अंतरराष्ट्रीय

15-Apr-2021 2:34 PM 31

कोपेनहेगन (डेनमार्क): डेनमार्क ने मंगलवार को ऐलान किया है कि वह कोविड-19 वैक्‍सीन AstraZeneca के उपयोग को पूरी तरह से रोक देगा. साइड इफेक्‍ट के संदेह के चलते AstraZeneca वैक्‍सीन पर रोक लगाने वाला डेनमार्क, यूरोप का पहला देश है. विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन यानी WHO और यूरोपीय मेडिसिन्‍स की नियामक इकाई की ओर से वैक्‍सीन के पक्ष में राय जताए जाने के बाद भी डेनमार्क ने यह फैसला किया है. हेल्‍थ अथॉरिटी डायरेक्‍टर सोरेन ब्रोस्‍ट्रॉम ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में कहा, 'डेनमार्क का टीकाकरण अभियान अब AstraZeneca वैक्‍सीन के बिना आगे बढ़ेगा.'

डेनमार्क यूरोप का पहला देश था जिसने अपने टीकाकरण प्रोग्राम से AstraZeneca वैक्‍सीन के उपयोग सस्‍पेंड किया था. वैक्‍सीन से ब्‍लड क्‍लॉटिंग की कुछ शिकायतों के बाद यह फैसला लिया गया था. ब्‍लड क्‍लॉटिंग के कुछ मामलों के बाद डेनमार्क ने एस्ट्राजेनेका के इस्तेमाल पर सबसे पहले रोक लगाई थी. डेनमार्क के स्वास्थ्य अधिकारियों ने इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि ऐहतियात के तौर पर यह कदम उठाया गया है. अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा गया है कि वैक्सीन और रक्त के थक्के जमने की बीच कोई संबंध है. बाद में फ्रांस, नॉर्वे और जर्मनी सहित करीब एक दर्जन देशों ने AstraZeneca वैक्‍सीन के उपयोग को अस्‍थायी तौर पर सस्‍पेंड किया था.

हालांकि यूरोपियन मेडिसिन्‍स एजेंसी की ओर वे वैक्‍सीन को सुरक्षित और प्रभावी बताए जाने के बाद ज्‍यादातर देशों ने इस वैक्‍सीन का फिर से उपयोग करना प्रारंभ कर दिया था. हालांकि डेनमार्क ने AstraZeneca का उपयोग बंद ही रखा था और इस संबंध में अपनी ओर से जांच की थी. डेनमार्क में 14 हजार से अधिक लोगों को टीका लगाए जाने के बाद Thrombosis के दो केसों को इस वैक्‍सीन के साथ जोड़ा गया था, इसमें से एक केस गंभीर किस्‍म था बताया गया था. 58 लाख की आबाद वाली डेनमार्क में अब तक 8 फीसदी लोगों का पूरी तरह कोविड-19 वैक्‍सीनेशन हो चुका है जबकि 17 फीसदी को टीके का पहला डोज लगा है. (ndtv.in)


15-Apr-2021 2:25 PM 38

एशिया महाद्वीप के हिस्सों में शादी पर लड़की वालों को दहेज देने की परंपरा पुरानी है. लेकिन पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अनोखी खबर ने सबको हैरत में डाल दिया. यहां दुल्हन की तरफ से मेहर के हक में सोना, चांदी, संपत्ति और लाखों रुपए नहीं रखा गया. शर्त रखी गई कि मात्र 32 फीसद कैदियों की जमानत और 32 नफिल नमाज मेहर में होना चाहिए. बीबीसी की खबर के मुताबिक, दुल्हन की तरफ से शर्त सामने आने पर वकील और गवाह दूल्हा के पास पहुंचे और उसने फौरन शर्त कबूल कर ली.

मेहर में 32 कैदियों की जमानत और नफिल नमाज की मांग

अनोखा निकाह जिला नवाबशाह की ताज कॉलोनी में सोमवार को आयोजित किया गया. 32 वर्षीय सफिया लाखो और 45 वर्षीय हबीब जसकानी एक दूसरे के जीवन साथी बन गए. सफिया का संबंध नवाबशाह और हबीब का संबंध खैरपुर जिला से है और दोनों पेशे से वकील हैं. 

पाक के सिंध प्रांत में अनोखी और आसान शादी का मामला

दुल्हन ने बताया कि गवाह और वकील ने रजामंदी के बारे में पूछा, "मैंने मेहर में उम्र के मुताबिक 32 गरीब कैदियों की जमानत और 32 नफिल नमाज की अदायगी की शर्त रख दी. जब ये शर्त दूल्हे को पढ़कर सुनाया गया, तो उसने भी हामी भर दी." दूल्हे का कहना था कि उनको मेहर में अजीब मांग सुनकर बहुत अच्छा लगा क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि परंपरा के मुताबिक सोना या नकदी लिखवाया जाएगा, लेकिन ये मामला तो बिल्कुल विपरीत साबित हुआ. हालांकि, उलेमाओं के कहने पर आपसी मशविरे से 11 सौ रुपए मेहर के तौर पर भी लिखाया गया है.

सफिया का कहना है कि उनका सबसे अलग मेहर तय करने का फैसला दूसरों को फायदा पहुंचाने की थी. उन्होने बताया, "32 कैदी आजाद होंगे तो उनके घरवालों की दुआएं मिलेंगी और हर जमानत के साथ एक नफिल की नमाज शुक्राने के तौर पर अदा की जाएगी." सफिया और लाखो दोनों की अरेंज मैरेज है. 2012 से सफिया वकालत के पेशे में हैं. उनकी कर्म स्थली नवाबशाह और कराची है, वहीं हबीब 2007 से सिंध हाई कोर्ट और निचली अदालतों मामले की पैरवी कर रहे हैं. दोनों की मंगनी पिछले साल अगस्त में हुई थी. (abplive.com)


15-Apr-2021 8:11 AM 23

गुवाहाटी/अगरतला, 14 अप्रैल| अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने रोंगाली बिहू, पोहेला बोइशाख और संक्रांति जैसे त्योहारों को मनाने वाले लोगों को शुभकामनाएं दी हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों, दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई नागरिकों को सोशल मीडिया के माध्यम से उनके नववर्ष पर शुभकामनाएं दीं।

बाइडेन ने अपने आधिकारिक फेसबुक पेज पर मंगलवार को लिखा, जिल (प्रथम महिला) और मैं (बाइडेन) दक्षिण एशिया एवं दक्षिण पूर्व एशियाई समुदायों को वैशाखी, नवरात्रि और इस सप्ताह आगामी नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं।

इसके साथ ही बाइडेन ने अल्थ अवुरुदा, बिहू, चैती चंद, गुड़ी पड़वा, खमेर नववर्ष, नवरेह, पोइला बोइशाख, पाना संक्रांति, पी माई, पुथंडु, रोंगाली बिहू, सोंगक्रान, तमिल नव वर्ष, उगादी और विशु को लेकर भी अपनी शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि आशा के इस मौसम में, हम कामना कर रहे हैं कि यह नव वर्ष आपके और आपके परिवार के लिए समृद्धि और प्रकाश लेकर लाए।

इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोगों को इन त्योहारों की शुभकामनाएं दीं हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने ओडिशा के लोगों को उड़िया नववर्ष और महा बिशुबा पना संक्रांति पर अपनी शुभकामनाएं दी हैं। एक ट्वीट में मोदी ने सभी को उड़िया नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कहा, उड़िया नववर्ष और महा बिशुबा पना संक्रांति के पावन अवसर पर ओडिशा के लोगों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं। मैं प्रार्थना करता हूं कि आने वाले वर्ष में आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ्य और प्रसन्न रहे।

मोदी ने पुथांडु के पावन उत्सव पर दुनिया भर के और तमिलनाडु के तमिल भाइयों और बहनों को अपनी शुभकामनाएं दी हैं।

मोदी ने एक ट्वीट में कहा, तमिल संस्कृति की महानता उज्‍जवल रहे। इस प्रसन्नतापूर्ण और पावन दिवस पर मैं प्रार्थना करता हूं कि नया वर्ष सभी के जीवन को स्वास्थ्य, प्रसन्नता और समृद्धि से परिपूर्ण कर दे।  (आईएएनएस)
 


14-Apr-2021 9:41 PM 25

लंदन, 14 अप्रैल. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अप्रैल माह के अंत में होने वाले अपने भारत दौरे की अवधि को कम कर दिया है. देश में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए यह कदम उठाया गया है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने बोरिस जॉनसन के प्रवक्ता के हवाले से बुधवार को यह जानकारी दी. इसके साथ ही प्रवक्ता ने कहा कि वो अपने इस दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात करेंगे. इससे पहले, जॉनसन की जनवरी में गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत जाने की योजना थी, लेकिन ब्रिटेन में बढ़ते कोविड-19 संकट के कारण उन्हें यह यात्रा स्थगित करनी पड़ी थी.

बोरिस जॉनसन यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर जाने के बाद अपने पहले बड़े अंतरराष्ट्रीय दौरे के तहत अप्रैल के अंत में भारत आएंगे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अवसर ‘देखेंगे’. जॉनसन की भारत यात्रा की घोषणा ऐसे समय में की गई है, जब जॉनसन ने विदेश नीति, रक्षा, सुरक्षा और विकास संबंधी ब्रिटेन सरकार की समेकित समीक्षा का निष्कर्ष जारी किया. ब्रिटेन की विदेश नीति में आए बदलाव में ‘विश्व के भू-राजनीतिक केंद्र’ के रूप में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ओर साफ झुकाव दिख रहा है. इसी के तहत ब्रिटेन ने आसियान आर्थिक संघ के साझेदार दर्जे के लिए आवेदन किया है.

‘डाउनिंग स्ट्रीट’ ने बीते 15 मार्च को कहा था, ‘‘ ‘क्वीन एलिजाबेथ कैरियर’ नाटो सहयोगियों के साथ क्षेत्र में अपनी पहली परिचालन तैनाती करेगा. ब्रिटेन दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) देशों के साझेदार दर्जे के लिए आवेदन कर रहा है और अप्रैल के अंत में प्रधानमंत्री (जॉनसन) यूरोपीय संघ (ईयू) से अलग होने के बाद अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा के तहत भारत जाएंगे.’’ उसने कहा था कि भारत की यात्रा ‘‘क्षेत्र में अवसरों को खोलेगी’’और इस दौरान भविष्य में एक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के प्रणेता के रूप में बहुप्रतीक्षित भारत-ब्रिटेन उन्नत व्यापार साझेदारी (ईटीपी) को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है.

गौरतलब है कि भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के एक दिन में अब तक के सर्वाधिक 1,84,372 नए मामले सामने आए हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बुधवार के आंकड़ों के मुताबिक संक्रमण के कुल मामले 1,38,73,825 हो गए हैं, जबकि 13 लाख से अधिक लोग अब भी संक्रमण की चपेट में हैं. मंत्रालय के सुबह आठ बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक, बीते 24 घंटे में 1,027 लोगों की मौत के बाद मृतक संख्या 1,72,085 हो गई है जो 18 अक्टूबर, 2020 के बाद सबसे ज्यादा है.

लगातार 35वें दिन मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है और संक्रमित लोगों की संख्या 13,65,704 हो गई है जो कुल मामलों का 9.84 प्रतिशत है, जबकि कोविड-19 से स्वस्थ होने की दर घटकर 88.92 प्रतिशत हो गई है. इससे पहले 12 फरवरी को संक्रमित लोगों की सबसे कम संख्या 1,35,926 थी और 18 सितंबर 2020 को सबसे ज्यादा 10,17,754 थी. आंकड़ों के मुताबिक, बीमारी से स्वस्थ होने वालों की संख्या 1,23,36,036 हो गई है, जबकि संक्रमित मरीजों की मृत्यु दर और घटकर 1.24 प्रतिशत हो गई है.(news18.com)


14-Apr-2021 9:39 PM 28

लाहौर, 14 अप्रैल: पाकिस्तान (Pakistan) में 800 से अधिक भारतीय सिख यात्री बुधवार को अंतत: रावलपिंडी में अपने गंतव्य तक पहुंच गए. देश में एक कट्टर इस्लामी पार्टी के समर्थकों द्वारा सड़कें बंद किये जाने के कारण बैसाखी मनाने गुरुद्वारा पंजा साहिब जाने के दौरान उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ा. भारतीय तीर्थयात्री बैसाखी पर्व में शामिल होने के लिये सोमवार को वाघा बॉर्डर के जरिये लाहौर पहुंचे थे.

फ्रांस में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून प्रकाशित करने के मामले में फ्रांसीसी राजदूत को निष्कासित करने की मांग कर रहे तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) के समर्थकों द्वारा सड़कें बंद किये जाने से उनकी यात्रा प्रभावित हुई. पंजाब सरकार के एक अधिकारी ने 'पीटीआई-भाषा' को बताया कि 800 से अधिक भारतीय सिखों ने हसनअबदाल में गुरुद्वारा पंजा साहिब में वैशाखी मनाई. उन्होंने कहा कि मंगलवार दोपहर भारतीय सिख पुलिस और रेंजर्स के साथ 25 बसों में सवार होकर लाहौर के गुरुद्वारा पंजा साहिब के लिये रवाना हुए.

अधिकारी ने कहा, 'टीएलपी के प्रदर्शन के दौरान सड़कें बंद होने के कारण सिख यात्री 14 घंटे के सफर के बाद बुधवार सुबह चार बजे के बाद हसनअबदाल पहुंचे, जहां पहुंचने में अमूमन तीन घंटे लगते हैं.' बुधवार को उन्होंने मुख्य कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जिसमें कई स्थानीय लोगों ने भी शिरकत की. भारतीय सिख पाकिस्तान में दिन के ठहराव के दौरान पंजाब में अन्य पवित्र स्थलों की भी यात्रा करेंगे.(news18.com)


14-Apr-2021 8:40 PM 23

न्यूयॉर्क, 14 अप्रैल | दैनिक जीवन में एल्गोरिदम की दखल पर बढ़ती चिंता के बावजूद, एक नए शोध से पता चलता है कि लोग मनुष्यों की तुलना में एल्गोरिदम पर भरोसा करने की अधिक संभावना रखते हैं, खासकर अगर कोई कार्य बहुत चुनौतीपूर्ण हो। अपनी प्लेलिस्ट पर अगला गीत चुनने से लेकर सही आकार की पैंट चुनने तक, लोग रोजमर्रा के निर्णय लेने में मदद करने और अपने जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिए एल्गोरिदम की सलाह पर अधिक भरोसा कर रहे हैं।

जॉर्जिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ता एरिक बोगर्ट ने कहा, "एल्गोरिदम बड़ी संख्या में कार्य करने में सक्षम हैं और वह जो कार्य करने में सक्षम है, उसमें हर दिन व्यावहारिक रूप से विस्तार भी हो रहा है।"

बोगर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा लगता है कि एल्गोरिदम पर अधिक से अधिक झुकाव के लिए एक पूर्वाग्रह भी है।

जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित अध्ययन के लिए टीम में 1,500 व्यक्ति शामिल रहे और लोगों को एक तस्वीर का मूल्यांकन करने को कहा गया।

टीम ने स्वयंसेवकों को भीड़ की एक तस्वीर में लोगों की संख्या गिनने के लिए कहा और इसके साथ ही अन्य लोगों के समूह द्वारा तैयार किए गए सुझावों और एल्गोरिदम द्वारा उत्पन्न सुझावों को प्रदर्शित करने को कहा।

शोधकर्ता ने कहा कि जैसे ही फोटोग्राफ में लोगों की संख्या का विस्तार हुआ और इनकी गिनती अधिक कठिन हो गई तो लोगों ने खुद से गिनने के बजाय एक एल्गोरिथम की ओर से उत्पन्न सुझाव का पालन करने को तवज्जो दी।

शोधकर्ता के अनुसार, परीक्षण कार्य के रूप में मतगणना का विकल्प काफी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि फोटो में लोगों की संख्या बढ़ने पर यह कार्य निष्पक्ष रूप से कठिन हो जाता है। यह उस प्रकार का कार्य भी रहा, जिसके लिए लोग कंप्यूटर पर अधिक भरोसे की उम्मीद करते हैं। (आईएएनएस)


14-Apr-2021 7:55 PM 27

चीन में टीकाकरण अभियान की शुरुआत बहुत धीमी रही है. अब, जबकि चीन देश भर में टीकाकरण की दर को बढ़ाना चाहता है, तो लोगों को सुरक्षा और देश में मौजूद टीकाकरण की क्षमता को लेकर आशंकाएं पैदा हो रही हैं.

   डॉयचे वैले पर विलियम यांग की रिपोर्ट- 

दुनिया भर के तमाम देश जहां कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी लहर को रोकने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कोरोना वैक्सीन को पहुंचाने की कोशिश में लगे हैं वहीं चीन में टीकाकरण की दर को बढ़ाने के लिए पुरस्कार और दंड का सहारा लेना पड़ रहा है. 11 अप्रैल तक चीन में टीके की सिर्फ 16.73 करोड़ खुराक ही लोगों को दी जा सकी थी जो कि लक्ष्य से बहुत पीछे है. चीन में सरकार का लक्ष्य है कि जून महीने के अंत तक 56 करोड़ लोगों यानी करीब 40 फीसद आबादी का टीकाकरण कर दिया जाए.

इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अलग-अलग शहर और अलग-अलग संस्थाएं अलग-अलग तरीके अपना रही हैं. मसलन, कहीं-कहीं टीका लगवाने वालों को उपहार दिए जा रहे हैं तो कुछ जगहों पर अध्यापकों से कहा जा रहा है कि वो छात्रों के अभिभावकों से पूछें कि उनका टीकाकरण हुआ है या नहीं. यही नहीं, कुछ निजी कंपनियां तो अपने कर्मचारियों पर दबाव डाल रही हैं कि वो टीका लगवाएं अन्यथा उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा.

देश के दक्षिणी हिस्से में स्थित औद्योगिक केंद्र शेनजेन में जगह जगह बैनर लगे हैं जिन पर लोगों को टीका लगवाने की सलाह देने वाले नारे लिखे हुए हैं और एक जगह एक अध्यापक वी चैट ग्रुप में अभिभावकों को अपने टीकाकरण का विवरण देने के लिए दबाव बना रहा है. ली सरनेम वाली एक महिला ने डीडब्ल्यू को बताया, "जब तक किसी व्यक्ति के साथ स्वास्थ्य संबंधी कोई विशेष दिक्कत न हो, तो हर व्यक्ति को टीका लगवाना जरूरी कर दिया गया है.”

शेनजेंग के एक सार्वजनिक अस्पताल में काम करने वाली ली बताती हैं कि उनके तमाम सहयोगियों को यह नहीं बताया गया है कि उन्हें कौन सी वैक्सीन दी गई है. ली कहती हैं कि टीका लगवाने से वो इसलिए बच गईं क्योंकि उन्होंने अपनी ऐसी शारीरिक समस्या का प्रमाण दे दिया था जिसमें टीका लगवाने से दिक्कत हो सकती थी. हालांकि वो ये भी कहती हैं कि तमाम निजी संस्थाओं में इसके बावजूद टीका लगवाना पड़ रहा है क्योंकि वहां कर्मचारियों को टीका न लगवाने पर नौकरी से निकालने की धमकी दी जा रही है.

टीकाकरण प्रोत्साहन के लिए धमकी दी जा रही है

ली कहती हैं, "मेरी एक दोस्त की कंपनी ने पिछले महीने कहा कि यदि वह टीका नहीं लगवाती है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा. जबकि मेरी दोस्त उस समय अपने नवजात शिशु को स्तनपान करा रही थी. तमाम लोग जो पहले चाइनीज वैक्सीन लगवाने से बच गए थे, अब सरकार के दबाव और तमाम धमकियों की वजह से उन्हें भी लगवाना पड़ रहा है.” डीडब्ल्यू के स्रोतों के मुताबिक, कोरोना वायरस संक्रमण के शुरुआती केंद्र रहे वुहान शहर में पिछले कुछ हफ्तों से वहां के नागरिकों को टीकाकरण के लिए तैयार किया जा रहा है. हालांकि तमाम लोग अपने आप भी टीका लगवा रहे हैं, लेकिन बहुत से लोगों का कहना है कि टीकाकरण के बारे में सूचनाएं छिपाई जा रही हैं और लोगों के पास ये जानने के बहुत कम स्रोत हैं कि जिन देशों में चीन में बने टीके लगाए गए हैं, वहां अब क्या स्थिति है.

लिन सरनेम वाले एक व्यक्ति का कहना था, "वुहान में बहुत से लोग सिर्फ यह जानते हैं कि कुछ देश चीन से टीका आयात कर रहे हैं लेकिन वो ये नहीं जानते कि टीकाकरण शुरू होने के बाद इन टीकों की वजह से पॉजिटिव मामलों में कमी आई है या नहीं. वुहान में हर व्यक्ति को सिनोफार्म नाम की वैक्सीन दी जा रही है लेकिन पड़ोसी शहरों में कुछ लोगों को सिनोवैट नाम की वैक्सीन दी जा रही है.”

सबसे ज्यादा चिंता सुरक्षा को लेकर है

कई चीनी नागरिकों ने टीका न लगवाने के पीछे सुरक्षा की चिंता और टीके की क्षमता को वजह बताया है. 11 अप्रैल को चीन में रोग नियंत्रण विभाग के एक बड़े अधिकारी ने कहा कि चीन में मौजूदा टीकों ने निम्न स्तर की सुरक्षा प्रदान की है और ऐसा माना जा रहा है कि इनकी क्षमता को बढ़ाने के लिए विभिन्न टीकों का मिश्रण बनाने की रणनीति अपनाई जा रही है. चीन में सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के डायरेक्टर गाओ फू कहते हैं, "टीकों की बहुत उच्च सुरक्षा दर न होने की समस्या को हम जल्द ही सुलझा लेंगे. अब यह औपचारिक विचार के तहत हो रहा है कि क्या हमें टीकाकरण प्रक्रिया में विभिन्न तकनीक वाले अलग-अलग टीकों का प्रयोग करना चाहिए या नहीं.” बाद में चीन के एक सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स से बातचीत में गाओ कहते हैं, कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उनकी टिप्पणियों की बिल्कुल गलत व्याख्या की.

अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर पॉलिसी, आउटकम्स एंड प्रिवेंशन के डायरेक्टर जैसन वांग ने डीडब्ल्यू को बताया कि चीन ज्यादा से ज्यादा लोगों के टीकाकरण के लिए "दंड और पुरस्कार” की रणनीति अपना रहा है. हालांकि उनका मानना है कि टीकाकरण में तेजी लाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि टीके को लेकर लोगों की गलतफहमियों को दूर किया जाए. डीडब्ल्यू से बातचीत में वांग कहते हैं, "लोगों को वैक्सीन लेने के लिए प्रेरित करने का एक तरीका यह है कि उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए और हर सरकार यह कर सकती है. यदि लोगों को कोई ऐसी चीज लेने के लिए दबाव डाला जाए जिसे वो अपने लिए नुकसानदेह समझ रहे हैं तो इससे लोगों का सरकार पर भरोसा कम हो जाएगा.”

दूसरी ओर, चीन ने पिछले कुछ महीनों में एक आक्रामक "वैक्सीन कूटनीति” कार्यक्रम की शुरूआत की है जिसके तहत दुनिया के कई देशों को वो लाखों टीकों का निर्यात कर रहा है. हालांकि चिली जैसे कई देश चीनी टीकों से देश की बड़ी जनसंख्या का टीकाकरण करने के बावजूद कोविड की एक नई लहर से जूझ रहे हैं.

चीन का टीकों का उत्पादन बढ़ाने पर जोर

कुछ चीनी नागरिक सुरक्षा कारणों से वैक्सीन लेने से हिचक रहे हैं जबकि कई अन्य लोगों को कहना है कि चीन में बनी कोरोनावायरस वैक्सीन की अपेक्षाकृत कमजोर क्षमता कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. कुछ लोग जो टीका लगवाने में दिलचस्पी ले रहे हैं, उसके पीछे मुख्य कारण ये लगता है कि देश के एक बड़े हिस्से में पिछले कुछ महीनों में एक भी पॉजिटिव केस नहीं मिला है. बीजिंग में ल्यू सरनेम वाली एक महिला ने डीडब्ल्यू को बताया, "मुझे लगता है कि चीन का ज्यादातर हिस्सा अब वायरस मुक्त हो चुका है. मैं बचाव के तरीकों को शुरू से ही अपना रही हूं इसलिए अब मैं संक्रमित होने से नहीं डर रही हूं. मेरे आस-पास तमाम लोगों ने स्वेच्छा से टीका लगवा लिया है और कुछ लोग इस डर से लगवा रहे हैं कि ऐसा न करने पर कहीं भविष्य में उन्हें अन्य देशों की यात्रा करने से रोक दिया जाए.”

चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिनहुआ के मुताबिक, देश में ज्यादातर वैक्सीन निर्माताओं ने उत्पादन क्षमता को बढ़ा दिया है और गाओ फू कहते हैं कि चीन का लक्ष्य है कि इस साल के अंत और अगले साल के मध्य तक देश की 70-80 फीसद जनसंख्या को टीका लग जाए. लेकिन जानकारों का कहना है कि इससे तब तक कोई मदद नहीं मिलेगी जब तक ज्यादातर देश भी अपनी अधिकांश आबादी का टीकाकरण नहीं कर लेते. वांग कहते हैं, "अन्यथा, जब सीमा खुल जाएगी और लोग एक-दूसरे देश में आवागमन करने लगेंगे, तो उन देशों के लोग फिर संक्रमित करना शुरू कर देंगे जहां पूरी तरह से टीकाकरण नहीं हुआ होगा.” (dw.com)

 


14-Apr-2021 6:43 PM 30

ओटावा, 14 अप्रैल | दुनियाभर में कोरोना की तेज रफ्तार जारी है। कनाडा में पिछले हफ्ते से, कोरोना के मामले लगभग 8100 आ रहे हैं, इसी के साथ रोजाना मामले में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार कनाडा के मुख्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी थेरेसा टैम ने मंगलवार को बताया, "कोविड-19 महामारी कई कनाडाई लोगों के लिए तनाव और चिंता पैदा कर रहा है।"

टैम ने कहा, "पिछले सप्ताह से मरीजों की संख्या में वृद्धि जारी है। हर दिन अस्पतालों में कोविड-19 के करीब 3,000 से अधिक मरीजों का इलाज किया जा गया, जिसमें पिछले सप्ताह की तुलना में 29 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।"

इसमें लगभग 970 लोगों को इंटेंसिव केयर यूनिट में इलाज किया गया था, जो कि एक सप्ताह पहले की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक था।

इनमें से लगभग 36,000 मामले नए वैरिएंट के हैं, जिसमें से बी.1.1.7 वैरिएंट का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा है।

इसमें बी.1.1.7 वैरिएंट के 34,404 मामले, पी.1 वैरिएंट के 1,222 मामले और बी.1.351 वैरिएंट के 365 मामले हैं।

सीटीवी के अनुसार कनाडा में मंगलवार शाम तक कुल 10,78,562 कोविड-19 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिसमें 23,392 मौतें शामिल हैं।(आईएएनएस)


14-Apr-2021 2:37 PM 83

 

शादी-ब्याह दो दिलों का मेल है. जब दो एडल्ट आपस में जिंदगी बिताने को सहमत हो जाते हैं तब दोनों शादी के बंधन में बंध जाते हैं. भारत में तो शादी-ब्याह को त्योहार की तरह मनाया जाता है, जिसमें दो लोग ही नहीं, दो परिवार भी आपस में जुड़ जाते हैं. भारत में शादी से पहले घर परिवार की सारी पड़ताल की जाती है. हालांकि, विदेशों में सिर्फ लड़का-लड़की अपनी अंडरस्टैंडिंग देख कर शादी का फैसला करते हैं. लेकिन हाल ही में अमेरिका के न्यूयॉर्क कोर्ट में एक शख्स ने अपनी ही औलाद से शादी करने की परमिशन मांगी है. ये अपील वायरल हो रही है.

कोर्ट में दाखिल की अपील
अपील में शख्स ने लिखा है कि उसे उसकी औलाद से ही प्यार हो गया है. वो अपनी संतान को प्रपोज करना चाहता है लेकिन उसे डर है कि समाज उसका विरोध करेगा. साथ ही वो चाहता है कि उसे कोर्ट से उसे अपनी औलाद से शादी की परमिशन मिल जाए ताकि भविष्य में उसे किसी तरह की कोई समस्या ना हो.

पहचान नहीं की उजागर
कोर्ट में दाखिल की गई अपील में अपीलकर्ता ने अपनी और अपनी औलाद की पहचान छिपाई है. दोनों का जेंडर भी डिस्क्लोज नहीं किया गया है. ये याचिका मैनहैट्टन के फेडरल कोर्ट में दायर की गई है. दरअसल, इस देश में ऐसे रिश्तों को असंवैधानिक घोषित किया गया है. इन रिश्तों के खुलासे से समाज में काफी बदनामी होती है.
 
मिल सकती है 4 साल की सजा
कोर्ट में दाखिल की गई अपील में शख्स ने लिखा कि शादी दो लोगों के बीच का पर्सनल मामला है. ये लोगों की फीलिंग्स पर आधारित है. इसका फैसला दो लोगों को अपनी सहमति के आधार पर लेना चाहिए ना कि कोर्ट और कानून द्वारा बनाए गए नियम पर. बता दें कि न्यूयॉर्क कानून के मुताबिक़, अगर कोई अपने परिवार के सदस्य से शादी करे या उससे रिश्ता रखे तो इसमें चार साल तक की सजा हो सकती है. (news18.com)


14-Apr-2021 1:24 PM 17

डेनमार्क नहीं चाहता कि वहां भविष्य में नए शरणार्थी आएं. इसलिए अब सीरियाई शरणार्थियों से कहा जा रहा है कि वो सीरिया लौट जाएं क्योंकि सीरिया अब सुरक्षित है. स्थानीय समाज में घुल मिल रहे युवाओं को मुश्किल हो रही है.

   (dw.com)

अया अबो दाहेर ने डेनमार्क के शहर निबोर्ग के एक हाईस्कूल से हाल ही में स्कूली पढ़ाई पूरी की है और जून के अंत में अपने दोस्तों के साथ वो इस खुशी का उत्सव मनाने वाली थीं तभी उन्हें डेनमार्क के अधिकारियों की ओर से एक ऐसा ईमेल मिला जिसने उनकी खुशियों पर पानी फेर दिया. सीरियाई छात्रों और उनके मां-बाप को भेजे गए ईमेल में लिखा था कि उनके आवासीय परमिट का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा.

20 वर्षीया दाहेर कहती हैं, "मैं बहुत दुखी थी, मैंने खुद को इस कदर विदेशी समझा जैसे डेनमार्क की हर चीज मुझसे दूर कर दी गई है. मैं नीचे बैठ गई और जोर से चिल्लाने लगी. रात में, मुझे मेरी एक दोस्त ने मेरे घर छोड़ा क्योंकि मैं सो नहीं पा रही थी.” सीरिया के ज्यादातर शरणार्थियों को यही ईमेल मिला था जो कि दमिश्क के आस-पास के इलाकों के रहने वाले हैं.

‘युद्ध न तो खत्म हुआ है और न ही भुलाया गया है'
पिछली गर्मियों में, जब से डेनमार्क के अधिकारियों ने सीरिया की राजधानी दमिश्क को सुरक्षित घोषित किया है, तब से उस इलाके के हजारों सीरियाई शरणार्थियों के आवासीय परमिट रद्द कर दिए गए हैं या यूं कहें कि उनका नवीनीकरण नहीं किया गया है. डेनिश रिफ्यूजी काउंसिल की महासचिव चार्लोट स्लेंटे कहती हैं, "हालांकि युद्ध न तो खत्म हुआ है और न ही इसे भुलाया गया है लेकिन डेनमार्क के अधिकारी यही मान रहे हैं कि दमिश्क में स्थितियां इतनी अच्छी हो गई हैं कि सीरियाई शरणार्थियों को वहां भेजा जा सकता है.”

डेनमार्क एकमात्र यूरोपीय देश है जो सीरियाई शरणार्थियों के आवासीय परमिट निरस्त कर रहा है. स्लेंटे कहती हैं कि यह एक "गैरजिम्मेदार” फैसला है और वापस लौटने वालों पर हमले और उत्पीड़न का खतरा रहेगा. वो कहती हैं, "वहां लड़ाई नहीं हो रही है, इस आधार पर दमिश्क वापस लौटने वाले शरणार्थियों के लिए एक सुरक्षित शहर नहीं बन जाता.”

डेनमार्क और सीरिया सहयोग नहीं कर रहे हैं
डेनमार्क के इस रवैये के खिलाफ सिर्फ डीआरसी और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार संगठन ही नहीं हैं बल्कि वो वामपंथी पार्टियां भी इस कदम का विरोध कर रही हैं जो कि डेनमार्क की संसद में कभी-कभी प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के नेतृत्व वाली सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी की अल्पमत सरकार का सहयोग करती हैं. सोशल लिबरल पार्टी यानी रेडिकेल वेंस्टर के प्रवक्ता क्रिस्टियान हेगार्ड कहते हैं, "अया अबो दाहेर जैसे छात्रों को निष्कासित करने का फैसला निर्दयी और विवेकहीन है. डेनमार्क कैसे मान सकता है कि सीरिया एक सुरक्षित देश है?” अपने फेसबुक पेज पर हेगार्ड लिखते हैं, "डेनमार्क ने सीरिया में अपना दूतावास इसीलिए बंद कर रखा है क्योंकि वहां स्थितियां ठीक और सुरक्षित नहीं हैं.”

वामपंथी पार्टियों का तर्क है कि चूंकि डेनमार्क सीरियाई शासक बशर अल असद की सरकार के साथ सहयोग नहीं कर रहा है इसलिए इस वक्त शरणार्थियों को जबरन निष्कासित करना ठीक नहीं है. फिलहाल, जिन सीरियाई लोगों के आवासीय परमिट खत्म हो गए हैं और जिन्होंने स्वेच्छा से देश छोड़ने से इनकार कर दिया है उन्हें डेनिश डिपोर्टेशन शिविरों में रखा जाता है.

‘उन्हें योगदान करने दें, काम करने दें और शिक्षा  लेने दें'
हेगार्ड कहते हैं कि सीरियाई शरणार्थी अपने देश में परिस्थिति बदलने के लिए सालों यहां बैठकर इंतजार कर सकते हैं. हेगार्ड सुझाव देते हैं कि उन शरणार्थियों से काम लिया जा सकता है, उनके योगदान का लाभ लिया जा सकता है और उन्हें शिक्षा प्राप्त करने में मदद दी जानी जाहिए. इससे डेनमार्क को भी लंबे समय तक फायदा मिलेगा.

अया अबो दाहेर की एक सहपाठी ने डेनमार्क के समेकन मंत्री मतियास तेस्फाइ को एक खुला पत्र लिखा और मांग की कि एक ऐसी लड़की को निष्कासित न किया जाए जो धाराप्रवाह डेनिश भाषा बोल लेती है और यहां के समाज को कुछ देना चाहती है. लेकिन उसकी बात सुनी नहीं गई और तेस्फाइ ने डेनमार्क की मीडिया को बताया कि वो अपने उन अधिकारियों पर भरोसा करते हैं जिन्होंने स्थिति का आकलन किया है और वो सिर्फ इसलिए कोई संशोधन नहीं करेंगे कि कोई टेलीविजन पर आकर कुछ कह रहा है.

दाहेर के स्कूल के डायरेक्टर वेस्टरगार्ड स्टॉकहोम भी अपनी विद्यार्थी को लेकर काफी भावुक हैं. अया अबो दाहेर को वो एक "कर्मठ, ज्ञानपिपासु और स्पष्ट लक्ष्य” वाली लड़की बताते हैं. स्टॉकहोम कहते हैं कि सीरिया वापस लौटने पर उसकी सुरक्षा को खतरा है. वो कहते हैं कि इस लड़की के दो भाई एक साल पहले भागकर डेनमार्क आ गए थे क्योंकि वो असद की सेना में भर्ती होने ही वाले थे. उन्हें निष्कासन की धमकी नहीं दी जा रही है क्योंकि उन्हें विशेष संरक्षण मिला हुआ है.

अया अबो दाहेर कहती हैं, "निष्कासन हमें अपने परिवार से फिर दूर कर देगा जो कि बहुत मुश्किल से एक साथ मिल पाए थे. दमिश्क में वापस जाने पर हमारे पास कुछ भी नहीं रहेगा. अधिकारी मुझे उस जगह कैसे वापस भेज सकते हैं जिसे वो जानते हैं कि मेरे लिए खतरनाक है?”

डेनमार्क एक ‘दुखद उदाहरण' है
स्कूल के डायरेक्टर स्टॉकहोम कहते हैं, "भाइयों के भागने के बाद लोग अया से बार-बार पूछते थे कि वे कहां हैं. जब खाना बंटता था, अया और उसके मां-बाप से कहा जाता था कि उन्हें तब तक खाना नहीं मिलेगा जब तक कि उसके भाई लौटकर नहीं आ जाते.” यूरोप में डेनमार्क के अलावा किसी और देश ने सीरिया की इन परिस्थितियों में किसी शरणार्थी को वापस भेजने के बारे में फैसला नहीं किया है. स्टॉकहोम कहते हैं कि डेनमार्क वास्तव में एक ‘दुखद उदाहरण' पेश कर रहा है.

दरअसल, शरणार्थियों को जल्दी से जल्दी वापस भेजने का फैसला साल 2019 में आए उस अप्रवासन कानून के तहत हो रहा है जिसे पिछली कंजर्वेटिव सरकार लेकर आई थी और अब सोशल डेमोक्रैट्स और दक्षिणपंथी भी संसद में उसी का अनुकरण कर रहे हैं. कानून में साफ कहा गया है कि आवासीय परमिट सिर्फ एक सीमित अवधि के लिए ही जारी किए गए हैं. इस नीति के तहत, जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल होने लगेंगी, आवासीय परमिट रद्द कर दिए जाएंगे और शरणार्थियों को उनके देश वापस भेज दिया जाएगा.

शरणार्थियों को हतोत्साहित करना
मेटे फ्रेडरिक्सन वामपंथी झुकाव वाली महिला होने के बावजूद अप्रवासन और शरणार्थी मामलों में दक्षिणपंथी रुझान दिखाने लगती हैं. उनके पास भविष्य में शरणार्थियों को डेनमार्क आने से रोकने की भी एक दीर्घकालीन योजना है. डेनमार्क की सरकार ऐसे शरणार्थियों को वित्तीय मदद भी दे रही है जो स्वेच्छा से अपने देश वापस जा रहे हैं. हालांकि सरकार लगातार शरणार्थियों को अपने देश से बाहर करने की भी कोशिशें कर रही है और जो लोग डेनमार्क में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें भी हतोत्साहित कर रही है.

अया अबो दाहेर निष्कासन से डरी हुई हैं लेकिन उन्हें उम्मीद है कि वो गर्मी में अपनी दोस्तों के साथ हाई स्कूल पूरा होने की खुशी मना सकेंगी. अया ने दंत चिकित्सक बनने का ख्वाब देख रखा है और अपने निष्कासन के नोटिस के खिलाफ एक याचिका भी डाल रखी है. उनके स्कूल के डायरेक्टर स्टॉकहोम कहते हैं कि इन सब में कुछ महीने लग जाएंगे और उम्मीद है कि जून महीने में अया अपनी ग्रेजुएशन की खुशी अपने दोस्तों के साथ मना सकेगी.
 


14-Apr-2021 10:29 AM 49

ईरानी अधिकारियों का कहना है कि रविवार को हुए हमले में ईरान के सबसे अहम परमाणु केंद्र की हज़ारों मशीनें या तो ख़राब हो गई हैं या बर्बाद हो गई हैं.

ईरानी संसद के रिसर्च सेंटर के प्रमुख अलिरेज़ा ज़कानी ने कहा है कि इस घटना से ईरान की परमाणु सामग्री को परिशोधित करने की क्षमता समाप्त हो गई है.

एक अन्य अधिकारी ने बताया है कि नतांज परमाणु केंद्र के जिस हिस्से पर ये हमला हुआ है वो ज़मीन से पचास मीटर नीचे है. ईरान ने इस हमले को 'परमाणु आतंकवाद' बताते हुए इसराइल को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया है.

वहीं इसराइल ने अपनी भूमिका की ना ही पुष्टि की है और न ही इसका खंडन किया है. लेकिन इसराइल के सरकारी रेडियो पर ख़ुफ़िया सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि ये इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद का एक ऑपरेशन था. ईरान का कहना है कि वो प्रभावित सेंट्रीफ्यूज को बदल देगा.

सेंट्रीफ्यूज वो मशीन होती है जिसमें यूरोनियम का संवर्धन किया जाता है जिसे बाद में परमाणु ऊर्जा बनाने के काम में लाया जाता है. अधिक उन्नत सेंट्रीफ्यूज के ज़रिए परमाणु बम भी बनाए जा सकते हैं.

ईरान को कितना नुकसान हुआ है?
ईरान ने शुरूआत में कहा था कि सेंट्रीफ्यूज को नुकसान पहुंचा है लेकिन अतिरिक्त जानकारी नहीं दी थी.

अब सरकारी टीवी चैनल पर बोलते हुए ज़कानी ने बताया है कि परमाणु संयंत्र को भारी नुकसान पहुंचा हैं.

उन्होंने सवाल किया, 'क्या ये सामान्य बात है कि वो हमारे बिजली सिस्टम में घुस जाते हं और एक ही बार में कई हज़ार सेंट्रीफ्यूज को या तो बर्बाद कर देते हैं या नुकसान पहुंचाते है?'

'क्या हमें रविवार को हुई घटना पर संवेदनशील नहीं होना चाहिए जिसने हमारे संवर्धन की क्षमता को ही नष्ट कर दिया है?'

वहीं अमेरिकी ख़ुफ़िया अधिकारियों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया है कि नाभिकीय संयंत्र पर एक बड़ा धमाका हुआ. इससे भूमिगत संयंत्र के भीतर स्थापित सेंट्रीफ़्यूज़ों को बिजली पहुँचाने वाला पावर सिस्टम पूरी तरह बर्बाद हो गया.

उनका अनुमान है कि इस धमाके के बाद वहां फिर से यूरेनियम का संवर्द्धन शुरू होने में कम से कम नौ महीने लग जाएंगे.

इसराइली जहाज़ पर हमला
इसी बीच इसराइली और अरब मीडिया में आई रिपोर्टों में कहा गया है कि संयुक्त अरब अमीरात के पास हुए एक हमले में एक इसराइली पोत को नुकसान पहुंचा हैं. हालांकि इस हमले में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं हैं.

एक अधिकारी ने इसराइले के चैनल 12 टीवी को बताया है कि इस हमले के पीछे ईरान है. यदि इसकी पुष्टि होती है तो ये दोनों देशों के जहाज़ों पर हुए हमलों और जवाबी हमलों की श्रंखला में एक और हमला होगा.

इसराइल ने दी थी धमकी

हाल ही में इसराइल ने ईरान को चेताया था कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा न शुरू करे. इसराइल बार-बार कहता रहा है कि वह ईरान को परमाणु शक्ति हासिल नहीं करने देगा.

ईरान ने रविवार को हुए हमले से एक दिन पहले ही नतांज परमाणु केंद्र पर उच्च गुणवत्ता के सेंट्रीफ्यूज़ शुरू किए थे. ये सेंट्रीफ्यूज़ साल 2015 के समझौते के तहत प्रतिबंधित थे.

ईरान और विश्व के छह शक्तशाली देशों के बीच साल 2015 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर समझौता हुआ था. अमेरिका राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया था.

ईरान ने फिर से उच्च गुणवत्ता का यूरेनियम संवर्धन शुरू कर दिया था. ईरान का कहना है कि वह उच्च गुणवत्ता वाले यूरेनियम का संवर्द्धन तभी बंद करेगा जब उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध ख़त्म कर दिए जाएंगे.

पिछले साल इसी परमाणु केंद्र में लगी थी आग
पिछले साल जुलाई में ईरान के इसी भूमिगत परमाणु केंद्र में आग लग गई थी. ईरानी अधिकारियों ने इसे साइबर हमले का नतीजा बताया था.

ईरानी परमाणु केंद्र को ऐसे वक़्त में निशाना बनाया गया है जब अमेरिका के मौजूदा बाइडन प्रशासन की ओर से 2015 के परमाणु समझौते को बहाल करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं. इसके लिए पिछले हफ़्ते वियना में बातचीत भी हुई.

ईरान के यूरेनियम संवर्धन से चिंतित हैं- अमेरिका
अमेरिका का कहना है कि वह ईरान के अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते का उल्लंघन करके यूरेनियम को परमाणु हथियार बनाने के स्तर तक संवर्धित करने को लेकर चिंतित है.

ईरान का कहना है कि वो यूरेनियम को 60 प्रतिशत तक संवर्धित करेगा. ये हथियार बनाने लायक यूरेनियम से 30 प्रतिशत नीचे होगा.

अमेरिका ने ईरान के इस क़दम को उकसाने वाला बताते हुए कहा है कि वो ईरान के साथ अप्रत्यक्ष वार्ता जारी रखेगा. (bbc.com)


14-Apr-2021 10:19 AM 24

-शुमायला जाफ़री

पाकिस्तान में धार्मिक नेता साद हुसैन रिज़वी और उनके कई सहयोगियों की गिरफ़्तारी के बाद देश के कई हिस्सों में तनाव है. इसी बीच पुलिस ने साद रिज़वी समेत तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान पार्टी (टीएलपी) के कई नेताओं के ख़िलाफ़ आतंकवाद रोधी क़ानून के तहत मुकद़मा दर्ज कर लिया है.

लाहौर पुलिस ने तहरीक ए लब्बैक पाकिस्तान के मुखिया साद हुसैन रिज़वी और दूसरे नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं पर पाकिस्तान दंड संहिता की अलग-अलग धाराओं, आतंकवाद विरोधी क़ानून और लोक व्यवस्था अध्यादेश के तहत मामला दर्ज किया है.

ये मामला पुलिस की तरफ से दी गई शिकायत पर लाहौर के शाहदरा टाउन थाने में दर्ज हुआ है. साद रिज़वी के अलावा काज़ी महमूद रिज़वी, पीर सैयद ज़हीर अल हसन शाह, मेहर मुहम्मद क़ासिम, मोहम्मद एजाज़ रसूल, पीर सैयद इनायत अली शाह, मौलामा ग़ुलाम अब्बास फ़ैज़ी, मौलाना ग़ुलाम ग़ौस बग़ददादी का नाम भी रिपोर्ट में दर्ज है. इसके अलावा पाकिस्तान की इस धार्मिक पार्टी के अज्ञात कार्यकर्ताओं पर भी मुकदमा दर्ज किया गया है.

एफ़आईआर में कहा गया है कि इन लोगों ने पूरे पाकिस्तान में लोगों को हिंसा करने और जाम लगाने के लिए उकसाया. इसके लिए लाउडस्पीकर से ऐलान करने और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के आरोप भी लगाए गए हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अपने नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं ने जान लेने के इरादे से पत्थरबाज़ी की और पुलिसकर्मियों पर हमले किए. एफ़आईआर के मुताबिक प्रदर्शनकारियों ने कई पुलिसकर्मियों को पीटा और सिपाही मोहम्मद अफ़ज़ल की मौत हो गई.

सोमवार को पाकिस्तानी पुलिस ने साद रिज़वी को गिरफ़्तार कर लिया था. इसके बाद से ही देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं जिससे कई इलाक़ों में जनजीवन भी प्रभावित हुआ है.

साद रिज़वी की गिरफ़्तारी के बाद इस्लामाबाद और रावलपिंडी में प्रदर्शनस्थलों पर इंटरनेट भी बंद कर दिया गया था. वहीं गुजरांवाला में प्रदर्शनकारियों पर काबू करने के लिए पुलिस की कबड्डी टीम को भी बुलाया गया था.

साद रिज़वी की गिरफ़्तारी के बाद शुरू हुए प्रदर्शनों से सबसे ज़्यादा प्रभावित लाहौर ही रहा है. बीबीसी संवाददाता शहज़ाद मलिक के मुताबिक केंद्रीय गृह मंत्री शेख राशिद अहमद के नेतृत्व में इस्लामाबाद में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में प्रदर्शनों से प्रभावित राष्ट्रीय राजमार्गों को खोलने का फैसला लिया गया है.

इस बैठक में प्रदर्शनों के बाद पैदा हुए सुरक्षा हालातों पर भी चर्चा की गई है. इसमें पंजाब के पुलिस प्रमुख और मुख्य सचिव वीडियो लिंक के ज़रिए शामिल हुए थे. धार्मिक मामलों के मंत्री नूर उल हक़ क़ादरी भी इस बैठक में शामिल रहे.

इस बैठक के बाद गृहमंत्री ने कहा कि गिरफ़्तार किए गए लोगों को रिहा नहीं किया जाएगा. सोशल मीडिया पर घायल पुलिसकर्मियों के अपुष्ट वीडियो भी शेयर किए जा रहे हैं. वहीं प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में इंटरनेट भी बंद कर दिया है.

इस्लामाबाद और रावलपिंडी के कई इलाक़ों में प्रदर्शन की रिपोर्टें हैं. संवाददाता शहज़ाद मलिक के मुताबिक फ़ैज़ाबाद और भारा काहू इलाक़ों में प्रदर्शन हुए हैं. पुलिस ने आम लोगों से परिवर्तित रूटों पर सफर करने के लिए कहा है.

ट्रैफ़िक पुलिस के मुताबिक मरी रोड पर कई जगह प्रदर्शन हुआ है जिससे जाम की स्थिति हो गई. हालात काबू करने के लिए पुलिस के जवानों के अलावा रेंजर भी तैनात किए गए हैं.

इस्लामाबाद का अथल चौक भारा काहू इलाक़ा पूरी तरह बंद रहा. सौ से अधिक कार्यकर्ता सड़कों पर डटे रहे. उग्र प्रदर्शनकारी नारेबाज़ी कर रहे थे और मंच से उत्तेजक भाषण दे रहे थे. रिपोर्टों के मुताबिक कई जगह हाथों में लाठी लिए लोगों ने सड़कें जाम की हैं.

यहां रह-रहकर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें होती रहीं. पुलिस ने लाठीचार्ज के बाद शहर के चंदा क़िला चौक को खाली कराया. इस्लामाबाद से लाहौर जाने वाले वाहन जीटी रोड पर इसी चौक से होकर गुज़रते हैं. गुजरांवाला पुलिस के मुताबिक पुलिस की कबड्डी टीम के ख़िलाड़ियों को भी भीड़ से निबटने के लिए बुलाया गया था.

प्रदर्शनकारियों ने कबड्डी खिलाड़ियों पर भी पत्थरबाज़ी की है. हालांकि पुलिस ने दावा किया है कि चंदा क़िला चौक को खाली करा लिया गया था.

लाहौर
यहां पुलिस ने फ्लैग मार्च निकाला है. इसमें लाहौर पुलिस की डॉलफ़िन फ़ोर्स और इलीट फ़ोर्स के जवानों ने भी हिस्सा लिया. टीएलपी कार्यकर्ताओं के प्रदर्शनों की वजह से शहर के कम से कम 17 इलाक़े बंद हैं.

यतीमख़ाना चौक से प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया. बीबीसी संवाददाता उमर दराज़ नांगियाना के मुताबिक यहां पुलिस ने कई मदरसों और टीएलपी नेताओं के घरों पर छापेमारी की है. गिरफ्तारी से बचने के लिए कई कार्यकर्ता घरों से भाग गए हैं.

संवाददाता रियाज़ सोहैल के मुताबिक शहर के कई इलाक़ों में टीएलपी कार्यकर्ता धरनों पर बैठे हैं. हालांकि पुलिस की तरफ से लाठीचार्ज और आंसूगैस के गोले छोड़े जाने के बाद कई जगह प्रदर्शन ख़त्म हो गए हैं.

संवाददाता मोहम्मद काज़िम के मुताबिक सोमवार से शुरू हुए प्रदर्शन चल रहे हैं. क्वेटा-कराची हाइवें को खुज़दार शहर में बंद कर दिया गया है जिसकी वजह से लोगों को परेशानी हो रही है.

कराची के पास हब इलाके में भी कार्यकर्ताओं ने क्वेटा-कराची हाईवे को जाम कर दिया है. डेरा जमाल मुराद इलाक़े में भी क्वेटा-जैकबाबाद रोड को जाम कर दिया गया था जिसे पुलिस ने बाद में खाली करा लिया.

पुलिस ने रिज़वी को हिरासत में लेने के बाद कोई कारण नहीं बताया था. साद रिज़वी ईशनिंदा विरोधी फ़ायरब्रांड धर्मगुरू ख़ादिम हुसैन रिज़वी के बेटे हैं.

हालांकी तहरीक-ए-लब्बैक पार्टी के नेता पुलिस के इस क़दम को 20 अप्रैल को प्रस्तावित इस्लामाबाद मार्च को रोकने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं.

साद रिज़वी जब एक दफ़न में शामिल होने जा रहे थे तब उन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया. जैसे ही उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर फैली तहरीक-ए-लब्बैक पार्टी के कार्यकर्ताओं ने देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन शुरू कर दिए.

पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार ने तहरीक-ए-लब्बैक के पूर्व प्रमुख ख़ादिम हुसैन रिज़वी के साथ 16 नवंबर 2020 को चार सूत्रीय समझौता किया था. ख़ादिम फ्रांस के राजदूत को देश से निकालने की मांग कर रहे थे. सरकार ने वादा किया था कि वो इस मुद्दे को संसद के सामने ले जाएगी और जैसा संसद में तय होगा वैसा किया जाएगा. ये समझौता ख़ादिम हुसैन रिज़वी को इस्लामाबाद की तरफ मार्च करने से रोकने के लिए किया गया था.

जब इस समझौते का पालन नहीं हुआ तो पार्टी ने सरकार के साथ फ़रवरी 2021 में एक और समझौता किया. इसके तहत टीएलपी ने पाकिस्तान सरकार को फ्रांसीसी राजदूत को वापस भेजने के लिए 20 अप्रैल तक का समय दिया है.

ख़ादिम रिज़वी का पिछले साल निधन हो गया था. उनकी पार्टी की 18 सदस्यीय समिति ने उनके बेटे साद हुसैन रिज़वी को नया प्रमुख चुन लिया है.

ख़ादिम रिज़वी के बेटे साद रिज़वी ने अपने पिता के मिशन को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया है. वो इस समय अपने पिता के बनाए मदरसे में दर्स निज़ामी के अंतिम वर्ष के छात्र हैं. इस्लामी शिक्षा में ये डिग्री स्नातकोत्तर के बराबर होती है. (bbc.com)


14-Apr-2021 10:17 AM 18

 

वाशिंगटन. अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने की एक मई की समयसीमा को बढ़ाने का फैसला किया है जो डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने तालिबान के साथ बातचीत करके तय की थी. अमेरिका के एक अधिकारी ने मंगलवार को यह जानकारी दी कि बाइडन प्रशासन ने अब सैनिकों को अफगानिस्तान में रहने देने के लिए नयी समयसीमा के रूप में 11 सितंबर के हमलों की 20वीं बरसी को तय किया है.

अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं होने की शर्त पर बाइडन के इस फैसले की जानकारी दी. हालांकि इसकी आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है. दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन में सैनिकों की वापसी की समयसीमा मई में तय की गई थी. लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की अंतिम तारीख एक मई का पालन नहीं कर पाएंगे, वापसी के लिए 9/11 के तौर पर नया लक्ष्य रखा है.

बाइडन ने व्हाइट हाउस के ‘ईस्ट रूम’ में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि एक मई की समय सीमा में काम समाप्त करना मुश्किल होगा, उन सैनिकों को वहां से बाहर निकालना मुश्किल होगा. इसलिए जो हम कर रहे हैं, जो मैं कर रहा हूं और जो विदेश मंत्री टोनी ब्लिंकन कर रहे हैं. वह यह है कि हम अपने सहयोगियों से मिल रहे हैं, उन अन्य देशों से जो नोटो सहयोगी हैं, जिनके सैनिक भी अफगानिस्तान में है. अगर हम वहां से अपने सैनिकों को वापस लाएंगे तो, इसे सुरक्षित तथा व्यवस्थित तरीके से करेंगे.’ (news18.com)


13-Apr-2021 10:06 PM 24

जापान ने फैसला किया है कि वह फुकुशिमा परमाणु बिजलीघर की दुर्घटना के दौरान दूषित हुए पानी को प्रशांत सागर में छोड़ेगा. जापान के इस पैसले को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का समर्थन है लेकिन पड़ोसी चिंतित हैं.

(dw.com)

जापान का फैसला इस चिंता से प्रभावित है कि वह रेडियोधर्मी पानी को रखे कहां लेकिन मछुआरों और स्थानीय निवासियों की चिंता है कि समुद्री पानी अगर रेडियोसक्रिय हो जाएगा, तो उनकी रोजी रोटी और सेहत का क्या होगा. जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सूगा की सरकार के इस फैसले को मंगलवार को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी. सरकार का कहना है कि टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर दो साल में रेडियोधर्मी पानी को ट्रीट कर उसे प्रशांत सागर में छोड़ना शुरू करेगी.

फुकुशिमा पावर प्लांट के ऑपरेटर ने करीब 12 लाख टन पानी बिजली घर के परिसर में 1000 विशालकाय टैंकों में जमा कर रखा है. ऑपरेटरों का कहना है कि कैंपस में पानी को जमा करने की जगह 2022 तक खत्म हो जाएगी. हालांकि स्थानीय अधिकारियों और कुछ विशेषज्ञों की राय अलग है.

रेडियोधर्मी ट्रिटियम पर विवाद

दस साल पहले जापान ने अपनी सबसे भयानक परमाणु दुर्घटना झेली थी, फुकुशिमा के दाइची परमाणु बिजलीघर में. उस समय मार्च 2011 में सूनामी की वजह से आए भारी भूकंप के बाद बिजलीघर के छह रिएक्टरों में से तीन में मेल्टडाउन हुआ था. उसके बाद से गले हुए परमाणु ईंधन को ठंडा रखने के लिए उस पर लगातार पानी डाला जा रहा है. लेकिन यह प्रदूषित पानी कंपनी के लिए सिरदर्द बना हुआ है.

हालांकि रेडिएशन से दूषित पानी को एक उन्नत लिक्विड प्रोसेसिंग सिस्टम की मदद से साफ किया जा रहा है लेकिन हाइड्रोजन के एक रेडियोएक्टिव आइसोटोप ट्रिटियम को पानी से अलग नहीं किया जा सका है. सरकार और बिजली घर के संचालकों का कहना है कि कम घनत्व में होने पर ट्रिटियम इंसानी सेहत के लिए खतरा नहीं है. लेकिन टोक्यो स्थित सिटिजन कमिशन ऑन न्यूक्लियर इनर्जी का कहना है कि सरकार को ट्रिटियम को पर्यावरण में नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि वह रेडियोधर्मी पदार्थ है. इस संस्था में बहुत से विशेषज्ञ भी शामिल हैं. उन्होंने सॉलिडेशन तकनीक के इस्तेमाल या जमीन पर स्टोरेज का सुझाव दिया है. लेकिन इन सुझावों को सरकार और स्थानीय मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया है.

फैसले की चौतरफा आलोचना

जापान सरकार की योजना की देश के अंदर और बाहर भारी आलोचना हो रही है. जापान के मछुआरों की सहकारी संस्था के प्रमुख किरोशी किशी ने कहा है कि पानी को समुद्र में डालना पूरी तरह अस्वीकार्य है. उन्होंने सरकार से दृढ़ विरोध दर्ज कराया है. कैबिनेट में फैसले से पहले किशी ने पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री सूगा से बातचीत की थी और उन्हें बताया था कि उनका संगठन पूरी तरह इस कदम के खिलाफ है.

कई नागरिक संगठनों और कुछ विशेषज्ञों ने सरकार की इस बात के लिए भी आलोचना की है कि उसने अपनी योजना के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी है और न ही समझौते की कोशिश की है. जापान की पर्यावरण संरक्षण संस्था ग्रीनपीस ने सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि यह "फुकुशिमा के अलावा जापान और एशिया प्रशांत क्षेत्र के लोगों के मानवाधिकारों और हितों की पूरी अवहेलना" करता है.

पड़ोसी देश भी कर रहे हैं विरोध

चीन ने भी "बिना दूसरे सुरक्षित उपायों पर विचार किए और पड़ोसी देशों तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सलाह लिए बगैर" अकेले फैसला लेने के लिए जापान की आलोचना की है. चीनी विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, "ये बहुत ही गैरजिम्मेदाराना है और पड़ोसी देशों में लोगों के स्वास्थ्य और फौरी हितों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा." बयान में कहा गया है कि चीन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ सारे विकास पर निकट से नजर रखेगा और अन्य प्रतिक्रिया करने का अधिकार सुरक्षित रखता है.

ताइवान के परमाणु ऊर्जा परिषद ने जापान के फैसले को अफसोसजनक बताया है और कहा है कि ताइवान के सांसदों ने भी इस तरह के कदम का विरोध किया था. जापान की क्योडो समाचार एजेंसी के अनुसार दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रालय ने जापान के राजदूत कोइची आइबोशी को मंत्रालय तलब किया और टोक्यो के फैसले के खिलाफ विरोध दर्ज कराया. दक्षिण कोरिया के सरकारी नीति समन्वय मंत्री कू यून चोल ने कहा कि उनकी सरकार इस फैसले का सख्त विरोध करती है. इसके विपरीत अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि जापान अपने फैसले के बारे पारदर्शी रहा है और अंतरराष्ट्रीय तौर पर स्वीकृत परमाणु सुरक्षा मानकों के हिसाब से रुख अपनाया है. (dw.com)

एमजे/आईबी (डीपीए)

 


13-Apr-2021 7:50 PM 72

लंदन, 13 अप्रैल| कोरोना वायरस के बी117 वैरिएंट से संक्रमित लोगों को अधिक गंभीर बीमारी का अनुभव नहीं होता और उनके मरने की आशंका अधिक नहीं रहती। यह बात पत्रिका 'लैंसेट' में प्रकाशित संक्रामक रोगों पर हुए शोध के निष्कर्ष में सामने आई है। हालांकि, एनपीआर डॉट ऑर्ग पर जारी रिपोर्ट के अनुसार, वायरस स्ट्रेन जिसे यूके वैरिएंट कहा जाता है, वायरस के मूल उपभेदों की तुलना में अधिक संक्रामक रहता है।

अमेरिका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र के मुताबिक, यह वैरिएंट पहली बार सितंबर 2020 में इंग्लैंड में उभरा और अब तो यह अमेरिका में सबसे आम वैरिएंट है।

शोध करने वाली टीम ने 9 नवंबर से 20 दिसंबर, 2020 के बीच यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन अस्पताल और नॉर्थ मिडलसेक्स यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती मरीजों से नमूने एकत्र किए थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन अस्पतालों भर्ती 341 मरीजों में से 58 फीसदी बी117 वैरिएंट से और 42 फीसदी एक अलग तरह के स्ट्रेन से संक्रमित थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों समूहों के बीच लक्षणों की गंभीरता की तुलना करते हुए टीम ने पाया कि बी117 वैरिएंट से संक्रमित मरीजों में भी कथित तौर पर अधिक 'वायरल लोड' था या उनके शरीर में वायरस की मात्रा अधिक थी। (आईएएनएस)


13-Apr-2021 7:47 PM 16

सैन फ्रांसिस्को, 13 अप्रैल | व्यापार और पेशेवर सेवाओं से जुड़े संगठन, खुदरा एवं आतिथ्य, वित्तीय, हेल्थकेयर और उच्च प्रौद्योगिकी ऐसे क्षेत्र रहे हैं, जिन्हें 2020 में साइबर अपराधियों ने विशेष तौर पर टारगेट किया है। मंगलवार को जारी एक नई रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।


'फायरआई मैंडिएंट एम-ट्रेंड्स 2021' रिपोर्ट के अनुसार, खुदरा और आतिथ्य उद्योग से जुड़े संगठनों को 2020 में अधिक टागरेट (लक्षित) किया गया है, जो कि पिछले साल की रिपोर्ट में 11वें स्थान की तुलना में दूसरे सबसे अधिक लक्षित उद्योग के रूप में सामने आए हैं।

हेल्थकेयर (स्वास्थ्य देखभाल) क्षेत्र में भी साइबर हमलों में काफी वृद्धि हुई है, जो पिछले साल की रिपोर्ट में आठवें स्थान की तुलना में 2020 में तीसरा सबसे अधिक लक्षित उद्योग बन गया है।

चूंकि कोरोनावायरस महामारी के बाद से स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र रहा है, जिसकी भूमिका सबसे अधिक देखी गई है। इस बीच थ्रीट एक्टर्स (साइबर हमले में निपुण) द्वारा बढ़ाए गए फोकस को वैश्विक महामारी के दौरान स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका से स्पष्ट किया जा सकता है।

जबकि पिछले वर्ष की रिपोर्ट में तुलनात्मक रूप से इस क्षेत्र में साइबर घुसपैठ में गिरावट देखी गई थी। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में अब साइबर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में साइबर हमलों की घटनाओं में 59 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और 2019 की तुलना में इसमें 12 अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है।

साइबर सिक्योरिटी कंपनी फायरआई के सहयोगी मैंडिएंट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर चार्ल्स कार्मकल ने एक बयान में कहा, "संगठनों के लिए बहुउद्देशीय एक्सटॉर्शन और रैंसमवेयर सबसे अधिक प्रचलित खतरे हैं। इस वर्ष की रिपोर्ट में, प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ के लिए कम से कम 36 प्रतिशत घुसपैठ की संभावना है, जिसकी हमने जांच की है।"

उन्होंने कहा कि डेटा की चोरी पीड़ित संगठनों तक अनधिकृत पहुंच अधिक देखी गई है। उन्होंने कहा किरैंसमवेयर एक्टर्स ने बड़े पैमाने पर जबरन वसूली मांगों का भुगतान करने की अधिक संभावना वाले संगठनों को लक्षित किया है।

उन्होंने कहा, "इस वृद्धि को देखते हुए, संभावित प्रभाव को कम करने के लिए संगठनों को सक्रिय कार्रवाई करनी चाहिए।" (आईएएनएस)


13-Apr-2021 6:56 PM 55

स्‍पेस एक्‍स के मालिक और दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपतियों में शुमार एलन मस्‍क की गर्लफ्रेंड ग्रिम्‍स का ताजा टैटू सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है. ग्रिम्स ने अपनी पीठ पर एलियन के जख्‍मों के निशान दिखाने वाला टैटू बनवाया है जो कि इंटरनेट पर जमकर वायरल हो रहा है.

कनाडियन गायिका ग्रिम्‍स ने तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, 'मेरे पास अभी इससे बेहतर तस्वीर नहीं है क्योंकि इस टैटू को बनवाने में मुझे काफी दर्द हुआ है और मुझे अब काफी नींद भी आ रही है. ये टैटू कुछ हफ्तों तक लाल रहेगा और फिर ये खूबसूरत एलियन्स के जख्म जैसा दिखने लगेगा.' ग्रीम्स की फोटो को करीब तीन लाख लाइक्स मिल चुके हैं जबकि 3 हजार से ज्यादा लोगों ने इस पर कमेंट भी किया है.

ग्रीम्स के ब्वॉयफ्रेंड एलन मस्क मंगल ग्रह पर जाने के लिए अपने स्‍टारशिप रॉकेट का लगातार परीक्षण कर रहे हैं. खुद ग्रीम्स भी मंगल ग्रह में अपनी दिलचस्पी दिखा चुकी हैं. उन्होंने अपने एक इंस्टाग्राम पोस्ट में कहा था कि वो मंगल ग्रह पर मरने के लिए तैयार हैं. वहीं एलन मस्‍क यह कह चुके हैं कि वह तीसरे विश्‍वयुद्ध से पहले मंगल ग्रह पर इंसानी बस्तियां बसा देंगे.

बता दें कि सिंगर ग्राइम्स और एलन मस्क का एक बेटा X Æ A-Xii है. ग्राइम्स सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और आए दिन पोस्ट साझा करती रहती हैं. (abplive.com)


13-Apr-2021 6:15 PM 79

संयुक्त राष्ट्र: विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस अदानोम गेब्रेयसस ने कहा है कि भले ही दुनियाभर में अब तक कोविड-19 रोधी टीकों की 78 करोड़ से अधिक खुराकें दी जा चुकी हैं, महामारी का अंत अब भी काफी दूर है. बहरहाल, जन स्वास्थ्य के संबंध में कड़े कदम उठाकर कुछ महीनों में इसे काबू में किया जा सकता है. चीन के वुहान शहर में दिसंबर 2019 में कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला सामने आया था. अब तक दुनियाभर में 13,65,00,400 लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं. इनमें से 29,44,500 की मौत हो चुकी है.

डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा, ''दुनियाभर में जनवरी और फरवरी में लगातार छह हफ्तों तक संक्रमण के मामलों में कमी देखी गई. अब हम लगातार सात सप्ताह से मामलों में वृद्धि देख रहे हैं और चार सप्ताह से मौत के मामलों में इजाफा हो रहा है. पिछले सप्ताह, एक सप्ताह में सबसे अधिक मामले सामने आए. उससे पहले तीन बार उससे ज्यादा मामले आए हैं. एशिया और पश्चिम एशिया के कई देशों में मामलों में भारी वृद्धि देखने को मिली है.''गेब्रेयसस ने जेनेवा में पत्रकारों से कहा कि दुनियाभर में कोविड-19 रोधी टीकों की 78 करोड़ से अधिक खुराकें दी जा चुकी हैं. टीका शक्तिशाली हथियार तो है लेकिन यही एकमात्र हथियार नहीं है.

उन्होंने कहा, ''सामाजिक दूरी कारगर है. मास्क लगाना कारगर है. वेंटिलेशन कारगर है. निगरानी, जांच, संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाना, पृथकवास आदि संक्रमण से निपटने और लोगों का जीवन बचाने उपाय हैं.'' डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने आगाह किया कि महामारी का अंत दूर है लेकिन दुनिया के पास आशावादी होने के कई कारण हैं.


13-Apr-2021 6:13 PM 19

 

वाशिंगटन: अमेरिका में वैध स्थायी निवास के लिए प्रति देश कोटा को खत्म करने की मांग को लेकर भारतीय मूल के फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स ने कैपिटल (संसद भवन) में शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया. ग्रीन कार्ड को आधिकारिक रूप से स्थायी निवास कार्ड कहा जाता है. यह दस्तावेज अमेरिका में रह रहे प्रवासियों को जारी किया जाता है जो इस बात का सबूत है कि कार्ड धारक को देश में स्थायी रूप से रहने का अधिकार है. भारतीय-अमेरिकी डॉक्टरों ने सोमवार को साझा बयान जारी कर कहा कि ग्रीन कार्ड देने के लंबित मामले निपटने की हालिया सिस्टम से उन्हें ग्रीन कार्ड पाने में 150 से अधिक साल लग जाएंगे. नियम के तहत किसी भी देश के सात फीसदी से अधिक लोगों को रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड देने की अनुमति नहीं है. 

उन्होंने कहा, ‘‘भारत की आबादी करोड़ों में हैं लेकिन इसके लोगों को ग्रीन कार्ड दिए जाने की संख्या आईसलैंड की आबादी के बराबर है. H-1B वीजा पर कोई सीमा नहीं है और यहां एच-1बी वीजा पर काम करने के लिए आने वालों में 50 फीसदी भारतीय है. एच-1बी और ग्रीन कार्ड के बीच विसंगति से प्रमाणपत्र पाने वालों की कतार लंबी होती जा रही है और इसका हमारे पेशेवर और निजी जीवन पर असर पड़ रहा है.''

भारतीय आईटी पेशेवर इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं. उन्होंने सांसद जो लोफग्रेन से इस संबंध में एक द्विदलीय प्रस्ताव पेश करने की अपील की जिससे कि दक्ष पेशेवरों की परेशानी का हल हो, बाल एवं किशोर मनोचिकित्सक डॉ. नमिता धीमान ने कहा, ‘‘ग्रीन कार्ड के लिए लंबे इंतजार से अग्रिम मोर्चे के स्वास्थ्यकर्मियों एवं उनके परिवारों पर असर पड़ा है। वे दहशत और डर में जी रहे हैं. ''उन्होंने कहा, ‘‘अमेरिकी राष्ट्रपति को यूएससीआईएस (यूनाइटेड स्टेट्स सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज) को इजाजत देकर पिछले कई वर्षों से शेष बच रहे ग्रीन कार्ड को उन अग्रिम मोर्चे के स्वास्थ्यकर्मियों के लिए जारी करना चाहिए जो लंबे समय से इसके इंतजार में हैं.'' उन्होंने कहा कि कोविड-19 से और अधिक बुरा प्रभाव पड़ा है.

(ndtv.in)


13-Apr-2021 6:12 PM 21

जेनेवा (स्विट्जरलैंड) : संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने म्‍यांमार में मानवता के खिलाफ अपराध को लेकर चेताया है. उन्‍होंने मंगलवार को कहा कि ऐसा लगता है कि यह सीरिया की तरह 'बहुत बड़े संघर्ष' की ओर बढ़ रहा है.मिशेल बेचलेट ने एक बयान में कहा, 'म्‍यांमार की स्थिति को लेकर मुझे डर सता रहा है, यह 'पूर्ण संघर्ष' की ओर बढ़ रहा है. देशों के उस तरह की भयावह गलतियां नहीं करनी चाहिए जिस तरह की पूर्व में सीरिया और अन्‍य किसी जगह पर की गई हैं  '

गौरतलब है कि म्यांमार की सेना ने एक फरवरी को तख्तापलट किया था और एक साल के लिए सत्ता अपने हाथ में ले ली है. सेना ने म्यांमार की नेता आंग सान सू ची और राष्ट्रपति यू विन मिंट समेत शीर्ष राजनीतिक शख्सियतों को हिरासत में ले लिया है.तख्तापलट के बाद देशभर में प्रदर्शन का दौर जारी है जिसमें सेना की कार्रवाई में सैकड़ों लोग मारे जा रहे हैं. म्‍यांमार के हालात को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी चिंतित है.म्‍यांमार में लोकतंत्र के समर्थन में निकाली गई रैलियों के खिलाफ जुंटा शासन ने निर्दयतापूर्वक कार्रवाई की  इस दौरान कई लोगों को जान गंवानी पड़ी है. (ndtv.in)