संपादकीय

21-Jun-2020 4:29 PM

जिन लोगों को अभी तक छत्तीसगढ़ सबसे सुरक्षित लग रहा था, और देश के बाकी राज्यों के मुकाबले यह कोरोना से बचा हुआ भी था, वह वक्त गुजर गया है। अब तो थोक में कोरोनाग्रस्त लोगों की शिनाख्त हो रही है, और एक-एक करके शहर, कस्बे, गांव की बस्तियां कंटेनमेंट जोन घोषित होती जा रही हैं। एक सबसे घने बसे हुए शहर राजनांदगांव के एक मोहल्ले में ही 49 पॉजिटिव निकल गए हैं, वह एक भयानक नौबत है। और कोरोना के खतरे को सिर्फ जिंदगी और मौत से जोड़कर देखना ठीक नहीं है, हर मोहल्ले के कंटेनमेंट के पीछे दर्जनों पुलिस कर्मचारी झोंके जाते हैं, दर्जनों म्युनिसिपल कर्मी, दर्जनों स्वास्थ्य कर्मचारी वहां लग जाते हैं। ऐसे एक-एक मोहल्ले के सैकड़ों नमूनों की जांच में लैब व्यस्त हो जाती है, और शासन-प्रशासन हर किसी का वक्त, उसकी ताकत, उसका पैसा सब कुछ उस पर खर्च होता है। यह भी याद रखना चाहिए कि लॉकडाऊन खुलने के बाद जिस तरह से कारोबार पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है, वह ट्रेन आगे बढऩे के पहले ही फिर बेपटरी हो जा रही है। इन इलाकों में कारोबार बंद, इन इलाकों से लोगों की आवाजाही बंद, और इन इलाकों की जिंदगी एक किस्म से स्थगित। यह नौबत एक-एक पखवाड़े तक तो चलना ही है। और यह पखवाड़ा अर्थव्यवस्था के बिना रहेगा, पढ़ाई के बिना रहेगा, किसी कामकाज के बिना रहेगा। 

आज चूंकि देश के दूसरे प्रदेशों में मौतें बड़ी अधिक संख्या में हो रही हैं, इसलिए छत्तीसगढ़ लोगों को सुरक्षित लग रहा है। लेकिन कोरोना के जाने में अभी कई हफ्तों से लेकर कई महीनों तक का वक्त लग सकता है, और ऐसे में सरकार की क्षमता भी चुक सकती है, और लोगों के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी। आज भी अगर ईमानदारी से बड़े पैमाने पर कोरोना की जांच हो जाए, तो इस प्रदेश की सारी तैयारी धरी रह जाएगी, और 10-15 हजार मरीजों को रखने की क्षमता हफ्ते भर में ही खत्म हो जाएगी। हो सकता है कि सरकार ने अघोषित रूप से यह फैसला लिया हो कि जांच इतनी अधिक न की जाए कि वह भर्ती करने की क्षमता को खत्म कर दे। हो सकता है कि सरकार में कुछ लोगों का यह सोचना हो कि बहुत से पॉजिटिव लोग बिना जांच, और बिना किसी गंभीर इलाज से अपने आप ही ठीक हो जाएंगे, लेकिन इससे नौबत बहुत अधिक खतरनाक ही हो सकती है। बिना शिनाख्त के कोरोना पॉजिटिव लोग चारों तरफ घूमते रहेंगे, जैसा कि कल राजनांदगांव में सामने आया है, और एक व्यक्ति से दर्जनों तक पहुंचने में चार दिन ही लगेंगे, फिर चाहे शिनाख्त में हफ्ते-दो हफ्ते ही क्यों न लग जाएं। इसलिए सरकार के तौर-तरीकों पर भरोसा करने के बजाय लोगों को अपनी खुद की सावधानी पर भरोसा करना चाहिए और अपनी जिंदगी को इस हिसाब से ढालना चाहिए कि कोरोना के साथ जीना सीखना है।

भारत के बहुत से ऐसे राज्य रहे हैं जहां पर 16-16 घंटे का पॉवरकट रहता है। लोगों ने वहां उसके साथ जीना सीख लिया है। बिजली आते ही कौन-कौन से काम तेजी से निपटाने हैं, उनके दिमाग में पुख्ता बैठ चुका है। जब बिजली नहीं है तब किस ठिकाने पर मोबाइल चार्ज हो सकता है, यह भी लोगों को अच्छी तरह समझ आ गया है। कोरोना के साथ जीना कुछ उसी तरह सीखना पड़ेगा, सावधानी बरतने को मिजाज में ही बैठाना पड़ेगा, गैरजरूरी मटरगश्ती को आत्मघाती मानना पड़ेगा, और लापरवाह-दुस्साहसियों को आत्मघाती दस्ता मानकर उनसे परहेज भी करना पड़ेगा। आज लापरवाह लोग खुद अकेले नहीं मरने जा रहे। वे उस शराबी बस ड्राइवर की तरह हैं जिसके साथ 50 जिंदगियां और भी जुड़ी हुई हैं। ऐसे में आज जब लोग लापरवाह होते दिख रहे हैं, तो यह याद रखने की जरूरत है कि कोरोना के मुकाबले भी लापरवाही अधिक संक्रामक है। एक लापरवाह इंसान सौ सतर्क इंसानों की सतर्कता खत्म करने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे में लोगों को कतरा-कतरा लापरवाही के बजाय कतरा-कतरा सावधानी बरतनी चाहिए, आसपास के लोगों को एकदम कड़ाई से सावधान करना चाहिए। मोहल्ले या किसी इमारत में एक कोरोनाग्रस्त निकलने पर हजारों लोगों पर एक पखवाड़े की जो रोक लग रही है, उससे उनकी निजी जिंदगी की और देश की उत्पादकता बहुत बुरी तरह बर्बाद हो रही है। अभी यह बात खुलकर सामने नहीं आई है, लेकिन ऐसे लॉकडाऊन और ऐसे कंटेनमेंट से लोग मानसिक रूप से विचलित हो रहे हैं, और खुदकुशी तक कर रहे हैं। इसलिए राज्य सरकार या केन्द्र सरकार की दी गई छूट को इस्तेमाल करना ही है, ऐसी लापरवाही से लोगों को बचना चाहिए। सरकारी छूट जनता को मिला अधिकार भर है, उसे अनिवार्य रूप से इस्तेमाल करना उस पर कोई जिम्मेदारी नहीं है। इसलिए सरकारी नसीहत से अधिक सावधानी बरतें, घर-परिवार और दफ्तर-कारोबार में अधिक से अधिक सावधानी रखें, और उसके बाद भी बुरी से बुरी नौबत के लिए तैयार भी रहें। 

आज दुनिया में देश के और बाहर के जो जानकार-विशेषज्ञ ऐसी भविष्यवाणी कर रहे हैं कि हिन्दुस्तान में कोरोना की सर्वाधिक संख्या जुलाई अंत में या अगस्त में किसी समय आ सकती है, उन्हें कोई ढकोसले वाला ज्योतिषी मानकर न चलें। ये लोग वैज्ञानिक आधार पर एक अनुमान बता रहे हैं, जो कि अगर थोड़ा गलत होगा तो यह भी हो सकता है कि कोरोना की सर्वाधिक संख्या और एक-दो महीने आगे तक खिसक जाए। ऐसे में कई महीनों की सावधानी के लिए लोगों को शारीरिक, मानसिक, और आर्थिक रूप से तैयार रहना चाहिए। कभी सुशांत राजपूत, तो कभी चीन की खबरों को ऐसा हावी नहीं होने देना चाहिए कि जिंदगी में कोरोना से परे भी बहुत सी चीजें हैं। लोगों की निजी जिंदगी में आज सबसे जरूरी यही है कि वे अपनी सेहत कोरोना से बचाकर रखें, और उसके लिए खुद की सावधानी के अलावा आसपास के सारे दायरे की सावधानी के लिए भी मेहनत करना जरूरी है। जैसा कि सड़क किनारे ट्रैफिक के बोर्ड पर लिखा रहता है, सावधानी हटी, दुर्घटना घटी, ठीक वैसी ही नौबत कोरोना को लेकर है। चिट्ठी को मौत का तार समझना, वरना बीमार को पार समझना। आगे आप खुद समझदार हैं। (जिनको तार शब्द का मतलब नहीं मालूम है, एक वक्त सबसे तेज खबर पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले टेलीग्राम को तार कहा जाता था)। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


20-Jun-2020 6:24 PM

कल शाम से लेकर आज दोपहर तक भारतीय मीडिया में कल की सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कही हुई बातों पर हैरानी भरी सनसनी फैली हुई थी। बैठक के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय के उनके कहे हुए जो छोटे-छोटे से पौन दर्जन वाक्य जारी हुए थे, उन्होंने लोगों को हैरान कर दिया था। खासकर उनमें से एक वाक्य जिसमें कहा गया था-''पूर्वी लद्दाख में जो हुआ, न वहां से हमारी सीमा में कोई घुस आया है, और न ही कोई घुसा हुआ है, न ही हमारी पोस्ट किसी दूसरे के कब्जे में है।''

चूंकि यह लिखित बात खुद प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी हुई थी, और पीएमओ की ओर से ट्वीट भी की गई थी, इसलिए इस पर कोई शक करने की गुंजाइश नहीं थी, और न है। लेकिन जब मीडिया ने पिछले चार-पांच दिनों में विदेश मंत्रालय के कई बयान के साथ इसे मिलाकर देखा, तो दोनों के बीच एक बड़ा साफ और पूरी तरह का विरोधाभास नजर आया। लोगों ने कल से सोशल मीडिया पर लिखा और समाचारों का मीडिया भी इससे भरा रहा कि मोदी ने तो चीन के पक्ष की बात कही है, और यह साफ-साफ कह दिया कि भारत की जमीन पर न कोई कब्जा है, न कोई यहां पर है। अब इन शब्दों के एक मायने यह निकल रहे थे कि भारतीय सेना चीन के कब्जे वाले इलाके में घुसी थी, और लड़ाई वहां पर हुई। दूसरी तरफ चीन का यह साफ बयान एक से अधिक बार आ गया है कि जिस गलवान घाटी की बात हो रही है, वह उसकी निर्विवाद जमीन है। 

शब्दों के अधिक न जाएं, तो भी यह बात कुछ अटपटी लगती है कि कल प्रधानमंत्री कार्यालय से जो लिखित टिप्पणी बैठक के बाद जारी हुई थी, उस पर बनी खबरों के बाद आज भारत सरकार की तरफ से एक बहुत लंबा लिखित स्पष्टीकरण जारी हुआ है कि प्रधानमंत्री ने बैठक में क्या कहा, और उसका मतलब क्या था। यह एक अलग बात है कि यह लंबा बयान भी कल के प्रधानमंत्री के लिखित शब्दों के बारे में पूरी तरह मौन है, और उन्हें छू भी नहीं रहा है। आज के बयान में कहीं यह खंडन भी नहीं किया गया कि कल के पीएमओ के बयान के शब्द प्रधानमंत्री ने बैठक में कहे थे, या नहीं कहे थे। यह बात कुछ नहीं, खासी अटपटी है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक-एक घंटा लंबा बोलने के आदी हैं, और किसी और को उनकी कही बातों का मतलब समझाने की जरूरत पड़े, ऐसा तो किसी ने कभी सोचा नहीं था। फिलहाल कल से लेकर आज तक न सिर्फ मोदी के आलोचक, बल्कि फौज और विदेश नीति के बहुत से जानकार भी इस बात पर हैरान हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री के शब्द चीन को क्लीनचिट देने वाले कैसे हैं? यह बात खासकर अधिक तल्खी के साथ इसलिए उठी कि अभी तो देश में तमाम 20 शहीदों की अर्थियां भी उठी ही हैं, और ऐसे में लोग यह सुनकर हक्का-बक्का थे कि सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री ने ऐसा कैसे कह दिया? क्या इन 20 फौजियों की शहादत कोई मायने नहीं रखती? ऐसे तमाम असुविधाजनक और आलोचना भरे सवाल उठे। 

हम अपनी तरफ से इस विवाद पर अधिक कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन यह याद रखना भी जरूरी है कि इस बड़ी शहादत के काफी पहले से यह बात उठ रही थी कि चीनी सरहद पर क्या चल रहा है, इस बारे में केन्द्र सरकार देश के सामने बताए। हमने दो-चार दिन पहले इसी जगह यह बात जरूर लिखी थी कि फौजी स्तर पर जो बातचीत चल रही थी, वह जाहिर तौर पर नाकाफी साबित हुई, क्योंकि उसके चलते हुए ही इतनी बड़ी हिंसक फौजी झड़़प हुई, और जिसमें कम से कम हिन्दुस्तान के तो 20 फौजी शहीद हुए ही हैं, चीन का क्या हुआ है यह तो अब तक सामने आया नहीं है, न उनके बयानों में, न ही किसी और सुबूत में। जब देश के सामने बहुत से सवाल ही सवाल खड़े थे, तब एक सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री की कही हुई बातों के एक दर्जन शब्दों को लेकर आज भारत सरकार को दो-चार सौ से भी अधिक शब्दों का एक ऐसा स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा है, जो किसी बात को स्पष्ट नहीं कर रहा है, बल्कि रहस्य को और गहरा रहा है, धुंध को और गहरा कर रहा है, कि प्रधानमंत्री ने ऐसा क्या कहा था, और ऐसा क्यों किया था, जिसे कि आज इतने लंबे खुलासे की जरूरत पड़ रही है, और जो कि कुछ भी नहीं खोल पा रहा है। 

चीन की सरहद के फौजी मोर्चे पर देश की इतनी बड़ी शहादत कोई रहस्यमय अस्पष्ट बात नहीं चाहती, बहुत साफ-साफ शब्दों में केन्द्र सरकार को यह खुलासा करना चाहिए कि हुआ क्या है, और यह भी कि सरकार इस पर क्या करने जा रही है, यह बात भी तभी जब यह सरकार की किसी गोपनीय कार्रवाई से जुड़ी हुई न हो। कल प्रधानमंत्री की लिखित जारी की गई बात से लोगों को बड़ा सदमा लगा था, और आज उसके स्पष्टीकरण से उससे भी बड़ी हैरानी हुई है। सरकार कितनी बार अपनी ही बात, या अपने ही स्पष्टीकरण का स्पष्टीकरण जारी करेगी? खासकर ऐसे वक्त जब देश में सामान्य जिज्ञासा के सवाल गद्दार करार दिए जा रहे हैं। जब सामान्य, गैरगोपनीय जानकारी मांगना भी एक जुर्म करार दिया जा रहा है। यह माहौल अधिक सवाल करने का नहीं छोड़ा गया है। ऐसे में जब सवाल पसंद नहीं है, तो खुद होकर तो जवाब देना ही होगा, और वह जवाब बड़ा साफ और बड़ा स्पष्ट होना चाहिए। इस मुद्दे और क्या कहें, सरकार साफ-साफ कहे, अपने शब्दों में कहे, और ऐसे शब्दों में कहे कि जिसकी भावना आगे जाकर हिन्दी के इम्तिहान में किसी कविता की व्याख्या की तरह  बखान न करनी पड़े। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


19-Jun-2020 6:47 PM

अभी दस मिनट पहले की खबर आई है कि भारत के वायुसेना चीफ ने लद्दाख जाकर वहां तनाव का जायजा लिया। तीन दिन पहले ही वहां हिन्दुस्तान ने चीन के साथ झड़प में अपने 20 सैनिक और अफसर खोए थे। तब से भारत की सरकार में एक अजीब किस्म का सन्नाटा छाया हुआ है, और लोगों ने इन 20 शहादतों के बाद प्रधानमंत्री के तीन-चार सौ शब्दों के बयान को गिनकर शब्द लिखे हैं कि उनमें कहीं भी चीन का नाम भी नहीं लिया गया। प्रधानमंत्री ने चाहे कुछ न कहा हो, लेकिन उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम है कि हिन्दुस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हिन्दुस्तानी सैनिकों की मौत का बदला लेना चाह रहा है, और सरकार से यह उम्मीद कर रहा है कि वह चीन को सबक सिखाए। दूसरी तरफ चीन लगातार चौथे दिन अपनी इसी बात पर कायम है कि भारत के सैनिकों ने उसकी जमीन पर घुसकर भड़काऊ नौबत लाई जिसकी वजह से यह मुठभेड़ हुई है। उसने अपने सैनिकों की मौत या उनके जख्मी होने की कोई बात नहीं मानी है। 

अब सवाल यह है कि पांच हफ्तों से अधिक चीन की सरहद पर यह तनाव चल रहा था, दूसरी तरफ भारत और चीन के बीच के नेपाल के साथ भारत की बड़ी तनातनी कागज की लकीरों को लेकर चल ही रही है, ऐसे में चीन के साथ ऐसा खूनी संघर्ष बड़ी फिक्र खड़ी करता है। लोग याद कर रहे हैं कि साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा पर 1975 के बाद पहली बार फौजी लहू बहा है। 

आज आम हिन्दुस्तानियों की सोच बदले की हो गई है, जिसमें बहुतायत मोदी-समर्थकों की है, लेकिन मोदी-विरोधी भी कम नहीं हैं, वे मोदी के पुराने बयान, उनके पुराने वीडियो, उनकी पार्टी के प्रवक्ता के पुराने वीडियो निकालकर याद दिला रहे हैं कि बिना किसी हिन्दुस्तानी सैनिक की मौत के, महज चीनियों की सरहद में घुसपैठ को लेकर मोदी ने किस तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मखौल बनाया था, और उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री साबित किया था। मोदी-समर्थक आज उन्हें मजबूत प्रधानमंत्री मानते ही हैं, और मोदी-विरोधी आज उन्हें एक निहायत कमजोर प्रधानमंत्री साबित करने पर आमादा हैं। जो बीच के समझदार लोग हैं, वे यह गिना रहे हैं कि मोदी और चीनी राष्ट्रपति कितनी बार हिन्दुस्तान में मिले, कितनी बार चीन में, और कितनी बार दूसरे देशों में। लोग उन तस्वीरों और वीडियो को पोस्ट कर रहे हैं, इनमें चीनी-प्रमुख के दक्षिण भारत आने पर वहां भाजपा के नेता भारत और चीन दोनों के झंडे लगाए हुए बोट दौड़ा रहे थे, और चीनी राष्ट्रपति के पोस्टर हिला रहे थे। तैश की तमाम बातें होनी ही थीं क्योंकि देश में लगातार एक उग्र राष्ट्रवाद को पनपाया गया है, और आज वह फन फैलाए हुए देख रहा है कि किस-किसको डसा जाए। मोदी-विरोधियों को एक मौका मिला है कि वे इस सरकार की विदेश नीति की नाकामयाबी, इस सरकार की फौजी नीति और तैयारी की नाकामयाबी को गिना सकें, और मोदी को एक फ्लॉप शो साबित कर सकें। लेकिन इस पर लिखना आज समर्थन और विरोध के नारों पर लिखना नहीं है, आज हिन्दुस्तान की जरूरत पर लिखना है। 

आज चीन के साथ जंग के फतवे देना तो आसान है, लेकिन उसके नतीजों के बारे में सोचना और समझना कम ही लोगों की फिक्र का सामान है। आम नागरिक बुनियादी रूप से गैरजिम्मेदारी की हद तक भड़क उठते हैं, ऐसा इसलिए भी होता है कि उन्हें लगातार भड़कने का चारा खिला-खिलाकर पाला-पोसा जाता है। अपने देश को, उसकी एक-एक इंच जमीन को, उस जमीन को अपनी माता का दर्जा देने को, और चीर देने, काट देने, फाड़ देने की हिंसक सोच को जब एक आम सोच बना दिया जाता है, तो वैसी सोच आज चीन के साथ सरहदी तनाव के वक्त तो भड़कनी थी ही, क्योंकि आज तो इस सोच ने अपनी पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा फौजी नुकसान इस सरहद पर देखा है। 1962 की जंग की हार भी आज बहुत से लोगों को याद नहीं है, और वैसे भी उसकी तोहमत तो नेहरू पर लगाने के लिए आज भी लोग रात-रात में नींद से उठकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर ही रहे हैं। आज लोगों को सैनिकों की लाशें दिख रही हैं जो कि देश में आधा-एक दर्जन प्रदेशों में जा रही हैं। यह समझने की जरूरत है कि इस राष्ट्रवादी तबके का सारा शिक्षण-प्रशिक्षण ही देश के नाम पर सरहद से हजारों किलोमीटर दूर मरने-मारने के फतवों तक ही सीमित है। इस तबके को न अंतरराष्ट्रीय चीजों की समझ है, न ही देश की अर्थव्यवस्था, और न ही चीन की ताकत का अहसास है। चीन चाइनीज-नूडल्स का एक प्याला नहीं है जिसे खाया जा सके, वह एक परमाणु-महाशक्ति भी है, जो फौजी पैमानों पर भारत से बहुत ऊपर है। ऐसे में चीन के साथ जंग का सपना हथियारों के सौदागर देखें वहां तक तो ठीक है, सत्ता के दलाल देखें वह भी जायज है, लेकिन जिस जनता के टैक्स से यह जंग लड़ा जाएगा, उस जनता का सबसे मूढ़ और सबसे हिंसक तबका ही जंग के फतवे दे रहा है। 

हम मीडिया या राजनीति के तमाम मोदी-आलोचकों से भी यह अपील करेंगे कि प्रधानमंत्री को घेरने का मौका मानकर आज चीन के साथ टकराव की चुनौती देना बंद करें, इन दोनों देशों के हित में फौजी तनाव का बढऩा बहुत नुकसानदेह होगा। आज हिन्दुस्तान वैसे भी कूटनीतिक रूप से बहुत ही नाकामयाब साबित हो चुका है जो कि साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी सरहद के एक छोटे से हिस्से को लेकर ऐसे तनाव में उलझा कि बातचीत के बजाय अपने सैनिकों की शहादत पाकर रह गया। पिछले छह बरस में प्रधानमंत्री मोदी की चीनी राष्ट्रपति के साथ यारी के तमाम किस्से मीडिया के झूलों में झूलते आए हैं, लेकिन वे सारे फ्लॉप शो साबित हुए हैं क्योंकि प्रधानमंत्री तो दूर, मंत्री तो दूर, फौजी चीफ तो दूर, चौथे-पांचवे नंबर के अफसर आपस में बात करते रहे, और दोनों देशों के तथाकथित प्रगाढ़ संबंध किसी काम नहीं आए। आज भी किसी देश के लिए बड़प्पन एक हमले से साबित नहीं होता, शांति बनाए रखने से साबित होता है। हिन्दुस्तानी सैनिकों की कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी, ऐसा सरकारी दिलासा किसी काम का नहीं है। हिन्दुस्तान की सरकार को चाहिए कि सरहद के तनाव को खत्म करने के लिए खुले दिल से चीन के साथ बात करे, और जंग के भड़कावे, जंग के उकसावे से अपने को बेअसर रखे। सरकार की सोच वैसी नहीं होनी चाहिए जैसी कि विपक्ष में रहते हुए इन्हीं प्रधानमंत्री-मंत्रियों ने बार-बार दिखाई थी, या कि आज के विपक्ष के कुछ नेता दिखा रहे हैं। यह सोच भड़कावे से उपजी हुई नहीं होनी चाहिए। यह सोच बदला निकालने की नहीं होनी चाहिए, क्योंकि 20 सैनिकों की शहादत तो हो ही चुकी है, सरहद पर किसी जंग से सैकड़ों-हजारों की शहादत और हो सकती है, और फैसले लेने वाले नेता और बड़े अफसर राजधानियों में महफूज बैठे रहेंगे। यह सिलसिला खतरनाक है, लोग सरकार को भड़काना बंद करें, सरकार किसी उकसावे में नहीं आए, और इन शहादतों से सबक लेकर सरकार को, दोनों देशों की सरकारों को चाहिए कि वे सरहद पर झगड़े खत्म करें क्योंकि जैसा कि चीनी प्रवक्ता ने पिछले दो दिनों में कहा है, दोनों देशों के बीच सरहद पर टकराव के मुकाबले दोनों के साझा हित बहुत अधिक हैं। हिन्दुस्तान को यह सबक जरूर लेना चाहिए कि बातचीत की नौबत रहने तक उसका इस्तेमाल न करना कितना महंगा साबित हुआ है। आज भी बातचीत की बची हुई नौबत का इस्तेमाल करना चाहिए, और किसी देश के सामानों के बहिष्कार के फतवे पूरी तरह से फर्जी रहते हैं क्योंकि हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था, लोगों की जिंदगी रातों-रात चीनी सामानों के बिना, चीनी कच्चे माल के बिना नहीं चल सकती। इसलिए सरकार जिम्मेदारी से काम ले, और चीन से धैर्य से बात करे। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


18-Jun-2020 7:28 PM

भारत और चीन के बीच तनाव को लेकर दो दिन पहले हमने जब यहां लिखा था, उस वक्त भारत के तीन फौजियों के मारे जाने की खबर थी। फिर देर रात तक सरकार ने यह खुलासा किया कि 20 हिन्दुस्तानी शहीद हुए हैं। यह भी खबर आई कि गोलियां नहीं चलीं, और पत्थर-लाठियों से यह टकराव हुआ है। बात थोड़ी अजीब थी, लेकिन जंग के मोर्चे पर लोगों को अपने देश की सरकार से परे की जानकारी कम मिल पाती है, और मीडिया को भी अपने देश की फौज के रास्ते ही जानकारी मिल पाती है। 
शुरुआती खबरों के मुकाबले बाद की हकीकत बहुत ही भयानक है, और हिन्दुस्तान हिल गया है। चीन की फौज को हुए नुकसान के बारे में वहां की सरकार ने कोई खुलासा नहीं किया है, लेकिन हिन्दुस्तानी फौज का कहना है कि उससे दुगुने लोग चीनी फौज के हताहत हुए हैं। फौजी जुबान में कैजुअल्टी यानी हताहत होने का मतलब बड़ा ही फैला हुआ होता है। सैनिक की मौत से लेकर उसकी बीमारी या उसके जख्मी होने तक को इस एक शब्द हताहत में गिना जाता है, इसलिए भारत के मुकाबले चीन का नुकसान अभी साफ नहीं है, और चीन ने अपने एक भी सैनिक की मौत की घोषणा नहीं की है। ऐसे में यह सिलसिला थोड़ा सा अजीब लग रहा है कि सरहद पर इतनी तनातनी के बीच दो परमाणु-हथियार संपन्न देशों के बीच टकराव लाठियों और पत्थरों से हुआ। आज एक भारतीय प्रतिरक्षा विशेषज्ञ ने भारतीय फौज के जब्त करके लाए गए जो हथियार दिखाए हैं, उनकी तस्वीर और भी हैरान करती है कि महीने भर से अधिक से चले आ रहे तनाव से निपटने के लिए, इतने टकराव के बाद क्या छड़ों में कीलें जोड़कर चीनी फौज लडऩे पहुंची थी? भारत सरकार बहुत रहस्यमय ढंग से बड़ी चुप्पी साधे हुए है, और जहां तक चीन का सवाल है वहां तो सब कुछ सरकार-नियंत्रित है, इसलिए वहां से कोई जानकारी सरकार से परे बाहर नहीं आ पाती। 

अब हिन्दुस्तान के भीतर-भीतर की बात करें, तो 15-16 जून की मध्य रात्रि इतने भारतीय सैनिकों की शहादत पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 19 जून की शाम एक सर्वदलीय वीडियो कांफ्रेंस करने जा रहे हैं। इतने हफ्तों से जो तनाव चल रहा था, उस पर देश उम्मीद कर रहा था कि प्रधानमंत्री कुछ बोलेंगे। अपने इन 6 बरसों में मोदी ने चीनी राष्ट्रपति के साथ शायद डेढ़ दर्जन मुलाकात की है, और दोनों ने एक-दूसरे को अपने-अपने देश में अपने-अपने शहर में मेहमान बनाया हुआ है। दोस्ताना संबंधों की इससे बड़ी नुमाइश आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई थी, लेकिन सरहद पर चल रहे टकराव के बीच यह कहीं पता नहीं लगा कि इन दोनों नेताओं के निजी दूतों ने भी कोई मुलाकात की हो, कोई बात की हो। जबकि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पहले भी कुछ नाजुक मुद्दों पर बात करने के लिए चीन जा चुके हैं, और वे तब्लीगी जमात से लेकर दूसरे देशों तक केन्द्र सरकार की तरफ से कई किस्म की पहल करते आए हैं, जो कि एक सलाहकार की भूमिका से बढ़कर भी रही हैं। लेकिन चीन के इस पूरे मुद्दे से वे भी गायब रहे, प्रधानमंत्री ने 20 सैनिकों की शहादत हो जाने के बाद पहली बार इस मुद्दे पर मुंह खोला। नतीजा यह हुआ कि इस घोर अप्रिय नौबत का सामना करने के लिए प्रतिरक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अकेले ही सामने रहे। 

भारत के भीतर आम जनता को लेकर राष्ट्रीय राजनीतिक दल तक भारतीय सैनिकों की इस तरह की मौत पर बहुत विचलित हैं। राहुल गांधी से लेकर दूसरे नेताओं तक ने सोशल मीडिया पर सरकार से कई तीखे और असुविधाजनक सवाल किए हैं। इन सवालों को लेकर उन्हें गद्दार भी माना जा रहा है, लेकिन लोकतंत्र के फायदे के लिए यूपीए सरकार के वक्त की एक चीनी घुसपैठ के समय एनडीए के एक बड़े प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का एक वीडियो आज जिंदा है और तैर रहा है जिसमें वे सरकार से संसद और देश के सामने तथ्य रखने और जानकारी देने की मांग कर रहे हैं। उनके पूरे बयान को टाईप करके अगर उनका नाम हटा दिया जाए, और तारीख हटा दी जाए, तो आज भी वह पूरा बयान मोदी सरकार से एक सवाल की शक्ल में जायज है, और केन्द्र सरकार को देश के सामने तमाम बातों को रखना चाहिए। 

जिन लोगों को अपने पसंदीदा लोगों से अपने नापसंद लोगों के सवाल नहीं सुहाते हैं, और जो बड़ी तेजी से इसे देश के साथ गद्दारी साबित करते हैं, पूछने वाले की बुद्धि को चीनपरस्त कहते हैं, तो कभी एक पप्पू की अक्ल करार देते हैं, वैसे लोगों को यह समझना चाहिए कि फौज से जुड़ी हुई, सरहद से जुड़ी हुई हर बात राष्ट्रीय सुरक्षा की गोपनीय जानकारी नहीं होती है, बहुत सी जानकारियां आम जनता के साथ बांटने के लायक होती हैं, और किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को आम जनता को हकीकत से वाकिफ रखना भी चाहिए। बहुत ही सीमित बातें ऐसी होती हैं जिनका राष्ट्रीय हित में गोपनीय रहना जरूरी होता है, और हमारी जानकारी में देश के किसी भी नेता ने ऐसी कोई जानकारी केन्द्र सरकार को मांगी नहीं है। ऐसे में मोदी सरकार बहुत सी बातों के लिए विपक्षी दलों के मार्फत जनता के प्रति जवाबदेह है। और यह जवाबदेही किसी भी शक्ल में देश का विरोध तो दूर, सरकार का विरोध करार देना भी बड़ी नाजायज बात होगी। लोकतंत्र अगर अपने भीतर के देश के प्रति वफादार लोगों को बात-बात पर गद्दार करार देने लगे, तो वह लोकतंत्र के खात्मे की शुरुआत होती है। 

किसी भी सरकार को चाहे वह देश की हो, चाहे किसी प्रदेश की, चाहे वह कोई म्युनिसिपल या पंचायत ही क्यों न हो, जवाबदेही उसे गलतियों और गलत कामों से बचाती है। आज भारत सरकार को अपने देश के भीतर लोगों की जिज्ञासा, लोगों की शंकाएं, इन सबको शांत करना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए जो गोपनीय पहलू हैं, उनकी आड़ लेकर आम जानकारी को भी आम जनता से दूर रखना लोगों के मन में कई किस्म के नाजायज शक भी पैदा करता है, जो किसी के हित में नहीं हैं। 

सरकार को यह बात भी समझना चाहिए कि हिन्दुस्तानी जनता के कारोबारी हित, उसकी रोज की जरूरतें, उसके रोज के इस्तेमाल के सामान चीन से आकर बाजारों में पटे हुए हैं। भारत का बहुत सा मेन्युफेक्चरिंग तबका चीन के पुर्जों और कच्चे माल पर जिंदा है। ये तमाम सामान सरकार की नीतियों के तहत, सरकार की इजाजत से, और सरकार को टैक्स देकर लाए गए हैं। सरकार की चुप्पी बाजार को भी एक असमंजस से घेरती है, और ऐसे में देश का एक संगठित उपद्रवी तबका चीनी सामानों के बहिष्कार के फतवे को हिंसा की हद तक ले जाता है। ऐसे में कानूनी ढंग से कारोबार करने वाले देश के लाखों लोग, और उनसे जुड़े हुए करोड़ों पेट खतरे में पड़ते हैं। भारत सरकार को तुरंत ही देश के सामने न सिर्फ अपनी बात रखनी चाहिए, बल्कि विपक्ष के मुंह से देश के अलग-अलग तबकों की बात सुननी भी चाहिए। बेहतर तो यही होगा कि सरकार भारत-चीन तनाव पर एक बयान दे, और उसके बाद विपक्ष की राय को सुनने का काम ही करे। 
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 


17-Jun-2020 5:06 PM

किसी एक अभिनेता की आत्महत्या पर लगातार तीन दिनों में दो बार इस जगह पर लिखना आज का मकसद नहीं है। लेकिन आज उससे जुड़े हुए एक अलग और नए पहलू पर लिखना है कि समाज में लोगों को दूसरों के बारे में अपनी राय बनाने के पहले क्या-क्या सोचना चाहिए, और कैसे इंसाफपसंद तरीके से सोचना चाहिए। 

हुआ यह कि सुशांत राजपूत की खुदकुशी के बाद एक दूसरी अभिनेत्री सोनम कपूर ने ट्विटर पर लिखा कि किसी की मौत के लिए उसकी गर्लफ्रेंड, या भूतपूर्व गर्लफ्रेंड, परिवार, या सहकर्मियों को जिम्मेदार ठहराना अज्ञान का सुबूत है, और परले दर्जे का तंगनजरिया है। अब इस बात को लेकर सोशल मीडिया पर लोग उन पर टूट पड़े और उन्हें हजार किस्म की बातें गिनाने लगे। कई लोगों ने यह लिखा कि अगर सोनम कपूर अनिल कपूर जैसे बड़े बाप की बेटी न होतीं, तो कहीं झाड़ू-पोंछा करती रहतीं। जितने मुंह उतनी बातें। और फिर इन दिनों सोशल मीडिया पर नफरत और बकवास लिखने वाले लोगों की तो सुना है कि रोजी-रोटी भी वहां से निकल जाती है। ऐसे में जितनी भड़काऊ बातें कोई लिखें, उतनी ही मजदूरी बढ़ती भी है। यह बात तो जाहिर है कि किसी मशहूर की खुदकुशी बिना ढेर सारी चर्चा के कहीं जाने वाली नहीं थी, फिर भी उसके लिखे बिना, उसकी चिट्ठी सामने आए बिना अगर लोग  अटकलें लगाकर आसपास के लोगों पर तोहमतें लगा रहे हैं, कोई किसी को खुदकुशी का जिम्मेदार ठहरा रहे हैं तो कोई और किसी और को, तो ऐसे में इस सलाह में भला क्या बुरा है कि लोगों पर ऐसी तोहमतें लगाना तंगनजरिया है? अभी तो पुलिस के हाथ खुदकुशी की चिट्ठी लग चुकी है, और मरने वाले को अपने जाने के पहले यह पूरा हक था कि अगर किसी पर तोहमत लगानी है तो वह लिखकर छोड़ जाए, उसके बाद अटकलों से तोहमतें बनाकर दूसरे लोगों को बदनाम करने का एक मतलब यह होता है कि लोग अपना-अपना हिसाब चुकता कर रहे हैं। जिसको जिससे नफरत है, उसका नाम जोड़कर उसे खुदकुशी का जिम्मेदार ठहरा दे रहे हैं। इसलिए ऐसी हरकत को एक तंगदिली या तंगनजरिया कहा जाना जायज है। 

अब जहां तक सवाल किसी अभिनेता की निजी जिंदगी के इस हद तक कुरेदने का है, तो यह दुनिया का रिवाज ही है कि जो शोहरत पर जिंदा रहते हैं, मशहूर होना उनके पेशे की एक जरूरत है, वे लोगों की खुर्दबीनी निगाहों से इंकार नहीं कर सकते। मीठा-मीठा गप्प, और कड़वा-कड़वा थू नहीं हो सकता। इसलिए चाहे सुशांत राजपूत हो, चाहे सोनम कपूर हो, इन सबको अपने कहे और दिखे के लिए लोगों के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है। और यह बात महज बॉलीवुड या हॉलीवुड की नहीं है, यह बात अनंतकाल से दुनिया में चली आ रही है, और राम को अयोध्या लौटने के बाद एक धोबी के ताने इसीलिए सुनने पड़े थे कि वे राजा थे। जिसे सम्मान मिलता है, जिसे शोहरत मिलती है, उन्हें ही अधिक जिम्मेदारी भी मिलती है, और उनकी ही अधिक जवाबदेही भी हो जाती है। इन दिनों तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से ऐसे अखबारनवीस या पत्रकार भी हर किसी की तोहमतों के घेरे में रहते हैं, जो कि खुद ईमानदारी से अपना काम करते रहते हैं, उन्हें भी सौ किस्म के आरोप झेलने पड़ते हैं, उनके बारे में झूठी बातें गढ़कर चारों तरफ फैलाई जाती हैं। 

लेकिन जहां पर किसी की जिम्मेदारी होने या न होने की बात वाली एक चिट्ठी मौजूद है, तो वहां पर लोगों को इंतजार करना चाहिए। जहां पर कुछ लोगों से टेलीफोन पर बातचीत की गई है, और उनसे जानकारी हासिल होना बाकी है, तो इंतजार करना चाहिए। ऐसी हालत में भी अटकलों पर टिकी तोहमतें ज्यादती हैं, और किसी जिम्मेदार व्यक्ति को उससे बचना चाहिए। 

पुलिस की जांच जो कि शुरू हो चुकी है, उसका इंतजार करने से दुनिया नहीं पलट जा रही। बहुत से लोगों पर तोहमत लगाने से बेहतर है कि सुशांत राजपूत की चिट्ठी, और अगर कोई दूसरे लोगों के बयान हों, तो उनका इंतजार करना चाहिए। महज मीडिया की सनसनी के लिए तोहमतों की बौछार ठीक नहीं है। 
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


16-Jun-2020 4:12 PM

भारत-चीन सरहद पर लगातार चल रहा तनाव बढ़ते हुए आज एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया जब दोनों फौजों के बीच गोलीबारी में हिन्दुस्तानी फौज का एक कर्नल और दो सैनिक मारे गए। लोगों ने इस बारे में लिखा है कि 1967 के बाद पहली बार इन दो देशों के बीच सरहद पर तनाव में कोई मौत हुई है। पिछले बरसों में कई बार, कभी अरूणाचल पर, तो कभी लद्दाख को लेकर चीन के साथ भारत की तनातनी होती थी, लेकिन निपट जाती थी। इस बार महीने भर से तनाव चल रहा था, और बातचीत की जो जानकारी लोगों के सामने आई है, वह महज फौजी अफसरों के बीच बातचीत की थी। इस बातचीत में कोई बुराई तो नहीं थी, लेकिन यह कूटनीतिक समझदारी के बिना होने वाली फौजी-दिमाग की बातचीत थी, जो शायद किसी किनारे नहीं पहुंच पाई। इस वक्त हिन्दुस्तान के टीवी चैनल अपने तीन फौजियों की शहादत को लेकर विचलित हैं, और इसी मुद्दे पर बहस चल रही है। भारत सरकार की ओर से अब तक सिवाय इन मौतों की पुष्टि के और कोई बयान नहीं आया है, और इतना कहा जा रहा है कि दोनों तरफ के फौजी अफसरों के बीच बातचीत जारी है। 

भारत और चीन के बीच करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी सरहद है। दो सगे भाईयों के बीच जब एक जमीन का बंटवारा होता है, तो फीट-आधा फीट का विवाद अक्सर ही रह जाता है, ऐसे में दो परस्पर प्रतिद्वंद्वी और अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक-दूसरे से टकराने वाले इन दो देशों के बीच सरहद पर झगड़ा कोई अनोखी बात नहीं है। हिन्दुस्तान में पिछले बरसों में जिन विदेशी राष्ट्रप्रमुखों का दर्शनीय स्वागत हुआ है, उनमें चीनी राष्ट्रपति भी एक रहे हैं जिन्हें भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कभी गुजरात के विख्यात जिले में झूला झुलाया, कभी ढोकला खिलाया, तो कभी दक्षिण के किसी पुरातात्विक स्मारकों की पृष्ठभूमि में उनसे बातचीत की। तरह-तरह चीन और भारत के शासन प्रमुख एक-दूसरे से मिलते रहे, और कुछ ऐसा माहौल कम से कम हिन्दुस्तान में तो बने रहा जो कि आधी सदी के भी पहले हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे से बना था। लेकिन ऐसा लगता है कि पिछले दिनों से चले आ रहे इस तनाव के दौर को मानो कम से कम हिन्दुस्तान ने महज फौजी अफसरों की बातचीत के लायक मान लिया था, और दूसरी कोई बातचीत सामने नहीं आई। 

हिन्दुस्तान में आज माहौल कुछ ऐसा है कि सरकार से ऐसे राष्ट्रीय मुद्दे पर भी किसी जानकारी मांगने के मुल्क के साथ गद्दारी करार देने के लिए लाखों लोग की-बोर्ड पर बैठे हैं, और एक सरीखी गालियां पल भर में हजारों लोग कॉपी-पेस्ट करने लगते हैं। इस मशीनरी के बारे में यहां पर अधिक चर्चा करना ठीक नहीं है, लेकिन देश के ऐसे बड़े मुद्दे को भी अगर लोगों की चर्चा से, लोगों के सवालों से परे कर दिया जाएगा, संसद का सत्र चलेगा नहीं, केन्द्र के प्रधानमंत्री या दूसरे बड़े मंत्री प्रेस का सामना नहीं करेंगे, तो लोग अपने सवाल किसके सामने रखेंगे? बात-बात पर लोगों को देश के साथ गद्दारी या वफादारी की कसौटी पर कसने का मतलब देश को कम आंकना है। अगर मीडिया या राजनीति के कुछ लोग हिन्दुस्तानी सरकार से इस तनाव पर तथ्य सामने रखने की मांग करते हैं, तो उन्हें पूरी तरह खारिज कर देना अलोकतांत्रिक बात है। लोकतंत्र में बंद कमरे की कूटनीतिक बातचीत के भी कुछ पहलुओं को सार्वजनिक रूप से उजागर किया जाता है। आज तो हालत यह है कि भारत और चीन के फौजी अफसरों के बीच बातचीत के बाद भारत के लोगों को पहला बयान चीन के अफसरों का पढऩे मिला कि बातचीत एक सकारात्मक किनारे पहुंच रही है। 

आज जब हिन्दुस्तान कोरोना से मुश्किल से जूझ पा रहा है, और कोरोना के बाद का वक्त तो आज के आर्थिक संकट से और भी बड़ा होने के आसार हैं। ऐसे में नेपाल जैसे एक वक्त के बड़े करीबी देश, और दुनिया में अकेले हिन्दू राष्ट्र रहे देश के साथ अभूतपूर्व तनाव चल रहा है। चीन के साथ आधी सदी बाद का इतना बड़ा तनाव अभूतपूर्व तो कहा ही जाएगा। पाकिस्तान के साथ भारत की स्थायी शत्रुता चली ही आ रही है। अब हिन्दुस्तान आखिर कितने मोर्चों पर एक साथ लड़ेगा? चीन की आर्थिक क्षमता बेमिसाल है, वह तो आज अमरीकी कारोबार के भी, वहां के वित्तीय संस्थानों के भी एक बड़े हिस्से का मालिक है। उसने कोरोना से निपटने में भी एक बेमिसाल तेजी दिखाई थी। भारत उस मुकाबले बहुत पीछे और बहुत कमजोर है। वह आज इस हालत में भी नहीं है कि दुनिया की एक बड़ी महाशक्ति चीन के साथ किसी लंबे युद्ध में उलझ सके। फिर भारत के भीतर आज जिस तरह का राष्ट्रवादी उन्माद चल रहा है, उसके चलते हुए यह भी मुमकिन नहीं है कि जनता के बीच किसी तर्कसंगत सरकारी फैसले पर एक व्यापक सहमति आसानी से तैयार हो सके। अपने देश की जनभावनाओं को देखते हुए भारत जैसे देश के आज चीन के साथ इस तरह का रूख दिखाना होगा, हो सकता है वह बहुत तर्कसंगत न भी हो। शायद ऐसे ही वक्त देश की जनता का न्यायप्रिय होना अधिक काम का रहता है, लेकिन भारत में आज राष्ट्रीय सोच इस तरह की रह नहीं गई है। 

खैर, आने वाले दिन तनाव भरे होंगे, और बहुत से लोग गद्दार कहलाने वाले हैं। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


15-Jun-2020 4:52 PM

कल एक फिल्म-टीवी कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी से देश के दर्शक और बाकी लोग भी सदमे में हैं। जिसकी हर तस्वीर हॅंसती-खिलखिलाती दिखती, जो फिटनेस का शौकीन था, जिसके पास अच्छा खासा काम था, शोहरत थी, कामयाबी थी, उसकी ऐसी आत्महत्या ने लोगों को यह सोचने मजबूर कर दिया कि क्या इतनी बातों के रहते हुए भी कोई आत्महत्या कर सकते हैं? लेकिन इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी घटना दिख रही है कि कोई हफ्ते भर पहले इस अभिनेता की मैनेजर ने आत्महत्या की थी। 

आत्महत्या हमेशा ही तकलीफदेह रहती है, परिवार, दोस्त, पड़ोस, और साथ काम करने वाले लोगों के लिए अधिक तकलीफदेह रहती है कि उन्हें इस बात का अहसास वक्त रहते क्यों नहीं हुआ? उनसे कहां चूक हो गई कि वे ऐसी घनघोर निराशा को भांप नहीं पाए। और हकीकत यही रहती है कि आसपास के लोग या तो तनाव और निराशा को देखकर भी अनदेखा करते हैं, या फिर वे भांप ही नहीं पाते, और बीच के कोई इस तरह बेवक्त चले जाते हैं। 
सुशांत राजपूत तो उस आय वर्ग का था कि जिसे जरूरत पर मानसिक चिकित्सा की सहूलियत हासिल थी। लेकिन हिन्दुस्तान में तो मनोचिकित्सकों और परामर्शदाताओं की इतनी कमी है कि आम लोगों को कभी भी पेशेवर सलाह और इलाज मिल नहीं सकते। फिर एक दूसरी बात यह भी है कि हिन्दुस्तान में मानसिक चिकित्सा की जरूरत को सीधे-सीधे पागलपन जैसे भद्दे और अपमानजनक शब्द से बखान किया जाता है जिसकी वजह से लोग अपनी मानसिक परेशानियों को, मनोरोग को बताने से भी हिचकते हैं, और अगर उनका इलाज चल भी रहा है तो भी वे आसपास इसका जिक्र नहीं करते। जबकि असल जिंदगी में सिर्फ मनोचिकित्सक, या परामर्शदाता काफी नहीं होते, परिवार और बाकी निजी दायरा भी मायने रखता है, और इन लोगों को भी न सिर्फ दिक्कत की खबर होनी चाहिए, बल्कि दिक्कत दूर करने में इनकी सक्रिय भागीदारी भी जरूरी रहती है। 

यह देश अपने दूसरे बहुत से पाखंडों की तरह मानसिक परेशानियों और तनावों को, अवसाद और दूसरी दिक्कतों को एक अछूत बीमारी की तरह मानकर चलता है, और देश के अनगिनत सबसे गरीब मानसिक रोगी तो कहीं कोठरी में बंद रखे जाते हैं, तो कहीं हाथ-पैर चेन से बांधकर उनमें जानवरों की तरह रख दिया जाता है। वैसे तो यह समाज एक-दूसरे की जिंदगी में दखल देने में अतिसक्रिय रहता है, और आसपास के लोगों की निजी बातों को भी खोद-खोदकर पूछता है, लेकिन जिन परिवारों में मानसिक रोगियों के साथ भारी हिंसक बर्ताव होता है, उन परिवारों के करीबी लोग भी इस बात को किसी समाजसेवी संगठन या सरकार को बताने से कतराते हैं। ऐसे में घर में कैद किए गए आम मानसिक रोगी की दिक्कतें तो बढ़ती ही चलती हैं। आज चूंकि एक आत्महत्या को लेकर बहुत अधिक चर्चा चल रही है, और सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति अपनी कोई न कोई राय दे रहे हैं, तो ऐसे में पेशेवर लोगों को सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर छोटे और बड़े आकार के परामर्श देने चाहिए, जो कि अभी तक दिख नहीं रहे हैं। आम लोग चूंकि मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा की जटिलताओं से वाकिफ नहीं रहते हैं, वे अपने मन की बातें लिखते हैं, जो कि अच्छी नीयत के बावजूद जरूरी नहीं है कि सही हों। ऐसे में सरकार को भी यह चाहिए कि मानसिक परामर्शदाता और मनोचिकित्सक के वीडियो बनवाकर उन्हें चारों तरफ फैलाए ताकि जिनको आज जरूरत नहीं है, वे भी जानकार होकर रहें, और आसपास किसी की जरूरत के समय मददगार हो सकें। आज भारत के समाज में सिर्फ मरीजों को मदद की जरूरत नहीं है, आज हर आम व्यक्ति को जानकारी की जरूरत है कि आसपास वे किस तरह ध्यान रखें, और जरूरत दिखने पर लोगों की मदद करें। दरअसल देश की आबादी इतनी अधिक है कि कुछ मौतों को लेकर कोई बड़ा नुकसान नहीं माना जाता है। यह बेरूखी खत्म होनी चाहिए, क्योंकि हर जिंदगी की कीमत है, और उसकी बाकी उम्र की अपार संभावनाएं भी रहती हैं। 

हम पहले भी इसी जगह कई बार लिख चुके हैं कि राज्यों को अपने विश्वविद्यालयों में मनोवैज्ञानिक परामर्श की शिक्षा बढ़ानी चाहिए, ताकि मनोचिकित्सा की जरूरत आने के पहले ही लोगों को परामर्श से राहत मिल सके। लेकिन आबादी के अनुपात में ऐसा करने का ध्यान किसी सरकार को नहीं है क्योंकि शायद सरकार में फैसले लेने वाले लोग इतने सक्षम और संपन्न होते हैं कि उन्हें जरूरत के वक्त मानसिक परामर्श और मानसिक चिकित्सा दोनों ही आसानी से हासिल रहते हैं। 

एक मशहूर इंसान की आत्महत्या के मौके पर लोगों को आत्महत्या की इस खुद के साथ हिंसा के बारे में सोचना चाहिए, और अपने आसपास के लोगों को भी देखना चाहिए जो डिप्रेशन में हैं, दूसरे किस्म की मनोवैज्ञानिक दिक्कतों के शिकार हैं, और उनकी मदद करनी चाहिए। जरूरी नहीं है कि अपनी दिक्कत के वक्त ही मदद मायने रखती है, आज आप दूसरों के लिए कुछ करेंगे, तो हो सकता है कि कल आपकी जरूरत के वक्त कोई दूसरे लोग आपका ख्याल रखें। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


14-Jun-2020 7:10 PM

दिल्ली का कोरोना के चलते जितना बुरा हाल हुआ है, और दिल्ली का मैनेजमेंट जितनी अलग-अलग सरकारों के हाथों में बंटा हुआ है, उसे देखते हुए यह पढऩे और सीखने के लिए एक शानदार मॉडल है कि किसी भयानक मुसीबत के वक्त ऐसी जटिल व्यवस्था में क्या किया जा सकता है, और क्या-क्या नहीं करना चाहिए। चार दिन पहले जब केजरीवाल सरकार के इस फैसले के दिल्ली के उपराज्यपाल ने खारिज कर दिया कि वहां के अस्पतालों में दिल्ली से परे के नागरिकों का इलाज नहीं होगा, तो इस पर भी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कोई टकराव लेने से इंकार कर दिया, और महज इतना कहा कि यह वक्त टकराव का नहीं है, मतभेद का नहीं है। यह एक समझदारी का रूख था, बजाय इसके कि केजरीवाल उसे चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाते। आज केन्द्र सरकार के साथ दिल्ली सरकार की बैठक हुई जिसमें कि कुछ बातें अभी निकलकर सामने आई हैं। यह तय हुआ है कि अस्पताल के बिस्तरों की कमी झेल रही दिल्ली के रेलवे की ऐसी पांच सौ आइसोलेशन कोच दी जाएंगी जिन्हें मरीजों को भर्ती करने के हिसाब से तैयार किया गया है। दिल्ली शहर के बीच से बहुत सी पटरियां निकली हैं, और पांच सौ रेलडिब्बों में 10-15 हजार मरीजों को रखा जा सकेगा, जिससे दिल्ली की भर्ती-क्षमता काफी बढ़ जाएगी। लेकिन दूसरी एक बात जो अधिक महत्वपूर्ण है और जिस पर बाकी पूरे देश को भी सोचना चाहिए, वह है अभी चल रही कोरोना-जांच को बढ़ाकर तीन गुना करने का फैसला। छत्तीसगढ़  सहित अधिकतर राज्य इस बात से कतरा रहे हैं कि कोरोना की जांच बढ़ाई जाए। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि कोरोनाग्रस्त लोग खुले घूम रहे हैं, उन्हें खुद पता नहीं है, उनके आसपास के लोगों को पता नहीं है, और खतरा फैलते चल रहा है। कोरोना के लक्षण बहुत से मामलों में ठीक हो जाने तक भी सामने नहीं आते हैं, और ऐसे में अगर वे बिना शिनाख्त ठीक हो जाते हैं, तो ऐसे 14 या 28 दिनों में वे न जाने कितने लोगों को संक्रमित कर चुके रहेंगे। बहुत से लोगों का यह मानना है कि राज्य सरकारें जांच कम से कम करना चाहती हैं क्योंकि अगर अधिक पॉजिटिव मिलते जाएंगे, तो उन्हें रखने के लिए अस्पताल कम पड़ेंगे, इलाज की क्षमता कम पड़ेगी। इसे एक किस्म से दरी के नीचे छुपा दिए जाने वाले कचरे की तरह देखा जा सकता है, फर्क यही है कि इस मामले में यह कचरा नहीं है खतरा है, और जिनकी जान जोखिम में है, वे इंसान हैं। 

कोरोना ने नुकसान चाहे जितना किया हो, उसने एक फायदा भी किया है। उसने दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देशों से लेकर हिन्दुस्तान जैसे बदइंतजाम देश तक सबको आईना दिखा दिया है कि इलाज की उनकी क्षमता कितनी नाकाफी है, दुनिया में वैज्ञानिक रिसर्च पर पूंजीनिवेश न करके सरकारें दुनिया का कितना नुकसान कर रही हैं, और लोगों को भी यह अहसास करा दिया कि उनका पैसा जरूरी नहीं है कि उनकी जिंदगी बचा सके। जिनके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं, उनको इस बात का अहसास करा दिया है कि अगर सरकारी अस्पतालों की बदइंतजामी उन्हें बर्दाश्त नहीं है, तो निजी अस्पतालों का खर्च उठाना भी उनके बर्दाश्त के बाहर रहेगा। ऐसी कई हकीकत देशों और लोगों के सामने आ गई हैं, जिनका सामना करने का साहस अगर लोगों में जुट सकेगा, तो वे अगली महामारी, या अगली किसी दूसरे किस्म की प्राकृतिक, या मानव निर्मित विपदा-आपदा के लिए बेहतर तैयार हो सकेंगे। 

भारत जैसे केन्द्र-राज्य के संघीय ढांचे वाले इंतजाम में भी यह कमजोरी उजागर हो चुकी है कि ऐसी मुसीबत के वक्त केन्द्र की कैसी मनमानी चल सकती है, और राज्य उसके सामने किस तरह बेबस हो सकते हैं। देश के लोगों के सामने यह भी अच्छी तरह उजागर हो गया है कि ऐसी मुसीबत के वक्त देश के पैसे वाले लोग, देश-प्रदेशों की सरकारें, और सबसे बढ़कर संसद-सुप्रीम कोर्ट किस कदर बेकाम और बेकार साबित हुए हैं। आजादी के 70 बरस बाद का यह लोकतंत्र अपने ईमानदार, मेहनतकश, और जुझारू मजदूरों की उतनी ही मदद कर पाया जितनी कि एक जंगल में शेर-चीते के सामने कोई हिरण की कर सकता है। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र ने सबसे कमजोर और सबसे गरीब को इस लॉकडाऊन के दौर में जिस तरह अपने हाल पर छोड़ दिया, और संपन्नता की ताकत वाले लोग जिस तरह महफूज होकर अपने घरों में बैठ गए, वह तजुर्बा भी कम काम का नहीं रहा, और मजदूर इस सबक को जिंदगी में कभी नहीं भूल पाएंगे। 

इस तरह इलाज से लेकर विज्ञान तक, तानाशाही से लेकर लोकतंत्र तक, संघीय व्यवस्था से लेकर राज्य और स्थानीय शासन तक, अलग-अलग तबकों के इंसानों तक, हर किसी को कोरोना के इस दौर ने अधिक तजुर्बेकार बनाकर छोड़ा है, और यह कोई छोटा हासिल नहीं है। अब देखना यही है कि इस तजुर्बे का दुनिया कोई सबक लेती है, या इस मुसीबत से उबरते ही अगली किसी मुसीबत तक पहुंचने के बीच फिर अपनी एक निहायत गैरजिम्मेदाराना बेफिक्री में डूब जाती है, जिस तरह की गुलामी के ठीक पहले हिन्दुस्तान के राजा रास-रंग में डूबे हुए थे। 

दुनिया को इस नारे पर भी अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए कि हर सौ बरस में महामारी आती है, या कि महामारी सौ बरसों में एक बार आती है। हो सकता है कि यह कोरोना ही कई बरस तक जारी रहे, और हो सकता है कि अगले दस बरस बाद ही कोई और वायरस आ जाए जिसकी महामारी इससे भी अधिक बुरी हो। लेकिन एक बात समझने की जरूरत है कि यह धरती इंसानों के चंगुल से छूटने वाली नहीं है। जनगणना के बड़े दिलचस्प आंकड़े हैं जो बताते हैं कि आज दुनिया की आबादी 800 करोड़ से अधिक है, और बरस इसमें 8 करोड़ से अधिक लोग जुड़ते चले जा रहे हैं। ऐसे में अंकगणित यह कहता है कि कोरोना अगर हर दिन एक लाख लोगों को मारते जाएगा, तो भी साल के आखिर में दुनिया की आबादी करीब 5 करोड़ बढ़ी हुई रहेगी। इसलिए यह महामारी, कम से कम इस रफ्तार में दुनिया की आबादी को कभी भी खत्म नहीं कर सकेगी, और न ही लाख मौतें रोज होने पर भी धरती से मानव जाति कभी मिट सकेगी। यह अलग बात है कि लोगों को इलाज के लिए कुछ भी नसीब नहीं होगा, और शायद उसी वक्त धरती के इंसानों में रेवड़-प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाएगी। 

सौ बरस पहले की महामारी, स्पेनिश फ्लू, से दुनिया एक सीमा तक ही सीख पाई थी क्योंकि उस वक्त सीखने वैसे औजार नहीं थे जैसे कि आज कम्प्यूटरों की शक्ल में हर जेब में मौजूद हैं। और हम पहले भी इस जगह इस बात को लिखते आए हैं कि लॉकडाऊन और कोरोना के हर पहलू से लोगों को कई बातें सीखना चाहिए, वह इसके पैदा किए हुए नुकसान के बीच भी थोड़ा सा नफा कमा लेने जैसी बात होगी। दिल्ली में केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, और स्थानीय म्युनिसिपल, इन सबका मिलाजुला राज है, इन सबके बंटे हुए अधिकार हैं, और बंटी हुई जिम्मेदारियां हैं। अब इस मौके पर ये सब मिलकर किस तरह काम करते हैं, इसे पूरा देश देख रहा है। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


13-Jun-2020 5:08 PM

आज दुनिया में जो पीढ़ी जिंदा है, उनमें से लाख में से दो-चार ही ऐसे होंगे जो सौ बरस पहले की 1918 की महामारी के वक्त पैदा हो चुके होंगे, फिर भी इस बात की संभावना बिल्कुल नहीं हैं कि उन्हें महामारी का वह दौर याद होगा। इसलिए आज की यह पीढ़ी फिलहाल तो इसी महामारी की यादों के साथ रहते दिख रही है, अगर उसके जीते जी कोई और महामारी न आ जाए। कुल मिलाकर बात यह है कि महामारी के ऐसे दौर से सीखने का इतना कुछ मिल रहा है, जो कि ऐसी महामारी के बिना सीखना मुमकिन नहीं था। ऐसे में आज जब दुनिया के बड़े-बड़े फैशन ब्रांड लॉकडाऊन और मंदी के चलते कपड़ों और बाकी सामानों के अपने ऑर्डर खारिज कर दिए हैं क्योंकि ग्राहक ही नहीं बचे हैं। इससे दुनिया के बांग्लादेश जैसे कई गरीब मजदूर-देशों में लोगों के सामने रोजी का संकट आ गया है जो कि इन्हीं फैशन ब्रांड के कपड़े और सामान बनाकर जीते हैं। 

अब बड़ी कंपनियों के दिए इस धोखे की सजा उन्हें देने के लिए पश्चिम के एक सामाजिक संगठन ने एक अभियान छेड़ा है जिसमें वह ऐसी दगाबाज कंपनियों का बाजार मंदा करके सजा देने के लिए 90 दिनों तक कोई नए कपड़े न खरीदने की कसम दिला रहा है। इस संगठन का सोचना है कि हर तीन महीने में मौसम के हिसाब से जो नई फैशन आती है, उसमें अगर उन कंपनियों ने अभी के तीन महीनों के हिसाब से दिया हुआ ऑर्डर भी रद्द कर दिया है, तो ऐसी कंपनियों से सामान खरीदना भी तीन महीनों के लिए रद्द कर देना चाहिए। सोशल मीडिया पर प्तनोन्यूक्लोद्स नाम का यह अभियान खरीददारी के शौकीन लोगों को यह मौका भी देगा कि वे अपनी आलमारियों में झांककर देख लें, कि उन्हें नए कपड़ों की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है। बड़ी कंपनियों को सबक सिखाने के अलावा इससे धरती पर पड़ रहा बोझ भी कम होगा क्योंकि बिना जरूरत लोग फैशन के हिसाब से नए-नए कपड़े खरीदते जाते हैं, और पुराने कपड़े घूरों पर पहुंचकर खदानों के गड्ढों को कचरे से पाट रहे हैं। इससे धरती पर एक गैरजरूरी बोझ बढ़ रहा है। 

अब यह अभियान कितना कामयाब होता है, कितना नहीं, यह एक अलग बात है। लेकिन पश्चिम में ऐसी ग्राहक जागरूकता ने पहले भी गरीब देशों के कामगारों का कुछ भला किया है। बांग्लादेश जैसे मजदूर-देश बड़ी-बड़ी खेल कंपनियों के सामान बनाते हैं, फैशन के कपड़े बनाते हैं, और वहां के सिलाई करने वाले, दूसरे मजदूर, बहुत ही कम मजदूरी पाते हैं। इन्हें पर्याप्त मजदूरी मिले इसके लिए पश्चिम के विकसित देशों में ऐसे अभियान चले कि इन ब्रांड का बहिष्कार किया जाए जो कि गरीब देशों में न्यूनतम मजदूरी दिए बिना भी ठेके पर काम करवाते हैं। भारत के कालीन उद्योग में बड़ी संख्या में बाल मजदूरों को लगाया जाता था, क्योंकि कहा जाता है कि उनकी छोटी उंगलियां कालीन की गठानों को बांधने के लिए बेहतर होती हैं। पश्चिम देशों में बाल मजदूरी खत्म होने तक भारत के कालीन का बहिष्कार घोषित किया था, हालांकि यह एक देखने की बात है कि इस बहिष्कार की वजह से कालीन उद्योग में बाल मजदूर घटे, या फिर भारत के बाल मजदूरी-विरोधी कानून की वजह से, या फिर यहां के सामाजिक कार्यकर्ताओं की वजह से। जो भी हो, कई बार यह होता है जब गोरे कोई नारा लगाते हैं, तो काले हिन्दुस्तान के लोग उसे अधिक गंभीरता से लेते हैं। फिर यह बात तो सभी जगह लागू होती है कि अपने भीतर की कई खामियों को देखने के लिए बाहर के दूर बैठे हुए लोग बेहतर होते हैं। बाहर वालों का नजरिया अधिक व्यापक होता है, और वे स्थानीय मुद्दों और हालात से परे भी सोच पाते हैं। 

इस तरह आज यह नई खरीदी के खिलाफ कसम दिलाने का जो आंदोलन शुरू हुआ है, वह कुछ कंपनियों के बहिष्कार से परे भी धरती के पर्यावरण का हिमायती साबित हो सकता है। यह वक्त लोगों के पास खरीदी के पैसे का भी नहीं है, और कोई जरूरत भी नहीं है। आमतौर पर पूरी दुनिया में पिछले तीन महीनों में कपड़ों और जूते-चप्पलों का बहुत कम इस्तेमाल हुआ है, खासकर गरीबों को छोड़कर बाकी सबमें। न जरूरत है, न पैसा है, और न ही आज दुनिया को चेहरा दिखाना है, तो ऐसे में नए कपड़ों और नए फैशन का क्या फायदा? न रेस्त्रां जाना आसान रह गया, न सिनेमाघर और दावतें हैं, और न ही कोई दूसरे जलसे। इसलिए फिलहाल तो कोरोना की विदाई होने तक नए फैशन के आगमन का रास्ता भी नहीं खुल रहा, और उसकी जरूरत भी नहीं है।
 
यह वक्त चीजों को री-साइकिल करने का है, अपने से कम कमाई वाले लोगों को जरूरत के हिसाब से सामान देने का है, कम खपत करने का है, कम खाने का है, कम खर्च करने का है। यह वक्त एक मौका देता है कि अपनी जरूरतों को एक बार तौलकर देखें कि क्या सचमुच इतने सामान जरूरी हैं, या फिर हम फैशन की दौड़ में सामानों का ढेर बढ़ाते चल रहे हैं? हो सकता है कि आज लॉकडाऊन, कोरोना, आइसोलेशन, क्वारंटीन, और जगह-जगह रोकटोक के चलते हुए यह सोच एक श्मशान वैराग्य की तरह की हो, जो कि कोरोना के अंतिम संस्कार में एक मु_ी मिट्टी, या पांच लकडिय़ों की तरह इस्तेमाल हो जाए, और इंसान एक बार फिर बाकी धरती की बाकी बर्बादी में पहले की तरह जुट जाए। लेकिन एक अदृश्य कोरोना ने लोगों को कम से कम यह एहसास तो करा दिया कि वे धरती पर कितने गैरजरूरी हैं, और उन्हें चाहे धरती की कितनी ही जरूरत हो, धरती उनके बिना कितनी सुखी रहेगी, धरती के बाकी सारे प्राणी, कुदरत, इन सबको इंसानों के खत्म हो जाने से कितना सुख हो सकेगा। आज भी ऐसी चर्चा छिडऩे पर कुछ लोगों का यह दंभ सामने आता है कि इंसान धरती के सबसे अच्छे प्राणी हैं। यह दंभ बेबुनियाद है, क्योंकि इंसान ने धरती को जिस रफ्तार से जितना खत्म किया है, वैसा तो कोई दूसरे प्राणी अगले लाखों बरस में नहीं कर सकते। ऐसे में यह भी समझने की जरूरत है कि कुदरत की दी हुई नेमतों की बर्बादी करने वाले इंसान अगर खत्म हो जाएंगे, तो यह धरती एक बेहतर ग्रह बन जाएगी। आज जब लोगों के पास काम कुछ कम हैं, तो इस किस्म का कुछ आत्ममंथन भी करने की जरूरत है, कि वे धरती पर कितने गैरजरूरी हैं, और कितने अवांछित हैं। इंसानों को जरा भी शर्म हो तो धरती के प्रति अहसानफरामोशी के अपनी मिजाज पर भी उसे सोचना चाहिए। 

पश्चिम में बड़े ब्रांड को सबक सिखाने के लिए शुरू किए गए इस प्तनोन्यूक्लोद्स अभियान से हमें भी आज कई चीजों पर सोचने का मौका मिल रहा है, आप भी थोड़ा तो सोचें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


12-Jun-2020 5:27 PM

देश भर में कोरोना के खतरे के बीच परले दर्जे की लापरवाही दिखाई पड़ रही है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज सुबह बाहर से आए हुए कुछ सौ मजदूरों के लिए बसों का इंतजाम नहीं था, तो वे अपने-अपने इंतजाम से आगे निकले। एक छोटी सी मालवाहक गाड़ी में 12-15 लोग सामान सहित किसी तरह सटे हुए बैठे थे, और एक ऑटोरिक्शा रायपुर से बसना के लिए रवाना हो रहा था जिसमें सामान और 10 सवारियां लेकर ऑटोरिक्शा एक-एक से 550 रूपए लेकर सबको लाद रहा था। जिस ऑटोरिक्शा का लाइसेंस तीन सवारियों के लिए है, वह सौ-डेढ़ सौ किमी. 10 लोगों को भरकर जा रहा था, अब यहां पर कौन सी शारीरिक दूरी कायम रह सकेगी? इस मुद्दे पर कई बार लिखने के बाद आज फिर लिखने की जरूरत इसलिए हो रही है कि अभी दिल्ली के एक बड़े अस्पताल, सर गंगाराम हॉस्पिटल के वाईस चेयरमेन, डॉ. एस.पी. बायोत्रा का बयान आया है कि कोरोना का कर्व अभी कहीं दबता हुआ नहीं है, और अभी वह बढ़ ही रहा है। उन्होंने कहा कि यह अपनी सबसे ऊंची ऊंचाई पर जुलाई के पहले पखवाड़े में, या अगस्त में किसी समय पहुंचेगा। उन्हें अगले बरस की पहली तिमाही में भी कोरोना-वैक्सीन की उम्मीद नहीं है। 

अब अगर सोचें कि कोरोना के सबसे बुरे आंकड़े अगस्त के महीने में आने वाले हैं तो आज से पूरे दो महीने इसमें बाकी हैं, और इन दो महीनों में अगर कोरोना लगातार बढ़ते रहता है, तो बात जाने कहां तक पहुंचेगी। लेकिन आज चारों तरफ लापरवाही का आलम दिख रहा है, और लोगों को लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कोरोना से लडऩे के लिए अकेले काफी हैं, या उनकी इस बात से कोरोना डर जाएगा कि कोरोना से लडऩे के लिए पूरा देश एकजुट है, एक साथ है। यह देश टीवी पर भाषण सुनने के लिए, एक मालवाहक में जानवरों से भी कम जगह में लदकर सफर करने के लिए, ऑटोरिक्शा में सामान सहित 10 लोगों के घुसने के लिए तो एक है, लेकिन किसी सावधानी को बरतने के लिए चौकन्नेपन में एक हो ऐसा नहीं दिखता है। आज शराब दुकानों पर भीड़ देखें तो लगता है कि वहां पर कोरोना को मारने के लिए मिलिट्री में भर्ती हो रही है, और राष्ट्रभक्त लोग एक पर एक चढ़कर बंदूक पाने की कोशिश कर रहे हैं। बाजारों को देखें तो दुकानदार मास्क की बेफिक्री से मुक्त हैं, खरीददार कोई यह परवाह नहीं है कि दुकानदार सावधान है या नहीं, अधिकतर खरीददार खुद भी मास्क को गले तक उतारे रहते हैं, और कहीं कोई पुलिस-म्युनिसिपल कर्मचारी पूछ न ले, इसके लिए तैयार रहते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि हेलमेट को टांगे रहते थे,  पहनते नहीं थे। 

लोगों की सोच एकदम से नहीं बदल सकती। लोग हेलमेट जांच करती पुलिस को धोखा देकर यह मान लेते हैं कि उन्होंने मौत को धोखा दे दिया। जबकि आए दिन सिर फटी लाशों की भयानक तस्वीरें मीडिया में आती ही रहती हैं। ऐसे ही लोग आज मास्क को लेकर एक-दूसरे को बेवकूफ बना रहे हैं। खरीद लिया है, या बना लिया है, और उसे टांगना काफी माना जा रहा है। या ऐसे गैरजिम्मेदार समाज को एक झटका देने के लिए कोरोना के बाद वेंटिलेटर के नीचे दम तोड़ते हुए मरीजों के कुछ वीडियो फैलाए जाएं ताकि लोगों को अहसास हो कि कोरोना से मौत कितनी भयानक हो सकती है? या फिर दिल्ली के अस्पतालों के वे बिल दिखाए जाएं कि एक-एक बार के इलाज में किस तरह दस-बीस लाख तक का बिल बन रहा है? या फिर लोगों को इटली जैसे देश के वीडियो दिखाए जाएं, वहां की खबरें दिखाई जाएं कि इलाज की क्षमता चुक जाने पर अस्पताल किस तरह बुजुर्ग मरीजों को भर्ती करने से मना कर रहे हैं क्योंकि उनकी जिंदगी ही कम बची है, और उतनी ही क्षमता से किसी जवान मरीज को अधिक लंबी जिंदगी के लिए बचाया जाए? लोगों का दिल आखिर दहलेगा किससे? अक्ल आएगी किस बात से? 

आज जब एक जानकार डॉक्टर, और दुनिया के बहुत से विशेषज्ञ यह कह रहे हैं कि भारत में कोरोना के सर्वाधिक ऊपर जाने का वक्त अगस्त में किसी समय आएगा, तो ऐसी लापरवाही इन दो महीनों में या देश में एक हर्ड-इम्युनिटी (जानवरों के रेवड़ सरीखी प्रतिरोधक क्षमता) पैदा कर चुकी रहेगी? तस्वीर बहुत भयानक लग रही है क्योंकि अब सरकारें भी जांच की गिनती घटा चुकी हैं, क्योंकि कोई प्रदेश अपने यहां कोरोना के अधिक मामले मंजूर करना नहीं चाह रहे हैं। 

हम एक बार फिर आज इस मुद्दे पर लिख बैठे हैं, क्योंकि पता नहीं कब किसी पर हमारी बात का असर हो। अगर बहुत बड़ी सावधानी नहीं बरती गई, तो हालात बहुत खराब हो सकते हैं, और हेलमेट और मास्क में फर्क यह है कि हेलमेट न पहनने पर अपना ही सर फट सकता है, कोरोना में मास्क न पहनने पर दूसरों को भी संक्रमण पहुंच सकता है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


11-Jun-2020 1:15 PM

अब जब लॉकडाऊन के चलते ग्रामीण मजदूरों के साथ-साथ दूसरे प्रदेशों और शहरों में काम करने वाले हुनरमंद कामगारों की भी वापिसी हो रही है, या तकरीबन हो चुकी है, तब हर प्रदेश की सरकार को यह सोचना चाहिए कि लौटे हुए इन लोगों की जानकारी, इनके हुनर, और इनके काम का कैसा बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। कहने के लिए सरकारें इन्हें मनरेगा में मजदूरी का काम देकर भी कह सकती हैं कि उन्होंने लोगों को बेरोजगारी से बचा रखा है, और कितने लाख या कितने करोड़ लोग कितने दिन तक काम पा रहे हैं, भूख से मरने से बच रहे हैं। लेकिन क्या किसी हुनरमंद का मिट्टी खोदना उसकी काबिलीयत का सबसे अच्छा इस्तेमाल है? और इस पर सोचते हुए यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि लौटे हुए मजदूरों और कामगारों, और स्वरोजगारों में से बहुत से ऐसे होंगे जो अगले साल-छह महीने वापिस दूसरे प्रदेशों में जाने का इरादा न रखते हों। ऐसे में इनको उत्पादक काम देना तो एक वक्ती जरूरत है, लेकिन इसके साथ-साथ इनकी गांवों में वापिसी को एक गुंजाइश और एक मौका भी मानकर चलना चाहिए। हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि जब बुरा वक्त आता है तो बहुत सी अच्छी नसीहतें,  बहुत से अच्छे सबक लेकर भी आता है। आज जिन लोगों के पास तरह-तरह के हुनर हैं, उन्हें सिर्फ जिंदा रखना ठीक नहीं होगा, बल्कि उनके काम का देश के लिए भी बेहतर उत्पादक इस्तेमाल करना जरूरी है। 

अब हम पल भर के लिए कुछ आदर्शवादी कल्पना कर लें, जो कि हो सकता है हकीकत की कड़ी जमीन पर लंबे न टिक पाए, फिर भी आज हर प्रदेश के सामने यह संभावना है कि उसके बहुत से लोग बाहर की दुनिया देखकर, कारोबार या स्वरोजगार का थोड़ा सा तजुर्बा लेकर, और तरह-तरह की स्किल सीखकर आए हैं, और वे महानगरों से गांव तक के सैकड़ों मील के पैदल सफर से इतने थके हुए हैं, कोरोना की इतनी दहशत में हैं, कि वे गांव में बसने की सोच सकते हैं। ऐसे में गांवों की कुटीर उद्योग और खेती के वैकल्पिक उपायों का इस्तेमाल करके इनको गांवों में लंबे समय तक रखने की एक कोशिश हो सकती है। हो सकता है कि इनमें से बहुत से लोग महानगरों से कारखानेदारों और कारोबारियों का न्यौता मिलने तक फिर से पुराने काम में लौट जाना चाहेंगे क्योंकि नौकरी या ठेका-मजदूरी का उनका लंबा तजुर्बा है, और गांवों में कारोबार करना उन्हें फिर से सीखना होगा जो कि बहुत आसान भी नहीं होगा। फिर भी आज राज्य सरकारों को चाहिए कि वे गांवों में स्वरोजगार की सारी संभावनाओं को एक बार लागू करने की कोशिश करें, ताकि एक सदी पहले गांधी ने इस देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में जो कहा था, उस पर आज के हालात में एक बार फिर अमल की कोशिश हो सके। 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और वहां पर स्वरोजगार इतनी पुरानी बात भी नहीं हो गई है कि लोग उसे भूल गए हों। खेती के साथ-साथ फल-सब्जी, डेयरी और पोल्ट्री, दूसरे जानवरों और पक्षियों, मछलियों और मधुमक्खियों का पालन, रेशम के कीड़ों से ककून, वनोपज, और लाख की खेती जैसे काम, ऐसे बहुत से काम हैं जो कि बहुत कम बिजली मांगते हैं, कोई रसायन नहीं मांगते, पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते, और लोगों को रोजगार देते हैं। राज्य सरकारों को ग्रामोद्योग का विस्तार करके इस मौके पर अपने गांव लौटे लोगों को वहां स्वरोजगार देने की एक कोशिश करनी चाहिए, हो सकता है कि वह कुछ या अधिक हद तक कामयाब भी हो जाए। आज बहुत सी बातें सौर ऊर्जा की वजह से मुमकिन हैं, तकरीबन सभी जगहों पर बिजली पहुंच गई है, और गांवों में जड़ी-बूटी, और जंगली फल से दवाओं का कच्चामाल बनाने की गुंजाइश है, पत्तों से दोने-पत्तल बनाए जा सकते हैं, बांस और केन से सैकड़ों किस्म के सामान बनाए जा सकते हैं। इन सबमें रोजगार भी मिल सकता है, और इससे पर्यावरण भी बच सकता है, और जिन शहरी कारखानेदारों ने मुसीबत के वक्त मजदूरों और कामगारों को बेसहारा छोड़ दिया था, उन कारखानों के ग्रामीण विकल्प भी तैयार हो सकते हैं। आज हिन्दुस्तान को बड़े कारखानों की कोई जरूरत नहीं है, ऐसे छोटे-छोटे स्वरोजगार की जरूरत है जो अधिक लोगों को मजदूरी दे सकें, और कमाई का अधिक लोगों में बंटवारा कर सकें। 

आज पूरे देश में मनरेगा एक सबसे बड़ी मदद के रूप में उभरा है, लेकिन यह समझना चाहिए कि मनरेगा से सिर्फ मजदूरी दी जाती है, कोई स्थायी रोजगार या स्वरोजगार खड़ा नहीं हो पाता। ये दोनों अलग-अलग बातें हैं और इनके अलग-अलग जरूरतें भी हैं। जब तक कोई स्थायी रोजगार खड़ा नहीं होता, तब तक मनरेगा की मजदूरी भी जरूरी है, लेकिन सिर्फ कुदाली-फावड़ा की मजदूरी को स्थायी बना देना ठीक नहीं होगा। आज तो जिस तरह देश में एमबीए और इंजीनियरिंग किए हुए लोग भी चपरासी बनने के लिए हजारों की संख्या में कतार में लगे हुए हैं, ऐसे में हुनरमंद लोग भी गांवों में जिंदा रहने के लिए मिट्टी खोदने लगेंगे, लेकिन यह देश की उत्पादकता के लिए अच्छी बात नहीं होगी कि वह अपने हुनरमंद मानव संसाधन का बेजा इस्तेमाल करे। 

प्रधानमंत्री अपने ताजा भाषणों में चाहे तुकबंदी के रूप में ग्लोबल और लोकल जैसी बातें कर रहे हैं, लेकिन यह बिल्कुल गांव के स्तर तक लोकल क्षमता विकसित करने का एक मौका है, केन्द्र सरकार को भी मनरेगा के अलावा ग्रामोद्योग को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा बजट रखना चाहिए। इससे देश के महानगरों पर पडऩे वाला बोझ भी कुछ हद तक घट सकता है जो कि आज दिल्ली और मुम्बई के अस्पतालों में दिख रहा है। आज देश के किसी महानगर की क्षमता गांवों से शहरों की तरफ आते हुए इंसानी-सैलाब को समाकर रखने की नहीं है, न जमीन है, न मकान है, न उतने रोजगार हैं, न स्कूल-अस्पताल हैं, और तो और उतने लोगों के लायक चूंकि महामारी के वक्त मरघट तक नहीं है इसलिए लोगों को गांवों में, अपनी जमीन पर महज जिंदा रखने से कुछ बेहतर संभावनाएं मुहैया करानी होंगी। हिन्दुस्तान में बहुत से कामों के लिए मजदूर मशीनों से बेहतर साबित होंगे, और वे धरती के पर्यावरण पर भी कम बोझ बनेंगे।  

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


10-Jun-2020 5:26 PM

लॉकडाऊन में देश भर में जगह-जगह पुलिस लाठियों की तस्वीरें सामने आईं, और अब मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्डिंग की सहूलियत होने से ऐसे हजारों वीडियो भी सामने आए। दुनिया के इतिहास में शायद यह पहला ही मौका रहा होगा कि ईमानदारी से मेहनत करने वाले मजदूरों की ऐसी करोड़ों की बेदखली हुई, उनका हजारों किलोमीटर का ऐसा सफर हुआ, वे भूख से मरते रहे, ट्रेनतले कटते रहे, और पुलिस से पिटते रहे। अपने खुद के राज्य लौटने के लिए वे तकरीबन हर राज्य की सरहद पर मार खाते रहे, और गुलज़ार ने  इसकी तुलना विभाजन के अपने देखे दिनों से की है, और कहा है कि उस वक्त तो लौटते लोगों को स्वीकार कर लिया गया था, इस बार उन्हें धिक्कार दिया गया। 

मानो लॉकडाऊन का तनाव काफी नहीं था, तो अब कोरोना के फैलने की वजह से देश के सैकड़ों शहरों, हजारों कस्बों, और लाखों गांवों में बस्तियों को आवाजाही से अलग किया जा रहा है। ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बस्ती को पूरी तरह सील किया गया, और वहां पैदल जाते गरीब मां-बेटे को रोककर पुलिस ने बेकसूर बेटे को जिस बुरी तरह पीटा है, उसके कई वीडियो अगर सामने नहीं आए होते, और अगर इसी अफसर ने कई और लोगों को उसी मौके पर नहीं पीटा होता, और अगर सोशल मीडिया पर धिक्कार के साथ ये वीडियो नहीं छाए होते, और अनगिनत अखबारनवीसों ने पुलिस के इस बर्ताव को नहीं कोसा होता, तो वह अफसर आज भी औरों को पीटता होता। यह तो भला हो मोबाइल टेक्नालॉजी का जिसने वीडियो रिकॉर्डिंग हर किसी के हाथ में दे दी है, और सरकार को हार मानकर इस अफसर को हटाकर पुलिस लाईन में बिठाना पड़ा, और उसकी विभागीय जांच शुरू करनी पड़ी। यह भी तब हुआ जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर इस मामले में दखल दी, और इस कार्रवाई की सूचना दी। 

अब कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं जो कि महज छत्तीसगढ़ पर लागू नहीं होते, सभी राज्यों पर लागू होते हैं। पुलिस का ऐसा बर्ताव क्यों, और ऐसे बर्ताव के बाद पुलिस पर कार्रवाई क्या? 

पुलिस ऐसा क्यों करती है इसके कई जवाब हो सकते हैं। पुलिस ओवरटाईम काम कर रही है, थकी हुई रहती है, तनाव में रहती है, बीमार को अस्पताल ले जाने से लेकर लाश को जलाने तक का काम करती है, अपने परिवार को और खुद को खतरे में डालती है। और ऐसे में वह आपा खो बैठती है, और किसी पर उसकी लाठियां बरस जाना बहुत अनहोनी नहीं होती। यह जवाब कुछ हद तक ठीक हो सकता है, लेकिन हाल के बरसों में सामने आए तमाम वीडियो इस बात के गवाह हैं कि पढ़े-लिखे और कामकाजी तबके के जुलूस छोड़ दें, तो पुलिस की लाठियां आमतौर पर सबसे कमजोर और सबसे गरीब पर ही बरसती हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह की अमरीका में पुलिस के घुटनेतले महज अफ्रीकी नस्ल के अश्वेत या काले कहे जाने वाले लोग ही मारे जाते हैं। हिन्दुस्तान में गरीबी एक जात है जो लोगों को अछूत बना देती है। यह जात किसी व्यायाम शाला में टंगे हुए पंचिंग बैग की तरह होती है जिस पर घूंसे चलाकर मुक्केबाजी का अभ्यास किया जाता है। गरीब इस देश में पुलिस के लिए एक पंचिंग बैग रहता है जिस पर घूंसे या लाठी चलाकर पुलिस अपना तनाव निकालती है। जापान में शहरी तनाव से गुजरने वाले लोगों के लिए ऐसे पार्लर रहते हैं जहां जाकर वे चीनी मिट्टी के बर्तन, या दूसरे घरेलू सामान खरीद सकते हैं, और वहीं दूसरे कमरे में ले जाकर उन्हें तोड़कर अपना तनाव दूर कर सकते हैं। घर पर जिन चीजों को तोडऩा मुमकिन नहीं है, उनको इस तरह बाहर खरीदकर तोड़ा जाता है। 

लेकिन सवाल यह भी उठता है कि पुलिस को ऐसे पंचिंग बैग की जरूरत क्या है? शायद इस तनाव को दूर करने के लिए कि उसे लगातार राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के नीचे काम करना पड़ता है, शायद इसलिए कि पुलिस में जो लोग खुद के लिए कमाई न करना चाहते हों, उन्हें भी ऊपर के लिए कमाना ही पड़ता है, पुलिस में जो लोग मुजरिमों को छोडऩा नहीं चाहते हैं, उन्हें भी सत्ता की मर्जी से उसके पसंदीदा मुजरिमों को छोडऩा पड़ता है। अब किसी पुलिस या दूसरे अफसर की इतनी तो औकात होती नहीं है कि वे अपने से ऊपर के लोगों पर लाठियां बरसा सकें, इसलिए वे सामने पड़े हुए सबसे गरीब और सबसे बेजुबान पर लाठियां बरसाते हैं, और शायद मन ही मन हिन्दी फिल्मों की तरह यह सोचते होंगे कि वे बड़े भ्रष्ट अफसर या बड़े मंत्री पर लाठियां बरसा रहे हैं। जो भी हो यह हिंसक सिलसिला बहुत ही खतरनाक है, और इसके साथ कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए, फिर चाहे इसके पीछे की वजहें जो भी हों। हमारा यह भी अंदाज है कि सैकड़ों या हजारों बार की पुलिस हिंसा में से एक-दो दर्जन ही शायद रिकॉर्ड हो पाती हैं, और उनको एक मिसाल के तौर पर इस्तेमाल करके ऐसे हिंसक पुलिसवालों को नौकरी से सीधे बर्खास्त किया जाना चाहिए। जिन लोगों ने छत्तीसगढ़ में हिंसा के ये वीडियो देखे हैं, और वे अगर बर्खास्तगी के खिलाफ हैं, तो उन्हें अपनी पीठ, अपनी कमर, अपनी रीढ़ की हड्डी ऐसी लाठियों के सामने पेश करनी चाहिए, और कुछ दर्जन लाठियां खाने के बाद फिर से अपनी राय देनी चाहिए। 

छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसे हिंसक और मुजरिम पुलिस अफसर के खिलाफ महज विभागीय जांच शुरू की है। यह पूरी तरह बेमायने है, और यह न्याय की न्यूनतम जरूरत के भी खिलाफ है। सरकार को ऐसे अफसर को बर्खास्त करने का फैसला लेना चाहिए, और मौजूदा सुबूत का इस्तेमाल करके एक मजबूत कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि उसे अदालत से भी कमजोर केस की राहत न मिले, जैसा कि सरकार के दर्जनों दूसरे मामलों में सोच-समझकर किया जा रहा है, और बड़े-बड़े मुजरिमों को अघोषित राहत दी जा रही है। दूसरी बात हम यह कहना चाहते हैं कि जब सार्वजनिक जगहों पर पुलिस को कानून लागू करने का कड़ा काम करना है, तो वैसे में बिना वर्दी के काम करती पुलिस और सड़क के मवालियों में फर्क किसे समझ आएगा? इसलिए पुलिस पर बिना वर्दी के लाठी छूने पर भी रोक लगनी चाहिए। यह तो राजधानी की बात है, लेकिन इसी छत्तीसगढ़ में पिछले दशकों में लगातार बस्तर में कुख्यात और बदनाम बड़े-बड़े पुलिस अफसरों ने दुनिया के सबसे हिंसक और हैवान कहे जा सकने वाले मुजरिमों की तरह की हरकत की है, और बेकसूर आदिवासियों को थोक में मारा है। वे भी सरकारों की मेहरबानी से अभी तक जेल के बाहर हैं, जबकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में उनके खिलाफ सुबूत आ चुके हैं। शहर की लाठी की हिंसा हमें भी जल्द दिख रही है, लेकिन बस्तर में पुलिस की जलाई बस्तियां, पुलिस के किए बलात्कार, पुलिस के मारे गए बेकसूर और नाबालिग लोग भी हमें ऐसे किसी भी मौके पर हमेशा दिखते रहे हैं, और हम उसके खिलाफ लिखते रहते हैं। आज छत्तीसगढ़ सरकार को ऐसी किसी भी पुलिस हिंसा के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, और बाकी पुलिसवालों के लिए मिसाल बन सके, ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए। बर्खास्तगी से कम कुछ भी सरकार के हिस्से नाजायज होगा यह बात सरकार खुद अपने हित में समझ ले। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


09-Jun-2020 8:04 PM

दिल्ली में इस वक्त यह बहस चल रही है कि वहां कोरोना का सामुदायिक संक्रमण शुरू हो चुका है या नहीं? इस बीच वहां यह बहस भी चल रही है कि दिल्ली के अस्पतालों में इलाज दिल्ली के लोगों का ही हो, या लगे हुए दूसरे प्रदेश के लोगों का भी? मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार ने यह फैसला लिया था कि दिल्ली के अस्पतालों में बाहर के लोगों का इलाज नहीं होगा, लेकिन सरकार के इस फैसले को केन्द्र सरकार के मनोनीत उपराज्यपाल ने खारिज कर दिया।  इस पर केजरीवाल सरकार की ओर से कहा गया है कि अस्पतालों को लेकर उपराज्यपाल के पास न तो कोई आंकड़े हैं, न ही कोई जानकारी है, और उन्होंने निर्वाचित सरकार के फैसले को इस तरह खारिज कर दिया है। बात सही है क्योंकि कोरोना फैलने को लेकर केजरीवाल को ही गालियां मिल रही हैं, और आगे इलाज की क्षमता अगर खत्म हो जाएगी, तो उसके लिए भी केजरीवाल का ही सिर पेश किया जाएगा। और वहां की हालत आज उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सामने रखी है कि जुलाई अंत के पहले दिल्ली में साढ़े 5 लाख कोरोना पॉजिटिव हो चुके रहेंगे, जिनमें से 80 हजार लोगों को अस्पताल के बिस्तर की जरूरत होगी। अब अगर दिल्ली सरकार अपने दायरे के भीतर अपने नागरिकों को ही इलाज नहीं दे पाएगी, तो क्या उसे यह हुक्म देना जायज होगा कि वह पड़ोस के राज्यों के लोगों को भी इलाज दे? पड़ोस में लगे हुए हरियाणा और उत्तरप्रदेश की अपनी भी जिम्मेदारी है कि वे अपने नागरिकों के इलाज का इंतजाम करें। भारत एक संघीय गणराज्य है, और अलग-अलग प्रदेशों को मिलाकर यह संघ बना है। ऐसे में हर प्रदेश की अपनी भी जिम्मेदारी बनती है, और वे तमाम लोग पास के किसी महानगर पर निर्भर नहीं कर सकते। 

खैर, दिल्ली में निर्वाचित सरकार और वहां एलजी कहे जाने वाले लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों की खींचतान चलती ही रहती है। एलजी के पास जिम्मेदारी धेले भर की नहीं है, और अधिकार ही अधिकार हैं। दूसरी तरफ दिल्ली राज्य की निर्वाचित सरकार के पास अधिकार गिनती के हैं, और जिम्मेदारियां अपार हैं जिनमें दिल्ली के बाहर के दसियों लाख लोगों की जिम्मेदारियां भी अनिवार्य रूप से राज्य सरकार की गिन ली जाती हैं। 

अब दिल्ली से थोड़ा परे की भी बात कर लें, तो छत्तीसगढ़ की राजधानी में दो बड़े-बड़े स्टेडियम अस्पतालों में तब्दील किए जा रहे हैं क्योंकि सरकार को यह अंदाज है कि अब रोजाना कोरोना मरीजों के आंकड़े अंधाधुंध बढ़ सकते हैं। और ऐसी खबर पढ़कर जिन लोगों को मौके की गंभीरता समझ नहीं आ रही है, उन्हें याद रखना चाहिए कि वे लापरवाह होकर सिर्फ आत्मघाती काम नहीं कर रहे हैं, वे आत्मघाती दस्ते की तरह हैं, जो कि धमाके में खुद भी मरेंगे, और आसपास के बहुत से लोगों को लेकर मरेंगे। बहुत से लोग अपनी मर्जी और पसंद से नहीं, बल्कि सरकारी जिम्मेदारी से कोरोना के मोर्चे पर डटे हुए हैं। अब तक कई डॉक्टर-स्वास्थ्यकर्मी पॉजिटिव निकल चुके हैं, और पुलिस के कई लोग भी। स्वास्थ्य विभाग के अलावा दूसरे विभागों के कर्मचारी भी खतरा झेल रहे हैं, और ऐसे में जब लोग परले दर्जे की नालायकी दिखाते हुए बिना मास्क घूम रहे हैं, तो सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों की गाडिय़ां भी जब्त कर लें। जिन्हें पूरे समाज को खतरे में डालने में कुछ नहीं लग रहा, वे कम से कम शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल ही जाकर देखें, उन्हें कोरोना फैलाने के लिए गाडिय़ां क्यों दी जाएं? चूंकि छत्तीसगढ़ अब तक कोरोना से कम प्रभावित राज्य रहा है, इसलिए यहां के लोग अधिक लापरवाह हो गए हैं। उन्हें दिल्ली शहर का हाल समझने की जरूरत है कि वहां तमाम मरीजों को तो अस्पताल के बिस्तर भी नसीब होने वाले नहीं हैं, और वेंटिलेटर न मिलने से मरने की नौबत भी आ सकती है। आज ही सोशल मीडिया पर दिल्ली के एक अस्पताल का वीडियो आया है जिसमें एक बुजुर्ग महिला को अस्पताल के बरामदे में ही एक स्टूल पर बिठाकर ऑक्सीजन दिया जा रहा है, क्योंकि शायद अस्पताल में उसके लिए बिस्तर नहीं है। जो नालायक लोग अभी भी कोरोना के खतरे को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, उन्हें यह वीडियो जरूर देखना चाहिए, और अपने परिवार के लोगों की इस महिला की जगह कल्पना करना चाहिए, कि अगर उनके घर के लोगों को इलाज नहीं मिलेगा तो उस दिन वे मास्क लगाकर भी अस्पताल के भीतर कुछ नहीं कर पाएंगे। जो लोग आज मास्क न लगाकर चलने को बहादुरी मान रहे हैं, वे सोच लें कि उनके घरवालों को अगर जरूरत पडऩे पर वेंटिलेटर का मास्क नहीं मिलेगा, और उसकी कमी से वे मरेंगे, तो बाद में उन्हें बाकी जिंदगी अपनी लापरवाही पर कोई मलाल रहेगा या नहीं? 

खैर, एक बार फिर दिल्ली पर लौटें, तो चारों तरफ से अलग-अलग राज्यों से घिरी हुई देश की यह राजधानी कभी भी इन तमाम राज्यों के समूह की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकती। हर सरकार की क्षमता की एक सीमा होती है, और वह ऐसे संक्रमण के समय दिल्ली जैसे शहर में, जहां कि आबादी तैरती रहती है, वहां पर सारे राज्यों को इलाज नहीं दिया जा सकता। केन्द्र सरकार केजरीवाल सरकार के लिए एलजी के मार्फत दिक्कत जरूर खड़ी कर सकती है, लेकिन उससे मरीजों का कोई भला नहीं होगा। हरियाणा और उत्तरप्रदेश की भाजपा सरकारों के बहुत बड़े-बड़े दावे सामने आते रहते हैं, उन्हें अपना इंतजाम खुद करना चाहिए। फिलहाल दिल्ली हो या रायपुर एक बात तय है कि सरकारों की क्षमता सीमित है, और कोरोना का खतरा असीमित है, ऐसे में जनता अगर अपने आपको नहीं बचाएगी, तो उसकी तोहमत किसी भी सरकार पर लगाना जायज नहीं होगा। जो आस्तिक हैं उन्हें तो कम से कम यह बात मालूम ही होगी कि ईश्वर भी उन्हीं की मदद करता है, जो खुद अपनी मदद करने को तैयार रहते हैं। सरकार आमतौर पर लोगों को इलाज दे सकती है, लेकिन आज के हालात में तो यह भी नहीं हो पाएगा, क्योंकि अस्पताल के बिस्तरों से कई गुना अधिक मरीज रहेंगे। 

अभी भी हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को देखते हैं तो सारे के सारे सब्जी बाजार बिना मास्क के दिख रहे हैं। अब ऐसे दुकानदारों से सामान लेना अगर लोग बंद नहीं करेंगे जो कि मास्क नहीं लगाए हुए हैं, तो वे खतरे की खरीददारी करेंगे, सब्जी की नहीं। यह नौबत कमोबेश देश के अधिकतर हिस्सों में होगी, और यहां पर समाज के जिम्मेदार लोगों की एक अधिक बड़ी भूमिका की जरूरत है, वे अपने आसपास चारों तरफ सावधानी की जागरूकता फैलाएं। इन तमाम नसीहतों के बाद भी हिन्दुस्तान में यह खतरा बहुत बढ़ते दिख रहा है। मई-जून की जिस गर्मी में कोरोना को लू लग जाने की उम्मीद की जा रही थी, वह तो बेबुनियाद साबित हो रही है, और अब तो देश के कुछ हिस्सों में मानसून आ चुका है, बाकी देश में भी अगले एक-दो हफ्तों में गर्मी घट जाएगी, और नमी बढ़ जाएगी। इसके बाद मौसम की मार से कोरोना के मरने की उम्मीद भी नहीं रहेगी। ऐसे में लोग जागें, एक-दूसरे को रोकें-टोकें, और अधिक से अधिक सावधानी बरतें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


08-Jun-2020 5:15 PM

छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल मोर्चे में तैनात एक महिला सुरक्षाकर्मी ने अभी एक संतान को जन्म दिया है, और उसके बारे में पुलिस विभाग बड़े गर्व से यह प्रचार कर रहा था कि वह सात महीने की गर्भवती होने पर भी घोर नक्सल इलाकों में ड्यूटी कर रही थी। और उस दौरान भी इस कमांडो की तस्वीरें छप रही थीं कि यह महिला कितने हौसले का काम कर रही है। इससे परे राजधानी रायपुर में भी पुलिस ने लॉकडाऊन लागू करवाने के काम में लगी हुई एक महिला अफसर के बारे में भी तस्वीरें और जानकारी पोस्ट की थी कि वह कितने महीने की गर्भवती होने पर भी सड़कों पर लोगों को रोकटोक रही हैं। पुलिस विभाग की ऐसी ट्वीट और फेसबुक पोस्ट पर चारों तरफ से बहादुरी की तारीफ की बौछार भी हो रही है। 

अब सवाल यह उठता है कि क्या बस्तर के नक्सल मोर्चे पर, और राजधानी के लॉकडाऊन मोर्चे पर पुलिस कर्मचारियों की ऐसी कमी हो गई थी कि छह-सात महीने की गर्भवती महिलाओं को भी तैनात करना पड़ रहा था? फिर बस्तर में तो यह कमांडो महिला हथियारबंद मोर्चे पर भी जहां जमीनी सुरंगों की धमाकों से लेकर गोलियों तक से सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने का सिलसिला चौथाई सदी से चल ही रहा है। हम इसे बहादुरी नहीं, नासमझी और गैरजिम्मेदारी मानते हैं जो कि केवल वाहवाही के इस्तेमाल की तो है, लेकिन इससे परे उसका कोई महत्व नहीं है, और जरूरत नहीं है। अगर बस्तर के नक्सल मोर्चे पर प्रदेश का आखिरी सिपाही भी झोंका जा चुका होता, तो उसके बाद एक गर्भवती महिला को बंदूक थमाकर जंगलों में उतारना जायज कहा जा सकता था, और हमारे हिसाब से तो उस वक्त भी नहीं। ऐसी दिलेरी किसी काम की नहीं है जिसमें गर्भ में पल रहे शिशु की जिंदगी भी खतरे में हो। यह तो गनीमत है कि इस महिला को किसी मुठभेड़ का सामना नहीं करना पड़ा, वरना कुछ बुरा होने पर  बस्तर के बड़े पुलिस अफसर अदालत और मानवाधिकार आयोग के सामने खड़े होते। खुद इस महिला कमांडो को ऐसा दुस्साहस नहीं दिखाना चाहिए था क्योंकि हर किसी को यह बात समझनी चाहिए कि जब कोख की संतान की धड़कन शुरू हो जाती है तो बाहर की अपनी माँ के भीतर भी उसके अपने मानवाधिकार होते हैं, और उनके साथ ऐसा खतरनाक खेल नहीं खेलना चाहिए। 

अब चूंकि यह हो ही चुका है, इसलिए हम महज  इस मुद्दे को आगे के लिए एक नसीहत की तरह लिख रहे हैं, और राज्य शासन को, पुलिस विभाग को एक स्पष्ट निर्देश जारी करना चाहिए कि गर्भवती महिलाओं को किसी भी किस्म की खतरनाक ड्यूटी से अलग रखा जाए। देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी खबरें भी आई हैं कि सात-आठ महीनों की गर्भवती नर्सें कोरोना वार्ड में लंबी-लंबी ड्यूटी कर रही हैं। यह बात भी हमारी समझ से परे है, और खासकर चिकित्सा के काम में लगे हुए लोगों को इस खतरे को अधिक समझना चाहिए। केन्द्र और राज्य सरकारें इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट नीति बनाकर चलें कि  गर्भवती महिलाओं को कैसे-कैसे कामों से दूर रखा जाएगा। इस देश में काम करने वाले लोगों की कमी नहीं है, और जिस तरह एक कानून बनाकर गर्भवती महिला को मिलने वाला मातृत्व अवकाश बढ़ाकर छह महीने किया गया है, उसी तरह बच्चे के जन्म के पहले के कई महीने भी खतरनाक कामों से दूर रखना चाहिए। 

राजधानी रायपुर में लॉकडाऊन के दौरान धेले भर का भी कोई ऐसा तनाव नहीं हुआ था कि शहर की तमाम पुलिस सड़क पर झोंक दी जाए। ऐसे में एक गर्भवती पुलिस अधिकारी को कोरोना के खतरे के बीच, लॉकडाऊन लागू करने के बहुत मामूली से काम में लगा देना भी गलत था, और तस्वीरों सहित उस बात का प्रचार करना भी गलत था। 

कई बार महिला कर्मचारियों और अधिकारियों के सामने यह चुनौती रहती है कि साथ के और उनसे सीनियर पुरूष अफसर उन्हें गंभीरता से नहीं लेते, उन्हें गंभीरता की ड्यूटी नहीं देते कि वे तो महिलाएं हैं, वे क्या करेंगी। ऐसे में अपने दमखम को साबित करने के लिए बहुत से मौकों पर महिलाएं लीक से हटकर, क्षमता और जरूरत से आगे बढ़कर चुनौतियां लेती हैं, और अपनी काबिलीयत साबित करती हैं। शायद इन महिलाओं के साथ भी ऐसी ही कोई नौबत रही होगी। लेकिन यह सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए। हमें तो पिछले कई हफ्तों से ऐसी खबरों के बीच यह उम्मीद थी कि मानवाधिकार आयोग, या महिला आयोग की तरफ से सरकार को नोटिस जाएगा, लेकिन ऐसे पदों पर अब आमतौर पर मनोनीत उपकृत बैठे रहते हैं, जो सत्ता पर बैठे आकाओं के लिए जरा भी दिक्कत खड़ी करना नहीं चाहते। हैरानी की बात यह है कि किसी ऊंची अदालत के ताकतवर जज ने भी कई बार छपी ऐसी खबरों का कोई नोटिस नहीं लिया। अब सरकार को इस बारे में स्पष्ट नियम बनाकर यह सिलसिला खत्म करना चाहिए। आज भी हो सकता है कि क्वारंटीन सेंटरों में, अस्पतालों में, और बाहर से आने वाले लोगों से जुड़े कामों में कई गर्भवती महिलाओं की ड्यूटी लगी हो, उसे तुरंत खत्म करना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


07-Jun-2020 5:03 PM

हिन्दुस्तान में कोरोना जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, न चाहते हुए भी आज फिर इसी मुद्दे पर लिखना पड़ रहा है। खतरा इतना बड़ा है कि लोगों को सावधान करना जरूरी है। यह हमारी जिंदगी में देखा हुआ पहला ऐसा मौका है जब आसपास, या दूर-दूर के लोगों की कोई चूक भी दूसरों की जिंदगी ले सकती है। कोरोना की मौत मरने के लिए आपका लापरवाह होना जरूरी नहीं है, आसपास के किसी का भी लापरवाह होना काफी है। और ऐसे आसपास में परिवार के लोग हो सकते हैं, दफ्तर या कारोबार के लोग हो सकते हैं, या ऐसे दोस्त-परिचित भी हो सकते हैं जिनके साथ अब लोग घूमते-फिरते नजर आने लगे हैं, और शायद कल से रेस्त्रां में खाते हुए भी दिखने लगेंगे। ऐसे में खतरा बहुत रफ्तार से बढऩे जा रहा है। लोगों को आज इसका अहसास नहीं है, जबकि हम इसी जगह पर पिछले महीनों में लगातार इस खतरे के बारे में लिखते आए हैं। 

अब हर कुछ घंटों में छत्तीसगढ़ जैसे अब तक कम कोरोनाग्रस्त चले आ रहे राज्य में दर्जनों नए कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं। अभी कुछ मिनट पहले राजधानी रायपुर में तीन दर्जन कोरोना पॉजिटिव अकेले एम्स की जांच में निकले हैं, और अभी राज्य शासन की जांच के आंकड़े आना बाकी ही हैं। यह राज्य कल तक सुरक्षित लग रहा था, लेकिन आज यह जंगल के हिरण की तरह तेज छलांगें लगाकर कोरोना का अपना ही रिकॉर्ड हर सुबह-शाम तोड़ रहा है। अब राज्य में हर दिन एक-एक मौत भी सामने आ रही है, जो कि दूसरे कई राज्यों के मुकाबले कुछ भी नहीं है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि एक-एक करके हर कस्बे और हर इलाके के गांव से ऐसे पॉजिटिव आ रहे हैं जो कि हाल ही में राज्य में लाखों की संख्या में लौटे हुए प्रवासी मजदूरों के बीच के हैं। मतलब यह कि ढाई लाख से अधिक लोग लौटने के बाद क्वारंटीन में रखे गए थे, और इनमें से बहुत से अभी तक खतरे के बाहर साबित नहीं हुए हैं। फिर गणित के इस गुणा को समझना चाहिए कि एक नया कोरोना पॉजिटिव शहर के एक किलोमीटर इलाके को या एक पूरे गांव-कस्बे को सील बंद कर दे रहा है, और आसपास के दर्जनों लोगों को क्वारंटीन में भेज दे रहा है। 

इससे बचाव का तरीका डॉक्टरों के हाथ में नहीं हैं। डॉक्टर तो लोगों के अस्पताल पहुंच जाने के बाद उनको मरने से बचाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन उसके पहले का जहां तक सवाल है, तो वह तो लोगों को खुद ही करना है। अगर लोगों को खतरे का अहसास नहीं हो रहा है तो उन्हें एक सदी पहले की भारत की महामारी का इतिहास पढऩा चाहिए, उससे अक्ल ठिकाने आ जाएगी। उस वक्त के प्लेग के मुकाबले आज का कोरोना कहीं अधिक बेकाबू है, लोगों की आवाजाही और सामाजिक संपर्क उस वक्त के मुकाबले कई गुना अधिक हैं, और लोगों पर खतरा उस वक्त के मुकाबले बहुत ज्यादा है। 

1921 की जनगणना में हिन्दुस्तान की आबादी पच्चीस करोड़ तेरह लाख थी, और 1918 के प्लेग में एक करोड़ चालीस लाख से अधिक लोग मारे जा चुके थे। इन आंकड़ों से अगर आज हिन्दुस्तानी लोगों को कोई नसीहत लेना है, तो यह अंदाज लगाना है कि कोई महामारी कितनी जिंदगियां ले सकती है, तो यह अंदाज लगा लें।  अगर 1911 की जनसंख्या को देखें तो वह पच्चीस करोड़ बीस लाख थी, मतलब यह कि दस बरस बाद की जनसंख्या में दस लाख लोग घटे हुए मिले, और बढ़ी हुई आबादी कुछ भी नहीं मिली क्योंकि इस बीच महामारी में इतनी मौतें हो चुकी थीं।  

आज जिन लोगों को यह लग रहा है कि जिंदगी पर से सरकारी रोक-टोक घट रही है, उन्हें यह खुशफहमी नहीं पाल लेना चाहिए कि यह कोरोना का खतरा घट रहा है। दरअसल हिन्दुस्तान में कोरोना का खतरा बढ़ते जा रहा है और जैसा कि हमने लिखा है, ऐन इसी वक्त सरकारी रोक-टोक घटती चली जा रही है। इन दोनों बातों को मिलाकर देखें तो नौबत भयानक होने वाली है, और सरकारी रोक-टोक घटने को लोग अपने बाहर निकलने की वजह बढऩा न बनाएं। लोगों को बहुत ही गंभीरता से और बहुत ही ईमानदारी से पहले के मुकाबले बहुत अधिक सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि खतरा आज पहले के मुकाबले, हफ्ते भर पहले के भी मुकाबले बहुत अधिक बढ़ चुका है, और लोगों की धड़क पहले के मुकाबले खुल चुकी है। लोग सरकारी छूट को खतरा घटना मान रहे हैं जो कि बिल्कुल ही नहीं है। हम कल इसी जगह लिखे गए तथ्यों और तर्कों को दुबारा दोहराना नहीं चाहते हैं, लेकिन आज जिस तरह से हमारे खुद के शहर में एकमुश्त तीन दर्जन पॉजिटिव मिले हैं, उसे देखते हुए हम इस मुद्दे को आज लगातार दूसरे दिन दुहरा रहे हैं, क्योंकि लोग यहां बेफिक्र होते दिख रहे हैं, खतरे को बढ़ाते हुए दिख रहे हैं। 

सरकारों के सामने काम-धंधों को छूट देने की एक बेबसी है, और हिन्दुस्तान में घरों में रहना, सावधानी से काम करना, मोटेतौर पर संपन्न तबके के लिए ही मुमकिन बात है। जो सरकारी कर्मचारी हैं और कोरोना के मोर्चे पर तैनात हैं, उनकी सावधानी की एक सीमा ही हो सकती है, उसके बाद तो वे खतरे में हैं ही। आम लोग जिंदा रहने के लिए काम करने को बेबस हैं, छत्तीसगढ़ में करीब ढाई लाख लोग क्वारंटीन में हैं, और हर दिन उनमें से दर्जनों लोग कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं। इनके साथ-साथ नए-नए इलाके न सिर्फ कोरोना के खतरे से घिर रहे हैं बल्कि सरकार के लिए भी नई-नई, और बढ़ी हुई चुनौतियां लेकर आ रहे हैं क्योंकि जिस तरह लोगों में साफ-सफाई को लेकर अब इन महीनों के बाद थकान आ चुकी है, लोग लापरवाह हो चुके हैं, उसी तरह सरकारी मशीनरी भी रात-दिन काम करते हुए, खतरा झेलते हुए संवेदनशीलता खोने लगेगी। नतीजा यह होगा कि खतरा बढ़ेगा, निजी लापरवाही बढ़ेगी, साफ-सफाई घटेगी, और सरकारी सेवाभाव या चौकन्नापन भी घटेगा। इनमें से किसी भी बात पर डॉक्टरी काबू नहीं है। यह पूरे का पूरा खतरा अस्पताल के बाहर का रहेगा, और इतने बढ़े हुए खतरे के अस्पताल पहुंचने पर उसका इंतजाम भी मुमकिन नहीं होगा। जिन लोगों को पढ़ा हुआ नहीं है, उन्हें अभी दो महीने पहले की इटली की खबर याद दिला दें कि किस तरह वहां पर अस्पतालों में बढ़ती चली जा रही मरीजों की भीड़ को देखते हुए सरकार ने डॉक्टरों को लिखकर यह सलाह दी थी कि जिन मरीजों के जिंदा रहने की गुंजाइश अधिक दिखती है, उन्हीं पर ध्यान दें। इस बात का सीधा-सीधा मतलब यह था कि दूसरी गंभीर बीमारियों वाले, या अधिक उम्रदराज लोगों पर ध्यान न दें। हिन्दुस्तान तो इटली के मुकाबले कम स्वास्थ्य सेवा वाला, और बहुत ही अधिक आबादी के घनत्व वाला देश है, और यहां हालात बेकाबू होने पर पैसे वालों को भी अस्पताल में वेंटिलेटर मिल पाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। निजी अस्पतालों का हाल तो देश की राजधानी दिल्ली में केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की आंखों के सामने दिख रहा है, जहां मरीजों को भगाया जा रहा है, और जहां मरीजों को लेने के लिए केजरीवाल सरकार ने कल ही बहुत कड़े कानून का इस्तेमाल किया है। 

लोग सावधानी की जरूरत को जिंदगी और मौत की तरह लेकर चलें। हम लोगों के थक जाने की हद तक इसी मुद्दे पर लिख रहे हैं क्योंकि यह लोगों की जिंदगी बचाने के लिए एक जरूरी मुद्दा है। इसे न सिर्फ पढ़ें, बल्कि आसपास के लोगों को भी बांटें, ताकि वे सरकारी ढील को बाहर निकलने का हुक्म न मान लें, वह सिर्फ एक विकल्प है, उस जरूरत से बचने की कोशिश करें, और अपने आसपास के सारे दायरे में लोगों के साथ बहुत कड़ाई बरतते हुए उन्हें भी कोरोना-सावधानी का पालन करने के लिए कहें।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


06-Jun-2020 6:02 PM

हिन्दुस्तान में अगले दो दिनों में अधिकतर जगहें लॉकडाऊन के बाहर आ जाएंगी, और कुछ शर्तों के साथ ईश्वरों को भी अपना कारोबार शुरू करने की छूट केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने दे दी है। दूसरी तरफ कोरोना से संक्रमण का हाल यह है कि कल देश में दस हजार से अधिक नए संक्रमित मरीज दर्ज हुए हैं, और यह बात तब है जब मीडिया में जानकार विशेषज्ञ लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि सरकारों ने कोरोना की जांच कम क्यों कर दी है? अधिकतर राज्यों का यही हाल है कि वहां प्रवासी मजदूर तो लाखों की संख्या में लौट रहे हैं, लेकिन उस अनुपात में जांच नहीं हो रही है, और जांच अधिक से अधिक टालने की कोशिश हो रही है क्योंकि एक आशंका यह है कि अगर जांच बढ़ाई गई तो अधिक पॉजिटिव निकलने लगेंगे और सरकार की इलाज की क्षमता, अस्पताल में दाखिले की क्षमता तुरंत ही खत्म हो जाएगी। बहुत से जानकारों का यह कहना है कि जांच न करके मरीजों की संख्या को सीमित दिखाना अधिक खतरनाक हो सकता है क्योंकि बिना शिनाख्त कोरोना पॉजिटिव लोग संक्रमण फैलाते रह सकते हैं। 

अब दूसरा बड़ा सवाल उठ रहा है कि लॉकडाऊन को खत्म करने के वक्त का। जानकारों से लेकर बिल्कुल ही अनजान सोशल मीडिया शौकीन लोगों तक, यह बड़ी हैरानी है कि जब कोरोना का कर्व बढ़ते जा रहा है, उसका ग्राफ आसमान की तरफ बढ़ते दिख रहा है, और इन दोनों बातों को जो न समझें, उनके लिए भी साधारण आंकड़ा तो समझाने वाला रहता ही है कि कल भारत में संक्रमण में दस हजार का आंकड़ा पार करके पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। जब संक्रमण बढ़ते चल रहा है, और लोगों को आशंका है कि इससे कई गुना अधिक संक्रमित लोग बिना जांच पीछे धकेलकर रखे गए हैं, वैसे में जब लॉकडाऊन में ढील दी जा रही है, तो संक्रमण जाने किस रफ्तार से आगे बढ़ेगा। कल के कुछ दूसरे आंकड़े बतलाते हैं कि दुनिया में सबसे बुरे संक्रमण से गुजरने वाले देशों में से एक इटली को पीछे छोड़कर भारत दुनिया में छठवें नंबर पर आ गया है, और इटली में तो नए मामले आना बंद हो चुके हैं। दूसरी तरफ कुछ लोगों ने एक ग्राफ पोस्ट किया है जिसमें बताया गया है कि स्पेन, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन में बढ़ते हुए संक्रमण की शुरूआत में लॉकडाऊन किया गया, और जब कोरोना संक्रमण आसमान पर पहुंच गया, उसके बाद वह जब ढलान पर था, और संक्रमण गिर रहा था तब जाकर लॉकडाऊन खोला गया था। दूसरी तरफ भारत का ग्राफ बताता है कि जब यहां संक्रमण लगातार आसमान की तरफ बढ़ रहा है तब लॉकडाऊन खोला गया, और उसके बाद भी अभी लगातार बढ़ रहा संक्रमण धीमा होने का नाम नहीं ले रहा है। एक समाजशास्त्री योगेन्द्र यादव ने इन ग्राफ को लेकर लिखा है कि आपदा प्रबंधन की पाठ्य पुस्तकों में हिन्दुस्तान का मॉडल पढ़ाने के लायक है कि यहां आपदा का प्रबंधन किस तरह आपदाग्रस्त रहा। 

यह बात जाहिर है कि जिस लॉकडाऊन में हिन्दुस्तान में तकरीबन पूरी आबादी का कारोबार ठप्प कर दिया था, आधी आबादी की रोजी-रोटी छीन ली थी, उसे कभी न कभी खत्म तो करना था, लेकिन अभी बढ़ते हुए ग्राफ के बीच उसे जिस तरह खत्म किया गया है वह वक्त हैरान करने वाला लगता है। लॉकडाऊन एक शेर की सवारी की तरह था, और जब भी उसे खत्म किया जाता, उस वक्त को तय करना एक बड़ा नाजुक फैसला होना ही था। आज एक-एक कोरोना पॉजिटिव की वजह से एक-एक किलोमीटर की आबादी का घर से निकलना, काम पर जाना बंद कर दिया जा रहा है। एक-एक पॉजिटिव की वजह से पूरे अस्पताल या पूरे डॉक्टर को बंद करना पड़ रहा है। यह नौबत अधिक समय तक साथ देने वाली नहीं है। पिछले एक हफ्ते में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से शहर से लगे हुए औद्योगिक क्षेत्र की मजदूर बस्तियों को एक पॉजिटिव की वजह से कंटेनमेंट जोन बना दिया गया है, और कारखाने ठीक से शुरू भी नहीं हो पाए थे और वहां इन बस्तियों के मजदूर नहीं जा सकते। किसी शहर से लॉकडाऊन अभी पूरी तरह हट भी नहीं पाया है, और एक-एक कोरोना पॉजिटिव की वजह से एक-एक वर्ग किलोमीटर की बस्ती अगर कंटेनमेंट-लॉकडाऊन में चली जाती है, तो पूरे शहर को बंद होने में अधिक वक्त नहीं लगेगा। 

दरअसल यह पूरा सिलसिला मजदूरों को जबर्दस्ती रोककर रखने से शुरू हुआ, रेलगाडिय़ों को एकाएक बंद कर दिया गया, और संक्रमण के शिकार न होने पर भी मजदूरों को जिस तरह जानवरों के हाल में ट्रकों में घुसकर आना पड़ा, छोटी-छोटी कोटरियों में दर्जनों मजदूरों को लंबे समय तक रहना पड़ा, उन सबका नतीजा था कि उनके बीच कोरोना फैला होगा। अब जब ये मजदूर शहरों में भूखे मरने से बचने के लिए वापिस अपने गांव लौट रहे हैं तो उनके बीच के कई लोग कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं। राज्य सरकारें मजदूरों की अधिक जांच करने के खिलाफ हो गई हैं क्योंकि वे अपने-अपने प्रदेशों में कोरोना के आंकड़े अधिक दिखाना नहीं चाहती हैं। सरकारें महज चार्ट और ग्राफ से ही कोरोना को छुपाकर रख सकती हैं, अपनी जमीन पर कोरोनाग्रस्त को मरने के बाद कहां तक छुपा पाएंगी? 

लॉकडाऊन को लेकर केन्द्र सरकार शुरू से ही योजनाविहीन थी, बिनतैयारी थी, और इस नौबत का कोई समाधान था भी नहीं। रेलगाडिय़ों को रातोंरात बंद करने के बजाय अगर चार दिनों में तमाम लोगों को गांव लौट जाने दिया जाता, तो वे शहरी भीड़ में रहकर संक्रमित होने से बचे होते। खुद सरकार के आंकड़े कहते हैं कि हर दिन करीब सवा दो करोड़ से अधिक मुसाफिर ट्रेनों में चलते हैं। ऐसे में घर लौटने वाले तमाम मजदूर चार-छह दिनों में अपने घर लौट जाते, और देश में बीमारी फैलने के काफी पहले करोड़ों मजदूरों और उनके परिवारों को संक्रमण का खतरा नहीं झेलना पड़ता जो कि आज लॉकडाऊन के ढाई महीने बाद भी घरवापिसी के दौर में झेलना पड़ रहा है।
 
केन्द्र सरकार को एक अनोखा अधिकार मिला हुआ है, और संसद में उसे एक अभूतपूर्व बाहुबल भी हासिल है। आज के इस अभूतपूर्व संकट में वह राज्यों को विश्वास में लिए बिना तमाम किस्म की मनमानियां कर रही है, और उसके फैसलों का बोझ राज्य उठा रहे हैं। आज जब कोरोना का ग्राफ लगातार छलांग लगाकर बढ़ते दिख रहा है तब लॉकडाऊन को हटाना अर्थव्यवस्था के लिए तो जरूरी हो सकता है, लेकिन बीमारी पर काबू पाने की जरूरत के यह ठीक खिलाफ है। चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र के बीच यहां पर सीधा टकराव है, और एक खतरनाक आशंका यह है कि लॉकडाऊन से बाहर की जा रही अर्थव्यवस्था कहीं जल्द ही बढ़ते कोरोनाग्रस्त लोगों की वजह से बहुत बुरे लॉकडाऊन में न फंस जाए। जहां एक-एक कोरोना मरीज की वजह से एक-एक दफ्तर, या एक-एक इमारत, या एक-एक कारोबार-कारखाना एक-एक पखवाड़े के लिए धंधे से बाहर हो जा रहे हैं। ऐसे में यह लॉकडाऊन हटाना अर्थव्यवस्था को उठा पाएगा या सेहत को और गिरा देगा, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है लेकिन दुनिया के ऐसे बहुत से जानकार हैं जो यह मान रहे हैं कि यह लॉकडाऊन हटाने का गलत वक्त है, और केन्द्र सरकार को देश के गरीबों की सीधी आर्थिक मदद करके उन्हें तब तक घर बैठने के लिए तैयार रखना चाहिए जब तक कि कोरोना का ग्राफ पर्याप्त गिर न चुका रहे। आज तो आसमान की तरफ बढ़ते ग्राफ को देखते हुए भी सरकार ने लॉकडाऊन में जो ढील दी है, वह भयानक दिख रही है, और यह नौबत पता नहीं और कितनी खतरनाक होगी? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


05-Jun-2020 6:46 PM

आज हिन्दुस्तान में किसी किस्म का चन्द्रग्रहण दिखाई देने वाला है, और कम से कम हिन्दी का मीडिया इस बात में जुट गया है कि ग्रहण के दौरान लोगों को क्या करना चाहिए, और क्या-क्या नहीं करना चाहिए। परंपरागत रूप से हिन्दू गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के दौरान कई तरह की अतिरिक्त सावधानी सुझाई जाती है, जिसके न मानने पर गर्भ के शिशु को भी नुकसान होने का खतरा बताया जाता है। बहुत से समाचार माध्यमों में ये सुर्खियां भी तैर रही हैं कि गर्भवती क्या करे, और क्या न करे। अब दो दिन बाद से धर्मस्थल भी खुलने वाले हैं, और केन्द्र सरकार ने एक लंबी लिस्ट जारी की है कि धर्मस्थलों में क्या किया जाए, और क्या-क्या न किया जाए। मीडिया को पलटते हुए यह भी दिखता है कि किस तरह नामी-गिरामी अखबार और समाचार माध्यम भी कोरोना और लॉकडाऊन के हो जाने के बाद भी भविष्यफल छाप रहे हैं, या टीवी चैनलों पर भविष्य बताया जा रहा है। 

ऐसा लगता है कि दुनिया पर छाया हुआ कोरोना का खतरा भी लोगों को यह समझ नहीं दे पाया है कि   विज्ञान भी कोई चीज है। जिस ज्योतिष शास्त्र ने दुनिया को यह अंदाज भी नहीं दिया कि वह कोरोना जैसे किसी खतरे से गुजरने वाला है, और विज्ञान ने कदम-कदम पर कोरोना के सारे खतरे गिनाए, उससे बचने के रास्ते निकाले, उसके इलाज की तरकीबें ढूंढीं, वह विज्ञान लोगों की सोच में जगह नहीं बना पाया है। और फिर बात महज ज्योतिष शास्त्र तक सीमित नहीं है, जो लोग हिन्दुस्तान में अभी दो महीने पहले तक गोमूत्र और गोबर को दुनिया के परमाणु खतरों तक को खत्म कर देने का रामबाण मानते थे, वे सारे के सारे अब किसी भी बयानबाजी और बकवास से पीछे हट गए हैं, यह साबित हो गया है कि तमाम गोबर भक्त भी जरूरत पडऩे पर एम्स की तराफ भागेंगे, किसी गौशाला की तरफ नहीं। यह देखते हुए भी गोबर भक्तों, और गैर गोबर भक्तों के बीच अवैज्ञानिक समझ कमजोर पड़ते नहीं दिख रही है, या कम से कम वे इस समझ के ढकोसले को अपने सिर पर ढोते हुए दिखना चाहते हैं। 

इस पर चर्चा की जरूरत आज इसलिए है कि दो दिन बाद जब धर्मस्थल शुरू होंगे, उस वक्त क्या होगा? हमने एक धर्म के नुमाइंदों को दिल्ली में तब्लीगी जमात में दुनिया की सबसे बड़ी बेवकूफी करते हुए देखा है जब उनके बीच यह सोच विकसित की जा रही थी कि अल्लाह के दरबार में कोरोना कुछ नहीं कर सकता। और आज जब अलग-अलग धर्मस्थलों पर लोग इक_ा होंगे, तो इसी किस्म की बेदिमाग समझ हावी रहेगी, और यह नौबत स्थानीय प्रशासन और पुलिस के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती रहेगी कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की तोहमत झेलते हुए वे धर्मस्थलों पर कितनी सख्ती बरतें? जब कभी लोकतंत्र, संविधान, और कानून से धर्म का टकराव होता है, तो धर्म हमेशा इस अहंकार में जीता है कि वह जिंदगी के बाकी पहलुओं से ऊपर है। कहीं कोई तब्लीगी जमात को मौत से ऊपर मानते हैं, तो कहीं कोई हिन्दुस्तान के संविधान के रहते हुए भी मंदिर वहीं बनाएंगे की जिद में देश के बरसों खराब कर चुके हैं। हमने स्वर्ण मंदिर में आतंकियों का ऐसा डेरा देखा है जो कि बाहर निकलकर लोगों को मारकर जाकर फिर भीतर बस जाता था। जो सिक्ख धर्म पूरी दुनिया में किसी भी मुसीबत के वक्त सबसे बड़ा मददगार रहता है, वह भी अपने भीतर की धर्मान्धता के सामने बेबस हो गया था, और पंजाब में अभूतपूर्व हिंसा को देखते रहने पर बेबस था। 

क्लिक करें और यह भी पढ़ें : पुरी मंदिर में देवस्नान के दौरान शारीरिक दूरी की धज्जियां, पुजारियों ने मास्क भी नहीं पहना

हम इन बातों को इसलिए गिना रहे हैं कि धर्म का मिजाज ही किसी भी नियम-कायदे को तोडऩे का रहता है। होली जलाने के लिए सड़कों को बर्बाद करना जरूरी मान लिया जाता है, गणेश और दुर्गा बिठाने के लिए सड़कों पर पंडाल लगाना जरूरी मान लिया जाता है। आज संयोग से कबीर जयंती भी है, और यह याद पड़ता है कि मस्जिदों के ऊपर चढ़कर आवाज लगाने वाले मुल्ला लोगों को लेकर कबीर ने सदियों पहले क्या लिखा था। मानो कबीर की बात का उल्टा करना है, मस्जिदों पर अब लाउडस्पीकर लग गए। और मानो इसके जवाब में दूसरे धर्मस्थलों पर भी उससे ज्यादा वक्त तक लाउडस्पीकर चलने लगे। ऐसे अराजक मिजाज वाला धर्म कोरोना की बंदिशों को भला क्या मानेगा? आज जब देश की पुलिस रात-दिन काम करके थकी हुई है, प्रशासन के लोग सरकार का नियमित काम छोड़कर सिर्फ कोरोना और प्रवासी मजदूरों के इंतजाम में जुटे हुए हैं, जब पूरे देश के डॉक्टर और अस्पताल लोगों की दूसरी बीमारियों को अनदेखा करके फिलहाल महज कोरोना के इलाज में लगे हुए हैं, तब ईश्वर का कारोबार शुरू करने की ऐसी कौन सी जरूरत आन पड़ी थी कि केन्द्र सरकार ने 8 तारीख से धर्मस्थल खोलने की छूट दी है। यह सिलसिला प्रवासी मजदूरों की वापिसी का इंतजाम न करने के बाद का दूसरा सबसे खतरनाक काम हो सकता है कि धर्मस्थल मजदूरों से परे के लोगों के बीच कोरोना-संक्रमण का एक बड़ा जरिया बन जाएं। लंदन से लेकर बांग्लादेश तक इस्कॉन के मंदिरों से बड़ी संख्या में कोरोना फैला था, इटली में एक चर्च से एक कोरोना पॉजिटिव महिला से सैकड़ों लोग संक्रमित हुए थे। धर्म का मिजाज ही नियम-कायदे को लात मारने का रहता है। यह सिलसिला बहुत महंगा पड़ सकता है, ऐसी आशंका हमें है। हम पहले भी लिख चुके हैं कि ईश्वर खुद कोरोना से बहुत सहमा हुआ अपने कपाट बंद करके बैठा हुआ था, और उसके कपाट अभी खोलने की कोई जरूरत भी नहीं थी। एक वक्त अयोध्या में रामलला के कपाट खोलने के बाद क्या हाल हुआ था यह भी देश का देखा हुआ है। और अब तो सरकार की दी गई ढील सारे के सारे धर्मों पर लागू होने जा रही है। अभी लोगों की रोजी-रोटी शुरू नहीं हुई है, लोग कर्ज में डूबे हुए हैं, और खाने का इंतजाम नहीं है। ऐसे में धार्मिक भीड़ और धार्मिक हलचल को आसानी से टाला जा सकता था, टालने की जरूरत थी। मुस्लिमों का साल भर का सबसे बड़ा त्यौहार ईद आकर चले गया, और देश भर में कहीं भी लोगों ने मस्जिद या ईदगाह जाकर सामूहिक नमाज की जिद नहीं की थी, लोगों ने अपने घर पर ही रमजान और ईद की नमाज पढ़ ली थी। ऐसे में धर्मान्ध लोगों के मुकाबले केन्द्र सरकार का उत्साह अधिक होना हैरान करता है। इस देश की जनता किसी भी ज्योतिषी की समझ से परे आए हुए कोरोना को देखते हुए भी भविष्यफल पढऩे वाली है, ऐसी जनता को धर्म के जमावड़े का एक मौका देना ठीक वैसा ही खतरनाक हो सकता है जैसा मजदूरों को घर लौटने का मौका न देना हुआ था।

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


04-Jun-2020 3:27 PM

पिछले तीन दिनों से केरल की एक हथिनी और उसके पेट में पल रहे उसके शिशु की मौत की खबर तस्वीरों सहित सोशल मीडिया और टीवी-अखबारों में इस कदर छाई हुई है कि बहुत से संवेदनशील लोग उसे देख भी नहीं पा रहे हैं। केरल में लोगों ने एक फल, अनानास, में विस्फोटक भरकर रख दिया था, जिसे मामूली फल समझकर इस हथिनी ने खा लिया था, और उसके बदन के भीतर विस्फोट से उसे इतनी चोट आई कि वह मर गई। भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री और वर्तमान पशु अधिकारवादी सांसद मेनका गांधी ने केरल के इस जिले की आलोचना करते हुए कहा है कि यहां के लोग  वनप्राणियों को मारने के मामले इसी तरह बदनाम हरकतें करते हैं। इस बारे में लोगों ने सोशल मीडिया पर जो लिखा है उसमें से एक ने हिन्दी के गुजर चुके वरिष्ठ साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी का लिखा एक वाक्य भी पोस्ट किया है- मनुष्य की पशुता को कितनी बार भी काट दो, वह मरना नहीं चाहती। 

अब सवाल यह है कि तमाम किस्म के पशुओं के बारे में अच्छे सोच-विचार लें, तो भी ऐसे कोई पशु दिखते नहीं हैं जो कि दूसरे पशुओं या इंसानों को मारने के लिए इस तरह की साजिश रचते हों। सच तो यह है कि जितने जंगली जानवर हैं, आसमान या समंदर में रहने वाले, जमीन के नीचे बिल बनाकर रहने वाले, सभी प्राणी अपनी जरूरत के लायक ही शिकार करते हैं, और कोई जानवर ऐसे नहीं हैं जो मजे के लिए, शिकार करके साथ में तस्वीर खिंचवाने के लिए दूसरों को मारते हों। यह तो हिन्दुस्तान में शिकार के खिलाफ कड़ा कानून बन गया है, इसलिए अब चर्चित फिल्मी सितारों को छोड़कर और कोई ऐसा दुस्साहस आमतौर पर नहीं करते हैं। इंसानों की खूबी यह है कि अपने भीतर की हर किस्म की कमीनगी के लिए वे किसी न किसी जानवर को मिसाल की तरह इस्तेमाल करते हैं, और ऐसा जाहिर करते हैं कि मानो इंसानों ने उन जानवरों से ही ऐसी घटिया बातें सीखी हैं। आपसी संबंधों में धोखा देने वाले लोगों को इंसान आस्तीन का सांप कहते हैं। अब भला सांप एक-दूसरे को कौन सा धोखा देते हैं? इंसान अपने भीतर की तमाम गंदगी के लिए कभी किसी अदृश्य और नामौजूद हैवान को जिम्मेदार ठहराते हैं, तो कभी किसी जानवर को। जो इंसान दूसरों के मरने से होने वाले फायदे का इंतजार करते बैठे रहें, उनके लिए गिद्ध की मिसाल दी जाती है। अब गिद्ध को तो कुदरत ने यह जिम्मा देकर रखा है कि वह मरे हुए प्राणियों की लाशों को ठिकाने लगाए। गिद्ध किसी के मरने का इंतजार करने वाले इंसानों की तरह इंतजार करते नहीं बैठते, वे अपने पेट भरने की जरूरत देखते हैं, और इंसानों की एक जरूरत को पूरा करते हैं, वे इंसानों जैसी घटिया सोच वाले नहीं होते। 

दुनिया में जानवरों के साथ ऐसी बदसलूकी होते आई है कि हर दिन उनकी कई प्रजातियां खत्म होती जा रही हैं। एक वक्त था जब हिन्दुस्तान जैसे देश में राजाओं से लेकर दूसरे रईसों तक के घर तब तक सजे हुए नहीं माने जाते थे, जब तक दीवारों पर शिकार किए गए कुछ जानवरों के सिर टंगे हुए न हों, उनकी खाल फर्श पर बिछी हुई न हों, और मेज पर हाथीदांत के कुछ सामान सजे हुए न हों। क्या जानवरों में कोई ऐसे हैं जो कि इंसानों को मारकर और सजाकर उस पर गर्व करते हों? शेर से लेकर सांप तक, बहुत से प्राणियों के बारे में जानकारों का यह मानना है वे इंसानों को तभी नुकसान पहुंचाते हैं जब इंसान उनके लिए खतरा बन जाते हैं। इंसानों ने आज पूरी धरती पर जानवरों की बसाहट की जगह पर खुद कब्जा कर लिया, और वे जंगली जानवर बेघर कर दिए गए, इसलिए जगह-जगह उनका इंसानों से सामना होते रहता है। इंसानों ने बड़े-बड़े समुंदरों को पूरी तरह प्रदूषित कर दिया, और वहां के प्राणियों की जिंदगी पर खतरा बन गए। आसमान में इतना प्रदूषण फैला दिया, पेड़ों को इस हद तक काट दिया कि पंछियों का जिंदा रहना मुश्किल हो गया। चारों तरफ अपने रसायनों को इंसानों ने इतना फैलाया कि खुद इंसानों का जीना हराम हो गया और बाकी प्राणियों को तो इंसान ने इस रफ्तार से खत्म किया है कि तमाम वैज्ञानिक हैरान हैं। हर दिन धरती से प्राणियों और वनस्पतियों की इतनी किस्में खत्म हो रही हैं कि बड़े-बड़े केलकुलेटर हिसाब न रख पाएं। 

आज जब कोरोना की दहशत में धरती लॉकडाऊन के चलते हुए एक बार फिर सांस ले पा रही है, तो हजारों ऐसे कार्टून बने कि जानवर और पंछी क्या महसूस कर रहे हैं, और हजारों ऐसी तस्वीरें छपीं कि शहरों के सूनी सड़कों पर आसपास के जंगलों के प्राणी आकर किस तरह एक बार फिर अपने इलाके पर अपना कब्जा जमा सके। आज एक बार फिर केरल की इस हथिनी की ऐसी भयानक हिंसक हत्या के बाद कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह बात भी लिख रहे हैं कि धरती से अगर मानव प्रजाति पूरी तरह खत्म हो जाए, तो उससे धरती का क्या-क्या भला होगा। हमने भी कुछ हफ्ते पहले इसी जगह यह बात लिखी थी कि इंसानों के बिना धरती एक बेहतर ग्रह बन जाएगी। इंसानों ने जिस रफ्तार से एक इतने संपन्न, इतने खूबसूरत, और इतने कामयाब कुदरत वाले ग्रह को खत्म कर दिया है, उससे लगता है कि उन्होंने धरती के इस गोले को भी एक गर्भवती हथिनी की तरह ही बर्बाद किया है। 
 
इंसानों को अपनी भाषाओं से बेइंसाफी और बदमाशी को हटाना चाहिए। जब भी हम किसी दूसरे प्राणी को हमारी अपनी खामियों की मिसाल की तरह इस्तेमाल करते हैं, हम अपनी खामियों की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं, और उन प्राणियों को ऐसी बुरी बातों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। भाषा से यह बेइंसाफी खत्म की जानी चाहिए क्योंकि इससे इंसानों की सुधरने की संभावना खत्म होती है। दूसरी बात यह कि आज कोरोना की दहशत में लोगों को यह समझ आ गया कि उनके जीने के ढर्रे की वजह से धरती की कितनी बर्बादी हुई थी, और लोगों को लग रहा है कि जैसे कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर को किसी पिछली तारीख पर भी सेट किया जा सकता है, उसी तरह धरती पर इंसानी जिंदगी को भी सौ-दो सौ बरस पहले की तारीख पर सेट कर दिया जाना चाहिए, ताकि धरती भी जिंदा रह सके। अपनी भाषा के साथ-साथ अपने ढर्रे पर भी इंसानों को सोचना चाहिए क्योंकि न सोचने का एक नतीजा यह भी हो सकता है कि धरती पर कुदरत कोरोना के साथ जीना बेहतर समझे, बजाय इंसानों के साथ जीने के। केरल में जिस तरह एक गर्भवती हथिनी को मारा गया है, उसके पेट के भ्रूण की तस्वीर देखने पर नाजुक दिलों वाले लोगों का बर्दाश्त जवाब दे जाएगा, उसे लेकर इंसानों को अपने बारे में सोचना चाहिए कि क्या धरती पर उनसे अधिक कमीनी नस्ल किसी भी दूसरे प्राणी की है? 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


03-Jun-2020 2:00 PM

सुबह-सुबह केरल से एक तकलीफदेह खबर आई कि वहां एक स्कूली छात्रा ने खुदकुशी कर ली। चौदह बरस की यह बच्ची दसवीं में पढ़ती थी, घर में टीवी या स्मार्टफोन नहीं था, स्कूलों से ऑनलाईन कक्षाएं शुरू हुई थीं, लेकिन वह उनमें शामिल नहीं हो पा रही थी। दलित मजदूरों की इस बेटी ने पढ़ाई में पिछडऩे की वजह से आत्मदाह कर लिया। पिता रोजी कमाने वाले मजदूर हैं, और लॉकडाऊन की वजह से बेरोजगार हैं। उनका कहना है कि बेटी होशियार छात्रा थी, और परेशान थी, घर का अकेला टीवी काफी वक्त से खराब है, और घर में किसी के पास भी स्मार्टफोन नहीं है। पुलिस ने बताया कि छात्रा को पढ़ाई पर असर का फिक्र थी।

क्लिक करें और यह भी पढ़े : संपादकीय : हिन्दुस्तान को खाने-पहरावे के अलावा भी अमरीका से काफी कुछ सीखना चाहिए

 अभी कुछ दिन पहले ही हमने इस अखबार में ऑनलाईन पढ़ाई को लेकर यह फिक्र जाहिर की थी कि इससे बच्चों के बीच एक गैरबराबरी की नौबत आ सकती है क्योंकि हर किसी के पास इंटरनेट या स्मार्टफोन तो हैं नहीं, और पढ़ाई आगे बढ़ती जाएगी, कुछ बच्चे उससे छूट जाएंगे, और साल के आखिर में इम्तिहान में वे गैरबराबरी का शिकार रहेंगे। हमने मणिपुर के लोगों की तस्वीरें भी दी थीं कि किस तरह वहां के लोग ऑनलाईन पढ़ाई का विरोध कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में ऑनलाईन पढ़ाई शुरू हुई है, और इस बारे में पूछने पर स्कूली शिक्षा के सबसे बड़े अफसर का कहना है कि कोई भी टेक्नालॉजी सबको बराबरी का मौका नहीं दे पाती, टेक्नालॉजी की अपनी सीमा रहती है, और सरकार यही देख रही है कि अधिक से अधिक बच्चों की पढ़ाई कैसे हो सकती है।
 
काफी पहले से एक शब्द चले आ रहा है जिसे डिजिटल डिवाइड कहते हैं। यह एक ऐसा फर्क है जो टेक्नालॉजी-सहित और टेक्नालॉजी-रहित तबकों के बीच अवसर का फर्क करता है। और बात महज टेक्नालॉजी तक सीमित नहीं है, हिन्दुस्तान में तो देश के सबसे बड़े दाखिला-इम्तिहानों में कामयाब होने के लिए कोचिंग-कारखाने, राजस्थान के कोटा की बात अभी कई बार आई क्योंकि देश के कई प्रदेशों ने अपने मजदूरों को सड़कों पर छोड़कर कोटा से प्रदेश के संपन्न कोचिंग पा रहे बच्चों को वापिस लाने के लिए बसें भेजी थीं। हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े कॉलेजों में दाखिले में एक बड़ा फर्क कोटा-कैपेबल, और कोटा-इनकैपेबल बच्चों के बीच हो जाता है। यह डिवाइड एक उदार अर्थव्यवस्था, और गैरबराबरी पर आधारित एक समाज की उपज है जिसमें समान सहूलियतों के समान अवसर बराबरी से हासिल नहीं रहते हैं। फिर यह भी होता है कि गैरबराबरी की बुनियाद पर जो लोग आगे बढ़ जाते हैं, उनकी कामयाबी से लेकर उनकी कमाई तक उनकी अगली पीढ़ी को भी आगे बढ़ाने में मददगार रहती है। इसी तरह मजदूरों के बच्चों के संपन्न तबके के बच्चों के बराबरी से बढऩे की संभावनाएं कम रहती हैं, और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे जाने वाले डीएनए की तरह आगे बढऩे वाली गरीबी रहती है जिसे तोड़कर कुछ गिने-चुने बच्चे आगे निकल पाते हैं, और उनसे यह गलत धारणा बनने लगती है कि गैरबराबरी को लेकर शिकायतें नाजायज हैं, और जिन्हें आगे बढऩा रहता है वे गरीबी में भी बढ़ जाते हैं।
 
लॉकडाऊन ने हिन्दुस्तान में एक बहुत भयानक खाई खोद दी है, जिसके बारे में हम पहले भी लिखते आए हैं। जो लोग होमलॉक्ड हैं, और जो लोग होमलेस हैं, उनके बीच की खाई अभी और बढ़ गई है क्योंकि पहला तबका घर में बैठे बोरियत का शिकार हुआ है, और दूसरा अपनी बोरियों को, बोरियों की तरह लादे गए मां-बाप को लेकर हजार-दो हजार मील के सफर पर निकला हुआ तबका रहा है। बोरियत के बोझ और बोरी के बोझ का यह फर्क बताता है कि पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश की सरहदों के बीच हिन्दुस्तान कहा जाने वाला जो एक इलाका है, वह एक देश नहीं है, वह एक देश के भीतर विभाजित तबकों का एक संघ है, संचित तबकों, और वंचित तबकों का मिला हुआ संघ, संपन्न तबकों और विपन्न तबकों का मिला हुआ संघ, होमलॉक्ड, और होमलेस तबकों का मिला हुआ संघ है। इसी तरह आज इस देश में ऑनलाईन पढ़ाई एक बहुत बड़ी गैरबराबरी खड़ी कर रही है कि जो बच्चे स्मार्टफोन से लैस नहीं हैं, वे मानो स्मार्ट ही नहीं है। देश में सबसे अधिक शिक्षित, और खासे रोजगार वाले केरल में आज गरीब मजदूर की गरीबी का हाल यह है कि एक टीवी न सुधर पाने की वजह से, एक स्मार्टफोन न होने की वजह से वह अपनी होनहार बच्ची खो बैठा है। लॉकडाऊन ने भारतीय समाज के भीतर की विसंगतियों और विरोधाभासों को और अधिक तल्खी के साथ सामने रखा है। इसने इंसान कहे जाने वाले लोगों के भीतर की हैवानियत कही जाने वाली उनकी खामी को उधेड़कर नंगा करके रख दिया है। इस लॉकडाऊन ने साबित कर दिया है कि देश की सबसे बड़ी अदालत को देश की आधी आबादी की तकलीफों की या तो समझ नहीं है, या उसका अहसास नहीं है, या उसकी फिक्र नहीं है, या फिर ये सारी बातें एक साथ लागू हो रही हैं। यह देश एक लोकतंत्र-विपन्न देश हो गया है जिसमें लोकतांत्रिक अधिकारों की कोई पूछ बाकी नहीं रह गई, और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से सरकारों-अदालतों ने अपने आपको बरी कर लिया है। ऐसी भयानक नौबत में जब एक बच्ची पढ़ न पाने की वजह से खुदकुशी कर रही है, तो यह समझने की जरूरत है कि बाकी देश में गैरबराबरी की ऑनलाईन पढ़ाई की जाए या न की जाए? यह भी देखने की बात है कि जिस देश में आमतौर पर बच्चों की खुदकुशी उनकी पसंद का मोबाइल न मिलने की वजह से सुनाई पड़ती है, तो देश के एक सिरे के केरल में एक बच्ची इसलिए खुदकुशी कर रही है कि उसे ऑनलाईन पढ़ाई नहीं मिल रही है। उसे फोन नहीं चाहिए, उसे टीवी नहीं चाहिए, लेकिन उसे पढ़ाई का हक और अवसर चाहिए। क्या इस नौबत पर देश-प्रदेश की जिम्मेदार सरकारों को कुछ सोचना चाहिए? 


03-Jun-2020 12:30 PM

अमरीका में अश्वेत, या ब्लैक, या अफ्रीकी नस्ल के कहे जाने वाले एक आदमी के दिए गए नोट पर दुकान के कर्मचारी को शक हुआ कि वह नकली है, उसने पुलिस को बुला लिया और पहुंची पुलिस में से एक गोरे अफसर ने इस काले आदमी को गिराकर उसकी गर्दन पर अपना घुटना 8-10 मिनट तक रखा, और वह मर गया, यह कहते-कहते कि वह सांस नहीं ले पा रहा है। आज इसके खिलाफ अमरीका के कई दर्जन शहरों में सभी नस्लों के लोग मिलकर एक बड़ा आंदोलन कर रहे हैं, और अमरीका से बाहर पश्चिम के कुछ दूसरे देशों में भी इसे लेकर प्रदर्शन चल रहे हैं। यह शायद पहला मौका है जब अमरीका में बहुत से शहरों की पुलिस अपने इस एक साथी के इस जुर्म पर माफी मांगते हुए प्रदर्शनकारियों को गले लगा रही है, उनसे हाथ मिला रही है, उनके सामने घुटने टेककर अपनी हमदर्दी और अपना साथ जाहिर कर रही है। यह एक अभूतपूर्व एकजुटता है जो अमरीका में पहले भी कई ऐसे नस्लभेदी हादसों और जुर्म के बाद दिखी है, लेकिन यह विशाल एकजुटता शायद पहली बार है। यह भी देखने की बात है कि एक शहर के पुलिस चीफ ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बकवास पर एक प्रमुख टीवी चैनल के सबसे प्रमुख समाचार कार्यक्रम में कहा कि अगर राष्ट्रपति के पास कहने के लिए कोई भली बात नहीं है, तो उन्हें अपनी जुबान पर लगाम लगाना चाहिए। राष्ट्रपति को शटअप कहना एक आम बात नहीं है, लेकिन अमरीका में लोकतंत्र का जो दर्जा है, और वहां की पुलिस सरकारी और राजनीतिक दबाव से जिस तरह परे है, और पुलिस चीफ अपने इलाके को जिस तरह अपनी जिम्मेदारी मानकर चलते हैं, उसमें यह देखना हैरान भी करता है। 

क्लिक करें और यह भी पढ़े : वेबक्लूजिव संपादकीय (छपे हुए अखबार में नहीं) : क्या इस नौबत पर देश, प्रदेश की जिम्मेदार सरकारें कुछ सोचेंगी?

अब पिछले दो दिनों में इस मुद्दे पर इसलिए नहीं लिखा कि इसी पन्ने पर और दूसरे लोगों ने अच्छा लिखा था जो कि यहां पर छप रहा था। अब आज कुछ जगह मिली है, तो इस अखबार का संपादक इस मुद्दे पर अपनी बात भी लिख ले। इस मारे गए आदमी के साथ एक आदमी और था जिसने ट्विटर पर लिखा है कि जॉर्ज फ्लॉयड और मैं दोनों एक ही साथ गिरफ्तार हुए हम पर यह आरोप लगाया गया कि हमने 20 डॉलर का एक नकली नोट चलाया था। जॉर्ज फ्लॉयड मेरी ही उम्र का था, उसके दो बच्चे थे, और उसे मौके पर ही मौत की सजा मिली। मेरे लिए यह गोरा होने का विशेषाधिकार था कि मैं जिंदा हूं। इस ट्वीट को दो दिन पहले साढ़े 5 लाख से अधिक लोग री-ट्वीट कर चुके थे, और 18 लाख लोग इसे पसंद कर चुके थे। इस ट्वीट को देखकर लगा कि औरों के लिखे से परे खुद का भी इस पर लिखना जरूरी है। 

अमरीका में काले, अश्वेत, या अफ्रीकी नस्ल के कहे जाने वाले लोगों की हालत देखें, उनके साथ भेदभाव देखें, जेलों में बंद लोगों में उनकी अनुपातहीन बहुतायत देखें, वहां की गरीबी में उनकी अनुपातहीन अधिक आबादी देखें, तो यह समझ पड़ता है कि वह भेदभाव का शिकार अमरीका का सबसे वंचित तबका है, ठीक उसी तरह दबा-कुचला है जिस तरह हिन्दुस्तान में भेदभाव के शिकार वंचित तबके रहते हैं। यहां पर हिन्दुस्तान की जमीनी हकीकत को समझने की जरूरत है जिसे यहां के संचित तबकों के लोग शायद नहीं समझ पाते हैं। और इसमें उनकी अकेले की कोई चूक नहीं है, उनकी दिक्कत सदियों से चली आ रही है, और उनकी सोच सदियों से सामाजिक बेइंसाफी की बुनियाद पर खड़ी हुई एक मजबूत इमारत है जो लोकतंत्र, संविधान, और 21वीं सदी नाम के तूफानों में भी नहीं हिलती है। आज भी हिन्दुस्तान में लोगों के पूर्वाग्रह इतने मजबूत हैं कि वे उनकी आंखों पर एक खास रंग का चश्मा बनकर टंगे रहते हैं, वे उनके दिमाग को एक खास रंग में रंगकर रखते हैं। ये पूर्वाग्रह सबसे अधिक हमलावर दो वंचित तबकों के खिलाफ दिखते हैं, अल्पसंख्यकों मुस्लिमों और दलितों के खिलाफ। इन पूर्वाग्रहों को कुछ और खुलासे से देखें तो महिलाएं और गरीब भी इनका शिकार हैं। और ये सारे के सारे हिन्दी के एक बड़े पुराने बड़े कवि की जुबान में ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, ये सब ताडऩ के अधिकारी होते हैं। अब पशुओं के साथ जो सुलूक होता है, वह कल केरल में सामने आया, जहां एक गर्भवती हथिनी को विस्फोटक भरा हुआ अनानास खिला दिया गया, और पेट के बच्चे के साथ-साथ वह भी मर गई। महिलाओं के साथ हिन्दुस्तान में जो सुलूक होता है, वह बहुत आम है, और क्या किसी दिन का कोई मिनट ऐसा भी हो सकता है जब किसी महिला के साथ बड़ी हिंसा देश में न होती हो? और जहां तक शूद्रों का सवाल है, तो हिन्दुस्तान के पिछले कुछ बरस शूद्रों पर अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हिंसा के रहे हैं। ऐसे में मुस्लिम मोटेतौर पर हिन्दुस्तान में शूद्रों के लिए रखे गए बर्ताव के ही लायक माने गए हैं, और जब हम सवर्ण, उच्च कही जाने वाली जाति के लोगों की हिंसा के शिकार लोगों की बात करते हैं, तो हिन्दुस्तान में शूद्र और मुस्लिम एक सरीखा निशाना हैं।
 
अब जब अमरीका में अफ्रीकी नस्ल के एक आदमी की ऐसी पुलिसिया-हत्या को लेकर पूरा देश जगह-जगह जल रहा है, और हिंसा-लूटपाट से घिर गया है, तो इस आंदोलन के शांतिप्रिय और लोकतांत्रिक हिस्से को देखकर लगता है कि क्या हिन्दुस्तान में आज हिंसा शिकार दलित-मुस्लिम लोगों के लिए कोई ऐसा सर्वधर्म, सर्वजाति, और सर्ववर्ग प्रदर्शन हो सकता है जो सीधे आंदोलनकारियों और पुलिस दोस्त बना जाए, हमदर्द बना जाए, और पुलिस अपने साथी के जुर्म पर शर्मिंदगी जाहिर करने, माफी मांगने घुटने टेककर प्रदर्शनकारियों के सामने देश भर में खड़ी रहे, देश के मुखिया को समझदारी से बात करने की नसीहत दे?
 
अमरीका एक अजीब सा देश है, वहां की सरकार अपने देश के बाहर पूरी तरह अलोकतांत्रिक रहती है, हमलावर रहती है, और एक मवाली गुंडे की तरह काम करती है। दूसरी तरफ उस देश के नागरिक हैं जिनका एक काफी बड़ा हिस्सा पूरी तरह लोकतांत्रिक सोच रखता है, और बात-बात पर सड़कों पर उतर भी आता है, और अपनी सरकार का विरोध करने में जिसे डर भी नहीं लगता, क्योंकि शायद वहां सरकार का विरोध करना खतरनाक भी नहीं है। अब अमरीका के ऐसे माहौल से यह सोचने की जरूरत लग रही है कि वहां मारे जाने वाले इस काले नौजवान के गोरे साथी ने जो कड़वी हकीकत उजागर की है, क्या वैसी हिम्मत हिन्दुस्तान में अधिक लोग कर सकेंगे? क्या यहां पर कुछ लोग कह सकेंगे कि फ्रिज में मांस रखने पर उनका तो कुछ नहीं बिगड़ सकता क्योंकि वे मुस्लिम अखलाक नहीं है जो कि भीड़त्या में मारा गया था। क्या यहां पर कुछ लोग यह कह सकेंगे कि वे समाज में एक बेहतर सुरक्षा पाए हुए हैं क्योंकि उनके नाम के साथ जुड़ा हुआ उपनाम उनके सवर्ण, और ऊंची समझी जाने वाली जाति बताता है। ये तकलीफदेह सवाल हिन्दुस्तान में कदम-कदम पर खड़े हैं। हम अमरीका से बहुत सी चीजें लाते हैं। वहां से कोकाकोला लाते हैं, जींस लाते हैं, फास्टफूड लाते हैं, और अमरीका को विदेश का अपना सपना मानते हैं। क्या अमरीकी जनता के इस मुखर तबके की राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक सक्रियता की समझ भी हम ला सकते हैं, और जींस की तरह पहन सकते हैं, कोकाकोला की तरह गले से उतार सकते हैं, और बर्गर की तरह उससे अपना पेट भर सकते हैं? जब किसी देश से कुछ सीखना हो, तो उससे वहां की लोकतांत्रिक समझ सीखनी चाहिए, वहां की सभ्य उदारता सीखनी चाहिए, वहां पुलिस के बड़े हिस्से में बसी तथाकथित इंसानियत सीखनी चाहिए। हिन्दुस्तान को खाने-पहरावे के अलावा भी अमरीका से काफी कुछ सीखना चाहिए, वहां की जनता से यहां की जनता को। किसी देश की सभ्यता इमारतों और पैसों से नहीं बनती है, और न ही काल्पनिक पौराणिक कथाओं पर गौरव करने से। किसी देश की लोकतांत्रिक सभ्यता वहां के लोगों की आज की जिम्मेदारी से साबित होती है, और इस पैमाने पर हिन्दुस्तानी बहुतायत बहुत बुरी तरह अलोकतांत्रिक, असभ्य, और गैरजिम्मेदार है। 

 (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)