संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बलात्कारियों के पक्ष में तिरंगे झंडे, और शिकार लडक़ी की प्रताडऩा...!
02-Apr-2021 6:26 PM (83)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बलात्कारियों के पक्ष में तिरंगे झंडे, और शिकार लडक़ी की प्रताडऩा...!

मध्यप्रदेश दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के साथ बहुत ही परले दर्जे के जुल्मों के लिए हमेशा से जाना जाता है। सतना-रीवां से लेकर ग्वालियर तक का इलाका सामंती असर में जीता है, और कल के सामंत, आज के नेता, इनके जुल्मों में कोई बहुत फर्क आ गया हो, ऐसा भी नहीं दिखता है। अभी वहां 16 बरस की एक नाबालिग लडक़ी से एक बालिग ने बलात्कार किया तो गांव ने दोनों को बांधकर साथ-साथ परेड निकाली। जब इसका वीडियो चारों तरफ फैल गया, तब पुलिस के पास भी बलात्कार के इस आरोपी और परेड निकालने वाले पांच लोगों को गिरफ्तार करने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया था। दिल दहलाने वाला यह वीडियो बताता है कि लोगों की भीड़ इन दोनों को बांधकर पीटते हुए इनका जुलूस निकाल रही थी, और भारत माता की जय के नारे लगा रही थी। अब जब चारों तरफ थू-थू होते कुछ दिन हो गए तो भारतीय बाल अधिकार संरक्षण परिषद ने मध्यप्रदेश के पुलिस प्रमुख से इस पर रिपोर्ट मांगी है। 

यह घटना याद दिलाती है कि किस तरह कुछ बरस पहले जब जम्मू-कश्मीर एक राज्य था, और वहां पीडीपी-भाजपा की गठबंधन सरकार थी तब जम्मू में एक खानाबदोश मुस्लिम बच्ची से एक मंदिर में पुजारी समेत आधा-एक दर्जन लोगों ने बलात्कार करके उस बच्ची को मार डाला था, तो इनके नाम सामने आने पर इन्हें बचाने के लिए भाजपा नेताओं की अगुवाई में जम्मू में तिरंगे झंडे लेकर जुलूस निकाले थे। जम्मू हिन्दू बहुतायत वाला इलाका है, और वहां पर सिर्फ हिन्दुओं वाली इस बलात्कारी-टोली को बचाना एक बड़ा हिन्दूवादी मुद्दा बनाया गया था। और तो और इस मुस्लिम बच्ची की तरफ से जो हिन्दू महिला वकील खड़ी हुई थी, उसे भी हिन्दू संगठनों की ओर से तरह-तरह की धमकियां दी गई थीं, उसका सामाजिक बहिष्कार किया गया था। 

किसी धर्म की महानता इस बात से तय नहीं होती कि उसकी किताबों में कैसी नसीहतें लिखी हुई हैं। यह तो उस धर्म को मानने वाले लोगों के चाल-चलन और बर्ताव से तय होने वाली बात रहती है। फिर अधिकतर धर्मों में धार्मिक किताबों से लेकर मानने वालों के चाल-चलन तक कुछ बुनियादी बेइंसाफी चली ही आती है। कहीं दलितों के खिलाफ, तो कहीं पति खो चुकी महिला के खिलाफ, तो कहीं किसी लांछन की शिकार महिला के खिलाफ, त्रेता और द्वापर युग से लेकर अब तक यह चले ही आ रहा है। और यह बात सिर्फ हिन्दू धर्म में है, ऐसा भी नहीं है। दूसरे भी बहुत सारे धर्मों में महिलाओं और दीगर कमजोर तबकों के खिलाफ बेइंसाफी की बातें भरी हुई हैं। नतीजा यह होता है कि जब मध्यप्रदेश में कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर सवार होकर बारात के साथ निकलता है, तो उस पर गांव के सवर्ण पथराव करते हैं। शर्मिंदगी की ऐसी तस्वीरें भी मध्यप्रदेश से कई बार सामने आती हैं जब ऐसी बारात को सुरक्षा देते हुए साथ चलती पुलिस हेलमेट लगाकर पैदल चलती है, और दूल्हे को भी घोड़ी पर हेलमेट पहना दिया जाता है। 

यह पूरा सिलसिला किसी धर्म, किसी देश, किसी प्रदेश, या किसी जाति के लोगों को शर्मिंदगी में डुबाने के लिए काफी होना चाहिए, लेकिन ये तमाम तबके ऐसे चिकने घड़े बन चुके हैं जिन पर शर्मिंदगी की एक बूंद भी नहीं टिक पाती, उसे छू भी नहीं पाती। 

जब देश में एक धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए भडक़ाया और उकसाया जाता है, जब दूसरे धर्म का एक काल्पनिक खतरा सामने खड़ा किया जाता है, और फिर कुछ ऐसा ही एक जाति में दूसरी जाति के खिलाफ पैदा किया जाता है, ऊंची कही जाने वाली जातियों को यह खतरा दिखाया जाता है कि नीची कही जाने वाली जातियां एकजुट होकर एक दिन हमलावर हो जाएंगी, तो ऐसे में सदियों से चले आ रहा सामाजिक तनाव पिछली पौन सदी के लोकतंत्र को अनदेखा करके सडक़ों पर हिसाब चुकता करने में लग जाता है। आज यह सामाजिक तनाव बढ़ाते-बढ़ाते इस हद तक पहुंचा दिया गया है कि लोगों को अपनी जाति के बलात्कारी सुहाने लगे हैं, और दूसरी जाति की बलात्कार की शिकार लडक़ी भी सजा की हकदार लगने लगी है। यह सिलसिला देखकर किसी की लिखी यह लाईन याद आती है कि जिन्हें नाज है हिन्द पर वे कहां हैं? 

दो राष्ट्रवाद लोगों के बीच एक अभिमान भरने वाला होना चाहिए, उसे अभिमान के लायक तो कुछ मिल नहीं रहा है, और शर्मिंदगी उसे होना बंद हो चुकी है। यह सिलसिला इस देश को टुकड़े-टुकड़े कर रहा है, लेकिन लोगों को ये दरारें अभी दिख नहीं रही हैं क्योंकि लोगों को अपने ही तबकों, अपनी बिरादरियों के भीतर मगन रहना सिखा दिया गया है। अपने तबके के बलात्कारियों को बचाने में जिस तबके को गौरव हासिल होता हो तो उस तबके के लोगों के धर्म और जाति अपनी इज्जत की फिक्र खुद कर लें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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