संपादकीय

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13-Jul-2020 6:00 PM

राजस्थान में इस वक्त मुख्यमंत्री निवास में कांग्रेस विधायकों की बैठक चल रही है, और खबर के मुताबिक कई विधायकों को साथ लिए हुए उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट उसमें गैरहाजिर है। उन्होंने कल से ही यह साफ कर दिया है कि वे इस बैठक में नहीं जाएँगे। वहां कांग्रेस पार्टी की सरकार के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष अब पूरी ऊंचाई पर है, और आज वहां आर-पार की लड़ाई दिख रही है। कांग्रेस पार्टी के भी तेवर ऐसे दिख रहे हैं कि अगर पायलट विधायक दल की बैठक में न आए तो गैरमौजूद विधायकों के साथ-साथ उन्हें भी पार्टी से अलग किया जा सकता है। किसी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए इससे अधिक नुकसान की कोई बात नहीं हो सकती कि उसके दर्जनों विधायक उससे अलग होने की कगार पर खड़े हों। अभी-अभी मध्यप्रदेश में कुछ ही महीने पहले कांग्रेस से 22 विधायक अलग हुए, पार्टी छोड़ी, और अब भाजपा सरकार के मंत्री बनकर उपचुनाव की कगार पर खड़े हैं। 

राजस्थान को देखें तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बारे में तो बाद में सोचने की जरूरत पड़ती है, पहले तो जरूरत रहती है कांग्रेस हाईकमान के बारे में सोचने की जिसने डेढ़ साल से राजस्थान में चल रहे खुले भीतरी संघर्ष को भी सुलझाया नहीं। राजस्थान में भाजपा सरकार के बाद किसी तरह कांग्रेस की सरकार आई थी, और एक पूरी पीढ़ी के फासले वाले गहलोत और पायलट के बीच मुख्यमंत्री पद की दावेदारी खुलकर सामने रही, और जैसा कि हर जगह होता है, उपमुख्यमंत्री का पद एक समझौता होता है, और हमेशा ही चुनौती भी होता है, तो राजस्थान में वही हुआ। 

आज कांग्रेस पार्टी के बारे में सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि गिने-चुने राज्य जब पास बचे हैं, तब मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ-दिग्विजय का टकराव काबू नहीं किया गया, राजस्थान में गहलोत और पायलट का टकराव काबू नहीं किया गया। और तो और काबू करने की कोशिश भी नहीं दिखी। जैसा कि मीडिया का एक बड़ा तबका और राजनीतिक लोग बताते हैं, कांग्रेस हाईकमान पार्टी के नेताओं की पहुंच से परे हो गया है। अब आज तो सोनिया परिवार के तीनों लोग पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। तीनों दिल्ली में रहते हैं, और अलग-अलग वक्त पर कुछ-कुछ लोग शायद उनसे मिल भी पाते हैं। जो पार्टी आज न केन्द्र में सत्ता में रह गई, न ही अधिक राज्य जिसके पास बचे, उस पार्टी में अगर लीडरशिप अपने राज्यों के सबसे बड़े नेताओं के साथ मिलने का समय नहीं निकाल पाती, या उनके विवाद नहीं सुलझा पाती, तो यह उस पार्टी पर मंडराते खतरे का सुबूत है। जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी, तो उसके बाद राहुल गांधी का यह ट्वीट सामने आया था कि उनके लिए तो राहुल के घर के दरवाजे हमेशा ही खुले थे, और वे किसी भी वक्त आ-जा सकते थे। हो सकता है यह बात सच हो, लेकिन यह बात भी सच है कि राहुल तक ऐसी पहुंच के बाद भी ज्योतिरादित्य ने पार्टी छोड़ी। हो सकता है कि उन्हें कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के बीच मध्यप्रदेश में अपना भविष्य अच्छा न दिख रहा हो, और भाजपा में वे अपनी बेहतर संभावनाएं देख रहे हों, लेकिन महीनों से चली आ रही इन खबरों पर कांग्रेस लीडरशिप ने क्या किया, कम से कम यह जनता के बीच तो सामने नहीं आया। इसी तरह राजस्थान का यह घरेलू मनमुटाव आज सरकार को ले डूबने तक पहुंच गया है, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने इन डेढ़ बरसों में इसे सुलझाने के लिए कुछ किया था यह कम से कम लोगों के सामने नहीं आया।
 
भारत जैसे तूफानी-चुनावी लोकतंत्र में देश की सबसे पुरानी पार्टी, एक वक्त की सबसे बड़ी पार्टी, और आज की भी एक बड़ी पार्टी की लीडरशिप से लोकतंत्र में कुछ उम्मीदें की जाती हैं। भारत सरीखी राजनीति किनारे बैठकर लहरों को देखते हुए वक्त गुजारने जैसी चीज नहीं है। वह तो तूफानी लहरों में उतरकर उनसे टकराने का काम है, जो कि आज कांग्रेस में कोई करते दिख नहीं रहे हैं। इससे कांग्रेस का जो नुकसान होना है, वह एक के बाद दूसरे राज्य में होते चल रहा है, लेकिन पार्टी के साथ-साथ लोकतंत्र का बड़ा नुकसान इस तरह हो रहा है कि केन्द्र का सबसे बड़ा विपक्षी गठबंधन भी इससे कमजोर हो रहा है क्योंकि उसके भीतर मुखिया-पार्टी अगर ऐसी कमजोर हो रही है, तो जाहिर है कि गठबंधन का मनोबल भी टूटता है। 

लोकसभा चुनाव में हार के बाद अध्यक्ष पद से अलग हुए राहुल गांधी की पार्टी के भीतर आज की भूमिका एक बड़ी पहेली है। वे अध्यक्ष के किए जाने वाले तमाम काम भी कर रहे हैं, लेकिन वे उस ओहदे पर नहीं है। सोनिया गांधी उस ओहदे पर हैं, लेकिन उन तक पार्टी के नेताओं की पहुंच नहीं सरीखी ही सुनाई पड़ती है। प्रियंका गांधी उत्तरप्रदेश तक सीमित हैं जहां अपने आपमें चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं, और उनकी संभावनाओं से बहुत अधिक भी हैं। ऐसे में कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं को यह समझ नहीं पड़ता है कि वे जाएं तो कहां जाएं, मिलें तो किससे मिलें। नतीजा यह है कि एक के बाद दूसरा प्रदेश तबाही झेल रहा है, लेकिन कांग्रेस हाईकमान समझा जाने वाला परिवार पार्टी की पहुंच से परे दिख रहा है।
 
हमें कांग्रेस पार्टी के अंदरुनी मामलों को लेकर अधिक फिक्र नहीं है। लेकिन देश में एक मजबूत विपक्ष के बिना लोकतंत्र कमजोर ही रहेगा, एक मजबूत पार्टी के बिना कोई गठबंधन के मुखिया नहीं बन सकते। ऐसे में कांग्रेस का छिन्न-भिन्न होना इस पार्टी से परे लोकतंत्र की कमजोरी भी पैदा कर रहा है। लेकिन हमारे लिए यह लिखना आसान है इस पार्टी के लिए इससे उबर पाना इतना आसान नहीं है। देखें आज-कल में राजस्थान का क्या होता है, और कांग्रेस की नींद कब टूटती है।  

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12-Jul-2020 1:55 PM

अमिताभ बच्चन और उनके बेटे अभिषेक बच्चन के कोरोना पॉजिटिव आने के बाद उन्हें मुम्बई के नानावटी अस्पताल में भर्ती किया गया है, और वहां से अमिताभ के भेजे गए एक वीडियो संदेश में इस अस्पताल के डॉक्टर-नर्सों का दिल से आभार किया गया है। इस पर हजारों लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है जिसमें से अधिकतर लोगों की नाराजगी निजी अस्पतालों से थी जो कि सिर्फ पैसे वालों का इलाज करते हैं, बहुत से लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि अमिताभ बच्चन ने लॉकडाऊन और कोरोना के इस दौर में जरूरतमंद लोगों के लिए क्या किया? 

हालांकि हमारी अपनी जानकारी यह है कि यह बात पूरी तरह से सही नहीं है। जब मुम्बई से सोनू सूद उत्तर भारत के लोगों को उनके घर भेजने का अभियान चला रहे थे, उसी बीच अमिताभ बच्चन ने भी कुछ सौ लोगों का बस का भाड़ा शायद दिया था। लेकिन सोनू सूद की रात-दिन की बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन की मेहनत और सोशल मीडिया, ट्विटर, पर एक-एक जरूरतमंद को दिया जा रहा उनका भरोसा लोगों की नजरों में इतना विशाल हो गया था कि अमिताभ जैसी मदद शायद नजरों में न आई पाई हो। बहुत से लोगों ने आज एक टीवी चैनल की वेबसाईट पर अमिताभ की तंगदिली को लेकर उनके खिलाफ काफी कुछ भड़ास निकाली है। 

अब सवाल यह है कि अपनी कमाई हुई दौलत में से वे समाज के लिए कुछ दें न दें, यह उनकी अपनी मर्जी है। इस पर किसी का जोर नहीं चल सकता, और अमिताभ कभी भी अपनी दरियादिली के लिए नहीं जाने गए। जबकि वे वनमैन इंडस्ट्री की तरह काम करते रहे हैं, और एक साधारण सा अंदाज यह है कि वे सैकड़ों करोड़ रूपए सालना कमाते हैं। ऐसे में उनकी कोई भी रहमदिली अगर उस अनुपात में है, तब तो ठीक है, लेकिन जब दुनिया के पैसे वाले लोग अपनी आधी दौलत समाजसेवा में देने की घोषणा करते हैं, और उस पर अमल करते हैं, जब सोनू सूद सरीखे मामूली अभिनेता बेतहाशा मेहनत करते हैं, बेतहाशा हमदर्दी दिखाते हैं, और खर्च भी करते हैं, तो फिर अडानी के दिए सौ करोड़, या अमिताभ की कुछ बसें लोगों पर कोई असर नहीं डालतीं, बल्कि लोगों को यह खटकता है कि अपनी इतनी दौलत के बाद भी अमिताभ ने लोगों का साथ नहीं दिया। कुछ लोगों ने अमिताभ की राजनीतिक पसंद-नापसंद को लेकर भी उन पर हमले किए हैं कि अपनी पसंद की सरकार की किसी खामी के बारे में उनका मुंह नहीं खुलता। बहुत से लोगों ने सुशांत राजपूत जैसे कई मुद्दे गिनाए हैं कि उन पर भी अमिताभ का मुंह नहीं खुला, और अब महंगे अस्पताल का शुक्रिया अदा करने के लिए वे वीडियो जारी कर रहे हैं। 

दरअसल दुनिया में लोग, लोगों की एक-दूसरे से तुलना करके ही अपनी राय बनाते हैं। हिन्दुस्तान में जब टाटा और उनकी कंपनियों ने 15 सौ करोड़ रूपए कोरोना से लड़ाई के लिए देने की मुनादी की, तो लोगों को अडानी-अंबानी के सौ-सौ करोड़ चुभने लगे। बात सही भी है, सडक़ किनारे फुटपाथ पर बैठा कोई भूखा अगर अपनी आधी रोटी किसी दूसरे को दे, तो वह तो टाटा के 15 सौ करोड़ से भी अधिक है, और अडानी-अंबानी की सौ-सौ करोड़ की चिल्हर से तो अधिक है ही।
 
सोशल मीडिया ने लोगों को अपने दिल की बात रखने की बेतहाशा ताकत दी है, और अराजकता की हद तक लोकतांत्रिक अधिकार भी दे दिए हैं। लेकिन यह कहते हुए भी हम इस बात को बहुत साफ समझते हैं कि सोशल मीडिया पर लोगों के मन की भड़ास को समाज की प्रतिनिधि-आवाज मान लेना गलत होगा। जिन लोगों को भड़ास अधिक निकालनी होती है, या भक्ति अधिक दिखानी होती है, वे ही लोग सोशल मीडिया पर अधिक सक्रिय रहते हैं। लेकिन जो लोग समझदारी और तर्क की बात कहना चाहते हैं, उनकी गिनती भी कम रहती है, और उनकी सक्रियता भी कम रहती है। इसलिए सोशल मीडिया पर दी गई गालियों को किसी बहुसंख्यक तबके के दिल से निकली गालियां मान लेना गलत होगा। समझदारी, और इंसाफपसंदगी हमेशा ही समाज में अल्पसंख्यक रहेंगे। 

अमिताभ बच्चन उन चर्चित लोगों में से हैं जो पिछले दस-बीस बरस में सोच-सोचकर राजनीतिक दलों और राजनीतिक मुद्दों का साथ देते रहे हैं, और बाकी मौकों पर अपने आपको गैरराजनीतिक करार देते रहे हैं। उनके बारे में हमने इसी जगह पर पहले भी लिखा था कि अपने ससुराल के शहर भोपाल में हुई गैस त्रासदी के शिकार लाखों लोगों की तबाह जिंदगी को बसाने के लिए अगर वे अपील करते, तो दुनिया भर से सैकड़ों करोड़ रूपए इक_े हो जाते। लेकिन उन्होंने कभी मुंह भी नहीं खोला। वे दिन इंदिरा और राजीव के थे, और अमिताभ उनके करीबी लोगों में से थे। फिर वे एक वक्त मुलायम सिंह के करीबी रहे, और अमिताभ की पत्नी जया आज भी मुलायम की पार्टी से सांसद हैं। खुद अमिताभ बच्चन मुलायम का सूरज डूबने के बाद मोदी के करीब चले गए, और गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर रहे, बाद में केन्द्र की मोदी सरकार का चेहरा भी बने रहे। उनकी मौकापरस्त राजनीतिक सोच, उनकी सरोकारविहीन सामाजिक सोच, और पैसों को लेकर उनकी तंगदिली ने उन्हें इतनी शोहरत के बावजूद उतनी इज्जत का हकदार नहीं बनाया।  खुद की फिल्म इंडस्ट्री में जब-जब कोई जलता-सुलगता मुद्दा आया, अमिताभ बच्चन मुंह बंद किए घर बैठे रहे। जब वे ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर सुबह 3-4 बजे तक लिखते रहते हैं, तब भी वे देश की हकीकत पर कुछ नहीं लिखते। अमिताभ बच्चन पर एक इंसान के नाते इतना लिखना हमारा मकसद नहीं है, लेकिन एक इंसान अपनी सोच और अपने काम से किस तरह अपनी कामयाबी और शोहरत की भी पूरी इज्जत नहीं पा सकता, यह सोचने के लिए अमिताभ एक मिसाल जरूर हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


11-Jul-2020 2:37 PM

आज 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जा रहा है। स्कूल-कॉलेज अभी बंद हैं, वरना वहां बढ़ती जनसंख्या के खतरे को लेकर बच्चों में भाषण होते, और इस विषय पर निबंध लिखने का मुकाबला होता। फिर भी जो जागरूक लोग हैं वे सोशल मीडिया पर अपनी तरफ से बढ़ती हुई जनसंख्या के खतरों को लेकर लिख रहे हैं। फिर ऐसे खतरे को गिनाने के लिए इस सालाना दिन की जरूरत भी नहीं होती है, लोग आबादी के बढऩे के खतरे गिनाते ही रहते हैं। 

अब सवाल यह है कि क्या धरती की आबादी सचमुच ही धरती पर बोझ है? जिनको ऐसा लगता है उन्हें थोड़ी सी मेहनत करके इंटरनेट पर यह ढूंढना चाहिए कि विकसित देशों में प्रति व्यक्ति खपत कितनी है, और अविकसित, तीसरी दुनिया के सबसे गरीब देशों में कितनी है? आज एक-एक अमरीकी की औसत खपत जितनी है, उसका एक मामूली सा हिस्सा भी भारत जैसे नवविकसित देश में नहीं है, जबकि इस देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी से ऊपर भी है, और उसकी ईंधन से लेकर खानपान और कपड़ों तक, मकान से लेकर गाडिय़ों तक की खपत अच्छी खासी है। ऐसे में दुनिया की गरीब आबादी जिसकी खपत नहीं के बराबर है, उस आबादी को धरती पर बोझ मानना एक अंकगणित के दिमाग के मुताबिक तो सही हो सकता है, किसी इंसान के दिमाग के लिए ऐसा मानना समझ की कमी है। 

इस धरती के प्राकृतिक साधन, धरती पर जमीन, लोगों की न्यूनतम जरूरत, इन सबको अगर देखें तो लगता है कि गरीब देशों की बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो कि धरती पर न प्रदूषण फैलाती, और न ही अपने आसपास के प्राकृतिक साधनों को वह खत्म कर रही है। उसकी खपत महज जिंदा रहने तक सीमित है, और इस तरह वह अपने आसपास की मामूली उपज पर जिंदा है जो कि धरती पर बोझ नहीं है। दूसरी तरफ सीमित संख्या और असीमित संपन्नता वाले देश ऐसे हैं जहां लोग जितने वजन का खाते हैं, उतने वजन के कागज का डिब्बा, या प्लास्टिक की ग्लास, या कांटा-छुरी भी खत्म कर देते हैं। लेकिन गरीबों की बढ़ती जनसंख्या संपन्न लोगों को चुभती इसलिए है कि धरती की एक सामूहिक और सामुदायिक  जिम्मेदारी के तहत दुनिया के संपन्न लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे सबसे गरीब लोगों को भूख से मरने से बचाएं। यही उम्मीद संपन्न समाज को इतना विचलित करती है, इतनी हीनभावना से भर देती है कि अपराधबोध उन पर भारी पड़ता है। इसलिए वे चाहते हैं कि गरीबों का बढऩा घटे। उनकी फिक्र धरती पर बोझ घटना नहीं है, हालांकि वे आड़ इसी बात की लेते हैं। अगर नीयत धरती पर बोझ बढऩा रोकना होता, तो वे अपनी खपत को घटाते, लेकिन ये तो धरती की सबसे कम खपत वाली आबादी को घटाना चाहते हैं। यह सबसे गरीब आबादी के मन में एक हीनभावना और अपराधबोध भरने का तरीका भी है कि वे अधिक बच्चे पैदा करके धरती पर अधिक बोझ बन रहे हैं। 

यह बात देश-प्रदेश की सरकारों को भी सुहाती है कि गरीब आबादी बढऩे की तोहमत गरीबों पर डालो, और उन्हें आबादी घटाने को कहो। कुदरत ने तो पूरी धरती के साधनों को आबादी में बराबरी से बांटने की एक सामान्य समझ दी है। लेकिन ताकतवर लोगों को यह कभी सुहा नहीं सकता कि हर गरीब को उनके बराबर के हक मिलें। इसलिए गरीब आबादी को घटाना एक आसान रास्ता है जिसे हर कोई सुझाते चलते हैं। 

अब जरा वैज्ञानिक नजरिए से देखें कि एक गरीब इंसान की जरूरत और खपत कितनी होती है, और हर दिन उसकी ताकत और क्षमता का इस्तेमाल करके धरती की उत्पादकता कितनी बढ़ाई जा सकती है। खेत में काम करने वाले लोग, फल-सब्जी उगाने में लगे हुए लोग, डेयरी और पशु-पक्षी-मछली पालने में लगे हुए लोग अपनी खपत से हजार-हजार गुना पैदा करते हैं। जो लोग अपने बदन की ताकत से जुड़े हुए और कई किस्म के काम करते हैं, वे भी अपनी खपत से अधिक दाम का शहद पैदा करते हैं, मशरूम उगाते हैं, या संपन्न तबके की सेवा करने के दूसरे काम करते हैं। जहां कहीं देश या प्रदेश की सरकारें अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाती हैं, वहां-वहां उसकी सबसे गरीब आबादी भी अपनी जरूरत से अधिक पैदा करती है, कमाती है, और धरती पर बोझ नहीं बनती है। धरती पर बोझ वही आबादी बनती है जिसकी खपत अंधाधुंध रहती है, जो बड़े मकान में रहती है, बड़ी गाड़ी में चलती है, बड़े पैमाने पर सामानों की खरीदी करती है, सामानों को खारिज करती है, और दुनिया के साधनों का अंधाधुंध इस्तेमाल करती है। वह आबादी धरती पर बोझ है। शहर के संपन्न लोग एक हफ्ते में जितने डीजल-पेट्रोल को जलाते हैं, एक गांव के हजार गरीब मिलकर भी साल भर में उतना डीजल-पेट्रोल नहीं जलाते। एक रईस के घर-दफ्तर के दर्जन भर एसी एक दिन में जितनी बिजली जलाते हैं, किसी गरीब बस्ती के हजार लोग मिलकर भी महीने-दो महीने में भी उतनी बिजली नहीं जला सकते। इसलिए धरती पर आबादी के बोझ होने का झांसा गरीबों को जीने का हक न देने का एक तरीका है। कोई गरीब आबादी धरती पर बोझ नहीं है, अगर उसके इलाके की सरकारें अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा रही हैं। मधुमक्खियां, लाख और रेशम के कीड़े, केंचुए, मछलियां, और पंछी, धरती पर बोझ तो ये भी नहीं हैं, इंसान कहां से बोझ हो जाएंगे। आज हालत यह है कि केंचुओं की बनाई हुई खाद भी अच्छे खासे दाम पर बिकती है, लाख और रेशम के कीड़ों की लार भी महंगे दाम पर बिकती है, मधुमक्खियों के बदन से निकला हुआ शहद सैकड़ों रूपए किलो बिकता है, ऐसे में मेहनत करने वाले इंसान कहां से धरती पर बोझ हो सकते हैं? 

लेकिन जब इंसानों को बेदखल करके उनका काम करने के लिए बनाई जा रही बड़ी-बड़ी फौलादी मशीनों की खरीदी और इस्तेमाल कारोबार और सरकार दोनों को चलाने वाले लोगों के निजी फायदे का हो, तो फिर इंसानी मजदूरी की क्या कीमत हो सकती है? इंसान को मजदूरी देने में बाजार और सरकार हांकने वाले लोगों को उतनी बचत नहीं होती जितनी कि मशीनों को बनाने में, बेचने में, और खरीदने में होती है।  यह सरकारों की गैरजिम्मेदारी है कि अपने देश-प्रदेश की आबादी को रोजगार देने लायक योजनाएं बनाने के बजाय मशीनों के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, और मजदूरों को भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है। जब वे दूर-दूर के प्रदेशों में जाकर काम करते हैं, तो उन्हें पलायन करने वाला कहा जाता है। हम इस अखबार में लगातार पलायन शब्द के खिलाफ लिखते आए हैं, कि यह बेइंसाफ शब्द है। यह मजदूरों का पलायन नहीं होता, यह सरकारों का अपनी जिम्मेदारी से पलायन होता है, मजदूर तो जिंदगी की लड़ाई लडऩे वाले योद्धा होते हैं जो कि सरकारों की साजिशों और उनकी लापरवाही के खिलाफ दूर-दूर तक जाकर जिंदा रहकर दिखाते हैं। 

इसलिए आज विश्व जनसंख्या दिवस पर जो लोग यह मानते हैं कि बढ़ती हुई जनसंख्या धरती पर बोझ है, उन्हें अलग-अलग देशों और अलग-अलग आय वर्ग के लोगों के बीच प्रति व्यक्ति खपत के आंकड़े देखना चाहिए, उनकी आंखें खुली की खुली रह जाएंगी कि एक औसत अमरीकी बच्चा सोमालिया, इथियोपिया, या यमन के सैकड़ों बच्चों से अधिक खपत वाला हो सकता है। आज दुनिया के कुछ देशों में भूखों मरते लोग धरती पर बोझ लग सकते हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि भुखमरी के शिकार लोगों को जिंदा रहने के लिए जितना अनाज चाहिए, उससे अधिक का बना खाना विकसित देशों के घूरों पर फेंका जाता है। दिक्कत धरती के साधनों का नहीं है, उनके असंतुलित, अनुपातहीन बंटवारे की है, और एकाधिकार की है। 

आंकड़े भी बहुत सही तस्वीर नहीं बताते हैं, लेकिन वे एक संकेत जरूर देते हैं। प्रति व्यक्ति घरेलू सामानों की खपत के आंकड़े देखें, तो हांगकांग और अमरीका में ये एक बरस में औसत 38 हजार डॉलर है, तो यह घटते-घटते जापान और डेनमार्क में 20 हजार डॉलर प्रतिवर्ष है, मैक्सिको और ब्रुनेई में 10 हजार डॉलर प्रतिवर्ष, इथियोपिया में एक हजार डॉलर प्रतिवर्ष है, और अफ्रीकी देशों में पांच सौ डॉलर प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति खपत है। मतलब यह कि अफ्रीका के एक व्यक्ति की खपत अमरीका के 75 व्यक्तियों की खपत से भी कम है। यह तो बात घरेलू खपत की हुई, लेकिन ऐसी आबादी के लिए देश जो ढांचा खड़ा करता है, उसकी खपत के आंकड़े सरकारों के खर्च से निकल सकते हैं, और उससे समझ आ सकता है कि संपन्न लोगों के देश धरती के साधनों पर कितना बड़ा बोझ है।

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10-Jul-2020 4:06 PM

जैसा कि सभी लोगों को भरोसा था, यूपी के कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे को पुलिस ने कानपुर पहुंचने के पहले ही एक कथित मुठभेड़ में मार डाला, या मार गिराया। आगे किसी जांच में यह सच सामने शायद ही आए कि पुलिस ने किसी मजबूरी में उसे मारा, या किसी साजिश के तहत उसका कत्ल किया। विकास दुबे के जुर्म की फेहरिस्त इतनी लंबी थी, कि देश के बड़े-बड़े चैनलों के रिपोर्टर भी यह बोलने में डर रहे हैं कि पुलिस के हाथों सडक़ पर ऐसी मौत जायज नहीं है। वे बार-बार यह सफाई दे रहे हैं कि विकास दुबे बहुत कड़ी सजा का हकदार था, उसके साथ उनकी हमदर्दी बिल्कुल भी नहीं है, फिर भी उनका आंखों देखा यह है कि राह चलते विकास दुबे की गाड़ी बदली गई, पीछे चलती मीडिया की गाडिय़ां 20 किमी पहले रोक दी गईं, और सब कुछ बहुत संदिग्ध है। अनगिनत लोगों ने गिरफ्तारी के तुरंत बाद से यह लिखना शुरू कर दिया था कि अदालत में पेश करने के पहले यूपी पुलिस उसे मार डालेगी। मुठभेड़-हत्याओं के अपने बदनाम रिकॉर्ड से परे भी इस एक मामले में मुठभेड़-हत्या का खतरा इसलिए अधिक था कि अपने आखिरी जुर्म में विकास दुबे नाम के इस गैंगस्टर ने 8 पुलिसवालों को मारा था, और अपनी बिरादरी की ऐसी मौत का बदला लेने के लिए पुलिस ऐसा करेगी, ऐसी आशंका लोगों को थी। 

सवाल विकास दुबे का नहीं है, वह तो बहुत पहले ही फांसी का हकदार दिखता था, जिस तरह से वो हत्याएं करते आया बताया जाता है, उसका नतीजा यही निकलना था, लेकिन यह मौत अदालत के आदेश से जेल के भीतर कानूनी मौत होनी थी, सडक़ पर गाडिय़ों को रोककर संदिग्ध तरीके से ऐसा नहीं होना चाहिए था। जिन लोगों को लोकतंत्र की प्रक्रिया में जरा भी भरोसा नहीं है, उन्हें फिल्मों की तरह सडक़ पर ऐसा ट्रिगर-हैप्पी इंसाफ अच्छा लग सकता है, लेकिन सवाल यह है कि पुलिस ही अगर मौके पर दो मिनट में पकने वाले नूडल्स की तरह इंसाफ करने लगेगी, तो फिर अदालतें क्या करेंगी? 

ऐसी मुठभेड़-हत्या या मुठभेड़-मौत देश के लिए एक फिक्र की नौबत इसलिए है कि जब तक एक मुजरिम सार्वजनिक रूप से सरकार के लिए फजीहत नहीं बना, तब तक उसे काबू करने की कोशिश नहीं हुई। और जब आज वह यूपी सरकार के लिए परेशानी का सबब बन गया, तो उसकी ऐसी मौत हुई जो कि हादसा कम साजिश अधिक दिखती है। आज सुबह से लोगों की जो सोच सामने आ रही है, वह यह है कि विकास दुबे के साथ ही कई पार्टियों और बहुत से नेताओं के गंदे राज भी दफन हो गए। इसके घर पर पुलिस-हत्याओं के बाद जिस तरह अफसरों ने आनन-फानन उसके घर को ढहा दिया था, उससे भी ये सवाल उठे थे कि मकान के साथ-साथ वहां लगे कैमरे और कैमरों की रिकॉर्डिंग भी शायद खत्म हो गई होगी, और इस हड़बड़ी में मकान गिराने  के पीछे शायद यही नीयत भी रही होगी। यह बात भी कि पुलिस या प्रशासन कैसे कानूनी कार्रवाई पूरी किए बिना विकास दुबे के मकान को इस तरह गिरा सकते हैं?अब आज का ताजा सवाल यह है कि कल मध्यप्रदेश के उज्जैन में महाकाल मंदिर में खुद होकर, चीख-चीखकर अपनी पहचान बताकर जिस विकास दुबे ने आराम से टहलते हुए अपनी गिरफ्तारी दी थी, आज वह यूपी की हथियारबंद पुलिस के बीच बैठे उनका हथियार छीनकर फरार होने चला था? उज्जैन में तो अपने आपकी पहचान कराकर गिरफ्तारी देने की कोई जरूरत भी नहीं थी, फिर भी उसने वैसा किया था, और आज यूपी पुलिस के घेरे से बच निकलने की कोई गुंजाइश नहीं थी, तब भी वह भागने की कोशिश कर रहा था? मुठभेड़-हत्या या मुठभेड़-मौत का यह मामला किसी गुब्बारे जितना खोखला है। उत्तरप्रदेश को एक बड़े गुंडे से निजात तो मिली है, लेकिन यह कानून से पूरे सिलसिले को खारिज करने की कीमत पर मिली है, और देश के कई राज्यों में ऐसी मुठभेड़-हत्याओं की छूट मिलने पर पुलिस के हाथों नाजायज हत्याएं भी देखी हैं। 

लेकिन बात महज उत्तरप्रदेश की और वहां की पुलिस के हाथों आज मारे गए इस मुजरिम की नहीं है। उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसी दर्जनों मुठभेड़-हत्याएं की गई हैं, और हैदराबाद में अभी कुछ महीने पहले ही बलात्कार के आरोपियों की ऐसी ही मुठभेड़-हत्या की गई जब उन्हें सुबह-सुबह वारदात की जगह ले जाया गया, और पुलिस के हथियार छीनकर पुलिस पर हमला करने की तोहमत लगाई गई, और उन्हें मार डाला गया। देश भर में लोगों ने अदालती इंसाफ के पहले ही ऐसे पुलिस इंसाफ की पेट भरकर तारीफ की थी, ठीक उसी तरह आज भी बहुत से लोग विकास दुबे की ऐसी मौत के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और यूपी पुलिस की तारीफ कर रहे हैं। तारीफ करने वाले लोगों को पल भर को भी यह नहीं लगता है कि किसी दिन उनके परिवार के लोग भी अदालत में अपने को बेगुनाह साबित करने का हक और मौका पाए बिना सडक़ पर ऐसे मारे जा सकते हैं, इसलिए वे मौके पर इंसाफ के इस अंदाज की तारीफ कर रहे हैं। लेकिन देश में कानून के राज पर ऐसी मुठभेड़-हत्याओं से बड़ी आंच आती है। इससे लोकतंत्र की, सरकार और अदालत की कमजोरी दिखती है कि अदालत से इंसाफ नहीं मिल सकता, समय पर नहीं मिल सकता, इसलिए मौके पर इंसाफ जायज हो गया है। 

देश के बहुत से पुलिस-अफसर भी सोशल मीडिया पर विकास दुबे की ऐसी मौत को जायज ठहरा रहे हैं, और इसे पुलिस की एक आम सोच सामने आ रही है। हो सकता है कि पुलिस इस बात से थकी हुई है कि उसकी कोशिशों के बावजूद मुजरिमों को सजा नहीं हो पाती है, लेकिन यह थकान तो मतदाताओं में भी है कि उसके वोट देने के बाद भी संसद और विधानसभाओं में अच्छे लोग नहीं जा पाते हैं, यह थकान टैक्स देने वालों में भी है कि उनका दिया पैसा सरकारी भ्रष्टाचार में खत्म हो जाता है, और पूरी तरह देश के काम नहीं आ पाता है। थकान तो पूरे लोकतंत्र में है, लेकिन यह थकान ऐसी असंवैधानिक हत्याओं में नहीं बदलना चाहिए जैसी कि यह दिख रही है। जो मीडिया यूपी पुलिस के काफिले के पीछे चल रहा था, उसकी दी हुई जानकारी सुझाती है कि यह हत्या वैसी नहीं है जैसी कि यूपी पुलिस बताने की कोशिश कर रही है। 

लेकिन आज योगी आदित्यनाथ और यूपी पुलिस पर उंगली उठाने का हक किस राज्य की किस सरकार को है, किस प्रदेश की पुलिस को है, क्योंकि ऐसी हत्याएं तो तकरीबन हर राज्य में हर बरस-दो बरस में होती ही रहती हैं। क्या अदालत इस सिलसिले को रोक सकती है जिस पर आज सुबह से ये सवाल उठ रहे हैं कि इस आत्मसमर्पण के वक्त से ही जब लोगों को ऐसा संदेह था, तो क्या वैसे में अदालतों का भी कुछ जिम्मा बनता था, या इस आदमी को मारे जाने के बाद कोई जिम्मा बनता है? आज यह बात साफ है कि विकास दुबे अगर कटघरे तक जिंदा पहुंचा होता तो पुलिस के बहुत से अफसरों और यूपी के बहुत से नेताओं के लिए दिक्कत का सामान बनता। पंचतत्व में विलीन की कोई गवाही तो होती नहीं है, आज यूपी के बहुत से रहनुमा चैन की नींद सोएंगे।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


09-Jul-2020 4:23 PM

उत्तरप्रदेश में 8 पुलिसवालों को मारने वाला खूंखार और पेशेवर मुजरिम विकास दुबे ने मध्यप्रदेश के उज्जैन में महाकाल के विख्यात मंदिर में आत्मसमर्पण किया। उसने गार्ड को बताया कि वह विकास दुबे है, लोगों को बताया, और भागने की किसी कोशिश के बिना आराम से चलते हुए वह पुलिस के साथ चले गया। उसके इस आत्मसमर्पण को मध्यप्रदेश पुलिस गिरफ्तारी कह रही है क्योंकि पुलिस ने उसे पकड़ा हो, या उसने आत्मसमर्पण किया हो, गिरफ्तारी तो एक कानूनी औपचारिकता है ही। अब 60 या अधिक कत्ल जैसे गंभीर अपराधों का यह आरोपी पुलिस के हाथ लग चुका है, तो इसकी मुठभेड़-हत्या की आशंका या संभावना थोड़ी सी कम है, और ऐसा लगता है कि एक बार फिर वह भारत की उसी अदालत में कटघरे में रहेगा जिससे वह पहले थाने में राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त नेता का कत्ल करके दर्जनों पुलिसवालों के गवाह रहते भी बरी हो चुका है। इस बार तो किसी ने उसे गोलियां चलाते देखा नहीं है, वह अपने घर के भीतर से गोलियां चला रहा था, ऐसा पुलिस का कहना है। परिवार के लोग ही अगर उसके खिलाफ गवाही नहीं देंगे, तो यह केस कोर्ट में टिकेगा कैसे? 

हिन्दुस्तान में जुर्म और मुजरिमों का यही हाल है। न्याय की भावना कही जाती है कि चाहे 99 मुजरिम छूट जाएं, लेकिन किसी एक बेकसूर को भी सजा नहीं होनी चाहिए। इसे पैमाना बनाकर हिन्दुस्तान की पुलिस, या दूसरी जांच एजेंसियां, हिन्दुस्तान की अदालतें, वहां सरकारी वकील, सुबूतों को परखने वाली अपराध-प्रयोगशालाएं, इतनी जगहों पर छेद रहते हैं कि सौ में 90 मुजरिम तो कभी सजा नहीं पाते, और जो 10 मुजरिम सजा पाते भी हैं, उनके लिए ऊपरी अदालतें भी हैं। कुल मिलाकर न्याय की भावना को जिस नाटकीयता के साथ बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है, करीब-करीब वैसा ही हकीकत में होता भी है, और शायद ही कोई बड़ा मुजरिम सबसे बड़ी अदालत जाकर भी सजायाफ्ता ही रहता है। 

उत्तरप्रदेश के इस कुख्यात मुजरिम के बारे में एक से अधिक राजनीतिक दलों का नाम सामने आया है कि उनसे इसका घरोबा था। बहुत से नेताओं के साथ इस मुजरिम और इसके गिरोह के दूसरे लोगों की तस्वीरें भी आई हैं कि वे कैसे करीब थे। लेकिन यह कोई रहस्य की बात नहीं है, और न ही ऐसी चर्चा पहली बार ही हो रही है। उत्तरप्रदेश और बिहार, उत्तर भारत के हिन्दी भाषी इलाकों के दो सबसे बड़े राज्य राजनीति और अपराध के ऐसे ही गठजोड़ के लिए कुख्यात रहे हैं। यहां के लोगों को यह विशेषण चुभ सकता है, लेकिन हकीकत यही है। और अगर देश के बीच के ये राज्य अगर आगे नहीं बढ़ सके हैं, तो उसके पीछे एक वजह यह भी है कि बाहर के पूंजीनिवेशक वहां जाने के पहले कई बार सोचते हैं कि वहां की रंगदारी से कैसे निपटेंगे? देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले उत्तरप्रदेश में जुर्म का हाल भयानक है। मुलायम सिंह के लंबे राज में भी वही था, उनके बेटे के राज में भी वही था, और योगी राज में भी चर्चित मुठभेड़-हत्याओं के बावजूद मुजरिमों का हौसला कितना बढ़ा हुआ था, यह कानपुर की इस ताजा वारदात से समझ आता ही है। कुछ लोगों को शायद अभी तक यह बात याद होगी कि एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के उनके प्रदेश बिहार के कुख्यात बाहुबलि लोगों से खुले और करीबी संबंध थे, जिनको वे कभी छुपाते भी नहीं थे। 

अब विकास दुबे के मंदिर में आत्मसमर्पण के बाद उसकी मां ने कहा है कि वह हर बरस महाकाल के दर्शन को उज्जैन जाता था, और महाकाल की कृपा से ही वह आज जिंदा है। अब हमारी सामान्य और स्थायी जिज्ञासा फिर सिर उठाती है कि जो हर बरस ईश्वर के दरबार में पहुंचता हो, उसे ईश्वर बुरे कामों से रोक क्यों नहीं पाता, उसे समझा क्यों नहीं पाता? और अपनी ड्यूटी पूरी करने गए पुलिसवालों को भी ऐसे मुजरिम की गोलियों से क्यों नहीं बचा पाता? ईश्वर का दुनिया के अच्छे कामों से लेना-देना इतना कमजोर क्यों है कि देश के हर किस्म के मुजरिम उसके दरबार में पहुंचते ही रहते हैं, और वह किसी के भी हाथ-पैर रोक नहीं पाता? हम पहले भी इसी जगह कई बार गिना चुके हैं कि हाजी मस्तान जैसे कुख्यात स्मगलर के नाम के साथ हाजी जुड़ा हुआ था, पंजाब में जनरैल सिंह भिंडरावाला बेकसूरों की थोक में हत्या करके जाकर स्वर्ण मंदिर में ही अपने ठिकाने पर डेरा डालता था। जेलों का अगर सर्वे किया जाए, तो सौ फीसदी मुजरिम आस्थावान-धर्मालु मिलेंगे, और शायद ही कोई नास्तिक वहां मिले, क्योंकि नास्तिक के पास किसी ईश्वर का सहारा नहीं रहता, वे किसी धर्म-दान से कालिख लगी अपनी आत्मा ड्राई-क्लीन नहीं कर सकते। इतने भयानक और खूंखार मुजरिमों के पास ईश्वर का सहारा होना भी बहुत ही अटपटी बात है। हो सकता है कि धर्म का कारोबार करने वाले लोग इसके पीछे की वजह बता पाएं। 

फिलहाल उत्तरप्रदेश में सरकार के सामने यह एक बड़ी चुनौती रहेगी कि इतने बड़े मुजरिम को अदालत से सजा दिला पाए। अदालत में मुकदमा जीत जाने की इनकी ताकत देखते हुए ही कई प्रदेशों की पुलिस ऐसे मुजरिमों की मुठभेड़-हत्या को एक बेहतर रास्ता मानती है, और ऐसा करती भी है। लोगों को कुछ समय पहले हैदराबाद के पास के बलात्कारियों को गिरफ्तारी के बाद मार डालने की घटना याद भी होगी। अब विकास दुबे के इस केस में उसके गिरोह के बाकी लोगों के नाम देखना भी दिलचस्प है, और उन नामों से कुल मिलाकर जो बात निकलती है, उस पर भी कुछ लोगों को फिक्र करनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


08-Jul-2020 5:19 PM

एक खबर है कि केन्द्र सरकार ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमीलेयर की आय सीमा को 8 लाख से बढ़ाकर 12 लाख करने जा रही है, लेकिन राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग इसका विरोध कर रहा है, और वह चाहता है कि मलाईदार तबके की यह सीमा 16 लाख रूपए सालाना आय से अधिक पर लागू हो। मतलब यह कि पिछड़ा वर्ग आयोग चाहता है कि शैक्षणिक संस्थाओं, और सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण में संपन्नता की अपात्रता को 16 लाख रूपए सालाना आय से अधिक होने पर ही लागू किया जाए। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम न केवल ओबीसी, बल्कि एसटी-एससी तबकों में भी मलाईदार तबके को आरक्षण के फायदे से बाहर करने के हिमायती हैं। लेकिन संसद या सरकार में, या इन दोनों तबकों के अधिकतर संपन्न और ताकतवर लोगों में शायद ही कोई ऐसा चाहते हों। मलाईदार तबके के तमाम लोग यह तर्क देते हैं कि आरक्षण आर्थिक आधार पर नहीं दिया जाता, वह सामाजिक स्थितियों और सामाजिक बेइंसाफी को देखकर दिया जाता है, इसलिए उसमें से किसी भी आय वर्ग को बाहर करना गलत होगा। यह एक इतना खोखला तर्क है कि साबुन से बना एक बुलबुला भी इससे अधिक मजबूत होगा। जब हम किसी तबके से मलाईदार तबके को आरक्षण के लिए अपात्र बनाने की बात कहते हैं, तो उसका मतलब है कि उसी तबके के नीचे की कमाई के लोग, गरीब और कमजोर लोग उस सीमित आरक्षण के हकदार हो सकें। मलाईदार तबके को बाहर करने का मतलब किसी कोने से भी आरक्षण को कम करना नहीं होता, बल्कि उन लोगों को आरक्षण का अधिक मौका दिलवाना होता है जो कि आरक्षित जातियों के भीतर ही अपने ही हमजात लोगों के मुकाबले बहुत अधिक कमजोर हैं। एक आईएएस या आईपीएस दलित, या एक सांसद-विधायक आदिवासी के बच्चे अपने मां-बाप की ताकत से किसी कॉलेज में दाखिले या नौकरी के मुकाबले की इतनी बेहतर तैयारी कर लेते हैं कि उन्हीं के स्वजातीय कमजोर लोग उनके मुकाबले कहीं टिक नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि आरक्षित तबकों के भीतर भी कुछ सीमित संख्या में लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी ताकतवर होते चलते हैं, और बाकी तमाम लोग कमजोर के कमजोर रह जाने से किसी भी मुकाबले में अपने तबके के भीतर कोई संभावना नहीं रखते। 

अब ओबीसी आरक्षण पाने वाले लोगों के भीतर बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो कि आर्थिक रूप से बहुत ताकतवर हैं। इन जातियों में लोग बड़े किसान हैं, जिनके पास बहुत सारी जमीन हैं, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जब वे अपनी फसल बेचते हैं, और सरकारी भुगतान बैंक खाते में आता है, तो यह भी साफ रहता है कि उनकी कमाई कितनी है। ऐसे में ओबीसी के भीतर के गरीब लोग भला क्या खाकर संपन्न ओबीसी के बच्चों के मुकाबले तैयारी कर सकते हैं। 

आज बहस का मुद्दा महज ओबीसी क्रीमीलेयर है, लेकिन हम इसी सिलसिले में दलित और आदिवासी क्रीमीलेयर के बारे में अपनी सोच को साफ रख देना चाहते हैं, फिर चाहे दलित-आदिवासी क्रीमीलेयर चर्चा में भी न हो। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि इन तबकों में जिन लोगों की जुबान का आज वजन है, वे सारे के सारे मलाईदार तबके में आते हैं, और वे अपने वर्गहित के लिए इस बात पर चर्चा भी नहीं होने देना चाहते। लेकिन जब आरक्षण के पीछे की नीयत सामाजिक अन्याय खत्म करने की है, तो फिर वह अन्याय आज किसी आरक्षित जाति के भीतर भी बुरी तरह हावी हो गया है, और आरक्षण को उतना ही रखते हुए उसे अपने तबके के कमजोर बहुसंख्यक की पहुंच के भीतर लाना चाहिए।

यह तो एक अच्छी बात है कि ओबीसी आरक्षण से आज मलाईदार तबके को बाहर रखने को लेकर कोई विवाद नहीं है, विवाद बस इतना है कि 8 लाख रूपए सालाना पारिवारिक आय की सीमा को बढ़ाकर 12 लाख किया जाए, या 16 लाख किया जाए। इससे बहस इस दायरे पर केन्द्रित हो गई है, और अब यह आम सहमति दिख रही है कि 16 लाख रूपए सालाना आय वाले परिवारों को पढ़ाई और नौकरी में आरक्षण के फायदे से बाहर रखा जाए। अब सरकार इसे 12 लाख तक लाना चाहती है, और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग इसे 16 लाख करना चाहता है। अभी की जानकारी यह है कि आयोग इस बात पर भी तैयार हो गया है कि 16 लाख रूपए सालाना वेतन वाले लोगों को भी मलाईदार तबके में गिन लिया जाए, जबकि पहले वेतनभोगियों को इस सीमा में लाने का विरोध चल रहा था। 

हमने एक-दो दिन पहले ही इसी जगह लिखा था कि संसद और विधानसभाओं में संपन्न लोगों का अनुपात जितना बढ़ते चल रहा है कि वहां गरीबी की सोच के साथ बात रखने वाले लोग बहुत बुरी तरह घट गए हैं। ऐसे में यह भी सोचना चाहिए कि क्या आरक्षित वर्गों के लिए तय संसदीय और विधानसभा सीटों को लेकर भी मलाईदार तबके की एक सीमा लागू करनी चाहिए ताकि उन्हीं तबकों के गरीब लोग भी चुनाव लड़ सकें? ऐसा इसलिए भी जरूरी लग रहा है कि संसद और विधानसभाओं से गरीबों की आवाज खत्म होते चल रही है। हमको मालूम है कि इन तबकों के कोई भी जनप्रतिनिधि इस राय को सिरे से ही खारिज कर देंगे, क्योंकि अपने पहले चुनाव के वक्त न सही, पांच साल का कार्यकाल खत्म होने तक तो वे मलाईदार तबके में पहुंच ही चुके रहते हैं। प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत तो यही कहता है कि आरक्षित तबकों के भीतर बार-बार चुनकर, बार-बार सत्ता या विपक्ष की ताकत से संपन्नता बढ़ाकर, प्रभाव और ताकत बढ़ाकर जो लोग आरक्षण का फायदा पा चुके हैं, उन्हें इस फायदे से अलग करके उन्हीं के समाज के बाकी लोगों को भी मौका देना चाहिए। देखें इन मुद्दों पर चर्चा के लिए कोई तैयार होते हैं या नहीं? 

आरक्षित तबकों के भीतर की यह मलाई बस नाम के लिए मलाई है, वरना हकीकत में तो वह एक फौलादी दीवार है जो कि अपनी पूरी बिरादरी के हकों के ऊपर एक मजबूत ढक्कन की तरह जमी हुई है, और जिसे चीरकर नीचे के निहत्थे, कमजोर, बेबस, और बेजुबान हमजात कभी ऊपर नहीं आ सकते। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


07-Jul-2020 3:12 PM

सोशल मीडिया वक्त खराब भी करता है लेकिन मुख्यधारा के कहे जाने वाले मीडिया की बंधी-बंधाई लीक से हटकर सोचने के लिए भी बहुत कुछ देता है। अब आज सुबह किसी ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि सरहद पर चीन के साथ झड़प में शहीद हुए 20 हिन्दुस्तानी फौजियों को लेकर देश के मन में जो दर्द उठा, वह देश के बीचोंबीच कानपुर में मुजरिमों के साथ भिड़ंत में मारे गए 8 पुलिसवालों के लिए क्यों नहीं उठा? दोनों वर्दियों में थे। 

अब इस पर सोचने की जरूरत है कि फौज और पुलिस के बीच लोगों के नजरिए में क्या फर्क रहता है। जिन प्रदेशों ने फौज की तैनाती देखी नहीं है, उनके लिए फौज महज खबरों और किस्सों में सरहदों पर तैनात है जो कि देश की दुश्मनों से हिफाजत करती है। लेकिन उत्तर-पूर्व के राज्यों और जम्मू-कश्मीर में फौज की बरसों से तैनाती से वहां के लोगों की नजरों में फौज की तस्वीर बहुत अलग है। मणिपुर की महिलाओं का वह बिना कपड़ों का प्रदर्शन बाकी हिन्दुस्तान को पता नहीं याद है या नहीं जो कि फौज को खास हिफाजत देने वाले कानून के खिलाफ कई बार किया गया है। इन इलाकों में फौज के लोगों के खिलाफ नागरिक कई किस्म की कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकते क्योंकि एक अलग कानून बनाकर यहां फौज को अतिरिक्त हिफाजत दी गई है। इसके खिलाफ लोगों को याद होगा कि मणिपुर में इरोम शर्मिला ने 16 बरस तक उपवास किया था लेकिन फौज को एक फौलादी हिफाजत देने वाला वह अलोकतांत्रिक कानून खत्म नहीं किया गया, और न ही बाकी देश में इसे लेकर कोई जनमत तैयार हो सका क्योंकि वह उस फौज के बारे में था जिसे हिन्दुस्तान के लोग दुश्मन से बचाने वाली मानते हैं। 

अब पुलिस की बात करें, तो लोगों का पुलिस से रोज का वास्ता पड़ता है। लोग अच्छे हों तो भी पड़ता है, बुरे हों तो भी पड़ता है। अब आज सुबह ही हमारे शहर में पुलिस सिपाही दौड़-दौडक़र बिना मास्क पहने लोगों को पकड़ रहे थे, और उनसे जुर्माना ले रहे थे। चाहे लोग ही गलती पर थे, लेकिन चूंकि कार्रवाई पुलिस कर रही है, इसलिए इन लोगों की नाराजगी पुलिस से पैदा होगी। फिर कई जगहों पर लोग सही रहते हैं, और पुलिस गलत रहती है, तो ऐसी वसूली-उगाही, मारपीट और गुंडागर्दी करने वाली पुलिस के खिलाफ लोगों के मन में एक जायज नाराजगी पैदा होती है, और ऐसी किसी नाराजगी का फौज के खिलाफ पैदा होने का कोई मौका ही नहीं आता क्योंकि फौज आम लोगों से दूर रहती है। जिन शहरों में फौजी छावनी भी रहती है, वहां यह टकराव सामने आता है, और कंटोनमेंट वाले शहरों में कई बार फौजी और जनता के बीच टकराव होता है, लेकिन ऐसे शहर देश में गिने-चुने ही हैं। दूर रहने से सम्मान बरकरार रहता है, और पास रहने से पुलिस की खामियां, मुजरिमों के साथ पुलिस की भागीदारी, पुलिस की हिंसा, और पुलिस का खुला या बंद भ्रष्टाचार, यह सब कुछ जनता की नजरों के सामने रहता है। ऐसे में पुलिस के प्रति लोगों के मन में नाराजगी अधिक रहती है, इज्जत कम रहती है। बड़े बुजुर्ग कह भी गए हैं कि थाने और कोर्ट-कचहरी की नौबत न आए, तो ही बेहतर। फिर हिन्दुस्तान में तो सिवाय गब्बर सिंह की बघारी गई अपनी शेखी को छोड़ दें, तो माताएं रोते हुए बच्चे को सुलाने के लिए असल में तो यही कहती हैं कि सो जा, नहीं तो पुलिस आकर ले जाएगी। ऐसी तमाम सांस्कृतिक वजहें हैं जो कि अंग्रेजों के वक्त से चली आ रही हैं, और जो हिन्दुस्तान के आबादी के मन में पुलिस के लिए परले दर्जे की हिकारत जमा चुकी हैं। हमने कुछ दिन पहले कानपुर की घटना के बाद लिखा भी था कि इस वारदात में भी हत्यारे-मुजरिम को पुलिस से ही खबर मिली थी कि उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस रवाना हो रही है। पुलिसवाले इस कुख्यात और भयानक मुजरिम से इतने मिले हुए थे कि उसने एक थाने में घुसकर दर्जनों अफसरों और छोटे पुलिस कर्मचारियों के बीच यूपी के एक मंत्री की हत्या कर दी थी, लेकिन 19 के 19 गवाह जो कि सारे पुलिस के थे, अदालत में जाकर पलट गए थे, और विकास दुबे नाम का यह मुजरिम बच निकला था। मुजरिमों के साथ ऐसी भागीदारी के चलते पुलिस की इज्जत बहुत गिरी हुई है। उसके कुछ गिने-चुने लोग कुछ अच्छे काम करके तस्वीर को बदलने की कोशिश जरूर कर रहे हैं, लेकिन जब तक एक पुलिस अफसर कुछ दर्जन भूखों को खाना खिला सके, तब तक सैकड़ों पुलिसवाले लोगों को मार-मारकर उनसे वसूली करते रहते हैं। ऐसे में पुलिस के बारे में जनधारणा अच्छी नहीं बन पाती, और यह बात बेवजह भी नहीं रहती है। 

यही वजह है कि अनदेखी फौज की शहादत ने देश के लोगों को विचलित किया, और देश के भीतर, देश के बीच पुलिस की ऐसी हत्या से लोग उस तरह जुड़ नहीं पाए। दोनों वर्दीधारी, बंदूकधारी हैं, दोनों ही कहने के लिए कानून के राज को लागू करने या बचाने का काम करते हैं, लेकिन दोनों के बारे में जनधारणाएं एकदम अलग-अलग है। ऐसा नहीं कि फौज के लोग दूध के धुले हैं, और वहां भ्रष्टाचार बिल्कुल नहीं है। हिन्दुस्तानी फौज के बड़े लोग अपने मातहतों की बीवियों का देह शोषण करते हुए सजा पा चुके हैं, खरीददारी जैसे भ्रष्टाचार में सजा पा चुके हैं, देश के राज दुश्मन देशों को बेचते हुए सजा पा चुके हैं, लेकिन देश की अधिकांश जनता ने फौज का यह चेहरा रूबरू नहीं देखा है। और रूबरू का यह फर्क होता है कि लोग अपने मन में एक धारणा बनाते हैं, बना पाते हैं। 

क्योंकि हिन्दुस्तान में उत्तर-पूर्व के फौजी तैनाती वाले मणिपुर सरीखे राज्य से बाकी हिन्दुस्तान अपने को जोडक़र नहीं देखता, कश्मीर की भारी फौजी तैनाती से बाकी हिन्दुस्तान के लोग अपने को नहीं जोड़ते, इन जगहों पर फौज के जुल्म से भी बाकी हिन्दुस्तान के लोग अपने को नहीं जोड़ते, और मानते हैं कि पत्थर चलाने वालों के साथ और कैसा सुलूक किया जाएगा? इसलिए फौजी शहादत लोगों को विचलित करती है, पुलिस की शहादत उस तरह विचलित नहीं करती। 

अपनी खुद की जिंदगी में लोगों ने पुलिस को जिस तरह देखा है, जिस तरह उसकी हिंसक लाठियों को देखा है, जिस तरह हिरासत में होने वाले कत्ल देखे हैं, जिस तरह बस्तर में बेकसूर आदिवासियों की बस्तियां जलाते देखा है, आदिवासी लड़कियों से बलात्कार करते और नाबालिगों का कत्ल करते देखा है, उससे जनता के बीच पुलिस के लिए हमदर्दी बहुत कम है। यह तमाम बात बड़ी कड़वी लग सकती है, लेकिन जब यह तुलना की जाए कि फौजी शहादत के लिए उपजी हमदर्दी पुलिस की मौत के वक्त कहां चली जाती है, तो यहीं पर साख काम आती है, पूर्वाग्रह काम आता है, और फौज की खामियों से अनजान जनता का अज्ञान भी काम आता है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


06-Jul-2020 2:40 PM

हिन्दुस्तान में फिलहाल तो दुनिया के बहुत से और देशों की तरह संसद और विधानसभाएं स्थगित हैं, इसलिए भी एक सदी की दुनिया की इस सबसे भयानक मुसीबत को लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही है। वरना मजदूरों की बदहाली से लेकर अस्पतालों के इंतजाम तक, और बेरोजगारी से लेकर फटेहाली तक इतनी ही पहलुओं पर तुरंत ही एक जिंदा चर्चा की जरूरत है। यह एक अलग बात है कि हिन्दुस्तानी संसदीय व्यवस्था में धीरे-धीरे करके संसद और विधानसभाओं में जिंदा चर्चा खत्म हो चुकी है, और अब सदनों में भी पार्टियां बोलती हैं, गठबंधन बोलते हैं, पहले से तय बयान देने के लिए सदस्य खड़े जरूर होते हैं, लेकिन वे अपनी पार्टी की बताई ऑडियो क्लिप बजाते हैं, और बैठ जाते हैं। 

अभी जब संसद चल नहीं रही है, विधानसभाएं संसद की ओर देख रही हैं कि वहां से कोई मिसाल मिले कि सदन कैसे चलाना है, तब इस बारे में बात करना अधिक जरूरी हो गया है कि ये सदन चल भी गए, तो उनके भीतर क्या चलेगा? जितनी पार्टियां हैं उनकी राजनीतिक-चुनावी रणनीति के तहत तय किए गए बयान चलेंगे, और भला क्या चल जाएगा? और अगर वही चलना है तो वह तो आज भी सुबह, दोपहर, शाम, रात, डॉक्टर की लिखी रोज चार खुराक की तरह, ट्विटर पर चल ही रहा है। लोग वहां सवाल कर रहे हैं, जवाब दे रहे हैं, तोहमत लगा रहे हैं, और सरकारी प्रचार माध्यमों से भी पहले ऐसे सोशल मीडिया पर वह सब कुछ हो जा रहा है जिसके लिए संसद जैसी चौपाल बनाई गई थी जो कि एक तय जवाबदेही की बुनियाद पर थी और है, जो कि विशेषाधिकारों को देने वाली चौपाल है, और जहां जवाब देना सरकार की मजबूरी रहती है। ऐसी चौपालों को छोडक़र आज राजनीतिक दल और उनके सांसद सोशल मीडिया पर आपस में बात कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि संसद और विधानसभाओं के जिन जनप्रतिनिधियों के कहने-सुनने की जगह बनाया गया था, उनके बीच सदनों में बहिष्कार अधिक चलते हैं, बहिर्गमन अधिक चलते हैं, विचार-विमर्श की वहां कोई जगह नहीं रह गई है, बहस वहां की बेमतलब शक्ति प्रदर्शन होकर रह गई है। आज जब हाल के हिन्दुस्तान में सबसे बड़े विचार-विमर्श की जरूरत है, तब अमरीकी कंपनियों के मुहैया कराए गए सोशल मीडिया पर बहस चल रही है जहां जवाब देने की कोई बंदिश नहीं है। 

लेकिन कोरोना और लॉकडाऊन के इस दौर के खत्म हो जाने के बाद भी जब कभी संसद और विधानसभाएं शुरू होंगी, उस वक्त के लिए भी आज से एक अफसोस लगता है कि देश भर के चुने गए जनप्रतिनिधियों के बीच विचार-विमर्श और बहस खत्म हो जाने का सिलसिला तो टूटने वाला नहीं है। अब हालत यह है कि दलबदल कानून के तहत व्हिप जारी हुए बिना भी सदन में उतने ही किस्म के विचार आ सकते हैं जितने गठबंधन सदन में बैठे हैं। एक गठबंधन के भीतर की पार्टियां भी अलग-अलग पार्टी की तरह बोलने के बजाय अमूमन गिरोहबंदी के तहत बोलती हैं। कभी किसी मुद्दे पर गठबंधन का एक भागीदार अगर थोड़ा खिसक भी जाता है, तो कोई दूसरा भागीदार साथ जुड़ भी जाता है। भारतीय संसद में गठबंधनों से अधिक संख्या में सोच सामने आई होगी। और यह उसी देश की संसद का हाल है जिस देश में आजादी के पहले संविधान बनाने के लिए जब संविधान सभा की बैठक हुई, तो उसमें देश के बहुत से महानतम नेताओं ने किसी बंधी सोच से परे जाकर अपनी मौलिक सोच सामने रखी थी। संविधान सभा की बहसों को अगर पढ़ें तो लगता है कि उसके बाद से लेकर अब तक आजाद भारत की संसद में कुल मिलाकर भी उतने मौलिक विचार सामने न आए हों, उतनी सार्थक बहसें न हुई हों, और हिन्दुस्तान के बुनियादी ढांचे की उतनी समझ बाद में संसद की किसी बहस में सामने न आई हो। 

लेकिन क्या संसदीय व्यवस्था मौलिक सोच और मौलिक बयान को दलबदल कानून के हथौड़े से कुचलकर सांसद या विधायक को उनके दल की घोषित रणनीति के सांचे में ढाल देने के लिए ही बनाई गई थी? क्या इस लोकतंत्र में मौलिक सोच और निजी विचार की कोई जगह नहीं रह गई है, जरूरत नहीं रह गई है? क्या पार्टियों की घोषित नीति और रणनीति से परे किसी मौलिक बात की कोई जरूरत नहीं रह गई है? यह बात इस संसदीय व्यवस्था के भविष्य पर एक गंभीर खतरा है, और यह उस वक्त है जब इस पर और भी कई किस्म के गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं। 

आज चूंकि संसद और विधानसभाएं चल नहीं रही हैं, इनके बारे में कुछ लिखा भी नहीं जा रहा है, और ऐसे में हमें लग रहा है कि इनके भीतर कोई बात हो न हो इनके बारे में बाहर बात जरूर होना चाहिए, जो कि आज हम कर रहे हैं। भारतीय संसद और विधानसभाओं को लेकर एक बड़े खतरे के बारे में बहुत कम चर्चा हो रही है कि किस तरह वहां के मामूली कमाई वाले जनप्रतिनिधि घटते चले जा रहे हैं, और करोड़पतियों को बेदखल करके अरबपति भरते जा रहे हैं, और राज्यसभा के मनोनयन में दीवालिया होने वाले खरबपतियों को भी जगह मिलती चली गई है। पैसे वालों में कोई बुराई नहीं है, और संसद तक पहुंचने का उनका बराबरी का हक है, लेकिन लोकतंत्र के तहत संसदीय व्यवस्था में अगर सदन में महज पैसे वाले ही भर जाएंगे, तो बिना पैसों वाली जनता की दिक्कत और उसकी चुनौतियों की समझ इनमें नहीं रहेगी। यह सिलसिला वैसे भी बुरी तरह खतरनाक हो गया है क्योंकि देश भर में तमाम पार्टियों ने यह मान लिया है कि अगर बाकी सारे पैमाने एक सरीखे रहते हैं, तो अधिक पैसे वाले को उम्मीदवार बनाने से जीत की अधिक उम्मीद रहती है। 

जब कभी संसद और विधानसभाएं फिर बैठें, उनके बारे में देश को यह सोचना चाहिए कि क्या ये ऐसे सदस्यों से बने हुए सदन नहीं हैं, जिनमें से अधिकतर चुनाव खरीदकर वहां पहुंचे हैं? जिन सदस्यों और उनकी पार्टियों ने एक पूंजीनिवेश की तरह सदन का सफर तय किया है, उनकी प्राथमिकता बिना पूंजी वाले सबसे गरीब लोग हो कैसे पाएंगे? और हमने पिछले महीनों में देश के औद्योगिक केन्द्रों से, महानगरों से गांवों तक मजदूरों का हजारों किलोमीटर का पैदल-साइकिल सफर देखा हुआ है कि देश की गरीब जनता की ऐसी जानलेवा तकलीफ भी संसद या विधानसभाओं को किसी किस्म की चर्चा के लिए मजबूर नहीं कर पाई। आज जब देश भर में गरीब स्कूलों के गरीब बच्चों से भी ऑनलाईन पढ़ाई करने की उम्मीद की जा रही है, कितने सांसदों, और कितने विधायकों ने पिछले महीनों में ऑनलाईन सदन चलाने की मांग की? बात-बात पर सडक़ किनारे धरने पर बैठने वाले नेताओं में से कितने सांसद और विधायक ऐसे थे जिन्होंने सदन के बाहर ही सही, सार्वजनिक रूप से सवाल पेश किए कि संसद चाहे न चल रही हो, संसदीय व्यवस्था में सरकार सार्वजनिक रूप से इसका जवाब दे। संसदीय लोकतंत्र में संसद का सदन तो महज एक तकनीकी मंच है, सवाल पूछने और जवाब पाने का हक अधिक बुनियादी है, और वह लोकतंत्र की धडक़न है। इस बुनियादी सोच के साथ कितने सांसदों और विधायकों ने देश-प्रदेश की सरकारों को चुनौती दी कि जवाब देना उनकी जिम्मेदारी है, चाहे सदन न चल रहे हों। दरअसल इस देश में लोकतंत्र की फिलॉसफी पर तंत्र और नियम इतने हावी हो गए हैं कि इनके बक्से के बाहर सोचना सांसदों और विधायकों के लिए मुश्किल हो गया है। यह सिलसिला बहुत खतरनाक इसलिए है कि यह लोकतंत्र में संसदीय व्यवस्था को बाहुबल की गिरोहबंदी में बदल चुका है, और बाहुबलविहीन लोग भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि लोकतंत्र संख्याबल या बाहुबल का नाम नहीं है, वह जनता के हक के लिए लडऩे का नाम है, फिर चाहे एक अकेला चना ही भाड़ फोडऩे में क्यों न जुट जाए। लोकतंत्र में सबसे अधिक जरूरत के वक्त संसदीय व्यवस्था के इस तरह बेअसर और प्रसंगहीन हो जाने की कल्पना क्या इस लोकतंत्र को बनाने वाले संविधान-निर्माताओं ने की होगी? आज ये सारे सवाल महज सरकार से नहीं किए जा रहे हैं, ये सवाल तमाम सांसदों और विधायकों से किए जा रहे हैं कि क्या कोरोना और लॉकडाऊन के बीच, चीन के साथ सरहद पर टकराव के बीच उनका जिम्मा क्या महज इतना है कि वे सदनों के शुरू होने का इंतजार करें, ताकि वहां पर अपने गठबंधनों और अपनी पार्टियों की खेमेबाजी कर सकें?(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


05-Jul-2020 2:53 PM

उत्तरप्रदेश के कानपुर में दो दिन पहले एक कुख्यात मुजरिम को पकडऩे गई पुलिस पर ऐसा जमकर हमला हुआ कि अफसर-कर्मचारी मिलाकर 8 पुलिसवाले मौके पर ही मारे गए। और मुजरिम वहां से भाग निकला। घटना बहुत बड़ी थी, लेकिन उस पर तुरंत अपनी सोच न लिखना समझदारी था। जैसे-जैसे घंटे गुजरे वैसे-वैसे जानकारी आई कि पुलिस के ही कुछ लोग किस तरह इस मुजरिम से मिले हुए थे, और पुलिस के ही एक थानेदार ने इसे फोन करके उसके घर पुलिस पार्टी पहुंचने की खबर की थी। मोबाइल फोन के कॉल रिकॉर्ड से इन दिनों आसानी से बहुत कुछ पता लग जाता है, और इस अपराधी को वक्त रहते पुलिस के लोगों से इतनी खबर लग गई थी कि वह अपने गिरोह के 50 लोगों को इकट्ठा करके घेरेबंदी करके इतने पुलिसवालों को मार सका, और फरार भी हो गया। 

यह बात उस उत्तरप्रदेश की है जहां योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद लगातार खुली मुठभेड़ करवाई थी, पुलिस को यह छूट दी थी कि वह जुर्म के आरोपों से घिरे हुए लोगों को सडक़ों पर मारे, और इस किस्म के सार्वजनिक बयान भी मुख्यमंत्री ने दिए थे। ढेरों ऐसे आरोपी या मुजरिम खुद होकर चलकर अदालत या पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर रहे थे क्योंकि उन्हें मुठभेड़ में मारे जाने का डर था। इसके बावजूद अभी जिस मुजरिम ने खुद जिंदा रहते हुए इतनी बड़ी संख्या में पुलिस को मारा है वह कोई नया मुजरिम नहीं था। उसके खिलाफ हत्या और हत्या की कोशिशों जैसे पांच दर्जन मामले दर्ज थे, और एक राज्यमंत्री को उसने पुलिस थाने में घुसकर मारा था। यह एक अलग बात है कि उसे अब तक सजा नहीं हुई थी, और वह अपने इलाके पर राज कर रहा था, उसके परिवार के लोग चुनाव जीत रहे थे। 

जिसके नाम लंबे बरसों से इतने बड़े-बड़े जुर्म दर्ज थे, वह योगी राज के आधे कार्यकाल के बाद भी न तो मारा गया था, न ही जेल में था, न ही उसे कोई सजा हुई थी, तो सवाल यह उठता है कि सरकार किसी मुजरिम के साथ कैसे निपटती है? मुठभेड़ में मार देना सबसे आसान है, वह तो एक मुजरिम ने अपने घर बैठे 8 पुलिसवालों को मार गिराया, और खुद बच निकला। दूसरी तरफ अदालत से सजा दिलवाना एक बेहतर काम होता है, लेकिन जब पुलिस के लोग इस हद तक बिके हुए थे कि उन्होंने अपने ही साथियों के खिलाफ इस मुजरिम को बचाने की कोशिश की, तो यह बात बहुत जाहिर और साफ है कि ऐसे पुलिसवाले अदालती मामलों में इस मुजरिम का कितना साथ देते आए होंगे। 

लेकिन आज हम उत्तरप्रदेश में अपराधियों के दबदबे पर लिखना नहीं चाहते, बल्कि हम देश में पुलिस पर लिखना चाहते हैं कि उसकी ऐसी नौबत क्यों हुई है? आज पूरे देश में यही हाल है कि संगठित अपराध और अधिक संगठित होते जा रहे हैं, और वे नेता-अफसर के संरक्षण में चल रहे हैं। संगठित अपराध में भागीदारी सबको पसंद है, और यह बात महज उत्तरप्रदेश तक सीमित नहीं है, देश के तकरीबन हर प्रदेश में, तकरीबन हर सरकार के राज में यह देखने मिलता है। कई बार यह भी लगता है कि जुर्म के लिए सबसे अधिक बदनाम रहने वाले यूपी-बिहार में भी मुजरिम जितने संगठित ढंग से जुर्म नहीं करते हैं, उससे अधिक संगठित जुर्म पुलिस अधिकतर राज्यों में करती है। छत्तीसगढ़ जैसा राज्य जो कि संगठित अपराधों के लिए कम जाना जाता है, उसमें पुलिस का संगठित अपराध शायद ही कभी कम हुआ हो। कोई अफसर अच्छा है तो उसके जिले में कुछ समय के लिए वर्दीधारी गुंडों का कारोबार सतह के नीचे चला जाता है, लेकिन किसी दूसरे संगठित अफसर के आते ही वह सतह के ऊपर आ जाता है। देश भर के अधिकतर प्रदेशों में अधिकतर पार्टियों की सरकारें पुलिस के इस संगठित जुर्म के साथ रहती हैं, बल्कि बहुत हद तक उसे बढ़ाते भी चलती हैं, उससे कमाई भी करते चलती हैं। अब ऐसे में मुजरिमों के हौसले बढऩे में दुनिया न देखे हुए किसी मासूम बच्चे को ही हैरानी हो सकती है। हिन्दुस्तान में सतही अपराधकथा लिखने वाले एक लेखक की एक किताब खासी मशहूर हुई थी- वर्दीवाला गुंडा। और इस संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विख्यात जज, जस्टिस अवध नारायण मुल्ला, की लिखी हुई एक बात याद आती है कि हिन्दुस्तान में पुलिस सबसे संगठित मुजरिम गिरोह है। 

कानपुर में पुलिस की इस तरह एकमुश्त मौत के मौके पर लिखी जा रही यह बात कई लोगों को अटपटी लग सकती है कि यह मौका तो पुलिस के साथ महज हमदर्दी का होना चाहिए। लेकिन हम यह साफ कर दें कि हमारी लिखी जा रही ये कड़वी बातें ईमानदार पुलिस अफसरों और कर्मचारियों के साथ हमदर्दी के तहत ही लिखी जा रही है। ऐसे मौके पर अगर भ्रष्ट और मुजरिम पुलिस-अफसरों के बारे में नहीं लिखा जाएगा, तो ईमानदार अफसर इसी तरह अपने साथियों की मुखबिरी से जान खोते रहेंगे। 

पूरे हिन्दुस्तान में पुलिस में सुधार की एक बहुत बड़ी जरूरत है जिससे पुलिस का कम से कम एक तबका अगर चाहे तो ईमानदार रह सके, जो कि आज तकरीबन नामुमकिन है। इस वर्दीधारी फोर्स को सत्तारूढ़ लोग अपनी निजी रणवीर सेना की तरह इस्तेमाल करते हैं, और चूंकि अदालत तक जाने वाली हर कोशिश इसी पुलिस की मार्फत जाने का कानून है इसलिए पुलिस के भ्रष्ट और दुष्ट हो जाने से इंसाफ की भ्रूणहत्या हो जाती है। अदालत कोई फैसला कर सके उसके पहले ही बिकी हुई पुलिस अधिक भुगतान करने वाले, अधिक ताकत रखने वाले, अधिक बड़े मुजरिम के पक्ष में फैसला सुना चुकी रहती है। यह सिलसिला कानपुर में अभी कतार से रखे गए ताबूतों को दी गई सलामी से बदलने वाला नहीं है। यह एक खतरनाक सिलसिला है जो कि इस श्रद्धांजलि के वक्त भी देश के अधिकतर प्रदेशों में बदस्तूर जारी था, जारी है, और जारी रहेगा। हिन्दुस्तान में पुलिस चुनिंदा जुर्म पकडऩे से परे जुर्म के गिरोह की सरदार रहती है। एक छोटी सी मिसाल यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रेलवे स्टेशन पर जीने वाले बेघर, बेसहारा बच्चों को एक रेलवे एसपी ने पढ़ाने और उनका नशा छुड़वाने का बीड़ा उठाया था। दोनों ही काम बहुत हद तक कामयाब थे। लेकिन इस एसपी के जाते ही वहां के छोटे-बड़े अफसरों ने मिलकर इन बच्चों को मजबूर किया कि स्टेशन के इलाके में संगठित गिरोह चलाने वाली एक माफिया डॉन के साथ काम करें, वरना उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। यह चूंकि करीब से देखी हुई, और बच्चों से जुड़ी हुई एक बात है इसलिए यह अधिक चुभती है, वरना आमतौर पर पुलिस संगठित जुर्म को बढ़ाने के लिए लोगों को मजबूर भी करती है ताकि उसकी हिस्सेदारी का एक कारोबार बढ़ सके। पुलिस का यह पूरा तौर-तरीका कुछ चुनिंदा और चर्चित जुर्म को पकडऩे से ढंक जाता है, छुप जाता है। दूसरी तरफ अभी लॉकडाऊन जैसे मौके पर पुलिस ने जगह-जगह लोगों की थोड़ी-थोड़ी मदद करके अपनी छवि सुधारने का एक काम किया है, और इससे भी उसके संगठित मुजरिम होने की बात कुछ हद तक दब गई है। लेकिन कुल मिलाकर पुलिस सत्ता के लिए, ताकतवर के लिए, और अपनी खुद की सीधी कमाई के लिए एक गिरोह की तरह काम करती है, यह बात बहुत से लोगों को बहुत बुरी तरह खल सकती है, फिर भी हम इसे इसलिए लिख रहे हैं कि पुलिस में जो लोग ऐसे गिरोह से परे हैं उनकी इज्जत और जिंदगी दोनों बच सके। कम लिखे को अधिक समझें, और पुलिस को बचाने की, सुधारने की कोशिश करें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


04-Jul-2020 2:20 PM

इतिहास को मनचाहे तरीके से ढालने की ताकत जब आ जाती है, तो हसरत फिर वहीं नहीं थमती, वह आगे बढ़ते चलती है। हिन्दुस्तान में यह हसरत अब भविष्य को भी ढाल लेना चाहती है। भविष्य को गढ़ लेने तक तो बात ठीक थी, लेकिन भविष्य को ढाल लेने की हसरत खतरा खड़ा कर रही है। हिन्दुस्तान में इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर का काम पूरी तरह से वैज्ञानिक है। जैसा कि संस्था का नाम सुझाता है, यह भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की संस्था है जो कि भारत में चिकित्सा शोध को नियंत्रित करती है। अभी 2 जुलाई को इसने देश की एक दवा कंपनी भारत बायोटेक को एक चिट्ठी लिखी है जिसमें कोरोना से बचाव के टीके के मानव-परीक्षण का जिक्र है। इसमें आईसीएमआर के डायरेक्टर ने लिखा है कि कोरोना की वैक्सीन के मानव परीक्षण के पूरे हो जाने के बाद 15 अगस्त तक इसे जनता के लिए उतार देने का अनुमान है। आपको इस क्लिनिकल ट्रॉयल के लिए चुना गया है, और जनता के स्वास्थ्य को देखते हुए कृपया यह सुनिश्चित करें कि 7 जुलाई तक परीक्षण के लिए मरीजों का पंजीयन हो जाए। 

अब सवाल यह है कि जिस वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रॉयल की अभी शुरूआत भी नहीं हुई है और 7 जुलाई तक लोगों को इसके लिए छांटना है, क्या उसके लिए कोई वैज्ञानिक संस्था 5 हफ्तों का समय तय कर सकती है कि उसे 15 अगस्त तक लोगों के लिए इस्तेमाल करना शुरू हो जाए? जिन्हें विज्ञान की जरा सी भी बुनियादी समझ होगी वे इस तरह की बात सोच भी नहीं सकते। इंसानों की जिंदगी को प्रभावित करने वाला कोई ऐसा टीका जिसे दुनिया के सभी विकसित देश बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उसे हिन्दुस्तान में लोगों के बीच उतारने के लिए पांच हफ्तों की एक बंदिश दे दी जाए। दुनिया के बहुत से विकसित देशों का यह अंदाज है उनके टीके जनता के काम में लाने के पहले कई महीनों का वक्त लग सकता है। कुछ देशों में मानव-परीक्षण शुरू हुए हैं, लेकिन किसी भी देश ने ऐसा कोई अनुमान सामने नहीं रखा है। 

यह दुनिया की सबसे अच्छी बात होगी कि हिन्दुस्तान सबसे पहले ऐसा कामयाब टीका बना सके। लेकिन देश के स्वतंत्रता दिवस पर इसे पेश करने की हड़बड़ी बहुत घातक हो सकती है, क्योंकि क्लिनिकल ट्रायल में डॉक्टर और बाकी विशेषज्ञ कर्मचारी लगते ही हैं, और अगर उनके मन में एक ऐसी राष्ट्रवादी भावना पैदा हो गई कि आजादी की सालगिरह पर देश को यह तोहफा देना ही है, और इस सोच ने अगर मेडिकल-परीक्षण को प्रभावित किया, तो देश एक बहुत बड़े खतरे में भी पड़ सकता है क्योंकि कोरोना का टीका मरीजों को नहीं लगना है, तमाम जनता को लगना है, और उतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले इस टीके के किसी प्रयोग में कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई जानी चाहिए। आईसीएमआर चिट्ठी को देखें तो यह बहुत खतरनाक अंदाज में लिखी गई है, और इसमें सामने रखा गया लक्ष्य किसी भी वैज्ञानिक परीक्षण को बर्बाद करने के लिए काफी दिखता है। हिन्दुस्तानियों को यह बात याद नहीं होगी कि अमरीका में गर्भवती महिलाओं के लिए बनाई गई एक दवा थेलिडामाइड को जब बाजार में उतारा गया, तो उसे जादुई करिश्मे जैसा माना गया था। लेकिन इस दवा को लेने वाली महिलाओं के जब बच्चे होना चालू हुए, तो वे बिना हाथ-पांव के थे। वह अमरीकी इतिहास का एक सबसे बुरा दु:स्वप्न था। लेकिन तब तक गर्भावस्था के दौरान ही सुबह होने वाली मितली रोकने के लिए लाखों महिलाएं यह दवा ले चुकी थीं। अमरीकी मेडिकल नियम भारत के मुकाबले अधिक कड़े हैं, उसके बावजूद वहां ऐसी चूक हुई थी। आज हिन्दुस्तान में पूरी आबादी को जो टीके लगने हैं, उन टीकों के मानव-परीक्षण के लिए पांच हफ्तों का वक्त तय किया जा रहा है, और चिकित्सा-वैज्ञानिकों को कह दिया जा रहा है कि 15 अगस्त को कामयाब टीका लेकर लालकिले पर पहुंच जाएं। 

हिन्दुस्तान में प्रकाशित होने वाली इतिहास की कुछ किताबों में इतिहास बदल देना एक अलग बात है, उससे हकीकत की बुनियाद नहीं बदल रही, और आज की इमारत गिरने नहीं जा रही। लेकिन आज की मेडिकल-रिसर्च और आज उसके लिए जरूरी मानव-परीक्षण में ऐसी हड़बड़ी करना एक ऐसी उन्मादी राष्ट्रवादी सोच की उपज है जो प्रयोगशाला की कुर्सी पर तो बैठी है, लेकिन जिसने विज्ञान की बुनियादी समझ को पूरी तरह उतारकर कूड़े के ढेर पर फेंक दिया है।

किसी देश के लिए विज्ञान से खिलवाड़ बहुत बुरा होगा, और ऐसे व्यापक उपयोग के एक टीके को आजादी की सालगिरह की तारीख दे देना हिन्दुस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी वैज्ञानिक चूक भी हो सकती है क्योंकि देश की पूरी आबादी इस टीके को लगवाने वाली रहेगी। इतनी बड़ी वैज्ञानिक संस्था की इतनी बड़ी अवैज्ञानिक चिट्ठी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज रहेगी, और बाकी दुनिया के चिकित्सा विज्ञान में इस एक चिट्ठी से भारत की साख पर बट्टा लगेगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


03-Jul-2020 6:15 PM

दिल्ली में कांग्रेस महासचिव और सोनिया परिवार की, प्रियंका को सरकारी मकान खाली करने का नोटिस मिला है क्योंकि उनका सुरक्षा दर्जा कुछ समय पहले घटा दिया गया था, और एसपीजी की सुरक्षा को सिर्फ प्रधानमंत्री तक सीमित किया गया था। ऐसे में भूतपूर्व प्रधानमंत्री की बेटी होने के नाते प्रियंका को भी सुरक्षा घट गई थी, और अब सरकारी मकान खाली करने को नोटिस दिया गया है। कहने को नोटिस में 30 दिनों का वक्त है, लेकिन साथ में यह भी है कि बाजार भाव पर भाड़ा देकर वे वहां और भी रह सकती हैं। जैसी कि उम्मीद थी दिल्ली की कांग्रेस नेताओं ने तुरंत ही सरकार के इस नोटिस के खिलाफ बयान देना शुरू कर दिया, और इसे सरकार की बदले की कार्रवाई बताया। लेकिन बहुत से ऐसे पत्रकार जो आमतौर पर मोदी सरकार के आलोचक रहते हैं, उन्होंने तुरंत ही यह ट्वीट किया कि प्रियंका गांधी को सुरक्षा घटते ही सरकारी बंगला खाली कर देना था, और दिल्ली में अपने परिवार के निजी बंगले में चले जाना था, लेकिन वे इस मौके को चूक गईं।
 
हमारा ख्याल है कि इस मामले को कांग्रेस पार्टी जितना कुरेदेगी, उतना ही उसका राजनीतिक नुकसान होगा। जनता का जो तबका किसी नेता या पार्टी का समर्थक है, या नहीं भी है, सबके बीच एक बात को लेकर भावना एक सरीखी है कि नेता सरकारी बंगलों का बेजा इस्तेमाल करते हैं। यह बात तमाम पार्टियों के तमाम नेताओं पर एक सरीखी लागू होती है, और महज वामपंथी नेता इससे परे के हैं जिनके सरकारी मकानों का एक बड़ा हिस्सा पार्टी अपने दूसरे कार्यकर्ताओं और पार्टी के दूसरे संगठनों के लिए आबंटित करती है। लोगों को याद होगा कि प्रियंका गांधी जिस उत्तरप्रदेश की राजनीति में पूरा समय दे रही हैं, उसी उत्तरप्रदेश में भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों के सरकारी बंगले खाली करवाने के लिए लोगों को अदालत तक जाना पड़ा है, और उसके बाद अलग-अलग राज्यों ने केबिनेट में फैसले लेकर ऐसी कानूनी व्यवस्था कर दी है कि भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और भूतपूर्व विधानसभा अध्यक्ष सरकारी बंगलों के हकदार बने रहें। एक गरीब देश में यह सिलसिला बहुत भयानक है। दुनिया के जो सबसे विकसित और लोकतांत्रिक देश हैं, वहां भी सरकारी मकानों की ऐसी कोई पात्रता नहीं रहती, और लोग जब तक किसी पद पर रहते हैं, उन्हें किराए की पात्रता अगर रहती है, तो उस सीमा के भीतर वे खुद ही मकान ढूंढकर किराए पर रह लें। 
यह देश कितना गरीब है यह इससे भी पता लगता है कि बहुत से प्रदेशों की मांग के बाद जब केन्द्र सरकार ने अभी मुफ्त राशन की व्यवस्था बढ़ाई, तो उसके आंकड़े बताते हैं कि 80 करोड़ लोग गरीबी की इस सीमा में आते हैं। इस बात में बहुत बड़ा विरोधाभास है कि देश की आबादी की आधे से अधिक हिस्से को मुफ्त राशन जरूरी हो, और पूरे देश में केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों के बंगलों का बेजा इस्तेमाल जारी रहे। सरकारी बंगले में एक बार पहुंच जाने के बाद लोग जिंदगी के आखिर तक उसे खाली करना नहीं चाहते। और अगर नाम जगजीवनराम और मीरा कुमार हो, तो गुजर जाने के बाद भी उस बंगले में स्मारक बनाने की जिद जारी रहती है। यह पूरा बेजा इस्तेमाल खत्म होना चाहिए। राज्यों की राजधानियों में भी सरकारी मकान खत्म होने चाहिए, और हर ओहदे के साथ एक किराए की पात्रता जुड़ी रहनी चाहिए जिससे लोग मर्जी के मकान में रहें, और पद से हटते ही वह किराया मिलना खत्म हो जाए।
 
हमारा ख्याल है कि सरकार के विवेक के सारे अधिकार अलोकतांत्रिक होते हैं कि किन लोगों को सरकारी मकान मिलें, और कितने बड़े मिलें। सरकार की अपनी कोई जेब नहीं होती है, वह जनता के पैसों पर पलती हैं, और उसके बेजा इस्तेमाल का हक किसी को नहीं होना चाहिए। आज हालत यह है कि बड़े-बड़े सरकारी बंगलों को लोग पहले तो आबंटित करा लेते हैं, और फिर उनके रख-रखाव के लिए, वहां सब्जी उगाने से लेकर कुत्ते नहलाने-घुमाने तक के लिए, वहां सफाई के लिए अंधाधुंध सरकारी कर्मचारियों की तैनाती करवा लेते हैं। निजी कंपनियों में किसी अधिकारी या कर्मचारी पर कंपनी का होने वाला कुल खर्च कॉस्ट टू कंपनी कहलाता है। आज बड़े अफसरों और मंत्रियों को देखें तो उनके बंगलों पर तैनात कर्मचारियों की सरकारी लागत इन अफसर-मंत्री की सरकारी लागत से बहुत अधिक होती है। जितनी तनख्वाह वे पाते हैं, उससे कई गुना अधिक तनख्वाह का अमला उनके निजी काम के लिए तैनात रहता है। राज्यों में तो हमारा देखा हुआ है कि सरकारी अमला विपक्ष के निर्वाचित विधायकों के घर भी तैनात कर दिया जाता है, ताकि वे विधानसभा में कुछ नर्मी बरतें। यह सब कुछ जनता के मुंह के निवाले को छीनकर ही हो पाता है, जनता के इलाज के हक, उसके बच्चों के पढ़ाई के हक में से छीनकर ही हो पाता है। 

इस फिजूलखर्ची को हिन्दुस्तान की कोई भी बड़ी अदालत शायद ही फिजूल माने क्योंकि देश की बड़ी अदालतों के जज खुद भी अपने पर ऐसी ही सरकारी फिजूलखर्ची करवाते हैं। एक-एक जज के साथ दो-दो, तीन-तीन सरकारी गाडिय़ों, सुरक्षा कर्मचारियों का काफिला चलता है जो सायरन बजाते हुए लोगों को हटाता है, जानवरों को हटाता है। जजों के बंगलों पर भी सरकार का बहुत खर्च होता है। ऐसे में जनता के बीच से ही ऐसे खर्च के खिलाफ आवाज उठनी चाहिए, और अदालतों तक मामलों को ले जाना चाहिए ताकि अगर जजों का पूर्वाग्रह जनहित याचिकाओं को खारिज भी करता है तो कम से कम वह कानून की किताबों में बुरी मिसाल की तरह दर्ज तो हो जाए।
 
प्रियंका गांधी का मामला अकेला नहीं है। पूरे देश में हर राजधानी में ऐसे सैकड़ों मामले हैं, और दिल्ली में भी ऐसे दर्जनों और मामले होंगे। इन सब पर एक तरह की सख्ती और कड़ाई से कार्रवाई होनी चाहिए। धीरे-धीरे सरकार को निजी बंगलों का सिलसिला खत्म ही कर देना चाहिए। आज सत्ता में ऊपर बैठे हुए लोगों पर यह खर्च बड़े सामंती दर्जे से भी अधिक का होता है, और उन पर अघोषित खर्च उससे भी अधिक होता है। राजनीतिक दलों में से वामपंथियों के अलावा कोई भी इस मुद्दे को नहीं उठाएंगे क्योंकि ऐशोआराम में हर कोई भागीदार हैं। इसके खिलाफ एक जनजागरण की जरूरत है ताकि जनता ही सवाल करे।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


02-Jul-2020 4:24 PM

अर्नब गोस्वामी नाम का आदमी जब-जब खबरों में आता है, यह बात पुराने और पेशेवर अखबारनवीसों को बहुत तल्खी के साथ खटकती है कि कुछ लोग उन्हें और अर्नबों को एक साथ मीडिया के नाम से बुलाते हैं। यह शब्द अब खटकने लगा है। अखबारों को अपने पुराने प्रेस नाम के शब्द पर जाना चाहिए, और छपे हुए शब्दों से परे के तमाम किस्म के मीडिया के लिए उनकी मर्जी के अलग-अलग शब्दों का इस्तेमाल उन पर छोड़ देना चाहिए। एक वक्त जब केवल छपे हुए अखबार और रेडियो हुआ करते थे, तब भी अखबार और रेडियो अलग-अलग गिनाते थे। रेडियो ने कभी यह जिद नहीं की थी कि वह प्रेस में गिनाए। सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी रेडियो के लिए आकाशवाणी नाम से या रेडियो के नाम से अलग से मेज लगती थी जिस पर टेपरिकॉर्डर जमाकर काम किया जाता था। दूसरी तरफ प्रेस के नाम की जो मेज लगती थी, उसमें सचमुच के छपाई के अखबारों वाले लोग बैठते थे।

अब कम से कम दो बहुत साफ-साफ तबके खड़े हो गए हैं, जिनका कोई मेल प्रेस से नहीं है। एक तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहा जाने वाला टीवी, और दूसरा डिजिटल कहा जाने वाला ऑनलाईन मीडिया। रेडियो का चलन भी कम हो गया, और अब उसके लिए अलग नाम भी नहीं गिना जाता। कम से कम अखबारों को मीडिया नाम की इस छतरी के नीचे से बाहर आ जाना चाहिए, और फिर से प्रेस नाम का इस्तेमाल करना चाहिए। ऑनलाईन मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तहजीब, उनके नियम-कायदे, काम का उनका मिजाज, इनमें से कोई भी बात अखबारों से मेल नहीं खाती, पत्रकारिता या अखबारनवीसी से मेल नहीं खाती। और कुल मिलाकर कहें तो अखबारों के लिए यह शर्म से डूब मरने की बात हो जाती है जब उन्हें इस देश के अर्नबों के साथ एक तबके में मीडिया कहकर गिना जाता है। 

कुछ हफ्ते पहले जब अर्नब गोस्वामी ने सोनिया गांधी पर इस देश के टीवी-समाचार के इतिहास का सबसे ओछा और सबसे गंदा हमला किया था, उस वक्त भी हमने इसी जगह बड़ी कड़ाई से इसी बात की वकालत की थी कि अखबारों को मीडिया नाम के इस नए दायरे से निकल जाना चाहिए, कम से कम अपनी खुद की इज्जत का ख्याल रखते हुए। 

आज देश के टीवी समाचार चैनलों में से एक बड़े हिस्से का जैसा इस्तेमाल देश में नफरत फैलाने के लिए, युद्धोन्माद फैलाने के लिए, झूठ को फैलाकर हकीकत को ढांक देने के लिए किया जा रहा है, उसे देखते हुए आज भी बहुत हद तक ईमानदार बने हुए अखबारों को मीडिया नाम से गिनाने पर परहेज करना चाहिए, और प्रेस नाम का ही इस्तेमाल करना चाहिए जो कि अभी बंद नहीं हुआ है, लेकिन प्रेस से परे के लोग एक नया शब्द गढक़र उसमें प्रेस को जोडक़र और खुद भी शामिल होकर एक अलग साख पा रहे हैं। साखदार प्रेस को ऐसी कोशिशों से अपने को बाहर कर लेना चाहिए।

जब सोनिया गांधी के बारे में अर्नब गोस्वामी ने चीख-चीखकर अपने अंग्रेजी चैनल पर बार-बार कहा था कि महाराष्ट्र में साधुओं की हत्या पर खुश होकर सोनिया ने वेटिकन चर्च को रिपोर्ट भेजी होगी कि उसके राज में हिन्दू साधुओं को इस तरह से मारा गया है, तो उसके खिलाफ देश में कई जगह कांग्रेस के लोगों ने रिपोर्ट लिखाई थी। लेकिन अर्नब को बचाने में इस देश में अब प्रतिबद्ध दिखती न्यायपालिका फौलादी ढाल बनकर खड़ी हो गई थी, और यह आदमी आज भी अपनी जहरभरी जुबान से रोज चीख-चीखकर नफरत फैलाने की आजादी का खुलकर इस्तेमाल कर रहा है। देश में एक भी अखबार इसकी टक्कर का नफरतजीवी दिखाई नहीं पड़ता है, और न ही अखबारों का ऐसे टीवी चैनलों पर किसी तरह का पेशेवर काबू भी है। ऐसे में जब ब्रॉडकॉस्टिंग मीडिया का एक अलग संगठन है, तब अखबारों को उससे परे रहना चाहिए। ऐसे कोई व्यापक जनहित या मीडिया-हित नहीं दिख रहे जिनके लिए अखबार और टीवी चैनलों को साथ रहना बेहतर लगे। सिर्फ इसलिए कि टीवी चैनल समाचार-विचार दिखाने का दावा करते हैं, उन्हें समाचार-विचार छापने वाले अखबारों के साथ गिनना नाजायज है। 

अखबारों को यह बात समझ लेना चाहिए कि न तो केन्द्र सरकार, न ही बहुत सी राज्य सरकारें, और न ही देश की कोई बड़ी अदालतें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के खिलाफ कोई कार्रवाई करने वाली हैं। प्रेस कौंसिल भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अनदेखा करके चल रहा है। ऐसे में प्रेस को अगर अपनी कोई इज्जत रखनी है, तो वह मीडिया नाम के इस दायरे से परे ही मुमकिन है। सुबह का भूला शाम तक अगर घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। प्रेस को अब प्रेस नाम से अपने गरीब घर में लौट जाना चाहिए।

कुछ लोगों ने अर्नब गोस्वामी की एक खबर अगर न पढ़ी हो तो अभी अपने एक डिबेट में अर्नब गोस्वामी ने कहा- क्या नाम है छत्तीसगढ़ के उस मुख्यमंत्री का जो सोनिया गांधी की चमचागिरी करते रहता है? इस पर पैनल में से किसी ने नाम बताया- भूपेश बघेल। इस पर अर्नब ने कहा- ओ सुनो बघेल... एक एफआईआर इस बात पर भी करा देना कि मैंने पूछा कि क्या आप (सोनिया) इटली की सेना के बारे में ऐसे बोलते हो? 
अखबार तय करें कि क्या वे ऐसे टीवी वालों के साथ एक कतार में रहना चाहते हैं? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


01-Jul-2020 7:03 PM

असम उच्च न्यायालय ने अभी एक आदमी को अपनी पत्नी से तलाक लेने की इजाजत दे दी। अदालत का यह मानना था कि एक हिन्दू शादीशुदा महिला सिंदूर लगाने और चूड़ी पहनने से इंकार करती है तो यह तलाक का पर्याप्त आधार है। निचली अदालत ने इस आधार पर पति को तलाक की इजाजत नहीं दी थी और माना था कि ऐसा करके पत्नी ने उसके साथ कोई क्रूरता नहीं की। अभी हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चूड़ी पहनने और सिंदूर लगाने से इंकार करना पत्नी को अविवाहित दिखाएगा, या फिर यह दर्शाएगा कि वह पति के साथ इस शादी को स्वीकार नहीं करती। अदालत ने कहा कि पत्नी का यह रवैया इशारा करता है कि वह पति के साथ दाम्पत्य जीवन स्वीकार नहीं करती है। 

तलाक के इस मामले में और भी बहुत सारे पहलू थे लेकिन दो जजों की हाईकोर्ट बेंच की ये टिप्पणियां भयानक है। भारतीय, और खासकर हिन्दू समाज में, एक महिला के ऊपर पुरूषप्रधान समाज की लादी गई उम्मीदों का यह एक नायाब नमूना है। एक शादीशुदा महिला के लिए भारत में चूड़ी, सिंदूर, बिंदी जैसे कई प्रतीक सैकड़ों-हजारों बरस से लादे गए हैं। और शादीशुदा आदमी बिना किसी प्रतीक के खुले सांड की तरह घूमने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह पूरा सिलसिला औरत के साथ गैरबराबरी के बर्ताव का है जिसमें प्रतीकों और रस्मों को अनिवार्य रूप से उसके शोषण से जोड़ा जाता है, और उसके दूसरे दर्जे की सामाजिक स्थिति की गारंटी भी इनसे की जाती है। एक महिला के लिए कुमारी या श्रीमती लिखकर अपनी वैवाहिक स्थिति का खुलासा करना जरूरी किया जाता है, लेकिन मर्द के लिए ऐसी कोई बंदिश किसी सरकारी कागज में नहीं रहती। एक महिला को शादी के बाद अनिवार्य रूप से सरकारी और अदालती कागजों में अपने नाम के साथ पति का नाम भी जोडऩा पड़ता है, लेकिन उसके पति पर ऐसी कोई बंदिश नहीं रहती, और वह अपने नाम के साथ पिता का नाम लिए हुए ही मर सकता है। वह अगर पहले मर गया, और आंकड़ों को देेखें तो उसे अनिवार्य रूप से पहले ही मरना है, तो उसके बाद हिन्दू समाज में उसकी पत्नी से और कई किस्म की उम्मीदें की जाती हैं कि वह इसके बाद चूड़ी न पहने, बिंदी न लगाए, रंगीन कपड़े न पहने, परिवार में किसी खुशी के समारोह के वक्त दूर कहीं पीछे बैठी रहे, और सामने न आए, मांस-मछली, अंडा-प्याज-लहसुन न खाए, अपनी कोई जिंदगी न जिए। मतलब यह कि अब कानूनी रूप से किसी औरत को मरे हुए पति के साथ सती करना आसान नहीं रह गया है, इसलिए उसे जीते-जी एक दर्शनीय सती बना दिया जाए कि उसकी जिंदगी अब उजड़ गई है। दूसरी तरफ पत्नी के गुजरने के बाद पति पर इस किस्म की कोई बंदिश नहीं हैं। हमने ऊपर पति के पहले गुजरने की बात आंकड़ों के आधार पर इसलिए लिखी है कि हिन्दुस्तान में आमतौर पर पुरूष अपने से पांच बरस या और अधिक छोटी महिला से शादी करना पसंद करते हैं ताकि बुढ़ापे में सेवा करने के लिए बीवी के हाथ-पैर चलते रहें। फिर ईश्वर ने भी मानो औरत को इसी मकसद से अधिक मजबूत बनाया है कि वह बच्चों, पति, और पति के परिवार की सेवा कर सके, और उसकी औसत उम्र भारत के औसत पुरूष की उम्र से तीन-चार बरस ज्यादा रहती है। इस तरह पांच बरस छोटी महिला से शादी, और महिला की जिंदगी तीन-चार बरस अधिक होने के जनगणना के तथ्य को जोडक़र देखें, तो औसत भारतीय महिला को आखिर के कई बरस अकेले रहना होता है। ऐसे में हिन्दुस्तान का एक हाईकोर्ट उसके माथे पर सिंदूर, और हाथ में चूड़ी को एक बेड़ी-हथकड़ी की तरह पहनाने पर आमादा है कि यह शादीशुदा जिंदगी की एक अनिवार्य कानूनी शर्त है। यह फैसला बहुत ही खराब फैसला है, और हमारा पक्का भरोसा है कि यह सुप्रीम कोर्ट में जरा भी खड़ा नहीं हो पाएगा। 

अभी चार दिन पहले ही इसी जगह पर हमें कर्नाटक हाईकोर्ट के एक जज की की गई टिप्पणी पर लिखना पड़ा था जिसमें जज ने बलात्कार की शिकायत करने वाली एक महिला के खिलाफ ही बहुत सी अवांछित बातें कहीं थीं। वहां के जज, जस्टिस कृष्ण एस. दीक्षित ने अपने फैसले में शिकायत करने वाली महिला के चाल-चलन के बारे में कई किस्म के लांछन लगाए। उन्होंने इस महिला के बारे में कहा- महिला का यह कहना कि वह बलात्कार के बाद सो गई थी, किसी भारतीय महिला के लिए अशोभनीय है। महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करती हैं। 

यह कहते हुए जज ने आरोपी की अग्रिम जमानत मंजूर कर दी। जज ने इस मामले में कई ऐसी टिप्पणियां कीं जिनका आरोप से कोई संबंध नहीं है, और जिनसे महिला के चाल-चलन के बारे में एक बुरी तस्वीर बनती है। जस्टिस दीक्षित ने कहा- शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया है कि वे रात 11 बजे उनके दफ्तर क्यों गई थीं, उन्होंने आरोपी के साथ अल्कोहल लेने पर एतराज नहीं किया, और उन्हें अपने साथ सुबह तक रहने दिया। शिकायतकर्ता का यह कहना कि वह अपराध होने के बाद थकी हुई थीं, और सो गई थीं, भारतीय महिलाओं के लिए अनुपयुक्त है। हमारी महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करतीं। शिकायतकर्ता ने तब अदालत से संपर्क क्यों नहीं किया जब आरोपी ने कथित तौर पर उन पर यौन संबंध के लिए दबाव बनाया था? 

यह सोच चूंकि हाईकोर्ट जज की कुर्सी से निकली है, इसलिए बहुत भयानक है। इस कुर्सी तक बलात्कार के शायद तीन चौथाई मामलों पर आखिरी फैसले हो जाते हैं, और इसके ऊपर की अदालत तक शायद बहुत कम फैसले जाते होंगे। ऐसे में बलात्कार का आरोप लगाने वाली एक महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति, बलात्कार के साथ उसके सामाजिक और आर्थिक संबंधों की बेबसी की कोई समझ अदालत के इस अग्रिम-जमानत आदेश में नहीं दिखती। जज की बातों में एक महिला के खिलाफ भारतीय पुरूष का वही पूर्वाग्रह छलकते दिखता है जो कि अयोध्या में सीता पर लांछन लगाने वाले का था। एक महिला के खिलाफ भारत में पूर्वाग्रह इतने मजबूत हैं कि उसके पास अपने सच के साथ धरती से फटने की अपील करते हुए उसमें समा जाने के अलावा बहुत ही कम विकल्प बचता है। 

एक फैसला कर्नाटक हाईकोर्ट का, और एक यह असम का, ये दोनों मिलकर 21वीं सदी में भारत के हाईकोर्ट के जजों की सोच बता रहे हैं, और ये एक हिंसक सोच है जो कि सदियों से महिलाओं के खिलाफ चली आ रही सोच का ही एक विस्तार है। 

इससे एक और बात भी उठती है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को न सिर्फ इस मामले में बल्कि कई दूसरे किस्म के मामलों में भी उनके पूर्वाग्रह से परे कैसे रखा जा सकता है? यह बात तो तय है कि किसी के पूर्वाग्रह आसानी से नहीं मिटाए जा सकते। लेकिन यह तो हो सकता है कि पूर्वाग्रहों की अच्छी तरह शिनाख्त पहले ही हो जाए, और फिर यह तय हो जाए कि ऐसे जजों के पास किस तरह के मामले भेजे ही न जाएं। 

जिन लोगों को अमरीका में जजों की नियुक्ति के बारे में मालूम है वे जानते हैं कि बड़ी अदालतों के जज नियुक्त करते हुए सांसदों की कमेटी उनकी लंबी सुनवाई करती है, और यह सुनवाई खुली होती है, इसका टीवी पर प्रसारण होता है। और यहां पर सांसद ऐसे संभावित जजों से तमाम विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दों पर उनकी राय पूछते हैं, उनसे जमकर सवाल होते हैं, उनके निजी जीवन से जुड़े विवादों पर चर्चा होती है, और देश की अदालतों के सामने कौन-कौन से मुद्दे आ सकते हैं उन पर उनकी राय भी पूछी जाती है। कुल मिलाकर निजी जीवन और निजी सोच इनको पूरी तरह उजागर कर लेने के बाद ही उनकी नियुक्ति होने की गुंजाइश बनती है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में रखी है, और वहीं से नाम तय होकर प्रस्ताव सरकार को जाते हैं। ऐसे में जजों की सामूहिक सोच से परे किसी और तरह की सोच आने की गुंजाइश नहीं रहती।
 
हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान में जजों के सारे पूर्वाग्रह पहले ही उजागर हो जाने चाहिए। और इसके साथ ही यह भी दर्ज हो जाना चाहिए कि उन्हें किस किस्म के मामले न दिए जाएं, या कि उन्हें नियुक्त ही न किया जाए। हमारा यह भी मानना है कि देश के सुप्रीम कोर्ट को अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट के फैसलों की ऐसी व्यापक असर वाली बातों का खुद होकर नोटिस लेना चाहिए, और इसके लिए कौन सा सुधार किया जा सकता है उसका एक रास्ता निकालना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


30-Jun-2020 5:47 PM

हिन्दुस्तान में कोरोना से तबाह जनता की सेहत, और देश की अर्थव्यवस्था की सेहत में से अधिक गंभीर हालत किसकी है, यह अंदाज लगाना कुछ मुश्किल है। कोरोनाग्रस्त लोगों के आंकड़े देखें, और यह हकीकत देखें कि जांच काफी नहीं हो रही है, तो लगता है कि जनता की सेहत अधिक खतरे में है। दूसरी तरफ उद्योग-व्यापार, और रोजगार के जानकार लोगों की बातें सुनें, तो लगता है 2020 का यह पूरा साल ही तबाह हो चुका है, और आने वाले कई महीने हालात से उबरने की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट जो कि कोरोना में मजदूरों के बुरे हाल को सुनने से ही इंकार कर चुका था, वह कई महीनों बाद देश के गरीबों की हालत को दखल के लायक मानकर उसकी सुनवाई कर रहा है, और मानो अपनी पहले की अनदेखी की भरपाई करने के लिए अब यह भी कह रहा है कि क्या सरकार का बैंकों की किस्त आगे खिसकाने के बाद उन किस्तों पर और अलग से ब्याज लेना चाहिए? खैर, अदालत की जुबानी जमाखर्च और अदालत के आदेश, इन दोनों का आपस में बहुत अधिक लेना-देना हो, ऐसा भी जरूरी नहीं है। लेकिन एक दूसरी बात की सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान से परे भी बाहर एक दुनिया है, और एक वक्त इस देश के नेता बाकी दुनिया के मुद्दों की भी फिक्र करते थे, जरूरतमंद देशों की मदद करते थे, और ऐसे देशों की हालत आज क्या है? 

भारत में तो अभी हम जब यह लिख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रसारण चल ही रहा है, और वे कह रहे हैं कि दीवाली और छठ तक लोगों को मुफ्त में राशन मिलना जारी रहेगा। यह मांग उनसे लगातार की जा रही थी, और कई राज्यों से केन्द्र के खाद्यमंत्री को चिट्ठी भी लिखी गई थी जिस पर आज यह घोषणा आई है। लेकिन आज एक दूसरी खबर बाकी दुनिया के बारे में है, जिसका एक बड़ा हिस्सा हिन्दुस्तान जितने अनाज वाला नहीं है, और उसकी जो हालत आने वाले वक्त में होने वाली है, वह दुनिया का भी नागरिक होने की वजह से हमें भी फिक्रमंद करता है। हिन्दुस्तान के लोग और यहां के नेता जब अपनी खुद की फिक्र से उबर सकें, तो हमसे अधिक भूखे लोगों के बारे में भी सोचने की जरूरत खड़ी हुई है। 

संयुक्त राष्ट्र संघ ने अभी नए आंकड़े जारी किए हैं जिनके मुताबिक कोरोना के पहले जितने लोग खाद्य असुरक्षा के शिकार थे, उनमें इस बरस के आखिर तक 82 फीसदी की बढ़ोत्तरी होते दिख रही है। कोरोना से प्रभावित देश अब तक तो मोटेतौर पर संपन्न और विकसित देश थे, लेकिन अब कोरोना की बीमारी और अर्थव्यवस्था पर इसका असर ये दोनों ही गरीब देशों तक पहुंच रहे हैं। जो देश पहले से खाद्य सुरक्षा पर जी रहे थे, वे देश अब तीन गुना रफ्तार से भुखमरी की ओर बढ़ रहे हैं। इनमें दुनिया का निम्न और मध्यम आय वाला शहरी समुदाय भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी के मुताबिक रोजगार खत्म होने और कमाई में भारी गिरावट आने के कारण लोग अभावग्रस्त जिंदगी की ओर खिंचते जा रहे हैं। 

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े एक ऐसी भयानक तस्वीर पेश कर रहे हैं जो कि हिन्दुस्तान के लोग भूल चुके हैं। हिन्दुस्तान में भूख से मौत एक इतिहास बन चुका है। कहीं किसी चूक की वजह से एक-दो ऐसी मौतें आज भी अगर सामने आ रही हैं, तो उनके लिए हिन्दुस्तान के हिन्दी भाषा में अपवाद नाम का एक शब्द बना हुआ है। भारत में केन्द्र सरकार और अधिकतर राज्य सरकारें देश में मौजूद अनाज के भंडार मौसम की मार से बचाने की हालत में भी नहीं हैं। अनाज इतना अधिक है कि वह गरीबी से टक्कर लेते दिखता है। ऐसे में आर्थिक मंदी कितनी भी हो जाए, अगले साल दो साल हिन्दुस्तान में लोगों के जिंदा रहने लायक अनाज शायद मिलते रहेगा। लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि एक समय हिन्दुस्तान दुनिया के देशों के बड़े-बड़े संगठनों का अगुवा भी था। वह गरीब और जरूरतमंद देशों को मदद भी करता था, और उस वक्त भी करता था, जब वह खुद जिंदा रहने और आगे बढऩे के संघर्ष में लगा हुआ था। आज जिस तरह बहुत से गरीबों की ऐसी तस्वीरें आती हैं जो अपनी आधी रोटी तोडक़र अपने से अधिक भूखे को देते हैं, ऐसा काम हिन्दुस्तान करते आया है। लेकिन उसके लिए एक व्यापक नजरिये की भी जरूरत होती है, और यह समझ जरूरी होती है कि अपना पेट भरने के अलावा भी लोगों की व्यापक जिम्मेदारी होती है। क्या आज हिन्दुस्तान के लोग यह सोचने की हालत में हैं कि उनसे अधिक गरीब लोग दुनिया में भूखे मरने की कगार पर हैं, और अपनी तमाम दिक्कतों के बीच भी अपनी रोटी का एक कोना हमें उन लोगों के लिए भी भेजना चाहिए जो कि मदद न मिलने पर बड़ी संख्या में मरेंगे। हिन्दुस्तान के बहुत से लोग अपनी जिस संस्कृति पर गौरव करते हैं, और वसुधैव कुटुम्बकं जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जिसका मतलब शायद पूरी दुनिया के एक परिवार होने जैसा कुछ है, उस संस्कृति के तहत क्या अपनी रोज की जरूरतों से परे भी उनकी कोई जिम्मेदारी है? 

देश के भीतर अपने से अधिक जरूरतमंद लोगों के काम आना, देश के बाहर अपने देश से अधिक जरूरतमंद लोगों के काम आना ही किसी देश को सही मायनों में विकसित, सभ्य, और महान देश बना सकता है। आज हिन्दुस्तान को अपनी परेशानियों के बीच भी यह देखना चाहिए कि वह दुनिया के सबसे गरीब देशों पर आई हुई इस कोरोना-मंदी के दौर में उनकी क्या मदद कर सकता है? जिनके घरों में बोरियों से अनाज रहता है, वे अगर किसी को कुछ किलो अनाज दे देते हैं, तो उसमें कोई बहुत बड़प्पन की बात नहीं है। बड़प्पन तो उसमें है कि जब आपके पास कुल एक रोटी हो, और आप उसमें से आधी रोटी किसी अधिक भूखे को देकर उसकी जिंदगी बचाएं। कई लोगों को यह बात फिजूल की लग सकती है कि देश की ऐसी हालत में दूसरे देशों का क्या सोचा जाए? लेकिन हर किसी को अपने से अधिक जरूरतमंद की फिक्र करनी चाहिए, और तंगनजरिया छोडऩा चाहिए। अभी तक हिन्दुस्तान की सरकार, यहां के विपक्ष के नेता, यहां का मीडिया, कहीं से भी हमें यह बात सुनाई नहीं पड़ी है कि भूख के मरने का खतरा झेलने वाले देशों की मदद के लिए हमें क्या करना चाहिए? आने वाले महीने बारिश के हैं, और हिन्दुस्तान में अनाज के खुले में रखे गए भंडार खराब होने जा रहे हैं, हर बरस की तरह। ऐसे में सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि आने वाले कई महीनों के लिए गरीबों को अनाज देना समझदारी होगी, या फिर उन घरों के लोग अनाज बेचकर शराब पी जाएंगे? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


29-Jun-2020 4:36 PM

भारत को पड़ोस के देशों को लेकर फिक्र करना चाहिए। कल नेपाल के प्रधानमंत्री ने इशारा किया है भारत उनका तख्तापलट करने की कोशिश कर रहा है। नेपाल के साथ अचानक एक तनाव एक नक्शे को लेकर खड़ा हो गया जिसमें वहां की पूरी संसद सरकार के साथ हो गई, और भारत को मानो यह सूझ नहीं रहा है कि इस नौबत में क्या किया जाए। नेपाली प्रधानमंत्री के आरोपों में अगर सच्चाई है, और भारत पड़ोस के एक असहमत, बागी तेवरों वाले प्रधानमंत्री को पलटने की कोशिश पर्दे के पीछे से कर रहा है, तो भी भारत कुछ कर तो रहा है। चीन के साथ तो भारत इतना भी करते नहीं दिख रहा है। हालांकि आज सोशल मीडिया पर कार्टून तैरा है जिसमें कोई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कह रहा है कि चीन के 40-50 सांसद खरीदकर वहां की सरकार क्यों नहीं गिरा देते। जब सरहद का मामूली दिख रहा तनाव बढ़ते-बढ़ते दशकों की सबसे बड़ी शहादत बन जाए, और उसके बाद भी सरकार को यह समझ न पड़े कि इस टकराव का नाम इलाहाबाद है, या प्रयागराज है, या कोई तीसरा नाम है, तो भारत एक मुश्किल में दिखता है। अब तक भारत सरकार के बयानों से यह समझ नहीं पड़ रहा कि हकीकत क्या है। और फिर बात केवल चीन तक रहती तो भी समझ आता, बात तो आज एक बागी नेपाल की हो गई है, जिनकी चारों तरफ धरती से घिरा हुआ लैंडलॉक्ड देश है, और भारत पर कई तरह से आश्रित भी है। दोनों देशों के नियम-कानून में एक-दूसरे के लोगों के लिए एक बड़ा उदार दर्जा रहते आया है। ऐसे में चीन से टकराव के ठीक बीच में नेपाल से यह निहायत गैरजरूरी टकराव खड़ा होना एक फिक्र की बात है। फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि श्रीलंका इन दिनों पूरी तरह चीन के साथ है, और वहां पर बड़ा पूंजीनिवेश, बड़ा रणनीतिक निर्माण चीन कर रहा है, और वह भारत को एक किस्म से घेरने का एक काम भी है। चीन के साथ पिछला फौजी टकराव पिछली सदी में 60 के दशक में हुआ, और इस वक्त भारत-चीन सरहद से परे कुछ नहीं था। इस बार पाकिस्तान में चीन की बहुत ही दमदार मौजूदगी है, श्रीलंका तकरीबन उसके कब्जे में है, नेपाल आज की तारीख में चीन के साथ है और भारत के खिलाफ है। अब भूटान, म्यांमार, और बांग्लादेश बचते हैं, तो बांग्लादेश के साथ हाल के बरसों में लगातार तनाव चलते आया है, एक-दूसरे देश की यात्रा भी रद्द हुई है, और टकराव के मुद्दे बने हुए हैं। 

पिछले 6 बरस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के रहते हुए, और उनके गुजर जाने के बाद भी पूरी की पूरी विदेश नीति अपने हाथ में रखी, और खुद अकेले उस मोर्चे पर अतिसक्रिय रहे। आज चीन को लेकर लोगों को यह गिनाने का मौका मिल रहा है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सबसे अधिक बार चीन जाने वाले मुख्यमंत्री रहे, प्रधानमंत्री के रूप में सबसे अधिक बार चीन जाने वाले प्रधानमंत्री रहे, दूसरे देशों में चीन के राष्ट्रपति से सबसे अधिक मुलाकातें करने वाले भी वे रहे, और हिन्दुस्तान में उन्होंने चीनी राष्ट्रपति का बड़ा ऐतिहासिक किस्म का दर्शनीय स्वागत करके पूरी दुनिया के सामने एक अनोखा नजारा पेश किया था। उसके बाद आज एकमुश्त हिन्दुस्तान के इतने फौजी बहुत भयानक तरीके से मार डाले गए, जितने कि पिछले 40-50 बरसों में मिलाकर भी चीनी सरहद पर नहीं मारे गए थे, एक भी नहीं मारे गए थे। 

यह तमाम नौबत देखकर यह लगता है कि भारत लौटते हुए नरेन्द्र मोदी बिना बुलाए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर के पारिवारिक जलसे में खुद होकर चले गए थे, और अजीब किस्म का इतिहास दर्ज किया था। ऐसी गलबहियों के बाद जिस तरह के सर्जिकल स्ट्राईक की नौबत आई, वह बड़ी अस्वाभाविक थी, और वह भारत की पाकिस्तान नीति की बहुत बुरी नाकामयाबी थी, आज भी है। आज भी पाकिस्तान के साथ रोटी-बेटी तक के रिश्ते खत्म हो चुके हैं, और बोलचाल तक खत्म है। मोदी सरकार की विदेश नीति का विश्लेषण करने वाले जानकार लोग बेहतर बता पाएंगे कि क्या उनकी तमाम विदेश नीति बड़े-बड़े इवेंट के मैनेजमेंट की कामयाबी तक सीमित रह गई? ऐसा इसलिए भी पूछना पड़ रहा है कि जिस अमरीकी राष्ट्रपति का उसके अपने देश के बाहर चुनाव प्रचार भारत ने अहमदाबाद से शुरू करवाया, उस ट्रंप ने उसके बाद से कई मौकों पर भारत की परले दर्जे की बेइज्जती की जो कि भारत-अमरीकी इतिहास में कभी नहीं हुआ था। मतलब यह कि कोरोना का खतरा झेलते हुए बहुत लंबा खर्च करके जिस तरह गुजरात में नमस्ते ट्रंप करवाया गया, उससे हासिल कुछ नहीं हुआ, सिवाय दुत्कार और धिक्कार के। 

किसी विदेशी नेता का स्वागत, या उसकी जमीन पर जाकर अपने खर्च से, अपने समर्थकों से एक स्टेडियम भरकर कामयाब कार्यक्रम, यह सब विदेश नीति की कामयाबी नहीं कहा जा सकता। मोदी सरकार ने इन बरसों में लगातार अपनी जमीन, और दूसरे देशों में बड़े अनोखे किस्म के कार्यक्रम किए, जो कि अभूतपूर्व थे, लेकिन न आज वर्तमान में वे काम आते दिख रहे हैं, और न ही उनसे भविष्य में कुछ हासिल दिखता है। अब खासकर चीन के साथ जो ताजा तनाव है, और उस बीच पड़ोस के दूसरे देशों के साथ चीन के अच्छे संबंध, और भारत के खराब संबंध की जो नौबत है, उन्हें देखते हुए यह भारत की मिलिटरी तैयारी के लिए सबसे महंगी नौबत दिख रही है, सबसे बड़ा खतरा भी दिख रहा है। हिन्दुस्तान के दो दर्जन फौजी शहीद हो गए, पहले चीन के साथ झड़प में, और अब उसी मोर्चे पर पुल बनाते हुए। आगे की नौबत बहुत फिक्र की दिखती है। यह हिन्दुस्तान में भयानक आर्थिक संकट, भयानक कोरोना संकट के बीच की नौबत भी है। मोदी सरकार के अभी चार साल बाकी हैं, उसे अपनी विदेश नीति के बारे में तुरंत दुबारा सोचना चाहिए कि महज दर्शनीय स्वागत और दर्शनीय कार्यक्रम को कितनी कामयाबी माना जाए?(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


28-Jun-2020 6:31 PM

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के तौर-तरीके कांग्रेस की आम राज्य सरकारों से कुछ हटकर हैं। यह सरकार इस राज्य में प्रचलित जनमान्यता के मुताबिक राम वनगमन पथ को पर्यटन के लिए विकसित करने की बात कर रही है, गांव-गांव में उसने पशुओं, जिनमें अधिकतर गायें ही हैं, उनके लिए दिन में रहने और खाने-पीने के इंतजाम में बड़ी रकम खर्च की है, अब वह गोबर खरीदने जा रही है जिससे पशु आधारित अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम मिल सकता है। अब राम से लेकर गाय तक, और गोबर तक, ये तमाम तो  भाजपा के पसंदीदा भावनात्मक-प्रतीक रहे हैं, और इन्हें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एक बड़े पैमाने पर काम में ला रहे हैं। इस सिलसिले में पिछली भाजपा सरकार में लंबे समय तक ताकतवर मंत्री रहे हुए, आज के राज्य के गिने-चुने भाजपा विधायकों में से एक, अजय चंद्राकर ने गोबर को लेकर अटपटा हमला किया है, जो गौभक्त पार्टी से निकला हुआ नहीं दिख रहा। 

सरकार का गोबर खरीदना एक मजाक जैसा भी लग सकता है, लेकिन गांधी से लेकर आरएसएस तक, ऐसी एक लंबी सोच रही है कि गाय आधारित, पूरी तरह स्वदेशी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था बहुत सी दिक्कतों का हल हो सकती है। अभी हम सरकारी गोबर खरीद के कारोबारी पहलू का अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार की इस योजना से कुल मिलाकर गांव और गरीब इन दो का फायदा होगा। अब फायदा इन तक पहुंचते हुए बीच में लोग उसका बड़ा हिस्सा रख लें, तो उस पर निगरानी रखना एक बड़ा मुश्किल काम होगा, लेकिन गोबर शब्द को लेकर अजय चंद्राकर के बयान से चाहे जितनी ही हिकारत निकली हो, गोबर शब्द इस देश के गांवों का एक प्रतीक है, और आज जब शहरों से करोड़ों मजदूर अपने गांवों को लौटे हैं, तो गांव आधारित अर्थव्यवस्था पर फिर से सोचने, और गंभीर कोशिश करने की जरूरत है। हमने इसी जगह पिछले तीन महीनों में दो-चार बार इस बात पर जोर दिया है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कुटीर उद्योग, गांव आधारित कृषि से जुड़े दूसरे कई तरह के काम, फल-फूलों की खेती, रेशम के कीड़ों से लेकर लाख के कीड़ों तक, और मधुमक्खियों तक को पालने की तकनीक, ऐसी सैकड़ों बातें हैं जो लोगों को गांव में जिंदा रहने में मदद कर सकती हैं, और जो उनकी जिंदगी को बेहतर भी बना सकती हैं। छत्तीसगढ़ जैसा राज्य तो भरपूर खेतिहर-मजदूरी वाला राज्य है, इसने मनरेगा जैसी मजदूरी-योजना में भी अच्छा काम किया है, गांव-गांव में गोठान बनाने में भी लोगों को काम मिला है, और अब अगर गोबर को हम एक प्रतीक के रूप में मानें, तो इसे भी आर्थिक रूप से मुमकिन बनाना सरकार के लिए एक अच्छी चुनौती हो सकती है। यह समझना चाहिए कि आज शहर केन्द्रित अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन लॉकडाऊन में फ्लॉप साबित हो चुके हैं, अमानवीय साबित हो चुके हैं, और करोड़ों लोग गांवों तक वापिस आए हैं। इसे हम कोई स्थायी व्यवस्था नहीं मानते क्योंकि लोग फसल के बाद शहरी, कारोबारी और औद्योगिक रोजगार में लौटने भी लगेंगे, क्योंकि गांव में मजदूरी उतनी नहीं मिलेगी। इसके बावजूद सरकार को मजदूरी से परे भी गांवों में ऐसे आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने चाहिए जिससे लोग अगर चाहें तो वे गांव में रहकर कमा-खा सकें, और मनरेगा की मजदूरी से बचे हुए दिनों का भी इस्तेमाल कर सकें।
 
हिन्दुस्तान में परंपरागत रूप से इतने ग्रामीण उद्योग, और ग्रामीण-काम चलते आए हैं कि वे खेती के साथ मिलकर गांवों को आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहे थे। लेकिन शहरी जिंदगी की चकाचौंध और वहां आगे बढऩे के मौकों ने गांवों से लोगों को शहर की तरफ दौड़ा दिया था, आज भी यह सिलसिला चल रहा है। गांव आज भी सामाजिक अन्याय का डेरा हैं, वे अभी भी छुआछूत और जात-पात, लैंगिक असमानता का केन्द्र हैं। ऐसे में शहर से आए हुए लोगों को गांवों में बांधकर रखना आसान तो नहीं होगा, लेकिन यह एक ऐसा मौका है जब दूसरे प्रदेशों में अधिक मेहनत करके जीने वाले मजदूरों को अपने ही गांवों में जिंदा रहने का एक मौका दिया जा सकता है, और इसके साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित भी किया जा सकता है। इस देश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा लंबा इतिहास अच्छी तरह दर्ज है, इसलिए हम उसे यहां अधिक खुलासे से गिनाना गैरजरूरी समझते हैं, लेकिन सरकार को इसे बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाना चाहिए। देश में ग्रामीण विकास के, डेयरी के बहुत से संस्थान हो गए हैं। देश में लाखों एनजीओ भी इस काम में लगे हैं। आईआईटी से लेकर आईआईएम तक तकनीक विकसित करने का काम हुआ है जिनसे हाथों का काम करने के औजार, गांवों की उपज, फसल में वेल्यूएडिशन के लिए फूड प्रोसेसिंग जैसे काम की अपार संभावना है। आज छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर धान की सरकारी खरीदी में मिलने वाले मोटे बोनस पर आधारित हो गई है, इसके साथ-साथ गरीब की जिंदगी रियायती चावल से चल रही है। इन दो किस्मों की रियायतों को अनंतकाल तक चलाने के बजाय लोगों की कमाई बढ़ाना एक बेहतर रास्ता है, और गोबर कामयाब हो या न हो, सरकार का रूझान गरीब और ग्रामीण के भले के लिए रहना चाहिए, और इसके कई दूसरे तरीके भी निकाले जा सकते हैं। यह भी समझने की जरूरत है कि गोबर से बनने वाले छेना और कंडे का बड़ा इस्तेमाल हिन्दू अंतिम संस्कार में किया जा सकता है। इसी राज्य में राजनांदगांव में सारे अंतिम संस्कार सिर्फ छेने से होते हैं, और लकड़ी का जरा भी इस्तेमाल नहीं होता। सरकार की दखल से ऐसा इस्तेमाल बढ़ सकता है, और खेतों में भी गोबर की खाद काम आ सकती है। आगे देखना है कि सरकार इसमें कितनी कामयाब होती है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


27-Jun-2020 6:57 PM

फेसबुक दुनिया का सबसे कामयाब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है, और सच तो यह है कि सोशल मीडिया शब्द कहते ही पहला ख्याल फेसबुक का ही आता है। इस शब्द के इतिहास पर जाएं तो शायद सबसे असरदार फेसबुक ही दिखाई पड़ता है, और यह इतिहास वर्तमान बन चुका है, और बहुत से लोगों को इसका खासा लंबा भविष्य दिखता है। लेकिन अपनी तमाम शोहरत के बावजूद फेसबुक पर ये तोहमतें हमेशा लगती रहीं कि वह अपने इस्तेमाल करने वालों की निजी जानकारियों को बाजार की कंपनियों को विश्लेषण के लिए बेचता है, और अमरीका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव में उस पर ये आरोप भी लगे कि उसने चुनाव को प्रभावित करने वाली दुर्भावना की पोस्ट, विज्ञापन, इनको मालूम होते हुए भी नहीं रोका। बात बढ़ते-बढ़ते यहां तक आ गई कि अभी अमरीका की कई कंपनियों ने फेसबुक की लोकप्रियता के बावजूद उस पर इश्तहार देना बंद कर दिया, और इसकी खुली घोषणा भी कर दी। उनका मानना है कि फेसबुक पर गलत जानकारियां पोस्ट होती हैं, लोकतांत्रिक चुनावों को प्रभावित करने का काम होता है, और फेसबुक इसे रोकने के लिए कुछ नहीं करता। इस बहिष्कार से फेसबुक से 7.2 बिलियन डॉलर के इश्तहार हट गए, जिससे इस कंपनी के शेयर का दाम 8.3 फीसदी गिर गया। एक कंपनी, यूनीलीवर, ने यह भी कहा कि वह इस साल के अंत तक फेसबुक के दूसरे कारोबारों से भी अपने विज्ञापन बंद कर देगी। शेयर बाजार में रेट टूटने से फेसबुक की मार्केट वेल्यू 56 बिलियन डॉलर हट गई, और इसके मालिक मार्क जुकरबर्ग की निजी संपत्ति 82.3 बिलियन डॉलर घट गई। 

इस तरह का कारोबारी नुकसान पहले कभी देखा-सुना नहीं है, क्योंकि सोशल मीडिया पर कुछ और कंपनियां भी हैं, और अमरीका में मीडिया कारोबार में भी बहुत सी कंपनियां हैं जिन पर पूर्वाग्रह का आरोप लगता है। लेकिन ऐसा बहिष्कार पहले किसी का याद नहीं पड़ता। दरअसल पिछले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अमरीका ने यह महसूस किया कि ट्रंप की जीत के पीछे रूस की मदद से लेकर फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म के अनैतिक इस्तेमाल सबका बड़ा हाथ रहा। अमरीकी कंपनियां दुनिया के बाहर चाहे जैसी हों, देश के भीतर उन्होंने कम से कम इस बार एक अलग तरह की जागरूकता दिखाई है, और जिससे शिकायत है उसके पेट पर लात मारी है। अब अमरीका के इस घरेलू मुद्दे को लेकर आज हमें इस जगह पर क्यों लिखना चाहिए? शायद इसलिए कि हिन्दुस्तान की कंपनियों और यहां के कारोबार का इस बात से कोई लेना-देना नहीं रहा कि कौन सा मीडिया, कौन सा सोशल मीडिया किस तरह के सरोकार वाला है, या बिना सरोकार का है। व्यापार की दिलचस्पी अखबारों की प्रसार संख्या, टीवी चैनलों की टीआरपी, और वेबसाईटों की हिट्स पर रही। किसी मीडिया को महत्वपूर्ण मानने का एकमात्र पैमाना अंकगणित रहा, और अंकों का खुद का भला क्या सरोकार हो सकता है? अंक तो लोगों के हाथ के खिलौने होते हैं जिन्हें इस्तेमाल करने वाले अपने हिसाब से अच्छे या बुरे काम में काम लाते हैं। मदर टेरेसा की संस्था भी शून्य से 9 तक के अंकों से अपने खातेबही चलाती है, और किसी समाजसेवी संस्था को दान देने वाले दुनिया के बहुत से माफिया भी इन्हीं 10 अंकों से अपना हिसाब रखते हैं। हिन्दुस्तान में विज्ञापन देने के लिए कारोबारी और विज्ञापनदाता जिन अंकों के फैसले मानते हैं, उन अंकों को हासिल करने के लिए तरह-तरह के अनैतिक काम किए जाते हैं। हिट्स बढ़ाने के लिए वेबसाईटें जिस तरह के अश्लील फोटो और वीडियो पोस्ट करती हैं, और उनकी वजह से पोर्नोग्राफी के जिस तरह के इश्तहार भी उन पर आते हैं, उनसे हिन्दुस्तान के बाजार तो बाजार, यहां की सरकारों के इश्तहारों के फैसले भी प्रभावित नहीं होते। अंकों की स्केल पर नापना आसान होता है, उत्कृष्टता, सरोकार, और नीयत की स्केल पर नापना बड़ा मुश्किल होता है। 

आज अमरीका की कई कंपनियों ने जो जागरूकता दिखाई है, और अपने कारोबारी हितों से परे जाकर सामाजिक सरोकार के लिए, लोकतंत्र को नाजायज असर से बचाने के लिए जो फैसला लिया है, उसके बारे में दूसरे देशों के जिम्मेदार और समझदार कारोबारियों को भी सोचना चाहिए। चोली के पीछे क्या है, ऐसी तस्वीरों और ऐसे वीडियो पर हजार गुना अधिक हिट्स मिलते हैं, बजाय भूखे-सूखे पेट के पीछे वजह क्या है, के मुकाबले। हिन्दुस्तान का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी आत्मा को बेच देने के लिए तोहमतें झेल-झेलकर अब जायज ही बदनाम होते दिख रहा है। दूसरी तरफ बाजार से अधिक सरकार और राजनीतिक दल सभी किस्म के मीडिया को जेब में रखते दिख रहे हैं। जब बाजार अच्छे और बुरे में कोई फर्क नहीं करेगा, और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक लोग अपने अस्तित्व के लिए सरकार के मोहताज रहेंगे, तो ऐसी ही नौबत आएगी। हिन्दुस्तान के उद्योग-व्यापार के जवाबदार लोगों को सोचना चाहिए कि उनका कारोबारी सहयोग लोकतंत्र को बचाने वाले मीडिया को होना चाहिए, या लोकतंत्र को मिटाने के लिए अपनी आत्मा बेच चुके मीडिया को? अगर महज आंकड़े ही लोगों की समझ हैं, तो फिर हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराए गए बम बनाने वाले वैज्ञानिकों ने भी तो सिर्फ आंकड़ों की समझ से बम बनाया था, उसके गिरने से इंसानों की होने वाली तबाही को नापना उतना आसान नहीं था। लोग महज बम गिराकर तबाही नहीं लाते, लोग लोकतंत्र में किसी जिम्मेदार सरोकार को अनदेखा करके भी तबाही ला सकते हैं। कारोबार में समझ है, या महज केलकुलेटर, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है, और अमरीकी कारोबारियों ने दुनिया के सामने एक मिसाल रखी है जिस पर चर्चा होनी चाहिए।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


26-Jun-2020 3:08 PM

महिलाओं को लेकर भारतीय समाज में पुरूषों की जो आम सोच है, वह कदम-कदम पर सामने आती है। हजारों बरस से मर्द की जो हिंसक सोच हिन्दुस्तानी औरत को कुचल रही है, वह कहीं गई नहीं है। एक वक्त गुफा में जीने वाले इंसानों पर बने कई कार्टून बताते थे कि गुफा का आदमी अपनी औरत के बाल पकड़कर उसे घसीटते हुए ले जा रहा है। गुफाओं में जीना हजारों बरस पहले खत्म हो गया, लेकिन आदमी की मुट्ठी से औरत के बाल नहीं निकल पाए। और तो और जजों की कुर्सी पर बैठे हुए लोग भी अपनी मुट्ठी तब से लेकर अब तक भींचे हुए हैं, यह एक अलग बात है कि हिन्दुस्तानी औरतों का एक तबका उस मुट्ठी के बाहर अपने बाल कैंची से काटकर, शरद यादव जैसे समाजवादी और अमूमन सुलझे हुए नेताओं से परकटी कहलवाने का खतरा लेते हुए भी मुट्ठी से दूर हो चुका है। फिर भी हिन्दुस्तानी मर्द है कि मुट्ठी में दबी बालों की लट को अपनी जीत मानकर मन ही मन औरत को घसीटते हुए चलता है। लेकिन ऐसे में जब यह मर्द किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज की कुर्सी पर बैठ जाता है, तो दिक्कत खड़ी हो जाती है। 

अभी कर्नाटक हाईकोर्ट में बलात्कार का एक मामला पहुंचा तो वहां के जज, जस्टिस कृष्ण एस. दीक्षित ने अपने फैसले में शिकायत करने वाली महिला के चाल-चलन के बारे में कई किस्म के लांछन लगाए। उन्होंने इस महिला के बारे में कहा- महिला का यह कहना कि वह बलात्कार के बाद सो गई थी, किसी भारतीय महिला के लिए अशोभनीय है। महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करती हैं। 

यह कहते हुए जज ने आरोपी की अग्रिम जमानत मंजूर कर दी। जज ने इस मामले में कई ऐसी टिप्पणियां कीं जिनका आरोप से कोई संबंध नहीं है, और जिनसे महिला के चाल-चलन के बारे में एक बुरी तस्वीर बनती है। जस्टिस दीक्षित ने कहा- शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया है कि वे रात 11 बजे उनके दफ्तर क्यों गई थीं, उन्होंने आरोपी के साथ अल्कोहल लेने पर एतराज नहीं किया, और उन्हें अपने साथ सुबह तक रहने दिया। शिकायतकर्ता का यह कहना कि वह अपराध होने के बाद थकी हुई थीं, और सो गई थीं, भारतीय महिलाओं के लिए अनुपयुक्त है। हमारी महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करतीं। शिकायतकर्ता ने तब अदालत से संपर्क क्यों नहीं किया जब आरोपी ने कथित तौर पर उन पर यौन संबंध के लिए दबाव बनाया था? 

यह सोच चूंकि हाईकोर्ट जज की कुर्सी से निकली है, इसलिए बहुत भयानक है। इस कुर्सी तक बलात्कार के शायद तीन चौथाई मामलों पर आखिरी फैसले हो जाते हैं, और इसके ऊपर की अदालत तक शायद बहुत कम फैसले जाते होंगे। ऐसे में बलात्कार का आरोप लगाने वाली एक महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति, बलात्कार के साथ उसके सामाजिक और आर्थिक संबंधों की बेबसी की कोई समझ अदालत के इस अग्रिम-जमानत आदेश में नहीं दिखती। जज की बातों में एक महिला के खिलाफ भारतीय पुरूष का वही पूर्वाग्रह छलकते दिखता है जो कि अयोध्या में सीता पर लांछन लगाने वाले का था। एक महिला के खिलाफ भारत में पूर्वाग्रह इतने मजबूत हैं कि उसके पास अपने सच के साथ धरती से फटने की अपील करते हुए उसमें समा जाने के अलावा बहुत ही कम विकल्प बचता है। जब देश का कानून शब्दों और भावनाओं दोनों ही तरह से किसी महिला को बलात्कार के मामले में पुरूष के मुकाबले अधिक अधिकार देता है, तब उसकी नीयत पर शक करते हुए, उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति की एक डॉक्टर और मनोचिकित्सक जैसी व्याख्या करते हुए एक जज ने जैसी बातें कही हैं, वे सुप्रीम कोर्ट में जाकर पूरी तरह से खारिज होने लायक हैं। बलात्कार के कानून का बेजा इस्तेमाल होता होगा, ऐसे मामले के आरोपी को जमानत या अग्रिम जमानत देना जज का विशेषाधिकार होता ही है, लेकिन ये टिप्पणियां तमाम भारतीय महिलाओं के लिए बहुत बुरी अपमानजनक हैं, और भारतीय पुरूषवादी सोच का नमूना है जो यह तय करती है कि भारतीय महिला का आचरण कैसा होना चाहिए, उसके तौर-तरीके कैसे होने चाहिए, उसे किसके साथ, कब और कहां शराब पीनी चाहिए, कब नहीं पीनी चाहिए, और बलात्कार के बाद उसे थक जाने का कोई हक नहीं है, उसे सो जाने का कोई हक नहीं है। अदालत उस महिला पर यह सवाल भी खड़ा करती है कि जब उससे यौन संबंध के लिए दबाव बनाया गया था, उसी वक्त वह अदालत क्यों नहीं आई। 

जज की इन बातों से भारतीय समाज की हकीकत, और उसमें महिलाओं की कमजोर स्थिति, पुरूष की हिंसा के बारे में उनकी कोई समझ दिखाई नहीं पड़ती है। उनके अपने पूर्वाग्रह जरूर चीखते हुए दिखाई पड़ते हैं, लेकिन ये न्याय से कोसों दूर हैं, और तकलीफ की बात यह भी है कि ये अपने आपमें अकेले नहीं हैं, इसके पहले भी बहुत से जजों ने बलात्कार की शिकार महिला के बारे में ऐसी ही पुरूषवादी और हिंसक सोच दिखाई है, जिसके चलते वहां से किसी महिला को इंसाफ मिलना नामुमकिन सा लगता है। इससे एक और बात भी उठती है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को न सिर्फ इस मामले में बल्कि कई दूसरे किस्म के मामलों में भी उनके पूर्वाग्रह से परे कैसे रखा जा सकता है? यह बात तो तय है कि किसी के पूर्वाग्रह आसानी से नहीं मिटाए जा सकते। लेकिन यह तो हो सकता है कि पूर्वाग्रहों की अच्छी तरह शिनाख्त पहले ही हो जाए, और फिर यह तय हो जाए कि ऐसे जजों के पास किस तरह के मामले भेजे ही न जाएं। 

जिन लोगों को अमरीका में जजों की नियुक्ति के बारे में मालूम है वे जानते हैं कि बड़ी अदालतों के जज नियुक्त करते हुए सांसदों की कमेटी उनकी लंबी सुनवाई करती है, और यह सुनवाई खुली होती है, इसका टीवी पर प्रसारण होता है। और यहां पर सांसद ऐसे संभावित जजों से तमाम विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दों पर उनकी राय पूछते हैं, उनसे जमकर सवाल होते हैं, उनके निजी जीवन से जुड़े विवादों पर चर्चा होती है, और देश की अदालतों के सामने कौन-कौन से मुद्दे आ सकते हैं उन पर उनकी राय भी पूछी जाती है। कुल मिलाकर निजी जीवन और निजी सोच इनको पूरी तरह उजागर कर लेने के बाद ही उनकी नियुक्ति होने की गुंजाइश बनती है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में रखी है, और वहीं से नाम तय होकर प्रस्ताव सरकार को जाते हैं। ऐसे में जजों की सामूहिक सोच से परे किसी और तरह की सोच आने की गुंजाइश नहीं रहती। भारत में भी जजों की नियुक्ति पर न्यायपालिका के ऐसे एकाधिकार के खिलाफ बात उठती रहती है, लेकिन न्यायपालिका इस एकाधिकार को मजबूती से थामे रखती है। 

संसद में लोकसभा में निर्वाचित होकर जो सांसद पहुंचते हैं, उनकी जमीनी हकीकत की समझ किसी भी जज से अधिक होती है। लेकिन उनकी उस समझ का कोई इस्तेमाल जजों को बनाने में नहीं होता। हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान में जजों के सारे पूर्वाग्रह पहले ही उजागर हो जाने चाहिए। और इसके साथ ही यह भी दर्ज हो जाना चाहिए कि उन्हें किस किस्म के मामले न दिए जाएं, या कि उन्हें नियुक्त ही न किया जाए।

हमारा यह भी मानना है कि देश के सुप्रीम कोर्ट को अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट के फैसलों की ऐसी व्यापक असर वाली बातों का खुद होकर नोटिस लेना चाहिए, और इसके लिए कौन सा सुधार किया जा सकता है उसका एक रास्ता निकालना चाहिए। एक तरफ तो देश में सामाजिक आंदोलनकारी बरसों तक बिना जमानत जेल में सड़ते हैं, दूसरी तरफ बलात्कार के आरोप से घिरे लोग इस तरह अग्रिम जमानत पा रहे हैं, यानी गिरफ्तारी के पहले ही उन्हें जमानत मिल जा रही है। यह पूरा सिलसिला देश की न्याय व्यवस्था में खामियों और कमजोरियों का एक नमूना है, और अगर न्यायपालिका इसे खुद दूर करने में सक्षम नहीं है, तो संसद को सामने आना चाहिए, यह एक अलग बात है कि संसद के पास देश के असल मुद्दों के लिए कोई समय नहीं है, और बहस के लिए संसद के विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या नहीं है। ऐसे में सत्ता की मर्जी के बिना कुछ हो पाना मुमकिन नहीं है, और सत्ता की प्राथमिकता पता नहीं कभी जनता की ऐसी जरूरतों, उसके साथ ऐसे इंसाफ तक पहुंच पाएगी या नहीं।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


25-Jun-2020 4:54 PM

एक अभिनेता सुशांत राजपूत की खुदकुशी के बाद से लगातार सोशल मीडिया पर लोग मुम्बई के टीवी और फिल्म उद्योग को कोस रहे हैं, वहां पर चल रहे भाई-भतीजावाद, बेटा-बेटीवाद को गालियां दे रहे हैं, और सोशल मीडिया से परे भी फिल्म-टीवी उद्योग के कुछ बड़े चेहरे इस दुनिया में कुनबापरस्तीतले कुचलने वाली प्रतिभाओं की यादें सामने रख रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है जब बॉलीवुड के लिए इन बातों को याद किया गया है, और न ही यह आखिरी मौका होगा, दिक्कत यही है कि लोग एक कारोबार को कुनबापरस्ती से आजाद देखना चाहते हैं। 

हमें यह मानने में कोई दिक्कत नहीं है कि फिल्म-टीवी उद्योग में, संगीत की दुनिया में लोग अपने परिवार के लोगों को बढ़ावा देते होंगे। दूसरी तरफ इसी मुम्बई में आधी सदी से यह कहानी खूब जमी हुई है कि किस तरह लता मंगेशकर ने अपनी ही सगी छोटी बहन आशा भोंसले को कभी आगे नहीं बढऩे दिया, कदम-कदम पर रोड़े अटकाए। और मुम्बई में एक फिल्म भी इन दोनों के इस पहलू को लेकर बनी थी। फिल्म, टीवी और संगीत एक खालिस कारोबार हैं। इनमें ढेर सारा पैसा पहले लगाना पड़ता है, और उसके बाद कुछ चुनिंदा फिल्मों या टीवी सीरियलों को कमाई होती है, जिन्हें देखकर बाकी लोग इधर-उधर से जुटाकर पूंजीनिवेश करते रहते हैं, और डूबते रहते हैं। अब कोई कारोबार धर्मार्थ काम तो हो नहीं सकता कि उसमें फायदे की उम्मीद के बिना पैसा डाला जाए। फिर दूसरी बात यह भी है कि दुनिया का कौन सा ऐसा कारोबार है जिसमें कारोबारी अपनी अगली पीढ़ी को आगे नहीं बढ़ाते, और विरासत देकर नहीं जाते? डॉक्टरों की संतानें बनते कोशिश मेडिकल साईंस पढ़कर उनके अस्पताल सम्हालती हैं, वकीलों की संतानें वकील बनकर उनके चेम्बर की प्रैक्टिस सम्हालती हैं, और बहुत सारे, तकरीबन हर कारोबार में अगली पीढ़ी के लिए, या अगली पीढ़ी की पहली पसंद पारिवारिक पेशा होता है। इसलिए अगर लोग अपने पूंजीनिवेश से अपनी औलादों को आगे बढ़ाते हैं, तो इसमें कोई अटपटी बात नहीं है। हिन्दुस्तान जैसे देश में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में वकालत करने वाले लोगों में एक तबका ऐसे लोगों का रहता है जो कि जजों के परिवार के होते हैं, उनके रिश्तेदार होते हैं, या जजों के दोस्तों की संतानें होती हैं। ऐसे में देश की सबसे बड़ी अदालतों में अंकल-जज की एक संस्कृति जगह-जगह सुनाई पड़ती है, और शायद ही कोई जज इस चर्चा से इंकार कर पाए। हिन्दुस्तान के मीडिया कारोबार को देखें तो दो-दो, तीन-तीन पीढिय़ां मालिकाना हक पा रही हैं, और एक के बाद एक पीढ़ी संपादक भी बन जा रही है, प्रकाशक भी बन जा रही है। इसलिए सिर्फ फिल्म उद्योग को तोहमत देना तो बहुत ही नाजायज होगा। फिर यहभी है कि फिल्म उद्योग कला, तकनीक, रचनात्मक लेखन, पूंजीनिवेश, और मार्केटिंग का इतना जटिल कारोबार है कि उसमें हर किसी की अपनी पसंद हो सकती है, अपनी प्राथमिकता हो सकती है। किसी फिल्म में किसी कलाकार की भूमिका को कम या अधिक करना कुनबापरस्ती के तहत भी हो सकता है, और किसी रचनात्मकता के तहत भी। इसलिए फिल्म और टीवी को कारोबार के प्रचलित तौर-तरीकों से अलग देखने की उम्मीद निहायत ही आदर्शवाद की बात होगी, कोई दुकानदार अपनी औलाद को गद्दी देने के बजाय क्या दुकान के सबसे काबिल या सबसे पुराने नौकर को मालिक बनाकर जाता है? 

चूंकि फिल्म, टीवी, और संगीत खबरों में आसानी से सुर्खियां पा जाते हैं, इसलिए वहां विवाद न रहने पर भी विवाद ढूंढकर, या खड़ा करके खबरें बना ली जाती हैं। लता मंगेशकर की एक मिसाल हमने दी है, दूसरी और भी कई तरह मिसालें सामने हैं जो बताती हैं कि किसी बड़े कामयाब फिल्मकार की औलाद होने से ही सब कुछ नहीं हो जाता। ऐसा अगर होता तो आज 77 बरस की उम्र में देर रात और सुबह तक ओवरटाईम करने वाले अमिताभ बच्चन क्या अपने बेटे को और अधिक फिल्में दिलवाने की चाहत नहीं रखते? अभिषेक बच्चन फिल्म उद्योग के सबसे बड़े और सबसे कामयाब अभिनेता के बेटे होने के बावजूद तकरीबन बेरोजगार हैं। अभी कुनबापरस्ती के चल रहे विवाद में भी उन्होंने इस बात को कहा है। ऐसी मिसालों को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए क्योंकि जिस एकता कपूर के बनाए सीरियल्स से हिन्दुस्तानी टीवी चैनल चलते हैं, उसी एकता कपूर का भाई फिल्मों में तीसरे-चौथे या छठवें किरदार से ऊपर कभी कुछ नहीं पा सका। इस परिवार के पास तो पैसा भी था, खुद का प्रोडक्शन हाऊस भी था लेकिन घर का लड़का छोटे-मोटे काम पाकर रह गया। 

जहां तक भेदभाव और मुकाबले की बात है, तो जिंदगी के हर पेशे और हर दायरे में इस तरह की बात होती है। मीडिया को ही देखें तो इसमें हमेशा से यह तोहमत लगती रही है कि किस बड़े संपादक की पसंद के कौन से रिपोर्टरों को चर्चित मामलों पर काम करने मिलता था, क्यों मिलता था, समर्पण न करने पर किस तरह काम नहीं भी मिलता था। यह बात यूनिवर्सिटी और कॉलेज में बड़े प्रोफेसरों के मातहत जूनियरों तक भी रहती है कि किसको मर्जी के विषय पढ़ाने मिलते हैं, किसे शोध करने मिलता है, किसे कौन सा प्रोजेक्ट मिलता है। भारतीय राजनीति में देखें तो कुनबापरस्ती की मिसालें इतनी अधिक और इतनी भयानक हैं कि उनकी फेहरिस्त से यह पूरा पन्ना ही भर जाए। और तो और सांस्कृतिक, सामाजिक, और समाजसेवी संगठनों में भी लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम रहते हैं। 

हमारा ख्याल है कि फिल्म-टीवी उद्योग और संगीत का कारोबार बहुत ही जटिल धंधा हैं, और इनमें व्यक्तिगत पसंद, या व्यक्तिगत नापसंद दिखने वाली बहुत सी बातें हो सकता है कि न्यायसंगत भी हों, तर्कसंगत भी हों। यह भी हो सकता है कि वे पसंद और नापसंद की बुनियाद पर टिकी हों जैसी बुनियाद हर कारोबार और हर पेशे में दिखाई पड़ती है। फिल्मों की खबरें खूब बिकती हैं, इसलिए वहां से खूब सारा झूठ, खूब सारी गंदगी, और खूब सारी तोहमतें सभी सामने आती हैं। उसकी हकीकत वे ही लोग जानें, लेकिन ऐसी बातें अगर सच भी हैं तो वे सिर्फ इसी ग्लैमरस दुनिया तक सीमित बातें नहीं हैं, और उन्हें उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना कि कोर्ट में अंकल-जज संस्कृति को दिया जाता है, या मीडिया में एमजे अकबर संस्कृति को दिया गया है। चारों तरफ हाल एक सा है, यह दुनिया खबरों में कुछ अजीब है, बस। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


24-Jun-2020 5:00 PM

कल ट्विटर पर एक नौजवान जोड़े ने अपना एक वीडियो पोस्ट किया, और देश के एक सबसे बड़े अखबार  की वेबसाईट पर आई खबर को दिखाया जिसमें इन दोनों की तस्वीर दिख रही थी। खबर बड़ी खराब थी, परिवार के भीतर ही हत्या और आत्महत्या जैसी कोई बात इसमें थी। उन्होंने वीडियो पर कहा कि वे दोनों जिंदा हैं, और खबर में जिस युवक और युवती, पति-पत्नी का जिक्र है, उनके नाम देखकर फेसबुक से इस दूसरे जोड़े का फोटो निकाल लिया गया, और पोस्ट कर दिया गया। एक दूसरी खबर जो खबर की शक्ल में सामने नहीं आई, लेकिन ट्रांसजेंडर तबके को सोशल मीडिया पर आकर एक बड़े अखबार के खबर का खंडन करना पड़ा। इस अखबार की वेबसाईट पर बहुत ही प्रमुखता से एक शहर की एक खबर पोस्ट हुई कि शहर के एक मुहल्ले में एक समलैंगिक नौजवान कोरोना पॉजिटिव निकला है, और उसने पिछले दिनों 34 लोगों से देहसंबंध बनाए थे, और सरकार में हड़कम्प मच गया है, और इन 34 लोगों को तलाशा जा रहा है। चूंकि शहर के मुहल्ले का भी नाम छपा हुआ था, इसलिए खतरा यह था कि उस मुहल्ले में अगर सचमुच ही कोई समलैंगिक नौजवान लोगों की जानकारी में हो, तो उसकी मॉबलिचिंग भी हो सकती थी कि वह इस तरह सेक्स बेचकर कोरोना फैला रहा है। खबर में बड़े खुलासे से जिक्र था कि किस तरह एक ब्रिटिश समलैंगिक डेटिंग एप्प से यह नौजवान ग्राहक ढूंढता था। इस खतरे को देखते हुए शहर के ट्रांसजेंडर समुदाय ने इस खबर की जड़ ढूंढी कि दिल्ली में ऐसी कोई खबर छपी थी, और उस खबर से दिल्ली हटाकर दूसरा शहर और दूसरा मुहल्ला जोड़ दिया गया, और उसे पोस्ट कर दिया गया।
 
पहली खबर तो एक चूक हो सकती है कि डिजिटल मीडिया इन दिनों अपनी पल-पल की हड़बड़ी के चलते फेसबुक पर उन्हीं नामों वाले किसी दूसरे जोड़े की तस्वीर निकालकर उसे पोस्ट कर दिया, लेकिन दूसरी खबर भयानक है। भयानक इसलिए कि इसके भयानक नतीजे हो सकते थे। यह कुछ उसी किस्म की थी कि किसी के बारे में यह अफवाह फैलाई जाए कि उसके घर गोमांस रखा है, और फिर उसे घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला जाए, और वह उसके घर की बात ही न हो। आमतौर पर मीडिया के बारे में लिखने से मीडिया बचता है। लेकिन हम किसी एक नाम को बदनाम करना नहीं चाहते, महज आज खड़े हो गए एक खतरे को गिनाकर लोगों को चौकन्ना करना चाहते हैं क्योंकि डिजिटल इंडिया जाने के लिए नहीं आया है, वह रहने के लिए, और राज करने के लिए आया है। ऐसे में अगर उसकी गलतियों, या इसके गलत कामों को शुरू से ही रोकना-टोकना नहीं किया जाएगा, तो आगे जाकर नौबत खराब हो जाएगी। 

शुरूआत से ही अखबारों को आपाधापी में रचा गया साहित्य कहा जाता था। बाकी देशों का तो नहीं मालूम, हिन्दुस्तान में, हिन्दी में यह बात जरूर पढ़ाई जाती थी। हालांकि हकीकत यह है कि पत्रकारिता और साहित्य का आपस में कोई सीधा रिश्ता नहीं होता, और साहित्य न पढ़े हुए लोग भी अच्छे पत्रकार बन सकते हैं, और बड़े दिग्गज साहित्यकार भी बड़े बकवास संपादक साबित हो चुके हैं। इसलिए यह लाईन जरूर किसी साहित्यकार ने गढ़ी होगी कि पत्रकारिता एक किस्म का साहित्य है, जबकि उसका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं था। एक वक्त जरूर था जब अखबारों के संपादकों का भी साहित्यकार होना अनिवार्य सा मान लिया गया था, लेकिन हिन्दी पत्रकारिता में भी वैसे दिनों को लदे हुए आधी सदी हो चुकी है। इसलिए अब यह किसी तरह का साहित्य नहीं है, लेकिन यह आपाधापी में किया गया काम जरूर है। अखबारों के वक्त यह आपाधापी कम रहती थी, फिर टीवी के वक्त थोड़ी बढ़ी कि हर घंटे में एक नया बुलेटिन आता था, और उसने खबर आ जानी चाहिए। लेकिन यह ताजा आपाधापी इंटरनेट पर डिजिटल समाचार-मीडिया की वजह से आई है कि खबर पोस्ट करने में एक पल की भी देर नहीं होनी चाहिए। और अब खबर पोस्ट करने के लिए न कोई दफ्तर लगता, न कम्प्यूटर लगते, और न ही कम्प्यूटर-ऑपरेटर लगते। अब तो रिपोर्टर मौके पर से अपने मोबाइल फोन से ही न सिर्फ टाईप की हुई खबर, बल्कि फोटो और वीडियो भी पोस्ट कर देते हैं, और इस तरह खबरों के डिजिटल मीडिया के सामने एक अजीब सा नया गलाकाट मुकाबला खड़ा हो गया है जिसमें एक-एक सेकंड मायने रखता है। लेकिन घड़ी की यह रफ्तार खबरों के मिजाज के साथ मेल नहीं खाती। खबरें उन्हें ठोक-बजाकर जानकारी को सच पा लेने के बाद बनती हैं। इन दिनों हो यह रहा है कि लोग पोस्ट पहले करते हैं, पुष्टि बाद में करते हैं। सबसे पहले न्यूज ब्रेक करने की हड़बड़ी में खबरों के सारे कायदे छूट गए हैं, और उस मेहनत से बच जाने और बरी हो जाने से लोग खुश भी बहुत हैं। अखबारनवीसों को खबर पर जो घंटों मेहनत करनी होती थी, वह मिनटों से होते हुए अब पूरी तरह से गैरजरूरी मान ली गई है, क्योंकि गलत साबित हो जाने पर उसे पल भर में मिटा देने और हटा देने का रास्ता खुल गया है। छपे हुए अखबार की कतरनें लोग पूरी जिंदगी सम्हालकर रखते थे, और बनाई गई खबर पूरी जिंदगी का बोझ रहती थी। आज डिजिटल शब्दों का कोई वजह नहीं होता, एक वक्त अखबारों के छपने के लिए सीसे जैसी धातु के बने टाईप लगते थे जिनसे छपाई होती थी, उनका खासा वजन होता था, और उतना ही वजन जिम्मेदारी का भी रहता था। इन दिनों अखबारों की जगह जो समाचार वेबसाईटें हैं, उनका कोई वजन नहीं रहता, और न ही जिम्मेदारी का बोझ ही ढोना पड़ता। 

आने वाले वक्त में सब कुछ डिजिटल जिंदा रहने वाला है। दुनिया के एक किसी भविष्यशास्त्री ने कई बरस पहले लिखा था कि अगर कोई नया काम शुरू करने जा रहे हैं, तो कौन-कौन से किस्म के काम नहीं करने चाहिए वह ध्यान रखें। उन्होंने जो आधा दर्जन काम गिनाए थे, उनमें से एक यह भी था कि ऐसा कोई काम शुरू न करें जिसमें कागज लगता हो। और आज वह हालत कोरोना के इन दो-तीन महीनों में ही दिख गई जब महानगरों के हाथियों जैसे भारी-भरकम अखबार अब हड्डी-हड्डी खच्चर की तरह दस-बारह पेज के रह गए हैं। ऐसे में कोरोना के बाद भी डिजिटल का आगे बढऩा तय है, और ऐसे में उसकी विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए अभी से मेहनत करने की जरूरत है। दरअसल खबरों का डिजिटल मीडिया, और सोशल मीडिया, इन दोनों के बीच कोई सरहद नहीं रह गई है, और दोनों एक-दूसरे से कई जगह मिल जा रहे हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह की हिन्दुस्तान और चीन के बीच सरहद को लेकर झगड़ा चलते ही रहता है। सोशल मीडिया को अगर अखबारों की पुरानी जुबान में कहें, तो वह संपादकीय पेज के पाठकों के पत्र कॉलम जैसा रहना था, लेकिन वह पहले पन्ने तक पसर गया है। ऐसे में डिजिटल समाचार मीडिया को अपने खुद पर नजर रखने के लिए कोई तरीका निकालना चाहिए, वरना पिछले जरा से बरसों में जिस तरह भारत के हिन्दी टीवी समाचार चैनलों की साख चौपट हुई है, उससे अधिक रफ्तार से डिजिटल समाचार मीडिया की साख चौपट होगी। इस मीडिया के औजार इतने धार वाले हैं कि अगर सम्हलकर इस्तेमाल नहीं किया गया, तो वे समाचार-विचार का निशाना लगने के पहले ही खुद को घायल कर जाएंगे।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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