संपादकीय

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Date : 12-Dec-2019

सुप्रीम कोर्ट की खबर है कि उसने केन्द्र सरकार को कहा है कि हाईकोर्ट जजों के खाली पद छह महीने में भर दिए जाएं। केन्द्र सरकार के इस महीने की पहली तारीख के आंकड़े बताते हैं कि सभी हाईकोर्ट मिलाकर 1079 पद मंजूर हैं जिसमें से 669 पर जज तैनात हैं, और 410 पद खाली हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ही एक तिहाई कुर्सियां खाली पड़ी हैं। देश के अधिकतर प्रदेशों में हाईकोर्ट की खाली कुर्सियां नया रिकॉर्ड कायम कर रही हैं। जाहिर है कि निर्भया हो, या कोई और हो, उन्हें जल्द इंसाफ देने की बात पूरी तरह बोगस है। 

हिन्दुस्तान के हाईकोर्ट में दो तरह से जज बनाए जाते हैं, राज्य की न्याय सेवा में जिला अदालतों से शुरू करके पदोन्नति पाने वाले जज, और वरिष्ठ वकीलों से सीधे जज बनाए जाने वाले लोग। इनका एक अनुपात भी निर्धारित है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जज बनाने के लिए एक प्रक्रिया बनाई हुई है जिसमें सबसे अधिक ताकत खुद उसी के हाथ है। लेकिन केन्द्र सरकार उसे सुझाए गए नामों में से छांटकर कुछ पर पहले फैसला लेती है, कुछ पर सुप्रीम कोर्ट से दुबारा पूछताछ करती है, और कुछ के नाम मंजूर नहीं करती। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने खुद होकर जजों की नियुक्ति में अपने आपको सबसे ऊपर बना लिया है, और कुछ लोग इस बात से भी असहमत हैं। लेकिन हम अभी उस तकनीकी बारीकी तक जाना नहीं चाहते और जो भी प्रक्रिया या व्यवस्था जजों की नियुक्ति के लिए है, उसी पर बात करना चाहते हैं। अगर हाईकोर्ट के 40 फीसदी जज हैं ही नहीं, तो बाकी जजों पर काम का बोझ इतना बढ़ जाना तय है कि लोगों के मामले पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते रहते हैं, लोग अदालती प्रक्रिया में भरोसा खो बैठते हैं, और जब पुलिस मुठभेड़ में कुछ संदिग्ध आरोपियों को मारती हैं, तो फूल भी बरसाते हैं, और पटाखे भी फोड़ते हैं। अदालत की रफ्तार अपनी साख पूरी तरह खो चुकी है, और इस मुद्दे पर आज हम यहां इसलिए लिख रहे हैं कि इसके लिए अदालत जिम्मेदार नहीं हैं, इसके लिए सरकार जिम्मेदार है, केन्द्र सरकार, जो कि वक्त रहते जजों के चयन को मंजूरी नहीं देती है। 

जैसे ही हाईकोर्ट में जज का कोई पद मंजूर होता है, उसके महीनों पहले से इसकी फाईल चलती रहती है, और केन्द्र सरकार अगर चाहे तो उसके पास पड़े हुए नामों में से पद के साथ ही नियुक्ति भी कर सकती है जिसकी तैनाती बाद में सुप्रीम कोर्ट करता रहे। इसी तरह रिटायर होने वाले जजों के जाने की तारीख उनके आने के दिन से ही तय रहती है, और ऐसे में कोई वजह नहीं बनती कि उनके आखिरी दिन को अगले जज का पहला दिन न बनाया जा सके। जनता की तकलीफें अदालतों को लेकर इतनी अधिक हैं, इंसाफ एक मजाक बन गया है, और सजा एक बहुत ही धूमिल संभावना, ऐसे में लोकतंत्र में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए सरकार को अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, तेजी से करनी चाहिए। लेकिन एक दूसरी खबर को देखें तो लगता है कि सरकार सोच-समझकर जजों की कुर्सियों को खाली रखती हैं। संसद और विधानसभाओं में इतने किस्म के मुजरिम या आपराधिक मामले झेल रहे लोग पहुंचे हैं कि अगर जज की हर कुर्सी भरी हो, तो तेजी से इनमें से बहुत से लोग जेल चले जाएंगे। इसलिए हो सकता है कि राजनीतिक तबके की यह एक वर्गहित की सोच हो कि न्यायपालिका की रफ्तार धीमी चलती रहे। अब अदालतें अगर तेज रफ्तार होतीं, तो लालू यादव दस बरस पहले ही जेल चले गए होते, और बहुत बड़े-बड़े मंत्री, अफसर भी जेल में होते। न्याय व्यवस्था तेज होती तो भोपाल गैस त्रासदी से लेकर बाबरी मस्जिद गिराने के मुजरिम कबके जेल में रहते, और जेल की दिक्कतों को झेलते हुए हो सकता है अब तक वे अगली सजा पाने के लिए ऊपर पहुंच चुके होते। इसलिए ऐसा भी लगता है कि सत्ता अपने हित में अदालतों की कुर्सियों को खाली रखना चाहती है, वरना संसद या विधानसभा की कोई कुर्सी खाली होती है, तो छह महीने के भीतर उसे भर ही दिया जाता है। ऐसा जजों की कुर्सियों के साथ क्यों नहीं हो सकता? आज सड़कों पर जितने लोग बलात्कारियों को फांसी की मांग करते हुए मोमबत्ती लेकर चल रहे हैं, उन्हें इस मांग के पहले जजों की कुर्सियां भरने की मांग केन्द्र सरकार से करनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना बाकी मोमबत्तियां इस लोकतंत्र को कोई राह नहीं दिखा सकतीं। 
-सुनील कुमार


Date : 11-Dec-2019

छत्तीसगढ़ के भिलाई में शहर के बीच की सड़क पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए स्टेज बनाकर छोड़ दिया गया, और रात के अंधेरे में उससे टकराकर एक दुपहिया सवार मर गया। अगली सुबह जैसा तय था, वैसा कार्यक्रम हुआ, दूसरी तरफ पोस्टमार्टम वगैरह के बाद अंतिम संस्कार हुआ होगा। इसके बाद से यह विवाद चल रहा है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? भिलाई इस्पात संयंत्र जो कि उस इलाके का मालिक है, या भिलाई नगर निगम जिसका यह कार्यक्रम बताया जा रहा है, और जो अपने को आयोजक मानने से इंकार भी कर रहा है, या फिर स्थानीय सत्तारूढ़ विधायक जो कि इस कार्यक्रम के आयोजक बताए जा रहे हैं, और जो इसे नगर निगम का कार्यक्रम बता रहे हैं। अखबारी कतरनों को देखें तो ऐसा लगता है कि सड़क के बीच बनाए गए इस स्टेज के लिए मरने वाला ही जिम्मेदार था क्योंकि बाकी तो तमाम लोग इसकी जिम्मेदारी से हाथ धोकर महज कार्यक्रम की वाहवाही तक सीमित हैं। चूंकि कार्यक्रम में सत्तारूढ़ विधायक के अलावा गृहमंत्री भी शामिल थे, इसलिए पुलिस भी गोल-मोल जवाब दे रही है। बीएसपी, म्युनिसपिल, पुलिस, प्रशासन, और विधायक, ये सारे लोग जिम्मेदारी को किसी दूसरे पर फेंक रहे हैं, और मेहनत-मजदूरी करके देर रात घर लौटते एक कामगार इसमें मारा गया। 

इन दिनों सार्वजनिक जगहों पर तरह-तरह के सत्तारूढ़ कार्यक्रम करने का चलन बढ़ते चल रहा है। और सत्ता का मतलब महज सरकार या स्थानीय संस्था पर काबिज राजनीतिक सत्ता नहीं है, मीडिया की ताकत अपने-आपमें एक सत्ता है, और कहीं बाग-बगीचों में, तो कहीं खेल के मैदानों पर मीडिया घरानों के कराए गए कारोबारी कार्यक्रम छाए रहते हैं, फिर चाहे लोगों का बगीचे जाना रूके, या बच्चों का खेलना रूके। कहने के लिए सड़कों के नियम हैं कि उन्हें रोका नहीं जाना चाहिए, खेल के मैदानों के लिए तो राज्य सरकार के बार-बार के वायदे हैं कि उनका गैरखेल इस्तेमाल नहीं होगा, लेकिन राजधानी रायपुर में ही हम देखते हैं कि हर बड़े खेल मैदान पर धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम चलते हैं, कई संगठनों के व्यापार मेले चलते हैं, मीना बाजार लगे रहते हैं, और बड़े-बड़े अखबार वहां पर रियल स्टेट या ऑटो मोबाइल के मेले लगाते हैं। इन सबके बीच जिन दिनों में वहां कुछ नहीं लगे रहता, उतने दिन मैदान पर ऐसे गड्ढे रहते हैं कि वे खेलने लायक रह नहीं गए हैं। 

राज्य की सार्वजनिक जगहों को लेकर सरकार की कोई साफ नीति नहीं है। अगर कागज पर कुछ फैसले लिए भी गए हैं, तो कोई भी संगठन जाकर उनके खिलाफ इस्तेमाल की इजाजत ले आते हैं। अधिकतर सार्वजनिक कार्यक्रमों को ऐसी जगहों पर किया जाता है कि लोगों के खेलकूद, उनकी सैर, इन सब पर सीधी चोट होती है। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होना चाहिए। मैदान खेल के लिए रहें, सड़कें चलने के लिए रहें, बाग-बगीचे सैर के लिए रहें, और स्टेडियम अधिकतम समय टूर्नामेंट के लिए रहें। राज्य में आम लोगों की कोई जुबान नहीं है, और जैसे ही कोई संगठन सत्तारूढ़ लोगों या ताकतवर लोगों का साथ पा जाते हैं वे सार्वजनिक जगहों पर कब्जा पा जाते हैं। आम जनता के आम लगते हुए हक उनकी रोज की जिंदगी के लिए बहुत खास होते हैं, और कोई भी जागरूक समाज अपने लोगों के हक इस तरह नहीं कुचलने देता। जनता के बीच के संगठनों को न सिर्फ ऐसे हादसे रोकने के लिए, बल्कि अपने रोज के आम हकों पर दावा करने के लिए भी खुद खड़ा होना होगा। भिलाई स्टील प्लांट की टाऊनशिप प्रदेश की सबसे अधिक व्यवस्थित और योजनाबद्ध बस्ती है, उसके बीच इस तरह का सड़क हादसा और अधिक गंभीर बात है। छोटी-छोटी जगहों पर ऐसे छोटे-बड़े अस्थाई कब्जों का सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए। इसमें राज्य सरकार से लेकर स्थानीय संस्थाओं तक को अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 10-Dec-2019

लोकसभा में बीती रात नागरिकता संशोधन विधेयक भारी बहुमत से पास हो गया, और एनडीए के बाहर की कुछ ऐसी पार्टियों ने भी इस विधेयक का साथ दिया जो कि अभी हाल तक एनडीए के खिलाफ चुनाव लड़ चुकी थी। बहुत सी क्षेत्रीय पार्टियों की यह सोच रहती है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर उन्हें केन्द्र सरकार के साथ रहना चाहिए। भाजपा से असहमत रहते हुए भी शिवसेना ने कल ऐसी ही बात कही, और बीजू जनता दल ने विधेयक का साथ दिया। विधेयक का विरोध बहुत कमजोर रहा क्योंकि एनडीए के बाहर सांसदों की गिनती ही लोकसभा में बहुत कम है। संसद में बहस के दौरान कल अनगिनत बार यह कहा गया कि यह संशोधन देश के भीतर मुस्लिमों से भेदभाव करने वाला है, यह धर्म के आधार पर भारतीयों के बीच, या लोगों के बीच फर्क करने वाला है, और इसलिए भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे के ही खिलाफ है। एक टीवी चैनल ने देश के ऐसे नौ संविधान विशेषज्ञों से इस संशोधन पर बात की जो कि किसी पार्टी से लगाव-जुड़ाव नहीं रखते। ऐसे नौ तटस्थ संविधानवेत्ताओं में से सात ने कहा कि यह संशोधन संविधान के खिलाफ है। बहुत से लोगों ने यह विधेयक पेश करने वाले गृहमंत्री अमित शाह के अभूतपूर्व आक्रामक भाषण को ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ बताया, और लालकृष्ण अडवानी के एक सबसे करीबी रहे सुधीन्द्र कुलकर्णी ने शाह के भाषण को एक काले कानून के लिए सफेद झूठ का पुलिंदा लिखा। इस भाषण में ऐतिहासिक तथ्यों को गलत कहने की बात कल भाषण के चलते हुए ही बहुत से लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखी। कुछ लोगों ने यह बात भी उठाई कि अगर पड़ोस के देशों में धार्मिक भेदभाव के आधार पर प्रताडऩा पाने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने की ही नीयत है, तो इसमें तमाम गैरमुस्लिम धर्मों का जिक्र करने, और मुस्लिमों को बाहर रखने की जरूरत नहीं थी क्योंकि सरकार तो वैसे भी हर अर्जी पर अलग-अलग फैसला लेगी ही, और उस वक्त वह तय कर सकती थी कि पड़ोसी देशों में कहां कौन प्रताडि़त है, और कौन नहीं। अमित शाह के भाषण के इस मतलब को भी लोगों ने खतरनाक बतलाया कि पाकिस्तान में मुस्लिमों की प्रताडऩा नहीं हो रही है। इस्लाम के भीतर के कई ऐसे सम्प्रदाय हैं जो लंबे समय से पाकिस्तान में प्रताडऩा और हत्याओं की शिकायत करते आ रहे हैं, भारतीय गृहमंत्री के संसद के ऐसे बयान से पाकिस्तान को एक क्लीनचिट मिलने की बात भी लोगों ने कही है। 

कई विश्लेषकों ने यह भी कहा है कि इस नागरिकता संशोधन विधेयक को जब भारत में इन दिनों लगातार खबरों में बने हुए एनआरसी, नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस के साथ मिलाकर देखें तो केन्द्र सरकार की यह साफ नीयत समझ में आती है कि वह एनआरसी में असम में बाहर रह गए दस-बीस लाख हिन्दुओं को नागरिकता देने के लिए भी यह संशोधन ला रही है जिससे कि हिन्दू तो भारतीय नागरिक हो जाएं, लेकिन जो लाखों मुस्लिम असम में आज गैरनागरिक करार देकर कैम्पों में रखे गए हैं, वे नागरिकता न पा सकें। इन दो कानूनों को मिलाकर देखने से ही केन्द्र सरकार की नीयत, और देश की नियति साफ हो सकती है। सम्प्रदायिकता-विरोधी एक प्रमुख लेखक सुभाष दाताड़े ने आज सुबह ही इस पर लिखा है कि नागरिकों की शुद्धता की कवायदें, और अंधराष्ट्रवाद वह खाद-पानी है जिस पर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी विचार मजबूती पाता है। 

अब जब बहुत से लोगों का यह मानना है कि लोकसभा में बहुमत के बाहुबल से पास किया गया यह विधेयक राज्यसभा में पास हो भी जाता है, तो भी इसे सुप्रीम कोर्ट में बड़ी चुनौती मिलना तय है, और लोगों का यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की आंच को यह झेल नहीं पाएगा। जजों की अपनी एक राजनीतिक सोच होती है, और उनसे यह उम्मीद करना फिजूल का आदर्शवाद ही होगा कि वे संविधान के इस जटिल पहलू की व्याख्या करते हुए अपनी सोच से पूरी तरह मुक्त रहेंगे। आज सुप्रीम कोर्ट ने पहले कश्मीर-प्रतिबंधों को लेकर, और फिर अयोध्या के मुद्दे पर जिस तरह के फैसले दिए हैं, या जिस तरह फैसले नहीं दिए हैं, उनसे भी भारतीय न्यायपालिका की एक ताजा सोच उजागर होती है। बड़े से बड़े लोकतंत्र में भी जजों को अपनी सोच का रखना सत्ता की एक बहुत ही दबी-छुपी कोशिश होती है, और अमरीका जैसे लोकतंत्र में तो यह दबी-छुपी भी नहीं होती है, वहां अपनी विचारधारा के जज बनाने की खुली घोषणा होती है। अब इस नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर देश के प्रमुख संविधानवेत्ताओं की सोच और सुप्रीम कोर्ट के जजों की सोच में बड़ा फर्क भी हो सकता है, और हो सकता है कि जजों की सबसे बड़ी बेंच का बहुमत सरकार के साथ जाए। ऐसे में देश के लोगों को इस देश की महान परंपराओं, और समानता के संविधान के खिलाफ चल रहे इस सिलसिले पर यही मानना होगा कि जब किसी पार्टी या गठबंधन को इतना बड़ा बहुमत दिया जाता है, और धार्मिक आधार पर बहुसंख्यक वाद के आधार पर दिया जाता है, तो उस देश के फैसले, और संविधान के संशोधन भी बहुसंख्यक तबके और अल्पसंख्यक तबके में भेदभाव करते हुए ही हो सकते हैं। खासकर उस हालत में जब बहुसंख्यक वर्ग को एकजुट रखने के लिए उस वर्ग का नायक अल्पसंख्यक वर्ग को एक खलनायक की तरह, एक खतरे की तरह पेश करने में कामयाबी पा चुका है। किसी भी देश के नागरिक वैसा ही वर्तमान और वैसा ही भविष्य पाते हैं जिसके कि वे हकदार होते हैं, या कि जैसा कि आज भारत का बहुसंख्यक तबका तय कर रहा है, संसद के भीतर नहीं, संसद के चुनाव में। दुनिया के इतिहास में किसी देश की महानता इससे साबित होती है कि वह अपने से बेहतर किस देश की मिसाल से कुछ सीखती है, हिन्दुस्तान एक दिन पाकिस्तान की मिसाल से कुछ सीखेगा, क्या यह दुनिया के सबसे ऊंचे बुत में बसाए गए सरदार पटेल ने भी कभी सोचा होगा? आज लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि दुनिया में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी नाम की बनाई गई सबसे बड़ी प्रतिमा के साये में देश की यूनिटी को इस तरह खत्म करके हिन्दुस्तान क्या एक महान देश बन सकेगा, या बने रह सकेगा? 
-सुनील कुमार


Date : 09-Dec-2019

एनडीए के भीतर भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी रहते हुए भी शिवसेना एक घरेलू ऑडिटर की तरह काम करती थी, और भाजपा-मोदी के कई फैसलों पर लगातार सवाल भी उठाती थी। शिवसेना इस मायने में भी एक दिलचस्प पार्टी है कि उसके तौर-तरीके ढंके-छुपे नहीं रहते, और जो अपने बयानों के अलावा भी पार्टी के अखबार, सामना, के संपादकीय के रास्ते अपनी रीति-नीति की बात करती रहती हैं। हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े अखबारनवीस इस बात पर मजाक भी करते हैं कि संपादकीय तो वे भी रोज लिखते हैं, लेकिन अपने अखबार से परे दूसरे अखबारों में संपादकीय सिर्फ सामना के ही छपते हैं। और दिलचस्प बात यह भी है कि सामना के संपादकीय दूसरे अखबारों में खबरें बनकर छपते हैं कि शिवसेना क्या सोच रही है। आज महाराष्ट्र में शिवसेना एक बिल्कुल ही अलग किरदार में है, और वह दो ऐसी पार्टियों की मदद से उनके साथ गठबंधन सरकार चला रही है जो कि धार्मिक भेदभाव नहीं करतीं। मतलब यह कि शिवसेना के निशान बाघ ने अपनी धारियां किनारे रखकर सत्ता को चलाना मंजूर किया है, अपने आपको उसके लिए तैयार किया है। 

आज सुबह की सामना की सोच यह है कि भारत में मोदी सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन विधेयक के रास्ते क्या धार्मिक युद्ध छेडऩे का काम नहीं किया जा रहा है, और हिन्दू-मुस्लिम के बीच अदृश्य विभाजन नहीं किया जा रहा है? लंबे समय से शिवसेना महज हिन्दूवादी पार्टी रही है, और मुस्लिमों के खुलकर खिलाफ भी रही है। लेकिन सत्ता पर आने के लिए, सत्ता को चलाने के लिए उसने अगर कुछ समझौते किए हैं, तो यह लोकतंत्र की कामयाबी ही है कि लोगों को वक्त-जरूरत एक-दूसरे के साथ चलने के लिए अपनी रीति-नीति बदलनी भी पड़ती है। आज शिवसेना मोदी के नागरिकता संशोधन विधेयक को वोट बैंक की राजनीति करार दे रही है, और देश हित के खिलाफ बता रही है। उसकी इस नई नीति को लेकर उसकी आलोचना भी की जा सकती है जो कि लोकतंत्र का एक अविभाज्य हिस्सा है, अपरिहार्य हिस्सा है, लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि हालात से अगर ख्यालात बदलते हैं, तो उसे लोकतांत्रिक ही मानना चाहिए उसे लेकर ताने कसना ठीक नहीं है, अगर यह फेरबदल देश के व्यापक हित में है। 

शिवसेना की आज भी पहचान एक हिन्दू पार्टी की ही है, और वह भाजपा से अलग, भाजपा के खिलाफ एक हिन्दू पार्टी है, लेकिन फिर भी उसने अपनी हिन्दू सोच को महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार बनने के बाद भी दुहराया है। महाराष्ट्र का यह प्रयोग लोकतांत्रिक गठबंधन का एक अटपटा सा लगता, लेकिन वहां की नौबत में अपरिहार्य हो गया गठबंधन है जिससे बाकी देश में भी जगह-जगह असहमत या परस्पर विरोधी पार्टियां एक सबक ले सकती हैं, उससे कुछ सीख सकती हैं। आज भारत में एनडीए-भाजपा की ताकत के मुकाबले बाकी पार्टियों और गठबंधनों की ताकत सीमित रह गई है। महाराष्ट्र से भाजपा गठबंधन सरकार जाने के बाद देश के नक्शे में एक बड़ा बदलाव जरूर आया है, और भाजपा देश की कम आबादी पर राज कर रही पार्टी या गठबंधन-भागीदार रह गई है। ऐसे में अलग-अलग कई प्रदेश हैं जहां क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा की कई नीतियों से असहमत हैं, उनके खिलाफ हैं, और अपने इलाकों में केन्द्र सरकार की रीति-नीति के खिलाफ आंदोलन भी कर रही हैं। लेकिन इसके साथ-साथ ऐसी गैरएनडीए पार्टियां आपस में असहमत हैं, और आपस में काम करने को तैयार भी नहीं हैं। अभी जब अगले आम चुनाव को खासा वक्त है, और उसके पहले हर बरस कुछ राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव भी होंगे, हमारी सलाह के बिना भी बहुत सी पार्टियां महाराष्ट्र के प्रयोग को बारीकी से देखेंगी, और उस प्रयोग में अपनी संभावना भी तलाशेंगी। शिवसेना आज अगर हिन्दू-मुस्लिम विभाजन के खिलाफ लिख और बोल रही है, तो बाकी पार्टियों के सामने भी एक संभावना बनती है कि वे प्रादेशिक तालमेल के लिए व्यक्तिगत परहेज को छोड़कर, अपनी तंगदिली और तंगनजरिए को छोड़कर सबसे ताकतवर एनडीए के खिलाफ गठबंधन की संभावनाएं तलाशें। और महाराष्ट्र ने यह साबित किया है कि ऐसी संभावना चुनाव के बाद भी तलाशी जा सकती हैं। आज नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर शिवसेना के उठाए गए सवालों से देश की बदली हुई हवा का एहसास हो रहा है, और इसीलिए लोकतंत्र के लचीलेपन के भीतर संभावनाओं की बात सूझ रही है। हम किसी पार्टी के गठबंधन में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं, बल्कि देश में एक मजबूत विपक्ष में हमारी दिलचस्पी है, देखें कौन-कौन सी पार्टियां, और कौन-कौन से नेता देश के मतदाताओं के सामने एक मजबूत विकल्प और विपक्ष पेश कर पाते हैं।
-सुनील कुमार


Date : 08-Dec-2019

दिल्ली के घने कारोबारी इलाके में छोटी-छोटी फैक्ट्रियों वाली एक इमारत में आग लगी, और कुछ ही देर में 43 मौतें हो चुकी हैं। इस इलाके में पुरानी इमारतों में छोटे-छोटे से कारखाने भी चलते हैं, और उनमें मेहनत करने वाले प्रवासी मजदूर वहीं पर सो भी जाते हैं। आग लगी तो मौतें दम घुटने से अधिक हुईं। अब तक हिन्दुस्तान के लोग बांग्लादेश में ही रिहायशी फैक्ट्रियों में ऐसी आगजनी में थोक में मौतें पढ़ते थे, लेकिन देश की राजधानी में यह हादसा बहुत सी बातों पर सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। 

जिस शहर में केन्द्र सरकार बसती है, सुप्रीम कोर्ट और संसद जहां चलती हैं, जहां पर सीमित अधिकारों वाली एक राज्य सरकार भी है, और जहां पर म्युनिसिपलें भी राज्य सरकारों जैसे अधिकार रखती हैं, जहां पर पुलिस केन्द्र सरकार के मातहत है, वहां पर इतनी-इतनी सरकारों के रहते हुए भी घनी बस्तियों में ऐसे कारखाने हैं, और ये कारखाने मजदूरों का डेरा भी हैं। जाहिर है कि ऐसे हादसे का इलाका न तो औद्योगिक सुरक्षा के नियमों को मान रहा था, न ही कोई मजदूर कानून वहां लागू किए गए थे, और तो और प्लास्टिक कारखानों के ऐसे ज्वलनशील इलाके में फायरब्रिगेड को पहुंचने तक में दिक्कत थी। दरअसल दिल्ली के बाहर से जाने वाले लोग दिल्ली का महज व्यवस्थित और अच्छा इलाका देखकर लौट आते हैं जहां पर कि दिल्ली की ताकत बसती है, जो कि सैलानियों को दिखाने वाला हाथी दांत है। लेकिन ऐसे इलाकों से परे  दिल्ली की गरीब बस्तियों में बिना बुनियादी सहूलियतों के, बिना न्यूनतम हिफाजत के, कारोबार चलता है, कारखाने चलते हैं, और देश भर से आए हुए बेबस मजदूर वहां बंधुआ मजदूरों की तरह काम करते हैं, और जिंदा रहते हैं। लोगों को पता नहीं यह बात याद भी होगी या नहीं कि इसी दिल्ली में अभी कुछ बरस पहले बड़ी संख्या में नाबालिग बंधुआ मजदूरों को रिहा कराया गया था। 

लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसे हाल और बुरे होने जा रहे हैं क्योंकि केन्द्र सरकार पूंजीनिवेश को लाने के लिए, आज मंदी के शिकार कारोबारियों को राहत देने के लिए हर किस्म के मजदूर कानून में फेरबदल कर रही है जिनमें मजदूरों के हक और भी काट दिए जाएंगे। हिन्दुस्तान में एक तो तीन बरस पहले की नोटबंदी से ही बहुत से कारोबार और छोटे कारखाने उबर नहीं पाए थे, और बहुत बुरी बेरोजगारी झेल रहे थे, अब मौजूदा मंदी और जनता की खपत में भारी गिरावट ने छोटे-बड़े कारखानों को बंद कर दिया है, और बाकी भी मंदी और बंदी की तरफ बढ़ रहे हैं। ऐसे में मौजूदा कामचलाऊ ढांचों में जो कारखाने चल रहे हैं, उन्हें व्यवस्थित और सुरक्षित होने में जब तक सरकारी योजनाबद्ध मदद नहीं मिलेगी, वे ठीक से चल भी नहीं पाएंगे। आज हकीकत यह है कि सारे मजदूर कानूनों और सारी औद्योगिक सुरक्षा पर अमल करने के साथ, न्यूनतम मजदूरी और निर्धारित सहूलियतें देने के साथ बहुत से कारखाने और कारोबार चल भी नहीं सकते। केन्द्र सरकार ने हाल ही में बड़ी-बड़ी कंपनियों को टैक्स-रियायत दी है, लेकिन असंगठित क्षेत्र के छोटे कारोबार अब भी संगठित कारोबार की बराबरी करने की हालत में नहीं हैं। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकारों को ऐसी औद्योगिक नीति की जरूरत है जो कि रोजगार देने वाले कारखानों को एक सुरक्षित योजना उपलब्ध करा सकें, और रिहायशी इलाकों की फैक्ट्रियां वहां जा सकें। दिल्ली जैसे दम घुट रहे शहर से वैसे भी गैरजरूरी निर्माण ईकाईयां बाहर ले जानी चाहिए जहां मजदूरों को इंसानों की तरह रहने का मौका भी मिले, और दिल्ली पर से बोझ घटे, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

बात महज दिल्ली की नहीं है, देश के अधिकतर हिस्सों में छोटे कारखाने इसी तरह से नियम-कायदों के खिलाफ चल रहे हैं, और आज देश की जो आर्थिक स्थिति है, उसमें यह भी हो सकता है कि सारे नियम-कायदे लाद दिए जाएं तो वे चल भी न पाएं। पश्चिम के देश आज बांग्लादेश को जिस तरह सस्ती मजदूरी का टापू बनाकर चल रहे हैं, उसका पश्चिम में ही जागरूक समुदाय में विरोध हो रहा है। लेकिन भारत में सस्ती फसल, सस्ती मजदूरी के खिलाफ किसी तरह की जागरूकता नहीं है, और लोग इतने, और ऐसे रोजगार को भी गरीबों पर अहसान मानकर चलते हैं। दिल्ली की यह ताजा आगजनी अधिक मौतों की वजह से इससे जुड़े हुए कई मुद्दों पर सोचने को मजबूर तो कर रही है, लेकिन कुल मिलाकर ये बातें श्मशान-वैराग्य की बातों की तरह कल तक आई-गई हो जाएंगी, बेबस मजदूर खतरों में इसी तरह खपेंगे, और जिंदा रहने की कोशिश करेंगे, सरकारों की नीतियों बड़े कारखानेदारों को बढ़ावा देंगी, और दिल्ली शहर केन्द्र, राज्य, और म्युनिसिपल के मिले-जुले काबू में इसी तरह खतरे में जिएगा। 
-सुनील कुमार


Date : 07-Dec-2019

अपने ऐसे दिन सोचकर ही पुलिस के अभिनंदन जुलूस में नागिन डांस करने जाएं...

किसी मुद्दे पर खूब लंबा लिखने के अगले ही दिन फिर उस मुद्दे पर लिखना पढऩे वालों के साथ कुछ ज्यादती होती है। लेकिन ऐसा भी लग रहा है कि किसी बहुत जटिल मुद्दे के कुछ पहलू हमेशा ही बाकी रहते हैं जो कि अगले दिन के बाकी दुनिया के मुद्दों के मुकाबले अधिक मायने रखते हैं, इसलिए हैदराबाद की कल की मुठभेड़ मौतों/हत्याओं के कुछ पहलुओं पर आज फिर। कल दोपहर इसी जगह इस पर लिखने के बाद जो खबरें आईं, उनमें यह भी थी कि हैदराबाद मुठभेड़ के मुखिया अफसर ने पहले कम से कम दो और ऐसी मुठभेड़ों में अगुवाई की थी जिनमें गिरफ्तार आरोपियों को ठीक इसी अंदाज में फरार होने की कोशिश करते, और पुलिस पर हमला करते दिखाकर मारा गया था। हैदराबाद की पुलिस जो बलात्कार और हत्या की शिकार युवती के परिवार को इधर-उधर दौड़ाने के एवज में खलनायक बनी हुई थी, वह दो दिन के भीतर नायक बन गई, उस पर फूल बरसने लगे, उसे राखियां बंधने लगीं, और देश भर में लोग बाकी प्रदेशों की पुलिस को ताने कसने लगे कि उन्हें हैदराबाद की पुलिस से कुछ सीखना चाहिए। देश का माहौल मौके पर बंदूक की नली से इंसाफ का इस कदर हिमायती हो गया कि कानून की राह अपनाने की अपील करने वाले लोग एक पल में खलनायक लगने लगे, और उन्हें ताने मिलने लगे कि उनकी बेटियों के साथ ऐसा होगा, तब पता लगेगा। बहुत से अफसरों ने, और आईपीएस अफसरों ने हैदराबाद पुलिस की आलोचना के खिलाफ लिखा, लेकिन ईमानदारी से कहें, तो कई ऐसे आईपीएस रहे जिन्होंने हैदराबाद पुलिस के मुठभेड़ के तरीकों पर सवाल भी उठाए, और कहा कि देर से मिला इंसाफ जिस तरह नाइंसाफी होती है, उसी तरह मौके पर किया गया इंसाफ, इंसाफ को दफन करना भी होता है। एक महिला आईपीएस ने लिखा कि मुठभेड़ के बाद मनाई जाती खुशियां इस देश की न्याय व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है, और न्यायिक जवाबदेही आज मौके का तकाजा है। छत्तीसगढ़ से कम से कम एक महिला आईएएस अधिकारी ऐसी थी जिसने ट्वीट करके लिखा कि गलत, बहुत गलत है, और हमेशा गलत रहेगा, कड़ी सजा के लायक रहेगा, पर गलत को गलत तरीके से सजा देना भी क्या सही कहलाएगा? कहीं कल कोई इसका कुछ और गलत करने के लिए फायदा न उठा ले।

लेकिन कल सुबह की पहली खबर के बाद से यह देश एक हर्षोन्माद में डूब गया, और जिस तरह कोई भी उन्माद लोगों से सोचने की ताकत दूर कर देता है, हैदराबाद की मुठभेड़ ने भी लोगों के साथ यही किया। पुलिस की जुबान में जिसे ट्रिगर-हैप्पी कहा जाता है, एनकाऊंटर स्पेशलिस्ट कहा जाता है, वैसी पुलिस ने देश की बदनाम अदालतों को पल भर में और बदनाम करते हुए इंसाफ अपने हाथ में ले लिया, और देश के बड़े-बड़े नेताओं ने, मुख्यमंत्रियों और चर्चित सांसदों ने इसे इंसाफ कहा, इस पर खुशी जाहिर की, और फख्र जताया। जाहिर है कि ऐसे में टीवी चैनल और बड़े कामयाब अखबार भी हर्षोन्माद में डूबे रहे, और बारात में नागिन डांस करने में जुट गए। देश के बड़े-बड़े अखबारों की आज सुबह की सुर्खियां देखें तो वे पुलिस राज में एकदम संतुष्ट दिख रहे हैं, खुश दिख रहे हैं, और गर्व से भरे हुए भी। चूंकि यह पुलिस इमरजेंसी की नहीं है, और अखबारनवीसों को बंद करती हुई नहीं है, इसलिए न्यायमूर्ति पुलिस सुपरिटेंडेंट लोगों को अच्छे लग रहे हैं, वे मीडिया की पसंदीदा न्याय व्यवस्था भी हो गए हैं। देश के सबसे बड़े अखबार के पहले पन्ने की सुर्खी इसका अभिनंदन करते दिख रही है।

अब तक हिन्दुस्तान में नक्सली यह बात कहते थे कि क्रांति बंदूक की नली से निकलती है। अब आज संसद का एक हिस्सा, विधानसभाओं का एक हिस्सा, और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा यह कहने में लग गया है कि हिन्दुस्तान में आज की तारीख में इंसाफ भी बंदूक की नली से ही निकल सकता है। अब सवाल यह उठता है कि जब मौके पर बंदूक की नली से निकला इंसाफ इतने लोगों को इतना सुहा रहा है तो उसमें जरूर सुर्खाब के कुछ पर लगे हुए होंगे, उसमें जरूर कोई ऐसी बड़ी खूबी होगी जो कि बड़ी-बड़ी अदालतों में जादूगरों से लबादे पहने हुए बड़े-बड़े जजों में भी नहीं लगी होती। अब सवाल यह उठता है कि बंदूक की नली से निकला इंसाफ इतना अच्छा है, तो फिर वह पुलिस की बंदूक तक क्यों सीमित रहे? हमने पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, और म्यांमार तक जगह-जगह फौजी बंदूकों का राज देखा है, और वे बंदूकें पुलिस की बंदूकों से बहुत बेहतर भी होती हैं, फौजी वर्दियों पर कलफ भी बेहतर होता है, पीतल के उनके बिल्ले भी अधिक चमकते हैं, और उन्होंने पाकिस्तान की हुकूमत को कई बार चलाकर दिखाया भी है कि बंदूक की नली से निकला इंसाफ किस तरह की जम्हूरियत चला सकता है। हिन्दुस्तान में लोकतंत्र को अगर बंदूक की नली से ही चलाना है, तो फिर अदना सी पुलिस को यह बड़ा सा मौका क्यों दिया जाए? यह काम तो फिर फौज को देना चाहिए जो कि मौके पर लोगों को जीप के सामने बांधकर, ढाल बनाकर ले जाने के लिए भी जानी जाती है, जो हर दूसरे किस्म के जुर्म को भी खास कानूनों की ढाल के पीछे छुपकर करने के लिए भी जानी जाती है। फिर धीमी रफ्तार की, और शायद कई जगहों पर भ्रष्ट भी, अदालतों की भी क्या जरूरत है? सवाल पूछने के लिए रिश्वत मांगने वाली संसद की भी क्या जरूरत है? देश को बेच देने पर आमादा सरकार की भी क्या जरूरत है? जब बंदूक की नली से निकला ही इंसाफ देश में अकेला इंसाफ दिख रहा है, तो फिर बंदूक भी उम्दा छांटी जाए, फौज की छांटी जाए, और धीमी अदालत, भ्रष्ट संसद, दुष्ट सरकार, इन सबको खारिज ही कर दिया जाए।

मौके पर आनन-फानन बंदूक की नली से निकला इंसाफ जिन्हें सुहाता है, वे लोकतंत्र के हकदार भी नहीं रहते। हम इतनी रियायत जरूर देना चाहते हैं कि सामूहिक बलात्कारों और जिंदा जला देने से विचलित यह देश कुछ वक्त के लिए अपनी तर्कशक्ति, न्यायशक्ति खोकर एक तात्कालिक और क्षणिक हर्षोन्माद में अपनी निराशा और तकलीफ को खोने की कोशिश कर रहा है, और देश के बहुत बड़े तबके की इस मौके की प्रतिक्रिया को हम उसकी स्थाई सोच नहीं मानते। आज दूसरे प्रदेशों की पुलिस से लोगों की इस उम्मीद को भी हम स्थाई नहीं मानते कि उन्नाव और बाकी जगहों के बलात्कारियों को भी वहां की पुलिस ऐसे ही मौका-ए-वारदात लेकर जाए, और वहीं पर उनका इंसाफ करे। हम देश की सोच का अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते क्योंकि कल सुबह का हर्षोन्माद कुछ लोगों में कल शाम तक ही होश वापिस पाने लगा था, और हमारा ऐसा अंदाज है कि बलात्कारों की भयावहता से ऊबरकर यह देश बंदूक की नली पर आस्था कुछ घटाएगा। देश के लोगों में हिंसा को स्थाई मान लेने जितनी निराशा हममें आज नहीं हैं, लेकिन देश में बड़ा असर रखने वाली मीडिया का पुलिस की इस बारात में इस तरह का नागिन डांस करना बड़ा खतरनाक जरूर लग रहा है। जब इसी अखबार की समाचार की सुर्खी में एक विचार का तडक़ा लगता है, तो वह विचार उस अखबार का अपना विचार छोड़ कुछ नहीं होता, और जब ऐसे विचार लोकतंत्र में घोर अनास्था दिखाते हैं, तो इन अखबारों को उन अखबारों के तजुर्बे भी जानना चाहिए जिन्होंने पाकिस्तान जैसे देश में बंदूक की नली का राज देखा हुआ है। बात पुलिस की बंदूक से फौज की बंदूक तक की नहीं है, यह लोकतंत्र में आस्था खोने की बात है, जिसके बाद मीडिया की न जगह होगी, न ही जरूरत। इसलिए लोकतंत्र से मिली ताकत से जो जिंदा हैं, कम से कम उनको जमीन पर गिरे लोकतंत्र को इस तरह कूद-कूदकर खूंद-खूंदकर नहीं कुचलना चाहिए, और धीमी सही, अदालतों के फैसलों का इंतजार करना चाहिए क्योंकि हमने जो सांसद चुने हैं, वे ऐसे ही चुने हैं जो कि देश में ऐसी ही अदालतों के हिमायती हैं, खाली कुर्सियों के हिमायती हैं, न्यायिक भ्रष्टाचार के हिमायती हैं। इसलिए आखिर में कुल मिलाकर एक साफ बात यह कि लोकतंत्र कतरे-कतरे में न आ सकता, न लागू हो सकता, वह अगर आएगा तो तमाम कतरों में एक साथ ही आएगा, या फिर नहीं आएगा। आज पुलिस बलात्कार के आरोपियों को मौके पर सजा दे रही है, कल वह आपका घर खाली कराने आएगी, और वह वहीं पर इंसाफ करेगी। अपने ऐसे दिन को याद करके ही पुलिस के अभिनंदन के जुलूस में नागिन डांस करें।


-सुनील कुमार


Date : 06-Dec-2019

हैदराबाद की जिस सामूहिक बलात्कार और जलाकर हत्या से देश कुछ देर को हिल गया था, उसके चारों गिरफ्तार आरोपियों को पुलिस ने आज मुंहअंधेरे एक मुठभेड़ में मार दिया। पुलिस का कहना था कि वह जुर्म का सीन फिर से गढऩे के लिए इन गिरफ्तार लोगों को लेकर मौका-ए-वारदात गई थी, और वहां उन्होंने पुलिस पर हमला कर दिया, भागने की कोशिश की, ऐसे में पुलिस ने उन्हें मार दिया। इनको मारने की फरमाईश देश भर में पहले से चल रही थी, और लोकसभा में जया भादुड़ी ने तो यह मांग भी की थी कि बलात्कार के मुजरिमों को सजा के लिए भीड़ के हवाले कर देना चाहिए जहां उनके चिथड़े उड़ाए जाएं। ऐसे माहौल में हैदराबाद की पुलिस ने एक किस्म से विविध भारती के फरमाईशी कार्यक्रम की तरह काम किया है, और जनता की मुराद पूरी कर दी है। अब जैसा कि कानून कहता है कि मुठभेड़-हत्या या मुठभेड़-मौत, जो भी कहें, उसकी जांच की घोषणा की गई है। जांच की घोषणा से यह याद आया कि अभी चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में एक हाईकोर्ट जज की गई जांच की रिपोर्ट सामने आई है जिसमें कहा गया है कि सीआरपीएफ और राज्य की पुलिस ने बस्तर में त्यौहार की तैयारी के लिए बैठक करते बेकसूर और निहत्थे आदिवासियों को गोलियों से भून दिया था, और मरने वाले 17 लोगों में 7 नाबालिग भी थे। इस किस्म की थोक हथियारबंद हत्या का मामला जांच रिपोर्ट में साबित होने के बाद अब इन सरकारी वर्दियों का क्या किया जाए? जया भादुड़ी की फरमाईश पूरी की जाए, या देश भर में जगह-जगह आज पटाखे फोड़ते, हैदराबाद पुलिस पर मौके पर फूल बरसाते लोगों की तारीफ की जाए? 

सुबह से इस खबर के आते ही जिन लोगों ने प्रतिक्रिया जानने के लिए बाकी लोगों तक यह खबर बढ़ाई, उनमें से काफी लोगों ने इंसाफ के इस तरीके की तारीफ की, क्योंकि इंसाफ का और कोई तरीका तारीफ के लायक रह नहीं गया है। बलात्कार के आरोप में पकड़े गए लोगों को इस तरह मार दिए जाने की तारीफ करने वाले लोग इस बात से भी निराश हैं कि देश में लड़कियों और महिलाओं की, बच्चों की हिफाजत का कोई जरिया नहीं रह गया है, मुजरिमों के हौसले आसमान पर हैं, बलात्कार के आरोपी जेल में रहने के बजाय संसद और विधानसभाओं में हैं, मंत्रिमंडलों में हैं। एक किसी ने सुबह हैदराबाद पुलिस के लिए यह गोपनीय सूचना भी पोस्ट की है कि बहुत से बलात्कारी रायसीना हिल की एक केंटीन में बैठक कर रहे हैं, वहां पहुंचे। जाहिर है कि यह इशारा संसद भवन की केंटीन की तरफ था। कुल मिलाकर देश में आम जगहों पर आम लोगों की हिफाजत से लोग निराश हैं, बहुत बुरी तरह निराश हैं, भ्रष्ट और दुष्ट हो चुकी पुलिस पर लोगों का अधिक ऐतबार नहीं है, उससे लोगों को कोई उम्मीद नहीं है, देश की अदालतों से मुजरिमों को सजा मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, और ऐसे में आम जनता को फिल्मी अंदाज वाला एक ऐसा इंसाफ अकेला रास्ता दिख रहा है जिसमें मौके पर ही पुलिस कथित मुजरिमों का हिसाब चुकता कर देती है। 

हैदराबाद में आज सुबह आरोपियों को मारने वाली यह उसी देश की पुलिस है जिसने बिना किसी आरोप के महज अपने गांव में त्यौहार की बैठक करने वाले बस्तर के निहत्थे आदिवासियों को घेरकर थोक में मार डाला था। इसलिए पुलिस के हाथों होने वाला इंसाफ उसी वक्त तक अच्छा लगेगा जिस वक्त तक उसकी गोलियों के शिकार आज ताली बजाते फूल बरसाते लोगों के घरवाले नहीं होंगे। इसी देश में बहुत ही गरीब और बेबस लोगों को बड़े-बड़े जुर्म में गिरफ्तार करके बरसों तक उन पर फर्जी मुकदमे चलाने का एक लंबा इतिहास रहा है। बेकसूर लोग चौथाई सदी बाद जाकर भी जेल से बाइज्जत बरी होते रहे हैं। ऐसे में अभी-अभी टीवी की स्क्रीन पर मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन मुठभेड़ मौतों को देश के लिए राहत की सांस कहा है, और यह भी कहा है कि दुष्टों के साथ दुष्टता का सुलूक होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी इसे पीडि़ता को इंसाफ मिलना कहा है। मायावती ने इसे सराहनीय काम कहा है, उमा भारती ने इसे महिला सुरक्षा की गारंटी का काम कहा है, तेलंगाना के कानून मंत्री ने इसे भगवान की दी हुई सजा कहा है। जाहिर है कि आज नेता कोई न्यायसंगत या तर्कसंगत बात कहने की हालत में नहीं हैं। लेकिन नेताओं से परे भी देश के चर्चित लोग, जया बच्चन से लेकर सायना नेहवाल तक, ऋषि कपूर से लेकर दूसरे चर्चित अनगिनत लोगों तक इस मुठभेड़ मौत/हत्या की तारीफ हो रही है। इस मौके पर अनगिनत लोग इस बात को भी उठा रहे हैं कि मानवाधिकार के हिमायती अब बयानबाजी करने लगेंगे, और मरने वालों के हक गिनाने लगेंगे। न्याय की प्रक्रिया को गिनाने लगेंगे। 

इस पल टीवी की स्क्रीन पर पुलिस की तारीफ में नारेबाजी दिख रही है, मुठभेड़ के पुल पर से गुजरती हुई छात्राओं की बस में खुशी के नारे लगाती लड़कियां दिख रही हैं, सड़कों पर आतिशबाजी दिख रही है, आम महिलाएं पुलिस को सलाम कर रही हैं, और पुलिस पर फूल बरसाए जा रहे हैं। कुल मिलाकर देश की न्याय व्यवस्था के प्रति एक बहुत बड़ी अनास्था साबित हो रही है जो कि लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक भी है। यह अनास्था कुछ उसी किस्म की है जैसी इमरजेंसी के दिनों में लोगों को थी कि रेलगाडिय़ां समय पर चलने लगी थीं, और जिनके घरवाले जबरिया नसबंदी के शिकार नहीं हुए थे, मीसा में बंद नहीं थे, उन सबको आपातकाल अनुशासन पर्व लगता था। जैसे आपातकाल अनुशासन पर्व लगता था, वैसे ही आज सुबह की मुठभेड़-मौतें लोगों को इंसाफ लग रही हैं। देश के चर्चित सांसदों, विधायकों, मौजूदा और भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को भी यह इंसाफ लग रहा है, तो इसका मतलब यह है कि संसद और विधानसभाओं के बनाए गए कानून फ्लॉप शो हो चुके हैं, और उसे कोई दर्शक नसीब नहीं हैं, तमाम दर्शक भीड़त्या या मुठभेड़-हत्या पर बरसाने के लिए फूल लाने गए हैं।  
यह सिलसिला लोगों की दहशत, उनकी नफरत, और उनकी निराशा को सहलाने वाला तो है, उनके जख्मों पर मरहम लगाने वाला तो है, लेकिन जख्मों पर ठंडक महसूसते लोग यह सोचने को भी तैयार नहीं हैं कि जिन जिंदा इंसानों की चर्बी निकालकर यह मरहम बनाया गया है, हो सकता है कि वे बेकसूर हों, ठीक वैसे ही बेकसूर हों जैसे हिन्दुस्तान में लंबे मुकदमों के बाद बेकसूर साबित होने वाले गरीब रहते हैं। पल भर की यह ठंडक लोगों की उस समझ को भी खत्म कर चुकी है जिसे अपने आसपास के बेकसूरों की बरसों बाद की ऐसी रिहाई याद रहनी चाहिए थी। हिन्दुस्तान की पुलिस जाने कब से बेबस और गरीब लोगों को मुकदमों में झूठे फंसाते आई है, और मुठभेड़ में मारे गए कौन लोग सचमुच ही मुजरिम थे, और कौन से लोग विचलित भीड़ के नारों के दबाव में फर्जी फंसाए गए लोग थे, इसके फैसले और फर्क का भी वक्त अब जनता देना नहीं चाहती। अब लोग वैसा ही इंसाफ चाहते हैं जैसा फिल्मों में होता है, लोग अब अदालती पेशियों की एक, दो, तीन, चार जैसी गिनती गिनना नहीं चाहते, वे अब सीधे अब तक छप्पन तक पहुंचना चाहते हैं, और वैसा ही इंसाफ चाहते हैं। यहां पर यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि आज सुबह जिस पुलिस अफसर के मातहत ये मुठभेड़-मौतें हुई हैं, उसी अफसर के मातहत 11 बरस पहले इसी शहर में एक महिला पर एसिड फेंकने के तीन आरोपियों को एक मुठभेड़ में ही मार गिराया गया था। आज इस आला अफसर की तारीफ में इस पुरानी कामयाबी को भी गिनाया जा रहा है। 

हिन्दुस्तान में सभ्यता और लोकतंत्र की इससे बड़ी नाकामयाबी और क्या हो सकती है? सभ्यता तो लोगों के बीच की है, और लोकतंत्र के तहत पुलिस से लेकर अदालत तक की वह सारी व्यवस्था है जो कि लोकतंत्र के हक और जिम्मेदारी को लागू करने का काम करती है। खुशी मनाती आम जनता को इस पल बस यही रियायत दी जा सकती है कि लोकतंत्र के ढांचे की पूरी तरह, और बुरी तरह नाकामयाबी के चलते जनता अपनी सभ्यता खो रही है, खो चुकी है, और खोना चाहती है। यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। संसद और विधानसभाएं, अदालतें, और समाज भी यह सोचे कि ये कहां आ गए हैं। यह सिलसिला उन नागरिकों के लिए भी खतरनाक है जिनके परिवार के लोग अब तक न भीड़ के हाथों मारे गए हैं, और न ही पुलिस-मुठभेड़ में जिनकी मौत हुई है, और जो अभी जिंदा हैं, और जो अभी बाकी हैं। यह सिलसिला उन तमाम जिंदा लोगों के लिए मौत सरीखा खतरनाक है जो कि इंसाफ के एक नाकामयाब हो चुकी मशीनरी पर भरोसा खो बैठे हैं, और जिंदा हैं, बलात्कार झेलने को, भीड़ के हाथों मौत पाने को, या पुलिस और सुरक्षाबलों के हाथों मासूमियत और बेगुनाही के कत्ल को। ऐसे तमाम लोगों के साथ इस लोकतंत्र में हमदर्दी ही हो सकती है क्योंकि वे अभी जिंदा हैं, और मौत उन तक भीड़ की शक्ल में भी आ सकती है, और वर्दी में भी। जो मारे जा चुके हैं, उनके साथ अब कोई हमदर्दी भी मुमकिन नहीं, वह महज उनके परिवार के साथ हो सकती है कि उनके लोगों को इंसाफ की प्रक्रिया नसीब नहीं हुई। आज लोगों की खुशी लोकतंत्र को श्रद्धांजलि है कि वह अब एक अवांछित संतान, या अवांछित बुजुर्ग की तरह रह गया है। देश के आम लोगों को हमारी शुभकामना कि उनके घर के लोग ऐसा मुठभेड़ी-इंसाफ न पाएं। 
-सुनील कुमार


Date : 05-Dec-2019

मध्यप्रदेश के इंदौर से एक खबर आ रही है कि वहां एक भांडाफोड़ अखबार निकालने वाले जीतू सोनी नाम के आदमी की इमारतों और होटल को तोडऩे का काम चल रहा है। पिछले कई दिनों से यह अखबार मध्यप्रदेश के चर्चित हनी ट्रैप सेक्स-वीडियो की बातों को छाप रहा था, और उसके होटल, शराबखाने, नाचघर, और अखबार के दफ्तर पर पुलिस ने लगातार छापे मारे, और उसके बेटे को गिरफ्तार भी किया। ऐसी खबरें आईं कि बाप-बेटे के होटल और बार में नाच-गाने के लिए बंगाल-असम से लाई गई दर्जनों महिलाओं को कैद करके रखा गया था, और उनको मजदूरी भी नहीं मिलती थी। अब पुलिस के साथ-साथ म्युनिसिपल और दूसरे विभाग भी इसके कारोबार पर टूट पड़े हैं। लोगों को थोड़ी सी हैरानी यह हो रही है कि इतने किस्म के अवैध कहे जा रहे कारोबार और निर्माण पर कार्रवाई की नौबत उस समय आई, जब सेक्स-सीडी की खबरें छपने लगीं। हैरानी की एक और बात यह है कि हनी ट्रैप मामले में मध्यप्रदेश की पिछली भाजपा सरकार के मंत्री-अफसर फंसे हुए बताए जा रहे हैं, लेकिन यह कार्रवाई आज प्रदेश की कांग्रेस सरकार कर रही है। 

इन खबरों को देखें तो यह लगता है कि इतने किस्म के विवादास्पद और गैरकानूनी काम लंबे समय से चलने के लिए क्या एक अखबार की आड़ काफी थी? वैसे तो अखबारों की आड़ लेकर बहुत किस्म के गलत और गैरकानूनी काम जगह-जगह पर होते आए हैं, और अब इस आड़ में अखबार के साथ-साथ टीवी चैनल या न्यूज पोर्टल और जुड़ गए हैं। खबरों की आड़ में सौ किस्म के दूसरे धंधे होने लगे हैं, जो कि पहले कम चलते थे, अब बढ़ चले हैं, बढ़ चुके हैं। मीडिया की ताकत का इस्तेमाल करके अवैध कब्जे, अवैध निर्माण, अवैध कारोबार बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गया है कि अब मीडिया मालिक युवतियों को कैद में रखकर डांस बार चलाने लगे हैं, और उससे कमाई करने लगे हैं। देश में कई जगहों पर टीवी चैनलों के नाम पर लोगों की रिकॉर्डिंग करके उनको ब्लैकमेल करने के बहुत से मामले सामने आए हैं, और ऐसे धंधों का विरोध करने के लिए मीडिया का कोई संगठन या प्रकाशकों की कोई संस्था नहीं रह गई है। 

लोगों को याद होगा कि एक समय श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन देश में बहुत मजबूत था, और वह पत्रकारों के कानूनी अधिकारों के लिए लडऩे के साथ-साथ पत्रकारिता के नीति-सिद्धांतों के लिए भी लड़ता था। उस वक्त पूरे देश में एक मजबूत मजदूर आंदोलन के रूप में श्रमजीवी पत्रकार संघ जाना जाता था, और उसका बड़ा सम्मान भी था। अब धीरे-धीरे बड़े पत्रकार अखबारों या टीवी चैनलों पर सिर्फ ठेके के मजदूरों की तरह काम करते हैं, और नियमित कर्मचारी जैसा वेतन का सिलसिला मीडिया के बहुत से हिस्से में खत्म हो गया है। ठेके के बड़े-बड़े पत्रकार किसी संगठन या आंदोलन का हिस्सा नहीं रह गए, और देश में मजदूर कानूनों की हिफाजत में किसी सरकार की दिलचस्पी नहीं रह गई, इसलिए लड़ते-लड़ते श्रमजीवी पत्रकार संघ खत्म हो गए। नतीजा यह हुआ कि पत्रकारिता में ईमानदारी की बात उठना भी बंद हो गई, और अब इंदौर-मध्यप्रदेश के बाहर के हमारे जैसे बहुत से लोगों को यह पहली बार पता लगा कि अखबार के पीछे डांस बार चल रहा था, और ऐसे धंधे हो रहे थे। 

मध्यप्रदेश में पन्द्रह बरस तक चली भाजपा सरकार की जानकारी में भी यह सब रहा होगा, लेकिन ऐसी किसी कार्रवाई की बात पता नहीं चली थी। अब सेक्स की खबरों और उसकी रिकॉर्डिंग के भांडाफोड़ के बाद ऐसी कार्रवाई सत्ता के लिए कई किस्म के शक भी खड़े करती है कि क्या कुछ खास किस्म की रिकॉर्डिंग के लिए ये छापे मारे गए? क्योंकि अब तक की इस भांडाफोड़ अखबारनवीसी का शिकार तो पिछली सरकार के ताकतवर लोग थे। खैर, सरकार की नीयत जो भी हो, पत्रकारिता के नाम पर चलने वाले ऐसे धंधों का खत्म होना ही एक नियति होनी चाहिए। यह और जल्दी होती, तो और बेहतर होता। पत्रकारिता में काम करने वाले लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि मीडिया मालिकों के ऐसे हाल के चलते वे अपने पेशे की इज्जत बनाए रखने के लिए क्या कर सकते हैं? क्योंकि अब कुछ हजार रूपए में एक न्यूज पोर्टल शुरू करने के बाद कोई भी व्यक्ति अपने आपको मीडिया कह सकते हैं, और कालेधंधे कर सकते हैं। मीडिया के अच्छे हिस्से की इज्जत बनाए रखने के लिए यह सिलसिला खत्म होना जरूरी है। 
-सुनील कुमार


Date : 04-Dec-2019

बस्तर के नक्सल मोर्चे पर तैनात आईटीबीपी के एक कैम्प में एक जवान ने पांच साथियों की गोली मारकर हत्या कर दी, और खुदकुशी कर ली। उसके बारे में पहली खबर में कहा जा रहा है कि वह छुट्टी न मिलने से तनाव में चल रहा था। आगे जाकर हो सकता है कि कोई और वजह सामने आए, लेकिन छुट्टी न मिलने से हत्या की पहले भी बहुत सी वारदातें ऐसे सशस्त्र सुरक्षा बलों में होते आई हैं जो मुश्किल और विपरीत परिस्थितियों में लंबे समय तक तैनात रहते हैं। और जिन्हें वक्त जरूरत पर घर जाने नहीं मिलता। यह वजह ऐसी हिंसा और आत्महत्या के अनगिनत मामलों के पीछे रही हैं, और कई स्तरों पर इस पर विचार-विमर्श होते भी आया है। 

बस्तर जैसे स्थायी हिंसा, तनाव, और खतरे के हथियारबंद मोर्चे पर तैनात लोग वैसे भी तनाव में रहते हैं, और हिन्दुस्तान जैसे देश में घर के एक प्रमुख पुरूष सदस्य के बाहर रहने पर दूर बसे उसके परिवार को बहुत किस्म की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। भारत के तकरीबन सभी प्रदेशों में सरकारी कामकाज का हाल इतना खराब है कि जिस परिवार को सरकारी कामकाज का चक्कर पड़ता है, उसका एक सदस्य इसी काम में लग जाता है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले बस्तर के नक्सल मोर्चे पर ही तैनात सीआरपीएफ के एक जवान का ऐसा वीडियो सामने आया था जिसने उत्तरप्रदेश में अपने परिवार के जमीन के एक मामले का जिक्र किया था कि अगर उसे सुलझाने में कानूनी मदद नहीं मिली तो वह नौकरी छोड़कर हथियार लेकर उतर जाएगा। इस वीडियो के खबरों में आने के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उत्तरप्रदेश सरकार से संपर्क करके इस समस्या को सुलझाने के निर्देश दिए थे। आज हिन्दुस्तान में जगह-जगह से ऐसी खबरें आती हैं कि छुट्टी पर लौटे किसी फौजी से सरकारी दफ्तरों में कैसी बदसलूकी की गई, या रिश्वत मांगी गई, या उसे सार्वजनिक जगह पर पुलिस ने किस तरह पीटा। जब परिवार से लंबे समय तक लोग दूर रहते हैं, तो उनके मन में ऐसी कई आशंकाएं भी घर कर जाती हैं, और उन्हें छुट्टी पाने की बेसब्री भी होती है। 

सुरक्षा बलों की दूर-दूर तक खतरे में लंबे वक्त तक की तैनाती उन्हें कई किस्म की मनोवैज्ञानिक दिक्कतों में भी उलझाती है, और यह बात भी ऐसी वारदातों के बाद कई बार सामने आई है। बहुत से ऐसे मामले हुए जिनमें जूनियर सुरक्षाकर्मी ने छुट्टी न मिलने पर अपने अफसर को गोली मार दी। लगातार हथियारों के साथ जीने, लगातार हथियारबंद, और विस्फोटकों के, खतरों के बीच जीने से भी सुरक्षा कर्मचारियों की सोच में एक अनचाही हिंसा आ जाती है, और उन्हें बहुत सी दिक्कतों का इलाज बंदूक की नली से निकलने वाला दिखने लगता है। फौज के सैनिक हों, या पैरामिलिट्री के सिपाही हों, ये जब समूह में कहीं सफर करते हैं, या एक साथ किसी हाट-बाजार जाते हैं, तो उस वक्त भी इनकी हिंसा की कई खबरें आती हैं। ऐसी तमाम बातों को देखें तो लगता है कि सुरक्षा कर्मचारियों को एक बड़े मानसिक परामर्श की सहूलियत हासिल होनी चाहिए, जो कि आज शायद नहीं है, या नहीं सरीखी है। यह बात बहुत बार उठती है कि परिवार से दूर रहने की वजह से तनाव, लगातार हथियारबंद संघर्ष की वजह से तनाव, परिवार की स्थानीय सरकारी-कानूनी दिक्कतों की वजह से तनाव को दूर करने के इंतजाम करने चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है, पूरे देश में मनोचिकित्सक या मानसिक परामर्शदाता गिनती के हैं, और वे लाखों की आबादी पर एक उपलब्ध हैं। ऐसे में अधिक तनाव में जीते हुए सुरक्षा कर्मचारियों के लिए बेहतर सुविधा रहनी चाहिए, परामर्श की भी, और जीने-कमाने-खाने की भी। एक ऐसा इंतजाम भी रहना चाहिए कि सरकार की योजना की वजह से जिन लोगों को लगभग स्थाई रूप से परिवार से दूर रहना पड़ता है, उनके परिवार की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए ऐसे सुरक्षा बल कोई स्थानीय इंतजाम भी करें। भारत में पुलिस को ही बहुत बुरी नौबत में काम करना पड़ता है, और उनको हर हफ्ते की छुट्टी भी नहीं मिल पाती है। ऐसे में बाकी सुरक्षा बलों के कर्मचारियों की जरूरतों को समझने और उनकी दिक्कतों को सुलझाने की एक गंभीर कोशिश तुरंत होनी चाहिए क्योंकि जिंदगियां इतनी सस्ती नहीं हैं कि उन्हें काम की स्थितियों के तनाव में गंवाया जा सके।
-सुनील कुमार


Date : 03-Dec-2019

केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है कि अदालत के पिछले बरस के एक फैसले को एक बड़ी बेंच सुने। सर्वोच्च न्यायालय में पांच जजों की बेंच ने अनुसूचित जाति-जनजाति के पदोन्नति में भी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने का फैसला दिया था, और अब केंद्र सरकार एक बार फिर अदालत के फैसले को पलटवाने के लिए इस मामले को सात जजों की बेंच को भेजने की अपील दाखिल कर चुकी है। सरकार के वकील ने अदालत को कहा कि यह एक भावनात्मक मामला है और सरकार चाहती है कि अधिक बड़ी बेंच इसे सुने। सुप्रीम कोर्ट में इसके पहले 2006 में पांच जजों की एक बेंच प्रमोशन से एसटी-एससी के मलाईदार तबके को बाहर कर चुकी थी, और 2018 में भी एक दूसरी बेंच ने ऐसा ही आदेश दिया था।

केंद्र सरकार की यह अपील पूरी तरह नाजायज है, और एसटी-एससी तबकों की क्रीमीलेयर को पदोन्नति से बाहर तो रखना ही चाहिए, इसके साथ-साथ देश के आरक्षण कानून में भी इन तबकों के मलाईदार हिस्से को तमाम फायदों से बाहर करना जरूरी है। हम इसके बारे में पहले भी दर्जनभर बार लिख चुके हैं कि इन तबकों को जिस आधार पर आरक्षण दिया गया था, वे आधार आज भी जारी हैं, इसलिए आरक्षण जारी रहना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह है कि दलित-आदिवासी तबकों के भीतर भी आरक्षण का फायदा पाने वाली पीढ़ी सरकारी नौकरियों से लेकर संसद और विधानसभा तक पहुंच चुकी है, और ऐसी ताकत पाने वाली पीढ़ी की संतानों को अतिरिक्त फायदे की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। ऐसे मलाईदार तबके का बड़ा सहज तर्क यह रहता है कि वे आज भी सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं, और इसलिए उन्हें आरक्षण का फायदा जारी रहना चाहिए, यह बात कुछ हद तक अगर सही भी है, तो भी इन तबकों के भीतर इनसे कमजोर नौबत वाली एक बहुतायत वाली आबादी है जो कि किसी फायदे तक नहीं पहुंच पाई है। इन तबकों के भीतर ताकतवर हो चुकी पीढ़ी के बच्चे संपन्नता और पढऩे-लिखने की सहूलियत, कोचिंग के चलते हुए इतने ताकतवर हो जाते हैं कि उनके स्वजातीय या स्वधर्मी बच्चे उनके आसपास भी नहीं फटक पाते। ऐसे में इस मलाईदार तबके को इन तबकों के ऊपर से ठीक उसी तरह हटाने की जरूरत है जिस तरह कढ़ाई में खौलते दूध के ऊपर से मलाई को किनारे किया जाता है, तब नीचे का दूध औंट पाता है। इन तबकों के लिए आरक्षित अवसरों और इनकी आबादी के बीच कोई अनुपात नहीं है। ऐसे में आरक्षण के फायदे घूम-फिरकर अगर उन्हीं सीमित लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलते चले जाएंगे, तो वह एक असंतुलित तबका बनने के अलावा और कुछ नहीं होगा। यह सामाजिक हकीकत समझना चाहिए कि क्रीमीलेयर को बाहर किए बिना उसी समाज के सबसे कमजोर लोगों की कोई संभावना नहीं बनती। जिस तरह और जिस तर्क के आधार पर ओबीसी के भीतर क्रीमीलेयर को फायदे से परे किया गया है वह तर्क एसटी-एससी पर भी लागू होता है और इसे अनदेखा करना सत्ता पर काबिज एसटी-एससी लोगों के पारिवारिक हित में जरूर है, लेकिन इन तबकों के बाकी गैरमलाईदार बहुतायत लोगों के हितों के ठीक खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी यह व्यापक मुद्दा गया नहीं है, लेकिन इसके बारे में  दलित-आदिवासी तबकों के गरीब-कमजोर लोगों को जाना जरूर चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 02-Dec-2019

देश के एक प्रमुख उद्योगपति राहुल बजाज ने एक मीडिया संस्थान के कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह, और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की मौजूदगी में माईक पर सार्वजनिक रूप से जब कहा कि देश के उद्योगपतियों में डर का माहौल है और वे केन्द्र सरकार से सवाल करने का हौसला नहीं जुटा पाते तो देश के मीडिया ने बड़े पैमाने पर उनके इस हौसले की तारीफ की। राहुल बजाज ने यह भी कहा कि देश में जिस तरह लिंचिंग हो रही है, जिस तरह से प्रज्ञा ठाकुर गोडसे की तारीफ में बयान दे रही है, वह भी ठीक नहीं है। उनकी कही बातें बहुत खुलासे से छपी हैं, इसलिए उन सबको यहां दुहराने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन राहुल बजाज के इस हौसले की सोशल मीडिया पर भी जमकर तारीफ हो रही है। इस तारीफ के सिलसिले में जिस तरह से लोगों ने उनके परिवार की तारीफ की है, उससे पता लगता है कि संपन्नता ही सब कुछ नहीं होती, किसी औद्योगिक घराने का आकार ही सब कुछ नहीं होता, एक सामाजिक साख भी होती है जो कि महत्वपूर्ण होती है। राहुल बजाज के परिवार के जमनालाल बजाज महात्मा गांधी के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे, वे अंग्रेजों के वक्त भी उद्योगपति थे, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने में पीछे नहीं हटे, गांधी का पूरा साथ दिया, और देश के लिए उन्होंने जितने किस्म के त्याग किए, उन सबको लोग सोशल मीडिया पर बड़े खुलासे से लिख रहे हैं। किसी उद्योगपति की तारीफ में लोग इस तरह उतरें, और खासकर ऐसे लोग उतरें जो कि आमतौर पर वामपंथी विचारधारा के हैं, या उदार पूंजीवाद के विरोधी हैं, तो यह बात भी सोचने पर मजबूर करती हैं। लोगों ने जमनालाल बजाज की तारीफ करते हुए, उनके सामाजिक सरोकार की तारीफ करते हुए जितनी यादें ताजा की हैं, और ऐसे ही सामाजिक योगदान के लिए टाटा और बिड़ला को भी याद किया है, उन्हें दूसरे कारोबारियों से अलग गिना है, वह भी सोचने लायक बात है। 

लेकिन इसके साथ-साथ अभी-अभी दो और बातें हुई हैं। लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम केबीसी में अमिताभ बच्चन के सामने बैठीं इंफोसिस कंपनी के सामाजिक संस्थान, इंफोसिस फाऊंडेशन की सुधा मूर्ति ने बताया कि वे टाटा की एक कंपनी में काम करती थीं, और जब वे नौकरी छोड़ रही थी तो जेआरडी टाटा ने उनसे वजह पूछी, जब उन्होंने बताया कि उनके पति नारायण मूर्ति एक नई कंपनी शुरू कर रहे हैं और उनके साथ रहने के लिए उन्हें दूसरे शहर जाना पड़ रहा है, तो जेआरडी टाटा ने यह नसीहत दी थी कि जब उनकी कंपनी खूब कमा ले, तो समाज को वापिस देना शुरू कर दे। उन्होंने सुधा मूर्ति को सुझाया था कि उद्योगपति अपने कारोबार के महज ट्रस्टी रहें, वे जिस समाज से कमाते हैं, उसी समाज को उन्हें वापिस करना चाहिए। सुधा मूर्ति ने यह बात याद रखी, और आज उनके पति की कंपनी अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाजसेवा मेें लगा रही है, और पति-पत्नी दोनों एक बहुत ही किफायत की जिंदगी जीते हैं, देश के सबसे संपन्न परिवारों में से एक होने के बाद भी सुधा मूर्ति ने पूरी जिंदगी में मेकअप तक नहीं किया, गहने नहीं पहने, और पूरी सादगी से रहती हैं। उनके पति भी इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वे विमान में इकॉनॉमी क्लास में सफर करते हैं, और अपनी दौलत को समाजसेवा में लगाते हैं। 

इसके साथ-साथ अभी एक खबर और आई है जिसे मिलाकर ही हम आज इस विषय पर यहां लिख रहे हैं। कश्मीर के राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक अब गोवा के राज्यपाल हैं, और उन्होंने वहां पर अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के उद्घाटन के मौके पर मंच से, माईक पर, कैमरों के सामने खुलकर कहा कि इस देश में ऐसे दौलतमंद लोग हैं जो अपने लिए 14-14 मंजिलों का मकान बनाते हैं जिनमें एक मंजिल पर नौकर, और एक मंजिल पर कुत्ते रहते हैं, लेकिन वे देश के लिए शहीद होने वाले सैनिकों के कल्याण के लिए एक पैसा भी नहीं देंते। राज्यपाल ने खुलकर बड़ी तेजाबी जुबान में कहा कि ऐसे अरबपतियों को वे सड़े हुए आलुओं के बोरे से अधिक कुछ नहीं मानते जिनका कोई सामाजिक योगदान नहीं रहता। उनके भाषण का वीडियो चारों तरफ फैल रहा है, और यह जाहिर है कि 14 मंजिला मकान से उनका साफ-साफ इशारा मुकेश अंबानी की तरफ था। 

आज देश में उद्योगपतियों को लेकर जिस तरह की नफरत फैली हुई है, वे जितने बड़े पैमाने की बैंक जालसाजी में लगे हुए हैं, जनता को लूट रहे हैं, खदानों के लिए आदिवासियों को बेदखल कर रहे, जंगलों को खत्म कर रहे हैं, पर्यावरण का नाश कर रहे हैं, वैसे में देश कुछ पुराने उद्योगपतियों को भी याद कर रहा है जिन्होंने कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज के लिए लगाया था, और आज के कुछ बड़े उद्योगपतियों को भी याद कर रहा है जो अपनी आधी कमाई या आधी दौलत समाज के लिए लगा रहे हैं। 

-सुनील कुमार


Date : 01-Dec-2019

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के वक्त से अब तक बस्तर से कमोबेश ऐसी शिकायतें आती रहीं कि पुलिस और बाकी सुरक्षा बलों के लोग बेकसूर आदिवासियों को मारते रहे हैं, उनके गांव जलाते रहे हैं, उन्हें छत्तीसगढ़ छोड़कर आन्ध्र जाने पर मजबूर करते रहे हैं, और आदिवासी लड़कियों-महिलाओं से बलात्कार करते रहे हैं। जब जो सरकार रही, उसके अफसरों ने ऐसी तमाम शिकायतों को नक्सली-आतंक में स्थानीय लोगों द्वारा की गई शिकायत करार दिया, और भाजपा के पिछले पन्द्रह बरस के राज में ऐसी बेतहाशा हिंसा देखी थी। उस पूरे दौर में हमने बार-बार हत्याओं के शौकीन पुलिस-अफसरों के बारे में लिखा था, लेकिन पिछली सरकार में ऐसे अफसरों को बचाने वाले इतने बड़े-बड़े अफसर थे, और बहुत से मौकों पर पूरी की पूरी सरकार ही बलात्कारी-हत्यारों को बचाने में जुट जाती थी, और इंसाफ के लिए लोग सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाते रहते थे। आज इस चर्चा की जरूरत इसलिए है कि 2012 में बस्तर के बीजापुर के सारकेगुड़ा में हुई एक कथित मुठभेड़ में 17 आदिवासियों की मौतों पर बिठाए गए न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट का नतीजा कल सामने आया है जिसमें कहा गया है कि सीआरपीएफ और सुरक्षा बलों की एक मिलीजुली टीम ने इस इलाके में बैठक कर रहे गांव के लोगों पर एकतरफा हमला किया जिसमें इतने आदिवासी मारे गए थे। 

रमन सरकार के कार्यकाल का यह भयानक मामला उस वक्त के अफसर लगातार भारी जोर लगाकर खारिज करते रहे, लेकिन इसे लेकर आरोपों का दबाव इतना अधिक था कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के एक जज की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया था, और उसकी रिपोर्ट बीती रात छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल के सामने पेश हुई। आयोग ने यह साफ-साफ लिखा है कि त्यौहार की तैयारी की बैठक कर रहे आदिवासियों ने कोई गोली नहीं चलाई थी, और सिर्फ पुलिस-सीआरपीएफ ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं जिससे मारे गए 17 आदिवासियों में से 7 तो नाबालिग भी थे। दर्जन भर ग्रामीण घायल भी हुए थे। आयोग ने यह भी पाया है कि मरने वालों के बदन पर गोलियों के अलावा मारपीट के निशान भी हैं, और यह काम सुरक्षा बलों के अलावा किसी का किया हुआ नहीं है। 

आज जब छत्तीसगढ़ एक राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव की तैयारी में जुटा हुआ है, और इस राज्य के आदिवासी मंत्री अलग-अलग राज्यों में जाकर मंत्री-मुख्यमंत्रियों को न्यौता दे रहे हैं, तो यह सोचने की जरूरत है कि बेकसूर-निहत्थे आदिवासियों को बिना किसी उकसावे या भड़कावे के, बिना किसी खतरे या वजह के इस तरह घेरकर थोक में मार डालकर अगर राज्य की पुलिस या बाकी सुरक्षा बलों के लोग बच जाते हैं, तो आदिवासी-मौतों के ऐसे नाच वाले राज्य को आदिवासी नृत्य महोत्सव की मेजबानी का क्या हक हो सकता है? बस्तर में रमन राज में कुख्यात पुलिस अफसरों ने जिस बड़े पैमाने पर बेकसूरों पर हिंसा की, उन्हें मारा और उनकी औरतों के साथ बलात्कार किया या करवाया, उन सबको देखते हुए राज्य सरकार को ऐसे दर्जन भर बड़े मामलों में एक न्यायिक जांच शुरू करवानी चाहिए, और तब तक के लिए ऐसे कुख्यात अफसरों को सरकारी काम से अलग भी करना चाहिए। 

जनता को तो यह अच्छी तरह याद है कि आज के कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, उनके सलाहकार, उनकी पार्टी के दूसरे नेता रमन सरकार के हाथों अनगिनत बेकसूर मौतों के आरोप लगाते ही आए हैं। अब इस सरकार पर यह साफ-साफ जिम्मेदारी है कि न केवल इस जांच रिपोर्ट पर तुरंत कार्रवाई करे, बल्कि सत्ता की हिंसा के जिन दूसरे बड़े मामलों की जानकारी सार्वजनिक है, उनको भी तुरंत जांच के दायरे में लाया जाए। बेकसूर आदिवासियों की हत्या, उनसे बलात्कार, उनकी बेदखली से बस्तर में कभी भी नक्सल मौजूदगी खत्म नहीं होगी। बीते बरसों में पुलिस के मुजरिम-अफसरों ने इस सिलसिले को खूब बढ़ाया, और बहुत से लोगों का यह अंदाज है कि बस्तर में नक्सल-हिंसा के विकराल होने पर राज्य के बड़े-बड़े अफसरों की कमाई सैकड़ों गुना बढ़ जाती थी क्योंकि नक्सल मोर्चे पर भी खर्च होता था, खरीदी होती थी, और नक्सल इलाकों में निर्माण कार्यों पर कोई निगरानी नहीं रह पाती थी। लोगों को यह भी मालूम है कि बस्तर में बैठकर बड़े पुलिस अफसर वहां के हजारों करोड़ के टेंडर तय करते थे, और उनमें सैकड़ों करोड़ कमाते भी थे। ये सारी बातें भूपेश बघेल और उनकी पार्टी ने बहुत बार विधानसभा के भीतर और बाहर उठाई भी थीं, और अब जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद सबकी निगाहें इस सरकार पर आ टिकी हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 30-Nov-2019

बलात्कारियों को बधिया बनाने के बारे में एक बार देश में चर्चा की जरूरत

हैदराबाद में एक युवती के दुपहिया को पंक्चर करके जिस तरह एक साजिश के साथ चार लोगों ने उससे बलात्कार किया और उसे जिंदा जलाकर मार डाला, उससे देश एक बार फिर हिल गया है कि बलात्कारों का आखिर क्या किया जाए? कल जब यह देश हिला हुआ ही था तो रांची से भी भूकंप का एक और झटका लगा, वहां कानून की पढ़ाई कर रही एक छात्रा से दर्जन भर लोगों ने बलात्कार किया था जो गिरफ्तार किए गए। कुछ पलों के लिए हिलते हुए इस देश में कुछ लोगों को यह भी याद आया कि बरसों पहले, सात-आठ बरस पहले दिल्ली में एक बस में युवती के साथ जिस तरह गैंगरेप किया गया था, और बलात्कारियों में एक नाबालिग भी था, उससे भी देश हिला था, खासा अधिक हिला था, और उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के कहे केन्द्र सरकार ने 3100 करोड़ रूपए का एक निर्भया फंड भी बनाया था कि बलात्कार रोके जा सकें। यह फंड खर्च नहीं हुआ, या थोड़ा सा खर्च हुआ तो महज इश्तहारों पर खर्च हो गया, और उसका मकसद तो किसी कोने से भी पूरा नहीं हुआ। आमतौर पर बलात्कार की खबरों पर हिलने वाला देश कुछ देर में हिलना बंद कर देता है, और फिर ऐसी हर खबर के साथ उसकी संवेदनशीलता घटती चलती हैं। धीरे-धीरे लोगों का हाल यहां तक सीमित हो जाता है कि बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला का जाति-धर्म क्या था, वह किस उम्र या आय वर्ग की थी, बलात्कारी किस जाति-धर्म के थे, कितने थे, बलात्कार के बाद उन्होंने कत्ल किया या नहीं? रेप की खबरों की ऐसी बुनियादी जानकारी तक सीमित समाज की संवेदनशीलता घटती चलती है और जब वारदात अधिक खूंखार हो जाती है, तो कुछेक मोमबत्तियां निकलती हैं, कुछेक प्रदर्शन होते हैं, और फिर बात आई-गई हो जाती है।

यह बात सही है कि हिन्दुस्तानी समाज में जब तक लड़कियों और महिलाओं का दर्जा बराबरी का नहीं होगा, तब तक बलात्कार कम नहीं होंगे, लेकिन हो सकता है कि बराबरी का दर्जा आने में दो सदियां लग जाएं। हो सकता है कि देश में महिला आरक्षण लागू करने में मौजूदा संसद सौ बरस और लगा दे, और उसके भी बाद एक सदी तक उसका असर धीरे-धीरे जमीन तक पहुंच सके। इसलिए समाज सुधार की ऐसी धीमी रफ्तार का लंबा इतिहास देखते हुए यह जरूरी है कि बलात्कार पर कुछ कड़ी कार्रवाई तय की जाए, जो कि मौजूदा कानूनों के तहत मुमकिन नहीं है। मौजूदा कानून बलात्कारी को एक लंबी कैद, अधिक से अधिक उम्रकैद या मरने तक की कैद दे सकते हैं, बलात्कार के बाद हत्या करने वालों को फांसी दे सकते हैं, लेकिन ऐसा दिखाई देता है कि समाज में इन दोनों सजाओं का कोई असर अब बाकी नहीं रहा है। लोग आए दिन खबरें पढ़ते हैं कि बलात्कारी को उम्रकैद हुई, लेकिन इससे लोगों के मन में सजा का खौफ रह नहीं गया है। ऐसे में मानव अधिकार आंदोलनकारियों की फिक्र को किनारे रखकर कुछ ऐसी सजा का प्रावधान करना चाहिए जिससे कि बलात्कार की हसरत रखने वाले लोगों के दिल कुछ हिलें। यह बात अलोकतांत्रिक और क्रूर लग सकती है, लेकिन बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला से पूछकर देखें कि वह कितनी लोकतांत्रिक और कितनी विनम्र रहना चाहती है, एक गैंगरेप के बाद भी। और गैंगरेप के बाद जलाकर मार डाली गई लडक़ी की राख से तो यह भी नहीं पूछा जा सकता।

दुनिया के कुछ देशों में बच्चों के साथ बलात्कार करने वालों को रसायनों से बधिया करने का एक कानून है। हिन्दुस्तान में भी इस पर कई बार बहस हो चुकी है, और आखिरकार इस सोच को खारिज किया गया कि यह बहुत अधिक अमानवीय सोच है। लेकिन आज देश भर में जिस धड़ल्ले से बलात्कार हो रहे हैं, और ऐसा लग रहा है कि हिन्दुस्तानी मर्दों की आबादी के एक हिस्से के लिए महिला से छेडख़ानी और बलात्कार पसंदीदा शगल बन गया है, उसे देखते हुए लगता है कि लोगों को एक अधिक कड़ी चेतावनी की जरूरत है। जिस देश के कानून में मौत की सजा को जारी रखने के अधिकतर लोग हिमायती हैं, वहां पर बलात्कारियों को रासायनिक इंजेक्शन से, या किसी सर्जरी से बधिया करने की सजा मौत की सजा से तो अधिक ही नर्मदिल होगी। अगर ऐसी सजा के बजाय किसी और तरीके से लोगों को लगता है कि बलात्कार रोके जा सकते हैं, तो उस तरीके को इस्तेमाल किया जाए। लेकिन आज के हालात में हमको जो बात सूझ रही है वह यही है कि एक ऐसी सजा का इंतजाम हो जिससे लोगों को अपनी देह की वह हिंसक मर्दानगी खो देने का खतरा दिखे, हमेशा के लिए खो देने का खतरा दिखे, तो हो सकता है कि उसका कुछ असर हो। बलात्कार की घटनाएं अधिकतर मामलों में रोकने के लायक नहीं रहती हैं। लड़कियों और महिलाओं को कामकाज के लिए बाहर निकलना ही होगा, सडक़ों से आना-जाना होगा, और ऐसे में पुलिस की हिफाजत की एक सीमा रहेगी। बहुत से मामलों में पुलिस बलात्कार में हिस्सेदार भी हो जाती है, इसलिए महज पुलिस के इंतजाम से बलात्कार रोके नहीं जा सकते, और न ही पुलिस का इतना बड़ा इंतजाम ही यह देश कर सकता है। ऐसे में समाज में जागरूकता और बराबरी का दर्जा स्थापित होने तक की सदियों के लिए ऐसे कानून की जरूरत है जिससे कम से कम कुछ अरसे के लिए तो लोगों के मन में जुर्म करने पर कानून का एक खौफ आए। आज देश के शरीफों के मन में तो कानून का खौफ दिखता है, लेकिन बलात्कारी सरीखे मुजरिमों के मन में नहीं दिखता, उसी का कुछ इलाज करना जरूरी है, और बलात्कारियों को बधिया बनाने के बारे में एक बार चर्चा छिडऩी चाहिए।

-सुनील कुमार


Date : 29-Nov-2019

बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की जेल जारी है। चारा घोटाले में उन्हें कुछ मामलों में सजा हो चुकी है, कुछ की सुनवाई जारी है, और लोग अब इन मामलों की गिनती भी भूल गए हैं, और सच कहा जाए तो लालू यादव को भी भूल गए हैं कि क्या वे अब जेल से बाहर आ भी पाएंगे? बीमारी के चलते उन्हें कभी-कभी जमानत भी मिली है, और अस्पताल में रहते हुए भी वे मोटे तौर पर खबरों से परे से हो गए हैं। उनके बारे में लिखने की जरूरत आज इसलिए लग रही है कि हिन्दुस्तान में केन्द्र और राज्य सरकारें मिलाकर करीब तीस सरकारें होती होंगी, और अब स्थानीय संस्थाओं में, म्युनिसिपल और पंचायतों में, गिनें तो देश भर में कुछ हजार स्थानीय सरकारें भी हो जाएंगी। इन सबमें सत्ता पर काबिज लोगों के सामने अच्छा काम करके एक मिसाल छोड़ जाने, और भ्रष्टाचार करके सुबूत छोड़ जाने की संभावनाएं हैं, और लालू यादव एक ऐसी मिसाल हैं जिनका यह हाल देखकर बाकी देश के उन लोगों को एक नसीहत लेनी चाहिए जो कि आज भ्रष्टाचार करने की ताकत रखते हैं। 

सरकार में भ्रष्टाचार बिना सुबूत छूटे कम ही हो पाता है। लोग रिश्वत या कमीशन लेते हैं, तो उसके भी ऑडियो-वीडियो सुबूत सामने आ ही जाते हैं, सरकारी फाईलों पर भी कुछ न कुछ गड़बड़ी रह जाती है। जो लालू यादव एक वक्त बिहार के मालिक सरीखे थे, और जो इतनी ताकत रखते थे कि अपनी घरेलू पत्नी को भी पल भर में उन्होंने अपनी वारिस बनाकर मुख्यमंत्री बना दिया था, जो देश में साम्प्रदायिकता-विरोधी मोर्चे के इतने बड़े नेता थे कि वामपंथियों और कांग्रेसियों समेत अधिकतर लोग उनके साथ एकजुट होते थे, जो इतने दमदार नेता थे कि उन्होंने देश भर में एक भड़काऊ और दंगाई रथयात्रा निकालने वाले लालकृष्ण अडवानी को बिहार में कदम रखते ही गिरफ्तार करवा दिया था, उस लालू यादव का आज यह हश्र क्यों हुआ है? लालू यादव का कुनबा सत्ता की अलग-अलग डालियों पर बैठा हुआ था, और आज भी बैठा हुआ है। यह ठीक से याद भी नहीं है कि उनकी पत्नी और बच्चों में से कौन बिहार में विधायक हैं, और कौन लोकसभा या राज्यसभा में हैं, लेकिन इनमें से कोई भी ऐसे नहीं हैं जो कि अनुपातहीन संपत्ति के गंभीर मुकदमे न झेल रहे हों। बिहार का बेताज बादशाह रहा यह समाजवादी नेता साम्प्रदायिकता-विरोध की अपनी कामयाबी के बावजूद आज भ्रष्टाचार और अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में परिवार को ऐसी गहरी दलदल में छोड़कर जेल में पड़ा हुआ है कि उसकी हालत पर महज तरस आ सकता है। 

राजनीति या सरकार, या सार्वजनिक जीवन में भी जिन लोगों के हाथों में किसी किस्म की ताकत होती है, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि कानून तोडऩे या मनमानी करने का सिलसिला किसी भी दिन इस तरह जेल में डाल सकता है कि वहां से निकलना मुश्किल हो। हो सकता है कि कुछ लोगों को यह लगे कि वे इतने होशियार हैं कि सरकारी भ्रष्टाचार करके, या किसी का कत्ल करवाकर भी बच सकते हैं, और ऐसी कुछ मिसालें तो सामने रहती भी हैं जिनमें लोग इस तरह बचे हुए दिखते हैं, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि इन बचे लोगों के मुकाबले कई लोग सजायाफ्ता भी रहते हैं। अब लालू यादव के बेटी-दामाद के नाम की सैकड़ों करोड़ की दौलत सरकारी जांच एजेंसियां जब्त कर चुकी हैं, हरियाणा के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और देश के एक सबसे बड़े नेता देवीलाल के बेटे रहे, हरियाणा के पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला भ्रष्टाचार में कैद भुगत रहे हैं। अब ऐसे में सवाल यह है कि इंसान की अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए भी कितनी कमाई की जरूरत रहती है? और किन खतरों को उठाकर ऐसी कमाई करनी चाहिए? 

लेकिन सत्ता का नशा ऐसा रहता है कि अतिआत्मविश्वास लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगता है। नेता तो नेता, अफसरों में भी यह देखने में मिलता है, और पड़ोसी मध्यप्रदेश के एक आईएएस जोड़े के पास जिस तरह सैकड़ों करोड़ की संपत्ति मिली थी, और जिस तरह की सजा का खतरा ऐसे लोगों पर रहता है, वह भी भ्रष्ट लोगों को नजर आना चाहिए। हमारा ख्याल तो यह है कि सरकारी दफ्तरों में गांधी-नेहरू, प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री-राज्यपाल की तस्वीरें लगाने के बजाय इन दफ्तरों में लालू यादव और चौटाला जैसों की तस्वीरें लगानी चाहिए ताकि वे भ्रष्टाचार करते हुए लोगों को अगर थोड़ी सी समझदारी दे सकें तो दे दें। जिस तरह कई शहरों में पुलिस लोगों की जागरूकता के लिए एक्सीडेंट में कुचल गईं, तहस-नहस गाडिय़ां चौराहों पर सजा देती है, ठीक उसी तरह तहस-नहस जिंदगी वाले लोगों की तस्वीरें सरकारी दफ्तरों में लगाना चाहिए। जिस तरह पहाड़ी रास्तों पर घुमावदार मोड़ पर चेतावनी के नोटिस लगते हैं, उसी तरह सत्ता पर बैठे ताकतवर लोगों के सामने लगातार जेल के सीखचों का कोई प्रतीक चिन्ह रहना चाहिए। अभी लोगों की मेज पर तिरंगे झंडे को सजा देखा जा सकता है, उसकी जगह जेल की सलाखों का एक छोटा मॉडल रखना चाहिए, शायद उसका कुछ अधिक असर हो। 

-सुनील कुमार


Date : 28-Nov-2019

देश की संसद अभी जाने कितनी और गोलियां गांधी पर दागेगी...

लोकसभा में कल भोपाल की आतंक-आरोपी भाजपा सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने गांधी के हत्यारे गोडसे को एक बार फिर देशभक्त करार देकर हंगामा खड़ा कर दिया। इसके पहले जनता के बीच तब हंगामा हुआ था जब भाजपा ने आम चुनाव में लोकसभा से प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया था, और साध्वी कही जाने वाली यह महिला अदालत में आतंकी मामलों में आरोपी चले आ रही है, और इलाज के लिए जमानत पाकर जेल के बाहर है। जिस भाजपा का देश भर में इतने करोड़ सदस्यों के होने का दावा है कि जिनकी बदौलत वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने की बात करती है, उतने करोड़ लोगों में से कुल कुछ सौ सांसद उम्मीदवार उसे चाहिए थे, और वह साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर आकर टिकी थी। खैर, चुनाव प्रचार के दौरान इस उम्मीदवार ने मुम्बई आतंकी हमले में शहीद हुए पुलिस अफसर हेमंत करकरे के खिलाफ गंदी, ओछी, और हिंसक बातें करते हुए यह दावा किया था कि उसके (साध्वी के) श्राप से हेमंत करकरे की मौत हुई थी। उल्लेखनीय है कि साध्वी प्रज्ञा को आतंकी मामलों में हेमंत करकरे द्वारा की गई जांच के आधार पर ही गिरफ्तार किया गया था। प्रज्ञा ठाकुर ने एक किस्म से मुम्बई आतंकी हमला करने वाले आतंकियों के बारे में यह कहा था कि वे भगवान की तरफ से हेमंत करकरे को सजा देने के लिए आए थे। उन्होंने कहा था- हेमंत करकरे को मैंने कहा था तेरा सर्वनाश होगा। चुनाव चल ही रहा था और पार्टी ने उससे यह बयान वापिस लेने को कहा था। फिर प्रज्ञा ठाकुर ने भोपाल चुनाव प्रचार के दौरान ही नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहा था, और कहा था कि वे देशभक्त हैं, और रहेंगे। इस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि वे उन्हें मन से कभी माफ नहीं करेंगे। लेकिन अभी जब देश के सबसे महत्वपूर्ण एक मंत्रालय, प्रतिरक्षा मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति बनी तो उसमें प्रज्ञा ठाकुर का नाम देखकर देश फिर हक्का-बक्का रह गया क्योंकि इतनी महत्वपूर्ण समिति में नामांकन प्रधानमंत्री की मर्जी के खिलाफ होने का तो सवाल ही नहीं उठता है।

अब देश भर में भारी आलोचना हो जाने के बाद, चौबीस घंटे गुजरने पर भाजपा ने लोकसभा में प्रज्ञा ठाकुर के बयान की निंदा की है, और उन्हें प्रतिरक्षा मंत्रालय की संसदीय कमेटी से हटाने की घोषणा की है। यह भी कहा है कि भाजपा संसदीय दल की बैठक में उन्हें आने नहीं दिया जाएगा। लेकिन प्रज्ञा ठाकुर खुद शब्दों की कलाबाजी करते हुए अपने ही कैमरों पर कैद बयान को अब तोड़-मरोड़ रही हैं, बिना किसी अफसोस या मलाल के। ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने अपना जो रूख दिखाया था, क्या वही रूख आज की इस नौबत के लिए जिम्मेदार नहीं हैं कि जिस संसद भवन के बाहर गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में स्थापित किया गया है, उसी संसद भवन की कार्रवाई में गोडसे को देशभक्त करार दिया जाए? इस नौबत से भाजपा किस तरह अपने को अलग कर सकती है, और तोहमत से बच सकती है?

यह सिलसिला देश में एक अकेली घटना नहीं है। सोशल मीडिया पर स्कूली बच्चों को पढ़ाने के लिए, उन्हें देश का इतिहास बताने के लिए जो पोस्टर फैले हुए हैं, उनमें ऐसे भी हैं जिनमें सावरकर की तस्वीर तो है, लेकिन न नेहरू की तस्वीर है, और न ही सरदार पटेल की। पूरे देश में हवा को जहरीला करने का काम कोई मासूम अनायास चूक नहीं है, यह पूरा सोच-समझकर किया जा रहा काम है, और इसी सोच के तहत प्रज्ञा ठाकुर को भाजपा उम्मीदवार बनाया गया, और संसद तक पहुंचाया गया। लगातार एक के बाद दूसरी ऐसी बयानबाजी कहीं न कहीं चलती है, और यह बात एकदम साफ दिखती है कि इनमें से कुछ भी अनायास नहीं है, बल्कि देश के असल मुद्दों की तरफ से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए भी इन्हें कहा जाता है, और ऐसा कहकर देश के लोगों का बर्दाश्त भी तौला जाता है, और धीरे-धीरे करके ऐसे बयानों को सामान्य का दर्जा भी दिलाया जाता है। लोगों के मन में ऐसी सोच को किस्तों में बैठाया जा रहा है कि गांधी को मारना देशभक्ति का काम था। और गांधी से जो शिकायत गोडसे की थी, वह गोडसे की मुस्लिम विरोधी सोच से उपजी हुई थी, और इस बहाने मुस्लिम विरोधी सोच को भी बढ़ाया जा रहा है।

देश की संसद अभी जाने कितनी और गोलियां गांधी पर दागेगी।

-सुनील कुमार

 


Date : 27-Nov-2019

महाराष्ट्र के गठबंधन से हुई शुरूआत बाकी देश में भी...

अब जब महाराष्ट्र में एक सरकार बनना तय हो गया है, और अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने और मानने वाली कांग्रेस पार्टी एक घोर हिन्दूवादी शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रही है, और इन दोनों के बीच में महाराष्ट्र के सबसे बड़े नेता शरद पवार की पार्टी, एनसीपी, गठबंधन की बुनियाद है, तो कई सवाल खड़े हो रहे हैं। शरद पवार के भतीजे और दो दिन उपमुख्यमंत्री रहे अजित पवार को लेकर ये सवाल खड़े ही हुए हैं कि उन पर भ्रष्टाचार की जितनी तोहमतें लगी हैं उनका क्या होगा? दूसरी तरफ यह खबर भी दिलचस्प थी कि दो दिन के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस के रहते हुए महाराष्ट्र के भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो ने अजित पवार के खिलाफ दर्ज बहुत से मामले वापस ले लिए थे। अब नई गठबंधन सरकार इस फैसले को जारी रखकर अजित पवार को मुकदमों से बचा भी सकती है और यह कह भी सकती है कि यह तो भाजपा के मुख्यमंत्री के लिए गए फैसले हैं। लेकिन देश भर में जो बुनियादी सवाल उठ रहे हैं, वे धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता को लेकर हैं। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने बाबरी मस्जिद को गिराने की पूरी जिम्मेदारी और पूरी वाहवाही खुद होकर ली थी, और उस वक्त देश में कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंह राव की सरकार थी जिसे कि मस्जिद के ढांचे की हिफाजत न कर पाने का जिम्मेदार माना गया था। वक्त ऐसा बदला है कि ये दोनों पार्टियां आज महाराष्ट्र की सरकार में एक होने जा रही हैं। शायद ऐसे ही वक्त के लिए यह कहा जाता है कि राजनीति में हैरान कर देने वाले हमबिस्तर होते हैं, और राजनीति में कभी नहीं शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा को दो दिन के लिए सरकार में आने का मौका मिला इसलिए था कि एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस को गठबंधन की बुनियाद तय करने में वक्त लग रहा था। सार्वजनिक रूप से जो कहा गया है उसके मुताबिक तीनों पार्टियां मिलकर एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार कर रही थीं, और उसमें वक्त लगना जायज था। राजनीति के विश्लेषक वैसे भी कर्नाटक में कांग्रेस की गठबंधन सरकार के ताजा इतिहास को गिनाते हुए महाराष्ट्र को लेकर अपनी आशंकाएं बता रहे हैं, और ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कांग्रेस को गठबंधन तोडऩे वाली पार्टी की अपनी छवि से उबरना भी होगा। लेकिन एक दिलचस्प बात यह है कि शरद पवार की शक्ल में महाराष्ट्र में इस गठबंधन के एक इतने बड़े नेता मौजूद हैं जो कि कांग्रेस की आज की अध्यक्ष सोनिया गांधी के भरोसे के हैं, और जिनकी उद्धव ठाकरे पर भी खासी पकड़ है। ऐसे में पवार की शक्ल में एक ऐसी धुरी मौजूद है जिसके इर्द-गिर्द इन तीनों पार्टियों के टकराव या सरकार के कई मुद्दे सुलझ सकते हैं, और शायद सुलझ भी जाएंगे। पवार इस उम्र और ऐसी सेहत में भी न सिर्फ अपनी पार्टी, बल्कि इस गठबंधन की बाकी पार्टियों पर भी जितना वजन रखते हैं, वह इस गठबंधन सरकार की लंबी जिंदगी में मददगार बात हो सकती है।

महाराष्ट्र को लेकर कांग्रेस और शिवसेना दोनों पर बहुत से तंज कसे जा सकते हैं, और हम भी उसका मजा ले ही रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जनता ने जब एक ऐसा मिलाजुला फैसला दिया था, और सत्तारूढ़ चले आ रहे गठबंधन के भीतर गंभीर मतभेद थे, जिन्हें कि कोई सुलझा नहीं पा रहा था, तो वैसे में दो ही विकल्प थे। या तो प्रदेश फिर से एक चुनाव में जाता, जिससे कि कोई हल निकलने की गारंटी नहीं दिख रही थी, और दूसरी बात प्रदेश की पार्टियां मिलकर कोई संभावना खड़ी करतीं। आज महाराष्ट्र का गठबंधन ऐसी ही तीन पार्टियों की संभावना लेकर सामने आया है, और इसे साम्प्रदायिकता के मुद्दों को अलग रखकर एक अच्छी सरकार चलाना चाहिए ताकि देश में बाकी प्रदेशों में भी क्षेत्रीय दल और राष्ट्रीय दल मिलकर बेहतर विकल्प बन सकें। अभी दो दिनों से भारत के प्रदेशों पर काबिज पार्टियों का जो नक्शा चारों तरफ फैल रहा है वह दिलचस्प है कि किस तरह भाजपा का कब्जा सिमटा है, और गैरभाजपाई कब्जा बढ़ा है। यह बात तय है कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व इस बात को लेकर फिक्रमंद होगा, लेकिन यह बात भी तय है कि पिछले पांच-छह बरस में भाजपा की अगुवाई में चल रही मोदी सरकार ने पूरे देश की जनता को निराश करने के बहुत सारे फैसले और बहुत सारे काम सामने रखे हैं। ऐसे में महाराष्ट्र का यह गैरभाजपाई-गैरएनडीए गठबंधन बाकी देश के लिए एक शुरूआत हो सकता है, और लोकतंत्र की सेहत के लिए ऐसी संभावनाएं हमेशा ही जनता के सामने रहनी चाहिए।

-सुनील कुमार

 

 


Date : 26-Nov-2019

एक-एक करके कई राज्यों का यह नाटक सामने आया कि वहां कोई सरकार बनाने के लिए, या कि गिराने के लिए, जब विधायकों को खरीदने के बाद, या बिक्री के पहले, भेड़ों के रेवड़ की तरह हांककर कहीं ले जाया जाता है, तो उन्हें किसी दूसरे प्रदेश की राजधानी की सबसे महंगी होटल या रिसॉर्ट में ही ठहराया जाता है। जाहिर है कि ये महंगी जगहें इन विधायकों के अपने विधानसभा क्षेत्रों की जनता के सपनों से भी परे की होती हैं, और हिन्दुस्तान की एक फीसदी जनता भी मरने तक ऐसी किसी जगह को देख भी नहीं सकती। चुनाव के वक्त गरीब जनता के वोटों के लिए तरह-तरह के वायदे करने वाले उम्मीदवार, विधायक या सांसद बनने के बाद जिस बेशर्मी के साथ ऐसी जगहों पर रहते हैं, और जरूरत पडऩे पर हफ्तों तक रहते हैं, विशेष विमानों से आते-जाते हैं, वह देखकर लगता है कि क्या इन्हें यह डर नहीं रहता कि लौटकर कभी अपनी जनता को मुंह दिखाना है? 

इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी मंत्री कवासी लखमा का खुद का सुनाया हुआ संस्मरण याद पड़ता है। पूरी तरह निरक्षर यह मंत्री कई बार का विधायक है, और अपने साफ दिल और साफगोई के लिए जाना भी जाता है। कवासी लखमा ने लोगों के बीच अपने उस दिन की कहानी बताई जब वे पहली बार विधायक बनकर अपने विधानसभा क्षेत्र लौटे, तो वे एक सरकारी जीप में थे जो कि कलेक्टर की तरफ से विधायकों को अपने क्षेत्र का दौरा करने के लिए दी जाती है। जब वे अपने गांव पहुंचे, तो उनके पिता ने उन्हें जीप से उतरते देखकर पीटना शुरू कर दिया। बाद में काफी मार खाने के बाद जब कवासी लखमा ने पिता से वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि विधायक बनने के बाद इतनी जल्दी इतनी रिश्वत खाने लगा कि जीप खरीद ली? उस मासूम आदिवासी बुजुर्ग का आदिवासी आत्मसम्मान बेटे के भ्रष्ट हो जाने की गलतफहमी से ही इतना घायल हो गया था कि जवान बेटा पिट गया। क्या आज पांच सितारा और सात सितारा मेहमाननवाजी से लौटे हुए विधायकों को जरा सी भी फिक्र सताती है कि वे अपने इलाके में क्या मुंह दिखाएंगे? 

कर्नाटक में जब आयरन ओर माफिया के नाम से कुख्यात दो रेड्डी बंधु मंत्री रहते हुए सत्तारूढ़ भाजपा के विधायकों को लेकर हैदराबाद के सात सितारा होटलों में पड़े थे ताकि अपने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को हटा सकें, तब कर्नाटक के इन विधायकों के इलाके बाढ़ के बाद कीचड़ में डूबे पड़े थे, और अपने वोटरों की तकलीफ में उनकी तरफ झांकने के बजाय ये लोग देश की सबसे महंगी खातिरदारी में मालिश करवा रहे थे। जितना महंगा राज्य होता है, जितना संपन्न होता है, उतनी ही महंगी खातिरदारी वहां के खरीदे जा चुके, या बिकने से रोके जा रहे विधायकों की की जाती है। यह सिलसिला बेशर्मी की तमाम हदों को पार कर गया है, और अपने विधायकों को दलबदल से बचाने के लिए, या दलबदल के लिए लाए गए विधायकों को रखने के लिए आम इंसानों जैसी किसी आम जगह का इस्तेमाल नहीं होता, विधायकों की ईमानदारी को बचाने के लिए, या उनको बेईमान बनाने के लिए हर बार हर कहीं इतना महंगा इंतजाम ही क्यों लगता है? क्या ईमानदारी सस्ते और किफायती इंतजाम में नहीं बच सकती? 

आज की राजनीति में भ्रष्टाचार के बोलबाले से वाकिफ लोगों को ये बातें निहायत फिजूल की लग सकती हैं कि जब हजारों करोड़ की कमाई की कोई सरकार बननी है, तो उसे बनाने या बचाने के लिए कुछ करोड़ खर्च करने में क्या दिक्कत है? लेकिन सवाल यह उठता है कि देश की आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, कुपोषण की शिकार है, उसे इलाज नसीब नहीं है, पेट भर खाना और सिर छुपाना भी नसीब नहीं है, और ऐसे लोगों के वोट पाकर जो नेता विधायक बनते हैं, वे एकाएक इतनी बेशर्मी कैसे ले आते हैं? क्या उन्हें पल भर को भी यह नहीं लगता कि ऐसे अश्लील और हिंसक काले इंतजाम में रहने के बजाय एक किफायती इंतजाम में रहा जाए?
-सुनील कुमार


Date : 25-Nov-2019

महाराष्ट्र का पिछले एक महीने का हाल देखें, तो ऐसा लगता है कि भारत की संसदीय व्यवस्था में कुछ बुनियादी फेरबदल करने की जरूरत है। इस देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव तो पहले ही गैरजमीनी मुद्दों को उठाकर, लोगों को भड़काकर, खरीद-बेचकर, और पैसों की ताकत पर लड़कर सदन तक पहुंचने वाले हो गए थे। यह सब कुछ अब और भी ऊंचे, या नीचे, दर्जे का होने लगा है। लेकिन इसके साथ-साथ अब जीते हुए विधायकों, जीते हुए गठबंधन, जीती हुई पार्टियों को जिस तरह से जोडऩा और तोडऩा चल रहा है, जिस तरह से घोड़ों को बदनाम करते हुए हार्स ट्रेडिंग जैसा शब्द बदनाम सांसदों और विधायकों की मंडी के लिए इस्तेमाल हो रहा है, वह एक बड़े आमूलचूल फेरबदल की मांग कर रहा है। अब देश की जनता की नजरों में यहां की बनने वाली सरकारें सिवाय हिकारत के किसी और का सामान नहीं हैं। अब लोग इतने लतीफे और इतने कार्टून बना-बनाकर चारों तरफ फैला रहे हैं कि वह लोकतंत्र से उनके मोहभंग का एक बड़ा सुबूत भी है। ऐसी हालत में देश के संविधान को जिंदा रखने में भरोसा रखने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि कैसे यह काम किया जा सकता है। 

इस देश ने पिछले दो-तीन चुनावों में जिस दर्जे की तिकड़मों को देखा है, उनकी कोई कल्पना संविधान बनाने वालों ने शायद की नहीं होगी, और इसीलिए संविधान में इन तिकड़मों से बचने का कोई जरिया नहीं है। जब जुर्म से ही सदन तक जाने का रास्ता बनने लगा है, तो उस रास्ते को बंद करके कोई दूसरा रास्ता बनाना चाहिए, या नहीं? आज जिस तरह से सरकार बनाने के पहले ही आसमान छूती हुई भ्रष्ट खरीद-बिक्री हो रही है, उससे यह तो जाहिर है ही कि सरकार बनने के बाद इस लागत को कैसे निकाला जाएगा, और जनता के हक कहां-कहां कुचले जाएंगे। आज भारत की संसदीय चुनाव व्यवस्था पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है, और कस्तूरबा गांधी के मरने के वक्त जिस पेनिसिलिन के इंजेक्शन को गांधी ने उन्हें लगने नहीं दिया था, उस इंजेक्शन से आज की भारतीय लोकतंत्र की बीमारी ठीक होते दिख नहीं रही है। तब से अब तक एंटीबायोटिक की कई पीढिय़ां आकर चली गई हैं, और भारतीय लोकतंत्र को भी उससे उबरना होगा, आगे बढऩा होगा, और बचाव के लिए नई दवाईयां या नए इलाज को ढूंढना होगा। 

भारत में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव जिस तरह आज पैसों, और जुर्म के काले पैसों, टैक्स की चोरी के पैसों, और भ्रष्टाचार के पैसों का खेल हो गया है, उसे देखते हुए इसका इलाज ढूंढना होगा। आज जिस तरह धर्म और जाति के भड़कावे पर चुनाव लड़े जा रहे हैं, जिस तरह सदनों में पहुंचे हुए लोग नफरत फैलाने को अपना पेशा बना चुके हैं, उसे भी रोकने और खत्म करने के लिए कोई इलाज ढूंढना होगा। फिर चुनाव के दौरान का वक्त, चुनाव के बाद सरकार बनाने का तरीका और वक्त, और दलबदल कानून का फायदा उठाते हुए थोक में दलबदल करवाने की आम हो चली तकनीक को खत्म करने की कोई दवाई ढूंढनी होगी। आज कितने ऐसे चुनाव हैं, और कितनी ऐसी सरकारें हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि वे लोकतंत्र के रास्ते चुनकर आई हैं, और लोकतांत्रिक हैं? यह सिलसिला तोडऩा होगा ठीक उसी तरह जिस तरह कैंसर से घिरी हुई किसी देह से कैंसर को खत्म करने के लिए दवा भी दी जाती है, रेडिएशन से भी इलाज होता है, और जरूरत पडऩे पर सर्जरी भी की जाती है। आज भारत की संसदीय निर्वाचन प्रणाली, और यहां की संसदीय व्यवस्था, ये दोनों ही ऐसे बुरे लाइलाज कैंसर की शिकार हैं कि इन्हें जिंदा रखने के लिए इन तीनों किस्मों के इलाज की जरूरत है, और इससे परे भी कुछ और तरह के इलाज की जरूरत पड़ सकती है। यह नौबत बहुत ही गंभीर है, और यह रास्ता लोकतंत्र को खत्म करके एक तानाशाही की तरफ जा सकता है, देश में अराजकता खड़ी कर सकता है, और देश को बेच देने जैसी नौबत भी ला सकता है। यह नौबत बुनियादी फेरबदल की मांग कर रही है, और सत्ता पर बैठे लोग चूंकि ऐसे किसी फेरबदल के हिमायती कभी नहीं होंगे इसलिए जनता के बीच से, छात्रों के आंदोलन से ही ऐसी कोई उम्मीद की जा सकती है। पिछले बरसों में दुनिया में जहां-जहां फेरबदल हुए हैं, वे व्यापक जनआंदोलनों और छात्र आंदोलनों के रास्ते से ही हुए हैं। क्या हिन्दुस्तान कोई उम्मीद कर सकता है?
-सुनील कुमार


Date : 24-Nov-2019

छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने कल यह तय किया कि पंचायत चुनावों में पंच बनने के लिए पांचवीं और उससे ऊपर के पद के लिए आठवीं पास होने की जो अनिवार्यता चली आ रही थी, उसे खत्म किया जाए। यह बंदिश पिछली भाजपा सरकार ने अपने एक कार्यकाल में लगाई थी, जो कल छत्तीसगढ़ कैबिनेट ने हटा दी। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से इस बात के लिए लिखते आ रहे थे, और अपने तर्क के समर्थन में हमने मिसालें भी गिनाई थीं कि किस तरह तमिलनाडू के एक सबसे महत्वपूर्ण कामराज नाडर बचपन में पिता के गुजर जाने के बाद मां का साथ देने के लिए 11 बरस की उम्र में ही स्कूल छोड़ चुके थे। छत्तीसगढ़ सरकार के अब तक के पैमाने के मुताबिक वे यहां सरपंच भी नहीं बन सकते थे लेकिन तमिलनाडू में उन्होंने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को ग्यारहवीं तक लागू करके साक्षरता और शिक्षा को बढ़ाने का महान काम किया था, और गरीब स्कूली बच्चों के लिए दोपहर के भोजन की योजना लागू की थी। उन्होंने यह सब काम 1954 से 1963 के बीच किया था जब देश में साक्षरता और शिक्षा इतना बड़ा मुद्दा ही नहीं थीं। इस छत्तीसगढ़ राज्य में पहली कांग्रेस सरकार में गृहमंत्री रहे नंदकुमार पटेल राज्य बनने के पहले से अविभाजित मध्यप्रदेश की दिग्विजय सरकार में भी मंत्री थे, और वे अपने पूरे कार्यकाल में सबसे अच्छे और काबिल मंत्रियों में से एक थे, और अभी उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वे आठवीं भी पास नहीं थे, और जब उन्होंने अर्जुन सिंह के लिए खरसिया विधानसभा सीट खाली की थी, तब वे वहां के सरपंच ही थे। अभी कल तक लागू नियम उनके वक्त भी लागू रहता, तो शायद वे सरपंच का चुनाव भी नहीं लड़ पाते, और राज्य को एक काबिल मंत्री मिलने की संभावना भी शुरू ही नहीं हो पाती। 

दरअसल राज्य के लिए कानून बनाने की विधानसभा की ताकत, और देश के लिए कानून बनाने की संसद की ताकत ने कई किस्म की तानाशाही भी दिखाई है। जब इस देश में पंचायत के स्तर पर, पंचायत के भीतर के पंच के लिए भी अनुसूचित जाति, जनजाति, और ओबीसी की महिलाओं तक का आरक्षण लागू है, शहर के मेयर के लिए, या किसी वार्ड मेम्बर के लिए भी इनमें से हर तबके की महिला के लिए आरक्षण लागू है, तब विधानसभा सीट और लोकसभा सीट के लिए आरक्षण लागू नहीं है। महिला आरक्षण का मुद्दा जाने अनंतकाल से संसद में चले आ रहा है, और तमाम पार्टियां उससे मुंह चुराते आ रही हैं। ऐसे में इन सांसदों और विधायकों ने अपने सदनों से वार्ड स्तर तक तो अलग-अलग जातियों की और तबकों की महिलाओं के लिए भी आरक्षण कर दिया, लेकिन अपने सदनों को इससे इंस अंदाज में परे रखा है कि मानो इनमें महिलाएं बढ़ जाने पर ये सदन उसी तरह अपवित्र हो जाएंगे जिस तरह कुछ ईश्वरों के घर हो जाते हैं। 

इससे परे एक और शहरी, शिक्षित, और बाहुबलि अहंकार पंचायत चुनावों पर लादी गई थी कि दो से अधिक बच्चे होने पर निर्वाचित पंच-सरपंच की पात्रता भी खत्म हो जाएगी, छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत से मामले हुए भी थे, और एक सामाजिक तनाव ऐसा भी खड़ा हो गया था कि दो से अधिक बच्चे होने पर पंच-सरपंच परिवार उन्हें छुपाने भी लगे थे। लेकिन 9 बच्चों के साथ लालू यादव सांसद बने हुए थे, और इतने ही बच्चों के साथ देश भर में बहुत से दूसरे सांसद और विधायक थे, लेकिन छत्तीसगढ़ में पंच-सरपंच पर दो बच्चों की शर्त थोप दी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त में बनाई गई त्रिस्तरीय शासन प्रणाली में स्थानीय संस्थाओं में पंचायतों और म्युनिसिपलों को तो एक साथ रखा गया था, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह शर्त सिर्फ पंच-सरपंचों पर लगी थी, शहरी वार्ड मेम्बरों और मेयरों पर नहीं। बाद में इस राज्य में पिछली भाजपा सरकार ने इस रोक को खत्म किया था, और सत्ता के इस लादे गए शहरी पूर्वाग्रह के खिलाफ हम लंबे समय से यह मांग कर रहे थे जो शर्तें सांसद और विधायकों पर नहीं लादी गई हैं, वे पंच-सरपंच पर भी नहीं लादी जानी चाहिए। और दिलचस्प बात यह है कि पंच-सरपंच के लिए जिस महिला आरक्षण की व्यवस्था की गई, उस व्यवस्था को संसद और विधानसभाओं में भी लागू करने में पुरूष प्रधान संसदीय राजनीति ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय पंचायतों में महिला आरक्षण जब लागू किया गया, तो देश के सर्वाधिक राजनीतिक चेतना वाले केरल जैसे राज्यों के पंचायत मंत्री और सचिव इन प्रावधानों के अध्ययन के लिए राजधानी भोपाल पहुंचे थे। 

कल भूपेश मंत्रिमंडल ने शिक्षा की यह पूरी तरह से अनैतिक अनिवार्यता खत्म करके एक अच्छा काम किया है। जो अनिवार्यता विधायक और सांसद बनने के लिए भी नहीं है, उसे गांव के लोगों पर लादना एक शहरी अहंकार है, और इसे खत्म किया ही जाना चाहिए था। छत्तीसगढ़ को एक और काम करना चाहिए कि विधानसभा में संसद-विधानसभा के महिला आरक्षण के लिए एक शासकीय संकल्प लाया जाए कि संसद जल्द से जल्द महिला आरक्षण विधेयक को पास करे और लागू करे। इस बात का और कोई महत्व हो या न हो, कम से कम एक प्रतीकात्मक महत्व रहेगा और महिला आरक्षण का इतिहास इसे दर्ज करेगा। यह विधेयक संसद में 2008 से चले आ रहा है जो कि महिलाओं को आबादी के अनुपात में आधी सीटों पर आरक्षण भी नहीं देने वाला है, महज एक तिहाई सीटों पर आरक्षण देगा, लेकिन इसे भी लोकसभा आज तक पास नहीं कर रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा को एक पहल करके यह प्रतीकात्मक संदेश बाकी देश को देना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 23-Nov-2019

आज सुबह-सुबह जब महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस के फिर मुख्यमंत्री बन जाने की खबर आई, तो लोगों ने बाकी खबर के पहले तारीख देखी कि आज कहीं अप्रैल फूल का दिन तो नहीं है। इसके बाद अजित पवार के उप मुख्यमंत्री बनने की बात पढ़ी, तो शरद पवार को कोसना चालू कर दिया कि उन्होंने शिवसेना और कांगे्रस दोनों को धोखा दे दिया। फिर कुछ घंटे गुजरे और पवार ने यह साफ किया कि भतीजे अजित पवार से न उनकी पार्टी सहमत है, और न ही परिवार, तो लोगों को यह तय करते नहीं बना कि शरद पवार ने देश को रात में धोखा दिया, या अब धोखा दे रहे हैं, या फिर भतीजे से धोखा खाए हुए हैं। जो भी हो, महाराष्ट्र में फिलहाल तो भाजपा के पिछले मुख्यमंत्री फडनवीस मुख्यमंत्री बन चुके हैं, और अब विधानसभा में बहुमत साबित करने का अकेला जरिया उनके पास यही है कि एनसीपी के विधायकों का इतना बहुमत शरद पवार के खिलाफ जाकर अजित पवार का साथ दे कि विधानसभा में विश्वासमत पाया जा सके। आज इस वक्त जो लोग केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को इस एक और कामयाबी के लिए वाहवाही दे रहे हैं, उनका मानना है कि शाह है तो मुमकिन है। 

अब बिना किसी पसंद-नापसंद के महाराष्ट्र की राजनीति को देखें तो आज सुबह के इस शपथग्रहण के पहले तक शिवसेना, एनसीपी, और कांगे्रस का जो गठबंधन आजकल में महाराष्ट्र में सरकार बनाते दिख रहा था, और जिसने औपचारिक रूप से पिछले दिनों में बार-बार इस फैसले की घोषणा भी की थी, वह गठबंधन एक पूरी तरह से अनैतिक और अप्राकृतिक गठबंधन था, ठीक वैसा ही जैसा कि आज सुबह भाजपा-अजित पवार की शक्ल में सत्ता पर आया है। अभी फडनवीस की वह ट्वीट सोशल मीडिया पर तैर ही रही है जिसमें उन्होंने अजित पवार के भ्रष्टाचार के किस्से गिनाते हुए कड़ी कार्रवाई का वायदा किया था। अब पुलिस और हवालाती अगल-बगल की दो कुर्सियों पर बैठे हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह माथे पर धर्मनिपरेक्षता का गुदना गुदाई हुई कांग्रेस पार्टी देश की एक सबसे साम्प्रदायिक पार्टी शिवसेना के साथ भागीदारी को तैयार थी। अब यह तो केंद्र सरकार के मातहत, उसके एक विभाग की तरह काम करने वाले राजभवन की मेहरबानी है कि वह किस अनैतिक गठबंधन को न्यौता दे, और दो अलग-अलग नस्लों के प्राणियों को एक विचित्र संतान पैदा करने को बढ़ावा दे।

इस मौके पर राजभवन की संवैधानिक भूमिका की असंवैधानिक बातों को लेकर काफी कुछ कहा जा सकता है, लेकिन राजभवन का बेजा इस्तेमाल तो इंदिरा के वक्त से चले आ रहा है जब राज्यपाल अंग्रेज सरकार के एक एजेंट की तरह बर्ताव करते हुए लंदन का एजेंडा लादते थे। राजभवन नाम की संवैधानिक संस्था का कुल जमा इस्तेमाल असंवैधानिक मौकापरस्ती को बढ़ावा देने का बना हुआ है, और आंकड़ों और चिट्ठियों की हकीकत सामने आने के बाद यह समझ आएगा कि महाराष्ट्र का राजभवन में अगर आज सुबह-सुबह अनैतिक काम किया है, तो वह किस दर्जे का अनैतिक है? फिलहाल जब हम इन लाइनों को लिख रहे हैं, मुंबई में एनसीपी, कांग्रेस, शिवसेना की प्रेस कांफ्रेंस जारी है, और उद्धव ठाकरे उसमें कह रहे हैं कि महाराष्ट्र पर फर्जिकल स्ट्राइक की गई है, पवार कह रहे हैं कि उन्हें शपथग्रहण का सुबह पता लगा है, और यह फैसला अजित पवार का है जिनके साथ दस-बारह विधायक ही रहेंगे। और कांग्रेस इन दोनों के साथ बनी हुई है।

दूसरी तरफ कांगे्रस के अभिषेक मनु सिंघवी जैसे बहुत से लोग हैं जो सोशल मीडिया पर इन तीनों पार्टियों की अंतहीन बैठकों को इस नुकसान के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं कि वक्त पर फैसला नहीं लिया गया तो ऐसी नौबत आई। कांग्रेस और एनसीपी जनता के बीच मखौल का सामान भी बन गए हैं कि वे हफ्ते भर बैठक-बैठक खेलते रहे, और भाजपा गोल मारकर चली गई। इन तीनों पार्टियों ने जब एक अप्राकृतिक और अनैतिक गठबंधन बनाना तय कर ही लिया था, तो राजनीति की मांग यही थी कि वे तेजी से दावा करते। जब चिडिय़ा खेत चुग गई, तब तक ये तीनों मिलकर खेत में खड़ा करने के लिए बिजूके की कद-काठी, उसके कपड़े, उसके सिर के लिए हंडी तय करते रहे। अब ये तीनों पार्टियां मिलकर खेत में बाकी पराली को जलाकर ठंड में हाथ ताप सकती हैं, या फिर एक आखिरी कोशिश कर सकती हैं कि विधानसभा में फडनवीस-अजित पवार बहुमत साबित न कर सकें।
-सुनील कुमार


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