संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कोरोना मोर्चे की अलग-अलग बातें, राज्य सरकार गौर करे
29-Apr-2021 6:02 PM (169)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कोरोना मोर्चे की अलग-अलग बातें, राज्य सरकार गौर करे

छत्तीसगढ़ में एक सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात 8 महीने की गर्भवती एक नर्स की कोरोना से मौत हो गई। उसने विभाग को लिखित अर्जी में अपने गर्भवती होने की सूचना दी थी और छुट्टी मांगी थी। उसे छुट्टी तो नहीं मिली लेकिन उसकी ड्यूटी कोरोना मरीजों के बीच लगा दी गई और कोरोना मरीजों को देखते-देखते वह खुद कोरोना की शिकार हो गई और चल बसी। वह 3 बरस की एक बच्ची की मां भी थी, और बीमार होने पर जिला अस्पताल में उसे दाखिल कराया गया, लेकिन एक चर्चित जीवनरक्षक दवाई उसे नहीं मिल पाई, उसके घरवाले बाजार से 15 गुना दाम देकर ब्लैक में वह दवा खरीद कर लेकर आए, लेकिन फिर भी वह उसके काम नहीं आ सकी। जिला अस्पताल में उसकी हालत बेकाबू होने पर उसे एम्स भेजा गया जहां 2 दिन बाद उसे वेंटिलेटर मिलने की बात खबर में आई है, और उसके कुछ घंटों के भीतर ही वह चल बसी। एक तरफ तो केंद्र सरकार और राज्य सरकार गर्भवती महिलाओं को मातृत्व अवकाश देने का कानून बनाती हैं, उसका दावा करती हैं, दूसरी तरफ 8 महीने की गर्भवती इस नर्स को न छुट्टी मिली और न ही उसके अफसरों ने यह देखा कि उसकी ड्यूटी कहां लगाई गई है। आखिर में कोरोना के बीच ड्यूटी करते  हुए वह कोरोनाग्रस्त होकर चल बसी अपनी छोटी सी बच्ची को छोडक़र। 

यह अकेली घटना नहीं है, अभी कुछ दिन पहले बस्तर में राज्य पुलिस सेवा की एक महिला अधिकारी भी इसी तरह गर्भवती रहते हुए सडक़ पर आकर लॉकडाउन का पालन करवाते हुए, लोगों को रोकते हुए दिख रही थी, और उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी आईं, और अखबारों में भी। हमने पहले भी गर्भवती महिलाओं के नक्सल मोर्चे पर ड्यूटी पर जाने के खिलाफ लिखा था। हो सकता है कि वे महिलाएं खुद होकर ऐसी ड्यूटी करना चाहती हों, लेकिन ऐसा करना उनके दुस्साहस का सबूत तो है, यह उनके अफसरों की लापरवाही का सबूत भी है जो कि एक गर्भवती कर्मचारी या अधिकारी को खतरे की ड्यूटी पर तैनात करते हैं, या कि जाने की इजाजत देते हैं। ऐसी महिलाओं को लोगों की वाहवाही भी मिलने लगती है, लोग उनके त्याग की भावना की तारीफ करने लगते हैं, ऐसे काम को जन सेवा के लिए बलिदान कहने लगते हैं, लेकिन यह सिलसिला एक सामाजिक अन्याय की एक कड़ी है जिसे समझने की जरूरत है। यह समझना जरूरी है कि गर्भवती तो महिला कर्मचारी या महिला अधिकारी ही हो सकती हैं, किसी पुरुष अधिकारी के सामने तो ऐसी नौबत आती नहीं है, इसलिए सरकारी नौकरी में काम करने वाली महिलाओं के सामने यह चुनौती भी रहती है कि वह अपने-आपको पुरुषों से कम नहीं साबित करने के लिए ऐसे मुश्किल काम करें। लेकिन जब कुदरत ने ही महिलाओं को अलग बनाया है, उनकी जरूरतों को अलग बनाया है, तो उनकी गर्भावस्था का सम्मान करना चाहिए उनके अजन्मे बच्चों का सम्मान करना चाहिए, यह अधिकार किसी महिला को भी नहीं है कि वह अपने अजन्मे बच्चे को खतरे में डालने का कोई काम करे। और फिर ऐसे जितने भी मामले सामने आते हैं उनमें से 100 फीसदी मामले ऐसे रहते हैं कि उन महिलाओं के बिना भी वे काम चल सकते थे, एक किसी और नर्स को कोरोना मरीजों के बीच ड्यूटी पर लगाया जा सकता था, एक किसी और महिला अफसर को लॉकडाउन में लगाया जा सकता था, और एक किसी और हथियारबंद महिला अधिकारी को या पुरुष को नक्सल मोर्चे पर जंगल भेजा जा सकता था। लेकिन जब ऐसी कहानियां सामने आती हैं तो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया तक के लोग बावले हो जाते हैं क्योंकि ऐसी खबरें, ऐसी तस्वीरें, लोगों का ध्यान खींचती हैं। बस अपने पाठक, और अपने दर्शक जुटाने के लिए मीडिया ऐसी लापरवाही को त्याग और बलिदान करार देने पर उतारू हो जाता है, और बड़े-बड़े लोग भी ऐसी महिलाओं को बधाई देने लगते हैं, बिना यह देखे हुए कि क्या यह काम उन महिलाओं के अजन्मे बच्चों को खतरे में डाले बिना नहीं चल सकता था? 

यह बात इसलिए भी सोचने की जरूरत है कि अभी छत्तीसगढ़ में सरकार ने सभी कर्मचारियों से कोरोना के लिए 1 दिन का वेतन मांगा है। विभागों ने शायद अपने कर्मचारियों का 1 दिन का वेतन खुद ही काट लिया है, और जहां पर उनसे सहमति मांगी गई है, बहुत से पुलिस कर्मचारियों ने इस पर असहमति जताई है। उनका अपना तर्क है कि वे कोरोना मोर्चे पर रात दिन खतरा झेलते हुए अधिक घंटों की ड्यूटी कर रहे हैं, और ऐसे में उनसे और त्याग की उम्मीद क्यों करनी चाहिए? यह बात इस हिसाब से भी सही है कि बिहार में जहां पर कि पुलिस कर्मचारियों का संगठन है, वहां पर उस संगठन ने मांग की है कि कोरोनाग्रस्त होकर गुजरने पर पुलिस कर्मचारी का 50 लाख रुपए का बीमा करवाया जाए. छत्तीसगढ़ में कुछ बरस पहले पुलिस कर्मचारियों और उनके परिवारों की मांग को लेकर एक सुगबुगाहट हुई थी, बाद में पुलिस परिवारों के नाम पर जो आंदोलन होने जा रहा था उसे बुरी तरह कुचलने के लिए सरकार और पुलिस विभाग टूट पड़े थे। अभी एक पुलिस कर्मचारी ने कोरोना के लिए 1 दिन की तनख्वाह देने से मना कर दिया तो शायद उसका नक्सल इलाके में तबादला कर दिया गया. इसके बाद उसका बताया जा रहा एक वीडियो चारों तरफ फैल रहा है जिसमें वह यह खुलासा कर रहा है कि पुलिस के छोटे कर्मचारियों का किस तरह बेजा इस्तेमाल होता है और किस तरह बड़े अफसर अपने बंगलों पर दर्जन-दर्जनभर गाडिय़ां और दर्जनों कर्मचारी रखते हैं। बड़े अफसरों की तनख्वाह भी लाखों रुपए महीने होती है, और वे उससे भी कई गुना अधिक तनख्वाह के कर्मचारियों को बंगलों पर बंधुआ मजदूरों की तरह रखते हैं, उनसे अपमानजनक और अमानवीय काम करवाते हैं। 

ये दो मामले अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ही मामले राज्य सरकार के हैं, और इनमें राज्य सरकार को तुरंत ही सुधार करना चाहिए। मुख्यमंत्री सहायता कोष या कोई और कोष, किसी कर्मचारी की तनख्वाह जबरदस्ती काटकर उसमें जमा नहीं करनी चाहिए। और अगर कोई ऐसा योगदान देने से मना करें तो उसका नक्सल इलाके में तबादला अगर किया गया है तो यह बहुत ही रद्दी किस्म का फैसला है, और यह नक्सल इलाके के साथ भी बेइंसाफी है कि वहां पर पुलिस को बतौर सजा भेजा जा रहा है। सजायाफ्ता पुलिस कर्मचारी वहां किस नैतिक मनोबल से जनकल्याण का काम कर सकते हैं? जो सरकार अपने प्रदेश के सबसे अधिक चुनौती भरे हुए इलाके में पुलिस को बतौर सजा भेजती हो, वह सरकार उस इलाके की चुनौती के साथ बेइंसाफी भी कर रही है। 

राज्य सरकार को कोरोना के मोर्चे पर अपने कर्मचारियों के साथ एक तो मानवीय रुख रखना चाहिए, दूसरी बात यह कि अगर कोई योगदान सरकारी कर्मचारियों से जुटाना है, तो वह योगदान जबरदस्ती नहीं होना चाहिए। तीसरी बात यह कि ऐसी जबरदस्ती के साथ अगर किसी को सजा दी जा रही है, तो यह मामला अदालत में जाकर सरकार के लिए बड़ी शर्मिंदगी खड़ी कर सकता है, और सार्वजनिक रूप से तो यह शर्मिंदगी की बात है ही कि कोई सरकारी कोष में चंदा देने से मना करें, योगदान देने से मना करें, तो उसे सजा दी जाए। ये कई मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन सारे ही राज्य सरकार से जुड़े हुए हैं, और जिस पुलिस कर्मचारी के बड़े अफसरों पर तोहमत लगाई गई है, तो उनके बारे में प्रदेश में हर कोई जानते हैं कि यह सही तोहमतें हैं। इसलिए सरकार को अगले किसी पुलिस परिवार आंदोलन के पहले यह अमानवीय सिलसिला भी खत्म करना चाहिए और सरकारी बर्बादी का सिलसिला भी खत्म करना चाहिए। जिन अफसरों को लाखों रुपए तनख्वाह मिलती है या लाख रुपए से अधिक पेंशन मिलती है उन अफसरों के, या रिटायर्ड अफसरों के घरों पर गाडिय़ों और सिपाहियों का रेला क्यों लगाया जाता है ? सरकारी खजाने की ऐसी खुली बर्बादी भी खत्म होनी चाहिए। जब पुलिस के छोटे कर्मचारी ऐसी बर्बादी रात-दिन देखते हैं, तब उनके मन में भी एक दिन का वेतन देने में तकलीफ होती है। राज्य सरकार को तुरंत इन बातों पर गौर करना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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