विचार/लेख
वे छोड़ गए थे दर्द..
वे छोड़ गए थे अनाथ बच्चे..
और सिसकती हुईं विधवाएं!
उन्हीं में दो महिलाएं थीं,अत्तर कौर और रत्तन देवी, जिनकी हिम्मत इतिहास में दर्ज है ।
अत्तर कौर उस वक्त गर्भवती थीं, जब उनके पति भगमल भाटिया को गोली मार दी गई। उस रात, खून और मौत के बीच, वो अपने पति की लाश के पास बैठी रहीं।
मरते हुए अजनबियों को पानी पिलाया, उनके दर्द में साथ बैठीं, जबकि उनका खुद का दिल टूट चुका था।
कुछ दिन बाद अंग्रेज़ ₹50,000 लेकर आए, उस दौर में एक बहुत बड़ी रकम। उन्हें लगा, शायद इससे अत्तर कौर 'आगे बढ़ पाएंगी'। लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। दो बार!
मना इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें पैसों की ज़रूरत नहीं थी, वो अकेली थीं, अपने तीसरे बच्चे को जन्म देने वाली थीं।
बल्कि इसलिए किया क्योंकि उनके शब्दों में, "इस पैसे को लेने का मतलब, मेरे पति की शहादत को बेच देना होगा।"
रत्तन देवी को जब गोलियों की आवाज़ सुनाई दी, तो वो भागकर बाग़ पहुंचीं, और वहां अपने पति की लाश देखी।
कर्फ्यू था, कोई मदद नहीं कर सकता था।
.तो वो पूरी रात वहीं रुकीं, अपने पति की लाश की अकेले रखवाली की।
अगली सुबह, उसे चारपाई पर उठाकर घर ले आईं।
कुछ दिन बाद अंग्रेज़ ₹25,000 लेकर आए।
रत्तन देवी का जवाब था, "मैं अपने पति के हत्यारों से पैसे नहीं लूंगी।"
इन दो महिलाओं ने न हथियार उठाए, न नारे लगाए।
लेकिन अपने दर्द, अपने इनकार और अपनी ख़ामोशी से, उन्होंने विरोध किया।
और ये विरोध, हमेशा याद रखा जाना चाहिए!
(द बेटर इंडिया)
"यह हमारा अंतिम और बेस्ट ऑफ़र है, अब देखना यह है कि क्या ईरानी इसे क़बूल करते हैं. शुक्रिया." इसके साथ ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने सामने रखी मेज़ को दो बार थपथपाया और प्रेस कॉन्फ़्रेस ख़त्म कर दी.
पाकिस्तानी राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली बातचीत बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गई.
इस बात की जानकारी अमेरिका के उपराष्ट्रपति ने दी, जो बातचीत के लिए पाकिस्तान आए थे. रविवार सुबह 6 बजे के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेस में जेडी वेंस ने कहा कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच फ़ासला कम करने और समझौता कराने की पूरी कोशिश की, लेकिन "बुरी ख़बर यह है कि हम किसी समझौते तक नहीं पहुंच सके."
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह ख़बर अमेरिका के लिए उतनी बुरी नहीं है जितनी ईरान के लिए है, "कोई समझौता नहीं हुआ है और हम अमेरिका वापस लौट रहे हैं."
पाकिस्तान के कहने पर अमेरिका और ईरान दो हफ़्ते के संघर्ष विराम पर राज़ी हुए थे और दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए इस्लामाबाद आए थे. दोनों पक्षों के बीच बातचीत इस्लामाबाद के सेरेना होटल में हुई.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने बताया कि बातचीत बेनतीजा रही, लेकिन उन्होंने यह साफ़ नहीं किया कि समझौता न होने का दो हफ़्ते के अस्थायी संघर्ष विराम पर क्या असर पड़ेगा.
प्रेस कॉन्फ़्रेस के क़रीब दो घंटे बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने भी प्रेस कॉन्फ़्रेस की और कहा कि पाकिस्तान अमेरिका-ईरान बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहेगा, "यह ज़रूरी है कि दोनों पक्ष संघर्ष विराम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जारी रखें."
बातचीत क्यों टूटी?
अमेरिका और ईरान शांति वार्ता की नाकामी के लिए अलग-अलग वजहें बता रहे हैं.
बातचीत के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेस में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा, "हमने बहुत साफ़ कर दिया था कि हमारी 'रेड लाइन्स' क्या हैं, हम किन बातों पर समझौता कर सकते हैं और किन पर नहीं."
जेडी वेंस के मुताबिक़, "और उन्होंने (ईरान) तय किया है कि वे हमारी शर्तें क़बूल नहीं करेंगे."
इस मौके पर पत्रकारों ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति से पूछा, "कृपया साफ़-साफ़ बताइए कि किन शर्तों को ख़ारिज किया गया?"
जवाब में जेडी वेंस ने कहा कि वह बंद कमरे में 21 घंटे चली बातचीत की पूरी जानकारी नहीं देंगे, लेकिन "सीधी बात यह है कि हम उनसे (ईरान से) यह भरोसा चाहते हैं कि वे परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे और ऐसी क्षमता हासिल करने के लिए ज़रूरी उपकरण भी नहीं जुटाएंगे."
"यह अमेरिकी राष्ट्रपति का मुख्य लक्ष्य है और हमने बातचीत के ज़रिए इसे हासिल करने की कोशिश की."
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि ईरान की यूरेनियम संवर्धन क्षमता पहले ही नष्ट की जा चुकी है, "लेकिन क्या हमें ईरान में यह इच्छा दिख रही है कि वे कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे? अभी तक हमें ऐसी इच्छा नहीं दिखी है."
एक सवाल के जवाब में जेडी वेंस ने कहा कि बातचीत के दौरान ईरान की फ़्रीज़ संपत्तियों पर भी चर्चा हुई, लेकिन हम उस मुकाम तक नहीं पहुंच सके जहां ईरान हमारी शर्तें मान लेता.
"मुझे लगता है कि हमने काफ़ी लचीलापन दिखाया. राष्ट्रपति ने हमें कहा था कि आपको अच्छी नीयत से बातचीत में जाना है और समझौते तक पहुंचने की पूरी कोशिश करनी है. हमने वही किया, लेकिन अफ़सोस कि कोई प्रगति नहीं हुई."
जेडी वेंस से पूछा गया कि बातचीत के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से कितनी बार संपर्क किया और उन्होंने क्या कहा.
इस पर अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने जवाब दिया, "हम राष्ट्रपति के साथ लगातार संपर्क में थे, पिछले 21 घंटों में हमने कितनी बार बात की, मुझे नहीं पता... शायद दर्जन भर बार."
"हम एडमिरल कूपर (सेंटकॉम कमांडर), मार्को रुबियो (विदेश मंत्री), पीट हेगसेथ (रक्षा मंत्री) और पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के संपर्क में थे. हम लगातार संपर्क में थे क्योंकि हम अच्छी नीयत से बातचीत कर रहे थे."
प्रेस कॉन्फ़्रेंस को ख़त्म करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा, "हम समझ बनाने के एक आसान सा प्रस्ताव दिया है. यह हमारी अंतिम और सबसे बेहतर पेशकश है, अब देखना यह है कि ईरानी इसे क़बूल करते हैं या नहीं."
इस संक्षिप्त प्रेस कॉन्फ़्रेस के बाद जेडी वेंस रावलपिंडी के नूर ख़ान एयर बेस गए और वहां से अमेरिका के लिए रवाना हो गए. उन्हें पाकिस्तान के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर, विदेश मंत्री इसहाक़ डार और गृह मंत्री मोहसिन नक़वी ने विदा किया.
ईरानी मीडिया- अमेरिका ने लचीलापन नहीं दिखाया
ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक़, अमेरिका की "ग़ैर-वाजिब मांगों" ने युद्ध ख़त्म करने की बातचीत को बाधित किया.
ईरान के सरकारी प्रसारक आईआरआईबी ने टेलीग्राम पर पोस्ट में कहा, "ईरानी प्रतिनिधिमंडल की तरफ़ से कई कोशिशों के बावजूद, अमेरिकी पक्ष की ग़ैर-वाजिब मांगों ने बातचीत की प्रगति को रोक दिया. इस तरह बातचीत ख़त्म हो गई."
ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार और शनिवार की दरमियानी रात इस्लामाबाद पहुंचा, जबकि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ़, जेरेड कुशनर और अन्य अमेरिकी अधिकारी शनिवार सुबह पाकिस्तानी राजधानी पहुंचे.
दोनों प्रतिनिधिमंडलों ने अलग-अलग पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, विदेश मंत्री इशाक़ डार और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर समेत अन्य अधिकारियों से मुलाक़ात की.
इन बैठकों के बाद पाकिस्तानी सरकार के बयानों में कहा गया कि पाकिस्तान मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका जारी रखेगा और उम्मीद जताई गई कि शनिवार को होने वाली बातचीत विवाद के हल की दिशा में एक क़दम होगी.
पाकिस्तानी अधिकारियों ने बीबीसी उर्दू को बताया कि पहले ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच पाकिस्तान के ज़रिए संदेशों का आदान-प्रदान हुआ, जिसके बाद दोनों पक्षों ने पाकिस्तानी अधिकारियों की मौजूदगी में ढाई घंटे तक बातचीत की.
इसके बाद एक घंटे का विराम लिया गया और पेश की गई मांगों के तकनीकी पहलुओं पर ईरानी और अमेरिकी विशेषज्ञों के बीच चर्चा हुई.
पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक़, तकनीकी मुद्दों पर संदेशों का आदान-प्रदान देर रात तक जारी रहा.
ईरान की तस्नीम न्यूज़ एजेंसी ने दावा किया है कि बातचीत बेनतीजा रहने की वजह अमेरिकी रुख़ में लचीलापन न होना था.
तस्नीम के मुताबिक़, ईरानी संसद अध्यक्ष ग़ालिबाफ़ की अगुवाई में आए प्रतिनिधिमंडल ने सेना प्रमुख से कम से कम दो बार और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से एक बार मुलाक़ात की, "ताकि ज़रूरी इंतज़ाम किए जा सकें और बातचीत की शुरुआत में ही अमेरिका के वादाख़िलाफ़ी के ख़िलाफ़ औपचारिक विरोध दर्ज कराया जा सके."
ईरानी न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक़, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत 21 घंटे से ज़्यादा चली. इस दौरान ईरान ने बार-बार अपने प्रस्ताव पेश किए और "अमेरिकी पक्ष को हक़ीक़त की तरफ़ लाने की कोशिश की."
तस्नीम न्यूज़ एजेंसी का दावा है कि "हर चरण पर अमेरिका की ज़्यादा मांगों ने साझा ढांचा बनने में रुकावट डाली. अमेरिकी रुख़ में लचीलापन न होने की वजह से बातचीत बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गई."
ख़बर में आगे कहा गया कि अगली बातचीत के दौर के समय, जगह और प्रक्रिया को लेकर अभी तक कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है.
सेरेना होटल से एक किलोमीटर दूर शनिवार को माहौल?
बिरयानी, फ़्राइड राइस, चिकन, कबाब और मिठाइयां भी... ये मेन्यू इस्लामाबाद के सेरेना होटल का नहीं था, जहां शनिवार को ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच सीधी बातचीत हुई.
बल्कि यह नज़ारा एक किलोमीटर दूर जिन्ना कन्वेंशन सेंटर का था, जहां दुनिया भर से आए पत्रकारों के लिए ख़ास इंतज़ाम किए गए थे.
अगर कोई और मौक़ा होता तो पाकिस्तानी सरकार की इन तैयारियों की तारीफ़ होती, लेकिन वहां असल में देशी और विदेशी पत्रकार मौजूद थे, जो 'एक्सक्लूसिव' ख़बर की तलाश में आए थे और पाकिस्तान की मध्यस्थता में हो रही अमेरिका-ईरान बातचीत को कवर कर रहे थे.
होटल के बाहर सड़क पर बसें खड़ी थीं, जो पत्रकारों को जिन्ना कन्वेंशन सेंटर ले जा रही थीं, जहां सुरक्षा कारणों से गाड़ियों और ग़ैर-अधिकृत लोगों के आने पर रोक थी.
बस में विदेशी पत्रकारों का उत्साह साफ़ दिख रहा था.
मैंने एक विदेशी मीडिया संस्थान से जुड़ी महिला पत्रकार को फ़ोन पर यह कहते हुए भी सुना कि "सारी निगाहें पाकिस्तान पर हैं."
जानकारी की कमी लेकिन खाने की भरपूर व्यवस्था
कुछ देर बाद हम जिन्ना कन्वेंशन सेंटर पहुंचे, जहां दर्जनों देशी और विदेशी पत्रकार मौजूद थे. यह एक मेला था जहां हर तरह की भाषाएं सुनाई दे रही थीं. कोई अंग्रेज़ी में, कोई उर्दू में, कोई पश्तो में और कोई दूसरी यूरोपीय भाषाओं में कैमरे और फ़ोन पर रिपोर्टिंग कर रहा था.
मैं सोच रहा था कि यहां काम कैसे चलेगा. मैंने एक विदेशी महिला पत्रकार से पूछा, "क्या आपको पता है कि यहां से एक किलोमीटर दूर सेरेना होटल में ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों के बीच बैठकों में क्या हो रहा है?" उसने जवाब दिया, "शायद कन्वेंशन सेंटर के बाहर कुछ पत्रकारों को जानकारी हो, लेकिन यहां किसी को कुछ नहीं पता."
मैंने यही बात अलग-अलग शब्दों में दूसरे पत्रकारों से भी सुनी. पूरा दिन यहां बिताने के बावजूद मैंने कोई ऐसा सरकारी अधिकारी नहीं देखा जो पत्रकारों को बता सके कि अंदर क्या चल रहा है.
स्थानीय और विदेशी पत्रकार एक-दूसरे से बार-बार यही सवाल पूछते रहे कि क्या किसी को बातचीत के बारे में कुछ पता है? जानकारी की कमी और धीमे इंटरनेट ने पूरे दिन पत्रकारों को परेशान किया.
इस बीच सेरेना होटल में पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत जारी थी. उनसे जुड़ी ख़बरें लेते समय मेरा संपर्क भी धीमे इंटरनेट की वजह से कई बार टूट गया.
दुनिया भर से इस्लामाबाद आए पत्रकार यह दुआ करते दिखे कि उन्हें खाली हाथ वापस न लौटना पड़े. यह एक बड़ी ख़बर थी और संघर्ष का ख़त्म होना, इससे बड़ी ख़बर नहीं हो सकती.
इसके लिए कन्वेंशन सेंटर में बैठे पत्रकार बातचीत के स्थल सेरेना होटल पर नज़र बनाए हुए थे.
जिस ख़बर का पत्रकार इंतज़ार कर रहे थे, वह रविवार सुबह 6 बजे के बाद आई, जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एलान किया कि बातचीत बेनतीजा रही.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-उमर नांगियाना और सारा हसन
पाकिस्तान फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ़्ते के सीजफायर पर बनी सहमति में मदद करने की अपनी सफलता का जश्न मना रहा है।
साथ ही पाकिस्तान के नेता शांतिवार्ता की मेज़बानी की तैयारी कर रहे हैं।
शनिवार से शुरू होने वाली इस बातचीत से पहले, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दो दिन की छुट्टी घोषित कर दी गई है।
यह बातचीत असल में होगी या नहीं, इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन शहर ने फिर भी खुद को पूरी तरह इसके लिए तैयार कर लिया है। सडक़ों पर सन्नाटा है, क्योंकि करीब 10 हजार पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है। लेकिन दुनिया के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है।
दुनिया भर के देश लड़ाई खत्म होते ही होर्मुज़ स्ट्रेट के फिर से खुलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। युद्ध से पहले इस रास्ते से दुनिया के लगभग 20 फीसदी तेल की सप्लाई होती थी। पाकिस्तान का भी काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है।
सोशल मीडिया में गर्व और उत्साह
अगर बातचीत सफल नहीं होती है और पाकिस्तान को पड़ोसी देश ईरान के साथ जंग में घसीटा जाता है तो फिर उसे ‘बुरे सपने जैसे हालात’ का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि पाकिस्तान ने पिछले साल सऊदी अरब के साथ एक द्विपक्षीय रक्षा समझौता किया था।
सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ अब्दुल बासित कहते हैं कि पाकिस्तान ने ‘यह साफ कर दिया है कि वह सऊदी अरब को दिए गए अपने वादे को निभाएगा।’
बासित बताते हैं कि इसका नतीजा यह हो सकता है, ‘पाकिस्तान की तीन सीमाओं पर माहौल गरमा जाए।’
वह यहां पाकिस्तान के अपने दूसरे पड़ोसियों अफग़़ानिस्तान और भारत के साथ चल रहे तनाव का जि़क्र कर रहे हैं। वह कहते हैं, ‘पाकिस्तान अपने चार में से दो प्रांतों में चल रहे विद्रोहों से लड़ रहा है। पाकिस्तान यह सब झेल नहीं सकता।’
बावजूद इसके पाकिस्तानी सोशल मीडिया पर गर्व और उत्साह छाया हुआ है। अलग-अलग तरह के मीम्स वायरल हो रहे हैं।
बासित कहते हैं, ‘यह इस मायने में एक जीत है कि दुनिया का कोई भी दूसरा देश युद्धविराम करवाने में कामयाब नहीं हो पाया। और हम एक संभावित बड़ी तबाही के कगार पर खड़े थे। पाकिस्तान ने उस तबाही को टाल दिया।’
यह सफलता उस देश के लिए बेहद ज़रूरी थी, जिसने सालों तक राजनीतिक उथल-पुथल, महज़ दो साल पहले कर्ज चुकाने में नाकाम होने की कगार पर खड़ी कमजोर अर्थव्यवस्था, और भारत के साथ जबरदस्त दुश्मनी का सामना किया है। तो आखिर पाकिस्तान ने यह कमाल कैसे कर दिखाया?
ट्रंप के पसंदीदा
पाकिस्तान बेहतर स्थिति में है, क्योंकि अमेरिका, ईरान और खाड़ी देश उस पर भरोसा करते हैं।
सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग के सांसद मुशाहिद हुसैन सैयद के मुताबिक, ‘सुलह की इस प्रक्रिया की अगुवाई पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर कर रहे हैं।’
आसिम मुनीर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपना ‘पसंदीदा फील्ड मार्शल’ कहते हैं।
मुनीर को शायद पाकिस्तान का सबसे ताकतवर इंसान माना जा सकता है। क्योंकि पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां सेना ने लंबे समय से राजनीति में अहम भूमिका निभाई है।
अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी बताती हैं, ‘ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के तुरंत बाद, मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ तालमेल बिठाना शुरू कर दिया था और उन्हें ‘दो शुरुआती जीत’ दिलाई थीं।’
सीआईए की खुफिया जानकारी पर काम करते हुए, फील्ड मार्शल ने 2021 के काबुल हवाई अड्डे पर हुए बम धमाके के कथित मास्टरमाइंड को तब अमेरिकियों के हवाले कर दिया, जब वे अफग़़निस्तान से निकल रहे थे।
इस आत्मघाती हमले में कम से कम 170 अफग़़ान और 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे।
लोधी कहती हैं, ‘ट्रंप इतने शुक्रगुजार थे कि उन्होंने कांग्रेस में अपने पहले भाषण में इसका जिक्र किया।’
लोधी कहती हैं कि दूसरी जीत यह थी, ‘जिस तरह पाकिस्तान ने उन्हें यह बताया कि भारत के साथ एक बड़े युद्ध को रोकने में उन्होंने (डोनाल्ड ट्रंप) अहम भूमिका निभाई थी।’
पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में से एक है, जिन्होंने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया है। इसकी डोनाल्ड ट्रंप को लंबे समय से चाहत थी।
वह कहती हैं, ‘याद रखिए कि ट्रंप को उस टैरिफ युद्ध से असल में कोई खास खुशी नहीं मिल रही थी, जिसे वे दुनिया के लगभग हर देश पर थोप रहे थे। इसलिए उन्हें सचमुच उस चीज़ की जरूरत थी, जो उन्हें पाकिस्तान से मिली।’
पाकिस्तान ने अपने अहम खनिजों तक अमेरिका को पहुंच देने का भी वादा किया है। इसे अमेरिका अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हित के तौर पर देखता है।
पाकिस्तान के फ्रंटियर वक्स ऑर्गनाइज़ेशन देश में अहम खनिजों का खनन करने वाली मुख्य संस्था है और सेना के अधीन काम करती है।
सितंबर 2025 में इसने एक अमेरिकी कंपनी के साथ पांच सौ मिलियन डॉलर के निवेश का समझौता किया। ये प्रधानमंत्री आवास पर हुआ, जिसमें मुनीर भी मौजूद थे।
इसके बाद जनवरी में, पाकिस्तान ने वर्ल्ड लिबर्टी फ़ाइनेंशियल्स की एक सहयोगी कंपनी के साथ एक समझौता किया।
वल्र्ड लिबर्टी फ़ाइनेंशियल्स एक क्रिप्टोकरेंसी वेंचर है जिसकी सह-स्थापना ट्रंप और उनके परिवार ने की थी। इस समझौते के तहत, कंपनी अपने स्टेबलकॉइन को देश के डिजिटल-पेमेंट सिस्टम में शामिल कर सकती है। इससे ट्रंप के करीबी लोगों के साथ पाकिस्तान के रिश्ते भी मज़बूत हुए हैं।
-दयानिधि
आजकल बच्चों के लिए चमकीले और रंग-बिरंगे कपड़े बहुत लोकप्रिय हैं। फैशन की दुनिया इतनी तेज हो गई है कि बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं और नए कपड़े चाहिए होते हैं। लेकिन हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि ये चमकीले कपड़े बच्चों के लिए खतरा भी बन सकते हैं। मरीअन यूनिवर्सिटी की केमिस्ट्री लैब में हुई जांच में यह पाया गया कि बाजार में बिक रहे बच्चों के कई कपड़े सीसे (लेड) से अधिक मात्रा में प्रभावित हैं।
जांच की शुरुआत
इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाली शोधकर्ता के द्वारा अपनी बेटी में उच्च स्तर का सीसा पाया गया था, जो खिलौनों की सतह से आया था। उस समय अमेरिका में सीसे की कड़ी सीमाएं नहीं थीं। आज, यूएस कंज़्यूमर प्रोडक्ट सेफ्टी कमिशन बच्चों के उत्पादों जैसे कपड़ों और खिलौनों में सीसा की अधिकतम सीमा 100 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) निर्धारित करता है।
शोधकर्ता ने देखा कि बहुत से माता-पिता इस समस्या से अनजान हैं। इसीलिए उन्होंने अपने अंडरग्रेजुएट छात्रों के साथ मिलकर बच्चों के रोजमर्रा के सामान में भारी धातु के खतरों का अध्ययन करना शुरू किया।
कपड़ों में सीसा कैसे आता है
अध्ययन से पता चला है कि बच्चों के कपड़ों में सीसा केवल जिपर, बटन या स्नैप्स में ही नहीं होता, बल्कि सीधे कपड़े की फैब्रिक में भी पाया जा सकता है। कुछ निर्माता लीड (द्वितीय) एसीटेट का इस्तेमाल करते हैं ताकि कपड़े में रंग लंबे समय तक चमकदार और टिकाऊ बने रहें। यह तरीका सस्ता होता है और चमकीले रंग बनाने में मदद करता है।
बच्चों के लिए खतरे
सीसा किसी भी उम्र के लिए हानिकारक है, लेकिन छोटे बच्चे सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। यह उनके मस्तिष्क, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और व्यवहार पर गंभीर असर डाल सकता है। बच्चे अक्सर अपने कपड़े मुंह में डालते या चबाते हैं, जिससे शरीर में सीसा आसानी से प्रवेश कर सकता है। अध्ययन में पाया गया कि अगर बच्चे कपड़े चबाएं, तो उनका शरीर सुरक्षित सीमा से अधिक सीसा ग्रहण कर सकता है।
जांच के परिणाम
शोधकर्ताओं ने 11 रंगीन शर्टों का अध्ययन किया। ये शर्ट चार अलग-अलग रिटेलर्स से खरीदी गई थीं, जिनमें फास्ट फैशन और डिस्काउंट ब्रांड शामिल थे। उन्होंने पाया कि सभी कपड़े 100 पीपीएम के सरकारी सुरक्षा मानक से अधिक थे। सबसे अधिक सीसा लाल और पीले रंग की शर्टों में पाया गया। यह संकेत देता है कि चमकीले रंग वाले कपड़े बच्चों के लिए ज्यादा जोखिमपूर्ण हो सकते हैं।
मुंह में डालने से सीसा का असर
दूसरे चरण में शोधकर्ताओं ने यह देखा कि अगर बच्चे कपड़े मुंह में डालते या चबाते हैं तो कितना सीसा शरीर में प्रवेश कर सकता है। उन्होंने पेट की स्थितियों को नकली तौर पर बनाया और गणना की। उनके निष्कर्ष से पता चला कि यह व्यवहार एफडीए की रोजमर्रा की सुरक्षित सीमा से अधिक सीसा ग्रहण करवा सकता है।
गुजरात का पोरबंदर महात्मा गांधी का जन्म स्थान है. इस शहर में पहली बार एक शराब की दुकान खुल रही है, जहां सरकारी परमिटधारक शराब ख़रीद सकेंगे.
पोरबंदर के लॉर्ड्स होटल की शराब की बिक्री से जुड़ी दो साल पुरानी अर्ज़ी को गुजरात के गृह विभाग ने मंज़ूरी दे दी है.
इस मंज़ूरी के बाद पोरबंदर ज़िले में रहने वाले और शराब का परमिट रखने वाले लोग वहाँ से शराब ख़रीद सकेंगे. गुजरात में पर्यटक, स्वास्थ्य कारणों से शराब का सेवन करने वाले लोगों और कॉरपोरेट इवेंट में हिस्सा लेने वालों को राज्य में शराब पीने के लिए ख़ास तरह के परमिट जारी होते हैं.
पोरबंदर महात्मा गांधी का जन्मस्थान है. महात्मा गांधी शराबबंदी के पक्ष में थे और उनके विचारों की वजह से ही गुजरात में शराबबंदी का क़ानून लागू किया गया था.
कुछ लोग इसे 'रूटीन प्रक्रिया' बता रहे हैं तो कई लोग इससे नाराज़ भी हैं.
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने कई लोगों से बात करके यह जानने की कोशिश की कि पोरबंदर में शराब बेचने को मंज़ूरी पर उनकी क्या राय है.
गौर करने वाली बात यह भी है कि गुजरात के अलग अलग इलाक़ों में शराब पकड़े जाने की ख़बरें लगातार मीडिया में आती रहती हैं.
गुजरात विधानसभा में भी राज्य सरकार ज़िलेवार शराब से जुड़े आंकड़े पेश करती है. हाल ही में राज्य सरकार ने सदन में बताया था कि पिछले दो साल में पुलिस ने पूरे राज्य से अवैध ढंग से बेची जा रही कुल 42 करोड़ रुपये की शराब ज़ब्त की है.
गुजरात में शराब को लेकर क़ानून क्या कहता है?
गुजरात में शराबबंदी का क़ानून मुख्य रूप से गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट, 1949 के तहत लागू है.
इस क़ानून के मुताबिक राज्य में शराब का उत्पादन, बिक्री, ख़रीद, भंडारण, परिवहन और सेवन आम तौर पर प्रतिबंधित है. राज्य में शराब की बिक्री और सेवन के लिए सरकार लाइसेंस, परमिट या कोई विशेष अनुमति जारी करती है.
इसी एक्ट की धारा 11 और 12 के अनुसार शराब की बिक्री या सेवन केवल क़ानूनी अनुमति के आधार पर ही की जा सकती है.
यानी गुजरात में शराब की पूरी तरह खुले तौर पर बिक्री की इजाज़त नहीं है, लेकिन कुछ ख़ास वर्ग के लोगों के लिए नियंत्रित परमिट की व्यवस्था की गई है.
गुजरात में शराब की परमिट शॉप एक क़ानूनी दुकान होती है, जो आमतौर पर किसी होटल में होती है, जहां सिर्फ़ वैध परमिट रखने वाले लोगों को ही शराब बेची जा सकती है.
ये परमिट पर्यटकों, विदेशी नागरिकों, दूसरे राज्यों के निवासियों, हेल्थ परमिट रखने वाले लोगों या ख़ास मौकों के लिए अनुमति पाने वालों को दिए जाते हैं.
क़ानून के मुताबिक ऐसे परमिटधारक तय मात्रा में ही शराब ख़रीद सकते हैं और उसका सेवन कर सकते हैं.
परमिट शॉप के लिए राज्य के गृह या एक्साइज़ विभाग से मंज़ूरी लेना ज़रूरी होता है. यह कोई आम खुली शराब की दुकान नहीं होती, बल्कि एक नियंत्रित बिक्री केंद्र के रूप में काम करती है.
पोरबंदर के परमिट शॉप के मालिक क्या कहते हैं?
इस बारे में जब बीबीसी गुजराती ने शराब परमिट शॉप के मालिक विक्रमभाई ओडेदरा से बात की.
उन्होंने बताया, "हमारी जानकारी के मुताबिक पूरे ज़िले में करीब 1500 परमिटधारक हैं. ये सभी लोग अब तक जूनागढ़, जामनगर और मोरबी जैसे शहरों में जाते थे. अब उन्हें अपने परमिट के आधार पर क़ानूनी शराब लेने के लिए इतनी दूर नहीं जाना पड़ेगा, उन्हें यहीं उपलब्ध हो जाएगी."
ओडेदरा ने इस परमिट शॉप के लिए क़रीब दो साल पहले आवेदन किया था.
वह कहते हैं, "क़रीब दो साल पहले से हमने यह मंज़ूरी लेने की प्रक्रिया शुरू की थी. सबसे पहले ज़िला स्तर पर आवेदन किया था. वहां से मंज़ूरी मिलने के बाद हमने राज्य स्तर की कमिटी के सामने अपनी बात रखी. इसके बाद पूरा शुल्क भरने पर हमें यह परमिट मिला है."
ओडेदरा ने इसके लिए क़रीब 9 लाख रुपये ख़र्च किए हैं. आगे भी ओडेदरा हर तीन महीने में सरकार को 6 लाख रुपये का भुगतान करेंगे.
पोरबंदर के लोगों ने शराबबंदी को लेकर क्या कहा?
आबकारी विभाग के मुताबिक, इस समय पोरबंदर में क़रीब 1400 से 1500 परमिटधारक हैं, जिनमें विदेशी पासपोर्ट रखने वाले लोग और हेल्थ परमिटधारक भी शामिल हैं.
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने पोरबंदर एक्साइज़ विभाग के अधिकारी बालुभाई कमरटा से बातचीत की.
वह कहते हैं, "हमारे पास सिर्फ़ दो ही अर्ज़ियां आई हैं, जिनमें से एक को मंज़ूरी मिल चुकी है और दूसरी अभी कलेक्टर कार्यालय में विचाराधीन है. कोई भी आवेदन आने पर उसकी ठीक से जांच की जाती है, उसके बाद आगे की कार्रवाई होती है."
बीबीसी गुजराती ने पोरबंदर के रहने वाले लोगों से भी बात की.
निजी कंपनी में काम करने वाले विनोदभाई आहीर कहते हैं, "महात्मा गांधी की धरती पर शराब को क़ानूनी तौर पर उपलब्ध कराना एक बड़ी ग़लती है. जिस चीज़ का वह जीवन भर विरोध करते रहे, उसे उनकी जन्मभूमि पर क़ानूनी रूप से दुकानों में बेचने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए."
हालांकि दूसरी तरफ़, पोरबंदर में एक एनजीओ चलाने वाले वीनेशभाई गोस्वामी ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "महात्मा गांधी पूरे देश के राष्ट्रपिता हैं, उन्हें सिर्फ़ पोरबंदर से जोड़कर देखना सही नहीं है. वह पोरबंदर से ज़्यादा अहमदाबाद और दिल्ली में रहे. अगर उनके सम्मान में शराबबंदी लागू करनी है, तो वह हर जगह होनी चाहिए, सिर्फ़ उनके जन्मस्थान पर ही नहीं."
वह आगे कहते हैं, "पोरबंदर में इतने लोगों को परमिट को क्यों परमिट दिया गया? और अगर उन्हें परमिट दिया गया है, तो उन्हें परमिट शॉप भी मिलनी ही चाहिए."
पोरबंदर के वरिष्ठ पत्रकार परेश पारेख का मानना है, "कई लोग चाहते हैं कि शराबबंदी हटा दी जाए. ख़ास तौर पर युवा पीढ़ी यह मानती है कि शराब आसानी से मिलनी चाहिए. हालांकि दूसरी तरफ़ ऐसे भी कई लोग हैं, जो मानते हैं कि पोरबंदर महात्मा गांधी की धरती है, इसलिए यहां परमिट शॉप नहीं होनी चाहिए."
हालांकि उनका यह भी दावा है कि पोरबंदर में शराब का ग़ैरक़ानूनी कारोबार तो सालों से चलता आ रहा है.
'कम से कम पोरबंदर को तो छोड़ देना चाहिए था'
इस बारे में बीबीसी गुजराती ने गांधी विचारधारा से जुड़े कुछ लोगों से भी बातचीत की.
गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति और पूर्व ट्रस्टी सुदर्शन आयंगर कहते हैं, "कम से कम पोरबंदर को तो छोड़ देना चाहिए था. अगर इस सरकार में गांधी के लिए आदर सम्मान होता, तो पोरबंदर में यह अनुमति नहीं दी जाती. गांधी विचारधारा से जुड़े हुए बहुत से लोग हैं, पूरी दुनिया में उनका सम्मान है, पूरी दुनिया उन्हें मानती है. ऐसे में उनके जन्मस्थान को तो अलग रखा जा सकता था."
इसी तरह गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलपति अनामिक शाह कहते हैं, "जिस तरह किसी धार्मिक स्थल के आस-पास क्या बिकेगा और क्या नहीं बिकेगा, इस पर नियंत्रण रखा जाता है, उसी तरह पोरबंदर में परमिट शॉप पर नियंत्रण क्यों नहीं रखा जा सकता? और अगर पर्यटन की बात की जाए, तो ऐसे लोग नहीं होते जो गांधी के जन्मस्थान पर आकर शराब पीना चाहें."
वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश एन शाह ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "एक समय था जब राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणापत्रों में शराबबंदी को तार्किक बनाने की बात करते थे, और अब वह बात ज़मीनी स्तर पर नज़र आ रही है. हालांकि इसका नुक़सान यह है कि जिस चीज़ का गांधी विरोध करते थे, वही शराब धीरे धीरे ज़्यादा सुलभ होती जा रही है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-डॉ. संजीव खुदशाह
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के रायपुर में रामकृष्ण नामक एक निजी अस्पताल में सीवर को साफ करते समय तीन सफाई कर्मियों की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि यह तीनों सफाई कर्मचारी बिना उपकरण के सीवर में घुसे थे जहां पर जहरीली गैस रिलीज होने के कारण उनकी मौत हो गई। रायपुर में ऐसे सैकड़ो निजी अस्पताल हैं, कल कारखाने हैं, होटल, मॉल है, जहां पर हर महीने सीवर की सफाई करनी पड़ती है। इससे पहले भी अशोका बिरियानी नामक होटल में सीवर के भीतर जाने के कारण दो व्यक्तियों की मौत हो गई थी।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार 1993 से 2025 तक पूरे देश में 1313 व्यक्तियों की मौत सीवर में जाने के कारण हुई है। यह आंकड़ा गंभीर है आधुनिक युग में जब विज्ञानिक तकनीक की सारी सुविधाएं मौजूद हैं सीवर साफ करने के लिए। मशीन का आविष्कार हो चुका है। इसके बावजूद आखिर क्यों एक मनुष्य को मानव मल साफ करने के लिए सीवर में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। यह एक बहुत ही घृणित कार्य है। इसके लिए पूरी भारतीय सभ्यता को शर्मिंदा होना पड़ता है। एक ओर हम जहां चांद में कदम रख रहे हैं दूसरी ओर हमारे पास सीवर साफ करने के लिए मशीन का प्रयोग करने की इच्छा शक्ति नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि थोड़े पैसे बचाने के लिए एक गरीब मजलूम को महीने पर, दिहाड़ी पर, काम करने वाले मजदूर को हम सीवर जैसी गंदगी साफ करने के लिए टैंक के भीतर घुसने को मजबूर कर देते हैं। यह एक मानवीय अपराध तो है ही साथ-साथ संवैधानिक अपराध भी है। उसके लिए जो मजदूर को यह घृणित कार्य करने के लिए मजबूर कर रहा है।
केंद्र शासन का हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 का कानून कहता है कि किसी मनुष्य को सीवर में उतारना अपराध है और यदि मौत होती है तो नियोक्ता को सजा और पीडि़त को भारी भरकम मुआवजा देना पड़ेगा। बावजूद इसके सीवर में मौत का सिलसिला नहीं थम रहा है। बहुत सारे नियोक्ता अपने संस्थान में व्यक्तियों को मल उठाने, सीवर में घुसने और घृणित कार्य में लगाए हुए हैं।
सोच में बदलाव की जरूरत
भारत के कुछ लोगों की सोच आज भी सामंती है वह गरीब पिछड़े और दलितों से चंद पैसे के एवज में ख़तरनाक एवं घृणित काम में लगा देते हैं। उनको लगता है की इनके जान की कोई कीमत नहीं है। कानून का भी इन्हें कोई डर नहीं है तभी लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं।
करीब 20-25 वर्षों से सफाई कर्मचारियों की बीच काम करने वाले सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बैजवाड़ा विल्सन कहते हैं की ‘सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार सीवर में मौत होने पर 30 लाख रुपए मुआवजा एवं परिवार का पुनर्वास किये जाने का प्रावधान है। लेकिन करीब 50त्न लोगों को यह मुआवजा अब तक नहीं मिला है। वह कहते हैं कि मैन्युअल स्कैवेंजिंग में काम आने वाली मशीन का निर्माण भारत में नहीं होता है न ही इसे बड़ी मात्रा में एक्सपोर्ट किया जाता है। इसलिए भारत में इस तरह की मशीन की भारी कमी है। जिस नगर निगम में ऐसी 100 मशीन होनी चाहिए वहां पर दो या तीन मशीन होती है। कई नगर निगम/पंचायत के पास में ये मशीन है भी नहीं।’ वह कहते हैं कि ‘सरकार को इस मामले में पहल करना चाहिए ताकि बहुत बड़ी मात्रा में मशीनों का उत्पादन हो सके। हम चंद्रयान के लिए तो संसाधन जुटा लेते हैं लेकिन इस मामले में मौन हो जाते हैं।’
-दिलीप कुमार पाठक
इतिहास अक्सर उन लोगों को भूल जाता है जो किसी भव्य इमारत की नींव में ईंट बनकर समा जाते हैं। लेकिन जब-जब आधुनिक भारत में न्याय और बराबरी की बात होगी, ज्योतिबा फुले का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। फुले कोई पारंपरिक नेता नहीं थे, वे एक ऐसे दूरद्रष्टा शिक्षक थे जिन्होंने ब्लैकबोर्ड पर अक्षर लिखने से पहले समाज की कड़वी सच्चाइयों और गरीबों के आंसू पढऩा सीखा था। आज हम जिस आधुनिक भारत में सांस ले रहे हैं, जहाँ महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और समाज का हर वर्ग तरक्की के सपने देख रहा है, उसकी पहली मजबूत ईंट 19वीं सदी में ज्योतिबा फुले ने ही रखी थी।वह एक ऐसा दौर था जब शिक्षा पर कुछ खास लोगों का एकाधिकार था और समाज की एक बहुत बड़ी आबादी अज्ञानता के घने अंधेरे में कैद थी। ज्योतिबा ने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि किसी को गुलाम बनाने के लिए लोहे की जंजीरें जरूरी नहीं होतीं, बल्कि उसे ‘अशिक्षा’ के पिंजरे में कैद रखना ही काफी होता है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से समाज को आईना दिखाते हुए कहा था-‘शिक्षा के बिना इंसान की बुद्धि मर जाती है और बुद्धि के बिना उसका विकास और नैतिकता हमेशा के लिए रुक जाती है।’
ज्योतिबा फुले के जीवन का सबसे साहसी अध्याय उनकी जीवनसंगिनी सावित्रीबाई फुले के साथ जुड़ा है। उन्होंने किसी बड़े मंच से केवल भाषण देने के बजाय, बदलाव की शुरुआत अपने घर से की। उस कट्टर समाज की कल्पना कीजिए, जहाँ औरतों का पढऩा एक महापाप माना जाता था, वहाँ ज्योतिबा अपनी पत्नी के हाथ में कलम और किताब थमा रहे थे। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने निकलती थीं और उन पर गोबर और कीचड़ फेंका जाता था, तो ज्योतिबा एक चट्टान की तरह उनके पीछे खड़े रहते थे। यह उन दोनों का अटूट साहस और जिद ही थी, जिसने 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत के पहले स्कूल का रास्ता खोला और सदियों पुराने बंद दरवाजे हमेशा के लिए तोड़ दिए। फुले के सुधार केवल स्कूलों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहे।
पश्चिम बंगाल में इस महीने होने वाले विधानसभा चुनाव किसी के लिए सत्ता में बने रहने की लड़ाई है तो किसी के लिए कुर्सी हथियाने की और किसी के लिए अपने अस्तित्व की रक्षा की.
इस बात पर अनुमान लगाए जा रहे हैं कि इसमें कौन जीतेगा और कौन विपक्ष की भूमिका में रहेगा. राजनीति पर बहस करने वाले अक़सर कहते हैं कि चुनावी गणित हमेशा सीधा नहीं होता.
इसकी वजह यह है कि चुनाव कभी मुद्दों पर होते हैं और कभी नतीजा उम्मीदवारों पर निर्भर होता है. इसमें कई बार एकदम अलग समीकरण काम करते हैं.
पश्चिम बंगाल चुनाव के इस समीकरण में कई राजनेता अहम भूमिका निभा रहे हैं. इनमें से कोई चुनाव लड़ रहा है तो कोई दूसरों के समर्थन में प्रचार कर रहा है. कई लोग बंगाल के रहने वाले नहीं हैं- लेकिन ये लोग किसी न किसी तरीके से इस चुनाव के अहम किरदार के तौर पर उभरे हैं.
ये लोग कौन हैं और कौन सी बात उनके पक्ष या विरोध में जा सकती है, इस रिपोर्ट में इसी का ज़िक़्र किया गया है.
ममता बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी अपने चुनाव अभियान के दौरान अक़सर कहती हैं कि राज्य की सभी 294 सीटों पर वही उम्मीदवार हैं. उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी उनको एकमात्र और अद्वितीय नेता बताते हैं.
संसदीय लोकतंत्र में ममता बनर्जी चार दशक से भी लंबे समय से सक्रिय हैं. उन्होंने वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर वाममोर्चा के 34 साल लंबे शासन का अंत किया था. राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद बीते 15 साल से वह लगातार सत्ता में हैं.
बीते कुछ साल के दौरान उनकी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगते रहे हैं. राज्य में विभिन्न मुद्दों पर आम लोगों की नाराज़गी भी सामने आती रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का एक गुट मानता है कि इन तमाम मुद्दों को ध्यान में रखते हुए यह चुनावी लड़ाई उनकी पार्टी के लिए आसान नहीं होगी.
क्यों बढ़त हासिल है
ममता बनर्जी लंबे समय से आम लोगों के बीच मुख्यमंत्री के बजाय दीदी के तौर पर अपनी पहचान बनाने का प्रयास करती रही हैं. महिला मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल, जनसंपर्क औऱ लड़ाकू नेता की छवि ने आम लोगों में उनकी अलग पहचान बनाई है. वह बार-बार कहती रही हैं कि तृणमूल कांग्रेस संगठन की नींव मज़बूत करने के लिए वह कड़े फैसले लेने से भी नहीं हिचकेंगी.
उनकी पार्टी भाजपा के ख़िलाफ़ लगातार मुखर रही है. ममता बंगाल के प्रति केंद्र की उपेक्षा के मुद्दे पर सक्रिय रही हैं. इसके साथ ही वह लगातार आरोप लगाती रही हैं कि देश के विभिन्न राज्यों में बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी करार दिया जा रहा है.
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के सवाल पर भाजपा पर आरोप लगाने के साथ ही इस मुद्दे पर राज्य के लोगों के हित में दलील देने के लिए वह वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में बहस कर चुकी हैं. तृणमूल कांग्रेस ममता की इस तारणहार वाली भूमिका का भी बड़े पैमाने पर प्रचार कर रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, स्वास्थ्य साथी और हाल में शुरू की गई युवा साथी जैसी योजनाएं इस महीने होने वाले चुनाव पर असर डाल सकती हैं.
कई लोग मानते हैं कि बीते कई चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जीत में महिला और मुसलमान वोटरों की उल्लेखनीय भूमिका रही है. यह दोनों तबके इस चुनाव में भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.
इन वजहों से दिक्कत हो सकती है
तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और जबरन चंदा उगाही जैसे कई आरोप लगे हैं. शिक्षा और नगर निगम में होने वाली बहालियों में भ्रष्टाचार के अलावा राशन घोटाले जैसे मामले सामने आए हैं. इन मामलों में पार्टी के कई बड़े नेता और मंत्री जेल भी जा चुके हैं.
दूसरी ओर, कोलकाता, दुर्गापुर और सिलीगुड़ी समेत राज्य के विभिन्न इलाक़ों में महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं पर राज्य में बड़े पैमाने पर आक्रोश का माहौल रहा है. कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या की घटना की जांच में अपनी भूमिका और राज्य में महिला सुरक्षा के सवाल पर राज्य सरकार कटघरे में खड़ी रही है.
कई लोग मानते हैं कि ये मुद्दे सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ जा सकते हैं. भ्रष्टाचार के अभियुक्त नेताओं को पार्टी में शामिल करने और उनको टिकट देने के मुद्दे पर विपक्ष तृणमूल के ख़िलाफ़ हमलावर रहा है.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी
पश्चिम बंगाल पर लंबे समय से भाजपा की निगाहें टिकी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चुनाव के पहले से ही बंगाल का दौरा करते रहे हैं.
इस महीने के विधानसभा चुनाव से पहले भी तस्वीर ऐसी ही नज़र आ रही है. बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल का सवाल हो या फिर वोटरों का दिल जीतने के लिए बंगाली अस्मिता के समर्थन का, पार्टी बार-बार आम लोगों को यह समझाने का प्रयास करती रही है कि बंगाल उसके लिए बेहद अहम है.
बढ़त कहां है
भाजपा प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी की छवि को सामने रख कर चुनाव लड़ना चाहती है. यह एक बड़ा फैक्टर हो सकता है. दूसरी ओर, अमित शाह को भाजपा का मुख्य चुनावी रणनीतिकार माना जाता है.
यह दोनों नेता अपनी जनसभा और चुनावी रैलियों में केंद्र सरकार की विकास योजनाओं का ब्योरा देने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस पर केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के आम लोगों तक न पहुंचने देने के भी आरोप लगा रहे हैं.
भाजपा इसके साथ ही सीमा पार से घुसपैठ, भ्रष्टाचार और चंदा उगाही के आरोपों पर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधती रही है. इस चुनाव में भी पार्टी ने इसे ही अपना हथियार बनाया है.
आरोप और आलोचना
बीते कुछ वर्षों में बंगाल में भाजपा की नींव मज़बूत हुई है. लेकिन इसके बावजूद यह देखना ज़रूरी है कि नरेंद्र मोदी को सामने रखकर बंगाल में चुनाव जीतना पार्टी के लिए कितना आसान होगा.
दूसरी ओर, एसआईआर और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम कटने के मुद्दे पर उसकी आलोचना हो रही है.
तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दल बंगालियों की सांस्कृतिक विरासत और मानसिकता के साथ भाजपा के मतभेदों के लिए उसकी आलोचना करती रही हैं. वह भाजपा के ख़िलाफ़ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के भी आरोप लगाती रही है.
अभिषेक बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी दक्षिण 24-परगना जिले की डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से सांसद हैं. वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. लेकिन इससे उनका महत्व ज़रा भी कम नहीं होता.
तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि पार्टी की रणनीति, पैसों और चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों से लेकर पार्टी संगठन मज़बूत करने तक हर काम में उनकी अहम भूमिका है.
फ़ायदा
पार्टी के पुराने नेताओं की भीड़ में अभिषेक बनर्जी एक ऐसा युवा चेहरा हैं जो पहले ही संसदीय राजनीति में कामयाबी हासिल कर चुके हैं. उन्होंने पार्टी की नींव मज़बूत करने पर ख़ास ध्यान दिया है.
उनकी 'ब्वॉय नेक्स्ट डोर' वाली छवि ने जनसंपर्क में मदद की है. वह आम लोगों के बीच पार्टी की एक स्मार्ट औऱ साफ-सुथरी चमकती छवि पेश करने में भी कामयाब रहे हैं.
कई लोग उनको भविष्य का नेता मानते हैं.
नुक़सान
विपक्ष ने अभिषेक के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और आर्थिक गड़बड़ियों का आरोप लगाया है. इसके अलावा कांग्रेस की तरह ही तृणमूल कांग्रेस पर भी 'परिवारवाद' के आरोप लग रहे हैं.
कुछ विश्लेशकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ लगे आरोपों से पार्टी की छवि पर असर पड़ सकता है.
शुभेंदु अधिकारी
कभी ममता बनर्जी के नज़दीकी रहे और अब भाजपा के महत्वपूर्ण नेता शुभेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता के तौर पर सक्रिय भूमिका में रहे हैं. भाजपा उनके सहारे नंदीग्राम जीतना चाहती है. वह उनका ही इलाक़ा है. इसके साथ ही ममता बनर्जी को सीधी चुनौती देते हुए इस बार कोलकाता की भवानीपुर सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं.
बढ़त होने की वजह
शुभेंदु ने वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराया था.
बीते कुछ साल के दौरान विपक्ष के ताकतवर नेता के तौर भाजपा की ओर से वह सरकार के ख़िलाफ़ काफ़ी मुखर रहे हैं. पूर्व मेदिनीपुर और आसपास के इलाकों में उनका ख़ासा असर है.
आरोप
विपक्षी नेता उनके ख़िलाफ़ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के आरोप लगा रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे का जमकर प्रचार कर रही है.
एसआईआर की पूरक सूची में नंदीग्राम से जिन वोटरों के नाम कटे हैं उनमें से ज़्यादातर मुसलमान हैं. यह मुद्दा राज्य में भाजपा के लिए परेशानी की वजह भी बन सकता है.
हुमायूं कबीर
चुनावी समीकरणों के लिहाज से वह भले केंद्रीय किरदार नहीं हों, सबकी निगाहें हुमायूं कबीर पर टिकी हैं.
कबीर को किसी दौर में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी का करीबी माना जाता था. लेकिन कांग्रेस के बाद वह पहले भाजपा और फिर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे. यानी वह कभी न कभी तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों में रह चुके हैं.
चुनाव से पहले उन्होंने 'आम जनता उन्नयन पार्टी' नाम के नए राजनीतिक दल का गठन किया है. विधानसभा चुनाव से पहले बाबरी मस्जिद की नकल पर मुर्शिदाबाद में मस्जिद बनाने के फैसले और उसके शिलान्यास के ज़रिये उन्होंने राजनीतिक हलके में हलचल मचा दी थी.
इस चुनाव में उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के साथ सीटों पर समझौता किया था. हालांकि शुक्रवार, 10 अप्रैल को ओवैसी की पार्टी ने इस गठबंधन से बाहर निकलने का फ़ैसला किया.
प्रभाव
कबीर फ़िलहाल मुर्शिदाबाद जिले के नौदा और रेजिनगर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. उस इलाके में उनका ख़ासा असर है. माना जा रहा है कि चुनाव में इस इलाके के मुसलमान अहम भूमिका निभा सकते हैं. उनकी पार्टी कुल 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इसमें नंदीग्राम और भवानीपुर सीटें भी शामिल हैं.
आलोचना
कई बार दल बदलने और विवास्पाद बयानों के कारण उनकी आलोचना होती रही है. भाजपा और तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि मुसलमान वोटों में सेंध लगा कर वह दूसरे दलों को फ़ायदा पहुंचाने का प्रयास करेंगे.
विशेषज्ञों का क्या कहना है
इन राजनेताओं और विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका के बारे में एक सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक के तौर पर ममता बनर्जी की काफ़ी अहमियत है. दूसरी ओर, मोदी और शाह भाजपा के कर्ता-धर्ता हैं. इस राज्य में मोदी और शाह के अलावा भाजपा के पास कोई अलग चेहरा नहीं है. नरेंद्र मोदी के नाम पर प्रचार होता है और अमित शाह प्रचार करवाते हैं. भाजपा पश्चिम बंगाल पर कब्ज़े के लिए बेताब है."
शुभेंदु अधिकारी के बारे में उनका कहना था, "वह खुद भाजपा के उत्पाद नहीं हैं. उल्टे भाजपा ने उनका अधिग्रहण किया है. उनकी एकमात्र योग्यता यह है कि उन्होंने पिछली बार नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराया था."
शिखा मुखर्जी के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी ममता के बाद पार्टी में नंबर दो हैं. उन्होंने ज़मीन पर काफ़ी काम किया है. इसके साथ ही संगठन को मज़बूत करने के साथ ही रैलियां भी आयोजित की हैं.
लेकिन वह हुमायूं कबीर को ज़्यादा महत्व देने के लए तैयार नहीं हैं. शिखा कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि हुमायूं कबीर को इतनी अहमियत दी जानी चाहिए. वह कुछ दिन पहले भाजपा में थे उसके बाद तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और अब अपनी अलग पार्टी बना ली है. कल वह कहां होंगे, यह कहना मुश्किल है."
राजनीतिक विश्लेषक उज्ज्वल राय नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर कहते हैं, "ये दोनों जब भी किसी चुनाव में जाते हैं तो उसका महत्व बढ़ जाता है. यह दोनों पहले भी बंगाल के दौरे पर आए थे. लेकिन चुनाव पर कोई असर नहीं डाल सके थे. इस बार भाजपा एसआईआर के मुद्दे पर काफ़ी उत्साहित है और वह इस बार चुनाव में कामयाबी हासिल करना चाहती है."
उनका कहना था, "ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त हैं और उनकी छवि लड़ाकू नेता की है. उनके साथ अभिषेक बनर्जी भी हैं. विपक्षी दल आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी की नाकामियों को ही अपना चुनावी मुद्दा बनाते हैं."
राय कहते हैं, "यह याद रखना होगा कि ममता का सबसे बड़ा करिश्मा राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेता के तौर पर है. वह एसआईआर को राजनीतिक तौर पर इतना बड़ा मुद्दा बना रही हैं कि भाजपा को इस पर जवाब देना पड़ रहा है. दिलचस्प बात यह है कि एक सत्तारूढ़ पार्टी दूसरी सत्तारूढ़ पार्टी से सवाल कर रही है."
उनका कहना था कि एसआईआर का मुद्दा फिलहाल बाकी तमाम मुद्दों पर भारी पड़ रहा है.
वह कहते हैं, "रोटी, कपड़ा और मकान जैसे लोगों की मौलिक ज़रूरतें अब पृष्ठभूमि में चली गई हैं. अब एसआईआर पर ही सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है."
राय का कहना था, "तृणमूल कांग्रेस लोगों को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि एसआईआर की आड़ में अल्पसंख्यकों के नाम सूची से काटे जा रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा समझाना चाहती है कि अवैध वोटरों के नाम ही सूची से कटे हैं और इनमें से ज़्यादातर तृणमूल कांग्रेस का वोट बैंक थे. दोनों पार्टियां आक्रामक रणनीति के सहारे आगे बढ़ रही हैं."
वह शुभेंदु अधिकारी की भी अहमियत बताते हैं, "शुभेंदु अधिकारी की ख़ासियत यह है कि उनका चुनाव क्षेत्र नंदीग्राम है और वह एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने मुख्यमंत्री को हराया है. इस बार वह नंदीग्राम के अलावा भवानीपुर से भी चुनाव लड़ रहे हैं."
राय के मुताबिक, शुभेंदु के ऐसा करने के दो कारण हैं. पहला यह कि वह यह संदेश देना चाहते हैं कि नंदीग्राम में ममता को हराने के बाद अब वह उनको उनके घर भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं.
दूसरा यह कि वह मुख्यमंत्री की चुनावी रणनीति में सेंध लगाते हुए उनके वोट तंत्र को ढहाने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी सोच यह है कि इससे ममता को भवानीपुर में ज़्यादा समय देना पड़ेगा और वह राज्य के दूसरे हिस्सों में ज़्यादा प्रचार करने का समय नहीं निकाल सकेंगी. इससे भाजपा को सहूलियत होगी.
राय की निगाह में हुमायूं कबीर बेहद दिलचस्प भूमिका में हैं.
वह कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस को मुसलमानों के ज़्यादा वोट मिलते हैं. इसलिए हुमायूं कबीर अहम हो गए हैं. उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई है. वह यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनकी पार्टी ही मुसलमानों की एकमात्र हितैषी है और तृणमूल कांग्रेस अब तक महज़ वोट बैंक के तौर पर उनका इस्तेमाल करती रही है. वह बाबरी मस्जिद की तर्ज पर मस्जिद भी बना रहे हैं."
राय का कहना था, "दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस उन पर मुस्लिम वोटों में सेंध लगा कर भाजपा को फायदा पहुंचाने के आरोप लगा रही है. लेकिन दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि वह दरअसल दूसरे तरीके से ममता बनर्जी की ही मदद कर रहे हैं. इससे खेल दिलचस्प हो गया है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
दिल्ली स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ सालों से छात्र संगठनों की गतिविधियां सीमित करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं. जेएनयू और जेएमआई के बाद अब डीयू प्रशासन ने भी नए दिशानिर्देश जारी किए हैं.
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना की रिपोर्ट -
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) उच्च शैक्षिक संस्थान होने के साथ ही बहस, असहमति और राजनीतिक चेतना का मंच रहा है. आर्ट्स फैकल्टी, चाय की दुकानों के कोने और पोस्टरों से भरी दीवारें इसकी पहचान है. यहां छात्र राजनीति से अरुण जेटली, अलका लांबा, रेखा गुप्ता, विजय गोयल और अजय माकन जैसे कई बड़े नेता निकले. वही विश्वविद्यालय परिसर अब बदल रहा है.
फरवरी में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई नियमावली के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के दौरान यूट्यूबर रुचि तिवारी के साथ कथित तौर पर बदसलूकी हुई. इसके बाद डीयू प्रशासन ने छात्र सभाओं पर प्रतिबंध की घोषणा की. दिल्ली हाई कोर्ट ने आपत्ति जताई, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने पुराने फैसले में बदलाव किया.
23 मार्च को डीयू ने एक नोटिफिकेशन जारी कर नए दिशानिर्देश बताए. इसके मुताबिक कैंपस में किसी भी तरह का प्रोटेस्ट, सभा, मार्च, रैली या कार्यक्रम के लिए 72 घंटे पहले अनुमति लेना जरूरी है. इसके लिए आयोजकों को स्थानीय पुलिस और प्रॉक्टर को लिखित आवेदन देना होगा.
बिना अनुमति किसी भी आयोजन पर निलंबन या अन्य कार्रवाई हो सकती है. साथ ही, बाहरी लोगों के शामिल होने पर भी रोक लगाई गई है. छात्र संगठन इस नोटिफिकेशन को कैंपस की लोकतांत्रिक संस्कृति पर सीधा प्रहार बता रहे हैं.
कोविड के बाद से बदलने लगा 'प्रोटेस्ट कल्चर'
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के संयुक्त सचिव अमन, दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से पीएचडी कर रहे हैं. नए नियमों को वह एक पैटर्न का हिस्सा मानते हैं. अमन बताते हैं कि पहले, प्रदर्शन करने से पूर्व वह केवल मौरिस नगर पुलिस स्टेशन को सूचित करते थे. उनके मुताबिक कई ऐसे उदाहरण हैं जहां प्रदर्शन बीच में रोका गया, छात्रों पर हमले हुए और खासकर छात्र संघ चुनावों के दौरान हिंसा होती रही है.
नए नोटिफिकेशन के अनुसार अब सूचना देने की बजाय अनुमति लेनी पड़ेगी. अमन का आरोप है कि कोविड महामारी के बाद कॉलेज खुलने के साथ ही प्रशासन की सख्ती बढ़ गई. विरोध करने वाले छात्रों को निलंबित या निष्कासित किया जाने लगा है. वह कहते हैं, "छात्रों में डर बिठाया जा रहा है. कंपलसरी अटेंडेंस, एक्सट्रा क्लासेज और लंबे लेक्चर्स के माध्यम से छात्रों को जानबूझकर कक्षाओं में व्यस्त रखा जाता है, ताकि वे प्रदर्शन में शामिल होने न जाएं."
'पाबंदियां सभी के लिए समान नहीं हैं'
इस साल 12 फरवरी को इतिहासकार एस. इरफान हबीब पर नॉर्थ कैंपस स्थित आर्ट्स फैकल्टी के बाहर हमला हुआ. यह कार्यक्रम ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) ने आयोजित किया था. आईसा (डीयू) अध्यक्ष सावी ने डीडब्ल्यू से बातचीत में पक्षपात का आरोप लगाया, "हम देख रहे हैं कि ये पाबंदियां सभी के लिए समान नहीं हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को लगभग हर आयोजन के लिए अनुमति मिल जाती है. कल ही मैंने एक पोस्टर देखा, जिसमें वे नॉर्थ कैंपस के गर्ल्स हॉस्टल में आरएसएस का कार्यक्रम आयोजित कर रहा है. कुलपति (वीसी) मुख्य अतिथि हैं. हमें अक्सर साधारण स्टडी सर्कल करने की भी इजाजत नहीं मिलती. यह सत्ता का दुरुपयोग है."
सावी आगे बताती हैं, "पहले हम आर्ट्स फैकल्टी में स्वामी विवेकानंद स्टैचू के सामने प्रदर्शन करते थे. कोविड के बाद यह जगह सीमित कर दी गई. अब केवल गेट नंबर 4 पर ही प्रदर्शन की अनुमति है. जबकि आरएसएस आर्ट्स फैकल्टी के अंदर शाखा लगाता है. हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि अगर एक विचारधारा को अपनी बात रखने की आजादी दी जा रही है, तो हमें भी वही अधिकार मिलना चाहिए."
भगत सिंह की विचारधारा से प्रेरित 'दिशा छात्र संगठन' डीयू में सक्रिय रूप से काम कर रहा है. नए नोटिफिकेशन के बावजूद 27 मार्च को उन्होंने 'शहीद दिवस' के अवसर पर एक सभा बुलाई, जिसे पुलिस ने बीच में रोक दिया. संगठन का आरोप है कि संबंधित नोटिफिकेशन इसलिए लाया गया ताकि छात्र, प्रशासन के खिलाफ आवाज न उठा सकें, फिर चाहे प्रशासन कोई भी गलत काम क्यों न कर रहा हो.
'दिशा छात्र संगठन' के सदस्य योगेश मीणा लॉ फैकल्टी में पढ़ाई करते हैं. वह कहते हैं, "दूसरी ओर प्रशासन फीस में बढोतरी जैसे किसी भी फैसले पर छात्रों से कोई राय नहीं लेता. फैसला सीधे उनके ऊपर थोप दिया जाता है. हमें अपने ही कैंपस में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए."
अनुशासन बनाए रखना जरुरी
वैचारिक रूप से आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन 'एबीवीपी' के दिल्ली राज्य सचिव सार्थक शर्मा ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि उनका संगठन डीयू प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ है और छात्रों के साथ खड़ा है.
वहीं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के छात्र संगठन 'एनएसयूआई' के सदस्य और पूर्व डूसू अध्यक्ष रौनक खत्री कहते हैं, "शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को सीमित करने वाला कोई भी कदम खतरनाक है. लेकिन, कैंपस में व्यवस्था बनाए रखना भी आवश्यक है. इसलिए एक संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत है, जो अनुशासन और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता दोनों को बनाए रखे."
डीयू के प्रॉक्टर मनोज कुमार सिंह का तर्क है कि वे विरोध प्रदर्शन नहीं रोक रहे हैं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित किया जा रहा है. वर्तमान में डूसू की संयुक्त सचिव दीपिका झा ने डीडब्ल्यू से कहा, "हम इस फैसले में डीयू प्रशासन के साथ हैं, क्योंकि कैंपस में सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है."
-अनिल माहेश्वरी
उद्योगपति मुकेश अंबानी के बेटे की शादी के बाद, मीडिया मुगल रजत शर्मा के बेटे की शादी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर खूब सुर्खियाँ बटोरीं। इस समारोह में भारतीय समाज के नामी-गिरामी लोग शामिल थे।
लगभग 18 वर्ष पहले, टाइम्स ऑफ इंडिया से जुड़े मीडिया उद्योगपति समीर जैन की बेटी त्रिशला ने अपने प्रेमी सत्येन गजनानी से अजमेर में विवाह किया था। लडक़ा-लडक़ी की इच्छा के अनुसार इस शादी में केवल 50 लोग शामिल हुए। यह शादी इतनी सादगीपूर्ण थी कि इसमें भारत के राष्ट्रपति भी शामिल हो सकते थे, फिर भी इसका मीडिया में कोई उल्लेख नहीं हुआ। कहीं कोई तस्वीर नहीं। आज गूगल पर खोजने पर भी इस विवाह का कोई जिक्र नहीं मिलता। निमंत्रण कार्ड की जगह समीर जैन ने ‘स्पीकिंग ट्री’ कॉलम के लेखों से युक्त एक पुस्तक भेजी थी।
नवभारत टाइम्स के संपादक एस.पी. सिंह की शादी में पाँच मुख्यमंत्रियों तक ने भाग लिया था। राज्य संवाददाताओं को वीआईपी मेहमानों को अशोका होटल में आयोजित इस विवाह समारोह तक लाने की जिम्मेदारी दी गई थी। आनंद स्वरूप वर्मा ने इस पर ‘मैरेज ऑफ एन एडिटर’ शीर्षक से विस्तृत लेख लिखा था।
बिरला परिवार परंपरागत तरीकों का पालन करता रहा है। ‘तुम्हें बहुत अधिक स्वतंत्रता नहीं मिलेगी,’ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उस संकोची युवती से कहा, जो अपने भावी पति के साथ उनसे मिलने आई थी। यह 1941 की सर्दियों का समय था और वे महाराष्ट्र के वर्धा के पास सेवाग्राम में थे। युवा जोड़े ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक समाप्त होने तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की और फिर बापू से आशीर्वाद लेने पहुँचे। बापू ने पूछा, ‘क्या तुम दोनों आपस में तालमेल बैठा पाओगे? क्यों न थोड़ा समय लेकर फिर से विचार करो?’ लेकिन लडक़ी अपने निर्णय पर अडिग थी, और लडक़ा भी।
मार्च 1942 में, पारंपरिक मारवाड़ी परिवार में पले-बढ़े किसी जोड़े का इस तरह, वह भी लडक़े के पिता की अनुपस्थिति में, सगाई करना असामान्य था। लेकिन बी.के. बिरला और सरला बिरला के साथ यही हुआ। देश के हृदय में स्थित एक सादे घर में, बापू, कस्तूरबा गांधी, सरदार पटेल और विशेष रूप से जमनालाल बजाज की उपस्थिति में, जिन्होंने इस जोड़े को मिलाया था। गांधीजी की सावधानी का कारण यह था कि सरला बिरला के पिता और कांग्रेस नेता ब्रिजलाल बियानी प्रगतिशील विचारों के थे और उन्होंने अपनी बेटी को पुणे के फग्र्यूसन कॉलेज भेजा था, जबकि उस समय मारवाड़ी परिवारों की महिलाओं के लिए पढ़ाई वर्जित मानी जाती थी।
फरवरी 2025 में, अरबपति शादियों की परंपरा से हटते हुए, अडानी समूह के अध्यक्ष और दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक गौतम अडानी ने सादगी को अपनाया। उनके बेटे जीत अडानी ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया, और इस अवसर पर सामाजिक कार्यों के लिए 10,000 करोड़ का योगदान दिया गया।
-संदीप राय
ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल जंग में दो हफ़्ते के युद्धविराम का भारत ने स्वागत किया है। लेकिन उसने पाकिस्तान का नाम लेने या उसके प्रयासों का जि़क्र करने से परहेज किया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया, ‘हम युद्धविराम के फैसले का स्वागत करते हैं। हमें उम्मीद है कि इससे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी। जैसा कि हम पहले भी कहते रहे हैं कि मौजूदा जंग को समाप्त करने के लिए युद्धविराम, संवाद और कूटनीति ज़रूरी है।’
विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि जंग ने पहले ही काफी तबाही मचा दी है, ‘इसने वैश्विक तेल और ऊर्जा सप्लाई और व्यापार प्रणाली को बाधित कर दिया है। हम आशा करते हैं कि कमर्शियल और तेल के जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजऱ सकेंगे।’
ब्रिटेन और यूरोपीय संघ समेत, जहाँ एक ओर दुनिया भर से कई नेता पाकिस्तान के मध्यस्थता प्रयासों की सराहना कर रहे हैं, वहीं भारत के विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत को लेकर भी चुप्पी साधे रखी।
पाकिस्तान की प्रशंसा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस युद्धविराम के लिए पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना हो रही है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम की घोषणा करते हुए पाकिस्तान का जिक्र किया।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने यह निर्णय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ़ और सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अनुरोध पर लिया है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने भी पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना की।
उन्होंने अपने बयान में कहा, ‘ईरान की ओर से, मैं अपने मित्र देश पाकिस्तान, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर के प्रति क्षेत्र में जंग ख़त्म करने के लिए, उनके अथक प्रयासों की तारीफ़ करता हूँ।’
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने संघर्ष को कम करने में पाकिस्तान सहित मध्यस्थों की भूमिका की भी सराहना की ।
उन्होंने लिखा, ‘हम तनाव कम करने के प्रयासों के लिए पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब सहित सभी वार्ताकारों के प्रयासों का आभार व्यक्त करते हैं और उनका समर्थन करते हैं।’ यूरोपीय यूनियन कमिशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेन ने मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान को धन्यवाद दिया है।
विदेश नीति पर सवाल
विपक्षी पार्टियों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान के ‘बढ़ते कद’ को लेकर भारतीय विदेश नीति पर सवाल खड़े किए हैं।
विपक्षी कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने युद्धविराम पर अपनी पार्टी की प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘पाकिस्तान ने जो किया है, वही भारत को करना चाहिए था। लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी इसराइल को ‘फादरलैंड’ कहते हैं, तो वे युद्धविराम की चर्चा कैसे कर सकते हैं?’
प्रमुख विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने पीएम मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, ‘पाकिस्तान ने जो भूमिका निभाई और सीजफ़ायर करवाया, उससे मोदी जी की पर्सनल स्टाइल वाली डिप्लोमेसी को बड़ा झटका लगा है।’
‘28 फऱवरी ईरान के शासन के शीर्ष नेतृत्व की टारगेटेड किलिंग के साथ शुरू हुआ था। ये घटनाएँ प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित इसराइल यात्रा पूरी होने के ठीक दो दिन बाद शुरू हुई थीं। इस यात्रा ने भारत की वैश्विक साख और प्रतिष्ठा को कम किया।’
उन्होंने लिखा, ‘विदेश मंत्री ने पाकिस्तान को दलाल कहकर खारिज किया था। लेकिन अब स्वयंभू विश्वगुरु पूरी तरह एक्सपोज़ हो चुके हैं उनका स्वयं घोषित 56 इंच का सीना सिमटकर रह गया है।’
कांग्रेस ने एक बयान जारी कर कहा, ‘बीजेपी सरकार की ग़लतियों के कारण पाकिस्तान को युद्धरत पक्षों के बीच मध्यस्थता में भूमिका निभाने का मौका मिला, जबकि भारत एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में बेहतर स्थिति में था।’
लेकिन शिवसेना-यूबीटी की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने एक्स पर लिखा, ‘भारत को अमेरिका और ईरान के बीच किसी बातचीत की मेज़ पर क्यों होना चाहिए था? आलोचना समझ नहीं आती, क्योंकि यह हमारी लड़ाई नहीं थी। पाकिस्तान के लिए यह ऐसा है जैसे कोई कछुआ जो पैसे लेकर कहे कि वह संकट सुलझा देगा, जैसा कि भारत के विदेश मंत्री ने सर्वदलीय बैठक में अच्छे तरीके से बताया।’
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने एक्स पर लिखा, ‘युद्धविराम से होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खुल गया, वही होर्मुज़ स्ट्रेट जो युद्ध शुरू होने से पहले सबके लिए खुला और आसानी से इस्तेमाल करने लायक था। तो आखिर इस 39 दिन के युद्ध से अमेरिका ने क्या हासिल किया?’
पाकिस्तान: मध्यस्थ या संदेश वाहक?
ईरान जंग में पाकिस्तान को क्या डिप्लोमेसी में भारत की तुलना में बढ़त मिली है?
इसे लेकर विपक्षी दलों में तो आम राय है लेकिन विश्लेषकों और पत्रकारों की राय मिली-जुली है। अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष पंत इसे ‘शार्ट टर्म कूटनीति’ कहते हैं।
-डॉ. संजीव खुदशाह
यदि किसी आदिवासी व्यक्ति को जंगली कहकर जलील करना हो या किसी दलित को घोड़ी पर चढऩे नहीं देना हो या मटका छूने पर जान से मारना हो, इंटरव्यू में नंबर काटना हो या किसी भी प्रकार का भेदभाव करना हो, तो जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन जब लाभ देना हो तो इसके लिए जाति प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए जाति प्रमाण पत्र हासिल करना आज के दिन में एक टेढ़ी खीर हो गई है। 1950 के बंदोबस्त का अभिलेख या स्कूल का रिकॉर्ड मांगा जाता है। जिसमें जाति का उल्लेख हो। अनुसूचित जाति जनजाति के ऐसे सदस्य जिनके पूर्वजों के पास में जमीन जायदाद थी अथवा शिक्षित थे। उनका तो जाति प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। लेकिन जिनके पूर्वजों के पास जमीन जायदाद नहीं थी, अशिक्षित, गरीबी के हाल में थे, शोषण के शिकार थे। तो उनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है क्योंकि उनके पास 1950 का दस्तावेज नहीं होता है। छत्तीसगढ़ में 13 फीसदी अनुसूचित जाति एवं 30 फीसदी अनुसूचित जनजाति की आबादी है। जाति प्रमाण पत्र पर काम करने वाले संतोष बोरकर जी कहते है कि एक अनुमान के मुताबिक लगभग आधी आबादी का जाति प्रमाण पत्र 1950 के दस्तावेज नहीं होने के कारण नहीं बन पाता है। इसके पीछे उनकी गरीबी, लाचारी, पूर्वजों की नासमझी भी कहीं जा सकती है। लेकिन यह आज भी वैसे ही भेदभाव के शिकार हो रहे हैं जैसे की और लोग होते हैं। इनकी कुल संख्या में वे लोग शामिल हैं जिनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है। यानी जनगणना में गणना, उनकी तो उस जाति के तौर पर हो रही है। इस गणना के हिसाब से योजनाएं बनाई जा रही है,आरक्षण दिए जा रहे हैं, लेकिन जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाने के कारण वे सब, सरकारी योजनाओं से वंचित है। इस कारण एक बड़े तबके में असंतोष व्याप्त है।
छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्र बनाने की समस्या को लेकर बरसों से मांग की जाती रही है और इसके लिए ज्ञापन पत्र व्यवहार आदि किया जाता रहा है। ऐसे ही पत्र व्यवहार के परिणाम स्वरूप केंद्र शासन ने व्यवहारिक परेशानी से सहमत होते हुए 10 जून 1925 को एक आदेश जारी किया। जिसमें यह स्पष्ट किया गया की जाति प्रमाण पत्र बनाने हेतु अभिलेख प्रस्तुत करने का नया कट ऑफ डेट 25 अगस्त 2000 होगा. यह नया कट ऑफ डेट ओबीसी के लिए भी मान्य होगा जो पहले 1984 था। यह आदेश शासन की वेबसाईट में उपल्बध है। इसको लेकर छत्तीसगढ़ में हलचल है। छ.ग. जाति प्रमाण पत्र समस्या एवं समाधान संयुक्त संघर्ष समिति के सचिव श्री संतोष बोरकर बताते है कि मुख्य सचिव ने अपने सभी कलेक्टरों को निर्देश पालन करने का पत्र जारी किया है लेकिन फिलहाल यह जमीनी स्तर पर लागू होते हुए नहीं दिख रहा है। इसका कारण है 2013 में शासन द्वारा जारी किए गए नियम। इस नियम में 1950 का दस्तावेज मांगा जाता है और यह नियम अभी भी लागू है। छ.ग. जाति प्रमाण पत्र समस्या एवं समाधान संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा सरकार से यह मांग की गई है कि 10 जून 2025 के आदेश के अनुसार इस नियम में भी परिवर्तन किया जाए और संबंधित जिम्मेदार पीठासीन अधिकारी को आदेशित किया जाए। तब कहीं जाकर इस आदेश को जमीन स्तर पर लागू किया जा सकेगा। गौरतलब है कि उत्तराखंड में इस आदेश को लागू कर दिया है। पीडि़त लोग अपने-अपने स्तर पर नेता, मंत्री, जनप्रतिनिधि एवं अफसरों से भेंट कर रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि यथाशीघ्र यह आदेश लागू किया जाए। ताकि जनता में असंतोष कम हो और राहत मिल सके।
हंगरी के पीएम ओरबान सबसे मुश्किल चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी हार के आसार हैं. ट्रंप ओरबान को जिताने की कोशिश कर रहे हैं. इसी क्रम में जेडी वैंस हंगरी पहुंचे, ओरबान को अगला पीएम बताया. क्या यूएस हंगरी चुनाव में दखल दे रहा है?
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा का लिखा-
हंगरी के नागरिक 12 अप्रैल को संसदीय चुनाव के लिए मतदान करेंगे. साल 2010 से सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान लगातार पांचवां कार्यकाल पाने के लिए मुकाबले में हैं. चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में विपक्षी नेता पीटर माग्यार के नेतृत्व में तिसा पार्टी जीतती नजर आ रही है.
हंगरी के पीएम ओरबान ने बनाया नया धुर-दक्षिणपंथी गठबंधन
हंगरी को 'अनुदार लोकतंत्र' बनाने का श्रेय लेने वाले ओरबान ने इतने बरस की सत्ता में संविधान और चुनावी तंत्र को कुछ इस तरह तोड़ा-मरोड़ा है, जहां उनके और उनकी फिडेस पार्टी के हारने की ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती. बावजूद इसके यह उनका सबसे मुश्किल राजनीतिक मुकाबला बन गया है. स्वतंत्र सर्वेक्षणों की मानें, तो ओरबान के हारने की संभावना है.
...मानो अकेले ओरबान नहीं लड़ रहे हैं चुनाव
ओरबान धुर-दक्षिणपंथी विचारधारा की राजनीति करते हैं. यूरोपीय संघ की राजनीति में भी वह फार-राइट खेमे के मुख्य चेहरों में हैं. उनके राजनीतिक सिद्धांतों की अपील, उनका जनाधार और भविष्य ऐसे विषय नहीं हैं जिनका असर हंगरी तक सीमित हो.
ओरबान की जीत या हार, अन्य यूरोपीय देशों की दक्षिणपंथी और धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों पर भी खासा असर डाल सकती है. 'ब्रैंड ओरबान' की जीत एक तरह का राजनीतिक बैरोमीटर बन गया है, जिससे फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में पहले ही मजबूत हो रही फार-राइट पार्टियों को भी मनमाफिक लय मिलने की उम्मीद है. इसीलिए, ओरबान की फिडेस पार्टी को यूरोप के दूसरे दक्षिणपंथी दलों से समर्थन मिल रहा है.
ओरबान के लिए चुनावी रैली करेंगे अमेरिकी उपराष्ट्रपति?
समर्थन या विरोध, बस यूरोपीय महाद्वीप तक सीमित नहीं है. ओरबान को डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन से भी खुला समर्थन मिल रहा है. अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वैंस खुद दो दिन की यात्रा पर हंगरी पहुंचे हैं. 7 अप्रैल को बुडापेस्ट में ओरबान के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में वैंस ने एलान किया, "विक्टर ओरबान हंगरी में अगला चुनाव जीतने जा रहे हैं."
वैंस ने कहा, "इस चुनावी मौसम में, मैं प्रधानमंत्री (ओरबान) की जितनी मदद कर सकता हूं, करना चाहता हूं. हालांकि, मैं यह अपेक्षा नहीं करता कि हंगरी के लोग संयुक्त राज्य अमेरिका के उप राष्ट्रपति की बात सुनेंगे. लेकिन मैं हर किसी को एक संकेत देना चाहता हूं, खासतौर पर ब्रसेल्स में नौकरशाहों को, जिन्होंने हंगरी की जनता को कामयाब होने से रोकने के लिए वो सब किया जो वो कर सकते हैं, क्योंकि वो उस नेता (ओरबान) को पसंद नहीं करते जो वाकई हंगरी की जनता के लिए खड़ा हुआ."
अमेरिकी उपराष्ट्रपति की राय में, ओरबान और ट्रंप प्रशासन का आपसी सहयोग "पश्चिमी सभ्यता की हिफाजत" करता है और "ईसाई मूल्यों" पर आधारित है, "बहुत कुछ है जो अमेरिका और हंगरी को एक करता है. दुर्भाग्य से, बहुत ही कम लोग हैं जो पश्चिमी सभ्यता के मूल्यों के लिए खड़े होने को तैयार हैं."
वैंस की यात्रा पर एक ओर जहां हंगरी के विपक्षी नेता विदेशी हस्तक्षेप ना करने की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं वैंस ने ब्रसेल्स पर दखलंदाजी का आरोप लगाते हुए दावा किया कि यह चुनाव उनकी देखी मिसालों में "विदेश में चुनावी हस्तक्षेप से सबसे खराब उदाहरणों में है." वैंस के मुताबिक, "ब्रसेल्स में ब्यूरोक्रैट्स ने हंगरी की अर्थव्यवस्था को तबाह करने की कोशिश की" क्योंकि वे "इस शख्स (ओरबान) से नफरत करते हैं." खबरों के मुताबिक, वह एक चुनावी रैली में भी ओरबान के साथ नजर आएंगे.
सवाल उठ रहे हैं कि क्या वैंस के इस कदम को हंगरी के चुनाव में "विदेशी हस्तक्षेप" माना जा सकता है? ओरबान के मुख्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी पीटर माग्यार ने सोशल मीडिया पर बाहरी दखलंदाजी के खिलाफ चेताते हुए लिखा, "कोई भी बाहरी देश हंगरी के चुनाव में दखल नहीं दे सकता है. यह हमारा देश है. हंगरी का इतिहास वॉशिंगटन, मॉस्को या ब्रसेल्स में नहीं लिखा गया है. यह लिखा गया है हंगरी की गलियों और चौराहों पर."
ट्रंप की राजनैतिक-वैचारिक शैली का छाता, कौन-कौन आएगा?
यूरोप और यहां की लिबरल पार्टियों-लीडरों के लिए ट्रंप का स्वर अक्सर शिकायती और तीखा रहता है. दिनोदिन यूरोप से 'नाराज' व 'असंतुष्ट' होते और यूरोपीय नेताओं पर कटाक्ष करते ट्रंप वैचारिक समानता वाले दक्षिणपंथी नेताओं को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं. यह कोशिश बस यूरोप में नहीं, बल्कि दक्षिण अमेरिका में भी नजर आती है. मसलन, ट्रंप ने अर्जेंटीना में जो किया.
नवंबर 2024 में जब ट्रंप दूसरे कार्यकाल के लिए चुने गए, तो अर्जेंटीना के राष्ट्रपति हावियर मिलेई उनसे मिलने फ्लोरिडा पहुंचे. वह ट्रंप की जीत के बाद उनसे मिलने आए पहले विदेशी लीडर थे. ट्रंप ने कहा मिलेई उनके "पसंदीदा राष्ट्रपति" हैं.
वहीं मिलेई, ट्रंप को अपना वैचारिक संदर्भ बिंदु बताते हैं. अक्टूबर 2025 में अर्जेंटीना में हुए चुनाव में ट्रंप ने मिलेई को समर्थन दिया. देश का आर्थिक संकट बड़ा मुद्दा था, तो मिलेई की संभावनाएं बढ़ाने के लिए बेलआउट पैकेज देकर ट्रंप ने बड़ी मदद भी की.
हंगरी चुनाव में ओरबान को जिताने में जुटे हैं ट्रंप
हंगरी में ट्रंप की दिलचस्पी का केंद्र हैं, ओरबान. ट्रंप और ओरबान, एक-दूसरे के समर्थक और प्रशंसक हैं. ट्रंप प्रशासन ने यह बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है कि उसके लिए हंगरी का चुनाव और ओरबान की जीत अहमियत रखती है. ट्रंप ने ओरबान को खुला सपोर्ट दिया और उन्हें "एक मजबूत और ताकतवर नेता" बताया.
फरवरी में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो हंगरी आए और उन्होंने ओरबान के लिए जीत की कामना की. एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में रुबियो ने कहा, "मैं पूरे यकीन के साथ आपसे कह सकता हूं कि राष्ट्रपति ट्रंप, आपकी सफलता के लिए गहराई से प्रतिबद्ध हैं क्योंकि आपकी कामयाबी हमारी कामयाबी है."
कैसा यूरोप चाहते हैं ट्रंप?
चुनाव से ऐन पहले वैंस का हंगरी आना और व्यक्तिगत रूप से ओरबान को चुनावी समर्थन देना, वैचारिक समानता और बयानबाजी से आगे की बात है. विश्लेषक इसे मुश्किल चुनाव में फंसे ओरबान को समर्थन देने की एक दुर्लभ चेष्टा के तौर पर देख रहे हैं.
जैसा कि पॉलिटिको मैगजीन ने वैंस की हंगरी यात्रा को "ऑपरेशन सेव ओरबान" का शीर्षक देते हुए लिखा, "ट्रंप प्रशासन यूरोप में अपने नंबर 1 सहयोगी को बचाने के लिए" पूरा जोर लगा रहा है.
यूरोप में मध्यममार्गी और प्रगतिशाली विचारधारा की सरकारों/ नीतियों को नापसंद करने और इनकी सख्त आलोचना करने के मामले में ट्रंप, वैंस और ओरबान तीनों एक स्वाभाविक गठबंधन बनाते हैं. ट्रंप 2.0 दबे-छिपे तरीके से नहीं, बल्कि सार्वजनिक तौर पर किसी और देश के चुनाव में वैचारिक और विदेश नीति की अपनी प्राथमिकताओं से मेल खाने वाले नेताओं को समर्थन देता दिख रहा है.
कौन हैं जॉर्ज सोरोस, जिन्हें कई लीडर कहते हैं "पपेट मास्टर"
अस्लाई डंतसबस, ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूट थिंक टैंक में एक विजिटिंग फैलो हैं. वैंस की यात्रा के संदर्भ में रॉयटर्स से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, "जेडी वैंस की यात्रा कोई सामान्य कूटनीति नहीं, बल्कि विक्टर ओरबान की जिंदगी के सबसे मुश्किल चुनाव के पहले स्पष्ट तौर पर उनका एंडॉर्समेंट है."
ट्रंप प्रशासन के लिए ओरबान की भूमिका रेखांकित करते हुए उन्होंने आगे कहा, "ट्रंप प्रशासन के लिए ओरबान केवल एक रूढ़िवादी साथी नहीं, बल्कि यूरोप के भीतर एक अनुदार धड़ा स्थापित करने की कोशिशों का मुख्य चेहरा हैं. अगर ओरबान हारते हैं, तो इस अभियान को नुकसान होगा."
हंगरी के चुनाव में दिलचस्पी बस अमेरिका की ही नहीं है
हंगरी के चुनाव में बस अमेरिका नहीं, रूस की भी रुचि बताई जा रही है. ओरबान, मॉस्को समर्थक हैं. बल्कि वह ईयू के सबसे बड़े पुतिन सपोर्टर हैं. यूक्रेन युद्ध से जुड़े मसलों पर ओरबान का रुख, रूसी हितों के ज्यादा करीब है.
दिलचस्पी ईयू की भी कम नहीं है, हालांकि ब्लॉक के लिए हंगरी एक अंदरूनी मसला है. एक तो ओरबान ईयू के विरोधी और तीखे आलोचक हैं. ऊपर से उनके वीटो ईयू के लिए बड़ी परेशानी बन गए हैं. सदस्य देशों की सर्वसम्मति की व्यवस्था में हंगरी का वीटो कई अहम मुद्दों पर ईयू के हाथ-पैर बांध देता है. स्थिति यह है कि ओरबान के वीटो के कारण ईयू के नियमों में सुधार की अपील की जा रही है.
हंगरी और ईयू का रिश्ता: इट्स टू कॉम्प्लिकेटेड
फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद से चाहे रूस पर प्रतिबंध लगाना हो या यूक्रेन की मदद करना हो, ओरबान ईयू के लिए गतिरोध खड़े करते आए हैं. न्यायिक स्वतंत्रता, मीडिया की आजादी, भ्रष्टाचार और निष्पक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे अहम विषयों पर ओरबान की नीतियां, ईयू मूल्यों से मेल नहीं खातीं.
विश्लेषकों के मुताबिक, यह चुनाव ईयू और हंगरी के रिश्ते में "आर या पार" साबित हो सकता है. हंगरी की कथित ब्लैकमेलिंग से ईयू में काफी झुंझलाहट है. मसलन, बीते दिनों जब यूक्रेन को 90 बिलियन यूरो के लोन देने की डील पर ओरबान मुकर गए तो यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष अंटोनियो कोस्टा जाहिर तौर पर नाराज दिखे.
यूक्रेन की मदद के लिए 90 अरब यूरो कैसे जुटाएगा ईयू?
कोस्टा ने कहा, "यूरोपीय संघ की संस्थाओं को कोई भी ब्लैकमेल नहीं कर सकता." 'ब्लूमबर्ग' की खबर के अनुसार, ओरबान ने ईयू से कहा कि जब तक रूस से तेल की खरीद फिर नहीं शुरू की जाती, वह यूक्रेन को आर्थिक मदद देने की सहमति नहीं देंगे.
डानिएल फ्रॉइंड, यूरोपीय संसद में ग्रीन्स/ ईएएफ ग्रुप के सांसद और जर्मन नेता हैं. उन्होंने संसद की एक अंदरुनी रिपोर्ट के हवाले से बताया कि ईयू के अब तक के इतिहास में ओरबान से ज्यादा कभी किसी लीडर ने वीटो नहीं किया. समाचार एजेंसी एपी से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह चौंकाने वाला है. कोई और करीब भी नहीं आया. ईयू के डिजाइन में यह सबसे बड़ा खोट है, जिसे उन्होंने (ओरबान) एक्सपोज कर दिया है."
यूक्रेन को फंड देने के तरीके पर क्या ईयू में बन पाएगी सहमति?
चीन भी चाहता है ओरबान जीतें?
ओरबान, चीन समर्थक भी हैं. इस मामले में भी वह ईयू में नंबर एक समझे जाते हैं. जैसा कि 'सेंटर फॉर यूरोपियन एनालिसिस' (सीईपीए) ने पिछले साल अपने एक विश्लेषण में लिखा कि हंगरी, यूरोप में सबसे ज्यादा प्रो-चाइना देश है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को जिस तरह चीन से मदद मिली, उसे ईयू में काफी संशय से देखा गया और कई देशों ने बीजिंग से दूरी बना ली. मगर, ओरबान के रिश्ते और गाढ़े हो गए.
बीजिंग सम्मेलन से पहले बढ़ा ईयू और चीन का व्यापारिक तनाव
साल 2023 में बीजिंग में आयोजित 'बेल्ट एंड रोड फोरम' में हिस्सा लेने पहुंचे वह ईयू के अकेले नेता थे. यहां पुतिन की उपस्थिति के कारण बाकी ईयू देशों ने हिस्सा नहीं लिया. फिर 2024 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हंगरी यात्रा पर आए. दोनों देशों ने एक विस्तृत साझेदारी पर भी दस्तखत किया. यह आशंका थी कि बीजिंग के साथ उनकी नजदीकी, ट्रंप के साथ दोस्ती में अड़चन बन सकती है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
विश्लेषकों के अनुसार, विक्टर ओरबान की जीत में चीन की भी दिलचस्पी है. 6 अप्रैल को 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' ने एक आर्टिकल छापा, जिसका शीर्षक था- कगार पर ओरबान: क्या हंगरी का चुनाव यूरोप में चीन के प्रभाव पर चोट पहुंचाएगा?
आर्टिकल के मुताबिक चीन, रूस और ट्रंप का अमेरिका, तीनों के लिए ओरबान की हार एक ऐसे सहयोगी को राह से हटा देगी, जिसने ईयू के सामाजिक और ग्रीन अजेंडा के तहत बार-बार उनके खिलाफ उठाए गए कदमों को रोका.
रिकॉर्ड मतदान की उम्मीद
सरकार समर्थित सर्वेक्षणों में ओरबान की फिडेस पार्टी और केडीएनपी का गठबंधन जीतता दिख रहा है. वहीं, स्वतंत्र सर्वेक्षण संकेत दे रहे हैं पीटर माग्यार के नेतृत्व में तिसा पार्टी लैंडस्लाइड जीत हासिल करने वाली है. विश्लेषकों को उम्मीद है कि इसबार जमकर मतदान होगा, वोटर टर्नआउट 75 से 80 फीसदी तक जा सकता है.
ओरबान पर पहले ही सत्ता के जोर पर विपक्ष और आलोचकों को दबाने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं. इस बार रूसी दखलंदाजी, मतदाताओं को धमकाने व वोट खरीदने के आरोप और घरेलू खुफिया विभाग की मदद से विपक्षी तिसा पार्टी को नुकसान पहुंचने के इल्जाम भी लग रहे हैं. राजनीतिक और चुनावी संस्थाओं पर सरकार के प्रभाव को देखते हुए यह सवाल बना हुआ है कि हंगरी के चुनाव कितने निष्पक्ष हैं.
भारतीय इतिहास के पन्नों में जब ‘नवजागरण’ (Renaissance) की बात होती है, तो राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले या दयानंद सरस्वती के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। लेकिन इसी आकाश में एक ऐसा नक्षत्र भी था जिसकी चमक ने न केवल सवर्ण पितृसत्ता की आंखों में चकाचौंध पैदा कर दी, बल्कि ईसाई मिशनरियों के पुरुष-अहंकार को भी चुनौती दी। वह नाम था-पंडिता रमाबाई सरस्वती। आज उनकी 104वीं पुण्यतिथि (5 अप्रैल 1922–5 अप्रैल 2026) पर यह याद करना जरूरी है कि क्यों उन्हें इतिहास की मुख्यधारा से सुनियोजित तरीके से बाहर रखा गया।
1858 में जन्मीं रमाबाई का बचपन जंगलों और यात्राओं में बीता। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे एक लीक से हटकर चलने वाले ब्राह्मण थे, जिन्होंने समाज के कड़े विरोध के बावजूद अपनी पत्नी और बेटी (रमाबाई) को संस्कृत सिखाई। जब 1877 के भीषण अकाल में रमाबाई ने अपने माता-पिता को खो दिया, तो वे अपने भाई के साथ पैदल ही पूरे भारत की यात्रा पर निकल पड़ीं।
कलकत्ता पहुँचने पर उनकी अद्भुत संस्कृत विद्वत्ता ने वहां के बड़े-बड़े पंडितों को हैरान कर दिया। यह वह दौर था जब स्त्रियों के लिए ‘अक्षर-ज्ञान’ भी पाप माना जाता था। वहां के विद्वानों ने उन्हें ‘पंडिता’ और ‘सरस्वती’ की उपाधियों से नवाजा-वे आधुनिक भारत की पहली स्त्री थीं जिन्हें सार्वजनिक रूप से यह सम्मान मिला। लेकिन रमाबाई केवल श्लोक पढऩे वाली विदुषी नहीं थीं। उन्होंने शास्त्रों का गहरा अध्ययन किया और पाया कि जिसे ‘धर्म’ कहा जा रहा है, वह वास्तव में स्त्रियों और अवर्णों (शूद्रों) को गुलाम बनाए रखने का एक व्यवस्थित तंत्र है।
उन्होंने जाति की सीमाओं को तोड़ते हुए एक गैर-ब्राह्मण (बिपिन बिहारी मेधवी) से विवाह किया। पति की असमय मृत्यु के बाद, एक छोटी बच्ची को गोद में लिए रमाबाई ने सवर्ण हिंदू विधवाओं की उस ‘नरक’ जैसी स्थिति को अपनी आंखों से देखा, जहाँ बाल-विधवाओं का मुंडन कर उन्हें अंधेरी कोठरियों में डाल दिया जाता था। यहीं से शुरू हुआ उनका वह संघर्ष, जिसने आगे चलकर तिलक और विवेकानंद जैसे दिग्गजों के माथे पर बल डाल दिए।
शारदा सदन और मुक्ति मिशन : जब विधवाओं को ‘इंसान’ बनाया गया
रमाबाई ने महसूस किया कि समाज सुधारक पुरुष केवल ‘विधवा विवाह’ की बात करते हैं, जैसे विवाह ही स्त्री के उद्धार का एकमात्र रास्ता हो। उन्होंने एक क्रांतिकारी विकल्प पेश किया—‘आत्मनिर्भरता।’ 1889 में उन्होंने पुणे में ‘शारदा सदन’ की स्थापना की। यह सिर्फ एक छत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी जगह थी जहाँ विधवाओं को शिक्षा, टाइपिंग, बढ़ईगिरी और बागवानी सिखाई जाती थी ताकि वे किसी पुरुष की दया पर निर्भर न रहें।
उन्होंने अपनी कालजयी पुस्तक ‘The High-Caste Hindu Woman’ (1887) के जरिए दुनिया को बताया कि हिंदू समाज की ‘कुलीनता’ वास्तव में स्त्रियों के शोषण की नींव पर खड़ी है। उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया क्योंकि उन्हें लगा कि वहां ‘समानता’ है, लेकिन जल्द ही उन्होंने वहां भी पितृसत्ता से लोहा लिया और बाइबिल का अनुवाद सीधे हिब्रू से मराठी में किया, ताकि चर्च के पुरुषों द्वारा किए गए ‘स्त्री-विरोधी’ अनुवादों को ठीक किया जा सके।
तिलक का भाषाई प्रहार: ‘पंडिता’से ‘रेवरंडा’ की गाली तक
यही वह बिंदु था जहाँ से रमाबाई के खिलाफ ‘महारथियों’ का मोर्चा खुला। बाल गंगाधर तिलक के लिए ‘स्वराज’ का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति था। तिलक का राष्ट्रवाद सवर्ण पुरुष की संप्रभुता पर टिका था। जब रमाबाई की ख्याति और उनके स्वतंत्र विचार बढऩे लगे, तो तिलक ने अपने अखबार ‘मराठा’ और ‘केसरी’ में उन पर व्यक्तिगत हमले शुरू किए।
तिलक ने उन्हें ‘पंडिता’ कहना बंद कर ‘रेवरंडा’ कहना शुरू किया। यह केवल एक पदवी नहीं थी। ‘रेवरेंडा’ शब्द का प्रयोग तिलक ने इसलिए किया ताकि उसमें ‘रंडा’ (विधवा के लिए एक अत्यंत अपमानजनक गाली) की ध्वनि साफ सुनाई दे। तिलक की नजऱ में एक विधवा का स्वतंत्र होना और धर्म बदलना समाज के पतन का संकेत था। तिलक ने ‘केसरी’ (1887) में साफ़ लिखा था:
‘स्त्रियों की शिक्षा और उनकी स्वतंत्रता हिंदू समाज की जड़ों में तेल डालने जैसा है। जो स्त्रियाँ पुरुषों के समान अधिकारों की मांग करती हैं, वे वास्तव में धर्म का नाश कर रही हैं।’
‘एज ऑफ कंसेंट’और तिलक का ‘मर्दाना’ स्वराज
1891 में जब लड़कियों के लिए शादी की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल करने का कानून (Age of Consent Bill) आया, तो तिलक इसके सबसे उग्र विरोधी थे। रमाबाई इस कानून के पक्ष में थीं क्योंकि उन्होंने सवर्ण घरों में छोटी बच्चियों का यौन शोषण देखा था। तिलक ने इस सुधार को ‘हिंदू धर्म पर हमला’ बताया। उनका तर्क था:
‘हमें अपनी संतानों पर पूर्ण अधिकार है। सरकार को यह तय करने का कोई हक नहीं कि हम अपनी बच्चियों का विवाह किस उम्र में करें।’तिलक का स्वराज उस 10 साल की बच्ची के आंसुओं पर खड़ा था, जिसे धर्म के नाम पर बूढ़ों के बिस्तर पर धकेला जा रहा था।
दिलीप कुमार शर्मा
गुवाहाटी से, 7 अप्रैल। असम विधानसभा की 126 सीटों के लिए 9 अप्रैल को चुनाव होने वाले हैं लेकिन उससे ठीक पहले प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा काफी चर्चा में आ गई हैं.
वैसे तो 52 साल की रिनिकी की अब तक की छवि अराजनीतिक रही है और उनको एक उद्यमी महिला के तौर पर ही असम में जाना जाता है.
लेकिन कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने रविवार को आरोप लगाया कि रिनिकी भुइयां सरमा के पास यूएई, मिस्र, एंटीगुआ और बारबुडा जैसे देशों के कई विदेशी पासपोर्ट हैं.
हालांकि, कांग्रेस नेता के इस आरोप को रिनिकी भुइयां और सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने ख़ारिज किया है.
कांग्रेस नेता ने अपने आरोपों में रिनिकी की स्वामित्व वाली एक कंपनी का बजट 3,467 करोड़ अमेरिकी डॉलर बताया और दावा किया कि वह अमेरिका में होटल खोलने की योजना बना रही हैं.
दरअसल रिनिकी को लेकर कांग्रेस के कई नेता पहले भी कई आरोप लगा चुके है, जिसके जवाब में मानहानि मुकदमे तक हुए हैं. लेकिन चुनाव के ठीक चार दिन पहले रिनिकी पर लगे आरोपों ने तमाम मुद्दों को पीछे धकेलते हुए उनको सुर्खियों में ला दिया है.
सीएम हिमंत सरमा ने आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए ख़ारिज किया और कहा कि इस मामले में उनकी पत्नी ने एफ़आईआर दर्ज करवाई है.
हिमंत बिस्वा सरमा ने सोमवार को प्रेस वार्ता में कहा, "कल पवन खेड़ा और गौरव गोगोई ने दो प्रेस कॉन्फ़्रेंस कीं, एक दिल्ली में और एक गुवाहाटी में. जब आप किसी चुनाव के नतीजे या आउटकम को प्रभावित करने के लिए इन आरोपों का इस्तेमाल फ़र्ज़ी डॉक्यूमेंट्स के साथ करते हैं, तो उस पर ज़्यादा सज़ा का प्रोविज़न लगता है और उसकी सज़ा उम्रक़ैद है."
टेनिस की स्टेट खिलाड़ी से जानी-मानी उद्यमी तक
असम के सबसे बड़े मीडिया हाउसेस में से एक 'प्राइड ईस्ट एंटरटेनमेंट' की मैनेजिंग डायरेक्टर रिनिकी का जन्म 31 जुलाई, 1973 को गुवाहाटी में हुआ था.
उनके पिता जाधव चंद्र भुइयां असम के जाने-माने उद्योगपति थे. वह अपने पांच भाई-बहन में सबसे बड़ी हैं.
गुवाहाटी के सेंट मैरी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद रिनिकी ने कॉटन कॉलेज से स्नातक (ग्रेजुएशन) और स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) की पढ़ाई पूरी की. स्कूल और कॉलेज के दिनों में लोग उन्हें एक अच्छी टेनिस खिलाड़ी के तौर पर जानते थे.
इंटरनेशनल टेनिस फ़ेडरेशन से प्रशिक्षित तथा राज्य के जाने-माने टेनिस कोच कल्याण दास ने रिनिकी को स्कूल के दिनों से टेनिस की ट्रेनिंग दी थी.
कल्याण दास ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "रिनिकी जब 10 साल की थी तभी से उन्होंने टेनिस खेलना शुरू किया था. मुझे याद है 1987 का वो साल जब रिनिकी अपनी कई सहेलियों के साथ एक ग्रुप में टेनिस सीखने आती थी. वह बहुत अच्छी टेनिस खिलाड़ी थीं और स्टेट के लिए खेल चुकी हैं."
रिनिकी को लेकर मौजूदा विवाद पर कल्याण दास कहते हैं, "अब रिनिकी का ताल्लुक चूंकि राजनीति से जुड़े व्यक्ति से है, सीएम की पत्नी हैं, इसलिए उनको सॉफ्ट टारगेट बनाया जाता है. वह एक अच्छी इंसान हैं. जिस दौर में वह टेनिस खेलती थीं, उस समय कई तरह के अभाव थे लेकिन अब वह स्थानीय खिलाड़ियों की पूरी मदद करती हैं."
कॉटन कॉलेज में हिमंत से मुलाक़ात
रिनिकी की मुलाक़ात हिमंत बिस्व सरमा से उस दौरान हुई थी जब वे गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहीं थीं.
उस समय हिमंत कॉटन कॉलेज छात्र संघ के जनरल सेक्रेटरी थे.
अपने कई इंटरव्यू में रिनिकी ने हिमंत के साथ अपनी लव स्टोरी का ज़िक्र करते हुए कहा है, "10वीं की परीक्षा पास करने के बाद ही मेरी मुलाक़ात हिमंत से हुई थी. 1992 का साल था, जब हमने प्यार का इज़हार किया था."
अपने इसी इंटरव्यू में रिनिकी ने बताया था कि 1994 में जब उन्होंने मिस इंडिया प्रतियोगिता के लिए आवेदन किया तो उनका चयन हो गया था और उन्हें मुंबई बुलाया गया.
वह इसी इंटरव्यू में कहती हैं, "मैंने सोचा कि एक बॉयफ्रेंड के तौर पर शायद हिमंत इस ख़बर से काफी खुश होंगे. लेकिन उन्होंने मुझे तब समझाया था कि यह प्रतियोगिता अच्छी नहीं होती. इस तरह वह मुझे कई दिनों तक हर सुबह अपने साथ ले जाकर समझाते. दरअसल वह मुझे मुंबई जाने देना नहीं चाहते थे."
10 साल तक एक-दूसरे को जानने-समझने के बाद रिनिकी और हिमंत ने 2001 में शादी कर ली. इस दंपति के अब दो बच्चे हैं. एक बेटा और एक बेटी.
जर्मन सरकार ने सैन्य क्षमताओं को बेहतर करने के लिए एक नया कानून बनाया. इस कानून के मुताबिक, 17 से 45 साल के पुरुषों को तीन महीने से ज्यादा समय तक जर्मनी छोड़ने से पहले अनुमति लेनी होगी.
डॉयचे वैले पर ओंकार सिंह जनौटी का लिखा-
जर्मनी की सेना हाल ही में अपडेट किए गए सैन्य सेवा कानून पर सफाई देने में जुटी है. असल में मामला, कानून की एक धारा से जुड़ा है, जिसके मुताबिक, 17 से 45 साल के पुरुषों को 3 महीने से अधिक समय के लिए जर्मनी छोड़ने से पहले अनुमति लेनी होगी.
यह कानून जनवरी 2026 में लागू हुआ. लेकिन इसकी यह शर्त लगभग अनदेखी रह गई. एक स्थानीय अखबार फ्रांकफुर्टर रुंडशाऊ की रिपोर्ट ने इसे शुक्रवार को इस शर्त पर रिपोर्टिंग की.
महाशक्तियों की नई दुनिया में ताकत का वर्चस्व: जर्मन चांसलर
रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि जर्मनी में सैन्य सेवा स्वैच्छिक है. उन्होंने बताया कि मंत्रालय अब छूट देने के लिए स्पष्ट नियम तैयार कर रहा है. इसका मकसद, गैरजरूरी ब्यूरोक्रैसी से बचना है.
जर्मन मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि यह कानून एक मजबूत और भरोसेमंद सैन्य पंजीकरण प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए है. उन्होंने कहा, "किसी आपात स्थिति में हमें पता होना चाहिए कि कौन लंबे समय तक विदेश में रह रहा है." उन्होंने यह नहीं बताया कि यह प्रक्रिया आखिरकार कैसी दिखेगी.
सैन्य सेवा से जुड़े नए कानून पर राजनीतिक घमासान
जर्मनी 2035 तक सक्रिय सैनिकों की संख्या 2,60,000 तक पहुंचाना चाहता है. 2025 के अंत में यह संख्या 1,83,000 थी. जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स, सैन्य नेतृत्व से कह चुके हैं कि देश को जल्द से जल्द आत्मरक्षा में सक्षम होना होगा. और इसके लिए सैनिकों की जरूरत है.
वहीं जर्मनी की विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है. बीएसडब्ल्यू पार्टी की संस्थापक जारा वागेनक्नेष्ट ने इस नियम पर कड़ी आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि विदेश यात्रा के लिए अनुमति लेने की शर्त आजादी के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है. उनका आरोप है कि यह नियम भूतपूर्व पूर्वी जर्मनी के समय की याद दिलाता है. वामपंथी नेता वागेनक्नेष्ट ने इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियुस के इस्तीफे की मांग भी की है.
उन्होंने कहा कि यह दिखाता है कि सरकार अनिवार्य सैन्य सेवा की ओर लौटना चाहती है. उनके मुताबिक इससे उन लोगों की चिंताएं बढ़ती हैं, जो मानते हैं कि जर्मनी एक बड़े युद्ध की तैयारी कर रहा है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यह कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं.
अमेरिका पर घटता भरोसा
विवादित सैन्य सेवा कानून पिछले साल पास हुआ था. इसका मकसद बुंडेसवेयर कही जाने वाली जर्मन सेना की ताकत बढ़ाना और नाटो के लक्ष्यों को पूरा करना है. जर्मनी में यह सोच बढ़ी है कि उसने लंबे समय तक रक्षा के लिए अमेरिका पर भरोसा किया लेकिन अब भूराजनीतिक हालात बदल रहे हैं, खासतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में. यूक्रेन युद्ध और वॉशिंगटन के बदलते रुख की वजह से भी यूरोप के देशों में अपनी सैन्य क्षमताएं मजबूत करने की पहल शुरू हो चुकी है.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से विदेशी धरती पर जर्मनी की पहली स्थायी सैन्य तैनाती
ट्रंप अक्सर अपने यूरोपीय और नाटो साझेदारों पर तंज कसते आ रहे हैं. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इस्राएल के ईरान युद्ध छेड़ने के बाद से अमेरिका और अन्य नाटो देशों के बीच मतभेद अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच चुके हैं. ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य खुलवाने में नाटो देशों से मदद मांगी, जिसे यूरोपीय साझेदारों ने ठुकरा दिया. यूरोपीय देशों को लग रहा है कि अमेरिका ने बिना साझेदारों से बात किए, इस्राएल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया.
नासा के आर्टेमिस 2 मिशन में चांद यात्रा पर निकले स्पेसक्राफ्ट के भीतर अंतरिक्ष यात्रियों की जिंदगी कैसी है?
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा का लिखा-
आर्टेमिस-2 के अंतरिक्षयात्रियों ने चंद्रमा के ऐसे नजारे देखे, जैसा पहले कभी इंसानी आंखों ने नहीं देखा था. 5 अप्रैल को तड़के जब एस्ट्रोनॉट्स के सोने का समय हुआ, तब तक उनका अंतरिक्षयान पृथ्वी से लगभग 321,869 किलोमीटर दूर जा चुका था.
नासा ने आर्टेमिस क्रू की खींची एक तस्वीर साझा की, जिसमें चांद ओरिएनताले बेसिन के साथ नजर आ रहा था. नासा ने लिखा, "यह मिशन पहला मौका है, जब पूरे बेसिन को इंसानी आंखों ने देखा है."
स्पेसक्राफ्ट के भीतर कैसा इंतजाम है?
अंतरिक्षयात्री स्मूदी पी रहे हैं. मैक एंड चीज खा रहे हैं. फोन से तस्वीरें खींच रहे हैं. टॉइलेट खराब हो जाए, तो उसे ठीक भी कर रहे हैं. यह कहना तो सही नहीं होगा कि नासा के आर्टेमिस-2 मिशन पर गए चारों एस्ट्रोनॉट बड़ा सामान्य वक्त बिता रहे हैं. लेकिन हां, अंतरिक्षयान के भीतर उनकी जिंदगी में रोजमर्रा की कई आम चीजें भी शामिल हैं.
मिशन स्पेशलिस्ट क्रिस्टिना कॉख, डीप स्पेस में गईं पहली महिला हैं. उन्होंने बताया कि 10 की चांद यात्रा की तैयारी करना कुछ-कुछ कैंपिंग की तैयारी जैसा था. ओरायन अंतरिक्षयान में खाने-पीने की जो चीजें भेजी गई हैं उनमें 58 टॉर्टिला, कॉफी के 43 कप और पांच तरह के सॉस शामिल हैं
यह पहली बार है, जब डीप स्पेस में गए अंतरिक्षयात्रियों को एक असली टॉयलेट मिला है. इससे पहले 1960-70 के दशक के अपोलो अभियानों में अंतरिक्षयात्रियों को शौच के लिए खास 'वेस्ट कलेक्शन बैग' दिया गया था, जिसे वो चंद्रमा की जमीन पर छोड़ आए.
इस बार ओरायन में टॉयलेट है और इसमें योगदान है क्रिस्टिना कॉख का. पिछले हफ्ते अमेरिकी मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, "मुझे खुद को स्पेस प्ल्मर बुलाने पर गर्व हो रहा है." कॉख ने कहा, "मुझे यह कहना अच्छा लगता है कि यह शायद ऑन बोर्ड सबसे अहम उपकरण है. तो जब इसने ठीक काम किया, तो हम सबने राहत की सांस ली."
यह टॉयलेट एक छोटे से कक्ष में है, दिक्कत यह है कि उसमें बहुत शोर होता है. तो एस्ट्रोनॉट जब भी टॉयलेट जाते हैं, उन्हें कान सुरक्षित करने वाला उपकरण लगाना पड़ता है.
मिशन कमांडर का आउटलुक काम नहीं कर रहा था
ओरायान में एक और परेशानी आई, मिशन कमांडर का माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक काम नहीं कर रहा था. नासा के लाइवस्ट्रीम में मिशन कमांडर रीड वाइसमैन ने बताया, "मैंने यह भी देखा कि मेरे पास दो माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक हैं और दोनों में से कोई काम नहीं कर रहा है." फिर ह्यूस्टन में मिशन कंट्रोल ने ईमेल की दिक्कत सुलझाई.
अंतरिक्षयात्रियों के लिए जरूरी है कि वे अपने सोने का ध्यान रखें. उन्हें एक स्लीप रूटीन का पालन करना है ताकि वे चांद उपकरणों की जांच करने और निगरानी करने जैसे जरूरी काम कर पाएं. सोने के लिए उनके पास स्लीपिंग बैग हैं, जो दीवार से बांध दिए जाते हैं. जिससे कि सोते समय वे तैरते ना रहें. रीड वाइसमैन ने बताया कि क्रिस्टिना कॉख, वाहन के बीच में यूं सोती हैं कि उनका सिर नीचे की तरफ होता है. वाइसमैन ने इसे चमगादड़ की तरह बताते हुए कहा कि यह काफी आरामदेह है.
अंतरिक्षयात्रियों के दिनभर के काम में 30 मिनट एक्सरसाइज करना भी शामिल है. माइक्रोग्रैविटी के कारण हड्डियों और मांसपेशियों पर असर पड़ता है. अगर सावधानी ना बरती जाए, तो खासा नुकसान हो सकता है. इसीलिए व्यायाम जरूरी है.
अफगानिस्तान में एक बार फिर भारी बारिश, बाढ़ और लैंडस्लाइड का जानलेवा मेल तबाही मचा रहा है. आखिर क्यों देश में बरसात जैसे मौसमी चक्र इतने घातक होते जा रहे हैं?
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा की रिपोर्ट –
चरम मौसमी घटनाओं के लिहाज से यह साल भी अफगानिस्तान पर भारी गुजर रहा है. बीते 10 दिनों में, भारी बरसात और तूफान के कारण आई बाढ़, भूस्खलन और बिजली गिरने की घटनाओं में 77 लोगों की जान गई और 137 लोग घायल हुए. देश के आपदा प्रबंधन विभाग ने यह आंकड़ा दिया है. आने वाले दिनों में और बारिश की आशंका है. लोगों को बाढ़ की आशंका वाले इलाकों और नदी तटों से दूर रहने की सलाह दी गई है.
संपत्ति की भी खासी क्षति हुई है. सैकड़ों की संख्या में मकान क्षतिग्रस्त हुए, 793 घर पूरी तरह तबाह हो गए, 337 किलोमीटर की सड़क नष्ट हो गई. आपदा प्रबंधन विभाग ने नुकसान का जो ब्योरा दिया है उसके मुताबिक कारोबार, खेतिहर जमीन, कुओं और सिंचाई की नहरें भी क्षतिग्रस्त हुई हैं. कुल मिलाकर 5,800 से ज्यादा परिवार प्रभावित हुए हैं.
जलवायु परिवर्तन की वजह से धंस रही धरती, बन रहे हैं विशालकाय सिंकहोल
समाचार एजेंसी एपी ने लोक निर्माण विभाग के प्रवक्ता अशरफ हकशिनास के हवाले से बताया कि राजधानी काबुल को अन्य प्रांतों से जोड़ने वाले कई राजमार्गों को भी नुकसान पहुंचा है. इनमें काबुल-जलालाबाद हाई-वे शामिल है, जो कि राजधानी को पाकिस्तानी सीमा और देश के पूर्वी प्रांतों से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग है. बाढ़ के चलते सलांग दर्रा भी बंद हो गया है. हिंदू कुश पर्वत शृंखला का यह दर्रा काबिल को देश के उत्तरी हिस्से से जोड़ता है.
अफगानिस्तान में आपदाएं क्यों ज्यादा नियमित होती जा रही हैं?
पिछले कुछ सालों के दौरान अफगानिस्तान में चरम मौसम का संकट गंभीर होता गया है. सिपरी (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट) ने अपनी 2023 की फैक्टशीट में देश को जलवायु परिवर्तन के असर के प्रति बहुत संवेदनशील माना है. यहां चरम मौसम की घटनाएं ज्यादा नियमित होती जा रही हैं.
तापमान भी वैश्विक औसत के मुकाबले ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहा है. जलवायु के ये कारक जब चार दशक लंबे युद्ध की विरासत, आर्थिक संकट और बदहाल बुनियादी ढांचे के साथ मिलते हैं तो प्राकृतिक आपदाओं का असर कई गुना बढ़ जाता है. ऊपर से, आपदा की स्थिति में आपातकालीन मानवीय सहायता पहुंचाने की व्यवस्था भी जटिल है. ऐसे में, आपदाओं का सामना करने या उनके असर को कम करने के मामले में लोग ज्यादा असुरक्षित और असहाय हो जाते हैं.
सिपरी की रिपोर्ट बताती है कि बदल रहा तापमान, पिघलती बर्फ और बरसात जैसे कारक सूखा और बाढ़ जैसी मौसमी घटनाओं को प्रभावित करते हैं, लेकिन इनका असर एक जैसा नहीं है. देश के अलग-अलग ईकोलॉजिकल हिस्सों में अलग पैटर्न नजर आता है. चाहे धीमी गति से होने वाली मौसमी घटनाएं हों या औचक आईं आपदाएं, अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन इन्हें ना केवल ज्यादा नियमित बनाएगा बल्कि इनकी तीव्रता भी बढ़ाएगा.
जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा असुरक्षित देशों में है अफगानिस्तान
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के जिन देशों की हालत सबसे संवेदनशील है, उनमें अफगानिस्तान शीर्ष के देशों में है. जर्मन वॉच के 'क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021' में जलवायु से सबसे ज्यादा असुरक्षित देशों की सूची में अफगानिस्तान छठे नंबर पर था. तापमान में हो रही बढ़ोतरी को देखें, तो साल 1951 से 2020 के बीच हवा का औसत सालाना तापमान (मीन एनुएल टेम्परेंचर्स) 1.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है. जबकि इस अवधि में वैश्विक औसत 1.5 डिग्री सेल्सियस था.
मौसम ने प्रभावित की 24 करोड़ बच्चों की पढ़ाई
हालांकि, यह वृद्धि समूचे देश में एकसार नहीं है. ऊंचाई और भूभागीय बनावट के हिसाब से अंतर है. मसलन, हिंदू कुश इलाके में सबसे कम 0.6 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ. सबसे अधिक करीब 2.4 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी पूर्वी हिस्सों में दर्ज की गई. साल 2021 में मीन एनुएल टेम्परेचर 14.3 डिग्री मापा गया. साल 1901 के बाद से यह सबसे ज्यादा आंकड़ा था.
सिपरी के मुताबिक, अनुमान है कि 2050 तक तापमान में 1.7–2.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो सकती है. यानी, अफगानिस्तान में तापमान वैश्विक औसत से ज्यादा तेजी से बढ़ने की आशंका है. एक तरफ तापमान बढ़ रहा है, दूसरी तरफ बारिश घट रही है. 1997 के बाद से लगभग हर साल सूखा या सूखे जैसे हालात रहे हैं है. बीता साल, पिछले तीन दशकों में सबसे बदतर सूखा माना गया. उससे पहले 2022 को भी यही कहा गया था.
यूनाइटेड नेशन्स ऑफिस फॉर दी कॉर्डिनेशन ऑफ ह्यूमैनिटेरियन अफेयर्स (ओसीएचए) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कम-से-कम 60 फीसदी आबादी सिंचाई के लिए खेती पर निर्भर है. ऐसे में एक के बाद एक "सबसे सूखे साल" का रिकॉर्ड मानवीय संकट को गाढ़ा करता जा रहा है. ओसीएचए के मुताबिक, जमीन के रेगिस्तानीकरण यानी आमतौर पर सूखे के कारण उपजाऊ जमीन के मरुस्थल बनने की प्रक्रिया ने उत्तरी, पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में 75 फीसदी से ज्यादा भूमि को चपेट में ले लिया है. मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि पैदावार घटती जा रही है. नतीजा, गरीबी और विस्थापन में इजाफा.
अफगानिस्तान का मौसम, यहां की बदलती जलवायु, सूखे की बढ़ती अवधि फिलहाल भले ही बस अफगानिस्तान की समस्या लगे, लेकिन ये पड़ोसी देशों को भी चपेट में ले सकती है. अफगानिस्तान आसपास के इलाके के सबसे बड़े, ताजे पानी के नवीकरणीय स्रोत हिंदू कुश शृंखला के केंद्र में है. जर्मन थिंक टैंक 'हेनरिष बोल श्टिफटुंग' की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की 276 ट्रांस-बाउंड्री नदियों में से चार नदियों का हिस्सा है. जब नदी का पानी एक से ज्यादा देश साझा करते हैं, तो पानी की उपलब्धता और प्रबंधन काफी संवेदनशील मुद्दा बन जाता है.
जितने तरह का सूखा, उतनी तरह की समस्याएं
मसलन, हेलमंद नदी अफगानिस्तान में जन्म लेकर दक्षिणपश्चिम की ओर बढ़ते हुए ईरान के सिस्तान बेसिन जाती है. हेलमंद नदी के पानी के बंटवारे पर दोनों देशों में पुराना विवाद रहा है. वहीं पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच नौ नदियां बहती हैं, लेकिन पानी के साझा प्रबंधन या बंटवारे के लिए दोनों देशों में कोई आधिकारिक समझौता नहीं है. जैसे-जैसे जलवायु से जुड़ी समस्याएं और प्रचंड होती जाएंगी और मीठे पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन सिमटते जाएंगे, उनपर तनाव और संघर्ष बढ़ने की आशंका है.
भारत में बीते दिनों कई न्यूज प्लेटफॉर्मों और न्यूज कंटेंट क्रिएटरों के सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी लगा दी गई। प्रेस क्लब ने इसे ‘ऑनलाइन सेंसरशिप’ करार देते हुए ‘मनमाना और संविधान का उल्लंघन’ करने वाला बताया है।
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा का लिखा-
राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार के निर्देश पर कई न्यूज प्लेटफॉर्मों, न्यूज कॉटेंट क्रिएटरों, इन्फ्लूएंसरों और अन्य अकाउंटों पर पाबंदी लगाई गई है। उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा, ‘4पीएम का यूट्यूब चैनल बंद किया गया। फेसबुक ने नेशनल दस्तक, मॉलिटिक्स और राजीव निगम का अकाउंट बंद कर दिया। कश्मीर के ग्रेटर कश्मीर, राइजिंग कश्मीर समेत कई अकाउंटों को मेटा ने बंद किया है। ट्विटर पर एक्टिविस्ट संदीप और डॉक्टर निमो यादव के अकाउंटों को भी बंद किया गया।’
योगेंद्र यादव ने बीजेपी शासित केंद्र सरकार पर ‘पोस्टमैन’ को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। यहां पोस्टमैन से उनका आशय उन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों से है, जो जनता तक खबरें पहुंचाते हैं। योगेंद्र यादव ने कहा, ‘सोशल मीडिया अब इस सरकार के खिलाफ हो रहा है और सरकार डर रही है। घबराई हुई, बौखलाई हुई, डरी हुई सरकार क्या करती है, पोस्टमैन को पकडऩे की कोशिश करती है कि तुम्हें (ये काम) नहीं करने देंगे।’
‘डिजिटल प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही सरकार’
न्यूज प्लेटफॉर्म ‘मॉलिटिक्स’ ने इस मुद्दे पर 2 अप्रैल को ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इसमें शामिल हुए 'आम आदमी पार्टी' के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि अगर सभी यूट्यूब चैनलों पर इस तरह की निगरानी शुरू हो गई, तो कोई भी सही खबर नहीं दिखा पाएगा। उन्होंने आरोप लगाया, ‘सरकार पहले ही टीवी मीडिया को नियंत्रित कर चुकी है और अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।’
संदीप सिंह का एक्स अकाउंट भी भारत में बंद कर दिया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने हाथों में जंजीर बांधकर इसका विरोध कियासंदीप सिंह का एक्स अकाउंट भी भारत में बंद कर दिया गया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने हाथों में जंजीर बांधकर इसका विरोध किया
इससे पहले संजय सिंह ने भी संसद में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है और उसके विरोध में उठती आवाजों को निशाना बना रही है।
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाया। उन्होंने भी आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बना दिया गया है, ‘मेरे देश और मेरी सरकार में फर्क है। ये फर्क 75 साल पहले भी था और ये फर्क 75 साल बाद भी रहना चाहिए।’
‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ ने भी इस विषय पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को निशाना बनाते हुए जारी किए गए टेकडाउन आदेशों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जहां क्रिएटरों को ब्लॉक कर दिया गया है या उनका कंटेंट हटा दिया गया है।’
प्रेस क्लब ने इस कार्रवाई को ‘ऑनलाइन सेंसरशिप’ करार देते हए कहा कि यह ‘मनमानी और संविधान का उल्लंघन’ करने वाली है।
.St. Augustine of Hippo
"Faith is to believe what you do not see; the reward of this faith is to see what you believe."
."St. Augustine (born November 13, 354, Tagaste, Numidia [now Souk Ahras, Algeria]—died August 28, 430, Hippo Regius [now Annaba, Algeria]; feast day August 28) was the bishop of Hippo from 396 to 430, one of the Latin Fathers of the Church, and perhaps the most significant Christian thinker after St. Paul. Augustine’s adaptation of classical thought to Christian teaching created a theological system of great power and lasting influence. His numerous written works, the most important of which are Confessions (c. 400) and The City of God (c. 413–426), shaped the practice of biblical exegesis and helped lay the foundation for much of medieval and modern Christian thought. In Roman Catholicism he is formally recognized as a doctor of the church.
(Read Britannica’s biography of the first Augustinian pontiff, Pope Leo XIV.)
Augustine is remarkable for what he did and extraordinary for what he wrote. If none of his written works had survived, he would still have been a figure to be reckoned with, but his stature would have been more nearly that of some of his contemporaries. However, more than five million words of his writings survive, virtually all displaying the strength and sharpness of his mind (and some limitations of range and learning) and some possessing the rare power to attract and hold the attention of readers in both his day and ours. His distinctive theological style shaped Latin Christianity in a way surpassed only by Scripture itself. His work continues to hold contemporary relevance, in part because of his membership in a religious group that was dominant in the West in his time and remains so today..."
इरावती कर्वे भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट के साथ-साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता भी थीं। जर्मनी में पीएचडी करते हुए उन्होंने अपने नाजी प्रोफेसर की नस्लभेदी थिअरी को गलत साबित किया था।
डॉयचे वैले पर रितिका की रिपोर्ट-
इरावती कर्वे को भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट के तौर पर जाना जाता है। हालांकि, बेहद कम लोगों को यह जानकारी है कि इरावती ने जर्मनी आकर अपनी पीएचडी पूरी की थी। 1920 के दशक में पीएचडी के दौरान ही उन्होंने अपने नाजी प्रोफेसर यूजीन फिशर की नस्लभेदी थिअरी को गलत साबित किया था।
इरावती का जन्म 15 दिसंबर 1905 बर्मा (अब म्यांमार) में हुआ था। उनके पिता गणेश करमरकर ने बर्मा की सबसे प्रमुख नदी ‘इरावडी’ के नाम पर बेटी को इरावती नाम दिया। वह बचपन से ही पढऩे-लिखने में बेहद होशियार थीं।
उस दौर में लगभग हर डिग्री के लिए उन्हें कोई-न-कोई स्कॉलरशिप जरूर मिली थी। साल 1926 में पुणे के फग्र्यूसन कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में अपनी ग्रैजुएशन पूरी की। इसके बाद मास्टर्स की डिग्री के लिए उन्हें बॉम्बे यूनिवर्सिटी से दक्षिणा फेलोशिप मिली।
आजाद खयाल थीं इरावती कर्वे
इरावती उस जमाने में भी अपने दौर से कहीं आगे की सोच रखती थीं। 1920 के दशक में एक भारतीय लडक़ी का स्कूटर चलाना, स्विमसूट पहनना या फिर अपनी मर्जी से शादी करना नामुमकिन सी बात लगती है। लेकिन इरावती ने ये सब करके दिखाया था।
उन्होंने दिनकर धोंडो कर्वे से शादी की। दिनकर एक प्रगतिशील और समाज सुधारकों के परिवार से आते थे। उन्होंने इरावती के हर फैसले में उनका साथ दिया था। इसलिए जब इरावती ने बर्लिन जाकर डॉक्टरेट करने का फैसला किया तो उनके पिता और ससुर दोनों नाराज हुए, लेकिन पति दिनकर ने साथ दिया। कर्वे ने खुद भी जर्मनी से पढ़ाई की थी, इसलिए उन्हें लगा कि इरावती की पीएचडी के लिए जर्मनी मुफीद जगह होगी।
इरावती कर्वे की नातिन और लेखिका उर्मिला देशपांडे बताती हैं, ‘वे उस जमाने में पीएचडी करने इसलिए आ पाईं क्योंकि उनके पति साथ खड़े थे। यह मुख्य वजह थी। और, ऐसा करने की उनकी अपनी इच्छाशक्ति भी इसके पीछे थी। मैंने अपनी किताब में भी लिखा है कि मैं सात साल की थी, जब उनकी मौत हुई तो एक व्यस्क के तौर पर मैं उन्हें नहीं जानती। लेकिन वो एक बेहद दृढ़ निश्चय वाली आत्मविश्वास से भरपूर इंसान थीं।’
भारत से बर्लिन तक का सफर
साल 1927 में इरावती ने जर्मनी आकर पीएचडी करने का फैसला किया। तब भारत से जर्मनी की कोई सीधी फ्लाइट तो थी नहीं। पानी के जहाज में कई हफ्तों का सफर तय करके वह हैम्बर्ग पोर्ट पहुंचीं और वहां से बर्लिन की ट्रेन पकड़ी।
इरावती को ‘काइजर विलहेल्म इंस्टीट्यूट ऑफ एंथ्रोपॉलजी’ में रिसर्च के लिए दाखिला मिला था। उनके पीएचडी सुपरवाइजर थे, जर्मन वैज्ञानिक प्रोफेसर यूजीन फिशर। यह वही शख्स थे, जिन्होंने यह ‘थिअरी’ सामने रखी थी कि वाइट यूरोपियंस की खोपड़ी एसिमेट्रिकल होती है। उनके दिमाग का दाईं तरफ का हिस्सा ज्यादा बड़ा होता है, जो उनकी श्रेष्ठता का सबूत है।
फिशर ने इरावती को एक टास्क दिया, जिसमें उन्हें यूरोपीय नस्ल की खोपडिय़ों की तुलना दूसरी नस्लों की खोपडिय़ों से करनी थी। और, यह साबित करना था कि यूरोपीय नस्ल ज्यादा तार्किक और समझदार होती है। इसके लिए इरावती को 149 इंसानी खोपडिय़ों पर यह स्टडी करनी थी।
स्टडी में शामिल दूसरी नस्लों की खोपडिय़ां रवांडा, तंजानिया और मेलानेशिया से थीं। तब इनमें से कुछ इलाके जर्मनी की कॉलनी हुआ करते थे। उर्मिला देशपांडे ने अपनी किताब में लिखा है अपनी रिसर्च के दौरान इरावती इन खोपडिय़ों से माफी मांगती थीं।
भारत में बीते दिनों कई न्यूज प्लेटफॉर्मों और न्यूज कंटेंट क्रिएटरों के सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी लगा दी गई. प्रेस क्लब ने इसे "ऑनलाइन सेंसरशिप" करार देते हुए "मनमाना और संविधान का उल्लंघन" करने वाला बताया है.
डॉयचे वैले पर आदर्श शर्मा की रिपोर्ट –
राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार के निर्देश पर कई न्यूज प्लेटफॉर्मों, न्यूज कॉटेंट क्रिएटरों, इन्फ्लूएंसरों और अन्य अकाउंटों पर पाबंदी लगाई गई है. उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा, "4पीएम का यूट्यूब चैनल बंद किया गया. फेसबुक ने नेशनल दस्तक, मॉलिटिक्स और राजीव निगम का अकाउंट बंद कर दिया. कश्मीर के ग्रेटर कश्मीर, राइजिंग कश्मीर समेत कई अकाउंटों को मेटा ने बंद किया है. ट्विटर पर एक्टिविस्ट संदीप और डॉक्टर निमो यादव के अकाउंटों को भी बंद किया गया."
योगेंद्र यादव ने बीजेपी शासित केंद्र सरकार पर "पोस्टमैन" को निशाना बनाने का आरोप लगाया है. यहां पोस्टमैन से उनका आशय उन डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों से है, जो जनता तक खबरें पहुंचाते हैं. योगेंद्र यादव ने कहा, "सोशल मीडिया अब इस सरकार के खिलाफ हो रहा है और सरकार डर रही है. घबराई हुई, बौखलाई हुई, डरी हुई सरकार क्या करती है, पोस्टमैन को पकड़ने की कोशिश करती है कि तुम्हें (ये काम) नहीं करने देंगे."
"डिजिटल प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही सरकार"
न्यूज प्लेटफॉर्म 'मॉलिटिक्स' ने इस मुद्दे पर 2 अप्रैल को 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया. इसमें शामिल हुए 'आम आदमी पार्टी' के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि अगर सभी यूट्यूब चैनलों पर इस तरह की निगरानी शुरू हो गई, तो कोई भी सही खबर नहीं दिखा पाएगा. उन्होंने आरोप लगाया, "सरकार पहले ही टीवी मीडिया को नियंत्रित कर चुकी है और अब डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है."
इससे पहले संजय सिंह ने भी संसद में यह मुद्दा उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है और उसके विरोध में उठती आवाजों को निशाना बना रही है.
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाया. उन्होंने भी आरोप लगाया कि सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बना दिया गया है, "मेरे देश और मेरी सरकार में फर्क है. ये फर्क 75 साल पहले भी था और ये फर्क 75 साल बाद भी रहना चाहिए."
'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' ने भी इस विषय पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, "प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को निशाना बनाते हुए जारी किए गए टेकडाउन आदेशों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जहां क्रिएटरों को ब्लॉक कर दिया गया है या उनका कंटेंट हटा दिया गया है."
प्रेस क्लब ने इस कार्रवाई को "ऑनलाइन सेंसरशिप" करार देते हए कहा कि यह "मनमानी और संविधान का उल्लंघन" करने वाली है.
"बिना किसी नोटिस के बंद कर दिया गया फेसबुक पेज"
न्यूज प्लेटफॉर्म 'मॉलिटिक्स' के फेसबुक अकाउंट को करीब 4,48,000 लोग फॉलो करते थे. मॉलिटिक्स की डिप्टी एडिटर निवेदिता शांडिल्य के मुताबिक, 28 मार्च को रात 2 बजे के बाद मेटा की ओर से नोटिफिकेशन आया, "सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 के सेक्शन 79(3)(बी) के तहत, भारत सरकार/कानून प्रवर्तन से मिले नोटिस के आधार पर भारत में आपके कंटेंट तक पहुंच को रोक दिया गया है."
निवेदिता ने डीडब्ल्यू हिंदी को बताया कि इससे पहले मॉलिटिक्स को सरकार या मेटा की ओर से कोई नोटिस नहीं मिला था और अचानक ही उनके अकाउंट को भारत में बैन कर दिया गया. निवेदिता के मुताबिक, पेज को बैन करने के पीछे कोई वजह भी नहीं बताई गई है. उन्होंने बताया कि मॉलिटिक्स की टीम इस कार्रवाई के खिलाफ कानूनों विकल्पों पर विचार कर रही है और दिल्ली हाईकोर्ट जाने की योजना बना रही है.
12 साल पुराना फेसबुक पेज झटके में बंद हुआ
'नेशनल दस्तक' नाम का न्यूज प्लेटफॉर्म चलाने वाले शंभू कुमार सिंह बताते हैं कि उनका फेसबुक पेज करीब 12 साल पुराना था और सरकार के निर्देश पर उसे डाउन कर दिया गया. फेसबुक पर नेशनल दस्तक को करीब 14 लाख लोग फॉलो करते थे.
शंभू कुमार ने डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में कहा कि नेशनल दस्तक के जरिए हाशिये पर मौजूद समुदायों की आवाज उठाई जाती थी, जिनमें एससी-एसटी, ओबीसी वर्ग, महिलाएं और किसान शामिल हैं.
उन्होंने बताया कि मॉलिटिक्स की तरह, उनका पेज भी अचानक भारत में बंद कर दिया गया और इस कार्रवाई से पहले उन्हें किसी भी तरह का कोई नोटिस नहीं भेजा गया था. उन्होंने कहा कि वे कोई संस्थागत मीडिया हाउस नहीं हैं, उनके लिए कोई कानूनी या आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं है, इसलिए वे फिलहाल कोर्ट जाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं बल्कि फेसबुक की शर्तों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं.
इस मामले पर सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है. डीडब्ल्यू हिंदी ने सोशल मीडिया अकाउंटों पर पाबंदी के मुद्दे पर भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से टिप्पणी का अनुरोध किया था, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला.
-ललित मौर्य
कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की, जहां कुछ हजार सबसे अमीर लोगों के पास इतनी छिपी हुई दौलत है, जो दुनिया की आधी आबादी की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह सिर्फ असमानता की कहानी नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की कहानी है, जहां अमीरों के लिए नियम अलग और आम लोगों के लिए अलग हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों ने टैक्स से बचने के लिए विदेशों में इतनी संपत्ति छिपा रखी है, जो दुनिया की आधी गरीब आबादी (करीब 410 करोड़ लोगों) की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। यह खुलासा ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट में हुआ है, जो पनामा पेपर्स की 10वीं वर्षगांठ से पहले जारी की गई है।
दुनिया में गरीबी की बड़ी वजह ‘छिपा हुआ पैसा’
इसका मतलब कहीं न कहीं दुनिया में गरीबी की सबसे बड़ी वजह पैसे की कमी नहीं, बल्कि छिपा पैसा है। जब करोड़ों लोग बेहतर अस्पताल, स्कूल और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उसी समय दुनिया के सबसे अमीर लोग अपनी खरबों डॉलर की संपत्ति टैक्स हेवन में छिपा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में करीब 3.55 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति टैक्स हेवन देशों और गुप्त खातों में छिपाई गई। यह रकम फ्रांस की पूरी अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है और दुनिया के 44 सबसे कमजोर देशों की कुल जीडीपी के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है।
ऑक्सफैम के मुताबिक, टैक्स से छिपाई गई इस कुल संपत्ति का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोगों के पास है, यानी करीब 2.84 ट्रिलियन डॉलर की रकम इन लोगों ने दबा रखी है। वहीं, इस समूह के अंदर भी सबसे अमीर सुपर रिच 0.01 फीसदी लोगों के पास ही करीब 1.77 ट्रिलियन डॉलर संपत्ति छिपी हुई है।
ऑक्सफैम इंटरनेशनल के टैक्स विशेषज्ञ क्रिश्चियन हॉलम का कहना है, ‘पनामा पेपर्स ने एक ऐसी छिपी दुनिया का पर्दाफाश किया था, जहां सबसे अमीर लोग अपनी संपत्ति टैक्स और जांच से बचाने के लिए विदेशों में छिपा देते हैं। दस साल बाद भी यह सिलसिला जारी है और सुपर-रिच लोग अब भी भारी मात्रा में संपत्ति टैक्स हेवन यानी विदेशों के गुप्त खातों में छिपा रहे हैं।’
सऊदी में कारोबार छोडक़र भारत लौटे अशरफ अब सोशल मीडिया पर अपने बेटे की प्रगति दुनिया तक पहुंचा रहे हैं। केरल के शाबिन के ऑटिज्म की यात्रा को हर कोने से मिल रहा है प्यार।
डॉयचे वैले पर जीशान तिरमिजी की रिपोर्ट –
केरल के पलक्कड में रहने वाले अशरफ और रसीना को अपने बेटे शाबिन के बारे में तब चिंता होने लगी, जब दो-ढाई साल की उम्र में भी वह कुछ नहीं बोल पा रहा था। लोग अलग-अलग राय देते थे। लेकिन माता-पिता का दिल जो ठहरा, रसीना और अशरफ को महसूस हुआ कि बात कुछ और है।
शाबिन साढ़े चार साल का था, जब डॉक्टर ने बताया कि उसे स्पीच थेरपी की जरूरत है। उस समय रसीना गर्भवती थीं और अस्पताल आना-जाना मुश्किल था। अशरफ भी तब सऊदी अरब में थे, तो एक दिन रसीना ने रोते हुए उन्हें फोन किया और भारत लौटने को कहा।
अशरफ सऊदी अरब में फोटोग्राफी का काम कर रहे थे, लेकिन परिवार के लिए सबकुछ छोडक़र वापस चले आए। भारत में एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक ने बताया कि शाबिन को ऑटिज्म है। यह पहली बार था, जब अशरफ ने यह शब्द सुना। बेंगलुरू के एक बड़े अस्पताल में ऑटिज्म से प्रभावित दूसरे बच्चों और उनके माता-पिता को देखकर अशरफ को पहली बार स्थिति की गंभीरता समझ आई।
थेरपी की सीमाएं और संघर्ष की शुरुआत
भारत लौटने के बाद स्पीच थेरपी, ऑक्यूपेशनल थेरपी और कई तरह के मूल्यांकन शुरू हुए। खर्च बढ़ता गया पर सुधार धीमा था। डेढ़ साल तक लगातार कोशिश करने के बावजूद शाबिन के बोलने में खास प्रगति नहीं हुई।
आर्थिक मोर्चे पर भी चुनौती खड़ी हो चुकी थी। अशरफ के मुताबिक, वह सऊदी में जिन्हें अपना कारोबार सौंपकर आए थे उन्होंने धोखे से वह भी खत्म कर दिया था। फिर भी अशरफ ने हिम्मत नहीं हारी और छोटे पैमाने पर रबर की खेती कर परिवार का गुजारा शुरू किया।
स्पेशल स्कूल भेजने पर भी उन्हें संतोष नहीं मिला। स्कूल में थेरपी तो थी, लेकिन ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी थी। न बोलने में प्रगति हुई, न बिना शब्दों के होने वाली अभिव्यक्ति में। अशरफ मानते हैं कि स्पेशल स्कूल, डाउन सिंड्रोम या अन्य स्थितियों वाले बच्चों के लिए ठीक हो सकता है, पर ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लिए नहीं।
फिर मां ने थामी पढ़ाई की कमान
रसीना ने अपने इलाके के एक वरिष्ठ डॉक्टर से कुछ दिन की ट्रेनिंग ली। वहां उन्हें सिखाया गया कि ऑटिज्म वाले बच्चों को जबरदस्ती नहीं, बल्कि धैर्य और दोहराव से सिखाया जाता है। फिर तो रसीना ने घर को ही स्कूल बना दिया।
वह शाबिन को रोजमर्रा के हर काम में अपने साथ रखती थीं। खाना बनाना, सफाई, कपड़े तह करना, पानी भरना हर काम में शाबिन उनके साथ होता। धीरे-धीरे शाबिन ने भी कई काम सीख लिए। परिवार बताता है कि वह खूब ऐक्टिव हैं और अचानक सडक़ की ओर भी चल देता थे। तब शाबिन के चाचा ने घर के बाहर लकड़ी का एक बैरियर लगाया। कुछ ही दिनों में शाबिन समझ गए कि बैरियर के पार नहीं जाना है।
सोशल मीडिया की ताकत और जागरूकता का नया रास्ता
एक दिन अखबार पढ़ते समय अशरफ ने नोटिस किया कि शाबिन एक घंटे तक शांत बैठा रहा। यह उनके लिए हैरान करने वाली बात थी। उन्होंने तस्वीर खींची और फेसबुक पर डाल दी। लोगों की प्रतिक्रिया अप्रत्याशित थी। सवाल आने लगे कि यह बच्चा कौन है।
यहीं से रोजमर्रा के वीडियो पोस्ट करने की शुरुआत हुई- कपड़े तह करना, खाना, संगीत सुनना, साफ-सफाई में मदद करना। कुछ ही महीनों में दुनियाभर से कई लोग उनके साथ जुड़ गए। अशरफ बताते हैं कि उनकी ऑडियंस में 70 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनकी उम्र 30 से 60 साल के बीच है। खासकर वे महिलाएं, जो स्पेशल बच्चों की परवरिश कर रही हैं।
आज फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लोग न सिर्फ शाबिन को देखते हैं बल्कि कमेंट और फोन के जरिये प्यार और हौसला भी देते हैं। सोशल मीडिया ने इस परिवार को आवाज दी है। साथ ही, शाबिन की यात्रा ने हजारों परिवारों के बीच नई जागरूकता भी जगाई है।
“जाम में फंसे आम आदमी को महंगाई, अशिक्षा, इलाज के नाम पर लूट, शिक्षा के नाम पर डकैती जैसी सांसारिक चीजें तुच्छ लगने लगेंगी”
सुल्तान का दरबार सजा हुआ था पर गजब की खामोशी थी। सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक अपने स्मार्टफोन पर रील पर रील स्क्रोल किए जा रहे थे। थोड़ी देर यूं ही चलता रहा। इससे पहले कि बाकी दरबारी भी रील देखना शुरू करते सुल्तान के चीफ वजीर ख्वाजा जहान उठे और अदब से सलाम करते हुए जेब से एक कागज निकाला और पढ़ने लगे, “सर जी! दरबार चलने का एक मिनट का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपए है। इस दर से एक दिन का खर्च लगभग 9 करोड़ रुपए से अधिक आता है। इसमें वजीरों के वेतन-भत्ते, यात्रा, सुरक्षा इत्यादि शामिल हैं। हर मिनट का यह खर्च टैक्सपेयर पर बोझ डालता है। सूत्रों ने आरटीआई लगाकर जानना चाहा है कि सुल्तान आखिर किस चिंता में डूबे हैं?”
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने अपनी आवाज में किसी दार्शनिक की खनक लाते हुए कहा, “ख्वाजा जहान, किसी ने सही कहा है कि कभी किसी को मुकम्मल जहान नहीं मिलता। अब मुझे ही देख लो, मेरी मुद्रा नीति फेल हो गई है, विदेश नीति का हाल देख ही रहे हो। सोचा था दौलताबाद शिफ्ट कर जाऊंगा पर वह भी नहीं हुआ। देश में बेरोजगारी, महंगाई आसमान छू रही है। गैस को लेकर मारामारी हो रही है और सामने कई राज्यों में चुनावी युद्ध होने वाले हैं। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि करूं तो क्या करूं? ऐसे में मैं रील न देखूं तो क्या करूं?”
ख्वाजा जहान बोले, “मैं किसी फिल्मी सड़क की नहीं बल्कि अपने राज्य की सड़कों की बात कर रहा हूं। अब आप क्रोनोलॉजी समझिए। सबसे पहले हमें सड़कों का मुआयना करना होगा। देखा जाए तो एक भी सड़क, सड़क कहलाने लायक बची नहीं है पर जहां भी कोई ढंग की सड़क दिखेगी हम उसको जहां-तहां खोद देंगे। इस पवित्र कार्य में हमारे सरकारी विभाग हमारी मदद के लिए सदैव तत्पर हैं। कभी किसी सड़क को हमारा बिजली-विभाग खोदकर भाग जाएगा तो कभी किसी दूसरी सड़क को जल-विभाग। कहीं गहरे सीवर के नाम पर खोदेंगे तो कहीं पर गैस पाइपलाइन के नाम पर। कभी किसी सड़क को पुल बनाने के नाम पर खोद दिया जाएगा तो कभी किसी को मेट्रो लाइन बिछाने के नाम पर।”
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने मासूमियत से पूछा, “भला इससे महंगाई, गैस की कमी, बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान कैसे होगा?”
ख्वाजा जहान ने कहा, “इससे यातायात ठप्प हो जाएगा। रियाया इस पहेली में रहेगी कि आखिर क्यों “मंजिलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह।” जैसे आत्मा एक शरीर से निकलकर दूसरे में जा घुसती है, उसी तरह एक आम नागरिक एक ट्रैफिक जाम से निकल कर दूसरे में जा फंसेगा। जल्द ही वह लगभग आध्यात्मिक हो जाएगा और यह सोचने लगेगा कि कैसे इस ट्रैफिक जाम के चक्र से मुक्ति मिले? यही मोक्ष की अवस्था है। ऐसे में उसके सामने महंगाई, अशिक्षा, इलाज के नाम पर लूट, शिक्षा के नाम पर डकैती जैसी सांसारिक चीजें तुच्छ लगने लगेंगी। चुनावों से ठीक पहले हम सड़कों की मरम्मत कर देंगे। जनता खुश हो जाएगी और हम चुनाव जीत जाएंगे। एक बार चुनावों के हो जाने के बाद हम एक बार फिर से पूरी प्रक्रिया को शुरू कर देंगे।”
सुल्तान को प्लान इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे राज्य का राज-प्लान घोषित कर दिया और अगले हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज करते रहे। (hindi.downtoearth.org.in/)


