विचार/लेख
कुछ संकरे समुद्री रास्ते अब व्यापार ही नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का केंद्र बन गए हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ताइवान और मलक्का के जलडमरूमध्य अब दबाव की इस नई रणनीति का हिस्सा बन रहे हैं।
डॉयचे वैले पर कैस्र्टन क्निप की रिपोर्ट –
क्या हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोडऩे वाले मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने पर शुल्क यानी टॉल लगाना फायदे का सौदा हो सकता है? इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुर्बाया युधि सदेवा ने अप्रैल के अंत में यह बात उछाली। उन्होंने कहा, ‘अगर इसे इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच बांटा जाए, तो यह काफी फायदेमंद हो सकता है।’
बाद में, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह बात गंभीरता से नहीं कही थी। इसी बीच, इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगियानो ने कहा कि मलक्का जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और उनका देश इस अहम जलमार्ग में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही का समर्थन करता है।
फिर भी, सदेवा के बयान ने यह आशंका तो पैदा कर ही दी कि समुद्री रास्तों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक फायदा हासिल करने के लिए हो सकता है, सिर्फ होर्मुज में नहीं, बल्कि दूसरे जलमार्गों पर भी। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने लिखा, ‘होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से इस तरह के अन्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर एशियाई नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ गई है।’
खासकर मलक्का जलडमरूमध्य को लेकर चिंताएं हैं। यह पूर्वी एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच सबसे अहम समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए दुनिया का 22 फीसदी समुद्री व्यापार होता है।
समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम
मौजूदा दौर में समुद्री लूट और क्षेत्रीय तनाव ही नहीं, अन्य मुद्दे भी चिंता बढ़ा रहे हैं। पिछले साल नवंबर में सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने इस नए खतरे को लेकर सावधान किया। इस थिंकटैंक ने लाल सागर में हूथी विद्रोहियों के हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि अब गैर-राज्य ताकतें भी वैश्विक व्यापार को बाधित करने में सक्षम हैं। नतीजतन, कई शिपिंग कंपनियां स्वेज नहर से दूरी बना रही हैं और अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर लंबा रास्ता चुन रही हैं, जिसके कारण सप्लाई चेन में देरी और कीमतों में इजाफा हो रहा है।
ऑस्ट्रियाई सेना के पूर्व कर्नल और ऑस्ट्रिया इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी के वरिष्ठ सलाहकार निकोलाउस शोलिक मानते हैं कि यह सब भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन में एक बुनियादी बदलाव के संकेत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, ‘आज हम एक घटनाक्रम के नतीजे देख रहे हैं, जिसमें कुछ देश यह मानने लगे हैं कि वे रणनीतिक रूप से अहम समुद्री जलडमरूमध्यों पर कानूनी रूप से प्रभुत्व जमा सकते हैं।’ उन्होंने आगाह किया कि अगर होर्मुज, मलक्का या ताइवान के रास्ते भू-राजनीतिक दबाव का जरिया बनते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के एशिया विश्लेषक क्रिस्टियान विर्थ भी इससे सहमत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि किसी समुद्री मार्ग की कमजोरी इन तीन बातों पर टिकी होती है: ट्रांसपोर्ट समझौते, वैकल्पिक रास्ते और उसके आसपास के इलाके में राजनीतिक स्थिति। जो मार्ग जितना ज्यादा अहम होता है, उसे अनदेखा करना उतना ही कठिन होता है, और उसकी रणनीतिक अहमियत भी उतनी ही ज्यादा होती है।
भूगोल फिर बना ताकत का नया आधार
होर्मुज जलडमरूमध्य इस समय जोखिम में नजर आ रहा है, जहां से होकर दुनिया भर के लिए बड़ी मात्रा में तेल और गैस जाती है। लेकिन विशेषज्ञ शोलिक कहते हैं कि हमें सिर्फ होर्मुज के तनाव पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उनका मानना है कि अगर चीन और ताइवान के बीच तनाव बढ़ता है, तो ताइवान जलडमरूमध्य और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। ताइवान जलडमरूमध्य के साथ ही मलक्का जलडमरूमध्य से भी एशियाई व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अनुसार, आज की दुनिया में ‘भूगोल की वापसी’ हो रही है। होर्मुज, बाब-एल-मंदेब या ताइवान जैसे जलडमरूमध्य अब सिर्फ समुद्री मार्ग नहीं रह गए हैं, बल्कि वे वैश्विक राजनीति में ताकत का हथियार बन चुके हैं। इस इंस्टीट्यूट का यह भी कहना है कि दुनिया के बढ़ते जुड़ाव ने देशों को एक-दूसरे पर अधिक निर्भर बना दिया है। इससे देश अब एक दूसरे पर ज्यादा दबाव भी बना सकते हैं।
विर्थ कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में यह साफ है कि अहम समुद्री जलडमरूमध्य में ‘फ्री ट्रांजिट' यानी जहाजों को स्वतंत्र रूप से गुजरने का अधिकार होता है। इसका मतलब है कि सभी जहाज, चाहे वे सैन्य हों या असैन्य, बिना रोक-टोक अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र से गुजर सकते हैं। इसीलिए विर्थ कहते हैं कि किसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य को बंद करना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन होगा।
समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि तो युद्धपोतों को भी उन तटीय जल सीमाओं के पास से शांतिपूर्ण रूप से गुजरने का अधिकार देती है, जो जलडमरूमध्य के आसपास स्थित देशों की सीमा में आते हैं। इन रास्तों पर कोई टोल या फीस भी नहीं देनी होती। यह टोल सिर्फ पनामा और स्वेज नहरों जैसे क=त्रिम रूप से तैयार जलमार्गों पर ही लिया जाता है।
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने पिछली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार के 2022 के आदेश को रद्द करते हुए स्कूल और कॉलेज के छात्रों को हिजाब, जनेऊ, पगड़ी, शिव माला और रुद्राक्ष पहनने की अनुमति दे दी है.
सरकारी आदेश में सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी शैक्षणिक संस्थानों में निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ "सीमित सामुदायिक या आस्था-आधारित प्रतीकों" की अनुमति दी गई है. यह नया नियम आगामी शैक्षणिक वर्ष से लागू होगा.
आदेश में कहा गया है, "हालांकि, ऐसे पारंपरिक और रीति-रिवाज आधारित प्रतीक यूनिफॉर्म के साथ सामंजस्यपूर्ण होने चाहिए और वे यूनिफॉर्म की मूल भावना या मक़सद को प्रभावित, परिवर्तित या कमज़ोर नहीं करने चाहिए."
इसमें यह भी कहा गया है कि इससे "अनुशासन, सुरक्षा और छात्र की पहचान" में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए. परीक्षाओं में उपस्थिति से जुड़े नियम पहले जैसे ही रहेंगे.
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा ने पत्रकारों से कहा, "कई घटनाएं हुई हैं. 24 अप्रैल को एक छात्र से जनेऊ हटाने के लिए कहा गया था. ऐसी बातें हमारे बच्चों की शिक्षा के रास्ते में नहीं आनी चाहिए. मुझे लगता है कि हमें यह फ़ैसला बहुत पहले कर लेना चाहिए था."
उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद फ़रवरी 2022 में कर्नाटक और देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शनों का कारण बना था. हाई कोर्ट की विभाजित पीठ के फ़ैसले के बाद यह मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
रुख़ में बदलाव क्यों?
कांग्रेस का यह क़दम ऐसे समय आया है, जब बेंगलुरु के एक कॉलेज ने मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश के लिए आयोजित सीईटी परीक्षा में जनेऊ पहनकर आए छात्रों को प्रवेश देने से रोक दिया था.
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह आदेश उस समय आया है, जब दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में मुस्लिम मतदाताओं केकांग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को समर्थन न देने से पार्टी को झटका लगा था.
समुदाय की मांग थी कि सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारा जाए क्योंकि वहां 60 प्रतिशत से अधिक मतदाता मुस्लिम समुदाय से थे. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने समर्थ शमनूर के पक्ष में फ़ैसला किया.
यह सीट समर्थ के दादा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शमनूर शिवशंकरप्पा के पास थी. समर्थ के पिता एसएस मल्लिकार्जुन सिद्धारमैया सरकार में मंत्री हैं और उनकी मां लोकसभा सदस्य हैं.
इस विवाद के बाद पार्टी ने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रमुख और एमएलसी अब्दुल जब्बार को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया. वहीं मुख्यमंत्री ने अपने राजनीतिक सलाहकार और एमएलसी नसीर अहमद को भी हटा दिया.
समर्थ ने 5,708 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की लेकिन एसडीपीआई को 18,975 वोट मिले. इस उपचुनाव ने मुस्लिम समुदाय के भीतर काफ़ी बहस छेड़ दी.
सरकार का यह ताज़ा क़दम ऐसे समय आया है, जब राज्य मुस्लिम संगठनों के महासंघ की ओर से शनिवार को बेंगलुरु में एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया जाना है.
उडुपी था केंद्र
हिजाब विवाद दिसंबर 2021 के अंत में उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ था. तब छह मुस्लिम छात्राओं को नई यूनिफॉर्म नीति का उल्लंघन करते हुए हिजाब पहनने के कारण क्लास में प्रवेश नहीं दिया गया.
दो छात्राओं को हिजाब पहनने पर क्लास छोड़ने के लिए कहा गया. 12 छात्राओं ने विरोध किया लेकिन आख़िरकार चार छात्राएं नई नीति के अनुसार, चलने को तैयार हो गईं.
चिक्कमंगलुरु ज़िले के कोप्पल सरकारी फर्स्ट ग्रेड कॉलेज में भी ऐसी ही स्थिति पैदा हुई, लेकिन वहां यह विरोध के रूप में सामने आई. तब लड़के भगवा शॉल पहनकर कॉलेज पहुंचे.
हालांकि कॉलेज ने मुस्लिम धार्मिक नेताओं, अभिभावकों और अन्य स्थानीय नेताओं की बैठक बुलाकर मामले को सुलझा लिया. वहां हिजाब और भगवा शॉल दोनों पर प्रतिबंध लगाया गया जबकि लड़कियों को यूनिफॉर्म से मेल खाने वाला दुपट्टा या स्कार्फ से सिर ढकने की अनुमति दी गई.
लेकिन यह मुद्दा धीरे-धीरे राज्य के कई अन्य ज़िलों में फैल गया. मंड्या ज़िले में हिजाब पहने छात्रा मुस्कान ख़ान के साथ नारेबाज़ी और विरोध की घटना हुई. उनके धार्मिक नारे लगाने के बाद कई हिस्सों में विरोध और प्रतिवाद शुरू हो गए, जिसके कारण कुछ दिनों के लिए स्कूल बंद करने पड़े.
तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके बाद सरकार के आदेश को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन तीन जजों की बेंच ने सरकार के आदेश को बरक़रार रखा. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहाँ यह अब भी लंबित है.
हिजाब पर कांग्रेस सरकार के फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी नेता आर. अशोक ने कहा, "कर्नाटक की कांग्रेस सरकार दावणगेरे उपचुनाव के परिणामों और अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक के भीतर बढ़ते असंतोष से घबरा गई है.''
''अपनी गिरती हुई वोट बैंक राजनीति को बचाने और 'डैमेज कंट्रोल' करने की हताश कोशिश में सिद्धरमैया सरकार ने एक बार फिर हिजाब विवाद को ज़िंदा कर दिया है. यह कांग्रेस की पुरानी रणनीति है, जब शासन में विफल हो जाओ तो ध्रुवीकरण का सहारा लो."
उन्होंने आगे कहा, सिद्धरमैया की तथाकथित 'धर्मनिरपेक्षता' की सच्चाई अब सबके सामने आ गई है. इस सरकार में हिजाब को स्वतंत्रता के नाम पर हरी झंडी दी जाती है जबकि भगवा शॉल पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाता है.''
''यह भेदभावपूर्ण नीति, जिसमें एक धर्म की पहचान को अधिकार और दूसरे की पहचान को नियमों का उल्लंघन माना जाता है. इससे साबित होता है कि कांग्रेस के लिए 'सेक्युलरिज्म' केवल हिंदुओं को निशाना बनाने और अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का एक साधन भर है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-सुमैया नस्त्र
दशकों से फ़ारस की खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा भरोसे को स्वाभाविक और गारंटीशुदा माना जाता था, लेकिन ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल की जंग इस समीकरण को बदलते दिख रहे हैं।
जंग के दौरान गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के देशों ने अपने महत्वपूर्ण ठिकानों को ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों से निशाना बनाए जाने से पैदा हुई रक्षा चुनौतियों को न केवल मिसाइलों के रास्ते की निगरानी की बल्कि अमेरिकी मदद पर भी सावधानीपूर्वक नजऱ रखी।
उन्होंने ख़ुद को एक ऐसी जंग में खिंचा पाया जिसके बारे में उनके अधिकारियों का भी मानना था कि इस जंग से पहले उनसे सलाह तक नहीं ली गई।
क्या इस संकट ने अमेरिका और खाड़ी के अरब देशों के बीच सुरक्षा समझौतों की सीमा को सामने ला दिया है?
क्या यह युद्ध अमेरिकी सैन्य शक्ति पर उनकी निर्भरता को कम करेगा या इसके उलट इसे और मज़बूत करेगा?
ब्रिटेन का विकल्प और सोवियत संघ का डर
गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के सभी देशों का अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग है। अमेरिका सऊदी अरब, क़तर, बहरीन और कुवैत को ‘नेटो के बाहर के प्रमुख सहयोगी’ देश मानता है और संयुक्त अरब अमीरात को ‘प्रमुख रक्षा साझेदार’ समझता है।
फारस की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी दिलचस्पी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई, जब उसने इस क्षेत्र में एक प्रमुख विदेशी शक्ति के रूप में धीरे-धीरे ब्रिटेन की जगह ले ली।
फारस की खाड़ी में अमेरिकी सुरक्षा प्रणाली दो फैक्टर पर आधारित थी- इलाके की भौगोलिक अहमियत और इसका विशाल तेल भंडार, साथ ही सोवियत प्रभाव का मुकाबला करने का रणनीतिक लक्ष्य।
द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से दो साल पहले ही अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने देश के लिए तेल और फारस की खाड़ी क्षेत्र के भविष्य की अहमियत को भांप लिया था।
साल 1943 में उन्होंने एलान किया था, ‘अमेरिका की रक्षा के लिए सऊदी अरब की रक्षा बहुत अहम है।’ रूजवेल्ट ने ये टिप्पणी सऊदी अरब को सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान करने और देश के साथ संबंधों को मज़बूत करने की जरूरत को सही ठहराने के लिए की थी।
साल 1945 में फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने मिस्र की स्वेज़ नहर में स्थित ‘ग्रेट बिटर लेक’ के जलक्षेत्र में युद्धपोत यूएसएस क्विंसी पर किंग अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद से मुलाक़ात की। हालांकि उनकी चर्चाओं के आधिकारिक रिकॉर्ड में तेल का कोई जिक़्र नहीं है, फिर भी इस मुलाकात को आम तौर पर दोनों देशों के बीच ‘खास रिश्तों’ की शुरुआत माना जाता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर और लेखक जेफरी एफ. गर्श ने बीबीसी अरबी को बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका के पास ‘दुनिया में सैन्य अड्डों और रसद सहायता का सबसे व्यापक और विस्तृत नेटवर्क था।’
उन्होंने आगे कहा कि उस समय अमेरिकी सेना ने ‘अपने विमर्श और नीतियों को विशेष रूप से फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र पर केंद्रित किया था। 1949 तक, जर्मनी में हवाई अड्डे के बाद, दहरान सबसे सक्रिय अमेरिकी विदेशी हवाई अड्डा बन गया था और युद्ध के बाद के समय में अमेरिकी वैश्विक अभियानों और तालमेल के लिए महत्वपूर्ण था।’
गर्श बताते हैं कि उस दौरान सैन्य अड्डे के समझौतों पर हस्ताक्षर करवाने में अमेरिकी सैन्य और आर्थिक सहायता के वादों ने अहम भूमिका निभाई। उनका कहना है कि अमेरिका सऊदी अरब के गोला-बारूद और सैन्य हथियारों की मांग को मानने के लिए तैयार था क्योंकि उसे डर था कि अगर वह इनकार करता है, तो सऊदी अरब सोवियत संघ से हथियार खरीदने लगेगा।
उनके मुताबिक़, बाहरी और क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ 'जंग के बाद के दशक में सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी समझौतों को बढ़ाने का मुख्य कारण' बनी रहीं। हालाँकि अमेरिका के साथ गठबंधन का सऊदी अरब के भीतर विरोध था, यह विरोध 'इसराइल के लिए अमेरिकी समर्थन और फ़लस्तीन के विभाजन’ की वजह से पैदा हुआ था।
80 में दशक में अमेरिकी दबदबे का एलान
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से लेकर 1980 के दशक तक, अन्य खाड़ी देशों के साथ अमेरिकी सैन्य सहयोग सीमित पैमाने पर ही सही जारी रहा। इस सहयोग में सुरक्षा समझौतों और सैन्य प्रशिक्षण से लेकर घरेलू ठिकानों पर अमेरिकी सेनाओं की मेज़बानी तक शामिल थे।
उदाहरण के लिए 1971 में बहरीन के साथ हुए समझौते ने अमेरिका को जुफ़ैर में बंदरगाह बनाने के लिए पूर्व ब्रिटिश नौसैनिक ठिकाने के इस्तेमाल करने की अनुमति दी।
1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक के शुरुआती सालों में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने फ़ारस की खाड़ी के प्रति ऐसी नीति अपनाई जिसमें ईरान और सऊदी अरब को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के 'दो स्तंभ' और अमेरिकी तेल हितों के रक्षक के रूप में देखा गया। क्योंकि अमेरिका शीत युद्ध में सोवियत संघ पर अपने दबदबे के लिए इसे ज़रूरी मानता था।
इस नीति के चलते अमेरिका ने इन दोनों देशों को हथियार मुहैया कराए और उनकी सेनाओं को व्यापक सैन्य प्रशिक्षण दिया।
साल 1973 के खाड़ी जंग के दौरान अमेरिका-खाड़ी संबंध तनावपूर्ण हो गए थे क्योंकि अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ने इसराइल का समर्थन करने वाले देशों, विशेष रूप से अमेरिका को तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।
साल 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति ने ईरान के शाह और अमेरिका के कऱीबी सहयोगी मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाकर 'दो-स्तंभ' नीति का अंत कर दिया।
उसी साल सोवियत संघ ने अफग़़ानिस्तान पर आक्रमण किया। इन दो घटनाओं ने फ़ारस की खाड़ी में सोवियत प्रभाव की संभावना को लेकर अमेरिकी चिंताओं को बढ़ा दिया और अमेरिका को इस क्षेत्र में अपने तेल हितों की रक्षा के लिए एक पुख़्ता सैन्य ढांचा तैयार करने के लिए प्रेरित किया।
साल 1980 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने घोषणा की, ‘किसी भी विदेशी ताक़त द्वारा फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के किसी भी कोशिश का सैन्य बल समेत सभी ज़रूरी साधनों से मुकाबला किया जाएगा।’
कई अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि रोनाल्ड रीगन और जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के शासनकाल में भी यही नज़रिया जारी रहा।
ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान 1981 में गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) की स्थापना ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरीन, कुवैत और ओमान के बीच सामूहिक सुरक्षा के लिए एक ढांचा दिया।
जीसीसी का मक़सद रक्षा तालमेल था, लेकिन इसका असर सीमित रहा और आखऱिकार अमेरिकी गारंटी क्षेत्रीय ख़तरों के ख़िलाफ़ मुख्य प्रतिरोध रणनीति बन गई।
साल 1980 के दशक में इराक़ और फ़ारस की खाड़ी के देशों के बीच तनाव बढ़ गया और 1990 में इराक़ ने कुवैत पर आक्रमण कर दिया।
1990 और 1991 के साल, अमेरिकी नीति में ‘कार्टर डॉक्ट्रिन’ के लागू होने का चरम काल था।
खाड़ी युद्ध के दौरान, अमेरिका के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने सऊदी अरब की रक्षा और कुवैत को मुक्त कराने के घोषित लक्ष्य के साथ ‘डेजर्ट शील्ड’ और ‘डेज़र्ट स्टॉर्म’ अभियान शुरू किए।
इस जंग ने जीसीसी देशों में बड़े पैमाने पर अमेरिकी सैन्य मौजूदगी की शुरुआत को पुख़्ता किया। यह एक ऐसी मौजूदगी थी जो इराक पर नो-फ्लाई जोन को लागू करने के लिए 1990 के दशक में भी जारी रही और इसे खाड़ी देशों की रक्षा करने और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुख्य गारंटर के रूप में अपनी भूमिका को मज़बूत करने की अमेरिका की क्षमता के प्रदर्शन के रूप में देखा गया।
वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट पॉलिसी काउंसिल के वरिष्ठ फ़ेलो सुल्तान अलामेर ने बीबीसी अरबी को बताया, 1980 के दशक में फारस की खाड़ी में सुरक्षा व्यवस्था इराक के कुवैत पर किए गए आक्रमण को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसलिए अमेरिकी सहयोग ने यह सुनिश्चित किया कि इन देशों को किसी भी ज़मीनी आक्रमण या अन्य सैन्य ख़तरे से बचाया जाएगा।
2003 में अमेरिका के इराक़ पर आक्रमण और सद्दाम हुसैन का तख्तापलट फ़ारस की खाड़ी में अमेरिका की भूमिका में एक और महत्वपूर्ण मोड़ था।
फारस की खाड़ी के अरब देशों ने अपनी सुरक्षा के मुख्य गारंटर के रूप में अमेरिका पर निर्भर रहना जारी रखा और अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का विस्तार किया। इस दौरान अमेरिका ने बहरीन, कतर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में अपने ठिकानों को मज़बूत किया।
साथ ही, सद्दाम हुसैन के पतन ने ईरान के मुख्य प्रतिद्वंद्वी को ख़त्म कर दिया और तेहरान को इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर दिया।
इसने जीसीसी देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया।
उसी साल अमेरिका ने घोषणा की कि वह सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान हवाई अड्डे से अपने विमान और अधिकांश सैन्य बलों को वापस बुला रहा है और फ़ारस की खाड़ी में स्थित अपने हवाई संचालन केंद्र को कतर के उदैद हवाई अड्डे पर ट्रांसफऱ कर रहा है।
इस बदलाव का दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग पर कोई असर नहीं पड़ा।
इसके बाद के वर्षों में अमेरिका ने जीसीसी देशों के साथ कई सैन्य, रक्षा और आर्थिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें उन्नत हथियार प्रणालियों की बिक्री और प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं।
उदाहरण के लिए, सऊदी अरब ने पिछले साल अमेरिका में निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई थी।
पहले कहा गया कि सऊदी अरब 600 अरब डॉलर का निवेश करेगा और फिर व्हाइट हाउस ने पिछले नवंबर में घोषणा की कि ये निवेश एक ट्रिलियन डॉलर होगा। इसमें 142 अरब डॉलर का हथियार बिक्री कॉन्ट्रेक्ट भी शामिल है। इसे इतिहास का सबसे बड़ा हथियार सौदा बताया गया है।
हालांकि, हाल के वर्षों में, खाड़ी देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब और यूएई ने चीन और यूरोप जैसी अन्य शक्तियों के साथ अपने संबंधों और साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश की है।
कुछ घटनाओं के एक साथ होने से खाड़ी देशों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। ये सवाल है कि क्या अमेरिका पर निर्भरता अभी भी एक टिकाऊ विकल्प है?
उदाहरण के लिए, 2019 में सऊदी अरब के तेल भंडारों पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के हमलों पर अमेरिका की सीमित प्रतिक्रिया ने निराशा का माहौल पैदा कर दिया।
सुल्तान अलामेर कहते हैं, ईरान पर हमला करने के बजाय, अमेरिका ने सऊदी अरब को कुछ एयर डिफ़ेंस सिस्टम भेजने का फ़ैसला किया। इस घटना से सऊदी अरब को यह स्पष्ट हो गया कि तेल भंडारों की रक्षा करने या फ़ारस की खाड़ी को ईरानी हमलों से बचाने के लिए अमेरिका की प्रतिबद्धता मज़बूत नहीं है।
उनके मुताबिक़, इस मुद्दे के कारण सऊदी अरब ने एक नई क्षेत्रीय नीति की ओर क़दम बढ़ाया।
2022 में अबू धाबी हवाई अड्डे पर हुए हूती हमलों की निंदा करने तक ही अमेरिका की सीमित भूमिका के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने भी इसी तरह की निराशा व्यक्त की थी।
2025 में ईरान और फिर इसराइल के कतर पर किए गए हमलों ने अमेरिका के साथ संबंधों की उपयोगिता के बारे में बहस को और भी हवा दी।
फ़ारस की खाड़ी में ग़ुस्सा और निराशा
28 फऱवरी को ईरान के साथ इसराइल-अमेरिकी युद्ध शुरू होने से कुछ ही घंटे पहले, ओमान के विदेश मंत्री बदर बुसैदी ने घोषणा की कि ईरान-अमेरिका वार्ता में 'महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व प्रगति' हुई है और एक समझौता होने ही वाला है।
जीसीसी के देशों ने ख़ुद को एक ऐसे युद्ध में उलझा हुआ पाया जिसने ईरान के साथ उनके संबंधों को वर्षों के प्रयासों के बाद टूटने के कगार पर ला दिया।
इन रिश्तों को बनाने के लिए इन देशों ने कड़ी मेहनत की थी। अतीत को भुलाते हुए ईरान और अधिकांश जीसीसी देशों के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली हुई थी।
ईरान के हमलों के बाद अरब खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी गंभीर नुक़सान पहुंचा। पर्यटन, विमानन, निवेश और डेटा सेंटर्स को निशाना बनाने की वजह से सऊदी अरब, यूएई और क़तर जैसे देश ख़ासे प्रभावित हुए।
18 मार्च को ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित एक लेख में बदर बौसेदी ने अमेरिका पर अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खोने का आरोप लगाया और युद्ध को आपदा बताया।
कई अरब और पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने 9 मार्च को अमीराती अरबपति खलफ हबतूर के एक्स पर किए गए (बाद में हटाए गए) पोस्ट को खाड़ी देशों के अभिजात वर्ग के बीच अमेरिका के प्रति आक्रोश और युद्ध के परिणामों को लेकर उनकी चिंताओं का प्रतिबिंब माना।
ये पोस्ट रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम की टिप्पणियों के जवाब में थे। लिंडसे ग्राहम ने खाड़ी देशों से अमेरिका और इसराइल का साथ देने का आग्रह किया था और इनकार करने पर उनके साथ रक्षा समझौतों पर पुनर्विचार करने की धमकी दी थी।
खलफ हबतूर के पोस्ट के एक हिस्से में लिखा था: हम अच्छी तरह जानते हैं कि हमें क्यों निशाना बनाया जा रहा है और हम यह भी जानते हैं कि किसने अपने तथाकथित सहयोगियों से सलाह लिए बिना पूरे क्षेत्र को इस ख़तरनाक टकराव में घसीटा है।।। हमें किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत नहीं है जो मध्य पूर्व में हमें बचाने का दावा करे। हम इस बात से इनकार नहीं करते कि ईरान इस क्षेत्र के लिए कितना बड़ा ख़तरा है।।। लेकिन यह एक गंदा खेल है जिसमें कई शक्तियां हमारे क्षेत्र की क़ीमत पर आपस में लड़ रही हैं। हम दूसरों के हितों की रक्षा के लिए इस युद्ध में शामिल नहीं होंगे।
क़तर के विशेषज्ञ और शोधकर्ता नायेफ़ बिन नाहर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवाद से निपटने के तरीक़े की आलोचना की।
उन्होंने 23 मार्च को एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, ‘आज ट्रंप ने अमेरिकी बाज़ार में क़ीमतों पर इसके प्रभाव के डर से ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर हमले को स्थगित कर दिया, लेकिन 20 दिनों से अधिक समय से खाड़ी देश ईरानी मिसाइलों के निशाने पर हैं और खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अरबों डॉलर का नुक़सान हुआ है, लेकिन इससे उनका मन नहीं बदला है।’
-चैतन्य नागर
कृष्णमूर्ति पूरी दुनिया में जन सभाएं करते रहे, छोटे बड़े समूह में लोगों से बातें करते रहे। ईश्वर या भगवान जैसे शब्दों से हमेशा परहेज किया। किसी धर्म ग्रन्थ की पवित्रता या सत्ता को मानने से इंकार किया। नोबेल विजेता ऑल्डस हक्सले ने कृष्णमूर्ति की किताब 'फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम' की भूमिका में कहते हैं कि कृष्णमूर्ति को सुनना बुद्ध को सुनने के सामान है। उन्होंने मृत्यु के बाद जीवन, आत्मा और इस तरह की अस्पष्ट बातों पर कभी कुछ नहीं कहा, और बुद्ध की तरह अपने आतंरिक कलह, दु:ख और समाज में उसकी अभिव्यक्ति को समझने और ख़त्म करने के बारे में ही बोलते रहे। कुछ लोग उन्हें रेशनलिस्ट मानते हैं; कम्युनिस्ट उन्हें अधार्मिक रहस्यवादी कहते हैं। पर सच्चाई यह है कि कृष्णमूर्ति के दर्शन और चिंतन को किसी श्रेणी में रखा ही नहीं जा सकता। किसी भी मत या वाद को वह विभाजन का कारण मानते थे।
उनका मानना था कि वैश्विक संकट की जड़ें वास्तव में मानव चेतना में हैं, और बदलाव वहीँ होना चाहिए। बाहरी अव्यवस्था एक अपरीक्षित, अव्यवस्थित चेतना की ही अभिव्यक्ति है और वाह्य भले ही कितना ही व्यवस्थित क्यों न कर दिया जाए, यदि आतंरिक पर ध्यान न दिया जाये, तो वह वाह्य को नष्ट कर सकता है और अभी तक हुई सामाजिक, राजनैतिक क्रांतियों का यही हश्र हुआ है। इन आंदोलनों ने संस्थागत, व्यवस्थागत परिवर्तन को अपनी ऊर्जा दी, पर इंसान की बेतरतीब, अव्यवस्थित चेतना को नहीं छुआ। कृष्णमूर्ति ने इस बात पर ज़ोर दिया कि व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की दिशा और दशा वास्तव में चित्त की आड़ी-तिरछी रेखाएं ही तय करती हैं। इस चित्त की दशा को न समझ कर यदि कोई बाहरी परिवर्तन किया जाए, तो न सिर्फ वह सतही और अस्थायी होगा, बल्कि एक बहुत बड़े भ्रम को भी जन्म देगा।
एक तरफ तो कृष्णमूर्ति भारतीय दार्शनिक परंपरा से कहीं जुड़े हुए प्रतीत होते हैं, क्योंकि प्राच्य दर्शन हमेशा से व्यक्तिगत चेतना में परिवर्तन की बात करता आया है, पर दूसरी ओर कृष्णमूर्ति अलग से कई ऐसे बिंदु उठाते हैं, जो उन्हें हर तरह की परंपरा से अलग भी करते है, और किसी नई परंपरा का निर्माण भी नहीं करते। हिन्दू धर्म की मुख्यधारा और इसकी बागी परंपरा—दोनों से छिटक कर वह दूर खड़े होते हैं और नए सिरे से जीवन और उसके बुनियादी सवालों पर संवाद करते प्रतीत होते हैं।
क्या कृष्णमूर्ति नास्तिक हैं? क्या वह मूल रूप से एक मनोवैज्ञानिक हैं? क्या उन्होंने दर्शन, धर्म और मनोविज्ञान का एक मिला जुला मिश्रण हमारे सामने प्रस्तुत किया? क्या कृष्णमूर्ति की शिक्षाएं बौद्धिकता में इतनी डूबी हुई हैं, कि वह बुद्धिजीवियों के सामने एक नयी तरह की चुनौती प्रस्तुत करते हैं और आखिर में बुद्धि को भी नकार देते हैं ? ऐसे कई सवाल हैं जो कृष्णमूर्ति के बारे में लोग उठाते हैं। यह तो जरुर कहा जा सकता है कि संगठित धर्मों का, गुरु शिष्य परंपरा का, धर्म ग्रंथों का इतना कठोर विरोध धर्म के इतिहास में किसी ने नहीं किया।
कुछ लोगों का मानना है कि कृष्णमूर्ति एक तरह से चरमपंथी या अब्सोल्युटिस्ट थे। वह अनर्किज़्म के अंतिम छोर पर खड़े प्रतीत होते हैं। इसलिए सतही समाज सुधार में उनका कोई भरोसा नहीं था। न ही वह किसी धार्मिक संगठन के थे, न ही राजनैतिक समूह के, न ही संप्रदाय के, न किसी देश के। अमेरिका की कम्युनिस्ट पार्टी ने उनसे जब कहा उन्हें तो कम्युनिस्ट पार्टी में होना चाहिए, तो उन्होंने साफ़ कहा कि वह किसी भी संगठन का हिस्सा नहीं बन सकते। उनका मानना था कि मत और वाद, संगठन और संप्रदाय विभाजन और युद्ध का कारण हैं। वह बार बार कहते रहे कि हम हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई नहीं बल्कि मानव हैं, शेष मानवता का हिस्सा हैं, एक दूसरे से बिलकुल भी अलग नहीं। उनका सवाल था: क्या हम इस धरती पर सहज होकर चलते फिरते रह सकते हैं, बगैर उसे नष्ट किये, खुद को और पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंचाए बगैर?
-क्या भारत में आने वाले दिनों में गंभीर तेल संकट होने की आशंका है? क्या ईरान युद्ध का असर भारत पर चिंताजनक असर डालने वाला है?
क्या भारत के लोगों को चुनौतीपूर्ण दिनों के लिए तैयार रहना होगा?
चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संकट पर चुप क्यों रहे?
पीएम मोदी के एक भाषण के बाद विशेषज्ञों, नेताओं और आम लोगों के बीच ये चर्चा होनी शुरू हो गई, जो उन्होंने रविवार को सिकंदराबाद में दिया था।
पीएम मोदी के भाषण के चंद घंटों बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को ‘पूरी तरह अस्वीकार्य’ बताया है, जो ईरान ने युद्ध ख़त्म करने के मक़सद से भेजा था।
यानी फिलहाल ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है जो ग्लोबल इकोनॉमी (भारत समेत) और शेयर बाजार के लिए भी अच्छी ख़बर नहीं है।
पीएम के भाषण पर कैसी चर्चा
पीएम मोदी ने अपने भाषण में भारत के लोगों से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर किफ़ायत बरतने के निर्देश दिए। साथ ही एक साल तक सोना न खऱीदने और खाने का तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की। और इस दौरान लोगों से विदेश यात्रा टालने की अपील भी की।
भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने पीएम के इस भाषण को शेयर करते हुए उनकी अपील को दोहराया। कुछ विशेषज्ञों ने पीएम के भाषण को डीकोड करते हुए भारत को मुश्किल दिनों से तैयार रहने के लिए कहा तो वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया कि ईरान वॉर से पैदा हुए हालात को सरकार ठीक से हैंडल नहीं कर पा रही है और इस मुश्किल को हैंडल करने की जिम्मेदारी जनता के कंधों पर डाल रही है।
वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया।
आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं। और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?
‘पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल कम करें’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान युद्ध का जिक्र करते हुए लोगों से पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह दी।
उन्होंने कहा, ‘भारत के पास बड़े-बड़े तेल के कुएं नहीं हैं। हमें अपनी जरूरत के पेट्रोल-डीजल-गैस ये सभी बहुत बड़ी मात्रा में दुनिया के दूसरे देशों से मंगाने पड़ते हैं। युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल, गैस और फ़र्टिलाइजऱ के दाम बहुत अधिक बढ़ चुके हैं। आसमान को भी पार कर गए हैं। पड़ोस के देशों में क्या है वो तो अख़बारों में आता है।’
पीएम ने ऐसा क्यों कहा है?
ईरान युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) में जहाजों की आवाजाही लंबे समय से प्रभावित है। ये वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया भर की तेल सप्लाई का 20 फीसदी हिस्सा ट्रांसपोर्ट होता है। भारत भी अपनी तेल और ऊर्जा जरूरतों के लिए होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई पर काफी हद तक निर्भर है।
ईरान युद्ध के कारण दुनिया भर में तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं। भारत को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में तेल आयात करना पड़ता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक़ पीएम ने इसी वजह से पेट्रोल और डीजल को लेकर संयम से काम लेने को कहा है क्योंकि युद्ध के कारण कच्चे तेल के साथ-साथ, खाने के तेल, फ़र्टिलाइज़र्स और एलएनजी गैस के दाम भी बढऩे की आशंका है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक आइटम और विमान यात्रा भी महंगी हो सकती है।
द हिंदू की एसोसिएट और पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बर ने कहा, ‘पीएम का भाषण संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संकट के असर को लेकर दिए गए उनके दो बयानों के बाद आया है। यह साफ इशारा करता है कि अब ज़्यादा समय तक सब कुछ सामान्य तरीके से नहीं चल सकता और सप्लाई चेन से जुड़ी परेशानियां आने वाली हैं। भारत, तैयार हो जाओ, आगे का सफर मुश्किल और झटकों भरा हो सकता है।’
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2025-26 भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात पर 144 बिलियन डॉलर खर्च किए।
विशेषज्ञ चेता रहे हैं कि पीएम का बयान भारत के लिए गंभीर ख़तरे की आहट है, क्योंकि अगर होर्मुज की नाकाबंदी लंबे वक्त तक जारी रहती है, अगर कच्चे तेल की कीमत 110 या 120 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती है तो महंगाई बढ़ेगी। वित्तीय घाटा बढ़ेगा। और कुल मिलाकर इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
सोना ना खऱीदने को क्यों कहा?
उन्होंने कहा, ‘सोने की खऱीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत खर्च होती है। एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे। आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरीदेंगे।’
‘सोना नहीं खऱीदेंगे। विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी’
क्यों कहा?
कच्चे तेल और सोना दोनों को ही भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है। ऐसे में इन्हें खऱीदने के लिए और ज़्यादा विदेशी मुद्रा (आम तौर पर डॉलर) की जरूरत पड़ेगी। और जिसकी वजह से रुपया कमजोर होगा और ये भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालेगा। इससे महंगाई बढऩे की आशंका है।
फॉरेक्स (विदेशी मुद्रा भंडार) जब कम होता है तो सरकार की चिंता दो स्तरों पर होती है।
कच्चे तेल के आयात को लेकर और सोने के आयात को लेकर। विशेषज्ञों के मुताबिक इसी वजह से पीएम ने अपने भाषण में कच्चे तेल के साथ-साथ सोना ना खरीदने की भी सलाह दी है।’
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 51.4 बिलियन डॉलर था। 2023 में यह 45.54 बिलियन डॉलर था। यानी 2024-25 में यह 13.7 फीसदी बढ़ गया।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेन एक्सचेंज रिजर्वस यानी फॉरेक्स) 9 मई 2026 तक लगभग 690.6 अरब डॉलर था।
वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी ने एक्स पर लिखा, ‘पीएम मोदी की एक साल तक सोना मत खरीदिए वाली अपील अपने भीतर एक बड़ा संदेश छिपाए हुए है- रुपये को बचाइए। यह विदेशी मुद्रा संकट से निपटने की शुरुआती चेतावनी जैसी लगती है, क्योंकि आयातित सोने पर खर्च होने वाला हर अतिरिक्त डॉलर रुपये को और कमज़ोर करता है। भारत में सोने की भारी मांग है। देश हर साल लगभग 800-900 टन सोना आयात करता है, जो दुनिया में दूसरे सबसे बड़े स्तर पर है। कच्चे तेल के बाद सोना भारत का सबसे बड़ा आयात है। वित्तीय वर्ष 2026 में सोने का आयात रिकॉर्ड लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वित्तीय वर्ष 2025 के लगभग 24त्न ज़्यादा है।’
विशेषज्ञों के मुताबिक़ सोने को लेकर दिया गया पीएम मोदी का बयान बताता है कि सरकार डॉलर रिज़र्व को बचा कर रखने पर ज़ोर दे रही है। साथ ही नॉन एसेंशियल इंपोर्ट (ग़ैर ज़रूरी आयात) को कम करना चाहती है। और ईरान युद्ध से पैदा हुए दीर्घकालीन दबाव के लिए लोगों को मानसिक तौर पर तैयार करना चाहती है।
-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
(भोपाल के भारत भवन में हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल पूरे होने पर ‘प्रणाम उदन्त मार्तंड’ के नाम से तीन दिन चले शानदार आयोजन के समापन समारोह में अध्यक्षता करने का मौका मिला। अपने अध्यक्षीय भाषण में मैंने जो कुछ कहा, उसकी खास-खास बातें)
* 30 मई 1826 को, 200 साल पहले हिन्दी का पहला समाचार पत्र शुरू हुआ था, जिसका नाम था उदन्त मार्तंड. साप्ताहिक अखबार था। संपादक थे पंडित जुगल किशोर शुक्ल।
* जिस जगह से अखबार शुरू हुआ, वह जगह थी कोलकाता। कोलकाता में लोग बांग्ला भाषा बोलते हैं, हिन्दी बोलने वाले कम हंै, इसलिए उदन्त मार्तण्ड जैसा अखबार निकालना और चलाना बहुत बड़ी चुनौती थी।
* उदन्त मार्तंड हिन्दी का पहला अखबार था, लेकिन भारतीय भाषाओं में और भी अखबार पहले से छप रहे थे।
* बांग्ला भाषा में 'दिग्दर्शन' नाम का अखबार 1818 से छप रहा था। अखबार ईसाई मिशनरीज़ वाले निकाल रहे थे और उनका लक्ष्य धर्म प्रचार था।
* बांग्ला में ही का एक और अखबार था ‘समाचार दर्पण’। वह भी ईसाई धर्म प्रचार के लिए था।
* 1821 में राजा राममोहन राय ने ‘सम्वाद कौमुदी’ शुरू किया था. राजा राम मोहन राय बड़े क्रांतिकारी व्यक्ति थे और उन्होंने महिलाओं के उत्पीडऩ के खिलाफ जमकर लिखा, बोला और काम किया था.
* 1822 में ही ‘चन्द्रिका’ नाम का अखबार शुरू हुआ और उसकी खास बात यह थी कि वह राजा राममोहन राय के क्रांतिकारी विचारों का विरोध करने वाला अखबार था। यह भी बांग्ला में ही था।
* राजा राममोहन राय ने 1822 में फारसी में एक अखबार शुरू किया था, जिसका नाम था ‘विरात-उल-अखबार’ यानी अखबार का दर्पण! 1822 में ही फारसी में एक और अखबार निकला ‘जाम-ए-जहांनुमा’ मतलब दुनिया को दिखाने वाला दर्पण।
* गुजराती भाषा में 1822 में ‘मुंबई समाचार’ (पहले नाम था बम्बई समाचार) शुरू हुआ था। यह अखबार आज भी छप रहा है और इसका नाम मुंबई समाचार कर दिया गया है।
* राजा राममोहन राय और द्वारकानाथ टैगोर ने1822 में यानी आज से 204 साल पहले ‘बंग दूत’ नाम का अखबार शुरू किया था। मजेदार बात यह है कि यह अखबार चार भाषाओं में था- अंग्रेजी, बांग्ला, फारसी और हिन्दी । अंग्रेजो की हुकूमत थी, इसलिए अंग्रेजी जरूरी थी, अखबार बंगाल से निकला था, इसलिए बांग्ला जरूरी थी। अदालतों की भाषा फारसी हुआ करती थी, उसके लिए फारसी जरूरी थी और सबसे अंत में हिन्दी थी, क्योंकि हिन्दी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा तब भी थी।
* * *
उदन्त मार्तण्ड 30 मई 1826 को शुरू हुआ साप्ताहिक अखबार था, लेकिन डेढ़ साल के बाद ही 4 दिसंबर 1827 को उसका 79वां अंक निकलते ही बंद कर देना पड़ा।
उदन्त मार्तण्ड को बंद क्यों करना पड़ा? क्योंकि वह अखबार अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ था’ उसके पाठक देश भर में थे और वह अखबार डाक से पूरे भारत में भेजा जाता था. डाकखाने सरकारी थे और नीतियां अंग्रेजों की थी, उन्होंने डाक से समाचार पत्र भेजने का जो शुल्क रखा था वह इतना ज्यादा था कि उदन्त मार्तण्ड जैसे अखबार के लिए सर्वाइव करना मुश्किल हो गया. उदन्त मार्तण्ड की तरफ से बार-बार इस बारे में अपील की गई कि अगर अंग्रेजी के और मिशनरीज के अखबारों को भेजने का शुल्क नाम मात्र का है, तो हिन्दी के अखबार को डाक से भेजने पर इतना शुल्क क्यों लिया जाता है? अंग्रेजी हुकूमत उनकी बात क्यों सुनती, क्योंकि उदन्त मार्तण्ड का तो लक्ष्य ही था- ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’।
उदन्त मार्तण्ड को विज्ञापन का सपोर्ट नहीं था. हिंदुस्तानियों की पर्चेसिंग पावर कम थी। हिन्दी भाषा में साक्षरता का प्रतिशत भी बहुत सीमित था, जाहिर है अखबार का प्रचार-प्रसार आसान काम नहीं था।
डेढ़ साल के संघर्षों के बाद ‘उदन्त मार्तण्ड’ बंद करना पड़ा। जो सुविधाएँ ईसाई मिशनरीज के अखबारों को थीं, हिन्दी के पहले अखबार को बार-बार की अपील के बाद भी नहीं मिली थी।
हिन्दी का पहला अखबार निकलना एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी, और उसका बंद होना उससे बड़ी ऐतिहासिक दुर्घटना!
* * *
आज 200 साल में हालात बहुत बदल चुके हैं। ‘उदन्त मार्तण्ड’ से शुरू हुआ हिंदी पत्रकारिता का सफर कई मंजिलें तय कर चुका है। भारत की आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता परवान चढ़ी और आज अपने पूरे शबाब पर है।
आज से 40 साल पहले तक देश के टॉप टेन सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में छह अखबार अंग्रेजी के हुआ करते थे, आज टॉप टेन बिकने वाले अखबारों में पांच अखबार हिन्दी के, दो मलयालम के, एक तमिल का, एक तेलुगु का और एक अंग्रेजी का है। टॉप 10 अखबारों में भी शुरू के टॉप चार यानी पहले नंबर से लेकर चौथे नंबर तक के, अखबार हिन्दी के हैं और और अंग्रेजी का सबसे बड़ा अखबार सातवें नंबर पर है।
* * *
-जुगल पुरोहित
चार मई को आए चुनावी नतीजों ने इस बहस को फिर से छेड़ दिया है कि बीजेपी का विस्तार क्या क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के लिए ख़तरा है?
पश्चिम और मध्य भारत में झारखंड स्थित झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) को छोडक़र, बाकी सभी राज्यों में बीजेपी का दबदबा है। पूर्वोत्तर भारत में, मिजोरम को छोडक़र, बाक़ी सभी राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सत्ता है।
दक्षिण भारत में हालांकि यह दबदबा कायम नहीं है। वहाँ बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन की सरकार सिफऱ् आंध्र प्रदेश में है।
उत्तर भारत में, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पंजाब ही विपक्ष के गढ़ बचे हैं जबकि बाकी सभी राज्यों में बीजेपी की सत्ता है।
ममता बनर्जी और एमके स्टालिन के अलावा, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल, के चंद्रशेखर राव (केसीआर), तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव और मायावती जैसे कई पूर्व शक्तिशाली क्षेत्रीय दलों के नेता सत्ता से बाहर हैं।
क्षेत्रीय दलों ने भारत की राष्ट्रीय राजनीति में विशेष रूप से 1989 में शुरू हुए गठबंधन के दौर के बाद अपनी जगह बनाई। 2014 से पहले तक दिल्ली में सत्ता की चाबी इन्हीं दलों के हाथों में रही है। वाजपेयी के समय में बीजेपी ख़ुद भी मज़बूत क्षेत्रीय ताक़तों के साथ गठबंधन करके ही उभरी थी।
लेकिन उनकी बढ़ती कमज़ोरी से अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या क्षेत्रीय दल बीजेपी के 'डबल इंजन वाली सरकार' के नारे के सामने कमज़ोर पड़ रहे हैं? या यह बीजेपी के प्रभुत्व का चरम है, जिसका मतबल है कि क्षेत्रीय राजनीति फिर से मज़बूत होगी?
क्या क्षेत्रीय पहचान अब काफ़ी नहीं है?
तीन दशकों से पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रहीं नीरजा चौधरी देश की चुनावी राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव को रेखांकित करती हैं। उन्होंने बीबीसी हिन्दी को बताया, ‘इन चुनावों ने दिखाया है कि सामाजिक कल्याण और क्षेत्रीय पहचान जीत के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मेरा मानना ??है कि युवा मतदाता, जो बहुत महत्वाकांक्षी हैं, राजनीतिक समीकरणों को पुराने मतदाताओं की तरह नहीं देखते।’
‘वे सामाजिक उन्नति का रास्ता देखने पर प्रयोग करने के लिए ज़्यादा खुले हैं। यही कारण है कि तमिलनाडु में विजय और पश्चिम बंगाल में बीजेपी को चुना गया।’
लेकिन एक और अहम कारण भी है। रिटायर्ड आईएएस ऑफिसर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने कहा, ‘वे किसी राजनीतिक दल से नहीं लड़ रहे हैं बल्कि एक ऐसी कॉर्पोरेट संस्था से लड़ रहे हैं, जिसके पास अत्याधुनिक तकनीकी संसाधन हैं जो किसी भी राजनीतिक दल की पहुंच से परे हैं।’
सरकार कहते हैं, ‘वे पैसे और नवीनतम एआई तकनीक के गठजोड़ से लड़ रहे हैं। क्षेत्रीय दलों को यह समझना होगा कि उनका दुश्मन एक ही है, यानी बीजेपी। लेकिन बीजेपी उन सभी से एक साथ नहीं लड़ेगी, बल्कि एक-एक करके उन्हें ख़त्म करेगी।’
हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी को ‘परिवारवाद’ वाली पार्टी नहीं बल्कि ‘जमीनी स्तर की’ पार्टी बताया है। पीएम मोदी का कहना है कि बीजेपी ने ‘विकास के प्रति नज़रिए और कोशिशों से’ लोकप्रियता हासिल की है।
लेखक और वरिष्ठ पत्रकार निलंजन मुखोपाध्याय के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मा और हिंदुत्व की अपील अब भी कायम है।
बीजेपी की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषक क्षेत्रीय स्तर पर बीजेपी की प्रगति के लिए उसकी गठबंधन रणनीति की ओर भी इशारा करते हैं।
बीजेपी आज सहयोगियों को किस नज़रिए से देखती है, इसके बारे में निलंजन मुखोपाध्याय एक उदाहरण देते हैं।
वह बताते हैं, ‘यह 2012 की बात है, जब मैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर जीवनी लिखने के लिए रिसर्च कर रहा था। मेरी उनसे मुलाक़ात हुई और मैंने उनसे पूछा कि बीजेपी अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए सहयोगी दलों को कैसे अपने खेमे में लाने की योजना बना रही है?’
‘उन्होंने इसका जवाब एक शब्द में दिया- जीतने की क्षमता। असल में, उनका कहना था कि सहयोगी दल बीजेपी से तभी जुड़ेंगे, जब उन्हें लगेगा कि पार्टी चुनाव में जीतने के क़ाबिल है।’
‘इससे व्यावसायिक दृष्टिकोण दिखता है। आज, उदाहरण के लिए जेडीयू को ही देख लीजिए, या हरियाणा में बीजेपी के मित्र बनाए गए छोटे दलों या शिवसेना को। बीजेपी ने उन्हें अपनी पहचान में ही शामिल कर लिया। जिससे इन दलों की नाममात्र की उपस्थिति के अलावा उनकी कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं बची है।’ वहीं सरकार ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा, ‘अगर हम तुलना करें कि बीजेपी ने सहयोगी दलों को कैसे गले लगाया और फिर उन्हें ख़त्म कर दिया।’
-ए. नंदकुमार
तमिलगा वेट्री कडग़म यानी टीवीके के नेता विजय ने मुख्यमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद अपने पहले भाषण और पहले दिन की गतिविधियों के ज़रिए कई तरह के राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।
विजय का पहला भाषण एक बहुआयामी राजनीतिक बयान था। इसमें सरकारी योजनाओं की घोषणाओं से लेकर पिछली सरकार की वित्तीय स्थिति की आलोचना, धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकों से किए गए वादे और गठबंधन की राजनीति पर रोशनी डाली गई।
साथ ही ‘मैं एक आम आदमी हूं’ वाले नज़रिए के साथ, इसमें एक भावनात्मक अपील भी थी। भाषण के अलावा, उनके पहले दिन के कामों को भी राजनीतिक प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।
शपथ ग्रहण समारोह के बाद, विजय अपने आधिकारिक काम को शुरू करने के लिए सचिवालय गए और बाद में पेरियार स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। विजय ने लगभग साठ सालों तक डीएमके और एआईएडीएमके के शासन में रहे तमिलनाडु के राजनीतिक वर्चस्व को तोड़ा है।
उन्होंने अपने पहले ही दिन यह दिखाने की कोशिश की है कि राज्य की अगली राजनीतिक दिशा क्या होगी।
डीएमके पर पहला राजनीतिक हमला
मुख्यमंत्री के रूप में अपने भाषण में विजय का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश पिछली सरकार की वित्तीय स्थिति की सीधी आलोचना थी।
विजय ने कहा कि पिछली सरकार ने खज़़ाना ख़ाली कर दिया और चली गई, और इस पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिए।
साथ ही उन्होंने कहा कि अगर लोग उन्हें कुछ समय दें तो यह मददगार होगा।
पत्रकार कुबेंद्रन कहते हैं, ‘विजय को तमिलनाडु सरकार की वित्तीय स्थिति को पूरी तरह समझने में कुछ समय लगेगा। उन्होंने इसके लिए खुलकर अनुरोध किया है।’
राजनीतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन कहते हैं, ‘विजय ने अपने शासन की शुरुआत में ही पिछली सरकार को आर्थिक चुनौतियों के लिए जि़म्मेदार ठहराने का राजनीतिक रुख़ अपनाया है। इसे भविष्य में संभावित वित्तीय संकटों या वादों को पूरा करने में देरी के लिए पहले से ही एक राजनीतिक स्पष्टीकरण तैयार करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।’
वो कहते हैं, ‘टीवीके कोई वैचारिक पार्टी नहीं है, बल्कि यह बीजेपी, डीएमके और एआईएडीएमके जैसी अन्य पार्टियों की आलोचना करके उभरी है। इसने इन पार्टियों के ख़िलाफ़ वोट हासिल करके चुनाव जीता। विजय के भाषण से पता चलता है कि पार्टी अपनी विपक्ष की राजनीति जारी रखेगी।’
‘अब तक डीएमके विरोधी राजनीति का नेतृत्व एआईएडीएमके कर रही थी। अब विजय ने वह जगह ले ली है। यह रुख़ व्याप्त असंतोष से निपटने में मददगार साबित हो सकता है।’
डीएमके नेता एमके स्टालिन की इस पर तुरंत दिए गए बयान से पता चलता है कि विजय के भाषण का राजनीतिक प्रभाव पड़ा था।
स्टालिन ने कहा, ‘तमिलनाडु का कज़ऱ् निर्धारित सीमा के भीतर है। हमने पिछले फऱवरी के बजट में तमिलनाडु सरकार की वित्तीय स्थिति स्पष्ट रूप से बताई थी। क्या आपको यह बात नहीं पता? उसके बाद ही आपने जनता से कई वादे किए। जिन लोगों ने आपको वोट दिया है, उन्हें धोखा न दें और गुमराह न करें।’
क्या बीजेपी का विरोध रहेगा जारी?
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की शपथ ग्रहण समारोह में भागीदारी ने काफ़ी ध्यान आकर्षित किया।
विजय ने राहुल गांधी को 'भाई' कहकर संबोधित किया, जो यह दिखाता है कि वो राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के ख़िलाफ़ विपक्षी दलों के साथ अच्छे राजनीतिक संबंध बनाने का प्रयास कर रहे हैं। चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की टीवीके की इच्छा थी। अब यह संभव हो पाया है।
रामू मणिवन्नन कहते हैं, ‘विजय ने सत्ता बचाने और अपने भविष्य के राजनीतिक मार्ग को सुरक्षित रखने की ज़रूरत को देखते हुए बीजेपी के ख़िलाफ़ रुख़ अपनाया है।’
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर राजा का कहना है, ‘भविष्य में बीजेपी विरोधी राष्ट्रीय गठबंधन में विजय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।’
उन्होंने कहा, ‘राजनीति में विजय का पहला दिन तमिलनाडु के उन मतदाताओं के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला था, जो बीजेपी विरोधी हैं। बीजेपी विरोधी दलों पर ज़ोर देना और पेरियार स्मारक का उनका दौरा, ये सभी संकेत हैं कि विजय द्रविड़ राजनीतिक परंपरा को पूरी तरह से नकारने के रास्ते पर नहीं हैं।’
रामू मणिवन्नन कहते हैं, ‘मैं विजय की पेरियार स्मारक यात्रा को नीतिगत बयान के रूप में नहीं देखता। तमिलनाडु में कोई भी पार्टी पेरियार के बिना राजनीति नहीं कर सकती। विजय को भी पेरियार की ज़रूरत है।’
उनका कहना है कि विजय ने अन्य गठबंधन दलों को जो महत्व दिया है, वह समय की ज़रूरत है और इस रुख़ का रुझान भविष्य में और अधिक स्पष्ट हो जाएगा।
राजा का कहना है, ‘हालांकि विजय लगातार बीजेपी को वैचारिक शत्रु कहते रहे हैं, लेकिन उन्होंने डीएमके का जितना विरोध किया, उतना बीजेपी की सीधी और गंभीर आलोचना ज़मीनी स्तर पर नहीं की है।’
‘ऐसे में यह देखना होगा कि कांग्रेस, कम्युनिस्ट और वीसीके जैसी बीजेपी विरोधी दलों के समर्थन से सरकार बनाने वाले विजय बीजेपी की आलोचना को और तेज़ करेंगे या केंद्र सरकार से सीधे टकराव से बचते हुए 'प्रशासनिक संतुलन' की राजनीति का रास्ता अपनाएंगे।’
क्या भारत में आने वाले दिनों में गंभीर तेल संकट होने की आशंका है? क्या ईरान युद्ध का असर भारत पर चिंताजनक असर डालने वाला है?
क्या भारत के लोगों को चुनौतीपूर्ण दिनों के लिए तैयार रहना होगा?
चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस संकट पर चुप क्यों रहे?
पीएम मोदी के एक भाषण के बाद विशेषज्ञों, नेताओं और आम लोगों के बीच ये चर्चा होनी शुरू हो गई, जो उन्होंने रविवार को सिकंदराबाद में दिया था.
पीएम मोदी के भाषण के चंद घंटों बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को "पूरी तरह अस्वीकार्य" बताया है, जो ईरान ने युद्ध ख़त्म करने के मक़सद से भेजा था.
यानी फ़िलहाल ईरान युद्ध को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है जो ग्लोबल इकोनॉमी (भारत समेत) और शेयर बाज़ार के लिए भी अच्छी ख़बर नहीं है.
पीएम के भाषण पर कैसी चर्चा
पीएम मोदी ने अपने भाषण में भारत के लोगों से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर किफ़ायत बरतने को कहा है. साथ ही एक साल तक सोना न ख़रीदने और खाने का तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की. और इस दौरान लोगों से विदेश यात्रा टालने की अपील भी की.
भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने पीएम के इस भाषण को शेयर करते हुए उनकी अपील को दोहराया. कुछ विशेषज्ञों ने पीएम के भाषण को डीकोड करते हुए भारत को मुश्किल दिनों से तैयार रहने के लिए कहा तो वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया कि ईरान वॉर से पैदा हुए हालात को सरकार ठीक से हैंडल नहीं कर पा रही है और इस मुश्किल को हैंडल करने की ज़िम्मेदारी जनता के कंधों पर डाल रही है.
वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया.
आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं. और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?
वहीं सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग पीएम के बयान से सहमति जता रहे हैं तो वहीं कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि विधानसभा चुनाव के दौरान इस संकट को देशवासियों से क्यों छुपाया गया.
आइए समझते हैं कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा और उसके मायने क्या हैं. और अपने इस बयान को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर क्यों हैं?
'पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करें'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान युद्ध का ज़िक्र करते हुए लोगों से पेट्रोल और डीज़ल का इस्तेमाल कम करने और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह दी.
उन्होंने कहा, "भारत के पास बड़े-बड़े तेल के कुएं नहीं हैं. हमें अपनी ज़रूरत के पेट्रोल-डीज़ल-गैस ये सभी बहुत बड़ी मात्रा में दुनिया के दूसरे देशों से मंगाने पड़ते हैं. युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीज़ल, गैस और फ़र्टिलाइज़र के दाम बहुत अधिक बढ़ चुके हैं. आसमान को भी पार कर गए हैं. पड़ोस के देशों में क्या है वो तो अख़बारों में आता है."
पीएम ने ऐसा क्यों कहा है?
ईरान युद्ध के कारण होर्मुज़ स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) में जहाज़ों की आवाजाही लंबे समय से प्रभावित है. ये वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया भर की तेल सप्लाई का 20 फ़ीसदी हिस्सा ट्रांसपोर्ट होता है. भारत भी अपनी तेल और ऊर्जा ज़रूरतों के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई पर काफ़ी हद तक निर्भर है.
ईरान युद्ध के कारण दुनिया भर में तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं. भारत को अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में तेल आयात करना पड़ता है.
विशेषज्ञों के मुताबिक़ पीएम ने इसी वजह से पेट्रोल और डीज़ल को लेकर संयम से काम लेने को कहा है क्योंकि युद्ध के कारण कच्चे तेल के साथ-साथ, खाने के तेल, फ़र्टिलाइज़र्स और लिक्विड नेचुरल गैस (एलएनजी) गैस के दाम भी बढ़ने की आशंका है. साथ ही इलेक्ट्रॉनिक आइटम और विमान यात्रा भी महंगी हो सकती है.
द हिंदू की एसोसिएट और पॉलिटिकल एडिटर निस्तुला हेब्बर ने कहा, "पीएम का भाषण संसद के दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संकट के असर को लेकर दिए गए उनके दो बयानों के बाद आया है. यह साफ़ इशारा करता है कि अब ज़्यादा समय तक सब कुछ सामान्य तरीके से नहीं चल सकता और सप्लाई चेन से जुड़ी परेशानियां आने वाली हैं. भारत, तैयार हो जाओ, आगे का सफ़र मुश्किल और झटकों भरा हो सकता है."
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2025-26 भारत ने कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात पर 144 बिलियन डॉलर खर्च किए.
विशेषज्ञ चेता रहे हैं कि पीएम का बयान भारत के लिए एक चेतावनी जैसी है, क्योंकि अगर होर्मुज़ की नाकाबंदी लंबे वक्त तक जारी रहती है, अगर कच्चे तेल की क़ीमत 110 या 120 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती है तो महंगाई बढ़ेगी. वित्तीय घाटा बढ़ेगा. और कुल मिलाकर इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
सोना ना ख़रीदने को क्यों कहा?
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में लोगों से एक साल तक सोना ना ख़रीदने की भी अपील की.
उन्होंने कहा, "सोने की ख़रीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत खर्च होती है. एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे. आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं ख़रीदेंगे."
"सोना नहीं ख़रीदेंगे. विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी."
कच्चे तेल और सोना दोनों को ही भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है. ऐसे में इन्हें ख़रीदने के लिए और ज़्यादा विदेशी मुद्रा (आम तौर पर डॉलर) की ज़रूरत पड़ेगी. और जिसकी वजह से रुपया कमज़ोर होगा और ये भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालेगा. इससे महंगाई बढ़ने की आशंका है.
फॉरेक्स (विदेशी मुद्रा भंडार) जब कम होता है तो सरकार की चिंता दो स्तरों पर होती है.
कच्चे तेल के आयात को लेकर और सोने के आयात को लेकर. विशेषज्ञों के मुताबिक़ इसी वजह से पीएम ने अपने भाषण में कच्चे तेल के साथ-साथ सोना ना ख़रीदने की भी सलाह दी है."
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 51.4 बिलियन डॉलर था. 2023 में यह 45.54 बिलियन डॉलर था. यानी 2024-25 में यह 13.7 फ़ीसदी बढ़ गया.
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के ताज़ा आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व्स यानी फॉरेक्स) 9 मई 2026 तक लगभग 690.6 अरब डॉलर था.
वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी ने एक्स पर लिखा, "पीएम मोदी की एक साल तक सोना मत खरीदिए वाली अपील अपने भीतर एक बड़ा संदेश छिपाए हुए है- रुपये को बचाइए. यह विदेशी मुद्रा संकट से निपटने की शुरुआती चेतावनी जैसी लगती है, क्योंकि आयातित सोने पर खर्च होने वाला हर अतिरिक्त डॉलर रुपये को और कमज़ोर करता है. भारत में सोने की भारी मांग है. देश हर साल लगभग 800–900 टन सोना आयात करता है, जो दुनिया में दूसरे सबसे बड़े स्तर पर है. कच्चे तेल के बाद सोना भारत का सबसे बड़ा आयात है. वित्तीय वर्ष 2026 में सोने का आयात रिकॉर्ड लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वित्तीय वर्ष 2025 के लगभग 24% ज़्यादा है."
विशेषज्ञों के मुताबिक़ सोने को लेकर दिया गया पीएम मोदी का बयान बताता है कि सरकार डॉलर रिज़र्व को बचा कर रखने पर ज़ोर दे रही है. साथ ही नॉन एसेंशियल इंपोर्ट (ग़ैर ज़रूरी आयात) को कम करना चाहती है. और ईरान युद्ध से पैदा हुए दीर्घकालीन दबाव के लिए लोगों को मानसिक तौर पर तैयार करना चाहती है.
वर्क फ़्रॉम होम के लिए क्यों कहा?
साथ ही पीएम मोदी ने वर्क फ़्रॉम होम का भी ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि हम वर्क फ़्रॉम होम और ऑनलाइन मीटिंग जैसी सेवाओं को फिर शुरू करें.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये बयान भी पेट्रोल और डीज़ल की किफ़ायत से जुड़ा है.
क्योंकि उम्मीद जताई जा रही है कि इस से फ़्यूल का इस्तेमाल कम होगा. लोगों की घर से दफ़्तर आवाजाही कम होगी. बिजली और तेल का कुल इस्तेमाल कम होगा. और बचत होगी.
खाने के तेल के इस्तेमाल को कम करने को क्यों कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "ऐसे ही खाने के तेल का भी है. इसके आयात के लिए भी बहुत बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा ख़र्च करनी पड़ती है. हर खाने में तेल के उपयोग में कुछ कमी करें तो वो भी देशभक्ति का काम है. इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी. इससे देश के ख़ज़ाने का स्वास्थ्य भी सुधरेगा और परिवार के लोगों का भी स्वास्थ्य सुधरेगा."
भारत खाने के तेल के सबसे बड़े आयातकों में से एक है. भारत पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ़्लॉवर ऑयल को आयात करता है. भारत इंडोनेशिया, मलेशिया अर्जेंटीना और ब्राज़ील जैसे देशों से खाने के तेल (कुकिंग ऑयल) को आयात करता है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ भारत अपनी कुल खाद्य तेल (कुकिंग ऑयल/एडेबल ऑयल) ज़रूरत का लगभग 55% से 60% आयात करता है. और इस क्रम में भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा ख़र्च करना पड़ता है.
फ़र्टिलाइज़र्स को लेकर क्या कहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों से अपील की कि केमिकल फ़र्टिलाइज़र्स पर अपनी निर्भरता कम करें. भारत दुनिया के सबसे बड़े फ़र्टिलाइज़र्स (उर्वरक) उपभोक्ताओं में है.
यूरिया, डीएपी, पोटाश, और इनके कच्चे माल का बड़ा हिस्सा भारत आयात करता है. इनकी कीमतें जुड़ी होती हैं- प्राकृतिक गैस, कच्चे तेल, और वैश्विक सप्लाई चेन से.
यानी अगर पश्चिम एशिया संकट से तेल महंगा होता है, गैस महंगी होती है, शिपिंग प्रभावित होती है, तो उर्वरक भी महंगे हो जाते हैं. भारत में किसान सस्ती कीमत पर खाद खरीदते हैं क्योंकि सरकार भारी सब्सिडी देती है. ऐसे में अगर फ़र्टिलाइज़र्स यानी खाद की क़ीमतें बढ़ती हैं तो सरकार का सब्सिडी बिल बहुत बढ़ जाता है.
समर्थन और आलोचना
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पीएम मोदी के इस भाषण के बाद कहा कि ये नाकामी का सबूत है, अब जनता को यह बताना पड़ रहा कि क्या ख़रीदें और क्या नहीं.
राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, "मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे- सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम इस्तेमाल करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो. ये उपदेश नहीं, ये नाकामी के सबूत हैं."
उन्होंने लिखा, "12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है- क्या ख़रीदें, क्या न ख़रीदें, कहां जाएं, कहां न जाएं. हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें. देश चलाना अब कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम के बस की बात नहीं."
शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, "मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष से निपटने में नीतिगत विफलता के बाद अब चुनावी फ़ैसलों का बोझ नागरिकों पर नहीं डाला जा सकता और उनसे तेल बचाने, यात्रा कम करने या ख़रीदारी घटाने की अपील नहीं की जा सकती."
उन्होंने सरकार को समझाइश देते हुए कहा कि मंत्रियों और नेताओं के लंबे चौड़े मोटर काफ़िलों पर रोक लगाकर, बड़ी-बड़ी रैलियों को एक साल के लिए बंद करके और भव्य शपथ ग्रहण समारोहों को बंद करके, उन्हें वॉच फ़्रॉम होम (घर से देखकर) भी पेट्रोल और डीज़ल बचाया जा सकता है.
वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर कहती हैं, "चुनाव ख़त्म हो गए हैं और इसके साथ ही पीएम मोदी ने लोगों से ईंधन की बचत करने को कहा है और विदेश यात्रा पर ना जाने की सलाह दी है. वो शुक्रवार को संयुक्त अरब अमीरात, स्वीडन, नीदरलैंड्स, नॉर्वे और इटली के दौरे पर जा रहे हैं."
वहीं गृहमंत्री अमित शाह ने लिखा, "वैश्विक संकट के इस दौर में मोदी जी ने देशवासियों से एक दूरदर्शी अपील की है. पेट्रोल-डीज़ल के उपयोग में संयम, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा और केमिकल फर्टिलाइजर को छोड़ नेचुरल फार्मिंग को अपनाने का उनका यह आह्वान भारत को आत्मनिर्भर और एनर्जी-सिक्योर राष्ट्र बनाने का स्पष्ट रोडमैप है. यह वैश्विक चुनौतियों के बीच देश को एक स्थिर, सशक्त और अग्रणी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में निर्णायक सिद्ध होगा."
वहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, "माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के द्वारा तेल और गैस को लेकर की गई अपील पर देशवासी अमल करें."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
हंटावायरस संक्रमण की नई रिपोर्ट के बाद चिंता बढ़ी है। कैसे फैलता है यह वायरस और इससे बचाव के उपाय क्या हैं?
डॉयचे वैले पर स्तुति लाल की रिपोर्ट –
अटलांटिक महासागर में होंडियस नामक क्रूज शिप पर सात लोगों के बीमार पाए जाने और तीन लोगों की मौत होने की खबर सामने आई है। इसका कारण शिप पर संदिग्ध हंटावायरस का फैलना बताया जा रहा है। इस जहाज पर करीब डेढ़ सौ यात्री और चालक दल के सदस्य मौजूद थे। हंटावायरस से जुड़े मामलों के सामने आने के बाद यह जहाज अब स्पेन के कैनरी आईलैंड्स की ओर अपना रुख करेगा। यहां मरीजों को मेडिकल मदद उपलब्ध करवाई जाएगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि केप वर्डे इस ऑपरेशन को पूरा करने में सक्षम नहीं है। उनके मुताबिक, ‘कैनरी द्वीप सबसे नजदीक और सुविधाओं वाला ठिकाना है, और इन लोगों की मदद करना स्पेन का नैतिक व कानूनी कर्तव्य है। वह भी तब, जब उस जहाज पर कई स्पेनिश नागरिक भी मौजूद हैं।’
इस नए मामले से जुड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रेस रिलीज के मुताबिक ‘सामान्य जनता के लिए खतरा अभी भी कम है और घबराने या यात्रा प्रतिबंध लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है।’
हंटावायरस कैसे फैलता है?
हंटावायरस का नाम कोरियाई नदी हंतान से लिया गया है। दरअसल, 1950 के दशक में कोरिया के इस इलाके में कई सैनिक इस वायरस से बीमार हुए। लेकिन सन् 1977 में पहली बार इस वायरस की पहचान हुई। हंटावायरस वायरस का एक ऐसा समूह है जो आमतौर पर चूहों और उनकी प्रजातियों में पाया जाता है। अगर यह इंसानों में फैल जाए तो जानलेवा भी साबित हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक हर साल इस संक्रमण से 10,000 से लेकर एक लाख लोग तक प्रभावित होते हैं।
जर्मनी के रॉबर्ट कॉख इंस्टिट्यूट के मुताबिक, हंटावायरस संक्रमित चूहों के लार, मूत्र और मल के जरिए बाहर निकलता है। जब यह पदार्थ सूखकर धूल बन जाता है और हवा में उड़ता है, तो इंसानों में सांस के जरिए उनके शरीर में प्रवेश कर जाता है। फिर यही वायरस इंसान के शरीर में संक्रमण पैदा करता है और अलग-अलग लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
यह वायरस कई तरह से इंसानों में फैल सकता है। खासकर जब कोई इंसान बाहरी गतिविधियों के दौरान चूहों के मल-मूत्र के संपर्क में आता है जैसे बागवानी करते हुए, लकड़ी काटते हुए या जॉगिंग करते हुए इसके संपर्क में आए। इसके अलावा, वायरस के संपर्क में आने का खतरा तब भी अधिक होता है जब हम ऐसे इलाकों में रहते हैं, जहां चूहों की संख्या बहुत ज्यादा है।
आम तौर पर इसका संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं होता है। कभी-कभी एक दूसरे के काफी पास-पास और लंबे समय तक साथ रहने पर यह एक व्यक्ति से दूसरे में जाता है। यही कारण है कि इसका संक्रमण खासकर घर के सदस्यों या करीबी लोगों में ज्यादा फैलता देखा गया है। साथ ही, संक्रमण के शुरुआती दिनों में इस बीमारी के फैलने का खतरा सबसे अधिक होता है।
कैसे होते हैं हंटावायरस संक्रमण के लक्षण
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हंटावायरस से संक्रमित होने के लक्षण आमतौर पर वायरस से संपर्क के एक से आठ सप्ताह के भीतर शुरू होते हैं। आम लक्षणों में बुखार, सिर दर्द, शरीर दर्द और पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे पेट दर्द, जी मिचलाना या उल्टी होना शामिल है।
यह वायरस इंसानों में दो तरह की बीमारी पैदा कर सकते हैं। पहली बीमारी ‘हंटावायरस कार्डियोपल्मोनरी सिन्ड्रोम’ (एचपीसीएस) के नाम से जानी जाती है, जिसे ज्यादातर अमेरिका में देखा गया है। यह बीमारी फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे फेफड़ों में पानी भर जाता है। इससे खांसी और सांस लेने में परेशानी होने लगती है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है।
वहीं, दूसरी बीमारी को ‘हेमरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम’ (एचएफआरएस) का नाम दिया गया है। हंटावायरस से होने वाली इस बीमारी को ज्यादातर यूरोप और एशिया में देखा गया है। इस बीमारी में गुर्दे को नुकसान पहुंचता है। बीमारी के आखिरी चरणों में लो ब्लड प्रेशर और खून बहने की समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा, कई बार तो गुर्दे अचानक काम करना भी बंद कर देते हैं।
-गोपालकृष्ण गांधी
प्रिय मुख्यमंत्री-निर्वाचित
सी. जोसेफ विजय,
आपकी शानदार जीत पर हार्दिक बधाई।
मैं उन लगभग 35 फीसदी लोगों में शामिल नहीं था जिन्होंने आपको वोट दिया। लेकिन जैसे ही नतीजे सामने आए, मैं सचमुच चौंक गया। और मेरे मन में यह विचार आया: यह व्यक्ति नया है, यानी अनुभवहीन है, और इसका मतलब यह भी है कि यह ताजा है, साफ है।
मैंने खुद से कहा, इसे कुछ सच्ची बातें बताई जानी चाहिए। यह समझेगा। इसकी युवावस्था के दरवाजे पर मध्य आयु की समझ दस्तक दे रही है। और इसलिए, माननीय मुख्यमंत्री-निर्वाचित महोदय, कृपया इन बातों पर विचार करें:
1. आपने वोट की लड़ाई जीत ली है; अब आपको विधानसभा में होने वाली सबसे महत्वपूर्ण ‘फ्लोर टेस्ट’ की लड़ाई जीतनी है। यह जरूरी है कि आप भारत के संघीय और धर्मनिरपेक्ष ढाँचे की रक्षा को अपनी पहली प्राथमिकता बनाएं। राज्य को संविधान की मूल संरचना के प्रति अपनी मरियादै (सम्मान) के तहत खड़ा रहने दें। अपनी कुर्सी बचाने के लिए किसी तरह की घबराहट में उस पर समझौता न करें।
2. हर मायने में विजय बनकर सदन में प्रवेश कीजिए, लेकिन याद रखिए कि विजयोल्लास अच्छा वस्त्र नहीं बनाता, वह अहंकार पैदा करता है।
एम.के. स्टालिन, जिनकी जगह आप ले रहे हैं, एक आदरणीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं-ऐसी परंपरा, जिसमें पेरियार द्वारा समुदाय के आत्मसम्मान को जागृत करने का प्रयास और महिलाओं की समानता के लिए उनका संघर्ष शामिल है, एक ऐसे समाज में जो पूर्वाग्रहों से संचालित रहा है। उनका अंदाज अलग था। सदन में उनकी अनुपस्थिति महसूस की जाएगी। आपके पास जो है, वह एक खाली स्लेट नहीं है। आपके पास वह है जो उनके पास नहीं था: एक अनुभवी स्टाइलिस्ट जो आपके लिए लिख सकता है। कृपया द्रविड़वाद क्या है और क्या नहीं, इसकी शब्दाडंबरपूर्ण बहस को अपने ऊपर हावी न होने दें। वे आपके पूर्ववर्ती हैं, शिकारी नहीं। आप उनके उत्तराधिकारी हैं, उनके स्थानापन्न नहीं। और सदन में उदयनिधि स्टालिन की मौजूदगी को एक कठिन द्वंद्व नहीं, बल्कि एक शानदार युगलबंदी बनने दें। जैसा कि केंद्र ने नाडाल का सामना करते हुए फेडरर में देखा है-कौशल का संतुलन।
3. पूछा जा सकता है, आपकी विचारधारा क्या है? इससे घबराइए मत। उनसे कहिए, ‘मेरी विचारधारा है-मेरी मनसाची (अंतरात्मा)।’
4. कृपया अधिकारियों को सहयोगी मानिए, अधीनस्थ नहीं। वे यह गलतफहमी पाल सकते हैं कि चाटुकारिता ही सेवा है। उस भ्रम को दूर कीजिए। उन्हें यह कहकर बिना भय अपनी स्पष्ट राय देने के लिए प्रोत्साहित कीजिए-जैसे सरदार पटेल ने गृह मंत्री रहते हुए अधिकारियों को किया था और निवर्तमान मंत्रियों की आलोचना करने का साहस भी बढ़ाइए।
5. अंत में, मुख्यमंत्री महोदय, कृपया याद रखिए कि राज्य के भीतर आपको पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता बनाते हुए सुशासन और आर्थिक प्रगति कायम रखनी है। लेकिन उससे आगे बढक़र, एक ऐसे भारत के प्रतीक बनिए जो नफरत से मुक्त, निडर और न्यायपूर्ण हो। अगर मैं व्यक्तिगत टिप्पणी पर समाप्त करूँ, तो यह पहली बार है कि आप जैसे एक ईसाई इस राज्य की सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं।
नियति के उस उपहार को ईश्वर के हस्तक्षेप के रूप में स्वीकार कीजिए, जो तमिलनाडु की धर्मनिरपेक्ष पहचान के लिए आया है। किसी को यह मत कहने दीजिए कि आप उस विरासत को कम करके आँकें या दबाएँ। वल्लुवर भी ऐसा नहीं चाहेंगे।
मैं आपको केवल सफलता नहीं, मुख्यमंत्री महोदय, पूर्णता की कामना करता हूँ।
-शुभांगी मिश्रा
एक पॉडकास्ट के वायरल होने के बाद मराठी अभिनेत्री गिरिजा ओक पूरे इंटरनेट पर छा गई थीं। इंटरनेट पर उन्हें लोगों ने ‘नेशनल क्रश’ भी बुलाना शुरू कर दिया। लेकिन इसके बाद उनकी तस्वीरों का दुरुपयोग जिस तरह से हुआ, और जिस स्तर पर हुआ, उससे वो भी हैरान रह गईं।
मुंबई में एक इंटरव्यू में गिरिजा ने इस बारे में बीबीसी हिन्दी से विस्तार में बात की। उन्होंने बताया, ‘मुझे एक फोटो भेजी गई, जिसमें एक बहुत ही कम कपड़ों वाली औरत के धड़ पर मेरी शक्ल चिपकाई गई, औरत के बराबर में एक बहुत ही कम कपड़ों में आदमी बैठा नजर आ रहा था, जिसके धड़ पर मेरे 12 साल के बेटे का चेहरा लगा हुआ था। वो बहुत बुरा था, मुझे बहुत गुस्सा आया।’ इस फोटो को देखने के बाद गिरिजा ने दिसंबर 2025 में ओशिवारा पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज करवाई, जिसके बाद काफी फोटो और वीडियो हटा लिए गए हैं।
एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 79 (महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाना), 356 (2) (मानहानि), और आईटी एक्ट की उपयुक्त धाराएं लगाई गई थीं। गिरिजा ओक ने बताया, ‘ये एआई नाम का टूल किसी के भी हाथ में हो सकता है और ये बहुत ही डरावना है।’
गिरिजा की कहानी
गिरिजा ओक मराठी सिनेमा की एक जानी-मानी अभिनेत्री हैं। साथ ही वे ‘तारे जमीन पर’, ‘शोर इन द सिटी’ और ‘जवान’ जैसी हिन्दी फिल्मों में काम कर चुकी हैं।
हम उनसे मुंबई के कार्टर रोड पर मिले जहाँ लोग उन्हें सेल्फी के लिए रोक रहे थे, और गिरिजा मुस्कुराकर अपने प्रशंसकों के साथ फोटो खिंचवा रही थीं।
नवंबर 2025 में सौरभ द्विवेदी के साथ एक पॉडकास्ट सिरीज करने के बाद, गिरिजा इंटरनेट पर वायरल हो गईं। नीली साड़ी में बैठी गिरिजा जिस कॉन्फिडेंस से बात कर रही थीं, उसे लोगों ने बहुत पसंद किया।
लेकिन जहां एक ओर गिरिजा के प्रशंसक थे वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे थे जिन्होंने उनकी फ़ोटो के साथ छेड़छाड़ की और उन्हें पोस्ट कर दिया।
गिरिजा बताती हैं कि शायद इंटरनेट को एक नया चेहरा मिल गया था जिस पर उन्होंने सोचा कि एआई का प्रयोग किया जाए।
उन्होंने कहा, ‘कुछ ऐसी फोटो हैं जिनमें मैंने साड़ी पहनी हुई है वो एकदम से बिकिनी में तब्दील हो गई या मेरा टॉप हटा दिया गया था। लोग ऐसी फ़ोटो में एनीमेशन भी डाल देते हैं, जैसे मेरा आगे झुककर जीभ बाहर निकालना, या अचानक से किसी आदमी का फ्रेम में आ जाना और हम फिर किस करने लगते हैं।’
गिरिजा ने काफी कंटेंट नजरअंदाज किया, लेकिन जब उन्हें उनके बेटे के साथ एक एआई फोटो भेजी गयी, तो उन्होंने मुंबई के ओशिवारा थाने में कंप्लेंट दर्ज करवाई जिसके बाद उनकी फ़ोटो सोशल मीडिया से हटाई गईं।
एआई का दुरुपयोग
एआई हम सबकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। ये समझा जाता है कि ये हमारी मदद के लिए हैं लेकिन यहां देखा जा रहा है कि इसका दुरुपयोग हो रहा है और इसके निशाने पर हम सब हैं।
ये भी देखा जा रहा है कि एआई के ज़रिए ख़ासकर महिलाओं और बच्चों के आपत्तिजनक और अश्लील वीडियो बनाए जाते हैं और उन्हें सर्कुलेट कर दिया जाता है। इसमें एआई की मदद से डीपफेक जैसे कई टूल्स हैं जिनका इस्तेमाल किया जा रहा है।
हाल ही में तमिलनाडु में लड़कियों के फ़ेक वीडियो बनाए जाने का एक मामला सामने आया था।
यहां एक छात्र ने कुछ छात्राओं की फ़ोटो एआई के ज़रिए मॉर्फ करके ऑनलाइन पोस्ट कर दी थी। इस मामले में पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की और 20 वर्षीय छात्र को गिरफ्तार भी किया।
वहीं ये भी देखा गया है कि लोग बदले की भावना से भी ऐसे वीडियो बनाते हैं। ऐसा एक मामला असम में सामने आया था।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक महिला के पूर्व में रहे बॉयफ्रेंड ने बदले की भावना से महिला की एआई के ज़रिए फ़ोटो में बदलाव किए और उन अश्लील फ़ोटो को ऑनलाइन पोस्ट कर दिया। ये तस्वीरें पोस्ट करके उसने लाखों रुपये भी कमाए।
विशेषज्ञ ये भी बताते हैं कि ‘न्यूडिफिकेशन ऐप्स’, यानी जिन ऐप्स के जरिए फोटो से छेड़छाड़ की जाती है, आजकल बहुत आम हो गए हैं।
गृह मंत्रालय ने राज्यसभा को बताया कि 2025 में नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर क्राइम्स अगेंस्ट वीमेन के 76,657 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 में ऐसे 48,335 मामले सामने आए थे।
-रिचर्ड महापात्रा
आप्रावसन (इमिग्रेशन) दुनिया भर में राजनीतिक संघर्ष का एक प्रभावशाली हथियार बन चुका है। पिछले एक दशक से अधिक समय से यूरोप से लेकर उत्तरी अमेरिका तक और एशिया से लेकर अफ्रीका तक, देशों की आंतरिक चुनावी राजनीति ने प्रवासी-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दिया है। अब यह स्पष्ट रूप से एक राजनीतिक एजेंडा बन गया है और लगातार अप्रवासी-विरोधी विजिलेंटिज्म (कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति) को भी उकसा रहा है।
वर्ष 2015-2016 के दौरान, जब शरणार्थी संकट चरम पर था, तब यूरोप में इस तरह की कानून अपने हाथ में लेने की घटनाएं व्यापक रूप से देखने को मिली थीं। वर्तमान में यह प्रवृत्ति आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना अनेक देशों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।
21वीं सदी की शुरुआत में दुनिया में आप्रवासन को लेकर भारी आक्रोश देखा गया, विशेष रूप से उन समृद्ध देशों में जिन्होंने वैश्विक संपदा के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा है। लोगों के एक देश से दूसरे देश में जाने पर रोक लगाने के लिए प्रतिबंध लगाए गए, नीतियां बनाई गईं और यह सब स्थानीय अर्थव्यवस्था तथा स्थानीय हितों की रक्षा के नाम पर किया गया।
आज के इस बंटे हुए और अलग-थलग पड़ते वैश्विक परिदृश्य में एक अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी होना ऐसी पहचान बन गया है, जो किसी भी समय राजनीतिक हमलों और उथल-पुथल का निशाना बन सकता है।
हालांकि आप्रवासियों के खिलाफ गढ़ी जा रही धारणाओं के विपरीत सांख्यिकीय रूप से अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी अब भी अल्पसंख्यक हैं। 2024 के मध्य तक उनकी संख्या लगभग 30.4 करोड़ थी, जो दुनिया की कुल आबादी का केवल 3.7 प्रतिशत है, हालांकि इसमें लगातार वृद्धि हो रही है।
फिर भी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय आप्रवासी अपवाद ही हैं, क्योंकि अधिकांश लोग अपने-अपने देशों के भीतर ही पलायन करते हैं (आंतरिक प्रवासी)। अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी श्रमिकों का है, जो मेजबान देशों की श्रमशक्ति का महत्वपूर्ण आधार हैं।
संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) की नवीनतम ‘वल्र्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2026’ में स्थानीय और व्यापक विकास में अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में उन्हें ‘वैश्विक रणनीतिक संपदा’ बताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इक्कीसवीं सदी में प्रवासन मानव विकास को आकार देने वाली एक शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरा है।’
इसे दुनिया के बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य के संदर्भ में समझना चाहिए। कुछ देशों की आबादी अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक है; कुछ देशों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार तेज है, जबकि कुछ देश अब उस जीवन प्रत्याशा स्तर तक पहुंच रहे हैं जिसे आधुनिक दुनिया में स्वस्थ माना जाता है। इसलिए देशों की जरूरतों के अनुसार मानव संसाधनों अथवा जनशक्ति के संतुलित वितरण की आवश्यकता होती है।
मानव इतिहास में प्रवासन हमेशा एक महत्वपूर्ण रणनीति रहा है, जिसने मानव समाज को आज के स्वरूप तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है।
इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम) का कहना है कि प्रवासन वैश्विक स्तर पर मानव विकास को आगे बढ़ाने वाली एक प्रमुख शक्ति है। अपनी रिपोर्ट में संस्था ने प्रवासियों के सामाजिक और आर्थिक योगदान का विस्तृत विश्लेषण किया है।
अंतरराष्ट्रीय आप्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि (रेमिटेंस) वर्ष 2025 में 913 अरब डॉलर तक पहुंच गई है और इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों को इस विदेशी धन प्रवाह का सबसे बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है।
इसका महत्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इन देशों के लिए रेमिटेंस की राशि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और आधिकारिक विकास सहायता (ओडीए) की संयुक्त राशि से भी अधिक है। वर्ष 2023 में भारत सहित निम्न और मध्यम आय वाले देशों को 656 अरब डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त हुआ, जबकि एफडीआई और ओडीए की संयुक्त राशि 638 अरब डॉलर थी।
-उमंग पोद्दार
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने हेट स्पीच यानी नफरती भाषण के मामले में बुधवार 29 अप्रैल को एक अहम फैसला दिया है। जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने कई याचिकाएँ थीं।
कुछ याचिकाओं में माँग थी कि हेट स्पीच के मुद्दे पर कानून में संशोधन होना चाहिए। ऐसे नए प्रावधान लाने चाहिए जिससे हेट स्पीच को रोका जा सके।
कुछ की माँग थी कि कोर्ट को विशेष जाँच टीम बना कर हेट स्पीच की घटनाओं पर जाँच की निगरानी रखनी चाहिए। वहीं, कई याचिकाएँ कुछ कथित हेट स्पीच की घटनाओं के खिलाफ थीं। इसमें याचिका दायर करने वालों की माँग थी कि ऐसे नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच के लिए क़ानून में फिलहाल कई प्रावधान मौजूद हैं और कोर्ट इसमें कोई नया संशोधन लाने के लिए आदेश नहीं दे सकता।
कई मामलों में कार्रवाई की भी माँग थी। इनमें अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के भाषणों, हरिद्वार और दिल्ली में धर्म संसद से जुड़े केस, कोरोना काल में तबलीग़ी जमात के बारे में दिए गए बयान जैसे मामले शामिल हैं। कोर्ट ने इन सभी मामलों को भी ख़ारिज कर दिया। सिर्फ चार याचिकाओं पर अभी सुनवाई जारी रखी है।
आइए समझते हैं, इस फैसले में क्या हुआ और सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला क्यों अहम है।
कौन-कौन से मामले कोर्ट के सामने थे?
कोर्ट के सामने एक दर्जन से ज़्यादा याच?िकाएँ थीं। इनमें पिछले कुछ सालों के सबसे बड़े मामले भी थे जिनमें आरोप था कि किसी समुदाय, ख़ासकर मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण दिए गए हैं।
एक मामला सुदर्शन टीवी चैनल से जुड़ा था। अगस्त 2020 में सुदर्शन टीवी के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके ने कथित ‘यूपीएससी जिहाद’ के बारे में ट्विटर (अब एक्स) पर टिप्पणी की थी।
उन्होंने कहा था कि कुछ दिनों में वे टीवी पर अपने कार्यक्रम में यह बात करने वाले हैं कि संघ लोक सेवा आयोग या यूपीएससी की परीक्षा में मुसलमानों को हिंदुओं के मुकाबले बढ़ावा दिया जाता है।
उन्होंने दावा किया कि उन्हें ज़्यादा उम्र तक परीक्षा देने की इजाजत और परीक्षा देने के ज़्यादा मौके दिए जाते हैं। इसके खिलाफ कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। इनका कहना था कि ये सारी बातें झूठी हैं और भारत में टीवी चैनलों से जुड़े नियमों के खिलाफ हैं।
यही नहीं, इस कथित मुद्दे से जुड़े चार एपिसोड टीवी पर प्रसारित हुए थे। इसके पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को यह तय करने के लिए कहा था कि इस कार्यक्रम का प्रसारण रुकना चाहिए या नहीं। हालाँकि, सरकार ने इस प्रसारण को रोका नहीं था।
उसके कुछ वक्त बाद साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने बाक़ी बचे एपिसोड के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। उसके बाद से यह मामला कोर्ट में लंबित था। साथ ही, और भी याचिकाएँ थीं, जो कथित तौर पर ‘कोरोना जिहाद’ से जुड़ी रिपोर्टिंग के खिलाफ थीं। साल 2020 में कोरोना काल के दौरान कई चैनलों ने खबरें चलाई थीं कि तबलीगी जमात ने भारत में कोरोना वायरस फैलाया है।
बाद में, इस बात को झूठ पाया गया था। इसके खिलाफ भी याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से कार्रवाई की माँग की थी।
इसके अलावा, दिसंबर 2021 में दिल्ली और हरिद्वार में हिंदू धर्म संसद हुए थे। इसमें कई वक्ता धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने, मुस्लिम प्रधानमंत्री न बनने देने, मुस्लिम आबादी न बढऩे देने समेत धर्म की रक्षा के नाम पर विवादित भाषण देते हुए दिखाई दिए।
साथ ही, कुछ याचिकाकर्ताओं ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ आंदोलन के दौरान भाजपा के नेताओं, अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के दिए गए बयानों पर कार्रवाई की माँग की थी।
कई ऐसी भी याचिकाएँ थीं जिनका कहना था कि हिंदुओं के खिलाफ हेट स्पीच दी गई है।
इन मामलों में द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) के नेता उदयनिधि स्टालिन की सनातन धर्म की कई कथित टिप्पणी भी शामिल थी।
इनमें कई याचिकाओं में यह माँग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट पुलिस को एफ़आईआर दायर करने का आदेश दे और उसके बाद तहकीकात और कार्रवाई पर निरंतर निगरानी रखें।
कई याचिकाएं थीं जिनमें कहा गया था कि हेट स्पीच के मामलों में पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। यह कोर्ट की अवमानना है। साथ ही, कुछ याचिकाओं की माँग थी कि कोर्ट सरकारों को मॉब लिंचिंग रोकने के साल 2018 के अपने दिशा-निर्देश को लागू करने का आदेश दे।
सुप्रीम कोर्ट ने किन चार मामलों को जारी रखा?
पिछले महीने 29 अप्रैल के फैसले में कोर्ट ने इनमें से कई याचिकाओं को खारिज कर दिया। यानी, अब ये मामले सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं हैं। अब इन मामलों में जहाँ पर पुलिस की तहकीकात या कोर्ट में कानूनी प्रक्रिया चल रही, वे जारी रहेंगी। फिलहाल केवल चार मामले हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी।
इनमें केरल के स्पीकर ऐन। शमशीर, उदयनिधि स्टालिन समेत कुछ नेताओं के खिलाफ अवमानना याचिकाएँ थीं। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि उन्होंने कथित तौर पर हिंदू भगवानों का अपमान किया था। इससे समाज में सांप्रदायिक शांति भंग हो सकती थी।
एक मामला गुंटूर के मेयर कवाती मनोहर नायडू के कुछ बयानों के खिलाफ है। वहीं, एक दूसरा केस अजमेर शरीफ दरगाह के खिलाफ एक व्यक्ति के बयान से जुड़ा है। इन सब याचिकाओं में कहा गया है कि पुलिस ने शिकायत के बाद भी कोई एफ़आईआर दायर नहीं की। यह कोर्ट के दिशा-निर्देश के खिलाफ जाता है।
कोर्ट ने कहा कि इन चार याचिकाओं में प्रशासन ने कोर्ट के सामने अपना जवाब दायर नहीं किया था कि उन्होंने क्या कार्रवाई की। इसलिए वे इन केस में आगे सुनवाई जारी रखेंगे।
बाक़ी मामलों के लिए कोर्ट ने कहा कि उन्होंने राज्यों से एक ‘स्टेटस रिपोर्ट’ माँगी थी। कोर्ट ने कहा कि उन मामलों में एफआईआर दायर हो चुकी है।
परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के बयानों पर कोर्ट ने कहा कि उनके भाषणों से किसी प्रकार की हिंसा के लिए उकसाया नहीं गया था।
हालाँकि, कोर्ट ने एक बिंदु पर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से असहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दायर करने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि हेट स्पीच से जुड़े प्रावधानों के तहत एफआईआर दायर करने के लिए उचित अधिकारियों से अनुमति लेने की जरूरत होती है।
हेट स्पीच से जुड़े इस फैसले के क्या मायने हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत के कानून और कोर्ट के पहले के फैसलों से यह साफ है कि अगर किसी संज्ञेय जुर्म (कॉग्निज़ेबल ऑफेंस) की जानकारी पुलिस को दी जाती है तो पुलिस को एफआईआर दायर करना जरूरी है। संज्ञेय जुर्म यानी ऐसे अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट के किसी अभियुक्त को गिरफ़्तार कर सकती है। साथ ही, कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं हो तो किसी व्यक्ति के पास अनेक कानूनी विकल्प हैं। वे वरिष्ठ पुलिस अफसर के पास शिकायत कर सकते हैं।
उसके बाद मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं। अगर मजिस्ट्रेट भी मामले में कार्रवाई करने से मना कर दे तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी जा सकते हैं।
पुलिस में एफआईआर दायर करने के बाद मजिस्ट्रेट के पास शक्ति होती है कि वे अलग-अलग पड़ाव में जाँच पर निगरानी रख सकें। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच के मुद्दे पर भारत में अनेक कानून हैं। यही नहीं, साल 2017 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कानून में संशोधन लाने के लिए सुझाव दिया था।
लॉ कमीशन के सुझावों पर अमल करना है या नहीं, ये संसद की जिम्मेदारी है और उसमें सुप्रीम कोर्ट को दख़ल नहीं देना चाहिए।
साथ ही कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मुद्दे पर कोई क़ानून नहीं है तो कोर्ट कुछ निर्देश जारी कर सकता है, जैसे कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए किया था।
तमिलनाडु विधानसभा का रिज़ल्ट 4 मई को आ चुका है जिसमें एक्टर विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है.
लेकिन अब तक राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उनको सरकार बनाने का न्योता नहीं भेजा है. उनके इस फ़ैसले ने अर्लेकर को सवालों के घेरे में ला दिया है.
234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटों की ज़रूरत होती है. इस हिसाब से विजय की पार्टी के पास अकेले दम पर बहुमत नहीं है.
राज्यपाल ने विधानसभा भंग तो कर दी है लेकिन राजभवन की ओर जारी बयान में भी कहा गया है कि टीवीके अब तक विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं जुटा सकी है.
लेकिन आम तौर पर परिपाटी रही है कि चुनाव में सबसे ज़्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी को राज्यपाल सरकार बनाने का न्योता देते हैं.
विजय ने भी सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है. उसके बावजूद उनको सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं करने के राज्यपाल के फ़ैसले पर सवाल उठ रहे हैं.
राज्यपाल की क्यों हो रही है आलोचना?
जब विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया में राज्यपाल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
अतीत में ऐसी परिस्थितियों में राज्यपालों ने अलग-अलग तरीके अपनाए हैं. कई बार सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाया गया, जबकि कुछ मामलों में बहुमत साबित करने वाले गठबंधन को प्राथमिकता दी गई.
इसी वजह से कई बार विवाद भी पैदा हुए. कांग्रेस, लेफ़्ट पार्टियों समेत कई नेताओं ने विजय को सरकार बनाने के लिए ना बुलाने के गवर्नर के फ़ैसले की आलोचना की है.
कांग्रेस नेता और पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने लिखा, "अगर किसी राजनीतिक गठबंधन या राजनीतिक दल को विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो राज्यपाल का कर्तव्य क्या होता है? सबसे बड़े दल के नेता को, विधानसभा सदस्यों की संख्या के आधार पर, सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए. यही राजनीतिक परंपरा है. यही संसदीय मर्यादा है. जिस मंच पर उस दल के नेता को यह साबित करना होता है कि उनके पास बहुमत का समर्थन है, वह विधानसभा है, न कि राजभवन. यही सुप्रीम कोर्ट का फैसला है. मैं तमिलनाडु के राजनीतिक दलों की सराहना करता हूँ कि उन्होंने इस नियम को स्पष्ट रूप से सामने रखा और उस पर ज़ोर दिया."
इससे पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की तमिलनाडु यूनिट ने भी विजय को बिना किसी देरी के सरकार बनाने का न्योता देने की मांग की है.
एक्स पर पोस्ट करते हुए सीपीआई (एम) ने लिखा, "हाल ही में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जनता ने ऐसा जनादेश नहीं दिया है, जिससे कोई एक पार्टी या गठबंधन पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना सके."
"ऐसी स्थिति में 108 विधायकों के साथ टीवीके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. इसके अनुसार, केवल टीवीके नेता विजय ने ही सरकार बनाने का दावा पेश किया है."
"बीजेपी संविधान के ख़िलाफ़ राज्यपाल के माध्यम से काम करने और उन्हें अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करने का रवैया अपनाती रही है. इसी क्रम में तमिलनाडु के राज्यपाल उन्हें पदभार ग्रहण करने के लिए आमंत्रित करने में देरी कर रहे हैं और इनकार कर रहे हैं. यह अस्वीकार्य है."
नियम क्या कहते हैं?
बीबीसी तमिल के मुताबिक सेवानिवृत्त न्यायाधीश हरिपरंथमन कहते हैं, "राज्यपाल यह नहीं कह सकते कि वह केवल तभी शपथ ग्रहण की अनुमति देंगे जब पूरी संख्या दिखाई जाए."
उन्होंने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, "सरकार गठन के लिए आमंत्रित करने का अधिकार राज्यपाल के पास होता है. जब किसी (पार्टी) के पास स्पष्ट बहुमत न हो, तब दावेदार पार्टी से संख्या साबित करने के लिए कहना गलत नहीं है."
उन्होंने आगे कहा, "लेकिन साथ ही यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी ताकत दिखाने पर ही शपथ ग्रहण की अनुमति दी जाएगी. बहुमत साबित करने की सही जगह विधानसभा होती है."
सुप्रीम कोर्ट के वकील करपका विनायगम का कहना है, "अगर राज्यपाल को दावेदार पार्टी पर भरोसा है, तो वह सरकार बनाने के लिए न्योता देंगे."
उन्होंने बीबीसी तमिल से बातचीत में कहा, "राज्यपाल को सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी को जवाब देना चाहिए. इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती, लेकिन साथ ही वह बहुत ज्यादा समय भी नहीं ले सकते."
उन्होंने कहा, "विधानसभा भंग होने के बाद उसे लंबे समय तक खाली नहीं रखा जा सकता, इसलिए राज्यपाल को इस मामले में जल्दी फ़ैसला लेना चाहिए."
सरकार बनाने का दावा करने वाली पार्टी को राज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद शपथ ग्रहण समारोह होगा. राज्यपाल मुख्यमंत्री और मंत्रियों को पद की शपथ दिलाएंगे.
राज्यपाल किसे बुलाएं: सरकारिया आयोग के मानदंड
जून 1983 में केंद्र सरकार ने राज्य और केंद्र सरकारों के संबंधों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति आरएस सरकारिया आयोग का गठन किया था. राज्यपाल की भूमिका पर विचार करते हुए आयोग ने सुझाव दिया था कि मुख्यमंत्री चुनते समय राज्यपाल को कुछ सिद्धांतों का पालन करना चाहिए:
विधानसभा में जिस पार्टी या दलों के गठबंधन को सबसे व्यापक समर्थन प्राप्त हो, उसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए.
राज्यपाल का काम यह सुनिश्चित करना है कि सरकार बने- न कि ऐसी सरकार बनाने की कोशिश करना जो उनकी पसंद की नीतियों को आगे बढ़ाए.
अगर किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता, तो राज्यपाल को इस क्रम में आमंत्रित करना चाहिए:
चुनाव पूर्व गठबंधन,
सबसे बड़ी एकल पार्टी जो बहुमत का समर्थन जुटा सके,
चुनाव बाद बना गठबंधन जिसके पास आवश्यक संख्या हो,
चुनाव बाद बना ऐसा गठबंधन जिसे बाहर से समर्थन देने वाले सहयोगी मौजूद हों.
राज्यपाल के इस रुख़ को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के एसआर बोम्मई केस के फ़ैसले के विपरीत माना जा रहा है.
उस फ़ैसले में कहा गया था कि सरकार के बहुमत की जांच केवल विधानसभा के पटल पर हो सकती है, राजभवन में नहीं.
इस ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद से राज्यपाल आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते रहे हैं और सदन में विश्वास मत के लिए तारीख तय करते हैं.
एसआर बोम्मई केस के मुताबिक़ सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का सबसे शुरुआती इस्तेमाल साल 1996 और 1998 में हुआ था, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी.
बीबीसी संवाददाता उमंग पोद्दार ने संवैधानिक मामलों के जानकार आलोक प्रसन्ना कुमार से बात की. उन्होंने भी 1994 के एस आर बोम्मई केस का ज़िक्र करते हुए कहा, "चुनाव के बाद अगर किसी एक दल को या चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत नहीं मिलता तो सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना चाहिए."
और अगर बाद में सबसे बड़ा दल (सिंगल लार्जेस्ट पार्टी) भी कहे कि उनके पास बहुमत नहीं है तो पोस्ट पोल अलायंस को बुलाना चाहिए."
हालांकि आलोक प्रसन्ना कुमार ने ये भी कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि यही करना है. गवर्नर कई बार अपने विवेक का इस्तेमाल करके स्थिति को देखते हुए फ़ैसला कर सकता है.
आलोक प्रसन्ना कुमार कहते हैं कि सरकार के शपथ ग्रहण करने के बाद सामान्य तौर पर बहुमत साबित करने के लिए 48 घंटों का समय दिया जाता है. ऐसा इसलिए होता है ताकि सरकार बनाने वाले दल को दूसरी पार्टी के विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का मौक़ा ना मिल पाए.
आलोक प्रसन्ना कुमार के मुताबिक़, "तमिलनाडु के केस में जब विजय ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया तो गवर्नर को चाहिए था कि उनको सरकार की शपथ दिलाते. फिर 48 घंटे के अंदर कहते कि चलो बहुमत साबित करो. फिर ये विजय का काम होता कि वो विधानसभा के फ़्लोर पर बहुमत साबित करें. तो इस हिसाब से यहां राज्यपाल ने बिलकुल ग़लत किया."
तमिलनाडु की स्थिति
जब किसी विधानसभा चुनाव में कोई भी राजनीतिक पार्टी या गठबंधन बहुमत हासिल नहीं कर पाता, तो उसे "हंग असेंबली या त्रिशंकु विधानसभा" कहा जाता है.
ऐसे में तमिलनाडु की सियासत में कई सवाल उछल रहे हैं कि क्या राज्यपाल जानबूझकर सबसे बड़ी पार्टी टीवीके को सरकार बनाने का न्योता नहीं दे रहे हैं. या फिर क्या परंपरागत रूप से प्रतिद्वंद्वी रहीं डीएमके और एआईएडीएमके की गठबंधन सरकार की संभावना भी बन सकती है.
टीवीके के नेतृत्व वाली सरकार बनाने के लिए कुछ विकल्प हो सकते हैं.
इनमें से एक है दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटाना, और इसके लिए केवल कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन पर्याप्त नहीं होगा. ऐसे में दो-दो सीटों वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और सीपीआई ने भी टीवीके को समर्थन देने के संकेत दिए हैं.
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने भी दो सीटें हासिल की हैं और उसने भी संकेत दिया है कि वह अगली सरकार को 'रचनात्मक और आलोचनात्मक' समर्थन दे सकती है. इस तरह टीवीके प्लस की कुल संख्या 119 तक पहुंच सकती है, जो बहुमत के आंकड़े से आगे है.
दूसरा विकल्प अल्पमत सरकार बनाने का है.सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते राज्यपाल टीवीके को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं, और फिर टीवीके राज्य की सियासी पार्टियों को अपना सहयोगी बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है. हालाँकि डीएमके या एआईएडीएमके की तरफ से इस दिशा में अभी किसी तरह के संकेत नहीं मिले हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
एनसीआरबी की ‘भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की, जो कुल आत्महत्याओं का 6.2% है।
इनमें 5,913 कृषि मजदूर (56%) हैं, जो पांच साल में सबसे अधिक है।
हर दिन औसतन 28 किसान व मजदूर जान दे रहे हैं और हर घंटे लगभग एक किसान आत्महत्या कर रहा है।
2022 के बाद से कुल संख्या में मामूली कमी के बावजूद किसानों और कृषि मजदूरों की आत्महत्याएं चिंताजनक स्तर पर बनी हुई हैं।
महाराष्ट्र में 3,824 मामलों के साथ सबसे आगे है, जहां चरम मौसम से 20 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल प्रभावित हुई।
कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पुडुचेरी में भी तेज वृद्धि दर्ज हुई।
खेती से जुड़े 10,546 लोगों में आत्महत्या करने वालों में 5,913 कृषि मजदूर थे। यानी कुल मामलों में उनकी हिस्सेदारी 56 प्रतिशत रही, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा आज जारी भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। यह देश में कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का 6.2 प्रतिशत है।
यह संख्या 2023 की तुलना में थोड़ी कम है, जब 10,786 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी। फिर भी देश में प्रतिदिन लगभग 28 किसान और कृषि मजदूर आत्महत्या कर रहे हैं। वर्ष 2022 में कृषि क्षेत्र में आत्महत्याओं की संख्या सबसे अधिक 11,290 दर्ज की गई थी और उसके बाद से इसमें लगातार कमी आई है। लेकिन पिछले पांच वर्षों के रुझान बताते हैं कि जमीनी हालात में बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ है। भारत में अब भी लगभग हर घंटे एक किसान आत्महत्या कर रहा है।
हालिया एनसीआरबी आंकड़ों में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। खेती-किसानी से जुड़े 10,546 व्यक्तियों में से, आत्महत्या करने वालों में कम से कम 56 प्रतिशत (5,913) खेतिहर मजदूर थे, जो पिछले पांच वर्षों में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। साल 2020 में, कृषि क्षेत्र में होने वाली कुल आत्महत्याओं में इनकी हिस्सेदारी 47.75 प्रतिशत थी।
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कृषि मजदूरों में आत्महत्या की हिस्सेदारी पहली बार 2021 में बढ़ी थी और उसके बाद से इसमें लगातार वृद्धि हो रही है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्षों से औसत कृषि परिवार की आय में खेती से होने वाली मजदूरी पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जबकि फसल उत्पादन से आय अपेक्षाकृत कम हो रही है।
किसान भी संकट में
हालांकि किसानों/कृषकों के बीच आत्महत्याओं में पिछले वर्षों में गिरावट देखी गई थी, लेकिन 2024 में इसमें मामूली वृद्धि दर्ज की गई। 2023 में कुल कृषि आत्महत्याओं में किसानों की हिस्सेदारी 43.48 प्रतिशत थी, जो 2024 में बढ़कर 43.93 प्रतिशत हो गई। यह वृद्धि 2021 के बाद लगातार हो रही गिरावट के बाद दर्ज की गई है।
महाराष्ट्र में सबसे अधिक आत्महत्याएं
कृषि क्षेत्र में आत्महत्या के सबसे अधिक मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए, जहां किसानों और कृषि मजदूरों की कुल 3,824 आत्महत्याएं हुईं। यह न केवल सबसे अधिक संख्या थी, बल्कि देश में कृषि क्षेत्र की कुल आत्महत्याओं का 36.26 प्रतिशत हिस्सा भी महाराष्ट्र से आया।
हालांकि एनसीआरबी रिपोर्ट इन आत्महत्याओं के कारणों का उल्लेख नहीं करती, लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि वर्ष 2024 में महाराष्ट्र में बाढ़ सहित चरम मौसमीय घटनाओं के कारण कम-से-कम 20,37,651 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ था। यह देशभर में चरम मौसमीय घटनाओं से प्रभावित कुल 40,72,523 हेक्टेयर फसल क्षेत्र का लगभग 50 प्रतिशत था।
महाराष्ट्र के बाद सबसे अधिक मामले कर्नाटक (2,971) में दर्ज किए गए। इसके बाद मध्य प्रदेश (835), आंध्र प्रदेश (780), तमिलनाडु (503) और छत्तीसगढ़ (486) का स्थान रहा।
हालांकि आत्महत्याओं में सबसे अधिक वृद्धि कर्नाटक में दर्ज की गई, जहां 2023 की तुलना में मामलों में 22.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसके बाद राजस्थान में 14 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 7.46 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। दूसरी ओर, चौथे स्थान पर रहने वाले आंध्र प्रदेश में 2023 की तुलना में आत्महत्याओं में 15.67 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
पुडुचेरी में सबसे तेज वृद्धि
केंद्रशासित प्रदेशों में पुडुचेरी में 2019 से 2022 के बीच कृषि क्षेत्र में आत्महत्या का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया था। लेकिन 2023 में यहां 10 मामले सामने आए, जो 2024 में बढ़कर 33 हो गए। इन सभी मामलों में मृतक कृषि मजदूर थे।
यह सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सबसे तेज वृद्धि रही, जहां एक वर्ष के भीतर कृषि क्षेत्र की आत्महत्याओं में 230 प्रतिशत यानी तीन गुना से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई।
-अनिल अश्वनी शर्मा
केंद्र सरकार ने बस्तर क्षेत्र से ‘लाल आतंक’ खत्म कर देने का दावा तो किया है, लेकिन क्या कभी वह बस्तर से कुपोषण को भी खत्म करने का दावा करेगी ? यह बात छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिला स्थित अबूझमाड़ छात्र संगठन के अध्यक्ष लक्ष्मण मंडावी ने डाउन टू अर्थ से कही।
वे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ अभी तक बाहरी दुनिया के लिए अबूझ रहा है। अब जब यहां थोड़ा-बहुत बाहरी लोगों का आना-जाना हो गया है तो सवाल उठता है कि क्या हमारी समस्याएं भी बाहरी दुनिया तक पहुंच रही हैं?
यहां से लाल आतंक की खबरें तो लगातार प्रकाशित या सुनाई पड़ती हैं, लेकिन इन इलाकों में लाल आतंक की छाया में यहां की बुनियादी जरूरतों से वंचित लोगों की आवाजें कभी बाहर नहीं आ पातीं। वास्तव में अबूझमाड़ के एक युवा आदिवासी की यह बात राज्य व केंद्र सरकार के नुमाइंदों के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
अबूझमाड़ इलाके में कहने के लिए पिछले दो-ढाई दशकों से तो चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी नजर आ जाएंगे, लेकिन आदिवासियों की बुनियादी जरूरतें आज भी इन इलाकों में एक सिरे से गायब है। नारायणुपर जिले में स्थित अबूझमाड़ का कुमुडग़ुंडा भी एक ऐसा ही गांव है, जहां के हालात देखकर लगता है कि यहां के लोगों को केवल मरने के लिए ही जिंदा छोड़ दिया गया है।
गांव के सभी आदिवासी मडिय़ा जनजाति से हैं। ध्यान रहे कि यह एक संरक्षित जनजाति की श्रेणी में आती है। ऐसी जनजातियों की संख्या यहां दिन-प्रति-दिन स्वास्थ्य सेवाओं के आभाव में कम होती जा रही है। लेकिन इस बात का राज्य सरकार पर कोई असर नहीं दिख पड़ रहा है।
लक्ष्मण मंडावी कहते हैं कि हमारे आदिवासी समुदाय की संख्या दिन-प्रति-दिन कम होती जा रही है। इसका कारण है कि हमारे इलाके में स्वास्थ की कोई भी सुविधा नहीं है। वे कहते हैं कि हमारे गांव से कोयलीबेड़ा कस्बा 35 किलोमीटर दूर है, जहां स्वास्थ केंद्र है।
वहां तक पहुंचने के लिए यह रास्ता भी कोई आम रास्ता न होकर नदी-नाले और पहाड़ों को पार करने में पूरा दिन चला जाता है। अबूझमाड़ के आमाटोला गांव में पीढिय़ों से पारंपरिक ज्ञान के सहारे बीस-पच्चीस गांवों में पैदल ही बीमार लोगों की देखभाल करने वाली सत्तर वर्षीय अमिल मंडावी कहती हैं कि हम तो केवल अपने पुरखों से सीखे गए कुछ पारंपरिक स्वास्थ्य सेवाएं ही आदिवासियों को दे पाते हैं, अन्यथा अब तो इतनी नई-नई बीमारी पैदा हो गई है कि हम उनका इलाज ही नहीं ढूंढ़ पाते। वे कहती हैं कि पिछले कुछ दशकों में कुपोषण ने तेजी से हमारे इलाके में पैर पसारे हैं।
डाउन टू अर्थ ने अबूझमाड़ के ऐसे ही दो गांवों (कल्पर और कुमुडग़ुंडा) का दौरा किया, जहां कुपोषण की स्थिति बहुत ही भयावह है। इसके अलावा भी इस इलाके में कई ऐसे गांव हैं जहां कुपोषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। राज्य सरकार ने अब तक इनकी सुध नहीं ली है।
कुपोषण प्रभावित कुमुडगुंडा अबूझमाड़ के उन गांवों में शामिल है जहां पहुंचना आज भी एक मुश्किल काम है। गांव में कुल जमा पांच ही घर हैं हालांकि उनकी बसाहट काफी दूर-दूर तक फैली हुई है। इस गांव की जनसंख्या कुल जमा 35 है।
गांव के आदिवासी पंडरन नूरुटी ने बताया कि इतनी कम जनसंख्या होने के बावजूद हम जैसे-तैसे परिवार को जीवित रख पा रहे हैं, हमारे यहां न तो स्कूल है, न स्वास्थ्य केंद्र, न आंगनबाड़ी। यहां तक कि जो सरकारी अनाज माह में पांच किलो मिलता है, उसे लेने जाने के लिए हमें यहां से 30 से 35 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है।
वे कहते हैं कि यह दूरी आसान नहीं होती है, जंगल, पहाड़ और नदी-नालों को पार करने में ही पूरा दिन चला जाता है और बदकिस्मत से यदि राशन की दूकान बंद मिली तो आपकी सारी मेहनत अकारत (बर्बाद) हो गई। ध्यान रहे कि अबूझमाड़ का यह गांव काफी अंदुरुनी इलाके में बसा हुआ है। गांव के हर घर से कोई न कोई बच्चा कुपोषण का शिकार है।
इस संबंध में लक्ष्मण कहते हैं कि जब सरकार की एक भी योजना यहां नहीं पहुंची है तो बच्चे कुपोषित होंगे ही।
ध्यान रहे कि राज्य सरकार ने कुपोषण को आदिवासी क्षेत्रों सहित पूरे राज्य से मिटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया हुआ है। लेकिन सरकारी आंकड़े ही यह बता रहे हैं कि कुपोषण को मिटाने के लिए चलाए जा रहे अभियानों के लिए स्वीकृत धनराशि पिछले तीन सालों में लगातार कम होती गई है।
उदाहरण के लिए मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना में 2022-23 के दौरान 80 लाख रुपए स्वीकृत किए गए थे। यह धनराशि 2023-24 में घटकर 76 लाख पर आ गई और 2024-25 में तो तीन गुना घट कर 23 लाख रुपए ही रह गई है।
इस संबंध में आदिवासी संगठन के सदस्य मनकू नेताम कहते हैं कि ये आंकड़े बता रहे हैं कि जब सरकार ही आदिवासी बच्चों के लिए स्वीकृत धनराशि कम करती जा रही है तो ऐसे में हमारे आदिवासी इलाकों से कैसे कुपोषण खत्म होगा।
राज्य सरकार की एक अन्य योजना में भी इसी प्रकार से धनराशि साल-दर-साल कम होती जा रही है। राज्य के महिला बाल विकास विभाग से मिली जानकारी के अनुसार राज्य सरकार द्वारा कुपोषण को कम करने के लिए बच्चों के लिए पूरक पोषण आहार योजना में भी 2022-23 में 30 करोड़ रुपए की धनराशि मंजूर की गई थी। यह 2023-24 में घटकर 29 करोड़ रुपए हो गई और 2024-25 में तो इसमें सीधे 33 फीसद कम करते हुए केवल 20 करोड़ रुपए ही स्वीकृत किए गए।
ध्यान रहे कि राज्य सरकार द्वारा कुपोषण को मिटाने के लिए चलाई जा रही योजनाओं की धनराशि में हर साल कमी होती जा रही है। यह सर्वविदित है कि ग्रामीणों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के लिए खर्च की जाने वाली धनराशि को प्रतिवर्ष बढ़ाया जाता है क्योंकि प्रतिवर्ष योजनाओं से लाभ पाने वाले लाभार्थियों की संख्या में बढ़ोतरी होती है न कि घटती है। राज्य सरकार ने कुपोषण को खत्म करने के लिए चलाई जा रही एक और योजना में कमी की है। यह है मुख्यमंत्री सुपोषण योजना।
-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
जय सोमनाथ !
वर्ष 2026 की शुरुआत में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी मंदिर के शाश्वत और अविनाशी होने का पर्व था। अब 11 मई को मुझे एक बार फिर सोमनाथ जाने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है। इस बार यह यात्रा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में है। मैं उस क्षण को फिर जीने जा रहा हूं जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने मंदिर का लोकार्पण किया था। उस दिन, सोमनाथ में विध्वंस से सृजन तक की यात्रा फिर से जीवंत होगी। छह महीनों के भीतर सोमनाथ के इतिहास से जुड़े इन दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी बनना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है।
सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, हमारी सभ्यता का अटूट संकल्प है। इसके सामने लहराता विशाल समुद्र अनंत काल की अनूभूति कराता है। इसकी लहरें हमें सिखाती हैं कि तूफान चाहे कितने भी विकराल क्यों न हों, मनुष्य का साहस और आत्मबल हर बार फिर से उठ खड़ा होने में सक्षम है। तट से टकराती लहरें सदियों से यह उद्घोष कर रही हैं कि मानवीय चेतना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता है।
हमारे प्राचीन शास्त्रों में लिखा है: प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसंभवम्। अर्थात दिव्य प्रभास (सोमनाथ) की परिक्रमा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान है! जब लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, तब उन्हें उस सभ्यता की अद्भुत निरंतरता का भी अनुभव होता है, जिसकी ज्योति कभी बुझाई नहीं जा सकी। कई साम्राज्य आए और गए, समय बदला और इतिहास ने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे, फिर भी सोमनाथ हमारे हृदय में हमेशा बना रहा।
यह समय उन असंख्य महान विभूतियों के स्मरण का भी है, जो क्रूर आक्रांताओं के सम्मुख अडिग रहे। लकुलीश और सोम शर्मा जैसे मनीषियों ने प्रभास को शैव दर्शन का महान केंद्र बनाया। चक्रवर्ती महाराज धारसेन चतुर्थ ने सदियों पहले वहां दूसरा मंदिर बनवाया था। समय की कठिन परीक्षा के बीच भीम प्रथम, जयपाल और आनंदपाल जैसे शासकों ने आक्रमणों के विरुद्ध अपनी सभ्यता की ढाल बनकर मंदिर की रक्षा की थी। ऐसा माना जाता है कि महान राजा भोज ने भी इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया था। कर्णदेव सोलंकी और जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात की राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। भाव बृहस्पति, कुमारपाल सोलंकी और पाशुपताचार्यों ने इस तीर्थ को आराधना और ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया। विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक ने इसकी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा की। महिपाल चूड़ासमा और राव खंगार चूड़ासमा ने विध्वंस के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को पुनर्जीवित किया। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर, जिनकी 300वीं जयंती मनाई जा रही है, उन्होंने सबसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भक्ति की परंपरा को जीवंत रखा। बड़ौदा के गायकवाड़ों ने तीर्थयात्रियों के अधिकारों की रक्षा की। इसके साथ ही हमारी यह धरती वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील जैसे पराक्रमियों से धन्य हुई है। उनके साहस और बलिदान को आज भी याद किया जाता है।
1940 के दशक में स्वतंत्रता की भावना पूरे भारत में फैल रही थी। सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की नींव रखी जा रही थी। ऐसे में एक बात जो उन्हें बहुत व्यथित करती थी, वह थी- सोमनाथ की दुर्दशा। 13 नवंबर 1947 को, दिवाली के समय, उन्होंने सोमनाथ के जर्जर अवशेषों के सामने खड़े होकर, समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया, ‘’इस (गुजराती) नववर्ष पर हमारा निश्चय है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। सौराष्ट्र के लोगों को इसके लिए हर तरह से अपना योगदान देना होगा। यह एक पावन कार्य है, जिसमें हर किसी को भागीदारी निभानी होगी।’’ उनके इस आह्वान ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष को नए उत्साह से भर दिया।
दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल अपने उस सपने को साकार होते नहीं देख सके, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था। इससे पहले कि जीर्णोद्धार के बाद सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलता, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इसके बावजूद, प्रभास पाटन की पावन धरती पर उनका प्रभाव निरंतर महसूस किया जाता रहा है। उनके विजन को के.एम. मुंशी ने आगे बढ़ाया, जिन्हें नवानगर के जामसाहेब का समर्थन मिला। 1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा होने पर राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के विरोध के बावजूद, डॉ. प्रसाद ने समारोह में हिस्सा लेकर इसे ऐतिहासिक बना दिया।
मुझे अक्टूबर 2001 का वह समय आज भी अच्छे से याद है, जब मैंने मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभाला था। 31 अक्टूबर 2001 को, सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर गुजरात सरकार ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन किया। इसी समय सरदार पटेल की 125वीं जयंती भी मनाई जा रही थी। इस कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और तत्कालीन गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी की मौजूदगी ने इसे और भी गरिमापूर्ण बना दिया।
11 मई 1951 को अपने भाषण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि सोमनाथ मंदिर दुनिया को यह संदेश देता है कि अद्वितीय श्रद्धा और विश्वास को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। उन्होंने आशा व्यक्त की, कि यह मंदिर सदैव लोगों के हृदय में बसा रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर के पुनर्निर्माण से सरदार पटेल का सपना साकार हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि सरदार पटेल की भावनाओं के अनुरूप लोगों के जीवन में समृद्धि भी लानी होगी। इसको लेकर उनके संदेश अत्यंत प्रेरणादायी रहे हैं।
पिछले एक दशक से हम इसी मार्ग पर चल रहे हैं। ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र से प्रेरित होकर सोमनाथ से काशी, कामाख्या से केदारनाथ, अयोध्या से उज्जैन और त्रयंबकेश्वर से श्रीशैलम तक, हमने अपने आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया है। इसके साथ ही उनकी पारंपरिक पहचान को भी बनाए रखा है। आज बेहतर कनेक्टिविटी से ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आ पा रहे हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है, आजीविका सुरक्षित हो रही है, साथ ही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना और सशक्त हो रही है।
-दिलीप कुमार पाठक
भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी बात निकलकर आई है, जिसे समझना जरूरी हो गया है। कभी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा लगाने वाली भाजपा का ये सियासी जुमला लगता था, लेकिन आज की हकीकत देखें तो यह ‘क्षेत्रीय दल मुक्त भारत’ के एक बड़े प्लान की तरह नजर आता है। भाजपा की रणनीति अब स्पष्ट हो चली है, वह पहले बड़े प्यार से किसी क्षेत्रीय दल की ‘बांह’ पकड़ती है, उसके साथ मिलकर सरकार बनाती है, वहाँ का गुणा गणित समझती है, उसके घर के भीतर तक अपनी पैठ बनाती है और फिर धीरे से उसी साथी को किनारे लगाकर अपना झंडा गाड़ देती है।
नीतीश कुमार हों या उद्धव ठाकरे, नवीन पटनायक हों या बादल परिवार... इन सब की कहानियाँ एक ही पैटर्न पर लिखी गई हैं। बिहार को ही देख लीजिए, जहाँ नीतीश कुमार कभी ‘बड़े भाई’ हुआ करते थे और भाजपा उनके पीछे चला करती थी। लेकिन आज पासा पूरी तरह पलट चुका है; भाजपा बिहार की सबसे बड़ी ताकत बन गई है और नीतीश अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराष्ट्र में जिस शिवसेना ने भाजपा को उंगली पकडक़र हिंदुत्व का रास्ता दिखाया, आज वह खुद दो टुकड़ों में बंटकर अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रही है। ओडिशा में नवीन बाबू का 24 साल पुराना अभेद्य किला जिस तरह ढहा, उसने सबको हैरान कर दिया। भाजपा ने वहां पहली बार अपनी सरकार बनाकर साबित कर दिया कि वह किसी की भी विरासत को समेटने का हुनर जानती है। अभी एक दशक पहले बंगाल में भाजपा का अस्तित्व भी न के बराबर था, लेकिन आज वहाँ प्रचंड बहुमत के साथ ही साथ सरकार बन गई है।
अब यह विस्तार की हसरत पंजाब और दक्षिण के राज्यों की ओर मुड़ चुकी है। पंजाब में अकालियों से नाता टूटने के बाद भाजपा ने जो ताकत दिखाई है, वह आने वाले समय में केजरीवाल की ‘आप’ के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है। दक्षिण भारत अब भाजपा के लिए एक ऐसी प्रयोगशाला बन गया है जहाँ वह नए-नए प्रयोग कर रही है। तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से दो ही नाम चलते थे, डीएमके और एआईएडीएमके लेकिन भाजपा ने एआईडीएमके के कमजोर पड़ते ही वहां अपने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं। केरल में जहाँ कांग्रेस और वामपंथियों के अलावा किसी तीसरे की जगह नहीं थी, वहाँ भाजपा ने त्रिशूर की सीट जीतकर और अपना वोट शेयर बढ़ाकर सबको चौंका दिया है। कांग्रेस वहां आज भले ही जीत गई हो, लेकिन उसे भी पता है कि भाजपा की नजरें अब उसकी कुर्सी पर हैं।
बंगाल जीतने के बाद पार्टी मुख्यालय के संबोधन में पीएम मोदी ने कहा कि महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का विरोध करना अखिलेश यादव को बहुत भारी पड़ेगा, मतलब साफ है अगला नंबर उत्तरप्रदेश का है। भाजपा जिस आत्मविश्वास के साथ अखिलेश यादव को टार्गेट कर रही है, और जैसे परिणाम आ रहे हैं तो लगता है कि भाजपा यूपी को जीतकर समाजवादी पार्टी को भी नफासत के साथ निपटा देगी।
'अंग' यानी बिहार और 'कलिंग' यानी ओडिशा का मोर्चा तो बीजेपी ने पहले ही फतह कर लिया था. अब बंगाल में चुनावी जीत के साथ ही अंग, बंग और कलिंग पर काबिज होने का भारतीय जनता पार्टी का सपना पूरा हो गया है.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट–
इस बार के विधानसभा चुनाव में मुकाबला 'बदला' बनाम 'बदलाव' था. बीजेपी ने जहां बदलाव का नारा देते हुए अपने पारंपरिक 'जय श्री राम' की जगह 'जय मां काली' के नारे को अपनाया था, वहीं ममता बनर्जी ने लोगों से केंद्र, बीजेपी और चुनाव आयोग के कथित सौतेले रवैए के खिलाफ बदला लेने के लिए वोट डालने की अपील की थी.
पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव में कई चीजें पहली बार हुई थीं और इसका नतीजा भी पहली बार बीजेपी की जीत के तौर पर सामने आया है. बीते पच्चीस वर्षों में पहली बार कोई चुनाव दो चरणों में कराया गया है. इससे पहले छह से आठ चरणों में मतदान कराया जाता रहा है. इसके अलावा भारी तादाद में तैनात केंद्रीय बल, और एसआईआर के दौरान कटे करीब 91 लाख नामों में राजनीतिक दलों के समीकरण गड़बड़ा दिए हैं. बंगाल में बीते कई दशकों में पहली बार चुनावी हिंसा न के बराबर हुई है. इससे पहले, यहां पर चुनाव से पहले और बाद में भारी हिंसा होती रही है.
इस बार राज्य में पहली बार रिकार्डतोड़ वोट पड़े थे. उसके बाद से ही सत्ता के दावेदार अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या करने में जुटे थे. इस बार चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि एसआईआर के मुद्दे ने अबकी तमाम पारंपरिक मुद्दों को पीछे छोड़ दिया. चुनावी नतीजों से साफ है कि बीजेपी को ममता बनर्जी के मुस्लिम और महिला वोट बैंक में भी सेंध लगाई है. पार्टी को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में कामयाबी मिली. इसी के कारण हिंदू तबके के वोटरों ने एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में मतदान किया.
बीजेपी भी इस बात को स्वीकार करती है. पार्टी के प्रमुख नेता शुभेंदु अधिकारी ने डीडब्ल्यू से कहा, "ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के खिलाफ हिंदू समुदाय ने एकजुट होकर हमारे पक्ष में मतदान किया है.खासकर शहरी तबके के लोगों का सरकार से मोहभंग हो गया था. उन्होंने बदलाव के लिए वोट डाला था."
क्या रही बीजेपी की जीत की वजहें?
करीब दस साल की कोशिश के बाद पहली बार बंगाल में बीजेपी की जीत की आखिर क्या वजह रही? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इसमें एसआईआर के दौरान भारी तादाद में कटे नामों की अहम भूमिका रही. इसके अलावा धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण, बीजेपी के आक्रामक प्रचार, आर.जी. कर कांड के बहाने महिला सुरक्षा के सवाल, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने भी बदलाव की राह तैयार की.
पश्चिम बंगाल चुनाव: दूसरे दौर में मतुआ समुदाय की भूमिका अहम
खासकर शहरी इलाकों में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के अलावा ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी का असर साफ नजर आया. इसके अलावा पहली बार वोटर बने युवाओं ने भी सरकार के कामकाज के खिलाफ वोट डाले. यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस का गढ़ समझे जाने वाले कोलकाता और इसके आस-पास के शहरी इलाको में भी बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहा.
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि होने की वजह से बंगाल बीजेपी के लिए काफी अहम था. उनकी 125वीं जयंती के मौके पर मिली इस जीत की पार्टी के लिए काफी अहमियत है. इस चुनाव ने पार्टी के सामने करो या मरो पैदा कर दी थी. यही वजह है कि पिछली बार की गलतियों से सबक लेते हुए उसने चुनाव में अपने तमाम संसाधन तो झोंके ही, ममता पर सीधा हमला करने या ऐसी कोई टिप्पणी करने से बचती रही जिससे बंगालियों की भावनाएं आहत हो सकती थी. इसी वजह से उसने अभियान के दौरान जय श्री राम से ज्यादा जय मां काली के नारे लगाए."
एक अन्य विश्लेषक और सिलीगुड़ी के एक कालेज में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं शुभांगी चटर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सिलीगुड़ी में चिकन नेक कॉरिडोर की अहमियत को ध्यान में रखते हुए बीजेपी का सत्ता में आना इस सीमावर्ती राज्य के लिए काफी अहम है. इसकी सीमाएं बांग्लादेश के अलावा नेपाल और भूटान से तो मिलती ही हैं, चीनी सीमा भी ज्यादा दूर नहीं है."
राष्ट्रीय राजनीति पर जरूर पड़ेगा असर
इस जीत का देश की भावी राजनीति की दशा-दिशा पर क्या असर होगा? कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार पुलकेश घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस अकेली ऐसी राजनीतिक ताकत थी जो अपने बूते बीजेपी को कड़ी टक्कर देते नजर आती थी. अब उसके कमजोर होने का असर 2029 के लोकसभा चुनाव पर भी नजर आएगा."
उनका कहना था कि तृणमूल कांग्रेस की गलतियां भी इस हार की जिम्मेदार हैं. उसके तमाम शीर्ष नेता चुनाव प्रचार के दौरान चार मई के बाद सबको देख लेने की धमकी देते रहे. खुद ममता ने भी कई बार यह बात दोहराई थी. इससे लोगों के मन में डर पैदा हुआ कि शायद चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा हो. इसी वजह से लोगों ने बदलाव के लिए खुलकर मतदान किया.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी के लिए बंगाल की जीत महज एक राज्य की जीत नहीं है बल्कि इसके दूरगामी नतीजे होंगे. इस जीत ने पूर्वी भारत में ओडिशा के बाद क्षेत्रीय पार्टी के दूसरे सबसे बड़े किले को ढहाने में कामयाबी दिलाई है. ऐसे में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ना तय है.
-आर.के.जैन
तमिलनाडु के चुनाव नतीजों में बहुत बड़ा उलटफेर हो गया है। वहां एक्टर विजय की पार्टी टीवीके सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई है। हालाँकि डीएमके या एआईएडीएमके से गठबंधन करना पड़ सकता है।
तमिल सिनेमा के सुपरस्टार जोसेफ विजय (थलापति विजय) ने फरवरी 2024 में अपनी नई राजनीतिक पार्टी ञ्जङ्क्य की स्थापना की थी। यह पार्टी 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में पहली बार चुनाव में उतरी। मतगणना के नतीजे चौंकाने वाले हैं। सत्तारूढ़ डीएमके तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है। लेकिन विजय की पार्टी और एआईएडीएमके ने डीएमके को पीछे छोड़ दिया है। रुझानों में विजय की सरकार बनना तय माना जा रहा है।
विजय ने अपने आखिरी फिल्म जन नायकन (पूर्व में थलापति 69) की घोषणा के साथ ही राजनीति में कदम रखा। विजय को तमिलनाडु का अगला एमजीआर बताया जा रहा है। जिन्होंने एआईएडीएमके की स्थापना की थी और तमिल सिनेमा के महानायक थे।
तमिलनाडु में फिल्म अभिनेताओं के राजनीति में आने की पुरानी परंपरा है (जैसे एमजीआर और जयललिता मुख्यमंत्री बने)। लेकिन कई अन्य अभिनेता जैसे शिवाजी गणेशन, कमल हासन,रजनीकांत आदि को सीमित या मिलीजुली सफलता ही मिली। विजय, आंध्र प्रदेश के एनटीआर (एन. टी. रामाराव) से प्रेरणा ले रहे हैं, जिन्होंने बहुत तेजी से राजनीतिक सफलता हासिल की थी।
विजय की बढ़त के निम्न फैक्टर रहे हैं :
1. विजय की पृष्ठभूमि और तैयारी: उनके फैन क्लब (विजय मक्कल इयक्कम) शुरू में कल्याणकारी संगठन थे, बाद में राजनीतिक रूप लेते गए। डीएमके प्रवक्ता कनिमोझी ने सोमवार 4 मई को स्वीकार किया कि विजय के फैंस ने जीत में बड़ी भूमिका निभाई है।
2. उनकी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों (किसान, स्वास्थ्य, महिलाओं आदि) पर जोर बढ़ता गया।
3. श्रीलंकाई तमिलों और नीट विरोध जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक रुख अपनाया।
चुनौतियाँ: करूर रैली में स्टैंपीड में 41 लोगों की मौत और व्यक्तिगत जीवन में तलाक की घटना की वजह से आलोचना हुई लेकिन उनकी लोकप्रियता ने इन चुनौतियों को धो डाला।
विजय की सरकार बनी तो वह क्या करेंगे ?
टीवीके खुद को गठबंधन-विरोधी बताती रही है। उसने न तो सत्तारूढ़ ष्ठरू्य के साथ और न ही क्चछ्वक्क के साथ गठबंधन करने की इच्छा जताई है। लेकिन नतीजों के बाद नए हालात में वो किसी न किसी पार्टी से समझौता कर सकती है।
-आशीष कान्ति घोष
वैचारिक संघर्ष के वो कठिन दिन : आशीष कान्ति घोष
भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इतिहास में कई ऐसे दौर आए हैं जिन्हें उनके ‘कठिन दिन’ कहा जा सकता है। इन कठिन परिस्थितियों ने ही इन दलों को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से मजबूती दी। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित इस दल का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस के विकल्प के रूप में एक राष्ट्रवादी विचारधारा को खड़ा करना था। कांग्रेस के प्रभुत्व के बीच एक नया विकल्प खड़ा करना बेहद चुनौतीपूर्ण था।
इसका मुख्य संकल्प और उद्देश्य राष्ट्रवादी विचारधारा, सांस्कृतिक एकता और एक सशक्त भारत का निर्माण करना था।जनसंघ का संकल्प मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित था।
अखंड भारत- जनसंघ का सबसे प्रमुख संकल्प ‘अखंड भारत’ था। एक देश, एक विधान, एक निशान, एक प्रधान:कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए यह जनसंघ का सबसे बड़ा नारा और संकल्प था।
राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता- यह भारतीय संस्कृति और सभ्यतागत चेतना पर आधारित राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना चाहता था।एकात्म मानववाद: पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म मानववाद’ को अपना मूल दर्शन माना, जो सर्वांगीण विकास पर जोर देता है ।
अंत्योदय- समाज के अंतिम व्यक्ति के विकास का संकल्प।
धारा 370 का विरोध-कश्मीर में अलग विधान का कड़ा विरोध और राष्ट्र की एकता के लिए 370 को हटाने का संकल्प। डॉ. मुखर्जी ने इन आदर्शों की प्राप्ति के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, प्रमुख कठिन समय और संघर्ष के चरण निम्नलिखित हैं:-
भारतीय जनसंघ के शुरुआती संघर्ष सीमित चुनावी सफलता- शुरुआती दौर (1951-1952)
स्थापना- 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुई।
पहला चुनाव (1951-52): जनसंघ ने अपना पहला आम चुनाव ‘दीपक’ चुनाव चिह्न के साथ लड़ा।
परिणाम- पार्टी को केवल 3 सीटें और लगभग 3.06 फीसदी वोट मिले। डॉ. मुखर्जी खुद कलकत्ता दक्षिण-पूर्व सीट से निर्वाचित हुए थे
डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन (1953)- पार्टी के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन ने पार्टी को नेतृत्व के गहरे संकट में डाल दिया था। उनके बाद दीनदयाल उपाध्याय ने महासचिव के रूप में संगठन को संभाला।
विस्तार और उदय (1957-1971)
1950 और 60 के दशक में जनसंघ ने उत्तर भारत के राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान) में अपनी पैठ बढ़ानी शुरू की।
1957 का चुनाव- सीटों की संख्या बढक़र 4 हुई। इसी चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार संसद पहुँचे।
1962 का चुनाव- पार्टी ने 14 सीटें जीतीं।
1967 का चुनाव- यह जनसंघ के लिए एक बड़ा मोड़ था, जहाँ पार्टी ने 35 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई।
दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु (1968)- पार्टी के प्रमुख विचारक और तत्कालीन अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मुगलसराय स्टेशन पर रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा आघात थी।
1971 का चुनाव- इंदिरा गांधी की ‘गरीबी हटाओ’ लहर के बावजूद जनसंघ 22 सीटें बचाने में सफल रहा।
दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार जोसेफ़ विजय ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सबको चौंका दिया है.
विजय, जिन्हें उनके फ़ैंस 'थलपति' के नाम से जानते हैं, की पार्टी टीवीके (तमिलगा वेट्री कड़गम) ने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की डीएमके को भी रुझानों में पीछे छोड़ दिया है.
डेटानेट के मुताबिक़ टीवीके 104 सीटों पर आगे चल रही है जबकि सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) 63 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं.
विपक्षी एआईएडीएमके भी डीएमके से फ़िलहाल आगे निकल गई है और वो 67 सीटों पर आगे है.
ख़ुद विजय पेरांबुर सीट से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी आर डी शेखर से लगभग तीन हज़ार वोटों से आगे चल रहे हैं.
एक्टर विजय तमिलनाडु के साथ-साथ हिंदी भाषी इलाक़ों में भी बेहद लोकप्रिय हैं.
एग्ज़िट पोल में उनके अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद जताई गई है लेकिन रुझान चौंकाने वाले आ रहे हैं.
फ़िल्मों में सफलता के बाद अब वह राजनीति में भी सक्रिय हुए.
पिछले साल सितंबर में उनका नाम एक बार फिर सुर्ख़ियों में तब आया था जब तमिलनाडु के करूर में उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) की रैली के दौरान भगदड़ मच गई, जिसमें 39 लोगों की मौत हो गई थी.
इस घटना पर विजय ने सोशल मीडिया पर गहरा दुख और सदमा जताया. साथ ही मारे गए लोगों के लिए 20-20 लाख रुपये और घायलों के लिए दो-दो लाख रुपये की मदद की घोषणा की थी.
विजय की ज़िंदगी भी किसी फ़िल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं रही, फ़िल्मी माहौल में जन्म, बचपन से ही अभिनय की शुरुआत, संघर्ष के बाद स्टारडम हासिल करना, पिता से मतभेद और फिर राजनीति में उतरना.
चाइल्ड एक्टर के तौर पर शुरुआत और पारिवारिक पृष्ठभूमि
विजय का पूरा नाम जोसेफ़ विजय चंद्रशेखर है. उनका जन्म 22 जून 1974 को चेन्नई में हुआ.
पिता एस.ए. चंद्रशेखर तमिल सिनेमा के जाने-माने निर्देशक रहे हैं और माँ शोभा एक गायिका थीं.
फ़िल्मी माहौल में पले-बढ़े विजय ने बहुत कम उम्र में ही अभिनय शुरू कर दिया था.
उनके पिता ने उन्हें 'वेट्री' फ़िल्म में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करने का मौक़ा दिया. बचपन से ही विजय ने तय कर लिया था कि उनका भविष्य सिनेमा में ही है.
कॉलेज में उन्होंने विज़ुअल मीडिया की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन अभिनय के जुनून के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी.
बाद में उनकी माँ शोभा ने एक स्क्रिप्ट लिखी और पिता एस.ए. चंद्रशेखर ने उस पर फ़िल्म बनाई. इसी फ़िल्म 'नालैया थीरपू' (1992) से विजय ने बतौर हीरो शुरुआत की.
हालांकि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर उतनी सफलता हासिल नहीं कर सकी, जितनी इससे उम्मीद थी. लेकिन इसने विजय के करियर की नींव रख दी.
शुरुआती पहचान से 'थलपति' तक
विजय के शुरुआती करियर की पहचान 'फ़ॉर्मूला फ़िल्मों' से जुड़ी रही, जिनमें एक्शन और रोमांटिक गानों का भरपूर मेल होता था.
लेकिन समय के साथ उनकी यह छवि बदल गई. कॉमेडी, एक्शन और सामाजिक विषयों वाली फ़िल्मों में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और धीरे-धीरे साधारण हीरो से 'थलपति' (सेनापति) बन गए.
'गिल्ली' जैसी सुपरहिट फ़िल्म ने उन्हें 'मास हीरो' की छवि दी और छोटे बच्चों तक को उनका प्रशंसक बना दिया.
वहीं 'कथी' ने उनके अभिनय को सामाजिक और राजनीतिक संदेशों से जोड़ा, जबकि 'थेरी', 'मर्सल' और 'बिगिल' जैसी फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर रिकॉर्ड बनाए.
अभिनय के साथ-साथ विजय को बेहतरीन डांसर भी माना जाता है.
निजी ज़िंदगी
विजय की निजी ज़िंदगी में अहम मोड़ तब आया जब लंदन में पली-बढ़ी संगीता उनकी फ़िल्में देखकर उनकी फ़ैन बनीं.
धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर यह रिश्ता आगे बढ़ा.
25 अगस्त 1999 को परिवार की सहमति से विजय ने संगीता से शादी की.
शादी के बाद संगीता उनकी निजी कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर बन गईं और कहा जाता है कि आज भी विजय वही कपड़े पहनते हैं जिन्हें उनकी पत्नी चुनकर देती हैं.
राजनीति में एंट्री
फ़रवरी 2024 में विजय ने राजनीति में औपचारिक रूप से क़दम रखा और अपनी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) की घोषणा की.
उन्होंने साफ़ किया कि वह संसद (2024 लोकसभा) का चुनाव नहीं लड़ेंगे और न ही किसी उम्मीदवार का समर्थन करेंगे, बल्कि उनका ध्यान 2026 के विधानसभा चुनावों पर रहेगा.
इसी एलान के साथ उन्होंने यह भी कहा कि वह सिनेमा छोड़ रहे हैं.
टीवीके की पहली रैली 27 अक्तूबर 2024 को तमिलनाडु के विल्लुपुरम ज़िले के विक्रवंडी में हुई, जहाँ भारी भीड़ उमड़ी.
मंच से विजय ने लोगों को बांटने वाली राजनीति करने वाली पार्टियों को आड़े हाथों लिया और कहा कि ऐसी ताक़तें वैचारिक रूप से उनकी पार्टी की विरोधी हैं.
उन्होंने द्रविड़ मॉडल के नाम पर धोखाधड़ी करने और "एक परिवार पर राज्य को लूटने" का आरोप भी लगाया.
राजनीति में आने से पहले विजय के परिवार में भी विवाद छिड़ा.
उनके पिता एस. ए. चंद्रशेखर ने पहले ही ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम नाम से एक पार्टी बनाई थी. इसको लेकर विजय और उनके पिता के बीच मतभेद सामने आए.
विजय ने अपने माता-पिता समेत 11 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराया था और मांग की थी कि उनके नाम का इस्तेमाल किसी चुनावी गतिविधि या भीड़ जुटाने के लिए न किया जाए.
'इंडियन एक्सप्रेस' के मुताबिक़ चंद्रशेखर ने इससे पहले भी विजय के फ़ैन क्लब को ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम के तहत एक राजनीतिक पार्टी के रूप में रजिस्टर करने की कोशिश की थी.
इस विवाद के बाद विजय ने एक बयान में कहा था, "मैं अपने प्रशंसकों और जनता को बताना चाहता हूं कि मेरे पिता की राजनीतिक पार्टी और मेरे बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई भी संबंध नहीं है."
सिनेमा को छोड़ने का एलान
जनसभा को संबोधित करते हुए विजय ने कहा कि राजनीति में आने के लिए उन्होंने अपना अभिनय करियर और कमाई दोनों पीछे छोड़ दिए हैं.
वह पहले ही साफ़ कर चुके थे कि राजनीति में सक्रिय होने के बाद अभिनय छोड़कर पूरी तरह समाजसेवा करेंगे.
सितंबर 2024 में प्रोडक्शन हाउस केवीएन ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की थी कि फ़िल्म 'थलपति 69' विजय की आख़िरी फ़िल्म होगी.
पार्टी की विचारधारा पर क्या कहा था?
अपनी पहली रैली में विजय ने टीवीके की विचारधारा पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा था, "हम द्रविड़ राष्ट्रवाद और तमिल राष्ट्रवाद को अलग नहीं करेंगे. ये दोनों इस मिट्टी की दो आँखें हैं. हमें ख़ुद को किसी ख़ास पहचान तक सीमित नहीं रखना चाहिए."
विजय ने बताया कि उनकी पार्टी धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित होगी.
उन्होंने कहा कि टीवीके पेरियार के दिखाए रास्ते पर चलेगी, जिसमें महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय की बात शामिल है. हालांकि उन्होंने साफ़ किया कि पेरियार के नास्तिकता वाले विचार को वह स्वीकार नहीं करते.
इसके अलावा विजय ने यह भी साफ़ किया कि टीवीके राज्य में दो भाषाओं की नीति को समर्थन देगी. उन्होंने कहा कि सरकारी कामकाज तमिल और अंग्रेज़ी दोनों में होना चाहिए.
विजय का कहना है कि उनकी पार्टी जातिगत जनगणना का समर्थन करती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में ज्यादा लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा होने के बावजूद अब भी इलाज का बड़ा खर्च आम लोगों को ही उठाना पड़ रहा है. गरीब राज्यों में इसका बोझ कई गुना ज्यादा है
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट–
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ने के सरकारी दावों के बीच एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने ‘पारिवारिक सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य' रिपोर्ट जारी की है. इसके अनुसार देश में हर 8 में से एक व्यक्ति बीमार है. यानी सर्वे में शामिल हर 100 में से करीब 13 लोगों ने पिछले 15 दिनों में किसी न किसी बीमारी से पीड़ित होने की बात कही. यह आंकड़ा 2017–18 के पिछले सर्वे में 7.5 प्रतिशत था. यानी बीमार लोगों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है.
यह रिपोर्ट नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के 80वें राउंड (जनवरी–दिसंबर 2025) पर आधारित है. इसके अनुसार पिछले आठ सालों में बीमा कवरेज में बढ़ोतरी हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह लगभग तीन गुना बढ़कर 14.1 प्रतिशत से 47.4 प्रतिशत हो गया है. जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 19.1 प्रतिशत से बढ़कर 44.3 प्रतिशत तक पहुंच गया.
इसका मतलब हुआ कि भारत के गांवों में अब करीब 46 प्रतिशत और शहरों में 32 प्रतिशत लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है. 2017-18 में यह आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्र में 13 प्रतिशत और शहरों में सिर्फ 9 प्रतिशत था. यह दिखाता है कि अब पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा लोग इंश्योरेंस कवरेज के दायरे में आते हैं. इसके बावजूद अस्पताल का खर्च मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहा है.
ग्रामीण भारत में एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर मरीज औसतन करीब 31,484 रुपये खर्च करते हैं. ये कुल खर्च का लगभग 95 प्रतिशत है, जो उन्हें अपनी जेब से देने पड़ते हैं. इसी तरह शहरों में अस्पताल में भर्ती होने पर करीब 83 प्रतिशत खर्च यानी औसतन करीब 38,688 रुपये भी मरीजों को खुद देने पड़ते हैं. बच्चे के जन्म (डिलीवरी) के मामलों में भी लोगों को इलाज का ज्यादातर खर्च खुद भरना पड़ता है.
भारत की स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था कमजोर
सर्वे के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में आधे से अधिक और शहरी क्षेत्रों में करीब दो-तिहाई मरीज निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं. अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च सभी प्रकार के अस्पतालों (सरकारी, निजी और चैरिटेबल) को मिलाकर लगभग 34,064 रुपये है जबकि सरकारी अस्पतालों में यह खर्च काफी कम, करीब 6,631 रुपये रहता है. निजी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च बढ़कर लगभग 50,508 रुपये तक पहुंच जाता है.
दूसरी तरफ अस्पताल में भर्ती होने की दर में खास बदलाव नहीं हुआ है और यह करीब 2.9 प्रतिशत पर ही स्थिर है. सामुदायिक चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ डॉ. दिव्यांश सिंह बताते हैं कि वैश्विक तुलना में भारत में स्वास्थ्य बीमा का कवरेज अभी भी सीमित माना जाता है. कई बीमा पॉलिसियों में जिन बीमारियों और इलाज को कवर किया जाता है, उससे कहीं लंबी सूची उन सेवाओं की होती है जिन्हें बाहर रखा गया है. वहीं ब्रिटेन जैसे देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के तहत अधिकांश सेवाएं सीधे सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं, जिससे मरीजों का जेब से खर्च बहुत कम रहता है.
कई दूसरे देशों में बीमा में मरीज पहले एक तय छोटी रकम देता है और उसके बाद बाकी बड़ा खर्च बीमा कंपनी उठाती है. जबकि भारत में स्वास्थ्य बीमा की सीमा तय की जाती है. जैसे आयुष्मान भारत योजना में पांच लाख रुपये तक ही मुफ्त इलाज मिलता है और उसके बाद का पूरा खर्च मरीज उठाता है. इस पर डॉ. दिव्यांश सिंह डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, "आयुष्मान भारत जैसी बड़ी योजनाओं का लाभ मुख्य रूप से अस्पताल में भर्ती होने पर मिलता है. जबकि भारत में ज्यादातर खर्च ओपीडी और दवाइयों पर हो रहा है. फिर इसके अंतर्गत सभी तरह के इलाज जैसे डेंटल ट्रीटमेंट, न्यूरोलॉजिकल बीमारियां और ज्यादातर क्रॉनिक बीमारियां पूरी तरह कवर नहीं होतीं. एक आम नागरिक के लिए ओपीडी पर होने वाला खर्च, अस्पताल में भर्ती (आईपीडी) के खर्च से अधिक है. यह एक बार का खर्च 4,000 रुपये तक पहुंच जाता है. यह भी बीमा में शामिल नहीं किया जाता.”
वह आगे बताते हैं, "निजी अस्पतालों में इलाज महंगा होता है. सरकार भले ही गांवों में पीएचसी और सीएचसी में डॉक्टर तैनात करती है. लेकिन वहां जरूरी दवाइयों और संसाधनों की कमी बनी हुई है. ऐसे में गांव के लोगों को शहर के निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है. उनका आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है. इसलिए लोग बीमार होने पर घर पर ही इलाज करने लगते हैं."
भारत के राज्यों में भी काफी असमानता
सरकारी अस्पतालों में इलाज बहुत सस्ता नहीं है बल्कि कई गरीब राज्यों में यह खर्च ज्यादा है. बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर जेब से होने वाला औसत खर्च 6,631 रुपये के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है. बिहार में यह 10,553 रुपये उत्तर प्रदेश में 12,878 रुपये और झारखंड में 12,364 रुपये है. पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिति भी चिंताजनक है. मणिपुर में औसतन 16,007 रुपये और नागालैंड में 16,342 रुपये खर्च होते हैं.
दक्षिणी राज्यों में स्थिति कुछ बेहतर है. तमिलनाडु में सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसत खर्च केवल 1,357 रुपये और केरल में 9,313 रुपये दर्ज किया गया है. डीडब्ल्यू ने 'जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया' के संयोजक अमूल्य निधि से बात की. वह सरकारी अस्पतालों के निजीकरण को मुख्य वजह बताते हैं. पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत कई स्वास्थ्य केंद्र निजी हाथों में सौंप दिए जा रहे हैं. उदाहरण के तौर पर उत्तरप्रदेश के शामली, महराजगंज और संभल में इस मॉडल पर 3 मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जा चुके हैं.
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सर्वे में यह भी पाया गया कि निजी अस्पतालों के मामले में जम्मू-कश्मीर सबसे ऊपर है. यहां औसतन खर्च 77,217 रुपये है. इसके बाद तमिलनाडु में यह खर्च 74,168 रुपये और तेलंगाना में 64,228 रुपये है. ये सभी आंकड़े निजी अस्पतालों के लिए राष्ट्रीय औसत 50,508 रुपये से बहुत ज्यादा है.
अमूल्य निधि कहते हैं, "हमारे अपने सर्वेक्षण के अनुसार 12 राज्यों में से 106 जिला अस्पतालों का पीपीपी मॉडल के तहत निजीकरण किया गया है. सरकार का अपना डाटा बता रहा है कि बीमारियां और मरीज दोनों बढ़ रहे हैं. मगर जनता इलाज के लिए अस्पताल नहीं जा पा रही है तो इसके दो बड़े कारण हैं. पहला, इलाज बहुत महंगा है. दूसरा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं है. नियम है कि हर 5 किलोमीटर के अंदर एक सब-सेंटर होना चाहिए. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सिर्फ इमारत है. वहां डॉक्टर, दवाइयां और जरूरी उपकरणों की कमी है."
बीमारी के रुझान में बदलाव
रिपोर्ट दिखाती है कि देश में बीमारी का पैटर्न भी बदल रहा है. पहले जहां ज्यादातर लोग संक्रामक बीमारियों से प्रभावित होते थे. वहीं अब डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों जैसी लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. यह बढ़ोतरी खासकर 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और खासकर बुजुर्गों में देखने को मिल रही है. बचपन और किशोरावस्था में संक्रमण और सांस से जुड़ी बीमारियां अधिक देखी जाती हैं. युवावस्था में मानसिक, न्यूरोलॉजिकल और पेट से जुड़ी समस्याएं ज्यादा रिपोर्ट की गईं.
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रिपोर्ट के मुताबिक शहरी क्षेत्रों में बीमारी की दर ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा है. 2025 में जहां शहरी इलाकों के करीब 14.9 प्रतिशत लोगों ने खुद को बीमार बताया, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा लगभग 12.2 प्रतिशत रहा. लिंग के आधार पर भी अंतर साफ दिखाई देता है. महिलाओं में स्वास्थ्य समस्याएं पुरुषों की तुलना में अधिक दर्ज की गई हैं. महिलाओं में बीमारी की दर 14.4 प्रतिशत रही जबकि पुरुषों में यह 11.8 प्रतिशत बताई गई है.
कुछ आंकड़े जो सर्वे ने भी सामने नहीं रखे
ओपीडी सेवाओं पर खर्च की जानकारी सर्वे में नहीं दी गई है जबकि इसके लिए डाटा एकत्रित किया गया था. स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े आलोचकों का कहना है कि उन मरीजों की पर्याप्त जानकारी नहीं है जो बीमार तो हुए पर इलाज के लिए अस्पताल नहीं गए. अमूल्य निधि इस आंकड़े को इस तरह समझाते हैं, "सर्वे यह बताता है कि लगभग 13.1 प्रतिशत लोग 15 दिनों में बीमार हुए. लेकिन यह नहीं बताया गया कि कितने लोगों ने इलाज नहीं कराया और इसके पीछे क्या कारण थे. साथ ही, अस्पताल में भर्ती होने की दर सिर्फ 2.9 प्रतिशत है. यह संकेत है कि इलाज की जरूरत कम नहीं, बल्कि सेवाओं तक पहुंच में बाधाएं बनी हुई हैं."
भारत में कम उम्र की महिलाओं में बढ़े ब्रेस्ट कैंसर के मामले
इसके अलावा रिपोर्ट बताती है कि मातृ स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. अब लगभग 96.2 प्रतिशत डिलीवरी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में हो रही है. डॉ. दिव्यांश सिंह इस आंकड़े पर सवाल उठाते हैं, "शहरों में लोग निजी अस्पतालों पर भरोसा करते हैं. गांवों में अब भी महिलाएं पुराने रूढ़िवादी तरीकों पर निर्भर करती हैं. गर्भावस्था के दौरान जांच लगभग सभी को मिल रही होगी लेकिन डिलीवरी के बाद की देखभाल, खासकर गांवों में, सबको नहीं मिलती."
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की जानकारी के अभाव में स्वास्थ्य सेवाओं से बाहर रह जाने वाले लोगों की असली स्थिति पूरी तरह सामने नहीं आ पाती.
-अशोक पांडे
केन्या के सेबेस्टियन सावे इन दिनों दुनिया की निगाह में हैं. बीती छब्बीस अप्रैल को उसने दो घंटे से कम समय में मैराथन पूरी कर इतिहास बना डाला. तब से तमाम बड़े-छोटे अखबारों-चैनलों-पत्रिकाओं में उसके संघर्ष, ग़ुरबत में बीते जीवन और दृढ़ इच्छाशक्ति के बारे में सैकड़ों लेख लिखे-छापे जा चुके हैं. खेत मजदूर पिता की माली हालत ऐसी न थी कि बेटे को अपने साथ रख पाते से सेबेस्टियन के बचपन का बड़ा हिस्सा दादी के पास रहकर बीता जो एक ऐसे घर में रहती थीं जिसमें बिजली भी नहीं थी.
सेबेस्टियन के चाचा केन्या छोड़ कर युगांडा चले गए थे जहां उन्होंने 800 मीटर दौड़ का राष्ट्रीय रेकॉर्ड बनाया था जो अब भी कायम है. वे ही सेबेस्टियन के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत थे. उन्हीं के इसरार पर उसने भी इसी दौड़ में अपना करियर बनाने की सोच रखी थी. सात बरस पहले उसे एक प्रतिष्ठित रेस में भाग लेने का मौका था लेकिन वह समय पर नहीं पहुँच सका. आठ सौ मीटर दौड़ के सारे स्लॉट भर चुके थे. बस 5000 मीटर रेस में जगह बची थी. उसने उसी में हिस्सा लिया और रेस जीत ली. यही उसके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.
मार्च 2020 में पैर में चोट लग गयी. दौड़ना मुश्किल हो गया. लेकिन वह उबर गया. फिर उसी साल उसे वेलेंशिया में
पहली मैराथन भागनी थी, उसे कोविड हो गया.


