विचार/लेख
सुप्रीम कोर्ट ने सेना में शार्ट सर्विस कमीशन वाली महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इसे लैंगिक असमानता दूर करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सेना में शार्ट सर्विस कमीशन के तहत भर्ती होने वाले महिलाओं को स्थायी कमीशन मिलेगा। अदालत ने सेना में महिलाओं के खिलाफ व्यवस्थागत भेदभाव को स्वीकार करते हुए उनके हक में फैसला सुनाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेषाधिकारों का इस्तेमाल किया।
सेना में एसएससी के भर्ती होने वाली महिलाएं अब तक स्थायी कमीशन से वंचित थीं। इसकी वजह से रिटायर होने के बाद उनको पेंशन और भत्ते भी नहीं मिलते थे। अब इन महिला अधिकारियों की सेवा 20 साल के समान मानते हुए उनको समुचित पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
सेना में महिलाओं के साथ कथित भेदभाव की शिकायतें तो बहुत पहले से उठ रही थी। इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबी लड़ाई के बावजूद इसे पूरी तरह दूर नहीं किया जा सका था। बीते साल कुछ महिला अधिकारियों ने केंद्र की स्थायी कमीशन से जुड़ी वर्ष 2019 की नीतियों और आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के फैसलों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनमें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का हिस्सा रही अधिकारी भी शामिल थीं। याचिका में आरोप लगाया गया था कि शीर्ष अदालत के साफ दिशा-निर्देशों के बावजूद केंद्र और सेना के अधिकारी स्थायी कमीशन देने के मामले में महिलाओं के साथ भेदभाव कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले सेना की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट तैयार करने में महिला और पुरुष अधिकारियों में भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए इस प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण बताया है। उसका कहना है कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति एन। कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के बाद मंगलवार को अपने फैसले में कहा कि योग्यता की कमी नहीं बल्कि भेदभाव की नीति के कारण ही महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन नहीं मिल सका है। अब शार्ट सर्विस के बाद सेना से हटाई गई महिला अधिकारियों की सेवा भी 20 साल के समान मान कर उनको पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलेंगी।
आदिवासी समुदायों और अमेजन वर्षावन को लंबे समय से रहस्यमय रूप में पेश किया गया है। जर्मनी के बॉन शहर में लगी एक नई प्रदर्शनी इन पुरानी धारणाओं को चुनौती देती है।
डॉयचे वैले पर ब्रेंडा हास की रिपोर्ट –
यूरोपीय इतिहास में दक्षिण अमेरिकी अमेजन को अक्सर एक विशाल और अछूते क्षेत्र के रूप में देखा गया है। समय के साथ-साथ अमेजन के प्रति कई धारणाएं बनती गईं। वर्षावन को ‘अछूता’ जंगल माना जाने लगा, वहां के आदिवासियों को पुराने युग से जोड़ा गया और इस पूरे इलाके को समय में रुका हुआ दिखाया गया। परिणामस्वरूप इस जटिल और विविधता से भरपूर क्षेत्र को मात्र एक ‘एक्जॉटिक बैकड्रॉप' के रूप में देखा जाने लगा।
‘अमेजन’ का यह एकल चित्रण और एकरूप जंगल मानने की यह धारणा असल में ‘अमेजोनिया’ के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विविधता से बिल्कुल मेल नहीं खाता। इसी विषय पर बॉन में आयोजित यह प्रदर्शनी केंद्रित है।
नजरिए में बदलाव
मानवविज्ञानी लेआंड्रो वेरिसन और ब्राजीलियाई कलाकार तथा कार्यकर्ता डेनिलसन बानिवा ने इस प्रदर्शनी का संयुक्त रूप से आयोजन किया है। ‘अमेजोनिया। इंडीजीनस वर्ल्ड्स’ नामक इस प्रदर्शनी का मकसद है दुनिया के इस हिस्से पर एक सूक्ष्म और समझदार नजरिया प्रस्तुत करना।
यह प्रदर्शनी अमेजोनिया को ऐसे सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करती है, जो जटिल सामाजिक संरचनाओं, आदान-प्रदान के घने जाल और मानव तथा गैर-मानव संसारों के रिश्तों से गठित है।
वेरिसन ने डीडब्ल्यू को बताया, ‘आदिवासियों को हमेशा ऐसे दिखाया जाता है जैसे वे इतिहास से अलग हो - न वे बदलते हैं, न विकसित होते हैं। लेकिन संस्कृति जीवित है, इसका मतलब यह है कि वह लगातार विकसित और परिवर्तित होती रहती है।’ इसलिए सामान्य संग्रहालयों की समय-रेखा का पालन करने की जगह, क्यूरेटरों ने प्रदर्शनी को आदिवासी समुदाय के दृष्टिकोण के अनुसार व्यवस्थित किया है।
‘अमेजोनिया’ एक बहुत ही बड़ा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक क्षेत्र है, जो ब्राजील, बोलिविया, पेरू, इक्वाडोर, कोलंबिया, वेनेजुएला, गयाना, सूरीनाम और फ्रेंच गयाना में फैला हुआ है। यह क्षेत्र अमेजन नदी के आस-पास स्थित है और इसे कई लैटिन अमेरिकी शैक्षणिक और आदिवासी संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है।
यह विश्व के उन क्षेत्रों में से एक है जहां भाषाओं की सबसे अधिक विविधता पाई जाती है।
विद्वानों का अनुमान है कि यूरोप में 16वीं शताब्दी में शुरू हुए विदेशी आक्रमणों से पहले इस क्षेत्र में 1,000 से भी ज्यादा भाषाएं मौजूद थीं। आज भी यहां 300 से ज्यादा आदिवासी भाषाएं बोली जाती है, जिनमें संकेत भाषाएं, सीटी से संवाद करने वाली और ढोल के माध्यम से संवाद करने वाली भाषाएं भी शामिल हैं। वेरिसन के अनुसार, यह यूरोपीय संघ की 24 आधिकारिक भाषाओं की तुलना में काफी बड़ा अंतर है। अगर आप महाद्वीप पर बोली जाने वाली 60 से अधिक क्षेत्रीय या अल्पसंख्यक भाषाओं को भी शामिल कर लें, तब भी यह काफी प्रभावशाली है।
यह विषय, जैसे सृष्टि की कहानियां, समुदाय के बीच संबंध और आदिवासियों का भविष्य के प्रति दृष्टिकोण हमें यह समझाने में मदद करते हैं कि अमेजोनिया में संस्कृति जीवित है, न कि स्थिर या अलग-थलग।
बदलता हुआ रुख
कुछ कलाकृतियां इस बात की ओर ध्यान दिलाती हैं कि यूरोपीय लेखों में आदिवासी समुदाय को किस तरह देखा या अनदेखा किया जा रहा है। ऐसा ही एक प्रभावशाली काम है ‘कार्टा ओ वेल्हो मुंडो’ (पुरानी दुनिया को पत्र, 2018–2019), जो दिवंगत मकुशी कलाकार और कार्यकर्ता जैडर एसबेल ने बनाया था। यह रचना उन्होंने तब की, जब उन्हें एक पुरानी किताबों की दुकान से 1972 की ‘गैलेरिया डेल्टा डा पिंटूरा यूनवर्सल ‘ नाम की एनसाइक्लोपीडिया मिली, जो पश्चिमी कला को ‘सार्वभौमिक’ बताती थी।
लगभग 400 पन्नों वाली इस यूरोपीय कला-पुस्तक के हर हिस्से पर उन्होंने सीधे ही चित्र बना दिए, रंग भरे और लिखावट भी की। उन्होंने इसमें आदिवासी मान्यताओं, पर्यावरण को लेकर चेतावनियां और ‘पुरानी दुनिया’ के लिए सीधी टिप्पणियां भी जोड़ीं। यह एक ऐसा कदम है जो उपनिवेशवाद की सोच को चुनौती देता है और दिखाता है कि इस किताब में दिखाया गया ‘सार्वभौमिक’ कला इतिहास असल में औपनिवेशिक नजरिए से बनाया गया था।
डेनिलसन बनिवा की इस कलाकृति ‘काकादोरेस दे फिक्सोएस कोलोनियाइस’ (2021) में पुरानी फोटो का उपयोग किया गया है। इनका उपयोग पहले आदिवासी समुदाय को अलग और अजीब दिखाने के लिए किया जाता था। अपनी तस्वीरों में वह पॉप कल्चर के किरदार भी जोड़ते हैं, जैसे 'बैक टू द फ्यूचर' वाली कार, किंग कांग और गॉडजिला। इन सब चीजों को वह तस्वीरों में जोडक़र अजीब से दृश्य बनाते हैं और यह दिखाते हैं कि इस तरह के फोटो और ज्ञान ने आदिवासियों के प्रति कैसे गलत धारणा स्थापित की है।
लेआंड्रो वेरिसन को अक्सर इस बात का सामना करना पड़ता है कि कलाकृतियां किस तरह हमेशा आम धारणा को दर्शाती है। उनका कहना है, ‘लोगों की सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि आदिवासी लोग सिर्फ अतीत में रहते हैं और बदलाव नहीं चाहते हैं। वह यह भी कहते हैं कि आज उनके पास मोबाईल फोन या सोशल नेटवर्क होने का मतलब यह नहीं है कि उन्होंने ‘अपनी संस्कृति खो दी है, बल्कि इसका मतलब यह है कि वह अपने तरीके से खुद को ढाल रहे हैं।’
उनका यह भी कहना है कि ‘अगर हम पश्चिमी लोग अपने आप को बदलने का अधिकार रखते हैं, तो आदिवासी समुदाय को यह अधिकार क्यों नहीं?’
आखिर किसने किसको खोजा?
एक प्रश्न यह भी उठता है कि ‘खोज’ का अर्थ क्या है और वास्तव में किसने किसकी खोज की।
शोध के मुताबिक, अमेजन में पहले लाखों लोग रह रहे थे। वह वन उद्यानों का विकास करते थे और कोयला एवं जैविक पदार्थ मिलाकर ‘टेरा प्रेटा’ नामक मिट्टी बनाते थे। यह एक उपजाऊ और कार्बन-समृद्ध मिट्टी होती है।
पुराने अध्ययनों से पता चलता है कि कई प्रसिद्ध पेड़ों की प्रजातियां जैसे ब्राजील नट, कोको और अकाई हजारों साल पहले से आदिवासी उगाते थे। आश्चर्य की बात यह है कि इस समुदाय ने यूरोपियों के आने से पहले इन पेड़ों को उगाना शुरू कर दिया था।
ऐसी खोज इस गलत धारणा पर सवाल उठाती है कि वन पूरी तरह से अछूते थे और यह बताती है कि वहां मानव की मौजूदगी और संरक्षण का इतिहास लंबे समय से चला आ रहा है।
-टिम मानसेल
जर्मनी इस समय कुशल कामगारों की कमी से लगातार जूझ रहा है। एक तरफ बुजुर्ग कर्मचारी रिटायर हो रहे हैं, और दूसरी तरफ उनकी जगह लेने के लिए पर्याप्त युवा उम्मीदवार नहीं मिल रहे। इस समस्या से निपटने के लिए यह भारत से आने वाले कामगारों को अब पहले से ज़्यादा मौक़ा दे रहा है।
हैंडिर्क फॉन उंगर्न स्टर्नबर्ग के लिए इसकी शुरुआत फरवरी 2021 में उनके इनबॉक्स में आए एक ईमेल से हुई। यह ईमेल भारत से आया था।
संदेश का सार कूछ यूँ था-‘हमारे पास बहुत से युवा और मेहनती लोग हैं, जो व्यावसायिक प्रशिक्षण लेना चाहते हैं, और हम जानना चाहते हैं कि क्या आपकी इसमें दिलचस्पी है।’
उस समय स्टर्नबर्ग दक्षिण पश्चिम जर्मनी में फ्ऱाइबर्ग चैंबर ऑफ स्किल्ड क्रॉफ्ट्स में काम कर रहे थे। यह एक व्यापारिक संगठन है, जो राजमिस्त्रियों और कारपेंटर्स से लेकर कसाइयों और बेकर्स तक, कुशल कामगारों और उन्हें काम देने वाली कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है।
स्टर्नबर्ग कहते हैं, ‘हमारे पास बहुत से ऐसे नियोक्ता थे, जो बेहद परेशान थे, क्योंकि उन्हें काम करने के लिए कोई मिल नहीं रहा था। इसलिए हमने इसे आज़माने का फैसला किया।’
उनकी पहली कॉल स्थानीय कसाई संघ के प्रमुख को गई। पूरे जर्मनी में कसाइयों की हालत खास तौर पर खऱाब थी। यह ऐसा क्षेत्र था, जो तेजी से गिरावट में जा रहा था।
2002 में जहाँ 19,000 छोटे परिवार इसे चला रहे थे, वहीं 2021 तक उनकी संख्या घटकर 11,000 से भी कम रह गई थी। नियोक्ताओं के लिए युवा लोगों को अप्रेंटिसशिप के लिए तैयार करना लगभग नामुमकिन हो गया था।
कसाई संघ के प्रमुख योआखिम लेडरर कहते हैं, ‘कसाई का काम बहुत मेहनत वाला होता है। और पिछले करीब 25 सालों से युवा दूसरे रास्ते पकड़ रहे हैं।’
‘मैं दुनिया देखना चाहती थी’
भारत में, उस शुरुआती ईमेल को भेजने वाली रोजगार एजेंसी ‘मैजिक बिलियन’ ने 13 युवाओं को भर्ती करने में सफलता पाई। ये सभी 2022 की शरद ऋतु में जर्मनी पहुंचे और स्विट्जऱलैंड की सीमा से लगे छोटे कस्बों में कसाई की अप्रेंटिसशिप शुरू की। वे अपने समय का एक हिस्सा कॉलेज में भी बिताते थे।
उनमें एक 21 साल की एक लडक़ी भी थी, जिसने अपना नाम न छापने की गुजारिश की। अपने साथ आए ज़्यादातर लोगों की तरह, उसने भी पहली बार भारत से बाहर कदम रखा था।
वह आज भी अपने उस समय के उत्साह को याद करती हैं, ‘मैं दुनिया देखना चाहती थी। मैं अपना जीवन स्तर बहुत ऊंचा करना चाहती थी। मैं अच्छी सामाजिक सुरक्षा चाहती थी।’
वह जर्मनी के सुदूर दक्षिण पश्चिम में बसे वाइल आम राइन शहर में काम करने आई थीं, जो स्विट्जरलैंड और फ्रांस दोनों की सीमाओं से सटा हुआ है।
तीन साल बाद हालात काफी बदल चुके हैं। फ़ॉन उंगर्न स्टर्नबर्ग अब उस चैंबर में काम नहीं करते।
अब उन्होंने ‘मैजिक बिलियन’ की अदिति बनर्जी के साथ मिलकर अपनी खुद की रोजगार एजेंसी ‘इंडिया वक्र्स’ शुरू कर ली है, ताकि और ज़्यादा युवा भारतीय कामगारों को जर्मनी लाया जा सके। शुरुआत के 13 लोगों से बढक़र अब जर्मनी की कसाई दुकानों में 200 युवा भारतीय काम कर रहे हैं।
जर्मनी ने बढ़ाया इंटर्नशिप कोटा
जर्मनी इस समय जनसांख्यिकीय संकट से गुजऱ रहा है। 2024 की एक स्टडी के मुताबिक़, अर्थव्यवस्था को हर साल 2,88,000 विदेशी कामगारों को आकर्षित करने की ज़रूरत है। बर्टेल्समान फ़ाउंडेशन थिंक टैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, वरना 2040 तक कामकाजी आबादी में 10त्न की गिरावट आ सकती है।
बेबी बूमर पीढ़ी के आखिरी लोग रिटायरमेंट की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन उनकी जगह लेने के लिए पर्याप्त युवा जर्मन मौजूद नहीं हैं और इसकी वजह है कम जन्म दर। लेकिन भारत में बहुत सारे युवा मौजूद हैं।
बनर्जी कहती हैं, ‘भारत ऐसा देश है, जहां 25 साल से कम उम्र के 60 करोड़ लोग हैं। हर साल सिर्फ 1.2 करोड़ लोग ही वर्कफोर्स में आते हैं। यानी यहां श्रम शक्ति की बहुत ज़्यादा उपलब्धता है।’
इंडिया वक्र्स इस साल 775 युवा भारतीयों को अप्रेंटिसशिप शुरू करने के लिए जर्मनी लाने की तैयारी कर रहा है। वे जिन पेशों में काम करेंगे, उनकी रेंज काफी बड़ी है। इनमें सडक़ बनाने वाले मज़दूर, मैकेनिक, पत्थर तराशने वाले और बेकर्स शामिल हैं।
2022 में भारत और जर्मनी के बीच माइग्रेशन और मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने के बाद से कुशल भारतीय कामगारों के लिए जर्मनी में काम करना आसान हो गया है। फिर 2024 के आखिर में जर्मनी ने यह एलान किया कि वह भारतीय नागरिकों के लिए कुशल कामगार वीज़ा का कोटा 20,000 सालाना से बढ़ाकर 90,000 कर देगा।
जर्मनी के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़, 2024 में देश में 1,36,670 भारतीय कामगार थे, जबकि 2015 में यह संख्या सिर्फ 23,320 थी।
-प्रेरणा
इतिहास में कभी-कभी कुछ ऐसा घटता है कि दुनिया को कठपुतली बनाकर नचाने वालों का भांडा फूट जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ था 2004 में, जब जॉन पर्किन्स नाम के एक सज्जन ने ‘कंफेशन्स ऑफ एन इकोनोमिक हिटमैन’ (एक आर्थिक हत्यारे की स्वीकारोक्ति) किताब प्रकाशित की थी। इस पर बड़ा हंगामा हुआ था, लेकिन कोई उसे झुठला नहीं सका, क्योंकि पर्किन्स ने किताब की शुरूआत में ही बता दिया था कि वे खुद भी एक ‘इकोनोमिक हिटमैन’ रहे थे।
क्या मतलब है ‘इकोनोमिक हिटमैन’ का? पर्किन्स बताता है कि दुनिया के सभी अमीर देश ‘इकोनोमिक हिटमैन’ पालते हैं जिनका काम ही है कि वे विकासशील देशों के नेताओं से नजदीकी रिश्ता बनाते हैं और फिर विकास या संपन्नता या गरीबी हटाओ जैसे लुभावने मंजर दिखाकर, उन्हें बड़े विदेशी ऋण लेने के लिए तैयार करते हैं। वे बताते हैं कि आपको ऋण के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं, वह हम लाकर देंगे !
पर्किन्स लिखता है कि यह मछली फंसाने जैसा है। एक बार मछली फंसी तो अमेरिका-यूरोप की सरकारों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चांदी हो जाती है। विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है, सो ऐसी परियोजनाओं के लाभ का लुभावना सब्जबाग ऐसा खड़ा किया जाता है कि विकासशील देशों की सरकारें बड़े-बड़े ऋण ले लेती हैं। ऋण का पैसा उनके हाथ आता भी नहीं है, क्योंकि उन्हीं अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट विकास परियोजनाओं का ठेका भी ले लेते हैं। जिसका पैसा था, उसी की जेब में वापस पहुंच जाता है, जबकि ऋण लेने वाले देश पर कर्ज लद जाता है।
एक बार देश कर्ज में फंसा तो शुरू होता है महाशक्तियों का खेल! कर्ज माफी या कर्ज की शर्तों में ढील के नाम पर उस देश पर जबर्दस्त राजनीतिक, आर्थिक या सैन्य दबाव डाला जाता है, ताकि वह अपनी राष्ट्रीय नीतियों में उनके अनुकूल बदलाव करे तथा अपने प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों के लिए खोल दे। कर्जदार देश घुटने टेक देता है और ‘इकोनोमिक हिटमैन’ अपना कमीशन लेकर आगे चल देता है-नया देश, नया शिकार खोजने !
पर्किन्स की किताब पढते हुए मुझे 1991 का आर्थिक संकट याद आया। तब भारत का ‘विदेशी मुद्रा भंडार’ लगभग खत्म हो चुका था। बताया गया था कि मात्र 2-3 हफ्तों की जरूरत लायक डॉलर देश के पास बचे हैं। सरकार को ‘अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ (आईएमएफ) और ‘विश्वबैंक’ से आपातकालीन ऋण लेना पड़ा। ऋण तो मिला, लेकिन उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण उस ऋण के साथ आया।
आपको ‘विकीलीक्स’ याद है? एक अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट जो गुप्त सरकारी व कॉर्पोरेट दस्तावेजों की जासूसी कर, उन्हें सार्वजनिक करती है? इसकी स्थापना 2006 में जूलियन असांजे नामक युवा ने की थी। वह कहता था कि सरकारों, शक्तिशाली वित्तीय संस्थाओं आदि के गुप्त दस्तावेजों का खुलासा करना जरूरी है, ताकि लोग जान सकें कि उनके साथ कितना खतरनाक खेल हो रहा है। इससे सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बढ़ेगी और ‘दादा’ देश जवाबदेही से काम करेंगे। इससे नाराज़ होकर सरकारों ने असांजे को जेल में डाला, देश-निकाला भी दे दिया। आज वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है, पोशीदा जीवन जी रहा है।
‘विकीलीक्स’ के खुलासों से 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते और उससे जुड़े सांसदों को कथित रिश्वत दिए जाने के आरोप सामने आए। आज की देखें तो अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद के बीच भारत सरकार ‘एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962’ और ‘सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010’ में बदलाव ला रही है। बात सीधी है : टैरिफ में छूट चाहते हो तो परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी और विदेशी निवेश के लिए खोलना होगा।
सालों पहले जिस एपस्टीन की मौत हो चुकी है उसके सेक्स-कांड की परतें जिस तरह खुल रही हैं, उससे लगता है मानो वह कब्र से बोल रहा हो। दरअसल, एपस्टीन सिफऱ् एक अमीर कारोबारी नहीं था; वह सत्ता के गलियारों में सक्रिय एक बेहद असरदार दलाल था। पैसे और प्रतिष्ठा की आड़ में उसने दुनिया के बड़े-बड़े राजनेताओं, धनकुबेरों, वैज्ञानिकों, विचारकों, शिक्षाविदों और स्वयंभू समाजसेवियों का एक घना और प्रभावशाली नेटवर्क खड़ा कर लिया था। इसी नेटवर्क के भीतर वह लोगों की कमजोरियों और वासनाओं को हथियार बनाता था। नतीजे में यह जाल इतना शक्तिशाली बन गया कि उसके जरिए वह दुनिया के किसी भी कोने से अपने मनमुताबिक काम निकलवा सकता था।
ऐसे में मैं गांधी की बात करूं? तब आजादी निकट थी। एक पत्रकार ने पूछा : क्या आजाद भारत अपने विकास के लिए ब्रिटेन का मॉडल अपनाएगा? ‘छोटे-से ब्रिटेन को अपनी दादागिरी बनाए रखने के लिए पूरी दुनिया पर राज करना पड़ा था,’ गांधीजी ने तक्षण जवाब दिया, ‘अगर विशाल भारत वही रास्ता अपनाएगा तो उसके लिए तो दुनिया भी कम पड़ जाएगी !’ क्या कह रहे थे गांधीजी? यही कि यह विकास विनाश का दूसरा नाम है।
कल के इंग्लैंड की बात छोडिए, आज के अमेरिका को ही देखिए ! सबसे अमीर देश बने रहने के लिए वह एक पागल हाथी की तरह घूम रहा है। ट्रंप की घोषणा है कि अमेरिका दुनिया भर से टैक्स वसूलेगा और अपना सामान बिना टैक्स हर जगह बेचेगा। तेल की लूट करने और अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए वह कहीं नेताओं का अपहरण कर रहा है, कहीं उनका क़त्ल करवा रहा है, कहीं युद्ध भडक़ा रहा है, कहीं बगावत उकसा रहा है। दुनिया के कई देश उसके सामने झुक रहे हैं जिनमें भारत भी शामिल है। आज अमेरिका तय कर रहा है कि हम किससे तेल खरीदें, किससे कूटनीतिक संबंध रखें, किससे युद्ध करें, कब समझौता कर लें।
इसे जंगल का कानून कहते हैं। सभ्य समाज की रीत क्या है? गांधीजी कहते हैं : स्वदेशी ! ‘मेक इन इंडिया’ नहीं, ‘मेड इन इंडिया !’ जब भी हम कुछ खरीदें, यह सोचें कि हमारा पैसा किसकी जेब में जा रहा है? अपने गांव में किसी की, पड़ौसी गांव में किसी की या फिर अपने ही देश में किसी की? अगर हां, तो यह स्वदेशी है ! दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है
इसलिए उत्पादन और तकनीक दोनों ऐसे हों कि प्राकृतिक संतुलन बिगड़े नहीं व मानवीय श्रम लुटे नहीं। यह होगा तब कोई पूछेगा कि दुनिया कौन चला रहा है तो हम गर्व से कह सकेंगे : अपनी दुनिया हम स्वयं चला रहे हैं। आजादी का यही मतलब है। (सप्रेस)
सुश्री प्रेरणा सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी-अर्थशास्त्र की अध्येता हैं।
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आज की दुनिया में जिस असीमत उपभोग पर टिकी जीवन-दृष्टि का सम्राज्य कायम है, उसमें हिंसक युद्ध, जहरीला भेदभाव और गहरी गैर-बराबरी मामूली पडाव भर हैं। खाड़ी देशों, खासकर ईरान के खिलाफ अमरीकी-इजरायली हवस के चलते फांदे गए भीषण युद्ध, गंदी, अमानवीय, हिंसक करतूतों से लदी-फंदी एप्सटीन फाइलों और कुछ दिन पहले तक जिन्दा, भरे-पूरे देशों के एक-एक कर ध्वस्त होने की वजह देखें तो हमारी हिंसक, गैर-बराबर और शोषणाधारित जीवन-पद्धति है। इससे कैसे पार पाया जाए? बता रही हैं, प्रेरणा।-संपादक
भारत सरकार ने माना है कि देश में मनोचिकित्सकों की उपलब्धता राज्यों के बीच काफी असमान है. मध्य प्रदेश में प्रति एक लाख आबादी के लिए सिर्फ 0.05 मनोचिकित्सक हैं, जबकि केरल में यह संख्या 1.2 है.
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना का लिखा-
"मुझे पिछले साल जुलाई में अमृतसर में स्थित एक निजी बैंक में नौकरी करने का अवसर मिला. मैं वहां अकेला रहता था. कुछ महीनों बाद ही मुझे गहरा अकेलापन महसूस होने लगा. काम और पढ़ाई में मेरा मन नहीं लग रहा था और बिना किसी कारण के थकान रहने लगी. शुरूआत में मैंने ध्यान नहीं दिया. एक दिन मुझे अपने आसपास आवाजें सुनाई देने लगीं. शरीर में झटके भी महसूस हुए. उसी वक्त मैंने तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेने का फैसला किया." यह कहानी दिल्ली के रहने वाले आयुष की है.
आयुष की तरह भारत में कई लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. इसे लेकर समाज में मौजूद स्टिग्मा, जागरूकता और मनोचिकित्सकों की कमी के चलते उन्हें समय से इलाज नहीं मिल पाता. आयुष आगे बताते हैं, "मेरा मानसिक स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया था कि मेरे घर में पड़ा कचरा सड़ने लगता, तब भी मैं उसे फेंकने के लिए बिस्तर से नहीं उठ पाता था. मैं अक्सर बहुत रोया करता. ऐसा तीन महीने तक चलता रहा. लक्षण काफी पहले ही महसूस होने लगते हैं. लेकिन सपोर्ट सिस्टम न होने की वजह से मैं उन्हें नजरअंदाज करता रहा."
आयुष स्थानीय निजी अस्पताल पहुंचे. वहां उन्हें हर हफ्ते काउंसलिंग सेशन दिया गया और दवाओं की मदद से उनके मानसिक स्वास्थ्य में सुधार आने लगा. लगभग डेढ़ महीने के बाद वह फिर से काम पर लौटकर सामान्य जीवन जी रहे हैं. लेकिन इस इलाज में उनका खर्चा भी बहुत हुआ. हर सेशन के उन्हें एक हजार रुपये देने पड़ते थे. हर महीने दवाइयों का बिल भी 2,000 से 3,000 रुपये था.
भारत में मौत को गले लगाते छात्र
आयुष ने बताया कि सरकारी अस्पताल केवल हेल्पलाइन नंबर देकर लौटा देते हैं. वहां पर्याप्त डॉक्टर भी नहीं हैं, जो मरीज पर पूरा ध्यान दे सकें. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत में आज हर 10 में से एक व्यक्ति मानसिक समस्या से लड़ रहा है. लगभग 90 प्रतिशत लोगों को सही इलाज नहीं मिलता.
हाल ही में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने लोकसभा में बताया कि पिछले पांच सालों में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (डीएमएचपी) के लिए आवंटित बजट का केवल 47.5 प्रतिशत हिस्सा ही इस्तेमाल हुआ है. साल 2020-21 से 2024-25 के बीच केंद्र सरकार द्वारा 691.24 करोड़ रुपये मंजूर किए गए. जबकि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इसमें से सिर्फ करीब 328.27 करोड़ रुपये ही खर्च किए.
फंड बढ़ा लेकिन काम नहीं
जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम या डीएमएचपी भारत सरकार के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित एक महत्वपूर्ण योजना है. इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को जिला और स्थानीय स्तर तक पहुंचाना है. इसके जरिए हर किसी को डिप्रेशन, एंग्जायटी और तनाव जैसी समस्याओं के लिए इलाज, काउंसलिंग और दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. राज्य स्वास्थ्य मंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, डीएमएचपी के लिए हर साल बजट बढ़ाया गया है. लेकिन खर्च उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाया.
वित्त वर्ष 2020-21 में 84.13 करोड़ रुपये मंजूर किए गए, जिनमें से केवल 33.92 करोड़ रुपये ही खर्च हुए. 2021-22 में आवंटन बढ़कर 122.90 करोड़ रुपये हो गया, जबकि खर्च 59.78 करोड़ रुपये रहा. 2022-23 में 159.59 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए, जिनमें से 66.55 करोड़ रुपये खर्च हुए. उसके अगले ही साल 2023-24 में 168.95 करोड़ में से 85.65 करोड़ रुपये खर्च हुए. हालांकि 2024-25 में फंड कम कर दिया गया और 157.62 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. इसमें से 82.39 करोड़ रुपये ही उपयोग में लाए गए.
स्नेही एक गैर सरकारी सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य संगठन है, जो साल 1994 से काउंसलिंग, सपोर्ट और रेफरल सेवाएं प्रदान करता आ रहा है. इसके निदेशक अब्दुल माबूद बताते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में फंड का उपयोग कई स्तरों पर जांच और संतुलन के तहत होता है, जिससे पूरी प्रक्रिया काफी जटिल हो जाती है. डीएमएचपी के अंतर्गत, पैसा केंद्र और राज्य दोनों मिलकर देते हैं. अधिकांश राज्य सरकारों के पास या तो इच्छाशक्ति की कमी होती है या फिर अपने हिस्से का बजट देने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते और डीएमएचपी पर खर्च प्रभावित होता है.
इस कार्यक्रम के लिए फंड आवंटन एक तय प्रक्रिया के जरिए होता है. सबसे पहले केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्यों को कुल बजट मंजूर करती है. इसके बाद हर राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन प्लान (पीआईपी) बनाकर केंद्र को भेजता है. केंद्र सरकार इस प्रस्ताव की समीक्षा करती है और मंजूरी मिलने के बाद फंड जारी किया जाता है.
अब्दुल माबूद ने बताया, "केंद्र सरकार द्वारा दिया गया फंड तभी पूरी तरह इस्तेमाल किया जा सकता है जब राज्य सरकार अपनी तय हिस्सेदारी (शेयर) देती है. ऐसा न होने पर केंद्र से मिला पैसा पूरी तरह खर्च नहीं हो पाता और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में बाधा आती है."
वह आगे कहते हैं, 'भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं ज्यादातर शहरों तक सीमित हैं. इसलिए सपोर्ट सिस्टम भी मुख्य रूप से शहरी इलाकों में ही उपलब्ध है. इसके अलावा इलाज का खर्च भी काफी ज्यादा है. काउंसलर एक सत्र के लिए दो हजार या उससे अधिक फीस लेते हैं. जिसे लगभग 90 प्रतिशत लोग वहन नहीं कर पाते और इलाज बीच में ही रुक जाता है."
प्रगति के बावजूद रास्ता अभी भी चुनौतीपूर्ण
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहांस) बेंगलुरु के पूर्व निदेशक बीएन गंगाधर से डीडब्ल्यू ने इस मुद्दे पर बात की. वह 1978 से सरकारी कार्यक्रमों में हुई प्रगति को देख रहे हैं. पिछले साल 6.8 लाख से अधिक मरीजों ने निमहांस आकर इलाज कराया. यह एक साल में सबसे अधिक संख्या है. वहीं 2022 में लॉन्च के बाद से भारत सरकार के फ्री हेल्पलाइन नंबर 'टेली-मानस' पर अब तक 34 लाख से अधिक कॉल्स दर्ज किए गए हैं. यानी जागरूकता बढ़ी है और लोग सामाजिक हिचक को पीछे छोड़कर अब मदद लेने के लिए आगे आ रहे हैं. यह सरकार के प्रयासों को दिखाता है.
डॉ गंगाधर बताते हैं, "आज करीब 700 से ज्यादा जिलों में डीएमएचपी चल रहा है. यह एक बड़ा बदलाव है. कोविड महामारी के बाद से सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य मिशन पर ज्यादा जोर दिया है और डिजिटल माध्यमों के जरिए सेवाएं पहुंचाने की दिशा में भी काम हो रहा है. अब अगला फोकस ट्रीटमेंट गैप को कम करने पर होना चाहिए. मरीजों और इलाज पाने वालों की संख्या के बीच अभी भी अंतर है."
मनोचिकित्सकों की कमी एक गंभीर चिंता
भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित मानव संसाधन अभी भी आवश्यकता की तुलना में सीमित हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग आठ हजार से दस हजार मनोचिकित्सक ही कार्यरत हैं. यानी एक लाख मरीजों के लिए 0.75 मनोचिकित्सक ही उपलब्ध है. जबकि वैश्विक औसत लगभग 1.3 है.
इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (इहबास) में प्रोफेसर एवं मनोचिकित्सक डॉ ओम प्रकाश डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, "मुख्य समस्या डीएमएचपी में प्रशिक्षित मनोचिकित्सक, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, साइकियाट्रिक सोशल वर्कर, नर्स और अन्य सहायक कर्मचारियों की कमी है. भारत में कुल मिलाकर लगभग दस हजार मनोचिकित्सक ही हैं. सरकार को अधिक संख्या में मनोचिकित्सकों को प्रशिक्षित करने और उनकी नियुक्ति पर ध्यान देना चाहिए."
डॉ ओम प्रकाश का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ विशेषज्ञों के प्रशिक्षण पर भी निरंतर ध्यान देना होगा. स्नातकोत्तर स्तर (पीजी) पर प्रशिक्षण क्षमता बढ़ाने से भविष्य में अधिक विशेषज्ञ उपलब्ध हो सकेंगे. लोकसभा में प्रतापराव जाधव ने बताया कि उनका मंत्रालय 19 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े 47 पीजी विभागों को मजबूत करने में मदद कर रहा है.
पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है क्योंकि यह साफ़ नहीं है कि 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के तहत चिह्नित कितने मतदाताओं के नाम सोमवार आधी रात से कुछ मिनट पहले भारत के चुनाव आयोग की पूरक मतदाता सूची से हटाए गए हैं.
राज्य में महीने भर बाद चुनाव हैं. पश्चिम बंगाल देश के उन कुछ राज्यों में शामिल है जहां ग़ैर भाजपा सरकार है.
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद, लगभग 60 लाख नामों को मतदाता के रूप में उनकी पात्रता की जांच के लिए अलग रखा गया है.
ये राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 8.5% हिस्सा हैं. मतदाता सूची में इन्हें 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के रूप में चिह्नित किया गया था.
सोमवार देर रात, भारत के चुनाव आयोग ने पहली सूची जारी की, जिसमें उन मतदाताओं के नाम शामिल थे जिन्हें अंतिम मतदाता सूची में जोड़ा गया है और जिन्हें सूची से हटाया गया है.
हालांकि, मंगलवार दोपहर तक यह जानकारी नहीं दी गई है कि उन 60 लाख 'संदिग्ध और लंबित' मामलों में से कितनों का निपटारा हुआ और कितने लोगों ने अपने मतदान का अधिकार खो दिया.
पूरक सूची जारी होने से कुछ घंटे पहले सोमवार दोपहर को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा था, "आज की स्थिति में, हमारे डैशबोर्ड के अनुसार लगभग 29 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है. कितने मामलों पर ई-साइन होगा, यह साफ़ नहीं है. आज हमें जितने ई-साइन मामले मिलेंगे, उन्हें आज की पूरक सूची में प्रकाशित किया जाएगा."
इसके अलावा, सोमवार तक 'अंडर एडज्यूडिकेशन' मामलों का केवल आंशिक निपटारा हुआ था, इसलिए कई मतदान केंद्रों के लिए कोई डेटा ऑनलाइन दिखाई नहीं दे रहा है.
इससे पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से एक महीने पहले मतदाताओं के बीच और भ्रम और चिंता बढ़ गई है.
कोई मतदाता अपनी स्थिति कैसे जांच सकता है?
जिन मतदाताओं के नाम 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के रूप में चिह्नित हैं, वे चुनाव आयोग के इस लिंक पर क्लिक करके मतदान केंद्र के अनुसार पूरक सूची डाउनलोड कर सकते हैं. इसके अलावा, मतदाता वेबसाइट पर अपलोड की गई डिलीट किए नामों की सूची में भी अपना नाम देख सकते हैं.
किसी 'अंडर एडज्यूडिकेशन' मामले के निपटारे का मतलब है कि उस मतदाता की सत्यापन प्रक्रिया पूरी हो गई है और यह तय किया गया है कि वह मतदान के योग्य है या नहीं.
इसलिए, निपटाया गया मामला या तो योग्य मतदाताओं की पूरक सूची में जोड़ा गया होगा या हटाए गए या अयोग्य मतदाताओं की सूची में शामिल किया गया होगा.
चुनाव आयोग के अनुसार, निपटारा होने का मतलब यह नहीं है कि नाम मतदाता सूची में जोड़ा ही जाएगा.
अंडर एडज्यूडिकेशन कौन हैं?
पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण पिछले साल 27 अक्तूबर को शुरू हुआ था. इस वर्ष 28 फ़रवरी को 'अंतिम' मतदाता सूची के प्रकाशन के साथ यह पूरा हुआ था.
इसमें कथित रूप से मृत, डुप्लीकेट, अनुपस्थित, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं को हटाया गया है.
इस प्रक्रिया में, चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर लगभग 6.44 करोड़ रह गई है.
सूची से हटाए गए मतदाताओं में 61 लाख से अधिक नाम शामिल थे जिन्हें निश्चित रूप से सूची से हटा दिया गया, और 60 लाख से अधिक ऐसे मतदाता थे जिनकी पात्रता 'तार्किक विसंगतियों' के कारण अभी तय नहीं हो सकी है.
यह समूह राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 8.5% है.
इन 'संदिग्ध और लंबित मामलों' को चुनाव आयोग ने 'अंडर एड्जुडिकेशन' के रूप में चिह्नित किया है. इनको आगे की जांच और निपटारे के लिए पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों के 700 से अधिक न्यायिक अधिकारियों को सौंपा गया था.
राज्य में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा उस समय की गई जब पश्चिम बंगाल के 60 लाख मतदाताओं को पता ही नहीं था कि वे वोट दे पाएंगे या नहीं.
क्या है उपाय
मतदाता चुनाव आयोग के निर्णय के ख़िलाफ़ दो तरीकों से अपील कर सकते हैं, जैसा कि आयोग ने सुझाया है.
वे www.ecinet.eci.gov.in पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं या ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या उप-मंडल अधिकारी के कार्यालय में ऑफ़लाइन अपील जमा कर सकते हैं.
चुनाव आयोग की अधिसूचना के अनुसार, अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि अपील को डिजिटाइज कर "जल्द से जल्द" वेबसाइट पर अपलोड किया जाए.
'अंडर एडज्यूडिकेशन' के रूप में चिह्नित मतदाताओं को शामिल या बाहर करने के निर्णय के ख़िलाफ़ सभी अपीलों की सुनवाई 19 अपीलीय न्यायाधिकरण में होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च को ऐसे न्यायाधिकरण बनाने के निर्देश दिए थे.
हर न्यायाधिकरण में एक पूर्व न्यायाधीश शामिल होगा और वह पश्चिम बंगाल के एक या अधिक ज़िलों से आने वाली अपीलों की सुनवाई करेगा.
विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा असर?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कम अंतर से जीत असामान्य नहीं है.
उदाहरण के लिए 2021 के विधानसभा चुनाव में दिनहाटा सीट से बीजेपी के निशीथ प्रमाणिक ने तृणमूल कांग्रेस के उदयन गुहा को केवल 57 वोटों से हराया था.
2021 में नंदीग्राम में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और उनके पूर्व सहयोगी और हाल में पार्टी बदलने वाले शुवेंदु अधिकारी के बीच हुए मुकाबले में जीत का अंतर केवल 1956 वोट था.
भवानीपुर सीट पर इस बार ममता बनर्जी और शुवेंदु अधिकारी के बीच मुकाबला हो रहा है. इस सीट पर लगभग 14,154 मतदाता 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के रूप में चिह्नित किए गए थे.
कई लोगों को लगता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं को हटाने और 'अंडर एडज्यूडिकेशन' में रखने से चुनाव परिणामों पर असर पड़ सकता है.
लेकिन कोलकाता के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शुभमोय मैत्रा इससे सहमत नहीं हैं.
उनका कहना है कि मतदाताओं और निर्वाचन क्षेत्रों का सांख्यिकीय सर्वेक्षण किए बिना, केवल यह देखकर कि कितने मतदाताओं को हटाया गया या 'अंडर एडज्यूडिकेशन' में रखा गया, चुनाव परिणामों पर नतीजा नहीं निकाला जा सकता.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "ऐसी धारणा है कि अगर किसी सीट पर कोई पार्टी एक निश्चित अंतर से जीती थी और वहां से हटाए गए मतदाताओं की संख्या उसी के आस-पास है, तो इस बार नतीजा बदल सकता है. लेकिन यह सही नहीं है. हमारे पास मतदाता हटाने से जुड़े आंकड़े नहीं हैं, इसलिए हम यह सटीक अनुमान नहीं लगा सकते कि एसआईआर का चुनावी परिदृश्य पर कितना असर पड़ेगा."
उन्होंने कहा, "यह मानने के लिए कि अयोग्य मतदाताओं को हटाने से किसी विशेष पार्टी को बड़ा नुकसान होगा, एक विशेष नैरेटिव को साबित करना होगा."
उन्होंने कहा, "यह धारणा, जिस पर पश्चिम बंगाल में अक्सर चर्चा होती है, यह बताती है कि जो भी पार्टी सत्ता में होती है, वह गड़बड़ी करती है."
उनका कहना है कि यह धारणा ग़लत हो भी सकती है और नहीं भी, लेकिन इसके समर्थन में पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था, सांप्रदायिकता और राजनीतिक दलों की संगठनात्मक ताक़त जैसे अन्य कारण भी चुनाव प्रक्रिया में अधिक असर डाल सकते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
-सिमरिन सिरूर
भारत में सर्वाधिक कोयला खपत करने वाले उद्योगों में से एक इस्पात उद्योग को कार्बन मुक्त करना कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करने पर केंद्रित है। इसका मकसद ग्रीनहाउस गैसों के दुष्प्रभाव को रोकना है। हालांकि, इस्पात बनाने की औद्योगिक प्रक्रियाओं से वायु प्रदूषण भी होता है, जिससे सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर निकलते हैं। ये सभी सेहत पर बुरा असर डालते हैं।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के एक नए विश्लेषण में झारखंड के बोकारो स्टील प्लांट (BSL) से होने वाले वायु प्रदूषण से जुड़े खुलासों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि भले ही BSL मौजूदा नियामक सीमाओं का पालन करता है, फिर भी इससे होने वाले प्रदूषण से हर साल लगभग 273 बच्चों का जन्म कम वजन और 284 बच्चों का जन्म समय से पहले ही हो जाता है।
भारत में स्टील उत्पादन की क्षमता 2035 तक 26 करोड़ और 28 करोड़ मीट्रिक टन के बीच पहुंचने का अनुमान है। ऐसा ऑटोमोटिव, नवीन ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में बढ़ती मांग की वजह से होगा। फिलहाल भारत में इस उद्योग से 10 से 12 फीसदी कार्बन उत्सर्जन होता है। इसलिए, इस सेक्टर को कार्बन मुक्त करना शून्य-उत्सर्जन के लक्ष्य को पाने में सबसे अहम है। अतिरिक्त इस्पात क्षमता में ब्लास्ट फर्नेस और बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस के इस्तेमाल से कार्बन-सघन प्रक्रिया लंबे समय तक बनी रह सकती है।
CREA की रिपोर्ट का सुझाव है कि जब तक इस्पात बनाने में कोयले की जगह नए और व्यवहारिक इनोवेशन उपलब्ध नहीं हो जाते, तब तक बेहतर वायु निगरानी और फिल्ट्रेशन में निवेश करके वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। CREA की विश्लेषक और रिपोर्ट की मुख्य लेखिका अनुबा अग्रवाल ने कहा, ‘उद्योग द्वारा उत्सर्जन के आंकड़े या तो खुद या उनकी ओर से नियुक्त किसी तीसरे पक्ष द्वारा रिपोर्ट किए जाते हैं। अनुपालन के लिए बताए गए उत्सर्जन के आंकड़े हमेशा मानकों से नीचे दिखाए जाते हैं, चाहे वह BSL, भिलाई स्टील प्लांट, IISCO (इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी) प्लांट या दुर्गापुर स्टील प्लांट हो। आंकड़ों में विसंगतियां और फर्क इस्पात क्षेत्र के वायु प्रदूषण पर असल असर को समझने में बाधा डालती हैं।’
यह एक बड़े इस्पात संयंत्र की तस्वीर है। बीच में ऊंची चिमनी और उसके आसपास लोहे की बनी विशाल औद्योगिक संरचनाएं दिख रही हैं। पूरा दृश्य धुंधला और धुएं भरा लगता है, जिससे भारी उद्योग और प्रदूषण का एहसास होता है।
सिंटरिंग से सल्फर डाइऑक्साइड
BSL का चुनाव इसलिए किया गया, क्योंकि यह भारत के सबसे पुराने इस्पात संयंत्रों में शामिल है। इसे ‘स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड’(SAIL) चलाती है, जो स्टील बनाने वाली भारत की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी है। देश की कुल कच्चे इस्पात क्षमता में इसकी हिस्सेदारी 13% है। BSL अपनी क्षमता को सालाना 5.25 मिलियन टन से बढ़ाकर 7.5 मिलियन टन करने की तैयारी में है। इस अध्ययन में कहा गया है, ‘इस विस्तार से संयंत्र में ईंधन की खपत और उत्सर्जन में काफी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, इसलिए पर्यावरण से जुड़े इसके मौजूदा प्रदर्शन का आकलन करना समयानुकूल और नीतिगत दृष्टि से अहम है।’
उत्सर्जन से जुड़े आंकड़े संयंत्र की हर छह महीने पर आने वाली अनुपालन रिपोर्ट से लिया गया था। इसमें प्लांट के सिंटर संयंत्र, कोक ओवन, रिफ्रैक्टरी मटीरियल संयंत्र, ब्लास्ट फर्नेस और स्टील मेल्टिंग शॉप को शामिल किया गया था। कुल मिलाकर, संयंत्र से 34,700 टन पार्टिकुलेट मैटर (PM), 19,600 टन नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOX) और 47,700 टन सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) का उत्सर्जन हुआ।
सिंटर संयंत्र में लौह अयस्क और चूना पत्थर जैसे अन्य तत्वों के बारीक कणों को आपस में जोडऩे के लिए ताप का इस्तेमाल किया जाता है और इसे सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाली प्रक्रिया माना गया। इससे PM का 49%, SO2 का 40% और NOX उत्सर्जन का 52% हिस्सा निकलता था।
ये उत्सर्जन एकीकृत इस्पात और लौह संयंत्रों के लिए सरकार की ओर से तय सीमाओं के भीतर थे, जिन्हें 2012 में जारी किया गया था और समय-समय पर इसमें बदलाव किया गया है। ये मानदंड संयंत्र के हर घटक जैसे कि कोक ओवन, स्टील मेल्टिंग शॉप और ब्लास्ट फर्नेस के लिए सीमाएं तय करते हैं। जहां सिंटरिंग संयंत्रों के लिए PM2.5 की सीमा 150 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक तय है, वहीं सल्फर डाइऑक्साइड की कोई सीमा तय नहीं की गई है। एक बड़े औद्योगिक कमरे में धातु की चादरों को मशीन से काटा जा रहा है। बीच में लगी भारी मशीन के नीचे चमकीली चिंगारियां निकल रही हैं। कमरे के चारों तरफ धातु के ढांचे और ऊपर सफेद रोशनी की लंबी पट्टियां दिख रही हैं।
अग्रवाल ने कहा, ‘सल्फर डाइऑक्साइड PM2.5 से पहले निकलता है और सेकेंडरी पार्टिकुलेट मैटर भारत में कुल PM 2.5 के स्तर में 50% का योगदान देता है।’
उन्होंने आगे कहा, ‘वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, अमोनिया और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOCs) जैसी पहले निकलने वाली गैसों से बनने वाला सेकेंडरी पार्टिकुलेट मैटर दिल्ली के वायु प्रदूषण की समस्या में लगभग 27% का योगदान देते हैं।’
CREA ने CALPUFF मॉडल का इस्तेमाल करके यह अनुमान लगाया कि इन संयंत्रों से निकलने वाले प्रदूषक पूरे इलाके में किस हद तक फैलते हैं। इस मॉडल को अमेरिका पर्यावरणीय सुरक्षा एजेंसी ने जांचा-परखा और अपनाया है। इस मॉडल के मुताबिक, प्लांट से निकलने वाला धुआं झारखंड के बड़े शहरों रांची और धनबाद तक पहुंचता है।
मोंगाबे-इंडिया ने बोकारो इस्पात संयंत्र के प्रमुख को पत्र लिखकर CREA की रिपोर्ट पर उनकी टिप्पणी मांगी थी, लेकिन प्रकाशन के समय तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
-जगदीश्वर चतुर्वेदी
भगत सिंह जहां एक जोशीला इंकलाबी था वह एक बहुत अच्छा विद्यार्थी भी था। उसके अध्यापक होने के नाते मैं यह बात दावे से कह सकता हूं कि उसे पढ़ाने में बहुत आनंद आता था। भगत सिंह को पढऩे का बेहद शौक था। जब किसी भी किताब का नाम उसके सामने लिया गया तो उसने फौरन उसे पढऩे की फरमाइश की। वैसे तो भगत सिंह ने न जाने इतिहास की कितनी ही किताबें पढ़ डाली होंगी लेकिन मुझे अभी तक याद है कि उसे जो किताब सबसे ज्यादा पसंद थी वह ‘क्राइ फॉर जस्टिस’ थी। भगत सिंह ने लाल पेंसिल से इस किताब के बहुत हिस्सों पर निशान लगाए थे। इनसे पता चलता था कि उसके हृदय में बेइन्साफी के खिलाफ लडऩे की भावना किस तरह कूट-कूटकर भरी हुई थी। वह पुस्तक लाजपतराय भवन लाहौर में हमारे घर में वर्षों तक रही। स्वयं मेरे बच्चों विजय, संतोष और मनोरमा ने कई बार इस किताब को लेकर मुझसे ढेरों सवाल पूछे। मेरे बच्चे भी यह जानना चाहते थे कि भगत सिंह को कौन-सी किताब पसंद थी और क्यों ?
भगत सिंह को पढऩे की आदत तो इतनी प्रबल थी कि जिस दिन उसे फांसी लगाई गई उस दिन भी वह अपने नियमानुसार किताब पढऩे में मगन था। तो स्वयं उन दिनों जेल में था लेकिन जेल ही से मिलने वाली रिपोर्टों से पता चलता था कि जिस दिन भगत सिंह को फांसी लगनी थी उस दिन उसके चेहरे पर परेशानी और गम की कोई झलक दिखाई नहीं पड़ती थी। जब वार्डन ने उससे आकर तैयार होने को कहा कि जेल के नियमों के अनुसार हर कैदी को बाकायदा नहा-धोकर कपड़े बदलवाकर और उसकी कोई अंतिम इच्छा हो तो उसे पूरी करके फांसी के तख्ते पर ले जाया जाता है, कहते हैं भगत सिंह ने हंसते-हंसते यही कहा था कि भाई पहले मुझे अपनी किताब तो पूरी कर लेने दो। भगत सिंह उस समय लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। एक नौजवान जो जानता था कि कुछ ही घंटे बाद उसे फांसी के तख्ते पर लटकाया जाना है अगर अपनी कोई प्रिय पुस्तक पढऩे में मगन रहे तो उससे यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह सचमुच एक अनोखे इरादे का व्यक्ति होगा।
मैंने नेशनल कॉलेज में और बाहर भी भगत सिंह को हमेशा हंसते हुए देखा। लेकिन उस हंसी के पीछे भी उसका पक्का इरादा और अपने मकसद को पूरा करने की भावना झलकती थी। लगता था कि भगत सिंह को जीवन के सांसारिक बंधनों से गहरी चिढ़ थी इसलिए उसने कभी शादी करवाने की हामी नहीं भरी। बहुत साल बाद भगत सिंह की माताजी उसके विषय में बातचीत करते हुए बताती थीं कि वह हमेशा हंसकर यही कहता था- बेबे तुम परेशान न हुआ करो, तुम्हारे लिए एक अनोखी दुल्हन ब्याह कर लाऊंगा। भगत सिंह का मतलब हिंदुस्तान की आजादी से था। जब भगत सिंह की मां श्रीमती विद्यावती फांसी लगने से कुछ दिन पहले अपने बेटे से मिलने गईं तब भी वह जोरों से हंस रहा था और मां को दिलासा दिलाने के लिए बार-बार यही कहता कि भारत को जल्दी ही आजादी मिलेगी और उसे तो खुशी होनी चाहिए कि उसका बेटा किसी मकसद के लिए मरने जा रहा है। लोग तो बीमारियों से भी मरते हैं। लेकिन कितने खुश किस्मत ऐसे हैं जिन्हें देशभक्ति और वतनपरस्ती के इल्जाम में फांसी का तख्ता नसीब होता है।
भगत सिंह को विश्वास था कि शादी का बंधन इंकलाब के रास्ते में बहुत भारी रुकावट है। मुझे याद है एक बार लाहौर में दरिया रावी में मैं और भगत सिंह कश्ती की सैर कर रहे थे, मेरी तरह भगत सिंह को भी दरिया में कश्ती की सैर का बहुत शौक था। उस वक्त शाम का अंधेरा होने ही वाला था। भगत सिंह ने हंसते हुए मुझसे पूछा-'गुरुजी सुना है आप शादी कर रहे हैं? क्या यह खबर ठीक है' जब मैंने कहा, ‘हां’ तो भगत सिंह एकदम से कहने लगा ‘फिर इंकलाब कैसे आएगा? आप घर गृहस्थी में पड़ जाएंगे या मुझ जैसे नौजवानों को इंकलाब का सबक पढ़ायेंगे? मैंने महसूस किया भगत सिंह को मेरी शादी करने का फैसला पसंद नहीं आया।
मैंने भगत सिंह को बताया कि मैं जिस लडक़ी से शादी कर रहा हूं वह कोई मामूली लडक़ी नहीं है बल्कि स्वयं एक आदर्शवादी और क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति की बेटी है। मुझे प्रसन्नता है कि स्वतंत्रता संग्राम में लडऩे के लिए मुझे एक सहयोगी और मिल गया है। मेरा वह जवाब सुनकर भगत सिंह हंसने लगा लेकिन मुझे उस समय ही यह एहसास हो गया था कि भगत सिंह को मेरे जवाब से सन्तोष नहीं हुआ था। वह यही सोच रहा था कि उसके गुरुजी ने अपनी जिंदगी का यह गलत फैसला किया था।
लेकिन मेरी पत्नी सीता देवी ने जिस तरह सक्रियता से स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, बार-बार जेल यात्रा की और आजादी मिल जाने के बाद भी उन्होंने महिलाओं व मजदूरों के अधिकारों के संघर्ष को अपना मकसद बनाये रखा था, उसने हमेशा मुझे यही एहसास दिया कि चाहे भगत सिंह को मेरा फैसला कितना भी नापसंद था लेकिन मेरा फैसला गलत नहीं था।
हमारे सौभाग्य में जिन दिनों देश भर में महात्मा गांधी तथा स्वराज्य आंदोलन की लहर मची हुई थी, उन्हीं दिनों विदेशी विशेषत: आयरलैंड तथा सोवियत रूस से धड़ाधड़ राजनीतिक लिटरेचर, किताबें, टेक्स्ट, अखबारों और मैगजीन का आना शुरू हो गया था। आयरिश लिटरेचर तो केवल यही नारा लगाता था कि किसी भी देश अथवा जाति को आजादी प्राप्त करने के लिए बन्दूकों, पिस्तौलों, बमों तथा हवाई जहाजों की भारी जरूरत होती है। भारत में अंग्रेजी शासन अपनी फौजों तथा छावनियों से सशस्त्र सैनिकों तथा टैंकों द्वारा स्थापित हुआ है और अब तक चल रहा है। बाइबिल में स्पष्ट घोषणा दी गयी है कि 'इफ यू हैव फेथ इन द सोर्ड, बाई द सोर्ड यू शैल बी पनिश्ड' अर्थात् यदि तुम तलवारों और बंदूकों द्वारा किसी को गुलाम बनाते हो तो समय और अवसर आने पर वही लोग तुमसे अधिक तेजतर शस्त्रों व बंदूकों से तुम्हें अपने हाथ से धकेल कर बाहर करेंगे। अत: यदि सचमुच ही भारत की जनता अपनी दासता का जुआ अपनी गरदन से उतार फेंकना चाहती है तो किसी न किसी ढंग से अणु शस्त्र प्राप्त करे। वे साधन बेग-बारो-स्टील अर्थात कहीं से मांगकर, उधार लेकर अथवा जबर्दस्ती कहीं से चुराकर अथवा लूटकर प्राप्त करे ।
हमारा दूसरा पड़ोसी देश जो हमें धड़ाधड़ अपना साहित्य भेज रहा था वह था सोवियत रूस जिसने 1917 में देश के किसानों तथा मजदूरों के बलबूते पर अपने देश में किसानों और मजदूरों का शासन स्थापित कर लिया था और सदियों की तानाशाही के जुए को अपनी गर्दन से उतार फेंका। नौजवान भारत सभा के एक दल ने आयरिश ढंग को अपनाकर और अस्त्र जमा करके अपना काम शुरू कर दिया। भारत की सेंट्रल असेंबली के अधिवेशन में बम फेंककर बहरे कान को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है वाले पोस्टर भी फेंके थे। फिर उन्होंने हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के समीप ही मद्रास से लौटते हुए वायसराय की ट्रेन पर बम चलाने का प्रोग्राम भी पूरा किया। फिर पंजाब के बड़े-बड़े शहरों जैसे लाहौर, अमृतसर, गुजरांवाला, लायलपुर और रावलपिंडी आदि में एक ही दिन एक ही समय में बम चलाने का कार्य पूरा किया। राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक बाजार में लार्ड हार्डिंग वायसराय के जुलूस वाले हाथी पर भी बम चला दिया जिसमें हाथी का महावत तथा उसका लडक़ा तत्काल ही दम तोड़ गए। लेडी हार्डिंग की गर्दन पर छह इंच गहरा जख्म लगा और लार्ड हार्डिंग स्वयं बेहोश हो गए। बंगला में कुछ पोस्टर भी फेंके जिसमें लिखा था कि हम अंग्रेज हुकूमत को सचेत करना चाहते हैं कि अंग्रेजी शासन के विरोधी तथा शत्रु केवल बंगाल एवं कलकत्ता में ही नहीं बसते। अब वे भारत में जिस भाग में भी कदम रखेंगे वहीं अपने शत्रु तथा जानलेवा मौजूद पायेंगे।
आजादी का साहित्य तैयार करने वालों तथा नौजवान भारत सभा में कांगड़े वाले लेखक रामचंद्र और मिंटगुमरी के मेहता सत्यपाल इत्यादि सम्मिलित थे। जिन्होंने दो-दो पैसे वाले टेक्स्ट उर्दू भाषा में हजारों की संख्या में छापकर पंजाब के गांव-गांव व कोने-कोने में बांटना और बेचना शुरू कर दिया। हमारा सबसे प्रथम टेक्स्ट भारतमाता के दर्शन अर्थात् हम स्वराज्य क्यों चाहते हैं था। टैक्स्टों के प्रकाशन का प्रोत्साहन फ्रांस की राज्य क्रांति के जन्मदाता वाल्टेयर से लिया गया था। मैंने अपने टेक्स्ट के दूसरे पृष्ठ पर प्रकाशन के शीर्षक में वाल्टेयर का वह ऐतिहासिक वाक्य लिखा कि दस-दस, बीस-बीस जिल्दों वाली हजारों पृष्ठों की मोटी-मोटी किताबों को भला कौन खरीद सकता है और उसे पढ़ और समझ भी कौन सकता है। सच्ची बात तो यह है कि यह गरीब से गरीब किसान और मजदूरों की झोंपडियों तक पहुंच सकने वाले पैसे दो-दो पैसे वाले टेक्स्ट ही होते हैं जिनसे सल्तनतों के तख्ते उलट जाया करते हैं। प्रेस का मालिक मेरा एक मुसलमान दोस्त था। यह वाक्य पढक़र वह मुझसे पूछने लगे कि आप भी अंग्रेजी राज्य का तख्ता उलटना चाहते हैं?
मैंने जवाब दिया जनाब यह वाक्य मेरा नहीं है बल्कि एक फ्रेंच विद्वान तथा फिलॉसफर वाल्टेयर का है। आप तो मुसलमान हैं और आपने फारसी की वह मिसाल नहीं सुनी है कि नकले कुफ्र-कफ्र न बासद अर्थात् कुफ्र के शब्दों को दोहराना कुफ्र नहीं होता। हमारी कचहरियों में ऐसे भी मुकदमे पेश होते हैं जहां एक आदमी जज के सामने पेश होकर कहता है कि अमुख आदमी ने मुझे बहुत ही गंदी गाली दी है और जज के सामने वह आदमी उस गंदी गाली के शब्दों को दोहरा देता है तो वह उसे अपराध नहीं समझता। प्रेस का वह मालिक मेरी बात सुनकर हंस पड़ा और मेरे टैक्स्ट की पांडुलिपि अपने हाथ मैं लेकर बोला जनाब में इसे अवश्य ही छाप दूंगा। इसके बाद तो वह टेक्स्ट तथा मेरे लिखे हुए दर्जनों टेक्स्ट हजारों की संख्या में छपते रहे और चलते रहे।
जब ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी लगाने का फैसला किया तो उस वक्त मैं मुल्तान जेल में था। लेकिन जिस दिन यानी 23 मार्च को भगत सिंह को फांसी लगाई गई तो जेल से रिहा होकर देहरादून अपनी पत्नी और बच्ची विजय को मिलने गया हुआ था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का समाचार मेरे जैसे बहुत से लोगों के लिए बेहद दुख का समाचार था। सारे पंजाब में सनसनी और दुख की लहर फैल गई थी। उस दिन शायद कुछ टोडियों को छोडक़र किसी घर में चूल्हा नहीं जला था। सारा पंजाब मातम में डूबा हुआ था। औरतें सिसक-सिसक कर रो रहीं थीं। अंग्रेज सरकार ने इस भय से कि अगर उन्होंने इन तीनों शहीदों की लाशें उनके रिश्तेदारों के हवाले कर दीं तो कहीं पंजाब में और उसके साथ ही सारे हिंदुस्तान में तूफान खड़ा हो जाए, इन तीनों की लाशों को रात के अंधेरे में सतलुज नदी के किनारे फिरोजपुर के नजदीक एक स्थान पर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया। जो क्रांतिकारी जीते हुए ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए भारी आतंक और चुनौती बने हुए थे उनकी लाशों से जैसे पूरा ब्रिटिश साम्राज्यवाद भयभीत था।
यह प्रश्न भी वाद-विवाद का रहा है कि गांधीजी की अहिंसा और असहयोग आंदोलनों में लाहौर तथा पंजाब के लोगों की प्रतिक्रिया कैसी रही ? पंजाब मुस्लिम, हिंदू और सिख संप्रदायों में विभाजित था। मुसलमान पचास प्रतिशत से ज्यादा थे। उनका कांग्रेस और कांग्रेसियों के साथ कोई नाता नहीं था। हिंदू संप्रदाय सनातन धर्म और आर्यसमाजियों में बंटा हुआ था। आर्यसमाज भी गुरुकुल पार्टी और कॉलिज पार्टी में बंटी हुई थी। हर संस्था की अपनी-अपनी समस्याएं थीं। इसलिए कोई भी पूरी तरह से आंदोलन की ओर आकर्षित नहीं हुआ। सिखों में भी एक वफादार ग्रुप था जो हमेशा ब्रिटिश सेना को जवान सप्लाई करने में गर्व अनुभव करता था। बंगाल, यू.पी. और दक्षिणी भारत के मुकाबले में पंजाब में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की प्रतिक्रिया बहुत कम और कमजोर रही। पंजाब सांप्रदायिक रूप से विभाजित था। और लोग आपस में खींचातानी करते रहते हैं।
पंजाब में कांग्रेस शक्तिशाली नहीं थी। विशेष रूप से शहरी इलाकों में कांग्रेस का प्रभाव कम था। गांवों में सिखों की एक संख्या कांग्रेस में शामिल हुई लेकिन उसका कारण उनमें राजनीतिक चेतना उत्पन्न होना नहीं बल्कि गुरुद्वारों में सुधार लाने की इच्छा थी। शहरी इलाकों में नाम की कांग्रेस कमेटियां तो बनी थीं लेकिन गांवों में वह भी नहीं थीं। पंजाब में लोग सार्वजनिक मीटिंगों में शामिल होते थे जब कोई बड़े लीडर किसी अन्य राज्य से लाहौर तथा पंजाब के किसी शहर में आते थे। लेकिन उनकी हिदायतों की कोई व्यावहारिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी।
‘क्राई फॉर जस्टिस’ के अलावा भगत सिंह की प्रिय पुस्तकें थीं डॉन ब्रीन लिखित ‘माई फाइट फॉर आयरिश फ्रीडम’ और ‘हीरोस और हीरोइन्स ऑफ रशिया।’ भगत सिंह ने मुझे भी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल होने के लिए कहा। मैंने उसे कहा ‘मैंने सर्वेंट्स ऑफ पीपुल्स सोसायटी के आजीवन सदस्य बनते हुए जो प्रतिज्ञा की है उसके अंतर्गत मैं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में शामिल नहीं हो सकता।’ मैंने उससे कहा कि मैंने आपकी संस्था के और नियम पढ़े हैं।
मैं जानता हूं कि आपके तीन नियम हैं, शस्त्र और असलह को जमा करना, उसका उचित अवसर पर इस्तेमाल करना और सारे देश में साम्राज्यवाद विरोधी प्रोपेगेंडा करना। मैंने भगत सिंह से पूछा था कि क्या तुम जानते हो कि मैं आजकल क्या काम कर रहा हूं? मैं आजकल किताबें और पम्पलेट लिख रहा हूं और जगह-जगह लेक्चर दे रहा हूं।
यह सुनकर भगत सिंह ने कहा, ‘गुरुजी मैं संतुष्ट हूं।’ मैंने भगत सिंह से कहा। ‘मैं तुम्हें आश्वासन दिलाता हूं कि तुम्हारी हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में औपचारिक रूप से प्रवेश किए बिना भी मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध अपने प्रोपेगैंडा को दुगना कर दूंगा ताकि लोग तुम्हारी संस्था और तुम्हारी कार्रवाई को सही मानें।’
नेहरू म्यूजियम नई दिल्ली के लिए ली गई एक इंटरव्यू में मुझसे पूछा गया कि मेरे यह छात्र जिनमें भगत सिंह भी शामिल था मुझसे एक अध्यापक होने के नाते प्रेरणा लेते होंगे?
(जब पूरा देश ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ लड़ रहा था, कुछ नेता ऐसे भी थे जो विद्यार्थियों को राजनीति में हिस्सा न लेने की सलाह देते थे. इस सलाह के जवाब में भगत सिंह ने ‘विद्यार्थी और राजनीति’ शीर्षक से यह महत्वपूर्ण लेख लिखा था, जो जुलाई, 1928 में ‘किरती’ में छपा था.)
इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान (विद्यार्थी) राजनीतिक या पॉलिटिकल कामों में हिस्सा न लें. पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है. विद्यार्थी से कॉलेज में दाख़िल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं कि वे पॉलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे. आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मंत्री है, स्कूलों-कॉलेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ाने वाला पॉलिटिक्स में हिस्सा न ले. कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेंट्स यूनियन या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था, वहां भी सर अब्दुल कादर और प्रोफेसर ईश्वरचंद्र नंदा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि विद्यार्थियों को पॉलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए.
पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है. इसका क्या कारण हैं? क्या पंजाब ने बलिदान कम किए हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली हैं? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे है? इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धू हैं. आज पंजाब काउंसिल की कार्रवाई पढ़कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी और फिज़ूल होती है, और विद्यार्थी-युवा जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता. उन्हें इस संबंध में कोई भी ज्ञान नहीं होता. जब वे पढ़कर निकलते हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफ़सोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता.
जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक़्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है. इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें ख़ुद ही समझ लेना चाहिए. हम यह मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं जो सिर्फ़ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाए. ऐसी शिक्षा की ज़रूरत ही क्या है? कुछ ज़्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं, ‘काका तुम पॉलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो ज़रूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो. तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फ़ायदेमंद साबित होगे.’
बात बड़ी सुंदर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं, क्योंकि यह भी सिर्फ़ ऊपरी बात है. इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक ‘अपील टू द यंग, प्रिंस क्रोपोटकिन’ पढ़ रहा था. एक प्रोफ़ेसर साहब कहने लगे, ‘यह कौन-सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है!’ लड़का बोल पड़ा, ‘प्रिंस क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है. वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे.’ इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफ़ेसर के लिए बड़ा ज़रूरी था. प्रोफ़ेसर की ‘योग्यता’ पर लड़का हंस भी पड़ा. और उसने फिर कहा, ‘ये रूसी सज्जन थे.’ बस! ‘रूसी!’ क़हर टूट पड़ा! प्रोफ़ेसर ने कहा, ‘तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पॉलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो.’ देखिए आप प्रोफ़ेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते हैं?
दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमीशन या वायसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वो पॉलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबंध से संबंधित कोई भी बात पॉलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जाएगी, तो फिर यह भी पॉलिटिक्स हुई कि नहीं? कहा जाएगा कि इससे सरकार ख़ुश होती है और दूसरी से नाराज़? फिर सवाल तो सरकार की ख़ुशी या नाराज़गी का हुआ. क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही ख़ुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक हिंदुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफ़ादारी करने वाले वफ़ादार नहीं, बल्कि ग़द्दार हैं, इंसान नहीं, पशु हैं, पेट के ग़ुलाम हैं. तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफ़ादारी का पाठ पढ़ें?
-जगदीश्वर चतुर्वेदी
हमारे कई फेसबुक मित्रों ने कहा है कि प्रेमचंद तो ईश्वर को मानते थे। हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि वे ईश्वर या ऐसे किसी तत्व की उपस्थिति मानने को तैयार नहीं थे जिसे देखा न हो।यह भी सवाल उठा है प्रेमचंद ने इस्लाम धर्म की आलोचना कहां की है? हम इन दोनों सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करेंगे। हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव का विस्तार से जिक्र करने के बाद प्रेमचंद ने ंमनुष्यता का अकालं(जमाना, फरवरी 1924) निबंध में लिखा , ंइतिहास में उत्तराधिकार में मिली हुई अदावतें मुश्किल से मरती हैं,लेकिन मरती हैं,अमर नहीं होतीं।ं
उपरोक्त निष्कर्ष निकालने के पहले प्रेमचंद ने ंमनुष्यता का अकालं में ही लिखा, ंहमको यह मानने में संकोच नहीं है कि इन दोनों सम्प्रदायों में कशमकश और सन्देह की जड़ें इतिहास में हैं। मुसलमान विजेता थे, हिन्दू विजित। मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं पर अकसर ज्यादतियाँ हुईं और यद्यपि हिन्दुओं ने मौका हाथ आ जाने पर उनका जवाब देने में कोई कसर नहीं रखी, लेकिन कुल मिलाकर यह कहना ही होगा कि मुसलमान बादशाहों ने सख्त से सख्त जुल्म किये। हम यह भी मानते हैं कि मौजूदा हालात में अज़ान और कुर्बानी के मौक़ों पर मुसलमानों की तरफ से ज्यादतियाँ होती हैं और दंगों में भी अक्सर मुसलमानों ही का पलड़ा भारी रहता है।ज्यादातर मुसलमान अब भी ंमेरे दादा सुल्तान थेंनारे लगाता है और हिन्दुओं पर हावी रहने की कोशिश करता रहता है।
इसी निबंध में पहलीबार धार्मिक प्रतिस्पर्धा को निशाना बनाते हुए उन्होंने तीखी आलोचना लिखी। उस तरह की आलोचना सिर्फ ऐसा ही लेखक लिख सकता है जिसकी ईश्वर की सत्ता में आस्था न हो,उन्होंने लिखा, दुनियावी मामलों में दबने से आबरू में बट्टा लगता है,दीन-धर्म के मामले में दबने से नहीं।ं आगे लिखा ंयह किसी मज़हब के लिए शान की बात नहीं है कि वह दूसरों की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाये। गौकशी के मामले में हिन्दुओं ने शुरू से अब तक एक अन्यापूर्ण ढंग अख्तियार किया है। हमको अधिकार है कि जिस जानवर को चाहें पवित्र समझें लेकिन यह उम्मीद रखना कि दूसरे धर्म को माननेवाले भी उसे वैसा ही पवित्र समझें, खामखाह दूसरों से सर टकराना है। गाय सारी दुनिया में खाई जाती है, इसके लिए क्या आप सारी दुनिया को गर्दन मार देने क़ाबिल समझेंगे? यह किसी खूँ-खार मज़हब के लिए भी शान की बात नहीं हो सकती कि वह सारी दुनिया से दुश्मनी करना सिखाये।ं
आगे लिखा ं हिन्दुओं को अभी यह जानना बाक़ी है कि इंसान किसी हैवान से कहीं ज्यादा पवित्र प्राणी है,चाहे वह गोपाल की गाय हो या ईसा का गधा, तो उन्होंने अभी सभ्यता की वर्णमाला भी नहीं समझी।हिन्दुस्तान जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए गाय का होना एक वरदान है, मगर आर्थिक दृष्टि के अलावा उसका और कोई महत्व नहीं है। लेकिन गोरक्षा का सारे हो-हल्ले के बावजूद हिन्दुओं ने गोरक्षा का ऐसा सामूहिक प्रयत्न नहीं किया जिससे उनके दावे का व्यावहारिक प्रमाण मिल सकता। गौरक्षिणी सभाएँ कायम करके धार्मिक झगड़े पैदा करना गो रक्षा नहीं है।
प्रेमचंद का मानना है ंवर्तमान समय में धर्म विश्वासों के संस्कार का साधन नहीं, राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन बना लिया गया है।उसकी हैसियत पागलपन की-सी हो गयी है जिसका वसूल है कि सब कुछ अपने लिए और दूसरों के लिए कुछ नहीं। जिस दिन यह आपस की होड़ और दूसरे से आगे बढ़ जाने का खय़ाल धर्म से दूर हो जायेगा,उसदिन धर्म-परिवर्तन पर किसी के कान नहीं खड़े होंगे।ं
प्रेमचंद ने हिन्दू और मुसलमानों को धर्म के नाम पर भडक़ाने वालों और धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों की तीखी आलोचना की है ।ंमिर्जापुर कांफ्रेस में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव (अप्रैल1931) में लिखा ंजब तक अपना हिन्दू या मुसलमान होना न भूल जायेंगे, जब तक हम अन्य धर्मावलम्बियों के साथ उतना ही प्रेम न करेंगे जितना निज धर्मवालों के साथ करते हैं, सारांश यह कि जब तक हम पंथजनित संकीर्णता से मुक्त न हो जायेंगे, इस बेड़ी को तोडक़र फेंक न देंगे, देश का उद्धार होना असंभव है।ंइसमें ही वे आगे कहते हैं ंधर्म को राजनीति से गड़बड़ न कीजिएं। एक अन्य निबंध गोलमेज परिषद में गोलमालं (अक्टूबर 1931) में लिखा ंभारत का उद्धार अब इसी में है कि हम राष्ट्र-धर्म के उपासक बनें, विशेष अधिकारों के लिए न लडक़र, समान अधिकारों के लिए लड़ें। हिन्दू या मुसलमान,अछूत या ईसाई बनकर नहीं, भारतीय बनकर संयुक्त उन्नति की ओर अग्रसर हों, अन्यथा हिन्दू मुसलमान,अछूत और सिक्ख सब रसातल को चले जायेंगे।ं
यह भी लिखा ंधर्म का संबंध मनुष्य से और ईश्वर से है।उसके बीच में देश,जाति और राष्ट्र किसी को भी दखल देने का अधिकार नहीं।हम इस विषय में स्वाधीन हैं।ं
शिवरानी देवी से बातचीत करते हुए प्रेमचंद ने ईश्वर के बारे में कहा ंईश्वर पर विश्वास नहीं होता कि अगर वह सचमुच ईश्वर है तो क्या दुखियों को दुख देने में ही उसे मजा आता है ? फिर भी लोग उसे दयालु कहते हैं।वह सबका पिता है।फला-फूला बाग उजाडक़र वह देखता है और खुश होता है। दया तो उसे आती नहीं । लोगों को रोते देखकर शायद से खुशी ही होती है। जो अपने आश्रितों के दुख पर दुखी न हो।वह कैसा ईश्वर है।ं
आगे वकौल शिवरानी देवी प्रेमचन्द पूछते हैं ंतब कैसे ईश्वर हमसे अन्याय कराता है। जो अच्छा समझे वही हमसे कराये, हम जिससे दुखी न हो सकें। कुछ नहीं। यह सब धोखे में डालने वाली भावनायें हैं, बस अपने को धोखे में डालने के लिए यह सब प्रपंच रचे गए हैं। और नहीं तो हम प्रत्यक्षत: कोई बुरा काम नहीं करते तो लोग कहते हैं। अगले जन्म में बुरा काम किया होगा, उसी का फल है।और मैं कहता हूँ,यह सब गोरखधंधा है।
प्रेमचंद मानते थे ंभगवान मन का भूत है,जो इन्सान को कमजोर कर देता है। ईश्वर का आधार अन्धविश्वास है और इस अंधविश्वास में पडऩे से तो रही सही अक्ल भी मारी जाती है।
प्रेमचंद का जैनेन्द्र के साथ लगातार पत्र-व्यवहार होता था, दोनों गहरे मित्र थे। प्रेमचन्द ने 9 दिसम्बर 1935 को जैनेन्द्र कुमार को लिखा, ंईश्वर पर विश्वास नहीं आता, कैसे श्रद्धा होती। तुम आस्तिकता की ओर जा रहे हो,जा ही नहीं रहे हो। बल्कि भगत बन गये हो मैं संदेह से पक्का नास्तिक होता जा रहा हूँ। और एक दिन जैनेन्द्र कुमार को दो-टूक उत्तर दे दिया, ंजब तक संसार में यह व्यवस्था है, मुझे ईश्वर पर विश्वास नहीं आने का: अगर मेरे झूठ बोलने से किसी की जान बचती है तो मुझे कोई संकोच नहीं होगा। मैं प्रत्येक कार्य को उसके मूल कारण से परखता हूँ। जिससे दूसरों का भला न हो।
जिससे दूसरों का नुकसान हो वही झूठ है।ं
मृत्यु से कुछ दिन पहले रोग-शैय्या पर पड़े हुए प्रेमचंद ने जैनेन्द्र कुमार से कहा ंजैनेन्द्र:लोग इस समय ईश्वर को याद किया करते हैं।मुझे भी याद दिलाई जाती है।पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं मालूम हुई, जैनेन्द्र! मैं कहचुका हूं। मैं परमात्मा तक नहीं पहुँच सकता। मैं उतना उत्साह नहीं कर सकता। कैसे करूँ जब देखता हूँ,बच्चा बिलख रहा है, रोगी तड़प रहा है। यहाँ भूख है, क्लेश है, ताप है,वह ताप इस दुनिया में कम नहीं है। तब उस दुनिया में मुझे ईश्वर का साम्राज्य नहीं दीखे तो मेरा क्या कसूर है?मुश्किल तो है कि ईश्वर को मानकर उसको दयालु भी मानना होगा। मुझे वह दयालुता नहीं दीखती ,तब उस दया सागर में विश्वास कैसे हो।
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतें भारत के वर्तमान जल आपूर्ति मॉडल की कमजोरी उजागर करती हैं। इस समस्या से निपटने के
लिए कड़ी निगरानी, बेहतर डाटा और सीवेज-प्राथमिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
अरुण प्रजापत को अंदेशा था कि कोई दिक्कत सामने आने वाली है लेकिन उन्हें यह अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि वह परेशानी इतनी जल्दी उनके सामने आएगी और उनकी जिंदगी को उलट कर रख देगी। 28 दिसंबर 2025 को वह एक निर्माण स्थल पर काम कर रहे थे तभी उनकी मां का फोन आया। उन्होंने बताया कि घर में आने वाले नल के पानी से बदबू आ रही है और वह पीने लायक नहीं रह गया है। उनकी मां ने जोर दिया कि अब पानी का फिल्टर खरीदने का वक्त आ गया है।
अगले ही दिन अरुण के मां की तबीयत बिगड़ने लगी। अरुण याद करते हैं, “मां को तेज पेट दर्द और मितली की शिकायत थी। यह समझने का मौका ही नहीं मिला कि आखिर हो क्या रहा है। दस्त और उल्टी के दो दौर के बाद उन्होंने अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया।”
इस घटना के कुछ ही दिनों में यह बीमारी मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के घनी आबादी वाले इलाके भागीरथपुरा में तेजी से फैली। स्थानीय निवासियों का अनुमान है कि करीब 3,000 लोग उल्टी, दस्त, शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) और कमजोरी से पीड़ित हुए, जिनमें से 450 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। 21 जनवरी, 2026 तक कम से कम 25 लोगों की जान चली गई।
इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज द्वारा किए गए प्रयोगशाला परीक्षणों में नल के पानी के नमूनों में रोगजनक जीव पाए गए। पानी के नमूनों में हैजा फैलाने वाला विब्रियो कॉलरा, मानव मलजनित कोलीफॉर्म (फीकल कोलीफॉर्म) और एस्चेरिचिया कोलाई (ई.कोलाई) पाए गए, जो यह साबित करते हैं कि सीवर पीने के पानी में मिल गया था और इसी कारण दस्तों का प्रकोप हुआ।
इन मौतों के बाद पूरे शहर में विरोध प्रदर्शन हुए और उन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिन पर महीनों से दूषित पानी की शिकायतों को अनदेखा करने का आरोप था। राज्य सरकार ने इस घटना को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित किया। प्रभावित लोगों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा और प्रत्येक पीड़ित परिवार को दो लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की गई। इस घटना के बाद नर्मदा नदी से पानी की आपूर्ति करने वाली पाइपलाइनों को भी बदलने का काम शुरू हुआ।
नगर निगम के जल आपूर्ति विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर नरेश भास्कर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि 20 किलोमीटर लंबी नई पाइपलाइन बिछाई जा रही है और काम तेजी से किया जा रहा। प्रकोप शुरू होने के तुरंत बाद अधिकारियों ने पीने के पानी की आपूर्ति के लिए 40 से अधिक पानी के टैंकर तैनात किए। हालांकि, कई निवासी टैंकर वाले पानी को लेकर सतर्क हैं और इसके बजाए बोतलबंद पानी खरीद रहे हैं या फिर व्यक्तियों और चैरिटी द्वारा वितरित फिल्टर किए गए पानी पर निर्भर हैं।
इस जानलेवा संकट से जुड़ी हुई कई याचिकाओं की सुनवाई मध्य प्रदेश (एमपी) हाईकोर्ट में जारी है। एमपी हाईकोर्ट ने 20 जनवरी को राज्य सरकार को फटकार लगाई और पूछा कि इंदौर में दूषित पानी की स्थिति इतनी गंभीर कैसे हो गई कि यह जानलेवा बन गया। कोर्ट ने सरकार से पीने के पानी में गंदगी पहुंचने के स्रोत को लेकर स्पष्टता भी मांगी। वहीं, राज्य सरकार ने बताया कि स्थानीय स्तर पर दूषित पानी फैलने का स्रोत दरअसल एक सार्वजनिक शौचालय था और उसे ध्वस्त कर दिया गया है।
पहले कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह बताया गया था कि यह सार्वजनिक शौचालय मुख्य पाइपलाइन के ऊपर स्थित था, जो क्षेत्र में पीने का पानी सप्लाई करती थी और पाइपलाइन में लीकेज के कारण पानी दूषित हो गया। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने हाईकोर्ट को बताया कि भागीरथपुरा के 51 ट्यूबवेल भी ई. कोलाई से दूषित पाए गए। वहीं, मध्य प्रदेश के दूसरे शहरों में पानी के दूषित होने संबंधी याचिकाओं पर पहले से ही सुनवाई कर रहे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इंदौर त्रासदी मामले का स्वतः संज्ञान लिया और 15 जनवरी को वास्तविक स्थिति की जांच के लिए छह सदस्यीय संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया।
मध्य प्रदेश में दूषित पानी की समस्या कोई नई बात नहीं है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2013 से 2018 के छह साल के दर्मियान इंदौर और राजधानी भोपाल में 5,45,000 से अधिक लोग जलजनित बीमारियों जैसे टाइफाइड और वायरल हेपेटाइटिस से पीड़ित पाए गए। फिर भी, शहर की सार्वजनिक छवि कुछ और ही कहानी बताती है।
भागीरथपुरा के निवासी सुरक्षित पीने के पानी की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं, जबकि शहर की दीवारों पर पोस्टर लगे हैं जिनमें लिखा है “इंदौर रहेगा नंबर वन।” सड़कें नियमित रूप से साफ की जाती हैं और निवासी कचरे को नीले और हरे डिब्बों में सही तरीके से अलग करते हैं। यह नागरिक अनुशासन और व्यवस्था का दृश्य है। इस नागरिक अनुशासन और सफाई व्यवस्था ने इंदौर को जुलाई 2025 में केंद्रीय सरकार के वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण, स्वच्छ सर्वेक्षण 2024-25 में लगातार आठवीं बार भारत का सबसे स्वच्छ शहर होने का खिताब दिलाने में मदद की। हाल ही में हुई मौतों ने उस सावधानीपूर्वक बनाए गए छवि को ध्वस्त कर दिया है और यह एक और चिंताजनक सवाल उठाया है कि इसके पीछे वास्तव में क्या छिपा हुआ है।
सिर्फ इंदौर नहीं, चपेट में पूरा भारत
इंदौर की घटना के दौरान ही गुजरात की राजधानी गांधीनगर में 150 से अधिक बच्चे संदिग्ध टाइफाइड के चलते अस्पताल में भर्ती हुए, जिनके दूषित पानी पीने की आशंका थी। सरकारी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) के 8 जनवरी के एक बयान के मुताबिक, नई बिछाई गई पाइपलाइन में सात लीकेज प्वाइंट थे जिसके कारण सीवर का गंदा पानी पीने के पानी की आपूर्ति में मिल गया था।
भारत के तकनीकी केंद्र बेंगलुरु के लिंगराजपुरम में एक छोटे रिहायशी इलाके केएसएफसी लेआउट में कम से कम 30 परिवारों ने दस्त और पेट संक्रमण की शिकायत दर्ज कराई। वहीं, पटना के कंकड़बाग हाउसिंग कॉलोनी में निवासी बताते हैं कि इंदौर जैसी स्थिति वहां भी बन रही है। कई ब्लॉकों का नल का पानी इतना प्रदूषित है कि त्वचा पर संपर्क होने पर खुजली होती है और इसे नहाने या कपड़े धोने तक के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वहां के निवासी टूटी हुई पाइपलाइनों को दोषी मानते हैं, जो कई दशकों पुरानी हैं और सीवर नालों के साथ बिछी हुई हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कचना हाउसिंग बोर्ड एरिया, पिंक सिटी, सेजबहार हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, स्टील सिटी और गांधी नगर के निवासी शिकायत करते हैं कि उन्हें एक महीने से बदबूदार और दूषित नल का पानी मिल रहा है। जनवरी की शुरुआत में कुछ लोगों ने जलजनित रोगों की रिपोर्ट भी की। निवासी आरोप लगाते हैं कि पुरानी पाइपलाइन और जाम हुए नालों के कारण सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल गया है। कई परिवार, खासतौर से गरीब परिवारों को अब पीने और खाना बनाने जैसी जरूरतों के लिए बोतलबंद पानी खरीदना पड़ रहा है।
रायपुर की मेयर मीनल चौबे ने डाउन टू अर्थ को बताया कि दूषित पानी की आपूर्ति रोकने और तकनीकी दोषों को ठीक करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया था। उन्होंने अपने बयान में कहा, “जैसे ही शिकायतें आती हैं, हम कार्रवाई करते हैं। लेकिन कुछ देरी हो जाती है क्योंकि पुरानी पाइप बदलने और तकनीकी दोष सुधारने में समय लगता है।”
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। ऊंची इमारतों और निजी जल आपूर्ति के लिए जाना जाने वाला गुरुग्राम में भी यह समस्या बरकरार है। सेक्टर 70ए के निवासियों ने दिसंबर की शुरुआत में नल का पानी पीने के बाद दस्त और पेट संबंधी रोगों की शिकायत की। लगभग 60-70 लोग प्रभावित हुए, जिनमें से 10 को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ग्रेटर नोएडा के डेल्टा 1 सेक्टर के निवासियों ने भी नल के पानी का इस्तेमाल करने के बाद उल्टी, बुखार, पेट दर्द और दस्त जैसी समस्याओं की रिपोर्ट की। उन्होंने शिकायत की कि सीवर का पानी आपूर्ति में मिला था। वहीं, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने पीने के पानी में किसी तरह की गंदगी होने को खारिज किया, लेकिन निवासी अभी भी संतुष्ट नहीं हैं।
डाउन टू अर्थ ने मीडिया रिपोर्ट और आधिकारिक बयानों का विश्लेषण किया, जिससे पता चलता है कि फरवरी 2025 से जनवरी 2026 तक कम से कम 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 12 शहरों में सीवर से प्रदूषित नल का पानी बीमारी फैलाने का कारण बना। इससे कम से कम 34 लोगों की मौतें हुई और 5,800 से अधिक लोग बीमार पड़े। सबसे अधिक रिपोर्ट की गई बीमारी दस्त थी, इसके बाद टाइफाइड, हेपेटाइटिस और लंबे समय तक बुखार होने की शिकायतें भी शामिल थीं। इन घटनाओं के बाद यह अनुमान भी गलत साबित हुआ कि ऐसे प्रकोप केवल मॉनसून के समय होते हैं। मॉनसून के वक्त बाढ़ और ओवरफ्लो वाले नाले सीवर के पानी के मिल जाने का जोखिम बढ़ा देते हैं, हालांकि अब ऐसे मामलों की रिपोर्ट हर मौसम में की जा रही।
एनजीटी ने 15 जनवरी के आदेश में यह दोहराया कि पीने के पानी का दूषित होना स्पष्ट रूप से पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अनुच्छेद 21 जीवन जीने के मौलिक अधिकार से जुड़ा है, जिसमें स्वच्छ और सुरक्षित पानी का अधिकार भी शामिल है। शहरी क्षेत्रों में इस मौलिक अधिकार की सुरक्षा के लिए केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय नीति निर्देश जारी करता है और राज्यों व शहरी स्थानीय निकायों को तकनीकी सहायता प्रदान करता है। कम से कम चार प्रमुख ऐसी योजनाएं चल रही हैं, जिनमें अटल मिशन फॉर रिजुवनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत), नमामि गंगे कार्यक्रम, स्मार्ट सिटी मिशन और राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना शामिल हैं।
अमृत का पहला चरण 2015 में शुरू हुआ था और इसमें 500 शहर शामिल थे। इस मिशन को 2021 में बढ़ाकर देश के सभी 4,378 वैधानिक नगरों तक विस्तृत किया गया, जिसका लक्ष्य पहले चरण में शामिल 500 शहरों में पानी की 100 प्रतिशत आपूर्ति और पूरी तरह से सीवर व सेप्टेज का प्रबंधन सुनिश्चित करना था।
गंगा नदी की सफाई पर केंद्रित केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नमामि गंगे कार्यक्रम भी शहरों में व्यापक स्तर पर सीवर के बुनियादी ढांचे के विकास को भी शामिल करता है। इसके तहत शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) स्थापित करना और इंटरसेप्शन और डाइवर्जन जैसे काम शामिल हैं ताकि नदियों में गैर शोधित सीवेज सीधा न मिल सके।
वहीं, भारत के अन्य प्रदूषित नदियों के हिस्सों में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना भी इसी तरह के उपाय को लागू करती है। स्मार्ट सिटी मिशन एक कदम आगे बढ़ता है और 100 चयनित शहरों को स्मार्ट जल प्रबंधन प्रणाली, चौबीसों घंटे पानी की आपूर्ति, स्मार्ट मीटरिंग के माध्यम से पीने के पानी के नुकसान को कम करना और उन्नत सीवेज ट्रीटमेंट लागू करने की बात करता है।
इसके बावजूद भारत के शहर और कस्बे बार-बार पीने के पानी में गंदगी और जलजनित रोगों के प्रकोप की रिपोर्ट क्यों करते हैं? समस्या वास्तव में कहां निहित है?
कागजों पर मैनुअल
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) में वाटर प्रोग्राम के डायरेक्टर सुब्रत चक्रवर्ती का कहना है कि इंदौर जैसी घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि पाइपलाइन बिछाने और बनाए रखने के लिए इंजीनियरिंग दिशानिर्देशों को नियमित रूप से अनदेखा किया जाता है।
भारत में शहर स्तर के इंजीनियरों के लिए सीवेज और पीने के पानी की लाइनों की योजना और डिजाइन तैयार करने हेतु दो मैनुअल हैं। पहला, मैनुअल ऑन वाटर सप्लाई एंड ट्रीटमेंट सिस्टम्स (ड्रिंक फ्रॉम टैप), मार्च 2024 है। इसे सेंट्रल पब्लिक हेल्थ एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग ऑर्गेनाइजेशन (सीपीएचईईओ) द्वारा मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग अर्बन अफेयर्स के तहत प्रकाशित किया गया है। यह पाइपलाइन स्थापना के मानक तय करता है। इसमें पीने के पानी की लाइनों को मौजूदा या संभावित सीवेज या ड्रेनों से क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर रूप से अलग रखने पर जोर दिया गया है ताकि मिलावट और गंदगी से सुरक्षा हो सके।
इसके तहत पानी की मुख्य पाइपलाइन को सीवर या नालों से कम से कम तीन मीटर दूर रखा जाना चाहिए। ऊंचाई के हिसाब से पानी की पाइपलाइन का निचला हिस्सा किसी भी सीवर या नाले से कम से कम 0.5 मीटर ऊपर होना चाहिए। और अगर यह दूरी रखना संभव न हो तो सुरक्षा के लिए विशेष आवरण लगाना चाहिए।
सीपीएचईईओ द्वारा 2013 में मैनुअल ऑन सीवरेज एंड सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम्स नाम से दूसरा मैनुअल प्रकाशित किया गया था। यह मैनुअल सलाह देता है कि सीवर लाइन हमेशा पानी की लाइनों के नीचे बिछाए जाएं। इसमें लैटरल ऑफसेट यानी एक-दूसरे के बगल में रखी गई पाइपलाइनों के बीच की न्यूनतम क्षैतिज दूरी का विवरण है जो मैनहोल की आधी चौड़ाई से 30 सेमी अधिक रखी जानी चाहिए। साथ ही जहां पर्याप्त अलगाव संभव नहीं हो वहां सीवर को आवरण में रखने की सिफारिश की गई है।
इसके साथ, कोड ऑफ प्रेक्टिस फॉर बिल्डिंग ड्रेनेज (आईएस कोड 1742:1983) यह निर्धारित करता है कि पानी और सीवर लाइनों के बीच न्यूनतम ऊर्ध्वाधर दूरी 0.3 मीटर और क्षैतिज दूरी 3 मीटर होनी चाहिए ताकि अशुद्धता का जोखिम कम किया जा सके। सुब्रत चक्रवर्ती कहते हैं कि यह मानक इंदौर में हुई पानी और सीवर के मिल जाने जैसी घटनाओं को रोकने के लिए बनाए गए हैं लेकिन शहरी विकास के दौरान इन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
एनजीटी के द्वारा 15 जनवरी, 2026 को भी इस समस्या को उजागर किया गया। ट्रिब्यूनल के मुताबिक, “कई शहरी केंद्रों में पीने के पानी की पाइपलाइन और सीवर लाइनें बहुत पास-पास बिछाई जाती हैं, अक्सर एक-दूसरे को काटती हैं या समानांतर चलती हैं। कई मामलों में तो पीने के पानी की पाइपलाइन सीवर या नालों के नीचे बिछाई जाती है, जिससे लीकेज, दबाव में उतार-चढ़ाव या पाइपलाइन को नुकसान होने की स्थिति में पीने के पानी में गंदगी पहुंचने का जोखिम बढ़ जाता है।”
एनजीटी ने 15 जनवरी के अपने आदेश में कहा, “अंतराल वाले जल आपूर्ति सिस्टम स्थिति को और बिगाड़ते हैं क्योंकि यह पाइपलाइनों में नकारात्मक दबाव पैदा करता है, जिससे दूषित पानी का प्रवेश आसान हो जाता है।” यह दोनों मैनुअल इंजीनियर्स को सीवर और पीने के पानी के नेटवर्क के नियमित रखरखाव के बारे में भी मार्गदर्शन देते हैं, जो लीकेज और पुरानी पाइपलाइन का पता लगाने के लिए आवश्यक हैं। यह खासकर उन शहरों के लिए अत्यंत जरूरी है जहां जहां सीवर नेटवर्क काफी पुराने हैं। मिसाल के तौर पर दिल्ली में पानी आपूर्ति नेटवर्क का आधे से अधिक हिस्सा 20 से 30 साल पुराना है। दिल्ली जल बोर्ड नियमित रूप से दूषण संबंधी हजारों शिकायतें प्राप्त करता है, जिससे ट्रांस-यमुना क्षेत्रों में बार-बार आपातकालीन जांच और मरम्मत की जाती है।
ग्रेटर नोएडा में जनवरी में सीवर से दूषित गंदे पानी के प्रकरण के बाद वहां के लोगों ने 30 साल से अधिक पुरानी पाइपों को बदलने की मांग की है। हैदराबाद में 1960 के दशक की पाइपलाइन अक्सर लीकेज करती है, जिससे शहर में रोजाना लगभग 7.5 करोड़ लीटर पानी बर्बाद हो जाता है।
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) जिला आधे से अधिक शताब्दी पुरानी पाइपलाइनों पर निर्भर करता है, जिससे अधिकारियों को सिस्टम पर दबाव कम करने के लिए आपातकालीन सुधार योजना बनानी पड़ रही है। कुछ शहरों का इंफ्रास्ट्रक्चर तो और भी पुराना है।
कोलकाता भारत का पहला शहर था जहां आधुनिक पाइपलाइन के जरिए जलापूर्ति 1870 से शुरू हुई थी और यह उन पहले शहरों में से था जहां सीवर लाइनें भी बनाई गईं। शहर के कुछ हिस्सों में ईंट से बनी सीवर लाइनों को आज भी देखा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा इन संरचनात्मक कमजोरियों को और बढ़ा रही है, क्योंकि बाढ़ और भूस्खलन से पाइपलाइनें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। कुछ शहरों के अधिकारी चरणबद्ध सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने की घोषणाएं कर चुके हैं। हालांकि, सुब्रत चक्रवर्ती का कहना है कि यह काम कहीं से भी आसान नहीं है।
पुरानी मानचित्रण प्रणाली और डाटा की कमी, एक बड़ी समस्या
भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। 2036 तक इसके कस्बों और शहरों में 60 करोड़ लोग रहेंगे यानी कुल आबादी का 40 प्रतिशत, जो 2011 में 31 प्रतिशत था। इसलिए देश दो दबावों के बीच फंसा है। पहला है, विशाल और पुराने बुनियादी ढांचों की मरम्मत और रखरखाव करना और दूसरी समस्या नई आबादी वाले क्षेत्रों में जल आपूर्ति का विस्तार करना है।
सुब्रत चक्रवर्ती कहते हैं, “चूंकि जल आपूर्ति का विस्तार सीवर प्रणाली से आगे निकल गया है और बड़े हिस्से के शहरी घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ना बाकी है, इसलिए यह आवश्यक है कि इंजीनियर सबसे पहले मौजूदा पीने के पानी की लाइनों की पहचान करें और सीवर लाइन बिछाने से पहले इसे पूरी सावधानी से करें।” हालांकि, भरोसेमंद मानचित्रों की कमी और ऐसी घनी आबादी वाले क्षेत्र जहां कई यूटिलिटी लाइनें समानांतर चलती हैं, वहां पाइपलाइन अलगाव के सुरक्षा मानकों का उल्लंघन होने का जोखिम बढ़ा सकते हैं। भोपाल स्थित स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरमेंटल मैनेजमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर गोविंद एम पी बताते हैं कि भूमिगत ढांचों का पुराना और टुकड़ों में मौजूद मानचित्रण एक केंद्रीय समस्या है। किसी शहर में आधारभूत ढांचों को बिछाने और बनाए रखने में कई संस्थाएं शामिल होती हैं। आमतौर पर पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (पीएचईडी) पाइपलाइन स्थापित करता है, जबकि नगर पालिकाएं उनका रखरखाव करती हैं। अक्सर अधिकारी अनजाने में इन पाइपलाइनों के ऊपर शौचालय या अन्य संरचनाएं बना देते हैं क्योंकि नेटवर्क के अपडेटेड मानचित्र उपलब्ध नहीं होते। गोविंद कहते हैं कि अक्सर सलाहकारों के पास सबसे सटीक डाटा होता है। वह जोर देते हैं “तकनीकी विशेषज्ञता संस्थानों के भीतर मौजूद है, लेकिन यह केवल तभी उपयोग में लाई जा सकती है जब डाटा उपलब्ध हो।”
मध्य प्रदेश के शहरों में पानी के प्रदूषण के संबंध में एनजीटी में याचिका दायर करने वाले भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता कमल राठी बताते हैं कि बढ़ते शहर में भूमिगत ढांचों के मानचित्र कितने महत्वपूर्ण हैं। जब भोपाल की अरेरा कॉलोनी में 1965 में पानी और सीवर लाइनें बिछाई गई थीं तो ध्यान रखा गया था कि सीवर लाइनें सड़क के एक तरफ और पानी की लाइनें दूसरी तरफ रहें ताकि प्रदूषण का जोखिम कम हो। लेकिन इस वक्त जगह की कमी के कारण इस अभ्यास को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
राठी कहते हैं, “अगर आप किसी भी शहर की किसी भी कॉलोनी में जाएं, तो आप पाएंगे कि सीवर लाइनें और पानी की लाइनों का क्रॉस होना आम बात हो गई है और यह इंदौर जैसी घटनाओं को बार-बार जन्म देता रहेगा।” वह जोड़ते हैं कि सभी शहरों को जियोस्पेशियल (जीआईएस) मानचित्रण अपनाना चाहिए ताकि भूमिगत ढांचों का डिजिटलीकरण किया जा सके और इसके प्रभावी निगरानी और रखरखाव को सुनिश्चित किया जा सके।
भूमिगत ढांचों का जीआईएस मानचित्रण पहले से ही स्मार्ट सिटी मिशन और अमृत योजना का एक अहम हिस्सा है। इसका उद्देश्य शहरों की नीचे मौजूद पाइपलाइन, केबल और अन्य ढांचों की सही जानकारी रखना है। साथ ही सभी प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पीएम गति शक्ति पोर्टल पर मैप करना जरूरी है। इसके पीछे तर्क यह है कि ऐसा करने से शहरी योजना बेहतर बनेगी और विकास कार्य ज्यादा प्रभावी तरीके से हो पाएंगे।
कुछ शहरों ने भूमिगत यूटिलिटी के लिए जीआईएस तकनीक लागू की है। इनमें वाराणसी, वडोदरा और पुणे का नाम शामिल है। हालांकि, सभी नामित शहर यह कार्य पूरा नहीं कर पाए हैं और अभी भी कागज आधारित मानचित्रों, तालिकाओं और रेखाचित्रों के साथ जूझ रहे हैं।
जयपुर के मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जुड़े शहरी योजनाकार प्रताप रावल कहते हैं कि अधिकांश यूटिलिटी कंपनियां यह पहचानने के लिए प्रेशर मीटर पर निर्भर करती हैं कि लीकेज किस क्षेत्र में हो रहा है। यह तरीका दोष का सटीक स्थान नहीं बताता। भारत में जल आपूर्ति प्रणाली में खराबियों का पता लगाने और प्रबंधन करने में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) सेंसर जैसी तकनीक निर्णायक भूमिका निभा सकती है। भूमिगत पाइपलाइन का मानचित्र बनाने और लीकेज पहचानने के लिए ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार का भी उपयोग किया जा सकता है। जयपुर जैसे शहरों में इसका प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि, रावल यह स्वीकार करते हैं कि उच्च लागत के कारण इसका उपयोग सीमित ही रहा है।
इन सीमाओं के बावजूद कुछ शहर नवाचार कर रहे हैं। ओडिशा के 11 शहरों में अब चौबीसों घंटे पीने लायक पानी की आपूर्ति की जा रही है। इसके लिए पाइपलाइनों में निरंतर दाब बनाए रखा जा रहा है, साथ ही समुदाय की सक्रिय भागीदारी के साथ सतत निगरानी सुनिश्चित की गई है (देखें : नल से जल अब हो सकता है हकीकत, पृष्ठ 28)। गुजरात में सूरत नगर निगम ने “नॉन-रेवेन्यू वाटर सेल” की स्थापना की है। यह सेल जीआईएस की मदद से पानी के रिसाव का मानचित्रण करता है, जल लेखा-परीक्षण (वॉटर ऑडिट) करता है और सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डाटा एक्विजिशन (एसीएडीए) जैसी स्मार्ट तकनीकों का उपयोग करता है। इससे न सिर्फ राजस्व वसूली में सुधार हो रहा है बल्कि पानी की बर्बादी कम होने के साथ कार्यकुशलता बढ़ रही है। वहीं, दिल्ली में अधिकारियों का ध्यान सही स्थापना और सामग्री की गुणवत्ता पर केंद्रित है ताकि जहां ज्वाइंट हो वहां से पानी न रिसे। स्थानीय नियम यूटिलिटी कंपनियों को सीवर और पानी की लाइनों के बीच निर्धारित दूरी बनाए रखने के लिए बाध्य करते हैं।
सीवर-केंद्रित रणनीति की ओर बदलाव
इसके बावजूद. ऐसी रणनीतियां अक्सर पूरी तरह काम नहीं कर पातीं। सार्वभौमिक सीवर व्यवस्था अभी भी सिर्फ एक सपना है और हर घर से मल-मूत्र को इकट्ठा करने के लिए बहुत कम काम किया जा रहा है। मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स के मुताबिक, अमृत योजना के तहत राज्यों में लगभग 8,792 परियोजनाओं के लिए 1,93,095 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए हैं। लेकिन जल आपूर्ति अभी भी शीर्ष प्राथमिकता है, जो स्वीकृत खर्च का 62 प्रतिशत लेती है। वहीं, सीवर और सेप्टेज प्रबंधन के लिए केवल 34 प्रतिशत खर्च किया गया है जबकि जलाशयों के पुनर्जीवन पर केवल तीन प्रतिशत खर्च हुआ। चक्रवर्ती बताते हैं कि “सीवरयुक्त” माने जाने वाले शहरों में भी बड़े गैर-सीवर वाले क्षेत्र मौजूद हैं। शहरी भारत का अधिकांश हिस्सा ऑन-साइट सैनिटेशन सिस्टम पर निर्भर करता है यानी सेप्टिक टैंक या अधूरे कंटेनमेंट सिस्टम होते हैं, जिनमें नीचे या चारों तरफ कोई जलरोधक परत नहीं होती।
सीएसई द्वारा 2022 में किए गए एक सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के चुनार में 95 प्रतिशत घरों में व्यक्तिगत शौचालय पाए गए। फिर भी सीवर लाइनों की अनुपस्थिति में 88 प्रतिशत घरों ने शौचालय का मल जल निकासी नालों या आसपास के जलाशयों या खुले मैदान में ही छोड़ा। 2024 के सीएसई सर्वेक्षण में दिल्ली के संगम विहार क्षेत्र में 70 प्रतिशत सेप्टेज होल्डिंग टैंक के नीचे लाइनिंग यानी जल रोधी सुरक्षा परत नहीं पाई गई। ऐसे तरीके भूमिगत पानी को गंदा करते हैं साथ ही खराब पेयजल और बार-बार होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं का चक्र बनाते हैं। चक्रवर्ती कहते हैं, “इसलिए सबसे पहले जरूरी है कि सेप्टिक टैंकों से कीचड़ को नियमित रूप से निकालकर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में ठीक से साफ किया जाए। अगर कीचड़ निकालने वाली गाड़ियां इसे एसटीपी में डालने के बजाय खुले नालों या तालाबों में फेंक देती हैं तो अधिकारियों को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।”
इंदौर जल संकट यह दिखाता है कि क्यों सीवर-केंद्रित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। भागीरथपुरा जिस कान्ह नदी के किनारे फैला है, वह नदी अब ऊपर की ओर मौजूद असंगठित कॉलोनियों से आने वाले सीवर का रास्ता बन गई है। वहां के निवासी डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि भागीरथपुरा को केवल एक साल पहले ही सीवर लाइन मिली थी, उससे पहले अधिकांश घरों का शौचालय और घरेलू कचरा सीधे नदी में बहाया जाता था। अब यह नदी की बजाए एक नाले जैसी दिखती है और लगातार बदबू फैलाती है। इंदौर के स्वतंत्र जल और स्वच्छता विशेषज्ञ राहुल बनर्जी कहते हैं, “शहर के भीतर कान्ह नदी की पूरे 9 किलोमीटर लंबी सीमा किसी भी मानव उपयोग के लिए अनुपयुक्त है।” पिछले कुछ वर्षों में शहर की हजारों खुली नालियों और आउटफॉल को ठीक करने के बड़े कार्यक्रम चलाए गए हालांकि, उनका प्रभाव बहुत कम रहा है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मल संक्रमण का अहम संकेतक ई. कोलाई हाल ही में भागीरथपुरा के 51 ट्यूबवेल के पानी के नमूनों में पाया गया। इससे पहले, मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा 2016-17 में की गई जांच में इंदौर के 60 स्थानों पर व्यापक भूजल प्रदूषण पाया गया, जिसमें भागीरथपुरा भी शामिल था। कुल कोलीफॉर्म स्तर यह संकेत देते हैं कि पानी में मल-संक्रमण मौजूद था।
सीएसई की महानिदेशक और पत्रिका की संपादक सुनीता नारायण साफ-सुथरे पानी की सुरक्षा के लिए तीन-स्तरीय दृष्टिकोण सुझाती हैं। उनके मुताबिक, अमृत योजना के दिशा-निर्देशों को सीवर प्रबंधन को प्राथमिकता देने के लिए फिर से तैयार किया जाना चाहिए। साथ ही शहरों को ऑन-साइट सेप्टेज टैंकों के मौजूदा नेटवर्क का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह तेज, सस्ता और अधिक समावेशी है। दूसरा, दिशा-निर्देशों में रीयूज को प्रोत्साहित करना चाहिए। शहरों को उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल और स्लज को जैव-उपज या ईंधन के लिए भेजने पर भुगतान किया जाना चाहिए। परियोजना केवल सीवर को इंटरसेप्ट करने या स्वतंत्र ट्रीटमेंट प्लांट बनाने तक सीमित ना हो। नारायण के मुताबिक, फाइनेंसिंग को इस बात से जोड़ा जाना चाहिए कि कितनी मात्रा में सीवर का पानी और कीचड़ साफ करके दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है। तीसरा, जल परियोजनाओं को स्थानीय स्रोतों से जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें जलाशयों का पुनर्जीवन शामिल है। इससे लंबी दूरी के जल स्थानांतरण की लागत कम होगी, भूजल उपयोग अधिक टिकाऊ होगा और जल आपूर्ति अधिक सस्ती होगी। हालांकि, नारायण यह भी जोड़ती हैं कि यह केवल सीवर को प्राथमिक दृष्टिकोण मानने और अपनाने पर ही संभव है।
(रायपुर से पुरुषोत्तम ठाकुर और पटना से मोहम्मद इमरान खान के इनपुट के साथ) (hindi.downtoearth)
"अगर आप इस पेड़ को ध्यान से देखें, तो यह इंसान की क्षमता से बाहर का पेड़ है. आज हम इस तरह के पेड़ लगाकर उन्हें ज़िंदा रख पाएंगे, इसकी कोई संभावना नहीं है. पेड़ों का जो यह विशाल आकार होता है, वह इंसानी बस से बाहर होता है."
पर्यावरण कार्यकर्ता रूपेश कलंत्री, छत्रपति संभाजीनगर में नगर नाका से दौलताबाद जाने वाली सड़क पर लगे एक विशाल बरगद के पेड़ की ओर इशारा करते हुए यह बात कह रहे थे.
इस पेड़ समेत कुल 697 पेड़ों को काटा जाना है, क्योंकि फिलहाल दो लेन वाली इस सड़क को चार लेन में बदला जा रहा है.
नगर नाका से दौलताबाद की ओर बढ़ते ही सड़क चौड़ीकरण का काम शुरू हुआ दिखाई देता है. सड़क के विस्तार के लिए हो रही इस पेड़ कटाई का शहर के पर्यावरण प्रेमियों ने विरोध किया है.
रूपेश कलंत्री कहते हैं, "हम सोचते ही ऐसे हैं कि सवाल खड़ा कर देते हैं, आपको सड़क चाहिए या पेड़? आपको विकास चाहिए या पर्यावरण? ऐसा क्यों होना चाहिए? यह या वह क्यों? दोनों साथ क्यों नहीं हो सकते?"
वह आगे कहते हैं, "पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि सारे पेड़ कैसे बचें, और उसके बाद सड़क बनाने की योजना तैयार की जाए."
'697 पेड़ काटना यानी मौत की ओर बढ़ना'
छत्रपति संभाजीनगर में नगर नाका से दौलताबाद टी-पॉइंट तक की साढ़े आठ किलोमीटर लंबी सड़क के चौड़ीकरण के लिए जिन पेड़ों को काटा जाना है, उन पर नंबर लगाए जा चुके हैं. पहले एक किलोमीटर के हिस्से में सड़क चौड़ीकरण का काम शुरू कर दिया गया है.
सड़क के किनारे कुछ पेड़ कटे हुए दिखाई देते हैं. इनमें कुछ छोटे हैं, तो कुछ बहुत बड़े.
नगर निगम की वृक्ष प्राधिकरण समिति के सदस्य डॉक्टर किशोर पाठक ऐसे ही एक कटे हुए पेड़ के बारे में कहते हैं, "यह जो पेड़ आप देख रहे हैं, यह 35 साल पुराना था. यह कम से कम डेढ़ से दो हज़ार लोगों को ऑक्सीजन देने वाला पेड़ था. इस पर अलग-अलग तरह की जैव विविधता निर्भर रहती है."
"छिपकलियां, गेको, कीड़े, तितलियों से लेकर पक्षी तक. ये छिपकलियां आपके खेतों के कीट खा जाती हैं. रात में इसी पेड़ पर ठहरने वाले बगुले दिन भर आपके कूड़ेदानों को साफ करते हैं, वहां के कीड़े और बचा-खुचा खाना खाकर."
सड़क को चार लेन का बनाने के लिए 200 करोड़ रुपये की प्रशासनिक मंज़ूरी मिल चुकी है. कुल 697 पेड़ों को काटा जाना है और इसके बदले दस गुना पेड़ लगाने की बात कही जा रही है. वहीं सड़क चौड़ीकरण के लिए 70 बरगद के पेड़ों का पुनर्रोपण (रिप्लांटेशन) भी किया जाएगा.
डॉक्टर बीएल चव्हाण, डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख हैं.
वह कहते हैं, "जो पेड़ आमतौर पर 10 साल से ज़्यादा पुराने होते हैं, वे हर साल कम से कम एक-दो लोगों के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन देते हैं. यानी हमारे अस्तित्व के लिए पेड़ों का होना बेहद ज़रूरी है. पेड़ों का नष्ट होना ऑक्सीजन की कमी की ओर ले जाता है. जैसे किसी मरीज़ की मौत ऑक्सीजन की कमी से हो सकती है, उसी तरह अगर तुलना करें तो हम भी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं."
'यह इलाका उजाड़ हो जाएगा'
सड़क निर्माण को लेकर छत्रपति संभाजीनगर के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अधीक्षक अभियंता सुंदरदास भगत ने बीबीसी मराठी से कहा, "सड़क को चार लेन बनाने का काम शुरू हो चुका है. ये पेड़ दो विभागों वन विभाग और नगर निगम, की सीमा में आते हैं. वन विभाग के अंतर्गत आने वाले पेड़ों की कटाई की अनुमति मिल चुकी है और वहां काम चल रहा है."
"नगर निगम की सीमा में आने वाले पेड़ों को लेकर आपत्तियां दर्ज की गई थीं. आयुक्त ने इस पर सुनवाई की है. अंतिम आदेश आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी. विभाग की कोशिश है कि ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ बचाए जा सकें. कुछ पेड़ों को रिप्लांट किया जाएगा, जबकि छोटे पेड़ों को काटा जाएगा."
फ़िलहाल इस सड़क के दोनों तरफ बड़ी संख्या में पेड़ हैं, जिनकी वजह से अच्छी-खासी छाया रहती है. इसी छाया में कई छोटे दुकानदार फल, जूस बेचते नज़र आते हैं. हमने इनमें से कुछ विक्रेताओं से बात की.
उनका कहना था कि अगर ये पेड़ काट दिए गए, तो यह हमारे पेट पर लात मारने जैसा होगा, यानी हमारी रोज़ी-रोटी ही खत्म हो जाएगी.
कुछ लोगों ने यह भी कहा कि अगर पेड़ कट गए, तो यह पूरा इलाका बिल्कुल उजाड़ और बेजान हो जाएगा.
रूपेश कलंत्री कहते हैं, "एक तरफ़ हमें नगर निगम की सुनवाई में उलझाकर रखा गया, और दूसरी तरफ़ वन विभाग की अनुमति लेकर चुपचाप पेड़ों की कटाई शुरू कर दी गई. ऐसा कौन-सा विकास है, जिसे छुप-छुपकर करना पड़े?"
"कोई भी पर्यावरण प्रेमी यह नहीं कह रहा कि सड़क नहीं चाहिए. सड़क की ज़रूरत है, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन ज़रूरत को देखते हुए यह भी तो देखा जाना चाहिए कि कितने पेड़ों को बचाया जा सकता है. यहां तो विरासत वाले पेड़ हैं, इनकी उम्र 300-300 साल तक की हो सकती है."
मामला एनजीटी में पहुंचा
सड़क के चौड़ीकरण से जुड़े इस मामले में कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई है या नहीं, यह जानने के लिए एडवोकेट निरंजन देशपांडे ने एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में याचिका दाख़िल की है.
एडवोकेट निरंजन देशपांडे बताते हैं, "जब कोई भी प्लानिंग अथॉरिटी अनुमति के लिए आवेदन करती है, तो सबसे पहले निरीक्षण किया जाता है. आपत्तियां आमंत्रित करनी होती हैं. सार्वजनिक नोटिस देना ज़रूरी होता है. आवेदन के साथ वैकल्पिक योजना भी देनी पड़ती है. हमें शक है कि क्या इन सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है या नहीं. इसी वजह से हम बार-बार आपत्ति दर्ज करा रहे हैं."
जिन पेड़ों को काटा जाना है, उन सभी पर नंबर लगाए जा चुके हैं.
फ़िलहाल जो दो लेन की सड़क मौजूद है, वह काफ़ी संकरी है. वहां अक्सर दुर्घटनाएं होती हैं और ट्रैफिक जाम की समस्या भी बनी रहती है. इसी आधार पर सड़क को चार लेन का बनाने की ज़रूरत बताई जा रही है.
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि उन्हें सड़क से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उनकी शिकायत यह है कि पेड़ों के पुनर्रोपण (रिप्लांटेशन) के जो प्रयोग किए जाते हैं, वे ज़्यादातर सफल नहीं हो पाते.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
जैसे-जैसे ईरान पर अमेरिका-इस्राएल युद्ध का असर बढ़ रहा है, ब्रिक्स देशों पर जवाबी कार्रवाई करने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है. आपसी मतभेदों और अलग-अलग हितों की वजह से इस गुट की कमियां पूरी दुनिया के सामने उजागर हो गई हैं
डॉयचे वैले पर मुरली कृष्णन का लिखा-
तेहरान ने 11 उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले ब्रिक्स समूह से अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है. फिलहाल, भारत इस समूह की अध्यक्षता कर रहा है. ईरान 2024 में इस समूह में शामिल हुआ था.
ईरान एक मजबूत और एकजुट रुख अपनाने की मांग कर रहा है, ताकि वह जिसे ‘सैन्य आक्रामकता' कहता है, उसकी निंदा की जा सके. वह चाहता है कि ब्रिक्स समूह क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाए.
भारत ने अब तक इस संघर्ष में किसी का भी पक्ष लेने से परहेज किया है. उसने संयम बरतने, तनाव कम करने और बातचीत के रास्ते पर लौटने का आग्रह किया है. विश्लेषकों का कहना है कि वाशिंगटन (अमेरिका) इसे ईरान के साथ एकजुटता के बजाय एक रणनीतिक कदम के रूप में देख रहा है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "ब्रिक्स के कुछ सदस्य सीधे तौर पर पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात में शामिल हैं. इसकी वजह से चल रहे संघर्ष पर ब्रिक्स का एक साझा और एकमत रुख बनाने में दिक्कत आ रही है.” उन्होंने कहा, "ब्रिक्स के अध्यक्ष के तौर पर, भारत शेरपा चैनल के माध्यम से सदस्य देशों के बीच बातचीत को बढ़ावा दे रहा है.” उन्होंने इस चैनल का जिक्र करते हुए बताया कि यह सदस्य देशों के बीच बातचीत और तालमेल का मुख्य जरिया है.
ब्रिक्स क्या कर सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की उम्मीदों के बावजूद, ब्रिक्स की प्रतिक्रिया देने की क्षमता सीमित है. ब्रिक्स के सदस्य देशों की संख्या बढ़ने से इनके अंदरूनी मतभेद और गहरे हो गए हैं. यूएई और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश ईरान की भूमिका को लेकर बेहद सतर्क और आशंकित हैं. वहीं, समूह के अन्य देश ऐसा कोई भी रुख अपनाने से बच रहे हैं जिससे यह लगे कि वे अमेरिका के खिलाफ खड़े हैं.
स्वतंत्र शोध मंच ‘मांत्रया' की प्रमुख शांथी मैरिएट डीसूजा ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह गठबंधन बातचीत के एक मंच के तौर पर संभावनाएं रखता है, लेकिन ब्रिक्स से कोई संयुक्त बयान जारी करने की उम्मीद करना शायद अवास्तविक है. किसी भी तरह से हस्तक्षेप करने की तो बात ही छोड़ दें.”
उन्होंने कहा, "ऐसा तब हो सकता है जब युद्ध के हालात सदस्य देशों के अपने हितों के लिए असहनीय हो जाएंगे.” उन्होंने आगे कहा कि यूएई और सऊदी अरब के साथ ईरान की ‘पुरानी और बुनियादी समस्याएं' रही हैं. डीसूजा ने आगे कहा, "चूंकि ईरान खुद इस संघर्ष का एक पक्ष है. इसलिए, किसी एक राय या आम सहमति पर पहुंचना मुश्किल है, भले ही ईरान की अधिकांश कार्रवाइयां अमेरिका-इस्राएल की आक्रामकता के जवाब में रही हों.”
बढ़ रही भारत की दुविधा
डीसूजा ने कहा कि ब्रिक्स के अध्यक्ष के तौर पर, आम सहमति बनाने में भारत की अहम भूमिका है. इससे उसे इस समूह की ओर से बयान जारी करने का अधिकार मिल जाता है. वह बताती हैं, "लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में, इस तरह के किसी भी कदम का उस चीज पर बहुत कम असर होगा जो अमेरिका और इस्राएल, ईरान में हासिल करना चाहते हैं." उन्होंने आगे कहा कि ब्रिक्स एक ‘सैद्धांतिक रुख' भी जाहिर करने में असमर्थ है.
डॉनल्ड ट्रंप कर रहे हैं ब्रिक्स को मजबूत?
अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत रही मीरा शंकर ने डीडब्ल्यू को बताया कि मौजूदा स्थिति में आम सहमति वाले किसी बयान की संभावना कम ही लगती है. उन्होंने कहा, "ब्रिक्स एक जैसी सोच वाले देशों का गठबंधन नहीं है. यह एक ढीला-ढाला समूह है जिसका एजेंडा काफी व्यापक है. इसमें व्यापार, विकास, आर्थिक सहयोग और बहुपक्षवाद को मजबूत करना शामिल है.”
शंकर ने कहा कि ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर इस गुट के सदस्य देश ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, इथियोपिया, इंडोनेशिया और ईरान मिलकर काम करना फायदेमंद मानते हैं, भले ही वे दूसरे मुद्दों पर सहमत न हों.
भारत का संतुलन बनाने का प्रयास
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की. वहां के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने भारतीय समकक्ष एस. जयशंकर के साथ कई बार फोन पर बात की. इन बातचीत का मकसद स्थिरता के लिए ब्रिक्स को सक्रिय करना और अमेरिका-इस्राएल के हमलों की निंदा करना था.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर यूरोपियन स्टडीज के प्रोफेसर गुलशन सचदेवा ने डीडब्ल्यू को बताया, "ब्रिक्स की अध्यक्षता होने के बावजूद, नई दिल्ली ने ईरान पर अमेरिका-इस्राएल युद्ध के मामले में काफी हद तक चुप्पी साधे रखी है. यहां तक कि ब्रिक्स के एक सदस्य देश के राष्ट्राध्यक्ष की हत्या के बाद भी, जो कि साफ तौर पर अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन था.”
उन्होंने कहा, "स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावी रूप से बंद होने के साथ-साथ यह फैलता हुआ युद्ध नई दिल्ली को अपनी स्थिति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर भारत का ऊर्जा आयात काफी ज्यादा निर्भर है.” उन्होंने इस रणनीतिक जलमार्ग में शिपिंग (जहाजों की आवाजाही) में आ रही बाधा के संदर्भ में यह बात कही.
भारत, ब्राजील और चीन पर रूस के साथ कारोबार बंद करने का भारी दबाव
सचदेवा ने इशारा किया कि तेहरान ने भारतीय झंडे वाले जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की इजाजत देना शुरू कर दिया है, लेकिन यह हर मामले में अलग-अलग आधार पर किया जा रहा है. हालांकि, उसे बदले में कुछ राजनीतिक संकेत मिलने की उम्मीद हो सकती है. सचदेवा ने कहा, "ईरान को ब्रिक्स से एक मजबूत बयान की उम्मीद हो सकती है, लेकिन भारत को सऊदी अरब और यूएई जैसे दूसरे क्षेत्रीय सदस्यों की स्थितियों को लेकर भी संतुलन बनाए रखना होगा.”
इन दोनों देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं और संघर्ष के दौरान इन पर ईरान ने हमले भी किए हैं. उन्होंने कहा, "काफी हद तक, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या वह अपने एक सदस्य (ईरान) पर हुए हमले के खिलाफ समूह को सक्रिय रूप से लामबंद करता है और तनाव कम करने के लिए जोर देता है या फिर वह ऐसे सामान्य औपचारिक बैठकों तक ही सीमित रहता है जिनका कोई खास नतीजा नहीं निकलता.”
आपसी हितों के टकराव से बंटा एक गुट
इस संकट ने ब्रिक्स के भीतर की गहरी दरारों को उजागर कर दिया है, जिसमें सदस्य देश अलग-अलग खेमों में बंटे हुए हैं. भारत ने विशेष रूप से अमेरिका-इस्राएल के हमलों की आलोचना करने से परहेज किया है.
पूर्व भारतीय राजनयिक अजय बिसारिया ने डीडब्ल्यू को बताया कि मध्य-पूर्व के संकट ने ‘विस्तारित ब्रिक्स के भीतर के राजनीतिक विरोधाभासों' को उजागर कर दिया है. उन्होंने कहा, "ब्रिक्स के सदस्य देश एक सक्रिय सैन्य संघर्ष में एक-दूसरे के आमने-सामने हैं, जिसमें ईरान, सऊदी अरब और यूएई के बुनियादी ढांचों पर हमले कर रहा है. अध्यक्ष के तौर पर भारत ब्रिक्स को एक ‘गैर-पश्चिमी' आर्थिक समूह के रूप में देखता है, न कि एक ‘पश्चिम-विरोधी' सुरक्षा गठबंधन के रूप में.”
वह आगे कहते हैं, "ब्रिक्स की ओर से एक साझा बयान जारी न कर पाना इस गुट की भू-राजनीतिक सीमाओं को दिखाता है. इससे यह भी पता चलता है कि यह समूह ज्यादातर आर्थिक मुद्दों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर ही ध्यान देता है.”
बिसारिया ने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स के अध्यक्ष के तौर पर भारत संभावित रूप से एक अधिक सक्रिय और प्रभावशाली रुख अपना सकता है. उन्होंने कहा, "भारत एक अध्यक्षीय बयान जारी कर सकता है, जिसमें इस हमले और ब्रिक्स के एक सदस्य देश के साथ चल रहे युद्ध पर गहरी चिंता व्यक्त की जा सकती है. यह समूह ‘बातचीत और कूटनीति' का रास्ता साफ करने के लिए युद्ध को तत्काल रोकने की अपील कर सकता है.”
बिसारिया ने कहा कि इससे भी अहम बात यह है कि यह संकट भारत को एक ऐसा मौका भी देता है कि वह शायद ब्रिक्स के दूसरे तटस्थ सदस्यों के साथ मिलकर शांति-दूत की भूमिका निभा सके. डीसूजा का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब ब्रिक्स ने इस तरह की चुनौती का सामना किया है. यूक्रेन युद्ध ने पहले ही इस संगठन की आम सहमति बनाने की सीमित क्षमता को उजागर कर दिया है. उन्होंने कहा, "आज की दुनिया में, बहुपक्षीय मंचों और क्षेत्रीय संगठनों का देशों की कार्रवाइयों पर नियंत्रण या असर कम होता दिख रहा है.”.
-डॉ. संजय शुक्ला
दुनिया इन दिनों अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की त्रासदी से जूझ रहा है तो वहीं दूसरी ओर तमाम इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनल्स से लेकर सोशल मीडिया पर इस जंग के बारे में अतिरंजित और झूठी खबरें परोसी जा रही है। आलम यह है कि एआई के जरिए पुराने युद्ध के वीडियो को मौजूदा जंग का वीडियो बताकर इसे सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है।अनेक न्यूज चैनल्स के महिला एंकर ' लेडी सिंघम ' के रूप में चीख-चीखकर युद्ध का आंखों देखा हाल इस तरह सुना रहे थे मानो वे खुद युद्ध के अग्रिम पंक्ति में हों। युद्ध की वजह से एलपीजी सिलेंडर के किल्लत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है फलस्वरूप लोगों के बीच सिलेंडर के लिए बदहवासी का आलम है।अनेक खबरिया चैनलों पर इस खाड़ी युद्ध पर भारत की भूमिका को लेकर ऐसे डिबेट प्रसारित किए जा रहे हैं जिससे देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो रहा है। पहले भी भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर ऐसे कार्यक्रम प्रसारित किए गए हैं जिसमें पैनलिस्ट के तौर पर शामिल नेता और पत्रकार अपने-अपने एजेंडे को बढ़ाते देखे गए। गौरतलब है कि युद्ध, आपदा और अशांति के दौरान सबसे बड़ी जवाबदेही उस देश के मीडिया की होती है जो देशवासियों को विपदा से जुड़े निष्पक्ष, सच और सकारात्मक खबरें देती है लेकिन भारत के खबरिया चैनलों में इस जवाबदेही का लगातार अभाव परिलक्षित हो रहा है। बीते दौर में देश में कुछ ऐसी सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं हुई है है जिसके लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही जवाबदेह है। युद्ध, आपदा या धार्मिक हिंसा के दौरान टीवी चैनलों में ‘प्राइम टाइम’ के नाम पर ऐसे डिबेट प्रसारित किए जा रहे हैं जिससे दर्शकों के बीच बेचैनी, नफरत और गुस्सा भडक़ रहा है। दरअसल इसके पीछे नेशनल टीवी चैनलों की टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट ‘टीआरपी’ की भूख है। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि टीवी चैनलों के ‘टीआरपी’ की भूख की शांति का रसद-पानी युद्ध, आपदा और धर्म ही है।
गौरतलब है कि वैश्विक व्यापार ,आर्थिक उदारीकरण और इंटरनेट क्रांति के बाद देश में मीडिया का व्यापक विस्तार हुआ है जिसके चलते लोगों के पास सूचना और समाचार के अनेक विकल्प मौजूद हैं।आज देश में रेडियो, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इंटरनेट , डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया समाचार और मनोरंजन के माध्यम हैं। विचारणीय यह कि भले ही मीडिया जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है लेकिन अब इसकी दुश्वारियां भी सामने आने लगी है फलस्वरूप देश में सांप्रदायिक नफरत और लोगों में अविश्वास की भावना घर कर रही है। टेलीविजन न्यूज चैनल्स की बात करें तो सबसे पहले और सबसे तेज खबरें ब्रेक करने के होड़ में कई बाद फेक न्यूज भी लोगों के पास पहुंच रहा है। वर्तमान परिदृश्य में आम लोगों के निशाने पर मीडिया की निष्पक्षता और खबरों की सत्यता है जिसके चलते अब मीडिया को अनेक उपमाओं से नवाजा जा रहा है। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भले ही अतीत में पाठकों और दर्शकों के पास समाचारों के साधन सीमित थे लेकिन तब लोगों का भरोसा परंपरागत मीडिया पर ही था। आर्थिक उदारीकरण और सूचना क्रांति के वर्तमान दौर में मीडिया की भीड़ के बावजूद लोगों का भरोसा इस भीड़ में गुम है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वातंत्र्योत्तर भारत में पत्रकारिता की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है लेकिन आज अहम सवाल यह कि इस स्तंभ का साख क्यों कमजोर हो रहा है? इसका उत्तर पत्रकारिता से जुड़े लोगों को ही ढूंढना होगा।
आज देश में सैकड़ों टीवी न्यूज चैनल हैं लेकिन राजनीतिक स्वार्थ और दबाव के चलते ये चैनल सत्ता और विपक्ष की गोद में बैठने लगे हैं फलस्वरूप लोगों का टीवी न्यूज चैनलों से मोहभंग होने लगा है। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सोशल मीडिया और खबरिया चैनलों के विस्तार के बावजूद लोगों का भरोसा आज भी अखबारों और पत्र -पत्रिकाओं के प्रति है। हालिया खाड़ी युद्ध की बात करें तो न्यूज चैनल्स और सोशल मीडिया में इस जंग के बारे में अनेक एआई जनरेटेड और एडिटेड वीडियो प्रसारित किए जा रहे हैं जिसकी सत्यता की पुष्टि नहीं है। सोशल मीडिया यूजर्स भी ऐसे विडियो और समाचारों की सत्यता जाने इसे आगे बढ़ा रहे हैं। बानगी यह कि अनेक सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स और डिजिटल मीडिया में ईरानी हमले में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मारे जाने की खबरें बड़ी तेजी से फैलने लगी। इंटरनेट के इन खबरों को अफवाह बताते हुए नेतन्याहू के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से एक विडियो सामने आया जिसमें वे एक कैफे में लोगों के साथ कॉफी पीते हुए दिखाई देते हैं। दूसरी खबर ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के अमेरिकी-इजरायली हमले में गंभीर रूप से जख्मी होने की आई है जो फेक साबित हुई। यूएई में 19 भारतीयों सहित 35 लोगों की गिरफ्तारी हुई है, इन पर सोशल मीडिया पर युद्ध से संबंधित भ्रामक और फर्जी वीडियो शेयर करने का आरोप है। अलबत्ता तीन सप्ताह से चल रहे इस युद्ध में जीत-हार किसी की नहीं हुई है लेकिन युद्धरत देश अफवाहों के जरिए ही इस जंग को जीतने की होड़ में है।
खबरिया चैनलों पर युद्ध या सांप्रदायिक तनाव के दौरान बेचैनी फैलाने वाले खबरें और डिबेट प्रसारित करने का यह कोई पहला वाकया नहीं है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद चले भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान टेलीविजन न्यूज चैनल्स के स्टुडियो मानो जंग के मैदान में बदल गए थे। महज 90 घंटे चले इस युद्ध के दौरान न्यूज चैनल जंग को लेकर लगातार झूठी और अतिरंजित खबरें प्रसारित करते रहे। एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल के एंकर ने 8 म?ई की रात रजौरी सेक्टर में फिदायीन हमले की झूठी खबर ब्रेकिंग के तौर पर प्रसारित कर दिया। दूसरी ओर कुछ चैनल पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ का सरेंडर और सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर के गिरफ्तारी का दावा करते रहे। कुछ टीवी चैनलों ने भारतीय सेना के कराची और इस्लामाबाद में घुसने का ब्रेकिंग न्यूज भी चला दिया। युद्ध के चार दिनों के दौरान चैनल्स के स्टुडियो में भारत-पाक के रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों की लगातार बहस चलती रही बल्कि इस दौरान युद्ध के सायरन भी बजते रहे।खबरिया चैनल अपने प्रसारण के दौरान सेना से जुड़ी संवेदनशील सूचनाओं और सैन्य क्षमताओं को सार्वजनिक करने से भी नहीं चूक रहे थे। न्यूज़ चैनलों में रूस-यूक्रेनन युद्ध के शुरूआत में ही इसे तृतीय विश्वयुद्ध का आगाज बता दिया गया।
जर्मनी में कई माता-पिता अब एक लडक़ी को जन्म देना चाहते हैं। कई तय धारणाएं इसकी वजह हो सकती हैं, जैसे कि यह मानना कि लड़कियां शांत और लडक़े शरारती होते हैं। क्या ऐसी सोच लैंगिक बराबरी की बहस में हमें पीछे नहीं खींच रही है?
डॉयचे वैले पर सोनम मिश्रा का लिखा-
एक गुब्बारे में से नीले या गुलाबी रंग के रंग-बिरंगे कागज के टुकड़े गिरते हैं और माता-पिता बनने वाला जोड़ा खुशी से झूम उठता है। देखा जाए तो सोशल-मीडिया ऐसे वीडियोज से भर पड़ा है, जिसमें माता-पिता अपने होने वाले बच्चे का जेंडर सार्वजनिक तौर पर दिखाते हैं। इस दौरान कभी खुशी के आंसू बहते हैं तो कभी निराशा भी दिखती है, अगर उम्मीद के मुताबिक बच्चे का लिंग न हो। और ज्यादातर ऐसा तब देखने को मिलता है, जब गुब्बारे में से नीले रंग के कागज के टुकड़े गिरते हैं।
इस निराशा के लिए अब एक शब्द भी है ‘जेंडर डिसअपॉइंटमेंट' यानी बच्चे के लिंग को लेकर निराशा। टिकटॉक समेत कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस हैशटैग से कई ऐसी वीडियोज है, जो इस तरह की निराशा दिखाते हैं। इंटरनेट पर माता-पिता के कई समूहों में भी कुछ महिलाएं बताती हैं कि वे हमेशा से एक लडक़ी चाहती थी, लेकिन अब इस बात से जूझ रही हैं कि उनका होने वाला बच्चा एक लडक़ा है।
क्या है इस निराशा की वजह?
जर्मनी स्थित टेक्निकल यूनिवर्सिटी ड्रेसडेन में क्लिनिकल चाइल्ड एंड यूथ साइकॉलजी की प्रोफेसर और शोधकर्ता, आना-लेना सीटलो कहती हैं कि आज के समय में बहुत-से माता-पिता के लिए सिर्फ इतना काफी नहीं है कि बच्चा स्वस्थ हो। पहले की तुलना में आजकल लोग कम बच्चे पैदा करते हैं इसलिए माता-पिता बनने को लेकर उनकी उम्मीदें बहुत ज्यादा होती हैं और बच्चे से भी कई तरह की अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं। वह मानती हैं, ‘माता-पिता अपने बच्चे के लिए सब कुछ बेहतरीन ही चाहते हैं लेकिन करीब से देखें तो वह यह भी चाहते हैं कि उनका बच्चा उनकी जिंदगी की कल्पना या उम्मीद के अनुसार हो।’
कुछ पीढिय़ों पहले तक माता-पिता एक लडक़ा चाहते थे, जो उनके खेत-खलिहान का उत्तराधिकारी बन सके लेकिन अब कई अध्ययन संकेत दे रहे हैं कि पश्चिमी समाजों में लड़कियों को प्राथमिकता दी जा रही है। शोधकर्ता सीटलो कहती हैं कि कई लैंगिक विचार इसमें एक अहम भूमिका निभाते हैं। जैसे एक धारणा के अनुसार अकसर ऐसा माना जाता है कि लड़कियां आज्ञाकारी, संवेदनशील और मेहनती होती हैं, जबकि लडक़े उग्र, शैतान और पढ़ाई में कमजोर होते हैं।
यह धारणाएं कितनी सच?
कील विश्वविद्यालय की जेंडर-शोधकर्ता टीना श्पीस इन धारणाओं को आलोचनात्मक नजरिए से देखती हैं। वह सवाल करती हैं, ‘असल में इसके क्या मायने हैं, जब हमारे दिमाग में लड़कियों और लडक़ों की ऐसी भूमिका तय होती हैं?’ उनके अनुसार यह बहस हमें काफी पीछे खींच ले जाती है।
वह कहती हैं, ‘मैं लिंग-भूमिकाओं की फिर से पारंपरिक रूप में वापसी देख रही हूं और सोशल मीडिया इसे और मजबूत कर रहा है।’ कई अन्य विशेषज्ञ भी इसी तरह की जटिल और संतुलित तस्वीर की ओर इशारा करते हैं, चाहे वह शिक्षा में सफलता की बात हो या बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने की या फिर मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा हो।
करियर के मामले में कौन है आगे?
डॉर्टमुंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी की शिक्षा विशेषज्ञ, रिकार्डा श्टाइनमायर कहती हैं कि लडक़ों की तुलना में अब लड़कियां अधिक पढ़ाई करती हैं। कई अलग-अलग अध्यनों में सामने आया है कि पढऩे के मामले में आमतौर पर लड़कियां लडक़ों से आगे रहती हैं, जबकि गणित जैसे विषय में लडक़े आगे रहते हैं। उन्होंने आगे कहा, ‘स्कूल में मिले अंकों के हिसाब से देखा जाए, तो यह अंतर ज्यादा बड़ा भी नहीं है।’
उन्होंने आगे कहा, ‘लड़कियों को सभी विषयों में बेहतर अंक मिलते हैं, दुनिया भर में ऐसा ही देखा गया है,’ लड़कियों के समान ही लडक़ों का प्रदर्शन होने के बावजूद भी उन्हे उच्चतर स्कूल के लिए कम सिफारिश मिलती है। उन्हें कई बार कक्षा दोहरानी पड़ती है और वह पढ़ाई भी पहले छोड़ देते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, इसका एक कारण लडक़ों का व्यवहार भी हो सकता है। उनके अनुसार, ‘लड़कियां पढ़ाई के लिए ज्यादा प्रेरित होती हैं, अधिक व्यवस्थित रहती हैं और उनका व्यवहार भी शांत होता है।’
वह बताती हैं कि अब धीरे-धीरे अधिक युवा महिलाएं यूनिवर्सिटी में पढ़ाई शुरू करने लगी हैं, लेकिन जब बात पीएचडी करने की आती है तो महिलाओं और पुरुषों का अनुपात बदल जाता है। पुरुष अधिक पीएचडी करते हैं और कंपनियों में भी उच्च पदों पर अधिकतर पुरुष ही नजर आते हैं।
जर्मनी के सांख्यिकी विभाग के अनुसार, आज भी महिलाएं औसतन प्रति घंटे पुरुषों से कम कमाती हैं। इसका एक कारण यह भी है कि महिलाएं अकसर कम वेतन वाली नौकरियों में काम करती हैं या पार्ट-टाइम काम करती हैं ताकि वह नौकरी के साथ-साथ बच्चों की देखभाल कर सकें और परिवार के बुज़ुर्गों का भी ख्याल रख सकें।
बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल के मामले में कौन आगे?
जर्मनी का वृद्धावस्था संबंधी अनुसंधान केंद्र (डीजेडए) नियमित रूप से 40 से 65 साल के लोगों से उनके जीवन के बारे में सवाल पूछता है। इन सवालों में उनकी देखभाल से जुड़े सवाल भी पूछे जाते हैं। हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा उन लोगों की देखभाल और मदद करती हैं, जिनकी सेहत ठीक नहीं होती। आज के समय में यह अंतर कितना कम हुआ है यह तो 2026 में होने वाले नए सर्वेक्षण से ही पता चल पाएगा।
अगर किसी की बेटी है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह जरूर अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल करेगी। अध्ययन के अनुसार, ‘बुढ़ापे में अपने बच्चों से देखभाल और मदद मिलना कोई पक्की बात नहीं है, चाहे बच्चा बेटा हो या बेटी।’ 2023 के एक सर्वेक्षण में पता चला था कि जिन लोगों के माता-पिता को देखभाल की जरूरत है, उनमें से सिर्फ 47।5 फीसदी लोग ही वास्तव में उनका ख्याल रखते हैं।
डीजेडए के अनुसार, आगे चलकर बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल करेंगे या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करता है। अध्ययनों से पता चलता है कि इसकी संभावना तब अधिक होती है, जब माता-पिता ने पहले अपने बच्चों की भी मदद की हो, जैसे पोते-पोतियों की देखभाल करने में। इसके अलावा भावनात्मक संबंध यानी प्यार-लगाव और कर्तव्य की भावना भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें से कुछ बातों को माता-पिता का व्यवहार प्रभावित करता हैं, चाहे उनके पास बेटा हो या बेटी इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता है।
-फ्रैंक गार्डनर
ज़्यादातर लोग, हालांकि सभी नहीं, चाहते हैं कि यह युद्ध जितनी जल्दी हो सके ख़त्म हो जाए।
लेकिन सवाल यह है कि किन शर्तों पर?
यहीं से अलग-अलग पक्षों की राय अलग-अलग बंट जाती है।
संयुक्त राज्य अमेरिका
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के युद्ध का मकसद अब तक पूरी तरह साफ़ नहीं है। कभी ऐसा लगता है कि उनका लक्ष्य सिर्फ ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना है, तो कभी वह अमेरिका और इसराइल की सभी मांगों के आगे ईरान के पूरी तरह झुक जाने की बात करते दिखते हैं, और कभी-कभी संकेत मिलते हैं कि वह इस्लामिक रिपब्लिक की पूरी व्यवस्था के ढह जाने तक की उम्मीद रखते हैं।
अब तक न तो ईरान ने आत्मसमर्पण किया है और न ही उसकी सत्ता व्यवस्था ढही है। लेकिन 16 दिनों तक चली लगातार और बेहद सटीक बमबारी ने उसकी सैन्य ताकत को गंभीर रूप से कमज़ोर कर दिया है।
फरवरी में जिनेवा में ओमान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच जो अप्रत्यक्ष बातचीत हुई थी, उसमें परमाणु मुद्दे पर कुछ प्रगति भी देखने को मिली थी। ओमान के अधिकारियों का कहना है कि ईरान बड़े समझौते करने के लिए तैयार था, जिससे यह भरोसा मिलता कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है।
हालांकि ईरान एक बात के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था, और वह बात थी अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को सीमित या बंद करने पर बातचीत करना, और न ही वह क्षेत्र में अपने सहयोगी सशस्त्र गुटों, जैसे यमन के हूती या लेबनान के हिज़्बुल्लाह, को समर्थन देने के मुद्दे पर चर्चा करना चाहता था।
अमेरिका और उसके कई सहयोगियों की आदर्श कल्पना यह है कि यह युद्ध आयतुल्लाओं के शासन के पतन के साथ ख़त्म हो और उसकी जगह जल्दी ही एक शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार आ जाए, जो न तो अपने लोगों के लिए और न ही अपने पड़ोसियों के लिए ख़तरा बने। लेकिन अब (सोमवार) तक ऐसा होता हुआ कहीं दिखाई नहीं देता।
अमेरिका के लिए इसके बाद सबसे अच्छा नतीजा यह हो सकता है कि बुरी तरह कमज़ोर हो चुका इस्लामिक रिपब्लिक (ईरान) अपना रवैया बदले, अपने नागरिकों के साथ ज़्यादतियां बंद करे और क्षेत्र में चरमपंथी मिलिशिया को समर्थन देना बंद करे। लेकिन यह भी मुश्किल लगता है, खासकर तब जब ईरान ने अपने नए सर्वोच्च नेता के रूप में मोज़तबा ख़ामेनेई को चुना है, जो दिवंगत कट्टरपंथी नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के बेटे हैं और जिनसे अमेरिका के और ज़्यादा नाराज़ होने की संभावना है।
दुनिया भर में तेल की बढ़ती कीमतें, होर्मुज़ जलडमरूमध्य का आंशिक रूप से बाधित होना, और अमेरिका के भीतर यह चिंता कि देश एक और महंगे मध्य-पूर्वी युद्ध में फंसता जा रहा है, इन सब वजहों से राष्ट्रपति ट्रंप पर इस युद्ध को रोकने का दबाव बढ़ता जाएगा। लेकिन अगर तेहरान की सत्ता व्यवस्था बिना किसी पछतावे और पहले जैसी सख़्ती के साथ बची रहती है, तो ट्रंप के लिए इस युद्ध को नाकामी के अलावा किसी और रूप में पेश करना बेहद मुश्किल होगा।
पश्चिम बंगाल की मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि वह ‘समानता, भाईचारा और भेदभाव रहित समाज’के लिए काम करेंगी।
डॉयचे वैले पर मुरली कृष्णन का लिखा-
मेनका गुरुस्वामी के राज्यसभा सदस्य चुने जाने से भारतीय राजनीति में एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के प्रतिनिधित्व को एक नई दिशा मिली है। अपनी खुली क्वीयर पहचान के लिए जानी जाने वाली गुरुस्वामी का संसद के उच्च सदन तक पहुंचना देश की लोकतांत्रिक राजनीति में बढ़ती समानता और स्वीकार्यता को दर्शाता है।
गुरुस्वामी एक संवैधानिक वकील हैं, जिन्होंने अपनी शिक्षा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी जैसे प्रसिद्ध संस्थानों से प्राप्त की हैं। वह काफी समय से संविधान, लोकतांत्रिक सिद्धांतों और नागरिक अधिकारों का समर्थन करने वाली जानी-मानी आवाज रही हैं।
51 साल की गुरुस्वामी को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने चुनावी मैदान में उतारा था। टीएमसी हमेशा से एक ऐसी पार्टी रही है जिसने राजनीति में महिला प्रतिनिधित्व पर जोर दिया है। टीएमसी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने डीडब्ल्यू को बताया कि ‘गुरुस्वामी के चुने जाने के बाद राज्यसभा में पार्टी के कुल 13 में से पांच सदस्य अब महिलाएं हैं।’
उन्होंने यह भी बताया कि गुरुस्वामी का चुनाव टीएमसी की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। इस रणनीति के अनुसार वह पढ़े-लिखे और संविधान को समझने वाली आवाजों को उच्च सदन में भेजना चाहते हैं, ताकी वे देश भर में विपक्ष की दलीलें स्पष्ट रूप से रख सकें।
मालविका राजकोटिया एक भारतीय लेखक और फैमिली लॉ की विशेषज्ञ हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, ‘गुरुस्वामी के चुने जाने से दो बातें साफ होती हैं। पहला है एलजीबीटीक्यू दृष्टिकोण और दूसरा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है टीएमसी का प्रतिनिधित्व करने वाली नारी शक्ति। वह निडर, बुद्धिमान और प्रेरणादायक हैं।’
साथ ही वह यह भी कहती हैं कि ‘यह नारी शक्ति उस जहरीली और अकड़ दिखाने वाली मर्दाना प्रवृत्ति का भी विरोध करती हैं, जो आज की राजनीति में आम बात है।’
गुरुस्वामी ने कहा कि संविधान के ‘समानता, भाईचारा और भेदभाव रहित व्यवहार’ जैसे मूल्य उनके काम का आधार रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह राज्यसभा में भी पश्चिम बंगाल के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हुए इन्हीं आदर्शों को आगे बढ़ाना चाहती हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार
भारत की विधानसभाओं में इससे पहले भी खुले तौर पर क्वीयर राजनेता रह चुके हैं। सार्वजनिक पद के लिए चुनी जाने वाली शबनम मौसी खुले तौर पहली ऐसी समलैंगिक व्यक्ति बनी, जब उन्होंने 1998 में मध्य प्रदेश के सोहागपुर से राज्य विधानसभा में एक सीट जीती।
इसके बाद छत्तीसगढ़ और दिल्ली में राज्य और स्थानीय स्तर पर भी ऐसी पहल देखी गई। इन्हें बड़ी उपलब्धि भी माना गया, लेकिन सामाजिक सोच में रुकावटों की वजह से यह बदलाव अब भी क्षेत्रीय स्तर तक ही सीमित है।
आज तक कोई भी समलैंगिक व्यक्ति किसी भी स्तर पर भारतीय संसद का हिस्सा नहीं बन पाया है। पर कुछ लोग हैं, जो लंबे राजनीतिक करियर बनाने में सफल हुए हैं। गुरुस्वामी के चुनाव ने इस बाधा को अब तोड़ तो दिया है, लेकिन वह राजनीति के इस संघर्ष से भलीभांति वाकिफ हैं।
गुरुस्वामी और उनकी साथी अरुंधती काटजू उस अहम मुकदमे का हिस्सा थे, जिसने सुप्रीम कोर्ट को 2018 में 158 साल पुराना कानून रद्द करने को राजी किया। यह कानून सहमति से बने समलैंगिक रिश्तों को अपराध बताता था। इस कानून का रद्द होना एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लिए ऐतिहासिक जीत थी। एलजीबीटीक्यू अधिकार कार्यकर्ता विश्वा स्कूलवाला के मुताबिक गुरुस्वामी का चुना जाना एक अच्छा संकेत है।
-राहुल कुमार सिंह
कुछ वर्ष पहले ‘छत्तीसगढ़ के शक्तिपीठ‘ पुस्तिका छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल द्वारा, आलेख डॉ. मन्नूलाल यदु, प्रकाशित की गई थी। अपनी सीमाओं के बावजूद पुस्तिका में आई जानकारी महत्वपूर्ण है, समय-समय पर तलाशी जाती है। पुस्तिका की मुख्य जानकारियां यहां सुलभ कराने के लिए प्रस्तुत है।
पुस्तिका के आरंभिक परिचय में सूची इस प्रकार है-
छत्तीसगढ़ की देवी शक्तियाँ- महामाया, महामाई, मनकादाई, बमलेश्वरी, सम्लेश्वरी, दन्तेश्वरी, बूढ़ीमाता, घूमामाता, मावलीमाता, तुलजा भवानी, खल्लारी माता, बंजारी माता, बगदेई माता, सरई श्रृंगारिणी, चंडी दाई, डिंडेश्वरी, सरंगढिऩ, सरगुजहिनदाई, मरही माता, चन्द्रसेनी, नाथन दाई, अम्बिकादाई, कुंवर अछरिया दाई, अष्टभुजी माता (अड़भार), कोसगईदाई, मंड़वारानी, सर्वमंगला, पतईदाई, लखनी देवी, शभरीनदाई, करमामाता, राजिम तेलीन दाई, कालीमाता, जरहीमाता, माताचैरा, गरवाईन दाई, बैंजिन डोकरी, सती चैरा, सतबहिनिया दाई, बिलाईमाता, कंकाली माता, गंगाजमुना देवी (झलमला), संतोषी माता, गायत्री माता, बीसो भवानी देवीदाई (लिमतरा), शंखनी, डंकनी, तुरतुरिया दाई, शारदा माता (परसदा), पद्मसेनी (पद्गपुर), कोसलाई (सरसीवां), घाठादुवारिन समलाई, सतिमाई (रायगढ़), लालादाई (कुटरा-जांजगीर), मनकेशरी देवी (तरौद अकलतरा)। छत्तीसगढ़ में शक्तिपीठ के रूप में माँ बम्लेश्वरी, शीतला, महामाया, दंतेश्वरी, सम्लेश्वरी, खल्लारी माता, बिलाईमाता, चंद्रहासिनी, गंगामैय्या, सीयादेवी, बजारी माता व कंकाली रुप मान्यता है। इन प्राचीन शक्तिपीठों में माँ बम्लेश्वरी प्रमुख है।
साथ ही//मां बम्लेश्वरी देवी, डोंगरगढ़//मां दंतेश्वरी देवी, दंतेवाड़ा (बस्तर)//मां महामाया देवी, रतनपुर//मां महामाया देवी, रायपुर//छत्तीसगढ़ के अन्य शक्तिपीठ एवं प्रमुख देवियों का उल्लेख है। मां बम्लेश्वरी देवी, डोंगरगढ़ के साथ मां रणचंडी देवी (टोनही बमलाई) और इस क्षेत्र के दंतेश्वरी मंदिर का उल्लेख है। मां दंतेश्वरी देवी, दंतेवाड़ा के साथ फागुन मड़ई की जानकारी है। मां महामाया देवी, रतनपुर के साथ धार्मिक, ऐतिहासिक जानकारियां हैं। इसी प्रकार मां महामाया देवी, रायपुर के साथ बंजारी धाम, कंकाली माता मंदिर और शीतला माता मंदिर की जानकारी है।
छत्तीसगढ़ के अन्य शक्तिपीठ एवं प्रमुख देवियां शीर्षक अंतर्गत जानकारी संक्षेप में इस प्रकार है-
महासमुंद से 10 किलोमीटर उत्तर में आदि शक्ति मां चंडी सिद्ध शक्ति पीठ, बिरकोना में है। चन्दरपुर की चंद्रहासिनी देवी महानदी और मांद (पुस्तिका में केलो) नदी के संगम पर स्थित है। सरगुजा, रमकोला के पास पिंगला नदी के पास झरिया देवी हैं। अंबिकापुर में महामाया मंदिर है। बागबहरा के पास खल्लारी (प्राचीन खल्वाटिका) ग्राम में खल्लारी माता का मंदिर है, यहीं लखेश्वरी गुड़ी भी है।
सूखी सर्दी और बढ़ती गर्मी ने कश्मीर की जीवन रेखा
झेलम नदी को ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँचा दिया
विशेषज्ञों के अनुसार, घाटी के कुछ इलाकों में धान जैसी अत्यधिक पानी की माँग करने वाली फसलों से धीरे-धीरे दूर होना चाहिए
-इरफान अमीन मलिक
12 मार्च (डाउन टू अर्थ)
कश्मीर घाटी दशकों में सबसे असामान्य शुरुआती वसंत देख रही है। इसकी जीवनरेखा झेलम नदी शून्य-गेज स्तर से नीचे चली गई है, जबकि तापमान रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँच गया है।
आधिकारिक बाढ़ नियंत्रण डेटा के अनुसार, दक्षिण कश्मीर के संगम में झेलम का जल स्तर 5 मार्च को माइनस 0.86 फीट तक गिर गया। यह शुरुआती मार्च में बहुत दुर्लभ है, क्योंकि इस समय बर्फ पिघलने से आमतौर पर जल स्तर बढ़ता है।
इसी समय, कश्मीर भर में तापमान तेजी से बढ़ा है। उदाहरण के लिए, पिछले सप्ताह श्रीनगर में अधिकतम तापमान 24.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से 11.7 डिग्री अधिक है। वहीं, स्की रिसॉर्ट गुलमर्ग में 17.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ, जो सामान्य से 13.7 डिग्री अधिक है—मार्च में अब तक का सबसे ऊँचा तापमान।
कश्मीर के स्वतंत्र मौसम पूर्वानुमानकर्ता फैजान आरिफ ने कहा कि यह पहली बार है जब गुलमर्ग, जिसे भारत का “शीतकालीन चमत्कार” कहा जाता है, ने मार्च की पहली सप्ताह में इतनी गर्मी देखी है।
वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, कम बर्फबारी, लंबी सूखी अवधि और असामान्य गर्मी ने आने वाले महीनों में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ा दी है, खासकर कश्मीर के धान की खेती के मौसम के लिए।
गर्मी के साथ एक परेशान करने वाली बात यह है कि वर्षा की कमी रही है।
जम्मू-कश्मीर ने अब सातवीं लगातार सूखी सर्दी देखी है। आरिफ के अनुसार, दिसंबर से फरवरी के बीच क्षेत्र में 100.6 मिलीमीटर वर्षा हुई, जबकि सामान्य 284.9 मिलीमीटर है—लगभग 65% की कमी।
फरवरी में ही पूरे केंद्रशासित प्रदेश में वर्षा के रिकॉर्ड टूट गए। श्रीनगर में मौसम रिकॉर्ड के अनुसार, शहर को केवल 5.3 मिलीमीटर वर्षा मिली, जो पिछले एक सदी में सबसे सूखे फरवरी में से एक है।
इस कमी का असर अब घाटी की नदियों पर दिख रहा है।
आरिफ ने कहा, “पहले सर्दी या शुरुआती वसंत में गर्मी आने पर झेलम का जल स्तर बर्फ पिघलने से 5 से 8 फीट तक बढ़ जाता था।” इस साल नदी ने कमजोर प्रतिक्रिया दी। गर्मी की शुरुआत में जल स्तर थोड़ा बढ़ा, लेकिन जल्द ही फिर से नकारात्मक आंकड़ों में चला गया। यह संकेत है कि पहाड़ों में बहुत कम बर्फ बची है जो पिघलकर नदी को पानी दे सके।
श्रीनगर में भारत मौसम विज्ञान विभाग के निदेशक मुख्तार अहमद ने डाउन टू अर्थ (DTE) को बताया कि जनवरी और फरवरी में कश्मीर में लगभग 66% वर्षा की कमी रही। उन्होंने कहा कि अगर मार्च के बाद भी बर्फबारी या बारिश होती है, तो भी जमा हुई कमी को पूरा करना मुश्किल होगा।
“वर्षा की प्रकृति में स्पष्ट बदलाव आया है,” अहमद ने कहा। पहले अक्टूबर से मार्च तक ज्यादातर वर्षा बर्फ के रूप में होती थी, लेकिन अब बारिश के रूप में हो रही है।
हिमालय में बर्फबारी एक प्राकृतिक जलाशय की तरह काम करती है, जो वसंत और गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलती है। जब बर्फबारी कम होती है, तो ग्लेशियर ठीक से रिचार्ज नहीं होते और नदी प्रणालियों को कम पानी मिलता है।
“झेलम ग्लेशियरों और बर्फ पिघलने पर बहुत निर्भर है,” अहमद ने बताया। अपर्याप्त बर्फबारी नदी के मौसमी प्रवाह को कमजोर करती है।
लंबी सूखी अवधि ने तापमान भी बढ़ाया है। “जब लंबे समय तक बारिश या बर्फ नहीं पड़ती, तो तापमान तेजी से बढ़ सकता है,” अहमद ने चेतावनी दी कि गर्मी और सूखे का संयोजन अब चिंताजनक हो रहा है।
हिमालयी पर्यावरण का अध्ययन करने वाले पृथ्वी वैज्ञानिकों के लिए संकेत स्पष्ट हैं।
इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IUST) कश्मीर के पृथ्वी वैज्ञानिक और सलाहकार शकील अहमद ने इस रिपोर्टर को बताया कि इस साल कम वर्षा और असामान्य उच्च तापमान के कारण क्षेत्र का जल चक्र बाधित हो गया है।
“गर्मी वाष्पीकरण को तेज कर रही है और नदियों तक पहुँचने वाले पानी की मात्रा कम कर रही है,” अहमद ने कहा।
शोधकर्ता अब समझने की कोशिश कर रहे हैं कि पिघला पानी कहाँ जा रहा है।
“हम अध्ययन कर रहे हैं कि क्या ग्लेशियर पिघल रहे हैं, और अगर हाँ, तो अतिरिक्त पानी नदी के प्रवाह में क्यों नहीं दिख रहा। गर्मी की लहरों से वाष्पीकरण से पानी का बड़ा हिस्सा नदी तक पहुँचने से पहले ही खपत हो सकता है,” उन्होंने कहा।
लंबी अवधि के अध्ययनों से पता चलता है कि कश्मीर के ग्लेशियर दशकों से लगातार पीछे हट रहे हैं। क्षेत्र के नौ बेंचमार्क ग्लेशियरों का कुल ग्लेशियेटेड क्षेत्र 1980 से 2013 के बीच 5.2 वर्ग किलोमीटर सिकुड़ गया, जो लगभग 18 प्रतिशत है। यह हिमालय भर में व्यापक गर्म होने के रुझान को दिखाता है।
अहमद, जो जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली में भूगोल विभाग के आपदा प्रबंधन केंद्र में प्रोफेसर (एम.के. गांधी चेयर) भी रह चुके हैं, ने कहा कि बर्फबारी क्षेत्र के जल संसाधनों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
“बर्फ एक प्राकृतिक जल ताला की तरह काम करती है,” उन्होंने कहा। “सामान्य वर्ष में निचले इलाकों में जमा बर्फ वसंत में पिघलती है और झरने, नदियों और कुओं को रिचार्ज करती है। इस साल निचले इलाकों में लगभग कोई बर्फ नहीं है।”
उन्होंने कहा कि किसानों को बदलते जलवायु पैटर्न को देखते हुए पानी की अधिक माँग वाली फसलों पर पुनर्विचार करना चाहिए।
“किसानों को घाटी के कुछ इलाकों में धान जैसी अत्यधिक पानी की माँग वाली फसलों से धीरे-धीरे दूर होना चाहिए और ड्रिप सिंचाई या जलवायु-सहिष्णु फसलों को अपनाना चाहिए,” अहमद ने समझाया।
एक जिए हुए हकीकत कश्मीर के किसानों के लिए ये बदलाव अब केवल चेतावनियाँ नहीं, बल्कि जिए हुए हकीकत हैं।
पुलवामा जिले के चारसू गाँव में, श्रीनगर से लगभग तीस किलोमीटर दक्षिण में, चौथी पीढ़ी के किसान अरशिद हुसैन भट हर साल नदी के स्तर को करीब से देखते हैं। भट दस कनाल (1 कनाल = 0.0505857 हेक्टेयर) जमीन पर धान उगाते हैं, जो सिंचाई नहरों से झेलम का पानी लेती हैं।
हाल के वर्षों में, उन्होंने कहा, खेती का मौसमी लय बदलने लगा है।
“पिछले साल हमारी फसल बुरी तरह प्रभावित हुई,” भट ने याद किया। बारिश देर से आई और सितंबर में बाढ़ ने कटाई से ठीक पहले खेतों को नुकसान पहुँचाया।
अब, शुरुआती वसंत में ही नदी का स्तर कम होने से वे आने वाले महीनों को लेकर चिंतित हैं।
“जब जल स्तर गिरता है, तो पंप काम करना बंद कर देते हैं,” उन्होंने कहा। नदी में पर्याप्त पानी न होने से दूर के खेतों तक सिंचाई नहरें पानी नहीं ले पातीं।
भट ने झेलम के किनारे बड़े पैमाने पर रेत खनन को भी सिंचाई समस्याओं का कारण बताया।
“खनन ने नदी के तल को गहरा कर दिया और किनारों को नुकसान पहुँचाया, जिससे सिंचाई नहरों में पानी लेना मुश्किल हो गया है,” उन्होंने कहा।
बढ़ता तापमान उन्हें और ज्यादा चिंतित करता है।
“अगर अभी ही तापमान 20 डिग्री के आसपास है और गर्मी ऐसी ही चलती रही, तो जून में यह 38 या 40 डिग्री तक पहुँच सकती है,” उन्होंने कहा।
आगे का रास्ता कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को इन बदलते हालातों के अनुकूल होना पड़ेगा।
शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) कश्मीर में शोधकर्ता पानी की कमी का सामना कर रहे किसानों के लिए आकस्मिक योजनाएँ बना रहे हैं।
विश्वविद्यालय के एग्रोमेटियोरोलॉजी विभाग की प्रमुख और प्रोफेसर समीरा कयूम ने डाउन टू अर्थ (DTE) को बताया कि विश्वविद्यालय ने किसानों को मिट्टी की नमी बचाने और सूखे की स्थिति के लिए तैयार रहने की सलाह दी है।
“वर्तमान हालात में फसलें कमजोर हैं,” कयूम ने कहा, यह बताते हुए कि फरवरी में ही 85% की वर्षा कमी दर्ज हुई।
विश्वविद्यालय ने किसानों को सलाह दी है कि फलों के पेड़ों के आसपास धान की भूसी जैसी जैविक मल्च लगाएँ ताकि मिट्टी की नमी बनी रहे, सिंचाई पानी की कमी वाले बागों में खाद न डालें, और पर्याप्त नमी न होने पर खेत की फसलों में यूरिया सीमित करें।
सब्जी उगाने वाले किसानों को ठंडे समय में सिंचाई करने और नर्सरी को छाया जाल या भूसे से ढकने की सलाह दी गई है।
लंबे समय में, उन्होंने कहा, किसानों को फसल पैटर्न पर पुनर्विचार करना होगा।
“अगर पानी की उपलब्धता अनिश्चित हो रही है, तो किसानों को घाटी के कुछ इलाकों में धान जैसी पानी की अधिक माँग वाली फसलों की बजाय मक्का या दाल जैसी फसलें उगाने के बारे में सोचना होगा,” उन्होंने कहा।
फिलहाल, अधिकारी आशावादी हैं कि हालात सुधर सकते हैं।
अनंतनाग में सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग के कार्यकारी अभियंता निसार अहमद मलिक ने डाउन टू अर्थ को बताया कि अगर महीने के बाद में तापमान से तेज बर्फ पिघलती है, तो नदी का प्रवाह अभी भी बढ़ सकता है।
“मध्य मार्च के बाद हम जल स्तर में कुछ वृद्धि की उम्मीद करते हैं,” मलिक ने कहा।
फिर भी उन्होंने स्वीकार किया कि कश्मीर की सर्दियाँ अब पहले जैसी नहीं रहतीं।
“बीस साल पहले इस समय बर्फबारी होती थी,” मलिक ने कहा।
-राजेश डोबरियाल
ईरान पर इसराइल-अमेरिका के हमले के बाद मध्य-पूर्व में छिड़ी जंग की वजह से दुनिया के कई देशों की तरह बांग्लादेश में भी ईंधन का संकट पैदा हो गया है।
देश में पेट्रोल पंपों पर गाडिय़ों की लाइनें लग रही हैं और लोग शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें ज़रूरत के मुताबिक तेल नहीं दिया जा रहा है।
इस सबके बीच भारत से बांग्लादेश को 5000 मीट्रिक टन डीज़ल की आपूर्ति की गई है।
बांग्लादेश ने ऊर्जा संकट में मदद के लिए भारत से 50,000 मीट्रिक टन डीज़ल और देने की मांग की है लेकिन अभी भारत की ओर से इस पर कोई जवाब नहीं दिया गया है।
बांग्लादेश की बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) के साथ भारत के संबंध पारंपरिक रूप से अच्छे नहीं रहे हैं हालांकि फरवरी में तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी की सरकार बनने के बाद मोदी सरकार ने उसका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था। लेकिन कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि भारत को इस संकट के समय में बांग्लादेश की तेल, ख़ासकर डीज़ल, की आपूर्ति कर उसकी मदद करनी चाहिए क्योंकि वह चीन से भी मदद मांग चुका है।
उनका यह भी कहना है कि चीन भारत के पड़ोस में अपनी स्थिति मज़बूत करने का कोई मौका शायद ही गंवाएगा।
भारत, चीन दोनों से मांगी मदद
बांग्लादेश ने संकट से निपटने के लिए भारत को पत्र लिखकर अतिरिक्त 50,000 मीट्रिक टन डीज़ल की आपूर्ति करने की गुज़ारिश की है। ढाका में भारतीय उच्चायुक्त प्रणॉय कुमार वर्मा ने 11 मार्च को बांग्लादेश के विद्युत, ऊर्जा और खनिज संसाधन मंत्री इकबाल हसन महमूद टुकू से मुलाकात की थी।
इसके बाद टुकू ने कहा, ‘उन्होंने कहा कि वे हमारे प्रस्ताव की समीक्षा करेंगे और निर्णय लेंगे। अभी वे खुद संकट में हैं।’
बांग्लादेश पेट्रोलियम निगम (बीपीसी) के अनुसार बीपीसी और भारत की सरकारी स्वामित्व वाली नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड के बीच हुए एक पूर्व समझौते के तहत बीते बुधवार को बांग्लादेश में 5,000 टन डीज़ल पहुंचा।
इस बीच, बांग्लादेश ने दीर्घकालिक अनुबंधों के तहत ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में चीन से सहायता भी मांगी है। यह भी बताया गया है कि सरकार के ऊर्जा मंत्री और राज्य मंत्री ने हाल ही में ढाका में चीनी राजदूत याओ वेन के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की।
टुकु का कहना है कि सरकार ऊर्जा आयात के लिए वैकल्पिक स्रोत वाले देशों के साथ बातचीत कर रही है।
भारत में हर साल हजारों बच्चे बिछड़ते हैं, कई कभी नहीं लौटते
झारखंड के राजा गोपे की कहानी, जो छह साल की उम्र में ट्रेन में भटक कर केरल पहुँच गया और तेरह साल बाद घर लौटा, भारत में खोए बच्चों की एक बड़ी और अक्सर अनदेखी समस्या की ओर ध्यान दिलाती है। रेलवे स्टेशन, मेले, बस अड्डे और शहरों की भीड़ में हर साल हजारों बच्चे अपने परिवार से बिछड़ जाते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल बड़ी संख्या में बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होती है। इनमें से कई बच्चे कभी वापस नहीं मिलते। लेकिन कुछ मामलों में सालों बाद ऐसे पुनर्मिलन भी होते हैं जो किसी चमत्कार से कम नहीं लगते। राजा गोपे का मामला ऐसा ही है, लेकिन यह अकेला नहीं है। पिछले दो दशकों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें बच्चे हजारों किलोमीटर दूर पहुँच गए और वर्षों बाद परिवार तक लौट सके।
रेलवे स्टेशन: बिछोह का सबसे बड़ा मंच
भारत में बच्चों के खोने की सबसे आम जगह रेलवे स्टेशन और ट्रेन यात्राएँ मानी जाती हैं। देश के विशाल रेल नेटवर्क में रोज़ लाखों लोग यात्रा करते हैं। भीड़, शोर और जल्दबाजी के बीच छोटे बच्चे अक्सर पल भर में नजरों से ओझल हो जाते हैं।
कई बार बच्चा गलत ट्रेन में चढ़ जाता है, और कुछ घंटों में वह अपने राज्य से सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर पहुँच जाता है। जब तक परिवार खोजबीन करता है, बच्चा किसी और शहर में पहुँच चुका होता है। भाषा बदल जाती है, पहचान खो जाती है और बच्चे के लिए घर लौटना लगभग असंभव हो जाता है।
इसी तरह की एक घटना बिहार के एक बच्चे के साथ हुई थी, जो 2000 के दशक में ट्रेन में भटक कर राजस्थान पहुँच गया था। वह वर्षों तक एक बाल गृह में रहा और बाद में पहचान के आधार पर अपने परिवार तक पहुँच पाया।
सरू ब्रियरली: भारत से ऑस्ट्रेलिया तक
भारत में खोए बच्चों की कहानियों में सबसे प्रसिद्ध मामला सरू ब्रियरली का है।
1986 में मध्य प्रदेश के खंडवा रेलवे स्टेशन पर पाँच साल का सरू अपने बड़े भाई के साथ ट्रेन में बैठा था। भाई काम की तलाश में गया था और सरू स्टेशन पर इंतजार कर रहा था। लेकिन वह एक खाली ट्रेन में चढ़ गया और सो गया।
जब उसकी आँख खुली, तब ट्रेन हजारों किलोमीटर दूर कोलकाता पहुँच चुकी थी।
सरू को बाद में एक अनाथालय भेज दिया गया और अंततः उसे एक ऑस्ट्रेलियाई दंपती ने गोद ले लिया।
करीब 25 साल बाद उसने गूगल अर्थ की मदद से अपने पुराने इलाके की खोज की और अंततः अपने असली परिवार को ढूँढ निकाला। उसकी कहानी पर बाद में फिल्म “लायन” भी बनी।
ट्रेन से तमिलनाडु पहुँचा उत्तर भारत का बच्चा
कुछ साल पहले एक मामला सामने आया जिसमें उत्तर भारत का एक बच्चा ट्रेन में भटक कर तमिलनाडु पहुँच गया था।
वह अपने घर से निकलकर रेलवे स्टेशन पहुँच गया था और किसी ट्रेन में चढ़ गया। बाद में रेलवे पुलिस ने उसे बचाया और एक बाल गृह में भेज दिया।
बच्चा अपनी भाषा के अलावा कुछ नहीं बोल पाता था। अधिकारियों को केवल उसके नाम और गाँव के धुंधले उच्चारण के आधार पर खोज करनी पड़ी। महीनों की कोशिश के बाद उसका परिवार ढूँढा जा सका।
ऐसे मामलों में भाषा सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। बच्चा जिस राज्य में पहुँचता है वहाँ उसकी भाषा कोई नहीं समझता, और वह स्थानीय भाषा नहीं समझ पाता।
दिल्ली से हरियाणा, फिर उत्तर प्रदेश
एक और मामला दिल्ली में सामने आया था जहाँ एक छोटा बच्चा अपने परिवार से बिछड़कर ट्रेन में बैठ गया और हरियाणा पहुँच गया। वहाँ से वह किसी और ट्रेन में चढ़ गया और उत्तर प्रदेश पहुँच गया।
रेलवे पुलिस ने उसे पकड़कर बाल कल्याण समिति के पास भेज दिया।
परिवार की पहचान करने में कई महीने लग गए, क्योंकि बच्चा अपने घर का पूरा पता नहीं बता पा रहा था। अंततः पुलिस ने स्कूल के नाम और इलाके की कुछ यादों के आधार पर उसके परिवार को ढूँढ लिया।
सोशल मीडिया का नया दौर
पहले ऐसे मामलों में बच्चों को परिवार तक पहुँचाना बेहद कठिन होता था।
लेकिन पिछले एक दशक में सोशल मीडिया ने इसमें बड़ी भूमिका निभानी शुरू की है। अब किसी बच्चे की फोटो या वीडियो वायरल हो जाए तो कई बार कुछ ही दिनों में उसका परिवार मिल जाता है।
राजा गोपे के मामले में भी यही हुआ। एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया गया जिसमें उसने अपने गांव के बारे में कुछ धुंधली यादें बताईं। उसी वीडियो के आधार पर झारखंड के लोगों ने पहचान कर ली।
यह तकनीक और सामुदायिक सहयोग का एक नया उदाहरण है।
रेलवे चिल्ड्रेन और अन्य संस्थाएँ
भारत में कई संस्थाएँ विशेष रूप से रेलवे स्टेशनों पर भटकते बच्चों की मदद के लिए काम करती हैं।
रेलवे चिल्ड्रेन इंडिया, चाइल्डलाइन, और विभिन्न राज्य सरकारों के बाल संरक्षण विभाग ऐसे बच्चों को बचाने, उनकी देखभाल करने और परिवार तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं।
रेलवे स्टेशनों पर कई जगह अब ऐसे हेल्प डेस्क बनाए गए हैं जहाँ अकेले या संकट में दिखने वाले बच्चों को तुरंत संरक्षण में लिया जा सकता है।
बिछोह की मनोवैज्ञानिक कीमत
जो बच्चे वर्षों तक परिवार से दूर रहते हैं, उनके लिए घर लौटना भी आसान नहीं होता।
वे नई भाषा, नए दोस्तों और नई जिंदगी के साथ बड़े हो चुके होते हैं। कई बार उन्हें अपने ही गांव में अजनबी जैसा महसूस होता है।
राजा गोपे के मामले में भी यही स्थिति बताई जाती है। वह मलयालम बोलने लगा था और अपनी मूल भाषा लगभग भूल चुका था। उसके लिए झारखंड लौटना एक तरह से नई जिंदगी शुरू करने जैसा है।
हर साल हजारों बच्चे
भारत में बच्चों के लापता होने का मुद्दा अभी भी गंभीर है।
कई मामलों में बच्चे मानव तस्करी, बाल मजदूरी या अन्य शोषण का शिकार भी हो जाते हैं। लेकिन कुछ मामलों में वे केवल भटक जाते हैं, और फिर वर्षों तक पहचान के बिना किसी और शहर में जीवन बिताते हैं।
राजा गोपे और सरू ब्रियरली जैसे मामलों में कहानी का अंत सुखद रहा। लेकिन हर कहानी का अंत ऐसा नहीं होता।
एक उम्मीद की कहानी
राजा गोपे की घर वापसी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि कभी-कभी समय, तकनीक और मानवीय प्रयास मिलकर असंभव लगने वाली दूरी को भी मिटा सकते हैं।
छह साल का जो बच्चा एक गलत ट्रेन में बैठकर अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर चला गया था, वही अब एक जवान के रूप में अपने गांव वापस लौटा है।
यह केवल एक परिवार का मिलन नहीं है, यह उस उम्मीद की कहानी है जो वर्षों के बिछोह के बाद भी खत्म नहीं होती।
-टॉम लैम
अमेरिका और इसराइल के ईरान के साथ युद्ध ने सोशल मीडिया और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। क्या चीन इस मौके का फ़ायदा उठाकर ताइवान पर हमला कर सकता है, जबकि अमेरिकी सेना का ध्यान मध्य पूर्व पर केंद्रित है।
1950 के दशक में चीन ने ऐसा कदम उठाया था, जब अमेरिका मध्य पूर्व में सैन्य अभियान में व्यस्त था। लेकिन इस बार स्थिति अलग दिखाई दे रही है। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ताइवान के आस-पास चीन की सैन्य गतिविधियां काफी कम हो गई हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम चीन की ओर से कूटनीतिक संकेत हो सकता है, क्योंकि मार्च के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा प्रस्तावित है। माना जा रहा है कि चीन ट्रंप की इस यात्रा के दौरान ताइवान समेत कई मुद्दों पर समझौते का माहौल बनाना चाहता है। इसके अलावा, अमेरिका की वेनेज़ुएला और ईरान जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों पर सैन्य कार्रवाइयों ने चीन की ऊर्जा आपूर्ति को भी प्रभावित किया है।
इससे भी ताइवान के ख़िलाफ़ संभावित सैन्य कार्रवाई कठिन हो सकती है।
ताइवान पर चीन की वर्तमान सैन्य स्थिति
इतिहास में एक उदाहरण मौजूद है। 1958 में चीनी नेता माओत्से तुंग ने किनमेन और मात्सु द्वीपों पर गोलाबारी की थी।
ये द्वीप चीन के तट के पास हैं, लेकिन आज भी ताइवान के नियंत्रण में हैं। उस समय अमेरिका लेबनान में सैन्य कार्रवाई कर रहा था।
उस समय, माओ ने ताइवान और लेबनान को 'दो फंदे' बताया था जो अमेरिका को जकड़े हुए हैं।
उनका मानना था कि किनमेन और मात्सु पर हमला करके चीन मध्य पूर्व के लोगों के अमेरिका विरोधी संघर्ष का समर्थन कर रहा है।
लेकिन इस बार चीन ने ईरान युद्ध का फ़ायदा उठाकर ताइवान के आस-पास सैन्य गतिविधियां नहीं बढ़ाई हैं, जबकि अमेरिका ने अपने कुछ सैन्य संसाधन मध्य पूर्व की ओर भेज दिए हैं।
उदाहरण के तौर पर अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन को दक्षिण चीन सागर से मध्य पूर्व भेजा गया था।
यूएसएस अब्राहम लिंकन ने 14 जनवरी को दक्षिण चीन सागर से मध्य पूर्व की ओर यात्रा शुरू की थी और 26 जनवरी को इसकी संभावित स्थिति ओमान के तट के पास थी।
इसके अलावा अमेरिका दक्षिण कोरिया से एंटी-मिसाइल सिस्टम थाड को भी मध्य पूर्व में तैनात करने की योजना बना रहा है।
इन कदमों से कुछ लोगों को चिंता है कि इससे चीन के ख़िलाफ़ अमेरिकी प्रतिरोध क्षमता कम हो सकती है।
फिर भी मार्च में अब तक केवल दो चीनी लड़ाकू विमान ताइवान के एयर डिफेंस ज़ोन में देखे गए हैं, जो हाल के वर्षों में ताइवान के हवाई क्षेत्र में चीन के विमानों की सबसे कम घुसपैठ का रिकॉर्ड है।
ताइवान के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ट्रंप की यात्रा से पहले सकारात्मक माहौल बनाना चाहता है और यह संकेत देना चाहता है कि वह ताइवान के मुद्दे को फिलहाल बल प्रयोग से नहीं सुलझाएगा।
हालांकि ताइवान के राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि चीन अमेरिकी सुरक्षा समर्थन और हथियारों की बिक्री को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है।
शी-ट्रंप की बैठक का क्या होगा एजेंडा
बीजिंग में होने वाली संभावित बैठक में शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप के बीच कई बड़े मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है। दोनों महाशक्तियां अब भी ताइवान, ट्रेड और अन्य मसलों को सुलझाने के रास्ते तलाश रही हैं।
अमेरिकी मीडिया के अनुसार, चीन ताइवान के मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ समझौता करने की कोशिश कर सकता है।
ख़ासकर ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री पर चर्चा, व्यापारिक टैरिफ़ कम करने और सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर लगे निर्यात प्रतिबंध हटाने जैसे मुद्दे इसमें शामिल हो सकते हैं।
वहीं अमेरिका उम्मीद करेगा कि बीजिंग रूस और ईरान से कम तेल खरीदे और अमेरिका से अधिक तेल, गैस, सोयाबीन और बोइंग विमान खरीदे। इसके अलावा अमेरिका ये भी चाहेगा कि चीन दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ) के निर्यात नियंत्रण में भी ढील दे।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वेनेज़ुएला और ईरान के ख़िलाफ़ हाल की अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयाँ चीन की तेल आपूर्ति को निशाना बनाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं।
ग़ैर आधिकारिक चीनी अनुमानों के अनुसार, 2025 में चीन ने वेनेज़ुएला से रोज़ाना लगभग 4।63 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया।
यह वेनेज़ुएला के कुल तेल निर्यात का लगभग 70–80 फ़ीसदी और चीन के कुल तेल आयात का करीब 7 फ़ीसदी था।
ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल के युद्ध का असर चीन पर और भी अधिक पड़ रहा है।
विश्लेषण के अनुसार 2025 में ईरान ने अपने कुल निर्यात का लगभग 99 फ़ीसदी हिस्सा चीन को निर्यात किया, जो चीन के समुद्री रास्ते से आने वाले कुल कच्चे तेल आयात का करीब 13 फ़ीसदी था। इस बीच, 2025 में होर्मुज़ जलडमरूमध्य से रोज़ गुजरने वाले 1।49 करोड़ बैरल तेल में से लगभग 50 लाख बैरल चीन के लिए था, जो उसके कुल रोज़ाना आयात का लगभग 43।3 फ़ीसदी था।
ताइवान के मीडिया ने एक फ्रांसीसी अर्थशास्त्री के हवाले से कहा है कि चीन की ऊर्जा पर निर्भरता ताइवान के ख़िलाफ़ संभावित सैन्य कार्रवाई में बाधा बन सकती है, क्योंकि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए लगातार ऊर्जा आपूर्ति ज़रूरी होती है।
हालांकि मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि चीन के पास अपने रणनीतिक भंडार में लगभग 1।4 अरब बैरल कच्चा तेल मौजूद है। यदि मध्य पूर्व से तेल आयात पूरी तरह बंद भी हो जाए तो यह भंडार लगभग छह महीने तक आपूर्ति की कमी को पूरा कर सकता है।
ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री
चीन विदेशी पेट्रोल, डीज़ल पर निर्भरता कम करके घरेलू स्तर पर उत्पादित रेन्यूवबल एनर्जी की ओर तेजी से बदलाव लाने की कोशिश भी कर रहा है।
इसका मकसद राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मूल रूप से सुरक्षित करना और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के लिए मजबूत आधार तैयार करना और आत्मविश्वास बढ़ाना है।
लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी (ब्रेस्ट कैंसर कोलैबोरेटर्स)’ के अनुसार 1990 से 2023 के बीच भारत में स्तन कैंसर के मामले 477।8 प्रतिशत बढ़े। वहीं मरने वालों की तादाद भी 352.3 प्रतिशत बढ़ी।
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना का लिखा-
ब्रेस्ट कैंसर दुनिया के लगभग हर देश में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। तमाम स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बावजूद मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित 204 देशों के अध्ययन के आधार पर, साल 2023 में दुनिया भर में करीब 23 लाख महिलाओं में स्तन कैंसर के नए मामले सामने आए। जबकि इसकी चपेट में आने से 7।6 लाख से अधिक महिलाओं की मौत हो गई।
अगर रोकथाम और जल्दी जांच पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले सालों में इस बीमारी का बोझ और बढ़ेगा। अनुमान है कि साल 2050 तक लगभग 35 लाख महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले सामने आ सकते हैं। वहीं हर साल होने वाली मौतों की संख्या भी बढक़र 14 लाख तक पहुंचने का अंदेशा है। भारत के आंकड़े भी चिंताजनक हैं। साल 1990 के बाद से देश में स्तन कैंसर के मामलों में तेज उछाल देखा गया है। साल 2023 में स्तन कैंसर के लगभग 2।03 लाख नए मामले दर्ज किए गए, जो 1990 की तुलना में करीब 477।8 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाता है। इसी अवधि में मरने वालों की संख्या भी बढक़र 1।02 लाख तक पहुंच गई। यह 1990 के मुकाबले 352।3 प्रतिशत अधिक है।
विश्वस्तर पर स्तन कैंसर के मामले बढ़े
स्तन कैंसर दुनिया में महिलाओं में मिलने वाला सबसे आम कैंसर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार हर मिनट चार महिलाओं में स्तन कैंसर का पता चलता है। विभिन्न देशों में स्तन कैंसर का असर भी अलग है। स्तन कैंसर से होने वाली मौत की दर बांग्लादेश में 91 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 78 प्रतिशत, भारत में 74 प्रतिशत, जापान में 52 प्रतिशत और फिलीपींस में 41 प्रतिशत देखी गई है। लाओस में यह सबसे ज्यादा 214 प्रतिशत है। जबकि चीन में स्तन कैंसर से होने वाली मौतों की दर में लगभग 37 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
स्तन कैंसर का बढ़ता बोझ अब कम और मध्यम-आय वाले देशों की ओर और अधिक बढ़ रहा है। इन देशों में अक्सर कैंसर का देर से पता चलता है। इलाज की सीमित सुविधा होने के कारण मृत्यु दर अधिक रहती है। भारत जैसे मध्यम-आय वाले देशों में स्तन कैंसर का आर्थिक दबाव भी बढ़ेगा। साल 2021 में इससे जुडा कुल आर्थिक बोझ लगभग 74 हजार करोड़ रुपये था। यह 2030 तक एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।
भारत में क्यों बढ़ रहा है स्तन कैंसर
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि स्तन कैंसर का कोई एक निश्चित कारण नहीं होता। इसके खतरे से जुड़े कई कारक होते हैं। डॉ। कुशाग्र गौरव भटनागर लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में एंडोक्राइन और ब्रेस्ट सर्जन हैं। वह डीडब्ल्यू को बताते हैं कि मोटापा, अधिक शराब का सेवन, सिगरेट पीना और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसे लाइफस्टाइल फैक्टर स्तन कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा परिवार में कैंसर का इतिहास होने पर भी स्तन कैंसर हो सकता है। साथ ही कई शोध बताते हैं कि जिन महिलाओं में पहली गर्भावस्था देर से होती है या जिनके बच्चे नहीं होते, उनमें स्तन कैंसर का खतरा अधिक होता है। डॉ। कुशाग्र आगे कहते हैं, ‘एस्ट्रोजन महिलाओं में यौन और शारीरिक विकास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण हार्मोन है। गर्भावस्था और स्तनपान (ब्रेस्टफीड) से महिलाओं में एस्ट्रोजन के लंबे समय तक अधिक प्रवाह का जोखिम कम हो सकता है। अब महिलाएं देर से शादी कर रही हैं। वे 30 साल के बाद गर्भ धारण करती हैं। ऐसे में स्तन कैंसर होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।’
डॉ. अभिषेक शंकर दिल्ली के एम्स अस्पताल में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। वह बताते हैं कि वायु प्रदूषण भी शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने बताया, ‘2023 में शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में पीएम 2.5 का स्तर अधिक होता है, वहां रहने वाली महिलाओं में स्तन कैंसर होने की संभावना 28 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इसका मतलब है कि अधिक वायु प्रदूषण वाले शहरों जैसे दिल्ली में स्तन कैंसर के मामले ज्यादा होंगे।’
कम उम्र की महिलाओं को भी खतरा
साल 2023 में 55 साल और उससे अधिक उम्र की महिलाओं में प्रति लाख लगभग 161 नए स्तन कैंसर के मामले दर्ज किए गए। वहीं 20 से 54 साल की महिलाओं में यह संख्या प्रति लाख 50 नए मामले रही। यह 1990 के बाद से इस उम्र की महिलाओं में स्तन कैंसर के 29 प्रतिशत अधिक मामले हैं। इसलिए जागरूकता और समय पर जांच बेहद महत्वपूर्ण है। स्तन कैंसर की पहचान के लिए मैमोग्राफी, पीईटी स्कैन, एमआरआई मैमोग्राफी और थर्मोग्राफी जैसी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं। इनकी मदद से बीमारी का पता पहले से ज्यादा जल्दी लगाया जा सकता है।
डॉ. अनिल ठकवानी शारदा केयर एंड हेल्थ सिटी अस्पताल में ऑन्कोलॉजी विभाग के एचओडी और सीनियर कंसल्टेंट हैं। वह 35 साल की उम्र के बाद महिलाओं को नियमित रूप से स्क्रीनिंग टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। डॉ।.अनिल बताते हैं, ‘स्तन में या उसके आसपास अगर कोई छोटी-सी गांठ भी महसूस हो, तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए। अक्सर यह दर्द नहीं करती और इसी वजह से लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। स्तन कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने से इसका इलाज संभव है और मरीज पूरी तरह ठीक भी हो सकता है।’
ईरान के साथ चल रहे तनाव के चलते ऊर्जा और खाद की कीमतें बढ़ रही हैं. खाने पीने की चीजों में फिर से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है. किसानों को डर है कि संसाधनों की कमी के कारण इस साल पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है.
डॉयचे वैले पर निक मार्टिन का लिखा-
ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) से गायब होते तेल और एलएनजी टैंकरों पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं. आखिर ऐसा हो भी क्यों न, ईरान और ओमान के बीच मौजूद इस संकरे समुद्री रास्ते से दुनिया का लगभग 20 फीसदी कच्चा तेल और एलएनजी गुजरता है. यह तेल और गैस खाड़ी देशों से पूरी दुनिया को भेजा जाता है.
हालांकि, असली संकट उन जहाजों को लेकर है जिनमें दुनिया भर में खेती के लिए जरूरी खाद और खाड़ी देशों के लिए भोजन भरा होता है. संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों के लिए यह समुद्री रास्ता जीवन रेखा है. इसके बंद होने का मतलब है कि इन रेगिस्तानी देशों में खाने-पीने की चीजें खत्म हो सकती हैं.
मैरीटाइम इंटेलिजेंस कंपनी ‘सिग्नल ग्रुप' के आंकड़ों से पता चलता है कि दुनिया भर में व्यापार होने वाली प्रमुख खादों, जैसे कि अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर का 20 फीसदी हिस्सा अकेले खाड़ी देशों से आता है.
ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के मुताबिक, दुनिया भर में व्यापार होने वाले यूरिया, जो सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद है, का लगभग आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है. इसमें से अकेले कतर पूरी दुनिया की सप्लाई के 10 फीसदी हिस्से का उत्पादन करता है.
जब पिछले हफ्ते ईरान ने दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी और फर्टिलाइजर हब ‘रास लफ्फान' पर हमला किया था, तो कतर एनर्जी को अपना उत्पादन रोकना पड़ा. इस वजह से लाखों टन जरूरी फर्टिलाइजर न्यूट्रिएंट्स और उन्हें बनाने वाले कच्चे माल (प्रिकर्सर्स) जहां के तहां रुक गए.
ईरान युद्ध के बढ़ते असर से, पिछले छह साल में दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए तीसरा सबसे बड़ा खतरा पैदा हो गया है. इससे पहले पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी और फिर 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध का सामना कर चुकी है. उस समय रूस ने यूक्रेन के उन खेतों और बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया था जहां से अनाज का निर्यात होता था.
जब से ईरान युद्ध शुरू हुआ है, खाद की कीमतें 10 से 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं. हालांकि, वे अभी भी रूसी टैंकों के यूक्रेन में घुसने के बाद के हफ्तों की तुलना में लगभग 40 फीसदी कम हैं.
फसल की पैदावार पर पड़ सकता है असर
विकासशील देशों की मदद करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनसीटीएडी' के मुताबिक, हर महीने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते लगभग 13.3 लाख टन खाद का निर्यात किया जाता है. इसलिए, अगर यह समुद्री रास्ता सिर्फ 30 दिनों के लिए भी बंद हो जाए, तो दुनिया भर में खाद की किल्लत पैदा हो सकती है. इससे मक्का, गेहूं और चावल जैसी फसलों की पैदावार गिरने का बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि ये फसलें पूरी तरह से नाइट्रोजन (यूरिया) पर निर्भर होती हैं.
वॉशिंगटन में मौजूद ‘इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट' (आईएफपीआरआई) के सीनियर रिसर्च फेलो जोसेफ ग्लॉबर ने डीडब्ल्यू को बताया, "खाद की बढ़ी हुई कीमतें इस बात पर असर डालेंगी कि किसान कौन सी फसल उगाना चाहते हैं. खेती की लागत को बढ़ने से बचाने के लिए, किसान उन फसलों को चुन सकते हैं जिन्हें कम खाद की जरूरत होती है, बजाय उन फसलों के जिनमें बहुत ज्यादा नाइट्रोजन की जरूरत पड़ती है.”
ग्लॉबर ने आगे कहा, "खाद की कीमतें बढ़ने से गरीब देशों के किसान उसे खरीद नहीं पाएंगे और मजबूरी में कम खाद का उपयोग करेंगे. अगर वे ऐसा करते हैं, तो इससे फसलों की पैदावार को भारी नुकसान पहुंच सकता है.”
इस हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान युद्ध ‘लगभग खत्म हो गया है.' इसके बावजूद, यूनाइटेड किंगडम के मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (यूकेएमटीओ) का कहना है कि ईरान ने बुधवार को होर्मुज में या उसके पास कम से कम तीन जहाजों पर फायरिंग की. यह इस बात का संकेत है कि तेहरान इस समुद्री रास्ते को लगभग बंद रखने पर अड़ा हुआ है.
गुरुवार तड़के खाड़ी क्षेत्र में और भी हमलों की खबरें मिली हैं. इनमें एक मालवाहक जहाज और कई तेल टैंकरों को निशाना बनाए जाने की खबर है.
कमोडिटी एक्सपर्ट का कहना है कि होर्मुज का रास्ता व्यापारिक जहाजों के लिए जितने लंबे समय तक बंद रहेगा, खाद की वैश्विक आपूर्ति उतनी ही ज्यादा ठप होने लगेगी.
डच बैंक ‘आईएनजी' ने इस महीने की शुरुआत में एक रिसर्च नोट में चेतावनी दी थी, "अगर आपूर्ति में रुकावट लंबे समय तक जारी रहती है, तो भारत, ब्राजील, दक्षिण एशिया और यूरोपीय संघ के कुछ हिस्सों में खाद की उपलब्धता काफी कम हो जाएगी. ये देश और इलाके मुख्य रूप से खाद के आयात पर निर्भर हैं.”
रूस, चीन, अमेरिका और मोरक्को जैसे अन्य खाद उत्पादकों के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता बहुत कम है. इसलिए, वे इस कमी को पूरा करने के लिए तुरंत उत्पादन नहीं बढ़ा पाएंगे. चीन ने फॉस्फेट और नाइट्रोजन खादों के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन अब उसे ये पाबंदियां हटाने के लिए दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के पूर्व वरिष्ठ अर्थशास्त्री ग्लॉबर ने कहा, "पोटाश या फॉस्फेट के विपरीत, नाइट्रोजन का उत्पादन कहीं भी किया जा सकता है जहां प्राकृतिक गैस या कोयला उपलब्ध हो. पोटाश और फॉस्फेट के लिए तो आपको उन खनिजों की खदानों पर निर्भर रहना पड़ता है. लेकिन असली समस्या प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतें हैं, जिसकी वजह से नाइट्रोजन का उत्पादन बढ़ाना घाटे का सौदा साबित हो सकता है.”
मध्य पूर्व में पिछले दो हफ्ते से जारी युद्ध का असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है. भारत के लाखों लोग मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों में रहते हैं. उड़ानें बंद होने के कारण लोग लौट नहीं पा रहे हैं.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट –
ईरान के खिलाफ इस्राएल और अमेरिका के युद्ध के चलते भारत के लाखों लोग खाड़ी के देशों में फंसे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या कामगारों, छात्रों और पर्यटकों की है. इधर भारत में बैठे उनके परिजन दिन-रात हालात जानने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी सुरक्षित वापसी की दुआ कर रहे हैं. हालांकि भारत सरकार की तरफ से यहां फंसे हजारों यात्रियों की अब तक सकुशल वापसी कराई गई है लेकिन बड़ी संख्या में अभी भी लोग वापस आने के लिए परेशान हैं.
भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक 28 फरवरी को युद्ध छिड़ने के बाद 1 से 7 मार्च के बीच खाड़ी क्षेत्र से 52 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराई गई है. इनमें से 32 हजार लोगों ने भारतीय विमानों से यात्रा की जबकि बाकी लोग विदेशी एअरलाइंस से वापस आए.
खाड़ी देश और एशिया को छोड़ यूरोप क्यों जा रहे हैं नेपाली श्रमिक
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नियमित प्रेस कान्फ्रेंस में बताया, "भारत सरकार पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में हो रहे घटनाक्रमों पर लगातार नजर रख रही है, खासकर उन पर जो ट्रांजिट के दौरान या फिर अल्पकालिक यात्राओं के दौरान वहां फंस गए हैं. क्षेत्र में मौजूद सभी भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय अधिकारियों के दिशा-निर्देशों के साथ-साथ अपने स्थान पर स्थित भारतीय दूतावास या वाणिज्य दूतावास द्वारा जारी की जा रही एडवाइजरी का पालन करें.”
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इस्राएल की ओर से शुरू किए गए ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' के बाद इस क्षेत्र में हालात तेजी से बदले हैं. कई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे अस्थायी रूप से बंद हैं और उड़ानें रद्द कर दी गई हैं. इसका सीधा असर इन देशों में रह रहे लोगों पर पड़ रहा है जो वहां कामकाज या फिर पढ़ाई और पर्यटन के लिए जाते हैं. खाड़ी के अलग-अलग देशों में भारत के करीब एक करोड़ लोग रहते हैं.
90 लाख से ज्यादा भारतीय हैं खाड़ी के देशों में
खाड़ी देशों यानी फारस की खाड़ी में बसे छह देशों में भारतीयों की एक बड़ी आबादी रोजगार के लिए जाती है. विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं. रोजगार की उपलब्धता और बेहतर वेतन वहां जाने के लिए लोगों को आकर्षित करता है. अकेले उत्तर प्रदेश से करीब पचीस लाख लोग इन देशों में हैं, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के. हालांकि अन्य इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग इन देशों में रह रहे हैं. बड़ी संख्या में घूमने के लिए भी लोग इन देशों का रुख करते हैं. लेकिन अब हवाई सेवाएं ठप होने से बहुत से लोगों को वहीं रुकना पड़ा है और यहां उनके घरों में बेचैनी का माहौल है.
बनारस के रहने वाले दुर्गेश कुमार दुबई में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "रोजगार की तलाश और ज्यादा पैसे कमाने के लिए अभी दो महीने पहले ही यहां आए थे लेकिन यहां तो युद्ध छिड़ गया है. हालांकि आम लोगों को बहुत खतरा तो नहीं है, लेकिन फिर भी हम लोग डरे हुए हैं. काम करने के बाद चुपचाप अपने-अपने कमरों में रहने चले जाते हैं. हर समय इस बात का खतरा बना रहता है कि कहीं कोई मिसाइल आकर न गिर जाए.”
हालांकि कई लोगों का ये भी कहना है कि रिहायशी इलाकों में किसी तरह का कोई डर नहीं है. नीरज निषाद गोरखपुर के रहने वाले हैं. दुबई के अलकूज में रहते हैं और पेंटिंग के ठेकेदार हैं. उनका कहना है कि शुरुआत में थोड़ा डर का माहौल था, लेकिन अब स्थिति सामान्य है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में नीरज निषाद कहते हैं, "यहां तो सब कुछ ठीक है. हां, बाहरी इलाकों में जरूर थोड़ा डर का माहौल है. पर हम लोग जहां हैं, वहां कोई डर नहीं है. हालांकि यहां से कुछ दूरी पर एक हफ्ते पहले एक मिसाइल गिरी थी लेकिन उसके बाद से कोई ऐसी घटना नहीं हुई. रिहायशी इलाकों में मिसाइल या बम नहीं गर रहे हैं.”
सुरक्षित लेकिन खौफ बरकरार
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के भी सैकड़ों लोग सऊदी अरब और यूएई सहित कई खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं. युद्ध के बाद बने तनाव से उनके परिवार की चिंताएं बढ़ गई हैं. मुरादाबाद के जमील कहते हैं कि उनका बेटा सऊदी अरब में नाई का काम करता है. उनके मुताबिक, "बेटा जहां रहता है उस बिल्डिंग को युद्ध शुरू होने के बाद खाली करा लिया गया था. बेटे और उसके साथी सुरक्षित जगह पर तो हैं, फिर भी हम लोगों को हर समय उनकी फ्रिक बनी रहती है. कई बार बात भी नहीं हो पाती, इसलिए चिंता बढ़ जाती है.”
अमेरिका, कनाडा पीछे छूटे, अब पढ़ाई के लिए कहां जा रहे भारतीय?
यूपी से बड़ी संख्या में लोग पढ़ाई के लिए ईरान का रुख करते हैं लेकिन लड़ाई के बाद से वहां भी अफरा-तफरी मची हुई है. संभल के मौलाना गुफरान नकवी पिछले दो साल से ईरान में पढ़ाई कर रहे हैं. उनके भाई मोहम्मद फहमान नकवी बताते हैं कि जहां वे रह रहे है, वहां स्थिति सामान्य है लेकिन खौफ बना रहता है.
बाराबंकी जिले के दर्जनों लोग ईरान के कुम शहर और अन्य इलाकों में फंसे हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो धार्मिक शिक्षा या फिर जियारत के लिए वहां गए थे. कई परिवारों का संपर्क वहां रह रहे अपने परिजनों से टूट चुका है.
इस्राएल जाने पर रोक!
इस बीच, उत्तर प्रदेश के 300 कामगारों के इस्राएल जाने पर 21 मार्च तक रोक लगा दी गई है. नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएसडीसी) और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त रूप से यह फैसला लिया है. उत्तर प्रदेश श्रम एवं सेवायोजन विभाग और एनएसडीसी के साथ इस्राइल की टीम ने पिछले महीने कानपुर में इन कामगारों का चयन किया था. इस्राइल में शटरिंग कारपेंटर, आयरन वेल्डिंग, प्लास्टरिंग और सिरेमिक टाइलिंग के काम के लिए इन श्रमिकों का चयन हुआ है.
लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत उन लोगों को हो रही है जो खाड़ी के देशों से आना चाहते हैं. कई लोग पहले से ही योजना बनाए थे आने की लेकिन हवाई मार्ग बंद होने और फ्लाइट रद्द होने के कारण नहीं आ पा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, युद्ध की स्थितियों के बावजूद भारत से खाड़ी देशों की ओर जाने वालों की कमी नहीं दिख रही है. गौरव दुबे गोरखपुर में एक ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं. उनके पास हर साल हजारों लोग थाईलैंड, इंडोनेशिया और खाड़ी देशों में जाने के लिए हवाई टिकट लेते हैं. उनका कहना है कि ट्रैवल एजेंसियों का व्यापार भी ठप सा हो गया है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में गौरव दुबे कहते हैं कि पिछले 12 दिन से गिनती के टिकट बिके हैं. उनके मुताबिक, "यहां से ज्यादातर लोग रोजी-रोजगार के लिए जाते हैं. यदि फ्लाइट सामान्य रूप से जाएं तो जाने वालों की कमी नहीं और यहां उनके परिजन भी परेशान नहीं हैं. लेकिन सामान्य फ्लाइट को स्पेशल फ्लाइट का नाम दे दिया गया है और किराया ज्यादा वसूला जा रहा है. बनारस से दुबई और शरजाह के लिए 17-18 हजार रुपये में सामान्य तौर पर टिकट मिल जाता है लेकिन अब यही टिकट 25-30 तीस हजार रुपये में मिल रहा है.”


