विचार / लेख

Date : 08-Nov-2019

ब्रिटिश लेखक और पत्रकार आतिश अली तासीर ने कहा है कि उनका ओवरसीज़ सिटीजऩ ऑफ़ इंडिया (ओसीआई) दर्जा एक कुटिल योजना के तहत ख़त्म किया गया।

भारत सरकार ने आतीश का ओसीआई कार्ड रद्द कर दिया है जिसे लेकर विवाद पैदा हो गया है।कई लोग इस फ़ैसले को टाइम पत्रिका में छपे उनके लेख से जोडक़र देख रहे हैं जिसमें उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए उन्हें 'ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड'ह्य ष्ठद्ब1द्बस्रद्गह्म् ढ्ढठ्ठ ष्टद्धद्बद्गद्घ' या महाविभाजनकारी बताया था।

भारत के गृह मंत्रालय ने गुरुवार को ये कहते हुए आतिश का ओसीआई दर्जा ख़त्म कर दिया कि उन्होंने ये बात छिपाई कि उनके पिता पाकिस्तानी मूल के थे। लेकिन आतीश का कहना है कि उन्हें अपना जवाब देने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया।
आतिश अली तासीर के पिता सलमान तासीर पाकिस्तान के उदारवादी नेता थे। सलमान को उनके अंगरक्षक ने ही पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानून के ख़िलाफ़ बोलने पर गोली मार दी थी। तासीर की मां भारत की जानी-मानी पत्रकार तवलीन सिंह हैं।
ओसीआई कार्ड भारतीय मूल के विदेशी लोगों को भारत आने, यहां रहने और काम करने का अधिकार देता है। हालांकि, उन्हें वोट देने और संवैधानिक पद प्राप्त करने जैसे कुछ अन्य अधिकार नहीं होते।
भारतीय मूल के लोगों (पीआईओ) को ओसीआई (विदेश में रहने वाले भारतीय) कार्ड दिया जाता है।
फ़ैसले पर आसिफ़ की प्रतिक्रिया
आसिफ़ तासीर ने बीबीसी संवाददाता सौतिक बिस्वास को बताया कि वे अपना ओसीआई कार्ड रद्द करने के फ़ैसले से काफ़ी आहत हैं और उन्हें लगता है कि जिस तरह से ऐसा किया गया वो बहुत कुटिल योजना थी। उन्होंने कहा, पहले उन्होंने अपने एक आदमी से मुझे उग्र इस्लामी कहलवाकर मेरी छवि खऱाब की और फिर इस घटना को प्रेस को लीक करवाया।
आसिफ़ ने बताया कि उनके पास 2000 से ही पीआईओ कार्ड है जिसे बाद में ओसीआई कार्ड में बदल दिया गया। उन्होंने बताया कि वो दो साल से 10 साल और फिर 26 साल से 35 साल की उम्र तक भारत में रहे हैं। उनका कहना है कि उनके पास भारत में बैंक खाते हैं, आधार कार्ड है और वे भारत में टैक्स भी भरते रहे हैं।
आसिफ़ ने कहा,मेरे पिता का नाम इन दस्तावेज़ों में दर्ज है। मेरे पास इस बात को साबित करने का कोई कागज़़ी सबूत नहीं है क्योंक हमारे बीच कोई संपर्क नहीं था और मेरी मां भी उनसे अलग रहती थीं।
आसिफ़ तासीर ने अपने पिता के साथ संबंध के बारे में विस्तार से एक किताब में लिखा था जो 2007 में प्रकाशित हुई थी। उनकी मां तवलीन सिंह एक पत्रकार हैं। उनके माता और पिता की शादी नहीं हुई थी और आसिफ़ ने अपने जवाब में लिखा है कि उनकी मां ही क़ानूनन उनकी अभिभावक हैं।
आसिफ़ ने कहा, अगर कोई भ्रम था तो वो मुझसे पूछ सकते थे क्योंकि उन्हें पता था कि मैं जान-बूझकर कुछ भी ग़लत नहीं कर रहा। अपने पिता का नाम छिपाने का कोई सवाल ही नहीं है: उनका नाम दस्तावेज़ पर है, और मैं उनके बारे में लिखता भी रहा हूँ।
क्या है मामला
मामले ने तूल गुरुवार को अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट 'द प्रिंट' के एक लेख से पकड़ा जिसमें लिखा था कि 'टाइम पत्रिका में मोदी की आलोचना वाले लेख के बाद सरकार लेखक आतिश अली तासीर के ओसीआई कार्ड को रद्द करने पर विचार कर रही है।'
आतिश तासीर ने अमरीका की प्रतिष्ठित पत्रिका 'टाइम' के इस साल के मई अंक में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक लेख लिखा था।
पत्रिका के 20 मई 2019 वाले अंतरराष्ट्रीय संस्करण के कवर पेज पर छपे उस लेख के शीर्षक में नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ 'ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड'ह्य ष्ठद्ब1द्बस्रद्गह्म् ढ्ढठ्ठ ष्टद्धद्बद्गद्घ (महाविभाजनकारी)' लिखा गया था। इस लेख को लेकर भारत में काफ़ी विवाद भी हुआ था।
मगर 'द प्रिंट' की इस स्टोरी पर आपत्ति जताते हुए गृह मंत्रालय की प्रवक्ता ने गुरुवार रात को अपने ट्विटर हैंडल पर स्पष्टीकरण दिया और इसे ग़लत बताया।
इसके आगे भी गृह मंत्रालय की प्रवक्ता के ट्विटर हैंडल से कई ट्वीट किए गए। इनमें से एक ट्वीट में लिखा गया है, "श्री आतिश अली ने पीआईओ आवेदन करते समय ये बात छिपाई कि उनके पिता पाकिस्तानी मूल के थे।"
"श्रीमान् तासीर को उनके पीआईओ/ओसीआई कार्ड के संबंध में जवाब/आपत्तियां दर्ज करने का मौका दिया गया लेकिन वो ऐसा करने में असफ़ल रहे।"इसलिए, आतिश अली तासीर नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार ओसीआई कार्ड प्राप्त करने के लिए आयोग्य हो जाते हैं। उन्होंने बुनियादी ज़रूरी बातों और छिपी हुई जानकारियों को लेकर स्पष्ट रूप से अनुपालन नहीं किया है।"
आतिश ने किया खंडन
आतिश अली तासीर ने गृह मंत्रालय की बातों को ग़लत बताते हुए एक तस्वीर ट्वीट की है। उन्होंने गृह मंत्रालय की प्रवक्ता के एक ट्वीट का जि़क्र करते हुए लिखा, ''ये सच नहीं है। मेरे जवाब पर ये कांउसिल जनरल की एक्नॉलेजमेंट (पावती) है। मुझे जवाब देने के लिए 21 दिनों की जगह सिफऱ् 24 घंटों का समय दिया गया। तब से मंत्रालय की तरफ़ से मुझे कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है।"
आतिश तासीर ने ट्वीट के साथ अपने मेबलॉक्स की एक तस्वीर भी लगाई है। इसमें दिख रहा है कि उन्होंने भारतीय गृह मंत्रालय से मिले एक पत्र के संबंध में अपना जवाब दिया है और डिप्टी काउंसिल जनरल के एक मेल में इस जवाब को प्राप्त करने की बात कही गई है।
इसके लगभग दो घंटे बाद अपने ओसीआई कोर्ड के रद्द होने की जानकारी दी और इस संबंध में मिली सूचना वाले ईमेल का स्क्रीनशॉट शेयर किया है।
इसमें नियमों का हवाला देते हुए ओसीआई पंजीकरण को रद्द करने की सूचना देते हुए आतिश तासीर को अपना ओसीआई कार्ड न्यूयॉर्क स्थित भारत के महावाणिज्यदूतावास में जमा करने के लिए कहा गया है।
इस स्क्रीनशॉट के साथ आतिश ने लिखा है, "मुझे ये प्राप्त हुआ। कुछ घंटे पहले तक गृह मंत्रालय ख़ुद मान रहा था कि उसे नहीं पता कि मैंने जवाब दिया है या नहीं। मगर अब वे किसी तरह- संभवत: जब गृह मंत्रालय बंद है- मेरे मामले की समीक्षा 'उचित अधिकारी' से करवाने और मेरे ओसीआई को रद्द करने में सफल रहे हैं।" (बीबीसी)

 


Date : 07-Nov-2019

वंदना
सात नवंबर 1969 - आज से 50 बरस पहले हिंदी की एक फि़ल्म रिलीज़ हुई थी सात हिंदुस्तानी।
दिग्गज लेखक-निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास की इस फि़ल्म में उत्पल दत्त थे जो साहित्य, पत्रकारिता और फिल्मी दुनिया की जानी मानी शख्सियत थे। साथ में था दुबला पतला और लंबे कद वाला एक नया लडक़ा- नाम था अमिताभ बच्चन। ऐसा नाम जिसे तब तक कोई नहीं जानता था।
निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास से जब अमिताभ से पहली बार मिले तो उस मुलाकात का जिक्र किताब ‘ब्रेड ब्यूटी रिवॉल्यूशन: ख्वाजा अहमद अब्बास’ में किया गया है।
इस किताब में सईदा हमीद और इफ्फ्त फातिमा ने अब्बास की आत्मकथा और उनके लेखों को एक जगह समेटा है। किताब में अब्बास साहब ने लिखा है -
ख्वाजा अहमद अब्बास - आपका नाम ?
जवाब- अमिताभ...
ख्वाजा अहमद अब्बास - फिल्मों में पहले काम किया है ?
जवाब- किसी ने लिया नहीं अब तक...
ख्वाजा अहमद अब्बास - क्यों क्या कमी लगी आपमें ?
जवाब- (कई बड़े नाम लेते हुए) सब कहते हैं कि उनकी हीरोइनों के हिसाब से मैं बहुत लंबा हूँ।
ख्वाजा अहमद अब्बास- हमारी फिल्म में ऐसी कोई दिक्कत नहीं क्योंकि इसमें हीरोइन ही नहीं है।
जब फिल्मफेयर ने किया अमिताभ को रिजेक्ट
अब्बास को अपनी फिल्म के लिए ऐसे युवक की तलाश थी जो एक्टिंग के गुर जानता हो, दिखने में दुबला-पतला हो, ख़ूबसूरत और जोशीला हो।
बात 1969 से पहले की है। उस वक्त अमिताभ बच्चन कलकत्ता की ‘बर्ड एंड को’ कंपनी में काम किया करते थे। सुबह से शाम दफ्तर में काम और शाम को थिएटर करते। एक्ंिटग का शौक अमिताभ को लग चुका था।
अमिताभ बच्चन ने कुछ साल पहले अपने ब्लॉग में लिखा था, ‘मैंने मैगजीन फिल्मफेयर-माधुरी की प्रतियोगिता के लिए फोटो भेजी जो फिल्मों में जगह बनाने वाले चेहरों के लिए अच्छा मंच होता था। मेरी फ़ोटो रिजेक्ट हो गई, क्या ये कोई अचरज की बात थी।
लेकिन अमिताभ ने फिल्मों में किस्मत आजमाने का मन बना लिया था। वो कलकत्ता में अपनी ठीक ठाक नौकरी छोड़ मुंबई आ गए।
उन्हीं दिनों के ए अब्बास गोवा की आज़ादी के संघर्ष पर फि़ल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें सात हीरो चाहिए थे जो एक दूसरे से एकदम जुदा हों।
एक रोल के लिए अब्बास साहब ने नए लडक़े टीनू आनंद को लिया था जो उनके दोस्त और मशहूर लेखक इंदर राज के बेटे थे। टीनू आनंद की एक दोस्त थी नीना सिंह, जो मॉडल थी। सातवें हिंदुस्तानी के लिए नीना को लिया गया। अमिताभ बच्चन दूर-दूर तक फि़ल्म का हिस्सा नहीं थे।
पहले रोल के लिए मिले 5000
निर्देशक और एक्टर टीनू आनंद कई बार मीडिया से बातचीत में ये किस्सा सुना चुके हैं, ‘हुआ कुछ यूँ कि मुझे बीच सत्यजीत रे के सहायक निर्देशक बनने का प्रस्ताव मिला। वैसे भी मैं वो रोल शौकिया तौर पर कर रहा था। मैंने वो रोल छोड़ कलकत्ता जाने का फैसला किया। इससे पहले मेरी दोस्त और अब फिल्म की हीरोइन बन चुकी नैना ने अपने कलकत्ता के किसी दोस्त की फोटो सेट पर दिखाई। अब्बास साहब जरा गर्म मिजाज़ के आदमी थे। नीना ने गुजारिश की कि मैं वो फोटो अब्बास साहब को दिखाऊँ ताकि ऑडिशन हो जाए। बस उस नए लडक़े को को सेट पर बुलाया गया।’
किताब ‘ब्रेड ब्यूटी रिवॉल्यूशन: ख्वाजा अहमद अब्बास’ किताब के एक लेख में अब्बास लिखते हैं,  ‘मैंने अमिताभ से मिलने के बाद कहा कि मैं 5000 रुपए से ज़्यादा नहीं दे सकता। अमिताभ के चेहरे पर थोड़ी मायूसी दिखी। मैंने पूछा कि क्या नौकरी में ज़्यादा पैसे मिलते हैं? जवाब आया हाँ, 1600 रुपए हर महीने।
तो मैंने पूछा ऐसी नौकरी छोडक़र क्यों आए हो जबकि अभी सिर्फ एक चांस भर है कि तुम्हे रोल मिल सकता है? तब अमिताभ ने बहुत ही आत्मविश्वास से कहा कि इंसान को ऐसा दांव खेलना पड़ता है। बस वो आत्मविश्वास देखते ही मैंने कहा रोल तुम्हारा।’
तो इस तरह अमिताभ बच्चन को उनकी पहली फिल्म सात हिंदुस्तानी मिलना तय हो गया।
जब पता चला कि अमिताभ ‘बच्चन’ के बेटे हैं
लेकिन अभी एक पेंच बाकी था। जब रोल का कॉन्ट्रेक्ट लिखा जा रहा था तो अमिताभ ने अपना पूरा नाम बताया -अमिताभ बच्चन, पुत्र डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन।
इससे पहल तक उन्होंने के ए अब्बास को अपना नाम केवल अमिताभ बताया था। लेकिन डॉक्टर हरिवंश का नाम सुनकर ही ख्वाजा अहमद अब्बास ठिठक गए। हरिवंश राय बच्चन उस समय के उम्दा कवि थे और के ए अब्बास से उनकी जान-पहचान थी।
के ए अब्बास नहीं चाहते थे कि डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन से किसी तरह की गलतफहमी हो जाए। के ए अब्बास ने कहा डॉक्टर बच्चन को टेलीग्राम किया जाए कि उनका बेटा फिल्मों में काम करने वाला है।
दो दिन बाद पिता की टेलीग्राम आई और उसके बाद ही सात हिंदुस्तान के लिए कॉन्ट्रेक्ट साइन हुआ।
इस तरह 15 फरवरी 1969 को अमिताभ बच्चन ने अपने करियर की पहली फि़ल्म सात हिंदुस्तानी साइन की जो 7 नंबवर 1969 को रिलीज हुई।
इत्तेफाक की बात है कि जिस नीना सिंह ने अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था और जो फिल्म की हीरोइन भी थीं और जो टीनू आनंद अमिताभ का नाम लेकर अब्बास साहब के पास गए थे, दोनों ही फिल्म नहीं कर सके।
नीना सिंह शूटिंग के एक शेड्यूल के बाद मुंबई लौटी ही नहीं और टीनू आनंद अपना रोल छोड़ सत्यजीत रे के सहायक बनने चले गए।
नीना की जगह जलाल आगा की बहन शहनाज को लिया गया जिन्होंने बाद में टीनू आनंद से शादी की।
हफ्ता भर पहले से लगानी पड़ती थी दाढ़ी
फिल्म की शूटिंग की कहानी भी काफी दिलचस्प है। फिल्म एक महिला क्रांतिकारी के नजरिए से आगे बढ़ती है जो अस्पताल में लेटे-लेटे उन पुराने दिनों को याद करती है जब देश के अलग-अलग धर्मों और इलाकों से आए उसके साथियों ने मिलकर गोवा को पुर्तगालियों से आजादी दिलवाई थी।
अमिताभ बच्चन बिहार के एक मुसलमान युवक अनवर अली का रोल कर रहे थे। फिल्म का बजट काफी कम था और ऐसे में मशहूर मेक अप आर्टिस्ट पंधारा जूकर बिना फ़ीस के काम करने के लिए तैयार हो गए लेकिन वो बहुत व्यस्त रहते थे।
के ए अब्बास एक किताब के विमोचन पर अमिताभ ने अपनी पहली फि़ल्म का किस्सा सांझा किया था, ‘शूटिंग मुंबई में नहीं गोवा में थी। मेक अप आर्टिस्ट जूकरजी ने कहा कि मेरे पास शूटिंग से एक हफ़्ते पहले का समय है तो मैं अमिताभ की दाढ़ी एक हफ़्ते पहले लगाकर चला जाऊँगा। उन दिनों मेक अप का काम उतना विकसित नहीं था। एक-एक बाल जोडक़र दाढ़ी बनती थी। मैं एक हफ़्ते तक दाढ़ी लगाकर घूमता रहा। एक हफ्ते तक नहाया तक नहीं कि दाढ़ी निकल न जाए।’
फिल्म में अमिताभ के काम की बहुत तारीफ  हुई थी। उन्हें एक ऐसे मुसलमान व्यक्ति का रोल करना था जो छह क्रांतिकारियों के साथ मिलकर गोवा की आज़ादी के लिए लड़ रहा है लेकिन सात हिंदुस्तानियों में वो अकेला है जिस पर अपने मजहब की वजह से शक का साया है कि कहीं वो गद्दार तो नहीं।
एक नए कलाकार के लिए वो मुश्किल रोल था। फिल्म का एक सीन है जहाँ अमिताभ का एक साथी और आरएसएस कार्यकर्ता मान लेता है कि अनवर यानी अमिताभ ने जेल में देश से गद्दारी की है।
लेकिन एक दिन लडख़ड़ाते अमिताभ को गोवा की जेल से बाहर फेंका जाता है जहाँ उसके पैर के तलवे चाकू के निशानों से कटे पड़े हैं जो दिखाता है कि प्रताडऩा के बावजूद उन्होंने देश के बाद गद्दारी नहीं की। इन चंद सीन में अमिताभ की अभिनय प्रतिभा का अंदाज़ा लग जाता है।
नहीं लगा कि ये दुबला पतला, लंबा इंसान कभी सुपरस्टार बनेगा
फिल्म में एक ही महिला किरदार था जिसे अभिनेत्री शहनाज ने निभाया था। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया था, उनकी आवाज जरूर शानदार थी लेकिन उन्हें देखकर मुझे उस वक्त तो कम से कम कतई नहीं लगा कि ये दुबला-पतला, लंबा इंसान कभी सुपरस्टार बन पाएगा। सेट पर वो बिलकुल खामोश रहते थे। फिर फिल्म के एक सीन में उन्हें पुर्तगाली टॉर्चर कर रहे हैं। उनका पांव काट दिया गया है और वो रेंग रहे हैं। ये सीन उन्होंने जब किया तो सेट पर मौजूद सारे लोग तालियां बजाने लगे और तब मुझे अहसास हुआ कि ये बंदा काफी दूर तक जाएगा।’ शहनाज बाद में टीनू आनंद की पत्नी बनी।
अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म होने के अलावा भी सात हिंदुस्तानी बहुत अहम फिल्म रही जो राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीयवाद और भाषाओं की दीवारों को लांघती एक फिल्म थी जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।
दरअसल के ए अब्बास एक प्रयोग करना चाहते थे कि जो एक्टर जिस भाषा या राज्य से है उससे एकदम अलग किरदार उससे वो फिल्म में करवाएँगे।
सो बंगाल के हीरो उत्पल दत्त को पंजाब का किसान बनाया, मलायली हीरो मुध को बंगाली बनाया, मॉर्डन दिखने वाला जलाल आगा को ग्रामीण मराठी बनाया, अभिनेता अनवर अली (महमूद के भाई) को एक आरएसएस कार्यकर्ता का रोल मिला था जिसे उर्दू से नफरत है और अमिताभ को उर्दू शायर का रोल दिया जो हिंदी को नापसंद करते हैं।
फिल्म का एक सीन है जहाँ अमिताभ को हिंदी में चि_ी आती है लेकिन वो ये कहते हुए पढऩे से इंकार कर देते हैं कि ये अरंतु-परंतु की भाषा अपने बस की नहीं और कहते हैं कि क्या जबड़ा तोड़ जुबान लिखी है।
फिल्म के एक किरदार में हिंदी के अरंतु-परंतु से चिढऩे वाला यही नौजवान आगे चलकर हिंदी फिल्मों का शहंशाह कहलाया- अमिताभ बच्चन। और आज उनकी पहली फिल्म को 50 साल हो गए हैं।

 

 

 


Date : 07-Nov-2019

भारत और पाकिस्तान में चर्चित करतारपुर कॉरिडोर 9 नवंबर को खुलने वाला है। इसे लेकर दोनों देशों के बीच समझौता हो चुका है और कई सांसद, विधायक व मंत्री करतारपुर जाने वाले पहले जत्थे का हिस्सा बनने जा रहे हैं।
दोनों देशों के बीच हुए समझौते में भारतीय पासपोर्ट धारकों एवं ओसीआई (भारतीय विदेशी नागरिकता) कार्ड धारकों के लिए वीजा मुक्त यात्रा, भारत के हिस्से को जोडऩे के लिए रावी नदी के डूबे क्षेत्र पर पुल निर्माण और रोज़ाना कम से कम पाँच हजार श्रद्धालुओं को दर्शन की इजाजत शामिल है।
पहले जत्थे में पंजाब के विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्रियों में हरसिमरत कौर व हरदीप सिंह पुरी शामिल होंगे। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस पहले जत्थे की अगुवाई करेंगे।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की तरफ से और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पाकिस्तान की तरफ से कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे।
करतारपुर कॉरिडोर पंजाब स्थित डेरा बाबा नानक को करतारपुर स्थित दरबार साहेब से जोड़ेगा। इससे पहले लोगों को वीजा लेकर लाहौर के रास्ते दरबार साहेब जाना पड़ता था जो एक लंबा रास्ता था।
अब दोनों देशों के लोगों को इस यात्रा के लिए वीजा की जरूरत नहीं होगी।
लंबे समय से सिख करतारपुर कॉरिडोर की मांग करते रहे हैं ताकि तीर्थयात्री दरबार साहेब दर्शन के लिए जा सकें।
पिछले साल भारत और पाकिस्तान सरकार ने करतारपुर कॉरिडोर की नीव रखी थी। इसे लेकर दोनों देशों के बीच कुछ विवाद भी हुआ और दोनों ने अपनी-अपनी शर्तें सामने रखीं थी। अंत में दोनों देश एक समझौते पर पहुंच गए।
अब जैसे-जैसे कॉरिडोर खुलने की तारीख़ नज़दीक आ रही है तो लोगों के बीच भी चर्चा बढ़ गई है। पढि़ए करतारपुर साहेब से जुड़े कुछ सामान्य सवालों के जवाब -
करतारपुर कॉरिडोर कब खुल रहा है?
कॉरिडोर 9 नवंबर, 2019 को खुलेगा।
क्या करतारपुर कॉरिडोर वीज़ा मुक्त है?
करतारपुर कॉरिडोर के लिए कोई वीजा नहीं है।
यहां जाने की फीस क्या है?
ये 20 डॉलर है। जो लोग 9 और 12 नवंबर को जाएंगे उन्हें फीस का भुगतान नहीं करना होगा। 12 नवंबर को 550वीं गुरुनानक जयंती है।
20 डॉलर रुपये में कितने होते हैं?
लगभग 1400 रुपये।
क्या आपको पासपोर्ट ले जाने की जरूरत है?
यह करतारपुर कॉरिडोर के लिए ऑनलाइन आवेदन के दौरान जरूरी है। अब पाकिस्तानी पीएम इमरान ख़ान ने घोषणा की है कि पासपोर्ट की जरूरत नहीं है और सिर्फ वैध पहचान पत्र लाना होगा।
करतारपुर कॉरिडोर को किसने फंड किया है?
दोनों सरकारों ने अपनी-अपनी तरफ से इसमें फंड दिया है।
आप करतारपुर कैसे जा सकते हैं?
आप ऑनलाइन पंजीकरण के लिए ये वेबसाइट द्धह्लह्लश्चह्य://श्चह्म्ड्डद्मड्डह्यद्धश्चह्वह्म्ड्ढ५५०.द्वद्धड्ड.द्दश1.द्बठ्ठ/ देख सकते हैं।
डेरा बाबा नानक से दरबार साहेब करतारपुर तक की दूरी कितनी है?
दोनों के बीच दूरी 4.6 किमी. है।
आप अपने पंजीकरण की ताजा जानकारी कहां देख सकते हैं?
आपको पंजीकरण के बाद नोटिफिकेशन प्राप्त होगा। इसके अलावा आप गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर भी देख सकते हैं।
क्या अनिवासी भारतीय (एनआरआई)भी करतारपुर कॉरिडोर से जा सकते हैं?
जिस व्यक्ति के पास ओसीआई कार्ड है वो करतारपुर कॉरिडोर से जा सकता है। अन्य लोगों को वीज़ा के लए आवेदन करना होगा।
क्यों अहम है ये जगह
सोमवार को होने वाले कार्यक्रम को भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के लिए अहम माना जा रहा है।
करतारपुर साहिब पाकिस्तान में आता है लेकिन इसकी भारत से दूरी महज़ साढ़े चार किलोमीटर है।
अब तक कुछ श्रद्धालु दूरबीन से करतारपुर साहिब के दर्शन करते रहे हैं। ये काम बीएसएफ़ की निगरानी में होता है।
श्रद्धालु यहां आकर दूरबीन से सीमा पार मौजूद करतापुर साहेब के दर्शन करते हैं।
मान्यताओं के मुताबिक, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक 1522 में करतारपुर आए थे। उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी 18 साल यहीं गुजारे थे।
माना जाता है कि करतारपुर में जिस जगह गुरु नानक देव का देहावसान हुआ था वहां पर गुरुद्वारा बनाया गया था।
दोनों देशों के बीच समझौते में क्या है
कोई भी भारतीय किसी भी धर्म या मज़हब को मानने वाला हो। उसे इस यात्रा के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं होगी।
यात्रियों के लिए पासपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवेल ऑथराइजेशन (ईटीए) की जरूरत होगी।
ये कॉरिडोर पूरे साल खुला रहेगा।
भारतीय विदेश मंत्रालय यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं की लिस्ट 10 दिन पहले पाकिस्तान को देगा।
हर श्रद्धालु को 20 डॉलर यानि कऱीब 1400 रुपये देने होंगे।
एक दिन में पाँच हज़ार लोग इस कॉरिडोर के जरिए दर्शन के लिए जा सकेंगे।
अभी अस्थाई पुल का इस्तेमाल किया जा रहा है और आने वाले वक्त में एक स्थाई पुल बनाया जाएगा।
श्रद्धालुओं को इस यात्रा के लिए ऑनलाइन पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना होगा। ये पोर्टल गुरुवार से शुरु हो चुका है। आवेदकों के मेल और मैसेज के ज़रिए चार दिन पहले उनके आवेदन के कन्फर्मेशन की जानकारी दी जाएगी। (बीबीसी)

 

 

 


Date : 07-Nov-2019

कृष्ण कांत

यह पराली उर्फ पुआल से प्रदूषण नाम की बला कहाँ से आई? पारंपरिक रूप से धान हंसिया से काट लिया जाता है। बस थोड़ी सी जड़ रह जाती है जो जुताई के साथ मिट्टी में मिल जाती है। पुआल से धान अलग करके उसे खलिहान में लगा दिया जाता है। पूर्वी यूपी में आज भी ज्यादातर पुआल पशुओं को खिलाने के काम आता है। वहां पराली जलाई नहीं जाती। वैसे भी पराली एक बार भीग जाए तो मुश्किल से महीने भर में सडक़र मिट्टी हो जाती है। यह समस्या उपजी कैसे?
धान तो देश के तमाम हिस्से में उगाया जाता है तो पराली पंजाब में ही क्यों जलाई जाती है? क्योंकि हरित क्रांति के बहाने जब खेती में कंपनियों ने घुसपैठ की तो सरकार ने कहा कि तकनीकी खेती से पैदावार बढ़ाएंगे। ट्रैक्टर के अलावा बीज बोने और गेहूं-धान काटने की मशीनें लाई गईं। अमीर किसानों ने ये मशीनें खरीद लीं।
अब पंजाब का संकट है कि खेती मशीन से होती है तो पशुओं का योगदान भी बंद और पशुओं के भोजन के रूप में पराली की कोई उपयोगिता नहीं। किसान उसका करे क्या। तो उसने तरकीब निकाली कि इसे खेत में जलाकर राख कर दो टंटा खतम।
बेशक हरित क्रांति वाले क्षेत्रों ने अनाज उपलब्धता में अहम योगदान दिया, लेकिन सरकार जब पारंपरिक चीजों में दखल देती है तो उसके अंजाम की चिंता क्यों नहीं करती? यह वैसे ही है जैसे बीजेपी सरकार ने गौहत्या रोकने का बहाना लेकर पशुओं का पूरा बाजार तोड़ दिया लेकिन यह नहीं सोचा कि बेकार पशुओं का क्या होगा? अब आवारा पशु समस्या बने हुए हैं। क्योंकि किसान उतने ही जानवर रखता है जितने की परवरिश कर सके। किसान ऐसा नहीं होता जो तमाम बेकार पशुओं को अपने खूंटे पर बांधकर भूखा मारे। यह काम कथित योगी और फकीर की गौशालाएं ही कर सकती हैं।
कहने का मतलब है कि सरकार के प्रयासों से हम अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर तो हुए, लेकिन इसकी भारी कीमत चुकाई है। किसानों को लालच देकर कर्ज बांटा गया तो उसका परिणाम 3 लाख से ऊपर आत्महत्याओं के रूप में सामने आया जिसका सरकार के पास कोई हल नहीं है। इसी तरह तकनीकी खेती का परिणाम पराली का धुआं है।
किसानों को कोसने की जगह आप अपने विकास मॉडल पर तरस खाइये कि आप काला धन रोकने निकलते हैं तो नोटबंदी कर देते हैं और पूरी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। पराली सरकार का दिया तोहफा है।
एक जानकार का तो यह भी कहना है कि मशीनों को खपाने के लिए ही यह पराली और धुएं का महाभारत रचा जा रहा है। एक खतरनाक स्तर का प्रदूषण तो पूरे साल होता है तो प्रदूषण पर बहस सिर्फ 15 दिन क्यों होती है जब धान काटने का सीजन होता है।
इस साल 5 नवम्बर तक पूरे साल में सिर्फ दो दिन ऐसे गुजरे जब दिल्ली की हवा में एक्यूआई सामान्य रहा, बाकी पूरे साल या तो खतरनाक श्रेणी का रहा या खराब रहा। फिर यह प्रदूषण चर्चा मियादी बुखार की तरह क्यों आती है?


Date : 06-Nov-2019

सुहैल ए शाह

कश्मीर घाटी में संचार सेवाएं पिछले दो महीने से ज़्यादा समय से बंद हैं, जो यहां अभी तक का सबसे लंबा संचार प्रतिबंध है। बीती पांच अगस्त को अनुच्छेद-370, जो भारत के संविधान में जम्मू कश्मीर को एक विशेष स्थिति देता था, हटा देने से एक दिन पहले सरकार ने सारी संचार सेवाएं बंद कर दी थीं।

इन दो महीनों में सरकार ने सिर्फ लैंड्लाइन फोन वापिस चालू किए हैं, जबकि इंटरनेट सेवाएं और मोबाइल फोन अभी भी बंद हैं। सडक़ों पर लगे प्रतिबंध हटा दिये गए हैं लेकिन कारोबार ठप्प है -दुकानें, स्कूल, कॉलेज, निजी दफ्तर, यातायात सब कुछ बंद पड़ा हुआ है।
ऐसे में कश्मीर में इस समय स्थानीय लोगों के पास करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है, तो टीवी के सामने बिताया जाने वाला समय थोड़ा सा बढ़ गया है।
मैंने सालों से टीवी नहीं देखा था। पहले तो इसके लिए ज़्यादा वक़्त नहीं मिलता था और मिलता भी था तो ऑनलाइन कॉन्टेंट देखने में बीत जाता था। अब कई दिन लगातार किताबों के पन्ने टटोलने के बाद में भी इस ईडियट बॉक्स के सामने बैठ गया। टीवी खोलते ही सामने फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार दिखे थे, किसी अस्पताल के कमरे में बेहोश पड़े मरीज के सामने लोगों को यह बता रहे थे कि इस मरीज ने अपना सारा पैसा हस्पताल के बिल भरने में गंवा दिया।
जब अक्षय यह कह रहे थे कि ‘सिर्फ 5 रुपया प्रतिदिन में आप अपना स्वास्थ बीमा करा सकते हैं’ तो मुझे अपने पड़ोस में रहने वाले इजाज अहमद की याद आ गयी। उनसे कुछ दिन पहले ही मेरी मुलाक़ात मोहल्ले के नुक्कड़ पर हुई थी।
इजाज परेशान थे, उनकी माता जी का ऑपरेशन होना था और उनके पास पैसे नहीं थे। पता नहीं अक्षय कुमार की बात सुनकर या खुद की ही अक्ल से इजाज ने अपने परिवार के लिए स्वास्थ बीमा ले तो लिया था लेकिन इंटरनेट बंद होने के चलते उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। ‘अस्पताल वाले भी बेचारे क्या करें। वो लोग भी लाचार हैं,’ इजाज ने मुझे बताया था।
इजाज की ही तरह घाटी में हजारों लोग इस समय अपने परिजनों का इलाज कराने के लिए दूसरों के मोहताज हो गए हैं। इन लोगों में ख़ासी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वास्थ योजना का ‘गोल्ड कार्ड’ है। लेकिन बावजूद इसके इन्हें औरों से इलाज के लिए पैसे मांगने पड़ रहे हैं। जिनके पास पैसे हैं उनको भी बैंक या एटीएम से निकालने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बैंक भी छुप-छुपा के काम कर रहे हैं। हाल ही में जम्मू-कश्मीर बैंक की एक शाखा का जेनरेटर किसी ने जला दिया था और उसके बाद मिलीटेंट्स ने बैंक वालों को धमकी दे दी कि वे काम न करें। ‘ऐसे में पिछले 5 दिनों से बैंक से अपने ही पैसे लेने के लिए, एक शाखा से दूसरी और एक एटीएम से दूसरी तक भटक रहा हूं लेकिन अभी पैसे नहीं मिले’ अनंतनाग जिले के ज़मीर अहमद, जिनको अपने बेटे के इलाज के लिए श्रीनगर के एक हस्पताल जाना था, सत्याग्रह से कहते हैं। दिल में यह सवाल था कि क्या अक्षय कुमार को पता होगा भारत में हजारों लोग अभी ऐसे हैं जो बीमा होते हुए भी उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।
खैर, अक्षय कुमार कहां मेरे सवाल का जवाब देने के लिए रुकने वाले थे। ध्यान फिर से टीवी की तरफ गया तो अक्षय कुमार वहां से जा चुके थे और स्क्रीन पर अब गूगल सर्च का विज्ञापन आ रहा था। इसमें एक जोड़ा अपनी शादी के लिए ‘वैडिंग फॉटोग्राफर’ की तलाश कर रहा था। उन्हें फॉटोग्राफर मिल जाता है और धूमधाम से उनकी शादी भी हो जाती है। विज्ञापन देखकर ध्यान मरियम बानो की तरफ गया, जिनकी बेटी की शादी अभी कुछ समय पहले ही हुई है।
मरियम, जो एक विधवा हैं, ने शादी के लिए 40 हजार रुपये देकर एक मैरिज हाल बुक किया था। लेकिन जब शादी का वक्त आया तो मैरिज हाल वालों से संपर्क करना संभव नहीं था। वैसे इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी क्यूंकि 300 मेहमानों में से सिर्फ 30 या 40 ही आ पाये थे।
तो कुल मिलाकर सिर्फ विदाई हुई और वह भी इस तरह से कि उसके होते-होते मरियम का कलेजा हलक में आ गया था। दूल्हे को चार बजे आने को कहा गया था लेकिन वह 9 बजे पहुंचा। ‘पता चला कि उसको सुरक्षाकर्मियों ने कम से कम सात जगहों पर रोका था और आगे जाने की अनुमति नहीं दे रहे थे’ मरियम सत्याग्रह को बताती हैं। जैसे-तैसे दूल्हा पहुंचा और शादी हुई। अब हालात थोड़े सामान्य हो गए हैं तो रिश्तेदार आकर फोटो दिखाने को कहते हैं। मरियम मोबाइल से खींची कुछ तस्वीरें उन्हें मोबाइल पर ही दिखा देती हैं।
इन खय़ालों से ध्यान भटकाने के लिए मैंने सोचा कोई फिल्म ही देख लूं। खोजा तो देखा अजय देवगन की सिंघम किसी चैनल पर चल रही है। दस पंद्रह मिनट तो रोहित शेट्टी की अद्भुत मार-धाड़ में निपट गए। फिर देखा कि अजय देवगन फिल्म में अपने होने वाले ससुर को उनका ड्राइविंग लाइसेंस एक्सपायर होने के लिए फटकार लगा रहे थे। ‘कल सुबह आरटीओ ऑफिस आ जाइएगा दो फोटो लेकर, स्माइल के साथ’ सिंघम अपने ससुर से कहते हैं।
‘काश इतना आसान होता’ मैं सोचने लगा, क्यूंकि फिर मुझे मुझे गुलजार अहमद डार याद आ गए थे, जो अपना परिवार चलाने के लिए ड्राइवर का काम करते हैं। उनका भी सिंघम के ससुर की तरह ड्राइविंग लाइसेंस एक्सपायर हो गया है। पिछले एक महीने से गुलजार श्रीनगर के आरटीओ ऑफिस के चक्कर काट रहे हैं लेकिन इस लेख को लिखे जाने तक उनका लाइसेंस रिन्यू नहीं हुआ है।
‘मैं अपनी जान जोखिम में डालकर गाड़ी लेकर निकल पड़ता, लेकिन पुलिस वाले चालान काट देते हैं और वह भी इतना कि आदमी भर ही नहीं पाये। आरटीओ ऑफिस वाले कह रहे हैं कि इंटरनेट बेन हटने से पहले वे कुछ नहीं कर सकते’ गुलजार सत्याग्रह को बताते हैं।
‘न नए लाइसेन्स, न रिन्यूवल और न लर्नर्स लाइसेन्स, कोई भी सुविधा नहीं दे पा रहे हैं हम। और ऐसा तब तक चलता रहेगा जब तक इंटरनेट नहीं चल जाता है यहां’ अपनी मजबूरी बताते हुए श्रीनगर के आरटीओ ऑफिस के एक अधिकारी सत्याग्रह से कहते हैं।
में अभी भी सिंघम देख ही देख रहा था कि बीच में विज्ञापन फिर आ गए। इस बार एक ऑनलाइन शॉपिंग की वैबसाइट का विज्ञापन था, ‘क्रोमा’। शायद नयी वैबसाइट है, मैंने कभी पहले नाम नहीं सुना था। विज्ञापन में पूरा क्या था यह तो मैंने ध्यान से नहीं देखा लेकिन उसका संदेश यह था कि क्रोमा वाले आप तक सिर्फ तीन घंटे में चीजें पहुंचा देते हैं। मैं हंस पड़ा।
कुछ समय पहले मेरे पिताजी को जोड़ों के दर्द के लिए डॉक्टर ने एक अच्छा स्पोर्ट्स शू पहनने की सलाह दी थी। मैंने ऑनलाइन एक अच्छा सा जूता देखा और ऑर्डर कर दिया। क्रोमा की तरह तीन घंटे में तो नहीं, एक हफ्ते में वह एमज़ोन से आने वाला था।
अब किसी वेयरहाउस में पड़ा वह धूल खा रहा होगा। देश के अन्य भागों की तरह कश्मीर में भी जगह-जगह लोगों ने ऑनलाइन शॉपिंग की डिलीवेरी सेवाएं अपने जि़म्मे लेकर वेयरहाउस बना लिए हैं। ‘मेरे वेयरहाउस में लाखों का माल धूल में सड़ रहा है। और पिछले दो महीनों से कोई नया माल नहीं आया है। हमारे खाने के लाले पड़ गए हैं’ दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में एक ऐसा ही डिलीवरी सेंटर चला रहे, मुश्ताक़ अहमद मीर, सत्याग्रह को बताते हैं। मुश्ताक के बारे में मैं सोचा ही रहा था कि मेरे बेटे की बात से मेरा ध्यान टूटा। ‘मैंने अपनी साइकिल के लिए लाइट मंगाई थी। कब आएगी’ उसने पूछा तो मैं जवाब में बस ‘जल्दी’ बोल पाया।
टीवी की तरफ फिर ध्यान गया तो देखा गूगल सर्च का एक और विज्ञापन चल रहा था। इस बार एक गंजा व्यक्ति अपने लिए हज्जाम ढूंढ रहा था, ‘सलोन्स नियर मी’
‘मुझे भी बाल कटवाने हैं’ मैंने सोचा। नहीं, गंजे को देखकर नहीं, विज्ञापन देखकर। लेकिन कश्मीर में इस समय बाल कटवाना भी और कामों की तरह ही असंभव सा हो गया है।
पांच अगस्त से पहले ही सरकार के आदेश के अनुसार कश्मीर घाटी से बाहर के राज्यों से यहां आए सारे लोग चले गए थे और उसमें उत्तर प्रदेश के बिजनौर से आए सैंकड़ों नाई भी शामिल हैं। पिछले कुछ साल में इन नाइयों ने पूरी तरह से कश्मीर के स्थानीय नाइयों की जगह ले ली थी।
अब ये लोग यहां नहीं हैं तो लोगों को काफी दिक्कत हो रही है। कश्मीर के स्थानीय नाई फिर मैदान में कूद तो पड़े हैं, लेकिन वे बहुत थोड़े से हैं और कारीगर भी बिजनौर वालों के मुक़ाबले के नहीं हैं। तभी टीवी पर देखा कि क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली किसी को फिलिप्स का शेवर इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं। मैं मुस्कुरा दिया और सोचा कि चलो दाढ़ी तो बना ही सकता हूं। उकताकर मैंने चैनल बदला और सोचा थोड़ी देर न्यूज़ देख लूं। देखा एनडीटीवी पर एक महिला कह रही थीं कि उनके माता-पिता बीमार हैं और उनका सारा पैसा उस बैंक में पड़ा हुआ है जो वे निकाल नहीं पा रही हैं। साथ में वित्त मंत्री, निर्मला सितारमण के दफ्तर के बाहर ऐसे ही कुछ अकाउंट होल्डर्स के किए गए प्रदर्शन की भी खबर भी थी।
ध्यान फिर कश्मीर के बीमारों की तरफ गया। ‘कम से कम यह लोग प्रदर्शन तो कर पाते हैं’ मैंने सोचा। फिर निराश होकर रिमोट उठाया और टीवी बंद करने लगा तो एनडीटीवी पर भी विज्ञापन चलने लगा था, ‘एयरटेल एक्स-स्ट्रीम’ का, जिसमें नेट्फ़्िलक्स और एमज़ोन प्राइम देखने को मिलता है।
यह सोचकर कि इंटरनेट चलेगा तो नेट्फ़्िलक्स और एमज़ोन प्राइम देखूंगा, मैंने अपना टीवी बंद कर दिया। (सत्याग्रह)


Date : 06-Nov-2019

पुलिस और अभियोजक सेक्स वर्करों की बलात्कार की शिकायत पर कार्रवाई करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते. ये आरोप ब्रिटेन की सेक्स वर्करों ने लगाया है.

1995 के बलात्कार से जुड़े ऐतिहासिक मुकदमे के 25 साल बीत जाने के बाद भी सेक्स वर्करों को बलात्कार और उन पर होने वाले दूसरे हमलों में न्याय के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है. ब्रिटेन में सेक्स वर्करों के स्वयंसेवी संगठन इंग्लिश कलेक्टिव ऑफ प्रॉस्टिट्यूट्स का कहना है कि उन्हें अकसर अधिकारियों के अविश्वास और खुद को ही सजा मिलने की आशंका से जूझना पड़ता है. ईसीपी की सदस्य निकी एडम्स कहती हैं, "एक समय लग रहा था कि चीजें बेहतर हो रही हैं लेकिन अब लग रहा है कि सब कुछ पीछे जा रहा है."
ईसीपी का आकलन है कि करीब दो तिहाई सेक्स वर्करों को किसी ना किसी तरह की हिंसा झेलनी पड़ती है. हाल ही में उनकी समस्याओं को लेकर लंदन में एक प्ले भी हुआ. निकी एडम्स बताती हैं, "नो बैड वीमेन: रेप ऑन ट्रायल, ने दिखाया है कि सेक्स वर्करों को कोर्ट में किस तरह से हमले झेलने पड़ते हैं और कैसे बलात्कारियों की बजाय उन्हीं का ट्रायल शुरू हो जाता है. वो अकसर यह मान लेते हैं कि अगर आपने सेक्स के लिए सहमति दे दी है तो आपको बलात्कार से इनकार का कोई हक नहीं है."
पुलिस सेक्स वर्करों की सुरक्षा को बेहतर करने और उनमें भरोसा बनाने की कोशिश कर रही है. नेशनल पुलिस चीफ्स काउंसिल का कहना है कि हाल ही में उसने ऐसे अधिकारियों को ऐसे दिशानिर्देश जारी किए हैं कि जब कोई सेक्स वर्कर कोई रिपोर्ट करे तो उन्हें अपराधी मान कर उसकी छानबीन नहीं करनी है. 
ब्रिटेन के क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस का कहना है कि वह पर्याप्त सबूत होने पर ही कार्रवाई कर सकता है और उसने अपने कर्मचारियों को इस बात के लिए प्रशिक्षित किया है कि वे सहमति की बात को समझें और अकसर सेक्स वर्करों के बारे में बनी हुई छवि और मिथकों को तोड़ें. प्रॉसिक्यूशन सर्विस के एक प्रवक्ता ने कहा, "सेक्स वर्करों के अधिकार सहमति को लेकर वैसे ही हैं जैसे किसी और के, जिस लेन देन के लिए ग्राहकों के साथ मोलभाव करती हैं वह सहमति से किए गए कामों के लिए होता है बलात्कार या फिर यौन उत्पीडऩ के लिए नहीं."
सितंबर में जारी आंकड़ों से पता चलता है कि इंग्लैंड और वेल्स में साल 2018-19 में बलात्कार के मामलों में सबसे कम लोगों को दोषी ठहराया गया जबकि पुलिस में दर्ज हुई शिकायतों में इस दौरान काफी इजाफा हुआ था.
1995 के मशहूर मुकदमे का ब्यौरा "नो बैड वीमेन" में भी दिखाया गया. यह दो सेक्स वर्करों के बारे में हैं जिनसे एक ही आदमी अलग अलग समय पर चाकू की नोक पर बलात्कार करता है. बाद में सेक्स वर्कर शिकायत करती हैं लेकिन मुकदमे खारिज कर दिए जाते हैं. ईसीपी का कहना है कि यह मुकदमा पूर्वाग्रह के कारण खारिज किया गया था.
इस फैसले से नाराज इसीपी और वीमेन अगेंस्ट रेप ने एक कानूनी टीम जुटाई और उन महिलाओं की मदद की जिसके बाद बलात्कारी को गिरफ्तार किया गया और उसे जेल हुई. एडम्स ने इस मुकदमे में अहम भूमिका निभाई थी.
नाटक का ज्यादातर हिस्सा मुकदमे की प्रतिलिपियों पर ही आधारित था. जिसमें यह दिखाया गया कि पीडि़त सेक्स वर्करों के चरित्र को लेकर कैसे सवाल किए गए. कैसे उनकी कहानियों पर अविश्वास जताया गया.
इंडोनेशिया में देह व्यापार गैरकानूनी है. इसे नैतिक अपराध माना जाता है. लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में देह व्यापार काफी फैला हुआ और संगठित है. यूनिसेफ के मुताबिक इंडोनेशिया में देह व्यापार से जुड़ी 30 फीसदी युवतियां नाबालिग है.
एडम्स का कहना है कि सेक्स वर्करों से लेकर ड्रग का इस्तेमाल करने वाली और यहां तक कि मानसिक असंतुलन वाली महिलाओं को "अच्छी पीडि़ता" नहीं माना जाता. ऐसे में उन पर हमला करने वालों को सजा दिलाने में उन्हें जंग लडऩी पड़ती है. एडम्स ने कहा, "बहुत से अलग अलग कारण है जिनके कारण कोर्ट में महिलाओं को खारिज कर दिया जाता है. हम एक बात पूछना चाहते हैं कि आखिर इतना सम्मानित कौन है जिसे संरक्षण मिलेगा, सच में? क्योंकि फिर तो इसमें बहुत कम ही लोग आएंगे."
करीब दर्जनों सेक्स वर्करों से सबूत इक_ा करने के बाद गृह मंत्रालय के लिए बनाई गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि "बहुत सी" औरतों ने काम के दौरान शारीरिक या फिर यौन हिंसा झेली है लेकिन ये लोग अकसर पुलिस में शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं.
इसमें एक चिंता देह व्यापार के लिए बनाए नियमों को लेकर भी है. ब्रिटेन में देह व्यापार अपराध नहीं है लेकिन सेक्स वर्करों को ग्राहक पटाने या फिर साथ मिल कर देहव्यापार के अड्डे चलाने के लिए उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है. उन्हें डर लगता है कि अगर वो पुलिस में शिकायत करेंगी तो उन पर ही मुकदमा चल जाएगा. एडम्स कहती हैं, "हर कोई यह मानता है कि सेक्स वर्करों के खिलाफ बहुत हिंसा होती है. पुरुष यह जानते हैं कि अगर वो सेक्स वर्करों पर हमला करेंगे तो ज्यादा उम्मीद इसी बात की है कि वो छूट जाएंगे."
एनआर/एमजे(रॉयटर्स)


Date : 05-Nov-2019

भागीरथ श्रीवास

दिल्ली और एनसीआर में सर्दियों में स्मॉग प्रदूषण पर बहुत हल्ला मचता है। स्मॉग धुंध और कोहरे का मिश्रण है जो पर्यावरण में प्रदूषण को खतरनाक स्तर पर पहुंचा देता है। स्मॉग प्रदूषण आज की परिघटना नहीं है। स्मॉग का जिक्र सबसे पहले 1905 में लंदन के रसायनशास्त्री एचए डेस वॉक्स ने किया था। उस वक्त लंदन की हवा धुएं से बेहद खराब हो गई थी। उन्होंने 1911 में ब्रिटेन की स्मोक एबेंटमेंट लीग को भेजी रिपोर्ट में बताया था कि दो साल पहले ग्लास्गो और एडिनबर्ग में हुई मौतें स्मॉग का परिणाम थीं। इससे पहले 13वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सम्राट एडवर्ड प्रथम ने लंदन में स्मॉग की वजह बनने वाले समुद्री कोयले पर प्रतिबंध लगा दिया था और लकड़ी के इस्तेमाल का आदेश दिया था।
आदेश न मानने पर मृत्युदंड का प्रावधान था लेकिन लंदन के लोग इससे भयभीत नहीं हुए। दरअसल उस समय लकड़ी महंगी थी और समुद्री कोयला उत्तरपूर्वी तट पर बहुतायत में था। समुद्री कोयला बहुत ज्यादा धुआं छोड़ता था और यह कोहरे के साथ मिलकर स्मॉग बनाता था। सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वैज्ञानिक जॉन ग्रांट और जॉन एवलिन ने पहली बार स्मॉग को बीमारियों से जोड़ा। एवलिन ने लिखा कि लंदन के नागरिक धुंध की मोटी और अशुद्ध परत में सांस ले रहे हैं। इससे उन्हें भारी असुविधा हो रही है। 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के बाद हालात और बदतर हो गए। पहले जहां लंदन में साल में 20 दिन धुंध छाई रहती थी, 19वीं शताब्दी में वह बढक़र 60 दिन हो गई। 
स्मॉग से हालात खराब होने पर राजनेताओं का इस पर ध्यान गया। ग्रेट ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विस्काउंट पाम्र्सटन को 1853 में कहना पड़ा, लंदन में शायद 100 भद्र पुरुष हैं जो विभिन्न भट्टियों से जुड़े हैं। वे अपने 20 लाख लोगों की सांसों में धुआं भरना चाहते हैं जिसका शायद वे खुद भी उपभोग न करें। धुएं के विरोध में खड़े लोगों और ब्रिटिश संसद में पाम्र्सटन की मजबूत स्थिति के कारण 1853 में लंदन स्मोक एबेटमेंट एक्ट पास हो गया। इस कानून ने लंदन की पुलिस को धुआं फैलाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की ताकत दे दी।
1891 में ये शक्तियां स्वच्छता से संबंधित प्राधिकरणों को स्थानांतरित कर दी गईं। हालांकि कानून से बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा। उद्योपतियों ने दलील दी कि 95 प्रतिशत धुआं लंदन के 700,000 घरों की चिमनियों से निकलता है। यहां तक िक लंदन काउंटी काउंसिल ने भी स्वीकार किया कि खुले में आग जलाना हमारी जिंदगी में शामिल हो चुका है और इसे खत्म करने का सवाल ही नहीं उठता। धुआं फैलाने वालों के अपराध सिद्ध करने के लिए अधिकारियों को यह भी साबित करना था कि उनके परिसर से निकलने वाला धुआं काले रंग का है। अत: दोष सिद्ध करना असंभव था।
इन सबसे बीच धुआं निर्बाध रूप से जारी रहा। अध्ययन में यह साबित हुआ कि 1873 के स्मॉग में 250 लोगों की मौत ब्रोंकाइटिस से हुई है। 1892 में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए। सबसे दर्दनाक हादसा 1952 में हुआ जब लंदन में महज चार दिन के भीतर स्मॉग के कारण 4,000 लोग मारे गए। इस हादसे के बाद जनदबाव के कारण सरकार को हग बेवर की अध्यक्षता में समिति गठित करने को मजबूर होना पड़ा।
समिति ने 1953 में अपनी रिपोर्ट में कहा कि घरों में उद्योगों से दोगुना धुआं निकलता है। समिति के सुझावों के चलते 1956 में ब्रिटिश क्लीन एयर कानून पारित हुआ। इस कानून ने ठोस, तरल और गैसीय ईंधनों को विनियमित किया। साथ ही औद्योगिक चिमनियों की ऊंचाई को नियंत्रित किया। पहले यह सब किसी कानून के दायरे में नहीं था। (डाऊन टू अर्थ)

 


Date : 05-Nov-2019

प्रकाश दुबे

कहावतें और परम्पराएं आसानी से करवट लेती हैं। डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, वकील का बेटा वकील होता है। नेता का बेटा, बहू, बेटी, पत्नी, प्रेयसी सब राजनीति के महल में जगह पा जाते हैं। वक्त ने करवट ली। नए रिवाज के हिसाब से नेता के बेटे राजनीति में सफल रहें या हार जाएं, खेल के कारोबार की कुर्सी बोनस में उनसे जा चिपकती है। गुजरात, हिमाचल प्रदेश के सभी दलों के नेता आसानी से यह बात समझ गए। पूर्व सांसद रामेश्वर डूडी लड़ाकू जाट हैं। राजनीति के पिच पर अकड़ गए।  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव राजस्थान क्रिकेट एसोशियेशन के अध्यक्ष बन गए हैं। डूडी समर्थक खेल संगठनों को मान्यता से वंचित कर दिया। एक मंत्री और मुख्य सचिव ने चुनाव अधिकारी को वश में किया। डूडी का दुखड़ा हमने सुना दिया। डूडी सौगंध ले चुके हैं कि अपने दिल के दाग सोनिया गांधी को ही बताएंगे। विकेट राजनीति में लेना है, क्रिकेट में नहीं।  
 सेब की सौगंध
कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का चेहरा सेब की तरह लाल हो गया। भारी पुलिस तैनाती के बावजूद बंगलूरु के हजारों लोग कट्टर येदि के विरोधी की अगवानी करने पहुंचे। यही नहीं, फूलों के साथ ही सेब फलों की विशाल माला से स्वागत किया। हजारों सेब में गुंथी माला वजनी थी। हवाई अड्डे तक दो क्रेन की सहायता से माला पहुंचाई गई। पुलिस ने टोंका तक नहीं। कई झटके खा चुके मुख्यमंत्री येदि का अपना ऐसा स्वागत कभी नहीं हुआ। जिस आदमी को 50 दिन जेल में रखने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी, जमानत मिलने के बाद उसका ऐसा स्वागत? गम दोगुना हो गया। डी.के. शिवकुमार जेल में हजामत तक नहीं बना पाए। भीड़ ने दाढ़ी वाले शिवकुमार के नए लुक-नए अंदाज को जमकर सराहा। शिवकुमार ने यह नहीं बताया कि दाढ़ी बढ़ाने के साथ कोई शर्त, कसम जुड़ी है?
 तिरुपति में आचमन
तिरुपति के बालाजी पर भरोसा रखने हजारों श्रद्धालु रोज दर्शन करने तिरुमला पहाड़ी चढ़ जाते हैं। उनकी श्रद्धा के बावजूद तिरुपति शहर में शराब दूकानों और होटलों में बार की भरमार है। तिरुमला तरुपति विकास बोर्ड को चिंता है कि बालाजी दर्शन के बाद भक्तजन लक्ष्मी के आर्शीवाद को मदिरा सेवन में न उड़ा दें। बोर्ड ने आंध्र प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर तिरुपति शहर में मदिरा व्यवसाय पर रोक लगाने की मांग की है। तिरुपति में घोर जल संकट है। किसी ज्ञानी ने सोचा होगा कि जल संकट के कारण सुरापान का विकल्प अपनाया जाता होगा। मुख्यमंत्री जगन्मोहन रेड्डी को भी इस बात की, पेयजल संकट की चिंता नहीं है। इसलिए तिरुपति बोर्ड ने जलाशय बनाने की पहल की। बालाजी जलाशय के निर्माण पर ज्यादा नहीं, करीब दो अरब रुपए खर्च आएगा। पूरा खर्च बोर्ड उठाएगा।  
जन्मदिन मुबारक
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.फारुक अब्दुल्ला को 82 वां जन्मदिन जेल में मनाने का मौका मिला। वे अपने घर में नजऱबंद हैं। कई राज्यों में पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिले मुफ्त सरकारी बंगले खाली कराए जा रहे हैं। केन्द्रशासित बनते ही जम्मू-कश्मीर इस कतार में शामिल हो गया। उमर के पिताश्री डॉ. फारुक अब्दुल्ला ने सरकारी बंगला नहीं लिया था। उन्हें दसवें दिन सरकार से तोहफा मिला। मुफ्त वाहन और सुरक्षा सुविधा एक नवंबर से बंद की दी। दलील दी गई कि इन सुविधाओं पर पर भारी खर्च आ रहा था। डॉ. फारुक सहित सभी पूर्व मुख्यमंत्री जेल में हैं। 
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ही नौकरशाहों से पूछ सकते हैं कि कैदी डा अब्दुल्ला, उनका बेटा उमर और महबूबा नजऱबंदी के दौरान कहां घूमते हैं? इन सबकी निगरानी के लिए पुलिस और केन्द्र सरकार के हथियारबंद तैनात किए गए हैं। उपराज्यपाल गिरीशचंद्र मुर्मू प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री के चहेते अफसर हैं। अब्दुल्ला परिवार ने घर को जेल में तब्दील करने पर किराया मांगा, तब जवाबदेही उनपर आएगी।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 


Date : 05-Nov-2019

प्रभाकर

पूर्वोत्तर राज्य मेघालय ने घुसपैठ रोकने और स्थानीय आदिवासियों और मूल निवासियों के हितों की रक्षा के लिए एक नया कानून बनाया है। इसके तहत 24 घंटे से ज्यादा राज्य में ठहरने वाले बाहरी लोगों को अब पंजीकरण कराना होगा।

देश में पहली बार किसी राज्य ने ऐसा कानून बनाया है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इनर लाइन परमिट की व्यवस्था जरूर लागू है। लेकिन यह कानून उससे कई मायनों में अलग है। राज्य के कई संगठन लंबे अर्से से इसकी मांग करते रहे हैं।  पड़ोसी असम में नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस (एनआरसी) लागू होने के बाद संभावित घुसपैठ के अंदेशे से इसके प्रावधानों में बड़े पैमाने पर संशोधन करते हुए इसे नए स्वरूप में लागू किया गया है। इस बीच, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा है कि असम में तैयार एनआरसी कोई नया या अनूठा विचार नहीं हैं। यह अवैध घुसपैठियों को रोकने के लिए एक ऐसा दस्तावेज है जिसके आधार पर भविष्य में दावों को निपटाया जा सकेगा।
नया कानून
मेघालय सरकार ने बीते शुक्रवार को मेघालय रेजिडेंट्स सेफ्टी एंड सिक्योरिटी एक्ट (एमआरआरएसए), 2016 को संशोधित स्वरूप में लागू कर दिया। फिलहाल इसे अध्यादेश के जरिए लागू किया गया है, लेकिन विधानसभा के अगले सत्र में इसे पारित करा लिया जाएगा।
उपमुख्यमंत्री प्रेस्टोन टेनसांग बताते हैं, उक्त अधिनियम सरकारी कर्मचारियों पर लागू नहीं होगा। यह उनके लिए है जो पर्यटन, मजदूर और व्यापार के सिलसिले में मेघालय आएंगे। इस अधिनियम का उल्लंघन करने वालों को खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
राज्य में अवैध आप्रवासियों को रोकने के उपायों के तहत वर्ष 2016 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस अधिनियम को पारित किया था। हालांकि तब इसमें किराएदारों की निगरानी पर ही जोर दिया गया था। उस समय तमाम मकान मालिकों को जरूरी कागजात दुरुस्त रखने और किराएदारों के बारे में पारंपरिक सामुदायिक मुखिया को सूचित करने का निर्देश दिया गया था। अब उस अधिनियम में कई बदलाव करते हुए इसे धारदार बनाया गया है।
टेनसांग कहते हैं, संशोधित अधिनियम के तहत राज्य में आने वाले लोग ऑनलाइन पंजीकरण भी करा सकते हैं। सरकार ने पंजीकरण के नियमों को पहले के मुकाबले काफी सरल बना दिया है। यह अधिनियम तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। विधानसभा के अगले अधिवेशन में इसे अनुमोदित कर दिया जाएगा।
उक्त अधिनियम में संशोधन से पहले मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने विभिन्न राजनीतिक दलों, गैर-सरकारी संगठनों और दूसरे संबंधित पक्षों की अलग-अलग बैठक बुला कर नए प्रावधानों पर चर्चा की थी। पहले वाला अधिनियम सिर्फ किरायेदारों पर लागू होता था। संशोधनों के बाद यह मेघालय आने वाले तमाम लोगों पर लागू होगा। अगर कोई व्यक्ति राज्य में प्रवेश करने से पहले अपनी जानकारी नहीं देता या फिर गलत जानकारी देता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। राज्य की कोनराड संगमा सरकार केंद्र के प्रस्तावित नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध कर रही है। इसके तहत पड़ोसी देशों से बिना किसी कागजात के यहां आने वाले हिंदू, सिख, ईसाई, जैन व पारसी तबके के लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। बीजेपी भी राज्य सरकार में शामिल है। वैसे तो राज्य के तमाम संगठन पहले से ही स्थानीय निवासियों के हितों की रक्षा के लिए समुचित कानून बनाने की मांग करते रहे हैं। पड़ोसी असम राज्य में एनआरसी लागू होने के बाद वहां से लोगों के भाग कर मेघालय में आने का अंदेशा बढऩे के बाद इस मांग ने काफी जोर पकड़ा था। बीते अगस्त में असम में जारी एनआरसी की अंतिम सूची में 19.06 लाख लोगों को जगह नहीं मिल सकी थी।
असम में तैयार एनआरसी पर जारी विवादों के बीच सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इसे भविष्य का दस्तावेज बताते हुए इसका बचाव किया है। न्यायमूर्ति गोगोई सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के अध्यक्ष हैं जो असम में एनआरसी की प्रक्रिया की निगरानी कर रही है। दिल्ली में आयोजित एक पुस्तक विमोचन समारोह में उन्होंने कहा, एनआरसी कोई तात्कालिक दस्तावेज नहीं है। यह भविष्य का मूल दस्तावेज है, जिसके आधार पर भविष्य के दावों को निपटाने में सहूलियत होगी।
गोगोई ने एनआरसी का विरोध करने वालों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि ऐसे लोगों को जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग जमीनी हकीकत से दूर हैं ही, विकृत तस्वीर भी पेश करते हैं। इसी वजह से असम और उसके विकास का एजंडा प्रभावित हुआ है।
असम के रहने वाले न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा, एनआरसी का विचार कोई नया नहीं है। इसे वर्ष 1951 में ही तैयार किया गया था। मौजूदा कवायद तो वर्ष 1951 के एनआरसी को अपडेट करने का महज एक प्रयास है।  (डॉयचेवेले)

 


Date : 04-Nov-2019

ज्ञान चतुर्वेदी

एंटीबायोटिक दवाओं और मेडिकल जांचों से जुड़ी ये गलतफहमियां इतनी आम हैं कि इन्हें शायद ही आपने कभी गंभीरता से लिया हो।

बीमारियों और उनके इलाज से जुड़ी गलतफहमियों की सूची वैसे तो बहुत लंबी है, लेकिन इस बार के कॉलम में हम सिर्र्फ एंटीबायोटिक दवाओं और मेडिकल जांचों से जुड़ी गलफहमियों की ही चर्चा करेंगे। ये ऐसी गलतफहमियां हैं जिनसे आप भी कई बार दो-चार हुए ही होंगे। चलिए शुरू करते हैं -
1. एंटीबायोटिक्स ‘गरम’ करती हैं
कोई इन्फेक्शन हो जाए तो डॉक्टरों के हाथ में ‘एंटीबायोटिक्स’ नाम का एक बड़ा कारगर हथियार है। वह निमोनिया, टायफायड, टीबी आदि हजारों बीमारियों का इलाज उचित एंटीबायोटिक्स देकर करता है। और हम क्या करते हैं?
 हम यह मानते हैं कि एंटीबायोटिक्स बड़ी ‘गरम’ दवाइयां हैं। डॉक्टर ने चार गोलियां लेने को लिखा है, हम दो ही लेते हैं। मानते हैं कि चार की जगह दो भी लेंगे तो थोड़ा कम ही सही पर काम तो करेंगी ही, गरमी भी कम होगी। लेकिन ऐसा नहीं है।
हर एंटीबायोटिक्स का एक तय ‘डोज’ होता है। जब तक रक्त में दवा का वह लेवल न पहुंचे यानी कि ‘मारक लेवल’ न बने, दवा बैक्टीरिया को नहीं मार पाती। इसी कारण एंटीबायोटिक्स की उतनी ही गोलियां लिखी जाती हैं जितनी रक्त में उसको ‘मारक स्तर’ तक पहुंचा सके। कम गोली खाईं तो असर नहीं होगा।
इसे हम डॉक्टरी भाषा में ‘ऑल ऑर नन’ का खेल कहते हैं। या तो गोली पूरा काम करेगी, या बिल्कुल भी नहीं करेगी। ऐसा कभी नहीं होगा कि हम यदि स्वयं ही डोज कम करके एंटीबायोटिक्स ले लेंगे तो वह थोड़ा ही सही परंतु कुछ न कुछ लाभ तो जरूर पहुंचाएगी। समझ लें और याद रखें कि एंटीबायोटिक्स उसी डोज में लें, जिसमें डॉक्टर द्वारा बताई गई हो। वरना, लेना, न लेना बराबर।
इसी सिद्धांत पर चलकर हम एंटीबायोटिक्स उसी दिन बंद कर डालते हैं, जिस दिन बुखार उतरा या जो तकलीफ थी, वह कम हुई। यह तो और भी खतरनाक बात है। हम बैक्टीरिया को अधमरा छोड़े दे रहे हैं। उसकी आधी-पौनी फौज को ही मार के हमने अपने एंटीबायोटिक्स के हथियार वापस धर दिए। तो जो दुश्मन जीवित बचे, वे अब नई तैयारी से, प्रतिरोध (एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस) के रक्षा कवच पहनकर वापस आक्रमण करेंगे। कुछ समय बाद आपको फिर तकलीफ होगी और तब ये ही एंटीबायोटिक्स आप पर काम नहीं करेगी। याद रहे कि हर इनफेक्शन में दवाएं देने की समय अवधि अलग-अलग होती है। इस मामले में खुद का दिमाग न चलाएं। डॉक्टर की मानें।
यह भी याद रहे कि एंटीबायोटिक्स मात्र एक हथियार है। उसे चलाने वाला आपका शरीर है। शरीर की प्रतिरोधी शक्तियां यदि पहले ही बुढ़ापे, मधुमेह, एड्स,कुपोषण आदि के कारण कमजोर होंगी, तब एंटीबायोटिक्स भी प्रभावी सिद्ध नहीं होंगी। हमें दवा की यह सीमा समझनी ही चाहिए और उचित खान-पान, व्यायाम आदि द्वारा शरीर मजबूत रखने की कोशिश करनी चाहिए।
2. हमारी तो सारी जांचें ठीक निकली हैं सो अब हमें कुछ भी नहीं हो सकता
बहुत से मरीज अपनी जांच रिपोर्टों को गर्व से तमगे की भांति लिए घूमते हैं। उन्हें तब बड़ा धक्का पहुंचता है जब ‘सब ठीक’ रहते हुए भी किसी बड़ी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। तब उन्हें जांच रिपोर्टों की सत्यता पर भी शक होता है। इतनी बढिय़ा रिपोर्टें थीं, फिर कैसे? वे पूछते हैं।
याद रखें कि हर जांच रिपोर्ट की सेंसिटिविटी तथा स्पेसिफिसिटी होती है। कोई भी जांच सौ प्रतिशत पूरी नहीं होती। इसे मरीज के हाल से जोडक़र ही समझा जाता है। उदाहरण के लिए जिस टीएमटी जांच के ठीक निकल आने पर हम खुश होकर सोचते हैं कि इसका मतलब है कि हमारा दिल एकदम बढिय़ा है, उसकी भी अपनी सीमा है। मान लें कि यदि दिल की एक ही नली बंद हो रही हो तो हार्ट अटैक तो आगे पीछे आएगा पर टीएमटी की जांच लगभग साठ प्रतिशत ऐसे केसों में ठीक ही बताती रहेगी। मेरी अपनी प्रैक्टिस में मैंने ऐसा देखा है कि जिसका टीएमटी मैंने पंद्रह दिन पूर्व नॉर्मल (निगेटिव) बताया था, वही हार्ट अटैक से भर्ती हो गया। ऐसे लोग यही शिकायत करते हैं कि जब जांच में सब ठीक था तो फिर ऐसा कैसे हुआ? 
इसका जवाब यह है कि कोई भी जांच प्राय: सौ प्रतिशत सेंसिटिव नहीं होती। ईसीजी की जांच नार्मल बताकर इमर्जेंसी से घर वापस भेज दिया था पर दो घंटे बाद ही हार्ट अटैक हो गया क्योंकि शायद डॉक्टर को भी यह सीमा नहीं पता थी कि ईसीजी लगभग 40 प्रतिशत केस में शुरू में नॉर्मल हो सकता है।
फिर तो मर गए साब? जब जांच पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता तो आदमी कहां जाएं? इसका उत्तर यही है कि हर जांच डॉक्टर को निर्णय लेने में सहायता के लिए बनी है। एक अच्छा डॉक्टर कभी भी रिपोर्ट का इलाज नहीं करता। वह हर जांच को मरीज की बीमारी से जोडक़र ही फिर तय करता है कि जांच रिपोर्ट को कितना महत्व दिया जाए। एक अच्छा डॉक्टर रिपोर्टों की सीमा को समझता है। सो हर रिपोर्ट उसी को समझने दें। स्वयं रिपोर्ट पढक़र अपने नतीजे न निकालें।
कई मरीज यही कहते हैं कि हमारी हर संभव जांच करा दें क्योंकि ‘आई वॉन्ट टू बी श्योर।’ आप कभी, किसी जांच के बाद भी ऐसा श्योर नहीं हो सकते। भ्रम में न रहें। ऐसी कोई मशीन अभी तक नहीं बनी है जिसमें से शरीर को गुजार दें तो दूसरी तरफ से अदालत का प्रभावीकृत शपथपत्र निकल आए जो बता दे कि आप एकदम ठीक हैं। रिपोर्ट सही आने पर ये मीठे भ्रम न पाल बैठें। यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें।
(सत्याग्रह)

 


Date : 04-Nov-2019

जसिंता केरकेट्टा और जयंती बुरुदा 

जयंती बुरुदा ओडिशा के मलकानगिरि जिले के एक सुदूर गांव सेरपाली से है। 11 भाई बहनों में जयंती नौवें स्थान पर है। जब वह कॉलेज भी थी, मां को कैंसर हो गया। उनकी बीमारी के वक्त जयंती पढ़ाई छोडक़र उनकी देखभाल करने लगी। जयंती कहती है सिर्फ मां को भरोसा था कि मैं कुछ कर सकती हूं। उनकी बीमारी के कारण मेरी पढ़ाई छूट जाने पर मां कहती थी वो जल्दी मर जाना चाहती है ताकि मैं फिर से पढ़ाई कर सकूं।
 एक दिन उसने आत्महत्या करने की भी कोशिश की। मैंने उन्हें रोक लिया। आज याद करती हूं कि वे मेरी शिक्षा को लेकर कितनी अधिक जागरूक थी। अपने प्राण भी देना चाहती थी।
जयंती मलकानगिरि के स्थानीय टीवी चैनल में काम करती है। बूढ़े पिता साथ रहते हैं। गांव के एक परिवार में जब एक मां की हत्या हो गई, पिता बच्चों को छोड़ भाग गए तब छोड़ दिए गए छोटे-छोटे 4 बच्चों को जयंती ने गोद ले लिया। इस तरह बूढ़े पिता के साथ उसके पांच बच्चे हैं। वो अपने काम के साथ-साथ गांव की दूसरी लड़कियों को पढऩे के लिए प्रोत्साहित करती है। कॉलेज के दिनों में ही एक संगठन बनाया और संगठन के माध्यम से लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर भी काम कर रही है। हमारी कहानी बहुत मिलती-जुलती है। सोचती हूं अपनी एक बहन को लेकर जयंती और उसके बच्चों के साथ मिलकर इस परिवार को बड़ा परिवार बना लें। ताकि हम एक-दूसरे को सहयोग कर सकें। अकेले - अकेले मां बने रहने से यह ज्यादा अच्छा है कि हम एक साथ चलें और जीवन के साथ जिम्मेदारियां भी साझा कर लें।
स्त्रियों की दुनिया ऐसे नहीं बदल सकती। एक दूसरे के खिलाफ होने के बजाए उनके साथ चलने से ही नए रास्ते निकल सकते हैं। दु:ख, ख़ुशी और जीवन साझा कर लेने से जीवन की बाकी लड़ाइयां आसानी से जीती जा सकती हैं।
हर लडक़ी को बर्तन की जगह रोज-रोज अपने संघर्ष के हथियार मांजने होंगे इसलिए कि उसकी रगड़ की आवाज से बहुतों के दिमाग के पर्दे खुले और उसकी चमक से बहुतों की आंखों में चमक आ सके...।

 


Date : 04-Nov-2019

अपूर्व भारद्वाज

1. आज से कुछ दिन पहले खबर आती है कि इसराइल स्पाई वेयर के द्वारा व्हाट्सएप पर जासूसी की जा रही है। व्हाट्सएप और सरकार दोनों इस बात से इंकार कर देती है लेकिन व्हाट्सएप ने आज इसकी पुष्टि कर दी है और सरकार ने भी व्हाट्सएप को नोटिस देकर उससे स्पष्टीकरण मांग लिया है। यह मसला सीधे आपके निजी गोपनीयता और सुरक्षा से जुड़ा है। इस पर और विस्तार से लिखूंगा। लेकिन अभी यह समझ लीजिए कि अगर आपने मेरी व्हाट्सएप हैक वाली पोस्ट को नही पढ़ा है तो समझ लीजिए आप कितनी बड़ी गलती कर रहे है।
2. आज के दैनिक भास्कर में आपने 12 लाख यूजर का क्रेडिट कार्ड और डेबिट का डॉटा चोरी का समाचार पढ़ा ही होगा लेकिन यह एक अधूरा समाचार है इससे बड़ी डॉटा डकैती इसी फिन 7 हैकर ग्रुप ने इटली के सबसे बड़े बैंक यूनिक्रेडिट बैंक के 30 लाख यूजर का डाटा उसी दिन हैक किया था। फिन 7 एक हैकिंग माफिया है जो अमरीका के बैंक, होटल्स और हॉस्पिटल के डॉटा की चोरी करके 2015 में आया था अमेरिकन इसे रशियन कहते है लेकिन यह सब साइबरवॉर का हिस्सा है जो अमरीका, चीन और रशियन के बीच चार साल से जारी है। लेकिन अचानक इनका टारगेट भारत क्यों हो गया है। इसका संकेत में अपनी सायबरवॉर वाली सीरीज में दे चुका हूँ लेकिन यह सब इतना जल्दी होगा उसका मुझे भी अंदाजा नही था। डॉटा चोरी पर बहुत लिख चुका हूं। आगे भी इस पर लिखूंगा। लेकिन अभी समझ लीजिये आप एक नाजुक समय में जी रहे है, अपने आप को बचा कर रखिए।
3. यह सबसे बड़ी और चिंतित करने वाली खबर है। यह कहानी तब शुरू हुई जब सायबर सुरक्षा विशेषज्ञ पुखराज सिंह ने ट्वीट किया कि उन्होंने कुछ महीने पहले भारतीय अधिकारियों को एक सूचना-चोरी करने वाले मालवेयर ‘डीट्रैक’ के बारे में बताया, जो कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र की पर अटैक कर चुका है। शुरू में परमाणु शक्ति निगम ने इसका खंडन किया लेकिन बाद में बाकायदा प्रेस रिलीज जारी कर के इस मालवेयर अटैक की पुष्टि की है।  हृक्कष्टढ्ढरु के अनुसार ‘यह मालवेयर अटैक एक यूजर के सिस्टम पर हुआ था जो इंटरनेट से जुड़ा हुआ था जांच में पाया गया है कि न्यूक्लियर प्लांट के सिस्टम इससे अफेक्टेड नही थे।’ 
जब मैंने डी ट्रेक के बारे में रिसर्च किया तो पाया कि इसे उत्तर कोरिया की जासूसी एजेंसियों के द्वारा प्रेषित एक हैकिंग ग्रुप ने डेवलप किया है और ऊत्तर कोरिया किस बात के लिए प्रसिद्ध है वो तो आपको न्यूज चैनल दिन में तीन बार तो दिखा ही देते है।
यह तीनों खबरें बहुत विचलित करने वाली है और अच्छे से अच्छे की नींद खोलने वाली है यदि आप अब भी सो रहे है तो जाग जाइये यह देश अभी बहुत बड़े साइबर खतरे से जूझ रहा है और यह खतरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है सबसे बड़ा खतरा इसकी दिनोंदिन बढ़ती पहुंच है जो आपके बेड रूम से शुरू होकर बैंकों के स्ट्रांग रूम से होकर परमाणु प्लांट के वॉर रूम तक हो गई है जैसे आपको यह पता ही नहीं चला कि डॉटा की छिटपुट लड़ाईया कब दंगल बन गई वैसे ही आपको यह भी नही पता नही पड़ेगा कि कब यह दंगल एक फूल फ्लैश साइबर वॉर में तब्दील हो गया।
इन तीनों डॉटा टाइम लाइन पर विस्तार से लिखूंगा लेकिन जब तक अपनी टाइमलाइन इस पोस्ट को लगाए ताकि डॉटा सुरक्षा पर बरसो से सो रही इस सरकार की कान में जू रेंगे औऱ वो अपनी कुंभकर्ण नींद से जागकर हिन्दू। मुसलमान छोडक़र देश के सही मुद्दों पर ध्यान दे ईश्वर सरकार को सद्बुद्धि प्रदान करे?


Date : 03-Nov-2019

पूर्वी जर्मनी के शहर हाले में मंदिर में पूजा करने गए यहूदी एक मास शूटिंग से बाल बाल ही बचे। डॉयचेवेले की मुख्य संपादक इनेस पोल का कहना है कि यहूदी विरोधी भावनाओं को किसी भी हाल में हल्के में नहीं लिया जा सकता।

पूर्वी जर्मनी के एक सिनोगॉग में करीब 70 लोग पूजा करने और यहूदियों का पर्व योम किपुर मनाने पहुंचे थे। पूजा घर के मजबूत दरवाजे ने उन्हें उस जर्मन शख्स से बचा लिया जो हथगोले और राइफल लिए खून खराबा करने वहां पहुंचा था। यह 9 अक्टूबर 2019 की घटना है।
दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत के अस्सी साल बाद, वह युद्ध जिसमें 60 लाख यहूदियों की हत्या की गई थी, आज एक बार फिर जर्मनी में अगर यहूदी खुले आम अपने धर्म का पालन करना चाहें, सिनोगॉग जाना चाहें, तो उन्हें अपनी जान की फिक्र करनी पड़ रही है।
इससे जर्मनी के बारे में क्या समझ में आता है? और क्या मतलब है इस बात का कि 27 साल के एक नौजवान ने हेलमेट पर कैमरा लगा कर अपने कारनामों को फिल्माना चाहा और फिर उसे एक वीडियो गेम वाली वेबसाइट पर अपलोड भी किया? 
न्यूजीलैंड में हुए क्राइस्टचर्च हमले की ही तरह यह व्यक्ति भी हमले की जगह पर जाता है और गोलीबारी शुरू करने से ठीक पहले अपने अंतरराष्ट्रीय दर्शकों से अंग्रेजी में कहता है, सारी मुसीबतों की जड़ यहूदी हैं। किसी की पीड़ा की ना तो कभी तुलना की जा सकती है और ना ही करनी चाहिए। इसलिए सबसे पहले तो हमारी संवेदनाएं उस महिला और पुरुष के परिवारों के साथ हैं जिनकी बर्बरता से हत्या कर दी गई।
हम मुंह नहीं फेर सकते। अगर स्थिति जरा भी अलग होती तो हमने बुधवार को जर्मनी में यहूदी लोगों की सामूहिक हत्या देखी होती।
यह तथ्य साफ दिखाता है कि इस देश में यहूदियों के प्रति बढ़ती हीन भावना किसी भी सूरत में इस्लामिक आतंकवाद तक सीमित नहीं है। अगर अभी भी कोई ऐसा दावा करता है तो वह झूठ बोल रहा है और सच्चाई का सामना करने से इनकार कर रहा है। इससे यह पता चलता है कि जर्मनी में यहूदी संस्थाओं की सुरक्षा अब भी जरूरी है, नाजी काल के खात्मे के 75 साल बाद भी। इस पर सवाल उठना लाजमी है कि योम किपुर जैसे त्योहार के दिन भी सिनोगॉग को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई थी।  यह अपराध दिखाता है कि यहूदी विरोधी गतिविधि के छोटे से छोटे संकेत को भी गंभीरतापूर्वक लेना होगा और उसकी जांच करनी होगी। इसमें इस्राएल के झंडे को जलाना भी शामिल है और यहूदी टोपी किप्पा पहनने वालों का अपमान भी।
यहूदी विरोधी भावना को हल्के में नहीं लिया जास सकता। थोड़ा-बहुत यहूदी विरोधी जैसा कुछ नहीं होता है। कहीं भी नहीं। और खास कर जर्मनी में तो बिलकुल भी नहीं। (डॉयचेवेले)


Date : 03-Nov-2019

-प्रिय मनीष माहेश्वरी,
मैनेजिंग डायरेक्टर, ट्विटर इंडिया.
जय भीम, जय भारत,
भारत में जिस समय लोकसभा चुनाव चल रहे थे, उस दौरान आपको ट्विटर इंडिया का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया।  कृपया मेरी विलंब से दी गई बधाई स्वीकार करें। 
आप ट्विटर में आने से पहले जिस कंपनी यानी नेटवर्क 18 में काम कर रहे थे, वहां मैं भी काम कर चुका हूं। मैं वहां सीएनबीसी आवाज चैनल का एक्जिक्यूटिव प्रोड्यूसर था और दिल्ली ऑपरेशन का हेड था। हालांकि उस समय ये कंपनी मीडिया हाउस के तौर पर काम कर रही थी और तब तक मुकेश अंबानी ने इसे खरीदा नहीं था। 
आप राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण समय में, लोकसभा चुनाव के बीच, ट्विटर में आए. देश में ओपिनियन बनाने में ट्विटर का क्या महत्व है, ये किसी से छिपा हुआ नहीं है। 
मुझे उम्मीद है कि चुनाव के दौरान मुकेश अंबानी की कंपनी से ले जाकर आपको जिस मकसद से ट्विटर इंडिया का हेड बनाया गया होगा, आपने वह काम असरदार तरीके से पूरा किया होगा। 
आपके ट्विटर इंडिया का हेड बनने के बाद ये देखा जा रहा है कि जहां ट्विटर पर सांप्रदायिक, हिंसक और धार्मिक भावनाएं भड़काने वाले कंटेंट की बाढ़ आ गई है, वहीं लोकतंत्र, समानता, बंधुत्व की बात करने वालों के एकाउंट सस्पेंड किए जा रहे हैं या उन पर रिस्ट्रिक्शन लगाए जा रहे हैं।  इसकी कोई वजह भी नहीं बताई जा रही है।  हंसराज मीणा से लेकर संजय हेगड़े इसके उदाहरण हैं। 
हमने ये नहीं सुना कि सांप्रदायिकता फैलाने के लिए किसी ट्विटर एकाउंट को कभी सस्पेंड किया गया है।  आप और आपके स्टाफ का, खासकर बहुजनों - एससी, एसटी, ओबीसी और माइनॉरिटी- के प्रति नजरिया बेहद बुरा है।
आप देश की इस 85 फीसदी आबादी को ट्विटर पर चाहते तो हैं, क्योंकि इनके बिना आपका बिजनेस नहीं चल सकता, लेकिन आप उन्हें पैसिव यानी निष्क्रिय रोल में ही देखना चाहते हैं। आप चाहते हैं कि ये करोड़ों लोग बस लाइक और रिट्विट तथा कमेंट करें। अपना एजेंडा पेश न करें।  अपने हैश टैग न चलाएं. ऐसा करते ही आप उनका एकाउंट सस्पेंड कर देते हैं। 
मतलब कि आपको एससी-एसटी-ओबीसी-माइनॉरिटी के सिर्फ फॉलोवर चाहिए, स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं। 
मिसाल के तौर पर आपने आज मेरे एकाउंट पर रोक लगा दी है, जिसकी वजह से मैं ट्विटर पर लिख नहीं सकता।  इसके लिए आपने जो वजह बताई है, वह हास्यास्पद है. बहाना भी आपने मार्च की एक पोस्ट को बनाया है। 
मेरी यह पोस्ट क्या बता रही है? यही न कि चुनाव से पहले बहुजन एजेंडा आ गया है। सभी राजनीतिक दलों तक इसे पहुंचाया जाएगा।  जो लोग पढऩा चाहते हैं वे डॉक्टर अनिल जयहिंद से संपर्क करें। 
आपको लगता है कि ये प्राइवेसी का उल्लंघन है? फिर तो आपको बताना चाहिए कि ये किसकी प्राइवेसी का उल्लंघन है?
डॉक्टर अनिल जयहिंद बी.पी. मंडल के सहयोगी रहे हैं (अब ये मत पूछिएगा कि बी.पी. मंडल कौन हैं!) हम सबके प्रिय और आदरणीय है।  उनके निर्देश पर मैंने उनका संपर्क का मेल ट्विटर पर डाला है।  ये कौन तय करेगा कि उनकी प्राइवेसी का उल्लंघन हो गया है? आप या डॉक्टर अनिल जयहिंद?
सीधी सी बात है कि आप नहीं चाहते कि भारत के तमाम लोग अपनी बात मजबूती से ट्विटर पर रखें। आपका ये व्यवहार ट्विटर को एक अलोकतांत्रिक जगह में बदल रहा है.
कायदे से तो आपको अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर कंपनी को चाहिए कि आपको निकाल दें।  इससे शायद ट्विटर की कुछ प्रतिष्ठा बहाल हो जाए।
आप बीजेपी के आईटी सेल में नौकरी क्यों नहीं कर लेते?
आपका,
प्रोफेसर दिलीप मंडल


Date : 03-Nov-2019

-अनुराग भारद्वाज
हाल के कुछ दिनों में कपूर खानदान में काफ़ी उथलपुथल रही है। कृष्णा राज कपूर का निधन हो गया है। सुनने में आया है ऋषि कपूर बीमार हैं, राज कपूर निर्मित 'आरके स्टूडियो' 170 करोड़ रूपये में गोदरेज प्रॉपर्टीज को बेच दिया गया है। इन सबके बीच पृथ्वी थिएटर अपने 40 साल पूरे करने जा रहा है। आज पृथ्वी थिएटर और फि़ल्मी 'कपूर खानदान' की स्थापना करने वाले 'पापाजी' उफऱ् पृथ्वीराज कपूर साहब का जन्मदिन है।
पृथ्वीराज कपूर का जन्म समुंदरी, जि़ला फैसलाबाद, पाकिस्तान में हुआ था। उन्होंने पेशावर के एडवर्ड्स कॉलेज से वकालत का कोर्स किया। चूंकि पिता पुलिस अफसर थे, तो उन्हें यही करना ठीक लगा। पर किस्मत को तो कुछ और ही मंज़ूर था। और उनको वकालत भी रास नहीं आ रही थी, सो वे लायलपुर में काम के साथ नाटक भी करते रहे। वैसे पृथ्वीराज बेहद शानदार शख्सियत के धनी थे। दिखने में गोरे-चिट्टे, कोई छह फुट दो इंच की भरपूर ऊंचाई, दमदार आवाज़ के मालिक। और हां, कुछ हलकी नीली आंखें। पूरे यूनानी दीखते थे और 'सिकंदरी' उनके खून में थी। तो अब मंजि़ल साफ़ नजऱ आ रही थी। दोस्तों से कुछ रुपये उधार लिए और लायलपुर से बम्बई आने के लिए ट्रेन पकड़ ली। यह बात साल 1928 की है।
यहां पर वे बंबई की इंपीरियल फिल्म्स कंपनी के साथ जुड़ गए। शुरुआत में उन्हें एक्स्ट्रा कलाकारों का किरदार करने को मिला पर जब कंपनी मालिकों की नजऱ उन पर पड़ी तो 1929 में 'सिनेमा गर्ल' फिल्म में मुख्य किरदार मिल गया। यह मूक सिनेमा का दौर था जिसमें उन्होंने 'दोधारी तलवार', 'शेर-ए-अरब' आदि फि़ल्मों में काम किया। 1931 में जब पहली बोलती फिल्म 'आलमआरा' बनी तो पृथ्वीराज कपूर ने उसमें भी एक किरदार निभाया।
1941 में सोहराब मोदी की 'सिकंदर' में जब उन्हें मुख्य किरदार करने को मिला तो मानो यूनान का वो लड़ाका परदे पर जीवंत हो उठा। फिल्म की इस तस्वीर को देखिए और आपको लगेगा कोई यूनानी देवता मुस्कुरा रहा है!
पृथ्वीराज कपूर को रंगमंच से बेहद लगाव था। वे 1942 में स्थापित 'इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन' यानी इप्टा के संस्थापकों में से एक थे। उनके अलावा बलराज साहनी, ज़ोहरा सहगल, उत्पल दत्त, ख्वाजा अहमद अब्बास, सलिल चौधरी, पंडित रविशंकर जैसे महान लोग इप्टा से जुड़े हुए थे। ये सब समाजवादी विचारधारा के लोग थे और इसलिए इप्टा पर इस विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा।
पृथ्वीराज ने 1944 में पृथ्वी थिएटर की स्थापना की थी और फिर पूरे देश में घूम-घूमकर वे नाटक करने लगे। इस थिएटर के तहत कालिदास रचित 'अभिज्ञान शाकुंतलम' और 'पठान' काफी चर्चित रहे। इसके अलावा कुछ और चर्चित नाटक थे जैसे 'ग़द्दार', 'आहुति' और 'पैसा', जिनमें पृथ्वीराज साहब ने मुख्य किरदार निभाया था। वे थिएटर के जरिए जो पैसा कमाते, वह सब फिल्मों में लगा दिया करते थे।
आपको जानकार हैरत होगी कि संगीतकार शंकर-जयकिशन पृथ्वीराज की ही खोज थे। इस जोड़ी की मुलाकात राज कपूर से पृथ्वी थिएटर में ही हुई और आगे चलकर इस तिकड़ी ने हिंदुस्तानी सिनेमा को कई यादगार गाने दिए। इन तीनों का मिलना भी एक इत्तेफ़ाक ही था। दरअसल, शंकर पृथ्वी थिएटर से सबसे पहले जुड़े। जब थिएटर को हारमोनियम वादक की ज़रूरत हुई, तो वे जयकिशन को ढूढ़कर लाए। फिर राज कपूर ने 1948 में 'आग' बनाई तो शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने बतौर सहायक संगीतकार इसके लिए काम किया। राज कपूर ने ही अपनी दूसरी फिल्म 'बरसात' में इस जोड़ी को मुख्य संगीतकार के तौर पर लिया था।
1950 के आते-आते पृथ्वीराज को यकीन हो गया था कि हिंदुस्तान में रंगमंच का भविष्य नहीं है। पूरे लाव लश्कर के साथ कहीं जाकर महीनों ठहरना और नाटक करना अब घाटे का सौदा बन गया था। उनके ख़ास कलाकारों ने भी फिल्मों से नाता जोड़ लिया था, हालांकि सार्थक नाटकों को लोगों तक पहुंचाने का जुनून अब भी उनमें बरकऱार था सो उन्होंने बंबई के जुहू में जमीन खरीदी ताकि इस थिएटर कंपनी को एक स्थायी ठिकाना दिया जा सके।
1972 में उनकी मौत के बाद शशि कपूर और उनकी पत्नी जेनिफर कैंडल कपूर ने इसकी स्थापना का जि़म्मा लिया। नवम्बर, 1978 को जुहू में पृथ्वी थिएटर शुरू हुआ। 'उदावस्त धर्मशाला' पहला नाटक था जो यहां खेला गया। जेनिफर और शशि कपूर के प्रयासों की वजह से नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, रत्ना पाठक शाह, दिनेश ठाकुर, बेंजामिन गिलानी जैसे रंगमंच के कलाकार इसके साथ जुड़ गए। आज पृथ्वी थिएटर हिंदुस्तान के सांस्कृतिक इतिहास में अपना अहम मुक़ाम रखता है।
1960 में आई 'मुग़ल-ए-आज़म' में पृथ्वीराज द्वारा अभिनीत 'अकबर' का किरदार अमर है। बहुत सालों तक जब तक कि ऋतिक रोशन अभिनीत 'जोधा-अकबर' नहीं आई थी लोगों के ज़ेहन में पृथ्वीराज कपूर का निभाया 'अकबर' का किरदार ही छाया रहा। आपको जानकर हैरत होगी कि डायरेक्टर के आसिफ ने 'अकबर' के किरदार के लिए पहले अभिनेता चंद्रमोहन का चयन किया था। 
हालांकि बाद में पृथ्वीराज कपूर ही इस किरदार के लिए चुने गए। उन्होंने इस फिल्म को इतनी अहमियत दी कि यह किरदार निभाने के लिए अपना वजन तक बढ़ाया। मेकअप रूम में जाने से पहले वे कहते थे 'पृथ्वीराज कपूर जा रहा है' और जब तैयार होकर बाहर आते तो कहते 'अकबर आ रहा है'। वे इतने पेशेवर कलाकार थे कि 'अकबर' का शॉट शुरू होने से पहले अपने आपको बड़े से शीशे में कुछ देर तक निहारते थे। जब उनसे पूछा गया कि वे ऐसा क्यूं करते हैं तो उन्होंने कहा कि इससे वे किरदार में घुस जाते हैं। शायद यही वजह है कि उनका निभाया हुआ 'अकबर' आज भी सबसे ज़्यादा विश्वसनीय नजऱ आता है।
पृथ्वीराज कपूर के जन्मदिन से पृथ्वी थिएटर फेस्टिवल की शुरुआत की जाती है। हैरत की बात है कि पृथ्वी थिएटर उन गिनी चुनी नाट्य संस्थाओं में से एक है जिसका उद्देश्य पैसे कमाना न होकर कला का सृजन है। शशि कपूर के चले जाने के बाद उनके पुत्र कुणाल कपूर इसकी देखभाल कर रहे हैं। राज कपूर साहब की फि़ल्म 'मेरा नाम जोकर' के गीत की पंक्तियां थीं
आरके स्टूडियो तो बिक गया, उम्मीद है पृथ्वी थिएटर बचा रहे। आनेवाली पीढिय़ां इसकी देखभाल करती रहें। राज कपूर कहा करते थे, 'द शो मस्ट गो ऑन' (सत्याग्रह)

 


Date : 31-Oct-2019

जय मकवाना 
हरिता कांडपाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पहुंचे। इसी दिन गुजरात में सरदार सरोवर बांध के पास केवडिय़ा में स्थित इस 182 मीटर ऊंची प्रतिमा के लोकार्पण का एक साल भी पूरा हो रहा है। इसके साथ ही पीएम मोदी केवडिय़ा कॉलोनी के आसपास कुछ परियोजनाओं का भी शुभारंभ करेंगे। लेकिन, मीडिया में इस तरह की खबर है कि पीएम केवडिय़ा कॉलोनी को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की घोषणा कर सकते हैं या बाद में ऐसा हो सकता है। 
जमीन खोने का डर
यहां रहने वाले एक शख्स दिलीपभाई ने बीबीसी से बात करते हुए अपने इन्हीं चिंताओं के बारे में बताया। दिलीपभाई श्रेष्ठ भारत भवन के निर्माण में अपनी जमीन खो दी।
उन्होंने कहा, हमें विशेष दर्जा नहीं चाहिए। हम नहीं चाहते कि केवडिय़ा को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाए या विशेष दर्जा दिया जाए। लेकिन, हमें सुनता कौन है? ये उनकी सरकार है और वो जो चाहें कर सकते हैं। हमारी जमीन जबरन छीन ली गई और उस पर निर्माण कार्य चल रहा है। हमारी रोजी-रोटी दांव पर है। यहां लोगों को डर है कि अगर केवडिय़ा और उसके आसपास का इलाका सीधे केंद्र सरकार के तहत आता है तो वो अपनी जमीन खो सकते हैं।
इसी तरह का डर जाहिर करते हुए दिलीपभाई कहते हैं, विशेष दर्जे के बाद वो कोई भी ज़मीन अधिग्रहण कर सकते हैं। दिलीपभाई का आरोप है कि पीएम मोदी के राष्ट्रीय एकता दिवस मनाने को लेकर इलाके में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं। इसके चलते आसपास के गांवों के कई आदिवासी अपनी रोजी रोटी खो चुके हैं। दिलीपभाई की ज़मीन भी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के पास बेस्ट भारत भवन के निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई है।
उन्होंने बताया कि उन्हें इसके एवज़ में 40-45 किमी। दूर जमीन दी जा रही थी लेकिन उन्होंने इसे लेने से इंकार कर दिया। दिलीपभाई कहते हैं, हम अपनी जमीन नहीं देंगे। इन आदिवासियों के बीच काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता लखन मुसाफिर ने बीबीसी गुजराती को बताया कि यहां पर केंद्रशासित प्रदेश बनने को लेकर काफ़ी चर्चा हो रही है।
लखन मुसाफिर कहते हैं, पिछले पांच सालों से ऐसी कई अटकलों के बारे में सुन रहे हैं। चाहे जो भी वजह हो लेकिन हम नहीं चाहते कि केवडिय़ा कॉलोनी के लिए, केंद्र शासित प्रदेश या विशेष दर्जा घोषित किया जाए।
क्या सरकार हमारी ज़मीन लेना चाहती है या यहां लगे प्रतिबंध हटाना चाहती है? हमारी जमीन पहले ही ले ली गई है। हमारी रोज़ी-रोटी छीन ली गई है। अब वो लोग हमें यहां से दूर भेजना चाहते हैं? क्या बाहर की कंपनियों को हमारी जमीन दी जा रही है? कई इमारतें बन रही हैं लेकिन इससे स्थानीय आदिवासियों को क्या फायदा है?
मुसाफिर कहते हैं, असीमित शक्तियों के साथ सरकार कुछ भी कर सकती है, लेकिन हम अपनी जमीन कभी नहीं देंगे। क्या यहां के लोग एक रुकावट हैं?
यहां तक कि आदिवासियों के अधिकारों के लिए लडऩे वाले आनंद मजगांवकर कहते हैं कि यहां का आदिवासी समुदाय चिंता में है।
बीबीसी गुजराती को उन्होंने बताया, सरकार ऐसा कोई कदम उठा सकती है, इस तरह की अटकलों ने आदिवासी समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी है। पंचायत विस्तार अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम (पेसा) के मुताबिक इसके लिए सरकार को पहले ग्राम सभा से इजाजत लेनी होगी। ये अधिनियम आदिवासियों को विशेष शक्तियां देता है। क्या सरकार केंद्र शासित प्रदेश या विशेष दर्जे के जरिए इस अधिनियम को खत्म करना चाहती है?
सरकार के इस कदम का विरोध करने के लिए ग्राम सभा ने पिछले दिसंबर से तीन या चार बैठकें की हैं। फिर भी क्यों सरकार इस कदम पर विचार कर रही है?
आनंद मजगांवकर ने पूछा, इस इलाके को केंद्र शासित प्रदेश बनाने या विशेष दर्जा देने की जरूरत क्यों है? क्या स्थानीय लोग सरकार के लिए एक बाधा की तरह हैं?
क्या कहती हैं मेधा पाटकर
उन्होंने कहा, हम ये जानना चाहते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी 31 अक्टूबर को कौन-सी 30 परियोजनाओं का उद्घाटन करना चाहते हैं। हाईकोर्ट ने स्टैचू ऑफ यूनिटी के आसपास के गांवों जैसे केवडिय़ा, कोठी, नवगाम और अन्य गावों के खेतों से नई सडक़ बनाने पर रोक लगाई है। इन गावों की फसलों के बीच से सडक़ बनाना इस रोक के खिलाफ है।
मेधा पाटेकर कहती हैं, यहां पर पेसा लागू है, तो ग्राम सभा की अनुमति के बिना कुछ भी करना गैर-कानूनी है। अगर पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर यहां के 72 गांवों को बर्बाद किया गया तो लोग सरकार को कभी माफ नहीं करेंगे। अगर विपक्ष इस मुद्दे को नहीं उठाता है तो ये माना जाएगा कि पार्टियां आदिवासियों का पक्ष नहीं ले रही हैं।
क्या केवडिय़ा को विशेष दर्जा मिलेगा?
हालांकि, गुजरात सरकार ने केवडिय़ा को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की किसी भी योजना से इंकार किया है। गुजरात के मुख्य सचिव जे. एन. सिंह ने कहा कि ये मीडिया रिपोर्ट्स बिना किसी आधार के हैं।
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट दी गई थी जिसके मुताबिक केवडिय़ा को विशेष दर्जा दिया जाएगा। इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनने से केवडिय़ा के आसपास पर्यटन में बढ़ोतरी हुई है और इसके बेहतर प्रबंधन के लिए ऐसे कदम पर विचार किया जा रहा है।
रिपोर्ट में ये भी लिखा गया था कि केवडिय़ा को मौजूदा ग्राम पंचायत से अलग किया जाएगा।
इंडियन एक्सप्रेस ने जे। एन। सिंह के हवाले से लिखा था, ग्राम पंचायत केवडिय़ा कॉलोनी की प्रशासनिक ज़रूरतों को पूरा करने में असमर्थ है। यहां चीजें आसान करने के लिए हम इसे स्पेशल ज़ोन बनाने पर काम कर रहे हैं।
इस रिपोर्ट में नर्मदा के जिला कलेक्टर और स्टैचू ऑफ यूनिटी के सीईओ आईके पटेल से भी बात की गई है।
आईके पटेल के हवाले से लिखा गया है, केवडिय़ा कॉलोनी में सफाई और पानी की आपूर्ति जैसी बुनियादी नागरिक जरूरतों को ग्राम पंचायत पूरा नहीं कर सकती। सरकार जल्द ही केवडिय़ा कॉलोनी के लिए एक अलग निकाय बनाने पर फैसला लेगी। (बीबीसी)

 

 

 


Date : 31-Oct-2019

अव्यक्त
मार्च, 1930 में हुए गांधीजी के नमक सत्याग्रह या दांडी मार्च की तैयारी के दौरान एक कथित भडक़ाऊ भाषण के आरोप में सरदार पटेल को गिरफ़्तार कर लिया गया। औपनिवेशिक सरकार की पुलिस ने जेल में सरदार के साथ दुव्र्यवहार भी किया।
इस घटना पर 12 मार्च, 1930 के ही दिन गांधीजी ने जेल में किसी भी कैदी के साथ दुव्र्यवहार पर यह तीखी टिप्पणी की थी-
‘...सरदार कहां और किस हालत में हैं। वे एक काल-कोठरी में हैं— वैसी ही काल कोठरी जैसी कि आमतौर पर होती है। वहां कोई रोशनी नहीं है। उन्हें बाहर सोने की सुविधा नहीं है।
उन्हें जो खाना दिया जा रहा है, उससे उन्हें पेचिश होने की संभावना है, क्योंकि भोजन में तनिक सी गड़बड़ी होने से ही उन्हें यह बीमारी हो जाती है। उन्हें धार्मिक पुस्तकों के अलावा और कोई पुस्तक देने की मनाही है। एक सत्याग्रही की हैसियत से वे विशेष व्यवहार की अपेक्षा नहीं रखते।
लेकिन किसी साधारण से साधारण अपराधी को भी, यदि उससे सुरक्षा को कोई खतरा न हो, तो ऐसी गर्मी के मौसम में खुले आकाश के नीचे सोने की इजाजत क्यों नहीं दी जानी चाहिए?
यदि किसी जरायमपेशा व्यक्ति को भी पढऩे-लिखने के लिए रोशनी की जरूरत हो, तो उसके लिए उसका प्रबंध क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
क्या किसी हत्यारे को भी कुछ पढक़र अपने अन्दर सुबुद्धि जगाने से रोकना उचित है? ...लेकिन यह तो जेल-व्यवस्था में सुधार का सवाल है। सरदार वल्लभभाई ऐसे व्यक्ति नहीं हैं कि अगर उन्हें मनुष्य के लिए आवश्यक सुख-सुविधाओं से वंचित रखा जाएगा, तो उनका हौसला टूट जाएगा।
क्या विद्वान पत्रकार और नाटककार श्रीयुत खाडिलकर को अभी कुछ ही दिन पहले इसी प्रकार के दुव्र्यवहार का शिकार नहीं होना पड़ा? भारतीय जेलों में भद्दा और अशोभन व्यवहार करके सत्याग्रह की भावना को खत्म नहीं किया जा सकता।’
गांधीजी के इस वक्तव्य के तुरंत बाद सरदार के साथ जेल में अच्छा व्यवहार शुरू कर दिया गया। जरूरी साहित्य और साफ-सुथरा भोजन मिलना शुरू हो गया।
आजकल ऐसा होता है कि नहीं यह कह नहीं सकते। कुछ समय पहले भारत के विधि आयोग ने संयुक्त राष्ट्र संघ के एक कन्वेंशन के आधार पर भारत सरकार से सिफारिश की है कि जो भी लोकसेवक हिरासत में यातना के दोषी पाए जाएं, उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिले।
कुछ समय पहले एक रिपोर्ट आई थी कि 2010 से 2015 के दौरान भारतीय पुलिस की हिरासत में 591 विचाराधीन कैदियों की मौत हो गई। इनमें से कुछ मौतें स्वाभाविक भी हो सकती हैं, लेकिन बाकी मौतों के बारे में क्या कहेंगे?
देश के पहले गृहमंत्री और सत्याग्रह के दौरान पुलिस हिरासत में खुद उत्पीडऩ के शिकार सरदार पटेल की जन्मदिन के अवसर पर बाकी सरकारी तामझाम के साथ-साथ क्या इसपर भी चर्चा नहीं होनी चाहिए?

 


Date : 31-Oct-2019

संयुक्त राष्ट्र समर्थित स्टॉप टीबी पार्टनरशिप संगठन ने बताया है कि बीपीएल नाम का की यह दवा कम आय वाले देशों को ग्लोबल ड्रग फैसिलिटी यानी जीडीएफ के जरिए मुहैया कराई जाएगी। स्टॉप टीबी पार्टनरशिप का गठन 2001 में टीबी की दवा मुहैया कराने के लिए किया गया था जो कीमतें कम रखने पर भी मोलभाव करता है।

दूसरे इलाजों के लिए वकालत करने वाले गुट इससे आधी कीमत रखने की बात कह रहे थे। बीपीएल एक दवा है जो टीबी के दूसरे इलाजों की तुलना में आसान है। इसमें एंटीबायोटिक दवाओं के एक मिश्रण का इस्तेमाल करीब दो साल की अवधि के लिए करना होता है। दवाओं का नया मिश्रण बीमारी की दवा प्रतिरोधी विकृतियों पर पूरा ध्यान देता है। इसमें टीबी एलायंस की नई स्वीकृत दवा प्रिटोमानिड के साथ लिनेजॉलिड और जॉन्सन एंड जॉन्सन की बेडाक्वीलिन होती है।
प्रिटोमानिड की कीमत एक आदमी के इलाज के लिए करीब 364 डॉलर होती है। प्रिटोमानिड बीते 40 सालों में तीसरी दवा है जिसे दवा प्रतिरोधी टीबी के इलाज के लिए मंजूरी दी गई है। इससे पहले बेडाक्वीलिन और डेलामानिड को ही टीबी के इलाज के लिए मंजूरी मिली थी।
कई संगठन लंबे समय से बेडाक्वीलिन और डेलामानिड की ऊंची कीमतों की आलोचना करते हैं। गैर लाभकारी संस्था मेडिसिन संस फ्रंटियर्स यानी एमएसएफ ने तो जॉन्सन एंड जॉन्सन के खिलाफ बकायदा सार्वजनिक अभियान चला रखा है। जॉन्सन एंड जॉन्सन की बेडाक्वीलिन की छह महीने के लिए खुराक की कीमत 400 डॉलर है। एमएसएफ की दलील है कि बेडाक्वीलिन को 25 सेंट प्रति दिन के मुनाफे पर बनाया और बेचा जा सकता है और इसकी कीमत पूरे इलाज के लिए 500 डॉलर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। हालांकि स्टॉप टीबी पार्टनरशिप का कहना है कि अत्यधिक दवा प्रतिरोधी टीबी के इलाज के लिए नियमानुसार दवाओं पर 2000 से 8000 डॉलर प्रति कोर्स का खर्च है जो कम से कम 20 महीने चलता है।
ट्यूबरकुलोसिस या फिर क्षय रोग का बैक्टीरिया खांसी जुकाम से फैलता है। सरकार सालों से अभियान चला रही है कि दो हफ्ते से ज्यादा खांसी टीबी हो सकती है। लेकिन इसके बावजूद देश में टीबी को लेकर संजीदगी नजर नहीं आती।
टीबी अलायंस ने अमरीकी दवा बनाने वाली कंपनी माइलान एनवी को उच्च आय वाले बाजारों के लिए प्रिटोमानिड बनाने का लाइसेंस दिया था। इसके साथ ही कंपनी को कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए भी लाइसेंस मिला था, जहां टीबी के ज्यादा मामले सामने आते हैं लेकिन यह लाइसेंस सिर्फ उसी कंपनी के लिए नहीं है।
स्टॉप टीबी पार्टनरशिप का कहना है कि वह विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशानुसार दवाओं की सप्लाई शुरू कर देगी हालांकि उसका यह भी कहना है कि वह सीधे उन देशों को भी दवा बेचेगी जिन्हें इसकी जरूरत है। कम आय वाले देशों में जीडीएफ के जरिए यह दवा बेची जाएगी। वहां उनकी कीमत वही होगी जो तय की गई है। लेकिन दूसरे देशों के लिए उनके हिसाब से कीमत बातचीत के जरिये तय होगी। दवा 26 गोली वाली शीशी में होगी और छह महीने के इलाज के लिए सात शीशियों की जरूरत होगी। भारत में मैक्लियोड्स फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड को भी प्रिटोमानिड बनाने का लाइसेंस मिला है। 
एनआर/एके (रॉयटर्स)


Date : 30-Oct-2019

हाल ही में एक समाचार पत्र में पढऩे को मिला कि आंध्रप्रदेश के तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर में 12 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक धन चढ़ावे के रूप में और 9 हजार किलो स्वर्णाभूषण के रुप में भक्तों ने वहां चढा़ए तो इस अपार धनराशि और हजारों किलो स्वर्णाभूषण मंदिरों को मिलने के क्या फायदे जिस देश के हजारों किसान बैंकों के तगादों से परेशान होकर प्रतिवर्ष आत्महत्या कर रहे हैं (अपने कृषि ऋण न चुका सकने के कारण।
बहुत से अमेरिकन, भारतीय राजनीति और समाचारों में भी रुचि रखते हैं। हमारे यूनिवर्सिटी (कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, अमरीका) के एक प्रोफेसर मित्र ने कहीं पढ़ा होगा कि मुंबई का अरब-खरबपति सिद्धिविनायक मंदिर महाराष्ट्र के उन किसानों के परिवारों की आर्थिक मदद करता है जो अपने कृषि ऋणसे परेशान होकर आत्महत्या कर चुके हैं। तो उस मित्र ने एक तर्कसंगत टिप्पणी कि सिद्धि धविनायक मंदिर किसान के आत्महत्या का इंतजार ही क्यों करता है?  (यानी कि कब आप आत्महत्या करोगे तो मैं आपके परिवार की आर्थिक सहायता के लिए तैयार बैठा हूं) वही आर्थिक सहायता सिद्धि धिविनायक मंदिर उस किसान के जीते जी ही क्यों नहीं कर देता यानी उसका ऋण ही क्यों नहीं चुकता कर देता। 
कर्जमुक्त हो जाने के बाद किसान को न तो आत्महत्या करने की जरुरत पड़ेगी और न ही सिद्धि धिविनायक मंदिर को आजीवन उसके परिवार की आर्थिक सहायता करने की जरुरत होगी। अब सिद्धि धिविनायक मंदिर और देश भर के करोड़पति, अरबपति और खरबपति मंदिर के संचालकों को कौन समझाए कि आप इस अपार धनराशि का कुछ हिस्सा देश के गरीब किसानों को कर्जमुक्त करने में लगाएं। क ोई समझाएगा भी तो भी वे सुनने के लिए तैयार नहीं होंगे लेकिन देश में कानून बनाने वाले (सांसद-विधायक) इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लेंगे कि उनका वेतन बढ़ाया जाय या उन्हें चुनाव हारने के बाद भी पेंशन दिया जाए।
शायद गणेश भगवान (मुंबई का सिद्धि धिविनायक  इन्हीं का मंदिर है) भी इस प्रस्ताव से 100 फीसदी सहमत होंगे कि मंदिर किसान का ऋण चुका दे बजाए उसके आत्महत्या करने के बाद उसके परिवार की आर्थिक सहायता करने के।
भारत के 25 - 30 अरब-खरबपति मंदिर बिल गेट्स और मुकेश अंबानी से भी ज्यादा धनी हैं। लेकिन उनके ये अपार धन किस काम के जो देश के असली पालनहारों (किसानों) के ऋण नहीं चुका सकते। और इससे हास्यास्पद और क्या हो सकता है कि किसान पहले आत्महत्या कर ले फिर उसके बाद वह उसके परिवार की आर्थिक सहायता करेगा!
केंद्र के मोदी सरकार ने कश्मीर से धारा 370 और 35 ए्र हटाने का काम जिस मुस्तैदी के साथ किया उसी मुस्तैदी से कानून बनाकर भारत के करोड़पति, अरबपति और खरबपति मंदिरों की अपार धनराशि से देश के पालनहारों (किसानों) के कर्ज क्यों नहीं चुकता कर दिए जाते? 370 हटाने का तो कई लोगों ने विरोध किया लेकिन संभवत: देश के पालनहारों के कर्जमुक्ति कानून का सारा देश केवल और केवल स्वागत ही करेगा।
-आदित्य शुक्ला


Date : 30-Oct-2019

पुलकित भारद्वाज

गुजरात में कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए अल्पेश ठाकोर और उनके करीबी धवल सिंह झाला को अपनी ही सीटों पर हुए उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा है

हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों के बीच गुजरात से आई एक महत्वपूर्ण ख़बर दब सी गई। ख़बर अल्पेश ठाकोर के अपनी ही विधानसभा सीट राधनपुर से उपचुनाव हारने की। वही अल्पेश ठाकोर जिन्होंने 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का हाथ थामकर भारतीय जनता पार्टी को नाकों चने चबाने के लिए मजबूर कर दिया था। तब अल्पेश के साथ दलित नेता जिग्नेश मेवानी और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल भी कांग्रेस के पक्ष में खड़े थे।

लेकिन कांग्रेस और अल्पेश का यह साथ ज्यादा नहीं चला। अल्पेश की तरफ़ से पार्टी को पहला झटका जुलाई 2018 में मिला। तब उन्होंने राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा प्रत्याशी एस जयशंकर और जुगलजी ठाकोर के पक्ष में मतदान किया था। उनके करीबी कांग्रेसी विधायक धवल सिंह झाला भी ऐसा करने में उनके साथ थे। इस घटना के करीब दस महीने बाद इन दोनों नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी और बीती जुलाई में भाजपा का दामन थाम लिया। अल्पेश और धवल सिंह के दल बदलने की वजह से ही उनकी विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे। इनमें इन दोनों को ही हार का सामना करना पड़ा है।

स्थानीय जानकारों के मुताबिक इस चुनाव में अल्पेश ठाकोर के सबसे बड़े हथियार ही उन पर उल्टे पड़ गए। दरअसल अल्पेश ठाकोर का अब तक का राजनीतिक सफऱ ठेठ जातिवाद और क्षेत्रवाद के दो प्रमुख स्तंभों पर टिका हुआ है जिसकी शुरुआत 2011 में ‘गुजरात क्षत्रिय ठाकोर सेना’ की स्थापना के साथ हुई थी। ठाकोर सेना का गठन आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को दूर करने के नाम पर किया गया था। लेकिन इतने भर से अल्पेश सुर्खय़िां नहीं बटोर पाए। इस मोर्चे पर उन्हें पहली सफलता 2015-16 के दौरान मिली। तब गुजरात में पाटीदार समुदाय अपने लिए ओबीसी कोटे में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनरत था। इससे गुजरात में पाटीदारों व अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच टकराव की स्थिति बन गई। मौके को भांपते हुए अल्पेश ठाकोर ने ओबीसी-एससी-एसटी मंच बनाकर पाटीदारों के विरोध में एक समानांतर आंदोलन खड़ा कर दिया।

किंतु इसके कुछ ही महीने बाद अल्पेश ठाकोर ने अपना रुख बदलते हुए गुजरात में अवैध शराब की बिक्री और बढ़ती बेरोजगारी को लेकर मुहीम छेड़ दी। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस की टिकट पर राधनपुर क्षेत्र से विधायक बन गए। अब वे उन हार्दिक पटेल के साथ भी खड़े थे जो उन पाटीदारों के नेता थे जिनके खिलाफ वे अब तक लड़ रहे थे। 2018 में अल्पेश ने एक बार फिऱ राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा जब ठाकोर सेना पर गुजरात में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा भडक़ाने का आरोप लगा था। हिंदी भाषी राज्यों के लोगों पर ये हमले एक ग़ैरगुजराती मजदूर की गिरफ्तारी के बाद शुरु हुए थे जिस पर एक सवा साल की बच्ची से दुष्कर्म का आरोप था।

अब बात इस उपचुनाव की। राधनपुर विधानसभा क्षेत्र के कुल पौने तीन लाख मतदाताओं में से 70 से 80 हजार वोट अकेले ठाकोर समाज के हैं। ऊपर से अल्पेश को भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के मत मिलना भी लगभग तय सा ही था। लिहाजा इस उपचुनाव में अल्पेश को बड़ी जीत मिलने की संभावनाएं जताई जा रही थीं। इस बात को लेकर अल्पेश ख़ुद भी इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने चुनाव से पहले ही ख़ुद को गुजरात का नया उपमुख्यमंत्री घोषित कर दिया था।

स्थानीय पत्रकार जेके जोशी इस बारे में कहते हैं, ‘अल्पेश ने अपने आप को एक जाति के नेता के तौर पर सीमित कर लिया। इससे राधनपुर के दूसरे समुदायों में उनके प्रति संशय और नाराजगी का भाव धीरे-धीरे घर करने लगा था। यह उपचुनाव एक तरह से ठाकोर बनाम ग़ैरठाकोर के बीच लड़ा गया और अल्पेश भाई को इसका नुकसान उठाना पड़ा।’ दिलचस्प बात यह है कि ख़ुद जाति आधारित राजनीति करने वाले अल्पेश ठाकोर ने अपनी शिकस्त के लिए जातिवादी तत्वों के षडयंत्र को जिम्मेदार ठहराया है।

लेकिन ऐसा नहीं था कि क्षेत्र के दूसरे समुदायों के लोग ही अल्पेश से खफ़़ा थे। जानकारों के अनुसार अल्पेश इस चुनौती से तो जैसे-तैसे पार पा लेते। मुसीबत यह हुई कि वे अपने ठाकोर समुदाय को भी अपने से जोड़े रखने में कामयाब नहीं हो पाए। राधनपुर क्षेत्र से ही ताल्लुक रखने वाले जीतू भाई ठाकोर का इस बारे में कहना है कि ‘अल्पेश ने अपनी राजनीति की शुरुआत समाज की भलाई के नाम पर की थी। लेकिन बाद में उनका लक्ष्य गुजरात में ख़ुद को बालासाहब ठाकरे और ठाकोर सेना को शिवसेना के तौर पर खड़ा करना रह गया। अल्पेश की शह पर ठाकोर सेना के युवा कार्यकर्ता चाहे जिस बात पर शहर-कस्बों की दुकानों में तोड़-फोड़ करते, उत्पात मचाते, दूसरे समुदायों के लोगों से झगड़ते, बाहर वालों को धमकाते।।। इस बात से ठाकोर समाज के बाकी सभ्रांत लोगों को आपत्ति होने लगी थी।’

ठाकोर सेना की तरफ़ से अपने गांव के प्रमुख रह चुके जीतू भाई आगे जोड़ते हैं, ‘कम समय में ज्यादा नाम होने की वजह से अल्पेश का अहंकार बहुत बढ़ गया है। वह सार्वजनिक तौर पर समाज के उन युवाओं की छोटी-छोटी बात पर बेइज्जती करने लगा, जिन्होंने उसे यहां तक पहुंचाने में जी-जान एक कर दिया था। बीते एक साल में अल्पेश के आस-पास रहने वाले उसके कई समर्थकों ने उसका साथ छोड़ दिया। उनमें से कइयों ने इस चुनाव में अल्पेश के विरोध में वोट डाले।’

एक अन्य स्थानीय पत्रकार की मानें तो क्षेत्रवाद फैलाने वाली छवि भी इस चुनाव में अल्पेश के लिए बैकफायर ही साबित हुई। इसके चलते उन्हें हिंदी पट्टी वाले लोगों के तो वोट नहीं ही मिले, बल्कि स्थानीय लोगों ने भी उनसे कन्नी काटना शुरु कर दिया। दरअसल, अल्पेश ठाकोर मूल रूप से राधनपुर (पाटण जिले) की बजाय अहमदाबाद से ताल्लुक रखते हैं। इसके चलते क्षेत्र में उपचुनाव से पहले यह चर्चा भी खूब थी कि ‘दूसरों को भगाने वाले ख़ुद भी तो राधनपुर के लिए बाहरी ही हैं।’ हालांकि अल्पेश को चार हजार वोट से हराने वाले कांग्रेस प्रत्याशी रघु देसाई भी राधनपुर से नहीं आते। लेकिन क्षेत्र में वे अल्पेश की तुलना में कहीं ज्यादा सक्रिय रहते हैं।

राजनैतिक विश्लेषक अल्पेश की शिकस्त को इसलिए भी बड़ी मान रहे हैं क्योंकि केंद्र और प्रदेश दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। ऐसे में माना जा रहा था कि सामान्य समझ वाला वोटर भी भाजपा प्रत्याशी के ही पक्ष में वोट डालेगा ताकि उसके क्षेत्र के विकास कार्यों में कोई अड़चन पैदा न हो। ऊपर से गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का गृहराज्य भी है और लोकसभा चुनाव में यहां की सभी 26 सीटें भाजपा की झोली में गई थीं। वैसे ये कयास गलत भी नहीं थे और शायद इसीलिए अल्पेश ठाकोर सम्मानजनक मत हासिल करने में सफल रहे। लेकिन फिर भी ये सभी वजहें उन्हें जीत दिलाने में नाकाम साबित हुईं।

राधनपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी इस बारे में नाम न छापने की शर्त पर एक काम की बात बताते हैं, ‘अल्पेश को पार्टी का टिकट मिलने के बाद हमारे स्थानीय कार्यकर्ताओं को बड़ा धक्का लगा था। वे इस बात को नहीं भूले थे कि उनकी ही वजह से विधानसभा चुनाव के दौरान क्षेत्र में उनकी जमकर किरकरी हुई थी। नतीजतन हमारे लाख समझाने के बावजूद हमारे कई कार्यकर्ताओं ने इस चुनाव से दूरी बना ली।’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘कार्यकर्ताओं को बिदकाने में अल्पेश ठाकोर के लटक-झटक वाले अंदाज ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। वे किसी शहरी नेता की तरह आम समर्थकों से एक दायरा बनाकर चलते हैं। जबकि राधनपुर जैसी ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली सीट पर लोगों से घुल-मिलकर ही राजनीति की जा सकती है।’ भाजपा से जुड़े इन सूत्र के शब्दों में, ‘क्षेत्र में भाजपा के कुछ कद्दावर नेताओं को यह डर भी था कि अल्पेश के इस सीट से जीत हासिल करने पर उनमें से कोई भी निकटतम भविष्य में पार्टी के टिकट पर दावेदारी नहीं कर पाएगा। ऐसे में हमें कुछ बूथों पर भितरघात की भी ख़बरें मिली हैं।’
जानकारों के मुताबिक अल्पेश के बार-बार अपने स्टैंड से पलट जाने की वजह से भी उनकी छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा है। गौरतलब है कि ठाकोर सेना के गठन के बाद अल्पेश ने सार्वजनिक तौर पर कई बार राजनीति में कदम न रखने की प्रतिज्ञा ली थी। लेकिन उनकी इस प्रतिज्ञा का हश्र सभी के सामने है। इसके बाद उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों से पाटीदारों की मुखालफत करवाकर गुजरात को एक बार फिऱ कौमी हिंसा के मुहाने पर ला खड़ा किया (हिंदू-मुसलमान दंगों के अलावा गुजरात कई बार अलग-अलग हिंदू जातियों के बीच हुए दंगों का भी गवाह रह चुका है)। लेकिन 2017 का विधानसभा चुनाव आते-आते अल्पेश ख़ुद हार्दिक पटेल के करीबी बन गए।
इससे पहले उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों में से किसी के साथ न जाने जैसी बातें भी कई बार दोहराई थीं। लेकिन वे पहले कांग्रेस जुड़े और भारतीय जनता पार्टी को जी भर के कोसने के बाद उसके पाले में आ गए। ऐसा करते समय वे शायद भूल गए थे कि उनसे पहले राधनपुर के मतदाता 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में दल-बदलकर चुनाव लडऩे वाले विधायकों को घर का रास्ता दिखा चुके हैं।
उपचुनाव में अल्पेश ठाकोर और धवल सिंह झाला की हार के बाद कांग्रेस में एक स्वाभाविक खुशी का माहौल तो है ही लेकिन इससे पार्टी को बड़ा फायदा भी पहुंचा है। गुजरात में कांग्रेस के एक मौजूदा विधायक इस बारे में सत्याग्रह को बताते हैं कि ‘अल्पेश और झाला के बाद पार्टी के कुछ अन्य विधायकों में भी दल-बदलने को लेकर सुगबुगाहट होने लगी थी। आशंका थी कि राज्यसभा की चार सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनावों में वे भी भाजपा प्रत्याशियों को अपना समर्थन दे सकते हैं। लेकिन इन नतीजों के बाद उनके हौंसले पस्त होते दिख रहे हैं।’