विचार / लेख

Date : 14-Jul-2019

सिफिलिस बीमारी पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। साल 2016 में यह नवजातों की मृत्यु की सबसे बड़ी वजह बन कर सामने आई थी। इस पर नियंत्रण के लिए यौन संबंध के दौरान सुरक्षा जरूरी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया है कि यूरोप में सिफिलिस बीमारी के मामले पिछले एक दशक में काफी ज्यादा बढ़े हैं। 2000 के दशक के बाद से पहली बार एचआईवी के नए मामलों की तुलना में कुछ देशों यह बामारी तेजी से फैली है। यूरोप के रोग निवारण और नियंत्रण केंद्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, समलैंगिक पुरुषों के बीच असुरक्षित यौन संबंधों और अपने साथी के साथ बिना सुरक्षा के यौन संबंध बनाने की वजह से 2010 के बाद से इस यौन संचारित रोग के मामलों में 70 फीदसी तक की वृद्धि हुई है।
यूरोपीयन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल, ईसीडीसी में यौन संचारित संक्रमणों के विशेषज्ञ एंड्रयू अमातो-गोची बताते हैं, पूरे यूरोप में सिफिलिस संक्रमण में वृद्धि के कई कारक हैं। इनमें बिना कंडोम के यौन संबंध बनाना, कई लोगों के साथ यौन संबंध बनाना और लोगों में एचआईवी संक्रमण का डर समाप्त होना शामिल हैं। यह यूरोपीय रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन के पिछले महीने के उस बयान के बाद आई है जिसमें उसने कहा था कि दुनिया भर में हर दिन लगभग एक लाख लोग यौन संचारित संक्रमण की चपेट में आते हैं।
सिफिलिस से पुरुषों और महिलाओं में गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। स्टिलबर्थ और नवजात की मौत भी हो सकती है। इससे एचआईवी का भी खतरा बढ़ जाता है। वर्ष 2016 में सिफिलिस पूरी दुनिया में नवजातों की मौत का सबसे बड़ा कारण बना था।
यूरोप में स्वास्थ्य और बीमारी की निगरानी करने वाले स्टॉकहोम स्थित ईसीडीसी ने बताया, 2007 से लेकर 2017 तक 30 देशों में सिफिलिस के 2,60,000 मामले सामने आए। 2017 में सबसे ज्यादा 33,000 मामले सामने आए। इसका मतलब यह है कि वर्ष 2000 के बाद एचआईवी से ज्यादा सिफिलिस से लोग प्रभावित हुए। ब्रिटेन, जर्मनी, आयरलैंड, आइसलैंड और माल्टा जैसे पांच देशों में समस्या दोगुनी बढ़ी जबकि एस्टोनिया और रोमानिया में 50 फीसदी या उससे अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। ईसीडीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 2007 और 2017 के बीच दर्ज किए गए दो-तिहाई मामलों में यौन संबंध दो पुरुषों के बीच बनाए गए थे। वहीं 23 फीसदी मामले महिलाओं के साथ संबंध बनाने वाले पुरुषों और 15 फीसदी महिलाओं में सामने आए।
पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले मामलों का अनुपात लात्विया, लिथुआनिया और रोमानिया में 20 फीसदी से कम और फ्रांस, जर्मनी, आयरलैंड, नीदरलैंड, स्वीडन और ब्रिटेन में 80 प्रतिशत से अधिक है। 
अमातो गोची का कहना है कि वे समलैंगिक पुरुष जिनके बीच एचआईवी संक्रमण का डर नहीं रहता है, इस समस्या का मुख्य कारण हैं। उन्होंने कहा, इस प्रचलन को बदलने के लिए लोगों को यौन संबंध बनाने के दौरान कंडोम का उपयोग बढ़ाने के लिए प्रेरित करना होगा। (डॉयचेवेले)


Date : 14-Jul-2019

-कुमार सिद्धार्थ
देश के महानगरों और शहरों में जिस तेजी से वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है, उसमें सबसे ज्यादा योगदान वाहनों से होने वाले प्रदूषण का है। यह ऐसा मुद्दा है जिस पर वर्षों से चिंता जताई जा रही है, लेकिन इस दिशा में कुछ खास परिणाम देखने में नहीं आ रहे।  देश में दुपहिया और चार पहिया वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है और रोजाना लाखों नए वाहन पंजीकृत हो रहे हैं। फिलहाल देश भर में करोड़ों वाहन ऐसे हैं, जो पेट्रोल और डीजल से चल रहे हैं और इनसे निकलने वाला काला धुआं कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है। 'विश्व स्वास्थ्य संगठनÓ की 2018 की रिपोर्ट बताती है कि भारत के लगभग 11 फीसदी वाहन कार्बन उत्सर्जक हैं, जो वायु प्रदूषण का प्रमुख स्रोत हैं।
पेरिस में हुए 'जलवायु परिवर्तन समझौतेÓ के प्रति प्रतिबद्धता के चलते अब बिजली से चलने वाले वाहनों के विस्तार को लेकर गंभीरता से काम शुरू हुआ है। इस दिशा में भारत सरकार ने साल 2030 तक बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देने के लिए एक वृहद योजना तैयार की है। ये वाहन बैटरी से चलेंगे और बैटरी बिजली से चार्ज होगी। 
माना जाता है कि बिजली से चलने वाले वाहनों की देखभाल व मरम्मत का खर्च भी कम आता है। सरकार की इस पहल से अब इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर निर्माता कंपनियां भी गंभीर हो चुकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि पूरे देश में इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग बढऩे से बिजली क्षेत्र में बड़ा बदलाव आएगा और जहरीली गैसों के उत्सर्जन में 40 से 50 फीसदी की कमी आएगी। इससे देश में कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने 'नीति आयोगÓ की अगुवाई में विद्युत गतिशीलता के मिशन को मंजूरी दी है। ध्यान रहे कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को सार्वजनिक परिवहन से जोडऩे के लिए केंद्र सरकार की हाइब्रीड (बिजली और जैविक दोनों) और इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाने और उनके निर्माण की नीति 'फास्टर एडॉप्शन एण्ड मैन्युफैक्चरिंग इलेक्ट्रोनिक व्हीकल्सÓ (एफएएमई) जिसे 2015 में लॉन्च किया गया था, का पुनरीक्षण किया जा रहा है। इसके तहत 'नीति आयोगÓ ने बिजली से चलने वाले वाहनों की जरूरत, उनके निर्माण और इससे संबंधित जरूरी नीतियां बनाने की शुरूआत की है।
दरअसल, ऑटोमोबाइल के लिए भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। भारत में इस वक्त लगभग 0.4 मिलियन इलेक्ट्रिक दुपहिया वाहन और 0.1 मिलियन ई-रिक्शा हैं। कारें तो केवल हजारों की संख्या में ही सड़कों पर दौड़ रही हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक 'सोसाइटी ऑफ  मैन्युफैक्चर्स ऑफ  इलेक्ट्रिक व्हिकलÓ (एसएमईवी) के अनुसार, भारत ने 2017 में बेचे जाने वाले 'आंतरिक दहनÓ (आईसी) इंजन वाले वाहनों में से एक लाख से भी कम बिजली से चलने वाले वाहनों को बेचा। इनमें से 93  फीसदी से अधिक इलेक्ट्रिक तीन-पहिया वाहन और 6 फीसदी दुपहिया वाहन थे। इलेक्ट्रिक गाडिय़ों में दुपहिया वाहन ही अग्रणी है।
भारत भले ही इलेक्ट्रिक कारों में दूसरे देशों से पीछे हो, लेकिन बैटरी से चलने वाली ई-रिक्शा की बदौलत उसने चीन को पीछे छोड दिया है। रिपोट्र्स के मुताबिक मौजूदा समय में भारत में करीब 15 लाख ई-रिक्शा चल रहे हैं, जो चीन में साल 2011 से अब तक बेची गईं इलेक्ट्रिक कारों की संख्या से ज्यादा हैं। एटी कर्नी नाम की एक कंसल्टिंग फर्म की रिपोर्ट में बताया गया है कि हर महीने भारत में करीब 11,000 नए ई-रिक्शा सड़कों पर उतारे जा रहे हैं। भारत में अभी इलेक्ट्रिक गाडिय़ों को चार्ज करने के लिए कुल 425 पॉइंट बनाए गए हैं। सरकार 2022 तक इन प्वाइंट्स को 2,800 करने वाली है।
कुछ दिनों पहले भारत सरकार ने देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के विनिर्माण और उनके तेजी से इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए  'फेम इंडियाÓ योजना के दूसरे चरण को मंजूरी दी है। कुल 10 हजार करोड़ रुपए लागत वाली यह योजना 1 अप्रैल, 2019 से तीन वर्षों के लिये शुरू की गई जो मौजूदा योजना 'फेम इंडिया वनÓ का विस्तारित संस्करण है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश में इलेक्ट्रिक और हाईब्रिड वाहनों के तेजी से इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। इसके लिए लोगों को इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में शुरुआती स्तर पर सब्सिडी देने तथा ऐसे वाहनों की चार्जिंग के लिए पर्याप्त आधारभूत संरचना विकसित करना है। यह योजना पर्यावरण प्रदूषण और ईंधन सुरक्षा जैसी समस्याओं का समाधान करेगी।
गौरतलब है कि देश में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग से बिजली की मांग भी बढ़ रही है। नॉर्वे और चीन जैसे देशों ने बड़े पैमाने पर बिजली से चलने वाले वाहनों का निर्माण शुरू किया है। जनवरी 2011 से दिसंबर 2017 के बीच चीन में बिजली से चलने वाले  17 लाख 28 हजार 447 वाहन सड़कों पर उतारे गए। उद्योग मंडल 'एसोचौमÓ और 'अन्सट्र्स एंड यंगÓ (ईएण्डवाई) के संयुक्त अध्ययन में कहा गया है कि साल 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग से बिजली की मांग 69.6 अरब यूनिट पहुंचने का अनुमान है।
आलोचकों का तर्क है कि भारत में 90 फीसदी बिजली का उत्पादन कोयले से होता है। ऐसे में इलेक्ट्रिक कारों से प्रदूषण कम करने की बात बेईमानी लगती है। नॉर्वे के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से कराए गए एक शोध के मुताबिक बिजली से चलने वाले वाहन पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से कहीं ज्यादा प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। 
अध्ययन में कहा गया है कि यदि बिजली उत्पादन के लिए कोयले का इस्तेमाल होता है तो इससे निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसें डीजल और पेट्रोल वाहनों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं। यही नहीं, जिन फैक्ट्रियों में बिजली से चलने वाली कारें बनती हैं वहां भी तुलनात्मक रूप में ज्यादा विषैली गैसें निकलती हैं। हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि इन खामियों के बावजूद कई मायनों में ये कारें फिर भी बेहतर हैं। रिपोर्ट में ये कहा गया है कि ये कारें उन देशों के लिए फायदेमंद हैं जहां बिजली का उत्पादन अन्य स्रोतों से होता है।
अपने देश में ऊर्जा अभाव के चलते इलेक्ट्रिक वाहनों का सपना चुनौतीपूर्ण ही लगता है। इलेक्ट्रिक वाहन चलाने के लिए पर्याप्त बिजली मिल सके, अभी इस पर काम किया जाना है। वहीं उसके लिए बुनियादी सुविधाओं, संसाधनों और बजट का प्रावधान किया जाना है। वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि अगर सरकार बैटरी निर्माण और चार्जिंग स्टेशनों की समस्या का समाधान कर दे तो बड़ी तादाद में बिजली-चलित वाहन बाजार में उतारे जा सकते हैं। जाहिर है बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम सरकार को करना है और इसके लिए ठोस दीर्घावधि नीति की जरूरत है। देखना होगा कि आने वाले समय में बिजली आधारित वाहनों के उपयोग और उससे उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयासों की पहल कितनी कारगर साबित होगी ? (सप्रेस)


Date : 13-Jul-2019

दुष्यंत कुमार

हाल ही में कुछ ऐसी जानकारियां सामने आई हैं जो सामान्य वर्ग (सवर्ण) के आरक्षण के चलते एससी-एसटी और ओबीसी श्रेणियों से होने वाले भेदभाव की ओर ध्यान दिलाती हैं

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जब संविधान में संशोधन करते हुए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्ल्यूएस) लोगों के लिए आरक्षण (जिसे सवर्ण आरक्षण भी कहा जाता है) का प्रावधान किया, तब इस पर कई तरह के सवाल उठे थे। उस समय से वंचित तबक़ों के प्रतिनिधियों समेत कई जानकार कह रहे हैं कि मोदी सरकार का यह क़दम संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है।

इस सवाल के साथ यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सरकार ने इसे ख़ारिज करते हुए कहा कि उसने ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए आरक्षण सामान्य श्रेणी से ही सुनिश्चित किया है, लिहाज़ा यह आरक्षण किसी भी तरह अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए तय कोटे से छेड़छाड़ नहीं करता।
हो सकता है सरकार की इस दलील से कुछ लोग इत्तेफ़ाक़ रखते हों, लेकिन हाल में कुछ जानकारियां सामने आई हैं जो सामान्य आरक्षण के चलते एससी-एसटी और ओबीसी श्रेणियों के उम्मीदवारों के साथ होने वाले भेदभाव की ओर ध्यान दिलाती हैं, ख़ास तौर पर ओबीसी के मामले में।
हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने 2019-20 के पोस्ट-ग्रेजुएशन कोर्स के लिए एक नोटिफिक़ेशन जारी किया है। इसमें दाख़िले के लिए भरे जाने वाले फ़ॉर्म की फ़ीस आरक्षित और अनारक्षित वर्गों के लिए अलग-अलग है, जो सामान्य बात है। लेकिन इसमें अनारक्षित और ओबीसी उम्मीदवारों के लिए 750 रुपये फ़ीस जमा कराने के बात कही गई है, जबकि ईडब्ल्यूएस श्रेणी को एससी-एसटी के साथ रखकर उनके नामांकन की फ़ीस 300 रुपये रखी की गई है।
डीयू के फ़ीस तय करने का यह तरीक़ा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। कई लोगों ने सवाल किया है कि जब आरक्षण का लाभ पाने के लिए ईडब्ल्यूएस और ओबीसी दोनों वर्गों को आठ-आठ लाख रुपये की आय सीमा के तहत रखा गया है, तो ओबीसी वर्ग की फ़ीस 750 और ईडब्ल्यूएस की फ़ीस 300 रुपये रखने का क्या तर्क है।
सामान्य आरक्षण लागू करते समय भी आठ लाख रुपये की आय सीमा को लेकर ख़ासी चर्चा हुई थी। तब कई लोगों ने यह कहते हुए ईडब्ल्यूएस आरक्षण का विरोध किया था कि सालाना कम से कम आठ लाख रुपये कमाने वाले किसी परिवार का उम्मीदवार गऱीब कैसे माना जा सकता है। जबकि इतनी ही कमाई वाले ओबीसी उम्मीदवार को क्रीमीलेयर का बताया दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि अब ईडब्ल्यूएस उम्मीदवार के लिए तय की गई फ़ीस ओबीसी से ढाई गुना कम क्यों है।
यहां इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी है कि मोदी सरकार ने सामान्य आरक्षण लागू करने के बाद कहा था कि सवर्णों के लिए तय की गई आय सीमा अंतिम नहीं है और वह इसकी समीक्षा कर इसे कम कर सकती है। लेकिन आरक्षण लागू होने के बाद अब तक ऐसा कुछ नहीं किया गया। इस बीच चुनाव बीत गए और विश्वविद्यालयों ने भी ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू करने में ज़बर्दस्त सक्रियता दिखाते हुए भर्तियों के लिए एक के बाद एक नोटिफिक़ेशन जारी कर दिए।
इन सबके बीच यह सवाल कहीं गुम हो गया कि तमाम सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में पहले से ही अपनी जनसंख्या से कहीं ज़्यादा नेतृत्व वाले सवर्ण वर्ग को आरक्षण देने के लिए आठ लाख रुपये की आय सीमा में रखना क्या सही है। इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा चुने गए देश के 445 उच्च शिक्षा संस्थानों के डेटा पर आधारित एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। यह बताती है कि 2016-17 में इन संस्थानों में 16 लाख छात्र-छात्राओं का नामांकन हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक़ इनमें से 28 प्रतिशत यानी कऱीब चार लाख 55 हजार छात्र आर्थिक रूप से गऱीब वर्ग (सामान्य वर्ग के) से ही थे। यह आंकड़ा ईडब्ल्यूएस को मिलने वाले दस प्रतिशत आरक्षण से लगभग तीन गुना ज़्यादा है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि ज़्यादातर शिक्षा संस्थान दो से 5।50 लाख रुपये तक सालाना आय वाले परिवारों को आर्थिक रूप से पिछड़ा मानते हैं। यह मोदी सरकार द्वारा तय की गई सीमा से दो-ढाई लाख रुपये कम है। ऐसे में अगर विश्वविद्यालय आठ लाख रुपये वार्षिक आय वाले उम्मीदवारों को फ़ीस में ढाई गुना रियायत देंगे तो लाज़मी है इससे ईडब्ल्यू आरक्षण पर सवाल उठेंगे।
पोस्ट-ग्रेजुएशन कोर्स के लिए डीयू के फ़ीस स्ट्रक्चर के अलावा धर्मशाला केंद्रीय विश्वविद्यालय का नया एडमिशन रोस्टर भी ‘सवर्ण’ आरक्षण के अतार्किक होने का संकेतक बताया जा रहा है। इस विश्वविद्यालय ने 2019-20 के सत्र के लिए जो मेरिट सूची जारी की है, उसके मुताबिक़ अगर कोई ईडब्ल्यूएस (या गऱीब सवर्ण) उम्मीदवार सौ में से एक से दस अंक भी लाता है, तो भी उसे दाख़िला मिल जाएगा। अमर उजाला ने मेरिट सूची के हवाले से बताया कि 1।25 अंक वाला ईडब्ल्यूएस विद्यार्थी बॉटनी में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर सकता है। वहीं, दस अंक लाने पर इसी कैटेगरी के उम्मीदवार को अंग्रेज़ी विषय में एमए करने दिया जाएगा।
हालांकि इसी तरह की रियायत एससी-एसटी वर्ग के उम्मीदवारों को भी दी गई हैं। लेकिन दिक़्क़त यह है कि उन्हें ईडब्ल्यूएस से बाहर रखा गया है। वे इसका लाभ नहीं उठा सकते। इसके जवाब में यह कहा जा सकता है कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवार भी एससी-एसटी व ओबीसी को मिले आरक्षण के दायरे से बाहर हैं लेकिन ऐसा सीधे-सीधे कह देना सही नहीं होगा।
यह कई रिपोर्टों से साबित हुआ है कि देश के वंचित तबक़ों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया है। विश्वविद्यालयों में दलित, आदिवासी और ओबीसी वर्ग के शिक्षकों की संख्या उनकी जनसंख्या के हिसाब से बहुत कम है। वहीं, आरक्षण का कोटा पूरा नहीं होने की सूरत में ख़ाली रह जाने वाली सीटों को सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से भरा जाता रहा है। इस व्यवस्था के होते यह नहीं कहा जा सकता कि सवर्ण वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी से ज़्यादा सीटें नहीं मिलतीं।
बहरहाल, इन सबके बीच एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए राहत की बात यह रही कि सरकार ने विवादित 13 पॉइंट रोस्टर को हटा कर दोबारा लाए गए पुराने 200 पॉइंट रोस्टर से जुड़े विधेयक को मंज़ूरी दे दी है। बीते बुधवार को कैबिनेट ने विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती से जुड़े इस रोस्टर को हरी झंडी दिखा दी। अब उच्च शिक्षा संस्थानों में भर्तियां विभाग की जगह विश्वविद्यालय को इकाई मानते हुए की जाएंगी। हालांकि इससे सामान्य आरक्षण से जुड़ा विवाद ख़त्म नहीं होने वाला। (सत्याग्रह)


Date : 13-Jul-2019

साक्षात्कार: आईआईटी प्रवेश की तैयारी के लिए चर्चित ‘सुपर 30’ कोचिंग के संस्थापक आनंद कुमार की जि़ंदगी पर आधारित फिल्म  इस हफ्ते रिलीज़ हुई है. उनसे रीतू तोमर की बातचीत.

आपने वर्ष 1992 में रामानुजन स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स की शुरुआत की, जिसके जरिये बच्चों को कोचिंग देना शुरू किया तो ऐसे में 2002 में ‘सुपर 30’ कोचिंग की शुरुआत करने का विचार कैसे आया?

रामानुजन स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स 1992 में जब शुरू हुआ तो वह एक प्लेटफॉर्म की शुरुआत की थी, यह कोचिंग इंस्टिट्यूट नहीं था. यहां बच्चों से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा होती थी. हम मिलकर रामानुजम जयंती मनाते थे, उस समय मैं खुद भी एक छात्र था. आर्थिक दिक्कतों की वजह से 1994 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय नहीं जा पाया था तो घर का खर्चा निकालने के लिए पापड़ बेचता था.

हमने 1997 में रामानुजम को दोबारा शुरू किया, नि:शुल्क शिक्षा शुरू की, जब धीरे-धीरे बच्चे उससे जुडऩे लगे तो हमने छात्रों के लिए एक साल 500 रुपये फीस रखी. उस समय एक वाकया यह हुआ कि एक छात्र ने कहा कि वह फीस नहीं भर सकता है, क्योंकि उसके घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं है. तब हमारे दिमाग में इस तरह के जरूरतमंद बच्चों के लिए नि:शुल्क में शिक्षा का विचार आया और इस तरह ‘सुपर 30’ की शुरुआत हुई.

आपने हमेशा कहा है कि आज तक किसी से एक रुपया भी चंदे में नहीं लिया तो ऐसे में 30 बच्चों की शिक्षा, खाने और रहने का खर्च किस तरह से उठाते हैं?

यह बात सौ फीसदी सच है कि मैंने आज तक एक रुपया भी चंदे में नहीं लिया. बिहार सरकार और कई उद्योगपतियों ने आर्थिक मदद करने की बात कही थी लेकिन हमने मना कर दिया. दरअसल, रामानुजम इंस्टिट्यूट से हम जो भी पैसे कमाते हैं, उसी से हमारे 30 बच्चों के खाने-पीने से लेकर हमारे परिवार और हमारे कुछ नॉन टीचिंग स्टाफ का खर्च चलता है.

इतनी उपलब्धियों के बावजूद आनंद कुमार और ‘सुपर 30’ पर आरोप क्यों लगते हैं?

मैं आरोपों से घबराता नहीं हूं. जीवन में सुख-दुख, बदनामी-प्रसिद्धि सब साथ चलती है. जब 2008 में टाइम्स मैगजीन ने बेस्ट इनोवेटिव स्कूल की सूची में  ‘सुपर 30’ को रखा तभी से लोगों के कान खड़े हो गए थे. कई बार मुझे नीचे दिखाने का प्रयास किया गया. हम पर कई कातिलाना हमले भी हुए, हम पर गोलियां चलीं.

मेरा एक नॉन टीचिंग वालेंटियर स्टाफ था, उस पर चाकू से हमला हुआ. पटना मेडिकल कॉलेज में तीन महीने रहा, तब जाकर उसकी जान बची. मुझे सुरक्षा के नाम पर दो बॉडीगार्ड दिए गए.

अभी कुछ दिन पहले हमारे भाई को ट्रक से कुचलने का प्रयास किया गया. हमने किसी का क्या बिगाड़ा है, आज तक किसी से एक रुपये चंदा किसी से नहीं लिया. बच्चों को पढ़ायाज् बिहार और देश का नाम बढ़ाया.

जो बच्चे जो पैसे की दिक्कतों की वजह से पढ़ नहीं पा रहे थे, उन्हें शिक्षा दी, उनका भविष्य संवारा, आज वहीं छात्र जापान और इंग्लैंड में काम कर रहे हैं. हमें समझ नहीं आता कि ये आरोप आखिर लग क्यों रहे हैं.

हमारे एक वालेंटियर को पिछले साल पर आईटी की धारा 66ए के तहत जेल में डाल दिया गया क्योंकि उसने फेसबुक पर लिख दिया था. सभी को पता होना चाहिए कि धारा 66ए निरस्त कर दी गई है. हम रात में ठीक से सो नहीं पाते थे, उस बच्चे के माता-पिता आकर मुझे कहते थे कि आपकी वजह से हमारा बेटा जेल चला गया.

हमने खूब चक्कर लगाए, डीजीपी से मुलाकात की, उनसे अनुरोध किया, जिसके बाद डीजीपी ने जांच के आदेश दिया. जांच में पूरा मामला फर्जी निकला, तो देखिए किस तरह हम पर फर्जी केस किया जा रहा है, हम पर गोलियां चल रही हैं क्योंकि कुछ लोग हैं, जो चाहते हैं कि ये गरीब की आवाज उठा रहा है, इसकी आवाज को कुचल दो.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर वे कौन लोग हैं, जो चाहते हैं कि आनंद कुमार की कहानी बड़े पर्दे पर न आए?

कुछ कोचिंग संस्थान के माफिया, नौकरशाह और कुछ नेता हैं, लेकिन यह बहुत ही छोटा समूह है. बिहार के लोग मुझसे बहुत खुश हैं, मुझे प्रोत्साहित करते हैं. आप ये देखिए कि इतनी नकारात्मक चीजों के बीच भी आनंद कुमार जिंदा है. मैं उन लोगों की वजह से जिंदा हूं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में मेरा साथ नहीं छोड़ा. मेरी हौसलाआफजाई की.

आपने जिन कोचिंग माफिया की बात की क्या ‘सुपर 30’ पर बनी आपकी बायोपिक में आपने इसे विस्तार से बताया है.

हमने फिल्म में माफिया गैंग की पोल खोली है. हमने दिखाया है कि किस तरह एक आदमी जो अपने भाई के दम पर दुनिया में संघर्ष करता है, उन 30 बच्चों के सहारे एक सपना देखता है. अपने अधूरे सपनों में रंग भरना चाहता है कि किसी की मदद नहीं लेता, फिर भी उस पर और उसके भाई पर जानलेवा हमले किए जाते हैं. कौन लोग हैं, वे जो ये सब कर रहे हैं. उनका मकसद क्या है. इन सभी बातों का जवाब देगी ‘सुपर 30’ फिल्म.

‘सुपर 30’ में हर साल किस तरह आप बच्चों को चुनते हैं. किस तरह की प्रक्रिया के जरिये बच्चों का चुनाव होता है?

शुरुआती दौर में तो हमारा भाई इसके लिए पर्चा बांटता था, लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे लोकप्रियता बढ़ी. अखबारों के जरिये इश्तहार देने लगे, फिर वेबसाइट का जमाना आया तो इसके लिए चुनाव प्रणाली आसान हो गई. जरूरतमंद बच्चों के एंट्रेंस एग्जाम के जरिये उनका चुनाव किया जाता है.

आप पर धोखाधड़ी का आरोप भी लगता रहा है कि आप झूठी लिस्ट जारी करते हैं, आप रामानुजम में पढ़ रहे बच्चों को ‘सुपर 30’ का बताकर उनके आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में पास होने का ऐलान करते हैं और इन्हीं आरोपों को लेकर गुवाहाटी के चार छात्रों ने आपके खिलाफ अदालत में पीआईएल दायर किया है.

मुझे बहुत दुख होता है, जब भी मैं इन छात्रों के बारे में सोचता हूं. इन चारों बच्चों को गुमराह किया गया. ये छात्र आज तक हमसे कभी नहीं पढ़े, मैं इनसे कभी मिला भी नहीं और न ही इन्होंने कभी ‘सुपर 30’ के लिए कभी किसी तरह का एंट्रेस एग्जाम दिया. हमने असम सरकार से भी आज तक कभी कोई चंदा नहीं लिया.

हम हर साल आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास करने वाले बच्चों की लिस्ट जारी करते हैं. इन विवादों की वजह से पिछले कुछ साल से मैं सभी 30 बच्चों की लिस्ट परीक्षा से पहले से जारी कर देता हूं लेकिन स्थानीय मीडिया, अखबार और वेबसाइटों के जरिये मेरे खिलाफ भ्रम फैलाया जा रहा है कि ये चारों बच्चे ‘सुपर 30’ से जुड़े हुए हैं जबकि ऐसा नहीं है.

इन छात्रों का ‘सुपर 30’ और मुझसे दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है. दरअसल, जब कोई संस्थान या व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ता है तो जिन लोगों की समाज में अपनी कोई पहचान नहीं है, जिन्हें सफलता नहीं मिली है, वे इन सब हथकंड़ों से सस्ती लोकप्रियता चाहते हैं.

‘सुपर 30’ के लिए सूची जारी नहीं करने के आरोप पर आप क्या कहेंगे?

हमारे बच्चे प्रमाण हैं कि हम झूठ नहीं बोल रहे हैं. इतने सालों में हमसे सैकड़ों बच्चे जुड़े हुए हैं, जिन्होंने अखबार और अनेक दूसरे माध्यमों से तमाम सच्चाइयां बयान की है. इसलिए इन आरोपों से न तो मैं घबराता हूं और न डरता हूं.

यह फिल्म एक सकारात्मक संदेश देगी, यह आनंद कुमार की कहानी नहीं है, यह देश के उन शिक्षकों की कहानी है, जो दिखाएगी कि अगर कोई टीचर गांव के किसी छोटे से स्कूल में भी पढ़ा रहा है तो उसका संघर्ष उसे कामयाबी तक लेकर जाएगा.

यह फिल्म शिक्षकों को प्रोत्साहित करेगी. इस फिल्म के बाद हर माता-पिता चाहेंगे कि उनका बच्चा बड़ा होकर एक शिक्षक बने. यह फिल्म गरीब बच्चों में एक उम्मीद की लौ जलाएगी कि वह कुछ अच्छा करे.

वहीं, अमीर बच्चों को और भी बेहतर करने की प्रेरणा मिलेगी कि हमें और अच्छा करना चाहिए. फिल्म सकारात्मक संदेश देगी. कुछ लोगों को डर था कि इस फिल्म के बाद कहीं आनंद कुमार बहुत बड़ा हीरो न बन जाए लेकिन हमारे पिता जी कहते थे कि बेटा तेरे जीवन में कभी समस्या आए तो डरना नहीं, जितना बड़ा विलेन जीवन में आएगा तू उतना बड़ा हीरो बनेगा.

लोगों को डर है कि कहीं मैं राजनीति में नहीं चला जाऊं, लेकिन मैं साफ कर देना चाहता हूं कि मेरी राजनीति में जाने की कोई इच्छा नहीं है. मैं अपने शिक्षण संस्थान को और आगे बढ़ाना चाहता हूं.

‘सुपर 30’ पर बनी बायोपिक के लिए कास्टिंग और प्रोडक्शन में आपका सहयोग रहा है. क्या इस बायोपिक का आइडिया आपका ही था?

बायोपिक का आइडिया मेरा नहीं था. दरअसल साढ़े आठ साल पहले संजीव दत्ता मेरे पास आए थे, संजीव इस फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर भी हैं. उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि इस पर एक फिल्म बनें.

मैंने शुरुआत में ज्यादा इच्छा नहीं जताई लेकिन बाद में जब वे अनुराग बसु को लेकर आए, तब हमें लगा कि फिल्म बननी चाहिए लेकिन अनुराग बसु ने इस फिल्म को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

आज से ढाई साल पहले संजीव दत्ता दोबारा आए, उन्होंने कहा कि अब सही वक्त आ गया है, फिल्म बननी चाहिए. इस बीच मधु मेंटेना से हमारी मुलाकात हुई, हमने विकास बहल को बतौर डायरेक्टर चुन लिया. पूरी टीम ने मिलकर सहमति जताई कि आनंद कुमार के किरदार के लिए ऋतिक रोशन सही रहेंगे.

फिल्म की स्क्रिप्ट 13 बार बदलवाने की भी खबरें हैं, इसमें कितनी सच्चाई है?

हां, यह सच है लेकिन इसका कारण यह था कि हम नहीं चाहते थे कि कल को झूठी बातें निकलकर सामने आएं. फिल्म में हमने कुछ लिबर्टी ली है. मैं नहीं चाहता था कि फिल्म में कुछ ऐसा दिखाया जाए जो वास्तव में हुआ ही नहीं हो.

यह पूरी तरह से बायोपिक है. जितने लोगों पर बायोपिक बनी है, उनका फिल्म में कभी इतना हस्तक्षेप नहीं रहा, लेकिन यहां मुझे पूरी तरह से फिल्म में इनवॉल्व रखा गया. ऋतिक ने कई बार मुझसे मुलाकात की. मेरे बोलने के तरीके, हाव-भाव को समझा. मैं जिस तरह से बोलता हूं, उसका 150 घंटे का वीडियो बनवाया. इसके लिए ट्रेनर भी रखा.

हमारे देश में विशेष रूप से बिहार में जिस तरह शिक्षा की स्थिति है. उस पर आप क्या कहेंगे?

पूरे देश में शिक्षा की स्थिति बहुत खराब है. सरकारी स्कूलों में हालत बेहद दयनीय है. मेट्रो शहरों और छोटे शहरों में बड़े आलीशान स्कूल हैं, लेकिन ऐसे कई पिछड़े गांव हैं, जहां बिजली और कंप्यूटर नहीं है.

पूरे देश में ऑनलाइन टेस्ट हो रहा है. आईआईटी ने ऑनलाइन एंट्रेस टेस्ट अनिवार्य कर दिया है, इससे गांव-देहात के बच्चों को परेशानी हो रही है. जब तक समान अवसर नहीं दिए जाएंगे तब तक देश में विकास की उम्मीद नहीं की जा सकती.

हालांकि, सरकार धीरे-धीरे प्रयास कर रही है. हम एचआरडी मंत्रालय से गुजारिश करते हैं कि आईआईटी एंट्रेस एग्जाम को तुरंत ऑनलाइन नहीं करें. ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों रखे. जब पूरी तरह से कंप्यूटर जागरूकता फैले, तब बेशक इसे पूरी तरह से ऑनलाइन कर दिया जाए.

आपका एडमिशन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में हुआ था लेकिन आप नहीं जा पाए. आज क्या लगता है, अगर कैम्ब्रिज गए होते तो जिंदगी कुछ अलग होती?

अगर कैम्ब्रिज गए होते तो अच्छा होता लेकिन उससे अच्छा ये हो गया. मेरे पिता कहते थे कि बेटा तुम जिस भी परिस्थिति में हो, उस परिस्थिति में तुम सबसे बढिय़ा क्या कर सकते हों, वही करो. खराब परिस्थित में भी अच्छा करो. खराब परिस्थिति भी अच्छे के लिए आती है.

अगर कैम्ब्रिज चले जाते तो लोगों का इतना प्यार नहीं मिलता, इतने छात्रों को प्रोत्साहित नहीं कर पाते. देश में लाखों ऐसे बच्चे हैं, जो हमसे और हमारे बच्चों से प्रेरणा लेकर मेहनत करते हैं और कर रहे हैं. फिल्म के बाद इनकी संख्या बढ़ेगी. अगर कैम्ब्रिज जाता तो शायद इतने बड़े पैमाने पर बदलाव लाने का मुझे मौका नहीं मिलता.

फिल्म में एक संवाद है कि अब राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, अब वहीं राजा बनेगा जो हकदार होगा. आपको क्या लगता है कि हमारे देश में मौजूदा समय में अमीर और गरीब के बीच की जो खाई है, वह लगातार बढ़ रही है.

हमारे देश में आज तक गरीब का इतिहास बनने नहीं दिया गया. इतिहास उन्हीं का बना, जो सक्षम थे, जो ताकतवर थे. कभी भी गरीब और दबे-कुचलों के संघर्ष को नहीं दिखाया गया. गरीब लोगों को इतिहास बहुत छोटा होता है. देश में अमीर-गरीब की खाई, शिक्षा व्यवस्था की खाई बहुत गहरी है, जिसे पाटने की जरूरत है.

‘सुपर 30’ को लेकर किस तरह की योजनाएं हैं?

हम इसका विस्तार करेंगे. एक स्कूल खोलने की योजना है, जिसमें छठी कक्षा से बच्चों को दाखिला दिया जाएगा. फिल्म के ऐलान के बाद लोगों की ‘सुपर 30’ से भी उम्मीदें बढ़ी हैं. मेहनत करेंगे कि लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरें.

आप शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण को किस तरह से देखते हैं?

इस पर सबकी राय अलग हो सकती है. बहुत लोग कहते हैं कि आनंद कुमार सिर्फ दलित के बच्चों को पढ़ाता है, जो बिल्कुल गलत है. मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमारे यहां जाति और धर्म के नाम पर आरक्षण नहीं है. यहां उन्हीं बच्चों को चुना जाता है, जो जरूरतमंद हो और जिनमें पढऩे की ललक हो. उनके धर्म या जाति से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. (द वायर)

 

 


Date : 12-Jul-2019

-प्रेम शंकर झा
वरिष्ठ पत्रकार
भाजपा के हाथों कांग्रेस को मिली करारी शिकस्त को एक महीने से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी थी।
कांग्रेस के केवल एक वरिष्ठ नेता, वीरप्पा मोइली ने उन्हें वो बात बताने का साहस किया, जो पार्टी का हर सदस्य जानता था, उनकी चुप्पी का एक-एक दिन इस धारणा को मजबूती दे रहा है कि उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है और राजनीति से पूरी तरह से संन्यास ले लिया है।
एक ऐसी पार्टी के लिए जिसने पूरी ताकत से सामूहिक नेतृत्व को हतोत्साहित किया है और जो मतदाताओं को रिझाने के लिए नेहरू-गांधी वंश के फीके पड़ते करिश्मे पर पहले से भी ज्यादा निर्भर हो गई है, यह मौत को गले लगाने जैसा है।
राहुल गांधी ने कांग्रेस का अध्यक्ष पद भले ही अनमने ढंग से स्वीकार किया हो, लेकिन उन्होंने इस पद के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को स्वीकार किया था। इसलिए वे कितनी भी निराशा में क्यों न डूबे हों, उनका फर्ज बनता था है कि वे अपने साथ पार्टी को भी तबाह न करें। उनके सामने मौजूद चुनौती ग्रीक नायक प्रमथ्यु जैसी रही। किसी जमाने में पूरे देश पर कांग्रेस का सिक्का चलता था, लेकिन पिछले चार दशकों से कांग्रेस लगातार अपनी बची-खुची जमीन को ही बचाए रखने की नाकाम कोशिश करती रही है।
आज कांग्रेस के सामने चुनौती पार्टी का कायाकल्प एक ऐसी पार्टी के तौर पर करने की है, जो अपने पुराने वैभव और साम्राज्य के बिखर जाने की टीस से बाहर निकल कर यह कबूल करे कि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और बचाव की मुद्रा से बाहर निकलकर आक्रामक अंदाज में खेलना शुरू करे।
ऐसा करने के लिए कांग्रेस पार्टी को गांधी, नेहरू, सरदार पटेल, आजाद जैसों के खून पसीने से तामीर किए गए राष्ट्र के प्रति नए जज्बे से भरना होगा। इन महान नेताओं ने एक धार्मिक और जातिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त देश का सपना देखा था, जिसमें अनेक सांस्कृतिक-भाषाई राष्ट्रीयताएं बराबरी के साथ रह सकती थीं और तरक्की कर सकती थीं। कांग्रेस अगर केवल अपने शुरुआती दिनों के आदर्शवाद को दोबारा पाने में सफल रहती है, तब यह आज के युवा के आदर्शों को देश की आज़ादी के नायकों के 'आइडिया ऑफ इंडिया' से जोडऩे में कामयाब होगी।
इस रास्ते पर पहला कदम निश्चित रूप से औपचारिक तौर पर सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति की विदाई होना चाहिए। सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति सॉफ्ट सेकुलरिज़्म (धर्मनिरपेक्षता) की नीति का विकास है। सतत तुष्टीकरण की इस नीति को 1980 के दशक में  पार्टी ने तब अपनाया जब भारतीय लोकतंत्र के भीतर सबसे प्रमुख और दबदबे वाली पार्टी की इसकी स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
1985 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना और 1985 में ही तीन तलाक के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटना इस यात्रा का एक निर्णायक मोड़ था। उसके बाद से यह एक के बाद एक समझौते करती गई और आखिरकार जनता के बीच इसने नैतिक आधार खो दिया।
बांग्लादेश के कट्टरपंथियों से सुरक्षा की तलाश में भाग कर भारत आईं तसलीमा नसरीन को जब भारत के मुस्लिम कट्टरपंथियों ने देश से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया, तब यह हाथ पर हाथ धर कर मूकदर्शक बनी रही और ऐसा होने दिया। इसने सलमान रश्दी के सैटेनिक वर्सेज को प्रतिबंधित कर दिया।
गुजरात को जोसेफ लेलीवेल्ड की महात्मा गांधी पर किताब को प्रतिबंधित करने दिया; रामायण पर एके रामानुजन के अध्ययन को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से बाहर हो जाने दिया और शिकागो की विद्वान वेंडी डोनिगर की हिंदुत्व पर किताब को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया।
सबसे शर्मनाक यह था कि भारतीय देवी-देवताओं के विवादास्पद चित्रों के कारण विश्व हिंदू परिषद द्वारा देश से बाहर कर दिए गए एमएफ हुसैन मरने के लिए भी अपने वतन नहीं लौट पाए, जिससे वे प्यार करते थे।
2014 की हार के बाद कांग्रेस की सॉफ्ट धर्मनिरपेक्षता ने विकृत होकर सॉफ्ट हिंदुत्व का रूप ले लिया है। गुजरात चुनाव से पहले पार्टी द्वारा राहुल गांधी के मंदिर जाने, उनके वहां पूजा करने और माथे पर टीका लगाने को जिस तरह से प्रचारित किया गया, वह पतन की पराकाष्ठा थी। लोगों के पास पहले से रिकॉर्ड ऐसे कॉल्स आने लगे, जिनमें पूछा जाता था कि 'क्या आप नहीं जानते हैं कि राहुल गांधी एक जनेऊधारी हिंदू (यानी ब्राह्मण) हैं?'
सॉफ्ट हिंदुत्व ने न सिर्फ देश के पहले से ही संकटग्रस्त धर्मनिरपेक्ष आवाजों को और हाशिये पर धकेल दिया, बल्कि इसने संघ के कट्टर हिंदुत्व को भी वैधता प्रदान करने काम किया।
जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने ढिठाई से स्वामी विवेकानंद की विरासत पर दावा किया, जिस तरह से आरएसएस के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल को हथियाया और कांग्रेस मूकदर्शक बनकर यह सब देखती रही और जिस तरह से उन्होंने पिछले साल गांधी जयंती के अवसर पर गांधी की विरासत पर घृणित दावा किया, वह इस बात का जीता-जागता सबूत है।
इस कार्यक्रम में राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों ही मौजूद थे, लेकिन विरोध में वॉकआउट करने की जगह वे चुपचाप बैठे रहे और मोदी को भारत के सबसे गर्वीली विरासत को हथियाने की कोशिश करते देखते रहे। ऐसा लगा मानो उनके लिए नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या इतिहास की कोई दुर्घटना मात्र हो- जैसे 1914 में सराजेवो में एक अकेले पागल धर्मांध गैवरिलो प्रिंसिप द्वारा किया कुकृत्य और जैसे 2002 का अहमदाबाद नरसंहार कभी हुआ ही न हो।
अगर कांग्रेस वापसी करना चाहती है, तो उसे अपनी अतीत की गलतियों पर आत्मविश्लेषण करने में लंबा समय लगाना चाहिए। अगर इस हार में कांग्रेस कोई अच्छी चीज खोजना चाहती है, तो उसे यह समझना होगा कि आगे होनेवाली विचारों की लड़ाई में कोई बीच का रास्ता नहीं है।
हिंदुत्व के जहर से लडऩे के लिए कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद जैसे आयातित और घिसे-पिटे शब्दों को तोते की रटना बंद करना चाहिए और उस पथप्रदर्शक दर्शन को फिर से खोजना चाहिए, जो ढाई हजार साल से ज्यादा समय से भारत में माने जाने वाले हर मजहब या उपासना पद्धति का सारतत्व है। यह सारत्व है धर्म।
धर्म, वैदिक भारत की असली आस्था पद्धति है। वेदों में हिंदू धर्म का कोई संदर्भ नहीं मिलता है, क्योंकि हिंदू शब्द ही लगभग एक हजार साल बाद फारस (ईरान) से आया और इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा इसका प्रयोग करने वाले मुस्लिम थे।
धर्म आधुनिक और विवादास्पद अर्थों में मजहब का पर्यायवाची नहीं है क्योंकि उस समय तक उन मसीहाई या पैगंबरी धर्मों का जन्म ही नहीं हुआ था, जो आज धार्मिक बहसों में छाए हुए हैं। धर्म का अर्थ सही जीवन-पद्धति से है- इसमें लोगों के बीच आपसी और बाहरी व्यापक दुनिया के साथ उनके संबंधों के नियम तय किए गए थे।
ऋग्वेद विभिन्न प्रकार के धर्मों में भेद करता है, जैसे प्रथम धर्म, राज धर्म और स्वधर्म। लेकिन धर्म के ये सारे भेद मानवीय कर्तव्य के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं, जिसका अर्थ है धारण करना, सहारा देना और पालन करना। प्राचीनकाल के दौरान धर्म ने ही हिंदू धर्म में कर्मयोग का चोला पहन लिया।
गौतम बुद्ध ने चार आर्य सत्य (दुख, समुदय, निरोध, मार्ग) और अष्टांगिक मार्ग के अपने उपदेशों की व्याख्या करने के लिए 'धर्मÓ शब्द का इस्तेमाल किया। तुलनात्मक धर्म के पश्चिमी छात्रों ने बौद्ध को एक अलग धर्म के तौर पर प्रस्तुत करके बौद्ध धर्म के साथ अन्याय किया, क्योंकि इसने इसे कई मजहबों में से एक और मजहब बना दिया, जिसमें तीन मसीहाई धर्म जूडावाद, ईसाई धर्म और इस्लाम भी शामिल हैं।
गौतम बुद्ध द्वारा वैदिक पद का इस्तेमाल यह बाताता है कि वे खुद कोई पैगंबर समझने की जगह एक समाज सुधारक समझते थे। उन्होंने धर्म के भ्रष्टाचार और अधर्म के विकास के खिलाफ विद्रोह किया था। इसका कारण धार्मिक रूढि़वाद और ब्राह्मणवादी नियंत्रण था। वास्तव में बौद्ध धर्म मानव इतिहास में किसी संगठित धर्म के खिलाफ पहला विद्रोह था। बौद्ध धर्म को पैगंबरी धर्मों के साथ रखकर देखने से हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और अन्य रहस्यवादी धर्मों और मसीहाई धर्मों के बीच का एक महत्वपूर्ण अंतर कुहासे में छिप जाता है।
मसीहाई धर्मों में आस्था का सार्वजनिक तौर पर ऐलान करना पड़ता है। इनमें से किसी धर्म का होने के लिए उस धर्म के प्रति पूरा समर्पण और दूसरे धर्मों को अस्वीकार करना पड़ता है। यह 'सच्चे' ईश्वर के सामने अपना पूरा समर्पण है, जिसका इनाम इस जीवन में प्रायश्चित के रास्ते पापों से मुक्ति की संभावना है। इसके उलट धर्म को जीवन में उतारना पड़ता है, उसे जीना पड़ता है। सिर्फ इस जीवन के अच्छे कर्म ही आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दे सकते हैं, न कि किसी पैगंबर के प्रति पूर्ण समर्पण। और इसमें पापों से मुक्ति का रास्ता भी आसान नहीं है।
बौद्धमत को -बौद्ध धर्म के तौर पर पुकारना हिंदू तरीका है और आज भी हिंदुओं द्वारा अक्सर की जानेवाली टिप्पणी- 'ये मेरा धर्म है'  इसके सारत्व को प्रकट करता है। (द वायर)


Date : 12-Jul-2019

-कुमार प्रशांत
क्या आपको याद है कि अभी-अभी कोलकाता से एक मेडिकल वायरस चला था जो देखते-देखते सारे देश में फैल गया था? सभी इंतजार करते रहे कि कोई आला डॉक्टर आएगा और हमें बताएगा कि कहां से आकर, कहां तक फैला है, यह वायरस ! इसके पीछे-पीछे राजनीतिक बदबू क्यों फैली है? किसी ने इन सवालों का कोई जबाव तो नहीं दिया, लेकिन, धीरे-धीरे डॉक्टरों के झुंड-के-झुंड इसके शिकार होते गए।  वायरस का नाम था - 'डॉक्टरोसेफलाइटिस' !  
कहानी इतनी ही थी कि कोलकाता में किसी डॉक्टर की, किसी मरीज के परिजन ने पिटाई कर दी ! बस, 'डॉक्टरोसेफलाइटिस' पैदा हुआ और देखते-देखते देश भर के डॉक्टर इसकी चपेट में आ गये। डॉक्टर की पिटाई बहुत बुरी बात है। पिटाई के कारणों में गए बिना भी कहा जा सकता है कि किसी भी हाल में, किसी पर हमला करना, किसी की मार-पिटाई करना एकदम अस्वीकार्य है। यह मनुष्यता को नीचे गिराने जैसा है। डॉक्टरी पेशे के कारण मिली ताकत से कोई डॉक्टर किसी मरीज की 'पिटाई' करे या मरीज या उसके परिजन अपने मनमाफिक न होने के कारण किसी भी तरह की हिंसा करें, यह समान रूप से निंदनीय है।
लेकिन एक डॉक्टर की पिटाई का बदला हजारों डॉक्टर मिलकर मरीजों को और उनके परिजनों को पीट कर लें, यह भी पूर्णत: अस्वीकार्य है। अपराध एक का और सजा दोषी-निर्दोष का विवेक किए बिना सबको, यह किस तरह सही हो सकता है ? हर सांप्रदायिक दंगा, हर जातीय उन्माद यही तो करता है ! यह इसलिए भी नहीं कहा जा रहा कि डॉक्टरी एक 'नोबल प्रोफेशन' है, कि यह सेवा का क्षेत्र है। नहीं, यह आज पूर्णत: व्यापार-धंधा है जिसकी सारी नैतिक भित्ती एक-एक कर ढह चुकी है। इस खंडहर में यदि कोई कहीं है जो सेवा की लौ जलाए बैठा है तो वह उसकी निजी पसंद है, उसके पेशे का स्वभाव नहीं है। 
चिकित्सा के व्यापार-धंधे में लगे दूसरे डॉक्टर, अपने बीच के ऐसे डॉक्टरों को पसंद नहीं करते हैं, उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। मनुष्य के सबसे कमजोर क्षणों से जुड़ा यह पेशा आज सबसे कुटिल व हृदयहीन पेशा बन चुका है, लेकिन हम सिर्फ  डॉक्टरों से ऐसी शिकायत कर सकते हैं क्या?  जब इतने बड़े बहुमत से बनी सरकार ने 'मॉब लिंचिंग' को कानून-व्यवस्था बनाये रखने के आम प्रशासनिक ढांचे में शुमार कर लिया है, तब डॉक्टर-मरीज एक-दूसरे का इलाज 'मॉब लिंचिंग' से करें, तो हैरान होने जैसा क्या है?
डॉक्टर और मरीज का रिश्ता एक अजीब-सी बुनियाद पर खड़ा है। लोग चाहते हैं कि वे शरीर के साथ जैसी भी चाहें मनमानी करें, जो भी चाहें खाएं-पीएं, जैसे चाहें रहें-चलें, लेकिन उन्हें ऐसा कुछ हो ही नहीं कि जिससे उनके मस्त जीने में खलल पड़े! 'खाना, पीना, ऐश करना'- आज का जीवन-मंत्र बन गया है। यह सरासर गलत ही नहीं, अवैज्ञानिक भी है, शरीर-शास्त्र के विपरीत जाता है। डॉक्टर बना या बनने की युक्ति में लगा यह जो आदमी हमारे सामने, गले में स्टेथस्कोप डाले खड़ा है, यह भी इसी धकमपेल में से पैदा हुआ है। इसके लिए हर आदमी एक मौका है, शिकार है कि जिसे वह कहता है कि तुम चाहे जैसे रहो, जो करो, जो खाओ-पियो चिंता नहीं, हम तुम्हें ठीक कर देंगे, काम के लायक बना कर रखेंगे। शर्त बस इतनी है कि इसका जो खर्च मैं मांगूं, वह देते जाना। यह समीकरण एकदम ठीक चलता है। इस धकमपेल में दोनों ने अपनी-अपनी सुविधा का रास्ता बना लिया है।
परेशानी वहां खड़ी होती है जहां इसमें एक वह तत्व आ जुड़ता है जो बीमार है। वह इलाज के लिए डॉक्टर चाहता है, लेकिन उसकी गांठ ढीली है। अब सामने डॉक्टर तो कहीं है नहीं, जो है वह तो 'ले और देÓ वाले समीकरण का एक खिलाड़ी है। वह बीमार को देख कर खुश होता है, उसकी जेब देख कर नाक-भौं सिकोड़ता है। आखिर डॉक्टर-मरीज के बीच की तनातनी अधिकांशत: सरकारी अस्पतालों में क्यों होती है ? देश के सभी सरकारी अस्पतालों की हालत ऐसी है कि वहां स्वस्थ आदमी भी बीमार हो जाए! काम करने वाले डॉक्टरों, स्टॉफ, नर्स आदि से लेकर मरीजों और उनके परिजनों तक के लिए कम-से-कम बुनियादी सुविधाएं भी वहां उपलब्ध नहीं हैं। 
बीमार सरकारें खुद को जिंदा रखने में ही इस कदर व्यस्त हैं कि बीमारों की यह दुनिया उनके यहां दर्ज भी नहीं होती। फिर भी अस्पताल चलते हैं, हजारों जरूरतमंद रोज इन दरवाजों तक पहुंचते हैं। एक तरफ  तनावग्रस्त, ऊबा हुआ, अपनी जरूरतों के नाकाफी होने से त्रस्त अस्पताल और डॉक्टर है तो दूसरी तरफ  बीमारी से टूटा हुआ, साधनहीनता के दबाव से निराश, हताश मरीज व उसके परिजन! जब ये दोनों रूबरू होते हैं तो किसी में, किसी के प्रति सम्मान या सहानुभूति का एक कतरा भी नहीं होता। मरीज के प्रति अमानवीयता की हद तक कठोर और डॉक्टरों के प्रति अमानवीयता की हद तक हिकारत-ऐसे दो प्राणियों का यह आमना-सामना सुखद कैसे हो सकता है ? नतीजा हर तरह की कुरुपता में सामने आता है।
डॉक्टरों की हड़ताल उनकी और भी खुदगर्ज तस्वीर बनाती है। मारपीट की घटनाएं निंदनीय हैं, सख्त कार्रवाई की मांग करती हैं, लेकिन यह कार्रवाई कौन करे? डॉक्टर करें कि प्रशासन? सरकारी अस्पतालों में प्रशासन की जिम्मेवारी है कि वह अस्पताल और कर्मचारियों की सुरक्षा करे। अस्पताल की जिम्मेवारी है कि उसका हर घटक मरीजों से इस तरह पेश आए कि उसके बीमार मन में कृतज्ञता का भाव पैदा हो। सरकार की जिम्मेवारी है कि वह जन-स्वास्थ्य केन्द्रों की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधन मुहैया कराए तो डॉक्टरों की जिम्मेवारी है कि वे मरीज से मशीनी नहीं, मानवीय रिश्ता बनाएं। मरीज और उनके परिजनों की जिम्मेवारी है कि वे डॉक्टरों को भगवान नहीं, अपना सहायक इंसान मानें और उस नाते वह सारा सम्मान दें जो एक इंसान को दिया ही जाना चाहिए। ऐसा हुआ तो आप पाएंगे कि टकराहट के अधिकांश कारण खत्म हो गए हैं। इस पर भी किसी ने, किसी के साथ गलत किया तो उसे कानून के हवाले किया ही जा सकता है। 
अब एक बड़ा सवाल डॉक्टरों से पूछना बाकी रह जाता है। आपका काम बीमार का इलाज करना भर नहीं है। आपका काम है कि आप ऐसा इलाज करें कि मरीज को दोबारा आपके पास आने की सामान्यत: जरूरत ही न पड़े। आप मरीज को एटीएम मशीन न समझें, मरीज आपको नया 'शायलॉक' न समझे। ऐसा कैसे हो? बीमार का स्वास्थ्य उसकी मु_ी में ला देना, यही डॉक्टर की सही भूमिका है, लेकिन डॉक्टर करते क्या हैं? वे मरीज को सदा-सर्वदा के लिए अपनी मु_ी में रखना चाहते हैं। यह चिकित्सा के धंधे का 'वोट बैंक' है। वोट बैंक की राजनीति की तरह यह भी अनैतिक है। जब तक यह चलेगा, डॉक्टरों को कोई भी संरक्षण नहीं दे सकेगा और न सामान्य जन का कभी इलाज ही हो सकेगा। स्वास्थ्य का स्वावलंबन और स्वावलंबन के लिए चिकित्सा ही इसका सही इलाज है। (सप्रेस)
(लेखक गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष हैं।)


Date : 11-Jul-2019

शिवप्रसाद जोशी
21वीं सदी के ‘गुलाम’ 
अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ (फीफा) ने विवादों के बावजूद कतर को 2022 के वल्र्ड कप की मेजबानी सौंपी। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि कतर में स्टेडियम और होटल आदि बनाने पहुंचे विदेशी मजदूरों की बुरी हालत है।

क्या है मकसद
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की जगह बनाया गया था। परिषद का मकसद था दुनिया में मानवाधिकारों को प्रोत्साहित करना और इस दिशा में काम करना। इसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में है। इसके सदस्य हर साल तीन बार, मार्च, जून और सितंबर में मिलते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों से मानवाधिकार अदालतों का गठन ना किए जाने को लेकर जवाब तलब किया है। ऐसी अदालतों से क्या इंसाफ जल्द मिल पाएगा।
मानवाधिकार सुरक्षा अधिनियम, 1993 के मुताबिक सभी राज्यों के प्रत्येक जिले में फास्ट ट्रेक मानवाधिकार अदालत का गठन उन राज्यों के हाई कोर्टों की देखरेख और दिशा-निर्देश के आधार पर किया जाना था लेकिन कई वर्ष बीत जाने के बाद भी ये काम लंबित पड़ा है। इन खास अदालतों में सरकारी वकीलों की नियुक्तियां भी लंबित है।
भारत में मानवाधिकारों के हनन के बढ़ते मामलों और हाल में आई विभिन्न रिपोर्टों के बीच, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच कानून की एक छात्र भाविका फोरे की याचिका पर ये सुनवाई कर रही है। याचिका के मुताबिक देश के 29 राज्यों और सात संघ-शासित प्रदेशों के सभी 725 जिलों में मानवाधिकार हनन के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रेक विशेष अदालतों के गठन किया जाना चाहिए था जो अब तक नहीं हुआ है।
मीडिया में प्रकाशित याचिका के अंशों के मुताबिक एक व्यक्ति के बुनियादी अधिकारों के संरक्षण और हिफाजत का अपरिहार्य दायित्व राज्य का है और इसके लिए उसे अदालतों के जरिए कम खर्च वाला, प्रभावशाली और जल्द से जल्द इंसाफ दिलाने वाला मुकदमा लडऩे में हर तरह की सहायता मुहैया करानी चाहिए। पिछले दिनों अमरीकी विदेश मंत्रालय के मानवाधिकार से जुड़े ब्यूरो की ओर से जारी इंडिया ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट 2018 का हवाला भी याचिका में दिया गया है।
रिपोर्ट में मानवाधिकारों की स्थिति को चिंताजनक बताया गया था। इसमें पुलिस क्रूरता, टॉर्चर, हिरासत में मौत, फर्जी मुठभेड़, जेलों की दुर्दशा, मनमानी गिरफ्तारियां, अवैध हिरासत, झूठे आरोप, मुकदमा लडऩे में रुकावटें आदि जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि भारत ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए अमेरिका को नसीहत भी दी है।
लेकिन बात सिर्फ अमरीकी रिपोर्ट की नहीं है। दुनिया भर के अन्य स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों और एजेंसियों ने भी भारत के मानवाधिकारों के रिकॉर्ड को सकारात्मक तो नहीं बताया है, चाहे वो एमनेस्टी इंटरनेशनल हो या ह्यूमन राइट्स वॉच हो। दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और आदिवासियों पर हिंसा के मामले हों या अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिशें- इन संस्थाओं ने ऐसे मामलों को अनदेखा तो नहीं होने दिया है।
देश में कुछ समूह इन संगठनों पर देश की छवि खराब करने का आरोप भी लगाते हैं और कई बार तो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह जैसी अवांछित टिप्पणियां भी देखने सुनने को मिल जाती हैं। लेकिन तमाम लांछनों के बावजूद क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि मानवाधिकारों को लेकर एक निर्मम उदासीनता तो यहां पसरी हुई है। देश के भीतर मानवाधिकार कार्यकर्ता और संगठन समय समय पर अपनी आवाज उठाते ही रहे हैं और इधर पिछले दो ढाई दशकों से ये लड़ाइयां जटिल और कठिन हुई हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना मानवाधिकार सुरक्षा अधिनियम के तहत ही की गई थी। 1993 में गठित इस आयोग ने अब तक कई मामलों में अपना स्टैंड साहस और विवेक के साथ रखा लेकिन पीडि़तों को इंसाफ दिला पाने में आयोग की कोशिशें नाकाफी ही कही जाएंगी।
आयोग की अपनी वैधानिक शक्ति के बावजूद देखा गया है मानवाधिकार हनन का मामला चाहे समाज के उग्र समूहों, लंपटों और दबंगों की ओर से हो या सरकारी मशीनरी की ओर से- आयोग का कोई भय ऐसी शक्तियों को रह नहीं गया है। आयोग की फटकार और कार्रवाइयों के ऊपर राजनीतिक दबदबा अपना प्रभाव दिखाने लगता है। जबकि अध्यादेश के जरिए जो शक्तियां केंद्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य के आयोगों को हासिल हुई हैं वे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की पूरी हिफाजत करती हैं।
याचिका में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक पुराने आंकड़े के हवाले से हालात की गंभीरता की ओर अदालत का ध्यान दिलाने की कोशिश की गई है। उसके मुताबिक आयोग ने 2001 से 2010 के बीच पाया था कि पुलिस और न्यायिक हिरासत में 14231 लोगों की मौत हुई थी। 1504 मौतें पुलिस हिरासत में और 12,727 मौतें न्यायिक हिरासत में हुईं। और ये भी पाया गया कि ज्यादातर मौतें टॉर्चर की वजह से हुई थी। हिरासत में मारपीट और बलात्कार के आंकड़े अलग हैं।
वर्ष 2006 से 2010 तक बलात्कार के 39 मामले कस्टडी के दौरान सामने आए थे। लेकिन हिंसा और जघन्यता का ये आंकड़ा आगे भी अपनी भयानकता में बना रहा है। और पुलिस या जांच एजेंसियों तक ही सीमित नहीं है। ऑनलाइन पत्रिका द क्विंट के मुताबिक सितंबर 2015 से अब तक देश के 95 नागरिक मॉब लिंचिंग का शिकार हुए हैं।
अब सवाल है कि क्या मानवाधिकारों वाली अदालतें बन जाएंगी तो इंसाफ मिल पाएगा। इसका कोई सीधा जवाब नहीं है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसी अदालतों की जरूरत ही न हो। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए ही जवाब तलब किया है।
न्यायिक व्यवस्था की कमजोरियां, जजों की कमी, लंबित मामलों का पहाड़, अदालती पेचीदगियां, आर्थिक संसाधनों की कमी जैसे कई अवरोध सामने हैं लेकिन संवैधानिक गरिमा तो यही कहती है कि अवरोधों को दूर कर इंसाफ दिलाने की मुहिम थमनी नहीं चाहिए। मानवाधिकारों के हनन पर मुस्तैदी से काबू पाना ज्यादा जरूरी है। फिर चाहे वो हिरासत में हिंसा हो या समाज में दबंगों की हिंसा। राजनीतिक मंशा सही रहे तो मानवाधिकारों का हनन इतना आसान नहीं। (डॉयचेवेले)

 

 


Date : 11-Jul-2019

कंपनियां कल्चर्ड मांस के उत्पादन की ओर बढ़ रही हैं। उन्हें लगता है कि जैसे जैसे उत्पादन बढ़ेगा, सस्ता होने पर ज्यादा से ज्यादा लोग इसे खरीदने में दिलचस्पी लेंगे।

लैब में बनाया जाने वाला मांस पहली बार आज से छह साल पहले दुनिया के सामने 280,000 डॉलर (आज के करीब 1।92 करोड़ रूपये) की कीमत वाले हैमबर्गर के रूप में पेश किया गया था। यूरोपियन स्टार्ट-अप्स का कहना है कि यह दो साल के भीतर 10 डॉलर मूल्य की एक पैटी के रूप में सुपरमार्केट में आ सकता है। गुड फूड इंस्टीट्यूट मार्केट रिसर्चर के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, पशु कल्याण और अपने स्वयं के स्वास्थ्य के बारे में चिंतित उपभोक्ताओं की तथाकथित स्वच्छ मांस में रुचि बढ़ रही है। यही वजह है कि 2016 के अंत में इस पर काम करने वाले स्टार्ट-अप्स की संख्या चार से शुरू होकर केवल दो सालों में दो दर्जन से अधिक हो गई।
पौधों पर आधारित मांस के विकल्प की मांग भी बढ़ रही है। मई में सार्वजनिक तौर पर पेश किए जाने के बाद से बियॉन्ड मीट के शेयरों की कीमत में तीन गुना से अधिक की वृद्धि हुई है। बियॉन्ड मीट और इम्पॉसिबल फूड्स दोनों अमेरिका में खुदरा विक्रेताओं और फास्ट फूड चेनों को सौ फीसदी पौधों से बनने वाला मांस बेचते हैं। खाने की प्लेटों पर पहुंचवे वाली अगली पेशकश पशुओं की कोशिकाओं से बनने वाला मांस हो सकता है। इसके उत्पादक प्राधिकरण की मंजूरी मिलने की ताक में हैं ताकि वे प्रौद्योगिकी में सुधार कर इसकी लागत को और कम कर सकें।
2013 में कृत्रिम तरीके से बने मीट वाला पहला हैमबर्गर दिखाते प्रोफेसर मार्क पोस्ट।
2013 में डच स्टार्ट-अप मोसा मीट के सह-संस्थापक मार्क पोस्ट ने 250,000 यूरो (280,400 डॉलर) की लागत से पहला कलचर्ड बीफ हैमबर्गर बनाया था। पैसे की व्यवस्था गूगल के सह-संस्थापक सर्गेई ब्रिन द्वारा की गई थी। लेकिन मोसा मीट और स्पेन के बायोटेक मीट का मानना है कि तब से उत्पादन लागत में गिरावट आई है। मोसा मीट की प्रवक्ता ने कहा, 2013 में बर्गर महंगा था क्योंकि तब इसकी खोज शुरूआती दौर में थी और काफी कम उत्पादन था। एक बार जैसे ही उत्पादन बढ़ता है, हमें उम्मीद है कि एक हैमबर्गर की कीमत 9 यूरो के आसपास आ जाएगी। यह एक पारंपरिक हैमबर्गर से भी सस्ता हो सकता है।
बायोटेक फूड्स के सह-संस्थापक मर्सिडीज विला ने मांस के प्रयोगशाला से कारखाने तक जाने के महत्व के बारे में बताया। विला ने कहा, हमारा लक्ष्य 2021 तक मंजूरी लेने के बाद इसका उत्पादन करना है। उन्होंने कहा कि एक किलोग्राम कल्चर्ड मांस के उत्पादन की औसत लागत अब लगभग 100 यूरो है। वहीं, अमेरिका की मीट प्रोसेसिंग कंपनी टायसन फूड्स की फंडिंग की सहायता से एक इजरायली बायोटेक कंपनी फ्यूचर मीट टेक्नोलॉजीज ने एक साल पहले 800 डॉलर की लागत से एक किलो मीट का उत्पादन किया था।
बायोटेक फूड्स, मोसा मीट और लंदन स्थित कंपनी हायर स्टेक मांस के उत्पादन के लिए यूरोपीय संघ की मंजूरी लेने का आवेदन करने वाले हैं। वे अभी भी सीरम में सुधार के लिए और काम कर रहे हैं। कल्चर्ड मांस बनाने के लिए, एक जानवर की मांसपेशियों से निकाली गई स्टेम कोशिकाओं को एक माध्यम में रखा जाता है जो बाद में एक बायोरिएक्टर में डाल दिया जाता है। इससे नई मांसपेशियों का विकास होता है। इस नई तकनीक के समर्थकों का कहना है कि मांस की मांग को पूरा करने का यह एकमात्र पर्यावरण-सम्मत तरीका है। दरअसल संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन को लगता है कि 2000 और 2050 के बीच मांस की मांग दोगुनी हो जाएगी।
हालांकि, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक पर्यावरण वैज्ञानिक जॉन लिंच ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि लैब में विकसित मांस उत्पादन वास्तव में पारंपरिक मांस उत्पादन की तुलना में ऊर्जा और पोषक तत्वों के लिहाज से ज्यादा प्रभावी होगा। वे कहते हैं, कुछ अध्ययनों ने सुझाव दिया है कि परम्परागत पशुधन उत्पादन की तुलना में कल्चर्ड मांस को फीड स्रोत की कम, लेकिन ऊर्जा की अधिक आवश्यकता हो सकती है। यदि ऐसा है, तो जलवायु पर उनका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि यह ऊर्जा कहां से आती है।
(डायचे वैले)

 

 


Date : 11-Jul-2019

गिरीश मालवीय

स्वागत कीजिए देश की पहली प्राइवेट ट्रेन का! जी हां, दिल्ली और लखनऊ के बीच चलने वाली तेजस एक्सप्रेस देश की पहली प्राइवेट ट्रेन होगी।  जो उन हजारों बेरोजगारों की छाती पर से दौडऩे वाली है, जो सरकारी रेलवे में नौकरी का सपना संजोए बैठे हुए हैं।
इंडियन रेलवे कोई छोटी-मोटी संस्था नहीं है। भारतीय रेलवे 12,000 से अधिक ट्रेनों का संचालन करता है, जिसमें 2 करोड़ 30 लाख यात्री रोज यात्रा करते हैं। भारतीय रेल लगभग एक ऑस्ट्रेलिया को रोज़ ढोती है।  रेलवे में करीब 17 लाख कर्मचारी काम करते हैं और इस लिहाज से यह दुनिया का सातवां सबसे ज़्यादा रोजग़ार देने वाला संस्थान है। इस लिहाज से इसका निजीकरण किया जाना ऐसे प्रश्न खड़े करता है जिस पर तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
यदि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में निजीकरण की तरफ बढऩे की गति 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 थी तो मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में यह गति 2, 4, 8, 16, 32, 64, 128, 256 की तरह होने वाली है। केंद्र सरकार ने तमाम विरोध के बीच आखिरकार रेलवे के निजीकरण की ओर दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार पकड़ ली है।  सरकार रेलवे के कॉरपोरेटीकरण और निजीकरण पर आक्रामक तरीके से आगे बढऩा चाहती है। 
मोदी-1 में 2014 सितम्बर में, भारतीय रेल में वित्त जुटाने की सिफारिशें देने के लिए, भारतीय रेल ने बिबेक देबरॉय समिति का गठन किया था। जून 2015 को प्रस्तुत बिबेक देबरॉय समिति की रिपोर्ट में रेलवे के निगमीकरण की सिफारिश की गई थी और कहा गया था कि सरकार के रेल मंत्रालय को सिर्फ नीतियां बनाने का काम करना चाहिए, जबकि निजी खिलाडिय़ों को यात्री व माल सेवा प्रदान करनी चाहिए।  कमेटी की सिफ़ारिशों में तर्क दिया गया कि ब्रिटेन की तरह ट्रेन संचालन के काम को पटरियों से अलग कर देना चाहिए।
इस समिति की सिफारिशों के रेलवे कर्मचारियों ने पुरजोर विरोध किया, पीएम मोदी ने भी साल 2015 में वाराणसी के डीजल लोको वक्र्स के मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा था कि रेलवे का निजीकरण नहीं किया जाएगा।
लेकिन जैसे ही मोदी सरकार दुबारा चुनकर आई उसने सबसे पहला जो काम किया वह यह था कि तेज गति से रेलवे के निजीकरण ओर, निगमीकरण की ओर आगे बढ़ा जाए। इसके तहत रेलवे बोर्ड से एक एक्शन प्लान-100 तैयार करने को कहा गया, जिस पर 100 दिन के भीतर ही कार्रवाई करने के आदेश दिए गए। इसके तहत आइआरसीटीसी को लखनऊ से दिल्ली सहित दो रूटों पर निजी क्षेत्र की मदद से प्रीमियम ट्रेन चलाने और रेल कोच फैक्ट्री रायबरेली, कपूरथला सहित सभी प्रोडक्शन यूनिटों का निगमीकरण का लक्ष्य रखा गया है।
लेकिन रेलवे के निजीकरण करने में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। 
कोई भी प्राइवेट ऑपरेटर घाटे वाले ट्रेक पर गाडिय़ां नहीं दौड़ाएगा। वो उसी ट्रेक पर ऑपरेट करेगा जो जेब भरे पर्यटकों के रूट हो यानी निजी पूंजीपति सिर्फ रेलवे के मुनाफ़ेदार रास्तों में ही रुचि रखेंगे, जो माल ढोने में या बुलेट रेलगाडिय़ों जैसी अमीरों के लिए सेवा में होगा। भारतीय रेल के पास सिर्फ घाटे में चलने वाले रेलमार्ग बचेंगे, जिसमें करोड़ों लोग कम भाड़े में अमानवीय परिस्थिति में यात्रा करेंगे। यही मोदी सरकार की योजना है जिन रेल कोच फैक्टरियों का निगमीकरण किया जा रहा है वह लगातार मुनाफा कमा रही थी।
यह निगमीकरण ओर निजीकरण रेलवे को पूरी तरह से बर्बाद कर देगा। यह तथ्य हम जितना जल्दी समझ ले उतना अच्छा है।

 


Date : 10-Jul-2019

डॉ. संजय शुक्ला

कांग्रेस की ताकत महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और बाबा साहब भीमराव आंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे लोग रहे हैं। इस पार्टी ने इन महापुरुषों के विचारधारा में चल कर विशाल वट-वृक्ष का स्वरूप अख्तियार कर लिया जिसकी जड़ें देश के अमूमन सभी राज्यों में मजबूती के साथ जम गई। 
कालांतर में इस पार्टी को लाल बहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी का नेतृत्व मिला तब तक यह पार्टी विपक्ष के लिहाज से चुनौतीहीन थी। ऐसा नहीं था कि उस दौर में विपक्ष में चेहरे का आभाव था, उस दौर में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के खिलाफ विचारधारा के पैरोकार या कहें कि देश के विभाजन के मुखालफत करने वाले दक्षिणपंथी विचारधारा के तपे तपाए चेहरा पं दीनदयाल उपाध्याय., श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर धुर समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, जयप्रकाश नारायण, जार्ज फर्नांडीस, कर्पूरी ठाकुर जैसे लोग भी थे लेकिन ये इंदिरा के सामने संख्या बल के लिहाज से चुनौतीहीन ही थे। 
हालांकि उनके विचारों में जमीनी हकीकत थी लेकिन लोकतंत्र में सत्ता का नियंता संख्या बल ही तय करता है। इसके बावजूद इन नेताओं के आवाजों ने संसद से लेकर सडक़ तक हलचल पैदा की थी यह लोकतंत्र का वह दौर था जब वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेहरू से लेकर इंदिरा उन्हें सम्मान देते रहे और उनसे निरंतर संवाद कायम रखा। तबके नेतृत्व यानि इंदिरा जी को चुनौती पार्टी के भीतर से ही मिलती रही चाहे निजलिंगप्पा, नीलम संजीव रेड्डी, देवराज अर्स हों या फिर सिंडिकेट । 
बहरहाल कांग्रेस को विपक्ष की पहली चुनौती 1977 में मिली जब देश ने आपातकाल की घोर काली अमावस्या के बाद संयुक्त विपक्ष के सरकार के रूप में नया सबेरा देखा लेकिन इस मोर्चे के ताश का महल कुछ माह में इंदिरा की आंधी में भरभराकर गिर गया। इसके बाद इंदिरा और राजीव का तिलिस्म कायम रहा। राजीव गांधी के बाद विपक्ष एक बार फिर चुनौती के रूप में उभरा लेकिन यह चुनौती इंडिया शाइनिंग के नारे को निस्तेज कर पुन: सोनिया गांधी को उभार दे गया। 
दस साल तक मनमोहन सिंह के हाथों सत्ता की कमान सौंपने के साथ सोनिया गांधी सत्ता की सुप्रीमो बनी रही। लेकिन राहुल गांधी के दौर में पार्टी आज बुरी तरह से चुनौतियों से जूझ रही है आज पार्टी का ही अस्तित्व संकट में प्रतीत होने लगा है। अहम प्रश्न क्या कांग्रेस मुक्त भारत की ओर देश बढ़ रहा है? जिस पार्टी के मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों को यह भरोसा नहीं रहता था कि कल की सुबह उनके पास कुर्सी रहेगी कि नहीं? उस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष इस्तीफा देकर पंद्रह दिनों बाद यह दुख जाहिर करने के लिए विवश है कि उनके द्वारा इस्तीफे की पेशकश करने के बावजूद पार्टी के किसी ने पद छोडऩे की मंशा जाहिर नहीं की। बहरहाल इस पीड़ा के बाद इस्तीफों की झड़ी लग गई। 
लेकिन अहम बात यह कि इस्तीफा कांग्रेस के संकट का हल नहीं है। फिर से एक बार प्रश्न क्या देश कांग्रेस मुक्त भारत की ओर बढ़ रही है? क्या कांग्रेस के पास अस्तित्व रक्षा का संकट है? नहीं, हरगिज नहीं। न तो देश कांग्रेस मुक्त होगा और न ही कांग्रेस के अस्तित्व पर कोई संकट है। कांग्रेस को इस चुनौती से निबटना होगा अपनी ताकत को सहेजना होगा क्योंकि यह 133साल पुरानी देश की  सबसे बड़ी पार्टी है जिसकी पैठ शहरों से गांवों तक है। भले ही बूढा वट-वृक्ष सूखने के कगार पर हो लेकिन इसकी जड़े गहरी है इन जड़ों में अभी बहुत जान है जरूरत इन जड़ों में खाद और पानी डालने की है।
यकीन मानिए एक दिन इसी दरख्त से नई कोपलें फूटेंगी जरूरत केवल और केवल एकजुटता, संघर्ष, समन्वय और धैर्य की है। कांग्रेस को उन छद्म मालियों से बचने की दरकार है जो रात के अंधेरे में इस बूढ़े दरख्त पर कुल्हाड़ी चलाने के फिराक में हैं।
कांग्रेस को जरूरत अब अपनी उस ताकत को फिर से सहेजने या हासिल करने की है जिसे हालात ने क्षीण कर दिया और इसका जवाबदेह वह स्वयं है। कांग्रेस के ताकत का जिक्र शुरू के लाइनों में है आज अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कांग्रेस के खाते में केवल और केवल पं जवाहरलाल नेहरु ही बच गए हैं जो हर किसी साफ्ट टार्गेट में हैं। बाकी सत्ताधारी पार्टी ने महात्मा गाँधी, सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस से अलग ही कर दिया तो बसपा ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर को अपने पाले में डाल लिया। सुनियोजित साम्प्रदायिक वोटों के ध्रुवीकरण के चलते कांग्रेस मौलाना आजाद को भी फ्रेम से बाहर कर चुकी है। 
वाह री कांग्रेस उसके खुद के घर से उनके कीमती धरोहर पार होते रहे और उनके दरबान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। लोकतांत्रिक परंपरा में विचारधारा ही किसी पार्टी की रीढ़ होती है लेकिन कांग्रेस जिन महापुरुषों के विचारधाराओं पर चलती रही उन्हें ही बेदखल कर दिया गया। कमजोर रीढ़ की पार्टी को अपने बलबूते खड़े होने के लिए फिर से आंतरिक बल और आत्मविश्वास की जरूरत है। पार्टी को उन महापुरुषों और विचारधारा को फिर से मुख्यधारा में लाना होगा और इसके लिए पार्टी को चिंतन और प्रशिक्षण शिविर की जरूरत है। इन शिविरों में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर आम सदस्यों को एक ही पंगत में बैठने की दरकार है। 
पार्टी को धारा 370, कश्मीर समस्या, तीन तलाक, राम मंदिर, महिला आरक्षण विधेयक, आतंकवाद, राष्ट्रवाद, नक्सलवाद, आर्थिक नीति, रोजगार और साम्प्रदायिकता पर अपना स्टैंड स्पष्ट करना होगा। पार्टी के पुराने और नए नेताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करते हुए जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को अहमियत देनी होगी। पार्टी में चाटुकारिता पसंद नेताओं और चाटुकारों को हतोत्साहित करना होगा। राजीव जी और राहुल के दौर में पनपे आक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसे यूनिवर्सिटी के अंग्रेजीदां थिंक टैंकरों को रूखसत करना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण कांग्रेस के नेताओं और आम कार्यकर्ताओं को भाजपा के धैर्य, अनुशासन, संगठन, निष्ठा और वाक शैली से सीख लेनी होगी।
हालांकि हाल के दिनों में इसमें कुछ गिरावट आई है लेकिन फिर भी नियंत्रण में है वहीं पार्टी को ममता बनर्जी के केवल जुझारूपन को अपनाना चाहिए। और हां कांग्रेस को कुछ गैर जरूरी प्रयोगों जैसे युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के संगठनात्मक चुनावों से भी बचना होगा क्योंकि इन चुनावों में धनबल और बाहुबल का भारी पैमाने पर उपयोग हो रहा है और इससे वंशवाद को भी बढ़ावा मिल रहा है।  कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रादेशिक स्तर पर ऐसे प्रवक्ताओं की नियुक्ति करनी होगी जिनमें पढऩे, लिखने की आदत हो और जिसके पास प्रत्यनुमति बुद्धि और तर्कक्षमता हो। पार्टी में ऐसे लोगों को ढूंढना टेढ़ी खीर नहीं है जरूरत ऐसे लोगों को अंदरखाने से निकालने की है। 
कांग्रेस को अब समझना और मानना होगा कि उसका परंपरागत वोट बैंक या उसकी एक और ताकत दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, गरीब और किसान अब उससे छिटक गए हैं और न ही उनके पार्टी में ऐसा कोई जनाधार वाला नेता बचा है जो मोदी और कथित राष्ट्रवाद की आंधी में अपने खुद की जमीन बचाने का माद्दा रखता हो।आज जरूरत इनका फिर से विश्वास हासिल करने की है। 2018 के विधानसभा चुनावों में तीन राज्यों में कांग्रेस की वापसी कांग्रेस की विजय नहीं अपितु भाजपा की हार थी। क्योंकि 6 माह बाद हुए लोकसभा चुनाव में इन राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस की करारी हार ने कांग्रेस के गुब्बारे में फिर से छेद कर दिया है।
 आने वाले समय में राजस्थान और मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार को बचाए रखना पार्टी के लिए अहम चुनौती होगी क्योंकि कर्नाटक के बाद लोकतंत्र का चीरहरण इन राज्यों में होना तय है।बहरहाल कांग्रेस को अब भगदड़, किंकर्तव्यविमूढ़ता और अनिश्चितता की स्थिति से बाहर आना ही होगा। अंत में महत्वपूर्ण यह कि कांग्रेस कभी भी नेहरु-गांधी परिवार से अलग नहीं हो सकती क्योंकि इस परिवार ने शहादत भी इसी पार्टी के खातिर दी है। भारत को नेहरू - गांधी परिवार की प्रतिच्छाया वाली कांग्रेस पार्टी चाहिए कि नहीं इसका फैसला देश के करोड़ों लोगों पर छोड़ देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में राजनीति और राजनेता के भविष्य तय करने की जिम्मेदारी इसी पर है। 

 

 

 


Date : 10-Jul-2019

प्रज्ञा बाजपेयी
सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पिछले कुछ समय से अपने साम्राज्य की आक्रामक घरेलू और विदेशी नीतियों पर पर्दा डालने के लिए कथित उदारवादी सुधारों को लाकर सऊदी अरब की एक अलग छवि गढऩे की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद वह अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को दबा नहीं पा रहे हैं।
यमन में सऊदी बमों से मरने वाले नागरिकों की बढ़ती संख्या, इस्तांबुल के सऊदी दूतावास में पत्रकार जमाल खशोगी की खौफनाक हत्या और रियाद के ईरान को लेकर आक्रामक रवैये की वजह से सऊदी के सुन्नी सहयोगी भी प्रिंस को समर्थन देने के अपने फैसले पर दोबारा विचार करने को मजबूर हो गए हैं।
फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल महीने में लीबिया के सबसे विख्यात सुन्नी मौलवी ग्रैंड मुफ्ती सादिक अल-घरीआनी ने सभी मुस्लिमों से इस्लाम में अनिवार्य माने जाने वाली हज तीर्थयात्रा का बहिष्कार करने की अपील की। उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर कोई भी शख्स दूसरी बार हज तीर्थयात्रा करता है तो यह नेकी का काम नहीं बल्कि पाप होगा। 
इस बहिष्कार की अपील के पीछे तर्क ये है कि मक्का की तीर्थयात्रा के जरिए सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। मजबूत अर्थव्यवस्था के जरिए सऊदी की हथियारों की खरीद जारी है जिससे यमन और अप्रत्यक्ष तौर पर सीरिया, लीबिया, ट्यूनीशिया, सूडान और अल्जीरिया में हमलों को अंजाम दिया जा रहा है। मौलवी सादिक ने आगे कहा कि हज में निवेश करना, मुस्लिम साथियों के खिलाफ हिंसा करने में सऊदी की मदद करना होगा।
सादिक पहले विख्यात मुस्लिम स्कॉलर नहीं है जो हज पर बैन का समर्थन कर रहे हैं। सुन्नी मौलवी और सऊदी अरब के प्रखर आलोचक युसूफ अल-काराडावी ने अगस्त महीने में फतवा जारी किया था जिसमें हज की मनाही की गई थी। इस फतवे में कहा गया था कि भूखे को खाना खिलाना, बीमार का इलाज करवाना और बेघर को शरण देना अल्लाह की नजर में हज पर पैसा बहाने से ज्यादा अच्छा काम है।  
सऊदी अरब का प्रभाव केवल राजनीतिक और सैन्य तौर पर ही नहीं है बल्कि इस्लाम के साथ इसका ऐतिहासिक रिश्ता भी काफी अहमियत रखता है। इस्लाम के दो सबसे प्रमुख तीर्थस्थल मक्का और मदीना दोनों सऊदी अरब में ही हैं और यहीं काबा और पैगंबर मोहम्मद की मजार भी है। यही वजह है कि सऊदी अरब का प्रभाव केवल अरब पड़ोसियों ही नहीं बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया पर है। हर साल करीब 23 लाख मुस्लिम हज के लिए मक्का जाते हैं। इस्लाम के साथ इस रिश्ते की वजह से सुन्नी अरब दुनिया नियमित तौर पर सऊदी साम्राज्य से मार्गदर्शन लेती रही है। 
ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रान्ति और पूरे क्षेत्र में इसके फैल जाने के डर से सऊदी अरब ने खुद को इस्लाम के ब्रैंड के तौर पर पेश करने के लिए दुनिया भर में मस्जिदों की फंडिंग में लाखों डॉलर्स खर्च किए। सऊदी अरब खुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में पेश करता रहा है।
कई बरसों से सऊदी अरब मध्य-पूर्व में क्षेत्रीय अधिनायक बनने की तरफ कदम आगे बढ़ा रहा है जिसे एकमात्र चुनौती ईरान से मिल रही है। दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देशों में से एक और यूएस का करीबी होने की वजह से सऊदी अरब को दशकों से अपने पड़ोसी देशों का समर्थन आसानी से हासिल होता रहा है।
खशोगी की हत्या में शाही परिवार की संलिप्तता के पर्याप्त सबूत होने के बावजूद ट्रंप प्रशासन सऊदी की किसी भी तरह की भूमिका होने से इनकार करता रहा है। यूएस ने भले ही आंखें मूंद ली हों लेकिन मुस्लिम जगत सऊदी को माफ करने के मूड में नजर नहीं आ रहा है।
मध्य-पूर्व और कई मुस्लिम बहुल देशों में खशोगी की हत्या को लेकर सबके मन में आक्रोश पनपा है। यमन में सऊदी नीत गठबंधन द्वारा हवाई हमले में मरने वालों की बढ़ती संख्या भी मुस्लिमों को चिंतित कर रही है। यमन में हॉस्पिटल और बच्चों की स्कूल बसों को भी निशाना बनाया गया। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र ने यमन युद्ध को मानवजनित सबसे खतरनाक संकट बताया।
सऊदी अरब के यमन युद्ध को लेकर रवैये ने उसे अपने ही सहयोगियों से दूर कर दिया है, यहां तक कि अमीराती सरकार भी सऊदी के रुख से असहज हुई है।
सऊदी अरब के इसी रुख की वजह से कई देश उसे हथियारों की बिक्री पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट ने हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सऊदी के साथ हथियार समझौते का विरोध किया। जर्मनी ने भी पिछले साल अक्टूबर महीने से ही सऊदी के साथ ऐसे समझौतों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। इसी क्रम में, स्विटजरलैंड और इटली भी सऊदी किंगडम के साथ हथियारों की बिक्री पर रोक लगाने की तरफ कदम आगे बढ़ा रहे हैं। हाल ही में एक ब्रिटिश कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सऊदी अरब के साथ हथियारों के समझौते गैर-कानूनी हो सकते हैं। इस्लामिक स्कॉलर सादिक ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि सऊदी का बहिष्कार करने के लिए हज ना करने जाएं।
पिछले कुछ दशकों के उलट इस बार सऊदी अरब का बहिष्कार पंथों के मतभेद से भी ऊपर उठ चुका है। वर्ष 2011 में  रियाद ने बहरीन के अनुरोध पर विद्रोहों का बुरी तरह दमन कर दिया था। सुन्नी शासन वाले बहरीन में शिया मुस्लिमों ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। इराकी कार्यकर्ताओं ने सऊदी उत्पादों का बहिष्कार करने की अपील कर इस पर प्रतिक्रिया दी थी। उस वक्त इराक के तत्कालीन प्रधानमंत्री नूरी अल-मालिकी ने कहा था कि अगर सऊदी नीत हिंसा जारी रहती है तो मध्य-पूर्व में पंथों के बीच युद्ध छिड़ सकता है।
वर्तमान में सऊदी साम्राज्य के बहिष्कार की अपीलें केवल शिया समुदाय से नहीं आ रही हैं बल्कि हर समुदाय इस पर एकजुट हो रहा है। ट्विटर पर कम से कम 16,000 ट्वीट्स के साथ ट्रेंड कर रहा है। दुनिया भर के सुन्नी मौलवी भी हज के बहिष्कार की अपील कर रहे हैं। ट्यूनीशियन यूनियन ऑफ इमाम ने जून महीने में कहा था कि हज से सऊदी प्रशासन को मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल दुनिया भर के मुस्लिमों की मदद करने में नहीं किया जाता है बल्कि यमन की तरह मुस्लिमों की हत्या और उन्हें विस्थापित करने में किया जा रहा है।
इस्लाम के पांच स्तंभों में से हज को एक प्रमुख स्तंभ माना गया है और यह मुस्लिमों के लिए अनिवार्य कर्तव्य भी है लेकिन बहिष्कार की ये मांग इशारा करती है कि सऊदी के प्रति चिंताएं कितनी वास्तविक हैं। अगर यह ट्रेंड जारी रहता है तो यह सऊदी अरब के लिए न सिर्फ इस्लाम के लिहाज से बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकता है।
सऊदी की अर्थव्यवस्था में हज तीर्थयात्रा की बहुत बड़ी भूमिका है और इससे करीब 12 अरब डॉलर की आय होती है। हज से होने वाली कमाई तेल के अलावा सऊदी की आय का सबसे प्रमुख स्रोत है। सऊदी की सरकार द्वारा लग्जरी होटलों पर निवेश को देखते हुए 2022 तक तक इस कमाई के 150 अरब डॉलर पहुंचने की उम्मीद है। इस निवेश से सऊदी को काफी मुनाफा हो रहा है लेकिन बढ़ते खर्च की वजह से कई गरीब मुस्लिमों के लिए हज यात्रा मुश्किल हो गई है।
यह पहली बार नहीं है जब किसी धार्मिक तीर्थयात्रा का राजनीतिकरण किया गया है। सऊदी अरब ने पिछले कुछ वर्षों में कतर और ईरान के नागरिकों को हज तीर्थयात्रा की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। सऊदी अधिकारियों ने मक्का की पवित्रता का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार करने में भी किया।
पिछले साल अक्टूबर महीने में एक उपदेश के दौरान मक्का की मुख्य मस्जिद के इमाम शेख अब्दुल-रहमान अल-सुदैस ने कहा था, इस पवित्र भूमि में सुधार और आधुनिकता से पूर्ण रास्ते पर।।।युवा, महत्वाकांक्षी और दैवीय ताकतों से प्रेरित सुधारक क्राउन प्रिंस की देखभाल में हम तमाम दबावों और धमकियों के बीच आगे बढ़ रहे हैं। इस संदेश का यही संकेत था कि किसी भी मुस्लिम को सऊदी राजनीतिक परिवार पर सवाल नहीं खड़े करने चाहिए।

खशोगी की हत्या और यमन युद्ध में अपनी भूमिका से ध्यान हटाने के लिए सऊदी अरब ने मई महीने में मक्का में आपातकालीन शिखर वार्ता बुलाई ताकि ईरान पर वापस ध्यान केंद्रित किया जा सके। शिखर वार्ता के दौरान अरब नेताओं, जीसीसी (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल, इस्लामिक दुनिया) से सऊदी ने अपील की है कि हर तरह से ईरान को अपने आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से रोकना होगा।
सऊदी अरब के क्षेत्र में कम होते रुबते का एक सबूत तब मिला जब इराक ने ईरान की निंदा वाले बयान का खुले तौर पर विरोध किया था। यही नहीं, इराक ने ईरान के प्रति समर्थन का संदेश दिया और दूसरे देशों से भी ईरान को स्थिर बनाने की अपील की। मक्का में शिखर वार्ता के दौरान, इराक के राष्ट्रपति बरहम साली ने ईरान के संदर्भ में कहा, ईमानदारी से बात की जाए तो पड़ोसी देश की स्थिरता मुस्लिम और अरब राज्यों के हित में है। शिखर वार्ता के दौरान ही सऊदी अरब इस्लामिक सहयोग संगठन से भी ईरान को अलग-थलग कराने में नाकामयाब रहा। 
यमन में मौतों के बढ़ते आंकड़ों के साथ पूरी दुनिया में सऊदी अरब के आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक बहिष्कार की अपील तेज हो गई है और यह केवल हथियारों की बिक्री तक सीमित नहीं है। रियाद को पश्चिम में भी दोस्तों की कमी पड़ गई है और अब इसके क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच भी दरार पड़ती नजर आ रही है। अगर ट्रंप प्रशासन को दूसरा कार्यकाल नहीं मिलता है तो सऊदी अरब के कुछ ही अंतरराष्ट्रीय दोस्त बचे रह जाएंगे और उसके मुस्लिम व अरब दुनिया का नेता होने के दावे को बुरी तरह से नुकसान पहुंचेगा। (आजतक)

 

 


Date : 09-Jul-2019

हिमांशु शेखर

13 विधायकों के इस्तीफे के बाद कर्नाटक की कांग्रेस-जेडीएस सरकार एक बार फिर से खतरे में है। 

कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेकुलर की गठबंधन सरकार एक बार फिर से खतरे में है। कांग्रेस के 13 विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया है। अभी इन विधायकों का इस्तीफा विधानसभा के स्पीकर ने स्वीकार नहीं किया है। ये सभी विधायक मुंबई के एक होटल में हैं। अगर इनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाता है तो कर्नाटक की एचडी कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ जाएगी और भाजपा का बहुमत हो जाएगा।
इस बीच कुमारस्वामी सरकार के सभी 21 मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है। कहा जा रहा है कि विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने वाले विधायकों को मंत्री बनाकर वापस कांग्रेसी खेमे में लाने के मकसद से मंत्रियों के इस्तीफे लिए गए हैं। कर्नाटक में चल रहे इस राजनीतिक नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की ओर से लगातार भाजपा पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि भाजपा कर्नाटक सरकार को अस्थिर करके अपनी सरकार बनाना चाहती है।
2018 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद कई बार यह स्थिति आई जब लगा कि भाजपा एचडी कुमारस्वामी की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। लेकिन सुनी-सुनाई है कि इस बार कहानी कुछ अलग है। इस बार कर्नाटक में जो कुछ हो रहा है उसमें भाजपा से अधिक कांग्रेस का खुद का हाथ बताया जा रहा है।
कहा जा रहा है कि अगर भाजपा को कुमारस्वामी सरकार को अस्थिर करना होता तो इसके लिए पार्टी संसद का सत्र खत्म होने तक इंतजार करती। क्योंकि संसद के सत्र के दौरान अगर भाजपा कर्नाटक में कुछ गड़बड़ करती है तो उसका असर संसद की कार्यवाही पर भी पडऩा तय है। मोदी सरकार को इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने हैं। इसके लिए राज्यसभा में उसे विपक्षी दलों का भी साथ चाहिए होगा। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि ऐसी स्थिति में भाजपा कर्नाटक में कोई गड़बड़ करके संसद में अपनी स्थिति खराब करना नहीं चाहेगी।
कर्नाटक में जो भी सियासी घटनाक्रम चल रहा है, उसके पीछे कांग्रेस का हाथ होने की कई वजहें बताई जा रही हैं। पहली बात तो यही कही जा रही है कि अपने मुकाबले आधी सीटों वाली जेडीएस को 14 महीने तक मुख्यमंत्री पद देने के बाद अब कांग्रेस को लग रहा है कि किसी भी तरह से एचडी कुमारस्वामी पर दबाव बनाकर उनसे मुख्यमंत्री का पद ले लिया जाए। लोकसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने कम सीटों वाली जेडीएस को मुख्यमंत्री की कुर्सी देने का निर्णय लिया था। अब उसे लगता है कि कुमारस्वामी को बनाए रखने का राजनीतिक तौर पर कोई खास लाभ नहीं है।
लोकसभा चुनावों में जेडीएस का प्रदर्शन बहुत ही बुरा रहा। पार्टी के सबसे बड़े नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा तक इस बार चुनाव हार गए और जेडीएस को सिर्फ एक ही सीट पर सफलता मिल सकी। कांग्रेस को भी एक ही सीट से संतोष करना पड़ा। जेडीएस की इस कमजोर स्थिति को देखते हुए कर्नाटक कांग्रेस के कुछ नेताओं को लग रहा है कि उस पर दबाव बनाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी वापस लेने का यही सही वक्त है। अभी कांग्रेसी दबाव को अगर कुमारस्वामी नहीं मानते हैं और भाजपा के पाले में जाते हैं तो वहां भी उन्हें मुख्यमंत्री का पद नहीं मिलेगा। ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि कुमारस्वामी के पास मुख्यमंत्री पद छोडऩे के बावजूद कांग्रेस के साथ बने रहने के अलावा कोई दूसरा व्यवहारिक विकल्प नहीं है।
सुनी-सुनाई तो यह भी है कि कुमारस्वामी के देश से बाहर होने की स्थिति का लाभ उठाते हुए कर्नाटक में जो कुछ चल रहा है, उसकी पटकथा कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने तैयार की। इसमें भी पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि लगातार ये दोनों नेता कह रहे हैं कि वे इस्तीफा देने वाले कांग्रेसी विधायकों के संपर्क में हैं और वे सभी विधायक कांग्रेस के पाले में वापस आ जाएंगे। कुछ खबरों में भी दावा किया गया है कि इस्तीफा देने वाले विधायकों में अधिकांश सिद्धारमैया के करीबी हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि कांग्रेस की सहमति से ही इस्तीफा देने वाले विधायकों ने मुंबई में ठहरने का निर्णय लिया। महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार है और इस राज्य की राजधानी में विधायकों को ठहराने से लोगों के बीच यह संकेत जाएगा कि इस पूरी उठापटक के पीछे भाजपा का हाथ हो सकता है।
अब यह खबर आ रही है कि कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर जब तक 13 कांग्रेसी विधायकों के इस्तीफे पर विचार करेंगे तब तक इन्हें सरकार में मंत्री पद का प्रस्ताव देकर मना लिया जाएगा। लेकिन अगर ऐसा हो जाता है तो भी अब इस बात की काफी संभावना है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री का पद कुमारस्वामी के पास नहीं रहेगा। उस हालत में कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के तौर पर सिद्धारमैया या डीके शिवकुमार के शपथ लेने की पूरी संभावना है। (सत्याग्रह)

 

 


Date : 09-Jul-2019

राजीव रंजन प्रसाद 

बस्तर पठार को अब मानसून सरोबार करने लगा है। चित्रकोट जलप्रपात अपने उफान पर आ गया है अत: यह भुला दिया गया है कि इंद्रावती नदी विलुप्तीकरण के भयावह खतरे से गुजर रही है। बस्तर का दुर्भाग्य यह है कि इस अंचल का सारा विमर्श नक्सलवाद पर केंद्रित आरंभ होता है और इसी पर समाप्त हो जाता है। इस परिस्थिति का लाभ यह है कि वे बुनियादी सवाल कभी भी राज्य की मुख्यधारा को नहीं कचोटते कि आज भी इस परिक्षेत्र का दो फीसदी से अधिक भाग सिंचित क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आता तथा कमोबेश कालेमेघा पानी दे पर कृषि सम्बद्ध परिस्थितिया निर्भर रहती हैं। इसके साथ यह ध्यान देना होगा कि मानसून में मृदा जो आद्रता समेटती है वह शीतकालीन जलीय आवश्यकताओं तक को पूरा नहीं कर पाती। मार्च का महीना आते-आते शुष्कता की स्थिति मृदा मे निर्मित होने लगती है, यदि समय पर मानसून ने दस्तक नहीं दी तो फिर हालात भयावह हो सकते हैं। ऐसे में बस्तर में जल-संग्रहण से जुड़ी किसी परियोजना पर कोई सोच विकसित क्यों नहीं हुई है? 
इंद्रावती नदी पर बात करनी है तो गोदावरी की चर्चा अवश्यंभावी है। इसका कारण यह है कि बस्तर पठार का लगभग 94.42 फीसदी भाग गोदावरी नदी प्रवाह क्षेत्र के अंतर्गत आता है। तेलांगाना नया निर्मित राज्य है, उसके विकास तथा सिंचन परिक्षेत्र में गोदावरी नदी क्या भूमिका निर्वहित कर रही है इसके लिए हाल की दो परियोजनाओं का विशेष उल्लेख आवश्यक है। पहली है - कालेश्वदरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना जो कि दुनिया की सबसे बड़ी मल्टी-स्टे-ज लिफ्ट सिंचाई परियोजना है। इस परियोजना के तहत गोदावरी नदी का पानी समुद्रतल से 100 मीटर लिफ्ट कर मेडिगड्डा बांध तक पहुंचाया जाएगा। यहां से पानी को 6 स्टेज तक लिफ्ट किया जाएगा और कोंडापोचम्मा सागर पहुंचाया जाएगा, जिसकी ऊंचाई 618 मीटर है। इस परियोजना से लगभग 45 लाख एकड़ जमीन पर दो फसलों के लिए सिंचाई की व्यवस्था होगी।
 इसके साथ ही राज्य में मिशन भागीरथ पेयजल आपूर्ति परियोजना के तहत 40 टीएमसी पानी उपलब्ध कराया जाएगा। तेलांगाना से ही गोदावरी नदी जे जल उपयोग से जुड़ा एक अन्य समाचार यह है कि केंद्र सरकार की पर्यावरण समिति ने गोदावरी नदी पर 2,121 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले बांध को पर्यावरण मंजूरी दे दी है। यह परियोजना तेलंगाना के जयशंकर भुपालापल्ली जिले में बननी है। प्रस्तावित पी.वी. नरसिम्हा राव कनथनपल्ली सुजल श्रवंती परियोजना के तहत गोदावरी नदी पर 23 मीटर ऊंचा और 1,132 मीटर लंबा बांध बनाया जाना है। इससे जयशंकर भुपालापल्ली, नालगोंडा और खम्माम जिलों में रबी के मौसम में सिंचाई सुविधाएं पहुंचाने में मदद मिलेगी। इन दोनो परियोजनाओं की लाभ-हानि पर विचार करने के साथ ही एक बात यह भी ध्यान रखने की है कि गोदावरी नदी को मिल रहे जल का एक बडा भाग इंद्रावती नदी अपने उस जलग्रहण क्षेत्र से प्रदान करती है जो बस्तर पठार का हिस्सा है। छत्तीसगढ को इन परियोजनाओं से क्या मिला? 
बस्तर में तो कोई बृहद सिंचाई अथवा जलविद्युत की परियोजना नहीं है लेकिन क्या ओडिशा ने इंद्रावती नदी के जल का अपके परिक्षेत्र में भरपूर उपयोग नहीं किया है? जिस दौर में बारसूर (दंतेवाड़ा) के निकट बोधघाट परियोजना का निर्माण कार्य आरंभ हुआ, ठीक उसी कालखण्ड में ओडिशा के नवरंगपुर के निकट भी 6 सौ मेगावाट विद्युत उत्पादन तथा सिंचाई परियोजना के लिये इन्द्रावती नदी ही पर बांध का निर्माण किया जा रहा था। इतना ही नहीं इस बीच बिना किसी विरोध और पर्यावरण के लिए हो हल्ले के ओडिशा ने इन्द्रावती के साथ साथ उसकी सहायक नदियों क्रमश: पोड़ागढ़, कपूर, मुरान के सम्पूर्ण जल को भी अपने रिजर्वायर में मिला लिया और बांध के सभी गेट बंद कर लिए। 
आज सूखे बस्तर के सुकमा जिसे से गुजरते हुए मलकानगिरि का रास्ता पकड़ कर ओडिशा का रुख कीजिए, अनेक छोटे -बड़े बांध और सिंचाई परियोजनाएं आपको दिखाई पडेंग़ी। साल भर और कई-कई फसलों को लेने का सिलसिला दिखाई पड़ेगा। ओडिशा राज्य इंद्रावती नदी के जल का बूंद-बूंद इस्तेमाल कर रहा है, परंतु छत्तीसगढ़ में क्या और कहां समस्या है? 
ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि बस्तर के बारसूर में प्रस्तावित तथा विरोध के बाद बंद कर दी गई बोधघाट बांध के समान ही इसी नदी पर बना ओडिशा का अपर इन्द्रावती बांध प्रभावित क्षेत्र भी समान रूप से सघन वनाच्छादित तथा जैव-विविधता से परिपूर्ण था। यह बात समझ से परे है कि एक ही समय की, एक ही नदी पर, एक ही जैसे वातावरण में लगभग एक जितनी ही क्षमता वाली दो परियोजनाओं में से एक का विरोध होता है तो दूसरी आराम से बन कर तैयार हो जाती है? क्या यह अंतर इसलिये था चूंकि वृहद मध्यप्रदेश के लिए तत्कालीन बस्तर पिछड़ा और राजनीति की दृष्टि से कम प्राथमिकता वाला जिला था जबकि ओडिशा सरकार योजनाबद्ध रूप से अपनी परियोजनाओं पर कार्य कर रही थी?
 उस दौर के कतिपय जानकारों का मानना है कि दंतेवाड़ा में निर्मित हो रही परियोजना के विरोध में ओडिशा के नितिनिर्धारकों की भी दूरगमी सोच और हाथ था। एक ही नदी-घाटी के अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम में बन रही दो परियोजनाओं के सुचारू रूप से संचालन के लिए वर्ष 1975 से 1979 के मध्य तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री प्रकाशचन्द्र सेठी एवं ओडिशा के मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी के मध्य जल बटवारे पर समझौता हुआ था जिसके तहत इन्द्रावती बांध से बोधघाट परियोजना के लिए 45 टीएमसी पानी छोडऩा आवश्यक था। अब न बोधघाट बांध रहा न ओडिशा सरकार की बाध्यता रही इसलिए कभी आठ टीएमसी पानी तो कभी तीन टीएमसी पानी इंद्रावती में छोड़ा जाता है। इसी कारण गर्मी का मौसम आते ही नदी बरसाती नाला बन कर रह जाती है, यहां तक कि चित्रकोट प्रपात पानी के लिए तरस जाता है। 
इन सवालों को खड़ा करने के पीछे मेरा उद्देश्य न तो बोधघाट परियोजना का समर्थन करना है, न ही विरोध। बड़ा प्रश्न यह है कि दिशा क्या होनी चाहिए? जो नदी ओडिशा और तेलांगाना का पेट भरती है वही बस्तर आ कर कैसे मरती है? ओडिशा और तेलांगाना इंद्रावती नदी जल का भरपूर दोहन करते रहें और बस्तर से केवल जल-जंगल-जमीन के नारे भर लगते रहने चाहिये? 
चलो, यह मान लिया जाए कि बस्तर की सभी जल-संचयन परियोजनाएं अव्यावहारिक हैं तो भी उन कारकों पर कभी बातें नहीं होती जो उनके न निर्मित किए जाने से उत्पन्न हो सकती हैं। उदाहरण के लिए इन्द्रावती नदी बस्तर से बहती हुई जा कर आन्ध्र के गोदावरी में जलवृद्धि करती है। ऐसा क्यों नहीं होता कि जिन वन क्षेत्रों में ‘पर्यावरण और विकास’ की बहसें सिचाई अथवा जल-विद्युत परियोजनाएं नहीं बनने देती वहां अपने संसाधन न इस्तेमाल करने के एवज में मुआवजा मिले? हमने इन्द्रावती को बहने दिया लेकिन गोदावरी अगर रोक ली गयी तो आन्ध्र मुआवजा दे अथवा केन्द्र क्षतिपूर्ति निर्धारित करे? गोदावरी नदी की बात करें तो उसके जलागम का लगभग चालीस हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र बस्तर के जंगलों से अबाध बहती सहायक नदियों के कारण है। 
बस्तर का हक है इस पानी पर और डाउनस्ट्रीम के प्रयोक्ता को इस पर रॉयल्टी क्यों नहीं देनी चाहिए? इसी तरह अपस्ट्रीम में निर्मित हुई परियोजनाओ को भी प्रभावित निचले क्षेत्रों को क्षतिपूर्ति तथा रॉयल्टी देनी ही चाहिए। यह तर्क स्वीकार है कि वृहत भारत के हित में नदियां इन जंगलों से तो अबाध ही बहेंगी, लेकिन बिजली न बना पाने और अपने प्यासे खेतों की क्षुधा न बुझा पाने की क्षतिपूर्ति बस्तर को क्यों न मिले? इस दिशा में भी सोचा जाना आवश्यक है।