संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : दूसरों को तौलने की जरूरत नहीं, अपने मन में अपने को ही तौल लें
19-Apr-2021 5:41 PM (86)
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : दूसरों को तौलने की जरूरत नहीं, अपने मन में अपने को ही तौल लें

photo courtsey navbharat times

दिल्ली से थोड़ी सी दिल दहलाने वाली खबर आई है, अगर अब तक लोगों का दिल दहलना जारी है। एक रिटायर्ड पुलिस अफसर की तीन बेटियां, तीनों की शादी, उनमें से दो दिल्ली में ही बसी हुई हैं, लेकिन अपने बीमार बाप को देखने नहीं पहुंचीं क्योंकि उन्हें डर था कि बाप को कोरोना हो सकता है। बाप ने घर के बाहर पोस्टर लगा रखा था कि मर जाने पर उसकी लाश को पुलिस को दे दिया जाए। एक बेटी ने पुलिस को फोन पर बताया कि वह इस डर से अपने बाप को देखने नहीं जा रही है। ऐसे में पुलिस वहां पहुंची, और मौके पर गए सिपाहियों ने कई घंटे तक बुजुर्ग को समझाया तो वे अस्पताल जाने के लिए तैयार हुए। सिपाही उसे ले जाकर अस्पताल में भर्ती करने के बाद भी उसका ख्याल करते रहे। बस, यह खबर यहीं खत्म है। इधर हिंदुस्तान के दूसरे बहुत से शहरों से दिल को छूने वाली खबरें भी आ रही हैं कि किस तरह घर के लोग नहीं है इसलिए पड़ोस के दूसरे मजहब के लोग भी ले जाकर किसी का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। ऐसी अनगिनत खबरों के बीच गुजरात की यह खबर भी आई है कि वहां के भाजपा नेताओं ने श्मशान में हिंदू लाशों के अंतिम संस्कार में मदद कर रहे मुस्लिम वालंटियरों का विरोध किया है। खैर इस तबके की क्या बात की जाए जो कि आज भी नफरत पर जिंदा है। बात उन लोगों की करनी है जो आज ऐसे वक्त पर अपनों से भी डरे-सहमे हैं, या दूसरों की मदद में अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं। 

महामारी का यह वक्त रिश्तों की परिभाषाओं को एक बार फिर तय करने का मौका भी है। आज जब कुछ लोग रात-दिन खतरे की फिक्र किए बिना कहीं मरीजों को अस्पताल पहुंचा रहे हैं, तो कहीं सड़कों पर बेघर लोगों को खाना खिला रहे हैं, कहीं लाशों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं, तो कहीं किसी और तरह से मदद। ये आखिर उन अनजानों के हैं कौन? ये रिश्ता क्या कहलाता है? दूसरी तरफ आज जिनके सिर पर कोरोना नाम का यह कहर टूट पड़ा पड़ा है उनके सामने भी रिश्ते बड़ी अजीब सी शक्ल अख्तियार करके खड़े हो गए हैं। आसपास के लोग कहीं जिम्मेदारी से परे जाकर मदद कर रहे हैं, तो कहीं जिम्मेदारी को छोड़कर भाग जा रहे हैं, और लोगों की शिनाख्त हो रही है, अपनों की शिनाख्त हो रही है, और मुसीबत के वक्त नए दोस्त, नए हमदर्द भी बन रहे हैं। लेकिन यह मौका इससे परे की कुछ बातों के बारे में भी सोचने का है। बहुत पहले लोगों ने ऐसी कहानी सुनी होगी कि नाव पर लोग अपने दोस्त और परिवार के चार लोगों के साथ सवार हैं, और नाव पर कुल दो को ले जाया जा सकता है, ऐसे में अलग-अलग लोगों से पूछा जाता है कि वे कौन से दो लोगों को बचाना चाहेंगे? कुछ ऐसी ही कहानी किसी हवाई जहाज को लेकर भी चलती है और लोगों से पूछा जाता है कि पैराशूट अगर केवल दो होंगे, तो वे किन दो लोगों को बचाना चाहेंगे? और यह लोगों के रिश्तों को तय करने की बात भी रहती है कि लोग अपने मन के भीतर ही यह अंदाज लगा सके कि जब जिंदा रहने की संभावना सीमित रहेगी, तो लोग किसे बचाएंगे? अपने बूढ़े मां-बाप को बचाएंगे? अपने हमउम्र जीवनसाथी को बचाएंगे? या अपने बच्चों को बचाएंगे? पल भर के लिए मान लें कि लोग अपनी पीढ़ी के लिए स्वार्थ को छोड़ भी देते हैं, तो भी अपने से एक पीढ़ी ऊपर, और अपने से एक पीढ़ी नीचे में से किसी एक को छांटना बहुत आसान बात तो होगी नहीं! सोचने के लिए जिन्हें किसी मिसाल से मदद मिल सकती है, उन्हें हम एक असली खबर बता सकते हैं। मुंबई के विख्यात टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल ने एक सर्वे किया। वहां जिन बच्चों की जांच में उन्हें कैंसर निकालता था, और उन्हें इलाज के लिए लाने कहा जाता था, उनमें से बहुत ही कम लड़कियों को मां-बाप वापिस लाते थे, बेटों को जरूर इलाज के लिए लेकर आते थे। 

दिल्ली की जिस खबर से आज इस मुद्दे पर लिखना सूझा है, उस खबर में उस बुजुर्ग रिटायर्ड अफसर की तीन बेटियां, तीनों शादीशुदा, और उसकी देखभाल करने कोई भी मौजूद नहीं, कोई भी झाँकने भी तैयार नहीं, और लोग आमतौर पर यह मानते हैं कि बुढ़ापे में बेटे ख्याल रखें या ना रखें, बेटियां तो ख्याल रखती ही हैं। हम इस घटना से बेटियों के बारे में कोई अधिक व्यापक का छवि बनाना नहीं चाहते क्योंकि एक अकेली कहानी किसी तबके का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। लेकिन आज सवाल यह है कि जब अस्पताल में बिस्तर हासिल नहीं है, आईसीयू में ऑक्सीजन या वेंटीलेटर हासिल नहीं है, तब अगर किसी परिवार के दो लोगों को एक ही जरूरत है, तो परिवार में फैसला लेने वाले लोग क्या फैसला लेंगे? यह सवाल कम असुविधा का नहीं है, और अधिकतर लोग यही सोचेंगे कि यह फिजूल का सवाल है, यह बात डॉक्टर पर छोड़ दी जाएगी कि वह किसके लिए वेंटिलेटर अधिक जरूरी समझते हैं, लेकिन सच में ही ऐसी नौबत आ सकती है जब सुविधा किसी एक के लिए हो, और दांव पर एक से अधिक जिंदगियां लगी हों, खर्च की ताकत सीमित हो, तब लोग क्या करेंगे यह सवाल बहुत ही कठिन है, और बहुत से लोगों के लिए कल्पना में भी यह सवाल शायद जिंदगी का सबसे कठिन सवाल होगा। हम महज इस सवाल पर लाकर इस बात को छोड़ देना चाहते हैं, क्योंकि लोगों को ऐसे किसी मौके पर तय तो अपने मन के भीतर करना होगा और जब तक ऐसा मौका आता नहीं है हम क्यों उन्हें उनकी ही नजरों के सामने, उनकी ही भावनाओं के भीतर उन्हें नीचा दिखाएं ?

आज इतने कठिन सवाल से कुछ कम कठिन सवाल भी लोगों के मन में तैर रहे हैं, जरूरी सामान लेने खतरे के बीच बाजार कौन जाए, और कौन ना जाए? बाहर सब्जी खरीदने कौन निकले, और कौन न निकले? अस्पताल की दौड़-भाग का जिम्मा अपने पर कौन ले? और खासकर जब एक से अधिक लोग ऐसे काम के लिए परिवार के भीतर हासिल हों तब यह देखने लायक बात रहती है कि परिवार के भीतर भी किस तरह का स्वार्थ और किस तरह का त्याग सामने आता है । यह कुछ उसी किस्म का रहता है कि जब परिवार में किसी को किडनी देने की बारी आती है, या किसी और किस्म के अंगदान की नौबत आती है, तब कौन खुद होकर सामने आते हैं? ऐसे बहुत से कठिन सवाल आज कई लोगों की जिंदगी में खड़े हुए हैं। दूसरों को तौलने की जरूरत नहीं, अपने मन में अपने को ही तौल लें। 

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