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ममता समेत वो मुख्यमंत्री जो विधानसभा चुनावों में नहीं बचा सके सीट, मिली हार
04-May-2021 4:24 PM (35)
ममता समेत वो मुख्यमंत्री जो विधानसभा चुनावों में नहीं बचा सके सीट, मिली हार

पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम आ चुके हैं. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफलता हासिल कर ली है. उनकी पार्टी ने 292 सीटों में 214 सीटें जीती हैं. यानि पिछली बार से भी ज्यादा सीटें. लेकिन ममता खुद नंदीग्राम से चुनाव हार गईं. हालांकि उनकी परंपरागत विधानसभा सीट भबनीपुर थी, जहां से उन्होंने 2016 में चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी. लेकिन इस बार वो भारतीय जनता पार्टी के शुवेंदु अधिकारी को उन्हीं के घर में चुनौती देने के लिए नंदीग्राम से चुनाव लड़ने गईं थीं. जहां उन्हें 1700 वोटों से हार का सामना करना पड़ा.

यद्यपि इस हार के बाद भी ममता बंगाल में सरकार बनाने का दावा राज्यपाल के सामने पेश करेंगी और मुख्यमंत्री बनेंगी. उन्हें 06 महीने के भीतर किसी विधानसभा सीट से जीत हासिल करनी होगी. हालांकि ममता मुख्यमंत्री रहते हुए सीट गंवानी वाली पहली नेता नहीं हैं. इससे पहले कई मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भी विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं.

रघुबर दास - झारखंड विधानसभा चुनाव में रघुबर दास के साथ यही हुआ. सूबे में पांच साल सरकार चलाने वाले पहले सीएम 2019 के चुनाव में अपनी विधायकी गंवा बैठे. जबकि वो 24 साल से विधायक का चुनाव जीतते आ रहे थे. जमशेदपुर की सीट पर उन्हें उन्हीं की कैबिनेट में मंत्री रहे सरयू राय ने हरा दिया. सरयू ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था.

सिद्धारमैया - 2013 में कांग्रेस ने कर्नाटक चुनाव जीता और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने. 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दो सीटों से लड़ने का फैसला किया. पहली मैसूर लोकसभा सीट की चामुंडेश्वरी सीट और दूसरी बगलकोट लोकसभा सीट की बादामी सीट. वो चामुंडेश्वरी में 36,042 वोटों से हार गए. बादामी सीट पर जीते जरूर लेकिन केवल 1,696 वोटों से.

हरीश रावत- कांग्रेस के हरीश रावत 2014 से 2017 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे. चार बार सांसद और एक बार विधायक बने. 2014 में धरचुला विधानसभा सीट का उपचुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने थे. हालांकि तीन साल बाद 2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में वो दो सीटों से चुनावों में खड़े हुए और दोनों पर ही चुनाव हार गए. पहली सीट हरिद्वार रूरल पर उन्हें बीजेपी के यतीश्वरानंद ने 12278 वोटों से हराया. वहीं दूसरी सीट किच्चा पर भी उन्हें बीजेपी प्रत्याशी राजेश शुक्ला ने हराया. यहां वो 2,127 वोटों से हारे.

लक्ष्मीकांत पारसेकर- नवंबर 2014 से मार्च 2017 तक गोवा के मुख्यमंत्री रहे पारसेकर अपने बयानों से काफी सुर्खियों में रहे. उन्होंने अपना पहला चुनाव 1988 में लड़ा था, जिसमें वो हार गए थे. 1999 के चुनाव में भी हारे. 2002 में पहली बार जीत दर्ज की. 2000 से 2003 और 2010 से 2012 तक गोवा बीजेपी के अध्यक्ष रहे. उन्हें 2014 में तब गोवा का मुख्यमंत्री बनाया गया जबकि सीएम मनोहर पर्रिकर को केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनाया गया. 2017 के विधानसभा चुनाव में वो अपनी सीट नहीं बचा पाए. मेंदरिम सीट पर उन्हें कांग्रेस के दयानंद रघुनाथ सोपते ने 7,119 वोटों से हराया.

भुवन चंद्र खंडूरी- 2007 से 2009 और 2011 से 2012 के बीच उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे बीसी खंडूरी पूर्व सैन्य अधिकारी थे. मेजर जनरल रैंक से रिटायर हुए खंडूरी गढ़वाल लोकसभा से पांच बार जीते. 2007 में इनकी अगुवाई में बीजेपी को उत्तराखंड में जीत मिली. उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. 2009 तक वो सीएम रहे इसके बाद फिर उन्हें 2011 से 2012 तक सीएम बनाया गया. 2012 के विधानसभा चुनावों वो कोटद्वार सीट से चुनाव हार गए. उन्हें कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी ने 4,623 वोटों से हराया.

शीला दीक्षित- शीला दीक्षित दिल्ली की लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहीं. वो लगातार तीन बार दिल्ली में मुख्यमंत्री बनीं. 1998 से 2013 तक सीएम रहीं शीला को 2013 में आम आदमी पार्टी के उभरने के बाद सत्ता गंवानी पड़ी. उन्हें आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने नई दिल्ली सीट पर 25,864 वोटों से हराया.

शांता कुमार-हिमाचल प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री शांता कुमार का राजनीतिक करियर 1963 में शुरू हुआ. 1972 में वो पहली बार विधानसभा पहुंचे थे. शांता 1977 से 1980 तक, फिर 1990 से 1992 तक सीएम रहे. 92 में बाबरी विध्वंस के बाद बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें बरखास्त कर दी गईं थीं. 1993 में जब राज्य में चुनाव हुए तो उसमें शांता कुमार अपनी सीट नहीं बचा पाए.उन्हें सुलाह सीट पर कांग्रेस के मानचंद राणा ने 3267 वोटों से हराया.

ललथनहवला - मिजोरम के मुख्यमंत्री ललथनहवला के साथ 2018 में ऐसा हुआ. तब वो मुख्यमंत्री थे और उन्होंने दो सीटों सेरछिप और चंफई (दक्षिण) से चुनाव लड़ा. दोनों ही सीटों पर वो हार गए. 2013 में ललथनहवाला रिकॉर्ड पांचवी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे.

कैलाश नाथ काटजू - मध्यप्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू 1962 के विधानसभा चुनावों के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री थे. वो जावरा सीट से चुनाव में खड़े हुए. लेकिन वहां उन्हें जनसंघ के लक्ष्मीनारायण जमनलाल ने 1500 वोटों से हराया.

चंद्रभान गुप्ता - साल 1958 में हमीरपुर की मौदहा सीट पर उपचुनाव हुए थे. उस वक्त चंद्रभान गुप्ता यूपी के सीएम थे. लेकिन तब वो विधायक नहीं थे लिहाजा उन्हें चुनाव लड़ना जरूरी था. वो मौदहा उपचुनाव में खड़े हगुए. बुंदेलखंड में राठ के दीवान शत्रुघ्न सिंह की पत्नी रानी राजेंद्र कुमारी निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उनके सामने थीं. इसमें चंद्रभान गुप्ता सीएम रहते हुए भी वि‍धानसभा चुनाव हार गए. हालांकि इसके बाद 1960 में उन्होंने फिर चुनाव लड़ा. जीता और प्रदेश के मुख्यमंत्री बने.

हेमंत सोरेन - हेमंत सोरेन मौजूदा समय में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं. 2014 के चुनावों में वो राज्य के मुख्यमंत्री थे. तब उन्होंने झारखंड की दो सीटों दुमका और बरहैट से. दुमका शिबू सोरेन की कर्मस्थली रही है. लेकिन हेमंत सोरेन वो सीट बचा नहीं पाए. दुमका में उनको बीजेपी के लुइस मरांडी ने हरा दिया था. बरहैट में उनको जीत मिली.

वीरभद्र सिंह- वीरभद्र हिमाचल के ऐसे नेता हैं, जो सबसे ज्यादा लंबे समय तक वहां मुख्यमंत्री रहे. आठ बार विधायक बने तो पांच बार लोकसभा का चुनाव जीता. जब प्रदेश में 1990 में विधानसभा का चुनाव हुआ तो वो सीएम थे. तब उन्होंने दो सीटों रोहरू और जुब्बल कोटखाई से चुनाव लड़ा. एक सीट पर वो हार गए और एक पर जीते. (news18.com)

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