संपादकीय

Date : 16-Mar-2020

इस कोरोना-तिहार पर क्या-क्या
करना ही चाहिए, यह तो सोचें...

बुरा वक्त कई जरूरी बातों को सोचने का वक्त, मौका, और वजह देता है। अब जैसे आज चारों तरफ इंसानी जिंदगी कोरोना की दहशत और चौकन्नेपन से घिर गई है, तो बहुत से लोग यह भी सोच रहे हैं कि उन्हें कोरोना हुआ तो क्या होगा? कई लोग सोशल मीडिया पर यह सवाल भी उठा रहे हैं कि अगर कोरोना-वार्ड में चौदह दिनों तक कैद रहना पड़ा तो वे क्या करेंगे? कुछ लोगों ने यह दिलचस्प सवाल खड़ा किया है कि ऐसे चौदह दिनों में वे किसके साथ रहना चाहेंगे? अब ऐसा सवाल परिवारों और जोड़ों के बीच एक लड़ाई भी खड़ी कर सकता है, अगर लोग सच बोलना तय करें। वैसे जिंदगी का तजुर्बा इंसानों को इतना तो सिखा ही देता है कि इंसानी मिजाज अधिक सच के लिए बना हुआ नहीं है, और यह भी एक बड़ी वजह है कि भाषा सच के साथ मुच जोड़कर सचमुच लिखती है क्योंकि खालिस सच न पच पाता है, न बर्दाश्त हो पाता है। लेकिन इस मजाक से परे अगर सचमुच ही यह सोचें कि जिंदगी में ऐसा वक्त आ ही गया कि कोरोना ने संक्रामक रोग अस्पताल पहुंचा दिया, और वहां से लौटना न हो पाया, तो उसके लिए अभी से क्या-क्या तैयारी करनी चाहिए। 

वैसे तो इंसानी मिजाज इस खुशफहमी में जीने का आदी भी रहता है कि बुरा तो दूसरों के साथ ही होगा, और उन्होंने तो कुछ इतना बुरा किया हुआ नहीं है कि उन्हें कोरोना पकड़ ले। लेकिन ऐसी सोच के बीच भी कम से कम कुछ लोगों को तो यह आशंका सताती होगी कि उन्हें या परिवार के किसी और को अगर कोरोना या ऐसा कोई दूसरा वायरस जकड़ेगा तो क्या होगा, और वे क्या करेंगे? इस किस्म की आशंका जिंदगी में जरूरी भी रहती है ताकि लोग यह सोच सकें कि अगर यह नौबत आ ही गई, और वे अस्पताल से नहीं लौटे, तो कौन-कौन से काम बकाया हैं जिन्हें अभी कर लेना ठीक होगा, और कौन-कौन से ऐसे नेक काम हैं जिनको किए बिना लोग उनको किसी अच्छी बात के लिए याद नहीं कर पाएंगे? ये दोनों ही बातें सोचना जरूरी है क्योंकि लोग अपने बुरे की सोच नहीं पाते हैं, और अपने अच्छे दिनों में जिम्मेदारियों को पूरा कर नहीं पाते हैं, या करने की सोचते ही नहीं हैं। 

यह मौका जब लोगों का भीड़-भड़क्के में आना-जाना कम हो रहा है, जब कारोबार कम हो रहा है, जब मामूली सर्दी-खांसी भी लोगों को घर बिठा दे रही है, जब निहायत इमरजेंसी-सफर ही किया जा रहा है, तो हर किसी के पास आज खासा वक्त है। कोरोना ने लोगों की वक्त की फिजूलखर्ची घटा दी है, और जरूरी कामों के लिए कुछ वक्त मुहैया करा दिया है, और कुछ वजहें भी। ऐसे में लोगों को बाहर कम से कम लोगों से मिलने, कम से कम मटरगश्ती करने की एक ऐसी मजबूरी भी है जो उन्हें अपने घर या अपने कमरे में कैद करके रख रही है, और इस मौके का फायदा उठाकर लोग कम से कम अपने कागजात और अपने कबाड़ छांट सकते हैं, और जिंदगी के बकाया कामों को पटरी पर ला सकते हैं। लोग मर्जी की किताबें पढ़ सकते हैं, मर्जी की फिल्में देख सकते हैं, और मर्जी का संगीत सुन सकते हैं। लोग अपनी मर्जी के लोगों के साथ रह सकते हैं, क्योंकि फिजूल के लोगों के साथ उठना-बैठना डॉक्टरी सलाह से सीमित हो चुका है। 

अंग्रेजी में कहा जाता है कि हर काले बादल के किनारे पर चांदी सी चमकती एक लकीर भी होती है। लोग अपनी जिंदगी के इस कोरोना-दौर में ऐसी सिल्वर-लाईनिंग देख सकते हैं, और उसका फायदा उठा सकते हैं। बीमारी की दहशत में आए बिना भी अपनी वसीयत कर सकते हैं, जमीन-जायदाद के कागज निपटा सकते हैं, घर में बंटवारा करना हो तो कर सकते हैं, और जिनसे दुश्मनी हो उनसे माफी मांग सकते हैं, या उनको माफ कर सकते हैं। किसी ने लिखा भी है कि अपनी जिंदगी को इस तरह बेहतर बनाया जा सकता है कि कुछ को माफ कर दिया जाए, और कुछ से माफी मांग ली जाए। कोरोना ने आज सभी को ऐसी वजहें दी हैं कि जिनसे मोहब्बत है, और उन्हें पर्याप्त शब्दों में यह बात कही नहीं जा रही है, तो पिटने का डर छोड़कर ऐसी बात कर ही लेनी चाहिए, और किसी नापसंद से ऐसी बात सुननी पड़े, तो उसे पीटना छोड़कर उसे माफ कर देना चाहिए। 

अभी किसी ने वॉट्सऐप पर एक मजेदार बात लिखकर भेजी है कि छत्तीसगढ़ के एक स्कूली बच्चे से किसी ने पूछा कि स्कूल की छुट्टी क्यों हो गई है? तो उसका जवाब था- कोरोना तिहार चल रहा है। बात सही है कि अब गर्मी और दीवाली की सिमट गई छुट्टियों के मुकाबले जब अचानक बिन मांगे एक पूरे पखवाड़े की ऐसी छुट्टी मिल जाए, तो वह कोरोना-देवता के त्योहार से कम क्या गिना जाए? 

काम-धंधे, नाते-रिश्तेदारी, आवाजाही, और आवारागर्दी से लेकर गप्पबाजी तक, इन सबसे एक पखवाड़े की जो छुट्टी मिली है, उसमें लोगों को अपनी जिंदगी की हमेशा ही लेट चलने वाली ट्रेन को पटरी पर ले आना चाहिए, और लेट को रिकवर करके एक पखवाड़े बाद के प्लेटफॉर्म पर गाड़ी समय पर पहुंचाना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 15-Mar-2020

अपने को ऐसी नौबत में सोचकर 
कोई फैसला तो लेकर देखें...!

कोरोना के शिकार योरप के सबसे बदहाल देश इटली की खबर है कि वहां अस्पतालों की इलाज की ताकत चुक गई है, और पूरे देश में लोगों से घर के भीतर रहने कहा गया है। इटली का यह हाल देखते हुए ही अमरीका ने तकरीबन पूरे ही योरप से लोगों का अपने यहां आना बंद कर दिया है, और सिर्फ ब्रिटेन के लोगों को कड़ी मेडिकल जांच के बाद आने की छूट दी है। इटली एक विकसित और संपन्न देश है, इसलिए ऐसी किसी महामारी के लिए उसकी कोई बड़ी तैयारी नहीं थी। आमतौर पर संक्रामक रोग गरीब देशों में अधिक होते हैं, और तेजी से फैलते हैं, लेकिन इस बार चीन के बाद इटली की बारी है, और वह देश इलाज के इतने ही दिनों में बुरी तरह से थक और टूट चुका है। 

अब खबर यह है कि वहां के अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करने की जगह नहीं बची है, और डॉक्टरों को यह समझ नहीं आ रहा है कि किसे बचाएं किसे छोड़ें। ऐसे में इटली में सरकार की तरफ से ऐसे निर्देश जारी हुए हैं जिनमें डॉक्टरों और नर्सों से कहा गया है कि इमरजेंसी की हालत में वे यह तय करें कि किसे बचाया जा सकता है, और किसी नहीं बचाया जा सकता है। सीमित इलाज से कौन सी जिंदगी बच सकती है, और किसे महज लंबा खींचा जा सकता है। ऐसे में कहा गया है कि यह फैसला लेना होगा कि इलाज के लायक कौन हैं? डॉक्टरों पर यह दबाव है कि जिन बूढ़े लोगों को बचाना मुमकिन नहीं दिख रहा, और जिनकी जिंदगी वैसे ही कम ही बची है उन पर मेहनत न करें। 

हुआ यह है कि कोरोना का असर 50 साल से ऊपर के लोगों पर अधिक हो रहा है। बच्चे और जवान, अधेड़ तक इसकी मार से बेअसर सरीखे हैं, लेकिन उम्रदराज लोग अपनी दूसरी बीमारियों के चलते इसके जल्द शिकार हो रहे हैं। बड़ी उम्र में बाकी बीमारियों की वजह से वैसे भी जटिलताएं बहुत बढ़ जाती हैं, इलाज के दौरान दबाव बहुत बढ़ जाता है, और सीमित चिकित्सा सुविधा का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्ग मरीजों को बचाने में लगता है, उससे बहुत कम मेहनत से जवान मरीजों को बचाया जा सकता है। लोगों को यह बात हैवानियत की लग सकती है कि किसी मरते हुए मरीज को छोड़ा कैसे जाए, लेकिन यह बात कुछ उसी किस्म की है कि किसी विमान पर कुल एक पैराशूट हो, और मुसाफिर कई हों, तो गिरते विमान से किस एक को बचाया जाए? या लोग आपसी बातचीत में अपने बच्चों से ही प्यार भरी मजाक में यह जानना चाहते हैं कि वे सबसे अधिक प्यार किससे करते हैं? 

कुछ ऐसे ही बात डॉक्टरों के सामने उस वक्त आ जाती है जब एक बिस्तर हो, और दस मरीज हों। एक इंजेक्शन हो, और दस मरीज हों। ऐसे में डॉक्टर करे तो क्या करे? एक ही इंजेक्शन को बांटकर दस लोगों को लगाना तो बेअसर होगा, इसलिए लगाना किसी एक को ही है। ऐसे में सबसे बुजुर्ग को बचाया जाए जिसकी कि जिंदगी थोड़ी ही बाकी है, या सबसे जवान को बचाया जाए जिसकी जिंदगी सबसे लंबी बाकी है? यह फैसला बहुत ही मुश्किल है, और हमारा अंदाज है कि दुनिया के कोई भी डॉक्टर ऐसे फैसले की नौबत में घिरना चाहते नहीं होंगे। लेकिन आज इटली में ऐसी ही नौबत आ गई है। हम तो हिन्दुस्तान जैसे देश के बारे में इलाज की ताकत चुक जाने की बात सोचते थे जहां पर सरकारी भ्रष्टाचार अस्पतालों को बेहाल करके रखता है, जहां गरीबी की वजह से संक्रमण फैलने का खतरा बहुत अधिक रहता है। लेकिन इटली के बारे में ऐसा सोचा नहीं था। फिर भी जब ऐसी नौबत आ गई है तो वहां के डॉक्टर क्या करने जा रहे हैं? 

इसका जवाब इतना मुश्किल भी नहीं है अगर हम आईने में अपनी बदशक्ल देखने का हौसला जुटा सकते हैं। हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों कमाऊ और नौजवान लोग हैं जिन्होंने अपने बूढ़े मां-बाप को जीते-जी मरने सरीखी हालत में छोड़ रखा है। ये लोग अपने बच्चों, अपनी अगली पीढ़ी का तो ख्याल रखते हैं, लेकिन अपनी पिछली पीढ़ी, अपने मां-बाप के जिंदा या मुर्दा रहने की जिन्हें परवाह नहीं है। ऐसे ही लोगों की वजह से वृद्धाश्रम चलते हैं, और ऐसे ही लोगों की वजह से बूढ़े मां-बाप बंद घरों में मर जाते हैं, और उनकी लाशें महीनों बाद मिलती हैं। दुनिया का रिवाज ही कुछ ऐसा है। बरसों पहले जापान की एक फिल्म आई थी जो कि वहां के अकाल के दौर पर बनी थी। उस फिल्म में जब बूढ़े लोग उत्पादक नहीं रह जाते हैं, तो सीमित अनाज के बेहतर इस्तेमाल के लिए लोग अपने बुजुर्गों को ईश्वर दिखाने के नाम पर एक पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहां से उन्हें नीचे फेंक देते हैं। गांव के बुजुर्गों को इस बात का अहसास रहता है कि ईश्वर को देखकर कोई भी वापिस नहीं आते हैं। फिल्म में एक बूढ़ी मां, या बूढ़े बाप को पहाड़ी से नीचे फेंकने का ऐसा भयानक नजारा है जिसमें नीचे धकेलकर जब गिराया जाता है, तो वे अपने जवान लड़के के पैर पकड़कर लटके रहते हैं, और बेटा उन्हें लात मार-मारकर नीचे गिराता है। जब जिंदगी के साधन सीमित रह जाते हैं, तो लोग अपनी उस खूबी को खो बैठते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में इंसानियत कहा जाता है। लोगों को एक दूसरी सच्ची घटना याद होगी कि एक मुसाफिर विमान एक बर्फीली पहाड़ी पर गिर जाता है, और उसके बहुत से मुसाफिर बच जाते हैं। बाद में कुछ खाने को नहीं रहता, तो वे अपने बीच के मरे हुए लोगों का गोश्त खाने लगते हैं। 

इटली में जो हो रहा है वह बहुत तकलीफदेह, और बहुत हैवानियत वाला जरूर लग रहा है, लेकिन हकीकत यही है कि लोगों के पास एक रोटी हो, और आखिरी कौर के लिए मरते हुए अपने खुद के बच्चे हों, और खुद के मां-बाप हों, तो लोग बच्चों को ही बचाएंगे क्योंकि उनकी जिंदगी लंबी बाकी है। जिनको यह बात अटपटी लग रही हो, वे अपने को ऐसी नौबत में सोचकर कोई फैसला तो लेकर देखें...!
-सुनील कुमार


Date : 14-Mar-2020

बाकी भीड़ तो घट गई, लेकिन
शराबी-धक्का-मुक्की का क्या?

दुनिया भर में आज कोरोना को लेकर जिस तरह का खतरा खड़ा हुआ है, ऐसा इसके पहले किसी दूसरे मौके पर याद नहीं पड़ता। लेकिन इसके साथ-साथ इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए जिस दर्जे की सावधानी बरती जा रही है, वैसी सावधानी भी पहले कभी याद नहीं पड़ती। दूसरे कई देशों पर कोरोना की मार अधिक बुरी हुई है, चीन, दक्षिण कोरिया, ईरान, और इटली में मौतें सैकड़ों में हैं, चीन में तो हजारों में हैं, और हिन्दुस्तान में मौत का खाता अभी खुला ही है। अमरीका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पहली बार किसी खतरे को गंभीरता से लिया है, और पूरे देश में इमरजेंसी लगा दी है। जिस न्यूयार्क में हर कदम पर कदम पड़ते दिखते थे, वहां सड़कें और सब-वे खाली पड़े हुए हैं। वहां के बड़े-बड़े स्टोर में लोग सामान अधिक से अधिक उठाते हुए एक-दूसरे से मारपीट भी कर रहे हैं। भारत चूंकि साफ-सफाई के मामले में लापरवाह देश है, इसलिए यहां पर न तो कोई तैयारी अधिक दिख रही है, न ही लोगों में उतनी दहशत दिख रही है। फिर भी भारत में सरकारों ने खतरे को गंभीरता से लिया है। 

अलग-अलग प्रदेशों में कोरोना के फैलने को रोकने के लिए अलग-अलग किस्म की तैयारी दिखाई है, और कई बरस बाद शायद यह अकेला ऐसा मुद्दा है जिस पर केन्द्र और राज्यों के बीच कोई टकराव नहीं हुआ है, और राज्यों ने केन्द्र की सलाह को तुरंत ही मान लिया है। बहुत से राज्यों में इस पूरे महीने के लिए स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं, हॉस्टल खाली करवा लिए गए हैं, मेले-ठेले पर रोक लगा दी गई है, कांफ्रेंस-सेमीनार, टूर्नामेंट-भर्ती कैंप सब पर इस महीने के लिए तो रोक लग ही गई है। जैसा कि हिन्दुस्तान में हर खतरे और समस्या के मामले में होता है, कोरोना से बचाने के लिए भी कहीं दस रूपए में झाड़ा उतारा जा रहा है, तो कहीं ताबीज बनाकर दी जा रही है। अब चीन से आए कोरोना को अगर हिन्दी, और बाकी हिन्दुस्तानी भाषाएं पढऩा आता होता, तो फिर डॉक्टरों की जरूरत ही नहीं रहती, और कोरोना खुद ही ऐसे इश्तहारों को पढ़कर हॅंसते-हॅंंसते मर गया होता। आज ही एक दिलचस्प तस्वीर मिली है जो कि ऐसे अंधविश्वासों से ठीक उल्टी है, और छत्तीसगढ़ के एक मंदिर में पुजारी भगवान की आरती उतारते हुए भी मास्क लगाए हुए हैं। हालत यह है कि हिन्दी-हिन्दुस्तान में भी मास्क, वायरस, और सेनेटाइजर जैसे अंग्रेजी शब्द अंग्रेजी में ही अधिक समझे जा रहे हैं, इनका हिन्दी ढूंढने की कोशिश भी भाषा के कट्टर लोगों ने नहीं की है। 

केरल ने दूसरे राज्यों के मुकाबले कुछ अधिक तैयारी की है, और जाहिर है कि राज्य अधिक पढ़ा-लिखा होने से वहां पर ये बातें लागू भी करना आसान है। वहां की सरकार ने राज्य के जिन लोगों को मेडिकल जांच होने तक अपने घरों में रहने का आदेश दिया है, उन परिवारों को पका हुआ खाना पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा स्कूलें बंद की गई हैं, इसलिए स्कूली बच्चों को भी दोपहर का खाना घर पर पहुंचाया जा रहा है। हिन्दुस्तानी की जमीनी हकीकत यह है कि गरीब बच्चों में से अधिकतर ऐसे हैं जो स्कूल के दोपहर के भोजन की वजह से पेट भर खा पाते हैं, और अगर यह पूरा महीना स्कूल बंद रहती है, तो उनके खानपान पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। बिहार ने स्कूली बच्चों के भोजन का पैसा उनके बैंक खातों में डालना तय किया है ताकि परिवार अपना इंतजाम खुद कर सके। देश के बाकी राज्यों को भी अपने स्कूली बच्चों की फिक्र करते हुए उनका इंतजाम करना चाहिए, और जरूरत हो तो ऐसे हर परिवार को राशन दुकानों से अतिरिक्त राशन देना चाहिए ताकि गरीब चूल्हों पर अधिक बोझ न पड़े। 

कुछ राज्यों में सिनेमाघरों को बंद करवा दिया गया है क्योंकि वहां सीमित और बंद जगह में अगर कोरोना वायरसग्रस्त लोग पहुंचें, तो वह एक बड़ी दिक्कत हो सकती है। कई राज्यों में अब तक ऐसा नहीं हुआ है, और उन्हें इस खतरे, और इस बचाव के बारे में सोचना चाहिए। इससे अलग, छत्तीसगढ़ में एक अजीब सी मांग सामने आई है कि सरकार स्कूल-कॉलेज, लाइब्रेरी-जिम के साथ-साथ शराब दुकानों को भी बंद करे क्योंकि वहां पर लोगों की भारी भीड़ लगती है। यह बात सही है क्योंकि लोग सीमित संख्या में रह गई दुकानों पर असीमित संख्या में भीड़ लगाते हैं, और आज छत्तीसगढ़ में ऐसे किसी वायरस के संक्रमण का एक बड़ा खतरा ऐसी शराबी-भीड़ को हो सकता है। अब रोज शराब पीने के आदी लोगों के लिए यह मुमकिन नहीं होगा कि वे पूरे महीने बिना शराब के रहें। वैसे भी राज्य में पड़ोसी राज्यों से आई हुई शराब गाडिय़ां भर-भरकर पकड़ा रही है, इसलिए दारू दुकानों को बंद करने का मतलब सरहद से तस्करी बढ़ाना भी होगा। इसलिए दिन में 11 घंटे खुलने वाली शराब दुकानों पर लगने वाली अंधाधुंध भीड़, धक्का-मुक्की, और मारपीट को घटाने के लिए सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि क्या दुकानों के खुलने के घंटे बढ़ाए जा सकते हैं, ताकि ऐसी बड़ी भीड़ न लगे? यह बात एक अलोकप्रिय राय लग सकती है, लेकिन लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए कई किस्म के कड़वे, अवांछित तरीके भी इस्तेमाल करने पड़ सकते हैं। अगर दुकानें सुबह और जल्दी खुलें, और देर रात तक चलती रहें, तो इन पर भीड़ घटेगी, और अधिक घंटों में फैल जाएगी। 

फिलहाल न सिर्फ सरकार को, बल्कि समाज और परिवार को भी बहुत सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि कोरोना के इलाज का भी कोई बड़ा इंतजाम हिन्दुस्तान में नहीं है, न ही इसकी कोई अधिक दवाएं बनी हैं, और न ही साल-दो साल इससे बचाव के टीके आते दिख रहे हैं। ऐसे में सावधानी मेें ही समझदारी है, और वैसी समझदारी में ही जिंदगी है। 
-सुनील कुमार


Date : 13-Mar-2020

कोरोना से मरें न मरें, मंदी से भी मारे जा सकते हैं...

बाकी दुनिया के साथ-साथ हिन्दुस्तान का शेयर बाजार जिस किस्म के तूफान का शिकार दिख रहा है, उससे इसमें पूंजीनिवेश करने वाले लोगों को समझ आनी चाहिए। जनता के बीच शेयर बेचकर उनके पैसों से खरबों की कंपनियां खड़ी करना, उनमें दसियों हजार करोड़ के बैंक-कर्ज भी ले लेना, और फिर जालसाजी-धोखाधड़ी करके भाग जाना, शेयर बाजार और भारतीय कारोबार का यह मिजाज पिछले बरसों में अच्छी तरह साबित हो चुका है। बहुत से लोग इसे पहले से सट्टा बाजार सरीखा मानते आए हैं, और शेयर बाजार में पूंजीनिवेश के खिलाफ बोलते आए हैं। लेकिन बीच-बीच में कुछ ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें शेयर बाजार की पूंजी एकाएक कई गुना बढ़ी हुई दिखती है, और ऐसी गिनी-चुनी मिसालों को देखकर देश भर के आम पूंजीनिवेशक इसमें कूद जाते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि मायानगरी कही जाने वाली मुंबई में फिल्म उद्योग में होता है जहां लोग चकाचौंध के शिकार होकर पहुंचते हैं, पूरी जिंदगी संघर्ष करते रहते हैं, और उनमें से कुछ गिने-चुने लोग कामयाबी और शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचते हैं, जिन्हें देखकर दूसरे लोग भी वहां संघर्ष के लिए जाते हैं, और जवानी से अधेड़ हो जाने तक लगे रहते हैं।

आज हिन्दुस्तान में आम लोगों के सामने एक बहुत बड़ी दिक्कत यह है कि वे अपनी जमा पूंजी कहां लगाएं? बैंकों में रखें तो बैंकों का कभी भी दीवाला निकल जाता है, सरकार कभी भी रकम निकालने पर रोक लगा देती है। घर में नगदी रखें तो भी दिक्कत है क्योंकि अगली नोटबंदी कौन से नोट बंद करवा देगी इसका ठिकाना नहीं है, और चोरी हो जाने, आग में खत्म हो जाने का भी खतरा है। सोना खरीदकर रखें, तो भी एक खतरा है कि सरकार किसी भी दिन सोने की सीमा पर एक कानून लाने जा रही है, और उसके बाद उसे कैसे जायज ठहराया जाएगा? उसे सुरक्षित कैसे रखा जाएगा क्योंकि चोरों की नजर सबसे पहले सोने पर होती है। खुले बाजार में रकम ब्याज पर चलाने से डूब जाने का खतरा रहता है, जमीनों में पूंजीनिवेश करने पर सरकार कभी भी जमीनों का इस्तेमाल बदल देती है, और जमीन मिट्टी के मोल की हो जाती है। इस तरह आज हिन्दुस्तान में लोगों के बीच अपनी जमा पूंजी को सम्हालकर रखने में बड़ा असमंजस चल रहा है।

दूसरी तरफ आज दुनिया के बाकी बाजारों की मंदी की असर से हिन्दुस्तान में भी हर किस्म के पूंजीनिवेश पर असर पड़ रहा है क्योंकि देश के कारोबार पर भी असर पड़ रहा है। बाजार में ग्राहकी घट रही है, कंपनियों का दीवाला निकल रहा है, दूसरे देशों से सामानों के आने पर सरकार की कब कैसी नीतियां हो जाएंगी उनका ठिकाना नहीं है, इसलिए हिन्दुस्तानी उद्योगपति और कारोबारी मंदी के अलावा असमंजस के शिकार भी हैं। देश की पूरी अर्थव्यवस्था चौपट है, बेरोजगारी आसमान पर है, लोगों की खर्च करने की क्षमता चुक गई है। ऐसे में लोग किस धंधे में अपना पैसा लगाएं? और न लगाएं तो क्या करें क्योंकि घर में रखे-रखे तो कोई पैसा कमाई देता नहीं है। आज जिस तरह से कोरोना जैसी एक बीमारी ने चीन से शुरू होकर कुछ महीनों के भीतर ही पूरी दुनिया का कारोबार चौपट कर दिया है, और हिन्दुस्तान के स्कूल-कॉलेज बंद करवा दिए हैं, मैच-मेले बंद हो गए हैं, और करोड़ों लोगों का रोजगार, उनकी कमाई फिलहाल तो खत्म ही हो गई है। चारों तरफ एक ऐसी धुंध छाई हुई है कि आम लोगों को कुछ नहीं सूझ रहा है, और खास लोग दूसरे खास लोगों को डूबते देखकर कम से कम यह तसल्ली तो पा रहे हैं कि वे अकेले नहीं डूब रहे हैं, या अभी तक तो नहीं डूबे हैं।

यह वक्त ऐसा है कि आम लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि अपने आपको जिंदा रखने का इंतजाम भी भारी पडऩे वाला है। दिन इतने खराब हो सकते हैं कि जिसकी कभी कल्पना न की हो। ऐसे में आने वाले दिनों को लेकर हर किसी को एक बड़ी तैयारी करनी है, बहुत सावधानी से रहना है, अगर कोरोना जल्दी भी चला जाएगा, तो भी जिस तरह नोटबंदी और जीएसटी ने लोगों और कारोबार की कमर तोड़ दी थी, यह कोरोना भी लोगों की कमर तोडऩे जा रहा है, पूरे देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था को खत्म करने जा रहा है। और सरकार पर लोग निर्भर करते हैं, लोगों पर सरकार निर्भर करती है, इसलिए हर किसी को यह समझने की जरूरत है कि आने वाला वक्त बहुत ही खराब हो सकता है, और जो उसके लिए तैयार नहीं होंगे वे कोरोना से मरंे न मरें, वे मंदी से भी मारे जा सकते हैं।

-सुनील कुमार

 


Date : 12-Mar-2020

सिंधिया के भाजपा जाने के मायने,
कांग्रेस के लिए, भाजपा के लिए भी

हाल के वक्त में देश में एक सबसे बड़ा दलबदल ज्योतिरादित्य सिंधिया का हुआ जो कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए। कांग्रेस छोडऩा एक अलग बात होती, कांग्रेस पार्टी तो शरद पवार और संगमा ने भी छोड़ी थी, ममता बैनर्जी ने भी छोड़ी थी, और जगन मोहन रेड्डी ने भी छोड़ी थी। लेकिन उन्होंने अपनी नई पार्टी खड़ी की, अपना दमखम दिखाया, और अलग-अलग राज्यों में सत्ता पर भी आए। खुद ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने एक वक्त कांग्रेस छोड़कर अलग पार्टी बनाई थी, और फिर वे कांग्रेस में लौट आए थे, लेकिन भाजपा में नहीं गए थे। दूसरी तरफ ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पिछले कुछ महीनों में लगातार भाजपा के साथ बातें तय करने का काम किया, और अब कांग्रेस छोड़ते ही अगले ही दिन वे भाजपा में आ गए, और उनके दलबदल की घोषणा के साथ-साथ ही उन्हें मध्यप्रदेश से भाजपा का राज्यसभा उम्मीदवार बनाया गया। यह सब इस घटनाक्रम के साथ हुआ है कि सिंधिया समर्थक करीब दो दर्जन कांग्रेस विधायक अपनी पार्टी से अलग होने के तेवर दिखाते हुए प्रदेश के बाहर जा बैठे हैं, और उनमें से शायद 20 ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा भेज दिया है। आंकड़ों के हिसाब से यह नौबत एमपी की कमलनाथ सरकार को गिराते हुए दिखती है, और इसी के एवज में ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा प्रवेश, उनका राज्यसभा निर्वाचन दिख रहा है, और केन्द्रीय मंत्रिमंडल में एक मंत्री पद की भी चर्चा कोरोना वायरस की चर्चा जितनी आम हैं। अब अपनी पार्टी की एक बड़े प्रदेश की सरकार को गिराकर वहां पर भाजपा की सरकार बनवाने के एवज में इतना तो बनता ही है। 

यह एक अलग बात है कि इस मौके पर प्रियंका गांधी से लेकर दूसरे कांग्रेसियों तक ने खुलकर यह गिनाया है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया को कांग्रेस ने क्या-क्या दिया था, और पिछले 18 बरस कांग्रेस में रहते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगातार किस तरह सांसद, केन्द्रीय मंत्री, कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य, और जाने क्या-क्या बनाया गया था। दूसरी तरफ कांग्रेस के लोग यह भी गिना रहे हैं कि भाजपा के बड़े-बड़े नेता बीते बरसों में लगातार सिंधिया राजघराने की अंग्रेजों से यारी, और झांसी रानी लक्ष्मीबाई से गद्दारी के कैसे-कैसे बयान देते आए हैं। खुद मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह का पिछला विधानसभा का पूरा चुनाव अभियान महाराज के खिलाफ केन्द्रित था, और मध्यप्रदेश भाजपा के अधिकतर बड़े नेता सिंधिया घराने की गद्दारी पर लगातार बोलते आ रहे थे, और यह भी कह रहे थे कि अगर सिंधिया ने गद्दारी न की होती तो 1857 में ही आजादी की लड़ाई कामयाब हो जाती। ऐसे सार्वजनिक बयान उस वक्त दिए गए जब सिंधिया घराने की दो बेटियां भाजपा की सत्ता में थीं, वसुंधरा राजे राजस्थान की भाजपा-मुख्यमंत्री थीं, और यशोधरा राजे मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार में मंत्री थीं। 

खैर, 1857 के इतिहास के लिए, और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की शहादत के लिए ज्योतिरादित्य को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, और उनका दलबदल 21वीं सदी की भारतीय राजनीतिक संस्कृति के हिसाब से है, उसे सही और गलत तो इतिहास लिखेगा, और जनता बताएगी। लेकिन यह बात तय है कि ज्योतिरादित्य का इस तरह से कांग्रेस छोडऩा कांग्रेस के आज के हाल का एक संकेत भी है, और उसने अगर अपना घर नहीं सुधारा, तो आगे जाने क्या होगा। लोगों की अटकलें हैं कि कांग्रेस के कुछ और बड़े-बड़े, वजनदार, दिग्गज, असंतुष्ट और नौजवान नेता भी पार्टी छोड़कर सत्ता सुख वाली भाजपा में जा सकते हैं। देश में एक ऐसी नौबत आ गई है कि चुनाव में ईवीएम मशीनों की बेईमानी की खबरें तो खारिज हो गई हैं कि कोई भी बटन दबाओ वोट भाजपा को जाता है। अब नौबत यह आ गई है कि किसी भी पार्टी का विधायक चुनो, सरकार भाजपा बना लेती है। एक के बाद एक कई प्रदेशों में विधायकों के ऐसे हृदय-परिवर्तन से सरकारें बदलीं, और भाजपा सत्ता में आ गई। लेकिन यह सिलसिला नया नहीं हैं, यह जुर्म करने वाली भाजपा पहली या अकेली पार्टी नहीं है। ऐसा दूसरी पार्टियां भी दूसरी जगहों पर किसी दूसरे वक्त कर चुकी हैं, लेकिन आज भाजपा जितने बड़े पैमाने पर ऐसी सरकारें गिराने, और फिर खुद की बनाने में महारत हासिल कर चुकी है, वह पैमाना डरावना है, और उसका ऐसा व्यापक इस्तेमाल सिर्फ यह सुझाता है कि इस देश में विधायकों और सांसदों के दलबदल पर, अपनी पार्टी की सरकारें गिराने पर एक नए किस्म के कानून की जरूरत है, क्योंकि मौजूदा कानून आधी सदी पहले के पेनिसिलिन की तरह का बेअसर हो चुका है, और अब छठवीं पीढ़ी के एंटीबायोटिक की जरूरत है। भाजपा अगर इस सिलसिले को इतने बड़े पैमाने पर न ले गई होती, तो शायद नए कानून की चर्चा शुरू नहीं हुई रहती। लेकिन आज हिन्दुस्तानी केन्द्र और राज्य सरकारों में जिस तरह भाजपा का एकाधिकार हो रहा है, और जायज-नाजायज सभी तरीकों से हो रहा है, तो वैसे में कम से कम नाजायज वाले हिस्से को रोकने के लिए एक नए कानून की जरूरत है, ठीक उसी तरह जिस तरह की आज कोरोना वायरस को रोकने के लिए नए किस्म की सरकारी रोकथाम की जरूरत है, नई सावधानी की जरूरत है। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से जाने के बाद अब मध्यप्रदेश में पिछली करीब आधी सदी से स्थापित सिंधिया-खेमा कांग्रेस पार्टी के भीतर खत्म हुआ, और अब सरकार बचाने का जिम्मा प्रदेश कांग्रेस में बाकी बचे बस दो खेमों, दिग्विजय-कमलनाथ पर आया है, और आने वाले दिन इन्हीं दो नेताओं के कामयाबी या नाकामयाबी के होंगे। 
-सुनील कुमार


Date : 09-Mar-2020

बिहारी-दंगल में ताल ठोंकी
विदेश से आई माटीपुत्री ने !

महिला दिवस पर बिहार के अखबारों के पहले पन्ने पर वहां के एक नेता की योरप में पढ़ी एक युवती की तरफ से पूरे पेज के इश्तहार दिए गए हैं, जिसमें उसने अपने आपको इस बरस होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया है। उसने एक नई पार्टी बनाकर बिहार को एक बेहतर और कामयाब राज्य बनाने का अपना इरादा और दावा सामने रखा है। और कुछ हो न हो इस इश्तहार से एक सनसनी फैली है, और लोग इस महंगे विज्ञापन अभियान के महंगे होने की वजह से ही सही, इसे गंभीरता से ले रहे हैं। जैसा कि राजनीति में आने वाली किसी भी महिला के साथ होता है, कुछ या कई लोग इसका मखौल भी उड़ा रहे हैं। अभी हम पुष्पम प्रिया चौधरी नाम की इस युवती के बारे में उसकी खुद की दी गई जानकारी से अधिक कुछ नहीं जानते, लेकिन राजनीति में कई बार ऐसे नए लोग आते हैं जो खुद चाहे जीत न सकें, सरकार न बना सकें, वे एक फर्क खड़ा कर सकते हैं। अब आज से दस बरस पहले किसने सोचा था कि अरविंद केजरीवाल नाम का एक नौजवान झाड़ू चुनाव चिन्ह को लेकर, आम आदमी पार्टी जैसा अटपटा नाम छांटकर दिल्ली की दोनों परंपरागत पार्टियों, कांग्रेस और भाजपा को इस तरह कुचलकर रख देगा, और एक के बाद दूसरा कार्यकाल पाते जाएगा? 

राजनीति में किसी नेता या नई पार्टी का दाखिला महज बहुमत तक जीत पाना नहीं होता, बल्कि कई बार परंपरागत और घिसीपिटी पार्टियों और नेताओं के खिलाफ भांडाफोड़ करने के लिए, उनके पाखंड को उजागर करने के लिए भी कुछ पार्टियां और उनके नेता काम आ सकते हैं, काम आते हैं। लोग इस बात को भूल भी गए होंगे कि महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में ठाकरे परिवार से अलग हुए, और अब तक चुनावी नाकामयाबी वाले राज ठाकरे ने चुनाव प्रचार के दौरान अपनी पार्टी के बैनर पर कार्यक्रम किए थे जिनमें मैदान भर-भरकर लोग पहुंचते थे, राज ठाकरे की तेजाबी जुबान से मोदी और केन्द्र सरकार की आलोचना सुनते थे, और जब वोट देने की बारी आई, तो भाजपा के विरोधियों को वोट दिया, राज ठाकरे को वोट नहीं दिया। दिल्ली के ताजा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने जितना कुछ भी प्रचार किया, उसका उसे कोई फायदा नहीं मिला, एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन जो माहौल बना वह भाजपा के खिलाफ बना, और वह केजरीवाल को फायदा पहुंचाने वाला रहा। 

अब बिहार के आने वाले चुनाव में अगर साफ-सुथरी छवि लेकर खर्च करने की ताकत रखने वाली एक युवती मैदान में सच में ही उतरती है, तो वह मौकापरस्त नीतीश कुमार का भाजपा से संबंधों का भांडा भी फोड़ सकती है, वह लालू-कुनबे के भ्रष्टाचार और कुनबापरस्ती की बात भी वोटरों को याद दिला सकती है, और कांग्रेस के हाशिए पर चले जाने की बात भी सामने रख सकती है। ऐसी किसी पार्टी और युवती की संभावनाएं तो बाद में दिखेंगी, लेकिन उसके राजनीतिक-चुनावी मुद्दों की संभावनाएं अभी से दिखती हैं। आज भारतीय चुनावी राजनीति में भरोसेमंद और साफ-सुथरी छवि का वजन कम नहीं है। इन्हीं दो बातों को लेकर अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर आए, और वहां काबिज रह गए। न सिर्फ बिहार में, बल्कि दूसरी जगहों पर भी नए और साफ-सुथरे दिखते लोगों की, पार्टियों की जरूरत है, और अगर किसी ने दूसरे देश में काम करके इतनी रकम जुटाई है कि यहां के चुनाव में खर्च करके अपनी बात सामने रख सके, तो उसमें बुराई क्या है? 

आम आदमी पार्टी की बाकी देश में एक यह भी नाकामयाबी रही कि वह बाकी राज्यों में वहां के परंपरागत सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के खिलाफ मुखर नहीं हो सकी, या असर नहीं छोड़ सकी। ऐसे में जब देश की विश्वसनीय वामपंथी पार्टियां लोकप्रिय-बहुमत खो बैठी हैं, और चुनाव जीतने की हालत में नहीं हैं, तो उन्हें भी असल मुद्दों को लेकर जनता के बीच जिस तरह सक्रिय रहना था, वे नहीं रह पाईं, और इसीलिए अधिकतर राज्यों में सत्ता या विपक्ष को वे उस तरह उजागर नहीं कर पाईं। ऐसे में कुछ नए चेहरों का आना अच्छा है, आज हालांकि पहले ही दिन इस युवती की इस पहल पर अधिक वजन के साथ कुछ लिखना ठीक नहीं है, इसलिए हम इसे एक मुद्दा मानकर इस पर नहीं लिख रहे हैं, हम इसे एक रूख और एक संभावना मानकर ऐसी तमाम पहलों के बारे में लिख रहे हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 08-Mar-2020

तरह-तरह की खाल ओढ़े 
ऐसे और भी मासूम दिखते 
हमले होते ही रहेंगे देश में

दुनिया के इतिहास में बहुत से लोग धूमकेतु की तरह आते हैं, तेजी से आते हैं, छा जाते हैं, और गायब भी हो जाते हैं। भूमंडल के धूमकेतु का तो नहीं मालूम, लेकिन धरती पर ऐसे लोग एक मकसद भी पूरा करते हैं जो कि जाहिर तौर पर उनका मकसद नहीं दिखता। हाल के बरसों के हिन्दुस्तान को देखें तो अभी दस बरस में ही अन्ना हजारे नाम के एक स्वघोषित समाजसेवी ने खादी और गांधी की खाल ओढ़कर देश की राजधानी दिल्ली में एक आंदोलन का ऐसा तूफान खड़ा किया कि लोगों को लगा कि अब बस हिन्दुस्तान से भ्रष्टाचार खत्म ही हो जाएगा। अन्ना ने बड़े-बड़े दावे किए कि किस तरह उन्होंने महाराष्ट्र में भ्रष्ट मंत्रियों को हटवा दिया, और किस तरह उनका सुझाया लोकपाल देश में भ्रष्टाचार खत्म कर देगा। उन दिनों गनीमत यही थी कि कोरोना वायरस का हमला हुआ नहीं था, वरना अन्ना हजारे लोकपाल को कोरोना का सबसे असरदार इलाज भी बता देते। उस वक्त की केन्द्र की यूपीए सरकार को विश्व इतिहास की सबसे भ्रष्ट सरकार साबित करने का एक अघोषित मकसद अन्ना ने पूरा किया, और देश में कांग्रेस-यूपीए के खिलाफ चुनाव के पहले एक माहौल खड़ा करके वे अपने गांव जाकर सो गए। तब से अब तक न किसी ने लोकपाल सुना, न भ्रष्टाचार के खिलाफ इस गांधीटोपीधारी को देखा। लोग इसके बारे में सही कहते हैं कि जब अगला चुनाव आएगा, अन्ना फिर आ खड़ा होगा, बिना मुंह से कहे, बिना पार्टी का नाम लिए, चुनाव प्रचार के लिए। 

ऐसा ही एक और आंदोलनकारी आया था, लेकिन वह न खादी में था, न टोपी में था, और न सफेद कपड़ों में था। वह भगवा कपड़ों में आया, और किसी महिला के सलवार कुर्ते में गया। बाबा रामदेव भी भ्रष्टाचार के खिलाफ नारा लगाते आया, और फिर खुलकर मोदी का प्रचार करते रहा, और उसने मोदीराज आने पर डॉलर और पेट्रोल के दाम कुछ 30-35 रूपए हो जाने की घोषणा की थी, इसकी पूरी मोदीनॉमिक्स भी समझाई थी, स्विस बैंकिंग समझाते हुए उसने विदेशों से कालाधन एक साल के भीतर आ जाने की बात कही थी, जैसे ही चुनाव निपटा, मोदी सरकार आई, बाबा योग शिविरों से गायब हो गया, आंदोलनों से गायब हो गया, उसका निशाना बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आ टिका, और उसने अपनी स्वदेशी-राष्ट्रवादी कंपनी को बाजार में एक सबसे चतुर बनिये की तरह उतारा, और अपने सामान इस्तेमाल करने को हिन्दू धर्म, भारतीय आध्यात्म, और हिन्दुस्तानी राष्ट्रवाद सबसे जोड़ दिया, और कारोबार में इतना डूब गया कि देश का डूबता रूपया, डूबती अर्थव्यवस्था, डूबते बैंक, इनमें से कुछ भी उसे दिखना बंद हो गया। 

ऐसे ही एक दौर में अपने आपको दो-दो श्री आबंटित करने वाले एक रविशंकर आए, उन्होंने भी यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ा, लेकिन जिस कर्नाटक की राजधानी में उनका आध्यात्म-महल बसा हुआ है, उसी राजधानी के भाजपा मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार की उनको भनक नहीं लगी। उनके अलावा बाकी पूरी दुनिया को वह भ्रष्टाचार दिखते रहा, लेकिन रविशंकर का निशाना एकलव्य की तरह सिर्फ यूपीए पर, सिर्फ कांग्रेस पर लगे रहा। वे भी जीने की कला सिखाने के नाम पर आए, उसका इस्तेमाल चुनाव में जिताने की कला के लिए किया, और एक मामूली मवाली के अंदाज में उन्होंने दिल्ली में यमुना को गंदा किया, बर्बाद किया, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पर थूककर चले गए। तब से अब तक कोई भ्रष्टाचार उन्हें दिखा नहीं, और देश मानो आर्ट ऑफ लिविंग में माहिर हो चुका है। 

इस सिलसिले की अब तक की सबसे ताजा कड़ी दक्षिण भारत के एक सद्गुरू हैं। नाम कुछ अटपटा लग सकता है कि क्या गुरू भी सद् के अलावा कुछ और हो सकते हैं? खैर, वे अपने योग-प्राणायाम और आध्यात्म की ताकत से उन तमाम आरोपों से ऊपर उठने में कामयाब थे जो कि उन पर उनकी पत्नी की मौत या हत्या को लेकर लगे थे। उन्होंने भी बहुत महंगी विदेशी गाड़ी को बहुत महंगे विदेशी चश्मे को पहनकर देश का दौरा किया, और नदियों को बचाने के लिए एक अभियान छेड़ा। नदियों से गंदगी दूर करने, नदियों को नई जिंदगी देने का दावा किया, और आखिर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने शिव प्रतिमा वाले विशाल समारोह में आमंत्रित करके हिन्दुस्तान के इतिहास का शायद सबसे रंगारंग मौका उन्हें दिया, और तब से अब तक नदियां अनाथ हैं, सद्गुरू धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं, और अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर के साथ पीछे की बेंच पर बैठने जा रहे हैं। 

इन सबको ठीक से याद करें, ठीक से याद रखें, तो इस विशाल लोकतंत्र में यह समझ आएगा कि ये किस वक्त आते हैं, किस हुलिए में आते हैं, किसकी खाल ओढ़कर आते हैं, किसके खिलाफ नारे लगाते हैं, और हकीकत में उसका क्या राजनीतिक-चुनावी मकसद होता है। यह समझना जरूरी इसलिए है कि तरह-तरह की खाल ओढ़े ऐसे और भी मासूम दिखते हमले होते ही रहेंगे, और जनता का जागरूक होना जरूरी है। इसको इस तरह भी समझा जा सकता है कि एक आदमी सरकारी अस्पताल से मुफ्त में मिलने वाले कंडोम का बड़ा सा बक्सा लेकर जा रहा है, जो कि बिन कहे ऐसा लगता है कि सेफ-सेक्स को बढ़ावा देने जा रहा है, लेकिन वह हकीकत में मुफ्तमिले कंडोम फुलाकर गुब्बारे बनाकर बेचने वाला है। देश के ये चारों चर्चित लोग ऐसा ही कुछ करते आए हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 07-Mar-2020

राज्यसभा की जरूरत अब 
खत्म हो गई दिखती है...

उत्तर-पूर्व की एक महिला पत्रकार ने फेसबुक पर पोस्ट किया है कि मेघालय से राज्यसभा के लिए एक ऐसे व्यक्ति को मनोनीत किया गया है जिसने मुसीबतों के इस दौर में एक शब्द भी नहीं बोला था, अब अगले छह बरस दिल्ली में वह एक मौन सांसद बने रहेगा। उत्तर-पूर्व की ऐसी निराशा देश भर में जगह-जगह दिखती है। बहुत से ऐसे राज्य रहते हैं जहां से राजनीतिक दल विजय माल्या जैसे लोगों को राज्यसभा भेजते हैं, या कम से कम एक पार्टी तो ऐसी है ही जो कि करोड़ों रूपए लेकर अरबपतियों को राज्यसभा भेजते आई है। यह पार्टी चुनाव के वक्त भी अपनी कुछ टिकटों को बेचने के लिए जानी जाती है, और बाकी सीटों पर उसी रकम से चुनाव का खर्च भी निकलता है। चूंकि राज्यसभा सदस्यों का चुनाव वोटर सीधे नहीं करते, और विधायकों के वोट से राज्यसभा सदस्य बनते हैं, इसलिए पार्टियां अपनी मर्जी के उम्मीदवार बनाती हैं, और पार्टी विधायकों पर नजर रखकर वोट भी डलवाती हैं। जब कभी भारत की संसद का ढांचा बनाया गया था, तब किसने सोचा होगा कि उच्च सदन कहलाने वाली राज्यसभा की सीटें बिकने लगेंगी, या बहुत ही नाकाबिल लोगों से उन सीटों को भरा जाएगा। कुछ पार्टियां तो बदनाम और मुकदमे-झेलते लोगों को भी राज्यसभा भेज देती हैं, उस सदन में जिसका गठन देश के उत्कृष्ट लोगों की प्रतिभा को इस्तेमाल करने के हिसाब से किया गया था। 

लेकिन हकीकत को अनदेखा करके महज संविधान-सभा की बहस को निकालकर गिनाना ठीक नहीं है, आज हकीकत यही है कि पार्टी के मुखिया के चापलूस, पार्टी के लिए फंड जुटाने वाले, धर्म और जाति के आधार पर कुछ तबकों को संतुष्ट करने के हिसाब से लोगों को राज्यसभा भेजा जाता है। इनमें कुछ लोग ऐसे जरूर रहते हैं जिन्हें केन्द्र में मंत्री बनाने की नीयत से सत्तारूढ़ पार्टी राज्यसभा में लाती है, और इनमें ऐसे लोग भी रहते हैं जो लोकसभा का चुनाव हारने के तुरंत बाद ऐसा मनोनयन पा जाते हैं। अब चूंकि इसी महीने देश भर में पार्टियां अपने राज्यसभा सदस्य चुनेंगी, और जहां-जहां कुछ अतिरिक्त विधायक-वोट पार्टियों के पास होंगे, वहां-वहां मोलभाव भी चलेगा, जोड़तोड़ भी चलेगी, और क्रॉस वोटिंग से लेकर हॉर्स ट्रेडिंग तक बहुत से शब्द अखबारी सुर्खियों में तैरेंगे। लेकिन जो राज्य समझदार हैं, या ऐसा कहें कि जिन राज्यों में जो राजनीतिक दल कोई सदस्य राज्यसभा भेजने जितने विधायक रखते हैं, उनको कम से कम अपने राज्य या पूरे देश की भलाई की बात भी सोचनी चाहिए। 

आज मोटेतौर पर अधिकतर पार्टियों में जाति या धर्म, या पार्टी के भीतर पकड़ के पैमाने ही काम आ रहे हैं। पूरे देश के जलते-सुलगते मुद्दों पर जमकर देशहित की बात करने की काबिलीयत को कोई पैमाना ही नहीं माना जाता। यह शायद पैमाना इसलिए भी नहीं रह गया है क्योंकि अब संसद में अभूतपूर्व-ऐतिहासिक बाहुबल के चलते सत्तारूढ़-पार्टी गठबंधन को किसी बहस की जरूरत भी नहीं है, शायद पसंद भी नहीं है। ऐसे में ये तमाम सोच, क्षमता, किसी काम की नहीं रह गई हैं कि संसद में कोई विचार-विमर्श हो, और उसमें इनकी जरूरत हो। सच तो यह है कि किसी विधेयक पर बहस और मतदान के पूरे दौर में अपनी पार्टी की घोषित नीति और रणनीति से परे जाकर कुछ बोलने वाले के लिए दल-बदल कानून का डंडा रखा हुआ है, और संसद के भीतर दोनों ही सदनों में अब लोगों की व्यक्तिगत सोच खत्म हो गई है क्योंकि पार्टियां व्हिप जारी करके अपने सदस्यों के हाथ-पैर, मुंह, सब बांध देती हैं। ऐसे में संसदीय विचार-विमर्श और बहस की उत्कृष्टता चल बसी है, और राज्यसभा में कितने ही स्तरहीन लोगों को भेजा जाए, उसका औसत स्तर आज जैसा ही रहेगा, क्योंकि बहुत से वैसे लोग वहां पहुंचे हुए हैं। लोकसभा में पहुंचने वाले कमजोर और खराब लोगों के साथ कम से कम यह बात तो रहती है कि उन्हें जनता के बीच से जनता के वोट पाकर जाना होता है, और वहां कई बार उन्हें खारिज भी कर दिया जाता है। लेकिन राज्यसभा में तो पार्टियां अपने सबसे रद्दी लोगों को भी भेज सकती हैं, और आज वैसा ही एक मौका आया हुआ है। चूंकि भारतीय संसद राजनीति में नीति-सिद्धांत, और उत्कृष्टता की जगह खत्म कर दी गई है, इसलिए अब राज्यसभा में पार्टियां कितने ही खराब, कितने ही कमजोर लोगों को भेजे, उस पर जनता का कोई बस तो चलता नहीं है। कुल मिलाकर जिस देश में पार्टियां अपने फैसलों के लिए, अपनी पसंद के लिए, अपने बर्ताव के लिए जवाबदेह न रह जाएं, उन देशों में उच्च सदन नाम की संस्था खत्म कर दी जानी चाहिए, जिसको बनाया ही उत्कृष्टता के लिए गया था। इसकी जरूरत भारतीय लोकतंत्र में अब खत्म हो गई दिखती है। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Mar-2020

क्या दुनिया के देश और प्रदेश 
ऐसी नौबतों के लिए तैयार हैं?

न सिर्फ चीन, बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट रद्द हो गए, ओलंपिक पर खतरा मंडरा रहा है, ईरान को अपनी जेलों से आधा लाख कैदियों को छोडऩा पड़ा, क्योंकि कोरोना वायरस का खतरा कैसे रोका जाए, कैसे कम किया जाए, किसी को समझ नहीं आ रहा है। विमानतलों से लेकर अस्पतालों तक दुनिया की हर सरकार पर जो दबाव पड़ रहा है, जितना नुकसान हो रहा है, जितना खर्च बढ़ रहा है, उसका अंदाज अभी तक सामने नहीं आया है। हिन्दुस्तान जैसे देश में जहां अधिकतर सामानों के लिए चीन से कलपुर्जे आते हैं, या दूसरे किस्म का कच्चा माल आता है, उसके पास अब दुनिया के दूसरे देशों से कारोबारी सौदों के अलावा कोई रास्ता नहीं दिख रहा है, और भारतीय अर्थव्यवस्था, यहां की मेन्यूफेक्चरिंग एक नाजुक हालत में पहुंच चुकी हैं। ताजा खबर मध्यप्रदेश के इंदौर में फिल्म पुरस्कार का आईफा समारोह स्थगित होने की है। दुनिया भर में लोग सफर रद्द कर रहे हैं, सैलानी कहीं जाने से कतरा रहे हैं, लोग नए लोगों से मिलना कम कर रहे हैं, और हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली में स्कूलों को इस पूरे महीने के लिए बंद कर दिया गया है। 

यह दुनिया न तो ऐसी बीमारी के फैलने पर उसकी रोकथाम के लिए तैयार है, न मरीजों के इलाज के लिए तैयार है, और न ही अर्थव्यवस्था इस बात के लिए तैयार है कि चीन के बिना वह चार कदम भी चल सके। जितने किस्म के कार्यक्रम पूरी दुनिया में रद्द हो रहे हैं उनकी वजह से उन जगहों पर कई किस्म का कारोबार भी चौपट हो रहा है। कहने के लिए हिन्दुस्तान के रिजर्व बैंक ने दो दिन पहले यह कहा था कि कोरोना वायरस की वजह से भारत के कारोबार पर पडऩे वाले बुरे असर से जूझने के लिए वह बैंकों की तैयारी कर रहा है, लेकिन यह तैयारी कैसी हो सकती है यह कल ही सामने आ गया जब खतरनाक अंदाज में काम करने वाला एक निजी बैंक, यस बैंक, डूबते दिख रहा है, और उस पर प्रशासक बिठा दिया गया है, वहां जमा करने वाले लोग अब सिर्फ पचास हजार रूपए तक निकाल सकते हैं। यह नौबत सिर्फ हिन्दुस्तान में नहीं है, और सिर्फ इस हद तक नहीं है। दुनिया की अर्थव्यवस्था वैसे भी चौपट चल रही थी, हिन्दुस्तान में बुरा हाल पहले से चल रहा था, और अब कोरोना के साथ-साथ यस बैंक की शक्ल में भारतीय शेयर बाजार में एक बड़ी बिजली गिरी है, जिससे पता नहीं कितना नुकसान होगा। ऐसे में एक खबर यह भी है कि तीन दिन पहले ही रिजर्व बैंक के एक और डिप्टी गवर्नर ने इस्तीफा दिया था, और वह किस वजह से था, यह अब तक साफ नहीं है। 

हम कुछ दिन पहले भी इस बात पर लिख चुके हैं कि देशों को, प्रदेशों को, अपनी अर्थव्यवस्था को इस लायक बनाकर रखना चाहिए कि वे किसी प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा का सामना कर सकें। अभी-अभी यह जानकारी सामने आई है कि देश में सबसे ज्यादा अनाज पैदा करने वाले, संपन्न किसानों वाले, विदेशों में बसे सबसे अधिक रिश्तेदारों वाले पंजाब की माली हालत ऐसी बुरी हो गई है कि अभी उसने सरकारी कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए कर्ज लिया है। अब अगर सोचा जाए कि ऐसा प्रदेश कोरोना के अधिक मामलों का शिकार होता है, या किसी दिन भोपाल गैस त्रासदी जैसा कुछ उसके साथ होता है, तो उसका क्या हाल होगा? कोरोना से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चौपट हुई है, और अभी उसका पूरा असर दिख नहीं रहा है। बाकी दुनिया की वजह से, और चीन पर कच्चे माल के लिए मोहताज रहने की वजह से, हिन्दुस्तान बहुत बुरी मंदी और नुकसान को झेलने जा रहा है। आने वाले कई महीने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत खराब रहेंगे। केन्द्र और राज्यों को कोरोना से बचाव और इलाज की तैयारी में खासा खर्च करना पड़ेगा, और इस वायरस से बचने के लिए पूरे देश में कार्यक्रम रद्द होंगे, आर्थिक गतिविधियां ठप्प होंगी। 

कोरोना वायरस दुनिया की सरकारों के लिए एक चेतावनी लेकर भी आया है कि अर्थव्यवस्था को फौलादी मानने वाले लोग यह जान और मान लें कि अर्थव्यवस्था एक बुलबुले से अधिक मजबूत नहीं होती है, और एक बड़ा झटका उसे फोड़ सकता है। कहने के लिए तो कोरोना से अब तक मौतें तीन हजार के करीब ही हुई हैं, लेकिन दुनिया का कारोबार इसकी दहशत में ठप्प हो गया है। ऐसी नौबत अगर हर बरस आने लगे, अलग-अलग वजहों से आने लगे, तो क्या दुनिया के देश और प्रदेश वैसी नौबतों के लिए तैयार हैं?
-सुनील कुमार


Date : 05-Mar-2020

बोझ से महिलाओं के दबे हुए सिर
देश का सिर ऊंचा कैसे करते हैं?

भारत सरकार के रेल मंत्रालय ने कल ट्विटर पर कुछ तस्वीरें पोस्ट की हैं जिनमें अलग-अलग रेलवे स्टेशनों पर सिर पर बोझ लेकर जाती हुई महिला कुली दिख रही हैं, और एक तस्वीर में एक महिला कुली एक लदी हुई ट्रॉली भी खींच रही है। रेलवे ने इन महिलाओं को सलाम लिखते हुए लिखा है कि भारतीय रेलवे के लिए काम करने वाली ये महिला कुली साबित करती हैं कि वे किसी से भी पीछे नहीं हैं। लोगों को याद होगा कि देश के बहुत से स्टेशनों पर काम करने वाली महिला कुली को लेकर ऐसी कहानियां स्थानीय स्तर पर छपती हैं जिनमें आमतौर पर पुरूष के किए जाने वाले इन कामों में महिलाओं की जीवट मेहनत का जिक्र होता है। इसी तरह का काम निर्माण कार्यों में सिर पर सीमेंट की 50 किलो की बोरी लेकर चलने वाली मजदूर महिलाएं करती हैं, बहुत सी ऐसी तस्वीरें भी आती हैं जिनमें अपनी पीठ पर साड़ी के आंचल में छोटे से बच्चे को टांगे हुए मजदूर महिला सिर पर 10-20 ईटें लादकर चलती हैं। कस्बाई मोहल्लों में सब्जी बेचने वाली महिलाएं भी भारी-भरकम टोकरी सिर पर लेकर इसी तरह चलती हैं, और पूरे देश में महिलाएं घर के लिए पानी लाते हुए घड़े इसी तरह सिर पर रखती हैं। 

अब अगर हड्डियों के किसी डॉक्टर, या स्नायुतंत्र के किसी डॉक्टर से पूछा जाए तो वे सिर पर इस तरह के बोझ का खतरा गिनाएंगे। इससे गर्दन और रीढ़ की हड्डी किस तरह तबाह होती है, यह चिकित्सा विज्ञान में अच्छी तरह दर्ज है। रेलवे स्टेशनों पर महिलाएं बाकी तमाम मर्दों के बीच बोझ ढोने के काम में अकेले किस तरह लगी रहती हैं, यह जाहिर तौर पर उनकी पसंद का काम तो नहीं हो सकता, और बहुत से मामलों में यह हकीकत छपती है कि किसी कुली के गुजर जाने पर उसका बिल्ला उसकी पत्नी को मिल जाता है, और घर चलाना जारी रखने के लिए वह इस तरह के दिक्कत वाले, मेहनत वाले काम में लग जाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत सरकार के इस सबसे बड़े मंत्रालय को इस बात पर गर्व करना चाहिए? क्या कल के दिन अगर कोलकाता में महिलाएं रिक्शों को खींचकर दौड़ती हुई दिखें तो क्या ममता सरकार इसे अपनी एक कामयाबी बताकर उनकी तस्वीरों को पोस्ट करे? 

हिन्दुस्तान में जिंदा रहने के लायक मजदूरी वाले काम मिल जाना भी किस्मत की बात मान ली जाती है। लोग यह समझते हैं कि भूखा नहीं मरना पड़ रहा है, तो वही जिंदगी बहुत अच्छी है। अब 21वीं सदी एक चौथाई होने को है, और ऐसे में कम से कम मानव श्रम के ऐसे तरीकों को हटाना चाहिए जो कि अमानवीय हैं। जिस देश के हवाई अड्डों पर महंगा सफर करने वाले मुसाफिरों के लिए आरामदेह ट्रॉली रहती हैं जिन पर सामान लादकर ले जाया जाता है। ऐसे में देश के दूसरे हिस्सों में भी, दूसरे कामों में लगी महिलाओं की हालत बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए, और यह बात महज महिला-मजदूरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि सभी मजदूरों के तन-मन का इतना तो ख्याल रखा ही जाना चाहिए कि मजदूरी के बाद भी उन्हें जिंदा रहना है, और बाकी की जिंदगी तरह-तरह की बीमारियों और तकलीफों से भरी हुई न रहें। 

कुछ अरसा पहले ऐसी खबर थी कि किसी एक आईआईटी के छात्र-छात्राओं ने आसपास की गरीब बस्तियों में जाकर उनकी रोज की जिंदगी को बेहतर बनाने की कोशिशें की हैं। उन्होंने उनके रोज के काम में आने वाले औजारों और उपकरणों को बेहतर बनाकर खतरा घटाने, उत्पादकता बढ़ाने, और सहूलियत बढ़ाने का काम किया है। एक तरफ जब देश चांद पर जा रहा है, तो दूसरी तरफ धरती पर जीने वाले आम, गरीब, और बेबस लोगों की जिंदगी से तकलीफ घटाने की जरूरत भी है। देश में बहुत किस्म के मजदूर कानून है, जिनकी कहीं कोई इज्जत नहीं होती, और मजदूर-दूसरे कामगार खतरे में काम करते हैं। ऐसी तमाम नौबत को सुधारने की जरूरत है। और भारत सरकार के रेल मंत्रालय को भी यह समझना चाहिए कि महिलाओं को सिर पर इस किस्म का बोझ किसी देश का सिर ऊंचा नहीं करता, महिलाओं को बेहतर काम, बेहतर हाल मिलना चाहिए, जो कि कुली महिलाओं का तो बिल्कुल भी नहीं है।
-सुनील कुमार


Date : 04-Mar-2020

ऐसे गौभक्त कोरोना वायरस 
से अधिक खतरनाक हैं...

दुनिया के दर्जनों देशों में जिस रफ्तार से कोरोना वायरस फैल रहा है, वह भयानक नजारा है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में जिम्मेदार ओहदों पर काबिज लोग जिस तरह से अज्ञान फैलाकर लोगों को अंधविश्वासी बना रहे हैं, वह और भी भयानक है। वैज्ञानिक सोच-समझ वाले लोग इस बात का अंदाज लगा सकते हैं कि हिन्दुस्तान में अगर कोरोना फैला, तो वह अपनी पूरी ताकत से जितने लोगों को मार सकेगा, उससे अधिक लोगों को अंधविश्वास मार डालेगा कि गोबर और गोमूत्र से लोग इस वायरस से बच जाएंगे। जिन लोगों की धार्मिक आस्था के चलते उन्हें गाय एक पवित्र पशु लगती है, उन्हें अपनी इस सोच को फैलाने के पहले यह हलफनामा देना चाहिए कि वे किसी दूसरी पद्धति का कोई इलाज कभी नहीं करवाएंगे, और सिर्फ गोबर और गोमूत्र से अपनी सभी बीमारियों का इलाज करेंगे। ऐसे हलफनामे के बाद ही इन लोगों को यह नैतिक हक रहेगा कि वे अफवाह फैलाकर दूसरों को बरगला सकें, खतरे में डाल सकें। 

आज चीन जैसा मजबूत सरकारी पकड़ वाला देश जिस मजबूती से कोरोना वायरस से निपट रहा है, हिन्दुस्तानी सरकार की क्षमता और समाज की जागरूकता उसका एक फीसदी भी नहीं कर सकते। यह तो गनीमत है कि चीन के पहले यह हमला हिन्दुस्तान पर नहीं हुआ, वरना यहां के अस्पतालों में ऐसी अराजकता फैली रहती, राजनीतिक दल प्रदर्शन करते रहते, अफसर दवाईयों की खरीद में भ्रष्टाचार के लिए ओवरटाईम करते रहते, और गौभक्त लोगों को बरगलाते रहते। यह तो ठीक हुआ कि कोरोना वायरस ने पहले दूसरे देशों पर हमला किया और हिन्दुस्तान के भीतर एक बहस की गुंजाइश खड़ी कर दी। एक तरफ तो प्रधानमंत्री कोरोना वायरस के चलते होली न मनाने का फैसला ले रहे हैं क्योंकि जहां भीड़ जुटेगी वहां इस वायरस के फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी की एक विधायक विधानसभा के भीतर गोबर-गोमूत्र पद्धति का इलाज कर रही है, उसका दावा कर रही है। एक हिन्दू संगठन का कोई भगवाधारी गाय की इन दो चीजों का एक स्टॉल लगाकर इलाज या बचाव करने वाला है। 

कोई जिम्मेदार लोकतंत्र होता तो वहां सरकारें खुद होकर इस किस्म के फैलाए जा रहे उच्च स्तरीय अंधविश्वास का विरोध करतीं, और जनता को जागरूक करने का काम करतीं। लेकिन आज गाय के नाम पर हर किस्म का फरेब फैलाना कुछ पार्टियों को चुनावी फायदे का दिख रहा है, और बाकी अधिकतर पार्टियों को ऐसे फरेब का पर्दाफाश करना चुनावी नुकसान का दिख रहा है। नतीजा यह है कि नेहरू के वक्त की वैज्ञानिक सोच को तबाह करके आज देश को एक धार्मिक और साम्प्रदायिक अंधविश्वास में डुबाया जा रहा है, जिसके चलते कोरोना का हमला अगर हुआ, तो वह बहुत तबाही फैलाएगा। लोगों को याद रखना चाहिए कि धर्मान्धता और कट्टरता से जल रहे पाकिस्तान में आतंकियों ने बच्चों को पोलियो का टीका पिलाने वालों को गोलियां मारीं, और लोगों को कहा कि इस दवा में मुस्लिम नस्ल को खत्म करने के लिए चीजें मिली हुई हैं। नतीजा यह है कि आज दुनिया में जिन गिनी-चुनी जगहों पर पोलियो बाकी है, उनमें पाकिस्तान अव्वल हो गया है। धर्मान्धता और कट्टरता जब मिलकर विज्ञान का गला घोंटते हैं, तो उसके बचने की गुंजाइश कम हो जाती है। वह तो जवाहर लाल नेहरू थे जिन्होंने सारे धार्मिक पाखंडों को नकारते हुए देश में एक वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, बढ़ाई थी, और मजबूत की थी। उन्होंने ही इस देश में बड़े-बड़े वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना की थी, जिसकी वजह से आज दुनिया भर में हिन्दुस्तानी इंजीनियरों का बोलबाला है। 

जहां कोरोना वायरस का खतरा एक बड़ी वैज्ञानिक और मेडिकल चुनौती रहनी चाहिए, जहां इससे बचने और जूझने की तैयारी में देश के बड़े-बड़े विशेषज्ञों को लगना चाहिए, वहां पर आज दुनिया के इस एक सबसे बड़े खतरे से जूझने का जिम्मा उस गाय को दे दिया जा रहा है जिसे उसके भक्तजन खाना नहीं देते, और वह घूरों पर प्लास्टिक की थैलियां खाकर जीने को मजबूर है। ऐसे अंधभक्तों से यह सवाल भी जायज होगा कि घास खाने वाली गाय के गोबर-गोमूत्र से ही कोरोना का इलाज होगा या फिर पॉलीथीन से भरे हुए पेट वाली गाय का गोबर-गोमूत्र भी हिन्दुस्तान को बचा लेगा? देश का यह सिलसिला इसलिए बहुत ही निराश करता है क्योंकि वैज्ञानिक सोच के कत्ल से निकला हुआ लहू उसकी लाश पर ही नहीं थमेगा, वह दूर तक रहेगा, और हिन्दुस्तानी आबादी को विज्ञान के पहले के जमाने में ले जाकर छोड़ेगा। कोरोना आज इस देश में छोटा खतरा है, ऐसे गौभक्त उससे अधिक खतरनाक वायरस हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 03-Mar-2020

पांच सौ करोड़ की शादी से किसका नफा, किसका...
कर्नाटक के एक भाजपा मंत्री की बेटी की शादी में चालीस एकड़ जमीन पर सजावट हो रही है, और पांच सौ करोड़ रुपये खर्च होने का अंदाज लगाया जा रहा है। इस जलसे की और भी बहुत सी जानकारी अलग-अलग खबरों में आ रही है, और उन सबकी लिस्ट गिनाए बिना भी हम अपनी बात सीधे आ सकते हैं। 

न सिर्फ कर्नाटक, बल्कि दक्षिण भारत में दूसरे राज्यों में भी इस किस्म की महंगी शादियों का चलन है। जनता के बीच से चुनकर आने वाले लोग सरकार में रहते हुए कब अरबपति और कब खरबपति हो जाते हैं, यह पता भी नहीं चलता, और फिर वे अपनी दौलत से ऐसे बड़े निजी समारोह करते भी हैं। यह तो केंद्र सरकार के सोचने की बात है कि क्या इतना बड़ा खर्च पूरे का पूरा हिसाब-किताब में दिखाया जाता है, या फिर वह दो नंबर के पैसों से होता है? यह भी सत्तारूढ़ पार्टी के सोचने की बात है कि क्या सार्वजनिक जीवन के लोगों को इस किस्म का खर्च करना चाहिए जिसे आम लोगों की जुबान में आमतौर पर अश्लील और हिंसक भी कहा जाता है। जब हिंदुस्तान की जनता इतनी गरीब है, कुपोषण की शिकार है, गरीब बच्चे लाखों की संख्या में हर बरस बेमौत मर रहे हैं, तो क्या वैसे में ऐसा खर्च एक हिंसक फिजूलखर्ची है, या इससे कोई नुकसान नहीं है?

इस बात को समझने की जरूरत है कि इस शादी, या ऐसी और शादियां पर होने वाले सैकड़ों करोड़ के खर्च को अगर नहीं किया गया होता? तो क्या वह रकम देश के किसी बांध या पुल जैसे उत्पादक काम में लगी होती? या फिर वह रकम ऐसे ही किसी पूंजीनिवेश में चली जाती जिससे अर्थव्यवस्था में आगे और कुछ नहीं होता। जमीन, हीरे-जवाहरात, या विदेशी बैंकों में नामी-बेनामी रकम से देश की अर्थव्यवस्था का क्या भला हुआ होता? अभी जो पचास करोड़ या पांच सौ करोड़, जो कुछ भी इस शादी पर खर्च हो रहा है, उससे हजारों मजदूरों और कारीगरों का काम मिलेगा, खर्च का कम से कम एक हिस्सा तो अकाउंट में भी होगा, और उस पर सरकार को टैक्स मिलेगा। जब तक इस बात की गारंटी न हो कि ऐसा खर्च अगर न हुआ होता और वह रकम किसी उत्पादक काम में, या किसी समाजसेवा में खर्च हुई होती, तब तक तो ऐसी बचत भी किसी काम की नहीं हो सकती। जहां तक जनता के बीच से इतनी कमाई करके उसके बीच ऐसे हिंसक खर्च की बात है, तो यह समझना चाहिए कि भारत की राजनीति में अब संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है, और जनता की भावना की परवाह करना राजनीति में अब खत्म हो चुका है। इसलिए इस बात पर अधिक फिक्र करने से कुछ हासिल नहीं होना है कि जिंदगी में किफायत बरती जानी चाहिए। ऐसे किफायत तभी काम की है, जब उसका समाज के लिए कोई बेहतर इस्तेमाल किया जाना हो। फिलहाल तो यह मानना चाहिए कि अगर सचमुच ही इस शादी में पांच सौ करोड़ खर्च हो रहे हैं, तो पच्चीस-पचास करोड़ पर तो सरकार को कुछ टैक्स मिलेगा और बाकी खर्च से लोगों को मजदूरी मिलेगी, काम मिलेगा। यह देश इसी किस्म का है कि यहां संसद और विधानसभाओं के अहाते में गांधी की प्रतिमा बिठा दी जाए और उसके साथ ही सादगी और किफायत का जिम्मा उस प्रतिमा को दे दिया जाए।
-सुनील कुमार


Date : 02-Mar-2020

दबाव में कोयले को हीरा बनते
देखा था, अब हीरे को कोयला...

दिल्ली में भाजपा की कुछ नेताओं के बयानों को नफरत की आग करार देते हुए उसके खिलाफ दायर की गई याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अभूतपूर्व और हैरान करने वाली बेबसी दिखाई है। मुख्य न्यायाधीश एस.ए.बोबड़े ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट शांति चाहता है, लेकिन हिंसा पर काबू करने के इसके अधिकार सीमित हैं। उन्होंने कहा- हम ऐसी बातों को होने से रोकने की ताकत नहीं रखते हैं, हम इनसे तभी निपट सकते हैं जब ऐसी नौबत आकर जा चुकी रहती है। यह हम पर एक किस्म का दबाव है। हम इतना दबाव बर्दाश्त नहीं कर सकते। 

याचिकाकर्ता की ओर से वकील का तर्क था कि दिल्ली हिंसा के शिकार लोगों की तरफ से हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी, वहां से पुलिस को नोटिस भी जारी हुआ था, लेकिन जज का तबादला हो गया, और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने केस को छह महीने आगे बढ़ा दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, और वहां मुख्य न्यायाधीश का यह रूख सामने आया। 

सुप्रीम कोर्ट हर सुनवाई पर कोई फैसला नहीं देता है, कागजों पर हर बात को लिखकर दस्तखत नहीं करता है, लेकिन जजों की कही जुबानी बातों को भी देश और दुनिया गौर से देखते हैं। उनकी कही बातें फैसले से एक ही कदम पीछे रहती हैं, और उनका दिया हुआ फैसला कई मौकों पर मौजूदा कानून को खारिज करते हुए आता है, और उसके बाद यह संसद के पाले में पहुंची हुई गेंद बन जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज करने के लिए संसद संविधान संशोधन करे। हिन्दुस्तान में एक सबसे ताकतवर संस्था का मुखिया अपनी नाकतले, अपनी आंखों के सामने सत्ता की चप्पी के बीच, और सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के खुले भड़काऊ-हिंसक भाषणों, पुलिस के तमाशबीन-किरदर के देखते हुए चल रही ऐसी भयानक हिंसा पर अगर महज इतना ही कह और कर सकता है, और दबाव बर्दाश्त न कर पाने की बात कहता है, तो यह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र और जनता दोनों को पूरी तरह निराश करने वाली, और बेसहारा छोड़ देने वाली बात है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर इस देश ने ऐसे लोग देखे हैं जिन्होंने मौजूदा कानूनों को गलत मानकर उनके खिलाफ फैसले दिए थे, जिनको संसद के बाहुबल से ही पलटा जा सका था। आज यह सुप्रीम कोर्ट अपनी ही सहूलियत की बस्ती में किए जा रहे कत्लेआम पर मुंह भी न खोल पाने की बेबसी जाहिर कर रहा है, और सदमा पहुंचाने वाले उसके शब्द हैं कि वह तभी कुछ कर सकता है जब हिंसा हो चुकी रहेगी। साम्प्रदायिक हिंसा चाहने और बढ़ाने, कहने और करने वालों को इससे अधिक और चाहिए भी क्या? सुप्रीम कोर्ट जब दबाव न झेल पाने की बात कहता है, तो कोयले की खदानों के भीतर दबाव से हीरे में बदल जाने वाले कोयले की याद आती है। आज हिन्दुस्तान के सबसे बड़े अदालती हीरे एक औसत से सतही राजनीतिक-साम्प्रदायिक दबाव में कोयले में तब्दील हो रहे हैं। जाहिर है कि दिल्ली में हत्यारों और दंगाईयों के लिए आज न सिर्फ राहत का दिन है, बल्कि बड़ी खुशी का दिन भी है कि देश की सबसे बड़ी अदालत का सबसे बड़ा जज उनके दबाव को झेल नहीं पा रहा है, और लाशों के गिराए जाने के पहले तक हत्याओं को रोक पाने में अपनी बेबसी जाहिर कर रहा है। 

हिन्दुस्तान दुनिया का एक बहुत बड़ा और ताकतवर लोकतंत्र माना जाता रहा है, और जाहिर है कि ऐसे देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले दुनिया के बाकी लोकतांत्रिक देशों में भी कानून पढ़ाने के दौरान चर्चा में आते होंगे, उन्हें कई जगहों पर किताबों में लिखा जाता होगा। अब हैरानी इस बात की है कि जिस कुर्सी से निकले हुए शब्द न महज हिन्दुस्तान में, बल्कि बाकी दुनिया में भी इतिहास में दर्ज होते हैं, वह कुर्सी अपनी एक ऐसी बेबसी का रोना रो रही है जो कि लोकतंत्र के भीतर कानून की एक मामूली समझ को भी गले नहीं उतरती है। कुल मिलाकर आज हिन्दुस्तान में हिंसा के मारे गए लोगों की बात सुनने के लिए, और मौतों को रोकने के लिए महज संसद-अहाते की गांधी प्रतिमा बची है जिसके सामने जाकर विपक्ष एक प्रतीकात्मक-प्रदर्शन कर सकता है, सुप्रीम कोर्ट तो एक प्रतीकात्मक बात कहने की हालत में भी नहीं दिख रहा है, क्योंकि वह और दबाव बर्दाश्त करने की हालत में अपने को नहीं पा रहा है। वैसे सुप्रीम कोर्ट से कौन यह पूछ सकता है कि यह किस दबाव की चर्चा हो रही है? 
-सुनील कुमार


Date : 01-Mar-2020

ऐसे हौसलामंद अफसरों
को सलाम कि उन्होंने...

दिल्ली में साम्प्रदायिक हमलों के शिकार बीएसएफ के एक मुस्लिम सिपाही के घर को जलाकर राख कर दिया गया, और वह सिपाही ओडिशा में तैनात था। बीएसएफ के एक डीआईजी अपने विभागीय सहयोगियों के साथ खाने-पीने का सामान लेकर उसके घर पहुंचे, उसके पिता से मिलकर दिलासा दिलाया, और उनकी तकलीफ बांटी। उन्हें यह खबर इस सिपाही से नहीं मिली थी, बल्कि अखबारी खबरों से मिली थी कि सिपाही के नाम की तख्ती के साथ बीएसएफ का जिक्र भी था, लेकिन हमलावरों ने उसके बावजूद वह घर जलाकर राख कर दिया था। डीआईजी पुष्पेन्द्र सिंह राठौर वहां बीएसएफ के इंजीनियरों के साथ पहुंचे थे, और उन्होंने अपने संगठन की ओर से इस मकान को बनवाने की घोषणा की, और परिवार को बीएसएफ कल्याण कोष से दस लाख रूपए की मदद देने की भी। उन्होंने इस मुस्लिम सिपाही का ओडिशा से दिल्ली तबादला करने की बात भी कही। 

बीएसएफ यानी सीमा सुरक्षा बल। मोटेतौर पर इस सशस्त्र बल के जवान देश की सरहदों पर तैनात रहते हैं, या बस्तर जैसे नक्सल मोर्चे पर भी वे जान खतरे में डालकर काम करते हैं। बीएसएफ का एक मुस्लिम जवान जब पाकिस्तान या बांग्लादेश की सरहद पर तैनात रहता है, तो उसे सरहद के पार मुस्लिम बहुतायत वाले देश दिखते हैं, और वहां से होने वाले किसी हमले, किसी घुसपैठ के खिलाफ वह खतरे झेलते खड़े रहता है। ऐसे वक्त उस सिपाही की दिमाग की बात सोचना मुश्किल है जब उसे यह खबर लगी होगी कि देश की राजधानी दिल्ली में उसके घर को आग लगा दी गई है, और मुस्लिम होने की वजह से उस इलाकों में बहुत से लोगों का कत्ल हुआ है, बहुत आगजनी हुई है, और लोगों को इलाका छोड़कर भागना पड़ा है। जिस वक्त यह सिपाही बीएसएफ में नौकरी पर पहुंचा होगा, और किसी सरहद पर तैनात हुआ होगा, या किसी दूसरे खतरनाक हथियारबंद मोर्चे पर रहा होगा, तो जाहिर है कि वह हिन्दू बहुतायत आबादी वाले इस देश की हिफाजत के लिए खतरे की एक नौकरी कर रहा था। अब अचानक इस हिन्दू बहुतायत आबादी के कुछ चुनिंदा साम्प्रदायिक-हिंसक मुजरिम मुस्लिमों को इस तरह से मार रहे थे, और केन्द्र सरकार, संसद, सर्वोच्च न्यायालय, मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग के इस मुख्यालय में तीन दिनों तक हिंसा चल रही थी जिसमें दिल्ली की पुलिस मौजूद रहते हुए भी गायब थी, तो उसके दिल पर क्या गुजरा होगा? सच तो यह है कि हिन्दुस्तानी फौज के  इतिहास के सबसे बहादुर शहीद कैप्टन हमीद की आत्मा पर क्या गुजर रही होगी जब वे यह देख रहे होंगे कि देश की राजधानी में मुस्लिमों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है? उन्होंने तो एक मुस्लिम देश के खिलाफ हिन्दुस्तान की फौज की तरफ से लड़ते हुए जान गंवाने की गारंटी वाली बहादुरी दिखाई थी, और शायद ऐसे किसी दिन की कल्पना नहीं की थी। 

खैर, देश में आज जो लोग हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच एक गहरी खाई खोदने में ओवरटाईम कर रहे हैं, वे आज दिल्ली जला रहे हैं, और कल कोई और शहर जलाएंगे। ऐसे में अगर केन्द्र सरकार के एक अर्धसैनिक संगठन बीएसएफ ने ऐसी एक पहल करने का हौसला दिखाया है, तो उससे भी देश के बाकी लोगों को सबक लेना चाहिए जो कि अधिकार तो रखते हैं, और केन्द्र सरकार के अधीन काम भी नहीं कर रहे हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि वे अपने आसपास के लोगों की किस तरह, क्या मदद कर सकते हैं। देश में धर्म के नाम पर दान देने वाले करोड़ों लोग हैं, आध्यात्मिक गुरूओं के नाम पर भी दान देने वाले करोड़ों लोग हैं, लेेकिन साम्प्रदायिक हिंसा में परिवार के लोगों को, घर-दुकान, कारोबार-रोजी गंवा देने वाले लोगों की मदद के लिए दान देने का एक शब्द भी अब तक हिन्दुस्तान में गूंजा नहीं है। और कोई सभ्य देश होता तो इस बात को दान भी नहीं कहा जाता, सहयोग कहा जाता, और उसके लिए कतार लग गई होती। आज महज दिल्ली की राज्य सरकार ने लोगों को मुआवजा देने की एक घोषणा की है, जिसके इश्तहार में शिनाख्त के कुछ कागज मांगे हैं। इसी धुआं उठती दिल्ली में आज भी दंगाई सोच वाले ऐसे नफरतजीवी मौजूद हैं जो कि इस इश्तहार की तस्वीर के साथ ट्वीट करके मुस्लिमों पर तंज कस रहे हैं कि उन्हें (नागरिकता) कागज नहीं दिखाने के अपने नारे, और अपने ऐलान पर कायम रहना चाहिए (ताकि वे मुआवजा न पा सकें)। सब कुछ जलाने और जान ले लेने के बाद भी जिनकी हवस पूरी नहीं हुई है, वे अब मुआवजा न लेने की चुनौती दे रहे हैं, जिससे कि उनकी खुद की सोच उजागर हो रही है। 

इस देश में धर्म और जाति के आधार पर चुन-चुनकर भेदभाव, कत्ल और आगजनी का सिलसिला न किसी मुआवजे से पूरा होगा, न ही 25-50 बरस बाद अदालत से आए किसी फैसले से ही। ये जख्म पीढिय़ों तक रिसते रहेंगे जब बच्चों को मां-बाप और दादा-दादी से हिंसा की ये कहानियां सुनने मिलेंगी। साम्प्रदायिक आगजनी किसी हादसे की तरह नहीं होती हैं जो कि बीमे की रकम से उबर जाए। साम्प्रदायिक हत्या किसी सड़क-दुर्घटना मौत की तरह नहीं होती कि वह दर्द से उबर जाए। आज देश में ताकतवर तबकों ने मिलकर जो माहौल बनाया है, उसकी आग किस दिन उनके अपने घर तक, और उनके अपने घरवालों तक पहुंचेगी इसका अंदाज उन्हें नहीं लगेगा, और उन्हें वैसे किसी दिन बस उसकी खबर लगेगी। फिलहाल बीएसएफ के ऐसे हौसलामंद अफसरों को सलाम जिन्होंने अपने एक सिपाही के परिवार के साथ जाकर इस तरह की हमदर्दी दिखाई है, और दंगाईयों को नकार दिया है।
-सुनील कुमार


Date : 29-Feb-2020

सरकार से असहमति को
राजद्रोह मानने की सोच...

दिल्ली के जेएनयू में वहां के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार ने चार बरस पहले राजद्रोह में गिरफ्तारी के बाद या पहले जो भाषण दिया था उस पर दिल्ली सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाने के लिए कानूनी मंजूरी दे दी है। कई बरस से मंजूरी का यह कागज केजरीवाल सरकार के पास पड़ा हुआ था, और कई बार केजरीवाल सवालों के घेरे में भी आए कि इस पर फैसला क्यों नहीं लिया जा रहा है। कुछ लोगों का यह भी मानना था कि कल तक सामाजिक कार्यकर्ता रहे केजरीवाल इस फर्जी दिखते मामले को लेकर कन्हैया कुमार के खिलाफ इजाजत नहीं देंगे। लेकिन अब दिल्ली का चुनाव निपट जाने के बाद उन्होंने यह इजाजत दे दी है। इसके पहले लोगों को याद रहना चाहिए कि कन्हैया कुमार के बताए जाने वाले नारों के वीडियो अदालत की फोरेंसिक जांच में झूठे साबित हो चुके हैं, और कम से कम एक अदालत ने यह माना था कि कन्हैया कुमार के कहे में कोई राजद्रोह नहीं था। लेकिन ऐसा लगता है कि चुनाव जीतने के बाद अब केजरीवाल के सामने दिल्ली के नौजवानों के समर्थन की कोई जरूरत रह नहीं गई है, और उन्होंने देश के एक सबसे बड़े नौजवान नेता को कटघरे में खड़े करने का रास्ता खोल दिया है।

सिर्फ कन्हैया कुमार की वजह से नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करके कोई भी गंभीर राजनीतिक या सामाजिक बातचीत करने वाले लोगों पर जब राजद्रोह लगाया जा रहा है, तो वह देश के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है। किसी एक राज्य के हाईकोर्ट ने हाल ही में यह कहा भी है कि सरकार की नीतियों से असहमति जाहिर करना किसी भी तरह से राजद्रोह नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि भारत की आज की राजनीतिक हवा में सरकार से असहमति को देश से असहमति मान लिया गया है। और लोकतंत्र में तो देश से असहमति भी कोई गद्दारी नहीं होती, वह लोकतंत्र का एक अविभाज्य और अपरिहार्य हिस्सा होती है। गणतंत्र दिवस पर जब भारत सरकार ने ब्राजील के एक घोर महिला विरोधी राष्ट्रपति को अतिथि बनाकर बुलाया, तो देश के बहुत से तबकों ने खुलकर उसकी आलोचना की। अब इसे केन्द्र सरकार से असहमति भी कहा जा सकता है, और देश के फैसले से भी। लेकिन क्या इसे राजद्रोह या देश के साथ गद्दारी भी कहा जाएगा? लोगों को याद रखना चाहिए कि भारत के मुकाबले जो अधिक परिपक्व लोकतंत्र हैं, उनमें से अमरीका में वहां की सरकार के युद्ध के फैसले के खिलाफ अनगिनत प्रदर्शन होते रहते हैं, अमरीकी राष्ट्रपति के जलवायु-परिवर्तन फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन चलते ही रहते हैं। इसी तरह जब इराक पर अमरीकी हमले में ब्रिटेन ने साथ दिया था, तो ब्रिटिश जनता सड़कों पर उतर आई थी, और राजधानी लंदन ने 10 लाख लोगों का एक ऐसा प्रदर्शन देखा था जिसकी कोई मिसाल ब्रिटिश इतिहास में भी नहीं थी। इसलिए एक बात लोगों को साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि कोई नेता देश का विकल्प नहीं होता, कोई सरकार देश का विकल्प नहीं होती, और किसी सरकार का फैसला हमेशा देश के हित में ही हो, यह भी जरूरी नहीं होता। ऐसे में बात-बात पर लोगों को गद्दार और राजद्रोही करार देना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक काम है। 

कन्हैया कुमार को जिन लोगों ने सुना है, वे जानते हैं कि देश के लिए इतने दर्द के साथ इतनी लोकतांत्रिक बातें कहने वाला इतना असरदार और कोई दूसरा नौजवान नेता है नहीं। ऐसे नेता के ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चलाना किसी सरकार के कानूनी अधिकार में तो आता है, लेकिन यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही शर्मनाक बात है, और हमारी कानून की सामान्य समझ यह कहती है कि इस मामले का अदालती फैसला जब होगा, मुकदमा चलाने वाली एजेंसियों और सरकारों को अदालती लताड़ ही पड़ेगी। यह असहमति को कुचलने का एक फैसला है, और पूरी तरह से बेकसूर दिख रहे एक नौजवान को बर्बाद करने की कोशिश भी है। लोकतंत्र में लोगों के कानूनी अधिकार तो रहते हैं, लेकिन उन अधिकारों के तहत बेकसूर साबित होते-होते एक पूरी जिंदगी निकल जाती है। देश के कई अल्पसंख्यकों के मामले सामने है जिन पर दस-बीस मुकदमे चलाए गए, और बीस-पच्चीस बरस के बाद वे बेकसूर साबित होकर अदालत से निकले हैं, इस बीच उनकी जिंदगी तो खत्म हो ही गई, उनके किस्म की सोच रखने वाले तमाम लोगों के लिए यह एक बड़ी धमकी भी रही। जो लोग जेएनयू के नौजवानों का मिजाज जानते हैं, उन्हें यह मिजाज शहीद भगतसिंह की याद दिलाता है, और यह तुलना इस देश की या किसी प्रदेश की सरकार के किस तरह के होने की याद दिलाता है, यह लोग खुद तय करें। 
-सुनील कुमार


Date : 28-Feb-2020

देश दिल्ली से बहुत किस्म के 
सबक भी लेता है, भड़कावे भी

दिल्ली की ताजा साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर अब खबरें सामने आ रही हैं कि किस तरह जब दंगाईयों की भीड़ एक-दूसरे को गोली मार रही थीं, घर और दुकान जला रही थीं, तब कुछ इलाकों में हिन्दू और मुस्लिम मिलकर दंगाईयों को भगा रहे थे, यह जिम्मा खुद उठा रहे थे क्योंकि पुलिस कहीं नहीं थी। एक सच्ची कहानी ऐसी भी आई है कि दंगों के दिन ही एक हिन्दू लड़की की शादी तय थी, और आसपास के सारे मुस्लिमों ने मिलकर उस शादी में काम किया, उसे हिफाजत के साथ निपटाया। मुस्लिमों के बताए हुए कुछ ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जिनमें हिन्दू परिवारों ने अपने घर में उन्हें रखा, और उन्हें बचाया। यह सब ऐसे माहौल में हो रहा था जब दिल्ली के कुछ नेता लगातार भड़काने वाली बातें कर रहे थे, ट्वीट कर रहे थे, या बोलने की जगह पूरी तरह चुप भी थे। यह सब उस माहौल के बीच हुआ जब लोग अगल-बगल की कई दुकानों में से कुछ चुनिंदा दुकानों को उनके नाम देखकर, उनके धर्म के आधार पर जला रहे थे, और उनके बगल की दुकानें जिन ईश्वरों के नाम की वजह से बच गई थीं, उन ईश्वरों ने पड़ोस की बेकसूर दुकान को भी नहीं बचाया था। यह सब उस माहौल के बीच हुआ जब देश के मीडिया का एक हिस्सा इन दंगों को देश में दंगों के इतिहास के साथ जोड़कर एक तुलना भी सामने रख रहा था। कुल मिलाकर आम इंसान जगह-जगह इंसान थे, और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लोग धर्म की आबादी का अनुपात गिनाते हुए कम होने पर भी अधिक (कत्ल) की धमकियां दे रहे थे, या दूसरी तरफ से कानून अपने हाथ में लेने की बात कर रहे थे। इस बीच एक कार्टून ऐसा भी छपा जिसमें जमीन पर गिरे एक आदमी को दूसरा खड़ा हुआ आदमी मारने पर उतारू है, और गिरा हुआ आदमी अपना मोबाइल फोन दिखाकर उसे याद दिला रहा है कि वे दोनों फेसबुक-फ्रेंड हैं। 

दिल्ली की साम्प्रदायिक हिंसा को कुछ लोग दंगा मानने से इंकार कर रहे हैं, और इसे अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों का हिंसक और हत्यारा हमला कह रहे हैं। दूसरी तरफ बहुसंख्यकों की ओर से कुछ तस्वीरें और कुछ वीडियो सामने रखे जा रहे हैं कि किस तरह अल्पसंख्यकों की छतों से हमले हुए हैं। इन तमाम बातों की जांच जब भी होगी, उस पर देश की आज की दिमागी हालत पता नहीं भरोसा कर पाएगी या नहीं क्योंकि आज तो हालत यह है कि कानूनी समाचारों की एक प्रतिष्ठित वेबसाईट ने यह तुलना सामने रखी है कि दंगों की रात पुलिस को फटकारने वाले एक हाईकोर्ट जज को तुरंत हटा देने के बाद अगले दिन सुनवाई करने वाले जजों का रूख कैसा बदला हुआ था। आमतौर पर ऐसी तुलना होती नहीं है, लेकिन जब एक ही मामले की सुनवाई में जज बदल जाने के बाद जब रूख जमीन-आसमान किस्म का बदल जाता है, तो आम लोगों के मन में ऐसी तुलना होती ही है, इसे एक कानूनी वेबसाईट ने बारीकी से सामने रखा है। इसलिए आज जब अदालत के रूख को भी आम जनता सोशल मीडिया पर खुलकर कोसने की दिमागी हालत में है, तो ऐसे में वहां कौन सी जांच लोगों का भरोसा जीत पाएगी, यह सोचना कुछ मुश्किल है। 

लोकतंत्र में कानून और व्यवस्था लागू करने का काम शासन, प्रशासन, पुलिस का रहता है, और जुर्म के निपटारे का काम अदालत का रहता है। दिल्ली में पिछले कुछ हफ्तों में इन तमाम संस्थाओं ने अपनी विश्वसनीयता और साख को कुछ या अधिक हद तक खोया है, और यह नुकसान करीब 40 जिंदगियों के नुकसान से कम नहीं है क्योंकि लोकतंत्र अपनी संस्थाओं की साख पर चलने वाली व्यवस्था है। दिल्ली का यह हाल हिन्दुस्तान में बहुत समय बाद इस किस्म के दंगों की याद ताजा कर रहा है, देश में साम्प्रदायिकता के एक खतरे को ताजा कर रहा है, और पुलिस की पूरी तरह खोई हुई साख के खतरे सामने रख रहा है, फिर चाहे उसके पीछे पुलिस की राजनीति से  अपनी खुद की दहशत हो, या कोई और वजह। यह सिलसिला मौतों की गिनती से कहीं अधिक नुकसान का है, और आग उगलने वाले कुछ हिन्दू-मुस्लिम नेताओं को कैद में भी डाल दिया जाए, तो भी अड़ोस-पड़ोस के जिन लोगों ने एक-दूसरे के घर-दुकान जलाए हैं, उनके बीच की दरार हो सकता है कि अगली एक-दो पीढ़ी तक कायम रहे। दिल्ली देश की राजधानी है, और इस नाते उसे कई मामलों में बाकी देश के सामने एक मिसाल भी बनकर रहना चाहिए। दिल्ली सत्ता का केन्द्र है, दिल्ली पुलिस जिसके मातहत है, वह केन्द्रीय गृहमंत्री भी इन दंगों से कुछ ही किलोमीटर पर थे, और प्रधानमंत्री भी। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज भी इन दंगों वाले शहर में ही थे, और दिल्ली के गैरराजनीतिक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी। ऐसे में अगर इनमें से किसी ने, इन सबने, अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काटी है, तो वह देश के सामने एक बहुत बुरी मिसाल पेश कर रही है, और उनकी साख को भी चौपट कर रही है। दिल्ली में विधानसभा के चुनाव जरूर निपट गए हैं, लेकिन उस वजह से किसी की जिम्मेदारी नहीं निपट गई है। देश दिल्ली की ओर न सिर्फ देख रहा है, बल्कि वह दिल्ली से बहुत किस्म के सबक भी लेता है, और भड़कावे भी। 
-सुनील कुमार


Date : 27-Feb-2020

एक बेहतर हिस्सेदारी वाला
सीएम दिल्ली में बेहतर होता

हाल ही के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को विलुप्त और भाजपा को रौंद देने वाली आम आदमी पार्टी के सामने दिल्ली की ताजा साम्प्रदायिक हिंसा एक नए किस्म की चुनौती खड़ी कर चुकी है। कहने के लिए तो कानूनी व्यवस्था यह है कि दिल्ली की पुलिस केन्द्र सरकार के मातहत काम करती है, और राज्य सरकार किसी दूसरे राज्य की सरकार जैसी नहीं है, वह लेफ्टिनेंट गवर्नर के मातहत काम करने वाली, सीमित अधिकारों वाली एक व्यवस्था है। लेकिन इस सीमित-सरकार को चुनते तो वोटर ही हैं, और यह चुनाव एक राजनीतिक व्यवस्था भी है। इसलिए जब दिल्ली एक साम्प्रदायिक हिंसा से गुजर रहा है, तो पुलिस के लिए तो केन्द्र सरकार जवाबदेह है, लेकिन दिल्ली की जनता के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी से केजरीवाल सरकार भी बच नहीं सकती है। 

पिछले पांच बरस तक दिल्ली में सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, और उनकी आम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति में एक नए किस्म का मॉडल सामने रखने की कोशिश की जो कि अपने आपको राजनीति से परे, एनडीए और यूपीए से परे, नागरिकता, धर्म, जाति जैसे मुद्दों से परे, आरक्षण और खानपान की लड़ाई से परे की पार्टी साबित करती रही। नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी के राजनीतिक विरोधी कोई नहीं रह गए, और उसने जो अच्छे सरकारी काम किए थे, उनका फायदा पाकर वह चुनाव फिर जीत गई। हमने पहले भी इसी जगह लिखा था कि केजरीवाल ने अपने आपको एक काबिल और कल्पनाशील म्युनिसिपल-कमिश्नर साबित किया, और दिल्ली पर राज करते हुए भी शाहीन बाग जैसे एक सबसे चर्चित मुद्दे पर मुंह भी नहीं खोला, और चुनाव लड़ लिया। यह चुनाव इस कदर गैरराजनीतिक रहा कि जिस शाहीन बाग पर गद्दारी की तोहमतें लगाकर भाजपा ने चुनाव लड़ा, और जिस तरह बाकी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने आंदोलनकारियों का साथ दिया, उन सबसे आम आदमी पार्टी ने अपने को अलग रखा। और तो और जेएनयू, कन्हैया कुमार, जामिया जैसे बाकी जलते मुद्दों पर भी आम आदमी पार्टी ऐसी तटस्थ बनी रही जैसी कोई पार्टी हिन्दुस्तान में कभी नहीं रही। 

अब दिल्ली की इस साम्प्रदायिक हिंसा के बीच की बात देखें, तो दंगा हो जाने के बाद, हमलों में मौतों के बाद केजरीवाल ने महज दिल्ली पुलिस के बेअसर होने की बात कही, और फौज को बुलाने की बात कही। लेकिन जलती-सुलगती दिल्ली को बचाने के लिए केजरीवाल की पार्टी और उनकी सरकार की कोई पहल जमीन पर नहीं दिखी। अब सवाल यह उठता है कि क्या दिल्ली में राजनीति, सामाजिक सुरक्षा, अल्पसंख्यकों के मुद्दे, ये सब महज केन्द्र सरकार और बाकी विपक्ष के बीच के रहेंगे, और केजरीवाल एक अफसर की तरह काम करते हुए स्कूल-अस्पताल, मैट्रो जैसी जनसुविधाओं तक अपने को सीमित रखेंगे? यह बहुत अजीब किस्म का मॉडल है, और विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद हमने इसी जगह लिखा भी था कि यह एक शहर वाले, सीमित अधिकारों वाले राज्य दिल्ली तक तो कामयाब हो सकता है, लेकिन जटिल आर्थिक-सामाजिक, धार्मिक और जातीय व्यवस्था वाले, विविधता से भरे हुए हिन्दुस्तान में यह कामयाब नहीं हो सकता। तनाव के इस दौर में केजरीवाल ने अगर कुछ साबित किया है, तो वह यही साबित किया है कि वे एक अफसर की तरह काम करने वाले, भारत की व्यापक राजनीतिक व्यवस्था से परे जीने वाले नेता हैं, और उनकी पार्टी भी उसी किस्म से चलने वाली है। दिल्ली को एक बेहतर हिस्सेदारी करने वाला मुख्यमंत्री ऐसे मौके पर अधिक काम का होता।
-सुनील कुमार


Date : 26-Feb-2020

दिल्ली पर कल के बाद आज फिर लिखने की जरूरत आई

दिल्ली में चल रही हिंसा को लेकर कल ही इसी जगह लिखने के बाद क्या आज फिर लिखने की जरूरत पडऩी चाहिए थी? यह सवाल किसी भी अखबार के संपादक को परेशान कर सकता है क्योंकि गंभीर विचारों को पढऩे वाले बहुत सीमित लोग होते हैं, और उन पर एक ही मुद्दे का वजन लगातार कितनी बार डाला जा सकता है? लेकिन सवाल यह है कि कल से अब तक जब लाशें और बहुत सी गिर चुकी हैं, एक से अधिक मस्जिदों को जलाया जा चुका है, जब एक-एक करके बहुत से ऐसे वीडियो सही साबित किए जा चुके हैं जिनमें दिल्ली पुलिस दंगाईयों के एक तबके के साथ मिलकर हिंसा कर रही है, नागरिकता-संशोधन विरोधियों को पीट-पीटकर जख्मी करने के बाद जमीन पर पड़े लोगों को लाठियों से पीटते हुए उनसे राष्ट्रगान गवाया जा रहा है, और पुलिस में से ही एक उसका वीडियो बना रहा है, तो फिर आज और किस मुद्दे पर लिखा जा सकता है? कुछ ईमानदार-पेशेवर समाचार वेबसाईटों के रिपोर्टरों ने अपनी आंखों देखी लिखी है कि किस तरह मस्जिद को जलाकर उस पर बजरंग बली का झंडा फहराया गया है, तो फिर क्या इस साम्प्रदायिक तनाव को अनदेखा करना जायज होगा? और क्या साम्प्रदायिकता के इस कैंसर को इस देश की देह में और बड़ी गठान बनने देना ठीक होगा? इसके साथ इस बात को भी देखने की जरूरत है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तुरंत दंगाग्रस्त इलाकों में कफ्र्यू लगाने के साथ-साथ दिल्ली में आर्मी बुलाने की मांग केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से की है, क्या 1984 के दंगों के बाद दिल्ली में पहले ऐसा कभी हुआ है? केजरीवाल ने कहा है कि पुलिस हालात नहीं सम्हाल पा रही है, और तुरंत सेना बुलाई जाए, तैनात की जाए।

दिल्ली में आज जो हिंसा चल रही है, उसमें 20 से अधिक लोगों की मौतों की बात कई लोगों ने पोस्ट की है जो कि गंभीर पत्रकार हैं, और अभी जलते इलाकों की रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं। ये आंकड़े कम हो सकते हैं, अधिक भी, लेकिन जितने इलाकों में जितने बड़े पैमाने पर पुलिस की मौजूदगी में दंगे हो रहे हैं, और आगजनी हो रही है, वह मामूली बात नहीं है। दिल्ली पुलिस पर राज करने वाली केन्द्र सरकार के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री-गृहमंत्री की कोई अपील भी अब तक सामने नहीं आई है। और दिल्ली भाजपा के नेता कपिल मिश्रा लगातार घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बातें कह रहे हैं और ट्वीट कर रहे हैं। यह सब तब चल रहा है जब उनकी पार्टी के भीतर दिल्ली में दोफाड़ दिख रहा है कि कपिल मिश्रा को रोका जाए, या इसी तरह ढील देकर रखा जाए? यह सब तब चल रहा है जब आधी रात दिल्ली की एक अदालत को दिल्ली पुलिस को यह हुक्म देना पड़ता है कि फंसे हुए जख्मी मुस्लिमों को उनके इलाकों से अस्पताल तक पहुंचाने के लिए सुरक्षित रास्ता मुहैया कराया जाए। इसलिए आज दिल्ली के बारे में जो कुछ लिखा जाए, कहा जाए, और समझा जाए, उसे इन तमाम जानकारियों के साथ जोडक़र ही किया जाना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि किस तरह दिल्ली में सबसे अधिक साख वाले अखबारों से जुड़े अनगिनत हिन्दू रिपोर्टरों ने अपना दिल दहलाने वाला साबका लिखा है कि दंगाईयों की भीड़ ने उनके कागजात जांचे कि वे हिन्दू हैं या नहीं, इसके बाद उनके फोन से सब कुछ मिटा दिया गया, उन्हें चेतावनी दी गई, यह तक कहा गया कि हिन्दू हो इसलिए बच गए, एक महिला संवाददाता की काली बिंदी पर आपत्ति की गई कि हिन्दू हो तो सिर्फ लाल बिंदी लगानी चाहिए। कुछ संवाददाताओं ने आंखों देखा हाल लिखा है कि किस तरह पुलिस की मौजूदगी में, पुलिस के संरक्षण में लोगों ने घरों और दुकानों में आग लगाई, सुरक्षा-कैमरे तोड़े, और सलाखें लेकर हिंसा करते रहे। एक संवाददाता ने यह तक लिखा है कि दंगाईयों ने एक मुस्लिम घर पर आंसू गैस का गोला फेंका ताकि लोगों को बाहर निकाला जा सके। उसने यह सवाल भी उठाया है कि ये गोले तो सिर्फ पुलिस के पास होते हैं, और दंगाई इनका इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं? एक संवाददाता ने लिखा कि उसके गले की रूद्राक्ष माला ने उसकी जिंदगी बचाई क्योंकि दंगाईयों को इसी से भरोसा हुआ कि वह हिन्दू है। एडिटर्स गिल ऑफ इंडिया ने मीडिया पर इस तरह के साम्प्रदायिक हमले के खिलाफ तुरंत कार्रवाई के लिए कहा है, और प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया अपने हाल के बरसों के मुर्दा-रूख के मुताबिक आरामदेह दफ्तर में चैन की बंशी बजाते हुए बैठा है। कुछ भडक़ाऊ समाचार चैनल अभी भी पूरी ताकत से झूठी तस्वीरों और झूठे वीडियो के साथ गलत जानकारी दिखाते हुए हकीकत को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं जो कि कुछ घंटों के भीतर ही सत्यशोधक वेबसाईटें भांडाफोड़ भी कर रही हैं। देश की राजधानी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के दो दिन के भारत प्रवास से मुक्त हुई है, और मानो इन दो दिनों तक केन्द्र सरकार को जलती दिल्ली को न देखने का एक बहाना मिला हुआ था, अब ट्रंप-वापिसी के बाद देखा जाएगा कि केन्द्र सरकार क्या करती है। इस बीच दिल्ली हिंसा और दिल्ली पुलिस के मुद्दे को लेकर इस वक्त देश के कुछ प्रमुख वकील दिल्ली हाईकोर्ट में खड़े हैं, और इस पन्ने के छपने तक हो सकता है कि अदालत का कुछ रूख सामने आए, और हो सकता है कि न भी आए, और हाईकोर्ट देश के सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक रूख पर जमा रहे कि जेएनयू-जामिया की हिंसा जब थम जाएगी, तभी अदालत उस पर सुनवाई करेगी। देश के डॉक्टर जजों के इस रूख से कुछ सीखकर जख्मी मरीजों को भगाना शुरू न कर दें कि जब जख्म भर जाएंगे तभी वे इलाज करेंगे। फिलहाल तो गुरू तेग बहादुर हॉस्पिटल के अधीक्षक ने कहा है कि वहां लाए गए लोगों में से 189 जख्मी हैं, और 20 मरे हुए हैं।

-सुनील कुमार

 


Date : 25-Feb-2020

दिल्ली-हिंसा का सबसे बड़ा
नुकसान आखिर हुआ किसे?

दिल्ली में कल नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक प्रदर्शन एक संघर्ष में बदल गया, और अभी यह अटकलें लगाना ठीक नहीं होगा कि इस भारी हिंसा के लिए कौन कुसूरवार हैं। फिर भी एक मुस्लिम नौजवान एक पिस्तौल से गोलियां चलाते कैमरों पर कैद हुआ है, एक पुलिस जवान पथराव में मारा गया है, और बहुत से रिपोर्टरों का यह कहना है कि उनकी आंखों के सामने पुलिस और नागरिकता-विरोधी मिलकर हमला करते रहे, इसके वीडियो भी कल से तैर रहे हैं। मीडिया के एक हिस्से का यह भी कहना है कि दिल्ली के भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने दो दिन पहले यह सार्वजनिक भाषण दिया था कि पुलिस कुछ जगहों पर शुरू हुआ नागरिकता-विरोधी धरना खत्म करवाए, वरना तीन दिन बाद वे पुलिस की भी नहीं सुनेंगे। कुछ लोगों का कहना है कि इस भाषण के जरा देर बाद ही हिंसा शुरू हो गई थी। लेकिन हम दिल्ली से दूर बैठे हैं, और अलग-अलग समाचार माध्यमों से आ रही खबरों को देखकर ही इस पर लिख रहे हैं, आंखों देखी नहीं। 

दो महीने से अधिक से दिल्ली के शाहीन बाग में एक पूरी तरह शांतिपूर्ण आंदोलन नागरिकता-संशोधन के खिलाफ चल रहा था, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही थी, और बाकी दुनिया में भी जिनको हिंदुस्तान मेंं दिलचस्पी है वे इसे गौर से देख रहे थे। इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसका शांतिपूर्ण होना था, यह एक अलग बात है कि कुछ लोगों ने उसके बीच बुर्का पहनकर घुसकर बवाल खड़ा करने की कोशिश की भी थी। महीनों तक चले इस आंदोलन का इतना शांत रहना देश में एक अलग किस्म की मिसाल बन चुका था। ऐसे में उसी मुद्दे पर दिल्ली के कुछ और इलाकों में शुरू हुए आंदोलन, और उसके खिलाफ खड़े हुए आंदोलन के बीच हुए संघर्ष में एक पुलिस जवान सहित कई मौतों की खबर है। इस बीच अधिकतर समाचार स्रोतों का यह कहना है कि दिल्ली की पुलिस तनाव पर काबू के मुताबिक तैनात नहीं थी, बहुत से लोगों का कहना है कि उसने समय रहते कार्रवाई नहीं की, और बहुत से लोगों का यह भी कहना है कि नागरिकता संशोधन-विरोधियों के साथ मिलकर, उन्हें साथ लेकर दिल्ली पुलिस ने नागरिकता-विरोधियों पर पथराव किया, हमला बोला। यह किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच से भी साबित हो सकता है कि देश की राजधानी में इस अचानक हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार हैं, और आज के वक्त में ऐसी जांच कुछ मुश्किल भी दिख रही है। जिन लोगों को दिल्ली की व्यवस्था मालूम नहीं है, उन्हें यह बताना जरूरी है कि देश की राजधानी की पुलिस केंद्र सरकार की मातहत है, केजरीवाल सरकार की नहीं। अभी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यह बयान दिया है कि दिल्ली पुलिस दंगाईयों पर कार्रवाई करने के बजाय ऊपर से निर्देश आने का इंतजार करती रहती है, और जाहिर है कि यह ऊपर केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय ही है। 

जो भी हो, यह समझने की जरूरत है कि इस ताजा हिंसा से एक बहादुर पुलिसकर्मी की मौत हुई है, और कुछ नागरिकों की भी। बहुत से इलाकों में हिंसा फैली है जो कि एक बड़ा नुकसान है। लेकिन इन सबके मुकाबले एक अधिक बड़ा नुकसान नागरिकता संशोधन-विरोधी आंदोलन का हुआ है जो कि अब तक सौ फीसदी शांतिपूर्ण चल रहा था, और अब कम से कम एक तबके के हाथ यह तोहमत तो लग ही गई है कि ये आंदोलनकारी हिंसा कर रहे हैं। तोहमतों से परे दिल्ली और बाकी देश को भड़काऊ भाषणों से बचाने की जरूरत है, और हिंसा से भी। यह बात बहुत मायने नहीं रखती कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिल्ली में रहते हुए ऐसी हिंसा हुई है। प्रधानमंत्री की पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने पुलिस अफसर की मौजूदगी में, उनके रोकते-रोकते भी सार्वजनिक रूप से यह भाषण दिया था कि वे अभी ट्रंप के प्रवास की वजह से चुप हैं, और तीन दिन के बाद वे पुलिस की भी नहीं सुनेंगे। दिल्ली की ताजा घटनाओं में यह अच्छी तरह दर्ज है कि इसके पहले भी कपिल मिश्रा और उनके जैसे एक-दो और नेताओं के हिंसक बयानों के बाद तनाव भड़का था, दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त चुनाव आयोग को इन पर रोक भी लगानी पड़ी थी। ऐसे नेताओं की पार्टियों को तनाव के ऐसे दौर में इनकी बदजुबानी के बारे में सोचना चाहिए, और फैसला लेना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 24-Feb-2020

जुल्म जब हद से बढ़ जाता है,
वह बगावत को जन्म देता है,
दिल्ली में हुई माहवारी-दावत

जब समाज के किसी तबके पर नाजायज हमला होता है, तो उससे बेइंसाफी के खिलाफ लोगों के खड़े होने की एक संभावना भी खड़ी होती है। अगर गुजरात में स्वामीनारायण सम्प्रदाय के चलाए जा रहे एक महिला कॉलेज की लड़कियों के साथ माहवारी को लेकर बदसलूकी न हुई होती, इस सम्प्रदाय के कॉलेज-इंचार्ज स्वामी ने अगर यह बयान नहीं दिया होता कि माहवारी में खाना पकाने वाली महिला अगले जन्म में कुतिया बनती है, तो माहवारी एक मुद्दा नहीं बनती। लेकिन हफ्ते भर के भीतर यह ऐसा मुद्दा बनी कि दिल्ली में कल एक महिला संगठन ने एक सार्वजनिक आयोजन किया, और उसमें दर्जनों ऐसी महिलाओं ने खाना बनाया जो कि माहवारी से गुजर रही हैं, और तीन सौ से अधिक लोग वहां खाने पहुंचे, जिनमें दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी थे। इस मौके की तस्वीरें अब चारों तरफ फैल रही हैं जिनमें महिलाएं अपने एप्रन पर यह लिखा हुआ दिखा रही हैं कि वे माहवारी से हैं, और वे खाना बनाते दिख रही हैं। इस आयोजन को माहवारी-दावत नाम दिया गया है, और इसके बैनर-पोस्टर, इसके न्यौते की सूचना चारों तरफ फैल रहे हैं। 

सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ सामाजिक जागरूकता वाले कलाकारों ने भी इस बारे में कलाकृतियां बनाई हैं जो कि महिला अधिकारों को लेकर एक नई जागरूकता सामने रख रही है, और पिछले बरसों में समाज में भारी मेहनत से फैलाई गई अवैज्ञानिकता पर हमला भी कर रही हैं। एक पाखंडी स्वामी ने अपनी बकवास से महिलाओं के, और महज महिलाओं के ही क्यों, प्राणियों के एक वैज्ञानिक मुद्दे की तरफ देश का ध्यान खींचा है, और इस पाखंड को ध्वस्त करने के लिए लोग उठ खड़े हुए हैं, चाहे झंडे-डंडे लेकर न सही, महज सोशल मीडिया पर। लेकिन आज कई किस्म की जंग सोशल मीडिया पर ही शुरू होकर वहीं खत्म हो रही है, और यह अच्छा ही हुआ कि एक ओछा हमला हुआ, एक गंदी बात कही गई, और न सिर्फ महिलाएं अपने हक के लिए उठ खड़ी हुई, बल्कि आदमियों ने भी खुलकर उनका साथ दिया। 

दरअसल धर्म शुरू से ही मर्दों के कब्जे में रहा है, उनका गुलाम रहा है, और मर्दानी सोच जगह-जगह बेइंसाफी करती है जिसका एक बड़ा शिकार महिलाएं रहती हैं। अभी जब स्वामीनारायण सम्प्रदाय के इस घटिया स्वामी ने ऐसी गंदी बकवास की, तो लोगों ने धर्म की मर्दानी सोच के कुछ और पहलुओं को भी उठाया, और लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया। अगर महिला इतनी ही अछूत है कि देश के कुछ मंदिरों में, और साथ-साथ दूसरे धर्मों की मस्जिदों-दरगाहों जैसी जगहों पर भी, महिलाओं का दाखिला सुप्रीम कोर्ट भी नहीं करा पा रहा है, तो उसके पीछे की कई वजहों में से एक यह वजह भी समझने की जरूरत है कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की जगह नहीं के बराबर है, फौज में महिलाओं को मोर्चे पर लीडरशिप देने से फौज और केन्द्र सरकार कतराती आ रही हैं। ऐसे माहौल में कुतिया बनने का श्राप जब छपा, तो लोगों ने यह सवाल उठाया कि हिन्दू देवी मंदिरों में देवियों के कपड़े बदलने का काम पुरूष पुजारी ही क्यों करते हैं? इस काम के लिए महिला पुजारी क्यों नहीं रखी जाती? और हिन्दू मंदिरों की ही बात अगर करें, तो उनमें महिला की जगह इतिहास में महज देवदासियों की रही है जो कि वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करने वाली महिलाएं थीं, और आज भी कुछ हद तक हैं। 

जब समाज में ओछे हमले होते हैं, तो एक सीमा तक ही वे किसी को घायल कर पाते हैं, उसके बाद वे एक बगावत को जन्म देते हैं, और वह बगावत उन हमलों के तमाम हथियारों को मोड़कर रख देती है। आज देश में वैसा ही कुछ हो रहा है। महिलाएं देश के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन करते बैठी हैं, और वे महिलाएं यह कर रही हैं जिनके घर से बाहर निकलने पर भी देश में सत्तारूढ़ कुछ बड़े ओहदे वाले आपत्ति कर रहे हैं कि मानो वे घरेलू सामान की तरह ही ठीक थीं, वे कैसे बाहर निकल आईं। ज्यादती करने वाले लोगों को यह याद रखना चाहिए कि वे लोगों के बर्दाश्त का इम्तिहान भी लेते चलते हैं, और किसी भी दिन वह बर्दाश्त जवाब दे सकता है। कहावत और मुहावरों में कई बार समझदारी की बातें भी रहती हैं, और ऐसे ही किसी संदर्भ में किसी ने यह लिखा होगा कि डोर को इतना न खींचो कि वह टूट ही जाए। माहवारी के मुद्दे पर यह डोर अब टूट चुकी है, ठीक उसी तरह जिस तरह की हरिजन कहे जाने वाले दलितों के मंदिर प्रवेश पर डोर एक वक्त टूट चुकी थी, और हिन्दू समाज के शुद्र कहे जाने वाले उन अछूत हरिजन-दलितों ने हिन्दू मंदिरों को खारिज करके बौद्ध धर्म में दाखिला लिया, और बुद्ध-अंबेडकर के अपने मंदिर बना लिए। आज जो लोग महिलाओं पर बिना किसी जरूरत के ऐसे हिंसक और अश्लील हमले करके उन्हें कोंच रहे हैं, वे अब एक बगावत भी झेलेंगे। और बात निकलेगी तो इतने दूर तलक जाएगी कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी महिलाओं पर अपनी नजर भी पडऩे की सीमा से उनको दूर क्यों रखते हैं? क्या वे एक महिला की कोख से नहीं जन्में हैं? और एक सम्प्रदाय अगर महिलाओं को इतनी हिकारत का सामान मानता है, तो उस सम्प्रदाय के लिए तमाम धर्मों के तमाम लोगों के मन में उससे बड़ी हिकारत क्यों नहीं होनी चाहिए? 

दिल्ली में जिस महिला संगठन ने यह आयोजन किया है, उसने जागरूकता का एक साहसी काम किया है, और जिस तरह देश भर में शाहीन बाग के मॉडल की नकल हो रही है, जिस तरह देश भर में बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं, उसी तरह देश भर में मर्दानी सोच के खिलाफ ऐसे आंदोलन होने चाहिए, और पुरूषों को भी महिलाओं का हौसला बढ़ाना चाहिए कि वे पाखंड में डूबे हुए समाज को झकझोरने का काम करें, और वे उनके साथ हैं, वे उनके पीछे हैं। 
-सुनील कुमार