संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : चीनी नौजवानों से कुछ सीखकर वसीयत करें..
10-Apr-2021 5:35 PM (72)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  चीनी नौजवानों से कुछ सीखकर वसीयत करें..

चीन की खबर है कि वहां लोग कोरोना के खतरे के चलते बड़ी संख्या में अपनी वसीयत रजिस्टर करवा रहे हैं। चीनी कानून के मुताबिक 18 बरस से ऊपर के कोई भी नागरिक वसीयत कर सकते हैं और एक फीस देकर उसे रजिस्टर भी करवा सकते हैं। बुजुर्गों के लिए वसीयत रजिस्टर करवाना सरकार की तरफ से मुफ्त है। पिछले बरस कोरोना फैलने और लोगों के मरने को देखते हुए चीनी नौजवानों में भी बड़ा डर फैला हुआ है और वे अपने मां-बाप से लेकर अपने बच्चों तक की देखभाल के हिसाब से वसीयत कर रहे हैं। नौजवानों के लिए वसीयत रजिस्टर करना सस्ता नहीं है, इसके लिए उन्हें करीब तीन हजार डॉलर की फीस देनी पड़ती है जो कि सवा दो लाख रुपये के बराबर होती है, इसके बावजूद नौजवान बड़ी संख्या में वसीयत रजिस्टर करवा रहे हैं।

 
इसी अखबार में बीच-बीच में हम कभी मजाक के अंदाज तो कभी गंभीरता से यह सलाह देते आए हैं कि लोगों को अपनी बारी के आने के पहले अपनी वसीयत कर देनी चाहिए, और लेन-देन का हिसाब भी चुकता कर देना चाहिए। इन कामों में वसीयत करना ही सबसे सस्ता है और हिंदुस्तान में तो दो-चार हजार रुपये में ही वसीयत रजिस्टर हो सकती है। जिन लोगों को अपने पर कोरोना का खतरा नहीं दिख रहा है उन्हें भी यह समझना चाहिए कि अच्छी भले चलते-फिरते लोग भी कोरोना से परे की बीमारियों से कभी भी खत्म हो जाते हैं, और आम से लेकर खास तक सभी किस्म के लोग सडक़ हादसों के भी शिकार हो जाते हैं। इसलिए महज कोरोना की वजह से नहीं जिंदगी पर हमेशा छाई रहने वाली एक अनिश्चितता की वजह से भी लोगों को परिवार में बंटवारा, जमीन-जायदाद के विवाद, लेन-देन, जमा करके रखी हुई या छुपाई हुई दौलत, इन सबकी एक वसीयत कर जाना चाहिए ताकि बाद में अगली पीढ़ी के बीच उसे लेकर सिर-फुटव्वल की नौबत न आए, और बच्चों के रिश्ते आपस में ठीक बने रहें। दुनिया की कड़वी हकीकत यह है कि बहुत से मां-बाप अपने बच्चों के बीच कोर्ट-कचहरी में जिंदगी बर्बाद करने का सामान छोडक़र जाते हैं। लोगों को अपने रहते-रहते कानूनी जिम्मेदारियां पूरी कर देनी चाहिए ताकि बाद में उनके हिस्से का यह काम वकीलों और जजों के सिर पर न आए। 

दरअसल इंसानी फितरत ही ऐसी रहती है कि वह अपना बुरा होने की कल्पना नहीं करती। उसे लगता है कि सडक़ हादसा किसी और का होगा, कोरोना या दूसरी बीमारी भी किसी और को होगी, और उनकी मौत तो चिट्ठी लिखकर तीन महीने का वक्त देकर आएगी। नतीजा यह निकलता है कि लिखने वाले लेखक भी जरूरी बातों को वक्त रहते लिखना जरूरी नहीं समझते और फिर वह लिखना कभी हो ही नहीं पाता। जब उनका वक्त आता है, तो वह कोई वक्त नहीं देता। 
चीन के लोग कई मायनों में कारोबारी कामयाबी के अलावा दुनिया भर में फैलकर अपना बेहतर कॅरियर बनाने के लिए जाने जाते हैं। चीन के पेशेवर लोग और वहां के छोटे-बड़े कारोबारी पिछले एक पीढ़ी में ही कामयाबी की सीढ़ी पर चढक़र आसमान तक पहुंचे हुए हैं। शायद इसीलिए वे अपने ताजा-ताजा हासिल को लेकर अधिक जिम्मेदारी दिखा रहे हैं, और नौजवानी में ही वसीयत कर रहे हैं। एक परंपरागत हिंदुस्तानी परिवार में तो परिवार के मुखिया के गुजर जाने के बाद जब मृत्यु संस्कार पूरे निपट चुके रहते हैं, तब आम तौर पर परिवार मुखिया की तिजोरी, आलमारी, या संदूक खोलते हैं और देखते हैं कि क्या-क्या छूटा हुआ है। इसके बाद शुरू होता है अदालती झगड़े का सिलसिला जो कि अगली पीढ़ी तक चलने की संभावना ही अधिक रहती है। 

यह सिलसिला इसलिए खराब है कि इससे देश की अदालतों पर एक अवांछित बोझ बढ़ता है जिसे कि टाला जा सकता था। इसके अलावा वारिसों के बीच जितना तनाव खड़ा हो जाता है वह उनकी अगली पीढ़ी तक भी जारी रह सकता है, और हमने पहले भी यहां लिखा था कि भाईयों के बीच जब दीवार उठती है, तो जरूरत से काफी अधिक ऊंची उठती है।

न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि तमाम जगहों पर लोगों को वसीयत की औपचारिकता अपने सेहतमंद रहते हुए, और किसी खतरे के आने के पहले ही कर लेनी चाहिए। जो लोग ऐसा इंतजाम कर लेते हैं वे हो सकता है कि अपने लिए बेहतर वृद्धाश्रम का इंतजाम कर लें, या फिर परिवार के भीतर ही वारिसों से बेहतर सम्मान पा लें। हर हिसाब से यह काम समय रहते कर लेना चाहिए। जिस तरह भारत सरकार ने एक आधार कार्ड की व्यवस्था की, परिवारों के लिए राशन कार्ड की व्यवस्था की, लोग अपने दस्तावेज ऑनलाइन रख सकें इसके लिए डिजिलॉकर मुफ्त में उपलब्ध कराया, उसी तरह सरकार को वसीयत मुफ्त बनवाने का विकल्प भी उपलब्ध करवाना चाहिए इससे देश की अदालतों पर बोझ घटेगा और पारिवारिक-समरसता बनी रह सकेगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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