संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : देश के बड़े जज अपना देश देखने न्यायमित्र क्यों तैनात नहीं कर लेते?
27-Apr-2021 4:14 PM (327)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : देश के बड़े जज अपना देश देखने न्यायमित्र क्यों तैनात नहीं कर लेते?

कार्टूनिस्ट मीका अजीज़

बहुत अरसा पहले जब हिंदी फिल्में एक ढर्रे पर बनती थीं तो उनमें कोई गुंडा आकर हीरोइन का बटुआ छीनकर भागता था और हीरो आकर उस गुंडे को पीट-पीटकर वह बटुआ लाकर हीरोइन को देता था और उसका दिल जीत लेता था। फिर फिल्मों में ही इसे एक तरकीब की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा और हीरो भाड़े के ऐसे गुंडे से हीरोइन का पर्स छिनवाता था और उसे लाकर देकर अपने आपको हीरो साबित करता था। इसी किस्म से हिंदी फिल्मों का एक और जमा-जमाया ढर्रा चल रहा था कि फिल्म के आखिर में जब हीरो विलेन को मार-मारकर हीरोइन को छुड़ा चुका रहता है, और विलेन को जमीन पर पटक-पटककर जख्मी कर चुका रहता है तब पुलिस की जीप सायरन बजाते पहुंचती है और महज गिरफ्तार करने का काम करती है। हिंदुस्तान की कई संवैधानिक संस्थाओं का हाल आज कुछ इसी किस्म से चल रहा है। 

पिछले दो दिनों से मद्रास हाईकोर्ट का चुनाव आयोग के खिलाफ एक हमलावर तेवर खबरों में बना हुआ है जिसमें चुनाव प्रचार की वजह से फैले कोरोना संक्रमण को देखते हुए हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि उसकी गैर जिम्मेदारी तो इस दर्जे की है कि उसके खिलाफ हत्या का जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने इतनी कड़ी बातें कही हैं कि हिंदुस्तान की जनता खुश हो गई कि चुनाव आयोग को अच्छी जमकर लताड़ पड़ी। लेकिन अब सवाल यह है कि मद्रास हाईकोर्ट का यह रूप कब देखने में आ रहा है? उस दिन जिस दिन कि वोट डाले हुए 20 दिन हो चुके हैं? चुनाव कार्यक्रम घोषित हुए शायद दो महीने, और चुनाव प्रचार खत्म हुए भी 20 दिन से अधिक हो चुके हैं, तब जाकर अगर हाईकोर्ट को यह दिख रहा है कि पूरा चुनाव जनता की सेहत को खतरे में डालकर करवाया जा रहा है तो यह देखना आज किस काम का रह गया है? सोशल मीडिया पर लोगों ने यह भी कहा है कि क्या हत्या का जुर्म सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भी दर्ज नहीं होना चाहिए जो कि देशभर में चुनाव-प्रचार और कोरोना की मिली-जुली कदमताल देखते हुए भी चुप बैठे हुए थे? और सवाल यह है कि जब असम से लेकर बंगाल तक और केरल से लेकर तमिलनाडु तक चारों तरफ चुनाव चल रहे थे, चारों तरफ यह लिखा जा रहा था कि ऐसा भयानक चुनाव प्रचार, ऐसी भयानक रैलियां, लोगों को खतरे में डालकर छोड़ेंगे और कोरोना इन्हें देखकर बहुत खुश हो रहा है, क्या उस वक्त भी देश के सुप्रीम कोर्ट को यह नहीं दिखा कि बंधुआ मजदूर की तरह काम करते हुए चुनाव आयोग से परे, देश की सबसे बड़ी अदालत को भी कुछ करना चाहिए? और अगर सुप्रीम कोर्ट ने अपना जिम्मा पूरा नहीं किया, तो फिर आज कागजी और सतही सुनवाई करके सरकार को कोरोना के मोर्चे पर कटघरे में खड़ा करने का क्या मतलब है?

मद्रास हाईकोर्ट का फैसला हिंदी फिल्मों में बीते वक्त में आखिर में सायरन बजाते हुए पहुंची पुलिस जीप की तरह का है, जिससे अब केवल चुनाव की मतगणना की गर्दन हाईकोर्ट के हाथ में आ रही है, और चुनाव आयोग ने अदालत के आदेश के बाद आज यह रोक लगा दी है कि जीतने वाले उम्मीदवार कोई विजय जुलूस नहीं निकालेंगे। हाथी निकल चुका है अब आखिर में बची हुई उसकी दुम पर हाईकोर्ट और चुनाव आयोग दोनों अपना झंडा लगाकर कामयाबी दिखा रहे हैं। यह पूरा सिलसिला हिंदुस्तानी लोकतंत्र की नाकामयाबी का है, जिसमें कई राज्यों में चल रहे चुनावों में एक साथ दखल देने का अधिकार अकेले सुप्रीम कोर्ट का था। और जब देश के बच्चे-बच्चे को दिख रहा था कि चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम तय नहीं कर रहा था, चुनावी आम सभाओं की सहूलियत तय कर रहा था, उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना के बढ़ते हुए खतरे को अनदेखा किया। जज चुपचाप अपने बंगलों में कैद होकर महफूज़ बैठ गए। उस वक्त भी हमने यह बात लिखी थी कि सुप्रीम कोर्ट के जजों के स्टाफ के कुछ कर्मचारी पॉजिटिव निकलने पर जिस रफ्तार से जजों ने अपने को अपने बंगलों में कैद कर लिया था, उन्हें देश की बाकी हालत नहीं दिखी, उन्हें देश में बाकी जगहों पर जनता को खतरे में डालते हुए राजनीतिक दल, सरकार और चुनाव आयोग नहीं दिखे? 

आज देश में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक और चुनाव आयोग तक ऐसी अनगिनत संवैधानिक संस्थाएं हैं जो कि वक्त निकल जाने पर काम शुरू करती हैं, ठीक उसी तरह जैसे आज केंद्र सरकार वेंटिलेटर के रोक दिए गए आर्डर जिंदा कर रही है, ऑक्सीजन के प्लांट लगाने के लिए देशभर के जिलों को मंजूरी दे रही है। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र की नाकामयाबी का है। जब केंद्र और राज्यों के संबंध इस हद तक तनातनी के चल रहे हैं कि केंद्र सरकार देश के संघीय ढांचे को कुछ गिन ही नहीं रही है, जब वह राज्यों के कोई अधिकार मान ही नहीं रही है, उस वक्त भी अगर सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी का एहसास नहीं हो रहा है, तो यह उसकी नाकामयाबी है। आज पत्ता-पत्ता बूटा -बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है, जैसी हालत हिंदुस्तानी लोकतंत्र की हो चुकी है। आज बेहतर तो यह होगा कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में अपनी मदद के लिए किसी बड़े वकील को न्याय मित्र बनाकर तैनात करता है कि वह जटिल मामलों को समझकर अदालत को उसकी बारीकियां समझाएंगे, सुप्रीम कोर्ट को इस देश में एक से अधिक ऐसे न्याय मित्र तैनात करने चाहिए जो सोशल मीडिया पर देखकर, अब तक ईमानदार रह गए कुछ अखबारों को देखकर, देश की हालत सुप्रीम कोर्ट को बताएं, क्योंकि जजों को खुद होकर अखबारों के पहले पन्ने की बड़ी-बड़ी सुर्खियां भी दिख नहीं रही है। 

तमिलनाडु में 6 अप्रैल को वोट डल चुके और 26 अप्रैल को हाईकोर्ट के जजों को यह दिख रहा है कि चुनाव आयोग पर हत्या का जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए। 6 अप्रैल के दो दिन पहले प्रचार बंद हो चुका होगा और तमाम आम सभाएं और रैलियां 4 अप्रैल के पहले खत्म हो चुकी होंगी। अब तक तो चेन्नई के मरीना बीच में से उस दिन के बने हुए पदचिन्ह भी मिट चुके होंगे, और अब जाकर मद्रास हाई कोर्ट को इतनी कड़ी टिप्पणी करना सूझ रहा है जबकि वहां के जज वहां के स्थानीय अखबारों में टीवी चैनलों पर और सोशल मीडिया पर लगातार चुनाव प्रचार का माहौल देख रहे होंगे। कुछ ऐसा ही देखना कोलकाता में वहां के हाईकोर्ट के जजों का हो रहा होगा, केरल हाईकोर्ट के जज भी देख रहे होंगे, गुवाहाटी में असम के हाई कोर्ट के जज भी देख रहे होंगे, और सुप्रीम कोर्ट के जज तो पूरे हिंदुस्तान के मालिक हैं इसलिए वे तो देख ही रहे होंगे। लेकिन देश की किसी अदालत ने समय रहते हुए इस देश के लोगों की जिंदगी की फितख नहीं की। नेताओं ने बंगाल की अपनी आमसभा में जहां तक नजर जाए वहां तक लोगों के सिर ही सिर दिखने पर खुशी जाहिर की, लेकिन किसी जज को इन सिरों पर मंडराते हुए खतरे को देखने की फुर्सत नहीं थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के तमाम जज अदालत के अपने चेंबर से अपने बंगलों के चेंबर जाने में लगे हुए थे। ऐसा लगता है किस देश का मीडिया और सोशल मीडिया जिन नजरों से हिंदुस्तान को देखता है, वह नजर भी जजों को हासिल नहीं है। इसलिए इस बात में कोई बुराई नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के जज अपने लिए कुछ ऐसे न्याय मित्र नियुक्त करें जो कि अखबारों को पढक़र और सोशल मीडिया देखकर जजों को बताएं कि हिंदुस्तान आज किस हाल में है। ऐसा लगता है कि न्याय की देवी की जो आंखों पर पट्टी बंधी हुई प्रतिमा न्याय के प्रतीक के रूप में पूरी दुनिया में प्रचलन में है, कुछ वैसी ही पट्टी हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र के बड़े-बड़े जज अपनी आंखों पर बांधे रखते हैं, और इस पट्टी को उस वक्त खोलते हैं जब उनके करने का कुछ नहीं रह जाता, और अदालती इतिहास में अपनी टिप्पणियों को दर्ज करने के लिए वे बड़ी कड़ी-कड़ी बातें कहते हैं जिनका असल जिंदगी में कोई इस्तेमाल नहीं बचता। 

अखबारों को मद्रास हाई कोर्ट के जजों की कही हुई बातों से एक अच्छी सुर्खी मिल गई, और हिंदुस्तानी लोकतंत्र के बेवकूफ वोटरों को यह तसल्ली मिल गई कि चुनाव आयोग को अच्छी लताड़ पड़ी है, लेकिन इस किस्म की नूरा कुश्ती देखकर आज अगर सबसे अधिक हंसी किसी को आ रही होगी तो वह कोरोना को, जिसे कि बंगाल में लाखों लोगों की भीड़ मिली जिनमें सैकड़ों मास्क भी नहीं थे। लोकतंत्र ऐसी नूरा कुश्ती या शास्त्रीय संगीत की जुगलबंदी का नाम नहीं है, लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के एक दूसरे पर संतुलित काबू का नाम है, जो कि आज खत्म हो चुका है। इस देश में 20 हज़ार करोड़ की लागत से नए संसद भवन और उसके आसपास के इलाके को आलीशान बनाया जा रहा है। संसद भवन का संसदीय इस्तेमाल शून्य सरीखा हो गया है, उसके लिए 20 हज़ार करोड़ की नई शान शौकत! यह जिसे हक्का-बक्का नहीं करती, उन्हें वोट डालने का भी कोई हक नहीं होना चाहिए। इस देश में आज ऑक्सीजन की कमी से लोग सडक़ों पर मर रहे हैं, योगीराज के रामराज में सरकारी अस्पताल के बाहर एक महिला, ऑक्सीजन के बिना मरते अपने कोरोनाग्रस्त पति को बचाने के लिए मुंह से सांसें देने की कोशिश में विधवा हो जाती है. लेकिन हिंदुस्तान नाम के दम तोड़ते इस लोकतंत्र के मुंह से मुंह लगाकर भला कौन ऑक्सीजन दे सकते हैं ? वोटर तो पहले ही खुद ही मुर्दा हो चुके हैं।

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