विचार / लेख

Date : 30-Mar-2020

कुमार हर्ष, गोरखपुर से

मन बहुत दु:खी है। जहां रहता हूँ वहां से बमुश्किल 100 मीटर दूरी पर बस स्टेशन है। इस नीरव समय में कल आधी रात से जोर जोर की आवाज़ें शुरू हुई जो लगभग 20 घण्टे बाद अभी तक जारी है। बीच बीच में माइक पर गूंजती आवाज़ें भी है।

महराजगंज वाले 7041 पर बैठ जाएं। 8252 पडरौना जा रही है तुरन्त बैठिए। ऐसी ही कई उद्घोषणाएं। पुलिस लगातार मौजूद है। लाइन लगवाती। भीड़ भीतर की बजाय पहले छत पर जाती है। दिन में कुछ लोग, मेरे कुछ दोस्त भी खाने का सामान लेकर गए थे।

दिन भर आवाजें बेचैन करती रहीं। मन नही माना तो अभी थोड़ी देर पहले वहां गया। मैंने विभाजन की तस्वीरें सिर्फ फिल्मों में देखी है। ये दृश्य वैसे ही लगते हैं। इसमें आदमी भी है, औरते और बच्चे भी। साथ में बोरे, झोले, पेंट के बड़े डिब्बों में सिमटी गृहस्थी है। बस किसी तरह घर पहुंचना है बस।

टीवी से लेकर सोशल मीडिया में आरोपों की भरमार है। चीन को गालियां देते लोग अब केजरीवाल को गरिया रहे हैं। उनकी राय में सब किया धरा उन्हीं का है। पहले अपनी खांसी दुनिया को दे दी और अब अपनी मुसीबत भी टरका दी।

कुछ अलग लोग भी है जो 2014 से एक ही बात कह रहे। जैसे भजनों में एक टेक होती है। अखण्ड पाठ में जैसे सम्पुट होता है वैसे ही उनके टेक और सम्पुट है जिसमें एक नाम ही रहता है।

कुछ इन मजदूरों या प्रवासियों को ही विलेन बता रहे हैं। कह रहे है कि सालों ने हमारे संयम को पलीता लगा दिया। अब जिंदा बम की तरह घूम रहे हैं। इन आवाजों को सुनने पर गुस्सा आ रहा है। कोई नहीं सोच रहा है कि मुसीबत में हर कोई घर ही भागना चाहता है। सुरक्षित इलाकों में रह रहे लोग अखबार तक तो ले नहीं रहे और मौत के मुहाने पर बेघर खड़े इन विपन्न लोगों को मरने से पहले अपनों के बीच तक पहुंच जाने को अपराध बताते हैं।

ये सोचकर ही डर लगता है कि कैंसर पीडि़त वो आदमी बीबी बच्चों के साथ दिल्ली से सिद्धार्थनगर क्यों भागा। वो भी मोपेड से। मौत तो तय ही थी पर उससे पहले वो परिवार को महफूज कर देना चाहता था। पर रास्ते में ही मर गया। आप गाली बकते रहिए।

कल देर रात एक मित्र पुलिस अधिकारी का फोन आया। सुबह से रात 10 बजे तक हजारों की भीड़ को बसों में बिठाते वर्दी भी भीग गयी थी और उनका स्वर भी। बेबस जिंदगी की न जाने कितनी किताबें पढ़ ली थी उन्होंने।

सबसे अरज है। यह वक्त कठिन है। आरोप प्रत्यारोप का नहीं। आप जैसा सोचते हैं दुनिया वैसी ही दिखने लगती है। बहुत निगेटिविटी आपको ही चोट पहुंचाएगी। प्रार्थना कीजिये कि यह संकट जल्दी से जल्दी टले। मुसीबतजदा लोगों के लिए कुछ कर सकें तो कीजिये। न कर सकें तो अपने परिजनों को ही खुशी दीजिये।

यह वक्त भी गुजर जाएगा।

(मीडिया/स्वराज)


Date : 29-Mar-2020

अपूर्वानंद

कृतज्ञता के साथ जब अपनी लाचारी का एहसास जुड़ जाए तो मनुष्य उससे मुक्त होना चाहता है। एक समुदाय ही रहम, कृपा, राहत का पात्र बनता रहे यह वह कबूल नहीं कर सकता। वह बराबरी हासिल करना चाहता है।

अभी कुछ रोज पहले जब सरकारी आह्वान पर राष्ट्रीय कृतज्ञता का कोलाहल सुना तो एक कविता याद हो आई।

हम भारतीय हैं

धन्यवाद, धन्यवाद, क्षमा कीजिएगा, नहीं कहते हैं

हम सिर्फ देखते हैं अपनी आंखों से

और ले लेते हैं पानी भरा गिलास

फिर से उधर एक बार देख कर।

रघुवीर सहाय की ‘भारतीय’ शीर्षक यह कविता जाने कब से मन में अटकी रह गई है। आज जब कृतज्ञता के भाव पर विचार कर रहा हूं, यह उभर आई है।

इस कविता को जब पढ़ा था तब समझ में आया कि हमारे लिए धन्यवाद कहना क्यों दुष्कर हुआ करता था। कवि भारतीयता के इस लक्षण या गुण की प्रशंसा कर रहा है या उसे अपनी न्यूनता बताकर व्यंग्य कर रहा है, कहना कठिन है। लेकिन जो कह रहा है वह उसे हम अपने रोजाना के आचरण से जानते हैं कि सच है। पानी का गिलास लेकर दोबारा उस ओर देख भर लेना ही धन्यवाद का पर्याय है। सिर्फ अपनी आंखों से देखना और पानी का गिलास लेकर फिर से एक बार उधर देखा लेना ही कृतज्ञता ज्ञापन है।

धन्यवाद दिया जाता है या किया जाता है? इसे लेकर बोलने वालों में हमेशा दुविधा देखी जाती है। इसलिए शुद्ध हिंदी में उसे ज्ञापित कर दिया जाता है।

धन्यवाद ज्ञापन के लिए आयोजन करना पड़ता है। धन्यवाद हमेशा ही कृत्रिम जान पड़ता था, ऐसा जो बहुत औपचारिक है। बल्कि कहने वाले और जिसे संबोधित किया जा रहा हो, उनके बीच एक दूरी का आभास देने वाला।

धन्यवाद कहने में मानो जीभ को श्रम करना होता है और झेंप-सी होती है। हिंदी क्षेत्र की ही भाषा जो उसकी बहन मानी जाती है, यानी उर्दू उसमें शुक्रिया बोलना उतना संकोच का विषय नहीं।

शुक्रिया कहें या ‘बड़ी मेहरबानी’ या सिर्फ ‘मेहरबानी’, शब्द सहजता से जुबान पर चढ़ते हैं। ऐसा क्यों?

हिंदी और उर्दू विभाग अगल-बगल हैं, लेकिन दोनों के शिष्टाचार में फर्क है। शुक्रिया, मेहरबानी ये शब्द अक्सर एक जगह आपके कानों में पड़ेंगे लेकिन धन्यवाद अपवादस्वरूप ही।

वैसे शुक्रिया भी हिंदी का शब्द है। हिंदी वाले मानेंगे कि वह अधिक स्वाभाविक भी लगता है। धीरे-धीरे हिंदी के औपचारिक शिक्षण में जिस तरह का बाहरी-भीतरी का भेद गहरा हुआ है, उसके चलते हो सकता है उसे कई हिंदी भाषी अपना न मानें।

हिंदी में धन्यवाद को लेकर इस संकोच को लेकर मैंने अपनी मलयालम भाषी मित्र देविका से बात की तो उन्होंने स्वीकार किया कि मलयालम में भी इसके लिए जो शब्द है, वह बनाया हुआ है- नंदी।

यह भी औपचारिक है रोजाना शायद ही इस्तेमाल होता हो। दूसरा प्रयोग है, वलिया उपकार। यह बड़ी मेहरबानी  का ही समतुल्य है।

मलयालम की करीबी भाषा तमिल में यह शब्द है नंद्री। सत्या शिवरमन ने कहा कि यह भी मनुष्य समाज के धीरे धीरे परिष्कृत होने के क्रम में ही विकसित हुआ है।

भारतीय स्वभाव में यह जो संकोच है उसे तोड़ देता है थैंक्स या थैंक यू। जिनसे धन्यवाद बोला नहीं जाता, वे थैंक्स धड़ल्ले से बोलते हैं।

कृतज्ञता को लेकर भारतीय संकोच की व्याख्या कैसे करें? क्या इस तरह कि हम मानते हैं कि हर किसी का काम बंधा है, वह दैवी विधान है।

सामाजिक हैसियत में जो नीचे की सीढ़ी पर है, वह अपना कर्तव्य कर रहा है। उसके लिए कृतज्ञता क्यों? एक हलवाहे को या बेगार खटने वाले को कब धन्यवाद की एक निगाह भी मिली?

ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव के अलावा शायद हम सिर्फ डॉक्टरों के प्रति ही कृतज्ञ होते रहे हैं। लेकिन जब अस्पताल पैसा न होने के कारण या डॉक्टर किसी और घृणा के चलते इलाज न करे तो इस पेशे के प्रति कृतज्ञता बिना शर्त कैसे हो?

बाहर से आने वालों को भारतीयों के इस व्यवहार से धक्का लगता है और इसका आदी होने में उन्हें समय लग जाता है।

बस या ट्रेन में किसी को बैठने के लिए जगह देने पर बिना कुछ कहे उसे स्वीकार कर लेना या दुकान में सामान लेने पर दुकानदार का बिना अनुरोध के सीधे पैसे तलब करना, इन चीजों को विदेशी नोट करते हैं। लेकिन फिर उनमें से कुछ यह मानते हैं कि इन औपचारिकताओं के अभाव से यह नहीं मानना चाहिए कि भारतीयों में धन्यवाद या कृतज्ञता का भाव है ही नहीं।

प्रत्येक प्रकार के भारतीयों में भी संसार के अन्य लोगों की तरह ही यह रिवाज रहा है कि भोजन आरंभ करने के पहले ईश्वर को धन्यवाद दें। भोजन मंत्र प्रत्येक धर्म में हैं।

भोजन के लिए ईश्वर को क्यों शुक्रिया अदा करें, यह सवाल रघुवीर सहाय का है। वह तो अनावश्यक ही श्रेय लेने आ जाता है।

भोजन क्या है, उसका रस या महत्त्व क्या है, यह मनुष्य के अलावा कौन जानता है? अगर ऐसा न था तो वह उसके लिए कृतज्ञ ही क्यों होता?

‘अन्न का रस’ शीर्षक कविता का अलग से अर्थ करने की जरूरत ही नहीं-

खाने के पहले कृतज्ञ होता हूं मैं

खाने के बाद भी

कहां आ जाते हो श्रेय लेने को

हर बार

ईश्वर

क्या तुम नहीं जानते

कि अन्न जो तुमने उगाया है

उसमें एक रस है

जो मैं ही जानता हूं?

विधाता के प्रति इस जीवन के लिए और उसमें अन्न, जल, वायु और दूसरे वरदानों के लिए कृतज्ञ होने की परंपरा लेकिन प्रत्येक संस्कृति में है। लेकिन खाना मिलना क्या सिर्फ ईश्वर की कृपा पर निर्भर है? सबका खाना क्या एक जैसा है?

कोरोना वायरस के वक्त जिसका काम छूट गया और जो सडक़ पर भटक रहा है, उसे सरकारें या हमदर्द शहरी जो खाना दे रहे हैं उसके लिए वह किसे धन्यवाद दे?

जो हिंसा में बेघर होकर राहत शिविरों में हैं, उनके लिए जब खाना राहत के तौर पर आता है तो उसे कबूल करते वक्त वे किसे शुक्रिया अदा करें?

‘खाने से पहले’ बहुत छोटी कविता है लेकिन शायद ऐसे ही अवसरों के लिए है-

सामने थाली को देखकर

पहले मैं ईश्वर को धन्यवाद करता था

आज मुझे अपमान याद आता है।

यह जो अपमान है, वह खाने या भोजन के एक असाधारण घटना में बदल जाने और अपने जैसे ही किसी और की मेहरबानी के एहसास से जुड़ा हुआ है। (बाकी पेज 8 पर)

ऐसे किसी के आगे हाथ फैलाना पड़े जिसका आपसे कोई रिश्ता नहीं आपके और उसके बीच एक गैर-बराबरी का रिश्ता बना देती है।

वह साधारण भोजन नहीं, राहत है। ऐसी राहत लेते हुए अपनी कमतरी का एहसास होता है। जो देता है, वह क्या इस अपमान या संकोच को वैसे ही समझ पाता है?

अविनाश पिछले एक महीने से भटक रहे हैं भजनपुरा, कोंडा, खजूरी, मुस्तफाबाद, चमन पार्क, शिव विहार की गलियों में। कल उन्होंने एक कारखाना मालिक के बारे में बताया जिनका सब कुछ फरवरी की हिंसा में खाक हो गया।

अब वे लोनी में अपने परिवार के कई सदस्यों के साथ एक कमरे में सिर छुपाए हुए हैं। यह जगह जहां उन्हें पनाह मिली है, वह उनकी हैसियत के लोगों के लिए नहीं।

यहां उनके कामगार और मजदूर रहते हैं। उनके बीच रहने में जिंदा बचे रहने और सुरक्षित रहने का आश्वासन तो है, लेकिन यह कहते-कहते वे रो पड़े।

वे जरूर कृतज्ञ हैं उनके जिनके कारण वे इस खोली में भी रह पा रहे हैं, लेकिन इसमें उस अपमान का दंश है जो रघुवीर सहाय की कविता में है।

अविनाश जब यह बता रहे थे मुझे 1984 में पटना के तख्त श्री हरमंदिर साहब की याद हो आई। पटना भर के सिखों का आश्रयस्थल आखिरकार यही गुरुद्वारा रह गया था। हम पटनावासी अपने ही हमशहरों से मिलने उस जगह गए, जो था तो तीर्थस्थल लेकिन इस बार हम तीर्थयात्रियों की तरह वहां नहीं गए थे।

हमारे पास थी शर्म सहानुभूति के साथ। वहां मैंने उन सरदारजी को देखा जो पटना मेडिकल कॉलेज के राजेन्द्र सर्जिकल वार्ड की कैंटीन चलाते थे।

कल तक जो अपनी बारी आने पर ही समोसे और चाय देते थे, आज इस अवस्था में हमें देखकर उन्होंने आंखें झुका लीं। उन्होंने जीवन में कभी न सोचा होगा कि इस तरह वे किसी का एहसान लेने को मजबूर हो जाएंगे।

कृतज्ञता के लिए देने और लेने का रिश्ता होना चाहिए। एक जिसके कुछ करने से दूसरे के जीवन में किसी भी तरह की, बड़ी या छोटी, बेहतरी आ रही हो।

इस रिश्ते में एक कृतज्ञता का अधिकारी है और दूसरा एहसानमंद बने रहने के लिए अभिशप्त है। उन दोनों के बीच इस रिश्ते के बदलते रहने की या इसके दोतरफा होने की जरूरत है।

अगर ऐसा न हो पाए तो मान लेना चाहिए कि नाइंसाफी ही इस तरह के जीवन का नियम है।

कोरोना वायरस का एक परिणाम दुर्भिक्ष (अकाल) भी हो सकता है। खुद को अपने घरों में बंद करके जिन्हें सडक़ पर भटकते रहने के लिए हमने छोड़ दिया है, वे संभव है भूख से मारे जाएं।

यह जो दुर्भिक्ष सामने मुंह बाए खड़ा है, इसमें कृतज्ञता जैसे मानवीय भाव की क्या जगह होगी?

यह जो एक झटके से जीवन से बाहर कर दिए जाने का सदमा है, वह क्यों एक खास तरह की आबादी के हिस्से ही क्यों हो?

इस दुर्भिक्ष में जो न तो हवा के पहले से हल्के हो जाने का एहसास कर पाएं, न जिन्हें मोर के बोलने का आनंद अपने कमरे के भीतर से मिल पाए क्योंकि वे शहरबदर कर दिए गए हैं, वे किनके प्रति एहसानमंद हों?

अगर उन्हें रास्ते में कुछ भलेमानस खाना खिलाएं तो वे उनके प्रति किस हद कृतज्ञ हों? और कैसे?

रघुवीर सहाय की ‘दुर्भिक्ष’ शीर्षक कविता इस समान रिश्ते को एक निजी प्रकरण के माध्यम से व्यक्त करती है-

वह आया और चबूतरे पर खड़ा हुआ

जंगले को खटखटा कर उसने बुलाया

और अपना बरतन वाला हाथ उठाया

मैंने कहा अरे, और फिर सकता खा गया

वह मुझसे कुछ बड़ा था उसी स्कूल में था

कुछ बरस पहले यह सुना था कि

कहीं चला गया था।

उस स्कूली मित्र को देखकर पहला ख्याल यह आया,

कि मुझे शर्म लगती है

और इसे लगेगी पहचाने जाने पर

ऐसा लेकिन होता नहीं। वह मित्र वाचक को पहचानता है और नि:संकोच कहता है,

जाओ कुछ ला दो न देने और लेने का यह एक नया रिश्ता इन दोनों के बीच बना है, वह कैसा है?

मैं बैठक में लौटा

दो रोटी लाया था, भीतर बुलाकर परस दिया

उसने उठाया वह परोसा और रख लिया बूढ़े बाप के लिए

और वह चला गया आदर से झुक प्रणाम करके जो हाल में सीखा था

यह कृतज्ञता ज्ञापन देने वाले को असहज कर देती है, लेकिन तभी जब वह इस असमान रिश्ते को स्वाभाविक न माने। अगली पंक्ति मारक है,

जाते वक्त हमको धकेल कर छोड़ गया जहां हम पहले थे। जब कृतज्ञता का भाव गैर-बराबरी और नाइंसाफी की स्थिति से जुड़ा हो तो हिंसा पैदा होती है। अक्सर लोग यह शिकायत करते मिलते हैं कि जिसकी भलाई करो, वह पहला मौका मिलते ही पीठ में छुरा घोंप देता है।

कृतज्ञ लोग हैं लेकिन कृतघ्न भी हैं। कृतज्ञता के साथ जब अपनी लाचारी का एहसास जुड़ जाए तो मनुष्य उससे मुक्त होना चाहता है। एक समुदाय ही रहम, कृपा, राहत का पात्र बनता रहे यह वह कबूल नहीं कर सकता। वह बराबरी हासिल करना चाहता है। कृतज्ञता पर यह बातचीत शायद रास्ता भटक गई है। लेकिन उसमें हर्ज ही क्या है?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं।) (द वायर)


Date : 29-Mar-2020

जितेन्द्र पारख

नेटफ्लिक्स और अमेजन की सीरीज़ के बारे में चर्चा करने, सोशल मीडिया में नए नए मीम देखने के बीच जब सोशल मीडिया में एक 17 साल का लडक़ा आता है जो रो-रो कर बताता है कि घर जाने के लिए पैसे नहीं हैं, एक आदमी आता है जिसके पास फोन नहीं है और कैसे भी करके बस बिहार पहुँचना है। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि क्या किया जाए।

बहुत गुस्सा भी आता है और दु:ख भी होता है। मौत के डर से इंसान घर में है, मीलों चलने को तैयार है। दो वक्त का अनाज मिलते रहे  इसके लिए हरसंभव कोशिश कर रहा है। इंसान हताश है, बेबस है। कल तक इंसान प्रकृति के सामने  शक्ति प्रदर्शन करते थक नहीं रहा था और आज पूरा विश्व एक सूक्ष्म वायरस के आगे बेबस नजर आ रहा है।

चीन से उपजा यह वायरस अब ब्रिटेन, अमेरीका, जापान, दक्षिण कोरिया, फि़लीपींस, थाईलैंड, भारत, ईरान, नेपाल और पाकिस्तान जैसे 168 देशों तक पहुंच चुका है। दुनिया का सबसे ताकतवर देश और सुपरपावर माना जाने वाला अमेरिका भी कोरोना का इलाज नहीं ढूंढ पाया। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अपने हुनर का लोहा मनवाने और  2020 तक आकाश में इलुमिनेशन सेटेलाइट नाम से उपग्रह भेजनेवाला चीन, स्वास्थ्य के लिए नए नए इक्विपमेंट्स बनाने वाला इटली भी आज इस कोरोना वायरस से जूझ रहा है।

ऐसा नहीं है कि महामारी जैसी स्थिति विश्व में पहली बार हुई है लेकिन जिस आधुनिक और प्रौद्योगिकी युग में हम जी रहे है उसमें इतनी बेबसी और खौफ बेशक नई बात है। आज से 102 साल पहले यानि 1918 में स्पैनिस फ्लू हुआ था, जिसमें दुनिया भर के 5 करोड़ लोगों की जान गई थी। इसके अलावा 1957 में एशियाई फ्लू में लगभग 11 लाख लोगों की जान गई थी। जबकि 2009 में स्वाइन फ्लू से आप परिचित होंगे ही, इसमें भी करीब 2 लाख लोगों की जानें गईं थी लेकिन हर घटना के बाद तमाम दावे किए जाते थे इन्हें रोकने के लिए और देखिये सब धरे के धरे रह गए।

इस महामारी से स्थिति इतनी भयवाह हो गई है कि इटली में कोविड 19 के कारण मरने वाले कई लोगों के पास आखरी वक्त में उनके परिवार का कोई सदस्य या कोई मित्र नहीं था। स्पेन में इंसान को दफनाने के लिए कब्रिस्तान छोटे पड़ गए है। भारत में दुकानों में ताले लग गए, सडक़े वीरान हो गई है।इन सारे परिणामों के जिम्मेदार बहुत हद तक हम ही है। हम लोग बार बार भूल जाते है कि इस पूरे संसार में हमारे अलावा भी बहुत जीव जंतु रहते है। हम भूल जाते है की हमारे जैसे प्रकृति के हर जीव का जीवनशैली है। लेकिन हमें फुर्सत नहीं थी नदी में ईमारत खड़ी करने और पहाड़ो में प्लांट लगाने से।

भारत की बात करे तो समय-चक्र को जरा सा पीछे ले चलें तो ये देख पाएंगे कि किस प्रकार केदारनाथ-त्रासदी के रूप में प्रकृति ने अपना विकराल रूप दिखाया और हजारों लोग पलक-झपकते ही काल के गाल में समां गए। प्रकृति का एक अन्य रूप सामने आया जब सुनामी ने भारत सहित अन्य एशियाई देशों में मौत का तांडव किया था। लाखों लोगों का आशियाना उजड़ गया, लाखों मरे, हजारों लोगों को अपना ठिकाना बदलना पड़ा। इससे पहले शायद ही मौत का ये मंजर देखा हो दुनिया ने।

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी पूरी मानव जाति के लिए खतरा पैदा कर रही है। कोरोना का तांडव थमता नहीं दिख रहा है। घर में रहने से शायद इस वायरस से बच जाए लेकिन अगर इस दुनिया में आगे अच्छे से रहना है तो प्रकृति के नियमों के साथ जीना सीखना होगा। शायद दुनिया कोरोना से बच जाए लेकिन हमारी इंसानी फितरत और लालच से प्रकृति बचेगी की नहीं पता नहीं।


Date : 29-Mar-2020

 

 

 

 

तारन प्रकाश सिन्हा

जब युद्ध की परिस्थितियां हों

तब हल के फालों को गलाकर

तलवारें ढाल लेनी चाहिए।

देश इस समय यही कर रहा है।

ऑटो मोबाइल सेक्टर की नामवर कंपनी महिंद्रा और महिंद्रा अब वैंटिलेटर्स के निर्माण के लिए आगे आ रही है और खबरों के मुताबिक वह चार-पांच लाख रुपए के वैंटिलेटर्स साढ़े 7 हजार रुपए से भी कम कीमत पर उपलब्ध कराने की तैयारी में है।

भारत में कोरोना वायरस को बड़ा खतरा इसलिए भी माना जा रहा था क्योंकि यहां संक्रमितों की संभावित संख्या की तुलना में वेंटिलेटर्स की संख्या बहुत कम है। महिंद्रा की पेशकश ने इस खतरे को न केवल कम कर दिया, बल्कि इस युद्ध को भी आसान कर दिया है।

अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए पलंग से लेकर सैनेटाइजर जैसे सामान कम न पड़े, इसके लिए रेलवे ने भी कमर कस रखी है। रेलवे ने अपने कई प्रोडक्शन इकाइयों को मेडिकल संबंधी सामान बनाने का आदेश जारी कर रखा है। खबर यह भी है कि कई वातानुकूलित ट्रेनों को भी अस्पतालों में तब्दील करने के बारे में विचार किया जा रहा है, यह इनोवेटिव आइडिया रेलवे को आमलोगों से ही मिला था।

कोरोना से रक्षा के लिए जब सेनेटाइजर्स कम पडऩे लगे तब शराब का उत्पादन करने वाली डिस्टिलरियों ने सेनेटाइजर्स का उत्पादन शुरू कर दिया। मास्क की कमी को दूर करने के लिए गांव-गांव में स्व सहायता समूह की महिलाएं अपनी सिलाई मशीनें लेकर जुट गईं।

संक्रमितों की जांच के लिए जब महंगे विदेशी किटों की उपलब्धता रोड़ा बनी तब पुणे के माईलैब डिस्कवरी साल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की देसी संस्था ने सस्ता किट तैयार कर दिखाया। इससे मरीजों की जांच अब एक-डेढ़ हजार रुपए में भी हो सकेगी, जिस पर पहले चार-पांच हजार रुपए तक खर्च हो जाया करते थे। भारत की यह उपलब्धि भी किसी मंगल मिशन से कम नहीं है। इस तरह के उदाहरणों का लंबा सिलसिला है। हम वो लोग हैं जो पुडिय़ों के लिए गर्म हो रहे तेल से राकेट साइंस सीख लेने की योग्यता रखते हैं।

 


Date : 28-Mar-2020

अनुराग भारद्वाज

रूसी साहित्य के सबसे चमकते सितारे मैक्सिम गोर्की का अपने देश ही नहीं, विश्व में भी ऊंचा दर्जा है। वे रूस के निझ्नी नोवगरद शहर में जन्मे थे। पिता की मौत के बाद उनका बचपन मुफलिसी और रिश्तेदारों के तंज खाते हुए गुजरा में गुजरा। गोर्की ने चलते-फिरते ज्ञान हासिल किया और पैदल घूम-घूमकर समाज और दुनियादारी की समझ हासिल की। 1892 में ‘मकार चुद्रा’ पहला उपन्यास था जिस पर उन्होंने एम गोर्की के नाम से दस्तखत किये थे।
इससे पहले अलेक्सेई मक्सिमोविच पेश्कोव से गोर्की बनने तक उनका सफर कई ऊंचे नीचे-पडावों से गुजरा। ‘मेरा बचपन’, ‘लोगों के बीच’ और ‘मेरे विश्वविद्यालय’ उपन्यास मैक्सिम गोर्की की आत्मकथायें हैं और इनमें उन्होंने अपना जीवन खोलकर रख दिया। ‘मेरा बचपन’ में उन्होंने अपने पिता की मौत से किताब का पहला पन्ना लिखा। इससे जाहिर होता है कि अलेक्सेई को पिता से गहरा लगाव रहा होगा और मां से कुछ खौफ। वे लिखते हैं  ‘...नानी मां से डरती है। मैं भी तो मां से डरता था, इसलिए नानी के साथ अपनापन और गाढ़ा हो गया।’
पर गोर्की का सबसे यादगार उपन्यास ‘मां’ ही है जो रूस में जार शासन के समय के समाज का हाल दर्शाता है। रूसी क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन की पत्नी नदेज्श्दा कोस्तैन्तिनोवा क्रुप्स्केया ने लेनिन की जीवनी में लिखा है कि वे (गोर्की) ‘मां’(उपन्यास) को बेहद पसंद करते थे। वहीं, लेनिन की बहन उल्यानोवा भी लिखती हैं कि गोर्की को इसे बार-बार पढऩा पसंद था। लेनिन ने भी इस किताब का जिक्र किया है। गोर्की ने लेनिन से हुए संवाद पर कुछ यूं लिखा; ‘बड़ी साफगोई से लेनिन ने अपनी चमकदार आंखों से मुझे देखते हुए इस किताब की खामियां गिनायीं। संभव है उन्होंने इसकी स्क्रिप्ट पढ़ी हो।’ जाहिर था यह उपन्यास उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना थी।
दरअसल, गोर्की को इसलिए पसंद किया जाता है कि जो उन्होंने लिखा, अपने जैसों पर ही लिखा। उनकी कहानियों के किरदार उनके आस-पास के ही लोग हैं। या कहें कि गोर्की उसी समाज के हैं जिस समाज पर उन्होंने लिखा। ‘मां’ की आलोचना में कई टिप्पणीकारों ने कहा कि उपन्यास में जिन पात्रों का जिक्र है, वैसे पात्र असल जिंदगी में नहीं होते।’ इस आलोचना के बाद उन्होंने खुलासा किया कि ये कहानी एक मई, 1902 को रूस के प्रांत सोर्मोवो के निझ्नी नोवगरद इलाके में हुए मजदूर आंदोलन से प्रभावित थी और इसके किरादर असल जिंदगी से ही उठाये हुए थे। मां, निलोव्ना और उसका बेटे पावेल के किरदार गोर्की के दूर की रिश्तेदार एक महिला एना किरिलोवना जलोमोवा और उसके बेटे प्योतोर जलोमोव से प्रभावित थे।
गोर्की ने इस उपन्यास में उस अवश्यंभावी टकराव को दिखाया है जो सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच हुआ था। जानकार यह भी कहते हैं कि उपन्यास में दिखाया गया काल वह है जब रूस में क्रांति आने वाली थी। पर कुछ लोग कहते हैं कि ‘मां’ रूस की क्रांति की तैयारी को दिखाता है उस काल को नहीं, यानी क्रांति से कुछ पहले वाला समय। जो भी हो, यह तय है कि गोर्की सरीखे लेखकों ने क्रांति की आहट सुन ली थी। पर आश्चर्य की बात यह है कि अगर किसी उपन्यास को रूसी क्रांति का जनक कहा जाता है तो वो अपटन सिंक्लैर का ‘जंगल’ है। जबकि ‘जंगल’ बाद में रचा गया है। ‘मां’ 1906-1907 के दरमियान लिखा गया और जबकि ‘जंगल’ 1904 में। जहां ‘मां’ एक रूसी समाज में संघर्ष की दास्तान है, ‘जंगल’ में अमेरिकी पूंजीवाद और सर्वहारा के टकराव का बयान है।
तो क्या हम मान सकते हैं कि पश्चिमी दुनिया ने रूसी क्रांति का सेहरा अमेरिकी लेखकों के सिर बांधकर कुछ रुसी लेखकों के साथ अन्याय किया है? यकीन से तो नहीं कहा जा सकता पर बात फिर यह भी है कि गोर्की को पांच बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया, पर यह सम्मान उन्हें एक बार भी नहीं मिला। वहीं रूस से भागकर अमेरिका चले गये अलेक्सेंडर जोलजेनितसिन को यह सम्मान दिया गया था। दोनों ही लेखकों को अपने काल में जेल हुई थी। गोर्की को जार शासन विरोधी कविता लिखने के लिए जेल में डाला गया तो जोलजेनितसिन को रूसी तानाशाह स्टालिन ने जेल भेजा।
गोर्की के साथ पश्चिम ने पहले भी बदसुलूकी की। अप्रैल 1906 में जेल से रिहा होने के बाद गोर्की और उनकी मित्र सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए चंदा इक_ा करने और अपने पक्ष में हवा बांधने के लिए अमेरिका गए। शुरुआत में तो उनकी बड़ी आवभगत की गई पर बाद में दोनों के संबधों के चलते अमेरिकी समाज ने उनकी फजीहत की। हालात इस कदर बिगड़ गए कि दोनों को होटल से बाहर फिंकवा दिया गया। गोर्की इस अपमान को कभी भुला नहीं पाए।
स्टालिन ने गोर्की के साथ अलग बर्ताव किया। उसने इटली में निर्वासित गोर्की को ससम्मान घर यानी रूस वापसी का न्यौता भेजा और वादा किया कि उन्हें राष्ट्रकवि की हैसियत दी जायेगी। स्टालिन ने ऐसा किया भी। गोर्की को आर्डर ऑफ द लेनिन के सम्मान से नवाजा गया और उनके जन्मस्थान का नाम बदलकर ‘गोर्की’ रखा गया। जानकार कहते हैं कि यह स्टालिन की रणनीति थी जिसके तहत वह गोर्की जैसे लेखक के जरिये विश्व को नव साम्यवाद का चेहरा दिखाना चाहता था। गोर्की ने रूस आने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया और कई ऐसे लेख लिखे जिनमें स्टालिन का गुणगान किया था।
गोर्की ने ऐसा क्यों किया, यह समझ से परे है क्योंकि रूसी क्रांति के कुछ समय बाद वे लेनिन के कट्टर आलोचक बन गए थे। इसी बात से यह विवाद खडा हुआ कि क्या गोर्की जीनियस थे या उनके इर्द-गिर्द जीनियस होने का आभामंडल गढ़ा गया? शायद यही दाग गोर्की के जीवन पर लगकर रह गया है जो मिटाया नहीं जा सकता। गोर्की की मौत भी संदेह के घेरे में हैं। कुछ लोगों का मानना है कि स्टालिन ने अपने विरोधियों के सफाए के लिए शुरू किये गए प्रोग्राम ‘दी ग्रेट पर्ज’ से पहले ही खुफिया पुलिस के हाथों उन्हें मरवा दिया था।
गोर्की की ज़्यादातर रचनाओं में सर्वहारा ही नायक है। उनकी कहानी ‘छब्बीस आदमी और एक लडकी’ एक लडकी और 26 मजदूरों की है जो उससे मन ही मन प्यार करते हैं। वह किसी से दिल नहीं लगाती पर उनसे बड़ी इज्जत से पेश आती है। एक दफा मजदूर एक सिपाही को उसका प्यार पाने को उकसाते हैं और वह सिपाही कामयाब हो जाता है। एकतरफा प्यार करने वाले मजदूर अपनी खीझ और भडास लडकी को तमाम गालियां तिरस्कार देकर निकालते हैं। कहानी में इंसान के टुच्चेपन के साथ-साथ दर्शन भी नजर आता है। वे लिखते हैं कि ‘प्यार भी घृणा से कम सताने वाला नहीं। शायद इसलिए कुछ चतुर आदमी मानते हैं कि घृणा प्यार की अपेक्षा अधिक प्रशंसनीय है।’ एक जगह वे लिखते हैं, ‘कुछ आदमी ऐसे होते हैं जो जीवन में सर्वोत्तम और उच्चतम को आत्मा या जिस्म का एक प्रकार का रोग समझते हैं और जिसको साथ लेकर अपना सारा जीवन व्यतीत करते हैं।’ जहां तक गोर्की के काम की समालोचना का सवाल है तो कुछ जानकार कहते हैं कि गोर्की के जीवन और लेखन में विरोधाभास के साथ-साथ ‘क्लीशे’ नजर आता है। गोर्की के साहित्य को खंगालने वाले आर्मीन निगी कहते हैं कि वे दोस्तोय्विसकी की तरह क्लासिकल राइटर तो नहीं थे, पर विश्व साहित्य के पुरोधा कहे जा सकते हैं। प्रेमचंद गोर्की के मुरीद थे। गोर्की की मौत पर उन्होंने कहा था, ‘जब घर-घर शिक्षा का प्रचार हो जाएगा तो गोर्की तुलसी-सूर की तरह चारों ओर पूजे जायेंगे’। पर ऐसा नहीं हो पाया क्यूंकि जिस आदर्श समाजवाद की परिकल्पना गोर्की ने की उसके क्रूरतम रूप यानी साम्यवाद ने दुनिया को ही हिलाकर रख दिया और नतीजन उसका खात्मा हो गया।
पर पूंजीवाद ने भी सर्वहारा के दर्द को मिटाया नहीं बस एक ‘एंटीबायोटिक’ की तरह दबाकर रख छोडा। वह दर्द अब-जब भी कभी-कभी टीस बनकर उभरता है, तो कुछ ताकतें फिर उसे दबा देती हैं। शायद इसीलिए अब गोर्की नहीं पढे जाते हैं। (सत्याग्रह)

 


Date : 28-Mar-2020

तारन प्रकाश सिन्हा

देश में कोविड-19 से होने वाली प्रभावितों का आंकड़ा 700 से पार हो चुका है। हालात बहुत चिंताजनक हैं, लेकिन राहत की बात है कि अब नियंत्रण में हैं। भारत इस महामारी से जिस कुशलता के साथ निपट रहा है, उसकी दुनियाभर में तारीफ हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हमारे प्रयासों की सराहना तो की है, इस महामारी की सबसे बड़ी चुनौती झेल चुके चीन ने भी तारीफ की है। कोविड-19 के जन्म से लेकर इस पर नकेल कसने तक चीन के पास लंबा अनुभव है, और वह कह रहा है कि भारत समय से पहले ही इस पर विजय पा लेगा।
ऐसे समय में जबकि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के हौसले पस्त हैं, इस भयंकर महामारी से निपटने के लिए भारत का मनोबल देखते ही बनता है। इसी मनोबल के बूते इस देश ने कोविड-19 को दूसरे चरण में ही अब तक थाम रखा है, अन्यथा अब तक तस्वीर कुछ और होती।
यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन कह रहा है कि कोरोना को लेकर दुनिया का भविष्य भारत के प्रयासों पर निर्भर है, तो इसके गहरे निहितार्थ है। इसीलिए इन प्रयासों को लेकर उसके द्वारा प्रकट की गई प्रसन्नता बहुत व्यापक है। भारत के इन्हीं प्रयासों ने उसे उसके समानांतर देशों में कोरोना के विरूद्ध चल रहे अभियान में एक तरह से नेतृत्वकर्ता की भूमिका में स्वीकार्यता दी है। 
पहले जनता कफ्र्यूू और बाद में 21 दिनों का लाक-डाउन जैसे कड़े फैसलों के दौरान जो परिदृश्य उभरा है, उसमें यह साफ नजर आता है कि हम न केवल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, बल्कि सबसे ताकतवर और एकजुट लोकतंत्र भी हैं। वह इसलिए कि भारत की तुलना में कोविड-19 से कई गुना अधिक पीडि़त होने के बावजूद अमेरिका अब तक ऐसे फैसलों की हिम्मत नहीं जुटा पाया है। 
चीन संभवत: इसीलिए चकित है कि लोकहित में कड़े फैसले तानाशाही के बिना भी लिए जा सकते हैं। 
कोविड-19 की पीड़ा के इस दौर में भारत न सिर्फ एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में उभरा है, बल्कि उसने अपने संघीय ढांचे की ताकत का भी अहसास करा दिया है। दुनिया देख रही है कि बहु-दलीय प्रणाली वाले इस देश के प्रत्येक राजनैतिक दल का मूल सिद्धांत एक है। जब देश और मानवता पर संकट आता है तो जाति, धर्म, संप्रदाय सबसे सब हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। इस समय यही राजनीतिक एकजुटता देश को ताकत दे रही है।
केंद्र और राज्य, शासन और प्रशासन, जनप्रतिनिधि और जनता, इन सबकी सीमाएं टूट चुकी हैं। सबके सब इस समय एकाकार हैं। अद्भुत समन्वय और तालमेल के साथ यह देश अपने अनदेखे दुशमन के साथ जंग लड़ रहा है। चाहे वह मेडिकल स्टाफ हो, या पुलिस के जवान, या फिर स्वच्छता-सैनिक, सभी ने साबित कर दिखाया है कि देश के लिए जो जज्बा सरहद पर लडऩे वाले सैनिक का होता है, वही जज्बा इस देश के जन-जन में है।
कोविड-19 पर हम निश्चित ही विजय पा लेंगे। उसके बाद नव-निर्माण का दौर होगा। हमें अपने हौसले पर भरोसा है। हम चीन जैसे देशों को एक और बार यह कहने पर मजबूर कर देंगे कि भारत समय से पहले उठ खड़ा होगा।

 


Date : 28-Mar-2020

अव्यक्त
गांधीजी कहते थे कि भय घृणा को जन्म देता है। आज महामारी से मौत का भय फिर से घृणा की नई घटनाओं और परिघटनाओं को जन्म दे रहा है। वह हमारे दिमाग में पहले से बैठे पूर्वाग्रहों को और भी जहरीले रूप में सामने ला रहा है।
10 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में उत्तर-पूर्व के छात्रों ने शिकायत दर्ज कराई कि उन्हें ‘कोरोनावायरस’ कहकर चिढ़ाया जा रहा है। उसी दिन मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में नागालैंड के छात्रों ने इसी तरह की शिकायत दर्ज कराई। इसी सप्ताह दिल्ली विश्वविद्यालय से सटे विजयनगर इलाके में मणिपुर की एक छात्रा पर यह कहते हुए थूक फेंका गया कि देखो चीनी कोरोनावायरस आ रही है। इसी तरह मुंबई में भी लॉ की पढ़ाई कर रही उत्तर-पूर्व की एक छात्रा को कहा गया कि ‘चीनी वायरस कोरोना जाओ यहाँ से’।
कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ रहे दार्जीलिंग के दो छात्रों को भी ‘कोरोनावायरस’ कहा गया। पुणे में भी एक दुकान पर मिजोरम की एक महिला के साथ एक स्थानीय महिला ने इसी आधार पर बदसलूकी की जिसका वीडियो बहुप्रसारित हो रहा है।
कोरोना प्रसंग में दुनियाभर के कई देशों से एशियाई मूल (खासकर चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों) के नागरिकों के साथ नस्लीय पूर्वाग्रहयुक्त दुव्र्यवहार की घटनाएँ सामने आ रही हैं। चौदहवीं सदी से ही महामारियों का इतिहास ऐसे सामुदायिक पूर्वाग्रहों के आधार पर हुई हिंसा की घटनाओं से भरा पड़ा है।
लेकिन इस सबके बीच इतिहास में ऐसे प्रसंग भी हैं जिनके बारे में जानना चाहिए। मसलन 1918 में अमरीका में भयानक इन्फ्लुएन्जा महामारी फैली थी। दुनिया प्रथम विश्वयुद्ध की आग में झुलस रही थी और विभिन्न राष्ट्रीयताओं के बीच घृणा और पूर्वाग्रह चरम पर थे।
सैन फ्रैंसिस्को और फिलाडेल्फिया में लाशों के ढेर लग गए थे। सार्वजनिक सेवाएँ लगभग ठप पड़ गई थीं। लेकिन लोगों ने आपसी पूर्वाग्रहों से समय रहते निजात पा ली। सारी भिन्नताओं को भुलाकर वे एक साथ हो गए।
समृद्ध तबके के स्वयंसेवी बड़ी संख्या में गरीबों की बस्तियों में पहुँचने लगे।  उन्होंने उनके लिए सामुदायिक रसोई खोल दिए। 2000 टैक्सी चालकों ने अपनी टैक्सी को नि:शुल्क एंबुलेंस का रूप दे दिया।
कैथोलिक नन अपनी धार्मिक वर्जनाओं को त्यागकर यहूदी अस्पतालों में काम करने लगीं। 
बीमारी के खतरों के बीच सभी तरह के लोग नर्स के रूप में अपनी सेवाएँ देने लगे। और यह सब कुछ बिना किसी संस्थागत ढाँचे की मौजूदगी में किया गया।
भारत का समाज आज भी अपनी विभिन्नता को आत्मसात करने लायक नहीं बन सका है। चमड़ी का रंग, नाक का आकार, मुखाकृति और देहयष्टि की भौगोलिक विशेषताओं के बारे में भारतवासी आपस में ही घोर अज्ञानता के शिकार रहे हैं।
बड़े शहरों में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा पाने लायक हो जाने के बावजूद शेष भारत के ज्यादातर छात्र उत्तर-पूर्व भारत और अफ्रीकी छात्रों के प्रति एक प्रकार की ‘अन्यता’ ग्रंथि के शिकार रहते हैं। यह कब नस्लभेद और ज़ेनोफ़ोबिआ में बदल जाता है पता भी नहीं चलता।
माता-पिता और शिक्षकों को चाहिए के वे बचपन से ही अपने बच्चों को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मनुष्यों की शारीरिक विशेषताओं के बारे में संवेदनशील बनाएँ। सबको मनुष्य-मात्र के रूप में देखने-दिखाने की सहजता पैदा करें।
क्योंकि समय-समय की बात है और जगह-जगह की बात है। ऐसी संवेदनशीलता और सहजता के अभाव में कब और कहाँ खुद आप भी इसका शिकार हो जाएंगे यह कहा नहीं जा सकता।
यह विडंबना ही है कि अक्सर पीडि़त के रूप में हम जिस बात का रोना रोते हैं, पीडक़ के रूप में वह भूल जाते हैं।

 


Date : 27-Mar-2020

कोरोना वायरस के विश्व व्यापी संक्रमण के बीच दो सबसे बड़ी आबादी वाले देशों चीन और भारत के लिए चुनौती सबसे बड़ी है। चीन से पैदा हुए कोरोना वायरस के संक्रमण ने दुनिया के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए आलोचना झेलने वाले चीन का दावा है कि उसने इस पर काफी हद तक काबू पा लिया है और अब वो दूसरे देशों की मदद के लिए तैयार है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चीन की कोशिशों की तारीफ की है। डब्लूएचओ का कहना है कि अब यूरोप और अमरीका कोरोना वायरस संक्रमण के केंद्र बन चुके हैं। इटली तो मौतों के मामले में चीन को काफ़ी पीछे छोड़ चुका है और अब स्पेन भी चीन से आगे निकल गया है। फ्रांस और ब्रिटेन में मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और अमरीका भी संक्रमण के मामले में ज़्यादा पीछे नहीं।

चीन में अभी तक कोरोना वायरस के कारण 3287 लोगों की मौत हुई हैं। जबकि 74 हजार लोग ठीक भी हुए हैं। इटली में 7500 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है, जबकि स्पेन में मरने वालों की संख्या 3600 से ज़्यादा हो गई है। लेकिन चीन के बाद सबसे ज़्यादा चिंता भारत को लेकर है। 1।37 अरब आबादी वाले देश की हर गतिविधि पर दुनियाभर की नजऱ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कई बार भारत को सावधान कर चुका है, तो साथ में कुछ कदमों की सराहना भी कर चुका है।

इस समय भारत में 21 दिनों का राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन चल रहा है। भारत की बड़ी आबादी को देखते हुए ये मुश्किल कदम है। लेकिन साथ ही मुश्किल है हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर। भारत सरकार भी दबी जुबान में ये मान रही है कि अभी देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए देश का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं है। वेंटिलेटर्स की कमी है और बड़ी संख्या में लोगों के टेस्ट भी नहीं हो पा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शायद इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए 15000 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की है। लेकिन साथ ही उन्होंने लोगों से बार-बार अनुरोध किया है कि अगर कोरोना वायरस के चेन को तोडऩा है तो लॉकडाउन का सही से पालन करना है। अन्यथा एक बार स्थिति हाथ से निकल गई, तो देश वर्षों पीछे चला जाएगा।

चीन ने किया आगाह

लॉकडाउन के फैसले के बावजूद चीन ने भारत को आगाह किया है और बताया है कि कैसे वो कोरोना पर नियंत्रण कर सकता है।

ग्लोबल टाईम्स के मुताबिक चीन के सीडीसी (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) एक्सपर्ट जेंग गुआंग ने कहा है कि अगर भारत चाहता है कि उसे घरेलू स्तर पर कोरोना वायरस का प्रसार रोकना है, तो उसे इंपोर्टेड केस को रोकना होगा।

इंपोर्टेड केस यानी बाहर से आए लोगों के माध्यम से फैल रहे वायरस को रोकना। पिछले दिनों भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर ये आरोप लगाए कि उसने फैसले लेने में देरी की।

अगर भारत में पहला मामला जनवरी के आखऱिी सप्ताह में पता चला था, तो सख़्त फ़ैसले लेने में इतनी देरी क्यों हुई। दरअसल इस बीच भारत में विदेशों से आए लोगों के माध्यम से कोरोना वायरस फैल गया। हालांकि सरकार का दावा है कि अभी भी उसने सामुदायिक स्तर पर इसे फैलने से रोका है। लेकिन दिन प्रति बढ़ते मामले भारत सरकार का सरदर्द भी बढ़ा रहे हैं।

दरअसल विदेशों से आए लोगों से शुरू हुआ संक्रमण अभी उन लोगों के परिजनों और उनके संपर्क में आए लोगों में ही फैला है। सरकार लॉकडाउन करके इस चेन को सामुदायिक स्तर पर फैलने से रोकना चाहती है।

चीन ने भी भारत को यही सबक दिया है कि अगर घरेलू स्तर पर बड़ा स्वरूप लेने से बचाना है तो इंपोर्टेड केस को रोकना होगा। जेन गुआंग का ये भी कहना है कि इस वायरस पर प्रभावी नियंत्रण करके भारत और चीन दुनिया को ये दिखा सकते हैं कि उन्होंने कैसे ये लड़ाई लड़ी।

चीन की ओर से मदद की पेशकश

पिछले दिनों चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से फ़ोन पर बात की और उन्हें कोरोना वायरस से लडऩे में हर संभव मदद की पेशकश की।

चीन ने हर दिन भारत में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई और कहा कि भारत चीन के अनुभव से सबक सीख सकता है।

चीन के विदेश मंत्री ने भी माना है कि दुनिया की नजऱ भारत और चीन पर इसलिए है क्योंकि दोनों की आबादी एक अरब से ज़्यादा है।

ऐसे में उनका तर्क है कि दोनों देशों को मिलकर इस वायरस से लडऩा होगा। जयशंकर ने भी कोरोना पर काबू पाने की चीन की कोशिशों की सराहना की और कहा कि वे चीन की मदद की पेशकश के लिए उसका धन्यवाद देते हैं।

चीन में जब कोरोना वायरस का संक्रमण अपने चरम पर था और वुहान में हर दिन बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हो रहे थे, चीन ने सिर्फ 10 दिनों में मेकशिफ्ट अस्पताल बनाकर पूरी दुनिया को ये बता दिया कि वो कोरोना को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं।

चीन को इस कोशिश का फायदा कोरोना को क़ाबू करने में मिला। चीन की कई कंपनियों ने पेशकश की है कि वो मेकशिफ्ट अस्पताल बनाने में भारत समेत अन्य एशियाई देशों की मदद भी कर सकते हैं।

चायना रेलवे कंस्ट्रक्शन कॉर्प के एक एक्सपर्ट ने ग्लोबल टाइम्स को बताया, चीन की कई कंपनियाँ भारत में कई प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं। इन कंपनियों के पास पहले से ही अच्छा सप्लाई नेटवर्क है। भारत अगर चाहे तो ये कंपनियाँ चीन के वुहान की तरह भारत में मेकशिफ़्ट अस्पताल बनाने का काम शुरू कर सकती हैं।

भारत में स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक इस समय भारत में करीब 600 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हैं, 13 लोगों की मौत हो चुकी है और 42 लोग डिस्चार्ज किए जा चुके हैं। लेकिन जानकार सबसे ज़्यादा सवाल इस पर उठा रहे हैं कि भारत अभी भी कम लोगों के टेस्ट कर रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक भारत जहाँ एक सप्ताह में 5000 लोगों के टेस्ट कर रहा है, वहीं अमरीका एक सप्ताह में 26 हजार और ब्रिटेन एक सप्ताह में 16 हजार लोगों के टेस्ट कर रहा है।

यानी भारत की सबसे बड़ी समस्या हेल्थकेयर सिस्टम पर भारी दबाव की है, वो चाहे अस्पताल, वेंटिलेटर्स की कमी हो या फिर पर्याप्त संख्या में लोगों के टेस्ट न कर पाने की समस्या।

अब भारत ने प्राइवेट टेस्ट लैब्स को कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए अनुमति दी है और जानकारों का मानना है कि इससे वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या में उछाल आ सकता है।

चीन ने कैसे किया नियंत्रण

एक समय चीन के सबसे ज़्यादा प्रभावित वुहान में एक दिन में 13 हज़ार तक संक्रमण के मामले सामने आए थे। लेकिन आज स्थिति ये है कि वुहान में पिछले दो दिनों से एक भी संक्रमण के मामले सामने नहीं आए हैं।

वुहान में लगाई गई पाबंदियों में ढील दी जा रही है और एक दिन पहले छोटे स्तर पर ट्रेन सेवा भी शुरू की गई। कई लोग वुहान से राजधानी बीजिंग भी पहुँचे।

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक अब भी जो मामले चीन में सामने आ रहे हैं, वे ज्यादातर इंपोर्टेड मामले हैं।

कोरोना पर काबू करने के लिए चीन के शीर्ष नेतृत्व की भी काफी सराहना की जा रही है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सराहना विश्व स्वास्थ्य संगठन के निदेशक ने भी की और कहा कि बाक़ी दुनिया के देश इससे सीखें।

शी जिनपिंग ने समय रहते पूरे देश को इसके ख़तरे के प्रति न सिफऱ् आगाह किया बल्कि संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल भी किया। मेकशिफ़्ट अस्पताल बने, टेस्टिंग फैसिलिटी बने, वुहान और हूबे की सीमाएँ सील की गईं।

वुहान में दो सप्ताह के अंदर जो दो मेकशिफ्ट अस्पताल बनाए गए, वहाँ 2600 मरीज़ों के लिए व्यवस्था थी। शिन्हुआ के मुताबिक जिम और एक्जीबिशन सेंटर्स की जगह 16 अस्थायी अस्पताल बनाए गए, जिनमें 13 हजार बेड्स थे। यही नहीं सरकार ने स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए पूरे संसाधन झोंक दिए। मरीज़ों की समय से भर्ती हो, इसके लिए सख़्त हिदायत थी।

चीन की इसी प्रशासनिक सूझबूझ को देखते हुए लांसेट ने अपने संपादकीय में लिखा- चीन की सफलता उसके मजबूत प्रशासिक व्यवस्था की वजह से है। किसी भी ख़तरे के समय प्रशासन पूरी तरह मोबिलाइज हो जाता है। साथ ही उसे जनता का समर्थन भी मिलता है।

लॉकडाउन और सीमाएँ सील होने के दौरान सरकार ने ये सुनिश्चित किया कि लोगों को सभी ज़रूरी सामान बिना किसी रुकावट के घर बैठे मिल सकें। जब लोगों को घर बैठे सामान मिलने लगे, तो लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा समर्थन किया।

चीन ने नए टेस्टिंग किट बनाए, दवाएँ विकसित कीं और वैक्सीन के लिए भी तैयारी शुरू की। अब चीन दुनिया के बाक़ी देशों के साथ मिलकर वैक्सीन पर तेज़ी से काम कर रहा है।

चीन ने तकनीक का भी बेहतर इस्तेमाल किया। छिडक़ाव के लिए रोबोट्स का इस्तेमाल किया गया, ड्रोन्स के माध्यम से तापमान मापे गए।

चीन ने संक्रमण के इस दौर में अन्य देशों की भी मदद की। चीन ने दक्षिण कोरिया को मास्क और प्रोटेक्टिव गाउंस भेजे। पाकिस्तान, ईरान, जापान और अफ्रीकी यूनियन को टेस्टिंग किट भेजे।

भारत के लिए सबक

चीन ने जिस तरह कोरोना वायरस के संक्रमण को क़ाबू करने का दावा किया है, भारत इससे सबक ले सकता है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जब चीन के विदेश मंत्री ने बात की, तो कहा कि वो चीन की कोशिशों की सराहना करते हैं। लेकिन भारत ने अब भी मेक शिफ़्ट अस्पतालों को लेकर कोई ठोस फ़ैसला नहीं किया है।

भारत की सबसे बड़ी चुनौती ही स्वास्थ्य व्यवस्था और बड़ी आबादी है। चीन ने मदद की पेशकश करके गेंद भारत के पाले में डाली तो है, लेकिन फ़ैसला तो भारत को करना है।


Date : 27-Mar-2020

कोरोना वायरस से आर्थिक मंदी गहराने की चिंताओं के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कई अहम फैसले किए हैं। केंद्रीय बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रेपो रेट में 75 बेसिस प्वाइंट्स की बड़ी कटौती करने का ऐलान किया। आरबीआई के इतिहास में इस सबसे बड़ी कटौती के बाद रेपो रेट 5.15 से घटकर 4.40 फीसदी हो गया है।

उधर, रिवर्स रेपो रेट में में 90 बेसिस प्वाइंट्स की कटौती कर इसे चार फीसदी कर दिया गया है। आरबीआई मुखिया शक्तिकांत दास के मुताबिक यह फैसला कोरोना वायरस से फैलने वाली आर्थिक मंदी का मुकाबला करने के लिए किया गया। उनकी मानें तो इसका मकसद यह है कि बैंकों को आरबीआई के पास पैसा जमा करते रहने से ज्यादा आकर्षक विकल्प यह लगे कि उस पैसे को उत्पादक क्षेत्रों के लिए कर्ज दिया जाए।

शक्तिकांत दास ने कहा कि कोरोना वायरस के चलते उपजे हालात में अनिश्चितता और नकारात्मकता का माहौल है। आरबीआई मुखिया कहना था कि इसका विकास दर पर बुरा असर पड़ेगा। उन्होंने ऐलान किया कि सभी बैंक और वित्तीय संस्थान अगले तीन महीनों के लिए अपने ग्राहकों को कर्ज चुकाने के मामले में ढील दे सकते हैं। यह ऐलान हर तरह के कर्ज पर लागू होगा। उनके मुताबिक केंद्रीय बैंक ने आज समेत हाल के समय जो ऐलान किये हैं उनसे बाजार में छह लाख करोड़ रु से भी ज्यादा की तरलता सुनिश्चित होगी।

शक्तिकांत दास ने बैंकों के ग्राहकों से न घबराने अपील भी की। उनका कहना था कि ग्राहकों को परेशान होकर अपना पैसा बैंक से निकालने की जरूरत नहीं है क्योंकि बैंकिंग सेक्टर की सेहत ठीक है। उन्होंने कहा कि यह बात सरकारी और प्राइवेट, दोनों बैंकों पर लागू होती है। शक्तिकांत दास का कहना था कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है और वह इस संकट से निपटने में सक्षम है। (सत्याग्रह)


Date : 27-Mar-2020

अव्यक्त

हम हिमाचल प्रदेश के एक सुदूर पर्वतीय गाँव में रहते हैं। शहरी दिखावटी जीवन-शैली का प्रभाव अब यहाँ भी दिखने लगा है। लेकिन ग्राम्यता, सामाजिकता और आत्मीयता अब भी यहाँ भरपूर बची हुई है।

हमारी छोटी-सी गृहस्थी में अनाज वगैरह का ज्यादा संग्रह होता नहीं। इसलिए कई सहग्रामियों ने आगे बढक़र पूछा कि घर में चावल-आटा-गैस वगैरह कम पड़े तो बताइयेगा। हम अपने घर से दे देंगे।

दो हज़ार किमी दूर झारखंड से कई आदिवासी परिवार मिस्त्री और मजदूरों के रूप में यहाँ अस्थाई रूप से आकर रहते हैं। हमारे पड़ोस में भी खेतों के बीच बने एक कच्चे मकान में दो आदिवासी परिवार संयुक्त रूप से रहते हैं। परिवार में बच्चे भी हैं।

सुबह-सुबह हम दोनों ने तय किया कि पड़ोसी धर्म और मनुष्य धर्म का पालन करते हुए उनका हाल-चाल पूछने जाएँ। भारत के आदिवासी अब भी एकदम निष्कपट, सरल और निर्लोभी लोग हैं।

उन्होंने कहा कि परसों ही उन्होंने अनाज, नमक, तेल और गैस आदि की व्यवस्था कर ली थी। बहुत जरूरत की स्थिति में जलावन वाले चूल्हे का इंतजाम भी है। वे अपने ठेकेदार से लगातार संपर्क में हैं।

हमने फिर भी कहा कि भाई, कभी कोई ऐसी जरूरत आन पड़े तो बेहिचक बताना। उनकी आँखों में प्रेम और आत्मीयता का उमड़ाव सहज ही देख सकता था। उनका हृदय गद्-गद् हो गया। गला भर आया। कहा, जरूर बताएंगे। आपको भी कोई जरूरत पड़े तो बताइयेगा।

पूरे देश से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि लोग शहरों में यहाँ-वहाँ अधर में फँस गए हैं। कुछ लोग तो अपने सामानों का बोझ उठाए सैकड़ों मील दूर अपने गाँवों के लिए पैदल ही निकल पड़े हैं। इनमें महिलाएँ और बच्चे भी हैं।

कुछ राज्य सरकारों ने थोड़ी-बहुत व्यवस्थाएँ अवश्य की हैं इनके लिए। लेकिन ऐसी परिस्थितियों में सरकारी प्रयास हमेशा ही अपर्याप्त होंगे।

पूर्णबंदी के बीच जहाँ तक संभव हो और उचित हो, अपने आस-पड़ोस के उन इलाकों की टोह अवश्य लें जहाँ प्रवासी कामगार और दिहाड़ी मजदूर छोटे-छोटे कमरों में 10-12 की संख्या में एक साथ मिलकर रहते हैं। फिर जो बन पड़े सो करें।

कुछ मित्रवत सुझाव हैं, केवल याद दिलाने के उद्देश्य से—

उनसे भाई-बहन या केवल एक साथी मनुष्य के रूप में मिलें। दाता या उपकारी के रूप में नहीं।

 प्रेम और कृतज्ञता से भरकर मिलें।

किसी को कुछ देते-बांटते हुए फ़ोटो न खिचाएँ, वीडियो न बनाएँ।

किसी को अपने घर में टिका सकें तो अवश्य टिका लें। घर बड़ा-छोटा नहीं होता, दिल बड़ा-छोटा होता है।

गाँवों में भी जाति, संप्रदाय और दलगत भावना से ऊपर उठकर सभी एक-दूसरे की मदद करें। यह याद रखते हुए कि हम सबसे पहले और सबसे आखिर में मनुष्य-मात्र हैं। बाकी सब ऊपरी ढकोसले हैं।

 


Date : 26-Mar-2020

रमण रावल 
बांग्लादेश की निर्वासित और विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कोरोना के मद्देनजर जो बात कही है, उससे आप-हम सहमत/असहमत भले हों, विचारणीय जरूर है। उन्होंने कहा है कि देवता (उनका आशय सभी धर्मों के देवताओं से है) हैं तो कोरोना संकट से लोगों को उबारने मदद क्यों नहीं कर रहे? आस्तिक व नास्तिक दोनों अपने ढंग से इस पर पेश आ सकते हैं। ऐसा उन्होंने किसी एक धर्म के लिये ही नहीं बोला, बल्कि साफ तौर पर हिंदू, मुस्लिम, ईसाई सभी के लिये कहा है। यह मौका धर्म और उनके मानने वालों  के लिये किसी बहस और गैर जरूरी विवाद का नहीं है, लेकिन मेरा मानना है कि इस बहाने सही उनकी बातों पर चर्चा तो बनती है।
जैसे वे कहती हैं कि पोप अनेक  मौकों पर दावा करते हैं कि वे यीशू से सीधे बात कर सकते हैं तो इस समय वे कोरोना के उपचार क्यों नहीं पूछते। रोम और इटली तो जबरदस्त संक्रमित भी है तो यीशू के अनुयायियों को राहत मिलना चाहिये। वे मंदिर के पुजारियों से पूछती हैं कि अच्छे समय में वे भक्तों से चढ़ावा, दान लेते हैं तो इस समय जब भक्त पर जान का खतरा मंडरा रहा है, वे मंदिरों के पट बंद कर और अनेक जगह तो भगवान की मूर्तियों को भी मास्क पहनाकर गायब हो गये हैं, ऐसा क्यों?
वे मुल्ला-मौलवियों से भी सवाल करती हैं कि काबा-मक्का,मदीना सब दूर सन्नाटा क्यों है? क्यों नहीं अल्लाह अपने बंदों को कोरोना से बचा पा रहा है? वे यह भी कहती हैं कि डार्विन ने 160 साल पहले ही विकास के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए कह दिया था कि मनुष्य का मौजूदा स्वरूप बंदर से बना है और ईश्वर जैसा कुछ नहीं है, तब हम ईश्वर-ईश्वर की रट क्यों लगाये रहते हैं।
यहां मैं अपने आस्तिक या नास्तिक होने के सवाल को एक तरफ रखकर कहना चाहता हूं कि कोई भी देवता कभी-भी भक्त की मदद के लिये दौड़ा चला आता हो, ऐसा किसी धर्म ग्रंथ में नहीं है। कोई व्याख्याकार ऐसा दावा नहीं करता। कोई पंडा-पुजारी ऐसा करता है तो उसका ईमान और इसे मानने वाले का यकीन जाने। मूल बात यह है कि तस्लीमा ने अपने लेखन में हमेशा कठमुल्लापन को निशाना बनाया है। धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड की छीछालेदार की है। वे काफी हद तक सही होती  हैं। इसीलिये उन्होंने बेहद तार्किक तरीके से कोरोना को लेकर एक बार फिर धर्म के ठेकेदारों पर सवाल दागे हैं। मुझे नहीं लगता कि वे लोगों की धार्मिक आस्थाओं पर सवाल उठा रही होंगी।
अब मैं अपनी बात कहता हूं। दरअसल, इस समय जो दुनिया भर में हो रहा है, उसे देखते हुए धार्मिक संगठनों ने वाकई ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे लगे कि धर्म के पहरेदार, प्रतिनिधि, पुजारी, पोप, पंडे या मौलवी अपने-अपने ईष्ट से सीधे तौर पर ऐसी कोई प्रार्थना कर रहे हैं ,जो बताये कि वे लोगों के संकट से दुखी हैं और उपाय ढूंढ रहे हैं। ईश्वरीय मदद की बात को एक तरफ रख भी दें तो याद नही पड़ता कि धार्मिक संस्थाओं, मठो,मस्जिदों, चर्चों से पीडि़त लोगों की मदद के लिये खजाने का मुंह खोल दिया गया हो। लाखों-करोड़ों रूपये की सालाना आमदनी वाले संस्थान, करोड़ों-अरबों रुपये के सोने-चांदी व नकदी का भंडारण करने वाले धार्मिक संस्थानों ने दवा, राशन-पानी का इंतजाम अपने ऊपर ले लिया हो, ऐसी तो जानकारी नहीं है। क्या यह अपेक्षा नहीं की जाना चाहिये कि जो लोग सामान्य दिनों में, अपनी बेहतरी के समय में कभी गुप्त तो कभी प्रकट दान देने वाले अनुयायी, भक्त, बंदे आज छुपे-छुपे बैठे हैं तो उन्हें आत्मिक,आध्यात्मिक , भौतिक मदद की जाये?
कमोबेश हर मुल्क के धाार्मिक प्रतिष्ठान इस मामले में उदासीन रहे हैं। यदि कहीं से कुछ राहत आ रही है तो वे सामाजिक संस्थान हैं, जो जान की परवाह किये बिना भी आगे आये हैं। वैसे मेरा मानना है कि किसी भी प्राकृतिक या मानव जनित आपदा के वक्त भी ये धार्मिक संस्थान अपना बड़ा दिल नहीं दिखा पाते। अलबत्ता, सामाजिक संगठन, व्यापारिक-औद्योगिक घराने और व्यक्तिगत स्तर पर मदद का अंबार लग जाता है। आखिरकार ऐसा क्यों? क्या तमाम उपदेश-प्रवचन केवल सामान्य नागरिकों के लिये हैं? तमाम मिसालें एक अदना व्यक्ति ही पेश करे? समर्पण, सर्वजन हिताय, परोपकार, प्राणी मात्र की मदद,सृष्टि का हर प्राणी एक समान जैसी चिकनी-चुपड़ी बातें मंच के नीचे बैठे, पंडाल में हाथ जोड़े भक्ति में तल्लीन व्यक्ति के लिये ही है?
कोरोना संकट के बहाने उपजी इस बहस का स्वागत भले ही करने का साहस हम नहीं दिखा पायें, क्योंकि धर्म के मामले को संवेदनशील बताकर किसी तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचना मानव स्वभाव है ही नहीं, तो भी इस पर पूर्वाग्रह के बिना चर्चा तो की ही जा सकती है। बहुत आसान है किसी दूसरे को दोषी ठहराना ,लेकिन जो अंगुली संगठित क्षेत्र की ओर जब भी उठती है तो उसे बगावत मान लेना भी तो उचित नहीं । मामला जब धर्म से जुड़ा हो तो अनाड़ी, धर्मांध लोगों को आसानी से भडक़ाकर तलवार,पत्थर थमा दिये जाते हैं। और कुछ नहीं तो धर्म के ये ठेकादर उन्हीं अनाड़ी और धर्मांध लोगों के भले के लिये ही आगे आने के जतन कर लें तो लोगों की आस्था धर्म के प्रति और बढ़ेगी ही।
यूं हम बात करें तो माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत के मुताबिक आबादी के बेतहाशा बढऩे पर प्रकृति ही संतुलन के उपाय आजमा लेती है। कोरोना वायरस का मसला मानवजनित होते हुए कुदरत के काम में अड़ंगा तो है ही। इसलिये माल्थस को याद रखना ही होगा। आयंदा भी कोशिश यह रहे कि कुदरत से छेडख़ानी न की जाये तो यह खुद पर मेहरबानी समान होगा। वैसे यह तो पक्का है कि जब तक दुनिया कायम है, तब तक धर्म, ईश्वर को मानने वाले भी बरकरार रहेंगे ही। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है। धर्म या ईश्वर का अस्तित्व हमें गलत करने से रोकता है या डराकर रखता है तो इसमें गलत या नुकसान कुछ भी नहीं है, बल्कि ताज्जुब इस बात का है कि खुदा-ईश्वर-यीशू के होने के अहसास के बावजूद हम तमाम अनैतिक, कदाचरण वाले काम करने से परहेज नहीं कर रहे। दुनिया में आर्थिक से लेकर तो हर तरह के अपराध तक द्रूत गति से बढ़ रहे हैं। अपराधों के आकार-प्रकार ने समूची मानव जाति को हिलाकर रख दिया, फिर भी इसे अंजाम देने वाले किसी अंजाम से नहीं डर रहे । इसे क्या कहेंगे? क्या वे यह मानते हैं कि ईश्वर नहीं है? उन्हें धर्म, ईश्वर, कानून, समाज किसी का डर क्यों नहीं लगता? 


Date : 26-Mar-2020

विजय जयराज
पिछले दो हफ्ते के दौरान मैंने भारत में अलग-अलग वर्ग के 500 से ज्यादा लोगों से पूछा होगा कि क्या वे नार्मन बोरलॉग को जानते हैं? यह तकलीफदेह बात है लेकिन, उनमें कोई भी बोरलॉग को नहीं जानता था जबकि हम सब की जिंदगी पर उनका भारी अहसान है।
नॉर्मन बोरलॉग ने कृषि विज्ञान में आधुनिक तकनीकें ईजाद कीं जिनसे गेहूं की उत्पादकता में 700 गुना तक बढ़ोत्तरी हुई। इसके साथ ही उन्होंने पूरी दुनिया के साथ ये तकनीकें मुफ्त में साझा कीं जिससे करीब एक अरब लोगों की जान भुखमरी से बचाई जा सकी। उनका योगदान यहीं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सरकारों को आर्थिक नीतियों पर अहम सलाह दी ताकि अन्न की उपज बढ़े तो वह लोगों तक पहुंचे भी।
बोरलॉग का जन्म अमेरिका में आयोवा के एक सामान्य परिवार में हुआ था। मिनेसोटा विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान उन्होंने गरीबी की तकलीफों को समझना और महसूस करना शुरू किया। ये अनुभव और ईसाई धर्म में उनकी सच्ची आस्था की बदौलत उनके दिल में गरीबों के लिए एक विशेष सहानुभूति पैदा हो गई और वे गरीबों की मदद करने के बारे में सोचने लगे।
ड्यूपॉन्ट में बोरलॉग के पास एक स्थायी नौकरी थी लेकिन, उन्होंने 1944 में इससे इस्तीफा दे दिया और मैक्सिको आ गए। यहीं उन्होंने गेहूं की उन किस्मों के विकास का काम शुरू किया जो रोग प्रतिरोधी थीं और जिनकी उत्पादकता पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा थी। 1963 तक उनकी ईजाद की हुई किस्मों का योगदान मैक्सिको के कुल गेहूं उत्पादन में 95 फीसदी तक हो गया। उत्पादन इतना बढ़ा कि बाद में मैक्सिको गेहूं का निर्यातक बन गया।
1970 के दशक की शुरुआत में भारत में अकाल पड़ा था। उस समय नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन (जिन्हें टाइम मैगजीन ने 20वीं शताब्दी के एशिया के 20 सबसे प्रभावशाली लोगों में स्थान दिया था) को यह जानकारी थी कि सुदूर लैटिन अमेरिकी देश मैक्सिको में क्या चल रहा है। वे भारत में भी बोरलॉग के काम का लाभ उठाना चाहते थे। इसी सिलसिले में उन्होंने बोरलॉग को भारत आमंत्रित कर दिया।
लियोन हेस्सेर ने अपनी किताब 'द मैन हू फेड द वर्ल्डÓ में बोरलॉग के भारत से जुड़े एक वाकये का जिक्र किया है जो बताता है कि वे किस मिट्टी के बने हुए थे। उस समय इंदिरा गांधी सरकार में अशोक मेहता योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे। सरकार में वे दूसरे नंबर के ताकतवर व्यक्ति थे। बोरलॉग को भारत में उनसे ही मुलाकात करनी थी। उन्हें पता था कि जो गड़बड़ नीतियां अकाल के लिए जिम्मेदार हैं उनपर वे पूरी ईमानदारी से अपनी राय रखेंगे। लेकिन उन्हें डर भी था कि कहीं अपनी बेबाकबयानी के चलते उन्हें जल्दी से जल्दी देश छोड़कर जाने के लिए न कह दिया जाए। हालांकि यह डर भी उन्हें चुप नहीं करा पाया और उन्होंने ईमानदारी से सरकारी नीतियों के बारे में अपनी राय अशोक मेहता के सामने रख दी। बोरलॉग को इस बेबाकी के बदले देश छोड़कर जाने के लिए नहीं कहा गया और चमत्कारिक रूप से सरकार ने ही नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया। इनके चलते कुछ ही सालों में अकाल जैसी स्थितियां खत्म हो गईं।
बोरलॉग की ईजाद की गई गेहूं की नई किस्में भारत को व्यावसायिक रूप से 1966 में मिलीं। ऊंची उत्पादकता से युक्त और रोग प्रतिरोधी गेहूं के इन दानों ने कुछ ही सालों में भारत की जमीन पर चमत्कार कर दिया। 1966 से पहले भारत गेहूं का आयातक देश था। हमारा उत्पादन खुद अपनी आबादी के लिए पूरा नहीं पड़ता था और हमें अमेरिका से 'फूड फॉर पीसÓ कार्यक्रम के तहत लाखों टन गेहूं आयात करना पड़ रहा था। लेकिन नई किस्में आने के साथ ही पांच साल के भीतर भारत में गेहूं का उत्पादन दो गुना हो गया।
बोरलॉग की नई किस्मों और कृषि के उन्नत तरीकों से एशिया में सिर्फ भारत को ही फायदा नहीं हुआ। 1965 में पाकिस्तान में गेहूं का उत्पादन सिर्फ 46 लाख टन था जो 1970 में बढ़कर 84 लाख टन हो गया।
कुछ समय बाद ही बोरलॉग ने उच्च उत्पादकता वाली धान की कुछ किस्मों का विकास किया। ये ही बाद के सालों में धान क्रांति की बुनियाद बनीं। आज पूरी दुनिया में तकरीबन छह करोड़ हेक्टेयर जमीन पर गेहूं और धान के जो बीज बोए जाते हैं वे बोरलॉग की ईजाद की हुई किस्में हैं। यदि ये न होतीं तो दक्षिण अमेरिका का एक बड़ा हिस्सा और चीन अपनी आबादी के लिए अनाज की आपूर्ति नहीं कर पा रहे होते। आज चीन और भारत अपनी आबादी के लिए पर्याप्त गेहूं तो उपजाते ही हैं, साथ ही उसके निर्यातक भी हैं।
अनाज उत्पादन बढ़ाने और कृषि विकास की बोरलॉग की कोशिश में आधुनिक कृषि तकनीकों की अहम भूमिका रही। उनके तरीकों में कई चीजें शामिल थीं, मसलन सही मात्रा में उर्वरकों का इस्तेमाल, सिंचाई की सुविधा में सुधार और किसानों को आर्थिक रूप से सहारा देने के लिए अलग-अलग सरकारी उपाय जिनमें तय कीमत के बजाय कृषि उपज के लिए एक प्रतियोगी बाजार उपलब्ध करवाना भी शामिल था।
खेती में जेनिकली मॉडिफाइड फसलों के साथ-साथ उर्वरकों के प्रयोग का विरोध करने वाले लोग बोरलॉग के आलोचक रहे हैं लेकिन, उनके लिए भी चौंकाने वाली बात है कि बोरलॉग द्वारा विकसित की गई खेती की तकनीक तमाम संभव तौर-तरीकों में पर्यावरण के लिए सबसे सुरक्षित तकनीक है। ज्यादा से ज्यादा उत्पादन का मतलब था खेती के लिए कम जमीन की जरूरत यानी जंगलों की कम कटाई। इसकी जगह कम उत्पादन वाली परंपरागत खेती ही हो रही होती तो दुनिया की बढ़ती आबादी की जरूरतें पूरी करने के लिए विशाल पैमाने पर जंगलों को साफ करना पड़ता। इसके बाद भी इतना अनाज नहीं होता कि दसियों करोड़ लोगों को भुखमरी से बचाया जा सके।
स्वामीनाथन ने बोरलॉग के बारे में कहा था, 'नॉर्मन बोरलॉग भूख से मुक्त दुनिया की इंसानी तलाश का जीवंत प्रतीक थे। उनका जीवन ही उनका संदेश है।Ó बोरलॉग का जीवन ही उनका संदेश था लेकिन वे अपनी आवाज उठाने से भी कभी पीछे नहीं हटे। उनका कहना था, 'आज मानवजाति के लिए जो सबसे बड़े खतरे हैं उनमें से एक है, विस्फोटक तरीके फैल रही लेकिन फिर भी छिपी हुई नौकरशाही। इससे एक दिन दुनिया का दम घुट सकता है।Ó
आज की नौकरशाही ने एक ऐसी सोच अपना ली है जो मानव जीवन के महत्व को कम करके आंकती है और इंसानों को दुनिया के लिए कैंसर जैसी बीमारी समझती है। आधुनिक समाज ने इंसान की कीमत 18वीं सदी के ब्रिटिश अर्थशास्त्री थामस माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत के हिसाब से तय कर दी है। यह सिद्धांत कहता है कि जनसंख्या ज्यामितीय (अंकों के गुणन के हिसाब से) तरीके से बढ़ती है और संसाधन अंकगणितीय (अंकों के क्रमिक योग के हिसाब से)। इसका मतलब है कि एक समय के बाद जनसंख्या संसाधनों से बहुत ज्यादा हो जाती है। तब प्राकृतिक उपायों जैसे संक्रामक बीमारियों, आपदाओं या युद्ध आदि के जरिए जनसंख्या का विनाश होता है ताकि वह संसाधनों के अनुपात में कम हो जाए। बोरलॉग इस सिद्धांत के विरोधी थे। वे मनुष्य मात्र के लिए हमेशा खड़े रहे और उन्होंने जबर्दस्ती जनसंख्या नियंत्रण के समर्थकों को गलत साबित किया।
बोरलॉग को 2006 में भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था; पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने 1968 में उन्हें सितारा-ए-इम्तियाज पुरस्कार से नवाजा था; वे 1968 में इंडियन सोसाइटी ऑफ जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग के मानद सदस्य चुने गए थे; बोरलॉग को 1978 में बांग्लादेश बोटैनिकल सोसाइटी और बांग्लादेश एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस का पहला मानद सदस्य बनाया गया था। इनके अलावा उन्हें कम से कम 48 और सम्मान मिले थे और ये उन देशों द्वारा दिए गए जिनके आम नागरिकों को किसी न किसी तरह से बोरलॉग के काम से फायदा पहुंचा था।
नॉर्मन बोरलॉग को 1970 में नोबेल पुरस्कार मिला था। इसके साथ वे उन छह विशेष लोगों में शुमार हो गए जिन्हें नोबेल के साथ-साथ यूएस कांग्रेसनल गोल्ड मेडल और यूएस प्रेजिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम दिया गया था। बोरलॉग 11 देशों के कृषि विज्ञान अकादेमियों के सदस्य भी थे और उन्हें 60 से ज्यादा मानद डॉक्टरेट की उपाधियां मिली थीं।
2009 में 95 साल की उम्र में नॉर्मन बोरलॉग का निधन हो गया। वे आज इस दुनिया में नहीं है लेकिन, उनकी विरासत उस अनाज के रूप में हम भारतीयों के साथ आज भी है जिसे हम रोज इस्तेमाल करते हैं। यह विरासत उन विकसित कृषि पद्धतियों के रूप में हमारे साथ है जिनसे हम यह अनाज उपजाते हैं और यह विरासत उन अरबों लोगों के रूप में आज भी इस दुनिया में है जिनकी जान बोरलॉग की कोशिशों के चलते बच सकी थी। हम भूखे थे और आपने हमारा पेट भरा। डॉ बोरलॉग, इसके लिए हम आपके आभारी हैं। (सत्याग्रह)


Date : 25-Mar-2020

हिमांशु शेखर
भारत में कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें इससे निपटने के लिए युद्ध स्तर पर काम कर रही हैं। इसकी वजह से आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ गई हैं। लोग अपने घरों में बंद हैं। माना जा रहा है कि अगले दो हफ्ते कोरोना वायरस के फैलने के लिहाज से बेहद अहम हैं। हर क्षेत्र पर इसके प्रभाव की चर्चा हो रही है। राजनीति पर भी। क्योंकि वह किसी न किसी रूप में हर क्षेत्र की गतिविधियों से जुड़ी हुई है। अगर दूसरे क्षेत्र प्रभावित होंगे तो वह भी होगी ही। लेकिन जितनी जल्दी कोरोना का प्रभाव स्वास्थ्य क्षेत्र और अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है, उतनी जल्दी शायद राजनीति पर नहीं दिखेगा लेकिन देर-सबेर इसका असर उस पर भी पडऩा तय है।
भारत में पहले भी इस तरह की महामारी का असर राजनीति पर पड़ा है। 1918 में स्पैनिश फ्लू नाम की महामारी फैली थी। एक अनुमान के मुताबिक उस महामारी में भारत में 1.8 करोड़ लोगों की जान गई थी। यह उस वक्त की भारत की आबादी का छह प्रतिशत था। वॉल स्ट्रीट जर्नल के एक लेख में कोरोना की तुलना उसी महामारी से की गई है। हालांकि, यह भी कहा गया है कि तब से लेकर अब तक दुनिया काफी बदली है उतना नुकसान संभवत: अब नहीं होगा। इसी लेख में 1918 की महामारी का भारतीय राजनीति पर पड़े असर का जिक्र भी किया गया है।
ब्रिटिश लेखिका लॉरा स्पिनी ने 1918 की महामारी के दुनिया पर पडऩे वाले प्रभावों पर एक पुस्तक लिखी है - पेल राइडर: स्पैनिश फ्लू ऑफ 1918 एंड हाउ इट चेंज्ड द वल्र्ड। वॉल स्ट्रीट जर्नल में लॉरा स्पिनी के हवाले से बताया गया है कि महामारी में हुए भारी नुकसान की वजह से भारत में लोगों का अंग्रेजी शासन से विश्वास उठ गया था। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्रता के लिए चल रहे संघर्षों को अपना समर्थन बढ़ाना शुरू किया और तीन दशक बाद भारत को आजादी मिल गई। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को देखने पर भी यह पता चलता है कि आजादी से संबंधित बड़ी और निर्णायक गतिविधियां 1918 के बाद ही हुईं। 1917 में चंपारण सत्याग्रह से सक्रिय हुए महात्मा गांधी भी इसके बाद और सक्रिय होते चले गए और उनके साथ बड़े पैमाने पर लोग जुड़ते चले गए।
इस उदाहरण से यह स्पष्ट है कि इस तरह की महामारी और राजनीति को अलग करके नहीं देखा जा सकता है। ऐसे में यह समझना होगा कि कोरोना वायरस की वजह से भारत की राजनीति किस-किस तरह से प्रभावित हो सकती है।
2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने कई चुनौतियों का सामना किया है।  लेकिन बतौर प्रधानमंत्री कोरोना वायरस उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। उनकी जगह कोई और प्रधानमंत्री होता तो उसके मामले में भी ऐसा ही होता। इसके पीछे कई वजहें हैं। पहली बात तो यह कि इसे भारत में आने से रोकने और भारत में इसका फैलाव रोकने के मोर्चे पर सीमित विकल्पों का होना।  उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के दौर की अर्थव्यवस्था होने के नाते कोई भी देश बगैर पर्याप्त साक्ष्य के रातों-रात विदेशों से हो रही आवाजाही को नहीं रोक सकता। शुरुआत में कोई साक्ष्य नहीं थे तो विदेशों से लोग आ रहे थे लेकिन अब जबकि डब्ल्यूएचओ ने कोविड-19 को महामारी घोषित कर दिया है तो सरकार ने इस पर रोक लगा दी है।
फैलाव और इलाज के मामले में भी केंद्र सरकार के पास विकल्प सीमित हैं। कई दशकों से बीमार स्वास्थ्य क्षेत्र में रातों-रात ऐसी क्रांति नहीं लाई जा सकती कि कोरोना से निपटने के लिए पर्याप्त क्षमताएं विकसित हो जाएं। कोरोना होने के संदेह वाले लोगों की जांच तक की पर्याप्त व्यवस्था देश में नहीं है। गिनी-चुनी जगहों पर जांच हो रही है और उसके लिए भी लोगों को बहुत मशक्कत करनी पड़ रही है। इलाज के मामले भी विकल्प सीमित हैं। लेकिन इसके बावजूद अगर स्थिति खराब होती है तो इसके लिए आम लोग मोदी सरकार को ही जिम्मेदारी ठहराएंगे। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली भी ऐसी रही है कि वे हर कामयाबी का श्रेय खुद लेते रहे हैं, इसलिए अगर इस मोर्चे पर सरकार नाकाम होती है तो जाहिर सी बात है कि जनता की नजर में उनके खलनायक बनने की बेहद प्रबल आशंकाएं हैं।
लेकिन एक दूसरा पक्ष यह भी है कि भारत अगर कोरोना से प्रभावी ढंग से निपटने में सफल रहा और यहां उसका फैलाव उतना अधिक नहीं हुआ तो नरेंद्र मोदी अभी से कहीं बड़े नायक बनकर उभरेंगे। नायक के तौर पर उनका यह उभार सिर्फ भारत में ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक स्तर पर उनकी एक सकारात्मक छवि बनेगी।
उदारीकरण के दौर में पूरी दुनिया की सरकारों ने जिन क्षेत्रों को सबसे अधिक निजी क्षेत्र के हवाले छोड़ा है, उनमें शिक्षा और स्वास्थ्य प्रमुख हैं। भारत में भी यही हुआ है। इस दौर में केंद्र में चाहे जिस पार्टी की भी सरकार बनी हो, सबने स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के हवाले छोडऩे की नीति को ही आगे बढ़ाया। राज्य सरकारों ने भी ऐसा ही किया।
 दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार को एक अपवाद माना जा सकता है। इससे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया है। गांवों में जो सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र काम करते थे, उनमें से अधिकांश इस वक्त बहुत बुरी हालत में हैं। कुछ अस्पतालों को छोड़ दें तो अधिकांश शहरी सरकारी अस्पताल भी बुनियादी ढांचे के अभाव का सामना कर रहे हैं और यहां निजी अस्पतालों का दबदबा है।
जैसे-जैसे भारत में कोरोना का फैलाव हो रहा है, वैसे-वैसे भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की कमजोरियां की वजह से इस संकट के और गहराते जाने की बात और स्पष्ट होती जा रही है। स्वास्थ्य क्षेत्र में जिस निजी क्षेत्र को बहुत बढ़ावा दिया गया, आज कोरोना से जंग में उन निजी अस्पतालों की भूमिका न के बराबर है। इसलिए अगर भारत में कोरोना का फैलाव खतरनाक स्तर पर होता है तो जाहिर है कि आने वाले दिनों में जो चुनाव होंगे, उनमें सभी पार्टियों से लोग यह उम्मीद करेंगे कि स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर वे एक स्पष्ट रणनीति सुझाएं। इसका मतलब यह हुआ कि स्वास्थ्य सुविधाएं आने वाले समय में एक चुनावी मुद्दा बन सकती हैं। ऐसी स्थिति में लोगों के स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के अस्पतालों और निजी इंश्योरेंस कंपनियों के हवाले छोडऩे की जो लोक नीति चल रही थी, उसमें स्वाभाविक तौर पर बदलाव होगा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार की भूमिका बढ़ाने की ठोस कोशिशें दिख सकती हैं।
कोरोना का कहर लोगों के स्वास्थ्य और स्वास्थ्य क्षेत्र के अलावा सबसे अधिक कहीं दिख रहा है तो वह अर्थव्यवस्था है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र पर इसका प्रभाव दिखने लगा है। इस वजह से बेरोजगारी का संकट और गहराना तय माना जा रहा है। शेयर बाजार में गिरावट और विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट दर्ज की जा रही है। कुछ क्षेत्रों में अभी मांग बढ़ी हुई जरूर दिख रही है लेकिन यह घबराहट में बढ़ी हुई मांग है। रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली वस्तुओं की बढ़ी हुई मांग इसका प्रतीक है। लेकिन जो वस्तुएं और सेवाएं रोजमर्रा में इस्तेमाल नहीं की जाती हैं, उनकी मांग कम या न के बराबर हो गई है। एक तरफ मांग कम और दूसरी तरफ उत्पादन बंद, ऐसे में मांग और आपूर्ति का पूरा चक्र गड़बड़ होने की आशंका है।
इसका मतलब यह हुआ कि पहले से ही सुस्ती की शिकार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आने वाले दिन और कठिन हो सकते हैं। ऐसे में राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आर्थिक मुद्दों का आना स्वाभाविक है। आने वाले दिनों में राजनीतिक पार्टियों को जनता को यह भी बताना होगा कि अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने के लिए वे क्या ठोस उपाय करने वाले हैं। बेरोजगारी का संकट और उसमें भी विनिर्माण के बाद अब सेवा क्षेत्र में बेरोजगारी का संकट गहराने से इसकी आंच निम्न वर्ग के बाद अब मध्य वर्ग तक पहुंचेगी। एक राजनीतिक वर्ग के तौर पर देखें तो हमारे देश में मध्य वर्ग ही सबसे मुखर वर्ग है। ऐसे में अगर उसे परेशान होगी तो जाहिर सी बात है कि बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था का बुरा हाल प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनेगा।
कोरोना वायरस का प्रकोप बढऩे और इससे होने वाला नुकसान बढऩे की स्थिति में एक संभावना यह हो सकती है कि कुछ समय तक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में थोड़ा पीछे किया जाए। 
क्योंकि एक तरफ वे परिवार होंगे जो कोरोना से सीधे तौर पर प्रभावित होंगे और वहीं दूसरी तरफ वे परिवार होंगे जो इसकी वजह से अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाले प्रभावों से बुरी तरह प्रभावित होंगे।  इन लोगों के सामने अगर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले मुद्दों को उठाया जाएगा तो इनमें और दूसरे लोगों में ऐसे मुद्दे उठाने वालों के खिलाफ गुस्सा बढ़ सकता है। इसलिए संभव है कि ऐसे मुद्दों की राजनीति करने वाली पार्टियां एक रणनीति के तहत कुछ समय के लिए उनसे बचने की कोशिश करें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर सहयोगात्मक संघवाद की बात करते हैं। वे केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मिलाकर ‘टीम इंडिया’ की बात कहते आए हैं। कोरोना वायरस से निपटने के मामले में यह सहयोगात्मक संघवाद दिख रहा है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें आपसी समन्वय के साथ इससे निपटने की कोशिश करती दिख रही हैं। 
अगर भारत में कोरोना का और फैलाव होता है और इससे होने वाला नुकसान काफी बढ़ता है तो उस स्थिति में कोरोना के फैलाव पर नियंत्रण पाने के बाद के दिनों में भारतीय राजनीति में सहयोगात्मक संघवाद दिख सकता है। क्योंकि जिस तरह के नुकसान दूसरे प्रभावित देशों में हुए हैं, अगर वैसा नुकसान भारत में होता है तो इससे निपटना न तो अकेले केंद्र सरकार के वश की बात होगी और न ही किसी राज्य सरकार के लिए यह संभव होगा कि वह अपने राज्य में स्थितियों को ठीक कर सके। ऐसे में केंद्र और राज्यों के सामने मिलकर काम करते हुए सहयोगात्मक संघवाद के रास्ते पर आगे बढऩा एक मजबूरी होगी। (सत्याग्रह)

 


Date : 25-Mar-2020

अश्विनी भटनागर

एक आदमी ने 1995 में अमरीका में दो बैंक लूटे। दोनों जगह वह बिना चेहरा ढंके गया और बैंक से पैसा लूटने के बाद मुस्कराता हुआ सिक्योरिटी कैमरा के सामने जाकर खड़ा हो गया। कैमरे के सामने वह बड़े आराम से काफी देर तक खड़ा रहा और उसको मुंह चिढ़ाता रहा। फिर वह भाग गया। पर रात होते तक पुलिस ने उसकी पहचान करके उसको गिरफ्तार कर लिया।
लुटेरा अपनी गिरफ्तारी पर स्तब्ध था।  उसको समझ नहीं आ रहा था कि उसकी पहचान कैसे हुई। पुलिस वालों ने उसको बताया कि भइया, हमें पहचान करने में कोई दिक्कत नहीं आई थी, क्योंकि तुम नकाब नहीं पहने थे और उसके ऊपर तुम खुद ही सिक्योरिटी कैमरा के सामने आकर अपना वीडियो बना गए थे। पर लुटरे को उनकी बात पर यकीन नहीं हो रहा था। वह हैरान था कि कैमरे ने उसकी तस्वीर ले कैसे ली, जबकि वह अपने चेहरे पर नींबू का रस लगा कर गया था। उसको विश्वास था कि नींबू का रस आदमी को अदृश्य कर देता है और पुलिस वाले जो कैमरे पर लिया गया वीडियो दिखा रहे हैं, वह फर्जी है।
उसकी दलील थी कि नींबू का रस अदृश्य स्याही बनाने के लिए उपयोग किया जाता है और चूंकि उसके उपयोग से लिखा हुआ गायब हो जाता है, तो उसका चेहरा भी गायब हो गया था। इसलिए उसके मुताबिक उसके सामने जो वीडियो साक्ष्य प्रस्तुत किए जा रहे थे, वे सब नकली थे। पुलिस ने उसे बहुत समझाया, पर वह नहीं माना और अंत तक अपनी बात पर अड़ा रहा कि वास्तव में नींबू की वजह से वह अदृश्य था और पुलिस बकवास कर रही थी। वैसे यह बैंक चोर न तो पागल था और न ही उसने मादक पदार्थों का सेवन किया हुआ था। बस, उसे अपने ज्ञान पर इतना आत्मविश्वास था कि उसके आगे उसे सारे साक्ष्य बेतुके और झूठे लग रहे थे।
इस घटना से प्रेरित होकर कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के दो विद्वानों- डेविड डनिंग और जस्टिन क्रूगर- ने एक शोध शुरू किया, जिसकी परिणति डनिंग-क्रूगर सिद्धांत के रूप में हुई। व्यंग्य शिरोमणि हरिशंकर परसाई ने उनके निष्कर्ष को पहले ही शब्द दे दिए थे। परसाई ने कहा था, आत्मविश्वास कई तरीके का होता है- धन का, सत्ता का या फिर ज्ञान का। पर सबसे प्रचंड आत्मविश्वास मूर्ख का होता है। बैंक चोर ने परसाई की हंसाई को गंभीर रूप दे दिया था।
बैंक चोर की मूर्खता से प्रभावित होकर डनिंग और क्रूगर ने जो अध्ययन किया, उसमें पाया कि अमूमन जिन लोगों के पास कम जानकारी होती है और जिनमें जानकारी जमा करने की क्षमता भी कम होती है, वे अपने सीमित ज्ञान को लेकर बेहद आक्रामक होते हैं। क्षमता के आभाव में उनके पास साक्ष्य को अस्वीकार कर देने की प्रतिभा होती है और वे बहस किए जाते हैं कि जो वे कह रहे हैं वही सही है और स्वयं में साक्ष्य भी है। बैंक चोर की तरह वे भी नींबू का रस लगा कर गायब हो जाने वाली बात कर पूरे आत्मविश्वास से अड़े रहते हैं। आखिरकार, वे तर्क करते हैं कि जब नींबू से लिखावट गायब हो सकती है, तो आदमी क्यों नहीं?
चाल्र्स डार्विन ने अपनी किताब ‘एसेंट ऑफ मैन, 1871’ में लिखा था कि कम जानकारी अक्सर लोगों में ज्यादा जानकारी की लालसा नहीं उत्पन्न करती, बल्कि उनमें आत्मविश्वास बढ़ाती है। वे अपने दोष को नहीं देख सकते हैं और इसलिए दोष को पूरे आत्मविश्वास के साथ गुण मनवाने के लिए भिड़ जाते हैं।
 ट्विटर और फेसबुक पर इस तरह की प्रवृत्ति के लाखों उदाहरण उपलब्ध हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि मूर्ख को नहीं मालूम होता कि वह मूर्ख है। दूसरे शब्दों में, उसको नहीं मालूम है कि उन्हें नहीं मालूम है। उसका घोर आत्मविश्वास नामालूमियत की भरपाई कर लेता है। नींबू के रस में विश्वास के चलते उनका अज्ञान उनके लिए अदृश्य है।
डोनाल्ड ट्रंप जब अमरीका के राष्ट्रपति बने, तो डनिंग-क्रूगर सिद्धांत को राजनीति से जोड़ा गया था। ट्रंप का आत्मविश्वास चौंकाने वाला था।
मंच पर खड़े होकर वे ऐसे-ऐसे दावे करते थे कि जानकार लोग उनकी बातों से परेशान हो जाते थे, जबकि आम लोग उनका जयकारा लगाने लगते थे। विशेषज्ञ हैरत में थे कि लोग ट्रंप के सफेद झूठों को भी सहर्ष स्वीकार रहे थे। अमरीकी वोटर बेहद रोमांचित हुए थे, जब ट्रंप ने कहा था कि वे सफलताओं का इतना ढेर लगा देंगे कि लोग सफलता से भी बोर हो जाएंगे। ऐसा होना संभव नहीं था, पर फिर भी लोगों को विश्वास था कि ऐसा जरूर होगा। 
इसी तरह, वे पिछले तीन साल से बार-बार कह रहे हैं कि वे बेहद सफल राष्ट्रपति हैं, अमरीका बेहद सफल देश है और अमेरिकी लोग बेहद सफल लोग हैं। ढपोरशंख ट्रंप अपने को बेहद बलवान बताते हैं, पूरे आत्मविश्वास के साथ, क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि उन्हें मालूम नहीं है कि असलियत क्या है। उनकी ही तरह उनके समर्थक वास्तविक और पूर्ण जानकारी की कमी और उसको पाने की अपनी क्षमता को आक्रामक आत्मविश्वास से पूरा करते हैं। वे मानते हैं कि वे सही हैं, क्योंकि उनको विश्वास है कि वे सही हैं। 
तथ्यों की सत्यता से उनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरे शब्दों में, कोई व्यक्ति जितना अक्षम होगा उसका आत्मविश्वास उतना ही ज्यादा होगा। ज्ञान का भ्रम उसको अति-आत्मविश्वास देता है। दरअसल, ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान नहीं, बल्कि ज्ञान का भ्रम है।
अमरीका में बहुत सारे और भी ऐसे उदाहरण हैं, जो पूरे आत्मविश्वास से अपने बारे में बहुत कुछ ऐसा कहते हैं, जिसे सत्य से परे या सिर्फ डींग कहा जा सकता है। कुछ नेता अपने को अटूट राष्ट्रभक्त कहते हैं और कुछ खुद ही अपने को सर्वोत्तम बुद्धिमान या बलवान घोषित कर देते हैं। 
राष्ट्रभक्ति या बुद्धिमत्ता क्या होती है, उसके बारे में उनकी जानकारी नगण्य है और अपनी अक्षमता की वजह से वे यह नहीं जान सकते कि उनकी जानकारी कितनी सीमित है। फलस्वरूप, वे अति-आत्मविश्वास में खुद-ब-खुद घिर जाते हैं। ऐसी स्थिति में समाज में आत्मविश्वास से भरे, आक्रामक तेवर वाले समूह का घेरा बन जाता है, जो अपनी सीमित जानकारी के अलावा हर जानकारी को नकार कर अपने जयकारे में मदहोश हो जाता है।
 इस समूह के लिए सवाल पूछना या फिर उत्तर तलाशना मूर्खता की निशानी है, क्योंकि उसके पास सब सवालों के जवाब पहले से ही मौजूद होते हैं। भ्रम ही उसके लिए ब्रह्म बन जाता है और ब्रह्म वाक्यों से बहस नहीं हो सकती है।

 


Date : 24-Mar-2020

सचिन कुमार जैन

इलेक्ट्रो मैग्नेटिक ऊर्जा, गीगा हर्ट्ज, टेरा हर्ट्ज ध्वनि तरंगे, मेम्ब्रेन, द्विपक्षीय ध्रुवीय क्षेत्र यानी स्रद्बश्चशद्यद्ग, वायरस का न्यूक्लियस, सूक्ष्म ध्वनि तरंगे  माइक्रोवेव थ्रेसहोल्ड एनर्जी, उच्च माइक्रोवेव तरंगे, वायरस के आउटर सेल यानी बाहरी कवर, माइक्रो वेव इलेक्ट्रो मेगेनेटिक किरणों...। कम से कम कोरोना ने भारत के लोगों को इन शब्दों का उपयोग करने का मौका दिया। यानी सियासी गुणाभाग के लिए भी विज्ञान के शब्दों का उपयोग जरूरी है। मैं मानता हूं कि यदि इतने शब्दों के अर्थ भी अपन समझ जाएं, तो भारत का मुस्तकबिल नये मुकाम पर पहुंच जाएगा। कोरोना के इलाज की खोज जारी है। इस वक्त जरूरत है कि इसके बारे में जानें और समझदारी से जानकारी का व्यवहार भी करें। हमारी श्रद्धा और विश्वास कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन यह कतई जरूरी नहीं कि सब उस विश्वास में विश्वास रखते हों। जब भी कुछ कृत्य करें।  तब यह भी सोचिए कि उसका मरीज़ों, आटिजम से पीडि़त व्यक्ति, पंछियों और छोटे छोटे पशुओं पर क्या असर पड़ रहा होगा? 
हमें स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के प्रति कृतज्ञता दिखानी ही चाहिए,  लेकिन शोर से नहीं, संगीत से। जरा यह भी सोचिए कि भारत में 28 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, 12 लाख आशा कार्यकर्ता हैं, जिन पर समुदाय को कोरोना के बारे में जागरूक करने की जिम्मेदारी है। इन्हें कुशल काम की न्यूनतम मज़दूरी के बराबर का मानदेय भी नहीं मिलता है।  कोरोना का संकट यह भी सिखा साबित कर रहा है कि हमें भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की नीति से तत्काल पीछे हटना चाहिए।  हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की मज़बूत करना होगा। कोरोना किसी राजनेता का ब्रांडिंग अवसर नहीं बनना चाहिए। कोरोना के कारणों और उपचार पर वैज्ञानिक बहस होना चाहिए । 
आज जरूरत यह भी है कि जो 56 करोड़ लोग दैनिक आय पर निर्भर हैं, उनके बारे में विशेष ध्यान रखा जाए। फर्जी नासा और आई टी सेल द्वारा जारी जानकारियों को प्रसारित करके हम भारत और विश्व को बहुत गहरा नुक्सान पहुंचा रहे हैं। आप तक आने वाली फर्जी जानकारी को रोकना आपकी जिम्मेदारी है। फर्जी-फेक जानकारी प्रसारित करने के बाद आप उसे सही साबित करने की जद्दोजहद में जुट जाते हैं और समझ ही नहीं पाते हैं कि विभाजन और झुंड की राजनीति के प्रतिनिधि बन जा रहे हैं।
-----


Date : 24-Mar-2020

विष्णु नागर

कोरोना को हम एक छोटे से उदाहरण के रूप में लेते हैं। हम सदियों से जानते हैं कि हर शहर, हर गांव, हर गली में अगर यज्ञ किए जाएं तो उसके पवित्र धुंए से कोरोना मुआ लंगोटी छोडक़र भाग जाएगा। फिर साला पलटकर कोरोना क्या उसका बाप, उसके परदादा का परदादा भी आने की हिम्मत नहीं करेगा। हमसे पनाह मांगेगा। 

हम हिंदुस्तानी और उनमें भी विशेषकर हिंदुत्ववादी कुछ बातें पक्के तौर पर जानते हैं। पहली यह कि भारत कभी जगद्गुरु था और मोदीजी उसे फिर से जगद्गुरु बनाने वाले हैं। कोरोना गया और भारत जगद्गुरु बना। दूसरी बात पहले से जुड़ी हुई है कि हिंदू संस्कृति महान थी,महान है और युगों-युगों तक यही महान रहनेवाली है, बाकी सब धूल चाटने में व्यस्त हो जाएंगी। इस संस्कृति के आगे दुनिया का कोई संस्कृति टिक नहीं पाएगी। चाहे तो कुश्ती लड़ाकर देख ले! तीसरी बात यह कि भारत का हर आदमी, बच्चा-बच्चा तक डॉक्टर, वैद्य, हकीम, होम्योपैथ, तंत्रमंत्र, गंडा-ताबीज एक्सपर्ट है। हमारे पास आने वाली हर समस्या, हर रोग, हर महामारी का रामबाण इलाज है। अमरीका-यूरोप-चीन सब हमारे आगे मूरख साबित हो चुके हैं। बस घोषणा होना बाकी है। पंडितजी मुहूर्त निकाल रहे हैं। एक दिन ये सब हमारी संस्कृति का डंका बजाएंगे और ओरीजनल डंका हमीं उन्हें एक्सपोर्ट करेंगे। हम चीन को डंका बनाकर बेचने नहीं देंगे। वह ज्यादा बदमाशी करेगा तो हम दुनियाभर में मुफ्त में डंके बंटवा देंगे। भारत सरकार के पास इसके लिए पर्याप्त धन है।
कोरोना को हम एक छोटे से उदाहरण के रूप में लेते हैं। हम सदियों से जानते हैं कि हर शहर, हर गांव, हर गली में अगर यज्ञ किए जाएं तो उसके पवित्र धुंए से कोरोना मुआ लंगोटी छोडक़र भाग जाएगा। फिर साला पलटकर कोरोना क्या उसका बाप, उसके परदादा का परदादा भी आने की हिम्मत नहीं करेगा। हमसे पनाह मांगेगा। अपनी जूतियां हमारे सामने रगड़ेगा।
दुर्भाग्य से मुझे कुछ ऐसे अखबार पढऩे की लत सी लग चुकी है, जिनमें कोरोना भगाने में यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ आदि के अभूतपूर्व योगदान की चर्चा नहीं होती। हारकर ज्ञानवद्र्धन के लिए मुझे गूगल देवता की शरण लेनी पड़ी। उन्होंने आश्वास्त किया कि बेटा, परेशान मत हो।देश सही दिशा में जा रहा है। देशभर में कोरोना भगाओ यज्ञ इतनी बड़ी तादाद में हो रहे हैं कि पूरी सूची अगर मैंंने तुझे थमा दी तो तेरे होश उड़ जाएँगे और उड़े तो फिर उड़े। वापिस पिंजरे में नहीं आएंगे। एक बार सोच ले।
यह जानकार गहरा संतोष हुआ कि हिंदू संस्कृति  हर महामारी, हर रोग का निवारण यज्ञ से करने की प्राचीन परंपरा नहीं भूली है। अनुमान लगाने के मामले में मैं बहुत कंजूस हूँ मगर भारतभर में ऐसे दस हजार यज्ञ हुए होंगे। इससे इस संस्कृति के प्रति मेरी आस्था बहुत पुष्ट हुई, इतनी कि अजीर्ण होने लगा। अजीर्ण के बावजूद यह जानकार तृप्ति मिली कि पूजा- पाठ, आरती, भगवती जागरण के भी अनगिनत आयोजन संपन्न हो रहे हैं। गोबर लेपन, गोमूत्र पीवन कार्यक्रम भी हजारों की संख्या में हो रहे हैं। इसके बावजूद किसी की हिंदू संस्कृति में आस्था प्रबल न हो तो ऐसे मूर्ख का भगवान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
मैं इस अवसर पर हिंदू संस्कृति के प्रचार-प्रसार में विशेषकर व्हाट्सएप के महती योगदान को भूल जाऊं तो मेरे जैसा अधम मनुष्य दूसरा न होगा, जबकि मैं चाहता हूं कि यह गौरव अकेले मैं क्यों प्राप्त न करूं! इस मामले में मैं कतई स्वार्थी नहीं हूं।  मेरे चरित्र पर ऐसे मामलों में स्वार्थी होने का दाग कोई नहीं लगा सकता। मुझे दूसरों के व्हाट्सएप से ज्ञात हुआ कि हमारी महान संस्कृति ने हजारों वर्षों पहले यह सिखाया था कि हिंदुओं, तुम दूसरों को नमस्कार किया करो। 
आज पता चल रहा है कि उन्होंने कितनी वैज्ञानिक बात कही थी। उन्हें मालूम था कि 2019-20 में कोरोना आएगा और तब दुनिया को इस संस्कृति की महानता से अभिभूत होने का सौभाग्य प्राप्त होगा। देखो आज पूरी दुनिया नमस्कार कर रही है! यहां तक कि व्हाट्सएप ज्ञान से परिपूर्ण उन ज्ञानी मैडम से स्वयं ट्रंप ने सपने में आकर नमस्कार किया। 
वे यह देखकर भावविभोर हो गईं। इस अवस्था में वह अपने ससुर समकक्ष ट्रंप के पैर छूने वाली थीं कि कोरोना ने उन्हें बरज दिया। तब विभोरावस्था में उन्होंने ट्रंप का नमस्कार इतनी देर तक किया कि वह सिर स्पर्श करके सौभाग्यवती कहने वाला था कि ये अचकचा कर पीछे हट गईं। इससे हताश होकर उसे वापिस व्हाइट हाउस जाना पड़ा। वहां से उसने हाथ हिलाकर मैडम को अभिवादन किया। उन्होंने उसे व्हाट्सएप मैसेज भेजा कि ट्रंप जी धन्यवाद। अगर आपको कोरोना हो जाए तो शरीर पर गोबर लपेट लेना और दिन में दस बार गोमूत्र पिया करना। गारंटी से ठीक हो जाओगे। यह बात अपने देशवासियों को भी बता देना, कोरोना मंगलयान की गति से छूमंतर हो जाएगा। और तुम लोग ये रूम स्प्रे, बाडी स्प्रे आदि सब क्या करते रहते हो? 
कुछ अकल भी है कि नहीं। जिस धरती पर जगद्गुरु भारत निवास करता हो, हिंदू संस्कृति दनदनाती-फनफनाती-सनसनाती घूम रही हो, वहाँ तुम लोग कपूर, लोभान, अगरबत्ती का इस्तेमाल क्यों नहीं करते? फास्ट फूड छोड़ो, शाकाहारी सादा भोजन करो और मेरी तरह उच्च विचार रखना सीखो। खुद नहीं सीख तो तुम लोगों को हिंदी में शिक्षित करने के लिए मुझे स्वयं अमेरिका आना पड़ेगा। तुम वीजा तैयार रखो,मैं पासपोर्ट का आवेदन करने वाली हूँ।
 इधर पासपोर्ट तैयार होता है, उधर मैं नरेन्द्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी सबको ठीक करके आती हूँँ। इन्होंने कोरोना भगाने के लिए एक बार भी यज्ञ-हवन, भजन-कीर्तन, भगवती जागरण, ताबीज आदि की महत्ता पर प्रकाश नहीं डाला। पहले इनके अज्ञान का अंधेरा दूर करूंगी, तब तक पासपोर्ट बन जाएगा और वीसा तो तुम खैर तैयार रखोगे ही।
तब तक के लिए नमस्कार।

 


Date : 24-Mar-2020

जे के कर
दुनिया के सबसे अमीरों में शुमार बिल गेट्स ने कोरोना वाइरस से लडऩे के लिए हाल ही में 751 करोड़ रुपया दान किया है। उनका कहना है कि उनका फाउंडेशन याने गेट्स फाउंडेशन दुनियाभर में कोरोना की दवा और टीका विकसित करने वालों के साथ मिलकर काम कर रहा है। उन्होंने कहा है हमारी प्राथमिकता है कि दवा और टीका निर्माण की क्षमता पर्याप्त हो, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों के मददगार साबित हो सके। जाहिरा तौर पर बिल गेट्स को दानवीर कर्ण माना जाता है परन्तु पड़ताल करने पर दूसरी ही बात उभरकर आती है।
सबसे पहली बात बिल गेट्स के दान उनकी ही बनाई गेट्स फाउंडेशन के जरिये दी जाती है। इसलिए गेट्स फाउंडेशन की पड़ताल करते हैं। बिल गेट्स ने दान देकर साल 2000 में इसकी स्थापना की थी। इसके ट्रस्टी तथा सह-चेयरमैन बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स हैं। इनके बाद इस फाउंडेशन के ट्रस्टी दुनिया के एक और रईस वरेन बफेट हैं। गेट्स फाउंडेशन के अध्यक्ष पद पर ट्राईवोर मुंडेल पदस्थ हैं जो साल 2011 में अपनी तैनाती के पहले नोवार्टिस, पार्क डेविस तथा फाइजऱ जैसी महाकाय दवा कंपनियों में उच्च पद पर आसीन थे।
बिल और मेलिंडा गेट्स ने साल 1999 में 750 मिलियन डॉलर का दान देकर ‘गावी’ अर्थात ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन इनिशियेटिव नाम के एक संस्था की शुरुआत कराई थी। आज भी गेट्स फाउंडेशन इस ‘गावी’ का पार्टनर है। यह ‘गावी’ दुनिया के गरीब देशों में वैक्सीन की जरूरत को पूरा करने का कार्य करती है। ‘गावी’ में गेट्स फाउंडेशन के अलावा विश्व-बैंक भी साझीदार है। खुद ‘गावी’ का कहना है कि साल 2014 में इस संगठन ने जितने वैक्सीन की सप्लाई की उसमें से 60 फीसदी भारत में सप्लाई किए गए। हालांकि, अपने घोषित तथा अघोषित उद्देश्यों को अमलीजामा पहनाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा यूनिसेफ को भी साझीदार बनाया गया है। इसके बोर्ड में दो-तिहाई सदस्य वैक्सीन एलायंज पार्टनर इंस्टीट्यूट के होते हैं।
नवउदारवाद के युग में इस दानवीर कर्ण का अधिकांश दान नए वैक्सीन के ईजाद में खर्च होता है। बता दें कि इस तरह के नये वैक्सीन का उपयोग भारत और अफ्रीका जैसे देशों विकासशील देशों के सरकार के कंधों पर बंदूक रखकर किया जाता है, पहले दान में वैक्सीन दी जाती है उसके बाद उन वैक्सीन को सरकारी कार्यक्रमों में शामिल करवा दिया जाता है। इन वैक्सीनों की सप्लाई दुनिया की महाकाय वैक्सीन उद्योग के जरिये की जाती है। 
इसका उदाहरण भी हम दे देते हैं। साल 2017 के दिसंबर माह में स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री को चि_ी भेजकर सर्वत्र टीकाकरण कायक्रम में ॥क्कङ्क नाम की इस वैक्सीन को इंट्रोड्यूस करने का विरोध किया गया था। क्योंकि पंजाब के दो जिलों और दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसे इंट्रोड्यूस किया गया था।
बता दें कि ॥क्कङ्क वैक्सीन का ट्रायल पहले विवादों में आ चुका था जब आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में टीकाकरण के बाद सात लड़कियों की मौत हो गई थी। स्वास्थ्य पर संसद की 72वीं स्थाई समिति ने इस तथ्य को हाईलाइट किया था।
गौरतलब है कि नवंबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार से इससे जुड़े फाइलों को प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। आंध्रप्रदेश तथा गुजरात के आदिवासी इलाकों के 24 हजार लड़कियों को ‘शड्ढह्यद्गह्म्1ड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य ह्यह्लह्वस्र4’ के नाम पर लगाया गया था। इस पुनीत काम को गेट्स फाउंडेशन से फंड लेने वाली संस्था क्क्रञ्ज॥ (क्कह्म्शद्दह्म्ड्डद्वद्वद्ग द्घशह्म् ्रश्चश्चह्म्शश्चह्म्द्बड्डह्लद्ग ञ्जद्गष्द्धठ्ठशद्यशद्द4 द्बठ्ठ ॥द्गड्डद्यह्लद्ध) ने अंजाम दिया था। वैक्सीन की सप्लाई विदेशी दवा कंपनी मर्क तथा ग्लैक्सो ने की थी। क्क्रञ्ज॥ के इस काम में ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ ष्टशह्वठ्ठष्द्बद्य शद्घ रूद्गस्रद्बष्ड्डद्य क्रद्गह्यद्गड्डह्म्ष्द्ध ने भी सहयोग दिया था। इससे हुई लड़कियों की मौत के बाद इसे रोक दिया गया।
बता दें कि भारत में ‘गावी’ के सहयोग से पेंटावेलेंट वैक्सीन, हेपेटाइटिस बी वैक्सीन, हेमोपेलस इंफुलेएंजा की वैक्सीन जैसे वैक्सीन को बढ़ावा दिया गया। दरअसल, भारत का टीकाकरण बाजार लंबे समय से सुप्तावस्था में था। जिसे ‘गावी’ और गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से जगाया गया है। अर्थात नये-नये टीके भारतीयों को ठोंके जा रहे हैं, भले ही भारतीय परिस्थियों के अनुसार ये अनावश्यक हैं।
हेपेटाइटिस-बी का हौव्वा खड़ा कर इसके टीके को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करवा दिया गया। हेपेटाइटिस बी का पीलिया फैलता है संक्रमित रक्तदान, शल्य क्रिया के संक्रमित औजारों या सुई से। कुछ हद तक यौन संबंधों से। चूंकि रक्तदान से पहले उसका परीक्षण कराया जाता है कि उस व्यक्ति को पीलिया, मलेरिया, एड्स या यौन रोग न हो। चिकित्सा तथा शल्यक्रिया के सभी औजारों को उपयोग के पहले संक्रमण रहित बनाया जाता है। वरन् चिकित्सा सेवा में रत चिकित्सकों तथा कर्मचारियों को मरीजों से पीलिया से पीडि़त होने का डर रहता है। इसीलिए हेपाटाइटिस-बी का टीका चिकित्सा कर्मचारियों के लिए जो मरीज के संपर्क में रहते हैं, उसके लिए आवश्यक है।
याद करिए जब दुनियाभर में बर्ड फ्लू का हौव्वा फैलाया गया था। डोनाल्ड रम्सफील्ड जनवरी 2001 से दिसंबर 2006 के बीच अमरीका के रक्षा सचिव थे तथा त्रद्बद्यद्गड्डस्र स्ष्द्बद्गठ्ठष्द्गह्य में उनका काफी धन लगा था। त्रद्बद्यद्गड्डस्र स्ष्द्बद्गठ्ठष्द्गह्य ने बर्डफ्लू की दवा टैमिफ्लू का ईज़ाद किया था एवं इसे रोश नामक महाकाय दवा कंपनी के माध्यम से दुनियाभर में बेचती है। 
रम्सफील्ड अमरीका के रक्षा सचिव रहने के दौरान साल 2005 में दुनियाभर में बर्डफ्लू का हौव्वा फैलाया गया तथा इससे रम्सफील्ड ने अरबों कमाया। जबकि दुनियाभर के वाइरोलाजिस्ट चीख-चीखकर चेता रहे थे कि बर्डफ्लू, बर्डो की बीमारी है मनुष्यों की नहीं। इस कारण से इससे इतना डरने की जरूरत नहीं है। उस समय भारत सरकार ने भी टैमिफ्लू दवा को खरीदकर स्टाक कर लिया था। यह मामला संसद में भी उठा था।
अब सारी दुनिया में बिल गेट्स की वाहवाही हो रही है कि उन्होंने कोरोना वाइरस से लडऩे के लिए सबसे बड़ा निजी दान दिया है। हालांकि, यदि कोरोना वाइरस पर अकेले भारत के कई राज्य अलग-अलग रूप से इससे कई गुना ज्यादा रकम खर्च कर रहें हैं। निश्चित तौर पर मानव समाज कोरोना वाइरस को मात दे देगा लेकिन उसके बाद भी महाकाय दवा कंपनियां इससे अरबों डॉलर कमाती रहेंगी। आखिरकार, यदि लंबे समय तक कमाना है तो उसके लिए टीके का ईज़ाद तो करना ही पड़ेगा। और बिल गेट्स महोदय की गेट्स फाउंडेशन वही पुनीत कार्य ही तो कर रही है।

 


Date : 23-Mar-2020

अव्यक्त 

आज डॉ. राम मनोहर लोहिया की जयंती है। संत कबीर की भांति शाब्दिक जीवन पाए होते तो आज 110 साल के होते। डॉ. लोहिया को अगर दलगत राजनीति का कीड़ा न काटता तो स्वातंत्र्योत्तर भारत को उनके मौलिक और मानवतावादी चिंतन का और भी लाभ मिल सकता था। जवानी के दिनों में लोहियाजी भी मानते थे कि चरखा चलाने से भला आज़ादी कैसे आएगी! उन्हीं के शब्दों में वे उसे ‘बुढिय़ा की करतूत’ या ‘बूढ़े-बूढिय़ों के कारनामे’ मानते थे।
उन्होंने गांधीजी को लगभग चिढ़ाने के अंदाज में एक लेख लिखा। उसमें कहा कि हाथ से धान की भूसी उड़ाने और चावल कूटने से विदेशी सत्ता का खात्मा भला क्या होगा? इतना ही नहीं, उन्होंने लेख की एक प्रति गांधीजी को भेजते हुए उनसे जवाब भी तलब कर लिया।
इस बारे में लोहिया ने लिखा है कि उनकी समझ में वह अकेला अवसर था जब गांधीजी उनसे नाखुश हुए थे। क्योंकि गांधीजी ने पोस्टकार्ड पर अपने जवाबी पत्र में लोहिया को लिखा था- ‘तुम्हें मुझसे जवाब लिखने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि मैं समझता हूँ तुममें अपने विरोधी के दृष्टिकोण के लिए तनिक भी सहिष्णुता नहीं है।’
हालांकि बकौल लोहिया, इसके बाद गांधीजी का एक ‘मधुर और मुलायम उत्तर’ वाला दूसरा पत्र भी आया। लोहिया को इसका जीवन भर मलाल रहा कि अपने यायावरी जीवन के चलते वे उस पत्र को संभाल कर नहीं रख पाए। 
‘विरोधी के दृष्टिकोण के प्रति सहिष्णुता’ वाली गांधीजी की बात उनके हृदय को धक से लगी थी और वे आजीवन इस बात को भूल न सके। 14 अगस्त, 1960 को ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ के अपने एक लेख में लोहिया ने लिखा- ‘विरोधी के दृष्टिकोण को न समझना सचमुच एक गंभीर बीमारी है। मन की इस शक्ति का आधुनिक युग में निश्चित ही अभाव हो रहा है। हम अपने ही विचारों में इतने डूबे रहते हैं कि जब दूसरा व्यक्ति बात करता है और हमारी कमियों या तर्कों के छिद्रों की ओर इशारा करता है तो हम उसे सुनना नहीं चाहते।
...लगता है हम सिर्फ अपनी ही बात सुनते हैं। दूसरों से बातें करते समय अक्सर ऐसा लगता है जैसे हम उनसे सचमुच बात नहीं कर रहे होते हैं, क्योंकि सामनेवाला भी अपनी ही बात की धारा में बहता रहता है और इसका ध्यान नहीं रखता कि मैं क्या कहूंगा या कहता।जबकि अपने से विरोधी दृष्टिकोण को समझना और उसे मानना सर्वथा भिन्न बात है।
एक बार दक्षिण भारत की किसी सभा में डॉ. लोहिया भारत के सभी राजनीतिक दलों की कथनी और करनी का फर्क समझा रहे थे। उन्होंने कहा कि इन दलों के लिए कथित ‘विशेष परिस्थितियों’ की आड़ में सब कुछ जायज हो जाता है।
दक्षिण भारतीय श्रोताओं को संस्कृतमय अंदाज में इस बात को समझाने के लिए उन्होंने दिलचस्प अदा के साथ कुछ ऐसा कहाा- ‘वाक् स्वातंत्र्यम्, कर्म नियंत्रणम्, इति जनतांत्रिक अनुशासनम्।
विपरीतम् कर्म स्वातंत्र्यम्, वाक् नियंत्रणम् भारते प्रचलित पंथ:।’
केवल गुणदर्शन की भावना से और साफ-सुथरे मन से डॉ. राम मनोहर लोहिया को पढऩा कई बार झकझोरता भी है और गुदगुदाता भी है।
भारतीय समाज भटकाव का शिकार हुआ, क्योंकि वह विवेकानंद, गांधीजी, विनोबा और डॉ. लोहिया जैसे मौलिक, मानवतावादी और कर्मयोगी विचारकों को या तो भूल गया, या फिर उनके विचारों में घालमेल कर और उन्हें विकृत कर अपने और दूसरों के सामने परोसता रहा। यह हमारी एक मानवोचित कमी ही है और इस दोष को समय रहते दूर भी किया जा सकता है। 


Date : 23-Mar-2020

अपूर्वानंद
आज भगत सिंह का पुण्यतिथि है। 23 साल के इस नौजवान की जि़ंदगी में आखिर वह क्या बात थी कि मारे जाने के 87 साल गुजर जाने के बाद भी उसे उसी शिद्दत से याद किया जाता है जो तब थी जब वह लोगों की याद में कुछ अधिक करीब रहा होगा? भगत सिंह को शहीदे आज़म कहा जाता है- शहीदों का सरताज। यह कोई राय बहादुर या सर या भारत रत्न जैसा कोई खिताब नहीं, जो सत्ता देती है, बल्कि जनता के द्वारा प्यार और श्रद्धा से दी गई उपाधि है।
भगत सिंह की अभूतपूर्व लोकप्रियता उनके बाद तत्कालीन नेताओं के लिए भी विचारणीय थी। जवाहरलाल नेहरू ने लिखा- ‘भगत सिंह एक प्रतीक में बदल गए, (हिंसा का) कृत्य भुला दिया गया, प्रतीक शेष रहा, और कुछ ही महीनों में पंजाब और बहुत कुछ बाकी उत्तर भारत के हर शहर और गांव में उनका नाम गूंजने लगा। उनके इर्द-गिर्द अनेकानेक गीत बन गए और उस शख्स ने जो शोहरत हासिल की वह हैरतंगेज़ थी।’
भगत सिंह लेकिन एक ख़ास रूप में लोगों के बीच फैले थे। गांधी, नेहरू, सुभाष या अन्य नेताओं को तो वे पहचानते थे। लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तो अपने दूसरे क्रांतिकारी साथियों की तरह ही प्राय: गोपनीय, भूमिगत जीवन बिताते थे। इसलिए उनकी फांसी के पहले उन्हें सूरत से जानने के मौके न के बराबर ही थे।
अब यह देखें कि आखिर भगत सिंह की कौन-सी छवि है जिसे भारत ने अपने दिल में बसा रखा है? बिना दाढ़ी का सफाचट चेहरा, मूंछें जो कायदे से तराशी हुई हैं, दोनों कोने हलके ऊपर की ओर उठे हुए जिनसे रुआब नहीं सिर्फ जवानी के तनाव का तकाजा झलकता है, सामने को तकती स्थिर निगाह और सर पर हल्का सा तिरछा हैट। इसी तस्वीर की अनुकृतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीय जनता ने घरों में, चाय और पान की दूकान पर लगाया है। उन्होंने एक कमीज पहन रखी है जिसके बटन ऊपर तक बंद हैं। इसमें कोई लापरवाही नहीं, एक औपचारिक लेकिन इत्मीनान की मुद्रा है।
भगत सिंह की इस तस्वीर की अनुकृतियां लोगों ने खूब बनाईं और वह फोटोग्राफ न रह कर पेंटिंग और दूसरे रूपों में भी प्रचलित हुई। इस तस्वीर के मकसद और इसके प्रभाव या संदेश को समझने का प्रयास विद्वानों ने किया है- इस तस्वीर ने ब्रिटिश हुकूमत के इस प्रयास को नाकामयाब करने में सफलता पाई कि भगत सिंह और उनके साथी जुनूनी हिंसक युवकों के तौर पर बदनाम हों। कैमरे को सीधी देखती आंखें जैसे ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दे रही हैं और उसके इकबाल के रुआब में आने से इनकार कर रही हैं। लेकिन जो चीज़ इस तस्वीर को ख़ास बना देती है, वह है यूरोपीय पोशाक और सर पर रखा हैट का तिरछापन। यह इसे रूमानी रंगत दे देता है।
‘अ रिवोल्युशनरी हिस्ट्री ऑफ़ इंटर वार इंडिया- वायलेंस, इमेज, वॉयस एंड टेक्स्ट’ नामक अपनी दिलचस्प किताब में कामा मैक्लीन ने इस तस्वीर की कहानी कही है, इसके सफर की भी। भगत सिंह सिख थे लेकिन यहां उनके केश नहीं हैं। अपने केश उन्होंने ब्रिटिश पुलिस को झांसा देने के लिए पहले ही कटा लिए थे। ऐसा नहीं कि उनकी मित्र मंडली में उनके सिख होने को तस्लीम न किया जाता हो, लेकिन इस धार्मिक पहचान पर कोई जोर न था। उन्हें सरदार कहकर पुकारा जाता था, लेकिन जैसा उनके समकालीन और दोस्त बताते हैं, यह मजहब से कहीं ज्यादा प्यार और अपनापन के चलते था।
यह तस्वीर बाकायदा स्टूडियो में खिंचवाई गई थी और एक योजना के तहत। असेंबली में बम फेंके जाने के बाद गिरफ्तारी तय थी, बल्कि भगत सिंह का यह फैसला था। उसके बाद इस तस्वीर को तेजी से लोगों के बीच फैला देने का मकसद था। इस वजह से बटुकेश्वर दत्त की तस्वीर भी उसी स्टूडियो में खिंचाई गई।
इस तस्वीर से भगत सिंह की उस खासियत का कुछ पता चलता है जो उन्हें बाकी क्रांतिकारियों से अलग कर देती है। भगत सिंह लेखक भी थे और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे संपादक के साथ काम भी कर चुके थे। पंजाब केसरी के संपादक से उनका लगाव था। लेकिन निरक्षर लोगों की बहुतायत वाले मुल्क में जनता से संवाद कायम करने के लिए अक्षर से कहीं अधिक तस्वीर कारगर हो सकती थी। जिस तरह गिरफ्तारी के बाद अपने मुकदमे को भगत सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मुक़दमे में बदल दिया, उसी तरह इन तस्वीरों का इस्तेमाल क्रांतिकारी आंदोलन की उस छवि की काट करने के लिए किया गया कि वह सिर्फ बम,पिस्तौल और खूनखराबा पसंद करने वाले जुनूनी नौजवानों का जमावड़ा है। यह एक संयत, सधी हुई मुद्रा है जिसमें हिंसा का आभास और आक्रामकता का लेश भी नहीं है।
हमारे मित्र मनोज कुमार ने दो साल पहले इसी दिन इस ओर ध्यान दिलाया था कि भगत सिंह का मिजाज समझने की आवश्यकता है। उदाहरण उन्होंने नहीं दिया लेकिन जिक्र उनके गद्य का किया। जो भंगिमा, भगत सिंह की इस तस्वीर में है वही उनके गद्य की भी है। वह न तो आक्रामक है न भावुकतावादी। उसमें तर्क की दृढ़ता है लेकिन एक निजी स्वर भी है, कोई मिशनरी निवैयक्तिकता नहीं।
भगत सिंह के इस स्वभाव का एक नमूना उनका ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लेख है। यह एक कठिन विषय पर लिखा गया निबंध है। कतई मुमकिन था कि इसमें वे ईश्वर को मानने वालों की अतार्किकता पर हमला करें, अपनी वैज्ञानिक वस्तुपरकता पर गौरवान्वित हों। लेकिन वे ऐसा न करके इसमें बातचीत और अपने भीतर की उथल-पुथल का जिक्रकरते हैं जो नास्तिकता के निर्णय में थी।
क्या ईश्वर के अस्तित्व से इनकार वे इसलिए करते हैं कि उनमें अहंकार आ गया है? क्या यह अहंकार एक उच्च ध्येय में लगे क्रांतिकारी दल के सदस्य के रूप में प्रसिद्धि के कारण है? भगत सिंह लिखते हैं कि जब वे कॉलेज में थे, और प्रसिद्ध होने का कोई सवाल न था तभी से वे इस खय़ाल के हो गए थे, इसलिए अहंकार से इसे जोडऩा मुनासिब न होगा। वे अपनी विचार यात्रा का वर्णन आत्मीय शैली में करते हैं।
जीवन के एक निर्णायक मोड़ पर (जऱा सोचिए, यह जीवन ही कितना लंबा था!), जब क्रांतिकारी दल का अस्तित्व भी असंभव लग रहा था, ‘अध्ययन की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूंज रही थी- विरोधियों द्वारा रखे गए तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिए अध्ययन करो। अपने मत के समर्थन में तर्क देने के लिए सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढऩा शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। हिंसात्मक तरीकों को अपनाने के रोमांस की जगह, जो हमारे पुराने साथियों में अत्यधिक व्याप्त था, गंभीर विचारों ने ले ली। यथार्थवाद हमारा आधार बना। हिंसा तभी न्यायोचित है जब किसी विकट आवश्यकता में उसका सहारा लिया जाए। अहिंसा सभी जनांदोलनों का अनिवार्य सिद्धांत होना चाहिए।’
अहिंसा की अनिवार्यता पर जोर ध्यान देने योग्य है। गांधी से बड़ा अहिंसा का पैरोकार कौन होगा? लेकिन वे नास्तिक न थे। अहिंसा एक तरह से व्यक्ति को निष्कवच बना देती है। सार्वजनिक या व्यक्तिगत प्रसंग में उसके निर्णय की कठिनता का सिर्फ अंदाज किया जा सकता है। 

भगत सिंह के इन शब्दों को पढि़ए और फिर इस तिरछे हैट वाले मुखड़े को देखिए

भगत सिंह उस अकेलेपन और निष्कवचता का जिक्र करते हैं जो नास्तिकता से अनिवार्यत: जुड़ी है ‘ईश्वर से मनुष्य को अत्यधिक सांत्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर होना पड़ता है... परीक्षा की इन घडिय़ों में अहंकार, यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है।’ आगे भगत सिंह लिखते हैं, ‘मैं जानता हूं कि जिस क्षण रस्सी का फंदा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख्ता हटेगा, वही पूर्ण विराम होगा, वही अंतिम क्षण होगा।  मैं, या संक्षेप में, आध्यात्मिक शब्दावली की व्याख्या के अनुसार, मेरी आत्मा, सब वहीं समाप्त हो जाएगी।’
‘एक छोटी सी जूझती हुई जि़ंदगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने आप में पुरस्कार होगी, यदि मुझमें उसे इस दृष्टि से देखने का साहस हो। यही सबकुछ है।’ इन शब्दों को पढि़ए और फिर उस तिरछे हैट वाले मुखड़े को देखिए। उस दृष्टि की विनम्रता का साहस महसूस कीजिए। (सत्याग्रह)

 


Date : 23-Mar-2020

डॉ. नवमीत
वायरस इतना घातक इसलिए नहीं है कि इसकी मृत्यु दर बहुत ज्यादा है। मृत्यु दर तो इसकी 1-4 फीसदी तक ही बताई जा रही है। यह घातक इसलिए है क्योंकि जितनी तेजी से यह फैलता है उस तेजी से हमारे देश का स्वास्थ्य ढांचा इसे रोक पाने में असमर्थ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश में प्रति 1000 आबादी पर 3 हॉस्पिटल के बेड चाहिए। 
लेकिन हमारे देश में सिर्फ 1 बेड प्रति 1000 आबादी है। बाकी यह जरूरत भी सामान्य परिस्थितियों के लिए है। महामारी के समय तो और भी बेडों जरूरत होती है। फिर इससे संक्रमित 80 फीसदी व्यक्ति भले ही बिना किसी खास नुकसान के ठीक हो जाते हैं, लेकिन 20 फीसदी को तो सघन चिकित्सा की जरूरत पड़ती ही हम 4-5 फीसदी को तो वेंटिलेटर की भी जरूरत पड़ सकती है। 
लेकिन फिलहाल हमारे पास इन तो इतने सघन चिकित्सा कक्ष हैं और न ही इतने वेंटिलेटर। जिस तेजी से और जितने कम समय में यह फैलता है, उस हिसाब से लगता है कि करोड़ों लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं जिनमें से लाखों क्या कई मिलियन लोगों को सघन चिकित्सा की जरूरत पड़ सकती है और हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाएं एक साथ इतने लोगों को सघन चिकित्सा देने की स्थिति में नहीं हैं।  नतीजा मुझे कहते हुए भी डर लग रहा। नतीजा बहुत भयावह होगा। न तो हमारे पास पर्याप्त लैब हैं, न सघन चिकित्सा कक्ष और न डॉक्टर्स व नर्सें। जो डॉक्टर्स नर्सें हैं वे भी कितने लोगों को एक साथ देख सकेंगे? वे भी इंसान हैं, उनकी भी सीमाएं हैं।
समस्या वायरस तो है ही। लेकिन सबसे बड़ी समस्या हमारे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था है। यह इसलिए है क्योंकि पूरी व्यवस्था मुनाफे पर आधारित है जिसने हर चीज के साथ स्वास्थ्य को भी मुनाफे का साधन बना छोड़ा है। इसी व्यवस्था ने इस वायरस को वाइल्ड से इंसानों में प्रविष्ठ करवाया। यही व्यवस्था इसके इलाज में बाधक है।