संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बंगाल की शेरनी के जख्मी पंजे ने भी दिल्ली का मुंह नोच लिया
02-May-2021 6:12 PM (202)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बंगाल की शेरनी के जख्मी पंजे ने भी दिल्ली का मुंह नोच लिया

वैसे तो आज की मतगणना में देश के 5 राज्यों की प्रदेश सरकारें तय हो रही हैं, लेकिन पूरे देश की नजरें एक प्रदेश पर टिकी हुई हैं जिसे देश के दो सबसे ताकतवर नेताओं, नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने, प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। उस राज्य में बंगाल की शेरनी ममता बनर्जी अपनी पार्टी की शानदार जीत के साथ वापस लौट रही हैं। कांटे की टक्कर में खुद ममता बैनर्जी अभी कुछ मिनट पहले नंदीग्राम से चुनाव हार गई हैं। अभी इस पल तक के आंकड़े बतला रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस 210 सीटों पर बढ़त के साथ सरकार बनाने के करीब है, और भाजपा वहां पर अपने सारे शानदार प्रदर्शन के बावजूद 100 के भीतर सिमट कर रह गई है। अभी तक उसकी 78 सीटें ही बताई जा रही हैं। मगर उसके बड़े-बड़े दावे सरकार बनाने के नहीं रहते, और वहां की गली-गली तक प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्रियों तक ने मेहनत नहीं की होती, ‘दो मई-दीदी गई’ जैसे नारे न लगाए होते,  तो यह कामयाबी बुरी नहीं मानी जाती। भाजपा सबसे अधिक 75 सीटों के फायदे में हैं, 3 सीटों से 78 सीटों तक पहुंचना छोटी कामयाबी नहीं है।  लेकिन जब खुद के दावे इतने बड़े रहे कि वे ही मुंह चिढ़ाने लगें तो फिर इतनी बड़ी जीत भी भाजपा के लिए आज महत्वहीन हो गई है। ममता बनर्जी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने यह दावा किया था कि अगर भाजपा 100 सीटों तक भी पहुंच जाएगी तो वे अपना काम छोड़ देंगे, और अभी तक के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा 100 सीटों से करीब दो दर्जन पीछे है।

एक पल के लिए पश्चिम बंगाल से बाहर आकर देखें तो तमिलनाडु भी भाजपा के लिए बड़ी शिकस्त के नतीजे लेकर आया है भाजपा ने वहां पर सत्तारूढ़ एआईएडीएमके के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था और यह गठबंधन मीलों पीछे चल रहा है, वहां पर डीएमके और कांग्रेस पार्टी का गठबंधन सरकार बनाने के एकदम करीब है। हालांकि इस वक्त ये तमाम बातें रुझान के आधार पर की जा रही हैं, लेकिन ये रुझान बदलने वाले नहीं हैं। तीसरा प्रदेश केरल, वहां पर सत्तारूढ़ वाम मोर्चे ने पिछले 1 बरस में कोरोना के फ्रंट पर इतना शानदार काम किया था कि आज वह विपक्षी गठबंधन के मुकाबले दोगुनी अधिक सीटें लेकर सरकार में वापस लौट रहा है। लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की 94 सीटें और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की 45 सीटें। राज्य में कांग्रेस और वामपंथियों की अगुवाई वाले इन दोनों परस्पर विरोधी गठबंधनों की यह बात भी दिलचस्प है कि ये दोनों ही राज्य की तकरीबन 100 फ़ीसदी सीटों पर काबिज हैं, और भाजपा को वहां कुल 1 सीट मिली है। लेकिन दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी मिलकर लड़ रहे थे और वहां इन दोनों को मिलकर करीब 0 फ़ीसदी सीटें मिल रही हैं। आपस में लडक़र ये केरल में सत्तारूढ़ भी हैं, और विपक्ष भी हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में विधानसभा सदन में इन दोनों को पांव रखने भी मिल जाए ऐसे कोई आसार अभी दोपहर 2.00 बजे तक नहीं दिख रहे हैं। 

अब एक और बड़ा राज्य असम बचता है जहां भाजपा की सरकार चली आ रही थी और वहां भाजपा भी पुरानी तमाम सीटों को कायम रखकर, दो सीटें और अधिक पाने की उम्मीद में दिख रही है, और कांग्रेस ने भी वहां पर 5 सीटें तो बढ़ा ली हैं, लेकिन उसकी अगुवाई वाले गठबंधन ने कई सीटें खो दी हैं। फिलहाल भाजपा की सरकार असम में कायम रहने जा रही है, कांग्रेस विपक्षी दर्जा कायम रहेगा। अब एक आखिरी राज्य बच जाता है जो छोटा है, पुदुचेरी।  इस राज्य में भाजपा सरकार में आते दिख रही है और कांग्रेस, जिसकी कि सरकार वहां कुछ समय पहले तक थी, वह विपक्ष में जाते दिख रही है। पुदुचेरी से रुझान बड़े धीमे आ रहे हैं इसलिए इस पल वहां के बारे में और अधिक लिखना ठीक नहीं है सिवाय इसके कि भाजपा का गठबंधन कांग्रेस के गठबंधन से दोगुना सीटें पाकर अभी आगे है।  

अब अगर इन तमाम नतीजों को एक साथ देखा जाए तो कांग्रेस और भाजपा ये दोनों मोटे तौर पर कुछ पाने वाली पार्टियां नहीं दिख रही हैं. भाजपा गठबंधन एक छोटा सा राज्य पुदुचेरी पाते दिख रहा है, लेकिन कांग्रेस एक खासे बड़े राज्य तमिलनाडु में सत्तारूढ़ गठबंधन में आते दिख रही है। केरल में बीजेपी के हाथ कुछ नहीं लगा है, और बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों ने अपने पास की तकरीबन हर सीट खो दी है, और भाजपा की तमाम सीटें कांग्रेस और वामपंथियों की मेहरबानी से आई हुई दिख रही हैं.  बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों ने  ममता बनर्जी को दुश्मन नंबर एक माना था और भाजपा को दुश्मन नंबर दो। लेकिन ऐसा लगता है कि बंगाल के कांग्रेस-लेफ्ट के भी मतदाताओं ने एक सामूहिक समझ से वोट दिया और भाजपा को हराने के लिए ममता बनर्जी को वोट दिए। 

लेकिन प्रदेशों से परे देखें तो जिस तरह नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा ने बंगाल को अपने चुनावी इतिहास की एक सबसे बड़ी चुनौती खुद ही बना लिया था, उसमें अकेली ममता बनर्जी के सामने उनकी बड़ी शिकस्त हुई है। और फिर दूसरी बात यह भी है कि आज हिंदुस्तान में हर कोई नरेंद्र मोदी की सरकार को इस बात की तोहमत भी दे रहे हैं कि बंगाल के चुनाव प्रचार के लिए उन्होंने चुनाव आयोग की मेहरबानी से ऐसा चुनाव कार्यक्रम पाया कि वे हर इलाके में जाकर लाखों लोगों की सभाएं करते रहे लाखों लोगों की रैलियां निकालते रहे और कोरोना का संक्रमण भी बढ़ाते रहे। यह तोहमत महज बंगाल की हार या जीत से जाने वाली नहीं थी, लोगों ने यह साफ-साफ कहा था कि जिस वक्त दिल्ली में बैठकर कोरोना पर काबू पाने के लिए सरकारी फैसले लेने थे, उस वक्त मोदी सरकार के प्रधानमंत्री सहित तमाम मंत्री बंगाल में चुनाव प्रचार में लगे हुए थे क्योंकि उन्होंने उसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था. अब कोरोना का फैलना और उसमें पूरे देश का तबाह हो जाना एक ऐसी हकीकत है कि वह भाजपा के, मोदी-शाह के, बंगाल हारने के साथ जोडक़र देखी जाएगी, और अगर यह वहां जीतते, तो भी उसके साथ ही जोड़ कर देखी जाती। फिलहाल शाम तक, रात तक आंकड़ों के फेरबदल का इंतजार रहेगा लेकिन सच तो यह है कि रुझान बिल्कुल साफ-साफ सामने हैं, और जिस राज्य की जो चर्चा हमने ऊपर की है उन्हीं की सरकारें बनने से वहां कोई रोक नहीं सकता। आज कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दलों को घर बैठकर यह सोचना चाहिए कि इन पांच राज्यों में उन्होंने कुल मिलाकर क्या पाया है और क्या खोया है।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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