संपादकीय

Date : 24-Sep-2019

केंद्र सरकार में चल रहे एक विचार को लेकर देश भर के केंद्रीय कर्मचारियों के बीच खलबली मची हुई है कि क्या उन्हें साठ बरस के पहले भी रिटायर कर दिया जाएगा? सरकारी अमले के एक बड़े तबके  की यह सोच रहती है कि हिंदुस्तान में बेहतर सेहत के चलते, और औसत उम्र बढ़ जाने से लोग रिटायरमेंट के मौजूदा साठ बरस तक भी बूढ़े नहीं होते हैं, और उनमें काम करने का बहुत दमखम बचा होता है, ऐसे में वे रिटायर होकर बाकी जिंदगी क्या करें? इसलिए लोग नौकरी को लंबा करना चाहते हैं, बड़े-बड़े अफसर जिन्हें मोटी पेंशन भी मिलती है, वे भी रिटायर होने के बाद सरकार से संविदा नियुक्ति चाहते हैं, या तरह-तरह के आयोगों में कोई काम चाहते हैं ताकि ताकत का सरकारी जलवा बना रहे और कमाई भी होती रहे।

दूसरी तरफ लोगों का यह सोचना है कि जब सरकार की मोटी तनख्वाह के बाद रिटायर होने पर अच्छी खासी पेंशन भी मिलती है, और अगर एक दुर्लभ नस्ल की ईमानदारी भी पूरी जिंदगी बनी रहे, तो भी जिंदगी आसानी से गुजर जाने का पूरा इंतजाम रहता है, इसलिए लोगों को सरकारी काम से परे भी कुछ सोचना चाहिए। दुनिया में जो कामयाब देश है, उनमें जो मामूली भी कामयाब लोग हैं, वे कामकाजी जिंदगी के बीच भी अपना काम बदल लेते हैं, अपने शौक और मर्जी का काम करने लगते हैं, आधी कमाई पर भी पूरी तसल्ली पाकर खुश रहते हैं, और अपने जिंदगी के मकसद को पूरा करते हैं, एक मुर्दा नौकरी को नहीं। 

इस बारे में आज लिखना इसलिए सूझ रहा है कि कल देश के एक गांधीवादी समाजशास्त्री प्रोफेसर प्रभुदत्त खेड़ा का छत्तीसगढ़ में निधन हुआ जहां पर वे जंगलों के बीच आदिवासी समुदायों में काम करते हुए उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में जुटे हुए थे। वे चालीस बरस पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से रिटायर होने वाले थे, और उनके पास सहूलियतों से भरी दिल्ली में, या देश के किसी और शहर में बाकी जिंदगी चैन से गुजारने का पूरा मौका था। लेकिन उन्होंने अपने देखे हुए छत्तीसगढ़ के अचानकमार के जंगलों में बैगा आदिवासियों के बीच ही रहना तय किया, और वहीं से अपने साथ आए छात्रों के साथ छुट्टी की अर्जी भेज दी, अपनी पेंशन के पैसों से स्कूल बनवाया, और चार दशक से इन्हीं लोगों के बीच सेवा करते हुए कल आखिरी सांस ली।

लोग घरबार और अपने दायरे को पूरी तरह छोड़कर किसी जंगल में जाकर वहां बसे समुदाय की सेवा चाहे न कर पाएं, लेकिन अपने आसपास के दायरे में वे लोगों के बीच अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को पूरा करने का काम तो कर ही सकते हैं। वे इर्दगिर्द के जरूरतमंद बच्चों को पढ़ा सकते हैं, लोगों को सफाई के लिए पे्ररित कर सकते हैं, कोई लाइब्रेरी चला सकते हैं, कोई हुनर दूसरों को सिखा सकते हैं, ऐसे सौ किस्म के योगदान वे लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए दे सकते हैं, बजाय सरकारी नौकरी से चिपके रहने के। और आबादी का एक छोटा हिस्सा ही सरकारी नौकरी में रहता है, बाकी लोग तो निजी काम करते हैं और ऐसे निजी नौकरी करते हैं जिसमें कभी भी निकाला जा सकता है। इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी का जुगाड़-पानी पा लेने के बाद अपना बाकी वक्त, अपनी बाकी क्षमता, दूसरों की भलों के लिए लगाना चाहिए। आज दुनिया में प्रोफेसर खेड़ा जैसी बहुत सी मिसालें हैं, बहुत सी मिसालें तो बड़ी कम उम्र की भी हैं, स्वीडन की सोलह बरस की एक छात्रा ने दुनिया में मौसम के बदलाव के खतरे पर एक आंदोलन ही खड़ा कर दिया है, और संयुक्त राष्ट्र में बीती रात उसने दुनिया के तमाम शासन प्रमुखों को झकझोर कर रख दिया है। इसलिए रिटायरमेंट को डरावना मानने वाले, और उसकी आशंका से ही दहशत में आ जाने वाले लोगों को अपनी जरूरतों से परे सामाजिक जरूरतों को भी देखना चाहिए और अपने सरोकार तय करने चाहिए, रिटायरमेंट और बुढ़ापा गुजारने के लिए उससे बेहतर और कोई जरिया नहीं हो सकता।
-सुनील कुमार


Date : 23-Sep-2019

बीती हिन्दुस्तानी रात अमरीका के टैक्सास प्रांत की ह्यूस्टन नाम की राजधानी में नरेन्द्र मोदी के नाम लिखी गई। हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए, उनको सुनने के लिए कई घंटों के इस कार्यक्रम के लिए वहां के एक सबसे बड़े स्टेडियम में 50 हजार भारतवंशी पूरे अमरीका से जुटे थे, और यह बीते बरसों में अमरीकी जमीन पर मोदी का तीसरा या चौथा ऐसा जलसा था जिसने हिन्दुस्तान में खबरों का एक सैलाब ला दिया था। इस बार एक दूसरी बड़ी बात यह थी कि चुनाव के करीब पहुंच चुके अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भी मोदी के इस कार्यक्रम में शामिल थे, और इसकी जाहिर तौर पर एक वजह भी थी कि भारतवंशी अमरीकी वहां पर अच्छे खाते-कमाते लोग हैं, और उनका समर्थन अमरीकी राजनीतिक दलों के लिए नोट और वोट दोनों का रहता है। देश भर से जुटे हुए भारतवंशियों में से भी अधिक कामयाब 50 हजार लोगों के बीच अपने आपको मोदी और हिन्दुस्तान के दोस्त की तरह पेश करना ट्रंप के चुनाव अभियान का एक हिस्सा था, और इसके लिए मोदी समर्थकों का तैयार किया हुआ इतना बड़ा कार्यक्रम भला किसे नहीं लुभाता? इसलिए ट्रंप वहां पूरे जोश के साथ थे, और हिन्दुस्तानियों के लिए, अमरीका में बसे भारतवंशियों के लिए यह एक बड़ा मौका था। इस पूरे आयोजन को इस तथ्य के साथ भी देखना चाहिए कि अपनी जमीन से दूर गए लोग, बाहर दूसरी संस्कृति और सभ्यता में बसे हुए लोग अपनी जमीन, अपने देश, अपने धर्म, और अपनी संस्कृति से जुडऩे के ऐसे आयोजनों को चूकते नहीं है, और ऐसा भारतवंशी समुदाय कई दिनों से मोदी के लिए इस कार्यक्रम, हाऊडी मोदी, की तैयारी कर रहा था। इस बात को इस हिसाब से भी समझना चाहिए कि ट्रंप अमरीका में बाहर से आकर बसे हुए, और काम कर रहे लोगों को बाहर निकालने पर आमादा हैं, और इनमें लाखों हिन्दुस्तानी प्रभावित होने वाले हैं। इसलिए भी ट्रंप और मोदी को एक साथ जुटाकर वहां पर भारतवंशियों की ताकत और उनकी मेजबानी दिखाकर ट्रंप को प्रभावित करने का यह एक अच्छा बड़ा मौका था, और अगर मोदी और भारतीय समुदाय के मिलेजुले असर से ट्रंप का रूख बदलता है, और भारतीयों के वहां पर काम करने के मौके घटते नहीं हैं, तो यह भारत के लिए भी एक अच्छी बात होगी, और लोगों ने इस मौके का ऐसा इस्तेमाल किया तो है। 

यह भी समझने की जरूरत है कि मोदी का यह कार्यक्रम ऐसे मौके पर हुआ है जब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों की घोषणा होनी तय थी, और पूरे देश के उपचुनावों की भी साथ-साथ घोषणा होनी थी। भारत में होने वाले चुनावों के मौके पर अगर अमरीका जैसे कारोबारी-कामयाबी वाले देश में मोदी का ऐसा बड़ा जलसा होता है, तो उसका हिन्दुस्तानी चुनावी-इस्तेमाल तो होगा ही, और इसमें गलत भी क्या है? दुनिया के किसी भी हिस्से में बसे हुए हिन्दुस्तानियों के साथ एक ऐसा अनोखा तालमेल बिठाना, उसके लिए बड़े-बड़े दर्शनीय और उल्लेखनीय जलसे करना, मोदी की एक मौलिक सोच रही, और मोदी के पहले के बहुत से कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों और नेताओं के सामने भी यह गुंजाइश तो थी ही, जिसका इस्तेमाल उन्होंने नहीं किया। इसलिए मोदी को चाहे एक कामयाब इवेंट मैनेजर कहा जाए, या सफल जनसंपर्क विशेषज्ञ कहा जाए, मोदी भारतवंशियों की एक सामूहिक ताकत खड़ी करके उसे अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की सूझबूझ तो रखते हैं, और लोकतंत्र में यह एक खूबी ही है, खामी नहीं। मोदी ने हिन्दुस्तान से बाहर ऐसा कार्यक्रम करवाकर, या उसमें शामिल होकर देश के भीतर अपने समर्थकों में एक लहर तो पैदा की ही है, और लोकतंत्र में यह एक छोटी चुनावी-कामयाबी नहीं होती, यह जनधारणा की एक मामूली सफलता नहीं होती। 

लेकिन अभी कुछ बातें सामने आना बाकी है जिनकी सुगबुगाहट शुरू हुई है। अभी यह देखना बाकी है कि हफ्ते भर के अमरीकी प्रवास में और ट्रंप के इस अघोषित चुनाव प्रचार में एक से अधिक आयोजन में शामिल होकर मोदी ट्रंप से उसके बदले क्या हासिल करते हैं? क्या पाकिस्तानी मोर्चे पर अमरीका भारत के अधिक करीब आएगा? क्या अमरीका में बसे और काम कर रहे भारतवंशियों का नुकसान होना रूकेगा? क्या भारतीयों के अमरीका में काम करने की संभावना बढ़ेगी? आखिर ट्रंप का चुनाव प्रचार करने के एवज में मोदी ट्रंप से क्या हासिल करने जा रहे हैं? मोदी के पिछले बहुत से विदेश प्रवास और दुनिया भर के नेताओं के साथ उनकी गलबहियां हिन्दुस्तान के ठोस फायदे की शक्ल में बदलते नहीं दिखी हैं, बल्कि सुगबुगाहट यह है कि उन देशों से ऐसे सार्वजनिक महत्व-प्रदर्शन के एवज में वहां के सरकार-कारोबार को भारत में कई किस्म की रियायतें देकर ऐसा महत्व पाया है। इसलिए मोदी का अमरीका में यह एक हफ्ता सामने खड़े विधानसभा चुनावों और उपचुनावों के पहले तो अंतहीन प्रचार पाएगा, लेकिन उसका ठोस हासिल बाद में जाकर पता लगेगा। 

जो ही हो, हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री अगर दुनिया भर के देशों में बसे भारतवंशियों के साथ अगर एक अनोखा तादात्म्य स्थापित कर रहे हैं, तो यह मोदी के बाद के लोगों के लिए भी एक साबित-संभावना की तरह बनी रहने वाली बात रहेगी। अमरीका के 44 लाख कामयाब हिन्दुस्तानियों में से अधिकतर इस हालत में रहते हैं कि वे उस देश के किसी भी कोने से ह्यूस्टन तक आने-जाने की टिकट ले सकें, और वहां एक दिन ठहर सकें, इस आयोजन में शामिल होने का भुगतान कर सकें। अकेले टैक्सास राज्य में ही लाखों भारतवंशी रहते हैं। इसलिए इसकी कामयाबी को वहां बसे हुए हिन्दुस्तानियों की मौजूदा कामयाबी के अनुपात में ही देखना ठीक होगा, और लोकतंत्र में प्रचार और जनसंपर्क, जनधारणा प्रबंधन और जनसमर्थन की तकनीकों को मोदी से काफी कुछ सीखने मिल रहा है, और उनके इस योगदान को अनदेखा नहीं करना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 22-Sep-2019

बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में अभी एक केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के साथ वहां के छात्रों की एक झड़प हुई। भाजपा के इस केन्द्रीय मंत्री का विरोध इस विश्वविद्यालय के वामपंथी, या भाजपा-विरोधी तृणमूल समर्थक छात्र कर रहे थे, और इस दौरान धक्का-मुक्की, खींचतान की बहुत सी तस्वीरें सामने आई हैं, बहुत से वीडियो सामने आए हैं, और विश्वविद्यालय परिसर में इस तनाव के बाद वहां के राज्यपाल जगदीप धनकर खुद अतिरिक्त पुलिस लेकर विश्वविद्यालय गए, और वहां से केन्द्रीय मंत्री को साथ लेकर लौटे। इस घटना की रिपोर्ट मीडिया में सभी जगह आई और कोलकाता के एक प्रमुख अखबार द टेलीग्राफ में छपी खबर से नाराज केन्द्रीय मंत्री ने अखबार के संपादक को फोन किया और उसकी रिपोर्ट पर माफी मांगने को कहा। टेलीग्राफ ने बाद में छपी एक खबर के मुताबिक, संपादक के यह कहने पर कि अखबार ने कुछ भी गलत नहीं छापा है, बाबुल सुप्रियो गाली-गलौज पर उतर आए, और उन्होंने गंदी जुबान का इस्तेमाल किया जिसके बारे में टेलीग्राफ ने अपनी खबर में लिखा भी है। इसके बाद बाबुल सुप्रियो ने ट्वीट करके लिखा कि टेलीग्राफ के संपादक ने उन्हें गंदी गालियां दीं, और टेलीफोन पर इस बातचीत की उनके पास रिकॉर्डिंग मौजूद है। इस पर अखबार के संपादक ने उन्हें चुनौती दी है कि वे इस टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग जारी करें, और कार्रवाई करें। 

इस एक मामले की हकीकत की तह में जाना हमारे लिए अभी यहां मुमकिन नहीं है, और ये दोनों पक्ष एक-दूसरे पर अपने पास मौजूद सुबूतों को लेकर कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन हम एक दूसरी बात पर आज यहां लिखना चाहते हैं कि किसी बातचीत या टेलीफोन कॉल को लेकर जब दो पक्ष एक-दूसरे के ठीक खिलाफ बयान दे रहे हों, तो ऐसे में सच तक पहुंचने के लिए क्या किया जाना चाहिए? क्या आज हर मोबाइल फोन पर मौजूद रिकॉर्डिंग की सहूलियत का इस्तेमाल करते हुए लोगों को अपने फोन को लगातार रिकॉर्डिंग पर रखना चाहिए ताकि किसी विवाद की नौबत आने पर सच सामने रखा जा सके? या ऐसा करना गैरकानूनी या अनैतिक होगा? सवाल यह भी उठता है कि एक पेशेवर अखबारनवीस क्या बिना बताए ऐसी रिकॉर्डिंग करे जो कि बाद में सुबूत के काम तो आए लेकिन जो विश्वास तोडऩे वाली भी कहलाए? अगर भारतीय टेलीग्राफ एक्ट ऐसी रिकॉर्डिंग को गलत न भी मानता हो, तो भी क्या लोग एक-दूसरे को बताए बिना बातचीत इस तरह रिकॉर्ड करें? और अगर रिकॉर्ड न करें तो फिर तोहमतों के आने पर अपना बचाव कैसे करें? 

इस बात का एक दूसरा पहलू भी है। बीच-बीच में कई प्रदेशों से ऐसी रिकॉर्डिंग सामने आती हैं जिनमें कोई नेता किसी अफसर को धमका रहे हैं, या कोई अफसर किसी पत्रकार को धमका रहे हैं, या कोई पत्रकार ब्लैकमेलिंग के अंदाज में किसी और से वसूली या उगाही कर रहे हैं। ऐसे मामलों में आवाज की रिकॉर्डिंग एक पुख्ता सुबूत होती है, और अब तक ऐसा कोई जुर्म दर्ज हुआ नहीं है कि अपने फोन से ऐसी रिकॉर्डिंग करना कोई जुर्म है। ऐसे में अगर कोई सत्तारूढ़ मंत्री या नेता, या कोई बड़े अफसर, अपने मातहत को फोन पर कोई जायज या नाजायज निर्देश देते हैं, तो क्या वह मातहत आगे अपने बचाव के लिए उसे रिकॉर्ड करके रख सकते हैं? या रूबरू भी सरकारी काम को लेकर ऐसे निर्देश दिए जाते हैं, तो क्या उसकी रिकॉर्डिंग करने का हक सरकारी अमले को है? अभी तक ऐसा भी कोई विवाद अदालत तक पहुंचा नहीं है जिसमें सरकारी कामकाज की बातचीत की ऐसी रिकॉर्डिंग को नाजायज कहा गया हो, इसलिए यह मानना चाहिए कि यह गैरकानूनी काम नहीं है।  अब जो गैरकानूनी नहीं है, उसे सरकारी कामकाज में क्या अनिवार्य रूप से सही मान लिया जाएगा, या फिर सरकारी सेवा नियमों की कुछ बहुत धुंधली शर्तों की आड़ लेकर ऐसा करने वाले अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्रवाई की जाएगी? 

बात शुरू तो हुई थी एक केन्द्रीय मंत्री और संपादक के बीच की बातचीत को लेकर, लेकिन किसी भी किस्म की बातचीत या फोन कॉल की रिकॉर्डिंग को लेकर नैतिकता के, पेशे के, और कानून के जो सवाल सामने हैं, उनके बारे में सोचना चाहिए। किसी फोन कॉल पर बातचीत के बीच जब धमकी मिलती है, या कोई गलत बात सुनने मिलती है, उस वक्त तो रिकॉर्डिंग शुरू नहीं की जा सकती। किसी कॉल की रिकॉर्डिंग पहले से ही शुरू हो सकती है, और अगर हर कोई ऐसा करने लगे तो उससे क्या अच्छा होगा, और क्या बुरा? एक पल को तो यह लगता है कि अगर लोगों को पता हो कि उनकी कॉल दूसरे सिरे पर रिकॉर्ड हो रही है, तो वे कई किस्म की गैरकानूनी या नाजायज बातें बोलने से बच ही जाएंगे। इसी तरह रूबरू बातचीत को लेकर भी अगर यह समझबूझ या तालमेल पहले से रहे कि कोई भी पक्ष बातचीत को रिकॉर्ड कर रहे होंगे, तो भी गलत बात और गलत काम घट जाएंगे। इन बातों से जुड़े हुए और पहलुओं के बारे में सोचना चाहिए कि इससे काम के रिश्तों और निजी रिश्तों पर किस तरह का फर्क पड़ेगा। 
-सुनील कुमार


Date : 21-Sep-2019

योरप का जो देश स्वीडन सबसे साफ देशों में से एक माना जाता है, जहां पर लोगों के खुश रहने की बहुत सी वजहें रहती हैं, लोग बहुत संपन्न भी हैं, देश को विकसित माना जाता है, वहां पर एक स्कूली छात्रा ने एक इतिहास रच दिया है। उसे गांधी की तरह रंगभेद का शिकार होकर दक्षिण अफ्रीका की ट्रेन में लात-जूते नहीं झेलने पड़े थे, और न ही उसका देश हिन्दुस्तान की तरह किसी विदेशी सरकार का गुलाम था। लेकिन आज जिस अंदाज में धरती इंसान के लालच की गुलाम हो चुकी है, जिस तरह विकसित देश, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, और लापरवाह सरकारें धरती के मौसम को खत्म कर रही हैं, उसके खिलाफ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए पन्द्रह बरस की यह छात्रा ग्रेटा थनबर्ग स्कूल के सामने हड़ताल पर बैठी थी। वह अपने देश की सरकार का ध्यान तो खींचना चाहती ही थी, साथ-साथ वह दुनिया का ध्यान भी खींचना चाहती थी। उसका यह आंदोलन पिछले बरस से शुरू होकर अब न्यूयार्क में पहुंचकर पूरी दुनिया का ध्यान खींच रहा है जहां अगले कुछ दिनों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के लिए दुनिया भर के नेता इक_ा हो रहे हैं। ग्रेटा को देखते हुए दुनिया भर के छात्रों ने तय किया है कि वे दुनिया में हो रहे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक दिन प्रदर्शन करेंगे। आज सुबह से अमरीका सहित योरप के बहुत से देशों की तस्वीरें खबरों और सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं जिसमें छात्रों के इस आंदोलन, फ्राईडेज फॉर फ्यूचर, के तहत बच्चे सड़कों पर हैं। 

इस बच्ची की कहानी दुनिया में एक बड़ा हौसला पैदा करने वाली है कि दुनिया को बचाने और बेहतर बनाने के लिए शुरुआत अपने से करनी चाहिए। इस बच्ची ने दुनिया के पर्यावरण का नुकसान पहुंचाने वाले सामानों का इस्तेमाल रोकने का काम अपने घर से शुरू किया, और अपने मां-बाप को शाकाहारी बनाया क्योंकि मांस तैयार करने में धरती का बहुत सारा पानी खर्च होता है। उसने अपने मां-बाप के हवाई सफर रूकवा दिए क्योंकि उनसे बहुत प्रदूषण होता है, और बड़ा ईंधन खर्च होता है। पिछले बरस इसी महीने में स्वीडन में चुनाव था, और ग्रेटा के साथ वहां के बहुत से छात्र-छात्राओं ने यह तय किया कि जब तक देश में जिम्मेदार सरकार न आए वे संसद के बाहर बैठकर आंदोलन करेंगे। इसके साथ-साथ इस छोटी सी लड़की ने एक बड़ा लंबा समुद्री सफर भी बोट से तय किया जो बिना ईंधन के ब्रिटेन से अमरीका तक गई। उस बोट पर कुछ और नौजवानों के साथ वह अकेली लड़की थी। आज उसकी प्रेरणा से पूरी दुनिया में जितनी बड़ी क्लाईमेट-स्ट्राईक हो रही है, वह अपने आपमें एक इतिहास है और उसने दुनिया को हिलाकर रख दिया है। 

अब इस मुद्दे पर आज लिखने की जरूरत यहां इसलिए लग रही है कि उसकी उम्र के या उससे बड़े भला ऐसे इतने लोग इस दुनिया में हैं जो कि दुनिया को बचाने के लिए एक जागरूकता के साथ अपनी निजी जिंदगी में फेरबदल करने को तैयार हैं, अपने स्वाद, अपने शौक, और अपने सुख को कुछ छोडऩे के लिए तैयार हैं? इस पर लिखने की जरूरत इसलिए भी है कि अगर दुनिया में एक अकेली लड़की भी किसी मुद्दे को लेकर एक ईमानदार अभियान शुरू करती है, तो वह दुनिया के एक सबसे बड़े आंदोलन में तब्दील हो सकता है। ऐसे बहुत से पहलू इस नाबालिग छात्रा के संघर्ष के हैं जिनके बारे में अलग-अलग देशों के किशोर-किशोरियों, और नौजवानों को सोचना चाहिए कि क्या वे अपने-अपने दायरे में सचमुच ही ऐसा कुछ कर रहे हैं जिससे कि धरती को बचने में मदद मिल सके? और यह भी कि क्या एक वक्त पूरी दुनिया को गांधी ने अहिंसा और किफायत की जो राह दिखाई थी, वह राह खुद हिन्दुस्तान में मिटा दी गई है, उसकी जगह गांधी के पदचिन्हों पर कांक्रीट की नई सड़क बना दी गई है ताकि किफायत के बारे में चर्चा भी न हो, और बाजार का कारोबार अधिक से अधिक बढ़ता चले? यह पूरा सिलसिला इक्कीसवीं सदी का एक नया इतिहास रच रहा है, और बताता है कि ईमानदार सोच की गूंज दुनिया भर में करोड़ों दिल-दिमाग से उठती है, और नेक काम में कोई भी अकेले नहीं है, अगर वह डटकर किया जाए। आज अमरीका जैसे अंतरराष्ट्रीय मवाली-कारोबारी देश दुनिया के मौसम को, पर्यावरण को बर्बाद करके अपना सुख तो जुटा ही रहे हैं, अपने कारोबार को भी बढ़ा रहे हैं, और इस काम को वे पूरी हिंसा और अश्लीलता के साथ कर रहे हैं। ऐसे अमरीका, और ऐसे कई दूसरे देशों की बर्बादी की आदतों को बदलने के लिए, वहां के नेताओं को झंकझोरकर जगाने के लिए एक बच्ची ने जो पहल की है, जो मुहिम शुरू की है, जो इतिहास रचते चले जा रहा है, उन सबको हमारा सलाम। 
-सुनील कुमार


Date : 20-Sep-2019

जिंदगी कैसे रूख बदलती है इसे असल जिंदगी में देखना बड़ा दिलचस्प होता है। और ऐसे में ही लोगों को कभी किस्मत पर भरोसा होने लगता है, तो कभी लगता है कि जिंदगी कैसे-कैसे खेल खेलती है। आज दुनिया के एक सबसे कामयाब फुटबॉलर, और सबसे रईस खिलाडिय़ों में से एक, क्रिश्चियानो रोनाल्डो की एक तलाश पूरी हुई जब उन्होंने एक इंटरव्यू में अपने बचपन का हाल बताया था कि किस तरह वे अपने दूसरे साथी खिलाड़ी बच्चों के साथ एक मैकडोनाल्ड रेस्तरां के पीछे का दरवाजा खटखटाकर पूछते थे कि कुछ खाना बचा हुआ है क्या, और उस वक्त खाना देने वाली तीन युवतियों में से एक ने आज सार्वजनिक रूप से अपना खुलासा किया। रोनाल्डो ने इंटरव्यू में बताया था कि किस तरह से मैकडोनाल्ड की तीन महिला कर्मचारी बड़ी रहमदिल थीं, और बचा हुआ खाना उन बच्चों को देती थीं। उन्होंने एक हसरत जाहिर की कि अगर वे महिलाएं उन्हें मिल जाएं, तो वे उन्हें अपने साथ डिनर पर ले जाना चाहेंगे। इस इंटरव्यू के बाद इनमें से एक महिला पॉला लेका सामने आई और उसने कहा कि वह उन तीनों में से एक है, और उसे रोनाल्डो के साथ डिनर पर जाने में खुशी होगी। 

हर कुछ हफ्तों में दुनिया के किसी न किसी कोने से आधी या चौथाई सदी पुरानी ऐसी कोई तलाश पूरी होने की खबर आती है जिसमें कहीं मां-बाप खोए हुए या बिछुड़े बच्चे को पा लेते हैं, या बच्चे अपने मां-बाप तक पहुंच जाते हैं। ऐसे मामलों को देखें तो लगता है कि जिंदगी बड़ी हैरतअंगेज और अविश्वसनीय होती है, और जाने कैसी-कैसी हसरतें वक्त पूरी कर देता है। जिन लोगों को जिंदगी में कभी ऐसा कुछ होने का भरोसा नहीं होता, और जो उम्मीद छोड़ चुके होते हैं, उनको भी असल जिंदगी की इन कहानियों को देखकर अपना हौसला रखना चाहिए कि अपना टाईम आएगा। भला कौन यह सोच सकते थे कि मांगकर खाने वाले एक बच्चे की जिंदगी अपने हुनर से ऐसी बदल जाएगी कि वह दुनिया का सबसे कामयाब और रईस खिलाड़ी बन जाएगा? और उस पर, एक फुटपाथी बच्चे की मदद करने वाली महिलाओं को भी भला यह क्या मालूम रहा होगा कि एक दिन वह बच्चा उन्हें दुनिया के सबसे महंगे रेस्त्रां में ले जाकर खाना खिला सकता है? 

इससे दो सबक मिलते हैं। पहला तो यह कि दया, प्रेम, और लोगों की मदद कभी बेकार नहीं जाते। जिस तरह कुदरत सिखाती है कि आम बोते चलें, तो जिंदगी में आम मिलते भी चलेंगे, फिर चाहे वे अपने बोए हुए आम न हो, किसी और के बोए हुए आम के फल हों। आज जो लोग सागौन के फर्नीचर पर बैठते हैं, वह उनकी अपनी जिंदगी का तो बोया हुआ रहता नहीं है, लेकिन लोग बोते चलते हैं, और पाते भी चलते हैं। इसीलिए नेक नीयत से किए हुए अच्छे काम कभी बेकार नहीं जाते, और रोनाल्डो की एक वक्त मदद करने वाली पॉला लेका का कहना है कि उसे कभी कर्म के फल पर भरोसा नहीं था, वह मानती थी कि ऐसा कुछ नहीं होता है, लेकिन अब उसे इस पर भरोसा होने लगा है। वह अब अपनी जिंदगी में आए इस मोड़ के बारे में सोच रही है, और साथ-साथ अपने इंटरव्यू के बाद रोनाल्डो की भी इस बात को लेकर चारों तरफ तारीफ हो रही है कि वह इतनी कामयाबी और संपन्नता के बाद भी विनम्र बना हुआ है।

धर्म तो नहीं, लेकिन कुदरत जरूर यह सिखाती है कि लोगों को अच्छा काम करते रहना चाहिए, और उसका अच्छा फल इसी दुनिया में, इसी जिंदगी में मिल जाता है। धर्म तो मौत के बाद स्वर्ग और जन्नत जैसे सपने दिखाता है, लेकिन कुदरत इसी धरती पर बोए हुए को काटने की बात साबित करते रहता है। जिन लोगों को आज अपनी जिंदगी में सामने आने वाले कमजोर, गरीब, और जरूरतमंद लोगों को हिकारत से देखने की आदत है, उन लोगों को यह सोचना चाहिए कि जिंदगी का सैलाब कब किसे बहाकर किसके सामने ले जाकर खड़ा कर दे, उसका कोई ठिकाना तो है नहीं। इसलिए और किसी वजह से न सही, कम से कम अपने खुद के भले के लिए लोगों को भला करना चाहिए, और बिना उम्मीद करते रहना चाहिए। सबसे अधिक भला वह होता है जो उन लोगों के लिए किया जाता है जो कि आज जाहिर तौर पर कुछ वापिस नहीं कर सकते। जिनसे कुछ हासिल होने की उम्मीद है, उनका भला करना कोई महान काम नहीं होता। जिन लोगों ने रोनाल्डो और इस महिला की यह खबर पढ़ी है, वे लोग जाहिर तौर पर ऐसे किसी डिनर की तस्वीरें और खबर देखने का इंतजार कर रहे होंगे। 
-सुनील कुमार


Date : 19-Sep-2019

सऊदी अरब में सबसे बड़ी तेल कंपनी पर एक ड्रोन हमले से उसके पेट्रोलियम कारखाने को बड़ा नुकसान पहुंचा है, और पूरी दुनिया में तेल के भाव एकदम से बढऩे का बड़ा खतरा खड़ा हो गया है। लेकिन इससे भी बड़ा खतरा यह है कि यह हमला सऊदी अरब के खिलाफ काम कर रहे यमन के विद्रोहियों ने किया है जो कि किसी देश की फौज जितनी ताकतवर नहीं हैं, महज हथियारबंद बागी लोग हैं जो कि दुनिया के अलग-अलग देशों में कई जगह रहते हैं, हिन्दुस्तान में भी कहीं नक्सली हैं, तो कहीं कोई और समूह काम कर रहा है। अब अगर ड्रोन से ऐसे हमले करके किसी कारखाने पर एक हमले से दुनिया की अर्थव्यवस्था में तहलका लाया जा सकता है, तो यह भी सोचना चाहिए कि ड्रोन जैसी अब मामूली हो चुकी तकनीक से और क्या-क्या हो सकता है? 

मोटे तौर पर फोटोग्राफी के लिए इस्तेमाल होने वाले ड्रोन का फौजी निगरानी के लिए भी इस्तेमाल होता है, और सामानों को घर पहुंचाने वाली कंपनियां लगातार प्रयोग कर रही हैं कि वे किस तरह ड्रोन से सामान पहुंचाएं। कुल मिलाकर हवा में उड़कर जाने वाला यह छोटा सा उपकरण अधिकतर जगहों पर कानूनी दर्जा प्राप्त है, और ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि वह गैरकानूनी इस्तेमाल से आखिर कितनी दूर है? दुनिया के कई देश अपनी फौज में ड्रोन का इस्तेमाल न सिर्फ निगरानी के लिए बल्कि हथियार गिराने के लिए भी कर रहे हैं, या उसकी क्षमता हासिल कर चुके हैं। ऐसे में बागियों तक, या आतंकियों तक ऐसी तकनीक के पहुंच जाने में कोई शक तो है नहीं। अब दुनिया को साइबर हमले जैसे एक नए खतरे के अलावा ड्रोन हमले की अलग-अलग किस्मों की आशंकाओं को भी देखना होगा। ड्रोन हमलों से अगर पानी की टंकियों में कोई रसायन डाला जा सके, या बिजली के बड़े खंभों को नुकसान पहुंचाया जा सके, किसी इलाके में मोबाइल फोन के टॉवर पर हमला किया जा सके, तो क्या होगा? क्या आज हम सचमुच ऐसे किसी खतरे से कुछ दूर हैं, या फिर वह खतरा आ चुका है, और बस ऐसे हमले की देर है? 

जैसा कि दुनिया में हर वक्त होता है, टेक्नालॉजी का इस्तेमाल जब तक सरकार या सुरक्षा एजेंसियां करती हैं, तब तक बड़े मुजरिम उसका इस्तेमाल कर चुके होते हैं, और उसकी तोड़ भी निकाल चुके होते हैं। बैंक जितने किस्म की तकनीक से जालसाजी रोकने की कोशिश करती हैं, मुजरिम उससे चार कदम आगे चलते हैं। ठीक ऐसा ही दूसरी तकनीक के बारे में भी रहता है और ड्रोन की हमलावर-संभावनाओं को आतंकियों ने अब तक नजरअंदाज तो किया नहीं होगा। लोगों को याद होगा कि अमरीकी राष्ट्रपति भवन के बारे में कई बार खबरें आती हैं कि खतरनाक-जानलेवा रसायन लगी हुई चि_ियां अमरीकी राष्ट्रपति के नाम भेजी जाती हैं, और वहां सुरक्षा कर्मचारी उनकी रासायनिक जांच करके उन्हें पहले ही रोक देते हैं। अब पल भर के लिए यह सोचें कि ऐसे फैलने वाले रसायनों को ड्रोन से किसी घर पर, किसी बगीचे में, किसी स्वीमिंग पूल के पानी में अगर डाल दिया जाए, तो कौन सी सुरक्षा तकनीक ऐसे हमलों को रोक सकेगी? दरअसल तकनीक और हथियारों के बेजा इस्तेमाल के खतरे को समय रहते आंक पाना हिन्दुस्तान जैसी सरकार की न तो प्राथमिकता में दिखता, और न ही उसकी कोई ऐसी तैयारी दिखती। इस देश में बैंकिंग को आम लोगों के लिए भी बुलडोजर से धकेलकर तेजी से डिजिटल की ओर किया गया है, लेकिन न तो गरीब आम जनता की डिजिटल समझ इतनी है, और न ही डिजिटल तकनीक सुरक्षित ही है। नतीजा यह हो रहा है कि बड़ी संख्या में रोजाना ठगी हो रही है, लोगों को ऑनलाईन लूटा जा रहा है, और तरह-तरह के दूसरे जुर्म हो रहे हैं। डिजिटल तकनीक को एक तिलस्म की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, और सांस लेने पर भी हिन्दुस्तान में आधार कार्ड जैसी डिजिटल शिनाख्त को अनिवार्य करने की सोच लोगों की जिंदगी की निजता को पूरी तरह खत्म कर चुकी है। आने वाला वक्त ऐसे अनदेखे, अनसोचे खतरों का रहने वाला है जिसमें हर डिजिटल जानकारी पर साइबर हमला कामयाब हो सकेगा। 

ड्रोन तकनीक से अगर दुनिया के सबसे बड़े कारखानों पर ऐसा हमला हो सकता है, सऊदी अरब जैसी बड़ी फौज के रहते हुए हो सकता है, तो दुनिया में कहीं भी ड्रोन कैमरे आम जगहों पर जाने किस तरह के रसायन छिड़क सकते हैं, या रेडियोधर्मिता फैला सकते हैं। ऐसी तकनीक से रोकथाम और बचाव की कोई तैयारी आज नहीं दिख रही है, और आने वाला वक्त पता नहीं कैसे खतरे लेकर आएगा। 
-सुनील कुमार


Date : 18-Sep-2019

पार्किंग पर गोलीबारी से सूझता एक समाधान भी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल एक रिहायशी इलाके में घर के सामने निजी कार खड़ी करने को लेकर चले आ रहे एक विवाद के बाद एक रिटायर्ड फौजी ने अपनी बंदूक से गोली चलाकर एक कार के दोनों शीशे आरपार तोड़ दिए, और गिरफ्तारी के बाद उसकी रिहाई भी हो गई। इस घटना को आपसी झगड़ा मानकर भी छोड़ा जा सकता है और एक गुस्सैल की बंदूक का लाइसेंस कैंसल किया जा सकता है। लेकिन समझदारी इसमें होगी कि इस दिक्कत की जड़ में जाकर उसका रास्ता ढूंढा जाए। 

यह बात शुरू तो एक शहर से हुई है, और एक इलाके का एक अकेला मामला दिखता है, लेकिन यह बात हिन्दुस्तान के सभी औसत शहरों में तेजी से बढ़ती हुई एक दिक्कत भी बताती है कि शहरी ढांचा इतनी निजी और दूसरी गाडिय़ों के लिए बना नहीं है। न तो इतनी गाडिय़ों के लायक सडक़ें हैं, और न ही इतनी गाडिय़ों के खड़े होने लायक जगह किसी इलाके में है। तकरीबन हर जगह लोगों की निजी गाडिय़ां उनके घरों के बाहर खड़ी रहती हैं, और बड़े शहरों के रिहायशी इलाकों में तो कुछ-कुछ इंच की दूरी पर गाडिय़ों को खड़ी करने में लोगों को महारथ हासिल करनी ही पड़ती है। जहां तक सरकार और स्थानीय संस्थाओं का सोचना है, तो हिन्दुस्तान के अधिकतर शहरों में कई मंजिलों की पार्किंग बनाने को एक समाधान समझ लिया गया है। जो सबसे व्यस्त बाजार हैं, या सरकारी इलाके हैं, वहां कई मंजिलों की पार्किंग बनाकर यह फख्र कर लिया जाता है कि वहां कितने सौ गाडिय़ों को खड़ा किया जा सकेगा। इसके अलावा शहरों में अब तक खाली बच गई गिनी-चुनी सरकारी जमीन पर लगातार बाजारू इमारतें बनाकर उनसे एक नंबर और दो नंबर की कमाई करने की बेचैनी स्थानीय संस्थाओं और सरकार दोनों में दिखती है। कांक्रीट के जंगलों के बीच अगर थोड़े से फेंफड़े बचे हैं, तो उन्हें भी बेच देने पर आमादा नेता और अफसर धरती की बची सारी उम्र के लिए उन शहरों को तबाह करने के गुनहगार बन रहे हैं, साथ-साथ दौलतमंद तो बन ही रहे हैं। 

पर्यावरण को बचाने के लिए शहरी योजना की जितनी भी बातें होती हैं, वे काली कमाई की उम्मीद दिखने पर बांधकर ताक पर धर दी जाती हैं। जिस रफ्तार से लोगों की निजी, कारोबारी, और स्कूल-कॉलेज की गाडिय़ां बढ़ रही हैं, उनके खड़े होने के लिए सिवाय सरकारी सडक़ों के और कोई जगह नहीं बचती है। ऐसे में आज यह सोचने की जरूरत है कि जो लोग गाड़ी खरीदते वक्त मोटा टैक्स देते हैं, उसका बीमा करवाने पर खर्च करते हैं, उसे चलाने के लिए महंगा डीजल-पेट्रोल खरीदते हैं, वे उसे सरकारी सडक़ पर या सरकारी जमीन पर खड़े करने के लिए एक फीस क्यों नहीं दे सकते, और स्थानीय संस्थाएं यह फीस वसूल क्यों नहीं करतीं? लोगों को कार खरीदते हुए अगर यह इत्मीनान रहता है कि उसे खड़े करने के लिए सरकारी या सार्वजनिक जगह हासिल है, तो वे बेफिक्र होकर बाकी खर्च का हिसाब लगाते हैं, और कार लाकर घर के बाहर बांध लेते हैं। जिस दिन पार्किंग का खर्च जुड़ जाएगा, उस दिन लोगों को समझ आएगा कि कार रखने पर यह बोझ भी पड़ता है, और वे उसके मुताबिक हिसाब लगाकर ही गाड़ी खरीदेंगे। 

पार्किंग को लेकर हुई यह गोलीबारी यह भी सोचने के लिए मजबूर करती है कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने की कितनी जरूरत है। पहले से व्यस्त बाजारों में कई मंजिलों की पार्किंग बनाना एक तुरंत-समाधान लग सकता है, लेकिन यह पूरी जिंदगी के लिए उस इलाके में सडक़ों पर भीड़ बढ़ाने का एक इंतजाम भी हो जाता है। शहरी विकास के हर शहर के अपने मॉडल होने चाहिए, इसलिए इस बारे में सोच की बात ही हो सकती है, उस शहर के लोगों को अलग-अलग योजनाएं अपनी जरूरत के मुताबिक बनानी होंगी। लेकिन एक बात तय है कि शहरों के बीच खाली पड़ी जमीन पर इमारतें खड़ा करना तुरंत ही बंद होना चाहिए, और सार्वजनिक परिवहन तेजी से बढ़ाना चाहिए ताकि लोग निजी गाडिय़ों के मोहताज न रहें, और ईंधन बचे, सडक़ों पर भीड़ बचे, पार्किंग को लेकर गोलीबारी बचे। हर शहर को एक पार्किंग फीस अनिवार्य रूप से लागू करनी चाहिए जिसे रजिस्ट्रेशन के वक्त लिया जाए, और उस टोकन के आधार पर ही किसी शहर में गाड़ी नियमित रूप से रखी जा सके। जिन लोगों के घरों में गाड़ी रखने का इंतजाम हो, वे भी बाकी वक्त तो शहर में अलग-अलग जगहों पर गाड़ी खड़ी करते ही हैं, इसलिए हर शहर की अपनी एक पार्किंग फीस ली जाए जो कि शहर के स्तर पर भी हो सकती है, या पूरे प्रदेश के लिए हो सकती है। निजी गाडिय़ों पर, कारोबारी गाडिय़ों पर ऐसा बोझ डालना जरूरी है क्योंकि इसके बिना लोग खरीदने की ताकत रहने तक गाडिय़ां खरीदते ही जाते हैं। 

-सुनील कुमार

 


Date : 17-Sep-2019

हिंदी दिवस के पहले ही गृहमंत्री और भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने पूरे देश में एक भाषा हिंदी की वकालत करके मधुमक्खियों के खूब बड़े से छत्ते पर बड़ा सा पत्थर मार दिया, और बंगाल से लेकर दक्षिण भारत तक खुद भाजपा के नेता सफाई देते-देते, विरोध करते हुए हलाकान हो गए। अभी नए मोटर व्हीकल एक्ट को लेकर भाजपा राज्यों का विरोध खत्म हुआ नहीं था कि अब अमित शाह की हिंदी की वकालत ने करीब एक पखवाड़े में यह दूसरा बखेड़ा खड़ा कर दिया है।

दरअसल हिंदुस्तान में भाषा विवाद में नया कुछ नहीं है। उत्तर भारत या भारत के हिंदीभाषी इलाकों से आने वाले नेताओं को बीच-बीच में अपनी मातृभाषा का कीड़ा काटता है, और वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदी को थोपने पर आमादा हो जाते हैं। नतीजा यह निकलता है कि अहिंदीभाषी प्रदेशों में उसका जमकर विरोध होने लगता है। यह बखेड़ा तकरीबन सालाना के रेट से खड़ा होता ही है, और इस बार चूंकि भाजपाध्यक्ष-गृहमंत्री खासे बड़े कद के, बड़े वजन के नेता हैं, और कश्मीर पर उनका ताजा-कड़ा रूख हाल का गवाह है, इसलिए लोगों के बीच उनकी बात एक धमकी की तरह तैर गई, और हिंदी से परे जीने वाले लोग हड़बड़ा गए कि क्या उनके प्रदेश भी कश्मीर की तरह काबू में कर लिए जाएंगे। 

दरअसल सालाना हिंदी दिवस का मौका बहुत से लोगों के लिए अपनी भावनाओं से हवा को भड़काने का रहता है। लोगों को हिंदी की सेवा करना याद आता है, हिंदी पर गर्व करना सूझता है, और जिनके पास गर्व के लायक कुछ भी नहीं रहता वे लोग दूसरी भाषाओं पर हमला करके, या अपनी हिंदी की स्तुति करके अपना सालाना जिम्मा पूरा करते हैं। इस पूरे भावनात्मक भाषाई उन्माद में इस बात को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाता है कि कोई भाषा महज एक औजार होती है, और उसका महत्व तभी साबित होता है जब उसके इस्तेमाल से कोई महत्वपूर्ण काम होता है, जब उस भाषा में उत्कृष्ट साहित्य रचा जाता है, विज्ञान या दूसरे विषयों की बेहतरीन किताबें लिखी जाती हैं, जब कारोबार की दुनिया में उस भाषा का इस्तेमाल नफे का होता है, तभी कोई भाषा सम्मान पाती है। अपने-आपमें भाषा अक्षरों, व्याकरण, और लिपि का एक टूलबॉक्स है, और जब इसके इस्तेमाल से लोग महत्वपूर्ण बनते हैं, लोग कामयाब बनते हैं, तो ही इस भाषा का सम्मान होता है।

इसलिए भाषा को लेकर एक भावनात्मक गौरवोन्माद पूरी तरह गैरजरूरी और नाजायज होता है क्योंकि वह महज भाषा के महज सतही इस्तेमाल से संतुष्ट हो जाने वाला रहता है, और उसके लिए कुछ अधिक बड़ा करने की जरूरत नहीं होती। कई बार तो किसी दूसरी प्रतिद्वंद्वी भाषा का विरोध, या उसे नीचा दिखाना भी काफी मान लिया जाता है, और अपनी भाषा के लिए कुछ भी करने की जरूरत नहीं होती। एक नफरतजीवी राष्ट्रवाद की तरह दूसरी भाषाओं के विरोध के हमलावर तेवर कई लोगों को अपनी भाषा की कामयाबी की खुशफहमी दे जाते हैं। यह घटिया सिलसिला खत्म होना चाहिए। दूसरे देशों में बम फटने से अपने देश की अशांति का दाग कम नहीं होता। इसलिए लोगों को अपनी भाषा में अधिक कामयाबी हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए, और ऐसा होने पर ही कोई भाषा सम्मान हासिल कर सकती है, उसका गौरव बढ़ सकता है। आज अमरीका टूटी-फूटी किस्म की अंगे्रजी बोलकर भी दुनिया में सबसे कामयाब भाषा वाला देश इसलिए बन गया है कि वह दुनिया में सबसे कामयाबी वाला देश है। वरना सही व्याकरण वाले अंगे्रजों का देश ही सबसे कामयाब होता। 

भाषा को लेकर सालाना उन्माद हिंदुस्तान का नुकसान कर जाता है और देश के नक्शे पर राज्यों की सरहदों की लकीरें गाढ़ी होने लगती हैं, लाल रंग की होने लगती हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए और हिंदुस्तान के अलग-अलग प्रदेश अपनी भाषाओं और बोलियों को लेकर दुनिया के बहुत से देशों से बड़े हैं। आज दुनिया के देश अपनी छोटी-छोटी आबादी को लेकर भी अपनी खुद की भाषा के साथ कामयाब हैं, और हम हिंदुस्तान में उन देशों से बड़े-बड़े प्रदेश लेकर उनकी अपनी भाषाओं के साथ नाकामयाब हैं, और देश में सबसे अधिक नाकामयाब हिंदी बोलने वाले प्रदेश हैं। उत्तर भारतीयों के बारे में अभी एक केंद्रीय मंत्री ने योग्यता की कमी की बात कह दी तो बड़ा बवाल हो गया। लेकिन क्या यह हकीकत नहीं है कि दक्षिण भारतीय राज्यों ने अपनी अंगे्रजी की मामूली या बेहतर समझ के चलते दुनिया के दूसरे देशों तक जाकर वहां कामयाबी पाने का एक ऐसा काम किया है जिसे उत्तर भारतीय कभी नहीं कर पाए। इसलिए क्षेत्रीय उन्माद को परे रखकर हिंदीभाषी इलाकों को पहले तो दूसरी भाषाओं के राज्यों के मुकाबले अपने को सुधारना होगा, तब भी दूसरे राज्यों पर हिंदी थोपने का उनका कोई हक नहीं बनेगा। पूरे देश में एक भाषा की सोच देश को एक साथ बांधने की नहीं, देश के अलग-अलग प्रदेशों को अलग-अलग बांधकर बिठा देने की है, इससे भारतीय लोकतंत्र और भारतीय संस्कृति कहीं भी समृद्ध होने नहीं जा रहे।
-सुनील कुमार


Date : 16-Sep-2019

किसी एक मुद्दे पर एक महीने में तीन-चार बार संपादकीय लिखना अच्छी बात नहीं है, लेकिन जब वह मुद्दा देश की तकरीबन पूरी आबादी को बुरी तरह प्रभावित करने वाला हो, और जिसे लेकर एक असमंजस बना हुआ हो, तो फिर ऐसा लिखने से बचा भी नहीं जा सकता। हिन्दुस्तान में ट्रैफिक का नया जुर्माना लागू हुए ठीक एक पखवाड़ा गुजरा है, और राज्यों के बगावती तेवर केन्द्र सरकार के सामने आ रहे हैं। चूंकि केन्द्र सरकार में नए मोटर व्हीकल एक्ट के साथ नितिन गडकरी का नाम विभागीय मंत्री के रूप मेें जुड़ा है, इसलिए केन्द्र सरकार का कोई भी दूसरा मंत्री, भाजपा-एनडीए के कोई भी दूसरे नेता गडकरी को खलनायक बनने से बचाने की कोशिश नहीं कर रहे। और राज्यों में तो सरकारें अपनी जनता को लुभावने अंदाज में फंसाकर डुबाने की हद तक ले जा रही हैं, और सड़कों पर उनके मरने का इंतजाम कर रही है। 

अपने आसपास छत्तीसगढ़ को देखते हुए यह लगता है कि इस एक पखवाड़े के पहले तक जब पुराना मोटर व्हीकल एक्ट लागू था जिसमें जुर्माना कम था, और कैद तकरीबन नहीं थी, तब भी सड़कों पर पुलिस उस पर अमल करवाने के लिए कुछ तो करते दिखती थी, लेकिन जब से राज्य की कांग्रेस सरकार ने केन्द्र की मोदी-गडकरी सरकार के लाए इस एक्ट को लागू न करने का फैसला लिया है, तब से राज्य की पुलिस ने मानो सत्ता का रूख देखते हुए सड़कों पर से अपनी चालानी-मौजूदगी खत्म सी कर दी है, और पखवाड़े पहले तक जो गिने-चुने हेलमेट सड़कों पर दिखते थे, वे भी अब ताक पर धर दिए गए हैं, लोग कारों के सीट बेल्ट का इस्तेमाल न करना तय कर चुके हैं, और दुपहिया-चौपहिया चलाने वाले लोग मानो मोबाइल फोन पर अपना सारा काम गाड़ी चलाते हुए ही कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि दुपहियों पर अगर दो लोगों को ही जाना है तो वे किसी तीसरे को बिठा लेते हैं, और नए मोटर व्हीकल एक्ट को तोडऩा एक नए किस्म का क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है मानो गांधी नमक कानून तोड़ रहे हों। 

अब सवाल यह है कि राजनीतिक वजहों से अगर एक राज्य सरकार केन्द्र सरकार के लाए नए कानून को लागू करने का विरोध कर रही है, तो क्या ऐसा करते हुए वह पहले से लागू चले आ रहे कानून को भी ताक पर रख दे? क्या वह लोगों को सड़कों पर मरने और मारने की खुली छूट दे दे? क्या सरकार की संविधान की शपथ सरकारी जिम्मेदारी को लेकर ऐसा ही काम करने की है? क्या केन्द्र में विरोधी विचारधारा की सरकार रहने पर उसका विरोध इस किस्म से होना चाहिए कि अपने ही प्रदेश के अपने ही लोगों को एक अराजकता सिखाई जाए, सड़कों पर कानून का सम्मान करने वाले लोगों की हिफाजत भी खत्म की जाए? यह सरकारी बर्ताव हैरान करने वाला है, और यह नाजायज इसलिए भी है कि पुराने कानून पर अमल करने, या नए कानून को लागू करने का फैसला जो मंत्री-मुख्यमंत्री ले रहे हैं, वे खुद तो बड़ी-बड़ी गाडिय़ों के लाव-लश्कर में महफूज घूम रहे हैं, और महज आम जनता सड़कों पर रोज मारी जा रही है। क्या संविधान की शपथ के बाद सरकार को अराजकता बढ़ाने का कोई हक मिल सकता है, मिलना चाहिए? 

जहां तक सड़कों पर जिंदगी का सवाल है, तो किसी सरकार को यह हक नहीं मिल सकता कि वह कानून तोडऩे वालों पर कार्रवाई न करना तय करे। जिन लोगों की बड़ी-बड़ी गाडिय़ां हैं, बड़ी महंगी मोटरसाइकिलें हैं, वे लोग नए कानून की सख्ती की दुहाई दें, यह कहां की बात है? संपन्न तबकों की गुंडागर्दी को छूट देने का अधिकार किसी सरकार को नहीं दिया जा सकता। और छत्तीसगढ़ सहित बाकी राज्यों की सरकारों को यह भी याद रखना चाहिए कि एक बरस की सख्ती के बाद सड़कों पर जो असर दिखता है, वह हफ्ते भर की घोषित-ढिलाई में ही पूरी तरह मटियामेट हो जाता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी में रोजाना सौ-पचास किलोमीटर सफर करते हुए यह साफ दिख रहा है कि लोग अब ऐसा मान बैठे हैं कि इस प्रदेश से ट्रैफिक का पुराना या नया, किसी किस्म का भी कानून खत्म हो चुका है। जनता के मन में नियम-कायदे के लिए इतनी मजबूत हेठी ठीक नहीं है। राज्य सरकार को अगर यह लगता है कि नया कानून जनता के भुगतान की ताकत से अधिक कड़ा है, तो उसकी सोच तभी जायज कहलाएगी जब लाख रूपए से अधिक के दुपहियों, और पांच-दस लाख रूपए से अधिक की कारों को नए कानून के तहत जुर्माने के लिए सीधे अदालत भेजा जाए। जिनकी ताकत इतने बड़े खर्च करने की है, उनकी ताकत जुर्माना पटाने की तो है ही। हर दिन किसी राज्य के अखबारों में उस राज्य की अदालतों से होने वाले पच्चीस-पचास हजार के जुर्माने की खबरें छपें, तो करोड़पति अराजक लोगों की अक्ल ठिकाने आए। ऐसी ही महंगी गाडिय़ां बहुत से हादसों के लिए जिम्मेदार भी रहती हैं, और सड़कों पर बददिमागी भी दिखाती हैं। ऐसे लोगों को नए महंगे कानून से छूट क्यों दी जा रही है? सड़कों पर आज भी पुलिस इन गाडिय़ों को कानून तोडऩे पर अदालत भेज सकती है, जहां उनसे मिलने वाली रकम जनता के काम भी आए।

दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ सरकार इस नए मोटर व्हीकल एक्ट पर विचार करने के नाम पर इसे भूल गई है। कानूनी सलाह में इतना वक्त नहीं लगता है, और जब केन्द्र सरकार पूरे देश में सड़कों पर होने वाली मौतों को कम करने की एक नीयत बता रही है, तो उस नीयत को धता बताना किसी राज्य सरकार के लिए अच्छी बात नहीं है। अगर नए जुर्माने को घटाना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, तो उसे करे, लेकिन तब तक मौजूदा नियमों के तहत कड़ी कार्रवाई जारी रखी जाए ताकि लोगों के मन में कानून के लिए हेठी घर न कर जाए। और जहां तक सड़कों पर बेकसूरों की मौत की बात है तो किसी सरकार को यह हक कैसे मिल सकता कि वह कुसूरवारों को खुश करने के लिए कानून पर अमल न करने की मुनादी करे, और उस पर चले आ रहा अमल भी खत्म कर दे। यह बहुत ही गैरजिम्मेदारी का बर्ताव है, और किसी भी राज्य सरकार के लिए यह संविधान की ली गई शपथ के ठीक खिलाफ भी है। 
-सुनील कुमार


Date : 15-Sep-2019

हिंदुस्तान, और बाकी दुनिया में भी बढ़ती आबादी को लेकर, और रोजगार घटने को लेकर बड़ी फिक्र चल रही है। बहुत से जानकारों का यह मानना है कि धरती आबादी का और अधिक बोझ लंबे वक्त तक नहीं झेल सकती, धरती के प्राकृतिक साधन सीमित हैं और वे कुछ सदियों में खत्म हो जाएंगे, उसके बाद पानी भी नसीब नहीं होगा। दूसरी तरफ मशीनों का बढ़ता इस्तेमाल और उसकी वजह से मौजूदा रोजगारों पर मंडराते खतरे से भी बहुत लोग फिक्रमंद हैं। एक तीसरी फिक्र हिन्दुस्तान जैसे देश में यह भी है कि कारोबार की तेजी से बदलती शक्ल की वजह से छोटे कारोबारी खत्म हो रहे हैं, परंपरागत पेशों का काम अब मशीनों से होने लगा है, और इन सब पर मंदी की मार भी भारी पड़ रही है।

इन बातों पर आंकड़ों को देखकर, भविष्य को लेकर विशेषज्ञों के अंदाज को लेकर, और तजुर्बे से, सोचने की जरूरत तो है, लेकिन इन पर एक गांधीवादी नजरिए से सोचने की जरूरत भी है। गांधी का मानना था कि यह धरती जरूरत तो सभी की पूरी कर सकती है लेकिन लालच पूरा नहीं कर सकती। आज जो लोग बढ़ती आबादी की वजह से बढ़ती खपत का हिसाब लगाते हैं, उनको समझना चाहिए कि आबादी का सबसे ऊपर का दस फीसदी हिस्सा ही धरती के नब्बे फीसदी साधनों का इस्तेमाल करता है। सबसे गरीब आबादी का खपत के अनुपात में उत्पादन अधिक होता है। गरीब जितना खाते हैं, उससे कई गुना उगाते हैं, या काम करते हैं। इसलिए धरती के साधनों को अधिक खतरा, या अकेला खतरा, रईसों की हवस का है, गरीबों की भूख और जरूरत का नहीं। इसलिए गांधी की सोच के मुताबिक सादगी और किफायत की राह ही एक रास्ता है।

दूसरी बात यह कि शहरीकरण के साथ आबादी का बढऩा अपने-आप भी घट रहा है, गरीबी घटने के साथ आबादी बढऩा घट रहा है, और शिक्षा से भी परिवार छोटे हो रहे हैं, इसके साथ-साथ इलाज बेहतर होने से जब बच्चों का मरना घटता है तो लोग आशंकाओं में अधिक बच्चे पैदा करना भी बंद करते हैं। इन सबकी वजह से आबादी बढऩा आगे चलकर घटेगा, और आज के अंदाज कुछ गलत साबित होंगे। साथ ही गरीब आबादी की खपत कम ही बनी रहेगी।

जहां तक बदलते कारोबार की वजह से रोजगार घटने की बात है, तो बड़े कारोबार छोटे धंधों में उतरने, या ऑनलाईन कारोबार से, छोटे कारोबार तो घटेंगे, लेकिन रोजगार नहीं। इससे नए किस्म के रोजगार खड़े हो रहे हैं। हिन्दुस्तानी सड़कों पर खाना, और दूसरे सामान पहुंचाने वाले दुपहिया सवार बढ़ते ही चल रहे हैं, लोग कई बार बाहर से खाना बुलाने लगे हैं। रोजगार मंदी की वजह से घट रहे हैं, बदलते कारोबार की वजह से नहीं। यह जरूर है कि छोटे कारोबारों से सीधे मिलने वाले रोजगार अब जगह बदल रहे हैं। ऐसे बहते हुए वक्त में वे देश तो नुकसान पाएंगे जो बाकी दुनिया का रूख और रफ्तार नहीं भांप पाएंगे, लेकिन दूर की सोचकर कमर कसने वालों के पेट खाली नहीं रहेंगे। हकीकत तो यह है कि इस इक्कीसवीं सदी में हिन्दुस्तान में नौजवानों की बड़ी आबादी को हिंदुस्तान की ताकत माना जा रहा है, अगर सरकारें अपने लोगों को दुनिया की आने वाली जरूरतों के मुताबिक तैयार कर सकें। आज अगर हिन्दुस्तान के ऑटो सेक्टर से लाखों नौकरियां गई हैं, तो टैक्सियों की शक्ल में उससे अधिक रोजगार बढ़े हैं, और सड़कों पर निजी गाडिय़ों की भीड़ बढऩा घटा है जो कि कोई बुरी बात नहीं है। एक टैक्सी सड़क पर एक होती है, लेकिन निजी कार के मुकाबले दिन भर में सौ-पचास गुना चलती है और कारों की भीड़ घटाती है। इसलिए जिंदगी के बदलते रूख की वजह से घटते रोजगारों को बढ़ते रोजगारों के साथ मिलाकर भी देखना होगा।

अब एक बात रह जाती है मशीनों की। मशीनों की वजह से घटने वाले रोजगार हो सकता है कि आम लोगों की जिंदगी में नई संभावना भी लेकर आएं। जब स्वेटर बुनने की मशीनें आईं तो लोगों को लगा था कि उनसे हाथ की बुनाई का रोजगार छिनेगा, लेकिन ऐसी घरेलू मशीनों से पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की महिलाओं ने घर-घर में इतने स्वेटर बनाए कि बड़े कारखानों का धंधा बिगड़ा। अगर देश-प्रदेश की सरकारें समझदार हैं तो हिन्दुस्तान में रोजगार बदल सकते हैं, खत्म नहीं हो सकते। 

कुल मिलाकर दुनिया की सरकारों को इस बदलते माहौल के लिए तैयार होना पड़ेगा। रोजगार खत्म नहीं हो रहे, वे रेगिस्तान में रातों-रात खिसककर कहीं और उग जाने वाले रेत के टीलों सरीखे हो गए हैं, उनको देखते हुए हर देश को अपनी आबादी को तैयार करना होगा। रही बात बढ़ती आबादी की, तो वह बढ़ते शहरीकरण, बढ़ते रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा के साथ-साथ खुद ही बढऩा घट जाएगी।
-सुनील कुमार


Date : 14-Sep-2019

छत्तीसगढ़ में इन दिनों अलग-अलग अफसरों और नेताओं के एक-दूसरे के खिलाफ बयान ज्वालामुखी से निकलकर आसमान तक पहुंचने वाले लावे की तरह चारों तरफ बिखर रहे हैं। हलफनामे, अदालतों में बयान, जेल, अस्पताल, ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग, स्टिंग ऑपरेशन, और पुलिस या दूसरी सरकारी जांच। जिस तरह किसी ज्वालामुखी से निकली हुई राख चारों तरफ धरती और आसमान को ढांक लेती है, उसी तरह छत्तीसगढ़ में सारी खबरें राजनीतिक और आर्थिक अपराध, भ्रष्टाचार और सत्ता के बेजा इस्तेमाल की जानकारी और आरोप से प्रदेश को ढांक चुकी हैं। हर दिन के अखबार कई नई सनसनीखेज बातें लेकर आते हैं, और नेताओं पर से लोगों का भरोसा कुछ और हद तक खत्म हो जाता है, अफसरों को लेकर यह सोच और पुख्ता हो जाती है कि वे ताकत और नेताओं के सामने बिछे रहते हैं। 

ऐसे में कुछ बरस पहले कांग्रेस प्रत्याशी घोषित हो जाने के बाद रहस्यमय तरीके से नाम वापिसी वाले मंतूराम पवार ने उनकी खुद की खरीद-बिक्री को लेकर उस वक्त के भाजपा मंत्री-मुख्यमंत्री, और जोगी पिता-पुत्र पर अदालती बयान देकर आरोप लगाए हैं, और कहा है कि स्टिंग ऑपरेशन की आवाज से मिलाने के लिए वे अपनी आवाज का नमूना देने के लिए तैयार हैं, और अब भूतपूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपने दामाद की आवाज का नमूना दिलवाएं जिसे कि स्टिंग ऑपरेशन में एक आवाज माना जा रहा है। हमने मंतूराम पवार की इस मांग के पहले ही इसी जगह लिखा था कि सार्वजनिक जीवन के प्रमुख लोगों को जरूरत पडऩे पर अपनी आवाज का नमूना देने से बचना नहीं चाहिए, और सबको खुलकर जांच और अदालती कार्रवाई का सामना करना चाहिए। लुकाछिपी का खेल पेशेवर मुजरिमों के लिए छोड़ देना चाहिए जो कि अदालत से बचने के लिए आवाज का नमूना देने से कतराते हैं। अब छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद से अब तक के इतने सारे बड़े-बड़े स्कैंडल हो चुके हैं, और उनमें प्रदेश के दर्जनों बड़े नेता और उनके परिवार, उनके कार्यकाल के बड़े अफसर शामिल दिखते हैं कि आज सार्वजनिक रूप से यह मांग होनी चाहिए कि सारे नेता झूठ को पकडऩे वाली जांच के लिए तैयार हों, और नार्को टेस्ट जैसी जांच के लिए भी सहमति दें ताकि उनसे उनके कार्यकाल के तमाम आरोपों पर बात की जा सके। 

जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, जनता के सामने वोट मांगने जाते हैं, संविधान की शपथ लेकर सत्ता पर आते हैं, और लोकतंत्र को हांकते हैं, उन लोगों को ऐसा छोटा सा त्याग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए जिससे कि उन पर लगे सारे आरोपों को धोने का एक मौका भी मिलता हो। राजनीति के लोग जनता की अदालत में घिर जाने पर कानून की अदालत जाने का रास्ता पकड़ते हैं, और कानून की अदालत में माहौल जब उनके खिलाफ दिखता है तो वे जनता की अदालत की बात करते हैं। ऐसे सारे नेताओं को एक साथ, एकमुश्त ऐसी चुनौती मिलनी चाहिए कि वे आरोपों के जवाब में सच का सामना करने को तैयार हों, और उससे सार्वजनिक जीवन की गंदगी खत्म भी हो। मंतूराम पवार कांग्रेस के प्रत्याशी घोषित हुए थे, और फिर उनकी खरीद-बिक्री की टेलीफोन रिकॉर्डिंग सामने आई थी। दूसरे भी बहुत सारे मामले हैं जिनमें लोगों ने एक-दूसरे के खिलाफ हलफनामे दिए हैं, जांच एजेंसियों ने सुबूत हासिल किए हैं, और जनता को भी बहुत से नेताओं और अफसरों पर शक है। ऐसे में संविधान की शपथ को पूरा करने के लिए, जनता के प्रति अपनी जवाबदेही निभाने के लिए, और इस देश की अदालतों पर से पुलिस और जांच एजेंसियों पर से गैरजरूरी और नाजायज बोझ घटाने के लिए इस प्रदेश के तमाम आरोपग्रस्त नेताओं को नार्को टेस्ट के लिए तैयार होना चाहिए, ताकि जो साफ-सुथरे हों, वे चमकदार सफेदी के साथ जनजीवन में लौटें, और जो दागदार हैं, वे जनता के सामने से हट भी जाएं। हमारा ख्याल है कि सत्ता के लिए, या लोकतंत्र में दूसरे संवैधानिक पदों के लिए लोग संविधान की जो शपथ लेते हैं, उसके पालन की जो शपथ लेते हैं, वही शपथ उन्हें ऐसी जांच के लिए मजबूर भी करती है, किसी जनसंगठन को बड़ी अदालत जाकर सारे नेताओं और बड़े अफसरों को उन पर लगे आरोपों को लेकर नार्को टेस्ट का सामना करने का आदेश मांगना चाहिए, और तमाम बड़े लोगों को खुद होकर भी इसके लिए सामने आना चाहिए। यह राज्य बनने के बाद से अब तक जितनी गंदगी हो चुकी है, उस पर पूर्णविराम लगाने का यही एक तरीका हो सकता है। 
-सुनील कुमार


Date : 13-Sep-2019

भोपाल में एक तालाब में गणेश विसर्जन के दौरान नाव पलटी और दर्जन भर लोगों की डूबकर मौत हो गई। आधा दर्जन लोग बचाए गए, और सरकार ने हर किसी को लाखों रूपए मुआवजा भी दिया। विसर्जन की नावों को आपस में बांट दिया गया था, और किसी ने लाईफ जैकेट नहीं पहना था। खबर बताती है कि यह घटना मध्यप्रदेश आपदा बचाव दल के मुख्यालय के पास हुई है। इधर कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ में जगह-जगह इस बात को लेकर तनाव हुआ कि बहुत से गणेश पंडाल में बिजली चोरी करके रौशनी की जा रही थी, और जब बिजली विभाग कनेक्शन काटने पहुंचा तो उसे घेर लिया गया, तनाव के बीच पुलिस मौजूदगी में चोरी को जारी रखा गया, तब बात आई-गई हुई। राजधानी रायपुर के रेलवे स्टेशन पर एक मंदिर का अवैध निर्माण कई बरस पहले बढ़ते-बढ़ते चार-पांच मंजिल इमारत जितना हो गया, और रेलवे इसके खिलाफ मुकदमा लड़ते-लड़ते जीतकर अब उसे तोडऩे का आदेश पा चुका है, लेकिन वह राज्य सरकार का मुंह देख रहा है कि उससे मदद मिले तो मधुमक्खियों के इस छत्ते में हाथ डाला जाए।

धर्म के सार्वजनिक रूप को देखें, तो वह पूरी तरह, और बुरी तरह हिंसक हो चुका है, अराजक हो चुका है, और जगह-जगह वह जरा से तनाव पर साम्प्रदायिक हो जाने की कोशिश करता है। देश की जाने कितनी ही बड़ी-बड़ी अदालतों ने धार्मिक अवैध निर्माण के खिलाफ आदेश दिए हैं, और उन्हें कड़ाई से तोडऩे को कहा है, लेकिन कोई भी राज्य सरकार ऐसा करके अंधभक्तों को नाराज करना नहीं चाहतीं। नतीजा यह होता है कि सरकारी जमीन पर, सरकारी अहातों में धर्मस्थान बनते चलते हैं, और एक बार बन जाने के बाद उन्हें छूना मुश्किल होने लगता है। धर्म के कोलाहल को काबू में करना कोई अफसर नहीं चाहते, कोई नेता नहीं चाहते, और एक धर्म के शोरगुल करने वाले मिसाल के लिए दूसरे धर्म के लाउडस्पीकर गिनाकर अपना शोर जारी रखते हैं, जो इतना अधिक होता है कि उनके ईश्वर भी शायद प्रतिमा की देह छोड़कर, धर्मस्थल छोड़कर दूर चले जाते होंगे, ताकि चैन से रह सकें। 

भारतीय लोकतंत्र में कानून का राज वहां से शुरू होता है जहां पर धर्म की मनमानी की आगे जरूरत नहीं रहती। धर्म का कारोबार जहां तक बढ़ाना है, वहां तक कानून को पांव रखने नहीं मिलता। दो दिन पहले उत्तरप्रदेश के एक मंत्री ने यह खुला फतवा जारी किया है कि सरकार उनकी है, सुप्रीम कोर्ट उनका है, इसलिए राम मंदिर बनने से कोई नहीं रोक सकता। इस बात में अनहोनी कुछ नहीं है, और सुप्रीम कोर्ट का भी इतना हौसला नहीं दिख रहा है कि इसकी चर्चा करते हुए नाराजगी जाहिर करने से अधिक कुछ करे। कायदे की बात तो यह होती कि इस मंत्री को बुलाकर सजा सुनाई जाती ताकि देश में बाकी नेताओं को सबक मिलता, लेकिन अदालतें अब ऐसा हौसला शायद खोती जा रही हैं। धर्म ने हिन्दुस्तान की जिंदगी के एक बहुत बड़े, बिल्कुल ही बेजरूरत हिस्से को, और पूरी तरह नाजायज अंदाज में कब्जा कर लिया है। इस कब्जे के बाद आम लोगों की तो जुबान ही सिल जाती है क्योंकि संगठित धार्मिक गुंडों की अराजकता और हिंसा का विरोध करने की ताकत किसी एक इंसान में कैसे रहे जब बड़े-बड़े नेता, बड़ी-बड़ी अदालतें भी ऐसी मनमानी को अनदेखा करने में ही अपनी हिफाजत मानती हैं। जब ताकतवर तबका अनदेखा करने में भरोसा करता है तो फिर आम जनता को भी आंख और कान बंद करके घर बैठने में ही सुरक्षा है। धर्म का ऐसा आक्रामक रूख आगे चलकर उसी को खत्म करेगा क्योंकि दुनिया के बहुत से सभ्य देशों में धीरे-धीरे नास्तिकों की गिनती बढ़ती जा रही है। 
-सुनील कुमार


Date : 12-Sep-2019

केन्द्र सरकार का लाया हुआ नया मोटर व्हीकल एक्ट बड़ी बुरी परेशानियों में फंसा दिख रहा है। इसके बहुत से प्रावधान लोगों की जुर्माना पटाने की ताकत से ऊपर दिख रहे हैं, और देश में कम से कम आधा दर्जन राज्य सरकारें इसे लागू करने के खिलाफ हैं, कुछ सरकारें, जिनमें भाजपा की गुजरात सरकार भी है, घटे हुए जुर्माने का अपना अलग नियम बना रही हैं, और छत्तीसगढ़ सहित कई सरकारें इसे लागू नहीं कर रही हैं। आम लोगों की समझ के लिए यह साफ कर देना जरूरी है कि देश की हर अदालत पर यह नया एक्ट लागू हो गया है, और अगर कोई मामला अदालत में जाता है तो वहां से नए जुर्माने ही लगाए जाएंगे, नई सजा ही सुनाई जाएगी। लेकिन राज्य सरकारें सड़कों पर अभी अपनी जनता के साथ रियायत बरत रही हैं, और समझौता शुल्क के एक प्रावधान के तहत कुछ सौ रूपए का जुर्माना लगाकर लोगों को छोड़ रही हैं। इस बारे में राज्यों और केन्द्र के बीच एक टकराव सामने आ गया है क्योंकि केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि राज्यों की सहमति से ही यह नया कानून बनाया गया है और राज्यों को इसमें फेरबदल का कोई अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ खुद गडकरी की पार्टी की गुजरात सरकार ने अपनी नई रियायती दरें लागू भी कर दी हैं। 

लोगों को याद होगा कि मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में जब आनन-फानन नोटबंदी लागू की, तो महीनों तक देश में अफरा-तफरी और अराजकता का माहौल रहा, अनगिनत लोग एटीएम की कतारों में या बिना इलाज अस्पतालों में मारे गए, और हर दो दिनों में रूपए जमा करने या निकालने के नियम बदले जाते रहे, और आखिर में जाकर यह पता लगा कि कालाधन रोकने के नाम पर हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए थे, और दो हजार के नए नोट शुरू किए गए थे, जो कि पूरे मकसद को ही शिकस्त देने वाले थे। न तो नकली नोट बनना बंद हुआ, न ही आतंकी हमले बंद हुए, और न ही किसी भी किस्म का कालाधन सामने आया। सारे के सारे नोट बैंकों में लौट आए और सरकार के मत्थे एक बड़ा खर्च लग गया। आज तक दुनिया के अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत नोटबंदी के वक्त चोट खाई अर्थव्यवस्था को अब तक सुधार नहीं पाया है, और उसकी वजह से जारी मंदी आज भी हिन्दुस्तान का नुकसान कर रही है। 

इसी किस्म से आधी रात की आजादी जैसा जलसा मनाते हुए मोदी ने जीएसटी लागू किया था, जो कि इतना बदहाल था और जिसकी तैयारी इतनी अधूरी थी कि अगले साल भर तक उसके नियमों और प्रावधानों में फेरबदल ही चलते रहा, और देश में उसकी वजह से छोटे-छोटे कारोबार बंद होने की नौबत आ गई, करोड़ों नौकरियों के खत्म होने का एक बड़ा कारण जीएसटी को भी माना गया, और आज तक जीएसटी में फेरबदल जारी है, और यह स्थापित हो चुका है कि बिना तैयारी, पूरी तैयारी से जीएसटी लागू करना देश को गड्ढे में डाल गया।

आम जनता को प्रभावित करने वाला यह तीसरा मामला है जिसमें नए ट्रैफिक जुर्माने और सजा को इस तरह लागू किया गया है कि खुद भाजपा के राज्य उसके खिलाफ हैं। हम ट्रैफिक को लेकर अधिक जुर्माने और सख्ती दोनों के हिमायती हैं, लेकिन जुर्माने की रकम जब पुरानी गाडिय़ों के दाम को पार कर जा रही है, तो ऐसे जुर्माने के बारे में पहले से सोचा जाना चाहिए था, और राज्यों को भरोसे में लेना चाहिए था। मोदी सरकार का यह आम बर्ताव हो गया है कि लोकसभा में अपने विशाल बहुमत की ताकत को देखते हुए, और देश में अपनी बहुत सी राज्य सरकारों को देखते हुए वह व्यापक असर वाले ऐसे कानूनों को देश पर आनन-फानन, रातोंरात थोप देती है, और उसके बाद महीनों तक, साल भर तक उसमें फेरबदल चलते रहते हैं। इस दौरान लोगों को जो तकलीफ होती है, उसका अंदाज सत्ता पर बैठे हुए लोगों को नहीं है। ट्रैफिक जुर्माने के मामले में राज्य सरकारों की असहमति की वजह से अब तक देश के बड़े हिस्से में इसे लागू नहीं किया गया है, और जहां इसे लागू किया गया है, वहां तो लोग गाडिय़ों को फेंककर चले जाने की नौबत के करीब आ रहे हैं। केन्द्र सरकार को बिना देर किए राज्यों के साथ बैठकर इसके बारे में फिर से सोचना चाहिए, और जुर्माना इतना लगाना चाहिए जिसे लोग बर्दाश्त कर सकें। कानून के कुछ जानकारों कायह भी मानना है कि कई किस्म के एक्ट नए मोटर व्हीकल एक्ट में रखी गई है जो कि नाजायज है, और लोगों ने इसे लेकर लेख भी लिखे हैं। इसलिए उस पहलू पर भी केन्द्र को राज्यों के साथ बातचीत करनी चाहिए। ऐसा लग रहा है कि इस कानून में कुछ फेरबदल की जरूरत है क्योंकि यह देश की जमीनी हकीकत को न समझकर आसमान छूते जुर्माने लगा रहा है। हम सख्त कानूनों और उससे भी सख्त अमल के हिमायती हैं, लेकिन जुर्माना कितना हो इस बारे में एक बार फिर से बात जरूरी लग रही है। 
-सुनील कुमार


Date : 11-Sep-2019

हिन्दुस्तान बड़े ही अजीब दौर से गुजर रहा है। उत्तरप्रदेश के उन्नाव में एक सत्तारूढ़-विधायक के बलात्कार की शिकार लड़की ने मुंह खोला, तो उसके पूरे परिवार को खत्म कर दिया गया, और वह मौत से लड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर दिल्ली के एम्स में भर्ती की गई है, और वहां पर उसका बयान दर्ज करने के लिए एक विशेष अदालत बनाकर आज वहीं पर काम किया जा रहा है। यह खबर महीनों से सुर्खियों में रही है, और एक सत्तारूढ़ विधायक किस हद तक, किस-किस तरीके से कानून के हाथों से बचाया जाता है, इस पर यूपी की योगी सरकार एक किताब लिख सकती है। एक दूसरा मामला लंबे समय से खबरों में है, और अब सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद यूपी की पुलिस उसे दर्ज करके उस पर कोई कार्रवाई करने के लिए तैयार हुई है, इस मामले में एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री रहे स्वामी चिन्मयानंद एक लड़की से लंबे समय तक बलात्कार की तोहमत के घेरे में हैं, और अब वह छात्रा वीडियो सुबूतों के साथ सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हुई है। यह सोचने की बात है कि इन दोनों ही मामलों में उत्तरप्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक और सांसद को बलात्कार के साफ-साफ मामले में बचाने के लिए सरकार किस हद तक जा सकती है, और देश की सबसे बड़ी अदालत को इसमें कैसे दखल देना पड़ रहा है। देश भर में हर दिन दर्जनों बलात्कार होते हैं, और उनमें सत्तारूढ़-ताकतवर बलात्कारियों को बचाने के लिए अगर राज्यों की सरकारें इसी तर्ज पर आमादा हो जाएंगी, तो बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के सामने खुदकुशी करने के अलावा और रास्ता क्या बचेगा? देश में औसतन हर महीने एक न एक खुदकुशी ऐसी भी हो रही है, और हो सकता है कि यह गिनती महीने में एक से अधिक भी हो। 

अब जब देश की सबसे बड़ी अदालत ऐसे कुछ मामलों में दखल दे रही है, और कुछ बरस पहले के देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार कांड के बाद देश में बनाए गए सैकड़ों करोड़ के एक फंड की रकम पड़ी हुई भी है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में सोच-समझकर साजिशन बलात्कारियों को बचाने की कोशिशों पर जिम्मेदार अफसरों को जेल भेजकर एक मिसाल कायम नहीं करनी चाहिए? आज तकरीबन पूरे देश में पुलिस का रूख बलात्कार की शिकार लड़की या महिला के लिए हिकारत का रहता है, और पुलिस हर जगह परिवार को समझाने से लेकर धमकाने तक में लग जाती है कि रिपोर्ट लिखाने से बदनामी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा। ऐसी धमकियों से पुलिस यह तो साफ कर ही देती है कि कम से कम इंसाफ तो हासिल नहीं होगा। और ऐसे ही एक मामले में अभी पिछले हफ्ते ही छत्तीसगढ़ में एक नाबालिग लड़की ने बलात्कार के बाद उसे एक सरकारी कार्यक्रम में पेश करने के बाद हताशा में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। 

हिन्दुस्तानी समाज बलात्कार को लेकर इस कदर संवेदनाशून्य हो गया है कि अभी पिछले हफ्ते छत्तीसगढ़ की नाबालिग बलात्कार-पीडि़त की इस खुदकुशी पर कोई चर्चा भी नहीं हुई, और एक सड़क हादसे की तरह यह खबर आई और चली गई। यह समाज बलात्कार को अपनी संस्कृति का एक हिस्सा मानकर चल रहा है, और बलात्कार की शिकार लड़की या महिला बेइंसाफी को ही अपनी नियति मानकर जीते जी मर जाती है या मरकर एक और खबर में एक दिन और जिंदा रह जाती है। हैरानी की बात यह है कि देश भर में बिखरे हुए लाखों पुलिस थानों और दसियों हजार अदालतों के रहते हुए भी देश की सबसे बड़ी अदालत को ऐसे एक-एक मामले में मुंह खोलना पड़ रहा है जिसमें अगर एक थाना अपनी जिम्मेदारी पूरी करता तो बात वहीं से सीधे जेल और अदालत चली गई होती। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे प्रदेशों, ऐसी सरकारों, और ऐसे जिलों के अफसरों को कटघरे में खड़ा करने की एक पहल करनी चाहिए, और ऐसी साजिश में भागीदारों की वर्दियां उतरनी चाहिए। आज देश का हाल इतना खराब है कि बहुत से लोग यह मनाते हैं कि उनकी बच्चियां न हों, और बहुत से गरीब-मजदूर मां-बाप यह सोचकर भी बाल विवाह कर देते हैं कि घर में बच्ची को कैसे अकेले छोड़कर काम पर जाएं। आज देश की सरकारें अपने पसंदीदा मुजरिमों को बचाने के लिए जिस तरह ओवरटाईम करते दिखती हैं, उसे देखते हुए कम से कम बलात्कार या महिला शोषण के दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट को उसी तरह एक जिम्मेदारी तय करनी चाहिए जिस तरह हर हिरासत मौत के बाद थाने के पुलिस वाले हटाए जाते हैं, और अनिवार्य रूप से दंडाधिकारीय जांच होती है। बलात्कार की हर रिपोर्ट के बाद ऐसी ही एक प्रक्रिया तय करनी होगी, वरना सत्ता और पुलिस मिलकर एक संगठित अपराधी गिरोह की तरह काम करते रहेंगे। 
-सुनील कुमार


Date : 10-Sep-2019

देश के बहुत से प्रदेशों में नेताओं और अफसरों के बीच के रिश्ते लोकतंत्र की भावना से खासे दूर के दिखते हैं। उत्तरप्रदेश में बहुत से आईपीएस अफसर मुख्यमंत्री के पैरों पर बैठे दिखते हैं, तो बंगाल में ममता बैनर्जी के साथ उनके कुछ मुंहलगे अफसरों का ऐसा ही हाल दिखता है। और यह हाल छोटे-छोटे ओहदों वाले अफसरों का नहीं है,  अखिल भारतीय सेवा के आईएएस-आईपीएस अफसरों का ऐसा हाल देखकर तरस भी आता है कि जिन्हें केंद्र सरकार की तरफ से जिंदगी भर की एक हिफाजत मिली हुई है, वे भी इस दर्जे की चापलूसी में लग जाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे नेता भी हैं जो कि अफसरों से बड़ी बदसलूकी करते हैं, उनके लिए मन में हिकारत रखते हैं, और इन दोनों तबकों के बीच परस्पर सम्मान खत्म कर बैठते हैं।

अभी कल छत्तीसगढ़ के एक बड़े सरल आदिवासी मंत्री, उद्योग और आबकारी विभाग देखने वाले नक्सल-बस्तर के कवासी लखमा का एक वीडियो तैरना शुरू हुआ जिसमें वे बहुत से बड़ों और बच्चों के बीच बैठकर किस्सागोई के अंदाज में एक बच्चे के सवाल का जवाब देते हुए कहते दिखते हैं कि बड़ा नेता बनने के लिए कलेक्टर-एसपी का कॉलर पकडऩा चाहिए। और ऐसा कहते हुए वे घूंसा चलाते हुए भी दिखते हैं जिस तरह कि कॉलर पकडऩे के बाद किसी को मुक्कों से मारा जाता है। अब कहने के लिए यह बात हँसी-मजाक कहकर टाली भी जा सकती है, लेकिन जब बच्चों के बीच यह बात कही जा रही है, तो कलेक्टर और एसपी जैसे ओहदों के लिए ऐसी हिकारत की बात महज मजाक करार नहीं दी जा सकती। यह सिलसिला ठीक नहीं है। लोगों को याद होगा कि कांगे्रस सरकार बनने के तुरंत बाद एक मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने उनके जिले में कलेक्टर रहे एक अफसर के बारे में कुछ इसी किस्म की हिकारत से बात कही थी, जिसका वीडियो उनके लिए दिक्कत भी बना था।

नेताओं और अफसरों के बीच लोकतंत्र में परस्पर सम्मान और परस्पर विश्वास का एक ऐसा संबंध रहना चाहिए जिसमें अनिवार्य रूप से दूरी भी हो, और दोनों के अधिकार और जिम्मेदारियों के अलग-अलग दायरे भी हों। अगर इन दोनों तबकों के बीच नियम-कायदे और जनहित से परे एक सांठ-गांठ हो जाती है, तो रिश्तों की उतनी मधुरता सरकारी खजाने और जनता के हित, दोनों का ही खासा नुकसान भी करती है। लेकिन इसके ठीक उल्टे अगर इन दोनों के बीच टकराव ही चलते रहता है, तो उसका नुकसान भी हमने छत्तीसगढ़ में हर दौर में देखा है। इसलिए लोकतंत्र में अलग-अलग तबकों के बीच रिश्तों और दूरियों का एक संतुलन बने ही रहना चाहिए। इस सिलसिले में मध्यप्रदेश के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की कही एक बात याद आती है जब मीडिया से जुड़े एक कार्यक्रम में संचालक ने कहा कि पटवाजी से मीडिया के बहुत ही मधुर संबंध हैं, तो अपनी बारी आने पर पटवाजी ने इसके जवाब में कहा था कि मीडिया से उनके कामकाज के ही संबंध हैं, कोई मधुर संबंध नहीं हैं, और होने भी नहीं चाहिए क्योंकि हम दोनों की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा था कि इन दोनों तबकों के बीच संबंध अगर मधुर हो जाएंगे, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। इसी तरह अफसरों और नेताओं के बीच संबंध औपचारिक और लोकतांत्रिक ढांचे के मुताबिक होना चाहिए, न तो एक-दूसरे के लिए कोई हिकारत होनी चाहिए, और न ही मोहब्बत। कल छत्तीसगढ़ के मंत्री ने चाहे जिस नीयत से अफसरों के बारे में ऐसी बात कही है, उसके लिए उन्हें अफसोस जाहिर करना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 09-Sep-2019

पूरे हिन्दुस्तान में आत्महत्या के औसत आंकड़े लाख लोगों पर 10.6 हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा इससे करीब पौने तीन गुना अधिक, 27.7 प्रति लाख आबादी है। यह आंकड़ा 2015 का है, और भारत सरकार के इकट्ठा किए गए आंकड़े इसके बाद के बरस में प्रकाशित नहीं हुए हैं। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ लंबे समय से किसान आत्महत्या की खबरों से चर्चा में रहता है, और हाल के बरसों में तो सरकार ने आत्महत्या के मामलों को राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के रिकॉर्ड में दर्ज करते हुए छत्तीसगढ़ की किसान-आत्महत्याओं को महज आत्महत्या लिखना शुरू कर दिया था, ताकि किसानों को दिक्कतें अधिक न दिखें, और सरकार को राजनीतिक असुविधा न हो।

10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस माना जाता है, और इस दिक्कत की तरफ ध्यान खींचने के लिए तरह-तरह से कोशिश की जाती है। हम हर बरस दो-चार बार आत्महत्याओं के खतरों पर लिखते ही हैं, और आज फिर लोगों को इस पर सोचने के लिए कुछ मुद्दे उठा रहे हैं। पूरे देश की अगर बात करें तो हिन्दुस्तान में इम्तिहान या पढ़ाई में नाकामयाबी की वजह से स्कूल-कॉलेज के बच्चों की आत्महत्या खबरों में बनी रहती है, प्रेम में असफल होने के बाद, या प्रेम के बाद शादी की इजाजत न मिलने की वजह से, किसी दूसरी जाति या धर्म में प्रेम हो जाने की वजह से भी हिन्दुस्तान में बहुत सी आत्महत्याएं हो रही हैं। यह तो गनीमत है कि इस देश के एक बड़े हिस्से में अब तक संयुक्त परिवार व्यवस्था चल रही है, और इस वजह से बेरोजगार रहते हुए भी नौजवान मां-बाप पर बोझ बनकर भी रह लेते हैं, और आमतौर पर खुदकुशी की कगार तक नहीं पहुंचते। लेकिन आत्महत्याओं से जुड़े कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर निराश और हताश लोगों के सोचने के साथ-साथ परिवार और समाज के आसपास के लोगों को भी सोचना चाहिए, और ऐसे लोगों का हौसला बढ़ाना चाहिए। 

जानकार लोगों का यह मानना है कि निराश और हताश लोग शुरू में तो अपने आसपास मदद ढूंढते हैं, लेकिन उन्हें सलाह नहीं मिलती तब वे कोई खतरनाक कदम उठाते हैं। इसलिए ऐसे में स्कूल-कॉलेज, परिवार, समाज, या दफ्तर में, दोस्तों के दायरे में अगर हौसला बंधाने वाले लोग मिल जाएं, तो आत्महत्याओं में कमी आ सकती है। यह भी समझने की जरूरत है कि आसपास के लोग हर बार कारगर नहीं हो सकते क्योंकि कुछ लोगों की हताशा इतनी अधिक हो सकती है कि उन्हें पेशेवर परामर्श, या मनोचिकित्सा की जरूरत हो, जिसकी कि हिन्दुस्तान में बहुत ही कमी है। अब धीरे-धीरे सरकार और कुछ गैरसरकारी संगठन इस तरफ जागरूक हो रहे हैं, और परामर्श केन्द्र खुल रहे हैं जिससे लोगों को मदद मिल सके। लेकिन इनकी जानकारी कम है, लोग पेशेवर मदद के लिए कहां जाएं, यह बताने वाले लोग नहीं मिलते। इसलिए सरकार और समाज के ढांचे में ऐसी जानकारी आसानी से उपलब्ध करानी चाहिए। 

आत्महत्याओं के पीछे एक वजह मीडिया में ऐसी तकलीफदेह खबरों का अधिक प्रमुखता पाना भी है। इस मोर्चे पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मीडिया में काम करने वाले लोग आत्महत्याओं को महज समाचार के महत्व से प्रकाशित करते हैं, और ऐसा करते हुए वे नहीं सोच पाते कि इन खबरों और ऐसी तस्वीरों या वीडियो से उन लोगों पर क्या असर पड़ता है जो अपनी तकलीफों के चलते खुदकुशी की कगार पर पहुंचे हुए हैं। ऐसी कोई भी खबर निराश-हताश लोगों के मन में इकट्ठा बारूद के लिए चिंगारी का काम करती है। इसलिए मीडिया में फैसले लेने वाले लोग यह भी सोच सकते हैं कि आत्महत्या की हर खबर के साथ क्या उस शहर या प्रदेश में उपलब्ध परामर्श के पते और फोन नंबर जैसी जानकारी भी दी जाए ताकि उन खबरों से प्रभावित होने वाले लोग खबर के साथ-साथ यह जानकारी भी पा सकें, और उन नंबरों या पतों पर संपर्क कर सकें, मदद पा सकें। आज एक बड़ी जरूरत मीडिया में काम करने वाले लोगों को संवेदनशील बनाने की भी है, और यहां पर सामाजिक संगठन मीडिया संस्थानों-संगठनों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं, साथ ही मीडिया की कक्षाओं में छात्र-छात्राओं को अभी से ऐसे मुद्दों पर संवेदनशील बनाना चाहिए ताकि आगे जाकर वे जब काम करें, तो संवेदनशीलता के साथ करें।

कोई भी आत्महत्या उस व्यक्ति के पूरे दायरे की एक नाकामयाबी होती है। दाम्पत्य जीवन के झगड़ों को घटाने में पड़ोसी और परिवार, दोस्त और रिश्तेदार मदद कर सकते हैं, निराश छात्र-छात्राओं की मदद स्कूल-कॉलेज के शिक्षक कर सकते हैं, और प्रेम-संबंधों में निराश लोगों की मदद के लिए समाज के सकारात्मक लोग पहल कर सकते हैं। लोगों की एक सामाजिक जिम्मेदारी भी होती है, और उसके तहत हर किसी को अपने आसपास की निराशा को घटाने का काम करना चाहिए। जहां तक किसानों की आत्महत्या की बात है, तो यह मामला मोटेतौर पर सरकार की कृषि नीति से जुड़ा हुआ रहता है, और सरकार पर इस बात का दबाव डालने में सबको मेहनत करनी चाहिए कि किसान को भी जिंदा रहने लायक फसल के दाम दिए जाएं। आत्महत्याओं को घटाने के लिए यह सालाना दिन महज कैलेंडर पर आकर गुजर नहीं जाना चाहिए, और हर किसी को अपनी पारिवारिक और सामाजिक, संस्थागत और मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए किसी भी निराश को देखने पर उसकी मदद करनी चाहिए, उससे बात करनी चाहिए, और उसे परामर्श केन्द्र या परामर्शदाता तक पहुंचाने की जहमत उठानी चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को यह सोचना चाहिए कि 2015 के ये आंकड़े बाकी देश से पौने तीन गुना क्यों हैं? और हो सकता है कि इस बरस कर्जमाफी और फसल के अधिक दाम की वजह से जब कुछ बरस बाद 2019 के आंकड़े आएंगे, तो वे इतने डरावने नहीं रहेंगे। एक आखिरी बात यह कि समाज को नौजवान पीढ़ी के प्रेम और विवाह को लेकर अपनी दकियानूसी सोच खत्म करनी चाहिए जिसके बिना सरकार आत्महत्याओं को घटा नहीं सकेगी।
-सुनील कुमार

 


Date : 08-Sep-2019

छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ऐसा बवंडर आया हुआ है जो कि अमरीका में रिकॉर्ड किए गए कुछ वीडियो में ही अब तक देखने में आता था, जो कि अपने दायरे में आने वाली कारों तक को उड़ा ले जाता है, मकानों को तबाह कर देता है। पिछले कुछ समय से, या यूं कहें कि प्रदेश में कांग्रेस सरकार आने के बाद से, जितने किस्म की जांच शुरू हुई है, और पहले से चल रही जांच जिस तरह आगे बढ़ी है, उसने हर कुछ दिनों में राज्य के लोगों को हक्का-बक्का कर दिया है। पिछली रमन सरकार के वक्त के कुछ ताकतवर लोगों ने सत्ता के इस्तेमाल से जो मनमाने काम किए थे उनकी शुरूआती जांच से ही गड़बडिय़ां तो सामने आ रही हैं, लेकिन गड़बड़ी करने वाले तमाम लोग दिग्गज वकीलों के साथ अदालत पहुंचकर वक्ती राहत भी पाते जा रहे हैं। खैर, जिनकी ताकत रहती है वे अदालत का काफी दूर तक ऐसा मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन जो शुरूआती जानकारी लोगों की नजरों में आ रही है, उससे सभी को यह समझ आ रहा है कि किसी को भी अपनी सत्ता अंतहीन नहीं माननी चाहिए, और सरकारी मशीनरी के पुर्जों को किसी भी वक्त अपने ऊपर के लोगों के तहत गलत काम नहीं करना चाहिए वरना आगे-पीछे कोर्ट-कचहरी और जेल तय है। 

अब कल ही अंतागढ़ में खरीदे या बेचे जाने वाले कांग्रेस विधानसभा उम्मीदवार मंतूराम पवार ने अदालत में एक हलफिया बयान दर्ज कराकर खलबली मचा दी है कि पिछली भाजपा सरकार के मंत्री-मुख्यमंत्री और जोगी पिता-पुत्र ने कुछ दलालों के साथ मिलकर उन्हें बेच डाला था, और साढ़े सात करोड़ के ऐसे सौदे में से उनके हाथ कोई रकम नहीं आई थी। पिछले बरसों में जब इस खरीद-बिक्री की रिकॉर्डिंग सामने आई थी, तो आवाजों से प्रदेश के हर किसी को यह पक्का मालूम हो गया था कि ये कौन लोग हैं, और क्या धंधा कर रहे हैं। लेकिन अदालती तिकड़मों से हिन्दुस्तान में लंबा समय खरीदा जा सकता है, और अभी वही दौर जारी है कि इस रिकॉर्डिंग की सभी आवाजें अपने आपको बचाकर चल रही हैं, और अदालत में आवाज देने से इंकार कर रही हैं। कैसी दिलचस्प बात है कि जो लोग अपने आपको जनता की आवाज कहते हैं, जो अपने फैसलों को अंतरात्मा की आवाज कहते हैं, उनके गले से अदालती कटघरे में आवाज ही नहीं निकल रही है। आवाज का नमूना देने से बचते हुए बड़े-बड़े नेता कल के मंतूराम पवार को अदालती-बयान से एक नई परेशानी में आ गए हैं, लेकिन बड़े-बड़े वकील बड़ी-बड़ी परेशानियों को टालने या खत्म करने के लिए ही तो बड़ी-बड़ी फीस लेते हैं। 

इधर एक दूसरे मोर्चे पर जोगी पिता-पुत्र जाति प्रमाणपत्र के मामले में फंस गए हैं, और उनका आदिवासी होना फिलहाल खतरे में पड़ गया है, बल्कि रद्द हो गया है। इसके बाद पुलिस में रिपोर्ट, जेल, जमानत, अस्पताल, यही दौर चल रहा है, और यह नौबत राज्य की राजनीति के बवंडर में एक और धूल भरा अंधड़ जोड़ रही है। लोग इस बात पर भी हैरान हैं कि जोगी पिता-पुत्र की कितने अदालती मामलों से जिंदगी भर जूझने की ताकत है। राजनीति में दिलचस्पी लेने वाली मौजूदा नौजवान पीढ़ी ने तो जन्म से ही जोगी परिवार को अदालती कटघरों में ही देखा है, और ऐसे मौके पर लोगों को 2003 का वह चुनाव याद पड़ता है जब भाजपा विधायकों को तोड़कर, खरीदकर, भाजपा सरकार बनने से रोकते हुए उस वक्त के कार्यकारी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बस्तर के तत्कालीन भाजपा सांसद बलीराम कश्यप से मोलभाव किया था, और उस कथित बातचीत की रिकॉर्डिंग हाल ही में गुजरे अरूण जेटली ने रायपुर की प्रेस कांफ्रेंस में सुनाई थी। वह भी बस्तर के सांसद से मोलभाव की रिकॉर्डिंग थी, और अभी ताजा रिकॉर्डिंग भी बस्तर के एक नेता से मोलभाव की रिकॉर्डिंग है। 

किसी भी एक खास मामले की चर्चा किए बिना हम सैद्धांतिक रूप से यह कहना चाहते हैं कि जो लोग मंच और माईक से अपनी बुलंद आवाज लोगों तक पहुंचाते हैं, जो लोग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दर्जन-दर्जन भर माईक के सामने दहाड़ते हैं, ऐसे किसी भी व्यक्ति को अपनी आवाज का नमूना देने से पीछे नहीं हटना चाहिए, अदालत में बचने की तिकड़मों को पेशेवर मुजरिमों के इस्तेमाल के लिए छोडऩा चाहिए। छत्तीसगढ़ में आज भांडाफोड़ हो रहे, या किसी नतीजे पर पहुंच रहे अधिकतर मामले पिछली भाजपा सरकार के वक्त के हैं, और इनमें से कई मामले जोगी परिवार से जुड़े हुए हैं। अदालतों से परे भी नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए। वैसे तो हर इंसान को, और हर मुजरिम को अपने बचाव के लिए कानून को तोड़-मरोड़कर अधिक से अधिक समय तक बेअसर रखने का पूरा लोकतांत्रिक हक रहता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन के नेताओं को अपने कामकाज के बारे में जनता के प्रति सीधे जवाबदेह भी रहना चाहिए, और यह रूख छोडऩा चाहिए कि जब जनता की अदालत में हारें, तो कानून की अदालत का सहारा लें, और जब कानून के कमजोर हाथ चाहे-अनचाहे उन तक पहुंच ही जाएं, तो वे जनता की अदालत का सहारा लें। लोगों में इतनी गैरत बाकी रहनी चाहिए कि वे जनता के बीच जवाब दें। आज जिस तरह की लुकाछिपी चलती है उससे किसी की लिखी यह लाईन याद पड़ती है- तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...। सार्वजनिक जीवन के लोगों को अदालतों से परे भी जवाबदेह रहना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 07-Sep-2019

राजस्थान के सबसे चर्चित सती-प्रकरण, रूपकुंवर के मामले की सुनवाई 32 बरस तक चलते-चलते अब जयपुर की विशेष अदालत में आखिरी दौर में दिख रही है। अगले हफ्ते इस पर सुनवाई आगे बढ़ेगी, इस बीच उसे सती बनाने के लिए आरोपी ठहराए गए गिरफ्तार 45 लोगों में से 25 लोग रिहा हो गए हैं, 6 लोग मर गए हैं, और 6 लोग लापता हैं। बाकी लोगों का भी पता नहीं फैसले तक क्या होगा। कुल मिलाकर रूपकुंवर के सती होने के बाद डेढ़ पीढ़ी गुजर चुकी है, और इस अदालत के फैसले के बाद हो सकता है कि एक-डेढ़ पीढ़ी और लग जाए तब जाकर सुप्रीम कोर्ट से कोई आखिरी फैसला हो। लेकिन इस एक मामले पर लिखना आज का मकसद नहीं है, एक दूसरा मामला और आया है जिसकी वजह से इस पर लिखने की जरूरत लग रही है। अभी राजस्थान मानवाधिकार आयोग राज्य सरकार के लिए एक आदेश जारी किया है और कहा है कि वह लिव इन रिलेशनशिप पर रोक लगाए। आयोग का कहना है कि ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाएं रखैल जैसी होती हैं। 

रूपकुंवर को सती किए गए 30 बरस से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन राजस्थान में मर्दाना सोच का वही हाल है जो कि 30 बरस पहले था। पति के मर जाने के बाद पत्नी को साथ में जिंदा जला देना, और यह जाहिर करना कि उसने अपनी मर्जी से जान दी है, और फिर उस तथाकथित त्याग को महिमामंडित करना, यह पूरे देश में राजस्थान के ही बस का है। इसके साथ-साथ इस प्रदेश में जो मानवाधिकार आयोग बनाया गया है वह सुप्रीम कोर्ट के हाल ही के बरसों के कई फैसलों के खिलाफ जाकर बात कर रहा है, और साथ रहते गैरशादीशुदा जोड़ों में से लड़की या औरत को रखैल जैसी गाली देना किसी भी मानवाधिकार आयोग के लिए तो शर्मनाक बात है ही, किसी भी सभ्य समाज में भी ऐसी भाषा मंजूर नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने साथ रहने वाले जोड़ों के हक पूरी तरह से कानूनी माने हैं, और इसके लिए शादी की बंदिश पूरी तरह गैरजरूरी करार दी है। देश का कोई भी कानून बालिग लोगों को साथ रहने से नहीं रोकता, और देश के महानगरों में यह एक आम बात है। ऐसे में इक्कीसवीं सदी का कोई मानवाधिकार आयोग ऐसी ओछी और घटिया बात न सिर्फ कहे, बल्कि सरकार को ऐसा आदेश जारी करे, यह बात अपने आपमें इस आयोग को भंग कर देने के लिए पर्याप्त आधार है। सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इसका संज्ञान लेना चाहिए, और इस आयोग को तुरंत भंग करना चाहिए, वैसे तो राजस्थान की कांग्रेस सरकार खुद भी यह काम कर सकती है, फिर चाहे इसके लिए जो वैधानिक प्रक्रिया अपनानी पड़े। 

हिन्दुस्तान के बहुत से हिस्से में महिला के लिए ऐसी ही हिकारत की जुबान इस्तेमाल होती है। रखैल शब्द की बुनियाद रखने से जुड़ी हुई है। जिस तरह कोई मर्द अपने पास किसी सामान को रख सकता है, उसी तरह औरत-मर्द के रिश्तों में यह मान लिया जाता है कि मर्द ने औरत को रख लिया है। यह समझने की जरूरत है कि इस भाषा में रखैला जैसा कोई शब्द क्यों नहीं है जबकि कई मामलों में कोई महिला अधिक संपन्न हो सकती है, और वह अपने साथी मर्द का खर्च उठा सकती है। ऐसा होने पर भी गाली जैसा शब्द महज औरत के लिए ही गढ़ा जाता है, और गढ़े जाने के सैकड़ों बरस बाद वह औरत के खिलाफ 21वीं सदी में भी प्रचलित रहता है। 

राजस्थान मानवाधिकार आयोग को देश भर में खूब धिक्कारा जाना चाहिए, और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से अपील करनी चाहिए कि वह इस आयोग को बर्खास्त करे। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Sep-2019

देश में लागू हो चुके नए ट्रैफिक कानून का असर अभी अदालतों में देखने मिल रहा है जहां पहुंचने वाले मामलों पर नए जुर्माने के हिसाब से लंबा-चौड़ा भुगतान करना पड़ रहा है। देश के कई राज्यों में सड़कों पर भी इसी को लागू कर लिया है, और जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि किसी दुपहिया पर 23 हजार, और किसी ट्रैक्टर पर पौन लाख का जुर्माना लगाया गया है। छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य ऐसे हैं जहां राज्य सरकारें सड़कों पर जुर्माने के नए रेट लागू करने के बजाय समझौता शुल्क किस्म की पुराने रेट की वसूली कर रही है, और लोग अभी तक सस्ते में छूट रहे हैं। नए कानून के हिसाब से भारी-भरकम हजारों का जुर्माना तो दूर रहा, छत्तीसगढ़ में पुलिस पुराने कानून के हिसाब से भी पूरा जुर्माना नहीं कर रही है, और मामूली सौ-दो सौ का समझौता शुल्क लेकर छोड़ रही है। सरकार का यह रूख लोगों को अच्छा लग सकता है क्योंकि नया जुर्माना चुकाना सबके बस का नहीं है। 

लेकिन यहां पर एक बात को समझने की जरूरत है कि कागजात लेकर चलने, नंबर प्लेट सही रखने, बीमा करवाकर चलने, हेलमेट या सीट बेल्ट लगाकर चलने, और गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात न करने की बंदिशों में क्या गलत है? सरकारें अगर अपनी जनता को लुभाने के लिए ऐसी मामूली बातों पर अमल से भी लोगों को छूट देना चाहती हैं, तो वह निहायत ही गलत बात है। ये जुर्माने ऐसे नहीं हैं कि जो सावधान लोगों पर भी कभी लगें। ये ऐसे ही हैं जो कि अपनी मर्जी से कानून तोडऩे वाले लोगों पर ही लग सकते हैं। अब अगर पूरे देश का मिजाज यही बनाकर रखना है कि वे कानून तोड़ें, खुद लापरवाही बरतें, और दूसरों की जिंदगी खतरे में डालें, तो हमारा ख्याल है कि ऐसी छूट देने का कोई हक किसी सरकार को भी नहीं मिलना चाहिए कि सोच-समझकर अपनी मर्जी से नियम तोडऩे वालों पर भी जुर्माना न लगे। यह सिलसिला लोगों को न सिर्फ सड़क पर ट्रैफिक के मामले में, बल्कि बहुत से दूसरे मामलों में भी नियमों को तोडऩे के लिए हौसला देता है जिससे देश में एक अराजकता की नौबत आती है। 

हम आम लोगों के बीच नियमों की हिकारत के बहुत से खतरे देख रहे हैं। अब लोग इलाज करने वाले उस डॉक्टर को ही मार डाल रहे हैं जिसने कि उस बीमार के लिए अपना खून भी दिया था। भीड़ जगह-जगह लोगों को किसी भी शक में, कोई भी आरोप लगाकर मार रही है, और ऐसी हत्याएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे देश में लोगों के मिजाज को रियायतें देकर अराजक बनाने के खतरे दूर तक जाएंगे, और आने वाली पीढ़ी को भी खतरे में डालेंगे। इसलिए जुर्माने की रकम कम या अधिक हो, इतने पर ही बहस होनी चाहिए, जुर्माना न हो, या महज प्रतीकात्मक जुर्माना हो, यह नहीं होना चाहिए। नियम-कायदे को मानकर चलने वाले लोगों को एक सुरक्षित सड़क का पूरा हक है, और नियम तोडऩे वाले लोग अपने साथ-साथ दूसरों की मौत की नौबत भी लाते हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार में या ऐसे दूसरे प्रदेशों की सरकारों में बैठे हुए लोगों को अधिक रियायत के बारे में नहीं सोचना चाहिए। दुनिया के जिन देशों में बड़ा जुर्माना और कड़ी सजा लागू है, वहां पर लोग ट्रैफिक नियम तोडऩे के पहले कई बार सोचते भी हैं। हो सकता है कि नए कानून में लगाए गए जुर्माने के हिसाब से लोग जिम्मेदार नहीं हो पाए हैं, लेकिन इन्हें कुछ हफ्ते का समय देकर राज्य सरकारों को कानून लागू होने देना चाहिए जो कि आज अदालतों तक सीमित रखा गया है। सड़क पर खतरे खड़े करना सोशल मीडिया पर ही मजाक की बात हो सकता है, लेकिन असल जिंदगी में इससे बेकसूर मौतें होती हैं। बड़ी-बड़ी महफूज गाडिय़ों में चलने वाली सत्ता को सड़क के गरीबों की मौतों का सामान जुटाने का कोई हक नहीं हो सकता, और राज्य सरकारों को जनता को लुभाने के बजाय जनता को जिम्मेदार बनाना चाहिए। शुरुआती जुर्माने से कुछ लोगों का दीवाला भी निकल सकता है, लेकिन एक बात तय है कि लोग मामूली बातों पर अमल करके चलेंगे, तो उन्हें कभी बड़ा जुर्माना नहीं होगा। छत्तीसगढ़ की अदालत में दस-दस हजार रूपए जुर्माना लगा दिया है, और ऐसे कुछ शुरुआती लोगों की बलि के बाद हो सकता है कि आगे बाकी लोगों को ज्ञान प्राप्त हो।
-सुनील कुमार


Date : 05-Sep-2019

फेसबुक पर दूसरे देशों के लोगों से ताजा-ताजा दोस्ती और मोहब्बत के नाम पर हिन्दुस्तान में आदमी तो कम लुट रहे हैं, औरतें अधिक लुट रही हैं। अपने आसपास के प्रदेशों को देखें, तो अधेड़ उम्र की, शादीशुदा, पढ़ी-लिखी, सरकारी नौकरी वाली, या संपन्न परिवारों की महिलाएं दसियों लाख रूपए गंवा दे रही हैं, और उसके बाद जाने किस तरह की और कितनी झिझक के साथ पुलिस में जाकर यह पूरा बखान कर रही हैं। यह सिलसिला नाइजीरिया के या किसी और देश के ठगों के बारे में सोचने का नहीं है, हिन्दुस्तानी समाज में शादीशुदा-अधेड़ महिलाओं के इस हैरतअंगेज रूख का है जिसकी कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकते थे। आमतौर पर हिन्दुस्तानी शादीशुदा महिला को अधिक जिम्मेदार माना जाता है, और शादीशुदा मर्द तो फिर भी किसी सस्ते विदेशी सफर पर जाकर मालिश-पॉलिश करवाकर आ जाने की चर्चा में रहते हैं, लेकिन महिलाओं से समाज अधिक जिम्मेदारी की उम्मीद करता है। अभी जो हाल सामने आ रहा है वह गिनती में भले कम हो, लेकिन नौजवान बच्चों की माताएं भी जिस तरह से ऐसे प्रेमजाल में फंस रही हैं, और आर्थिक नुकसान के साथ-साथ शर्मिंदगी भी झेल रही हैं, पूरे का पूरा परिवार तनाव में पड़ रहा है, और शायद टूटने का खतरा भी झेल रहा है, उसे देखते हुए इस पर समाजशास्त्रीय नजरिए से गौर करना चाहिए। 

किसी अनदेखे मर्द के मोह में इस हद तक पड़ जाना इन महिलाओं की जिंदगी में एक बड़े से शून्य का सुबूत दिखता है कि वे अपनी पारिवारिक स्थिति, वैवाहिक स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है, और उन्हें बाहर एक महत्व, एक मोहब्बत की तलाश की जरूरत लग रही है। जिन परिवारों में ऐसे हादसे हो गए हैं, उन परिवारों से परे भी बाकी लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि परिवार के भीतर एक-दूसरे का ऐसा ध्यान कैसे रखा जाए कि लोग ऐसे जाल में न फंसें। वैवाहिक जीवन में भावनात्मक और शारीरिक संतुष्टि से लेकर परस्पर सामाजिक सम्मान जैसी बहुत सी बातें हैं जो कि पति-पत्नी को एक-दूसरे के बारे में सोचनी चाहिए, और परिवार के बाकी लोगों को भी घर की छत के नीचे परस्पर सम्मान का एक वातावरण रखना चाहिए। भारतीय समाज के खासे बड़े हिस्से में शादीशुदा महिला को एक-दो बच्चों के बाद घर चलाने वाली मान लिया जाता है, जो कि सही नौबत नहीं है। आज फिल्म, टीवी, अखबार, और सोशल मीडिया के चलते हर किसी को दुनिया भर में बिखरे हुए सपनों को देखना तो नसीब है ही, और ऐसे में जब अपने जीवन-साथी से कोई निराशा हो, दाम्पत्य जीवन में कोई बड़ी कमी हो, और बाहर किसी अनजाने से बहुत सा महत्व मिल रहा हो, तो लोग राह से इस तरह भटक भी जाते हैं, और खतरों में पड़ जाते हैं, बड़ा नुकसान पा जाते हैं। 

परिवार के सभी पीढिय़ों के लोगों को मिलकर इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि परिवार के हर सदस्य को भावनात्मक सहयोग और समर्थन मिलता रहे, आपसी सम्मान और महत्व मिलता रहे, और एक-दूसरे की उम्मीदों को जहां तक मुमकिन हो वहां तक पूरा करने की कोशिश की जाए, या कम से कम इस बात की चर्चा भी की जाए कि क्या-क्या मुमकिन नहीं है। जीवन में अगर शारीरिक या मानसिक प्यास बनी हुई है, तो उसे अनदेखा करके किसी को यह सलाह नहीं दी जा सकती कि वे ब्रम्हचारी साधु-साध्वियों की तरह अपने आप पर काबू रखें। लोगों को इस तरह के काबू की न तो आदत होती है, और न ही किताबों से परे ऐसी कोई काबू हो सकते हैं। हर कुछ महीनों में तो किसी न किसी धर्म के, किसी आध्यात्मिक सम्प्रदाय के ऐसे ब्रम्हचारी के किस्से सामने आते ही हैं जो बताते हैं कि सांसारिक जीवन को छोड़कर ईश्वर की राह पर बढ़ते हुए भी कैसे नजर हटी, दुर्घटना घटी जैसी नौबत आती ही रहती है। और सामने आने वाले हर किस्से से सौ-सौ गुना अधिक किस्से ऐसे रहते होंगे जो कि सामने नहीं आते हैं। ठीक इसी तरह फेसबुक पर अनजानी चाह के पीछे दौड़ पडऩे वाले लोगों के जो मामले सामने आते हैं उससे हजारों गुना अधिक मामले ऐसे रहते होंगे, और इन खतरों को टालने का तरीका परिवार के भीतर ही ढूंढा जा सकता है, बाहर नहीं। 
-सुनील कुमार