संपादकीय

18-May-2020

ये तस्वीर देखकर भी सरकारें नहीं लजाएंगी जानता हूँ। ये दो गरीब बच्चे नंगे पांव गरीब भूखों को खाना बांट रहे हैं। उचेहरा (मध्यप्रदेश) रेलवे क्रॉसिंग पर रूकी गाडिय़ों व पैदल जाते प्रवासी मजदूरों को भोजन के पैकेट बांटते ये दो बच्चे भूखे राहगीरों से कुछ यूं पूछते हैं- खाना चाहिए जी? कुछ खा लीजिए, पैसे नहीं लगेंगे!
-तस्वीर और टिप्पणी सुशील मानव ने फेसबुक पर पेश की

कम से कम उन्हें देखकर ही 
और लोग कुछ सीख जाएं

हमारे आसपास और दूसरी जगहों पर लोगों की मदद करने के लिए बाहर निकले हुए लोगों की तारीफ में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं। लेकिन मुसीबत और खतरे की ऐसी घड़ी में अगर तारीफ के लायक कुछ बातों का दुबारा भी जिक्र हो जाए तो क्या हर्ज है? आज सुबह छत्तीसगढ़ के रायपुर में मंजीत कौर बल नाम की सामाजिक कार्यकर्ता ने फेसबुक पर पोस्ट किया है कि जिन कॉलोनियों या इमारतों में लोगों के पास पानी की खाली बोतलें हों वे 20 बोतलों में पानी भरकर इन नंबरों पर फोन करें, तो बोतलें ले जाकर शहर के सिरे पर मजदूरों के जमघट को दे दी जाएंगी ताकि आगे के सफर में उनके पास पानी रहे, और बोतल रहे। पानी की खाली बोतलें हर संपन्न परिवार में एक बोझ होती हैं, लेकिन खाते-पीते परिवारों के कई नौजवान, कई आदमी, कई महिलाएं, और कई बुजुर्ग रात-दिन मजबूर-मजदूरों के लिए इस कदर लगे हुए हैं कि मानो उनके अपने घर में आग लगी है। भोपाल में एक अधेड़ या बुजुर्ग दिखतीं लेखिका तेजी ग्रोवर रात-दिन छत्तीसगढ़ के मजदूरों के लिए लगी हुई हैं कि उन्हें खाना पहुंच जाए, अनाज पहुंच जाए, वे पैदल छत्तीसगढ़ रवाना न हों, वे पागलों की तरह सोशल मीडिया पर मदद की अपील करती हैं, मदद जुटाती हैं, और अपने परिचितों को लेकर हर किस्म के इंतजाम में लगी हुई हैं। इस मुद्दे पर आज लिखना दो बातों से सूझा है जिसमें से एक 20 मिनट पहले तेजी ग्रोवर का फेसबुक पोस्ट है कि गाजियाबाद के दोस्तों तुरंत संपर्क करो, हम लोग छत्तीसगढ़ के मजदूरों के एक समूह को वहां रोकने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे पैदल रवाना न हों, उनके लिए गाड़ी का इंतजाम कर रहे हैं। उसके पहले उन्होंने अपने किसी परिचित का नाम लेकर लिखा कि तुरंत संपर्क करो, छत्तीसगढ़ के मजदूर विजय नगर चौराहे पर हैं, और उन्हें पैदल वापिस नहीं आने देना है, उनके लिए इंतजाम कर रहे हैं। लेकिन इससे इन कोशिशों से कुछ अधिक विचलित करने वाली एक तस्वीर मध्यप्रदेश की है जिसमें ऊचेहरा नाम की जगह पर दो गरीब बच्चे नंगे पांव सड़क के बीच खड़े हैं और आते-जाते मजदूरों को पूछ-पूछकर खाने के पैकेट बांट रहे हैं, और बता भी रहे हैं कि पैसे नहीं लगेंगे। 

एक तरफ रायपुर में एक महिला शाम सात से रात दो तक मजदूरों के जमघट के बीच इंतजाम में लगी है, अपने तमाम परिचितों को झोंककर रखा है, विचलित होकर कभी सरकार के खिलाफ लिख रही है, तो कभी सरकार के अच्छे काम की तारीफ में लग जाती है। कुल मिलाकर वह पल-पल इन मजदूरों की मदद करने में लगी है जिनकी मदद इस देश की सरकारें ठीक से नहीं कर पा रहीं, लोकतंत्र बिल्कुल नहीं कर पा रहा है। ऐसी कहानियां जगह-जगह है। कृष्ण कांत नाम के एक पत्रकार ने दो-तीन दिन पहले की एक तस्वीर पर दर्द के साथ लिखा है कि किस तरह सूरत से उत्तरप्रदेश रवाना हुए दो कपड़ा-मजदूर रास्ते में एक की तबियत बिगडऩे पर एक साथ उतर गए। बाकी मजदूरों ने साथ नहीं दिया, और वे ट्रक में आगे बढ़ गए। दोस्त की मदद करते हुए अस्पताल ले जाकर तमाम कोशिशों के बावजूद जब वह मर गया, तो उस हिन्दू नौजवान के साथ सिर्फ उसका वह मुस्लिम दोस्त मौजूद था। 

यह सब जिस वक्त हो रहा है उस वक्त उत्तरप्रदेश में थानेदार नोटिस जारी करके सड़क के किनारे के घरवालों को लिख रहा है- एक नोटिस जारी कर रही है सड़क किनारे के कई घरवालों को लिखा गया है- प्राय: देखने में आ रहा है कि आपके द्वारा पैदल चल रहे प्रवासी मजदूरों को अपने आवास के सामने रोक लिया जाता है। इस आशय की गोपनीय जानकारी प्राप्त हुई है कि आपके द्वारा रास्ते में मजदूरों को अपने आवास पर खाने-पीने की वस्तुओं की लालच देकर बुलाया जाता है। इससे कोविड-19 के नियमों का उल्लंघन हो रहा है। आप सचेत हों, भविष्य में आपके द्वारा इस प्रकार करने पर महामारी अधिनियम के अनुसार आपके विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही की जाएगी। 

अब सवाल यह है कि राह चलते मजदूरों को कोई क्या लालच देकर अपने घर बुला लेंगे, और उन्हें खिला-पिलाकर उनसे क्या हासिल कर लेंगे? उनके पास मेहनत से कमाया हुआ टूटा-फूटा, फटा-पुराना जो कुछ था, वह सब तो पूंजीवाद, लोकतंत्र और सरकार ने मिलकर पूरी तरह लूटा हुआ है, उनके पास से लूटने के लिए अब और क्या निकल सकता है? अगर हजार मील के सफर पर चलते मजदूर परिवारों कोई रोककर खाना खिला रहे हैं, कुछ पल बैठने की जगह दे रहे हैं, तो उस पर उत्तरप्रदेश की योगी सरकार की पुलिस का यह रूख है! यह हाल तब है जब सरकारों ने अधिकतर जगहों पर लोगों को ठीक उसी तरह बेसहारा छोड़ दिया है जिस तरह आमतौर पर गाय-बकरियों के मालिक उन्हें घूरों पर खाने के लिए छोड़ देते हैं। इन मजदूरों की ऐसी हालत के बीच भी अगर आम लोगों के बीच से निकलकर महान लोग सामने आ रहे हैं, और अपनी महानता की कोई तस्वीर छपवाने नहीं आ रहे, तो उस बीच सरकारों में जो संवेदनशीलता होनी चाहिए, वह कम से कम उत्तरप्रदेश सरकार के इस नोटिस में तो नहीं है।

लेकिन आज देश भर में जगह-जगह जिस तरह बिना किसी प्रचार के लालच के लोग खतरे में पड़कर भी लोगों की मदद करने में रात-दिन लगे हैं, कहीं एक कोई मुस्लिम आदमी है जो लावारिस छोड़ दी गई हिन्दू, मुस्लिम तमाम किस्म की लाशों को उनके धार्मिक रीति-रिवाजों के मुताबिक निपटा रहा है, बहुत सी जगहों पर लोग अपने धर्मस्थान दूसरे धर्म के लोगों के लिए खोलकर, खाना खिलाने के लिए बैठे हैं, इन सब बातों से हिन्दुस्तान के बेहतर इंसानों का पता लगता है, और यह भी पता लगता है कि सरकारों में बैठे बहुत से लोग, बहुत सी सरकारें ऐसी बेहतर बातों से ठीक उतनी ही दूर हैं जितनी दूर मजदूर अपने घरों से हैं। लोगों के समर्पण, लोगों के हौसले, लोगों के नि:स्वार्थ त्याग, और लोगों के सरोकार, इन सब पर भी बार-बार चर्चा होनी चाहिए क्योंकि लोगों में भलमनसाहत के बारे में जिस तरह से भरोसा खत्म हो चुका है, उस भरोसे का वापिस आना, और कायम होना भी जरूरी है। यह दुनिया अब तक चाहे जिस किसी झांसे में जी रही थी, कोरोना ने हिन्दुस्तान में यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र, या देश की सरकार सबसे गरीब के सबसे नाजुक वक्त में उससे हजार मील दूर बैठी हुई है, और दिल्ली में अपने ऐशोआराम की खूबसूरती बढ़ाने के लिए 20 हजार करोड़ रूपए मंजूर करके बैठी है, उसे खर्च करने पर आमादा है। देश के गरीबों को यह समझ आ गया है कि उनकी जगह सरकारों के लिए पांच बरस में एक बार पोलिंग बूथ के बाहर तो है, लेकिन उससे अधिक कुछ नहीं है। ऐसे में कुछ राज्य सरकारें अच्छा काम कर रही हैं, और यह बात भी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होगी। फिलहाल हम यह चाहते हैं कि जो लोग तरह-तरह के गढ़े हुए झूठ फैलाकर नफरत बढ़ाना चाहते हैं, उनके बीच कम से कम कुछ जिम्मेदार लोग तो बेहतर और महान इंसानों के त्याग के बारे में बाकी लोगों को बताएं, हो सकता है कि बाकियों में से कुछ को इससे प्रेरणा मिले, और हो सकता है कि बाकी में से कुछ ऐसे में घर बैठे शर्म खाकर चुल्लू भर पानी में डूब मरें। ऐसे लोगों के मरने से भी धरती पर से बोझ ही कम होगा। 

आज सोशल मीडिया गिनती में चाहे कम हो, लेकिन भले और सरोकारी लोगों की वजह से मानवता कही जाने वाली इस खूबी की कहानियां देख रहा है। इनसे सीखकर लोगों को खुश तो करना चाहिए। और कुछ नहीं तो सूखे बिस्किट और पानी की घर में भरी हुई साफ बोतलों को लेकर राह पर निकल पड़ें, और जहां जो दिखे उससे पूछते चलें, उसे देते चलें। ऐसे अनगिनत वीडियो सामने आए हैं जिसमें मजदूर सैकड़ों किलोमीटर बाकी सफर के लिए भी जरूरत से अधिक बिस्किट-पानी लेने से मना कर रहे हैं। कम से कम उन्हें देखकर ही और लोग कुछ सीख जाएं। 

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17-May-2020

मजदूर के मुकाबले कहां 
टिकेगा ईश्वर, साफ नहीं

देश के कुछ प्रमुख धर्मस्थानों की खबरें आ रही हैं कि वहां कर्मचारियों की तनख्वाह देने के लिए बैंकों में जमा एफडी तुड़वानी पड़ रही है। धर्मस्थलों के कपाट बंद हो गए हैं, वहां होने वाले जलसे, रस्म-रिवाज सब बंद हो गए हैं, वहां रोज पूजा-पाठ करने वाले गिने-चुने लोग रस्म अदायगी कर रहे हैं, बाकी धर्म का धंधा मंदा है। लोगों को याद होगा कि कई हफ्ते पहले जब दिल्ली में तब्दीली जमात के लोगों के बीच बड़ी संख्या में कोरोना पॉजीटिव मिलने लगे तो उसी वक्त मुस्लिमों के कुछ प्रमुख नेता होने का दावा करने वाले चेहरे टीवी के स्टूडियो पर और दूसरे वीडियो में बढ़-चढ़कर धार्मिक फतवे जारी करते दिख रहे थे कि मरने के लिए मस्जिद से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती, और कई धर्म के लोगों का यह कहना था कि जीना-मरना तो ईश्वर की हाथ की बात होती है। लेकिन धीरे-धीरे जब कोरोना ने अपनी पकड़ फैलाई, तो ये सारे धार्मिक दावे बंद हो गए, और अब टीवी चैनलों का पेट भरने के लिए भी ऐसा कोई दावा अब नहीं हो रहा है। कुल मिलाकर यह समझ पड़ रहा है कि जब सचमुच में बचाने की नौबत आती है, तो ईश्वरों के कपाट बंद हो जाते हैं, महज अस्पताल काम आते हैं, आग बुझाने को दमकल काम आती है, सड़क हादसे से जख्मियों को अस्पताल ले जाने एम्बुलेंस काम आती है, और आज देश में चलते हुए दसियों लाख गरीब-भूखे मजदूरों को खाना खिलाने के लिए मोटेतौर पर समाज काम आता है। जिन ईश्वरों ने जिंदगी भर लोगों से दान हासिल किया, जिनके मंदिरों में जमा सोने को गिनने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है, तमाम धर्मों के ऐसे तमाम उपासना केन्द्र आज की मुसीबत में किसी काम के नहीं रह गए हैं। होनी वही जो राम रखि राखा से लेकर जाको राखे सांईंयां, मार सके नहिं कोय जैसी कई बातें इंसान की समझ विकसित करने के बाद से बढ़ती चली गई हैं। ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, उसने जितनी सांसें दी हैं उससे एक अधिक सांस मिल नहीं सकती, इस तरह की भी कई बातें प्रचलित हैं। लेकिन सवाल यह है कि न दिखने वाले, और आकार में नापे न जा सकने वाले कोरोना के चलते ईश्वर की धारणा से जुड़े कोई भी दावे काम नहीं आ रहे। 

इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद यह है कि कोरोना के बाद गरीब-मजदूर की हालत चाहे जो हो, देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था चाहे जो हो, ईश्वर की धारणा का क्या होगा, उसकी अपनी अर्थव्यवस्था का क्या होगा? क्योंकि आज बाजार के मंदी के बीच भी शेयर बाजार में कंपनियों के शेयरों के कुछ तो दाम है। लेकिन ईश्वर का तो पूरा कारोबार ही बंद हो गया है। अब यह भक्तों पर है कि वे इस हकीकत को समझते हुए भी मान पाते हैं, या फिर एक खुशफहमी में जिंदा रहना चाहते हैं कि हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन...। 

क्या यह ऐसा वक्त आने वाला है जिसमें बहुत से लोग यह उम्मीद कर रहे हैं कि दुनिया को मानो एक पिछली तारीख पर ले जाकर सेट किया जा सकेगा। कम्प्यूटरों को चलाने वाले सॉफ्टवेयर में ऐसा इंतजाम रहता है कि आप नए फेरबदल से खुश नहीं हैं, तो आप किसी एक पिछली तारीख पर इस सॉफ्टवेयर को ले जा सकते हैं, और आपका कम्प्यूटर उस तारीख सरीखा हो जाता है। क्या ईश्वर को लेकर समाज की धारणा में कोई ऐसा बुनियादी फेरबदल आ सकेगा? या फिर लोग और अधिक अंधविश्वासी होकर, भक्तिभाव और अधिक डूबकर ईश्वर की शरण में कुछ और हद तक चले जाएंगे कि कोरोना से हुए नुकसान से उबार दे ईश्वर? अभी यह बात साफ नहीं है क्योंकि इंसान का मिजाज समझना आसान नहीं है, और फिर यह बात भी है कि पिछले दो महीने में इंसान जिस दौर से गुजरे हैं, आज भी गुजर रहे हैं, और अगले कुछ महीने गुजरने वाले हैं, उससे यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल है कि हिन्दुस्तान के दसियों करोड़ मजदूर ईश्वर की हकीकत को समझ जाएंगे या अपनी हकीकत को बदलने के लिए ईश्वर के चरणों में जाएंगे। 

वैसे तो अब समय आ गया है जब लोग यह जान लें कि ईश्वर के बड़े-बड़े दरबारों वाली दिल्ली और मुम्बई में भूखे मजदूरों को ईश्वर के दिए महज भूख और बेदखली की सजा मिली, हासिल कुछ नहीं हुआ, एक वक्त का खाना भी नहीं मिला। जो मजदूर सैकड़ों मील चलकर, अपने कुनबे को ढोकर भी जिंदा हैं, उनको यह हकीकत समझ आना जरूरी है कि वे अपने दम पर जिंदा हैं, किसी ईश्वर की वजह से नहीं, किसी लोकतंत्र की वजह से नहीं, किसी सरकार की वजह से नहीं। बल्कि सच तो यह है कि वे ईश्वर के बावजूद जिंदा हैं, लोकतंत्र के  बावजूद जिंदा हैं, और सरकारों के बावजूद जिंदा हैं। यह बात समझ में आना जरूरी है क्योंकि इसी मजदूर तबके को धार्मिक प्रवचनों से लेकर कारखानों में बने छोटे-छोटे मंदिरों तक कई प्रतीकों से ठगा और लूटा जाता है। ये मजदूर अगर आज भी राजा और व्यापारी का साथ देने वाले धर्म का सच नहीं समझ पाएंगे तो ये बाकी जिंदगी ऐसी ही गुलामी करते रहेंगे जैसी गुलामी उन्हें धर्मगुरुओं से लेकर कथावाचकों तक के हाथों दी जाती है। 

पिछली कई पीढिय़ों के बाद, या कि एक सदी बाद हिन्दुस्तान में ईश्वर और धर्म पहली बार इस हद तक अप्रासंगिक हो गए हैं, इस हद तक हाशिए पर चले गए हैं कि देखते ही बनता है। एक सदी हम इसलिए कह रहे हैं कि पिछली महामारी 102 बरस पहले आई थी, और उसक वक्त कोई ऐसा सामाजिक अध्ययन अभी हमें याद नहीं पड़ रहा है कि 1918 के पहले या 1929 के बाद ईश्वर की धारणा में कोई फेरबदल आया था या नहीं। आज तो कायदे की बात यह है कि दुनिया के जो सबसे विकसित और सबसे सभ्य देश हैं, उनमें ईश्वर का धंधा कोरोना के पहले भी मंदा चल रहा था। लोग आस्था खो बैठे थे, धर्म को मानना बंद कर चुके थे, और नास्तिक हो गए थे। योरप के कुछ एक देशों में धर्म एकदम ही महत्वहीन हो चुका है। लेकिन यह अजीब बात है कि जो सबसे संपन्न लोग हैं, वे तो धर्म से दूर होते दिख रहे हैं लेकिन जो महज अपने खून-पसीने पर जिंदा हैं, और जिन्होंने अभी-अभी हिन्दुस्तान में अपनी ताकत को ईश्वर की ताकत के ऊपर साबित किया है, वे लोग अभी भी ईश्वर की तरफ जाएंगे या ईश्वर से दूर जाएंगे, यह अभी साफ नहीं है। 

खैर, यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि ईश्वर नाम की एक कल्पना दुनिया पर फिर से अपना बेमिसाल राज कायम कर सकेगी, या नहीं कर सकेगी? 
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16-May-2020

मजदूर के पसीने से धरती 
का घड़ा भर सकता है... 

देश भर से गांवों में लौटने वाले मजदूरों के लिए अब बस एक ही किस्म के काम की गारंटी हो सकती है, सरकारी मनरेगा में मजदूरी। अभी एक-डेढ़ महीने के बाद खेती-किसानी में कुछ मौसमी काम निकल सकता है, लेकिन वह भी कुछ महीने ही चलेगा, और फसल के साथ ही खत्म हो जाएगा। ऐसे में दशकों पहले केन्द्र सरकार ने नरेगा और मनरेगा नाम से जो योजना चल रही है उसमें देश में रोज करोड़ों लोगों को मजदूरी मिल रही है, और यह मजदूरी ठीक-ठाक रोजी की रहती है। कोरोना के माहौल में जब बहुत सावधानी के साथ काम करने की एक मजबूरी है, उस दौर में भी छत्तीसगढ़ ने मनरेगा में मिलने वाले काम की हालत देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर बताई जा रही है, फिर चाहे वह पिछले बरस के इन्हीं महीनों के आंकड़ों से बहुत ही कम ही क्यों न हो। पिछले बरस के इन्हीं महीनों के आंकड़ों से हिन्दुस्तान में आज एक ही चीज अधिक है, और वह है पैदल सफर। इतना पैदल सफर न विभाजन के वक्त हुआ था, और न ही पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को इतना सफर करना पड़ा था क्योंकि इन दोनों ही वक्त पर रेलगाड़ी और सड़क की गाडिय़ां भी हासिल थीं। 

आज जब मनरेगा में रिकॉर्ड संख्या में लोगों को रोजगार मिलना है, और उसका अधिकांश हिस्सा तालाबों की खुदाई किस्म के पूरी तरह मजदूरी देने वाले काम रहेंगे, तो यह एक समस्या के साथ-साथ आया हुआ एक अवसर भी है। अवसर जिस हिसाब से बारिश के पहले-पहले सैकड़ों करोड़, या हो सकता है हजारों करोड़ भी मजदूरी में लगाए जाएं। ऐसे में इस पैसे का एक फायदा भी उठाया जा सकता है। अगर पूरे प्रदेश में बारिश के अतिरिक्त पानी को नदियों में जाकर बाढ़ बनने से रोकना है, तो नदियों के कैचमेन्ट एरिया में ऐसे बड़े-बड़े तालाब बनाने चाहिए जो कि अनिवार्य रूप से चाहे किसी आबादी के काम न भी आ सके। आबादी के लिए तालाबों का गहरीकरण एक बात है, और बारिश के अतिरिक्त पानी को बाढ़ में बर्बाद हो जाने से रोकना एक दूसरी किस्म का काम है। जहां से पानी नदियों में जाता है वहां पर उनको तालाब बनाकर रोकने का काम करना चाहिए। इसे आबादी के सीधे काम का न मानकर भूजल भंडारण बढ़ाने के काम का मानना चाहिए जिससे कि सारी जनता को बारिश के बाद के महीनों में पानी पाने में आसानी हो। 

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने आने के साथ ही नालों को बांधकर उनमें पानी रोकने का एक काम किया है जो कि बहुत बड़े पैमाने पर हुआ है। सरकार के डेढ़ साल में कम से कम एक साल ऐसे नाले बांधे गए हैं। अब सरकार को जमीन के भीतर पानी बढ़ाने के लिए अपना फोकस एक दूसरी तरफ मोडऩा चाहिए, और जिन इलाकों से बड़े पैमाने पर बारिश का पानी नदियों में जाता है, उन इलाकों में बड़े-बड़े तालाब बनवाने चाहिए, जिनमें मजदूरों के साथ-साथ अगर जरूरत पड़े तो मशीनों का इस्तेमाल करके भी बारिश के पानी का बड़े से बड़ा भंडार बनाना चाहिए। हमारी यह सलाह रोजगार को बढ़ाने के लिए तो है ही, लेकिन साथ-साथ धरती के भीतर घटते हुए पानी की भरपाई के लिए भी है। इस पानी की भरपाई किसी कर्ज के चुकारे के लिए नहीं है, बल्कि यह धरती के घड़े को भरकर रखने जैसा काम है ताकि जब गर्मी में तपकर इंसान घर लौटें तो उस घड़े का पानी पी सकें। इसके साथ-साथ योजना बनाने वालों की एक बड़ी खूबी यह भी हो सकती है कि वह महानगरों और शहरों से गांव लौट रहे देश भर के पांच-दस करोड़ मजदूरों और कामगारों के लिए गांवों में कुटीर उद्योग या किसी और तरह के स्वरोजगार की भी सोचे। खेती-किसानी, पशुपालन, मछलीपालन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री, बकरी पालन, रेशम, ऐसे दर्जनों काम हैं जिनमें गांवों में अधिक पानी की जरूरत पड़ेगी, और आज अगर मनरेगा के तहत यह इंतजाम किया जा सकता है, तो हो सकता है कि बहुत से मजदूरों को शहर लौटना ही न पड़े। 

जमीन के भीतर के पानी को खींचकर निकालने का काम छत्तीसगढ़ में खूब होता है। सरकार तकरीबन मुफ्त या अधिकतम रियायत वाली बिजली देती है, सोलर पंप लगाकर देती है, और धान का अधिकांश हिस्सा बाजार भाव से बहुत अधिक पर खरीद भी लेती है। नतीजा यह होता है कि छत्तीसगढ़ी किसान धान से परे अधिक नहीं सोच पाते। देश के दूसरे हिस्सों में तरह-तरह की फसलें ली जाती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में शायद नब्बे फीसदी से अधिक फसल सिर्फ धान की होती है। धान का मिजाज राजस्थानी ऊंट सरीखा होता है, और वह खूब पानी पीता है, महज पानी मांगता है, और फिर महीनों तक किसी और देखभाल की जरूरत नहीं रहती। नतीजा यह होता है कि मुफ्त की बिजली, मुफ्त का भूजल, और फसल बिक जाने की गारंटी के चलते किसान धरती की एक-एक बूंद खींच लेने में जुट जाते हैं। ऐसे में धरती के भीतर जो नुकसान हो रहा है, उसका अंदाज अभी नहीं लग रहा है। लेकिन सिर्फ बहस के लिए एक बुरी कल्पना करके देखें, अगर धरती के भीतर भूकंप जैसी किसी नौबत से कोई प्लेट खिसक गई, और पानी एकदम से गिर गया तो क्या होगा? तो पंप किस काम आएंगे, और धान की सरकारी खरीदी लोगों की क्या मदद कर सकेगी? अगर पानी हजार फीट नीचे चले गया, तो कितने इलाकों में फसल हो पाएगी? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो दो बातों के बारे में सोचने को कहते हैं। पहली बात तो यह कि धरती के भीतर बारिश के पानी को बचाने के लिए हर किसी की कोशिश होनी चाहिए। इस सरकार की नीति के हिसाब से नाले भी बांधने चाहिए, और री-चार्ज तालाब भी बनाए जाने चाहिए जिससे नदियों की बाढ़ भी घटेगी, और ऐसे तालाबों का गर्मी के महीनों तक इस्तेमाल भी हो सकेगा। आज मनरेगा में मजदूरी देने के लिए सबसे आसान काम तालाबों का गहरीकरण है, और नए तालाब बनाना है। आज से एक-डेढ़ महीने तक ही यह काम चलने वाला है, और प्रदेश सरकारों को मजदूरी से जमीनी पानी को जोडऩे का एक अभियान चलाना चाहिए जो कि देश भर के मजदूरों के पसीने से धरती का घड़ा भर देगा। 
-सुनील कुमार


15-May-2020

इन मुस्कुराहटों को जो समझ
नहीं पाएंगे, वे एक पूरा युग
समझना चूक जाएंगे...

आज जब तप रही सड़कों पर करोड़ों मजदूर नंगे पैर या टूटी-फूटी चप्पलों के साथ एक अंतहीन सफर पर हैं, तब बीच रास्ते उन्हें करीब से देखना एक ऐसा तजुर्बा है जिसे फोटोग्राफर, रिपोर्टर, और मौके पर तैनात सरकारी कर्मचारी, या समाजसेवी लोग कभी भूल नहीं पाएंगे। आज जो लोग अपने एयरकंडीशंड घरों में बैठे इस बात का रोना रो रहे हैं कि उनका बाहर निकलना नहीं हो पा रहा है, अधिक संपन्न लोग इस बात का रोना रो रहे हैं कि वे कहीं जा नहीं पा रहे हैं, कुछ खरीद नहीं पा रहे हैं, और घर में रहते हुए उब गए हैं, पता नहीं रेस्त्रां और सिनेमा कब शुरू होंगे। देश में इससे अधिक विरोधाभास वाला कोई माहौल शायद इतिहास में कभी नहीं रहा कि घर बैठे लोग बाहर निकलने को झींक रहे हैं, और बाहर के लोग अपने घर पहुंचने के लिए मौत का एक सफर तय कर रहे हैं। ऐसे में हम सड़कों पर लोगों को देखने की बात इसलिए भी कर रहे हैं कि जगह-जगह सड़कों पर लोग जिन छोटी-छोटी बातों से खुश होते दिख रहे हैं, वह हैरतअंगेज है। लोगों को याद होगा कि लॉकडाऊन के कुछ दिनों के भीतर ही इस अखबार में हमने दिल्ली की एक रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ के लिए पैदल रवाना हुए एक परिवार और उसके दो बच्चे सामान लेकर चल रहे थे, और एक मददगार युवती ने जब उन्हें रोककर खाने-पीने का सामान देना चाहा, तो परिवार का जवाब था कि साथ में सामान है, और हैरान करने वाले एक संतोष के साथ परिवार आगे बढ़ा। आज जब करोड़पति इंसान में अरबपति बनने के लिए, अरबपति में खरबपति बनने के लिए एक हवस सवार रहती है, तब हजार किलोमीटर के ऐसे पैदल परिवार का संतोष देखने लायक लगता है। 

इस महीने भर में गंगा में बहुत पानी बह चुका है, दसियों लाख मजदूर अपने गांव पहुंच चुके हैं, तब भी आज फिर इस मुद्दे पर लिखने की बात इसलिए सूझ रही है कि सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल चुके लोग अगर आगे के सफर के लिए तपते हुए लोहे से लदी हुई ट्रक पर भी बैठने की जगह पा रहे हैं, तो उनके चेहरे खुशी से खिल जा रहे हैं। ऐसे ही लंबे सफर के बाद किसी बस में परिवार को आगे के लिए जगह मिल गई, तो छोटे बच्चों से लेकर उनकी मां तक के चेहरे हॅंसी से जगमगाते दिख रहे हैं। जिंदगी कैसी हो गई है कि जिंदा रहना भी एक तसल्ली दे रहा है, ट्रक पर जगह मिल जाना भी सब कुछ हासिल हो जाने सरीखा साबित हो रहा है। जो लोग अपने घरों में आराम से बैठे हैं, जिनके पास टीवी और इंटरनेट पर सैकड़ों चैनल का मनोरंजन देखने की सहूलियत है, वैसे लोग क्या इस एक महीने में ऐसी महिला, ऐसी बच्ची जैसी खुशी पा सके हैं? 

आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखना इसलिए सूझ रहा है कि दुख और तकलीफ का ऐसा दौर हमने पहले कभी देखा नहीं, और शायद आगे की बाकी जिंदगी में ऐसा देखना न हो। इसलिए सैकड़ों किलोमीटर जले हुए तलुओं के ऊपर की देह पर के चेहरे पर जो हॅंसी और खुशी देखने मिल रही है, उसे देखने का मौका किसी को चूकना नहीं चाहिए। हम यह तो नहीं कहते कि यह खुशी सचमुच ही खुश करने वाली है, क्योंकि इस खुशी की एक वजह वह यातना भी है जिससे गुजरने के बाद की थोड़ी सी राहत के चलते यह खुशी मिल रही है। इस पूरे नजारे को देखें, इस पूरी नौबत को समझें तो यह समझ आता है कि सुख और दुख ये सब कुछ तुलनात्मक रूप से होते हैं, ये अपने आपमें कुछ भी नहीं होते। किसी एक की खुशी दूसरे के लिए बिल्कुल भी बेमायने हो सकती है। एक परिवार में जिस उम्र की छोटे बच्चे मोबाइल और टीवी की स्क्रीन पर कार्टून फिल्म देखकर भी खुश नहीं होते, जिन्हें खिलाना मां-बाप के लिए एक मशक्कत होता है, उसी उम्र के मजदूर-परिवारों के बच्चे सड़कों पर जिस तरह एक पैकेट बिस्किट पाकर खुश हैं, उससे समझ पड़ता है कि खुशी और गम हरेक के लिए बिल्कुल ही अलग-अलग पैमानों पर शुरू होते हैं, और अलग-अलग घटते-बढ़ते हैं। 

लेकिन इसके साथ-साथ एक बात जो समझने की है, वह यह है कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के भीतर मेहनतकश गरीब आबादी का यह क्या हाल हो गया है कि सफर के आखिरी हिस्से के लिए मिली कुछ राहत भी उसे शुरू की सारी तकलीफ भूल जाने में मदद कर रही है। लोकतंत्र में यह कैसी नौबत आई हुई है कि अच्छी खासी बड़ी तकलीफ भी उसके पहले की पहाड़ से बड़ी तकलीफ का दर्द भुला देती है, और चेहरे पर मुस्कुराहट ले आती है। क्या यह सचमुच ही लोकतंत्र है, या लोकतंत्र की एक ऐसी कागजी शक्ल है जिसके भीतर सब कुछ खोखला है? जब आबादी का आधा हिस्सा कम तकलीफ को ही आराम मानने लगता है, तो यह समझ पड़ता है कि लोकतंत्र में आम लोगों की हालत आम की ऐसी चूसी हुई गुठली की तरह हो गई है, जिसे पाकर घूरे पर जिंदा गाय खुश हो जाती है। 

क्या यह सचमुच ही एक लोकतंत्र का नजारा है? क्या यह सचमुच ही इंसानियत का नजारा है? क्या सचमुच ही पांच ट्रिलियन डॉलर की तरफ बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है? क्या यह लोकतंत्र लोगों के अपने पैरों पर सैकड़ों मील के सफर के बाद उनको कुछ भरोसा दिलाने वाला रह गया है? नोटबंदी के बाद एक वक्त का, एक लंबा दौर था जब लोगों की अपने खाते में पड़ी हुई रकम भी उनके काम की नहीं रह गई थी। आज हिन्दुस्तानी जनता के पास, उनकी देह के भीतर ताकत का पॉवरहाऊस भी उनके किसी काम का नहीं रह गया है, उनका हुनर भी उनके किसी काम का नहीं रह गया है, किसी जगह बरसों काम करने का तजुर्बा भी उनके काम का नहीं रह गया है, किसी कारोबारी महानगरी की झोपड़पट्टी में जुटाया गया टूटा-फूटा सामान भी उनके काम का नहीं रह गया है। कल ही सोशल मीडिया पर किसी ने यह सवाल उठाया है कि जिंदा रहने के लिए जिन सामानों की जरूरत पड़ती है, उन फटे-पुराने सामानों को लोग महानगरों के खाली किए हुए मकानों के बाहर न तो ढोकर ला पाए होंगे, और न ही उनके बिना आगे उनका काम चलेगा। 

ऐसी नौबत के लोग भी पल भर के लिए अगर मुस्कुरा सकते हैं, मुस्कुरा रहे हैं तो यह कम से कम हमको बहुत बुरी तरह हैरान करने वाली बात है कि देह का इतना दर्द, मन का इतना विचलन, और दिमाग का दहशत से भरा होना भी उन्हें जिंदगी के लिए उम्मीद से रोक नहीं पा रहा है। ऐसा वे ही लोग कर सकते हैं जिनके पास सबसे बड़ी ताकत अपनी देह की ताकत है, जिसे कि हजार मील का सफर भी छीन नहीं पाया है। जो लोग त्रासदी के इस दौर में जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे ऐसे योद्धाओं के चेहरों को देखकर इन बातों को सोच-समझ नहीं पाएंगे, उनके लिए एक पूरा युग बिना कुछ समझे निकल जाएगा। 
-सुनील कुमार


14-May-2020

मजदूर तो जिंदा रह लेंगे, पर 
बाकी डायनासॉर न हो जाएं

चारों तरफ से दुख-तकलीफ की खबरों के बीच एक अच्छी खबर यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एयरपोर्ट वाला गांव अपनी महिला सरपंच की अगुवाई में बाहर से लौटे मजदूरों को तुरंत ही सरकारी काम में मजदूरी दे रहा है, और लोग आते ही काम पर लग गए, सरकारी रेट पर रोजी मिलने लगी। आज जब कोरोना ने पूरी दुनिया को उथल-पुथल कर दिया है, धरती से लेकर समंदर की गहराई तक, और उधर अंतरिक्ष में ओजोनलेयर के पार तक कोरोना की वजह से जिंदगी में आई तब्दीली दिख रही है, तब बहुत से लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आगे की जिंदगी कैसी होगी। यह समझना सचमुच ही कुछ मुश्किल इसलिए हैं कि लोगों ने ऐसा कभी देखा नहीं था, और 102 बरस पहले की भारत की महामारी के बारे में सुनाने वाले बाप-दादा अब बचे हुए नहीं होंगे। इसलिए लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि लॉकडाऊन खत्म होने के बाद, धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने के बाद भी वह जिंदगी आज तक की जिंदगी जैसी नहीं रहेगी। वह एक अलग अर्थव्यवस्था रहेगी, अलग कारोबार और रोजगार रहेंगे, जिंदगी का रोज का तौर-तरीका बिल्कुल अलग रहेगा, और यह कुछ महीनों के लॉकडाऊन के बाद फिर से पुरानी जिंदगी बिल्कुल नहीं रहेगी। ऐसे में दो लोगों के बचने की संभावना सबसे अधिक रहेगी, एक तो मजदूर की, जो कि महीने भर पैदल चलकर आए, और अगले ही दिन कुदाली-फावड़ा लेकर मनरेगा में रोजी कमाने में लग गए। जो लोग इस रफ्तार से नई जगह, नए काम, नए हौसले पर नहीं पहुंच पाएंगे, वे पिछड़ जाएंगे। 

हमारी किस्म के लोग जो दफ्तर में, मेज पर, कम्प्यूटर पर, एक खास किस्म का काम अब तक करते आए हैं, और यह उम्मीद करेंगे कि कुछ महीने के फासले के बाद अब फिर वही पुराना काम करने लगेंगे, वे निराश होंगे, और नाकामयाब भी होंगे। अब दुनिया पहले सरीखी नहीं रह जाने वाली है, और लोगों को धर्म से लेकर आध्यात्म तक, अपनी पढ़ाई-लिखाई से लेकर कामकाज तक, दांतों को कुरेदकर पान-सुपारी निकालने की आदत छोड़कर, नाक-कान कुरेदने की आदत छोड़कर एक सावधानी बरतनी होगी, वरना दांत, नाक, कान वाला बदन ही नहीं बचेगा। लेकिन जो लोग नहीं बचेंगे वो तो फिर भी दिक्कत से दूर हो जाएंगे, दिक्कत उनको अधिक होगी जो जिंदा रहेंगे, लेकिन काम का ढर्रा नहीं बदलेंगे। आज हिन्दुस्तान के कई राज्यों ने मजदूर कानूनों को बुलडोजर के नीचे कुचलकर चूर-चूर कर दिया है। अब 9 घंटे की शिफ्ट 12 घंटे हो गई, ओवरटाईम कहीं बाकी रहा, कहीं खत्म कर दिया गया, मजदूर विवादों का निपटारा अब संस्थान के भीतर कर दिया गया ताकि कोई लेबर कोर्ट न जा सके। पता नहीं ये सारे कानून, या ये तमाम फेरबदल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर कायम रहेंगे या खारिज कर दिए जाएंगे, इन कानूनों से परे भी आज देश और दुनिया का कारोबारी माहौल यही रहने वाला है। हम पिछले दो-तीन महीनों में दो-तीन बार इस बारे में यहां लिख चुके हैं, और आज बाहर से आए मजदूरों के अगले ही दिन काम पा जाने, काम में जुट जाने की खबर देखकर इस मुद्दे पर एक बार और लिखने का दिल किया है। 

बाजार के हिसाब से अभी बुरा वक्त आया ही नहीं है जो कुछ बुरा होना है वह तकरीबन पूरे का पूरा बचा हुआ है और आगे आएगा। ऐसे वक्त में कारोबारियों को अपने धंधे के बारे में सोचना चाहिए कि वे सच में चलाने लायक हैं, या बंद कर देने के लायक हैं। उनमें काम करने वाले कर्मचारियों को यह सोचने की जरूरत है कि क्या वे सचमुच ही अपने संस्थान के लिए इतने अधिक उपयोगी हैं कि उनके बिना काम नहीं चल सकेगा, या उन्हें हटा देने से संस्थान पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आज  मालिक से लेकर नौकर तक, स्वरोजगारी से लेकर मजदूर तक, हर किसी को अपने आपको बेहतर बनाने, अधिक उत्पादक बनाने, और भविष्य का थोड़ा अंदाज लगा लेने की जरूरत है। जो लोग ऐसा नहीं करेंगे वे महाराष्ट्र में पटरी पर सोए हुए मजदूरों की तरह रहेंगे जिनके ऊपर से वक्त की ट्रेन धड़धड़ाते हुए निकल जाएगी, और उन्हें पता ही नहीं चलेगा कि वे कब खत्म हो गए।
 
ऐसे माहौल में जो मजदूर देह की जमकर मेहनत करने के लिए तैयार रहेंगे, उन्हीं के बचने का आसार सबसे अधिक रहेगा। इंसानों में मजदूर, और बाकी प्राणियों में तिलचट्टा। तिलचट्टे के बारे में कहा जाता है कि वह किसी भी स्थिति में, कुछ भी खाकर जिंदा रह लेते हैं, यहां तक कि सीमेंट खाकर भी जिंदा रह लेते हैं। यह बात वैज्ञानिक सच है या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन यह बात तय है कि हालात के मुताबिक अपने आपको ढाल लेना जरूरी है, और आज हर किसी को अपने हुनर को बेहतर बनाने के साथ-साथ हालात के मुताबिक अपने को ढाल भी लेना चाहिए क्योंकि बीते कल से कोई तुलना अब किसी काम नहीं आने वाली है। यहां तक कि सरकार की अपनी ताकत भी इन दो महीनों में ही बुरी तरह चुक चुकी है। छत्तीसगढ़ ने अपने बजट को सीधा 30 फीसदी काट दिया है, और सरकारी विभागों को कहा है कि वे 70 फीसदी से अधिक का उपयोग नहीं कर पाएंगे। बजट में तीन फीसदी बढ़वाने के लिए मंत्री और अफसरों को जान लगा देनी पड़ती है, और अब बजट  एकमुश्त 20 फीसदी कट गया। 

देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह घटा दी है, कल ही एक दर्दनाक कार्टून कहीं छपा है कि घरेलू नौकर-नौकरानी मालिक की इमारत के सामने खड़े होकर खाली कटोरे बजा रहे हैं कि उनकी तनख्वाह दी जाए। अभी तक देश में कारोबार का एक बड़ा हिस्सा बंद है, इसलिए अभी मजदूर विवाद सामने नहीं आ पा रहे हैं, और आगे जाकर बहुत से राज्योंं में मजदूर कानून ऐसे होने वाले हैं कि विवाद सामने आ भी नहीं सकेंगे। कोरोना की मार ने जितना इंसानों को मारा है, उससे कहीं अधिक कारोबार मारे हैं, मजदूर कानून मारे हैं। इस बदले हुए हालात को समझना इसलिए जरूरी है कि धरती पर एक वक्त चट्टान जैसी मजबूती और पहाड़ जैसे आकार वाले डायनासॉर हुआ करते थे। उनके बारे में यह धारणा प्रचलित है कि वे वक्त के साथ अपने को नहीं बदल पाए, इसलिए खत्म हो गए। आज छोटे-बड़े तमाम लोगों को डायनासॉर बनने से बचना चाहिए। महज मजदूर ही ऐसे रहेंगे जो किसी भी नौबत में जिंदा रह लेंगे। 
-सुनील कुमार


13-May-2020

राष्ट्र के नाम संदेश में मोदी
आखिरी बस पकडऩे से चूके

बीती रात वही अमूमन 8 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर देश से मुखातिब हुए। उन्होंने इस देश के सदियों के गौरव को गिनाया, अपने कार्यकाल के कुछ योगदान गिनाए। शुरू के चौदह मिनट लोगों को यह समझ नहीं आया कि वे किस मौके पर क्या बोल रहे हैं, क्या बोलना चाहते हैं, उनके दर्शक-श्रोता कौन हैं, और हिन्दुस्तान की जो जनता इस ऐतिहासिक त्रासदी के मौके पर अपने प्रधानमंत्री को जो सुनना चाहती थी वह कहां है? एक तरफ जीवंत प्रसारण चल रहा था, दूसरी तरफ उसे सुनते हुए लोग ट्विटर पर लगातार लिख भी रहे थे कि प्रधानमंत्री बोलना क्या चाह रहे हैं, वे मुद्दे की बात कब शुरू करेंगे, और अधिक कटुआलोचक या अधिक कट्टर भक्त लोगों की बातों का जिक्र करने का कोई मतलब नहीं है। 

प्रधानमंत्री करीब आधा घंटा बोले होंगे, और इसमें उन्होंने देश का और जनता का विशाल गौरवगान किया, पिछली कई सदियों की गौरवगाथा गिनाई, और अपने कार्यकाल को भी गिनाया, यह अलग बात है कि इसके बीच के आधी सदी से अधिक के कांग्रेस के कार्यकाल का कोई जिक्र उन्होंने नहीं किया, और न ही लोग उनसे उसकी उम्मीद ही कर रहे थे। हमें इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इतना तो सुनने मिला कि 20 लाख करोड़ का एक आर्थिक पैकेज देश को दिया जा रहा है, उसे लेकर भी उन्होंने मुसीबत से उबरने की बातें नहीं कीं, उत्कृष्टता और बेहतरी की बातें अधिक कीं। आधे घंटे सुनने वाले लोग कई मुद्दों पर, कई वजहों से बुरी तरह निराश होकर उठे कि आज जब मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चों के पांवों के तलुए सड़क पर जलकर लोहा हुए जा रहे हैं, जब हिन्दुस्तानी गरीब मजदूर मां-बाप और गर्भवती बीबी को उठाकर सैकड़ों किलोमीटर चलने के ओलंपिक से भी बड़े रिकॉर्ड बना रहे हैं क्योंकि वहां तो या तो भार उठाने का रिकॉर्ड रहता है, या लंबी दूरी तय करने का। ये मजदूर तो ये दोनों ही काम कर रहे हैं। दुनिया के इतिहास में, खासकर किसी जिम्मेदार लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा बहुत कम होता है कि घर लौटते मजदूर थोक में गाजर-मूली की तरह कतार से कट जाते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण में इसका कोई जिक्र नहीं था। दरअसल उनके आधे घंटे में एक भी मौत का जिक्र नहीं था, एक भी मानवीय त्रासदी का जिक्र नहीं था, आत्मनिर्भरता का गौरवगान था, और विश्व का मुखिया बनने का एक दावा कहें तो दावा था, भरोसा कहें तो भरोसा था। 

प्रधानमंत्री का भाषण सुनकर हमें थोड़ी सी नहीं, ज्यादा हैरानी हुई है। जब उनके पास सुनने वाले प्रशंसकों और आलोचकों की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी मौजूद है, और हिन्दुस्तान के इतिहास का आजादी के बाद का यह सबसे अधिक त्रासदी भरा हुआ मौका उनको अपना दिल-दिमाग देश के सामने रखने का मौका हासिल था, तब वे यह मौका चूक गए। अभी हम और बातों को गिनाना नहीं चाहते कि वे और क्या-क्या चूके।  लेकिन इतना जरूर गिनाना चाहते हैं कि अपनी ऐतिहासिक चूक को, अपनी ऐतिहासिक गलतियों को कुबूल करके, उनसे आगे बढऩे का जो मौका उनके हाथ था, वह मौका वे चूक गए। जो कि अब भविष्य में कभी वे इस बात पर अपनी गलती, अपनी चूक, अपनी नाकामयाबी कुबूल भी करना चाहेंगे, तो उस रास्ते की आखिरी बस कल रात 8 बजे निकल गई। हर व्यक्ति की जिंदगी में एक ऐसा मौका आता है जब वे अपनी पिछली गलतियों, या गलत कामों के लिए माफी मांगकर अपने रिकॉर्ड को कुछ हद तक दुरूस्त कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बीती रात वह मौका बुरी तरह चूक गए। सड़कों और पटरियों पर हो रही दर्जनों मौतों को लेकर भी उनके पास कहने को कुछ नहीं था। उन्होंने आधे घंटे में शायद एक या दो बार मजदूर शब्द का जिक्र किया हो, लेकिन उससे परे उनकी पूरी की पूरी बात प्रसंगहीन, और एक किस्म से बेरहम की। आज जब देश विभाजन के बाद की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी से गुजर रहा है तब हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को लेकर एक ऐसा भाषण जो कि पूंजीपतियों को संबोधित दिख तो रहा हो, हालांकि शायद ही कोई पूंजीपति उससे प्रभावित हुआ हो। ऐसी शाम जब लोग अपने जख्मों को लिए हजार मील के सफर पर कहीं रूककर टीवी देख रहे होंगे कि उसमें से मरहम आएगा, और उसमें से देश के इतिहास के गौरवगान, और भविष्य को लेकर विश्व का मुखिया बनने की उम्मीदें पता नहीं किसमें भरोसा जगा पाएंगे। जब जिंदगी की हकीकत इस कदर जलती-सुलगती हो कि तलुओं की आग को बुझाना किसी देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, और खासकर प्रधानमंत्री के लिए सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए, तब उन तलुओं के ऊपर के देह तक की चर्चा न हो, तो क्या राष्ट्र के नाम ऐसे संदेश का न होना बेहतर नहीं होता, दुख और तकलीफ के बीच जो लोग इस नौबत के जिम्मेदार हैं, इसके लिए जवाबदेह जिन्हें रहना चाहिए वे लोग अगर मिलें, आधे घंटे बात करें, और इस दुख-दर्द की चर्चा भी न करें, तो वह लोगों के जख्मों पर बिना नमक के नमक डालने सरीखा हो जाता है। अगर प्रधानमंत्री को बीती रात मुद्दे की इतनी ही बात करनी थी कि 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की जानकारी कल आएगी, तो यह बात तो दर्द के इस मौके को गंवाए बिना कोई सरकारी प्रवक्ता भी कर सकता था, या जैसा कि आजकल अधिक आम हो चला, वित्तमंत्री ऐसा ट्वीट कर सकती थीं, कि कल वे किस वक्त यह घोषणा करेंगी। 

प्रधानमंत्री की आलोचना करना आज यहां मकसद नहीं है, लेकिन हम अपनी तकलीफ, अपनी निराशा, और अपना सदमा अगर नहीं लिखेंगे, तो हम भी इसे जाहिर करने का यह मौका चूक जाएंगे। प्रधानमंत्री की कल की बात कर आज न लिखा जाए, तो बाद में फिर कभी लिखना तो एक जिक्र भर रह जाएगा। लोकतंत्र महज सरकारी फैसलों का नाम नहीं है, लोकतंत्र जनता के बीच भरोसा जगाने का नाम भी है। जो लोग आज मरने की कगार पर हैं, जो लोग अपने बूढ़े मां-बाप को जीते जी मुर्दों की तरह ढोकर चल रहे हैं, इस पल भी किसी सफर में हैं, उनके लिए राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का मतलब शायद मोदी की कही आत्मनिर्भरता से कुछ अलग है। उनके लिए आत्मनिर्भरता यही है कि सरकारों की मदद के बिना, लोकतंत्र की मदद के बिना, समाज के संपन्न तबके की मदद के बिना, निजी गाडिय़ों के दर्जनों हार्सपॉवर की ताकत के बिना वह अपने मां-बाप के जीते जी उन्हें जिंदा लाश की तरह ढोकर एक अंतहीन सफर पर निकले। इस मौके पर अगर भारतीय लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के पास आधे घंटे के भाषण में उसके लिए महज एक ऐसी संख्या है, जिस 20 लाख करोड़ का वह मतलब भी नहीं समझता, तो हमारे हिसाब से यह भाषण जमीन को छू भी नहीं रहा था। नरेन्द्र मोदी और उनके भाषण लेखक या तो वक्त की नब्ज को टटोल नहीं पा रहे, या फिर नब्ज से आती हुई आवाज पर कुछ कहने का वे साहस नहीं जुटा पाए। 
-सुनील कुमार


12-May-2020

कोरोना के पहले नहीं सीखा तो
कम से कम अब सबक ले लें

हिन्दुस्तान में चल रहे लॉकडाऊन के बीच आज डेढ़ महीने बाद भी जिस तरह से राज्यों के ऊपर जिम्मेदारी आई हुई है, उससे जूझना देश के किसी भी राज्य के लिए आसान नहीं लग रहा है। सरकारों से बात करें तो लगता है कि यह उनके लिए मुमकिन नहीं है, मजदूरों से बात करें तो लगता है कि उनके लिए इस मुल्क में कोई लोकतंत्र नहीं है। यह तो देखने का नजरिया रहता है जो केन्द्र सरकार से शुरू होता है जिसे लॉकडाऊन करते वक्त यह लगा कि राष्ट्र के नाम एक संदेश देश में पूरा इंतजाम करने के लिए काफी है। राज्य सरकारों को लगा कि उनके प्रदेशों से गए हुए मजदूर जहां हैं, वहां जिंदा रह लेंगे, यह राज्य सरकारों का नजरिया था। यह अपनी खुद की समझ के खिलाफ की भावना थी क्योंकि यह राज्यों के लिए सबसे आसान बात दिख रही थी कि न उन्हें मजदूरों को लाना पड़े, न ही कोरोना जैसी महामारी उनके प्रदेश में बेकाबू हो, न ही सरकार पर आर्थिक बोझ आए। उद्योगपतियों का नजरिया था कि जब तक धंधे-कारखाने बंद हैं, तब तक मजदूर अपने हाल पर किसी तरह जी लें, ताकि काम-धंधा शुरू होने पर मजदूर और कारीगर मौजूद रहें, मालिक तो हासिल रहेंगे। एक ही नौबत, एक ही तस्वीर, लेकिन देखने के नजरिये कितने अलग-अलग थे, अलग-अलग हैं, और अलग-अलग रहेंगे। इस देश में देवी की पूजा की महिमा के राजनीतिक गीत गाने वाले नेता, उनकी पार्टियां, और उनकी सरकारें, ये सबके सब यह नजारा देखकर भी एकदम चुप हैं कि गर्भवती औरतें हजार-हजार किलोमीटर पैदल चल रही हैं, सड़क किनारे बच्चे जन रही हैं, और उन बच्चों को थामे फिर सैकड़ों किलोमीटर के पैदल सफर पर निकल जा रही हैं। जिन वामपंथियों के हाथ आज केरल की सरकार है, और जो देश में सबसे अच्छा काम कर रही है, उसकी बात को अगर छोड़ दें, तो देश के बाकी पार्टियों में से किसी ने भी क्या महिलाओं की ऐसी हालत पर अपनी पार्टी के लाखों-करोड़ों कार्यकर्ताओं के लिए यह फतवा जारी किया कि वे गाडिय़ां लेकर निकलें, और जितने मजदूरों को जितनी दूर तक छोड़कर आ सकें, उतनी दूर तक छोड़कर आएं। जो नेता और पार्टियां अपने करोड़ों कार्यकर्ता होने का दावा करती हैं, क्या वे नमूने के लिए भी, सुबूत के तौर पर भी एक भी ऐसी अपील दिखा सकती हैं कि उन्होंने अपने सारे कार्यकर्ताओं को सड़क पर लोगों की मदद करने, उन्हें उनके प्रदेश की सरहद तक छोड़कर आने को कहा हो? 

राज्य सरकारों की आज की नौबत ठीक वैसी ही है जैसी कि उत्तराखंड में भूस्खलन होने के बाद उस तबाह प्रदेश की हुई थी। यह अलग बात है कि आज चट्टानों ने गांवों को कुचला नहीं है, आज हिन्दुस्तानी मेहनतकश मजदूर हजारों किलोमीटर का सफर करते हुए भी मोटेतौर पर जिंदा हैं। लोकतंत्र ने उनको मार डालने में कोई कसर नहीं रखी थी, लेकिन मेहनत की आंच से तपे हुए उनके बदन, और जिंदा रहने का उनका पक्का इरादा, बेमुद्दत हौसला उनको चलाए जा रहा है। हमारे पुराने और नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने हर किसी किस्म की आपदा के लिए राज्य शासन को तैयारी करने का सुझाव दिया था। उस वक्त ऐसी महामारी का तो अंदाज नहीं था, लेकिन मानव निर्मित या किसी प्राकृतिक विपदा से निपटने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए, प्रदेश के नक्शे पर हर अस्पताल, हर रक्तदाता, हर समाजसेवी संगठन के नाम-नंबर किस तरह दर्ज करके रखने चाहिए ऐसी बहुत सी बारीक बातें भी हमने आपदा प्रबंधन की तैयारी के लिए सुझाई थी। लेकिन सरकार का आपदा प्रबंधन का नजरिया अपने एक विभाग के तहत एक फाईल तक सीमित रहता है, और छत्तीसगढ़ भी उससे कोई अछूता नहीं है। इस राज्य में भी ऐसी किसी मुसीबत की कल्पना करके भी यह तैयारी नहीं थी कि समाज के कौन से लोग मुसीबत के वक्त अपनी गाडिय़ां लेकर सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ में लाखों खिलाड़ी हैं, और कसरत करने वाले, एनसीसी में जाने वाले लाखों नौजवान हैं जिनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अधिक है, और जो आज काम आ सकते थे। लेकिन सरकार की तरफ से कोई ऐसी संगठित और व्यवस्थित योजना इन डेढ़ महीनों में भी नहीं दिखी है जिसमें समाज के लोगों की इस अतिरिक्त और उत्साही क्षमता का इस्तेमाल हो सके। और यह राज्य कोई अपवाद नहीं है, पूरे देश का यही हाल है, कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं दिखता जहां सरकारों ने अपने बजट, अपने अफसर, और अपने जिले या नीचे के स्तर तक के सरकारी ढांचे से परे जनता की कोई योजना बनाकर रखी हो। आज भी जहां-जहां सामाजिक भवन लोगों को ठहराने के लिए मिल रहे हैं, वे सबके सब आग लगने पर खोदे गए कुएं हैं। जो सामाजिक संगठन लोगों को खाना पहुंचा रहे हैं, वे सरकारी योजना के बिना अपनी मर्जी से कर रहे हैं, या उन्हें प्रशासन ने आखिरी में जोड़ा है। जो राजनीतिक दल खुद होकर लोगों के लिए कुछ इंतजाम कर रहे हैं, वे भी अपनी मर्जी से कर रहे हैं, सरकार की किसी आपदा प्रबंधन योजना के तहत नहीं। आज भी सरकारों को चाहिए कि अपने प्रदेश में चलने वाले आईआईएम जैसे प्रबंधन संस्थानों से कहे कि वे मौजूदा समस्याओं, और मौजूदा आपात तैयारियों को देखते हुए आगे के लिए समाज का, संचार का, सरकार का, आवागमन का, खानपान का, इलाज और ठहरने का एक ऐसा खाका तैयार किया जाए जो कि किसी भी वक्त की मुसीबत में बस कम्प्यूटर की एक बटन जितनी दूरी पर रहे।
 
जैसा कि किसी गंभीर बीमार के इलाज के मामले में होता है, ऐसा ही एक गोल्डन अवर, सुनहरा घंटा) हर मुसीबत के वक्त होता है। आग लगे तब फायर ब्रिगेड का नंबर ढूंढने में वक्त बर्बाद करने वाले सब कुछ जल जाने देने के लिए जिम्मेदार रहते हैं। और हो सकता है कि राज्य सरकारों की कोई दिलचस्पी ऐसी कोई योजना में न हो, क्योंकि कई बार बदइंतजामी सरकारी अमले को सुहाती है, ऐसे में आईआईएम जैसे संस्थानों को खुद होकर आपदा प्रबंधन के ऐसे मैप बनाने चाहिए जो कि किसी प्रदेश के हर किलोमीटर पर उपलब्ध संसाधनों को नाम और नंबर सहित दर्ज करके रखे। हम आदतन हर बरस एकाध बार सरकारों के लिए ऐसी नसीहत लिखते हैं जिसे सरकार में शायद ही कोई पढ़ते हों, लेकिन आम जनता को भी यह समझ में आना चाहिए कि सरकारी कामकाज में अगर कोई कमी-कसर है, तो वक्त पडऩे पर उसके बारे में सवाल किए जा सकें।
 
दो लाईनों में अगर हम अपनी सोच को अगर फिर से दोहराएं, और पुरानी सलाह के साथ कोरोना-बदइंतजामी का नया तजुर्बा जोड़कर कहें, तो पहली बात यह कि सरकार को अपने ढांचे से बाहर समाज की ताकत का नक्शा बनाकर रखना चाहिए जो कि सरकारी अमले से हजार गुना अधिक बड़ा है, और ताकतवर है। जिस तरह कई संस्थाएं रक्तदाताओं के नाम और नंबर का रजिस्टर रखती हैं, उसी तरह सरकार को समाज और लोगों की हर उत्साही क्षमता का नक्शा बनाकर रखना चाहिए, उसका ऐसा दस्तावेजीकरण और कम्प्यूटरीकरण करना चाहिए कि वह मुसीबत के वक्त तुरंत ही इतनी बड़ी ताकत का इस्तेमाल किया जा सके। आज अगर इस देश में ऐसे उत्साही लोगों की एक लिस्ट हर राज्य के पास होती, तो किसी मजदूर को एक मील भी पैदल नहीं चलना पड़ता, और लोग अगले शहर तक उन्हें छोड़कर आने की ताकत रखते हैं। लेकिन आज जो सबसे मेहरबान लोग हैं, उनकी ताकत को भी सरकार ने महज खाने और पानी तक सीमित रखा है। इस लोकतंत्र में आज यह साबित हो चुका है कि सरकार तंत्र इस देश का पूरा फ्लाप शो है। जैसा कि हम कुछ दिन पहले यहां लिख चुके हैं यह देश संचितों और वंचितों के बीच बंटी हुई आबादी का एक खंडित देश है। यह देश केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच बुरी तरह टकराव और भेदभाव वाला एक खंडित संघ है। यह देश अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के बीच अनबोले सरीखे रिश्तों वाला एक देश है जिसमें कोई भी सरकार अपनी जमीन से अपने निवासियों के अलावा बाकी सबको किसी भी तरह धकेलकर दूसरे प्रदेश में दाखिल करा देने में दिलचस्पी रखती है। यह पूरा सिलसिला बताता है कि कोई राज्य केन्द्र पर निर्भर नहीं रह सकते, कोई स्थानीय संस्थाएं राज्य पर निर्भर नहीं रह सकतीं, और मजदूर तो अपने खून-पसीने के अलावा और किसी पर निर्भर नहीं रह सकते। ऐसे में हिन्दुस्तानी समाज की सामूहिक चेतना, उसकी सामूहिक क्षमता का एक नक्शा बनाना जरूरी है ताकि मुसीबत के वक्त मदद की ताकत रखने वाले लोग मदद की जरूरत वाले लोगों के सीधे भी काम आ सकें। लेकिन चूंकि ऐसी व्यापक योजना बनाना जनता के बस का नहीं है, इसलिए इसमें सरकार और आईआईएम जैसे संस्थानों की भागीदारी जरूरी है। कोरोना से अगर हम इतना भी नहीं सीख पाए, तो इस ठोकर से नुकसान तो हो ही चुका है, अगली ठोकर से भी नुकसान इससे बड़ा भी हो सकता है। 
-सुनील कुमार


11-May-2020

आज की हिन्दुस्तानी त्रासदी समकालीन इतिहास लेखन

का एक ऐतिहासिक मौका, ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी..

आज पूरे हिन्दुस्तान के गांव-गांव से लॉकडाऊन की वजह से जनता की त्रासदी की जो खबरें आ रही हैं, उनके लिए मीडिया में जगह नहीं बची है। ईश्तहारों के बिना अखबारों की हालत अकाल और भुखमरी से जूझ रहे किसी देश के इंसानों सरीखी हो गई है। पन्ने घटते चले गए हैं, खबरें बढ़ती चली गई हैं। नतीजा यह हुआ है कि मीडिया का जो बड़ा सा हिस्सा गैरखबरों को खबर बनाकर जगह बर्बाद करता था, वह घट गया है। मीडिया की अपनी कंगाली और किफायत ने मिलकर वह कर दिखाया है जो कि संपादक नहीं कर पा रहे थे, अब अखबारों में खबरें काम की रह गई हैं, और अखबार रद्दी वाले का सपना नहीं रह गया है। कमोबेश ऐसा ही हाल कुछ बेईमान और घटिया टीवी चैनलों का भी हुआ है जो कि नफरत की आग उगलने वाले, अलग-अलग धर्मों का चेहरा बने हुए, धरती के सबसे घटिया और कमीने इंसानों को अपने स्टूडियो में बिठाकर देश में नफरत का लावा फैलाने में लगे रहते हैं। अब उनके दर्शक या तो घटते चले गए हैं, या लोगों को यह समझ आ रहा है कि खून न हिन्दू होता है न मुस्लिम, और भूख का अकेला धर्म खाना होता है, उससे परे कुछ नहीं। अब हार मानकर सबसे घटिया समाचार चैनलों को भी कम से कम कुछ समय असल जिंदगी की असल त्रासदी को देना पड़ रहा है, इससे उनके जुर्म घटते चल रहे हैं। 

 

लेकिन आज दो बातों को समझने की जरूरत है। एक तो यह कि हिन्दुस्तान में करीब पौन सदी बाद इस किस्म की त्रासदी आई है, छाई है, और जारी है जिसे पिछली बार भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक्त देखा गया था। विभाजन का इतिहास तो बहुत लिखा हुआ है, लेकिन आज वक्त है भारत के समकालीन इतिहास को अच्छी तरह दर्ज करने का जो कि इतिहास की किताबों को देखकर नहीं लिखा जा सकेगा जिनके लिए आज सड़कों पर जो मजदूर हैं, जो बेघर हैं, उनसे बात करके, उनकी बातचीत को रिकॉर्ड करके, उनके सफर को रिकॉर्ड करके ही किया जा सकता है। एक भूतपूर्व पत्रकार और फिल्मकार विनोद कापरी ने अभी मजदूरों के एक जत्थे के साथ दिल्ली से लेकर बिहार के सहरसा तक 1232 किलोमीटर का साइकिल सफर किया, और अब वे इसी नाम से एक फिल्म बनाने जा रहे हैं। आज देश में हजारों ऐसे छोटे-बड़े पत्रकार हैं जो लगातार प्रवासी मजदूर कहे जाने वाले जिंदगी के योद्धाओं से बातचीत रिकॉर्ड कर रहे हैं, और सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर रहे हैं। ऐसे वीडियो, ऐसे ऑडियो, नाम-पते और नंबर सहित ऐसी तस्वीरें उस तरह छा गई हैं जिस तरह आम के पेड़ों पर बौर छा जाते हैं, या गर्मी में गुलमोहर के सुर्ख लाल फूल छा जाते हैं। 

 

आज जरूरत इतिहास, राजनीति शास्त्र, समाज विज्ञान, पत्रकारिता, और लोक प्रशासन के प्राध्यापकों और छात्रों की है जो कि ऐसी तमाम कहानियों का दस्तावेजीकरण कर सकें, उन्हें संदर्भ और जानकारी सहित लिख सकें, फोटो, वीडियो, और ऑडियो को सम्हालकर रख सकें क्योंकि सोशल मीडिया की चीजें वक्त के साथ गुम होने लगती हैं। देश भर में जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनसंगठनों, और स्वयंसेवियों के जत्थे अलग-अलग स्तर पर लोगों की मदद कर रहे हैं, और उनसे बातचीत दर्ज भी कर रहे हैं। जगह-जगह मौतें दर्ज हो रही हैं, सड़क किनारे बच्चों के जन्म दर्ज हो रहे हैं, और खुद मरियल सी कद-काठी वाले गरीब-मजदूर कहीं गर्भवती पत्नी को उठाकर सैकड़ों किलोमीटर जा रहे हैं, तो कहीं बूढ़े मां-बाप को। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र के लिए एक बुरे सपने की तरह है, लेकिन एक कड़वी हकीकत भी है। हिन्दुस्तान के छात्र-छात्राओं और उनके प्राध्यापकों के लिए सोवियत संघ के विघटन के इतिहास से लेकर प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास तक को पढऩे के लिए अगले हजार-पांच सौ साल का वक्त रहेगा। लेकिन आज हिन्दुस्तान के भीतर इतने बड़े पैमाने पर ऐसी बेरहम और अलोकतांत्रिक बेदखली जो हुई है, उसके अध्ययन का वक्त यही है। आज हिन्दुस्तान में कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं होगा जहां पर बाहर से लौटकर आए हुए मजदूर न पहुंचे हों, जहां से न गुजरे हों, या जहां से मजदूर छोड़कर न आए हों। ऐसे तमाम छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों के लिए यह जिंदगी का सबसे तकलीफदेह और सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन भी हो सकता है कि वे समकालीन इतिहास दर्ज करते हुए, दर्ज करने के लिए ऐसे तमाम लोगों से मिलें, बात करें, उनके इंटरव्यू रिकॉर्ड करें। 

 

दुनिया में वे ही देश पढ़ाई-लिखाई में आगे बढ़ते हैं जो कि अपने कभी न हुए अतीत पर एक झूठा गौरव करते हुए, उसका झूठा दंभ न भरते हुए विषय की ईमानदारी पर मेहनत करते हैं, ईमानदार शोध करते हैं, ईमानदार दस्तावेजीकरण करते हैं। आज इस देश में स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद हैं। अगले कई हफ्ते या कुछ महीने बंद रह सकते हैं। अगर इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, भारतीय मजदूरों का अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, ऐसे विषयों के जानकार अपने आसपास के बड़े स्कूली बच्चों, या कॉलेज के बच्चों, या समाज के बेरोजगारों को मजदूर-त्रासदी की ऐसी कहानियां दर्ज करने में लगा सकें, तो वह इस देश की एक तकलीफदेह हकीकत का दस्तावेजीकरण होगा। और यह मौका अगर एक बार निकल जाएगा, तो दुबारा फिर आएगा भी नहीं। 

इसी तरह सोशल मीडिया, और डिजिटल मीडिया के जानकार लोगों के एक समर्पित समूह को देश भर के मीडिया से इस दौर की कहानियों को इक_ा करना चाहिए, सोशल मीडिया से जानकारी दर्ज करनी चाहिए, मजदूरों के जितने नंबर सरकारों के पास आ रहे हैं उनको इक_ा करना चाहिए ताकि आगे-पीछे उनसे फोन से बात करके भी उनके तजुर्बे को लिखा जा सके। इस देश में पढ़ाई-लिखाई वाला तबका अगर जिम्मेदार होगा, तो आज की इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराएगा। आज हिन्दुस्तान के पिछले दो सौ बरस के, या उससे भी अधिक के, गजेटियर मौजूद हैं, तो अंग्रेजों के वक्त मेहनत से किए गए दस्तावेजीकरण की वजह से हैं। आज भी इस देश में प्रशासनिक प्रशिक्षण के नाम पर छांटे गए बड़े अफसरों का जो प्रशिक्षण होता है, उसमें कमरों के भीतर के काम से हटाकर उन तमाम लोगों को सड़कों पर झोंक देना चाहिए ताकि वे कम से कम इतना तो देख और सीख सकें कि शासन-प्रशासन कैसा नहीं होना चाहिए। जो लोग इस दौर में सीखना नहीं चाहते, समकालीन इतिहास दर्ज करना नहीं चाहते, उनका सारा शिक्षण-प्रशिक्षण बकवास से अधिक कुछ नहीं रहेगा। किसी भी देश-प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था सामाजिक जिम्मेदारी और सरोकार से परे नहीं होनी चाहिए, वरना विज्ञान एक बम बनाना जानता है, उसे हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराकर तबाही करने के नुकसान नहीं जानता। आज भारतीय लोकतंत्र की विफलता को लेकर एक व्यापक अध्ययन की जरूरत है। किसी भी समस्या के समाधान की पहली सीढ़ी यह होती है कि समस्या को समस्या माना जाए। उसे मानने के बाद ही उसका विश्लेषण करके जवाबदेही देखकर, उसका समाधान ढूंढा जा सकता है, भविष्य में उससे बचने का रास्ता ढूंढा जा सकता है। 

 

हिन्दुस्तान आज जिस दौर से गुजर रहा है, अगर लोकतंत्र कामयाब रहेगा, तो दुबारा ऐसी नौबत नहीं आएगी। लेकिन लोकतंत्र कामयाब तभी रहेगा जब उसकी आज की नाकामयाबी का अच्छी तरह अध्ययन करके आगे का रास्ता तय किया जाएगा। जो लोग सरकारिया कमीशन के पहले से भारत के संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्यों के संबंधों को लेकर फिक्र में दुबले होते आए हैं, उनके लिए केन्द्र-राज्य संबंधों के अध्ययन का इससे बड़ा कोई मौका आजाद भारत में तो नहीं आया था, और लोकतंत्र दुबारा ऐसा मौका आने भी न दें। जिन सैकड़ों लोगों ने केन्द्र-राज्य संबंधों को लेकर फर्जी और कागजी शोध किए हुए हैं, उन सबको रद्दी की टोकरी में डालते हुए आज ईमानदार शोधकर्ताओं को इस लॉकडाऊन को लेकर केन्द्र-राज्य के संबंधों, जिम्मेदारियों और अधिकारों पर नया अध्ययन करना चाहिए, और जिनकी दिलचस्पी इस या ऐसे विषय में हो, उनको भी मेहनत करने के लिए जुट जाना चाहिए। 

कुल मिलाकर बात को खत्म करते हुए हम अगर कुछ लिखें तो वह यह है कि समकालीन भारतीय इतिहास का ईमानदार और गंभीर दस्तावेजीकरण करने की जरूरत है, लोगों के बयान, उनकी त्रासदी की असल जिंदगी की कहानियां दर्ज करने की जरूरत है, आदमियों से परे औरतों से भी अलग से बात करके उसे रिकॉर्ड करने की जरूरत है क्योंकि भारतीय समाज में एक त्रासदी का आदमी पर असर अलग होता है, और औरत पर असर अलग होता है। ऐसी गरीब, मजदूर, ग्रामीण, और मजबूर महिलाओं से बात करने के लिए महिला कार्यकर्ताओं और छात्राओं के भी बहुत बड़े-बड़े जत्थों की जरूरत पड़ेगी। इस देश की सरकारों में इतिहास लेखन के लिए जो संस्थाएं हैं, जो लोग हैं, वे कभी नहीं चाहेंगे कि ऐसा कोई समकालीन इतिहास लेखन हो, लेकिन लोकतंत्र का तकाजा है कि यह हो। 

-सुनील कुमार


10-May-2020

बच्चे पैदा करने की सोचने
के पहले दुनिया पर सालभर
छाए रहने वाले खतरे भी सोचें

हमने कई दिन पहले इसी जगह बहुत गंभीरता से यह बात लिखी थी कि लोगों को इस बरस बच्चे पैदा करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। इसकी कोई वैज्ञानिक वजह हमारे पास नहीं थी, हमने सिर्फ कोरोना के मेडिकल खतरे को देखते हुए, और आने वाले वक्त देश और दुनिया की आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह सलाह यहां भी लिखी थी, और कुछ अधिक तल्ख शब्दों में सोशल मीडिया पर भी। अब इसका एक वैज्ञानिक आधार भी सामने आया है। जिस चीन से कोरोना शुरू हुआ है, उसी चीन ने वहां के पुरूष मरीजों के शुक्राणु की जांच करके यह पाया है कि उसमें भी कोरोना पहुंच रहा है। अब कितने नमूनों में से कितनों तक पहुंच रहा है हम इस पर जाना नहीं चाहते क्योंकि आंकड़े लोगों को झूठा दिलासा भी दिला देते हैं। लेकिन यह बात समझने की है कि जिस शुक्राणु से अगली पीढ़ी का जन्म शुरू होता है, उस शुक्राणु में अगर कोरोना वायरस पहुंच रहा है, तो यह एक वैज्ञानिक खतरे की बात भी है। 

आज इस मुद्दे पर चर्चा की जरूरत इसलिए भी है कि डब्ल्यूएचओ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, समेत कई संगठनों का यह अंदाज है कि लॉकडाऊन के समय घरों में लंबे समय तक कैद जोड़ों के बच्चे इसी बरस में एक सैलाब की तरह आने वाले हैं। रोजगार जाने वाले हैं, जिंदगी जीने के साधन जाने वाले हैं, और बच्चे आने वाले हैं! फिर ये बच्चे एक ऐसी दुनिया में आएंगे जिसका इलाज का पूरा ढांचा कोरोना केन्द्रित हो चुका रहेगा, मतलब यह कि बाकी तमाम किस्म की बीमारियों के इलाज और चिकित्सा की जरूरत उपेक्षित रहेगी। लोगों के पास खाने को नहीं होगा, नौकरी और रोजगार नहीं रहेगा, लेकिन उनके हाथों में नए जन्मे बच्चे रहेंगे। अब यह पूरा सिलसिला इतना खतरनाक है कि यह सिलसिला भारी गैरजिम्मेदारी का भी रहेगा। अगर जिम्मेदारी के साथ एक नए बच्चे को बड़ा किया जाता है, तो उसका खर्च किसी भी मायने में एक बड़े से कम नहीं होता है। ऐसे में पहले से अधिक आबादी वाले हिन्दुस्तान जैसे गरीब देश में और बच्चे बढ़ाना एक भयानक खतरे की बात होगी, दुनिया के दूसरे देशों में भी। 

अगली पीढ़ी को दुनिया में लाना एक बड़ी तैयारी से गंभीर योजना के साथ किया हुआ काम रहना चाहिए। आने वाला वक्त बच्चों की बढ़ी हुई जरूरतों और बढ़ी हुई उम्मीदों का भी रहेगा। ऐसे में न तो दुनिया के अस्पताल बच्चों के सैलाब के लिए तैयार रहेंगे, और न ही अधिकतर परिवारों की आर्थिक स्थिति इस लायक रहेगी। हिन्दुस्तान जैसे देश में तो करोड़ों लोग आज जिस बेदखली के शिकार हुए हैं, उससे वे अगले सालभर के भीतर उबरकर पता नहीं किस शहर में रहेंगे, किस गांव में रहेंगे, या किस हाल में रहेंगे। ऐसे में अगर मजदूर काम पर लौटते हैं, तो दूसरे शहरों में जहां आज उन्हें सिर छुपाने की जगह नहीं मिली, दो वक्त का खाना नहीं मिला, वहां पर उनके नए बच्चे के जन्म की सुविधा मिल जाएगी, उसे पोषण आहार और इलाज मिल जाएगा, यह सपना फिजूल का है। लोगों को महज बच्चों की चाह, या सेक्स के चलते अनचाहे बच्चों से इस दौर में बचना चाहिए। कोरोना के पूरे खतरे तो अभी तक सामने भी नहीं आए हैं, आने वाले महीनों में हो सकता है कि कोरोना के बाद के कई और खतरे चिकित्सा विज्ञान स्थापित करे, और वे अगर सबसे गरीब आबादी के कम संख्या के लोगों को प्रभावित करने वाले होंगे तो उसके लिए टीका या दवाईयां भी विकसित करने का काम इस रफ्तार से नहीं होगा जिस रफ्तार से आज कोरोना के लिए टीका तलाशा जा रहा है। इसलिए इस धरती को भी थोड़ी सी राहत देनी चाहिए, बढ़ती हुई आबादी से, उस आबादी की बढ़ती हुई खपत से, और धरती की तबाही से। हम यह बात भारत जैसे गरीब देशों के संदर्भ में नहीं लिख रहे क्योंकि हिन्दुस्तानी आबादी अधिक होने के बावजूद प्रति व्यक्ति खपत की बात करें तो हिन्दुस्तानी लोग बहुत पीछे हैं, उनकी जरूरतें बहुत सीमित है। दुनिया के विकसित देशों के मुकाबले हिन्दुस्तान के औसत बच्चे दस फीसदी भी खपत नहीं करते, पांच फीसदी भी खपत नहीं करते। लेकिन कम खपत के बावजूद हिन्दुस्तानी बच्चों के साथ एक दिक्कत यह है कि यह देश दुनिया में सबसे कम स्वास्थ्य सुविधाओं वाला देश है, अपने से बहुत से गरीब देशों के मुकाबले भी हिन्दुस्तान में स्वास्थ्य सुविधाएं कम हैं, और जो हैं उनमें भी अमीर और गरीब आबादी के बीच इनका बंटवारा बहुत अधिक अनुपातहीन है। ऐसे में कोरोना के तुरंत बाद पैदा होने वाली पीढ़ी अगर कोई गंभीर तकलीफ लेकर आएगी तो उसका क्या होगा? दुनिया में जगह-जगह ऐसा हुआ है कि किसी दवा के साईड इफेक्ट से, या किसी वायरस की वजह से बच्चे बहुत ही गंभीर शारीरिक दिक्कतों को लेकर पैदा हुए। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ बरस पहले ही जीका वायरस के चलते हुए ब्राजील जैसे कई देशों में जो बच्चे पैदा हुए वे बहुत भयानक तकलीफों को झेल रहे थे। उन तस्वीरों को देखना भी डरावना हो सकता है लेकिन फिर भी हम खतरे से लोगों को आगाह करना चाहते हैं। यह पूरा सिलसिला मां-बाप के लिए अपने पर काबू करने का है, परिवार के बुजुर्गों को भी अपनी उन हसरतों पर काबू पाना चाहिए कि वे जाने के पहले अगली पीढ़ी का चेहरा देख लें। ऐसे तमाम लोग यह सोचें कि अगली पीढ़ी का चेहरा अगर इस किस्म का होगा, जैसा कि जीका वायरस की वजह से हुआ है, तो क्या वैसा चेहरा भी उन्हें खुश करेगा? 

आज का वक्त बहुत खराब होने के बावजूद दवा दुकानों के खुले रहने का है। अगले एक बरस के लिए लोगों को अपने मनपसंद गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करके अगले बच्चों से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसे खतरे और इतनी अनिश्चितता के बीच बच्चों के बारे में सोचना सिवाय आपराधिक गैरजिम्मेदारी के और कुछ नहीं होगा। 
-सुनील कुमार


09-May-2020

आज भारत एक देश के बजाय प्रदेशों में बंटे हुए समूह की तरह बर्ताव कर रहा है क्योंकि

आज एक अजीब सी खबर सामने आई है, जब पूरे देश से करोड़ों मजदूर अपने गृहप्रदेश लौटने के लिए हजार-हजार किलोमीटर तक पैदल चल रहे हैं, तब बिहार के मजदूरों की ट्रेन सरकारी मंजूरी के साथ तेलंगाना रवाना हुई है, क्योंकि वहां मिल मालिकों ने उन्हें काम पर बुलाया है, और सरकारी औपचारिकताएं पूरी करके वे काम पर जा रहे हैं। हिन्दुस्तान अलग-अलग प्रदेशों में खंडित देश कभी नहीं रहा है। जब यह अंग्रेजों का गुलाम रहा उस वक्त तो पूरा का पूरा पाकिस्तान, इधर बांग्लादेश सहित कई और देशों तक इस देश का नक्शा, या अंग्रेजीराज का नक्शा फैले रहा। यह तो हाल के बरसों में केन्द्र और राज्यों के बीच एक अभूतपूर्व टकराव खड़ा हुआ है जिसकी वजह से बार-बार देश के संघीय ढांचे की बात उठ रही है। पहले शायद यह बात इसलिए भी अधिक नहीं उठती थी कि देश का अधिकतर हिस्सा अकेली कांग्रेस पार्टी के कब्जे में था, और केन्द्र तथा अधिकतर राज्य एक ही रीति-नीति पर, एक ही लीडरशिप पर चलते थे। आज जब अलग-अलग प्रदेशों से निकलकर मजदूर अपने गांव लौट जाना चाह रहे हैं, ताकि बिना काम के भी वे अपनी झोपड़ी में जिंदा रह सकें, तो यह बात भी उठ रही है कि दूसरे प्रदेशों में जाकर काम करने वालों की ऐसी वापिसी से इन उद्योग-व्यापार का क्या होगा, और अपने प्रदेश जाकर वे क्या करेंगे, उनके लिए रोजगार पहले ही नहीं था तभी तो वे दूसरे प्रदेश पहुंचे थे। अब लौटकर वे अपने गरीब प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर क्या एक नया अतिरिक्त बोझ नहीं बन जाएंगे? 

आज हिन्दुस्तान के सभी प्रदेशों के सामने दो किस्म की दिक्कतें चल रही हैं। धंधा बंद है जिससे कि सभी परेशान हैं, जनता से लेकर सरकार तक का जीना मुश्किल हो रखा है। दूसरी बात जम्मू-कश्मीर राज्य के वक्त से वहां जिस तरह का लॉकडाऊन शुरू हुआ, वह राज्य के टुकड़े हो जाने के बाद भी जारी है, और लोगों का जीना कैसे हो रहा होगा, यह बाकी हिन्दुस्तान ने कभी सोचा ही नहीं। आज बाकी हिन्दुस्तान की हालत कमोबेश उसी किस्म की हो रही है जिस तरह कश्मीर की हालत आधा साल पहले से चली आ रही थी। आवाजाही बंद, धंधा बंद, स्कूल-कॉलेज बंद, और धरती की इस जन्नत को बाकी हिन्दुस्तान के मुकाबले एक और अतिरिक्त रोक मिली थी, फोन और इंटरनेट बंद होने की। आज बाकी हिन्दुस्तान कम से कम फोन और इंटरनेट की कमी तो नहीं झेल रहा है। आज देश के बाकी तमाम प्रदेश मंदी से परे एक दूसरी दिक्कत झेल रहे हैं, कुछ के पास कारखाने हैं, कंस्ट्रक्शन के काम हैं, लेकिन मजदूर लौट चुके हैं, या बचे-खुचे लौटने के लिए स्टेशनों पर पहुंचे हुए हैं, या पटरियों पर कटे पड़े हैं। दूसरी तरफ जिन राज्यों में उनके मजदूर लौट रहे हैं, उन राज्यों के पास स्टेशनों पर, या राज्य की सरहद पर मेडिकल जांच की चुनौती है, तमाम मजदूरों की जानकारी दर्ज करने, उन्हें ठहराने, जरूरत पर उनका इलाज करने के लिए दाखिला करने, और फिर उन्हें गांव तक पहुंचाने की चुनौती तो है ही। इससे परे एक और बहुत बड़ी चुनौती यह है कि लाखों से लेकर दसियों लाख तक लोग अलग-अलग राज्यों में लौट रहे हैं, उन्हें कैसे काम से लगाया जाएगा? दूसरे प्रदेशों में मजदूरी या दूसरे काम करके वे लोग जो कमाई घर भेजते थे, अब उसका क्या होगा? घरवालों का क्या होगा? कुल मिलाकर बड़े पैमाने पर बेकारी और बेरोजगारी के जो-जो बुरे असर हो सकते हैं, उन सबसे राज्य कैसे निपटेंगे? 

बोलचाल की मजाक की जुबान में कहा जाता है कि एक तरफ पीपल के पेड़ को भूत नहीं मिल रहा है, तो दूसरी तरफ भूतों को पीपल नहीं मिल रहा है। आज प्रदेशों की हालत यही है। कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे बहुत सारे संपन्न, विकसित, और रोजगार की गारंटी वाले राज्य हैं, जो कि अपनी स्थानीय आबादी से अधिक बाहरी मजदूरों पर निर्भर रहते हैं। स्थानीय आबादी खेती में खप जाती है, और दूसरे बहुत से कारोबार दूसरे प्रदेशों के मजदूरों पर टिके रहते हैं। ऐसे लोगों में से बहुत से लोग तो आज भी रोजगार की जगह को छोड़कर अपने गांव लौटने के पहले चार बार सोच रहे हैं कि गांव लौटकर आखिर करेंगे क्या? यहां पर एक बार फिर केन्द्र और राज्य सरकारें की जिम्मेदारी और नाकामयाबी दोनों की चर्चा जरूरी हो जाती है। राज्यों के पास न तो अपने राज्य से बाहर गए हुए मजदूरों, कारीगरों, और दूसरे हुनरमंदों की पुख्ता और पूरी जानकारी है, न ही विकसित राज्यों के पास वहां आए हुए दूसरे प्रदेशों के मजदूरों  की जानकारी है। हालत यह है कि जिन राज्यों के लोग बाहर जाते हैं वहां की सरकार, वहां के नेता, वहां का समाज उसे मजदूरों का पलायन कहता है। हम लगातार हमेशा से इस पलायन शब्द को अन्यायपूर्ण मानते हुए यह लिखते आए हैं कि मजदूर अपनी किसी जिम्मेदारी को छोड़कर बाहर नहीं भागते हैं, जब उनके अपने प्रदेश की सरकारें उन्हें रोजगार नहीं दे पातीं, उन्हें जायज मजदूरी नहीं मिल पाती, तो ही वे काम की तलाश में, बेहतर मजदूरी की तलाश में बाहर जाते हैं। इसी तरह आज जब रोजगार देने वाले प्रदेश इस बात का रोना रो रहे हैं कि जब काम शुरू होने के आसार हैं तो मजदूर उन्हें छोड़कर चले जा रहे हैं, और इसे उल्टा-पलायन कह रहे हैं, तो हम एक बार फिर इस शब्द को भी अन्यायपूर्ण पाते हैं। हमारा मानना है कि रोजगार वाले प्रदेश अगर प्रवासी मजदूरों का ठीक से ख्याल रखते, तो हजार-हजार किलोमीटर के सफर पर मरने के लिए ये गरीब मजदूर निकले ही नहीं होते। इन रोजगारी प्रदेशों ने भी बाहर से आए मजदूरों को मानो स्थानीय कारोबारियों और कारखानेदारों का बंधुआ मजदूर बनाकर आसानी से भुला दिया था क्योंकि ये उन राज्यों के वोटर तो थे ही नहीं। 

अब जब केन्द्र सरकार ने करीब डेढ़ महीने पहले लॉकडाऊन किया, तो उसने इनमें से किसी भी किस्म के प्रदेश से चर्चा नहीं की, जहां मजदूर थे उनसे चर्चा नहीं की कि सबसे आसान काम, उन्हें उसी प्रदेश में जिंदा रहने में मदद करता, कैसे किया जाएगा। दूसरी तरफ जिन प्रदेशों में ऐसे करोड़ों मजदूर लौट सकते थे, उनसे भी बात नहीं की कि इनके वापिस आने का क्या इंतजाम होगा, लौटकर वे कहां रहेंगे, क्या करेंगे, और क्या कमाएंगे-खाएंगे। नतीजा यह हुआ कि आज हर राज्य एक किस्म से अनाथ हो गया है और उसे अपने धंधों की, या अपने बंदों की फिक्र सारी की सारी खुद करनी पड़ रही है। नतीजा यह हुआ है कि भारत एक देश के बजाय प्रदेशों में बंटे हुए एक समूह की तरह बर्ताव कर रहा है क्योंकि जिम्मेदारी आकर प्रदेश की सरहद पर खत्म हो रही है, या वहां से शुरू हो रही है। जब कभी राष्ट्रीय स्तर की कोई समस्या होती है, विपदा होती है, या राष्ट्रीय स्तर का कोई समाधान ढूंढना होता है, तो भारत के संघीय ढांचे में सबसे बड़ी जिम्मेदारी, और शायद अकेली जिम्मेदारी केन्द्र सरकार पर ही आती है, जो कि राज्यों को भरोसे में लेकर, उनमें तालमेल बिठाकर, जरूरत के मुताबिक उनकी मदद करके विपदा से पार पाती है। लेकिन आज केन्द्र सरकार मोटे तौर पर एकतरफा बंदिशें लागू करने वाली एक तमाशबीन की तरह दिख रही है जो कि राज्यों के बीच किसी भी किस्म के तालमेल से बिल्कुल ही हाथ झाड़ बैठी है। यह नौबत भारतीय लोकतंत्र और उसकी शासन व्यवस्था को बनाने वाले लोगों ने शायद सोची भी नहीं होगी कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की सबसे भयानक विपदा के वक्त केन्द्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी, और प्रदेशों के बीच अपने-अपने अस्तित्व का संकट उन्हें आत्मकेन्द्रित और आत्मरक्षा के फैसले लेने पर मजबूर करेगा। आज हालत यह है कि कुछ प्रदेश बिना किसी इंतजाम के बेबस मजदूरों को बेबसी में रोके रखना चाहते हैं, ठीक बंधुआ मजदूरों की तरह। कई प्रदेश यह बिल्कुल भी नहीं चाहते हैं कि कोरोना-संक्रमण के इस भयानक दौर में उनके प्रदेश के मूल निवासी मजदूर दूसरे प्रदेशों से वापिस लौटें, और सरकार की मुसीबत को कई गुना बढ़ा दें। और जिन प्रदेशों से होकर मजदूर गुजर रहे हैं, वे सारे ही प्रदेश यह चाहते हैं कि यह बला जल्द से जल्द उनकी जमीन से पार हो जाए, और अगले प्रदेश में चले जाए। कड़वा सच यह भी है कि प्रदेशों के भीतर भी मजदूरों की राह में पडऩे वाले जिलों के अफसर भी इतने आत्मकेन्द्रित हो गए हैं कि वे अपने जिलों में दाखिल होने वाले मजदूरों को जल्द से जल्द अगले जिले में दाखिल करवा देना चाहते हैं, ताकि उनके जिले पर से बला टले। 

केन्द्र सरकार के एक गलत, और बिना तैयारी, बेमौके के लॉकडाऊन के एकतरफा फैसले ने राज्यों को केन्द्र से अलग कर दिया है, और राज्यों के भीतर एक जिले ने उसको दूसरे जिले से अलग कर दिया है। अखंड भारत की सोच रखने वाले लोगों को यह खंड-खंड भारत, और उसके खंड-खंड जिले आसानी से समझ नहीं आएंगे क्योंकि भावनाओं की पट्टी आंखों के साथ-साथ दिमाग को भी ढांक लेती है। फिलहाल यह बरस निकल जाए, तो उसके बाद लोकतंत्र के शोधकर्ताओं को भारत के संघीय ढांचे पर कोरोना की चुनौती नाम का एक दिलचस्प मुद्दा शोध करने के लिए मिलेगा। 
-सुनील कुमार


08-May-2020

घर लौटते थोक में कटते मजदूर 
कोरोना और पूंजीवाद ही नहीं, 
लोकतंत्र की भी मार झेल रहे हैं

महाराष्ट्र में आज सुबह-सुबह रेलपटरियों पर थककर निढाल होकर सोए हुए प्रवासी मजदूरों पर से मालगाड़ी धड़धड़ाते हुए निकल गई, और करीब डेढ़ दर्जन मजदूर कटकर मर गए। वे जालना के एक कारखाने में काम करते थे, और उन्हें भुसावल से मध्यप्रदेश वापिसी की ट्रेन मिलने की उम्मीद या खबर थी। पूरी रात पटरियों पर चलकर थककर वे सो गए थे क्योंकि उनकी जानकारी के हिसाब से देश भर में रेलगाडिय़ां बंद थीं। थकान इतनी रही होगी कि आती मालगाड़ी की आवाज भी, पटरियों की कंपकपी ने भी उनकी नींद तोड़ी नहीं होगी, और सब गाजा-मूली की तरह कट गए। ये मध्यप्रदेश के शहडोल इलाके से गए हुए मजदूर बताए जा रहे हैं, इस इलाके के आदिवासी मजदूर हमेशा से काम की तलाश में देश के दूसरे हिस्सों में जाते रहे हैं। इसके साथ-साथ उमरिया जिले के मजदूर भी थे जिन्हें अपना प्रदेश देखना नसीब नहीं हो पाया। लॉकडाऊन के पैंतालीस दिनों के बाद भी आज देश भर में घरवापिसी करते मजदूरों का यही हाल है। अब तक दर्जनों और मजदूर सड़कों पर गिरकर मर चुके हैं जिनमें बस्तर की बारह बरस की एक बच्ची भी शामिल है जो तेलंगाना के मिर्च के खेतों से मजदूरी करके लौटते हुए तीन दिन पैदल चलने के बाद मर गई। इस देश में लौटते हुए मजदूरों में से अधिकतर बदन में पानी की कमी से मर रहे हैं, थोक में ऐसी मौतों का आज सुबह यह पहला मामला रहा, जो हो सकता है कि देश में कुछ लोगों का दिल हिला भी सके। 

न चाहते हुए भी लॉकडाऊन के नतीजों और असर पर घूम-फिरकर लिखना पड़ रहा है क्योंकि उसके बिना लिखने की जिम्मेदारी पूरी हो नहीं सकती। आज यह बात समझ में आ रही है कि केन्द्र सरकार के लादे गए इस लॉकडाऊन के लिए राज्य बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। न तो राज्यों की ऐसी कोई विशेषज्ञता थी कि करोड़ों लोगों की आवाजाही को सेहत की जांच के साथ जोड़कर वे काबू में रख सकें, उनका इंतजाम कर सकें। न ही करोड़ों लोगों की जांच का इंतजाम राज्यों के पास था, न ही इलाज का। लेकिन इन सबसे बढ़कर करोड़ों मजदूरों के रहने-खाने, और जिंदा रहने की बाकी जरूरी बुनियादी बातों के इंतजाम का तो उनके पास कुछ भी नहीं था। न हुनर था, न ताकत थी, और न ही केन्द्र सरकार ने राज्यों को इस फैसले में किसी भी तरह शामिल किया था। नतीजा यह हुआ कि चार घंटे के नोटिस पर देश भर में रेल-बस सबको बंद कर दिया गया, और लोग फंसे रह गए। राज्यों के ऊपर एक ऐसी जिम्मेदारी आ गई जिससे निपटना उन्हें सीखना भी पड़ रहा है, और युद्ध स्तर पर उसे करना भी पड़ रहा है। जिस राज्य की जितनी क्षमता है, राजनीतिक इच्छा-शक्ति है,  उतना काम हो पा रहा है, और पूरे देश भर से एक बात समझ आ रही है कि हर राज्य अपनी जमीन पर से तो दूसरे राज्य के लोगों को जल्द से जल्द सरहद पार करा देना चाह रहा है, और अपने लोगों को लौटाकर लाने के काम को या तो चाह नहीं रहा है, या फिर प्रतीकात्मक रूप से, अनमने ढंग से कर रहा है ताकि प्रदेश पर न तो अंधाधुंध आर्थिक बोझ आए, और न ही प्रदेश की इलाज की क्षमता चुक जाए। यह सिलसिला इसलिए भी खड़ा हुआ है कि न तो केन्द्र सरकार ने राज्यों को इस फैसले में शामिल किया, न तैयारी में शामिल किया, और न ही इसकी अभूतपूर्व लागत में हिस्सा बंटाया। नतीजा यह है कि आज राज्य अपने सीमित साधनों को देखते हुए जो कर पा रहे हैं, और उस सीमा के भीतर जो सचमुच ही करना चाह रहे हैं, वही कर रहे हैं।

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नतीजा यह है कि लॉकडाऊन के करीब डेढ़ महीने बाद मजदूर अब तक घर जाने के रास्ते पर हैं, हम छत्तीसगढ़ में ही रोजाना ट्रकों पर सामानों के ऊपर लदे हुए मजदूरों को देख रहे हैं, और आम लोगों के लिए भी यह सोच पाना आसान नहीं होगा कि तपती दुपहरी में लोहे के गैस सिलेंडरों से लदी ट्रक के ऊपर उन सिलेंडरों पर बैठे हुए मजदूर अगर पूरे-पूरे दिन का सफर कर रहे हैं, और उसे पैदल सफर के मुकाबले एक राहत मान और पा रहे हैं, तो यह इस लोकतंत्र के इतिहास में एक काला दिन है जब लोग घरों में बंद एयरकंडीशंड आराम में शिकायत कर रहे हैं, और करोड़ों लोग इस तरह सफर कर रहे हैं। यह उन पर महज कोरोना की मार नहीं है, उनसे कहीं अधिक यह लोकतंत्र की मार है जिसने यह साबित कर दिया है कि सत्ता के पसंदीदा तीर्थयात्री एक अलग दर्जे के हिन्दुस्तानी हैं जिनको ले जाने के लिए एयरकंडीशंड बसें हैं, अलग-अलग राज्य सरकारों की बसें हैं जो कोटा में लाखों रूपए सालाना खर्च करके कोचिंग पा रहे बच्चों को वापिस ला रही हैं, लेकिन तपती गर्मी में गर्भवती महिलाओं, दुधमुंहे बच्चों, और बुजुर्गों को लेकर सफर करते लोगों के लिए सामाजिक संगठनों द्वारा कहीं-कहीं मिल जा रहे खाने के पैकेट हैं। आज राज्य सरकारें भी मोटेतौर पर इन मजदूरों को कहीं-कहीं पर रोक रही हैं, तो वह मजदूरों को राहत देने के लिए कम, और अपने राज्य को बीमारी से बचाने के लिए ज्यादा है। ऐसे में मजदूरों का जत्था, घरवापिसी के लिए पटरियों पर चलते-चलते, पूरी रात चलते जब थककर वहीं सो गया, तो इस लोकतंत्र ने उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। 

यहां लिखी कई बातों पर हम पिछले दिनों में कई बार लिख चुके हैं, लेकिन रोज ही ऐसी मौतें सामने आ रही हैं, रोज ही नेताओं के श्रद्धांजलि नाम के पूरी तरह खोखले शब्द हवा में गूंज रहे हैं, जो कि जिम्मेदारी की जगह श्रद्धांजलि का काम कर रहे हैं। यह देश पिछले दो महीनों में लोकतंत्र को जितने हिंसक और वीभत्स रूप में देख चुका है, उससे यह बात साफ है कि जब देश-प्रदेश की सत्ता हांकने वाले लोग करोड़पतियों से बढ़कर अरबपति और खरबपति हो जाते हैं, जब उनके दोस्त केवल खरबपति रह जाते हैं, तब भूख, प्यास, धूप, फफोले, बच्चों का दूध जैसे शब्दों के मायने वे भूल जाते हैं। यह लोकतंत्र इतना खतरनाक हो गया है कि यह बहुमत का तय किया हुआ हिंसातंत्र हो गया है, यह लोकतंत्र सत्ता की आंखों में जनता की अनदेखी का तंत्र हो गया है। यह लोकतंत्र अब दो अलग-अलग तबकों का हो गया है, एक वह जिसके पास लॉकडाऊन के लिए आरामदेह घर है, और दूसरा वह तबका जिसके पास अपने घर पहुंच जाने की दहशत में मौत तक का सफर है। 

हमको इस मौके पर एक और बात पर हॅंसी आती है, इस देश के तमाम ईश्वर अपने-अपने घरों में कपाट बंद करके बैठ गए हैं, और हो सकता है कि भीतर वे मास्क भी लगाकर बैठे हों। और जिस देश की अमूमन आस्थावान जनता ईश्वर के नाम पर धोखा खाते आई है, वह आज भी उसी ईश्वर का नाम लेते हुए यह सफर कर रही होगी, जबकि यह बात जाहिर है कि किसी धर्म के किसी ईश्वर ने भी ऐसा मुश्किल सफर कभी नहीं किया होगा। इस देश के आज के नेताओं में से भी किसी ने न कभी ऐसा मुश्किल सफर किया होगा, न अपने मां-बाप और बच्चों को इस तरह मरते देखा होगा, न ही उनमें से किसी की संतानें ऐसे में सड़क किनारे पैदा हुई होंगी, और जिनके दिमाग से महाराष्ट्र की आज की डेढ़ दर्जन लाशें भी शायद शाम तक हट चुकी होंगी। ऐसे लोकतंत्र में आज हिन्दुस्तानी गरीब मजदूर, और उसके कुनबे महज कोरोना से नहीं लड़ रहे, वे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से लड़ रहे हैं, और सरकारों की अनदेखी से भी लड़ रहे हैं, खासकर केन्द्र सरकार की।
-सुनील कुमार 


07-May-2020

अर्थव्यवस्था चलाने सरकारें 
मजदूर कानून स्थगित रखने 
की तैयारी कर रही हैं ?

आन्ध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में एक केमिकल-कारखाने से मुंहअंधेरे जहरीली गैस रिसी, और आठ लोगों की मौत की खबर है, और हजारों इससे प्रभावित हुए हैं। दुनिया के सबसे बुरे औद्योगिक हादसे, भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने की याद ऐसे मौके पर आती ही है जिसमें हजारों लोग मारे गए थे, और लाखों की जिंदगी तबाह हो गई थी। चौथाई सदी गुजर जाने पर भी भोपाल उसके जख्मों से उबर नहीं पाया है। वह गैस हादसा भी इसी तरह स्टोर की गई गैस में हुआ था, और इसी तरह सुबह के मुंहअंधेरे हुआ था। 

कल से लेकर आज तक देश के मजदूरों और कारखानों की ही चर्चा हो रही है, और कल इसी जगह हमने देश के कई उद्योगपतियों, और कई उद्योग संगठनों की बात भी लिखी थी जो कि यह सोचते हैं कि लॉकडाऊन के इस दौर में खाली बैठे मजदूर अपने गांव भी न जाएं, और कारखाने-काम शुरू होने का इंतजार करें। दूसरी तरफ मालिकों से किसी तरह की मदद न मिलने पर, जान पर खतरा, जेब खाली, सिर पर अनिश्चितता के चलते मजदूर राह में मरते हुए भी पैदल आगे बढ़ते जा रहे हैं, बचे हुए जिंदा मजदूर। ऐसे में मजदूरों के हक, काम की उनकी गारंटी की बात भी करना जरूरी है। एक खबर यह आ रही है कि भारत के कुछ राज्य मजदूर कानूनों में अगले तीन साल के लिए ढील देने जा रहे हैं ताकि कारखानों के बंद होने की नौबत न आए, और नए कारखाने शुरू करने में लोगों की दिलचस्पी रहे। यह बात कई देशों के सिलसिले में पहले भी हुई है कि किस तरह चीन में मजदूर कानूनों को खत्म करके वहां पर उत्पादन बढ़ाया गया है, और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी है। हिन्दुस्तान में अभी दो-चार दिन पहले ही देश के एक सबसे अच्छे समझे जाने वाले उद्योगपति, नारायण मूर्ति का यह बयान सामने आया था कि लोगों को दस घंटे रोज काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस बात के लिए मजदूरों के बहुत से हिमायती लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी खूब आलोचना भी की थी, और कल से अब तक कर्नाटक के भवन निर्माताओं की आलोचना चल ही रही है कि उन्होंने किस तरह राज्य सरकार पर दबाव डालकर मजदूरों की वापिसी की रेलगाडिय़ां रद्द करवाईं ताकि लॉकडाऊन के बाद काम शुरू होने पर निर्माण मजदूर उपलब्ध रहें। आज एक अखबार की रिपोर्ट है कि उत्तरप्रदेश मंत्रिमंडल ने अगले तीन बरस के लिए बहुत से मजदूर कानून स्थगित कर दिए हैं, लेकिन अभी तक इसकी अधिक पुख्ता जानकारी आई नहीं है कि यह खबर सच है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश को लेकर एक पुख्ता अखबार की जानकारी है कि वहां ऐसी तैयारी चल रही है कि औद्योगिक मजदूरों को लेकर बहुत से कानूनों को स्थगित किया जा सकता है ताकि नए उद्योग वहां आएं। बिहार को लेकर यह बात चल रही है कि आज वहां पर जितनी जनता काम के उम्र की है, उसे भी काम नसीब नहीं है, और इसीलिए लोग बाहर जाते हैं। अब बिहार के सामने यह दिक्कत है कि वहां से बाहर गए 17 लाख मजदूर लौटते हैं, तो वे इस पहले से बेरोजगार चल रहे राज्य में काम क्या करेंगे? और दूसरे प्रदेशों में काम करते हुए वे घर पर जो मजदूरी भेजते थे, उसके बंद होने से बिहार का क्या होगा?

कोरोना के आने के पहले से ही बाजार की मंदी भयानक थी। हिन्दुस्तानी कारखानों और कारोबारों में से शायद ही कोई चैन से दिन गुजार रहे थे। ऐसे में कोरोना इन दो महीनों का धंधा तो खत्म कर ही चुका है, यह बात तय है कि आज ही कोरोना चल बसे, तो भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में चार-छह महीने और लगेंगे ही। आज तो हाल यह दिखता है कि हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था की पटरी भी लोग बेचकर खा चुके हैं, और पटरी भी फिर से बिछानी पड़ेगी। लेकिन यह हालत सिर्फ सरकारों की हो ऐसा भी नहीं है। यह हालत हर कारोबार की भी है। देश के जाने कितने ही टीवी चैनल अपने लोगों को निकाल चुके हैं, बहुत से अखबारों ने छपना बंद कर दिया है, और सिर्फ डिजिटल संस्करण पर आ गए हैं। कल सुबह का टाईम्स ऑफ इंडिया कुल 8 पेज का था, जबकि साल में बहुत से दिन इस अखबार के आठ पेज पलटने के बाद तो इश्तहार खत्म होते थे। यह हाल सभी का है। केन्द्र सरकार की तरफ से यह आदेश जरूर निकाल दिया गया कि कोई मालिक तनख्वाह न काटे, राज्य सरकारों ने आदेश निकाल दिया कि कोई स्कूल फीस न मांगे। अब सवाल यह है कि फीस न लें, तो शिक्षकों को तनख्वाह कहां से दें? इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं कि मजदूर कानून, और नौकरी की सेवा शर्तों से परे जाकर केन्द्र सरकार का फतवा कोई मायने नहीं रखता है, और सरकार किसी को जबर्दस्ती तनख्वाह नहीं दिला सकती। 

अब देश में ऐसे हाल में जब उद्योग-धंधों का एक बड़ा हिस्सा शुरू नहीं होने जा रहा है, उस वक्त कोई सरकार अगर यह सोच रही है कि मजदूर कानूनों को निलंबित रखकर किसी तरह काम-धंधों को शुरू होने दिया जाए, तो एक सरकार के रूप में उसका यह सोचना हमें नाजायज नहीं लगता है। हिन्दुस्तान में एक सदी लड़ते-लड़ते मजदूरों को हक मिले थे, लेकिन ये तमाम हक तभी तक मायने रखते हैं, जब तक उनके साथ-साथ मजदूरी या तनख्वाह भी मिलते रहे। नौकरी ही छूट जाए, काम ही बंद हो जाए, तो मजदूर कानूनों से पेट भरने वाला नहीं है। हमारी यह बात मजदूर विरोधी लग सकती है, लेकिन अगर आज कड़ाई से मजदूर कानूनों को लागू करवाया जाए तो बहुत ही कम काम-धंधे शुरू हो पाएंगे। देश में कई किस्म के काम के लिए केन्द्र सरकार द्वारा तय किए गए वेतनमान आज भी मालिक के हिसाब से व्यवहारिक नहीं हैं, और वे जमीन पर अधिकतर संस्थानों में लागू भी नहीं होते हैं, जिनमें अखबारों को लेकर बनाया गया वेतनमान भी शामिल है। इसी तरह दूसरे कारोबार भी देश की अर्थव्यवस्था के चलते मजदूर कानूनों का बोझ उठाना मुश्किल पा रहे हैं। ऐसे में सरकार में बैठा तबका जरूर यह सोच सकता है कि काम-धंधे चलें तो ही मजदूर-कामगार को काम मिलेगा, और सरकार को टैक्स मिलेगा। आज कोरोना के पहले की बदहाली में कोरोना के बाद की बर्बादी ने जुड़कर हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को ऐसे फटेहाल में पहुंचा दिया है कि मजदूर कानून और रोजगार के बीच आपस में एक टकराव दिखने लगा है। यह नौबत मजदूरों के हित के खिलाफ है, लेकिन यह नौबत मालिकों के काबू के बाहर की भी है। अब आने वाला वक्त कौन से कानून, कौन से अधिकार, और कौन से रोजगार की जगह लेकर आता है, यह बताना अभी मुश्किल है क्योंकि अभी कोरोना का खतरा पूरी तरह से सामने आना भी बाकी है। अभी हो सकता है कि आने वाले महीने सरकार और कारोबार दोनों के लिए इससे भी अधिक चुनौती के रहेंगे, और सब कुछ इन दोनों के काबू के बाहर भी रहेगा। 

हमने मजदूरों-कामगारों, और हुनरमंद स्वरोजगारियों, सभी के लिए पिछले दिनों यह लिखा था कि लॉकडाऊन के दौरान उनको अपने हुनर को बेहतर बनाना चाहिए, कोई बेहतर हुनर सीखना चाहिए क्योंकि आने वाले वक्त किसी भी धंधे का मैनेजमेंट एक कसाई की तरह यह देखेगा कि किस कर्मचारी से उसका कितना काम निकलता है। जिंदा रहने के लिए हर किसी को अपने आज से बेहतर होकर चलना होगा, अधिक मेहनत करनी होगी, वरना गुजारा बहुत ही मुश्किल रहेगा। जिस तरह लोगों को अपने घर के भीतर के खर्च भी घटाने होंगे, सीमित साधन-सुविधाओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करना होगा, कुछ वैसा ही कारोबार का मैनेजमेंट भी करने पर मजबूर होगा। सारे कानून धरे रह जाएंगे अगर मैनेजमेंट अपने कमजोर कर्मचारियों को हटाने पर उतारू हो जाएगा। हिन्दुस्तान में करोड़ों कर्मचारी बिना किसी औपचारिक कागजात के काम करते हैं जिनको कभी भी हटा दिया जाता है, कभी भी हटाया जा सकता है। ऐसे में मजदूर-अदालतें सरकारी अधिकारी ही चलाते हैं, और सरकार का रूख किसी भी तरह धंधे को जारी रखने का होगा। जब तक कर्मचारी संगठन अदालतों तक जाकर मजदूर कानूनों पर कड़ी अमल के आदेश लाकर उन पर अमल करवाएं, तब तक करोड़ों लोगों के भूखे मरने की नौबत आ सकती है। इसलिए आने वाले महीनों के लिए ही तमाम कामगार-कर्मचारी अपने आपको महत्वपूर्ण साबित करने के लिए तैयारी करें, क्योंकि आने वाला वक्त कम संख्या में अधिक काम करने वाले लोगों का रहेगा, वैसे ही लोगों को काम मिलेगा, वैसे ही लोग अपने स्तर पर जिंदा रह पाएंगे। यह वक्त तमाम गैरसरकारी वेतनभोगियों के लिए बहुत ही खतरे का है, और जैसे-जैसे लॉकडाऊन के बाद काम शुरू होगा, नौकरियां जाने लगेंगी। सभी लोग कमर कसकर तैयार रहें। 
-सुनील कुमार


06-May-2020

मजदूरों की गांव वापिसी न हो 
सके, क्या यह साजिश थी?

देश के कुछ प्रदेशों से उद्योग संगठनों की यह खुली मांग सार्वजनिक मंचों पर सामने आ रही है कि अगर औद्योगिक क्षेत्रों और महानगरों को छोड़कर मजदूर अपने गांव लौट जाएंगे तो कारखाने शुरू नहीं हो पाएंगे। यह बात महीने भर से हवा में तैर रही थी कि जब लॉकडाऊन किया गया तो दूसरे प्रदेशों में फंसे हुए प्रवासी मजदूरों और कामगारों के लौटने का बहुत आसान-मुमकिन इंतजाम इसीलिए रोक दिया गया था कि जल्द ही लॉकडाऊन उठने की नौबत आ जाएगी तो कारखाने और कारोबार मजदूर और कामगार कहां से लाएंगे। कुछ लोगों का तो यह भी मानना रहा कि लॉकडाऊन की घोषणा के चार घंटे के भीतर देश भर की ट्रेन-बस, और बाकी तमाम गाडिय़ों को इसीलिए बंद कर दिया गया था कि मजदूर वापिस न जा सकें, और धंधे शुरू होने पर मालिकों को हासिल रहें। हमने ऐसी आशंका पर पहले इसलिए नहीं लिखा था कि उसका कोई सुबूत नहीं था। लेकिन अब जब एक-एक करके कई उद्योगपति या औद्योगिक संगठन यह फिक्र जाहिर कर रहे हैं, और इस हद तक ट्वीट भी कर रहे हैं कि मानो मजदूर नमकहराम थे, और जब तक काम रहा किया, और फिर निकल गए। ऐसे में यह बात सोचने को हम मजबूर होते हैं कि क्या लॉकडाऊन के फैसले के चार दिन पहले पूरे देश की रेलगाडिय़ों और बसों को मजदूरों को उनके प्रदेश वापिस पहुंचाने में झोंका नहीं जा सकता था? और क्यों नहीं झोंका जा सकता था? आज जब एक-एक मजदूर-स्पेशल ट्रेन के लिए तमाम इंतजाम करने पड़ रहे हैं, तो लॉकडाऊन के पहले के चार दिनों में जब हिन्दुस्तानी रेलगाडिय़ां हर दिन ढाई करोड़ से अधिक मुसाफिरों को हर दिन ढो रही थीं, तो चार दिनों में हर मजदूर अपने घर पहुंच गए होते, बजाय महीने भर से अधिक के पैदल सफर के, और सड़क पर जान देने के। 

कल ही कर्नाटक की यह खबर आई थी कि वहां बिल्डर्स की मांग पर कर्नाटक सरकार ने मजदूरों के वापिस जाने के लिए तय की गई रेलगाडिय़ां रद्द कर दीं ताकि काम शुरू होने पर भवन निर्माताओं को मजदूर हासिल रहें। जो उद्योगपति आज मजदूरों को कोस रहे हैं, उन्हें अपने दिल से पूछना चाहिए कि अगर ऐसी मुसीबत के बीच उन्होंने अपने बड़े-बड़े अहातों में, इमारतों में, या आसपास की किसी और जगह पर अपने मजदूरों को ठहराकर उनका साथ दिया होता, तो क्या वे सचमुच ही महीने भर के पैदल सफर पर निकले होते? जब मालिक या रोजगारदाता साथ छोड़ देते हैं, तभी मजदूर और कामगार जिंदगी और मौत के बीच के ऐसे मुश्किल सफर पर निकलने को बेबस होते हैं। उनके बदन पर मालिकों की तरह अतिरिक्त चर्बी नहीं होती कि जिसे छांटने को उन्हें इस तरह पैदल चलना पड़े। और उन्हें धोखेबाज करार देने के पहले मालिकों को यह सोचना चाहिए कि जिन मजदूरों के चलते उनके कारखाने और कारोबार चल रहे थे, उनको ऐसा भूखा और बेबस बनाकर क्यों निकाल दिया था? क्या वे यह उम्मीद करते थे कि मजदूर चालीस दिनों के लॉकआऊट को बिना खाना खाए निकाल देंगे? आज उनकी यह फिक्र जायज है कि मजदूर अगर गांव पहुंच गए तो शायद वे जल्द वापिस शहरी कारखानों तक नहीं लौटेंगे। और लौटेंगे भी क्यों? आने वाले खेती के महीनों में उन्हें कुछ तो रोजगार खेतों में मिल जाएगा, और कुछ तो छत्तीसगढ़ जैसे कामयाब राज्य मनरेगा जैसी रोजगार योजना में रिकॉर्ड रोजगार देकर उन्हें उनका हक दे रहे हैं। कारखानेदार थोड़े समझदार तो थे जो उन्होंने सोचा था कि मजदूरों की गांव वापिसी को रोक दिया जाए, तो वे वहीं बेसहारा पड़े हुए जैसे ही काम शुरू होगा, काम पर आ ही जाएंगे। अगर इस नीयत से भी ट्रेन और सड़क की तमाम गाडिय़ों को बंद किया गया था, तो भी हिन्दुस्तानी गरीब ने, मेहनतकश मजदूर ने यह साबित कर दिखाया कि उसके पैरों में इतना दम है, इरादों में ऐसे पंख लगे हैं कि वह जान भी गंवाते हुए हजार-हजार किलोमीटर तक पैदल जा सकते हैं, अपने घर के बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को उठाकर भी ले जा सकते हैं। पसीने ने पूंजी की तमाम साजिशों को नाकामयाब करके दिखा दिया। आज अगर कोई यह सोचे कि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मजदूरों को कारखाने लौटना चाहिए, तो उनकी मुसीबत के वक्त दगाबाज साबित हो चुके पूंजीवाद पर अहसान करने के लिए उनके पास और पसीना भी बाकी नहीं है। हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था मजदूर को पुर्जे की तरह आखिरी दम तक इस्तेमाल करके उसे फेंक देने की सोच के साथ अगर चल रही है, तो उसे पुर्जों से किसी वफादारी की उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। पुर्जे तो पुर्जे ही होते हैं, वे क्या वफादार होंगे, और वे क्या बेईमान होंगे। यह लिखते हुए हमें पिछले दिनों छापे हुए एक कार्टून की याद आती है जिसमें शतरंज की एक बिसात मुड़कर एक छत की तरह बारिश को रोक रही है, और महज प्यादों को खुली बारिश में छोड़ दिया गया है, तमाम राजा-रानी-वजीर उस छत के नीचे महफूज हैं। इस बार का लॉकडाऊन कुछ वैसा ही था और राजा-रानी-वजीर के पास तो चालीस दिन जिंदा रहने का इंतजाम था, प्यादों को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया गया था। अब प्यादों को वफादारी का तकाजा गिनाया जा रहा है। पिछले बरसों में गरीबों और मजदूरों ने यह देखा है कि उनके खाते में अगर कुछ रकम थी, तो भी वह नोटबंदी के दौरान अपने इलाज के काम भी नहीं आ सकती थी। उनके पास पुराने नोट अगर कहीं दबे हुए थे, तो उनकी वह मेहनत भी मानो दफन हो गई थी। इस बार उन्होंने लॉकडाऊन की बेरहमी देखी है, और जाहिर है कि अगर मालिकों ने ही उनका साथ दिया होता तो वे चिलचिलाती धूप में जलती सड़कों पर दुधमुंहे बच्चों से लेकर चलने में अशक्त बुजुर्गों तक को ढोकर ऐसे अंतहीन सफर पर क्यों निकले होते? 

हिन्दुस्तानी मजदूर के सामने एक बात साफ है, मुसीबत के वक्त मालिक और सरकार के मुकाबले हो सकता है कि कोरोना उसके काम आ जाए। ऐसे तजुर्बे वाले मजदूर से देश की अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए खुद मर जाने की उम्मीद करना एक ज्यादती भी होगी, और उसकी समझ को कम आंकना भी होगा। हो सकता है कि हिन्दुस्तान की आज की तथाकथित अर्थव्यवस्था आने वाले वक्त में एक नई शक्ल ले जब गांव लौटे हुए मजदूर गांव में ही रोजगार की सोचें, वहीं पर कोई काम करने की सोचें। यह गांव की गांव की तरफ वापिसी का एक वक्त भी हो सकता है, और कोई भी समझदार राज्य सरकार इस मौके को इस्तेमाल भी कर सकती है। शहरों से हुनरमंद मजदूर और कारीगर लौट रहे हैं, और गांवों में कुटीर उद्योग लगाने और बढ़ाने का यह एक बड़ा मौका साबित हो सकता है। 

फिलहाल कारखानेदार और उनके संगठन आज जब मजदूरों को बिना शब्दों के इस्तेमाल के दगाबाज और नमकहराम साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो वे मजदूरों के साथ अपने संबंधों की हकीकत को सामने रख रहे हैं, और साबित कर रहे हैं कि वे कितने बुरे मालिक थे। ऐसी जुबानी कड़वाहट से परे रहते लोगों को वक्त रहते अपने मजदूरों का साथ देना था, जो कि उन्होंने नहीं दिया। 
-सुनील कुमार


05-May-2020

कश्मीर से कन्याकुमारी तक, 
और योगी से कम्युनिस्ट तक, 
जाम टकराने में सब शामिल

केन्द्र सरकार ने लॉकडाऊन खोलने के लिए तमाम प्रदेशों को जो गाईडलाईन दी उसके मुताबिक हर प्रदेश में शराब बिकना शुरू हो गई। जिन राज्यों में पहले से शराबबंदी है, वहां जरूर इसकी बिक्री शुरू नहीं हुई हो, लेकिन बाकी राज्य मानो एक पैर पर खड़े हुए थे कि कब और कैसे बिक्री शुरू की जाए। जब केन्द्र सरकार ने ही रास्ता खोल दिया, तो एक नंबर और दो नंबर, दोनों किस्म की कमाई का एक बड़ा जरिया कौन सी राज्य सरकार छोड़ सकती थी? और आज तो तमाम किस्म के कारोबार बंद पड़े हुए हैं, कोरोना से मुकाबले के लिए खर्च से लेकर मजदूरों पर हो रहे खर्च तक, सारे अभूतपूर्व खर्च हो रहे हैं। ऐसे में सरकारें सरकारी कमाई के लिए, सत्तारूढ़ संगठन के लिए, और सत्तारूढ़ नेता-अफसर-दारू कारखानेदार सबकी कमाई के लिए इस धंधे को शुरू करने पर आमादा थीं। जिन लोगों को छत्तीसगढ़ में यह धंधा खटक रहा है, उनको यह देख लेना चाहिए कि हिन्दुस्तान में किस राज्य ने सबसे पहले शराब कारखानों को लॉकडाऊन के बीच भी उत्पादन शुरू करने का आदेश दिया था। उत्तरप्रदेश के एक योगी मुख्यमंत्री ने सबसे पहले लॉकडाऊन के बीच ही शराब उत्पादन शुरू कराया, और लॉकडाऊन में ढील के पहले घंटे से ही शराब बेचना शुरू भी कर दिया। भगवान राम के जन्मस्थली वाले, और अनगिनत तीर्थों वाले उत्तरप्रदेश में देवी-देवताओं को पता नहीं ऐसी शराबी बेसब्री का कितना बुरा लग रहा होगा। 

हमारा ख्याल है कि दारू के धंधे से होने वाली कई किस्म की वैध और अवैध कमाई से देश के तमाम प्रदेश इस तरह परिचित हैं कि यह भ्रष्टाचार आरटीओ की तरह का एक खुला भ्रष्टाचार है, और देश में शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो जिसे अपनी सरकार के चलते ऐसी कमाई से परहेज रहता हो। इसलिए उत्तरप्रदेश हो, या छत्तीसगढ़, या ममता का बंगाल, कल दारू की पहली बोतल बिकने के भी पहले के जो नजारे सामने आए, उन्होंने एक बात साफ कर दी कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है, और हमारी अनेकता में एकता दारू में ही सबसे अधिक है। इसने यह बात भी साफ कर दी कि चालीस दिनों का सूखा भी लोगों की हसरत को जरा भी कम नहीं कर पाया था, और एकाएक शराबबंदी से होने वाले मनोवैज्ञानिक नुकसान को भी हिन्दुस्तानी दारूखोरों ने बड़े अच्छे से झेल लिया और अपने आपको पहली बिक्री की कतार के लिए तैयार रखा। लेकिन पूरे देश में ही इन चालीस दिनों में गैरकानूनी या अघोषित शराब उसी तरह बिकती रही जिस तरह गुजरात में हमेशा से चली आ रही स्थाई शराबबंदी के दौरान शराब बिकती है, जिस तरह बिहार में नीतीश बाबू के सुशासन में शराब बिकती ही है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी शराबबंदी के चुनावी वायदे के साथ सत्ता पर आई थी, लेकिन किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी की तरह अब इस वायदे के लिए भी उसका रूख यही है कि इसे सोच-समझकर किया जाएगा, और वायदे पांच साल में पूरे करने के होते हैं जिसके करीब चार साल अभी बाकी हैं। 

लेकिन सरकार और राजनीतिक दलों के दारूप्रेम को छोड़ दें, और आज कोरोना के खतरे के बीच दारू से जुड़ गए अतिरिक्त खतरों को देखें तो भयानक नजारा सामने आ रहा है। छत्तीसगढ़ से कई गुना अधिक धक्का-मुक्की के कुछ ऐसे वीडियो बंगाल और दक्षिण भारत के सामने आए हैं कि जिन्हें देखकर लगता है कि कल कोरोना ने कोई काम नहीं किया होगा, और महीनों के बाद पूरी तरह छुट्टी मनाई होगी क्योंकि कल उसके हिस्से का काम दारू कर रही थी। पिछले चालीस दिनों में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक ने, और फिल्मी कलाकारों से लेकर खिलाडिय़ों तक ने लोगों को शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए जितना कुछ कहा था, वह कल दारू की पहली धार ने बहा दिया, और नशेड़ी-नशेड़ी भाई-भाई का स्थगित चला आ रहा रिश्ता फिर से मजबूती से कायम कर लिया। पूरे देश ने कल जिस तरह कमजोर शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता वाले शराबियों की जो धक्का-मुक्की देखी है, वह अभूतपूर्व रही, और इस देश में गांधी-नेहरू, या इंदिरा-राजीव के अंतिम संस्कार के बाद शायद ही कभी ऐसी धक्का-मुक्की देखी हो। नतीजा यह हुआ कि चालीस दिनों से देश जिस सावधानी पर चल रहा था, वह कुछ घंटों में ही चल बसी, और कल हिन्दुस्तानियों ने दस-बीस करोड़ तक लोगों को एक-दूसरे का कई किस्म का संक्रमण लिया-दिया होगा, और उसमें कोरोना कितना रहा होगा यह पता नहीं। पूरे देश में कम से कम दस अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों की राज्य सरकारें हैं, लेकिन एक भी सरकार दारू की घोषित या अघोषित कमाई के खिलाफ नहीं है, और न ही गठबंधनों वाली  केन्द्र सरकार ही इसके खिलाफ है। जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी एक मर्जी के देश पर तमाम किस्म की बंदिशें पल भर की सूचना पर लाद देते हैं, जहां पर वे चाहते तो दारू की बिक्री शुरू करने की बात न लिखवाते, और कम से कम कोरोना के फैलने की रफ्तार कुछ धीमी हुई होती। लेकिन केन्द्र सरकार ने जब दारू शुरू करने की बात लिख दी, जब एकदम खालिस भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके पहले से ही औपचारिक तैयारी शुरू कर दी थी, तो फिर बाकी राज्य भला क्यों पीछे रहते। 

लॉकडाऊन खुलने से देश के कारोबार को आगे बढऩे का, फिर से शुरू होने का एक मौका मिलता, और मरे पड़े धंधे कामों पर उठ खड़े होने की शुरूआत करते। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों ने बिना किसी मतभेद के, सर्वसम्मति से अगर कोई धंधा देश में सबसे पहले शुरू होने दिया, सबसे पहले शुरू किया तो वह सबसे बड़ी काली कमाई वाला दारू का सरकारी धंधा ही था। अभी सड़क किनारे पंक्चर बनाने वाले का कारोबार भी शुरू नहीं हुआ था कि देश की सरकारों ने हरेक ने एक दिन में करोड़ों-अरबों का काम कर लिया। भूखे बेरोजगार कारोबार यह देख ही रहा है कि सरकार सबसे चतुर और एकाधिकारवादी कारोबारी है, और सबसे पहले जनता को लूटने का धंधा उसने भारी उत्साह के साथ शुरू कर दिया है। अब जब दारू बिकना एक हकीकत हो ही गई है, तो नशे में लोगों के नाली में छह-छह फीट की दूरी पर गिरने का नियम तो लागू नहीं किया जा सकता, दारू दुकानों पर से भीड़ घटाने के लिए उन्हें अधिक घंटे खोला जाना चाहिए, अधिक दुकानें खोल देनी चाहिए, और जिस तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार ने दारू पर 70 फीसदी कोरोना-टैक्स लगाया है, बाकी राज्यों को भी शराब को ऐसा ही महंगा कर देना चाहिए, ताकि जो दारू पर खर्च से अपना सत्यानाश कर रहे हैं, वे हिन्दुस्तानी मुहावरे के मुताबिक सवा सत्यानाश करें। जहां सत्यानाश, वहां सवा सत्यानाश। और इस अतिरिक्त कमाई को सरकार केजरीवाल की तरह कोरोना से लडऩे के लिए इस्तेमाल करे। हमारा साफ मानना है कि दारू से सरकार को जितनी कमाई होती है, उससे कहीं अधिक उसको जनता की दवा पर खर्च करना पड़ता है, उन दवाओं पर जो कि दारू से जुड़ी होती है। लेकिन जब हिन्दुस्तान के देवताओं को सोमरस पसंद है, जब बहुत से देवताओं को दारू चढ़ती है, तो दारूखोरों और सरकारों के दिमाग से हम दारू कैसे उतार सकते हैं? इस मौके पर साफ-साफ यह न लिखना जिम्मेदारी से मुंह चुराना होगा कि कोरोना से तो यह देश एक बार बच भी जाता, लेकिन अकेली दारू ने देश के तमाम डॉक्टरों और नर्सों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। शराब की वजह से कोरोना के फैलने का खतरा इतना बढ़ गया है जितना कि मजदूरों की घरवापिसी की वजह से भी नहीं बढ़ा है। सरकारों को अधिक लिहाज नहीं करना चाहिए, और जब उन्होंने दारू बेचना तय कर ही लिया है, तो सौ दुकानों की जगह दो सौ दुकानें शुरू कर देना चाहिए, और किसी भी सभ्य कारोबार की तरह इस धंधे सभ्यता से करना चाहिए। किसी धंधे को गंदगी के साथ, जुर्म के अंदाज में करने का कोई मतलब नहीं है। जो प्रदेश शराब को पहले भी गैरजरूरी और नाजायज नियमों से बांधकर नहीं चलते थे, वहां पर शराब के धंधे में भ्रष्टाचार भी कम था, और पैसे बर्बाद करने पर आमादा शराबियों को पसंद की बेहतर शराब भी मिलती थी। राज्य सरकारों को इस धंधे को अपने नाजायज काबू में कैद करके रखने की चाहत छोडऩी चाहिए, और दुनिया से सभ्य देशों की तरह लोगों को ढंग से पीने देना चाहिए, और हो सकता है कि वैसे में उसका पीना घटे। फिलहाल कल की रिपोर्ट यह है कि बिना किसी मेहनत के अपनी एक दिन कामयाबी पर कोरोना खुशी में छककर दारू पी रहा है। 
-सुनील कुमार


04-May-2020

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,
4 मई 2020


जिसे आधी सदी बाद भी हिन्दुस्तानी
बहू मानने से इंकार, उसी ने की
सबसे बेबस हिन्दुस्तानी की फिक्र


पिछले चार-पांच दिनों में केन्द्र सरकार ने अपनी जो दुर्गति करवाई है, उसने लॉकडाऊन के बाद से अपनी नाकामयाबी को भी पीछे छोड़कर एक नया रिकॉर्ड बनाया है। अचानक एक सुबह देश को पता लगा कि तेलंगाना से झारखंड के लिए एक मजदूर-ट्रेन रवाना हुई है। फिर दोपहर शाम तक खबर आई कि कुछ और राज्यों के लिए भी श्रमिक-स्पेशल नाम की गाडिय़ां चलने वाली हैं। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने प्रदेश के लोगों के वापिस आने के लिए ऐसी गाडिय़ों की मांग भी की थी, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ने तो प्रदेश के बाहर अपने एक-सवा लाख मजदूरों के रिकॉर्ड देखते हुए 28 गाडिय़ों की मांग की है जिस पर अभी तक कोई जवाब मिला नहीं है। लेकिन इस बीच रेलवे ने लिखित आदेश में यह साफ किया कि अपने मजदूरों के लिए ट्रेन मांगने वाले राज्य को ही ट्रेन का भुगतान करना होगा। फिर दिन गुजरा नहीं था कि ऐसी खबरें आईं कि रेलवे मजदूरों से ही किराया धरवा रहा है, और वह आम रेल टिकट से अधिक भी है। इन दोनों बातों को लेकर देश में खूब बवाल हुआ, सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल किए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कोरोना फंड, पीएम केयर्स, का इस्तेमाल अगर इन मजदूरों को इनके प्रदेश तक छोडऩे के लिए नहीं हो रहा, तो फिर वह आखिर बना किस काम के लिए है? बहुत से लोगों ने यह सवाल भी किए कि जिन मजदूरों के पास सवा महीने से बिना काम बाहर बैठे खाने तक का पैसा नहीं है, उन्हें रेलवे स्टेशनों से टिकट न होने पर लौटाया जा रहा है, तो यह कहां की इंसानियत है? देश पर अचानक लाद दिए गए लॉकडाऊन के फैसले के बाद इस तरह से भाड़ा वसूली का सिलसिला लोग भूल नहीं पाएंगे।  

हैरानी इस बात की है कि मोदी सरकार प्रधानमंत्री के कड़े कामकाज के लिए जानी जाती है। जब लॉकडाऊन हुआ, तो अब उजागर हो रहा है कि उस वक्त कोई तैयारी नहीं थी, कोई योजना नहीं थी, राज्यों की कोई भागीदारी नहीं थी। जब लॉकडाऊन का पहला दौर निकल गया, तब दूसरे दौर के पहले मुख्यमंत्रियों से और विपक्षी दलों से कुछ चर्चा की गई। लेकिन रेलवे को केन्द्र सरकार का अपना विभाग है, और अभी तो सवा महीने से रेलवे बंद ही है, इसलिए मंत्री से लेकर अफसरों तक तो किसी भी योजना के लिए वक्त ही वक्त था। फिर रेलवे को किसी न किसी दिन शुरू होना ही था, हर कुछ दिनों में रेलवे कभी रिजर्वेशन शुरू कर देता था, तो कभी बंद कर देता था, मतलब यह कि रेलवे जिंदा था, और रेलवे एयर इंडिया की तरह अपने बिकने का इंतजार भी नहीं कर रहा है। ऐसे में क्या रेलवे को यह नहीं मालूम था कि जिस दिन मजदूरों को राज्य वापिस भेजने की नौबत आएगी, उस दिन भाड़ा वसूलने या न वसूलने का सवाल भी खड़ा होगा। आज पूरे देश में रेलवे बिना काम है, कर्मचारियों की तनख्वाह का मीटर घूम रहा है, उसका पूरा ढांचा बिना इस्तेमाल पड़ा है। ऐसे खाली पड़े हुए अमले और ढांचे को अगर हजार-पांच सौ रेलगाडिय़ां चलाकर मजदूरों को उनके प्रदेश पहुंचाना ही है, तो भी इसमें रेलवे को कोई बड़ा खर्च तो आ नहीं रहा था। देश की किसी भी राष्ट्रीय आपदा में इतिहास की हर केन्द्र सरकार राज्य को आर्थिक सहयोग करते आई है। हम सोच-समझकर मदद शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं क्योंकि देश के संघीय ढांचे में यह राज्य का हक है कि अपनी मुसीबत के वक्त वह केन्द्र से अतिरिक्त आबंटन पाए। कहीं सूखा हो, कहीं बाढ़ हो, कहीं ओले बरसे हों, केन्द्र सरकार राज्यों को अतिरिक्त बजट देती ही है। फिर यह लॉकडाऊन तो पूरे की पूरी केन्द्र सरकार की लादी हुई मानव निर्मित विपदा है, और इसमें तो बिन मांगे, बिन बोले कोई भी समझदार केन्द्र सरकार लोगों को ट्रेन से, बस से उनके प्रदेश तक पहुंचाती और अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाती। लेकिन जिस तरह एक भीड़ का बर्ताव होता है, जितने मुंह उतनी बातें, केन्द्र सरकार हर दिन इन मजदूरों की टिकट-वसूली के लिए अलग-अलग किस्म की बात कर रही है, और अभी सुनाई पड़ रहा है कि केन्द्र सरकार टिकट का 15 फीसदी राज्य सरकारों से लेगी, और 85 फीसदी खर्च खुद उठाएगी। यह बात कुछ वैसी लग रही है कि कहीं पर आग लगी हुई हो, और दमकलकर्मी मौके पर हिसाब गिनाए कि कितना पानी खर्च होने पर कितना भुगतान करना पड़ेगा। यह सिलसिला जरा भी समझदार केन्द्र सरकार के रहते शुरू ही नहीं हुआ रहता। एक तरफ तो रेलवे स्टेशनों पर टिकट का पैसा न होने पर मजदूरों को भगा देने की खबरें आ रही हैं, दूसरी तरफ एयरफोर्स के विमान गैरजरूरी उड़ान भरकर अस्पतालों पर फूल बरसा रहे हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह हिसाब लगाने में भी लगे हैं कि ऐसी गैरजरूरी उड़ानों का खर्च कितने हजार करोड़ रूपए आया होगा, और उस खर्च से कितने वेंटिलेटर खरीदे जा सकते थे, डॉक्टरों के लिए नामौजूद मास्क और पोशाक कितने आ सकते थे। यह पूरा सिलसिला देश को भावनाओं के एक सैलाब में भिगाकर रख देने का है, और सरकार की सोच और उसके कामों के बीच एक बड़ा विरोधाभास साफ दिख रहा है। डॉक्टरों की हिफाजत के लिए जरूरी सामान नहीं हैं, करोड़ों मजदूर देश भर में बेघर हैं, सड़कों पर हैं, तेलंगाना से मजदूरी करके लौटती हुई बारह बरस की एक मजदूर बच्ची तीन दिन पैदल चलने के बाद दम तोड़ देती है, तो कुछ फूलों पर तो उसका भी हक बनता था।

खैर, आज सुबह एक अच्छी खबर लेकर आई जब कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यह घोषणा की कि पूरे देश से मजदूरों की घरवापिसी की ट्रेन का भाड़ा कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार को देगी। कांग्रेस आज अच्छी हालत से नहीं गुजर रही है, फिर भी कल कर्नाटक कांग्रेस ने वहां की भाजपा सरकार को एक करोड़ रूपए का चेक दिया था ताकि राज्य की सरकारी बसों में घर लौटते मजदूरों से टिकट न वसूली जाए। आज सोनिया गांधी की यह घोषणा देश के करोड़ों लोगों के लिए राहत की बात तो है ही, भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था में पिछले कई हफ्तों में यह अकेली बात सबसे अधिक इंसानियत की बात भी है। जो नेता रात-दिन सोनिया गांधी को इटली की करार देते हैं, और दशकों पहले की भारतीय बन चुकी एक बहू को इंसान भी मानने से इंकार करते हैं, उस महिला का यह फैसला मोदी सरकार पर बहुत भारी पड़ा है जो कि एक सूदखोर साहूकार के अंदाज में बेघर मजदूरों की देह टटोलकर उस पर गोश्त का अंदाज लगा रही थी, कि उससे कितनी टिकट वसूली जा सकती है।

भारतीय राजनीति में भावनाओं की अपनी एक जगह है, लेकिन वे भावनाएं कब खोखली होती हैं, और कब ठोस होती हैं, यह जनता को समझ आ जाता है। थाली-ताली, दीया-मोमबत्ती, और अस्पतालों पर फूलों की बारिश, इन सबको मिला लें, इन तमाम प्रतीकों को गूंथ लें, तो भी एक मजदूर के लिए एक रोटी भी नहीं बन सकती। राष्ट्रीय स्तर पर किसी पार्टी ने अगर अब तक की सबसे बड़ी घोषणा की है, तो वह सोनिया गांधी ने की है, और यह बात तो जाहिर है ही कि इस पार्टी के पास भाजपा के मुकाबले दस फीसदी भी पैसा नहीं है। ऐसे में बिना रकम भरे दस्तखत करके दिए गए कांग्रेस पार्टी के ऐसे चेक की बात लोग भूलेंगे नहीं। दूसरी बात यह कि मोदी सरकार को वैसे तो दुनिया में किसी सलाहकार की जरूरत है नहीं, फिर भी आने वाले कई महीने उसके लिए कई ऐसे नाजुक फैसलों के होंगे जिनसे जनता का हित जुड़ा रहेगा, इसलिए उसे यह भी देखना चाहिए कि रेलगाडिय़ों की ऐसी इंसानियत से परे की गफलत हुई कैसे? क्या पूरी सरकार में एक भी समझ ऐसी नहीं है कि सवा महीने की बेरोजगारी-बेकारी के बाद जब लोग सड़क पर बांटे जा रहे खाने को खाकर जिंदा हैं, तब उन्हें घर पहुंचाने के लिए टिकट वसूली का मोलभाव करना एक जुर्म से कम नहीं है? समझ की यह कमी इतिहास में एक बड़ी नाकामयाबी, और एक बड़े बेरहम फैसले के रूप में दर्ज हो रही है। लेकिन हम मोदी सरकार के इतिहास और भविष्य से परे आज करोड़ों भूखे हिन्दुस्तानियों की भूख को लेकर, उनकी जिंदगी पर छाए हुए खतरे को लेकर, उनकी अनिश्चितता को लेकर फिक्रमंद हैं, और महज इसी वजह से मोदी सरकार को आत्मविश्लेषण की एक निहायत गैरजरूरी और बिनमांगी सलाह दे रहे हैं। साथ ही हम सोनिया गांधी को उनकी संवेदनशीलता और उनकी दरियादिली के लिए देश के करोड़ों भूखे, बेघर, बेबस, बेजुबान, बेरोजगार मजदूरों की तरफ से शुक्रिया भी कह रहे हैं।
-सुनील कुमार


03-May-2020

स्मार्ट सिटी के अतिमहत्वोन्मादी

अहंकार से निकलकर स्लम खत्म

करने की जरूरत है कोरोनायुग में

बुरा वक्त बहुत अच्छी नसीहतें, और बहुत अच्छे सबक दे जाता है। आज कोरोना का जो खतरा आया है, और उससे जो तबाही हुई है, उससे न सिर्फ सेहत के मामले में, बल्कि कारोबार के मामले में, शहरी जिंदगी के मामले में, बसाहट और आवाजाही के मामले में, सूचना तंत्र के ढांचे के बारे में बहुत कुछ सीखने मिल रहा है। यह सिलसिला अभी जारी ही है, और अगले कई महीने चलते ही रहेगा। एक किसी बड़े कारोबारी ने अभी यह सुझाया है कि देश की निर्माण-कंपनियां अपने लोगों को दो टीमों में बांट लें, जिनमें से एक टीम अभी तुरंत कोरोनाग्रस्त अर्थव्यवस्था से उबरने के बारे में सोचे और दूसरी टीम दो बरस बाद को लेकर योजना बनाए।

कारोबार तो ठीक है क्योंकि वह मोटेतौर पर एक सीमित दायरे का होता है, और जिसकी कमाई का एक हिस्सा जनता से परे भी जाता है। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं, और सार्वजनिक उपक्रमों की तो पूरी ही कमाई जनता की होती है, और जब कभी देश पर कोई मुसीबत आती है तो उससे जूझने की पहली जिम्मेदारी भी इन्हीं पर रहती है। इसलिए कोरोना से सबक लेकर इन सभी को ऐसी योजना बनानी चाहिए जो कि लॉकडाऊन-2 और लॉकडाऊन-3 की तरह अगर या जब कोरोना-2 और कोरोना-3 सामने आए तो उससे जूझने के लिए सरकारें बेहतर तैयार रहें। आज हिन्दुस्तान में कोरोना को विदेशों से आने वाले, और लौटने वाले लोग लेकर आए हैं, लेकिन इससे सबसे बड़ी तबाही सबसे कमजोर तबके की हुई है जो कि पूरे का पूरा बेघर-बेरोजगार हो चुका है। इसलिए आगे की तैयारी इस तबके को ध्यान में रखकर भी करनी चाहिए जो कि देश की कम से कम आधी आबादी तो है ही।

यह समझने की बात है कि इस बार का यह वायरस-संक्रमण मोटे तौर पर हवा में सफर नहीं कर रहा है। इसके मरीजों वाले अस्पताल के कमरों में एयरकंडीशंड हवा में कहीं-कहीं यह वायरस हवा में चला है, लेकिन खुले में इसकी ताकत हवा में उडऩे की नहीं है। अब हिन्दुस्तान को एक ऐसे वायरस की कल्पना करके तैयारी करनी चाहिए जो कि हवा में भी सफर करता हो, तब लोगों का क्या होगा? जब इस देश के मुम्बई जैसे महानगरों में धारावी जैसी एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी हो, जहां हर घर दूसरे कई घरों से चिपका हुआ हो, जहां एक-एक पखाने पर सैकड़ों आबादी मोहताज हो, वहां पर कोरोना से अधिक उड़ान भरने वाले किसी वायरस के आने पर क्या होगा? यह भी समझने की बात है कि पिछले पांच बरस में हिन्दुस्तान में चुनिंदा सौ-दो सौ शहरों को हजार-हजार करोड़ रूपए सालाना के अधिक की फिजूलखर्ची से स्मार्ट बनाने की केन्द्र सरकार की जो अतिमहत्वोन्मादी योजना चल रही है, उसने हिन्दुस्तान हांकने वालों को एक अजीब किस्म के झूठे गौरव से भर दिया है कि वे देश को स्मार्ट बना रहे हैं। हकीकत यह है कि केन्द्र ने अपनी इस योजना के लिए प्रदेशों में एक झूठा उत्साह बो दिया, और उन्हें एक अंधी दौड़ में लगा दिया कि कौन सी स्मार्ट सिटी दूसरों से आगे है। नतीजा यह निकला कि केन्द्र से आए सौ-दो सौ करोड़ के साथ राज्य को उससे कई गुना अधिक रकम अपनी जेब से लगानी पड़ी, और केन्द्र सरकार के पैमानों और शर्तों के मुताबिक उसे खर्च करना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि केन्द्र के एनडीए गठबंधन के विरोध वाली राज्य सरकारों ने भी यह दिमाग नहीं लगाया कि स्मार्ट सिटी की पूरी योजना स्थानीय म्युनिसिपल के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अलग रखकर ही बनाई गई है, और इस हिसाब से वह पूरी तरह अलोकतांत्रिक भी है। लेकिन अभी हम उस बुनियादी बात को अधिक कुरेदना नहीं चाहते क्योंकि उससे आज की जरूरी बात धरी रह जाएगी।

आज की बात यह है कि क्या हिन्दुस्तान गंदगी का एक ऐसा समंदर बने रह सकता है जिसमें तमाम लोगों के हक के पैसे लगाकर अतिसंपन्नता और अति सुविधा की योजनाओं वाली स्मार्ट सिटी नाम के सौ-दो सौ टापू रहें? कोरोना के पहले तक तो यह फिर भी ठीक था क्योंकि भारत जैसे लोकतंत्र में गैरबराबरी तो एक आम बात है लेकिन अब कोरोना यह सिखा रहा है कि कुछ लोगों को स्लम की घनघोर गरीबी और गंदगी में रखकर महंगे बंगलों के लोग भी महफूज नहीं रह सकते। आज हिन्दुस्तान को स्मार्ट सिटी और स्लम के बीच का एक रास्ता ढूंढना होगा जिसमें बेतहाशा फिजूलखर्ची वाली स्मार्ट सिटी न बनाकर देश को स्लममुक्त पहले बनाया जाए और फिर सभी को एक साथ स्मार्ट होने की एक बहुत दूर की मंजिल की तरफ ले जाया जाए। स्मार्ट सिटी की योजना मोदी सरकार के वक्त ही शुरू हुई, और राज्य सरकारों को ऐसा लगा कि बाकी प्रदेश स्मार्ट हो जाएंगे, और वे भोंदू ही बने रह जाएंगे। इसलिए उन्होंने दौड़-दौडक़र अपने शहरों को केन्द्र सरकार की योजना में जुड़वाया, और राज्य का अनुपातहीन अतिरिक्त पैसा गिने-चुने शहरों पर झोंक दिया। नतीजा यह हुआ कि पूरे प्रदेश में गंदी बस्तियों की जो बेहतरी होनी थी, उसकी रकम चाहे केन्द्र की जेब से, चाहे राज्य की जेब से, स्मार्ट सिटी पर लगती चली गई।

आज दुनिया के कई समझदार देशों में शहरीकरण और बसाहट के विशेषज्ञ अपनी अब तक की तमाम समझ को किनारे रखकर एक क्लीन स्लेट को लेकर बैठे हैं कि कोरोना को देखते हुए अब आगे की बसाहट कैसी होनी चाहिए। किसी बसाहट या शहर की योजना 25-50 साल के हिसाब से बनती है, इसलिए यह भी याद रखना चाहिए कि किसी अलग किस्म का कोई वायरस आकर जो खतरा पैदा कर सकता है, क्या उससे भी बचाव के तरीकों को नई बसाहट के वक्त सोचा जा सकता है? आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक तरफ तो कोरोना से लडऩे के लिए सरकार की पूरी ही ताकत लग जा रही है, तो दूसरी ओर इस शहर में पिछले 25-50 बरस से चली आ रही पानी की पाईप लाईनें नालियों के भीतर डूबकर, सडक़र, नाली की गंदगी लोगों के बदन तक पहुंचा रही हैं, और इसी शहर पर पिछले बरसों में केन्द्र का थोड़ा, राज्य का पूरा, हजारों करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं। क्या सचमुच ही ऐसी स्मार्ट सिटी को जनता के पैसों पर सैकड़ों करोड़ खर्च करके आलीशान गौरवपथ बनाने का हक है जहां पर शहर की गरीब आबादी का एक बड़ा हिस्सा म्युनिसिपल के पीने के पानी के पाईप से नाली की गंदगी पा रहा है, और पीलिया में पड़ा हुआ है, पीलिया-मौतें हो रही हैं।  क्या ऐसा शहर अपने को स्मार्ट साबित करने के एक भोंदू-अहंकारी नशे को छोड़ सकता है? या फिर ऐसी बड़ी और योजनाबद्ध लागत वाली योजनाओं की कमाई सबको सुहाती है?

इस देश को, खासकर इसके प्रदेशों को देश के संघीय ढांचे में अपनी आजाद सोच के हक का इस्तेमाल करते हुए स्मार्ट नाम के झांसे से बाहर आना चाहिए। यह पूरा सिलसिला न सिर्फ गैरबराबरी का है, बल्कि यह अलोकतांत्रिक भी है। कोरोना से भी अगर यह देश नहीं सीखेगा कि अपने सबसे गरीब और सबसे कमजोर लोगों को ध्यान में रखते हुए अपनी बसाहट, अपने रोजगार, अपनी आवाजाही, अपने इलाज के ढांचे को बनाना जरूरी है, तो वह गैरगरीब और गैरकमजोर पर से खतरे को कभी नहीं हटा सकेगा। कोरोना से लोगों को सबक लेना चाहिए कि आज अगर पासपोर्ट वालों ने राशन कार्ड वालों को यह जानलेवा-तोहफा दिया है, तो कल राशन कार्ड वाले भी कोई रिटर्न-गिफ्ट पासपोर्ट वालों को दे सकते हैं। इसलिए आज सही वक्त है कि देश स्मार्ट बनने के अपने अतिमहत्वोन्मादी नशे से बाहर आए, और स्लम खत्म करे, शहरों में और कारखानों के इलाकों में मजदूरों की बसाहट के बारे में सोचे, और संसद भवन के इर्द-गिर्द 20 हजार करोड़ रूपए बर्बादी की अपनी मौजूदा योजना को छोड़े। जब देश भुखमरी की कगार पर खड़ा हुआ है, जब कोरोना की मार और देशों के मुकाबले अब तक पांच फीसदी भी नहीं हुई है, और प्रदेशों के साल भर के इलाज के बजट महीने भर में ही चुक गए हैं, तब सरकार दिल्ली के कुछ किलोमीटर पर 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करके हैवानियत से हॅंसी पा सकती है, इंसानियत तो उस पर रो ही सकती है। इस दुनिया के इतिहास में, आज के हिन्दुस्तान में 20 हजार करोड़ रूपए का यह खर्च काले अक्षरों से लिखा जाएगा, और सैकड़ों बरस पहले हिन्दुस्तानी राजा अकाल के वक्त भी जिस तरह नाच-गानों में डूबे रहते थे, वही मिसाल इससे याद आएगी। किसी दिन समझदार सरकार को अपने इतिहास में इतना काला पन्ना छोडक़र नहीं जाना चाहिए। आज देश को आम गंदगी से आजादी की जरूरत है, और वही स्मार्ट-लोकतंत्र होगा।

-सुनील कुमार 


02-May-2020

मजदूरों की घरवापिसी से जुड़े मुद्दे, और तैयारियां...

केन्द्र सरकार का लॉकडाऊन-3 शुरू होने को है, और इसी बीच रेलगाडिय़ां शुरू हो गई हैं जो कि मजदूरों को उनके अपने प्रदेश पहुंचाएंगी जहां वे घर पर रहकर आसपास कुछ काम कर सकेंगे, या फिर कोरोना के मरने और अर्थव्यवस्था के जिंदा होने का इंतजार कर सकेंगे। इन मजदूरों को उनके काम के प्रदेशों ने इस बुरी तरह निराश किया है कि जहां वे कारखानों और धंधों में काम करते थे, उनमें शायद ही किसी को उनके कानूनी हक मिल पाए, उनका बकाया मिल पाया, और चार घंटे के नोटिस वाले लॉकडाऊन के बाद उनको सिर छुपाने की जगह तो उन राज्यों ने, वहां के कारखानेदारों और कारोबारियों ने, वहां की सरकारों ने बिल्कुल ही नहीं दी, जबकि ऐसे हर कारोबारी शहर और प्रदेश में आज हजारों अधूरी बनी इमारतें पड़ी हैं जहां कोई काबिल सरकार आसानी से मजदूरों को वहां रूकने का एक विकल्प दे सकती थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि प्रवासी मजदूर किसी राज्य में वहां के स्थाई वोटर नहीं होते हैं, और उनकी कोई राजनीतिक उपयोगिता नहीं होती है। ऐसे करोड़ों मजदूर पैदल चलकर भी चार-पांच हफ्तों में अपने इलाके में पहुंच रहे हैं, रास्ते में दम तोड़ रहे हैं, और राह में सामाजिक मदद से मिलने वाले खाने के मोहताज होकर उन्होंने कल का मजदूर दिवस भी निकाल दिया।

अब जब रेलगाड़ी से लौटना एक हकीकत हो गई है, कल से अब तक कुछ रेलगाडिय़ां रवाना हुई हैं, तो हर राज्य अपने दसियों हजार मजदूर पाने जा रहा है। छत्तीसगढ़ शायद ऐसे लाख से अधिक मजदूर देखे जो कि बाहर बुरे हाल में हैं, और अब अगले कुछ हफ्तों में जो लौट सकते हैं, और जब बाहर किसी काम-धंधे का कोई ठिकाना नहीं, कोरोना का जानलेवा खतरा सामने खड़ा हुआ है, तो फिर उन्हें लौटना भी चाहिए। अपने गांव में कांधा देने वाले चार लोग तो नसीब होंगे। लेकिन यह नौबत राज्य सरकार पर एक अभूतपूर्व दबाव डालने वाली है। किसी एक प्रदेश में ट्रेन और बसों से अगर चारों तरफ की सरहदों पर हजारों लोग रोज पहुंचने लगेंगे, और आज वे शायद लुके-छिपे, अघोषित रूप से आ ही रहे हैं, तो ऐसी घोषित वापिसी की हालत में मजदूरों को जांच के बाद जरूरत रहने पर सरकारी इंतजाम में क्वॉरंटीन करना होगा, या फिर जैसा कि कल झारखंड ने किया है, बिना लक्षणों वाले मजदूरों को उनके घर भेजना होगा। सरकार के इंतजाम की अपनी सीमाएं हैं, और बिना लक्षण किसी को भर्ती रखने का एक मतलब यह भी होता है कि उसे मजदूरी कमाने के हक से दूर रखना। हमारी सलाह तो यह है कि जितने गरीब मजदूरों को सरकार को क्वॉरंटीन या आइसोलेशन में रखना पड़े, उन्हें उतने दिन की न्यूनतम मजदूरी भी देनी चाहिए ताकि उनका परिवार बाहर जिंदा रह सके। यह इंतजाम केन्द्र सरकार को अपनी किसी रोजगार योजना के तहत करना चाहिए। मनरेगा जैसी किसी योजना में क्वॉरंटीन के एक पखवाड़े की रोजी देना बाकी समाज की सेहत के मुकाबले कोई महंगी बात नहीं होगी। जिस तरह की आदर्श स्थिति घर के भीतर क्वॉरंटीन करने के लिए चाहिए, वह एक फीसदी मजदूरों को भी नसीब नहीं है, शायद किसी भी प्रवासी मजदूर के पास घर में ऐसा अलग कमरा नहीं होगा जैसा कि केन्द्र सरकार के होम-क्वॉरंटीन की शर्तों में कहा गया है। इसलिए प्रवासी मजदूरों की वापिसी या तो सरकार को कुछ खर्च देगी, या फिर समाज को कुछ खतरा देगी। हमारी सलाह एक पखवाड़े की मजदूरी देकर क्वॉरंटीन करने की है, लेकिन सरकारों की अपनी सीमाएं हैं। केन्द्र सरकार ने मोटेतौर पर कोरोना से निपटने का खर्च राज्यों पर डाल दिया है। यह बात बिल्कुल भी ठीक नहीं है, यह एक राष्ट्रीय आपदा है, घोषित महामारी है, और इसकी सारी लागत केन्द्र सरकार को उठानी चाहिए। हुआ तो यह है कि केन्द्र सरकार वाहवाही पाने के अंदाज में विदेशों से हिन्दुस्तानियों को तो अपने खर्च पर लेकर आई, और फिर अपने खर्च पर क्वॉरंटीन में भी रखा। लेकिन देश के भीतर के गरीब मजदूरों का पूरा बोझ राज्य सरकारों पर डाल दिया गया, और आज तो यह शर्मनाक खबर है कि केन्द्र सरकार मजदूरों का रेलभाड़ा राज्यों से वसूलने जा रही। हवाई जहाज से लोगों को लाते हुए क्या राज्यों से यह पूछा गया था कि उनके लोगों को विदेशों से लाने का खर्च वे उठाएंगे? सरकार को तुरंत ही यह शर्मनाक बात वापिस लेनी चाहिए, और इसके साथ-साथ राज्यों को उदारता से कोरोना की वजह से आया हुआ सारा खर्च देना चाहिए। लेकिन हुआ तो यह है कि प्रधानमंत्री के स्थाई राहत कोष से अलग एक ऐसा नया पीएम-केयर्स नाम का फंड बनाया गया है जिसमें दान देने के लिए कंपनियों को सीएसआर का पैसा देने की छूट दी गई है। लेकिन कंपनियां अपने राज्य में अपने मुख्यमंत्री राहत कोष में इस फंड का पैसा नहीं दे सकतीं। केन्द्र का यह फैसला बहुत ही अन्यायपूर्ण है, और पीएम-केयर्स एक ऐसा फंड है जो कि बिना पारदर्शिता का है, और जिसका ऑडिट सीएजी नहीं कर सकता। यह बहुत ही अटपटी और अनैतिक बात है, और इसे खत्म करना चाहिए। केन्द्र सरकार का अब तक का रूख दस-दस पन्नों की गाईडलाईन जारी करने का है जिसमें ऐसी तमाम बातें भी लिखी गई हैं जो कि राज्य के अधिकार क्षेत्र की हैं, राज्य की जिम्मेदारी हैं। ख्रैर, इससे परे राज्यों को भी तैयार रहना होगा कि बुरी हालत में रहकर लौटे हुए ये मजदूर अगर अपने साथ बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव लेकर आते हैं, तो क्या होगा? हमारा ख्याल है कि अधिकांश राज्यों पर हर पांच-दस हजार मजदूरों पर कुछ दर्जन कोरोना पॉजिटिव निकलने का एक खतरा आ सकता है, और इसके लिए राज्य के जांच और इलाज के ढांचे को पुख्ता करके रखना ठीक रहेगा।

- सुनील कुमार 


01-May-2020

वक्त कितना ही बुरा आए, 
जूझने की सबसे अधिक 
ताकत मजदूर की ही होगी

पूरी एक सदी के बाद दुनिया में ऐसा मजदूर दिवस आया है जब अधिकतर देशों में मजदूर बेरोजगार बैठे हैं, और अगर वे बहुत खुदकिस्मत हैं तो ही वे अपने घर पर बैठे हैं, वरना हिन्दुस्तान जैसे देश में तो मजदूर सड़कों पर इतना लंबा पैदल सफर कर रहे हैं जितना कि उन्होंने 1947 में भारत-पाक विभाजन के दौर में भी नहीं किया था, और न ही 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से भारत में शरण लेने के बाद किया था। दोनोंं ही मौकों पर सरहद के बाद जल्द ही लोगों को रेलगाडिय़ां मिल गई थीं, या सड़क से चलने वाली किसी गाड़ी पर जगह मिल गई थी। आज ये दोनों ही हासिल नहीं हैं। आज सुबह तेलंगाना से झारखंड के बारह सौ मजदूरों को लेकर पहली ट्रेन निकली है, लेकिन यह ट्रेनों की शुरुआत शायद नहीं है, एक प्रयोग है। फिर भी मजदूर दिवस पर यह मजदूरों को एक तोहफा है कि उनमें तो बारह सौ को अपने प्रदेश जाने मिल रहा है, आगे का सफर अभी शुरू भी नहीं हुआ है।

20 मार्च को हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 22 मार्च को जनता कफ्र्यू की घोषणा की थी, और 24 मार्च की रात पूरे देश में लॉकडाउन करके तमाम ट्रेनों को रद्द कर दिया गया था। इस वक्त देश में करोड़ों मजदूर दूसरे प्रदेशों में मजदूरी के लिए गए हुए थे, छोटे कारीगर और कारखाने-कारोबार के हुनरमंद मजदूर एकाएक रात 8 बजे बेरोजगार हो गए क्योंकि लाखों मालिक और ठेकेदार ऐसे थे जिन्होंने मजदूरों को बकाया पैसा भी नहीं दिया। न खाने को, न रहने को, न घर लौटने को। ऐसे में गिनती के बचे-खुचे पैसे लेकर, बच्चों को कंधे पर लाद, सामान को घरवाली को पकड़ाकर हिन्दुस्तानी मजदूर हजार-हजार किलोमीटर तक के पैदल सफर पर निकल गए थे जो कि आज 30-35 दिन बाद भी जारी है। अखबारों के दफ्तर उन खबरों और तस्वीरों से पट गए हैं जो कि देश भर में पैदल चल रहे मजदूरों की हैं, और पूरे देश में फंसे हुए मजदूरों की हैं, जो कि इतना लंबा पैदल सफर नहीं कर पा रहे हैं। कुल मिलाकर 20 मार्च से 24 मार्च तक का वक्त इतना था कि घरों से सफर शुरू करने वाले लोगों को रोक दिया जा सकता था, और दूसरे प्रदेशों में फंसने जा रहे मजदूरों को अपने प्रदेश रवाना किया जा सकता था। लेकिन वैसा हुआ नहीं, और अगर आज उसकी तकलीफ पर बात भी न हो, तो फिर मजदूर दिवस कैसा? जिन मजदूरों की देह से पसीने की शक्ल में नमक बहता है, उनकी बाकी देह के साथ-साथ उनके पांवों के फफोलों के फूटने से भी नमक बहने लगा था। 

लेकिन बात महज दूसरे प्रदेशों में काम कर रहे मजदूरों की नहीं थी। खुद अपने प्रदेश में काम करने वाले मजदूर घर बैठे भी खासे वक्त से बेरोजगारी झेल ही रहे थे, अब उन्हें रोजगार मिलने की गुंजाइश लॉकडाउन के साथ पूरी तरह खत्म हो गई। आज मजदूर दिवस पर तमाम मजदूरों के बारे में सोचना है जो कि इतने बरसों में मिट्टी खोदने से अधिक कुछ सीख चुके थे, उन सबका हुनर आज धरा रह गया है। अलग-अलग प्रदेशों में मशीनों पर और कारोबारों में काम करने का उनका तजुर्बा धरा रह गया है, और मेहनत की खाने वाले करोड़ों लोग आज राहत में मिलने वाले अनाज की कतार में खड़े हो गए हैं। कोरोना को लेकर यह नौबत कुछ हद तक तो आनी थी, लेकिन जिस तरह मजदूरों को बेघर, बेबस, बेरोजगार, और बेसहारा करके एकाएक छोड़ दिया गया था, यह पूरा पांच हफ्तों का वक्त उनके आत्मविश्वास को भी तोड़ देने वाला रहा, उनके आत्मसम्मान को भी चकनाचूर करने वाला था। 

आज मजदूर दिवस पर अगर देश के इस सबसे बड़े, दसियों करोड़ गिनती वाले तक के सदमे, उसके फफोलों, और उसकी जिंदगी पर छाए खतरे की भी बात न की जाएगी, तो फिर क्या किया जाएगा? मजदूरों का यह पूरा सिलसिला बहुत ही अनिश्चितता से भरा हुआ है। हम यह तो नहीं कहते कि कोरोना जैसे खतरे और इतनी बड़ी समस्या का किसी को पूर्वाभास रहा होगा, लेकिन यह बात तो तय है कि कम से कम कुछ हफ्ते पहले से इसका अहसास हो चुका था, और उसके बाद जिस तरह एक झटके में रेलगाडिय़ां बंद की गईं, और आज पांच हफ्ते बाद इस तरह प्रायोगिक तौर पर फिर चलाई गई है, इन दोनों के बीच का यह अरसा भारत के मजदूर इतिहास का अब तक का सबसे ही खराब दौर रहा है, और अगर भारत सरकार की कोई बेहतर योजना होती, या कि जैसा कि कई अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री कह रहे हैं, भारत की कोई योजना होती, तो बर्बादी इतनी अधिक नहीं होती, तकलीफ इतनी अधिक नहीं होती, और करोड़ों मजदूरों को इंसानों की तरह रहने का मौका मिला होता। 

हम इस पूरे मुसीबत के दौर में भी इन बातों को करना जरूरी इसलिए समझते हैं कि मुसीबत अभी कई और महीने चलने वाली है, और अगर आगे भी कोई योजना नहीं बनेगी, केन्द्र राज्यों को साथ लेकर काम नहीं करेगा, तो हो सकता है कि हिन्दुस्तानी मजदूरों को आज तक की सबसे बुरी त्रासदी अपनी पहले नंबर की जगह खो बैठे, और इससे और बुरी त्रासदी हिन्दुस्तान में दर्ज हो। आज का वक्त इतिहास से सबक लेने का नहीं है, आज का वक्त अपने बीते हुए हफ्ते और महीने से भी सबक लेने का है, और हिन्दुस्तान को इसकी जरूरत बहुत अधिक है, इसके प्रदेशों को इसकी जरूरत बहुत अधिक है। मजदूर दिवस पर हम बस इतना ही कह सकते हैं कि वक्त चाहे कितना ही बुरा आए, उससे जूझने की सबसे अधिक ताकत मजदूर की ही होगी। दुनिया के मजदूरों को लाल सलाम। 
-सुनील कुमार


29-Apr-2020

तैयार हो जाइये कोरोनोत्तर 

युग की दुनिया के लिए...!

दुनिया के अलग-अलग देश, अलग-अलग दर्जे के लॉकडाउन झेल रहे हैं, कहीं-अधिक, कहीं कम। हिंदुस्तान भी जबरदस्त लॉकडाउन देख रहा है। बच्चों ने इतने लम्बे वक्त तक माँ-बाप को सर पर सवार देखा नहीं होगा, माँ-बाप बच्चों को इतने वक्त, ऐसी नौबत में पहली बार ही देख रहे होंगे। छोटे या बड़े, किसी भी आकार के परिवार ने पहली बार सबको इतना झेला होगा। लोग खुलकर इस बारे में अधिक बोलेंगे नहीं, कि लॉकडाउन के बीच जान बचाने कहाँ जाएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि अब इंसान बहुत अधिक समय तक सिर्फ परिवार के लोगों के साथ उस तरह रहने के आदी नहीं रह गए हैं, जिस तरह गुफा में रहने वाले इंसान रहा करते थे। और उस वक्त के इंसान को तो गुफा के भीतर न वाई-फाई हासिल था, न गुफाबैठे वे सोशल मीडिया के दोस्तों से जुड़े रहते थे। अब तो इंसान को घरवालों के बीच रहते हुए भी बाहर की दुनिया में जीने का एक बड़ा मौका हासिल है, लेकिन इस दसियों हजार बरस में इंसान ने धीरे-धीरे अपना मिजाज बदल लिया है। अब घर बैठे लोग बाहर निकलने के लिए बेचैन हैं। सबको यह समझ आ गया है कि छुट्टी नाम की अच्छी चीज भी बहुत अधिक मिलने पर जी उसी तरह अघा जाता है जिस तरह रईस बारात में बाराती को जबरदस्ती खानी पड़ रही दसवीं रसमलाई भारी पड़ती है। 

अब लोगों को काम करने की जरूरत भी समझ आ रही होगी, बाहर निकलने की भी, और लोगों से सशरीर मिलने की भी। कोरोना ने जिंदगी में अहमियत रखने वाली बहुत सी चीजों की समझ विकसित कर दी है। लोगों की पहचान करा दी है, और हम पहले भी लिखते आए थे कि बुरा वक्त अच्छे-अच्छे लोगों की पहचान करा देता है। वह हो भी रहा है, लेकिन इससे भी अधिक अभी होगा। आने वाले महीनों में लोग ऐसा बोलते मिलेंगे कि फलां को पहचानने में बड़ी देर हो गई। वक्त बहुत खराब आने वाला है, और घर के भीतर, घर के बाहर रिश्ते, बहुत खराब भी होने जा रहे हैं। 

लेकिन ये तमाम बातें तो उन लोगों के बारे में हैं, जो लोग घरों में बैठे हैं, जिनके अधिक संबंध हैं, अधिक दोस्त हैं। हिंदुस्तान जैसे देश में दसियों करोड़ लोग ऐसे हैं जहां लोग घरों से बाहर हैं, या मजदूरी के लिए फिर जिन्हें बाहर निकलना होगा। जिनके अधिक रिश्ते भी नहीं होंगे। जिन्होंने आज बेरोजगारी, फटेहाली देखी होगी, भुखमरी के कगार पर पहुँच गए होंगे। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों ने ऐसे बुरे वक्त अपने बच्चों का एक नया बर्ताव देखा होगा, छोटे बच्चों ने अपने माँ-बाप को सैकड़ों मील पैदल चलते देखा होगा, जिंदगी की एक अलग दर्जे की लड़ाई लड़ते देखा होगा। उनके मन में अपने माँ-बाप की ऐसी योद्धा सरीखी तस्वीर बनने का और तो कोई मौका आना नहीं था। इसलिए यह नई पीढ़ी जिंदगी की लड़ाई की एक नई समझ भी लेकर बड़ी होगी, अपने जुझारू माँ-बाप से यह पीढ़ी बहुत कुछ सीखकर भी बड़ी होगी। 

दुनिया में आज इस बात को कहने वाले लोग कम नहीं हैं कि कोरोना के बाद दुनिया अलग ही हो जाएगी। कुछ लोगों ने बिफोर क्राइस्ट और आफ्टर क्राइस्ट की तरह बिफोर कोरोना और ऑफ्टर कोरोना के लिए बीसी और एसी भी लिखना शुरू भी कर दिया है। समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक, एंथ्रोपोलॉजिस्ट और अर्थशास्त्रियों के पास कोरोनोत्तर दुनिया के बारे में लिखने को और भी बहुत कुछ होगा। फिलहाल सौ बरस पहले की महामारी के बाद की इस महामारी के बाद के लिए अपने-आपको तैयार करते चलिए।  
-सुनील कुमार


28-Apr-2020

यह तो अच्छा हुआ कि 
उसका नाम मुरारी था... 

उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर से बुरी खबर आई है कि दो साधुओं को एक मंदिर में सोते हुए किसी ने धारदार हथियार से मार डाला। मौत तो बहुत बुरी थी, लेकिन उस बीच भी गनीमत यह है कि मारने वाला एक हिन्दू गिरफ्तार हुआ है जिससे दो दिन पहले साधुओं का सार्वजनिक झगड़ा हुआ था, और वह उन्हें धमकी देते हुए गया था। अभी-अभी महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं को उनके ड्राइवर सहित पीट-पीटकर मार डाला गया, देश के एक नफरतजीवी तबके ने दिल्ली में अपने अपने बड़े-बड़े नेताओं की अगुवाई में, और बाकी नफरतजीवियों ने अर्नब गोस्वामी नाम के टीवी-दंगाई की अगुवाई में उन साधुओं की हत्या की तोहमत पहले दिन मुस्लिमों की तरफ मोडऩे की कोशिश की, लेकिन पता चला कि मारने वाले तमाम लोग हिन्दू आदिवासी थे। आदिवासी अपने को हिन्दू नहीं मानते लेकिन जिस हिन्दू-हिस्से की बात हो रही है, वह उनको हिन्दू गिनता है। तो मुस्लिम उस भीड़त्या की तोहमत से बाहर हो गए, लेकिन आदिवासियों की नाम के साथ ईसाई जोडऩा आसान रहता है, इसलिए यह जोड़ा गया कि मारने वाले ईसाई हैं, और उनको बचाने में सोनिया गाँधी के करीबी लोग जुट गए हैं। फिर यह झूठ भी चौबीस घंटों से अधिक खड़े नहीं रह पाया, तो फिर अर्नब गोस्वामी का वीडियो खूब काम आया कि किस तरह सोनिया गाँधी ने अपनी सरकार के राज में हिन्दू साधुओं की ह्त्या के बाद खुशी से भरकर रोम रिपोर्ट भेजी है कि किस तरह हिन्दू साधू मारे गए। यह नफरत शायद देश में दंगा करवाने में बड़ी काम आती, लेकिन अब हिंदुस्तान में मुस्लिम, हिन्दू अर्थी उठाने में लगे हैं, अंतिम संस्कार कर रहे हैं, हिन्दू, मुस्लिमों को अपने घर में रख रहे हैं, उनकी जान बचा रहे हैं, खाना खिला रहे है, मुस्लिम कॉरोनामुक्त होने के बाद अपने खून का प्लाज़्मा दे रहे हैं। कुल-मिलाकर अभी दंगे के लायक माहौल अर्नब, और बेचेहरा नफरती, मिलकर भी नहीं बना पा रहे। इसलिए देश का सबसे संवेदनशील प्रदेश, उत्तर प्रदेश भी तनाव से बच गया, और साधुओं का हिन्दू हत्यारा पकड़ा गया। 

देश में धर्म को सर पर चढ़ा लिया गया है। और महज त्योहारों के लिए नहीं, नफरत, राजनीति, और डूबते हुए मीडिया-कारोबार को चलाने के लिए धार्मिक नफरत को बढ़ावा दिया जा रहा है। धार्मिक प्रेम किसी को आसानी से नहीं जोड़ पाता लेकिन धार्मिक नफरत तुरंत ही इस देश के अर्नबों को एक कर देती है। देश की सबसे बड़ी अदालत का मिजाज हैरान करता है कि नफरत की आग की लपटें उगलते ड्रैगन पर सवार अर्नब गोस्वामी रात में सुप्रीम कोर्ट पहुँचता है, और अगले दिन राहत हासिल कर लेता है। नफरत की इन लपटों से देश में अगर दंगे हो गए होते तो? इस बहुत ही हकीकत के खतरे को भी देखने से सुप्रीम कोर्ट इंकार कर रहा है! अर्नब की बुनियाद ही नफरत से बनी है, जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने हैरतअंगेज अंदाज से अनदेखा कर दिया है। ऐसे में देश में नफरत मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय भावना बन गयी है, और धार्मिक सद्भावना को जिंदा रखना आम लोगों की जिम्मेदारी हो गयी है। 

यह तो अच्छा हुआ कि साधुओं का चिमटा किसी हिन्दू ने ही चुरा लिया था, खुला झगड़ा भी हुआ था, धमकी भी हुई थी, और मुरारी नाम का वह नशेड़ी पकड़ा भी गया। नहीं तो जाने क्या होता। देश को एक बारूद के ढेर पर बिठाने की कोशिश हो रही है, कब तक वह उससे बच पायेगा यह भी अंदाज लगाना मुश्किल है। आज कोरोना की दहशत से लोगों के मन में जो श्मशान वैराग्य आया है, उससे लोग नफरत से छुटकारा पा सकेंगे यह भी ठीक से समझ नहीं पड़ रहा है। लेकिन यह तय है कि तब्लीगियों के मज़हब से लेकर अर्नब के हिंदुत्व तक, धर्म ने लोगों को पागल कर रखा है। जब किसी लोकतंत्र पर, सरकार पर, अदालत पर, धर्म हावी हो जाता है, तो उसका क्या होता है इसकी एक उम्दा मिसाल बगल का पाकिस्तान है। जिंदगी पर, राजनीति पर, निजी मामलों से लेकर सड़कों तक, जब धर्म का इतना बोलबाला हो जाता है, तो फिर लोकतंत्र धार्मिक आतंक होकर रह जाता है। हिंदुस्तान को हिन्दू पाकिस्तान बनाने के लिए रात-दिन ओवरटाइम मेहनत करने वाले अरनबों की तालिबानियत इस देश की जम्हूरियत को खत्म तो शायद न कर पाए, लेकिन बर्बाद जरूर कर दे रही है। 
-सुनील कुमार