विचार/लेख

13-Jan-2021 8:36 PM 30

देश में अडल्टरी को जुर्म की श्रेणी से हटाए जाने के तीन साल बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि सेना में अडल्टरी को जुर्म ही रहने दिया जाए. सरकार का कहना है कि इससे सेना में अनुशासन के पालन पर असर पड़ता है.

    डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा -

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में अडल्टरी को डीक्रिमिनलाइज कर दिया था यानी यह कह दिया था कि अब से उसे जुर्म नहीं माना जाएगा. 2018 के फैसले के पहले यह भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत एक जुर्म था और इसके लिए पांच साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान था. तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा था कि "अडल्टरी एक जुर्म नहीं हो सकता और इसे जुर्म होना भी नहीं चाहिए."

लेकिन तीनों सेनाओं की तरफ से सरकार का कहना है कि सेनाओं को 2018 के आदेश से बाहर रखा जाना चाहिए क्योंकि उनके अपने नियमों में अडल्टरी को एक संगीन जुर्म के रूप में देखा जाता है और दोषी पाए जाने वाले को नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है. केंद्र की इस अपील पर अदालत ने अभी फैसला नहीं दिया है और चीफ जस्टिस से कहा है कि वो इस मामले को सुनने के लिए पांच जजों की एक संवैधानिक पीठ का गठन करें.

सरकार का कहना है कि सेना के कर्मी जब सीमा पर या दूर-दराज इलाकों में लंबे समय तक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में तैनात रहते हैं तो ऐसे में वे अपने परिवार के प्रति निश्चिन्त रहें, इसलिए सेना उनके परिवार का ध्यान रखती है. सरकार का कहना है कि ऐसे में सेना के दूसरे कर्मी या अधिकारी जब उनके परिवार वालों से मिलने जाएंगे तब अपने परिवार से दूर तैनात कर्मियों को यह चिंता सताएगी की उनका "परिवार" कोई "प्रतिकूल गतिविधि" तो नहीं कर रहा. सरकार का कहना है कि ऐसे में अडल्टरी को एक जुर्म बनाए रखना बेहद अनिवार्य है.

सरकार ने यह भी कहा है कि अनुशासन सेनाओं में काम करने की संस्कृति की रीढ़ है और इस अनुशासन के पालन के लिए संविधान संसद को सेनाओं के अंदर कुछ मौलिक अधिकारों को दिए जाने से भी रोका जा सकता है. जानकारों का कहना है कि हालांकि आर्मी एक्ट में अडल्टरी का कहीं भी जिक्र नहीं है, फिर भी सेना में "अपने सहयोगी अधिकारी की पत्नी के स्नेह को चुरा लेना" एक संगीन जुर्म माना जाता है और ये सेना के नियमों के तहत "अनुचित व्यवहार" की परिभाषा में आता है.

भारतीय सेना के कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी भी अडल्टरी को जुर्म बनाए रखनी की जरूरत में विश्वास रखते हैं. सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डी एस हूडा ने डीडब्ल्यू को बताया कि अडल्टरी को सेना में सख्त नापसंद किया जाता है और सेना में अनुशासन बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि उसे एक जुर्म ही समझा जाए. उनका कहना है कि सेना के कर्मी काफी करीब और बंद समुदायों में रहते हैं और सबके एक दूसरे से निजी ताल्लुकात होते हैं.

ऐसे में जूनियर और सीनियर अफसर या उनकी पत्नियों को लेकर ऐसा कुछ हुआ तो पूरा माहौल बिगड़ जाता है. लेफ्टिनेंट जनरल डी एस हूडा का यह भी कहना है कि भारत में ही नहीं बल्कि सभी देशों में सेना का अपना संगठनात्मक सदाचार होता और एक विशिष्ट सैन्य न्याय प्रणाली होती है जो आम न्याय प्रणाली से अलग होती है.

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल उत्पल भट्टाचार्य ने डीडब्ल्यू को बताया कि सेना में एक कमांड प्रणाली होती है और इस वजह से किसी भी विषय को 'ग्रे एरिया' या अस्पष्ट स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता. उनका कहना है कि सेना में इस तरह की "लेजे फेयर" छूट देना अनुशासनहीनता की तरफ बढ़ने की शुरुआत है. लेफ्टिनेंट जनरल उत्पल भट्टाचार्य ने यह भी बताया कि वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना में ऐसी चीजें देखी गई थीं और वहीं से अमेरिकी सेना की हार की शुरुआत हो गई थी. (dw.com)

 


12-Jan-2021 2:05 PM 40

फेसबुक और ट्विटर ने डॉनल्ड ट्रंप के अकाउंट बंद कर दिए हैं. डॉयचे वेले की मुख्य संपादक मानुएला कास्पर क्लैरिज का कहना है कि सिर्फ इतना कर देने से ये कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकतीं.

   डॉयचे वैले पर मानुएला कास्पर क्लैरिज का लिखा

सोशल मीडिया के विशाल स्तंभ - अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप - को गिरा दिया गया है. ऐसा किसी छोटी मोटी ताकत ने नहीं बल्कि बड़े दिग्गजों ने किया है - ट्विटर, फेसबुक, गूगल, एप्पल और एमेजॉन ने. अपने सबसे लोकप्रिय यूजर को हटा कर उन्होंने साफ कर दिया है कि उनके प्लेटफॉर्म पर कौन अपने विचार व्यक्त करेगा और कैसे.

ट्विटर के 8.8 करोड़ फॉलोअर और फेसबुक उन्हें लाइक करने वाले 3.5 करोड़ लोगों  को अब उनकी नस्लवादी और खतरनाक टिप्पणियां पढ़ने को नहीं मिलेंगी.  सोशल मीडिया पर अमेरिकी राष्ट्रपति का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है.

डॉनल्ड ट्रंप अपने अकाउंट का इस्तेमाल अपने विरोधियों के खिलाफ हथियार के तौर पर कर रहे थे. "हेट स्पीच" और "फेक न्यूज" उनके ट्रेडमार्क थे. उनके ट्वीट का क्या असर हो सकता था यह वॉशिंगटन में संसद पर हमले से साफ हो गया. 

खैर, लोग कह रहे हैं कि अब वहां शांति है और इसे देख मैंने भी राहत की सांस ली. लेकिन कुछ ही देर के लिए. क्योंकि अगर हमें अभिव्यक्ति की आजादी चाहिए तो हमें दूसरों को भी अभिव्यक्ति की आजादी देनी होगी. मैं यह जान कर थोड़ी बेचैन हो रही हूं कि मुट्ठी भर लोग मिल कर किसी के लिए दुनिया के सबसे प्रभावशाली प्लेटफॉर्मों के दरवाजे बंद कर सकते हैं.

हमें एक बात समझनी होगी - हम यहां हेट स्पीच या फेक न्यूज का साथ नहीं दे रहे हैं. इनकी पहचान करना, इन्हें सामने लाना और फिर डिलीट करना ही होगा. यह काम इन प्लेटफॉर्म को चलाने वालों का है. पिछले कुछ महीनों में उन्होंने यह काम करना शुरू भी किया है लेकिन हिचकिचाहट के साथ.

मई की बात है जब ट्विटर ने पहली बार राष्ट्रपति ट्रंप के दो ट्वीट पर चेतावनी जारी कर दी थी. उसके बाद से ट्वीट पर वॉर्निंग देने का और उन्हें डिलीट करने का सिलसिला लगातार जारी रहा. हर कोई देख सकता था कि ट्रंप के कुछ बयान कितने बेबुनियाद और खतरनाक थे. यह एक अच्छा कदम था.

हालांकि अकाउंट को ही बंद कर देना - यह तो बहुत आसान था. प्लेटफॉर्म चलाने वाले अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं. डॉनल्ड ट्रंप के बिना भी इन प्लेटफॉर्म पर लाखों करोड़ों चीजें ऐसी हैं जिनसे हेट स्पीच, फेक न्यूज और प्रोपगैंडा फैलाया जा रहा है. इसे देखते हुए ट्विटर, फेसबुक और दूसरी कंपनियों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी होगी. उन्हें लगातार पोस्ट डिलीट करनी होंगी और जहां जरूरी हो, वहां उन पर फेक न्यूज का ठप्पा लगाना होगा.

ट्रंप समर्थकों का बवाल
हाल के कई सालों में अमेरिका से इस तरह की तस्वीरें सामने नहीं आई हैं. सत्ता हस्तांतरण से पहले हिंसा और बवाल ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को हिला कर रख दिया. आरोप ट्रंप समर्थकों पर लगा कि उन्होंने कैपिटल हिल में घुसकर तोड़फोड़ की और उस पर कब्जे की कोशिश की.

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये सोशल नेटवर्क विचार व्यक्त करने के लिए अहम माध्यम हैं, खास कर उन देशों में जहां मीडिया पूरी तरह आजाद नहीं है. लेकिन जब कुछ कंपनियों के बॉस बाजार पर हावी हो जाते हैं और अपनी ताकत का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आजादी के नियमों को तय करने के लिए करते हैं, तो यह किसी भी तरह से लोकतांत्रिक नहीं कहे जा सकता.

वक्त आ गया है कि हम फेसबुक, ट्विटर और गूगल जैसी कंपनियों की ताकत को संजीदगी से समझें और लोकतांत्रिक तथा सही रूप से इन्हें नियंत्रित करें.

जर्मनी इस दिशा में पहला कदम उठा चुका है. 1 जनवरी 2018 को देश में नेटवर्क एन्फोर्स्मेंट एक्ट (नेट्स डीजी) प्रभाव में आया. इसके तहत सोशल नेटवर्क कंपनियां फेक न्यूज और हेट स्पीच को रोकने के लिए बाध्य हैं.

यूरोपीय आयोग ने इस कानून का स्वागत किया था. तब से अन्य सोशल मीडिया कंपनियों को जर्मनी में सैकड़ों "कॉन्टेंट मॉडरेटरों" को नियुक्त करना पड़ा है जो पोस्ट की निगरानी करते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें डिलीट करते हैं.

सोशल मीडिया पर मौजूद आपत्तिजनक पोस्टों की विशाल संख्या को देखते हुए इसे महज एक शुरुआत ही कहा जा सकता है. लेकिन कम से कम शुरुआत हुई तो सही.

सीधे अकाउंट की बंद कर देना - जैसा कि डॉनल्ड ट्रंप के मामले में किया गया - यह यकीनन सही तरीका नहीं है. यह सिर्फ बड़ी टेक कंपनियों का अपनी जिम्मेदारी से भागने का एक आसान रास्ता है. 


12-Jan-2021 1:56 PM 41

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

कोरोना का टीका देश के लोगों को कैसे सुलभ करवाया जाएगा, इसके लिए केंद्र का स्वास्थ्य मंत्रालय पूरा इंतजाम कर रहा है लेकिन टीके के बारे में तरह-तरह के विचार भी सामने आ रहे हैं। कई वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में बने इस टीके का वैसा ही कठिन परीक्षण नहीं हुआ है, जैसा कि कुछ पश्चिमी देशों के टीकों का हुआ है। इसीलिए करोड़ों लोगों को यह टीका आनन-फानन क्यों लगवाया जा रहा है ? भोपाल में एक ऐसे व्यक्ति की मौत को भी इस तर्क का आधार बनाया जा रहा है, जिसे परीक्षण-टीका दिया गया था। संबंधित अस्पताल ने स्पष्टीकरण दिया है कि उस रोगी की मौत का कारण यह टीका नहीं, कुछ अन्य रोग हैं। कुछ असहमत वैज्ञानिकों का यह मानना भी है कि अभी तक यह ही प्रमाणित नहीं हुआ है कि किसी को कोरोना रोग हुआ है या नहीं ? उसकी जांच पर भी भ्रम बना हुआ है। किस रोगी को कितनी दवा दी जाए आदि सवालों का भी ठोस जवाब उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में 30 करोड़ लोगों को टीका देने की बात खतरे से खाली नहीं है। इसके अलावा पिछले कुछ हफ्तों से कोरोना का प्रकोप काफी कम हो गया है।

ऐसे में सरकार को इतनी जल्दी क्या पड़ी थी कि उसने इस टीके के लिए युद्ध-जैसा अभियान चलाने की घोषणा कर दी है ? कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार यह टीका-अभियान इसलिए चला रही है कि देश की गिरती हुई अर्थ-व्यवस्था और किसान-आंदोलन से देशवासियों का ध्यान हटाना चाहती है। विपक्षी नेता ऐसा आरोप न लगाएं तो फिर वे विपक्षी कैसे कहलाएंगे लेकिन टीके की प्रामाणिकता के बारे में हमारे वैज्ञानिकों पर हमें भरोसा जरुर करना चाहिए। रुस और चीन जैसे देशों में हमसे पहले ही टीकाकरण शुरु हो गया है। यह ठीक है कि अमेरिका और ब्रिटेन में टीके को स्वीकृति तभी मिली है जबकि उसके पूरे परीक्षण हो गए हैं लेकिन हम यह न भूलें कि इन देशों में भारत के मुकाबले कोरोना कई गुना ज्यादा फैला है जबकि उनकी स्वास्थ्य-सेवाएं हमसे कहीं बेहतर हैं। हमारे यहां कोरोना उतार पर तो है ही, इसके अलावा हमारे आयुर्वेदिक और हकीमी काढ़े भी बड़े चमत्कारी हैं। इसीलिए डरने की जरुरत नहीं है। यदि टीके के कुछ गलत परिणाम दिखेंगे तो उसे तुरंत रोक दिया जाएगा लेकिन लोगों का डर दूर हो, उसके लिए क्या यह उचित नहीं होगा कि 16 जनवरी को सबसे पहला टीका हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आगे होकर लगवाएं। जब अमेरिका के बाइडन, ब्रिटेन की महारानी और पोप भी तैयार हैं तो हमारे नेता भी पीछे क्यों रहें ?

 (नया इंडिया की अनुमति से)


12-Jan-2021 1:53 PM 41

-प्रकाश दुबे

2020 की चार सौ बीसी खत्म हुई। अच्छे दिन की खुशी में मन भर लड्?डू खाओ। छोटे मुंह इतनी बड़ी बात अदना इंसान नहीं करता। यह तो निर्मला सीतारामन के वश की बात है। कठिन समय में सरकारी तिजोरी भरने की कश्मकश के साथ बजट तैयार करने के साथ दोहरी जिम्मेदारी जबर्दस्त तरीके से निभाई। बानगी देखिए-ट्रेक्टरों की बिक्री बढऩे से साबित हुआ कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के कारण ग्रामीण क्षेत्र में परेशानी दूर हुई। महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के कारण रोजगार बढ़ोत्तरी और न्यूनतम समर्थन मूल्य की बदौलत रिकार्ड खरीदी से देहात खुशहाल हैं। दोपहिए, तिपहिए वाहनों और ट्रेक्टरों की बिक्री ऐसी बढ़ी कि मार्च 2020 के वाहन पंजीयन का मार्च 2020 का आंकड़ा मात खाएगा। इतनी सुहानी रपट वित्त मंत्रालय जारी कर चुका है। इस रपट के आधार पर बजट की चमक का अंदाज़ लगाकर खुश हो सकते हैं। बढ़ती आमदनी से खरीदे गए ट्रेक्टर दिल्ली परिक्रमा करने पर आमादा क्यों हैं? यह सोचकर परेशान होना आपका काम नहीं है। मुंह में लड्?डू रखकर मीठा बोलो।

कटी पतंग की डोर

पेशे से कूटनय भले हों, लेकिन हरदीप सिंह पुरी राजनीति में नए खिलाड़ी हैं। नागरिक विमान मंत्रालय ने 6 जनवरी से मुंबई और दिल्ली से विलायत जाने वालों के लिए उड़ानें शुरु कराईं। प्रवासी दिवस पर आने वाले भारतीयों तथा गणतंत्र दिवस पर ब्रितानी प्रधानमंत्री की मौजूदगी ने उम्मीद को पंख लगाए। इसलिए लगे हाथों सवारियों की भरमार का दावा कर डाला। बिकाऊ कतार में शामिल एयर इंडिया को रौनक लौटने की आस बंधी। महामारी के नए वायरस को साथ लाए कुछ यात्री ब्रिटेन से उडक़र आए थे। हवाई अड्?डे से कुछ सैलानियों के लापता होने से पूरी सरकार हैरान थी। इन दिनों चीन और पाकिस्तान सीमा से अधिक निगरानी दिल्ली के सिंघु बार्डर पर है। इसके बावजूद भगोड़े यात्रियों को दबोचने के लिए विमानतल पर पुलिस गश्त तेज कर दी गई है। बोरिस ने भारत यात्रा रद्द कर एयर इंडिया की उम्मीदों की पतंग सद्दी से काट दी। पेशे से पत्रकार। फिर राजनीति में घुस गया। तिस पर गोरा। यात्रा रद्द करने पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन के प्रति तीन तीन अपशब्द काफी हैं।

मनसुख का तन सुख

भारतीय जनता पार्टी का बुरा चाहने वालों के लिए बुरी खबर। भरूच के लोकसभा सदस्य मनसुख वसावा कमर और गले का दर्द से मुक्ति पा सकेंगे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखिया डाक्टश्र हैं और वैद्य भी बउ ओहदे पर हैं। संघ के किसी डाक्टर या वैद्य ने यह जानकारी नहीं दी। बहरहाल खबर पक्की है कि मनसुख भाई दिल्ली के नार्थ एवेन्यू-डुप्लेक्स में बने रहने के लिए राजी हो चुके हैं। गुजरात के आकाश पर पतंगें लहरा रहीं हैं। स्थानीय निकाय के चुनाव का मौसम है। आदिवासी समुदाय को बताया जा रहा है कि मनसुख भाई सचमुच खुश हैं। न संसद सदस्यता छोड़ी और न पार्टी। प्रधानमंत्री की पुकार पर मनसुख भाई वर्ष 2019 में तीन लाख के अंतर से जीते थे। अब फिर प्रधानमंत्री के आदेश पर मनसुख भाई ने नाराजगी को नर्मदा में ड़ुबकी लगवा दी। प्रधानमंत्री के चहेते नौकरशाह पर नकेल तो नहीं कस सके। भाजपा के किसी राजनीतिक आपरेशन करने वाले डाक्टर ने कहा-सांसद रहोगे तो कमर और गले का मुफ्त उपचार होगा। तनसुख की खातिर, भोला भाला मनसुख मान गया।  

पंचमेल खिचड़ी

कुछ धुरंधरों का वश चले तो अपने जैसे भारतीय नागरिक बंधुओं को चलता-फिरता पाकिस्तान साबित करने की कोशिश करने से न चूकें। प्रेम, पसंद और परिणय से पहले धर्म-परिवर्तन की पड़ताल के कानून बन रहे हैं। अध्यापक देवेन्द्र यादव का गांववालों से गहरा भाईचारा था। धार्मिक एकता का देवेन्द्र ने नया नुस्खा निकाला। बेटी का नाम नज्मा और और बेटे का सलीम रखा। नाम और धर्म में अंतर जानने वालों को हैरानी होती। पाठशाला सहित सरकारी कामकाज में आए दिन झंझट के बाद नज्मा नीलम हुई और शहजादे सलीम योगेन्द्र बने। किसानों की लड़ाई से जुड़े योगेन्द्र दो दिन मोर्चा छोडक़र गायब रहे। पिता देवेन्द्र यादव का अंतिम संस्कार करने के बाद वापस मोर्चे पर आ डटे। जाति और धर्म की संकीर्ण सरहद लांघकर किसानों के साथ जाड़े के थपेड़े सह रहे हैं। योगेन्द्र की मान्यता है कि खिचड़ी सेहत के लिए और मिली जुली संस्कृति देश की सेहत के लिए मुफीद हैं। 

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


11-Jan-2021 6:41 PM 21

केंद्र सरकार ने कृषि क़ानूनों को जिस तरह से पारित किया और उसके बाद शुरू हुए किसानों के विरोध प्रदर्शन को जैसे हैंडल किया गया है, उसे लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराज़गी जताई है.

सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहंती ने बीबीसी हिंदी को बताया कि केंद्र सरकार ने किसानों के मुद्दे को जिस तरह से हैंडल किया है, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नाराज़गी जताते हुए पूछा कि क्या हो रहा है?

कोर्ट ने सरकार से कहा, "आपने बिना पर्याप्त राय-मशविरा किए हुए एक ऐसा क़ानून बनाया है जिसका नतीजा इस विरोध प्रदर्शन के रूप में निकला है. आप लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, भारत सरकार को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी. अगर सरकार में ज़िम्मेदारी की कोई भावना होती तो आपको इन्हें थोड़े समय के लिए रोक लेना चाहिए था. आप क़ानून ला रहे हैं तो आप इसे बेहतर तरीक़े से कर सकते हैं."

चीफ़ जस्टिस अरविंद बोबडे की अध्यक्षता में तीन जजों की बेंच ने कृषि क़ानूनों और किसानों के विरोध प्रदर्शन के मुद्दे पर दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई की. इनमें द्रमुक के सांसद तिरुचि शिवा और राजद के सांसद मनोज झा की याचिकाएं भी थीं. इन लोगों ने कृषि क़ानूनों की संवैधानिक वैधता को लेकर सवाल खड़े किए हैं.

कोर्ट ने कहा, "हमें नहीं लगता कि केंद्र सरकार इस मामले को अच्छी तरह से हैंडल कर रही है. हमें आज ही कोई क़दम उठाना होगा. ये एक गंभीर मामला है. हम इस पर एक कमेटी गठित करने का प्रस्ताव रख रहे हैं. हम ये भी विचार कर रहे हैं कि अगले आदेश तक इन क़ानूनों के अमल पर रोक लगा दी जाए."

कमेटी के गठन का प्रस्ताव

इस मामले पर केंद्र सरकार के रवैये को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, "हमारा सुझाव है कि कमेटी के सामने बातचीत का रास्ता खोलने के लिए इन क़ानूनों के अमल पर रोक लगाई जाए. हम और कुछ नहीं कहना चाहते. विरोध प्रदर्शन जारी रखे जा सकते हैं. लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?"

"भले ही आपको भरोसा हो या न हो पर सुप्रीम कोर्ट अपना काम करेगा. भले ही आप प्रदर्शन स्थल पर अपना धरना जारी रखें या प्रदर्शन थोड़ा आगे बढ़े या किसी अन्य क्षेत्र में इसका दायरा बढ़े. हमें आशंका है कि इससे शांति भंग हो सकती है. अगर कुछ हुआ तो हममें से हर कोई इसके लिए ज़िम्मेदार होगा. हम नहीं चाहते कि हमारे हाथों पर किसी के ख़ून के छींटे पड़े. हम सुप्रीम कोर्ट हैं. हम वो करेंगे जो हमें करना है. इसे समझने की कोशिश कीजिए."

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा, "अगर केंद्र सरकार कृषि क़ानूनों के अमल को रोकना नहीं चाहती तो हम इस पर स्थगन आदेश देंगे. भारत सरकार को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी. आप (केंद्र) ये क़ानून ला रहे हैं तो आप ये बेहतर तरीक़े से कर सकते हैं."

शांति भंग की आशंका

कोर्ट ने ये भी कहा कि एक भी ऐसी याचिका नहीं दायर की गई है जिसमें इन क़ानूनों को अच्छा बताया गया हो. "अदालत ने पूछा, हम नहीं जानते हैं कि क्या बातचीत चल रही है? लेकिन क्या इन क़ानूनों को थोड़े समय के लिए रोका नहीं जा सकता है?"

"अगर हम लोग कृषि क़ानूनों के लागू किए जाने पर रोक लगा देते हैं तो आप अपना विरोध जारी रख सकते हैं. हम इस तरह की आलोचनाएं नहीं चाहते हैं कि कोर्ट प्रोटेस्ट दबा रहा है. इस पर ग़ौर किए जाने की ज़रूरत है कि क्या प्रदर्शनकारियों को वहां से थोड़ी दूर हटाया जा सकता है. सच कहें तो हमें ये आशंका है कि वहां कुछ ऐसा हो सकता है जिससे शांति भंग हो सकती है. भले ही ये इरादतन हो या फिर ग़ैर-इरादतन. हम ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सड़कों पर कोई हिंसा न हो."

"हम कृषि क़ानूनों के अमल पर रोक लगाएंगे. हम ये स्पष्ट करना चाहते हैं कि हम प्रदर्शन को दबा नहीं रहे हैं. आप विरोध-प्रदर्शन जारी रख सकते हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या विरोध प्रदर्शन उसी जगह पर जारी रहना चाहिए? अगर केंद्र सरकार क़ानून पर रोक नहीं लगाना चाहती, तो हम इन क़ानूनों के अमल पर रोक लगाएंगे."

क़ानूनों पर स्थगन आदेश

सुप्रीम कोर्ट में एक किसान संगठन की तरफ़ से पैरवी कर रहे सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने कहा, "इतना महत्वपूर्ण क़ानून संसद में ध्वनि मत से कैसे पारित किया जा सकता है? अगर सरकार गंभीर होती तो वो संसद का संयुक्त सत्र बुला सकती थी और सरकार ऐसा करने से संकोच क्यों कर रही है. किसानों को रामलीला मैदान में जाने की इजाज़त दी जानी चाहिए. हमें किसी क़िस्म की हिंसा में दिलचस्पी नहीं है."

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसलों में ये कहा गया है कि कोर्ट क़ानूनों पर स्थगन आदेश नहीं दे सकती है. वेणुगोपाल ने उन फ़ैसलों की नज़ीर सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी जिनमें कोर्ट ने ये कहा था कि क़ानूनों पर स्टे नहीं दिए जा सकते हैं.

उन्होंने कहा, "कोर्ट किसी क़ानून पर तब तक स्टे ऑर्डर नहीं दे सकता है जब तक कि कोर्ट ये मान ले कि वो क़ानून बिना किसी क़ानूनी अधिकार के पारित किया गया हो और उससे बुनियादी अधिकारों का हनन होता हो."

शांतिपूर्ण तरीक़े से विरोध प्रदर्शन

इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें ये कहते हुए अफ़सोस हो रहा है कि केंद्र सरकार की हैसियत से आप इस समस्या का हल नहीं निकाल पाए हैं. हालांकि अटॉर्नी जनरल ने ये कहा कि किसान शांतिपूर्ण तरीक़े से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

वेणुगोपाल ने कहा, "हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की रैली में जो कुछ हुआ, वो नहीं हो सकता है. 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय महत्व के दिन को बर्बाद करने के लिए किसान अपने ट्रैक्टर्स से राजपथ पर मार्च करने की योजना बना रहे हैं."

याचिकाकर्ताओं में से एक पक्ष की पैरवी कर रहे सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने कहा कि कुछ ऐसे तत्व हैं जिन्हें प्रदर्शन स्थल से हटाये जाने की ज़रूरत है. साल्वे ने कनाडा के एक संगठन का ज़िक्र किया जो 'जस्टिस फ़ॉर सिख' के बैनर तले पैसा जुटा रहा है.

याचिकाकर्ता एमएल शर्मा ने कहा कि संसद को कृषि क़ानून बनाने का कोई अधिकार नहीं था. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम आपकी दलीलें समझ नहीं पा रहे हैं. हम इस पर बाद में सुनवाई करेंगे.(bbc.com/hindi)

 


11-Jan-2021 2:25 PM 38

-शायन सरदारिज़ादेह और जेसिका लुसेनहोप

वाशिंगटन में जिस तरह की घटनाएं पिछले दिनों देखने को मिली हैं उससे काफी लोग सकते में हैं. लेकिन अति दक्षिणपंथी समूह और षड्यंत्रकारियों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखने वाले लोगों को ऐसे संकट का अंदाज़ा पहले से था.

अमरीकी राष्ट्रपति पद के लिए जिस दिन वोट डाले गए, उसी रात डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम के स्टेज पर आकर जीत की घोषणा की थी. उन्होंने कहा था, "हम लोग ये चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे हैं. साफ़ साफ़ कहूं तो हम यह चुनाव जीत चुके हैं."

उनका यह संबोधन उनके अपने ही ट्वीट के एक घंटे बाद हुआ था. उन्होंने एक घंटे पहले ही ट्वीट किया था, "वे लोग चुनाव नतीजे चुराने की कोशिश कर रहे हैं."

हालांकि उन्होंने चुनाव जीता नहीं था. कोई जीत नहीं हुई थी जिसे कोई चुराने की कोशिश करता. लेकिन उनके अति उत्साही समर्थकों के लिए तथ्य कोई अहमियत नहीं रखते थे और आज भी नहीं रखते हैं.

65 दिनों के बाद दंगाइयों के समूह ने अमरीका की कैपिटल बिल्डिंग को तहस नहस कर दिया. इन दंगाइयों में तरह तरह के लोग शामिल थे, अतिवादी दक्षिण पंथी, ऑनलाइन ट्रोल्स करने वाले और डोनाल्ड ट्रंप समर्थक क्यूएनॉन लोगों का समूह जो मानता है कि दुनिया को पीडोफाइल लोगों का समूह चला रहा है और ट्रंप सबको सबक सिखाएंगे. इन लोगों में चुनाव में धांधली का आरोप लगाने वाले ट्रंप समर्थकों का समूह 'स्टॉप द स्टील' के सदस्य भी शामिल थे.

वाशिंगटन के कैपिटल हाउस में हुए दंगे के करीब 48 घंटों के बाद आठ जनवरी को ट्विटर ने ट्रंप समर्थ कुछ प्रभावशाली एकाउंट को बंद करना शुरू किया, ये वैसे एकाउंट थे जो लगातार षड्यंत्रों को बढ़ावा दे रहे थे और चुनावी नतीजों को पलटने के लिए सीधी कार्रवाई करने के लिए लोगों को उकसा रहे थे. इतना ही नहीं ट्विटर ने इसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एकाउंट पर भी पाबंदी लगा दी. 88 मिलियन से ज़्यादा फॉलोअर वाले ट्रंप के एकाउंट पर पाबंदी लगाने के पीछे की वजह यह बताई गई है कि उनके ट्वीट से और ज़्यादा हिंसा भड़कने का ख़तरा है.

वाशिंगटन में हुई हिंसा से दुनिया सदमे है और लग रहा था अमेरिका में पुलिस और अधिकारी कहीं मौजूद नहीं हैं. लेकिन जो लोग इस घटना की कड़ियों को ऑनलाइन और अमरीकी शहरों की गलियों में जुड़ते हुए देख रहे थे उनके लिए यह अचरज की बात नहीं है.

चुनावी नतीजों को प्रभावित किया जा सकता है, ये बात वोट डाले जाने के महीनों पहले से डोनाल्ड ट्रंप अपने भाषणों और ट्वीट के ज़रिए कह रहे थे. चुनाव के दिन भी जब अमेरिकों ने मतदान करना शुरू किया था, तभी से अफ़वाहों का दौर शुरू हो गया था.

रिपब्लिकन पार्टी के पोलिंग एजेंट को फिलाडेल्फिया पोलिंग स्टेशन में प्रवेश की इजाज़त नहीं मिली. इस पोलिंग एजेंट के प्रवेश पर रोक वाला वीडियो वायरल हो गया. ऐसा नियमों को समझने में हुई ग़लती की वजह से हुआ था. बाद में इस शख़्स को पोलिंग स्टेशन में प्रवेश की इजाज़त मिल गई थी.

लेकिन यह उन शुरुआती वीडियो में शामिल था जो कई दिनों तक वायरल होते रहे. इसके साथ दूसरे वीडियो, तस्वीरों, ग्राफिक्स के ज़रिए एक नए हैशटैग '#स्टॉप द स्टील' के साथ आवाज़ बुलंद की जाने लगी कि मतदान में धांधली को रोकना है. इस हैशटैग का संदेश स्पष्ट था कि ट्रंप भारी मतों से जीत हासिल कर चुके हैं लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान में बैठी ताक़तें उनसे जीत को चुरा रही हैं.

चार नवंबर, 2020 बुधवार को दिन के शुरुआती घंटों में जब मतों की गिनती का काम जारी था और टीवी नेटवर्कों पर जो बाइडन की जीत की घोषणा होने में तीन दिन बाक़ी थे, तब राष्ट्रपति ट्रंप ने जीत का दावा करते हुए आरोप लगाया था कि अमरीकी जनता के साथ धोखा किया जा रहा है. हालांकि अपने दावे के पक्ष में उन्होंने कोई सबूत नहीं था. हालांकि अमेरिका में पहले हुए चुनावों के अध्ययन यह स्पष्ट है कि वहां मतगणना में किसी तरह की गड़बड़ी एकदम असंभव बात है.

दोपहर आते आते 'स्टॉप द स्टील' नाम से एक फेसबुक समूह बन चुका था जो फ़ेसबुक के इतिहास में सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाला समूह साबित हुआ. गुरूवार की सुबह तक इस समूह से तीन लाख से ज़्यादा लोग जुड़ चुके थे.

अधिकांश पोस्ट में बिना किसी सबूत के आरोप लगाए गए थे कि बड़े पैमाने पर मतगणना में धांधली की जा रही है, यह भी कहा कि हज़ारों ऐसे लोगों के मत डाले गए हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है. यह आरोप भी लगाया गया कि वोट गिनने वाली मशीन को इस तरह से तैयार किया गया है कि वह ट्रंप के मतों को बाइडन के मतों में गिन रही है.

लेकिन कुछ पोस्ट वास्तव में कहीं ज़्यादा चिंतित करने वाले थे, इन पोस्टों में सिविल वॉर और क्रांति की ज़रूरी बताया जा रहा था. गुरुवार की दोपहर तक फ़ेसबक ने स्टॉप द स्टील पेज को हटाया लेकिन तब तक इस पेज पर पांच लाख से ज़्यादा कमेंट, लाइक्स और रिएक्शन आ चुके थे. इस पेज को हटाए जाने तक दर्जनों ऐसे समूह तैयार हो चुके थे.

ट्रंप के मतों को चुराए जाने की बात ऑनलाइन फर फैलती जा रही थी. जल्दी ही, मतों की सुरक्षा के नाम पर स्टॉप द स्टील के नाम से समर्पित वेबसाइट लाँच की गई. शनिवार यानी सात नवंबर को, प्रमुख समाचार नेटवर्कों ने जो बाइडन को चुनाव का विजेता घोषित कर दिया. डेमोक्रेट्स के गढ़ में लोग जश्न मनाने के लिए सड़कों पर निकले. लेकिन ट्रंप के अति उत्साही समर्थकों की आनलाइन प्रतिक्रियाएं नाराजगी भरी और नतीजे को चुनौती देने वाली थी.

इन लोगों ने शनिवार को वाशिंगटन डीसी में मिलियन मेक अमेरिका ग्रेट अगेन मार्च के नाम से रैली प्रस्तावित की. ट्रंप ने इसको लेकर भी ट्वीट किया कि वे प्रदर्शन के ज़रिए रोकने की कोशिश कर सकते हैं. इससे पहले वाशिंगटन में ट्रंप समर्थक रैलियों में बहुत ज़्यादा लोग नहीं जुटे थे लेकिन शनिवार की सुबह फ्रीडम प्लाज़ा में हज़ारों लोग एकत्रित हुए थे.

एक अतिवादी शोधकर्ता ने इस रैली की भीड़ को ट्रंप समर्थकों के विद्रोह की शुरुआत कहा. जब ट्रंप की गाड़ियों का काफिला शहर से गुजरा तो समर्थकों में उनकी एक झलक पाने के लिए होड़ मच गई. समर्थकों के सामने 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' की टोपी पहने ट्रंप नज़र आए.

इस रैली में अति दक्षिणपंथी समूह, प्रवासियों का विरोध करने वाले और पुरुषों के समूह प्राउड ब्यॉज़ के सदस्य शामिल थे जो गलियों में हिंसा कर रहे थे और बाद में अमरीकी कैपटिल बिल्डिंग में घुसकर हिंसा की. इसमें सेना, दक्षिणपंथी मीडिया और षड्यंत्र के सिद्धांतों की वकालत करने वाले तमाम लोग शामिल हुए थे.

रात आते आते ट्रंप समर्थकों और उनके विरोधियों में हिंसक झड़प की ख़बरें आनी लगी थीं, इसमें एक घटना तो व्हाइट हाउस से पांच ब्लॉक की दूरी पर घटित हुआ. हालांकि इन हिंसाओं में पुलिस भी लिप्त थी, लेकिन इससे आने वाले दिनों का अंदाज़ा लगाया जा सकता था.

अब तक राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी कानूनी टीम ने अपनी उम्मीदें दर्जनों कानूनी मामलों पर टिका चुकी थीं हालांकि कई अदालतों ने चुनाव में धांधली के आरोपों को खारिज कर दिया था लेकिन ट्रंप समर्थकों की ऑनलाइन दुनिया ट्रंप के नजदीकी दो वकीलों सिडनी पॉवेल और एल लिन वुड की उम्मीदों से जुड़ीं थीं.

सिडनी पॉवेल और लिन वुड ने भरोसा दिलाया था कि वे चुनाव में धांधली के मामले को इतने विस्तृत ढंग से तैयार करेंगे कि मामला सामने आते ही बाइडन के चुनावी जीत की घोषणाओं की हवा निकल जाएगी.

65 साल की पॉवेल एक कंजरवेटिव एक्टिविस्ट हैं और पूर्व सरकारी वकील रह चुकी हैं. उन्होंने फॉक्स न्यूज़ से कहा कि क्रैकन को रिलीज करने की कोशिश हो रही है. क्रैकन का जिक्र स्कैंडेवियन लोककथाओं में आता है जो विशालकाय समुद्री राक्षस है जो अपने दुश्मनों को खाने के लिए बाहर निकलता है.

उनके इस बयान के बाद क्रैकन को लेकर इंटरनेट पर तमाम तरह के मीम्स नजर आने लगे, इन सबके जरिए चुनावी में धांधली की बातों को बिना किसी सबूत के दोहराया जा रहा था. ट्रंप समर्थकों और क्यूएनऑन कांस्पिरेसी थ्योरी के समर्थकों के बीच पॉवेल और वुड किसी हीरो की तरह उभर कर सामने आए. एक्यूएनऑन कांस्पिरेसी थ्योरी में यक़ीन करने वाले का मानना है कि ट्रंप और उनकी गुप्त सेना डेमोक्रेटिक पार्टी, मीडिया, बिजेनस हाउसेज और हॉलीवुड में मौजूद फीडोफाइल लोगों के ख़िलाफ़ लड़ रही है. दोनों वकील राष्ट्रपति और उनके षडयंत्रकारी समर्थकों के बीच एक तरह से सेतु बन गए थे. इनमें से अधिकांश समर्थक छह जनवरी को कैपिटल बिल्डिंग में हुई हिंसा में शामिल थे.

अमेरिकी संसद में हिंसा
पॉवेल और वुड समर्थकों के आक्रोश को ऑनलाइन भुनाने में कामयाब रहे लेकिन क़ानूनी तौर पर दोनों कुछ ख़ास नहीं कर पाए. इन दोनों ने नवंबर के आख़िर तक 200 पन्नों का आरोप पत्र जरूर तैयार किया लेकिन उनमें अधिकांश बातें कांस्पीरेसी थ्योरी पर आधारित थे और इससे वे आरोप अपने आप खारिज हो गए थे जिन्हें दर्जनों बार अदालत में खारिज किया जा चुका था. इतना ही नहीं इस दस्तावेज़ में कानून की ग़लतियों के साथ साथ स्पेलिंग की ग़लतियां और टाइपिंग की ग़लतियां भी देखने को मिलीं.

लेकिन ऑनलाइन की दुनिया में इसकी चर्चा जारी रही. कैपिटल बिल्डिंग में हुई हिंसा से पहले 'क्रैकन' और 'रिलीज द क्रैकन' का इस्तेमाल केवल ट्विटर पर ही दस लाख से ज़्यादा बार किया जा चुका था.

जब अदालत ने ट्रंप के कानूनी अपील को खारिज कर दिया तब अतिवादी दक्षिणपंथियों ने चुनाव कर्मियों और अधिकारियों को निशाना बनाना शुरू किया. जॉर्जिया के एक चुनावकर्मी को जान से मारने की धमकी दी जाने लगे. इस प्रांत के रिपब्लिकन अधिकारी, जिसमें गवर्नर ब्रायन कैंप, प्रांत-मंत्री (सीक्रेटरी ऑफ़ स्टेट) ब्रैड राफेनस्पर्जर और प्रांत के चुनावी व्यवस्था के प्रभारी गैबरियल स्टर्लिंग को ऑनलाइन गद्दार कहा जाने लगा.

स्टर्लिंग ने एक दिसंबर को भावनात्मक और भविष्य की आशंका को लेकर एक चेतावनी जारी की. उन्होंने कहा, "किसी को चोट लगने वाली है, किसी को गोली लगने वाली है, किसी की मौत होने वाली है और यह सही नहीं है."

दिसंबर के शुरुआती दिनों में मिशिगन के प्रांत-मंत्री (सीक्रेटरी ऑफ़ स्टेट) जैकलीन बेंसन डेट्रायट स्थित अपने घर में चार साल के बेटे के साथ क्रिसमस ट्री को संवार रही थीं तभी उन्हें बाहर हंगामा सुनाई दिया. करीब 30 प्रदर्शनकारी उनके घर के बाहर बैनर पोस्टर के साथ मेगाफोन पर स्टॉप द स्टील चिल्ला रहे थे. एक प्रदर्शनकारी ने चिल्ला कर कहा, "बेंसन तुम खलनायिका हो." एक दूसरे ने कहा, "तुम लोकतंत्र के लिए ख़तरा हो." एक प्रदर्शनकारी इस मौके पर फेसबुक लाइव कर रहा था और कह रहा था कि उसका समूह यहां से नहीं हटने वाला है.

यह उदाहरण बताता है कि प्रदर्शनकारी वोटिंग की प्रक्रिया से जुड़े लोगों के साथ किस तरह से पेश आ रहे थे. जॉर्जिया में ट्रंप समर्थक लगातार राफेनस्पर्जर के घर बाहर हॉर्न के साथ गाड़ियां चलाते रहे. उनकी पत्नी को यौन हिंसा की धमकियां मिलीं.

आरिज़ोना में प्रदर्शनकारी डेमोक्रेट प्रांत मंत्री (सीक्रेटरी ऑफ़ स्टेट) कैटी होब्स के घर के बाहर जमा हो गए. ये प्रदर्शनकारी लगातार यही कह रहे थे, "हमलोग तुम पर नजर रख रहे हैं."

11 दिसंबर को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैक्सास प्रांत के चुनाव नतीजों को खारिज करने की कोशिश को निरस्त कर दिया.

जैसे जैसे ट्रंप के सामने कानूनी और राजनीतिक दरवाजे बंद हो रहे थे वैसे वैसे ट्रंप समर्थक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर हिंसक हो रहे थे. 12 दिसंबर को वाशिंगटन डीसी में स्टॉप द स्टील की दूसरी रैली का आयोजन किया गया. एक बार फिर इस रैली में हज़ारों समर्थक जुटे. इसमें अतिवादी दक्षिणपंथी लोगों से मेक अमेरिका ग्रेट एगेन से लेकर सैन्य आंदोलनों में शामिल रहे लोग शामिल हुए.

ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल फ्लिन ने इन प्रदर्शनकारियों की तुलना बाइबिल के सैनिकों और पुजारियों से की जिन्होंने जेरिको की दीवार को गिराया था. इस रैली में चुनावी नतीजे को बदलवाने के लिए 'जेरिको मार्च' के आयोजन का आह्वान किया गया. रिपब्लिकन पार्टी को मॉडरेट बताने वाली अतिवादी दक्षिणपंथी आंदोलन ग्रोयपर्स के नेता निक फ्यूनेट्स ने इन प्रदर्शनकारियों से कहा, "हमलोग रिपब्लिकन पार्टी को नष्ट करने जा रहे हैं."

इसके दो दिन बाद इलेक्ट्रोल कॉलेज ने बाइडन की जीत पर मुहर लगा दी. अमरीकी राष्ट्रपति के लिए कार्यभार संभालने के लिए जरूरी अहम पड़ावों में यह भी शामिल है.

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर ट्रंप समर्थकों को यह नजर आने लगा था कि सभी वैधानिक रास्ते बंद हो चुके हैं, ऐसे में उन लोगों को लगने लगा था कि ट्रंप को बचाने के लिए सीधी कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प है. चुनाव के बाद फ्लिन, पॉवेल और वुड के अलावा ट्रंप समर्थकों के बीच ऑनलाइन एक और शख्स तेजी से जगह बनाने में कामयाब हुआ.

अमरीकी कारोबारी और इमेजबोर्ड 8 चैन और 8कुन के प्रमोटर जिम वाटकिंस के बेटे रॉन वाटकिंस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर ट्रंप के समर्थक के तौर पर सामने आए. 17 दिसंबर को वायरल हुए ट्वीट्स में रॉन वाटकिंस ने डोनाल्ड ट्रंप को सलाह देते हुए कहा कि उन्हें रोमन साम्राट जूलियस सीजर का रास्ता अपनाना चाहिए और लोकतंत्र की बहाली के लिए सेना की वफादारी का इस्तेमाल करना चाहिए.

रॉन वाटिकंस ने अपने पांच लाख से ज़्यादा फॉलोअर्स को क्रास द रोबिकन को ट्वीटर ट्रेंड बनाने के लिए प्रोत्साहित किया. जूलियस सीजर ने 49 ईसापूर्व रोबीकन नदी को पार करके ही युद्ध की शुरुआत की थी. इस हैशटैग का मुख्यधार के लोगों ने भी इस्तेमाल किया. इसमें अरिज़ोना में रिपब्लिकन पार्टी की नेता कैली वार्ड भी शामिल थीं. एक अन्य ट्वीट में रॉन वाटकिंस ने ट्रंप को सुझाव दिया कि वे उन्हें राजद्रोह के क़ानून का इस्तेमाल करना चाहिए जिसके तहत राष्ट्रपति के बाद सेना और दूसरे पुलिस बलों पर अधिकार हो जाता है.

18 दिसंबर को ट्रंप ने पॉवेल, फ्लिन और दूसरे लोगों के साथ व्हाइट हाउस में रणनीतिक बैठक की. न्यूयार्क टाइम्स के मुताबिक इस बैठक के दौरान फ्लिन ने ट्रंप को मार्शल लॉ लागू करके सेना के अधीन फिर से चुनाव कराने का सुझाव दिया था. इस बैठक के बाद ऑनलाइन दुनिया में दक्षिणपंथी समूहों के बीच एक बार फिर से युद्ध और क्रांति को लेकर बातचीत शुरू हो गई. कई लोग छह जनवरी को अमेरिकी कांग्रेस के ज्वाइंट सेशन को देखने आए थे, जो एक तरह से औपचारिकता पर होती है. लेकिन ट्रंप समर्थकों को उपराष्ट्रपति माइक पेंस से भी उम्मीद थी.

वे छह जनवरी के आयोजन की अध्यक्षता करने वाले थे, ट्रंप समर्थकों को उम्मीद थी कि माइक पेंस इलेक्ट्रोल कॉलेज वोट्स की उपेक्षा करेंगे. इन लोगों की आपसी चर्चा में कहा जा रहा था कि उसके बाद किसी तरह के विद्रोह से निपटने के लिए राष्ट्रपति सेना की तैनाती करेंगे और चुनावी धांधली करने वालों के बड़े पैमानी पर गिरफ्तारी का आदेश देंगे और उन सबको सेना की ग्वांतेनामो बे की जेल में भेजा जाएगा. लेकिन यह सब ऑनलाइन की दुनिया में ट्रंप समर्थकों के बीच हो रहा था, ज़मीन की सच्चाई पर इन सबका होना असंभव दिख रहा था. लेकिन ट्रंप समर्थकों ने इसे आंदोलन का रूप दे दिया और देश भर से आपसी सहयोग और एक साथ सफर करके हज़ारों लोग छह जनवरी को वाशिंगटन पहुंच गए.

ट्रंप के झंडे लगाए गाड़ियों का लंबा काफिला शहर में पहुंचने लगा था. लुइसविले, केंटुकी, अटलांटा, जॉर्जिया और सक्रेंटन जैसे शहरों से गाड़ियों का काफिला निकलने की तस्वीरें भी सोशल प्लेटफॉर्म्स पर दिखने लगी थीं. एक शख़्स ने करीब दो दर्जन समर्थकों के साथ तस्वीर पोस्ट करते हुए ट्वीट किया, "हमलोग रास्ते में हैं." नार्थ कैरोलिना के आइकिया पार्किंग में एक शख्स ने अपने ट्रक की तस्वीर के साथ लिखा, "झंडा थोड़ा जीर्णशीर्ण है लेकिन हम इसे लड़ाई का झंड़ा कह रहे हैं."

लेकिन यह स्पष्ट था कि पेंस और रिपब्लिकन पार्टी के दूसरे अहम नेता क़ानून के मुताबिक ही काम करेंगे और बाइडन की जीत को कांग्रेस से अनुमोदित होने देंगे. ऐसे में इन लोगों के ख़िलाफ़ भी जहर उगला जाने लगा. वुड ने उनके लिए ट्वीट किया, "पेंस राष्ट्रद्रोह के मुक़दमे का सामना करेंगे और जेल में होंगे. उन्हें फायरिंग दस्ते द्वारा फांसी दी जाएगी." ट्रंप समर्थकों के बीच ऑनलाइन चर्चाओं में आक्रोश बढ़ने लगा था. लोग बंदूकें, युद्ध और हिंसा की बात करने लगे थे.

ट्रंप समर्थकों के बीच लोकप्रिय गैब औऱ पार्लर जैसी सोशल प्लेटफॉर्म्स के अलावा दूसरों जगह पर भी ऐसी बातें मौजूद थीं. प्राउड ब्यॉज के समूह में पहले सदस्य पुलिस बल के साथ बाद में वे अधिकारियों के ख़िलाफ़ लिखने लगे थे क्योंकि उन्हें एहसास हो गया था कि अधिकारियों का साथ अब नहीं मिल रहा है.

ट्रंप समर्थकों में लोकप्रिय वेबसाइट द डोनाल्ड पर पुलिस बैरिकैड तोड़ने, बंदूकें और दूसरे हथियार रखने, बंदूक को लेकर वाशिंगटन के सख्त कानून के उल्लंघन को लेकर खुले तौर पर चर्चा हो रही थी. कैपिटल बिल्डिंग में हंगामा करने और कांग्रेस के 'देशद्रोही' सदस्यों को गिरफ्तार किए जाने तक की बकवास बातें हो रही थीं.

छह जनवरी, यानी बुधवार को ट्रंप ने व्हाइट हाउस के दक्षिण में स्थित इलिप्स पार्क में हज़ारों की भीड़ को एक घंटे से ज़्यादा समय तक संबोधित किया था. उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत में कहा कि शांतिपूर्ण और देशभक्ति से आप बात कहेंगे तो वह सुनी जाएगी. लेकिन अंत आते आते उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, "हमें पूरे दमखम से लड़ना होगा, अगर हम पूरे दमखम से नहीं लड़े तो आप अपना देश खो देंगे. इसलिए हमलोग जा रहे हैं. हमलोग पेन्सेल्विनया एवेन्यू जा रहे हैं और हमलोग कैपिटल बिल्डिंग जा रहे हैं."

कुछ विश्लेषकों के मुताबिक उन दिन हिंसा की आशंका एकदम स्पष्ट थी. अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में आंतरिक सुरक्षा मंत्री रहे माइकल चेरटॉफ़ उस हुई हिंसा के लिए कैपिटल पुलिस को जिम्मेदार ठहराते हैं. कथित तौर पर कैपिटल पुलिस ने नेशनल गार्ड की मदद की पेशकश को भी ठुकरा दिया था.

माइकल इसे कैपिटल पुलिस की सबसे बड़ी नाकामी बताते हुए कहत हैं, "मैं जहां तक सोच पा रहा हूं, इससे बड़ी नाकामी और क्या होगी. इस दौरान हिंसा होने की आशंका का पता पहले से लग रहा था. स्पष्टता से कहूं तो यह स्वभाविक भी था. अगर आप समाचार पत्र पढ़ते हैं, जागरूक हैं तो आपको अंदाजा होगा कि इस रैली में चुनावी में धांधली की बात पर भरोसा करने वाले लोग थे, कुछ इसमें चरमपंथी थे, कुछ हिंसा थे. लोगों ने खुले तौर पर बंदूकें लाने की अपील की हुई थीं."

इन सबके बाद भी, वर्जीनिया के 68 साल के रिपब्लिकन समर्थक जेम्स क्लार्क जैसे अमेरिकी बुधवार की घटना पर चकित हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, "यह काफी दुखद था. ऐसा कुछ होगा मैंने नहीं सोचा था."

लेकिन ऐसी हिंसा की आशंका कई सप्ताह से बनी हुई थी. चरमपंथी और षड्यंत्रकारी समूहों को भरोसा था कि चुनावी नतीजे की चोरी हुई है. ऑनलाइन दुनिया में ये लोग लगातार साथ में हथियार रखने और हिंसा की बात कर रहे थे. हो सकता है कि पुलिस अधिकारियों ने इन लोगों की पोस्ट को गंभीरता से नहीं लिया हो या फिर उन्हें जांच के लिए उपयुक्त नहीं पाया हो. लेकिन अब जवाबदेय अधिकारियों को चुभते हुए सवालों का सामना करना होगा.

जो बाइडन 20 जनवरी को अमरीकी राष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेंगे. माइक चेरटॉफ़ उम्मीद कर रहे हैं कि सुरक्षा बल बुधवार की तुलना में कहीं ज़्यादा मुस्तैदी से तैनात होगा. हालांकि अभी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हिंसा और बाधा पहुंचाने की बात कही जा रही है. इन सबके बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर भी सवाल उठ रहे हैं कि इन लोगों ने कांस्पीरेसी थ्योरी को लाखों लोगों तक क्यों पहुंचने दिया?

बुधवार की हिंसा के बाद शुक्रवार को ट्विटर ने ट्रंप के पूर्व सलाहकार फ्लिन, क्रैकन थ्योरी देने वाले वकील पॉवेल एवं वुड और वाटकिंस के खाते डिलिट किए हैं. इसके बाद ट्रंप का एकाउंट भी बंद किया गया है.

कैपिटल बिल्डिंग में हिंसा करने वाले लोगों की गिरफ़्तारी जारी है. हालांकि अभी भी ज़्यादातर दंगाई अपनी सामानान्तर दुनिया में मौजूद हैं जहां वे अपनी सुविधा के मुताबिक तथ्य गढ़ रहे हैं. बुधवार को हुई हिंसा के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने वीडियो बयान जारी किया जिसमें उन्होंने पहली बार यह स्वीकार किया है कि नया प्रशासन 20 जनवरी को अपना कार्यभार संभालेगा.

ट्रंप समर्थक इस वीडियो को देखने के बाद भी नए तरह के स्पष्टीकरण दे रहे हैं. वे खुद को दिलासा दे रहे हैं कि ट्रंप को आसानी से हार नहीं माननी चाहिए, उन्हें संघर्ष करना चाहिए. इतना ही नहीं ट्रंप समर्थकों की एक थ्योरी यह भी चल रही है कि यह वीडियो ट्रंप का है ही नहीं, यह कंप्यूटर जेनरेटेड फेक वीडियो है. ट्रंप समर्थक ये आशंका भी जता रहे हैं कि ट्रंप को बंधक तो नहीं बना लिया गया है. हालांकि ट्रंप के ढेरों प्रशंसकों को अभी भी भरोसा है कि ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे.

इनमें से किसी भी बात के सबूत मौजूद नहीं हैं लेकिन इससे एक बात ज़रूर साबित होती है. डोनाल्ड ट्रंप का चाहे जो हो, अमेरिकी कैपिटल बिल्डिंग में हिंसा करने वाले लोग आने वाले दिनों में जल्दी शांत नहीं होने वाले हैं, यह तय है. (bbc.com)

 


11-Jan-2021 1:53 PM 35

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

जैसे कि कल मैंने अपने लेख में आशंका व्यक्त की थी, सरकार और किसानों के बीच सीधी मुठभेड़ का दौर शुरु हो गया है। आठवें दौर की बातचीत में जो कटुता बढ़ी है, वह दोनों पक्षों के आचरण में भी उतर आई है। करनाल और जालंधर जैसे शहरों से अब किसानों और पुलिस की मुठभेड़ की खबरें आने लगी हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि दिल्ली पर डटे हुए किसान संगठनों का भी धैर्य अब टूट जाए और वे भी तोड़-फोड़ पर उतारु हो जाएं।

यह अच्छा ही हुआ कि हरयाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने करनाल के एक गांव में आयोजित किसानों की महापंचायत के जलसे को स्थगित कर दिया। यदि वे जलसा करने पर अड़े रहते तो निश्चय ही पुलिस को गोलियां चलानी पड़तीं, किसान संगठन भी परस्पर विरोधियों पर हमला करते और भयंकर रक्तपात होता। लेकिन किसान संगठनों ने भी कोई कमी नहीं रखी। उन्होंने सभा-स्थल पर लगाए गए बेरिकेड तोड़ दिए, मंच को तहस-नहस कर दिया और जिस हेलीपेड पर मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर उतरना था, उसे ध्वस्त कर दिया।

किसान नेता इस बात पर अपना सीना जरुर फुला सकते हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री को मार भगाया लेकिन वे यह क्यों नहीं समझते कि सरकार के पास उनसे कहीं ज्यादा ताकत है। यदि खट्टर की जगह कोई और मुख्यमंत्री होता तो पता नहीं आज हरयाणा का क्या हाल होता ? करनाल में किसानों के नाम पर किन्हीं भी तत्वों ने जो कुछ किया, क्या उसे किसानों के हित में माना जाएगा ? मुश्किल ही है। क्योंकि अभी तक किसानों का आंदोलन गांधीवादी शैली में अहिंसक और अनुशासित रहा है और उसने नेताओं को भी आदर्श व्यवहार सिखाया है लेकिन अब यदि ऐसी मुठभेड़ें बढ़ती गईं तो किसानों की छवि बिगड़ती चली जाएगी।

यदि किसान नेता अपने धरनों और वार्ता के जरिए अपना पक्ष पेश कर रहे हैं तो उन्हें चाहिए कि वे सरकार को भी अपना पक्ष पेश करने दें। लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष को अपनी बात कहने की समान छूट होनी चाहिए। यह स्वाभाविक है कि कड़ाके की ठंड, आए दिन होनेवाली मौतों और आत्महत्याओं के कारण किसानों की बेचैनी बढ़ रही है लेकिन बातचीत के जरिए ही रास्ता निकालना ठीक है। यह समझ में नहीं आता कि सरकार भी क्यों अड़ी हुई है ? या तो रास्ता निकलने तक वह कानून को स्थगित क्यों नहीं कर देती या राज्यों को उसे लागू करने की छूट वह क्यों नहीं दे देती?  (नया इंडिया की अनुमति से)


11-Jan-2021 8:42 AM 20

मृणाल पाण्डे-

2021 की शुरुआत में लग रहा है कि शायद 2019 के लोकसभा चुनावों ने देश के लैंडस्केप से पार्टियों का ही नहीं, राजनीति में वैचारिकता, विविधता का भी लगभग सफाया कर दिया है। कई विचारों का घालमेल होते हुए भी कांग्रेस 2014 तक एक लोकतांत्रिक विचार तो थी ही। जीवंत चलती-फिरती लोकतांत्रिकता से जरूरी जन मुद्दों की बाबत जो बहस-मुबाहसे और संसदीय टकराव निकलते हैं, उनके क्षीण ही सही लेकिन प्रामाणिक दर्शन हमको हर बरस संसद सत्रों के दौरान हो ही जाते थे। बड़े उपक्रम, व्यापक मनरेगा जैसी योजनाएं और आईआईटी और एम्स जैसे तकनीकी तथा चिकित्सकीय शिक्षा के उन्नत संस्थान और साहित्य, संगीत, कला वगैरा से जुड़ी अकादमियां तब सरकार के लिए सिर्फ डींग भरी गर्व का विषय नहीं, मूलत: एक उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के हिस्से भी थे। सच है कि कांग्रेस में भीतरी टकराव और गुटबाजी तब भी थी, यह भी संभव है कि चुनाव-दर-चुनाव भीतर खाने जमीनी राजनीति के शातिर राजनीतिक जोड़-तोड़ या भाव-ताव तब भी चलते रहते हों, लेकिन इसमें शक नहीं कि तब तक वैचारिक धरातल पर मुलायम सिंह, नीतीश कुमार, प्रकाश करात, नरेंद्र मोदी और योगी जी सबके पास अपनी खास वैचारिक जमीन थी। और उसके बूते वे बहुत कुछ ऐसा सार्वजनिक तौर से ऐलानिया कहा, किया करते थे, (मसलन एमएसपी का विरोध, निर्भया रेप कांड के बहाने कानून-प्रशासन की निंदा अथवा स्वास्थ्य या शिक्षा क्षेत्र में सरकारी निवेश का समर्थन), जिसका फायदा उनको 2014 में मिला। पर आज जब वे खुद सत्ता में हैं, लगभग वही काम उसी तर्ज पर वे खुद भी कर रहे हैं। 2019 के बाद से विपक्ष की वैचारिक जमीनें कब्जाने का संघर्ष क्रमश: तीखा और कटु होता गया है। 2021 तक आते-आते सरकार के हर नुमाइंदे को सरकारी काम देश प्रेम का प्रतीक और उससे इतर खड़े नेता या किसी जनांदोलन का सरकार के इकतरफा अहम फैसलों पर सवालिया निशान लगा देना बांझ और देश विरोधी नजर आता है जिसे साम-दाम-दंड-भेद हर तरह से रोकना जायज है।

यह एकाएक नहीं हुआ। 2004 के बाद जब मनरेगा और मिड-डे मील जैसी खर्चीली योजनाओं ने 2009 तक वोटरों, खासकर महिला वोटरों के मर्म को छू लिया था, गरीब लोगों को लगने लगा था कि इनके पीछे एक तरह की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का अहसास है जो अर्थव्यवस्था के खुलने के फायदों को सबसे नीचे की सीढ़ी के वोटर तक आंशिक रूप से ही सही, लेकिन पहुंचाते रहने का एक ठोस चैनल बना रही है। फिर 2014 में वैकल्पिक विचारों का एक बड़ा हाहाकार देश में उठा कर कांग्रेस को पश्चिमोन्मुखी, छद्म लिबरल और छद्म बुद्धिजीवियों को पालने वाली बताते हुए भाजपा नीत गठजोड़ ने दिल्ली का सिंहासन हासिल कर लिया। इसके बाद जो कई दक्षिणपंथी नेता, साधु-साध्वी बानाधारी भाजपा कार्यकर्ता पन्ना प्रमुख आदि बाबरी ध्वंस के बाद के बरसों में हर धार्मिक मेले हरि कथा रामचरित मानस के मोहल्ला स्तरीय अखंड पाठ के समय आपस में सुना-सुना कर कहते थे कि हाय हिंदुत्व खतरे में है, उनको भी मौका मिला कि वे अपने बड़े नेताओं को शत-शत नमन करते हुए अपनी तरह का हिंदू नीत देश रचें। और शेष धर्मावलंबियों का जो हो, यज्ञ, हवन, अखंड आरतियों, कथित वैदिक रूढ़ि-रिवाजों को हिंदुत्व प्रचार का नाम देकर संसद से सड़क तक फैला दिया जाए।

अगर नोटबंदी, हाथरस कांड, कोविड और अब देशव्यापी किसान धरने ने 2014-21 के बीच हर भारतीय के आगे हमारी अर्थव्यवस्था ही नहीं, कानून प्रशासनऔर राजकीय स्वास्थ्य कल्याण सहित संसदीय व्यवस्था का पोलापन न उजागर कर दिया होता, तो हिंदुओं को शायद लगता कि हिंदू भारत उनके लिए सचमुच एक नई तरह की कामधेनु है। पर सरकार ने इधर कोविड की वैक्सीन को लेकर जो घोषणाएं की हैं, जिस तरह जबरन, बिना समुचित परीक्षण के प्रमाण हरी झंडी दे कर कोविशील्ड और कोवैक्सिनको ‘आत्मनिर्भर भारत’ का प्रतीक बता कर उसने साफ कर दिया है कि हिंदू राष्ट्रवादियों में तर्कसंगत वैज्ञानिकता और सही वैचारिक नुस्खे, दोनों नहीं बचे हैं। क्या आज तक बिना जरूरी उपकरणों और चिकित्सकीय परामर्श के, कोई जवान पर्वतारोही भी एवरेस्ट पर चढ़ा है? पर हम हैं कि गंभीर विश्व महामारी से जूझ रहे लाखों मरीजों और उनकी सेवा तथा इलाज करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को ‘आत्मनिर्भर भारत’ और देश प्रेम के नाम पर एक ऐसी वैक्सीन के लिए गिनीपिग बनाए दे रहे हैं जिसके स्नायुतंत्र अथवा ब्रेन पर कोई गंभीर स्थायी दुष्परिणामों की बाबत अभी तक कोई पक्की जानकारियां नहीं हैं। अचरज नहीं कि संयुक्त राष्ट्र संगठन की प्रतिनिधि डॉ. कांग ने सरकार और उसके चिकित्सातंत्र की ऐसी उतावली और रोग निरोधी टीके को इलाज के समतुल्य ठहराने को ‘समझ से परे’ करार दे दिया है।

अब तक यह साफ हो चुका है कि कोविड-19 के रूप में वैज्ञानिक एक नई तरह के वायरस को देख रहे हैं। इसकी सही काट के लिए कारगर रोग निरोधी टीका बनाना हो तो उसके लिए तयशुदा वैज्ञानिक प्रक्रिया में राजनीतिक दबावों की तहत कोई शॉर्टकट निकालना घातक होगा। इसलिए हर वैक्सीन का तीन चरणों में मानवीय वॉलंटियरों पर परीक्षण करना होता है, फिर उसके नतीजों से मिला सारा डेटा पारदर्शी तरीके से अपने पेशे के अन्य विशेषज्ञों से उसको जंचवाना होता है। उनकी स्वीकृति पाने के बाद ही किसी भी दवा का मसौदा कमर्शियल उत्पादन के लिए सरकार को सौंपने का विधान है। सरकार खुद अपने विशेषज्ञों से उनकी संतुष्टि का सबूत मिलने के बाद ही उत्पादन को हरी झंडी देती है। हमारे यहां एक वैक्सीन ऑक्सफॉर्ड एस्ट्रा का भारतीय संस्करण है, जिसका पुणे में पूनावाला सीरम इंस्टीट्यूट ब्रिटिश निर्माताओं के साथ सह-उत्पादन कर रहा है। वह आपात्कालीन दशा में इस्तेमाल के लिए ब्रिटिश सरकार से ब्रिटेन में स्वीकृति पा चुकी है हालांकि1600 वॉलंटियरों पर किए गए उसके तीसरे चरण के प्रयोग का डेटा अभी सार्वजनिक होना है। लेकिन अधिक विवाद हैदराबाद की बायोटेक कंपनी और भारतीय चिकित्सा शोध परिषद द्वारा सह-उत्पादित कोवैक्सीन को लेकर हो रहा है, जिसका तीसरा चरण शुरू भी नहीं हुआ, उसके लिए अभी वॉलंटियर खोजे ही जा रहे हैं। और जिसके पहले दो चरणों का डेटा भी अभी सार्वजनिक होना है।

कोविशील्ड के निर्माताओं का दावा है कि परीक्षण के दौरान उनका कोविड निरोधी टीका 70 फीसदी सफल पाया गया है जबकि भारतीय ड्रग कंट्रोलर जनरल वीजी सोमानी इसे 110 प्रतिशत सेफ बता चुके हैं। कोवैक्सीन को हरी झंडी दिए जाने की बाबत एम्स के प्रमुख डॉ. गुलेरिया का कहना है कि कोवैक्सीन का इस्तेमाल ‘फॉल बैक’ यानी आपात्कालीन स्थिति में बतौर विकल्प ही प्रयोग होगा। लेकिन उन्होंने इसकी संदिग्ध क्षमता की बाबत इतना ही कहा कि उसका प्रयोग किया गया तो सफलता संभव (लाइकली टु) है।

इस बिंदु पर जानकार लोगों के बीच भारत निर्मित वैक्सीनों को लेकर तीन मुख्य चिंताएं हैं। एक, कि रोग निरोधी टीकों का इस्तेमाल उपचार नहीं रोग निरोध के लिए किया जाता है। इसलिए जब रोग उफान पर हो बिना संपूर्ण परीक्षणों से गुजरी वैक्सीन का प्रयोग अगर सही नतीजे न दे, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? वे वैज्ञानिक जो इस पर काम करते रहे हैं, या वे राजनीतिक तत्वजो अपनी नाक बचाने को इसका परीक्षण पूरा होने से पहले इसका भारी मात्रा में उत्पादन जायज बना रहे हैं? दो, कोविशील्ड की बाबत एम्स के प्रमुख का कहना कि उम्मीद है वैक्सीन जब इस्तेमाल होगी तो संभवत: सफल ही होगी, क्या इस बात का परिचायक नहीं कि एक उम्दा अनुभवी चिकित्सक होने के नाते वह उसकी सफलता की पक्की गारंटी देने की बजाय उसे ‘संभावित’ बता रहे हैं। तीन, हमारे ड्रग कंट्रोलर जनरल ऐसे टीके की, जिसे अभी पूरी परीक्षाओं में खरा उतरना बाकी है, जिसका डेटा अपारदर्शी बना हुआ है, 110 प्रतिशत सफल होने की भविष्यवाणी कैसे कर रहे हैं? अगर आज सरीखे नाजुक आपात्काल में भी सरकारें सोच विचार से तलाक लेकर कानून की बजाय सनक, सिद्धांत की बजाय कंपनी विशेष की सिफारिश और जनहित की बजाय अमीरों के प्रति पक्षपात और गरीब गिनीपिगों के लिए दादागिरी दिखाते हुए ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे नारे के आधार पर लाखों नाजुक स्वास्थ्य वाले नागरिकों को नए टीके के परीक्षण का गिनीपिग बनाना गलत न मानें, तो इसका साफ मतलब है वे ‘विचार विहीन मही मैं जानी’ की गर्वोक्ति से अपनी छाती फुला रहे हैं।

दुनिया में अगर सबसे अधिक प्रतिगामी कोई चीज़ है, तो वह विचारहीनता ही है। शायद इसी कारण निरंतर चुनावी मोड में रहने वाले राजनेताओं ने ही नहीं, हमारे गोदी मीडिया, सरकारी बाबुओं, वैज्ञानिकों और उद्योग जगत ने भी कोविड की आपदा में पीड़ित जनता के कष्ट निवारण करने की बजाय मसला ए वैक्सीन को अपने लिए कोई रत्न जटित सिंहासन या पंच हजारी ओहदा हथिया ने का नायाब अवसर बना डाला है। (navjivan)


10-Jan-2021 8:36 PM 26

-नवनीत मिश्रा
प्रिय मीडिया के साथियों,  
सिविल सर्विसेज का रिजल्ट आने पर एक सावधानी जरूर बरतें। हर सफल उम्मीदवार को सीधे आईएएस मत घोषित करिए। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की पुत्री के आईएएस होने की खबर वायरल है। हिंदी छोड़िए, अंग्रेजी मीडिया ने भी अंजलि के आईएएस होने की खबरें जारी कर दीं। जबकि यह सरासर गलत है। सिविल सर्विसेज में सफल हुआ हर व्यक्ति आईएएस नहीं हो जाता। अंजलि बिरला का नाम सिविल सर्विसेज परीक्षा 2019 की मंगलवार को घोषित हुई रिजर्व लिस्ट में आया है। रिजर्व लिस्ट तब बनती है, जब पहली लिस्ट से वैंकेसी पूरी नहीं होती। इस लिस्ट में मेरिट में आने से छूटे अभ्यर्थियों को मौका मिलता है। 

2019 की जिस सिविल सर्विसेज परीक्षा में अंजलि सफल हुईं हैं, उसका परिणाम पिछले साल 4 अगस्त में आया था। तब कुल 829 सफल उम्मीदवारों की पहली सूची जारी हुई थी। अब वैंकेसी के हिसाब से संघ लोक सेवा आयोग ने 89 और सफल अभ्यर्थियों की सूची जारी की है, जिसमें अंजलि 67 वें नंबर पर हैं। अंजलि की रैंक को देखते हुए मुझे लगता है कि उन्हें आईएएस, आईपीएस और आईआरएस भी नहीं बल्कि ग्रुप बी की केंद्रीय सेवाओं में ही मौका मिलने की संभावना है। यहां तक कि पहली लिस्ट के 829 में से आधे से भी ज्यादा अभ्यर्थी आईएएएस, आईपीएस छोड़िए, आईआरएस भी नहीं बन पाए होंगे। ऐसे में दूसरी लिस्ट वाले आईएएस कहां से बन पाएंगे? लेकिन, अंग्रेजी लेकर हिंदी मीडिया ने अंजलि को तत्काल प्रभाव से आईएएस घोषित कर दिया। नतीजा, सब आईएएस होने की बधाई देने लगे। यह मामला अंजलि का नहीं है, हर साल मीडिया इसी तरह भेड़चाल का शिकार होती है।

दोस्तों, अंजलि को क्या काडर मिलेगा, क्या नहीं, यह उनकी मेरिट और कई मानकों के हिसाब से तय होगा। उन्हें आईएएस काडर ही मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हर साल वैकेंसी के हिसाब से सात, आठ, नौ सौ लोग सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सफल होते हैं। लेकिन, सभी आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस ही नहीं बन जाते। सिविल सर्विसेज परीक्षा के माध्यम से इन चार प्रमुख काडर के अतिरिक्त ग्रुप ए और ग्रुप बी की दो दर्जन सेवाओं के लिए भी चयन होता है।

कहने का मतलब है कि CSE में सफलता अलग बात है और IAS, IPS, IFS, IRS... आदि बनना अलग बात है। प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार कुल मिलाकर तीन चरणों में संघ लोक सेवा आयोग की ओर से होने वाली सिविल सर्विसेज परीक्षा में हर साल वैकेंसी के हिसाब से अभ्यर्थी सफल होते हैं। अभ्यर्थियों की रैंक और  उनके द्वारा Detailed Application Form (DAF) में बताई गई प्राथमिकता सहित कई मानकों के आधार पर काडर का आवंटन होता है। मेरिट के आधार पर कोई भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएएस) में जाता है तो कोई भारतीय विदेश सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय वन सेवा, भारतीय राजस्व सेवा, भारतीय रेल सेवा आदि में जाता है। 

और हां। सिविल सर्विसेज में सफलता अपने आप में बड़ी बात है। इस प्रतिष्ठित परीक्षा से अलग-अलग सेवाओं में लोग चुने जाते हैं। रैंक महज कुछ अंकों का खेल होता है बस। कोई आईएएस बन जाता है तो कोई कुछ और। लेकिन कुछ और बनने वाला आईएएस से कतई कम नहीं होता। लेकिन बिना आईएएस हुए किसी को आईएएस लिखना, क्या गलत नहीं है?

सिविल सर्विसेज को आईएएस का पर्याय मान लेना भी गलत है। आईएएस होना ही सर्वोत्कृष्ट होने की गारंटी नहीं है। कुछ अंकों से चूककर आईपीएस या आईआरएस बनने वाला भी बराबर योग्यता का होता है। ऐसे में मुझे लगता है कि सिविल सर्विसेज को आईएएस होने के नजरिए से देखना बंद करना चाहिए। सिविल सर्विसेज की सभी सेवाओं का बराबर सम्मान करना चाहिए।
  
अनुरोध है कि अगले साल जब सिविल सर्विसेज का रिजल्ट आएगा तो फिर एडवांस में किसी को IAS- IPS  घोषित करने की जगह सिर्फ इतनी सूचना देंगे अमुक ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सर्विसेज परीक्षा में सफलता हासिल की... रैंक के हिसाब से फला काडर मिलने की उम्मीद है.... आदि... आदि। न कि सीधे आप काडर भी रिजल्ट के साथ घोषित कर देंगे। काडर घोषित करने का काम संघ लोक सेवा आयोग और कार्मिक मंत्रालय को करने दीजिए।


10-Jan-2021 7:55 PM 26

ट्रंप के समर्थकों द्वारा कैपिटल बिल्डिंग पर हमला किए जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस में अपने ही समर्थकों की बेरुख़ी का सामना करना पड़ रहा है.

अमेरिका : कई रिपब्लिकन सीनेटर अब उनके समर्थन में खड़े होने को तैयार नहीं हैं और ट्रंप द्वारा नियुक्त किए गए कुछ लोगों ने उस घटना के बाद इस्तीफ़ा दे दिया है.

तय कार्यक्रम के अनुसार, अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को 20 जनवरी के दिन व्हाइट हाउस छोड़ना है और उसी दिन अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन कार्यभार लेंगे.

लेकिन कैपिटल बिल्डिंग में हुई हिंसा के बाद डेमोक्रेट नेता इंतज़ार के लिए तैयार नहीं हैं. वो चाहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप जल्द से जल्द ऑफ़िस खाली करें. साथ ही उन पर दोबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने से रोक लगाई जाए.

अमेरिकी कांग्रेस की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने शुक्रवार को कहा कि वो ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करेंगी, अगर उन्होंने जल्द से जल्द व्हाइट हाउस छोड़ने की घोषणा नहीं की.

पेलोसी का कहना है कि ट्रंप की बयानबाज़ी के कारण ही हिंसा भड़की जिसमें एक पुलिस अफ़सर समेत पाँच लोगों की मौत हुई.

ट्रंप के ख़िलाफ़ इससे पहले हुई महाभियोग की कार्यवाही के समय जो रिपब्लिकन सीनेटर उनके साथ खड़े थे, उनमें से कई अब उनके साथ नहीं हैं.

हालांकि, वो उनके ख़िलाफ़ जाने को भी तैयार नहीं दिखाई देते - यानी डोनाल्ड ट्रंप अपने लाखों समर्थकों की सहानुभूति खो चुके हैं, भले ही वो अब भी उनके वफ़ादार हों.

वहीं ट्रंप ने यह कसम ली है कि वो उन सभी रिपब्लिकन सीनेटरों के समानांतर नए उम्मीदवार उतारेंगे जिन्होंने संसद में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को चुनौती नहीं दी और बाइडन की जीत को नहीं रोका.

इस्तीफ़े और आशंकाएं

अमेरिकी कैपिटल में ट्रंप समर्थकों द्वारा की गई हिंसा की चौतरफ़ा आलोचना हुई है. कई वफ़ादार रिपब्लिकन नेताओं ने भी इस घटना की खुलकर निंदा की है. आलोचना करने वालों में ट्रंप प्रशासन के कई पूर्व मंत्री और वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक भी शामिल हैं.

कैपिटल हिंसा के बाद, संसद की कार्यवाही में दोनों पार्टियों के नेताओं ने राष्ट्रपति की हरकतों की निंदा की.

डेमोक्रेट नेताओं ने कहा कि ट्रंप को तुरंत दफ़्तर छोड़ देना चाहिए. डेमोक्रेट नेताओं का मानना है कि 'ट्रंप देश के लिए ख़तरा हैं. उनके रुख़ का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है, इसलिए व्हाइट हाउस में उन्हें 11 दिन और देने का कोई मतलब नहीं.'

अगर ट्रंप को वक्त से पहले उनके पद से हटाया गया, तो वे अगला चुनाव नहीं लड़ सकेंगे.

इसके लिए अमेरिका के उप-राष्ट्रपति और राष्ट्रपति चुनाव में उनके पार्टनर रहे माइक पेंस और मंत्रियों को राष्ट्रपति ट्रंप को रिटायर करने की कार्यवाही शुरू करनी होगी.

अमेरिकी संविधान के 25वें संशोधन के तहत ऐसा किया जा सकता है और संसद की स्पीकर नैंसी पेलोसी और सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर पहले ही माइक पेंस को यह क़दम उठाने के लिए कह चुके हैं.

लेकिन पेंस ने अब तक उनकी अपील पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

कुछ लोगों का मानना है कि वे इस योजना का समर्थन भी कर सकते हैं, क्योंकि ट्रंप प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी सांकेतिक रूप से इसका विरोध कर चुके हैं - जैसे कई अधिकारियों ने पिछले दिनों में इस्तीफ़ा दे दिया है.

इससे पहले जब डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही करनी चाही थी, तो ट्रंप कैबिनेट का समर्थन ना मिलने की वजह से वह सफल नहीं हो पायी थी.

लेकिन इस बार स्पीकर नैंसी पेलोसी उनके सहयोगियों से भी बात कर रही हैं. वे उन्हें समझाने की कोशिश कर रही हैं कि ट्रंप के 'एक्शन' ख़तरनाक हैं. उनका कहना है कि ट्रंप एक बड़ा ख़तरा साबित हो सकते हैं.

परमाणु हमले का डर

पेलोसी ने अपने एक पत्र में लिखा है कि उन्होंने अमेरिकी जनरल ऑफ़ स्टाफ़ जनरल मार्क मिली से बात की है कि अगर अस्थिर राष्ट्रपति ट्रंप किसी युद्ध का आदेश देते हैं या परमाणु हमले का आदेश देते हैं तो क्या होगा?

इस पर जनरल ने क्या जवाब दिया, सार्वजनिक रूप से इसकी कोई जानकारी नहीं है.

नेन्सी पेलोसी की चेतावनी के अनुसार, अगर ट्रंप इस सप्ताह में व्हाइट हाउस नहीं छोड़ते हैं, तो अगले कुछ दिनों में ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही शुरू हो सकती है.

संसद के निचले सदन में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत है जो ट्रंप के ख़िलाफ़ इस कार्यवाही को शुरू कर सकता है, और अगर ऐसा हुआ, तो ट्रंप अकेले अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे जिनके ख़िलाफ़ दो बार महाभियोग की कार्यवाही होगी.

लेकिन सीनेट में अब भी डेमोक्रेटिक पार्टी के पास इतने वोट नहीं हैं कि बिना रिपब्लिकन नेताओं के समर्थन के उनके ख़िलाफ़ यह कार्यवाही पूरी की जा सके.

सीनेट में जो नेता ट्रंप के रवैये से नाखुश भी हैं, उन्हें भी ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की कोई जल्दी नहीं है.

साल 2019 में जब डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा इसी तरह की कार्यवाही की कोशिश की गई थी, तो रिपब्लिकन सीनेटरों ने इसका खंडन किया था. अब उनमें से अधिकांश सीनेटर शांत हैं और कुछ खुलेतौर पर कह रहे हैं कि कैपिटल बिल्डिंग वाली घटना में ट्रंप की कोई ग़लती नहीं थी.

'ट्रंप को हटाकर फ़ायदा कम, नुक़सान ज़्यादा'

साउथ कैरोलाइन से रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा है कि "कार्यकाल के अंतिम दिनों में अगर ट्रंप के ख़िलाफ़ कार्यवाही की गई, तो उससे फ़ायदा की जगह नुकसान ही होगा. मुझे उम्मीद है कि जो बाइडन इसका आकलन करेंगे कि इससे कितना नुकसान हो सकता है."

कुछ अन्य रिपब्लिकन नेताओं ने भी यही तर्क दिया है.

रिपब्लिकन नेताओं का कहना है कि अंतिम दिनों में ट्रंप के ख़िलाफ़ कार्यवाही शुरू करने से देश और विभाजित होगा.

राष्ट्रपति ट्रंप ख़ुद को राष्ट्रपति चुनाव का विजेता बताते आये हैं और वे बार-बार यह दावा करते हैं कि चुनावों में धांधली हुई. हालांकि, अब तक उनके द्वारा कोई पुख़्ता सबूत पेश नहीं किया गया है.

उनके समर्थक भी उनकी बात पर विश्वास कर रहे हैं. उनके समर्थकों ने लोकतंत्र बचाओ के नारे के साथ अमेरिका के कई राज्यों में प्रदर्शन किये हैं और उनका कहना है कि 'चुनाव में चोरी से उनके नेता को हराया गया.'

अमेरिकी संसद ने नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को राष्ट्रपति चुनाव में उनकी जीत का सर्टिफ़िकेट तो दे दिया है, लेकिन अगले कुछ दिन यह तय करेंगे कि राष्ट्रपति ट्रंप की विदाई व्हाइट हाउस से कैसे होने वाली है.(bbc.com/hindi)


10-Jan-2021 6:01 PM 31

-ध्रुव गुप्त

दक्षिण भारत से आने वाली हिंदी फिल्मों की सबसे मधुर और संजीदा आवाज येशु दास अपनी तरह के बिल्कुल अलग-से गायक रहे हैं। ऐसे गायक जिनके सुर गले से नहीं, रूह से उठते हैं। हिंदी सिनेमा को आए न बालम का करूं सजनी, जब दीप जले आना, मधुबन खुशबू देता है, तू जो मेरे सुर में सुर मिला दे, दिल के टुकड़े-टुकड़े कर के मुस्कुरा के चल दिए, चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा, तुम्हें देखकर जग वाले पर यकीं नहीं क्योंकर होगा, ऐ मेरे उदास मन चल दोनों कहीं दूर चलें, गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, तेरी तस्वीर को सीने से लगा रखा है, जानेमन जानेमन तेरे दो नयन, आज से पहले आज से ज्यादा ख़ुशी आजतक नहीं मिली, चांद अकेला जाए सखी री, कोई गाता मैं सो जाता, कहां से आए बदरा, माना हो तुम बेहद हसीं, काली घोड़ी द्वार खड़ी, सुरमई आंखों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे जैसे सैकड़ों बेहतरीन गीत देने वाले काट्टश्शेरि जोसफ़ येशुदास अपनी आवाज की शास्त्रीयता और दिल में उतर जाने वाली सादगी  के लिए जाने जाते हैं। संगीतकार सलिल चौधरी के साथ फिल्म ‘आनंद महल’ के गीत ‘आ आ रे मितवा’ से हिंदी सिनेमा में शुरूआत करने वाले येशुदास देश के पहले गायक हैं जिन्होंने हिंदी, संस्कृत, मलयालम, तमिल, तेलगु, कन्नड़, गुजराती, मराठी, उडिय़ा, पंजाबी, अंग्रेजी, लैटिन, रूसी और अरबी भाषाओं में पचपन हज़ार से ज्यादा गीत गाए हैं। इतना सब कुछ हासिल करने के बावज़ूद उनकी एक तमन्ना रह गई कि वो केरल के मशहूर गुरुवायुर मन्दिर में बैठकर कृष्ण की स्तुति गाएं। मन्दिर के नियमों के अनुसार ईसाई येशुदास को कभी भी मन्दिर में प्रवेश नही मिल सका। येशुदास को उनकी बेमिसाल गायिकी के लिए 7 राष्ट्रीय और 43 अन्य पुरस्कार हासिल हैं।

पश्चिमी संगीत के शोर में अरसे से हिंदी सिनेमा के परिदृश्य से ओझल येशुदास के जन्मदिन (10 जनवरी) पर उनके सुरीले जीवन की शुभकामनाएं!


10-Jan-2021 6:01 PM 33

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

सरकार और किसानों का आठवाँ संवाद भी निष्फल रहा। इस संवाद के दौरान जऱा साफगोई भी हुई और कटुता भी बढ़ी। थोड़ी देर के लिए बातचीत रुक भी गई। सरकार के मंत्रियों और किसान नेताओं ने अपनी-अपनी स्थिति का बयान दो-टूक शब्दों में कर दिया।

सरकार ने कह दिया कि वह तीनों कानून वापस नहीं लेगी और किसानों ने कह दिया कि यदि कानून वापस नहीं होंगे तो किसान भी वापस नहीं जाएंगे। धरने पर डटे रहेंगे। बल्कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में एक लाख ट्रेक्टरों की परेड करेंगे। किसानों ने इन कानूनों में संशोधन के लिए एक संयुक्त कमेटी के सरकारी प्रस्ताव को भी रद्द कर दिया है। जितना समय बीतता जा रहा है, हरियाणा और पंजाब के इन किसानों की तकलीफें बढ़ती जा रही हैं। भयंकर ठंड में किसानों की मौत की खबरें रोज आ रही हैं। लेकिन उन्होंने अहिंसक सत्याग्रह का अनुपम उदाहरण पेश किया है।

संतोष का विषय है कि इन दोनों प्रांतों के किसान काफी मालदार और दमदार हैं। उन्होंने धरनाधारी किसानों, आढ़तियों और अपने मजदूरों के लिए दिल्ली की सीमा पर क्या-क्या सुविधाएं नहीं जुटाई हैं।

यदि उन्हें यहां कुछ माह तक और टिकना पड़ेगा तो वे टिक पाएंगे। वे यदि इसी तरह से शांतिपूर्वक टिक रहते हैं तो टिके रहें। दो-चार माह में तंग आकर वे अपने आप लौट जाएंगे। लेकिन यदि उन्होंने रास्ते रोके, तोड़-फोड़ की और यदि वे हिंसा पर उतारु हो गए तो सरकार को मजबूरन सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी। वैसी हालत में किसानों की जायज़ मांगें भी हवा में उड़ जाएंगी और जनता के बीच उनके प्रति जो थोड़ी-बहुत आत्मीयता दिखाई पड़ रही है, वह भी खत्म हो जाएगी। भारत का मुर्दार प्रतिपक्ष कुछ बड़बड़ाकर चुप हो जाएगा। इस कानून को बनाते वक्त सरकार ने जो लापरवाही बरती थी, वह भी जनता की नजऱों से ओझल हो जाएगी। कुुछ किसान नेताअेां का यह अहंकार कि वे संसद को भी अपने चरणों में झुकाकर रहेंगे, उन्हें काफी भारी पड़ सकता है। अब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आनेवाले फैसले को भी मानने से मना कर दिया है तो इसका अर्थ क्या है?अदालत में कौन गया है? सरकार या किसान? खुद किसान नेता गए हैं। इसके बावजूद किसान नेता सरकार पर तोहमत लगा रहे हैं कि वह अदालत के जरिए किसानों को दबाना चाहती है। मु_ी भर किसान नेताओं का यह अहंकार और दुराग्रह देश के अन्नदाताओं को नुकसान पहुंचाए बिना नहीं रहेगा। उन्हें संयम और विवेक से काम लेना होगा। देश के ज्यादातर गरीब और साधनहीन किसान दिल्ली में चल रही इन मालदार किसान नेताओं की इस नौटंकी पर हतप्रभ हैं। देश के 94 प्रतिशत गरीब किसानों की हालत सुधरे और हमारी खेती 4-6 गुना ज्यादा उत्पादन करे, इस लक्ष्य पर सरकार और किसानों को आज गहरा संवाद करने की जरुरत है।

  (नया इंडिया की अनुमति से)


08-Jan-2021 1:37 PM 45

-ईश्वर सिंह दोस्त

सवाल एक ट्रंप का नहीं है। उसके पीछे लाखों श्वेत अमेरिकी खड़े हैं। सवाल श्वेत चौधराहट का भी नहीं है। उसके पीछे अमेरिका के शीर्ष कॉर्पोरेट पूँजीपतियों की ताकत खड़ी है। इसलिए अमेरिकी संसद भवन केपिटल पर हमले का खेल खत्म नहीं हुआ है। यह अभी शुरू हुआ है। निश्चित ही अभी ट्रंप समर्थक एक कदम पीछे हो जाएंगे, ताकि भविष्य में लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए दो कदम बढ़ाने का मौका खुला रहे।

यह लंबे समय चलने वाली रस्साकशी होगी। लोकतंत्र के खेमे में जो अब हैं, उन्हें यह समझना होगा कि रस्सी के दूसरी तरफ सिर्फ ट्रंप का सनकीपन नहीं है, जिसे पिछले साल भर से अमेरिका के ही कुछ शीर्ष मनोवैज्ञानिक उनकी तेजी से गिरती हुई मानसिक स्थिति बता रहे हैं। 

रस्सी के दूसरी तरफ सिर्फ रिपब्लिकन पार्टी नहीं है, जो ट्रंप और उसके एजेंडे को सर आँखों पर बैठाए हुए थी। रस्सी के दूसरी तरफ सिर्फ पगलाई हुई श्वेत जनसंख्या नहीं है। जो पिछले चार सालों से नस्लीय नफरत और प्रतिहिंसा की आग में जल रही है। रस्सी के दूसरी तरफ सिर्फ अंधाधुंध मुनाफे के लालच में अंधे हो चुके चंद कॉर्पोरेट पूँजीपति नहीं हैं।

बल्कि देखना यह होगा कि रस्सी के दूसरी तरफ पूँजीवाद और लोकतंत्र की बढ़ती रार भी है। रस्सी के दूसरे तरफ महामंदी के भँवर में फँसी पूँजीवादी पद्धति भी है, जो नवउदारवादी भूमंडलीकरण के नाकाम होने के बाद से बौराई हुई है। रस्सी के दूसरी तरफ बढ़ती विषमता के बीच लोकतंत्र के असुरक्षित होने व अस्मिताओं की अफीम के सुलभ होने की दास्तान भी है।

 ट्रंप तो मुफ्त में बदनाम है। हकीकत यह है कि ट्रंप के झूठ अकेले ट्रंप के झूठ नहीं हैं। वे अमेरिका की बहुसंख्यक श्वेत जनसंख्या के झूठ भी हैं। वह झूठ सुनना चाहती है। वह झूठ दोहराना चाहती है। वह झूठ जीना चाहती है। वह कह रही है कि मैं जो कहूं वही कानून है और मैं जो करूं वही व्यवस्था है। तभी तो जो पुलिस कुछ महीनों पहले यहीं हुए फ्लायड लायड के समर्थन में हुई रैली के समय चाक-चौबंद थी, कैपिटल पर हुए हमले में अनमनी सी थी।

भीड़ के खत्म होने के बाद पुलिस नहीं है बल्कि भीड़ और पुलिस की विभाजक रेखा धुंधली हो गई है। अमेरिका की पुलिस इसके पहले भी चाहे लाख नस्लीय झुकाव वाली हो, मगर केपिटल के चौराहे पर उभरी यह नई पुलिस है, जिसके साथ बाइडन और हैरिस को अपना राज चलाना होगा। यह सोचना भयंकर भूल होगी कि अमेरिका की लोकतांत्रिक संस्थाएं इतिहास की काल गति से निरपेक्ष रहकर मजबूत बनी खड़ी रहेंगी। ये संस्थाएं जिस प्रतियोगी पूँजीवाद के दौर की उपज थी, वह अब नहीं है। ये संस्थाएं जिस पूँजीवादी उदारवाद के दौर की उपज थी, वह अब नवउदारवाद में तब्दील हो चुका है।

उदारवादी लोकतंत्र की इबारतों की दुनिया भर में रोज धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। दुनिया भर में देशों के संविधान कांप रहे हैं और डोल रहे हैं। बाइडन और हैरिस अमेरिकी संविधान को तब तक नहीं बचा पाएंगे, जब तक कि उनके पास लोकतंत्र से ऊब चले कार्पोरेट को खुश करने और साथ ही हावी न होने देने की रणनीति नहीं होगी।

यहां एक और लोकतंत्र भारत का ही उदाहरण लें। 2014 में मनमोहन सरकार ने जनता का विश्वास खोने से कहीं पहले भारत के कॉर्पोरेट जगत का विश्वास खो दिया था। वे मनरेगा, शिक्षा अधिकार, खाद्य सुरक्षा जैसे कदमों से बेचैन हो गए थे। उन्हें लगने लगा था कि देश के पैसे देश की जनता के लिए ही खर्च होंगे तो फिर हमारा क्या होगा।

मनमोहन सरकार के एक हाथ में नवउदारवाद का फंडा और दूसरे में नव-नेहरूवाद का मिनी झंडा था। कॉर्पोरेट उद्विग्न था कि इसके दोनों हाथों में नवउदारवाद का फंडा क्यों नहीं है। बेचैन कॉर्पोरेट ने नफरत की राजनीति को समर्थन का दांव खेला।

यही अमेरिका और दुनिया के तमाम देशों में हुआ था। अति दक्षिण यूं ही मजबूत नहीं हुआ है। यूं ही पिछले साल जर्मनी की संसद पर ऐसा ही हमला नहीं हो गया था। 

दुनिया भर में तमाम देशों में जो पहचानें बहुसंख्या में हैं या आर्थिक व सामाजिक रूप से ज्यादा मजबूत हैं, उनमें एक तरह का पीडि़तवाद पैदा कर दिया गया है। वे सोचने लगे हैं कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय उन्हें पीडि़त बनाए रखने के कायदे-कानून हैं। कॉर्पोरेट भी नए कानून चाहता है, नई व्यवस्था चाहता है। ये ताकतवर ‘पीडि़त’ भी नए कानून चाहते हैं, नई व्यवस्था चाहते हैं।

कॉर्पोरेट पूँजी का एजेंडा सिर्फ मेहनतकशों या किसानों के भविष्य को ही नहीं बल्कि छोटे पूँजीपतियों, मध्यवर्ग व व्यापारियों के भविष्य को भी नष्ट करता है, इसीलिए बिना नफरत के रसायन के उसके साथ भीड़ नहीं जुड़ती।

इसलिए जो बड़ा सवाल है वह यह है कि ताकतवरों के पीडि़तवाद से लोकतंत्र को कैसे बचाया जाए।

सवाल यह है कि लोकतंत्र और नवउदारवाद की चूहा-बिल्ली जैसी दुश्मनी कैसे खत्म हो? अब या तो लोकतंत्र को झटका लगेगा या फिर नवउदारवाद को!

यह भी ख्याल रखना होगा कि कथित समाजवादी देशों का राजकीय पूँजीवादी मॉडल या सामाजिक पूँजीवादी मॉडल या फिर चीन जैसा अर्ध राजकीय- अर्ध नवउदारवादी मॉडल विकल्प नहीं है। लोकतंत्र में उसकी कोई रुचि नहीं है।

कथित समाजवादी देशों में औंधे मुँह पड़े मार्क्स को कोई सीधा करेगा या फिर कोई नई सोच आएगी? रास्ता कहाँ से मिलेगा? वाशिंगटन के कैपिटल से नवउदारवादी नफरत व लोकतंत्र की टक्कर की लाइव रिपोर्ट के बीच में ही यह सब भी सोचना समझना होगा।


08-Jan-2021 1:37 PM 42

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डोनाल्ड ट्रंप ने सिद्ध कर दिया है कि वह अमेरिका के कलंक हैं। अमेरिका के इतिहास में राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कुछ विवाद कभी-कभी जरूर हुए हैं लेकिन इस बार ट्रंप ने अमेरिकी लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। उन्होंने चुनाव परिणामों को रद्द करते हुए यहां तक कह दिया कि वे व्हाइट हाउस (राष्ट्रपति भवन) खाली नहीं करेंगे। वे 20 जनवरी को जो बाइडन को राष्ट्रपति की शपथ नहीं लेने देंगे। उनके इस गुस्से को सारी दुनिया ने तात्कालिक समझा और उनके परिवार के सदस्यों की सलाह पर वे कुछ नरम पड़ते दिखाई पड़े लेकिन अब जबकि अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के दोनों सदन बाइडन के चुनाव पर मोहर लगाने के लिए आयोजित हुए तो ट्रंप के समर्थकों ने जो किया, वह शर्मनाक है।

वे राजधानी वाशिंगटन में हजारों की संख्या में इक_े हुए और उन्होंने संसद भवन पर हमला बोल दिया। उत्तेजक नारे लगाए। तोडफ़ोड़ की। धक्का-मुक्की की और गोलियां भी चलाईं। चार लोग मारे गए। एक महिला को पुलिस की गोली लगी। भीड़ ने इतना आक्रामक रुख अपनाया कि सांसदों ने एक बंद पड़े भवन में घुसकर अपनी जान बचाई। इन लोगों को भडक़ाने की जिम्मेदारी डोनाल्ड ट्रंप की ही है, क्योंकि वे व्हाइट हाउस में बैठे-बैठे अपनी पीठ ठोंकते रहे। खुद उनके बीच नहीं गए।

ट्रंप की इस घनघोर अराजक वृत्ति के बावजूद अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने बाइडन और कमला हैरिस की जीत पर अपनी मुहर लगा दी। उन विवेकशील रिपब्लिकन सांसदों पर हर लोकतंत्रप्रेमी गर्व करेगा, जिन्होंने अपने नेता ट्रंप के खिलाफ वोट दिया। ट्रंप तुरंत समझ गए कि उनकी अपनी पार्टी के नेता उनका विरोध कर रहे हैं। अब उन्हें राष्ट्रपति भवन में कोई टिकने नहीं देगा। उनकी हवा खिसक गई। उन्होंने हारकर बयान जारी कर दिया है कि 20 जनवरी को सत्ता-परिवर्तन शांतिपूर्वक हो जाएगा लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि उनका असली संघर्ष अब शुरू होगा।

वे ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि उन्होंने अपने चार साल के कार्यकाल में मानसिक रुप से अमेरिका के दो टुकड़े कर दिए हैं। दूसरे शब्दों में बाइडन की राह में अब वे कांटे बिछाने की कोशिश जमकर करेंगे।  अमेरिका के लिए बेहतर यही होगा कि रिपब्लिकन पार्टी ट्रंप को बाहर का रास्ता दिखा दे।

जिन रिपब्लिकन सांसदों ने इस वक्त ट्रंप की तिकड़मों को विफल किया है, यदि वे पहल करेंगे तो निश्चय ही अमेरिकी लोकतंत्र गड्ढे में उतरने से बच जाएगा।

(नया इंडिया की अनुमति से)


07-Jan-2021 6:33 PM 23

-एंथनी जर्चर

इस तरह से ट्रंप का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है. किसी शोर से नहीं, एक धमाके से.

कई हफ़्तों से डोनाल्ड ट्रंप छह जनवरी का ज़िक्र कर रहे थे. उन्होंने अपने समर्थकों से राजधानी वाशिंगटन डीसी आने और संसद को चुनौती देने को कहा था. इसके अलावा उन्होंने उप-राष्ट्रपति माइक पेंस को नवंबर के चुनावी नतीजों को ख़ारिज करने को कहा था.

बुधवार की सुबह राष्ट्रपति और उनके तैयार वक्ताओं ने शुरुआत की.

राष्ट्रपति के निजी वकील रूडी जियुलियानी ने चुनावी विवाद को 'ट्रायल बाय कॉम्बेट' से सुलझाने की बात कही.

ट्रंप के सबसे बड़े बेटे का अपनी पार्टी के सदस्यों के लिए भी संदेश था.

उन्होंने कहा, "ये उनकी रिपब्लिकन पार्टी नहीं है. ये डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी है."

उसके बाद राष्ट्रपति ने बढ़ती भीड़ को व्हाइट हाउस से दो मील दूर संसद भवन की ओर मार्च करने के लिए उकसाया. राष्ट्रपति के उकसाने पर भीड़ 'चोरी रोको', 'बकवास' जैसे नारे लगा रही थी.

राष्ट्रपति ने कहा, "हम कभी हार नहीं मानेंगे. हम कभी हार स्वीकार नहीं करेंगे. हमारे देश ने बहुत सहन कर लिया. अब और नहीं."

जैसे ही राष्ट्रपति का भाषण ख़त्म होने लगा, एक अलग तरह का ड्रामा संसद के अंदर ही शुरू हो गया जहां सदन के साझा सत्र में हर राज्य के नतीजे रखे जाने लगे.

पहले पेंस ने बयान दिया कि उनके पास ज़्यादा शक्तियां नहीं हैं और उनकी भूमिका प्रक्रिया निभाने के तौर पर ज़्यादा है.

उसके बाद रिपब्लिकन नेताओं ने एरिज़ोना के चुनाव पर अपनी पहली आपत्ति पेश की और इसके बाद सदन में अलग-अलग चर्चा शुरू हुई कि वहां जो बाइडन की जीत को स्वीकार किया जाए या नहीं.

सदन की कार्यवाही में काफ़ी हंगामा रहा, दोनों पक्ष के लोग अपने अपने स्पीकरों की टिप्पणियों पर ख़ुशी मना रहे थे.

नई निर्वाचित सांसद लॉरेन बोबर्ट ने कहा, "पिछले रविवार को जो मैंने संविधान की सुरक्षा और समर्थन की शपथ ली है, उसकी वजह से मेरे लिए ये ज़रूरी है कि मैं ग़लत बात पर आपत्ति जताऊं."

"मैं लोगों को नज़रअंदाज़ नहीं होने दूंगी."

सीनेट में अलग ही स्वर में बहस चल रही थी. सीनेट के बहुमत नेता मिच मैक्कॉनल काले रंग के सूट और टाई में थे जो किसी अंतिम क्रिया के लिए फिट बैठती है. वे डोनाल्ड ट्रंप को 'दफ़नाने' आए थे, उनकी तारीफ़ करने नहीं.

उन्होंने कहा, "अगर इस चुनाव को हारे हुए पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों के आधार पर ही ख़ारिज कर दिया जाएगा तो हमारा लोकतंत्र मौत के कुएं में दाख़िल हो जाएगा."

"इसके बाद कोई ऐसा चुनाव नहीं दिखेगा जिसे पूरा देश स्वीकार करेगा. हर चार साल में किसी भी हाल में सत्ता के लिए ऐसी छीना-झपटी होगी."

ड्रामा रूक-रूक कर शुरू हुआ. टीवी के कैमरों ने प्रदर्शनकारियों की संसद भवन की सीढ़ियों पर नाचने और झंडे लहराने की तस्वीरें दिखाई. सोशल मीडिया पर बिल्डिंग में घुसे दंगाइयों की फ़ोटो और वीडियो आने लगीं जो निर्वाचित सदस्यों के दफ्तरों में घुसने की कोशिश कर रहे थे, उनके साथ सुरक्षा अधिकारियों को संसद के निचले सदन में बंदूक़ें निकालने की तस्वीरें भी सामने आई.

विलमिंगटन, डेलावेयर में राष्ट्रपति-इलेक्ट जो बाइडन ने अर्थव्यवस्था पर अपने तय भाषण को हटाया और वाशिंगटन में हो रही 'बग़ावत' की निंदा की.

उन्होंने कहा, "इस वक़्त हमारे लोकतंत्र पर अभूतपूर्व हमला हो रहा है जो हमने आधुनिक युग में कभी नहीं देखा. स्वतंत्रता की पहचान संसद पर हमला."

उन्होंने अंत में ट्रंप को चुनौती देते हुए कहा कि वे टीवी पर जाकर हिंसा की निंदा करें और इसे रोकने की माँग करें.

कुछ मिनट बाद ही ट्रंप ने देश के नाम अपना संदेश दिया लेकिन ये वो नहीं था जो बाइडन ने सुझाया था.

उसकी बजाय चुनाव को लेकर उनकी पुरानी शिकायतों को बताते हुए उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि 'घर जाइए, हम आपसे प्यार करते हैं, आप बहुत ख़ास हैं.'

ट्रंप के सोशल मीडिया पर प्रतिबंद्ध

ये उसी तरह था जैसे ट्रंप ने अपने समर्थकों के अपराधों पर हमेशा प्रतिक्रिया दी है. चाहे समर्थकों की रैली में हिंसा हो, या शार्लेटविले में व्हाइट सुपरमेसिस्ट रैली में झड़प के बाद 'दोनों तरफ़ के अच्छे लोग' वाला बयान या बाइडन के साथ उनकी पहली डिबेट में घोर-दक्षिणपंथी लड़कों के ग्रुप को उनका 'स्टैंड बैक स्टैंड बाय' वाला संदेश.

ट्रंप के दो ट्वीट, जिसमें वे अपने समर्थकों की तारीफ़ कर रहे हैं, उन्हें ट्विटर ने हटा दिया और 12 घंटे के लिए राष्ट्रपति का अकाउंट भी लॉक कर दिया जो पहले कभी नहीं हुआ था.

फ़ेसबुक ने भी ऐसा ही किया और ट्रंप को पूरे दिन के लिए प्रतिबंधित कर दिया.

ट्रंप के कार्यकाल में पहली बार, उनके सोशल मीडिया से लंबे क़रीबी रिश्ते में पहली बार ट्रंप को चुप करवाया गया.

अगर ये पल डोनाल्ड ट्रंप के लिए 'तुम में कोई शर्म बची है या नहीं' वाला पल है तो ये ऐसे आ रहा है जहां एक तरफ़ कैपिटल में ख़ून और टूटे कांच साफ़ किये जा रहे हैं.

दोपहर से शाम हो गई और आख़िरकार जब पुलिस संसद भवन को सुरक्षित करने में कामयाब हुई तो दाएं बाएं से हिंसा के विरोध में स्वर उठने लगे.

ये जानकर हैरानी नहीं होगी कि चक शूमर जैसे डेमोक्रेट्स ने हिंसा का दोष ट्रंप पर मढ़ा.

उन्होंने कहा, "छह जनवरी अमेरिका के इतिहास में सबसे काले दिनों में से एक होगा. ये हमारे देश को एक अंतिम चेतावनी है कि लोगों की भावनाओं को भड़काने वाले उस राष्ट्रपति की वजह से, उसका साथ देने वालों की वजह से, उसे मानने वालों की वजह से और उसके झूठ को बार-बार दोहराने वाली ग़ुलाम मीडिया की वजह से क्या परिणाम हो सकते हैं जो अमेरिका को बर्बादी के रास्ते पर धकेल रहा है."

रिपब्लिकन भी कर रहे हैं ट्रंप की आलोचना

ग़ौरतलब है कि रिपब्लिकन भी कुछ ऐसा ही कह रहे हैं.

ट्रंप की आलोचक और रिपब्लिकन सांसद लिन चिनेय ने ट्वीट किया, "अपना संवैधानिक फ़र्ज़ निभाने से रोकने के लिए अभी संसद में हमने एक हिंसक भीड़ का हमला देखा. इस बात पर कोई सवाल नहीं कि राष्ट्रपति ने ही ये भीड़ बनाई है, भीड़ को उकसाया है और इस भीड़ को संबोधित किया है."

लेकिन सिर्फ़ ट्रंप के आलोचक ही नहीं, अक्सर उनका साथ देने वाले सांसद टॉम कॉटन ने भी उनके ख़िलाफ़ बोला है.

उन्होंने कहा, "अब काफ़ी वक़्त हो चुका है कि राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को स्वीकार कर लें, अमेरिका के लोगों को भ्रमित करना छोड़ दें और हिंसक भीड़ को ख़ारिज करें."

मिलानिया ट्रंप की स्टाफ़ प्रमुख स्टेफ़नी ग्रीशम और व्हाइट हाउस की डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी साराह मैथ्यूस ने विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया. ऐसी भी ख़बरें आ रही हैं कि अगले 24 घंटे में कई प्रशासनिक अधिकारी इस्तीफ़ा दे सकते हैं.

सीबीएस न्यूज़ के मुताबिक़ ट्रंप के कैबिनेट अधिकारी अमेरिकी संविधान के 25वें संशोधन पर चर्चा कर रहे हैं जिसमें प्रावधान है कि कैसे उप-राष्ट्रपति और कैबिनेट राष्ट्रपति को अस्थायी तौर पर हटा सकती है.

चाहे उप-राष्ट्रपति पेंस और कैबिनेट इस पर आगे बढ़ें न बढ़ें लेकिन ट्रंप का कार्यकाल दो हफ़्तों में ख़त्म हो जाएगा. इस वक़्त रिपब्लिकन नेताओं के सामने भविष्य को लेकर सवाल है जहां वे सत्ता खो चुके हैं, व्हाइट हाउस खो चुके हैं और एक पूर्व राष्ट्रपति है जिसकी छवि बुरी तरह ख़राब हो चुकी है लेकिन फिर भी पार्टी के सपोर्ट बेस के एक तबक़े पर उसका अच्छा प्रभाव है.

ट्रंप की चुप्पी

बुधवार की घटनाओं के बाद पार्टी की दिशा के लिए एक लड़ाई शुरू हो सकती है क्योंकि पार्टी के अंदर के लोग ही ट्रंप और उनके वफ़ादारों से नियंत्रण छीनने की कोशिश कर रहे हैं.

आज मैक्कॉनल की टिप्पणियों से भी ये नज़र आता है. इसके अलावा यूताह के सांसद और पूर्व राष्ट्रपति उम्मीदवार मिट रोमनी भी नेतृत्व की भूमिका में आ सकते हैं.

इन लोगों को पार्टी के दूसरे लोगों से चुनौती मिल सकती है जो ट्रंप की लोकलुभावन राजनीति पर दावा करने में दिलचस्पी रखते हैं.

ग़ौर करने वाली बात है कि सबसे पहले सीनेट में चुनाव नतीजों को चुनौती देने की घोषणा करने वाले मिसूरी के सांसद जॉश हॉले अपनी आपत्ति से पीछे नहीं हटे, तब भी नहीं जब कैपिटल में हिंसा होने के बाद सीनेट की कार्यवाही शुरू हुई.

संकट एक राजनीतिक मौक़ा लेकर आता है और बहुत से नेता हैं जो इसका फ़ायदा उठाने से चूकेंगे नहीं.

बहरहाल, ट्रंप अब भी सत्ता में हैं. हालांकि फ़िलहाल वे चुप होंगे, व्हाइट हाउस में अपने सोशल मीडिया के बिना बैठ कर टीवी देख रहे होंगे लेकिन वे देर तक चुप नहीं रहेंगे.

और एक बार जब वे अपने नए फ्लोरिडा वाले घर के लिए निकल जाएंगे, वे हिसाब चुकता करने की योजना पर काम करना शुरू कर सकते हैं और शायद दोबारा सत्ता में आएं तो एक विरासत बना पाएं जो फ़िलहाल बर्बाद हो चुकी है.(https://www.bbc.com/hindi)


07-Jan-2021 4:41 PM 50

-सतीश जयसवाल 

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध बाँस गायक-वादक हमारे जानते, देखते में इतिहास की बात होते जा रहे है।उनके साथ उनका "बाँस" भी।यह "बाँस" वस्तुतः बांसुरी का ही एक रूप है।छत्तीसगढ़ का बिल्कुल अपना।खूब लम्बी बांसुरी,जिसे बजाने के लिए उतनी ही लम्बी और दमदार साँस भी चाहिए।जो "बाँस" को भर सके।

बिलासपुर के चकरभाठा एयरपोर्ट से लगे हुए एक गांव- अचानकपुर के पंजूराम बरेठ के पास इतनी लंबी और दमदार साँस है।यह साँस उसे अपने पिता से विरासत में मिली है।इस लम्बी साँस के साथ उसके पिता का बनाया हुआ, कलात्मक "बाँस वाद्य" भी उसे विरासत में मिला है।अब यह विरासत 100 बरस से भी पुरानी हो चुकी।

खुद पंजूराम 60 पार कर चुका।और जुठेल राम बरेठ, उसके पिता ने जब उसे सौंपा था तब वह सत्तर पार कर चुके थे। या, शायद इससे भी अधिक। जुठेल राम, उसके पिता अब नहीं रहे। अब 10 बरस से अधिक हुए।
जुठेल राम ने अपना "बाँस वाद्य" खुद बनाया था।उसकी कलात्मक सजावट भी खुद ही की थी।पंजूराम ने उसे ही सम्हाल कर रखा है।और उसे ही बजाता है।लेकिन उसके पिता ने उसे "बाँस" वादन-गायन के साथ बनाना और सजना भी सिखाया था।छत्तीसगढ़ के यदुवंशी राउत बाँस गायन-वादन के साथ इसके बनाने-कलात्मक सजावट में भी पारंगत होते हैं।एक तरह से यह कला उनकी अपनी जातिगत परम्परा है।

जुठेल राम भी यादव ही था।लेकिन उसने अपनी जाति से बाहर एक बरेठ स्त्री से विवाह किया।बाहर होकर खुद भी बरेठ हो गया।अब उसका वंश भी बरेठ ही हुआ।लेकिन जब तक वह रहा, बाँस गायन की शान बनकर रहा।
बाँस वादन और गायन साथ चलते हैं। यह गायन पारंपरिक धुन में चलता है।ऐसे ही यहाँ की कोई पारंपरिक लोक गाथा भी इसके साथ-साथ चलती है। और लोक-संगीत का अनोखा रूप रचती है।

अब पंजूराम अपने पिता की स्मृतियों की कोई एक गाथा अपने भीतर समाये किसी ना किसी पारंपरिक लोक-गाथा को बाँस गीत की धुन में बांधता, रोजाना गांव से शहर आता है।और दिन भर घूमता है। रोजी-रोटी ढूंढता है। फिर लौट जाता है।
हाँ, अपने पिता और उनके पिता की वंशगत कला-परंपरा के साथ अपने बाँस की कलात्मक सजावट और खुद अपनी आकर्षक रंगीन पोषाक और वही रौबदार घनी मूँछें भी सम्हाले हुए है।और शहर के लिए खुद को दर्शनीय बनाये हुए है। 
ऐसे में भी कोई सुनने वाला मिल जाये तो वहां घर में,शाम का चूल्हा जल सके।वैसे प्रति माह 300 रुपयों  की सरकारी पेंशन का भी एक सहारा है।

 


07-Jan-2021 2:15 PM 48

-गिरीश मालवीय

दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर का फायदा हो जाता है। देश में कोरोना वैक्सीन के इमरजेंसी यूज का अप्रूवल पाने वाली दोनों बड़ी फार्मा कंपनियां, भारत बायोटेक के CEO ओर सीरम इंस्टीट्यूट के CEO आपस में भिड़ गए, ओर हम जैसे तथाकथित ‘कांस्पिरेसी थ्योरिस्ट’ का फायदा हो गया

दोनों कम्पनियों ने एक-दूसरे की कोरोना वैक्सीन की ऐसी पोल पट्टी खोली कि लोग असलियत जानकर हैरान रह गए। हम जैसे लोग यह बात बताते तो लोग यकीन ही नहीं करते और बोलते कि आप तो वैक्सीन के बारे में भी भ्रम फैला रहे हो।

यह मामला तब शुरू हुआ जब सीरम इंस्टीट्यूट के अदार पूनावाला ने दावा किया कि हमारी वैक्सीन में दम है बाकी सबमें पानी कम है। अदार पूनावाला ने रविवार को फाइजर, मॉडर्ना और ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोवीशील्ड के अलावा बाकी सभी वैक्सीन को पानी की तरह बता दिया। उनके इस दावे से भारत बायोटेक के सीईओ कृष्णा इल्ला के तनबदन में आग लग गई। उन्होंने सीरम इंस्टीट्यूट समेत एम्स के निदेशक तक को निशाने पर ले लिया।

भारत बायोटेक के रूष्ठ कृष्णा एल्ला ने कहा कि एस्ट्राजेनेका ने वॉलंटियर्स को वैक्सीन के साथ पैरासिटामॉल दी थी, ताकि वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स (ड्डस्र1द्गह्म्ह्यद्ग ह्म्द्गड्डष्ह्लद्बशठ्ठ) को दबाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और यूरोप ने यूके के एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के परीक्षण डेटा को मंजूर करने से इनकार कर दिया था क्योंकि वह स्पष्ट नहीं था लेकिन कोई भी ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के डेटा पर सवाल नहीं उठा रहा है

 यह बहुत बड़ा आरोप थे इसे सुनकर सीरम इंस्टीट्यूट वाले अदार पूनावाला की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी ओर कल शाम को मोदी सरकार द्वारा दोनों कंपनियों पर इस तकरार को खत्म करने का दबाव बनाया गया और दोनों कम्पनियो ने सुलह का ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी कर दिया

दरअसल यह दो वैक्सीन निर्माता कंपनियों की आपसी प्रतिद्वंदिता से अधिक सरकार द्वारा की गई जल्दबाजी पर सवाल अधिक है जहाँ वेक्सीन केंडिडेट पर थर्ड ट्रायल के परिणामो का असर जाने बिना अनुमति प्रदान कर दी गयी है

भारत बायोटेक की वैक्सीन के थर्ड ट्रायल पूरे हुए ही नही है ओर सीरम के कोवीशील्ड के ट्रायल्स को दरअसल फेज-2/3 ट्रायल्स कहा जा रहा है। क्योकि इसमें वहीं सब है जो दुनियाभर में फेज-2 ट्रायल्स में होता है। इसमें सेफ्टी और इम्युनोजेनेसिटी देखी जा रही है, उसके असर का एनालिसिस नहीं हो रहा है।

दोनों ही वेक्सीन को इमरजेंसी अप्रूवल देना कितना गलत था यह इन दोनों कंपनियों के ष्टश्वह्र के बीच आरोप प्रत्यारोप से साफ हो गया है


07-Jan-2021 2:12 PM 32

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

कोरोना से जैसा युद्ध भारत करेगा, वैसा कोई और देश करने की स्थिति में नहीं है। 30 करोड़ लोगों को फिलहाल टीका लगाने की तैयारी है। इतने लोग तो बस दो-तीन देशों में ही हैं। धीरे-धीरे भारत में 140 करोड़ लोगों को भी कोरोना का टीका मिल सकेगा। मकर संक्राति के दिन से टीकाकरण की यह क्रांति शुरु हो जाएगी। इस टीका-क्रांति को लेकर दो टीका-टिप्पणी हो रही है। एक तो पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच और दूसरी टीका निर्माता दो भारतीय कंपनियों के बीच। दोनों कंपनियों-भारत बायोटेक और सीरम-इंस्टीट्यूट ने एक-दूसरे के टीके के बारे में जो विवाद खड़ा किया था, उसे अब उन्होंने खुद ही सुलझा लिया है। इन दोनों के टीके दुनिया के सबसे सस्ते टीके होंगे। ये टीके भारत के वातावरण के भी अनुकूल होंगे।

इन्हें सदा 200 या 300 डिग्री ठंडे शीतमान में रखने की जरुरत नहीं होगी। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने हजारों शीतयंत्र तैयार कर लिये हैं। 37 राज्यों के 41 हवाई अड्डों पर इस टीके को भिजवाने का इंतजाम हो गया है। हवाई अड्डे से टीका-केंद्र तक भी टीका मिनटों में सुरक्षित पहुंचवाने की व्यवस्था की जा रही है। हर प्रदेश में हजारों टीका-केंद्र बनाए जा रहे हैं ताकि बुजुर्ग और कमजोर लोगों की भी समुचित सेवा हो सके।सरकार को इस अभियान में अभी 13,500 करोड़ रु. खर्च करने होंगे। अंदाज है कि सरकार को लगभग 30 हजार कोल्ड चेनों, 45 हजार बर्फीले रेफ्रीजरेटरों और 41 हजार डीप फ्रीजरों का प्रबंध करना होगा। यह टीका बुजुर्गों और बीमारों को पहले दिया जाएगा। इस गणित को भी स्वास्थ्य मंत्रालय सुलझा रहा है। वास्तव में कई मंत्रालयों के सहयोग से ही यह अभियान सफल होगा।

यह अभियान लगभग वैसा ही है, बल्कि उससे भी ज्यादा गंभीर है, जो हमारे देश में चुनावों के दौर में होता है। इस अभियान में देश के सभी लोग का अधिकतम सहयोग होना चाहिए लेकिन हमारे विपक्षी नेताओं ने इस राष्ट्रसेवा के मामले में भी विवाद खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है कि इस टीके का तीसरे परीक्षण के पहले ही उपयोग करना खतरनाक है। क्या हम अपने वैज्ञानिकों से भी ज्यादा उनकी बात को प्रामणिक मानें?

यदि कुछ खतरा होगा तो उसका पता तुरंत चलेगा और तत्काल समुचित कार्रवाई होगी। कुछ लोग टीके के बारे में यह भ्रम भी फैला रहे हैं कि इसमें सूअर या गाय की चर्बी है और उसको लगवाने वाला नपुंसक हो जाएगा। इन विघ्नसंतोषी टीका-टिप्पणियों को दरकिनार करके इस अभियान को सफल बनाना हर भारतीय का कर्तव्य है।  (नया इंडिया की अनुमति से)


06-Jan-2021 7:48 PM 30

2020 में जलवायु परिवर्तन की वजह से 10 सबसे बड़ी मौसमी विपदाओं में से दो भारत में हुई थीं जिनसे अरबों रुपये का नुकसान होने का अनुमान है. जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा नुकसान झेलने वाले देशों में भारत भी आता है. 

    डॉयचे वैले पर शिवप्रसाद जोशी का लिखा-

ब्रिटेन की स्वयंसेवी संस्था क्रिश्चियन एड की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में जो दस सबसे बड़ी कुदरती आफतें आई थीं वे मानव जाति को बहुत "महंगी” भी पड़ी हैं. उनसे जानमाल के करीब 150 अरब डॉलर के नुकसान का अंदाजा लगाया गया है. इन विपदाओं की वजह से साढ़े तीन करोड़ लोगों की जानें गईं और एक करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए.

2020 को जलवायु ब्रेकडाउन का साल कहने वाली इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सबसे बुरी मार गरीब देशों पर पड़ी है जहां क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए जानमाल का कोई बीमा भी नहीं था. और ये मार चौतरफा पड़ी है, एशियाई भूभाग में आई बाढ़ हो, अफ्रीका में टिड्डियों का आतंक हो या यूरोप और अमेरिका में आए भयंकर तूफान.

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि का दीर्घकालीन प्रभाव भी इस नुकसान में साफ झलकता है. ऐसा नहीं है कि मानवनिर्मित ग्लोबल वॉर्मिंग से पहले कुदरती आफतें इंसान पर नहीं टूटी हैं लेकिन एक सदी से अधिक के तापमान के डाटा और दशकों के सैटेलाइट डाटा के जरिए हासिल हुए चक्रवात और समुद्र के स्तर में वृद्धि के आंकड़ों के आधार पर कहा जा सका है कि धरती तप रही है और विपदाएं बढ़ रही हैं- अतिवृष्टि और तूफान से लेकर लू और जंगल की आग तक, और डायबिटीज और हृदयरोग जैसी बीमारियों से लेकर वैश्विक महामारी तक.

अम्फान की तबाही
2020 में सबसे ज़्यादा "महंगी” साबित हुई 10 कुदरती आफतों में से दो का कहर भारत के विभिन्न हिस्सों पर टूटा था. मई 2020 में अम्फान नाम का सुपर साइक्लोन इस वैश्विक सूची में चौथे और जून से अक्टूबर के दौरान आई बाढ़ पांचवे नंबर पर है. बंगाल की खाड़ी में उठने वाले अम्फान ने 270 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाओं के साथ भारत और बांग्लादेश में तबाही मचाई थी. दोनों देशों को करीब 95 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. कम से कम 128 लोग मारे गए थे और करीब पांच करोड़ लोग विस्थापित हो गए थे.

जून और अक्टूबर के बीच असम से लेकर केरल तक, मॉनसून से हुई अत्यधिक बारिश के चलते बाढ़ और भूस्खलन की काफी घटनाएं दर्ज की गई थीं. रिपोर्ट के मुताबिक इन बाढ़ों से भारत को करीब 73 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था और दो हजार लोगों की मौत हो गई थी.

बात सिर्फ इतने बड़े आर्थिक नुकसान की नहीं है, बड़ी चिंता ये है कि ऐसी आफतें आने वाले समय में आवृत्ति और शक्ति के लिहाज से और तीव्र हो सकती हैं. जलवायु परिवर्तन ऐसी घटनाओं के लिए कैटालिस्ट की तरह काम करता आ रहा है. नवंबर 2021 में ग्लासगो में अगला जलवायु सम्मेलन होना है. 2015 के पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और 2030 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन आधा करने का लक्ष्य रखा गया था. इसके तहत हर साल उत्सर्जन में करीब साढ़े सात प्रतिशत कटौती की जानी है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक लक्ष्य कम होने के बजाय दूर होता जा रहा है.

कोविड-19 महामारी से त्रस्त दुनिया में इन कुदरती आफतों से हुई तबाहियों ने गरीबों को और पीछे धकेला है. हिंद महासागर क्षेत्र में वैश्विक तापमान बढ़ने से साइक्लोन की ताकत भी बढ़ती जा रही है और नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी. अम्फान के अलावा भारत पिछले साल जून में एक और शक्तिशाली साइक्लोन- निसर्ग के वार को झेल चुका है.

पर्यावरण से जुड़ी लड़ाइयां और चिंताएं
वैज्ञानिकों का मानना है कि 2020 अतिरेक रूप से गरम साल था, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में 30 से 33 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किए गए थे. जलवायु परिवर्तन कितना बड़ा खतरा बनता जा रहा है इसका एक अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले साल के पहले छह महीनों में ही 200 से अधिक प्राकृतिक विपदाएं आ चुकी थीं. ये आंकड़ा 21वीं सदी के 2000-2019 की अवधि में 185 विपदाओं के औसत से ऊपर है. 2019 के मुकाबले 2020 में कुदरती आफतों की घटनाओं में पहले छह महीने की अवधि में 27 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.

पर्यावरण से जुड़ी लड़ाइयों और चिंताओं को इसीलिए खारिज करने की मूर्खता नहीं की जा सकती. परियोजनाएं और निर्माण जरूरी हैं लेकिन वे समावेशी और सुचिंतित विकास के पैमानों पर होने चाहिए ना कि अंधाधुंध! उत्तराखंड में चार धाम सड़क परियोजना को लेकर विवाद थमा नहीं है, इसी तरह सुप्रीम कोर्ट की बहुमत से हरी झंडी के बावजूद सरकार के सेंट्रल विस्ता प्लैन को लेकर पर्यावरणवादियों और अन्य एक्टिविस्टों में शंकाएं और सवाल बने हुए हैं. वैसे एक राहत की बात ये है कि भारत हरित ऊर्जा अभियान को भी जोरशोर से चलाता दिख रहा है.

कुछ सप्ताह पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के कच्छ में 30 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन वाले और उनके मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े पुनर्चक्रित ऊर्जा पार्क का शिलान्यास किया था. खबरों के मुताबिक ये विशाल प्रोजेक्ट एक लाख 80 हजार एकड़ यानी सिंगापुर के आकार जितने भूभाग में फैला हुआ है. इसमें सौर पैनल, सौर ऊर्जा भंडारण यूनिट और पवनचक्कियां लगाई जाएंगी. दावा है कि इस प्रोजेक्ट से हर साल भारत कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जन में पांच करोड़ टन की कटौती करने में सफल हो सकेगा. ये परियोजना भारत के उस महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य का हिस्सा है जिसके तहत 2022 तक 175 गीगावॉट और 2030 तक 450 गीगावॉट पुनर्चक्रित ऊर्जा का उत्पादन किया जाना है. इससे हर साल 20 अरब डॉलर के बिजनेस अवसर भी बनने की बड़ी उम्मीद भी जताई गई है.

सौर ऊर्जा के अलावा गैस पाइपलाइन के जरिए भारत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की कोशिशों में जुटा है. सरकार की योजना अगले चार से छह साल में देश में 16 हजार किलोमीटर लंबी प्राकृतिक गैस पाइपलाइन बिछाकर चालू करने की योजना भी है. पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने 450 किलोमीटर लंबी कोच्चि-मंगलुरू गैस पाइपलाइन का उद्घाटन किया था. भारत के प्राथमिक ऊर्जा स्रोतो में गैस का हिस्सा अभी करीब छह प्रतिशत है जबकि वैश्विक औसत 24 प्रतिशत है. 2030 तक भारत इस हिस्से को 15 प्रतिशत करना चाहता है. हरित ऊर्जा का दायरा बढ़ाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत ने पेरिस समझौते के तहत अपने कार्बन फुटप्रिंट में 2005 के स्तरों से 2030 तक 33-35 प्रतिशत कटौती करने का लक्ष्य रखा है.  (dw.com)


06-Jan-2021 4:03 PM 32

-कनुप्रिया

बहुत साल पहले एक फि़ल्म देखी थी ‘अकेले हम अकेले तुम।’ फिल्म का नायक गायक होता है और नायिका गायिका, यूँ तो हर फिल्म में नायक नायिकाएँ बहुत अच्छा ही गाते हैं मगर इस फिल्म के किरदारों की ये खासियत अलग से दिखाई गई। शादी के बाद नायक अपने गायिकी के करियर को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हो जाता है और नायिका जो समान रूप से प्रतिभाशाली है घर और बेटे को संभालने में व्यस्त हो जाती है, मगर वो चाहती है कि नायक जब अपने लिए काम खोजे तो उसके लिए भी खोजे, इसी मुद्दे पर उनका विवाद बढ़ जाता है और नायिका घर छोडक़र चली जाती है।

अब नायक पर जिम्मेदारी आ जाती है कि वो बेटा सम्भाले, वो अपने करियर पर फोकस नही कर सकता, वो छोटी मोटी नौकरी ढूँढता है और बच्चा संभालता है वहीं नायिका अपनी प्रतिभा के कारण करियर के ऊँचे पायदान पर पहुँचती है।

फिल्म में जो यह रोल रिवर्सल था वो यह दिखाता है कि नायक के साथ जो बीता वो unusual था इसलिये दर्शक उससे सहानुभूति भले कर लें मगर यही अगर usual pattern होता यानी नायिका घर बच्चा सम्भालती रहती और उसका करियर ख़त्म हो जाता तो किसी को उसमे कुछ भी असामान्य नही लगता। समाज के ठ्ठशह्म्द्वह्य ऐसे ही होते हैं वो असामान्य को भी सामान्य की महसूस कराते हैं।

संसार के किसी भी जीव के प्राथमिक कर्तव्यों में होता है उसकी प्रजाति बचाना, और इसके लिये जीव क्या क्या नही करते, ड्डठ्ठद्बद्वड्डद्य द्मद्बठ्ठद्दस्रशद्व ऐसी ऐसी जानकारियों से भरा है कि चकित हो जाएँ।  जैकलीन कैनेडी पर एक डॉक्युमेंट्री देखी थी वो vogue में जूनियर सब एडिटर की तरह काम कर चुकी थीं और वाशिंगटन नैशनल हेराल्ड में फोटोग्राफर का कर रही थीं जब वो जॉन कैनेडी से मिली और शादी के बाद एक दृश्य में वो कहती हैं कि मुझसे कहा गया बच्चे पैदा करना और सम्भालना स्त्री का पहला कर्तव्य है और यह अमेरिका की फर्स्ट लेडी कह रही थी 60 के दशक में।

कई धर्म जो स्त्रियों को दूर रखने की बात करते हैं जिनका कहना है कि स्त्रियों के कारण ध्यान और मोक्ष में दिक्कत आती है वो सब मुख्यत: पुरुषोनमुखी धर्म हैं, जो पुरुष के मोक्ष और ज्ञान की राह में स्त्री की स्थिति देखते हैं, क्योकि जिन कारणों से वो स्त्रियों को दूर रखने की बात करते हैं उन्ही कारणों से पुरुषों को दूर रखा जाता अगर उनकी प्राथमिकता में स्त्री का ध्यान और मोक्ष होता। मगर स्त्री मनुष्य प्रजाति के महत्वपूर्ण काम मे लगी थी।

ध्यान से ध्यान आया कुछ साल पहले एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने , मैं नाम भूल रही हूँ, स्त्रियों के प्रयोगशाला में काम करने पर रोक लगाने की बात कही थी, उसके अनुसार इससे पुरुष रिसर्चर्स का ध्यान बंटता था, कमाल है कि उसने स्त्री रिसर्चर्स के ध्यान बंटने की बात नहीं कही थी। और लोग कहते हैं कि ध्यान और मोक्ष स्त्री के बस का नहीं। 

यह सच है कि स्त्री हमेशा ही मनुष्य सन्तति को जन्म देने और भविष्य के विश्व नागरिको के पालन पोषण की गुरुतर जिम्मेदारी को अपने कंधों पर ज़्यादा उठाती आई है और इसके बदले में उसे कम प्रतिभाशाली, कम योग्य, ध्यान मोक्ष के लायक नही , विज्ञान तकनीक जितनी बुद्धि नहीं, आदि तानो से नवाज़ा जाता रहा है। दरअसल उससे वाँछित सामाजिक दायित्व की पूर्ति करवाने का यह एक harrasment वाला तरीक़ा है कि उसे किसी दूसरे रास्ते के क़ाबिल ही न समझा जाये, वहीं दूसरा तरीका महानता वाला है जिसने उससे अति मानव होने की अपेक्षा की है कि वो अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं का गला भी पूरी तरह घोटे रखे, जबकि ज़रूरत बस इतनी भर थी इस मानव समाज मे उसके इस योगदान को समझा जाए, appreciate किया जाए और ज़्यादा से ज़्यादा सहयोग किया जाए।

एक मूर्ख समर्थक अपने नेता को गाली दिलवा देता है, जय श्रीराम के नारे ने राम के नाम को भय की वस्तु बना दिया, जिहाद की आक्रामकता ने इस्लाम पर सवाल उठवा दिए, यीशु तो ख़ुद सूली पर पहले ही चढ़े हुए थे, कल से एक बुद्धिस्ट की नासमझी के पीछे बेचारे बुद्ध गरियाये जा रहे हैं  और बुद्ध बनाम यशोधरा स्त्री बनाम पुरुष का सवाल बना दिया गया, जबकि बुद्ध ने महत्वपूर्ण सामाजिक कर्तव्य निभाया और यशोधरा ने मातृत्व का। पितृसत्ता के  विरोध का पुरुष बनाम स्त्री का झगड़ा हो जाना मानो सर फुटौव्वल के सिवा कहीं नही पहुँचना है, जबकि इसके  विरोध का मामला महज स्त्री के हित तक सीमित नही। इस सबके बीच अभी तो बेचारे बुद्ध बख्शे जाएँ बाकी स्त्रियाँ तो अपना रास्ता इस सबके बीच से निकालना सीखती ही रहेंगी।