संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : कोरोना के टीके लगवाएं या नहीं, एक दुविधाभरा सवाल
15-Apr-2021 5:49 PM (101)
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय :  कोरोना के टीके लगवाएं या नहीं, एक दुविधाभरा सवाल

जो लोग आज कोरोना के शिकार हो चुके हैं या जो लोग आज कोरोना से बचे हुए हैं, ऐसे तमाम लोगों के सामने एक दुविधा है कि वे टीका लें या ना लें। यह दुविधा भी तब है जब वे अपने देश में मिल रहे टीकों को पाने के हकदार माने जा रहे हैं। हिंदुस्तान में जहां कि आज केंद्र सरकार ही टीके देना तय कर रही है और यह भी तय कर रही है कि किस उम्र के किन लोगों को ये पहले मिलें तो ऐसे में यह पसंद या नापसंद की दुविधा भी इसी उम्र के लोगों के सामने है या ऐसी ही बीमारी वाले लोगों के सामने है। दूसरी तरफ दुनिया के बहुत से देशों में जहां आज लोग अपनी मर्जी से टीके लगवाने की आजादी रख रहे हैं वहां भी उनके सामने यह दुविधा है कि कोरोना से बचाव के टीके के बारे में जितनी खबरें आ रही हैं उन्हें देखते हुए वे टीका लगवाएं या ना लगवाएं?

इस बात को समझने के लिए सबसे पहले तो इस बात पर गौर करना जरूरी है कि कोरोना वायरस करीब एक बरस ही पुराना है। और उसका टीका शायद आधा बरस पुराना ही है। इतिहास गवाह है कि टीकों के विकास में लंबा समय लगता है और क्योंकि यह महामारी बहुत सी जिंदगियां ले रही है इसलिए आधी-अधूरी तैयारी के साथ ही इन टीकों को परीक्षण के तौर पर लगाया जा रहा है। आज जब यह सवाल उठता है कि इन टीकों का असर कितने समय तक रहेगा, तो इसका जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि उतना तो समय ही इन्हें बने हुए नहीं हुआ है, ऐसे में यह टीके परीक्षण ही हैं। और इसीलिए हिंदुस्तान जैसे कड़ाई से नियम लागू करने वाले देश में भी लोगों को यह छूट दी गई है कि वे चाहें तो टीके लगवाएं, और ना चाहें तो ना लगवाएं।
 
हिंदुस्तान के अधिकतर लोग टीका लगाते दिख रहे हैं, जबकि कुछ लोगों के मन में लगातार यह संदेह है कि दुनिया भर में जगह-जगह इस टीके के लगने के बाद, इस टीके के लगने की वजह से बहुत से लोगों की तबियत बिगड़ी है और मौतें भी हुई हैं। कुछ देशों ने कुछ टीकों पर रोक भी लगाई है कि नौजवानों पर ऐसे टीकों का बुरा असर हो रहा है और उनके खून में थक्के जम रहे हैं। लेकिन एक सवाल यह भी उठता है कि टीका लगाने के बाद लोगों को होने वाले कोरोना वायरस में जितनी कमी आई है, और कोरोना होने पर भी उनके लक्षण जितने कम खतरनाक दिखे हैं, टीका लगे हुए लोग जितने दूर तक मौत से बचे हुए हैं, उसे देखते हुए क्या टीका लगवा लेना चाहिए? यह सवाल छोटा नहीं है, यह सवाल बड़ा है, लेकिन इस सवाल से भी अधिक बड़ा एक दूसरा सवाल है कि आज सार्वजनिक जीवन में जिस रफ्तार से कोरोना का संक्रमण फैल रहा है, वैसे में क्या इंसानों को सचमुच ही इस बात का सामाजिक और नैतिक हक है कि वे अपने निजी फैसले से समाज के बाकी लोगों को खतरे में डालें? यह बात छोटी नहीं है क्योंकि दुनिया के तकरीबन तमाम लोकतांत्रिक देशों ने लोगों को छूट दी है कि वे चाहें तो ही टीके लगवाएं। 

हिंदुस्तान भी ऐसे ही देशों में से एक है जो कि आज बढ़ते हुए कोरोना संक्रमण की वजह से दुनिया में सबसे ऊपर पहुंच गया है। ऐसे में चिकित्सा विज्ञान की सीमाओं के सीमित रहते हुए भी सवाल यह उठता है कि उन सीमाओं के भीतर अगर कोई संभावना दिख रही है तो क्या उन संभावनाओं पर काम करना हमारी सामाजिक जवाबदेही और जिम्मेदारी नहीं है? यह बात निर्विवाद रूप से साबित होते दिख रही है कि कोरोना वायरस से बचाव के टीकों से संक्रमण कम हो रहा है और संक्रमण की मार भी कम हो रही है। आज टीका कितने महीने काम करेगा, कितने महीने बाद उसका असर खत्म हो जाएगा, जैसे कई सवाल लोगों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन विज्ञान की अपनी सीमाएं हैं, वह रातों-रात हर सवाल का जवाब ढूंढकर पेश नहीं कर सकता। आज दवा उद्योग से निकली खबरें यह भी बताती हैं कि हो सकता है कि लोगों को हर बरस यह टीके लगवाने पड़े, और टीकों के जानकार वैज्ञानिक इस बात पर भी मेहनत कर रहे हैं कि क्या किसी एक टीके के दो या अधिक डोज के मुकाबले अलग-अलग टीमों को देना अधिक असरदार हो सकता है?
 
ऐसे बहुत से सवालों के जवाब आते-जाते रहेंगे, लेकिन मौत बहुत रफ्तार से आ रही है, हिंदुस्तान में तो सरकार और म्युनिसिपल की मुर्दों के जलाने की क्षमता से अधिक रफ्तार से मौतें आ रही है। और यह सब हो रहा है जब चारों तरफ तरह-तरह से लॉकडाउन लगाया गया है, रात का कफ्र्यू लगाया गया है। लेकिन यह रोक-टोक पूरी जिंदगी तो चल नहीं सकती, और ऐसे में रोक-टोक उठने के बाद फिर कोरोना अधिक रफ्तार से बढ़ सकता है।  इसलिए लोगों को अपने टीके लगवाने के फैसले के वक्त यह भी सोचना चाहिए कि समाज के प्रति, परिवार और बाकी लोगों के प्रति, उनकी क्या जवाबदेही है, और अगर टीकों का असर कुछ महीनों के लिए भी उनको कोरोना से या उसकी गहरी मार से बचाकर रख सकता है तो क्या वह भी कोई छोटी बात रहेगी? दुनिया में हमेशा ही बहुत से ऐसे लोग रहते हैं जिन्हें हवा में भूत दिखते हैं जो कि शंकाओं से भरे रहते हैं, जिनका मन तरह-तरह की साजिशों की कहानियां पर बहुत भरोसा करता है, ऐसे लोगों को आज भी कोरोना के टीकों में खामियां ही खामियां दिख रही हैं, लेकिन जिनको यह भी लग रहा है कि यह टीके लगवाने में कोई खतरा हो सकता है, उन्हें भी यह समझना चाहिए कि अपने परिवार और समाज के प्रति उनकी क्या जिम्मेदारी है। उनकी जिद, उनका दुराग्रह, उनका आशंकाओं से भरा मन कहीं बाकी तमाम लोगों के लिए खतरा तो नहीं बन रहा है। 

हम तो महज इतना लिख सकते हैं, इसके बाद जब तक लोकतंत्र लोगों को टीके लगवाने या ना लगवाने का फैसला करने की छूट दे रहा है, तब तक वे जितना चाहे समय ले लें, लोगों को जितना चाहे उतना खतरे में डाल दें। दुनिया के इतिहास में बीमारियों से बचाव के टीके लगवाने के वक्त बहुत से लोग पीछे हटते रहे, हिंदुस्तान में अभी कुछ बरस पहले तक पोलियो का टीका अपने बच्चों को लगवाने से मुस्लिम समाज के बहुत से लोग हिचकते रहे कि वह टीका अमेरिका का बनाया हुआ था और उस टीके से उनके बच्चे कुनबे को आगे बढ़ाने की क्षमता खो बैठेंगे। ऐसी क्षमता तो किसी ने नहीं खोई, लेकिन ऐसे मां-बाप के बच्चे पोलियो के शिकार जरूर हुए। इसलिए यह वक्त अपने पूर्वाग्रहों को अलग रखकर समाज के व्यापक भले को समझने का है।
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