विचार/लेख
-दयानंद पांडेय
इधर कुछ समय से एक जुमला बहुत तेज़ चल रहा है वह है, गोदी मीडिया। ख़ास कर मोदी वार्ड के मरीजों का यह बहुत प्रिय जुमला है। यह मरीज गोदी मीडिया का जिक्र ऐसे चिढकर करते हैं गोया उनका सब कुछ छिन गया हो। और कि ऐसे बताते हैं जैसे ऐसा पहली बार हो रहा है कि मीडिया सरकार के सुर में सुर मिला रही हो। मैं तो बहुत पहले से यह लिखता और मानता रहा हूं कि जब जिस की सत्ता, तब तिस का अखबार। और अब तो मीडिया काले धन की गोद में है। कॉरपोरेट सेक्टर के तहत है। यानी पूरी तरह दुकान है।
बहरहाल इमरजेंसी की याद कीजिए। गोदी मीडिया कहने वाले यही लोग तब इंदिरा गांधी के चरणों में साष्टांग लेटे हुए थे। इमरजेंसी के बाद जब जनता पार्टी की सरकार आई तो यही मीडिया फिर जनता सरकार के आगे लेट गई। तब के दिनों में विपक्ष में बैठी इंदिरा गांधी को यही मीडिया बिलकुल नहीं पूछती थी। इंदिरा गांधी बहुत परेशान हो गईं। कभी ब्रिटिश पीरियड में नेहरू भी इसी तरह परेशान थे कि मीडिया उन को भी घास नहीं डालती थी। उपेक्षा करती थी। बेबस हो कर नेहरू ने नेशनल हेरल्ड नाम से अंगरेजी अखबार खुद निकाला। कोआपरेटिव के तहत। बाद में हिंदी अखबार नवजीवन और उर्दू में कौमी आवाज़ भी निकाला। तीनों अखबार शानदार निकले।
बहुत दिनों तक इन अखबारों का जलवा कायम रहा। पर बाद में कांग्रेस और कांग्रेस की निरंतर मिजाजपुर्सी करते-करते इन अखबारों की चमक और धमक फीकी पड़ गई। आहिस्ता-आहिस्ता इन अखबारों की हालत खस्ता हो गई। धीरे-धीरे बंद ही हो गए। या फाइलों में ही छपने लगे। जनता के बीच से गायब। तो जनता सरकार के समय में मीडिया में अपनी छुट्टी होते देख इंदिरा गांधी ने नेशनल हेरल्ड , नवजीवन , कौमी आवाज़ को नया जीवन देने की तैयारी शुरू की। पर जनता सरकार , मोदी सरकार की तरह भाग्यशाली नहीं थी। कुछ कांग्रेस की नजऱ लग गई तो कुछ जनता पार्टी के लोगों की आपसी कलह के कारण जनता पार्टी की मोरार जी देसाई सरकार गिर गई।
फिर जनता पार्टी से टूट कर चरण सिंह की सरकार बनी , कांग्रेस के समर्थन से। प्रधान मंत्री चरण सिंह को बतौर प्रधानमंत्री लाल किले से भाषण देने का अवसर तो मिला पर संसद का मुंह देखने का अवसर नहीं मिला। संसद में विश्वास मत पाने का अवसर नहीं मिला। कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह सरकार गिर गई। फिर चुनाव हुए और कुल ढाई साल में ही इंदिरा गांधी फिर सत्ताशीन हो गईं।
एक प्रेस कांफ्रेंस में इंदिरा गांधी से नेशनल हेरल्ड के शुरू करने के बारे में जब पूछा गया तो पहले तो वह टाल गईं इस सवाल को। पर जब कई बार यह सवाल पूछा गया तो अंतत: इंदिरा गांधी ने जवाब दिया। इंदिरा गांधी ने बहुत साफ़ कहा कि अब जब सारे अखबार मेरी बात सुन रहे हैं और छाप रहे हैं तो नेशनल हेरल्ड को फिर से शुरू करने की ज़रूरत ही क्या है। यह वही दिन थे जब कांग्रेस के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष देवकांत बरुआ इंदिरा इज इंडिया का नारा दे रहे थे और तब की मीडिया भी खूब खुलकर इंदिरा इज इंडिया के नारे में सुर में सुर मिला रही थी।
आज की तरह तब सोशल मीडिया , वायर , कारवां , क्विंट जैसे जहरीले और एकपक्षीय वेबसाइट या एन डी टी वी जैसे तमाम एकपक्षीय चैनल वगैरह भी नहीं थे। सो तब के दिनों में गलत , सही सरकार जो भी कहे , वही सही था। बतर्ज न खाता , न बही , केसरी जो कहे , वही सही। यह वही दिन थे जब खुशवंत सिंह हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक और राज्य सभा में सदस्य भी थे। यह दोनों सौभाग्य संजय गांधी की कृपा से उन्हें मिले थे। खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा में बहुत साफ़ लिखा है कि हां , मैं संजय गांधी का पि_ू था।
तो अगर आज की तारीख में मीडिया का एक ख़ास पॉकेट मोदी का पि_ू बन गया है तो इस में अचरज क्या है भला। ब्रिटिश पीरियड से यह परंपरा जैसे भारतीय मीडिया का चलन बन गया है। मीडिया का एक ख़ास पॉकेट तो आज की तारीख में सोनिया और राहुल का भी पि_ू है। वामपंथियों का भी पि_ू है। जो इंदिरा गांधी के समय में मुमकिन नहीं था। हां , लेकिन पि_ू होते हुए भी तब की मीडिया इतनी एकपक्षीय और जहरीली नहीं थी। कुछ लाज-शर्म भी शेष थी तब की मीडिया में , जो अब लगभग मृतप्राय है। अभी आप आ जाइए न सत्ता में , मीडिया आप की। रही बात तानाशाही की तो इंदिरा गांधी ने 39 राज्य सरकारें बर्खास्त की थीं। नरेंद्र मोदी ने अभी तक एक भी राज्य सरकार बर्खास्त नहीं की है।
तो गोदी मीडिया का तराना गाने वाले पतिव्रता टाइप टिप्पणीबाजों के लिए अंजुम रहबर के दो शेर खर्च करने का मन हो रहा है-
इल्जाम आईने पर लगाना फिजूल है
सच मान लीजिए चेहरे पर धूल है।
हां, फिर भी लोग हैं कि स्तुति गान में लगे ही रहते हैं तो यह उनका कुसूर नहीं है। अंजुम रहबर का ही दूसरा शेर सुनिए:-
जिनके आंगन में अमीरी का शजर लगता है,
उनका हर ऐब भी जमाने को हुनर लगता है।
रही बात पत्रकारिता की तो आज की पत्रकारिता में कुछ नहीं धरा है। जो भी कुछ है, अब वह सिफऱ् और सिफऱ् भडुओं के लिए है। अब उन्हीं के लिए रह गई है पत्रकारिता। अब तो कोई गिरहकट भी अखबार या चैनल चला दे रहा है और एक से एक मेधावी, एक से एक जीनियस वहां पानी भर रहे हैं। एक मास्टर भी बेहतर है आज के किसी पत्रकार से। नौकरी के लिहाज़ से। कब किस की नौकरी चली जाए, कोई नहीं जानता। हर कोई अपनी-अपनी बचाने में लगा है। इसी यातना में जी रहा है। सुविधाओं और ज़रूरतों ने आदमी को कायर और नपुंसक बना दिया है। पत्रकारिता के ग्लैमर का अजगर बड़े-बड़े प्रतिभावानों को डंस चुका है। किस्से एक नहीं, अनेक हैं।
-रवि जैन
मशहूर अभिनेत्री और राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने बीते सोमवार को मुंबई के बांद्रा स्थित बाल गंधर्व सभागृह में एक आयोजन के दौरान जानी मानी पत्रकार बरखा दत्त से पैपराज़ी और मीडिया से अपने रिश्ते के बारे में बोलते हुए पैपराज़ी को मीडिया का हिस्सा मानने से इंकार कर दिया।
जया बच्चन ने पैपराजिय़ों को ‘गंदे-गंदे पैंट पहनकर और हाथ में मोबाइल लेकर चूहे की तरह कहीं भी घुस जाने वाला’ कहते हुए कड़े शब्दों में आलोचना? भी की। उनके इस बयान को मनोरंजन जगत के बड़े से बड़े आयोजनों और तमाम सितारों को कवर करने वाले पैपराज़ी 'वर्गवादी, गऱीब-विरोधी और भेदभावपूर्ण' ठहरा रहे हैं और इसे लेकर जया बच्चन की आलोचना का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
जया बच्चन के बयान से उपजे विवाद के बाद आगे से पूरी तरह से उनका बहिष्कार करने से लेकर उनके बंगले ’ के बाहर धरना देने तक की बातों पर पैपराज़ी की ओर से विचार किया जा रहा है।
फि़ल्मी सितारों को अपने कैमरे में क़ैद करने के लिए? दिन-रात भागदौड़ करने वाले कुछ नामचीन पैपराज़ी से बात करते हुए हमने उनकी राय जानने की कोशिश की है।
‘पहनावे से जज करना ग़लत’
बॉलीवुड में फ़ोटोग्राफऱ और कंटेंट क्रिएटर के रूप में अपनी एक पहचान रखने वाले विरल भयानी ने कहा, ‘इसमें कोई दो राय नहीं है कि जया जी को किसी से भी नाराज़ होने और अपनी नाराजग़ी जताने का पूरा हक़ है। वह उम्र में काफ़ी बड़ी हैं और ऐसे में अगर उन्हें किसी बात का बुरा लगे तो उन्हें किसी को डांटने का पूरा हक़ है। मगर मेरा मानना है कि जया जी ने जिस अंदाज़ में पैपराज़ी के ख़िलाफ़ बातें कहीं हैं, उस तरह से उन्हें पैपराज़ी की आलोचना नहीं करनी चाहिए थी। वैसे हर फोटो लेने वाला पैपराजी ही नहीं होता है।’
विरल यह भी जोड़ते हैं, ‘किसी की जाति, धर्म, स्किन कलर, शरीर की बनावट या फिर आर्थिक हैसियत को लेकर टिप्पणी करना किसी को भी शोभा नहीं देता क्योंकि यह नैतिक रूप से ग़लत है। बतौर पैपराजी हम सभी जया जी की बेहद इज़्ज़त करते हैं मगर उन्हें ‘गंदे पैंट पहनने वाले’ कमेंट से बचना चाहिए था और निजी टिप्पणी के बगैर ही अपनी बात को सलीके से कहना चाहिए था।’
बीते आठ सालों से बॉलीवुड सितारों को कवर करते आ रहे फोटोग्राफर और पैपराजी समुदाय का हिस्सा रहे स्नेह जाला तो जया बच्चन के कमेंट्स से ख़ासे आहत नजर आए।
स्नेह ने अपना विरोध दजऱ् कराते हुए कहा, "‘ दिन-रात सितारों और उनसे जुड़े बड़े-बड़े इवेंट्स को कवर करते रहते हैं। ऐसे में हम भी अपने दायरे में रहकर काम करने की कोशिश करते हैं ताकि किसी को भी किसी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े। जया जी ने जो कुछ भी कहा, वे बातें निजी तौर पर किसी भी शख़्स के लिए नहीं कही जानी चाहिए।’
स्नेह यह भी मानते हैं कि जया बच्चन जी को पैप कल्चर पसंद नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हम समझते हैं कि जया जी पैप कल्चर को नापसंद करती हैं, मगर एक सीनियर अभिनेत्री और वरिष्ठ पॉलिटिकल फिग़ऱ होने? के नाते किसी के पहनावे और हुलिये से किसी को जज करना जायज तो नहीं ठहराया जा सकता है।’
स्नेह पैपराजी बिरादरी का बचाव भी करते हैं, ‘ढेरों यू ट्यूबर्स और हाथ में फोन लेकर कहीं भी पहुंच जाने वाले लोगों की वजह से फ़ील्ड पर इस तरह की दिक्कतें पेश आ रही हैं। ऐसे लोग सही मायनों में पैपराज़ी नहीं होते हैं लेकिन इन कंटेट क्रिएटर्स और यू ट्यूबर्स की हरकतों से हम लोगों का भी नाम खऱाब होता है और फिर हमें इस तरह की आलोचना का शिकार होना पड़ता है।’
पिछले 28 सालों से बतौर फ़ोटोग्राफऱ मनोरंजन जगत में सक्रिय वरिंदर चावला ने भी जया बच्चन की पैपराज़ी के लिए ‘गंदे पैंट पहनने वाले और हाथ में मोबाइल लेकर चूहा की तरह कहीं भी घुस जाने वाले’' बयान पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी।
बहिष्कार पर विचार
बीबीसी हिंदी से वरिंदर ने कहा कि पैपराज़ी समुदाय में फि़लहाल इस बात को लेकर? काफ़ी चर्चा हो रही है कि जया बच्चन के इस रवैये के लिए उनका बहिष्कार किया जाना चाहिए और इस पर जल्द ही फ़ैसला लिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि पैपराज़ी को लेकर जया बच्चन ने अपने बयान में यह भी कहा कि वह उनकी कतई परवाह नहीं करती हैं।
इस पर वरिंदर कहते हैं, ‘हम जानते हैं कि जया जी पैपराज़ी को किस क़दर नापसंद करती हैं, लेकिन अगर उन्हें हमारी परवाह नहीं है तो हम पूरे बच्चन परिवार का बहिष्कार करने के बारे में भी कोई फ़ैसला ले सकते हैं। हो सकता है कि तब कहीं जाकर जया बच्चन को इस बात का एहसास होगा कि उन्होंने पैपराज़ी के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया है, वह नहीं करना चाहिए था।’
वरिंदर चावला कहते हैं, ‘एक राजनीतिक हस्ती होने के नाते जया बच्चन गऱीबों के मुद्दों को भी उठाती रही हैं। मगर ‘गंदे पैंट’ वाला उनका यह बयान गऱीबी विरोधी नहीं है तो क्या है?’
दरअसल, आए दिन फि़ल्मी इवेंट्स को कवर किये जाने के दौरान पैपराज़ी द्वारा 'सितारों का मखौल' उड़ाने वाली टिप्पणियां, अभद्र तरीके से किये जाने वाले व्यवहार, सितारों की प्राइवेसी के प्रति पैपराज़ी की बेफि़क्री से जुड़े वीडियोज़ की यू ट्यूब और तमाम अन्य तरह के सोशल? मीडिया पर ख़ूब चर्चा होती रही है।
मगर विरल भयानी और स्नेह ज़ाला की तरह ही वरिंदर चावला का भी मानना है कि पैपराज़ी की भीड़ में घुसकर, हाथ में मोबाइल लेकर शूट करने वाले किसी भी शख़्स को पैपराज़ी समुदाय का हिस्सा नहीं माना जा सकता है और न ही उ?नकी किसी हरकत का जि़म्मेदार पैपराज़ी को ठहराया जा सकता है।
जाने-माने पत्रकार मयंक शेखर ने भी जया बच्चन के कमेंट करने के तरीके को ग़लत बताते हुए कहा, ‘इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हूं कि पैपराज़ी को जर्नलिस्ट माना जाए या नहीं माना जाए।।। अगर ये मान लिया जाए कि वह जर्नलिस्ट नहीं भी हैं तब भी वह कुछ काम कर रहे होते हैं। उनका अपना एक पेशा है और उन्हें जीविकोपार्जन का पूरा अधिकार है जिसके लिए उन्हें सम्मान की भावना से देखा जाना चाहिए। मगर यह बात भी सही है कि आप सितारों के पीछे पड़ जाएं, उनकी प्राइवेसी का उल्लंघन करें तो कोई भी नाराज़ होगा ही।’
राष्ट्रपति पुतिन भारत आ रहे हैं. मॉस्को और नई दिल्ली के रिश्ते, खासकर भारत के रूस से तेल खरीदने पर ट्रंप की टेढ़ी नजर है. क्या ट्रंप की चेतावनियों के आगे पुतिन, भारत को कारगर कवच और राहत दे पाएंगे?
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा का लिखा-
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपनी दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर 4 और 5 दिसंबर को भारत में होंगे. वह भारत और रूस के बीच हो रहे 23वें सालाना सम्मेलन में रूसी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे.
उनकी इस यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच रक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे कई क्षेत्रों में समझौते होने की उम्मीद है. रूसी राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बताया कि भारत से आयात बढ़ाने की संभावनाओं के साथ-साथ पुतिन, एस-400 मिसाइल सिस्टम और एसयू-57 लड़ाकू विमानों के निर्यात को भी प्रमुखता देंगे.
अमेरिकी टैरिफ के कारण हुए कारोबारी नुकसान की भरपाई का रास्ता खोजना फिलहाल भारत के लिए एक बड़ी प्राथमिकता है. इसमें रूस बड़ी भूमिका निभा सकता है.
हालांकि, तमाम गर्मजोशियों के बावजूद ट्रंप फैक्टर एक चिंता का विषय बना हुआ है. खबरों के मुताबिक, भारतीय अधिकारियों को चिंता है कि रूस के साथ कोई भी नया ऊर्जा या रक्षा करार ट्रंप को और ज्यादा नाराज करने की वजह बन सकता है. भारत को उम्मीद है कि साल के अंत तक अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौता हो जाएगा.
आयात बढ़ाकर भारत को राहत देने की कोशिश?
रूस अभी भारत के साथ करीब 70 अरब डॉलर का व्यापार करता है. भारत के आयात की तुलना में यह बेहद असंतुलित है. दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर 100 अरब डॉलर तक ले जाना चाहते हैं. भारत चाहता है कि दवा, कृषि और कपड़े के क्षेत्र में वह रूस को ज्यादा माल निर्यात करे. रूस ने भी स्पष्ट संकेत दिया है कि वह भारत से आयात बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
क्या भारत अब रूसी तेल की खरीदारी बंद करने वाला है?
मसलन, रूस का सबसे विशाल बैंक 'एस्बरबैंक' भारत से औद्योगिक आयात और कामगारों का माइग्रेशन बढ़ाने पर काम कर रहा है. ये कोशिशें अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत को राहत देने पर लक्षित हैं.
जैसा कि बैंक के डेप्युटी सीईओ अलेक्जांदर वेदयाखिन ने रॉयटर्स से कहा, "अपने ग्राहकों की मदद के लिए हम अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं. तो इसका मतलब ना केवल भारत को निर्यात करना है, बल्कि भारत से आयात करना भी है."
अगर भारत और चीन रूसी तेल खरीदना बंद कर दें तो क्या होगा?
वेदयाखिन ने बताया कि एस्बरबैंक 6,000 से ज्यादा ऐसे भारतीय फर्मों के साथ काम कर रहा है, जिनके पास रूस के साथ व्यापार का कोई अनुभव नहीं है. उन्होंने यह भी बताया कि एस्बरबैंक अपने रूसी ग्राहकों को यह बता रहा है कि मशीन निर्माण, दवा और आईटी सेक्टरों में भारत की स्थिति मजबूत है. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि रूस ऊर्जा निर्यात से जो भारतीय मुद्रा कमाता है, उसी में भारतीय उत्पादों की खरीद का भुगतान किया जा सकता है.
भारत-रूस के रिश्तों पर ट्रंप का साया?
पुतिन पिछली बार साल 2021 में भारत आए थे. नरेंद्र मोदी भी पिछले साल रूस गए. इस साल सितंबर में चीन में हुए 'शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन' के सम्मेलन में भी पुतिन और मोदी की मुलाकात हुई थी.
दोनों देशों में पुरानी दोस्ती है. साल 1947 में आजाद देश बनने के बाद यूं तो भारत ने 'गुटनिरपेक्षता' की घोषित नीति अपनाई, लेकिन जल्द ही कई मामलों में सोवियत संघ की ओर उसका झुकाव बढ़ने लगा.
ये नजदीकियां एक नए राष्ट्र के तौर पर भारत की आर्थिक और सामरिक जरूरतों से भी उपजीं. एक ओर पाकिस्तान, दूसरी ओर चीन की दोहरी चुनौती और एक के बाद एक लड़े गए कई युद्धों के दौर में बहुत मौके आए, जब भारत को सोवियत संघ से अहम मदद मिली.
भारत को हथियारों की जरूरत थी, तो सोवियत संघ उसका सबसे बड़ा सप्लायर बना. 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध और बांग्लादेश के गठन के समय जटिल भूराजनीतिक स्थितियों में जब अमेरिका और चीन, इस्लामाबाद के साथ थे, तब सोवियत संघ ने भारत का समर्थन किया था.
फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भी भारत ने पश्चिमी देशों और रूस के बीच संतुलन बनाकर रखा. उसने रूस के साथ अपने करीबी रिश्तों का मुखरता से बचाव किया और संप्रभु राष्ट्र के तौर पर अपने हितों के अनुरूप स्वतंत्र विदेश नीति को जायज ठहराया.
कैसे काम करता है सस्ते रूसी तेल का गणित?
मगर अब, दोनों देशों के बीच कायम दशकों पुराने व्यापारिक-सामरिक सहयोग में डॉनल्ड ट्रंप एक बड़ा व्यवधान बन गए हैं. वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच पनपे हालिया तनाव की पृष्ठभूमि में पुतिन का भारत भ्रमण कूटनीतिक रूप से और भी अहम माना जा रहा है.
पहले कार्यकाल के दौरान, मोदी सरकार के साथ ट्रंप के रिश्ते कमोबेश बढ़िया रहे. मगर, दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही ट्रंप धागा खींचने लगे. व्यापारिक असंतुलन से शुरू हुआ असंतोष गंभीर तनाव में बदल गया. ट्रंप की चेतावनियों के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया.
भारत बनाम अमेरिका: कारोबारी विवाद किसे पड़ेगा ज्यादा भारी?
भारत का तर्क है कि अपनी बड़ी आबादी के मद्देनजर बढ़ते ऊर्जा खर्च को पूरा करने के लिए यह आयात जरूरी है. वहीं, अमेरिका का आरोप है कि तेल की खरीद रूस को फंड मुहैया करा रही है, जिसकी मदद से वह यूक्रेन में युद्ध लड़ रहा है. रूसी तेल की खरीद के कारण ही ट्रंप ने भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाया, जिससे कुल ड्यूटी बढ़कर 50 फीसदी हो गई.
अब रूस की बड़ी तेल कंपनियों पर लगे अमेरिकी टैरिफ के कारण भारत की मुश्किलें बढ़ी हैं. समाचार एजेंसी एपी ने भारतीय अधिकारियों के हवाले से बताया है कि भारत प्रतिबंधित उत्पादकों से तेल खरीदने से बचेगा. जो कंपनियां अभी सेंक्शन के दायरे से बाहर हैं, उनसे तेल खरीदने का विकल्प खुला रखा गया है.
रॉयटर्स के मुताबिक, ज्यादातर भारतीय रिफाइनर रूसी कंपनियों से तेल की खरीद बंद कर कर रहे हैं. अब उन कंपनियों से तेल खरीदने पर ध्यान दिया जा रहा है, जिनपर सेंक्शन नहीं लगा है. रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इंडियन ऑइल ने दिसंबर और जनवरी के लिए ऐसी ही कुछ रूसी कंपनियों को ऑर्डर दिया है. वहीं, भारत पेट्रोलियम भी ऑर्डर को आखिरी रूप देने के करीब है.
रूस पर लगाए गए नए प्रतिबंधों से ईयू-भारत संबंधों पर कितना असर होगा?
रूसी तेल की खरीदारी में आई कमी पर मॉस्को ने उम्मीद जताई कि यह अस्थायी हो सकता है. रूसी सरकार के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने नई दिल्ली में भारतीय पत्रकारों से बातचीत में यह बात कही. हालांकि, यह सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या निकट भविष्य में भारत रूसी तेल की खरीद पूरी तरह बंद कर देगा, या उसे बंद करना पड़ेगा?
पुतिन की यात्रा के मद्देनजर भी यह सवाल अहम है. हालांकि, कई विशेषज्ञ इस संभावना को खारिज करते हैं. हर्ष पंत, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन नाम के थिंक टैंक में विदेश नीति मामलों के उपाध्यक्ष हैं. उन्होंने एपी से बताया, "निश्चित तौर पर भारत जोर देगा कि रूस से पूरी तरह ऊर्जा आयात खत्म करने का उसका कोई इरादा नहीं है."
तेल की खरीद से इतर भी रूस, ऊर्जा क्षेत्र में भारत का अहम सहयोगी है. इसका एक बड़ा अध्याय है, तमिलनाडु के कुडनकुलम में रूसी सहयोग से बना परमाणु ऊर्जा संयंत्र. दोनों देश परमाणु ऊर्जा में आपसी सहयोग और बढ़ाना चाहते हैं.
रक्षा सहयोग बढ़ाने पर भी फोकस
सामरिक क्षेत्र में पहले सोवियत संघ, फिर रूस, भारत का पुराना और भरोसेमंद सप्लायर है. भारत दशकों से रूसी हथियारों का बड़ा ग्राहक है. बीते सालों में भारत अपने सैन्य उपकरणों और हथियारों की खरीद में विविधता लाया है, लेकिन अब भी रूस उसका सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है.
रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने पीएम मोदी को किया फोन, जानिए क्या बात हुई
विशेषज्ञों के मुताबिक, पुतिन की ताजा यात्रा में भारत जमीन से हवा में वार करने वाले एस-400 मिसाइल स्क्वॉर्डन की तेज आपूर्ति पर जोर देगा. इस संबंध में दोनों देशों के बीच साल 2018 में करार हुआ था. भारत को तीन एस-400 की खेप मिल चुकी है, लेकिन दो की सप्लाई बाकी है. यूक्रेन में जंग छिड़ने के बाद आपूर्ति शृंखला में आई दिक्कतों के कारण डिलिवरी में देर हो रही है.
इसके अतिरिक्त, एसयू-30एमकेआई लड़ाकू विमानों को अपग्रेड किए जाने और मिलिट्री हार्डवेयर की आपूर्ति को तेज करने पर भी चर्चा होने का अनुमान है. रूस, भारत को एसयू-57 फाइटर जेट बेचना चाहता है, लेकिन भारत ने दूसरे विकल्प भी खुले रखे हैं.
यूक्रेन युद्ध खत्म करने में परोक्ष भूमिका निभा सकता है भारत?
पुतिन की यात्रा यूक्रेन के लिए प्रस्तावित शांति योजना के मद्देनजर भी अहम है. अमेरिका, यूक्रेन युद्ध खत्म करने पर जोर दे रहा है. अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही यूक्रेन को लेकर ट्रंप का रवैया आक्रामक रहा.
अलास्का में पुतिन के साथ हुई चर्चित मुलाकात के कुछ दिनों बाद तक भी ट्रंप की शांति योजना पर काफी चिंताएं थीं, इसे रूस की तरफ ज्यादा झुका हुआ माना जा रहा था. बीते दिनों अमेरिकी और यूक्रेनी अधिकारियों की जेनेवा में हुई बैठक के दौरान प्रस्ताव की समीक्षा की गई.
प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन में शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद उन्होंने यूक्रेन पर हमला करने के लिए रूस और पुतिन की सीधी निंदा नहीं की है.
-रजनीश कुमार
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दौरे से ठीक पहले भारत में जर्मनी, फ्रांस के राजदूत और ब्रिटेन की उच्चायुक्त के साझे लेख को लेकर विवाद हो रहा है।
एक दिसंबर को भारत में जर्मनी के राजदूत फि़लिप एकरमैन, फ्रांस के राजदूत थिरी मथोउ और ब्रिटेन की उच्चायुक्त लिंडी कैमरुन ने टाइम्स ऑफ इंडिया में एक आर्टिकल लिखा था।
इस लेख का शीर्षक है- दुनिया चाहती है कि यूक्रेन युद्ध का अंत हो लेकिन रूस शांति को लेकर गंभीर नहीं दिख रहा है।
इस आर्टिकल की शुरुआत में लिखा गया है, ‘पिछले तीन वर्षों से भी अधिक समय से यूक्रेन के लोगों ने अपने देश की रक्षा।। साहस और प्रबल संकल्प के साथ की है। रूस अपनी सेना वापस बुलाकर और अपने अवैध आक्रमण को समाप्त करके या कम से कम युद्धविराम पर सहमत होकर, वार्ताओं में शामिल होकर तत्काल युद्ध समाप्त कर सकता है।’ ‘लेकिन 2025 में रूसी हमलों में तेज़ी से वृद्धि हुई है और शांति वार्ताओं की शुरुआत के बाद से राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन पर पूरे युद्ध के दौरान 22 सबसे बड़े हमले शुरू किए हैं।’
पूरे लेख में यूक्रेन युद्ध के लिए रूस को जि़म्मेदार ठहराया गया है। पीएम मोदी का जि़क्र करते हुए एक पैरा में लिखा गया है, ‘दुनिया इस बात पर सहमत है कि युद्ध ख़त्म होना चाहिए। इस मामले में भारत भी स्पष्ट है। पीएम मोदी ने कहा था कि किसी भी समस्या का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं मिल सकता है।’ जर्मनी, रूस और ब्रिटेन के राजनयिकों के इस आर्टिकल को एक्स पर रीपोस्ट करते हुए रूस में भारत के राजदूत रहे और भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने तीखी आलोचना की है।
क्या प्रोटोकॉल का उल्लंघन है?
कंवल सिब्बल ने लिखा है, ‘पुतिन की भारत यात्रा से ठीक पहले रूस के खिलाफ यह उग्र लेख प्रकाशित करके राजनयिक मानकों का उल्लंघन किया गया है। यह भारत का अपमान भी करता है। यह एक अत्यंत मित्रवत देश के साथ भारत के घनिष्ठ संबंधों पर प्रश्न उठाता है।’
‘यह हमारे आंतरिक मामलों में दखलंदाज़ी है क्योंकि इसका उद्देश्य भारत में यूरोपीय समर्थित हलकों में रूस-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देना और रूस के साथ हमारे संबंधों की नैतिकता पर सवाल खड़े करना है। इन तीनों देशों के प्रतिनिधि भारत के विदेश मंत्रालय को अपनी राय आधिकारिक विरोध-पत्र के माध्यम से दे सकते हैं लेकिन खुली बयानबाज़ी उचित नहीं है।’
‘टाइम्स ऑफ इंडिया का इस लेख को प्रकाशित करना पूर्णत: गलत है। यह जानबूझकर हमारी कूटनीति और राष्ट्रीय हित के खिलाफ काम करना है। भारत के विदेश मंत्रालय को इन तीनों प्रतिनिधियों की ओर से राजनयिक मानकों के उल्लंघन पर सार्वजनिक रूप से अपनी असहमति व्यक्त करनी चाहिए।’
न्यूज वेबसाइट फस्र्टपोस्ट में सीनियर एडिटर श्रीमॉय तालुकदर ने लिखा है, ‘पुतिन की यात्रा के वक्त यह लेख किसी भारतीय मीडिया आउटलेट में प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए था। यह लेख भारत की विदेश नीति में हस्तक्षेप का स्पष्ट प्रयास है और इसे रूसी राष्ट्रपति के आगमन से पहले भारत को शर्मिंदा करने के इरादे से लिखा गया है।’
‘राष्ट्रपति पुतिन राजकीय दौरे पर आ रहे हैं, भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी है। भारत यूरोप की रूस-विरोधी नैतिक बयानबाज़ी का मंच नहीं है। यह लेख बेहद खऱाब और अनुचित है और किसी भारतीय प्रकाशन द्वारा इसे स्थान देने का निर्णय भी उतना ही अनुचित है।’
श्रीमॉय की इस टिप्पणी पर द हिन्दू की डिप्लोमैटिक अफेय़र्स एडिटर सुहासिनी हैदर ने लिखा है, ‘यहाँ मीडिया को आड़े हाथों क्यों लिया जा रहा है? इसका फ़ैसला विदेश मंत्रालय करेगा कि प्रोटोकॉल का उल्लंघन हुआ है या नहीं।’
नेपाल और वियतनाम में भारत के राजदूत रहे रंजीत राय से पूछा कि वाकई यह लेख डिप्लोमैटिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन है? इसके जवाब में रंजीत राय कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता है कि किसी तरह के डिप्लोमैटिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन है लेकिन इतना ज़रूर है कि हमारे मेहमान आ रहे हैं और आप उनके आने से ठीक पहले ऐसी बातें कर रहे हैं।’
‘इसे गुड टेस्ट में तो नहीं लिया जाएगा। यूरोप को रूस से समस्या है लेकिन यूरोप की समस्या पूरी दुनिया की समस्या नहीं हो सकती है। इसके बावजूद मुझे लगता है कि एक लोकतांत्रिक देश में किसी का स्वागत और विरोध में कुछ कहने या लिखने की आज़ादी होनी चाहिए।’
पश्चिम बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया में बीएलओ की परेशानियां चर्चा में हैं। इससे एक ओर स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई प्रभावित हो रही है, तो दूसरी ओर उनको समय सीमा के भीतर अपना काम पूरा करने के दबाव से जूझना पड़ रहा है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल में 80 हजार से शिक्षकों और सहायक शिक्षकों को बीएलओ की जिम्मेदारी दी गई है। इससे एक ओर जहां स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई प्रभावित हो रही है वहीं समुचित ट्रेनिंग की कमी से उनको निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना काम पूरा करने के दबाव से जूझना पड़ रहा है।
इस मुद्दे पर बढ़ते विवाद और काम के कथित दबाव से बीएलओ की मौतों के बाद चुनाव आयोग ने समय सीमा एक सप्ताह बढ़ा दी है। लेकिन बीएलओ के संगठन का आरोप है कि यह समय भी काफी कम है। बीएलओ अधिकार रक्षा समिति के बैनर तले कई बीएलओ बीते सप्ताह से ही धरने पर हैं। यह लोग चुनाव आयोग के दफ्तर के सामने भी कई बार धरना प्रदर्शन कर चुके हैं।
बीएलओ संगठन का कहना है कि एसआईआर में जुटे तमाम शिक्षक दोहरी मार से जूझ रहे हैं। एक तो उनको इस काम के लिए खास अतिरिक्त भुगतान भी नहीं हो रहा है। उस पर उनको सरकारी कार्रवाई के डर से देर रात तक जागकर फार्म अपलोड करना पड़ रहा है। किसी भी गलती की स्थिति में चुनाव आयोग की ओर से कार्रवाई का डर भी सता रहा है।
संगठन के एक प्रवक्ता डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘राज्य के सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जहां काम करने वाले सभी या ज्यादातर शिक्षकों को इस काम में लगा दिया गया है। इससे पढ़ा-लिखाई का काम ठप हो गया है। सरकारी स्कूलों का सत्र जनवरी से दिसंबर तक चलता है। ऐसे में एसआईआर के बाद इन शिक्षकों के सामने वार्षिक परीक्षाओं की कापी जांच कर समय पर रिजल्ट प्रकाशित करने का भी भारी दबाव है।’
बीएलओ भी परेशान, वोटर भी
एसआईआर की कवायद के दौरान बूथ लेवल एजेंट (बीएलओ) भी परेशान हैं और आम वोटर भी। बीएलओ काम के दबाव से परेशान हैं तो लाखों लोग इसलिए परेशान हैं कि वो 2002 की सूची में अपना या अपने परिजनों के नाम नहीं तलाश पा रहे हैं।
दक्षिण कोलकाता के टालीगंज इलाके की एक महिला बीएलओ नाम नहीं छापने की शर्त पर बताती हैं, ‘हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी खास वार्ड के वोटरों के नाम क्रमवार नहीं हैं।’ उनके इलाके में करीब 18 सौ वोटर हैं। लेकिन उनमें से करीब दो सौ वोटरों के कोई सुराग नहीं मिल सका है।’
ऐसे लोगों की संख्या लाखों में है जो 2002 की सूची में अपने या परिजनों के नाम नहीं तलाश सके हैं। ऐसे ही एक वोटर सुरंजन मुखर्जी ने डीडब्ल्यू को बताया,‘वर्ष 2002 की सूची में मेरा नाम हुगली जिले में था। अब कोलकाता में रहता हूं। मैं कई दिनों की कोशिश के बावजूद अपना या माता-पिता नाम नहीं तलाश सका हूं। बीएलओ ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं।’
कोलकाता से बाहर भी बीएलओ और वोटरों की समस्याएं भी समस्याएं जस की तस हैं। एक वोटर तन्मय मंडल डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘अगर एपिक नंबर डाल कर सर्च का विकल्प होता तो नाम तलाशना बेहद आसान होता। लेकिन चुनाव आयोग ने पता नहीं क्यों आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने की बजाय पीडीएफ के तौर पर सूची अपलोड की है?’
एक बीएलओ नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, ‘फार्म को डिजिटल स्वरूप में चुनाव आयोग के वेबसाइट पर अपलोड करना बड़ी चुनौती है। उम्रदराज लोगों को और ज्यादा दिक्कत हो रही है। इसके अलावा सबके पास न तो लैपटॉप है और न ही ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन।’
ज्यादातर बीएलओ का कहना है कि वर्ष 2002 की सूची ही ज्यादातर समस्याओं की जड़ है। उनमें कई जगह वोटरों या उनके परिजनों के नाम गलत हैं। कुछ जगह कई वोटरों के एपिक नंबर एक ही हैं तो कुछ जगह पुराने वोटरों के मतदान केंद्र वाले इलाके बदल गए हैं। कई ऐसे लोग भी हैं जिनके नाम ही उस सूची से गायब हैं।
पूर्व मेदिनीपुर जिले के तमलुक विधानसभा क्षेत्र में जगन्नाथ पाल नामक एक वोटर के पूरे परिवार के साथ कई पड़ोसियों के एपिक नंबर भी एक ही हैं। उसी इलाके के एक अन्य वोटर तापस पाल का सवाल है कि चुनाव आयोग की गलतियों का खामियाजा हम क्यों भुगतें? इस गलती को सुधारना आयोग की जिम्मेदारी है।
काम के दबाव की स्थिति यह है कि कूचबिहार जिले के एक बीएलओ पौलभ गांगुली अपने पिता की चिता को आग देने के बाद उसी हालत में अगले दिन ही काम पर लौट आए। वो बताते हैं, मेरे पास 1211 वोटरों की जिम्मेदारी है। घर-परिवार से लेकर एसआईआर तक का काम तक कैसे संभाल रहा हूं, यह ऊपरवाला ही जानता है।
बहराइच में भेड़ियों के हमलों से गांवों में दहशत फैली हुई है. कई बच्चों और बुजुर्गों की मौत के बाद अब सवाल उठ रहा है कि इन भेड़ियों का व्यवहार क्यों बदल रहा है. भूख, आवास की कमी और झुंड बिखरने जैसे कारण बताए जा रहे हैं.
डॉयचे वैले पर साहिबा खान की रिपोर्ट –
उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में पिछले कुछ महीनों से भेडिय़ों के हमलों के कारण गांवों में दहशत का माहौल है। समाचार एजेंसी एएफपी के अनुसार सबसे ताजा घटना में एक भेडिय़ा दस महीने की एक बच्ची को रात में उसकी मां के पास से उठा ले गया। सुबह उसकी लाश खेत में मिली। इसके ठीक एक दिन पहले पांच साल का एक बच्चा दोपहर में अपने घर के बाहर खेल रहा था, तभी भेडिय़ा उसे उठा ले गया। बाद में वो गन्ने के खेत में जख्मी हालत में मिला। अस्पताल ले जाते समय ही उसकी जान चली गई। इन हमलों से निपटने के लिए अब जंगल विभाग ने ड्रोन और जालों का इस्तेमाल शुरू किया है।
इन घटनाओं जैसे कई हमलों ने एक ही पैटर्न दिखाया है कि भेडिय़े घरों के बिल्कुल पास आकर बच्चों को उठा ले जाते हैं। पिछले तीन महीनों में कम से कम नौ लोगों की मौत ऐसी घटनाओं में हो चुकी है। इनमें बच्चे ही नहीं, एक बुजुर्ग दंपति भी शामिल है। गांव वालों का कहना है कि अब दिन हो या रात, वे हमेशा भयभीत रहते हैं।
समस्या अब बड़ी हो चुकी है
लगातार होती मौतों ने बहराइच के कई गावों की जीवनशैली ही बदल दी है। कुछ घर अब सूरज ढलते ही पूरी तरह बंद हो जाते हैं। खेतों में अकेले जाना भी महिलाओं ने छोड़ दिया है। बच्चे घरों के भीतर ही रखे जा रहे हैं, और स्कूलों में उनकी संख्या कम हो गई है।
लोग कहते हैं कि वे पहली बार देख रहे हैं कि भेडिय़े अब गांवों के आसपास निर्भीक होकर घूम रहे हैं। एक गांव वाले ने एएफपी को बताया, ‘हमारे बच्चे अब घर के अंदर भी सुरक्षित नहीं होते। हम बस इतना चाहते हैं कि ये हमले बंद हों।’
-जेम्स कुक यरुशलम से, पाउलिन कोला और पैट्रिक जैकसन
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने अपने खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में देश के राष्ट्रपति आइजैक हरजोग से औपचारिक तौर पर माफी की दरख्वास्त की है।
राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा है कि राष्ट्रपति आइजैक हरजोग इस ‘असाधारण गुजारिश’ पर विचार करने से पहले न्याय अधिकारियों की राय लेंगे, क्योंकि इस कदम के ‘महत्वपूर्ण परिणाम हो सकते हैं।’
पिछले पांच साल से नेतन्याहू तीन अलग-अलग मामलों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं।
उन पर रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोप हैं। हालांकि नेतन्याहू खुद पर लगे आरोपों से इनकार करते रहे हैं।
नेतन्याहू ने एक वीडियो संदेश में कहा कि वो चाहते थे कि कानूनी प्रक्रिया अपने निष्कर्ष तक पहुंचे, लेकिन ‘राष्ट्रीय हित’ में ये ठीक नहीं रहेगा।
वहीं इसराइल के विपक्षी दलों का कहना है कि माफी की गुहार लगाने से पहले नेतन्याहू को दोष स्वीकार करना चाहिए।
इस महीने की शुरुआत में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसराइली राष्ट्रपति हरज़ोग से अपील की थी कि वो नेतन्याहू को ‘पूरी तरह माफी’ दे दें। उस समय हरजोग ने कहा था कि माफी के लिए किसी भी व्यक्ति को औपचारिक तौर पर अनुरोध देना होता है।
रविवार को राष्ट्रपति कार्यालय ने नेतन्याहू के इस अनुरोध के बारे में जानकारी दी और उनका लिखा पत्र ये कहते हुए जारी किया कि इसकी ‘गंभीरता और उसके प्रभाव’ को देखते हुए इसे सार्वजनिक करने का फैसला लिया गया है।
अब तक राष्ट्रपति कार्यालय ने यह नहीं बताया है कि राष्ट्रपति इस पर कब फैसला करेंगे।
नेतन्याहू पर लगे तीन आरोप क्या हैं?
साल 2020 में नेतन्याहू मुक़दमे का सामना करने वाले इसराइल के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन पर पद पर रहते आरोप लगा था।
अटॉर्नी जनरल अविखाई मंडोब्लिट ने फरवरी में ही कहा था कि वो तीन मामलों के सिलसिलों में नेतन्याहू पर मुकदमा करना चाहते हैं।
अपने फैसले की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैंने प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू को बताया है कि उन पर तीन आरोपों में मुकद़मा चलाया जाएगा। जब कोई अटॉर्नी जनरल किसी पदस्थ प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में मुकदमा चलाने की बात करता है, वो दुखद होता है।’
नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे इन मामलों को केस 1,000, 2,000 और 3,000 के नाम से जाना जाता है। ये सभी मामले लंबित थे और पिछले महीने इन तीनों पर आखिरी सुनवाई हुई।
केस 1,000 इस मामले में नेतन्याहू पर धोखाधड़ी करने और भरोसा तोडऩे के आरोप हैं। उन पर आरोप हैं कि उन्होंने अपने एक अमीर दोस्त से किसी काम के बदले कई महंगे तोहफे जैसे पिंक शैंपेन और सिगारें लीं। नेतन्याहू का कहना है कि ये सभी तोहफ़े सिफऱ् दोस्ती की वजह से मिले और उन्होंने तोहफ़ों को ग़लत तरीके से किसी काम के बदले में नहीं लिया। नेतन्याहू के दोस्त ने ऐसे किसी भी आरोप से इनकार किया है।
केस 2,000- ये मामला भी धोखाधड़ी और भरोसा तोडऩे का है। नेतन्याहू पर आरोप है कि उन्होंने एक प्रमुख अखबार के प्रकाशक को अपनी पार्टी की बेहतरीन कवरेज और अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी को कमजोर करने के लिए एक डील पर मंजूरी दी थी। इस मामले में भी नेतन्याहू और अखबार के प्रकाशक ने आरोपों से इंकार किया है।
केस 3,000- तीनों मामलों में ये सबसे संगीन मामला है और इसमें नेतन्याहू पर रिश्वत लेने का आरोप है। इसके अलावा उन पर भरोसा तोडऩे और धोखाधड़ी करने के आरोप भी हैं।
नेतन्याहू पर लगे तीन आरोप क्या हैं
आरोप है कि नेतन्याहू ने एक प्रमुख टेलीकम्युनिकेशन कंपनी के पक्ष में नियामक के फ़ैसले को बढ़ावा दिया ताकि वो कंपनी अपनी वेबसाइटों पर नेतन्याहू के समर्थन वाली और सकारात्मक ख़बरों को जगह दे।
हालांकि नेतन्याहू का कहना है कि कंपनी के पक्ष में फैसले को विशेषज्ञों ने अपना समर्थन दिया था वहीं कंपनी ने किसी भी तरह के अनुचित कदम के आरोपों से इनकार किया है।
-चन्द्र शेखर गौर
देश में खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं पर संसद कैंटीन में परोसी जाने वाली कई चीजों के दाम अभी भी ऐसे है कि सडक़ किनारे ठेले वाले की रेट लिस्ट में भी कई चीजों के दाम इससे ज्यादा होते होंगे ।
संसद कैंटीन में परोसी जाने वाली चीजों में से कुछ के दाम तवा रोटी 3, तंदूरी रोटी 4, नॉन 6, लच्छा पराठा 8।
माननीयों के लिए कई तरह की चाय-कॉफी का इंतजाम किया गया है चाय का सबसे कम दाम 5 है वहीं मसाला चाय, दार्जिलिंग चाय, अर्ल ग्रे चाय, अदरक चाय और कॉफी का दाम 10, नेस्कैफे कॉफी 23 है।
नौ तरह के सूप हैं सभी का दाम 25 है।
दाल, सब्जी, चावल, चपाती और पापड़ वाली मिनी थाली का दाम 50 है।
पनीर, दाल, सब्जी, चावल, चपाती, दही, सलाद, पापड़ और मिष्ठान्न वाली पूरी थाली का दाम 100 है।
नॉन वेज थाली का दाम 200 है।
दो तरह की व्यंजन सूची है एक 20 पन्नों की है इसमें करीब 140 तरह के व्यंजन है और दूसरी सूची 24 पन्नों की इसमें करीब 190 तरह के व्यंजन है।
ऐसे में जब खाने पीने की चीजों की महंगाई आसमान पर है जैसे आटा 40-45 किलो, दाल 120- 165 किलो तक, दूध 60- 70 लीटर दही 100- 120 किलो, पनीर 300 किलो, घी 700 किलो ऐसे समय में भी दिल्ली में पांच सितारा होटल संचालित करने वाली भारतीय पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी) इतने कम दाम में एक से एक तरह के लजीज व्यंजन बिना किसी सब्सिडी (वित्तीय सहारे) के बेच रही है तो इस सरकारी कंपनी से एक गुजारिश हमारी भी है कि इससे एक चौथाई व्यंजन सूची वाला एक कैंटीन हमारे शहरों में भी खुलवा दे इससे महंगाई का दंश तो कुछ कम होगा और हां हमें 140 या 190 व्यंजन सूची वाला कैंटीन नहीं चाहिए हमारे लिए तो 20- 25 व्यंजन सूची वाला कैंटीन ही काफी है...यही एक बड़ी कृपा होगी ।
-चित्रगुप्त
भारत में न्याय और राजनीति के बीच की दूरी हमेशा उतनी नहीं रहती जितनी संविधान चाहता है। कुछ मुकदमे अदालत में कम, और अखबारों व टीवी स्टूडियो में ज़्यादा लड़े जाते हैं। नेशनल हेराल्ड मामला भी पिछले दशक का वैसा ही एक मुकदमा है जहाँ तथ्य कम, और धारणाएँ ज़्यादा तैरती हैं। यह मामला एक पुरानी, बंद हो चुकी अखबारी कंपनी, उसके डूबे हुए कर्ज, एक नई बनाई गई गैर-लाभ कंपनी, और कांग्रेस नेतृत्व पर लगाए गए आरोपों का समुच्चय है। आरोप सरल शब्दों में यही है कि गांधी परिवार ने ‘यंग इंडियन’ नाम की कंपनी बनाकर ‘एसोसिएटिड जर्नल्स लिमिटेड’ की करोड़ों की संपत्तियों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। बचाव पक्ष का कहना है कि यह सिफऱ् एक बंद अखबार को जि़ंदा करने की कोशिश थी, कोई आर्थिक लाभ नहीं। समस्या यह है कि इस देश में राजनीति और लाभ एक ही सांस में सुने जाते हैं, और अदालतों में जाकर यह तय करना पड़ता है कि असल कहानी क्या है।
अगर पूरे मामले की परतें खोली जाएँ, तो कहानी कुछ ऐसी है। एसोसिएटिड जर्नल्स लिमिटेड (ए.जे.एल.) कभी वह कंपनी थी जो नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और क्वामी आवाज जैसे अख़बार निकालती थी। धीरे-धीरे अखबार बंद होते गए और कंपनी कांग्रेस से लिया हुआ लगभग नब्बे करोड़ रुपये का कर्ज चुकाने में असमर्थ हो गई। वर्ष 2010 में कांग्रेस ने यह कर्ज ‘यंग इंडियन’ नाम की नई सेक्शन 25 (आज की सेक्शन 8) गैर-लाभ कंपनी को सौंप दिया, जिसने ए.जे.एल. से कहा-हम यह कर्ज अपने ऊपर ले रहे हैं, बदले में आपको यंग इंडियन के शेयर दे दीजिए। यंग इंडियन ने सिर्फ पचास लाख रुपये देकर ए.जे.एल. के नब्बे करोड़ रुपये वाले कर्ज का अधिकार हासिल कर लिया, और इसके बाद ए.जे.एल. की ज़मीन-जायदाद समेत पूरा नियंत्रण यंग इंडियन के हाथ चला गया। राहुल गांधी और सोनिया गांधी यंग इंडियन में छिहत्तर प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं—यही वह तथ्य है जिसके आधार पर पूरा मामला खड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय कहता है—यह ‘वित्तीय लाभ’ का मामला है। गांधी परिवार कहता है—लाभ कमाने वाली कंपनी ही नहीं है, तो लाभ कहाँ से आएगा?
अब अदालत में असली सवाल यह है कि यंग इंडियन ने कोई अपराध किया या सिर्फ एक अजीब-सा कॉर्पोरेट पुनर्गठन प्रवर्तन निदेशालय का दावा है कि कांग्रेस के फ़ंड का इस्तेमाल ‘निजी फायदे’ के लिए हुआ और यह धन-शोधन की परिभाषा में आता है। परंतु धन-शोधन निरोधक क़ानून (पी.एम.एल.ए.) अत्यंत तकनीकी क़ानून है। उसके तहत तभी अपराध बनता है जब कोई ‘निर्दिष्ट मूल अपराध’ पहले सिद्ध हो। इस मामले में यदि आरोप है कि कंपनी का नियंत्रण गलत तरीके से लिया गया-तो पहले यह साबित करना होगा कि यह ‘अपराधजन्य संपत्ति’ थी। ए.जे.एल. कांग्रेस का कज़ऱ्दार था, जिसने अपनी सहमति से कज़ऱ् यंग इंडियन को सौंपा। धोखाधड़ी साबित करने के लिए किसी ‘पीडि़त’ का होना आवश्यक है और ए.जे.एल. के शेयरधारक वही थे जिन्होंने यह सौदा किया। ऐसे में यह कैसे सिद्ध होगा कि किसी को नुकसान हुआ? प्रवर्तन निदेशालय यहाँ ‘नियंत्रण को ही लाभ’ बता रहा है, जो राजनीतिक स्तर पर तीखा आरोप बनता है, लेकिन अदालत में इसे वास्तविक आर्थिक लाभ साबित करना कठिन है। यंग इंडियन अपने किसी निदेशक या हिस्सेदार को कोई लाभ बाँट ही नहीं सकती—उसका ढाँचा ही ऐसा है।
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे पर दशकों से भारत और चीन के आपसी संबंधों में तनाव रहा है। चीन हमेशा इसके दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा होने का दावा करता रहा है। दोनों देश इसे लेकर एक बार फिर आमने सामने हैं।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे पर दशकों से भारत और चीन के आपसी संबंधों में तनाव रहा है। चीन हमेशा इसके दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा होने का दावा करता रहा है। अब इस मुद्दे पर दोनों देश एक बार फिर आमने सामने हैं।
अरुणाचल प्रदेश के मालिकाना हक के सवाल भारत और चीन के बीच हमेशा तनातनी रही है। करीब एक महीने से दोनें देशो के बीच कुछ शांति थी। लेकिन अब अरुणाचल प्रदेश की एक महिला को शंघाई एयरपोर्ट पर कथित रूप से परेशान करने और घंटों बेवजह रोके जाने के कारण यह विवाद एक बार फिर उभर आया है।
ताजा विवाद
बीते सप्ताह भारतीय पासपोर्ट पर लंदन से जापान जाने वाली अरुणाचल प्रदेश की एक महिला प्रेमा वांगजोम थोंगडोक को इमिग्रेशन अधिकारियों ने चीन के शंघाई एयरपोर्ट पर रोक लिया था। उसके बाद उसे कहा गया कि अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है। इसलिए उसका भारतीय पासपोर्ट वैध नहीं है। उसे चीनी पासपोर्ट के लिए आवेदन करना चाहिए या फिर चाइना ईस्टर्न एयरलाइंस का टिकट खरीदना चाहिए। घंटों एयरपोर्ट पर रोके जाने के कारण महिला की कनेक्टिंग फ्लाइट छूट गई। उसने बाद में किसी तरह चीन स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क किया और करीब घंटे भर बाद उच्चायोग के अधिकारी एयरपोर्ट पहुंचे और उनको बाहर निकाला।
प्रेमा ने भारतीय विदेश मंत्रालय को पत्र भेज कर अपने साथ घटी घटना की विस्तार से जानकारी दी है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी इस घटना की निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करार दिया है। जानकार सूत्रों के मुताबिक, भारत ने इस मुद्दे पर चीन सरकार के समक्ष अधिकृत रूप से विरोध दर्ज कराया है। सरकार ने चीनी अधिकारियों की इस हरकत को सिविल एविएशन से जुड़े शिकागो और मॉन्ट्रियल कन्वेंशन का उल्लंघन करार दिया है।
लेकिन दूसरी ओर, चीन अपने इस दावे पर अड़ा है कि अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा रहा है और उसका नाम जांगनान है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा कि जांगनान चीन का हिस्सा है। हमने कभी अवैध रूप से बसाए गए अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं दी है। उनका कहना था कि तय कानूनों के तहत ही उस महिला यात्री की जांच की गई और उनके अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया गया।
वॉशिंगटन डीसी में बुधवार को व्हाइट हाउस के नज़दीक हुए हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह थर्ड वर्ल्ड यानी तीसरी दुनिया के देशों के नागरिकों को अमेरिका आने पर स्थायी रूप से रोक लगा देंगे।
हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने ये नही बताया है कि ‘थर्ड वर्ल्ड’ में कौन से देश शामिल हैं या उनकी ये घोषणा किन देशों पर लागू होगी।
ऐसे में सवाल उठता है कि थर्ड वर्ल्ड क्या है और इसमें कौन से देश शामिल हैं? क्या भारत में भी इसमें शामिल है?
थर्ड वर्ल्ड क्या है?
‘थर्ड वर्ल्ड’ की कोई स्पष्ट भौगोलिक या शाब्दिक परिभाषा नहीं है। यह टर्म आमतौर पर गऱीब और पिछड़े देशों के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
बीसवीं सदी के दूसरे हिस्से में ये शब्द ख़ासतौर पर प्रचलित हुआ, जब दुनिया के कई देश यूरोप के उपनिवेश से आजाद हो रहे थे।
तीसरी दुनिया टर्म उन राष्ट्रों के लिए इस्तेमाल हुआ जो वैश्विक औद्योगीकृत देशों को जोडऩे वाले आर्थिक और राजनीतिक संबंधों से बाहर थे। इनमें से कई यूरोप के पूर्व उपनिवेश थे।
हालांकि मूल रूप से ‘थर्ड वर्ल्ड’ या ‘तीसरी दुनिया’ टर्म ऐसे देशों के लिए इस्तेमाल हुआ था जो शीत युद्ध के दौरान ना तो पश्चिमी पूंजीवादी धड़े का हिस्सा थे और ना ही सोवियत कम्युनिस्ट धड़े का।
एक तरफ अमेरिका के नेतृत्व वाली पहली दुनिया थी, दूसरी तरफ सोवियत संघ के नेतृत्व वाली दूसरी दुनिया और एक तीसरी दुनिया उभर रही थी जो इन दोनों के दायरे से बाहर थी।
हालांकि, आगे चलकर थर्ड वर्ल्ड ऐसे देशों के लिए इस्तेमाल किया गया जो गरीब, विकास में पिछड़े या फिर विकासशील हो।
कहाँ से आया यह टर्म?
सबसे पहले फ्रांसीसी डेमोग्राफर अल्फ्रेड सॉवी ने 1952 में ‘थर्ड वर्ल्ड’ टर्म इस्तेमाल किया था।
एक लेख में उन्होंने लिखा था, ‘ये थर्ड वर्ल्ड, नजरअंदाज की हुई, तिरस्कृत, शोषित, तीसरे एस्टेट की भांति- भी कुछ बनना चाहती है।’
डेमोग्राफर और अर्थशास्त्री अल्फ्रेड सॉवी ने पहली बार ‘थर्ड वल्र्ड’ टर्म का इस्तेमाल करते हुए तीसरे एस्टेट (किसान, मजदूर, सामान्य जनता) का संदर्भ दिया जो पहले एस्टेट- पादरियों और दूसरे एस्टेट कुलीनों द्वारा शोषित और वंचित थी।
एक तरह से उन्होंने शोषित और वंचित देशों के लिए ‘थर्ड वर्ल्ड’ टर्म का इस्तेमाल किया था।
ऐसे देश जो शोषित और वंचित तो थे लेकिन आगे बढऩा चाहते थे।
हालांकि आज के दौर में ‘थर्ड वर्ल्ड’ देशों को लेकर परिभाषा और समझ बदली है। वर्तमान में राजनीतिक और आर्थिक संदर्भों में थर्ड वल्र्ड शब्द का कम ही इस्तेमाल किया जाता है।
अब ऐसे देशों के संदर्भ के लिए ‘ग्लोबल साउथ’ या ‘विकाशील देश’ या ‘निम्न एवं मध्यम आय वाले देश ’ जैसे वाक्यांशों का इस्तेमाल किया जाता है।
अपमानजनक संबोधन?
वर्तमान में किसी देश के लिए थर्ड वर्ल्ड शब्द के इस्तेमाल को अपमानजनक माना जाता है।
साल 2022 में संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने कहा था, ‘थर्ड वर्ल्ड टर्म पुराना पड़ चुका है और अपमानजनक है। अब हम विकासशील देशों या ग्लोबल साउथ की बात करते हैं।’
आमतौर पर इसमें उन देशों को शामिल किया जाता है, जिनका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कम है, गऱीबी की दर अधिक है, औद्योगिक ढांचा कमजोर है और जहाँ राजनीतिक अस्थिरता है या जिनकी अर्थव्यवस्था प्राथमिक उत्पादों जैसे- कच्चा माल, कृषि उत्पाद, खनिजों के निर्यात पर केंद्रित हो।
हालांकि विशेषज्ञ थर्ड वर्ल्ड को आर्थिक के बजाय राजनीतिक अवधारणा भी मानते रहे हैं।
अमेरिकी समाजशास्त्री, लेखक और प्रोफेसर इर्विन लुई हॉरोविट्ज ने अपनी किताब थ्री वर्ड्स ऑफ डेवलपमेंट: द थियरी एंड प्रैक्टिस ऑफ इंटरनेशनल स्ट्रेटिफिकेशन में लिखा था, ‘थर्ड वल्र्ड एक राजनीतिक अवधारणा है ना कि आर्थिकज्ये उन देशों को संदर्भित करती है जो शीत युद्ध के दौरान गुट निरपेक्ष रहे।’
वहीं 1970 के दशक में वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्री हॉलिस चेनेरी ने लिखा था, ‘तीसरी दुनिया’ टर्म अपनी उपयोगिता खो चुका है यह दक्षिण कोरिया जैसे उन्नत देशों को सोमालिया जैसे विफल राज्यों को एक साथ ला देता है।’
तथाकथित ‘हुकअप कल्चर’ ने महिलाओं को आजादी और खुद से फैसले लेने का अधिकार देने का भरोसा दिलाया था। हालांकि, शोध और असल जिंदगी के अनुभव इसके कुछ और ही असर दिखा रहे हैं।
डॉयचे वैले पर कौकब शायरानी का लिखा-
विशेषज्ञों की मानें तो ‘कैजुअल सेक्स’ के नाम पर अगर कोई व्यक्ति अपनी निजी जरूरतों या भावनात्मक सीमाओं को नजरअंदाज करता है, तो यह भावनात्मक तौर पर नुकसानदेह हो सकता है। हुकअप कल्चर से महिलाओं को आसानी से संबंध बनाने की आजादी तो मिली है, लेकिन इससे वे हमेशा खुद को मजबूत या सशक्त महसूस नहीं करती हैं। कुछ महिलाएं इसकी वजह से अप्रत्याशित रूप से भावनात्मक तौर पर खाली महसूस करने लगती हैं।
डीडब्ल्यू ने उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में रहने वाली कई महिलाओं से बात की। इन महिलाओं ने बताया कि हुकअप से उन्हें थोड़े समय के लिए तो आत्मविश्वास मिला, लेकिन साथ ही इसने किसी व्यक्ति के साथ गहरे रिश्ते बनाना और नजदीकी हासिल करना कठिन बना दिया।
अमेरिका की 40 वर्षीय महिला हीथर बताती हैं कि इस तनाव के कारण वह खुद को ‘अंदर से खाली, दुखी और थोड़े समय के लिए सशक्त महसूस करती थी, लेकिन हमेशा और पाने की चाहत बनी रहती थी।’ कैजुअल सेक्स के दौरान, वह लगातार अपनी भावनाओं को दबाने की कोशिश करती थीं। उन्हें ऐसा लगता था जैसे वह खुद के एक हिस्से को अलग कर रही हों।
हुकअप कल्चर के नकारात्मक पहलुओं के बारे में कही गई उनकी ये बातें उस स्थिति से मिलती है जिसे पोस्टकोइटल डिस्फोरिया (पीसीडी) कहते हैं। हालांकि, इस स्थिति को लेकर कम शोध हुआ है। पीसीडी में, लोग यौन संबंध के बाद आंसू आना, दुखी होना या चिड़चिड़ापन जैसी नकारात्मक भावनाएं अनुभव करते हैं।
2020 के एक अध्ययन में, महिलाओं ने बताया कि उन्हें सहमति से सेक्सुअल एक्टिविटी या मास्टरबेशन के बाद ये लक्षण महसूस हुए। बाद के कुछ घंटों या दिनों में वे थका हुआ या भावनात्मक रूप से परेशान महसूस करती थीं। कुछ ने कहा कि ये एहसास सिर्फ ऑर्गेज्म के बाद हुआ।
पुरुषों में भी पीसीडी के मामले सामने आते हैं। हालांकि, महिलाओं की यौन आजादी और निजी अपेक्षाओं को लेकर सदियों से चले आ रहे सामाजिक कलंक के कारण कुछ शोध सर्वे में यह बात सामने आयी है कि कैजुअल सेक्स के अनुभवों के बाद लगभग हर चार में से तीन महिलाएं इस स्थिति का सामना करती हैं।
मिले-जुले नतीजे
तीस वर्षीय फ्रेंच-इंडियन महिला इश्ता ने कहा, ‘मुझे लगता है कि मैं हुकअप कल्चर के लिए नहीं बनी हूं। हुकअप कल्चर मेरे स्वभाव के विपरीत है। मुझे शारीरिक संबंध से कहीं ज्यादा भावनात्मक जुड़ाव चाहिए। मैं अक्सर यह उम्मीद करती थी कि मेरे पार्टनर के मन में मेरे लिए फीलिंग्स आएगी या हम डेटिंग शुरू कर देंगे।’
सेक्स की इच्छा एक मुश्किल चीज है। कुछ शोध बताते हैं कि महिलाओं की सेक्स की इच्छा अक्सर भावनात्मक नजदीकी और रिश्तों से जुड़े संकेतों से प्रभावित होती है। इसी वजह से, शारीरिक संबंध बनाते समय भावनाओं से खुद को अलग कर पाना मुश्किल हो जाता है।
अमेरिका में कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में सेक्सुअल और रिलेशनल कम्युनिकेशन की प्रोफेसर तारा सुविनयट्टिचैपोर्न का कहना है कि ऐसा अक्सर इस वजह से होता है कि महिलाओं की परवरिश कैसे होती है।
उन्होंने कहा, ‘महिलाओं को छोटी उम्र से ही देखभाल करने वाली, प्यार करने वाली और दूसरों का ख्याल रखने वाली बनने के लिए सामाजिक तौर पर तैयार किया जाता है। ये गुण अलग-थलग और बिना किसी भावना वाली महिला होने के बिल्कुल विपरीत हैं। यही कारण है कि महिलाओं के लिए भावनात्मक अलगाव दिखाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।’
पीसीडी के लक्षण तब दिखाई दे सकते हैं जब जुड़ाव या नजदीकी की इच्छा पूरी न हो। किसी व्यक्ति का आत्म-सम्मान भी इस समस्या को और बढ़ा सकता है। हालांकि, यह पूरी तरह निश्चित नहीं है, लेकिन ज्यादा आत्म-सम्मान वाले जो लोग कैजुअल सेक्स करते हैं, वे अक्सर नकारात्मक भावनात्मक असर से बच सकते हैं।
तारा बताती हैं, ‘लेकिन बहुत से पुरुष और महिलाएं दूसरों से सराहना पाने के उद्देश्य से ऐसा करते हैं।’ इससे आगे चलकर लंबी अवधि के रिश्तों को लेकर तनाव पैदा हो सकता है, खासकर अगर कोई अच्छा रिश्ता न मिल पाए।
इश्ता ने कहा, ‘मैं पहले बहुत ज्यादा रोमांटिक थी। अब मुझे लगता है कि मैं उन पुरुषों के सामने एक भूमिका निभाती हूं जिनके साथ मैं हुकअप करना चाहती हूं। मुझे लगता है कि मैं अब लोगों पर उतना भरोसा नहीं करती।’
हीथर ने महसूस किया कि उनका आत्म-सम्मान कम हो गया था और अपने होने वाले सेक्सुअल पार्टनर के प्रति उनका नजरिया नकारात्मक हो गया था। उन्हें ‘लगता था कि मर्द भरोसे के लायक नहीं होते। वे सिर्फ सेक्स में दिलचस्पी रखते हैं और वे अहंकारी होते हैं।’ हीथर ने कहा, ‘इसके बाद अक्सर मुझे लगता था कि मेरी अहमियत कम हो गई है, जैसे किसी ने बस मुझे इस्तेमाल कर लिया हो।’
भारत ने हाल ही में 29 श्रम कानूनों को हटाकर चार नए लेबर कोड लागू किए हैं। सरकार का दावा है कि इससे कामगारों को ज्यादा सुरक्षा मिलेगी। कंपनियों के लिए नियम पालन भी सरल होगा पर मजदूर संगठन इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना का लिखा-
भारत की केंद्र सरकार ने नए लेबर कोड लागू कर दिए हैं। इनका मकसद कामगारों को सुरक्षित काम, समय पर वेतन और सामाजिक सुरक्षा देना है। संसद ने ये चार लेबर कोड लगभग पांच साल पहले पारित कर दिए थे। इन्हें हाल ही में 21 नवंबर से लागू कर दिया गया है। अब पूरे देश में संगठित और असंगठित क्षेत्रों के लिए श्रम कानून एक जैसे होंगे।
सरकार ने वेज कोड, सामाजिक सुरक्षा कोड, औद्योगिक संबंध कोड और व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य शर्त कोड को लागू किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा है कि ये कोड कामगारों के लिए बड़े बदलाव लाएंगे। इससे रोजगार बढ़ाने और उद्योगों में पारदर्शिता लाने में मदद मिलेगी। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर लिखा कि यह स्वतंत्रता के बाद से सबसे व्यापक और प्रगतिशील श्रमिक-केंद्रित सुधार हैं। इससे कामगारों को ज्यादा ताकत मिलेगी। साथ ही, ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि कई मजदूर संगठनों का आरोप है कि ये कोड कंपनी मालिकों को पहले से कहीं अधिक अधिकार देते हैं। खासकर छोटी और असंगठित कंपनियों में कामगारों का शोषण बढ़ेगा। ये संगठन कहते हैं कि इन नए लेबर कोड को किसान आंदोलन और कोरोना महामारी के दौरान पेश किया गया, ताकि विपक्ष और मजदूर संगठन इसका विरोध ना कर पाएं।
क्या है नया लेबर कोड?
आजादी के बाद भी भारत में कामकाज कई दशकों तक ऐसे श्रम कानूनों के तहत चलता रहा जो 1930 और 1950 के बीच बनाए गए थे। नियम जटिल और बिखरे हुए थे। कंपनियों और कामगारों दोनों के लिए इनका पालन मुश्किल होता था। पुराने 29 श्रम कानून मुख्य रूप से संगठित क्षेत्र में ही काम करते थे। जबकि देश में नौकरी करने वाले कुल 50 करोड़ लोगों में से करीब 90 फीसदी असंगठित क्षेत्र में ही लगे हुए हैं। श्रम कानूनों का उन पर ही सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है।
सरकार ने पहली बार नए लेबर कोड में डिजिटल और गिग इकोनॉमी को भी शामिल किया है। रिकॉर्ड-कीपिंग और रजिस्ट्रेशन को भी डिजिटल करने की बात नियमों में है। महिला और पुरुष को एक जैसे काम के लिए समान वेतन भी मिलेगा।
भारत के संविधान में श्रम कानून कॉन्करेंट लिस्ट में आता है। इसका मतलब है कि केंद्र और राज्य दोनों लेबर से जुड़े कानून बना सकते हैं। अब केंद्र सरकार कामगारों का न्यूनतम वेतन तय करेगी। इसे ‘लेबर फ्लोर’ कहते हैं। पहले की तरह राज्य वेतन तय कर सकते हैं, लेकिन यह सेंट्रल फ्लोर वेज से कम नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही प्रतिदिन काम का समय 8 से 12 घंटे तय किया गया है।
वहीं सामाजिक सुरक्षा कोड के तहत अब देश के हर कामगार को बीमा, पेंशन और अन्य सुरक्षा लाभ मिलेंगे। पहले ग्रेच्युटी पांच साल काम के बाद मिलती थी। अब यह एक साल में भी मिल सकेगी। इसके साथ ही प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ) का दायरा बढ़ाया गया है। अब गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म वर्कर्स भी इसका लाभ उठा सकेंगे। एक्सपर्ट मानते हैं कि इससे छोटे व्यवसायों पर भार बढ़ेगा। उन्हें कर्मचारियों के वेतन, बोनस और सुरक्षा लाभ पर अधिक खर्च करना होगा।
भारतीय उद्यमी संघ ने सरकार के इस कदम को जरुरी बताया है। उनका कहना है कि देश को वैश्विक मानकों तक पहुंचने के लिए नए लेबर कोड की आवश्यकता थी। संघ के अध्यक्ष अभिषेक कुमार सरकार के साथ कई श्रम नीतियों पर काम कर चुके हैं। वह बताते हैं कि असंगठित क्षेत्र में नियम लागू करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है, खासकर जहां ज्यादा अंशकालिक और मौसमी नौकरियां होती हैं।
भारत में नए लेबर कोड का असंगठित क्षेत्र पर असर होगा। लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि इन कानूनों को कितना सही और प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है। अभिषेक डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘सामाजिक सुरक्षा कोड के बदलावों से इन कामगारों को फायदा होगा। लेकिन नए नियमों का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ेगा और बहुत हद तक इस पर निर्भर करेगा कि सरकार इन योजनाओं को कैसे डिजाइन, लागू और रोलआउट करती है। इसको लेकर अभी सरकार ने कोई स्पष्ट योजना नहीं बताई है।
इंटरनेट को दुनिया ने शुरुआत में बड़ी उम्मीदों के साथ अपनाया था, यह एक ऐसी जगह मानी गई जहाँ हर शख़्स बिना किसी ओहदे, बिना किसी इजाज़त, और बिना किसी सरकारी पहरे के अपनी बात कह सकेगा। लेकिन इंटरनेट की यही आजादी चीन को हमेशा से एक बोझ जैसी लगी है। अब उसने एक नया डिजिटल फरमान जारी किया है, जो किसी लोकतांत्रिक समाज में शायद कल्पना जैसा लगता, लेकिन चीन में यह उसी लंबे सिलसिले का एक और कदम है जिसके तहत वह मीडिया, नागरिक समाज, और सार्वजनिक राय पर अपनी पकड़ मजबूत करता आया है। इस फरमान के मुताबिक, चिकित्सा, अर्थशास्त्र, कानून, शिक्षा या किसी भी विशेषज्ञ दायरे की बातें करने के लिए पहले सरकार से साबित कराना होगा कि आप उन विषयों पर बोलने के ‘लायक़’ हैं। यानी अब राय रखने का हक़ आपकी समझ और अनुभव से नहीं, बल्कि काबिलियत पर सरकार की मान्यता से तय होगा। यह इंतज़ाम सुनने में भले साफ़-सुथरा लगे, लेकिन इसकी तह में वही पुरानी कोशिश है—आवाजों पर नियंत्रण, सवालों पर ताले, और असहमति को प्रबंधन का मसला बना देना।
लेकिन चीन के इस आदेश को समझने से पहले दुनिया की मौजूदा स्थिति को देखना जरूरी है-क्योंकि आज गलत सूचना, अफवाह और झूठ का जो सैलाब सोशल मीडिया पर बह रहा है, वह किसी एक देश की समस्या नहीं है। भारत में तो सुबह उठते ही किसी चमत्कारी इलाज वाला वीडियो मिल जाए, तो लोग उसे आँख बंद करके आगे भेज देते हैं, नींबू से कैंसर ठीक, गर्म पानी से डायबिटीज़ ग़ायब, जड़ी-बूटी से रीढ़ की हड्डी जोड़ देना, सब कुछ सोशल मीडिया पर चलता है। अमेरिका में झूठ ने चुनावों को हिला दिया, यूरोप में टीकाकरण पर अफवाहों ने सरकारें परेशान कर दीं। दुनिया के किसी भी हिस्से में चले जाएँ, सोशल मीडिया का जंगल एक जैसा है, जहाँ अवैज्ञानिक बातें, झूठे दावे, और बेमतलब की सनसनी इतनी तेजी से फैलती है कि कोई भी समझदार समाज इससे बेचैन हो जाए। यानी समस्या असली है, गहरी है, और इस पर किसी भी देश को सोचने की जरूरत है कि आखिर झूठ और अफवाहों से निपटा कैसे जाए।
लेकिन समस्या असली होने का मतलब यह नहीं कि उससे निपटने का चीन का तरीका सही है। चीन का मॉडल सबसे आसान है, सरकार कह दे कि कौन बात कर सकता है और कौन नहीं। डॉक्टर पर नजर, अर्थशास्त्री पर नजर, शिक्षक पर नजर, और वकील पर नजर। और यह नजर सिर्फ उनके ज्ञान पर नहीं, उनकी राय पर भी है। डॉक्टर अगर सरकारी अस्पतालों की हालत पर उंगली उठाएँगे तो उनकी ‘काबिलियत’ पर शक़ हो जाएगा। अर्थशास्त्री अगर अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह बताएं जो सरकार को पसंद न हो, तो उनकी राय ‘अप्रमाणित’ घोषित की जा सकती है। और शिक्षक अगर शिक्षा नीति की खामियों पर बोलें तो यह पूछना आसान होगा कि ‘आपको राय रखने का हक़ किसने दिया?’ यानी चीन गलत सूचना रोकने के नाम पर वह सब कुछ कर रहा है जिसमें सरकार सच को और झूठ को अपने हिसाब से तय कर सके, ये लोकतंत्र नहीं, सुविधा का इंतज़ाम है।
अब सवाल यह है कि बाकी दुनिया क्या करे? क्योंकि यह कहना आसान है कि चीन की राह गलत है, लेकिन झूठ और अफवाह को खुला छोड़ देना भी कोई हल नहीं है। हमारे यहाँ सोशल मीडिया कंपनियों की कमाई झूठ, बहस और तकरार पर टिकी है, जिम्मेदारी पर नहीं। योरप प्लेटफ़ॉर्मों पर दबाव डालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसने कहीं भी राय पर सरकारी मोहर लगाने का रास्ता नहीं चुना। भारत में भी झूठ और अफवाह की समस्या बढ़ रही है, लेकिन यहाँ अब भी अदालतें हैं, बहस है, और जनता के पास अपने सवाल रखने की जगह है। लोकतांत्रिक समाजों का रास्ता मुश्किल है क्योंकि उन्हें दो चीजें एक साथ बचानी पड़ती हैं, आजादी भी और जिम्मेदारी भी। आसान रास्ता वही है जो चीन ने चुना, लेकिन आसान रास्ते अक्सर सबसे खतरनाक होते हैं।
-यासिर उस्मान
वो दिसंबर 2005 की एक सुबह थी। मैं नया नया टीवी प्रोड्यूसर फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यू वाले शो की शूटिंग के लिए दिल्ली से मुंबई पहुंचा था।
उस दिन अभिनेता बॉबी देओल ने इंटरव्यू के लिए सुबह साढ़े ग्यारह बजे का समय दिया था। कैमरा क्रू और एंकर के साथ हम लोग करीब एक घंटा पहले ही मुंबई के जुहू में धर्मेंद्र के मशहूर बंगले पर पहुंच गए।
एंकर बॉबी देओल से मिलने चली गईं, कैमरा टीम ने गाड़ी से लाइट्स और दूसरा सामान उतारना शुरू कर दिया।
लकड़ी के बड़े से गेट से अंदर आते ही सबसे पहले मेरी नजर गेट के दूसरी तरफ फैले हरे-भरे लॉन पर पड़ी। कई पेड़ थे। उनके पास ही कई चमचमाती लग्जरी कारें खड़ी थीं।
सबसे पीछे एक काली फिएट कार थी। हाल ही में पॉलिश की हुई लग रही थी। बड़ी ब्रांड्स वाली बाकी गाडिय़ों के बीच वो फिएट किसी दूसरी दुनिया की चीज लग रही थी।
मैंने गार्ड से पूछा, ‘ये पुरानी फिएट किसकी है?’
वो मुस्कुराया, बोला, ‘धरम जी की पहली गाड़ी है साहब आज भी चलती है।’
अपने लोगों के लिए ‘धरम जी’
गार्ड ने मुझे पास ही बने एक कमरे में बैठने को कहा। पुराने दौर की शाही गरिमा लिए हुए वो सुंदर ड्रॉइंग रूम था।
दीवारों पर लकड़ी के भारी पैनल थे। कमरे की एक दीवार पर युवा धर्मेंद्र की ख़ूबसूरत तस्वीर थी।
फ्रेम की हुई और भी कई नई-पुरानी तस्वीरें थीं। बीच में लकड़ी और कांच की बड़ी टेबल थी। बड़ा-सा कत्थई सोफा था जिस पर तीन लोग बैठे हुए नाश्ता कर रहे थे। ब्रेड और ऑमलेट।
बात हुई तो उन्होंने बताया कि वो लुधियाना से आए हैं। मैंने सुना था कि पंजाब में धर्मेंद्र के गांव के लोग या उनकी जान-पहचान वाले, जरूरत पडऩे पर मुंबई में सीधे धरम जी के घर पहुंच सकते हैं। उस दिन मैंने अपनी आँखों से ये देखा।
कुछ ही मिनट बाद धर्मेंद्र कमरे में दाखिल हुए। करीब सत्तर बरस के रहे होंगे उस समय, लेकिन बेहद फिट लग रहे थे और उनके मुस्कुराते हुए चेहरे पर एक अजीब-सा भोलापन था।
लोगों ने उनके पैर छुए। उन्होंने मेरी तरफ सवालिया नजरों से देखा और अपने खास अंदाज में बोले, ‘कैसे हो बेटे?’
एक पत्रकार के तौर पर मैं कई फिल्मी सितारों से मिल चुका था लेकिन उन तीन शब्दों में जो अपनापन महसूस हुआ, वैसा कभी नहीं हुआ था, मानो वो मुझे सालों से जानते हों।
मैंने उन्हें नमस्ते करते हुए अपना नाम बताया और ये भी कि मैं बॉबी के इंटरव्यू के लिए दिल्ली से आया हूं।
वो बोले, ‘दिल्ली में तो ठंड हो गई होगी, कितनी सुबह की फ्लाइट ली?’
मैंने कहा, ‘सुबह साढ़े पांच बजे की।’
वो हैरान हुए और फिर सवाल किया, ‘कुछ खाया तुमने?’
मैंने कहा कि सुबह फ्लाइट में कुछ खाया था। मैं उन्हें बताना चाहता था कि बचपन से लेकर अब तक मुझे उनकी ना जाने कितनी फिल्में देखकर कितना मजा आया है- ‘शोले’, ‘चुपके-चुपके’ से ‘गजब’ और ‘ग़ुलामी’ तक।
लेकिन मैं उस रोज बस उनके चेहरे को देखता रहा। और वह भी, कुछ पल, मुझे देखते रहे।
इसके बाद वो पंजाब से आए लोगों की तरफ मुड़ गए।
वो लोग किसी परिचित की सिफारिश लेकर आए थे जिनका नाम सुनते ही धर्मेंद्र पुरानी यादें साझा करने लगे।
बॉलीवुड का अजेय सितारा जिसकी चमक पूरे देश को दशकों से दीवाना बनाती रही, वो पंजाबी में बड़े अपनेपन से, गांव के पुराने दिन और किसी पुराने दोस्त को याद कर रहा था।
जब इंटरव्यू के दौरान नाराज़ हुए बॉबी
थोड़ी ही देर में सनी देओल भी वहां आए, मेजबान की तरह सबका हालचाल लेते हुए।
कुछ देर बाद अभय देओल भी मुस्कुराते हुए आए ‘हैलो’ कहने के लिए।
कोई दिखावा नहीं, कोई बनावट नहीं। उनके लिए तो एक बड़े पंजाबी संयुक्त परिवार वाली आम सुबह ही थी। लेकिन मेरे लिए यह यादगार सुबह थी। इतने सारे स्टार एक छत के नीचे।
उस पूरे माहौल के केंद्र में थे- धर्मेंद्र। सबकी नजरें, सबका आदर, बस उनकी ओर था।
मुझे बाद में किसी ने बताया कि अभय देओल हैं तो धर्मेंद्र के भतीजे लेकिन सनी और बॉबी की तरह वो भी धर्मेंद्र को ‘पापा’ कहकर पुकारते हैं जबकि अपने पिता को वो ‘चाचा’ कहकर पुकारते हैं।
पता चला कि पुराने पंजाबी परिवारों में अक्सर घर के मुखिया को सम्मान में पिता का दर्जा दिया जाता है।
तभी मेरी टीम का सदस्य मुझे बुलाने आया। मैंने धरम जी से इजाज़त ली।
उन्होंने बड़े प्यार से कहा, ‘जीते रहिए।’
हम बंगले के एक दूसरे कमरे की तरफ निकल पड़े जहां इंटरव्यू शूट किया जाना था।
बॉबी देओल के करियर और उनके जीवन पर बातचीत चल ही रही थी कि किसी निजी सवाल पर बॉबी बुरी तरह नाराज हो गए और इंटरव्यू रुक गया। बेहद खराब मूड में बॉबी ग़ुस्से में वहां से उठकर चले गए।
हमारी पूरी टीम बुरी तरह घबरा गई। पता नहीं वो आगे क्या करेंगे और चिंता अपने एपिसोड की भी थी जो अभी तक अधूरा था।
कुछ देर में सनी देओल आए, उन्होंने हमारी बात सुनी और बोले कि थोड़ी देर मामला ठंडा होने दो, फिर वो बॉबी को समझाएंगे।
तकरीबन एक घंटा बीत गया। हमें भूख भी लग रही थी।
बॉबी तो नहीं आए लेकिन उनके किचन से दो लोग बड़ी-बड़ी ट्रे में पूरी टीम के लिए कुछ लेकर आए।
लोग बोले, ‘धरम जी ने भेजा है।’
ट्रे में ब्रेड और ऑमलेट था, बिल्कुल घर जैसा। उन्हें याद था कि सुबह दिल्ली से सफऱ के बाद हम सीधे काम पर निकले थे।
मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई के रिटायर होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में केवल एक दलित और एक महिला जज ही बचे हैं. उनके अलावा ज्यादातर जज उच्च हिंदू जातियों के पुरुष हैं. विविधता के लिए कितना तैयार है सुप्रीम कोर्ट?
डॉयचे वैले पर महिमा कपूर सोनम मिश्रा का लिखा-
पिछले छह महीनों से भारत के सर्वोच्च न्यायालय की अगुवाई एक ऐसा व्यक्ति कर रहा था, जो भारत के सबसे ज्यादा भेदभाव झेलने वाले समुदायों में से एक से आते थे. 23 नवंबर को रिटायर हुए मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई की अगुवाई में देश ने एक दुर्लभ दृश्य देखा. जब देश के सर्वोच्च न्यायालय में एक दलित विरासत वाला व्यक्ति बैठा. दलित समुदाय को हिंदू समाज की जाति व्यवस्था में सबसे निचली पायदान पर माना जाते है. यहां तक कि इस समुदाय को पहले "अछूत” भी कहा जाता था. आज भी देश के कई हिस्सों में उन्हें भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है.
गवई के पिता दलित समुदाय के एक प्रमुख नेता थे. उन्होंने गवई के जन्म से पहले बौद्ध धर्म अपना लिया था. जिस कारण गवई भी बौद्ध धर्म का पालन करते थे. लेकिन अपने करियर के दौरान उन्होंने अपनी दलित पहचान को भी स्वीकार किया और माना कि संविधान की आरक्षण जैसी नीतियों ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष तक पहुंचने में मदद की है. गवई, सुप्रीम कोर्ट के इतिहास के पहले बौद्ध और दूसरे दलित मुख्य न्यायाधीश रहे हैं.
गवई की इस उपलब्धि के बावजूद भारत के कई हिस्सों में आज भी महिलाएं और वंचित समुदाय अपने जीवन में आगे बढ़ने के दौरान ऐतिहासिक पिछड़ापन, पक्षपात और लैंगिक भेदभाव का सामना करते हैं. डीडब्ल्यू ने भारत की सर्वोच्च अदालत में विविधता की स्थिति को ध्यान से देखने की कोशिश की है. इस जांच में जजों के लिंग, धर्म और जाति जैसे पहलुओं का ध्यान रखा गया है.
आंकड़े क्या कहते हैं?
सुप्रीम कोर्ट अपने न्यायाधीशों की जाति से जुड़ा आधिकारिक डेटा सार्वजनिक नहीं करता है. जिस कारण हर जज की जाति और धार्मिक पहचान को निश्चित रूप से पता लगाना संभव नहीं है. लेकिन फिर भी हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि गवई के रिटायर होने के बाद बचे हुए 33 जजों में से कम से कम 12 जज ब्राह्मण हैं. जो कि हिंदू धर्म की सबसे ऊंची जातियों से आते हैं. 2020 के प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के मुताबिक, ब्राह्मण जाति भारत की कुल आबादी का केवल चार फीसदी हिस्सा है. लेकिन देश के सर्वोच्च न्यायालय में उनकी हिस्सेदारी 36 फीसदी है.
इन 12 जजों के अलावा अदालत के बाकी आठ जज भी अन्य उच्च जातियों से ही आते हैं. जिससे सुप्रीम कोर्ट के कुल जजों का 60 फीसदी हिस्सा ऊंची जाति के हिंदू जजों से ही बन जाता है.
अब गवई के रिटायर होने के बाद अदालत में केवल एक दलित जज ही बचा है. यहां तक कि अनुसूचित जनजाति (यानी एसटी) समुदाय से तो एक भी जज नहीं है. एसटी वर्ग में उन आदिवासी समुदायों को शामिल किया जाता है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर माना गया है और संविधान के तहत उन्हें विशेष सुरक्षा मिली है. हालांकि, दलितों के साथ मिलकर यह समुदाय भारत की कुल आबादी का 35 फीसदी हिस्सा है.
बचे हुए अन्य पांच जज पिछड़ा वर्ग (यानी ओबीसी) से आते हैं. संविधान में उन्हें सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा माना गया है. इनके अलावा डीडब्ल्यू अन्य तीन जजों की जाति की पुष्टि नहीं कर सका है. बाकी कम से कम चार जज धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं. जिसमें एक मुस्लिम, एक ईसाई, एक पारसी और एक जैन है. 33 जजों में से केवल एक जज, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना महिला हैं. हालांकि, देश की लगभग 48.5 फीसदी आबादी महिलाएं हैं. इसके बावजूद आज तक कभी किसी महिला ने मुख्य न्यायाधीश का पद नहीं संभाला है.
उम्मीदवारों में नाममात्र की विविधता
डीडब्ल्यू से बात करने वाले कई पूर्व सुप्रीम कोर्ट जजों ने शीर्ष अदालत में विविधता की कमी के लिए सीमित और कमजोर भर्ती प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराया है.
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मदन लोकुर (2012–2018) ने कहा, "अब ज्यादा से ज्यादा महिलाएं और वंचित समुदायों के लोग सिस्टम में आ रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद अभी भी उनकी संख्या काफी कम है.” उन्होंने कहा, "ऐतिहासिक रूप से कानूनी व्यवस्था हमेशा से पुरुषों के कब्जे में ही रही है, और उसमें भी ज्यादातर वही लोग आगे बढ़े हैं, जो अनुसूचित जाति (एससी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) से नहीं आते हैं. उन्होंने आगे कहा, "हालांकि, स्थिति बदल जरूर रही हैं. लेकिन असल सवाल यह है कि क्या बदलाव की यह रफ्तार पर्याप्त है?”
इसके अलावा कई जजों ने यह भी माना कि भारतीय न्यायपालिका में आज भी भाई–भतीजावाद व्यवस्था मौजूद है. हालांकि, साथ ही उन्होंने यह भी माना कि अब कई पहली पीढ़ी के वकील और जज भारी संख्या में सामने आ रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने में जजों को दशकों लग जाते हैं
बदलती व्यवस्था का एक संकेत यह भी है कि 2024 तक भारत की जिला अदालतों में 38 फीसदी जज महिलाएं हो गई थी. हालांकि, छह साल पहले तक यह संख्या केवल 28 फीसदी ही थी.
नवंबर 2024 में रिटायर हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था, "मैंने पिछले 15–20 सालों में एक बड़ा बदलाव होते देखा है, यह बेहद बड़ा है.” उन्होंने कहा, "हमें सुनिश्चित करना होगा कि जिस पूल से हम सुप्रीम कोर्ट में जज चुनते हैं, वह विविध हो.” चंद्रचूड़ हमेशा से पारदर्शिता, विविधता और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रबल समर्थक माने जाते रहे हैं. उन्होंने आगे कहा, "लोग सीढ़ी चढ़ रहे हैं.”
हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि करियर में आगे बढ़ने की प्रक्रिया "काफी धीमी” होती है. जिसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने वाले जजों को आमतौर पर यहां तक पहुंचने के लिए 50 वर्ष का समय लग जाता है.
महिला वकीलों के लिए "काफी बेहतर हुई है स्थिति”
इसमें सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि 2022 के एक सर्वे के मुताबिक भारत में केवल 15 फीसदी वकील ही महिलाएं हैं.
2025 की शुरुआत में रिटायर हुई दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व जज रेखा पल्ली ने कहा कि आज भी ज्यादातर मुवक्किल पुरुष वकीलों को ही तरजीह देते हैं. उन्होंने कहा, "मेरे समय में मेरे साथ केवल कुछ गिनी-चुनी ही महिलाएं (वकालत में) थी. अब हालातों में काफी सुधार हुआ है, लेकिन अब भी महिलाओं को काफी कम अवसर मिलते हैं.”
उन्होंने यह भी कहा कि अदालत में बहस करने वाली भूमिकाओं में पर्याप्त महिला वकील नहीं हैं. उन्होंने बताया, "जब मैं युवा लड़कियों से पूछती हूं कि वह अदालत में बहस क्यों नहीं कर रहीं, तो कई बार वह बताती हैं कि उन्हें पर्याप्त केस ही नहीं मिलते है.” जिस वजह से उन्हें अदालत में अपनी क्षमता दिखाने का मौका ही नहीं मिल पाता है.
युवा जजों की राह में काफी संघर्ष
उत्तरी भारत की एक युवा जज सीमा (इस लेख के लिए वह अपनी पहचान सीमा बताती है) कई घंटों की यात्रा करके अपने घर से निचली अदालत में मामलों की सुनवाई करने जाती हैं. अपने परिवार में ऐसा प्रतिष्ठित पद पाने वाली वह पहली महिला हैं. लेकिन अपने सपनों की नौकरी करते हुए उन्हें लगातार कई कठिन संघर्ष झेलने पड़ते हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "कुछ सालों बाद तो मैं यह नौकरी ही छोड़ना चाहती थी. जैसे-जैसे आप बड़े शहरों से छोटे शहरों की ओर जाते हैं, वैसे-वैसे हालात और व्यवहार खराब होने लगते हैं.” सीमा ने बताया कि उन्हें कई बार वरिष्ठ जजों को खाना परोसने, चाय या कॉफी लाने जैसे काम भी करने पड़ते थे. उन्होंने कहा, "एक बार तो एक वरिष्ठ वकील ने कोर्ट में खुलेआम कह दिया था कि ‘इसे क्या पता? यह नई है,'” जिसे वह साफ तौर पर अपने प्रति लैंगिक भेदभाव का मामला मानती हैं.
'भारतीय न्यायपालिका भी भारतीय समाज का प्रतिबिंब'
डीडब्ल्यू से बात करते हुए कई पूर्व हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों ने न्यायपालिका में किसी भी तरह का भेदभाव मानने से साफ इनकार किया. जस्टिस पल्ली ने कहा, "यह कहना गलत होगा कि कोई भी व्यवस्था भेदभाव से लिप्त है. मैं यह बात बहुत स्पष्ट करना चाहता हूं कि अगर आप अच्छे हैं, तो आपको प्रमोशन जरूर मिलेगा.”
हालांकि, जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह नहीं नकारा कि कभी–कभार "उत्पीड़न के कुछ मामले” रहे हैं. उन्होंने कहा, "भारतीय न्यायपालिका भारतीय समाज का ही प्रतिबिंब है. इसलिए यह उम्मीद करना कि न्यायपालिका पूरी तरह सामाजिक पक्षपात से मुक्त होगी, शायद सही नहीं होगा.” उन्होंने आगे कहा, "लेकिन हमारे पास एक मजबूत शिकायत-निवारण प्रणाली है, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.”
-चंदन कुमार जजवाड़े
भारत में केंद्र सरकार ने पुराने लेबर लॉ की जगह चार नए लेबर कोड लागू कर दिए हैं। सरकार इस कोड को कर्मचारियों और मजदूरों के हित में बता रही है, जबकि कई मजदूर संगठनों ने इसे मज़दूर विरोधी और उद्योगपतियों के हित में बताया है।
पीएम मोदी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, ‘आज, हमारी सरकार ने चार लेबर कोड लागू कर दिए हैं। यह आजादी के बाद मजदूरों के लिए सबसे बड़े और प्रगतिशील सुधारों में से एक है।’
उनके मुताबिक, ‘यह हमारे कामगारों को बहुत ताकतवर बनाता है। इससे कम्प्लायंस भी काफी आसान हो जाएगा और यह ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा देने वाला है।
हालाँकि कई मज़दूर संगठनों का मानना है कि इससे कामगारों का शोषण बढ़ेगा और इसे पूंजीपतियों के दबाव में तैयार किया गया है।
लेबर कोड के ख़िलाफ़ इंटक, एटक, एचएमएस, सीआईटीयू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, एईडब्लूए, एआईसीसीटीयू, एलपीएफ़ और यूटीयूसी जैसे मज़दूर संगठनों ने 26 नवंबर को देशभर में विरोध प्रदर्शन का फ़ैसला भी किया है।
विपक्ष का विरोध
हालाँकि कांग्रेस ने सरकार के इस फ़ैसले पर तंज़ किया है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, ‘मजदूरों से जुड़े 29 मौजूदा कानूनों को 4 कोड में री-पैकेज किया गया है। इसका किसी क्रांतिकारी सुधार के तौर पर प्रचार किया जा रहा है, जबकि इसके नियम अभी तक नोटिफाई भी नहीं हुए हैं।’
उन्होंने सवाल खड़े किए हैं, ‘लेकिन क्या ये कोड भारत के मजदूरों की न्याय के लिए इन 5 जरूरी मांगों को हकीकत बना पाएंगे?
मनरेगा समेत पूरे देश में हर किसी के लिए 400 रुपये की न्यूनतम मजदूरी
‘राइट टू हेल्थ’ कानून जो 25 लाख रुपये का हेल्थ कवरेज देगा
शहरी इलाकों के लिए एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट
सभी असंगठित श्रेत्र के मजदूरों के लिए पूरी सोशल सिक्योरिटी, जिसमें लाइफ इंश्योरेंस और एक्सीडेंट इंश्योरेंस शामिल है
प्रमुख सरकारी क्षेत्रों में कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी पर रोक
मोदी सरकार को कर्नाटक सरकार और राजस्थान की पिछली सरकार से सीखना चाहिए, जिन्होंने नए कोड से पहले अपने ज़बरदस्त गिग वर्कर कानूनों के साथ 21वीं सदी के लिए लेबर रिफॉर्म की शुरुआत की थी।’
आइए जानने की कोशिश करते हैं कि नए लेबर कोड में क्या है और इसके लागू होने से क्या फर्क पड़ेगा।
केंद्र सरकार ने ‘कोड ऑन वेज’ यानी पगार या मजदूरी से जुड़ा कोड साल 2019 में ही संसद से पारित करा लिया था। इसके बाद साल 2020 में संसद के दोनों सदनों से तीन लेबर कोड को पारित कराया गया।
इनमें ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड (ओएसएच), कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी और इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड शामिल हैं।
हालांकि कई लोगों का मानना है कि किसानों से जुड़े कानून का विरोध शुरू होने के बाद सरकार ने लेबर कोड को लागू करने में सावधानी बरती है।
क्या मोदी राज में मजदूरों के हक कमजोर हुए हैं?
सरकार का तर्क है कि सही मायनों में कामगारों को सुरक्षा देने के लिए 29 कानूनों के चार नए कोड बनाए गए हैं और इस बात को पुख्ता किया गया है कि कामगारों को श्रम कानूनों का लाभ मिल सके।
सरकार का दावा है कि साल 2019 के वेज कोड से कामगारों को न्यूनतम मजदूरी की गारंटी मिल सकेगी और हर पांच साल में न्यूनतम मजदूरी को रिव्यू किया जाएगा।
सरकार का यह भी दावा है कि इससे सभी कामगारों को समय पर वेतन मिलने की गारंटी भी दी जाएगी और महिलाओं और पुरुषों को समान मेहनताना मिल सकेगा।
सरकार का यह भी तर्क है कि एक छोटे से योगदान के बाद सभी कामगारों को ईएसआईसी के हॉस्पिटल और डिस्पेंसरी में चिकित्सा सुविधा मिल सकेगी और यह सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने के लिहाज से काफी अहम होगा।
मजदूर संगठनों का आरोप है कि किसान क़ानूनों पर विपक्ष के विरोध के दौरान सरकार ने बिना चर्चा के ही तीन लेबर कोड पारित करा लिए थे और राज्यसभा में जब विपक्ष विरोध में सदन से बाहर था उसी दिन सरकार ने इस बिल को पास करा लिया था।
दूसरी तरफ उद्योग जगत के कई लोग नए लेबर कोड के लागू होने का इंतजार कर रहे थे।
केंद्र सरकार ने पीआईबी के ज़रिए एक प्रेस रिलीज में दावा किया है कि इन चार लेबर कोड से बड़ा बदलाव आएगा। इससे बेहतर पगार, दुर्घटनाओं के दौरान सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा मिलेगी और यह मजदूरों के लिए कल्याणकारी होगा।
-समरेंद्र शर्मा
राजधानी रायपुर के जीई रोड स्थित एनआईटी के सामने की चौपाटी केवल एक संरचना नहीं थी। यह सत्ता और विपक्ष की जिद, बदले की भावना और राजनीतिक अहंकार का प्रत्यक्ष प्रदर्शन थी। पिछली कांग्रेस सरकार ने इसे युवाओं के मनोरंजन और शहर की रात्रिकालीन अर्थव्यवस्था का केंद्र बताकर तेजी से बनाया। जिस रफ्तार से निर्माण हुआ, संदेश साफ था कि चौपाटी किसी भी कीमत पर बनेगी।
तब भाजपा विपक्ष में थी और उसने इसे अवैधानिक, अव्यवस्थित एवं नगर नियोजन के नियमों के विरुद्ध बताते हुए सडक़ से सदन तक विरोध किया। धरना, प्रदर्शन, अनशन, विरोध इतना प्रतीकात्मक हो चुका था कि यह साफ हो गया था कि अगर यह बनेगी तो बचेगी नहीं और हुआ भी वही। एक ने बनाकर दम लिया, दूसरे ने तोडक़र।
करोड़ों रुपये का निवेश, समय, योजना और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षण भर में ध्वस्त कर दिया गया और जिन लोगों ने इस चौपाटी से रोजगार पाया था, वे बजट और विकास के बहस के बीच गुम हो गए। निर्माण में भी उनका नाम नहीं, ध्वस्तीकरण में भी नहीं। वे सिर्फ राजनीतिक रस्साकशी के शिकार बने।
रुख बदलने का यह खेल नया नहीं है। दानी स्कूल चौपाटी पर जिन लोगों ने विरोध किया था, उन्हीं में से कई एनआईटी चौपाटी बचाने की अगुवाई करते दिखे और दानी स्कूल चौपाटी का समर्थन करने वाले एनआईटी चौपाटी हटाने बुलडोजर के साथ पहुंचे। यह विरोध या समर्थन का मुद्दा नहीं है बल्कि राजनीतिक सुविधा तथा अवसरवाद का सबसे स्पष्ट चेहरा है।
इतिहास दोहराया जाता है, क्योंकि राजनीतिक चरित्र नहीं बदलता। रायपुर इससे पहले भी स्काईवॉक के मामले में यह अध्याय पढ़ चुका है। भाजपा ने इसे राजधानी की पहचान और भविष्य की परिवहन योजना कहकर बनाया। कांग्रेस ने इसे अव्यावहारिक और जनविरोधी बताते हुए तोडऩे के पक्ष में खड़ी रही। आज फिर उसी स्काईवॉक का पुनर्निर्माण शुरू हो चुका है।
-समरेंद्र शर्मा
राजधानी रायपुर के जीई रोड स्थित एनआईटी के सामने की चौपाटी केवल एक संरचना नहीं थी। यह सत्ता और विपक्ष की जिद, बदले की भावना और राजनीतिक अहंकार का प्रत्यक्ष प्रदर्शन थी। पिछली कांग्रेस सरकार ने इसे युवाओं के मनोरंजन और शहर की रात्रिकालीन अर्थव्यवस्था का केंद्र बताकर तेजी से बनाया। जिस रफ्तार से निर्माण हुआ, संदेश साफ था कि चौपाटी किसी भी कीमत पर बनेगी।
तब भाजपा विपक्ष में थी और उसने इसे अवैधानिक, अव्यवस्थित एवं नगर नियोजन के नियमों के विरुद्ध बताते हुए सड़क से सदन तक विरोध किया। धरना, प्रदर्शन, अनशन, विरोध इतना प्रतीकात्मक हो चुका था कि यह साफ हो गया था कि अगर यह बनेगी तो बचेगी नहीं और हुआ भी वही। एक ने बनाकर दम लिया, दूसरे ने तोड़कर।
करोड़ों रुपये का निवेश, समय, योजना और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षण भर में ध्वस्त कर दिया गया और जिन लोगों ने इस चौपाटी से रोजगार पाया था, वे बजट और विकास के बहस के बीच गुम हो गए। निर्माण में भी उनका नाम नहीं, ध्वस्तीकरण में भी नहीं। वे सिर्फ राजनीतिक रस्साकशी के शिकार बने।
रुख बदलने का यह खेल नया नहीं है। दानी स्कूल चौपाटी पर जिन लोगों ने विरोध किया था, उन्हीं में से कई एनआईटी चौपाटी बचाने की अगुवाई करते दिखे और दानी स्कूल चौपाटी का समर्थन करने वाले एनआईटी चौपाटी हटाने बुलडोजर के साथ पहुंचे। यह विरोध या समर्थन का मुद्दा नहीं है बल्कि राजनीतिक सुविधा तथा अवसरवाद का सबसे स्पष्ट चेहरा है।
इतिहास दोहराया जाता है, क्योंकि राजनीतिक चरित्र नहीं बदलता। रायपुर इससे पहले भी स्काईवॉक के मामले में यह अध्याय पढ़ चुका है। भाजपा ने इसे राजधानी की पहचान और भविष्य की परिवहन योजना कहकर बनाया। कांग्रेस ने इसे अव्यावहारिक और जनविरोधी बताते हुए तोड़ने के पक्ष में खड़ी रही। आज फिर उसी स्काईवॉक का पुनर्निर्माण शुरू हो चुका है।
जनता जनप्रतिनिधियों को इस आशा के साथ चुनती है कि वे उसके हित की रक्षा करेंगे। लेकिन बार-बार यही संदेश मिलता है कि जनता की चिंता नहीं, जिद की पूर्ति ज्यादा है। निर्माण में जनता का पैसा, तोड़ने में भी जनता का पैसा। निर्णय सत्ता का होता है और कीमत जनता को चुकानी पड़ती है। शहरी विकास सत्ता परिवर्तन पर निर्भर नहीं होना चाहिए, लेकिन रायपुर में विकास का पहला मतलब पहले निर्माण फिर ध्वस्तीकरण होता जा रहा है और इस चक्र में नुकसान हमेशा उन्हीं को होता है, जो टैक्स देते हैं, जो रोजगार तलाशते हैं, जो शहर के बेहतर भविष्य का सपना देखते हैं।
रायपुर विकास के नाम पर कितनी बार राजनीतिक प्रयोगशाला बनेगा? कब तक शहर सत्ता की जिद को झेलेगा। कब तक करोड़ों रुपये मिटाए जाएंगे सिर्फ इसलिए कि योजना किसी और की थी? जिस दिन जनता सवाल पूछना शुरू करेगी, उसी दिन सत्ता जिद छोड़कर जवाब देने लगेगी। तब तक सत्ता जिद करती रहेगी और शहर कीमत चुका रहा होगा।
-सीटू तिवारी
नीतीश कुमार गुरुवार को 10वीं बार जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, तो यह पहले की शपथ से बिल्कुल अलग था।
इससे पहले नीतीश कुमार को शब्दों के उच्चारण में कभी इतनी दिक्कत नहीं हुई।
नीतीश कुमार के सार्वजनिक भाषणों का रिकॉर्ड देखें, तो वह आत्मविश्वास से भरे और अच्छी हिन्दी बोलने वाले नेता के तौर पर दिखते थे। लेकिन इस बार बढ़ती उम्र का असर साफ़ दिख रहा था।
इसके बावजूद नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं।
2005 से वही गठबंधन सत्ता में रहा है, जिसके साथ नीतीश कुमार रहे हैं। 2005 से अकेले अपने दम पर न तो आरजेडी सत्ता में आ पाई है और न ही बीजेपी।
1985 में पहली बार विधायक बने नीतीश राजनीति के सांध्य काल में हैं, लेकिन उनकी प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि नीतीश कुमार का बिहार में कोई विकल्प क्यों नहीं हैं?
2020 के चुनाव में तीसरे नंबर यानी 43 सीट लाने के बाद भी बीजेपी ने नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाया।
2025 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही बनाना पड़ा।
नीतीश : 2005 से अब तक
नीतीश कुमार, बिहार ही नहीं बल्कि पूरी भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प किरदार हैं।
नीतीश कुमार, बिहार में सबसे ज्यादा वक्त मुख्यमंत्री के तौर पर रहे और अब उन्होंने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है।
बिहार की राजनीति में देखें, तो यहाँ तीन बड़ी पार्टियां हैं- आरजेडी, बीजेपी और जेडीयू।
आरजेडी में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के कार्यकाल को विपक्षी पार्टियाँ जंगलराज कहकर आलोचना करती हैं।
बीजेपी खुलकर हिन्दुत्व की राजनीति करती है। वहीं जेडीयू दोनों पार्टियों के साथ अपने लिए मध्यमार्गी राह खोज लेती है। साल 2003 में अस्तित्व में आई जेडीयू ख़ुद को समाजवादी बताती है।
नीतीश कुमार, अपनी पार्टी जेडीयू के संख्याबल के साथ आरजेडी और बीजेपी के साथ गठबंधन में चले जाते हैं। नीतीश कुमार करीब दो दशक से मुख्यमंत्री है।
नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, ‘नीतीश कुमार 77 और 80 का चुनाव हार गए थे। 1990 में जब लालू का उभार हुआ, तो बीजेपी को एक ओबीसी चेहरा चाहिए था जो लालू के बरक्स खड़ा किया जा सके।’
‘वह चेहरा नीतीश कुमार थे, बीजेपी ने उनको पॉलिटिकली मज़बूत किया। लेकिन 2010 के प्रचंड बहुमत के बाद नरेंद्र मोदी के सवाल पर नीतीश छिटकते हैं और 17 साल पुराना बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ देते है। उस वक्त 2014 के लोकसभा चुनाव में वो सीपीआई के साथ मिलकर लड़ते हैं लेकिन उन्हें सिर्फ दो सीट मिलती हैं।’
यानी नीतीश कुमार को भी इस बात का अंदाजा है कि वह भी बिना गठबंधन के बिहार में नहीं टिक सकते हैं। यानी एक साथ वह बीजेपी और आरजेडी दोनों से नहीं लड़ सकते हैं।
नीतीश की राजनीति
बिहार में देखें तो दो पार्टियाँ ही कैडर बेस्ड पार्टी है। बीजेपी और वामपंथी पार्टियाँ। आरजेडी का अपना आधार यानी कोर वोटर (एमवाई) रहा है।
नीतीश कुमार को जब नवंबर 2005 में सत्ता मिली, तो जेडीयू बहुत मजबूत सांगठनिक बेस वाली पार्टी नहीं थी।
वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष कहते हैं, ‘बिहार की राजनीति जाति प्रधान रही। लेकिन नीतीश कुमार इसे कास्ट टू क्लास की ओर ले गए। उन्होंने विकास को केंद्र में रखकर राजनीति की। ऐसा नहीं था कि उन्होंने जातियों की गोलबंदी नहीं की लेकिन उन्होंने यह गोलबंदी करके इन जातियों के लिए नीतिगत फैसले लिए।’
सुरूर अहमद भी कहते हैं, ‘आप लालू की पॉलिटिक्स देखिए, तो वह दलितों, पिछड़ों के यहाँ पहुँच जाते थे और साफ-सफाई पर ध्यान देने की बात करते थे। यानी उनकी पॉलिटिक्स बहुत पर्सनल लेवल पर चीज़ों को डील करती थी, लेकिन नीतीश एक डिस्टेंस रखते हुए नीतिगत परिवर्तन करते हैं, जिनका सकारात्मक असर होता है।’
लालू प्रसाद यादव जिस जाति से ताल्लुक रखते हैं, उसकी आबादी बिहार में 14 फीसदी है लेकिन नीतीश कुमार की जाति कुर्मी तो महज 2.87 फ़ीसदी ही हैं।
अगर कुर्मी के साथ कोइरी को भी जोड़ दिया जाए, तो ये तकरीबन सात फीसदी है। कुर्मी-कोइरी को बिहार की राजनीतिक शब्दावली में ‘लव कुश’ कहा जाता है।
लेकिन नीतीश कुमार ने अपने साथ केवल कोइरी और कुर्मी को ही नहीं, जोड़ा बल्कि महिलाओं और अति पिछड़ी जातियों को भी जोडऩे की सफल कोशिश की। इस बार जेडीयू का वोट शेयर 19 फीसदी से ज्यादा है।
महिलाओंं में नीतीश कुमार की पैठ
नीतीश कुमार ने अति पिछड़ी जातियों, महादलितों और महिलाओं के लिए कई योजनाएँ शुरू कीं।
एएन सिन्हा इंंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज (पटना) के पूर्व निदेशक डी एम दिवाकर कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने बीते 20 सालों में जो सोशल इंजीनियरिंग की है, उससे उनका वोट बेस बढ़ा है। लड़कियों के लिए साइकिल, पोशाक जैसी योजनाएँ चलाकर उन्होनें महिलाओं को अपने वोट बेस में शामिल किया।’
‘साल 2010 में जिस महिला ने नीतीश कुमार के लिए वोट किया होगा, अब उसकी बेटी भी नीतीश कुमार के लिए वोट कर रही है। यानी एक तरीके से जेनरेशन टू जेनरेशन की पसंद नीतीश कुमार हैं।’
वह कहते हैं, ‘दूसरा काम नीतीश कुमार ने यह किया कि उन्होनें कर्पूरी ठाकुर की तरह ही अतिपिछड़ा और महादलित कैटिगरी पर लगातार काम किया। जिससे ये जातियाँ जो आबादी के लिहाज से भी बड़ा वोट बैंक है, वो नीतीश के पक्ष में गोलबंद हुईं। तीसरा बिहार में जातीय गणना। इस गणना का विरोध बीजेपी लगातार कर रही थी, लेकिन नीतीश कुमार ने इसे करवाया और विभिन्न जातियों का आँकड़ा स्पष्ट तौर पर सामने आया। इस डेटा के संदर्भ में भी नीतीश फिलहाल एनडीए की मजबूरी बन जाते हैं।’
इस चुनाव में जीविका दीदियों पर लोगों को मतदान के लिए जागरूक करने की जिम्मेदारी थी। स्वयं सहायता समूह बनाकर जिस तरह से एक करोड़ 40 लाख जीविका दीदियों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश, नीतीश सरकार की तरफ से हुई, उससे भी नीतीश कुमार के पीछे महिलाएँ गोलबंद हुईं।
असम की मतदाता सूची बीते कई दशकों से विवादों के घेरे में रही है. राज्य में नागरिकता पर विवाद भी काफी पुराना है. तमाम राजनीतिक संगठन इसमें बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम होने के आरोप लगाते रहे हैं.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट -
अस्सी के दशक में घुसपैठ के मुद्दे पर करीब छह साल तक व्यापक आंदोलन झेल चुके इस सीमावर्ती राज्य में घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए ही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस यानी एनआरसी की कवायद शुरू की गई थी. लेकिन बरसों चली इस कवायद पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद जब सूची तैयार हुई तो 19 लाख से ज्यादा नाम इससे बाहर हो गए थे. इसके बाद यह पूरी कवायद भी विवादों में घिर गई. इस मुद्दे पर हजारों मामले विभिन्न अदालतों में लंबित है. राज्य सरकार ने भी अब तक एनआरसी की अंतिम सूची को मंजूरी नहीं दी है.
कैसे होगा असम में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण
बीते चार नवंबर से देश के विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद शुरू हुई है. इस कवायद में खरा उतरने के लिए मतदाता या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में होना जरूरी है. ऐसे सबूत नहीं होने की स्थिति में मतदाता को आयोग की ओर से तय 12 में से कोई एक दस्तावेज देना होगा. हालांकि यह कवायद भी विवादों में घिरी है. खासकर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में इसका काफी विरोध हो रहा है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी दायर की है.
पश्चिम बंगाल में क्यों कड़ी चुनौती है एसआईआर की प्रक्रिया?
लेकिन असम का मामला इससे अलग है. चुनाव आयोग ने राज्य की मतदाता सूची के विशेष संशोधन के जो नियम तय किए हैं उनके मुताबिक किसी भी मतदाता को अपनी पात्रता साबित करने की जरूरत नहीं है. इसके लिए पात्रता की तारीख एक जनवरी 2026 रखी गई है.
असम के मुख्य चुनाव अधिकारी अनुराग गोयल ने पत्रकारों को बताया, "यह कवायद 22 नवंबर से 20 दिसंबर तक चलेगी. इस दौरान बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) घर-घर जाकर मतदाताओं की मौजूदगी की पुष्टि करेंगे. 27 दिसंबर को मतदाता सूची का मसविदा प्रकाशित होगा. उसके बाद दावों और आपत्तियों के निपटान का दौर शुरू होगा. उनके निपटारे के बाद 10 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होगी."
असम में भी अगले साल अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने हैं.
एसआईआर वाले बाकी राज्यों से अलग प्रक्रिया क्यों?
लेकिन आखिर असम में यह कवायद बाकी 12 राज्यों में इस समय चल रही कवायद से अलग क्यों है? असम चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "असम में नागरिकता तय करने के मानदंड देश के बाकी राज्यों के मुकाबले अलग हैं. वर्ष 2019 में राज्य में एनआरसी की कवायद हुई थी. लेकिन उसकी अंतिम सूची अब तक जारी नहीं की गई है. ऐसे में बाकी राज्यों की तरह विशेष गहन पुनरीक्षण की स्थिति में एनआरसी के साथ टकराव की आशंका है. इसके अलावा विदेशी न्यायाधिकरणों के समक्ष 10 हजार से ज्यादा मामले अभी लंबित हैं. एनआरसी की सूची से बाहर होने वाले लोगों ने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए उस आंकड़े को चुनौती दी है."
असम में दूसरे धर्म के लोगों को जमीन की बिक्री करना हुआ कठिन
यह कवायद एसआईआर से इस मायने में भी अलग होगी कि इसके तहत मतदाताओं को किसी तरह का फॉर्म नहीं भरना होगा. वो इस दौरान अपने नाम जुड़वा, कटवा या संशोधित करा सकते हैं.
असम की मतदाता सूची बीते कई दशकों से विवादों के घेरे में रही है. राज्य में नागरिकता पर विवाद भी काफी पुराना है. तमाम राजनीतिक संगठन इसमें बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम होने के आरोप लगाते रहे हैं.
अस्सी के दशक में घुसपैठ के मुद्दे पर करीब छह साल तक व्यापक आंदोलन झेल चुके इस सीमावर्ती राज्य में घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए ही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस यानी एनआरसी की कवायद शुरू की गई थी. लेकिन बरसों चली इस कवायद पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद जब सूची तैयार हुई तो 19 लाख से ज्यादा नाम इससे बाहर हो गए थे. इसके बाद यह पूरी कवायद भी विवादों में घिर गई. इस मुद्दे पर हजारों मामले विभिन्न अदालतों में लंबित है. राज्य सरकार ने भी अब तक एनआरसी की अंतिम सूची को मंजूरी नहीं दी है.
कैसे होगा असम में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण
बीते चार नवंबर से देश के विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद शुरू हुई है. इस कवायद में खरा उतरने के लिए मतदाता या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में होना जरूरी है. ऐसे सबूत नहीं होने की स्थिति में मतदाता को आयोग की ओर से तय 12 में से कोई एक दस्तावेज देना होगा. हालांकि यह कवायद भी विवादों में घिरी है. खासकर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में इसका काफी विरोध हो रहा है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी दायर की है.
पश्चिम बंगाल में क्यों कड़ी चुनौती है एसआईआर की प्रक्रिया?
लेकिन असम का मामला इससे अलग है. चुनाव आयोग ने राज्य की मतदाता सूची के विशेष संशोधन के जो नियम तय किए हैं उनके मुताबिक किसी भी मतदाता को अपनी पात्रता साबित करने की जरूरत नहीं है. इसके लिए पात्रता की तारीख एक जनवरी 2026 रखी गई है.
असम के मुख्य चुनाव अधिकारी अनुराग गोयल ने पत्रकारों को बताया, "यह कवायद 22 नवंबर से 20 दिसंबर तक चलेगी. इस दौरान बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) घर-घर जाकर मतदाताओं की मौजूदगी की पुष्टि करेंगे. 27 दिसंबर को मतदाता सूची का मसविदा प्रकाशित होगा. उसके बाद दावों और आपत्तियों के निपटान का दौर शुरू होगा. उनके निपटारे के बाद 10 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होगी."
असम में भी अगले साल अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने हैं.
एसआईआर वाले बाकी राज्यों से अलग प्रक्रिया क्यों?
लेकिन आखिर असम में यह कवायद बाकी 12 राज्यों में इस समय चल रही कवायद से अलग क्यों है? असम चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "असम में नागरिकता तय करने के मानदंड देश के बाकी राज्यों के मुकाबले अलग हैं. वर्ष 2019 में राज्य में एनआरसी की कवायद हुई थी. लेकिन उसकी अंतिम सूची अब तक जारी नहीं की गई है. ऐसे में बाकी राज्यों की तरह विशेष गहन पुनरीक्षण की स्थिति में एनआरसी के साथ टकराव की आशंका है. इसके अलावा विदेशी न्यायाधिकरणों के समक्ष 10 हजार से ज्यादा मामले अभी लंबित हैं. एनआरसी की सूची से बाहर होने वाले लोगों ने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए उस आंकड़े को चुनौती दी है."
असम में दूसरे धर्म के लोगों को जमीन की बिक्री करना हुआ कठिन
यह कवायद एसआईआर से इस मायने में भी अलग होगी कि इसके तहत मतदाताओं को किसी तरह का फॉर्म नहीं भरना होगा. वो इस दौरान अपने नाम जुड़वा, कटवा या संशोधित करा सकते हैं.
डी-वोटर्स का मुद्दा
असम में डी यानी संदिग्ध वोटर्स लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रहे हैं. यह ऐसे लोग हैं जिनकी नागरिकता संदिग्ध है. ऐसे वोटरों की पहचान की कवायद वर्ष 1997 में शुरू हुई थी. इनके नाम राज्य की मतदाता सूची में तो शामिल हैं. लेकिन यह लोग वोट नहीं डाल सकते.
चुनाव आयोग के ताजा निर्देश के मुताबिक, ऐसे वोटरों की यथास्थिति बनी रहेगी. चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि जब तक किसी अदालत या विदेशी न्यायाधिकरण से उनके पक्ष में फैसला नहीं आता, उनके नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जा सकते. ऐसे में ताजा कवायद से उनको कोई फायदा नहीं होगा.
दरअसल, डी यानी संदिग्ध वोटर शब्द वर्ष 1985 के असम समझौते से अस्तित्व में आया था. इसके तहत केंद्र सरकार ने तय किया था कि 24 मार्च 1971 के बाद अवैध तरीके से असम आने वाले लोगों को विदेशी मानते हुए उनको इस श्रेणी में रखा जाएगा. वर्ष 1997 में असम की मतदाता सूची के संशोधन के बाद करीब तीन लाख लोगों के नाम इस सूची में शामिल किए गए थे. उनकी नागरिकता सवालों के घेरे में थी. उनमें से हजारों लोगों ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है. इनमें से ज्यादातर मामले राज्य के विदेशी न्यायाधिकरणों के समक्ष लंबित हैं. ऐसे लोगों को अपनी नागरिकता खुद साबित करनी होती है. असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मुताबिक राज्य में फिलहाल करीब 97 हजार ऐसे वोटर हैं.
स्वागत और विरोध
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने आयोग के फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि एक जनवरी, 2026 को पात्रता की तारीख तय करने से साफ-सुथरी, संशोधित और सटीक मतदाता सूची तैयार करने में सहायता मिलेगी.
भाजपा ने भी इसका स्वागत किया है. पार्टी के एक प्रवक्ता ने डीडब्ल्यू से बातचीत में दावा किया, "कांग्रेस ने बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार के लोगों को फर्जी तरीके से मतदाता सूची में शामिल किया है. इस कवायद से ऐसे लोग सूची से बाहर हो जाएंगे."
आजादी के करीब आठ दशक बाद किस हाल में है पूर्वोत्तर?
लेकिन कांग्रेस ने इस कवायद की आलोचना की है. पार्टी के एक प्रवक्ता ने डीडब्ल्यू से कहा, "बीजेपी अपने चुनावी हितों को साधने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही है. चुनाव आयोग भी उसके कहने पर चल रहा है."
सीपीएम ने इसे चुनावी लोकतंत्र पर हमला बताते हुए इसकी निंदा की है. पश्चिम बंगाल में पार्टी के एक नेता सोमनाथ बारुई ने डीडब्ल्यू से कहा, "चुनाव आयोग ने सत्तारूढ़ बीजेपी के कहने पर ही इस कवायद का फैसला किया है. असम में इससे पहले नागरिकता के सवाल पर तमाम फैसले विवादास्पद ही रहे हैं. वह चाहे एनआरसी का मुद्दा हो या फिर डी-वोटरों का."
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि असम के मामले को बाकी राज्यों से अलग रखने के आयोग के फैसले पर सवाल उठना लाजिमी है. खासकर, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में तमाम राजनीतिक दल इस कवायद को अपने हित में भुनाने का प्रयास कर रहे हैं. लोगों को वर्ष 2002 की मतदाता सूची में अपना या परिजनों का नाम तलाशने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है. लेकिन असम का मामला इससे अलग है. वहां लोगों को अपनी पहचान साबित नहीं करनी होगी.
- सुशांत आचार्य
भारत में ऑनलाइन मनी गेमिंग पर प्रतिबंध का फैसला ऐसे समय आया है, जब यह उद्योग अभूतपूर्व रफ्तार से बढ़ रहा था। यूनिकॉर्न कंपनियों का उभार, करोड़ों की भागीदारी और फैंटेसी क्रिकेट का जुनून, ये सभी मिलकर एक ऐसा डिजिटल इकोसिस्टम बना रहे थे, जिसमें उम्मीदें ज्यादा थीं, और वास्तविक कमाई बेहद कम।
यह उद्योग गरीब भारतीयों की आकांक्षाओं पर न केवल खड़ा हुआ, बल्कि फला फूला भी, और फिर सरकार को अंतत: इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा।
भारत की अर्थव्यवस्था जितनी तेज़ी से आगे बढ़ रही है, उतनी तेजी से रोजगार के अवसर नहीं बढ़ पाए। नतीजा यह रहा कि बड़ी संख्या में युवा, खासकर ग्रामीण और निम्न आय वर्ग वाले, ऑनलाइन गेमिंग को अतिरिक्त आय के तौर पर देखने लगे। सस्ते स्मार्टफोन, सस्ता डेटा और यूपीआई ने इस रुझान को और हवा दी। यह रुझान आकस्मिक नहीं था, यह एक सामाजिक और आर्थिक विस्थापन की कहानी भी है, जिसमें युवाओं को कहीं और अवसर न दिखे, तो उन्होंने डिजिटल दांव-पेंच को ही आजमाना शुरू कर दिया।
फेडरेशन ऑफ इंडियन फैंटेसी स्पोर्ट्स के अनुसार, लगभग 22.5 करोड़ भारतीय फैंटेसी गेम्स से जुड़े, इनमें से 85त्न क्रिकेट पर दांव लगाते थे, जिनमें से 30 वर्ष से कम उम्र के भारतीयों की भागीदारी लगभग एक-चौथाई थी, आंकड़े बताते हैं की इनमें से 40त्न लोगों की सालाना कमाई 3 लाख रुपये तक नहीं थे, अधिक कमाई वालों में अत्यधिक सक्रिय खिलाडिय़ों की संख्या केवल 12%, यानि यह उद्योग उन लोगों पर निर्भर था, जिनके लिए हार का मतलब सिर्फ पैसे का नुकसान नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक सुरक्षा पर गहरी चोट थी।
2023 में एक निजी प्रसारक ने भारत में ऑनलाइन सट्टे का अनुमान 3–4 लाख करोड़ रुपये बताया। इतनी बड़ी रकम डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर रोजाना घूम रही थी, लेकिन इसका फायदा ज्यादातर कंपनियों को ही होता था। खिलाड़ी नुकसान के चक्कर से निकल ही नहीं पाते थे। लत लगाने वाले एल्गोरिदम, छोटे-छोटे दांव, करोड़ों के इनाम का लालच और लगातार नोटिफिकेशन, इन सभी ने मिलकर युवाओं की मानसिकता को प्रभावित किया। धीरे-धीरे यह मनोरंजन का रूप न रहकर एक छुपा हुआ मानसिक और सामाजिक संकट बनता गया।
इस पर लगे प्रतिबंध से राजस्व पर चोट लगना तय है। कई सालों तक इस उद्योग ने अपनी कमाई पर 18% जीएसटी दिया, लेकिन बाद में सरकार ने दांव की पूरी राशि पर 28% टैक्स की मांग की, जिसकी कुल डिमांड 1.12 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह विवाद बताता है कि, उद्योग का संचालन पारदर्शी नहीं था, कर संरचना अस्पष्ट थी, और डिजिटल सट्टेबाजी के वास्तविक पैमाने को लेकर सरकार भी आशंकित थी।
यह तो साफ था की प्रतिबंध राजस्व पर असर डालेगा, लेकिन सरकार का रुख स्पष्ट है, समाज की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी।
2008 में Dream11 की शुरुआत एक छोटे प्रयोग के रूप में हुई थी। 2016 में यूपीआई लॉन्च होने के बाद इसमें अचानक तेजी आई। छोटे दांव-11 रुपये, 50 रुपये, और त्वरित भुगतान ने इसे आम भारतीयों तक पहुंचा दिया। इसके बाद, Dream11 यूनिकॉर्न बना, MPL ने तीन साल में यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल किया, Games24x7 ने RummyCircle और MyvvCircle के साथ बाज़ार का बड़ा हिस्सा कब्जा लिया, 2024 तक उद्योग में 400 कंपनियों के सक्रिय होने का अनुमान था। लेकिन पीछे छिपी हकीकत यह थी कि जितना पैसा कंपनियों ने कमाया, उतना ही नुकसान करोड़ों खिलाडिय़ों को उठाना पड़ा।
18 नवंबर, बाल शोषण जागरूकता दिवस
-दिलीप कुमार पाठक
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 नवंबर को बाल यौन शोषण, उत्पीडऩ और हिंसा की रोकथाम और उपचार को विश्व दिवस के रूप में घोषित किया है। इस दिन का उद्देश्य बाल यौन शोषण को वैश्विक स्तर पर उठाने एवं लोगों को जागरूक करने के लिए उठाया गया सकारात्मक सोच का प्रतीक है द्य विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हर साल लाखों बच्चे यौन हिंसा का अनुभव करते हैं। यह शोषण हमारे आसपास भी खूब दिखता है, बस हमें देखने की दृष्टि चाहिए। इसलिए ये संकल्प सभी सदस्य देशों, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के निर्वाचित व्यक्तियों और अन्य साझीदारों, विश्व नेताओं, अभिनेता नागरिको समाज और अन्य संबंधित लोगों को इस विश्व दिवस पर इस तरह से शपथ लेने के लिए आमंत्रित करता है।
यह बाल यौन शोषण से प्रभावित लोगों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने और बाल यौन शोषण, भेदभाव और हिंसा को रोकने और समाप्त करने की आवश्यकता एवं जवाबदेही ठहराने को मान्यता देता है। इस प्रस्ताव को अफ्रीकी देश सिएरा लियोन और नाइजीरिया ने रखा था और 110 से अधिक देशों ने इसका समर्थन किया था। इसे तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच आम सहमति से पारित किया गया। प्रस्ताव पेश करने वाली सिएरा लियोन की प्रथम महिला फातिमा माडा बायो ने बाल यौन शोषण को ए जघन्य अपराध करार दिया। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने आज बच्चों के खिलाफ हो रही हिंसा, शोषण, दुर्व्यवहार, तस्करी, यातना और हानिकारक प्रथाओं को रोकने के लिए और भी तेज़ी से काम करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि जो बच्चे पीडि़त हुए हैं या बच गए हैं, उन्हें इलाज और न्याय मिलना बहुत जरूरी है। बाल यौन शोषण, दुव्र्यवहार और हिंसा एक गंभीर समस्या है जो पूरी दुनिया में फैली हुई है। लाखों बच्चे इसके शिकार हो रहे हैं। हमें मिलकर इन अपराधों को रोकना होगा, बच्चों को सुरक्षित रखना होगा, और जो लोग ऐसा करते हैं उन्हें सजा दिलानी होगी-चाहे वो ऑनलाइन हो या ऑफलाइन। कोविड-19, युद्ध, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं जैसी बड़ी चुनौतियों के समय में, गरीबी बढ़ रही है, जिससे लोगों के साथ भेदभाव हो रहा है। इन सब से बच्चों की स्थिति और भी खराब हो रही है, और वे शोषण, दुर्व्यवहार और हिंसा का शिकार हो रहे हैं। जो बच्चे इन अपराधों का शिकार होते हैं, उनकी शारीरिक, मानसिक और यौन सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है, और उनकी पूरी जिंदगी प्रभावित हो सकती है। यह उनके लिए यातना जैसा ही है, हमें इन समस्याओं को रोकने के लिए और भी काम करना होगा।
-दीपक मंडल
बिहार में मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए ने शानदार जीत दजऱ् की है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नीतीश कुमार का एक बार फिर सीएम बनना लगभग तय है।
बिहार में बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, रोजगार और महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर उन्होंने कई अच्छे कदम उठाए हैं।
पिछले 20 साल के दौरान किए गए सुधारों की वजह से ही नीतीश कुमार को ‘सुशासन बाबू’ कहा जाने लगा है।
लेकिन अभी भी बिहार देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर नीतीश कुमार सीएम बनते हैं तो उन्हें अपने नए कार्यकाल में बहुत कुछ ऐसा करना होगा जिससे बिहार का आर्थिक और सामाजिक विकास तेज़ हो सके।
आइए देखते हैं कि बिहार के सामने क्या बड़ी चुनौतियां हैं और नई सरकार को किन मोर्चों पर काम करना होगा।
1. पलायन और रोजगार
बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल और प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज ने बिहार से रोजगार के लिए पलायन को बड़ा मुद्दा बनाया था।
आरजेडी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहे महागठबंधन ने राज्य में हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया था तो एनडीए ने एक करोड़ नौकरियां देने की बात कही थी।
दरअसल बिहारी नौजवानों का रोजग़ार के लिए देश के दूसरे राज्यों में पलायन करना इस राज्य के लिए बड़ी समस्या है।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में हर तीन में से दो घरों का कम से कम एक सदस्य दूसरे राज्य में काम करता है।
1981 में, केवल 10-15 फ़ीसदी परिवारों में ही कोई प्रवासी मजदूर था लेकिन 2017 तक ये आंकड़ा बढक़र 65 फीसदी हो गया।
अखबार ने एक हालिया रिपोर्ट का हवाला देकर कहा है कि 2023 में भारत के चार सबसे व्यस्त अनरिजर्व्ड रेल मार्ग बिहार से शुरू होने थे। ये इस बात का सबूत है कि बिहार का वर्किंग फोर्स किस तरह राज्य से बाहर जा रहा है।
बिहार में छोटी जोत, इंडस्ट्री में नौकरियों की कमी और कमजोर मैन्युफैक्चरिंग बेस की वजह से लोगों को रोजगार के लिए घर छोडऩा पड़ता है।
बिहार का 54 फीसदी वर्किंग फोर्स अभी भी खेती-बाड़ी से जुड़ा है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 46 फीसदी है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सिर्फ पांच फीसदी लोगों को रोजगार मिला है जबकि राष्ट्रीय औसत 11 फीसदी है।
बिहार भारत की सबसे युवा आबादी वाले राज्यों में से एक है। यहां आधे से अधिक लोग 15-59 वर्ष की कामकाजी आयु वर्ग के हैं। फिर भी यहां अच्छी नौकरियों की कमी है।
2. शहरीकरण और इन्फ्रास्ट्रक्चर
2011 की जनगणना के मुताबिक केरल में शहरीकरण 47.7, गुजरात में 42.6 और तमिलनाडु में 48.4 फ़ीसदी की दर से बढ़ा लेकिन बिहार में सिर्फ 11.3 फ़ीसदी की दर से शहरीकरण हुआ है।
बिहार में नीतीश कुमार के शासन के दौरान इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के लिए काफी अच्छा काम हुआ है। लेकिन शहरीकरण की दर अब भी काफी कम है।
2013 से 2023 तक के नाइट लाइट (रात में दिख रही रोशनी) डेटा के मुताबिक़ बिहार के ज़्यादातर विधानसभा क्षेत्र अभी भी ग्रामीण हैं।
नाइट लाइट डेटा किसी इलाके में मानव गतिविधियों और बिजली के इस्तेमाल का आकलन करने में काम आ सकता है।
रात में लाइट सिस्टम न सिर्फ सडक़ और गाडिय़ों का दिखाता है बल्कि ये कंस्ट्रक्शन और सडक़ निर्माण जैसी आर्थिक गतिविधियों को भी दिखाता है।
नाइट लाइट सिस्टम का ये पैटर्न शहरी विकास और तरक्की का संकेत हो सकता है।
3. मैन्युफैक्चरिंग मजबूत करने की चुनौती
दूसरे राज्यों की तुलना में देखें तो बिहार का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर राज्य की जीडीपी में सिफऱ् 5 से 6 फीसदी का योगदान करता है।
ये दो दशक पहले जैसी स्थिति है। जबकि गुजरात की जीडीपी (जीएसडीपी) में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 36 फीसदी है।
बिहार की मैन्युफैक्चरिंग में ये ठहराव न केवल राज्य के भीतर की चुनौतियों को दिखाता है, बल्कि असमान औद्योगिक विकास के राष्ट्रीय रुझान को भी जाहिर करता है।
फैक्ट्रियों की सीमित संख्या होने से राज्य में कौशल विकास बाधित हो रहा है। इससे कामकाजी उम्र के लोगों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर है।
-उमंग पोद्दार
बीते 30 अक्तूबर को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्यकान्त को भारत का अगला मुख्य न्यायाधीश, या चीफ जस्टिस, नियुक्त किया।
24 नवंबर 2025 को जस्टिस सूर्यकान्त चीफ जस्टिस के पद को संभालेंगे। हाल के कुछ मुख्य न्यायाधीशों के मुकाबले उनका एक लंबा कार्यकाल होगा, जो कि 15 महीने, यानी फरवरी 2027 तक चलेगा।
चीफ जस्टिस भारत के न्यायपालिका व्यवस्था के मुख्य अधिकारी होते हैं। वे ना केवल एक जज के तौर पर मामलों में फैसले लेते हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी सारी प्रशासनिक कार्यों पर भी निर्णय लेते हैं।
इसमें एक बड़ी शक्ति है ये तय करना कि किसी मामले की सुनवाई कब होगी और कौन से जज उस मामले को सुनेंगे। इसलिए यह भी कहा जाता है कि सभी फैसलों में चीफ जस्टिस की एक ‘इनडायरेक्ट’ शक्ति होती है।
हाल में, जस्टिस सूर्यकान्त कई चर्चित मामलों में सुर्खियों में रहे हैं, बिहार में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’, कॉमेडियन समय रैना के इंडियाज गॉट लेटेंट शो से जुड़ा विवाद, और अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली ख़ान महमूदाबाद की गिरफ़्तारी।
वकालत में प्रवेश
22 साल की उम्र में, जस्टिस सूर्यकान्त ने हरियाणा में वकालत शुरू की। एक साल बाद, 1985 में, वे चंडीगढ़ में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे। वकालत में 16 साल बिताने के बाद, वे हरियाणा के एडवोकेट-जनरल नियुक्त हुए। उस वक्त वे केवल 38 साल के थे, जोकि एडवोकेट-जनरल के लिए बहुत कम आयु मानी जाती है। उस वक्त वे एक सीनियर एडवोकेट भी नहीं थे। उन्हें सीनियर एडवोकेट साल 2001 में बनाया गया।
इसके कुछ वर्षों बाद ही, 2004 में उन्हें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में जज नियुक्त किया गया। 2019 में वे हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया।
तेज प्रताप यादव क्यों हारे
हालांकि, इस बीच उन पर कई गंभीर आरोप भी लगाए गए, जिनकी व्याख्या समाचार मैगजीन कारवां की एक रिपोर्ट में की हुई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 में एक व्यापारी सतीश कुमार जैन ने भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस को एक शिकायत भेजी थी, जिसमें उन्होंने कहा कि जस्टिस सूर्यकान्त ने कई संपत्तियों को खरीदने और बेचने के दौरान संपत्तियों को ‘अंडर वेल्यू’ किया था। इससे उन्होंने सात करोड़ रुपए से ज़्यादा के ट्रांजेक्शन पर टैक्स नहीं दिया। इस रिपोर्ट में 2017 के भी एक आरोप की बात की है, जब सुरजीत सिंह नामक पंजाब में एक कैदी ने जस्टिस सूर्यकान्त पर आरोप लगाया कि उन्हें रिश्वत लेकर लोगों को जमानत दी है।
इन आरोपों की कई बार चर्चा हुई है। लेकिन ये साफ नहीं कि इन पर कभी कोई कार्यवाही की गई या नहीं। जब जस्टिस सूर्यकान्त को हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा गया, तब कारवां और अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में खबरों के मुताबिक, तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने तब के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र को एक चि_ी लिखी। उसमें उन्होंने कहा कि जस्टिस सूर्यकान्त पर लगाए गए आरोप पर उन्होंने 2017 में एक जांच की मांग की थी, हालांकि उसका क्या परिणाम निकला इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से जाँच नहीं होती, तबतक जस्टिस सूर्यकान्त को हिमाचल प्रदेश का मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाना चाहिए।
हालांकि, 2019 में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक पत्र में कहा कि जस्टिस सूर्यकान्त के खिलाफ आरोप निराधार हैं। बीबीसी हिंदी ने सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस सूर्यकान्त से उन पर लगे आरोपों के बारे में उनकी टिप्पणी मांगी, हालांकि हमें इसका कोई जवाब नहीं मिला। जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट में उसे शामिल किया जाएगा।
जस्टिस सूर्यकान्त की संपत्ति कई बार चर्चा में रही है। मई 2025 में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वेबसाइट पर जजों की संपत्ति को सार्वजनिक तौर से घोषित किया। जस्टिस सूर्यकान्त की घोषणा में आठ संपत्तियाँ और करोड़ों रुपए के निवेश शामिल थे।


