संपादकीय

Date : 31-Jul-2019

मध्यप्रदेश में एक बड़े सीनियर आईएएस अफसर का नाम एक महिला के साथ सेक्स-वीडियो में जुड़ा जो कि पिछले दिनों से चारों तरफ फैल रहा था, तो उस अफसर को एक महत्वपूर्ण विभाग से हटाकर आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान का संचालक बनाया गया है। जाहिर है कि बिना पूरी जांच के, बिना कोई तोहमत साबित हुए सरकार किसी को सजा दे सकती है, तो वह तबादले की किसी किस्म की सजा रहती है जिसे दुनिया सजा मानती है, जो कि हकीकत में सजा रहती है, लेकिन ऐसे तबादले के खिलाफ अफसर किसी अदालत नहीं जा सकते क्योंकि तबादला करना सरकार का विशेषाधिकार रहता है।

अब सोचने की बात यही है कि किसी अफसर का चाल-चलन ऐसा निकला कि उसे सजा देना है, या किनारे करना है, या कम महत्व की जगह पर भेजना है, तो उसे आदिम जाति अनुसंधान एवं विकास संस्थान भेज दिया गया। यह देश की सरकारों की मौजूदा सोच का एक सुबूत है कि आदिवासियों से जुड़ी हुई जिम्मेदारियां सजायाफ्ता अफसरों के लायक मानी जाती हैं। यह सिर्फ मध्यप्रदेश में नहीं है, यह छत्तीसगढ़ में भी आए दिन सुनाई पड़ता है जब पिछली सरकार के नेता-अफसर, और मौजूदा सरकार के नेता-अफसर अपने मातहतों को जुबानी धमकी देते हुए यह कहते हैं कि उनका बस्तर तबादला किया जाएगा, तब उन्हें अक्ल आएगी। बस्तर जो कि जाहिर तौर पर सबसे बेबस और सबसे बेजुबान आदिवासियों का इलाका है, जो कि प्रामाणिक तौर पर सबसे पिछड़ा इलाका है, उसे सजायाफ्ता अफसरों और कर्मचारियों के लायक माना जाता है। आजाद हिन्दुस्तान में यह सोच अंग्रेजों की विरासत है जिसमें देश के क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से जिनको सबसे कड़ी और बड़ी सजा के लायक माना जाता था, उन्हें कालेपानी की सजा में अंडमान भेजा जाता था जो कि देश में सबसे प्राचीन और सबसे अछूते आदिवासियों का इलाका था, और है। छत्तीसगढ़ में भी बात-बात में नाखुश सीनियर जूनियरों को मानो कालेपानी की सजा पर बस्तर भेजने की बात करते हैं, और हकीकत में भेजते भी हैं, और लोगों को याद होगा कि पिछली रमन सरकार के एक कार्यकाल के सलाहकार केपीएस गिल ने काम पूरा करने के बाद एक इंटरव्यू में कहा था कि बस्तर से बाहर निकलने के लिए पुलिस कर्मचारियों को बड़े अफसरों को लाखों की रिश्वत देनी पड़ती है। 

आदिवासियों के लिए यह नजरिया पूरी दुनिया में शहरी इलाकों में तकरीबन एक सरीखा है। ऑस्ट्रेलिया हो, या अमरीका, या फिर लैटिन अमरीकी देशों के पूरे-पूरे आदिवासी देश, इन सब जगहों को लेकर बाकी शहरी और संपन्न दुनिया का नजरिया ऐसा ही रहता है। आदिवासियों को सजा का हकदार मान लिया जाता है कि उनके इलाकों में सबसे दुष्ट, सबसे भ्रष्ट, सबसे नालायक, सबसे बदनाम, सबसे बदचलन लोगों को भेजा जाएगा। ऐसे में कोई हैरानी नहीं है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर सरीखे आदिवासी इलाकों में अफसरों ने आजादी के बाद से जो खुली लूटपाट की है, उसी का नतीजा है कि वहां पर नक्सलियों को एक उपजाऊ जमीन हाथ लगी। सरकारों के बीच आदिवासी मुद्दों को लेकर किसी किस्म की संवेदना नहीं दिखती है। और तो और सुप्रीम कोर्ट भी आदिवासियों को लाखों की संख्या में जंगल की उनकी जमीन से बेदखल करने की एक मुहिम सी चला रहा है। सरकार हो, संसद हो, या अदालत हो, जहां कहीं आदिवासी पहुंचते भी हैं, वे सत्ता के असर में अपना आदिवासी डीएनए इस रफ्तार खो बैठते हैं कि मानो वे कभी आदिवासी थे ही नहीं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम एक दूसरी बात भी देखते आए हैं। राज्य बनने के बाद से अब तक किसी भी राज्यपाल ने संविधान में आदिवासी इलाकों और आदिवासियों की रक्षा के लिए उन्हें दिए गए विशेष अधिकारों का कभी इस्तेमाल नहीं किया। सत्ता का रूख दबे-कुचले लोगों की भलाई के लिए जुबानी जमाखर्च से परे कुछ भी नहीं रहता। 

जब तक आदिवासी इलाकों को, आदिवासी संस्थानों को, अंडमान की कालेपानी की सजा माना जाता रहेगा, तब तक आदिवासी इलाकों में नक्सली कायम रहेंगे, और आम जनता का भरोसा लोकतंत्र पर नहीं रहेगा। हमारा तो यह साफ मानना है कि आदिवासी इलाकों वाले राज्यों में राज्य सरकारों को आदिवासी समाज और मुद्दों की समझ रखने वाले समाजशास्त्रियों की अनिवार्य रूप से सलाहकार के रूप में नियुक्ति करनी चाहिए, और उनकी काबिलीयत का इस्तेमाल आदिवासी इलाकों के लिए अफसर तय करने में भी होना चाहिए, और वहां पर सरकार के कामकाज पर नजर रखने में भी होना चाहिए। आज की सरकारें शहरी, शिक्षित, संपन्न, और सवर्ण सोच से भरी हुई सरकारें रहती हैं, आदिवासी मुद्दों से बिल्कुल ही नासमझ। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। आदिवासी इलाकों के लिए अलग से समर्पित अफसर और कर्मचारी तय होने चाहिए, और किसी भी सेवा में लोगों की नियुक्ति के पहले ऐसे इलाकों के लिए समझ और संवेदनशीलता रखने वालों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मध्यप्रदेश में यह ताजा फैसला शर्मनाक इसलिए है कि आदिवासी मुद्दों से जुड़े संस्थान को सजायाफ्ता के लायक माना गया। 
-सुनील कुमार


Date : 30-Jul-2019

छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा जीतकर आने वाली एक नौजवान अधिकारी वर्षा डोंगरे को दो बरस पहले   भाजपा की राज्य सरकार ने निलंबित कर दिया था, उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर राज्य सरकार की नक्सल और आदिवासी मामलों में रीति-नीति के खिलाफ बड़े आक्रामक अंदाज में लिखा था, और सरकार के दूसरे आलोचकों ने इसे हाथों-हाथ उठाया था, और चारों तरफ फैला दिया था। इस पोस्ट में यह भी लिखा हुआ था कि उन्होंने एक जेल अधिकारी की हैसियत से काम करते हुए जेल में ऐसी महिलाओं से बातचीत की है जिनके साथ सुरक्षा बलों ने बस्तर में सेक्स-बदसलूकी की थी। यह आरोप राज्य शासन के सुरक्षा कर्मचारियों और केन्द्रीय सुरक्षा कर्मचारियों पर लंबे समय से लगते आ रहा है, और बस्तर के आदिवासियों महिलाओं ने आरोपों को लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक दौड़ लगाई है। राज्य शासन की एक जेल-अधिकारी की ऐसे कथित पोस्ट को लेकर रमन-सरकार की काफी फजीहत हुई थी।

इस निलंबन के बाद रमन-सरकार आलोचना के कटघरे में आई थी कि उसने सच कहने वाली एक अफसर को निलंबित किया था। उस वक्त कांगे्रस पार्टी ने भी इस मामले को उठाया था। कल भूपेश सरकार ने इस महिला अधिकारी का निलंबन खत्म करके उसे बहाल कर दिया है। इन दो बरसों में यह बात खबरों में कहीं नहीं आई कि क्या इस अफसर की फेसबुक पोस्ट पर जांच का कोई नतीजा निकला? अब जब बहाली हो गई है तो एक बात पर कार्रवाई जरूरी हो जाती है। इस महिला अधिकारी ने अपनी नौकरी दांव पर लगाकर, और सरकारी सेवा शर्तों को तोड़कर अपने विभाग और जेल के भीतर की बातों को सरकार के सामने रखने के बजाय जनता के सामने रखा था। उसने तो दो बरस निलंबन झेल लिया, लेकिन उसके उठाए हुए मुद्दों का क्या हुआ? और वे मुद्दे छोटे नहीं थे। वर्षा डोंगरे ने आदिवासियों के हक सरकार और कारोबार द्वारा हड़पने और कुचलने के खिलाफ लिखा था और लिखा था कि जिस तरह देश के रक्षक ही आदिवासियों की बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, फर्जी केसों में चार दीवारी में सडऩे भेज रहे हैं, वे इंसाफ के लिए कहां जाएं? वर्षा ने लिखा था कि उन्होंने खुद बस्तर में चौदह से सोलह बरस की आदिवासी बच्चियों को देखा था जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर करके पूरा नंगा करके प्रताडि़त किया गया था, उनकी कलाईयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था जिन्हें वर्षा ने खुद ने देखा था।

अब छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार खुद होकर भी आदिवासियों के खिलाफ दर्ज फर्जी मामलों की जांच ऊंचे स्तर पर करवा रही है। ऐसे में वर्षा डोंगरे की शक्ल में सरकार को एक ऐसी गवाह मिलती है जिसने सरकार जुल्म और बेइंसाफी को उठाते हुए निलंबन झेला था। सरकार को चाहिए कि इस नौजवान अफसर को ऐसी जांच में गवाह बनाकर तमाम शिकायतों के सुबूत ढूंढे। ऐसे कम ही सरकारी अफसर मिलते हैं जो सरकारी जुल्म के खिलाफ बोलने को तैयार होते हों।
-सुनील कुमार


Date : 29-Jul-2019

उत्तरप्रदेश के उन्नाव के भाजपा विधायक पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली एक युवती कल अपनी मां और अपने वकील के साथ जेल में बंद अपने चाचा से मिलने जा रही थी कि उनकी कार को एक ट्रक ने टक्कर मारी जिसमें चाची, मौसी और ड्राईवर मर गए, और यह युवती और उसके वकील बुरी तरह जख्मी होकर अस्पताल में हैं। खबरें बताती हैं कि रेप की रिपोर्ट लिखाने के बाद उसके चाचा पर आनन-फानन आधा दर्जन फर्जी मुकदमे दर्ज कर लिए गए थे। इसके पहले रिपोर्ट लिखाने के बाद इसके पिता को पुलिस हिरासत में पीट-पीटकर मार डाला गया था, मामले के एक या  अधिक गवाह मार डाले गए थे। भाजपा विधायक जेल में है जिससे मिलकर भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने चुनाव में सहयोग के लिए धन्यवाद दिया था। पूरे देश का मीडिया और सोशल मीडिया इस बात पर उबल रहा है कि एक ताकतवर के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने वाला परिवार किस तरह कुचल दिया गया है। पुलिस ने माना है कि इस परिवार की हिफाजत के लिए तैनात पुलिस सुरक्षा कर्मचारी इस वक्त उनके साथ नहीं थे, और क्यों नहीं थे इसकी जांच की जा रही है। खबर बताती है कि टक्कर मारने वाली ट्रक के आगे और पीछे, दोनों नंबर प्लेट पर कालिख पोती गई थी ताकि नंबर देखा न जा सके। 

लोगों को कुछ इसी किस्म का सिलसिला एक दूसरे मामले में भी याद होगा, बापू कहा जाने वाला आसाराम जब बलात्कार के मामले में गिरफ्तार हुआ, और अदालती सुनवाई चल रही थी, तब इस मामले के गवाह एक-एक कर मार डाले गए थे। ऐसे ही एक और मामले को याद रखने की जरूरत है कि मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाले में, उसमें शामिल, और उसके गवाह लोगों की मौतों का सिलसिला ऐसा चला कि शायद 40 से अधिक लोग सुनवाई के दौरान ही बेमौत मारे गए। 

यह पूरा सिलसिला देखें तो अभी पौन सदी पहले तक अमरीका में जब संगठित माफिया के खिलाफ कोई गवाह रहते थे, तो वे इसी तरह एक-एक कर मार डाले जाते थे। कुछ ऐसा ही इटली में सिसिली के माफिया के खिलाफ सिर उठाने वाले लोगों के साथ होता था। हिन्दुस्तान में अधिक मामलों में ऐसा याद नहीं पड़ता, लेकिन यह तो तय है कि गवाहों की हत्या या शिकायतकर्ता के परिवार के लोगें की हत्या से कुछ कम दर्जे का दबाव अनगिनत मामलों में बनता होगा जब गवाहों को एक-एक कर खरीद लिया जाता है, या सुबूतों को एक-एक कर तबाह किया जाता है, अदालतों में सरकारी वकीलों को प्रभावित किया जाता है, और कई मामलों में जजों को रिश्वत देने की चर्चा रहती है। कुल मिलाकर लगता यह है कि अदालत से सजा पाने वाले लोग वे ही रहते हैं जो शिकायतकर्ता को खत्म नहीं कर पाते, उसके परिवार को, गवाहों को, वकीलों को खत्म नहीं कर पाते, और न्यायप्रक्रिया के अलग-अलग हिस्सों को खरीद या बर्बाद नहीं कर पाते। आज ही एक दूसरी खबर है कि पंजाब के जालंधर कें जिस ईसाई बिशप पर बलात्कार का मामला केरल में चल रहा था, उसमें पुलिस ने जब अदालत में डीवीडी सरीखे डिजिटल सुबूतों को पेश किया, तो उनकी फोरेंसिक जांच रिपोर्ट बताती है कि उनके साथ छेडख़ानी की गई है। बलात्कार की शिकार एक नन के साथ ईसाई समुदाय की हजारों नन्स खड़ी हैं, महिला अधिकार और मानव अधिकार के लिए लडऩे वाले खड़े हैं, लेकिन ऐसा शक है कि चर्च के दबाव में, चर्च को बचाने के लिए सरकार इस मामले को शुरू से कुचल रही है। 

ताकतवर लोगों के खिलाफ हिन्दुस्तान का कानून किस तरह लुंजपुंज हो जाता है, वह देखने लायक है। गरीबों को बेदखल करना हो, उन्हें कैद काट लेने के बाद भी जेल में सड़ते पड़े रहने देना हो, उन्हें संभावित सजा से अधिक वक्त तक विचाराधीन कैदी बनाकर जेल में पड़े रहने देना हो, इन सब मामलों में हिन्दुस्तानी अदालतें एक पेशेवर मुजरिम के अंदाज में काम करती हैं, और इंसाफ की किसी भी संभावना को कुचलती जाती हैं। दो और मामले इसी से जुड़े हुए गिनाना ठीक होगा, राजस्थान हाईकोर्ट से अभी कुछ कश्मीरी आदमियों को बेकसूर करार देकर रिहा किया गया है, उन पर आतंकी हमले में शामिल होने का मामला 24 बरस से चल रहा था, वे जब जेल में डाले गए थे तब छोकरे थे, और अब अधेड़ हो चुके हैं, उससे अधिक उम्र के हो चुके हैं, और अब वे बाहर निकलकर क्या करेंगे, यह उन्हें खुद ही नहीं मालूम है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट में अभी कुछ दिन पहले जिला सहकारी बैंक के एक मर चुके कर्मचारी को बेकसूर मानते हुए बैंक को हुक्म दिया है कि वह उसके सारे बकाया भुगतान करे। दिक्कत यही है कि इस भुगतान को लेने के लिए वह जिंदा नहीं है। यह मामला 28 बरस तक चला, और इस बीच ही वह कबका मर-खप गया, और  अब उसे शायद ही यह पता चले कि वह जीत गया है। 

ऐसे कई मामलों को देखें तो हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था को लेकर एक घोर निराशा होती है। हिन्दुस्तान में कानून के राज को देखकर घोर निराशा होती है, और ताकतवर तबके की हिंसक ताकत को देखकर एक दहशत होती है। शायद कुछ लोगों को अब तक इस बात पर हैरानी होना जाहिर हो कि किस तरह इस भाजपा विधायक पर लगे बलात्कार के आरोपों से लेकर, उसकी गिरफ्तारी तक, और उसके खिलाफ शिकायत करने वाली लड़की के पूरे कुनबे की हत्या तक, वकील की हत्या तक पर किसी बड़े नेता को कुछ भी नहीं कहना है, न राज्य की सरकार को, न केन्द्र की सरकार को, न उस विधायक की भाजपा को। 
-सुनील कुमार


Date : 28-Jul-2019

छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य विभाग की सेहत कुछ ठीक नहीं चल रही है। पिछली रमन सरकार के वक्त इस विभाग के जितने घोटाले सामने आए, उससे अधिक अभी तक दबे हुए हैं। लेकिन उन घोटालों की जांच की सुर्खियों के बीच भूपेश बघेल सरकार ने स्वास्थ्य विभाग में जो चल रहा है, उसमें फिर नया घोटाला होते दिख रहा है। वैसे तो स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव बड़े जानकार और तजुर्बेकार माने जाते हैं, और उनकी साख भी ठीक बताई जाती है, लेकिन विभाग में एक अदना से अफसर को लेकर जो खींचतान चल रही है, वह हक्का-बक्का करने वाली है। 

खुद कांग्रेस पार्टी के एक बड़े कार्यकर्ता और कांग्रेस के चिकित्सा प्रकोष्ठ के नेता डॉ. राकेश गुप्ता रमन सरकार के वक्त से पिछले बरसों में स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार को लेकर सड़क से लेकर मीडिया तक लड़ाई लड़ रहे थे। कांग्रेस पार्टी ने भी अपने मंच से उस लड़ाई को आगे बढ़ाया था। उस वक्त स्वास्थ्य विभाग में संविदा पर काम कर रहे एक अफसर पर सैकड़ों करोड़ के स्वास्थ्य बीमा में भयानक भ्रष्टाचार का आरोप डॉक्टरों के संघ ने भी लगाया था, नर्सिंग होम एसोसिएशन ने भी लगाया था, और अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस संविदा-अफसर के भ्रष्टाचार की बात उठाई थी। अभी कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इस अफसर को दुबारा संविदा पर रखने के खिलाफ हाईकोर्ट तक गए हैं, और स्वास्थ्य विभाग के भीतर मंत्री और आईएएस अफसरों के बीच इस संविदा अफसर को आगे जारी रखने के मुद्दे पर ऐसी भयानक लड़ाई छिड़ी है कि उसे बचाने के लिए स्वास्थ्य मंत्री विभाग की एक आईएएस अफसर के खिलाफ कई तरह की जांच शुरू करवा चुके हैं। 

अभी तक जो कागजात हमारे सामने आए हैं, उनसे एक बात साफ है कि इस संविदा अफसर की रमन सरकार में नियुक्ति ही गलत हुई थी, और वर्तमान सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सिंहदेव एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर उस विवादास्पद अफसर को जारी रखने के लिए किसी भी हद तक जाते हुए दिख रहे हैं। यह बात हैरान करने वाली है क्योंकि टी.एस. सिंहदेव को भ्रष्टाचार के आरोपों वाले लोगों को इतना खुलकर आगे बढ़ाते लोगों ने देखा नहीं था, और उनसे उम्मीद भी नहीं थी। अभी इस सरकार को आए एक बरस भी पूरा नहीं हुआ है, और सबसे अधिक आरोपों से घिरे एक संविदा-अफसर को लेकर यह सरकार हाईकोर्ट के कटघरे में खड़ी कर दी गई है। हाईकोर्ट ने पहली नजर में इस अफसर के खिलाफ आरोपों में कुछ दम देखते हुए उसके काम सम्हालने पर रोक लगाई है, हालांकि सरकार इससे भी सम्हलते दिख नहीं रही है। 

स्वास्थ्य विभाग छत्तीसगढ़ बनने से अब तक प्रदेश सरकार का सबसे भ्रष्ट विभाग रहा है। खुद कांग्रेस पार्टी के एक प्रमुख कार्यकर्ता डॉ. राकेश गुप्ता लगातार जिस भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ करते रहे हैं, उसी भ्रष्टाचार को इतना खुलकर आगे बढ़ाना राज्य सरकार की साख को चौपट कर रहा है। इस मामले के कागज यह भी बताते हैं कि किस तरह एक परिपक्व और वरिष्ठ मंत्री खुद एक विवाद में फंसते जा रहा है, और यह शायद इस सरकार को बड़ी बदनामी दिलाने वाला पहला स्कैंडल है जिसमें रमन सरकार के एक सबसे भ्रष्ट माने जाने वाले अफसर को भूपेश सरकार में इज्जत का मुद्दा बना लिया गया है। इस सरकार से जिन लोगों को बेहतर काम की उम्मीद थी, वे लोग कम से कम इस एक मामले को लेकर सरकार के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। बेहतर यही होगा कि यह सरकार समय रहते सम्हल जाए। 
-सुनील कुमार


Date : 27-Jul-2019

कर्नाटक में कल शाम भाजपा के मुख्यमंत्री ने शपथ ले ली, और कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार का अधूरा कार्यकाल खत्म हो गया। कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस छोडऩे वाले विधायकों की विधानसभा सदस्यता पर फैसला अब तक विधानसभा अध्यक्ष ने लिया नहीं है, और ऐसा लगता है कि उस फैसले से अब नई सरकार की सेहत पर कोई फर्क पडऩा भी नहीं है। कर्नाटक में पिछली कई सरकारों ने कार्यकाल पूरे नहीं किए, और ऐसा महज विपक्ष की वजह से नहीं हुआ है, खुद भाजपा सरकार में भाजपा के विधायकों ने भी सरकार के खिलाफ खुली बगावत दर्ज की हुई है। इस पूरे सिलसिले में जिस बड़े दाम पर विधायकों की खरीद-फरोख्त की तोहमतें हवा में तैर रही हैं, वे भयानक हैं। ऐसा लगता है कि भारतीय लोकतंत्र में लोकसभा या विधानसभा का चुनाव जीतना एक बड़ा पूंजीनिवेश है, एक महंगी कैशक्रॉप बोना है, जिसे सही समय आने पर काटकर नगदीकरण किया जा सके। 

भारत में लोकतंत्र में जब-जब, जहां-जहां विधायकों या सांसदों की मंडी में खरीद-फरोख्त होती है, तब-तब बिकती जनता है। वह जनता जिसे यह झांसा दिया जाता है कि उसके वोट से सरकार बनती है, और जिसे अब तो चुनाव आयोग भी लुभावने इश्तहार जारी करके वोट देने के लिए बुलाता है, वह जनता इस खुशफहमी में रहती है कि वह पांच बरस के लिए विधायक और सांसद चुनती है। जनता आज की तारीख में हिन्दुस्तान में सामान चुनती है जो कि मंडियों में जरूरत के वक्त असंभव से लगने वाले दाम पर बिकते हैं। बिकाऊ माल चुनने को कुछ लोग लोकतांत्रिक अधिकार मान लेते हैं, कुछ लोग पांच बरस में एक बार आने वाला जलसा मान लेते हैं, और फिर इसी खुशफहमी में मगरूर घूमते हैं, फिर वे चाहे भूखे पेट हों। 

भारतीय लोकतंत्र में जिस रफ्तार से, जिस बड़े पैमाने पर दौलत और बेईमानी का खेल चल रहा है, उससे अब यह लगता है कि दलबदल कानून के तहत अगर हुए बाकी कार्यकाल के लिए सदन की सदस्यता खत्म नहीं होगी, तो मौजूदा कानून तो थोक में खरीदी को बढ़ावा देने वाला एक बाजारू फॉर्मूला होकर रह गया है। आज किसी विधायक दल या सांसद दल के एक तिहाई सदस्य दलबदल करते हैं, तो वह दलबदल नहीं, दलविभाजन कहलाता है। आज की राजनीति में अरबपति उम्मीदवारों की बढ़ती गिनती, दलबदल में पूरी तरह स्थापित हो चुकी बेशर्मी, और पार्टियों के पीछे खरबपतियों की दौलत की ताकत, इन सबने मिलकर लोगों की शर्म और झिझक खत्म कर दी है, लोगों के नीति-सिद्धांत खत्म कर दिए हैं, और मोटे तौर पर लोकतंत्र को खत्म कर दिया है। आज इस देश में ऐसे लतीफे बनने लगे हैं कि पिछले चुनाव तक तो यह कहा जाता था कि किसी भी निशान पर वोट दो, वह जाएगा तो एक खास निशान पर ही, और अब तस्वीर बदल गई है कि किसी भी उम्मीदवार को वोट दो, वह उम्मीदवार तो जाएगा एक खास पार्टी में ही। 

अभी कुछ पार्टियों ने इस बात की वकालत शुरू की है कि जब देश के कुल राजनीतिक चंदे का तीन चौथाई से अधिक हिस्सा महज भाजपा में जा रहा है, तो फिर देश में चुनाव में बराबरी बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि सरकारी खर्च पर चुनाव हों। एक दूसरी रिपोर्ट यह भी थी कि अभी-अभी हुए आम चुनाव दुनिया के सबसे महंगे चुनाव थे, हिन्दुस्तान के इतिहास के तो सबसे महंगे चुनाव थे ही। अब कर्नाटक या किसी दूसरे प्रदेश में किसी एक पार्टी या किसी दूसरी पार्टी की खरीद-फरोख्त देखकर लगता है कि चुनाव के बाद भी हिन्दुस्तान का लोकतंत्र सबसे महंगा लोकतंत्र साबित हो रहा है जहां विधायकों के इतने दाम लगने की चर्चा खुले रहस्य की तरह होती है। यह सिलसिला उन लोगों को निराश करता है जो संविधान की बात करते हैं, जो लोग लोकतंत्र पर भरोसा करते हैं, या जो लोग अपने वोट की ताकत पर एक बेबुनियाद आत्मविश्वास रखते हैं। इस मंडी को लोकतंत्र समझ लेने की खुशफहमी महज हिन्दुस्तानी कर सकते हैं। 


Date : 26-Jul-2019

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने देश की इस सर्वोच्च अदालत में मामलों को रजिस्टर करने वाले अपने दफ्तर के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि वहां बुनियादी रूप से कुछ गड़बड़ी है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि हाईकोर्ट में एक हफ्ते में करीब 6 हजार नए मामले दायर होते हैं, और सभी दर्ज हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक हफ्ते में करीब हजार मामले दायर होते हैं, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री इनका निपटारा नहीं कर पाती है, इन्हें दर्ज नहीं कर पाती है। उन्होंने इस हाल पर तकलीफभरी नाराजगी जाहिर की है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ समय पहले ही अंबानी से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट जजों के आदेश के उल्टे एक आदेश नीचे के बाबुओं ने टाईप करके जारी कर दिया था। इस मामले में कुछ लोगों पर कार्रवाई भी हुई थी। 

यह तो अच्छा है कि देश के मुख्य न्यायाधीश ने देश की सबसे बड़ी अदालत के हाल पर शर्मिंदगी जाहिर की है, वरना देश की जनता तो पीढिय़ों से निचली अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक में जो तकलीफ झेलते आ रही है, उसके चलते उसका भरोसा ही न्यायपालिका पर से खत्म हो चुका है। यह भी एक वजह है कि कहीं भीड़ हत्या कर रही है, कहीं लोग सुपारी देकर कत्ल का ठेका दे रहे हैं, और कहीं खुद आमने-सामने एक-दूसरे का कत्ल कर रहे हैं। कई जगहों पर जाति पंचायतों से लेकर इलाके के मवाली तक अपने अंदाज में इंसाफ कर रहे हैं, और कई जगहों पर मुजरिमों की ज्यादती के खिलाफ लोग अदालत तक जाने का हौसला भी नहीं जुटा पाते हैं। यह सब कुछ इसलिए अधिक हो रहा है क्योंकि अदालतों में इंसाफ आसान नहीं रह गया है, वक्त पर नहीं मिल पा रहा है, बहुत महंगा हो गया है, और बहुत खतरनाक भी हो गया है क्योंकि इस देश ने पिछले बरसों में शिकायतकर्ताओं का कत्ल, सड़कों पर गवाहों का कत्ल, और जजों की संदिग्ध मौत तक देखी है, और जैसा कि आए दिन चर्चा में रहता है, जजों को राजनीतिक दबाव या भ्रष्टाचार के तहत फैसले लेते भी देखा जाता है। 

जिन आम लोगों को जिले की अदालतों तक काम पड़ता है, वे जानते हैं कि अदालत में तकरीबन हर मुजरिम से हर पेशी पर रिश्वत ली जाती है, और साथ-साथ शिकायतकर्ता से भी ऐसा ही सुलूक होता है, और हर पेशी पर उसे जज के ठीक सामने बैठे बाबू को टेबिल के ऊपर ही नगदी थमानी पड़ती है, तभी उसकी बारी आती है, तभी उसका दस्तखत करवाकर उसे उस दिन की छुट्टी मिलती है, और तभी उसे अगली तारीख मिलती है। अदालतों का हाल देखें तो आम लोगों का यह तजुर्बा और कहना है कि सरकार का कोई भी विभाग इतना भ्रष्ट नहीं रहता जितनी कि निचली अदालतें रहती हैं। इससे परे हाईकोर्ट की बात करें तो वहां भी तारीखों को जुटाने, या टलवाने के काम में नगदी काम आती है, और अधिकतर हाईकोर्ट के बारे में यह चर्चा रहती है कि वहां बहुत से, और कौन-कौन से, जज नगदी लेकर फैसले देते हैं। 

लोगों को याद होगा कि देश के कानून मंत्री रहे हुए एक बड़े वकील शांतिभूषण, और उनके चर्चित वकील बेटे प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ यह खुला आरोप लगाया था कि वहां के एक दर्जन जज भ्रष्ट रहे हैं। इस पर अदालत ने उनके खिलाफ अवमानना का मुकदमा भी चलाया था, उनसे माफी मांगने के लिए जोर के साथ कहा भी गया था, लेकिन वे जेल जाने को तैयार थे, माफी मांगने को नहीं। उसके बाद से शायद यह मामला सबकी सहूलियत के लिए ताक पर धर दिया गया है। अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा था कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज रिटायरमेंट के बाद कोई पुनर्वास पाने के लिए सत्ता की मर्जी के फैसले देने के संदेह से घिरे रहते हैं। हमने यह भी सलाह दी थी कि राज्यों में उसी राज्य के हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों का कोई मनोनयन नहीं होना चाहिए, और इसके लिए दूसरे राज्यों से ही संवैधानिक जरूरत पूरी करनी चाहिए। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों की ही संवैधानिक जरूरत वाली कुर्सियों पर मनोनयन करने के लिए सरकार के एकाधिकार को खत्म करना चाहिए, और ऐसे चयन-मनोनयन के लिए बड़ी संख्या में तटस्थ लोगों की एक कमेटी बनानी चाहिए, और उसमें जजों से खुली बातचीत करके, उनके बारे में खड़े हुए संदेहों पर जवाब मांगकर ही उनका चयन करना चाहिए। 

आज की बात शुरू तो हुई थी सुप्रीम कोर्ट के दफ्तर की गड़बडिय़ों को लेकर जो कि खुद मुख्य न्यायाधीश ने उठाई हैं, लेकिन लगे हाथों न्यायपालिका की दूसरी गड़बडिय़ों पर भी यह चर्चा जरूरी थी क्योंकि जनता का विश्वास सरकार की ईमानदारी पर से एक सीमा तक खत्म हो गया है, संसद की ईमानदारी या उसके असर पर खत्म हो गया है, और अगर अदालत पर से भी जनता का विश्वास उठ जाएगा, जो कि आज भी काफी हद तक उठ चुका है, तो फिर जुर्म के राज को कैसे टाला जा सकेगा?
-सुनील कुमार


Date : 25-Jul-2019

मध्यप्रदेश के भोपाल से दिग्विजय सिंह को लाखों वोटों से हराकर सांसद बनने वाली गोडसेवादी साध्वी प्रज्ञा एक बार फिर खबर और आलोचना के घेरे में है। उन्होंने लोगों के बीच और कैमरों के सामने यह कहा कि वे नाली साफ करने के लिए सांसद नहीं बनी हैं, झाड़ू लगाने के लिए सांसद नहीं बनी हैं, वे जिस काम के लिए सांसद बनी हैं उस काम को वे ठीक से करेंगी। देश के अमन-पसंद और समझदार लोगों के बीच पहले से नफरत के लायक मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के बीच भी, या चुनाव प्रचार के बीच ही, गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के प्रति अपनी निष्ठा और भक्ति सार्वजनिक तौर पर कही थी। यह अलग बात है कि उसके कुछ समय बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनकी बात से असहमति जाहिर करते हुए कुछ कड़े शब्द कहे थे, जिस पर कोई अमल होते दिखा नहीं है। फिर वे खबरों में आईं कि वे खुलकर चुनाव प्रचार कर रही हैं, दौड़-भाग कर रही हैं, महिलाओं की किसी जलसे में कुछ नाचते भी दिख रही हैं, लेकिन वे आतंकी हिंसा के मामले में अदालत से इलाज के नाम पर जमानत पर जेल के बाहर हैं, और अदालत की पेशी पर जा नहीं रही हैं, संसद जा रही हैं। 

साध्वी प्रज्ञा की कही यह बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान की बात से मेल नहीं खाती है जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में जमीन पर और नालियों में पड़ी गंदगी को साफ करने को एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी ठहराने की कोशिश की है। यह एक अलग बात है कि उनकी यह कोशिश महज जमीन और नालियों की भौतिक गंदगी तक सीमित रही है, और सोच और बोली की गंदगी के बारे में वे मौन हैं। साध्वी प्रज्ञा ने एक तरफ तो जमीन और नालियों की गंदगी को साफ करने से साफ मना भी कर दिया है, और दूसरी तरफ सोच और बोली की परले दर्जे की गंदगी को फैलाना उन्होंने अपनी जिम्मेदारी मान लिया है। ऐसे में उनकी कही इस ताजा बात के बारे में कहा जा रहा है कि भाजपा की तरफ से नाराजगी जाहिर करते हुए उन्हें समझाईश दी गई है कि वे ऐसी बात न करें। 

लेकिन हम बात पर आते हैं, उसके पीछे के मुंह पर नहीं जाते, तो इसमें अटपटा तो कुछ भी नहीं लगता। लोग अगर सांसद से सड़क और नालियों की गंदगी साफ करने की उम्मीद करते हैं, तो पंचायत-सदस्यों से लेकर शहरी वार्ड मेम्बरों तक की जिम्मेदारी क्या होगी? क्या वे संसद में जाकर देश के व्यापक महत्व के मुद्दों पर चर्चा करके राष्ट्रीय स्तर के कानून बनाने का काम करेंगे? इस बात को ठीक से समझने की जरूरत है कि भारत का निर्वाचित लोकतंत्र तीन सतहों में बंटा हुआ है। राष्ट्रीय स्तर पर संसद है, राज्य के स्तर पर विधानसभा है, और शहर-गांव के स्तर पर म्युनिसिपल-पंचायत हैं। ऐसी व्यवस्था में इन तीनों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, और ठीक से तय भी की हुई हैं। सांसद तो दूर, एक विधायक की जिम्मेदारी भी जमीन और नाली की सफाई की नहीं है। इसका अधिकार और इसकी जिम्मेदारी दोनों ही स्थानीय संस्थाओं की है, और इन्हीं के लिए वार्ड मेम्बर चुने जाते हैं, म्युनिसिपिल-अध्यक्ष चुने जाते हैं, और पंच-सरपंच चुने जाते हैं। 

लोकतंत्र में अगर सारी जिम्मेदारियों को सब पर लाद दिया जाएगा, तो उसका एक असर यह भी होगा कि कोई जिम्मेदारी किसी की नहीं होगी। देश की संसद के सामने जो मुद्दे हैं, जो मुद्दे रहते आए हैं, और जो आगे रहेंगे, उनके बारे में पल भर को सोचें, तो यह साफ होता है कि निर्वाचित सांसदों को अपनी जमीनी-समझ के अलावा भी बहुत सी पढ़ाई-लिखाई करनी है, बहुत सी बातों को समझना है, अपने इलाके के लोगों से लेकर विशेषज्ञ-जानकारों तक से सीखना है, और उसके बाद संसद में चर्चा में, बहस में हिस्सेदारी करनी है। अगर कोई सांसद इस जिम्मेदारी को ठीक से निभाए, तो उनके लिए पांच साल का पूरा कार्यकाल भी काफी नहीं होता है। वे हर दिन लोगों से मिलकर, लोगों की दिक्कतों को समझें, उनमें से संसद में चर्चा के लायक बातों को वहां पर उठाएं, वहां आने वाले विधेयकों की जटिलता को समझकर संविधान संशोधन करें, या नए कानून बनाएं, या मौजूदा कानून सुधारें, यह काम ही किसी सांसद के लिए भारी-भरकम होता है। ऐसे में अगर साध्वी प्रज्ञा ने कहा है कि वे झाड़ू लगाने या नाली साफ करने के लिए नहीं चुनी गई हैं, तो यह बात भाजपा के लिए एक राजनीतिक असुविधा की तो हो सकती है, लेकिन इस बात में गलत कुछ भी नहीं है, जरा सा भी नहीं है। इस बात को पढ़कर साध्वी प्रज्ञा के आलोचकों को निराशा हो सकती है कि उनकी किसी बात को सही करार देने की हमारी क्या बेबसी है। लेकिन जब उनके बयान के दो दिन बाद भी किसी भी पार्टी के किसी सांसद ने उस बात के मतलब पर कुछ नहीं कहा, तो यह चर्चा जरूरी है। 

लोगों को यह अच्छा लगता है कि उनकी छोटी-छोटी बातों के लिए वे अपने सांसद से लेकर विधायक तक, या मुख्यमंत्री की चौपाल तक को शामिल कर लें, और हर जगह से दिक्कत का इलाज पाने की कोशिश करें। लेकिन यह अच्छी नौबत नहीं है क्योंकि इससे लोगों की बुनियादी जिम्मेदारी किनारे रह जाती है, और वे जनता के बीच लुभावने लगने वाले कामों में लग जाते हैं जिनसे वोट प्रभावित हो सकते हैं। ऐसा लुभावनापन अच्छा नहीं रहता है, चाहे वह बहुत सुहावना क्यों न लगे। चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शुरू किया हुआ क्यों न हो, हकीकत यह है कि सफाई की बुनियादी जिम्मेदारी में स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं की रहती है, और उस जिम्मेदारी को देश के बाकी लोग अपने कंधों पर उठाकर खुद तो तस्वीरें खिंचवा सकते हैं, स्थानीय संस्थाओं को जिम्मेदारी का अहसास नहीं करा सकते। लोकतंत्र में जिम्मेदारियों के बंटवारे की हकीकत को किनारे करके शोहरत की हसरत से काम करना अच्छी बात नहीं है।
-सुनील कुमार


Date : 24-Jul-2019

केन्द्र सरकार ने सूचना के अधिकार कानून में कई संशोधन किए, और सत्तारूढ़ एनडीए का जिस तरह का विशाल बहुमत लोकसभा में है, उसके चलते उसे वहां से पास भी करवा लिया। विपक्ष न तो इससे सहमत था, और न ही उसकी आवाज का कोई वजन लोकसभा में रह गया है। लेकिन देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस संशोधन का बड़ा विरोध किया है जिसके बाद सूचना का अधिकार बहुत ही कमजोर हो गया है, और अब सरकारों सहित जो भी संस्थाएं इसके दायरे में आती हैं, वे अपने-अपने भ्रष्टाचार को छुपाने में कामयाब रहेंगी। 

यूपीए सरकार के वक्त जब सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सामाजिक कार्यकर्ता सदस्यों ने उन्हें सहमत कराकर सूचना का अधिकार बनवाया,और लागू करवाया, तब भी किसी राजनीतिक दल के लोग इससे सहमत नहीं थे। क्योंकि बारी-बारी से हर पार्टी की कभी न कभी, कहीं न कहीं सरकार बनती है, और वैसे में उनकी जानकारियां बाहर निकलने पर उनके भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ होता है। आरटीआई लागू होने के बाद से लगातार यह बात सामने आई कि मीडिया या सामाजिक आंदोलनों में सरकार के, दूसरी संस्थाओं के जो भ्रष्टाचार उजागर हुए, वे आरटीआई के बिना नहीं हुए होते। इसे एक क्रांतिकारी-लोकतांत्रिक अधिकार और औजार माना गया, लेकिन राजनीतिक ताकतों ने हमेशा इसे एक हथियार की तरह देखा, जिसका हमला उन पर होता है। अभी कल हुए इस ताजा संशोधन के बिना भी राज्य सरकारों ने और केन्द्र सरकार ने अपने-अपने स्तर पर इस अधिकार को कुचलने की खूब कोशिश की। सरकारी दफ्तरों में जनसूचना अधिकारी की बड़ी जिम्मेदारी यही बना दी गई थी कि वे किस तरह के तकनीकी बहाने ढूंढकर सूचना देने से बचें, या उसमें देरी करते जाएं। ऐसी देरी के खिलाफ जब लोग राज्य के सूचना आयोग तक पहुंचते हैं, तो वहां पर प्रदेश के वही पुराने घुटे हुए रिटायर्ड नौकरशाह बैठे रहते हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सरकार की फाईलों की जानकारी को छुपाते हुए गुजारी है, और जिनकी भरसक कोशिश रहते आई है कि विधानसभा और संसद से भी जानकारी को जितना मुमकिन हो सके छुपाया जाए। ऐसे लोगों को सूचना आयोग में अपील सुनने के जिम्मेदार संवैधानिक पदों पर रखने का एक मतलब यह भी होता है कि इन्हें मनोनीत करके सत्ता अपनी हिफाजत की गारंटी खरीदती है। 

और तो और इस देश की सबसे बड़ी अदालत के जज भी सूचना के अधिकार को कुचलने में अपने जूतों को भी शामिल कर लेते हैं, और जब किसी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की संपत्ति की जानकारी मांगी, तो जजों ने एकमुश्त उस मांग को खारिज किया। यह देश की न्यायपालिका के लिए एक शर्मनाक नौबत थी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अपील पर यह फैसला दिया था कि आरटीआई के तहत जनता को सुप्रीम कोर्ट जजों की संपत्ति जानने का हक है, और जज उससे बच नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ यह फैसला हाईकोर्ट ने दिया था जिससे यह उजागर हुआ था कि अपने निजी हितों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज भी कानून की गलत व्याख्या कर रहे थे। अभी हमारे सामने इसी बरस की 15 फरवरी की एक खबर है जिससे पता लगता है कि जजों की संपत्ति जानने के लिए आरटीआई की एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में 2010 से चली आ रही है, और 2016 में इसे तीन जजों की बेंच से पांच जजों की बेंच को भेज दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के जज अपने आपको जनता की निगाहों से बचाने के लिए राष्ट्रीय सूचना आयोग के आदेश भी खारिज कर रहे हैं। 

जब हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए सूचना का अधिकार एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कानून बनकर सामने आया, उसमें आम जनता को बहुत ही मजबूत लोकतांत्रिक अधिकार दिए, तो यह जाहिर ही था कि सत्ता पर बैठे लोग उसके खिलाफ रहते। ऐसे में एनडीए सरकार ने लोकसभा में इस कानून को कमजोर करके देश भर की अपनी सरकारों के कामकाज को भी जनता की नजरों से दूर और छुपाए रखने का इंतजाम कर लिया है। इससे लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है, अगर लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी यह विधेयक पास होकर कानून बन जाता है।
-सुनील कुमार


Date : 23-Jul-2019

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के एक बयान को लेकर कल से हिंदुस्तानी मीडिया में लोग बौखलाए हुए हैं, और आज सुबह जब संसद शुरू हुई तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इसे लेकर बवाल हुआ। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ कल अमरीकी राष्ट्रपति भवन में बैठक के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में ट्रंप ने बड़े साफ-साफ शब्दों में कहा था कि दो हफ्ते पहले ओसाका की एक बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद पर उनसे (ट्रंप से) मध्यस्थता की अपील थी और ट्रंप ने उसे मंजूर करते हुए कहा कि दोनों पक्ष ऐसा चाहेंगे तो वे मध्यस्थता के लिए तैयार हैं। ट्रंप के पूरे शब्द समाचार में छप रहे हैं इसलिए उनकी पूरी बात को यहां देने का कोई उपयोग नहीं है, लेकिन भारत सरकार ने इस बात का पूरी तरह खंडन किया है कि मोदी ने ट्रंप से ऐसा कोई आग्रह किया हो। दूसरी तरफ एक अमरीकी सांसद ने टं्रप के ऐसे बयान को लेकर भारत के अमरीका में मौजूद राजदूत से माफी मांगी है और कहा है कि ट्रंप का बयान बचकाना, भ्रामक, और शर्मनाक है। इधर भारत में संसद के भीतर और संसद के बाहर लोग टं्रप को कोस रहे हैं।

दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत पहले इंदिरा गांधी के वक्त से इस बात पर सहमति बनी हुई है कि इन दोनों देशों के बीच के परस्पर विवाद आपसी बातचीत से ही निपटाए जाएंगे, और ऐसी द्विपक्षीय बातचीत में किसी तीसरे की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। यह ठोस नीति लगातार जारी है, और मोदी का कोई खंडन आए बिना भी कांगे्रस-यूपीए के विदेश राज्यमंत्री रहे शशि थरूर ने मानो मोदी का बचाव करते हुए कल ही यह बयान दिया है कि यह असंभव है कि मोदी ऐसी कोई बात कहें। जिस तरह ट्रंप ने एक निहायत अटपटी बात कही, तकरीबन वैसी ही अटपटी बात शशि थरूर की है जो कि कांगे्रस के नेता हैं, और जो आज इस मामले में मोदी के कुछ कहने के पहले ही मोदी की तरफ से सफाई देते से दिख रहे हैं। भारत सरकार के पास, मोदी के पास, और मोदी की पार्टी भाजपा के पास बहुत से प्रवक्ता हैं, और वे ट्रंप की बात का खंडन करने की क्षमता रखते हैं, और मोदी का पक्ष रखने का मौका भी जिन्हें हासिल है, लेकिन उन सबसे पहले अगर शशि थरूर ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं, तो यह कांगे्रस के लिए शर्मिंदगी की एक बेतुकी बात है।

जहां तक ट्रंप का सवाल है, तो वॉशिंगटन पोस्ट ने आज ही अपनी एक लिस्ट को अपडेट किया है कि ट्रंप अब तक 10 हजार और कितने-कितने झूठ बोल चुके हैं। ट्रंप के साथ दिक्कत यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति रहते हुए वे परले दर्जे की गैरजिम्मेदारी के साथ बकवास करते हैं, और ट्विटर जैसे सार्वजनिक मीडिया पर खुलकर बकवास लिखते हैं। लोगों को याद नहीं पड़ रहा है कि ऐसा बुरा बोलने और लिखने वाला अमरीकी राष्ट्रपति उन्होंने पहले कब देखा था। लेकिन इन सब बातों से परे अगर अमरीकी राष्ट्रपति भवन की ओर से जो स्पष्टीकरण जारी हुआ है, उसमें ट्रंप की कही गई बात का खंडन नहीं किया गया है, और महज इतना कहा गया है कि अमरीका भारत के इस रूख का समर्थन करता है कि आतंकवाद खत्म होने के बाद ही बातचीत संभव है, और यह कि कश्मीर भारत-पाक का द्विपक्षीय मामला है। इस स्पष्टीकरण में ट्रंप की कही बात के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। 

चूंकि ट्रंप आदतन झूठे, और अकसर बकवास करने वाले नेता हैं, इसलिए लोग पहली नजर में उनकी कही बात को झूठ मान रहे हैं, और मोदी के कुछ कहे बिना ही यह मान रहे हैं कि मोदी ने ट्रंप से ऐसा कुछ नहीं कहा था। फिलहाल संसद में आज नए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ-साफ कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्रंप से ऐसी कोई अपील नहीं की है। इसके साथ ही यह विवाद खत्म हो सकता है, लेकिन यह पूरा सिलसिला एक परले दर्जे की गैरजिम्मेदारी से उपजा हुआ है, और इसने वॉशिंगटन पोस्ट के काऊंटर को एक और गिनती दे दी है। हम भी फिलहाल भारतीय विदेश मंत्री के बयान को सही मानकर बात यहां खत्म कर रहे हैं।
-सुनील कुमार


Date : 22-Jul-2019

छत्तीसगढ़ से लगे हुए, मध्यप्रदेश के डिंडौरी में आवासीय नवोदय विद्यालय में छठवीं की एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली। उसने लिख छोड़ा है कि उसे स्कूल नर्क जैसा लग रहा था, और पहली खबर में स्कूल प्रबंधन ने अपनी गलती मानी है। दरअसल नवोदय एक बिल्कुल अलग किस्म की सोच पर बना हुआ स्कूल है, और देश भर में इसका कई किस्म का बड़ा योगदान है। इसकी वजह से गांव के बच्चे, अनुसूचित जाति-जनजाति के बच्चे, गरीब बच्चे, इन सबको समाज के बाकी तबकों के बच्चों के साथ सबसे अच्छी सरकारी तालीम पाने का एक मौका मिलता है। इसमें दाखिले का इम्तिहान पारदर्शी होता है, और इसकी वजह से देश में धर्म और जाति से परे की एक अलग किस्म की समानता विकसित हो रही है। यह एक अलग बात है कि शिक्षा के मुद्दे पर गंभीर बात करने वाले कुछ लोगों का यह भी मानना है कि देश भर में विपन्न सरकारी स्कूलों के बीच एक संपन्न ढांचे वाले नवोदय की सोच अपने आपमें सामाजिक असमानता की है, और इससे संतुष्ट केन्द्र सरकार बाकी स्कूलों की बहुत मामूली जरूरतों को भी अनदेखा करती है। नवोदय में दाखिले के तरीके को जानने वाले यह कह सकते हैं कि वह एक पारदर्शी व्यवस्था है जिसमें शहरी और ग्रामीण का अनुपात भी है, और आरक्षित वर्गों के लिए भी उनका अनुपात सुरक्षित है। जिन लोगों को नवोदय की अधिक जानकारी नहीं है उनके लिए यह जानना काम का हो सकता है कि छत्तीसगढ़ के एक जिले में नवोदय की 80 सीटों के लिए 40 हजार से अधिक बच्चे दाखिला-इम्तिहान में बैठे थे। लेकिन आज की यह चर्चा इसलिए जरूरी है कि देश भर के नवोदय स्कूलों में बहुत से बच्चों ने अलग-अलग समय पर आत्महत्या की है जो कि बहुत फिक्र की बात है। 

दरअसल कड़े दाखिले इम्तिहान के बाद बच्चे जहां भी पहुंचते हैं, वहां उनमें से बहुत से ऐसे रहते हैं जिनका तनाव आगे की मेहनत में बढ़ जाता है। जो बच्चे आईआईटी पहुंच जाते हैं, लेकिन वहां की पढ़ाई का बोझ नहीं झेल पाते, उनमें से भी बहुत से आत्महत्या कर बैठते हैं। कुछ ऐसा ही हाल नवोदय मेें हो रहा है जहां दाखिले के समय जो बच्चे सही जवाब दे देते हैं लेकिन बाद में पढ़ाई के ऊंचे स्तर में जो कदम मिलाकर नहीं चल पाते, दूसरे बच्चों के साथ हॉस्टल की जिंदगी जिनको माकूल नहीं बैठती, वहां ऐसे बच्चे एक तनाव में रहते हैं। इस हालत का कोई आसान इलाज भी हमको नहीं सूझ रहा है, लेकिन इसके बारे में सोचना जरूर चाहिए क्योंकि आत्महत्या तो खबरों और आंकड़ों में आ जाती है, और दिखती है, लेकिन जो बच्चे आत्महत्या करने के पहले तक के तनाव में जिंदा हैं, उनके बारे में किसी को पता नहीं चलता। राष्ट्रीय स्तर पर समानता की सोच के साथ शुरू किया गया नवोदय विद्यालय पढ़ाई के लिए और राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत अच्छा है, लेकिन वहां सबसे गरीब तबके के, सामाजिक हिसाब से निचले तबके के जो बच्चे पहुंचते हैं, उनको बाकी बच्चों की बराबरी तक लाने के लिए पढ़ाई से परे भी कुछ जरूरत रहती है, और स्कूलों में परामर्शदाता का अनिवार्य रूप से इंतजाम करना चाहिए। चूंकि ये स्कूल केन्द्र सरकार की संपन्नता से सुविधा संपन्न रहते हैं, इसलिए वहां पर परामर्शदाता की सलाह कोई महंगी सलाह नहीं है। दूसरी बात यह कि जब छठवीं क्लास से बच्चों को ऐसी असमानता से आकर एक अलग किस्म की समानता के बीच आगे बढऩा रहता है, तो उन्हें परामर्शदाता की मदद भी मिलनी चाहिए। 

दरअसल इस बात की शुरुआत तो हम नवोदय से कर रहे हैं, लेकिन आईआईटी जैसे उत्कृष्ट शिक्षा के संस्थान भी छात्रों की आत्महत्या बड़ी संख्या में झेल रहे हैं। वहां भी अनिवार्य रूप से परामर्शदाता रहने चाहिए, और नवोदय के मामले खबरों में आने के बाद आईआईटी भी इस बारे में गौर कर सकती है। 


Date : 21-Jul-2019

नवजोत सिंह सिद्धू इस बात की एक अच्छी मिसाल हैं कि लोगों की जुबान किस तरह उनकी दुश्मन बन जाती है। सार्वजनिक जीवन में, और खासकर निर्वाचित राजनीति में लोगों को बोलते हुए गांधी के नाम से प्रचलित इस बात को याद रखना चाहिए कि सच बोलो, लेकिन कड़वा सच मत बोलो। गांधी खुद तो वैसे खासा कड़वा बोलते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने हो सकता है किसी संदर्भ में यह बात कही हो। और भी बहुत से लोग इस बात की वकालत करते हैं कि कड़वा नहीं कहना चाहिए। लेकिन कड़वे से परे भी कई और किस्म की बातें रहती हैं जो सार्वजनिक जीवन में चुनाव लडऩे वाले लोगों को नुकसानदेह हो सकती हैं। जब पाकिस्तान के खिलाफ हिन्दुस्तानियों की भावनाओं को पेट्रोल के चूल्हे पर उबाला जा रहा था, उस वक्त सिद्धू ने पाकिस्तान के बारे में एक सही बात कह दी, लेकिन वह एक नाजुक राजनीतिक मौके पर कही हुई नुकसानदेह बात साबित हो गई। उनके नाम पर ऐसा बवाल खड़ा किया गया कि उन्हें टीवी के एक कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया, और कांग्रेस पार्टी ने भी कुछ अरसे तक उन्हें चुनाव प्रचार से परे रखा। लोगों को याद होगा कि सिद्धू के पहले लालकृष्ण अडवानी भी पाकिस्तान प्रवास के दौरान जिन्ना के बारे में एक बात कहकर ऐसे बवाल में फंसे कि भाजपा के भीतर वे किनारे लग गए। 

जहां तक सिद्धू की बात है तो पंजाब की राजनीति में भी वे भाजपा से कांग्रेस में आए थे, लेकिन पार्टी के भीतर अपनी जगह धीरे-धीरे बनाने के बजाय वे शायद अपने को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान बैठे जिस पर राजीव गांधी को राजीव कहने का रिश्ता रखने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह काबिज थे। इससे सिद्धू को सुर्खियां तो मिलीं, और मीडिया को यह मसाला मिला कि पंजाब सीएम को एक मुकाबला मिला है, चुनौती मिली है। लेकिन धीरे-धीरे सिद्धू के बयान और उनके काम आत्मघाती साबित होते चले गए, और एक बरस के भीतर ही वे पंजाब केबिनेट से भी बाहर हो गए, और अब सरकारी बंगले से भी, टीवी से तो पहले ही बाहर हो चुके थे। 

राजनीति में मंच, माईक, माला, और महत्व सामने देखकर बड़े-बड़े लोग आपा खोने लगते हैं। ऐसे लोगों को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को याद रखना चाहिए जिन्हें न तो आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में देखा जाता, और न ही मीडिया से बात करते हुए। चुपचाप घर पर रहकर वे ऐसा राज चलाते हैं कि देश भर के राज्यों में सेंध लगाने में कामयाब भाजपा को भी इस राज्य में कामयाबी नहीं मिली, और नवीन पटनायक एक बार फिर शानदार तरीके से सरकार में लौटे हैं। उनकी कही हुई कोई भी बात आज तक उनके खिलाफ नहीं गई है, और अपनी चुप्पी से उन्हें फायदा ही हुआ है। दूसरी तरफ इसी दौरान अपने बयानों की वजह से कई पार्टियों के कई नेता ठिकाने लग गए, उनका राजनीतिक भविष्य खत्म हो गया। 

यह बात कुछ नेताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि चुनावी राजनीति में सक्रिय सारे ही लोगों पर लागू होती है, और लोगों को इससे नसीहत लेना चाहिए। हम छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश समेत देश के बहुत से राज्यों के, कई पार्टियों के कई नेताओं को देखते हैं जो कि बेवक्त बेअक्ल बात करने को अपनी कामयाबी मानते हैं। लालकृष्ण अडवानी और नवजोत सिंह सिद्धू की तस्वीरें सभी नेताओं के अपने टेबिल पर कांच के नीचे लगाकर रखना चाहिए, इससे वे पटरी से उतरने से बच सकते हैं, कुर्सी से उतरने से भी। 
-सुनील कुमार


Date : 20-Jul-2019

छत्तीसगढ़ सरकार ने कल एक बड़ा फैसला लिया है, और राज्य में जमीनों के सरकारी रेट में तीस फीसदी की कमी कर दी है। इससे लोगों को रजिस्ट्री ऑफिस में लगने वाले सरकारी टैक्स में कमी आएगी, लेकिन इसकी भरपाई सरकार रजिस्ट्री का रेट बढ़ाकर कर ले रही है। दूसरी तरफ जमीन-जायदाद की बिक्री पर होने वाली कमाई पर आयकर विभाग जो कैपिटल गेन टैक्स लेता है उसमें भी लोगों को राहत मिलेगी। आज होता यह है कि कई इलाकों में सरकारी रेट बाजार भाव से खासा अधिक तय कर दिया गया है। सरकार रजिस्ट्री शुल्क तो सरकारी रेट के आधार पर लेती ही है, आयकर विभाग भी सरकारी रजिस्ट्री रेट के हिसाब से कैपिटल गेन गिनता है, और राजधानी रायपुर के कई इलाके ऐसे हो गए हैं जहां जमीन बेचने पर लोगों को अपनी जेब से आयकर को भुगतान करना होगा, उनके घर कुछ भी नहीं आएगा। 

पिछले कुछ बरसों में छत्तीसगढ़ के जमीन-जायदाद के बाजार ने सबसे ही बुरा दौर देखा है। बाजार ठप्प हो गया है, जिनको अपनी जमीन बेचने की मजबूरी है, उनको बाजार भाव से आधे भाव पर बेचना पड़ रहा है। ऊपर से सरकार कलेक्टर के तय किए हुए रेट से रजिस्ट्री शुल्क ले रही है, और कैपिटल गेन टैक्स पटाने के बाद लोगों के पास बहुत कम पैसा बच रहा है। यह सिलसिला खत्म करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने तमिलनाडू की एक मिसाल इस्तेमाल की है जहां पर सरकारी रेट को गिराने से जमीनों का कारोबार बढ़ा था, लोग एक नंबर के पैसे से रजिस्ट्री करवाने लगे थे, और राज्य सरकार को कुल मिलाकर बढ़े हुए शुल्क और बढ़े हुए कारोबार से कमाई बढ़ गई थी। आज हालत यह है कि एक बिल्कुल ही झूठे सरकारी रेट के चलते बाजार ठप्प पड़ा है, लोग बिना रजिस्ट्री मुख्तियारनामे से काम चला रहे हैं, और आयकर विभाग लोगों के पीछे लाठी लेकर पड़ा हुआ है। राज्य सरकार का यह फैसला सभी लोगों के फायदे का है, और इससे जमीन-जायदाद के धंधे से दो नंबर की रकम भी काफी कम होगी, और ऐसा लगता है कि कारोबार बढऩे से आयकर विभाग को भी भरपाई हो ही जाएगी। आज राज्य में सबसे बड़ा नुकसान यह था कि राज्य सरकार बिना कुछ कमाए अपने नागरिकों पर आयकर विभाग का अंधाधुंध बोझ डालकर केन्द्र सरकार की कमाई बढ़ा रही थी, और राज्य का कारोबार ठप्प हो गया था। 

राज्य सरकार के इसी रूख के अनुरूप कुछ फैसले और लिए जाने चाहिए। जमीनों का किस इलाका में कैसा उपयोग हो इसे नया रायपुर के इलाके में राज्य सरकार ने पिछले बरसों में एक तानाशाह के अंदाज में काबू कर रखा है जिससे वहां की जमीनें बिक नहीं पा रही हैं, लोगों को दाम नहीं मिल रहा है, जिनकी जमीनें हैं वे अपने मकान तक नहीं बना पा रहे हैं। नया रायपुर में सरकारी मकानों को बेचने, और सरकारी प्लाट बेचने के लिए सरकार ने निजी जमीनों पर प्रतिबंधों की एक पूरी फेहरिस्त ही लाद दी थी। जब तक किसी के पास कई हेक्टेयर जमीन न हों, वे वहां पर अपना खुद का मकान भी नहीं बना सकते। रमन सरकार के समय भी हमने इसी कॉलम में कई बार इस मनमानी के खिलाफ लिखा था, और भूपेश सरकार को इस तरफ गौर करना चाहिए। संविधान में अपनी संपत्ति के उपयोग का जो बुनियादी हक दिया गया है, उसके भी खिलाफ जाकर नया रायपुर विकास प्राधिकरण ने ऐसे नियम बनाए थे कि कई हेक्टेयर जमीन के मालिक भी वहां अपना घर भी नहीं बना सकते। आज नया रायपुर का पूरा इलाका मरघटी-सन्नाटे से घिरे रहता है, और इस नौबत को अगर बदलना है, सरकार को सिर्फ अपने खर्च से परे, नागरिकों को भी नया रायपुर में बसाना है, तो उसे अपने तानाशाह प्रतिबंधों को खत्म करना होगा, और शहरी विकास की योजनाओं के बुनियादी नियमों तक अपनी मनमर्जी को सीमित रखना होगा। इस शहर और इस प्रदेश के विकास में जमीन-जायदाद और मकान-दुकान की खरीद-बिक्री के कारोबार का बड़ा योगदान रहा है, और उसके खिलाफ नियमों का जाल बिछाकर सरकार कुछ हासिल नहीं कर पा रही है। बाजार व्यवस्था के ठीक खिलाफ जाकर सरकार क्या हासिल करती है यह देखना हो तो हाऊसिंग बोर्ड को देखना चाहिए जो सरकार की खुद की एजेंसी है, और सरकार से मुफ्त में मिली जमीन के बावजूद आज उसके हजारों करोड़ के निर्माण खंडहर होते जा रहे हैं। सरकार ने नया रायपुर के इलाके में सरकारी मकान-जमीन की बिक्री बढ़ाने के लिए निजी निर्माण और निजी उपयोग पर रोक लगा दी, न निजी निर्माण हुआ, और न ही सरकार का निर्माण बिका। छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले बरसों में नया रायपुर को एक नियंत्रित टापू बना लिया था, और बाकी जनता, बाकी दुनिया से उसे काट दिया था। इस तरह कोई भी कारोबार नहीं चलता, चाहे वह निजी हो, चाहे सरकारी। इसलिए राज्य सरकार को अगर नया रायपुर नाम के मरघट को बसाना है, तो उसे वहां के घोषित हजारों एकड़ के इलाके पर लादे गए अपने निहायत-नाजायज नियमों को खत्म करना होगा। 
-सुनील कुमार


Date : 19-Jul-2019

कानूनी मुद्दों का अध्ययन करने वाले देश के एक गैरसरकारी संगठन, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी, ने एक अध्ययन में यह पाया है कि सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले पिछले सौ जजों में से 70 ऐसे हैं जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद केन्द्र या राज्य सरकारों के मनोनीत पद संभाले हैं। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात जो सामने आई है वह यह है कि इन पदों में से आधे से अधिक ऐसे हैं जिनमें संवैधानिक जरूरत ही सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की है। ऐसी शर्त की वजह से ही रिटायर्ड जज ही इन पदों पर रखे जा सकते हैं, हालांकि मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज को राज्यपाल भी बनाया जो कि उस कुर्सी की कोई शर्त नहीं थी। 

ये आंकड़े कुछ चौंकाने वाले हैं, और जब सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिटायर होने के बाद कई बरस तक उसी दर्जे की सहूलियतें, और मोटी तनख्वाह मिलने की एक गुंजाइश रहती है, तो जाहिर है कि जज की कुर्सी पर बने रहते वक्त यह संभावना अनदेखी तो नहीं रहती होगी, और जैसा कि आम मानवीय स्वभाव रहता है, हो सकता है कि जजों के कुछ फैसले सरकार में बैठे हुए लोगों की पसंद और प्राथमिकता को देखते हुए भी प्रभावित होते हों, क्योंकि रिटायर्ड जजों में से किसे किसी कुर्सी पर बिठाना है, या किसे बस बिदा ही कर देना है, यह फैसला तो सरकार में बैठे लोग ही लेते हैं। और यह बात महज जजों के साथ नहीं है, और महज केन्द्र सरकार के साथ नहीं है, राज्यों में भी ऐसा होता है, और रिटायर्ड अफसरों की नजरें राज्य की कई संवैधानिक, और दूसरी महत्वपूर्ण-ताकतवर कुर्सियों पर पहले से लग जाती हैं, और उनके फैसले उन सत्तारूढ़ लोगों को खुश रखने के हिसाब से होने लगते हैं जिन्हें इन ओहदों पर चेहरे बिठाने होते हैं। हम इसी जगह बहुत बरसों से लिखते आ रहे हैं कि राज्य के भीतर रिटायर होने वाले जजों और अफसरों को उसी राज्य में किसी कुर्सी पर रिटायरमेंट के बाद नहीं बिठाना चाहिए। अगर कोई संवैधानिक जरूरत है, या राज्य के हित में किसी अनुभवी की जरूरत है, तो उसके लिए राज्य के बाहर से अर्जियां बुलवानी चाहिए, और राज्य का न होना एक अनिवार्य शर्त रखनी चाहिए। 

जहां कहीं भी इंसाफ की बात होती है, एक पैमाना सबसे पहले लागू किया जाता है, हितों के टकराव का। किसी अदालत में कोई जज ऐसा कोई मामला नहीं सुन सकते जिससे वे बीते हुए कल या आज किसी भी तरह से जुड़े हुए हों। ठीक इसी तरह सरकार में कोई फैसला लेने वाले लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि उनसे संबंधित लोगों के मामले हों, तो वे अपने को फैसले से अलग कर लें। ऐसा ही हाल सरकार के मनोनीत लोगों का रहता है चाहे वे जज हों, चाहे अफसर हों। अगर वे रिटायर होने के बाद लाभ और सहूलियत का कोई पद लेते हैं, तो जाहिर है कि पहले उनके कामकाज से खुश सरकार ही ऐसा फैसला लेगी, और सरकार की यह खुशी आमतौर पर सरकार में बैठे लोगों की निजी खुशी होती है, न कि जनहित की खुशी। 

अगर कोई ऐसी जनहित याचिका लेकर अदालत भी जाए, तो भी उसकी सुनवाई में हमें शक है क्योंकि सुनने वाले जजों को भी रिटायर होने के बाद पुनर्वास की संभावना अच्छी ही लगती है, वे भला ऐसे नियम क्यों लागू करना चाहेंगे जिससे उनकी अपनी संभावनाएं खत्म हो जाएं। केन्द्र सरकार के स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के जजों की अनिवार्यता वाले पदों का कोई आसान हल अभी हमें नहीं सूझ रहा है, लेकिन राज्यों के मामले में तो यह तुरंत लागू हो सकता है, और होना चाहिए, कि किसी राज्य में काम कर चुके जज और अफसर उस राज्य में कहीं मनोनीत न हो सकें। तंग दायरे में पसंद करने से बेहतर यही होगा कि राज्य सरकारें देश भर से काबिल लोगों की अर्जियां बुलवाएं, और लोगों को नियुक्त करें। दूसरी बात केन्द्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति को भी केन्द्र सरकार के एकाधिकार से बाहर निकालना चाहिए, और ऐसी नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों, बार एसोसिएशन के प्रतिनिधि, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता, जैसे लोगों को शामिल करना चाहिए।

इनके अलावा एक दूसरी प्रक्रिया लोगों को जज बनाते हुए, या रिटायर्ड जजों को किसी पद पर बिठाते हुए अपनाने की वकालत हम पहले भी कर चुके हैं। अमरीका में किसी भी बड़े संवैधानिक पद पर किसी की नियुक्ति के पहले संसद की कमेटी के सामने उसकी खुली सुनवाई होती है, और कई-कई दिन तक ऐसे लोगों से बहुत से सवाल किए जाते हैं जो कि विचारधारा, प्रतिबद्धता, पसंद-नापसंद से लेकर उनकी निजी जिंदगी के विवादास्पद मुद्दों तक पर पूछे जाते हैं। हिन्दुस्तान में भी ऐसी प्रक्रिया बहुत से मनोनयन के पहले अपनानी चाहिए, और इससे सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता आएगी, जवाबदेही बढ़ेगी। जब कोई पसंद महज सत्ता पर छोड़ दी जाती है, तो उसके अच्छे होने की संभावना घट जाती है। 
-सुनील कुमार


Date : 18-Jul-2019

अयोध्या मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का यह रूख सामने आया है कि इसकी सुनवाई करने वाले जज अगर रिटायर भी हो जाते हैं, तो भी वे इस केस के खत्म होने तक जज बने रहेंगे, और सुनवाई करते रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट की कही हुई यह बात खबरों में सामने आई है, और कभी-कभी ऐसा भी होता है अदालतें अपनी कही हुई बातों को किसी आदेश या फैसले में शामिल नहीं करती हैं, या कभी-कभी फैसले में फेरबदल भी कर देती हैं। जो भी हो, आज तो हम यहां यह मानकर लिख रहे हैं कि अदालत इस बार अयोध्या के बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद को निपटाने के इरादे में दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट का यह रूख अच्छा है कि अयोध्या की सुनवाई करने वाले जज फैसले तक रिटायर नहीं होंगे, क्योंकि नए जजों के आने पर मामले की फिर से सुनवाई भी होने लगती है। और हो सकता है कि अदालत का यह रूख ऐसे कुछ और मामलों में भी काम का साबित हो, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने अभी हाल में ही प्रधानमंत्री को लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ानी चाहिए क्योंकि अदालतों में कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और मामलों के पहाड़ खड़े हुए हैं। 

मामला आजादी के पहले से हिन्दू और मुस्लिम लोगों के बीच झगड़े और दावे की शक्ल में चले आ रहा है, और अंग्रेज सरकार से होते हुए वह आजादी के बाद नेहरू सरकार के सामने भी रहा, और अदालत में इसे ले जाने वाले लोगों में से भी कुछ लोग मर-खप गए हैं। ऐसे में इस विवाद का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने वाले लोगों को इसकी शक्ल में एक बहाना मिलता है, और वे हर चुनाव में, या हर मौके पर इसका बेजा इस्तेमाल करते हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को हिम्मत जुटाकर, दिल कड़ा करके इस मामले को निपटाना चाहिए। इस बारे में यह समझ लेना जरूरी है कि यह किसी धार्मिक आस्था के झगड़े के निपटारे का मामला नहीं है, यह महज जमीन पर मालिकाना हक का मामला है। 

लंबे समय तक हिन्दुस्तान में बहुत से अमन-पसंद लोग यह मानते रहे कि इस मामले का कोई अदालती इलाज न निकालना ही सबसे बेहतर इलाज है। ऐसे लोग किसी फैसले के आने पर देश में सामने आने वाले तनाव की सोचकर इसे टालना चाहते थे। लेकिन उस टालने से इस मुद्दे के राजनीतिकरण का खतरा एक हकीकत बन गया, और लगातार देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के बीच यह भावना फैलाई गई कि अदालत फैसला इसीलिए नहीं दे रही है कि वह बहुसंख्यक आबादी को नाराज करने का खतरा उठाना नहीं चाहती। दूसरी तरफ अनगिनत हिन्दू पार्टियां, और संगठन लगातार ऐसे आक्रामक बयान देते रहे कि फैसला चाहे जो हो उस जगह पर मंदिर बनकर रहेगा। मंदिर वहीं बनाएंगे, इस नारे के साथ बाबरी मस्जिद को पहले तो गिराया गया, और फिर कहा गया कि वहां कभी मस्जिद थी ही नहीं। कुल मिलाकर देश में लगातार चौथाई सदी से अधिक वक्त से ऐसा माहौल बना हुआ है कि वहां पर मंदिर बनना देश के लिए सबसे जरूरी मुद्दा है, और रामलला को एक भव्य मंदिर मिल जाने से देश की तमाम दिक्कतें खत्म हो जाएंगी। 

लेकिन ऐसी किसी भी योजना या साजिश से परे, हमारा सोचना यह है कि लोकतंत्र में अदालतों को अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए, और नाजुक मुद्दों को अंतहीन टालते रहना कोई चतुराई नहीं है। दुनिया में बड़े-बड़े लोकतंत्र कई किस्म के तनाव झेलते हैं, और ऐसे तनावों से गुजरकर ही कोई लोकतंत्र मजबूत हो सकता है। इसलिए अयोध्या के विवाद को निपटाकर, और उसके बाद अगर कोई तनाव होता है तो उस तनाव से कड़ाई से निपटकर ही भारत अपने आपको एक जिम्मेदार और परिपक्व लोकतंत्र साबित कर सकेगा। अराजक मवालियों की भीड़ से डरकर कोई लोकतंत्र नहीं चल सकता। 
-सुनील कुमार


Date : 17-Jul-2019

दुनिया में आए दिन सरकारी या समाजसेवी संगठनों के खर्च से कोई न कोई बैठक या कांफ्रेंस चलती ही रहती है। जो लोग इन पर समय गंवाने में अधिक भरोसा नहीं करते, उन्हें भी बीच-बीच में कभी शिष्टाचार के चलते, तो कभी किसी और वजह से इनमें जाना पड़ता है। और जो लोग समाज में जितने अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, उनमें से अधिकतर को उतनी ही अधिक बैठकों में शामिल होना पड़ता है। इस तरह कुल मिलाकर बैठकें अपरिहार्य हैं, जिनसे बचा नहीं जा सकता, और जिनके बारे में यह सोचना बेहतर होगा कि उन्हें अगर होना ही है, तो इस तरह इनकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। 

किसी बैठक में अगर किसी नेता या बड़े अफसर को आना है, तो यह खतरा बने रहता है कि वे देर से आकर उन तमाम लोगों का वक्त बर्बाद करें जो आदतन समय पर पहुंचते हैं, और अक्सर ही अपने वक्त की ऐसी बर्बादी झेलते हैं। इसके बाद जब सबसे ऊंची कुर्सी पर कोई काबिज हो चुके रहते हैं, तो स्वागत का सिलसिला शुरू होता है जिसमें तमाम किस्म के झूठे विशेषणों के साथ खासी मात्रा में चापलूसी मिलाकर मौजूद बड़े लोगों को उनके असल कद से और बहुत बड़ा दिखाते हुए फूलों को बर्बाद किया जाता है। यह सिलसिला खत्म होने के बाद जब काम की कोई बात शुरू होने का मौका आता है तो बोलने वालों में से जो जितने बड़े होते हैं, वे यादों में उतना ही गहरा गोता लगाते हैं, और सुनने वालों पर अपने संस्मरणों का गैरजरूरी पानी उलीच देते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी सम्मेलन या बैठक का मुद्दा धरे रह जाता है, और बोलने वाले वही बोलते हैं जो अपनी जिंदगी के बारे में वे बोलना तय करके आते हैं, फिर चाहे कांफ्रेंस के बैनर पर कोई भी विषय लिखा हो। बड़े लोगों की यादों के बड़े और लंबे कारवां को बाकी लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनने का नाटक करते हैं, और जिन्हें ऐसे नाटक में कोई दिलचस्पी नहीं होती उनका वक्त और बर्बाद होते चलता है। हालांकि यादों की बारात देखते हुए सिर हिलाने और आखिर में तालियां बजाने का मौका चापलूसों या मातहतों के लिए खासा मायने रखता है, और वे उसे चूकना नहीं चाहते। 

किसी बड़ी बैठक या सम्मेलन में हर किसी के बोलने का वक्त भी तय रहता है, लेकिन जब लोग बोलना शुरू करते हैं, तो वे यह मानकर चलते हैं कि उनकी कही बातें इतना मायने रखती हैं कि मौजूद लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे दुगुने वक्त तक उन्हें सुनें। नतीजा यह होता है कि विषय की गाड़ी पटरी से ऐसे उतरती है कि कोई एक व्यक्ति ऐसे इंजन-डिब्बों को उठाकर फिर पटरी पर ला भी नहीं पाते। दिक्कत यह होती है कि जिन लोगों को अमूमन मंच और माईक पर से बोलना होता है, उन्हें कभी बोलना सिखाया नहीं जाता, कभी रोका-टोका नहीं जाता, और नतीजा यह होता है कि वे अपने कहे में मुद्दे की बात से परे खासी बर्बादी अपने वक्त की भी करते हैं, और बाकियों के वक्त की भी। आमतौर पर कांफ्रेंस टीवी पर चल रहे उस अकेले चैनल जैसी हो जाती है जिसमें आगे शायद कुछ जरूरी आएगा मानकर बहुत सारा कूड़ा बर्दाश्त करना होता है। 

कम से कम सरकारों को, और राजनीतिक संगठनों को अपने लोगों को चुस्त, प्रासंगिक, और रोचक बोलना सिखाना चाहिए ताकि वे सरकार, पार्टी, या किसी और संगठन का नजरिया ठीक से सामने रख सकें। कुछ संगठन अपने सदस्यों के लिए मंच पर से बोलना सिखाने की ट्रेनिंग रखते हैं, और सरकार में भी, राजनीतिक दलों में भी ऐसी ट्रेनिंग जरूरी है। टीवी पर राजनीतिक दलों के बहुत से ऐसे औसत प्रवक्ता या प्रतिनिधि पहुंच जाते हैं जो कि यादों और संस्मरणों की नाव पर बहस को पार कर लेना चाहते हैं। कुछ बड़े वकील अपनी पार्टियों की बात को रखते हुए उसे ऐसा जटिल कानूनी बनाने में जुट जाते हैं कि मानो किसी छोटी अदालत के साधारण ज्ञान वाले जज को अपने ज्ञान के आतंक से दहशत में ला रहे हों। जनता के बीच न तो गैरजरूरी यादों का कोई असर होता, न ही गैरजरूरी तकनीकी-तर्कों का। इसलिए किसी कांफ्रेंस या बैठक से लेकर प्रेस कांफ्रेंस या टीवी बहस तक तमाम लोगों को यह सीखना और सिखाना चाहिए कि सीमित समय में मुद्दे की बात कैसे कही जाए, और कैसे महज मुद्दे की बात कही जाए। पटरी से उतरकर बोलना किसी मौके को बर्बाद करने से कम नहीं रहता। ऐसी बहुत सी कतरा-कतरा बातें हैं जो कि लोगों का वक्त बर्बाद होने से बचा सकती हैं, और लोगों की कही बातों को असरदार भी बना सकती हैं। चापलूस विशेषणों के सैलाब से लेकर यादों की बारात तक, सबमें भारी कटौती की जरूरत है, और यह बात हर संगठन को, हर सरकार को अपने लोगों को खूब अच्छी तरह सिखाना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 16-Jul-2019

छत्तीसगढ़ के बस्तर के लगातार जीतने वाले एक कामयाब आदिवासी विधायक कवासी लखमा को राज्य की भूपेश बघेल सरकार ने जब मंत्रिमंडल की पहली लिस्ट में ही रखा, तो उस समय भी यह सवाल उठा था कि वे लिखना-पढऩा नहीं जानते हैं, और ऐसे में मंत्री की जिम्मेदारियां किस तरह पूरी कर पाएंगे? इसके बाद से विधानसभा की कार्रवाई उनके विभागों से जुड़े सवालों पर दूसरे मंत्री जवाब देते आए हैं। कवासी लखमा की समझ, उनका तजुर्बा, और उनकी राजनीतिक क्षमता पर किसी को शक नहीं है, लेकिन मंत्री के पद से जुड़ी हुई कुछ ऐसी जिम्मेदारियां होती हैं जो कि फाईलों और कागजों से होते हुए विधानसभा या अदालत में जवाब देने तक खड़ी रहती हैं। ऐसे में यह सवाल उठाना नाजायज नहीं होगा कि क्या सत्तारूढ़ पार्टी उनके लिए कोई ऐसी भूमिका तय नहीं कर सकती थी कि जिससे वे अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए आज की तरह असुविधा से नहीं गुजरते?

किसी जननेता का अकेला सम्मान मंत्रीपद नहीं होता, उसे महत्व देने के लिए सत्ता और संगठन में कई किस्म के काम हो सकते हैं। कुछ मामलों में मंत्रिमंडल में बिना विभागों वाले मंत्री भी रखे जाते हैं, जिनकी क्षमता का इस्तेमाल फाईलों से परे भी किया जाता है। आज कवासी लखमा को आबकारी विभाग देखना होता है जो कि राज्य में सबसे बड़ी कमाई वाला विभाग है, जो परंपरागत रूप से सबसे अधिक भ्रष्ट भी रहते आया है, और जिस विभाग से जुड़े दारू कारोबारी राज्य की राजनीति में अपनी थैलियों से सबसे अधिक दखल भी रखते हैं। जाहिर है कि ऐसे विभाग को चलाते हुए सिर्फ एक मजबूत समझ काफी नहीं हो सकती, उसके लिए फाईलों को पढऩा, उनको समझना, उन पर लिखना भी जरूरी होता है। कल को अगर इस विभाग की फाईलों को किसी अदालत में खड़ा होना पड़े, तो यह बात एक मुद्दा बन सकती है कि मंत्री ने जब पढ़कर समझा नहीं है, तो उन्होंने उस पर दस्तखत कैसे किए? और यह बात अदालत में सरकार के खिलाफ जा सकती है। कवासी लखमा को वाणिज्य और उद्योग जैसे विभाग भी दिए गए हैं जो कि कारोबारियों से, उद्योगपतियों से, और पूंजीनिवेशकों से जुड़े रहते हैं। वैसे तो किस मंत्री को क्या विभाग दिए जाएं, यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार माना जाता है, लेकिन इन विभागों को कवासी लखमा को देने से एक ऐसी छवि भी बनती है कि इनको अफसरों के मार्फत ही चलाया जा रहा है। यह नौबत ठीक नहीं है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल भी नहीं है कि निर्वाचित नेता अफसरों के किए हुए पर महज दस्तखत करें या अंगूठा लगाएं।

कवासी लखमा जितनी बार मुश्किल बस्तर के आदिवासी इलाके से जीतकर आए हैं, उन्हें सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार में एक बड़ा महत्व मिलना जायज और जरूरी है। लेकिन यह महत्व मंत्रीपद के मौजूदा ढांचे में फिट नहीं बैठ रहा है। मुख्यमंत्री चाहें तो उन्हें अपने बंगले पर लगने वाली जनचौपाल का प्रभारी बना सकते हैं जहां वे लोगों की बातें सुनकर अधिकारियों को जुबानी निर्देश दे सकते हैं, और किसी फाईल पर दस्तखत करने की मजबूरी भी नहीं रहेगी। हम किसी भी तरह से समझ को ज्ञान के नीचे नहीं मान रहे, लेकिन मंत्रीपद की कुछ जिम्मेदारियां पढ़े-लिखे बिना पूरी नहीं हो सकतीं। राज्य सरकार ने मंत्री स्तर का दर्जा देने के कई प्रावधान हैं और उनका इस्तेमाल करके कवासी लखमा का सम्मान बरकरार रखा जा सकता है, और सरकार शासकीय कामकाज को नियमों के मुताबिक करने की अपनी जिम्मेदारी भी निभा सकती है। आज जिस तरह से उनसे काम लिया जा रहा है यह किसी दिन उन्हीं के खिलाफ कानूनी दिक्कत खड़ी कर सकता है। ऐसी नौबत से सबको बचना चाहिए, और किसी के पढऩे-लिखने की कमी को मजाक या कानूनी परेशानी का मुद्दा नहीं बनने देना चाहिए। सत्तारूढ़ पार्टी अपने संगठन में, या सरकार में कवासी लखमा की क्षमता के अनुरूप कोई दूसरी जिम्मेदारी ढूंढे।
-सुनील कुमार


Date : 15-Jul-2019

उत्तरप्रदेश के एक ब्राम्हण भाजपा विधायक की बेटी ने मर्जी से एक दलित लड़के से शादी की, और उसके बाद एक वीडियो बयान जारी किया कि अपने विधायक पिता से उसे और उसके पति को जान का खतरा है। विधायक ने इसका खंडन किया, और कहा कि उनसे किसी को खतरा नहीं है। लेकिन सुरक्षा मांगते हुए जब यह नवविवाहित जोड़ा हाईकोर्ट पहुंचा, तो आज वहां हाईकोर्ट के अहाते में ही उनसे मारपीट हुई। इस पर हाईकोर्ट ने विधायक को चेतावनी भी जारी की है, और पुलिस को हिफाजत देने के लिए कहा है। सोशल मीडिया इस पर दो खेमों में बंट गया है, एक खेमा यह मानता है कि जिस पिता ने लड़की को बड़ा किया, उसके खिलाफ ऐसी बदनामी करना बेटी की एक नाजायज हरकत थी। दूसरा खेमा यह मानता है कि इस लड़की को अपने लिए खतरे को समझने और उससे हिफाजत मांगने का पूरा हक है। चूंकि ऐसे कई मामले हाल के दिनों में सामने आए हैं, और कल ही छत्तीसगढ़ में एक पेड़ से टंगा हुआ एक जोड़ा मिला भी है जिसकी शिनाख्त नहीं हो पाई है, इसलिए इस मुद्दे पर लिखना जरूरी है। 

देश भर मेें कई जगहों पर ऐसे जोड़ों के साथ हिंसा होती है, जगह-जगह हत्याएं हो रही हैं, और बहुत से परिवार ऐसा कत्ल करके फख्र भी हासिल करते हैं, इसलिए अगर किसी ने सोशल मीडिया पर खतरे की आशंका जाहिर करते हुए अदालत से हिफाजत मांगी है, तो वह एक कारगर तरीका दिख रहा है। और भी जोड़े इस तरह का काम कर सकते हैं कि अपने बयान के साथ अदालत से हिफाजत मांगें, और फिर उन पर हिंसक हमले का इरादा रखने वाले लोगों के हौसले कुछ पस्त हों। यह सिलसिला बहुत जल्द खत्म इसलिए नहीं होने वाला है कि भारत की कट्टर जाति व्यवस्था के बीच अपनी बेटी किसी दलित के घर जाते हुए देखने के बजाय बहुत से सवर्ण मां-बाप उसे मार डालना बेहतर समझते हैं, या ऐसे लड़कों को मार डालना बेहतर समझते हैं जो कि उनकी लड़की से शादी की हिम्मत करते हैं। एक तरफ तो देश का कानून यह कहता है कि अनुसूचित जाति या जनजाति में इन जातियों से बाहर के लोग अगर शादी करते हैं, तो उन्हें सरकार की तरफ से नगद सहायता भी मिलती है। दूसरी तरफ इनकी हिफाजत मुश्किल हो चली है। 

जिस तरह बहुत सी सामाजिक कट्टरता को खत्म करने के लिए कानून की जरूरत पड़ते आई है, उसी तरह आज अंतरजातीय, या विधर्मी विवाह के लिए, प्रेम-विवाह के लिए बालिगों को एक अलग से हिफाजत देने का कानून न सही, सुप्रीम कोर्ट का आदेश जरूरी है जिसे मानना देश भर की पुलिस के लिए एक बाध्यता होगी। एक ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे ऐसे जोड़े जिले के कलेक्टर या एसपी को एक हलफनामा दें, और उसके बाद उनकी खतरे की आशंका को दर्ज किया जाए, वे जिनसे खतरा बता रहे हैं उन्हें बुलाकर सावधान कर दिया जाए कि किसी हमले के होने पर वे खतरे में फंसेंगे। आज देश में ऐसी हिंसा की घटनाएं तो कम होती हैं, लेकिन मर्जी से शादी न होने पर आत्महत्याएं खासी अधिक होती हैं, और नौजवान पीढ़ी का एक हिस्सा कुंठा में जीता है। आज जब 21वीं सदी में सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में लोगों के लिए बच्चे पैदा करने के लिए भी शादी की बंदिश नहीं रह गई है, जहां जाति और धर्म मायने नहीं रखते हैं, जहां समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी मिली हुई है, वहां आजादी की पौन सदी गुजर जाने पर भी हिन्दुस्तान एक खाप पंचायत की तरह बर्ताव कर रहा है। यह एक अच्छी बात है कि यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा है, और इसे लेकर एक कानूनी व्यवस्था लागू होनी चाहिए जो कि लोगों को हिफाजत दे सके, और बालिगों को मर्जी से शादी का मौका दे सके। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Jul-2019

छत्तीसगढ़ में इन दिनों अंडे को लेकर एक विवाद चल रहा है कि स्कूलों में दोपहर के भोजन में बच्चों को अंडा दिया जाए, या नहीं? हिन्दू समाज के एक बहुत छोटे हिस्से, और जैन समाज को अंडे से परहेज है। कुछ लोगों का परहेज पिछले कुछ दशकों में घट गया है क्योंकि अंडे के हिमायती बताते हैं कि अब वह मांसाहारी नहीं रह गया क्योंकि अब उससे बच्चे नहीं निकलते, इसलिए वह शाकाहारी हो चुका है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में यह विरोध एक बिल्कुल ही अलग तबके की तरफ से शुरू हुआ है, कबीरपंथियों की तरफ से। अंडे का विरोध जैन या ब्राम्हण करते, या मारवाड़ी करते तो वह अधिक स्वाभाविक लगता, लेकिन कबीरपंथियों की तरफ से यह विरोध लोगों को थोड़ा चौंका गया है, इसकी एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि संपन्न शहरियों को शायद कबीरपंथ में प्रचलित मान्यताओं की जानकारी कम थी। 

खैर, जो भी हो, आज मुद्दा यह है कि स्कूली बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए उन्हें दोपहर के भोजन में अंडा देना ठीक है, या नहीं? मामला थोड़ा जटिल है। स्कूलों के भोजन में एक समय इस बात को लेकर एक तबके का विरोध चल रहा था कि खाना पकाने के लिए किसी दलित महिला को न रखा जाए। फिर हिन्दुस्तान के कुछ हिस्सों में कुछ समय तक यह विरोध भी चला कि सवर्ण बच्चे दलितों बच्चों के साथ एक पंगत में बैठकर कैसे खाएंगे? और कैसे उन्हीं थालियों का इस्तेमाल करेंगे जो कि पिछले दिन जाने किस जाति के बच्चे ने इस्तेमाल की होगी। यह मामला अब कम से कम अधिक जगहों पर तो सुनाई नहीं पड़ता है, और सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले, आमतौर पर गरीब बच्चे सभी बिना किसी जाति-धर्म के हल्ले के, किसी का भी पकाया हुआ, किसी के भी साथ बैठकर खाने लगे हैं। एक समाजशास्त्री का यह निष्कर्ष था कि भिलाई जैसे कारखाने वाले शहर में सार्वजनिक उपक्रम बीएसपी में जाति व्यवस्था की तंगदिली कमजोर थी, लेकिन उसी भिलाई के निजी कारखानों में उसी दर्जे के मजदूरों के बीच वह कायम थी। हो सकता है कि हिन्दुस्तान के सरकारी स्कूलों में दोपहर के भोजन के चलते इस पीढ़ी से जाति व्यवस्था कमजोर हो रही हो, और महंगी निजी स्कूलों में सवर्ण बहुतायत की वजह से वह मजबूती से जारी हो। 

अब सवाल यह उठता है कि कुपोषण के शिकार बच्चों को अंडा दिया जाए या नहीं? देश के कई हिस्सों में यह व्यवस्था चले आ रही है, और राजनीतिक ताकतों से परे इसका कोई विरोध भी नहीं हुआ। वैसे भी यह स्कूली खाने में एक अतिरिक्त सामान ही रहने जा रहा है, जिन बच्चों को अंडा खाना हो वे खाएं, और जिन्हें न खाना हो वे न खाएं। लेकिन जिन परिवारों को अंडे से परहेज है, उनके लिए यह एक फिक्र की बात हो सकती है कि बाकी बच्चों को अंडा खाते देखकर उनके बच्चे भी वैसा करने लगें, तो पारिवारिक प्रथा टूट जाएगी। लेकिन देखादेखी अगर कोई प्रथा टूटनी है, तो वह तो महंगे स्कूलों में घर से टिफिन में मांसाहार लेकर जाने वाले बच्चों के शाकाहारी परिवारों के बच्चों पर असर से भी टूट सकती है। जहां तक कुपोषण से लडऩे का सवाल है तो शाकाहारी तबका मांसाहारी लोगों के तर्क मानने से वैसे भी इंकार कर देता है कि कुछ जरूरी तत्व सिर्फ मांसाहार से मिल सकते हैं। शाकाहारी लोग मांसाहार का विकल्प ढूंढ ही लेते हैं, लेकिन उसके लिए उनकी खर्च की ताकत होना जरूरी रहता है। 

सरकारी स्कूलों में उन इलाकों के कुपोषण के शिकार बच्चों को अंडा खिलाने पर बाकी लोगों का विरोध फिजूल का है। स्कूल का सारा खाना अंडे का नहीं रहेगा, और जो बच्चे उसे न खाना चाहते हों, वह बाकी खाना खा सकते हैं। जब गरीब आबादी का बड़ा हिस्सा कुपोषण का शिकार है, तो स्कूलों के खाने के रास्ते ही उनकी मदद की जा सकती है। और बाकी बच्चों में इसके लिए एक बर्दाश्त विकसित करना जरूरी है। आज पूरे हिन्दुस्तान में जिस तरह से खानपान को लेकर कुछ लोगों को हिंसक तेवर सड़कों पर दिखते हैं, उन्हें देखते हुए खाने की अलग पसंद रखने वाले लोगों के साथ जीना भी आना चाहिए। आज देश के कुछ राज्यों में हिन्दूवादी सरकारों ने खानपान तैयार करने का जिम्मा ऐसे धार्मिक या शाकाहारी संगठनों को दे दिया है जिन्होंने स्कूल के खाने से प्याज-लहसुन तक अलग कर दिया है। हिन्दू या जैन समाज के एक बहुत छोटे तबके की खानपान की पसंद को बाकी लोगों पर इस तरह लादना ठीक नहीं है। विज्ञान के मुताबिक अब अंडा शाकाहारी माना जाता है, और उससे एक आक्रामक परहेज उन लोगों के साथ बेइंसाफी होगी जो कि कुपोषण के शिकार हैं। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि आज किसी धर्म के, कुछ जातियों के, या मांसाहार करने वाले लोगों को देश के अधिकतर शहरों में कई रिहायशी इलाकों या इमारतों में मकान नहीं मिल पाते। इस आक्रामकता की धार को वैज्ञानिकता से ही कम किया जा सकता है, और स्कूलों में अंडा देना इसकी एक बुनियादी शुरुआत हो सकती है। लोगों के सामाजिक संस्कारों को देखते हुए यह जरूर ध्यान देना चाहिए कि अंडा पकाने और खिलाने का काम उन्हीं बच्चों के लिए हो जो उसे चाहते हों। और ऐसा तो आज किसी भी रेस्त्रां में होता ही है कि वहां मांसाहार भी बनता है, और शुद्ध शाकाहारी भी वहां जाकर अपनी मर्जी का शाकाहारी खाना खाते हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 13-Jul-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जमीन के एक झगड़े में आमने-सामने हुए कुछ हिन्दू और कुछ मुस्लिम लोगों के तनाव को साम्प्रदायिक रंग देने में पेशेवर दंगाई जुट गए हैं। एक टीवी चैनल जो कि पूरे ही वक्त इस देश में साम्प्रदायिकता की बात करता है, उसने इस तनाव को धर्म के रंगों में रंगकर साम्प्रदायिकता भड़काने की पूरी कोशिश की, लेकिन छत्तीसगढ़ का मिजाज कुछ ऐसा है कि यहां ऐसे दंगे भड़कते नहीं हैं। लोगों को आमतौर पर याद भी नहीं पड़ता कि उन्होंने पिछला कफ्र्यू कब देखा था, या कब कोई साम्प्रदायिक टकराव हुआ था। ऐसे में खुलकर तनाव को भड़काना किसी किस्म से मीडिया का काम नहीं है, यह एक अलग बात है कि टेक्नालॉजी की मेहरबानी से एक मशीन हो तो अखबार छापा जा सकता है, और उससे अधिक पूंजीनिवेश हो तो कोई टीवी चैनल शुरू करके उस पर मनचाही खबरें फैलाई जा सकती हैं। देश का कानून कहने के लिए तो इस मामले में खासा कड़ा है कि टीवी चैनल के लिए लाइसेंस या इजाजत लेने में लोगों को बरसों लग जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बड़े-बड़े दुष्ट और भ्रष्ट लोग अपने जाने-पहचाने कारोबार के बाद भी टीवी चैनल शुरू कर लेते हैं, साम्प्रदायिकता भड़काने के लिए झूठी खबरें दिखाकर पकड़ में आने वाले लोगों के चैनल भी जारी रहते हैं, और कमोबेश ऐसा ही हाल प्रिंट मीडिया के मालिकों का रहता है जिनके किसी भी किस्म के काम में मीडिया से जुड़े कानून आड़े नहीं आते, और उनका कारोबार जारी रहता है। 

लेकिन बाकी कारोबारी मामलों से परे जब देश की साम्प्रदायिकता एकता की बात आती है तो उसे सोच-समझकर बिगाडऩे में लगे हुए लोगों को किसी मीडिया की आड़ लेकर यह काम नहीं करना चाहिए। दंगाई अगर सीधे-सीधे पहचान में आते हैं तो उन पर कार्रवाई आसान होती है, लेकिन जब किसी धर्म, किसी आध्यात्मिक संगठन, किसी मीडिया का चोला पहनकर यह काम करते हैं, तो उन पर कार्रवाई कुछ मुश्किल रहती है। छत्तीसगढ़ में जमीन के झगड़े को साम्प्रदायिकता बनाने की कोशिश मीडिया का काम नहीं कही जा सकती, फिर चाहे इसके लिए मीडिया के नाम के मालिकाना हक का इस्तेमाल हो, या मीडिया के लिए प्रचलित औजार का इस्तेमाल हो। मीडिया के औजार अगर साम्प्रदायिकता या हिंसा के हथियार बना लिए जाएं, तो उस पर सरकारी कार्रवाई में मीडिया के नाम पर किसी रियायत की न तो उम्मीद करनी चाहिए, और न ही वकालत। 

इस देश में कुछ दशक पहले तक श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन चलता था जो कि पत्रकारों के हक की लड़ाई तो लड़ता ही था, वह पत्रकारिता के सिद्धांतों को लेकर भी लड़ता था और जिसके मंच पर इस पेशे के सिद्धांत, उसकी ईमानदारी की बात भी होती थी। वह दौर खत्म हो गया, और अब एक बिल्कुल ही अलग चाल, चरित्र, और जरूरत वाली संस्था, प्रेस क्लब, देश के अलग-अलग शहरों में चलन में हैं। दिल्ली से लेकर रायपुर तक अब मीडिया के मुद्दे प्रेस क्लब के बैनरतले उठने लगे हैं क्योंकि श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन मरकर गहरे दफन हो चुका है। लेकिन प्रेस क्लब को अपने नाम के क्लब वाले हिस्से को अपने पर हावी नहीं होने देना चाहिए, और अगर वह मीडिया से जुड़े मुद्दों को उठाना चाहता है, तो उसे लोकतंत्र में मीडिया की बुनियादी जिम्मेदारी को समझते हुए मीडिया के सिद्धांतों पर भी चलना चाहिए। छत्तीसगढ़ में जमीन के झगड़े को सोच-समझकर साम्प्रदायिकता का रंग देने की कोशिश लोकतंत्र का मीडिया-औजार नहीं है, यह लोकतंत्र के खिलाफ एक हथियार है। और ऐसी कोशिशों का साथ देने के पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी के प्रेस क्लब को यह भी समझना चाहिए कि अपने बीच के गलत लोगों को बचाकर कोई संस्था न तो इज्जत पा सकती, और न आगे चलकर किसी सही को बचाने के लिए उसकी ताकत काम आएगी। 

छत्तीसगढ़ एक शांतिप्रिय राज्य रहा है, और यहां पर घोर साम्प्रदायिक संगठन भी दुबके हुए ही चलते हैं। साम्प्रदायिक आक्रामकता की इस राज्य में कोई जगह नहीं है, और मीडिया के जो गिने-चुने लोग साम्प्रदायिकता फैलाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी भी छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में कोई जगह नहीं है। 
-सुनील कुमार


Date : 12-Jul-2019

देश के एक बड़े स्टील निर्माता नवीन जिंदल को कल केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रम भिलाई इस्पात संयंत्र ने जिस तरह अपने कारखाने का दौरा करवाया है वह हैरान करने वाला है। नवीन जिंदल पर केन्द्र सरकार की ही जांच एजेंसी सीबीआई मुकदमा चला रही है कि उन्होंने रिश्वत देकर, गलत तरीके से केन्द्र सरकार से कोयला खदान हासिल की। इस मामले में अपनी कंपनी के सभी बड़े अफसरों के साथ नवीन जिंदल जमानत पर रिहा हैं। केन्द्र सरकार के भला कौन से उपक्रम की यह समझदारी कही जाएगी कि वह केन्द्र सरकार के खिलाफ साजिश करके, भ्रष्टाचार से खदान हासिल करने वाले को मेहमान बनाकर अपना कारखाना दिखाए? और यह बात उस वक्त अधिक गंभीर हो जाती है जब अंतरराष्ट्रीय खुले बाजार में भिलाई इस्पात संयंत्र और नवीन जिंदल एक-दूसरे के मुकाबले खड़े रहते हैं। लोगों को याद होगा कि एक वक्त जब बीएसपी के एमडी विक्रांत गुजराल थे, और बीएसपी रेलपांत बनाने के काम में सबसे आगे थी, तब जिंदल ने रेलपांत बनाना शुरू किया था, और गुजराल बीएसपी को छोड़कर जिंदल की नौकरी में चले गए थे, और आज तक उसी कंपनी में हैं। उस वक्त भी ये आरोप लगे थे कि गुजराल ने बीएसपी के मुखिया रहते हुए जिंदल के इंजीनियरों को रेलपांत बनाने की तकनीक दिखाई थी, जिसका फायदा जिंदल को मिला। 

आज जब मोदी सरकार एक-एक करके बहुत से सार्वजनिक उपक्रम बेचने की अपनी नीयत और तैयारी खुलकर बता चुकी है, तब बीएसपी को इस तरह एक दूसरे कारोबारी के सामने खोलकर रख देना किसी तरह का शिष्टाचार नहीं है, यह सीधे-सीधे बीएसपी के हितों के खिलाफ एक साजिश है, फिर चाहे इसका फैसला किसी भी स्तर पर क्यों न लिया गया हो। लोगों को याद है कि एनडीए और यूपीए सरकारों के वक्त जब एक-एक करके निजी फोन कंपनियां बाजार में आ रही थी, तो किस तरह सरकारी टेलीफोन कंपनी को आधुनिकीकरण में सोच-समझकर सुस्त रखा गया था, और उसे घाटे की कंपनी बनने पर मजबूर किया गया था। जब निजी विमान सेवाएं चालू हुईं, तो उन्हें मुनाफे के रास्ते दिए गए, और सरकारी विमान कंपनी को कोशिश करके घाटे में लाया गया। वहां से लेकर छत्तीसगढ़ में राज्य परिवहन निगम बंद करने के पहले जोगी सरकार के वक्त जो नौबत लाई गई, उसके चलते सरकारी बसें घाटे में आईं, और निजी बसों का धंधा आसमान पर पहुंच गया। कुछ और आगे बढ़कर देखें तो जैसे-जैसे छत्तीसगढ़ में निजी अस्पताल बढ़ते चले गए, वैसे-वैसे सरकारी चिकित्सा ढांचे को कमजोर किया गया, बिगाड़ा गया, ताकि लोग निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर हों। इसके बाद सरकारी चिकित्सा बीमा योजना में सारे निजी अस्पतालों को शामिल करके सरकारी अस्पतालों को एक किस्म से अप्रासंगिक ही बना दिया गया कि जनता को तो बीमे के तहत निजी अस्पतालों से इलाज मिल ही रहा है। 

सरकार को सोच-समझकर घाटे में लाने की यह योजना कोई नई नहीं है। जिस बीएसपी से जिंदल उसका एमडी छीनकर ले गया था, उसी बीएसपी में उसी जिंदल के लिए लाल कालीन बिछाकर स्वागत करना वहां के अफसरों की नीयत उजागर करता है, और हो सकता है कि इसके पहले दिल्ली की मंजूरी भी रही हो। यह समझने की जरूरत है कि नवीन जिंदल के अपने कारखाने बिक गए हैं, जिन्हें उनके भाई ने ही खरीदा है। ऐसे में इतनी बड़ी बीएसपी को किस उम्मीद से जिंदल के सामने पेश किया जा रहा है? नेहरू के बनाए हुए देश के इस पहले सबसे बड़े औद्योगिक तीर्थ को एक पशु बाजार में पशु कारोबारी के सामने खड़ा कर दिया गया है, और मानो नवीन जिंदल इसकी देह को टटोलकर इसमें गोश्त का अंदाज लगाने आया हुआ हो। इसके बाद देश में केन्द्र सरकार द्वारा अपराधी साबित करने के लिए जितने लोगों को कटघरे में खड़ा किया गया है, वे भी जमानत मिलने के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र आकर मांग कर सकते हैं कि उन्हें भी कारखाना घुमाया जाए। भारत का संविधान दो अभियुक्तों के बीच भेदभाव की इजाजत नहीं देता है, यह एक अलग बात है कि जिन लोगों पर अब तक केन्द्र सरकार के साथ साजिश और भ्रष्टाचार करने का मुकदमा शुरू नहीं हुआ है, और जिन्हें जमानत लेने की जरूरत नहीं पड़ी है, उन लोगों को बीएसपी के अफसर घुमाने से मना भी कर सकते हैं। 
-सुनील कुमार