विचार / लेख

Date : 29-Feb-2020

अंधेरे में रौशनी की कई कहानियां भी-1

कृष्णकांत

भजनपुरा की एक गली में जियाउद्दीन भाग रहे थे। दंगाइयों की पागल हो चुकी टोली उन्हें खदेड़े हुए थी। वे भागते-भागते गिर पड़ते हैं और दंगाइयों के हाथ आ जाते हैं।  दंगाई उन्हें पीटने लगते हैं। यह मंजर जिस गली में था, उसी गली में जिन्दर सिंह सिद्धू का घर है। यह सिद्धूजी के घर के सामने हो रहा था। सिद्धू घर से निकलते हैं और दंगाइयों को खदेड़ कर जियाउद्दीन को बचा कर घर में ले जाते हैं।
सुनील, विकास और जैन साब ने सिद्धू का साथ दिया। उन्होंने कई लोगों को बचाया है लेकिन वे नहीं चाहते कि इसका प्रचार हो। रवीश बता रहे हैं कि बहुत कहने पर उन लोगों ने बात तो की लेकिन फोटो दिखाने की इजाजत नहीं दी। इस घटना के बारे में मोहम्मद अदनान ने रवीश को बताया और उन्होंने ही नम्बर दिया। आम जनता मम्मी का पैर छूती है तो फोटो नहीं खिंचवाती। वह फर्ज मानकर उसे निभाए चली जाती है।
सिद्धूजी ने जिया को 3 घंटे अपने घर मे रखा, पानी पिलाया, भरोसा दिया फिर अपनी पगड़ी उतार कर जिया को पहना दी। जिया को मूंछें नहीं थीं सो सरदार जैसे नहीं लग रहे थे तो चेहरे पर भी पगड़ी लपेट दी और उनको हेलमेट पहनाया। फिर सुनील और सोनू ने जियाउद्दीन को बाइक के बीच बिठाया और रात के अंधेरे में उनके घर छोड़ आए। रवीश कह रहे हैं कि जो सरदार अपनी पगड़ी के लिए जान दे देता है, वही सरदार अपनी पगड़ी उतार कर किसी की जान बचा लेता है।
एक चचा बहराइच से दिल्ली आए थे। दो छोटे बच्चों के साथ वे घर से निकले तो बाहर बवाल हो रहा था। वे रास्ता भटक गए। दंगा देखकर काफी घबरा गए क्योंकि साथ में दो बच्चे थे। उन्हें डर था कि हिंदू भीड़ उन्हें मिल गई तो जाने क्या अनहोनी हो! भटकते हुए उन्हें कुछ हिंदू लड़के मिल भी गए। पूछा, कहां जाना है। चचा बोले, बहराइच जाना है, रास्ता भटक गया हूं। लड़कों ने कहा, चलो छोड़कर आते हैं।
चचा ने बताया है, यहीं भजनपुरा में भटक गया था, कई लोगों ने मिलकर मेरी मदद की है, मेरे साथ बच्चे भी थे, मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। इन्होंने मुझे इज्जत भी दी और साथ भी दिया।
कुछ जहरीले प्राणी अशोक नगर की एक मस्जिद जलाने पहुंचे थे। मस्जिद से सटे मुसलमानों के करीब 10 घर भी थे। दंगाई हिंदू बनकर आए थे। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि उनके साथ क्या होने वाला है। इन जानवरों को हिंदुओं ने ही दौड़ा लिया। हालत नाजुक देख हिंदुओं ने मुसलमानों को अपने घर बुला लिया। न मस्जिद जली, न घर जला, न लोग जले। नफरत के ध्वजवाहक दो चार चेहरों से नजर हटाइए, मैं आपको हिंदुस्तान दिखाऊंगा।

अंधेरे में रौशनी की कई कहानियां भी-2

अपने पड़ोसी को बचाने के लिए प्रेमकांत का शरीर तो झुलस गया, लेकिन उनके झुलसे बदन ने दिल्ली के तमाम लोगों के लिए मरहम का काम किया। अब लोग इस फरिश्ते से मिलने के लिए लाइन लगा रहे हैं। उनकी मदद के लिए तमाम लोग आगे आए हैं। प्रेमकांत खुश हैं कि हमारे इलाके में कभी दो समुदायों में आपसी झगड़ा नहीं रहा। मैं झुलस गया लेकिन लोगों का प्यार देखकर मैं कह सकता हूं कि मुझे अपने झुलसने का कोई गम नहीं है।
ऐसा करने वाले प्रेमकांत अकेले नहीं थे। जाफराबाद के एक मोहल्ले पर दंगाइयों ने तीन बार हमले का प्रयास किया। लेकिन मोहल्ले के हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर तय कर लिया था कि न हम आपस मे लड़ेंगे और न बलवाइयों को मोहल्ले में घुसने देंगे। हर बार दंगाइयों को खदेड़ दिया गया।
घोंडा इलाके में दंगा हो रहा था। एक हिंदू मोहल्ले में तीन मुसलमान परिवार थे। परिवार डरा हुआ था। मोहल्ले के हिन्दू सुरक्षा कवच बनकर खड़े हो गए। तीनों घरों के लोगों से कहा कि तुम्हें घर के बाहर नहीं निकलना है। जिस भी चीज की जरूरत हुई, मोहल्ले वालों ने उन्हें पहुंचाया। तीनों परिवार खुश हैं कि हमारा मोहल्ला इन दंगाई राक्षसों के लिए मिसाल है।
जिन इलाकों में परसों तक श्मशान का सन्नाटा था, कल गुरुद्वारा कमेटी ने वहां-वहां पहुंच कर लंगर लगाए। लोग आना शुरू हुए और इस तरह आवाजाही शुरू हुई। आधा दर्जन से ज्यादा इलाकों में कमेटी ने लंगर सेवा पहुंचाई है। लोगों ने कहा, साब दो दिन बाद रोटी मिली है।
जिन इलाकों में दंगा हुआ वह दिल्ली का सबसे भीड़भाड़ वाले इलाका है। वहां की आबादी लाखों में है। सबने एक-दूसरे को बचाया है। हम इन 38 मौतों पर सिर्फ आंसू बहा सकते हैं, लेकिन उजड़े परिवारों के साथ देश को ये उम्मीद दे सकते हैं कि हमारे भीतर इंसानियत जिंदा है।
मौतों के बाद हिंदू मर्द और मुस्लिम महिला को तो एक-दूसरे के सहारे रोना पड़ा है। आम जनता किसी से मोहब्बत करे न करे, लेकिन नफरत भी नहीं करती। आम आदमी किसी अजनबी को भी रोते देखकर आंसू पोंछ देता है। मोहल्ले के आदमी तो फिर भी अपना है।
इसके उलट सरकार का रवैया देखिए। वे क्या कर रहे हैं? वे दंगाइयों को पकडऩे की जगह दोषियों में हिन्दू मुसलमान खोज रहे हैं। कार्रवाई किसी पर नहीं हो रही है। कल दिन भर सिर्फ माहौल बनाया गया है और चैनलों ने दिन भर आग का छिड़काव किया है।
अपने देश से, अपने लोगों से अपील कीजिए कि विभाजन की चिंगारी सुलगाने वाली इस सियासत को जले हुए घरों की राख में ही हमेशा के लिए दफना दें। उजड़े घरों और लाशों के ढेर पर नंगा नाच रही इस सियासत को दफना दीजिए, वरना आपकी पीढिय़ों को भुगतना पड़ेगा।

अंधेरे में रौशनी की कई कहानियां भी-3
आप वारिस पठान जैसे सिरफिरे को तो जानते हैं, लेकिन शकील अहमद को नहीं जानते जो एक मंदिर बचाने के लिए 72 घंटे तक नहीं सो पाए। वही शकील जिन्होंने एक मोहल्ले का भरोसा नहीं मरने दिया। जब तमाम वहशियों की भीड़ शिव विहार को जला रही थी, तब उसी शिव विहार एक शख्स था शकील अहमद जो इस आग पर पानी डाल रहा था। चमन पार्क के पास एक शिव मंदिर है। वहीं पर एक मस्जिद भी है। हथियारबंद उपद्रवी मस्जिद की तरफ बढ़ रहे थे। शकील अहमद उन्हें देखकर घबराए नहीं। उन्होंने स्थानीय लोगों को इक_ा किया। आधे लोगों को मोर्चा लेने मस्जिद की तरफ भेजा, आधे लोगों लेकर मंदिर की तरफ रुक गए। मंदिर पर उपद्रवियों ने हमला किया। लेकिन शकील और उनके मोहल्लावासियों ने मिलकर सभी को भगा दिया। भीड़ ने वहां मौजूद घरों पर भी हमला करने की कोशिश की लेकिन शकील और उनके साथियों ने सभी को खदेड़ दिया। मोहल्ले में कुछ छोटे-छोटे देव स्थान भी हैं, उनको भी बचाया गया।
शकील गर्व से बता रहे हैं कि हम लोगों ने उपद्रिवों को न मंदिर पर हमला करने दिया, न ही मस्जिद पर हमला करने दिया। मुस्लिम बहुल मोहल्ले में अगर एक मंदिर तोड़ दिया जाता तो यह हमारे लिए शर्म की बात होती। हमने उनको मोहल्ले में घुसने तक नहीं दिया। मोहल्ले के रामसेवक ने बताया है कि मैं यहां 35 साल से रह रहा हूं। इस इलाके में सिर्फ एक या दो ही हिंदू परिवार रहते हैं, लेकिन हमें कभी किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। हिंसा के समय मेरे मुस्लिम भाइयों ने मुझसे कहा कि अंकल जी, आप आराम से सो जाइए। आपको कोई नुकसान नहीं होगा।
रामसेवक से किसी ने पूछा कि क्या आप यहां से कहीं और रहने जाएंगे? रामसेवक ने कहा, हम कहीं नहीं जा रहे। हम अपने पड़ोसियों के बीच सुरक्षित हैं। जिसका परिवार उजड़ गया, उसे हम वापस नहीं बसा सकते। लेकिन जिन गलियों में श्मशान सा सन्नाटा है, जिन गलियों में 42 लाशें मिली हैं, उन्हीं गलियों में से 42 हजार उम्मीदें भी निकल रही हैं। ये उम्मीदें हमारा आपका भरोसा जगाएंगी। जिन सियासी वहशियों के बारे में आप रोज बहस करते हैं, जिनका समर्थन विरोध करते हैं, जिनके लिए मरने-मारने को तैयार हैं, वह बंद कर दीजिए। शकील अहमदों और प्रेमकांतों के साथ रहना शुरू कर दीजिए। 
क्या आपको भी दाढ़ी और टोपी देखकर पेट में मरोड़ उठता है? अगर हां तो आपको यह पोस्ट पढऩे के बाद किसी कुशल मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए। आपके दिमाग में जहर भर गया है और आप पागल होने के बेहद करीब हैं।

अंधेरे में रौशनी की कई कहानियां भी-4
दिल्ली का जाकिर नगर। यहां एक शिव मंदिर है। चारों तरफ खून-खराबा मच गया। मंदिर के पुजारी हैं पंडित राकेश शास्त्री। शास्त्री को लगा कि मंदिर पर हमला हो सकता है। वे डर के मारे वहां से जाने की तैयारी करने लगे। लेकिन आसपास के मुसलमानों को भनक लग गई कि पुजारीजी पलायन करने वाले हैं। वे परिवार पुजारी के पास पहुंचे और बोले, ऐसे कैसे चले जाओगे। कोई आएगा तो पहले हमें मारेगा। जब हम मर जाएं तब जान बचाकर भाग जाना। जब तक हम जिंदा हैं तब तक साथ रहेंगे। शास्त्रीजी कह रहे हैं कि जावेद भैया आए और बोले कि तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है। कोई गोली चलाएगा तो सबसे पहले मेरे सीने पर चलाएगा।
वे कौन दैत्य हैं जो पंडित राकेश शास्त्री से उनके जावेद भैया को छीनना चाहते हैं? वे कौन मानवता के दुश्मन हैं जो शास्त्रीजी से कहते हैं जावेद से घृणा करो? उन्हें पहचान लो। वे तुम्हारे बच्चों के, इस देश और हम सबके भविष्य के दुश्मन हैं।
दिल्ली का चांद बाग। सबसे प्रभावित इलाकों में है। यहां पर एक दुर्गा मंदिर है। पुजारी ओमप्रकाशजी बेहद बुजुर्ग हैं। हिंसा की खबरें सुनकर वे जाने लगे तो उन्हें मुसलमानों ने रोक लिया।  पुजारीजी अपनी लरजती आवाज में बता रहे हैं, हम यहां से छोड़कर जा रहे थे तो मुसलमानों ने कहा कि बाबा आप हमारे हैं, हम आपके हैं। आपको कोई कुछ क्यों कहेगा? आप तो पुजारी हैं। हाथ मिलाने लगे। किसी ने यहां एक कंकड़ी भी नहीं फेंका। फाहीना बता रही हैं कि भीड़ का मकसद था कि मंदिर पर हमला किया जाए ताकि गलत संदेश जाए। यहां के मुसलमान मानव श्रृंखला बनाकर खड़े हो गए। कई लड़कों को चोट लगी लेकिन मानव श्रृंखला तोडऩे नहीं दी गई। वह कौन है जो फाहीना से कह रहा है कि ओमप्रकाश से घृणा करो। उस मानवता के दुश्मन को पहचान लो।
नफरत का यह धंधा बहुत पुराना है, लेकिन बार-बार हार जाता है। इससे गांधी, गफ्फार और मौलाना आजाद की तरह निपटो। आप जानते हैं कि यह नफरत बार बार हारती क्यों है? क्योंकि नफरत इंसान का मूल स्वभाव नहीं है। जनता यह नहीं जानती कि वह इसे हरा रही है, लेकिन अपनी इंसानियत से वह इसे हरा देती है। मेरे पास कहने के लिए सिर्फ यही इतनी बात है कि यह नफरत का कारोबार सियासी है। दंगे के बाद सियासी और प्रशासनिक कार्रवाई देख लीजिए। आपको मेरी बात पर यकीन हो जाएगा।


Date : 29-Feb-2020

मुकदमे की इजाजत में देर क्यों?

संजय कुमार सिंह
देश में जब जज लोया की हत्या का आरोप है, हत्या की जांच रोकने के उपायों की जानकारी है, खास तरह के फैसले देने वाले जजों के तबादले के आरोप हैं और ऐसा ही एक फैसला तथा तबादला हाल ही हुआ है तो कन्हैया मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति देने का दिल्ली सरकार का फैसला निश्चित रूप से शर्मनाक है। घुटने टेकने जैसा लग रहा है। पहले लग रहा था कि किन्हीं कारणों से दिल्ली सरकार ने दिल्ली पुलिस को मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी। 
अब दिल्ली चुनाव जीतने या भाजपा को हराने के बाद दिल्ली के दंगों में जनता की रक्षा कर पाने में बुरी तरह असफल रहने वाली आम आदमी पार्टी द्वारा इस महत्वपूर्ण मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति देना निश्चित रूप से राजनीति है और बेहद शर्मनाक है। न्याय होना ही नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए।  आम आदमी पार्टी इसे सुनिश्चित करने के लिए क्या कर रही है? और उसे ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए। क्या इस एक कार्रवाई के बाद आम आदमी को भी दूसरे दलों की तरह राजनीतिक दल न मान लिया जाए? 
आदर्शवाद और तर्क के लिहाज से यह ठीक है कि मामला चले या नहीं - इसे तय करने का काम अदालत का है। सरकार को इसमें नहीं पडऩा चाहिए। लेकिन यह तो पुरानी बात है। यह ख्याल अब आया होगा मानने लायक नहीं है। इसलिए, फैसला अदालत में ही होना था तो मुकदमा चलाने की अनुमति देने में एक साल से भी ज्यादा का समय नहीं लगना चाहिए था। यह सही है कि चार्जशीट तीन साल में दायर हुई थी। 
मुझे अनुमति नहीं देने के कई कारण समझ में आते हैं, अनुमति देने के कारण पार्टी ने बताए हैं पर देरी का कारण कौन बताएगा? मुकदमा चलाने की अनुमति देने या नहीं देने का काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था। मैं और मेरे जैसे बहुत लोग समझ रहे हैं कि पार्टी ने अनुमति नहीं देने का फैसला कर लिया है। लेकिन अब पता चला कि पार्टी इस मुद्दे पर राजनीति कर रही थी। आम आदमी पार्टी ने अनुमति नहीं देकर उसका राजनीतिक लाभ लिया (अमित शाह ने भी लिया पर वह नई बात नहीं है)। अब अनुमति देकर फिर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश हो रही है। 
न्याय देने या होने में देरी अदालतों के कारण होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालतें ही जिम्मेदार होती हैं। दलअसल देरी का कारण व्यवस्था है और यह व्यवस्था इसलिए है कि दोषी भले छूट जाए पर निर्दोष को सजा नहीं हो। 
अभी स्थिति यह है कि दोषी को सजा हो या न हो कितने ही निर्दोष को मुकदमों को फंसा कर मुकदमा लडऩे और पैसे खर्च करने की सजा दे दी जाती है। प्रभावशाली लोगों के खिलाफ यौनशोषण का मामला हनीट्रैप का मामला बन जाता है। ऐसे में आम आदमी का साथ कौन देगा? वही जो चुनाव जीतकर पलट जाते हैं? कई निर्दोष वर्षों जेल भी हो आए। कइयों की बदनामी हुई है और उन्हें परेशानी उठानी पड़ी है। देश की आम राजनीति और राजनेता इस मुद्दे पर चुप है लेकिन अब लग रहा है कि अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और उनकी सरकार भी मुकदमे में देरी और मुकदमा चलाने के अधिकार का उपयोग सजा देने के मौके के रूप में कर रही है। आम आदमी पार्टी से यह अपेक्षा नहीं है कि वह भी बहती गंगा में हाथ धोने लगे।  अनुमति नहीं देने का तो मतलब और कारण समझा जा सकता है पर देरी का कारण जरूर बताया जाना चाहिए। 
बहुत सारे लोग आम आदमी पार्टी को भी किसी अन्य राजनीतिक दल की तरह मानने लगे हैं। इसके लिए उनके पास अपने कारण हैं। मेरा मानना है कि राजनीति करनी है तो राजनीति के नियमों से ही होगी। इसलिए कुछ छूट मिलनी चाहिए और दी जानी चाहिए। अचानक आदर्श स्थिति नहीं बहाल की जा सकती है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप भी पूरी तरह वही करने लगे। कुछ मामलों में स्टैंड साफ होना चाहिए। इस मामले में भी मुझे आप का स्टैंड साफ लग रहा था। अब उसके तर्कों से भी मैं सहमत हूं। पर दोनों को नहीं स्वीकार कर सकता। इसलिए जरूरी है कि देरी का संतोषजनक कारण बताया जाए। मौजूदा स्थिति में इस बात में कोई डर नहीं है कि राजनीति में भाजपा के खिलाफ वही टिक पाएगा जिसके हाथ साफ हों। इस स्थिति से बचने के लिए अपने हाथ भी गंदे न किए जाएं, ऐसे लोगों को लाया जाए, आगे बढ़ाया जाए जिसके हाथ साफ हैं।
(मीडियादरबारडॉटकॉम)


Date : 28-Feb-2020

पंकज चतुर्वेदी

दिल्ली में हुई हिंसा के बीच चांदबाग के मुस्लिम बहुल इलाके में रहने वाली एक हिन्दू लडक़ी का परिवार शादी रद्द करने के लिए मजबूर था। मगर मुस्लिम पड़़ोसियों की मदद से किसी तरह तय समय पर ही शादी हुई। हाथों में मेंहदी और शादी के जोड़े से सजी 23 वर्षीय सावित्री प्रसाद ने कहा कि वह अपने घर में रो रही थी क्योंकि शादी वाले दिन यानी मंगलवार को बाहर हिंसक भीड़ बवाल काट रही थी। मगर सावित्री प्रसाद के पिता ने उसी दिन शादी का आयोजन किया। उन्होंने कहा कि उनके मुस्लिम पड़ोसी उनके साथ थे और उनकी उपस्थिति से उन्हें सुकून मिला।
जब समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने शादी के दिन सावित्री के घर का दौरा किया तो बातचीत में दुल्हन सावित्री ने बताया, आज मेरे मुस्लिम भाई हमारी रक्षा कर रहे हैं। इस दौरान वह रोने भी लगती हैं। फिर परिवार और पड़ोसियों ने उन्हें सांत्वना दी।
चांदबाग जिले के संकरी गली में एक छोटे से मकान में सावित्री की शादी की सारी रस्में पूरी हुईं। यह शादी जहां हुई, वहां से कुछ कदम की दूरी का सारा इलाका युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो गया था। सडक़ों पर कार और दुकानों को तोड़ा जा रहा था, आगें लगाई जा रही थीं। दोतरफा पत्थरबाजी हो रही थी। सोमवार और मंगलवार की हिंसा को देखने के बाद सावित्री प्रसाद के पिता भोदय प्रसाद ने कहा कि हम छत पर गए और देखा कि चारों तरफ धुआं ही धुआं फैला है। यह सच में भयानक था। हम शांति चाहते हैं। उन्होंने आगे कहा कि वह वर्षों से इस इलाके में मुसलमानों के साथ बिना किसी परेशानी के रहते हैं। उन्होंने कहा, हम नहीं जानते कि हिंसा के पीछे कौन लोग हैं, लेकिन वे मेरे पड़ोसी नहीं हैं। यहां हिंदू और मुसलमानों के बीच कोई दुश्मनी नहीं है।'
दुल्हन सावित्री ने कहा कि घर के बाहर दंगा जारी था। मगर इस उम्मीद में कि कल शायद बेहतर माहौल हो जाएगा, मैंने मेंहदी लगवाई। हालांकि, इस दौरान दुल्हन के पिता ने दूल्हे और उसके परिवार को कहा कि यहां आना खतरे से भरा है।
लेकिन इस परिवार के लिए पड़ोस के मुस्लिम परिवार सुरक्षा की ढाल बने रहे और अपनी उपस्थिति में शादी को संपन्न करवाया। पड़ोस के कई मुस्लिम परिवार शादी के दौरान डटे रहे और उन्होंने दूल्हे-दुल्हन को आशीर्वाद भी दिया। जब घर के भीतर शादी हो रही थी, बाहर मुस्लिम पड़ोसी पहरेदारी कर रहे थे। 
शादी संपन्न होने के बाद सावित्री और उनके पति गुलशन और उसके परिवार को पड़ोसियों द्वारा गलियों से सुरक्षित बाहर निकाला गया। सावित्री के पिता ने कहा कि आज मेरी बेटी की शादी में कोई भी रिश्तेदार शामिल नहीं हुए। मगर मेरे मुस्लि भाई लोग शामिल हुए। वे हमारे परिवार की तरह हैं।


Date : 28-Feb-2020

राम यादव
स्विट्जऱलैंड के दावोस शहर में हर वर्ष जनवरी में होने वाला ‘विश्व आर्थिक फ़ोरम’ दुनिया भर के राजनेताओं और अर्थशास्त्रियों का सबसे बड़ा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन कहा जा सकता है। यही ख्याति जर्मनी के म्युनिक नगर में 1963 से हर वर्ष फऱवरी में होने वाले अनौपचारिक विश्व सुरक्षा सम्मेलन की भी है। 14 से 16 फ़वरी तक चले इस बार के 56वें सम्मेलन में 35 देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री, कऱीब सौ रक्षा, विदेश या अन्य मंत्री तथा साढ़े तीन सौ अन्य विशिष्ट जनों ने भाग लिया। भारत के विदेशमंत्री एस जयशंकर भी म्यूनिक में थे। उन्होंने पश्चिमी जगत के साथ बहुपक्षीय सहयोग के विषय पर अपने विचार व्यक्त किये।
अमरीकी नेतृत्व वाला ‘उत्तर एटलांटिक संधि संगठन’ यानी नाटो, यूरोप और अमेरिका के बीच बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित एक ऐसा ही सुरक्षा-गठबंधन है। उसके 29 सदस्य देशों में से 27 यूरोपीय देश अब तक यह मान कर निश्चिंत रहा करते थे कि जब तक अमेरिका है, तब तक कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ये यूरोपीय देश सपने में भी नहीं सोच रहे थे कि अमेरिका में कभी कोई ऐसा राष्ट्रपति भी आ सकता है, जो नाटो की छत्रछाया तले पूर्णरूपेण सुरक्षित होने के सुनहरे सपनों वाली मीठी नींद हराम कर देगा। अमेरिका में जब से डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति बने हैं, उसके यूरोपीय मित्रों की रातें करवटें बदलते बीत रही हैं। अमेरिका के सबसे प्रखर प्रशंसक रहे जर्मन नेताओं की नींद कुछ अधिक ही हराम हो गयी दिखती है।
यही कारण है कि म्युनिक के सम्मेलन में इस बार वैश्विक सुरक्षा से अधिक यूरोप वालों की अपनी सुरक्षा-चिंतांए अपूर्व प्रमुखता से छायी रहीं। इन चिंताओं का उद्घोष जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर ने सम्मेलन के अपने उद्घाटन भाषण के साथ ही कर दिया। अमेरिका की अप्रत्याशित रूप से खुलकर आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, ‘’हमारे सबसे घनिष्ठ साथी अमेरिका की इस समय की सरकार अंतरराष्ट्रीय सामुदायिकता के विचार को खुद ही ठोकरें मार रही है।’’ इसके कुछ उदाहरण देते हुए जर्मन राष्ट्रपति ने ईरान के साथ हुए बहुपक्षीय परमाणु समझौते को अमेरिका द्वारा रद्द घोषित कर देने और विश्व व्यापार संगठन ‘डब्ल्यूटीओ’ के विवाद निपटाने वाले पंचाट के लिए अपना कोई जज न भेज कर उसे पंगु बना देने जैसे क़दमों का उल्लेख किया।
राष्ट्रपति बनने से पहले जर्मनी के विदेश मंत्री रहे फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर को, अमेरिका का वर्तमान डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन, अब एकीकृत और शक्तिशाली यूरोप का विरोधी नजऱ आता है। उन्हें लगता है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच एक गहरी दरार पड़ गयी है। उससे पैदा हो रही असुरक्षा के लिए उन्होंने एक बिल्कुल नया शब्द भी गढ़ लिया है –– ‘वेस्टलेसनेस।’ अंग्रेज़ी के ‘रेस्टलेसनेस’ शब्द की तजऱ् पर गढ़े गये इस नये कृत्रिम शब्द का प्रयोग उन्होंने इस अभिप्राय से ‘पश्चिम के विलोपीकरण’ के अर्थ में किया है कि पश्चिमी जगत की साख अब विलुप्त होने की हद तक क्षीण हो रही है।
जर्मनी में भी अलिखित नियम यही रहा है कि देश के राष्ट्रपति राजनीतिक भाषणबाज़ी नहीं करते। विदेश नीति के मामले में तो बिल्कुल नहीं। पर कुछ ही समय पहले तक जर्मनी के विदेशमंत्री रहे और तब इस तरह की भाषा से परहेज़ करने वाले फ्रांक-वाल्टर श्टाइनमायर ने म्युनिक में अमेरिका को आड़े हाथों लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अमेरिका पर उन्होंने आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से लगातार मुंह मोड़ते हुए वह ‘’वैश्विक राजनीति को अधिकाधिक विध्वंसकारी गतिशीलता प्रदान कर रहा है।।। एक शांतिपूर्ण विश्व के निर्माण के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने वाले अपने लक्ष्य से हम वर्ष-प्रतिवर्ष दूर हटते जा रहे हैं।’’
जर्मन राष्ट्रपति ने अपने भाषण में रूस और चीन को भी नहीं बख़्शा। रूस के बारे में उन्होंने कहा कि उसने ‘’सैन्य बल प्रयोग द्वारा सीमाएं ज़बर्दस्ती खिसकाने-सरकाने को एक बार फिर अपनी राजनीति का हथकंडा बना दिया है।’’ उनका इशारा यूक्रेन की तरफ़ था। वहां रूसी-भाषियों के बहुमत वाले रूस से सटे दोनबास को यूक्रेन से अलग करने के लिए सशस्त्र संघर्ष चल रहा है। इसी प्रकार चीन के बारे में जर्मन राष्ट्रपति ने कहा कि उसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून की याद ‘’चुन-चुन कर केवल तब आती है, जब इससे उसे अपना हितसाधन होता दिखता है।’’
श्टाइनमायर का मानना है दुनिया में हर तरफ़ राष्ट्रवाद भले ही बढ़ रहा है, जर्मनी का राष्ट्रीय हित इसी में है कि वह अपने राष्ट्रवाद को यूरोप के हित में समाहित कर दे और यूरोप को ही अपनी विदेश नीति का केंद्रबिदु बनाये। उनके शब्दों में, ‘’दुनिया में टिके रहने के लिए यूरोप ही जर्मनी का मुख्य सहारा है।’’ जर्मनी का ही अब यह भी कर्तव्य है कि वह यूरोप को एकजुट रखे। यूरोप महाद्वीप के देशों को एकसूत्र में पिरोने वाला यूरोपीय संघ यदि बना रहता है और साथ ही यदि अधिक शक्तिशाली भी बनता है, तो यह जर्मनी के ही व्यापक हित में होगा।
जर्मनी के राष्ट्रपतिने एक तरफ़ तो अमेरिका को खरी-खोटी सुनाई, दूसरी तरफ़ उसकी इस मांग का समर्थन भी किया कि नाटो के सदस्य यूरोपीय देशों को अपने रक्षा-बजट बढ़ाने चाहियें। अमेरिका चाहता है कि नाटो के सदस्य देश अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम दो प्रतिशत अपनी सेनाओं को आवंटित करें। 2014 के नाटो शिखर सम्मेलन में यही तय भी हुआ था। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी नाटो के यूरोपीय देशों को इसकी याद दिलाया करते थे।
जर्मनी ने 2019 के अपने रक्षा-बजट के लिए अपनी जीडीपी का केवल 1।38 प्रतिशत ही ख़र्च किया है। 2024 तक वह इस अनुपात को 1।5 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहता है। दो प्रतिशत वाले लक्ष्य पर 2031 से पहले पहुंच पाना संभव नहीं माना जाता। जर्मन राष्ट्रपति का कहना था कि अपना रक्षा-बजट बढ़ा कर जर्मनी नाटो के यूरोपीय स्तंभ को ही मज़बूत करेगा, हालांकि उसे इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि सैन्य-क्षमता कूटनीतिक और राजनैतिक कार्यक्षमता पर हावी न हो जाये।
फ्रांस के राष्ट्रपति ने भी कहा, ‘’पश्चिम कमज़ोर’’ हो रहा है जर्मन राष्ट्रपति के समान ही फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने भी कहा कि ‘’पश्चिम कमज़ोर’’ हो रहा है। उन्होंने भी अमेरिका को पश्चिम की कमज़ोरी के लिए दोषी ठहराया।

 


Date : 28-Feb-2020

पुष्यमित्र
किताबों में पढ़ी जाने वाली ये पंक्तियां कल बिल्कुल सच मालूम हुई। कल एक वीडियो शेयर किया। दंगाइयों के भय से सहमा एक परिवार छत पर छुपा था। वीडियो शेयर करते हुए मैंने लिखा कि शायद यह वीडियो आपकी मरी हुई संवेदना को जिंदा कर सके। आज जाकर उस वीडियो पर आए कमेंट को पढिए। पढक़र मुझे खुद शर्म आती है। कॉमेंट करने वाले ज्यादातर लोग मेरे मित्र और पूर्व परिचित हैं। उनकी बातों में जो खून का स्वाद है, वह मैं महसूस कर रहा हूं। मन तीता हो गया है।
एक परिवार अगर छत पर छुपा भयभीत हो रहा है तो यह दृश्य सिर्फ हमारे मन में हिंसा को गलत ठहराने का भाव जगा सकता है। उन लोगों को अपना मन बदलने के लिए प्रेरित कर सकता है, जो सोचते हैं दूसरे धर्म वालों को इसी तरह सजा मिलनी चाहिए। वे आतंकवादी हैं। अरे वे आतंकी नहीं बहुत आम लोग हैं, जो इस वीडियो में दिखता है।
मगर आपको क्या दिखा। आपको दिखा कि वह मुसलमान परिवार है। वीडियो हिंदुओं का होना चाहिए। आप लगे गालियां देने। खूब गालियां दीजिए। अगर मुझे गाली दे देने से आपके मन की नफरत कम होती हो जो जी भर कर दीजिए। मगर अपने मन में किसी के खून खराबे का शौक मत पालिए। मजहबी कारणों से इंसान के बदले खूंखार जानवर मत बनिए। जानवर भी इतना बुरा नहीं होता कि नफरत में इस कदर डूबा हो।
आप सब इस बात से खुश हैं कि दंगा सही हो रहा है। दिल्ली पुलिस ठीक कर रही है। कपिल मिश्रा हिंदुओं का असली नायक है। मुसलमानों को इसी तरह कत्लोगारत कर देना चाहिए। मोदी और शाह ने इन्हें ठीक सबक सिखाया है। अगर हां, तो आप आज से मेरे लिए एक खूनी राक्षस के सिवा कुछ नहीं हैं। दोस्त तो बिल्कुल नहीं हैं। अगर आप मानवता के मामले में अपने मजहब से ऊपर नहीं उठ सकें तो आप मीठी बातें करते हो या दंगाई नारे लगाते हो। आप एक बराबर हैं। बहुत हो गया। मुझे ऐसी दोस्ती, ऐसे रिश्ते नहीं चाहिए। इन राक्षसों के साथ के बदले अकेला रहना ठीक है। आपको अगर मेरी बात गलत लग रही है तो खुद विदा लीजिये। मैं तो अब ऐसे घटिया लोगों से विदा लूंगा ही।

 


Date : 26-Feb-2020

पुष्यमित्र
दिल्ली पर कुछ लिखना चाहता हूँ, इस डर से नहीं लिखता कि अपने ही उन मित्रों की नफरत की खुराक नहीं बन जाऊं, जो पिछले तीन दिनों से लगातार इस कोशिश में हैं कि दंगा ठीक से भडक़ जाए, खूब मारकाट हो और फैसला हो जाए। कुछ मित्र लोगों को हथियार खरीदने के लिए उकसा रहे हैं तो कुछ मित्र उन लोगों को कायर कह रहे हैं जो घर में बैठे हैं। बाहर निकल कर खून खराबा नहीं कर रहे। ऐसे ज्यादातर मित्र दिल्ली से बाहर के हैं, सेफ पैसेज में बैठ कर इस तरह आग लगाने वाले पोस्ट लिख रहे हैं। 
उन्होंने मौतों को, विरोधी पक्ष के बीच फंसे लोगों के चेहरे पर उभर आए भय को, आगजनी, पत्थरबाजी और तनाव को देखा, समझा महसूस नहीं किया होगा। उनके लिए यह दंगा, यह नफरत, टीवी के किसी शो की तरह है, वे बाहर बैठे कर अपने पक्ष के दंगाईयों को चीयर अप और दूसरे पक्ष को हूट कर सकते हैं। सब फेसबुक पर खुले आम हो रहा है। अफसोस कि इस वक्त फेसबुक की कोई टीम इन पोस्टों की स्क्रीनिंग तक नहीं कर रही। पुलिस की साइबर सेल भी कुछ होती है, पता नहीं है।
मगर उसी वक्त दिल्ली से कुछ ऐसी कहानियां भी आ रही हैं, जो ताकत देती हैं। एक पड़ोसी जब दूसरे पड़ोसी को मुसीबत से बचाता है, संकट में शरण देता है। हत्या के भय से उबारता है। जब मोहल्ला खुद शांति मार्च निकालता है कि वह अपने मोहल्ले को जलने नहीं देगा। तब लगता है कि इतना अंधेरा नहीं, लोग जिंदा हैं, नफरत की फसल बनकर नहीं रह गए।
मेरे हिसाब से तो इस खून-खराबे के दो ही जिम्मेदार हैं, एक तो दिल्ली पुलिस, दूसरा टीवी मीडिया। ये दोनों अगर संवेदनशील होते तो दिल्ली का माहौल कभी खराब नहीं होता।
आप लाख मना करें, जिम्मेदारी केजरीवाल की भी है। एक नेता अपने इलाके को कैसे जलने से बचा सकता है वह नीतीश कुमार से सीखा जा सकता है। नीतीशजी से मेरी खूब असहमतियां रहती हैं। मगर अक्सर उन्हें देखा है बिहार को सांप्रदायिक होने से बचाते हुए, भाजपा के साथ रहने पर भी। कल भी जो किया वह यही काम था। लोग कह रहे हैं, इससे क्या फर्क पड़ेगा। यह केंद्र का विषय है। मेरा उनसे कहना है, अब बिहार एनआरसी-एनपीअआर के नाम पर नहीं जलेगा। यही कल के प्रस्ताव का सबसे बड़ा हासिल है।
मगर केजरीवाल और उनकी पार्टी ने दिल्ली को जलने से बचाने के लिए क्या किया? जाकर राजघाट पर बैठ गए। क्या गांधी यही करते थे? वे नफरत को कम करने के लिए लगातार लोगों के बीच घूमते थे, उपवास करते थे और लोगों पर दबाव बनाते थे कि वे लिख कर दें, अब ऐसा नहीं करेंगे। डायरेक्ट एक्शन डे के बाद उन्होंने उस सुहारावर्दी को अमन का पैगाम चलाने के लिये मजबूर किया जो डायरेक्ट एक्शन डे का एक बड़ा कसूरवार था। वे सिर्फ प्रार्थना नहीं करते थे, प्रार्थना के साथ एक्शन में भी उतरते थे। दंगाइयों की भीड़ में घुस जाते थे। आप क्या कर रहे हैं।
सॉफ्ट हिंदुत्व और मोदी का लोकल विकल्प, अच्छा हिन्दू दिखने का जो नशा है वह आपको लोगों के दर्द से जुडऩे से रोक रहा है। आपकी रणनीति यही है कि देर सवेर सब ठीक हो जाएगा, लोग भूल जाएंगे। हिंदुओं के वोट नहीं टूटने चाहिये। इससे आप एक दो टर्म अपनी कुर्सी तो बचा लेंगे मगर इतिहास में एक समझौता वादी और कायर नेता के रूप में अपना नाम दर्ज होने से नहीं बचा पाएंगे। 
आपको ध्यान रखना चाहिए, दिल्ली की आधी से अधिक आबादी ने आपको अपना नेता चुना है। इसलिए नहीं कि जब उनका घर जल रहा हो, आप यह बहाना बनाएं कि दिल्ली की पुलिस आपकी नहीं है। आपके नेता अपने फ्लैट से बाहर नहीं निकलें। लोगों को संयम बरतने के लिए भी नहीं कहें। अफसोस।


Date : 26-Feb-2020

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित ‘लोकतंत्र और असहमति’ पर एक व्याख्यान देते हुए जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि अगर यह भी मान लिया जाए कि सत्ता में रहने वाले 50 फीसदी से अधिक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तब क्या यह कहा जा सकता है कि बाकी की 49 फीसदी आबादी का देश चलाने में कोई योगदान नहीं है?
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने सोमवार को कहा कि असहमति का अधिकार लोकतंत्र के लिए आवश्यक है और कार्यकारिणी, न्यायपालिका, नौकरशाही तथा सशस्त्र बलों की आलोचना को ‘राष्ट्र-विरोधी’ नहीं कहा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित  ‘लोकतंत्र और असहमति’ पर एक व्याख्यान देते हुए जस्टिस गुप्ता ने कहा कि जब असहमति की बात आती है तब किसी को पाक साफ नहीं ठहराया जा सकता है।  उन्होंने कहा कि असहमति का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त ‘सबसे बड़ा’ और ‘सबसे महत्वपूर्ण अधिकार’ है और इसमें आलोचना का अधिकार भी शामिल है। उन्होंने कहा, ‘असहमति के बिना कोई लोकतंत्र नहीं हो सकता।’
जस्टिस गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) द्वारा ‘लोकतंत्र और असहमति’ पर आयोजित एक व्याख्यान में कहा कि सभी को आलोचना के लिए खुला होना चाहिए, और न्यायपालिका आलोचना से ऊपर नहीं है। उन्होंने कहा, ‘आत्मनिरीक्षण भी होना चाहिए, जब हम आत्मनिरीक्षण करते हैं, तो हम पाएंगे कि हमारे द्वारा लिए गए कई निर्णयों को ठीक करने की आवश्यकता है।’
जस्टिस गुप्ता ने हालांकि कहा कि असंतोषपूर्ण विचारों को ‘शांतिपूर्ण ढंग से’ व्यक्त किया जाना चाहिए और नागरिकों को जब लगे कि सरकार द्वारा उठाया गया कदम उचित नहीं है तो उन्हें एकजुट होने और विरोध करने का अधिकार है। उनका कारण हमेशा सही नहीं हो सकता है, लेकिन साथ ही सरकार भी सही नहीं हो सकती है।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जस्टिस गुप्ता ने कहा कि जब तक विरोध शांतिपूर्ण होता है, तब तक सरकार को विरोध प्रदर्शन को दबाने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा, ‘यदि स्वीकृत मानदंड को कोई चुनौती नहीं है, तो समाज स्थिर रहेगा।’ उन्होंने कहा, ‘मुझे कई विषय दिए गए थे, लेकिन देश के मौजूदा हालात को देखते हुए मैंने लोकतंत्र और असंतोष विषय पर बोलना चुना। असहमति को न केवल सहन किया जाना चाहिए बल्कि प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ‘असहमति, असंतोष और संवाद ही लोकतंत्र को चला सकते हैं। सरकार और देश दो अलग-अलग चीजें हैं। देश की आलोचना किए बिना आप सरकार के आलोचक हो सकते हैं।’
जस्टिस गुप्ता ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में बहुमत का शासन अंतर्निहित होने के बावजूद बहुसंख्यकों के शासन को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। 
उन्होंने कहा, जब सत्ता में रहने वाले दावा करते हैं कि वे लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं तब वे बड़ी संख्या में बहुसंख्यक मतदाताओं द्वारा चुनी गई सरकार हो सकती हैं, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि वे लोगों की संपूर्ण इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं।’
उन्होंने कहा, ‘अगर यह भी मान लिया जाए कि वे 50 फीसदी से अधिक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तब क्या यह कहा जा सकता है कि बाकी की 49 फीसदी आबादी का देश चलाने में कोई योगदान नहीं है?
फरवरी 2017 में शीर्ष अदालत के न्यायाधीश बनने के बाद, जस्टिस गुप्ता ने पर्यावरण के कई महत्वपूर्ण मामलों की अध्यक्षता की है, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने का मामला भी शामिल है। वे यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के उचित कार्यान्वयन की मांग करने वाली पीठ का भी हिस्सा हैं। वे 6 मई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं।  (द वायर) 

 

 

 


Date : 26-Feb-2020

राम यादव
चंद्रमा एक बार फिर बहुत चर्चा में है। भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने पिछले दिनों कहा कि भारत ‘चंद्रयान-2’ की आंशिक विफलता से निराश नहीं है, बल्कि 2020 में ‘चंद्रयान-3’ भेजने की तैयारी कर रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि ‘चंद्रयान-3’ की उड़ान के साथ-साथ भारत की पहली समानव अंतरिक्ष उड़ान के अंतरिक्षयात्रियों को प्रशिक्षण देने का काम भी अब शुरू हो गया है। ‘गगनयान’ नाम के इस अभियान के लिए जिन चार भावी अंतरिक्षयात्रियों को चुना गया है, उन्हें रूस में प्रशिक्षित किया जाएगा। ‘गगनयान’ से इसरो 2022 तक तीन अंतरिक्षयात्रियों को एक सप्ताह के लिए पृथ्वी की परिक्रमाकक्षा में भेजना चाहता है। ‘चंद्रयान-3’ एवं ‘गगनयान’ के अनुभव देर-सवेर भारतीय अंतरिक्षयात्रियों की पहली चंद्रयात्रा का मार्ग भी सुगम करेंगे।
दिसंबर 1972 के बाद से किसी धरतीवासी ने चंद्रमा पर पैर नहीं रखा है। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ की ओर से वह रात के समय पहली और चंद्रमा की दिशा में अंतिम उड़ान थी। यान था अपोलो-17। तारीख़ थी 7 दिसंबर 1972। यात्री थे यूजीन सेर्नन, रॉन इवैन्स और हैरिसन श्मिट। चंद्रमा के पास पहुंचने के बाद इवैन्स परिक्रमा यान में बैठे रहे, जबकि सेर्नन और श्मिट अवतरणयान से 11 दिसंबर को चंद्रमा पर उतरे।
चंद्रमा की अंतिम यात्रा सबसे लंबी थी
किसी खुली जीप जैसे एक रोवर में बैठ कर चंद्रमा पर विचरण करने की, उसकी परिक्रमा कक्षा में रह कर उसके फेरे लगाने की और वहां की धूल-मिट्टी व कंकड़-पत्थर जमा कर पृथ्वी पर लाने की यह सबसे लंबी यात्रा थी। अब तक के अंतिम चंद्रयात्रियों ने वहां तीन दिनों में कुल मिलाकर 34 किलोमीटर की दूरी तय की। 110 किलो धूल-मिट्टी व कंकड़-पत्थर जमा किये। 14 दिसंबर 1972 को वे अपोलो-17 से पृथ्वी पर वापसी के लिए चले। तब से अब तक किसी भी देश की और कोई नई समानव चंद्रयात्रा नहीं हुई है।
लेकिन जल्द ही एक बार फिर चंद्रमा पर जाने और इस बार वहां लंबे समय तक रहने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। विश्व भर के अब तक के अंतरिक्षयात्रियों का दिसंबर 2019 के अंत में वॉशिगटन में एक महामिलन हुआ था। चंद्रमा पर दुबारा वापसी इस महामिलन में चर्चा का मुख्य विषय बनी। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के प्रमुख जिम ब्राइडनस्टीन ने घोषित किया, ‘’हमारा लक्ष्य है पांच वर्षों में चंद्रमा पर पुन: उतरना और 2028 से वहां लगातार बने रहना।’’
पहली बार एक महिला भी चंद्रमा पर जाएगी
वस्तव में नासा ने चंद्रमा ही नहीं, वहां से मंगल ग्रह पर आते-जाते रहने के भी एक ऐसे कार्यक्रम का मॉडल अभिकल्पित किया है, जिसमें अंतरिक्षयात्रा संबंधी साज़-सामान, उपकरण एवं रॉकेट बनाने वाली अमेरिकी कंपनियों के साथ-साथ यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’, जापानी एजेंसी ‘जेएएक्सए’ और कनाडाई एजेंसी ‘सीएसए’ को भी शामिल किया गया है। ‘आर्तेमीस’ नाम की एक यूनानी पौराणिक देवी के नाम वाले इस अभियान के अंतर्गत, 2024 -25 तक, पहली बार एक महिला और एक पुरुष को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारा जाएगा।
नासा का समझना है कि विभिन्न देशों की अंतरिक्ष अनुसंधानी व्यावसायिक कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के बीच भागीदारी वाला यह अंतरराष्ट्रीय मॉडल चंद्रमा पर लंबे समय तक मनुष्य की उपस्थिति संभव बनाने और बस्ती बसाने की दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध हो सकता है। ‘आर्तेमीस’ की सफलता इस बात को भी संभव बनायेगी कि भविष्य में कभी चंद्रमा पर से ही मंगल ग्रह पर आना-जाना सरल और सस्ता हो जायेगा।
नवंबर 2020 में पहली परीक्षण उड़ान
वाशिंगटन में हुए अंतरिक्षयात्रियों के महामिलन में नासा के प्रमुख का कहना था कि इस दिशा में पहला कदम उठाते हुए, यथासंभव नवंबर 2020 में ही, चंद्रमा की दिशा में पहली मानव-रहित परीक्षण उड़ान होगी। फ्लोरिडा के ‘केनेडी स्पेस सेंटर’ में इसकी तैयारी चल रही है। चंद्रमा पर दुबारा पहुंचने के लिए एक नये रॉकेट के साथ-साथ नए प्रकार का एक ऐसा कैप्सूल या मॉड्यूल भी डिजाइन किया गया है जिसमें अंतरिक्षयात्रियों के रहने-बैठने और अपने साथ विभिन्न प्रकार की सामग्रियां लाने-ले जाने की सुविधा होगी।
‘ओरायन’ नाम के इस स्पेसक्राफ्ट का डिज़ाइन नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ ने मिलकर बनाया है। उसके लिए आवश्यक इंजन सहित उसमें उपलब्ध की जाने वाली सुविधाओं के निर्माण की जिम्मेदारी यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ को सौंपी गयी है। यूरोपीय विमान निर्माता कंपनी एयरबस इन चीज़ों का निर्माण जर्मनी में करेगी। प्रबल संभावना यही है कि ‘ओरायन’ की पहली परीक्षण चंद्र-उड़ान, बिना किसी अंतरिक्षयात्री के, 2021 में होगी। किसी अंतरिक्ष यात्री के बिना 2022 में वह पहली बार चंद्रमा की परिक्रमा करेगा। ऐसे ही कुछ और परीक्षणों के बाद, यदि सब कुछ पूरी तरह संतोषजनक रहा, तो 2024 में अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर ‘ओरायन’ पहली बार चंद्रमा पर पहुंचेगा।
नासा-प्रमुख ने वॉशिगटन में एकत्रित अंतरिक्षयात्रियों से कहा कि इस बार हम चंद्रमा पर पहुंच कर वहां डेरा डालना चाहते हैं। वहां अपना एक अड्डा बनाना चाहते हैं। भविष्य में वहीं से मंगल ग्रह की दिशा में उड़ानें संचालित करना चाहते हैं। 1998 से पृथ्वी से कऱीब 408 किलोमीटर दूर रह कर अंतरराष्ट्री अंतरिक्ष स्टेशन ‘आईएसएस’ इस समय जिस तरह पृथ्वी की निरंतर परिक्रमा कर रहा है, नासा की योजना है कि वैसा ही एक स्टेशन चंद्रमा की परिक्रमाकक्षा में भी स्थापित किया जाएगा। उसे ‘गेटवे’ (प्रवेशद्वार) नाम दिया गया है।
‘गेटवे’ होगा पहला 
चंद्र-स्टेशन
‘गेटवे’ को, समय के साथ, चंद्रमा का चक्कर लगा रहे क्रमश: एक ऐसे विशाल अड्डे (स्टेशन) का रूप दिया जाएगा, जिससे चंद्रमा के हर इलाके में आना-जाना आना-जाना आसान हो जाएगा। भविष्य के चंद्रयात्री किसी फेरीयान में बैठकर चंद्रमा पर कभी भी उतर सकेंगे और काम के बाद पुन: ‘गेटवे’ पर लौट सकेंगे। वही उनका घर या होटल होगा। इस प्रकार वे बार-बार पृथ्वी पर लौटे बिना चंद्रमा पर अधिक समय बिता सकेंगे।
‘गेटवे’ की सहायता से चंद्रयात्री चंद्रमा के उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के पास वाली उन जगहों पर उतर सकेंगे, जहां काफ़ी मात्रा में पानी होने का अनुमान है। पानी न केवल पीने और जीवित रहने के लिए चाहिए, सौर ऊर्जा की सहायता से उसके विद्युत-अपघटन द्वारा ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस भी प्राप्त की जा सकती है। ऑक्सीजन सांस लेने के लिए चाहिए और हाइड्रोजन ईंधन के काम आयेगी।
दो सप्ताह दिन, दो सप्ताह रात
चंद्रमा का अपना कोई वायुमंडल नहीं होने से वहां हवा नहीं है। लगभग दो सप्ताह तक लगातार दिन का उजाला रहता है और दो सप्ताह तक रात का अंधेरा। किंतु उसके दोनों ध्रवों पर लगभग सारे समय उजाला रहता है। चंद्रमा की मिट्टी में मिले सिलिकॉन के उपयोग से सूर्य-प्रकाश को बिजली में बदलने वाले सौरफलक सीधे वहीं बनाए जा सकते हैं। 

क्या चंदा मामा जल्द ही कइयों के लिए 
चंदा माता में बदलने जा रहा है?

चंद्रमा की निरंतर परिक्रमा करने वाला ‘गेटवे’ स्टेशन इस तरह का बना होगा कि अमरीका और यूरोप के ही नहीं, रूस, चीन या भारत जैसे अन्य देशों के चंद्रयान भी उसके साथ संयोजन (डॉकिंग) कर सकेंगे और उनके चंद्रयात्री भी उसका उपयोग कर सकेंगें। यह सुविधा ऐसी व्यावसायिक कंपनियों के लिए भी उपलब्ध रहेगी, जिनकी चंद्रमा पर खनिजों की खुदाई में, वहां कारखाने लगाने में या कोई दूसरा उपयोगी काम करने में दिलचस्पी होगी।
चंद्रमा की मिट्टी सीमेंट जैसी है। समझा जाता है कि इस मिट्टी के ईंटों से वहां घर बनाए जा सकते हैं। लोहे, अल्यूमीनियम, टाइटेनियम, सिलिकॉन, कैल्शियम, मैग्नेशियम और ‘रेयर अर्थ’ कहलाने वाले कई दुर्लभ खनिज पदार्थ वहां होने के संकेत मिले हैं। इन खनिजों के अतिरिक्त वहां हीलियम गैस के ‘हीलियम-3’ नाम के आइसोटोप (समस्थानिक) की मात्रा इतनी अधिक होने का अनुमान है कि उससे वहां परमाणु बिजलीघर चलाए जा सकते हैं।
हीलियम-3 को सर्वोत्तम परमाणु ईंधन माना जाता है। पृथ्वी पर वह बहुत ही दुर्लभ है। चंद्रमा पर वह सौर आंधियों के साथ पहुंचता है और उसकी ज़मीन में संचित हो जाता है। चंद्रमा पर स्थित धूल में, जिसे ‘रिगोलिथ’ कहा जाता है, लगभग 45  फीसदी तक ऑक्सीजन होने का अनुमान है। इन धूलकणों में बंधे ऑक्सीजन के अणुओं को मुक्त करके शुद्ध ऑक्सीजन गैस प्राप्त करने के वैज्ञानिकों के पास कम से कम 20 अलग-अलग तरीके हैं।
चंद्रमा की धूल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक
‘रिगोलिथ’ धूलकणों के साथ एक समस्या भी है। चंद्रमा पर बहते पानी और बहती हवा के न होने से वे आपस में रगड़ खाकर गोलाकार होने के बदले बहुत नुकीले किस्म के महीन कण होते हैं। उन्हें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पाया गया है। चंद्रमा पर जा चुके अमरीकी अंतरिक्ष यात्रियों ने बताया कि उन्हें वहां गले में खऱाश, छींक आने और आंखें बहने की शिकायत होती थी। चंद्रमा पर विचरण करने वाले 12वें अंतरिक्ष यात्री हैरिसन श्मिट ने तो वहां ऐसी छींकें आने और नाक बहने की शिकायत की, मानो उन्हें ज़ुकाम हो गया था।
चंद्रमा पर मौजूद यह धूल हालांकि सिर से पैर तक के पूरी तरह वायुरोधी (एयरटाइट) अंतरिक्ष सूट से होकर नाक तक नहीं पहुंच सकती। किंतु समस्या तब पैदा होती थी, जब चंद्रयात्री बाहर घूमने-फिरने के बाद अपने यान में लौटते थे। घूमने-फिरने के दौरान ये धूल कण उनके अंतरिक्ष सूट व साथ के उपकरणों पर चिपक कर यान में पहुंच जाते थे और वहां सिरदर्द बन जाते थे। पृथ्वी पर लाई गई चंद्रमा की मिट्टी और धूल में कोई पौधे उगाने के प्रयास भी सफल नहीं सिद्ध हुए हैं। धूलकणों का नुकीलापन पौधों की जड़ों वाली कोशकाओं को इतना क्षतिग्रस्त कर देता है कि पूरा पैधा कुछ दिनों बाद निर्जीव हो जाता है।
नया स्पेस सूट
अब तक एक और समस्या ऐसी थी, जो खुले अंतरिक्ष में और चंद्रमा पर भी चलने-फिरने और काम करने में काफी बाधक हो रही थी अंतरिक्ष यात्रियों का ‘स्पेस सूट।’ वह इतना भारी-भरकम और असुविधाजनक होता है कि उसे पहनने के बाद अंतरिक्ष यात्री स्वाभाविक ढंग से चल-फिर या काम नहीं कर सकते। अक्टूबर 2019 में नासा ने अंतरिक्षयात्रियों के लिए ऐसे दो नए, हल्के और कहीं अधिक लचीले स्पेस सूट पेश किए, जिन में ‘आर्तेमीस’ अभियान के अंतर्गत पांच साल बाद चंद्रमा पर जाने वाली पहली महिला और पहले पुरुष को दुनिया देखेगी। जब वे चंद्रमा की ऊपरी सतह पर चल-फिर रहे होंगे, तब सफेद-नीले रंग का स्पेस सूट पहने दिखेंगे। जब उड़ान के दौरान ‘ओरायन’ में या चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे स्टेशन ‘गेटवे’ में होंगे, तब केसरिया रंग के सूट में दिखेंगे।
नासा द्वारा जारी नए स्पेससूट्स का वीडियो
दोनों प्रकार के नए सूट वातानुकूलित हैं और सिर के हेल्मेट के साथ जुड़े हैं। अब तक के स्पेस सूट 1969 से चल रहे थे। उन्हें पहनने के बाद हाथ ऊपर उठा सकना बहुत ही मुश्किल और सीमित था। नए सूट की आस्तीन और कंधे के बीच ‘बॉलबियरिंग’ वाले ऐसे छल्ले हैं, जिनके कारण बाहों को असानी से घुमाया और हाथ ऊपर की तरफ उठाया जा सकता है। नए सूट में कमर के पास का हिस्सा ऐसा है कि नीचे पड़ी किसी चीज को उठाने के लिए झुका भी जा सकता है। अब तक के सूट में ऐसा संभव नहीं था।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’ के अध्यक्ष यान व्यौर्नर कुछ समय पहले तक जर्मन अंरिक्ष अनुसंधान एजेंसी ‘डीएलआर’ के प्रमुख हुआ करते थे। वे बहुत प्रसन्न हैं कि अंतरराष्ट्रीय भागीदारी को आमंत्रित करने की नासा की नयी नीति से न केवल यूरोपीय वैज्ञानिकों के लिए बल्कि यूरोपीय कंपनियों के लिए भी शोध और कमाई के नए अवसर बनेंगे। उनका मानना है कि इस खुलेपन के द्वारा ‘’चंद्रमा पर बस्ती बसाने के प्रयासों में हम सारी दुनिया को एकसाथ ला सकते हैं।’’ कहने की आवश्यकता नहीं कि देर-सवेर भारत भी इस खुलेपन का लाभ उठा सकता है। ‘गेटवे’ भारत के भावी चंद्रयात्रियो के लिए भी चंद्रमा पर पहुंचने का प्रवेशद्वार बन सकता है। (सत्याग्रह)


Date : 25-Feb-2020

दिनेश श्रीनेत

दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी धार्मिक विमर्श में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानंद, कबीर और जे कृष्णमूर्ति के लिए जगह नहीं हैं। भारत से निकलकर दुनिया के तमाम देशों में फैले बौद्ध धर्म को वे अपने देश की पहचान से नहीं जोड़ते। बल्कि बहुत से दक्षिणपंथी बौद्ध धर्म की आलोचना करते हैं और उनके अहिंसा के सिद्धांत को हिन्दू धर्म के लिए घातक बनाते हैं। 

इसे दो तरीकों से समझा जा सकता है। मौजूदा दौर में दक्षिणपंथी विचारक और राजनीतिक पार्टियां जिस हिन्दुत्वाद की बात करते हैं, उसकी अवधारणा बड़ी अस्पष्ट है और उसमें बहुत से विरोधाभास हैं। हिन्दुत्व के नाम पर दक्षिणपंथी कुछ स्थूल प्रतीकों को चुनते हैं और बताते हैं कि दरअसल यही हमारी धार्मिक पहचान है। ये प्रतीक होते हैं अमूमन मंदिर, मठ, आरती, भगवा झंडे, चंदन-तिलक आदि। इस मामले में इनका विमर्श स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, रमण महर्षि और रामकृष्ण परमहंस की विवेचनाओं से भी पीछे है। जबकि ये सभी विचारक देश के पुनर्जागरण काल में ही हिन्दु धर्म और अनुशीलन की विशद व्याख्याएं दे चुके थे।
भारतीय जनमानस उस तरीके से धार्मिक नहीं रहा जिस तरीके से यूरोप के ईसाई थे। जब सनातन धर्म का जिक्र होता है तो इसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था से जोड़ दिया जाता है। जबकि ब्राह्मणवादी व्यवस्था को हिन्दू धर्म पर आरोपित किया गया है और इसने धर्म का काफी नुकसान किया है। इस बात को थोड़ा और गहराई से समझने का प्रयास करते हैं। 
सनातन का अर्थ मनु की लिखी किताब के कायदे-कानून नहीं हैं बल्कि सनातन अपने दार्शनिक अर्थ में प्रकृति की निरंतरता से मनुष्य का नाता है। नदियां हजारों साल से बह रही हैं। धर्म उनसे रिश्ता जोड़ता है। गंगा का महात्म्य है मगर देश की हर छोटी नदी का आसपास के गांवों से धार्मिक रिश्ता है। यही हाल वृक्षों का है। पीपल, आम, केले के पत्ते और बेल पत्र प्रकृति की आराधना का ही एक हिस्सा है। फिर पशु आते हैं। गाय की पूजा होती ही है, नंदी की भी, कुत्ता कालभैरव है तो कौवों का भी महत्व है।
सामान्यत: हिन्दू धर्म में पूजा करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं थी। पूजा अपने पर्यावरण से रिश्ता बनाने की प्रक्रिया थी। हर समाज के अपने कुल देवता और देवियां होती थीं। उसके लिए भी किसी बाहरी व्यक्ति को नियम-कानून बनाने की जरूरत नहीं थी। दक्षिणपंथियों ने अपने विमर्श के जरिए हिन्दू धर्म के इस बहुलतावाद को कुचला है। उनकी दिलचस्पी धर्म के सार्वजनीकरण या वैयक्तिकता अथवा दार्शनिक ऊंचाइयों में नहीं रही है, बल्कि धर्म के जरिए ताकत हासिल करने और आक्रामक होने में रही है। यहां धर्म का हर वह रूप मुखर होकर सामाने आता है जहां उसके माध्यम से समाज के कुछ वर्गों पर स्थायी वर्चस्व हासिल किया जा सके। उदाहरण के लिए ज्यादातर दक्षिणपंथी नारीवादी विमर्श से चिढ़ते हैं। वे परिवार में सत्ता के केंद्रीयकरण के हिमायती हैं।
भारत में मौजूदा हिन्दुत्ववादी लहर ने हमेशा अपने लिए शत्रु तलाशे हैं और उसके बहाने धर्म के भीतर आक्रामक तत्वों को मजबूती से स्थापित किया है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जनमानस के भीतर बसे तुलसी के राम को मिटाने का प्रयास किया गया। वे एक पारिवारिक राम थे, जिन्हें हम ‘सीता-राम’  कहकर याद करते थे। वे जननायक के रूप में स्थापित थे। उसकी जगह अकेले धनुष लेकर निकलने ‘राम’  आ गए और ‘जय श्री राम’  एक आक्रामक उद्घोष में बदल गया। राम तो कभी अकेले रहे ही नहीं। 
आप कोई पुरानी तस्वीर याद करें आपको राम हमेशा सीता, हनुमान, लक्ष्मण या अपनी पूरी वानर सेना के साथ दिखते हैं। हाल के दिनों में बलशाली मगर भोले रामदूत हनुमान की जगह पश्चिम की कॉमिक आर्ट से प्रभावित क्रूद्ध हनुमान कारों पर स्टीकर के रूप नजर आते हैं।
दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी धार्मिक विमर्श में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानंद, कबीर और जे कृष्णमूर्ति के लिए जगह नहीं हैं। भारत से निकलकर दुनिया के तमाम देशों में फैले बौद्ध धर्म को वे अपने देश की पहचान से नहीं जोड़ते। बल्कि बहुत से दक्षिणपंथी बौद्ध धर्म की आलोचना करते हैं और उनके अहिंसा के सिद्धांत को हिन्दू धर्म के लिए घातक बनाते हैं। आमतौर पर उग्र हिन्दुत्व को स्थापित करने के लिए यह तर्क रचा जाता है कि हिन्दू की सांस्कृतिक पहचान खतरे में हैं। जबकि हकीकत यह है कि इस देश में किसी भी हिन्दूू को अपनी पूजा पद्धति अथवा सार्वजनिक धार्मिक उत्सवों-जिनमें कुंभ, पदयात्राएं, देश के विभिन्न हिस्सों में तीर्थ आदि शामिल हैं-की पूुरी आजादी है।
अब सांस्कृतिक पहचान का संकट दिखाकर अक्सर दो काम किए जाते हैं। पहला, सांस्कृतिक पहचान के नाम पर समाज के कुछ समुदायों पर अंकुश रखना। उदाहरण के लिए महिलाओं का पहनावा ही जैसे हिन्दुत्व के सांस्कृतिक पहचान की सबसे बड़ी रणभूमि है। विदेशी वस्त्र, कॉलेज में जींस पहनने का विरोध, स्त्रियों को परंपरागत खांचे में बनाए रखने की कोशिश इसका हिस्सा होती है। 
सांस्कृतिक पहचान की आड़ में अन्य संस्कृतियों पर हमले किए जाते हैं। जैसे वैलेंटाइन डे का विरोध, ईसाइयों का विरोध, मुसलमानों की जीवनशैली पर कटाक्ष आदि। इस देश के दलित और आदिवासी भी अपने तरीके से पूजा करते हैं, मगर दक्षिणपंथी हिन्दुत्व में उनकी विविधता और उपासना की लिए भी जगह नहीं है।
अब अगर गौर करेंगे तो यह पूरा विमर्श दरअसल अपरोक्ष रूप से एक सत्ता कायम करने के उपक्रम में रहता है। यह साबित करने का प्रयास किया जाता है कि कुछ ही प्रतीक ही हिन्दुत्व के वास्तविक प्रतीक हैं और उनके साथ रहने समुदाय खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे। लोगों को तथाकथित बाहरी (काल्पनिक) शत्रुओं से डराया जाता है, क्योंकि वास्तव में कोई बाह्य शत्रु है ही नहीं तो अंत में यह हिन्दुत्व अपने ही समुदाय पर हमला करने लगता है। ऊपर मैंने प्रोपेगेंडा की बात कही थी। सबसे प्रभावी प्रोपेगेंडा वह होता है जो ऊपरी तौर पर सत्य लगे मगर उसमें असत्य, अर्धसत्य या तार्किक दोष से भरे कथनों का घालमेल हो। उसका मकसद सूचना देने के बजाय एक खास हित के लिए लोगों के व्यवहार और राय को प्रभावित करना होता है। इसलिए, भारत में दक्षिणपंथी विमर्श एक चिंतनधारा कम प्रॉपेगेंडा ज्यादा है।

 

 


Date : 25-Feb-2020

आदित्य ओझा/सौरभ शर्मा

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के बेलवार गांव के निवासी किशुन गुप्ता ने दो साल पहले अपने छह दिन के बेटे को हमेशा के लिए खो दिया था। उनका बेटा एकदम स्वस्थ पैदा हुआ था और उसे जन्म के बाद कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन जन्म के चौथे दिन अचानक उसे तेज बुखार आया। उसे लेकर वह तुरंत नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे, पेशे से फार्मासिस्ट किशुन बताते हैं।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में उन्हें पहले तो डॉक्टर नहीं मिले और जब किसी ने डॉक्टर को फोन कर के बुलाया तो डॉक्टर ने उन्हें दवा और दूसरी चीज़ों के अभाव के चलते किसी प्राइवेट डॉक्टर के पास जाने को कह दिया, 33 वर्षीय किशुन ने बताया।
किशुन अपने बेटे को लेकर तुरंत गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज  पहुंचे लेकिन उनके बेटे को बचाया ना जा सका। बेटे की मौत के बाद उनकी पत्नी ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया और दो साल के निरंतर इलाज के बाद अब वह कुछ ठीक होती हुई दिखाई दे रही है, किशुन ने बताया।
ये वही वक्त था जब गोरखपुर का बीआरडी मेडिकल कॉलेज नवजात शिशुओं की मौत की वजह से देशभर के मीडिया में सुखिर्
यों में आया था। एक ख़बर के मुताबिक़ साल 2017 में जनवरी से अगस्त के बीच बीआरडी मेडिकल कॉलेज में तकऱीबन 1250 शिशुओं की मौत हुई। सिफऱ् अगस्त के महीने में ही 290 शिशुओं की मौत हुई।
नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में शिशु मृत्यु दर चिंता का विषय है। पैदाइश के 28 दिन के अंदर मरने वाले शिशुओं की संख्या 2016 में हर 1,000 शिशुओं पर 30 थी। साल 2015 में यही संख्या 31 थी। केरल में यह स्थिति सबसे बेहतर है जहां यह संख्या सिर्फ 6 है। यह आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग की गुणवत्ता दर्शाता है, रिपोर्ट में कहा गया है। लेकिन 2017 में रजिस्ट्रार जनरल के कार्यालय द्वारा सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार उत्तर प्रदेश की शिशु मृत्यु दर 41 थी। 2018 में दिमागी बुख़ार यानी एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम के कारण, उत्तर प्रदेश में 230 बच्चों की मौत हो गई। 2019 में यह संख्या 126 थी। 2019 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट करके लिखा था की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजग़ार, सफऱ हो रहा आसान, विकास के उत्तर प्रदेश गढ़ रहा नए प्रतिमान।
उत्तर प्रदेश के अस्पतालों की हालत पर अलग-अलग सरकारी एजेंसियां समय-समय पर रिपोर्ट जारी करती रहती हैं। हाल ही में आई कम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया (सीएजी) की रिपोर्ट् में उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों के कामकाज को लेकर कई सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट में कहा गया था कि यूपी के स्वास्थ्य विभाग ने ना तो केंद्र सरकार के मानदंडों को अपनाया है और ना ही अपने मानदंड तय किए हैं। 
जून 2019 में नीति आयोग ने भी राज्यों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक रिपोर्ट जारी की थी। अलग-अलग पैमानों के आधार पर राज्यों की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक रैंकिंग दी गई थी। इसमें तीन श्रेणियां बनाई गईं, ‘बड़े राज्य’, ‘छोटे राज्य’ और ‘केंद्र शासित’ प्रदेश। 
अगर हम बड़े राज्यों की लिस्ट देखें, तो इसमें केरल पहले पायदान पर था और आंध्र प्रदेश दूसरे पर। उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य व्यवस्था के मामले में इस लिस्ट में 21वें यानी आखिरी पायदान पर था। उप्र का परफ़ॉरमेंस इंडेक्स 28.61 था जबकि लिस्ट में सबसे ऊपर रहे केरल का 74.01।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वित्त वर्ष 2016-17 में उत्तर प्रदेश ने स्वास्थ्य पर 19,287.1 करोड़ रूपए खर्च किए। यह खर्च बाकी सभी राज्यों के मुकाबले में सबसे ज़्यादा था। देश में सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाला राज्य होने के नाते अगर प्रति व्यक्ति खर्च निकाला जाए तो यह 964 रूपए प्रति व्यक्ति बनता है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की 2014-2015 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य पर देशभर का औसत खर्च 3,826 रूपये प्रति व्यक्ति था। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य पर खर्च राष्ट्रीय औसत से 4 गुना कम रहा। 
अगर डॉक्टरों की संख्या की बात करें तो सितम्बर 2019 तक उत्तर प्रदेश में रजिस्टर्ड डॉक्टरों की कुल संख्या 81,348 थी जो कि महाराष्ट्र (179,783) और आंध्र प्रदेश (100,587) के बाद तीसरे स्थान पर है।  केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलीजेंस की एक रिपोर्ट के अनुसार देशभर का औसत 11,082 लोगों पर एक डॉक्टर का है। उत्तर प्रदेश में 1 जनवरी 2016 तक 19962 लोगों पर एक डॉक्टर का औसत था। 
साल 2017-18 में उत्तर प्रदेश में इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी यानि किसी भी प्रकार के प्राइवेट या सरकारी अस्पताल में जन्म देने के मामले केवल 50.6 फीसदी रहे। यह आंकड़ा 2015-16 से भी कम हो गया। 2015-16 में इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी के मामले 52.4 फीसदी  थे। यानि की हर दूसरी गर्भवती महिला को नवजात को जन्म देते वक़्त अस्पताल की सुविधा उपलब्ध नहीं रही। 
जनसंख्या दबाव के हिसाब से संसाधन उपलब्ध होने चाहिए। बहुक्षेत्रीय भागीदारी होनी चाहिए जैसे कि ग्राम प्रधान को गांव के विकास के साथ स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना चाहिए। माताओं को उनका अधिकार नहीं पता है। सुविधाओं की कमी से मरने वालों में गऱीबों की संख्या अधिक है। हालांकि संस्थागत डिलीवरी में पहले से सुधार आया है, एक समाज सेवी संस्था से जुड़े पी. सिंह ने कहा।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत हर राज्य को फंड आवंटित किया जाता है। इस धनराशि का इस्तेमाल राज्य अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के लिए करते हैं। तेलंगाना और ओडिशा में जहां यह धनराशि मात्र 20 दिन के भीतर आकर विभिन्न विभागों को चली जाती है वहीं उत्तर प्रदेश में 2017-18 में इसमें 118 दिन का वक्त लग रहा था। यह स्थिति 2015-16 से भी बद्तर हो गई। 2015-2016 में इसमें 93 दिन का वक्त लग रहा था। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत उत्तर प्रदेश को केंद्र का हिस्सा साल 2007-2008 के 3,050 करोड़ से घटकर साल 2018-2019 में 2,564 करोड़ रुपये रह गया।
अगर ताजा आंकड़े निकाले गए तो मौजूदा स्थिति और बदतर हो सकती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सही से काम नहीं कर रहे हैं और मेडिकल कॉलेज के ऊपर अतिरिक्त दबाव डाल दिया गया है, जाने माने बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कफील ख़ान ने कहा।  स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के लिए सबसे पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ध्यान देना चाहिए। अधिकतर मामलों में पहला संपर्क जनता का प्राथमिक सुविधा केंद्र से ही होता है।  28 जनवरी को फोन पर दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया। ह्म्द्गह्यश्चशठ्ठस्रञ्चद्बठ्ठस्रद्बड्डह्यश्चद्गठ्ठस्र.शह्म्द्द 
(लेखक लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं और v®vReporters.com के सदस्य हैं।) 

 

 


Date : 24-Feb-2020

ब्रजेश मिश्र

चीन में कोरोना वायरस फैलने की वजह से आयात और निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है और एपीआई का आयात ना हो पाने की वजह से कई कंपनियों दवाओं के प्रोडक्शन में कमी आ रही है। जिसका असर आने वाले वक़्त में दवाओं की वैश्विक आपूर्ति पर दिख सकता है।

जेनेरिक दवाएं बनाने और उनके निर्यात में भारत अव्वल देश है। साल 2019 में भारत ने 201 देशों को जेनेरिक दवाएं निर्यात की हैं और उससे अरबों रुपए कमाए हैं। लेकिन आज भी भारत इन दवाओं को बनाने के लिए चीन पर निर्भर है और दवाओं को प्रोडक्शन के लिए चीन से एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स आयात करता है। ये दवाइयां बनाने का कच्चा माल होता है।
चीन में कोरोना वायरस फैलने की वजह से आयात और निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है और एपीआई का आयात ना हो पाने की वजह से कई कंपनियों दवाओं के प्रोडक्शन में कमी आ रही है। जिसका असर आने वाले वक़्त में दवाओं की वैश्विक आपूर्ति पर दिख सकता है।
भारत सरकार के वाणिज्य विभाग से मान्यता और समर्थन प्राप्त ट्रेड प्रोमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया  की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2018-19 में भारत से दवाओं का अनुमानित निर्यात 19।14 अरब डॉलर का था।
इन दवाओं को बनाने के लिए कऱीब 85 फ़ीसदी एपीआई (कच्चा माल) चीन से आयात किया जाता है। भारत में एपीआई का प्रोडक्शन बेहद कम है और जो एपीआई भारत में बनाया जाता है उसके फ़ाइनल प्रोडक्ट बनने के लिए भी कुछ चीज़ें चीन से आयात की जाती हैं। यानी भारतीय कंपनियां एपीआई प्रोडक्शन के लिए भी चीन पर निर्भर हैं।
बढ़ रही हैं एपीआई की क़ीमतें
कोरोना वायरस की वजह से चीन से एपीआई के आयात पर असर पड़ा है। चीन से सप्लाई बंद होने की वजह से भारत में दवाएं बनाने वाली कंपनियों को एपीआई अब बढ़ी हुई क़ीमत पर खऱीदना पड़ रहा है।
मुंबई स्थिति कंपनी आरती फार्मा एपीआई आयात करती है और उसे दवा बनाने वाली कंपनियों को बेचती है। कंपनी के मालिक हेमल लाठिया ने बताया कि चीन से जो भी कच्चा माल आता है वो पूरी तरह बंद है। कोई कंसाइन्मेंट नहीं आ रहे और कब तक आएंगे इसकी कोई जानकारी नहीं है।
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''भारत में जो एपीआई बनते हैं वो भी चीन पर ही निर्भर हैं। इसलिए यहां के जो एपीआई मैन्युफैचर हैं उन पर असर पड़ रहा है और हम जो सीधे चीन से एपीआई आयात करते हैं उसमें भी कमी होने लगी है।''
उनका अनुमान है कि अप्रैल तक शायद आयात फिर से शुरू हो जाए। लेकिन एक से डेढ़ महीने तक ये समस्या जस की तस रह सकती है।
हेमल लाठिया कहते हैं, ''एपीआई के पुराने स्टॉक की क़ीमतें 10 से 15 फ़ीसदी तक बढ़ गई हैं। जो कंपनियां चीन से एपीआई आयात करके स्थानीय कंपनियों को बेचती हैं वो स्टॉक में आ रही कमी की वजह से कीमतें बढ़ाकर एपीआई बेच रही हैं।''
भारत में क्यों कम है एपीआई प्रोडक्शन?
विशेषज्ञों के मुताबिक़, चीन में एपीआई का प्रोडक्शन भारत के मुक़ाबले 20 से 30 फ़ीसदी तक सस्ता है।
हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब चीन से एपीआई आयात रुकने को लेकर चिंता जताई जा रही है। साल 2014 में भी इसे लेकर लोकसभा में सवाल जवाब भी हुए थे।
उस वक़्त दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव की वजह से यह चिंता जताई जा रही थी कि शायद चीन कच्चे माल की सप्लाई रोक सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठकें भी हुईं और इस स्थिति से निपटने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन भी किया गया था।
तत्कालीन रसायन और उर्वरक मंत्री अनंत कुमार ने कहा था कि आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल 12 दवाएं ऐसी हैं जिन्हें तैयार करने के लिए ज़रूरी 80 से 90 प्रतिशत कच्चा माल चीन से आता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, टास्क फोर्स ने सुझाव दिया था कि एपीआई का प्रोडक्शन भारत में बढ़ाना होगा जिससे चीन पर निर्भरता कम हो।
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क्या प्रोडक्शन में कमी आई है?
हेमल लाठिया यह भी कहते हैं कि अधिकतर कंपनियों ने या तो दवाओं का प्रोडक्शन कम कर दिया है या फिर जो स्टॉक उनके पास पहले से था उसी से काम चला रही हैं और बेहद ज़रूरी चीज़ें ही खऱीद रही हैं। अतिरिक्त स्टॉक कोई नहीं खऱीद रहा। मांग ज्य़ादा है और आपूर्ति कम है इसलिए क़ीमतें बढ़ रही हैं। अगर डेढ़ महीने तक सप्लाई नहीं शुरू हुई तो मुश्किलें बढ़ेंगी और क़ीमतें भी।
दवा बनाने वाली कंपनी मैक्सटार-बायो जेनिक्स के डायरेक्टर जगदीश बंसल कहते हैं कि कऱीब 70 फ़ीसदी एपीआई वो चीन से आयात करते हैं। उनकी कंपनी कैप्सूल बनाती है। चीन से आयात बंद होने की वजह से जिन लोगों के पास स्टॉक पहले से रखा है वो ऊंचे दामों में बेच रहे हैं।
जगदीश बंसल कहते हैं, ''जो स्टॉक है वो कऱीब एक महीने तक चल सकता है। अगर एक महीने के अंदर आयात शुरू नहीं हुआ तो काफ़ी मुश्किलें आने वाली हैं।''
वो मानते हैं कि चीन से एपीआई आयात बंद होने की वजह से उनकी कंपनी में दवाओं का प्रोडक्शन कम हो रहा है और सप्लाई जल्दी शुरू नहीं हुई तो दवाओं का बनना रुक सकता है।
हालांकि जगदीश बंसल कहते हैं कि इसकी वजह से फिलहाल दवाओं की कीमतों पर असर नहीं पड़ेगा लेकिन चीन से सप्लाई मिलने में अगर लंबा वक़्त लगा तो असर ज़रूर दिखेगा।
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दिल्ली ड्रग्स ट्रेडर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी आशीष ग्रोवर बताते हैं कि बहुत सी कंपनियां इतना स्टॉक रखती हैं कि दो-तीन महीने तक काम नहीं रुकेगा। लेकिन उसके बाद समस्या आ सकती है। हालांकि वो यह भी उम्मीद जताते हैं कि एक-दो महीने में चीन से एपीआई का आयात शुरू हो जाएगा।
आशीष ग्रोवर कहते हैं, ''प्रोडक्शन चल रहा है लेकिन एपीआई की क़ीमतें बढ़ रही हैं। किसी दवा की मांग अचानक नहीं बढ़ी जिससे लगे कि संकट आ गया है। चीन में कोरोना वायरस फैला है लेकिन उससे जुड़ी कोई दवा यहां से जा नहीं रही इसलिए फिलहाल बाकी दवाओं की कीमतों पर असर नहीं पड़ रहा।''
सरकारी आकंड़े क्या कहते हैं?
फार्मास्यूटिकल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2018-19 में भारत से दवाओं का कुल निर्यात 19 बिलियन डॉलर था।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की मांग के आधार पर डीपीटी और बीसीजी के लिए करीब 65 फ़ीसदी दवाएं भारत में बनती हैं और खसरा के 90 फ़ीसदी टीके भारत बनाता है।
जेनेरिक दवाएं बनाने वाली दुनिया की शीर्ष 20 कंपनियों में आठ कंपनियां भारत की हैं।
भारत से निर्यात होने वाली दवाओं में से 55 फ़ीसदी उत्तरी अमरीका और यूरोप आयात करते हैं। भारत से दवाएं आयात करने वाले देशों में अमरीका सबसे बड़ा आयातक है।
अफ्रीका के जेनरिक दवाओं के बाज़ार में भारत की साझेदारी 50 फ़ीसदी की है।
भारत ने साल 2018-19 में दुनिया के 201 के देशों में 9।52 करोड़ डॉलर की दवाएं निर्यात कीं।
अब चिंता जताई जा रही है कि अगर चीन से एपीआई का आयात लंबे समय तक बंद रहा तो भारत के साथ ही दुनिया भर में दवाओं की किल्लत हो सकती है। साथ ही भारत की अर्थव्यवस्था को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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Date : 24-Feb-2020

पवन वर्मा

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक अमूमन एक रस्मी आयोजन होती है। इसमें मीडिया की नजर किसी राष्ट्र प्रमुख के भाषण से ज्यादा इस बात पर होती है कि उसकी किस दूसरे महत्वपूर्ण नेता से मुलाकात हुई। 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बैठक में भाग लेने न्यूयॉर्क गए तो शुरुआत में यही हो रहा था। लेकिन जब उन्होंने टाउनहॉल स्थित फेसबुक मुख्यालय में कंपनी के संस्थापक और सीईओ मार्क जुकरबर्ग से मुलाकात की तो शायद भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार मीडिया ने इस मुलाकात को मोदी की बाकी राष्ट्र प्रमुखों से मुलाकात से ज्यादा तवज्जो दी।
27 सितंबर, 2015 को मोदी और जुकरबर्ग के बीच हुई यह बातचीत उस दिन मीडिया में छाई रही। सोशल मीडिया में तो उससे बड़ा कोई मुद्दा था ही नहीं। उसी दिन यहां एक खबर वायरल हो रही थी कि डिजिटल इंडिया के समर्थन में जिन लोगों ने प्रोफाइल पिक्चर को तिरंगे में रंगा है उन्होंने अनजाने में ही फेसबुक के एक विवादित कार्यक्रम को समर्थन दे दिया। इस खबर के बाद लोग लगातार यह सवाल पूछ रहे थे कि क्या यह कैंपेन किसी षड्यंत्र का हिस्सा है। हालांकि बाद में जब फेसबुक ने आधिकारिक रूप से इस खबर को नकारते हुए स्पष्टीकरण दे दिया तो सभी लोगों को इस सवाल का जवाब मिल गया और यह विवाद भी खत्म हो गया।
लेकिन मोदी और जुकरबर्ग की इसी मुलाकात से जुड़ा एक सवाल ऐसा है जिस पर सोशल मीडिया में अब भी कयासबाजी चलती रहती है। मोदी से मुलाकात के दौरान मार्क जुकरबर्ग ने इस बात का जिक्र किया था कि एक समय जब फेसबुक बहुत बुरे दौर से गुजर रहा था और कंपनी के बिकने की नौबत आ गई थी तो एपल के सीईओ स्टीव जॉब्स की सलाह पर वे भारत के एक मंदिर में आए थे।
इस घटना की जानकारी देते हुए जुकरबर्ग का कहना था, ‘हमारी कंपनी के इतिहास में निजी तौर पर भारत काफी महत्वपूर्ण है। यह कहानी मैंने सार्वजनिक रूप से कभी नहीं सुनाई और बहुत कम लोगों को इस बारे में पता है। जब चीजें ठीक नहीं चल रही थीं कई लोग फेसबुक को खरीदना चाहते थे।  तब मैं अपने एक मार्गदर्शक स्टीव जॉब्स से मिलने गया। उन्होंने मुझे सलाह दी कि मेरा अपनी कंपनी के लिए जो मिशन है, उससे दोबारा जुडऩे के लिए मुझे भारत के उस मंदिर में जाना चाहिए जहां वे खुद अपने शुरुआती दिनों में गए थे।’
मार्क जुकरबर्ग ने यह पूरी घटना तो बताई लेकिन यह नहीं बताया कि वे भारत में कौन से मंदिर आए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मंच पर उनसे यह नहीं पूछा, लेकिन सोशल मीडिया में तुरंत कयासबाजी शुरू हो गई। लोगों ने इस सवाल का जवाब खोजने के लिए स्टीव जॉब्स की आधिकारिक जीवनी और बीते सालों के उनके साक्षात्कारों व बयानों को खंगालना शुरू किया। कुछ ही घंटे लगे होंगे और सोशल मीडिया और कुछ एक दूसरी न्यूज वेबसाइटों ने एक तरह से घोषणा कर दी कि मार्क जुकरबर्ग उत्तराखंड के नैनीताल स्थित कैंचीधाम आश्रम आए थे। इसका आधार यह था कि स्टीव जॉब्स जब 1980 के दशक में भारत आए तो उनकी मंजिल भी नैनीताल स्थित नीब करौरी बाबा (प्रचलित नाम- नीम करौली बाबा) का यही आश्रम था।
फेसबुक के सीईओ की बात को यदि स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा से सीधे-सीधे जोड़ें तो यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं है। लेकिन यदि आप स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा में बारे में उनके साक्षात्कारों, बयानों और उनके ऊपर लिखी गई किताबों व आलेखों को पढ़ेंगे तो इस बात पर पर्याप्त संदेह उभरते हैं कि उन्होंने जुकरबर्ग को कैंचीधाम आने की सलाह दी होगी।
स्टीव जॉब्स के भारत आने की बात तो सभी मानते हैं कि लेकिन खुद उन्होंने कहीं इसका जिक्र नहीं किया कि वे किस साल भारत आए थे। इंटरनेट पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि 1974 से 1976 के बीच कुछ महीनों के लिए वे भारत आए थे। उनके भारत आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। जिस तरह जुकरबर्ग कहते हैं कि उन्हें स्टीव जॉब्स ने भारत आने की सलाह दी थी उसी तरह जॉब्स को भी उनके एक दोस्त और मार्गदर्शक रॉबर्ट फ्रीडलैंड ने यही सलाह दी थी। 2011 में आई किताब ‘स्टीव जॉब्स’ में वॉल्टर आईजेक्सन लिखते हैं कि रॉबर्ट 1973 में भारत आए थे और नीम करौली बाबा के भक्त बन गए थे। उन्होंने ही स्टीव को सलाह दी थी कि उन्हें बाबा से मिलना चाहिए। रॉबर्ट इस समय खनन क्षेत्र की कंपनी इवान्हो माइन्स के सीईओ हैं और फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार तकरीबन करीब एक से डेढ़ अरब डॉलर के मालिक हैं। स्टीव जॉब्स एपल कंपनी शुरू करने के पहले वीडियो गेम बनाने वाली कंपनी एटारी में काम करते थे। कॉलेज की पढ़ाई छोडक़र उन्हें यहां नौकरी करते हुए कुछ वक्त ही बीता था कि रॉबर्ट से उनकी मुलाकात हो गई। फिर उन्होंने भारत घूमने की चाह में नौकरी छोड़ दी। ‘स्टीव जॉब्स’ में जिक्र है कि उनके लिए भारत की यात्रा एडवेंचर नहीं थी। उन्हें अपने लिए गुरू की तलाश थी और वे यहां आध्यात्मिक यात्रा पर आना चाहते थे।
स्टीव जॉब्स ने भारत की यात्रा शुरू की तो उनका पहला पड़ाव दिल्ली थी। यहां वे पहाडग़ंज के एक होटल में रुके और तुरंत ही खादी का कुर्ता और लुंगी पहनकर साधारण भारतीय लिबास में आ गए। स्टीव जॉब्स पहले से ही भारत और भारतीय दर्शन से काफी प्रभावित थे, लेकिन ‘गुरू’ की खोज के क्रम में जब वे यहां रहे तो भारत से जुड़ी उनकी कई धारणाएं टूटीं। इनमें से पहली तो भारतीयों के बहुत सज्जन होने से जुड़ी थीं। इसका पहला अनुभव उन्हें तब हुआ जब होटल वाले ने उनसे वादा किया कि वे जब तक यहां रुकेंगे उन्हें पीने के लिए फिल्टर्ड पानी मिलेगा, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे स्टीव की तबीयत काफी खराब हो गई।
स्टीव की सेहत जब ठीक हुई तो वे पहले हरिद्वार पहुंचे। यहां कुछ दिन रुकने के बाद वे कैंचीधाम आ गए। हालांकि जब वे नीम करौली बाबा के आश्रम में आए तब उन्हें पता चला कि बाबा का देहांत तो कई दिन पहले हो चुका है। स्टीव जॉब्स के दोस्त डेनियल कोट्टके जो बाद में एपल के पहले कर्मचारी भी बने, ने इस यात्रा में कुछ वक्त स्टीव के साथ बिताया था। 
वे एक इंटरव्यू में कहते हैं, ‘जब हम नीम करौली बाबा आश्रम पहुंचे तो वह काफी सूनी-सूनी सी जगह थी। बाबा के जो हिप्पी भक्त थे अब उनका वहां जमावड़ा नहीं लगता था।’ अब स्टीव जॉब्स को ‘आत्म साक्षात्कार’ की कोई उम्मीद नहीं रही। इस आश्रम को देखकर उन्हें काफी झटका भी लगा।
स्टीव जॉब्स और डेनियल कोट्टके कुछ दिन यहीं रुके और फिर हरियाखान बाबा के आश्रम चले गए। उनकी भी ख्याति थी कि वे अवतार हैं। कोट्टके एक इंटरव्यू में कहते हैं, ‘हरियाखान बाबा अपेक्षाकृत युवा थे। हमने उनके बारे में भी कई बातें सुनी थीं लेकिन उनसे मिलकर हमें ऐसा नहीं लगा कि वे परमज्ञानी हैं।’
स्टीव जॉब्स ने उत्तराखंड की इस यात्रा में कई गांवों और कस्बों को करीब से देखा था। माइकल मोरित्ज ने उनकी एक जीवनी लिखी है। इसमें वे कहते हैं कि स्टीव के दिमाग में जो छवि थी उस हिसाब से उन्हें भारत में ज्यादा गरीबी देखने को मिली। वे देश की इस हालत और इसके ‘माहौल में पवित्रता’ के विरोधाभास से हैरान थे। 
अपनी आधिकारिक जीवनी ‘स्टीव जॉब्स’ में स्टीव के हवाले से कहा गया है, ‘हमें ऐसी कोई जगह नहीं मिलने वाली थी जहां हम आत्मसाक्षात्कार के लिए महीनेभर रुक सकते हों। इस समय पहली बार मैंने सोचना शुरू किया कि नीम करोली बाबा और कार्ल माक्र्स, दोनों ने दुनिया की बेहतरी के लिए शायद उतना नहीं किया जितना थॉमस अल्वा एडीसन ने किया है।’
स्टीव जॉब्स भारत में तकरीबन सात महीने तक रुके। अपनी यात्रा के अंतिम दिनों में वे बौद्ध धर्म से काफी प्रभावित हो गए थे। एपल के संस्थापकों में शामिल स्टीव वोजिनियाक एक इंटरव्यू में बताते हैं कि स्टीव जॉब्स जब भारत से लौटे तो उनका सिर मुंडा हुआ था और वे बौद्ध धर्म के अनुयायी बन चुके थे।
ऊपर लिखे उदाहरण और उद्धरण बस ये बताने के लिए हैं कि सीधे-सीधे यह मान लेना कि स्टीव जॉब्स ‘भारतीय आध्यात्म’ से बहुत प्रभावित थे, सही नहीं है। इसकी एक बानगी 2005 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के उस भाषण से भी मिलती है जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी भारत यात्रा कोई बहुत खुशनुमा यात्रा नहीं थी। अब यदि ऐसा था तो इस बात पर पूरा यकीन करना मुश्किल है कि उन्होंने मार्क जुकरबर्ग को भारत के किसी विशेष मंदिर, जिसे कई लोग कैंचीधाम कह रहे हैं, आने की सलाह दी होगी।
अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों को पाने असफल रहे स्टीव जॉब्स यह जरूर कहते थे भारत आकर उन्होंने आत्मप्रेरणा की शक्ति को समझा। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कई बार कहा कि अमरीकी या पश्चिमी देशों के लोग कामों में बुद्धिमत्ता को तरजीह देते हैं लेकिन भारतीय आत्मप्रेरणा को तरजीह देते हैं और यह ज्यादा प्रभावशाली है। यह अनुभव उन्हें भारत के गांव-कस्बों में घूमते हुए मिला था। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि उन्होंने मार्क जुकरबर्ग को भारत आने की सलाह दी होगी तो वह भारतीय जनजीवन के इसी पहलू को समझने के उद्देश्य से दी होगी। इसके लिए उन्होंने शायद ही ये कहा हो कि मार्क को कैंचीधाम जाना चाहिए। जुकरबर्ग ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत में यह भी कहा था कि वे तकरीबन एक महीने तक भारत में घूमते रहे। भारत में स्टीव जॉब्स के अनुभव समझने के बाद मार्क जुकरबर्ग की दूसरी बात ज्यादा सही लगती है।
वैसे मार्क जुकरबर्ग के एक ‘मंदिर’ में आने की बात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात को एक अलग नजरिए से भी देखा जा सकता है। 2015 में अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान विश्व की तमाम शीर्ष कंपनियों के सीईओ के साथ मोदी की मुलाकात हुई थी। लेकिन भारतीय मीडिया में जुकरबर्ग के पहले सिर्फ एपल के सीईओ टिम कुक ने अलग से चर्चा बटोरी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि उन्होंने भी मोदी से बातचीत के दौरान जिक्र किया था कि एपल का भारत से पुराना नाता है क्योंकि स्टीव जॉब्स कंपनी शुरू करने के पहले भारत की यात्रा पर गए थे। टिम कुक ने सिर्फ इस एक बात से भारतीय मीडिया में बाकी सभी सीईओ को पीछे छोड़ दिया था। इसके बाद ठीक इसी से मिलती-जुलती बात यदि मार्क जुकरबर्ग कही तो बिना लाग-लपेट यह कहा जा सकता है कि तथ्यों के सही-गलत होने से अलग यह जनसंपर्क के लिहाज से बहुत ही प्रभावी बात थी। (सत्याग्रह)

 


Date : 23-Feb-2020

गिरीश मालवीय

वारिस पठान प्रकरण में एक बात पर हम गौर करना भूल गए हैं।  मीडिया चैनल दिन भर वारिस पठान का जहरीला भाषण दिखाते रहे लेकिन एक बार भी उन्होंने इसके लिए एआईएमआईएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओवेसी को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश नहीं की।  मीडिया इसे इस तरह से पेश कर रहा था जैसे ओवैसी ओर पठान दोनों अलग-अलग हो, जबकि इस वक्त वारिस पठान ओवैसी की पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता है और रिपब्लिक चैनल पर बतौर पैनलिस्ट नजर आते रहते हैं। 
एआईएमआईएम नेता और महाराष्ट्र से पूर्व विधायक वारिस पठान इस बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भायखला सीट से लड़े थे। लेकिन हार गए यह वही वारिस पठान है जो कुछ साल पहले भारत माता की जय नहीं बोलने के कारण चर्चा में आए थे। 
महाराष्ट्र में इस बार पार्टी ने धुले और मालेगांव की दो सीटें जीती हैं जबकि इस बार वह एक लोकसभा सीट भी जीतने में सफल हुई है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि 2016 में इस पार्टी की मान्यता स्थानीय स्तर पर रदद् कर दी गई थी और इसकी वजह भी दिलचस्प थी। इनकम और फंड डिटेल्स नहीं जमा करने की वजह से राज्य चुनाव आयोग द्वारा पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द किया गया था।  राज्य चुनाव आयोग ने कहा था कि पार्टी को कई नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन पार्टी निर्धारित तिथि तक टैक्स रिटर्न या ऑडिट रिपोर्ट जमा नहीं करा पाई। पार्टी को 31 दिसंबर 2015 तक ऑडिट और आईटी रिटर्न जमा करने की मोहलत दी गई थी। मान्यता रद्द होने की वजह से ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम उस साल हुए महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में भाग नहीं ले पाई थी। 
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन या एआईएमआईएम पर लगातार साम्प्रदायिकता के आरोप लगते रहे हैं 2018 में महाराष्ट्र के बीड में एक रैली के दौरान ओवैसी ने कहा था कि अगर तुम्हें (मुस्लिम) जिंदा रहना है तो अपने हक के लिए लड़ो और चुनाव में सिर्फ अपने लोगों को जिताओ।
यानी वारिस पठान कोई अनोखी बात नहीं कह रहे हैं। 2018 में इस पार्टी के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका प्रस्तुत की गई। याचिकाकर्ता तिरुपति नरसिम्हा मुरारी ने राजनीतिक दल के रूप में पार्टी की मान्यता खत्म करने का आग्रह करते हुए आरोप लगाया गया था कि ये पार्टी केवल मुसलमानों से संबंधित मुद्दे उठाती है और धर्म के नाम पर वोट मांगती है जो असंवैधानिक है। याचिकाकर्ता ने ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलिमीन यानि एआईएमआईएम को राज्य स्तर की पार्टी के रूप में मान्यता देने के निर्वाचन आयोग के 19 जून 2014 के फैसले को निरस्त करने का आग्रह किया था, लेकिन इस याचिका पर क्या फैसला हुआ कुछ पता नहीं है। 
आखिरकार इस पार्टी पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा रहा है। समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। बिहार के आने वाले विधानसभा इस पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका है। एमआईएमआईएम के उम्मीदवार किशनगंज विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में जीत हासिल करने में सफल रहे हैं, वारिस पठान का यह बयान को इस तरह से राष्ट्रीय मीडिया पर महत्व दिए जाना एक तरह से बिहार चुनाव में पार्टी को रिलॉन्च करने की महत्वपूर्ण तैयारी का ही भाग है। नीतीश कुमार का जो वोट बैंक जो मोदी के साथ आने से छिटक गया है उस वह वोट बैंक युनाइट होकर एक तरफा वोटिंग न कर पाए। यह वारिस पठान के बयान का असली हासिल है अभी तो ऐसे और जहर बुझे बयान सामने आने वाले हैं।

 


Date : 23-Feb-2020

अव्यक्त

राजस्थान के नागौर में दलित युवकों के साथ की गई अमानवीय बर्बरता की कारुणिक चीख और रुदन कानों से जा ही नहीं रही है। लेकिन इस बर्बरता के बाद जब ये अपराधी घर पहुंचे होंगे, तो उनकी मांओं ने उन्हें खीर-पूड़ी परोसकर खिलाया होगा। बहनों ने भैया-भैया कहकर चुहलबाजियां की होंगी। विवाहितों की पत्नियों ने गलबहियों से उनका स्वागत किया होगा। बड़े भैया और पिता ने ऊपरी नाराजगी दिखाकर भी पर्याप्त इशारा दे दिया होगा कि चिंता मत कर। कोर्ट-पुलिस का मामला हम देख लेंगे।
भारत भर में इस वीडियो को देख रहे लाखों गैर-दलित युवक और किशोर बर्बर हंसी हंस रहे होंगे। मजाकिया कैप्शन लगाकर इसे प्राइवेट व्हॉट्सएप ग्रुप में शेयर कर रहे होंगे।
हम देखें कि हमने क्या हाल कर दिया है अपने ही बच्चों का। गुप्तांगों में पेंचकश और पेट्रोल डाल रहे ये बच्चे हमारे ही हैं। आज ये दूसरों के साथ ऐसा कर रहे हैं तो हमें आनंद आ रहा है। लेकिन मत भूलिए कि ये हमारे साथ भी ऐसा ही करेंगे। बल्कि करते भी हैं। बंद कमरों के भीतर करते हैं तो चीख चहारदीवारियों में ही दबकर रह जाती है।
होना तो यह चाहिए था कि बहनें ऐसे भाइयों को राखी बांधने से इंकार करने का सामूहिक और सार्वजनिक वक्तव्य जारी करतीं।  मांएं उन्हें अपना बेटा मानने से इंकार कर देतीं। पत्नियां असहयोग शुरू कर देतीं। प्रेमिकाएं ऐसे हिंसक जाहिलों को पलटकर भी न देखतीं।
भाई और पिता भी आगे बढक़र उन्हें कानून के हवाले करते। ऐसे गैर-दलित युवक-युवतियां जो इंसानी एकता और समानता में सचमुच विश्वास करते हैं, वे लाखों-करोड़ों की संख्या में आगे आकर ऐसे कृत्यों की भत्र्सना करते। अपने साथियों के प्रबोधन का हरसंभव प्रयास करते। तब कम-से-कम यह संदेश जाता कि भारत का गैर-दलित समाज अपनी संतानों को मनुष्य बनाने को लेकर गंभीर है। लेकिन नहीं। जब स्वयं हममें ही मानवता नहीं बची है, तो हम अपनी संतानों को क्या बनाएंगे!
डॉ. लोहिया ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘हिंदू बनाम हिंदू’ में लिखा है- हिंदू शायद दुनिया का सबसे बड़ा पाखंडी होता है, क्योंकि वह न सिर्फ दुनिया के सभी पाखंडियों की तरह दूसरों को धोखा देता है, बल्कि अपने को धोखा देकर खुद अपना नुकसान भी करता है।
एक तरफ हिंदू धर्म अपने छोटे-से-छोटे अनुयायियों के बीच भी दार्शनिक समानता की बात करता है। वह केवल मनुष्य और मनुष्य के बीच ही नहीं, बल्कि मनुष्य और अन्य जीवों और वस्तुओं के बीच भी ऐसी एकता की बात करता है जिसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती।
लेकिन दूसरी तरफ इसी धर्म में गंदी से गंदी सामाजिक विषमता का व्यवहार चलता है। मुझे अक्सर लगता है कि दार्शनिक हिंदू खुशहाल होने पर गरीबों और शूद्रों से पशुओं जैसा और पशुओं से पत्थरों जैसा व्यवहार करता है। इसका शाकाहार और इसकी अहिंसा गिर कर छिपी हुई क्रूरता बन जाती है।
हिंदू धर्म ने सच्चाई और सुंदरता की ऐसी चोटियां हासिल कीं जो किसी और देश में नहीं मिलतीं, लेकिन वह ऐसे अंधेरे गड्ढों में भी गिरा है जहां तक किसी और देश का मनुष्य नहीं गिरा।
जब तक हिंदू मानव जीवन की असलियतों को वैज्ञानिक और लौकिक दृष्टि से स्वीकार करना नहीं सीखता, तब तक वह अपने बंटे हुए दिमाग पर काबू नहीं पा सकता और न कट्टरता को ही खत्म कर सकता है, जिसने अक्सर खुद उसी का सत्यानाश किया है।
यह कहा था डॉ. लोहिया ने आज से 70 साल पहले जुलाई, 1950 में। भारतीय समाज में एक आमूलचूल मानवतावादी पुनर्जागरण की आवश्यकता है। सुधिजन बताएं कि इसके लिए परिवार और समाज के स्तर पर क्या-क्या किया जाना चाहिए!


Date : 23-Feb-2020

ओम तिवारी

राष्ट्रवाद है क्या? क्या वजह है कि इस पर जानकारों की सोच बंटी हुई है? भारत की बात करें तो हालात ऐसे हैं कि राष्ट्रवाद की चर्चा छेड़ते ही बातचीत विवाद का रूप ले लेती है। एक तरफ लोग राष्ट्रवाद को देशभक्ति से जोड़ कर देखते हैं और खुद को राष्ट्रवादी कहलाने में गौरव का अहसास करते हैं। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो राष्ट्रवाद के नाम से ही खार खाते हैं। वे इसे हिटलर-मुसोलिनी की विचारधारा कहते हैं।
नई बहस आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान से पैदा हुई। झारखंड की राजधानी में संघ कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने राष्ट्रवाद शब्द के इस्तेमाल से बचने का जिक्र किया। वे यूनाइटेड किंगडम में संघ के किसी कार्यकर्ता से बातचीत को याद कर रहे थे जिसने उन्हें सलाह दी थी- ‘आप नेशनलिज्म शब्द का इस्तेमाल मत कीजिए। नेशन चलेगा, नैशनल कहेंगे चलेगा, नेशनैलटी भी चलेगा, लेकिन नैशनलिज्म मत कहो क्योंकि इसका मतलब होता है हिटलर, नाजीवाद, फासीवाद।’
मोहन भागवत के इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। कोई इसे भाजपा के लिए आरएसएस की नसीहत बता रहा है। तो कोई इसे राष्ट्रवाद पर कटाक्ष करने वालों पर तंज बता रहा है।
पहले उनका तर्क समझते हैं जो इसे भाजपा को संघ की सलाह मानते हैं। इनके मुताबिक भागवत एक घटना के जरिए बीजेपी से स्पष्ट कर रहे हैं कि अब पार्टी को राष्ट्रवाद से आगे की रणनीति तैयार करनी होगी। क्योंकि राष्ट्रवाद का नारा अब अपना असर खो रहा है। एक के बाद एक चुनावों से यही साबित हो रहा है। जो मंत्र मोदी को दोबारा सत्ता में लाने में सार्थक साबित हुआ वह अब बेअसर होता जा रहा है।
हरियाणा में चुनाव के बाद सत्ता गठबंधन के सहारे चल रही है, तो महाराष्ट्र में सबसे पुराना गठबंधन टूट गया और सत्ता हाथ से निकल गई, उधर झारखंड में ऐसी करारी हार का सामना करना पड़ा जिससे उबरना आसान नहीं होगा। दिल्ली में पार्टी के पास सिर्फ राष्ट्रवाद की नैया बची थी लेकिन विरोधी आम आदमी पार्टी की लहर के सामने वह किनारे नहीं लग सकी।
मोहन भागवत के बयान का दूसरा तर्क रखने वाले लोग उनके भाषण को पूरा सुनने की सलाह दे रहे हैं। उनके मुताबिक आरएसएस चीफ बता रहे हैं कैसे वक्त के साथ शब्दों के मायने बदल जाते हैं। राष्ट्रवाद भी ऐसा ही एक शब्द है जो आज के माहौल में नाजीवाद और फासीवाद का पर्यायवाची बन गया है। इसे अब हिटलर और मुसोलिनी से जोड़ कर देखा जाने लगा है। इस पक्ष के मुताबिक भागवत विपक्ष पर हमला बोल रहे हैं जो बीजेपी की विचारधारा होने की वजह से इस भावना के खिलाफ माहौल बना रहा है। वह बार-बार खुल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर और नाजी से करता है। खुद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ऐसा कर चुके हैं।
राष्ट्रवाद पर बहस कोई नई बात नहीं है। मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन मानते थे कि ‘राष्ट्रवाद एक बचकानी चीज है और मानव जाति के लिए यह खसरा बीमारी जैसी है।’ वहीं प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल कहते थे ‘राष्ट्रवाद इंसान को कीड़े-मकोड़ों की तरह वर्गीकृत करने की एक आदत है जिसमें पूरे यकीन से लाखों-करोड़ों लोगों को अच्छा या बुरा चिन्हित कर दिया जाता है।’
तो क्या राष्ट्रवाद मानव जाति के लिए एक बुरी चीज है और इस विचारधारा से जितनी दूरी रखी जाए उतना ही बेहतर है?
इसका जवाब न और हां दोनों में मिल सकता है। खुद जॉर्ज ऑरवेल ही राष्ट्रवाद को दो श्रेणियों में रखते थे। मोटे तौर पर वे इसे सकारात्मक और नकारात्मक राष्ट्रवाद कहते थे। सकारात्मक राष्ट्रवाद का मतलब होता है अपने देश के लिए प्यार, उसे आगे बढ़ाने की भावना। नकारात्मक राष्ट्रवाद किसी दूसरे देश या समूह के खिलाफ घृणा से संचालित होता है।
जाहिर है अपने देश के प्रति प्रेम की भावना गलत नहीं हो सकती है। इतिहास गवाह है कि कैसे राष्ट्रवाद की भावना ने जापान का कायाकल्प कर दिया। फिलीपींस के आंदोलन की शुरुआत राष्ट्रवाद से ही हुई। अफीम युद्ध के बाद बुरी तरह टूट चुके चीन के लिए भी राष्ट्रवाद ने मरहम का काम किया। पिछले दो सौ साल के इतिहास में ऐसी कई मिसालें मिलती हैं जब राष्ट्रवाद ने देश के लोगों को एक साथ लाने और उन्हें जोडऩे का काम किया। अगर इस तरह की भावना नहीं होती तो कई देश शायद आज भी उपनिवेशवाद के युग में ही जी रहे होते।
लेकिन कहने वाले कह सकते हैं कि अगर यह भावना नहीं होती तो उपनिवेशवाद ही नहीं होता। किसी भी दूसरे समाजिक आंदोलन या विचारधारा की तरह राष्ट्रवाद भी खतरनाक हथियार बन सकता है। जर्मनी और इटली इसकी सबसे बड़ी मिसालें हैं। यहां से हिटलर और मुसोलिनी ने नाजीवाद और फासीवाद को जन्म दिया। हिटलर के सत्ता में आने की बड़ी वजह थी जर्मनी की जर्जर आर्थिक हालत। उसने राष्ट्रवाद  का सहारा लेकर पहले देश के अंदर अपने विरोधियों को खत्म किया फिर उसके नाम पर ही सरहद के बाहर कदम रखा। नाजी मानते थे कि वे सबसे ऊंची नस्ल हैं। नतीजा कितना खौफनाक निकला, पूरी दुनिया जानती है। राष्ट्रवाद की आड़ में मनमानी का यह फॉर्मूला आज भी आजमाया जा रहा है। आरोप लगते हैं कि तुर्की, रूस, ब्राजील, फिलीपींस, ऑस्ट्रिया जैसे कई देशों में नेता राष्ट्रलाद के नाम पर देश को गुमराह कर रहे हैं। जानकार मानते हैं ऐसे देशों में स्थिति अभी भले हिटलर और मुसोलिनी के समय जैसी भयावह नहीं दिखती। लेकिन सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए राष्ट्रवाद की भावना का इस्तेमाल आने वाले समय में बेहद खतरनाक रूप ले सकता है।
जाहिर है कुछ तानाशाहों-हुक्मरानों की वजह से राष्ट्रवाद बदनाम हुआ है। लेकिन क्या इससे कोई विचारधारा गलत हो जाती है? कभी समाजवाद काफी प्रचलित था। अभी परिस्थितियां राष्ट्रवाद के अनुकूल हैं। इनके चलते राष्ट्रवाद के रास्ते कम समय में ज्यादा लोगों को संगठित किया जा सकता है। नकारात्मक राष्ट्रवाद ऐसा और भी तेज़ी से कर सकता है।
भारत में भाजपा खुद को राष्ट्रवादी पार्टी मानती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘इंडिया फस्र्ट’ की बात करते हैं। ‘न्यू इंडिया’ की बात करते हैं। यही वजह है देश की जनता ने दोबारा प्रचंड ताकत देकर उन्हें सत्ता की चाबी सौंपी। कोई शक नहीं सकारात्मक राष्ट्रवाद से देश आगे बढ़ता है। पूरे देश की जनता साथ खड़ी हो तो राष्ट्र विकास के रास्ते पर चल पड़ता है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी का राष्ट्रवाद नकारात्मक है। एक समूह के खिलाफ है। नागरिकता संशोधन कानून और एनसीआर के खिलाफ देश भर में जारी प्रदर्शनों ने उसे नया हथियार दे दिया है। भाजपा इसे भोंथरा कर सकती है। यह साबित करके कि ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ सिर्फ नारा नहीं है। बल्कि सकारात्मक राष्ट्रवाद का सिद्धांत है। (सत्याग्रह)

 


Date : 22-Feb-2020

प्रकाश दुबे

विश्व हिंदू परिषद में नरेन्द्र मोदी विरोधी मोर्चा खोलने वाले डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा की नकेल कसने के लिए वर्ष 1914 में  विष्णु सदाशिव कोकजे को पहले उपाध्यक्ष बनाया। बाद में तोगडिय़ा केा बकायदा चुनाव में पराजित कर कोकजे अध्यक्ष बने। विहिप का प्रतिनिधित्व चंपत राय करेंगे। 
पांच फरवरी को रामजन्म भूमि तीर्थक्षेत्र न्यास की घोषणा के साथ ही कुछ साधु-संत दुर्वासा की तरह शाप देने के लिए उद्धत थे। वे मुदित होंगे। न्यास की घोषणा के अगले सप्ताह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और प्रदेश के वित्तमंत्री सतीश महाना ने प्रयाग जाकर वासुदेवानंद के दर्शन किए। पुष्पहारों से स्वागत किया। मंदिर निर्माण की योजना पर एकांत में चर्चा की। महंत वासुदेवानंद ने अयोध्या जाकर दो अन्य न्यासियों (अवध प्रांत के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख होम्योपैथ अनिल मिश्र और विमलेन्द्र मोहन मिश्र) से चर्चा की। मंदिर आंदोलन की कमान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हाथ में रही। 
पहली कतार में  साधु-संतों के साथ ही संघ का अनुषंगी संगठन विश्व हिंदू परिषद नजऱ आया। विहिप के उपाध्यक्ष चंपत राय ने 12 जनवरी को प्रस्तावित मंदिर के माडल का अनावरण किया था। घोषणा कर दी थी कि यही माडल अयोध्या में मूर्त रूप लेगा। न्यास में पांच प्रमुख शक्तियां सर्वोपरि हैं। विमलेंदु मोहन को अयोध्या का राजा कहा जाता है। अयोध्यावासियों के पप्पू भैया। अयोध्या मंडल के कमिश्नर एम. पी. अग्रवाल ने  विमलेंदु को 67 बिंदु 703 एकड़ जमीन के दस्तावेज सौंपे। साथ ही न्यास के रिसीवर का ओहदा प्रदान कर दिया। 
दूसरा संघ 16 फरवरी को अयोध्या में सरयू नदी के तट पर राम की पैड़ी में संघ की 101 शाखाओं के हजारों स्वयंसेवकों ने शारीरिक प्रदर्शन कर ताकत का अहसास कराया था। तीसरे वासुदेवानंद।  विश्व हिंदू परिषद में नरेन्द्र मोदी विरोधी मोर्चा खोलने वाले डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा की नकेल कसने के लिए वर्ष 1914 में  विष्णु सदाशिव कोकजे को पहले उपाध्यक्ष बनाया। बाद में तोगडिय़ा केा बकायदा चुनाव में पराजित कर कोकजे अध्यक्ष बने। विहिप का प्रतिनिधित्व चंपत राय करेंगे।  
न्यास की पहली बैठक में नृत्यगोपाल दास अध्यक्ष नियुक्त हुए। मुकदमा जारी होने के कारण प्रधानमंत्री ने महंतजी या राय को न्यासी नहीं बनाया। यह दायित्व न्यासियों पर छोड़ा जिन्होंने महंत नृत्य गोपाल दास को अध्यक्ष और चंपक राय को न्याया नियुक्त किया। मोदी सरकार उच्चतम न्यायालय को सफाई देगी कि हमने किसी ऐसे व्यक्ति को न्याया नहीं बनाया जिस पर मुकदमा चल रहा है। 
  संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने 21 मई 1964 को मुंबई में स्वामी चिन्मयानंद के साथ मिलकर विहिप की स्थापना की। संघ प्रमुख सदैव कहते थे कि विहिप और आरएसएस राजनीतिक संगठन नहीं है। संघ परिवार का इन दिनों इन दिनों संसद और विधानसभाओं जमकर प्रतिनिधित्व है। उस समय अलग माहौल था इसलिए 19 जून 1966 को मुंबई में शिवसेना का जन्म हुआ। 19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में बालक माधव का जन्म हुआ था। 19 फरवरी को न्यास की पहली बैठक दिल्ली में आयोजित करना गोलवलकर जी को श्रद्धांजलि देने का निमित्त बना। संघ समर्थित संवाद माध्यम इस संयोग का उल्लेख करने से बचे।   
    निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेन्द्र दास को न्यासी के रूप में मताधिकार से वंचित रखा गया है। अन्य अखाड़ों को न्यास में स्थान न मिलने पर रोष है। रामानंदी संप्रदाय सहित कई वैष्णव संगठन न्यास के गठन से असंतुष्ट हैं। 85 वर्षीय महंत नृत्य गोपालदास वर्ष 2003 से रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष हैं। उनके वारिस महंत कमलनयन दास ने विमलेन्द्र मोहन मिश्र को न्यासी बनाने का विरोध करते हुए कहा-वह राजनीतिक व्यक्ति हैं। विमलेन्द्र कांग्रेस के करीबी थे। बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़े और हारे। 
उन्होंने बीस वर्ष पहले अपनी मां के नाम दर्ज दस एकड़ भूमि विश्व हिंदू परिषद को दान की थी। वहां विहिंप ने कार्यशाला बनाकर मंदिर के लिए पत्थरों की तराश शुरु की थी। विमलेन्द्र राम के वंशज होने के कारण राजा नहीं हैं। उनके पूर्वज को संतानविहीन राजा ने गोद लिया था। 
चर्चा यह भी है कि 1857 की क्रांति में गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़े। युद्ध में पराजित होने के बाद उनकी संपत्ति जब्त हो गई। अयोध्या उनकी रियासत का हिस्सा था।  अंग्रेजों की खिदमत तथा स्वतंत्रता संग्राम का विरोध करने पर अयोध्या विमलेन्द्र के पुरखों को ईनाम में मिला।  राजा कहलाए।
 अंचल के वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह पूरी कहानी सुना सकते हैं।  विमलेन्द्र उर्फ पप्पू भैया के न्यासी पद की पात्रता पर आंच नहीं आती। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने तो विभीषण को लंका का राज ही सौंप दिया था। हिंदू साधु संगठनों में वासुदेवानंद के नाम पर विवाद है।   इलाहाबाद हाइकोर्ट के 22 सितम्बर 2017 के निर्णय में वासुदेवानंद को बद्रिकाश्रम का शंकराचार्य पद से वंचित करते हुए कहा था कि पट्टाभिषेक के समय वे दंडी सन्यासी नहीं थे। चावर, छत्र,  सिंहासन का प्रयोग करने से उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी।  महंत वासुदेवानंद गोरेगांव मुंबई के आसाराम आश्रम के सेवा साधना शिविर सक्रिय रहे हैं।
 द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने तो आरोप लगाया कि उन्होंने अदालत में फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए। साधु-संतों के आपसी विवाद की छाया मंदिर निर्माण पर न पड़े, इसका ध्यान सरकार और न्यासी के रूप में नियुक्त प्रशासनिक अधिकारियों को रखना होगा। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रसिद्ध कविता राम की शक्ति पूजा में प्रसंग है कि 108 कमल की पूजा में एक कमल कम पड़ गया। राम ने अपनी आंख निकालकर चढ़ाने का प्रयास किया। आंख मतलब दृष्टि। मंदिर निर्माण के सकारात्मक पक्षधर निराला के संकेत से सीख पा सकते हैं-रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,  शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन। 
 चार न्यासियों में केन्द्र सरकार भारतीय प्रशासनिक सेवा के सचिव स्तर के अधिकारी को नियुक्त करेगी। उत्तर प्रदेश सरकार भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एक न्यासी का नाम तय करेगी। उनके सिवा अयोध्या का जिला कलेक्टर न्यासी होगा। न्यास के सदस्य अपना सभापति या अध्यक्ष तय करेंगे। 
शर्त यह है कि ये सब हिंदू हों। अध्यक्ष महंत नृन्य गोपाल दास हिंदू हैं। यदि कलेक्टर हिंदू नहीं है तो अतिरिक्त कलेक्टर पदेन न्यासी होगा। विश्व हिंदू परिषद का गठन करने के बाद सरसंघाचालक गुरु गोलवलकर ने कहा था-हिंदू हिंदुस्तानियों के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला शब्द है। यह धर्मों से ऊपर है। उनके कथन को आज भी संघ दोहराता है। संविधान में धर्म के आधर पर प्रतिनिधित्व का उल्लेख नहीं है।
 मुंबई के सिद्धि विनायक में बरसों पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुसलमान को ट्रस्टी नियुक्त किया। बवाल मचा। शिवसेना के तत्कालीन प्रमुख बाल ठाकरे ने निर्णय का स्वागत किया।  सरकार की  हिंदू की परिभाषा अलग होगी। वरना हिंदू धर्म की अनिवार्यता की शर्त रखने की आवश्यकता ही नहीं थी। उम्मीद करें कि विवाद सुलझेंगे। मिलजुलकर निर्माण की ओर पहलकदमी होगी। 
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 


Date : 22-Feb-2020

प्रभाकर

सीपीएम की एक आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि आरएसएस मंदिरों और धर्मस्थलों का इस्तेमाल अपने एजेंडे और हिंदुत्ववाद के प्रचार के लिए करता है।
कभी पश्चिम बंगाल को लेफ्ट का सबसे अजेय लालकिला माना जाता था। लेकिन 2011 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी के पैरों तले की जमीन यहां लगातार खिसक रही है। बीते लोकसभा चुनावों में तो उसका खाता तक नहीं खुल सका था। लेफ्टफ्रंट शुरू से ही धर्म से दूरी बना कर चलता रहा है। लेकिन अब उसके इस नजरिए में बदलाव आ रहा है। सीपीएम की एक आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि धर्म को आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के भरोसे छोडऩे से काम नहीं चलेगा। 
रिपोर्ट में धार्मिक स्थलों के पास बुक स्टॉल खोलने के अलावा चिकित्सा सेवाएं और पीने के पानी की सुविधा मुहैया कराने की सिफारिश की गई है। कहा गया है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले इन उपायों पर अमल करना जरूरी है।
सीपीएम ने बीते साल लोकसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले उपचुनावों में पार्टी की हार की वजहों की समीक्षा की थी। इसके अलावा पार्टी के प्लेनम यानी विशेष अधिवेशन के दौरान लिए गए फैसलों को लागू करने के मुद्दे पर महीनों चले मंथन के बाद पार्टी ने इस महीने एक आंतरिक रिपोर्ट तैयार कर सभी सदस्यों और शाखा संगठनों को भेजा है। इसमें कहा गया है कि पार्टी मंदिरों व दूसरे धर्मस्थलों को आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के रहमोकरम पर नहीं छोड़ सकती। इस मामले में हस्तक्षेप के लिए समुचित कदम उठाए जाने चाहिए। पार्टी का कहना है कि मंदिरों का प्रबंधन ऐसे लोगों के हाथों में होना चाहिए जो धर्मनिरपेक्ष और आस्थावान हों।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आरएसएस मंदिरों और धर्मस्थलों का इस्तेमाल अपन एजेंडे और हिंदुत्ववाद के प्रचार के लिए करता है। वैसे सीपीएम के नेता मूर्तिपूजा से दूरी बरतते रहे हैं। लेकिन धार्मिक त्योहारों के मौके पर वह मेडिकल कैंप और बुक स्टॉल खोल कर आम लोगों से रिश्ते मजबूत करने की कवायद करता रहा है। लेकिन यह पहला मौका है जब पार्टी ने हिंदुत्व के मुकाबले के लिए मंदिर परिसरों में स्थानीय बुक स्टॉल, मेडिकल सेंटर और पेय जल की व्यवस्था की बात कही है।
रिपोर्ट में सांप्रदायिक ताकतों से मुकाबले के लिए आदर्शों की लड़ाई तेज करने की बात भी कही गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शैक्षणिक संस्थानों में सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ आदर्शों की लड़ाई को मजबूत करने के लिए बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों और संस्कृति के विद्वानों को अपने पाले में करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
पार्टी की इस आंतरिक रिपोर्ट ने सीपीएम के आदर्शों में बदलाव पर सवाल उठाया है। लेकिन पार्टी के नेता इन प्रस्तावों को तार्किक ठहराते हैं। उनकी दलील है कि धार्मिक उत्सव और धर्मस्थल आम लोगों के मिलने-जुलने का अवसर है। पार्टी आम लोगों से संबंध मजबूत करने के लिए इनका पहले से बेहतर इस्तेमाल कर सकती है। 
पश्चिम बंगाल विधानसभा में सीपीएम विधायक दल के नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, हम लोगों से जुडऩे के नए-नए तरीके तलाश रहे हैं। इसमें हमारा कोई धार्मिक एजेंडा नहीं है। विभाजनकारी और सांप्रदायिक ताकतों से निपटने के प्रयासों के तहत हम मंदिर समितियों में धर्मनिरपेक्ष लोगों की तादाद बढ़ाने पर जोर देंगे।
वह कहते हैं कि इसका मतलब इन समितियों में सीपीएम के लोगों को शामिल करना नहीं है। सीपीएम नेता चक्रवर्ती कहते हैं कि पार्टी मंदिर परिसरों में पहले भी बुक स्टॉल और मेडिकल सेंटर खोलती रही है। इसी तरह दुर्गापूजा और कालीपूजा के दौरान भी पंडालों के आस-पास स्टॉल लगाए जाते रहे हैं। सामाजिक तौर पर आम लोगों से जुडऩे का इससे बेहतर कोई मौका नहीं हो सकता। वह कहते हैं, अंतर यही है कि अब हम अस्थायी की जगह मंदिरों के नजदीक स्थायी स्टॉल बनाना चाहते हैं।
रिपोर्ट में पार्टी के काडरों को खासकर बंगाल के ग्रामीण इलाकों में आरएसएस के बढ़ते असर पर अंकुश लगाने के लिए आदिवासी इलाकों के शैक्षणिक संस्थानों में अपनी गतिविधियां तेज करने और मौजूदगी बढ़ाने की सलाह दी गई है। ध्यान रहे कि इन इलाकों में आरएसएस की मजबूत उपस्थिति से ही बीते लोकसभा चुनावों में बीजेपी को भारी कामयाबी मिली थी।
दूसरी ओर राजनीतिक दल इसे सीपीएम के चेहरे और चरित्र में बदलाव के तौर पर देख रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत राय मानते हैं कि यह वामपंथियों के आदर्शों में बदलाव का संकेत है। 
वह कहते हैं, सीपीएम अब क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। इसलिए वह राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए नए-नए तरीके तलाश रही है। राय कहते हैं कि सीपीएम पहले भी बंगाल में धार्मिक त्योहारों का सियासी इस्तेमाल करती रही है। अब शायद वह समझ गई है कि धर्म और धार्मिक मूल्यों से नाता तोड़ कर आम लोगों से नहीं जुड़ा जा सकता।
कांग्रेस ने भी इसे सीपीएम के आदर्शों में बदलाव करार दिया है। कांग्रेस सांसद अधीर चौधरी कहते हैं, सीपीएम अब आम लोगों और उनकी धार्मिक भावनाओं से खुद को जोडऩे का प्रयास कर रही है। अपने पैरों तले की खिसकती जमीन को बचाने के लिए उसे लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना होगा। वामपंथी पार्टी भारत में धर्म की अनदेखी कर राजनीति नहीं कर सकती। 
उधर बीजेपी इस बदलाव को देश में सीपीएम के खात्मे का संकेत मानती है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं, अपने आदर्शों से दूर हटने वाली पार्टी का अंत तय है। खुद को नास्तिक कहने वाले वामपंथी अब मंदिर में शरण लेकर अपने एजंडे को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं।वह कहते हैं कि आम लोग इस बदलाव को स्वीकार नहीं करेंगे। सीपीएम पूरे देश में राजनीति के हाशिए पर है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, सीपीएम चाहे कुछ भी कर ले, उसकी चुनावी किस्मत में बदलाव संभव नहीं है। आम लोगों ने उसे नकार दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी के रुख में यह बदलाव अपनी जमीन मजबूत करने का प्रयास है। राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर समरेश सान्याल कहते हैं, "सीपीएम के आदर्शों व नीतियों में प्रस्तावित बदलाव को आम लोग कितना स्वीकार करेंगे और इससे पार्टी को कितना फायदा होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन फिलहाल इस मुद्दे पर पार्टी को आतंरिक मतभेद और विरोध से भी जूझना होगा।
रिपोर्ट प्रभाकर, कोलकाता

 


Date : 22-Feb-2020

मोहम्मद सलीम

हम मुसलमानों के हाथों में शहनाई थमा दी जाती है तो हम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान बन जाते हैं। हमारे हाथों में तबला थमा दिया जाता है तो हम जाकिर साहब बन जाते हैं। हमारे हाथों में म्यूजिक थमा दिया जाता है तो हम ऑस्कर जीतने वाले एआर रहमान बन जाते हैं।  कहीं अदाकारी के युसूफ दिलीप कुमार बन जाते हैं। कहीं दिलकश आवाज के मोहम्मद रफी देश की शान बन जाते हैं। हमारे हाथ में जब साइंस थमा दी जाती है तो हम अब्दुल कलाम बन जाते हैं। थमा दिया वतन का जज्बा तो अशफाक़ उल्ला कहीं अब्दुल हमीद बन जाते हैं। 
 क्या हर बात की शहादत दे हजारों दिन के उलेमा कुर्बान हुए जंगे आजादी में, हमारे हाथ में टेनिस का रैकेट थमा दिया जाता है तो हमारी बहनें सानिया मिजऱ्ा बन जाती हैं।  हमारे हाथ में जब गेंद और बल्ला पकड़ा दिया जाता है तो हम युसूफ पठान और जहीर खान बन जाते हैं। क्योंकि हमें अव्वल रहने की आदत है।  हमारे कदम लडख़ड़ाए तो हम हाजी मस्तान भी बन गए हों।
कभी दाऊद कभी-कभी इंडियन मुजाहदीन बन गए ये हम पर काला दाग है। हम मुस्लिम इसकी पूरी तरह से मज्जमत करते हैं। वतन से हम हैं हम से वतन नहीं।  लेकिन जिस तरह से एक इंद्रधनुष होता है उसमें बहुत सारे रंग होते हैं। उसमें एक रंग काला भी होता है।  ये हमारी जिंदगी का ब्लैक है।  मैं इस व्यवस्था से कहना चाहता हूँ कि भारत के करोड़ों मुसलमानों को उस ब्लैक कलर्स से न पहचाना जाए।  हमारी जिंदगियों के और भी रंग हैं हमें उन रंगों से पहचाना जाए।  हमारी फितरत दिन और इमां की है। बिखेर दी है खुशबू इस गुलिस्ताने हिन्द में। शफकत इमां और दिन की कुछ तो जगह देना ए वतन इस मिट्टी में दफन की, लहू जिगर का हर किसी मां-बाप का जलता है जो उसके हर बेटे को कोई आंतकवादी कहता है। इल्जाम जब किसी बेकसूर पर लगता है तो बताओ भाई उसके दिल पर क्या गुजरती है। कौन कहता है उन कम्जर्फो को सजाए मौत मत दो जिसने भी किसी बेगुनाहों को मारा उसे मौत सरे आम दो।
हर किसी को उसके अपराध की सजा मिलनी चाहिए। चाहे कोई छोटा हो या बड़ा चाहे अमीर हो या गरीब चाहे हिन्दू हो या मुसलमान सजा सबकी एक होनी चाहिए।  वतन सबका है वतन की शान होनी चाहिए। 

 


Date : 21-Feb-2020

आज महाशिवरात्रि का दिन है। आपको हर जगह मार्केट में फूलों की दुकान पर एक ऐसा फल दिखेगा, जिसमें कांटे भी होंगे। इस फल का नाम धतूरा है। भगवान शिव का ये प्रिय फल आपकी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। हालांकि इसका इस्तेमाल केवल ऊपर से करना है।
यह आपकी चोट के दर्द को चुटकियों में दूर कर सकता है। इसके अलावा भी इसके कई फायदे हैं, जिनके बारे में नीचे पूरी जानकारी दी जा रही है। इस बात का विशेष ध्यान दें कि धतूरे को खाने के लिए बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं करना है। यह जानलेवा भी हो सकता है।
फायदे जानने से पहले यह बात जान लें कि इसे केवल त्वचा पर इस्तेमाल करना है। इसे खाना नहीं है, क्योंकि इसमें कुछ जहरीले तत्व भी पाए जाते हैं। ओरल रूप में किया गया इनका सेवन जानलेवा भी हो सकता है। खासकर इसे बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
​कान के किसी भी रोग में करें उपयोग
कान में दर्द और सूजन की स्थिति में आप धतूरे का प्रयोग कर सकते हैं। धतूरे में एंटी-इन्फेल्मेट्री और एंटी-सेप्टिक गुण पाया जाता है। इस कारण से यह कान की इस समस्या को खत्म करता है।गंजेपन से परेशान लोग इसके रस को प्रभावित जगह पर लगा सकते हैं। इसके रस में ऐसे विशेष गुण होते हैं, जो सीबम को स्वस्थ करते हैं और गंजेपन की समस्या को रोक देते हैं।
​गंजेपन की समस्या को करता है खत्म
गंजेपन से परेशान लोग इसके रस को प्रभावित जगह पर लगा सकते हैं। इसके रस में ऐसे विशेष गुण होते हैं, जो सीबम को स्वस्थ करते हैं और गंजेपन की समस्या को रोक देते हैं।
​हड्डियों के जोड़ बनाता है मजबूत
हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए भी धतूरे का उपयोग किया जाता है। धतूरे में कैल्शियम की अच्छी मात्रा पाई जाती है। इसका रस निकालकर हड्डियों के जोड़ पर मालिश करने से यह स्किन पोर से सोख लिया जाता है। जिससे हड्डियों को मजबूती मिलती है।
​चुटकियों में दूर होंगे कई दर्द
अगर आपको किसी प्रकार का दर्द है तो आप इसके जरिए उसे चुटकियों में दूर कर सकते हैं। धतूरे को पीसकर इसका पेस्ट बना लें और इसमें दो चार बूंद शहद की मिला लें। अब इसे दर्द वाले स्थान पर लगा लें। एंटीसेप्टिक गुण होने के कारण इसका पेस्ट आपके दर्द को ठीक कर देगा।
​​चोट की सूजन को करता है दूर
धतूरे के फल में एंटीइन्फ्लेट्री गुण पाया जाता है, जिसके कारण से यह चोट की या सामान्य रूप से हुई सूजन को कम कर देता है। चोट की सूजन को दूर करने के लिए इसके फलों को खूब अच्छी तरह कूट लें। पेस्ट बनाकर इसे सूजन वाली जगह पर लगाकर राहत पाई जा सकती है। प्राइवेट पार्ट में क्रिकेट आदि खेलने के दौरान होने वाली सूजन को दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

 


Date : 21-Feb-2020

पुष्यमित्र

बसंत के मौसम में शिव के विवाह की वर्षगांठ आज आप सबको को मुबारक हो। पता नहीं सनातन धर्मावलंबियों ने क्यों इस अद्भुत देव को संहारक की उपाधि दे दी। इनका बाह्य आवरण भले ही एक औघड़ संन्यासी का लगता हो, मगर दिल से वे अनन्य प्रेमी और सद-गृहस्थ ही लगते हैं। तभी अविवाहित युवतियां शिव जैसे पति की कामना करती हैं। वैसे पति के लिए 16 सोमवार का व्रत रखती है।
यह दिलचस्प है कि विष्णु और उनके अवतार राम जैसे एक पत्नी व्रती और कृष्ण जैसे 16 हजार कन्याओं को छोड़ कर सनातन महिलाओं ने आदर्श प्रेमी और पति के रूप में शिव को मान्यता दी, जो स्वभाव से ही फक्कड़ है। वह अपने परिवार को कोई सुख नहीं देता, मगर सनातन धर्म का संभावत: अकेला देव है जो अपने भरे पूरे परिवार के साथ सार्वजनिक रूप से दिखता है। उसके लिए उसकी पत्नी भांग भी पीस देती है, उसके तमाम नखरे उठाने के लिए तैयार रहती है।
वह एक पत्नी व्रती भी नहीं है। उसका मन पुरुष से स्त्री बने विष्णु के मोहिनी अवतार पर भी डोल जाता है। काली जैसी क्रोधित हो जाने वाली देवी और हिमालय से वेग के साथ उतरी गंगा जैसी स्त्रियों को वही वश में कर पाते हैं। क्या शिव भारतीय मिथकों के आदर्श पुरुष और प्रेमी हैं?
यह शिव ही हैं जिन्हें स्त्रियां अपने रूप से रिझाती हैं, कामदेव उन्हें अपने प्रयोग का निमित्त बनाते हैं। यह वही शिव हैं जो अपनी पत्नी की मृत्यु पर इतने बावले हो जाते हैं कि उन्हें शांत करना मुश्किल हो जाता है। यह वही शिव हैं जिन्हें देखकर कर्मयोगी ऋषियों की पत्नियां बावली हो जाती हैं। यह वही शिव हैं जिनकी पूजा उनके लिंग के स्वरूप में होती है।
हिन्दू धर्म में शिव को देवता के रूप में देर से मान्यता मिली। अमृत मंथन के वक़्त उन्हें देवों के हिस्से का अमृत नहीं मिला, उन्होंने असुरों के हिस्से का विषपान किया। असुर उनसे अक्सर वरदान लेते रहे। हालांकि वे छले भी जाते रहे। उनका अनगढ़ व्यक्तित्व अन्य देवों के समझ से परे था, मगर सनातन स्त्रियों ने उन्हें खूब समझा और अपना माना।
आज भी पूर्वी भारत में शिव गुरु के नाम से एक सम्प्रदाय काफी प्रसिद्ध है, जिसकी प्रचारक घरेलू महिलाएं हैं। उनका शैव सम्प्रदाय देवियों के पूजक शाक्त सम्प्रदाय के काफी करीब है। सभी शाक्त देवियों का शिव से कोई न कोई रिश्ता रहा है। यही वजह है कि शिव को एक अनन्य प्रेमी के बदले संहारक कहना मुझे जँचता नहीं है।
(यह मिथिला पेंटिंग अर्चना मिश्रा जी की वाल से साभार)