राजनीति

आंध्र प्रदेश : क्या है 'मंदिरों पर हमलों' का हंगामा और क्या है त्रिकोणीय सियासत?
03-Feb-2021 6:46 PM (112)
आंध्र प्रदेश : क्या है 'मंदिरों पर हमलों' का हंगामा और क्या है त्रिकोणीय सियासत?

-भवेश सक्सेना

आंध्र प्रदेश में मंदिरों पर लगातार हमले का मुद्दा राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के बीच त्रिकोणीय जंग का रूप ले चुका है. एक बहस जारी है, जिसमें हर पार्टी दूसरी को ज़िम्मेदार ठहरा रही है. पिछले डेढ़ साल से राज्य में मंदिरों पर लगातार हो रहे हमलों पर केंद्र से एक्शन लिये जाने की मांग करते हुए भाजपा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव ने मुद्दा उठाया. वायएस जगनमोहन रेड्डी इस मामले के केंद्र में इसलिए हैं क्योंकि मई 2019 से ही वो राज्य की सत्ता में आए. पूरा मामला सिलसिलेवार ढंग से समझिए और तय कीजिए कि कौन किस तरफ है.

दिसंबर 2020 के आखिर में रामतीर्थम में जब भगवान राम की मूर्ति को तोड़ा गया और मंदिर के पुजारी को रोता देखा गया, तबसे आंध्र में मंदिरों पर हमले का मुद्दा तेज़ी से गर्म होता चला गया. इस पूरे मुद्दे को, पीछे की कहानी को और इस पर चल रही राजनीति को ठीक से समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि मुद्दा संवेदनशील है.

क्या कह रहा है आंकड़ा?
सबसे पहले तो आंध्र में मंदिरों पर हमले का मुद्दा इतना बड़ा क्यों है? यह जानने के लिए कुछ आंकड़े देखिए. राव ने संसद में आरोप लगाया कि राज्य में पिछले 19 महीनों में मंदिरों में तोड़फोड़ या मूर्ति भंग किए जाने के 140 से ज़्यादा केस सामने आ चुके हैं राज्य सरकार ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं. वहीं राज्य के डीजीपी डी गौतम सवांग ने दो हफ्ते पहले कहा कि अंतर्वेदी रथ यात्रा में आगज़नी स​मेत 44 प्रमुख मामलों में से 28 को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम सुलझा चुकी.

यही नहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी अशोक गजपति राजू ने पिछले दिनों कहा कि बीते 19 महीनों में 128 मंदिरों पर हमले की घटनाएं हुईं. एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पिछले साल सितंबर से अब तक राज्य में मंदिरों के खिलाफ कम से कम 20 बड़ी घटनाएं हुई हैं. यानी मुद्दा बहुत गंभीर और संवेदनशील हो चुका है.

कौन किस तरह है पार्टी?
आग की तरह राज्य में फैल चुके इस मुद्दे के बीच कौन किस तरह की भूमिका में है? इस सवाल के जवाब से आपको त्रिकोणीय राजनीतिक जंग का अंदाज़ा भी लग जाएगा, जो YSRCP, टीडीपी और भाजपा के बीच जारी है. इस केस को पार्टीवार समझना बेहतर है.

सत्तारूढ़ YSRCP की भूमिका : ज़ाहिर है राज्य में इतने बड़े तांडव से सबसे ज़्यादा आरोपों के घेरे में वायएसआर कांग्रेस पार्टी ही है. डैमेज कंट्रोल करते हुए पार्टी ने तीन मंदिर ट्रस्टों के चेयरमैन रहे राजू को सुरक्षा में लापरवाही का आरोप लगाकर पद से हटाया, लेकिन सवाल यह खड़ा हो गया कि बाकी जिन मंदिरों पर हमले हुए, उनके ट्रस्ट पदाधिकारी क्यों नहीं हटाए गए?

YSRCP पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह ईसाइयों को केंद्र में रखने वाली पार्टी है और राज्य की ईसाई गृह मंत्री मेकातोती सुचारिता के हाथ में इस मामले की कमान होने के चलते ही दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई. वहीं, सत्तारूढ़ पार्टी का जवाब है कि उसकी सरकार बनने और कल्याणकारी योजनाएं लागू होने के बाद से ही ये हमले होने लगे हैं. यह सरकार की छवि खराब करने के लिए राजनीतिक सा​ज़िश है. राज्य की सांप्रदायिक फिज़ा को बिगाड़ने के साथ ही YSRCP का आरोप है कि इन हमलों के पीछे तेलुगु देशम पार्टी का हाथ हो सकता है.

टीडीपी की भूमिका : चंद्रबाबू नायडू की यह पार्टी मुस्लिमों को केंद्र में रखने वाली सियासत को तरजीह देने के आरोप झेलती रही है. तेदेपा ने अपने कार्यकाल के दौरान 2016 में कृष्णा नदी पर विकास कार्यों और सड़क को बड़ा करने के काम के चलते दर्जनों मंदिर गिरवाए थे. इस बात को भी रेड्डी की पार्टी ने मुद्दा बनाकर न केवल आरोप लगाया है, बल्कि रेड्डी ने डैमेज कंट्रोल के एक और अहम कदम के तौर पर बीती 8 जनवरी को ऐसे 30 मंदिरों के पुनरुद्धार के लिए शिलान्यास भी किया.

बीजेपी की भूमिका : मंदिरों पर हमले की राजनीति में भाजपा का क्या लेना देना है? पहले तो यह याद रखिए कि तेदेपा की राज्य सरकार के समय भाजपा का समर्थन था और तेदेपा के मंदिर तोड़े जाने के वक्त भाजपा ने कोई स्टैंड नहीं लिया था. एमआर सुब्रमणि के लेख में भाजपा के पक्ष वाले राजनीतिक विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि राज्य में हिंदुओं को ही अपने पूजास्थल तोड़ने का दोषी ठहराया जा रहा है.

अन्य विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि जब नायडू सरकार में मंदिरों को तोड़ने पर कोई हंगामा नहीं हुआ तो हिंदू विरोधी तत्वों को शह मिली और इस सरकार में यह सिलसिला और तेज़ी से बढ़ गया. लेकिन अब भाजपा हिंदुओं के पक्ष और राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रही है, जबकि यहां तेदेपा से अलग होने के बाद से अपरोक्ष रूप से भाजपा रेड्डी सरकार की समर्थक ही रही.

तो कौन है दोषी?
अब सवाल खड़े होते हैं कि तेदेपा दोषी है तो राज्य सरकार ने विरोधी पार्टी के सदस्यों की गिरफ्तारी क्यों नहीं की? भाजपा पर साज़िश में शामिल होने के आरोप हैं तो इनका आधार क्या है? सिर्फ राजू को पद से क्यों हटाया गया? क्या हिंदू ही हिंदू मंदिरों को तोड़ रहे हैं? इन सब सवालों के जवाब में रेड्डी सरकार का जवाब यही रहा है कि यह 'सियासी गुरिल्ला युद्ध' है, जो राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए विरोधी अंजाम दे रहे हैं.

विश्लेषकों का एक बड़ा आरोप यह भी है कि भले ही सुचारिता ने हमलों की घटनाओं के लिए माफी मांगी हो, लेकिन महीनों तक इन संवेदनशील मामलों में कोई गिरफ्तारी या एक्शन न होने का मतलब यही है कि रेड्डी सरकार किस तरह इस मुद्दे पर रुख रखती है. यह भी कहा गया कि रेड्डी सरकार ने हमलों की निंदा तक नहीं की, जिससे हमलावरों को और शह मिली.

क्या है सियासी व सामाजिक माहौल?
आपको याद हो तो हैदराबाद में निकाय चुनाव नज़दीक थे, तो वहां भी सांप्रदायिक हंगामे और बयानबाज़ी की झड़ी थी. तिरुपति में अस्ल में, उप चुनाव के वातावरण में यह पूरा मुद्दा खड़ा हुआ है जिसमें सीधे तौर YSRCP और TDP एक दूसरे पर आरोप की राजनीति कर रही हैं तो तीसरे मोड़ पर BJP इस पूरे मुद्दे को भुनाना चाह रही है. राज्य में 'आंध्र में तालिबान' और 'बाइबल पार्टी' बनाम 'भगवद्गीता पार्टी' जैसे नारे लग रहे हैं. और लोगों से कहा जा रहा है कि आप किस तरफ हैं? (news18.com)

अन्य पोस्ट

Comments