विचार / लेख

Date : 08-Jan-2020

अपर्णा द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार
2019 में लोकसभा के चुनाव आए तो बीजेपी ने जमकर जश्न मनाया। दिल्ली की सातों सीटों पर कमल खिला तो केन्द्र और दिल्ली बीजेपी में खुशी की लहर दौड़ गई।
बीजेपी का मानना था कि लोकसभा चुनाव में एनडीए की सरकार तो बन गई, लेकिन चुनाव के इन नतीजों मे लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनावों के भी कुछ पहलू छिपे हैं।
बीजेपी को उम्मीद थी कि देश की जनता ने अगर इसी तरह अपना भरोसा बीजेपी पर बरकरार रखा तो दिल्ली विधानसभा चुनाव की तस्वीर भी कमलमय होगी।
मगर 2020 में चुनाव की घोषणा होने के बाद दिल्ली बीजेपी में न तो मई 2019 वाला वो उत्साह दिख रहा है और ना ही वो जोश।
छह महीने में ऐसा क्या हो गया कि दिल्ली में बीजेपी के हौसले पस्त हैं? लेकिन इस सवाल के साथ एक और सवाल उठता है कि क्या अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी फिर से 67 सीटें जीतने का जलवा दिखा पाएगी?
लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सातों सीटों को आम आदमी पार्टी मापदंड नहीं मानती क्योंकि 2014 में भी दिल्ली में बीजेपी ने सभी लोकसभा सीटें जीती थीं लेकिन 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीत ली थीं। उस समय बीजेपी सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गई थी और दस साल तक दिल्ली में राज करने वाली कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी।
दिल्ली में पांच साल तक राज करने वाली अरविंद केजरीवाल की सरकार ने धीरे-धीरे काम की रफ़्तार पकड़ी और काम करने का तरीका भी बदला। शुरुआती सालों में अरविन्द केजरीवाल काफी उग्र नजऱ आते थे। वह बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी पर हर बात को लेकर निशाना साधते थे।
कऱीब चार सालों तक उनकी सरकार चीफ़ सेकेट्ररी और उपराज्यपाल से नाराजग़ी, धरना, मारपीट और गाली गलौज के लिए ख़बरों में बनी रही।
अरविन्द केजरीवाल के इसी रवैये की वजह से पिछला लोकसभा चुना मोदी बनाम केजरीवाल हो गया था और इसका खामियाज़ा आम आदमी पार्टी ने चुनाव में झेला। उसके सारे उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी। लेकिन धीरे-धीरे अरविन्द केजरीवाल ने अपने काम का तरीक़ा बदला। यही वजह है कि पिछले एक साल से ‘आप’  की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने अपने काम का दावा ठोकना शुरू किया। आम आदमी पार्टी ने सत्तर वादे किए थे। अब ‘आप’  उन्ही सत्तर कामों का रिपोर्ट कार्ड लेकर दिल्ली की जनता के पास पहुंच रही है।
दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया अपनी सरकार की सफलता में मोहल्ला क्लीनिक, अच्छी शिक्षा, सस्ती बिजली, हर मोहल्ले में अच्छी गलियां और सडक़ें बनवाने जैसी बातों को गिना रही है। उनका कहना है कि दिल्ली में स्वास्थ्य, बिजली, पानी और शिक्षा का स्तर बेहतर हुआ है जिससे आम आदमी को लाभ पहुंच रहा है और यही वजह है कि अब दिल्ली की जनता अच्छा काम करने वाले अरविन्द केजरीवाल की सरकार को फिर से चुनेगी।
‘आप’ का दावा है कि वो इस बार नया रिकॉर्ड बनाएगी। हालांकि, नागरिकता संशोधन क़ानून जैसे मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल की चुप्पी आम आदमी पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है।
‘आप’  की तरफ़ से राज्यसभा सांसद संजय सिंह जेएनयू छात्रों पर हुए हमले के बाद एम्स में घायलों से मिलकर उनका हाल-चाल ले चुके हैं। हालांकि, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस घटना के तुरंत बाद वहां नहीं पहुंचे। शायद वह किसी के भी पक्ष में खड़े होकर ध्रुवीकरण का हिस्सा नहीं बनना चाह रहे।
वहीं दिल्ली में कांग्रेस वापसी के लिए पुरज़ोर कोशिश कर रही है। साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी 54.3 फ़़ीसदी, बीजेपी 32.3 फ़ीसदी और कांग्रेस पार्टी मात्र 9।7 फ़ीसदी मत हासिल कर पाई थी। लेकिन पांच साल बाद, इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि वो बेहतर प्रदर्शन करेगी।
कांग्रेस की उम्मीद का एक कारण है कि झारखंड विधानसभा के नतीजे कांग्रेस को काफ़ी उत्सहित कर रहे हैं। कांग्रेस की सहयोगी राजद ने दिल्ली में चुनाव लडऩे की घोषणा कर बिहार-झारखंड के पूर्वाचंली वोटरों में सेंधमारी करने का इरादा ज़ाहिर किया। कांग्रेस को उम्मीद है कि यहीं पूर्वांचली वोट उसके सत्ता के रास्ते को साफ़ करेंगे। हालांकि कांग्रेस ये भी जानती है कि उसका पुराना वोटबैंक आज केजरीवाल सरकार का वोटबैंक है। अब कांग्रेस उसको फिर से हासिल करने की कोशिश में है और लोकलुभावन वादे भी कर रही है।
दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने ऐलान किया कि राजधानी में कांग्रेस पार्टी की सरकार आने पर सभी बुज़ुर्गों, विधवाओं व दिव्यांगों की पेंशन राशि को बढ़ाकर 5000 रुपये प्रतिमाह किया जाएगा। चूंकि नागरिकता संशोधन क़ानून पर आम आदमी पार्टी की ख़ास प्रतिक्रिया नहीं आई, इसलिए कांग्रेस इस बात को भी भुनाना चाहती है। कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में वो अच्छा प्रदर्शन करेगी।
हालांकि, कांग्रेस में गुटबाज़ी काफ़ी है। इसके अलावा कांग्रेस के पास नए चेहरों में कोई चमकता चेहरा नहीं है। इस चुनाव में कांग्रेस को अपने ताकतवर नेता जैसे शीला दीक्षित या सज्जन कुमार की कमी खलेगी।
15 साल तक दिल्ली में राज करने वाली शीला दीक्षित ने भले ही चुनाव में हार का सामना किया लेकिन लोगों को उनके चेहरे पर भरोसा था। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उस जगह को भरने वाला कोई नहीं है।
वहीं दिल्ली में बीजेपी भी अपने नेता की तलाश में है। दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी जिन पूर्वांचली वोटरों पर कब्ज़ा करने की कोशिश में हैं, उनपर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की नजऱ है।
बीजेपी कच्ची कॉलोनियों को नियमित करने के सहारे भी दिल्ली के लोगों का दिल जीतना चाहती है। साथ ही बीजेपी नागरिकता संशोधन क़ानून, राम मंदिर और राष्ट्रवाद के मुद्दे को भी लेकर भी मैदान में है।
दिल्ली में शहरी मतदाताओं के होने के चलते बीजेपी को उम्मीद है कि उसका राष्ट्रवाद का मुद्दा काफ़ी प्रभावी साबित हो सकता है। सिखों को लुभाने के लिए बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर गुरु गोविंद सिंह के वीर पुत्रों की याद में बाल दिवस मनाने की परंपरा शुरू करवाने का अनुरोध किया है।
बीजेपी दिल्ली की सत्ता से पिछले 21 साल से दूर है और पार्टी इस बार अपने सियासी वनवास को ख़त्म करने के लिए एड़ी चोटी की ज़ोर लगा रही है।
बीजेपी केंद्र सरकार के काम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को भुनाने की क़वायद में है क्योंकि दिल्ली में छह महीने पहले ही लोकसभा चुनाव की जंग केजरीवाल बनाम मोदी की हुई थी, जिसमें आप को काफी नुक़सान हुआ था। दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी जहां अपने कामकाज के सहारे सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए हुए है, वहीं कांग्रेस और बीजेपी अपने वोटबैंक को वापस पाने के जुगाड़ में लगी है।
नागरिकता संशोधन क़ानून के बाद देश में दिल्ली विधानसभा का पहला चुनाव है। इस क़ानून का विरोध हो रहा है और उसमें दिल्ली के तीन केंद्रीय विश्वविद्यालयों- जेएनयू, डीयू, और जामिया में कैंपस में विरोध की आग भडक़ी है।
जामिया और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों को हिंसा का भी सामना करना पड़ा। लेकिन ये मुद्दा दिल्ली के चुनावों में छाएगा या नहीं, ये समय बताएगा। (बीबीसी)

 

 


Date : 07-Jan-2020

डॉ. निर्मल चन्द्र अस्थाना, रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की प्रसिद्ध नज़्म ‘हम देखेंगे’ को लेकर बवाल मचा हुआ है। यहां पर उस नज़्म पर कुछ लिखकर समय नष्ट करने का कोई मतलब नहीं। जिनको शायरी की तमीज़ है और शायरी में दिलचस्पी है, वे फ़ैज़ और उनकी इस नज़्म की अहमियत को बख़ूबी जानते हैं। बात उस बवाल की कर लेते हैं जो किसी दूसरे देश में आज से 40 वर्ष पहले लिखी गई इन 22 लाइनों पर हो रहा है?
सबसे पहले तो शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध के विरोध में झंडा उठाने वालों से मेरा एक सवाल- भैया, आप 40 सालों तक सो रहे थे क्या?  इस दौरान फैज़़ के ऊपर सैकड़ों थीसिसें और किताबें लिखी गईं। लाखों-करोड़ों लोगों ने इसे प्रिंट में और न जाने कितने लोगों ने इसे इन्टरनेट पर पढ़ा होगा। अब तक तो आपको इस पर कोई ऐतराज़ नहीं हुआ था। अचानक ही आप जागे और चाह रहे हैं कि सब इसे ही सवेरा मान लें।
इसके दो ही कारण हो सकते हैं। या तो आपने इसे अब तक पढ़ा नहीं था, या इसमें विरोध के लायक कुछ पाया नहीं था। और जब पिछले महीने कुछ छात्रों ने इसे पढ़ दिया तो आपने ’हम तुम्हें देख लेंगे’ अभियान शुरू कर दिया। जाहिर है कि आपको गुस्सा उन छात्रों पर है जो आपका विरोध करने की हिमाक़त कर रहे थे। और मोहरा बन गई ‘हम देखेंगे’।
हम समझते हैं कि इसमें ऐतराज करने जैसा कुछ भी नहीं है। आप कहते हैं कि इसमें तो बड़ी क़ाबिले ऐतराज़ बातें हैं। चलिए आपकी बात को मान लिया तो अब आप जरा क़ानून समझ लें।
अगर आप कहते हैं कि इन 22 लाइनों को पढ़ देने मात्र से हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं या देश के ऊपर क़ानून-व्यवस्था का गंभीर खतरा मंडराने लगा है, तो आपको इतना तो पता ही होगा कि देश में न्यायालय और संसद नाम की चीज़ें भी हैं। आप अपने सांसदों से संपर्क करें और इस नज़्म को बैन करवा दें। या कोर्ट जाइए और वहां बहस कीजिये। जब तक आप कोर्ट से ऐसा कोई आदेश नहीं प्राप्त कर लेते कि इस नज़्म को कहीं भी पब्लिक प्लेस में पढ़ा जाना जुर्म है या फिर संसद से इस पर बैन नहीं लगवा लेते, तब तक इसे पढऩा गुनाह कैसे हो गया!
दूसरी बात, आपने 40 वर्ष पूर्व ही इस मामले को उठाया होता तो शायद कुछ बात बन भी सकती थी, कुछ किया जा सकता था। अब तो बैन लगवाने में भी दिक्क़त है। लाखों लोगों के पास यह नज़्म प्रिंट में होगी। और इन्टरनेट पर हज़ारों साइटों पर भी है। क्या आप लाखों-करोड़ों लोगों के घरों में घुस कर, उन किताबों को निकलवा कर उन्हें जलवा सकते हैं या उनका गूदा बनवा सकते हैं? असंभव! है कि नहीं? और इन्टरनेट पर, जो आपके हाथ में भी नहीं है, वहां से भी हटवा सकते हैं, क्या? आप हर हद से बाहर जाकर हद से हद यह आदेश ही निकलवा सकते हैं कि इसे पब्लिक प्लेस में न पढ़ा जाए। तो प्लीज़, पहले जाइए और ऐसा बेतुका आदेश अगर निकल सकता हो तो निकलवा लीजिए।
फैज़ की यह नज़्म 40 साल पुरानी है। आपकी निगाह में ऐसी आपत्तिजनक चीज़ें 400 या 4000 साल पुरानी भी हो सकती हैं। गरज़ यह कि कि किसी सुहानी सुबह आपके दिमाग में यह सुविचार आ जाए कि भई दुनिया के उस कोने की फलाना चीज आपके लिए आपत्तिजनक है, हिन्दू विरोधी है या राष्ट्र विरोधी है तो आप चाहेंगे कि आगे से कोई उसका नाम भी न ले। और कहीं ग़लती से नाम ले लिया तो आप ल_ लेकर दौड़ पड़ेंगे। आपमें से कई ऐसे भी हो सकते हैं जो ये कहेंगे कि उन्हें अपने धर्म के अलावा दुनिया की कोई बात पसंद नहीं है और उन सब पर बैन होना चाहिए। अब आप इतना पढ़े-लिखे तो होंगे ही कि यह समझ सकें कि यह दुनिया आपकी ख़ानदानी जागीर नहीं है। होश के नाख़ून लो, भैया! दुनिया हंस रही है हम पर!
वैसे आपके पास एक विकल्प और भी है। मैं बनारसी आदमी हूं और आपको वहां का एक वाकया बताता हूं। हमारे यहां एक मोहल्ला है, कर्णघंटा। इसका नाम कर्णघंटा क्यों पड़ा? कहते हैं कि पुराने समय में वहां कोई साधु रहते थे जो बड़े भारी शिव भक्त थे। इतने भारी भक्त कि वे शिव के अलावा और कोई शब्द सुनना ही नहीं चाहते थे। उन्होंने अपने कानों में दो घंटे लटका रखे थे। जब भी उन्हें ऐसा लगता कि उनके कानों में शिव के अलावा कोई और शब्द पडऩे वाला है तो वे अपने कानों को ज़ोर से हिला दिया करते थे ताकि घंटों की ध्वनि में वो दूसरा शब्द विलीन हो जाए।
आप भी कुछ ऐसा ही कर सकते हैं। आप बस वही देखें, वही सुनें, वही पढ़ें जो आपको पसंद हो। बाक़ी सबके लिए अपने महान वैज्ञानिकों से कहिये कि ऐसे फि़ल्टर का आविष्कार करें कि अन्य सारी बातें आपके सामने आते ही म्यूट हो जाएं। (सत्याग्रह)

 

 


Date : 07-Jan-2020

प्रकाश दुबे
संस्कृत की उक्ति है-महाजनो येन गत: स पंथ:। (बड़े लोग जिस राह से जाएं वही रास्ता अपनाना चाहिए)।
 प्रमोद महाजन नेता थे। महाजन भी नाम के साथ जुड़ा था। इसी राह पर चले। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनते ही करीबी दिखने के लिए पड़ोस की कोठी में जा पहुंचे। निकटता दिखाने वाले मंत्रियों से दूरी दिखाने के लिए नरेन्द्र मोदी ने खास गुजराती नुस्खा अपनाया। आसपास के तीन चार बंगले प्रधानमंत्री आवास में ज़ुड़वाए।
 केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल को दिलासा दी- प्रधानमंत्री न सही, पूर्व प्रधान सही। अटल बिहारी के निधन के बाद खाली कृष्ण मेनन मार्ग की कोठी को बसेरा बनाया। संसद अधिवेशन खत्म होने से संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी परम पुलकित हैं। अधिवेशन ठीक-ठाक निपट गया। पार्टी अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह की अकबर रोड वाली कोठी में प्रहलाद जोशी को गृह प्रवेश का सौभाग्य मिला।
आ बला, मुझे मार
चलती उसी की है जो घर संभाले। राजनाथ सिंह तो गृह मंत्री हैं नहीं। अमित भाई हैं। नागरिकता संशोधन विधेयक पर जोश में कह गए कि पड़ोस के देशों में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं। वहां से घुसपैठ होती है। इस सिलिसले में बांग्लादेश का नाम भी लिया। बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने कडक़ जवाब दिया। साथ ही बांग्लादेश सीमा रक्षक दल के महानिदेशक ने संवाद माध्यमों को बुलाकर आंकड़ा बताया कि कुल 999 बांग्लादेशी गैरकानूनी रूप से भारत में रहते थे। इन्हें गिरफ्तार किया गया है। 
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के विदेश नीति सलाहकार ने कोलाकाता जाकर चुनौती दी-एक भी बांग्लादेशी साबित कर दो। हम वापस लेंगे। पिछले कुछ बरसों से बांग्लादेश घनिष्ठ पड़ोसी है। बांग्लादेश के तीखे तेवर से विदेश मंत्री जयशंकर की बोलती बंद है। बांग्लादेश ने 96 नागरिकों की जारी कर कहा-ये भारतीय गैरकानूनी रूप से हमारे देश में रह रहे थे।  62 को भारत की सीमा में धकेला। बाकी को गिरफ्तार कर फटाफट कानूनी कार्रवाई शुरु कर दी। सीमा पर फोन सेवा यानी दूर संचार व्यवस्था बंद करा दी। यानी दलीलें सुनने का मूड नहीं है। जयशंकर हक्का बक्का रह गए।
खिदमतगार की अनदेखी 
नरेन्द्र मोदी सरकार के संकट छांटने के लिए तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव खुदाई खिदमतगार की तरह कृपालु बनकर प्रकट होते हैं। नागरिकता कानून पर बखेड़ा मचने पर तेलंगाना राष्ट्र समिति ने संसद में समर्थन का भरोसा दिलाते हुए मुसलमानों को शामिल करने की मांग रखी। सरकार ने एक नहीं सुनी। राव कहे जा रहे हैं कि तेलंगाना राष्ट्र समिति देशहित में विधेयक का समर्थन करेगी। बदले में चाहिए क्या?  बंगलूरु और हैदराबाद के बीच सडक़ मार्ग के लिए रक्षा विभाग की कुछ जमीन चाहिए। कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में रक्षा विभाग की जमीन सडक़ बनाने दी गई। दोनों राज्यों में भाजपा सरकार है। तेलंगाना सरकार को जमीन भी कितनी चाहिए? दो एकड़ से कम। केन्द्र सरकार ने नहीं दी तो नहीं दी।
झूम बराबर झूम
मौसम ही ऐसा है कि सोडे की दरकार नहीं रही। गरम पानी से लोग काम चला रहे हैं। भरे जाड़े में जनहितैषी मंत्री जनसेवा का उपाय सुझाता है। डांट खाता है। मदिरा की घर पहुंच सेवा शुरु करने का इरादा जतलाने पर मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने फटकार लगा दी। कर्नाटक के आबकारी मंत्री नागेश ने हार नहौौीं मानी। पत्रकारों को न्यौता दिया। उनसे कहा-गरीबों को अच्छी गुणवत्ता वाली शराब सस्ती दर पर दिलाने का विचार कर रहे हैं। दीनदयालु मंत्री ने कहा-बंगलूरु के लोग महंगी शराब खरीदते थे। हमारी पब्लिक नहीं खरीद पाती। किसी ने सवाल किया-गरीबी कार्ड दिखाने पर रियायत देंगे? मंत्री ने कहा-वित्त मंत्रालय से इस बारे में विचार विमर्श करेंगे। खलबली मची। मंत्री ने नेकनीयती का सबूत देने के लिए पत्रकारों को साल के आखिरी दिन यानी 31 दिसम्बर को बुलाया था। अब कहते हैं- उस दिन (या उस शाम) मैंने ऐसा तो नहीं कहा था।   
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 


Date : 07-Jan-2020

अपने यहां की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के जनरल सुलेमानी की हत्या कर दी। यह हत्या विज्ञान और तकनीक के उत्कृष्ट प्रयोग के जरिए की गई। जनरल सुलैमानी सीरिया से विमान द्वारा ईराक पहुंचे। वहां पर उनका स्वागत किया गया। बगदाद एयरपोर्ट पर वे गाडिय़ों के काफिले के साथ निकले। इसी बीच अमेरिकी ड्रोन ने मिसाइलें छोड़ी। जिन्होंने सीधे जनरल सुलैमानी की कार को निशाना बनाया। जनरल सुलेमानी की मौत हो गई। किसी वीडियो गेम की तरह। रिमोट के जरिए हत्याएं की जा सकती हैं। विज्ञान और तकनीक को इस हद तक पहुंचने के लिए कितना उत्कृष्ट होना पड़ा होगा।
ऑस्ट्रेलिया सदा से ही एक अभागा महाद्वीप रहा है। इसे अनूठा भी कह सकते हैं। जब पृथ्वी की प्लेटें खिसक रही थीं, उसी समय यह मुख्य जमीन से अलग हो गया था। उस समय तक यहां पर स्तनपायी जीवों का विकास भी नहीं हो पाया था। इसी के चलते यहां पर जैव विकास या इवोल्यूशन अलग दिशा पकड़ते हुए चला। यहां पर शिशुधानी वाले ऐसे गजब मार्सूपियर्स विकसित हुए, जो और कहीं नहीं पाए जाते। इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय कंगारू है। अपने पेट की थैली में बच्चे को लिए और पिछली दो टांगों पर उछलते कंगारुओं को हमने तस्वीरों में देखा है। उनकी शकल काफी कुछ चूहे या खरगोश से मिलती-जुलती है।
ऑस्ट्रेलिया की जैव-विविधता एकदम अलग है। वहां पर बहुत से अनूठे और निराले जीव रहा करते हैं। हम इंसानों के जाने के साथ ही वहां की जैव विविधता को नुकसान पहुंचना शुरू हुआ। ढुलाई के लिए कभी ऑस्ट्रेलिया में हजारों ऊंट ले जाए गए। जब रेलवे का विकास हुआ तो उन्हें छोड़ दिया गया। आज लाखों ऊंट यहां पर झुंडों में जंगलियों की तरह घूमा करते हैं। कभी इंसानों के साथ यहां पहुंचे कुत्तों की एक नस्ल यहां पर जंगलियों की तरह घूमा करती है। आप लोगों को शायद पता हो कि ऑस्ट्रेलिया शायद पहला देश है जहां पर लाखों बिल्लियों को समाप्त करने का अभियान लिया गया है। ये बिल्लियां भी यहां पर इंसानों के साथ ही पहुंची थी और धीरे-धीरे जंगलों पर इन्होंने कब्जा कर लिया।
जिंदगी ने ऑस्ट्रेलिया में अलग रास्ता पकड़ा था और आज मौत ने भी यहां पर कुछ अलग रास्ता पकड़ लिया है। पिछले तीन महीनों से ऑस्ट्रेलिया के जंगल जल रहे हैं। यह आग इतनी बड़ी है कि इसकी चपेट में ऑस्ट्रेलिया का एक बड़ा हिस्सा आ चुका है। बेल्जियम के क्षेत्रफल से भी ज्यादा का जंगल जल चुका है। पचास करोड़ से भी ज्यादा जीव-जंतु मर चुके है। इनमें से पता नहीं कितनों की प्रजाति समाप्त हो जाएगी। पता नहीं कौन फिर से जंगलों में वापसी कर पाएगा कि नहीं।
हर किसी के मन में यह सहज जिज्ञासा है कि आखिर यह आग क्यों लगी। जंगलों में आग लगना कोई अनोखी बात नहीं है। हमारे यहां भी उत्तराखंड के जंगलों में लगभग हर साल ही आग लगती है। इसके लिए वहां पर अलग शब्द दावानल का प्रयोग भी किया जाता है। लेकिन, जब आग इतनी भयंकर हो जाए, जो पूरे एक महाद्वीप को ही जलाकर राख कर देने पर उतारू हो जाए, तो निश्चित तौर पर उसके कारणों पर विचार किया जाना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया भी क्लाईमेट एमरजेंसी के उसी हमले का सामना कर रहा है, जिसका सामना दुनिया के अन्य देश दूसरी तरह से कर रहे हैं। यहां पर पिछले कई सालों से लगातार सूखा पड़ रहा है। 
पिछला दशक ऐतिहासिक तौर पर सबसे सूखा माना जा रहा है। बीते दिसंबर महीने में यहां पूरे राष्ट्र ने सबसे ज्यादा गरम दिन देखा था। यहां पर पूरे देश का औसत तापमान 41.9 डिग्री तक पहुंच गया था। लू चल रही थी।
वर्ष 1920 से लेकर अब तक ऑस्ट्रेलिया के औसत तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा हो चुका है। गर्मी लगातार बढ़ रही है। जंगल सूख रहे हैं। झाडिय़ां सूख रही हैं। नमी कम हो रही है। यानी आग के लिए वो सबकुछ मौजूद है, जिस पर वो फलती-फूलती है। इसी ने इस आग को भयंकर बना दिया है। तीन महीने से यह आग ऑस्ट्रेलिया के जंगलों को राख कर रही है। वहां से लगातार दिल तोडऩे वाली तस्वीरे आ रही हैं।
हालांकि, अभी जब मैं यह सब कुछ लिख रहा हूं तो ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्से में बारिश की बूंदे पडऩी शुरू हो गई हैं। बारिश की इन बूंदों का हर कोई बहुत ही बेताबी से इंतजार कर रहा था। खैर, अब मौसम की थोड़ी मेहरबानी हुई है। अगर यह मेहरबानी थोड़ी टिकी तो जंगलों की आग शायद बुझ भी जाए। लेकिन, कुछ बड़े सवाल हैं, जिन्हें यह आग हमेशा के लिए छोड़ जाएगी।
पूरी दुनिया में कहीं भी अपने ड्रोन भेजकर हत्याएं करने वाली तकनीक आखिर इंसान की भलाई में क्यों नहीं लगाई। ऑस्ट्रेलिया के जंगलों को जलने से बचाने के लिए आखिर पूरी दुनिया की ओर से पहल क्यों नहीं की गई।
विज्ञान और तकनीक का प्रयोग दुनिया को बचाने, इंसान की जरूरतें पूरी करने की बजाय दुनिया को नष्ट करने और इंसानों की हत्याएं करने के लिए क्यों हो रही हैं।

 

 


Date : 06-Jan-2020

तेहरान/ वाशिंगटन, 6 जनवरी । इराक की राजधानी बगदाद में अमेरिका की ओर से किये गये हवाई हमले में ईरानी कमांडर मेजर जनरल कासिम सुलेमानी तथा उसके कई सहयोगियों के मारे जाने के बाद सोमवार को दोनों देशों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गयी और पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया। 
ईरान समथित हिजबुल्ला विद्रोही अमेरिकी सैनिकों को निशना बनाते हुय लगातार हमले कर रहे है। बगदाद के ग्रीन जोन में स्थित अमेरिकी दूतावास और प्रमुख सरकारी कार्यालयों पर रविवार की शाम चार मोर्टार दागे गए।
एक अधिकारी ने बताया कि इस घटना में ग्रीन जोन में स्थित अमेरिकी दूतावास और इराक के सरकारी कार्यालय पर चार मोर्टार दागे गए। सूत्रों के अनुसार एक मोटार्र अमेरिकी दूतावास के पास टाइग्रिस नदी के तट पर गिरा।
शनिवार की शिया हिजबुल्ला विद्रोही नेता अबु अली अल असकरी ने इराकी सुरक्षाबलों को अमेरिकी ठिकानों से हटने की चेतावनी दी थी। इसके बाद ही यह घटना घटी।
इस हमले से दो दिन पहले शुक्रवार को अमेरिकी के बगदाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ड्रोन हमले में ईरानी कमांडर  जनरल सुलेमानी के अलावा ईरान समर्थित संगठन शिया पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स के उप प्रमुख अबु महदी अल-मुहांदिस समेत कई लोग मारे गये थे।
इन हमलों के कारण इन देशों में रह रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कई देशों को चिंता होने लगी है।
ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने अमेरिका को चेतावनी देते हुये कहा कि ईरान इस क्षेत्र में तनाव नहीं चाहता है लेकिन अमेरिका क्षेत्र में अस्थिरता बढऩे के लिए गलत कार्य कर रहा है और उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। श्री रूहानी ने कतर के विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी के साथ मुलाकात के दौरान कहा कि अमेरिका ने एक नया तरीका अपनाया है जो इस क्षेत्र के लिए बहुत ही खतरनाक है।
इस तनाव के बीच ईरान ने कहा है कि जबतक तेहरान से प्रतिबंध पूरीतरह हटा नहीं लिये जाते तबतक वह अमेरिका के साथ हुए परमाणु समझौते का पालन नहीं करेगा।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अब्बास मोसावी ने रविवार को कहा कि अमेरिका के साथ हमारे सहयोग और परमाणु समझौते पर चर्चा के बारे में रुख अभी वही हैं। उन्होंने कहा कि परमाणु समझौते पर बातचीत शुरू करने की प्राथमिक शर्त अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए प्रतिबंध हटाने की ही है। 
उधर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि ईरान किसी भी अमेरिकी नागरिक या अमेरिकी संपत्ति पर हमला करता है तो उस पर बहुत जल्द और बहुत बड़ा हमला किया जाएगा। उन्होंने ने कहा कि अमेरिका ने 52 ईरानी साइटों को चिन्हित कर रखा है जो कि सांस्कृतिक तौर पर उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
  उन्होंने कहा कि मुझे बताने की जरुरत नहीं है कि ईरान के सेना कमांडर मेजर जनरल कासिम सुलोमानी ने अपने जीवन अपने में कितने लोगों को मारा है और हाल ही में ईरान में मारे गए प्रदर्शनकारी शामिल था और अमेरिकी राजदूत पर हमला किया था तथा अन्य जगहों पर हमला करने की भी योजना बना रहा था।
इस बीच रविवार को जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल, फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने एक संयुक्त बयान जारी कर इराक में अमेरिका के गठबंधन वाले सैन्य संगठन पर हमले की निंदा की है और कहा है कि वे सभी सुलेमानी की क्षेत्र में भूमिका को लेकर चिंतित हैं।
  जर्मन मंत्रिमंडल द्वारा जारी बयान में कहा गया,‘‘हम इराक में गठबंधन सेनाओं के खिलाफ हमले की ङ्क्षनदा करते है और सुलेमानी के ईरान क्षेत्र में भूमिका से बेहद चिंतित है।’’ तीनों नेताओं ने इस क्षेत्र में तनाव को कम करने का भी आह्वान किया।
उधर इस मामले में बगदाद में अमेरिकी हमले में सुलेमानी और मुहांदिस समेत कई लोगों के मारे जाने की घटना को लेकर इराक ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वाशिंगटन के विरूद्ध आधिकारिक शिकायत दर्ज करायी है। इराक की संसदीय समिति ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सरकार से अमेरिका के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय संगठनों में शिकायत दर्ज कराने का अनुरोध किया था जिसके बाद इराक ने यह  कदम उठाया गया है। 
  ईरान के हैकरों के समूह ‘ईरान साइबर सिक्योरिटी ग्रुप’ ने अमेरिका में फेडरल डिपॉजिटरी लाइब्रेरी प्रोग्राम की ओर से संचालित एक सरकारी वेबसाइट में कथित रूप से सेंध लगाई है।
स्थानीय मीडिया के मुताबिक ईरानी हैकरों ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी सरकार की वेबसाइट पर हमला ईरान की साइबर क्षमता का ‘छोटा हिस्सा’ भर है। आउटलेट ने वेबसाइट पर नजर आ रहा एक बैनर भी प्रकाशित किया जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को चेहरे पर मारते हुए दिखाया जा रहा है और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमनेई की तस्वीर है।
बैनर पर लिखा हुआ है, ‘‘हम इस क्षेत्र में अपने दोस्तों का समर्थन करना बंद नहीं करेंगे। फिलिस्तीन के दबे-कुचले लोग, यमन के दमित लोग, सीरिया के लोग और वहां की सरकार, इराक की जनता और सरकार, बहरीन के दबे-कुचले लोग तथा लेबनान और फिलीस्तीन के सच्चे मुजाहिदीनों को हम हमेशा समर्थन देते रहेंगे।’’
अमेरिका के गृह सुरक्षा विभाग ने कहा है कि वह ईरान से किसी भी संभावित खतरे की निगरानी कर रहा है। विभाग के राष्ट्रीय आतंकवाद परामर्श प्रणाली बुलेटिन ने कहा कि ईरान महत्वपूर्ण अमेरिकी बुनियादी ढाँचे के पर हानिकारक प्रभावों वाले साइबर हमले करने में सक्षम है।
ब्रिटेन ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के मद्देनजर ब्रिटेन के जहाजों और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दो युद्धपोतों को हरमूज जलडमरूमध्य में भेजने का निर्णय लिया है।
इसबीच ब्रिटेन के रक्षा मंत्री बेन वालेस ने कहा है कि मैंने एचएमएस मोंट्रोस और एचएमएस डिफेंडर को हरमूज जलडमरूमध्य में  रेड एनसाइन शिपिंग के साथ तैनाती का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार इस समय हमारे जहाजों और नागरिकों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगी। (वार्ता)
 


Date : 06-Jan-2020

इमामुद्दीन का गंगा देवी से कोई रिश्ता नहीं था, लेकिन प्रेम रिश्ते का मोहताज नहीं होता। यह कहानी 33 साल पहले शुरू हुई थी। इमामुद्दीन और आयशा बानो मियां बीवी थे। दोनों मज़दूरी करते थे और एक हिंदू के घर में किराये पर रहते थे।

घर मालिक चंद्रभान की अचानक मौत हो गई। उनकी पत्नी गंगा देवी बेसहारा हो गईं। गंगा को कोई औलाद भी नहीं थी। भाग्य ने उनके साथ और खेल खेला। उन्हें लकवा मार गया।
गंगा की जिंदगी एक चारपाई में सिमट गई तो उनके अपनों ने भी उनका साथ छोड़ दिया।
इमामुद्दीन के बचपन में ही सिर से मां का साया उठ गया था। उन्हें गंगा देवी में अपनी मां दिखाई दी। इमामुद्दीन और उनकी बीवी आयशा दोनों बेघर मज़दूर थे तो क्या हुआ, दिल में खूब जगह थी। दोनों ने गंगा देवी की देखभाल शुरू कर दी।
गंगा के इलाज पर मोटा माल खर्च हुआ जिसके लिए इमामुद्दीन ने अपनी जमा पूंजी सब खर्च कर दी।
दोनों मियां बीवी मजदूरी करते और साथ साथ गंगा की सेवा भी। आयशा और इमामुद्दीन के लिए गंगा अब उनकी मां थी। उन्हें नहलाना, कपड़े बदलना, अपने हाथों से खाना खिलाना, दवा कराना, सारी जिम्मेदारी इन दोनों की थी।
साथ लंबा हुआ तो रिश्ता और गाढ़ा होता गया। आयशा बहू की तरह मां के पैर दबाती तो बेटा इमामुद्दीन उन्हें कुर्सी पर बैठाकर घुमा लाता। ऐसा वे किसी दबाव या लालच में नहीं कर रहे थे।
समय बीतता गया। इमामुद्दीन ने अपना छोटा सा घर बनवा लिया। तब तक गंगा का घर भी खंडहर हो गया था। अब गंगा इमामुद्दीन के साथ नये घर में आ गईं।
इमामुद्दीन से लोगों ने पूछा कि ये सब करने की क्या ज़रूरत है? इमामुद्दीन ने कहा, उसे मेरी नहीं, मुझे उसकी जरूरत है।
गंगा लोगों से कहतीं, भगवान ने मुझे औलाद नहीं दी थी, लेकिन अब मिल गई है। अब यही दोनों मेरे बहू बेटे हैं।
लकवा मारने के बाद गंगा ने 33 साल लंबी जि़ंदगी जी ली। हाल ही में गंगा की मौत हो गई।
जब देश भर में हिंदू मुस्लिम का खेला चल रहा है, तब इमामुद्दीन ने गंगा का हिंदू रीति से अंतिम संस्कार किया है और गंगा की अस्थियां हरिद्वार में विसर्जित करके लौटे हैं। उन्होंने दान पुण्य क्रिया कर्म सब वैसे ही निभाया जैसा होना चाहिए था।
इमामुद्दीन ने बुढिय़ा गंगा को मथुरा काशी के वृद्धाश्रम में नहीं डाला। ताउम्र उसकी सेवा की। गंगा की अस्थियां अब गंगा में मिल चुकी हैं और हिंदुओं की देवी गंगा ने इमामुद्दीन के हाथ से अस्थि कलश स्वीकार कर लिया है।
यह कहानी काल्पनिक नहीं है। यह कहानी राजस्थान के नीमकाथाना की है, जिसके पड़ोसी राज्य से शुरू हुआ नफरत और बंटवारे का कारोबार आज पूरे देश को त्रस्त किये हुए है।


Date : 05-Jan-2020

पुलकित भारद्वाज

दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजऱ आम आदमी पार्टी (आप) ने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश कर दिया है। यह काफी हद तक उस घोषणा पत्र से मिलता-जुलता नजऱ आता है जिसे आम आदमी पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव से पहले जारी किया था। दूसरे शब्दों में कहें तो आप इसके जरिए यह कहना चाहती है कि उसने अपने ज्यादातर वायदों को पूरा किया है और इसलिए उसे दिल्ली का सत्ता का एक और मौका मिलना चाहिए।
दिल्ली में कई लोग ऐसे हैं जो आम आदमी पार्टी के रिपोर्ट कार्ड से एक हद तक सहमत हैं। लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो आम आदमी पार्टी से खासे निराश नजऱ आते हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने इस पार्टी से दूषित हो चुकी परंपरागत राजनीति के तौर-तरीकों को बदल देने की उम्मीद पाली थी। लेकिन अब उन्हें लगता है कि एक ऐतिहासिक जनांदोलन की परिणति के तौर पर उभरी आप भी उसी रंग-ढंग में ढल चुकी है जिसमें कि देश के बाकी राजनीतिक दल ढले हुए हैं।
ताजा मामला चर्चित चुनावी रणनीतिकार और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर से जुड़ा है। हाल ही में आप संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव के लिए प्रशांत किशोर की प्रचार कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) से हाथ मिलाया है। प्रशांत इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनावों में (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी को अपनी सेवाएं दे चुके हैं। बाद में उन्होंने नीतीश कुमार, कांग्रेस और जगन मोहन रेड्डी के लिए भी काम किया। आई-पैक पश्चिम बंगाल के अगले विधानसभा चुनाव के लिए वहां की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर भीे काम कर रही है।
प्रशांत किशोर को साथ लेने से कई विश्लेषकों को इसलिए ऐतराज है क्योंकि उनका काम एक इवेंट मैनेजर के जैसा है। माना जाता है कि वे किसी राजनेता या उसकी पार्टी के लिए इस तरह चुनावी कैंपेन तैयार करते हैं कि उसकी चकाचौंध और शोर-शराबे में असल मुद्दे कहीं गौण से हो जाते हैं। यह बात आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल भी अच्छी तरह से जानते हैं। बल्कि प्रशांत किशोर की इसी खासियत की वजह से उन्हें चुना गया है।
उदाहरण, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले आयोजित कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की ‘खाट-सभाओं’ को शायद ही कोई भूला हो! लेकिन यह बता पाने में अधिकतर लोग नाकाम हो जाते हैं कि उन सभाओं में राहुल गांधी ने किन बातों को प्रमुखता से उठाया था या फिर कांग्रेस तब किन मुद्दों के आधार पर अपनी खोई जमीन तलाश रही थी।
अब अरविंद केजरीवाल द्वारा प्रशांत किशोर को साथ लेने पर एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘केजरीवाल एक ऐसे नायक सरीखे थे जिसने लोकतंत्र को सच्चे अर्थों में उसकी गरिमा लौटाई थी। जब धनबल और बाहुबल के सहारे परिणामवादी संसदीय राजनीति को लोकतंत्र का पर्याय बनाने की कोशिश हो रही थी, जब समाज को बांटने वाली राजनीति पूरी निरंकुशता के साथ आगे बढ़ रही थी, तब केजरीवाल ने कमज़ोर, बेदखल, विस्थापित और लाचार लोगों के स्वस्फूर्त कैंपेन की बदौलत एक बैलेट क्रांति कर डाली। तब आम आदमी पार्टी के दृष्टिकोण से ईमानदारी झलकती थी। लेकिन एक आर्टिफिशियल कैंपेन का सहारा लेने का मतलब है कि आप अब वह नैतिक आधार खो चुकी है।’
लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब आप के तौर-तरीकों से भारत में मौजूद अन्य राजनीतिक दलों की झलक दिखी हो। दरअसल इसकी शुरुआत 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद से ही हो गई थी। तब 70 में से 28 सीटें हासिल कर आम आदमी पार्टी ने उसी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली थी जिसे कोस-कोसकर उसके प्रमुख नेताओं ने राजनैतिक गलियारों में अपनी पहचान स्थापित की थी।
फिऱ इसके 49 दिन बाद ही जन लोकपाल विधेयक के प्रस्ताव को समर्थन न मिल पाने के कारण अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके इस फैसले के चलते मीडिया से लेकर राजनैतिक गलियारों में उन्हें अनुभवहीन और भगोड़ा तक कहा गया। लेकिन दिल्ली की जनता ने ‘आप’ का साथ नहीं छोड़ा और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में पार्टी ने 67 सीटों पर जीत का परचम लहराकर इतिहास रच दिया।
लेकिन इस दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही पार्टी में अंदरखाने अरविंद केजरीवाल पर अलोकतांत्रिक और तानाशाह होने के आरोप लगने लगे। इसकी शुरुआत आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य रहीं शाजिय़ा इल्मी ने की थी। उन्होंने जल्द ही पार्टी भी छोड़ दी। ये कुछ वैसे ही आरोप थे जिन्हें आप के बाकी नेताओं की तरह अरविंद केजरीवाल भी देश के मौजूदा राजनैतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व पर जोर-शोर से लगाया करते थे।
फिऱ, आप समर्थकों को बड़ा झटका मार्च-2015 में तब लगा जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ प्रोफेसर आनंद कुमार तथा अजीत झा जैसे सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने न सिफऱ् इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया बल्कि पार्टी के दूसरे धड़े पर अपने समर्थक सदस्यों से मारपीट करने का भी आरोप लगाया। आदर्शवादी समझे जाने वाले इन दो संस्थापक नेताओं को निकाले जाने से ‘आप’ की छवि को बड़ा बट्टा लगा था।
इसके कुछ ही दिन बाद पार्टी के पूर्व विधायक राजेश गर्ग ने भी एक ऑडियो क्लिप जारी कर अरविंद केजरीवाल को कटघरे में ला खड़ा किया। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले के इस टेप में केजरीवाल कथित तौर पर गर्ग से कांग्रेस विधायकों के साथ संपर्क साधने और अलग गुट बना कर आम आदमी पार्टी को समर्थन देने की बात करते सुनाई दिए थे।
इस टेप के आने के बाद आप की महाराष्ट्र इकाई का चेहरा रहीं अंजलि दमानिया ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। इसी तर्ज पर शांति भूषण, मयंक गांधी, कैप्टन गोपीनाथ और कपिल मिश्रा जैसे प्रमुख नेता भी आम आदमी पार्टी से दूर होते गए। इन सभी ने भी केजरीवाल पर टिकट बंटवारों में मनमानी करने, ईमानदारी की राजनीति से पीछे हटने, कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल करके उन्हें छोड़ देने और पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को ख़त्म करने जैसे इल्ज़ाम लगाए। अपने इस कार्यकाल में अरविंद केजरीवाल पर मौकापरस्त राजनेता होने के आरोप भी जमकर लगे। 
ऐसा खास तौर पर तब हुआ जब उनके दिल्ली छोडक़र पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा था। लेकिन तब ‘आप’  अपने प्रमुख गढ़ पंजाब में कुछ खास प्रदर्शन करने में बुरी तरह नाकाम हुई। इसके कई कारणों में से एक यह भी माना जाता है कि पंजाब में चुनाव जीतने के लिए आप खालिस्तान समर्थकों और कट्टरपंथियों का समर्थन लेने लगी थी।
इसके अलावा आप शीर्ष नेतृत्व ने पंजाब में संगठन की कमान अपने प्रमुख नेताओं में से किसी को सौंपने के बजाए कांग्रेस से आए उन सुचा सिंह छोटेपुर को दे दी जिनकी छवि प्रदेश में दलबदलू नेता के तौर पर स्थापित थी। इस पर आप से निलंबित हुए पूर्व सांसद हरिंदर सिंह खालसा ने भरे मंच से पार्टी हाईकमान पर धन के बदले जिम्मेदारियों की बंदरबांट करने का आरोप लगाया। इससे पंजाब में ‘आपर्’ का बड़ा समर्थक वर्ग जिसमें खास तौर पर युवा शामिल थे, उससे बिदक गया।
वहीं दिल्ली में आम आदमी पार्टी पर दूसरे राजनीतिक दलों की तरह मीडिया मैनेज करने के आरोपों ने भी ख़ूब सुर्खियां बटोरी थीं। कहा जाता है कि आप ने हिंदी-अंग्रेजी के सभी मुख्य अखबारों और चैनलों के वरिष्ठ पत्रकारों को विभिन्न सरकारी समितियों में नियुक्त करने के साथ-साथ विभिन्न मीडिया घरानों को करोड़ों रुपए के विज्ञापन देने जैसे हथकंडे भी अपनाए ताकि वह अपने खिलाफ चलने वाली ख़बरों को प्रभावित कर सके।
2017-18 में दिल्ली सरकार ने सूचना और प्रचार के लिए 198 करोड़ रुपए आवंटित किए थे जबकि 2018-19 के लिए यह बजट बढ़ाकर 257।42 करोड़ रुपये कर दिया गया। बीते पांच साल में ‘आप’ ने भी अन्य क्षेत्रीय-राष्ट्रीय क्षत्रपों की तरह अपने प्रमुख अरविंद केजरीवाल को ब्रांड बनाया और उनकी तस्वीरों से दिल्ली शहर को पाटे रखा। वहीं, दूसरी तरफ़ अरविंद केजरीवाल अपने एक इंटरव्यू में एक पत्रकार पर सिफऱ् इसलिए भडक़ गए क्योंकि उसने नोटबंदी की वजह से 55 लोगों की मौत हो जाने के उनके आरोपों की पुष्टि करने से इन्कार कर दिया था।
अपने कार्यकाल में अरविंद केजरीवाल ने कई बार अपने विरोधियों पर पहले तो बेबुनियाद आरोप लगाए, फिऱ बाद में इसके लिए बिना शर्त माफी मांगकर अपनी और पार्टी की फज़़ीहत भी करवाई। इसके उदाहरण के तौर पर शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम मजीठिया, भाजपा के अरुण जेटली, नितिन गडकरी और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल से जुड़े मामलों को याद किया जा सकता है। जानकारों के मुताबिक इन घटनाओं ने उन लोगों को केजरीवाल से दूर करने में बड़ी भूमिका निभाई जो बतौर राजनेता उनसे जिम्मेदारी भरे आचरण और उस पर टिके रहने की उम्मीद रखते थे।
इसके अलावा अरविंद केजरीवाल द्वारा अपनी हर नाकामी के लिए बार-बार दिल्ली के उपराज्यपाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराने, या कहें कि उनके एक मजबूत विकल्प की बजाए शिकायतों की पोटली बन जाने ने भी कई लोगों को खिजाने का काम किया। यह कुछ वैसा ही था जैसा कि भाजपा कांग्रेस या देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को लेकर करती रही है।
आम आदमी पार्टी के अन्य राजनीतिक दलों की कतार में खड़े होने में जो कसर बाकी रही थी वह बीते साल राज्यसभा चुनाव ने पूरी कर दी। तब आप हाईकमान ने दिल्ली की तीन में से दो राज्यसभा सीटों पर कांग्रेस छोडक़र आए नारायण दास गुप्ता और सुशील गुप्ता को अपना उम्मीदवार बना दिया। जबकि इन सीटों पर कुमार विश्वास, मीरा सान्याल और आशुतोष जैसे आप के नेताओं की दावेदारी शुरुआत से ही तय मानी जा रही थी। इसके बाद से कुमार विश्वास खुलकर अरविंद केजरीवाल के विरोध में आ गए।
शायद ‘आप’ पर से लोगों का घटता हुआ भरोसा ही था कि पहले राजौरी गार्डन की विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव और फिऱ नगर निगम चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद पार्टी पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सात में से पांच सीटों पर तीसरे पायदान पर फिसल गई। जबकि 2014 के चुनाव में आप प्रदेश के सभी लोकसभा क्षेत्रों में दूसरे स्थान पर रही थी।
गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में आप को दिल्ली में 33 फीसदी वोट मिले थे जबकि इस बार यह आंकड़ा सिर्फ 18 फीसदी पर ही सिमट गया। कुछ-कुछ ऐसा ही हाल पंजाब का भी था जहां 2014 में जबरदस्त मोदी लहर के बावजूद आम आदमी पार्टी 19 में से चार सीटें जीतने में सफल रही थी। इस बार वहां पार्टी को सिर्फ एक ही सीट पर जीत हासिल हो सकी।
हालांकि इस सब के बाद भी दिल्ली में ऐसे मतदाताओं की कमी नहीं जिनका भरोसा ‘आप’ में पहले की तरह कायम है। इसमें अरविंद केजरीवाल के बदले अंदाज ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। उन्होंने बीते कुछ महीनों के दौरान फिज़ूल के विवादों में उलझे बिना जनहित से जुड़ी योजनाओं को अमली जामा पहनाने की दिशा में काफी काम किया है।
इसे देखते हुए दिल्ली में ‘आप’ के समर्थक जिस बात को जोर देकर कहते हैं, उसका लब्बोलुआब यह है - अंदरखाने आप में जो कुछ हुआ वह उसका निजी मसला था। राजनीति में टिके रहने के लिए मजबूरन कई तरह के दांव-पेंच अपनाने पड़ते हैं। लेकिन यह बात नजऱअंदाज नहीं की जा सकती कि आप देश की इकलौती ऐसी पार्टी है जो लगातार दूसरी बार शिक्षा, स्वास्थ्य, सस्ती बिजली, सस्ते पानी और सुरक्षित शहर जैसे बुनियादी मुद्दों पर चुनाव लडऩे जा रही है। इसके लिए अरविंद केजरीवाल निश्चित तौर पर साधुवाद के पात्र हैं, क्योंकि भारत की सड़ चुकी राजनीतिक व्यवस्था के बीच ऐसा कर पाना आज भी कोई आम बात नहीं है।
अच्छा होता कि प्रशांत किशोर के बजाए अरविंद केजरीवाल अपने काम और दिल्ली के मतदाताओं पर ज्यादा भरोसा कर पाते। (सत्याग्रह)

 


Date : 05-Jan-2020

फैसल फरीद

एंग्लो इंडियन समुदाय से सोलहवीं लोकसभा में नामित सदस्य जॉर्ज बेकर भी इस सुविधा को जारी रखने के पक्ष में है। बेकर 2014 की लोक सभा के सदस्य थे। बेकर कहते हैं, ये सुविधा अगर लोक सभा में नहीं तो कम से कम विधान सभा में जरूर जारी रखनी चाहिए। एंग्लो इंडियन समुदाय पूरे भारत में फैला हुआ है। 

भारतीय संविधान के 126वें संशोधन के अनुसार अब उत्तर प्रदेश विधानसभा ने भी दलितों के लिए आरक्षण को आगे जारी रखने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया है। वहीं एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित एक सीट समाप्त हो सकती है।
भारत के लगभग सभी बड़े नगरों और शहर में आपको ऐसे स्कूल मिल जाएंगे जिनको एंग्लो इंडियन समुदाय द्वारा संचालित किया जाता है। समाज में इस समुदाय को लोगों को अब भी कई लोग, अंगरेज, समझते हैं। भारत के संविधान के अंतर्गत लोक सभा में 2 और राज्यों की विधान सभा में 1 सदस्य एंग्लो इंडियन समुदाय से नामित किया जाता है। लेकिन अब इस प्रावधान पर ब्रेक लग सकता है। संसद द्वारा पारित अधिनियम की उत्तर प्रदेश विधान सभा ने भी पुष्टि कर दी है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधान सभा में 404 सदस्य होते है जिसमें एक सदस्य एंग्लो इंडियन समुदाय से नामित होता है। अब उत्तर प्रदेश विधान सभा में 403 सदस्य रह जाएंगे।
कौन होते हैं एंग्लो इंडियन
एंग्लो इंडियन जिनको हिंदी में आंग्ल भारतीय कहा जाता है उनकी परिभाषा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 (2) में परिभाषित की गयी है। इसके अनुसार, आंग्ल-भारतीय से ऐसा व्यक्ति है जिसका पिता या पितृ-परंपरा में कोई अन्य पुरूष जनक यूरोपीय उद्भव का है या था, किन्तु जो भारत के राज्यक्षेत्र में अधिवासी है और जो ऐसे राज्यक्षेत्र में ऐसे माता-पिता से जन्मा है या जन्मा था जो वहां साधारणतया निवासी रहे हैं और केवल अस्थायी प्रयोजनों के लिए वास नहीं कर रहे हैं।
इस परिभाषा के अनुसार ये बात बिलकुल साफ है कि हर ईसाई व्यक्ति एंग्लो इंडियन नहीं होता है। इसके लिए पुरुष जनक यूरोपीय मूल का होना चाहिए। बहुत से एंग्लो इंडियन लोग प्रसिद्ध हुए। जैसे कि कीलर बंधू। ये दोनों भाई एयर फील्ड मार्शल डेंजिल कीलर और विंग कमांडर ट्रेवोर कीलर भारतीय वायु सेना का हिस्सा रहे। इतिहास में ऐसे मौके कम ही होंगे जब दो भाइयों को वीर चक्र से सम्मानित किया गया हो। दोनों के अदम्य साहस और वीरता के कारण 1965 के भारत-पाक युद्ध में वीर चक्र से सम्मानित हुए थे। दोनों का जन्म लखनऊ में हुआ था। 
इसके अलावा फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड कुक ने लखनऊ में पढ़ाई की थी और उनको भी 1965 के भारत-पाक युद्ध में वीर चक्र से सम्मानित किया गया। और भी कई प्रसिद्ध एंग्लो इंडियन समुदाय कि हस्तियां हुई हैं जैसे पीटर फैनथम जो कई बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य रहे एवं आईसीएसई के चेयरमैन भी हुए। पॉप सिंगर क्लिफ रिचर्ड भी लखनऊ में पैदा हुए। वहीं जॉर्ज बेकर ने भी लखनऊ के लामार्टिनियर कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की है। हॉलीवुड कलाकार माइकल बेट्स का भी जन्म झांसी में हुआ था।
कैसी है एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था
भारत के संविधान के अनुच्छेद 331 के अंतर्गत लोकसभा में एंग्लो इंडियन समुदाय के अधिकतम 2 सदस्यों के नामांकन का प्रावधान भारत के राष्ट्रपति के अधिकार में हैं। वहीं एंग्लो इंडियन समुदाय को भारत के संविधान के अनुच्छेद 333 के अंतर्गत विधानसभा में अधिकतम 1 सदस्य का नाम निर्देशित करने का अधिकार कुछ राज्यों के राज्यपाल के पास निहित है। एंग्लो इंडियन समुदाय को भारत के संविधान के अनुच्छेद 334 (ख) के अंतर्गत लोक सभा और राज्यों की विधान सभा में नाम निर्देशन के द्वारा प्रतिनिधित्व प्राप्त है।
वहीं भारत के संविधान के अनुच्छेद 334 (क) द्वारा लोकसभा और राज्यों की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण संबंधी प्रावधान है। वर्तमान में लोक सभा और राज्यों की विधान सभा में केवल यही आरक्षण है जिसमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित रहती है।
संविधान में 126वां संशोधन
एंग्लो इंडियन समुदाय के नामांकन एवं अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षण की समय सीमा 70 वर्ष के उपरान्त अर्थात 25 जनवरी 2020 को समाप्त हो रही थी। संसद द्वारा लोक सभा और राज्य सभा ने दिसंबर 2019 को संविधान (एक सौ 26वां संशोधन) विधेयक 2019 पारित कर दिया। इससे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सीटों के लिए आरक्षण सीमा दस वर्ष बढ़ा दी गयी है।
परन्तु एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए इसमें कोई जिक्र नहीं है। इससे ये तात्पर्य निकलता है कि अगर प्रावधान न किया गया तो भविष्य में एंग्लो इंडियन समुदाय को नाम निर्देशन द्वारा सदनों में प्रतिनिधित्व समाप्त हो जाएगा। वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधान सभा में 404 सदस्य होते है जिसमें एक सदस्य एंग्लो इंडियन समुदाय से नामित होता है।
क्या कहता है एंग्लो इंडियन समुदाय
वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधान सभा में डेंजिल जे गोडिन नामित सदस्य है। जब राज्य विधान सभा में जब इस विधेयक कि पुष्टि हुई तब भी डेंजिल ने अपना मत रखा। डेंजिल बताता है कि संभवत: इसमें कुछ आंकड़ों की गलती हो गई है। डेंजिल कहते हैं, कानून मंत्री द्वारा ये बताया गया कि एंग्लो इंडियन समुदाय के मात्र 296 लोग है। ऐसा संभव नहीं है। हमारे लखनऊ में ही 500 लोग है। पूरे देश में लगभग 3.5 से 6.5 लाख लोग है।
डेंजिल का मानना है कि चूंकि जनगणना फार्म में एंग्लो इंडियन लिखने का कोई कॉलम नहीं होता उन्होंने धर्म क्रिस्चियन लिखवाया। डेंजिल ने कहा, इसमें कोई जाति होती नहीं है। एंग्लो इंडियन समुदाय के लोग अंग्रेजी ज्यादा बोलते हैं तो हो सकता है कि उन्होंने धर्म की जगह यही लिखवा दिया गया हो। इस कारण गलती हुई है। लेकिन गलती को सुधारा भी जा सकता है। हमें नेताओं से यही आशा है।
पूरे भारत में केवल 296!
डेंजिल के अनुसार उनका समुदाय हमेशा से राष्ट्र निर्माण में लगा रहा है। आंकड़ों के हिसाब से उनका योगदान अत्यधिक है। डेंजिल बताते है कि पिछले वर्ष 26 जनवरी को राजपथ पर जिस वायु सेना अधिकारी ने फूल बरसाए थे वो भी एंग्लो इंडियन है। वे कहते हैं, पूरे देश में हमारा समुदाय स्कूल, अस्पताल स्थापित करता है। इससे सरकार की समस्त योजनाओं का लाभ जन मानस तक पहुचाया जाता है। गोडिन इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिल चुके हैं और आशावान्वित है कि उनके समुदाय के बारे में अवश्य सोचा जायेगा।
एंग्लो इंडियन समुदाय से सोलहवीं लोकसभा में नामित सदस्य जॉर्ज बेकर भी इस सुविधा को जारी रखने के पक्ष में है। बेकर 2014 की लोक सभा के सदस्य थे। बेकर कहते हैं, ये सुविधा अगर लोक सभा में नहीं तो कम से कम विधान सभा में जरूर जारी रखनी चाहिए। एंग्लो इंडियन समुदाय पूरे भारत में फैला हुआ है। उनका अगर विधान सभा में प्रतिनिधित्व रहेगा तो वो अपनी आवाज रख सकते हैं। हालांकि इस संदर्भ में कानून मंत्री का बयान देना कि देश में मात्र 296 एंग्लो इंडियन हैं, समझ से परे है। (डॉयचेवेले)

 

 


Date : 04-Jan-2020

जॉनाथन मार्कस
इराक की राजधानी बग़दाद में ईरान के बहुचर्चित कुद्स फोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या ने अमरीका और ईरान के बीच चल रहे निम्नस्तरीय संघर्ष को नाटकीय ढंग से एक उछाल दे दिया है जिसके परिणाम काफ़ी गंभीर हो सकते हैं।
उम्मीद की जा रही है कि ईरान इसका जवाब देगा। पर प्रतिशोध और प्रतिक्रियाओं की यह श्रृंखला दोनों देशों को सीधे टकराव के कऱीब ला सकती है।
अब इराक़ में अमरीका का भविष्य क्या होगा, यह सवाल तो उठेगा ही। पर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मध्य-पूर्व क्षेत्र के लिए अगर कोई रणनीति बनाई हुई है, तो उसका परीक्षण भी अब हो जाएगा।
फि़लिप गॉर्डन जो कि बराक ओबामा की सरकार में व्हाइट हाउस के लिए मध्य-पूर्व और फ़ारस की खाड़ी के सह-समन्वयक रहे, उन्होंने कहा है कि सुलेमानी की हत्या अमरीका का ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा से कम नहीं है।
कुद्स फोर्स ईरान के सुरक्षा बलों की वो शाखा है जो उनके द्वारा विदेशों में चल रहे सैन्य ऑपरेशनों के लिए जिम्मेदार है और सुलेमानी वो कमांडर थे जिन्होंने वर्षों तक लेबनान, इराक़, सीरिया समेत अन्य खाड़ी देशों में योजनाबद्ध हमलों के जरिए मध्य-पूर्व में ईरान और उसके सहयोगियों के प्रभाव को बढ़ाने का काम किया।
अमरीका ने सुलेमानी पर हमले का फैसला अभी क्यों लिया?
पर अमरीका के लिए जनरल क़ासिम सुलेमानी के हाथ अमरीकियों के ख़ून से रंगे थे। वहीं ईरान में सुलेमानी किसी हीरो से कम नहीं थे। व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो ईरान पर दबाव बनाने के लिए अमरीका के चलाए गए व्यापक अभियान और प्रतिबंधों के खिलाफ जारी लड़ाई का सुलेमानी ने नेतृत्व किया।
पर अधिक आश्चर्य की बात ये नहीं है कि सुलेमानी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के निशाने पर थे, बल्कि ये है कि अमरीका ने सुलेमानी पर हमले का फैसला इस वक्त ही क्यों किया?
इराक में अमरीकी सैन्य ठिकानों पर निचले स्तर के रॉकेटों से किए गए सिलसिलेवार हमलों का दोषी ईरान को ठहराया गया था। इन हमलों में एक अमरीकी ठेकेदार की मौत हो गई थी।
इससे पहले ईरान ने खाड़ी में टैकरों पर हमला किया, अमरीका के कुछ मानवरहित हवाई वाहनों को गिराया, यहां तक कि सऊदी अरब के एक बड़े तेल ठिकाने पर हमला किया। इन सभी पर अमरीका ने कोई प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया नहीं दी थी।
एक तीर से दो निशाना
रही बात इराक में अमरीकी सैन्य ठिकानों पर रॉकेटों से हमले की, तो अमरीका ने ईरान समर्थक सैन्य गुटों को इन हमलों का मास्टरमाइंड मानते हुए, उनके खिलाफ कार्रवाई की थी। इस कार्रवाई ने बग़दाद स्थित अमरीकी दूतावास परिसर में संभावित हमले को प्रेरित किया था।
सुलेमानी को मारने का फ़ैसला क्यों किया गया, यह समझाते हुए अमरीका ने ना सिफऱ् उनके पिछले कारनामों पर ज़ोर दिया, बल्कि ज़ोर देकर यह भी कहा कि उनकी हत्या एक निवारक के तौर पर की गई है।
अमरीका ने अपने आधिकारिक बयान में लिखा भी है कि कमांडर सुलेमानी सक्रिय रूप से इराक़ और उससे लगे क्षेत्र में अमरीकी राजनयिकों और सेवा सदस्यों पर हमला करने की योजनाएं विकसित कर रहे थे। अब बड़ा सवाल ये है कि आगे क्या होता है। राष्ट्रपति ट्रंप जरूर यह सोच रहे होंगे कि उन्होंने इस नाटकीय कार्रवाई के ज़रिए एक साथ दो निशाने लगा लिए हैं।
पहला तो ये कि इस हमले के ज़रिए अमरीका ने ईरान को धमकाया है। और दूसरा ये कि मध्य-पूर्व में अमरीका के सहयोगी सऊदी अरब और इसराइल, जिनकी बेचैनी पिछले कुछ वक़्त से लगातार बढ़ रही थी, उन्हें अमरीका ने यह जता दिया है कि अमरीका के तेवर अभी भी क़ायम हैं, वो उनके साथ है, उन्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।
ईरान अब क्या कर सकता है?
हालांकि, यह लगभग अकल्पनीय है कि ईरान इसके जवाब में कोई आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं देगा। इराक़ में तैनात पांच हजार अमरीकी सैनिक संभवत: ईरान के लक्ष्य पर होंगे। ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि अतीत में ईरान और उसके समर्थकों ने जवाबी कार्रवाई के तौर पर ऐसा किया है। खाड़ी में अब तनाव बढ़ेगा ऐसा लगता है और इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इसका प्रारंभिक प्रभाव तेल की कीमतों में वृद्धि के तौर पर दिखाई देगा।
अमरीका और उसके सहयोगी अब अपने बचाव पर ध्यान दे रहे हैं। अमरीका ने पहले ही बग़दाद स्थित अपने दूतावास को छोटी मात्रा में सहायता भेज दी है। साथ ही ज़रूरत पडऩे पर वो इस क्षेत्र में अपने सैन्य बेड़ों की संख्या को भी बढ़ा सकता है।
और क्या करेगा ईरान?
लेकिन यह इतना सीधा-सपाट नहीं होगा कि ईरान एक हमले का जवाब दूसरे हमले से ही दे। माना जा रहा है कि इस बार ईरान की प्रतिक्रिया असंयमित होगी।
दूसरे शब्दों में कहें तो संभावना ये भी है कि ईरान सुलेमानी के बनाए गए और फंड किए गए गुटों से व्यापक समर्थन हासिल करने का प्रयास करे। उदाहरण के लिए ईरान बग़दाद स्थित अमरीकी दूतावास पर घेराबंदी को नया रूप दे सकता है। वो इराक़ी सरकार को और भी मुश्किल स्थिति में डाल सकता है। साथ ही इराक़ में अन्य जगहों पर प्रदर्शनों को भडक़ा सकता है ताकि वो इनके पीछे अन्य हमले कर सके।
सुलेमानी को मारने का अमरीकी फैसला कितना सही?
ईरान की बहुचर्चित कुद्स फ़ोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या स्पष्ट तौर पर अमरीकी फ़ौज की इंटेलिजेंस और उनकी सैन्य क्षमताओं का प्रदर्शन है। पर क्या राष्ट्रपति ट्रंप का इस कार्रवाई को अनुमति देना, सबसे बुद्धिमानी का फ़ैसला कहा जा सकता है?
क्या अमरीका इस घटना के बाद के परिणामों को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार है? और क्या इससे मध्य-पूर्व को लेकर डोनल्ड ट्रंप की समग्र रणनीति के बारे में पता चलता है? क्या इसमें किसी तरह का बदलाव हो गया है? क्या ईरानी अभियानों के प्रति यह एक नए स्तर की असहिष्णुता है?
या सिर्फ ये एक राष्ट्रपति द्वारा एक ईरानी कमांडर को सज़ा देने तक सीमित है जिसे वो एक बहुत बुरा आदमी कहते आए हैं।  (बीबीसी)

 


Date : 04-Jan-2020

अंजलि मिश्रा
‘द जंगल बुक’ रचने वाले मशहूर लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी एक कविता में कहा था कि ‘द फीमेल ऑफ स्पीशीज इज मोर डेडली दैन द मेल।’ इसका भावार्थ यह हुआ कि महिलाएं पुरुषों से ज्यादा खतरनाक, साहसी या ताकतवर होती हैं।  इसका एक उदाहरण नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ जारी प्रदर्शनों में भी देखने को मिला। देश भर में चल रहे इन प्रदर्शनों में महिलाओं ने न सिर्फ बराबरी से भाग लिया है बल्कि पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा बुलंदी से आवाज उठाती भी नजऱ आईं। क्रिएटिव नारों से भरी तख्तियां लेकर आंदोलन करती महिलाओं की तस्वीरें और वीडियो देश के अलग-अलग कोने से सोशल मीडिया पर आए और खूब वायरल हुए।
अगर आंदोलन की शुरूआत यानी जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में हुए विरोध प्रदर्शन की बात करें तो वह तस्वीर सबसे पहले दिमाग में आती हैं जिसमें कई लड़कियां एक लडक़े को चारों ओर से घेरकर उसे पिटने से बचाने की कोशिश कर रहीं हैं। इसके अलावा भी छात्र रैलियों में लड़कियां क्रिएटिव स्लोगन से भरे बैनर थामे आगे-आगे चलती दिखाई दीं और मौका मिलने पर उतने ही जोश के साथ उन्होंने अपनी बात भी रखी। उदाहरण के तौर पर जामिया विश्वविद्यालय की छात्राओं सृजन चावला और भूमिका सरस्वती का यह वीडियो देखा जा सकता है।
बेहद सामान्य घरों से आने वाली ऐसी छात्राओं में जामिया विश्वविद्यालय से ही लॉ की पढ़ाई कर रही अनुज्ञा भी हैं। हॉस्टल और यूनिवर्सिटी में बिगड़े हालात पर मीडिया से बात करते हुए अनुज्ञा इतनी विचलित थीं कि कैमरे पर भी उनके आंसू बह रहे थे लेकिन इसके बावजूद वे अपना विरोध पूरी मजबूती से दर्ज करवाने से नहीं चूकीं। अनुज्ञा जब चीखकर कहती हैं कि ‘मैं तो हिंदू हूं अंकल लेकिन फिर भी मैं हमेशा फ्रंट रो में खड़ी रही हूं’ तो इस बात का यकीन सा होने लगता है कि इस देश में धर्मों के आपसी ताने-बाने को उधेड़ पाना इतना भी आसान नहीं है। वे लड़कियां जिन्हें भारत में अपने लिए भी खड़े होना नहीं सिखाया जाता, किसी और के लिए इतनी हिम्मत से अपनी बात कहें तो भारतीयता की बुनावट को बारीक और मजबूत ही समझा जाना चाहिए।
जामिया विश्वविद्यालय पर हुई पुलिस कार्रवाई के अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में जिक्र किया था कि हिंसा करने वालों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है। छात्र समुदाय ने उनकी इस टिप्पणी पर भी उतने ही रचनात्मक तरीके से नारजगी जताई। इस दौरान हिज़ाब में एक लडक़ी की तस्वीर खासी वायरल हुई जिसके हाथ में दिख रही तख्ती पर लिखा कि ‘मोदी जी मेरा नाम इंदुबाला है, मुझे मेरे कपड़ों से पहचानिए।’
इसी तरह की एक और तस्वीर में हिज़ाब के साथ बिंदी लगाए हुए एक लडक़ी नजऱ आई जिसकी तख्ती पर लिखा है कि ‘आपको मेरे हिज़ाब से ज्यादा नाराजग़ी है या हिज़ाब के साथ बिंदी लगाने से।’ यह साफ है कि इस तस्वीर में लडक़ी न सिर्फ सरकार पर बल्कि बेवजह फतवा निकालने वाले इस्लामिक संगठनों पर भी तंज कर रही थी। इस तरह यह मौका लड़कियों के लिए अपने चेहरे, अपनी पहचान और अपनी आवाज के साथ सामने आने का भी था।
विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं के आगे आकर अपनी बात कहने को इस तरह से भी देखा जा सकता है कि आम तौर पर पुलिस उन पर इतनी जल्दी बल प्रयोग नहीं करती है। इसलिए वे सार्वजनिक जगहों पर खुद को ज्यादा सशक्त महसूस करती हैं और ज्यादा आक्रामक हो सकती हैं। 
लेकिन इसे दूसरी तरह से देखा जाए तो इसका एक पक्ष यह भी है कि किसी भी तरह की हिंसा भडक़ने पर महिलाओं को न सिर्फ उससे खतरा होता है बल्कि वे यौनहिंसा और दूसरी तरह की प्रताडऩाओं का शिकार भी हो सकती हैं। हमारा सामाजिक हिसाब-किताब इतना बिगड़ा हुआ है कि किसी महिला का चेहरा पहचान में आने पर, कभी भी वह राह चलते हुए, कुछ और न सही तो वह फिकरेबाज़ी का ही शिकार हो सकती है। महिलाओं के सामने आने वाली ऐसी तमाम छोटी-बड़ी मुश्किलों के चलते उनके घर से बाहर निकलने जैसी छोटी-सी कोशिश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जबकि यहां तो यह पूरा आंदोलन ही मानो उनके द्वारा ही संचालित हो रहा था।
सीएए का विरोध करने वाली महिलाओं में कुछ ऐसी भी थीं जो अपने कामकाज छोडक़र विरोध करने तो पहुंची ही लेकिन उससे पहले लोगों को साथ लाने की कोशिशों में भी लगी रहीं, उन्हें यह समझाते हुए कि क्यों उन्हें इनका विरोध क्यों करना चाहिए। बीते हफ्ते ट्विटर पर मुंबई लोकल के महिला कोच में महिलाओं से एनआरसी पर बात करती एक लडक़ी का वीडियो खासा वायरल हुआ था। इस वीडियो में लडक़ी सीएए के असंवैधानिक होने और व्हाट्सएप फारवर्ड पर भरोसा ना करने की बात कहती नजऱ आ रही है।
बैंगलोर से भी एक ऐसी ही युवा लडक़ी का एक वीडियो चर्चा में रहा था जिसमें वह नरेंद्र मोदी और अमित शाह को संबोधित कर इस कानून का विरोध करती नजऱ आई थीं। नागरिकों के गुस्से का जिक्र करने वाला यह वीडियो (नीचे) दिल्ली का है जिसमें एक महिला भारतीय नागरिक होने का मतलब समझाती नजऱ आ रही है। इस वीडियो की खास बात यह है कि जब वह धाराप्रवाह बोल रही है तो उसके पीछे खड़े एक व्यक्ति के चेहरे पर कई तरह के एक्सप्रेशंस आते-जाते दिखाई दे रहे हैं। बहुत सीधेपन और मासूमियत के साथ सिर हिलाते इस मुस्लिम व्यक्ति को देखकर लगता है जैसे उसके मन की बात कही जा रही है और शायद उसका सिर हिलाना ही इस महिला के शब्दों को सार्थकता दे देता है।
सीएए का विरोध करने वाली महिलाओं की फेहरिश्त में पांडिचेरी और जाधवपुर यूनिवर्सिटी की उन छात्राओं को भी शामिल किया जा सकता है। जिन्होंने अपने दीक्षांत समारोह के मंच का इस्तेमाल सीएए का विरोध करने के लिए किया। 
पांडिचेरी विवि से रबीहा अब्दुर्रहीम ने मास कम्युनिकेशन में एमबीए किया है और उन्हें उनके ही दीक्षांत समारोह से तब तक बाहर रखा गया जब तक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद वहां पर मौजूद थे। 
इस दौरान रबीहा ने हिज़ाब पहन रखा था और ऐसा माना जा रहा है कि यही उनके साथ हुए भेदभाव की वजह बना। राष्ट्रपति के जाने के बाद वे दोबारा समारोह में शामिल तो हुईं लेकिन अपना गोल्ड मेडल लेने से इंकार कर दिया। रबीहा के मुताबिक ऐसा उन्होंने अपने साथ हुए भेदभाव और नए नागरिकता कानून पर अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए किया।
इसी तरह का एक उदाहरण कोलकाता की जाधवपुर यूनिवर्सिटी में भी देखने को मिला जहां देबोस्मिता चौधरी ने दीक्षांत समारोह के मंच पर जाकर नए नागरिकता कानून की प्रति फाड़ी और इंकलाब जि़ंदाबाद का नारा लगाया। यह बताता है कि सामान्य तरीके न हासिल होने पर ये लड़कियां हर जगह, हर मौके, हर मंच का इस्तेमाल अपना प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिए करना जानती हैं। शायद उन्हें मिलने वाले सीमित मौकों के चलते, ऐसा करना अब उनकी आदत में शुमार हो चुका है। यह अच्छा है कि जिन तरीकों का इस्तेमाल अब तक महिलाएं केवल अपने भले की बातों के लिए कर रही थीं, उनका अब देश के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
आखिर में सना गांगुली और ट्विंकल खन्ना के नाम लिये जा सकते हैं। बीते हफ्ते अचानक बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली की बेटी सना गांगुली तब चर्चा में आ गईं, जब उन्होंने इंस्टाग्राम पर मशहूर लेखक खुशवंत सिंह की किताब ‘द एंड ऑफ़ इंडिया’ का एक अंश शेयर किया। इसमें फासीवादी शासन का जिक्र किया गया था जिसे लोगों ने मोदी सरकार और एनआरसी विरोध से जोडक़र देखा। किसी भी राजनीतिक मुद्दे से दूरी बनाकर रखने वाले सौरव गांगुली ने इस पर बचाव की मुद्रा अपनाते हुए कहा कि सना अभी छोटी हैं और राजनीति नहीं समझती हैं।
सना जहां अपने पिता से अलग विचार रखती नजऱ आईं थीं वहीं अभिनेत्री और लेखिका ट्विंकल खन्ना भी अपने पति अक्षय कुमार से उलट दिशा में जाती हुई दिखाई दीं। यह बात जगजाहिर है कि अक्षय कुमार भाजपा सरकार के बड़े समर्थक और प्रधानमंत्री के मुरीद हैं। लेकिन ट्विंकल ने न सिर्फ जामिया में हुई पुलिस कार्रवाई का विरोध किया बल्कि बिना किसी भेदभाव वाले लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत करती हुई भी नजऱ आईं। यहां पर यह बात साफ तौर पर नजऱ आती है। सना के पिता और ट्विंकल के पति जहां संभावित-अपेक्षित राजनीतिक फायदों के लिए या फिर किसी तरह के विवाद से बचने के लिए, इन महत्वपूर्ण मुद्दों से दूरी बनाते दिखे, वहीं इन महिलाओं ने जो उन्हें सही लगा बिना डर के कहा। और हां, यह कहने की तो जरा भी ज़रूरत नहीं है कि यह हौसला हर उम्र की महिलाओं ने दिखाया है। (सत्याग्रह)

 


Date : 03-Jan-2020

कुबूल अहमद

जुनैद कहते हैं कि दुनिया में कई धर्म हैं जो यह बात मानते हैं कि मनुष्य ईश्वर का ही अंश है। इसी लिहाज से उस धर्म में अनल-हक का इस्तेमाल किया जाना सही है, लेकिन इस्लाम में यह पूरी तरह से अलग बात है। इस्लाम में यह बात साफ कही गई है कि खुदा और मनुष्य अलग-अलग हैं। मनुष्य खुदा का अंश नहीं है।

उठेगा अनल-हक का नारा, जो मैं भी हूं और तुम भी हो ...पाकिस्तानी शायर फै़ज़ अहमद फै़ज़ की इस नज्म का नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन में इस्तेमाल हुई तो उस पर विवाद खड़ा हो गया। कानपुर आईआईटी में भी सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शन में इसी नज्म का इस्तेमाल किया गया, जिस पर एंटी हिंदू होने को लेकर जांच बैठा दी है। इस नज्म में मशहूर सूफी मंसूर अल हल्लाज के अनल-हक नारे का भी इस्तेमाल है। यही नारा देने की वजह से मंसूर अल हल्लाज को बगदाद में सूली पर चढ़ा दिया गया था।

ईरान में जन्मे मंसूर अल हल्लाज 900 ई. के मशहूर सूफी थे, जिन्होंने अनल-हक का नारा दिया था। गीतकार जावेद अख्तर कहते हैं कि अनलहक का अर्थ है अहं ब्रह्मास्मि। यह भारत के अद्वैत सिद्धांत और वैदिक विचारधारा की तरह है, जिसमें क्रिएटर और क्रिएशन को अलग नहीं माना गया है बल्कि वो एक है। वो भगवान का ही एक रूप है, वो अलग नहीं है। ये इस्लामिक विचार ही नहीं है। अनल-हक सूफी विचार से आया है। इस्लाम और ईसाईयत में भगवान मालिक है और इंसान रियाया (जनता) है। इंसान उसके दरबार में है और खुदा उसको देख रहा है और उस पर फैसला करेगा।

 

जामिया के इस्लामिक स्टडीज के प्रोफेसर जुनैद हारिस कहते हैं कि मंसूर अल हल्लाज ने खुद के लिए अनल-हक का प्रयोग किया जबकि यह शब्द खुदा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अनलहक के साफ मायने हैं कि मैं ही खुदा हूं या फिर मेरे अंदर खुदा बसा हुआ है जबकि इस्लाम में पैगंबर मोहम्मद साहब या फिर किसी नबी को खुदा का दर्जा नहीं दिया गया है। ऐसे में कोई अपने आपको कैसे खुदा कह सकता है। इसी वजह से मंसूर अल हल्लाज को फंसी पर लटकाया गया।

जुनैद कहते हैं कि दुनिया में कई धर्म हैं जो यह बात मानते हैं कि मनुष्य ईश्वर का ही अंश है। इसी लिहाज से उस धर्म में अनल-हक का इस्तेमाल किया जाना सही है, लेकिन इस्लाम में यह पूरी तरह से अलग बात है। इस्लाम में यह बात साफ कही गई है कि खुदा और मनुष्य अलग-अलग हैं। मनुष्य खुदा का अंश नहीं है। ऐसे में अगर कोई अपने आपको खुदा कहता है तो वह इस्लाम के खिलाफ है।

सूफिज्म को समझने वाले हमदर्द विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तारिक अशफाक कहते हैं सूफिज्म और उलेमा में एक टकराव रहा है। मंसूर अल हल्लाज सूफी थे, जिन्होंने अनल-हक का नारा दिया। अनल-हक सूफिज्म में की एक इत्तला (सूचना) है जिसके द्वारा वे आत्मा को परमात्मा की स्थिति में लय कर देते है। इसके जरिए वो अपने आपको खुदा नहीं कह रहे हैं बल्कि यह कहना चाहते हैं कि जीव आत्मा ही परमात्मा है यानी मेरी आत्मा का परमात्मा से एक रहस्यमय संबंध है, इसे ततत्वम असि (वह तुम्ही हो) के जरिए भी समझा जा सकता है।

तारिक अशफाक कहते हैं कि सूफिज्म रुहानी इबादत की बात पर जोर देता है तो उलेमा इस्लाम की जाहिरी इबादत को महत्व देते हैं। जाहिरी और बाहरी इबादत में पाखंड के होने की संभावना होती है, लेकिन रुहानी में ऐसा नहीं होता है।

तारिक अशफाक ने बताया कि इमाम अबू अब्दुल्लाह अहमद बिन मोहम्मद बिन हम्बल का अनुसरण करने वालों को हम्बली कहा जाता है। इनमें इब्ने तैमिया और अब्दुल वहाब जैसे कट्टरपंथी हुए हैं। बगदाद में 908 ईस्वी में हम्बली फिरके के लोग राजनीतिक रिफॉर्म लाने की कोशिश कर रहे थे और इब्बुनल मोताश को खलीफा नियुक्त करना चाहते थे। इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली लेकिन वो एक साल से कम ही शासन चला सके।

जव्वाद मुजादीदी ने मंसूर अल हल्लाज के बारे में लिखा है कि 909 ईस्वी में हम्बली लोगों ने राजनीतिक रिफॉर्म फिर शुरू किया। इस दौरान मंसूर अल हल्लाज हम्बली के खिलाफ थे और वो खुलेतौर पर अपनी बात रखते थे। मंसूर अल हल्लाज की बातें हम्बली विचाराधारा के लोगों को पसंद नहीं थीं। इस्लामी उलेमा को चुनौती देने की खातिर इनको इस्लाम का विरोधी मान लिया गया।

इसकी वजह से मंसूर अल हल्लाज बगदाद छोडक़र अहवाज चले गए। उन्हें तीन साल के बाद गिरफ्तार कर बगदाद लाया गया और जेल में डाल दिया गया। मंसूर अल हल्लाज पर दो चार्ज लगाए गए, इनमें एक था अनल-हक जिसके जरिए अपने आपको वो खुद कह रहे थे और दूसरा चार्ज हुलूल का यानी मेरे अंदर खुदा होने का दावा करना। इसके बाद उन्हें 9 साल तक जेल में रखा गया। इसके बाद 922 ईस्वी में उन्हें मौत की सजा दे दी गई। मंसूर अल हल्लाज पर एक हजार कोड़े लगाए गए और उनके हाथ-पैर काट दिए गए। इसके बाद उन्हें फांसी दी गई और उनकी लाश को जलाकर राख को फरात नदी में बहा दिया गया। फना ही इंसान का मकसद और सूफीज्म का भी।

जावेद अख्तर कहते हैं कि सरमद दिल्ली में ही अनल-हक का नारा लगाता था जिसकी औरंगजेब ने गर्दन कटवा दी थी क्योंकि वो अनलहक नारे के खिलाफ था। औरंगजेब का कहना था कि यह इस्लाम के खिलाफ नारा है। इसमें तुम कह रहे कि तुम और खुदा अलग नहीं हो। आज जो लोग अनल-हक के खिलाफ बोल रहे हैं वो औरंगजेब की तरह बोल रहे हैं। लोग कहते हैं कि यह हिंदू के खिलाफ है, जबकि इस पर तो यह आरोप रहा है कि यह तो हिदू विचारधारा है और इस्लाम के खिलाफ है। (आजतक)


Date : 03-Jan-2020

मैंने सुना है, एक फकीर था और फकीर बहुत अद्भुत आदमी था। वह एक दिन घर लौटता था।  किसी मित्र ने उसे कुछ मांस भेंट कर दिया और साथ में एक किताब भी दे दी। किताब में मांस को बनाने की विधि लिखी हुई थी। वह एक बगल में किताब को दबा कर और हाथ में मांस को लेकर घर की तरफ भागा। एक चील ने झपट्टा मारा, वह उसके मांस को उठा कर ले गई। उस फकीर ने चील से कहा कि मूरख है तू, विधि बनाने की तो मेरे पास है, मांस का क्या करेगी?

वह घर पहुंचा, उसने अपनी पत्नी को कहा- देखती हो, एक मूरख चील मेरे मांस को छीन कर ले गई है और किताब मेरे पास है जिसमें विधि लिखी है बनाने की, चील मांस का करेगी क्या?

उसकी पत्नी ने कहा- तुम विचारक मालूम होते हो। चील को किताब से मतलब नहीं है, चील को मांस बनाने की विधि से मतलब नहीं है। तुम किताब बचा लाए और मांस छोड़ आए, अच्छा होता कि किताब चील को दे आते और मांस घर ले आते।

लेकिन विचारक हजारों साल से किताब बचाता चला आ रहा है और जिंदगी को छोड़ता चला जा रहा है। इसलिए दुनिया में जितना विचार बढ़ गया है उतना जीवन कम और क्षीण हो गया है। दुनिया में जितना विचार रोज बढ़ता जा रहा है, आदमी उतना उदास, परेशान और हैरान होता चला जा रहा है क्योंकि जिंदगी का सारा अर्थ खोता चला जा रहा है। जिंदगी का जो रस है, जिंदगी का जो भी अर्थ है, वह जीने से उपलब्ध होता है, विचार करने से नहीं। हम जीने को देते हैं और विचार को पकड़ लेते हैं। ओशो 


Date : 03-Jan-2020

जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के पिता ने कहा है कि वे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अभियान में अपनी बेटी के अग्रिम पंक्ति में जाकर मोर्चा संभालने को सही नहीं समझते थे। 
ग्रेटा के पिता स्वान्टे थनबर्ग ने बीबीसी के एक कार्यक्रम में बताया कि वे जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपनी बेटी के स्कूल छोडक़र हड़ताल पर जाने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने कहा कि पर्यावरण कार्यकर्ता बनने के बाद से ग्रेटा बहुत खुश है, लेकिन उनकी बेटी को इसे लेकर जो नफरत झेलनी पड़ रही है, इससे उनके मन में चिंता है।
16 साल की ग्रेटा थनबर्ग ने जलवायु परिवर्तन को लेकर जिस तरह से आंदोलन किया है उससे दुनिया भर के लाखों लोगों को प्रेरणा मिली है। ग्रेटा के पिता ने बीबीसी के रेडियो 4 के टुडे कार्यक्रम में ये बातें कहीं जिसकी अतिथि-संपादक खुद ग्रेटा थीं।
इस कार्यक्रम में पर्यावरण मामलों पर कई डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले प्रतिष्ठित प्रेजेंटर सर डेविड ऐटनबरो भी शामिल हुए। उन्होंने ग्रेटा से कहा कि उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर सारी दुनिया की आँखें खोल दी हैं।
ग्रेटा ने स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में अपने घर से कार्यक्रम में शिरकत की। उन्होंने डेविड ऐटनबरो से कहा कि कैसे उन्हें उनके काम से प्रेरणा मिली।
सर डेविड ने ग्रेटा से कहा कि उन्होंने ऐसी चीजें हासिल की हैं जिसे इस बारे में 20 साल से मेहनत कर रहे हम में से ज़्यादातर लोग हासिल करने में नाकाम रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्रेटा एकमात्र कारण थीं जिनकी वजह से जलवायु परिवर्तन ब्रिटेन के आम चुनावों का बड़ा मुद्दा रहा।
ग्रेटा का नाम इस साल के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया है। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर दुनिया के नेताओं से कदम उठाने की माँग की और उनके आंदोलन की वजह से एक साथ दुनिया के कई स्कूलों में हड़ताल किए गए।
बीबीसी के कार्यक्रम में ग्रेटा के पिता ने बताया कि स्कूल स्ट्राइक शुरू करने के तीन-चार साल पहले उनकी बेटी डिप्रेशन से लड़ती रही। उन्होंने कहा, ग्रेटा ने बात करना बंद कर दिया था। स्कूल जाना भी छोड़ दिया था। वो बताते हैं कि ग्रेटा का खाना छोड़ देना उनके लिए एक बुरे सपने जैसा था।
उन्होंने कहा कि ग्रेटा को ठीक करने के लिए उन्होंने ग्रेटा और उनकी छोटी बहन बियाटा के साथ घर पर ज़्यादा समय बिताना शुरू किया।
ग्रेटा की मां मालेना अर्नमैन एक ओपेरा गायिका हैं। उन्होंने भी परिवार के साथ समय बिताने के लिए कई कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिए।
स्वान्टे बताते हैं कि उन्होंने डॉक्टरों की भी मदद ली। ग्रेटा जब 12 साल की थी, तब पता चला कि ग्रेटा को ऐस्पर्गर्स सिंड्रोम है, जो ऑटिज़्म जैसी एक बीमारी है। ग्रेटा बताती हैं कि इस वजह से ही वो लीक से अलग हट कर सोच पाती हैं।
बीमारी का पता चलने के बाद कुछ सालों तक ग्रेटा और उनके परिवार ने जलवायु परिवर्तन को लेकर रिसर्च और चर्चा की और ग्रेटा में इस मुद्दे को लेकर जुनून बढऩे लगा।
मानवाधिकार को लेकर सजग ग्रेटा के पिता बताते हैं कि ग्रेटा के जुनून का ये आलम था कि उसने अपने मां-बाप ही पाखंडी बताना शुरु कर दिया और कहा, अगर हम जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं तो आप किन मानवाधिकारों की बात करते हैं। वो बताते हैं कि ग्रेटा को अपने माता-पिता के बदलते व्यवहा से पर्यावरण प्रेमी होने की ऊर्जा मिली।
ग्रेटा की मां ने हवाई जहाज से सफर करना छोड़ दिया है और उनके पिता शाकाहारी बन गए हैं। ग्रेटा और उनके पिता न्यूयॉर्क और मैड्रिड में हुए संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए नाव से गए थे जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता। पर्यावरण पर पडऩे वाले बुरे प्रभाव के कारण ग्रेटा ने हवाई यात्रा करने से मना कर दिया था।
स्वान्टे कहते हैं, मैंने ये सब इसलिए किया क्योंकि ये सब सही था। मैंने ये सब पर्यावरण बचाने के लिए नहीं किया, अपनी बच्ची को बचाने के लिए किया।
मेरे पास दो बेटियां हैं और सच कहूं तो ये ही दोनों मेरे लिए मायने रखती हैं। मैं बस इन्हें खुश देखना चाहता हूं। ग्रेटा के पिता बताते हैं कि एक्टिविस्ट बनने के बाद ग्रेटा में बदलाव आए हैं, अब वो खुश रहने लगी हैं।
आपको लगता होगा कि ग्रेटा एक आम नहीं, खास लडक़ी है और बहुत मशहूर है। लेकिन मेरे लिए वो एक सामान्य लडक़ी है। वो दूसरे लोगों की तरह बाकी सभी चीजें कर सकती है।
वो आस-पास नाचती है, हंसती है, हम साथ में बहुत मस्ती करते हैं, वो जीवन में अच्छी जगह पर है।
स्वान्टे बताते हैं कि जबसे ग्रेटा की स्कूल स्ट्राइक वायरल हुई है तबसे ग्रेटा को बहुत से अपशब्दों का सामना करना पड़ता है। ये वो लोग हैं जो पर्यावरण को बचाने के लिए अपना लाइफस्टाइल नहीं बदलना चाहते।
ग्रेटा पहले बता चुकी हैं कि किस तरह लोग उन्हें उनके कपड़ों, उनके व्यवहार और उनके अलग होने के वजह से उन्हें अपशब्द कहते हैं।
ग्रेटा के पिता बताते हैं कि वो फेक न्यूज को लेकर चिंतित है। वो सभी चीजें जो लोग ग्रेटा के बारे में गढ़ते हैं, उनसे नफरत पैदा होती है। साथ ही वो ये भी कहते हैं कि उनकी बेटी बेहतर तरीके से आलोचना से निपट लेती है।
सच कहूं तो मुझे नहीं पता वो ये कैसे करती है लेकिन ज़्यादातर समय वो बस हंसती है उसे ये बहुत मजाकिया लगता है। 
साथ ही वो कहते हैं कि अब ग्रेटा 17 साल की होने जा रही है तो उसे यात्रा के दौरान किसी के साथ की जरूरत नहीं पड़ेगी।
अगर उसे मेरी जरूरत पड़ेगी, तो मैं उसके साथ जाने की कोशिश करूंगा। लेकिन वो ज़्यादातर चीजें अपने आप ही कर लेगी जो कि बहुत ही अच्छा है।(बीबीसी)


Date : 02-Jan-2020

आलोक प्रकाश पुतुल

जाने-माने अर्थशास्त्री कौशिक बसु का कहना है कि भारत में जिस तेज़ी से ग्रामीण खपत में कमी आई है और देश भर में बेरोजगारी की दर में बढ़ी है, उसे आपातकालीन स्थिति की तरह लिया जाना चाहिये। उनका मानना है कि रोजगार गारंटी जैसे अल्पकालीन उपायों के अलावा भारत को निवेश पर भी ध्यान देना होगा।

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा कि पिछले दो सालों से जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वो बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ रही है। एक समय भारत की वार्षिक विकास दर 9 प्रतिशत के आसपास थी। आज सरकार का अधिकृत तिमाही विकास दर का आंकड़ा 4,5 प्रतिशत है। जो चिंता का विषय है।

विश्व बैंक के सीनियर वाइस-प्रेसिडेंट और मुख्य आर्थिक सलाहकार पद पर काम कर चुके कौशिक बसु ने बीबीसी से कहा, विकास दर का 4।5 प्रतिशत पर पहुंच जाना बेशक़ हमारी चिंता का विषय होना चाहिए लेकिन हरेक सेक्टर से जो माइक्रो लेबल के विस्तृत आंकड़े आ रहे हैं, वह कहीं ज़्यादा बड़ी चिंता का विषय है। हमें उस पर गौर करने की ज़रुरत है। हमें इसे दुरुस्त करने के लिए नीतिगत फैसले लेने होंगे। अमरीका की कार्नल यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत 67 वर्षीय कौशिक बसु, 2017 से इंटरनेशनल इकॉनमिक एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। उन्होंने यूपीए सरकार के कार्यकाल में 2009 से 2012 तक भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के तौर पर भी काम किया है। कौशिक बसु को 2008 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।

बेरोजगारी कैसे रुकेगी?

डॉ. बसु ने कहा, ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की औसत उपभोग में वृद्धि की बात तो छोडिय़े, उसमें गिरावट आई है। पिछले 5 सालों में ग्रामीण भारत में औसत खपत में लगातार कमी आ रही है। 2011-12 और 2017-18 के बीच, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले भारतीयों के लिए खपत न केवल धीमी नहीं हुई है, बल्कि लगातार गिरती चली गई है। पांच साल पहले की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति खपत में 8.8 प्रतिशत की कमी आई है। इसके साथ-साथ देश में गरीबी की दर में वृद्धि हो रही है। यह मेरे लिये अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में खपत की कमी के आंकड़े उस तरह से लोगों का ध्यान आकर्षित नहीं कर पाते क्योंकि अधिकांश मीडिया और प्रेस, शहर केंद्रित हैं। लेकिन भारत की दूरगामी अर्थव्यवस्था के लिये ग्रामीण क्षेत्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। उस पर हमें ध्यान देना होगा।

कौशिक बसु ने कहा, अगर आप बेरोजगारी के आंकड़े देखेंगे तो यह 45 सालों में सर्वाधिक है। पिछले 45 सालों में कभी भी बेरोजगारी की दर इतनी अधिक नहीं रही। युवा बेरोजगारी की दर काफी अधिक है। 4.5 प्रतिशत का विकास दर कुछ चिंताजनक तो है लेकिन बेरोजगारी की दर में बढ़ोत्तरी और ग्रामीण खपत में कमी को आपातकालीन स्थिति की तरह लिया जाना जरुरी है। सरकार को तुरंत नीतिगत निर्णय लेने होंगे, जिससे दूरगामी नुकसान को रोका जा सके।

उन्होंने कहा कि भारत में लंबे समय से रोजगार की स्थिति ठीक नहीं है। 2005 से भारत की विकास दर हर साल, चीन के समान 9.5 प्रतिशत थी लेकिन रोजगार में बहुत तेजी से बढ़ोत्तरी नहीं हो रही थी। उसकी वजह से कुछ समय बाद तनाव की स्थिति पैदा होने लगी कि रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं। इसके राजनीतिक परिणाम भी जरूर भुगतने होंगे। लेकिन पिछले दो सालों से जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ी है, उसके भी राजनीतिक परिणाम आएंगे।

कौशिक बसु ने कहा, भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में जो गिरावट आई है, उस पर तत्काल ध्यान देने की ज़रूरत है। अल्पकालिक उपाय के रूप में हमें ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसे कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। विकास को पुनर्जीवित करने और इसे बेहतर ढंग से विस्तारित करने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के बारे में विचार करना होगा।

कैसे संभव है दीर्घकालिक विकास?

अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक नीतियों को लेकर कौशिक बसु ने कहा कि भारत में निवेश की दर में लगातार कमी आ रही है। 2008-2009 में जीडीपी के भीतर करीब 39 प्रतिशत हिस्सा निवेश का था। जो कम हो कर आज 30 प्रतिशत पर पहुंच गया है। निवेश दर को अखबारों में भी नहीं छापा जाता क्योंकि इसकी चिंता केवल अर्थशास्त्रियों को है। लेकिन दीर्घकालिक विकास, निवेश से ही संभव है और इसमें राजनीति की बड़ी भूमिका है।

कौशिक बसु ने कहा, लोगों में अगर आत्मविश्वास होगा, सहकारिता की भावना अधिक होगी, भरोसा ज्यादा है तो लोग निवेश करेंगे। वे भविष्य को सुरक्षित करेंगे। लेकिन अगर आप चिंतित हैं तो आप अपने पैसे को अपने पास रखना चाहेंगे। आप उसे अपनी तात्कालिक जरुरत पर खर्च करना चाहेंगे। इसलिये दीर्घकालीन नीति के लिये निवेश को लेकर हमें चिंता होनी चाहिए।

उन्होंने मोदी सरकार द्वारा भारत को 'फाइव ट्रिलियन डॉलर इकॉनामी बनाये जाने के दावे को खारिज़ करते हुए कहा, भविष्य में ऐसा हो सकता है लेकिन फाइव ट्रिलियन डॉलर इकॉनामी की अर्थव्यवस्था अगले 4-5 सालों में तो असंभव है क्योंकि इसकी गणना यूएस डॉलर के आधार पर होती है। अब तो विकास दर गिर कर 4.5 प्रतिशत पर पहुंच गई है, ऐसे में तो यह सवाल ही नहीं उठता। उनका मानना है कि दीर्घकालीन अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिये नैतिक मूल्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। नैतिक मूल्य और उसके प्रति प्रतिबद्धता के बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है। वे इसी विषय पर कोलकाता में एक महत्वपूर्ण व्याख्यान भी देने वाले हैं।

उन्होंने कहा कि लोगों के भीतर इस बात का नैतिक बोध होना चाहिए कि कोई व्यक्ति चाहे वह मेरे जैसा हो या न हो, उसके प्रति दया भाव हो। हमें जरूरतमंद लोगों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने कहा, आम आदमी को सोचना चाहिये कि मुझे पैसे जमा करने हैं, लेकिन नैतिक स्थिति में और नैतिक प्रतिबद्धता के साथ जीना है। यह दीर्घकाल के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है। नैतिकता, सदाचार और दीर्घकालिक विकास का आपस में गहरा संबंध है। गरीब व्यक्ति तक पहुंच कर ही हम एक अमीर राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि लोग इस नैतिक प्रतिबद्धता से जुड़ेंगे।

अर्थव्यवस्था के विरोधाभासी

और संदेहास्पद आंकड़े?

पिछले कुछ सालों में अर्थव्यवस्था के विरोधाभासी और संदेहास्पद आंकड़ों को लेकर कौशिक बसु ने कहा, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिये, अगर भारत के आंकड़ों की विश्वसनीयता गिरती है तो यह बेहद दुखद होगा। मैं चार सालों तक वर्ल्ड बैंक में था, जहां दुनिया भर से आंकड़े आते थे। न केवल उभरती हुई अर्थव्यवस्था बल्कि विकसित अर्थव्यवस्था के बीच भारतीय आंकड़े हमेशा विश्वसनीय होते थे। भारतीय आंकड़ों को जिस तरह से एकत्र किया जाता था और जो सांख्यिकीय प्रणाली उपयोग में लाई जाती थी, वो उच्चतम स्तर की होती थी।

वल्र्ड बैंक में हम सभी इससे सहमत थे कि शानदार आंकड़े आ रहे हैं। हम उन आंकड़ों की पवित्रता का आदर करते थे। 1950 से बहुत ही व्यवस्थित तरीके का इस्तेमाल हो रहा था।

उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आंकलन बहुत मुश्किल है। रोजगार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अमीर देशों में दो ही स्थितियां होती हैं- या तो आपके पास रोजगार है या आप बेरोजगार हैं। लेकिन भारत में आप कई अनौपचारिक काम से जुड़े होते हैं। जिसका आंकलन मुश्किल है। जीवन के कुछ आयाम ऐसे होते हैं, जहां आंकलन करना आसान नहीं है।

कौशिक बसु ने कहा, अगर हम कहें कि आंकड़ों में पारदर्शिता होनी चाहिए तो भारत इसके लिये ही तो जाना जाता रहा है। भारत में कुछ क्षेत्र जहां आंकलन का काम आसान है, वहां आंकड़े अच्छे हैं या बुरे हैं, उसे सार्वजनिक करना होगा। हमें स्वीकार करना होगा कि हां, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस-इस क्षेत्र में गिरावट है और हमें ज्यादा मेहनत करनी होगी। (बीबीसी)


Date : 02-Jan-2020

गिरीश मालवीय

हम जैसे भारत में रोजगार की तलाश में आए लोगों को घुसपैठिया कहते हैं वैसे ही यदि भारत से कोई व्यक्ति बिना कागजात के यूरोप-अमेरिका रोजगार की तलाश में जाता है तो हम उसे अवैध प्रवासी कहते हैं, 2012 में पता चला कि अमेरिका में भारत के 4।5 लाख से ज्यादा प्रवासी अवैध रूप से रह रहे हैं... फर्ज कीजिए कि अमेरिका में भी एनआरसी जैसे कानून के तहत घुसपैठियों को बाहर करने की मुहिम चलाई जाए और अचानक अमेरिकी सरकार सीएए जैसा कानून बना दे कि हम ईसाइयों को तो नागरिकता दे देंगे लेकिन अन्य धर्मावलंबियों को बाहर जाना होगा तो यकीन मानिए अवैध प्रवासी तुरंत बपतिस्मा करवा लेंगे ओर हिन्दू धर्म की आबादी में बड़ी कमी आ जाएगी।

यह तो एक हाइपोथेटिकल सिचुएशन है अब इसी से जुड़ी एक तथ्यात्मक बात भी जान लीजिए

जनवरी 2018 में ब्रिटेन दौरे पर पहुंचे भारत के गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने और ब्रिटेन की मंत्री कैरोलिन नोकस ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत ब्रिटेन में गैर कानूनी रूप से रह रहे भारतीयों की वापसी को सुनिश्चित किया जाना था, ब्रिटेन इस पर काफी जोर दे रहा था, समझौता फाइनल ही था बस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीं के हस्ताक्षर होने बाकी थे। कुछ महीने बाद नरेंद्र मोदी ब्रिटेन दौरे पर पुहंचे ओर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा ओर मोदीजी के बीच भारत और ब्रिटेन से जुड़े हुए द्विपक्षीय मुद्दों पर 20 से ज़्यादा समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए लेकिन इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से उन्होंने ऐन वक्त पर इंकार कर दिया। ब्रिटेन समेत पूरे यूरोप में आज भी करीब 40 हजार भारतीय अवैध रूप से रह रहे हैं। ब्रिटिश सरकार का कहना है कि इन लोगों को तुरंत भारत भेजने की जरूरत है यदि यह समझौता हो जाता तो अगले 15 दिनों के अंदर यह तथाकथित घुसपैठिए भारत वापस भेज दिए जाते।

ब्रिटेन भारत की इस वादाखिलाफी से इतना नाराज हुआ कि उसने तुरंत आसान नियमों के तहत वीजा पाने वाले देशों की सूची से भारत को बाहर कर दिया इसका सबसे बड़ा नुकसान भारतीय छात्रों को झेलना पड़ा जो ब्रिटेन के शीर्ष विश्वविद्यालयों में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे

ऐसी खबरें आ रही है कि ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन अब एक बार फिर से यह मुद्दा उठा रहे हैं समझने की बात यह है कि जैसा माहौल आज देश में बनाया जा रहा है वैसा ही माहौल यदि शेष विश्व में बन जाए तो सबसे ज्यादा प्रभावित भारतीय समुदाय ही होगा।


Date : 02-Jan-2020

कृष्णा कांत

एक शायर जो जीवन भर इस्लाम विरोधी छवि के साथ जिया, निर्वासन झेला, जेल की यातनाएं सहीं, भारत के हिंदूवादियों ने उसके इस्लामिक होने की कल्पना कर डाली और बहुत डरे हुए हैं।

बात पाकिस्तान की है। तानाशाह जिया उल हक पाकिस्तान के इस्लामीकरण में लगे हुए थे। पूरे देश में मार्शल लॉ लगा हुआ था। लोकतंत्र खत्म कर दिया गया था। अवाम पर जुल्म बेइंतहा हो गया था। आम लोगों के मूल अधिकारों को भी सस्पेंड कर दिया गया था।

जिया उल हक ने यह भी फरमान जारी किया कि औरतों के साड़ी पहनने पर पाबंदी होगी। फैज अहमद फैज की नज़्मों और गजलों पर भी पाबंदी थी।

साल 1985 के एक दिन पाकिस्तान की मशहूर सिंगर इकबाल बानो इस फरमान के विरोध में लाहौर के एक स्टेडियम में काले रंग की साड़ी पहनकर पहुंच गईं। वे 50000 लोगों की भीड़ के सामने खड़ी थीं। उन्होंने फैज अहमद फैज की नज़्म गानी शुरू की और लोगों ने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाना शुरू किया। नज़्म के बीच-बीच में लोग इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे। तालियों की गडग़ड़ाहट और नारों के बीच गाई गई यह नज़्म और इकबाल बानो समेत वह दिन इतिहास में दर्ज हो गया।

वह नज़्म जानते हैं कौन सी थी? वही जिसे गाने पर कानपुर आईआईटी वालों के पेट में दर्द हो गया। इस गाने के बाद पाकिस्तान की तानाशाह सत्ता भी हिल गई थी। इस गाने के बाद पाकिस्तान के तमाम युवा जिया उल हक के शासन के खिलाफ उठ खड़े हुए।

मजेदार तो यह था कि ये नज़्म भी फैज साब ने पाकिस्तान के तानाशाह जिया-उल-हक के खिलाफ ही लिखी थी।

फैज ऐसे शायर हुए जो लिखते थे और जेल में डाल दिए जाते थे, फिर जेल में ही लिखते थे। फिर बाहर आकर लिखते थे, फिर जेल में डाल दिए जाते थे। फिर लिखते थे।

फैज अहमद फैज इतने बड़े शायर हो गए कि वे पाकिस्तान के नहीं रह गए। वे पाकिस्तान से तो निष्काषित कर दिए गए थे, लेकिन पूरी दुनिया की सपनों के शायर बन गए। वे संघर्ष और सपनों के ऐसे शायर हैं जिनसे मूर्खता भी डरती है और तानाशाही भी।

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वालों को अल्लाह शब्द भर सुनकर परेशानी हो जाती है। कानपुर में शिकायत दर्ज कराने वाला और करने वाला, दोनों ही व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के वैशाखनंदन हैं, जो एक वामपंथी शायर की नज़्म को इस्लामिक मान बैठे।

इस नज़्म में जनता की तरफ से यह कामना की गई है जालिम का तख्त एक दिन पलट दिया जाएगा और गरीबों, मजलूमों का शासन होगा।

पढि़ए वह खूबसूरत नज़्म और इसे पढऩे पर कार्रवाई करने वालों पर लानत भेजिए।

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है

जो लौह-ए-अजल में लिक्खा है

जब जुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गराँ

रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले

जब धरती धड़-धड़ धडक़ेगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कडक़ेगी

जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो गाएब भी है हाजिर भी

जो मंजर भी है नाजिर भी

उ_ेगा अनल-हक का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगी खल्क-ए-खुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो


Date : 01-Jan-2020

ऋषभ कुमार शर्मा

यूरोप और दुनिया के अधिकतर देशों में नया साल 1 जनवरी से शुरू माना जाता है। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। और अभी भी दुनिया के सारे देशों में 1 जनवरी से नए साल की शुरुआत नहीं मानी जाती है। 500 साल पहले तक अधिकतर ईसाई बाहुल्य देशों में 25 मार्च और 25 दिसंबर को नया साल मनाया जाता है। 1 जनवरी से नया साल मनाने की शुरुआत पहली बार 45 ईसा पूर्व रोमन राजा जूलियस सीजर ने की थी। रोमन साम्राज्य में कैलेंडर का चलन रहा था।
पृथ्वी और सूर्य की गणना के आधार पर रोमन राजा नूमा पोंपिलुस ने एक नया कैलेंडर लागू किया। यह कैलेंडर 10 महीने का था क्योंकि तब एक साल को लगभग 310 दिनों का माना जाता था। तब एक सप्ताह भी आठ दिनों का माना जाता था। नूमा ने मार्च की जगह जनवरी को साल का पहला महीना माना। जनवरी नाम रोमन देवता जैनुस के नाम पर है। जैनुस रोमन साम्राज्य में शुरुआत का देवता माना जाता था जिसके दो मुंह हुआ करते थे। आगे वाले मुंह को आगे की शुरुआत और पीछे वाले मुंह को पीछे का अंत माना जाता था। मार्च को पहला महीना रोमन देवता मार्स के नाम पर माना गया था। लेकिन मार्स युद्ध का देवता था। नूमा ने युद्ध की जगह शुरुआत के देवता के महीने से साल की शुरुआत करने की योजना की। हालांकि 153 ईसा पूर्व तक 1 जनवरी को आधिकारिक रूप से नए साल का पहला दिन घोषित नहीं किया गया।
46 ईसा पूर्व रोम के शासक जूलियस सीजर ने नई गणनाओं के आधार पर एक नया कैलेंडर जारी किया। इस कैलेंडर में 12 महीने थे। जूलियस सीजर ने खगोलविदों के साथ गणना कर पाया कि पृथ्वी को सूर्य के चक्कर लगाने में 365 दिन और छह घंटे लगते हैं। इसलिए सीजर ने रोमन कैलेंडर को 310 से बढ़ाकर 365 दिन का कर दिया। साथ ही सीजर ने हर चार साल बाद फरवरी के महीने को 29 दिन का किया जिससे हर चार साल में बढऩे वाला एक दिन भी एडजस्ट हो सके।
साल 45 ईसा पूर्व की शरुआत 1 जनवरी से की गई। साल 44 ईसा पूर्व में जूलियस सीजर की हत्या कर दी गई। उनके सम्मान में साल के सातवें महीने क्विनटिलिस का नाम जुलाई कर दिया गया। ऐसी ही आठवें महीने का नाम सेक्सटिलिस का नाम अगस्त कर दिया गया। 10 महीने वाले साल में अगस्त छठवां महीना होता था। रोमन साम्राज्य जहां तक फैला हुआ था वहां नया साल एक जनवरी से माना जाने लगा। इस कैलेंडर का नाम जूलियन कैलेंडर था।
पांचवी शताब्दी आते-आते रोमन साम्राज्य का पतन हो गया था। यूं तो 1453 में ओटोमन साम्राज्य द्वारा पूरे साम्राज्य के राज को खत्म करने तक रोमन साम्राज्य चलता रहा लेकिन पांचवीं शताब्दी तक रोमन साम्राज्य बेहद सीमित हो गया। रोमन साम्राज्य जितना सीमित हुआ ईसाई धर्म का प्रसार उतना बढ़ता गया। ईसाई धर्म के लोग 25 मार्च या 25 दिसंबर से अपना नया साल मनाना चाहते थे।
ईसाई मान्यताओं के अनुसार 25 मार्च को एक विशेष दूत गैबरियल ने ईसा मसीह की मां मैरी को संदेश दिया था कि उन्हें ईश्वर के अवतार ईसा मसीह को जन्म देना है। 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म हुआ था। इसलिए ईसाई लोग इन दो तारीखों में से किसी दिन नया साल मनाना चाहते थे। 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया जाता है इसलिए अधिकतर का मत 25 मार्च को नया साल मनाने का था।
लेकिन जूलियन कैलेंडर में की गई समय की गणना में थोड़ी खामी थी। सेंट बीड नाम के एक धर्माचार्य ने आठवीं शताब्दी में बताया कि एक साल में 365 दिन 6 घंटे ना होकर  365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकंड होते हैं। 13वीं शताब्दी में रोजर बीकन ने इस थ्योरी को स्थापित किया। इस थ्योरी से एक परेशानी हुई कि जूलियन कैलेंडर के हिसाब से हर साल 11 मिनट 14 सेकंड ज्यादा गिने जा रहे थे। इससे हर 400 साल में समय 3 दिन पीछे हो रहा था। ऐसे में 16वीं सदी आते-आते समय लगभग 10 दिन पीछे हो चुका था। समय को फिर से नियत समय पर लाने के लिए रोमन चर्च के पोप ग्रेगरी 13वें ने इस पर काम किया।
1580 के दशक में ग्रेगरी 13वें ने एक ज्योतिषी एलाय सियस लिलियस के साथ एक नए कैलेंडर पर काम करना शुरू किया। इस कैलेंडर के लिए साल 1582 की गणनाएं की गईं। इसके लिए आधार 325 ईस्वी में हुए नाइस धर्म सम्मेलन के समय की गणना की गई। इससे पता चला कि 1582 और 325 में 10 दिन का अंतर आ चुका था। ग्रेगरी और लिलियस ने 1582 के कैलेंडर में 10 दिन बढ़ा दिए। साल 1582 में 5 अक्टूबर से सीधे 15 अक्टूबर की तारीख रखी गई।
साथ ही लीप ईयर के लिए नियम बदला गया। अब लीप ईयर उन्हें कहा जाएगा जिनमें 4 या 400 से भाग दिया जा सकता है। सामान्य सालों में 4 का भाग जाना आवश्यक है। वहीं शताब्दी वर्ष में 4 और 400 दोनों का भाग जाना आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लीप ईयर का एक दिन पूरा एक दिन नहीं होता है। उसमें 24 घंटे से लगभग 46 मिनट कम होते हैं। जिससे 300 साल तक हर शताब्दी वर्ष में एक बार लीप ईयर ना मने और समय लगभग बराबर रहे। लेकिन 400वें साल में लीप ईयर आता है और गणना ठीक बनी रहती है। जैसे साल 1900 में 400 का भाग नहीं जाता इसलिए वो 4 से विभाजित होने के बावजूद लीप ईयर नहीं था। जबकि साल 2000 लीप ईयर था। इस कैलेंडर का नाम ग्रेगोरियन कैलेंडर है। इस कैलेंडर में नए साल की शुरुआत 1 जनवरी से होती है। इसलिए नया साल 1 जनवरी से मनाया जाने लगा है।
इस कैलेंडर को भी स्थापित होने में समय लगा। इसे इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल ने 1582 में ही अपना लिया था। जबकि जर्मनी के कैथोलिक राज्यों, स्विट्जरलैंड, हॉलैंड ने 1583, पोलैंड ने 1586, हंगरी ने 1587, जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश और डेनमार्क ने 1700,  ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752, चीन ने 1912, रूस ने 1917 और जापान ने 1972 में इस कैलेंडर को अपनाया।
सन 1752 में भारत पर भी ब्रिटेन का राज था। इसलिए भारत ने भी इस कैलेंडर को 1752 में ही अपनाया था। ग्रेगोरियन कैलेंडर को अंग्रेजी कैलेंडर भी कहा जाता है। हालांकि अंग्रेजों ने ग्रेगोरियन कैलेंडर को 150 सालों से भी ज्यादा समय तक अपनाया नहीं था। भारत में लगभग हर राज्य का अपना एक नया साल होता है। मराठी गुडी पड़वा पर तो गुजराती दीवाली पर नया साल मनाते हैं। हिंदू कैलेंडर में  चैत्र महीने की पहली तारीख यानि चैत्र प्रतिपदा को नया साल मनाया जाता है। ये मार्च के आखिर या अप्रैल की शुरुआत में होती है। इथोपिया में सितंबर में नया साल मनाया जाता है। चीन में अपने कैलेंडर के हिसाब से भी अलग दिन नया साल मनाया जाता है।
लेकिन ग्रेगरी के कैलेंडर के साथ भी एक समस्या है। इस कैलेंडर में 11 मिनट का उपाय तो हर चार में से तीन शताब्दी वर्षों को लीप ईयर ना मानकर कर लिया। लेकिन 14 सेकंड का फासला अभी भी हर साल है। इसी के चलते साल 5000 आते-आते फिर से कैलेंडर में एक दिन का अंतर पैदा हो जाएगा। हो सकता है तब इस कैलेंडर की जगह समय गणना की कोई नई प्रणाली आए जो इस गणना को ठीक करे। लेकिन तब तक हम 1 जनवरी से नए साल की शुरुआत की उम्मीद कर सकते हैं। (डॉयचेवेले)

 


Date : 01-Jan-2020

अभय शर्मा

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमरीकी सेना की छठी शाखा- ‘स्पेस फोर्स’ बनाने का रास्ता साफ़ कर दिया है। 

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते हफ्ते सेना की छठी शाखा ‘स्पेस फोर्स’ बनाने के लिए राष्ट्रपति रक्षा प्राधिकरण कानून (एनडीएए) पर हस्ताक्षर कर दिए। इस कानून के तहत अब अमेरिका के पास 16 हजार सैनिकों की ताकत वाला एक अलग सैन्य बल होगा, जिसके ऊपर सिर्फ अंतरिक्ष में पैदा होने वाले खतरों से निपटने की जिम्मेदारी होगी। सेना की यह नई शाखा अमेरिकी वायुसेना के अंतर्गत उसी तरह काम करेगी जैसे मरीन कॉर्प अमरीकी नेवी के अंतर्गत काम करती है। स्पेस फोर्स को पहले वर्ष के लिए 40 मिलियन डॉलर यानी करीब 300 करोड़ रुपए का फंड दिया गया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने विधेयक पर हस्ताक्षर करने के बाद कहा कि अब अंतरिक्ष में काफी कुछ होने वाला है, क्योंकि वह अब दुनिया का सबसे नया युद्धक्षेत्र बनने जा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने फैसले का बचाव करते हुए यह भी कहा, ‘राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अंतरिक्ष में अमरीका की श्रेष्ठता साबित करना बेहद जरूरी है। हम काफी आगे हैं, लेकिन (रूस और चीन के खतरे से निपटने के लिए) यह काफी नहीं है। बहुत जल्द हम इस क्षेत्र में बहुत आगे निकल जाएंगे।’
बीते साल जब ‘स्पेस फोर्स’ बनाने की बात चली तो अमरीकी रक्षा विभाग के कई अधिकारी इसके लिए तैयार नहीं थे। इनका कहना था कि पेंटागन के ऊपर वैसे भी काम का बहुत ज्यादा बोझ है इसलिए इस नई शाखा को संभालना अभी सम्भव नहीं है। वायु सेना को यह लग रहा था कि कहीं ‘स्पेस फोर्स’ बनने के बाद उसकी आजादी कम न कर दी जाए।
डोनाल्ड ट्रंप के सामने यह चुनौती तो थी, लेकिन एक बात, जो उनके पक्ष में थी वह यह कि अमेरिकी सांसद इस फैसले में उनके साथ थे। बीते दिसंबर में न केवल यह विधेयक सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के वर्चस्व वाले अमरीकी सीनेट में 86-8 के अंतर से पारित हुआ, बल्कि डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत वाले संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में भी इसे 48 के मुकाबले 377 वोट मिले। अमरीका सांसदों का कहना था कि उन्हें भी लगता है कि चीन और रूस की अंतिरक्ष में बढ़ती गतिविधियों को रोकने के लिए ‘स्पेस फोर्स’ बनाना जरूरी है।
2019 के मध्य में अमरीका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीईए) ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें कहा गया कि चीन और रूस ने अंतरिक्ष में खुफिया, जासूसी और सैन्य परीक्षण करने लायक सक्षम तकनीक विकसित कर ली है। उनके पास एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के अलावा हवा में लेजर से हमला करने की भी क्षमता है। रिपोर्ट में कहा गया था कि अमेरिका के पास इस वक्त सैकड़ों सैन्य सैटेलाइट हैं, जिनकी सुरक्षा के लिए कोई खास इंतजाम नहीं हैं। यही नहीं, रूस-चीन के अलावा ईरान और उत्तर कोरिया भी धीरे-धीरे अंतरिक्ष में अपनी पहुंच बना रहे हैं।
बीते साल तत्कालीन अमरीकी इंटेलिजेंस प्रमुख डैन कोट्स ने अमरीकी संसद को चीन द्वारा अत्याधुनिक एंटी-सेटेलाइट तकनीक (एएसएटी) का सफल निर्माण कर लेने की जानकारी दी थी। उनका कहना था कि इस तकनीक से वह कभी भी किसी भी सेटेलाइट को नष्ट कर सकता है।
अमरीकी थिंक टैंक ‘न्यू अमरीका’ से जुड़े विदेश मामलों के विशेषज्ञ पीटर सिंगर एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘चीन की यह नयी तकनीक युद्ध के समय गेम चेंजर साबित हो सकती है। इससे युद्ध के परिणामों को तेजी से अपनी ओर मोड़ा जा सकता है।’ पीटर इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ‘आज अमरीकी सेना संचार, समन्वय, नेविगेशन और निगरानी सहित हर सैन्य गतिविधि में सेटेलाइट तकनीक पर ही निर्भर है। यही नहीं, नागरिक मामलों में भी अब अमरीका की निर्भरता सेटेलाइट तकनीक पर काफी ज्यादा बढ़ चुकी है।’ वे आगे कहते हैं कि अब अगर ऐसे में युद्ध के समय चीन अपने एंटी-सेटेलाइट हथियारों से अमरीकी सेटेलाइटों को नष्ट कर देगा तो जाहिर है कि अमरीका के लिए उससे मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि ऐसा होने पर अमेरिका तकनीक के मामले में दशकों पीछे पहुंच जाएगा।
अपने इस साक्षात्कार में पीटर एक और बात भी बताते हैं, ‘चीन और रुस भी सेटेलाइट सिस्टम पर निर्भर हैं। लेकिन, अमरीका की सेटेलाइट निर्भरता उनसे कहीं ज्यादा है। चीन और रूस अभी भी अपने पुराने जेट, टैंक और नौकाओं में एनालॉग सिस्टम का उपयोग करते हैं जिनका सेटेलाइट तकनीक के बिना ही बेहतर संचालन किया जा सकता है।’
कुछ अमरीकी रक्षा अधिकारियों ने अमरीकी संसद को यह भी बताया है कि एंटी-सेटेलाइट तकनीक तो चीन की एक बड़ी योजना का छोटा सा हिस्सा मात्र है। इनके मुताबिक करीब एक दशक से अंतरिक्ष पर विशेष ध्यान दे रहे चीन ने 2015 में ‘स्ट्रेटजिक सपोर्ट फोर्स’ का गठन किया है जिसका मकसद युद्ध के लिए अंतिरक्ष, साइबर और इलक्ट्रॉनिक माध्यमों को मजबूत करना है।
बीते सालों में रूस पर भी कई बार पश्चिमी देशों के सैन्य सेटेलाइटों की जासूसी के आरोप लगे हैं। बीते साल सिंतबर में फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पार्ली ने खुलासा किया था कि रूस के जासूसी सेटेलाइट लुक-ओलिम्प ने 2017 में एक फ्रेंच सेटेलाइट के सिग्नल में ताक-झांक करने की कोशिश की थी। फ्लोरेंस ने बताया था कि फ्रांस अपने मित्र देशों के साथ इसी सैटेलाइट के जरिए खुफिया सूचनाएं साझा करता है। लुक-ओलिम्प को लेकर कई और देश भी यह शिकायत कर चुके हैं। अमरीकी अधिकारी अक्सर इस रूसी सेटेलाइट के अमरीकी इंटेलसैट सैटेलाइट्स के करीब आने का दावा करते रहे हैं। अमेरिकी इंटेलसैट सेटेलाइट सैन्य और ड्रोन मिशनों के लिए काम करता है। हालांकि, इन आरोपों के जवाब में रूस हर बार यही कहता है कि लुक-ओलिम्प सेटेलाइट में कम्युनिकेशन की दिक्कत आने की वजह से वह अन्य देशों के सेटेलाइटों के करीब पहुंच जाता है।

 


Date : 31-Dec-2019

अनुराग शुक्ला

श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध उपन्यास राग दरबारी के बारे में हिंदी के एक सुविख्यात आलोचक ने लिखा था कि अपठित रह जाना ही इसका लक्ष्य है

कल्पना के घोड़ों की लगाम खींचिए और उन्हें जरा उल्टा दौड़ाइए। सोचिए कि अगर श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी न लिखा होता तो! क्या होता अगर यह कालजयी उपन्यास न होता!
अगर राग दरबारी न हुआ होता तो न जानें कितनी पीढिय़ां शहर की सडक़ें छोडऩे के बाद हिंदुस्तानी देहात का जो महासागर शुरु होता है उसमें गोते लगाए बिना रह जातीं। अगर राग दरबारी न होता तो शिवपालगंज नहीं होता। गंजहे नहीं होते और उनकी टिल्ल-टांय नहीं होती। तब हो सकता है कि हम हिंदी साहित्य में गांव के बारे में मैथिलीशरण गुप्त की इस कविता को ही सच्चाई मान लेते कि अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है/थोड़े में निर्वाह यहां है/ ऐसी सुविधा और कहां है। इस भावुक-भावना से भरी कविता को पढक़र बहुत सारे शहरी हिंदी हृदय प्रदेश के गांव की उसी छवि को मन में बसा लेते जैसी हमारी सरकारें हमें इंडिया शाइनिंग, भारत निर्माण और साफ नीयत-सही विकास के विज्ञापनों में दिखाती हैं।
अगर राग दरबारी न होता तो हम ग्राम्य जीवन की सरलता के ऐसे महिमामंडन का शिकार होते कि जानते हुए भी न मानते कि हमारे गांवों में पंडित राधेलाल भी रहते हैं जो साक्षरता और निरक्षरता की सीमा रेखा पर खड़े रहते हैं और अपनी सुविधानुसार अदालत में कह सकते हैं कि ‘हुजूर पढ़ा-लिखा नहीं हूं।’ और अगर बात बिगडऩे लगे तो निरक्षरता की एलओसी पार कर यह भी कह सकते हैं कि ‘सरकार दस्तखत कर सकता हूं।’ पंडित राधेलाल चाहें निरक्षरता का लघु रूप धरें या साक्षरता का विकट रूप। इंसाफ हर हाल में उनकी गवाही के आगे सरेंडर कर ही देता है।
अगर राग दरबारी न लिखा गया होता तो हमारे पास ऐसे वन लाइनर नहीं होते जो भीषण से भीषण सवालों के लिए कुंजी का काम करते हैं। मसलन, देश की उच्च शिक्षा की बदहाली पर हम यह कैसे कह पाते कि उच्च शिक्षा रास्ते में पड़ी कुतिया है, जिसे कोई भी लात मारकर निकल सकता है। राग दरबारी न होता तो हम यह कैसे जान पाते कि मध्ययुग का कोई सिंहासन रहा होगा, जो अब घिसकर कुर्सी बन गया है और हमारे दारोगा जी उसी पर विराजते हैं। अगर गंजहों का दिया सहज ज्ञान न होता तो यह ज्ञान कौन देता कि पुनर्जन्म का ईजाद भारत की दीवानी अदालतों से हुआ ताकि कोई यह अफसोस लेकर न मरे कि उसे इंसाफ नहीं मिला।
शिवपालगंज के आत्मविश्वास से भरे गंजहे न होते तो किसानों को उन्नत कृषि सिखाने आए वैज्ञानिकों को मूर्ख मानने का साहस कौन जुटा पाता। गंजहों ने पूरे भारत के ग्रामीणों को स्वर दिया और एक अनूठा सिद्धांत स्थापित किया कि सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों में वक्ता और श्रोता दोनों एक दूसरे को मूर्ख मानकर चलें। राग दरबारी न लिखा गया होता तो अधिक अन्न उपजाओ टाइप के विज्ञापनों की वाल राइटिंग की निरर्थकता बहुत बाद में समझ आती। राग दरबारी के गंजहों ने पहले ही समझ लिया था कि इस तरह के विज्ञापन सिर्फ गॉसिप के काम आ सकते हैं। गंजहों ने हमें ज्ञान दिया कि ऐसे विज्ञापनों मे छपे हष्ट-पुष्ट शरीर वाले मर्द को रसूखदार बद्री पहलवान ही समझा जाए और उसके साथ बनी सुघड़ कन्या के बारे में विचार देने के लिए पूरा गांव स्वतंत्र रहे।
राग दरबारी न होता तो छंगामल माध्यमिक विद्यालय भी नहीं होता जो खुद-ब-खुद एक किरदार है और मजे की बात है कि राग दरबारी लिखे जाने के पचास साल बाद भी उसका यौवन बरकरार है। छंगामल विद्यालय में अगर इतिहास के मास्टर खन्ना अंग्रेजी न पढ़ा रहे होते तो हम कैसे जान पाते कि यह तो हमारी गौरवशाली परंपरा है और हमें 2019 में भी किसी भूगोल के अध्यापक से भौतिक विज्ञान पढऩे में गर्व महसूस करना चाहिए। किसी इंटर कालेज की प्रिंसिपली कितना दिक्कत तलब काम है, यह हमें कैसे पता चलता अगर अहम राग दरबारी में छंगामल विद्यालय के प्रिंसिपल और क्लर्क की बातें न सुनी होतीं। हम कैसे जान पाते कि राजनीतिक रसूख वाले किसी वैद्य जी को अगर किसी स्कूल का क्लर्क चाचा कहता है देता है तो प्रिंसिपल इस बात से मन मसोस कर रह जाता है कि वह उन्हें बाप नहीं कह सकता। और भारतीय़ ग्रामीण प्रतिभा से हमारी शहरी पीढ़ी को यह ज्ञान कहां से मिलता कि हर चिड़ीमार को मौके-बेमौके सलाम करते रहना चाहिए, पता नहीं कब काम आ जाए क्योंकि कोई शरीफ आदमी तो कुछ करके देता नहीं है।
राग दरबारी ने ही हमें बताया कि हमारा लोकतंत्र ऐसी चीज है जो बदन पर महज एक जांघिया धारण करने वाले सनीचर को ग्राम प्रधान भी बना सकता है। बस उसकी एक शर्त है कि वह प्रधानी पूर्व और प्रधानी के बाद भी पूरी आस्था से वैद्य जी की बैठकी में भंग पीसता रहे।
और फिर वैद्य जी। जो हैं तो हमारे मुल्क में बहुत सारे लेकिन अगर राग दरबारी न होता तो वैद्य जी के कृतित्व की ऊंचाइयों और व्यक्तित्व की गहराइयों का वर्णन कौन कर पाता। आज भी भारत के सार्वजनिक शौचालयों में लगे गुप्त रोग के इलाज के विज्ञापन देखकर आपको यह एहसास कैसे होता कि वैद्य जी पहले ही बता गए थे कि ब्रम्हचर्य का नाश ही सब रोगों का मूल है। अगर राग दरबारी ने वैद्य जी के किरदार को न गढ़ा होता तो भ्रष्टाचार को नैतिक आभा कैसे दी जाती है, कइयों के लिए यह सीखना जरा मुश्किल होता। वैद्य जी बहुत सरलता से कैसे कह सकते थे कि ‘ऐसी कौन सहकारी यूनियन है जिसमें भ्रष्टाचार नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता तो लोग हमें गलत समझते। अब ठीक है लोग समझेंगे हम कुछ छुपाते नहीं।’ अगर राग दरबारी जैसी साहित्यिक कृति हमारे पास नहीं होती तो हम इस प्रकार की ईमानदारी वाली बेईमानी के लिए सिर्फ राजनीति के अखबारी किस्सों पर निर्भर रहते।
राग दरबारी न लिखा गया होता तो हमें यह समझने में मुश्किल होती कि नेता बनने के लिए रूप्पन बाबू जैसा मिजाज होना चाहिए जो थाने में बैठे चोर और थानेदार को एक नजर से देखता हो। रूप्पन बाबू ने ही हमें बहुत पहले सिखाया कि ‘सार्वजनिक जीवन का मूलमंत्र है- सबको दयनीय समझो, सबका काम करो और सबसे काम लो।’ किसी भी वाद और विचार से मुक्त रहकर रूप्पन बाबू पूंजीवाद के प्रतीक दुकानदारों से सामान खरीदते नहीं थे, ग्रहण करते थे। शोषण का प्रतीक इक्के वाले भी उन्हें शहर पहुंचाकर किराया नहीं आशीर्वाद मांगते थे। राजनीति में परिवारवाद पर सर खपाने के बजाय हम राग दरबारी के उदाहरण से आसानी से ही समझ गए कि नेता पैदायशी होते हैं। रूप्पन बाबू नेता थे क्योंकि उनके बाप वैद्य जी भी नेता थे।
शिवपालगंज का लंगड़ न होता तो सरकारी दफ्तर में दी जाने वाली दरख्वास्तों की जान चींटी जैसी होती है जिसे कोई भी ले सकता है, यह हम जानते लेकिन इसकी ऐसी सार्वजनकि अभिव्यक्ति न हुई होती। लंगड़ ने हम सबको सिखाया कि आम आदमी की दरख्वास्त खारिज हो जाना उसकी नियति है और हमें ज्यादा टिल्ल-टांय के बगैर अपनी नियति बदलने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
राग दरबारी न होता तो हम कहां जान पाते कि उच्च शिक्षा प्राप्त और दुनिया बदलने के सपने से लैस रंगनाथ जैसे युवा कैसे और क्यों अपने हालात से मुंह मोड़ लेते हैं और पलायन संगीत की स्वर लहरी का सहारा लेते हैं।
राग दरबारी न होता तो हमारे पास हिंदी की बहुपठित किताब नहीं होती और हिंदी के एक सुविख्यात आलोचक की यह बात कैसे गलत निकलती कि अपठित रह जाना ही इसका लक्ष्य है। (सत्याग्रह)

 

 


Date : 31-Dec-2019

रोबोटों के साथ काम करना उतना भी आसान नहीं जितना लगता है। रोबोट के निर्माताओं के मुताबिक मशीनों से सबसे कठोर और नीरस काम कराना आसान है, लेकिन वास्तव में वह चोटों के रूप में नए तरह का तनाव पैदा कर रहे हैं। अमेरिकी प्रांत कनेक्टिकट में अमेजन कर्मचारी अमांडा टैलन कहती हैं, उनका वजन बहुत होता है। उनके बगल में ही 6 फीट लंबा घूमने वाला रोबोट काम कर रहा है।
टैलन का काम उस पिंजरे में घुसना है जहां रोबोट काम कर रहे हैं। टैलन का काम रोबोट को पकडक़र गिरे हुए खिलौने को उठाना है या फिर एक तरह के ट्रैफिक जाम से छुटकारा दिलाना है। इस दौरान टैलन अपनी कमर पर एक बेल्ट बांधती हैं और पास के रोबोट को अचानक रुकने और दूसरे रोबोट्स को अपने मार्गों पर धीमा या व्यवस्थित होने का आदेश देती हैं। वह कहती हैं, जब आप अंदर होते हैं तो तब आप रोबोट के चलने की आवाज सुन सकते हैं। लेकिन आप उन्हें नहीं देख सकते हैं कि वह कहां से आ रहे हैं। पहली बार जब आप यह काम करते हैं तो आप नर्वस होते हैं।
अमेजन और उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां लगातार अपने कर्मचारियों को रोबोट के साथ काम करने की आदत डलवा रही है। अमेजन के पास फिलहाल दो लाख रोबोटिक व्हीकल्स हैं, जो फिलहाल अमेरिका में डिलीवरी केद्रों में माल इधर से उधर ले जाते हैं। साल 2014 में अमेजन के पास सिर्फ 15,000 रोबोट्स ही थे।
अमेजन के प्रतिद्वंद्वियों ने भी इस ओर ध्यान देते हुए लागत कम करने और डिलीवरी को गति देने के लिए रोबोट से काम लेना शुरू कर दिया। हाल के समय में आशंका इस बात की रही है कि रोबोट मानव श्रमिकों की जगह ले लेंगे हालांकि अब तक ऐसा नहीं हो पाया है। इस बात की चिंता जरूर बढ़ गई है कि नवीनतम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ कदम से कदम मिलाना कर्मचरारियों की सेहत, सुरक्षा और हौसले को चोट पहुंचा रही है।
पूरे अमेरिका में गोदामों में काम करने वाले कर्मचारियों का इंटरव्यू ले चुकी और शिकागो की यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोएस की प्रोफेसर बेथ गुटेलिएस के मुताबिक कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ रहा है।
वह कहती हैं, ऐसा नहीं है कि कर्मचारियों को रोबोट के साथ काम करने की ट्रेनिंग ना दी जा रही हो, समस्या तब अधिक हो जाती है जब उत्पादकता मानक बहुत ऊंचे होते हैं।
साल 2012 में अमेजन ने जब मैसाच्यूसेट्स की स्टार्टअप कंपनी किवा सिस्टम्स को खरीदा है तभी से गोदामों में रोबोटिक्स का चलन भी तेजी से बढ़ा है। किवा सिस्टम्स पिछले सात साल से अमेजन के लिए अरमाडा रोबोट के डिजाइन और निर्माण पर काम कर रही है।
कनाडा स्थित ई-कॉमर्स कंपनी शॉपीफाई ने करीब 450 मिलियन डॉलर निवेश कर मैसेच्यूसेट्स की रिवर सिस्टम्स को खरीदा है, जिसका काम ऐसे कार्ट बनाना है जो गोदामों में कर्मचारियों के पीछे-पीछे चलता है और माल ढोता है। फेडेक्स और डीएचएल जैसी डिलीवरी कंपनी और वॉलमार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियां भी मोबाइल रोबोट बनाने वाली कंपनियों के साथ काम कर रही है ताकि डिलीवरी में आसानी और लागत में कमी की जा सके। (एपी)