अंतरराष्ट्रीय

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03-Aug-2021 7:13 PM (39)

निएंडरथलों के बारे में अनगढ़ और पाशविक होने की धारणा रही है, लेकिन अब एक अध्ययन में पुष्टि हुई है कि उन्होंने हजारों साल पहले स्पेन की एक गुफा में कलाकृतियां बनाई थीं.

(dw.com)  

2018 में एक शोध पेपर छपा था जिसमें स्पेन में कुएवा दे अरदालेस नाम की एक गुफा में स्टेलेग्माइटों पर मिले लाल ओकर के रंग को लेकर चौंकाने वाली जानकारी थी. पेपर में दावा किया गया था कि लाल ओकर की ये कलाकृतियां निएंडरथलों ने ही बनाई थीं.

इस दावे को लेकर पुरातत्व समुदाय में भी काफी बहस हुई थी. कलाकृतियों के अध्ययन से अनुमान लगाया गया कि ये कम से कम 64,800 साल पुरानी थीं. ये उस समय बनाई गई थीं जब आधुनिक मानव अभी यूरोप में बसा नहीं था. लेकिन इस दावे को लेकर विवाद हुआ.

प्राकृतिक निशान?

पीएनएएस नाम की पत्रिका में छपे एक नए पेपर के सह-लेखक फ्रांसेस्को द'एरिको ने बताया कि "एक वैज्ञानिक लेख में कहा गया कि संभव है ये रंगों के निशान प्राकृतिक हों." उन्होंने यह भी बताया कि ये लोहे के ऑक्साइड के बहने का नतीजा हो सकते हैं.

हालांकि एक नए विश्लेषण में सामने आया है कि इन निशानों के अंदर मौजूद तत्त्व और उनका स्थान प्राकृतिक प्रक्रियाओं के अनुकूल नहीं थे, बल्कि उन्हें छींटें और फूंक मार कर लगाया गया था. इसके अलावा उनकी बनावट भी गुफा से लिए हुए प्राकृतिक नमूनों से मेल नहीं खाती. इससे यही संकेत मिलता है कि यह रंग किसी बाहरी स्रोत से आए थे.

और ज्यादा गहन अध्ययन करने पर यह भी पता चला कि रंगों को अलग अलग अवधि पर लगाया गया, जिनमें 10,000 सालों से भी ज्यादा का फासला था. द'एरिको का कहना है कि इससे इस अनुमान को बल मिलता है की निएंडरथल कई हजार सालों तक बार बार यहां आते रहे और गुफा में रंगों के निशान बनाते गए."

नई रोशनी

इस निएंडरथल "कला" की पूर्व-ऐतिहासिक आधुनिक इंसानों द्वारा बनाए गए गुफा चित्रों से तुलना करना मुश्किल है. फ्रांस की शॉवे-पों द'आर्क गुफा में मिले गुफा चित्र 30,000 सालों से भी ज्यादा पुराने हैं. हालांकि यह नई खोज निएंडरथलों के बारे में सामने आ रहे नए तथ्यों में इजाफा करती है.

कई नए तथ्य अब इस बात को साबित कर रहे हैं कि जिनकी वंशावली करीब 40,000 साल पहले लुप्त हो गई वो निएंडरथल होमो सेपियन्स के कोई उजड्ड रिश्तेदार नहीं थे, जैसा की उन्हें लंबे समय से दर्शाया गया. इस नई खोज को करने वाली टीम ने लिखा कि ये निशान "कला" की संकरी परिभाषा के तहत नहीं आते, "लेकिन ये एक स्थान के सांकेतिक अर्थ को यादगार बनाने के इरादे से किए गए चित्रात्मक व्यवहार का नतीजा" हैं.

इन कलाकृतियों ने "कुछ निएंडरथल समुदायों की सांकेतिक प्रणालियों में एक मूलभूत भूमिका निभाई". हालांकि इन चिन्हों का अर्थ आज भी एक रहस्य है.  (dw.com)

सीके/एए (एएफपी)


03-Aug-2021 7:11 PM (29)

बेलारूस का एक एक्टिविस्ट यूक्रेन की राजधानी कीव के एक पार्क में फांसी पर लटका हुआ पाया गया है. विटाली शिशोव बेलारूस में हो रहे उत्पीड़न से भाग कर यूक्रेन आए लोगों की मदद करते थे.

(dw.com)  

शिशोव कीव में ही स्थित 'बेलारुसियन हाउस इन यूक्रेन' के नेता थे. पुलिस के बयान के अनुसार जिस पार्क में उनका शव लटका हुआ मिला वो उनके घर से ज्यादा दूर नहीं था. हत्या से संबंधित जांच शुरू कर दी गई है. पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि क्या हत्या को आत्महत्या जैसा दिखाने की कोशिश की गई है?

'बेलारुसियन हाउस इन यूक्रेन' उत्पीड़न से भाग रहे बेलारूस के लोगों को यूक्रेन में कानूनी दर्जा, आवास और रोजगार दिलाने में मदद करता है. संस्था ने सोमवार को ही जानकारी दी थी कि शिशोव सुबह की दौड़ के लिए गए थे लेकिन उसके बाद लापता हो गए थे. बेलारूस के मानवाधिकार केंद्र विआसना ने उनके दोस्तों के हवाले से बताया कि हाल ही में उनकी दौड़ के दौरान अजनबी लोग उनका पीछा करने लगे थे.

बेलारूस में उत्पीड़न

बेलारूस में हाल के हफ्तों में सरकार ने गैर सरकारी संगठन और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ा दिया है. अकेले जुलाई में ही ऐक्टिविस्टों और पत्रकारों के दफ्तरों और घरों पर 200 से ज्यादा छापे मारे गए हैं. दर्जनों लोगों को हिरासत में भी लिया गया है. राष्ट्रपति एलेग्जेंडर लुकाशेंको ने प्रण लिया है की सिविल सोसाइटी ऐक्टिविस्टों के खिलाफ वो अपना "सफाई अभियान" जारी रखेंगे. वो इन एक्टिविस्टों को "लुटेरे और विदेशी एजेंट" बताते हैं.

अगस्त 2020 में हुए चुनावों में लुकाशेंको जीत हासिल कर छठी बार राष्ट्रपति बने, लेकिन विपक्ष और दूसरे कई देशों ने भी इन चुनावों को धोखाधड़ी भरा बताया था. चुनाव के बाद उनके खिलाफ प्रदर्शन हुए लेकिन उन्होंने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की. 35,000 से भी ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया और पुलिस ने हजारों को मारा-पीटा भी.

हमले की आशंका

बेलारुसियन हाउस इन यूक्रेन' ने एक बयान में बताया कि शिशोव को 2020 की शरद ऋतु के दौरान जब बेलारूस में सरकार-विरोधी प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सरकार की सख्त कार्रवाई अपने चरम पर थी तब उन्हें मजबूरन यूक्रेन चले आना पड़ा.

संस्था ने बताया कि यूक्रेन में भी उन पर निगरानी रखी जाती थी और "स्थानीय सूत्रों के अलावा बेलारूस में भी मौजूद हमारे लोगों ने" समूह को आगाह कराया है कि उसके खिलाफ "अपहरण या हत्या जैसे कई कदम" उठाए जा सकते हैं. संस्था ने कहा,"इसमें कोई शक नहीं है कि यह बेलारूस की सरकार के लिए खतरा बन चुके एक नागरिक को खत्म करने की सुरक्षाकर्मियों की योजनाबद्ध कार्यवाही थी. हम विताली की मौत के सच के लिए लड़ते रहेंगे." (dw.com)

सीके/एए (एपी)


03-Aug-2021 4:19 PM (33)

नई दिल्‍ली. पाकिस्‍तान के डॉन अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के कानून एवं न्याय मंत्रालय ने गिलगिट-बाल्टिस्‍तान को देश के एक प्रांत के तौर पर स्वीकार करने का मसौदा तैयार कर लिया है. 2009 से पहले ये उत्तरी क्षेत्रों के रूप में जाना जाता था.

वहीं भारत गिलगिट-बाल्टिस्‍तान को अपना अंदरूनी हिस्सा मानता रहा है. भारत ये बात 1947 में भारत संघ के कानूनी तौर पर जम्मू-कश्मीर के पूर्ण अधिग्रहण के आधार पर कहता है. चीन-पाकिस्तान के आर्थिक कॉरीडोर पर होने के बाद कूटनीतिक तौर पर भी ये क्षेत्र भारत के लिए अहम हो जाता है. इस करार के तहत चीन सड़क और बेल्ट निर्माण में भारी निवेश करने वाला है. वैसे भी पिछले साल पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों की सेना के बीच तनातनी के बाद ये भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है.

क्षेत्र का इतिहास
गिलगिट पहले जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा हुआ करता था, जिस पर ब्रिटिश सरकार का शासन था, ब्रिटिश सरकार ने इस क्षेत्र को हरिसिंह ( जो इस मुस्लिम बाहुल्य राज के हिंदु शासक थे) से लीज़ पर लिया था. जब 26 अक्टूबर,1947 को हरिसिंह ने भारत के साथ मिलना स्वीकार किया, तब गिलगिट में ब्रिटिश कमांडर मेजर विलियम एलेक्जेंडर ब्राउन के नेतृत्व में विद्रोह का बिगुल बजा और गिलगिट के सिपाही बाल्टिस्‍तान पर कब्जा जमाने के लिए आगे बढ़े, जो उस वक्त लद्दाख का हिस्सा हुआ करता था, और विद्रोहियों ने स्कार्दु, करगिल और द्रास पर भी कब्जा जमा लिया. आगे की लड़ाइयों में भारत की सेना ने अगस्त 1948 को द्रास और करगिल को वापस हासिल कर लिया.

इसके पहले 1 नवंबर, 1947 को एक कथित राजनीतिक संगठन गिलगिट-बाल्टिस्‍तान क्रांतिकारी परिषद ने गिलगिट-बाल्टिस्‍तान को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया. 15 नवंबर को उसने पाकिस्तान में शामिल होने की घोषणा कर दी, लेकिन पाकिस्तान को केवल प्रशासनिक नियंत्रण ही मिला और इस क्षेत्र को सीधे फ्रंटियर क्राइम रेग्यूलेशन के तहत शासित करने का फैसला लिया गया, ये वो कानून था जिसे ब्रिटिश सरकार ने उत्तर पश्चिम के अशांत आदिवासी क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए बनाया था. आगे 1 जनवरी, 1949 में भारत-पाकिस्तान युद्धविराम के बाद उसी साल अप्रैल में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर की अंतरिम सरकार के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत वो हिस्से जिस पर पाकिस्तानी सेना और अनियमित सैनिकों ने कब्जा किया था उसके रक्षा और विदेशी मामले को अपने काबू में कर लिया. इस समझौते के तहत जम्मू-कश्मीर सरकार ने गिलगिट-बाल्टिस्‍तान का प्रशासन भी पाकिस्तान को सौंप दिया.

प्रांत से परे
1974 में पाकिस्तान ने पहला पूर्ण नागरिक संविधान पारित किया, जिसमें पाकिस्तान को चार प्रांतों में विभाजित किया गया. इनमें पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा आते हैं. खास बात ये थी कि पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) और गिलगिट-बाल्टिस्‍तान प्रांत के तौर पर शामिल नहीं किया था. इसके पीछे एक वजह ये भी थी कि पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मामले को कमज़ोर नहीं करना चाहता था जहां कश्मीर मुद्दे का समाधान संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों (जनमत संग्रह) के जरिये होना चाहिए. 1975 में पाक अधिकृत कश्मीर ने खुद का संविधान लागू किया जिसके तहत वो एक स्वायत्त क्षेत्र प्रकट होता है. इस संविधान में उत्तरी इलाके पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था जिससे यहां पर इस्लामाबाद का प्रत्यक्ष प्रशासन (फ्रंटियर क्राइम रेग्युलेशन 1997 में समाप्त कर दिया गया, बस 2018 में इसे रद्द किया गया) जारी रहा . वास्तव में पीओके पर कश्मीर परिषद के ज़रिये पाकिस्तानी प्रशासन और सुरक्षा स्थापना का ही नियंत्रण रहा.

बस इसमें खास अंतर सिर्फ इतना है कि पीओके के लोगों को अधिकार और स्वतंत्रता उनके संविधान के आधार पर थी, जो एक तरह से पाकिस्तानी संविधान की ही प्रतिकृति है. अल्पसंख्यक शिया प्रभावी उत्तरी क्षेत्र का कोई भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं रहा. जबकि इन्हें पाकिस्तानी माना जाता है और इनके पासपोर्ट पर नागरिकता भी पाकिस्तान की ही होती है. फिर भी चार प्रांतों और पीओके की तरह ये संवैधानिक सुरक्षा के घेरे से बाहर आते हैं.

पहला बदलाव
सदी की शुरुआत के पहले दशक में ही पाकिस्तान ने उत्तरी इलाकों में प्रशासनिक बदलाव करना शुरू कर दिया था. क्योंकि विकास के नाम पर चीन की रणनीतिक गतिविधि बढ़ रही थी. और चीन की इस परियोजना के लिए दोनों देशों के बीच गिलगिट-बाल्टिस्‍तान की ज़मीन बेहद मायने रखती है. 2009 में पाकिस्तान ने गिलगिट-बाल्टिस्‍तान में ( सशक्तिकरण और स्वशासन) का आदेश पारित किया, 2009 के आदेश के बाद उत्तरी क्षेत्र विधान परिषद को विधानसभा में तब्दील कर दिया गया और उत्तरी इलाके को गिलगिट-बाल्टिस्‍तान नाम वापस मिल गया.

इसके पहले उत्तरी क्षेत्र विधान परिषद एक निर्वाचित निकाय था जिसका काम कश्मीर मुद्दे और उत्तरी इलाकों के लिए मंत्री (इस्लामाबाद) को परामर्श देना था. विधानसभा से इसमें एक छोटी सी प्रगति हुई. अब इसमें 24 प्रत्यक्ष चयनिय सदस्य और 9 नामित सदस्य होते हैं. 2010 से इस्लामाबाद की सत्ताधारी दल ने इस क्षेत्र का हर चुनाव जीता है. नवंबर 2020 में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पाकिस्तान-तहरीक-इ-इन्साफ ने यहां पर 33 में से 24 सीट पर फतह हासिल की थी.

प्रांतीय स्थिति
नवंबर 1, 2020 को गिलगित-बाल्टिस्‍तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, इमरान ख़ान की सरकार ने इस क्षेत्र को अंतरिम प्रांतीय दर्जा देने की घोषणा की. इसी साल मार्च में नवनिर्वाचित विधानसभा ने सर्वसम्मति से गिलगिट-बाल्टिस्‍तान को (कश्मीर विवाद को लेकर किसी भी पूर्वाग्रह के बगैर) पाकिस्तान का अंतरिम प्रांत बनाए जाने के संवैधानिक संशोधन की मांग की.

डॉन के मुताबिक इमरान ख़ान ने जुलाई में कानून मंत्री से गिलगित-पाकिस्तान को एक प्रांत का दर्जा दिए जाने के मसविदे पर तेजी लाने को कहा. और इसे 26वें संवैधानिक संशोधन बिल के तहत तैयार करके सौंप दिया गया है. प्रस्तावित कानून के अनुसार कश्मीर के अनसुलझे विवाद का हिस्से की वजह से, गिलगित-बाल्टिस्‍तान को संविधान के आर्टिकल 1 में संशोधन के तहत अंतरिम प्रांत का दर्जा दिया गया है. गिलगिट-बाल्टिस्‍तान में विधानसभा की स्थापना के अलावा पाकिस्तान संसद में प्रतिनिधित्व को लेकर अलग से एक मसौदा तैयार किया जाएगा.

ये बदलाव गिलगिट-बाल्टिस्‍तान के लोगों की लंबे समये से चली आ रही मांग को पूरा करेगा. पाकिस्तान के प्रति इस बात को लेकर नाराज़गी जरूर है कि उसने वहां के शियाओं को निशाना बनाने के लिए उग्रवादी ताकतों का इस्तेमाल किया लेकिन सरकार का ऐसा मानना है कि एक बार ये प्रांत पाकिस्तान का हिस्सा बन गया तो ये नाराज़गी अपने आप खत्म हो जाएगी.

वहीं कुछ रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान ने ये फैसला चीन के दबाव में आकर लिया है. क्योंकि गिलगिट-बाल्टिस्‍तान की अस्पष्ट स्थिति से चीन की परियोजना खटाई में पड़ सकती है. ऐसा भी कयास लगाया जा रहा है कि ये पाकिस्तान द्वारा भारत के 5 अगस्त, 2019 को कश्मीर से विशेष दर्जा हटाए जाने के फैसले की स्वीकृति से पहले की हवा है. पीओके चुनाव के दौरान पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) ने इमरान ख़ान पर इल्जाम लगाया था कि वो भारत के साथ एक गुप्त समझौते के तहत गिलगिट-बाल्टिस्‍तान को पाकिस्तान का प्रांत बनाने वाले थे. (news18.com)


03-Aug-2021 3:32 PM (52)

न्यूयॉर्क, 3 अगस्त | अमेरिका के एक नए राष्ट्रीय सर्वेक्षण से पता चलता है कि शारीरिक गतिविधि, कंडीशनिंग और गतिशीलता में बदलाव के कारण कोविड-19 महामारी ने वृद्ध वयस्कों के उम्र कम होने और मांसपेशियों की ताकत कम होने से गिराने की संभावना बढ़ गई है। मिशिगन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थकेयर पॉलिसी एंड इनोवेशन के शोधकतार्ओं द्वारा आयोजित हेल्दी एजिंग पर नेशनल पोल से मिली जानकारी के मुताबिक, 50 से 80 वर्ष की आयु के 2,000 से अधिक एडल्ट के राष्ट्रीय नमूने के उत्तर पर आधारित है, जो कि महामारी की शुरूआत के बीच किए गए एक सर्वेक्षण में है। यह सर्वेक्षण मार्च 2020 और जनवरी 2021 तक का है।

सर्वेक्षण में पाया गया है कि 25 प्रतिशत वृद्ध वयस्कों के कमजोर होकर गिरने की संभावना है। इनमें से 40 प्रतिशत में गिरावट भी आई।

महामारी शुरू होने के बाद से एक तिहाई से अधिक वृद्ध वयस्कों (37 प्रतिशत) ने शारीरिक रूप से काम करना कम कर दिया है। लोग मार्च 2020 के बाद से वार्कआउट,बाहर निकालना कम कर दिए है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि घटी हुई गतिविधि 27 प्रतिशत में तब्दील हो गई है। उनकी शारीरिक कंडीशनिंग, लचीलापन, मांसपेशियों की ताकत और धीरज रखना खराब हो गई है।

महामारी के दौरान शारीरिक गतिविधिया कम हुई है। जिसके कारण गिरने का डर 23 फीसदी तक बढ़ गया है। यह उन लोगों में बहुत अधिक है जिन्होंने कम शारीरिक गतिविधि (32 प्रतिशत), खराब शारीरिक कंडीशनिंग (42 प्रतिशत) या खराब गतिशीलता (45 प्रतिशत) हो गई है।

पोल निदेशक और मिशिगन मेडिसिन संक्रामक रोग चिकित्सक प्रीति मलानी ने कहा कि सर्वेक्षण से इस बात का भी पता चलता है कि महामारी के दौरान वृद्ध वयस्कों में अकेलापन और साहचर्य की कमी गतिविधि के स्तर में बदलाव, गतिशीलता और गिरावट के जोखिम और बढ़ सकती है।

मलानी ने कहा,जैसा कि जीवन सामान्य के करीब आता है, विशेष रूप से वृद्ध वयस्कों के बड़े प्रतिशत के लिए, जिन्हें कोविड -19 के खिलाफ पूरी तरह से टीका लगाया गया है। स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और प्रियजनों को अधिक बातचीत को प्रोत्साहित करना चाहिए जिसमें सुरक्षित शारीरिक गतिविधि शामिल है।

रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्रों के अनुसार, हर साल 32,000 से अधिक वृद्ध वयस्कों की मृत्यु हो जाती है, और हाल के वर्षों में संख्या में लगातार वृद्धि हुई है और अमेरिका की आबादी बढ़ने के साथ उम्र भी बढ़ने की उम्मीद है। (आईएएनएस)
 


03-Aug-2021 3:12 PM (39)

सैन फ्रांसिस्को, 3 अगस्त | माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर अब यूजर्स को एप में गूगल अकाउंट या एपल आईडी से साइन इन करने की अनुमति देगा। कंपनी ने प्लेटफॉर्म पर अपने सपोर्ट पेज पर लिखा कि वह अब गूगल और एपल आईडी से लॉग इन करने का विकल्प जोड़ रही है।

माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म ने सोमवार को एक ट्वीट किया जिसमें लिखा है, आसानी से साइन इन करें और अपनी टाइमलाइन को स्क्रॉल करना शुरू करें।

अब, जब आप ट्विटर पर बातचीत में शामिल होने के लिए लॉग इन या साइन अप करते हैं, तो आपके पास ऐप पर और वेब पर अपने गूगल अकाउंट का उपयोग करने का विकल्प होगा (या) आईओएस पर और जल्द ही वेब पर अपनी ऐप्पल आईडी का उपयोग करने का विकल्प होगा।

कथित तौर पर यह सुविधा पिछले महीने ट्विटर बीटा में दिखाई गई थी, लेकिन अब यह अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध है।

बताया गया था कि जुलाई में ट्विटर कथित तौर पर ऐप्पल के साथ साइन इन के लिए समर्थन जोड़ने पर काम कर रहा है।

शोधकर्ता जेन मनचुन वोंग ने पहले कहा था कि अगर ट्विटर पूरी तरह से इसे जनता के लिए रोल आउट कर देता है, तो यह सुविधा यूर्जस को अपनी ऐप्पल आईडी का उपयोग करके ट्विटर में साइन इन करने की अनुमति देगा।

वोंग ने कई अलग-अलग चीजों की खोज की थी जो बताते हैं कि ट्विटर ऐप्पल के साथ साइन इन के लिए समर्थन विकसित कर रहा है। सबूत का एक टुकड़ा एक नया कनेक्टेड खाते विकल्प है जो ऐप्पल को साइन इन करने के विकल्प के रूप में सूचीबद्ध करता है। (आईएएनएस)


03-Aug-2021 2:57 PM (19)

अफगानिस्तान में अमेरिका और ब्रिटिश दूतावासों ने तालिबान पर नागरिकों से संभावित बदले की भावना से हत्या करने का आरोप लगाया है. तालिबान ने इस आरोप से इनकार किया है.

 (dw.com)

ऐसे समय में जब तालिबान को सबसे बड़े शहर पर कब्जा करने से रोकने के लिए अफगान सेना कड़ी मेहनत कर रही है, अमेरिका और ब्रिटेन ने तालिबान पर पाकिस्तानी सीमा के पास हाल ही में कब्जा किए गए शहर में "नागरिकों की हत्या" करने का आरोप लगाया है.

दोहा स्थित तालिबान वार्ता दल के सदस्य सुहैल शाहीन ने रॉयटर्स को बताया कि आरोपों वाले ट्वीट "निराधार रिपोर्ट" हैं.

तालिबान के खिलाफ युद्ध अपराधों के आरोप
अमेरिकी दूतावास ने एक बयान ट्वीट कर तालिबान पर दक्षिणी कंधार प्रांत के स्पिन बोलदाक क्षेत्र में दर्जनों नागरिकों की हत्या करने का आरोप लगाया. यहां भारी लड़ाई हुई थी. बयान को ब्रिटिश दूतावास ने भी ट्वीट किया था.

अमेरिका और ब्रिटेन का बयान अफगान स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग (एआईएचआरसी) की एक रिपोर्ट के बाद आया है जिसमें कहा गया है कि आतंकवादियों ने स्पिन बोलदाक में "बदले के लिए हत्या" की थी.

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा, "तालिबान ने मौजूदा और पूर्व सरकारी अधिकारियों की पहचान की और उनके खिलाफ जवाबी कार्रवाई की. उन्होंने उन लोगों को भी मार डाला जिनकी संघर्ष में कोई भूमिका नहीं थी." अमेरिकी और ब्रिटिश दूतावासों ने अलग-अलग ट्वीट में कहा कि हत्याएं "युद्ध अपराधों के समान" थीं.

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने भी तालिबानी नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि यह खबर "बेहद परेशान करने वाली और पूरी तरह से अस्वीकार्य" है. उन्होंने कहा कि तालिबान जो अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाहता है इन ज्यादतियों के कारण संभव नहीं होगा.

अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने एक बयान में कहा, "तालिबान के हमले दिखाते हैं कि उनके मन में मानव जीवन के लिए कोई सम्मान नहीं है. अगर वे बातचीत के जरिए विवाद का हल निकालने में वाकई ईमानदार हैं तो उन्हें इस तरह के भीषण हमलों को रोकना होगा."

तालिबान के लड़ाकों ने 31 जुलाई और 1 अगस्त को भारी लड़ाई के बाद 2 अगस्त को तीन प्रांतीय राजधानियों लश्कर गाह, कंधार और हेरात पर धावा बोल दिया. जिसके बाद हजारों नागरिकों को अपने घरों से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

अफगान सरकार द्वारा सैकड़ों कमांडो की तैनाती की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद तालिबान ने हेलमंद की राजधानी लश्कर गाह में सिटी सेंटर और जेल पर एक साथ हमला किया.

इस बीच तालिबान ने लश्कर गाह पर दबाव बढ़ा दिया है. विश्लेषकों का कहना है कि अगर तालिबान का वहां नियंत्रण हो जाता है, तो यह सरकार के लिए यह एक बड़ा सैन्य और मनोवैज्ञानिक झटका होगा.

"अमेरिका जिम्मेदार"
अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने देश में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया है. विदेशी सैनिकों की वापसी का जिक्र करते हुए गनी ने अफगान संसद में कहा, "हमारी मौजूदा स्थिति का कारण यह है कि यह फैसला अचानक लिया गया. सुरक्षाबलों की वापसी के गंभीर परिणाम होंगे."

राष्ट्रपति का बयान तब आया जब वॉशिंगटन ने घोषणा की कि वह देश में बढ़ती हिंसा के मद्देनजर हजारों और अफगान शरणार्थियों को निकालने के लिए तैयार है. इसमें वे लोग शामिल हैं जिन्होंने सालों से अमेरिका के लिए काम किया है.

वॉशिंगटन ने पिछले दो दशकों में अमेरिकी सेना और दूतावास में सेवा देने वाले हजारों अनुवादकों और उनके परिवारों को देश से निकालना शुरू कर दिया है.

एए/वीके (रॉयटर्स, एएफपी)


03-Aug-2021 2:55 PM (20)

अमेरिका समेत कई देश पोलैंड पर दबाव बना रहे हैं कि यहूदियों को अपने पुरखों के घरों पर दावा करने से रोकने वाला कानून न लाया जाए.

  डॉयचे वैले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट

होलोकास्ट और कम्युनिस्ट सरकारों के दौरान जिन लोगों की संपत्तियों को छीन लिया गया था, उन्हें वापस पाने की राह में बड़ी बाधा माना जा रहा एक कानून पोलैंड की संसद से जल्दी ही पास हो सकता है.

पिछले हफ्ते अमेरिका ने कहा कि यूरोप में पोलैंड ही ऐसा देश है जो नात्सी नरसंहार के दौरान यातनाएं झेलने वाले परिवारों की संपत्तियां लौटाने या मुआवजा देने की प्रतिबद्धता से पीछे हट रहा है. हालांकि पोलिश नेता इन आलोचनाओं को खारिज करते हैं.

क्या है कानून?
प्रस्तावित कानून इसी महीने से लागू हो सकता है. इस कानून को इस्राएल भी खारिज कर चुका है. यदि यह कानून पास होता है तो संपत्ति पर दावा करने पर 30 वर्ष की सीमा लागू हो जाएगी.

इसका अर्थ होगा कि कम्युनिस्ट शासन के दौरान जो संपत्तियां छीनी गई थीं, उन पर मौजूदा दावे भी खारिज हो जाएंगे. यह कानून पोलिश, यहूदी और अन्य कई तबकों को प्रभावित करेगा.

पोलैंड का कहना है कि यह कानून इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि संपत्तियों के दावों में कई फ्रॉड और अनियमितताएं पाई गई हैं. अधिकारियों के मुताबिक कई बार मकानों में रह रहे लोगों को निकालना पड़ा या वे प्रॉपर्टी डीलरों के हाथों में चले गए.

अधिकारियों का कहना है कि संपत्ति पर अधिकार के दावे अब भी संभव होंगे, बस उसके लिए अदालत के जरिए दावा करना होगा और किसी भी राष्ट्रीयता के लोग ये दावे कर सकेंगे.

पोलैंड के दावे अधूरे
अमेरिका और इस्राएल इन तर्कों से सहमत नहीं हैं. इस्राएल ने तो यहां तक कहा है कि यह कानून पोलैंड के साथ उसके संबंधों को प्रभावित कर सकता है.

एक अमेरिकी अधिकारी ने पिछले हफ्ते समाचार एजेंसी एपी को बताया, "हम इस बात से निराश हैं कि पोलैंड की सरकार और विपक्ष दोनों ही जानबूझकर संपत्ति की वापसी से अक्सर पीछे हटते दिखते हैं. हम चाहेंगे कि पोलिश अधिकारी कम से कम इतना संशोधन कानून में जरूर करे कि जो मौजूदा दावे हैं, वे जारी रहें और उनकी प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी हो.”

वर्ल्ड जूइश रेस्टीट्यूशन ऑर्गनाइजेशन और वर्ल्ड जूइश कांग्रेस ने भी पोलैंड की सरकार से मांग की है कि एक ऐसा कानून या प्रक्रिया बनाई जाए जो समस्या को समग्र दृष्टि से देखे और मुआवजे के मामलों को समय पर हल करे.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने छह ऐसे देशों की पहचान की है जहां मुआवजों के दावों को अब भी पूरी तरह निपटाया नहीं गया है. लेकिन अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक उन छह देशों में से सिर्फ पोलैंड ही है जो पीछे हट रहा है. बाकी देश हैं क्रोएशिया, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया और रोमानिया.

विवाद का इतिहास
दूसरे विश्व युद्ध से पहले पोलैंड में यूरोप की सबसे बड़ी यहूदी आबादी रहती थी, जिनकी संख्या लगभग 35 लाख थी. नात्सी जर्मनी के दौरान हुए नरसंहार में इस आबादी का बड़ा हिस्सा मारा गया था. जर्मनी के पोलैंड पर कब्जे के दौरान बड़ी संख्या में यहूदी लोगों की संपत्तियों को उनसे छीन लिया गया था.

युद्ध के बाद जब देश में कम्युनिस्ट सरकार बनी तो उसने भी वॉरसा और अन्य शहरों में यहूदियों से इतर दूसरे लोगों की संपत्तियां भी छीनीं. 1989 में जब कम्युनिस्ट शासन का अंत हुआ तो संपत्तियों पर दोबारा दावे के रास्ते खुले. इनमें से ज्यादातर पोलिश लोगों ने ही किए थे.

यूरोप में पोलैंड ही एक ऐसा देश है जिसने सरकार द्वारा छीनी गई निजी संपत्ति के बदले कोई मुआवजा नहीं दिया है. सिर्फ सामुदायिक यहूदी संपत्तियों जैसे यहूदी धर्मस्थलों, प्रार्थना स्थलों और कब्रिस्तानों को या तो लौटाया गया या फिर उनके लिए मुआवजा दिया गया.

अब भी देश में बड़ी संख्या में ऐसे दावे शेष हैं जिनका निपटारा नहीं हो पाया है. यह मुद्दा अक्सर देश में राजनीतिक रंग भी लेता रहा है. इसके अलावा अमेरिका और इस्राएल से तनाव का कारण भी बनता रहा है. (dw.com)
 


03-Aug-2021 1:30 PM (31)

 

बीजिंग. चीन के वुहान में एक साल के भीतर कोरोना वायरस संक्रमण के नए मामले सामने आने के बाद स्थानीय प्रशासन ने पूरी आबादी का कोविड-19 टेस्ट करने का फैसला किया है. वुहान ही चीन का वो शहर है, जहां पहली बार कोरोना वायरस संक्रमण फैला था, और अब तकरीबन एक साल बाद वुहान में कोरोना का एक स्थानीय मामला सामने आया है.

वुहान में स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी ली ताओ ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि जल्द ही सभी लोगों का न्यूक्लियक एसिड टेस्ट करने के लिए अभियान शुरू किया जाएगा. बता दें कि चीनी शहर वुहान की आबादी 1 करोड़ से ज्यादा (11 मिलियन) की है.

इससे पहले सोमवार को वुहान के अधिकारियों ने यह ऐलान किया था कि शहर के प्रवासी मजदूरों में कोरोना संक्रमण के सात स्थानीय मामले मिले हैं. ये मामले तब सामने आए हैं, जब 2020 के शुरुआती महीनों में वुहान में कोरोना संक्रमण के प्रकोप पर चीन ने सफलतापूर्वक काबू पाने का दावा किया था. उसके बाद से लगभग एक साल तक वुहान में संक्रमण का कोई स्थानीय मामला सामने नहीं आया.

वुहान में वायरस संक्रमण फैलने के बाद चीन ने अपने नागरिकों को उनके घरों में कैद कर दिया था. साथ ही घरेलू यातायात सुविधाओं को भी बंद कर दिया और बड़े पैमाने पर कोविड टेस्टिंग के लिए अभियान चलाया गया था. वुहान में कई महीनों तक कोरोना वायरस संक्रमण का प्रकोप देखने को मिला था. दुनिया के सर्वाधिक प्रभावितों शहरों में वुहान शीर्ष में शामिल है.

चीन ने मंगलवार को कोरोना वायरस संक्रमण के 61 मामलों को दर्ज किया है. कोरोना का डेल्टा वैरिएंट चीनी शहर नानजिंग के एयरपोर्ट सफाई कर्मियों को संक्रमित करने के बाद कई शहरों में फैल गया है और संक्रमण फैलने की रफ्तार बेहद तेज है. चीन के अलग-अलग हिस्सों से कोरोना संक्रमण के मामले दर्ज किए जा रहे हैं. (news18.com)


03-Aug-2021 1:29 PM (32)

वॉशिंगटन. अमेरिका में स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच चलाए जाने वाले गिफ्टेड एजुकेशन प्रोग्राम ने एक भारतीय मूल की 11 वर्षीय बच्ची को दुनिया की सबसे मेधावी स्टूडेंट्स में से एक घोषित किया है. न्यूजर्सी स्थित थेल्मा एल सैंडमाइर एलिमेंट्री स्कूल की छात्रा नताशा पेरी को SAT, ACT और अन्य परीक्षाओं में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया है. इन परीक्षाओं का आयोजन जॉन हॉपकिन्स सेंटर फॉर टैलेंटेड यूथ की ओर से टैलेंट सर्च अभियान के तौर पर किया गया था.

डूडलिंग और जेआरआर टॉल्किन के उपन्यास पढ़ना पसंद करने वाली पेरी ने जॉन हॉपकिन्स द्वारा आयोजित हाई ऑनर अवॉर्ड में अपनी जगह बनाई और उन 20 फीसदी बच्चों में शामिल हुई जिन्होंने टैलेंट सर्च अभियान में हिस्सा लेकर अवॉर्ड के लिए क्वालिफाई किया. पीटीआई से बातचीत में पेरी ने कहा, “इससे मुझे और ज्यादा बेहतर करने की प्रेरणा मिलती है.”

पीटीआई के मुताबिक इस टैलेंट सर्च प्रतियोगिता में दुनिया भर के 84 देशों के 19,000 छात्रों ने हिस्सा लिया था. पेरी इस प्रतियोगिता में तब शामिल हुईं जब वो ग्रेड पांच की स्टूडेंट थीं. परीक्षा का आयोजन 2021 की गर्मियों में किया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक पेरी का मौखिक और क्वान्टिटेटिव सेक्शन की परीक्षा में रिजल्ट एडवांस ग्रेड-8 के 90 फीसदी के बराबर माना गया.

बाल्टीमोर स्थित जॉन्स हॉपकिन्स सेंटर फॉर टैलेंटेड यूथ दुनिया भर के प्रतिभाशाली छात्रों की पहचान करने के लिए ग्रेड लेवल टेस्टिंग प्रक्रिया का उपयोग करता है. परीक्षा के जरिए छात्रों की वास्तविक शैक्षणिक क्षमताओं की स्पष्ट तस्वीर भी उभरकर सामने आती है.

जॉन्स हॉपकिन्स सेंटर फॉर टैलेंटेड यूथ की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर वर्जिनिया रोच ने एक बयान में कहा, “हम इन छात्रों के साथ सेलेब्रेट करने के लिए रोमांचित हैं,. एक साल में जो कुछ भी सामान्य था, वह सीखने के प्रति उनकी ललक के चलते बदल गया है. हम हाई स्कूल, कॉलेज और उससे आगे की पढ़ाई में विद्वानों और नागरिकों के रूप में उनकी मदद करने के लिए उत्साहित हैं.” (news18.com)


03-Aug-2021 1:16 PM (22)

भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े का एक कार्यबल अगस्त 2021 की शुरुआत से दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण चीन सागर और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में दो महीने से अधिक की विदेशी तैनाती पर रहेगा.

 डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट

भारत और चीन लगभग 15 महीनों से पूर्वी लद्दाख में एक सैन्य गतिरोध में शामिल हैं. भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े के जहाज दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण चीन सागर और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में एक विदेशी तैनाती पर आगे बढ़ेंगे. और संयुक्त रूप से अभ्यास में भाग लेंगे. भारतीय नौसेना चीन के पड़ोसी देशों की नौसेनाओं और क्वॉड के सदस्य देशों के साथ अभ्यास करेगी.

नौसेना के एक बयान में कहा गया है कि भारतीय नौसेना के जहाजों की तैनाती समुद्री क्षेत्र में अच्छी व्यवस्था सुनिश्चित करने और भारत-प्रशांत के देशों के बीच मौजूदा संबंधों को मजबूत करने के लिए मित्र देशों के साथ परिचालन पहुंच, शांतिपूर्ण उपस्थिति और एकजुटता को रेखांकित करना चाहती है.

चीन के पड़ोसियों के साथ अभ्यास
यह तैनाती भारत की "एक्ट ईस्ट नीति" के अनुसरण में और मित्र देशों के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने के लिए है. भारतीय टास्क फोर्स में गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर रणविजय, गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट शिवालिक, एंटी-सबमरीन कार्वेट कदमत और गाइडेड मिसाइल कार्वेट कोरा शामिल हैं.

बाद के तीन जहाजों को स्वदेश में डिजाइन किया गया है और वे हथियारों और सेंसर की एक बहुमुखी प्रणाली से लैस हैं जिसे रक्षा शिपयार्ड द्वारा भारत में बनाया गया है.

हिंद प्रशांत में चीन को चुनौती
हिंद प्रशांत में तैनाती के दौरान जहाजों को वियतनामी पीपल्स नेवी, रिपब्लिक ऑफ फिलीपींस नेवी, रिपब्लिक ऑफ सिंगापुर नेवी (सिमबेक्स), इंडोनेशियाई नेवी (समुद्र शक्ति) और रॉयल ऑस्ट्रेलियन नेवी (ऑस-इंडेक्स) के साथ द्विपक्षीय अभ्यास में भाग लेना है.

इसके अलावा वह जापानी समुद्री आत्मरक्षा बल, रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की नौसेना के साथ बहुपक्षीय अभ्यास मालाबार-21 में भी भाग लेगी.

भारतीय नौसेना के बयान में कहा गया है कि नौसेना क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास को आगे बढ़ाने के लिए मित्र देशों और भारतीय और प्रशांत महासागर क्षेत्रों में नियमित तैनाती करती है.

नौसेना का कहना है कि इसके अलावा इस तरह के जुड़ाव दोस्ती के पुल का निर्माण करते हैं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करते हैं. नौसेना के मुताबिक ये समुद्री पहल भारतीय नौसेना और मित्र देशों के बीच तालमेल और समन्वय को बढ़ाती है.

चीन का दावा
चीन दक्षिणी चीन सागर के बड़े हिस्से पर अपने अधिकार का दावा करता है. यह दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में तनाव और विवाद की बड़ी वजह है क्योंकि कई अन्य देश भी इन इलाकों पर दावा करते हैं, जिन्हें अमेरिका और यूरोप का भी समर्थन मिलता है. कथित "नाईन डैश लाइन" पर उसके अधिकार का दावा द हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में भी खारिज हो चुका है.

चीन ने इंडोनेशिया, वियतनाम, फिलीपींस, जापान, और ताइवान जैसे देशों की सीमाओं में लगातार अतिक्रमण किया है जिससे इन देशों ने भी अपने तेवर तीखे करने शुरू किए हैं. (dw.com)


03-Aug-2021 1:15 PM (19)

फ्रांस की सरकार ने टीका ना लगवाने के खिलाफ कड़े कदम उठाने का फैसला किया है. ऐसे लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर जाने की अनुमति भी नहीं होगी.

 डॉयचे वैले पर लीजा लुईस की रिपोर्ट
    
पेरिस के एक रेस्तरां मालिक सिल्वेन बेलॉद के लिए लिए कोविड की शुरुआत से ही जिंदगी और व्यापार मुश्किल रहे हैं. पिछले साल उनका धंधा 60 प्रतिशत कम रहा. और अब पेरिस स्थित इस रेस्तरां के लिए हालात और मुश्किल होने वाले हैं. सरकार कोविड वैक्सीन न लेने वालों के लिए नए प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है, जिसका सीधा असर बेलॉद के धंधे पर पड़ेगा.

जल्दी ही फ्रांस में एक हेल्थ पास जारी किए जाएगा जिसके बिना ट्रेनों, घरेलू उड़ानों, लंबी दूरी की बसों और रेस्तरां व कैफे में जाने की अनुमति नहीं होगी. यह पास स्मार्ट फोन या कागज पर एक क्यूआर कोड है जो दिखाता है कि कोविड वैक्सीन लगवाई जा चुकी है और कोविड संक्रमण की मौजूदा स्थिति क्या है.

टीका नहीं तो सुविधा नहीं
सांस्कृतिक कार्यक्रमों में तो पहले से ही क्यूआर कोड अनिवार्य कर दिया गया है. 9 अगस्त से इसका इस्तेमाल बाकी जगहों पर भी जरूरी कर दिया जाएगा, बशर्ते फ्रांस की सर्वोच्च अदालत इस पर मुहर लगा दे.

नए उपायों के तहत स्वास्थ्यकर्मियों और बीमार व कमजोर लोगो के साथ काम करने वालों के लिए भी कोविड का टीका लगवाना अनिवार्य किया जाएगा. जो कर्मचारी इस आदेश को नहीं मानेंगे उन्हें बिना तन्ख्वाह के निलंबित किया जाएगा.

फ्रांसीसी अधिकारी कोविड की चौथी लहर के खतरे को देखते हुए टीकाकरण की रफ्तार और सीमा बढ़ाना चाहते हैं. इसलिए ये सख्त उपाय किए जा रहे हैं. हाल के हफ्तों में रोजाना आने वाले कोविड के मामलों में काफी वृद्धि देखी गई है. जुलाई में जहां 3,000 मामले आ रहे थे, वहीं अब इनकी संख्या 20 हजार को पार कर चुकी है.

सरकार देश में एक सामूहिक इम्यूनिटी के स्तर को हासिल करना चाह रही है, जो स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक 80-90 प्रतिशत आबादी के टीकाकरण से ही संभव है. लेकिन सभी लोग टीकाकरण पर विश्वास नहीं करते. और बहुत से ऐसे हैं जो सख्त उपायों के खिलाफ हैं.

आजादी का हनन?
रेस्तरां मालिक बेलॉद हालांकि टीकाकरण के समर्थक हैं. वह खुद पूरी खुराक ले चुके हैं और जल्दी ही उनके सभी कर्मचारी भी ले लेंगे. लेकिन उन्हें नए सख्त नियमों से अपने व्यापार को लेकर चिंता हो रही है.

बेलॉद ने डीडबल्यू को बताया, "हमारे कुछ ग्राहकों ने हमें बताया है कि वे अब यहां नहीं आएंगे. उनमें से सभी वैक्सीन नहीं लगवाना चाहते और हर 48 घंटे पर टेस्ट भी नहीं करवाना चाहते. और हमारा टर्नओवर पहले ही सामान्य से 30 प्रतिशत कम है क्योंकि सामान्य सालो के मुकाबले पर्यटक कम हैं.”

32 साल का यह व्यापारी इसलिए भी चिढ़ा हुआ है कि महीनों तक बंद रहने के बाद रेस्तरां खोलने की इजाजत दो महीने पहले ही मिली थी और अब ये नए नियम लागू किए जा रहे हैं. वह कहते हैं, "हमें इस बात की राहत है कि अब ग्राहकों को अब अंदर भी बुला सकते हैं. ऐसे में बारिश के वक्त हमें ज्यादा विकल्प मिल जाते हैं. और अच्छी बात ये भी है कि अब कर्फ्यू पूरी तरह उठा लिया जाएगा.”

12 जुलाई को लागू किए गए नए नियमों से निराश लोगों की संख्या काफी बड़ी है. पिछले तीन हफ्तों से हर सप्ताहांत पर दसियों हजार लोग विरोध करने सड़कों पर उतर रहे हैं.

विरोधी प्रदर्शनकारियों का मानना है कि उनकी स्वतंत्रता खतरे में है. कुछ लोग तो कहते हैं कि समुदाय को ही बांट दिया जा रहा है. हर हफ्ते विरोधी प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ती जा रही है.

माक्रों नहीं मानेंगे!
पिछले महीने मीडिया से बातचीत में फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने स्वतंत्रता की इस मांग को गलत बताया था. उन्होंने कहा था, "बिना कुछ दिए स्वतंत्रता नहीं मिलती.”

फिर भी, हेल्थ पास के समर्थकों की संख्या ज्यादा है. हाल ही में एक सर्वेक्षण संस्था आईफोप ने सर्वे किया जिसमें सिर्फ एक तिहाई लोगों ने ही विरोधियों को सही बताया.

एक अन्य सर्वे इप्सोस और सोपरा स्टेरिया ने रेडियो स्टेशन फ्रांसइन्फो के लिए किया था, जिसमें पता चला कि 60 प्रतिशत लोग हेल्थ पास के पक्ष में हैं जबकि 74 प्रतिशत मानते हैं कि स्वास्थ्यकर्मियों के लिए अनिवार्य वैक्सीनेशन उचित है.

माक्रों द्वारा नए नियमों के ऐलान के बाद से ही टीका लगवाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है. जुलाई के शुरुआत में करीब टीका लगवाने वालों की संख्या औसतन साढ़े तीन लाख साप्ताहिक थी, जो अब बढ़कर साढ़े छह लाख हो चुकी है. (dw.com)
 


03-Aug-2021 10:50 AM (28)

ढाका, 3 अगस्त| बांग्लादेश में पिछले 24 घंटों में स्थानीय समयानुसार सोमवार सुबह 8:00 बजे तक कुल 287 लोगों को मच्छर जनित डेंगू बुखार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, जो इस साल अब तक एक दिन में सबसे ज्यादा संख्या है। इसकी जानकारी स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) ने दी।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत डीजीएचएस द्वारा बताए गए आंकड़ों के अनुसार, अकेले ढाका में 279 लोगों में डेंगू का पता चला है।

डीजीएचएस ने कहा कि, सोमवार को ताजा संक्रमण के साथ, बांग्लादेश में इस साल अब तक चार संदिग्ध मौतों के साथ डेंगू के मामलों की संख्या बढ़कर 3,182 हो गई है।

ताजा संक्रमण टैली बांग्लादेश की राजधानी शहर में एडीज जनित बीमारी के तेजी से बढ़ने की ओर इशारा करता है।

ढाका में अधिकारियों ने हाल ही में मच्छर उन्मूलन अभियान को मजबूत किया है क्योंकि जून की मानसूनी बारिश के साथ डेंगू का मौसम शुरू होता है। (आईएएनएस)


02-Aug-2021 7:44 PM (43)

बीजिंग. चीन पर एक बार फिर कोरोना का खतरा मंडराने लगा है. देश में डेल्टा वैरिएंट के खौफ की वजह से लाखों की संख्या में लोगों को घरों के भीतर रहने के निर्देश दिए गए हैं. दरअसल सोमवार को देश में डेल्टा वैरिएंट के 55 केस मिले हैं. ये केस देश के 20 शहरों में मिले हैं. डेल्टा वैरिएंट की संक्रामक क्षमता के देखते हुए चीनी सरकार ने सक्रियता बरतनी शुरू कर दी है. चीन में इतनी बड़ी संख्या में एक दिन में कोरोना के मामले लंबे समय बाद सामने आए हैं.

पूरे देश के विभिन्न शहरों में स्थानीय प्रशासन ने कोरोना टेस्टिंग की रफ्तार बढ़ा दी है. राजधानी बीजिंग में भी टेस्टिंग स्पीड बढ़ाई गई है. देश के हुनान प्रांत के झूझाउ शहर में करीब 12 लाख लोगों को तीन दिनों तक सख्त लॉकडाउन में रहने के आदेश दिए गए हैं. स्थानीय प्रशासन का कहना है कि कोरोना की स्थिति गंभीर हो सकती है.

कोरोना को काबू में करने के लिए चीन थपथपाता रहा है अपनी पीठ
बता दें 2019 में चीन में ही पहली बार कोरोना का आउटब्रेक हुआ था. इसके बाद कोरोना की स्थिति को काबू में करने के लिए चीनी सरकार ने अपनी पीठ कई बार थपथपाई है. लेकिन भारत के बाद यूरोपीय देशों में तबाही मचा रहा डेल्टा वैरिएंट अब चीन का भी रुख कर चुका है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर एक बयान में कहा, ‘कई संक्रमण रोकथाम उपायों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया, जिसकी वजह से नए मामले तेजी से फैले हैं.’

चीनी अधिकारी ने स्थिति के गंभीर होने की कही बात
चीन के एक स्वास्थ्य अधिकारी ने बीते शनिवार को कहा था कि कोरोना वायरस का घातक डेल्टा स्वरूप का देश के और अधिक क्षेत्रों तक फैलना जारी रह सकता है क्योंकि यह व्यस्ततम हवाईअड्डों में से एक नानजिंग हवाईअड्डे पर पाया गया है जहां गर्मी में सैकड़ों पर्यटक पहुंचे. राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग के वरिष्ठ अधिकारी एच किंघुआ ने संवाददाताओं से कहा कि पूर्वी चीन में जिआंग्सु प्रांत के नानजिंग शहर में डेल्टा स्वरूप की नयी लहर का अल्पकालिक अवधि में और अधिक क्षेत्रों तक फैलना जारी रह सकता है.


02-Aug-2021 7:32 PM (37)

बीजिंग, 2 अगस्त | 2 अगस्त को दुनिया के 100 से अधिक देशों और क्षेत्रों की 300 से अधिक पार्टियों, सामाजिक संगठनों और थिंक-टैंक ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सचिवालय को संयुक्त बयान भेजा। इस संयुक्त बयान के अनुसार, उन्होंने मानव जीवन सुरक्षा और स्वास्थ्य के प्रति नये कोरोना वायरस के गंभीर खतरों से अवगत करवाने की अपील की। उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को महामारी-रोधी सहयोग को मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने डब्ल्यूएचओ से वायरस की ट्रेसिबिलिटी का उद्देश्य और निष्पक्ष अनुसंधान करने की अपील की और वायरस की ट्रेसिबिलिटी का राजनीतिकरण किये जाने का विरोध भी प्रकट किया।

संयुक्त बयान के अनुसार मानव एक भाग्य समुदाय है। बड़े संकट के सामने कोई भी देश अकेला रह नहीं सकता है। महामारी से जीतने के लिये अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सहयोग आगे बढ़ाना चाहिये। वायरस की ट्रेसिबिलिटी एक वैज्ञानिक प्रश्न है। दुनियाभर के वैज्ञानिकों और चिकित्सा विशेषज्ञों को सहयोग कर इस प्रश्न का अनुसंधान करना और तथ्यों व सबूतों के आधार पर वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालना चाहिये।

इस बयान में पता चला है कि वायरस की ट्रेसिबिलिटी सभी देशों का आम दायित्व है। यह डब्ल्यूएचओ की महासभा द्वारा प्रकाशित संकल्प की आवश्यकताओं के अनुकूल नहीं है कि डब्ल्यूएचओ के सदस्य देशों से जरूरी बातचीत के बगैर डब्ल्यूएचओ के सचिवालय ने वायरस की ट्रेसिबिलिटी के दूसरे चरण की परियोजना एकतरफा रूप से प्रस्तावित की।

साथ ही, यह बात न केवल दुनिया भर वायरस की ट्रेसिबिलिटी के अनुसंधान के नवीनतम परिणामों को पूरी तरह से प्रतिबिंबित नहीं करती है, बल्कि वायरस की ट्रेसिबिलिटी क्षेत्र में वैश्विक सहयोग को बढ़ाने के लिए हानिकारक है। डब्ल्यूएचओ के सचिवालय को सदस्य देशों के साथ सहयोग करना चाहिये।

बयान के अनुसार इन पार्टियों, सामाजिक संगठनों और थिंक टैंक ने वायरस की ट्रेसिबिलिटी के राजनीतिकरण का ²ढ विरोध प्रकट किया। इसके अलावा उन्होंने राजनीतिक कारकों व राजनीतिक जोड़-तोड़ के संबंधित अनुसंधान प्रक्रिया और महामारी-रोधी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर हस्ताक्षर कर ²ढ़ विरोध जताया।

बयान के अनुसार चीन समेत कुछ देशों को प्रशंसा की गयी है कि उन देशों ने पूरी दुनिया विशेषकर विकासशील देशों को वैक्सीन की मदद दी। उन्होंने महामारी के खिलाफ वैश्विक सहयोग में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बयान के मुताबिक वैक्सीन के अनुसंधान, विकास व उत्पादन से सक्षम देशों को संबंधित वैक्सीन के निर्यात प्रतिबंधित और ओवरस्टॉकिंग करने से बचना चाहिये।

उन्होंने अपील की कि सभी देशों की पार्टियों और संगठनों को संबंधित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को सक्रिय बढ़ाना और मानव स्वच्छता व स्वास्थ्य समुदाय के निर्माण के लिये संयुक्त प्रयास करना चाहिये।(आईएएनएस)


02-Aug-2021 7:18 PM (34)

ऑस्ट्रेलियाई फिनटेक कंपनी 'आफ्टरपे' सात साल पहले "अभी खरीदो, भुगतान बाद में करो" के सपने के साथ शुरू की गई थी. अब इसे अमेरिकी डिजिटल भुगतान कंपनी 'स्क्वायर' 29 अरब डॉलर में खरीद रही है.

(dw.com)  

'स्क्वायर' ट्विट्टर के संस्थापक और सीईओ जैक डॉर्सी की कंपनी है. कहा जा रहा है कि 'आफ्टरपे' को खरीदने का यह सौदा इतना बड़ा है जितना बड़ा ऑस्ट्रेलिया में आज तक नहीं देखा गया. आफ्टरपे का ऐप उपभोक्ताओं को छोटी छोटी खरीदारी भी नियमित किश्तों में करने की सुविधा देता है.

यह क्रेडिट कार्ड के जैसा लग सकता है, लेकिन इसमें किश्तों में भुगतान करने के लिए ना कोई ब्याज चुकाना पड़ता है और ना जुड़ने का शुल्क. इसके अलावा खर्च की सीमा को कम ही रखा जाता है. हालांकि जो निर्धारित भुगतान नहीं करते हैं उन्हें देरी करने का शुल्क जमा करना पड़ता है.

कैसे कमाती है कंपनी

ऑस्ट्रेलियाई उपभोक्ताओं के लिए यह शुल्क खरीदे गए सामान की कीमत का 25 प्रतिशत तक हो सकता है, लेकिन इसमें प्रति आर्डर 68 डॉलर की सीमा है. कंपनी की अधिकतर कमाई विक्रेताओं से लेन देन शुल्क लेकर होती है. आफ्टरपे का इतेमाल करने वाली दुकानों की लागत लेन देन के कुल मूल्य के करीब चार प्रतिशत के आस पास बैठती है, लेकिन बाकी नकद वो सीधा कमा लेती हैं.उन्हें भुगतान ना होने का जोखिम भी नहीं उठाना पड़ता है. 'आफ्टरपे' की स्थापना 2014 में ऑस्ट्रेलिया में ही रहने वाले ऐंथनी आइसेन और निक मोलनार ने की थी. मोलनार 31 साल के हैं और 'आफ्टरपे' शुरू करने से पहले इंटरनेट पर आभूषण बेचने का काम किया करते थे.

उनके पड़ोसी आइसेन कई सालों से फाइनेंस और निवेश के क्षेत्रों में काम कर चुके थे. दोनों ने जब हाथ मिलाया तो मोलनार के घर में ही 'आफ्टरपे' का जन्म हुआ. इसे बनाने के पीछे दोनों का उद्देश्य कैशलेस जीवनशैली अपना रहे मिलिनियलों को लुभाना था.

युवाओं में लोकप्रिय

'स्क्वायर' के साथ हुए इस सौदे के पहले ही दोनों अरबपति बन चुके थे, लेकिन माना जा रहा है कि अब दोनों की संपत्ति में काफी इजाफा हो जाएगा. 'आफ्टरपे' अब ऑस्ट्रेलिया के अलावा अमेरिका, कनाडा, यूके, फ्रांस और इटली में भी मौजूद है. दुनिया भर में ऐप के 1.6 करोड़ से भी ज्यादा उपभोक्ता हैं और लगभग 100,000 विक्रेता इसका इस्तेमाल करते हैं."अभी खरीदो, भुगतान बाद में करो" सुविधा देने वाली दूसरी सेवाओं के अलावा, इस ऐप को युवाओं के ऑनलाइन खर्च के तरीके को पूरी तरह से बदल देने का श्रेय भी दिया जाता है. कुछ आलोचकों ने चिंता व्यक्त की है कि इस तरह के ऐप लोगों को वो पैसा खर्च करने के लिए लुभा सकते हैं जो असल में उनके पास है नहीं.

इस तरह की सेवाएं अधिकांश देशों में अनियंत्रित हैं, जिसकी वजह से नियामकों से मांग भी की जा रही है कि वो उपभोक्ताओं की रक्षा करने के लिए हस्तक्षेप करें. इसी साल मार्च में 'आफ्टरपे' और सात दूसरी ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों ने एक स्वैच्छिक औद्योगिक आचार संहिता बनाई और उस पर हस्ताक्षर किए.

विनियमन की जरूरत

कैलिफोर्निया के नियामकों ने जब 'आफ्टरपे' पर बिना लाइसेंस के ऋण देने का व्यापार चलाने का आरोप लगाया, तो कंपनी ने लगभग 10 लाख अमेरिकी डॉलर का भुगतान करना स्वीकार किया. 'स्क्वायर' के पास पहले से 'कैश ऐप' नाम की एक मोबाइल भुगतान सेवा है, जिसे हर साल करीब सात करोड़ लोग इस्तेमाल करते हैं.

कंपनी की योजना है कि 'आफ्टरपे' की सेवाओं को अपनी मौजूदा सेवाओं के साथ समाहित कर लिया जाए. इन सेवाओं में 'सेलर' भी शामिल है. कंपनी का कहना है कि ये सेवाएं क्रेडिट के पारंपरिक तरीकों से दूर जा रही युवा पीढ़ी को आकर्षित करती हैं. दोनों कंपनियों का कहना है कि इस सौदे से दोनों को और विस्तार करने में मदद मिलेगी और वो नए ग्राहकों और विक्रेताओं तक पहुंच पाएंगी. उम्मीद की जा रही है कि सौदा 2022 की शुरुआत में पूरा हो जाएगा. (dw.com)

सीके/ (एएफपी)


02-Aug-2021 7:11 PM (26)

 

नई दिल्‍ली. दुनिया के सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के भाई इब्राहिम बिन लादेन की हवेली अब बिकने वाली है. अमेरिका के लॉस एंजेलिस में स्थित यह शानदार हवेली पिछले 20 साल से खाली पड़ी थी. इस हवेली की बिकवाली की खबर सामने आते ही यह वायरल हो गई है. आपको यह भी बता दें कि यह हवेली करीब 2 अरब डॉलर में बिकने वाली है.

दरअसल अमेरिका का लॉस एंजेलिस महंगा शहर है. इस हवेली को इब्राहिम बिन लादेन ने 1983 में खरीदा था. तब इसके लिए उसने करीब 20 लाख डॉलर यानी 1.48 करोड़ रुपये चुकाए थे. लेकिन यह हवेली पिछले 20 साल से खाली पड़ी है. इसमें कोई रहने वाला नहीं है.

हवेली कुल दो एकड़ जमीन पर बनी है. यह लॉस एंजेलिस के प्रसिद्ध होटल बेल एयर और बेल एयर कंट्री क्‍लब से पैदल दूरी पर स्थित है. ऐसे में इसकी कीमत अधिक होना जायज है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जब 2001 में ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका में बड़ा आतंकी हमला करवाया था, उसके बाद से ही इब्राहिम ने इसमें रहना बंद कर दिया था.

इस हवेली को 1931 में बनाया गया था. इसमें सात बेडरूम और पांच बाथरूम हैं. साथ ही इमारत के बाहरी हिस्‍से में भी काफी जगह है. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इब्राहिम बिन लादेन अपनी पूर्व पत्‍नी क्रिस्‍टीन के साथ यहां रहता था. लेकिन 9/11 के हमले के बाद से ही उसने यह छोड़ दी थी. (news18.com)


02-Aug-2021 7:05 PM (30)

 

लंदन. ब्रिटेन में भी कोरोना वैक्‍सीन से बचाव के लिए बड़े स्‍तर पर टीकाकरण का अभियान जारी है. इस बीच एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन सरकार अगले महीने से देश के 3.2 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्‍सीन की बूस्‍टर डोज देने का काम शुरू करेगी. इस बड़े अभियान के लिए 2000 फार्मेसी को जोड़ा गया है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर सबकुछ ठीक रहा तो बूस्‍टर डोज का यह अभियान 6 सितंबर से शुरू हो सकता है. इस टीकाकरण कार्यक्रम को इस साल दिसंबर के अंत तक पूरा करने की योजना है. ब्रिटेन में जारी ताजे आंकड़ों के मुताबिक देश के 88.5 फीसदी वयस्कों को टीके की पहली खुराक और 72.1 फीसदी वयस्कों को टीके की दोनों खुराक लग चुकी है.

वहीं ब्रिटिश सरकार युवाओं को कोविड-19 टीका लगवाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कथित ‘वॉउचर फॉर वैक्सीन’ योजना भी बना रही है जिसमें शॉपिंग वॉउचर से लेकर पिजा डिस्काउंट और उबर यात्रा पर रियायत देने तक की पेशकश शामिल है.

सरकार समर्थित योजना के तहत कई यात्रा और फूड डिलिवरी ऐप उन लोगों को रियायती दर पर यात्रा कराने या भोजन परोसने की पेशकश कर रहे हैं, इनमें टीकाकरण केंद्र तक मुफ्त में पहुंचाने और पहले ही टीका लगवा चुके लोगों को सस्ता खाना देने तक की पेशकश शामिल है. उबर, बोल्ट, डिलिवरु और पिजा पिलग्रिम्स कुछ चुनिंदा ब्रांडों में हैं जो सरकार की योजना का हिस्सा है. (news18.com)


02-Aug-2021 1:17 PM (23)

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि अगले तीन महीनों में 23 देशों में गंभीर भूख संकट मंडरा रहा है. इथियोपिया, दक्षिणी मैडागास्कर, यमन, दक्षिण सूडान और उत्तरी नाइजीरिया में स्थितियां भयावह हो सकती हैं.

(dw.com)

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) और विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) ने अगस्त और नवंबर के बीच भूख संकट का सामना कर रहे संभावित देशों पर ताजा रिपोर्ट जारी की. उन्होंने कहा कि भोजन की कमी से स्थिति और खराब हो सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे देशों में इथियोपिया सबसे ऊपर है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर तत्काल सहायता नहीं दी गई, तो इथियोपिया में भूखे और भूख से मरने वाले लोगों की संख्या चार लाख पार कर सकती है. यह सोमालिया में 2011 के अकाल से मरने वालों की संख्या से भी अधिक है.

एफएओ और डब्ल्यूएफपी की रिपोर्ट कहती है कि भूख संकट न केवल अपने आकार बल्कि इसकी गंभीरता के संदर्भ में भी गंभीर होता जा रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है, "अगर जीवन और आजीविका बचाने के लिए तत्काल सहायता नहीं दी जाती है, तो दुनिया भर में कुल 4.1 करोड़ लोगों के सामने भुखमरी या अकाल जैसी स्थिति का खतरा है."

कोविड-19 और अन्य कारण
संयुक्त राष्ट्र की दोनों एजेंसियों ने इथियोपिया के टिग्रे, दक्षिणी मैडागास्कर और पांच सबसे गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों का हवाला देते हुए वैश्विक भूख संकट से सबसे अधिक प्रभावित 23 देशों में तत्काल सहायता का आह्वान किया है. यमन, दक्षिण सूडान और उत्तरी नाइजीरिया में अकाल और मौतों को रोकने के लिए तत्काल सहायता की जरूरत है.

संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों का कहना है कि "बिगड़ती स्थिति का मुख्य कारण इन क्षेत्रों में चल रहे संघर्ष के साथ-साथ कोविड-19 की महामारी के प्रभाव हैं."

खाद्य कीमतों में वृद्धि, परिवहन प्रतिबंधों के कारण बाजार तक सीमित पहुंच, मुद्रास्फीति के कारण क्रय शक्ति में गिरावट, साथ ही विभिन्न आपदाओं के कारण फसल को नुकसान भूख संकट के बढ़ने के अन्य कारण हैं.

अफगानिस्तान में भी भूख संकट
रिपोर्ट के मुताबिक 'गंभीर खाद्य असुरक्षा' से पीड़ित लोगों की सबसे अधिक संख्या वाले नौ देशों में अफगानिस्तान भी एक है. अन्य देश बुरकिना फासो, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, कोलंबिया, कांगो, हैती, होंडुरास, सूडान और सीरिया हैं.

एफएओ और डब्ल्यूएफपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जून और नवंबर के बीच अफगानिस्तान में 35 लाख लोगों को भोजन की कमी का सामना करना पड़ सकता है, जो दूसरी सबसे बड़ी संख्या है. इससे कुपोषण और मौत का खतरा बना रहता है.

रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि अगस्त तक अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो बलों की वापसी से हिंसा में वृद्धि हो सकती है, अधिक लोगों का विस्थापन हो सकता है और मानवीय सहायता वितरित करने में कठिनाई हो सकती है.

सबसे ज्यादा प्रभावित देश
संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों का कहना है कि दक्षिण सूडान, यमन और नाइजीरिया अलर्ट सूची में सबसे ऊपर हैं. इथियोपिया और दक्षिणी मैडागास्कर को भी पहली बार सूची में जोड़ा गया है.

उनका कहना है कि अक्टूबर और नवंबर 2020 से दक्षिण सूडान के पाबोर काउंटी के कुछ हिस्सों में अकाल पड़ रहा है और समय पर और निरंतर मानवीय सहायता की कमी के साथ-साथ दो अन्य क्षेत्रों में भी स्थिति जारी रहने की संभावना है.

संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों का कहना है, "यमन में स्थिति जहां अधिक लोग भूख से मर रहे हैं, वहां कुछ हद तक नियंत्रित किया गया है, लेकिन स्थिति बेहद अस्थिर है."

एए/वीके (एपी)
 


02-Aug-2021 1:15 PM (25)

पिछले साल कोविड लॉकडाउन के दौरान लगी पाबंदियों के बीच महिलाओं का पीछा करने और नुकसान पहुंचाने की धमकियों जैसे मामलों में कमी आने की बजाय इजाफा हुआ है.

 डॉयचे वैले पर स्वाति बक्शी की रिपोर्ट

ब्रिटेन के ऑफिस ऑफ नैशनल स्टैटिस्टिक्स (ओएनएस) यानी राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक इंग्लैंड और वेल्स में साल 2020 में स्टॉकिंग के 80 हजार मामले दर्ज किए गए. ये साल 2019 में दर्ज 27 हजार 156 मामलों पर भयंकर बढ़त है लेकिन पिछले साल आंकड़े जुटाने के तरीकों में बदलाव के चलते इन नंबरों को एक साथ रखकर देखा नहीं जा सकता.

ओएनएस के ही 2017 के आंकड़ों के मुताबिक ब्रिटेन में हर पांच में से एक महिला अपने जीवन में इस अपराध की शिकार होती है. एक और अहम बात ये है कि जिस तेजी से स्टॉकिंग के मामले बढ़े हैं, गिरफ्तारियां उस गति से नहीं हुई. बीबीसी ने सूचना की स्वतंत्रता अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड में पुलिस सेवाओं से गिरफ्तारियों पर जानकारी हासिल की जिसके आधार पर ये पता चला है कि अपराधियों को हिरासत में लेने की रफ्तार बेहद धीमी है.

साल 2019 में पीछा करने और मानसिक प्रताड़ना से जुड़े मामले में बाइस महीने की सजा पाने वाले भारतीय रोहित शर्मा का मामला सुर्खियों में रहा. स्टॉकिंग का ये सिलसिला 18 महीने तक चला जिसमें रोहित ने कई तरीकों का इस्तेमाल करते हुए एक लड़की का पीछा किया.

शादी के लिए मजबूर करने के इरादे से रोहित ने अलग अलग नंबरों से लड़की को दिनभर में 40 कॉल करने और उसके काम की जगहों पर नजर रखने जैसे तरीके अपनाए. लड़की ने खुद को मानसिक प्रताड़ना से बचाने के लिए काम की जगहें, फोन नंबर और घर तक बदल डाला लेकिन मामले का अंत पुलिस की कार्रवाई के बिना मुमकिन नहीं हुआ जिसमें एक साल से ऊपर का वक्त लग गया.

सामाजिक-सांस्कृतिक दायरे
पीछा करने से जुड़े अपराधों में ज्यादातर पीड़ित महिलाएं कानून का सहारा लेने में हिचकिचाती हैं. खास बात ये भी है कि स्टॉकिंग हो रही है इसे स्वीकार करने में भी महिलाओं को वक्त लगता है. ये रवैया व्यापक तौर पर देखा जाता है और ब्रिटिश-भारतीय महिलाओं में आम है.

लंदन के हाउंसलो इलाके में रहने वाली, पेशे से डेंटिस्ट एक भारतीय महिला ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा, ”ब्रिटिश-भारतीय समुदाय में शायद ही कोई ऐसी महिला होगी जो इस बारे में खुलकर बात करना चाहेगी. इसका मतलब ये नहीं है कि उनके साथ ये हुआ नहीं है. इसका मतलब ये है कि उन्हें अपने ही लोगों के बीच होने वाली बातों का डर है”.

युवा ब्रिटिश-भारतीय लड़कियों के ख्याल भी ऐसे हैं जो कानूनी मदद के प्रति ज्यादा भरोसा नहीं जगाते. 23 बरस की भारतीय छात्रा सुचित्रा (बदला हुआ नाम) ने बातचीत में बताया कि "शुरुआत में समझ ही नहीं आता कि ये क्या हो रहा है. कई बार लगता है कि सबके साथ होता होगा इसलिए वक्त के साथ बंद हो जाएगा. डर तो होता है लेकिन किसी तरह बच कर निकलना होता है. पुलिस तक जाने से हंगामा होगा."

महिलाओं में स्टॉकिंग के मामलों को रफा-दफा करने के पीछे समुदाय में बातचीत का मुद्दा बन जाने का डर बड़ी भूमिका निभाता है और विशेषज्ञ इसे स्वीकार करते हैं.

ब्रिटेन में स्टॉकिंग पर जानकारी और प्रशिक्षण के क्षेत्र में एक दशक से काम कर रहीं ऐलिसन बर्ड कहती हैं, "ऐसे अपराध झेलने वाली औरतों को ज्यादा चिंता इस बात की होती है कि लोग अपराधी के बारे में नहीं बल्कि उनके बारे में ही चर्चा करेंगे. ऐसे मामलों में महिला की सुरक्षा का इंतजाम करना भी कठिन हो जाता है क्योंकि समुदाय ही अपराधी के लिए सूचनाएं इकट्ठा करने का जरिया बन सकता है. ब्रिटेन में रहने वाले कुछ समुदायों में ये प्रवृत्ति वाकई बहुत ज्यादा चिंताजनक तरीके से काम करती है.” यानी महिलाओं की चुप्पी में अपराधी से ज्यादा सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का डर समाया हुआ है.

कानून और पुलिस की भूमिका
पीछा करने से जुड़े अपराधों में पुलिस की मदद लेने वाली महिलाओं के अनुभव ये बताते हैं कि उन्हें मामले से निजात पाने में जैसी मदद मिलनी चाहिए थी, वो नहीं मिली. एक ब्रिटिश महिला रेचल (बदला हुआ नाम) ने ईमेल के जरिए अपनी आपबीती बांटते हुए बताया कि एक शख्स से ऑनलाइन मिलने के बाद डेटिंग शुरू हुई. जब रेचल ने इस सिलसिले को खत्म करने का फैसला किया तो पीछा करने और मानसिक प्रताड़ना का लंबा दौर शुरू हुआ.

रेचल कहती हैं "मैंने पुलिस की मदद ली लेकिन उसने मुझे बेहिसाब फोन करना, मेरे बेटे और मुझे नुकसान पहुंचाने की धमकियां देना और मेरा घर जला देने की बातें करना नहीं छोड़ा. एक बार पुलिस ने गिरफ्तार भी किया लेकिन छह महीने बाद वापस आकर उसने फिर वही सब शुरू कर दिया. पुलिस ने पहले मेरे मामले को गंभीरता से नहीं लिया और अब घर के बाहर चारों तरफ कैमरे लगे हैं. मेरी और मेरे बेटे की आजादी खत्म हो चुकी है. ऐसा लगता है कि जेल में कैद अपराधी हम हैं और वो आजाद घूम रहा है.”

ऐसे अनुभव साफ इशारा करते हैं कि पुलिस इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए प्रशिक्षित नहीं है. ऐलिसन बर्ड मानती हैं कि पुलिस का अप्रशिक्षित होना इन मामलों में बहुत बड़ी दिक्कत है. वह कहती हैं "जब कोई महिला अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन पर शिकायत करती है तो जरूरी नहीं कि जो पुलिस कर्मचारी मदद के लिए आए उसे पता हो कि स्टॉकिंग की शिकायत में क्या कार्रवाई होनी चाहिए. अक्सर इन शिकायतों को गंभीरता से लिया भी नहीं जाता. इन मामलों में बहुत से बिंदुओं को जोड़ना होता है जिसके लिए पुलिस को ट्रेनिंग की जरूरत है”.

स्टॉकिंग को अपराध के तौर पर देखे जाने की मुहिम कई चैरिटी संस्थाएं और ट्रस्ट चला रहे हैं लेकिन इस अपराध की कोई सटीक कानूनी परिभाषा नहीं है. ज्यादातर मामलों में इसे हैरेसमेंट यानी प्रताड़ना कानून, 1997 के तहत बने नियम-कायदों से जांचा जाता रहा है.

साल 2012 में आए स्वतंत्रता की सुरक्षा कानून के तहत पहली बार स्टॉकिंग को कानूनी तौर पर अपराध के रूप में जगह मिली और साल 2020 में आए स्टॉकिंग सुरक्षा आदेश के जरिए अपराधी को रोकने की दिशा में कुछ उम्मीदें जगी हैं. हालांकि अपराध को पहचानने से लेकर अपराधी के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की हिम्मत जुटाने और कार्रवाई होने तक का रास्ता औरतों के सब्र का कठिन इम्तेहान साबित होता रहा है. (dw.com)
 


02-Aug-2021 1:14 PM (22)

गुरुवार को एक टैंकर पर हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराते हुए अमेरिका और उसके सहयोगी जवाबी हमले पर विचार कर रहे हैं. ईरान इन आरोपों को गलत बताता है.

 (dw.com)

अमेरिका और ब्रिटेन का मानना है कि गुरुवार को ओमान के तट पर एक इस्राएली तेल टैंकर पर हमला ईरान ने किया था. इस हमले में एक ब्रिटिश और एक रोमानियाई नागरिक मारे गए थे. हालांकि ईरान ने इस घटना में किसी भी तरह की भूमिका से इनकार किया है.

इस्राएल ने पहले ही ईरान पर इस घटना का इल्जाम डाला था, जिसे अब अमेरिका और ब्रिटेन का भी समर्थन मिल गया है. अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने रविवार को कहा, "उपलब्ध सूचना की समीक्षा के बाद हमें इस बात का यीकन है कि ईरान ने ही यह हमला कराया, जिसमें दो निर्दोष लोगों की जान गई.”

ब्लिंकेन के मुताबिक इस हमले में विस्फोटक ड्रोन का इस्तेमाल किया गया था. उन्होंने कहा कि इस हमले को किसी भी तरह जायज नहीं ठहराया जा सकता. ब्लिंकेन ने कहा, "अगला कदम क्या हो, इस बारे में हम अपने सहयोगियों से विचार कर रहे हैं और इलाके में मौजूद सरकारों से भी मश्विरा कर रहे हैं ताकि उचित जवाब दिया जा सके.”

इससे पहले ब्रिटेन के विदेश मंत्री डॉमिनिक राब ने भी कहा था कि इस बात की बहुत अधिक संभावनाएं हैं कि ईरान ने इस "गैरकानूनी और निर्दयी” हमले के लिए एक या उससे ज्यादा ड्रोन इस्तेमाल किए.

राब ने कहा, "हम मानते हैं कि यह हमला जानबूझकर किया गया और ईरान द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन था. एक माकूल जवाब के लिए युनाइटेड किंगडम अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ काम कर रहा है.”

दोनों तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं
इस्राएली प्रधानमंत्री नफताली बेनेट ने इस हमले में हिस्सेदारी के ईरान से इनकार करने को ‘कायराना' बताया और कहा कि वह अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है. रविवार को अपने कैबिनेट की साप्ताहिक बैठक में नफताली ने कहा, "मैं बिना किसी लाग-लपेट के कह रहा हूं कि ईरान ने ही उस जहाज पर हमला किया.”

नफताली ने कहा कि खुफिया सूचनाएं उनके दावे का समर्थन करती हैं. उन्होंने कहा, "ईरान को संदेश देने के हमारे पास अपने तरीके हैं.” इससे पहले इस्राएली विदेश मंत्री ने भी कहा था कि इस घटना के लिए कठोर जवाब दिया जाना चाहिए.

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सईद खतीबजादे ने साप्ताहिक संवाददाता सम्मेलन में ईरान की जहाज पर हमले में भागीदारी से साफ इनकार किया. रविवार को उन्होंने कहा जियोनिस्ट शासन (इस्राएल) ने असुरक्षा, आतंक और हिंसा का माहौल बना दिया है.

उन्होंने कहा, "ईरान की भागीदारी के इन आरोपों की तेहरान निंदा करता है. ये आरोप इस्राएल की तथ्यों से ध्यान भटकाने की कोशिश हैं और निराधार हैं.”

टैंकर पर क्या हुआ था?
यह घटना बीते गुरुवार की है जब मर्सर स्ट्रीट नाम के एक जहाज में विस्फोट हुआ और दो लोगों की मौत हो गई. मर्सर स्ट्रीट पर झंडा लाइबेरिया का था जबकि उसका मालिकाना हक जापान के पास था और प्रबंधन इस्राएली कंपनी जोडिएक मैरिटाइम के पास.

इस जहाज के साथ अमेरिकी नौसेना का विमानवाहक जहाज यूएसएस रॉनल्ड रीगन था जिसने शनिवार को कहा था कि प्रारंभिक संकेत एक ड्रोन हमले की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं.

गुरुवार को टैंकर पर क्या हुआ, इसे लेकर अलग-अलग बातें कही जा रही हैं. जोडिएक मैरिटाइम ने इस घटना को ‘समुद्री लुटेरों का संदिग्ध हमला' बताया था. ओमान मैरिटाइम सिक्यॉरिटी सेंटर से जुड़े एक सूत्र का कहना कि यह घटना ओमानी जलसीमा के बाहर हुई.

ईरान और इस्राएल पहले भी एक दूसरे के जहाजों पर हमले के आरोप लगा चुके हैं. 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा परमाणु संधि से बाहर निकलने और ईरान पर प्रतिबंध लगाने के बाद से खाड़ी इलाके में तनाव में वृद्धि हुई है.

वीके/एए (रॉयटर्स, एएफपी)
 


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