संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : क्या सचमुच इस समाज को देवीपूजा का हक है?
23-Mar-2021 6:44 PM (71)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : क्या सचमुच इस समाज को देवीपूजा का हक है?

वैसे तो हिन्दुस्तान देवियों की पूजा करने वाला देश है। पश्चिम से लेकर पूरब तक, और जम्मू से लेकर केरल तक सभी जगह देवियों की उपासना होती है, उनके न सिर्फ बड़े-बड़े मंदिर और तीर्थ हैं, बल्कि गुजरात की नवरात्रि में दुर्गा पूजा से लेकर बंगाल की दुर्गा पूजा तक, और दीवाली पर देश के अधिकतर हिस्से में कारोबार से लेकर सरकारी खजाने तक में होने वाली लक्ष्मी पूजा धर्म से आगे बढक़र सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा बन चुकी है। ऐसे देश में महिलाओं से अत्याचार का भी कोई अंत नहीं है। 

आज एक प्रमुख समाचार वेबसाईट पर कुछ खबरों को कतार से देखते हुए इस मुद्दे पर लिखना सूझा जिसमें नया कुछ नहीं है लेकिन इन्हें एक साथ देखते हुए लगा कि देवियों की पूजा करने वाला यह देश किस तरह हर नामुमकिन तरीके से भी लड़कियों और महिलाओं पर जुल्म करता है। जुल्म की हकीकत है, और देवी पूजा के फसाने हैं! जब कभी हिन्दुस्तानी समाज के महिलाओं के प्रति हिंसक होने की बात कही जाए, भ्रूण हत्या से लेकर कन्या हत्या तक, और फिर दहेज हत्या से लेकर विधवाश्रम तक की कोई भी बात की जाए, तो हिन्दुस्तानी समाज बड़ी रफ्तार से अपने बचाव में देवी पूजा की परंपरा गिनाने लगता है। लोग यह गिनाना नहीं भूलते कि यहां कन्या पूजा करके छोटी-छोटी बच्चियों के भी पैर छूने की परंपरा है। मानो ये सारी परंपराएं हिन्दुस्तानी मर्दों ने लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ अपनी हिंसा के बचाव के सुबूत की तरह गढक़र रखी हैं। 

अभी सोशल मीडिया पर एक जगह मां-बाप की विरासत में बेटों के अलावा बेटियों के भी हक की बात छिड़ी, तो पुत्रमोह के शिकार हिन्दुस्तानी, हिन्दू आदमियों के मन की महिलाविरोधी बातें फूट पड़ीं। लोग याद दिलाने लगे कि लड़कियों को न सिर्फ दहेज दिया जाता है, बल्कि बाद में भी जिंदगी भर भाई उनसे रिश्ता निभाते हैं, लेन-देन करते हैं, इसलिए मां-बाप की सम्पत्ति पर बेटियों का कोई हक नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट तक इस बारे में बिल्कुल साफ है कि मां-बाप की जायदाद का बंटवारा करते हुए बेटियों और बेटों में कोई फर्क नहीं किया जा सकता, लेकिन बहस में शामिल अधिकतर आदमी मानो इस कानूनी व्यवस्था से नावाकिफ रहकर बहन-बेटियों को कोई भी कानूनी हक देने के खिलाफ लिखते रहे। और तो और कोई-कोई महिला भी इस पुरूषवादी तर्क की हिमायती निकलीं कि बेटियों का हक बराबरी का होना चाहिए। 

भारत में लैंगिक समानता एक बहुत ही काल्पनिक आदर्श सोच है जिसके उपजने और पनपने के लिए समाज में कोई जमीन नहीं है। और यह नौबत महज हिन्दुओं के बीच है ऐसा भी नहीं है, मुस्लिमों के बीच एक शाहबानो के हक को लेकर हिन्दुस्तान में मुस्लिम समाज के आदमियों ने इतना तनाव खड़ा किया था कि उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अल्पसंख्यक-वोटरों की दहशत में आकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था, और कांग्रेस के उस वक्त के संसदीय बाहुबल का बुलडोजर बूढ़ी शाहबानो पर चला दिया था। देश के जिन आदिवासी समाजों को सबसे कम पढ़ा-लिखा मानते हुए शहरी लोग जिन्हें जंगली कहते हैं, उन्हीं आदिवासी समाजों में महिलाओं को शहरी और सवर्ण तबकों की महिलाओं के मुकाबले अधिक बराबरी के हक मिलते हैं। शहरी, शिक्षित, सवर्ण महिलाओं को समाज में पुरूषों के मुकाबले जरा सी भी बराबरी का कोई हक अगर मिलता है तो वह उनके आर्थिक आत्मनिर्भर होने पर ही मिलता है, वरना वे गुलामों की सी जिंदगी जीती रह जाती हैं। 
हर दिन कई ऐसी खबरें आती हैं कि हिन्दुस्तान में महिलाओं और लड़कियों पर किस किस्म के जुल्म हो रहे हैं। आज की ही खबर है कि हरियाणा में आठवीं की एक छात्रा ने अपने वकील के मार्फत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है कि उसकी मां ने अपने प्रेमी और उसकी पत्नी के साथ मिलकर उस लडक़ी की जबर्दस्ती शादी करवाई और जबर्दस्ती शारीरिक संबंध को मजबूर किया। हरियाणा की ही एक दूसरी खबर है कि वहां ट्यूशन पढ़ा रहा शिक्षक नाबालिग छात्रा से लगातार बलात्कार कर रहा था, और जब लडक़ी ने ट्यूशन पर जाना बंद कर दिया, तो मां-बाप ने उसकी डॉक्टरी जांच कराई और बलात्कार के इस सिलसिले की खबर हुई। 

लड़कियों के लिए यह बहुत आम बात है कि किसी टीम में चुने जाने के लिए उन्हें खेल संघों के पदाधिकारी, खेल प्रशिक्षक, या चयनकर्ता के सामने अपना समर्पण करना पड़ता है, तो दूसरी किसी अधिक काबिल खिलाड़ी का हक मारकर उसे टीम में ले लिया जाता है। कई बार तो टीम में जगह तक नहीं मिलती, और अलग-अलग कई लोग लड़कियों का शोषण करते रहते हैं। विश्वविद्यालयों में शोधकार्य करने वाली लड़कियों का रिसर्च-गाईड द्वारा देहशोषण बहुत अनसुनी बात नहीं है, और ऐसा बहुत से मामलों में होता है, यह अलग बात रहती है कि पीएचडी पाने के मोह में और सामाजिक बदनामी-प्रताडऩा से बचने के लिए लड़कियां और महिलाएं यह जुल्म बर्दाश्त कर लेती हैं। देश के एक सबसे नामी-गिरामी संपादक रहे एम.जे.अकबर पर उनके सबसे कामयाबी के बरसों में अपनी मातहत महिला-पत्रकारों के यौन शोषण के दर्जन भर से अधिक आरोप लग चुके हैं, और इसी सिलसिले में एक आरोप के खिलाफ अकबर के दायर किए गए मुकदमे में अकबर की हार भी हो चुकी है। एम.जे. अकबर उसी बंगाल की राजधानी कोलकाता से अखबारनवीसी करते थे जहां देवियों की पूजा की लंबी परंपरा है। बंगाल में तो देवताओं की पूजा सुनाई भी नहीं पड़ती, और दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और काली की ही पूजा होती है, और वहां की इस सामाजिक संस्कृति के बावजूद वहां के इस मशहूर संपादक का यह आम हाल और मिजाज था। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

अन्य पोस्ट

Comments