संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कुदरत को नुकसान के एवज में पड़े कोड़े
12-Feb-2021 5:08 PM 139
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कुदरत को नुकसान के एवज में पड़े कोड़े

चीन की बाढ़, अमरीका का सूखा, वहीं पर तूफान, जापान में एक साथ सुनामी और बाढ़, उत्तराखंड में ताजा आपदा, इस तरह के कुदरत के कहर का सिलसिला पिछले बरसों में लगातार बढ़ते चल रहा है, और मौसम के इन तीखे तेवरों को लेकर अब एक सवाल यह उठ रहा है कि कौन से देश, कौन से प्रदेश और कौन से शहर इससे निपटने के लिए कितना खर्च करें? ऐसी नौबत साल में शायद दस-बीस दिन ही किसी इलाके को झेलनी पड़ती है। कुछ जगहों पर हमेशा से ज्वालामुखी या भूकंप के खतरे बने रहते थे, लेकिन अब नई-नई जगहों पर नई-नई कुदरती मुसीबतें सामने आ रही हैं, और इनका दर्जा भी पहले से बहुत ऊंचा हो चुका है। जो नए ढांचे खड़े हो रहे हैं, उनके लिए तो इस दर्जे की तैयारियां काफी अधिक दाम पर भी की जा रही हैं, लेकिन जहां पहले ऐसी कोई आशंका नहीं थी, वहां पर तो कोई तैयारी भी नहीं थी। इसलिए दुनिया के मौजूदा ढांचे में किस तरह कोई फेरबदल करके इन नई मुसीबतों के लिए तैयारी कर सकते हैं? पिछले कुछ सालों में ही योरप में ज्वालामुखी से निकलने वाली राख ने कुछ हफ्तों के लिए वहां जिंदगी तहस-नहस कर दी थी। योरप में ही जिस तरह से हिमयुग की वापिसी दिख रही थी उससे भी लोग हैरान थे क्योंकि दुनिया भर में तो ग्लोबल वॉर्मिंग की बातें चल रही हैं। अमरीका में लोग लू से मारे जा सकते हैं, यह पहले किसने सोचा था? दूसरी तरफ रूस की बाढ़ में डेढ़-दो सौ लोग मारे गए और ब्रिटेन बेमौसम की बरसात की मार झेलता रहा।

हिंदुस्तान की एक सबसे बड़ी पर्यावरण-जानकार सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सुनीता नारायण ने अपनी पत्रिका डाऊन टू अर्थ के संपादकीय में उन्होंने बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन में रिश्ता समझने का वक्त गिनाया था। उन्होंने लिखा था-सच बात तो यह है कि बदलाव हमारे वर्तमान और भविष्य में होंगे ही। चूंकि दुनिया ने बढ़ते तापमान का असर अभी देखना शुरू ही किया है, चरम मौसमी घटनाओं के कारण समझाने वाले  पिछले कई सालों के आंकड़े अस्तित्व में ही नहीं हैं। इसलिए ज्यादा से ज्यादा यही किया जा सकता है कि एक मॉडल के आधार पर  दुनिया भर में बढ़ रहे तापमान के असर की भविष्यवाणी की जाए।
  
हम बात वहां से कुछ अलग भी ले जाना चाहते हैं। इंसान जितने किस्म से कुदरत को कुचल रहे हैं, उसे देखते हुए यह माना जाना चाहिए कि कुदरत भी इसका हिसाब आगे-पीछे चुकता करेगी। और यह सब तो तब है जब आज धरती पर अमीरी और गरीबी के बीच का फासला एक सीमा तक ही पहुंचा है और यह आगे बढ़ते जाना तय है। जब यह फासला और अधिक भयानक हो जाएगा, तब अमीर तबके की खपत भी भयानक बढ़ जाएगी। और उससे धरती के गर्म होने, यहां पर प्रदूषण बढऩे की नौबत भी अधिक भयानक हो जाएगी। उनका एक नतीजा इस तरह के चरम मौसम की शक्ल में भी सामने आएगा। लेकिन इंसान के बनाए हुए इस खतरे से परे अगर दुनिया की इस आकाशगंगा में कुछ ऐसे फेरबदल हों जो इंसान काबू से परे हों तो क्या होगा?

आज तो यह धरती इंसानों के बिगाड़े हुए माहौल की मार को नहीं झेल पा रही है, इस पर उम्मीद से परे की कोई और मार पड़े तो क्या होगा?
हिंदुस्तान के मामले में देखें तो यह बात कई तरह के बहस के लायक लगती है कि देश के एक हिस्से में बाढ़ और दूसरी हिस्से में सूखे से निपटने के लिए नदी-जोड़ योजना का नफा क्या होगा, और नुकसान क्या होगा? यह मामला बहुत अधिक जानकार लोगों के बीच के तर्क -वितर्क का है इसलिए इस बारे में हमारी अपनी कोई विशेषज्ञ राय नहीं है। पहली नजर में यह ठीक लगता है कि पानी को सूखे इलाकों की तरफ मोड़ा जाए। लेकिन इससे इन इलाकों के पर्यावरण पर पडऩे वाले असर का ठीक-ठीक अंदाज लगाना क्या आज मुमकिन है? और यह भी कि क्या इतनी बड़ी योजना से कम कोई ऐसी योजना बन सकती है जिसका असर सीमित हो? यह कुछ उसी तरह की बात है जिस तरह कि बड़े बांधों के मुकाबले पर्यावरणवादी लोग छोटे बांधों की वकालत करते हैं। लेकिन यह जरूर है कि भारत के एक हिस्से में बाढ़ को कम करके, दूसरे हिस्से से सूखे को कम किया जा सके, और सारे सूखे हिस्से में जमीन के भीतर भी रिसकर जाने वाला पानी अधिक पहुंचे, तो उसके कई फायदे भी हो सकते हैं।

मौसम के कोड़े को आज दुनिया के बहुत से हिस्से बहुत बुरी तरह झेल रहे हैं। और अमरीका जैसा ताकतवर देश भी इस मार को हल्का करने का कोई तरीका नहीं निकाल पा रहा है। भारत को भी यह सोचना शुरू करना चाहिए कि वह कुदरत को पहुंचाए जा रहे नुकसान को कम कैसे करे। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी जरूरी बात यह भी रहेगी कि विकसित और संपन्न देशों की मतलबपरस्ती के चलते कुदरत को जो बड़ा नुकसान पहुंचाया जाता है, उसे रोकने के लिए ऐसे देशों पर दबाव कैसे बढ़ाया जाए।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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