संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ...क्या सचमुच ही यह लोकतंत्र गौरवशाली है?
11-Mar-2021 5:30 PM (247)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ...क्या सचमुच ही यह लोकतंत्र गौरवशाली है?

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पर कल उन्हीं के राज में हमला हुआ और टूटे हुए पैर के साथ वे अस्पताल में हैं। भाजपा तो भाजपा, कांग्रेस भी इसे नौटंकी कह रही है क्योंकि इस चुनाव में भाजपा अपने आपमें एक खेमा है, और दूसरी तरफ कांग्रेस वामपंथियों के साथ मिलकर यह चुनाव लड़ रही है जिन्हें ममता बैनर्जी ने तीन दशक के राज के बाद बेदखल किया था। इसलिए इन सबका हक बनता है कि ममता बैनर्जी की अस्पताल की तस्वीरों को नौटंकी कहें। हम तब तक इस हमले की असलियत पर कुछ कहना नहीं चाहते जब तक कि ममता के विरोधी ऐसे सुबूत न रखें कि यह हमला उनका अपना करवाया हुआ था, और यह नौटंकी है। सार्वजनिक जीवन में जब तक किसी को बेईमान साबित न किया जाए, तब तक उसे ईमानदार मानने को ही हम ठीक समझते हैं। लेकिन यह हमला तो कैमरों से, अफसरों और आसपास के लोगों के बयानों से सच्चा या झूठा साबित हो जाएगा, इसके बाद से ममता बैनर्जी पर सोशल मीडिया में जिस दर्जे के हमले हो रहे हैं, वे बहुत हक्का-बक्का तो नहीं करते हैं, लेकिन यह सोचने पर मजबूर जरूर करते हैं कि जिन पार्टियों और जिन नेताओं के समर्थक और प्रशंसक ऐसे अश्लील और हिंसक पोस्ट कर रहे हैं, क्या उनके लिए उन पार्टियों के नेताओं के पास कहने को कुछ है? अभी दो दिन पहले ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर इन तमाम नेताओं ने बड़ी-बड़ी बातें कही थीं, महिलाओं के सम्मान की बड़ी-बड़ी बात की थी, लेकिन दो दिन के भीतर एक महिला के खिलाफ, उसके चाल-चलन के खिलाफ, उसके महिला होने पर जिस तरह की अश्लील गालियां दी जा रही हैं, वे आज के इस भयानक गंदे माहौल में भी हैरान करती हैं। 

सोशल मीडिया पर ममता बैनर्जी को रंडी लिखते हुए, उनके शरीर के कुछ चुनिंदा हिस्सों का जिक्र करते हुए जिस जगह उनके नाम गालियां दी जा रही हैं, अश्लील फोटो चिपकाई जा रही है, सेक्स की कुछ हरकतें उन्हें सुझाई जा रही हैं, उसी जगह पर उसी तस्वीर के साथ जयश्रीराम की तस्वीरें भी लगी हुई हैं। सोशल मीडिया पर अभी चार दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोलकाता की आमसभा के दिन सैकड़ों लोगों ने एक ही ट्वीट को अपने नाम से अपने पर हुए तृणमूल-गुंडों के हमले की बात कहते हुए बार-बार दुहराया था। लोग हैरान हुए थे कि ये सैकड़ों लोग सारे के सारे हावड़ा के रहने वाले, सारे के सारे अपने पिता के साथ मोदी की सभा में जा रहे थे, और सारे के सारे लोगों पर तृणमूल के गुंडों ने हमला किया था, और सारे के सारे लोगों को सिर पर तीन-चार टांके आए थे, और सारे के सारे लोगों ने बिना एक पूर्णविराम या अल्पविराम के फर्क के एक सा ट्वीट किया था। कल ममता बैनर्जी पर हुए हमले के बाद से ममता बैनर्जी के चरित्र, ममता बैनर्जी के शरीर को लेकर, उन्हें तरह-तरह वीभत्स सेक्स सुझाते हुए जो बातें सोशल मीडिया पर लिखी जा रही हैं, वे बातें इन रामभक्तों के भगवान को पता नहीं कैसे बर्दाश्त होंगी, इनके नेताओं को तो बर्दाश्त हो ही रही हैं ऐसा दिखता है।

 कई बार हमें लगता है कि सोशल मीडिया ने संगठित मीडिया में उपेक्षित लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी को एक अधिकार दिया है। संगठित मीडिया और नेताओं को भी सोशल मीडिया में लिखी बातों पर गौर करना पड़ता है। लेकिन जब हजारों लोग मानो भाड़े पर काम करते हुए किसी एक व्यक्ति के चाल-चलन पर ऐसे हमले करने को छोड़ दिए जाते हैं, तो मन में यह शक पैदा होता है कि हिन्दुस्तान जैसे बेअसर लोकतंत्र में क्या सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की यह कानूनविरोधी आजादी सचमुच ही अभिव्यक्ति की आजादी है? क्या यह सचमुच ही लोकतांत्रिक है? या यह लोगों के जीने के अधिकार के खिलाफ एक हिंसक हमला है जिस पर किसी भी लोकतांत्रिक देश को जमकर कार्रवाई करनी चाहिए थी? ममता बैनर्जी हों, या कोई अभिनेत्री हो, या नफरतजीवियों को नापसंद कोई महिला पत्रकार हो, किसी भी महिला के खिलाफ किसी एक हमलावर की दमित यौन-कुंठाएं अगर इस तरह बाहर निकलतीं तो भी समझ आता, लेकिन जब ट्रोल-आर्मी कही जाने वाली हजारों लोगों की यह फौज किसी एक के चाल-चलन, उसकी देह, सेक्स की उसकी काल्पनिक जरूरतों को लेकर उसे घेरकर पत्थर मार-मारकर मार डालने पर उतारू हो जाती है, तो यह भी सोचने की मजबूरी आ खड़ी होती है कि इस फौज के सेनापति कौन हैं, यह फौज आखिर किसके हाथ मजबूत करने के लिए तैनात की गई है? इस फौज का चाल-चलन किस धर्म और किस राष्ट्रवाद की संस्कृति के मुताबिक जायज है? जो लोग एक ही सांस में जयश्रीराम कहते हुए अगली ही सांस में औरत के कुछ अंगों और अपने कुछ अंगों का रिश्ता जोडऩे पर उतारू हो जाते हैं, वे अपने धर्म और अपनी संस्कृति का कितना सम्मान बढ़ाते हैं? और इस देश का जो कानून एक-एक ट्वीट को देशद्रोही करार देते हुए बेकसूरों को बरसों तक कैद रखने के लिए बदनाम हैं, वह कानून जब ऐसे भयानक जुर्म करने वालों को अनदेखा करके मजा पाते दिखता है, तो इस लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं पर से भरोसा उठने लगता है। हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट जो कि प्रशांत भूषण की एक ट्वीट पर हफ्तों-महीनों तक सुनवाई करके उसे अपनी अवमानना मानकर सजा सुना सकता है, उस सुप्रीम कोर्ट को इस देश की बेकसूर महिलाओं पर छोड़ दी गई ऐसी बलात्कारी-हत्यारी फौज को अनदेखा करने में मजा आता दिखता है। जब सुप्रीम कोर्ट सोशल मीडिया पर अपने बारे में कही एक-एक बात को लेकर इस हद तक संवेदनशील है, तो इस देश की महिलाओं पर हो रहे ऐसे संगठित सेक्स-हमलों पर उसे कुछ भी करना जरूरी नहीं लगता? इस सुप्रीम कोर्ट ने आज तक ऐसी एक कमेटी बनाना भी जरूरी नहीं समझा जो सेक्स की धमकियां देने वाले ऐसे सोशल मीडिया अकाऊंट्स के पीछे की ताकतों को जेल भेजने का इंतजाम कर सके। सुप्रीम कोर्ट, संसद, सरकार, चुनाव आयोग, ये तमाम संवैधानिक संस्थाएं इस लोकतंत्र के भीतर ऐसे अलोकतांत्रिक, हिंसक और अश्लील हमलों को अनदेखा करने का मजा ले रहे हैं। हो सकता है कि इन संस्थाओं में बैठे कई लोगों को ममता बैनर्जी सरीखी नापसंद महिलाओं के अंगों के साथ किस्म-किस्म के सेक्स की बातें पढऩे में मजा भी आ रहा हो। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के लिए, हिन्दू धर्म के लिए, और तथाकथित गौरवशाली भारतीय संस्कृति के ठेकेदारों के लिए यह शर्म से डूब मरने की बात है कि  आधुनिक टेक्नालॉजी का मुहैया कराया गया एक औजार इस तरह हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, और इसे रोकने में किसी की दिलचस्पी नहीं है। अगर बंगाल के इस चुनाव को ही लें, तो झूठे ट्वीट करने वाले, ममता बैनर्जी के खिलाफ सेक्स और हिंसा की सबसे गंदी बातें लिखने वाले दसियों हजार लोग अब तक गिरफ्तार हो जाने थे, दसियों हजार कम्प्यूटर और स्मार्टफोन जब्त हो जाने थे, लेकिन देश में ऐसी ताकतें हैं जो अपने को नापसंद इंसानों को जिंदा रहने का बुनियादी हक भी देना नहीं चाहतीं। क्या सचमुच ही यह लोकतंत्र गौरवशाली है? 
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