संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : हर कुछ महीनों में बिखरी चुनावी गंदगी लोकतंत्र का क्या भला कर रही?
14-Apr-2021 6:09 PM (133)
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : हर कुछ महीनों में बिखरी चुनावी गंदगी लोकतंत्र  का क्या भला कर रही?

cartoonist kirtish bhatt bbc

जब जनतंत्र और जिंदगी में से किसी एक को बचाने की प्राथमिकता तय करना हो तो जाहिर तौर पर पहले जिंदगी को छांटना चाहिए क्योंकि जन है तो ही तंत्र है, जनतंत्र तो बाद में बना है, पहले तो जन ही था, और आखिरी तक जन ही रहने चाहिए। अब यह सवाल हम आज इसलिए उठा रहे हैं कि हिंदुस्तान में जनतंत्र जारी और कायम रखने के नाम पर चुनाव नाम का जो ढकोसला चल रहा है, उस ढकोसले को समझने की जरूरत है। अगर यह नहीं होता तो लोगों के मन में बेचैनी रहती कि देश में लोकतंत्र नहीं है अब यह है तो कम से कम एक दिखावा है कि लोगों को वोट डालने मिलता है, और उनके वोटों से चुनी हुई सरकार बनती है। यह एक अलग बात है कि वह बनी हुई सरकार कितने समय में गिर जाती है, यह देख-देखकर भी लोग थक गए हैं। फिर भी पाखंडपसंद हिंदुस्तानी इस बात को बहुत पसंद करते हैं कि चुनाव होते रहना चाहिए। 

अब इस बार जब इन चुनावों को कोरोना के खतरे के साथ मिलाकर देखें तो लगता है कि क्या सचमुच यह चुनाव इस तरह से, इस कीमत पर होते रहना चाहिए? यह साफ-साफ दिख रहा है कि हिंदुस्तान के जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें से अधिकतर में कोरोना के खतरे को कम दिखाने के लिए आबादी के अनुपात में जांच कम हो रही है, आंकड़ों को छुपाया जा रहा है, और एक अविश्वसनीय तस्वीर पेश की जा रही है कि मानो कुछ हुआ ही नहीं है। हिंदुस्तान के कार्टूनिस्टों ने अब तक 100 से अधिक कार्टून इस बात पर बना लिए हैं कि चुनावों के बीच कोरोना वायरस किस तरह खत्म हो जाता है और किस तरह पूरे देश को कोरोना वायरस  से बचाना हो तो पूरे देश में चुनाव की घोषणा कर देनी चाहिए। अभी यह भी समझने की जरूरत है कि कुछ समय पहले से देश के मोदीमय हो जाने पर यह मांग उठने लगी थी कि वन नेशन वन इलेक्शन करवाया जाए। मतलब यह कि पूरे देश में एक साथ चुनाव हो, विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ हों, और हो सके तो स्थानीय संस्थाओं के चुनाव भी साथ-साथ हो जाएं ताकि पंचायत और म्युनिसिपल तक भी मोदी के नाम पर चुनाव लड़े जा सकें, जीते जा सकें । 

हम तकनीकी रूप से ऐसे किसी विकल्प के पक्ष में लिख चुके हैं कि एक साथ होने वाले चुनाव से देश में एक तो चुनाव का खर्च घटेगा, दूसरी तरफ चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दल जिस तरह के समझौते करते हुए सरकारी फिजूलखर्ची करते हैं, जिस तरह से नाजायज वायदे करते हैं, वह सब भी घटेगा।  हम इस हद तक तो वन नेशन वन इलेक्शन के हिमायती रहते आए हैं। अभी दो और वजह से हम इसके बारे में सोच रहे हैं। बंगाल के चुनाव को लेकर वहां राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच जितने किस्म की चुनावी गंदगी हुई है वह भयानक है। केंद्र और राज्य के संबंध जिस हद तक खराब हुए हैं वह भी अभूतपूर्व है। और अभी तो चुनावी नतीजे आना बाकी हैं, जिसके बाद हो सकता है कि तोडफ़ोड़ और खरीदी-बिक्री का एक नया सिलसिला नई ऊंचाइयों तक पहुंचे। फिर जिस तरह मेहरबान चुनाव आयोग ने 8 किस्तों में बंगाल का मतदान बांटकर दिल्ली के बड़े नेताओं को बंगाल की तकरीबन हर विधानसभा सीट तक पहुंचने का एक अभूतपूर्व मौका दिया है, वह भी देखने लायक है। बंगाल का पूरा सिलसिला देखें तो समझ पड़ता है कि क्या इतनी गंदगी देश के अलग-अलग राज्य में घूम-घूमकर हर कुछ महीनों के बाद करना ठीक रहेगा जब वहां विधानसभा चुनाव हो रहे होंगे? यह सिलसिला केंद्र और राज्य के संबंधों को तबाह करने वाला भी है। जब लोगों के बीच आपस में बातचीत के भी रिश्ते ना रह जाएं, और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को यह लगने लगे कि प्रधानमंत्री के उस राज्य में आने पर भी उन्हें लेने जाना, उनके कार्यक्रम में जाना अपनी बेइज्जती करवाना होगा, यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। 

ऐसा लगता है कि वन नेशन वन इलेक्शन चाहे पूरे देश में एक नेता के पक्ष में सुनामी की तरह क्यों ना हो, सच तो यह है कि उससे चुनावी गंदगी कुछ महीनों में निपट जाएगी जो कि आज बारहमासी हो चुकी है। अगली जिस बात पर पर हम सोच रहे हैं वह कोरोना का खतरा है या कि ऐसी आने वाली किसी दूसरी महामारी का। असम से लेकर बंगाल तक और तमिलनाडु से लेकर केरल तक यह देखने में आ रहा है कि राजनीतिक दलों के मन में चुनाव की कीमत पर कोरोना के खतरे के लिए हिकारत के सिवाय कुछ नहीं है। राजनीतिक दलों ने चुनाव के लिए मतदाताओं की लाखों की भीड़ को जिस तरह कोरोना के खतरे में झोंक दिया है, उससे भी लगता है किसी देश में लोकतंत्र को बचाने का पाखंड आखिर किस कीमत पर किया जाए? अगर करोड़ों की आबादी वाले राज्यों को वहां एक-एक सीट पर लाखों वोटरों को इस तरह लापरवाह करके, कोरोना के हवाले करके, चुनाव लड़ा और जीता जाना है, तो देश पर इस खतरे से बेहतर यह है कि जिसे चुनाव जीतना है वह जीत ले, लेकिन बयानों की गंदगी से लेकर कोरोना के खतरे तक इन सबको 5 बरस में एक बार के लिए कर दिया जाए। 

जिस तरह कुंभ मेला 12 बरस में एक बार होता है, और दो कुंभ के बीच 6 बरस के फासले पर अर्धकुंभ होता है, वैसे ही चुनाव भी इस देश में एक फासले पर हो जाने चाहिए ताकि उनके बीच की गंदगी खत्म हो जाए। चुनाव के बीच जिस तरह कुंभ को लेकर नेता और सरकार लापरवाह हैं, धार्मिक नेता इसका मजा ले रहे हैं, देश की अदालतें अपने आपको सुरक्षित कमरों में बंद करके आंखें बंद किए बैठी हैं, उससे भी लगता है कि देश के चुनावों को कुंभ के साथ भी जोड़ देना चाहिए। जिस बरस कुंभ हो, उसके आगे-पीछे चुनाव भी हो जाने चाहिए ताकि सभी किस्म की गंदगी का खतरा, और महामारी का खतरा एक साथ चले जाएं। हर कुछ महीनों में देश में खतरे कहीं ना कहीं खड़े होते रहे वह ठीक नहीं है, तमाम किस्म के खतरे एक साथ आ जाने चाहिए, एक साथ चले जाने चाहिए।  ताकि उससे उबरकर हिंदुस्तानी जनता आगे देख सके, आगे तकरीबन 4 बरस काम कर सके। 

देश में चुनावों के दौर में जिस हद तक नफरत के उन्माद को बढ़ाया जा रहा है, उतनी नफरत और उतना उन्माद हर दो-चार महीने में अलग अलग राज्य चुनाव में सामने आता रहे वह भी ठीक नहीं है। जिस नेता की पार्टी को वन नेशन वन इलेक्शन से सबसे अधिक उम्मीदें हैं, वही जीत जाए, यह देश नफरत से परे रह ले, महामारी के खतरे से बच जाए। लोकतंत्र पर नाजायज चुनावी वायदों का बोझ ना पड़े वह अधिक जरूरी है। यह सिलसिला खतरनाक हो गया है, राज्यों के चुनाव लोकतंत्र के बदन को चकलाघर पर खरीदने बेचने का एक और मौका बनकर आने लगे हैं, ऐसी कमाई से भला किस लोकतंत्र की इज्जत बढ़ रही है? जिन पार्टियों को वन नेशन वन इलेक्शन में हार जाने का खतरा दिखता है, उन पार्टियों की वैसे भी आज के भारतीय लोकतंत्र में क्या गुंजाइश बच गई है? ये तमाम सवाल बहुत तकलीफदेह हैं, लेकिन यही साफ दिख रहा है कि चुनावी गंदगी से लेकर कोरोना की गंदगी तक, मरना तो लोकतंत्र को है लोक को है, और तंत्र तो लोक से वैसे भी कट चुका है।

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