संपादकीय

Date : 24-Nov-2019

छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने कल यह तय किया कि पंचायत चुनावों में पंच बनने के लिए पांचवीं और उससे ऊपर के पद के लिए आठवीं पास होने की जो अनिवार्यता चली आ रही थी, उसे खत्म किया जाए। यह बंदिश पिछली भाजपा सरकार ने अपने एक कार्यकाल में लगाई थी, जो कल छत्तीसगढ़ कैबिनेट ने हटा दी। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से इस बात के लिए लिखते आ रहे थे, और अपने तर्क के समर्थन में हमने मिसालें भी गिनाई थीं कि किस तरह तमिलनाडू के एक सबसे महत्वपूर्ण कामराज नाडर बचपन में पिता के गुजर जाने के बाद मां का साथ देने के लिए 11 बरस की उम्र में ही स्कूल छोड़ चुके थे। छत्तीसगढ़ सरकार के अब तक के पैमाने के मुताबिक वे यहां सरपंच भी नहीं बन सकते थे लेकिन तमिलनाडू में उन्होंने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को ग्यारहवीं तक लागू करके साक्षरता और शिक्षा को बढ़ाने का महान काम किया था, और गरीब स्कूली बच्चों के लिए दोपहर के भोजन की योजना लागू की थी। उन्होंने यह सब काम 1954 से 1963 के बीच किया था जब देश में साक्षरता और शिक्षा इतना बड़ा मुद्दा ही नहीं थीं। इस छत्तीसगढ़ राज्य में पहली कांग्रेस सरकार में गृहमंत्री रहे नंदकुमार पटेल राज्य बनने के पहले से अविभाजित मध्यप्रदेश की दिग्विजय सरकार में भी मंत्री थे, और वे अपने पूरे कार्यकाल में सबसे अच्छे और काबिल मंत्रियों में से एक थे, और अभी उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वे आठवीं भी पास नहीं थे, और जब उन्होंने अर्जुन सिंह के लिए खरसिया विधानसभा सीट खाली की थी, तब वे वहां के सरपंच ही थे। अभी कल तक लागू नियम उनके वक्त भी लागू रहता, तो शायद वे सरपंच का चुनाव भी नहीं लड़ पाते, और राज्य को एक काबिल मंत्री मिलने की संभावना भी शुरू ही नहीं हो पाती। 

दरअसल राज्य के लिए कानून बनाने की विधानसभा की ताकत, और देश के लिए कानून बनाने की संसद की ताकत ने कई किस्म की तानाशाही भी दिखाई है। जब इस देश में पंचायत के स्तर पर, पंचायत के भीतर के पंच के लिए भी अनुसूचित जाति, जनजाति, और ओबीसी की महिलाओं तक का आरक्षण लागू है, शहर के मेयर के लिए, या किसी वार्ड मेम्बर के लिए भी इनमें से हर तबके की महिला के लिए आरक्षण लागू है, तब विधानसभा सीट और लोकसभा सीट के लिए आरक्षण लागू नहीं है। महिला आरक्षण का मुद्दा जाने अनंतकाल से संसद में चले आ रहा है, और तमाम पार्टियां उससे मुंह चुराते आ रही हैं। ऐसे में इन सांसदों और विधायकों ने अपने सदनों से वार्ड स्तर तक तो अलग-अलग जातियों की और तबकों की महिलाओं के लिए भी आरक्षण कर दिया, लेकिन अपने सदनों को इससे इंस अंदाज में परे रखा है कि मानो इनमें महिलाएं बढ़ जाने पर ये सदन उसी तरह अपवित्र हो जाएंगे जिस तरह कुछ ईश्वरों के घर हो जाते हैं। 

इससे परे एक और शहरी, शिक्षित, और बाहुबलि अहंकार पंचायत चुनावों पर लादी गई थी कि दो से अधिक बच्चे होने पर निर्वाचित पंच-सरपंच की पात्रता भी खत्म हो जाएगी, छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत से मामले हुए भी थे, और एक सामाजिक तनाव ऐसा भी खड़ा हो गया था कि दो से अधिक बच्चे होने पर पंच-सरपंच परिवार उन्हें छुपाने भी लगे थे। लेकिन 9 बच्चों के साथ लालू यादव सांसद बने हुए थे, और इतने ही बच्चों के साथ देश भर में बहुत से दूसरे सांसद और विधायक थे, लेकिन छत्तीसगढ़ में पंच-सरपंच पर दो बच्चों की शर्त थोप दी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त में बनाई गई त्रिस्तरीय शासन प्रणाली में स्थानीय संस्थाओं में पंचायतों और म्युनिसिपलों को तो एक साथ रखा गया था, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह शर्त सिर्फ पंच-सरपंचों पर लगी थी, शहरी वार्ड मेम्बरों और मेयरों पर नहीं। बाद में इस राज्य में पिछली भाजपा सरकार ने इस रोक को खत्म किया था, और सत्ता के इस लादे गए शहरी पूर्वाग्रह के खिलाफ हम लंबे समय से यह मांग कर रहे थे जो शर्तें सांसद और विधायकों पर नहीं लादी गई हैं, वे पंच-सरपंच पर भी नहीं लादी जानी चाहिए। और दिलचस्प बात यह है कि पंच-सरपंच के लिए जिस महिला आरक्षण की व्यवस्था की गई, उस व्यवस्था को संसद और विधानसभाओं में भी लागू करने में पुरूष प्रधान संसदीय राजनीति ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय पंचायतों में महिला आरक्षण जब लागू किया गया, तो देश के सर्वाधिक राजनीतिक चेतना वाले केरल जैसे राज्यों के पंचायत मंत्री और सचिव इन प्रावधानों के अध्ययन के लिए राजधानी भोपाल पहुंचे थे। 

कल भूपेश मंत्रिमंडल ने शिक्षा की यह पूरी तरह से अनैतिक अनिवार्यता खत्म करके एक अच्छा काम किया है। जो अनिवार्यता विधायक और सांसद बनने के लिए भी नहीं है, उसे गांव के लोगों पर लादना एक शहरी अहंकार है, और इसे खत्म किया ही जाना चाहिए था। छत्तीसगढ़ को एक और काम करना चाहिए कि विधानसभा में संसद-विधानसभा के महिला आरक्षण के लिए एक शासकीय संकल्प लाया जाए कि संसद जल्द से जल्द महिला आरक्षण विधेयक को पास करे और लागू करे। इस बात का और कोई महत्व हो या न हो, कम से कम एक प्रतीकात्मक महत्व रहेगा और महिला आरक्षण का इतिहास इसे दर्ज करेगा। यह विधेयक संसद में 2008 से चले आ रहा है जो कि महिलाओं को आबादी के अनुपात में आधी सीटों पर आरक्षण भी नहीं देने वाला है, महज एक तिहाई सीटों पर आरक्षण देगा, लेकिन इसे भी लोकसभा आज तक पास नहीं कर रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा को एक पहल करके यह प्रतीकात्मक संदेश बाकी देश को देना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 23-Nov-2019

आज सुबह-सुबह जब महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस के फिर मुख्यमंत्री बन जाने की खबर आई, तो लोगों ने बाकी खबर के पहले तारीख देखी कि आज कहीं अप्रैल फूल का दिन तो नहीं है। इसके बाद अजित पवार के उप मुख्यमंत्री बनने की बात पढ़ी, तो शरद पवार को कोसना चालू कर दिया कि उन्होंने शिवसेना और कांगे्रस दोनों को धोखा दे दिया। फिर कुछ घंटे गुजरे और पवार ने यह साफ किया कि भतीजे अजित पवार से न उनकी पार्टी सहमत है, और न ही परिवार, तो लोगों को यह तय करते नहीं बना कि शरद पवार ने देश को रात में धोखा दिया, या अब धोखा दे रहे हैं, या फिर भतीजे से धोखा खाए हुए हैं। जो भी हो, महाराष्ट्र में फिलहाल तो भाजपा के पिछले मुख्यमंत्री फडनवीस मुख्यमंत्री बन चुके हैं, और अब विधानसभा में बहुमत साबित करने का अकेला जरिया उनके पास यही है कि एनसीपी के विधायकों का इतना बहुमत शरद पवार के खिलाफ जाकर अजित पवार का साथ दे कि विधानसभा में विश्वासमत पाया जा सके। आज इस वक्त जो लोग केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को इस एक और कामयाबी के लिए वाहवाही दे रहे हैं, उनका मानना है कि शाह है तो मुमकिन है। 

अब बिना किसी पसंद-नापसंद के महाराष्ट्र की राजनीति को देखें तो आज सुबह के इस शपथग्रहण के पहले तक शिवसेना, एनसीपी, और कांगे्रस का जो गठबंधन आजकल में महाराष्ट्र में सरकार बनाते दिख रहा था, और जिसने औपचारिक रूप से पिछले दिनों में बार-बार इस फैसले की घोषणा भी की थी, वह गठबंधन एक पूरी तरह से अनैतिक और अप्राकृतिक गठबंधन था, ठीक वैसा ही जैसा कि आज सुबह भाजपा-अजित पवार की शक्ल में सत्ता पर आया है। अभी फडनवीस की वह ट्वीट सोशल मीडिया पर तैर ही रही है जिसमें उन्होंने अजित पवार के भ्रष्टाचार के किस्से गिनाते हुए कड़ी कार्रवाई का वायदा किया था। अब पुलिस और हवालाती अगल-बगल की दो कुर्सियों पर बैठे हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह माथे पर धर्मनिपरेक्षता का गुदना गुदाई हुई कांग्रेस पार्टी देश की एक सबसे साम्प्रदायिक पार्टी शिवसेना के साथ भागीदारी को तैयार थी। अब यह तो केंद्र सरकार के मातहत, उसके एक विभाग की तरह काम करने वाले राजभवन की मेहरबानी है कि वह किस अनैतिक गठबंधन को न्यौता दे, और दो अलग-अलग नस्लों के प्राणियों को एक विचित्र संतान पैदा करने को बढ़ावा दे।

इस मौके पर राजभवन की संवैधानिक भूमिका की असंवैधानिक बातों को लेकर काफी कुछ कहा जा सकता है, लेकिन राजभवन का बेजा इस्तेमाल तो इंदिरा के वक्त से चले आ रहा है जब राज्यपाल अंग्रेज सरकार के एक एजेंट की तरह बर्ताव करते हुए लंदन का एजेंडा लादते थे। राजभवन नाम की संवैधानिक संस्था का कुल जमा इस्तेमाल असंवैधानिक मौकापरस्ती को बढ़ावा देने का बना हुआ है, और आंकड़ों और चिट्ठियों की हकीकत सामने आने के बाद यह समझ आएगा कि महाराष्ट्र का राजभवन में अगर आज सुबह-सुबह अनैतिक काम किया है, तो वह किस दर्जे का अनैतिक है? फिलहाल जब हम इन लाइनों को लिख रहे हैं, मुंबई में एनसीपी, कांग्रेस, शिवसेना की प्रेस कांफ्रेंस जारी है, और उद्धव ठाकरे उसमें कह रहे हैं कि महाराष्ट्र पर फर्जिकल स्ट्राइक की गई है, पवार कह रहे हैं कि उन्हें शपथग्रहण का सुबह पता लगा है, और यह फैसला अजित पवार का है जिनके साथ दस-बारह विधायक ही रहेंगे। और कांग्रेस इन दोनों के साथ बनी हुई है।

दूसरी तरफ कांगे्रस के अभिषेक मनु सिंघवी जैसे बहुत से लोग हैं जो सोशल मीडिया पर इन तीनों पार्टियों की अंतहीन बैठकों को इस नुकसान के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं कि वक्त पर फैसला नहीं लिया गया तो ऐसी नौबत आई। कांग्रेस और एनसीपी जनता के बीच मखौल का सामान भी बन गए हैं कि वे हफ्ते भर बैठक-बैठक खेलते रहे, और भाजपा गोल मारकर चली गई। इन तीनों पार्टियों ने जब एक अप्राकृतिक और अनैतिक गठबंधन बनाना तय कर ही लिया था, तो राजनीति की मांग यही थी कि वे तेजी से दावा करते। जब चिडिय़ा खेत चुग गई, तब तक ये तीनों मिलकर खेत में खड़ा करने के लिए बिजूके की कद-काठी, उसके कपड़े, उसके सिर के लिए हंडी तय करते रहे। अब ये तीनों पार्टियां मिलकर खेत में बाकी पराली को जलाकर ठंड में हाथ ताप सकती हैं, या फिर एक आखिरी कोशिश कर सकती हैं कि विधानसभा में फडनवीस-अजित पवार बहुमत साबित न कर सकें।
-सुनील कुमार


Date : 22-Nov-2019

हिन्दुस्तान अंग्रेजों का गुलाम रहा इसलिए आजाद होने के बाद भी यह देश अंग्रेजों के देश, उसकी भाषा, उसकी पोशाक और तहजीब से अधिक जुड़ा रहा। इसलिए वहां होने वाली खबरों पर हिन्दुस्तानियों का ध्यान अधिक जाता है। अभी वहां के एक पुराने और दुनिया के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की खबर है कि एक कॉलेज के डाइनिंग हॉल में लगी हुई 17वीं सदी की एक महत्वपूर्ण पेंटिंग को हटा दिया गया क्योंकि उसमें मांस के बाजार का चित्रण था, और शाकाहारी छात्र-छात्राओं को उससे दिक्कत होती थी, खाते समय यह पेंटिंग देखना उनके लिए तकलीफ की बात थी। 

लोकतंत्र में दुनिया की अलग-अलग सभ्यताएं एक-दूसरे से बहुत कुछ सीख भी सकती हैं। एक-दूसरे को किस तरह बर्दाश्त किया जाए, किस तरह एक-दूसरे का सम्मान किया जाए, यह बात जहां से भी सीखने मिले लोगों को सीखनी चाहिए। हिन्दुस्तान में बहुत से धर्मोँ और जातियों के लोग कभी धार्मिक स्थान पर पशु-पक्षियों की बलि देते थे, कभी रिहायशी इलाकों में भी जानवरों को काट देते थे, वह सब धीरे-धीरे कानून, या स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था के तहत कम होता गया, अब तकरीबन बंद सा हो गया है। सरकार से परे भी कुछ ऐसे निजी संस्थान रहे हैं जिन्होंने इस बात के लिए खासी आलोचना झेली कि वे अपने कर्मचारियों को दफ्तर की कैंटीन में मांसाहार नहीं करने देते। देश का एक प्रमुख अखबार, द हिन्दू, इस बात के लिए आलोचना का शिकार रहा, लेकिन उसने अपने शाकाहारी कर्मचारियों का ध्यान रखते हुए खाने के वक्त अरूचि पैदा न होने देने के लिए इस नियम को कड़ाई से लागू किया। 

शाकाहार के हिमायती लोगों का यह तर्क है कि मांसाहारी तो शाकाहार करते ही हैं, लेकिन शाकाहारी लोग मांसाहार नहीं करते। और खानपान का यह तरीका महज किसी जाति या धर्म से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि प्राणियों के जीवन को लेकर इंसानों की सोच से भी जुड़ा हुआ है, और आमतौर पर जिन जाति-धर्मों के लोग मांसाहारी होते हैं, उनके बीच भी कई लोग अपनी पसंद से शाकाहारी हो जाते हैं। हिन्दुस्तान में अगर उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में जाएं, जैसे मिजोरम में सौ फीसदी लोग मांसाहारी हैं, और वहां स्कूलों में दोपहर के भोजन में बिना गोश्त वाला कोई खाना नहीं बनता। और गोश्त भी ऐसे जानवरों का रहता है जिनमें से कोई किसी धर्म को मंजूर नहीं है, तो कोई किसी दूसरे धर्म को। लेकिन वहां की सरकारी स्कूलों में भी बिना मांसाहार के कोई खाना नहीं रहता, और वहां यह मुद्दा भी नहीं रहता क्योंकि शायद कोई भी शाकाहारी नहीं है। 

लेकिन इस मुद्दे पर आज चर्चा महज खानपान तक सीमित रखने का कोई इरादा नहीं है। जिंदगी के बाकी पहलुओं में भी लोगों के बीच फर्क रहता है, सोच का भी, रीति-रिवाज का भी, और भाषा-पहरावे का भी। हिन्दुस्तान में इन दिनों लोकतंत्र की शक्ल कुछ ऐसी दिखती है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा महज अपने हक और बाकियों की जिम्मेदारी की व्यवस्था चाहता है। जबकि सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी और बाकियों के हक के सम्मान से ही चलती है। हम हिन्दुस्तान की और किस्मों की बारीक मिसालों में जाना नहीं चाहते, लेकिन सभी धर्मों और जातियों के लोगों को, सभी संस्कृतियों और सोच के लोगों को दूसरों का सम्मान करना भी आना चाहिए, करना चाहिए। इसके बिना यह देश बहुत बुरे किस्म के टकराव का शिकार हो चुका है, और हिन्दुस्तान का नक्शा सूबों की सरहदों में तो वैसा ही दिख रहा है, लेकिन इन सरहदों के भीतर समाजों में नई सरहदें खड़ी होती जा रही हैं जो कि इस देश के न केवल मिजाज के खिलाफ हैं, बल्कि इस देश की जरूरतों के भी खिलाफ हैं। यह देश इंसानों के बीच की खाई और दीवारों के रहते हुए आगे बढ़ नहीं सकता, बल्कि वहीं के वहीं खड़ा भी नहीं रह सकता। हाल के बरसों में हिन्दुस्तान की चौपट हुई अर्थव्यवस्था से लोग समाज के इस विघटन को जोड़कर अभी शायद देख नहीं पा रहे हैं, लेकिन इन नई खाईयों ने दसियों लाख रोजगार खत्म किए हैं, दहशत खड़ी की है, और आर्थिक विकास की संभावनाओं को सीमित भी किया है। देश की संस्कृति, देश में सद्भाव, देश की एकता का अर्थव्यवस्था से भी रिश्ता रहता है, हालांकि उसे आंकड़ों में तुरत-फुरत तौला नहीं जा सकता। भारत के लोगों को देश के भीतर भी जगह-जगह से बर्दाश्त और सद्भावना की मिसालें मिलती हैं, और उनसे भी सीखना चाहिए, साथ-साथ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के इस मामले में जो सद्भावना देखने मिली है, उसको भी देखकर अपने आपको भी देखना चाहिए।
-सुनील कुमार 


Date : 21-Nov-2019

पता नहीं इस देश में और कौन-कौन से दिन देखना बाकी है

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एक मुस्लिम प्राध्यापक के विरोध का ऐसा घटिया आंदोलन सामने आ रहा है कि हिन्दूवादी हमलावर छात्रों ने विश्वविद्यालय के इस चयन पर सवाल उठाया है कि कोई मुस्लिम संस्कृत कैसे पढ़ा सकता है? दूसरी तरफ विश्वविद्यालय का कहना है कि उन्होंने प्राध्यापक चयन के सारे पैमाने तय करके सबसे अच्छे उम्मीदवार को चुना है जो कि संस्कृत का विद्वान है। एक मुस्लिम से संस्कृत पढऩे पर जिनके नाजुक हिन्दुत्व पर बड़ी आंच आ रही है, वे लोग विश्वविद्यालय कैम्पस में ढोलक लेकर धार्मिक प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरी तरफ उत्साही मीडिया की मेहरबानी से यह बात सामने आ रही है कि राजस्थान का यह मुस्लिम नौजवान किस तरह बचपन से ही संस्कृत पढ़ते आ रहा है, किस तरह उसका परिवार कृष्ण का भक्त रहा है, पिता जगह-जगह घूमकर कृष्ण के भजन-कीर्तन करते रहे हैं, और इसके बाद भी मुस्लिम होने की वजह से इस नौजवान का संस्कृत पढ़ाने से रोका जा रहा है। हमारा तो यह मानना है कि अगर इसका परिवार कृष्ण भक्त न भी होता, तो भी क्या उसका किसी भाषा को बढ़ाने का हक कुछ कम हो सकता है?

यह देश ऐसी गौरवशाली परंपराओं वाला देश रहा है कि यहां पर योरप से आकर बसे हुए फॉदर कामिल बुल्के न केवल हिन्दी भाषा के प्रकांड विद्वान थे, बल्कि वे रामचरित मानस पर भी एक बहुत बड़े विद्वान माने जाते थे। और वे हिन्दुस्तान में एक ईसाई मिशनरी की तरह बेल्जियम से आए थे, और महान हिन्दी प्रेमी हो गए थे। वे आजादी के वक्त रांची विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाते थे, हिन्दी साहित्य में उनकी पीएचडी थी जो कि रामकथा का विकास विषय पर की गई थी। आज अगर कामिल बुल्के इस देश में होते, तो राम का नाम लेने वाले ईसाई होने के नाते हो सकता है उन्हें रांची में भीड़त्या का शिकार होना पड़ता। यह कैसा हिन्दुस्तान हो गया है कि किसी धर्म के व्यक्ति को दूसरे धर्म की बपौती मानी जाने वाली भाषा को पढ़ाने से रोका जा रहा है। अमरीका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय दर्शन पढ़ाने वाली एक प्राध्यापक लिंडा हेस चौथाई सदी से अधिक वक्त से हिन्दुस्तान आकर कबीर का अध्ययन करती आई हैं, और वे महादेवी वर्मा से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी तक से मिलती रही हैं, बनारस के कबीर चौरा से लेकर छत्तीसगढ़ के दामाखेड़ा तक कबीर का अध्ययन करती रही हैं, और इन दिनों वे मध्यप्रदेश के कबीर गायक प्रहलाद टिपणिया को लेकर अमरीका में जगह-जगह कबीर गायन का आयोजन कर रही हैं। ऐसी विदुषी महिला और ऐसी महान कबीर भक्त को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के ये साम्प्रदायिक छात्र वहां पढ़ाने न दें कि एक ईसाई किस तरह कबीर को पढ़ा सकती है।

और दिलचस्प बात यह है कि संस्कृत का विद्वान यह मुस्लिम नौजवान धर्म भी नहीं पढ़ाने वाला था, वह महज एक भाषा पढ़ाने वाला था, और मानो संस्कृत भाषा ने जनेऊ पहनकर हिन्दू धर्म की दीक्षा ले ली है, हिन्दू छात्रों ने इस व्याख्याता की नियुक्ति का उग्र विरोध किया। यह पूरा सिलसिला सिर्फ नफरत से उपजा हुआ है, नफरत पर फलाफूला है, और अब उसके नुकसान दे रहा है, किसी भी धर्म या भाषा के लिए यह गौरव की बात होनी चाहिए कि दूसरे धर्म के लोग, या दूसरी भाषा के लोग भी उनमें दिलचस्पी लेते हैं। सिर्फ परले दर्जे के मूर्ख ही ऐसी बात पर विरोध कर सकते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान की हालत आज इस कदर खराब हो चुकी है कि पूरे देश में धार्मिक सद्भाव को बढ़ाने वाले जेएनयू को देश का गद्दार करार दिया जा रहा है, और जो बीएचयू के छात्र इस तरह की साम्प्रदायिक नफरत फैला रहे हैं उन्हें देशभक्त करार दिया जा रहा है। नेहरू के हिन्दुस्तान की धार्मिक सद्भाव की सोच, जनता के कम से कम एक तबके की वैज्ञानिक सोच, यह सब इस कदर तबाह कर दी गई है कि आज बीएचयू जैसे ऐतिहासिक विश्वविद्यालय की यह घोर साम्प्रदायिक घटना भी राज्य या केन्द्र सरकार का मुंह नहीं खुलवा पा रही है। पता नहीं इस देश में और कौन-कौन से दिन देखना अभी बाकी है।


-सुनील कुमार

 


Date : 20-Nov-2019

बीते एक दिन में ही अपने आसपास के दो-तीन अखबारों को देखने पर खबरें दिल दहलाने वाली है। एक मां ने सौतेले बेटे को मारने के लिए सुपारी दी, एक लाश मिलने के मामले की जांच में पता लगा कि पांच दोस्तों ने चाकू से हत्या की थी, एक युवती की हत्या में साथी युवक को उम्रकैद सुनाई गई, और एक फिल्म अभिनेत्री पर उसके ही प्रमोटर और साथियों ने हमला किया था, क्योंकि वह उससे एकतरफा प्रेम करता था, और अभिनेत्री उसे भाई मानती थी। 

यह फेहरिस्त बड़ी लंबी चली जाएगी अगर चार दिन के पन्ने पलटे जाएंगे, लेकिन उसके बिना भी यह बात साफ जाहिर है कि कत्ल के अधिकतर मामलों में परिवार के लोग, दोस्त, भागीदार, या प्रेमी-प्रेमिका शामिल मिल रहे हैं। ऐसे कितने ही मामले लगातार खबरों में आ रहे हैं जिसमें कोई पत्नी प्रेमिका के साथ मिलकर पति को मार रही है, या भाड़े के हत्यारों को ठेका दे रही है। अब न रिश्तों का कोई भरोसा रहा, न यारी-दोस्ती का, और न कारोबारी भागीदारी या पड़ोस के संबंधों का। निजी मामलों की वजह से होने वाले ऐसे कत्ल रोक पाना किसी भी पुलिस के लिए मुमकिन नहीं है क्योंकि गले में हाथ डले हों, और जेब में छुरा हो, तो पुलिस क्या अंदाज लगा लेगी? फिर ऐसे हाल में लोगों की यह भयानक बेवकूफी भी है कि वे कत्ल करके बच जाएंगे। कत्ल की सजा तो सबको मालूम है, फांसी न भी हुई तो भी उम्रकैद तो तय है, फिर भी लोग अगर कत्ल कर और करवा रहे हैं, ठंडे दिल से साजिश करके करवा रहे हैं, तो परले दर्जे की ऐसी मूर्खता के चलते कत्ल रूकें तो कैसे रूकें? क्योंकि अखबारों में रोज जितनी खबरें कत्ल की छपती हैं, तकरीबन उतनी की उतनी खबरें कातिलों की गिरफ्तारी की भी छपती हैं, और थोड़ी-बहुत खबरें पांच-दस बरस बाद होने वाली सजा की भी छपती हैं, लेकिन इनसे सचेत होकर लोग कत्ल जैसे मामले में न फंसें, ऐसा पता नहीं कितने मामलों में होता है क्योंकि कत्ल तो बढ़ते ही चल रहे हैं। 

ऐसा लगता है कि समाज में सामाजिक, पारिवारिक, और भावनात्मक जिम्मेदारी घटती चल रही है, यह भी लगता है कि लोगों में अपने आपके कानून से बच निकलने की खुशफहमी भी बढ़ती चल रही है। यह भी लगता है कि बहुत से लोग तैश और आवेश में, नशे और नफरत में आपा खोकर कत्ल कर बैठते हैं, और हैरानी की बात यह है कि आसपास के कई करीबी लोग मिलकर भी कत्ल कर रहे हैं, जबकि उनमें से किसी एक की समझदारी को तो ऐसा जुर्म रोकना था। हो सकता है कि कई जुर्म रूकते भी हों, और न हो पाए जुर्म सामने तो आते नहीं हैं, न एफआईआर बनते हैं, न खबर बनते हैं, इसलिए पूरे के पूरे समाज की नासमझी मान लेना भी ठीक नहीं होगा, लेकिन बढ़ते हुए कत्ल बढ़ती हुई फिक्र का सामान जरूर हैं। 

चूंकि आपस के लोगों द्वारा किए और करवाए गए कत्ल पुलिस द्वारा रोक पाना मुमकिन नहीं हैं, इसलिए समाज में जब तक एक जागरूकता नहीं बढ़ेगी, लोगों के बीच रिश्तों को लेकर एक भड़काऊ भावना नहीं घटेगी, जब तक एकतरफा प्रेम अपने को पूरा हकदार मान लेने की खुशफहमी नहीं छोड़ेगा, जब तक लोग जीवन-साथी या प्रेम-संबंध में सौ फीसदी वफादारी को अनिवार्य समझ लेने की खुशफहमी नहीं छोड़ेंगे, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे, ऐसे कत्ल होते रहेंगे। लेकिन ऐसे मामलों में महज कातिलों को पकड़ लेना काफी नहीं हो सकता, किसी भी सभ्य और जिम्मेदार समाज में अपराधों को घटाते चलना, जिम्मेदारी की भावना को बढ़ाते चलना भी जरूरी है। इसलिए भारतीय समाज में लोगों की सामाजिक चेतना, और व्यक्तिगत जिम्मेदारी को बढ़ाना ही होगा। ये दोनों ही बातें बड़ी ही अमूर्त बातें हैं, और यह समझना आसान नहीं है कि यह कैसे होगा, लेकिन यह जरूरी इसलिए भी है कि समाज में नए-नए किस्म के खतरे बढ़ते चल रहे हैं, और ऐसे में हर किस्म के खतरों को घटाना भी जरूरी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के दो ऐसे वीडियो अभी हवा में तैर रहे हैं जिनमें एक सूने स्कूली क्लासरूम में यूनीफॉर्म पहनी हुई बच्चियां शराब की बोतल से ग्लास में शराब निकालकर पी रही हैं, और एक दूसरे वीडियो में दस बरस का दिखता एक बच्चा बुरी तरह शराब के नशे में बकवास करते हुए दिख रहा है। लेकिन इन वीडियो से परे भी देश के हर शहर में हजारों ऐसे बेघर और फुटपाथी बच्चे हैं जो कि तरह-तरह के रासायनिक नशे कर रहे हैं, और उनमें से कम से कम कुछ बच्चे तो तरह-तरह के जुर्म में शामिल भी रहते हैं। सरकारों की कोई योजना इन बच्चों को नशे से बचाने, बसाने, और उनकी जिंदगी संवारने के लिए दिखती नहीं हैं। इन दिनों लगातार ऐसे अपराध भी बढ़ते चल रहे हैं जिनमें बच्चों के सुधारगृह में रखे गए बच्चे जुर्म में शामिल हैं, और हिंसा करके सुधारगृह से फरार हो रहे हैं। कुल मिलाकर बड़ों के किए जुर्म, और बच्चों के किए जुर्म सबको देखें, तो लगता है कि समाज में जागरूकता की एक बड़ी जरूरत है, और आम लोगों में ऐसी जरूरत के पहले उन लोगों में जागरूकता की जरूरत है जो कि सरकार में हैं, संसद में हैं, विधानसभाओं में हैं, और देश के लोगों में लगातार तरह-तरह की गैरजिम्मेदारी को बढ़ा रहे हैं। राजनीतिक और साम्प्रदायिक वजहों से देश के लोगों को जब किसी एक मोर्चे पर गैरजिम्मेदार बनाया जाता है, तो देश की बाकी आबादी भी कई मोर्चों पर साथ-साथ गैरजिम्मेदार होते चलती है। इन बातों का आपस में रिश्ता सतह पर तैरता हुआ दिखता तो नहीं है, लेकिन सतह के नीचे ये मजबूत जड़ों से जुड़े हुए जुर्म हैं जो कि समाज में बढ़ती हुई, बढ़ी हुई गैरजिम्मेदारी का सुबूत हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 19-Nov-2019

मध्यप्रदेश के हनीट्रैप मामले का एक नया वीडियो सामने आया है जिसमें पिछली भाजपा सरकार के एक विवादग्रस्त मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को एक महिला के साथ बताया गया है। इस वीडियो के साथ जो बातचीत मध्यप्रदेश के अखबारों में छपी है वह इस मंत्री के अपने मुख्यमंत्री, शिवराज सिंह, और उनके परिवार पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों से भरी हुई भी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आज मध्यप्रदेश की कांगे्रस सरकार ऐसे आरोपों की जांच करवाने का काम करे, या इसे छोड़ दे?

हमने पहले देश और कई प्रदेशों की सरकारों को लेकर लगातार यही बात लिखी है कि संविधान की शपथ लेकर जो मंत्री-मुख्यमंत्री सत्ता पर आते हैं, यह उनकी पसंद का मामला नहीं हो सकता कि वे ऐसे आरोपों की जांच करवाएं, या न करवाएं। यह तो पद की संवैधानिक बाध्यता रहती है कि भ्रष्टाचार या किसी गलत काम की जो जानकारी उनके सामने आए, चाहे वह किसी शिकायत की शक्ल में रहे, या फिर वह मीडिया के मार्फत सार्वजनिक रूप से सामने आए, उसकी जांच करवानी ही चाहिए। यह आरोप डराने वाला नहीं होना चाहिए कि विपक्षियों और विरोधियों की जांच के पीछे राजनीतिक दुर्भावना रहती है। जब कोई जुर्म होते हैं, उस जुर्म के कोई सुबूत या गवाह होते हैं, तो उनकी कही हुई बातों के आधार पर जांच जरूर ही होनी चाहिए। अगर सत्ता पर आए लोग विरोधियों से रियायत करते हुए जांच से परहेज करें, तो यह राजनीतिक लेन-देन का एक बड़ा भ्रष्टाचार बन जाएगा।

आज मीडिया, सोशल मीडिया, और तरह-तरह के स्टिंग ऑपरेशनों के चलते हुए बहुत से ऐसे मामले सामने आते हैं जिनके पुख्ता सुबूत ऑडियो-वीडियो शक्ल में मौजूद रहते हैं। इनकी मदद से जांच करके आगे कार्रवाई करना हर सरकार की जिम्मेदारी रहती है, और बहुत से मामलों में जब सरकार कार्रवाई नहीं करती है, तो अदालतें दखल देती हैं। मध्यप्रदेश के ही इस हनीट्रैप मामले में हाईकोर्ट को एक से अधिक बार यह कहना पड़ा कि राज्य सरकार बार-बार जांच अफसर क्यों बदल रही है? राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, सामने आए हुए हर संदिग्ध मामले की जांच तो होनी ही चाहिए। हम पहले भी यह बात लिख चुके हैं कि जब किसी प्रदेश में किसी पार्टी की सत्ता बदलती है, तो विपक्ष से सत्ता पर आने वाली पार्टी के बीते बरसों में लगाए गए अनगिनत ऐसे आरोप रहते हैं जिनमें सत्ता के भ्रष्टाचार को उठाया गया था। सत्ता पर आने के बाद यह उस पार्टी की भी जिम्मेदारी रहती है कि वह अपनी ही उठाई गई बातों को सही साबित करे, और अपने लगाए आरोपों की जांच भी करे। अभी मध्यप्रदेश के हनीट्रैप मामले से सत्ता के इतने लोग जुड़े हुए थे कि जिस-जिस वीडियो में जो तथ्य सामने आए, उन तमाम लोगों की कड़ाई से जांच करनी चाहिए क्योंकि सत्ता किसी पार्टी का घरेलू सामान नहीं होती है, वह देश की व्यवस्था रहती है, और उसके बेजा इस्तेमाल पर सजा मिलनी ही चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 18-Nov-2019

सड़कों की जगह पानी की नहरों वाले इटली के वेनिस शहर के इलाके की एक क्षेत्रीय काऊंसिल की बैठक चल रही थी, और वहां एक पार्टी के लोगों ने जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में विचार करने का प्रस्ताव रखा। इसे दूसरी बड़ी पार्टियों ने खारिज कर दिया। बैठक चल ही रही थी। कुदरत की चेतावनी का शायद दुनिया के इतिहास का इतना बड़ा दूसरा मामला दर्ज न हुआ हो, बैठक में प्रस्ताव खारिज हुआ, जलवायु परिवर्तन के खतरों पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई, और दो मिनटों के भीतर बैठक के कमरे में पानी भरना शुरू हो गया, देखते ही देखते पानी टेबिल तक पहुंच गया। और यह किसी साजिश के तहत किसी टंकी से लाकर भरा गया पानी नहीं था, यह समंदर से जुड़ी हुई वेनिस की नहरों से आया हुआ पानी था जिसने पूरे शहर को डुबाकर रख दिया। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए लोगों ने प्रस्ताव रखा था कि आसपास के इलाकों में डीजल इंजनों पर रोक लगाई जाए और कुछ दूसरे कदम भी उठाए जाएं, लेकिन जब बैठक में हिस्सेदार लोगों ने यह तय किया कि ऐसे कदम उठाने की जरूरत नहीं है, ऐसे कोई कदम नहीं उठाए जाएंगे, तो कुदरत ने ही एक कदम उठाया, और मीटिंग रूम के भीतर पहुंच गई। 

कुदरत की चेतावनी पहले भी कहीं सुनामी की शक्ल में, कहीं बाढ़ की शक्ल में, और कहीं फटी हुई धरती के सूखे की शक्ल में सामने आती रही है। लेकिन अगर इस मीटिंग के बीच दो मिनटों के भीतर पानी ऐसा नहीं पहुंचा होता तो शायद यह किसी विज्ञान कथा या किसी फिल्म की बात ही मानी जाती। लेकिन कुदरत ने बैठक के भीतर घुसकर लोगों को बतलाया कि यह उसकी खुद की जरूरत का मामला नहीं है, यह डूबने जा रहे शहरों में बसे लोगों की जरूरत का मामला है, उसने शहर को डुबाकर एक नमूना सामने रख दिया। आज पूरी हिन्दुस्तान में एक्स्ट्रीम वैदर, या वैदर एक्स्ट्रीम के मामले जिस रफ्तार से बढ़ते चल रहे हैं, शहरों को पाटने वाली बर्फ की ऊंचाई जितनी बढ़ती चल रही है, दिल्ली जैसा प्रदूषण जितना बढ़ते चल रहा है, महाराष्ट्र जैसा जलसंकट जितना बढ़ते चल रहा है, नए-नए इलाकों में बाढ़ जितनी तबाही बढ़ाते चल रही है, उन सबको देखें तो लगता है कि कुदरत के साथ खिलवाड़ के खतरे धीरे-धीरे दिखते हैं, या सुनामी की शक्ल में इस रफ्तार से आते हैं कि दौड़कर समंदर से दूर जाने का वक्त भी नहीं मिलता। लेकिन जब इस खतरे से बचने के बारे में सोचा जाए, तो दुनिया का अधिकतर हिस्सा अपनी आज की सुख-सुविधा को देखते हुए खतरे को कल की तरफ धकेल देता है, और रात में एसी शुरू करके सो जाता है। 

लेकिन यह समझने की जरूरत है कि समझदार दुनिया किस तरह अपनी ऊर्जा की खपत को काबू करने के साथ-साथ ऊर्जा पैदा करने के तरीकों को बदल भी रही है ताकि धरती की तबाही धीमी हो सके। अभी पश्चिम के एक विकसित देश की खबर है कि किस तरह उसने यह तय किया है कि वह कोयले से चलने वाले अपने सारे बिजलीघरों को बंद कर रहा है। दुनिया में आज सौर ऊर्जा जितनी सस्ती होती जा रही है, अभी दो दिन पहले ही उसने पेट्रोलियम से चलने वाली गाडिय़ों के मुकाबले अधिक किफायती होना साबित कर दिया है। इंसान की कल्पना से भी अधिक रफ्तार से सौर ऊर्जा पेट्रोलियम और कोयले जैसे जीवाश्म से पैदा होने वाली बिजली से सस्ती होने जा रही है, या हो चुकी है। ऐसे में यह पता भी नहीं चलेगा कि कब कोयले का बिजलीघर अपने तमाम धुएं और प्रदूषण के साथ, या उसे अनदेखा करने पर भी, सौर ऊर्जा से महंगा पडऩे लगेगा, या शायद आज भी महंगा पड़ चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे उन प्रदेशों को अपनी चली आ रही सोचने की रफ्तार को कुछ थामकर नए किस्म से सोचना चाहिए क्योंकि इस राज्य में जंगलोंतले, आदिवासी इलाकोंतले दबी हुई कोयला खदानों को खोलने की एक बड़ी मशक्कत चल रही है जिसका सामाजिक कार्यकर्ता जमकर विरोध भी कर रहे हैं। लेकिन हिन्दुस्तान के एक सबसे बड़े उद्योगपति के हवाले होने जा रही छत्तीसगढ़ की कोयला खदानों को लेकर यह भी समझने की जरूरत है कि क्या दस-बीस बरस बाद सचमुच ही इतने कोयले की जरूरत बची रहेगी, या सस्ती सौर ऊर्जा कोयला-बिजलीघरों को कबाड़ बनाकर रख देगी? यह भी समझने की जरूरत है कि जब कोयले के खरीददार नहीं बचेंगे, तो बेदखल किए गए आदिवासियों को उनके हक की जमीन, और उनके हक के जंगल कहां से लाकर, और कैसे लौटाए जा सकेंगे? यह भी समझने की जरूरत है कि कोयले की बिजलीघरों के घाटे में चले जाने के बाद उन पर लगे हुए पूंजीनिवेश का क्या होगा, और क्या वे दीवालिया होकर बैंकों में आम जनता की जमा पूंजी को ही डुबाएंगे? लेकिन बैंकों के डूबने से परे, आम जनता की जमा पूंजी के डूबने से परे, धरती के डूबने के बारे में पहले सोचना चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के सामने, और हिन्दुस्तान के अधिकतर राज्यों के सामने एक ऐसी बड़ी संभावना मौजूद है जो कि दुनिया के बहुत से दूसरे देशों में नहीं है। यहां पर साल के कम से कम आठ महीने सूरज की इतनी रौशनी रहती है कि सौर बिजलीघर जरूरत की तकरीबन सारी बिजली पैदा कर सकते हैं। हर घर और हर इमारत की छत भी अपनी जरूरत का बिजलीघर बन सकती है, हिन्दुस्तान में ही कई जगहों पर नहरों पर ऐसे सोलर पैनल कामयाबी से लग चुके हैं जो वहां के पंप चलाते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे कोयला खदान वाले राज्य को कुछ थमकर यह देखना चाहिए कि कोयला खदानों को बढ़ाए बिना भी, कोयला उत्पादन बढ़ाए बिना भी किस तरह देश-प्रदेश का काम चल सकता है? और भारत सरकार को चाहिए कि एक तरफ सौर ऊर्जा के कोयला-बिजली से सस्ते हो जाने के बाद, और दूसरी तरफ पेट्रोलियम की जगह बैटरियों से चलने वाली गाडिय़ों के किफायती हो जाने के बाद, इस देश की ऊर्जा की जरूरत और इसकी तकनीक के बारे में एक बार फिर से सोचे। और तब तक यह होना चाहिए कि केन्द्र और राज्य सरकारें थोड़ी सी दूरदर्शिता दिखाते हुए इतना काम करें कि कोयला खदानों के नाम पर जंगलों और आदिवासियों को बेदखल और खत्म करना रोक दें। पर्यावरण और कारोबार दोनों से जुड़ा हुआ यह इतना बड़ा मुद्दा है कि हिन्दुस्तान की सर्वोच्च अदालत, या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल खुद होकर भी ऐसी एक रोक लगा सकती हंै, या कम से कम केन्द्र और राज्य सरकारों को नोटिस भेजकर ऐसा अनुमान मांग सकती हैं कि आने वाले दिनों में ऊर्जा की जरूरत, ऊर्जा की तकनीक, और कोयले के बिजलीघरों का भविष्य, इन सब पर जवाब दे। छत्तीसगढ़ जैसे कोयला-राज्य को इस मामले में पहल करनी चाहिए, और जंगल-आदिवासियों की बेदखली को तो तुरंत ही स्थगित करना चाहिए। जो पानी इटली की एक क्षेत्रीय काऊंसिल की बैठक में पहुंचकर लोगों के दिमाग को खटखटा चुका है, वह खटखटाहट किसी और शक्ल में पूरे हिन्दुस्तान के सिर पर भी हो सकती है, छत्तीसगढ़ के सिर पर भी। अभी तक कुदरत की मार से धरती नाम के इस गोले को बचाने के लिए इतना बड़ा कोई हेलमेट बना नहीं है, इसलिए देश-प्रदेश की सरकारें धरती की जिंदगी को अपनी पांच बरस की जिंदगी से अधिक लंबा मानकर चलें, अपने कार्यकाल से अधिक महत्वपूर्ण मानकर चलें। 
-सुनील कुमार


Date : 17-Nov-2019

चुनाव आयोग में राजनीतिक दलों को अपना खर्च बताना होता है। आन्ध्र की सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस ने अपने खर्च में साढ़े 37 करोड़ रूपए राजनीतिक और चुनावी सलाह देने के लिए मशहूर प्रशांत किशोर की कंपनी को दिए हैं। विधानसभा चुनाव के पहले इस पार्टी के अध्यक्ष और अब आन्ध्र के मुख्यमंत्री जगन मोहन ने प्रशांत किशोर की कंपनी की सेवाएं ली थीं। राजनीतिक दलों द्वारा किया गया खर्च चुनाव आयोग की प्रत्याशी खर्च सीमा में नहीं आता, और इसलिए 176 सीटों वाली इस विधानसभा के चुनाव में प्रशांत किशोर पर इस पार्टी ने हर सीट के लिए औसतन 21 लाख रूपए खर्च किए। चुनाव आयोग की एक सीट पर खर्च करने की सीमा उम्मीदवार के लिए तो इससे कम है लेकिन जाहिर तौर पर पार्टी में आयोग की छूट इस्तेमाल करते हुए प्रत्याशी से अधिक खर्च सलाहकार पर कर दिखाया है। लोगों को पिछले काफी समय से लगातार खबरों में आ रहे चुनावी चंदे की भी याद होगी कि किस तरह देश में आज अधिकतर चुनावी चंदा भाजपा को मिल रहा है, और बाकी पार्टियां उसके बहुत पीछे हैं। चुनाव आयोग में अगर चुनावी खर्च का एक छोटा सा हिस्सा ही पार्टियां घोषित करती हैं, ऐसा अंदाज है। अब एक पार्टी चुनाव सलाहकार कंपनी को कितना पैसा चेक से देती है, और कितना नगद कालाधन, इसका हिसाब न तो आयोग रख पा रहा है, और न ही केन्द्र और राज्य सरकारों की कोई एजेंसियां। लोगों का अंदाज यह है कि घोषित खर्च के मुकाबले अघोषित खर्च पांच से दस गुना तक अधिक रहता है। अब सवाल यह है कि एक पार्टी आयोग के नियमों के तहत ही अगर एक-एक विधानसभा सीट पर सलाह और रणनीति के लिए किसी कंपनी को 21-21 लाख रूपए का घोषित भुगतान कर रही है, तो किस तरह की पार्टियां विधानसभाओं में पहुंचेंगी, किस तरह की पार्टियों की सरकार बन सकेगी? और जब विधानसभाओं में ऐसा हाल है, तो यह सोचना एक नासमझी ही होगी कि लोकसभा में हाल कुछ और होगा। 

कुल मिलाकर हालत यह है कि घोषित और अघोषित वजहों से भारतीय राजनीति में चुनावी दल इतने बड़े चंदे के कारोबार में लग गए हैं, और सामान्य समझबूझ के मुताबिक घोषित चंदा अघोषित के मुकाबले बहुत थोड़ा सा होता है, ऐसे में क्या चुनाव जीतना महज पैसों का खेल नहीं रह गया है, जिन पैसों से जनधारणा प्रबंधन से लेकर चुनावी रणनीति तक, और वोटरों की खरीदी तक आम बात है। अब चुनाव हो जाने के बाद विधायकों की खरीदी, पार्टियों में विभाजन की खरीदी, और पूरी की पूरी पार्टी का गठबंधन बदल एक और बात है जो कि बहुत अनजानी नहीं है। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी चुनाव क्या सचमुच ही लोकतांत्रिक रह गए हैं, और क्या वे सचमुच ही जनता की स्वतंत्र पसंद का जरिया रह गए हैं? अब आन्ध्र में जगन रेड्डी की पार्टी की उस वक्त से धनकुबेर होने की साख थी जब जगन के पिता वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री थे। उस वक्त से ही जगन की टकसाल जैसी कमाई की चर्चा रहती थी। कई किस्म की जांच भी चली, और शायद अब तक कार्रवाई जारी भी है। ऐसे अथाह पैसे से अगर कोई पार्टी ऐसे सलाहकार और रणनीतिकार की सेवा खरीद सकती है जिसने कभी मोदी को गुजरात जीतने में मदद की, तो कभी नीतीश कुमार को बिहार जीतने में, तो फिर ऐसे पैसे के मुकाबले अगर दूसरी कोई ईमानदार पार्टी है, दूसरे कोई ईमानदार उम्मीदवार हैं, तो उनके जीतने की कोई गुंजाइश बच भी जाती है? 

आज जो लोग चुनाव के तौर-तरीकों को जानते हैं, वे एक मामूली सा केलकुलेटर लेकर अपने प्रदेश की विधानसभा की एक औसत सीट पर किया गया पूंजीनिवेश आसानी से हिसाब कर सकते हैं। इसी तरह अपने प्रदेश की लोकसभा सीटों पर किया गया पूंजीनिवेश भी लोग निकाल सकते हैं। मतलब यह कि कोई विधानसभा, या लोकसभा काम शुरू करने के पहले ही इतने बड़े पूंजीनिवेश की बुनियाद पर बनी होती है कि उसकी भरपाई, और अगले ऐसे कुछ चुनावों की तैयारी प्रतिनिधियों और पार्टियों का एक बड़ा मकसद रहता है। जाहिर है कि ऐसे सदन किसी भी तरह से गरीब के हिमायती नहीं रह सकते, उन्हें गरीबों की फिक्र नहीं रह सकती क्योंकि चुनाव जीतने के लिए गरीबों के जो वोट लगते हैं, वे मतदान के पहले के ताजा-ताजा नोटों से पाए जा सकते हैं, पाए जा रहे हैं। तकनीकी रूप से हिन्दुस्तान के हर वोटर के हाथ में बराबर का हक है, लेकिन हकीकत यह है कि इन वोटों में से एक बड़ा हिस्सा नोटर के हाथ बिकने वाला रहता है, और जीतने वाले उम्मीदवार की कामयाबी का एक बड़ा हिस्सा रहता है। यह भी सोचने की जरूरत है कि जहां पर सबसे ताकतवर खरीददार जीत को खरीद सकते हैं, वहां पर अपने मन को झांसा देने के लिए भी क्या यह सोचना ठीक है कि यह जनता का लोकतांत्रिक फैसला है? क्या हिन्दुस्तान में अब चुनावों का फैसला वोटों के साथ-साथ, या वोटों से अधिक, नोटों से तय नहीं होने लगा है? क्या जनता भी ऐसे ताकतवर और संपन्न उम्मीदवार को पसंद नहीं करने लगी है जो अगले पांच बरस उसकी जायज और नाजायज जरूरतों को पूरा कर सके? क्या जनता के वोट प्रदेश और देश का भविष्य तय करने के बजाय, उसके खुद के आज और आने वाले कल की सहूलियतों को तय करने के हिसाब से नहीं डाला जा रहा है? क्या जिंदगी के, देश और प्रदेश के असल मुद्दों से परे निहायत ही खोखले लेकिन भड़काऊ-भावनात्मक मुद्दे चुनावी नतीजे तय करने के लिए नोटों पर सवार होकर वोटों तक जा रहे हैं? इन तमाम पहलुओं को देखें तो लगता है कि हिन्दुस्तान का लोकतंत्र एक बड़ा पाखंड रह गया है। यह लिखा हुआ छपने जा ही रहा था कि एक खबर सामने आई, कर्नाटक में कांग्रेस छोड़ भाजपा जाने वाले विधायक-मंत्री एमटीबी नागराज ने 5 दिसंबर को होने वाले उपचुनाव के लिए भरे पर्चे में अपनी संपत्ति 1223 करोड़ घोषित की है, जो कि 18 महीने पहले की घोषणा से 160 करोड़ अधिक है। दौलत की ऐसे तेज रफ्तार और ताकतवर सुनामी के सामने किस पार्टी के कौन से उम्मीदवार टिक सकते हैं?
-सुनील कुमार


Date : 16-Nov-2019

जेएनयू पर चारों तरफ चर्चा के बीच अपने राज्य के विवि देखें?

इन दिनों देश में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय खबरों में सबसे अधिक बना हुआ है। जिन लोगों ने इसके कैम्पस को देखा नहीं है, उन्हें यह जानकर हैरानी हो सकती है कि पूरी दुनिया में भारत के सबसे अधिक चर्चित इस विश्वविद्यालय में दस हजार से भी कम छात्र-छात्रा हैं। उनकी गिनती कम है, लेकिन देश में सरकारी नौकरी के सबसे बड़े इम्तिहान, यूपीएससी, में कामयाबी पाने वालों में इसी एक विश्वविद्यालय के लोग सबसे अधिक रहते हैं। शिक्षा की उत्कृष्टता आकार पर हावी है, तमाम आंदोलनों के बावजूद यहां के छात्र-छात्राएं और रिसर्च स्कॉलर खुले दिमाग से पढ़ते हैं, काम करते हैं, वैचारिक सहमति-असहमति का सम्मान करते हैं, और अपनी सोच को विकसित करते हैं। जेएनयू का योगदान गिनती में कम है, लेकिन उत्कृष्टता में बहुत अधिक है। एक विश्वविद्यालय को ऐसा होना भी चाहिए कि उसकी पढ़ाई-लिखाई, वहां के शोधकार्य का विश्व के लिए कोई महत्व हो, और जहां के नौजवान एक विश्व दृष्टि रखने को विदेशी संस्कृति का हमला न मानें। जैसा कि किसी विश्वविद्यालय के नाम से ही जाहिर होता है, उसका नजरिया पूरे विश्व का होना चाहिए, वहां की पढ़ाई-लिखाई लोगों को बाहर देखने के काबिल भी बनाए, और बाहर की दुनिया को समझने के भी। वरना कमोबेश उसी किस्म की पढ़ाई तो किसी कॉलेज में भी हो सकती है, और विश्वविद्यालय में अलग से किसी अध्ययन केन्द्र की जरूरत ही क्यों होना चाहिए?

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में एक खबर आई कि रायगढ़ जिले में एक नया विश्वविद्यालय खुलने वाला है। पिछले दो बरस में ही दुर्ग में एक विश्वविद्यालय खोला गया। इस तरह अब राज्य में बस्तर संभाग के पास अपना एक विश्वविद्यालय है, रायपुर संभाग के पास एक, दुर्ग संभाग के पास एक, सरगुजा संभाग के पास एक, और बिलासपुर संभाग में अभी तो एक विश्वविद्यालय है, और दूसरे के खुलने की बात कही गई है। एक वक्त था जब मध्यप्रदेश भी नहीं बना था, और उस वक्त मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ का सारा इलाका सागर विश्वविद्यालय के तहत आता था। उच्च शिक्षा के लिए सरगुजा का बिहार और उत्तरप्रदेश को छूता हुआ इलाका भी सागर पर निर्भर करता था। बाद में कई विश्वविद्यालय बने, और छत्तीसगढ़ में कई निजी विश्वविद्यालय भी मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में बने, सुप्रीम कोर्ट से खारिज हुए, और फिर बाद में नए नियमों के तहत फिर से बने। आज अगर इस राज्य में विश्वविद्यालयों की गिनती करने बैठें, तो खासी मुश्किल होती है क्योंकि चिकित्सा शिक्षा के लिए अलग विश्वविद्यालय है, तकनीकी शिक्षा, कृषि शिक्षा, पत्रकारिता शिक्षा, के लिए अलग-अलग विश्वविद्यालय हैं, और एक ओपन विश्वविद्यालय भी है, बिलासपुर में एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय भी है, और केन्द्र सरकार के यहां शुरू हुए तीन संस्थान तो विश्वविद्यालय की बराबरी का दर्जा रखते ही हैं, आईआईएम, आईआईटी, और एम्स। करीब आधा दर्जन निजी विश्वविद्यालय भी इस राज्य में काम कर रहे हैं, और केन्द्र सरकार के इग्नू जैसे खुले विश्वविद्यालय से भी छत्तीसगढ़ से हजारों लोग पढ़ाई करते हैं, और इम्तिहान देते हैं। इन सबको मिलाकर एक विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं की औसत संख्या घटती चली गई है।

छत्तीसगढ़ में एक वक्त रविशंकर विश्वविद्यालय पहला था, और पूरे प्रदेश के कॉलेज छात्र-छात्राओं के इम्तिहान यहीं से होते थे, डिग्री यहीं से मिलती थी, और रायपुर में इस विश्वविद्यालय का अध्ययन केन्द्र था। बाद में अलग-अलग संभागीय विश्वविद्यालय बनते चले गए, और इस पहले अध्ययन केन्द्र से परे भी कई केन्द्र बन गए। यह याद रखने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी कॉलेजों में भी प्राध्यापकों के सैकड़ों पद खाली हैं, और विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों की जितनी जगहें हैं, उन पर भी बहुत औसत दर्जे के ही प्राध्यापक दिखते हैं। पूरे राज्य के सारे विश्वविद्यालयों को मिला भी लें, तो भी ऐसे गिनती के भी प्राध्यापक नहीं हैं जिनकी लिखी हुई किताबें बाकी देश में भी कहीं कोर्स में चलती हों। गिने-चुने ऐसे प्राध्यापक हैं जिनकी की हुई, या करवाई हुई रिसर्च का कोई अंतरराष्ट्रीय सम्मान हुआ हो। बल्कि प्रदेश के अकेले विश्वविद्यालय अध्ययन केन्द्र में अध्ययन और शोधकार्य की, सुविधाओं और लाइब्रेरी-प्रयोगशाला की जो उत्कृष्टता थी, या हो सकती है, वह भी हर संभाग में खुले विश्वविद्यालयों की वजह से घट गई। न प्राध्यापक बहुत ऊंचे दर्जे के, और न ही वहां की सहूलियतें।

दरअसल इस राज्य में पिछले दशकों में क्षेत्रीय गौरव की भावना को पहले उकसाकर, और फिर उसे संतुष्ट करने के लिए विश्वविद्यालय खोले गए, क्षेत्रीय विश्वविद्यालय भी बनाए गए, और खास किस्म की शिक्षा के लिए भी। जहां पर छात्र-छात्राओं को सिर्फ विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामों से वास्ता पड़ता था, जहां सिर्फ एक प्रशासनिक दफ्तर से ऑनलाईन काम चल सकता था, वहां भी सैकड़ों करोड़ की लागत वाले, और करोड़ों रूपए महीने के खर्च वाले विश्वविद्यालय बना दिए गए। नतीजा यह हुआ कि क्षेत्रीय तुष्टिकरण तो हो गया, लेकिन उत्कृष्टता घटती चली गई। हालत यह है कि इस राज्य के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में महज कुछ सौ छात्र-छात्राओं का दाखिला है, जिनमें से बहुत से दाखिले दूसरे प्रदेश से आकर दाखिला लेने वालों के सिर्फ कागजी दाखिले हैं। इतनी पढ़ाई तो प्रदेश के पहले विश्वविद्यालय के मातहत कॉलेजों में भी पत्रकारिता विभाग में हो सकती थी, इतना बड़ा सफेद हाथी खड़ा करने की जरूरत नहीं थी।

प्रदेश के संभागों से अधिक क्षेत्रीय विश्वविद्यालय बन जाने के बाद अब बाकी संभागों में भी जिला स्तरों पर और विश्वविद्यालय खोले जा सकते हैं, और आखिर में जाकर प्रदेश में विश्वविद्यालयों का एक विश्वविद्यालय और खोला जा सकता है। गिनती और उत्कृष्टता का रिश्ता खत्म हो चुका है, और यही वजह है कि इस राज्य की उच्च शिक्षा देश में कहीं दर्ज नहीं होती।

-सुनील कुमार


Date : 15-Nov-2019

दो-तीन अलग-अलग खबरें बहुत फिक्र खड़ी करती हैं। एक तो खबर बैंक की है कि किस तरह खाते की कुछ जानकारी पाकर ठगों ने किसी के एफडी की रकम भी निकाल ली। अभी तक फिक्स्ड डिपॉजिट के बारे में तो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती थी कि उसे भी लूटा जा सकता है, लेकिन अब वह भी हो गया है। एक दूसरी खबर भारत सरकार से ही संबंधित है, कई ऐसी फर्जी वेबसाईटें चल रही हैं जो कि अपने आपको पासपोर्ट दफ्तर बताती हैं, और वहां फीस जमा करवाकर पासपोर्ट के लिए इंटरव्यू का समय भी दे देती हैं, जब लोग पहुंचते हैं तो पता लगता है कि उनका संपर्क किसी फर्जी वेबसाईट से हुआ था। खुद भारत सरकार ने ऐसी आधा दर्जन वेबसाईटों को बताया है कि लोग उनसे संपर्क न करें, वे फर्जी हैं। इसके साथ-साथ कई अलग-अलग खबरें हर कुछ हफ्तों में आती हैं जिनमें कहीं पर सरकारी नौकरी लगाने के नाम पर लोगों से कुछ रकम जमा करवाई जाती है, या दूसरे तरह की ऑनलाईन ठगी होती है। एक खबर में यह भी है कि बैंक खातों में इतनी बड़ी संख्या में ठगी इसलिए हो पा रही है कि ठग बड़ी आसानी से खाते खोल रहे हैं, ठगी की रकम उसमें जमा करके निकालकर गायब हो जाते हैं, और फिर उनका कोई सुराग नहीं लगता। 

देश में चल रही ऐसी तमाम बैंक और साइबर ठगी को देखें, तो लगता है कि सरकार का निगरानीतंत्र और सरकार का साइबर सुरक्षातंत्र ऐसे छेदों से भरा हुआ है जिनसे होकर ठग और जालसाज आसानी से आवाजाही करते रहते हैं, और जनता लुटती चली जा रही है। अब अगर लोगों के एफडी की रकम भी गायब हो जा रही है, तो ऐसे कितने लोग हैं जो कि रोज अपनी एफडी की रकम जांचते हों? बहुत से लोग तो हर महीने या हर साल एफडी का ब्याज निकलवाने से परे अपने इन खातों की कोई जानकारी नहीं लेते हैं। देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, का हाल यह है कि वह खाते में जमा या उसमें से रकम की निकासी का कोई एसएमएस भेजता है, और कोई एसएमएस नहीं भेजता। मतलब यह कि सबसे बड़े बैंक में भी हिफाजत का इंतजाम ऐसा कमजोर है। हमारे खुद के देखने में आया है कि एसबीआई से ऑनलाईन ट्रांसफर करते हुए फोन पर जो ओटीपी आता है, उसे डाले बिना ही कभी-कभी खाते से रकम चली जाती है। चूंकि यह हमारा खुद का देखा हुआ है, तो ऐसे भी बहुत से लोग होंगे जो उतनी बारीकी से अपने खाते पर नजर नहीं रखते होंगे या नहीं रख पाते होंगे, और जिन्हें बरसों तक रकम कम होने का पता भी नहीं चलता होगा। 

हम पहले भी इस जगह पर कई बार लिख चुके हैं कि भारत सरकार जिस आक्रामक अंदाज में डिजिटल बैंकिंग और भुगतान-ट्रांसफर को बढ़ावा दे रही है, उसके लायक सरकार और बैंकों का अपना हिफाजत-इंतजाम नहीं है। सरकार देश में कैशलेस इकॉनॉमी बढ़ाना चाहती है, लेकिन सबसे जानकार और संपन्न तबका पहले से उसका इस्तेमाल कर रहा है, अब धीरे-धीरे नीचे के लोग उसमें आते जा रहे हैं, लेकिन जैसे-जैसे हम कम आयवर्ग की तरफ बढ़ते हैं वहां पर तकनीकी जानकारी घटती जाती है, लोगों को फोन या कम्प्यूटर, या बिना नगदी भुगतान के कई औजारों की जानकारी और समझ कम है। हालांकि अभी जो खबरें आती हैं, उनमें बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए सरकारी कर्मचारी भी ठगी और जालसाजी का शिकार हो रहे हैं, तो ऐसे में कम पढ़े-लिखे लोगों के तो भगवान ही मालिक होंगे। 

फिलहाल भारत सरकार, उसकी बैंकों, और उसके दूसरे संस्थानों को चाहिए कि देश में एक बहुत तगड़ा साइबर निगरानी और सुरक्षातंत्र विकसित करें, क्योंकि एक बार जनता या सरकार की रकम निकल गई, तो फिर उसके वापिस हाथ लगने की गुंजाइश बिल्कुल भी नहीं रहती है। जैसे-जैसे बैंक खाते बढ़ रहे हैं, लोग मोबाइल बैंकिंग, या ऑनलाईन बैंकिंग की तरफ बढ़ रहे हैं, कार्ड से पेमेंट कर रहे हैं, वैसे-वैसे ठगों के पास उनके धंधे के लिए आबादी भी बढ़ रही है। सरकार को कैशलेस को बढ़ावा देना रोककर, खुफिया निगरानी, और सुरक्षा के इंतजाम विकसित करने चाहिए। इसके बिना लोगों का भरोसा भी कैशलेस पर से कम होता जाएगा, बैंकों पर से लोगों का भरोसा पहले ही घट चुका है, नोटों पर से भी लोगों का भरोसा कम हो गया है क्योंकि सारे बड़े दाम के नोट नकली आ चुके हैं, और किसी भी दिन सरकार बड़े नोटों को बंद कर देगी, ऐसा अंदेशा लोगों को है। देश के लोग वैसे भी बहुत बुरे हाल से गुजर रहे हैं, नौकरियां जा रही हैं, जिंदा रहने को कमाई कम पड़ रही है, और ऐसे में अगर उनके पास की थोड़ी-बहुत रकम कोई ठग लेते हैं, तो इस देश की जनता उसे बर्दाश्त करने की हालत में बिल्कुल नहीं है।
-सुनील कुमार


Date : 14-Nov-2019

आए दिन हिन्दी के अखबारों में यह पढऩे मिलता है कि किसी एक आदमी ने, या कुछ लोगों ने मिलकर, किसी एक महिला या लड़की की इज्जत लूट ली। बड़े-बूढ़े समाज के भीतर यह नसीहत देते ही रहते हैं कि लड़की को अपनी इज्जत बचाने की खुद भी फिक्र करनी चाहिए। कुछ समय पहले झारखंड की एक खबर आई थी कि एक लड़की के साथ उसके चाचा ने बलात्कार किया, और पंचायत ने फैसला दिया कि उन दोनों को जिंदा जला दिया जाए। 

समाज का यह मर्दाना रूख न तो नया है, और न ही इक्कीसवीं सदी में पहुंची हुई दुनिया में भी यह कम हिंसक हुआ है। बलात्कार करने वाले लोग अपनी इज्जत नहीं खोते, और जिस लड़की के साथ बलात्कार होता है, उसकी इज्जत चली जाती है! यह हिंसक नजरिया मर्दों को यह बलात्कारी मर्दानगी जारी रखने का हौसला देता है क्योंकि इससे मर्द की इज्जत तो जाती नहीं। लोग लड़कियों और महिलाओं को ही अकेले न निकलने, कपड़े सावधानी से पहनने, और मर्दों के बीच न उठने-बैठने की दर्जनों नसीहत देते दिख जाते हैं, लेकिन लड़कों को कैसा रहना चाहिए, उन्हें क्या-क्या नहीं करना चाहिए, ऐसी नसीहत देते कोई परिवार शायद ही दिखते हों। नतीजा यह होता है कि जब बलात्कारी अपने पूरे परिवार की इज्जत को मिट्टी में मिला देता है, तब भी इज्जत लुट जाने की बात लड़की के लिए ही लिखी जाती है। बोलचाल में कहा जाता है कि वह अब कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगी, मानो बलात्कारी का चेहरा दमक रहा हो, और वह अखबार के पहले पन्ने के लायक हो। 

जब से भारत में कुछ प्रमुख महिलाओं ने उनके साथ हुए यौन शोषण, या यौन प्रताडऩा की शिकायतें की हैं, तब से सोशल मीडिया पर महिलाओं के पूरे तबके के खिलाफ तरह-तरह के लतीफे बन रहे हैं, तरह-तरह के कार्टून बन रहे हैं, और मर्दों की सारी रचनात्मक कल्पनाशीलता जोरों से इस्तेमाल हो रही है। बलात्कार को लेकर मजाक के इस हद तक आम हो जाने का यह शायद पहला ही मौका है, और कुछ प्रमुख मर्दों पर लगी तोहमतों को लेकर मानो जवाब में बाकी तमाम मर्द-बिरादरी जवाबी हमले के तेवरों में आ गई है। दरअसल मर्दों के पूरे तबके को यह मालूम है कि यह सिलसिला महानगरों और प्रमुख महिलाओं से आगे बढ़कर छोटे शहरों और आम महिलाओं तक अगर आगे बढ़ेगा तो तकरीबन तमाम मर्द किसी न किसी किस्म की दिक्कत में आ जाएंगे। 

लेकिन जैसा कि हमने इस मुद्दे पर लिखते हुए पहले भी लिखा है कि ऐसे मौके समाज को आत्ममंथन का एक मौका भी देते हैं कि उसकी भाषा, उसके मुहावरे, उसकी कहावतें, और उसके शब्द किस तरह बेइंसाफी की बात करते हैं, किस तरह वे महिलाओं के खिलाफ हिंसक रहते हैं। यह सिलसिला लगातार जागरूकता पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल होना चाहिए, न सिर्फ महज भांडाफोड़ के लिए, बल्कि महिलाओं के लिए काम की जगहों पर, समाज में एक सुरक्षित माहौल बनाने के लिए, बल्कि समाज की भाषा को भी सुधारने के लिए। मीडिया जो कि आमतौर पर पढ़ा-लिखा माना जाता है, उसे भी यह समझने की जरूरत है कि इज्जत बलात्कारी की लुटती है, न कि बलात्कार की शिकार महिला की। अखबारी भाषा का यह मर्दाना रुझान बदलना चाहिए, और आज लोगों की जिंदगी में खासे हावी हो चुके मीडिया को अपने राजनीतिक-शिक्षण की फिक्र भी करनी चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 13-Nov-2019

महाराष्ट्र में देश के एक सबसे पुराने चुनावी गठबंधन, भाजपा और शिवसेना के बीच रिश्ते टूट जाने के बाद अब एनसीपी और कांग्रेस पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वे इस राज्य में सरकार बनाने पर अपना क्या रूख रखते हैं, क्या करते हैं। केन्द्र सरकार ने बड़ी रफ्तार से फैसला लेकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया है, लेकिन शिवसेना के साथ अगर उसकी दो विरोधी पार्टियां सरकार के भीतर रहते हुए, या सरकार के बाहर रहते हुए अगली सरकार बनाने का रास्ता बनाती हैं, तो राष्ट्रपति शासन खत्म हो जाएगा, और राज्यपाल को चाहे-अनचाहे अगली सरकार को शपथ दिलानी पड़ेगी। लेकिन आज जितनी बड़ी दुविधा भाजपा से गठबंधन तोडऩे के बाद शिवसेना के सामने है, उससे अधिक बड़ी दुविधा एनसीपी के सामने है, और सबसे बड़ी दुविधा तो कांग्रेस के सामने है जिसके नीति-सिद्धांत शिवसेना के ठीक खिलाफ हैं। लेकिन पिछले कई बरसों से देश की राजनीति में जिस तरह फ्री स्टाईल गिरोहबंदी चल रही है, उसमें कुछ भी हैरान नहीं करेगा, और देश की तीन वंशवादी पार्टियां मिलकर देश के सबसे संपन्न प्रदेश में एक अनोखी सरकार बना सकती हैं। तीनों ही पार्टियां एक-एक परिवार पर टिकी हैं, एक-एक परिवार के काबू में हैं, और जैसा कि राजनीति के बारे में दुनिया भर में कहा और लिखा जाता है, राजनीति हैरतअंगेज हमबिस्तर पेश करती रहती है। हो सकता है कि महाराष्ट्र में बाघ गले में घड़ी बांधकर सिंहासन पर बैठे, और उसकी जंजीर एक हाथ में रहे। 

दरअसल भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति एक बाजार व्यवस्था की तरह हो गई है जिसमें डिमांड के आधार पर सप्लाई न करने वाले कारोबारी धंधे से बाहर हो जाते हैं। पिछले पांच बरस में भाजपा ने अनगिनत राज्यों में अनगिनत अनैतिक गठबंधन किए हैं, विधायकों के दलबदल न करवाकर, पूरे-पूरे दल को बदलकर रख दिया है, और ऐसी राजनीति के बीच में लोग या तो अपने नीति-सिद्धांत लेकर वामपंथियों के साथ बैठकर कॉफी और सिगरेट पियें, या फिर असल राजनीति को उसके मौजूदा तौर-तरीकों और बाजार के प्रतिद्वंद्वियों के तौर-तरीकों को देखते हुए लड़ें। कांग्रेस के सामने एक बड़ी दुविधा है, लेकिन हर बड़ी पार्टी ऐसी कई दुविधाओं से पार पाना धीरे-धीरे सीखने लगती हैं, और ऐसी मशक्कत करते हुए चमड़ी मोटी भी होने लगती है। हर अनैतिक समझौते के बाद पार्टी उस आत्मग्लानि से उबर जाती है, और उससे अधिक अनैतिक समझौता करने के लिए अपने आपको तैयार भी कर लेती है। भाजपा ने पूरे देश में कांग्रेस के लोगों को ला-लाकर, राज्यसभा, लोकसभा, और विधानसभा में भेज-भेजकर देश को कांग्रेसमुक्त करने का अभियान तो चलाया, लेकिन इस दौरान भाजपा इतनी अधिक कांग्रेसयुक्त हो गई है कि वह पहचाने पहचान नहीं आती। इसलिए अब भारतीय राजनीति में नैतिकता की दुहाई 18वीं सदी की लुगाई की तरह हो गई है, जो कि कोई हक नहीं रखती थी। 

कांग्रेस को आज की हकीकत को देखते हुए यह तय करना पड़ेगा कि वह चुनावी राजनीति के बाजार में जिंदा रहना चाहती है, या नीति-सिद्धांत पर टिके हुए घर बैठना चाहती है। यह फैसला आसान नहीं होगा, लेकिन आज हिन्दुस्तान की राजनीति में मोदी नाम की सुनामी आने के बाद बाकी लोगों के लिए कोई भी फैसला आसान नहीं है। और लोकतंत्र अच्छी और बुरी हर किस्म की संभावनाओं की पराकाष्ठा का नाम है, और जिस तरह फिल्म शोले की शूटिंग के दौरान की एक तस्वीर बीच-बीच में सामने आती है जिसमें गब्बर, बीरू, जय, और ठाकुर सभी एक साथ खड़े हॅंसते दिखते हैं, ठीक वैसा ही भारतीय राजनीति में चल रहा है। अगर कांग्रेस पार्टी ऐसे किसी गठबंधन में जुडऩा चाहती है, तो वह एक बात के लिए बेफिक्र हो सकती है कि उस पर पत्थर चलाने का नैतिक हक केवल वामपंथी ही रखेंगे, जो कि केरल में उसके लिए दिक्कत खड़ी कर सकते हैं, बाकी कोई भी पार्टी नैतिकता को रद्दी वाले को बेचने के बाद ही राजनीति में आई है, इसलिए कांग्रेस का यह कोई अनोखा गुनाह नहीं रहेगा। उसे बस यह सोचना होगा कि पांच बरस बाद अपने सबसे अधिक सांसदों वाले, और साफ-साफ वामपंथी रूझान वाले केरल में वह मतदाताओं को कौन सा हाथ दिखाएगी?
-सुनील कुमार


Date : 12-Nov-2019

पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में हर बरस भारतीय फौज के कुछ अफसर को गिरफ्तार किया जाता है जो कि फेसबुक पर महिलाओं से दोस्ती करके उनके जाल में फंस जाते हंै, और उससे बातचीत के दौरान उसने फौज की गोपनीय जानकारी उनको देना शुरू कर देते हैं। ऐसे मामले भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पकड़े, और इनको बर्खास्त कर दिया गया है, और अदालत में पेश किया गया। यहां पर दो बातें निकलकर सामने आती हैं, एक तो यह कि सोशल मीडिया पर अपनी या सरकार की संवेदनशील बातों को पोस्ट करने, या चर्चा करने का क्या बुरा नतीजा हो सकता है। दूसरी बात यह कि सोशल मीडिया लोगों को बेचेहरा रिश्ते बनाने का सामान है, और लोग न सिर्फ जासूसी में, बल्कि ब्लैकमेलिंग में भी फंस सकते हैं। पूरी दुनिया में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनमें जीवनसाथी भी एक-दूसरे के किसी नकली मुखौटे के चलते हुए उन्हें पहचान नहीं पाते, और शादी से परे प्रेम संबंध में फंसकर अपनी हकीकत उजागर कर बैठते हैं, और रिश्ते टूटने की नौबत आ जाती है। 
भारत में भी फेसबुक जैसी सोशल वेबसाइट को लेकर रोज ही शायद कहीं न कहीं पुलिस में एक रिपोर्ट दर्ज होती है कि किस तरह वहां पर संबंध बनाकर धोखा दिया गया। दरअसल इंटरनेट और डिजिटल जमाना इतनी रफ्तार से आया है कि लोग उस संस्कृति के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर पाए, और कई तरह की जालसाजी में फंस रहे हैं, अपने निजी जीवन के राज बांट रहे हैं, और किसी भी दिन उनके वीडियो, उनकी तस्वीरें, उनकी गोपनीय समझी जाने वाली बातें पोस्टर बनकर दीवारों पर चिपकी दिख सकती हैं। लोगों को नए जमाने की नई तकनीक के हिसाब से एक नई सावधानी सीखने की जरूरत है, और लोग उसके लायक तैयार नहीं हो पाए हैं। दरअसल भारत के लोगों को, यहां के अधिकतर लोगों को सामाजिक संबंधों की कोई आजादी पहले नहीं थी, और इंटरनेट के सोशल मीडिया ने उनको एक अभूतपूर्व उदार सामाजिक-संबंधों की संभावना जुटा दी है जिसकी वजह से लोग उसी तरह फिसल रहे हैं जिस तरह बर्फ पर पहली बार चलने वाले लोग पांव जमाकर चलना नहीं जानते, और फिसलते हैं। 

अब कम उम्र के लोग भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, बेरोजगार भी सक्रिय हैं, और सरकारी नौकरी के लोग भी। इन सबको लेकर एक तरह की सामाजिक सीख की जरूरत है। बेरोजगारों को यह समझना चाहिए कि उनको किसी नौकरी के पहले आज कंपनियां सोशल मीडिया पर उनके चाल-चलन को खंगाल डालती हैं, और ऐसे में अगर उनका चाल-चलन गड़बड़ रहा, उनकी विचारधारा आपत्तिजनक रही, उनके दोस्तों का दायरा गड़बड़ रहा, तो उनको काम मिलने की संभावना भी गड़बड़ा जाती है। इसी तरह सरकारी नौकरी के बहुत से लोग हैं जिनको कि नौकरी की सेवा शर्तों के खिलाफ जाकर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने की सजा भुगतनी पड़ती है। आज भारत में लोगों को सावधानी सीखने की जरूरत है, और इंटरनेट पर हैकिंग नाम की एक आसान और प्रचलित घुसपैठ कभी भी लोगों के तौलियों के भीतर झांककर दुनिया को तस्वीरें दिखा सकती है। 
-सुनील कुमार


Date : 11-Nov-2019

अयोध्या पर फैसले के साथ ही लोगों को बाबरी मस्जिद गिराने की याद आई और याद आए लालकृष्ण अडवानी जिन्होंने रथयात्रा निकालकर देश में हिंदू-उन्माद को बाबरी मस्जिद के गुम्बदों की ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया था। देश में जो सोचने वाले अब भी बचे हैं उनमें से कुछ ने याद किया कि रथयात्रा के प्रबंधक नरेन्द्र मोदी नाम के एक नौजवान थे। फिर लोगों को लगा कि चौथाई सदी हो गई, बाबरी विध्वंस का मुकदमा ही चल रहा है, उसका फैसला भी क्या मुजरिमों की जिंदगी में आएगा, या स्वर्गवासियों को सजा होगी? लोगों को वे मुख्यमंत्री और राज्यपाल याद आ रहे हैं जो बाबरी केस के कटघरे से सीधे शपथ लेने गए थे और अब फिर कटघरे में हैं। धरती की नाचीज अदालत का इंसाफ आए तब तक राम और अल्लाह का इंसाफ इन लोगों को बुला तो नहीं लेगा?

लेकिन देश की मंदिरों की घंटियों की तेज होती आवाजों के बीच सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक अधिक धार्मिक, अधिक धर्मान्ध और अधिक साम्प्रदायिक देश के रूप में हिंदुस्तान अधिक खुशहाल भी होगा? आज जब नारे हिंदुत्व के मील के पत्थर को खासा पीछे छोड़कर हिंदू राष्ट्र की ओर लपक चले हैं, तो दुनिया के सभ्य, सुखी, खुशहाल लोकतंत्रों की ओर भी देखना जरूरी है कि क्या वे खुशहाली की ओर धर्म के घोड़े पर सवार होकर पहुंचे हैं? 

दुनिया के खुशहाल देशों की फेहरिस्त में जो देश ऊपर हैं, वहां धर्म दम तोड़ रहा है। अधिकतर लोग गैरसाम्प्रदायिक और गैरनफरती हैं। धर्म का महत्व भी घटते चल रहा है और धर्म से परे जाते, नास्तिक होते लोग बढ़ते जा रहे हैं। हिंदुस्तान जैसे धर्म से लबालब, उफनते हुए, देश में जहां बेरोजगारी करोड़ों की गिनती में बढ़ रही है, वहीं सभ्य, विकसित और खुशहाल देशों में धर्म की दुकानें बंद हो रही हैं और चर्चों का बंद होकर वहां शराबखाने खुलना चल रहा है। उधर धर्म बेरोजगार हो रहा है, लोग खुशहाल हो रहे हैं, इधर धर्म खुशहाल हो रहा है, लोग बेरोजगार और बदहाल हो रहे हैं, लेकिन धर्म नाम की अफीम के नशे में उसके दर्द का अहसास नहीं हो रहा है। कभी किसी कमसमझ ने लिखा था कि भूखे भजन न होए गोपाला। अब आज के हिंदुस्तान में भोजनवंचित लोग भजनसंचित होकर बेतहाशा खुश हैं और भूखे पेट, नंगे पैर, हिंदू राष्ट्र की मंजिल की तरफ बढ़े चल रहे हैं। कार्ल मार्क्स ने धर्म को नाहक ही अफीम का दर्जा नहीं दिया था। आज वह इस देश में सिर चढ़कर बोल रहा है।

दुनिया के नास्तिक होते देशों और अमरीका के सबसे कम धार्मिक प्रदेशों को देखें तो उनमें एक बात एक सरीखी है, वे बेहतर हालत में हैं, और अधिक खुशहाल हैं। हिंदुस्तान का मॉडल यह समझाने के लिए आज एकदम सही है कि धर्म की धार को बढ़ाते चलने से उसके सामने एक काल्पनिक विधर्मी दुश्मन खड़ा कर देने से वह धर्म से बढ़कर धर्मोन्मादी हो जाता है, फिर साम्प्रदायिक हो जाता है, और फिर जानलेवा हो जाता है। वह अपने को मानने वालों के लिए भी जानलेवा हो जाता है।

आज अपने ही परिवार के किसी बच्चे को बेहतर इंसान बनाना हो तो उसे धर्म से दूर रखकर देखें, वह दुनिया का एक बेहतर नागरिक बनेगा, और बेहतर दुनिया बनाएगा।
-सुनील कुमार


Date : 10-Nov-2019

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हिन्दुस्तान जिस तरह और जिस हद तक शांत है, उससे कम से कम देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को मानो सांप सूंघ गया है। देश में बड़े बवाल की उम्मीद करने वाले लोगों की तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी शायद सोचा था कि दंगा-फसाद शुरू होगा, भड़काऊ बातें होंगी, और कैमरों को नजारे मिलेंगे। लेकिन हुआ कुछ नहीं। जिनसे तेजाब की उम्मीद थी, उन लोगों ने भी इस मुकदमे के खत्म होने पर उस पर गंगाजल चढ़ाया, दुआ की, और वहां से चल निकले। अब आज सुबह से कुछ टीवी चैनल रामनाम के कीर्तन को घंटों दिखा रहे हैं, तो कुछ और हैं जो दर्शकों से राम के नाम पर कुछ दे बाबा के अंदाज में अपील कर रहे हैं। फैसले के कुछ समय पहले से देश में टीवी समाचार चैनलों के रूख को लेकर सरकार, जनता, और अदालत तक जिस तरह की नाराजगी चल रही थी, उसके बाद ऐसा लगता है कि समझदारी को थोड़ी सी जगह मिली, और चैनलों को समझ आ गया कि पेट्रोल के कनस्तर स्टूडियो से भी परे कर लेना ही ठीक होगा। 

अब इससे एक बात समझ पड़ती है कि हिन्दुस्तानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने अपने 24 घंटों को भरने के लिए, और दर्शकों को बांधकर रखने के लिए जितना कारोबारी दबाव रहता है, उतनी खबरें नहीं रहती हैं। और अगर रहती भी हैं, तो उनको जुटाना बड़ा महंगा इसलिए पड़ेगा कि वे भड़काऊ खबरों की तरह, पानी की सतह पर तैरती जलकुंभी जैसे, आसानी से हासिल नहीं रहतीं। असल जिंदगी की असल खबरें न तो उतनी उत्तेजक रहतीं, न उतनी भड़काऊ रहतीं, और न ही उनके दम पर विज्ञापनों के मिनट बेचे जा सकते। असल जिंदगी के असल मुद्दे रूखे-सूखे होते हैं, और उनमें मादक-उत्तेजक, भड़काऊ-नफरती माल बिल्कुल भी नहीं रहता। इसलिए रूखे-सूखे कागज वाले अखबार तो आज के बाजार के बीच भी कम या अधिक हद तक असल मुद्दों को ढो रहे हैं, लेकिन इंसानी दिल-दिमाग की सबसे बुरे स्वाद वाली रगों को सहलाने का काम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही करता है, और अमूमन वही करता है। इसलिए कल जब देश भड़का नहीं, नफरत का लावा फैलना कहीं शुरू हुआ नहीं, तो आज टीवी चैनलों को कीर्तन का सहारा लेना पड़ा। वैसे नफरत के मुकाबले कीर्तन फिर भी बेहतर है क्योंकि संगीत के सुर-ताल पर हिलते हुए सिर कम से कम उतनी देर तो कोई हिंसा नहीं करते हैं। 

कुछ लोगों ने यह लिखा जरूर कि अगर कोई चैनल भड़काने का काम करें तो पहले उनका बहिष्कार किया जाए, और उसके बाद उनके खिलाफ शिकायत की जाए। आज बाजार को दुहने के लिए जिस तरह के गलाकाट मुकाबले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भड़काने पर जिंदा हैं, उसे समझकर लोगों को गैरजिम्मेदार का बहिष्कार करना चाहिए। आज भारत में टीवी चैनलों को छांटने की जो सुविधा है, उसके चलते लोगों को जिम्मेदार समाचार चैनलों को ही लेना चाहिए, और गैरजिम्मेदार चैनलों को हटा देना चाहिए। ऐसा ही अखबारों के साथ भी किया जाना चाहिए, लेकिन अखबार अपने मिजाज से इतने गैरजिम्मेदार अब तक हुए नहीं हैं, इसलिए वैसी नौबत अभी आई नहीं है। लेकिन हिन्दुस्तान के टीवी समाचार चैनलों में से अधिकतर गैरजिम्मेदारी में एक बेनाम और गुमनाम सोशल मीडिया का मुकाबला करते दिखते हैं, इसलिए उनके बारे में दर्शकों को तय करना चाहिए। देश में कुल मिलाकर मीडिया को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक में अलग-अलग बांटना चाहिए क्योंकि दोनों का स्तर अलग है, मिजाज अलग है, और दोनों की प्राथमिकताएं अलग हैं। इसी तरह सोशल मीडिया और ऑनलाईन मीडिया को भी अलग-अलग रखना चाहिए क्योंकि शुरू से प्रिंट मीडिया जिस तरह की पत्रकारिता करते आया है उससे इलेक्ट्रॉनिक या वेबमीडिया का कुछ भी लेना-देना नहीं है, और इनमें से हर तबके को अपनी-अपनी जरूरत और अपने-अपने मिजाज के मुताबिक अलग-अलग पहचान बनाना चाहिए। एक-दूसरे की साख को कम करने का काम नहीं करना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 09-Nov-2019

एक लंबे इंतजार के बाद पिछली की पिछली सदी से चले आ रहा अयोध्या का रामजन्म भूमि का विवाद आखिर निपटा, और सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने  सर्वसम्मति से यह फैसला दिया है कि इस जमीन को रामलला का माना जाए, और यहां पर एक मंदिर बनाने-चलाने के लिए केन्द्र सरकार एक ट्रस्ट बनाए। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के लिए अयोध्या में कहीं और पांच एकड़ अच्छी जमीन देने के लिए सरकार को कहा। साथ-साथ अदालत ने मस्जिद को गिराने को गलत कहा है और वहां पर रामलला की मूर्तियों को बलपूर्वक बिठाकर पूजा करने को भी गलत करार दिया है। लेकिन चूंकि बाबरी मस्जिद गिराने का मामला अलग से चल रहा है, और वह सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले में विचाराधीन भी नहीं था, इसलिए यहां पर जजों ने सिर्फ जमीन के मालिकाना हक को तय किया है। अदालत ने सुबूतों के आधार पर यह माना कि बाबरी मस्जिद के नीचे का ढांचा कोई इस्लामिक ढांचा नहीं था, इसलिए बाकी सुबूतों के आधार पर वह जमीन रामलला की मानी जाती है, और सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन कहीं और दी जाए। 

एक लंबा विवाद जिस पर सभी पक्षों को एक साथ संतुष्ट करना मुमकिन नहीं था, वह एक किस्म से यहां खत्म हुआ, और देश में कोई ऐसा माहौल नहीं दिख रहा है कि इसके खिलाफ कोई ऐसा आक्रामक आंदोलन शुरू हो जिससे अमन-चैन खत्म हो। मुस्लिमों का इस मामले में खड़ा हुआ एक पक्ष फैसले से संतुष्ट न होने के बावजूद इसका सम्मान करने की बात कह रहा है, और ऐसा लगता है कि दर्जन भर चुनावों का मुद्दा रह चुका यह मामला अब खत्म हो गया है। इस फैसले के खिलाफ किसी अपील की गुंजाइश है या नहीं, यह अभी हमारे सामने साफ नहीं है, लेकिन यह साफ है कि यह अब एक बड़ा राजनीतिक और चुनावी मुद्दा नहीं रह गया है। देश की बहुसंख्यक आबादी इस फैसले से संतुष्ट होगी, और अल्पसंख्यक आबादी अगर संतुष्ट नहीं भी होगी, तो भी आज के हिन्दुस्तान में उसके संघर्ष करने और लडऩे की अधिक गुंजाइश है नहीं। 

देश के हित में भी यही है कि मुगलों के आने के पहले से इस जमीन के हो रहे धार्मिक इस्तेमाल, और मुगलों के वक्त में इसके बदले गए धार्मिक इस्तेमाल को देखते हुए, आजाद हिन्दुस्तान में गिराई गई बाबरी मस्जिद और वहां रामलला की पूजा शुरू करने जैसे बहुत से मुद्दे ऐसे हैं जिनमें देश लंबे समय से उलझकर रह गया था, जिसे अपनी पसंद के किनारे पर पहुंचाने के लिए एक वक्त लालकृष्ण अडवानी ने पूरे देश को पहले रथयात्रा की आग में झोंक दिया था, और फिर खड़े रहकर बाबरी मस्जिद गिरवाई थी। ऐसी तमाम बातों को एक साथ रखकर देखें तो ऐसा लगता है कि देश को कम से कम जमीन के इस टुकड़े के मालिकाना हक को तय करके, विवाद के उतने हिस्से का निपटारा करके आगे बढऩा चाहिए। यह एक अलग बात है कि बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए जो मुकदमा चल रहा है, उसे भी इंसाफ के किनारे तक पहुंचाना चाहिए, और जिन लोगों ने देश भर में दंगों और साम्प्रदायिक हिंसा की यह वजह खड़ी की थी, उनको भी जल्द सजा मिलनी चाहिए, इसके पहले कि गुनहगारों को ईश्वर कही जाने वाली वह ताकत बुला ले। 

पहली नजर में यह फैसला सर्वसम्मति का होने की वजह से, और पांच जजों की बेंच होने की वजह से अंतिम फैसला भी लगता है, और किसी पुनर्विचार याचिका की अधिक गुंजाइश दिखती नहीं है। अभी जब हम यह बात लिख रहे हैं, उस वक्त फैसले की बातें एक-एक लाईन में आती जा रही हैं, और पूरे फैसले को पढ़कर यह नहीं लिखा जा रहा है, लेकिन इसकी मोटी-मोटी बातों से ऐसा लगता है कि यह सुबूत और हालात, दोनों को देखते हुए समझदारी का एक फैसला है, और सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के अहाते में ही इस फैसले का स्वागत किया है। अदालत ने आखिर में जाकर कुल दो ही दावेदारों के बीच मालिकाना हक का फैसला लिया है, किसी धार्मिक समुदाय को इसका हक देने के बजाय रामलला को ही एक व्यक्ति मानते हुए उन्हें मालिकाना हक दिया है, और सरकार को उनकी ओर से मंदिर ट्रस्ट बनाने की जिम्मेदारी दी है। दूसरी तरफ मस्जिद बनाने के लिए जमीन देने का जिम्मा सरकार को दिया है, और उसे बनाने का अधिकार सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही बिरादरियों से बाकी दावेदार भी जुटे हुए थे, लेकिन उन सबका दावा अदालत ने पहले ही खारिज किया, और फिर आखिर में इन दो पक्षों के बीच फैसला सुनाया। 
-सुनील कुमार


Date : 08-Nov-2019

जिन वजहों को बताकर तीन बरस पहले मोदी सरकार ने हिन्दुस्तानी जनता पर नोटबंदी थोपी थी, उनमें से एक भी वजह जायज साबित नहीं हुई। न एक धेले का कालाधन कम हुआ, न आतंक की घटनाएं घटीं, और न ही डिजिटल लेन-देन बढ़ा। वैसे भी जब कालेधन को घटाने के नाम पर हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए, और दो हजार के नोट शुरू किए गए, तो सरकार की सोच की खामी सिर चढ़कर दिखने लगी थी, और हमने कई बार इस बात पर लिखा भी था। अब वह गलती साबित भी हो रही है और सरकार एटीएम से दो हजार के नोट बंद कर रही है, उन्हें प्रचलन से कम कर रही है क्योंकि वे कालेधन के लिए हजार के पुराने नोटों के मुकाबले दुगुने आसान साबित हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और बातें भी नोटबंदी के बाद के इन तीन बरसों में हुई हैं जिन्होंने नोटबंदी के वक्त की सरकारी सोच को पूरी तरह नाकामयाब साबित किया है। 

आज जिस तरह एक-एक कर कई बैंक डूब रहे हैं, लोग अपनी ही रकम को अपने ही इलाज के लिए निकाल नहीं पा रहे हैं, उससे लोगों का बैंकों पर भरोसा घटा है, और लोग पहले के मुकाबले अधिक नगदी घर पर इसलिए रखने लगे हैं कि पता नहीं कब बैंक डूब जाए, पता नहीं कब कोई साइबर मुजरिम लोगों के खातों की रकम गायब कर दे, और पता नहीं कब बैंक और एटीएम रकम निकासी पर तरह-तरह की नई बंदिशें लाद दें। बिना दवा मरते हुए ऐसे लोग खबरों में दिख रहे हैं जिनके खातों में दसियों लाख रूपए जमा हैं, लेकिन बैंक की धोखाधड़ी-जालसाजी की वजह से रिजर्व बैंक ने लोगों के रकम निकालने पर रोक लगा दी है। यह भी समझ पड़ रहा है कि किसी बैंक के डूबने पर एक खातेदार को महज एक लाख रूपए मिलना है, और बाकी डूब जाना है। ऐसे में लोग घर पर नगदी रख रहे हैं, या कुछ दिन पहले तक सोना भी खरीद रहे थे। अब नई बंदिश सामने आते दिख रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी घरेलू सोने की सीमा तय करने वाले हैं, लोगों को उसके कागजात सहित सरकार के सामने घोषणा करनी पड़ेगी, और उसके पुराने बिल अगर नहीं होंगे तो उस पर भारी जुर्माना भी लगने की खबर है। 

अब जनता के सामने दिक्कत यह है कि वह जाए तो जाए कहां? बैंकों में रकम डूब जाने का खतरा है, ब्याज बहुत कम है, और रकम निकालने पर किसी भी दिन नई रोक लग जाने का तजुर्बा लोगों का है। जब एटीएम काम नहीं भी करते हैं, तब भी कुछ बार कोशिश करने पर एक दिन में कोशिश करने की सीमा खत्म हो जाती है, और स्क्रीन पर लिखा दिखने लगता है कि एक दिन में ट्रांजेक्शन की सीमा खत्म हो गई है। लोग खाते के लाखों रूपए में से दो हजार निकाल पाते हैं, और सीमा खत्म हो जाती है। यह सिलसिला जनता के भरोसे को तोड़ चुका है, और लोगों को लगता है कि सरकार और बैंकों के हजारों करोड़ खाने वाले लोग तो विदेशों में मस्ती कर रहे हैं, और मेहनत की कमाई बैंकों में रखने वालों की रकम डूब रही है, या उनकी अपनी जिंदगी बचाने के लिए भी काम नहीं आ रही है। कोई हैरानी नहीं है कि ऐसे हाल में यह देश जनता की खुशी के पैमाने पर दुनिया में पाकिस्तान के भी नीचे आ रहा है। अगर लोग अपनी मुसीबत के वक्त अपनी ही खून-पसीने की कमाई को छू नहीं सकते, तो कोई राष्ट्रवादी उन्माद ही उनका भरोसा बनाए रख सकता है। 

आज सुबह से हिन्दुस्तान के हर किस्म के मीडिया में बिना किसी अपवाद के नोटबंदी की सालगिरह पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह इसे एक निहायत ही अवांछित, नाजायज, और नाकामयाब हरकत बता रहा है। खुद केन्द्र सरकार अपने सबसे बड़े फैसले की तीसरी सालगिरह पर इसकी तारीफ में दो शब्द भी नहीं कह पा रही है, और केन्द्र सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी बहुत ही सुविधाजनक याददाश्त का इस्तेमाल करते हुए नोटबंदी को ठीक उसी तरह भुला दे रही हैं जिस तरह अच्छे दिनों के जुमले को भुला दिया गया था, विदेशों से कालाधन लाकर हर किसी को 15 लाख रूपए देने की बात को भुला दिया गया था, जिस तरह डॉलर और पेट्रोल के दाम 30-40 रूपए करने की बात को भुला दिया गया था। नोटबंदी की तीसरी बरसी तो चली जाएगी, लेकिन इसकी वजह से अर्थव्यवस्था की तबाही की भरपाई कभी नहीं होगी।
-सुनील कुमार


Date : 07-Nov-2019

आज जब देश भर में कांग्रेस की हालत को लेकर लतीफे और कार्टून बनना भी तकरीबन बंद हो गया है, क्योंकि वह चर्चा से ही बाहर हो गई है, तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर खबरों में बनाए रखने का एक काम किया है। लेकिन यह काम महज खबरों में बने रहने के लिए नहीं हैं, बल्कि पार्टी को सत्ता में लाने वाले धान के समर्थन मूल्य का मामला है जिसके लिए भूपेश केन्द्र सरकार से टकराव मोल लेने के लिए सैकड़ों गाडिय़ों के काफिले में दस-बीस हजार लोगों को लेकर दिल्ली जाने का ऐलान कर चुके हैं। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीतने के बाद छत्तीसगढ़ में अपने चुनावी वायदे के मुताबिक ढाई हजार रूपए के दाम से धान खरीदा था। बाजार की व्यवस्था के बीच यह एक बड़े घाटे का काम था, लेकिन नई-नई सरकार ने बड़ा कर्ज लेकर भी इसे पूरा किया। इसके साथ-साथ भूपेश सरकार ने अपने पहले कुछ दिनों में ही किसानी-कर्जमाफी का भी वायदा पूरा किया। इन दो फैसलों से राज्य के ग्रामीण इलाकों में सरकार को भारी वाहवाही मिली, यह एक अलग बात है कि लोकसभा चुनाव में मोदी की सुनामी का मुकाबला इस वाहवाही की मदद से भी नहीं हो पाया। दूसरी तरफ यह भी याद रखने की जरूरत है कि धान के समर्थन मूल्य और कर्जमाफी जैसे मुद्दों पर विधानसभा चुनाव के काफी पहले से छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा ने नरेन्द्र मोदी-अमित शाह से अपील की थी, लेकिन वहां से बड़ी साफ मनाही हो गई थी कि अर्थव्यवस्था इसकी इजाजत नहीं देती, और पार्टी चुनाव हार जाए तो हार जाए। ऐसे में कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र और वायदे पर छत्तीसगढ़ की जनता ने विश्वास किया, और कांग्रेस भवन का छत फाड़ते हुए सीटें बरसा दी थीं। 

अब आज जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ सड़कों पर न कोई मुद्दा है, न कोई माहौल है, और न ही देश में विपक्ष वजनदार रह गया है, तो ऐसे में भूपेश बघेल केन्द्र सरकार से धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए, और छत्तीसगढ़ से अधिक धान लेने के लिए केन्द्र सरकार के सामने प्रदर्शन करने जा रहे हैं। उन्होंने जिस तरह के दिल्ली कूच की घोषणा की है, वह अपने आपमें अभूतपूर्व है, और देश के किसी भी राज्य में कांग्रेस पार्टी के लिए अकल्पनीय भी है। भूपेश बघेल विधानसभा चुनाव के पहले से नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ जिस तरह के हमलावर तेवरों के साथ एक जनमोर्चा चला रहे हैं, वह कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों या किसी भी प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्षों के बीच भी कुछ अनोखी बात रही। इसलिए अब जब दिल्ली से सवा हजार किलोमीटर दूर बसे एक प्रदेश का मुख्यमंत्री इतना बड़ा कारवां लेकर मोदी के सामने जाने की घोषणा कर चुका है, तो यह प्रदेश के भीतर किसानों से वायदा निभाने के साथ-साथ, देश की राजनीति में किसानों के हमदर्द की तरह खड़े होने का काम भी है। लोगों को याद रखना होगा कि जब मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई थी, तो भाजपा ने किसानों के समर्थन मूल्य पर स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों को मानने का वायदा किया था। लेकिन सरकार बनाने के बाद भाजपा को यह समझ आया कि यह वायदा वह पूरा नहीं कर सकती। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान ही बंद कमरों की बैठकों में यह साफ कर दिया था कि भाजपा स्वामिनाथन कमेटी की सिफोरिशों के मुताबिक समर्थन मूल्य नहीं देगी क्योंकि उससे देश का दीवाला निकल जाएगा। अब ऐसे हाल में भूपेश बघेल न सिर्फ छत्तीसगढ़ में पिछले बरस से अधिक धान खरीदी की घोषणा कर चुके हैं, बल्कि 25 सौ रूपए का दाम देने के लिए उन्होंने कर्ज लेने की तैयारी भी की है। अब वे केन्द्र सरकार से मांग करने जा रहे हैं कि वह छत्तीसगढ़ से अधिक धान ले ताकि राज्य में क्षमता से अधिक धान जमा न हो जाए। 

भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के किसानों से किए गए अपने वायदे को तो खुद पूरा कर रहे हैं, लेकिन आगे के इंतजाम के लिए वे दिल्ली जाकर एक मोर्चा खोल रहे हैं। इससे छत्तीसगढ़ के किसानों से परे भी एक बात होने जा रही है, कि फसलों का समर्थन मूल्य एक बार फिर चर्चा में आएगा, देश भर के किसानों के सामने छत्तीसगढ़ की मिसाल खड़ी रहेगी जो कि कांग्रेस पार्टी को बाकी प्रदेशों से परे की एक अलग साख दिलवाएगी। इसके साथ-साथ जब एक राज्य केन्द्र सरकार से अधिक अनाज लेने की मांग कर रहा है तो यह बात भी बहस में आएगी कि अगर देश में अनाज की इतनी पैदावार है जिसे रखने की दिक्कत है, तो फिर यह देश भूख और कुपोषण की लिस्ट में इतना ऊपर क्यों है? यह बात भी चर्चा में आएगी कि क्या अधिक पैदावार को लोगों के बीच, खासकर सबसे गरीब और कुपोषण के शिकार लोगों के बीच बांट देना कोई बुरी बात रहेगी? आज तो हालत यह है कि देश में सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा है लेकिन लोगों को बांटा नहीं जा रहा है। इस तस्वीर को कैसे बदला जा सकता है, उस पर भी देश को सोचना चाहिए, और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के इस दिल्ली-कूच से देश की सरकारें, देश की पार्टियां, अर्थशास्त्री इस बारे में सोचने के लिए मजबूर होंगे। कुल मिलाकर अपने वायदे को पूरा करने के साथ-साथ, उससे आगे बढऩे के साथ-साथ भूपेश बघेल मोदी-शाह के सामने एक चुनौती भी खड़ी कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की अपनी ही भाजपा की बात तो इन्होंने अनसुनी कर दी थी, लेकिन अब एक सार्वजनिक विपक्षी चुनौती को उसी तरह अनसुना करना एक राजनीतिक नुकसान भी हो सकता है। छत्तीसगढ़ का बढ़ा हुआ समर्थन मूल्य भी स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों से बहुत कम है, और उस तरफ आगे बढऩे के लिए जिस बहस की जरूरत है, अब कम से कम वह तो दिल्ली-कूच से शुरू होगी।
-सुनील कुमार


Date : 06-Nov-2019

मद्रास हाईकोर्ट ने अभी मेडिकल दाखिला इम्तिहान के लिए होने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा, नीट, को लेकर यह फिक्र जताई है कि नतीजे बताते हैं कि तकरीबन उन्हीं लोगों को इसमें कामयाबी मिल पाती है जो कि निजी कोचिंग सेंटरों को मोटी फीस देकर दाखिला इम्तिहान की तैयारी करते हैं। अदालत ने तमिलनाडू के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले को लेकर दायर की गई एक याचिका की सुनवाई करते हुए यह तंज भी कसा कि जब केन्द्र सरकार पिछली सरकार की लागू की हुई लगभग हर योजना को पलट रही है तो इस नीट को ही क्यों छोड़ दिया गया है? सरकारी वकील से अदालत ने सवाल पूछा कि गरीब बच्चे किस तरह ऐसी महंगी कोचिंग का खर्च उठा सकते हैं? अदालत ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों के दरवाजों कभी भी गरीबों के लिए नहीं खुले रहते, और जब नीट को शुरू किया गया था तो दावा किया गया था कि इससे पैसों से खरीदी जाने वाली मेडिकल सीटों का धंधा खत्म होगा। लेकिन अब यह खर्च कोचिंग सेंटरों पर करके सीटें हासिल की जा रही हैं। अदालत ने केन्द्र सरकार द्वारा जमा की गई जानकारी को देखते हुए ये बातें कही हैं जिनके मुताबिक तमिलनाडू में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पहुंचने वाले तीन हजार से अधिक छात्रों में से कुल 48 ऐसे थे जो कोचिंग सेंटरों में नहीं गए थे। इसी तरह निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाने वाले करीब 16 सौ छात्रों में से कुल 52 ऐसे थे जिन्होंने कोचिंग नहीं ली थी। 

ये आंकड़़े एक ऐसी हकीकत को उजागर करते हैं जिसे गरीबों के वोटों और अमीरों के नोटों से चुनकर बनने वाली सरकारों को देखना चाहिए था, लेकिन अफसोस यह है कि हाईकोर्ट के जजों को यह बात दिख रही है, केन्द्र सरकार को नहीं दिख रही कि गरीबों की अब ऊंची पढ़ाई में जगह तकरीबन खत्म हो चुकी है। इस कड़वी सामाजिक हकीकत को बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा रहना चाहिए था, लेकिन दिक्कत यह है कि वामपंथियों को छोड़कर बाकी किसी भी पार्टी के सांसद संसद पहुंचने तक इतने नोट देख चुके होते हैं कि वे गरीबों की तकलीफों से ऊपर उठ जाते हैं। इसके बाद संसद में सवाल पूछने के लिए जो कमाई होती है, वह संसद के रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज है, और उसके स्टिंग ऑपरेशन देश की जनता सुन चुकी है। इनमें से कोई भी सांसद जेल नहीं गए, और संसद के विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए तमाम लोग बाहर हैं। अब ऐसे सांसदों की ऐसी संसद, ऐसे विधायकों की विधानसभाएं, और राजनीतिक दान के लिए लागू की गई पूरी तरह दोनंबरी सी बॉंड योजना से जिस तरह पार्टियों को सैकड़ों करोड़ मिल रहे हैं, जिस तरह सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त पर सैकड़ों करोड़ खर्च की चर्चा है, ऐसी राजनीतिक संस्कृति के बीच यह सोचना भी ज्यादती होगी कि कोई संपन्न पार्टी, और उसकी सरकार गरीब बच्चों के कॉलेज दाखिले में समानता के मौके के बारे में सोचेंगी भी। 

यह देश गरीबों की लाशों पर खड़ी होने वाली व्यवस्था का देश हो गया है। गरीब की जगह बुनियाद के पत्थरों की जगह पर है, और इन पत्थरों को कभी रौशनी देखना नसीब नहीं होता। जो आंकड़े सामने हैं वे बताते हैं कि देश किसी भी कोने से आजाद नहीं हैं, और नागरिकों के बीच समान अवसर की बात फिजूल है। नौकरी के लिए हो या ऊंची पढ़ाई में दाखिले के लिए, सरकारों ने ऐसे इम्तिहान गढ़ रखे हैं कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर लोग और उनका संपन्न तबका ही इन इम्तिहानों की तैयारी कर सके। मीडिया कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से पटा हुआ है, और ऐसा मीडिया इस बात को खुलकर सामने इसलिए भी नहीं रख सकता कि यह आत्मघाती काम होगा, और अपने ही पेट पर लात मारने सरीखा होगा। कुदरत को ऐसी दिक्कत का अंदाजा था, इसलिए उसने इंसानी बदन में लात को इस तरह डिजाइन किया है कि कितना भी घुमाकर उसे अपने पेट पर नहीं मारा जा सकता। इसलिए देश का संपन्न और मलाईदार तबका, सत्तारूढ़ तबका, अपने तबके के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे इम्तिहान बनाता है जिनको पार पाना सिर्फ उसी तबके के बस की बात हो। जिस तरह दो-चार फीसदी बच्चे बिना कोचिंग के मेडिकल कॉलेज पहुंच पा रहे हैं, उसे भी उनकी प्रतिभा या कोई संयोग मानना बेहतर होगा, ऐसा सोचने का हमारे पास कोई कारण नहीं है कि सत्ता ने दो-चार फीसदी की गुंजाइश भी गरीबों के लिए छोड़ी होगी। 
इस देश के लिए यह सबसे शर्मिंदगी की बात है कि सामाजिक न्याय के मुद्दे न सरकार उठाती है, न संसद, इन्हें बीते बरसों में अक्सर अदालतों ने ही उठाया है जिन पर चुनाव लड़कर जीतकर आने का कोई दबाव भी नहीं रहता। यह सिलसिला इस देश में ताकतवर तबके को और अधिक ताकतवर बनाने की एक ऐसी साजिश है जिसे करने वाले लोग आज भी अंग्रेजों की शिक्षा नीति को इतनी गालियां देते हैं कि आज की शिक्षा नीति की तरफ किसी का ध्यान न जाए। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को रावण के पुतले की तरह खड़ा रखा जाता है, ताकि उसकी ओट में आज 21वीं सदी में भी गरीबों को उच्च शिक्षा से दूर रखा जाए, और संपन्न तबका एक कुलीन तबके की तरह एकाधिकार बनाए रखे। 
-सुनील कुमार


Date : 05-Nov-2019

दिल्ली में आज एक अभूतपूर्व प्रदर्शन हो रहा है जिसमें पुलिस मुख्यालय पर वर्दी में पुलिसकर्मी अपने लिखे हुए पोस्टरों सहित प्रदर्शन कर रहे हैं और पिछले दो-चार दिनों में वकीलों के हमलों का विरोध कर रहे हैं। यह नजारा हैरान भी करता है, और परेशान भी करता है। जब आमतौर पर अपनी किसी हिंसा की तस्वीर या वीडियो के साथ पुलिस लोगों के सामने अपनी एक हिंसक छवि के लिए जानी जाती है, उसमें जब वकीलों ने एक भीड़ की शक्ल में पुलिस पर हमले किए, एक से अधिक बार, एक से अधिक अदालतों में, और सड़कों पर पुलिस को पीटा, तो यह नजारा आम तस्वीर से बिल्कुल उल्टा था। दिल्ली पुलिस ऐसी हिंसा का विरोध करते खड़ी थी और पुलिस के बड़े अफसर उन्हें समझाते हुए माईक पर बोल रहे थे। और यह एक ऐसा मामला है जिसकी तोहमत दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर नहीं थोपी जा सकती क्योंकि दिल्ली की पुलिस केंद्र सरकार की मातहत है, और वकील भी किसी सरकार के तहत काम नहीं करते हैं। ऐस मेें यह टकराव एक फिक्र खड़ी करता है, दिल्ली के बाहर भी।

इस मामले पर लिखते हुए तेलंगाना की कल की एक घटना को भी देखने की जरूरत है जिसमें एक महिला तहसीलदार को दिन-दहाड़े उसके दफ्तर में जिंदा जलाकर मार डाला गया है। लोगों को याद होगा कि हाल ही के महीनों में छत्तीसगढ़ में जगह-जगह लोगों ने पुलिस को पीटा है, लेकिन वह बिखरी हुई छोटी-छोटी वारदातों में हुआ इसलिए पुलिस की ओर से ऐसा कोई संगठित विरोध सामने नहीं है जो कि दिल्ली में आज दिख रहा है। लेकिन हर कुछ हफ्तों में देश के किसी सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की पिटाई होती है, और हड़ताल चलती है। इन तमाम बातों का आपस में वैसे तो कोई रिश्ता नहीं दिखता, लेकिन इनके बीच एक रिश्ता है जरूर और उस पर सोचने की जरूरत है।

यह याद रखना चाहिए कि एक वक्त जब देश में जगह-जगह मॉबलिंचिंग होती है, और हमें मजबूर होकर उसके लिए भीड़त्या जैसा शब्द गढऩा पड़ता है, तो वह किसी एक इंसान की मौत नहीं होती, देश के लोगों में तथाकथित इंसानियत की मौत भी होती है, और फिर ऐसे समाज में दूसरी जगहों पर भी यह मौत असर डालती है। पुलिस को इस तरह पीटते हुए वकीलों के जहन में वे तस्वीरें और वे वीडियो जरूर रहे होंगे जिसमें कहीं पर, खासकर उत्तरप्रदेश में, पुलिस बेकसूरों को बुरी तरह पीट रही है, या किसी भी जगह हिंसक भीड़ के बिना दिमाग वाले बहुत से सिरों के चलते किसी बेकसूर को पीटा जा रहा है। जब पीटना, या पीट-पीटकर मार डालना देश की संस्कृति होने लगती है, और बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों के बड़बोले बड़े-बड़े मुंह भी ऐसी भीड़त्याओं पर जरा सा भी नहीं खुलते, तो वह इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत में देश में स्वीकार्य संस्कृति बन जाती है, बन चुकी है। इसलिए काले कोटों वाली भीड़ खाकी वर्दी पर ऐसा संगठित हमला करती है, और हिंसा पर पुलिस का एकाधिकार खत्म करने की एक नुमाइश भी करती है। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि यह आज देश की राजधानी में, केंद्रीय गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, और सुप्रीम कोर्ट के ठिकानों के बीच चल रहा है, और वर्दीधारी पुलिस वाले ऐसे प्रदर्शन को मजबूर हुए हैं। यह मामला किसी न्यायिक जांच से निपट भी सकता है, लेकिन यह तो तय है कि भीड़ की हिंसा किसी जांच रपट से सुलझेगी नहीं। आज देश में कदम-कदम पर भीड़ कानून अपने हाथ में ले रही है, और फिर पैरोंतले रौंद भी रही है। ऐसे में जरूरत देश के पूरे माहौल को इंसाफ की तरफ मोडऩे की है। ऐसा नहीं हो सकता कि देश में जगह-जगह गाय के नाम पर हिंसक भीड़त्याओं को अनदेखा किया जाए, और महज वकीलों की, या पुलिस की हिंसा पर काबू पाया जा सके। आज देश का माहौल लोकतंत्र के खिलाफ है, इंसाफ के खिलाफ है, और तथाकथित इंसानियत के भी खिलाफ है। एक जगह की अराजकता दूसरी जगह अराजकता को हवा देती है, और देश में हिंसा को कतरे-कतरे में काबू नहीं किया जा सकता।
-सुनील कुमार