संपादकीय

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Date : 19-Aug-2019

भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग को लेकर रोज दिल दहलाने वाली खबरें आ रही हैं कि किस कंपनी ने अपने कितने कारखानों को कितने हफ्तों या महीनों के लिए बंद कर दिया, कौन सी ऑटो कंपनी कितने हजार कर्मचारियों की छंटनी कर रही है, और देश में पिछले तीन या छह महीनों में कितने हजार ऑटोमोबाइल डीलरशिप बंद हो चुकी हैं। हालत यह है कि आज कारखानों और डीलरों के अहातों में इक_ा दुपहिया-चौपहिया बिकने में अगले कई महीने लग जाएंगे, और ग्राहकी बढऩे के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। जाहिर है कि देश की अर्थव्यवस्था में मंदी का हाल यह है कि चड्डी-बनियान तक बिकना घट गया है, और इसकी खबरें दुनिया के एक मान्य सिद्धांत को भी बताती हैं कि जब पुरूषों के चड्डी-बनियान बिकना कम हो जाएं, तो वह अर्थव्यवस्था की बदहाली का सुबूत होता है। अब जब सावन खत्म हो चुका है, कांवड़ यात्रा निपट चुकी है, अमरनाथ यात्रा का वक्त भी खत्म हो गया है, कश्मीर बाकी देश का हिस्सा बना दिया गया है, देश की आबादी को काबू में करने का नया फतवा जारी हो गया है, और मानो उस फतवे के खिलाफ उसी खेमे के एक दूसरे वजनदार व्यक्ति ने हिन्दुओं को अपनी आबादी बढ़ाने का फतवा भी दे दिया है, तब देश की सब समस्याओं को खत्म मानते हुए, अर्थव्यवस्था पर भी थोड़ी सी चर्चा कर लेनी चाहिए। 

आज देश में जिस तरह फोन और इंटरनेट बाजार का एक बड़ा हिस्सा अंबानी के हाथ आ चुका है, और बाकी टेलीफोन कंपनियां एक-एक कर बिकती जा रही हैं। साल के आखिरी में देश की अर्थव्यवस्था के सरकारी आंकड़े दूरसंचार क्षेत्र की कमाई को बढ़ा हुआ जरूर बता देंगे, लेकिन उसमें कंपनियां घट चुकी रहेंगी, और एक अंबानी के हिस्से कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा रहेगा। देश का सकल राष्ट्रीय उत्पादन या जीडीपी एक धोखा खड़ा करने वाला आंकड़ा रहता है क्योंकि वह एक अंबानी, एक अदानी, और मनरेगा मजदूरों सबकी कमाई को मिलाकर उसका औसत निकालकर देश की औसत आय बता देता है, और उसकी कुल आय को वह सकल राष्ट्रीय उत्पादन बता देता है। इसलिए ये आंकड़े सफेद झूठ के और ऊपरी दर्जे का झूठ होते हैं, इनका कोई मतलब नहीं होता। लेकिन आज निजी गाडिय़ों की बिक्री का जो भट्टा बैठा हुआ है, उस बीच कुछ सोचने की भी जरूरत है। 

कहा जाता है कि जब बादल बहुत घने और काले रहते हैं, तो उन्हीं के किनारे से कहीं एक चमकीली लकीर उभरती है। ऐसी ही सिल्वर लाईनिंग आज ऑटोमोबाइल इस्तेमाल में हो सकती है। जब लोगों की औकात निजी गाडिय़ां खरीदने की रह नहीं गई हैं, तब सरकार और समाज दोनों के सामने यह मौका है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाए। शहरों में आवाजाही के लिए छोटी और बड़ी बसों का, मेट्रो या किसी और किस्म की ट्रेन का ऐसा ढांचा खड़ा किया जाए जो कि निजी गाडिय़ों की जरूरत को ही घटा दे। इससे यह हो सकता है कि कारों और दुपहियों का कारोबार घट जाए, लेकिन दुनिया में कई कारोबार घटते हैं, और कई कारोबार बढ़ते हैं। ऐसे ही लोगों के रोजगार भी एक जगह से हटकर दूसरी जगह चले जाते हैं। जब एटीएम शुरू हुए थे तो लोगों को लगता था कि बैंकों में कैशियरों की लाखों कुर्सियां छिन जाएंगी, लेकिन कोई नौकरी गई नहीं, और हर एटीएम के पीछे एक या दो चौकीदार लगने लगे। ऐसा ही हाल कार बनाने वाली कंपनियों का हो सकता है कि उनकी बढ़ोत्तरी रूक जाए, लेकिन बसें बनाने वाली कंपनियों का कारोबार खूब बढ़ सकता है, मेट्रो बनाने वाली निर्माण कंपनियों का काम खूब बढ़ सकता है। 

दरअसल ऑटोमोबाइल क्षेत्र की दिक्कत तो एक दिक्कत है, बड़ी दिक्कत दुनिया के शहरों में क्षमता की है कि वहां की सड़कें, वहां की पार्किंग कितनी गाडिय़ों को ढो सकती हैं। दुनिया को गाडिय़ों के बोझ और उनके जहर से बचाने के लिए यह जरूरी है कि लोगों की अपनी निजी गाडिय़ों पर निर्भरता घटाई जाए, और उनके सामने एक सस्ता, आसान, और सहूलियत का सार्वजनिक विकल्प उपलब्ध कराया जाए। भारत में सरकारें बहुत रफ्तार से ऐसा नहीं सोचती हैं, और अभी भी निजी गाडिय़ों को ही बैटरी से चलने वाली बनाने पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन इस बात को समझना चाहिए कि निजी गाडिय़ां लोगों के निजी घर में नहीं चलतीं, उनके लिए शहरीकरण की योजना और उसके ढांचे की जरूरत पड़ती है। इसलिए निजी वाहनों को निजी उपयोग की सुविधा के बजाय शहरों पर बोझ मानकर उस हिसाब से शहरी यातायात की एक नई योजना बनाना चाहिए जिसमें निजी गाडिय़ों को घटाना एक बड़ा मुद्दा हो। निजी गाडिय़ों की खपत घटने की फिक्र को मौका मानकर उसका इस्तेमाल करते हुए शहरी सार्वजनिक परिवहन की तरफ तेजी से जाना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 18-Aug-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में लोगों को मुफ्त में हेलमेट दे रही है। उसे ये हेलमेट अलग-अलग सामाजिक या कारोबारी संगठनों की तरफ से मिल रहे हैं, और वह कार्यक्रम करके इन्हें लोगों में बांट रही है। आज आम लोगों की एक मोटरसाइकिल भी औसतन 50 हजार रूपए की है। राजधानी एक महंगा और संपन्न शहर होने से यहां दसियों हजार मोटरसाइकिलें लाख रूपए से ऊपर की भी हैं। एक संपन्न शहर के संपन्न लोगों को उनकी खुद की हिफाजत के लिए जागरूक करने के लिए पुलिस और समाज मिलकर खर्च कर रहे हैं, जो कि एक बेतुकी मशक्कत है। कुछ सौ रूपए के ऐसे हेलमेट की मदद उन गरीबों के लिए तो ठीक है जो इसे खरीद नहीं सकते। लेकिन जिनके पास चलाने के लिए स्कूटर या मोटरसाइकिल है, उनके पास हेलमेट के लिए ही पैसे न होने का क्या तर्क है?जो लोग अपनी खुद की जिंदगी के लिए ऐसे लापरवाह हैं, उन्हें मुफ्त में हेलमेट देना पुलिस या संगठनों के पैसों की बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं है। इस किस्म से जुटाया गया पैसा या सामान बेबस और गरीब लोगों की मदद में ही इस्तेमाल करना चाहिए, बेशर्म और लापरवाह लोगों की मदद में नहीं।

दरअसल दुपहिया पर चलने वालों के लिए हेलमेट उनकी अपनी हिफाजत का सामान है। लोग महंगी गाडिय़ां खरीद लेते हैं, महंगा पेट्रोल खरीदते हैं, गाड़ी का बीमा भी करवाते हैं, लेकिन अपनी खोपड़ी को टूटने से बचाने के लिए हेलमेट नाम का बीमा करवाने की फिक्र अगर उन्हें नहीं है, तो उन्हें कोई तोहफा देने के बजाय उन पर जुर्माना लगाना चाहिए। कोई बिना हेलमेट दुपहिया चलाए तो उससे सड़क पर बाकी लोगों की जिंदगी खतरे में नहीं पड़ती। इसलिए जिन्हें मरने का शौक है, उन्हें मौत के पहले जुर्माने से भला क्यों परहेज होना चाहिए? 

दरअसल हिन्दुस्तान में कई बातों को समाजसेवा मान लिया जाता है। किसी परिवार के मरीज अस्पताल में रहें, और परिवार के दस हट्टे-कट्टे रिश्तेदार अस्पताल में खड़े रहें, लेकिन खून की जरूरत पडऩे पर बाहर का दानदाता ढूंढें, तो वह दान नहीं है, वह लोगों की गैरजिम्मेदारी को बढ़ाने की एक सामाजिक गैरजिम्मेदारी है। उस परिवार के लोगों को खुद खून देने की अक्ल देना खून देने से बेहतर है। इसी तरह शहरी सड़कों पर हर बरस कम से कम दर्जन-दो दर्जन बार तरह-तरह के धार्मिक मौकों पर भंडारे लगते हैं। किसी पूजापाठ के बाद आस्थावान धर्मालु लोग सड़क किनारे पंडाल लगाकर दोना-पत्तल का इंतजाम करके लोगों को तरह-तरह का खाना खिलाते हैं। वहां से निकलते हुए खाते-पीते घरों के लोग भी स्कूटर-मोटरसाइकिल रोक-रोककर जमकर खाने लगते हैं, और खिलाने वालों को लगता है कि वे गरीब और भूखों को खिला रहे हैं। शहरों में दुपहियों पर घूमने वाले मेहनतकश हो सकते हैं, गरीब हो सकते हैं, लेकिन भूखे तो बिल्कुल ही नहीं हो सकते। इसलिए खाते-पीते लोगों को खिलाने से न तो किसी धर्म का भला होता है, और न ही मुफ्तखोरी के आदी हो चुके हिन्दुस्तानियों का इससे कुछ भला होता है। 

रायपुर पुलिस को खुद यह लग सकता है कि वह हेलमेट बांटकर लोगों की जिंदगी बचाने का काम कर रही है। लेकिन यह एक बहुत ही गैरजरूरी, महंगा, और बेतुका काम है। जिन लोगों की ताकत एक हेलमेट के दाम से अधिक जुर्माना पटाने की है, उन्हें भला कोई सामान मुफ्त में क्यों दिया जाए? मुफ्त में देना ही है तो साइकिलों पर रात-बिरात चलने वालों की साइकिलों पर रिफलेक्टर टेप लगाने जैसा कोई सस्ता और जरूरी काम किया जाए, किसी बहुत ही गरीब और असहाय के हित में कोई काम किया जाए, शारीरिक अक्षम गरीबों के तिपहियों के लिए कुछ किया जाए। जिस तरह राह चलते गैरगरीबों पर सरकार या समाज का पैसा बर्बाद किया जा रहा है, वह अब तक लापरवाह और गैरजिम्मेदार चले आ रहे लोगों को मुफ्तखोर भी बना देने का काम है, जिसकी कोई तारीफ नहीं की जा सकती। इन लोगों पर मोटा जुर्माना लगाकर उन्हें यह एहसास कराने की जरूरत है कि एक हेलमेट पर खर्च, और उसका इस्तेमाल करके वे रोजाना के जुर्माने से बच सकते हैं, और सिर बचाने में उनकी दिलचस्पी हो तो बचाएं, वरना उनके सिर के बारे में उनका परिवार सोचे। पुलिस को तो कानून को लागू करने की फिक्र करनी चाहिए, हेलमेट का ऐसा भंडारा किसी का भी भला नहीं कर रहा है। 
-सुनील कुमार


Date : 17-Aug-2019

छत्तीसगढ़ की रायपुर पुलिस के तीन सिपाहियों का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे एक छोटे से नाबालिग बच्चे को मिलकर पीट रहे हैं, और पीटते हुए उसका मजा भी ले रहे हैं। रेलवे पटरी के पास की इस हिंसा को ट्रेन में बैठे एक मुसाफिर ने कैमरे में कैद किया, और रेलवे के बोर्ड सहित वीडियो को सोशल मीडिया पर डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि पुलिस को आनन-फानन इन सिपाहियों को निलंबित करना पड़ा। यह एक अलग बात है कि उन्हें राजधानी में ही लाईन अटैच किया गया है, और यहां रहते हुए उन्हें इस बात की पूरी सहूलियत रहेगी कि वे इस गरीब बच्चे के परिवार पर, उस बच्चे पर दबाव बना सकें। अब पुलिस की तरफ से यह कहानी पेश की जा रही है कि यह बच्चा जेब काटते पकड़ाया था, और पुलिस उससे पूछताछ कर रही थी। अगर कोई बच्चा जुर्म करते मिलता भी है, तो उसे किसी सुनसान इलाके में ले जाकर खुले में पीटकर कोई पूछताछ करने की इजाजत कौन सा कानून देता है? इन तीनों सिपाहियों की बर्खास्तगी से कम कुछ भी नहीं होना चाहिए क्योंकि जिनकी सोच ऐसी है, वे मौका मिलते ही फिर ऐसी दूसरी हरकत करेंगे। 

इसी शहर में रेलवे स्टेशन पर पुलिस की कई किस्म की कहानियां हाल के दशकों की दर्ज हैं। रेलवे पुलिस नाम की रेलवे की रहती है, उसमें तैनाती राज्य की पुलिस की होती है। इस राज्य में एक आईपीएस अफसर रमेश शर्मा की जब रायपुर रेलवे पुलिस में एसपी की तैनाती थी, उन्होंने प्लेटफॉर्म पर घूमने वाले बेघर और बेसहारा बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू किया था जहां पुलिस उन बच्चों को पढ़ाती थी। जब तक वे रहे, तब तक स्कूल चलते रहा, बच्चों से धीरे-धीरे नशे की आदत भी छुड़वाने की कोशिश की गई, रमेश शर्मा ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी जोड़ा और इन बच्चों की जिंदगी बेहतर बनाने की कोशिश की। लेकिन जैसा कि किसी भी सरकारी नौकरी में होता है, एक वक्त के बाद उनका तबादला हो गया, और बाद में आए अफसर और उसके मातहत लोगों ने इन बच्चों के साथ वही सुलूक फिर शुरू कर दिया जो कि रमेश शर्मा के आने के पहले तक चलता था। स्टेशन के इलाके में मुजरिमों का एक बड़ा गिरोह चलाने वाली एक कुख्यात सरगना महिला स्टेशन पर पलने वाले बच्चों से जुर्म करवाती थी, और उस कमाई को गिरोह और पुलिस दोनों खाते थे। स्कूल बंद हो गई, और बच्चों को चेतावनी दे दी गई कि या तो वे गिरोह में काम करें, या फिर उन्हें किसी भी मामले में पकड़कर अदालत में पेश कर दिया जाएगा, और सुधारगृह भेज दिया जाएगा। पुलिस ने एक संगठित और पेशेवर मुजरिम गिरोह की तरह बच्चों को पूरी तरह मुजरिम बनाने का काम इतनी खूबी से किया कि स्टेशन के बेघर बच्चे उसके लिए मजबूर कर दिए गए। 

यह बात सुनने में एक फिल्मी कहानी लगती है, लेकिन यह हमारी देखी हुई हकीकत है, और इस बात को लिखने वाले संपादक ने ऐसे दर्जनों बच्चों से रूबरू बात की थी, और इन बच्चों को बचाने में लगे हुए एक सामाजिक संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं से भी पुलिस का यह जुर्म समझा था। अपने खुद के इस तजुर्बे के आधार पर हम यह बात लिख सकते हैं कि इस देश में बेघर और बेसहारा बच्चों को पेशेवर मुजरिम बनाने में, उन्हें सेक्स के धंधे में धकेलने में पुलिस का बड़ा हाथ रहता है। इसलिए अभी जो हिंसा का वीडियो सामने आया है उसे महज एक घटना मानकर नहीं चलना चाहिए, बल्कि उसे एक संकेत मानकर पुलिस की पूरी बीमारी का इलाज करना चाहिए। अपने बारे में ऐसी बातें मानना पुलिस के किसी अफसर को अच्छा भी नहीं लगता, अगर ऐसा वीडियो सुबूत के तौर पर लोगों के बीच तैर नहीं गया होता। इसके बाद अगर पुलिस खुद कार्रवाई नहीं करती, तो कोई अदालत कार्रवाई करती और वह महज सिपाहियों तक सीमित नहीं रहती। पुलिस को अपने आपको एक संगठित अपराधी गिरोह बनने से बचाना चाहिए, क्योंकि ऐसा गिरोह महज मुजरिमों के गिरोह के मुकाबले समाज के लिए कई गुना अधिक खतरनाक होगा। आज छत्तीसगढ़ में पुलिस जगह-जगह तरह-तरह के संगठित अपराध, अपराधी कारोबार बढ़ाने के लिए पेशेवर लोगों पर दबाव बनाते दिखती है ताकि सभी का फायदा हो सके। यह सिलसिला तुरंत थामने की जरूरत है। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Aug-2019

अपने पहले स्वतंत्रता दिवस भाषण में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक नए जिले, और 25 नई तहसीलें बनाने की घोषणा की है। इसके साथ ही उन्होंने एसटी, एससी, और ओबीसी के आरक्षण के नए पैमानों की घोषणा भी की है। जिन लोगों को सरकारी नौकरियों, और स्कूल-कॉलेज के दाखिले में आरक्षण का लाभ पाने की जरूरत होती है, वे इसके महत्व को अधिक समझ सकते हैं। इसके साथ-साथ नई तहसीलों से लोगों की जिंदगी में क्या फर्क पड़ सकता है इसे भी वे लोग जान सकते हैं जो अपने गांव-कस्बे से दूर की तहसील पर अब तक जाते रहे हैं, उन्हें तहसील पास आने से दिक्कतों में बड़ी कमी आना तय है। यह एक अलग बात है कि आज प्रदेश की तहसीलों में आम जनता के कामकाज में पिछली सरकार के समय से चले आ रहा ढर्रा जारी है, और उसे सुधारे बिना महज तहसीलें बना देने से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन किसी जलसे की घोषणाओं में सेवाओं में बेहतरी को नहीं गिनाया जाता, सिर्फ नई बातों को, नई मंजूरी और नए निर्माण को गिनाया जाता है, इस हिसाब से 15 अगस्त का मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का यह भाषण इंसानों और पालतू, बेसहारा पशुओं के लिए कई किस्म की नई मदद लेकर आया है, और इस पर अमल पर मेहनत अगर होगी, तो प्रदेश के दसियों लाख लोगों की जिंदगी पर एक बड़ा असर पड़ सकता है। 

कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के पहले से अपना ग्रामीण और खेतिहर रूझान चुनाव प्रचार के दौरान ही खुलकर सामने रख दिया था, और सत्ता में आने के बाद रफ्तार से कर्जमाफी की गई, धान के दाम को बढ़ाया गया, और धान बोनस दिया गया। इन तीनों बातों से प्रदेश की आधी आबादी पर सीधा असर पड़ा, और प्रदेश की अर्थव्यवस्था का पहिया इससे उस वक्त भी घूमते रहा जब पूरे देश में ऑटोमोबाइल के पहिये थम से गए थे। बाजार का एक अंदाज बताता है कि जब पूरे देश में गाडिय़ों की बिक्री एक चौथाई घट गई थी, तब भी छत्तीसगढ़ में उस मंदी का असर नहीं पड़ा क्योंकि यहां किसान और आम लोगों के हाथ में सरकार से ताजा-ताजा मिला हुआ फायदा था, और पिछले महीनों में छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था बाकी देश की मंदी के मुकाबले कम प्रभावित रही। मुख्यमंत्री ने पिछले महीनों में राज्य सरकार की कई घोषणाओं पर अमल का ठोस ढांचा इस भाषण में गिनाया है, और राशन के पैमानों को शिथिल करते हुए अधिक चावल देने के साथ-साथ कुछ और चीजें भी कुछ इलाकों को देना शुरू किया है। 

आज जब छत्तीसगढ़ में विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव निपट गए हैं, तो सरकार इन बड़े चुनावों के दबाव से तो मुक्त है, लेकिन अभी नगरीय संस्थाओं और पंचायतों के चुनाव सामने हैं। ऐसे में महज यह जरूरी नहीं है कि विधानसभा की चुनावी घोषणाओं को लागू किया जाए, बल्कि यह भी जरूरी है कि नई नीतियों और कार्यक्रमों पर अमल को असरदार बनाया जाए। सरकार के बहुत से विभाग पिछले लंबे समय से एक अलग रफ्तार से काम करते आ रहे थे, और गले-गले भ्रष्टाचार में भी डूबे हुए थे। ऐसी हालत में मुख्यमंत्री ने यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम की घोषणा तो कर दी है, लेकिन सरकारी स्वास्थ्य सेवा के ढांचे का जो हाल है, उसे देखते हुए इस बात में गहरा संदेह खड़ा है कि क्या यह घोषणा पूरी हो पाएगी? कांग्रेस सरकार को सत्ता में आए कई महीने हो गए हैं, लेकिन सरकारी इलाज का हाल अभी मानो रमन सरकार के मातहत ही चल रहा है। 

मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर यह गिनाया है कि स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए दो दशक बाद 15 हजार नियमित शिक्षकों की भर्ती की जा रही है। सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि सरकारी नौकरियों में नियुक्ति का मामला कई राज्यों में उनके सबसे बड़े भ्रष्टाचार की वजह रहा है। छत्तीसगढ़ में ईमानदारी और पारदर्शिता से ये नियुक्तियां होनी चाहिए, और न सिर्फ शिक्षकों की नियुक्ति में, बल्कि सरकार की तमाम नौकरियों में राज्य सरकार को लोगों को समान अवसर देने की फिक्र करनी चाहिए, और चयन में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू से निगरानी भी रखनी चाहिए। इसी भाषण में मुख्यमंत्री ने प्रदेश में कुपोषण के शिकार बच्चों, और एनीमिया की शिकार माताओं का जिक्र किया है जिनके लिए पोषण आहार देने की शुरुआत की जा रही है, और यह शुरुआत गांधी जयंती से बढ़कर पूरे प्रदेश में लागू हो जाएगी। मुख्यमंत्री की और भी घोषणाएं हैं जो कि सरकार का एक ग्रामीण नजरिया सामने रखती हैं, लेकिन इन पर अमल खासा मुश्किल हो जाता है, और उस मोर्चे पर अधिक मेहनत करने की जरूरत है। आज सरकार का नजरिया किसान, ग्रामीण, गरीब, मजदूर, दलित-आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, कुपोषित मां-बच्चों के लिए हमदर्दी का दिख रहा है और चुनावी घोषणापत्र के वक्त से चले आ रहे इसी नजरिये ने राज्य में कांग्रेस को इतने बहुमत से आने में मदद की थी। अब यह नजरिया ठोस योजनाओं की शक्ल में सामने आ गया है, और इस पर अमल की कामयाबी या नाकामयाबी नगरीय-पंचायत चुनावों में नतीजों की शक्ल में साबित होगी। इसलिए राज्य सरकार को खासी मेहनत करने की जरूरत है। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Aug-2019

आजादी की सालगिरह जैसे जो मौके साल में एक बार आते हैं, वे कई विरोधाभासों को याद दिला जाते हैं। प्रेस की आजादी की सालगिरह आती है, तो याद दिलाती है कि प्रेस किस-किस तरह आजाद नहीं है। संविधान की सालगिरह आती है तो याद पड़ता है कि संविधान को किस-किस तरह कुचला जा रहा है, किस-किस तरह उसे अनदेखा किया जा रहा है। इसी तरह आजादी की सालगिरह बताती है कि किन-किन चीजों में देश और इसके लोग आजाद नहीं हुए हैं। किस-किस चीज से आजादी मिलना बाकी है, या मिलना चाहिए, या मिली हुई आजादी खो चुकी है। ऐसी ही तमाम बातों के बीच हिन्दुस्तान की सालगिरह एक बार फिर आकर खड़ी हो गई है, और आज की सुबह-सुबह छत्तीसगढ़ की पुलिस के तीन सिपाही मिलकर एक छोटे से बच्चे को पीटते हुए नजर आ रहे हैं, और ऐसे वीडियो याद दिलाते हैं कि हिन्दुस्तानी पुलिस का किस तरह अंग्रेज सोच से आजाद होना अभी बाकी ही है। उसे अंग्रेजों ने गुलाम हिन्दुस्तानियों पर काबू और जुल्म करने के हिसाब से ढाला था, और आजाद हिन्दुस्तान ने इस सांचे को तोडऩे की कोशिश कभी इसलिए नहीं की कि सत्तारूढ़ लोगों को ऐसी जुल्मी पुलिस माकूल बैठती है, सुहाती है, उनके बड़े काम आती है। 
लेकिन कुछ दूसरे मुद्दों को देखें तो लगता है कि आज देश में हो रही बेइंसाफी, कमजोरों पर जुल्म देखते हुए सत्ता की जो चुप्पी जारी है, क्या उस चुप्पी से आजादी एकदम ही जरूरी नहीं है? एक तरफ तो यह चुप्पी अपने आपमें जब सत्ता की होती है, तो वह एक जुल्म की शक्ल में इतिहास में दर्ज होते चलती है। और दूसरी ओर इस चुप्पी को अनदेखा और अनसुना करने के लिए सत्ता कई किस्म के नाटक करती है जो कि आज देश में देखने मिल रहे हैं। देश के असल मुद्दों की अनदेखी की आजादी तो ताकतवर तबकों को मिल गई है, लेकिन कातिल चुप्पी से आजादी के कोई आसार नहीं है। देश के असल मुद्दे कहीं सिर न उठाने लगें, इसलिए एक के बाद दूसरी लुभावनी, भावनात्मक और भड़काऊ बातों का सैलाब समंदर के नमकीन पानी की लहर सरीखा लगातार जारी रखा जाता है ताकि नमकीन पानी से भरी आंखें कहीं असल मुद्दे देख न ले। लोगों के दिल-दिमाग लगातार एक ऐसे कीर्तन से घेरकर रखे जा रहे हैं कि समझदारी की कोई बात उन तक पहुंच न जाए, कोई सच, वैज्ञानिक सोच, न्यायसंगत आवाज पहुंच न जाए। 

यह एक ताजा गुलामी है, जो कि आजादी के पूरे हासिल पर छा चुकी है। सोच की यह गुलामी, विचारों की यह तंगदिली, तर्कशक्ति का यह तंगनजरिया एक राष्ट्रीय गौरव बनाकर पेश किया जा रहा है, और लोग इस हड़बड़ी में उसे निगले जा रहे हैं कि कहीं वे देश के गद्दार न करार दे दिए जाएं। देश की आम सोच को भावनात्मक उत्तेजना का गुलाम बनाकर इंसाफ की आजादी खत्म की जा रही है, और देश का बहुमत मानो इसी का जश्न मना रहा है। लोकतंत्र को महज एक जनमतसंग्रह बनाकर रख दिया गया है, और बहुमत को इंसाफ का विकल्प मान लिया गया है। अगर भारत के पुराने किस्से-कहानियों की जुबान में कहें तो आज कौरवों को यह हक हासिल है कि वे गिनती के गिने-चुने पांडवों की भीड़-हत्या कर दें, और वह जायज भी कहलाए। लोकतंत्र बहुमततंत्र में बदलने के बाद अब भीड़तंत्र की शक्ल में अपने सबसे हिंसक रूप के साथ हिन्दुस्तानियों के भीतर की हजारों बरस पहले की हिंसानियत के डीएनए सैकड़ों पीढ़ी बाद फिर हासिल कर रहा है, और इसके लिए राष्ट्रप्रेम के तमाम प्रतीकों का इस्तेमाल करके ऐसी हिंसानियत को देशभक्ति, देशप्रेम की ढाल भी मुहैय्या कराई जा रही है। 

आजादी की सालगिरह यह सोचने पर मजबूर करती है कि करीब एक सदी के संघर्ष से हासिल आजादी इस पौन सदी में ही कहां पहुंच गई है? लेकिन जिस तरह आधुनिक पर्यटन केन्द्रों में मशीनों से पानी में लहरें पैदा की जाती हैं, अधिक हिन्दुस्तानी दिमाग न्याय और तर्क की बातें सोचें, उसके पहले और कोई राष्ट्रवादी लहर आकर उनकी आंखों में नमकीन पानी भर देगी।
-सुनील कुमार


Date : 13-Aug-2019

क्रिकेट की दुनिया से एक खबर है कि बॉल में अब एक माइक्रोचिप लगने जा रहा है जिससे बॉलिंग की हर किस्म की जानकारी कम्प्यूटर पर दर्ज होते रहेगी। अंपायरों को भी फैसले लेने में इससे मदद मिलेगी। अभी वैसे भी क्रिकेट के बल्ले और विकेट में सेंसर लगा हुआ है, विकेट में तो कैमरा और माइक्रोफोन भी लगा हुआ है, और हाल ही में निपटे विश्वकप में यह देखने मिला कि अंपायरों के कई फैसलों को कम्प्यूटरों और कैमरों ने आनन-फानन गलत भी साबित कर दिया। एक वक्त अंपायर की ऊंगली आसमान की तरफ ठीक उसी तरह उठती थी जिस तरह फांसी देने वाले जल्लाद को इशारा करने के लिए जेलर की ऊंगली उठती थी, अब धीरे-धीरे हो सकता है कि अंपायर मैदान से गायब ही हो जाए।

दुनिया के दूसरे कई दायरों में अगर देखें, तो अब मीडिया के न्यूज रूम में खबरों को बनाने का काम करने वाले कम्प्यूटर-प्रोग्राम आ गए हैं जो कि तथ्यों को लेकर समाचार ड्राफ्ट कर देते हैं। धीरे-धीरे कैमरापरसन की जरूरत कम होते चल रही है क्योंकि लोग मोबाइल कैमरों से भी रिकॉर्डिंग करने लगे हैं। टीवी चैनलों की जरूरत कम हो चली है क्योंकि लोग खुद ही अपने यू-ट्यूब चैनल बनाकर उस पर आनन-फानन पोस्ट कर देते हैं, या फेसबुक और ट्विटर पर लाईव प्रसारण करने लगते हैं। कुल मिलाकर मशीनों ने इंसान की जरूरत को कई दायरों में घटाना शुरू कर दिया है, और यह बढ़ते ही चलना है। बहुत से दायरे ऐसे रहेंगे जिनमें आखिर तक इंसान लगेंगे ही लगेंगे, लेकिन बहुत से दायरों से वे बाहर होने जा रहे हैं। इसके अलावा यह बात समझने की जरूरत है कि आज क्रिकेट अंपायर के फैसलों को तकनीक जिस बारीकी से और जिस रफ्तार से सही या गलत साबित कर रही है, वैसा ही कई और दायरों में हो सकता है। अखबार में लिखी गई खबरों में से हिज्जों की गलती, व्याकरण की गलती, या तथ्यों की गलती निकालने वाले कम्प्यूटर-प्रोग्राम आज भी मौजूद हैं, और ये धीरे-धीरे कृत्रिम इंटेलीजेंस की मदद से और उत्कृष्ट होते चलेंगे।

इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद यह है कि इंसानों को अपने कामकाज को सुधारने और बेहतर बनाने की पहले से कहीं अधिक, बहुत अधिक जरूरत इसलिए आन खड़ी हुई है कि अब मशीनें उसके काम को तौलने लगेंगी। मोबाइल फोन से छोटा उपकरण यह बता देगा कि दीवार उठाने वाले राजमिस्त्री ने ईंटों को तिरछा तो नहीं लगाया है, या टाईल्स फिट करने वाले मिस्त्री ने सतह ठीक रखी है या नहीं। अब औना-पौना, कामचलाऊ काम आसानी से पकड़ में आ जाएगा। इसलिए टेक्नॉलॉजी जहां-जहां इंसानों को बेदखल नहीं भी करेगी, वहां-वहां उसकी चूक को, उसकी लापरवाही को पकड़ सकेगी।

इस सिलसिले में एक छोटी सी मिसाल देना ठीक होगा जिससे आज बहुत से लोग वाकिफ नहीं होंगे। हिंदुस्तान में बाजार में मौजूद छोटी कारों में से कुछ कारें ऐसी भी हैं जिनमें भीतर एक छोटा सा उपकरण लगा हुआ है जो कि किसी मोबाइल फोन से जोड़ा जा सकता है, और लोग अपने घर बैठे फोन पर देख सकते हैं कि उनकी कार कहां पर है, किस रफ्तार से चल रही है, उसमें ईंधन कितना बचा है, क्या उसकी कहीं टक्कर हुई है, या उसके इंजन में कोई बड़ी गड़बड़ी तो नहीं हो गई है। आज मौजूद बड़ी साधारण सी कार के लिए फोन पर एक सीमा तय की जा सकती है कि कार किस रफ्तार से अधिक पहुंचने पर फोन पर अलर्ट आ जाए, या कितने किलोमीटर के दायरे से बाहर निकलते ही फोन पर अलर्ट आ जाए। इस किस्म की निगरानी, इस किस्म की जांच धीरे-धीरे तमाम आम उपकरणों में आने जा रही है, और इनके साथ काम करने वाले इंसानों को अपने-आपको बेहतर करना होगा, क्रिकेट के अंपायरों की तरह।


Date : 12-Aug-2019

कश्मीर के हालात को लेकर मीडिया में इतनी अलग-अलग तस्वीरें आ रही हैं कि यह लगता ही नहीं है कि वे एक देश के एक प्रदेश की हैं। पश्चिम का मीडिया कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन की जो तस्वीरें दिखा रहा है, और जो वीडियो दिखा रहा है, उसे हिन्दुस्तान के मीडिया का एक हिस्सा गलत बता रहा है, और हिन्दुस्तान के सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी लोग उबल पड़ रहे हैं, और बीबीसी जैसे मीडिया-संस्थान पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ भारत का बड़ा मीडिया तकरीबन पूरा का पूरा केन्द्र सरकार की पेश की हुई तस्वीर को सामने रख रहा है, और देश के कुछ गिने-चुने पत्रकार ऐसे हैं जो कि कश्मीर जाकर वहां देखी हुई, और दर्ज की हुई एक अलग तस्वीर सामने रख रहे हैं। हकीकत इनके बीच जहां भी हो, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में मीडिया पर, संचार पर लगाई गई रोक के कैसे नुकसानदेह नतीजे होते हैं। 

कश्मीर से धारा 370 खत्म करने और उसे केन्द्र के मातहत एक प्रदेश बना देने का कश्मीर में जैसा विरोध होने का एक खतरा दिख रहा था, अब तक उतना बड़ा खतरा सामने नहीं आया है। अगर बीबीसी या न्यूयॉर्क टाईम्स की दिखाई जा रही तस्वीरें सही है, तो भी वे एक बड़े विरोध-प्रदर्शन को दिखा रही हैं, बड़े पैमाने पर कोई हिंसा नहीं दिखा रहीं, दोनों तरफ से किसी की हत्या करने या किसी मौत होने की खबरें नहीं हैं। पत्थरों से पटी हुई सड़कों की जो तस्वीरें दिख रही हैं, और पत्थर फेंकते हुए कश्मीरी नौजवानों के जो वीडियो दिख रहे हैं, उनमें से भरोसेमंद मीडिया में तो ये सही लगते हैं, लेकिन सतही मीडिया और सोशल मीडिया पर दुनिया के अलग-अलग देशों से छांटकर निकाले गए वीडियो और तस्वीरें चारों तरफ तैर रहे हैं। ऐसा झूठ महज कश्मीर के मामले में चल रहा हो ऐसा नहीं है, दूसरी तरफ पथराव कश्मीर में अभी पहली बार हो रहे हों ऐसा भी नहीं है। यह सब कुछ कश्मीर बरसों से झेलते आ रहा है, और वहां की एक पूरी नौजवान पीढ़ी पथराव का हिस्सा बने हुए बड़ी हुई है। इसलिए आज कश्मीर में हालात, वहां पर हिंसा, अभूतपूर्व नहीं हैं। वहां पर लगाई गई बंदिशें भी आज पूरे राज्य में फैली हुई जरूर हैं, लेकिन अभूतपूर्व नहीं है। कश्मीर ने इसके पहले भी कर्फ्यू देखा है, फोन-नेट पर रोक देखी है, और फौज तो हमेशा से देखी ही है। इसलिए कश्मीर, और बाकी देश दोनों के हित में यह है कि वहां की तस्वीर को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में देखा जाए। न तो केन्द्र सरकार की उपलब्ध कराई गई उन वीडियो-तस्वीरों का अधिक वजन है जिनमें एक चुनिंदा जगह पर आधा दर्जन चुनिंदा लोगों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बिरयानी खाते हुए, बात करते हुए दिख रहे हैं। और न ही ऐसी तस्वीरों का अधिक वजन है जिनमें सड़कों पर पथराव करते हुए नौजवान दिख रहे हैं। ऐसी दोनों ही किस्म की नौबतें न सिर्फ कश्मीर में, न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में आती हैं, और सरकारें जनधारणा को अपने पक्ष में करने के लिए ऐसी तस्वीरें प्लांट भी करती हैं। 

इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर ने पिछले एक हफ्ते में हिंसा पर जिस काबू को दर्ज किया है, वह भी कम नहीं है। लोगों के मन में आग सुलग रही होगी, यह एक अलग बात है, लेकिन सरकार का यह जिम्मा होता है कि उस आग की लपटें किसी देश-प्रदेश को न जलाएं, किसी शहर-कस्बे को न जलाएं। इसलिए कश्मीर को लेकर आज मीडिया की रिपोर्ट एक तो बिल्कुल सही और सच्ची होनी चाहिए, दूसरी ओर वह सही संदर्भ में और फौज से लेकर हिंसा तक के तथ्यों को सही अनुपात में बताने वाली भी होनी चाहिए। लोगों को अपने विचारों के कॉलम में लिखना चाहिए, और खबरों के लिए आंकड़ों को, तथ्यों को, तस्वीरों और वीडियो को, विचारों की मिलावट के बिना खालिस रखना चाहिए, और खालिस पेश करना चाहिए। यही पत्रकारिता होती है, और यही बात लोकतंत्र के हित में भी होती है। 

जिन लोगों की आज कश्मीर की जमीनी हकीकत तक पहुंच नहीं है, चाहे वह सरकार के रोके हो, चाहे वह किसी और वजह से, उन्हें अटकलबाजी में नहीं पडऩा चाहिए, और अपने हाथ लगे चुनिंदा तथ्यों को, सरकार द्वारा पेश किए गए चुनिंदा तथ्यों को सोच-समझकर ही पेश करना चाहिए। सच इन दोनों के बीच कहीं पर हो सकता है, और जब तक मीडिया के हाथ ऐसे सच के सुबूत न लगें, उसे बिना स्रोत बताए कुछ पेश नहीं करना चाहिए। मीडिया और लोकतंत्र के बाकी तबकों को अपने विचार लिखने की हमेशा ही आजादी रहनी चाहिए, और विचारों पर आज कोई रोक है नहीं। इसलिए लोग पुख्ता तथ्यों के आधार पर सच लिखें, खुलकर लिखें, लेकिन सच के अलावा कुछ न लिखें, जो पुख्ता न हो उसे न लिखें, और आगे न बढ़ाएं।
-सुनील कुमार
 


Date : 11-Aug-2019

कांग्रेस पार्टी ने कल सुबह से शाम तक मशक्कत करके अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी एक बार फिर सोनिया गांधी पर डाली है जो कि कार्यकारी अध्यक्ष रहेंगी, और हो सकता है कि पार्टी सचमुच ही एक पूर्णकालिक अध्यक्ष की तलाश करे, और न भी करे तो भी कम से कम सोनिया को महज कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। बहुत से लोगों को यह बात एक नाटक लग सकती है, और कांग्रेस के आलोचकों को इस पर मजाक उड़ाने का एक अच्छा मौका मिल गया है। सोनिया गांधी 19 बरस तक कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं, और यह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि राजीव गांधी के जाने के बाद उन्होंने अपने को और अपने बच्चों को राजनीति से अलग ही कर लिया था, और पी.वी. नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया गांधी के खिलाफ कुछ दबी-छुपी हरकतें की भी थीं। विद्याचरण शुक्ल के मार्फत राव ने बोफोर्स को लेकर कई ऐसी अफवाहों को जिंदा करने की कोशिश की थी जिनसे सोनिया गांधी के लिए एक दिक्कत खड़ी हो। लेकिन बेअसर रहकर ऐसी बातें वक्त के साथ दम तोड़ गईं, और नरसिंहराव के बाद एक वक्त ऐसा आया जब कांग्रेस पार्टी अपने अस्तित्व के लिए एक बार फिर सोनिया गांधी की मोहताज हुई, लौटकर उनके दरवाजे पहुंची। सोनिया ने पार्टी की अगुवाई करते हुए उसे सत्ता का वापिस पहुंचाया, और यूपीए ने दो-दो कार्यकाल पूरे किए। इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि विदेशी मूल की सोनिया गांधी भारत के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार की महज बहू थीं, और अनचाहे हालातों के चलते वे राजनीति में आने को मजबूर हुई थीं। और शायद जिस वक्त उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल के फैसले की घोषणा हो जाने के बाद भी दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र की प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया, वह दुनिया का शायद सबसे बड़ा इंकार था। उन्होंने पूरे दिल से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, जो कि तमाम पैमानों पर उन हालातों में उस पार्टी के भीतर की सबसे अच्छी पसंद थे। उनके पहले कार्यकाल के बाद सोनिया ने पार्टी और गठबंधन की अगुवाई करते हुए यूपीए को दूसरी बार सत्ता पर पहुंचाया था, और उस वक्त भी वे खुद किसी सरकारी ओहदे पर आने, या राजनीति में आ चुके अपने बेटे को मंत्री बनाने या किसी और सरकारी ओहदे पर बिठाने के मोह से पूरी तरह अछूती और बची रहीं। इन तमाम बातों को देखते हुए सोनिया गांधी का मूल्यांकन आज के संदर्भ में किया जाना चाहिए जब भारत की चुनावी राजनीति में नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने भारतीय संसदीय ढांचे को ठीक उसी तरह एकध्रुवीय बना दिया है जिस तरह दुनिया मेें अमरीका एकध्रुवीय व्यवस्था बन चुका है। 

पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता पर वापिसी न होने को लेकर उसकी बड़ी आलोचना हुई, और खासकर उसके अध्यक्ष राहुल गांधी की। यह इसलिए हुआ कि कांग्रेस के चाहे या अनचाहे, देश के मीडिया में मोदी के मुकाबले राहुल तस्वीर पेश की गई थी, और जब चुनावी नतीजे निकले तो मोदी के मुकाबले राहुल कहीं नहीं टिके, राहुल की पार्टी कहीं नहीं टिकी, राहुल का यूपीए गठबंधन कहीं नहीं टिका। लेकिन इसके साथ-साथ पिछले लोकसभा चुनाव में यह बात भी साफ हुई कि राहुल से बिल्कुल परे का अखिलेश-मायावती गठबंधन भी मोदी के मुकाबले कहीं नहीं टिका, राहुल से परे की एक पार्टी, लालू की आरजेडी कहीं नहीं टिकी, पश्चिम बंगाल में ममता ने गहरी शिकस्त झेली, दक्षिण भारत में कांग्रेस से परे की पार्टियां भी मोदी से हारीं। लेकिन मीडिया के मार्फत जिस तरह की जनधारणा मोदी और राहुल के मुकाबले की बनाई गई थी, उसके मुताबिक शिकस्त केवल राहुल के नाम दर्ज की गई। हमने उस वक्त भी आंकड़े गिनाते हुए लिखा था कि कांग्रेस ने पांच बरस पहले के लोकसभा चुनाव के पहले के मुकाबले अपनी हालत सुधारी थी, और राहुल गांधी के लिए इस्तीफा देने की बात नहीं की। राहुल गांधी को ऐसे नाजुक मौके पर इस्तीफा नहीं देना चाहिए था। लेकिन देश में समय-समय पर पार्टियों और सरकारों में बहुत से नेताओं ने किसी हादसे या हार की जिम्मेदारी लेते हुए कभी रेलमंत्री की कुर्सी छोड़ी, तो कभी पार्टी की। ऐसा कम ही होता है कि पार्टी के नेता हार की जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष का पद छोड़ दें, लेकिन राहुल गांधी ने वैसा किया था, उस पर अड़े रहे, और नया अध्यक्ष चुनने से कहा जा रहा है कि उन्होंने अपने को अलग भी कर लिया।

ऐसे हालात में कांग्रेस ने काफी मशक्कत करके नया अध्यक्ष चुनने की कोशिश की, और शायद ऐसी सर्वसम्मति नहीं जुट पाई कि वे किसी एक नाम को कल शाम घोषित कर पाते। ऐसे में उन्होंने खासे अर्से से बीमार चल रहीं सोनिया गांधी पर एक बार फिर पार्टी की अगुवाई करने का जिम्मा डाला है, जो कि बहुत बुरा फैसला भी नहीं है। कोई भी पार्टी अध्यक्ष अपने भीतर से ही चुन सकती है, और कांग्रेस पार्टी एक कामयाब अमित शाह को तो अपना अध्यक्ष बना नहीं सकती, इसलिए उसने अपने भीतर से ही अध्यक्ष चुना, चाहे वह पूर्णकालिका हो, चाहे कार्यकारी। यह समझने की जरूरत है कि राजनीतिक दलों के बीच नेहरू-गांधी परिवार को जिस कुनबापरस्ती के लिए कोसा जाता है, वह तो भारतीय राजनीति के डीएनए में शुमार एक खूबी या खामी है जिससे बहुत सी पार्टियां कभी नहीं उबर पातीं। कांग्रेस में चाहे दिखावे के लिए ही सही, बीच-बीच में बहुत से दूसरे अध्यक्ष रहे। लेकिन शिवसेना को देखें, बसपा को देखें, तेलुगुदेशम को देखें, एडीएमके को देखें, डीएमके को देखें, नेशनल कांफ्रेंस को देखें, पीडीपी को देखें, अकाली दल को देखें, सपा को देखें, आरजेडी को देखें, टीएमसी को देखें, या आन्ध्र-तेलंगाना की दूसरी पार्टियों को देखें, एक कुनबा, एक नेता, पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत से परे क्या दिखता है? पार्टी अध्यक्ष के पद को छोड़ दें, तो पूरी की पूरी भाजपा केन्द्रीय राजनीति से लेकर हर राज्य तक दूसरी, तीसरी, और चौथी पीढ़ी के नेताओं से भरी हुई हैं, उन्हीं कुनबों के लोग पार्टी संगठन में, संसद में या विधानसभाओं में पहुंचते हैं, और भाजपा के भीतर महज अध्यक्ष का ही एक पद तो है जो कि कुनबापरस्ती का नहीं है, बाकी तो तमाम टिकटें, तमाम पद कुनबापरस्ती के डीएनए से ग्रस्त हैं ही। इसलिए नेहरू-गांधी परिवार की कुनबापरस्ती अब फिजूल की बात हो गई है, पूरी भारतीय राजनीति ही कुनबापरस्त है, व्यक्तिवादी है, एक व्यक्ति पर केन्द्रित है, और उसे अलोकतांत्रिक हद तक जाकर नेता बनाए रखने वाली है। 

अब सोनिया गांधी की चर्चा करें, तो वे इंदिरा के बाद और मोदी के पहले के पूरे दौर में सबसे कामयाब पार्टी अध्यक्ष रही हैं। मोदी को कोई पैमाना मानकर सोनिया या कांग्रेस या राहुल की उनसे तुलना जायज नहीं है क्योंकि मोदी अभूतपूर्व हैं, और उन्होंने भारतीय राजनीति के खेल के सारे नियम-कायदे, सारे बैट-बल्ले सब कुछ बदलकर रख दिए हैं, और वे अपनी तरकीबों के साथ अतुलनीय हैं, बेमिसाल हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि लोकतंत्र में दूसरी पार्टियां शटर गिराकर घर बैठ जाएं। कांग्रेस का कल का फैसला उसकी सीमाओं और संभावनाओं को देखते हुए उसका सबसे अच्छा फैसला है। न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के भीतर, बल्कि कांग्रेस पार्टी के बाहर, और उसकी अगुवाई वाले यूपीए गठबंधन में भी सोनिया सबसे अधिक स्वीकार्य नेता हैं, सबसे अधिक धीर-गंभीर नेता हैं, और सबसे अधिक कामयाब साबित नेता भी हैं। एक पार्टी अपने कार्यकारी अध्यक्ष को कब तक बनाए रखे यह उसकी अपनी प्राथमिकता है। ऐसे में सोनिया की शक्ल में इस देश की राजनीति को विपक्ष की एक मजबूत अगुवाई मिली है जो कि यूपीए को भी एक नई ताकत देंगी, और जो यूपीए के बाहर की पार्टियों से भी एक बेहतर तालमेल की संभावना रखती हैं। 

सोनिया के इस जिम्मेदारी को सम्हालने के साथ ही सोशल मीडिया पर उनका मखौल उड़ाने की भी एक नई और बहुत बड़ी संभावना खड़ी हुई है, और लोकतंत्र में लोग उसका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है, और लोकतंत्र का मतलब ही आलोचना, कटु आलोचना, और नाजायज आलोचना तक की छूट रहता है, और आज हो सकता है कि लोगों को महज सोनिया गांधी एक ऐसा सुरक्षित निशाना दिख रही हैं जहां से उन पर कोई कानून या गैरकानूनी वार होने का खतरा न हो। अच्छा है लोगों को आज किसी के तो खिलाफ खुलकर लिखने का मौका मिले, और सोनिया गांधी ने पिछले दशकों में कई किस्म के वार झेले हैं, और उनके सामने यह मिसाल भी है कि किस तरह नेहरू उनके खिलाफ बने हुए सबसे कड़वे और सबसे अन्यायपूर्ण कार्टूनों की भी तारीफ करते थे। आने वाले दिन देश की राजनीति में, लोकतंत्र में सोनिया गांधी की एक महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करेंगे।  
-सुनील कुमार


Date : 10-Aug-2019

अभी जब कश्मीर को केन्द्र सरकार ने केन्द्र शासित प्रदेश बनाया है, और देश भर के गैरकश्मीरी लोगों में से एक बड़े तबके के लोग इस पर सोशल मीडिया में गंदी बातें लिख रहे हैं, तो कुछ लोगों ने यह बात भी लिखी है कि किस तरह देश के मीडिया के नामी-गिरामी चेहरे इन बातों को अनदेखा कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे ही चर्चित टीवी-सितारों के नाम गिनाए हैं कि जब आजम खान ने लोकसभा में एक महिला सांसद के बारे में आपत्तिजनक बात कही, तो ये तमाम नाम उन पर टूट पड़े थे, और उन्होंने आजम के खिलाफ क्या-क्या लिखा था। इसी तरह आज जब कश्मीर की लड़कियों को सामान की तरह बाकी देश में लाने की खुली चर्चा चल रही है, और इसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर तक शामिल हो गए हैं, तब नामी-गिरामी टीवी चेहरों की यह टोली उसे अनदेखा करते हुए खामोश है। 

दरअसल इस देश में मीडिया के लोगों के बीच खेमेबंदी इतनी मजबूत हो गई है कि बहुत से पत्रकारों को कायदे से तो अपने पसंदीदा राजनीतिक दल में चले जाना चाहिए। ऐसा करके वे अधिक ईमानदार हो सकेंगे, और उनकी टीवी-पत्रकारिता की साख भी बढ़ सकेगी। मीडिया के लोगों का राजनीतिक रूझान कोई गलत बात नहीं है, अगर वह खुलकर मंजूर किया जाए। बहुत से नामी-गिरामी अखबारों के संपादक भी राजनीतिक दलों, राजनीतिक विचारधारा, या किसी सांस्कृतिक खेमे से जुड़े रहते हैं, और जब वे इस बात को खुलकर मंजूर कर लेते हैं, तो कोई दिक्कत नहीं बचती। मीडिया को कहीं से भी निष्पक्ष या तटस्थ रहने की जरूरत नहीं रहती, और उसे अपनी प्रतिबद्धता, अपनी पसंद या नापसंद खुलकर बताते हुए उसके बाद लिखना या बोलना चाहिए जिससे उसकी कही बातों को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में लिया जा सके। खतरा वहीं रहता है जहां लोग तटस्थ बने रहने का अभिनय करते हैं, और बेशर्मी के साथ किसी नेता या किसी पार्टी के चापलूस बने हुए काम करते हैं। 

भारत में कई राजनीतिक दलों के अपने अखबार हैं। दक्षिण भारत में पार्टियों या नेताओं के अपने टीवी चैनल भी हैं। यह एक अधिक ईमानदार व्यवस्था है जिसमें पार्टी के मुखपत्र, या ऑर्गन कहे जाने वाले अखबारों को उनकी संबद्धता के साथ ही देखा जाता है। वामपंथी पार्टियों, शिवसेना, भाजपा या कांग्रेस पार्टी के अपने अखबार हैं जिनसे कभी भी तटस्थ होने की उम्मीद नहीं की जाती। लेकिन जब देश के प्रमुख समाचार चैनल या कई अखबार चुनाव के वक्त या फिर पांचों बरस बारहमासी तटस्थता की खाल ओढ़े हुए बेईमानी का प्रचार करने में लगे रहते हैं, तो उनकी वजह से पूरे मीडिया की साख खत्म होती है। आज हिन्दुस्तान में टीवी चैनलों पर समाचार देखते हुए लोगों को यह समझ नहीं पड़ता कि विचारों के सैलाब में से समाचार कैसे निकाले जाएं, और उनके किन हिस्सों पर भरोसा किया जाए। टीवी की खबरों में जितने तथ्य रहते हैं, उससे अधिक विशेषण रहते हैं, और लोग चारण या भाट की तरह, या मुखौटे पहनकर फुटपाथ पर प्रचार करने वालों की तरह लगे रहते हैं, और वे अपने आपके पत्रकार होने का दावा भी करते हैं। 

भेडि़ए को भेडि़ए की तरह रहना चाहिए, उसमें कोई बुराई नहीं है, उसकी अपनी एक नस्ल है, और फिर वह हिंसक हो, या मांसाहारी हो, वह उसका चरित्र है, उसकी कुदरती जरूरत है। दिक्कत तब है जब भेडिय़ा गाय की खाल ओढ़कर आए, और फिर लोगों को धोखा देकर खाए। देश के टीवी चैनलों में से एक-दो चैनल खुलकर साम्प्रदायिक, और हिंसक हैं, भड़काऊ हैं, और धर्मान्धता बढ़ाते चलते हैं। ऐसे में उनको पहचानना बड़ा आसान रहता है, और बाकी चैनलों को, कुछ अखबारों को भी अपने दर्शकों और पाठकों के लिए ऐसी सहूलियत का इंतजाम करना चाहिए। टीवी समाचार चैनल अपने चैनल के निशान के साथ-साथ पसंदीदा पार्टी का निशान भी लगा सकते हैं, और उससे वे एकदम से बेईमान से हटकर ईमानदार हो जाएंगे। भारत में पुरातत्व के जानकार पत्थरों पर लिखे हुए को पढ़कर बताते हैं कि सैकड़ों बरस पहले भी किस तरह चारण और भाट रहते थे जिन्हें राजा के गुणगान करने की तनख्वाह मिलती थी। आज भी अगर लोग अपनी यह शिनाख्त उजागर करके यह काम करेंगे तो उनका अधिक सम्मान होगा, वरना आज वे बिके हुए मीडिया के नाम से जाने जाते हैं। लोगों को जो काम करना हो, ईमानदारी से और पारदर्शी तरीके से करना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 09-Aug-2019

आज विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर दुनिया के बहुत से देशों में आदिवासियों द्वारा, और उनके लिए तरह-तरह के जलसे किए जा रहे हैं, लेकिन उनके बुनियादी मुद्दे अमेजान के जंगलों से लेकर बस्तर तक, और हिंदुस्तान की सुप्रीम कोर्ट से लेकर हॉलीवुड की फिल्म अवतार तक खतरे में हैं। आज भारतीय सुप्रीम कोर्ट देश के दस लाख से अधिक आदिवासियों को बेदखल करने के एक मामले में लगा हुआ है, और इससे पूरे देश में आदिवासी-गैरआदिवासी तबकों के बीच एक गहरी खाई और चौड़ी होने जा रही है। इससे परे चारों तरफ आदिवासी इलाकों में जंगल और खदान को लेकर धरती के इन मूलनिवासियों के बीच भारी बेचैनी फैली हुई है क्योंकि हजारों बरस से इस जमीन पर इन पेड़ों के बीच रहते चले आ रहे ये समाज आज सब कुछ खो देने का खतरा झेल रहे हैं।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की बात करें तो यहां पर सबसे घने आदिवासी इलाके बस्तर में नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच बेकसूर आदिवासियों का लहू बहते चौथाई सदी से अधिक हो चुका है, और शहरी समाज के लिए ये मौतें महज आंकड़ा हैं। एक बरस से दूसरे बरस ये आंकड़े कुछ कम हो जाते हैं, तो बड़ी-बड़ी वर्दियां उन्हें ही अपनी कामयाबी मान लेती हैं। लेकिन मौतों का यह सिलसिला आदिवासियों के शोषण की जमीन पर पनपा था, और अब फल-फूल रहा है। आज के दिन देश के तमाम नक्सल प्रभावित राज्यों को चार कदम आगे बढ़कर इसके शांतिपूर्ण निपटारे की लोकतांत्रिक पहल करनी चाहिए, और नक्सल हिंसा में झुलसे हुए आदिवासी इलाकों के लिए वही एक बड़े हक की बात हो सकती है। दूसरी बात छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में उन अरबपति-खरबपति कारखानेदारों की है जिन्होंने साजिश और जालसाजी से आदिवासी जमीन खरीदी है, और जिनके मामले सामने आ जाने के बाद भी सरकारी नरमी का मजा पाते हुए ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि आदिवासियों को धोखा देकर खरीदी गई जमीन पर कारखाने खड़े करने वालों को जेल भेजे ताकि वह बाकी लोगों के लिए एक मिसाल बन सके। छत्तीसगढ़ और हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया में जहां-जहां खदानें हैं, वहीं-वहीं जंगल भी हैं, और वहीं-वहीं आदिवासी भी हैं। खनिजों के लिए आदिवासियों को किस तरह बेदखल किया जाता है, यह हिंसानियत धरती से लेकर अवतार फिल्म के दूसरे ग्रह तक दिखाई पड़ती है, और  हर प्रदेश को ऐसी हिंसा खत्म करने के लिए हर कोशिश करनी चाहिए।

छत्तीसगढ़ में टाटा को जमीन दिलवाने के लिए बस्तर के आदिवासी इलाकों के बीच पिछली सरकार ने एक ऐसे कलेक्टर को तैनात किया था जिसने फर्जी ग्रामसभाएं करवाकर आदिवासी जमीनों की लूट की सरकारी सुपारी उठाई थी, और अब वह फर्जीवाड़ा उजागर हो चुका है। आज सही समय है जब राज्य सरकार ऐसे तमाम जुर्म की सजा तय करे, ताकि प्रदेश में दूसरे कोई कलेक्टर ऐसे जुर्म का हौसला न कर सकें। आदिवासियों से जुड़े हुए मुद्दे बहुत साफ हैं, और तमाम राजनीतिक दलों के नेता उनसे अच्छी तरह से वाकिफ हैं। लेकिन हमने बस्तर जैसे इलाकों में यह देखा है कि किस तरह वहां के आदिवासी नेता अपने समाज के व्यापक हितों को कारोबारियों के हाथ बेच देने के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं। यह सिलसिला उजागर होना चाहिए, इसका भांडाफोड़ होना चाहिए। हम सामाजिक हकीकत से परे एक राजनीतिक हकीकत की बात करें, तो भी आदिवासी समाज और इलाकों की अब तक चली आ रही अनदेखी किसी पार्टी को सत्ता में आने से रोक सकती है, यह पिछले चुनावों के नतीजों से साफ हो चुका है। इसलिए किसी और वजह से न भी हो, तो भी अपने खुद के राजनीतिक अस्तित्व के लिए नेताओं और पार्टियों को आदिवासी मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए। यह केवल जरा से मुद्दे हैं, आदिवासियों से जुड़े और भी कई मुद्दे हैं जिन्हें उठाना चाहिए और महज साल का एक दिन इन पर चर्चा के लिए काफी नहीं है।
-सुनील कुमार


Date : 08-Aug-2019

कश्मीर में मोदी सरकार ने जिस रफ्तार से जो कुछ किया है, वह सबके सामने है। अब उसके हो जाने के बाद अलग-अलग तबके अपने-अपने हिसाब से उसे देख रहे हैं। देश की दूसरी सबसे प्रमुख पार्टी, कांग्रेस में नेताओं में मतभेद दिख रहा है कि मोदी सरकार के 370 पर फैसले का कितना विरोध किया जाए, और कितना नहीं। दूसरी तरफ कश्मीर के भीतर आज संगीनों के साए में एक सन्नाटा दिख रहा है, और जाहिर है कि वहां के लोगों को अभी तो घरों के भीतर रखा गया है, बिना फोन और इंटरनेट के रखा गया है, इसलिए उनकी तुरंत कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आ रही है। सरकार ने अपनी तरफ से जनधारणा बदलने और बनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को कश्मीर भेजा है जो वहां आधा दर्जन चुनिंदा लोगों के साथ खड़े होकर कुछ खाते-पीते दिख रहे हैं, जिससे सरकार लोगों के बीच भरोसा कायम करते दिख रही है।

लेकिन इस बीच लिखने की एक वजह आज यह आन पड़ी है कि देश के तमाम कट्टर हिंदूवादी, आक्रामक राष्ट्रवादी, मुस्लिम-विरोधी, और पाकिस्तान-विरोधी जैसी ताकतें मोदी सरकार के फैसले पर खुशियां मनाने के साथ-साथ सोशल मीडिया पर जिस जुबान में कश्मीरियों के बारे में लिख रही हैं, उससे नफरत की खाई गहरी और चौड़ी होने के सिवाय और कुछ नहीं हो रहा है। जो धर्मांध और साम्प्रदायिक लोग मुस्लिम डिलीवरी बॉय के हाथ से आया हुआ डिब्बाबंद खाना भी लेने से मना करें, वे लोग भी आज कश्मीरी मुस्लिम लड़कियों से शादी की हसरतें निकाल रहे हैं, और कश्मीर में जमीन खरीदकर मकान बनाकर बसने की बातें कर रहे हैं। यह पूरा सिलसिला इस कदर हिंसक और अश्लील है कि मानो मोदी की फौज ने कोई दुश्मन देश जीत लिया हो, और फौज के हर सिपाही का अब यह हक है कि वह जीते हुए देश की लड़कियों पर कब्जा कर लें। आदमी की एक हिंसक सोच खुलकर सामने आ रही है कि कैसे दूसरे की जमीन और उनकी लड़कियों पर कब्जा किया जाए। यह लग ही नहीं रहा है कि ये लोग इसी कश्मीर को पाकिस्तान को देने के बजाय उसे चीर देने की बातें कर रहे थे। ऐसा लगता है कि इनके लिए कश्मीर महज जमीन का एक टुकड़ा है, और वहां के इंसानों में से उन्हें महज जवान लड़कियों की देह पसंद है।

ऐसी हमलावर सोच, और ऐसी हिंसक जुबान की नुमाइश इस देश को एक घटिया समाज से भरा हुआ साबित कर रही हैं, और इसके बारे में देश के बड़े-बड़े नेता, खासकर वे नेता जो कि कश्मीर का यह फैसला लेकर उस पर अमल कर रहे हैं, वे तमाम लोग चुप हैं। वे जब तक कुछ बोलते नहीं, तब तक इस देश में दंगाई सोच रखने वाले नफरतजीवी लोग हवा में इतना जहर घोल चुके रहेंगे कि बाद में उस कश्मीर में जाकर बसने वाले कश्मीरी पंडितों को उसका हिसाब चुकता करना होगा। आज कश्मीरी पंडितों में से जो लोग कश्मीर लौटकर वहां बसने की संभावना देखते हैं, वे लोग शांत हैं। लेकिन जिन लोगों को वहां कभी नहीं जाना है, वे कश्मीर को एक जमीन और एक देह की तरह देखकर अपनी हिंसा का लावा चारों तरफ फैला रहे हैं। यह वक्त है कि देश के बड़े नेता मुंह खोले, और ऐसे बकवासी मुंहों को बंद रखने की चेतावनी दें।
-सुनील कुमार


Date : 07-Aug-2019

एक पखवाड़े के भीतर दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा की दो बड़ी महिला नेताओं का गुजर जाना दिल्ली की आंखों को गीला कर गया है। शीला दीक्षित के बाद सुषमा स्वराज। दोनों की सोच एकदम अलग, दोनों की पार्टियां एकदम अलग, लेकिन दोनों के व्यक्तित्व की कुछ बातें ऐसी रहीं कि जिन्हें लेकर पार्टियों के आर-पार, खेमों के आर-पार, राजनीति से बाहर के लोगों के बीच भी एक दुख दिखा, उनके लिए तारीफ दिखी, और लोग अच्छी बातें कहते दिखे। इन दोनों की सज्जनता से परे, काबिलीयत से परे, और कामयाब राजनीतिक करियर से परे इनके बीच बहुत सी और बातें एक सी नहीं रहीं, लेकिन दोनों की भलमनसाहत को लोग जिस तरह याद कर रहे हैं, उससे एक बात उभरकर आती है कि भले लोगों के बीच भलमनसाहत की थोड़ी सी कदर अभी बाकी है। और राजनीति महज ओछेपन का खेल नहीं रह गई है, और लोग अच्छी बातों का अब तक सम्मान करते हैं। 

यह बात कहना आज जरूरी इसलिए हो गया है कि राजनीति मुजरिमों से लद चुकी है, ओछापन एक लुभावना औजार हो गया है, नैतिकता की कोई जगह नहीं रह गई है, और ऐसे में कम संख्या में रह गए, अल्पसंख्यक बिरादरी की तरह एक बिरादरी बन गए भले लोगों को भी अच्छी तरह याद करना जरूरी है। चूंकि सत्ता से जुड़ा हुआ बहुत लंबा राजनीतिक जीवन आमतौर पर कुछ विवादों से घिर ही जाता है, इसलिए शीला दीक्षित और सुषमा स्वराज दोनों के साथ कुछ अप्रिय बातें जुड़ी रहीं जिनकी चर्चा के बिना उनके व्यक्तित्व पर चर्चा अधूरी रहेगी। शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते हुए दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों में कुछ भ्रष्टाचार हुआ था, जिसकी सीधी जवाबदेही उन पर नहीं थी, लेकिन वह उनके कार्यकाल में जरूर हुआ था। इसी तरह सुषमा स्वराज के लंबे सत्ताकाल में कर्नाटक में खदानों के मालिक रेड्डी बंधुओं के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते उनकी तस्वीर से वे कभी नहीं उबर पाईं, और जैसे-जैसे रेड्डी बंधु जुर्म की दुनिया में शोहरत पाते रहे, सुषमा स्वराज तोहमत पाती रहीं। इसके अलावा एक और बात के लिए सुषमा स्वराज को याद किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। जब देश में कांग्रेस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री चुना था, उसके ठीक पहले संसद में सुषमा स्वराज ने अपने खुद के स्तर से खासे नीचे जाकर कहा था कि अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनेंगी, तो वे सिर मुंडा लेंगी, जमीन पर सोने लगेंगी, और एक भिक्षुणी की जिंदगी गुजारेंगी। उनके यह कहने के बाद भी सोनिया को नेता चुना गया था, यह अलग बात है कि उन्होंने खुद यह फैसला लिया कि मनमोहन सिंह उनके मुकाबले बेहतर प्रधानमंत्री होंगे, और वे यह ओहदा मंजूर नहीं करेंगी। इसलिए सुषमा की बात पूरी होने का मौका नहीं आया। 

लेकिन इससे परे यह याद रखने की जरूरत है कि संसद के भीतर, संसद के बाहर, संयुक्त राष्ट्र संघ में, या दूसरे सार्वजनिक मंचों पर सुषमा स्वराज ने अपनी पार्टी की नीतियों पर चलते हुए अपने खुद के संघ के बुनियादी मूल्यों पर चलते हुए एक राजनीतिक और संसदीय शिष्टाचार कायम रखा, और उस बात के लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। वे बहुत शानदार बोलने वाली थीं, संसद में भाजपा की अगुवाई करने में वे एक बहुत मजबूत नेता साबित हुईं, और जब तक मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना आसमान पर छा नहीं गई थी, ऐसा मानने वाले लोग कम नहीं थे कि एक दिन वे भाजपा की प्रधानमंत्री बन सकती हैं। मोदी एक अभूतपूर्व कद और विशाल अस्तित्व लेकर भाजपा की केन्द्रीय राजनीति में पहुंचे, और भाजपा के तब तक के तमाम राष्ट्रीय नेता एक-एक कर, धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए जिनमें सुषमा स्वराज भी शामिल थीं। पिछली मोदी सरकार के पांच बरस के कार्यकाल में वे अपने तमाम राजनीतिक जीवन के सबसे कमजोर दौर से गुजरीं, जब प्रधानमंत्री ही सारी विदेश नीति को तय कर रहे थे, उस पर अमल कर रहे थे, और सुषमा महज उनके एक सहायक के रूप में विदेश मंत्री के ओहदे पर बैठी हुई भर थीं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर मोदी ने एक धूमकेतू की तरह अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी, और उनके आभामंडल में किसी और की कोई गुंजाइश नहीं थी। बाद में अपनी सेहत के चलते वे खुद ही मोदी सरकार के दूसरे, और मौजूदा कार्यकाल में किनारे हो गई थीं, और सत्ता से रिटायर होने के बाद एक बरस भी वे नहीं गुजार पाईं, और सेहत उनका साथ छोड़ गई। एक वक्त था जब देश की भाजपा की राजनीति में सुषमा स्वराज बहुत बड़ा नाम बन चुकी थीं, और तब तक नरेन्द्र मोदी गुजरात से बाहर निकले भी नहीं थे। लेकिन राजनीति महज बरसों की गिनती नहीं होती है, वह किसी वक्त पर सत्ता पर काबिज रहने की सबसे अधिक काबिलीयत रखने का नाम भी होती है, और उसमें मोदी के मुकाबले और कोई भी नेता दूर-दूर तक नहीं टिक पाए थे, लेकिन फिर भी सुषमा ने एक सहायक की भूमिका में भी पांच बरस गुजारते हुए दुनिया भर के हिन्दुस्तानियों की मदद करने, भारत आकर इलाज करवाने के लिए पाकिस्तान सहित बाकी पड़ोसी देशों के मरीजों की मदद करने का जो काम किया है, उसे लोग हमेशा याद रखेंगे। शीला दीक्षित को भी डेढ़ दशक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहते हुए उसे एक बेहतर ढांचा देने के लिए याद रखा जाएगा, और राजनीति में ऊंचे आदर्शों पर चलने, भलमनसाहत कायम रखने के लिए भी याद रखा जाएगा। 

एकाएक दिल्ली में बसी हुई इन दो बड़ी नेताओं का जाना भारतीय राजनीति के केन्द्र में भलमनसाहत के घनत्व को एकाएक कम कर गया है। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Aug-2019

जम्मू-कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के फैसले पर कल जब इसी जगह हमने लिखा, दोपहर के उस वक्त संसद में इस फैसले पर बहस चल ही रही थी। उसके बाद रात तक अलग-अलग बहुत से तबकों ने कुछ जानकारियां सामने रखीं, कुछ सोच बताई, और कश्मीर से आने वाली जमीनी खबरों ने वहां का एक सन्नाटा बयां किया। वह सन्नाटा जो पिछले दशकों में आए दिन सड़कों पर सुरक्षा बलों पर पथराव की शक्ल में सामने आता था, लेकिन कल के कश्मीर में उन पत्थरों को हाथ नहीं मिले, हाथों को किसी वर्दी का निशाना नहीं मिला, या इनमें से किसी को भी कोई हौसला नहीं मिला। इस फैसले की मुनादी के साथ वहां पर जिस बवाल की आशंका थी, उसे देखते हुए मोदी सरकार ने वहां केन्द्रीय सुरक्षा बलों की बड़ी मौजूदगी पहले ही तय कर दी थी, और दो तरह के आंकड़े हवा में हैं, जिनमें से एक में कहा जा रहा है कि कश्मीर में सुरक्षा बल हर इक्कीस कश्मीरियों पर एक है, और दूसरे में कहा जा रहा है कि हर पांच कश्मीरियों पर एक बंदूकबाज सुरक्षा बल तैनात है। इनमें से जो भी बात सही हो, इस ताजा तैनाती के पहले भी, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के भी पहले, कश्मीर दुनिया में सबसे बड़ी फौजी तैनाती बनी हुई थी, जो कि पिछले पांच बरस में और बढ़ी ही है। 

फिलहाल केन्द्र सरकार के कश्मीर को विभाजित करने, केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले के खिलाफ वहां कोई पत्थर उठते नहीं दिख रहा है, और देश के अधिकतर राजनीतिक दलों के बीच इस फैसले के खिलाफ कोई बुनियादी असहमति नहीं दिख रही है। कुछ पार्टियां इसके खिलाफ हैं, लेकिन वे जनता के बीच वैसे भी हाशिए पर जा चुकी हैं, और उनकी असहमति एक लोकतांत्रिक मुद्दा जरूर है, लेकिन उसका बहुसंख्यक आबादी के वोट से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में आज कुछ बातें उठ रही हैं जिन्हें मोदी के संसदीय बाहुबल तले भी सुनने और समझने की जरूरत है। लोकतंत्र महज बहुमत की ताकत नहीं होता, अल्पमत की असहमति उसका एक अविभाज्य हिस्सा होता है, और उसे ध्यान में रखते हुए आज इतिहास में दर्ज हो रहे तथ्यों और तर्कों को भी सुनना चाहिए। 

मोदी सरकार ने कल जिस फैसले की घोषणा की है, उसके पीछे जो संवैधानिक बुनियाद बताई है, उस पर देश के एक बड़े संविधानवेत्ता सोली सोराबजी का कहना है कि कश्मीर की संविधान सभा की अनुमति से ही कल का यह फैसला किया जा सकता था, उसके बिना नहीं। और अभी तो कश्मीर की विधानसभा भी अस्तित्व में नहीं है, इसलिए महज राज्यपाल की सहमति को राज्य की संविधानसभा या विधानसभा की सहमति नहीं माना जा सकता। इसके अलावा एक दूसरा तर्क कल रात की एक बहस में उभरकर यह आया है कि इसके बाद क्या केन्द्र की कोई भी सरकार धारा 356 के तहत किसी भी राज्य में विधानसभा को भंग करके, उसके बाद उस राज्य के विभाजन का फैसला महज इस बिना पर ले लेगी कि राज्यपाल ने उसके लिए सहमति दी है? क्या राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले का ऐसा बेजा इस्तेमाल करने से किसी सरकार को रोका जा सकेगा जिसके बाद उस राज्य को विभाजित करने का फैसला ले लिया जाए? और यहां तो कश्मीर को न सिर्फ विभाजित किया गया है, बल्कि उसे केन्द्र प्रशासित प्रदेश भी बना दिया गया है जो कि पूरी तरह केन्द्र सरकार के मातहत ही काम करेगा। अगर भारत के मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग करके, या उनका हवाला देकर ऐसा किया जाए, तो क्या केन्द्र की कोई सरकार उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाकर उसकी जगह पांच केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाने से रोकी जा सकेगी? कुछ वकीलों ने कल यह राय भी रखी है कि ऐसी बहुत सी संवैधानिक शर्तों की अनदेखी करके यह फैसला लिया गया है, और इसके खिलाफ जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में भी अपील की जा सकती है, और सुप्रीम कोर्ट में भी। अगर, और यह तय भी लगता है कि, इसके खिलाफ अदालत में जो तर्क दिए जाएंगे उनमें भारत में कश्मीर के शामिल होने के वक्त किए गए लिखित वायदे भी उठाए जाएंगे जिनके बारे में लोग अलग-अलग तथ्य और तर्क सामने रख रहे हैं। 

आज भारत के राजनीतिक दलों में एक बड़ा असमंजस है कि देश के इस सबसे अधिक लोकप्रिय साबित हो रहे मुद्दे का कैसे विरोध करें, किस हद तक विरोध करें, और कितना विरोध करें? अभी जब यह बात लिखी जा रही है उस वक्त लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह कांग्रेस से यह सवाल भी कर रहे हैं कि वे इस मुद्दे पर अपना रूख साफ करे। वे संसद की सर्वोच्चता की बात भी कह रहे हैं, और आज के माहौल में उनकी कही बातों से असहमति जाहिर करने वाले लोग एक बड़ा जनाधार खोने का खतरा भी रख रहे हैं। 

लेकिन आज इस मुहाने पर हम कुछ और बातों को भी उठाना चाहते हैं। अगर किसी अदालती रोकटोक के बिना कश्मीर का दर्जा केन्द्र प्रशासित प्रदेश का हो जाता है, और वहां पर आबादी और सरकार को मिले हुए विशेष अधिकार खत्म हो जाते हैं, तो वैसी नौबत में आम और गरीब कश्मीरी की जमीन-जायदाद को बाकी हिन्दुस्तान के भूमाफिया से बचाने के लिए क्या किया जा सकता है? उनकी जिंदगी भर की अकेली दौलत को बचाने के लिए क्या हो सकता है। पौन सदी से अलग नियम-कायदों से हिफाजत में रखे गए कश्मीरियों पर अब जब देश-विदेश के बाजार का एकाएक हमला होगा, तो उससे गरीब कश्मीरियों के बचाव के बारे में तुरंत फिक्र करनी चाहिए, वरना लोग वहां उनसे तरह-तरह के सौदे लिखवाकर उनका सबकुछ लूट लेंगे। 
-सुनील कुमार 


Date : 05-Aug-2019

कश्मीर पर इतिहास का सबसे बड़ा फैसला, कोई विशेष कानून नहीं

कश्मीर को लेकर भारत सरकार कोई बड़ा फैसला लेने जा रही थी, यह तो हफ्ते भर से जाहिर था ही, और यह फैसला क्या हो सकता है, इसे लेकर भी अटकलें इसलिए आसान थीं कि भारतीय जनता पार्टी ने जनसंघ के जमाने से कश्मीर को लेकर जो नारा लगाया हुआ था, या अधिक सही यह कहना होगा कि जो नारे लगाए हुए थे, उनसे परे कुछ करना उसके लिए पीछे हटने सरीखा होता, इसलिए मोदी सरकार ने आज कश्मीर से धारा 370 खत्म करते हुए दो कदम और आगे का काम किया है। संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने इसके साथ-साथ घोषणा की कि जम्मू-कश्मीर को केन्द्र प्रशासित राज्य का दर्जा दिया जा रहा है। कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म हो गया है, और वह एक किस्म से केन्द्र सरकार के मातहत राज्य हो गया है जिसकी विधानसभा तो रहेगी, लेकिन वहां कोई भी विशेष कानून नहीं बच जाएगा। इस फैसले में लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाया है। 

किसी भी केन्द्र सरकार के फैसले के स्तर पर यह एक बड़ा फैसला है, और इससे कश्मीर के भविष्य पर एक अभूतपूर्व और बड़ा असर होने जा रहा है। यह फैसला एक ऐसे समय आया है जब एक तरफ तो अफगानिस्तान से अमरीकी फौजों की वापिसी को लेकर, उसमें अमरीका को पाकिस्तान की जरूरत है। दूसरी तरफ यह फैसला ऐसे वक्त भी आया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान लगातार अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से कश्मीर के मुद्दे पर मध्यस्थता करने की अपील कर रहे हैं, और अमरीकी राष्ट्रपति भी इस दुस्साहसी न्यौते का मजा लेते दिख रहे हैं। ऐसे वक्त पर इस फैसले का कुछ अंतरराष्ट्रीय असर भी, कम से कम भारत और पाकिस्तान के बीच तो होगा ही। कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष की कुछ पार्टियां भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के इस फैसले का विरोध कर रही है कि कश्मीर के खास हालात को अनदेखा करते हुए, भारत के नक्शे में कश्मीर की एक सरहदी जगह को अनदेखा करते हुए यह फैसला लिया गया है। कश्मीर में प्रदेश के बाहर के लोगों के जमीन-जायदाद खरीदने, वहां कारोबार करने पर जो भी रोक अब तक लगी हुई थी, वह इस फैसले के साथ खत्म हो जाएगी, और इससे कश्मीर में लोगों की मिल्कियत पर भी बड़ा असर पड़ेगा, और बाकी देश के साथ कश्मीर के रिश्ते पर भी। आज विपक्षी पार्टियां इसे भाजपा और एनडीए के संसदीय बाहुबल से लिया गया एक मनमाना फैसला कह रही हैं, और कश्मीर के स्थानीय नेताओं का यह भी कहना है कि यह फैसला देश के संविधान के खिलाफ है जिसे सरकार ले ही नहीं सकती थी। दूसरी ओर सरकार के इस फैसले के हिमायती लोगों का कहना है कि आज का सारा फेरबदल आधी सदी के पहले राष्ट्रपति के एक आदेश को बदलकर, आज राष्ट्रपति के जारी किए गए एक नए आदेश का है, और इसमें कोई संवैधानिक दिक्कत नहीं है। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी जरूर दी जाएगी, और कुछ लोगों का यह मानना है कि वह चुनौती अधिक खड़ी नहीं रह पाएगी। 

इस फैसले से जम्मू-कश्मीर की स्थानीय राजनीति में भाजपा या एनडीए, कांग्रेस या कश्मीरी पार्टियों के चुनावी भविष्य पर जो असर पड़ेगा, वह तो अलग ही रहा, लेकिन इस फैसले से बाकी हिन्दुस्तान में भाजपा-एनडीए को एक हौसलामंद पार्टी-गठबंधन की साख मिलते दिख रही है जो कि जो कहती है वह करती है। भाजपा जनसंघ के जमाने से जो नारे लगाते आ रही थी, उन नारों को आज जमीन पर उतारकर उसने अपने पुराने वायदे को ही पूरा किया है। देश में एक तबके का यह मानना है कि भारतीय गणराज्य में शामिल होते समय कश्मीर ने जो शर्तें रखी थीं, उन शर्तों को आज तोड़ दिया गया है। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा के एक बड़े पूर्व केन्द्रीय मंत्री, और एक बड़े वकील अरूण जेटली में यह ट्वीट किया है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में एकीकरण 1947 में हुआ। अनुच्छेद 370 इसके बरसों बाद 1952 में लागू हुआ, और अनुच्छेदद 35-ए 1954 में लागू हुआ। इसका साफ मतलब है कि ये दोनों अनुच्छेद भारत में विलय की शर्त थे ही नहीं। 

आज भाजपा और मोदी के कटु आलोचक दल और नेताओं में से कई केन्द्र के इस फैसले साथ हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसका समर्थन किया है, और मायावती की बसपा ने भी। एनडीए के बाहर की कुछ और पार्टियां भी इस फैसले के साथ हैं। और यह फैसला कश्मीर की पिछली आधी सदी की पृष्ठभूमि में लिया गया फैसला है जो कि बताता है कि कश्मीर में लगातार चल रही राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा, और वहां के अलगाववाद के चलते भारत का एक बड़ा हिस्सा यह मानता था कि कश्मीर में भारत विरोधी, आजादी के हिमायती, या पाकिस्तान परस्त लोगों को काबू में रखने के लिए कोई बड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। कश्मीर के बाहर के हिन्दुस्तान का एक बड़ा हिस्सा, या आबादी का एक बड़ा तबका केन्द्र के इस फैसले के साथ रहेगा ऐसा माहौल दिख रहा है। लोगों का यह भी मानना है कि बहुत सी पार्टियों और गठबंधनों वाली केन्द्र और कश्मीर सरकारों ने अलग-अलग किस्म की नीति-रणनीति इस्तेमाल करके देख ली थीं, लेकिन उनमें से किसी ने कोई सकारात्मक नतीजे नहीं दिए थे। ऐसे में आज का मोदी सरकार का फैसला एक अकेले विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है, और कुछ लोगों ने यह कहा भी है कि यह कश्मीर को देश से काटने के लिए नहीं, देश से जोडऩे के लिए लिया गया फैसला है। यह बात खटकने वाली जरूर है कि आधी सदी से अधिक पुरानी कश्मीर-समस्या का यह समाधान संसद में बिना किसी बहस के इस तरह लागू किया जा रहा है। इसके पहले कश्मीर में जितनी बड़ी चौकसी का इंतजाम किया जा चुका था, उसके बाद संसद में कम से कम कुछ अधिक और काफी बहस की जानी थी, और हो सकता है कि वह बहस मोदी सरकार की हिमायती अधिक साबित होती। कश्मीर की जटिलता के अधिक जानकार और सामरिक-राजनीतिक विश्लेषक इस फैसले के नतीजों को अधिक बारीकी से सामने रखेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत देखने में हो सकता है कि कुछ दशक लग जाएं।

-सुनील कुमार

 


Date : 04-Aug-2019

आज दोस्ती के जलसे, फ्रेंडशिप डे पर हर बरस की तरह छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचों में फिर पुलिस तैनात हो गई। हर दिन नौजवान लड़के-लड़कियां तालाब किनारे, बगीचे में, मॉल में, या नया रायपुर की खाली सड़कों के किनारे मिलते हैं, और कुछ वक्त साथ में गुजारते हैं। जिन लोगों की खर्च करने की क्षमता है, उनके लिए पब, रेस्त्रां, और डिस्को थैक भी मौजूद हैं। लेकिन साल में दो दिन, एक तो दोस्ती के दिन फ्रेंडशिप डे पर, और दूसरे प्रेम के प्रतीक वेलेंटाईन डे पर पुलिस तैनात रहती है क्योंकि कुछ हिंदू धर्मांध और कट्टर संगठन कभी-कभी सार्वजनिक जगहों पर मिलने वाले लड़के-लड़कियों पर हमले करते हैं। अब राज्य में कांग्रेस सरकार आने के बाद ऐसे संगठनों की आक्रामकता कुछ कम हुई है, और अभी ऐसी चेतावनी जारी नहीं की गई है, फिर भी पुलिस चौकन्नी थी। वेलेंटाईन डे पर तो पिछले बरसों में पुलिस का हाल यह था कि सार्वजनिक जगहों पर कहीं गेट बंद करके तो कहीं बाहर से ही लोगों को भगाकर बवाल का खतरा खत्म कर दिया जाता था। 

यह देश नौजवान पीढ़ी की हसरतों को कुचलने में इतना माहिर हो गया है कि जब तक नौजवान जोड़े आत्महत्या न कर लें, या जब तक मानसिक बीमारियों के शिकार न हो जाएं, जब तक उनके सपनों को कुचलने के लिए लठैत भी जुटा लेता है, और परिवार के लोग भी कत्ल करने पर आमादा रहते हैं। और कत्ल तो फिर भी नजरों में आ जाता है, कत्ल से कम की हिंसा तो कई बार खबरों में नहीं आती, पुलिस तक नहीं जाती। यह देश जो कि अनंत काल से श्रृंगार रस से भरा हुआ था, जहां कृष्ण के गोपियों संग रास-रंग को पूजा घर में भी रखा जाता है, उस देश में पिछले कुछ दशकों में प्रेम को पूरी तरह अवांछित मान लिया गया है और सांप और प्रेम दोनों एक साथ दिख जाएं तो हिंदुस्तानी समाज पहले प्रेम को कुलचने में जुट जाता है।

हिंदुस्तानी समाज के ऐसे बड़े हिस्से ने दुनिया के सभ्य देशों को देखा नहीं है, वहां के बारे में जाना नहीं है। इसलिए आम हिंदुस्तानियों को यह मालूम नहीं है कि नौजवान पीढ़ी को उसकी हसरतों से अलग करके उसकी क्षमताओं और संभावनाओं को किस तरह कुचलना हो जाता है। नौजवान अपनी मर्जी के लड़के-लड़कियों के साथ उठ-बैठ नहीं सकते, कहीं आ-जा नहीं सकते, साथ रह नहीं सकते, मां-बाप की मर्जी के बिना शादी नहीं कर सकते, ऐसे में उनका मनोबल टूट जाता है, और समाज में उनकी जो उत्पादकता मिलनी चाहिए, वह संभावना खत्म हो जाती है। हिंदुस्तान में महानगरों का कुछ हिस्सा ऐसी बंदिशों से उबरा है, बाकी शहरों में भी थोड़े से तबके को थोड़ी सी आजादी मिली है, लेकिन यह सब भी मां-बाप की नजरों से बचते हुए करने की बेबसी अधिकतर लोगों के सामने रहती है। 

इस देश की बुनियादी संस्कृति में तो पौराणिक कथाओं से लेकर संस्कृत के कालिदास तक चारों तरफ पे्रम और श्रृंगार रस की मजबूत परंपरा रही है। बाद में पता नहीं किस वजह से हिंदुस्तानी मां-बाप एक दहशत में आ गए, और प्रेम एक वर्जित शब्द हो गया। यह सिलसिला धर्म और जाति के बंधनों से और आगे बढ़ते चले गया। जब देश का एक बड़ा हिस्सा खाप पंचायत की तरह सोचने लगे, तो वह देश आगे नहीं बढ़ सकता। हिंदुस्तान को इस पाखंड से उबरना होगा कि उसकी नौजवान पीढ़ी हमेशा ही बच्चे बनी रहेगी और मां-बाप की मर्जी से ही प्रेम और शादी करेगी।

-सुनील कुमार


Date : 03-Aug-2019

कश्मीर आज एक सन्नाटे में जी रहा है और वहां की किसी नेता को, इंसान को यह नहीं मालूम है कि उनके साथ क्या होने जा रहा है। यह बात महज अलगाववादियों की नहीं है, कश्मीर की तीन प्रमुख पार्टियों, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, और कांग्रेस के नेता भी हक्का-बक्का और हैरान हैं कि केन्द्र सरकार वहां क्या करने जा रही है। पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कश्मीर होकर लौटे, और आते ही उन्होंने 10 हजार अतिरिक्त सैनिक-सिपाही वहां रवाना किए। अब खबर है कि इसके बाद 28 हजार और सैनिक-सिपाही वहां भेजे गए हैं। केन्द्र सरकार ने कल एक अभूतपूर्व चेतावनी जारी की है और कश्मीर गए हुए तमाम गैरकश्मीरी लोगों को तुरंत राज्य छोड़कर निकल जाने को कहा है। अमरनाथ यात्रा बीच में रद्द कर दी गई है और सारे तीर्थयात्रियों को लौटने कह दिया गया है, जिससे एक भारी भगदड़ मची हुई है। कश्मीर गए हुए सैलानियों की वापिसी को लेकर भी बदहवासी फैली हुई है, लेकिन वहां काम कर रहे कई राज्यों के लाखों मजदूरों का क्या होगा इसकी कोई खबर नहीं है। लेकिन बड़ी बात यह है कि ऐसी कार्रवाई क्यों की जा रही है, ऐसी चेतावनी क्यों दी गई है, इतनी फोर्स क्यों भेजी गई है, इसका कोई जवाब केन्द्र सरकार ने या कश्मीर चला रहे राज्यपाल ने किसी को नहीं दिया है। कश्मीर के प्रमुख नेताओं ने कल जाकर राज्यपाल से मुलाकात की है और पूछा है कि क्या हो रहा है उन्हें भी बताया जाए। यह सब तब हो रहा है जब संसद का सत्र चल रहा है, और संसद की छुट्टी के दिन अचानक यह कार्रवाई की जा रही है। लोग अधिक हैरान और हक्का-बक्का इसलिए हैं कि कई दशकों में कभी भी अमरनाथ यात्रा को रद्द नहीं किया गया था, और तब भी नहीं किया गया था जब उस पर सीधा आतंकी हमला हुआ था, और मौतें हुई थीं। आज पूरे के पूरे राज्य में केन्द्रीय सुरक्षा बल और हिन्दुस्तानी फौज चप्पे-चप्पे पर क्यों इस तरह तैनात हो रहे हैं, यह लोगों की समझ से परे है, और कश्मीर की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा रखने वाले, चुनाव लड़कर कई बार वहां की सत्ता सम्हालने वाले नेता और भी विचलित हैं। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के इस दूसरे कार्यकाल में गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर को लेकर एक कड़ा रूख संसद में दिखाया था, और कश्मीर राज्य के लिए संविधान में की गई विशेष व्यवस्था के तहत धारा 35-ए, और धारा 370 को हटाने की चर्चा चल रही है, ऐसा लग रहा है कि सरकार इस बात की घोषणा होने पर राज्य में होने वाली बेचैनी और उपद्रव की आशंका से केन्द्रीय सुरक्षा बलों की ऐसी तैनाती कर रही है। कश्मीर को लेकर केन्द्र सरकार की नीति आज जितनी कड़ी दिखाई पड़ रही है, ऐसी पहले कभी नहीं थी, और कश्मीरी लोगों में इतनी आशंका भी पहले कभी नहीं थी। 

संसद में बहुमत अगर इतना बड़ा हो कि एनडीए के भीतर भी महज भाजपा बहुमत की सरकार बनाने की ताकत अकेले रखती हो, तो वैसे में वह कई किस्म की कार्रवाई इस ताकत और संविधान में मिले अधिकारों के तहत कर सकती है। लेकिन लोकतंत्र महज बहुमत की ताकत का नाम नहीं होता, वह तालमेल और विचार-विमर्श के बाद किसी सर्वमान्य समाधान तक पहुंचने की एक कोशिश का नाम भी होता है, और वैसी बातचीत आज दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक होते दिख नहीं रही है। लोकतंत्र में यह कहीं नहीं लिखा है कि संसद के हर सत्र के पहले प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ पार्टी सर्वदलीय बैठक बुलाए, लेकिन लोकतांत्रिक परंपराएं और संसदीय शिष्टाचार के तकाजे से ऐसा हमेशा ही किया जाता है। जब राजीव गांधी इससे भी बड़े संसदीय बाहुबल के साथ प्रधानमंत्री थे, तब भी यह परंपरा नहीं टूटी थी, और आज भी यह परंपरा जारी है। लेकिन संसद सत्र के चलते ऐसी गोपनीय कार्रवाई इस पैमाने पर की जा रही है और संसद को उससे अलग रखा जा रहा है, यह रूख लोकतांत्रिक नहीं है। इसके अलावा कश्मीर की जो पार्टियां लोकतंत्र पर भरोसा रखती हैं, जो समय-समय पर केन्द्र में, और कश्मीर में भी एनडीए की भागीदार रही हैं, उन पार्टियों से भी कोई बात किए बिना अगर इतनी बड़ी कोई कार्रवाई हो रही है, तो उस पर कश्मीरी जनमत के साथ होने की संभावना इससे कम हो जाती है। 
-सुनील कुमार


Date : 02-Aug-2019

कुछ बातें कभी-कभी महज दिमागी जुगाली के लिए भी करना चाहिए ताकि दिमाग का काम करना एकदम बंद न हो जाए, उस पर चर्बी न चढ़ जाए। दूसरी बात अंग्रेजी में कही गई एक लोकप्रिय बात है कि लोगों को कभी-कभी आऊट ऑफ बॉक्स भी सोचना-विचारना चाहिए। इसका मतलब होता है कि बंधी-बंधाई लीक से हटकर भी कुछ सोचना आना चाहिए। दुनिया का इतिहास और कुदरत भी इस बात के हिमायती हैं क्योंकि अगर हर कोई पहले से रौंदी जा चुकी सड़क पर चलते होते, तो फिर नई पगडंडियां तो कभी बनी ही नहीं होतीं। इसलिए कभी-कभी बंधी-बंधाई बातों से परे भी कुछ सोचना चाहिए, और ऐसा एक मौका अभी सामने आया है। 

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कुछ दिनों से ठंडे पड़े हुए एक विवाद के बाद आज फिर एक दूसरा पत्थर मधुमक्खी के छत्ते पर मारा है, और कहा है कि भारत और पाकिस्तान दोनों अगर चाहेंगे तो वे उनके बीच मध्यस्थता करने को तैयार हैं। पिछले दिनों जब उन्होंने यह कह दिया था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों एक मुलाकात में उनसे कहा था कि वे कश्मीर के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करें। यह बात भारत की विदेश नीति की पुरानी स्थापित बात से एकदम अलग थी, और इसे लेकर भारत में संसद के भीतर और बाहर बवाल भी हुआ था कि अमरीका यह साफ करे कि मोदी ने ऐसा कब कहा। भारत सरकार ने पूरी तरह से इस बात का खंडन किया था कि मोदी ने ट्रंप से ऐसा कुछ कहा था। लेकिन अब ट्रंप ने बिना मोदी का नाम लिए उसी बात को दुहराकर अपनी तरफ से एक पहल की है, एक प्रस्ताव रखा है, और सभ्य दुनिया में पुराने फैसलों से परे ऐसे नए प्रस्ताव कई बार आते हैं, और कई मौकों पर पुरानी बातों से परे कुछ नए कदम बढ़ते हैं। 

हिन्दुस्तान में अगर देखें तो इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच 1972 में दस्तखत हुए एक समझौते में यह तय किया गया था कि ये दोनों देश अपने सारे मतभेद विपक्षी शांतिपूर्ण बातचीत से हल करेंगे। और भारत लगातार किसी समझौते का हवाला देते हुए पाकिस्तान के साथ किसी संभावित बातचीत में किसी तीसरे की भागीदारी या मध्यस्थता के खिलाफ रहा है। लेकिन पाकिस्तान में इस लगभग आधी सदी में कुछ ऐसे मौके आए हैं जब वहां के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने किसी तीसरे पक्ष की जरूरत बताई है। आज हिन्दुस्तान में भी, और हिन्दुस्तान को भी ठंडे दिल से यह सोचना चाहिए कि क्या 1972 के शिमला समझौते को एक धार्मिक किताब की तरह अनंतकाल तक पवित्र विदेश नीति मानकर चलने से उसे कुछ हासिल हो रहा है, या किसी मध्यस्थता से कुछ बेहतर हो सकता है? आज इन दोनों देशों के बीच सरहद पर शक की बर्फ इतनी मोटी जमी हुई है कि उस पर बैठकर कोई बातचीत करने की गुंजाइश नहीं दिखती है। दोनों देशों के बीच इस पूरे दौर में परमाणु हथियारों का मुकाबला चलते रहा, जंग भी हो गई, एक-दूसरे पर आतंकी हमलों की तोहमतें भी लगती रहीं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में ही अचानक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के घर बिना बुलाए जाकर भारत की विदेश नीति में एक तूफान खड़ा कर दिया था, और जब यह थमा तो सरहद पर लाशों से परे और कुछ नहीं दिखा। 

ऐसे में भारत को दुनिया के कुछ दूसरे मामलों से भी सबक लेकर कम से कम अपने घर के भीतर सोचना-विचारना चाहिए। दूसरे देशों की मध्यस्थता हमेशा बुरी ही रहती हो ऐसा भी जरूरी नहीं है। और हर बार ऐसी मध्यस्थता कामयाब होती हो, ऐसा तो बिल्कुल भी जरूरी नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच खुद होकर तो कामयाबी के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। ऐसे में एक मिसाल याद पड़ती है कि ग्रेट ब्रिटेन का एक हिस्सा रहे उत्तरी आयरलैंड के साथ लंदन की ब्रिटिश हुकूमत का हथियारबंद टकराव चलते रहता था। इसका बहुत पुराना इतिहास रहा है जिसकी अधिक चर्चा यहां जरूरी नहीं है। लेकिन इस मामले को इसलिए छेड़ा जा रहा है कि ऐसे तनाव के चलते हुए इस सदी की शुरुआत में ही उस वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने लंदन और उत्तरी आयरलैंड के बीच मध्यस्थ का काम किया था, और एक देश के भीतर ही राष्ट्रीय सरकार और प्रादेशिक सरकार, प्रादेशिक हथियारबंद आंदोलन के बीच एक समझौता करवाया था, हथियार डलवाए थे, और अमन कायम करवाया था। यह एक मिसाल यह सोचने का हौसला देती है कि क्या भारत और पाकिस्तान को परस्पर सहमति के आधार पर किसी मध्यस्थ के साथ बैठकर अपनी विवाद निपटाने की एक कोशिश करनी चाहिए? ऐसी कोशिश बिना किसी शर्त के हो सकती है, और हो सकता है कि उससे संबंधों में जमी हुई यह बर्फ पिघलने में मदद मिल सके। इतिहास की परस्पर थोपी गई एक बंदिश क्या आज एक संभावना की राह में रोड़ा बनकर नहीं खड़ी है? क्या शिमला समझौते से आगे भी निकलने की, बढऩे की, सोचने की जरूरत है? कम से कम सोचने-विचारने के स्तर पर इस बहस में क्या बुरा है कि क्या भारत शिमला समझौते को एक धार्मिक ग्रंथ की कट्टरता से मानने के बजाय तब से अब तक बदल चुकी अंतरराष्ट्रीय हकीकत को सोचते हुए दोनों देशों की भलाई के लिए एक नई संभावना पर भी सोचे, बिना कुछ दांव में लगाए हुए। ऐतिहासिक दस्तावेजों का ऐतिहासिक महत्व तो ठीक है, लेकिन उन्हें वर्तमान की राह में ऐसा रोड़ा भी नहीं बनने देना चाहिए कि उससे भविष्य की संभावना खत्म हो जाए। हम अगर अपनी खुद की सोच कहें, तो वह भारत और पाकिस्तान के बीच किसी मध्यस्थ पर आपसी सहमति स्थापित करके बात शुरू करने की है, और दूसरे लोगों को भी इस सैद्धांतिक बात पर सोचना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 01-Aug-2019

उत्तरप्रदेश से खबरें और तस्वीरें आ रही हैं कि किस तरह सावन में मंदिर जाते कांवरियों के पांव धुलाने में आस्थावान पुलिस लगी हुई है, कहीं जिले के एसपी कांवरियों का बदन दबा रहे हैं, कहीं और बड़े अफसर हेलीकॉप्टर से कांवरियों पर फूल बरसा रहे हैं। खुद राज्य सरकार ने एक आदेश निकालकर कांवरियों को यह छूट दी है कि पेट्रोल पंप पर दुपहियों पर पेट्रोल डलाते हुए उन्हें हेलमेट लगाना जरूरी नहीं है। लेकिन ऐसी खबरों के दौरान ही उत्तरप्रदेश से जगह-जगह से ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि कहीं किसी मुस्लिम को जयश्रीराम कहने के लिए मजबूर करते हुए पीटा जा रहा है, तो कहीं और कोई साम्प्रदायिक तनाव खड़ा किया जा रहा है। 

किसी भी राज्य में पुलिस और प्रशासन इन दोनों का धर्मनिरपेक्ष, सम्प्रदायनिरपेक्ष होना जरूरी होता है। भारत के संविधान के मुताबिक यह कानूनी रूप से भी जरूरी है क्योंकि अगर वे अपनी आस्था के चलते हुए जनता के कामों में भेदभाव करने लगेंगे, तो सरकार का पूरा मकसद ही खत्म हो जाएगा। उत्तर भारत की पुलिस के बीच हिन्दू धर्म की आस्था का बोलबाला पहले से था, और उत्तर भारत के अधिकतर थानों में या तो बजरंग बली के छोटे मंदिर बना दिए गए थे, या फिर थाने के भीतर दीवारों पर हिन्दू देवी-देवता सजे हुए थे। नतीजा यह था कि पुलिस की सोच पहले से हिन्दू चली आ रही थी, और हाल के बरसों में जब योगी आदित्यनाथ जैसे आक्रामक और साम्प्रदायिक सोच वाले मुख्यमंत्री बने, तो पुलिस के भीतर की यह आस्था सिर चढ़कर बोलने लगी। लेकिन बात सिर्फ उत्तरप्रदेश की नहीं है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार के चलते अफसर इसी तरह का काम करने में लग गए थे। मंडला की एक मुस्लिम महिला कलेक्टर सूफिया फारूकी ने शंकराचार्य की चरणपादुका को सिर पर उठाकर सार्वजनिक रूप से सड़कों पर ले जाने का काम किया था, और कई दूसरे अफसरों ने भी आस्था का, या अपने आस्था से बाहर जाकर इसी तरह का काम किया था। 

आज जब सड़कों पर नमाज पढऩे से लेकर हज यात्रा पर सरकारी सब्सिडी तक पर सवाल उठ रहे हैं, जब सुप्रीम कोर्ट सार्वजनिक जगहों पर धर्मस्थलों के अवैध निर्माण गिराने को लेकर अड़ा हुआ है, तब सार्वजनिक जीवन, और खासकर सरकारी नौकरियों से, अदालत और संसद-विधानसभा से धर्म को हटाना जरूरी है। सत्तारूढ़ पार्टी या नेता की सोच के मुताबिक जब सरकारी कामकाज पर धर्म को हावी किया जाएगा, तो उसका नतीजा एक न सिर्फ साम्प्रदायिक, बल्कि धर्मान्ध और अराजक पुलिस की शक्ल में देखने मिलेगा, उत्तरप्रदेश में देखने मिल रहा है, मध्यप्रदेश में देखने मिल चुका है जहां पर दलितों को कुचलना सवर्णों की धार्मिक आस्था के तहत आता है। लोगों को याद होगा कि किस तरह उमा भारती ने मुख्यमंत्री बनने पर सरकारी मुख्यमंत्री-निवास में एक मंदिर बनवा दिया था, मुख्यमंत्री-दफ्तर की मेज पर मूर्तियां रखकर एक छोटा पूजा घर जैसा सजवा दिया था। अब अगर वहां कोई मुस्लिम मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री-आवास में एक मस्जिद बनवा दे, कोई ईसाई मुख्यमंत्री चर्च बनवा दे, कोई सिक्ख मुख्यमंत्री गुरूद्वारा बनवा दे, तो मुख्यमंत्री निवास का क्या हाल रह जाएगा? 

भारत में धर्म का जो आक्रामक रूप आज सार्वजनिक जीवन में, सार्वजनिक जगहों पर हावी हो चुका है, उसे थामने की जरूरत है। यह आक्रामकता बढ़ती चल रही है, और धीरे-धीरे यह बहुसंख्यक तबके, और सत्ता पर बहुमत रखने वाली पार्टी का बुनियादी हक मान लिया गया है। लोकतंत्र एक जनमतसंग्रह नहीं होता जहां सबसे अधिक वोट पाने वाले लोग सब कुछ अपने मन का कर सकें। किसी धर्म से जुड़ी पार्टी का बहुमत पाकर सत्ता पर आना, उसे संविधान की धर्मनिरपेक्षता की शर्त से आजादी पाने की आजादी नहीं देता। देश वैसे भी धर्म के नाम पर बर्बाद हो रहा है, अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है, लोगों की जागरूकता और उनकी तर्कशक्ति धर्म के नाम पर एक साजिश के तहत खत्म की जा चुकी है, लोगों की वैज्ञानिक सोच खत्म की जा चुकी है, इसलिए यह सिलसिला रोकने की जरूरत है। अब सवाल यह उठता है कि जिस देश में हाईकोर्ट का एक जज एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ब्राम्हणों को दूसरी जातियों से बेहतर बताते हुए यह साबित करता है कि ब्राम्हण दो बार जन्म लेते हैं, गैरब्राम्हण एक बार, जिस देश में हाईकोर्ट का एक जज सतीप्रथा का समर्थन करता है, उस देश में सरकारी अमले के धार्मिककरण, और उसकी साम्प्रदायिकता को कौन रोकेंगे? सुप्रीम कोर्ट ?


Date : 31-Jul-2019

मध्यप्रदेश में एक बड़े सीनियर आईएएस अफसर का नाम एक महिला के साथ सेक्स-वीडियो में जुड़ा जो कि पिछले दिनों से चारों तरफ फैल रहा था, तो उस अफसर को एक महत्वपूर्ण विभाग से हटाकर आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान का संचालक बनाया गया है। जाहिर है कि बिना पूरी जांच के, बिना कोई तोहमत साबित हुए सरकार किसी को सजा दे सकती है, तो वह तबादले की किसी किस्म की सजा रहती है जिसे दुनिया सजा मानती है, जो कि हकीकत में सजा रहती है, लेकिन ऐसे तबादले के खिलाफ अफसर किसी अदालत नहीं जा सकते क्योंकि तबादला करना सरकार का विशेषाधिकार रहता है।

अब सोचने की बात यही है कि किसी अफसर का चाल-चलन ऐसा निकला कि उसे सजा देना है, या किनारे करना है, या कम महत्व की जगह पर भेजना है, तो उसे आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान भेज दिया गया। यह देश की सरकारों की मौजूदा सोच का एक सुबूत है कि आदिवासियों से जुड़ी हुई जिम्मेदारियां सजायाफ्ता अफसरों के लायक मानी जाती हैं। यह सिर्फ मध्यप्रदेश में नहीं है, यह छत्तीसगढ़ में भी आए दिन सुनाई पड़ता है जब पिछली सरकार के नेता-अफसर, और मौजूदा सरकार के नेता-अफसर अपने मातहतों को जुबानी धमकी देते हुए यह कहते हैं कि उनका बस्तर तबादला किया जाएगा, तब उन्हें अक्ल आएगी। बस्तर जो कि जाहिर तौर पर सबसे बेबस और सबसे बेजुबान आदिवासियों का इलाका है, जो कि प्रामाणिक तौर पर सबसे पिछड़ा इलाका है, उसे सजायाफ्ता अफसरों और कर्मचारियों के लायक माना जाता है। आजाद हिन्दुस्तान में यह सोच अंग्रेजों की विरासत है जिसमें देश के क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से जिनको सबसे कड़ी और बड़ी सजा के लायक माना जाता था, उन्हें कालेपानी की सजा में अंडमान भेजा जाता था जो कि देश में सबसे प्राचीन और सबसे अछूते आदिवासियों का इलाका था, और है। छत्तीसगढ़ में भी बात-बात में नाखुश सीनियर जूनियरों को मानो कालेपानी की सजा पर बस्तर भेजने की बात करते हैं, और हकीकत में भेजते भी हैं, और लोगों को याद होगा कि पिछली रमन सरकार के एक कार्यकाल के सलाहकार केपीएस गिल ने काम पूरा करने के बाद एक इंटरव्यू में कहा था कि बस्तर से बाहर निकलने के लिए पुलिस कर्मचारियों को बड़े अफसरों को लाखों की रिश्वत देनी पड़ती है। 

आदिवासियों के लिए यह नजरिया पूरी दुनिया में शहरी इलाकों में तकरीबन एक सरीखा है। ऑस्ट्रेलिया हो, या अमरीका, या फिर लैटिन अमरीकी देशों के पूरे-पूरे आदिवासी देश, इन सब जगहों को लेकर बाकी शहरी और संपन्न दुनिया का नजरिया ऐसा ही रहता है। आदिवासियों को सजा का हकदार मान लिया जाता है कि उनके इलाकों में सबसे दुष्ट, सबसे भ्रष्ट, सबसे नालायक, सबसे बदनाम, सबसे बदचलन लोगों को भेजा जाएगा। ऐसे में कोई हैरानी नहीं है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर सरीखे आदिवासी इलाकों में अफसरों ने आजादी के बाद से जो खुली लूटपाट की है, उसी का नतीजा है कि वहां पर नक्सलियों को एक उपजाऊ जमीन हाथ लगी। सरकारों के बीच आदिवासी मुद्दों को लेकर किसी किस्म की संवेदना नहीं दिखती है। और तो और सुप्रीम कोर्ट भी आदिवासियों को लाखों की संख्या में जंगल की उनकी जमीन से बेदखल करने की एक मुहिम सी चला रहा है। सरकार हो, संसद हो, या अदालत हो, जहां कहीं आदिवासी पहुंचते भी हैं, वे सत्ता के असर में अपना आदिवासी डीएनए इस रफ्तार खो बैठते हैं कि मानो वे कभी आदिवासी थे ही नहीं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम एक दूसरी बात भी देखते आए हैं। राज्य बनने के बाद से अब तक किसी भी राज्यपाल ने संविधान में आदिवासी इलाकों और आदिवासियों की रक्षा के लिए उन्हें दिए गए विशेष अधिकारों का कभी इस्तेमाल नहीं किया। सत्ता का रूख दबे-कुचले लोगों की भलाई के लिए जुबानी जमाखर्च से परे कुछ भी नहीं रहता। 

जब तक आदिवासी इलाकों को, आदिवासी संस्थानों को, अंडमान की कालेपानी की सजा माना जाता रहेगा, तब तक आदिवासी इलाकों में नक्सली कायम रहेंगे, और आम जनता का भरोसा लोकतंत्र पर नहीं रहेगा। हमारा तो यह साफ मानना है कि आदिवासी इलाकों वाले राज्यों में राज्य सरकारों को आदिवासी समाज और मुद्दों की समझ रखने वाले समाजशास्त्रियों की अनिवार्य रूप से सलाहकार के रूप में नियुक्ति करनी चाहिए, और उनकी काबिलीयत का इस्तेमाल आदिवासी इलाकों के लिए अफसर तय करने में भी होना चाहिए, और वहां पर सरकार के कामकाज पर नजर रखने में भी होना चाहिए। आज की सरकारें शहरी, शिक्षित, संपन्न, और सवर्ण सोच से भरी हुई सरकारें रहती हैं, आदिवासी मुद्दों से बिल्कुल ही नासमझ। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। आदिवासी इलाकों के लिए अलग से समर्पित अफसर और कर्मचारी तय होने चाहिए, और किसी भी सेवा में लोगों की नियुक्ति के पहले ऐसे इलाकों के लिए समझ और संवेदनशीलता रखने वालों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मध्यप्रदेश में यह ताजा फैसला शर्मनाक इसलिए है कि आदिवासी मुद्दों से जुड़े संस्थान को सजायाफ्ता के लायक माना गया। 
-सुनील कुमार


Date : 30-Jul-2019

छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा जीतकर आने वाली एक नौजवान अधिकारी वर्षा डोंगरे को दो बरस पहले   भाजपा की राज्य सरकार ने निलंबित कर दिया था, उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर राज्य सरकार की नक्सल और आदिवासी मामलों में रीति-नीति के खिलाफ बड़े आक्रामक अंदाज में लिखा था, और सरकार के दूसरे आलोचकों ने इसे हाथों-हाथ उठाया था, और चारों तरफ फैला दिया था। इस पोस्ट में यह भी लिखा हुआ था कि उन्होंने एक जेल अधिकारी की हैसियत से काम करते हुए जेल में ऐसी महिलाओं से बातचीत की है जिनके साथ सुरक्षा बलों ने बस्तर में सेक्स-बदसलूकी की थी। यह आरोप राज्य शासन के सुरक्षा कर्मचारियों और केन्द्रीय सुरक्षा कर्मचारियों पर लंबे समय से लगते आ रहा है, और बस्तर के आदिवासियों महिलाओं ने आरोपों को लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक दौड़ लगाई है। राज्य शासन की एक जेल-अधिकारी की ऐसे कथित पोस्ट को लेकर रमन-सरकार की काफी फजीहत हुई थी।

इस निलंबन के बाद रमन-सरकार आलोचना के कटघरे में आई थी कि उसने सच कहने वाली एक अफसर को निलंबित किया था। उस वक्त कांगे्रस पार्टी ने भी इस मामले को उठाया था। कल भूपेश सरकार ने इस महिला अधिकारी का निलंबन खत्म करके उसे बहाल कर दिया है। इन दो बरसों में यह बात खबरों में कहीं नहीं आई कि क्या इस अफसर की फेसबुक पोस्ट पर जांच का कोई नतीजा निकला? अब जब बहाली हो गई है तो एक बात पर कार्रवाई जरूरी हो जाती है। इस महिला अधिकारी ने अपनी नौकरी दांव पर लगाकर, और सरकारी सेवा शर्तों को तोड़कर अपने विभाग और जेल के भीतर की बातों को सरकार के सामने रखने के बजाय जनता के सामने रखा था। उसने तो दो बरस निलंबन झेल लिया, लेकिन उसके उठाए हुए मुद्दों का क्या हुआ? और वे मुद्दे छोटे नहीं थे। वर्षा डोंगरे ने आदिवासियों के हक सरकार और कारोबार द्वारा हड़पने और कुचलने के खिलाफ लिखा था और लिखा था कि जिस तरह देश के रक्षक ही आदिवासियों की बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, फर्जी केसों में चार दीवारी में सडऩे भेज रहे हैं, वे इंसाफ के लिए कहां जाएं? वर्षा ने लिखा था कि उन्होंने खुद बस्तर में चौदह से सोलह बरस की आदिवासी बच्चियों को देखा था जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर करके पूरा नंगा करके प्रताडि़त किया गया था, उनकी कलाईयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था जिन्हें वर्षा ने खुद ने देखा था।

अब छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार खुद होकर भी आदिवासियों के खिलाफ दर्ज फर्जी मामलों की जांच ऊंचे स्तर पर करवा रही है। ऐसे में वर्षा डोंगरे की शक्ल में सरकार को एक ऐसी गवाह मिलती है जिसने सरकार जुल्म और बेइंसाफी को उठाते हुए निलंबन झेला था। सरकार को चाहिए कि इस नौजवान अफसर को ऐसी जांच में गवाह बनाकर तमाम शिकायतों के सुबूत ढूंढे। ऐसे कम ही सरकारी अफसर मिलते हैं जो सरकारी जुल्म के खिलाफ बोलने को तैयार होते हों।
-सुनील कुमार


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