संपादकीय

Date : 03-Jul-2019

दुनिया भर में मशहूर ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की एक श्वेत शोध छात्रा ने इस प्रतिष्ठित संस्थान को छोडऩे की घोषणा करते हुए एक लंबा बयान लिखा है जो कि यहां पर रंगभेदी-नस्लभेदी ढांचे और संस्कृति पर हमला करता है। इंडियाना सेरेसिन नाम की संपन्न परिवार से आने वाली इस छात्रा ने यहां पर अपने देखे हुए बहुत से मामलों में रंगभेद का आरोप लगाते हुए कहा कि तकरीबन पूरा विश्वविद्यालय अश्वेतों की गैरमौजूदगी बताता है, न छात्र, न पढ़ाने वाले। उसने कहा कि वह ऐसे संस्थान में शोध करने का फायदा उठाने को अनैतिक रंगभेदी फायदा मानती है, और इसलिए इस विश्वविद्यालय को छोड़ रही है। उसका कहना है कि विश्वविद्यालय से पूरे शोध कार्य के लिए उसी मिली हुई स्कालरशिप का इस्तेमाल करना उसके सिद्धांतों के खिलाफ रहेगा और इससे उसके बौद्धिक कामकाज के सिद्धांत और ईमानदारी भी खतरे में पड़ेंगे। उसने माना है कि एक श्वेत छात्रा के रूप में वह इस विश्वविद्यालय के रंगभेदी ढांचे का फायदा पाने वाली बन जाएगी जो कि वह नहीं चाहती। 

आज हिन्दुस्तान में विश्वविद्यालयों से लेकर सार्वजनिक जीवन तक, और संसद से लेकर विधानसभाओं तक, क्या कोई इस दर्जे की सैद्धांतिकता और नैतिकता की बात करते दिखते हैं? यह सवाल बड़ी दिक्कत खड़ी करने वाला है, और अधिकतर लोग इससे बचना चाहेंगे। इस देश में संसद और विधानसभाओं जिस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी गिने-चुने परिवारों से आए लोगों से भरती चली जा रही हैं, जिस तरह संपन्न तबके का एकाधिकार देश की सबसे बड़ी पंचायत पर बढ़ते जा रहा है, जिस तरह कुछ लोग पांच-पांच, दस-दस बार सांसद या विधायक बनकर अपने इलाके से बाकी तमाम लोगों की संभावनाओं को खत्म करते जा रहे हैं, क्या उनके बीच नैतिकता और सैद्धांतिकता का ऐसा कोई सवाल खड़ा किया जा सकता है? यही बात राजनीतिक दलों के संगठन के भीतर है, यही बात स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले लोगों की जाति, धर्म, उनके समुदाय के बारे में है, कुछ ऐसी ही बात हिन्दुस्तानी मीडिया के मालिकान के जाति-धर्म के बारे में है, और मीडिया के समाचार-विचार के विभागों में काम करने वाले पत्रकारों की जाति और उनके धर्म के बारे में भी है। 

दूसरे वंचित तबकों के हक को छीनकर गिने-चुने मौकों पर काबिज होने की बात हिन्दुस्तानी समाज के हर दायरे में दिखती है, इसके साथ-साथ एक दूसरी बात जो दिखती है वह यह कि आरक्षित वंचित तबकों के भीतर मलाईदार तबके का एक दबंग-एकाधिकार जिस तरह पूरे तबके के सारे हक अकेले निगल लेता है, उसकी अनैतिकता पर तो कोई चर्चा भी नहीं होती। इस देश में ओबीसी आरक्षण के भीतर तो मलाईदार तबके को फायदों से अलग करने की बात होती भी है, लेकिन सबसे कुचले हुए होने की वजह से आरक्षण के हकदार दलित-आदिवासी तबकों के भीतर मलाईदार-ताकतवर तबकों को हटाने की बात भी नहीं होती। और इसलिए नहीं होती कि जिन बड़े अफसरों को सरकार में ऐसा संविधान-संशोधन बनाना पड़ेगा, जिन सांसदों को संसद में, और जिन विधायकों को विधानसभाओं में इसे पास करना पड़ेगा, और जिन सुप्रीम कोर्ट जजों को ऐसे संशोधन के खिलाफ अपील सुननी पड़ेगी, वे सारे के सारे मलाईदार तबके की परिभाषा में आएंगे, और उनकी आल-औलाद आरक्षण के फायदों से बाहर हो जाएगी। हितों के ऐसे स्पष्ट टकराव का मामला होते हुए भी इनमें से किसी भी तबके से इस सामाजिक न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती, जैसे सामाजिक न्याय के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की इस अकेली छात्रा ने एक बड़ा मुद्दा उठाया है, और अब तक मीडिया में भी मोटे तौर पर चर्चा से परे रहते आई ऐसी रंगभेदी-नस्लभेदी व्यवस्था पर हमला किया है। 

हिन्दुस्तान के भीतर जिन विश्वविद्यालयों के जो लोग सामाजिक न्याय के लिए लडऩे वाले जाने जाते हैं, क्या उनमें से कुछ लोग भारतीय सामाजिक-अनैतिकता की बात छेड़ सकेंगे? आगे बढ़ा सकेंगे? और ऐसी अनैतिकता का नफा पाने वाले लोगों से असुविधाजनक सवाल कर सकेंगे? और बात महज विश्वविद्यालयों की नहीं है, यह बात सभी सामाजिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों, और संसदीय संस्थाओं पर भी लागू होती है जहां पर जमींदारी प्रथा चलती दिखाई पड़ती है, सामंती व्यवस्था जारी दिखती है, छुआछूत जारी दिखता है, और लोकतंत्र नदारद जान पड़ता है। 
-सुनील कुमार


Date : 02-Jul-2019

दिल्ली से भाजपा संसदीय दल की एक बैठक के बाद उसमें शामिल हुए एक सांसद राजीव प्रसाद रूड़ी ने मीडिया से कहा कि कैलाश विजयवर्गीय के बेटे विधायक आकाश विजयवर्गीय के मामले में प्रधानमंत्री नाराज हैं, और उन्होंने कहा है कि ऐसा व्यवहार मंजूर नहीं किया जा सकता चाहे वह किसी का बेटा हो, या सांसद हो। रूड़ी के मुताबिक प्रधानमंत्री ने नाम लिए बिना कहा कि अहंकार नहीं होना चाहिए, ठीक से व्यवहार करना चाहिए, और ऐसे लोग पार्टी में नहीं होने चाहिए। अलग-अलग मीडिया पर प्रधानमंत्री की कही गई बताते हुए कुछ बातें सामने आई हैं, लेकिन भाजपा के किसी अधिकृत प्रवक्ता ने इस बारे में कुछ कहा नहीं है। जो भी हो, इस घटना को हुए इतने दिन हो चुके हैं, और अफसरों की पिटाई के बाद कैलाश विजयवर्गीय ने मीडिया के साथ जो बदसलूकी की उसको भी कई दिन हो चुके हैं, और जेल से रिहाई के बाद इस विधायक बेटे ने फिर से जो अहंकार दिखाया है, उसके समर्थकों ने खुशी में जो गोलीबारी की है, उसे भी कुछ दिन हो गए हैं, ऐसे में अगर कार्रवाई नहीं होती है, तो प्रधानमंत्री के नाम से कही जा रही ऐसी बातों का कोई खास मतलब नहीं है।
 
इस बीच उत्तरप्रदेश से भाजपा की एक महिला पदाधिकारी का एक बयान फेसबुक पर हंगामा कर गया जिसमें उसने हिन्दू मर्दों का आव्हान किया था कि वे टोली बनाकर मुस्लिम घरों में घुसें, और उनकी मां-बहन से बलात्कार करें, और उन्हें काटकर  सार्वजनिक जगह पर टांग दें। इस पोस्ट पर जब बड़ा बवाल हुआ, तो भाजपा की महिला शाखा की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इस बारे में लिखा कि इस महिला को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। लेकिन महिला अध्यक्ष के ट्वीट से परे नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, या कार्यकारी अध्यक्ष जे.पी.नड्डा के कोई बयान इस बारे में नहीं आए हैं। यह मामला न सिर्फ एक भयानक साम्प्रदायिक हिंसा को भड़काने का है, बल्कि भारतीय कानून के तहत लंबी कैद वाला जुर्म भी है। इस पर भी अगर पार्टी कुछ नहीं कहती है, तो इससे बाकी उन तमाम लोगों का हौसला बढ़ता है जो कि ऐसी ही हिंसक बातें रात-दिन लिखते हैं, रेप के फतवे जारी करते हैं, असहमत लोगों की बच्चियों से रेप की धमकी पोस्ट करते हैं, और अपने पेज पर फख्र से यह दावा भी करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें फॉलो करते हैं। 

इस बात में अब कुछ नया नहीं रह गया है क्योंकि यह बात देश भर में जगह-जगह हर दिन सैकड़ों बार की जा रही है, और देश की हवा में जहर घोला जा रहा है। दरअसल पहाड़ सी बड़ी चुनावी जीत किसी भी पार्टी को ऐसा मगरूर कर सकती है कि उसे अपने मुजरिमों पर कोई भी कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है क्योंकि जनता ने उसे इतना बड़ा समर्थन ऐसे लोगों के बावजूद दिया है। यह बात तकनीकी रूप से, और आंकड़ों के मुताबिक सही हो सकती है, लेकिन भाजपा हो, या मवालियों वाली कोई दूसरी पार्टी, उसे यह भी सोचना चाहिए कि जिस दिन उनकी पार्टी की चुनाव में किसी से कांटे की टक्कर होगी, उस दिन क्या बल्ला खाए हुए लोग, रेप की धमकियां झेल रहे लोग, ऐसे लोगों का वोट क्या कोई फर्क नहीं करेगा? जब समंदर से सुनामी-लहरें उठती हैं, तो वे सारी असहमति और सारे विरोध को बहा ले जाती हैं। लेकिन जिस दिन चेन्नई जैसे शहर में एक घड़े पानी के लिए कई किलोमीटर लंबी कतार आधे-आधे दिन खड़ी रहती है, उस दिन एक-एक बूंद पानी का महत्व समझ आता है। भाजपा को, या हम फिर कहेंगे, कि मवालियों वाली किसी भी पार्टी को ऐसे दिन का सोचकर भी रहना चाहिए जिस दिन उन्हें एक-एक वोट के लाले पड़ सकते हैं। हिन्दुस्तान सहित दुनिया के तमाम लोकतंत्रों में ऐतिहासिक बहुमत से आई हुई पार्टियों को सुनामी की लौटती लहरों के साथ समंदर में जाकर डूबते भी देखा है, और वैसे दिन ऐसे बल्लों की मदद से डूबने से बचना मुमकिन नहीं होता। जब बड़े नेता अपनी पार्टी को दूसरे नेताओं के कुकर्मों की चर्चा भर करके छोड़ देते हैं, तो वह जुबानी खानापूरी मानी जाती है, कोई कार्रवाई नहीं मानी जाती है। भाजपा लोकसभा चुनाव में जिस दर्जे की विजेता रही है, उसके चलते वह ऐसा कर तो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में तमाम फतवे, तमाम बल्लागर्दी, तमाम गौगुंडई अच्छी तरह दर्ज भी होते रहते हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 01-Jul-2019

ओलंपिक में भारत के लिए कुश्ती में स्वर्णपदक जीतने वाली महिला खिलाडिय़ों की जिंदगी पर बनी एक फिल्म, दंगल, में पहलवान का किरदार निभाकर राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली एक कश्मीरी लड़की जायरा वसीम ने फिल्मों की दुनिया छोड़ दी है, और इसकी वजह सार्वजनिक रूप से सामने रखी है। उन्होंने कहा है-एक्ट्रेस बनने की वजह से वो अपने इस्लाम से दूर होती जा रही हैं।

जायरा के पोस्ट में उनका दर्द साफ झलक रहा है। उन्होंने अपने पोस्ट के जरिए बताया कि पांच बरसों से वो किस तरह अपनी आत्मा से लड़ रही हैं। एक कामयाब पहचान मिलने के बाद वो खुश हैं। लेकिन ये वो पहचान नहीं है जो वो अपनी जिंदगी से चाहती हैं और इस बात का उन्हें एहसास हो गया है। लंबे समय से उन्हें ऐसा लग रहा है कि वो कुछ और ही बनने की जद्दोजहद कर रही हैं। लेकिन उन्हें एहसास हो गया है कि उनकी नई लाइफस्टाइल, फेम और कल्चर में वो खुद को फिट तो कर सकती हैं, लेकिन वो इस प्लेटफॉर्म के लिए नहीं बनी हैं। उन्हें लगता है कि फिल्म इंड्स्ट्री से जुडऩे पर वो अपने धर्म इस्लाम से दूर होती जा रही हैं। लेकिन वो बीते कुछ समय से खुद को समझाने की कोशिश कर रही थीं कि वो जो कर रही हैं वो सब सही है। लेकिन उन्हें आखिरकार समझ आ गया है कि अपने धर्म इस्लाम की बताई हुई राह पर चलने में वो एक बार नहीं बल्कि 100 बार असफल रहीं हैं। जायरा ने अपने पोस्ट में यह भी बताया कि वो अपनी छोटी सी जिंदगी में इतनी लंबी लड़ाई नहीं लड़ पा रही हैं और वो बहुत सोच समझकर बॉलीवुड को अलविदा कहने का फैसला ले रही हैं। 

सोशल मीडिया पर आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष और उदार सोच रखने वाली महिलाओं में से भी कई ने उनके इस बयान के खिलाफ लिखा है, और अपनी धार्मिक आस्था को वजह बताते हुए इस तरह फिल्मों को छोडऩे की आलोचना की है। बॉलीवुड की एक मशहूर अभिनेत्री रवीना टंडन ने कुछ अधिक ही कड़ा हमला करते हुए ट्विटर पर लिखा- कोई फर्क नहीं पड़ता अगर वो लोग जिन्होंने महज 2 फिल्मों में काम किया है, इस इंडस्ट्री के प्रति कृतज्ञता महसूस नहीं करते हैं कि उन्हें यहां क्या-क्या मिला है। उन्होंने आगे आशा करिए कि वो शांति के साथ यहां से निकल जाएं और अपने उल्टे रास्तों पर चलने वाली सोच को खुद तक ही सीमित रखें। आमतौर पर समझदारी की बातें लिखने वाले कई और लोगों ने भी हमलावर बातें लिखी हैं। 

यह हैरान करने वाली बात है कि एक नौजवान लड़की ने इतना शानदार काम करने के बाद, राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के बाद, इतने गरिमापूर्ण तरीके से अपने धर्म पर अपनी आस्था को अधिक महत्व देते हुए फिल्म उद्योग छोडऩे का फैसला लिया है, और उसे दो फिल्मों की अभिनेत्री इस अंदाज में कहा जा रहा है जैसे कोई दो कौड़ी का इंसान कहे। किसी की निजी आस्था उसकी अपनी है, और कॅरियर और आस्था के बीच की प्राथमिकता तय करना उनका अकेले का अधिकार है। इस हक के इस्तेमाल पर उन्हें कोसना और उनके खिलाफ ओछी और बेहूदी बातें लिखने वालों के धर्म को देखते हुए समझ आ जाता है कि उनकी नीयत क्या है। किसी समझदार युवती ने फिल्मी दुनिया के अफवाहबाज लोगों को कोई मौका दिए बिना बहुत भले शब्दों में अपनी बिदाई की वजहें गिनाई हैं, जिनमें से कोई भी बात आलोचना की हकदार नहीं है। 

कुछ ऐसा ही बुरा हाल बंगाल से अभी तृणमूल कांग्रेस की सांसद बनी एक दूसरी अभिनेत्री नुसरत जहां का भी हो रहा है। इस मुस्लिम युवती ने एक जैन नौजवान से हिन्दू रीति-रिवाज से शादी की है, और अपनी मर्जी से मांग भरी या दूसरे हिन्दू प्रतीक चिन्ह इस्तेमाल किए। इस पर दकियानूसी मुस्लिमों का टूट पडऩा तो समझ पड़ता है, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय हिन्दुओं की एक फौज भी इस नौजवान सांसद पर टूट पड़ी है, और उसे मुस्लिम रिवाज ही मानने की नसीहत दी जा रही है। इन दोनों मामलों में लोगों के बर्ताव, उनकी सोच और उनकी पोस्ट देखकर एक पुरानी बात याद पड़ती है कि जब आप किसी दूसरे के बारे में फैसला करने पर उतरते हैं, तो आप उस दूसरे के बारे में कम उजागर करते हैं, अपने खुद के बारे में अधिक उजागर करते हैं। इन दोनों ही युवतियों ने अपनी धार्मिक आस्था, अपनी निजी पसंद, और अपने तौर-तरीके तय करने के हक का इस्तेमाल क्या कर लिया, दुनिया के नफरतजीवियों को लग रहा है कि उनका हक छिन गया। नफरतजीवियों के साथ-साथ जब उदार लोगों के की-पैड से भी इनके खिलाफ बातें टाईप हो रही हैं, तो कुछ अधिक तकलीफ के साथ कुछ अधिक हैरानी होती है कि, तुम भी!
-सुनील कुमार


Date : 30-Jun-2019

तकरीबन हर दिन किसी न किसी राज्य में मंत्री, सांसद, विधायक की गुंडागर्दी की ऐसी खबरें आती हैं कि लगता है कि उनकी पार्टी के मन में जनता के बुनियादी हक के लिए कोई सम्मान नहीं है। ताजा मामला मध्यप्रदेश के इंदौर में विधायक आकाश विजयवर्गीय का रहा जिन्होंने खतरनाक हो चुके मकानों को गिराने के लिए निकले म्युनिसिपल अफसरों को खुद क्रिकेट बल्ले से मारा, और फिर इस प्रेरणा को पाकर उनके भाजपा के साथियों ने और अफसरों को पीटा। बात यहीं तक नहीं रूकी, जब इस बारे में उसके पिता, और भाजपा के एक बड़े दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय से मीडिया ने सवाल किया तो उन्होंने संवाददाता से ही सवाल किया कि उसकी औकात क्या है कि वह सवाल करे। इसके बाद बिना किसी के कहे ऐसी खबरें आईं कि भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने इस मामले पर रिपोर्ट मांगी है, लेकिन इस खबर का कोई असर दिखा नहीं। आज जब जमानत पाकर यह नौजवान विधायक जेल से निकला, तो उसका पहला ही बयान था कि उसे अपने किए हुए पर कोई पछतावा नहीं है, और वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे दुबारा बल्लेबाजी का मौका न दे।

यह बयान अपने-आपमें जमानत रद्द करने के लायक है, और यह भी हैरानी की बात है कि ऐसे बर्ताव वाले, और ऐसी ताकत वाले नेता को इस रफ्तार से जमानत मिली। उसकी रिहाई पर समर्थकों ने खुली भीड़ में खुशी के हवाई फायर किए, और जब अफसर को पीटकर वह जेल गया तो उसे सलाम करते हुए उसके पोस्टर शहर में लगाए गए। यह पूरा सिलसिला इतना बुरा है कि जरा भी सभ्य किसी राजनीतिक दल में इसे बर्दाश्त नहीं किया गया होता, लेकिन राजनीतिक दलों में धीरे-धीरे करके सभ्यता खत्म होती चली गई है। खासकर केरल और पश्चिम बंगाल दो ऐसे राज्य हो गए हैं जहां पर परले दर्जे की हिंसा, और कत्ल राजनीतिक संस्कृति बन चुकी है। वैसी हिंसा के मुकाबले मध्यप्रदेश की यह ताजा हिंसा बच्चों के खेल सरीखी लगती है, और शायद भाजपा इसीलिए इसे अधिक महत्व नहीं दे रही है।

लेकिन समाज में मीडिया, सोशल मीडिया, और दूसरे संगठनों को ऐसी हर हिंसा के खिलाफ एक माहौल इसलिए बनाना चाहिए कि अगर धीरे-धीरे करके भीड़-हत्या एक संस्कृति हो जाएगी, सरकारी अफसरों पर हिंसक हमले आम हो जाएंगे, तो कानून का राज खत्म ही हो जाएगा। मध्यप्रदेश में ही मानो आकाश विजयवर्गीय से प्रेरणा पाकर एक और जिले में जिला पंचायत के निर्वाचित नेता ने अधिकारी को खूब पीटा, और लहूलुहान कर दिया, उसके सिर पर टांके लगे। जब बड़े नेता इस तरह की हरकत करते हैं, तो अदालतों को भी उन्हें आसानी से जमानत नहीं देनी चाहिए। ऐसा ही काम विधायक की जगह किसी रिक्शेवाले ने किया होता तो हो सकता है कि उसे हफ्तों-महीनों जमानत न मिली होती। राजनीतिक हिंसा की सभी किस्मों के खिलाफ लोगों को खूब लिखना चाहिए, खूब बोलना चाहिए, क्योंकि किसी दिन उनके अपने बच्चे, उनके परिवारों के लोग नेताओं की ऐसी हिंसा के शिकार हो सकते हैं।
-सुनील कुमार


Date : 29-Jun-2019

सरकारें बड़ी बेरहम होती हैं। कुछ बरस पहले राजस्थान में भाजपा सरकार के रहते हुए अलवर में पशुओं के एक व्यापारी की गाड़ी को रोका गया था, और गायों के नाम पर गुंडागर्दी करने वालों ने पहलू खान नाम के इस व्यापारी को सड़क पर दिनदहाड़े पीट-पीटकर मार डाला था। उसके साथ मौजूद उसके बेटों ने बताया था कि उनके पास जानवरों को खरीदकर लेकर जाने के कागजात थे जिन्हें इन गुंडों ने फाड़कर फेंक दिया था। अब जब राजस्थान में कांग्रेस सरकार बने आधा बरस गुजर चुका है तब पहलू खान और उनके बेटों के खिलाफ पशु तस्करी के मामले में चार्जशीट पेश की गई है। जो भीड़-हत्या देश में साम्प्रदायिक उन्माद का एक प्रतीक बन गई थी, उसी मामले में आज कांग्रेस सरकार का यह रूख हक्का-बक्का करने वाला है। पहलू खान के कातिलों का तो पता नहीं क्या होगा, बाप को खोने वाले बेटे जरूर अब अदालत के धक्के खाएंगे। यह मामला चलाना या न चलाना पूरी तरह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला था, और कांग्रेस सरकार का यह रूख भयानक है। 

कांग्रेस पार्टी देश में ऐसे ही दुर्गति तक नहीं पहुंची है। उसके नेताओं का रूख कई प्रदेशों में संवेदनाशून्य रहता है, और जिस राजस्थान में अभी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह जमीन खो चुकी है, उसी राजस्थान में सरकार ने जरा भी दिल या दिमाग, किसी का भी इस्तेमाल नहीं किया कि जिस हत्या को पूरे देश में न सिर्फ कांग्रेस पार्टी ने, बल्कि तमाम गैरभाजपाई दलों ने इतना बड़ा मुद्दा बनाया था, उस हत्या पर अब मरने वाले के परिवार पर ही यह मुकदमा चल रहा है जिसे लेकर देश भर में जगह-जगह तथाकथित गौभक्त हिंसा कर रहे हैं, हत्याएं कर रहे हैं। इस एक मुकदमे के बाद अब कांग्रेस पार्टी देश भर में अपनी जुबान खो बैठेगी क्योंकि वह किस मुंह से ऐसी गौगुंडई के खिलाफ कुछ बोल पाएगी जिसे लेकर वह खुद बेकसूरों पर मुकदमा चला रही है। 

कांग्रेस पार्टी को देश भर में जमीन खोने के बाद अब एक सैद्धांतिक और राजनीतिक समझ की जरूरत है। उसे हार के सदमे से उबरकर देश के सबसे बड़े विपक्षी की हैसियत से अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए, जो कि वह नहीं कर पा रही है। आज मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष कुर्सी छोडऩे पर अड़े हुए हैं, और उनका उत्तराधिकारी तय करने का काम पार्टी कर नहीं पा रही है। राहुल गांधी के बारे में दो दिन पहले यह खबर आई थी कि पार्टी के लोगों से मुलाकात में उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया था कि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जब उन्होंने इस्तीफा सामने रखा तो उसके बाद भी कुछ कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने, और प्रदेश अध्यक्षों या महासचिवों ने इस्तीफे की पेशकश तक नहीं की। राहुल ने इसी बैठक में मध्यप्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को लेकर यह तकलीफ जाहिर की थी कि उनके मना करने पर भी ये दोनों अपने बेटों को लोकसभा चुनाव लड़वाने पर आमादा रहे, और अपने पूरे प्रदेश इसी चक्कर में खो बैठे। उनके कुछ मुख्यमंत्रियों का इशारा ऐसा लगता है कि इन दो लोगों के बारे में था, लेकिन इन दोनों की सेहत पर इस खबर का भी कोई असर पड़ा नहीं दिखता है। 

अब जब राहुल गांधी ने कुर्सी छोडऩा तय कर लिया है, तो पार्टी को भी उनसे परे, उनके कुनबे से परे, कोई अध्यक्ष तेजी से छांटना चाहिए, और पार्टी को लोकतंत्र में अपने हिस्सेदारी सक्रियता से जारी रखनी चाहिए। इस पार्टी को आज देश में साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक जिम्मेदार भूमिका के लिए अपने बुनियादी सिद्धांतों पर लौटना चाहिए। आज हालत यह है कि कल तक खबरों में राजस्थान के जिस मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम भी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चल रहा था, उसी अशोक गहलोत की सरकार ने यह बेरहम मुकदमा दर्ज किया है जिसमें मरने वाले पहलू खान के बेटे अदालत में खड़े रहेंगे। ऐसी बेदिमाग और बददिमाग कांग्रेस पार्टी अधिक लंबा नहीं चल पाएगी। उसे इस उम्मीद में जीना छोडऩा होगा कि देश की जनता जब मोदी से थक जाएगी, तब उसके पास कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा। 
-सुनील कुमार


Date : 28-Jun-2019

हिन्दुस्तान में जब से सरकारों ने कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर को तिलस्म की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, लोगों की जिंदगी कुछ कामों में आसान हो गई, और कुछ कामों में बहुत ही मुश्किल। छत्तीसगढ़ में पन्द्रह बरस की पिछली भाजपा सरकार के वक्त से जमीन से जुड़े हुए सारे मामलों में पटवारी नक्शों से लेकर नामांतरण तक, और जमीन की रजिस्ट्री से लेकर नक्शे में बटांकन तक जैसे दर्जनों काम पूरी तरह कम्प्यूटर से जोड़ दिए गए, और जनता की जिंदगी तबाह हो गई। पिछली सत्तारूढ़ पार्टी के हारने की, और इस बुरी तरह हारने की कई वजहों में से एक वजह यह भी थी कि सरकार सब कुछ कम्प्यूटरों पर करने पर आमादा थी, और न तो पटवारी को कम्प्यूटर हासिल था, न उनको कम्प्यूटर पर काम करना आता था, और न ही रजिस्ट्री ऑफिस जैसी सरकारी और अवैध, दोनों किस्म की कमाई की जगह पर भी इंटरनेट काम करता था। नतीजा यह होता था कि इंसानी हाथों से काम कुछ घंटों में हो तो जाता था, आज पूरे प्रदेश में महीनों तक काम नहीं हो रहा है, और जनता की जरूरतें खड़ी हुई हैं। सरकार बदले छह महीने हो गए हैं, लेकिन अफसरों का सरकारी रूख नहीं बदला है, वे अड़े हुए हैं कि जमीन के रिकॉर्ड से जुड़े हुए सारे काम सिर्फ कम्प्यूटर के रास्ते होंगे, जो कि काम कर नहीं रहा है। अफसर इस नौबत को पटवारियों का भ्रष्टाचार जारी रखने का एक बहाना बताते हैं, और पटवारी गिनाते हैं कि सरकारी इंतजाम सिर्फ खामियों से भरा हुआ है जिसके तहत काम करना मुमकिन नहीं है। जिस तरह बस्तर में पुलिस और नक्सलियों के बीच की गोलीबारी में बेकसूर ग्रामीण-आदिवासी मारे जाते हैं, उसी तरह छत्तीसगढ़ में राजस्व विभाग के अफसरों और पटवारियों के बीच जनता की यह बदहाली हो रही है। 

छत्तीसगढ़ इस बात की सबसे बुरी मिसाल है कि राज्य सरकार लोगों के अपनी संपत्ति पर बुनियादी अधिकार को किस तरह कुचलकर रख सकती है। इस राज्य के शहरों में मास्टर प्लान के नाम पर सत्ता पर बैठे लोगों ने अपनी मनमानी से किसी की जमीन पर आमोद-प्रमोद का उपयोग तय कर दिया, किसी की जमीन पर बाजार की इजाजत दे दी, और नया रायपुर जैसे बहुत बड़े इलाकों में ऐसी मनमानी की शर्तें लाद दीं कि जिनकी पांच एकड़ भी जमीन है, वे भी अपना खुद का मकान भी उस पर नहीं बना सकते। इतने नियम लादे गए कि लोगों को भ्रष्टाचार के रास्ते से काम करवाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता बचा नहीं। इसी तरह पूरे प्रदेश में जमीन की खरीदी-बिक्री को लेकर ऐसा अंधा कानून लागू कर दिया गया था कि गरीब लोग अपनी छोटी सी जमीन किसी को बेच भी नहीं सकते थे, और कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही इस प्रतिबंध को खत्म किया, तो राज्य में दसियों हजार लोगों को अपनी संपत्ति के उपयोग का बुनियादी अधिकार मिला। 

लेकिन आज भी राजस्व विभाग के मातहत आने वाले पटवारी, तहसीलदार, और एसडीएम के दफ्तरों में गैरजरूरी कागजी कार्रवाई का ऐसा जाल बिछाकर रखा गया है कि इंसान उससे बचकर कहीं निकल न जाए। सत्ता में बैठे हुए मंत्रियों और अफसरों को ऐसी पूरी सरकारी साजिश की जानकारी है, लेकिन सरकार इसे दूर करना शायद चाहती ही नहीं है क्योंकि ऐसी व्यवस्था जारी रहने से ही शहरों के एक-एक पटवारी करोड़पति होते हैं, और वे अपने तबादलों के लिए लाखों रूपए भी देते हैं। राज्य सरकार में पिछली सरकार के पूरे पन्द्रह बरस से जनता से सीधे वास्ते वाले जो सबसे भ्रष्ट विभाग रहे, उनमें स्वास्थ्य विभाग के बाद इसी राजस्व विभाग का नंबर सबसे ऊपर रहा। भूपेश बघेल सरकार को चाहिए कि आम जनता की जिंदगी से ऐसी बुरी तकलीफ को खत्म करने के लिए गैरजरूरी कागजी कार्रवाई खत्म करे, लोगों की निजी जमीन पर लगाए गए अंधाधुंध प्रतिबंध खत्म करे, और जो कम्प्यूटर-इंटरनेट व्यवस्था पूरी तरह से नाकामयाब साबित हो चुकी है, उसे पहले सुधारे, और फिर लागू करे। आज जिस तरह सरकारी अस्पतालों में मरीजों को एक से दूसरी जगह भेजकर मरीज के मरने तक दौड़ाया जाता है, ठीक उसी तरह एक-एक छोटे से बुनियादी हक के लिए आम लोग पटवारी-तहसीलदार के दफ्तर में चक्कर लगाते रहते हैं, और यह बात तो जाहिर है ही कि थके हुए लोग ही रिश्वत देने के लिए जल्दी तैयार होते हैं। 

राज्य सरकार को जमीन की खरीद-बिक्री, उसके उपयोग, मालिकाना हक के रिकॉर्ड दुरूस्त करने की सारी औपचारिकताएं बहुत आसान करना चाहिए जिसके बिना आम जनता न तो अपने इलाज के लिए जमीन बेच पाती, न बच्चों की पढ़ाई के लिए, और न ही जिंदा रहने के लिए। आज का राज्य सरकार का राजस्व नियमों और प्रक्रियाओं का सारा ढांचा घोर अमानवीय है, और यह संविधान में दिए गए एक मूल अधिकार को कुचलता भी है। जनता इनमें से किसी भी काम के लिए जब रजिस्ट्री ऑफिस, या पटवारी-तहसील तक जाती है तो उसे फिल्म मुगल-ए-आजम की एक बात याद आती है जिसमें शहंशाह अकबर अनारकली से कहते हैं- सलीम तुझे मरने नहीं देगा, और हम तुझे जीने नहीं देंगे...।
-सुनील कुमार


Date : 27-Jun-2019

एक-एक करके दुनिया के बहुत से शहरों के बारे में ये खबर आ रही है कि आने वाले कितने बरसों में वहां की जमीन के नीचे का पानी खत्म हो जाएगा, और किस बरस में जाकर वहां पीने का कोई पानी नहीं बचेगा, किस देश की कितनी फीसदी आबादी बिना पानी रह जाएगी। यह तस्वीर इतनी भयानक है कि पश्चिम के एक सभ्य और विकसित लोकतंत्र में लोगों के एक समूह ने यह तय किया है कि वे बच्चे पैदा नहीं करेंगे क्योंकि उन बच्चों को वे ऐसा सूखा भविष्य देकर जाना नहीं चाहते जिसमें एक बोतल पानी के लिए कोई किसी के गले काट दें। 

लेकिन दुनिया की इस भयानक तस्वीर को देखें तो लगता है कि दसियों हजार साल का इंसानी इतिहास अभी 20वीं सदी, यानी 1900, के पहले तक धरती को कुल मिलाकर जितना तबाह कर चुका था, इस एक 20वीं सदी में इंसान ने उससे कई गुना अधिक तबाही खड़ी कर दी है। एक-एक तकनीक सामने आई, उससे औजार या हथियार बने, गाडिय़ां बनीं, ईंधन बदले, इमारतें खड़ी हुईं, और कांक्रीट के जंगल बने। लोगों की खपत हिंसक सीमा तक पहुंच गई, और धरती की क्षमता चुक गई। नतीजा यह हुआ है कि जमीन के भीतर के पानी को इंसानों ने पंपों से उलीचकर रख दिया है, और धरती के ऊपर कचरे के पहाड़ खड़े कर दिए हैं, समंदर की तलहटी तक, और मछलियों के गलफड़ों तक प्लास्टिक को पहुंचा दिया है, गायों के पेट पॉलीथीन के गोदाम बना दिए हैं, शहरों की हवा ऐसी जहरीली बना दी है कि इलाज के कारखानों को कच्चे माल की कमी ही नहीं पड़ सकती। यह सब कुछ पिछली सदी में इस रफ्तार से हुआ कि दुनिया देखती रह गई कि इंसान कहां से कहां तक उसे पहुंचा सकता है, किस रफ्तार से पहुंचा सकता है। 

लेकिन दूसरी तरफ इस भयानक तस्वीर के बीच भी अगर देखें, तो जिस तरह आसमान पर काले बादलों के किनारे एक चमकीली लकीर दिखती है, उसी तरह इस तस्वीर के भीतर भी एक संभावना दिखती है कि हो सकता है कि जो सदी अभी चल रही है इस सदी के खत्म होने के पहले ही इंसान कुदरत के साथ खेली जा रही इस शतरंज की बिसात को पलटकर रख दे, और हो सकता है कि अगले 80 बरसों में इंसान पिछले सवा सौ बरसों की तबाही की भरपाई भी कर ले। इंसान में जहां खामियां हैं, वहां खूबियां भी हैं। अब पल भर को जिंदगी की निराशा से बाहर निकलने के लिए यह सोचें कि इन खूबियों से कौन-कौन सी संभावनाएं बनती हैं। यह एक अलग बात है कि इंसान उन संभावनाओं तक पहुंचे, या न पहुंचे, लेकिन वे आज तो कम से कम संभावनाओं की शक्ल में मौजूद तो हैं ही। 

इंसान ने अब धीरे-धीरे कोयले सरीखे प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन की जगह परमाणु, सूरज, हवा, और लहरों से बिजली बनाना शुरू कर दिया है। हिन्दुस्तान के छोटे-छोटे शहरों में भी अब डीजल-पेट्रोल के बजाय बैटरी से चलने वाले ऑटो रिक्शा चलने लगे हैं, और जाहिर है कि इनसे प्रदूषण का बढ़ता हुआ स्तर बढऩा तो कम होना शुरू हो गया होगा। जैसे-जैसे ये ऑटो रिक्शा बढ़ेंगे, या बैटरी से चलने वाली कारें और बसें बढ़ेंगी, प्रदूषण कम होता जाएगा। इसी तरह दुनिया में जगह-जगह अब लोगों को यह समझ आ रहा है कि बारिश के पानी की बूंद-बूंद को बचाकर धरती में डालकर रखने के बाद उसे बाद में निकालकर इस्तेमाल करना अधिक आसान होगा, और ऐसा करने से नदियों में बह जाने वाले मौसमी बारिश के पानी से आने वाली बाढ़ भी थमेगी, और समंदर का बढ़ता हुआ जल स्तर बढऩा भी थमेगा। यह बात अधिक मुश्किल नहीं है, और हम इसी जगह पर बार-बार इस बात को लिखते आए हैं कि किस तरह भूजल की री-चार्जिंग तेजी से बढ़ानी चाहिए, और आज की जो टेक्नालॉजी है, हिन्दुस्तान में जितने मजदूर हैं, उन्हें मिलाकर देखें तो पांच-दस बरस में ही ऐसा हो सकता है कि बारिश का बहुत कम पानी नदियों तक जाए, बाढ़ तो बिल्कुल ही थामी जा सकती है क्योंकि नदियों को जोडऩे का काम वैसे भी चल रहा है जिससे एक तरफ का अधिक पानी दूसरी तरफ मोड़ा जा सके। पानी की जो भयानक दिक्कत आज सामने दिख रही है, उसका आसान सा एक इलाज भी मौजूद है, और उस पर काम सरकारों की ताकत के भीतर का है। 

एक और बात धरती पर से पेड़ों के कटने की है। पेड़ काटे जा रहे हैं, बॉयोडायवर्सिटी खत्म हो रही है, लेकिन साथ-साथ दुनिया की प्रयोगशालाओं में ऐसे पौधे तैयार हो रहे हैं जो आज की मौजूदा प्रजातियों के मुकाबले जल्दी बढ़ सकते हैं। बॉयोडायवर्सिटी को वापिस लाना तो आसान नहीं होगा, लेकिन धरती की हरियाली को वापिस लाना मुश्किल भी नहीं होगा। दुनिया के विकसित और संपन्न देशों के लिए भी यह जरूरी होगा कि वे गरीब देशों में जमीन के नीचे पानी बढ़ाने में पूंजीनिवेश करें, वे तरह-तरह की तकनीक से जंगल को बढ़ाएं, और दुनिया में ऐसे ईंधन का चलन बढ़ाते चलें जो धरती के नीचे से निकाला गया न हो, बल्कि सूरज, हवा, लहरों, और बारिश की बूंदों से पैदा हुआ हो। योरप के विकसित देश धीरे-धीरे इस तरफ बढ़ रहे हैं, और कोई वजह नहीं है कि हिन्दुस्तान जैसे देश ऐसा न कर सकें। 

बहुत सी टेक्नालॉजी बन जाने के बाद भी इंसान ने समय-समय पर उसका इस्तेमाल समझबूझ से करने की मिसालें सामने रखी हैं, इसलिए इसमें ऐसी कोई अनोखी बात नहीं होगी अगर आने वाले बरसों में एक बार फिर इंसान यह समझदारी दिखाए, और टेक्नालॉजी को बर्बादी से आबादी की ओर मोड़कर ले चले। लेकिन जब तक वापिसी का यह सफर शुरू नहीं होता है, तब तक लोगों को यह याद रखना चाहिए कि तस्वीर कई लोगों को आज इतनी भयानक लग रही है कि वे ऐसी दुनिया में कोई अगली पीढ़ी लाना नहीं चाहते, और आगे का जो सुधार या बचाव करना है वह इसी को ध्यान में रखकर करना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 26-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में आज शाला प्रवेश उत्सव मनाया जा रहा है, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल दुर्ग जिले के एक गांव की उस स्कूल में नए बच्चों के स्वागत-समारोह में पहुंचे हुए हैं जहां अपने बचपन में वे खुद पढ़े थे। वे मुख्यमंत्री हैं इसलिए जाहिर है कि आज वे इस स्कूल के लिए तमाम सहूलियतों की घोषणा कर सकते हैं। और पिछले बरसों में वे लगातार इस इलाके के विधायक भी रहे हैं, और उस हैसियत से भी उन्होंने उस स्कूल के लिए काफी कुछ किया होगा। लेकिन इस मौके पर हमें कई बरस पहले इसी जगह अपनी लिखी हुई एक बात याद पड़ती है। 

आज बहुत से लोग न सिर्फ राजनीति और सरकार में, बल्कि कारोबार में, या पेशे में बहुत कामयाब हो जाते हैं, और ऐसी हालत में रहते हैं कि वे उन जड़ों को अपनी आज की ताकत से सींच सकें जिनसे बढ़कर वे यहां तक पहुंचे हैं। हमने पहले भी यह लिखा था कि सक्षम और संपन्न लोगों को अपनी बचपन की स्कूलों की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिनकी स्कूलें अपने आपमें बहुत संपन्न हों, और वहां पर कुछ भी जोडऩे की कोई जरूरत न हो, लेकिन बहुत से लोग सरकारी, म्युनिसिपल, पंचायत, या गरीब स्कूल से पढ़कर निकले होंगे और आज आगे बढ़े हुए होंगे। बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जो ऐसी किसी स्कूल में न पढ़े हों, लेकिन उनके बच्चे या उनके माता-पिता ऐसी किसी साधारण स्कूल में पढ़े हों। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो ऐसे इलाकों से निकलकर बाहर आकर कामयाब हुए हों जहां आज भी स्कूलों की जरूरत हो। इनमें से कोई भी बात हो, यह गुंजाइश तो हमेशा रहती है कि लोग आगे बढ़कर स्कूलों की मदद करें, जो कि किसी किस्म का दान नहीं होगा, वह एक बेहतर भविष्य के लिए एक छोटा सा पूंजीनिवेश होगा। 

अच्छी से अच्छी सरकारी स्कूल भी बहुत सी और चीजों की जरूरत में रहती है। कहीं मैदान नहीं होता, कहीं लाइब्रेरी या प्रयोगशाला की कमी रहती है, और कई जगहों पर कुछ विषयों के शिक्षक नहीं रहते हैं। लोग उन स्कूलों से पढ़कर निकले बिना भी अपना वक्त या अपना पैसा वहां लगा सकते हैं, जिनका ज्ञान अच्छा हो वे वहां जाकर पढ़ाने का प्रस्ताव रख सकते हैं, या जिनके पास पैसे अधिक हों, वे आर्थिक योगदान कर सकते हैं। कुछ ऐसे खिलाड़ी हो सकते हैं जो वहां जाकर बच्चों को खेल सिखाने में मदद करें, कुछ ऐसे लेखक हो सकते हैं जो बच्चों की भाषा बेहतर बना सकें, उन्हें लिखने की बेहतर समझ दे सकें। कुछ ऐसे भी कलाकार हो सकते हैं जो आसपास की किसी स्कूल के बच्चों को चित्रकला, मूर्तिकला, या संगीत सिखा सकें। अगर लोगों में अपने इर्द-गिर्द के, अपने गांव-कस्बे के बच्चों का माहौल बेहतर बनाने में दिलचस्पी हो, तो बहुत सी संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। 

आज छत्तीसगढ़ जैसे हिन्दीभाषी राज्य के बच्चे जब राज्य से निकलने की सोचते हैं, तो अंग्रेजी का ज्ञान न होना उनके लिए एक बड़ी रूकावट बन जाता है। ऐसे में किसी भी स्कूल के आसपास बसे हुए रिटायर्ड या कामकाजी लोग जिनकी अंग्रेजी बेहतर हो, वे स्कूल के प्राचार्य से मिलकर समय तय करके बच्चों की अंग्रेजी बेहतर करने का काम कर सकते हैं क्योंकि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की अंग्रेजी कई जगहों पर खासी कमजोर रहती है, या भाषा के शिक्षकों पर बहुत बड़ा बोझ रहता है। दरअसल स्कूलों में, या स्कूलों के बाहर छोटे बच्चों के लिए कुछ करने का सरोकार अधिक फैशन में नहीं है। लोगों का ध्यान उस तरफ अधिक जाता है जहां बच्चों की जरूरत किसी वजह से, शारीरिक या मानसिक दिक्कत की वजह से अधिक रहती है, और वहां पर दान करने को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। जबकि तमाम आम जगहों पर बच्चों के लिए कुछ न कुछ करने की बड़ी जरूरत रहती है, और लोग अपने स्तर पर, कुछ लोग संगठित होकर, या कुछ संगठनों के लोग एक पहल करके स्कूल न जाने वाले बच्चों को स्कूल भेजने की कोशिश कर सकते हैं, या वहां जा चुके बच्चों के लिए कुछ और अच्छा कर सकते हैं। आज ही फेसबुक पर किसी ने एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें सरकारी नौकरी करने वाला एक नौजवान अपनी दिलचस्पी और अपने पैसों से रोज बेघर-फुटपाथी बच्चों को पढ़ाने की ऐसी कोशिश कर रहा है कि जो बच्चा खुली जगह पर उससे दो घंटा पढ़ ले, उसे वह अपना पकाया खाना खिलाता है। इस खाने की जरूरत से उसके पास दर्जनों बच्चे आने लगे हैं, और वह इस काम को बढ़ाते चल रहा है। उसका कहना है कि महज खाने के लिए बच्चे उसके पहले दो घंटे पढऩे के लिए तैयार हैं, और धीरे-धीरे उनकी सोच ऐसी हो जाती है कि वे खाना न मिले तो भी शायद पढऩे के लिए आना जारी रखें। इसलिए आज जो बात हमने यहां छेड़ी है वह स्कूल से शुरू तो होती है, लेकिन महज स्कूल तक सीमित नहीं हैं, और स्कूल पर खत्म नहीं होती है। लोग अपने इर्द-गिर्द देखें तो बच्चों की जरूरतें चारों तरफ बिखरी हुई हैं, और यह चर्चा उन्हें सोचने के लिए एक मुद्दा देने की कोशिश भर है।
-सुनील कुमार


Date : 25-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के कलेक्टर संजय अलंग एक जाने-माने साहित्यकार हैं, और वे सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय रहते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के बहुत से पहलुओं का इतिहास बताते हुए कई किताबें लिखी हैं, और देश भर में साहित्य की पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं छपती भी रहती हैं। ऐसे में यह माना जाता है कि यह अधिकारी दूसरों के मुकाबले कुछ अधिक संवेदनशील होगा, और ऐसी ही एक संवेदना अभी कल ही सामने आई है। वे कुछ अरसा पहले कलेक्टर की जिम्मेदारी के तहत जेल के दौरे पर गए थे, और वहां उन्होंने एक ऐसी छोटी बच्ची को देखा जिसका पिता जेल में बंद था, और बच्ची को महिला जेल में रखा गया था, जहां बाकी महिला कैदी और जेल कर्मचारी उसका ख्याल रखते थे। उस बच्ची से बात करके जब उन्होंने जाना कि वह किसी अच्छी स्कूल में पढऩा चाहती है, तो उन्होंने बिलासपुर की बड़ी महंगी निजी स्कूलों में बात की, और एक स्कूल ने उसकी मुफ्त पढ़ाई और हॉस्टल में मुफ्त रहने की जिम्मेदारी उठाई। इसके बाद संजय अलंग अपनी कार से उस बच्ची को जेल से स्कूल लेकर गए, और उसकी नई जिंदगी शुरू हुई। कलेक्टर की पहल पर जेल में अभी रह रहे सत्रह और बच्चों को भी दूसरी स्कूलों में दाखिल करवाया जा रहा है।

ये पूरी कहानी एक सरकारी अधिकारी के जिम्मेदार काम की है, और एक बच्ची की जिंदगी में आए एक ऐसे मोड़ की है जो कि उसे कहीं भी पहुंचा सकता है। कलेक्टर ने उस बच्ची का नाम और चेहरा सार्वजनिक नहीं होने दिया है, लेकिन स्कूल का नाम उजागर हुआ है, और उस बच्ची की बेचेहरा तस्वीरें जारी हुई हैं। इस कहानी का एक हिस्सा बहुत अच्छा है और यह दूसरे जिलों के लिए, जिलों में इस तरह से मां-बाप के साथ बंद दूसरे बच्चों के लिए एक मिसाल बन सकता है, लेकिन एक दूसरी बात भी इससे जुड़ी हुई है जिसका ख्याल रखना चाहिए। 

हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया में स्कूली बच्चों के बीच एक-दूसरे को परेशान करना एक बहुत आम बात है। बच्चों के बीच सामाजिक हकीकत की समझदारी आ नहीं पाती है, और वे परिवार के दूसरे लोगों के नजरिए से प्रभावित रहते हैं। अभी चार-छह दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अपनी बेटी की एक तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है कि उसकी क्लास का एक लड़का (और उन्होंने उसका नाम भी लिख दिया है), किस तरह उनकी बेटी की तस्वीर को लेकर उसे परेशान करता है। देश की एक सबसे ताकतवर महिला की बेटी के साथ जब ऐसी परेशानी हो सकती है, तो यह जाहिर है कि एक बहुत ही वंचित तबके से आई हुई, जेल से निकलकर स्कूल पहुंची हुई बच्ची की अगर ऐसी बेचेहरा भी नुमाइश होती हो, तो स्कूल मैनेजमेंट उसे अपनी सामाजिक जवाबदेही की मिसाल की तरह पेश करने की लालच में पड़ सकता है, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा गैरजिम्मेदारी से उसे एक दिलचस्प रिपोर्ट का सामान मान सकता है, और स्कूल के दूसरे बच्चे उसे एक कैदी की बेटी की तरह मानकर उसके साथ एक ऐसा अलग किस्म का बर्ताव कर सकते हैं जो कि उस छोटी बच्ची के मानसिक विकास में बड़ी बाधा बन सकता है। अभी ही खबरों में यह छप चुका है कि इस बच्ची का पिता जेल में पांच साल की सजा काट चुका है, और पांच साल बाकी है। जब यह बच्ची पन्द्रह दिनों की थी, तभी माँ की मौत हो गई, और घर पर कोई नहीं थे तो उसे पिता के पास जेल भेज दिया गया, और तबसे महिला कैदी उसे पाल-पोसकर बड़ा कर रही हैं। ऐसी जानकारियां और उसकी अब तक की सामने आईं बेचेहरा तस्वीरें उसी बच्ची की निजता को खत्म कर रही हैं, और इस मामले में उसका भला करते हुए भी उसे ऐसे प्रचार से, भेदभाव के खतरे से बचाना बेहतर होगा। आगे ऐसे दूसरे मामलों में इन बच्चों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा गवाहों को बचाने के लिए उन्हें एक नई शिनाख्त देकर किया जाता है।
-सुनील कुमार


Date : 24-Jun-2019

भारत की सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया की एक खबर है कि उसके एक सीनियर पायलट को सस्पेंड करके उसके खिलाफ जांच शुरू की गई है क्योंकि उस पर यह आरोप है कि ऑस्ट्रेलिया के सिडनी एयरपोर्ट पर एक दुकान से सामान चुरा लिया था। पायलट का कहना है कि वे खुशी की एक खबर के बीच एक तोहफा खरीदने गए थे और भुगतान करना भूल गए, हड़बड़ी में विमान उड़ाकर भारत आ गए। उनका कहना है कि उन्हें हिंदुस्तान से फोन पर यह खबर मिली कि वे दादा बन गए हैं, और वे अपनी बहू के लिए उपहार लेने गए थे।

यह बात सही हो सकती है कि उन्होंने इरादतन चोरी न की हो और हड़बड़ी में, खुशी में वे बिना भुगतान सामान लेकर निकल गए हों। लेकिन दूसरी तरफ यह जरूरी नहीं है कि वे मोटी तनख्वाह पाने वाले सीनियर पायलट थे, और वे भला चोरी क्यों करते। पैसे वालों लोगों में भी दुकानों से चोरी की आदत पाई जाती है, और अरबपति परिवारों से  सरकारी नौकरी में आने वाले लोग भी छोटे-बड़े सभी किस्म के भ्रष्टाचार करते मिलते हैं। लेकिन यह खबर सभी लोगों के लिए एक नसीहत देने वाली है, और उसी लिए हम यहां इस पर लिख रहे हैं। गलती हो, या गलत काम, अधिकतर मामलों में दोनों को ही सजा का हकदार पाया जाता है। सजा देते हुए उसने कमी-बढ़ोत्तरी हो सकती है, लेकिन सजा तो मिलती ही है। ऐसे में लोगों को जिंदगी के हर दायरे में एक बड़ी समझदारी और सावधानी रखनी चाहिए। 

हिंदुस्तान में दलितों और आदिवासियों के सम्मान की सुरक्षा के लिए कुछ खास कानून बनाए गए हैं जिनके तहत किसी दलित आदिवासी को उनके जातिसूचक उल्लेख का इस्तेमाल अगर अपमानजनक तरीके से किया जाता है, तो वह सजा के लायक जुर्म है। कानून कड़ा है, बचाव मुश्किल है। इस कानून की बाकी बारीकियों पर भी ध्यान देना चाहिए जिसमें कहा गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को घूरकर देखना भी उनका अपमान है। जब तक देश में जो कानून लागू है लोगों को उसके प्रति सावधान रहना चाहिए, क्योंकि एक छोटी सी गलती, या छोटा सा गलत काम भी लोगों को बड़ी लंबी तकलीफ में डाल सकता है।

हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के अधिकतर सभ्य देशों में कामकाजी महिला की सुरक्षा के लिए बड़े कड़े कानून हैं। हिंदुस्तान में हाल ही के बरसों में महिलाओं ने हौसला जुटाकर शिकायतें करना शुरू भी किया है, और पिछली केंद्र सरकार के एक मंत्री, और अपने वक्त के देश के सबसे नामीगिरामी संपादक एम.जे. अकबर ऐसी कई तोहमतों को झेलते हुए आज मानहानि का मुकदमा दायर करके अदालत में हैं, मंत्री का पद छोड़ देना पड़ा है, सामाजिक साख मिट्टी में मिल गई है। उनके खिलाफ जितनी शिकायतें हैं उसने यह अंदाज लगता है कि उन्होंने कोई गलती नहीं की, बल्कि गलत काम किया है, और यह एक लंबी सजा का मामला भी बन सकता है।

चूंकि बात गलतियों की भी हो रही है, इसलिए लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि देश में बाल मजदूरी के खिलाफ किस तरह का कानून है। आमतौर पर लोग घरों में बच्चों को खिलाने के लिए छोटी लड़कियों को काम पर रख लेते हैं या दफ्तर-दुकान पर चाय पिलाने के लिए छोटे लड़कों को रख लेते हैं। यह सिलसिला गैरकानूनी है, और खासा खतरनाक हो सकता है अगर कोई इसकी शिकायत कर दे, पड़ोस के लोग पीछे लग जाएं, या ऐसे बाल मजदूर के साथ कोई हादसा हो जाए। इसलिए लोगों को ऐसी गलती या गलत काम से भी दूर रहना चाहिए। 

इन दिनों लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि शादी का वायदा करके शारीरिक संबंध बनाए, और फिर शादी से मुकर गए तो उसके खिलाफ बलात्कार का जुर्म दर्ज हो गया। हमारी अपनी सोच बलात्कार की ऐसी परिभाषा नहीं मानती, और हम इसके खिलाफ कई बार लिख चुके हैं कि यह एक वायदाखिलाफी हो सकती है, लेकिन यह बलात्कार नहीं कहा जा सकता। लेकिन हमारे कहने से परे देश का कानून अलग है, और लोगों को उसे ध्यान में रखकर ही रिश्ते बनाने चाहिए।
एक अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस में सीनियर पायलट की एक छोटी सी चूक उसकी बाकी जिंदगी किस कदर बर्बाद कर सकती है, यह लोगों को एक बड़ी नसीहत रहना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 23-Jun-2019

विश्व कप क्रिकेट में बीती रात जब आखिरी ओवर में हिन्दुस्तान किसी तरह अफगानिस्तान से जीता तो भी हिन्दुस्तानी क्रिकेट प्रशंसकों को खुशी भी हुई, और अफगानिस्तान के लिए थोड़ा सा मलाल भी हुआ। लंबे बरसों से यह देश जिस तरह की दहशतगर्दी से गुजर रहा है, अमरीकी फौजी कार्रवाई को झेल रहा है, और अपने देश की सरकार में अस्थिरता देख रहा है, वैसे देश में क्रिकेट की ऐसी शानदार टीम बनना लोगों को हैरान करती है। अफगानिस्तान में क्रिकेट का कोई लंबा इतिहास नहीं रहा है, और पड़ोस का पाकिस्तान आजाद होने के पहले से अंग्रेजों की हुकूमत में हिन्दुस्तान के साथ एक ही टीम में क्रिकेट खेलते आ रहा था। अभी चार दिन पहले ही पाकिस्तान की टीम की जो धज्जियां हिन्दुस्तानी टीम ने उड़ाई हैं, उन्हें देखकर पाकिस्तान में वहां के खिलाडिय़ों को बड़ी बुरी बेइज्जती झेलनी पड़ रही है, जो कि नाजायज भी है। दूसरी तरफ अभी दो बरस पहले अफगानिस्तान की टीम को अंतरराष्ट्रीय दर्जा मिला, और टेस्ट मैच खेलने मिला। अफगानिस्तान की टीम का यह दूसरा ही विश्व कप है, और पिछला मुकाबला उन्होंने 2015 में ही पहली बार खेला था। ऐसे देश ने कल भारत के खिलाफ जो प्रदर्शन किया है, वह देखने लायक था, और हिन्दुस्तान के अनगिनत क्रिकेट प्रशंसकों ने रात से अब तक यह ट्वीट किया है कि हिन्दुस्तान ने मैच जीता, और अफगानिस्तान ने दिल। 

इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि लगातार अभाव और तनाव में संघर्ष करने वाले लोग कई बार इन दिक्कतों को अपने मन में ही संघर्ष छोड़ देने का एक बहाना बना लेते हैं। वे अपनी हार के लिए तश्तरी में तैयार इस तर्क को सहूलियत से इस्तेमाल कर लेते हैं कि ऐसे हालात में वे भला क्या जीतते। जिस अफगानिस्तान में तालिबानों ने लंबे अर्से से जिंदगी के हर पहलू पर इस्लामी पैमाने लादने का काम किया है, गीत-संगीत पर रोक लगा दी है, महिलाओं पर तो तरह-तरह की रोक है ही, और वहां की राजधानी में भी हर कुछ महीने में धमाके होते हैं जिनमें बहुत सी मौतें होती हैं। ऐसे में वहां के नौजवानों ने क्रिकेट के खेल में यह गजब की दिलचस्पी ली है, और दुनिया में सबसे अच्छी मानी जाने वाली एक टीम, हिन्दुस्तान की नाक में कल दम करके रख दिया था। आखिरी ओवर तक यह समझ नहीं पड़ रहा था कि नतीजा क्या होगा, यह तो गनीमत कि भारत के मो. शमी ने इस मुस्लिम देश की टीम के लगातार तीन विकेट लिए, और ट्विटर पर साम्प्रदायिकता फैलाने में जुट गए हिन्दुस्तानियों को अपने ट्वीट मिटाने पर मजबूर भी कर दिया। मैच चल ही रहा था कि मुस्लिमों से नफरत करने वाले कुछ हिन्दुस्तानियों ने यह लिखना शुरू कर दिया था कि अजहर से लेकर शमी तक ये लोग गद्दार हैं, देशद्रोही हैं। मैच के आखिरी ओवर ने ऐसे नफरतजीवी लोगों के मुंह पर कालिख पोत दी। कल रात मैच में यह देखना भी बड़ा शानदार लग रहा था कि हिन्दुस्तानी टीम की प्रायोजक एक चीनी मोबाइल कंपनी थी, और अफगानिस्तान की टीम का प्रायोजक हिन्दुस्तान का सबसे मशहूर ब्रांड, अमूल था। 

अफगानिस्तान टीम की इस मिसाल से परे इन दो-चार दिनों पर एक बात और कही जाए तो वह यह है कि पाकिस्तानी टीम की हार पर वहां के निराश क्रिकेटप्रेमियों ने खिलाडिय़ों के साथ जैसा बुरा सुलूक किया है, वह शर्मनाक है। टीम तो मैदान में हारी थी, पाकिस्तान के ऐसे लोगों की इंसानियत एयरपोर्ट और सड़कों पर कैमरों के सामने हार रही है। अपने खिलाडिय़ों को देश के खिलाफ गद्दार कहना एक बहुत ही घटिया बात है, और ऐसे लोगों को खेलप्रेमी कहलाने का भी कोई हक नहीं है। अब अगर मानो पाकिस्तान के साथ हुए मैच में जब हिन्दुस्तानी कप्तान विराट कोहली बिना आऊट हुए अपने को आऊट समझकर पैवेलियन लौट गए थे, तो उनकी जगह कोई अजहर या शमी होता, तो उन्हें गद्दार कहने वाले लोग कम नहीं होते। इसी तरह इसके कुछ ओवर बाद जब एक पाकिस्तानी खिलाड़ी के आऊट होने पर कप्तान कोहली अपील करना चाहते थे, और धोनी ने उन्हें समझाया कि खिलाड़ी आऊट नहीं है, और अपील नहीं की गई। इसके बाद वह खिलाड़ी आऊट निकला, लेकिन मौका निकल चुका था। अब अगर धोनी की जगह कोई मुस्लिम खिलाड़ी होता तो हिन्दुस्तान के बहुत से नफरतजीवी लोग उसे गद्दार लिखना शुरू कर देते। 

इन दो मैचों से अफगानिस्तान ने एक मिसाल पेश की है जिसने हिन्दुस्तान सहित बाकी दुनिया का भी दिल जीत लिया है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के कुछ घटिया लोगों ने अपने खिलाडिय़ों के खिलाफ नफरत उगली है, जिससे उनकी ही बेइज्जती अधिक हुई है, कोई खिलाड़ी गद्दार साबित नहीं हुए। खेलों में नफरत की जगह नहीं रहनी चाहिए, जीत-हार तो लगी रहती है। 
-सुनील कुमार


Date : 22-Jun-2019

बिहार के सरकारी अस्पतालों में बच्चों की थोक में हो रही मौतों के चलते आखिरकार देश के मीडिया के एक हिस्से ने भी यमदूतों को किनारे धकेलकर वार्डों पर हमला किया, और डॉक्टरों को खलनायक साबित करके एक किस्म से बिहारी मुख्यमंत्री स्वशासन बाबू नीतीश कुमार को बिना कहे बेकसूरी का एक सर्टिफिकेट दे दिया। यह काम कम से कम एक हिन्दी समाचार चैनल की एक चर्चित रिपोर्टर ने इतने अश्लील और हिंसक तरीके से किया कि मीडिया में मामूली शर्म रखने वाला तबका भी इस पर शर्म में डूब गया। लाशों पर मंडराने के लिए, या दम तोडऩे के करीब लोगों पर मंडराने के लिए जिन गिद्धों को बदनाम किया जाता है, उन्होंने भी यह नजारा देखकर मुंह मोड़ लिया। लेकिन कुछ लोगों ने इस हरकत के पीछे की नीयत को पहचाना कि किस तरह बिहार की सत्ता को मासूमियत और बेकसूरी का प्रमाणपत्र दिया गया, और यह साबित किया गया कि बंगाल के अस्पतालों में ऐसी मौतों के लिए मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी जिम्मेदार हैं, लेकिन बिहार में ऐसी सैकड़ों मौतों के लिए डॉक्टर और चिकित्सा कर्मचारी खलनायक हैं। 

यह नजारा देखकर थोड़ी सी हैरानी भी होती है कि किस तरह लालू यादव को बेदखल करके नीतीश कुमार सत्ता पर आए, और मुख्यमंत्री के तीसरे कार्यकाल से गुजर रहे हैं। इस बीच वे भाजपा के साथ रहे, भाजपा के खिलाफ रहे, मोदी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से खुलकर रूख जाहिर किया, और फिर मोदी का झंडा लेकर चलने लगे। ऐसे कई किस्म के बदलते रूख के बीच भी वे बिहार पर लगातार राज करते रहे, लगातार चुनाव जीतते रहे, और लगातार लोकसभा चुनावों में भी एनडीए को आगे बढ़ाते रहे। अब सवाल यह उठता है कि जाने-पहचाने जिलों में अगर संक्रामक बीमारियों से मौतों का ऐसा बुरा हाल है, और शिनाख्त रहते हुए भी इनसे निपटने का इंतजाम नहीं किया गया, तो भी नीतीश कुमार कैसे लगातार जीतते हैं? क्या इसलिए कि उनके पहले की सरकारें उनसे अधिक खराब थीं, और अब तक लोग उन बुरी यादों को भूल नहीं पाए हैं, और ऐसे अस्पतालों के बाद भी नीतीश को बेहतर मुख्यमंत्री मानते हैं? आखिर किसी इलाके या प्रदेश के वोटरों के सामने तुलना करने के लिए जो बात रहती होगी, उसी से तो तुलना करेंगे? आज नीतीश के अस्पतालों की तुलना कोई दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के मोहल्ला क्लीनिक से तो कर नहीं सकते जो कि देश में शायद सबसे इलाज दे रहे हैं? कोई बिहार के स्कूलों की तुलना दिल्ली के उन स्कूलों से तो कर नहीं सकते जिन्हें वहां की सरकार ने विश्व स्तर का बनाकर रखा है? 

बरस-दर-बरस बिहार में ऐसी मौतों के चलते हुए भी सत्तारूढ़ पार्टी की चुनावी जीत पर कोई दाग-धब्बा नहीं लगता, और इससे समझ पड़ता है कि मौजूदा सरकार लोगों की पुरानी यादों से अब भी बेहतर है। शायद यह भी एक वजह रही कि अभी ताजा आम चुनावों में बिहार में कांग्रेस-लालू का नामों-निशान मिट जाने जैसी नौबत रही, और नीतीश-भाजपा बुलडोजर की तरह आगे बढ़ते चले गए। लेकिन यहीं पर एक बात सामने आती है जिस पर उन तमाम पार्टियों को गौर करना चाहिए जो कि बड़ी जीत लेकर सत्ता पर आती हैं। बड़ी जीत लोगों की आंखों पर एक बड़ा पर्दा बनकर भी आती है, और सत्ता की चुनौतियों को उनकी जीत के नशे वाले आंखों से दूर कर देती है। ऐसी बड़ी जीत लोगों को अपनी जिम्मेदारियों का पूरा एहसास नहीं करवाने देती, और ऐसी बड़ी जीत लोगों को जनता से मिले हुए अधिकारों को लेकर एक खुशफहमी में भी डाल देती है कि अब उनका पसीना भी गुलाब के अत्तर सरीखे छोटी-छोटी शीशियों में बिकेगा। 

और दूसरी बात यह भी है कि चुनावी हार-जीत या सत्ता से परे, इस किस्म से बेकसूर बच्चों की थोक में होने वाली वे मौतें इतिहास में तो उन लोगों के नाम के साथ दर्ज हो ही रही हैं जो कि सत्ता पर हैं, सत्ता का सुख पा रहे हैं, और मौतों को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। बात महज बिहार की नहीं है, बात किसी दूसरे प्रदेश की भी नहीं है, बात पूरे देश की है कि मौतों पर किस नेता का क्या रूख रहता है। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से देश के हर आम इंसान के हाथ एक खास लोकतांत्रिक हथियार लगा हुआ है। और लोग इस बात को अच्छी तरह दर्ज भी कर रहे हैं कि बिहार  में सौ-सौ बच्चों की मौत के बाद देश के प्रधानमंत्री की किसी के सेहत के लिए पहली फिक्र सामने आई, तो वह एक हिन्दुस्तानी क्रिकेटर के अंगूठे टूटने पर आई। आज लोगों की कही बातें जितनी दर्ज हो रही हैं, उतनी ही लोगों की चुप्पी भी दर्ज हो रही है, और इन सबसे ऊपर बेकसूर मासूम बच्चों की ऐसी अकाल मौत के बाद उनकी बद्दुआ भी तो किसी न किसी को लगती होगी। 
-सुनील कुमार


Date : 21-Jun-2019

मोबाइल फोन पर एक गेम खेलते हुए एक छोटे बच्चे की खुदकुशी सामने आई है। इसमें खेलने वाले दूसरे लोगों ने उसे एक टास्क दिया था, और उसके मुताबिक उसने चूडिय़ां पहनी, मंगलसूत्र पहना, और फांसी लगा ली। यह बात दिल को दहलाने वाली है, और यह हादसा अपने आपमें अकेला नहीं है, हर कुछ हफ्तों में कोई बच्चा इसी तरह कुछ खेलते हुए जान दे रहा है। मोबाइल पर किसी एक गेम पर प्रदेश की सरकारें या देश की सरकार रोक लगाती हैं, और या तो उससे बचकर लोग यह खेलते रहते हैं, या फिर कोई नया कातिल-वीडियो खेल सामने आ जाता है। आज हालत यह है कि मोबाइल फोन के भयानक इस्तेमाल के चलते छोटे-छोटे दुधमुंहे बच्चे भी बड़ों को देख-देखकर उस पर वीडियो देखे बिना खाने-पीने से मना कर देते हैं, और उनको कुछ खिलाने के चक्कर में मां-बाप तुरंत समझौता कर लेते हैं। 

अब चौथाई सदी पहले तक हिन्दुस्तान में जो फोन किसी ने देखा-सुना नहीं था, उसने इस भयानक रफ्तार से, और इस भयानक हद तक घुसपैठ कर ली है कि पति-पत्नी में फोन के बुरी तरह इस्तेमाल को लेकर तलाक की नौबत आ रही है, अपनी मर्जी का फोन पाने के लिए जिद करते हुए बच्चे मांग पूरी न होने पर खुदकुशी कर रहे हैं। फोन पर तरह-तरह के एप्लीकेशन के चलते लोग लापरवाही में अपनी फोटो या वीडियो बांट रहे हैं, और उसके फैल जाने पर जान ले रहे हैं, या जान दे रहे हैं। कुल मिलाकर टेक्नालॉजी और उसके इस्तेमाल को लेकर लोगों में समझ की कमी खूनी हुई जा रही है। डिजिटल नशा सिर चढ़कर बोल रहा है, और दुनिया के दूसरे कई देशों की तरह इसके नशे से नशामुक्ति करवाने के लिए हिन्दुस्तान में भी अभियान चलाने की जरूरत आ खड़ी हुई है। 

दुनिया के बाल मनोचिकित्सकों का मानना है कि छोटे बच्चों के सामने फोन, कम्प्यूटर, या टीवी, किसी भी तरह की स्क्रीन एक दिन में तीस मिनट से अधिक नहीं रहनी चाहिए, वरना उनकी दिमागी सेहत पर, उनकी आंखों पर इसका बुरा असर पड़ता है। लेकिन बच्चों के इर्द-गिर्द रहने पर भी परिवार के बड़े लोग अपनी जरूरत, अपने शौक, या अपनी लत के चलते हुए ऐसे तमाम डिजिटल उपकरणों का घंटों इस्तेमाल करते हैं, और उनके चाहे-अनचाहे छोटे बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। सरकारें तो किसी खूनी खेल पर कानूनी रोक लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं, लेकिन घर के भीतर ऐसे प्रतिबंधित खेलों से परे परिवार के लोग कितनी देर तक किस स्क्रीन पर क्या देखते हैं, इस पर तो न कोई सरकार निगरानी रख सकती, न इसे रोकने का कोई कानून बन सकता। लोगों को खुद ही अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, और अपने न सही, अपने बच्चों के भले के लिए तमाम किस्म के डिजिटल उपकरणों का रोजाना का एक ऐसा कोटा तय करना होगा जिससे कि बच्चों के सामने ये सामान कम से कम शुरू हों। 

यह भी समझने की जरूरत है कि बच्चों के दिमाग विकसित होने के जो शुरूआती बरस रहते हैं, उसमें उनके सामने कल्पनाएं अधिक महत्वपूर्ण रहती हैं, बजाय रेडीमेड फिल्मों के, या कि गढ़े हुए संगीत के। जब वे खुद कुछ लकीरें बनाते हैं, या चीजों को ठोक-बजाकर आवाज पैदा करते हैं, तो वही उनके मानसिक विकास के लिए बेहतर होता है, फिर चाहे वह कार्टून फिल्मों की तरह अधिक चटख रंगों वाला न हो, या स्टूडियो में बनाए गए गीत-संगीत जितना मधुर न हो। इसलिए छोटे बच्चों को बड़ा करते हुए आज के वक्त यह सावधानी इसलिए भी अधिक जरूरी है क्योंकि हर आम परिवार में एक से अधिक ऐसे फोन या दूसरे उपकरण हो गए हैं जिन पर लगभग मुफ्त मिलने वाले इंटरनेट से ऐसी तमाम फिल्में बच्चों को दिखाई जा सकती हैं। ऐसा करना परिवार के बड़े लोगों को अपने दूसरे काम करने के लिए वक्त तो दिला देता है, लेकिन छोटे बच्चों को बहुत बुरी तरह ऐसे वीडियो, और फिर आगे जाकर ऐसे गेम का नशेड़ी भी बना देता है। परिवार के बड़े लोगों के एक सामाजिक-शिक्षण की जरूरत है ताकि वे उपकरणों के बीच रहते हुए भी अपने बच्चों को एक सेहतमंद माहौल में बड़ा कर सकें। इस बात की गंभीरता जिनको नहीं लग रही है, वे कल मोबाइल-गेम खेलते हुए इस तरह खुदकुशी करने वाले बच्चे की खबर कुछ बार जरूर पढ़ लें। 
-सुनील कुमार


Date : 20-Jun-2019

कई बरस पहले से कुछ जानकार और समझदार दूरदर्शी यह कहने लगे थे कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। और इस चर्चा के दस-बीस बरस के भीतर ही आज यह नौबत दिख रही है कि पानी के लिए हिन्दुस्तान के ही कई हिस्सों में हिंसा हो रही है। हिन्दुस्तान का एक बड़ा हिस्सा सूखा पड़ा है, और लोग अपनी प्यास बुझाने को गांव और इलाका छोड़कर जा रहे हैं, और उन्होंने अपने जानवरों को मरने के लिए छोड़ दिया है क्योंकि हिंसक और हमलावर गौरक्षकों की वजह से, और अंधाधुंध कड़े गौरक्षा कानूनों की वजह से पशुओं को बेच पाना मुमकिन नहीं रह गया है। लेकिन यह तो शहरी इंसान और जानवर की बात हुई, देश भर में जगह-जगह प्यासे जंगली-जानवर पास की बस्तियों में पहुंच रहे हैं, और एक अलग टकराव बढ़ते चल रहा है। 

जो धरती अपने गर्भ में पानी से लबालब थी, उसे टेक्नालॉजी और मुफ्त की बिजली ने मिलकर खाली कर दिया। धान उगाने वाले इलाकों में इस फसल के लिए खूब पानी लगता है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में किसानों को इसके लिए मुफ्त बिजली मिली हुई है। किसान की तो मदद हो गई, लेकिन धरती की कोख सूनी हो गई। जिस वक्त इस बात को लिख रहे हैं, उस वक्त टीवी स्क्रीन पर मध्यप्रदेश के खरगौन इलाके का एक वीडियो दिख रहा है जिसमें गांव का गांव इलाका छोड़कर जा रहा है क्योंकि पानी बचा ही नहीं। आज बीस जून को विश्व शरणार्थी दिवस भी है, और यह कैसा अजीब इत्तफाक है कि महज पानी के लिए लोग अपना इलाका छोड़कर कहीं शरणार्थी होने जा रहे हैं, हजारों-लाखों बरस से जंगलों में बसे हुए जानवर तो शरणार्थी हो ही चुके हैं। 

छत्तीसगढ़ में धरती के भीतर के पानी को बढ़ाने के लिए गांवों के आसपास के नालों को बिना किसी टेक्नालॉजी या शहरी सामान के, महज सामान्य समझबूझ और परंपरागत ज्ञान से ऐसा बदला जा रहा है कि उससे उनमें पानी थम सके, और आसपास की धरती में भी जा सके, बारिश के बाद भी लोगों को उससे पानी मिल सके। यह छोटे स्तर पर, कम खर्च पर, बहुत ही विकेन्द्रीकृत और मजदूरी से जुड़ी हुई स्थानीय तकनीक है, जो अगर कामयाब होती है तो कामयाबी आने वाले कुछ बरसों में ही दिखने लगेगी। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात पर गौर करने की जरूरत है ताकि धरती के भीतर बारिश के पानी को वापिस भेजने के लिए एक अलग कोशिश भी हो सके। यह बड़ी सामान्य ज्ञान की बात है कि हिन्दुस्तान में बारिश कुछ दिनों में बहुत अधिक होती है, और नदियों में बाढ़ आ जाती है, और उसका सारा पानी समंदर में चले जाता है। ऐसे में हर इलाके में नदियों तक पहुंचने वाले पानी को जगह-जगह रोककर उससे भूजल की री-चार्जिंग की एक बड़ी कोशिश ऐसी होनी चाहिए जो कि न तो अनिवार्य रूप से इंसान और जानवर की निस्तारी के मकसद से हो, और जो न ही अनिवार्य रूप से मजदूरी जुटाने के मकसद से हो। इन दोनों पैमानों से परे महज धरती के पेट को भरने के लिए, मतलब इंसानों को प्यासे मरने से रोकने के लिए, जगह-जगह बड़े पैमाने पर ऐसे री-चार्जिंग जलाशय बनाने चाहिए जो कि तेज बारिश के वक्त नदियों में बाढ़ लाने वाले पानी को पहले ही रोक सके। 

यह हमारा पसंदीदा विषय है, और इस पर कुछ दिन पहले भी हमने इसी जगह लिखा भी था। अभी राज्य सरकार नालों में पानी रोकने की जो व्यापक कोशिश कर रही है, वह अपनी जगह चलती रहे, लेकिन बड़े पैमाने पर बड़े जलाशय बनाकर बाढ़ की नौबत को रोकने,  पानी के उस तात्कालिक सैलाब को रोकने के लिए प्रदेश भर में बड़ी-बड़ी मशीनों से बड़े-बड़े जलाशय बनाने चाहिए, फिर चाहे वे आबादी से दूर हों, किसी इंसान या जानवर के सीधे काम न आए, जिनसे कोई मजदूर काम न पाए। धरती के पानी को वापिस डालने के लिए एक अलग सोच की जरूरत है, और आज राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में ऐसी कोई योजना दिखाई नहीं पड़ती है। यह काम अधिक लागत के बिना हो सकता है क्योंकि मशीनों से काम सस्ता पड़ता है, और जल्दी हो सकता है। इस बारिश में भी राज्य सरकार चाहे तो प्रदेश के नक्शे में पहले से दर्ज नदियों के कैचमेंट एरिया छांटकर वहां जगह-जगह सरकारी जमीनों पर ऐसे तालाब तुरंत खोदे जा सकते हैं, और इनका फायदा पूरे प्रदेश में जमीनी पानी का स्तर ऊपर आने की शक्ल में दिखने भी लगेगा। यह काम मजदूरी देने के मुकाबले कम लोकप्रिय या कम लुभावना रहेगा, लेकिन नालों के साथ-साथ ऐसे बड़े तालाब भी बनने से ही नदियों की बाढ़ में बर्बादी घटेगी, और वह अतिरिक्त पानी धरती के पेट को फिर भर सकेगा।
-सुनील कुमार


Date : 19-Jun-2019

आज इस वक्त छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार प्रदेश की सबसे व्यापक फैली हुई आनुवांशिक बीमारी सिकल सेल पर एक कार्यक्रम कर रही है जिसमें मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी में प्रदेश की इस गंभीर समस्या को लेकर चर्चा हो रही है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी और पिछड़ा वर्ग में सिकल सेल से प्रभावित लोग लाखों में हैं, और पांच वर्ष की उम्र से कम में मरने वाले बच्चों में से पन्द्रह फीसदी की मौत इसी बीमारी की वजह से होती है। बाद में भी लोग इसकी वजह से जान खोते हैं, या बहुत तकलीफ के साथ कम उम्र जीते हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा देश के कुछ और राज्यों में आदिवासी और ओबीसी तबकों में सिकल सेल का कहर बहुत है, और संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे रोकने के लिए बड़ी फिक्र जाहिर की है। 

लेकिन छत्तीसगढ़ में जो लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं, जो डॉक्टर इसके इलाज की कोशिश करते हैं, और सरकारी क्षेत्र में जिन लोगों पर इससे जूझने की जिम्मेदारी है, उन तमाम लोगों की जानकारी में यह बात अच्छी तरह है कि राजधानी रायपुर के मेडिकल कॉलेज में सिकल सेल पर बड़े पैमाने पर जो उत्कृष्ट शोध चल रहा था, उसके बीच से उस विभाग के मुखिया, उस काम में बरसों से लगातार जुटे हुए डॉक्टर को पिछली भाजपा सरकार ने व्यक्तिगत नापसंदगी के चलते इस कॉलेज से हटाकर बिलासपुर भेज दिया था, और उनके रहते जितनी रिसर्च हुई थी, वह धरी रह गई। वैसे तो सरकार में किसी को भी कहीं भेजा जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि एक थानेदार को दूसरे थाने में भेजने और एक चिकित्सा वैज्ञानिक को उसके शोध केन्द्र से दूर भेज देने में फर्क क्या इस सरकार को समझ आता है? यह काम एक ऐसे वैज्ञानिक-चिकित्सक के साथ किया गया जो कि प्रदेश की इस सबसे बड़ी बीमारी पर शोध कार्य में बहुत आगे पहुंचा हुआ था, और यह तबादला पिछली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में खरीदी के सैकड़ों-हजारों करोड़ के घोटाले में साथ न देने की वजह से किया गया था। आज जब उस घोटाले पर जुर्म दर्ज करके नई सरकार कई किस्म की जांच कर रही है, उस वक्त के घोटालेबाज जमानत पर हैं, या सैकड़ों करोड़ कमाकर पूछताछ की राह देख रहे हैं, तब आज का यह सरकारी जलसा इस हकीकत से पूरी तरह अछूता बना हुआ है कि पिछली सरकार ने किस भ्रष्टाचार में साथ न देने की वजह से ऐसे वैज्ञानिक का तबादला करके पूरे के पूरे शोध कार्य, अध्ययन, और चिकित्सा को गड्ढे में डाल दिया था। 

सरकार को लंबे समय से देखने का हमारा तजुर्बा बताता है कि राज्य में जिन मंत्रियों को चिकित्सा या स्कूल शिक्षा का जिम्मा दिया जाता है, उन्हें और कोई भी विभाग नहीं देना चाहिए क्योंकि ये दो विभाग किसी भी एक इंसान की मानवीय क्षमता, और हर दिन चौबीस घंटे काम करने से अधिक जरूरत वाले हैं। लेकिन भारत, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में विभागों का बंटवारा इस आधार पर होता है कि किस मंत्री के पास कितने हजार करोड़ का सालाना बजट है, और मीडिया में खुलकर इस बात की चर्चा इसी अंदाज में होती है कि मंत्रियों को मानो कितनी कमाई का मौका मिला है। यह नौबत पूरी तरह बदलनी चाहिए। स्वास्थ्य और स्कूल शिक्षा, ये दो विभाग किसी भी मंत्री के लिए पर्याप्त जिम्मेदारी जब तक मानी नहीं जाएगी, तब तक इनको सुधारना मुमकिन नहीं है। ये दोनों विभाग परले दर्जे के भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं, और पिछली सरकार के वक्त ये तबाह हो चुके हैं। इनके मंत्री, और इनके सचिव, दूसरी जिम्मेदारियों से मुक्त रखे जाने चाहिए। दुनिया के किसी भी विकसित देश में इन दोनों विभागों को बजट का बड़ा हिस्सा मिलता है, महत्व सबसे अधिक मिलता है, और अभी एक हफ्ते पहले ही भूटान की खबर आई है कि वहां पर डॉक्टरों और शिक्षकों को वहां के मंत्रिमंडल ने देश में सरकारी वेतन तय करते हुए सबसे ऊंची तनख्वाह वहां के डॉक्टरों, और शिक्षकों को देना तय किया है। 

चूंकि छत्तीसगढ़ की नई सरकार ने पिछली सरकार के वक्त सिकल सेल शोध कार्य को किनारे पटक देने के फैसले पर अब तक कुछ सोचा नहीं है, इसलिए इस बात को हम यहां जोर देकर लिख रहे हैं कि अगर राज्य सरकार के मन में प्रदेश की इस सबसे बड़ी आनुवांशिक बीमारी का भी महत्व अगर नहीं है, तो आज इस वक्त चल रहे सरकारी जलसे का कोई मतलब भी नहीं है। राज्य सरकार को इलाज और प्राथमिक शिक्षा को भ्रष्टाचारमुक्त रखना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही बातें किसी भी सभ्य लोकतंत्र में भविष्य की बुनियाद मानी जाती हैं। भ्रष्टाचार के लिए सरकार के पास बहुत से और विभाग हैं, और उसे वहीं से अपना काम चलाना चाहिए, अगर ईमानदारी असंभव सी है।
-सुनील कुमार


Date : 18-Jun-2019

दो दिन पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेश में प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण, खरीद और बिक्री पर रोक लगा दी है। यह भी फैसला लिया गया अब किसी भी सरकारी कार्यक्रम में प्लास्टिक से बने बर्तनों कप, प्लेट, चम्मच या कटोरी का इस्तेमाल नहीं होगा। यहां तक कि विज्ञापनों में और कैरी बैग के रूप में भी उपयोग नहीं किया जा सकेगा।   व्यापारी,  दुकानदारों को 100 रुपए के स्टांप पेपर पर इसके उपयोग नहीं करने का शपथ पत्र देना होगा। जो भी प्लास्टिक के उत्पाद बनेंगे, उस पर निर्माता का नाम, पंजीकरण नंबर और प्लास्टिक का प्रकार लिखना अनिवार्य होगा। राज्य सरकार इन सबकी जांच और निगरानी के लिए प्रदेश स्तर पर एक समिति का गठन करेगी। यह फैसला प्रदेश में सैकड़ों करोड़ के कारोबार और हजारों लोगों के रोजगार को तो प्रभावित करेगा, लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि इससे इस धरती के बर्बाद होने की रफ्तार कम भी हो सकती है।

आज तो बाकी हिन्दुस्तान की तरह छत्तीसगढ़ में भी हालत यह है कि एक-दो दिनों तक टंगने वाले जन्मदिन, या स्वागत के बैनर, बोर्ड, और होर्डिंग उसके बाद घूरों से होते हुए कचरे में बाकी पूरी जिंदगी के लिए हमेशा के लिए बोझ बन जाते हैं। इसी तरह आज छोटे-बड़े किसी भी कार्यक्रम के बाहर हजारों कप-प्लेट, गिलास का प्लास्टिक का कचरा इक_ा हो जाता है, और जो कि कभी सड़ता नहीं, हजारों, शायद दसियों हजार बरस के लिए वह धरती की छाती पर बोझ बना हुआ पड़े रहता है। लेकिन किसी भी सरकार के लिए यह एक अलोकप्रिय और साहसी फैसला है कि प्रदूषण पर एक साथ इतनी बड़ी और कड़ी कार्रवाई की जा रही है। अगर बाकी देश में इसी तरह कार्रवाई की जाती है तो धरती पर स्थायी प्रदूषण बहुत हद तक घट सकता है।

आज मशीनों से बनने वाले प्लास्टिक के सामान और मशीनों से होने वाली फ्लैक्स की छपाई का नतीजा यह हो गया है कि लोग इनका अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। जो कार्यक्रम कुछ घंटों के रहते हैं, उनका मंच भी फ्लैक्स से सजा दिया जाता है जिसका कोई उपयोग उसके बाद नहीं रहता है। एक समय ऐसा था जब कपड़े पर कलाकार हाथ से ऐसी ही लिखावट और सजावट करते थे, जिससे रोजगार भी मिलता था, और उस कपड़े का दुबारा इस्तेमाल भी हो जाता था। लेकिन मशीनों ने यह पूरा सिलसिला खत्म कर दिया था, और अब मिनटों के भीतर फ्लैक्स पर छपाई होकर पोस्टर और होर्डिंग बना दिए जाते हैं। इसी तरह अब गिलासों को धोकर इस्तेमाल करना, प्लेट को धोकर इस्तेमाल करना, यह सब खत्म हो गया, और अब अमीरों से लेकर धार्मिक कार्यक्रमों तक सब जगह यूज एंड थ्रो सामानों ने जगह बना ली है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल एक बहुत ही बड़ा फैसला है, और अगर इसमें कोई अदालती दखल न आए, सरकार किसी दबाव में अपना फैसला न बदले, तो यह पर्यावरण के हित में एक ऐतिहासिक फैसला रहेगा।
-सुनील कुमार


Date : 17-Jun-2019

नई लोकसभा आज से शुरू हुई तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक किस्म से विपक्ष को हिम्मत बंधाते हुए कहा कि वे संख्या में चाहे कम हों, वे लोगों के मुद्दे तो उठा ही सकते हैं, और उन्होंने विपक्ष से यह उम्मीद और अपील भी की कि वे जनता के हित के मुद्दों पर सरकार का साथ भी दें। अब पिछले आम चुनाव के बाद इस बार के आम चुनाव में भी मोदी से लगातार दूसरी बार हारने के बाद कांग्रेस और बाकी विपक्षी पार्टियां सदमे से उबरने के दौर में दिख रही हैं। आज संसद शुरू हो चुकी है लेकिन एनडीएविरोधी पार्टियों ने अब तक अपनी कोई बैठक नहीं की है, और न ही कांग्रेस अपने संसदीय दल का कोई नेता चुन सकी है। बीच में एक सुगबुगाहट हुई थी कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होने वाले शरद पवार अपनी पार्टी सहित कांग्रेस में वापिस आ सकते हैं, और उससे कांग्रेस को शायद लोकसभा में विपक्षी दल बनने के लिए जरूरी सांसद जुट जाएंगे, लेकिन फिर वह बात भी आई-गई हो गई। 

लोकसभा को देखें, तो विपक्ष के नेता का संसदीय दर्जा कई मायनों में काम का रहता है, और देश के कई संवैधानिक पदों पर, कई नाजुक संस्थानों के मुखिया चुनने के लिए संविधान में विपक्ष के नेता को कमेटी में रखने की शर्त भी है। ऐसी जगहों पर तो कांग्रेस या बाकी विपक्ष का एक नुकसान रह सकता है, लेकिन सदन की रोज की कार्रवाई अगर देखें, तो उसे लेकर किसी को हीनभावना में नहीं आना चाहिए, निराश नहीं होना चाहिए, और हथियार डालकर बैठ नहीं जाना चाहिए। आम चुनाव में मोदी को चुनौती देने वाले राहुल गांधी एक सीट से हारने के बाद भी दूसरी सीट से संसद पहुंच चुके हैं, और उन्हें वहां पर मुद्दे उठाने से लेकर मोदी को गले लगाने तक के कई मौके हासिल रहेंगे। कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस और डीएमके दो ऐसी बड़ी पार्टियां संसद में हैं जिनके सदस्य काफी संख्या में हैं। इसके अलावा देश के तकरीबन हर बड़े प्रदेश से एनडीएविरोधी कोई न कोई सांसद लोकसभा पहुंचे हैं, और दिल्ली जैसे जिस राज्य से कोई गैरभाजपाई सांसद लोकसभा में नहीं है, वहां के मुद्दों को भी दूसरी पार्टियां अखबार और टीवी से भी जान सकती हैं, और उन राज्यों में अपने विधायकों के मार्फत भी उन मुद्दों को लगातार जान सकती हैं जो किसी सांसद के मार्फत पता लगते। 

विपक्ष को यह याद रखने की जरूरत है कि 1984 में लोकसभा में भाजपा के कुल दो सांसद थे, मतलब यह कि देश के नक्शे का अधिकतर हिस्सा तो भाजपा के सांसदों के छूने का भी नहीं था। लेकिन वहां से बढ़ते हुए यह पार्टी पिछली सदी के आखिर में ही संसद में बहुमत का गठबंधन बनाकर केन्द्र सरकार बना चुकी थी। कुल डेढ़ दशक के भीतर बीजेपी ने यह पहाड़ की ऊंची चढ़ाई पूरी की थी। ऐसे में कोई वजह नहीं है कि एनडीए और भाजपा के खिलाफ अगले पांच-दस बरस में कोई ऐसा गठबंधन न बन सके जो कि सत्ता पर आ सके। लेकिन सत्ता से परे भी एक दूसरी बात यह है कि संसदीय लोकतंत्र में सत्ता में आना जितना महत्वपूर्ण होता है, विपक्ष में रहना भी लोकतंत्र के लिहाज से तो उतना ही महत्वपूर्ण रहता है, फिर चाहे विपक्ष में साधन-सुविधा और कमाई उतनी न हो। ऐसे ताजा इतिहास को देखते हुए, और संभावनाओं को देखते हुए, और आज की लोकतांत्रिक-संसदीय जिम्मेदारी को देखते हुए विपक्ष के दलों को, उनके सांसदों को अपनी जिम्मेदारी और अधिक गंभीरता से निभानी चाहिए। विपक्ष की पार्टियों को देखें, तो उनके हारे हुए सांसद भी अपने-अपने इलाकों के मुद्दों, और देश-विदेश के मुद्दों के जानकार रहे हैं, और वे संसद के बाहर से भी अपने सांसदों को मुद्दे दे सकते हैं, उनके लिए लगातार अध्ययन कर सकते हैं। सांसद या विधायक किसी भी पार्टी के व्यापक संगठन का एक हिस्सा ही रहते हैं, उनसे परे भी पार्टी संगठन के और बहुत से हिस्से रहते हैं जो कि संसद के लायक मुद्दों को उठाकर अपने या किसी दूसरे सहयोगी दल के सांसद को दे भी सकते हैं। 

आज जो दल विपक्ष में हैं, उनके ऊपर लोकतंत्र को मजबूत करने की एक बड़ी जिम्मेदारी है, और यह जिम्मेदारी जनता के प्रति है। जनता ने उन्हें सत्ता के लायक नहीं चुना लेकिन संसद में तो चुना है। इसलिए सरकार की गलतियों और गलत कामों पर संसद में आवाज उठाने की एक बड़ी जिम्मेदारी सामने है। और सरकार पर हमले से परे भी यह सोचने-समझने की जरूरत है कि विपक्ष सरकार को एक नई दिशा देने का काम भी कर सकता है। हिन्दुस्तान की इसी लोकसभा में ऐसे बहुत से दिग्गज और महान विपक्षी नेता रहे हैं जिनको सुनने के लिए प्रधानमंत्री सहित पूरी की पूरी सरकार डटी रहती थी, और जिनको सुनने के लिए संसद के दूसरे सदन के सदस्य भी आकर दीर्घा में बैठते थे। ऐसे लोग अपने वक्त और अपनी पार्टी से परे भी देश और दुनिया का ख्याल रखते हुए बड़ी महान सोच सामने रखते थे, जिसकी संभावना आज पूरी की पूरी खत्म नहीं हुई है। आज संसद में अपराधों से जुड़े हुए संभावित-मुजरिम अधिक हैं, लेकिन उनके बीच भी कुछ ऐसे लोग जरूर हैं जो कहने को खड़े होंगे, तो उनकी बात तमाम लोग सुनेंगे। 

संसद इस देश की सबसे बड़ी पंचायत है, और जनता को उतनी उम्मीद, वैसी उम्मीद किसी और से हो भी नहीं सकती। ऐसे में हर सांसद को अधिक तैयारी के साथ सदन के वक्त का एक-एक पल इस्तेमाल करना चाहिए, खासकर विपक्ष के सांसदों को। किसी संसदीय क्षेत्र के मुद्दों को उठाने के लिए वहीं के सांसद का होना जरूरी नहीं है, कोई भी सांसद देश के किसी भी हिस्से की बात उठा सकते हैं। सत्ता पक्ष के पास तो पूरी की पूरी सरकार है जिसके कामकाज से वह अपनी सोच सामने रख सकते हैं, लेकिन विपक्ष के पास तो जनता, देश-प्रदेश, और दुनिया के मुद्दों को उठाने के लिए खासी तैयारी जरूरी है, और विपक्षी पार्टियां चाहे जितनी भी कमजोर क्यों न हो गई हों, वे मेहनत करके संसद सत्र में अपने निर्वाचित सांसदों के मार्फत देश और दुनिया का भला कर ही सकती हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Jun-2019

भारत और पाकिस्तान के बीच अब से कुछ देर में क्रिकेट विश्वकप का मैच शुरू हो जाएगा, और अभी हमारे सामने जो हिंदुस्तानी टीवी चैनल हैं, वे हिंदुस्तान की जीत के लिए एक भावनात्मक उन्माद खड़ा कर रहे हैं, और शायद ऐसा ही कुछ पाकिस्तान में वहां की टीम के लिए हो रहा होगा। कुछ चैनलों पर दोनों देशों के भूतपूर्व खिलाडिय़ों के चेहरे स्क्रीन पर दिख रहे हैं, जो कि दोनों देशों के भूतपूर्व फौजियों के मुकाबले अधिक समझदारी की, कम नफरत की, और कुछ खेल की भी बात कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों सोशल मीडिया पर लगातार कुछ ऐसे मजाकिया वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें पाकिस्तान द्वारा रिहा किए गए भारतीय फौजी पायलट अभिनंदन को लेकर व्यंग्य गढ़ा गया है, और फिर सरहद के दूसरी तरफ से उसका वैसा ही जवाब भी बनाकर पोस्ट किया गया। मजाक से लेकर व्यंग्य तक, और फिर नफरत से लेकर हमलावर तेवरों तक, सोशल मीडिया दोनों तरफ के अलग-अलग मिजाज के अलग-अलग लोगों को देख रहा है, झेल रहा है। और दुनिया का तजुर्बा यही है कि जब भाईयों के बीच दीवार उठती है, तो कुछ अधिक ही ऊंची उठती है। भारत और पाकिस्तान के बीच भी यह हाल दोनों की आजादी के बाद से तकरीबन लगातार बना रहा है, या कि बनाकर रखा गया है। पूरी दुनिया में क्रिकेटप्रेमियों के बीच यह बात बहुत अच्छी तरह जानी और मानी जाती है कि भारत और पाकिस्तान के बीच के क्रिकेट मैच जितनी अधिक दिलचस्पी दुनिया के किसी भी और मैच के लिए कभी नहीं होती। और इन दोनों देशों के बीच खेला गया कोई भी मैच उस टूर्नामेंट के फाइनल मैच की तरह का रोमांचक हो जाता है। 

लेकिन जिनको सरहद पर गोलियों से मोहब्बत न हो, और जो सचमुच ही खेल को चाहते हैं, क्या उन्हेें ऐसे मैच को देखते हुए यह हैरानी नहीं होती होगी कि वे दूसरे देश की टीम के बेहतर खेल की भी तारीफ नहीं कर सकते? खेल दो देशों के बीच तनावतले कुछ ऐसा दब गया है कि एक बेहतरीन गेंद या एक बेहतरीन शॉट की तारीफ मन में भी उठने के पहले यह सोच लेना होता है कि क्या दूसरे देश के खिलाड़ी के काबिले तारीफ खेल पर भी मन में तारीफ उठना अपने देश के साथ गद्दारी होगी? लेकिन इन दोनों देशों के बीच समय-समय पर सरहदी तनाव के चलते, या आतंकी हमलों के चलते एक-दूसरे से क्रिकेट खेलना सरकारों में बंद भी करवाया हुआ है। खेल से इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच रिश्ते अच्छे हो सकते थे, ठीक उसी तरह जिस तरह कला, साहित्य, संगीत के चलते अच्छे हो सकते थे, एक देश से दूसरे देश में सामानों की आवाजाही के चलते अच्छे हो सकते थे, कहीं दरगाह और कहीं मंदिर-गुरुद्वारे में आवाजाही से अच्छे हो सकते थे। लेकिन दोनों मुल्कों की राजधानियों में बैठे नेताओं, अफसरों, और फौजियों के चलते रिश्तों की मोहब्बत मुमकिन नहीं हो पाती है, और फिर आग में घी डालने के लिए सरहद के दोनों तरफ टीवी के समाचार चैनल भी हैं, जिनका धंधा जंग के फतवों से एकदम ही बढ़ जाता है। अभी भी जिन समाचार चैनलों पर हमारी नजर जा रही है, वे अपने देश के लिए फतवे जारी करते हुए मीडिया की अपनी बुनियादी और परंपरागत भूमिका से कोसों दूर चल रहे हैं। इस मैच को देखते हुए भी समझदार लोगों को यह तो याद रखना ही चाहिए कि सरहद के आरपार एक शायर की लिखी गज़ल को दूसरे देश के गायक ने गाकर मशहूर कर दिया, और फिर उस गज़ल का इस्तेमाल दूसरे देश ने बखूबी किसी फिल्म में कर दिया। आम लोगों से लेकर खेल, कला, साहित्य, और संगीत के खास लोगों तक सरहद के दोनों तरफ खूब मोहब्बत है, बस राजधानियां और समाचार चैनल अपने पेट चलाने के लिए इसे तबाह न करें। अब से कुछ मिनटों में शुरू होने वाला यह मैच लोग बेहतर खेल का मजा लेने के लिए देखने की कोशिश करें, उसमें अपने देश के साथ कोई गद्दारी नहीं होगी।
-सुनील कुमार


Date : 15-Jun-2019

पश्चिम बंगाल में तनाव और झगड़े थमने का नाम ही नहीं लेते हैं। कभी ऐसा लगता है कि बात इतनी बड़ी तो नहीं थी, तो ऐसे में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अपने निहायत गैरजरूरी हमलावर तेवरों के सार्वजनिक प्रदर्शन से बनती हुई बात को बिगाडऩे के लिए ओवरटाईम करती दिखती हैं, और नतीजा वैसा ही होता है जैसा कि अभी डॉक्टरों की हड़ताल को लेकर हो रहा है। कोलकाता के सरकारी अस्पताल में एक मरीज के घरवालों ने डॉक्टरों को पीट दिया, और इस पर तुरंत ही डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। इस नौबत को देश भर में कई जगहों पर देखा जाता है, और सरकार गुनहगारों पर तुरंत कड़ी कार्रवाई करके, या डॉक्टरों की हिफाजत का इंतजाम करके मामले को सुलझाने की कोशिश करती है। लेकिन बंगाल में ममता बैनर्जी अस्पताल पहुंची तो वहां भी उनके गुस्सैल मिजाज ने बात को और बिगाड़ दिया, और अब डॉक्टर उनके दफ्तर जाकर बात करने को भी तैयार नहीं हैं, वे उनसे अस्पताल आकर अपनी चेतावनी वापिस लेने की बात कर रहे हैं। सैकड़ों डॉक्टरों ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है, और कोलकाता के समर्थन में बाकी प्रदेश, और बाकी देश के डॉक्टर भी आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन के आज 5वें दिन इसे लेकर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच एक और तनातनी खड़ी हो गई है, और ममता बैनर्जी राज्य के भीतर इस टकराहट को भाजपा की साम्प्रदायिक साजिश का नतीजा करार दे रही है। 

इस ताजा हालात के दो अलग-अलग पहलू हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि सरकारी हो या गैरसरकारी, अस्पतालों में किसी मरीज के इलाज को लेकर शिकायत, नाराजगी, और तोहमत के बाद मरीज के साथ के लोगों की तोडफ़ोड़ और मारपीट बहुत अनोखी बात नहीं है। कई बार ऐसा होता है, और छत्तीसगढ़ में कुछ बरस पहले ऐसे ही तेवरों का हौसला पस्त करने के लिए राज्य सरकार ने एक कानून बनाकर ऐसे हमलावरों के लिए अलग से कड़ी सजा का इंतजाम किया था जो कि आज भी लागू है। यह बात समझ में आती है कि अस्पतालों की कहीं पर लापरवाही भी होती होगी, कहीं पर भ्रष्टाचार भी होगा, कुछ जगहों पर हादसे भी होते होंगे, लेकिन इनमें से किसी भी बात की सजा अस्पताल के गलियारे में हिंसा से नहीं दी जा सकती। अगर बंगाली की राजधानी के सरकारी अस्पताल में ऐसा हुआ, और मुख्यमंत्री ने इसके बाद की हड़ताल में सीधे दखल देना तय किया, तो वे किसी समझौता-वार्ता के लिए एक बेहतर व्यक्ति नहीं हैं। उनका मिजाज ही उन्हें किसी भी समझौता-वार्ता से दूर रखने की सलाह देता है। ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री की मौके पर पहुंचकर सीधी दखल, गुस्से से भरी चेतावनी, हड़ताल के खिलाफ साजिश के आरोप, इन सबसे एक बात साबित होती है कि उनकी सरकार में अधिकारों और जिम्मेदारियों का विकेन्द्रीकरण नहीं है, और वहां पर जो हैं वह वे खुद ही हैं। नतीजा यह है कि अगर वे नाकामयाब हो जाती हैं, तो उसके बाद कुछ बचता नहीं है। यह नौबत किसी प्रदेश या सरकार के लिए अच्छी नहीं है कि अंतिम फैसला लेने वाले को शुरुआती दौर में ही टकराव में हिस्सेदार बना दिया जाए। 

दूसरी बात यह कि डॉक्टरी का काम समाज के दूसरे पेशों से अलग किस्म का है, और पुलिस, फायरब्रिगेड, के अलावा डॉक्टरी ही एक ऐसा काम है जिसके बिना किसी नाजुक मौके पर एक पल भी काम नहीं चल सकता। इसलिए रात-बिरात हर वक्त तनाव में पहुंचने वाले मरीज के साथियों से डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को बचाने का पुख्ता इंतजाम कानून बनाकर, और सुरक्षा व्यवस्था लागू करके किया जाना चाहिए। यह तो ठीक है कि आज सुरक्षा कैमरे लगे होने से बहुत से सुबूत दर्ज हो जाते हैं, लेकिन हिंसा के खतरे के बीच न डॉक्टर काम कर सकते, न अस्पताल के दूसरे कर्मचारी। इसलिए सुरक्षा को अस्पतालों, खासकर सरकारी अस्पतालों, के इंतजाम का एक जरूरी हिस्सा मानकर चलना चाहिए। महंगे निजी अस्पताल तो सुरक्षा कर्मचारियों का इंतजाम कर लेते हैं, लेकिन सरकारी अस्पताल अक्सर बेसहारा साबित होते हैं। पिछले एक दिन में देश भर में डॉक्टरों की हड़ताल के चलते अनगिनत मौतें हुई होंगी जो कि हड़ताल के साथ जुड़कर दर्ज नहीं हुई होंगी। ऐसी नौबत दुबारा आनी नहीं चाहिए, इसके लिए राज्यों के मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के मुकाबले अधिक समझदार साबित हों तो बेहतर होगा। अपने राज्य की अस्पताली हड़ताल के लिए किसी राजनीतिक दल या केन्द्र सरकार पर तोहमत लगाने के बजाय ममता बैनर्जी को अपना घर सुधारना चाहिए जो कि बुरी तरह अराजकता और बदइंतजामी का शिकार दिख रहा है। एक-एक कर बहुत से मामलों में अगर बंगाल में यही हाल बढ़ते चले गया, तो ममता की साख पूरी तरह चौपट हो जाएगी। आज हालत यह है कि बिहार में हर दिन दर्जन के हिसाब से बच्चों की मौत हो रही है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खलनायक की तरह नहीं दिख रहे हैं। दूसरी तरफ देश भर में अस्पतालों में जिसको जो दिक्कत डॉक्टरों की हड़ताल से हो रही है, वे लोग ममता को ही खलनायिका मान रहे हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में कल से आज तक दो अलग-अलग जिलों में दो घटनाएं हुई हैं जिन्हें जोड़कर देखने की जरूरत है, और देखकर फिक्र भी होती है। आज महासमुंद जिले के एक समाचार वेबसाईट वाले पत्रकार को पुलिस ने शांति भंग करने के आरोप में गिरफ्तार किया है, और उस पर आरोप है कि वह बिजली बंद होने को लेकर अपनी वेबसाईट पर जो लिख रहा था उससे लोगों में असंतोष भड़क रहा था। लेकिन दूसरी खबर इससे अधिक फिक्र की है, राजनांदगांव जिले में एक आदमी ने एक वीडियो बनाकर उसे फैलाया जिसमें राज्य सरकार पर उसका आरोप है कि उसने बिजली के इन्वर्टर बनाने वाली एक कंपनी के साथ मिलकर यह साजिश रची है कि बार-बार बिजली बंद की जाएगी ताकि उसके इन्वर्टर की बिक्री बढ़े। इसके बाद इस आदमी को राजद्रोह की धाराओं में गिरफ्तार करने की खबर है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल के कानूनी सलाहकार ने इसे राजद्रोह करार देते हुए थाने में रिपोर्ट लिखाई है, और उस पर यह कार्रवाई हुई है। 

इन दोनों बातों के कई पहलू बहुत बुरी तरह चौंकाने वाले हैं। इस बात में कोई शक नहीं है कि पूरे प्रदेश में जगह-जगह बिजली का इंतजाम गड़बड़ाया हुआ है। हो सकता है कि इसमें कुछ तोहमत कुदरत के हिस्से भी जाए कि आंधी-तूफान से तार और खंभे गिरे हैं, कुछ जगहों पर असामान्य गर्मी की वजह से ट्रांसफार्मर भी गड़बड़ाए हैं, लेकिन कुल मिलाकर जनता को बिजली की दिक्कत हो रही है, इसे अनदेखा करना खुद राज्य सरकार के लिए अच्छा नहीं होगा। लोगों का यह भी मानना है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को विधानसभा चुनाव के मुकाबले जो बड़ा नुकसान हुआ है, उसके पीछे लोगों की बिजली की दिक्कत भी कई वजहों में से एक वजह रही है। अभी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरगुजा विकास प्राधिकरण की बैठक में बिजली की शिकायतों को लेकर आधा दर्जन बिजली इंजीनियरों को निलंबित भी किया था, और उससे भी जाहिर है कि बिजली का मामला गड़बड़ तो है ही। 

ऐसी हालत में अगर जनता के बीच से कोई सरकार पर भ्रष्टाचार करके किसी साजिश के तहत बिजली गुल करने का आरोप भी लगा रहा है, तो उस पर कार्रवाई के लिए कुछ दूसरे साधारण कानून हो सकते हैं, और हमारे हिसाब से तो ऐसे कानूनों से भी कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता तकलीफ के बीच अगर सरकार पर कोई आरोप लगाती है, तो सरकार में बर्दाश्त रहना चाहिए। ऐसे में जिस किसी की समझ से इस आदमी पर राजद्रोह के तहत जुर्म दर्ज करने की खबर है, वह समझ कानूनी रूप से कुछ कमजोर जान पड़ती है। राजद्रोह का अंग्रेजों का कानून हिन्दुस्तानी जनता को कुचलने के लिए बनाया गया था। राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि कांग्रेस सरकार में रहेगी तो राजद्रोह का कानून खत्म करेगी। राजनांदगांव में जिस दफा के तहत यह जुर्म दर्ज किया गया है, ठीक उसी दफा का जिक्र कांग्रेस के घोषणापत्र में था। और अभी चार दिन भी नहीं हुए हैं सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्वीट पर एक पत्रकार की गिरफ्तारी को लेकर योगी सरकार को जमकर फटकार लगाई थी, हालांकि जजों का कहना था कि उन्हें वह ट्वीट अच्छा नहीं लगा था, लेकिन अभिव्यक्ति का जवाब गिरफ्तारी नहीं हो सकती। 

ऐसे में भूपेश सरकार की इन दो जिलों की यह कार्रवाई चाहे जिस स्तर के अधिकारियों ने की हो, इन्हें तुरंत सुधारना चाहिए। अगर सरकार यह मानेगी कि बिजली की गड़बड़ी की खबरों को पोस्ट करना, या सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना जुर्म है, तो सरकार बिजली ठीक रखने की अपनी जिम्मेदारी से बचने का काम करेगी। लोकतंत्र में जनता की तरफ से आने वाली जायज, और नाजायज आलोचना भी, एक सबक और चेतावनी के रूप में लेनी चाहिए। राज्य सरकार को हमारी सलाह है कि अपने अधिकारियों पर काबू करे, और ऐसी कार्रवाई न करे जो कि न सिर्फ पूरी तरह अलोकतांत्रिक हैं, बल्कि जो अदालत में राज्य सरकार को शर्मिंदगी भी दिलाने वाली साबित होंगी। खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पिछले बरसों में विपक्ष के नेता के रूप में राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार के बहुत से आरोप लगाते आए हैं, और सरकारी इंतजाम के नाकाम रहने पर भी उन्होंने लगातार हमला बोला है। उनकी ऐसी सक्रियता ने ही उन्हें राज्य की सत्ता में आने का मौका दिया। इस ताजा-ताजा तजुर्बे को भूलकर जनअसंतोष पर ऐसी कड़ी कार्रवाई बिल्कुल ही नाजायज है, और मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से यह सिलसिला खत्म करना चाहिए, वरना अदालत में तो यह खत्म हो ही जाएगा। 
-सुनील कुमार