विचार / लेख

Date : 13-Sep-2019

राधिका रामाशेषन

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की गुरुवार को एक बैठक हुई जिसमें पार्टी को पटरी पर लाने की एक ठोस कोशिश दिखाई दी। इस बैठक की अध्यक्षता पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की। हालांकि, सोनिया गांधी के ब्लूप्रिंट का कुछ हिस्सा आरएसएस-बीजेपी के चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के फॉर्मूले से मिलता-जुलता था। लेकिन फिर भी उन्होंने दिखाया कि उन्होंने कांग्रेस के उबर न पाने के कारणों पर गंभीरता से सोच-विचार किया है। साथ ही इन स्थितियों से पार्टी को निकालने के तरीके ढूंढने की कोशिश की है।
सोनिया गांधी के संदेश में एक और बात जो निकलकर आई, जो उनके नजरिये को राहुल गांधी से कुछ अलग दिखाती है। राहुल गांधी आधुनिक तकनीक के चश्मे से राजनीति को देखते हैं लेकिन सोनिया गांधी के विचार इससे अलग हैं।
सोनिया गांधी ने कहा कि सोशल मीडिया पर सक्रिय होना और आक्रामक दिखना ही काफी नहीं है। इससे ज़्यादा जरूरी है लोगों से सीधे तौर पर जुडऩा। आंदोलन के एक ठोस एजेंडे के साथ गलियों-कूचों, गांवों और शहरों में निकलना जरूरी है।
इस बैठक में कांग्रेस के मुद्दे भी कुछ बदलते नजऱ आए। सोनिया गांधी ने आर्थिक मंदी, नौकरियों की कमी और निवेशकों के डगमगाए विश्वास जैसे प्रमुखों मुद्दों को लोगों के सामने उठाने की बात कही।
एक तरह से उन्होंने कांग्रेस को सामाजिक ध्रुवीकरण करने वाले मसलों जैसे अनुच्छेद 370 को हटाना, असम में एनआरसी और राम मंदिर से दूर रहने की सलाह दी है।
सोनिया गांधी ने कांग्रेस को लोगों की रोजी-रोटी के मुद्दे पर ध्यान देने पर जोर दिया। उन्होंने शायद ये महसूस किया है कि अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे भले ही पार्टी को कम समय में चुनावी फायदा नहीं दिला सकते लेकिन बीजेपी को राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर हराने की कोशिश करके अपनी फजीहत कराने का कोई मतलब नहीं है। पिछले दिनों नरम हिंदुत्व कार्ड खेलने के राहुल के प्रयासों से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ है।
सोनिया गांधी ने ये भी माना है कि जब तक कांग्रेस को व्यवस्थित नहीं किया जाता तब तक किसी भी अभियान का कोई फायदा नहीं होगा। उन्होंने ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर्स नियुक्त करने का फैसला किया है। ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर सामूहिक संपर्क अभियान पर जाने से पहले कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते समय कांग्रेस के दृष्टिकोण और विचारधारा के बारे में बताएगा। हालांकि, ये बीजेपी के प्रचारक से थोड़ा अलग होगा क्योंकि ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर के लिए चुनाव न लडऩे की कोई बाध्यता नहीं होगी।
सोनिया गांधी ने घर-घर जाकर सदस्यता अभियान चलाने की बात कही जिसमें मुख्यमंत्रियों से लेकर बूथ कार्यकर्ताओं तक को शामिल करने की योजना है ताकि निचले स्तर तक संपर्क बनाया जा सके।
ये एक और सीख है जो कांग्रेस ने बीजेपी से ली है जिसमें राजनीतिक गतिविधियों के मामले में शीर्ष नेता से लेकर काडर के व्यक्ति तक में कोई अंतर नहीं है। आखिर में, सोनिया गांधी ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस को अपनी विरासत को बीजेपी को नहीं हड़पने देना चाहिए, हालांकि ये सलाह बहुत देर से आई। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी के पास अपने गलत उद्देश्यों के लिए महात्मा गांधी, सरदार पटेल और बीआर अंबेडकर जैसे महान प्रतीकों के संदेशों को अपने अनुसार बदलने के तरीके हैं।
अर्थव्यवस्था कांग्रेस के लिए प्रमुख मुद्दा रहा जो इस बात से भी साबित होता है कि पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर कई साक्षात्कार दिए जो बैठक के दिन बड़े हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित हुए।
इन साक्षात्कारों में उन्होंने सरकार से मीडिया में खबरें प्रभावित करने के तरीकों को छोडक़र देश के सामने मौजूद संकट को स्वीकारने का अनुरोध किया।
नब्बे के दशक में वित्त मंत्री रहते हुए देश को खराब आर्थिक स्थिति से निकालने वाले मनमोहन सिंह ने मौजूदा आर्थिक हालात सुधारने के लिए जीएसटी के रेशनलाइजेशन (भले ही इससे अल्पकालिक राजस्व हानि हो) और ग्रामीण खपत में वृद्धि जैसे उपायों का सुझाव दिया। आज की बैठक ने कांग्रेस के अंदर एक धारणा को मजबूत किया कि सोनिया गांधी अब भी पार्टी के लिए सबसे जरूरी हैं।
इस बैठक की एक वजह ये भी थी कि लगभग हर राज्य और खास तौर पर कांग्रेस शासित राज्यों में पार्टी नेताओं में मनमुटाव और गुटबाजी है। जिससे ये बात साबित होती है कि बीजेपी नेतृत्व ने कांग्रेस को अपंग बना दिया है।
मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लें तो राज्य के बड़े नेताओं मुख्यमंत्री कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच तब से ही टकराव बना हुआ है जब से कांग्रेस सत्ता में आई है।
कमलनाथ इस बैठक में शामिल नहीं थे जबकि सिंधिया वहां मौजूद थे। सोनिया गांधी को दो दिग्गज नेताओं के बीच टकराव को ख़त्म करने वाला माना जाता था लेकिन अब वो बात भी नहीं रही। इन हालात में बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश में कर्नाटक जैसी स्थितियां बनाने का रास्ता आसान हो गया है।
इसी तरह राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट एक-दूसरे से नजरें तक नहीं मिलाते। बुधवार को सचिन पायलट ने अपराध रोकने में असफलता को लेकर सरकार की आलोचना की थी। जाहिर है कि कांग्रेस को मजबूत रखने के लिए सिर्फ सत्ता मिलना ही काफी नहीं है।
हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हालात और खराब हैं जिनमें जल्द ही चुनाव होने वाले हैं। इन सभी राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सरकार है।
हरियाणा में एक नया विवाद तब पैदा हो गया जब सोनिया गांधी की विश्वासपात्र कुमारी सैलजा ने प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के पसंदीदा अशोक तंवर की जगह ली।
सोनिया गांधी ने पूर्व मुख्यमंत्री और मजबूत जाट नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा को चुनाव समिति का प्रमुख बनाकर एक और विवाद छिडऩे से तो रोक लिया लेकिन अशोक तंवर की नाराजग़ी खुले तौर पर जाहिर हो गई। उन्होंने कह दिया कि वो कांग्रेस के लिए काम करेंगे लेकिन सैलजा और हुडा के नेतृत्व में नहीं।
महाराष्ट्र में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ बीजेपी और शिवसेना में जाने का सिलसिला जारी है।
सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के हालात ठीक करने की कोई कोशिश नहीं की है। वहीं, एनसीपी प्रमुख शरद पवार भी बेबस नजर आते हैं।
झारखंड में भी गुटबाजी है क्योंकि हफ्तों पहले प्रदेश कांग्रेस प्रमुख अजॉय कुमार ने भी मनमुटाव के चलते पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों सुबोधकांत सहाय और प्रदीप कुमार बलमुचु के समर्थकों के कथित हमले के बाद ये फैसला लिया था। लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन एकजुट नहीं है। ये दिखाता है कि कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए सोनिया गांधी को कई और बैठकें करने, जोश जगाने और मनोबल बढ़ाने की जरूरत होगी। उन्होंने इस बैठक के साथ शायद इसकी शुरुआत की है। (बीबीसी)

 


Date : 13-Sep-2019

गिरीश मालवीय

हमें तभी समझ जाना चाहिए था कि कोई गलत व्यक्ति वित्तमंत्री की कुर्सी पर बैठ गया है। जब यह महिला लाल साड़ी पहनकर लाल थैली में लाया हुआ बजट पेश करने गई थी। उन्होंने कहा कि ऑटो सेक्टर में मंदी इसलिए आई है कि लोग आजकल मेट्रो में सफर करना या ओला-ऊबर का उपयोग करना पसंद करते हैं। 
यह कमाल का बयान है। यह ज्ञान हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क से भी उच्चतम है। यह सरल सोच का चरम बिंदु है। शायद आपने ध्यान दिया हो टीवी पर एक विज्ञापन आता था किसी बड़ी कंपनी की एजीएम चल रही हैं और चेयरमेन बड़ी शान से भाषण दे रहे हैं। भाषण खत्म होने के बाद जब क्वेश्चन आवर शुरू होता है तो चेयरमेन एक सरदारजी की तरफ इशारा करते हैं कि तुम पूछो।  उनका आशय यह रहता है कि यह क्या पूछेगा!  लेकिन सरदारजी उस भरी सभा में इतनी टेक्निकल डिटेल वाला सवाल पूछते हैं कि बेचारे चेयरमेन के पसीने छूट जाते हैं। 
ठीक यही बात है हम उम्मीद कर रहे थे कि वित्तमंत्री मंदी को लेकर कोई ऐसा तगड़ा तर्क सामने रखेगी कि सामने वालों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाएगी। लेकिन वह इतना बोदा तर्क सामने रखेगी इस की उम्मीद किसी को भी नही थी यह ऐसा ही तर्क है जैसा व्हाट्सएप पर आता है। 
अब मैं कन्फ्यूज हूं। सरकार के लोग आईटी सेल चला रहे हैं या आईटी सेल वाले ही सरकार चला रहे हैं।  क्या ऑटो सेक्टर में केवल कारों की ही गिनती होती है? नहीं भाई ! ऑटो सेक्टर एक वृहद अवधारणा है इसमें कार ही नहीं अन्य पैसेंजर व्हीकल जैसे टूव्हीलर और थ्री व्हीलर भी शामिल हैं। ऑटो सेक्टर में कमर्शियल व्हीकल्स भी शामिल हैं। 
पिछले दिनों अशोक लीलैंड ने भी कम मांग को देखते हुए अपने 5 प्लांट्स में नो वर्क डेज का ऐलान कर दिया। सितंबर में अशोक लीलैंड ने अपने प्लांट्स में 5 से 18 दिन तक कामकाज बंद रखने की घोषणा की है।  वित्तमंत्री से पूछिए कि अशोक लीलैंड कौन-सी कार बनाती है?
हीरो मोटोकॉर्प ने भी पिछले महीने 15 अगस्त से 18 अगस्त तक चार दिनों के लिए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बंद कर दिए थे।  हीरो मोटोकॉर्प कौन-सी कार बनाती है मैडम? आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि हीरो मोटोकॉर्प देश की सबसे बड़ी दोपहिया वाहन निर्माता कंपनी है
टू व्हीलर की बिक्री लगातार घटती जा रही है। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल्स मैन्युफैक्चरर्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक टू-व्हीलर्स की बिक्री की बात करें तो अप्रैल से अगस्त 2019 में अप्रैल-अगस्त 2018 के मुकाबले 14.85 फीसद की गिरावट आई है। टू-व्हीलर सेगमेंट में, स्कूटर्स की बिक्री में 17.01 फीसद की गिरावट, मोटरसाइकिल्स में 13.42 फीसद की गिरावट और मोपेड्स में 20.39 की गिरावट दर्ज की है।
थ्री व्हीलर्स की बिक्री की बात करें तो अप्रैल से अगस्त 2019 में 7.32 फीसद की गिरावट आई है। थ्री व्हीलर्स में, पैसेंजर कैरियर्स की बिक्री में 7.25 फीसद की गिरावट और गुड्स कैरियर में 7.64 फीसद की गिरावट आई है।
अब टूव्हीलर से चलने वाला ओर थ्री व्हीलर चलाने वाला ओला उबर बुलाकर तो कहीं जाता नहीं होगा न? ऑटो सेक्टर में सबसे बुरी हालत है। कमर्शियल व्हीकल्स निर्माताओं की टाटा मोटर्स, अशोक लीलैंड, वोल्वो आयशर और महिंद्रा ऐंड महिंद्रा के कमर्शियल वाहनों की कुल बिक्री पिछले साल अगस्त की तुलना में इस साल अगस्त में 40 से 60 फीसदी तक घट गई है। 
बाजार में मंदी के कारण डिमांड ही पैदा नहीं हो रही है और इसका सीधा असर सप्लाई चेन की सबसे अहम कड़ी ट्रांसपोर्टर पर पड़ा है। कई ट्रांसपोर्टर संगठनों ने अगले छह महीने तक नए ट्रक न खरीदने का आव्हान किया है ट्रांसपोर्टर अपने पास मौजूद वाहनों के पूरे काफिले का ही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए वे नए वाहनों की खरीद टाल रहे हैं, ट्रांसपोर्टर्स का कहना है कि बाजार में मंदी की वजह से उनका कारोबारा मंदा है, ऐसे में नए ट्रक के लिए लोन लेने के बाद किश्त के लिए पैसे भी नहीं निकाल पा रहे हैं। कमजोर मांग के कारण मालवहन की उपलब्धता कम है और माल भाड़ा भी कम हुआ है, नवंबर 2018 के बाद से ट्रक रेंटल में 15त्न की गिरावट आ चुकी है।  जिस ओला उबर का यह हवाला दे रही है उसकी ग्रोथ घट गयीं है 2018 में ग्रोथ 20 पर्सेंट रह गई हैं, जबकि 2017 में 57 पर्सेंट और 2016 में करीब 90 पर्सेंट की थी।
इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले छह महीनों में डेली राइड्स केवल 4 पर्सेंट ही बढ़ी है। यात्री सबसे ज्यादा परेशान है। उन्हें अब कैब के लिए औसत 12-15 मिनट का इंतजार करना पड़ रहा है, जो दो वर्ष पहले 2-4 मिनट का था। इसके साथ ही बड़े शहरों में नॉन-पीक आवर्स में किराए भी 15-20 पर्सेंट बढ़ गए हैं। 
महाराष्ट्र में 2017-18 में ओला और उबर इंडिया के लिए कार्य करने वाली 66,683 टूरिस्ट कैब रजिस्टर्ड हुई थी, लेकिन यह संख्या 2018-19 में घटकर 24,386 पर आ गई। पिछले एक वर्ष में ड्राइवर इंसेंटिव लगभग 40 पर्सेंट घटे हैं देश के विभिन्न भागों में ओला उबर के ड्राइवर हड़ताल कर रहे हैं। क्योंकि उनकी मांग है कि पहले की तरह उनको मासिक कम से कम 1.25 लाख रुपए कारोबार मिले लेकिन नहीं मिल रहा है उनकी आमदनी में लगातार कम हो रही है। 
यह है ओला उबर के व्यापार की असलियत लेकिन वित्तमंत्री से इन सब फैक्ट के साथ काउंटर क्वेश्चन करे कौन?
 मीडिया तो सुबह शाम पाकिस्तान पुराण लेकर बैठ जाता है। यह बात सत्ताधारी दल को अच्छी तरह से मालूम पड़ गई है कि जब व्हाट्सएप का ज्ञान ही लोगों को पसंद है तो अब ऑफिशियल रूप से व्हाट्सएप ही सरकारी मंत्री परोस रहे हैं। दुख इस बात का है यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था?

 


Date : 13-Sep-2019

काइद नजमी

एक किसान संगठन के प्रमुख ने कहा कि नए मोटर वाहन अधिनियम के तहत लगाया गया भारी जुर्माना लोगों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर सकता है।

महाराष्ट्र के एक किसान संगठन के प्रमुख ने बुधवार को चेतावनी देते हुए कहा कि नए मोटर वाहन अधिनियम (एमवीए) के तहत लगाया गया भारी जुर्माना गलत व जनविरोधी है और यह लोगों को आत्महत्या करने पर मजबूर करने वाला फैसला हो सकता है। वसंतराव नाइक शेट्टी स्वावलंबन मिशन (वीएनएसएसएम) के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने कहा, देशभर में विशेष रूप से मध्यवर्गीय लोगों द्वारा इस जुर्माने का विरोध किया गया है, मीडिया में सुनने और पढऩे के बाद यह पता चलता है कि यह एक जन विरोधी कदम है।
तिवारी ने केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से जुर्माने को घटाने का आग्रह किया। उन्होंने अपील करते हुए कहा है कि अगर आम लोगों पर जुर्माने के लिए जोर दिया गया तो वे आत्महत्या भी कर सकते हैं। तिवारी ने आईएएनएस को बताया, इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि गुजरात में एवीए जुर्माने को कम कर दिया गया है, जोकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष व गृह मंत्री अमित शाह का गृह राज्य है। इससे साबित होता है कि भाजपा शासित राज्य भी इस संशोधित जुर्माने के खिलाफ हैं।
मुंबई के एक आरटीओ अधिकारी ने कहा, आरटीओ के फील्ड कर्मचारियों में भी इसके लागू होने को लेकर आशंकाएं बनी हुई हैं। इन नए नियमों को लागू करने की कोशिश कर रहे आरटीओ कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार व मारपीट की गई है। लोग अपने वाहनों को छोडक़र दूर चले जाते हैं। जब एक महिला पर जुर्माना लगाया गया तो उसे दिल का दौरा पड़ गया। इस तरह की अन्य कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
जब तिवारी से इस बात का जिक्र किया गया कि हाल ही में गडकरी ने कहा कि उन्हें मुंबई में राजीव गांधी बांद्रा वर्ली सी लिंक पर जुर्माना भुगतना पड़ा, तो तिवारी ने कहा, आम जनता की तुलना किसी मंत्री के साथ नहीं की जा सकती है। 
उन्होंने कहा, अगर किसी मंत्री पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगता है, तो यह उसके लिए कम मायने रखता है। लेकिन अगर यही जुर्माना एक साधारण टैक्सी या टेम्पो चालक पर लगता है, जो एक महीने में मुश्किल से इतना वेतन कमा सकता है, तो उसका परिवार भूखा रह जाएगा। इसके बाद आम आदमी आत्महत्या का सहारा लेगा।
तिवारी ने एमवीए जुर्माने को पूरी तरह से बेतुका बताते हुए कहा कि इससे पहले से ही खराब हो रही अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि ऑटोमोबाइल उद्योग पहले ही संकट में है और इसकी वजह से आम लोग नए वाहन खरीदना बंद कर देंगे।  (आईएएनएस)

 


Date : 12-Sep-2019

वजह जो भी हो, हक़ीक़त यह है कि तनाव तो यहां भरपूर है लेकिन कुछ जगहों को छोडक़र इस वक़्त कश्मीर घाटी में हिंसा नहीं हो रही है। इसी वजह से सरकार धीरे-धीरे प्रतिबंध हटा पा रही है, इस आशा में कि हालात अब कुछ ही दिनों में सामान्य हो सकते हैं। लेकिन इस आशा की राह में कई बेहद बड़ी आशंकाएं भी हैं।

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुछेद 370 को हटे एक महीने से ज़्यादा वक़्त बीत गया है। जहां राज्य के कुछ हिस्से, जैसे जम्मू शहर, अब सामान्य होते दिखाई दे रहे हैं, वहीं कश्मीर घाटी में तनाव अभी भी वैसा ही है जैसा इसे हटाये जाने के तुरंत बाद था। मोबाइल फोन, इंटरनेट और हजारों लोग यहां अभी भी बंद हैं और घाटी के अलग-अलग हिस्सों से प्रदर्शनों की खबरें भी लगातार ही आ रही हैं।
हालांकि सरकार ने कर्फ्यू में थोड़ी नरमी बरती है और लैंडलाइन फोन चालू कर दिये हैं। लेकिन इसके बावजूद कश्मीर में समान्य जीवन ठप्प पड़ा हुआ है और सरकार की तरफ से बरती जाने वाली नरमी का ज़मीन पर कोई असर होता दिखाई नहीं दे रहा है।
सरकार ने स्कूल, कॉलेज, दफ्तर खोल देने का ऐलान कर दिया है, लेकिन इनमें लोगों की उपस्थिति न के बराबर है। बाकी, दुकानें यहां अभी भी बंद हैं, कारोबार ठप्प पड़े हुए हैं और सडक़ों पर ट्रेफिक के नाम पर सिर्फ कुछ निजी गाडियां ही चलती दिखाई देती हैं।
ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि आगे क्या? सत्याग्रह ने पिछले 15 दिन से कश्मीर घाटी के कई इलाकों में घूमकर लोगों और जानकारों से बात करके इस एक सवाल का जवाब खोजने की काफी कोशिश की, लेकिन इसका कोई संतोषजनक जवाब उसे नहीं मिल पाया है।
दक्षिण कश्मीर के एक वकील, आसिफ अहमद, के शब्दों में बात कही जाये तो, ‘कश्मीर घाटी, जहां दशकों से अनिश्चितता एक सामान्य नियम है, इतनी ढुलमुल कभी नहीं थी।’
आसिफ कहते हैं कि शायद ही कोई इस समय यह अनुमान लगा सकता है कि आगे क्या होने वाला है और ‘मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि प्रशासन भी आम लोगों जितना ही बेखबर है।’
उनकी इस बात की पुष्टि पुलिस के एक बड़े अधिकारी भी करते हैं। केंद्रीय कश्मीर में तैनात ये पुलिस अधिकारी कहते हैं कि वे हालात को दैनिक आधार पर देख रहे हैं और जो करने की ज़रूरत होती है वह कर देते हैं।
‘मेंने अपनी पूरी नौकरी में कश्मीर में इतनी अनिश्चितता कभी नहीं देखी है’ अपना नाम गोपनीय रखने की शर्त पर ये पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं।
अब दूसरा सवाल यह है कि ऐसा है तो क्यों है? लोगों से बात करके इस चीज़ के कई पहलू सामने आते हैं।
कश्मीर में उतने विरोध प्रदर्शन नहीं हुए
‘इस बार के प्रदर्शन 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हुए प्रदर्शनों से दस गुना ज़्यादा हो सकते हैं।’ सूत्रों के अनुसार, अनुच्छेद 370 को हटाये जाने से कुछ दिन पहले, कश्मीर में तैनात सुरक्षा बलों को यही बताया गया था। 2016 में हुए प्रदर्शनों में 100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और हजारों घायल हुए थे।
प्रदर्शन इस बार भी हो तो रहे हैं, लेकिन अनुमान से काफी कम। जानकारी के मुताबिक इनमें अब तक कम से कम दो लोगों की मौत हुई है और सौ से ज्यादा लोग घायल हैं। हालांकि सरकार ने अभी इनमें से किसी भी चीज़ की पुष्टि नहीं की है।
इस बार प्रदर्शनों के उतना न होने की एक वजह सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पहले से की गयी तैयारी भी है। इसके तहत तमाम नेताओं सहित हजारों लोगों की गिरफ्तारियां की गई हैं, संचार को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है और लोगों के आंदोलन करने पर सख्त प्रतिबंध लगाये गये हैं।
लेकिन जानकार कहते हैं कि सिर्फ ये सब चीज़ें बड़े पैमाने पर प्रदर्शन न होने को ठीक से नहीं समझाती हैं।
‘प्रतिबंध कश्मीर में नए नहीं हैं और कश्मीर में लोग इनके बावजूद सडक़ों पे आते रहे हैं। लोगों का इस बार सडक़ों पे न आना, वो भी 370 हटाये जाने पे, मेरी समझ से बाहर है।’ कश्मीर के एक वरिष्ठ पत्रकार, सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं कि शायद आने वाले वक़्त में समझ में आ जाये कि ऐसा क्यों हो रहा है, ‘कश्मीर में 1987 के चुनाव में धांधली के बाद लगभग तीन साल तक कुछ नहीं हुआ था। और फिर 1990 में जो हुआ वो पूरी दुनिया ने देखा था और अभी भी चल ही रहा है।’
वजह जो भी हो, हक़ीक़त यह है कि तनाव तो यहां भरपूर है लेकिन कुछ जगहों को छोडक़र इस वक़्त कश्मीर घाटी में हिंसा नहीं हो रही है। इसी वजह से सरकार धीरे-धीरे प्रतिबंध हटा पा रही है, इस आशा में कि हालात अब कुछ ही दिनों में सामान्य हो सकते हैं। लेकिन इस आशा की राह में कई बेहद बड़ी आशंकाएं भी हैं।
आखिरी लड़ाई
सत्याग्रह ने पिछले दो हफ्तों में कश्मीर के अनंतनाग, पुलवामा, श्रीनगर, बडगाम, शोपियां और कई अन्य जिलों में जाकर दर्जनों लोगों से बात की। इनमें दुकानदार, सरकारी मुलाजिम, ट्रांसपोर्टर्स और अन्य लोग शामिल हैं।
इन लोगों में से एक बड़ी संख्या यह मानकर चल रही है कि इस बार कश्मीर के लिए यह आखिरी लड़ाई है और यह जितनी भी देर चले इसको लड़ते रहना ज़रूरी है।
‘हर दूसरे-तीसरे साल कश्मीर छह महीने के लिए बंद हो जाता है और इस बार तो बात हमारी पहचान की है। मुझे लगता है अब नहीं हम डटे रहे तो हम खतम कर दिये जाएंगे धीरे-धीरे’ बडगाम जिले के एक 70 साल के दुकानदार, ग़ुलाम कादिर, सत्याग्रह को बताते हैं, ‘यह सब हमें अपनी आने वाली नस्लों के लिए करना ही पड़ेगा वरना किसको अच्छा लगता है क़ैद होके रहना, अपने बच्चों को स्कूल न जाते हुए देखना और हजारों करोड़ का नुकसान अलग।’
में भी लोगों से बात कर रहा हूं और में एक अजीब चीज़ होती हुई देख रहा हूं। कश्मीर में लोग हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के खिलाफ रहे हैं, लेकिन आप अभी जिससे भी बात करें वो ये ही कहता है कि इस मसले का हल सिर्फ युद्ध है’ कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित एक पत्रकार सत्याग्रह को बताते कि यह परिवर्तन आने वाले समय में कश्मीर के हालात काफी कठिन कर सकता है, ‘आप समझ सकते हैं कि जो लोग अभी युद्ध चाह रहे हैं, उनके लिए दुकानें बंद रखना या प्रतिबंधों में रहना कोई बड़ी बात नहीं है।’
ऐसा सोचे जाने की एक वजह है हाल ही में 89 साल के अलगाववादी नेता, सैय्यद अली शाह गिलानी, का दिया वह बयान था जिसमें उन्होने लोगों से आग्रह किया है कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते रहें।
‘प्रदर्शन करते हुए इस बात का खास खयाल रखना है कि हम अनुशासन प्रिय रहें। अगर उसके बाद भी लोगों को मारा जाता है तो पूरी दुनिया इस बात की गवाह होगी।’ गिलानी, अपने घर में कई सालों से नजऱबंद हैं।
इसके अलावा जगह-जगह ऐसे पोस्टर्स भी देखे गए हैं जिनमें लोगों से अपील की जा रही है कि वे अपने कारोबार बंद रखें और दफ्तरों या अन्य काम की जगहों पर न जाएं।
दूसरा पक्ष
लेकिन एक सच यह भी है कि सब लोग ऐसा नहीं सोचते हैं। भले ही अल्पसंख्यक हों लेकिन ऐसे लोग भी हैं कश्मीर में जो चाहते हैं कि अब सरकार ने प्रतिबंध कम कर दिये हैं तो जीवन सामान्य हो जाये।
सत्याग्रह ने कई ऐसे लोगों से भी बात की। पुलवामा जिले के एक सेब व्यापारी, अपना नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कहते हैं कि चाहे कश्मीर के लोग अब सालों प्रदर्शन करते रहें, जो हो गया वह अब हो गया है।
‘ऐसे सब कुछ बंद करके बैठ जाने से हमारा दोतरफा नुकसान हो रहा है’, इस सेब व्यापारी ने सत्याग्रह को बताया, ‘370 हटने से जो नुकसान है वो तो है ही, ऐसे हम आर्थिक रूप से भी कमजोर होते जा रहे हैं।’
लेकिन इस सेब व्यापारी का यह भी कहना है कि उनके साथ काम करने वाले और लोग ऐसा नहीं सोचते और वे अकेले कुछ नहीं कर सकते।
इस बार कश्मीर में पहली बार ऐसा हो रहा है जब मिलिटेंट्स मैदान में कूद पड़े हैं और लोगों को कारोबार वगैरह बंद करके रखने के लिए बोल रहे हैं। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। ऐसे में इन सेब व्यापारी जैसी सोच रखने वालों के लिए खतरा भी कम नहीं है।
कई दिनों से घाटी के विभिन्न इलाकों से खबरें आ रही थीं कि मिलिटेंट्स दूकानदारों को दुकानें न खोलने की सलाह दे रहे हैं। और हाल ही में श्रीनगर के एचएमटी इलाके में एक दुकानदार की, अज्ञात बंदूकधारियों ने, गोली मार के हत्या कर दी।
इसके बाद सोपोर जिले में फिर से बंदूकधारियों ने एक परिवार के चार लोगों को, जिनमें दो साल की एक बच्ची भी थी, गोली मार के घायल कर दिया। इस परिवार का मुखिया एक सेब व्यापारी है और सूत्रों के अनुसार उसको मिलिटेंट्स ने सेब मंडी में अपनी दुकान खोलने से मना किया था।
उधर कुछ दिन पहले दक्षिण कश्मीर के बिजबेहरा इलाक़े में एक ट्रक ड्राईवर की पत्थर लगने से मौत हो गयी।
‘ये सब घटनाएं घाटी में एक भय का माहौल पैदा कर रही हैं और मुझे ऐसा लगता है कि अब वो लोग भी, जो चाहते हैं कि चीज़ें जल्दी सामान्य हों, ऐसा कहने और अपना कारोबार करने से कतराएंगे’ उत्तर कश्मीर के सोपोर जिले के एक पुलिस सूत्र सत्याग्रह को बताते हैं।
तो कुल मिलाकर अभी यही लग रहा है कि कश्मीर को सामान्य होते-होते काफी समय लगने वाला है। क्योंकि कश्मीर और जगहों जैसा नहीं है। (सत्याग्रह)

 


Date : 12-Sep-2019

पाकिस्तान में तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के विधायक रह चुके बलदेव कुमार एक महीने से भारत में हैं और अपने परिवार समेत शरण की मांग कर रहे हैं। डीडब्ल्यू ने बलदेव कुमार से पूछी इसकी वजह।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के बारीकोट से विधायक रह चुके सिख नेता बलदेव कुमार बीते एक कई हफ्तों से भारत के पंजाब में अपने ससुराल वालों के पास रह रहे हैं। इस 43 वर्षीय नेता के पास तीन महीने का भारत का वीजा है, जो उन्होंने अपनी 12 साल की बेटी के इलाज के नाम पर लिया था। उनकी बेटी थैलासीमिया की गंभीर मरीज है। लेकिन कुमार की लड़ाई एक दूसरे स्तर पर भी जारी है। उनका कहना है कि पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के लिए असुरक्षित देश है और इमरान खान के नेतृत्व वाली सरकार उनके साथ बुरा बर्ताव कर रही है। डीडब्ल्यू ने कुमार से इस बारे में विस्तार से बातचीत की ।
डीडब्ल्य-क्या आपने भारत में शरण मांग कर बहुत बड़ा जोखिम नहीं उठाया है? इस कदम को उठाने की आपकी वजह क्या थी?
बलदेव कुमार- पाकिस्तान में कितने ही सिख अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए चिंतित हैं। मैंने जोखिम उठाया है लेकिन नपा-तुला। इसीलिए पाकिस्तान से निकलने की मैंने योजना बनाई। मेरे भाइयों को चिंता थी कि मैं सही सलामत यह यात्रा कर भी पाउंगा, कहीं मारा ना जाऊं। आशा करता हूं कि इस यात्रा का कुछ मतलब बने और मैं दूसरे सिख परिवारों की व्यथा को सबके सामने ला सकूं।
जब से इमरान खान प्रधानमंत्री बने हैं तब से चीजें खराब हो गईं। वे तो केवल दूसरों के हुक्म बजाने वाली कठपुतली हैं। वहां के तमाम अल्पसंख्यक समुदायों के लिए सुरक्षा एक बड़ी चिंता है। लोगों को अगवा किए जाने, जबरन धर्मांतरण करवाए जाने से डर का माहौल और बढ़ गया है।
क्या आपने पाकिस्तान इसलिए छोड़ा क्योंकि आप हत्या के एक मामले में आरोपी बनाए गए थे?
यह सच नहीं है। सन 2016 में सूरन सिंह की हत्या हुई, जो कि तब मुख्यमंत्री के विशेष सलाहकार और प्रांतीय असेंबली के सदस्य थे। मुझ पर उस मर्डर केस से जुड़े होने के झूठे आरोप लगे और 2018 में मुझे इससे मुक्त भी कर दिया गया। मुझे नहीं पता कि उनका परिवार मेरे बारे में क्या सोचता है लेकिन मुझे कोर्ट ने रिहा किया। बल्कि सरकार के ऊपर मेरे उन दो सालों का मेहनताना अब भी बकाया है। बिना वजह उन्होंने मेरी कमाई भी रोक कर रखी हुई है।
क्या आपने ऐसा कुछ झेला है जिससे पता चले कि पाकिस्तान में सिख और दूसरे अल्पसंख्यकों को लेकर आपका डर जायज है?
पाकिस्तान में सिखों की आबादी घटती जा रही है। उनकी संख्या में इतनी तेजी से कमी आई है कि दो दशक में ही वे 50,000 से घट कर केवल 8,000 रह गए हैं। देश में जबरन धर्म बदलवाए जाने जैसी बहुत सी चीजें हो रही हैं। इसके बारे में लोगों को ज्यादा पता नहीं चल पाता। हाल ही में 3 सितंबर को भी पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एक सिख लडक़ी को कथित तौर पर अगवा कर इस्लाम कबूल करवाया गया। वह लडक़ी एक ग्रंथी (सिख धर्म में पुजारी) की बेटी थी। एक हफ्ते के भीतर ऐसी दूसरी घटना का पता चला। सिंध और खैबर पख्तूनख्वाह प्रांतों में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। मुझे वहां अपनी जान का डर है और इसीलिए मैंने पाकिस्तान छोड़ा।
अब आप आगे क्या करने वाले हैं?
मेरी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से गुजारिश है कि वीजा शर्तों में थोड़ी ढील दें ताकि पाकिस्तान में जो लोग कष्ट झेल रहे हैं वे भारत आकर रह सकें। वहां जो हो रहा है वो बहुत ज्यादा दुखद है। मैं उन लोगों की परेशानियां सबके सामने रखना चाहता हूं।
मैं आशा करता हूं कि मुझे भारत में रहने दिया जाएगा। मेरे पास पाकिस्तान वापस लौटकर जाने का कोई रास्ता नहीं है। मैं ऐसा कर ही नहीं सकता और ना ही ऐसा करना चाहता हूं। मुझे भारत में पनाह चाहिए। (डॉयचे वैले)

 


Date : 12-Sep-2019

1919 के जलियांवाला बाग जनसंहार के लिए ब्रिटेन ने भारत से आज तक माफी नहीं मांगी है। लेकिन इंग्लिश चर्च के प्रमुख ने अमृतसर में दंडवत होकर उस जनसंहार के लिए क्षमा मांगी।

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में बड़ी संख्या भारतीय जनता जमा हुई थी। चारों तरफ से बंद मैदान में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी थे। लोग भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए जमा हुए थे। तभी ब्रिटिश कर्नल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर ब्रिटिश फौज के लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान तैयार किए गए रिकॉर्ड के मुताबिक 379 लोगों की मौत हुई। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक मृतकों की संख्या करीब 1,000 थी।
जनसंहार के 100 साल बाद 10 सितंबर 2019 को इंग्लैंड के चर्च प्रमुख आर्चबिशप ऑफ कैंटरबरी जस्टिन वेल्बी अमृतसर पहुंचे। जलियांवाला बाग के सामने वह हाथ जोडक़र जमीन पर दंडवत हो गए। जस्टिन वेल्बी ने जनसंहार के लिए माफी मांगते हुए कहा, मैं ब्रिटिश सरकार के लिए नहीं बोल सकता हूं क्योंकि मैं ब्रिटिश सरकार का अधिकारी नहीं हूं। लेकिन मैं ईसा मसीह के नाम पर बोल सकता हूं।
आर्चबिशप ऑफ कैंटरबरी ने इसके आगे कहा, मैं बहुत शर्मिंदा हूं और किए गए अपराध के असर के लिए माफी मांगता हूं। मैं एक धार्मिक नेता हूं, एक राजनेता नहीं हूं। एक धार्मिक नेता होने के नाते मैं उस त्रासदी के लिए विलाप करता हूं जो हम यहां देख सकते हैं।
इंग्लिश चर्च के प्रमुख ने बाद में फेसबुक पर इसका जिक्र किया। दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट पर उन्होंने लिखा, इस जगह पर जो हुआ, उससे उनके भीतर एक अगाध शर्म का भाव पैदा हो गया है। यह दर्द और संताप कई पीढिय़ों से गुजर चुका है, इसे कभी खारिज या नाकारा नहीं जाना चाहिए।
ब्रिटेन ने आधिकारिक तौर पर आज तक इस जनसंहार के लिए कभी भारत से माफी नहीं मांगी है। हालांकि 1997 में अपनी भारत यात्रा पर ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ द्वितीय जलियांवाला बाग स्मारक पर गईं थीं। वहां फूलों से श्रद्धांजलि देकर और मौन रख कर उन्होंने दर्शन तो किए लेकिन इसी यात्रा में उनके पति प्रिंस फिलिप ने जलियांवाला जनसंहार पर ऐसी टिप्पणी की थी कि विवाद छिड़ गया। फिलिप ने कह दिया कि भारत वहां हुई मौत के आंकड़ों को काफी बढ़ा चढ़ा कर पेश करता है।
फरवरी 2013 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन जब भारत आए तो उन्होंने स्वर्ण मंदिर का दौरा किया। उस दौरान कैमरन ने जलियांवाला जनसंहार को शर्मनाक बताया था। इस तरह घटना पर अफसोस जताने वाले पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री थे, लेकिन मांगी मांगने का साहस कैमरन भी नहीं जुटा सके।
कैमरन के बाद प्रधानमंत्री बनी टेरीजा मे ने भी ब्रिटिश संसद में जलियांवाला जनसंहार पर गहरा अफसोस जरूर जताया लेकिन मात्र पांच अक्षरों वाला सॉरी शब्द उनके मुंह से भी नहीं निकला। (डॉयचे वैले)

 


Date : 11-Sep-2019

एफ.वी.
अमेरिकी राष्ट्रपति के एक कदम ने तालिबान के साथ जारी वार्ता पर रोक लगा दी है। हालांकि दोनों पक्षों में से किसी के लिए भी इस हालत को लटका कर रखना भयानक साबित हो सकता है, मानना है कि डॉयचे वेले के फ्लोरिआन वाइगांड का।
हाल के हफ्तों में तालिबान ने दर्जनों अफगानी लोगों की जान ली है। इसके बावजूद अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप उनसे मिले होते और हाथ मिलाया होता। लेकिन जैसे ही खबर आई कि एक और तालिबानी हमले में एक अमरीकी सैनिक भी मारा गया है, ट्रंप ने पहले से तय अपनी इस मुलाकात को रद्द कर दिया। और इसी के साथ मिट्टी में मिला दिया उस संभावना को जो कि अमरीका और तालिबान के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर से पैदा होती।
ट्रंप ट्विटर पर एक मरने वाले की कीमत उसकी राष्ट्रीयता के आधार पर लगाने का कुटिल काम कर रहे हैं। वे जानते हैं कि अमरीका में उनके फिर से चुने जाने के मकसद में अमरीकी सैनिकों के खून से रंगे तालिबान से हाथ मिलाने से नुकसान हो सकता है। एक बार फिर वार्ता रद्द कर उन्होंने दिखा दिया है कि वे अपने अमरीकी वोटरों को खुश रखना चाहते हैं भले ही उससे दुनिया में कुछ भी असर हो। तो क्या मान लेना चाहिए कि करीब एक साल से चल रही अफगानिस्तान में शांति बहाल करने की कोशिशें इसी के साथ दम तोड़ देंगी? सौभाग्यवश, फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता।
भले ही एक ओर तालिबान और अमरीकी सैनिकों को मारने और हमले जारी रखने की धमकी दे रहा हो और राजधानी काबुल समेत देश के एक बड़े हिस्से पर अब भी नियंत्रण बनाए हुए हो, फिर भी यह कट्टरवादी समूह जानता है कि वह पश्चिमी सेनाओं से जीत तो नहीं सकता। अगर यह सच न होता तो वे अपने कट्टर दुश्मन से बातचीत के लिए राजी ही क्यों हुए होते।
जल्द ही ट्रंप के भावावेश से भरे ट्विटर संदेशों के बादल हटेंगे और फिर सामने होगा तालिबान को लेकर एक संतुलित विदेश नीति रवैया। निश्चित तौर पर ऐसा लग रहा था कि अमेरिका-तालिबान समझौता होने ही वाला था, लेकिन ऐसी कुछ रिपोर्टें भी बाहर आई हैं जिनसे पता चलता है कि दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दे अब भी सुलझाए जाने बाकी थे। हो सकता है कि ट्रंप के मुलाकात रद्द करने के पीछे असली वजह यही रही हो। जाहिर है अपने देश के एक सैनिक को लेकर देशभक्ति वाले संदेश से ओतप्रोत होकर इसे आधिकारिक तौर पर रद्द करना ट्रंप के समर्थकों को कहीं ज्यादा प्रभावित करेगा।
तमाम खूनखराबे के बावजूद ट्रंप खुद भी ऐसा नहीं करना चाहेंगे कि अफगानिस्तान में एक शांति समझौते को भुला दिया जाए। उन्होंने अपने समर्थकों से चुनावी वादा जो किया था कि वे जल्द से जल्द अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लेंगे और वहां अपने सैनिकों की जान नहीं जाने देंगे। अगर वाकई तालिबान अमेरिका को बातचीत की मेज पर वापस लाने के लिए और अमरीकी सैनिकों को निशाना बनाते हैं तो हर अमेरिकी सैनिक की मौत का ठीकरा ट्रंप के माथे फोड़ा जाएगा। जल्द ही उनके चुनाव प्रचार अभियान को हवा मिलेगी ऐसे में ट्रंप को इससे नुकसान हो सकता है।
लेकिन तालिबान को दोबारा सोचना होगा कि अपने मकसद में सफल होने के लिए क्या और बल प्रयोग करने की रणनीति से वाकई उन्हें फायदा होगा। ट्रंप के ट्वीट से तो उन्हें भी समझ आना जाना चाहिए कि बम गिराकर वे जल्दी जीत हासिल नहीं कर पाएंगे। इसके अलावा, अमेरिका और तालिबान दोनों ने अब तक जिस तरह अफगानी सरकार को नजरअंदाज किया है, उसमें भी बदलाव आ सकता है। सरकार अचानक ज्यादा अहम भूमिका में आ सकती है और खुद को और आफगानी वोटरों की मान्यता दिलाने के लिए सितंबर में चुनाव भी करा सकती है। कुछ ही हफ्तों में अफगानिस्तान में चुनाव कराए जा सकते हैं, जिन पर लंबे समय से अनिश्चितता छाई थी। इस लिहाज से आने वाले कुछ दिन इस पूरे घटनाक्रम के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं। (डॉयचेवेले)

 


Date : 11-Sep-2019

पूनम कौशल

श्रीनगर के अधिकतर इलाक़ों में भले ही सन्नाटा पसरा हो लेकिन यहां के लल्ला डेड अस्पताल के गलियारों में चहल पहल है। बाहर के तनाव का असर यहां भी साफ़ नजऱ आता है। श्रीनगर के इस सबसे बड़े मैटरनिटी अस्पताल में नन्ही जि़ंदगियों को दुनिया में ला रही मांओं के चेहरों पर उल्लास से ज़्यादा उदासी दिखाई देती है। अपने सीने से नवजात बेटी को चिपकाए एक मां कहती है, ‘मेरी बेटी बेहद मुश्किल हालात में दुनिया में आई है, अल्लाह उसे बेहतर जि़ंदगी दे।’
वहीं पहली बार मां बनीं समीरा कहती हैं, ‘हम जिस माहौल में बड़े हुए, नहीं चाहते थे वो माहौल हमारे बच्चों को मिले। अपनी बेटी को गोद में लिए मैं बस अमन की दुआ करती रहती हूं।’
अस्पताल की एक डॉक्टर आंकड़ों पर नजऱ डालते हुए बताती हैं, ‘रोज़ाना औसतन सौ बच्चे यहां जन्म ले रहे हैं। हमारी तैयारी पूरी है इसलिए कोई दिक्क़़त नहीं आ रही है।’
अस्पताल पहुंचकर भले ही गर्भवती महिलाओं को संतोषजनक सुविधाएं मिल पा रही हैं लेकिन उनके लिए यहां तक पहुंचना बड़ी चुनौती है।
बीते पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त करने के बाद केंद्र सरकार ने भारत प्रशासित कश्मीर घाटी में बेहद सख़्त पाबंदियां लागू की हैं।
यूं तो इनसे सभी बेहाल हैं लेकिन इनका सबसे ज़्यादा असर महिलाओं और बच्चों पर नजऱ आता है। लल्ला डेड अस्पताल में भर्ती होने का इंतज़ार कर रही एक गर्भवती महिला कहती हैं, ‘हम बमुश्किल यहां पहुंचे हैं। गाड़ी में मरीज़ होने के बावजूद हमें जगह-जगह रोका गया। उम्मीद है यहां सब ठीक होगा।’
ग्रामीण इलाक़े से आई एक गर्भवती महिला के तीमारदार कहते हैं, ‘पाबंदियों की वजह से दवाइयां लेना और चेकअप कराना मुश्किल हो गया था।’ कश्मीर घाटी के एक ग्रामीण इलाक़े में दो महीने बिताकर क़तर लौट रही एक महिला बताती हैं, ‘सबसे ज़्यादा परेशान गर्भवती महिलाएं हैं। अस्पताल जाने के लिए गाड़ी भी नहीं मिल पाती है।’  वो कहती हैं, ‘सिर्फ गर्भवती महिलाएं ही नहीं बल्कि सभी बीमार लोगों के लिए हालात बेहद खऱाब हैं।’
स्कूल बंद होने की वजह से बच्चे भी घरों में ही क़ैद हैं। श्रीनगर की एक खाली गली में तेज़ क़दमों से चलतीं दो बच्चियां मिलीं। उनकी मासूमियत पर मायूसी हावी थी। वो इन दिनों स्कूल नहीं जा पा रही हैं। डॉक्टर बनने की चाहत रखने वाली ये बच्चियां कहती हैं, ‘हड़ताल की वजह से स्कूल बंद हैं। हर जगह आर्मी है, हम खेल भी नहीं पा रहे हैं।’ वो कहती हैं, ‘एग्ज़ाम आ रहे हैं, हम सब यही चाहते हैं कि स्कूल जल्दी खुल जाए।’
सरकार का कहना है कि श्रीनगर और अन्य इलाक़ों में अधिकतर स्कूल खोल दिए गए हैं। लेकिन स्कूलों में बच्चे नजऱ नहीं आते।
श्रीनगर के जीबी पंत अस्पताल के बाहर अपनी बेटी को गोद में लिए एक महिला कहती है, ‘मैं अपनी बच्ची के लिए अच्छा ही सोचती हूं। चाहती हूं मेरी बच्ची आगे चलकर अच्छा कर सके। लेकिन अभी हालत बहुत खऱाब है। स्कूल बंद होने की वजह से हमारे बच्चों की तालीम रुक गई है। अभी तो बस आग ही आग नजऱ आती है।’
पुरुष तो फिर भी घर के बाहर निकल पा रहे हैं। लेकिन महिलाएं पूरी तरह घरों में ही क़ैद हैं। इससे उनमें ग़ुस्सा और अवसाद बढ़ रहा है। बेहद ग़ुस्से में एक महिला कहती हैं, ‘अधिकारियों को बता दिया गया था कि वो सामान इक_ा कर लें। लेकिन हमें आगाह नहीं किया गया। हमारे पास अब खाने पीने का सामान भी ख़त्म हो रहा है। हम घरों में मर रहे हैं लेकिन कोई ख़बर लेने वाला नहीं हैं।’
वो कहती हैं, ‘कश्मीर घाटी में कुछ भी ठीक नहीं है। ज़ुल्म इतना बढ़ गया है कि बच्चे पेट में ही मरने लगेंगे क्योंकि प्रेग्नेंट महिलाएं अस्पताल ही नहीं पहुंच पा रही हैं।’ वो सबसे ज़्यादा नाराज़ मीडिया की उन ख़बरों से हैं जिनमें कश्मीर घाटी में सब कुछ सामान्य होने का दावा किया जा रहा है।
तल्ख़ आवाज़ में वो कहती हैं, ‘मेरा मन करता है कि मैं टीवी तोड़ दूं। सरकार अगर हमसे बात करती, हमारी सुनती तो हम ख़ुशी-ख़ुशी भारत के साथ रहते।’
मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी का असर भी महिलाओं की मानसिक सेहत पर पड़ रहा है। मर्दों के घर से बाहर जाने पर वो इस चिंता में रहती हैं कि वो ठीक भी होंगे या नहीं।
डल के पास दुकान चलाने वाले एक कारोबारी बताते हैं, ‘अब लैंडलाइन ठीक हुआ तो हालात कुछ बेहतर हुए हैं। पहले मेरी मां पूरा दिन दरवाज़े के पास मेरे घर लौटने का इंतज़ार करती रहती थीं। अब दिन में कई बार फोन करके हालचाल पूछती हैं।’
कश्मीर में महिलाओं के लिए हालात पहले भी मुश्किल थे लेकिन अब ये असहनीय हो रहे हैं। बीते कई सप्ताह से अपने घर की चारदीवारी में क़ैद एक महिला बस इतना ही कहती है, ‘हमारा दम घुट रहा है। घर से बाहर झांकते हैं तो सन्नाटा ही दिखाई देता है।’
दस साल से लंदन में रह रहीं हिबा अपने मां-बाप का हालचाल जानने श्रीनगर पहुंची हैं। बहुत कोशिशों के बाद भी उनका अपने मां-पिता से संपर्क नहीं हो पा रहा था।
किसी तरह उनके पिता ने सीआरपीएफ़ के एक अधिकारी के फ़ोन से दिल्ली में उनके एक रिश्तेदार को फ़ोन किया जिन्होंने दूसरे फ़ोन से हिबा को उनके पिता की आवाज़ सुनवाई।
वो कहती हैं, ‘मेरे अब्बा ने सबसे पहले मुझसे यही कहा कि मैं सोशल मीडिया पर कुछ ना लिखूं। वो मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे और मैं उनकी सुरक्षा को लेकर।’ हिबा कहती हैं, ‘इसके बाद मेरा घरवालों से कोई संपर्क नहीं हुआ। मेरे पिता को डायबिटीज़ है, मुझे नहीं पता था कि उनके पास दवाइयां हैं या नहीं।’
वो कहती हैं, ‘मैंने जैसा सोचा था ज़मीनी हालात उससे भी कहीं ज़्यादा खऱाब हैं। मेरी दादी अस्पताल में भर्ती हैं। मैं उनसे मिलने गई तो रास्ते में कम से कम दस बार रोका गया। कफ्र्यू पास होने के बावजूद हमें रोका गया क्योंकि वो सडक़ों पर किसी तरह की आवाजाही नहीं चाहते थे। मैं अपनी दादी का हाल नहीं जान सकी।’
हिबा कहती हैं कि उन्होंने कश्मीर छोड़ा क्योंकि उनके लिए यहां मौके नहीं थे। वो कहती हैं, ‘यहां हमारा कोई कश्मीर नहीं हैं। मुझे अपना बचपन याद है। शाम को साढ़े पांच बजे हमारे घर के दरवाज़े बंद हो जाते थे।’
हिबा के मुताबिक उनकी चचेरी बहनें इन दिनों बेहद परेशान हैं। वो कहती हैं, ‘बीती रात मैं अपनी कजिऩ बहन से बात कर रही थी। वो सातवीं क्लास में हैं। वो अपने भविष्य को लेकर बहुत चिंतित है। उसका सिलेबस पूरा नहीं हुआ है और स्कूल बंद हैं। वो स्कूल, अपने दोस्तों और अपनी पढ़ाई को बेहद मिस कर रही है। सबसे अहम ये है कि वो स्कूल नहीं जा पा रही है।’
हिबा कहती हैं, ‘मैं दस साल से लंदन में रह रही हूं। ये पहली बार है जब इंडिया के बाहर कश्मीर को इतनी अटेंशन मिल रही है। भारत के दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के दावे पर सवाल उठ रहा है।’
श्रीनगर एयरपोर्ट के पास काम करने वाले कुछ नौजवानों का कहना था कि वो चि_ियां लिखकर अपनी ख़ैर-ख़बर प्रेमिकाओं को दे रहे हैं।
अपनी प्रेमिका को लिखे पत्र में एक युवा ने लिखा है, ‘मैं जानता हूं कि तकनीकी रूप से हम दोनों का संपर्क नहीं हो रहा है। जिस तरह तुम मुझे छोड़ कर गईं वो अच्छा नहीं था। मैं तुम्हारी समस्या समझता हूं। मैं ये पत्र ये बताने के लिए लिख रहा हूं कि अब मैं मैनेजर बन गया हूं और अब मैं तुम्हारा खयाल रख सकता हूं। मैं पूरी स्पष्टता से कह रहा हूं कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं।’
वहीं एक अन्य नौजवान ने बताया कि मोबाइल बंद होने के बाद से ही वो अपनी प्रेमिका से बात नहीं कर सका है। उसे नहीं मालूम कि वो आगे कब उससे बात कर पाएगा।
वो बस इतना ही कह पाता है, ‘सरकार के इस फ़ैसले ने मेरी प्रेम कहानी ख़त्म कर दी है। मैं नहीं जानता कि वो कैसी है, क्या कर रही है।’ (बीबीसी)

 


Date : 10-Sep-2019

गिरीश मालवीय

योगीजी कुछ कीजिए! मोदीजी कुछ कीजिए! प्लीज मुझे इंसाफ दिलाइए। यही कहा था शाहजहांपुरा की छात्रा ने अपने वायरल वीडियो में! जब उसने संत समाज के एक बहुत बड़े नेता के बारे में बताया था, जो कि बहुत लड़कियों की जिंदगी बर्बाद कर चुका है। शायद उसे भी ‘बेटियों के सम्मान में, भाजपा मैदान में’ के नारे पर यकीन था। कल उसने जब प्रेस कांफ्रेंस की तो उसका यह यकीन टूट चुका था। 
संत समाज के यह बहुत बड़े नेता हैं स्वामी चिन्मयानंदजी। भगवावेशधारी यह महापुरुष बहुत ज्ञानवान और प्रज्ञावान हैं।  वैदिक धर्म के प्रकाण्ड पंडित हैं।  कहा जाता है कि उन्होंने उपनिषद् ्सार, गीता बोध, भक्ति वैभव समेत करीब आठ धार्मिक किताबें लिखी हैं। दो धार्मिक पत्रिकाओं ‘धर्मार्थ’ और ‘विवेक रश्मी’  का संपादन करते हैं। संत के रूप में शाहजहांपुर में आश्रम भी चलाते हैं। वे मुमुक्षु आश्रम के अधिष्ठाता हैं। ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन और राम मंदिर आंदोलन से भी सक्रिय रूप में आज भी जुड़े हुए हैं। 
स्वामी चिन्मयानंद वैसे तीन बार सांसद रह चुके हैं और अटलजी की सरकार में गृह राज्यमंत्री पद को सुशोभित कर चुके हैं। 
2001 की बात है। स्वामी जौनपुर के सांसद थे। तब दक्षिणी दिल्ली की रहने वाली एक लडक़ी अपने माता-पिता के साथ स्वामी चिन्मयानंद के संपर्क में आई। स्वामीजी ने उसे आधात्यामिक ज्ञान लेने के लिए प्रेरित किया। 2002 में उसकी दीक्षा हुई और उसका नया नामकरण हुआ। उसे साध्वी बनाया गया। उसी साध्वी ने जब वह स्वामीजी के ही शाहजहांपुर के एक विद्यालय में प्राचार्य पद पर कार्यरत थीं। 30 नवंबर 2011 को चिन्मयानन्द के खिलाफ शहर कोतवाली में दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया था। 
साध्वी ने आरोप लगाया कि 2004 में स्वामी के लोगों ने बंदूक के बल पर उसे उठा लिया। दिल्ली से शाहजहांपुर लाया गया। उस पर पहरा लगा दिया गया। आरोप के मुताबिक एक दिन स्वामी ने नशे में धुत होकर उसके साथ रेप किया। रेप का वीडियो भी बनाया गया था। साध्वी ने स्वामी पर सात साल तक रेप करने और जबरन गर्भपात का आरोप लगाया। 
2011 में मायावती सत्ता में थी, इसलिए कम से कम पीडि़त साध्वी की तहरीर के आधार पर पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज कर लिया था। लेकिन तब भी आज ही की तरह स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती की गिरफ्तारी नहीं की गई थी। बाद में स्वामी चिन्मयानन्द ने गिरफ्तारी को लेकर कोर्ट से स्टे लिया। मायावती गई। अखिलेश आए। लेकिन स्वामीजी ने अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर मामला लटकाए रखा। जब उनके अभिन्न मित्र योगीजी प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और प्रदेश में रामराज्य की स्थापना हुई तब पिछले साल 2018 में योगी सरकार ने चिन्मयानंद पर धारा 376 (बलात्कार) और 506 (धमकाने) के तहत दर्ज मुकदमा वापस लिए जाने का आदेश दे दिया। 
जैसे आज यह छात्रा अपने वायरल वीडियो में योगीजी और मोदीजी से गुहार लगा रही हैं। ठीक उसी प्रकार उस महिला ने भी राष्ट्रपति, प्रधान न्यायाधीश और जिला जज को पत्र भेजकर राज्य सरकार के इस क़दम पर आपत्ति दर्ज कराई थी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। 
उस बलात्कार से पीडि़त महिला ने दुहाई दी कि  यही भाजपा ‘बेटियों के सम्मान में, भाजपा मैदान में’ का नारा दे रही थी और अब वहीं पार्टी मेरा मुकदमा खत्म करा रही है, यह बहुत ही दुखद है। सरकार को न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी। मैंने अदालत में इस आशय का प्रार्थनापत्र दे दिया है कि आरोपी के खिलाफ वारंट जारी करके उसे जल्द से जल्द जेल भेजा जाए। ’
एबीपी न्यूज ने उस महिला का इंटरव्यू लिया था। एबीपी न्यूज से बात करते हुए पीडि़ता ने कहा-‘कि मैं भी किसी बेटी हूं, मुझे इंसाफ दो, केस वापस लेना लोकतंत्र की हत्या जैसा है’। सरकार को अगर कोर्ट के निर्णय पर भरोसा नहीं है तो आम लोगों का क्या होगा? कम से कम लोकतंत्र में किसी को ट्रायल तो फेस करना चाहिए।  आप किसी का इस हद तक पक्ष ले रहे हैं कि उसे ट्रायल तक फेस नहीं करने देना चाहते।  ये न्याय और लोकतंत्र की हत्या है। 
लेकिन कौन सुनता है। ये श्रीराम का रामराज्य नहीं है। जहां धोबी के संदेह मात्र से सिंहासन हिल जाते हैं। ये योगीजी का रामराज्य है। जहां सत्ताधारी दल कर नेता और दबंग दिन-रात आतंक मचा रहे हैं और स्वामीजी के पास तो एक गुण विशेष भी है वे ठहरे भगवाधारी। 
कुछ नहीं होगा। कुछ सालों में ये मुकदमा भी सरकार वापस ले लेगी। कल लडक़ी ने प्रेस कांफ्रेंस में साफ-साफ कहा कि जिलाधिकारी उसकी फरियाद सुनने के बजाए उसके पिता को धमका रहे थे कि जानते हो वो कितने बड़े आदमी हैं। जब पिछले साल योगी सरकार ने उपरोक्त पुराना केस वापस लिया तब भी बताया जाता है कि उसके कुछ दिन पहले शाहजहांपुर के सीडीओ और एडीएम (प्रशासन) ने भी स्वामी की आरती उतारी थी।
वैसे बहुत संभव है कि आप कुछ दिनों बाद शाहजहांपुर की उस लडक़ी की दुर्घटना में मृत्यु का समाचार पढं़े। आखिरकार ये योगीजी का रामराज्य है। न पहली वाली को इंसाफ मिला न दूसरी वाली को मिलेगा और लडक़ी तो कह भी रही है कि मेरे जैसी ओर भी बहुत-सी लड़कियां हैं...।

 


Date : 10-Sep-2019

कविता कृष्णपल्लवी

मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश विजया के. ताहिलरमानी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।  वह देशभर के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की वरिष्ठता सूची में पहले स्थान पर थीं। अब उनके इस्तीफे की वजह भी जान लीजिए!
इस वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मेघालय हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पद पर तबादला कर दिया था।  बताते चलें कि मद्रास हाईकोर्ट में कुल जजों की संख्या पचहत्तर है, जबकि मेघालय हाईकोर्ट में तीन है। जस्टिस ताहिलरमानी अगस्त, 2018 से अपने पद पर थीं और अक्टूबर, 2020 में उन्हें रिटायर होना था!
 ताहिलरमानी की जगह मेघालय हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ए. के. मित्तल को मद्रास हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया है! ये दोनों तबादले कॉलेजियम ने न्याय के बेहतर प्रशासन के हित में किए हैं! इस फैसले के विरुद्ध चार दिनों पहले जस्टिस ताहिलरमानी ने कॉलेजियम के समक्ष जो रिप्रजेंटेशन दिया था, उसे कल ठुकरा दिया गया जिसके बाद उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। 
यह भी जान लेना जरूरी है कि कॉलेजियम के सदस्य कौन-कौन हैं! भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम के अन्य चार सदस्य हैं -जस्टिस एस.ए. बोबडे,  एन.वी. रमन्ना, अरुण मिश्र, और रोहिंटन नरीमन। चारों उच्चतम न्यायालय के जज हैं!  बिना किसी स्पष्ट कारण के, वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज को मद्रास हाईकोर्ट से उठाकर कॉलेजियम ने मेघालय जैसे तीन जजों वाले हाईकोर्ट में भेज ही क्यों दिया? वह तो कॉलेजियम के सम्मानित सदस्य गण जानें, पर कुछ और भी तथ्य हैं जिन्हें हमें-आपको, सबको जानना चाहिए। 
जस्टिस ताहिलरमानी ही वह जज हैं जिन्होंने गोधरा के बाद हुए गुजरात दंगों के दौरान हुए बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार कांड के अभियुक्तों को निचली अदालत से मिली आजीवन कारावास की सज़ा को बरकऱार रखा था!
अब तक विभिन्न कारणों से ऊपरी अदालतों के कई जजों ने इस्तीफे दिए हैं, लेकिन कॉलेजियम के निर्णय से असहमति के कारण इस्तीफ़ा देने के उदाहरण दुर्लभ ही रहे हैं ! जस्टिस ताहिलरमानी के पहले 2017 में कर्नाटक हाईकोर्ट के दूसरे नंबर के वरिष्ठतम जज जस्टिस जयंत पटेल का जब कॉलेजियम ने इलाहाबाद ट्रांसफर कर दिया था तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। जस्टिस पटेल ही वह जज थे जिन्होंने गुजरात हाईकोर्ट में जज रहते समय इशरतजहां फर्जी मुठभेड़ कांड के सीबीआई जांच का आदेश दिया था !
यह भी जानना जरूरी है कि जिस जस्टिस ताहिलरमानी के साथ कॉलेजियम यह सुलूक कर रहा है, उन्होंने अपने कैरियर में कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं! स्त्री बंदियों के गर्भपात के अधिकार को मान्यता देने वाला उनका फैसला ऐसे ही फैसलों में से एक है!
यह सब जो हो रहा है, उससे अब भला किसी को संदेह क्यों न हो कि न्यायपालिका नीचे से लेकर ऊपर तक सरकार की सेवा में सन्नद्ध हो चुकी है! उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था और जजों के भ्रष्टाचार बारे में शांतिभूषण, प्रशांत भूषण और जस्टिस मार्कन्डेय काटजू जैसे लोग जो कुछ भी कह चुके हैं, उसे हम यहां दुहराना नहीं चाहते!

 


Date : 10-Sep-2019

फेसबुक डेटिंग पहले से ही ब्राजील, कनाडा और 17 दूसरे देशों में चल रहा था अब यह अमेरिका में भी शुरू हो गया। बीते सालों में कई बार निजता के उल्लंघन का आरोप झेल चुके फेसबुक पर क्या प्यार के लिए लोग भरोसा करेंगे?

फेसबुक अपनी मुद्रा जल्दी ही शुरू करने वाली है, ई कॉमर्स पहले से ही चल रहा है, अब उसने प्यार में हाथ डाल कर इंसान के जीवन से जुड़ी हर चीज में दखल देने का मन बना लिया है। फेसबुक डेटिंग की कई चीजें जोडिय़ां मिलाने वाली सेवाओं से मेल खाती हैं हालांकि फेसबुक का दावा है कि यह अलग है। फेसबुक डेटिंग प्रोफाइल आपकी मेन प्रोफाइल से अलग होगी हालांकि यह आपको अपने नेटवर्क में मौजूद दोस्तों की पहचान करने और उन तक पहुंचने का जरिया देगा। 
फेसबुक डेटिंग केवल मोबाइल पर चलेगा, यह अकेली ऐसी सेवा है जिसका इस्तेमाल मुफ्त है और जो विज्ञापन से मुक्त है। हालांकि फेसबुक फिर भी इससे कमाई कर सकेगा क्योंकि लोग लंबा वक्त इस ऐप पर बिताएंगे ऐसी उम्मीद की जा रही है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या इसे इस्तेमाल करते समय लोग निजता से जुड़ी आशंकाओं से दूर रह सकेंगे। कंपनी में निजता के मामलों के उप प्रमुख रॉब शर्मन ने कहा है, फेसबुक का कोई भी फीचर अगर ऐसा हो जिस पर लोग भरोसा नहीं करें तो वह नहीं चलेगा। हम बिल्कुल शुरुआत से ही निजता को बनाए रखेंगे।
32 साल के सेठ कार्टर इंडियाना राज्य के टेरे हॉयटे में इंजीनियर हैं। वह अपने मौजूदा रिश्ते में आने से पहले मैच टू बंबल, टिंडर और क्रिश्चियन मिंगल जैसे डेटिंग ऐप पर हाथ आजमा चुके हैं। कार्टर ने कहा, फेसबुक यहां पैसा बनाने आया है और मैं यह जानता हूं। हालांकि उन्हें चिंता है कि फेसबुक की निजता को लेकर जो प्रतिबद्धता है वह पैसा कमाने के दबाव के आगे ढह जाएगी। उन्होंने कहा, इसके आसार हैं कि वो मेरी डेटिंग की पसंद को बेचेंगे जिसका मतलब है कि मेरी जिंदगी में उनका ज्यादा दखल।
फेसबुक का कहना है कि वह ऐसा कुछ नहीं करेगा। हालांकि कार्टर जैसे ग्राहकों के डर को बेवजह नहीं कहा जा सकता। इसी साल गर्मियों में फेसबुक पर निजता उल्लंघन के आरोप में पांच अरब डॉलर का जुर्माना लगा था। चुनाव से जुड़ी गलत सूचनाओं को फैलने देने और इसी तरह के दूसरे मामलों में उस पर जांच भी चल जा रही है। 
ऑनलाइन डेटिंग के लोकप्रिय होने के बाद से अब फेसबुक डेटिंग मैदान में आ रहा है। 2016 में अमेरिका के 15 फीसदी वयस्कों ने कहा कि वो ऑनलाइन डेटिंग सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं। पीउ रिसर्च सेंटर के मुताबिक 2005 में ऐसा कहने वालों की संख्या शून्य थी। बाजार भरा हुआ है। ई हार्मनी से लेकर हिंजे और द लीग तक की केवल सदस्यों के लिए मौजूद सेवाएं लोगों को एक जगह ला रही हैं। इतना ही नहीं ऐसे ऐप भी आ गए हैं जो किसानों, धार्मिक गुटों, वरिष्ठों और एलजीबीटी समुदाय के लोगों का खास ध्यान रख रही हैं।
 पिछले साल फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने फेसबुक डेटिंग फीचर लाने की घोषणा की थी। तब कहा गया था कि यह सिर्फ (लोगों को) जोडऩे के लिए नहीं है बल्कि अर्थपूर्ण, लंबे समय के संबंध के लिए है। यह सीधा टिंडर पर आघात था जो लोगों को उनकी तस्वीरें, उम्र और पहला नाम बता कर जोडऩे के लिए ही जाना जाता है।
फेसबुक डेटिंग के लिए आप मुख्य फेसबुक से अलग एक प्रोफाइल बना कर शुरुआत करते हैं। यहां लोग अपने स्कूल और नौकरी के बारे में भी जानकारी डाल सकते हैं लेकिन फेसबुक डेटिंग के लिए उन्हें छिपाया भी जा सकता है। इसके साथ ही आप अपने इंस्टाग्राम की 36 तस्वीरें भी डाल सकते हैं। प्रोफाइल बनाने के लिए आपको कम से कम 18 साल का होना होगा। फेसबुक में यह काम आप 13 साल की उम्र में भी कर सकते हैं और हां इस सेवा का इस्तेमाल करने के लिए आपका सिंगल होना जरूरी नहीं है। फेसबुक डेटिंग में आपकी उम्र तो दिखती है लेकिन आपका अंतिम नाम छिपा रहता है।
फेसबुक डेटिंग आपको जोड़ीदार के नाम नहीं सुझाएगा, ना ही यह आपकी डेटिंग प्रोफाइल को आपके मुख्य फेसबुक की न्यूज फीड में या फिर आपके दोस्तों को दिखाएगा। सुरक्षा के उपाय के तहत आप चाहें तो डेट पर जाते वक्त अपनी लोकेशन अपने दोस्तों को बता सकते हैं।
एनआर/एमजे (एपी)

 


Date : 09-Sep-2019

राजू पाण्डेय

इसरो प्रमुख के. सिवान भावुक होकर रो पड़े और प्रधानमंत्री ने उन्हें दिलासा दी। इसरो प्रमुख का यह रुदन एक यशस्वी और दृढ़ निश्चयी वैज्ञानिक की प्रतिक्रिया थी या एक ऐसे हताश व चिंतित संस्था प्रमुख की, जो अपने अति महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री की उपस्थिति में उसकी अपेक्षाओं पर खरा न उतर सका, यह तय कर पाना कठिन है। प्रधानमंत्री जी ने इसके बाद अपने भाषण में इसरो के वैज्ञानिकों की भूरी भूरी प्रशंसा की और कहा कि पूरा देश आपके साथ है।

मिशन चंद्रयान 2 को लेकर मीडिया और राजनीतिक हलकों में जो कुछ चल रहा है वह आश्वस्त करने वाला है अथवा चिंतित बना देने वाला-यह विश्लेषण का विषय हो सकता है किंतु इतना तय है कि इस घटनाक्रम में कुछ न कुछ अतिरेकपूर्ण और असमंजसकारी तत्व अवश्य उपस्थित हैं। सोशल मीडिया पर मिशन चंद्रयान 2 की आंशिक असफलता को लेकर चलने वाला विमर्श धीरे-धीरे अपशब्दों से भरी उन अमर्यादित बहसों का रूप ले रहा है जो तथाकथित राष्ट्रवादियों और तथाकथित देशद्रोहियों के मध्य आजकल अक्सर हुआ करती हैं। 
पूरे देश में अपनी राष्ट्रभक्ति सिद्ध करने की एक होड़ सी मची हुई है। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे भारतीय समाज का हर तबका इसरो के वैज्ञानिकों को हौसला देकर मानो उन पापों का प्रायश्चित कर रहा है जो उसने आजीवन किए हैं। सबका एक ही राग है- हम इसरो के वैज्ञानिकों के साथ हैं। आप हताश न हों। आप हौसला न खोएं। 
इस तरह एक वैज्ञानिक प्रयोग के दौरान आई तकनीकी बाधा को एक राष्ट्रीय विपत्ति में परिवर्तित कर दिया गया है। वैज्ञानिक अविष्कारों और अन्वेषणों की सामान्य सी जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी यह जानता है कि बारम्बार प्रयोग, बारंबार असफलता और निरंतर सुधार ही निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुंचाते हैं। वैज्ञानिक की कार्यप्रणाली में न तो भावनाओं के लिए स्थान होता है न ही प्रदर्शनप्रियता के लिए। स्वयं को निर्लिप्त, अचर्चित और पारिवारिक- सामाजिक-राजनीतिक व्यस्तताओं से दूर रखना हर वैज्ञानिक की पहली पसंद होती है।
 एकांत साधना वैज्ञानिक की विवशता नहीं होती। एकांत तो वैज्ञानिक का चुना हुआ आनंद लोक होता है। जिन वैज्ञानिकों पर सांत्वना भरे शब्दों की बौछार की जा रही है उन्हें यदि एकाकी और स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तो शायद उनका सर्वश्रेष्ठ सामने आ सकेगा। इसरो के वैज्ञानिक देश और विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं हैं। हर तकनीकी समस्या का समाधान निकालने में वे सक्षम हैं किंतु जन अपेक्षाओं के इस अप्रत्याशित दबाव का सामना करने का मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण शायद उनके पास नहीं है क्योंकि वे कोई राजनेता या सामाजिक कार्यकर्ता तो हैं नहीं जो भीड़ के मनोविज्ञान से खिलवाड़ कर सके।
   जिस तरह से मिशन चंद्रयान 2 को एक मीडिया इवेंट में बदला गया वह चिंतित करने वाला है। भारत के अंतरिक्ष कायक्रम का इतिहास गौरवशाली रहा है। हमारे वैज्ञानिकों ने उस समय भी दुनिया को चौंकाने वाली सफलताएं हासिल की थीं जब न तो इतना प्रो एक्टिव राजनीतिक नेतृत्व था न इतना सनसनीपसंद छिद्रान्वेषी मीडिया ही था। वैज्ञानिकों के साथ पूरे देश को जगाए रखने की कोशिश नावाजिब और गैरजरूरी है। देश के किसान वैज्ञानिकों के लिए अन्न उपजा रहे हैं। देश के मजदूर उनके लिए आवश्यक सुख सुविधाओं के निर्माण में लगे हैं। देश के शिक्षक इन वैज्ञानिकों को योग्य बनाने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। देश की संसद, समूचा प्रशासन तंत्र, पुलिस और न्याय व्यवस्था-सब के सब- इन वैज्ञानिकों और उनके परिवार के लिए अमन चैन के वातावरण की सृष्टि कर रहे हैं। आम भारतवासी तो अब तक ईमानदारी से कर्तव्य निर्वहन को ही राष्ट्रभक्ति समझता आया है। उसका अपने वैज्ञानिकों पर इतना प्रबल विश्वास है कि वह उन पर अपनी अनगढ़ अपेक्षाओं का दबाव डालना नहीं चाहता। वह अपना कत्र्तव्य कर चैन की नींद सोने का आदी है। दूसरी ओर वैज्ञानिक भी एकाग्रचित्त होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सांसारिक सुख सुविधाओं और सार्वजनिक जीवन का परित्याग कर प्राण प्रण से जुटे हुए हैं। उन्हें अपने लक्ष्य का ज्ञान भी है और लक्ष्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं का बोध भी। वैज्ञानिक शब्दावली में असफलता जैसे शब्द के लिए कोई स्थान नहीं है। असफलता वैज्ञानिक के लिए प्रयोग के दौरान आने वाला एक तकनीकी अवरोध है जिसे दूर कर लक्ष्य की ओर अग्रसर होना पड़ता है।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब मीडिया चंद्रयान 2 की लैंडिंग की इस तरह कवरेज करना प्रारंभ कर देता है मानो यह विश्वकप क्रिकेट का फाइनल मैच हो। सोशल मीडिया पर इसरो के वैज्ञानिकों के लिए शुभकामना संदेशों की बाढ़ आ जाती है क्योंकि शुभकामना न दे पाने वालों की राष्ट्रभक्ति पर संदेह भी किया जा सकता है, इसलिए कोई भी यह अवसर खोना नहीं चाहता।
चंद्रयान 2 की लांचिंग के 15 जुलाई के प्रथम प्रयास के दौरान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हरिकोटा में मौजूद थे। किंतु तकनीकी खामी के कारण प्रक्षेपण टल गया था। 7 सितंबर को चंद्रयान 2 की लैंडिंग के दौरान प्रधानमंत्री जी इसरो मुख्यालय में उपस्थित थे। संभव है कि प्रधानमंत्री जी अपने उत्साह और उत्सुकता को नियंत्रित करने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हों और उन्होंने इसरो मुख्यालय जाने का निर्णय ले लिया हो। निश्चित ही उनके मन में यह विचार भी रहा होगा कि उनकी उपस्थिति इसरो के वैज्ञानिकों को प्रेरणा देगी और वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगे। यद्यपि मिशन चंद्रयान 2 जैसे अभियान इतने जटिल होते हैं कि इनकी एक एक गतिविधि और संक्रिया पर वर्षों से शोध और अन्वेषण कर इनकी ऐसी रूपरेखा बनाई जाती है जो लगभग अपरिवर्तनीय होती है। इसलिए इस प्रक्रिया में मोटीवेट होकर पर्सनल हीरोइक्स दिखाने की गुंजाइश नहीं होती जैसा युद्ध और खेल के मैदान में होता है। 
मीडिया द्वारा इस मिशन को प्रधानमंत्रीजी की व्यक्तिगत उपलब्धि की भांति प्रचारित किए जाने की हास्यास्पद कोशिशें प्रारंभ कर दी गईं और – चांद पर मोदी मोदी-  जैसी सुर्खियां टीवी चैनलों पर दिखने लगीं। यदि मिशन कामयाब होता तो शायद इसकी सफलता को टीवी चैनलों द्वारा प्रधानमंत्री के 100 दिन के कार्यकाल की उपलब्धियों में भी शुमार किया जाता। मीडिया ने यह तथ्य बड़ी सफाई से छिपा लिया कि नवंबर 2007 में चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट पर एक साथ काम करने के लिए इसरो और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस के मध्य अनुबंध हुआ। सितंबर 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में सरकार ने चंद्रयान-2 मिशन हेतु अपनी स्वीकृति दी।
 अगस्त 2009 में  इसरो तथा रॉसकॉसमॉस ने मिलकर चंद्रयान-2 का डिजाइन तैयार कर लिया एवं इसकी लॉन्चिंग जनवरी 2013 में तय की गई। किंतु 2013 से 2016 की कालावधि में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस द्वारा लैंडर तैयार करने में लगातार विलंब किए जाने की वजह से मिशन में देरी होती रही। अंतत: उसने लैंडर देने में असमर्थता व्यक्त करते हुए खुद को मिशन से अलग कर लिया। इसके बाद इसरो ने स्वयं ही लैंडर विक्रम को बनाने का फैसला किया।
मीडिया की अपने चहेते महानायक को महिमामण्डित करने की कोशिशों पर तब तुषारापात हो गया जब दुर्भाग्य से यह वैज्ञानिक प्रयोग 90-95 प्रतिशत सफलता ही प्राप्त कर सका और लैंडर विक्रम अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चांद की धरती पर उतर न पाया। विक्रम लैंडर से संपर्क टूटने के बाद प्रधानमंत्री जी कुछ हताश से लगते हुए रात लगभग 2 बजे इसरो मुख्यालय से निकल गए। बाद में शायद उन्हें यह बोध हुआ हो कि इस तरह उनके अचानक चले जाने की व्याख्या अनेक प्रकार से हो सकती है। शायद उन्हें यह भी लगा हो कि इस लैंडिंग को मेगा इवेंट में बदलने की यह कोशिश अब नकारात्मक संदेश दे सकती है। तब उन्होंने सुबह 8 बजे इसरो के वैज्ञानिकों को संबोधित करने का फैसला किया। इस कार्यक्रम के दौरान अनेक भावुक पल भी आए और नाटकीय दृश्य भी उपस्थित हुए। 
इसरो प्रमुख के. सिवान भावुक होकर रो पड़े और प्रधानमंत्री ने उन्हें दिलासा दी। इसरो प्रमुख का यह रुदन एक यशस्वी और दृढ़ निश्चयी वैज्ञानिक की प्रतिक्रिया थी या एक ऐसे हताश व चिंतित संस्था प्रमुख की, जो अपने अति महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री की उपस्थिति में उसकी अपेक्षाओं पर खरा न उतर सका, यह तय कर पाना कठिन है। प्रधानमंत्री जी ने इसके बाद अपने भाषण में इसरो के वैज्ञानिकों की भूरी भूरी प्रशंसा की और कहा कि पूरा देश आपके साथ है। 
इस तरह इसरो के वैज्ञानिकों को उस भूल के लिए क्षमादान और अभयदान की प्राप्ति हो गई जो कि उनसे हुई ही नहीं। वे तो किसी बाधा के कारण  एक वैज्ञानिक प्रयोग की शत-प्रतिशत सफलता से बस 5 प्रतिशत दूर रह गए। भूल तो मीडिया से हुई जो चीख चीख कर इस वैज्ञानिक प्रयोग का राजनीतिकरण कर रहा था। भूल सोशल मीडिया के स्वयंभू राष्ट्रभक्तों से हुई जो हर वैज्ञानिक विचार और हर पवित्र संस्था को अपनी जहरीली सोच से दूषित कर देते हैं। भूल शायद कभी गलती न करने वाले महानायक से भी हुई जो इस निम्नस्तरीय प्रहसन का एक भाग बना रहा।
अंतरिक्ष मिशन में तकनीकी बाधाओं को असफलता मानकर दिल से लगा लेने पर कामयाबी प्राप्त नहीं की जा सकती और इसरो के वैज्ञानिक शुरुआती दौर से ही सफलता यह मूल मंत्र जानते हैं। इसरो के कितने ही अभियान आम आदमी की भाषा में असफल हुए। 10 अगस्त 1979 को प्रक्षेपित रोहिणी टेक्नोलॉजी पे लोड अपनी कक्षा में स्थिर न हो पाया। 1982 में इनसेट 1 ए का संपर्क टूट गया। 1987 में ए एस एल वी की डेवलपमेंट फ्लाइट द्वारा भेजा गया उपग्रह अपनी कक्षा तक नहीं पहुंच पाया। 1988 में प्रक्षेपित इनसेट 1 सी के बैंड ट्रांस्पोण्डर ने काम करना बंद कर दिया था। आई आर एस 1 ई को पूरे प्रयास के बावजूद अपनी कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका।
 यह पीएसएलवी की पहली डेवलपमेंट उड़ान थी। जून 1997 में प्रक्षेपित इनसेट 2 डी ने 4 अक्टूबर 1997 को काम करना बंद कर दिया था। 2010 में प्रक्षेपित जीएसएटी 4 अपनी कक्षा में स्थापित नहीं हो सका था। रोहिणी टेक्नोलॉजी पे लोड को ले जाने वाली एस एल वी 3 की पहली उड़ान असफल रही थी- यह महान वैज्ञानिक भारत रत्न ए पी जे अब्दुल कलाम के कार्यकाल का वाकया है। यह सूची बड़ी लंबी है। और इस सूची से बहुत अधिक लंबी है इन कथित असफलताओं के बाद इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा अर्जित सफलताओं की सूची। 
यह उस समय की बात है जब चीखता चिल्लाता मीडिया नहीं था, सोशल मीडिया के राष्ट्रभक्त एवं उनका राष्ट्रवाद भी नहीं थे और प्रधानमंत्री जैसा कोई मोटिवेशनल स्पीकर भी नहीं था। लेकिन तब इसरो प्रमुख को मीडिया के सामने आकर उदास चेहरे और रक्षात्मक मुद्रा के साथ देश को सफाई नहीं देनी पड़ी थी। 
प्रधानमंत्रीजी ने अपने भाषण में वैज्ञानिकों को यह संदेश देने की कोशिश की कि जन अपेक्षाओं के दबाव और आलोचनाओं के आघातों को अवशोषित करने वाले रक्षा कवच के रूप में वे वैज्ञानिकों के साथ खड़े हैं जबकि वस्तुस्थिति यह है कि यह दबाव प्रधानमंत्री की इसरो मुख्यालय में उपस्थिति से उन्मादित मीडिया द्वारा गढ़ा गया था अन्यथा अपने वैज्ञानिक प्रयोगों की पब्लिक स्क्रूटिनी का सामना करने की नौबत अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के सम्मुख स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद अब तक नहीं आई थी। 
प्रधानमंत्री के शानदार भाषण में ऐसी कोई नई बात नहीं थी जो अपना जीवन विज्ञान के प्रयोगों को समर्पित करने वाले वैज्ञानिकों को प्रेरित कर पाती। शायद इस तरह  प्रधानमंत्री अपनी हताशा से उबर कर खुद को प्रेरित करने की कोशिश कर रहे थे। या वे अपने समर्थकों की उस फौज और मीडिया के लिए बोल रहे थे जो उनसे प्रेरित होने के लालायित रहते हैं।
    यदि विभिन्न देशों के अंतरिक्ष कायक्रमों और चंद्रयान मिशन पर नजर डाली जाए तो यह ज्ञात होता है कि मिशन चंद्रयान 2 में उत्पन्न तकनीकी बाधा कोई असाधारण घटना नहीं है। यूएस स्पेस एजेंसी नासा की मून फैक्ट शीट के अनुसार पिछले 6 दशक में सम्पन्न कुल 109 चन्द्र अभियानों में से 61 सफल रहे और 48 असफल रहे।
 पूरी दुनिया में 1960 से लेकर अब तक विभिन्न अंतरिक्ष उड़ानों में 20 से अधिक अंतरिक्ष यात्री मारे जा चुके हैं। स्वयं नासा के नोआ 19, द मार्स क्लाइमेट ऑर्बिटर, डीप स्पेस 2, द मार्स पोलर लैंडर, स्पेस बेस्ड इन्फ्रारेड सिस्टम, जेनेसिस, द हबल स्पेस टेलिस्कोप, नासा हेलियोस, डार्ट स्पेस क्राफ्ट और ओसीओ सैटेलाइट जैसे महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी अभियान असफल रहे हैं। हाल के वर्षों में चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने भी असफलताओं का दौर देखा है। इसका लांग मार्च 5 हैवी लिफ़्ट रॉकेट जुलाई 2017 में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। अप्रैल 2018 में चीन का ही प्रोटोटाइप स्पेस स्टेशन तियानगोंग 1 नियंत्रण केंद्र से संपर्क टूटने के बाद पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर नष्ट हो गया था।
 एक प्रश्न गोपनीयता का भी है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भी अमरीका और रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रमों में ऐसा बहुत कुछ है जो गोपनीय है। नासा के विषय में कहा जाता रहा है कि उसके कुछ अभियान तो इतने गोपनीय होते हैं कि इनके वास्तविक उद्देश्य का पता बहुत कम लोगों को होता है। गोपनीयता का आलम यह रहता है कि स्पेस शटल चैलेंजर और कोलंबिया के मलमे को आम जनता को दिखाने में नासा ने वर्षों लगा दिए और 2015 में जाकर इसे सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु रखा।
नासा के शोधकर्ताओं पर उन चीनी नागरिकों के साथ काम करने पर पाबंदी है जो चीनी सरकार के किसी उपक्रम से जुड़े हैं। अमरीकी सरकार अमेरिकन इंडस्ट्री को चीन में उपलब्ध प्रक्षेपण सुविधाओं का उपयोग करने से मना करती रही है क्योंकि यह ईरान, सीरिया और उत्तर कोरिया जैसे देशों को तकनीकी स्थानांतरण का कारण बन सकता है। चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर भी गोपनीयता का गहन आवरण डला रहता है।
किसी भी देश का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक संवेदनशील मसला होता है और इसका संचालन उस देश की सामरिक, आर्थिक, व्यापारिक और संचारगत आवश्यकताओं के आधार पर होता है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को आम जनता और मीडिया के दबावों से दूर रखा जाता है। यह गोपनीयता के लिए भी आवश्यक होता है और उनके कार्य की प्रकृति के अनुकूल भी होता है क्योंकि गहन अनुसंधान एकांत और एकाग्रता की मांग करते हैं। सस्ती लोकप्रियता और चुनावी राजनीति के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम का उपयोग करने की प्रवृत्ति देश के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
 इसरो के प्रति उमड़ते प्रेम के बीच  खबर तो यह भी है कि इसरो के वैज्ञानिकों के वेतन में कटौती की गई है। सरकार इसरो का निजीकरण करने की ओर अग्रसर है। चर्चा इस बात की भी है कि निजीकरण का विरोध करने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिकों को इसरो में महत्वहीन भूमिकाएं दी जा रही हैं। बहरहाल यह आशा तो की ही जानी चाहिए कि इसरो का गौरव और पवित्रता बरकरार रखने में सरकार कोई कोताही नहीं बरतेगी।
 


Date : 09-Sep-2019

पवन वर्मा

असम देश का अकेला ऐसा राज्य है जिसका अपने ज्यादातर पड़ोसी राज्यों से सीमा विवाद है। इन विवादों का एक बुनियादी पहलू यह है कि ये सभी असम से काटकर ही बनाए गए हैं। 1972 में मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को असम से अलग कर केंद्र-शासित राज्यों का दर्जा दिया गया था। इसी साल मेघालय को भी पूर्ण राज्य बनाया गया था। इस कड़ी में नागालैंड पहला राज्य था जिसे असम से अलग किया गया। यही वह राज्य भी है जिसके साथ असम का सीमा विवाद कई बार हिंसक संघर्षों के कारण चर्चा में रहा है।
नागालैंड का गठन 1963 में हुआ था। तत्कालीन नागालैंड सरकार का दावा था कि असम जिन नगा पहाडिय़ों के क्षेत्रों को मिलाकर बना है, उसका एक बड़ा हिस्सा उसे नहीं दिया। इस दावे के पीछे तर्क यह था कि अंग्रेजों के असम पर शासन से पहले नागा आबादी एक विस्तृत भू-भाग में रहा करती थी और वह सारा इलाका नए राज्य - नागालैंड  में शामिल होना चाहिए।
उधर असम सरकार का कहना था कि संवैधानिक रूप से जो सीमा तय की गई है, दोनों राज्यों को उसका सम्मान करना चाहिए। हालांकि ऐसा हुआ नहीं। नागालैंड के गठन के साथ ही असम के सीमावर्ती जिलों (जिनके कुछ इलाकों पर नागालैंड अपना अधिकार जताता है) में नगा विद्रोहियों द्वारा छिटपुट हमलों की घटनाएं होने लगीं।
इस दौरान केंद्र सरकार ने कई बार दोनों राज्यों को बातचीत से सीमा विवाद हल करने के लिए कहा। लेकिन जब इसका कोई समाधान नहीं निकला तो 1971 में इस मसले को सुलझाने की जिम्मेदारी केवीके सुंदरम को दे दी गई। सुंदरम तब विधि आयोग के अध्यक्ष थे। इसके बाद दोनों राज्यों के बीच चार अतंरिम समझौते हुए जिनके चलते कुछ समय तक सीमा पर शांति रही। लेकिन 1979 की एक घटना ने इस समझौतों को पूरी तरह महत्वहीन बना दिया। 
उस साल नगा विद्रोहियों ने असम के गोलाघाट जिले के कुछ गांवों में हमला कर 60 लोगों की हत्या कर दी थी। इसकी वजह से बिगड़े माहौल के चलते उस इलाके के पच्चीस हजार लोगों को वहां से पलायन करना पड़ा। केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद यहां मुश्किल से शांति स्थापित हुई ही थी कि 1985 में ठीक ऐसी ही एक और घटना हो गई।
इस बार गोलाघाट के मेरापानी में असम पुलिस की एक चौकी पर हमला किया गया था। कहा जाता है कि यह हमला नागालैंड पुलिस के सिपाहियों ने किया था। उधर नागालैंड पुलिस का कहना था कि उनके सिपाहियों पर असम के पुलिसकर्मियों ने फायरिंग की थी। भारत के इतिहास में शायद यह पहली घटना थी जहां दो राज्यों के पुलिस बलों के बीच मुठभेड़ हुई थी। इसमें तकरीबन 100 लोग मारे गए थे जिनमें से 28 असम के पुलिसकर्मी थे।
इस घटना के बाद 1988 में असम सरकार ने सीमा विवाद के निपटारे के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। इसके 18 साल बाद 2006 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद दोनों राज्यों की सीमा निर्धारित करने के लिए एक तीन सदस्यीय आयोग बनाया गया। इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज थे। यह आयोग अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप चुका है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आज तक इस मामले में कोई आखिरी फैसला नहीं सुनाया है। (सत्याग्रह)


Date : 08-Sep-2019

संजय श्रमण

हाल ही में मकबूल हो रहे युवाल नोवा हरारी भी कह रहे हैं कि टेक्नोलॉजी जितनी तेजी से बदल रही है उसके हिसाब से मनुष्य की मानवीय क्षमताएं, संवेदनाएं और शक्तियां नहीं बढ़ रही हैं।  जीवन के अधिकांश प्राचीन तौर-तरीके अब आउट डेटेड हुए जा रहे हैं। लेकिन इंसानों के बीच की आदिम घृणा और असुरक्षाएं कम होने की बजाए नए-नए कलेवरों में सामने आ रही हैं। टेक्नोलॉजी के साथ मनोविज्ञान और धर्म का पर्याप्त विकास नहीं हो रहा है इसीलिए अब नए टेक्नोरिलीजन मैदान संभालने वाले हैं जो अगले कुछ दशकों में नीति, नैतिकता और सौन्दर्यबोध आदि की सारी परिभाषाएं बदल डालेंगे। इस बदलाव से तीसरी दुनिया के लोग अर्थात लातिन अमरीका और दक्षिण एशिया के अधिकांश गरीब देश वैश्विक विकास और सभ्यता की दौड़ में अचानक से बहुत पीछे छूट जाएंगे।
केन विल्बर्स कृष्णमूर्ति की बात को एक-दूसरे ढंग से भी रखते हैं। वे कहते हैं कि अधिकांश समाज और संस्कृतियां सिर्फ तकनीक और विज्ञान के सहारे उन सुविधाओं का उपभोग करने लगी हैं जो कुछ सभ्य और लोकतांत्रिक (तुलनात्मक रूप से) देश उपभोग करते आए हैं। लेकिन चूँकि इन समाजों ने अपनी जमीन पर सामाजिक, राजीनीतिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक पुनर्जागरण की लड़ाई नहीं लड़ी इसलिए ऊपर से वे सभ्य नजर आते हैं लेकिन अंदर से वे एकदम बर्बर और आदिम हैं।
सीरिया का पिछले कुछ सालों का उदाहरण हमारे सामने है। सीरिया से पलायन करते लोगों को मालदार अरब मुल्क मिलकर संभाल सकते हैं। लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे। वे रात भर की अय्याशी में लाखों डॉलर उड़ा देंगे, लेकिन अपने ही धर्म के लोगों को बचाने के लिए सामने नहीं आएंगे।
हालांकि ठीक यही सवाल उन तथाकथित सभ्य और लोकतान्त्रिक यूरोपीय या अमरीकी समाजों पर भी लागू होता है।  जिन्होंने पूरे अरब सहित लेबनान और सीरिया में आग लगाईं हुई है, लेकिन शरणार्थियों की दुर्दशा के संदर्भ में यूरोप की तुलना में अरब समाज की बेरुखी बहुत पीडि़त करती है।
भारत में भी इसी तरह की बर्बादी का इंतजाम कश्मीर, आसाम और बंगाल में शुरू हो गया है। मनुष्यों को एक-दूसरे की चिंताओं और तकलीफों का जऱा भी एहसास नहीं है। दो चार शब्दों के इधर उधर हो जाने से कोई राष्ट्रवादी हो जाता है कोई विदेशी हो जाता है कोई घुसपैठिया हो जाता है। इन शब्दों के खेल में मीडिया ने पूरा चिडिय़ाघर खोला हुआ है। हर तरह का मनोरंजन मौजूद है। देश के जेहन को बर्बाद करने में सरकार, कारपोरेट और धर्म तीनों ने गजब का निवेश किया हुआ है। इस निवेश की सफलता के चिन्ह भी नजर आने लगे हैं।
ऐसे में हरारी, केन विल्बर्स और कृष्णमूर्ति शेष मनुष्यता के लिए न सही तो कम से कम भारत के लिए बिलकुल सही साबित होते हैं। भारत को तत्काल नए धर्म, नई सभ्यता, और नयी नैतिकता की जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्य से नई नैतिकता की बजाए पुराने श्मशानों में से वेदान्त का भूत फिर से जि़ंदा किया जा रहा है।


Date : 08-Sep-2019

 अशोक वाजपेयी

मुंबई के किशनचंद चेलाराम महाविद्यालय ने 30-31 अगस्त 2019 को दो दिनों का एक परिसंवाद आयोजित किया जिसका विषय था - 'क्या महात्मा गांधी संभव हैं? उद्घाटन प्रो. सामधोंग रिनपोचे ने किया। बीजवक्तव्य डॉ.  आशीष नंदी का था। एक सत्र संस्कृति पर था, जिसमें गणेश देवी, मल्लिका साराभाई, अपूर्वानंद और मैंने भाग लिया। इस सत्र का विचार-विषय था- 'संस्कृति के विचारों से फिर जुड़ावÓ।
इधर कुछ ऐसी आदत सी पड़ गई है जब संस्कृति पर कहीं भी बोलना हो तो शुरूआत में हमारे यहां उसके एकवचन नहीं बहुवचन होने पर इसरार से करता हूं। इससे कई बार ऐसा भ्रम भी हो सकता है कि इस बहुलता के लिए हिंदू धर्म प्रमुख रूप से श्रेय ले सकता है। यह भ्रम इसलिए है कि इससे हिंदू धर्म की बुनियादी बहुलता का एक मिथक बन जाता है जो फिर यह मानने लगता है कि हिंदू धर्म बुनियादी रूप से उदार और सर्वसमावेशी है। इन दिनों हिंदुत्व के नाम पर हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग जो हत्या-हिंसा-बलात्कार-घृणा का माहौल बना रहा है और उससे असहमत हिंदू तक उसे चुपचाप देखकर होने दे रहे हैं, यह साक्ष्य तथाकथित हिंदू उदारता और सहिष्णुता की असलियत समझने के लिए काफ़ी है।
गांधी-दृष्टि से विचार करें तो संस्कृति में, दृष्टि और आचरण दोनों में, बहुलता का स्वीकार अनिवार्य है। यह नहीं कि मतभेद या असमानताएं नहीं हैं। यही कि उन्हें संवाद, समझ और परस्पर सद्भाव से समझा और उनसे निपटा जा सकता है। हमारी संस्कृति में, उसकी विचार-परंपरा में असहमति, संवाद और विवाद की जगह रही है जो आज ख़त्म की जा रही है, वह लोकतंत्र के नाम पर असल में बहुसंख्यकतावाद की हेकड़ी से। गांधी-दृष्टि बहुत सारे द्वैतों के ध्वंस का आधार भी बनती है। याद करें गांधी ने कहा था कि 'मैं अच्छा हिंदू हूं, इसलिए अच्छा मुसलमान, अच्छा क्रिस्तान (ईसाई) आदि भी हूंÓ। गांधी-दृष्टि धर्मों के बीच लोकतांत्रिकता और समकक्षता का आग्रह करती है। हमारे प्राय: सभी धर्मों ने लोकतंत्र में सत्तर वर्ष बिताने के बाद भी स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्य न समझे हैं, न उन्हें अमल में लाने की कोशिश की है। पहले भी एकाधिक बार मैंने लिखा-कहा है कि हमारे धर्म लोकतंत्र से पिछड़ गये धर्म हैं।
हमारे सार्वजनिक जीवन में भद्रता, परस्पर सद्भाव और आदर, असहमति की जगह बराबर घटती जा रही है। गांधी-दृष्टि आज भद्रता और गरिमा के पुनर्वास पर बल देगी। इन दिनों तो कई बार लगता है कि सिविल सोसायटी तो है पर सिविल होना लगातार भूल-चूक रही है। बड़ी संख्या में तथाकथित भक्त सामाजिक व्यवहार और संवाद में किसी तरह की भी सौम्यता बाहर कर रहे हैं।
आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है जहां झूठ और पाखंड का बोलबाला न हो। गांधी-दृष्टि की एक मांग यह होगी कि हर व्यक्ति जो झूठ को पहचानता है और जिसे सच का आभास है वह अपने स्तर पर, एक व्यक्ति का सही, नागरिक सत्याग्रह करे। अगर ऐसे सत्याग्रही नागरिक अकेले होकर भी बढ़ते गए तो फिर एक बड़ा सत्याग्रही समुदाय बन सकता है। गांधी की निजी संस्कृति के दो और गुण आज हमारे काम आ सकते हैं। पहला बकबक और बेवजह संसद, टेलीविजन, त्यौहारों आदि में जो भयानक कनफ़ोड़  शोर होता रहता है उसके बरक़्स हमें जब-तब मौन बरतना चाहिये। पर कायर चुप्पीवाला नहीं, दहाड़वाला मौन। दूसरे, हम अकेले रहना-करना लगभग भूल चले हैं। गांधी अकेले होने या पड़ जाने से कभी नहीं घबराये। हमें अपनी संस्कृति में फिर एकांत वापस लाना चाहिए।
सभी वक्ताओं ने जिनमें अनेक मूर्धन्य विशेषज्ञ शामिल थे कहा कि गांधी संभव है, एक व्यक्ति के रूप में नहीं पर विचार और आचरण के रूप में। यही नहीं कि वे इस तरह संभावना हैं बल्कि उनकी संभावना आज पहले से कहीं अधिक ज़रूरी और तात्कालिक हो गई है।
पहले ख़बर आई कि माननीय जज महोदय ने टाल्स्टाय के महान उपन्यास 'वार एंड पीसÓ को ख़तरनाक या आपत्तिजनक बताते हुए अभियुक्त के पास वह होने पर प्रकारान्तर से उस पर आपत्ति की है। फिर खुलासा आया कि उन्होंने अभियुक्त से इस महान उपन्यास नहीं उससे मिलते-जुलते शीर्षकवाली एक पुस्तक का जि़क्र किया है। वे टाल्स्टाय के महान उपन्यास के बारे में जानते हैं। उन्होंने किसी अन्य पुस्तक का जि़क्र किया था जिसके शीर्षक में भी टाल्स्टाय के उपन्यास के शीर्षक का प्रयोग है। पर यह स्पष्टीकरण अभी बाक़ी है कि जिस पुस्तक का जि़क्र जज महोदय ने किया अगर वह प्रतिबंधित पुस्तक नहीं है तो उसका रखना आपत्तिजनक कैसे हो सकता है। पिछले कुछ बरसों में विशेषज्ञत: तथाकथित देशद्रोह आदि के मामलों में अभियुक्तों के पास कुछ विशेष पुस्तकों के होने को उनके आपराधिक होने के साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। अगर इस संकीर्ण दृष्टि को हावी होने दिया जाये और उसे क़ानून में उपयुक्त माना जाने लगे तो हमारे अधिकांश गौरवग्रंथ आपत्तिजनक होने की कोटि में आ जाएंगे। ऐसा ज्ञान और सृजन से डरनेवाला राष्ट्र ही कर सकता है- एक आत्मविश्वस्त और ज्ञानसम्पन्न, भारतीय परंपरा से परिचित, राष्ट्र नहीं।
ज्ञान की बढ़ती अवज्ञा, ज्ञान और साहित्य के बढ़ते अपमान का यह नया मुकाम है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रशासन ने अपनी एक एमेरिटस प्रोफ़ेसर विवि और समादृत इतिहासकार डॉ. रोमिला थापर से उनका जीवनकार्य वृत्त मांगा है। ऐसा इसलिए कि विश्वविद्यालय की एक विशेषज्ञ समिति यह तय कर सके कि उन्हें उस पर आगे रहने दिया जाए या नहीं। सारे प्रशासन थोड़े तो अज्ञानी होते हैं पर एक विश्वविद्यालय का प्रशासन स्वयं अपने यहां दशकों कार्यरत विद्रुषी का कार्यवृत्त नहीं जानता यह दयनीय और हास्यास्पद एक साथ है। वह वृत्त इंटरनेट पर भी सुलभ है। एक अत्यंत सम्मानित और वयोवृद्ध विदुषी से ऐसी मांग करना अज्ञान द्वारा सत्ता-मद में ज्ञान का अपमान करना है। जो जेएनयू में रोमिला थापर के अवदान से परिचित नहीं उसे वहां कुलपति और कुलसचिव होना तो दूर, चपरासी होने का भी हक नहीं है।
जो हो रहा है वह निरे अज्ञानवश नहीं हो रहा है। इस अपमान के पीछे सुनियोजन है। यह एक संकीर्ण विचारधारा को, सत्ता के माध्यम से, विश्वविद्यालय जैसे मुक्त और स्वतंत्रचेता संस्थान पर लादने की कोशिश है। ज्ञान अपमानित या दंडित होकर बाहर चला जाए ताकि ऐसी संकीर्णता का आक्रामक राज्य स्थापित हो जाए। ऐसा न हो पाये इसका नागरिक प्रयत्न होना ज़रूरी है।
स्नेहमयी चौधरी साठ के दशक से काफ़ी देर बाद तक हिन्दी कविता के परिवेश और अनेक समानधर्माओं के बीच सक्रिय रहीं। उनकी भौतिक उपस्थिति की तरह उनकी काव्य-उपस्थिति भी हमेशा सौम्य रही। उनकी एक छोटी सी कविता उनका आत्मवृत्तान्त ही है- 'फिर उसने अस्तित्व को नकारा और दूसरों में घुलमिल गई।Ó यह दूसरों में घुलना-मिलना उनकी कविता का स्वभाव रहा। उनके यहां मर्म और विवेक कविता में इसी रसायन से उपजते थे। अगर सिर्फ उनकी कविताओं के शीर्षकों को ही एक बार पढ़ लें, तो हमारे आसपास की अपार छवियां और यादें ताज़ा हो आती हैं। अंदर-बाहर, खड़-खड़, कुचलन, धकापेल, दिन भर, आवाज़, बकबक, राख, बिल्ली, प्रतीक्षा, हड़बड़ी, स्कूल की बस, पल्ले, मलबा, चमक, धमाका, चाल। रज़ा फ़ाउंडेशन के सहयोग से संभावना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मरणोत्तर संग्रह से दो कविताएं-
कर न सकें
जब अलमारी में चूहा घुस जाए
और कपड़ों को काटता रहे
आप कुछ न कर सकें...
दूसरी अलमारी में किताबें ऊटपटांग पड़ी हों
आप तरतीबवार न कर सकें...
केवल सुनते रहें, ताकते रहें
और लकड़ी के सहारे टुकुर-टुकुर चलते रहें, बस।
एक दिन
जब सब तलवारें भांजते हुए उठ खड़े होंगे
तब गले मिलेंगे?
या काटेंगे...
यह मालूम नहीं।
स्नेहमयीजी का देहावसान 2017 में उनके पति अजित कुमार के निधन के कुछ दिनों बाद हुआ था। (सत्याग्रह)


Date : 07-Sep-2019

राम यादव
अमेरिका के नील आर्मस्ट्रांग चंद्रमा पर अपने पैर रखने वाले पहले धरतीवासी थे। वह 21 जुलाई 1969 का दिन था। भारतीय समय के अनुसार सुबह आठ बजकर 26 मिनट हुए थे। हममें से ज्यादातर ने यही पढ़ा-सुना होगा कि अंतरिक्षयान ‘कोलंबिया’ से अलग होकर जो अवतरण यान ‘ईगल’ चंद्रमा पर उतरा था उससे आर्मस्ट्रांग ही सबसे पहले बाहर निकले थे। यह नहीं कि अपने पैर चंद्रमा की मिट्टी पर रखने से पहले आर्मस्ट्रांग ने गांठ मारकर बंद की हुई प्लास्टिक की एक थैली चंद्रमा पर फेंकी थी।
यह थैली आर्मस्ट्रांग के सहयात्री बज़ एल्ड्रिन ने उन्हें तब पकड़ाई थी, जब वे ‘ईगल’ से नीचे उतरने की सीढ़ी पर खड़े थे। थैली में दोनों का मल-मूत्र और उड़ान के दौरान की खाने-पीने की सामग्रियों आदि का कचरा था। यह ऐसा पहला कचरा था, जिसे किसी मनुष्य ने अपने हाथ से चंद्रमा पर फेंका था। यह संभवत: आज भी वहां ज्यों का त्यों पड़ा है।
ऐसा नहीं था कि आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन से, चंद्रमा पर पैर रखने से पहले, उसे गंदा करने के लिए कहा गया था। यह एक अनिवार्यता थी। चंद्रमा पर अपने विचरण के बाद ईगल में ही बैठकर दोनों को ‘कोलंबिया’ के पास वापस जाना था। और चंद्रमा के आकाश में उसकी परिक्रमा कर रहे कोलंबिया’ को उन्हें पृथ्वी पर वापस ले आना था।
‘ईगल’ में जगह की बहुत तंगी थी और ईंधन भी बहुत नपा-तुला था। कचरा फेंककर उसका भार हल्का करने से थोड़ा ईंधन बच सकता था और कुछ जगह भी ख़ाली हो जाती। इसलिए चंद्रमा को ग़ंदा करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। चंद्रमा पर पहुंचने की 50वीं वर्षगांठ से कुछ ही पहले, बज़ एल्ड्रिन ने अपने एक ट्वीट में लिखा, ‘जिस किसी को मेरी वह थैली कभी मिले, उसके प्रति मैं खेद प्रकट करता हूं।’ आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन के बाद अमेरिका की ओर से पांच और चंद्र-अभियान हुए। 10 और चंद्रयात्रियों ने वहां विचरण किया। 1972 तक चले इन अभियानों के दौरान सबने वहां कुछ न कुछ सामग्री एवं कचरा भी पीछे छोड़ा।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ का अनुमान है कि चंद्रमा पर भले ही कोई नहीं रहता, पर वहां 190 टन मनुष्य-निर्मित कचरा यहां-वहां बिखरा पड़ा है। ‘नासा’ की एक सूची के अनुसार, अकेले उस क्षेत्र में, जहां अमेरिका के दोनों प्रथम चंद्रयात्री 21 जुलाई 1969 के दिन उतरे थे, 50 से अधिक चीज़ें बिखरी पड़ी हैं - अतिरिक्त लेंसों के साथ एक टीवी कैमरा, कई पाइप और ढक्कन, एक सुरक्षा कमरपट्टी, एक रिमोट कंट्रोल, एक हथौड़ी और कॉम्बिनेशन प्लायर (पकड़/ चिमटे) जैसे कई औज़ार।
चंद्रमा पर क्योंकि न तो हवा है और न बरसात होती है, इसलिए सब कुछ सड़े-गले बिना आज भी वैसा ही पड़ा होना चाहिये, जैसा पहले दिन से था। भावी चंद्रयात्रियों को यदि उनके रूप-रंग में कोई परिवर्तन मिलता है, तो वह दिन में तेज़ धूप, दिन और रात के तापमानों में 290 डिग्री सेल्सियस तक के अंतरों और सूर्य से आ रहे रेडियोधर्मी विकिरण का ही परिणाम हो सकता है।
चंद्रमा पर पड़े कचरे का अध्ययन वैज्ञानिक शोध का नया विषय भी बन सकता है। जर्मनी में बर्लिन की एक फ़र्म दूरनियंत्रित रोबोट भेजकर ऐसी ही किसी जगह की जांच-परख करना चाहती है, जहां अमेरिका के चंद्रयात्री कुछ छोड़ आये हैं। उसका कहना है कि इन चीज़ों के साथ कोई छेड-छाड़ नहीं की जायेगी। ये चंद्रमा पर मनुष्य के पहुंचने के ऐतिहासिक स्मारकों जैसी धरोहर हैं।
रद्दी या कचरा बन गयी इन चीज़ों के चंद्रमा पर पहुंचने, वहां छोड़ देने या फेंक दिये जाने की शुरुआत नील आर्मस्ट्रांग के थैली फैकने से करीब 10 साल पहले 13 सितंबर 1959 को हुई थी। उस दिन तत्कालीन सोवियत संघ का चंद्रमा तक पहुंचने वाला पहला चंद्रयान ‘लूना2’ उससे टकराकर ध्वस्त हो गया था। ‘लूना2’ एक ही दिन पहले, 12 सितंबर 1959 को, प्रक्षेपित किया गया था। मात्र एक दिन 14 घंटे और 22 मिनट की उड़ान के बाद वह चंद्रमा के पास पहुंचते ही उससे टकरा गया। उसके सारे टुकड़े चंद्रमा पर मनुष्य-निर्मित पहला कचरा बने।
बाद में सोवियत संघ के ही कुछ और ‘लूना’ चंद्रयान वहां पहुंचे। 1966 में पहुंचा ‘लूना9’ ऐसा पहला यान था, जो बिना टूटे-फूटे चंद्रमा की सतह पर उतर पाया। उसने वहां के कुछ फ़ोटो भी पृथ्वी पर भेजे। लेकिन तीन ही दिन बाद उसकी बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज हो गयी और वह भी कूड़े में तब्दील हो गया।
समय के साथ अमेरिका, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’, चीन, जापान और भारत ने भी अपने यान चंद्रमा पर भेजे। कुछ सफलतापूर्वक वहां उतरे, कुछ उससे टकराकर ध्वस्त हो गये। जो सफलतापूर्वक उतरे, उनका जीवनकाल बाद में समाप्त हो गया। वे भी अब रद्दी या कूड़े की ही तरह यहां-वहां पड़े हुए हैं। अब तक 30 से अधिक यान चंद्रमा पर उतरे हैं या उससे टकराकर नष्ट हो चुके हैं। सितंबर 2019 शुरू होने तक चंद्रमा पर पहुंचने के बाद उससे टकराकर नष्ट हो जाने वाला अंतिम यान ‘बेरेशीत’ था।
‘बेरेशीत’ मोरिस कान नाम के एक इसराइली अरबपति का निजी अभियान था। इसे अमेरिका के केप कैनेवरल से 22 फऱवरी 2019 को प्रक्षेपित किया गया था। 11 अप्र?ल 2019 को चंद्रमा पर गिरकर उसका अंत हो गया। बात इतनी ही होती, तो यहीं समाप्त हो जाती। चंद्रमा पर हुई यह ऐसी पहली दुर्घटना है, जिससे पहली बार, ऐसे हज़ारों सूक्ष्म कीड़े चंद्रमा पर पहुंचकर बिखर गये, जो इतने जीवट के हैं कि बिना हवा, पानी और भोजन के लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। उनका जीववैज्ञानिक नाम ‘फ़ाइलम टार्डिग्राडा’ है। अंग्रेज़ी में उन्हें ‘वाटर बेअर’ कहा जाता है।
एक मिलीमीटर से भी छोटे व आठ पैरों वाले इन जीवों के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि घोर सर्दी हो या गर्मी, हवा और आहार मिले या न मिले, वे कई-कई दशकों तक जीवित रह सकते हैं। यहां तक कि रेडियोधर्मी विकिरण भी उनका बाल बांका नहीं कर पाता। वैसे तो ये पानी या नमी वाली जगह पसंद करते हैं, पर पानी या नमी नहीं होने पर वे अपने भीतर की तरलता त्यागते हुए अपने आपको सुखाकर इस तरह निर्जीव-से बन जाते हैं कि वर्षों बाद जब भी नमी मिले, पुनर्जीवित हो सकते हैं।
आशंका यही है कि चंद्रमा पर पहुंच गये ‘वाटर बेअर’ वहां की घोर गर्मी और सर्दी ही नहीं, सौर एवं ब्रह्माडीय विकिरण को भी लंबे समय तक झेलकर जीवित रह सकते हैं। यदि बाद के चंद्रयात्रियों को वे जीवित मिले, तो इसका अर्थ यही होगा कि मनुष्य ने जीवनहीन चंद्रमा पर कूड़ा-करकट ही नहीं, जीवन भी पहुंचा दिया है। अब तक ऐसी हरसंभव सावधानी बरती जाती रही है कि धरती से च्रंद्रमा पर कोई बैक्टीरिया आदि न पहुंचे।
अमेरिकी अंतरिक्षयात्रियों ने चंद्रमा पर कुछ ऐसी चीज़ें भी छोड़ी हैं, जिन्हें कचरा कहना उचित नहीं होगा। उदाहरण के लिए, अपोलो11 के नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन ने वहां अमेरिका का राष्ट्रीय झंडा गाड़ा। मैत्रीभाव के प्रतीक के तौर पर जैतून (ओलिव) के पेड़ की एक स्वर्णिम टहनी और पृथ्वी वासियों की ओर से सद्भावना-संदेश की एक फ्लॉपी डिस्क भी वहां रखी।
दोनों ने जर्मनी में विशेष प्रकार के कांच का बना एक ऐसा दर्पण (रिफ्लेक्टर) भी वहां रखा, जो पृथ्वी से भेजी गयी लेजऱ किरणों को परावर्तित करता है। उसकी सहायता से पहली बार पृथ्वी से चंद्रमा की सबसे सटीक दूरी नापी गयी। ‘ल्यूनर लेजऱ रैंजिंग एक्स्पेरिमेंन्ट’ (एलएलआर) कहलाने वाले इस प्रयोग के लिए बाद में कुछ और दर्पण भी चंद्रमा पर रखे गये। उनका आज भी यह जानने के लिए उपयोग होता है कि चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी किस गति से बढ़ रही है। इस समय चंद्रमा हमारी पृथ्वी से प्रतिवर्ष 3।8 सेंटीमीटर दूर हट रहा है। पृथ्वी से उसकी औसत दूरी इस समय 3,84, 400 किलोमीटर है।
1971 में वहां गये एलन शेपर्ड ने गोल्फ़ की कुछ गेंदों को यह देखने के लिए शॉट लगाये कि क्या वे चंद्रमा पर प़थ्वी की अपेक्षा कितनी दूर तक जाती हैं? चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के छठे हिस्से के ही बराबर है। गोल्फ की गेंदें वहां सचमुच काफी दूर जाकर गिरीं और अब भी वहीं पड़ी हुई हैं। चंद्रमा पर पहुंचने वाले दसवें अमेरिकी, चार्ल्स ड्यूक ने, वहां अपने परिवार का एक फ़ोटो छोड़ा। अपोलो15 के चंद्रयात्री जेम्स अर्विन ईसाई धर्मग्रंथ बाइबल की एक प्रति, बाज़ पक्षी का एक पंख और 100 बैंक नोट भी वहां छोड़ आये।
चंद्रमा पर जो सबसे भारी वस्तुएं पड़ी हुई हैं, उनमें अमेरिका के अपोलो अभियान वाले पांच रॉकेटों के सबसे ऊपरी हिस्से, उडऩखटोले-जैसे अवतरण यानों के पैरों वाले छह निचले हिस्से और बैटरी-चालित चार पहियों वाले वे तीन रोवर (मोटर वाहन) गिने जाते हैं, जिन पर बैठकर अंतिम अपोलो मिशनों के चंद्रयात्री वहां घूमे-फिरे थे। चंद्रमा की परिक्रमा करते हुए वहां गिर चुके चार अलग-अलग परिक्रमा-यान, चीनी रेडियो-रिले उपग्रह लोंगज्यांग-2 और इस वर्ष उस हिस्से पर पहली बार सुरक्षित उतर पाया चीनी अन्वेषणयान चांग’ए-4 भी इस गिनती में शामिल हैं। ये सब चंद्रमा के उस पृष्ठभाग पर पड़े हुए हैं जो पृथ्वी पर से कभी दिखायी नहीं पड़ता।

 


Date : 07-Sep-2019

मनीष सिंह'

असम में गैंडे मिलते हैं, असम में बीहू डांस होता है, असम में ब्रम्हपुत्र बहती है, असम में चाय बागान हैं, ये तो सब जानते हैं। मगर ये नहीं जानते हैं कि भारत में पांच सौ से अधिक ट्राइब हैं, उसमें से आधे नार्थ ईस्ट में हैं, उसके आधे आसाम में हैं। अपनी-अपनी भाषा, इलाके, कल्चर भारत की विविधता का सबसे रंगीन गुलदस्ता कोई है तो आसाम है। हिमालय के फुटहिल में ये जनजातियां सदियों से, गुनगुनाते मौसम में खेती-पाती करते खुश थे।
फिर अंग्रेज आ गए, चाय बागान लाए, पीछे पीछे आए मजदूर। व्यापार, बिजनेस बढ़ा और लोग आए, चारोंओर से। आदिवासियों के बीच बसते गए।। जमीने कब्जाई, असमी चुप रहे।
फिर हुआ भारत विभाजन, ईस्ट बंगाल से बहुतेरे हिन्दू आए, बस गए। असमी चुप रहे। फिर हुआ पाकिस्तान विभाजन, फिर लाखों शरणार्थी आए। अब असमियों को गुस्सा आना शुरू हुआ। असम की असमी पहचान खतरे में थी। बंगाली भाषी प्रजाति उनके बगीचे में गाजर घास की तरह फैल रही थी, उनके रिसोर्स कब्जिया रही थी।
सेवेंटीज में आंदोलन शुरू हुआ, घुसपैठिए भगाने के लिए। छात्रों ने मोर्चा उठाया। जबरदस्त हड़ताल हुई। पब्लिक कफ्र्यू का कॉन्सेप्ट था। पुलिस कहती थी, बाहर घूमो, जनता कहती हम बंद रहेंगे।
1983 में भयानक दंगे हुए। हिन्दुओं ने मुसलमानों को मारा, मुसलमानों ने मुसलमानों को मारा, हिन्दुओं ने हिन्दुओं को मारा। असल धर्म कुछ भी हो किसी का, असमियों ने मिलकर गैर असमियों की खबर ली। होते-होते राजीव पहुंचे। छात्रों से समझौता किया। कहा कि घुसपैठियों की पहचान की जाएगी। कांग्रेस ने सत्ता से रिजाइन किया, और छात्रों को सरकार बनाने दी। शांति हो गई। प्रफुल्ल मोहंती यंगेस्ट सीएम हुए। ये 1985 की बात है।
मोहंती को सत्ता मिली, घुसपैठ भुला गए। मगर जिन्हें सत्ता नहीं मिली थी, वो कैसे भूलते। तब हिन्दू हित वाले दो सीट लेकर उदास बैठे थे। बंग्लादेशी शरणार्थी कहने से ही मुस्लिम मुस्लिम महकता है।  मुद्दा एकदम मुफीद था। हर खासोआम को इत्तला दी गई कि असम में 2 करोड़ से ऊपर मुसलमान शरणार्थी हैं। सब हिन्दुस्तान को खतरा हैं। सबको कान पकड़ कर हमई भगाएंगे । बरसों तक ये राग चला।
मोहंती की सत्ता वक्त के साथ चली गई। उनके साथी निराश थे सो थोक में भगवा पटका डाल लिया। सत्ता मिल गयी। घुसपैठ का मुद्दा फिर गरम हुआ। उधर कोर्ट ने भी तेजी दिखाई, और रजिस्टर बनवाना शुरू किया।
अब नए भारत में, चूहे निकालने के लिए घर गिराना तो जरुरी होता है। सो पूरा असम इस चक्की में पिसा। सबको अपने दादा-परदादा के कागज-पत्तर दिखाने पड़े। पहली बार में 1.9 करोड़ फेल हुए।  फिर 40 लाख, फिर अब 19 लाख बाकी है। एक राउंड और बचा है। शायद बारह-तेरह लाख बचेंगे। दो करोड़ का ढोल फट गया है।
दिक्कत ये है कि बचे 10-12 लाख में अधिकांश बंगाली भाषी हिंदू निकलेंगे। क्या इन हिन्दुओं को बंगाल की खाड़ी में डुबोया जाएगा। अखण्ड हिन्दू भारत के मिष्टी भाषी बंगाली हिंदू, काली और दुर्गा के उपासक, हकाल कर हिंदुस्तान से बाहर भेजे जाएंगे, हे राम।
डिटेंशन कैम्प बन रहे हैं, मगर गैस चेम्बर्स की किसी योजना की जानकारी नहीं है। संघ नेताओं की बयानबाजी सुनें, तो हिन्दू बक्शे जाएंगे। तो भैया, असमी फॉर आसाम वाले आंदोलन की तो तुरही बज  गई। मांगा गुड़, लाएं ढेला।  भगवा पटका पहने पूर्व गण परिषदी, अपने असमियों को क्या मुह दिखाएंगे।
उधर डिटेंशन सेंटर बनाकर दस बारह लाख लोगों कहां बंद करेंगे। उनको खिलाएगा कौन? ध्यान रखिए, ये दस-बारह लाख लोग अभी तो ट्रिब्यूनल के सामने पेश होंगे। उन्हें ट्रिब्यूनल अवैध अप्रवासी घोषित करेगा। फिर हाईकोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट। एक आदमी एक केस है। अभी बरसों चलेगा। तब तक पटका धारी आपके टैक्स से इनको रोटी दाल खिलाएंगे। या फिर एक घर-एक रोटी का अभियान छेड़ेंगे।
इस तमाशे में असमियों की मांग अभी पूरी नहीं हुई। उनकी अगर सुनना मजबूरी बन गई, तो एक ही विकल्प बचेगा, असम का विभाजन। बंगाली बहुल और असमी बहुल दो प्रदेशों में। ऐसा निपटाया है कि हर कोई लूजर है। जात धर्म क्षेत्रीयता की लड़ाई में यही होता है। प्रदेश हो या देश टुकड़े होते हैं।
तो जनाब, आसाम में गैंडा है। सुना है एनआरसी का ये गैंडा देशभर में घुमाने का प्लान है। गाड़ी की आरसी, लाइसेंस, इंश्योरेंस,हेल्मेट खोज निकालें हो, तो दादे-परदादे का बर्थ सर्टिफिकेट भी लगे हाथ खोज लीजिए। कौन जाने, किसी को आपके भेस में रोहिंग्या दिख रहा हो।

 

 


Date : 06-Sep-2019

अभय शर्मा

बीते हफ्ते चीनी सेना की एक नई टुकड़ी बख्तरबंद वाहनों के साथ हांगकांग की सडक़ों पर दिखाई दी थी। इसके बाद से यहां सैन्य कार्रवाई की आशंका जताई जा रही है।

नए प्रत्यर्पण विधेयक के विरोध में और लोकतान्त्रिक सुधारों की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शनों के बीच बीते हफ्ते चीनी सेना की एक नयी टुकड़ी हांगकांग पहुंची। इसे लेकर चीनी विदेश मंत्रालय का कहना था कि यह केवल उस नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है जिसके तहत वहां पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की टुकड़ी की अदला-बदली की जाती है। सरकारी मीडिया एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक इस टुकड़ी में शामिल सैनिकों को हांगकांग की स्थिति और वहां के कानूनों के बारे में बेहतर प्रशिक्षिण दिया गया है। लेकिन फिर भी यह आशंकाएं जताई जा रही हैं कि चीन अपनी सेना के जरिये हांगकांग के प्रदर्शनकारियों को डराना और उनके खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है।
हांगकांग लंबे समय तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था। 1997 में ब्रिटेन ने स्वायत्तता की शर्त पर उसे चीन को सौंपा था। तब चीन ने ब्रिटेन से वादा किया था कि वह ‘एक देश-दो व्यवस्था’ के सिद्धांत के तहत काम करेगा और हांगकांग को अगले 50 सालों के लिए अपनी सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी व्यवस्था बनाए रखने की पूरी आजादी होगी। ब्रिटेन के हांगकांग छोडऩे के समय चीन ने यह भी कहा था कि हांगकांग में उसकी सेना की उपस्थित काफी कम और प्रतीकात्मक ही रहेगी।
लेकिन 2017 में चीन की सरकार ने हांगकांग में पीएलए की उपस्थिति को काफी बढ़ा दिया। उसने एक विशेष कमांडो दल भी वहां भेज दिया और ब्रिटिश आर्मी की करीब एक दर्जन से ज्यादा बैरकों का इस्तेमाल भी चीनी सेना आधिकारिक रूप से करने लगी। एक अनुमान के मुताबिक इस समय हांगकांग की इन बैरकों में करीब पांच से दस हजार चीनी सैनिक रहते हैं। इन बैरकों में बख्तरबंद वाहनों और ट्रकों की भी अच्छी-खासी तादाद बताई जाती है। यानी साफ़ है कि अब हांगकांग में चीनी सेना की उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक नहीं है। कई जानकारों का यह भी मानना है कि चीन ने यह कदम 2014 के ‘अंब्रेला मूवमेंट’ से सबक लेते हुए उठाया था जिसका सीधा मकसद भविष्य में इस तरह के प्रदर्शनों को रोकना और लोगों में डर बनाना था।
ब्रिटेन के हांगकांग छोड़ते वक्त यह भी तय हुआ था कि चीनी सेना हांगकांग में उपस्थित तो रहेगी, लेकिन कभी भी उसके आतंरिक मामलों में दखल नहीं देगी। चीन ने अभी तक इस नियम का पालन किया है। इससे संबंधित कानून में यह भी कहा गया है कि हांगकांग में सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने और आपदा की स्थिति से निपटने के लिए चीनी सेना की मदद ली जा सकती है, लेकिन ऐसा तभी होगा जब हांगकांग की सरकार इसके लिए चीनी सरकार से अनुरोध करेगी।
कई जानकार कहते हैं कि अब इस कानून का कोई विशेष महत्व इसलिए नहीं रहा क्योंकि हांगकांग की सरकार अब पूरी तरह से चीन के प्रभाव में रहती है। ऐसे में चीन जब चाहेगा तब हांगकांग की सरकार उसे सैन्य कार्रवाई की अनुमति दे देगी। हांगकांग की यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के दिग्गज नेता मार्टिन ली अमेरिकी न्यूज़ एजेंसी एनपीआर से कहते हैं, ‘अगर, बीजिंग अपने सैनिकों को हांगकांग में तैनात करना चाहेगा तो उसे बहुत हल्के से हांगकांग की सरकार से यह कहना होगा कि आप हमारी सहायता के लिए हमसे अनुरोध करें। मैं यकीन से कहता हूँ, हांगकांग की सरकार की मुखिया कैरी लैम बीजिंग को न कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगी।’
बीते महीने कैरी लैम के एक सलाहकार ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि यदि विरोध प्रदर्शन हांगकांग को खतरे में डालते हैं और ज्यादा अशांति होती है तो पीएलए को बुलाने की संभावना है। कुछ जानकार भी जल्द चीनी सेना के मोर्चा संभालने की आशंका जाहिर करते हैं। ये लोग कहते हैं कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि पहले प्रदर्शनकारियों की मांग केवल नए प्रत्यर्पण विधेयक को वापस लेने की थी जिस पर हांगकांग की सरकार सहमत हो चुकी है। लेकिन इसके बाद अब प्रदर्शनकारियों ने लोकतांत्रिक सुधारों की मांगे रख दी हैं जिनके लिए चीन की सरकार कभी तैयार नहीं होगी। ऐसे में आने वाले समय में प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भडक़ने की संभावना काफी ज्यादा है। इससे निपटने के लिए सेना का इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि, कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन इस समय हांगकांग में सेना का इस्तेमाल करने से बचना चाहेगा। इनके मुताबिक चीन द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सेना तैनात किए जाने का मतलब साफ़ तौर से ‘एक देश, दो व्यवस्थाओं’ के सिद्धांत की हत्या करने जैसा होगा। और फिर इसके परिणाम उसे किसी एक नहीं बल्कि कई मोर्चों पर देखने को मिलेंगे।
एबीसी न्यूज के चीन मामलों के संवाददाता बिल बर्टल्स के मुताबिक हांगकांग में सैन्य कार्रवाई के बाद चीन की ताइबान को लेकर मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। 1949 में चीनी गृह युद्ध की समाप्ति के बाद से ताइवान का शासन अलग संचालित होता रहा है, लेकिन चीन अभी भी इसे अपना क्षेत्र ही मानता है। वह काफी समय से ताइवान पर नियंत्रण हासिल करने के प्रयास कर रहा है। चीन वहां के लोगों को लुभाने के लिए उनके सामने हांगकांग की प्रगति को उदाहरण के तौर पेश करता है। वह उनसे कहता आ रहा है कि वह ताइवान का चीन में विलय कर उसे ‘एक देश, दो व्यवस्थाओं’ के सिद्धांत के तहत रखेगा।
जानकारों के मुताबिक अब अगर चीन हांगकांग के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल करेगा तो ताइवान को लेकर उसकी दशकों पुरानी मुहीम को तगड़ा झटका लगेगा। अभी जो ताइवानी नागरिक उसके समर्थन में दिख रहे हैं फिर वे भी उससे दूर चले जाएंगे।
विदेश मामलों के जानकार इस बारे में एक और बात बताते हैं। इनके मुताबिक चीन द्वारा हांगकांग में सैन्य कार्रवाई किये जाने के बाद उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ सकता है। ये लोग कहते हैं कि हांगकांग ब्रिटेन का उपनिवेश रहा है इसलिए ब्रिटेन का इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया देना स्वाभाविक है। वह चीन की इस हरकत के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ दोनों से कार्रवाई करने को कह सकता है। इस वजह से ये दोनों चीन पर कई तरह के प्रतिबंध लगा सकते हैं।
इसके अलावा सेना के इस्तेमाल की वजह से चीन की उस विदेश नीति को भी झटका लगेगा, जो वह बीते एक दशक से दुनिया के सामने पेश करता आ रहा है। इसके तहत चीन का कहना है कि वह महाशक्ति बनने के बाद भी दुनिया भर में शांति से व्यापार और विकास को ही प्राथमिकता देगा। वह इस नीति पर चलते हुए ही ‘वन बेल्ट वन रोड’ (बीआरआई) परियोजना के तहत 60 से ज्यादा देशों में अपने व्यापार को बढ़ा रहा है। उसने इन देशों को बड़े कर्ज भी दिए हैं।
काफी समय से ऐसी खबरें भी आती रही हैं कि चीन इन देशों को भारी भरकम कर्ज के जाल में फंसाकर उन्हें अपने प्रभाव में लेना चाहता है। जानकारों की मानें तो हांगकांग में सैन्य कार्रवाई करने के बाद बीआरआई के तहत आने देशों में चीन को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। ये देश तब उससे दूरियां बनाना शुरू कर सकते हैं। (सत्याग्रह)

 


Date : 06-Sep-2019

नीलेश द्विवेद

‘सिर्फ संगीत के बारे में ही मेरे टूटे-फूटे शब्दों में मैंने थोड़ा कुछ कहा। अब चलता हूं। रात हो गई है। यह सब जो कहा, वह मेरा चरित्र सुनाने के लिए नहीं। आप लोग देखिए संगीत साधना के लिए कितने कष्ट उठाना पड़ते हैं।’
ये अल्फाज़ किसके हैं किसके नहीं, यह जानने से पहले ‘संगीत’ ‘साधना’ और ‘कष्ट’ (संघर्ष) इन तीन लफ्जों के सफर पर चलते हैं। संगीत, वह तो शायद पैदाइशी ही उसके साथ नत्थी था। लेकिन साधना और कष्ट का सफर अभी शुरू होना था। उम्र यही कोई आठ साल। लेकिन इसके भी दो-तीन साल पहले जब स्कूल जाना शुरू ही किया था कि तभी किताब-कॉपियों के बजाय बीच रास्ते में पडऩे वाले शिव मंदिर के सितार की डोरियों ने अपनी तरफ खींच लिया। बस फिर क्या था। घर से यह कहकर निकलता कि पाठशाला जा रहा हूं। लेकिन रास्ते में शिव मंदिर में रम जाता। साधु-संन्यासियों के साथ संगीत की संगत करता और फिर स्कूल की छुट्टी होने पर दूसरे साथियों के साथ घर की राह पकड़ लेता।
अब के त्रिपुरा के एक छोटे से कस्बे शिवपुर में रहने वाले उस बच्चे की महीनों तक यही दिनचर्या रही। फिर एक रोज भांडा फूट गया। स्कूल के हेडमास्टर ने घर आकर मां (सुंदरी) से शिकायत कर दी, ‘आपका बेटा पाठशाला नहीं आता।’ ‘ऐसा कैसे हो सकता है। मैं तो उसे रोज स्कूल भेजती हूं,’ मां ने ज़वाब दिया। फिर बेटे के पिता (सदू खां) से बोलीं, ‘स्कूल नहीं जाता तो कहीं और जाता होगा। आप जाकर देखो।’
और इस तरह पिता अपने बेटे की खोज-खबर लेने निकल गए। रास्ते में देखा कि बेटा शिव मंदिर में साधुओं के साथ बैठा है। एक साधु सितार बजा रहा है और बेटा ठेका (बड़े भाई आफताब तबला बजाते थे, उन्हीं को सुनकर थोड़ा सीख लिया था) लगा रहा है। पिता खुद सितार बजाते थे। लिहाज़ा बेटे को दूर से देखकर चुपचाप घर लौट आए। बेटे की मां को बताया और समझाया भी, ‘शंकर के मंदिर में ठेका लगा रहा है। एक साधु के सितार के साथ। मारना-वारना मत उसे।’
लेकिन सख््त मिजाज मां के कान में उनके आखिऱी लफ्ज शायद पड़े ही नहीं थे। वह गोली से छूटती घर से निकली और शिव मंदिर से बेटे को पकडक़र ले आई। हाथ-पैर बांधकर एक कोने में पटक दिया। जमकर पीटा और तीन दिन तक खाना नहीं दिया। ‘कष्ट’ से उस बच्चे का शायद यह पहला परिचय था। फिर तीन दिन बाद सबसे बड़ी बहन (मधुमालती) मायके आई तो उसने छुड़ाया। अपने घर ले आई। मगर उस बच्चे का मन उचट गया था। वह घर लौटा मगर लौटने के लिए नहीं ‘साधना के सफर’ पर निकलने के लिए।
घर आकर देखा तो मां बीमार थी। लेकिन उस वक़्त उसके सिर पर कोई और धुन सवार थी इसलिए मां की बीमारी का उसे ख़्याल तक न आया। उसी रात जब वह सोई थी तो चुपचाप उसके पल्लू से बंधी संदूक की चाबी निकाली। धीरे से संदूक का ताला खोला। छोटी सी मु_ी में जितने रुपए (10-12 रुपए थे शायद) समा सके, लिए। कुछ कपड़े गठरी में बांधे और घर से निकल गया। रात को ही नज़दीक के मानकनगर स्टेशन पहुंच गया। वहां से बिना टिकट नारायणगंज होते हुए अगले दिन सियालदाह और वहां से पैदल कलकत्ता। हाथ में एक गठरी और सिर्फ आठ रुपए। शाम हो चुकी थी। भूख भी तेज लगी थी। गंगा किनारे उडिय़ा (ओडिशा के) लोगों की बनाई दाल-पूड़ी मिलती थी। दो पैसे की ली और भूख शांत की।
अब पानी पीना था। लेकिन गांव से आए उस बच्चे को नल-वल का कुछ पता नहीं था। इसलिए गंगा का खारा पानी पीकर ही गला तर किया और वहीं घाट पर गठरी को सिरहाना बनाकर सो गया। लेकिन जब सुबह उठा तो गठरी नदारद। उसमें रखे रुपए भी। बच्चे का धीरज टूट गया। रोने लगा। पास खड़े सिपाही को देखा तो उससे मदद मांगी। लेकिन उसने डांटकर भगा दिया। सो रोते-रोते पास ही दूसरे घाट में जा पहुंचा जहां कई साधु धूनी रमाए बैठे थे। वहीं एक साधु ने ढांढस बंधाया। गंगा में नहाने को कहा। नहाकर लौटा तो अपने पास से थोड़ी सी भस्म निकालकर दी। और कहा, ‘सीधे चला जा। पीछे मत देखना।’ और यकीन मानिए उसने फिर पीछे मुडक़र नहीं देखा। बस आगे, आगे और आगे ही बढ़ता गया।
गंगा के किनारे से कुछ आगे पहुंचा तो एक अन्न क्षेत्र (लंगर) मिल गया। यहां खाने-पीने का इंतज़ाम हो गया। पास ही केदारनाथ डॉक्टर का दवाखाना था। उस रोज उसी के चबूतरे पर सो गया। कुछ दिनों तक यही दिनचर्या चली। लंगर में खाना। पास के नल पानी और बाकी का वक्त दवाखाने के चबूतरे पर बीतता। एक दिन केदारनाथ डॉक्टर के हत्थे चढ़ गया। वे पूछ बैठे, ‘ये लडक़े कौन है तू?’ ‘मैं घर से भागकर आया हूं, साहब। गाना-बजाना सीखना है। आपका कोई परिचित उस्ताद हो तो मिलवा दीजिए न।’ उस बच्चे ने भोलेपन से जवाब दिया। लेकिन पलटकर उसे फिर झिडक़ी मिली, ‘काहे का गाना-बजाना? आवारा कहीं का। उस्ताद चाहिए। चल भाग यहां से। नहीं तो लगाऊं जूता।’
लेकिन वह भागा नहीं। भागने के लिए थोड़े ही घर से भागा था। सो डटा रहा। दवाखाने में कुछ बच्चे आते-जाते थे। डॉक्टर के पास। उनसे भी वह बार-बार एक ही विनती करता, ‘किसी उस्ताद से मिलवा दो। गाना-बजाना सीखना है।’ कोई सुनता, कोई नहीं सुनता। कोई दो-एक पैसा दे जाता। फिर एक दिन एक लडक़ा बोला, ‘मैं एक उस्ताद से सीखता हूं। तू कहे तो तुझे भी वहीं ले चलता हूं।’ उसकी तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गई। झट तैयार हो गया और उस लडक़े के साथ हो लिया। लडक़ा पहले उसे अपने घर ले गया। वहां उसे अपने पिता वीरेश्वर बाबू से मिलवाया। पूरी कहानी बताई तो वे अवाक् रह गए। इतनी सी उम्र और संगीत के लिए ऐसा जुनून। वे खुद संगीत सीखते थे। इसलिए उस बच्चे के सुरों को परखा। जब वीरेश्वर बाबू पूरी तरह मुतमइन हो गए तो उसे अपने गुरु नूलो गोपाल (गोपालचंद्र भट्टाचार्य) से मिलवाने उनके घर की ले चले। 

नूलो गोपाल कलकत्ता के जाने-माने ध्रुपदिए थे। ख्याल भी गाते थे। पथुरिया घाट के राजा यतींद्र मोहन के दरबारी गायक थे। वहां उनके ठाट देख वह बच्चा पहले तो सहम गया। फिर संभला और अपनी पूरी कहानी बताई। संगीत के लिए उस बच्चे की छटपटाहट देख नूलो गोपाल भी पसीज गए। मगर अपनी तरफ से थोड़ा और ठोकने-बजाने की गरज से उन्होंने कहा, ‘12 साल तक साधना करनी पड़ेगी। कर पाएगा?’ ‘जन्म भर सीखूंगा’, उस बच्चे ने सपाट सा ज़वाब दिया। और यहां से अब ‘संगीत, साधना और संघर्ष’ तीनों उस बच्चे के साथ कदमताल करने लगे।
गुरुजी के घर पर उसकी दिनचर्या बदल गई थी। अब वह ज़्यादातर वक्त सुर साधता था। एक हाथ में तानपूरा, दूसरे से तबले पर ठेका। एक पैर से मात्रा गिनना और दूसरे से ताल देना। ऐसे ही गुरुजी ने 360 तरह के पलटे (अलंकार) सिखाए। चार-पांच साल ऐसे ही चला। धैर्य की परीक्षा में जब वह पास हो गया तो आगे की संगीत शिक्षा शुरू हुई। गुरु ने उसे तबला और मृदंग भी सिखाया। बच्चा अब 15 बरस का हो चुका था। इसी बीच एक रोज ढूंढते-ढूंढते उस लडक़े के बड़े भाई नूलो गोपाल के घर पहुंच गए। गुरुजी से विनती की और छोटे भाई को साथ ले गए। घरवाले चाहते थे कि वह वहीं रुक जाए। इसलिए आठ साल की लडक़ी से उसकी शादी करा दी। लेकिन उसका तो पहले ही संगीत से गठजोड़ हो चुका था।
इसलिए शादी की ही रात फिर भाग निकला और सीधा गुरुजी के घर जा पहुंचा। लेकिन तब तक गुरुजी उसका साथ छोड़ गए थे। प्लेग की बीमारी ने उन्हें दुनिया से दूर कर दिया था। बच्चा फिर बेसहारा था। पर तभी नूलो गोपाल के दामाद किरण बाबू ने उसे अमृतलाल दत्त (हाबू दत्त) से मिलवा दिया। ये स्वामी विवेकानंद के भाई लगते थे। कई वाद्य यंत्र बजाना जानते थे। उस लडक़े ने पूरी आपबीती उन्हें बताई। उन्हें लडक़े में तड़प दिखाई दी और उन्होंने उसे अपना शागिर्द बना लिया। इस तरह हाबू दत्त के साथ उसकी वाद्य यंत्रों की शिक्षा शुरू हुई। उन्हीं ने मिनर्वा थिएटर में नौकरी दिला दी। उससे खर्चा-पानी निकलने लगा। ऐसे ही दिन-ब-दिन, साल-दर-साल वक्त बीतता गया।
ईडन गार्डन के बैंड मास्टर लोबो बाबू और उनकी पत्नी से उसने वायलिन सीखा। फिर रामपुर के अहमद अली और उनके पिता आबिद अली से सरोद। संगीत सीखने के लिए वह लडक़ा रामपुर में आबिद अली के घर पर ही रहा। कच्चा मकान। मिट्टी की दीवारें और उस लडक़े के रहने का ठिकाना? पाखाने के पास का एक कमरा, जहां बदबू के कारण दो मिनट ठहरना भी मुश्किल। मगर उस लडक़े का जीवट ही था कि कई दिनों तक वहीं रहकर वह अपनी संगीत साधना करता रहा। बाद में अहमद अली की मां को उस पर तरस आया और उन्होंने उसे रहने के लिए कुछ ठीक सी जगह दी। लेकिन तभी मकान में काम लग गया। उसे ईंट-चूना तक ढोना पड़ा। बीमार पड़ गया मगर टूटा नहीं।
इसी तरह पांच-छह बरस बीते। यहां वह ज़्यादा कुछ नहीं सीख पाया था। इसलिए रामपुर के ही दूसरे उस्तादों के दरवाजे खटखटाए। पर कोई सिखाने को राजी न हुआ। एक बार तो हताशा ऐसी हुई कि जान देने पर आमादा हो गया। मगर मस्जिद के मौलवी ने रोक लिया। उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद उसे एक चिट्ठी दी और कहा, ‘नवाब हाजिद अली से मिल लो।’ वे खुद गायक थे। वीणा बजाते थे। उन्होंने उस लडक़े को सुना और उसके कायल हो गए। तुरंत अपने दरबारी कलाकार वजीर खां को बुला भेजा। उनके कहने पर वजीर खां ने उस लडक़े को अपना शागिर्द तो बना लिया लेकिन ढाई साल तक सिखाया कुछ नहीं। इस बीच वह रोज गुरुजी के घर जाता। वहां सेवा-टहल करता लेकिन वे शायद उसे भूल ही चुके थे।
हालांकि वज़ीर खां के शागिर्द की हैसियत मिलने से रामपुर के दूसरे उस्तादों ने उसे कुछ-कुछ सिखाना शुरू कर दिया था। सो तालीम आगे बढ़ती रही। इसी बीच उस लडक़े के घर से उस्ताद वज़ीर खां के पास ख़बर आई, ‘इसकी पत्नी ने फांसी लगाकर जान देने की कोशिश की है। इसे वापस भेज दें’ तब कहीं जाकर गुरुजी को उसकी याद आई। उन्होंने अपने बेटों-शागिर्दों को टेर दी, ‘अरे बाबू (बंगालियों को वे लोग बाबू कहते थे) कहां हैं? प्यारे मियां, मंझले साहब, छोटे साहब। बाबू कहां है?’ ‘ये तो दिन में 12 बजे तक यहीं रहता है हुज़ूर।’ उन सबने ज़वाब दिया। ‘अरे, तुम लोगों ने अभी तक इसे कुछ सिखाया या नहीं।’ उस्ताद ने पूछा तो उन्हें सीधा सा ज़वाब मिला, ‘आपका हुक्म नहीं था। इसलिए कुछ नहीं सिखाया।’
‘चलो कोई बात नहीं। अब आज से तालीम शुरू।’ उस्ताद का हुक्म हुआ। और इस तरह उसकी तालीम का अगला दौर शुरू हो गया। रात-रात भर सिर्फ उस्ताद, शागिर्द और संगीत। इनके सिवा कोई चौथा न होता। दिन में मौका मिलने पर उस्ताद के बेटे भी सिखा देते। सालों तक यही सिलसिला चलता रहा। फिर एक रोज उस्ताद का हुक्म हुआ, ‘देश में घूमो। शिक्षा, दीक्षा और परीक्षा- यह तीन बातें मानें ही विद्या है। गुणीजनों से सुनो और उन्हें सुनाओ।’ उस्ताद का हुक्म सिर-आंखों पर। लडक़े ने फिर कलकत्ते की राह पकड़ ली। भवानीपुर में संगीत सम्मेलन था। उसे भी बजाने का न्यौता मिला था। लेकिन बड़े-बड़े उस्तादों के बीच मौका मुश्किल से मिला। पर जब मिला तो लोग चार घंटे तक अपनी जगह से हिल नहीं पाए।
सुनने वालों ने पहली तान से पहचान लिया कि यह वज़ीर खां की तालीम है। इसी महफिल में एक श्यामलाल खत्री भी थे। मैहर (मध्य प्रदेश) के राजा बृजनाथ सिंह के परिचित। उन्होंने इस युवक में उस्तादों वाली झलक देख ली थी। वे चाहते थे कि यह युवक अब मैहर आकर शागिर्द तैयार करे। वह युवक पहले तो राज़ी नहीं हुआ। क्योंकि उस्ताद ने सिर्फ घूमने का हुक्म दिया था। सिखाने का नहीं। सो श्यामलाल के बताने पर राजा ने इसका भी बंदोबस्त कर दिया। वज़ीर खां के पास अपने दीवान को भेजकर उनसे उस युवक के लिए हुक्म निकलवा दिया। इधर श्यामलाल ने उसे यह भी समझाया कि राजा को खुद बहुत शौक है गाने-बजाने का। तो अंत में उसे राज़ी होना ही पड़ा और मैहर की राह पकड़ ली।
उस दूर्गा पूजा की सप्तमी का दिन था जब वह युवक मैहर के दरबार में राजा बृजनाथ सिंह के सामने बैठा था। चंद घंटों बाद ही राजा खुद उसका पहला शागिर्द बन चुका था लेकिन, वह उनसे कुछ लेने को राजी नहीं था। कहता था, ‘मैंने तय किया है कि विद्या दान कर के किसी से कुछ नहीं लूंगा। क्योंकि संगीत सीखने में मैंने बहुत कष्ट सहे हैं।’ राजा ने भी उसकी बात काटी नहीं। बस दरबार में एक ओहदा देकर 150 रुपए की तनख्वाह तय कर दी। लेकिन इस ओहदे और तनख्वाह से ज़्यादा शायद मैहर की आबो-हवा उस युवक को खूब रास आई थी। इसलिए वह हमेशा के लिए यहीं का होकर रह गया। वह भी कुछ इस तरह कि छह सितंबर 1972 को इसी मैहर की मिट्?टी से हमेशा के लिए जा मिला।
यह कोई और नहीं बल्कि अलाउद्दीन खां साहब हैं। ‘हैं’ इसलिए क्योंकि अलाउद्दीन खां बस एक शख्स का नाम नहीं है। बल्कि वह एक जीती-जागती परंपरा हैं। ऐसी परंपरा जो उनके बेटे-बेटियों- अन्नपूर्णा देवी, अली अकबर खान, पौत्र- आशीष खान तथा शागिर्दों- पंडित रविशंकर, पन्नालाल घोष, निखिल बनर्जी, सरन रानी और इनके भी शिष्यों से होती हुई आज तक लगातार बहती जा रही है। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पितामह सरीखे उस्ताद अलाउद्दीन की जि़ंदगी के कई कहे-अनकहे किस्से कुछेक साल पहले आई ‘मेरी कथा’ नाम की किताब में दजऱ् हैं। यह वे किस्से हैं जो कई बेतकल्लुफ सी महफिलों में ख़ुद अलाउद्दीन खां साहब ने अपने बच्चों/शागिर्दों को सुनाए थे। बाद में इन्हीं किस्सों को जस का तस किताब की शक्ल में पाबंद कर दिया गया।
इन्हीं किस्सों में एक यूं भी है कि उस्ताद अलाउद्दीन खां सरोद, सितार, सुरबहार, वायलिन, जैसे 200 से ज्यादा भारतीय और पश्चिमी वाद्य यंत्र बजा लेते थे। कहते हैं जिस वाद्य यंत्र पर वे हाथ रख देते थे वहीं उनका गुलाम हो जाता था। ध्रुपद और ख़्याल भी गाते थे। इसके बावज़ूद दंभ का लेशमात्र भी उनको छू तक नहीं पाया।
पूरी जि़ंदगी वह बाबाओं की तरह रहे शायद इसलिए या फिर अपने शागिर्दों को बच्चों की तरह प्यार करते थे इस वज़ह से, लोग उन्हें ‘बाबा’ कहते थे। और जब उन्होंने शरीर छोड़ दिया तो उन्हें ‘संगीत का काशी-काबा’ मानने और कहने लगे। और यही वज़ह है कि आज यह कहना भी बहुत ज़्यादा न होगा कि अगर संगीत, साधना और संघर्ष का मिलाजुला कोई नाम होता तो वह उस्ताद अलाउद्दीन खां होता। (सत्याग्रह)

 


Date : 05-Sep-2019

मोहित चतुर्वेदी

भारत के पहले राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। उनका जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था। गूगल ने डूडल के जरिए सर्वपल्ली राधाकृष्णन का बर्थडे सेलीब्रेट कर रहा है। वो भारत के दूसरे राष्ट्रपति भी रहे। राष्ट्रपति और दो बार उपराष्ट्रपति का पद सुशोभित करने वाले सर्वपल्ली राधाकृष्णन बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के वर्ष 1939 से 1948 तक वाइस चांसलर भी रहे। 5 सिंतबर को शिक्षक से भारत के राष्ट्रपति तक का पद संभालने वाले डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की 132वीं जयंती है। ऐस मौके पर हम आपको पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन से जुड़ी एक किस्सा बता रहे हैं जो शायद आपने पहले नहीं सुनी होगी।
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के इसी चीन यात्रा से जुड़ा एक और वाक्या बेहद रोचक है। बताया जाता है कि माओ और राधाकृष्णन एक साथ बैठकर भोजन कर रहे थे। तभी माओ ने खाते-खाते बहुत अपनापन दर्शाने के लिए चॉपस्टिक से अपनी प्लेट से खाने का एक कौर उठा कर राधाकृष्णन की प्लेट में रख दिया। दिलचस्प बात यह है कि माओ को नहीं पता था कि राधाकृष्णन पूरी तरीके से शाकाहारी हैं। माओ के इस प्यार का राधाकृष्णन ने भी सम्मान किया। उन्होंने ऐसा माओ को अहसास नहीं होने दिया कि उन्होंने कोई गलती की है।
जब माओ के थपथपाए थे गाल
साल 1957 का वाक्या है। भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ। सर्वपल्ली राधाकृष्णन चीन के दौरे पर गए थे। उस वक्त माओ चीन के प्रसिद्ध नेता थे, या यूं कहें कि उस देश की राजनीति इन्हीं के इर्द-गिर्द घुम रही थी। माओ ने राधाकृष्णन को मिलने के लिए अपने घर पर आमंत्रित किया। राधाकृष्णन कुछ भारतीय अधिकारियों के साथ माओ से मिलने उनके घर चुग नान हाई पहुंचे। यहां माओ उनकी अगवानी के लिए अपने आंगन में खड़े थे। आंगन में दाखिल होते ही दोनों नेताओं ने आपस में हाथ मिलाया। इसके बाद राधाकृष्णन ने माओ के गाल को थपथपा दिए। इस बर्ताव पर माओ के कुछ बोलने से पहले राधाकृष्णन ने ऐसी बात कह दी कि शायद वे चाहकर भी कुछ नहीं कह सके। गाल थपथपाने के बाद सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने माओ से कहा, अध्यक्ष महोदय, परेशान मत होइए। मैंने यही स्टालिन और पोप के साथ भी किया है।
राधाकृष्णन की कटी अंगुली देखकर द्रवित हो गए माओ
राधाकृष्णन और माओ से जुड़ा एक और किस्सा बेहद रोचक है। चीन यात्रा पर जाने से पहले राधाकृष्णन कंबोडिया गए थे। यहां उनके साथ गए सहयोगी की गलती के चलते कार के दरवाजे से राधाकृष्णन की अंगुली की हड्डी टूट गई थी। राधाकृष्णन जब चीन पहुंचकर माओ से मिले तो उनकी नजर अंगुली पर गई। उन्होंने पहले तत्काल अपने डॉक्टर को बुलाकर उसका मलहम-पट्टी कराया। इसी दौरान उन्होंने उनसे अंगुली के चोटिल होने की वजह जानी। (एनडीटीवी)