ता का मिजाज किसी भी देश-प्रदेश में ऐसा ही होता है। नेताओं का भी, और अफसरों का भी।
 
हाल ही के बरसों में इस देश में जेएनयू से लेकर जामिया मिलिया तक, और शाहीन बाग तक बहुत से आंदोलनों की ऐसी भ्रूण हत्या देखी है। केन्द्र सरकार के खिलाफ यह एक सबसे मजबूत आंदोलन खड़ा हुआ था, और किसानों की दर्जनों शहादत के बाद भी डटा हुआ था। इसे खत्म करवाने के लिए लालकिले और तिरंगे झंडे का गणतंत्र दिवस पर जैसा इस्तेमाल किया गया है, वह बहुत ही खतरनाक तरीका रहा है, उसने देश के अमन-पसंद लोगों के हौसले को तोड़ दिया है। दिक्कत यह है कि लालकिले पर ऐसे हमले या हंगामे का खलनायक आज भी पूरे किसान आंदोलन को खुली सार्वजनिक धमकी देते हुए खुला घूम रहा है, और यह जाहिर भी है कि उसके ऐसा करने के पीछे ठोस वजहें हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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