संपादकीय
आज बहुत से लोग समाचारों के लिए सोशल मीडिया की तरफ देखते हैं। ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर खबरें सबसे पहले आती हैं, टीवी और समाचार की वेबसाइटों से भी पहले। लेकिन बहुत से लोग फेसबुक पर आने वाली जानकारी को खबरें मानकर उसी से अपना काम चला लेते हैं। अभी पश्चिम में हुई एक गंभीर रिसर्च में यह बात सामने आई है कि वहां रहने वाले लोग अगर मौसम में बदलाव की खबरों के लिए अगर फेसबुक पर भरोसा करते हैं, तो वे गलत जानकारियों से घिरने के खतरे में रहते हैं। अमरीका की कॉर्निल यूनिवर्सिटी में अभी एक रिसर्च में पाया कि 99.5 फीसदी वैज्ञानिक एक बात पर एकमत हैं कि क्लाइमेट चेंज इंसानों का पैदा किया हुआ है। किसी भी निष्कर्ष पर इतने वैज्ञानिक शायद ही कभी एक साथ रहते हैं। लेकिन अगर फेसबुक पर जाएं तो वहां सच्चाई कुछ और है। वहां पर जलवायु परिवर्तन को लेकर पोस्ट की जा रही गलत जानकारियां इस कदर हावी हैं कि अगर कोई उनमें से कुछ बातों में दिलचस्पी ले, तो फेसबुक का एल्गोरिदम् उन्हें ऐसी ही दूसरी गलत जानकारियों से लाद देता है। फेसबुक का काम करने का तरीका यही है कि लोगों की दिलचस्पी जैसी बातों में हो, उन्हें वैसे ही बातें अधिक दिखाई जाती हैं।
अब अभी एक संस्थान ने एक प्रयोग किया, उसने दो अलग-अलग नामों से दो फेसबुक खाते खोले, एक में उसने पर्यावरण और मौसम-बदलाव से जुड़ी हुई सही जानकारी में दिलचस्पी दिखाना शुरू किया, और दूसरे खाते से इन्हीं मुद्दों पर झूठी जानकारी और अफवाह में दिलचस्पी लेना शुरू किया। नतीजा यह निकला कि कुछ ही दिनों में सही देखने वाले को दूसरी सही जानकारियां दिखने लगीं, और गलत देखने वाले पर गलत जानकारियां लदती चली गईं। पर्यावरण को लेकर, वैक्सीन को लेकर, कोरोना और लॉकडाउन को लेकर, हिन्दुस्तान जैसे देश में गोमांस या बीफ को लेकर, मुस्लिमों को लेकर, फेसबुक तरह-तरह की झूठी जानकारी और पूर्वाग्रहों से भरा हुआ है। दुनिया की यह एक सबसे अधिक कमाने वाली कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर भरी हुई गलत और बदनीयत जानकारी को हटाने के लिए दिखावा जरूर करती है, लेकिन यह जाहिर है कि अंधाधुंध कमाई के बावजूद अगर वह गलत सूचना और दुर्भावना के विचार हटाने के लिए, नफरत और हिंसा हटाने के लिए काफी कुछ नहीं कर रही है, तो उसका मतलब यही है कि वह काफी कुछ करना नहीं चाहती है। आज फेसबुक का इश्तहारों का बाजार इस बात पर नहीं टिका है कि उस पर पोस्ट करने वाले, उसे पढऩे वाले या उस पर सक्रिय लोग बेहतर इंसान हैं या नहीं। विज्ञापन देने वालों को सिर्फ गिनती से मतलब रहता है कि कितने लोग फेसबुक पर कितनी देर सक्रिय हैं, और वे कितने इश्तहारों के सामने पड़ते हैं। इसलिए जब फेसबुक यह पाता होगा कि नफरत या झूठी जानकारी को लेकर लोग अधिक सक्रिय रहते हैं, और झूठी जानकारी पाने वाले लोग भी उस प्लेटफॉर्म पर अधिक वक्त गुजारते हैं, तो उसके कम्प्यूटरों का एल्गोरिदम् उन्हीं को बढ़ाने का काम करता होगा क्योंकि आखिरकार फेसबुक है तो कारोबार ही।
जो दो अकाऊंट खोलकर फेसबुक पर यह प्रयोग किया गया उससे यह बात भी सामने आई कि झूठ और गलत जानकारी में दिलचस्पी लेने वाले पर झूठ की बरसात सी हो रही थी, और उसके मुकाबले सही जानकारी पाने वाले को सीमित संख्या में ही सही जानकारी मिल रही थी। मतलब यह कि जो पुरानी कहावत चली आ रही है कि जब तक सच अपने जूतों के तस्मे बांधता है, तब तक झूठ शहर का एक फेरा लगाकर आ जाता है। यह भी लगता है कि हिन्दुस्तान जैसे देश में साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता को बढ़ाने के लिए जो लोग शौकिया, या भुगतान पाकर यह काम करने वाले पेशेवर की तरह काम करते हैं, वे समझदारी की और अहिंसा की बातें करने वालों के मुकाबले बहुत अधिक सक्रिय रहते हैं, और झूठ के मुकाबले सच के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं। आज फेसबुक की पकड़ और जकड़ भयानक रफ्तार से फैलने वाली जंगली घास की तरह हो गई है जो कि दूसरी फसल के लिए जगह नहीं छोड़ती है। आज लोगों की जिंदगी में सामाजिक अंतरसंबंधों का जो समय है, उसका एक बड़ा हिस्सा फेसबुक ने कब्जा रखा है, और वह अगर लापरवाही से, या कि सोच-समझकर लोगों को एक तरफ मोड़ रहा है, तो वह लोगों की लोकतांत्रिक और मानवीय सोच को अपने कारोबारी फायदे के लिए, और अपने किसी बड़े ग्राहक के राजनीतिक या साम्प्रदायिक फायदे के लिए उसी तरह मोड़ रहा है जिस तरह नदी की धार को एक नहर बनाकर उस तरफ मोड़ा जाता है।
फेसबुक के खतरे कम नहीं हैं, और अमरीका में अभी संसद के सामने इसके मालिक की लंबी पेशी हुई है, जिसमें वहां के सांसदों ने फेसबुक के गैरजिम्मेदार रूख के बारे में कड़े सवाल किए हैं। अभी-अभी भारत में फेसबुक के बारे में यह रिपोर्ट आई है कि इसने 2019 के चुनावों के दौर में बाइस महीनों में हुए दस अलग-अलग चुनावों में भाजपा से विज्ञापनों का कम भुगतान लिया है, और दूसरे राजनीतिक दलों से अधिक भुगतान लिया है। पत्रकारों की एक संस्था, द रिपोटर््र्स कलेक्टिव ने एक बड़ा रिसर्च किया है जिसमें उसने यह पाया है कि फेसबुक ने भाजपा, उसके उम्मीद्वारों और उसके सहयोगी संगठनों के इश्तहार जिस रेट पर दिखाए, कांग्रेस के इश्तहार उससे 29 फीसदी अधिक रेट पर दिखाए। जिन लोगों को फेसबुक एक मासूम कारोबार लगता है, उन्हें यह बात समझने में दस-बीस बरस लग सकते हैं कि यह किसी देश के लोकतंत्र को, वहां की जनता की पसंद को प्रभावित करने का एक धंधा भी है, और यह सिर्फ चुनाव प्रभावित करने की मशीन नहीं है, यह नफरत फैलाने और हिंसा फैलाने का प्लेटफॉर्म भी है जिसे अंधाधुंध कमाई के बावजूद सुधारा नहीं जा रहा है। रिपोर्टरों की इसी जांच-पड़ताल में यह बताया है कि फेसबुक ने भाजपा के एजेंडा को बढ़ाने वाले बहुत से दूसरे मुखौटाधारी विज्ञापनदाताओं को खूब बढ़ावा दिया, और उसने भाजपा की विरोधी पार्टियों और उनके उम्मीदवारों के मुद्दों को उठाने वाले वैसे विज्ञापनदाताओं को ब्लॉक करने का काम भी किया।
फेसबुक नाम का यह खतरा हिन्दुस्तानी चुनावों के इतिहास में बूथ पर कब्जा करने वाले गुंडों की तरह का दिखता नहीं है, लेकिन यह लोकतंत्र में जनता की सोच को प्रभावित करने का भाड़े का एक हथियार बन गया है जो कि मानो सुपारी लेकर काम करता है।
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कर्नाटक में पहले हिजाब को लेकर सत्ता और सत्तारूढ़ पार्टी के फतवे चले, जिसने पांच राज्यों के चुनाव के बीच देश में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का काम किया। फिर कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिजाब के हक की मांग करने वाली मुस्लिम छात्राओं को कोई राहत नहीं दी, तो वह मुद्दा फिलहाल टल गया, और कर्नाटक भाजपा के बड़े नेताओं ने प्रदेश की हिन्दू आबादी से अपील की कि वे मुस्लिम तरीके से, हलाल करके काटे गए जानवर का गोश्त न खाएं क्योंकि उससे मुस्लिम एक आर्थिक जिहाद चला रहे हैं। यह मामला अभी हवा में उछला ही हुआ था कि वहां हाईकोर्ट के एक फैसले के मुताबिक सभी धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाने की जगह मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के फतवे दिए गए, और कर्नाटक का एक पुराना घोर साम्प्रदायिक संगठन श्रीराम सेना इसके लिए जुट गया है। अभी इसको चार दिन भी नहीं हुए हैं कि श्रीराम सेना ने मुस्लिम फल व्यापारियों के बहिष्कार का फतवा दिया है, और उसका तर्क है कि आम के थोक बाजार पर मुस्लिम कारोबारियों का दबदबा है जो हिन्दू किसानों से फल खरीदने के लिए इंतजार कराते हैं, और फिर सस्ते रेट पर आधी रात में आम खरीदते हैं। इस संगठन का कहना है कि कुछ जिलों में पचास फीसदी तक फल-सब्जी कारोबारी मुसलमान हैं।
भाजपा के राज वाले इस प्रदेश में मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई से लेकर उनके मंत्री, उनकी भाजपा के बड़े नेता, और दूसरे हिन्दू संगठन लगातार प्रदेश में मुस्लिमों पर हमला करने का अभियान चलाए हुए हैं, और कर्नाटक हमलावर हिन्दुत्व की एक प्रयोगशाला की तरह चलाया जा रहा है। ऐसा भी नहीं है कि यह देश में ऐसे हिंसक, अलोकतांत्रिक, और साम्प्रदायिक प्रयोग करने वाला अकेला प्रदेश है, लेकिन यह योगी के उत्तरप्रदेश और शिवराज के मध्यप्रदेश के मुकाबले भी कई गुना अधिक साम्प्रदायिक हो चुका है, और बढ़ते चल रहा है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इन तमाम मुस्लिम विरोधी मुद्दों का पर्याप्त असर जनता पर नहीं हुआ, और आम लोगों ने ऐसी फतवेबाजी को अनसुना किया है इसलिए नए-नए मुद्दे उठाए जा रहे हैं ताकि लोग कहीं चैन से रहना जारी न रखें। लेकिन राजनीति की समझ रखने वाले लोगों का एक दूसरा भी सोचना है। कुछ जानकार मानते और बताते हैं कि मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई पहले जनता दल में थे, और 2008 में वे भारतीय जनता पार्टी में आए। उन्होंने पिछले भाजपा मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के साथ काम किया था, और अब मुख्यमंत्री बने। लेकिन भाजपा के दायरे में ऐसा माना जाता है कि बोम्मई की कार्यकर्ताओं के बीच कोई पकड़ नहीं है, और वे भाजपा में नए हैं, और वे लोगों के बीच कट्टर हिन्दुत्व को बढ़ावा देकर अपनी एक बुनियाद बना रहे हैं।
जो भी हो, भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी है और उसकी एक राज्य सरकार उसकी राष्ट्रीय नीतियों से परे मनमानी तो कर नहीं सकती है। और एक संगठन के रूप में भाजपा की तरफ से कर्नाटक के इन हिन्दुत्व-प्रयोगों के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है, बल्कि इनका साथ ही दिया गया है। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि कर्नाटक की इस प्रयोगशाला को केन्द्र सरकार और भाजपा की मंजूरी प्राप्त है। यह भी लगता है कि एक के बाद दूसरा लगातार ऐसा प्रयोग क्या राष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले कई प्रयोगों के पहले का कोई पायलट प्रोजेक्ट तो नहीं है? कई बार राजनीति और सार्वजनिक जीवन में जनमत और जनभावना को तौलने के लिए ऐसे प्रयोग किए जाते हैं, और देश के अलग-अलग तबकों का बर्दाश्त देखकर उनका विस्तार किया जाता है। अभी कुछ लोगों का यह भी मानना है कि कश्मीर फाइल्स नाम की एक फिल्म पर लोगों का रूख और रूझान देखकर अब किसी बड़े फैसले की तैयारी चल रही है, और इस फिल्म को एक नरेटिव सेट करने के लिए उतारा गया, लोगों की भावनाएं तौली गईं, और उन भावनाओं को एक सांचे में ढाला भी गया। कश्मीर से धारा 370 खत्म करने के बाद, और राज्य का तीन हिस्सों में बंटवारा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 24 अप्रैल को पहली बार कश्मीर प्रवास पर जा रहे हैं। वे वहां पर कश्मीरी पंडितों के कार्यक्रम में भी जाएंगे। इसलिए अगर कश्मीर फाइल फिल्म को लेकर देश भर में बना, और बनाया गया माहौल प्रधानमंत्री के इस प्रवास के पहले की भूमिका की तरह था, तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए। और इसी तरह कर्नाटक में अभी चल रहे आक्रामक प्रयोग अगर देश भर में ऐसे धार्मिक ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिकता का पायलट प्रोजेक्ट हैं, तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए।
सवाल यह है कि आज जब हिन्दुस्तान और बाकी दुनिया एक आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं, गिने-चुने लोगों के हाथ की दौलत बढ़ते चल रही है, लेकिन आबादी के अधिकतर हिस्से का हाल खराब होते चल रहा है, वैसे में देश को साम्प्रदायिकता के प्रयोगों, और फिर उनके विस्तार में झोंकने की अभी ऐसी क्या हड़बड़ी है? क्या यह 2024 के आम चुनावों के पहले जमीन को जोतकर फसल के लिए तैयार करने की लंबी तैयारी है, या फिर इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी, उसे तौला जा रहा है?
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि कर्नाटक में चल रहे ऐसे हिंसक और साम्प्रदायिक प्रयोगों का जो विरोध, कांग्रेस, जनता दल, जैसे संगठनों को करना चाहिए था, वैसा किया नहीं जा रहा है। ये राजनीतिक पार्टियां भी चुप बैठी हैं, या चुप सरीखी हैं। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के इतिहास के इस दौर में सबकी प्रतिक्रिया दर्ज होते चल रही है।
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ हुई एक बैठक में देश के बड़े अफसरों ने यह सुझाया है कि अलग-अलग राज्य सरकारें जिस तरह लोगों को मुफ्त में चीजें देने में लगी हुई हैं, उससे इन प्रदेशों की माली हालत बहुत खराब हो सकती है। प्रधानमंत्री की देश के करीब दो दर्जन से अधिक बड़े अफसरों के साथ यह बैठक शायद की मुफ्त की योजनाओं को लेकर ही की गई थी क्योंकि इस बैठक की इन्हीं मुद्दों पर चर्चा सामने आई है। खबरों में जो आया है उसके मुताबिक बैठक में उन राज्यों की चर्चा हुई जो कि कर्ज में डूबे हुए हैं लेकिन जो वोट के बदले नोट सरीखी मुफ्त के तोहफों वाली योजनाएं घोषित किए जा रहे हैं, और लागू किए जा रहे हैं। यह जानकारी सामने रखी गई कि बिहार पर ढाई लाख करोड़, पंजाब पर पौन तीन करोड़ से अधिक, आन्ध्र पर करीब चार लाख करोड़, गुजरात पर पांच लाख करोड़, बंगाल पर साढ़े पांच लाख करोड़ से अधिक, और उत्तरप्रदेश पर साढ़े छह लाख करोड़ से अधिक का कर्ज है। लेकिन तमाम राज्य चुनावों के वक्त तरह-तरह की मुफ्त चीजों की घोषणा करते हैं, और फिर कम या अधिक हद तक इसे पूरा करते हैं। नतीजा यह होता है कि विकास के कामों के लिए सरकारों के पास पैसा नहीं बचता, बल्कि चुनावी वायदों के लिए भी राज्यों को लंबा-चौड़ा कर्ज लेना पड़ता है। इस बैठक में शामिल अफसरों ने श्रीलंका की मिसाल सामने रखी कि जिस तरह वहां पर अर्थव्यवस्था चौपट हुई है, उसी तरह की नौबत भारत के कई राज्यों में या पूरे देश में आ सकती है। हालांकि श्रीलंका को लेकर कई और वजहें भी गिनाई गईं, जो कि कम या अधिक हद तक भारत पर भी लागू होती हैं, लेकिन हम आज यहां पर जनता को मुफ्त में चीजें देकर वोटों के लिए रिझाने वाले पहलू पर ही बात करना चाहते हैं।
लोगों को याद होगा कि हिन्दुस्तान में तमिलनाडु जैसा राज्य जनता को सरकारी खर्च पर तोहफे देने में सबसे अधिक चर्चित रहा है, और वहां एक वक्त मुख्यमंत्री रहीं जयललिता का नाम जोड़-जोडक़र लोगों को तरह-तरह के मुफ्त सामान दिए जाते थे। यह एक अलग बात है कि बाकी तमाम राज्यों की तरह तमिलनाडु में भी मुफ्त के ऐसे सामानों की खरीदी और सप्लाई का बड़ा ठेका चलता था, और जिसमें बड़ा भ्रष्टाचार भी होता था। सरकारें जब भी किसी सामान को मुफ्त बांटती हैं तो उनमें सप्लायर के मार्फत बड़ी रिश्वतखोरी की गुंजाइश पहले तय होती है क्योंकि जो जनता किसी सामान को मुफ्त में पाती है, वह उसकी क्वालिटी को लेकर कोई सवाल नहीं करती, हिन्दुस्तान में लंबे समय से कहावत चली आ रही है कि दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते। एक-एक करके बहुत से राज्यों में अलग-अलग पार्टियों ने एक-दूसरे आगे बढऩे के लिए मुफ्त के सामानों का मुकाबला खड़ा किया, और अब वह बढ़ते-बढ़ते नगदी पर आ गया है, और हाल में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कुछ पार्टियों ने हर महिला को हर महीने कुछ हजार रूपये देने की घोषणा भी की है।
लेकिन लोगों को मुफ्त मिलने वाले सामानों को एक ही दर्जे में रखना ठीक नहीं है। छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के पहले कार्यकाल से ही गरीबों को सस्ता चावल देने की जो योजना शुरू हुई, वह कभी बंद नहीं हो पाई क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी चाहे बदल जाए, गरीब समाज की यह जरूरत नहीं बदली है, और कोई पार्टी इसे बंद करने की हिम्मत नहीं कर सकती। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय गरीबों को सबसे बड़ा तोहफा देने का काम तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने किया था, उन्होंने तेंदूपत्ता का राष्ट्रीयकरण करके उन्हीं मजदूरों के बीच सारी कमाई बांटना शुरू किया था, पूरे प्रदेश में रिक्शा चलाने वालों को मालिकाना हक दिया था, सरकारी जमीन पर जो जहां बसे हुए थे, उन्हें वहां उसी जगह का मालिकाना हक दिया था, और हर गरीब के घर पर एकबत्ती कनेक्शन दिया था। इनमें से कोई भी योजना बंद नहीं हो सकी क्योंकि ये बड़े-बड़े तबकों के फायदे की तो थी हीं, ये समाज के आर्थिक विकास और गरीब परिवारों के मानवीय-सामाजिक विकास के लिए भी जरूरी थीं। इसी तरह स्कूलों में दोपहर के भोजन की योजना, पोषण आहार केन्द्रों में गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को पोषण आहार की योजना से सबसे गरीब तबके को कुपोषण की जिंदगी से कुछ हद तक राहत मिली, और सबसे गरीब जनता के जीवन स्तर को एक न्यूनतम स्तर तक लाने की कोशिशों को सरकारी तोहफों से जोडक़र नहीं देखना चाहिए, हालांकि शहरी-संपन्न तबका ऐसा करता है क्योंकि सस्ता अनाज मिलने और मनरेगा में काम मिलने की वजह से शहरों को अब सस्ते और बेबस मजदूर नहीं मिलते।
कमजोर तबकों के न्यूनतम खानपान और न्यूनतम रहन-सहन, इलाज और पढ़ाई से जुड़ी हुई योजनाओं को तोहफे में गिनना गलत होगा। लेकिन हाल के बरसों में अलग-अलग चुनावों के वक्त सरकारें बिना आर्थिक बेबसी वाले तबकों को भी तरह-तरह से नगद या सामानों के जो तोहफे दे रही हैं, उससे उन राज्यों में विकास ठप्प होना तय है। जब सरकार अपनी कमाई से भी बाहर जाकर कर्ज लेकर लोगों में बांटती है, तो यह तय है कि जरूरी योजनाओं पर खर्च के लिए उसके पास पैसा ही नहीं बचेगा। फिर हाल ही में जिस तरह कर्नाटक के सरकारी ठेकेदारों ने प्रधानमंत्री को लिखकर भेजा है कि भाजपा की राज्य सरकार ठेकेदारों से चालीस फीसदी कमीशन मांग रही है, तो उससे भी यह तय है कि राज्यों के बजट का जो हिस्सा विकास कार्यों के लिए रहता है, उसका एक बड़ा हिस्सा इस तरह के भ्रष्टाचार में भी चले जाता है। इसलिए देश को इस बारे में सोचना चाहिए कि जनता के किस तबके को कौन सी बुनियादी जरूरतों के लिए मदद करना मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना नहीं है, और इन चीजों को बढ़ावा देना वोटरों को रिश्वत देने सरीखा काम है।
ऐसे ही वक्त याद पड़ता है कि देश में योजना आयोग नाम की एक संस्था थी जिसके सामने हर राज्य को अपने बजट और आर्थिक कार्यक्रम रखने पड़ते थे, और वहां से उसे कई किस्म की नसीहतें भी मिलती थीं, जानकारों के सुझाव मिलते थे। लेकिन चूंकि वह नेहरू के वक्त की बनी हुई संस्था थी, इसलिए यह जाहिर है कि अब उसकी जरूरत नहीं रह गई थी, और आज प्रधानमंत्री के साथ एक बैठक में कुछ अफसर उस तरह की चर्चा कर रहे हैं जिस तरह कि बात योजना आयोग में औपचारिक रूप से होती थी, और राज्यों की काफी हद तक जवाबदेही भी तय रहती थी। आज जब जनता की सामूहिक चेतना इस हद तक गैरजिम्मेदार हो गई है कि उसे राज्य के दीवालिया हो जाने की कीमत पर भी मुफ्त के तोहफे सुहा रहे हैं, तो उसका वोट पाने के लिए राजनीतिक दल तो इस तरह की तोहफेबाजी करते ही रहेंगे। यह सिलसिला पता नहीं कहां जाकर थमेगा, शायद वहां तक जाए कि इसकी हालत श्रीलंका जैसी दीवालिया हो जाए।
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हिन्दुस्तान के पड़ोस में दो देशों में अलग-अलग वजहों से एक भयानक अस्थिरता की नौबत आई हुई है, और इसका भारत पर कई तरह से असर पडऩा तय है। श्रीलंका में जो आर्थिक इमरजेंसी खड़ी हुई है उसमें वहां के लोगों का जीना मुहाल हो गया है, सरकार खत्म हो चुकी है, सत्तारूढ़ कुनबा अपने इस्तीफे देकर विपक्षियों को सरकार में शामिल होने का न्यौता देकर बैठा है, यह एक और बात है कि डूबते हुए जहाज की ऐसी कप्तानी में भागीदारी करना कोई नहीं चाहते। यह एक अजीब सा देश हो चुका था जिसमें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भाई हैं, और इनके कुनबे के तीन और लोग अलग-अलग मंत्री हैं। अभी जब देश में बगावत की नौबत आ गई, लोगों के पास खाने को नहीं बचा, देश में बिजली-पेट्रोल नहीं बचा, जब राजधानी में लोगों की भीड़ राष्ट्रपति भवन की तरफ बढ़ गई, तब ऐसे जनदबाव में परिवार के तीन लोगों ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया क्योंकि राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री छोडक़र सभी मंत्रियों के इस्तीफे ले लिए गए थे। लेकिन नाराज जनता सडक़ों पर नारे लगा रही है कि ये राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री भी जाएं क्योंकि आर्थिक बदहाली के लिए वे ही जिम्मेदार हैं। श्रीलंका से यह सबक लेना जरूरी है कि किस तरह वहां बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक आबादी के बीच चले लंबे गृहयुद्ध ने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट किया, फिर श्रीलंका से होने वाले सामानों का निर्यात घटा, और 2019 में राजधानी कोलंबो में होटलों और चर्चों पर आतंकी हमले हुए जिसमें साढ़े तीन सौ से ज्यादा लोग मारे गए, और श्रीलंका का पर्यटन उद्योग पूरी तरह चौपट हो गया। यही तमाम बातें देश की कमाई थी, और सब कुछ खत्म होने के साथ-साथ अभी ठीक एक बरस पहले राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने एक सनकी फैसला लिया कि देश में रासायनिक खाद का इस्तेमाल पूरी तरह बंद किया जा रहा है, और खाद का आना रोक दिया गया, फसल गिर गई, और यह अर्थव्यवस्था के ताबूत की आखिरी कील साबित हुई। आज श्रीलंका दाने-दाने को मोहताज है, और अपने बंदरगाह चीन के पास गिरवी रखकर एक-एक दिन काट रहा है, भारत से मदद की अपील कर रहा है।
भारत के दूसरी ओर पाकिस्तान एक बिल्कुल ही अलग किस्म की राजनीतिक अस्थिरता से घिर गया है, अपनी ही पार्टी में अल्पमत का शिकार होकर प्रधानमंत्री इमरान खान ने संसद के भीतर अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने की बात तो कही, लेकिन अपनी ही पार्टी के संसद अध्यक्ष के हाथों अविश्वास प्रस्ताव को खारिज करवाकर उन्होंने राष्ट्रपति के मार्फत संसद भंग करवा दी, और अब देश एक और चुनाव के मुहाने पर पहुंच रहा है। हालांकि अभी सुप्रीम कोर्ट में संसद के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई चल रही है, लेकिन यह देश अपने अस्थिर लोकतंत्र की लंबी परंपरा को बढ़ाते हुए आज फिर बुरी तरह अस्थिर खड़ा हुआ है। देश में ऐसे ही मौकों पर फौज ने कई बार सत्ता संभाली हुई है, और इस बार भी अगर ऐसी कोई नौबत आती है तो वह अभूतपूर्व नहीं रहेगी, और न ही ऐतिहासिक रहेगी। दिक्कत यह है कि पाकिस्तान और हिन्दुस्तान जब-जब किसी घरेलू संकट का शिकार होते हैं तो वहां की सरकारें सरहद पार पड़ोस से कोई टकराव खड़ा करके लोगों का ध्यान उधर खींचने का काम करती हैं। ऐसे में पाकिस्तान की घरेलू समस्या कब भारत के लिए कोई समस्या हो सकती है, इसका अंदाज लगाना न बहुत आसान है, और न बहुत मुश्किल। पाकिस्तान से भारत की चल रही तनातनी के चलते हुए वहां का कोई बोझ सीधे-सीधे हिन्दुस्तान पर नहीं पडऩे वाला है, लेकिन कार्यकाल के बीच में बदलने वाली सरकार पता नहीं कैसी अगली सरकार के लिए रास्ता खाली करेगी, और उसकी भारत नीति कैसी रहेगी, यह एक फिक्र की बात तो है ही क्योंकि पाकिस्तान मुस्लिम आतंकियों की पनाहगाह भी है, और एक परमाणु शक्ति भी है। पाकिस्तान में परमाणु शक्ति अगर आतंकी हाथों तक पहुंचती है, तो उसके नतीजे कल्पना से परे के भयानक हो सकते हैं। इसलिए वहां पर लोकतंत्र की शिकस्त को लेकर खुशी मनाने वाले कुछ हिन्दुस्तानी हालात की नजाकत को नहीं समझते हैं।
श्रीलंका में जब कभी गृहयुद्ध होता है, या कोई और आर्थिक संकट आता है तो उसका असर भारत के कुछ हिस्सों पर भी पड़ता है। भारत का तमिलनाडु न सिर्फ श्रीलंका के बहुत करीब है, बल्कि श्रीलंका की तमिल आबादी पहले भी गृहयुद्ध के चलते हुए लाखों की संख्या में तमिलनाडु में आकर शरणार्थी रह चुकी है। अभी भी पिछले कुछ दिनों में श्रीलंका से तमिल लोग तमिलनाडु पहुंच रहे हैं, और यह भारत के लिए एक फिक्र की बात रहेगी, भारत पर एक बड़ा आर्थिक बोझ भी रहेगा। भारत के लिए श्रीलंका एक मजबूरी इसलिए है कि मुसीबत में उसका साथ न देने पर वह चीन की गोद में जाकर बैठने को मजबूर हो जाएगा, और वह भारत के लिए एक बड़ा फौजी खतरा रहेगा। इसलिए पाकिस्तान से अलग, श्रीलंका भारत के लिए एक आर्थिक बोझ रहेगा, और आज हिन्दुस्तान की खुद की हालत ऐसी नहीं है कि वह श्रीलंका को एक सीमा से अधिक मदद कर सके। इतना जरूर है कि जहां श्रीलंका में सत्तारूढ़ नेता जनता का भरोसा पूरी तरह खोकर उसके निशाने पर हैं, जहां पाकिस्तान ने प्रधानमंत्री इमरान खान अपनी पार्टी के सांसदों का भी भरोसा खो चुके हैं, वहां पर हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश में एक अभूतपूर्व जनसमर्थन वाले नेता बने हुए हैं। लेकिन देश पर पडऩे वाले बोझ और देश की सरहदों पर खड़े खतरे को अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत जैसे बड़े देश का नेता, और यह देश पड़ोसी देशों में हो रही हलचल से अछूता नहीं रह सकता। भारत की विदेश नीति की जटिलताओं को समझने वाले इस बात को बेहतर तरीके से समझ और समझा सकते हैं कि इन दो देशों के अलावा चीन के साथ चल रहे तनावपूर्ण संबंधों को भी साथ-साथ निभाना भारत का एक बड़ा बोझ है। यह देखना भी दिलचस्प है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के ऐसे मोर्चे पर इसी महीने भारत में नए विदेश सचिव काम सम्हालने जा रहे हैं, जो कि अभी तक एक बहुत ही छोटे देश नेपाल में भारत के राजदूत हैं। भारत सरकार की यह नीति भी थोड़ा हैरान करती है कि जो देश का अगला विदेश सचिव होने जा रहा था, उसे नेपाल जैसे छोटे देश में राजदूत रखा गया था। खैर, आने वाले महीने कई देशों के साथ भारत के संबंधों को लेकर बड़े नाजुक बने रहेंगे, आगे-आगे देखें, होता है क्या।
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यूक्रेन में रूसी हमले की रफ्तार शायद कुछ इलाकों में कुछ कम हुई है, और एक शहर में जहां से रूसी फौजों को पीछे हटना पड़ा है वहां पर एक साथ चार सौ से अधिक नागरिकों की लाशें मिली हैं। अब बचे हुए यूक्रेनियों को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि चारों तरफ बिखरी लाशों का निपटारा कैसा किया जाए। और जब लाशें सड़ रही हों, लोगों के इलाज के लिए डॉक्टर न हों, तब क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि इन लाशों का डीएनए टेस्ट करवाकर रखा जाए ताकि बाद में इनके परिवार के लोगों को पता लग सके कि इनकी मौत हो गई थी, और क्या इनको दफन करने की जगह का भी कोई रिकॉर्ड रखा जा सकता है? जब जिंदा लोगों को बचाने के साधन-सुविधा न हों, तो फिर कफन-दफन की गुंजाइश कहां निकलती है। जिन परिवारों के लोग अपने लोगों को नहीं ढूंढ पाएंगे, आज जंग के बीच उन्हें मरा हुआ ही मान लिया जाएगा। जंग महज फौजों को खत्म नहीं करती है, किसी देश के इतिहास, वर्तमान और भविष्य सबको खत्म करती है।
आज दुनिया के अधिकतर देश रूस और यूक्रेन को लेकर अपनी रणनीति तय कर चुके हैं, और उनमें कोई बदलाव होते नहीं दिख रहा है। इन खबरों के आने के बाद भी उनमें कोई बदलाव आते नहीं दिखेगा कि यूक्रेन में चल रही बमबारी और धमाकों की वजह से वहां पर गर्भवती महिलाओं को समयपूर्व प्रसव हो रहा है, और ऐसे जल्द जन्मे बच्चे चार सौ और छह सौ ग्राम वजन के भी हैं जिन्हें बचा पाना आम हालात में भी नामुमकिन सा रहता, और आज तो गिर रही इमारतों के बीच, बिना बिजली, बिना दवाई किस तरह से इन बच्चों को बचाया जा सकेगा, बचाया जा रहा है, यह वहीं के समर्पित स्वास्थ्य कर्मचारी जानते हैं। कई ऐसे मामले युक्रेन के शहरों से सुनाई पड़ रहे हैं जिनके बारे में डॉक्टरों का कहना है कि आम दिनों में जितने समयपूर्व प्रसव होते हैं, जंग शुरू होने के बाद से उनकी संख्या तीन गुना बढ़ चुकी है। ऐसे जन्म के पहले कई माताएं तीन-तीन दिन तक बिना खाए-पिए लगातार सफर करके अस्पताल तक पहुंची हैं, और जन्म दिया है। ऐसे हालात में गर्भ में वक्त पूरा किए बिना पैदा बच्चों के बचने की गुंजाइश भी बहुत कम रह जाती है, लेकिन दुनिया के अलग-अलग देशों की अपनी-अपनी रणनीति और प्राथमिकताएं हैं। किसी को तेल चाहिए, किसी को फौजी साज-सामान चाहिए, किसी को अमरीका के खिलाफ हिफाजत चाहिए, किसी को अमरीका से मदद चाहिए, दुनिया का हर देश विदेश नीति के मामले में पहले अपने देश के प्रति अपनी नीति तय करता है, और उसके बाद ही वह किसी और मोर्चे पर इंसाफ के बारे में सोचता है। अभी कुछ ही वक्त पहले हमने लिखा था कि हर देश के विदेश मंत्रालय के बाहर बिना लिखा हुआ एक नोटिस टंगा होता है कि नैतिकता बाहर छोडक़र आएं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नैतिकता के दिन लद गए हैं, और एक वक्त ऐसे महान नेताओं का दौर था जो पूरी दुनिया के भले की कोशिश करने में अपने देश के लोगों को भी नाराज करने का हौसला रखते थे, जिन्होंने पूरी इंसानियत का भला सोचकर अपने लोगों के हिस्से कुछ तकलीफ ले लेने को तकलीफ नहीं माना था। आज रूस की संपन्नता और उसके बाहुबल को देखते हुए दुनिया के कई देश यूक्रेन की तकलीफ को देखना भी नहीं चाहते क्योंकि उसे देखना महंगा पड़ेगा। जिस तरह हिन्दुस्तान में किसी दबंग से मार खाते किसी कमजोर को बचाने की हसरत कम ही लोगों में जाग सकती है, कुछ वैसा ही आज यूक्रेन के साथ हो रहा है, कुछ ऐसा ही इस सदी में इराक के साथ हुआ, अफगानिस्तान के साथ हुआ, सीरिया के साथ हुआ।
आज यूक्रेन की तकलीफ छोटी नहीं है, लेकिन वह विश्व इतिहास में अभूतपूर्व भी नहीं है। बहुत से देशों ने बड़ी ताकतों के हाथों इस तरह की मार खाई है, और दुनिया का इतिहास बताता है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी कागजी संस्था के सूखे आंसुओं से परे किसी देश ने नैतिकता के आधार पर शायद ही कभी किसी का साथ दिया हो, या किसी का विरोध किया हो। जब अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने गढ़े हुए झूठे सुबूतों के आधार पर इराक पर हमला किया था, तो संयुक्त राष्ट्र के सारे विरोध के बावजूद दुनिया के देश अमरीका के साथ बने रहे, और हमले में भागीदार भी रहे। जिन जनसंहार के हथियारों के इराक में होने का दावा अमरीका ने किया था, उनमें से कोई हथियार वहां नहीं निकला, फिर भी इराक के मुखिया सद्दाम हुसैन को मौत की सजा दे दी गई। दुनिया के अनगिनत देशों में अमरीका ने ऐसे हमले किए, लेकिन इनका विरोध महज उन देशों ने किया जो अमरीका का विरोध वैसे भी कर रहे थे। इसलिए विश्व राजनीति में अपने लिए सस्ता तेल, अपने लिए हथियार पाने का मौका छोडक़र शायद ही कोई देश नैतिकता के आधार पर दूसरे देश का साथ देता है। आज अमरीका और पश्चिम के जो देश यूक्रेन के साथ खड़े दिख रहे हैं, उनकी अपनी रणनीति रूस का विरोध करने की है, और रूस को नुकसान पहुंचाने के लिए ये देश यूक्रेनी फौजों और नागरिकों की जिंदगी की कीमत पर भी इस जंग को जारी रखना चाहते हैं, जारी रखे हुए हैं।
विश्व इतिहास इस बात को अच्छी तरह दर्ज करेगा कि दुनिया की एक महाशक्ति रूस ने जब एक बेकसूर यूक्रेन पर हमला किया था, और वहां वक्त से पहले पैदा होने वाले बच्चे इस तरह मर रहे थे, तब कौन-कौन से देश इसे अनदेखा कर रहे थे।
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उत्तरप्रदेश के गोंडा की एक खबर है कि चार बच्चों की एक मां और सत्रह साल के उसके प्रेमी लडक़े ने एक साथ, लेकिन अलग-अलग जगहों पर आत्महत्या कर ली। दोनों ने फांसी लगा ली। इस महिला का पति बाहर रहकर काम करता है, उसके चार बच्चे हैं, जिनमें बड़ी लडक़ी की उम्र मां के इस प्रेमी लडक़े से कुल पांच साल कम है। नवीं कक्षा में पढऩे वाला यह लडक़ा घर के आसपास की ही इस दोगुनी उम्र, 34 बरस की इस महिला के साथ प्रेम-संबंध में था। आसपास के लोगों को जब इसकी खबर लगी तो दहशत में आकर इन दोनों ने अलग-अलग आत्महत्या कर ली।
हिन्दुस्तान में ही नहीं, बल्कि हर देश में ऐसे मामले सामने आते हैं, कुछ समाज व्यवस्थाएं अधिक उदार हैं, और उनमें लोग मनचाहे रिश्ते बना सकते हैं, उन्हें कोई कुछ नहीं कहते। दूसरी तरफ कुछ समाज अधिक तंगदिल होते हैं, और उनमें ऐसे संबंध मरने-मारने की नौबत ले आते हैं। हिन्दुस्तान पढ़-लिख गया है, संपन्न भी हो गया है, लेकिन यहां तो जवान और बालिग प्रेमी जोड़े को भी अपनी पसंद से प्रेम करने या शादी करने की छूट नहीं मिलती है, ऐसे में इस देश में विवाहेत्तर संबंधों को भला कैसे छूट मिल सकती है। फिर जिस घटना से आज यहां लिखने की वजह बन रही है उसमें तो यह लडक़ा नाबालिग था, और महिला अधेड़ थी, शादीशुदा थी, और चार बच्चों की मां भी थी। लेकिन जैसा कि जिंदगी की हकीकत में होता है, प्रेम और देह संबंध न तो उम्र का फासला देखते हैं, और न ही रिश्तों के वर्जित होने से उनमें कोई बाधा आती है। लोगों के तन और मन की जरूरतें जाति और समाज व्यवस्था से लाखों बरस पुरानी हैं, और अधिक बुनियादी हैं। वे जरूरत पडऩे पर तमाम व्यवस्थाओं को तोडक़र अपने इंसान होने का दावा करने लगती हैं।
यह भी समझने की जरूरत है कि विकास होने के साथ-साथ क्या दुनिया में सामाजिक प्रतिबंध कहीं पर कम हो रहे हैं, और कहीं पर बढ़ रहे हैं? दुनिया के जिन देशों में लोगों के बीच बेरोजगारी अधिक है, जहां लोग ठलहा बैठे हुए हैं, जहां महिलाओं को काम करने के मौके कम हैं, और जहां घरेलू काम और पड़ोस के गॉसिप तक सीमित रहना उनकी मजबूरी है, उन जगहों पर समाज के प्रतिबंध बढ़ते चलते हैं। दूसरी तरफ जिन देशों में खूब आर्थिक विकास है, जहां पर हर किसी के पास या तो रोजगार है, या फिर जीने के और तरीके हैं, वहां पर समाज व्यवस्था भी उदार होने लगती है क्योंकि तमाम लोग अपने आपमें मस्त रहते हैं। जहां लोगों के पास अपने वक्त का इस्तेमाल नहीं रहता है, वहां पर उन्हें धार्मिक आध्यात्मिक प्रवचनों में फंसाकर रखा जाता है, और वहां संकीर्णता पनपने लगती है।
वैसे दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देशों को देखें तो वहां पर भी एक कमउम्र नाबालिग, और दूसरे अधेड़ के बीच के सेक्स संबंध जुर्म के दायरे में ही आते हैं, और उत्तरप्रदेश के गोंडा का यह ताजा मामला उसी दर्जे का है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ अरसा पहले ही छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में ऐसा एक मामला सामने आया था जिसमें एक अधेड़ शिक्षिका ने अपने एक नाबालिग छात्र से जबर्दस्ती सेक्स-संबंध बना लिए थे, और फिर उस लडक़े ने थक-हारकर तनाव में खुदकुशी कर ली थी, और उसकी छोड़ी चिट्ठी की बिना पर उस शिक्षिका को गिरफ्तार भी किया गया था।
जब कभी अपने आसपास की आम और औसत समाज व्यवस्था से बहुत परे जाकर तन या मन के कोई संबंध बनते हैं, तो वे कई बार मरने या मारने तक पहुंच जाते हैं। धर्म, जाति, या परिवार ऐसे लोगों को मारने पर उतारू हो जाते हैं, या फिर उन्हें इतना प्रताडि़त किया जाता है कि वे खुदकुशी कर लें। भारत चूंकि विविधताओं वाला देश है, और यहां पर न सिर्फ धर्म और जाति की विविधता है, बल्कि क्षेत्रीय रीति-रिवाजों, और स्थानीय संस्कृतियों की विविधता भी है, और इतने किस्म की समाज व्यवस्था लोगों की निजी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को कुचलने के लिए काफी रहती हैं। जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ रहा है, जैसे-जैसे लड़कियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ रही है, वैसे-वैसे सामाजिक दबाव से बाहर निकलने की संभावनाएं बढ़ रही हैं। फिलहाल आत्मघाती हिंसा के ऐसे मामलों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि लोगों को अगर सामाजिक बंधनों को तोडक़र अपने हिसाब से जीना है, तो उन्हें अपनी जगह और अपनी आर्थिक क्षमता के बारे में पहले सोचना चाहिए। गोंडा में जिस तरह बाहर कमाने गए एक गरीब कामगार की बीवी ऐसे रिश्ते में पड़ी, उसके बजाय अगर वह किसी महानगर में रहने वाली करोड़पति महिला होती, और अपने आसपास के किसी नाबालिग लडक़े से उसका रिश्ता हो गया रहता, तो उन दोनों के मरने की नौबत उतनी आसान से नहीं आई रहती। मतलब यह कि एक ही देश, एक ही धर्म, समान समाज व्यवस्था में भी अलग-अलग आर्थिक क्षमता के लोगों के लिए सामाजिक नियम अलग-अलग रहते हैं। करोड़ों के किसी फ्लैट में साथ रहने वाले गैरशादीशुदा लडक़े-लडक़ी को अड़ोस-पड़ोस के ऐसे किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ता जैसा कि किसी मोहल्ले में एक कमरा लेकर रहने वाले अविवाहित लडक़े-लडक़ी को झेलना पड़ेगा। मतलब यह कि पैसे की ताकत लोगों को कई किस्म की तथाकथित अनैतिकता की ताकत भी दे देती है।
लोगों को अपने दायरे को देखते हुए ही अपना चाल-चलन तय करना चाहिए, वरना लोग उन्हें मार डालेंगे, या खुदकुशी के लिए मजबूर कर देंगे। जब कांच के मछलीघर में मछलियों को रखा जाता है, तो वे पानी की पीएच वेल्यू अपने हिसाब से बदल लेती हैं, और अगर नहीं बदल पातीं, तो मर जाने का खतरा ढोती हैं। इंसानों को भी या तो समाज की सोच को बदलना होगा, या उसकी तलवार के सामने अपनी गर्दन रखनी होगी।
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गुजरात के अहमदाबाद में मौजूद महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम के पूरे इलाके को विकसित करने के गुजरात सरकार के एक बहुत बड़े इरादे के खिलाफ गांधी के पड़पोते तुषार गांधी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के खिलाफ तुषार की याचिका खारिज कर दी थी, और अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी सुनवाई मंजूर कर ली, और कल उसने गुजरात हाईकोर्ट को यह निर्देश दिया है कि वह तुषार गांधी की अपील की जांच करे।
राज्य की भाजपा सरकार ने साबरमती आश्रम को बारह सौ करोड़ रूपए लगाकर विकसित करने की योजना बनाई है। इसमें आश्रम के मूल ढांचे को तो नहीं छुआ जा रहा है, लेकिन उसके आसपास कई एकड़ की जमीन पर विशाल योजना है, जिसे तुषार गांधी महात्मा गांधी की सोच के खिलाफ बतला रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे सादगी और किफायत का गांधी का पूरा दर्शन ही परास्त हो जाएगा। गुजरात सरकार की ओर से हाईकोर्ट में यह केस आने पर एक छोटा सा जवाब दे दिया गया था कि साबरमती आश्रम के मूल ढांचे को नहीं छुआ जा रहा है, और हाईकोर्ट ने उस जवाब से संतुष्ट होकर तुषार गांधी की याचिका खारिज कर दी थी।
गांधी की अपनी जिंदगी सादगी और त्याग की एक मिसाल रही। उन्होंने एक धोती को काटकर दो टुकड़े किए, और एक वक्त पर एक टुकड़े से ही अपना काम चलाया। वे कम से कम सामान और खपत के साथ जीते थे, अपने खुद के तमाम काम खुद करते थे, और उनके आश्रमों की जिंदगी भी बहुत ही किफायत की थी। यह सोच पाना भी तकलीफ देता है कि गांधी के आश्रम को विकसित करने पर बारह सौ करोड़ रूपए खर्च किए जा रहे हैं, और उस देश में खर्च किए जा रहे हैं जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी गरीबी की रेखा के नीचे है, भूख की कगार पर है, जिसके बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जिन्हें ठीक से इलाज नसीब नहीं है, जिन्हें ठीक से इंसाफ नसीब नहीं है। ऐसे देश में सरदार पटेल के नाम पर तीन हजार करोड़ से अधिक की एक प्रतिमा बना दी गई, और अब गांधी के आश्रम के पूरे इलाके को बारह सौ करोड़ रूपए से एक नई शक्ल दी जा रही है, यह जाहिर है कि वहां आश्रम की दहलीज तक पहुंचते-पहुंचते लोग इतना कुछ देख चुके रहेंगे कि गांधी की किफायत की सोच की हवा खत्म हो चुकी होगी।
यह देश अब निर्माण के ठेके देने वाली सरकारों, ठेके पाने वाले ठेकेदारों, और योजनाओं पर अपने नाम का ठप्पा लगाने वाले नेताओं और योजनाशास्त्रियों का देश होकर रह गया है। छत्तीसगढ़ में नई राजधानी बनाने के लिए नया रायपुर नाम का एक खाली शहर बसाया गया था, जहां आज भी मरघटी सन्नाटा छाया रहता है, और उस पर भी हजारों करोड़ रूपए खर्च कर दिए गए थे जिसकी कोई उत्पादकता नहीं है। कुछ ऐसा ही हाल बरसों तक गुजरात की राजधानी अहमदाबाद के बारे में सुनाई पड़ता था जहां गांधीनगर नाम का नया राजधानी शहर बसाया गया था, और जहां बरसों तक दिन में भी उल्लू बोलते थे। सरकार और ठेकेदार के लिए खूबसूरत सपने की तरह का नया रायपुर आज भी अपने सन्नाटे के चलते एक छत्तीसगढ़ी कहावत याद दिलाता है कि वहां मरे रोवय्या न मिले। सरकारों की ऐसी बड़ी योजनाएं जिनसे जनता का कोई भला नहीं होता, वे अहंकार और कमाई दोनों के लिए बनाई जाती हैं, कुछ से अहंकार पूरा होता है, कुछ से कमाई पूरी होती है, और कुछ से दोनों साथ-साथ पूरे होते हैं। अब बारह सौ करोड़ रूपए जिस साबरमती के संत के नाम पर खर्च किए जा रहे हैं, उसने अपनी पूरी जिंदगी यह कहते हुए गुजारी कि लोगों के काम ऐसे रहने चाहिए कि उससे समाज के सबसे कमजोर तबके के आखिरी व्यक्ति का फायदा हो सके। आज सरकारों के फैसले नेताओं और ठेकेदारों को फायदा देते हैं, फिर चाहे वे गांधी की स्मृतियों को कुचल देने की कीमत पर ही क्यों न हों।
इस देश को महान विरासतों से लेकर शहरों की स्थानीय विरासत तक जहां जो मिला है, उसे राह चलते मिल गई बिन मालिक की गाय की तरह दुहने के लिए लोग उतारू रहते हैं। इस देश के शहरों को देखें तो सैकड़ों या हजारों बरस पहले के जो तालाब हैं, आज उनका बाजारू इस्तेमाल हो रहा है, अंग्रेजों के वक्त छोड़े गए खेल के मैदानों को काट-काटकर वहां मनोरंजन और पार्किंग का इस्तेमाल हो रहा है, कहीं तालाबों को पाटकर खाने-पीने के बाजार बनाए जा रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट के तमाम हुक्म कचरे की टोकरी में फेंक दिए गए हैं। सरकार और बाजार की मिलीजुली बदनीयत इतनी ताकतवर हो जाती है कि उसके खिलाफ लंबी अदालती लड़ाई भी अगर कोई रोक लाती है, तो उससे बचने के लिए सरकारें इतना संघर्ष करती हैं जितना संघर्ष किसी पेशेवर मुजरिम का नियमित वेतनभोगी वकील भी नहीं करता।
जिन लोगों को आज गांधी को गालियां देने वालों को और गोडसे का महिमामंडन करने वालों को संसद पहुंचाने में ओवरटाईम करना सुहा रहा है, वे अगर गांधी की स्मृति पर हजारों करोड़ रूपए खर्च करने जा रहे हैं, तो वह गांधी के लिए नहीं है, नेता, आर्किटेक्ट, और ठेकेदार के भले के लिए है। ठीक ऐसा ही दिल्ली में बीस हजार करोड़ रूपए खर्च करके नए संसद भवन और उसके इलाके को बनाने में किया जा रहा है। देश की विरासत को बर्बाद करने की एक बड़ी मिसाल जालियांवाला बाग है जहां पर ऐतिहासिक निशानों को मिटाते हुए, दीवारों पर दर्ज इतिहास खत्म करते हुए उस पूरे इलाके को सैलानियों के कारोबार के लिए विकसित किया गया है, और उस भयानक त्रासदी की अनगिनत यादों को मिटा दिया गया है।
रूस तो आज यूक्रेन पर हमला करते हुए वहां की ऐतिहासिक इमारतों को खत्म कर रहा है, लेकिन हिन्दुस्तान में तो यहां की सरकार ही इस काम में लगी है, और बाकी प्रदेशों में भी सरकारें अपने-अपने स्तर पर ऐतिहासिक या प्राकृतिक धरोहरों को खत्म करके एक कार्यकाल की अधिक से अधिक काली कमाई का रिकॉर्ड बनाने में लगी हुई हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने तुषार गांधी के तर्क को नहीं समझा, यह उस हाईकोर्ट की कमजोर समझ है, जो कि सरकार का साथ देने से कम नहीं है। हमारा यह मानना है कि साबरमती आश्रम हो या कि गांधी से जुड़ी हुई कोई भी और याद, उसके संरक्षण के अलावा और कोई आधुनिक या सरकारी दखल उनमें नहीं होना चाहिए, वह इतिहास को खत्म करना भी होगा, और गांधीवाद को भी।
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केरल की एक खबर है कि वहां त्रिशूर जिले के एक प्रमुख मंदिर में एक समारोह में एक भरत नाट्यम नर्तकी को इसलिए कार्यक्रम में प्रदर्शन से रोक दिया गया क्योंकि वह हिन्दू नहीं थी। यह मंदिर राज्य शासन के नियंत्रण वाला मंदिर ट्रस्ट चलाता है। मनसिया नाम की इस नर्तकी ने भरत नाट्यम में पीएचडी भी किया हुआ है, और एक मुस्लिम परिवार से आने की वजह से उसे अपने नृत्य के लिए मुस्लिम मुल्लाओं की आलोचना भी झेलना पड़ी है। अपने फेसबुक पेज पर मनसिया ने अभी लिखा कि 21 अप्रैल को मंदिर में उसका कार्यक्रम तय था, और वहां के एक पदाधिकारी ने उसे बाद में फोन करके यह कहा कि चूंकि वह हिन्दू नहीं है इसलिए उसे वहां के कार्यक्रम में नृत्य करने की इजाजत नहीं दी जा रही। अब इस बखेड़े के खड़े होने पर लोग उससे यह भी पूछ रहे हैं कि क्या वह संगीतकार श्याम कल्याण से शादी के बाद हिन्दू हो चुकी है? मनसिया का कहना है कि उसका कोई धर्म नहीं है, और वह अब कहां जाए? कुछ बरस पहले भी केरल के एक और बड़े प्रमुख मंदिर ने उसे निर्धारित कार्यक्रम से मना कर दिया था, और उस वक्त भी उसके गैरहिन्दू होने की वजह बताई गई थी। उसका कहना है कि जब कोई एक कला किसी एक धर्म में प्रतिबंधित हो, और वह अनिवार्य रूप से किसी दूसरे धर्म से जुड़ी हुई हो, तो फिर उसके जैसी कलाकार कहां जा सकती है? अभी त्रिशूर के इस मंदिर के बारह एकड़ के आहाते में दस दिनों तक यह समारोह चलना है, और इसमें करीब आठ सौ कलाकार मंच पर प्रस्तुति देंगे, लेकिन चूंकि ट्रस्ट के पूछने पर मनसिया ने लिखकर दिया था कि उसका कोई धर्म नहीं है, इसलिए उसे ट्रस्ट ने इजाजत नहीं दी। यह हाल केरल का है जहां पर अब तक वामपंथी और कांग्रेस ही राज करते आए हैं। लोगों को याद होगा कि यहां के एक प्रमुख मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर लंबा बवाल चले आ रहा है।
यह खबर इस दौर में आई है जब कर्नाटक की भाजपा सरकार ने मुस्लिम लड़कियों का हिजाब पहनकर स्कूल-कॉलेज जाना रोक दिया है, और हाईकोर्ट से भी इन लड़कियों को कोई राहत नहीं मिली है। इसके बाद मानो सरकार और सत्तारूढ़ भाजपा की हसरत पूरी न हुई हो, प्रदेश भाजपा के बड़े पदाधिकारियों ने प्रदेश के हिन्दुओं से हलाल मीट का बहिष्कार करने के लिए कहा है ताकि मुस्लिम कसाई भूखे मरें। इसी कर्नाटक से समझदारी की एक आवाज उठी है और वहां की एक कामयाब बेटी, देश की एक प्रमुख उद्योगपति किरण मजूमदार शॉ ने अभी एक ट्वीट में कर्नाटक के मुख्यमंत्री को नसीहत दी है कि राज्य में बढ़ते धार्मिक विभाजन का जल्द हल निकालें, नहीं तो इस साम्प्रदायिकता में देश तबाह हो जाएगा। कर्नाटक में अभी सत्ता और भाजपा के दबाव में मंदिरों के त्यौहारों पर उनके आसपास भी किसी गैर हिन्दू के व्यापार करने से रोका जा रहा है, और इसी पर किरण मजूमदार शॉ ने यह ट्वीट किया है- कर्नाटक ने हमेशा समावेशी आर्थिक विकास किया है, और हमें इस तरह केसाम्प्रदायिक बहिष्कार की अनुमति नहीं देनी चाहिए, अगर सूचना प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी साम्प्रदायिक हो गई तो यह हमारे वैश्विक नेतृत्व को नष्ट कर देगी। उन्होंने सीएम से खुली अपील की कि इस धार्मिक विभाजन को हल करें। इस पर भाजपा के नेता उन पर टूट पड़े हैं, और इसे राजनीतिक पूर्वाग्रह का बयान बताया है।
भाजपा के राज वाले कर्नाटक में, और वामपंथी राज वाले केरल में धर्म का हाल एक जैसा है। कहीं सत्ता और धर्म मिलकर कदमताल कर रहे हैं, और कहीं धर्मनिरपेक्ष सत्ता रहने पर भी मंदिर देश के लोगों में, कलाकारों में इतना भयानक भेदभाव कर रहे हैं। धर्म में लोगों के बीच खाई खोदने की इतनी अपार क्षमता है कि खुदाई करने वाली बड़ी से बड़ी मशीनें भी उनके मुकाबले कमजोर साबित हों। आज जब दुनिया के अधिकतर देश आर्थिक मंदी का सामना कर रहे हैं, महंगाई, बेरोजगारी से उबरने की कोशिश कर रहे हैं, वैसे में हिन्दुस्तान को धर्म के ऐसे तमाम मुद्दों में उलझाया जा रहा है जिनसे देश के तबाह होने का खतरा बढ़ते चल रहा है। और यह बात किसी कम्युनिस्ट की कही हुई नहीं है जिस पर भाजपा के लोग लाठी लेकर टूट पड़ें, यह बात देश की एक प्रमुख उद्योगपति की कही हुई है जो कि समय-समय पर अपनी सामाजिक चेतना लिखने के लिए जानी जाती हैं, और अभी भी उन्होंने यही काम किया है। जब कोई सत्ता या संगठन देश-प्रदेश का भला चाहने वाले लोगों की भली नीयत की बातों के लिए इतनी हिकारत और नफरत पाल लें, तो उनके राज में तबाही का खतरा बढ़ते चलता है। जो धर्म किसी को दो रोटी नहीं दे सकता, जो धर्म लगातार दुनिया में सबसे बड़ी सामाजिक बेइंसाफी बना हुआ है, उस धर्म को मुसीबत से गुजर रहे इस देश में लोगों के कमाने और जिंदा रहने पर इतना हावी किया जा रहा है कि उससे लोगों को तमाम ईश्वर मिलकर भी नहीं बचा सकेंगे। आज जब देश के कारोबारी होठों को सिलकर बैठे हुए हैं, वैसे में किरण मजूमदार शॉ ने जो हौसला दिखाया है, वह काबिले तारीफ है और देश के भले का है। इसे खारिज कर देना ठीक नहीं है, और देश को बचाने के लिए और अधिक लोगों को सामने आना पड़ेगा, मुंह खोलना पड़ेगा।
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रूस और यूक्रेन के बीच जो जंग चल रही है उसके चलते योरप के बाकी देश और अमरीका कई तरह से और कई वजहों से फिक्रमंद हैं। एक तो उन्हें गैस और तेल की सप्लाई मुश्किल में पड़ते दिख रही है जिसकी वजह से इन देशों को उस सऊदी अरब से बात करनी पड़ रही है जिससे वे अनबोला रखना चाहते थे क्योंकि उसने अपने एक पत्रकार का कत्ल करवाया था, और मानवाधिकारों का हनन कर रहा है। दूसरी तरफ उन्हें ईरान के साथ नरमी बरतनी पड़ रही है क्योंकि वे रूस के मुकाबले ईरान का तेल बाजार में चाहते हैं, और इसके लिए उन्हें कई आर्थिक प्रतिबंध हटाने पड़ सकते हैं। लेकिन यूक्रेन से निकलने वाले दसियों लाख शरणार्थियों के लिए भी पड़ोस के देशों को जगह बनानी पड़ रही है जो कि आसान नहीं है। अमरीका ने भी एक लाख यूक्रेनी शरणार्थियों को जगह देने की घोषणा की है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच पश्चिम के देशों को यूक्रेन का साथ सीमित हद तक देने के बावजूद रूस से एक असीमित खतरा है, और इसकी तरफ से हर रूस विरोधी देश चौकन्ना रहना चाहता है, लेकिन यह उतना आसान भी नहीं है।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि आने वाले वक्त की जंग सरहदों पर हथियारों से लडऩे के बजाय एक साइबर जंग भी हो सकती है जिससे कि कुछ कम्प्यूटरों पर बैठे हुए लोग दुनिया के किसी भी देश के तमाम सरकारी और सार्वजनिक इंतजाम तबाह कर सकते हैं। इस तरह की तबाही के कुछ नमूने हॉलीवुड की फिल्मों में दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उससे परे असल जिंदगी में भी ऐसे साइबर हमले होते आए हैं, और कोई वजह नहीं है कि रूस और चीन जैसी काबिल साइबर ताकतें वक्त आने पर अपने विरोधी और दुश्मन देशों को साइबर अटैक से तबाह करने की कोशिश न करें। आज यह माना जा रहा है कि चूंकि अमरीका और योरप के देशों ने रूस पर बहुत से आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं तो रूस के घोषित और अघोषित साइबर हैकर इन देशों में तबाही ला सकते हैं। रूस के हैकर पहले भी यूक्रेन पर ऐसे हमले करते आए हैं, और कभी वहां पर बिजली का इंतजाम चौपट कर देते हैं, तो कभी कुछ और। यूक्रेन पर किए गए ऐसे ही एक और रूसी हमले से एक तबाही वाला सॉफ्टवेयर दुनिया भर में फैल गया था, और उससे लाखों कम्प्यूटरों को नुकसान हुआ था, कामकाज और कारोबार चौपट हुआ था। ऐसे ही एक साइबर हमले की वजह से अमरीका में तेल की पाईप लाईन बंद करनी पड़ी थी, और अमरीका के कई राज्यों में इमरजेंसी घोषित करनी पड़ी थी, पेट्रोल पंपों पर अफरा-तफरी मच गई थी। दुनिया भर में कई तरह के साइबर जुर्म करने वाले मुजरिम रूस में बसे हुए हैं, और वे सरकार के साथ मिलकर, या फिर सरकार की अनदेखी से वहां काम करते हैं, और दुनिया भर से वसूली करते हैं। अब पश्चिम की सरकारों को यह आशंका है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन रूस के साइबर मुजरिमों को पश्चिमी सरकारों और सुविधाओं पर हमला करने को कह सकते हैं।
हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि सरहद पर हथियारों से एक हद तक ही नुकसान पहुंचाया जा सकता है, और अगर कम्प्यूटर हैकरों में काबिलीयत है तो वे अपने घर बैठे दुनिया भर में जहां चाहें वहां सार्वजनिक सुविधाओं को खत्म कर सकते हैं, सरकारी कामकाज ठप्प कर सकते हैं। हमारी तरह की साधारण समझबूझ रखने वाले लोगों को भी यह दिखता है कि अगर इंटरनेट और संचार कंपनियों के कम्प्यूटरों को कोई ठप्प कर दे, तो हिन्दुस्तान जैसे देश के हजारों काम ठप्प हो जाएंगे। ट्रेन और प्लेन की बुकिंग और आवाजाही खत्म हो जाएगी, बैंक, एटीएम और क्रेडिट कार्ड काम करना बंद कर देंगे, बिजलीघर ठप्प हो जाएंगे, और वित्तीय संस्थान, मेडिकल जांच, और कई किस्म के इलाज खत्म हो जाएंगे। अब तक दुनिया के सामने इतनी बड़ी तबाही करने की कोई वजह थी नहीं, लेकिन आज जब रूस और पश्चिमी देशों के टकराव को तीसरे विश्व युद्ध की आशंका लाने वाला माना जा रहा है, तब ऐसे साइबर युद्ध की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। अमरीका ने अभी एक-दो बरस के भीतर ही ऐसा साइबर हमला देखा था कि उसके पानी साफ करने के कारखानों में मिलाया जाने वाला केमिकल साइबर अटैक से बढ़ा दिया गया था, और वह जानलेवा साबित हो सकता था। अभी से 13-14 महीने पहले फ्लोरिडा में हुए ऐसे एक हमले में एक साइबर घुसपैठिये ने अमरीकी जल संयंत्र पर कब्जा कर लिया था, और रसायन की मात्रा बदल दी थी।
पश्चिम के देश भारत के भी मुकाबले कम्प्यूटर और इंटरनेट के अधिक मोहताज हैं, और उनका रोज का कामकाज इन्हीं से चलता है। हॉलीवुड की एक एक्शन फिल्म में साइबर हैकरों का एक गिरोह एकाएक शहरी ट्रैफिक सिग्नलों को चारों तरफ हरा कर देता है, और पल भर में चारों तरफ गाडिय़ां एक पर एक चढ़ जाती हैं, और आवाजाही पूरी तरह बंद हो जाती है। इसी तरह कहीं बांध के गेट खोल दिए जा सकते हैं, या बिजली की सप्लाई बढ़ाई जा सकती है जिससे कि पूरी ग्रिड ठप्प पड़ जाए। अमरीका और योरप के देशों का साइबर सुरक्षा इंतजाम भारत के मुकाबले बहुत बेहतर है, लेकिन आज पश्चिम की आशंका को देखते हुए भारत जैसे देश को यह समझना चाहिए कि चीन की तरह की साइबर आर्मी के रहते हुए वह अपने कमजोर इंतजामात पर कितने चैन से सो सकता है? आग कहीं और लगी हुई है, लेकिन बाकी लोगों को भी अपने घर सम्हाल लेने चाहिए।
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हिन्दुस्तान में शहरों की सफाई एक बड़ा मुद्दा है, और किसी शहर के विकसित होने का एक बड़ा पैमाना भी है। केन्द्र सरकार देश भर के शहरों के बीच मुकाबला करवाती है, और पिछले बरसों में मध्यप्रदेश का इंदौर ऐसे कई मुकाबले जीत चुका है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे शहर को देखें तो शहर के भीतर ही उसके अलग-अलग हिस्से अलग-अलग साफ या गंदे दिखते हैं। मोटेतौर पर तो पूरा शहर एक ही म्युनिसिपल के तहत आता है, लेकिन अलग-अलग वार्ड के निर्वाचित पार्षद अपनी अधिक और असाधारण कोशिशों से अपने इलाके को अधिक साफ रख पाते हैं। इसमें संपन्न इलाकों में जनभागीदारी से भी खर्च जुटा लिया जाता है, और दिन भर सफाई चलती रहती है, गाडिय़ां दौड़ती रहती हैं। शहरों में ऐसे कुछ सक्रिय पार्षदों वाले इलाकों में इतने अधिक सफाई कर्मचारी काम करते दिखते हैं कि इन इलाकों में रहने वाले लोग अपने घर-दुकान के सामने मनचाहा कचरा फेंक सकते हैं, वह साफ होते रहता है। इसके साथ-साथ अगर सुबह की सैर पर निकलने वाले लोग कचरे और सफाई के इस सिलसिले को ध्यान से देखें तो समझ पड़ता है कि घरों से निकलने वाला कचरा छांटकर अलग नहीं किया जाता, और हर तरह के कचरे को एक साथ मिलाकर फेंक दिया जाता है, या कचरा गाड़ी के लिए रख दिया जाता है। आम लोग इस कचरे को नाली में भी फेंक देते हैं, जहां से इसे निकालना सफाई कर्मचारियों के लिए भी बड़ी मशक्कत का काम रहता है, और वे बड़ी नालियों या गटर में डूब-डूबकर भी ऐसा कचरा निकालते हैं, और इसमें कई बार कई कर्मचारियों की मौत भी होती है।
यह सिलसिला सिरे से गलत है कि वोट देने वाली जनता की इतनी चापलूसी की जाए कि वह मनचाही गंदगी मनचाहे तरीके से फैलाती रहे, और वार्ड का पार्षद या म्युनिसिपल उसे साफ करते रहें। वोट पाने के लिए लोगों की आदत इतनी बिगाडक़र उनके तलुए सहलाने का सिलसिला ठीक नहीं है। पार्षद तो आते-जाते रहते हैं लेकिन जनता की आदत पीढ़ी-दर-पीढ़ी खराब होते चलती है जो कि धरती के सीने पर बोझ बढ़ाते रहती है। हिन्दुस्तान की अधिकतर म्युनिसिपल अपने रहवासियों की आदत सुधारने की जहमत उठाना नहीं चाहती क्योंकि वह अलोकप्रिय काम हो जाएगा, उसके बजाय सफाई कर्मचारियों और गाडिय़ों को बढ़ाकर कचरा उठाना उन्हें ज्यादा आसान लगता है। लेकिन यह बात वैज्ञानिक तथ्य है कि अगर घर, दुकान, हॉस्टल, अस्पताल जैसी जगहों से निकलने वाला कचरा अगर उसी जगह पर छांटकर अलग कर दिया जाता है, तो उसे ढोना भी आसान है, उसका निपटारा भी आसान है, और उसका तरह-तरह का उत्पादक इस्तेमाल भी हो सकता है। यह कचरा उसी शहर की कमाई बढ़ाने में इस्तेमाल हो सकता है, बजाय इसे महंगे खर्च से उठाने, और निपटाने के। दक्षिण भारत के कुछ म्युनिसिपलों ने कचरे को अलग करके सार्वजनिक जगह पर अलग-अलग डालना अपने नागरिकों की ही जिम्मेदारी बना दी है। शुरुआती प्रतिरोध के बाद लोग इसके आदी हो गए हैं, और म्युनिसिपल कचरे से कमाई कर रहे हैं, सफाई पर कोई खर्च नहीं कर रहे। देश में अव्वल आने वाले इंदौर जैसे शहर में सफाई पर बड़ी रकम खर्च होती है, और चूंकि कामयाब कारोबार वाले शहरों की कमाई खूब होती है, इसलिए वहां कचरे और सफाई पर अनुपातहीन खर्च भी लोगों को खटकता नहीं है।
लेकिन यह पूरा सिलसिला इस बात पर टिका हुआ है कि स्थानीय संस्थाओं के पास कचरे के निपटारे के लिए अंधाधुंध पैसा हमेशा ही बने रहेगा, और इससे भी बड़ी बात समाज का यह भरोसा है कि सफाई कर्मचारी हमेशा ही गंदगी ढोने के लिए, नालियों में उतरने के लिए, और घर-घर जाकर कचरा लाने के लिए तैयार रहेंगे, हासिल रहेंगे। क्या कोई यह सोच सकते हैं कि आमतौर पर दलित दबके से आने वाले सफाई कर्मचारियों ने अगर यह काम करना बंद कर दिया, तो हिन्दुस्तान जैसा देश अपने कचरे को लेकर क्या करेगा? हफ्ते भर के भीतर हर शहर की हर नाली बंद हो चुकी रहेगी, और हर मोड़ कचरे से पट जाएगी। फिर हफ्ते भर के बाद क्या होगा? कोई महामारी फैलना शुरू होगी, और जिस तरह गुजरात के सूरत में एक वक्त प्लेग फैला था, उस तरह की कई बीमारियां लोगों को मारना शुरू कर देंगी। आज लोग जिन सफाई कर्मचारियों को देखना भी पसंद नहीं करते हैं, उन्हीं की वजह से आज हिन्दुस्तान जैसा देश रोजाना देखने लायक बचा हुआ है। लेकिन सामाजिक बेइंसाफी के इस सिलसिले पर टिकी हुई शहरी व्यवस्था जायज नहीं है। सफाई कर्मचारियों का तबका गुलाम नहीं है कि उसकी मर्जी के खिलाफ उससे काम लिया जा सके। और अगर यह तबका सफाई करना बंद कर देगा, कचरा ले जाना और नाली-गटर साफ करना बंद कर देगा, तो देश में इस काम के लिए और तो कोई तबका है नहीं।
सामाजिक न्याय के हिसाब से तो यह बात बेहतर होगी अगर पूरे देश के सफाई कर्मचारी एक हफ्ते की हड़ताल कर दें। लोगों को उनकी जरूरत भी समझ आ जाएगी, और अपने इर्द-गिर्द कचरा देखने के बाद जब उन्हें कचरे को छांटने और निपटारे में भागीदारी सिखाई जाएगी, तो शायद उनके लिए सीखना आसान होगा। आज जहां कचरा पैदा हो रहा है वहीं पर उसे छांटने का सबसे सस्ता और सबसे आसान काम वोटरों की चापलूसी करने के लिए अनदेखा किया जा रहा है, और लोगों की आदतें बिगाडक़र रखी जा रही हैं। यह सिलसिला तुरंत बंद करना चाहिए। लोग महज एक छोटा सा सफाई-शुल्क देकर धरती पर मिलेजुले कचरे का बोझ इस तरह बढ़ाते रहें यह ठीक नहीं है। शहरी सफाई अपने नागरिकों को जागरूक बनाए बिना महज खर्च करके करना ठीक नहीं है। यह जागरूकता न लाकर स्थानीय नेता अपनी महानता और कामयाबी साबित करते हैं, यह बुनियादी तौर पर एक गलत बात है, और नागरिकों को गैरजिम्मेदार बनाना पूरे भविष्य को खराब करना है।
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कल अमरीका के सबसे बड़े फिल्म अवार्ड समारोह, ऑस्कर, में एक अभूतपूर्व घटना हुई जब मंच संचालन कर रहे एक कॉमेडियन क्रिस रॉक ने सामने बैठी एक अभिनेत्री जेडा पिंकेट स्मिथ के बालों को लेकर एक मजाक किया, जो कि एक गंभीर बीमारी से गुजर रही है, और उस बीमारी की वजह से उसे अपना सिर मुंडाना पड़ा है, और यह बात उसने सोशल मीडिया पर खुलासे से लिखी हुई भी है। जैसा कि किसी कॉमेडियन की कही अधिकतर जायज और नाजायज बातों के साथ होता है, इस बात पर भी जेडा के अभिनेता पति विल स्मिथ सहित तमाम लोग हॅंस पड़े, सिवाय जेडा के। और इसके बाद पत्नी का चेहरा देखने पर शायद विल स्मिथ को भी कॉमेडियन की, और खुद की चूक समझ आई, और फिर उसने गुस्से में मंच पर पहुंचकर क्रिस रॉक को जोरों से एक थप्पड़ मारा, और वापिस आकर बैठ गया। इसके बाद भी वह वहां बैठकर क्रिस रॉक के लिए गालियां कहते रहा। यह एक बड़ा अजीब संयोग था कि इसके तुरंत बाद विल स्मिथ को अपने लंबे अभिनय जीवन का पहला ऑस्कर पुरस्कार मिला, और उसे लेते हुए उसने तमाम लोगों से एक आम माफी मांगते हुए जिंदगी में परिवार के महत्व के बारे में बहुत सी बातें कहीं। दरअसल टेनिस खिलाड़ी बहनों वीनस और सेरेना विलियम्स की जिंदगी पर बनी इस फिल्म में विल स्मिथ ने इनके पिता का किरदार किया है, और वह किरदार भी परिवार को महत्व देने वाला है। नतीजतन इस अभिनय के लिए ऑस्कर लेते हुए विल स्मिथ ने न सिर्फ विलियम्स परिवार के संदर्भ में महत्व की बात कही, बल्कि अपनी बीमारी से गुजर रही पत्नी के मजबूरी में हटे बालों की तकलीफ की तरफ भी इशारा किया।
खैर, यह बात तो उस वक्त आई-गई हो गई, लेकिन जैसा कि दुनिया में समझदार लोगों को करना चाहिए, कल ही विल स्मिथ और क्रिस रॉक दोनों ने सोशल मीडिया पर अपनी गलतियां मानीं, एक-दूसरे परिवार से भी माफी मांगी, और बाकी तमाम लोगों से भी। क्रिस रॉक ने अपनी इस दुविधा का भी बखान किया कि किस तरह एक कॉमेडियन के लिए कई बार सीमा तय करना मुश्किल हो जाता है, और किस तरह उन्होंने यह सीमा लांघी जिससे कि उनके दोस्तों को तकलीफ हुई और उनकी अपनी साख भी चौपट हुई। उन्होंने यह भी मंजूर किया कि जो लोग अपनी जिंदगी में तकलीफ से गुजर रहे हैं, उन पर कोई मजाक बनाना कॉमेडी नहीं होता। इसी तरह विल स्मिथ ने भी अपने सार्वजनिक बयान में यह कहा कि जब उनकी पत्नी की बीमारी की दिक्कत का मजाक उड़ाया गया तो वे बर्दाश्त नहीं कर पाए, और भावनाओं में उन्होंने ऐसा काम किया। उन्होंने क्रिस और बाकी तमाम लोगों से अपनी गलती मानते हुए माफी मांगी है।
इस मुद्दे पर अधिक लिखने की जरूरत इसलिए नहीं रह गई थी कि इन दोनों के बयान आज खबरों में वैसे भी आ जाएंगे, और तमाम लोगों को कुछ सबक मिल जाएगा। लेकिन हम इस पर एक दूसरी वजह से लिखना चाहते हैं कि हिन्दुस्तान में कॉमेडी के नाम पर जिस तरह की सामाजिक बेइंसाफी होती है, उस बारे में भी लोगों को सोचना चाहिए। हिन्दुस्तान में ऐतिहासिक कामयाबी वाला कॉमेडी शो, कपिल शर्मा देखकर तमाम लोग हॅंसते हैं, लेकिन उसमें जिस तरह की बेइंसाफी होती है, उस बारे में शायद ही किसी का ध्यान जाता है। अपने शो के अपने से कम कामयाब या मशहूर हास्य कलाकारों के बारे में कपिल शर्मा का हिकारत भरा बर्ताव देखा जाए, तो वह एक स्थायी शैली है। दूसरी तरफ कार्यक्रम में आमंत्रित बड़े सितारों की चापलूसी भी उतनी ही स्थायी शैली है। आधे लोगों की चापलूसी और आधे लोगों को दुत्कारना, यह बताता है कि ताकतवर और कमजोर के साथ बर्ताव में कैसा फर्क किया जाता है। इससे परे भी देखा जाए कि भिखारियों के लिए, गरीब, बेघर और भूखों के लिए जिस तरह की जुबान कपिल शर्मा और उनका शो इस्तेमाल करते हैं, तो वह किसी भी चेतना संपन्न और संवेदनशील व्यक्ति को सदमा पहुंचा सकता है, पहुंचाता होगा, यह एक और बात है कि सार्वजनिक रूप से कोई मशहूर कामयाबी के खिलाफ लिखते नहीं हैं, बोलते नहीं हैं। बहुत पुरानी बात चली आ रही है कि कामयाबी से बहस नहीं होती, इसलिए कपिल शर्मा जब अपने शो में कई बार भिखारियों की नकल करते हुए अपनी उंगलियां मोडक़र ऐसा दिखाते हैं कि मानो किसी कुष्ठ रोगी की गली हुई उंगलियां हों, तो आम हिन्दुस्तानी को इससे कोई तकलीफ नहीं होती, और किसी कुष्ठ रोगी की तो कोई जुबान हो नहीं सकती। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में सत्ता और ताकत का मजाक उड़ाने वाले कॉमेडियन को जगह-जगह पुलिस रिपोर्ट का सामना करना पड़ता है, उनके कार्यक्रम लगातार रद्द होते हैं, और लोकतंत्र उन्हें कैमरे के सामने से और मंच पर से अलग ही कर देता है।
यहां यह भी समझने की जरूरत है कि हास्य और व्यंग्य में एक बुनियादी फर्क होता है। हास्य तो बिना किसी सामाजिक जिम्मेदारी के, बिना किसी सामाजिक सरोकार के किया जा सकता है, लेकिन व्यंग्य के लिए जिम्मेदारी और सामाजिक सरोकार दोनों जरूरी होते हैं। लोकप्रिय मंचों पर हर कॉमेडियन को व्यंग्यकार मान लेना भी ज्यादती होगी क्योंकि बहुत से कॉमेडियन सिर्फ हास्य के लिए पहुंचते हैं, बहुत से हास्य कवियों की तरह। उनसे व्यंग्य की तरह की जिम्मेदारी की उम्मीद कुछ अधिक ही बड़ी हो जाएगी। ऑस्कर समारोह में कल एक गैरजिम्मेदार हास्य ने सबके मुंह का स्वाद कड़वा कर दिया, ऐसे हास्य की जगह अगर जिम्मेदार व्यंग्य होता, तो वह किसी की बीमारी की खिल्ली नहीं उड़ाता। इस बारीक फर्क को हिन्दुस्तान में भी लोगों को समझना चाहिए, और फूहड़ हास्य कलाकार, फूहड़ हास्य कवि को व्यंग्य का दर्जा देना बंद करना चाहिए।
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धरती की बात करें तो कारोबार से अधिक हिंसक कोई और तबका नहीं हो सकता। महज आज के मुनाफे के लिए कारोबार सारे सरोकार अनदेखे करके धरती का कितना भी नुकसान कर सकता है। इसके बाद कारोबार से होने वाली टैक्स और रिश्वत, दोनों किस्म की कमाई के चलते सरकार का हाल भी कारोबार जैसा ही हो जाता है, और वह भी पूरी तरह बेफिक्र हो जाती है, सामाजिक सरोकारों के प्रति। इसकी एक बड़ी मिसाल अभी सामने आई जब ब्रिटिश अखबार गार्डियन ने यह रिपोर्ट छापी कि किस तरह कोरोना और लॉकडाऊन के इस पूरे दौर में ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों से भुतहा-उड़ानें आती-जाती रहीं। भुतहा उड़ानों का मतलब जिनमें कोई असल मुसाफिर नहीं चलते, विमान या तो सिर्फ पायलट और सेवक-दल के गिने-चुने लोगों को लेकर आते-जाते हैं, या मजबूरी में दस फीसदी से कम मुसाफिर होने पर भी उड़ान भरते हैं। सरकार ने अखबार की मांगी जानकारी देने से आखिर तक मना किया, इसके बाद चतुर संवाददाता ने एक ब्रिटिश सांसद को पकडक़र उससे संसद में सरकार से जानकारी मंगवाई, संसद के नियमों के मुताबिक सरकार मना नहीं कर सकती थी, और वहां उसे बताना पड़ा कि किस तरह लॉकडाऊन के दौर में ब्रिटिश हवाई अड्डों से 15 हजार से अधिक अंतरराष्ट्रीय भुतहा-उड़ानें आई-गईं। अब हवाई कंपनियों को ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि हवाई अड्डों पर विमानों के उडऩे और उतरने के लिए जो समय तय रहता है, उस वक्त का अगर 80 फीसदी से ज्यादा इस्तेमाल नहीं होता है तो उनके लिए तय किया गया वह समय खारिज हो जाता है। अपने टाईम स्लॉट को बचाने के लिए विमान कंपनियों को वहां से विमान उड़ाने पड़ते हैं और वहां उतारने पड़ते हैं, फिर चाहे वे पूरी तरह से खाली ही क्यों न हों। लोगों को याद होगा कि ऐसी ही कुछ उड़ानों की तस्वीरें लोग सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं कि वे दो देशों के बीच की उड़ान में अकेले मुसाफिर थे।
अब दिक्कत यह है कि ऐसी भुतहा-उड़ानों से एयरलाईंस को जो नुकसान होना है उसे एयरलाईंस जानें, उनसे अधिक नुकसान धरती का होता है जो कि हवाई जहाजों से होने वाले प्रदूषण से आज वैसे ही लदी हुई है। दुनिया में आज सफर का सबसे नुकसानदेह तरीका हवाई जहाज हैं जिनसे धरती पर कार्बन का बोझ बहुत बढ़ रहा है। पर्यावरण की फिक्र करने वाले वैज्ञानिक और आंदोलनकारी वैसे भी हवाई सफर के दूसरे विकल्प तलाशने और सुझाने में लगे हुए हैं ताकि कम प्रदूषण के साथ सफर हो सके। योरप जैसे अधिक हवाई यातायात वाले इलाके में खूब रेलगाडिय़ां भी हैं, लेकिन वे हवाई सफर से महंगी हैं, और सस्ते सफर की वजह से लोग प्लेन में ही अधिक चलते हैं। ऐसे में व्यस्त हवाई अड्डों पर टाईम स्लॉट की खूब मारमारी रहती है, और एयरलाईंस के बीच अधिक लोकप्रिय समय पर उडऩे और उतरने का टाईम पाने के लिए गलाकाट मुकाबला चलता है। यह बात सरकारी या निजी सभी किस्म के एयरपोर्ट के लिए भी एक कारोबारी मजबूरी की हो सकती है कि विमान उडऩे और उतरने से उन्हें एयरलाईंस से जो फीस मिलती है, उसे पाने के लिए विमानों की आवाजाही जरूरी है। लेकिन ब्रिटेन जैसा एक विकसित और पुराना लोकतंत्र भी, जहां पर कि मजबूत सरकारी व्यवस्था है, वह भी सरकारी और कारोबारी नियमों की ऐसी कोई काट क्यों नहीं ढूंढ पाया कि बिना भुतहा उड़ानों के कारोबार चल सकता। यह बात तो जाहिर है कि एयरलाईंस जितना पैसा एयरपोर्ट को देती होगी, उससे सैकड़ों गुना अधिक खर्च उसका उड़ान पर होता होगा, और इन तीनों पहलुओं ने मिलकर पता नहीं क्यों इस बर्बादी को रोकने का रास्ता क्यों नहीं ढूंढा।
दुनिया में आज गैरजरूरी हवाई सफर को घटाने के लिए कई किस्म की सोच चल रही है। लेकिन यह आसान बात नहीं है क्योंकि दुनिया के बहुत से देशों की अर्थव्यवस्था पर्यटकों पर टिकी रहती है, बहुत से देश एयरलाईंस की कमाई के मोहताज रहते हैं, और विमान बनाने वाली कंपनियां हर बरस आसमान में उसी तरह विमान जोड़ती जा रही हैं जिस तरह कार बनाने वाली कंपनियां हिन्दुस्तान जैसे देश की सडक़ों पर हर बरस लाखों कारें जोड़ देती हैं। इसलिए हवाई सफर को घटाना तो आसान नहीं दिख रहा है, लेकिन जहां-जहां ईंधन की बर्बादी हो रही है, उसे एक जुर्म करार देना जरूरी है। और इस जुर्म के लिए बड़ा जुर्माना लगाना भी जरूरी है। इसे महज किसी देश की सरकार, एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनी, और एयरलाईंस का आपसी मामला नहीं माना जा सकता। धरती का वातावरण, आसमान और हवा, ये सार्वजनिक संपत्ति हैं, और उसे बर्बाद करने का हक इन तीन लोगों के ऐसे गिरोह को नहीं दिया जा सकता जो कि गैरजिम्मेदार है। हम यहां मिसाल के तौर पर ही इस मामले की बात कर रहे हैं, इस तरह की दूसरी मिसालें दुनिया के अधिकतर देशों में मिलेंगी जहां सरकार और कारोबार लापरवाही से या सोच-समझकर धरती को बर्बाद कर रहे हैं, और इन देशों का कोई कानून ऐसी बर्बादी को रोकने के लिए बना नहीं है।
पहले भी कुछ बार हमने इसी जगह पर यह मुद्दा उठाया था कि देश-प्रदेश की सरकारों को फैशनेबुल सामानों की अंधाधुंध पैकिंग पर एक टैक्स लगाना चाहिए ताकि मार्केटिंग के लिए धरती पर कचरे का बोझ बढ़ाना रोका जा सके। आज 50 मिलीलीटर इत्र की शीशी और उसके ऊपर की पैकिंग कई बार तीन-चार सौ ग्राम तक की हो सकती है। धरती के सामानों की ऐसी फिजूलखर्ची और बर्बादी पर एक टैक्स लगाने की जरूरत है, और इसे राज्य भी अपने स्तर पर लागू कर सकते हैं कि खपत होने वाले सामान को छोडक़र बाकी तमाम पैकिंग पर एक टैक्स लगाया जाए। हो सकता है कि इससे कमाई कम हो, लेकिन इससे जागरूकता अधिक आए। राज्यों को अपने स्तर पर कुछ और कोशिशें भी करनी चाहिए जिनमें पॉलीथीन बैग के विकल्प खड़े करना एक बड़ा काम होना चाहिए। राजस्थान के बहुत से शहरों में पुरानी साडिय़ों के कपड़े से सिले हुए बैग दुकानों में सामान भरकर दे दिए जाते हैं। इस मामूली सिलाई के काम में ऐसी कोई चीज नहीं है जो कि हिन्दुस्तान के किसी प्रदेश में न हो, महज सोच और पहल की कमी है जो कि इन प्रदेशों के पर्यावरण को तबाह कर रही हैं। बात शुरू तो हुई थी ब्रिटेन और योरप की भुतहा उड़ानों से, लेकिन वह राजस्थान के पुराने कपड़ों के झोलों तक पहुंच गई। यह हर किसी की जिम्मेदारी है कि वे अपने आसपास पर्यावरण को बचाने के रास्ते ढूंढें, और पर्यावरण को तबाह करने वाले तरीकों की शिनाख्त करके उसे रोकने की बात भी करें। चुनावों के धंधे में लगे राजनीतिक दलों से अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि पेड़ों का वोट नहीं होता, मछली, कछुओं, और पंछियों का वोट नहीं होता। ऐसे में लोगों को ही आवाज उठाना चाहिए, सोशल मीडिया पर जमकर बहस छेडऩी चाहिए, और जरूरत हो तो अदालतों तक जाकर जनहित याचिका भी लगानी चाहिए।
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अफगानिस्तान में अभी लड़कियों का मिडिल स्कूल खोला गया, और बच्चियां खुशी-खुशी वहां पहुंचीं, लेकिन कुछ घंटों के भीतर ही तालिबान ने स्कूल बंद करने की घोषणा कर दी, और वे ही बच्चियां रोते-रोते घर लौटीं। तालिबान सरकार ने इस फैसले पलटने को लेकर को वजह नहीं बताई है, और कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है। लेकिन यह बात अपनी जगह सच है कि अमरीकी फौजों की वापिसी के बाद से जब से तालिबान राज कायम हुआ है, महिलाओं के हक अफगानिस्तान में खत्म हो गए हैं, उनका काम का दायरा सीमित हो गया है, और महज कुछ किस्म के कामों में उन्हें इजाजत है। लेकिन घर के बाहर किसी दूर जगह जाने के लिए उन्हें परिवार के किसी मर्द का साथ होना जरूरी है, उनके अकेले चलने पर बंदिश है। और प्राइमरी स्कूल से ऊपर लड़कियों की पढ़ाई अब तक बंद ही है।
कोई देश या समाज जब अपनी लड़कियों और महिलाओं पर इस किस्म की बंदिशें लगाते हैं तो उनके आगे बढऩे की संभावनाएं भी सीमित हो जाती हैं। दुनिया के जिन देशों में महिलाओं के कोई भी काम करने पर रोक नहीं है, वे देश अपनी आम संभावनाओं से आगे निकल जाते हैं। रूस जैसे देश में महिलाएं दशकों से क्रेन और बुलडोजर जैसी मशीनें भी चलाती आई हैं, और कोई भी काम ऐसा नहीं है जिसमें उन पर रोक हो। नतीजा यह होता है कि ऐसी महिलाएं और उनके परिवार खुद भी आगे बढ़ते हैं, और देश को भी आगे ले जाते हैं। दूसरी तरफ दुनिया के जिन देशों में इस्लामिक व्यवस्था है वहां पर जिस हद तक इस्लामिक कानून को लागू किया जाता है, उसी हद तक महिलाओं की आत्मनिर्भरता घट जाती है। ईरान या अफगानिस्तान में अगर बंदिशें अधिक हैं, तो वहां संभावनाएं कम हैं। दरअसल यह बात खुलकर इसलिए सामने नहीं आ पाती कि इस्लामिक देशों में कुछ देश सउदी अरब किस्म के तेल के कुओं वाले देश हैं जिनमें धरती ही सारी कमाई दे देती है, और महिलाओं के तो क्या, आदमियों के भी काम करने की जरूरत नहीं रहती है। फिर दूसरी तरफ कुछ ऐसे बहुत ही गरीब और फटेहाल मुस्लिम देश हैं जहां पर मजहब ही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत रहती है, और वे ईश्वर के नाम पर सभी किस्म की गरीबी और अभाव को बर्दाश्त कर जाते हैं। यमन जैसे देश में कुपोषण से बड़ी संख्या में मौतें होती हैं लेकिन कट्टरपंथी आतंकी समूह वहां मजहब के नाम पर जान लेने और देने पर उतारू रहते हैं। अतिसंपन्न और अतिविपन्न, दोनों ही किस्म की अर्थव्यवस्थाओं में यह अंदाज लगाना मुश्किल रहता है कि वहां महिलाओं की भागीदारी की कमी की वजह से अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा है, या कि समाज पर क्या असर हुआ है।
अफगानिस्तान और उस किस्म के कुछ और देशों में धार्मिक कट्टरता से लोकतंत्र और इंसानियत का जो बड़ा नुकसान हुआ है उससे बाकी दुनिया को भी सबक लेने की जरूरत है। आज जब इंसान पिछले कई सौ बरसों से लगातार विज्ञान और टेक्नालॉजी की मेहरबानी से अपनी सहूलियतें बढ़ा रहे हैं, दुनिया को बेहतर जगह बना रहे हैं, तो कई देशों में धर्म लोगों को विज्ञान और टेक्नालॉजी के पहले के वक्त पर ले जाने पर उतारू है, और उसे कहीं कम तो कहीं अधिक कामयाबी भी मिल रही है। लेकिन दुनिया का इतिहास एक बात बताता है कि अगर प्राकृतिक साधन एक बराबरी के हों, तो वे देश ही तरक्की करते हैं जो कि महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते हैं, उन्हें बराबरी का हक और बराबरी की संभावनाएं देते हैं। किसी जानकार विद्वान ने जरूर ही ऐसा तुलनात्मक अध्ययन किया होगा कि किसी देश की प्राकृतिक और ऐतिहासिक क्षमता के मुकाबले उस देश के आगे बढऩे में वहां की महिलाओं की भागीदारी का कितना हाथ रहा है। लोगों को अपने आसपास के प्रदेश, शहर, समाज और परिवार, इन सबको देखना चाहिए कि महिलाओं को दबाकर रखने वाले समाज किस तरह पीछे रह जाते हैं। आज न सिर्फ तालिबान को, बल्कि दुनिया के बाकी समाजों को भी यह देखने की जरूरत है कि वे लड़कियों को विकसित होने के बराबरी के, और हिफाजत वाले मौके मुहैया कराने में कितनी दिलचस्पी ले रहे हैं। आधी दुनिया, और बेहतर आधी दुनिया को कुचलकर बाकी आधी दुनिया किसी तरह से भी एक बेहतर जगह नहीं बन सकती। चूंकि कुदरत ने महिलाओं को गर्भधारण और बच्चों को बड़ा करने जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारियां दी हैं, जिन्हें पुरूषवादी समाज ने औरत की कमजोरी बनाकर रख दिया है, इसलिए देश के कानून को महिलाओं को खास हक और खास हिफाजत दिलवाने का काम करना चाहिए। तालिबान की जो सोच है, वह उनसे कुछ कम कट्टरता के साथ और उनसे कुछ कम हिंसा के साथ दुनिया में जगह-जगह फैली हुई है। तालिबान को कोसना आसान है, अपने आपको आईने में देखना कुछ मुश्किल है। फिर भी लोगों को अगर एक सभ्य समाज बनना है, दुनिया के बेहतर लोकतंत्रों की तरह आगे बढऩा है, तो उन्हें अपनी सोच के अलग-अलग कोनों में छुपी बैठी तालिबानी सोच से छुटकारा पाना होगा। हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में भी कई प्रदेशों में ऐसे मुख्यमंत्री बैठे हैं जो औरत को एक सामान से अधिक नहीं देखते हैं, और जिनकी बातों में तालिबानी डीएनए झलकता है। उनका तालिबानी सोच से कुछ पीढिय़ों पहले का रिश्ता दिखता है, और इस सोच से भी हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को छुटकारा पाना चाहिए। जहां धार्मिक कट्टरता जितनी अधिक है, वहां औरत के हक उतने ही कम पाए जाते हैं।
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छत्तीसगढ़ का एक वीडियो कल से सोशल मीडिया पर तैर रहा था, और उसने देखने वालों को बड़ा विचलित भी कर दिया। स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव के अपने इलाके सरगुजा में एक सरकारी अस्पताल में सात साल की एक गरीब बच्ची गुजर गई। उसके शव को घर ले जाने के लिए जब कोई सरकारी गाड़ी नहीं मिल पाई तो उसका पिता उसे कंधे पर लेकर ही 8-10 किलोमीटर पैदल गया। इस वीडियो ने उन अच्छे-अच्छे शहरी लोगों को भी हिलाकर रख दिया जिनके मन में आमतौर पर सबसे गरीब तबके के लिए कोई हमदर्दी नहीं होती है, और उन्हें मिलने वाली कुछ छोटी-मोटी सरकारी रियायतें जिन्हें खटकती ही रहती हैं। फिलहाल स्वास्थ्य मंत्री ने ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी को हटा दिया है, जांच के आदेश दिए हैं, और स्वास्थ्य विभाग के अमले को अधिक संवेदनशीलता से काम करने के लिए कहा है।
चूंकि यह मामला एक गरीब बाप के कंधे पर उसकी बेटी की लाश का था, इसलिए यह तुरंत खबरों में आ गया, और उसने लोगों को विचलित भी कर दिया। लेकिन यह बर्ताव सिर्फ अस्पताल के कर्मचारियों का हो, ऐसा भी नहीं है। यही बर्ताव तहसील के कर्मचारियों का होता है, पुलिस का होता है, जंगल विभाग के कर्मचारियों का होता है, और बिना किसी अपवाद के सरकार के हर विभाग का ऐसा ही बर्ताव होता है। यह तो मौत और लाश की बात है जो कि सरकारी अस्पताल में ही अधिक दिखती है, वरना पटवारी के दफ्तर में भी हक का कागज पाने के लिए भी सबसे गरीब और बेबस को भी जिस तरह हजारों रूपये देने पड़ते हैं, महीनों तक चक्कर खाने पड़ते हैं, वह भी लोगों को जिंदा लाश बनाकर छोडऩे वाली बात रहती है। जिन लोगों ने सरकारी ऑफिसों के संवेदनाशून्य बर्ताव के एक हिन्दी सीरियल को देखा होगा, उन्हें यह बात मालूम होगी कि छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से प्रदेश हैं जहां पर हर नागरिक का हाल मुसद्दीलाल सरीखा है।
अभी दो ही दिन पहले की ही बात है इसी छत्तीसगढ़ में एक जिले मुंगेली में सिटी कोतवाली के थानेदार का एक ऑडियो सामने आया जिसमें वह बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाने वाली महिला को पैसे लेकर समझौता करने के लिए दबाव डाल रहा है, और यह धमकी भी दे रहा है कि शिकायत वापिस नहीं लेने पर अदालत में कैसे बर्ताव का सामना करना पड़ेगा। इस मामले में चूंकि समझाने के नाम पर धमकाने की ऑडियो रिकॉर्डिंग चारों तरफ फैल गई थी, एसपी को मजबूरी में कार्रवाई करनी पड़ी, वरना बलात्कार के आरोपी को बार-बार फरार बताकर गिरफ्तारी से बचाया जा रहा था। ऐसा ही हाल प्रदेश में हर उस गरीब और कमजोर का है जो कि सत्ता के किसी ताकतवर तक पहुंच नहीं रखते, उन पर दबाव नहीं डाल सकते। गरीबी, लोगों के बुनियादी हक खत्म करने की एक पर्याप्त वजह है, और आये दिन उसकी मिसालें सामने आते रहती हैं। आज प्रदेश में आदिवासी सरकार के बर्ताव के कुछ मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। भाजपा शासन के पन्द्रह बरसों में आदिवासी हक के लिए लडऩे वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार आने के बाद बस्तर के आदिवासियों के लिए मानो कुछ भी नहीं बदला है। अभी भी बेकसूर आदिवासियों को नक्सली बताकर मारना जारी है, उनकी गिरफ्तारी जारी है, उनके खिलाफ मुकदमे जारी हैं। ऐसी बहुत सी वजहों को लेकर प्रदेश के आदिवासी बहुत बेचैन हैं, लेकिन आदिवासी इलाकों पर राज करने वाले वन विभाग को आज भी प्रदेश का सबसे भ्रष्ट विभाग माना और जाना जाता है। पुलिस विभाग का भी कमोबेश ऐसा ही हाल है, और ऐसे विभागों में जिस तरह के पूंजीनिवेश के बाद अफसर मैदानी पोस्टिंग पाते हैं, उसकी भरपाई के लिए वे संवेदनाशून्य तरीके से काम करते हैं, और ऐसे में लोगों के हक सबसे पहले बेचे जाते हैं। सरकार के किसी एक विभाग, या कुछ चुनिंदा विभागों की ही बात नहीं है, यह बात पूरे के पूरे सरकारी अमले में संवेदनशीलता गायब होने की है, और बेकाबू भ्रष्टाचार की भी है। गांव-गांव से गरीबों की शिकायतें आना थमता ही नहीं है कि सरकारी दफ्तरों से वास्ता पडऩे पर, अदालतों से वास्ता पडऩे पर उनका कैसा बुरा हाल होता है। ऐसी नौबत जब नहीं सुधरती है, तो जनता सरकारों को सुधार देती है।
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छत्तीसगढ़ के एक जिले जीपीएम में 45 साल की एक महिला की रिपोर्ट पर उसके पति और बेटे को गिरफ्तार किया गया है। उसने शिकायत की थी कि उसका एक न्यूड वीडियो फैलाया जा रहा है, और यह काम उसका पति और बेटा कर रहे हैं। महिला का अपने पति से झगड़ा चल रहा था, और वह मायके चली जाती थी। अभी वह ससुराल लौटी तो 19 बरस के बेटे ने उससे उसका मोबाइल मांगा, और उसमें से उसके कुछ वीडियो निकालकर रिश्तेदारों के बीच फैला दिए। इस महिला के मुताबिक ये वीडियो उसके पति ने ही बनाए थे, और अब उसका चरित्र खराब बताने के लिए पति और बेटा मिलकर उसके वीडियो फैला रहे हैं। इस तरह के दर्जनों मामले हिन्दुस्तान के अलग-अलग हिस्सों से रोज आते हैं जिनमें परिवार के लोग ही बच्चों से बलात्कार करते हैं, एक-दूसरे की हत्या करते हैं या करवाते हैं, या बच्चों को सेक्स के लिए दूसरों को बेच देते हैं, पत्नी को जुए के दांव पर लगा देते हैं। बहुत से ऐसे मामले आते हैं जिनमें कोई महिला अपने प्रेमी की पत्नी को मारने की सुपारी देती है, या कोई नौजवान दोस्तों के साथ मिलकर प्रेमिका के पति को मार डालता है। परिवार के भीतर जितने किस्म की हिंसा और वर्जित माने जाने वाले काम होते हैं, वे हैरान करते हैं। हैरानी दो बातों से होती है, एक तो यह कि इंसानी मिजाज में इतनी हिंसा आती कैसे है, और दूसरी बात यह कि क्या वर्जित और अनैतिक मानी जाने वाली बातों के पैमाने समाज में आज एकदम से खत्म हो चुके हैं?
परिवार के भीतर बच्चों के सेक्स-शोषण के मामले जितने सामने आते हैं उससे शायद सैकड़ों गुना अधिक वे होते हैं लेकिन परिवार अपनी इज्जत की दुहाई देकर और परिवार के लोगों से संबंध जारी रखने के लिए ऐसी बातों को छुपा देते हैं। नतीजा यह होता है कि बलात्कारी परिजन या रिश्तेदार, या पारिवारिक परिचित बेधडक़ हो जाते हैं, और उनका सेक्स-शोषण करने का सिलसिला जारी रहता है, बढ़ते चलता है। परिवार की इज्जत बची रहे इस नाम से घर की महिला भी बाप के बेटी के साथ बलात्कार को भी अनदेखा करती चलती है, और इज्जत से परे रोटी का भी एक मुद्दा रहता है कि अगर आदमी ही परिवार का अकेला कमाऊ सदस्य है, तो उसके बलात्कार को भी अनदेखा करना मजबूरी हो जाती है। बच्चों के यौन शोषण के अधिकतर मामले ऐसे ही होते हैं जिनमें परिवार अपने बच्चों की बात पर भरोसा नहीं करते, या उसे सोच-समझकर अनसुना कर देते हैं। यह सामाजिक निष्कर्ष है कि ऐसे बच्चे आगे चलकर समाज के लिए खतरा बनने की अधिक आशंका रखते हैं।
आज परिवार के भीतर वर्जित संबंधों के पैमाने कमजोर होते चल रहे हैं। एक वक्त परिवार के दो पीढ़ी के लोग, या भाई-बहन साथ बैठकर कोई अश्लील या वयस्क फिल्म या टीवी कार्यक्रम नहीं देखते थे। लेकिन अब यह बात खत्म सी हो गई है, और सभी किस्म के संबंधी साथ बैठकर किसी भी किस्म का कार्यक्रम देख लेते हैं। नतीजा यह होता है कि जिन रिश्तों में एक लिहाज रहना चाहिए था उन रिश्तों के बीच अब नजरों की कोई ओट नहीं रह गई है, और यह नौबत बढ़ते-बढ़ते पारिवारिक संबंधों को कई किस्म से प्रभावित कर रही है। ऐसे में परिवारों के भीतर अनैतिक कहे जाने वाले संबंध भी बढ़ रहे हैं, और परिवार के बाहर के लोगों से भी विवाहेतर संबंधों के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में परिवार के लोगों को ही यह सावधानी बरतनी चाहिए कि रिश्तों में खतरे की नौबत ही कम आए। यह बात कहना आसान है लेकिन आज जिस तरह से शहरीकरण बढ़ते चल रहा है, परिवार छोटे और अकेले होते जा रहे हैं, परिवार के हर सदस्य बाहर काम करने लगे हैं, लोगों से मिलना-जुलना बढ़ रहा है, टेक्नालॉजी की मेहरबानी से जिंदगी में वयस्क मनोरंजन अश्लीलता और हिंसा की हद तक बढ़ रहा है, तो ऐसे में आग और पेट्रोल मिलकर खतरा तो बनते ही जा रहे हैं। अब मोबाइल फोन पर वीडियो कैमरा शुरू होने के पहले तक यह खतरा तो नहीं था कि मां के फोन पर बेटा उसका नग्न वीडियो देख लेगा। टेक्नालॉजी ने परिवार के लोगों को एक-दूसरे के सामने उघाडक़र भी रख दिया है, और खतरे में भी डाल दिया है।
कुछेक और मामले दिल दहलाने वाले आए हैं जिनमें कहीं मां अपनी बेटी को लोगों के सामने बेच रही है, तो कहीं बाप और भाई मिलकर बेटी के लिए ग्राहक ढूंढ रहे हैं। कुछ लोग इन्हें विचलित और अप्राकृतिक सोच का बतला सकते हैं, लेकिन ये सारे लोग सोच-समझकर ऐसा करने वाले रहते हैं। इसलिए इन्हें मानसिक रोगी होने के संदेह का लाभ देना ठीक नहीं होगा, और इन्हें समाज का एक हिस्सा मानकर चलना ठीक रहेगा, और इनके अस्तित्व को मंजूर करने के बाद ही इनसे बचाव के तरीके सोचे जा सकेंगे। फिलहाल तो इस मुद्दे पर हमारा यहां पर लिखने का मकसद यह है कि आज परिवार और समाज के तमाम लोगों को अपने बारे में भी सावधान रहना चाहिए, और अपने अड़ोस-पड़ोस का भी ध्यान रखना चाहिए कि वहां किसी हिंसा या जुर्म की नौबत तो नहीं आ रही है। लोगों को अपने बच्चों के शिक्षक-प्रशिक्षक के बारे में भी सावधान रहना चाहिए, घर-परिवार में काम करने वाले लोगों के प्रति भी आंखें खुली रखनी चाहिए, और अपने-आप पर भी काबू रखना चाहिए। ऐसे जुर्म बढ़ते चले जा रहे हैं, और उनके मुकाबले सावधानी और अधिक बढऩी चाहिए।
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पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में एक अभूतपूर्व दर्जे की हिंसा ने पूरे देश में फिक्र खड़ी कर दी है। बिना किसी बाहरी या विदेशी आतंकी, बिना किसी नक्सल सरीखे घरेलू हथियारबंद संगठन की हिंसा के, जिस तरह बंगाल के एक गांव में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता की हत्या के बाद जवाबी दिखती हिंसा में एक दर्जन घर जला दिए गए जिनमें से एक मकान में एक कमरे में ही छिपे सात लोग जलकर मर गए, और इससे परे एक और मौत जलने से हुई है। बंगाल में पहले तो वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं और ममता बैनर्जी की टीएमसी के लोगों के बीच ऐसे हिंसक संघर्ष होते थे, लेकिन बाद में वामपंथी कमजोर होते चले गए और विपक्ष की जगह भाजपा ने ले ली, तब से भाजपा और टीएमसी के बीच यह खूनी संघर्ष चलते रहता है। जब जिसके हाथ लगता है, वे दूसरी पार्टी के लोगों को मार डालते हैं, और बंगाल में विधानसभा चुनावों के बाद जिस परले दर्जे की हिंसा वहां हुई थी उसकी अदालत की निगरानी में जांच भी अब तक पूरी नहीं हुई है, और इस ताजा हिंसा पर कोलकाता हाईकोर्ट ने खुद होकर रिपोर्ट मांगी है।
भारत की राजनीति में यह बात थोड़ी सी अटपटी है कि पश्चिम बंगाल के अलावा केरल में भी सत्ता और विपक्ष के बीच इसी किस्म की हिंसक झड़प चलती रहती है, और गाहे-बगाहे लाशें गिरती रहती हैं। अभी कुछ अरसा पहले ही वहां आरएसएस का एक कार्यकर्ता बम बनाते अपने ही हाथ की उंगलियों को उड़ा बैठा था, और वहां संघ-भाजपा और वामपंथियों के बीच बहुत सी हत्याएं होते आई हैं। यह बात बड़ी अजीब है कि ये दो राज्य अलग-अलग बसे हुए हैं, दोनों गैरहिन्दी भाषी हैं, और दोनों पर समय-समय पर वामपंथियों ने राज किया है, आज भी वहां उनकी राजनीतिक मौजूदगी है। लेकिन बंगाल में अब वामपंथी अपनी खोई हुई ताकत के बाद हिंसा के मामलों से परे हैं, और वहां सत्ता और विपक्ष चलाने वाले टीएमसी और बीजेपी ने यह जिम्मा ले लिया है।
इस बात का कोई राजनीतिक विश्लेषण अभी तक हमारे देखने में नहीं आया है कि बाकी देश से परे इन दो राज्यों में इतनी राजनीतिक हत्याएं आखिर क्यों होती हैं? लेकिन यह तो एक गंभीर राजनीतिक-सामाजिक अध्ययन का मुद्दा है, और उससे इस नौबत को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि बंगाल लगातार बड़े पैमाने पर हिंसा को देख रहा है, वहां लाशें गिर रही हैं। ममता बैनर्जी केन्द्र की मोदी सरकार से लगातार टकराव मोल लेते हुए अगले आम चुनावों में मोदी के एनडीए का विकल्प बनने और पेश करने में लगी हुई हैं, लेकिन इस ताजा घटना ने बंगाल को ही उनके काबू के बाहर का साबित किया है। कहने के लिए तो यह कहा जा सकता है कि यह मामला ममता के एक कार्यकर्ता की हत्या से शुरू हुआ, और जवाबी हिंसा की एक अकेली घटना में आगजनी में एक घर के लोग मारे गए, और उनकी हत्या नहीं की गई, वे जलकर मर गए। लेकिन विधानसभा चुनावों के बाद की हिंसा अभी सबकी यादों में ताजा है, और उस पर कोई कार्रवाई भी होना अभी बाकी है। इस हिंसा को लेकर मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और एनडीए के मनोनीत राज्यपाल के बीच सार्वजनिक टकराव चलते ही रहता है। चुनाव बाद की हिंसा में बंगाल में दर्जन भर हत्याएं हुई थीं, और जगह-जगह विपक्षी पार्टियों के दफ्तर भी जला दिए गए थे। हिंसा की वह संस्कृति ममता के राज में अब भी जारी है, और इस बार जिन्हें जलाकर मार डाला गया है, उनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे हैं।
ममता बैनर्जी ने अपनी आदत के मुताबिक अपनी सरकार की इस नाकामी का बचाव करते हुए देश के दूसरे प्रदेशों की कुछ हिंसक घटनाओं को गिनाया है, जहां पर भाजपा की सरकारें हैं। लेकिन दूसरे राज्यों की खामियां गिनाने से ममता खुद कामयाब नहीं हो जातीं, और खासकर जब वे देश के विपक्षी गठबंधन की अगुवा होने के लिए ओवरटाइम मेहनत कर रही हैं, जब वे दूर-दूर के प्रदेशों में जाकर अपनी पार्टी की बैनरतले चुनाव लड़ रही हैं, तब उन्हें सरकार चलाने की एक बेहतर मिसाल भी पेश करनी होगी। राजनीतिक हिंसा का ऐसा इतिहास बाकी भारत में ममता को सम्मान नहीं दिला पाएगा क्योंकि इस दर्जे की राजनीतिक हिंसा देश के किसी भी और प्रदेश में नहीं हो रही हैं, नहीं होती हैं। ममता बैनर्जी के तेवर सत्ता को चलाने के लिए कुछ अधिक ही बगावती दिखते हैं। उन्हें सत्ता की जवाबदेही समझनी चाहिए, और विपक्ष की तरह का बर्ताव अपने ही राज में करना ठीक नहीं है।
अब आज बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी दलों की कोई जमीन नहीं बच गई है, विधानसभा में ये घुस भी नहीं पाए हैं, इसलिए वहां के लोकतांत्रिक नजारे में इनकी बात का अधिक वजन भी नहीं रह गया है। ऐसे में भाजपा और टीएमसी के बीच का कातिल-टकराव केन्द्र और राज्य के संवैधानिक टकराव में बार-बार बदलता है, और इस दर्जे की हिंसा एक नया टकराव तो खड़ा कर ही चुकी है। कोलकाता हाईकोर्ट के अलावा केन्द्र सरकार, भाजपा, कांग्रेस, वामपंथी, राष्ट्रीय महिला आयोग, सभी बंगाल पहुंच रहे हैं, और राजनीतिक मतभेदों के चलते राज्य में इस दर्जे की हिंसा ममता को निश्चित ही भारी पड़ेगी।
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आज कांग्रेस पार्टी के भीतर चुनावी शिकस्त को लेकर दिख रही बेचैनी कोई नई बात नहीं है। दो बरस पहले जब पार्टी को लोकसभा चुनावों में उम्मीदों के खिलाफ जाकर बड़ी बुरी हार मिली थी तब भी यह बेचैनी शुरू हुई थी, और तब से अब तक जारी ही थी। लेकिन इसे पार्टी के खिलाफ गद्दारी भी कहा गया, लोगों की भाजपा में जाने की कोशिश भी करार दिया गया। लोगों को बार-बार यह नसीहत दी गई कि घर की बात घर के भीतर रखनी चाहिए, हालांकि यह बात किसी ने नहीं कही कि घर की बात घर के भीतर रखने के लिए उस घर तक आखिर पहुंचा कैसे जाए जहां पार्टी के नेताओं को भी महीनों और बरसों तक वक्त नहीं मिलता? खैर, कांग्रेस पार्टी की आज की बदहाली के बारे में अधिक चर्चा करना आज का मकसद नहीं है, बल्कि यह एक शुरुआत के लिए दिख रहा मुद्दा है जिस पर बात की जानी चाहिए।
किसी भी सरकार या संगठन के भीतर, या किसी कारोबार के भीतर भी अगर लोगों का आपस में सोचना-विचारना कम हो जाता है, बंद हो जाता है, तो उनका आगे बढऩा भी बंद हो जाता है। जिस संगठन या कारोबार में ऊपर से फतवे आते हैं, और फिर वे नीचे के लोगों के लिए हुक्म बन जाते हैं, तो वहां पर गलतियों की सबसे अधिक गुंजाइश रहती है। गिनाने के लिए कई ऐसी मिसालें गिनाई जा सकती हैं कि फलां पार्टी तो एक व्यक्ति के हांके चलती आ रही है, और वह आगे भी बढ़ते जा रही है। लेकिन इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या वह सचमुच अपनी सभी संभावनाओं को पा सकी है? या फिर उन संभावनाओं से बहुत पीछे रह गई है, क्योंकि उसमें न तो कोई आत्ममंथन था, और न ही उसमें नई सोच, सोच की विविधता की कोई जगह रह गई थी। एक बंद टंकी के पानी की तरह उसकी सोच पर काई जमती चली गई, और ऐसी अधिकतर पार्टियां अपार संभावनाओं के रहते हुए भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पातीं या कांग्रेस की मिसाल अगर देखें तो आसमान की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद यह पार्टी नीचे मिट्टी में मिल गई है क्योंकि न इसमें सोच की विविधता की जगह रही, न सामूहिक नेतृत्व नाम की कोई बात रही। ऐसे में उसका यह हाल होना ही था। लेकिन राजनीतिक दलों से परे की भी बात करें तो सोच की विविधता, प्रतिभा का सम्मान, और खुला दिमाग रखना, इन सबकी वजह से कोई भी संगठन या कोई देश बहुत आगे बढ़ सकते हैं।
अब आज हिन्दुस्तान की एक सबसे बड़ी, और अच्छी-खासी साख वाली कंपनी टाटा को अगर देखें तो पारसी परिवार की शुरू की हुई कंपनी जिसके अधिकतर शेयर पारसी परिवारों के बीच थे, उसके अलग-अलग अफसर बदलते हुए आज एक दक्षिण भारतीय मुखिया इस कंपनी को चला रहा है। इसका न तो टाटा परिवार से कोई लेना-देना था, और न ही शेयर होल्डरों से। ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं जिनमें पेशेवर सीईओ काम करते हैं, और उसे आसमान तक ले जाते हैं। अमरीका में आज बड़ी-बड़ी कंपनियां चलाने वाले सुंदर पिचाई, सत्या नडेला, इन्द्रा नूरी जैसे लोगों का उन कंपनियों से कोई लेना-देना नहीं था, वे केवल पेशेवर कर्मचारी थे, और कंपनियों के मुखिया बने। ऐसी कामयाब कंपनियों के भीतर यह बात रही कि लोगों के बीच साथ बैठकर सोचने-विचारने की आजादी रही। हिन्दुस्तान में आज कारोबार से लेकर सरकार तक, और राजनीतिक पार्टियों तक इसी बात की कमी है। जयललिता और मायावती जैसे लोगों के सामने दंडवत होना ही उनकी पार्टियों में विचार-विमर्श का पैमाना था। इनका अंत आगे-पीछे होना ही था। कुछ वैसा ही अंत अकाली दल का हुआ, समाजवादी पार्टी अपनी संभावनाओं तक नहीं पहुंच पाई, और लालू की पार्टी उनके कुनबे की गुलाम होकर खत्म हो गई। शरद पवार लंबे समय तक महाराष्ट्र के मुखिया रहने के बाद आज वहां के सत्तारूढ़ गठबंधन के तीन भागीदारों में से एक रह गए हैं, और केन्द्र की सत्ता में उनकी कोई भागीदारी नहीं रह गई है। इसलिए बदहाली हासिल करने वाली कांग्रेस अकेली पार्टी नहीं है।
दरअसल कामयाबी तक पहुंचने के लिए अपने घर के भीतर, संगठन के भीतर जिस तरह की आंतरिक असहमति का स्वागत होना चाहिए, वह जहां बिल्कुल नहीं रह जाता, वहां गलतियां ही गलतियां होने लगती हैं, और संभावनाएं धरी रह जाती हैं। संगठन या कारोबार के भीतर जहां असहमति का सम्मान होता है, वहां बहुत से दिमाग मिलकर काम करते हैं, वहां विविधता का फायदा मिलता है। लेकिन जहां असहमति को गद्दारी मान लिया जाता है, और विचार-विमर्श को बगावती तेवर करार दिया जाता है, वहां आगे बढऩा खत्म हो जाता है। हिन्दुस्तान में आज भाजपा जिस आसमान पर पहुंची हुई है उसके पीछे पिछले कुछ दशकों को देखें तो नेताओं की एक विविधता भी रही है। हर दो-चार बरस में पार्टी अध्यक्ष बदलते रहे, पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बदलते रहे, और वक्त आने पर लालकृष्ण अडवानी जैसे लोगों को हाशिए पर करके नई लीडरशिप आई, और उसने नई कामयाबी भी पाई। लोगों की आवाजाही जहां लगी नहीं रहती, वहां संगठन खत्म होने लगते हैं, आगे-पीछे यह खतरा ममता बैनर्जी की पार्टी के साथ भी रहेगा जहां वे अकेली ही सब कुछ हैं, और अगर उनके अलावा जरा सी गुंजाइश किसी और के लिए है, तो वह उनके भतीजे के लिए ही है।
सरकारों के भीतर भी यह देखने में आता है कि जहां प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपने फैसलों को लेकर किसी से सलाह-मशविरा करने के मोहताज नहीं रहते, वहां पर उनसे नोटबंदी जैसी ऐतिहासिक गलतियां होती हैं, और जिनसे उबरने की गुंजाइश हर किसी के पास नहीं होती, नरेन्द्र मोदी के पास तो फिर भी थी। इसके बजाय जिन सरकारों में सलाह-मशविरे की भागीदारी अधिक रहती है, उनमें कामयाब होने की संभावना भी अधिक होती है। सार्वजनिक जिंदगी से परे निजी जिंदगी में भी जो व्यक्ति या परिवार अपने बड़े फैसले अपने छोटे से दिमाग से अकेले लेते हैं, वे बड़ी गलतियां करने का खतरा अधिक उठाते हैं। इसलिए अपने आसपास के लोग, अपने संगठन या सरकार, या कारोबार के लोग न सिर्फ विचार-विमर्श के लिए साथ रखने चाहिए, बल्कि उन्हें उनकी असहमति को भी सामने रखने के लिए बढ़ावा देना चाहिए।
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भाजपा सरकार वाले कर्नाटक में सरकार द्वारा मुस्लिम स्कूली छात्राओं के हिजाब पर लगाई गई रोक को कर्नाटक हाईकोर्ट ने सही ठहराया है, और कहा है कि हिजाब इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। इस बारे में मुस्लिम छात्राओं ने याचिका लगाई थी जिसे खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल-कॉलेज में छात्र-छात्राएं यूनिफॉर्म पहनने से मना नहीं कर सकते हैं। वहां जब से सरकारी स्कूलों में यूनिफॉर्म से हिजाब पर बंदिश लगाई गई थी, बहुत से परंपरागत मुस्लिम परिवारों ने अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना बंद कर दिया था। अब समाज में इस प्रचलित व्यवस्था के चलते हुए इन लड़कियों की पढ़ाई का क्या होगा यह एक बड़ा सवाल इस अदालती फैसले के बाद खड़ा हुआ है, और सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल रहेगा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के 9 जज इससे जुड़े हुए कुछ बुनियादी सवालों पर आखिरी फैसला नहीं लेते हैं, तब तक मुस्लिम लड़कियों को स्कूली पोशाक के साथ-साथ हिजाब की छूट दी जाए या नहीं। अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई शुरू नहीं की है लेकिन हमारा यह मानना है कि हाईकोर्ट के फैसले के इस हिस्से पर तुरंत ही स्थगन देने की जरूरत है क्योंकि इससे मुस्लिम छात्राओं की पढ़ाई पर एक ऐसा नुकसान पडऩे वाला है जिसकी भरपाई नहीं हो सकेगी। अगर परंपरागत समाज इस मुद्दे पर लड़कियों को स्कूल-कॉलेज भेजना बंद कर देता है तो वह भारत में लड़कियों की आत्मनिर्भरता के खिलाफ भी जाएगा।
अब कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले को अगर देखें तो इसमें संविधान की कुछ बुनियादी बातों को अनदेखा किया गया है। बहुत सी बातें संविधान की मूल धाराओं में लिखी हुई है जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बातें हैं जिनमें पोशाक की पसंद भी शामिल है। यह फैसला ऐसी बातों का कोई न्यायसंगत निपटारा नहीं कर रहा है कि पोशाक की व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक परंपरा का स्कूली पोशाक के साथ एक सहअस्तित्व भी हो सकता है। संविधान के जानकार लोगों ने इस फैसले को बहुत ही निराशाजनक और खामियों वाला माना है, और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस पर अमल तुरंत रोकने की उम्मीद भी की है। हम कानूनी बारीकियों के जानकार नहीं हैं, लेकिन प्राकृतिक न्याय की हमारी साधारण समझ यह सुझाती है कि धर्म के कट्टर प्रतीकों से परे भी धर्म के ऐसे प्रतीक हो सकते हैं जो लोग अपनी साधारण मान्यताओं के तहत मानना चाहते हैं, और इनमें हिजाब भी एक हो सकता है जो कि इस्लाम के तहत अनिवार्य चाहे न हो, वह इस्लाम को मानने वाले लोगों में एक धार्मिक परंपरा की तरह है। अब हिजाब या ऐसा कोई भी दूसरा प्रतीक किसी धर्म का अनिवार्य हिस्सा है, या उन धर्मावलंबियों के लिए वह एक प्रचलित परंपरा है, ऐसे महीन फर्क के बीच जब कर्नाटक हाईकोर्ट के जज फर्क करने बैठे हैं, तो उससे लोगों के बुनियादी हक खत्म हो रहे हैं। बाकी बहुत से धर्मों के बहुत से ऐसे प्रतीक हैं जिनका इस्तेमाल स्कूली पोशाक के साथ टकराव नहीं माना जाता। हिन्दू, सिक्ख, ईसाई धर्मों के कई प्रतीकों का इस्तेमाल छात्र-छात्राएं करते हैं, और उन पर एक हमलावर अंदाज में रोक अगर लगाई जाएगी, तो उससे इस देश में विविधता की बुनियादी खूबी खत्म होगी, और बहुत से तबके के लोगों को यह लगेगा कि देश में उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जा रहा है।
कर्नाटक की भाजपा सरकार का शुरू किया गया यह बखेड़ा उसकी राजनीतिक ध्रुवीकरण की बदनीयत की एक हिंसक मिसाल है। उत्तरप्रदेश चुनाव के वक्त इसे शुरू किया गया था, और अब चुनाव के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी अपने बहुत ही तंगनजरिए की व्याख्या से सरकार और राजनीतिक ताकतों की इस कोशिश की आग में घी डालने का काम किया है। दिल्ली नेशनल लॉ स्कूल में संविधान पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर ने सुप्रीम कोर्ट के बहुत से ऐसे फैसलों को गिनाया है जिनको कर्नाटक हाईकोर्ट की इस बेंच ने अनदेखा किया है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले तब तक कानून रहते हैं जब तक संसद कोई नया कानून बनाकर उन्हें पलट न दे। ऐसे में हाईकोर्ट ने यह बहुत ही खराब और सामाजिक अन्याय का फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट के बहुत से फैसलों को अनदेखा किया है।
अभी दरअसल सुप्रीम कोर्ट में धर्म के रीति-रिवाज को लेकर एक मामला चल रहा है, और संविधानपीठ उसकी सुनवाई कर रही है। इस मामले के बहुत से पहलू हैं, और उनमें से कुछ का अंतिम निपटारा होने तक कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले की अमल पर रोक लगानी चाहिए, और हिजाब की छूट दी जानी चाहिए। भारत के संविधान की बुनियादी समझ रखने वाले आम लोग भी यह बतला सकते हैं कि स्कूल-कॉलेज में यूनिफॉर्म का नियम साधारण धार्मिक परंपराओं को कुचले बिना लागू करने का एक आसान रास्ता जब है, तब एक अल्पसंख्यक तबके पर हमला करने की यह सरकारी सोच लोकतंत्र से बहुत परे की है। आज यह हमला सोच-समझकर मुस्लिम समुदाय पर हो रहा है, लेकिन बाकी धार्मिक अल्पसंख्यकों को यह समझ लेना चाहिए कि अगली बारी उनकी हो सकती है।
इस मुद्दे से जुड़ा हुआ एक दूसरा सामाजिक सवाल यह भी है कि क्या इस्लाम के तहत मुस्लिम समुदाय में पोशाक की हर तरह की बंदिश लड़कियों और महिलाओं पर ही लादने के इस सिलसिले को खत्म करना सारे देश की जिम्मेदारी नहीं है? आज जब किसी एक समाज को कुचलने की नीयत से कर्नाटक में यह सरकारी फैसला लागू किया गया है, तो उसे देखते हुए इस फैसले के समाज सुधारक होने का संदेह का लाभ देने की कोई गुंजाइश नहीं बचती है। फिर भी हम इस पहलू की चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इसे लादने वाले लोग इसे मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों का हिमायती फैसला बताने का तर्क भी दे सकते हैं, और वे कितने बड़े हिमायती हैं, यह बात उनके बाकी दर्जन भर फैसलों से और उनके हिंसक बर्ताव से आए दिन साबित होते रहती है। कुल मिलाकर कर्नाटक हाईकोर्ट का यह बहुत ही कमजोर और बेइंसाफ फैसला सुप्रीम कोर्ट में खड़े होते नहीं दिखता, लेकिन इस पर फैसला जल्द होना चाहिए क्योंकि जब तक इसे खारिज नहीं किया जाएगा तब तक एक तबके के बुनियादी अधिकार छिने रहेंगे।
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भारतीय रेल के मुसाफिरों को कोरोना लॉकडाऊन के पहले तक मिलने वाली टिकट पर रियायत अब शुरू नहीं की जा रही है। इसे लॉकडाऊन के बाद चलने वाली गिनी-चुनी रेलगाडिय़ों में बंद रखा गया था, लेकिन अब लोकसभा में रेलमंत्री ने यह जानकारी दी है कि रियायत पर यह पाबंदी जारी रहेगी। अब न तो लॉकडाऊन रहा, और न कोरोना की कोई लहर बची है, फिर भी बुजुर्ग मुसाफिरों को मिलने वाली यह बड़ी रियायत छीन ली गई है। ये लोग संख्या में कम हो सकते हैं, इनका सफर भी कम हो सकता है, लेकिन बुढ़ापे की सीमित कमाई या दूसरों का मोहताज रहते हुए सस्ती टिकट पर तो ये तीर्थयात्रा से लेकर रिश्तेदारी तक में आना-जाना कर लेते थे, अब टिकट रियायत में छूट खत्म होने से गरीब तबके के बुजुर्गों का तो मानो सफर बंद सा हो जाएगा, क्योंकि आज तो गरीबों के पास जवान लोगों के काम के लिए भी टिकट खरीदने की गुंजाइश नहीं बची है।
केन्द्र की मोदी सरकार ने हाल के बरसों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाते हुए उन्हें 30-40 फीसदी से अधिक महंगा कर दिया है। रेलवे प्लेटफॉर्म टिकटों को पांच रूपए से बढ़ाकर पचास रूपए कर दिया गया है। जहां-जहां रेलवे स्टेशनों का निजीकरण हुआ है वहां पर पार्किंग फीस भी कई गुना बढ़ चुकी है। महामारी से बचने के लिए और अपना खर्च बचाने के लिए रेलवे ने लॉकडाऊन के पूरे दौर में बिना रिजर्वेशन वाली टिकटें भी बंद कर दी थीं, और तरह-तरह की तरकीबें निकाली थीं कि सीमित मुसाफिरों की जेब से अधिक से अधिक पैसा कैसा निकाला जा सके। अब बुजुर्गों की टिकट पर जब रियायत खत्म की जा रही है तो कम से कम यह सोचा जाना चाहिए था कि महंगे दर्जे के डिब्बों में चाहे रियायत खत्म की गई होती, साधारण दर्जे पर तो इसे जारी रखना था। वैसे भी किसी भी सभ्य देश में बुजुर्ग नागरिकों का अलग से अधिक ध्यान रखा जाता है, और भारत में तो माता-पिता और बुजुर्गों की अतिरिक्त सम्मान की एक तथाकथित संस्कृति का दावा किया जाता है, जिसके चलते हुए भी इस तबके की जिंदगी से खुशी के ये पल छीन लिए गए हैं।
ऐसा लगता है कि चुनावों में लगातार जीत की वजह से केन्द्र सरकार की मुखिया भाजपा को अब देश के वोटरों के किसी छोटे तबके की फिक्र नहीं रह गई है। जब देश के लोग भावनात्मक मुद्दों पर रीझ कर वोट देने को आमादा हों, तो उन्हें किसी भी तरह की रियायत देने की जरूरत कहां रह जाती है? जब सौ रूपए लीटर पेट्रोल खरीदने वाले लोग मोदी को प्रधानमंत्री बनाए रखने के लिए दो सौ रूपए लीटर का भी पेट्रोल खरीदने के फतवे देते रहते हैं, तो फिर उन्हें रियायत की भी क्या जरूरत है, और उनके टैक्स को भी असीमित बढ़ाने चलने में क्या दिक्कत है? अलग-अलग किस्म के सामानों को लेकर भारत की आम जनता पर बोझ हाल के बरसों में कितना बढ़ा है, इसकी एक लंबी फेहरिस्त बन सकती है। लेकिन जनता उससे भी बेफिकर है, और यही बात सरकार को असाधारण आत्मविश्वास देती है, उसे बददिमाग और बेरहम भी बना देती है।
दरअसल हिन्दुस्तान की तथाकथित जनचेतना का 21वीं सदी के किसी भी असल मुद्दे से सौतेला रिश्ता भी नहीं रह गया है। वह अधिकतर हिन्दुस्तान के इतिहास के एक हिस्से से लगातार जंग जारी रखे हुए है, और इसके लिए हिन्दुस्तान के इतिहास के एक दूसरे काल्पनिक हिस्से से हथियार भी निकालकर ले आती है, और आज की सत्ता को नापसंद इतिहास पर हमले करने लगती है। जब सारा का सारा आत्मगौरव ऐसे काल्पनिक इतिहास पर खड़ा होता है, तो उसे आज की पथरीली जमीन भला कहां सुहा सकती है। इस सिलसिले ने देश की जनता के रोजाना के दुख-दर्द को महत्वहीन बना दिया है। जब राष्ट्रवाद को भूख-प्यास से बढक़र महत्वपूर्ण बना दिया गया है, तो नोटबंदी की कतारों की तकलीफ, और लॉकडाऊन की घरवापिसी की तकलीफ की चर्चा होने पर लोग तुरंत कारगिल में छह महीने बर्फ में खड़े सैनिकों की तकलीफ गिनाने लगते हैं, और सवाल करने लगते हैं कि आम हिन्दुस्तानी की रोजाना की तकलीफें क्या उससे भी बढक़र हैं?
एक बड़ी दिक्कत यह भी हो गई है कि हिन्दुस्तानी जिंदगी में जिस तरह धर्म का महत्व बढ़ गया है, धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता का महत्व बढ़ गया है, उसी तरह मीडिया और सोशल मीडिया का भी महत्व बढ़ गया है जो कि इस देश में सबसे अधिक हमलावर और दकियानूसी सोच से लदे हुए हैं। आज यह तुलना कर पाना मुश्किल है कि मीडिया अधिक पाखंडी है, या सोशल मीडिया। ऐसे में जिंदगी की सोच को चारों तरफ से घेरकर रखने वाले तमाम माध्यम इसी तरह के हो गए हैं। आज जब देश की सामूहिक जनचेतना कश्मीरी पंडितों की दिक्कतों को देखने, उन पर सोचने, और उन्हें सुलझाने के बजाय इस पर केन्द्रित है कि उन्हें कश्मीर से भगाने वाले लोगों का मजहब क्या था, और उस मजहब के लोगों को आज देश भर में किस तरह धिक्कारा जा सकता है, तो फिर बुजुर्गों की रेलटिकट-रियायत खत्म होने की क्या चर्चा करना?
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होली के रंगों के बाद आज कामकाज शुरू होने को था कि पहली खबर ही बहुत खराब मिली। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के एक गांव में पेड़ पर एक नाबालिग जोड़े ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। लोगों का कहना है कि दोनों एक ही समुदाय के थे, और आपस में प्रेम करते थे, शादी करना चाहते थे, घरवालों की ओर से शादी की मंजूरी भी मिल चुकी थी, और इस बीच दोनों ने फांसी लगा ली। दोनों ही स्कूल में पढ़ते थे। इस मामले में फांसी कुछ अटपटी बात इसलिए लग रही है कि दोनों एक ही जाति के थे, और परिवार की तरफ से शादी की मंजूरी मिली हुई थी। आमतौर पर अलग-अलग जाति या धर्म के लडक़े-लड़कियों के बीच प्रेम होने पर परिवार और जात बिरादरी दुश्मन बन जाते हैं, और मोहब्बत की किस्मत दीवार में चुुन दी जाती है। ऐसे भी प्रेमीजोड़े की आत्महत्या हर कुछ दिनों में कहीं न कहीं होती है। हिन्दुस्तान में धर्म और जाति का, आर्थिक ताकत की अहंकार का, ओहदे के घमंड का हाल यह है कि मां-बाप अपने बच्चों की मौत बनकर सामने आते हैं, या बच्चे उनके हुक्म को अनसुना करें, तो वे अपनी तथाकथित इज्जत के लिए अपने हाथों अपनी औलादों को मार डालते हैं।
इस मामले के दो बिल्कुल अलग-अलग पहलू हैं, एक तो भारतीय समाज में प्रेम की संभावनाओं का, और दूसरा किसी भी तरह की वजह से आत्महत्या का। इन दोनों पर अलग-अलग गौर करना जरूरी है। जिस राजनांदगांव जिले से ऊपर की यह खबर आई है उसी जिले के एक दूसरे गांव में होली के दिन गर्भवती नवविवाहिता अपने मायके जाना चाहती थी, और पति को यह आपत्ति थी कि कुछ दिन पहले ही वह मायके से लौटी थी, इस पर बहस हुई, और पत्नी ने मिट्टी तेल छिडक़कर आग लगा ली, वह मर गई, और बचाते हुए पति झुलस गया। इस किस्म के घरेलू तनाव से आत्महत्या के भी बहुत से मामले सामने आते हैं। छत्तीसगढ़ में ही कल ही आत्महत्या की कुछ और खबरें भी आई हैं।
शहरीकरण के साथ-साथ जब अपने परिवारों से परे लोगों का आर्थिक सशक्तिकरण हो रहा है, तो लोग अपनी मर्जी से शादी का हौसला भी जुटा पा रहे हैं। शादी के बिना भी प्रेम की संभावनाएं बढ़ती चल रही हैं क्योंकि पढ़ाई, खेलकूद, दूसरे तरह की गतिविधियों के चलते हुए लडक़े-लड़कियों को बाहर मिलने के मौके बहुत मिल रहे हैं, और उससे दोस्ती, प्रेम, और शादी की गुंजाइश भी बढ़ते चल रही है। इससे जाति व्यवस्था भी टूट रही है, और दकियानूसी समाजों में गोत्र को लेकर जो हिंसक जिद चली आती है, वह भी खत्म हो रही है। धर्मों के बीच भी अलगाव शहरीकरण की वजह से कम हो रहा है, और अंतरजातीय और अंतरधर्मीय शादियों से सामाजिक विभाजन भी घट रहा है। इसकी रफ्तार बहुत धीमी है, लेकिन यह सिलसिला शहरीकरण और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ आगे बढ़ रहा है। आज दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा शहरों में नहीं है, और जो हिस्सा शहरों में है वह हिस्सा भी मां-बाप के काबू वाले समाज का अधिक है, इसलिए प्रेम विवाह के पहले हिंसा अधिक होने लगती है। ऐसे में निराश प्रेमी-प्रेमिका खुदकुशी पर उतारू हो जाते हैं क्योंकि पुलिस या समाज के बाकी लोग भी जाति व्यवस्था को कायम रखने पर आमादा रहते हैं।
प्रेम-संबंधों से परे भी हिन्दुस्तान में आत्महत्याओं के आंकड़े बढ़ते चले जा रहे हैं। नेशनल क्राईम रिकॉडर््स ब्यूरो की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ देश में आत्महत्याओं के मामले में तीसरे नंबर पर है, यहां पर हर बरस एक लाख आबादी पर 26.4 लोग खुदकुशी करते हैं, जो कि राष्ट्रीय आत्महत्या-औसत 11.3 प्रति लाख से ढाई गुना है। 2018 में छत्तीसगढ़ देश में पांचवें नंबर पर था, 2019 में चौथे नंबर पर आ गया, और 2020 में तीसरे नंबर पर। छत्तीसगढ़ के दुर्ग-भिलाई, और रायपुर देश में आत्महत्याओं के मामले में देश में तीसरे और चौथे नंबर वाले शहर हैं। जिस प्रदेश में सरकार ने किसानों को इतनी सहूलियत दी हुई है वहां पर इतने लोग क्यों जान देते हैं, यह एक सामाजिक अध्ययन का विषय होना चाहिए। यहां पर इस वैज्ञानिक तथ्य को भी समझना जरूरी है कि कुछ आत्महत्याओं का कारण अनुवांशिकी भी होता है, अगर परिवार में पहले किसी ने खुद की जान ली है, तो इसका खतरा अधिक रहता है कि बाद में भी परिवार में कोई ऐसा करे।
आत्महत्याओं की रोकथाम की सामाजिक जागरूकता में लगे हुए लोगों ने यह पाया है कि इसकी बहुत सी बिल्कुल अलग-अलग वजहें हो सकती हैं। असफल प्रेम से लेकर इंटरनेट गेम्स से प्रोत्साहित होकर भी लोग खुदकुशी करते हैं। छत्तीसगढ़ से लेकर पंजाब तक अलग-अलग बहुत से किसानी वाले राज्यों में किसानों की आत्महत्या हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है, और देश में हरित क्रांति में सबसे अधिक योगदान देने वाले पंजाब में भी किसानों की आत्महत्या हर बरस सैकड़ों की संख्या में होती है, और इस आंकड़े को किसान आंदोलनकारी पूरी तरह फर्जी करार देते हैं। फिर भी देश के सरकारी आंकड़े पिछले कई बरसों से हर बरस दस हजार से अधिक किसानों की आत्महत्या दिखा रहे हैं। हिन्दुस्तान में असफल प्रेम या अवैध कहे जाने वाले संबंधों के तुरंत बाद किसानों की आत्महत्या के आंकड़े आते हैं। लेकिन समाज और परिवार को अपने बीच के लोगों की फिक्र करनी चाहिए जो कि तनाव से गुजर रहे हैं।
जानकार लोगों का यह मानना है कि आत्महत्या करने वाले लोग काफी सोचने-विचारने के बाद ऐसा करते हैं, और उनके व्यवहार से कई बार ऐसे संकेत मिलते हैं कि वे तनाव से गुजर रहे हैं, और उनका तनाव बढ़ते चल रहा है। कई बार उनके मुंह से निकलता है कि जिंदगी में क्या रखा है, कभी उनके बर्ताव में फर्क आ जाता है, कभी वे अपने चहेते सामान लोगों में बांट देते हैं, कभी किसी के सामने अपनी जिंदगी को बोझिल बताते हैं, कभी उनकी भूख गायब हो जाती है, या नींद खत्म हो जाती है, कभी वे अनजानी आवाजें सुनाई पडऩे की शिकायत करते हैं। ऐसी तमाम बातों पर आसपास के लोगों को नजर रखनी चाहिए, और उनका मानसिक उपचार करवाना चाहिए। इसके साथ-साथ परिवार और समाज के लोग, निराश लोगों के दायरे के लोग भी उनका हौसला बंधाने का काम कर सकते हैं। आज एक दिक्कत यह भी है हिन्दुस्तान में मानसिक इलाज की बात करने पर, या परामर्श के लिए ले जाने पर लोग उनके लिए लापरवाही और हिंसा से पागल जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं।
आज हमारे इस अखबार सहित हर किस्म के मीडिया में आत्महत्या की खबरें रोज छपती हैं, और दुनिया भर के रिसर्च में यह पाया गया है कि आत्महत्याओं को बढ़ा-चढ़ाकर छापना या दिखाना, कई और लोगों को ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करता है। यही वजह है कि एक आत्महत्या की खबर कगार पर खड़े हुए कई दूसरे लोगों को भी वैसा करने के लिए प्रेरित करती हैं, या उन्हें उसका हौसला देती हैं। इसे नकल करते हुए की गई आत्महत्या कहते हैं। इसके ठीक उल्टे यह है कि अगर मीडिया में सकारात्मक खबरें आती हैं, ऐसी सच्ची कहानियां आती हैं कि कैसे लोग आत्महत्या की कगार पर पहुंचकर वापिस लौटे, और फिर जिंदगी में कामयाब हुए, तो उसके असर से कई संभावित आत्महत्याएं रूकती भी हैं।
इसलिए परिवार और समाज से लेकर मीडिया तक, सबको अपने-अपने किरदार को बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है ताकि वे आत्महत्या को बढ़ावा देने के जिम्मेदार न बनें, और उसकी रोकथाम में मदद कर सकें।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट में अभी दो जजों, प्रीतिंकर दिवाकर और आशुतोष श्रीवास्तव, की अदालत में एक वकील बिना गाऊन (लबादा) पहने पेश हुआ तो जजों ने उसकी आलोचना की, और इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने कहा कि वे ऐसी हरकत पर बार काउंसिल को लिख सकते हैं लेकिन वकील के नौजवान होने की वजह से वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। जजों ने इस वकील को भविष्य में इसका ख्याल रखने की चेतावनी भी दी है। भारत के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकीलों को काले कोट के ऊपर एक काला लबादा भी पहनना पड़ता है जो कि एक कॉमिक्स, मैनड्रेक के मुख्य किरदार एक जादूगर के लबादे की तरह रहता है। हिन्दुस्तानी अदालतों में यह सिलसिला उन अंग्रेजों के वक्त से शुरू हुआ था जिन्होंने इस हिन्दुस्तान को गुलाम बनाकर कुचला था, और जो अपने ठंडे देश की जरूरत की मुताबिक कपड़े पहनने के आदी थे, और उन्होंने हिन्दुस्तान में भी जहां-जहां अदालती और सरकारी रीति-रिवाज बनाने थे, उसी किस्म के बनाए थे। वही ड्रेस लागू किया था जो कि उनके सर्द माहौल में जरूरी था। लोगों ने अंग्रेजी अदालतों के जजों की तस्वीरें फिल्मों और टीवी सीरियलों में देखी होंगी कि वे किस तरह कोट के ऊपर लबादा पहनकर और सिर पर ऊन की एक विग लगाकर बैठते हैं ताकि उनका सिर ठंड से बचा रहे। जिस हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में गर्मी और बहुत गर्मी नाम के दो मौसम रहते हैं, वहां पर वकीलों पर काले कोट के ऊपर काला लबादा पहनकर ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पेश होने की बंदिश शर्मनाक है।
हिन्दुस्तान की छोटी अदालतों में भी देखें तो जहां पर भरी गर्मी में भी वकीलों के लिए ठंडक का कोई इंतजाम नहीं रहता, और जहां पर वे एक अदालत से दूसरी अदालत दौड़ते हुए लू के थपेड़ों का सामना करते हैं, वहां भी उनसे काला कोट पहनने को कहा जाता है, और बहुत से गरीब वकील तो ऐसे रहते हैं जिनके काले कोट पर पसीने के सफेद दाग से मानो मुल्क का नक्शा ही बन जाता है। कुछ ऐसा ही हाल भारत की रेलगाडिय़ों में अंग्रेजों के समय से टिकट जांचने वाले अधिकारियों का है जिन्हें काला कोट पहनने की बंदिश रहती है, और बिना एसी वाले डिब्बों से लेकर रेलवे प्लेटफॉर्म तक भट्टी की तरह तपते रहते हैं। कुछ ऐसा ही हाल हिन्दुस्तान में पुलिस का है जिसे अंग्रेजों के समय से चमड़े के जूते पहनाना शुरू हुआ, तो वह आज भी जारी है, जबकि आज कई किस्म के आरामदेह जूते चलन में आ गए हैं, लेकिन जिस पुलिस से दौड़-भाग और कामकाज की उम्मीद की जाती है, उसे चमड़े के कड़े जूते पहनने को कहा जाता है जिस पर पॉलिश करने का बोझ भी रहता है।
आजादी की पौन सदी पूरी हो रही है, लेकिन हिन्दुस्तान अब तक सिर उठाकर जीना नहीं सीख पाया है। वह अंग्रेजों के छोड़े गए पखाने को अपने सिर पर एक टोकरे की तरह सजाकर खुश है। देश की नौकरशाही को देखें तो वह बंद गले का कोट या सूट और टाई लगाकर लाट साहब बनकर जनता के पैसों की एयरकंडीशनिंग बर्बाद करती है। किसी शासकीय या राजकीय समारोह में अफसरों को बंद गले का कोट पहने देखकर ही तन-बदन में आग लगने लगती है। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति, या देश के मुख्य न्यायाधीश के आने पर, या किसी और देश के किसी प्रमुख का स्वागत करने के लिए तैनात अफसरों को मई-जून की 45 डिग्री की तपती हुई भट्टी में भी कोट या सूट पहनने की बंदिश बुनियादी मानवाधिकारों के भी खिलाफ है, लेकिन देश की किसी अदालत को यह बात नहीं खटकती, और वे राजसी-सामंती महत्व पाना चाहती हैं। ऐसे जितने लोग दिखावे के इस आडंबर के लबादे ढोते हैं, उनकी वजह से उनके घर, दफ्तर, समारोह की जगहों पर अंधाधुंध एसी चलाकर उन्हें ठंडा रखा जाता है ताकि वे कोट-जॉकिट, और लबादों के भीतर भी गर्मी महसूस न करें। कुल मिलाकर अंग्रेजों की इस उतरन को आज भी हिन्दुस्तानी राजकीय, शासकीय, और अदालती परंपरा बनाने की कीमत आम जनता चुकाती है, जो कि इन जगहों के बिजली के बिल देती है। अदालतों के जानकार कुछ लोगों का कहना है कि दिल्ली हाईकोर्ट वहां के साल के कुछ सबसे गर्म महीनों में वकीलों को लबादे से छूट देती है। लेकिन कई हाईकोर्ट अंग्रेजों की छोड़ी परंपराओं के इतने बड़े भक्त हैं कि वहां किसी नए मुख्य न्यायाधीश को शपथ लेते समय ऊनी विग भी पहननी पड़ती है जो कि अंग्रेजों के अपने देश में तो बर्फीले मौसम में जजों के सिर के लिए हिफाजत की चीज थी, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे गर्म देश में जो एक गंदे बोझ के अलावा कुछ नहीं है।
एक आजाद देश में यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। आम जनता जो कि पिछले कई जन्मों के बुरे कामों की वजह से आज अदालत में फंसती है, वह वैसे भी अदालती माहौल देखकर दहशत में रहती है। उसके बाद जब लबादा पहने हुए वकील उससे बात करते हैं, तो वह अपने या सामने वाले वकील को जादूगर की तरह मानने को मजबूर हो जाती है। ये सारे सामंती प्रतीक हिन्दुस्तान की अदालतों से, राष्ट्रपति भवन और राजभवनों से खत्म किए जाने चाहिए। यह देश गरीबों का देश है, और यहां पर साधनों की ऐसी बर्बादी भी ठीक नहीं है, और न ही वकीलों, खुद जजों, और दूसरे सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों पर पोशाक की ऐसी बंदिश लागू करनी चाहिए जो कि यहां के मौसम के खिलाफ है। देश के कई विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोहों में ऐसे ही लबादों का चलन खत्म कर दिया गया है, और उनकी जगह हिन्दुस्तानी संस्कृति की पोशाक लागू की गई है, जो कि एक बेहतर समझदारी का फैसला है। देश के बाकी तबकों को भी इससे सबक लेना चाहिए, और अंग्रेजों की गंदगी को ढोना अगर बंद किया जाए तो देश की बहुत सी बिजली भी बच सकती है।
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यूक्रेन पर रूस के हमले पर दुनिया बंटी हुई है। हिन्दुस्तान और चीन जैसे कई देश अपनी-अपनी अलग-अलग वजहों से इस मामले पर शांत हैं, पश्चिमी देश और योरप रूस के खिलाफ है, और बाकी देशों का भी अलग-अलग रूख है। खुद अमरीका के भीतर यूक्रेन को लेकर अमरीकी नीति बंटी हुई है, और कुछ प्रमुख लोगों का यह मानना है कि अमरीकी सरकार वहां जो कर रही है वह नाकाफी है। लेकिन रूस के मुहाने पर बैठे हुए योरप के नाटो देश अधिक खतरा उठाने की हालत में नहीं दिख रहे हैं क्योंकि अगर यह युद्ध बढ़ेगा, और रूस अगर दूसरे देशों पर भी जवाबी हमला करेगा तो वह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा युद्ध हो जाएगा, और वह तीसरा विश्वयुद्ध भी हो सकता है। ऐसे में सारे देश चौकन्ना होकर काम कर रहे हैं, यूक्रेन को नागरिक मदद कर रहे हैं, कुछ फौजी मदद भी भेज रहे हैं, लेकिन न तो अमरीका और न ही नाटो देश अपनी फौज वहां भेज रहे हैं। दरअसल किसी भी देश की फौज वहां पहुंचने का मतलब रूस को इस बात का हक देना हो जाएगा कि वह उन देशों पर भी हमला कर सके। तनाव को इतना बढऩे देने से सारे लोग कतरा रहे हैं।
लेकिन आज नाटो और अमरीका की तरफ से जो फौजी हथियार यूक्रेन को दिए जा रहे हैं, उनके खतरे को समझना होगा। आज बाहर से कोई फौजी मदद मिले बिना यूक्रेन रूस के सामने जल्दी कमजोर पड़ता, और वह या तो हार जाता, या कोई संधि विराम होता। इन दोनों ही स्थितियों में यूक्रेन की जनता मरने से बचती, और यूक्रेनी शहरों की जो भयानक तबाही अभी चल रही है, वह भी थमती। यूक्रेन अपनी ताकत से लडऩे लायक रहता तो लड़ता या फिर रूस के सामने समर्पण कर देता। दोनों तरफ की मौतें थमतीं, और यूक्रेन के ढांचे की तबाही भी थमती। लेकिन अमरीका और योरप जिस तरह का फौजी साज-सामान यूक्रेन को भेज रहे हैं उसका एक मकसद यह भी दिखता है कि वे यूक्रेन को इस मोर्चे पर डटाए रखना चाहते हैं ताकि उसके हाथों रूस की जितनी तबाही हो सके, उतनी हो जाए। पश्चिम के देश रूस पर लगाए आर्थिक प्रतिबंधों के असर का भी इंतजार कर रहे हैं, जिसमें महीनों लग सकते हैं। लेकिन इस बीच वे रूस को कमजोर भी करना चाहते हैं, इसलिए वे बिना अपनी फौजों को भेजे सिर्फ यूक्रेन को मोर्चे पर डटाए चल रहे हैं। रूस का नुकसान करने की नीयत पूरी करने के लिए नाटो और अमरीका यूक्रेन के जनता और इस देश को कोलैटरल डैमेज बना रहे हैं। नाटो और अमरीका के पास इस बात का पूरा अंदाज है कि इस मोर्चे के जारी रहने से रोज दोनों तरफ कितनी मौतें हो सकती हैं, यूक्रेन का कितना नुकसान हो सकता है, लेकिन रूसी फौजों का नुकसान, और रूसी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए नाटो और अमरीका इस जंग को चलने देना चाहते हैं।
यह बात कुछ लोगों को विरोधाभासी लग सकती है क्योंकि यूक्रेन से निकल रहे, और निकलने वाले दसियों लाख शरणार्थियों का बोझ योरप के देशों पर ही पडऩे वाला है, लेकिन वह एक नागरिक बोझ रहेगा, और रूस को फौजी और आर्थिक रूप से कमजोर करने की रणनीति एक अलग बात है। आज अगर नाटो-अमरीका की हथियारों की यह मदद नहीं रहती, तो शायद यूक्रेन की जंग कुछ जल्द खत्म हो गई रहती। किसी की मदद करने का यह अनोखा तरीका है जिसमें उसके अधिक दूर तक नुकसान पाने की गारंटी हो रही है। आज चारों तरफ इस मुद्दे पर अपनी कोई राय बनाने के पहले हर सरकार यह सोच रही है कि इस जंग से उसे क्या नफा या नुकसान हो रहा है। अब जैसे पंजाब की नई सरकार को लेकर एक नई अटकल सामने आई है कि दुनिया में गेहूं का दाम दो से चार गुना तक बढ़ चुका है क्योंकि रूस और यूक्रेन गेहूं के सबसे बड़े निर्यातक थे, और ऐसे हाल में पंजाब की नई सरकार को चाहिए कि वह दुनिया में गेहूं निर्यात करके एक मोटा मुनाफा कमाने की कोशिश करे ताकि उसके किसानों को फायदा हो सके। ऐसा हाल पेट्रोलियम, गैस, खाने का तेल, कई तरह के खनिज, बहुत किस्म की धातुओं को लेकर भी है कि रूस और यूक्रेन से निर्यात ठप्प होने पर किस-किस देश की क्या नई संभावना बनेगी? सोचा तो यहां तक जा रहा है कि रूस से पेट्रोलियम बहिष्कार जारी रखने के लिए क्या दुनिया ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को ढीला करे, और क्या ईरानी पेट्रोलियम से दुनिया की कमी को पूरा किया जा सके? दो देशों के बीच जंग में उनका सीधा नुकसान जो भी हो रहा हो, बाकी दुनिया को कई किस्म का नुकसान भी हो रहा है, और उसकी भरपाई के लिए भी उन्हें कई किस्म के फायदे कमाने के रास्ते निकालने का हक है।
लोगों को यह भी लग रहा है कि रूस अगर एक वक्त के सोवियत संघ का अपना हिस्सा रहा हुआ यूक्रेन फिर से कब्जा कर पाता है, तो क्या उससे ताईवान पर कब्जा करने की चीन की बहुत पुरानी, और हमेशा जिंदा हसरत को एक नई ताकत मिलेगी? क्या इससे हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच कश्मीर के कुछ विवादित हिस्सों को लेकर एक नए तनाव की हसरत खड़ी हो सकेगी? और आज लोगों को यह भी लग रहा है कि इस तनाव के बीच रूस और चीन के बीच संबंध जितने बेहतर हो रहे हैं, क्या वह अमरीका और उसके साथी देशों के लिए एक नया खतरा बन सकता है? ऐसे सौ किस्म के सवाल सौ देशों के सामने है, और वे अपने-अपने हितों को देखते हुए यह सोचते हैं कि रूस की हार या रूस की जीत में से उनका फायदा किसमें है? और रूस का अगर नुकसान करना उनके फायदे में है तो वह अपने लोगों की जिंदगी दांव पर लगाए बिना कैसे किया जा सकता है? आज की एक चर्चा यह भी है कि रूस में सत्ता के कुछ खरबपति कारोबारी लोगों की भाड़े के सैनिकों की निजी फौज को भी यूक्रेन भेजा गया है ताकि वे राष्ट्रपति और उनके परिवार को मार सकें। रूसी सरकार ऐसी किसी निजी फौज के अस्तित्व से हमेशा इंकार करती रही है, लेकिन सीरिया की जंग से लेकर कांगो के फौजी मोर्चे तक ये भाड़े के रूसी सैनिक कारोबारियों द्वारा भेजे जाते रहे हैं, और वे रूसी सरकार की रणनीति में साथ देने का काम करते रहे हैं। इसलिए ऐसी बहुत सारी जानकारी यह बताती है कि रूस और यूक्रेन की यह जंग, या रूस का यूक्रेन पर यह हमला बाकी दुनिया के लिए शतरंज की बिसात पर चाल चलने जैसा हो गया है, और इस मुद्दे का अतिसरलीकरण करना ठीक नहीं है।
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छत्तीसगढ़ के बस्तर में बेकसूर और निहत्थे आदिवासियों की सुरक्षा बलों के हाथों मौत एक आम बात है। हर बरस कई ऐसे कत्ल होते हैं लेकिन चूंकि कातिल सरकारी वर्दीधारी रहते हैं, और वे लोकतंत्र को बचाने के नाम पर लोगों का कत्ल करते हैं इसलिए उस कत्ल को हत्या न कहकर नक्सल-संदेह में हुई मौत कह दिया जाता है, या कभी यह कह दिया जाता है कि सुरक्षा बलों ने आत्मरक्षा में गोलियां चलाईं जिनमें ये मौतें हो गईं, या नक्सलियों के साथ क्रॉस फायरिंग में ये ग्रामीण मारे गए। सबसे अधिक तो यही होता है कि पुलिस और सुरक्षा बल इस बात पर अड़े रहते हैं कि मारे गए लोग नक्सली थे, उनके पास कुछ हथियार भी रखकर जब्ती दिखा दी जाती है। लेकिन बहुत से मामले ऐसे रहते हैं जिनमें शक की गुंजाइश नहीं रहती है, जिनमें सरकार भी भारी जन-दबाव में किसी जांच के लिए मजबूर होती है। जब-जब ऐसी जांच होती है तब-तब यह सामने आता है कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी खतरे के, बिना किसी उकसावे और भडक़ावे के निहत्थे और बेकसूर ग्रामीण आदिवासियों को मार डाला था।
ऐसी ही एक वारदात 2013 में बीजापुर जिले के जगरगुंडा थाना-इलाके के एडसमेटा गांव में हुई थी जिसमें 8 बेकसूर आदिवासियों को सुरक्षा बलों ने मार डाला था, जिनमें तीन बच्चे भी थे। इस मामले की न्यायिक जांच एमपी हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज, जस्टिस वी.के. अग्रवाल ने की थी, और कल यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ विधानसभा में पेश की गई है। इस रिपोर्ट का नतीजा यह है कि समारोह मनाते आदिवासियों की जिस भीड़ पर सीआरपीएफ ने गोलियां चलाई थीं, उन सुरक्षा-जवानों को इन आदिवासियों से कोई खतरा नहीं था। न इन्होंने सुरक्षा बलों पर गोलियां चलाई थीं, न हमला किया था। इसलिए सीआरपीएफ ने ये गोलियां आत्मरक्षा में नहीं चलाईं बल्कि आदिवासियों को पहचानने में हुई गलती और घबराहट के कारण चलाईं।
जैसा कि आमतौर पर इस किस्म के जांच आयोग आदिवासी जिंदगी से नावाकिफ शहरी जजों वाले होते हैं, इसलिए इनमें आदिवासी जिंदगियों के लिए वह दर्द नहीं होता जो कि आदिवासियों के जानकार किसी हमदर्द का हो सकता है। थोक में किए गए ऐसे कत्ल भी सजा नहीं पाते हैं क्योंकि सरकारें इस बात से डरती हैं कि बेकसूरों के कत्ल के जुर्म में अगर सुरक्षा बलों को सजा होने लगे, तो ऐसे हथियारबंद मोर्चों पर उनका मनोबल टूटेगा। यह सोच निहायत ही अलोकतांत्रिक और शहरी सोच है जिसमें निहत्थे और बेकसूर आदिवासियों के कत्ल की कीमत पर भी वर्दी का मनोबल बनाए रखने को जरूरी समझा जाता है। और बस्तर के मामले में हमने बार-बार ऐसी सोच देखी है, कोई भी पार्टी सरकार चलाए, सत्ता की सोच तकरीबन एक सरीखी दिखती है। सत्तारूढ़ पार्टी और सुरक्षा बलों के हित मानो एक हो जाते हैं, और नक्सल-संदेह में कितने ही बेकसूर आदिवासियों का कत्ल माफ कर दिया जाता है। जांच के नाम पर, जांच आयोग के नाम पर ऐसी लीपापोती की जाती है कि किसी कातिल को कोई सजा मिल ही नहीं पाती। अब 2013 के इस हत्याकांड की जांच रिपोर्ट का कवर पेज ही कहता है- एडसमेटा में मुठभेड़ की घटना के मामले में न्यायिक जांच आयोग का प्रतिवेदन। जबकि यह रिपोर्ट खुद ही लिख रही है कि यह साबित नहीं हुआ है कि उक्त मुठभेड़ नक्सलियों के साथ हुई, और आगे यह साफ होता है कि घटना सुरक्षा बलों द्वारा आग के आसपास इक_े लोगों को देखकर उन्हें संभवत: गलती से नक्सल समझकर घबराहट की प्रतिक्रिया के कारण गोलियां चलाने के कारण हुई।
अब सवाल यह उठता है कि वर्दीधारी सुरक्षा बलों का पूरा जत्था पूरी तैयारी से जंगल गया हुआ है, और वहां पर निहत्थे आदिवासियों को देखकर वह इतना हड़बड़ा रहा है कि वह उन पर गोलियां चलाकर 8 लोगों को मार डाल रहा है जिनमें नाबालिग भी थे। तो यह सुरक्षा बलों की कैसी तैयारी है, और यह कैसी घबराहट है जिसके चलते बेकसूरों को भून दिया गया? यह पूरा सिलसिला बताता है कि आदिवासी जिंदगी इतनी सस्ती है कि नक्सलियों को मारने के नाम पर जंगल में बसे हुए मासूम और सीधे-साधे, निहत्थे आदिवासियों को भी महज अपने संदेह के आधार पर मार डाला जा सकता है। अगर सुरक्षा बल किसी के नक्सली होने की आशंका में इतने घबरा सकते हैं कि वे उन्हें गोलियों से भून सकते हैं, तो फिर ऐसी हालत में सरकार को यह नीतिगत फैसला लेना चाहिए कि ऐसे डरे-सहमे सुरक्षा बल को ग्रामीण इलाकों में भेजा ही क्यों जाए? खुद जांच रिपोर्ट की भाषा और उसके निष्कर्ष न छुपने लायक तथ्यों को तो मानो मजबूरी में सामने रख रहे हैं, लेकिन किंतु-परंतु जैसे शब्दों के साथ संदेह का इतना लाभ सुरक्षा बलों को दे रहे हैं कि मानो वह किसी चुनाव के पहले किसी सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा दिया गया चुनावी तोहफा हो। सुरक्षा बलों द्वारा घबराहट में गोली चलाना इस रिपोर्ट में इतनी बार इतने तरह से लिखा गया है कि ऐसा लगता है कि बेकसूर आदिवासियों की लाशों से भी अधिक ठोस सुबूत इस घबराहट का है। बार-बार इस घबराहट का हवाला देना एक किस्म से कातिल सिपाहियों को बचने के लिए एक रास्ता देना है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका के आधार पर इसकी जांच 2019 में सीबीआई को दे दी गई थी, और वह जांच चल रही है। उस जांच, और उसके नतीजे के बारे में अभी कुछ कहना ठीक नहीं है, लेकिन यह अकेला मामला नहीं है जिसने बस्तर में बेकसूर आदिवासियों को थोक में मारा है। इससे पहले भी राज्य की पुलिस द्वारा आदिवासी गांवों को जलाने और लोगों को मारने के मामले सामने आ चुके हैं, महिलाओं से बलात्कार के मामले भी सामने आ चुके हैं, और विपक्ष में रहते हुए जो कांग्रेस आदिवासियों की हमदर्द थी, वह सत्ता में आने के बाद अपने कार्यकाल के ऐसे जुर्म जायज ठहराने में लगी दिखती है। यह मौका जनसंगठनों द्वारा नक्सल कहलाने का खतरा उठाते हुए भी ऐसी सरकारी हिंसा को उजागर करने का है जिसके बिना आदिवासियों के बचने की और कोई गुंजाइश नहीं है। बस्तर को लेकर यह सरकारी फैशन है कि आदिवासियों की हमदर्द कोई भी बात, उनका कोई भी आंदोलन, नक्सलियों का करवाया हुआ मान लिया जाता है। सत्ता का चरित्र एक ही होता है, प्रदेश में भाजपा की सरकार गई, और कांग्रेस की सरकार आई, ये दोनों ही सरकारी सुरक्षा बलों की हिमायती रहीं, और बेकसूर आदिवासियों के कत्ल पर इनकी हमदर्दी की कमी एक बराबर रही। इसलिए जांच आयोग के इस प्रतिवेदन से सरकारी सुरक्षा बलों के चाल-चलन पर कोई फर्क पड़ेगा, ऐसी उम्मीद गलत होगी। सीबीआई जांच के बाद कुछ लोगों को सजा मिल सके, तो उसमें अभी से कई बरस लगना बाकी है। आदिवासियों की मौत इसी तरह जारी रहेगी, और शहरी लोकतंत्र के पास उनके लिए गोलियां ही हैं।
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पंजाब में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत और जनता द्वारा कांग्रेस सरकार की बुरी तरह बर्खास्तगी लोगों को हैरान कर गई है। इसके साथ-साथ जिस तरह वहां अकाली दल और भाजपा किनारे कर दिए गए हैं, इन तीनों पार्टियों के सारे के सारे बड़े नेता जनता ने हरा दिए हैं, वह भी चौंकाने वाली नौबत है। बहुत से लोगों को आम आदमी पार्टी की सरकार आते दिख रही थी, लेकिन वह ऐसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बहुमत के साथ आएगी इसका अंदाज कई लोगों को नहीं था, या बेहतर यह कहना होगा कि शायद किसी को नहीं था। वहां पर लोग पांच कोने का संघर्ष देख रहे थे जिनमें ऊपर लिखी गई चारों पार्टियों के अलावा किसान उम्मीदवार भी एक ताकत माने जा रहे थे, लेकिन जनता ने खुलकर दो बातें साफ कीं, एक तो यह कि उसने कांग्रेस, भाजपा और अकाली, पंजाब में सत्तारूढ़ रही इन तमाम पार्टियों को पूरी तरह खारिज कर दिया, और आम आदमी पार्टी के नारे के मुताबिक एक मौका केजरीवाल को दिया है।
अब आप की सरकार पंजाब में चुनौतियों के एक टोकरे के साथ काम शुरू कर रही है। पंजाब की अर्थव्यवस्था खराब हालत में है, बेरोजगारी आसमान छू रही है, नौजवानों में नशा पंजाब के हर दूसरे-चौथे घर को बर्बाद कर चुका है, उद्योग लग नहीं रहे हैं, और किसान कानून वापिस होने के बावजूद पंजाब में किसानों की यह हकीकत तो दर्ज है ही कि वहां देश में सबसे अधिक किसान आत्महत्याएं हो रही हैं। इसके साथ-साथ पंजाब के बारे में यह बात भी कही जाती है कि वहां के लोग अपनी सरकार पर दिल्ली से राज पसंद नहीं करते। ऐसे में दिल्ली से चल रही आम आदमी पार्टी का जीता हुआ पंजाब राज्य से कितना चलेगा और दिल्ली से कितना, इसे लेकर भी लोगों में कुछ हैरानी बनी हुई है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि दिल्ली में स्कूल और अस्पताल नाम की जिन दो सहूलियतों को लेकर आम आदमी पार्टी अपनी पीठ थपथपाती है, वे दोनों चीजें तो कायदे से म्युनिसिपल के करने की रहती हैं, और राज्य सरकार पंजाब में इन बातों को अपनी पूरी कामयाबी नहीं बता पाएगी, दिल्ली में बात कुछ और थी।
दिल्ली को कुछ समझे बिना आम आदमी पार्टी के कामकाज को समझना मुमकिन नहीं है। दिल्ली की सरकार को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है। उसके पास न पुलिस है, और न जमीनों का हक। दिल्ली के सारे बड़े प्रोजेक्ट केन्द्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के अधीन आते हैं, और दिल्ली की अधिकतर दूसरी दिक्कतों और संभावनाओं के लिए राज्य सरकार न जिम्मेदार है, न अधिकारसंपन्न। इसके अलावा दिल्ली में स्थानीय म्युनिसिपल और दिल्ली विकास प्राधिकरण, राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण जैसे दूसरे संगठन भी हैं जो कि राज्य सरकार से परे काम करते हैं, और वहां राज्य सरकार की संभावनाएं, उसकी स्वायत्तता, सब लेफ्टिनेंट गवर्नर के मातहत रहती हैं, और केजरीवाल सरकार किसी आईएएस का तबादला भी करने का हक नहीं रखती है। बात-बात में उसे एलजी की इजाजत लेनी पड़ती है। इसलिए केजरीवाल सरकार दिल्ली को एक बड़े म्युनिसिपल की तरह चला रही थी, और केजरीवाल एक म्युनिसिपल कमिश्नर अफसर की तरह काम कर रहे थे। पंजाब एक अलग मामला है, और दिल्ली का प्रयोग पंजाब में बहुत ही सीमित उपयोग का है।
पंजाब में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री बन रहे भगवंत मान का सरकार चलाने का कोई तजुर्बा नहीं है, और उन्हें विरासत में एक भयानक भ्रष्ट और घाघ नौकरशाही मिल रही है, जिससे काम लेना एक बड़ी चुनौती रहेगी। केजरीवाल के साथ म्युनिसिपल जैसी दिल्ली चलाते भी यह सहूलियत थी कि वे आईआईटी से पढक़र निकले हुए इंजीनियर थे, और भारत सरकार में एक बड़ी नौकरी करते हुए पहले सामाजिक आंदोलन, और फिर राजनीति में आए थे। उनकी पत्नी भी इसी बड़ी सरकारी नौकरी में थीं। यानी उनके पास सरकार के कामकाज का कुछ तजुर्बा था, और वह सहूलियत भगवंत मान को हासिल नहीं है। दिल्ली और पंजाब की कई दिक्कतों पर एक-दूसरे से टकराव की नौबत भी है। पंजाब में किसानों को फसल के ठूंठ, पराली, जलाने की मजबूरी है, और दिल्ली लगातार इसका विरोध करते आई है कि इससे दिल्ली की हवा दमघोंटू और जहरीली हो जाती है। अब दोनों जगह आम आदमी पार्टी की सरकार रहने से इसका क्या होगा, यह भी सोचने की बात है। पंजाब की शक्ल में आम आदमी पार्टी को अपने इतिहास में पहली बार एक पूर्ण राज्य चलाने का मौका मिल रहा है, और उसकी दिल्ली की कामयाबी का पैमाना इस राज्य में काम नहीं आने वाला है। पंजाब की चुनौतियां भी अलग हैं, और संभावनाएं भी। हो सकता है कि आप सरकार पंजाब में दिल्ली से अधिक कामयाब भी हो जाए, या बहुत हद तक फ्लॉप भी हो जाए। पंजाब में सरहद पाकिस्तान से लगी हुई है, और वहां से नशे की तस्करी के अलावा आतंक का खतरा भी लगातार बने रहता है। पहली बार पुलिस सम्हालने जा रही आम आदमी पार्टी के सामने यह सरहद भी चुनौती रहेगी क्योंकि इसके किनारे की बहुत चौड़ी पट्टी राज्य की पुलिस के अधिकार क्षेत्र से परे बीएसएफ के हाथ रहती है, और यह राज्य और केन्द्र के बीच टकराव का एक मुद्दा रह सकती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि केजरीवाल सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट तक जाकर दिल्ली सरकार से टकराव के कई प्रयोग किए थे, और उन सबमें उसकी हार हुई थी। दिल्ली में चुनौतियां भी सीमित थीं, और संभावनाएं भी, पंजाब में ये दोनों असीमित हैं, और विरासत में एक बदहाल राज्य मिला है।
पंजाब को आम आदमी पार्टी की दिल्ली की पहली जीत के बाद का सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे इस पार्टी की देश भर की संभावनाएं भी खुलती हैं, और वह कांग्रेस और भाजपा के एक विकल्प के रूप में भी कहीं-कहीं कोशिश कर सकती है, यह एक और बात है कि बहुत से राजनीतिक विश्लेषक भी इस पार्टी को संघ परिवार का एक मुखौटाधारी संगठन मानते हैं, और यह मानते हैं कि आखिर में जाकर यह किसी चुनौती की नौबत रहने पर भाजपा के ही हाथ मजबूत करने का काम करेगी। भाजपा को आप की पंजाब जीत इस हिसाब से भी बुरी नहीं लग रही होगी कि उसने कांग्रेस की सरकार को बेदखल किया है, और भाजपा से अलग हुए अकालियों को भी मटियामेट कर दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के साथ आम आदमी पार्टी का किस तरह का तालमेल रहेगा, इस पर भी लोगों की निगाह रहेगी, हो सकता है कि यह तालमेल तुरंत शुरू न हो, और भाजपा के किसी नाजुक मौके के लिए बचाकर रखा जाए। फिलहाल आम आदमी पार्टी के सामने पंजाब दिल्ली के मुकाबले कई गुना अधिक बड़ी चुनौती है, और उसे केजरीवाल जैसा सरकारी कामकाज का जानकार भी हासिल नहीं है। आगे-आगे देखें होता है क्या?
यूपीए सरकार के वक्त भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे और मशहूर अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने अभी एक इंटरव्यू में कहा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण महंगाई बढ़ेगी, और यह लंबे समय तक रहेगी, इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि कई चीजों के दामों में इस युद्ध से बढ़ोत्तरी हो चुकी है, और कई देशों में पहले से ही महंगाई अधिक थी, अब इन दोनों के मिले-जुले असर को देखें तो यह महंगाई और मंदी लंबी चलेंगी। उन्होंने कहा कि रूस ऊर्जा सहित दूसरे कई सामानों का एक बड़ा एक्सपोटर है और रूस पर पश्चिमी देशों के लगाए हुए आर्थिक और कारोबारी प्रतिबंध से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
आज दुनिया में दिक्कत यह है कि अर्थव्यवस्था के पैमाने आम इंसानों की जिंदगी से काटकर अलग कर दिए गए हैं। जब किसी देश में बेरोजगार आसमान पर पहुंच रही है, महंगाई चरम पर है, लोग सरकारी रियायती अनाज के बिना भुखमरी की हालत में हैं, तब अगर उस देश का शेयर बाजार आसमान पर पहुंचता है, तो क्या उसे सचमुच ही देश की अच्छी और मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत मान लिया जाए? हिन्दुस्तान इसकी एक बड़ी मिसाल है कि यहां पर जनता जब से बदहाल है, तब शेयर बाजार सबसे खुशहाल है। इसलिए अर्थव्यवस्था के पैमानों को अलग-अलग देखने की जरूरत है कि शेयर बाजार का रूझान और जनता की हकीकत के बीच क्या फर्क है? ऐसा न होने पर अंबानी-अडानी की कमाई को आम जनता की कमाई से जोडक़र औसत निकालकर आम जनता को खुशहाल साबित किया जा सकता है। इसलिए आज अगर हिन्दुस्तान में 20 लाख की कार के लिए 50 हजार लोग कतार में लगे हैं, तो इसे आम जनता की खुशहाली मान लेने की गलती नहीं करनी चाहिए।
रघुराम राजन की बातों से परे भी यह समझने की जरूरत है कि दुनिया की एक बड़ी जंग हो, या कि मौसम की सबसे बुरी मार हो, सबसे अधिक जख्म सबसे कमजोर तबकों को आते हैं। बाढ़ हो या तूफान, उसमें सबसे अधिक तबाही सबसे गरीब आबादी की होती है क्योंकि वे ही लोग सबसे नाजुक और खतरनाक जगहों पर बसे होते हैं। जब सूखा पड़ता है और उसकी वजह से लोगों को अपना इलाका छोडक़र, घर-बार छोडक़र बाहर जाना पड़ता है, तो सूखे की सबसे बुरी मार सुखी तबके पर नहीं पड़ती, गरीबी से दुखी तबके पर पड़ती है जो कि एक मौसम का सूखा झेलने की हालत में भी नहीं रहता। आज अगर हिन्दुस्तान में आधी आबादी रियायती सरकारी अनाज की वजह से जिंदा है, तो यह जिंदा रहना भी क्या जिंदगी है? जिस संसद को इस गरीबी पर सोच-विचार करना था, लोगों को इससे उबारने की कोशिश करनी थी, वह संसद अपने आप पर 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करने जा रही है, इसके मुखिया मुल्क के प्रधानमंत्री अपने लिए 8 हजार करोड़ रूपए का विमान खरीद रहे हैं। ऐसे में अदम गोंडवी की लिखी एक गजल याद पड़ती है-
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं,
दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है?
दुनिया या किसी देश की अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय आंकड़ों से आंकने का सिलसिला ही नाजायज है। गरीबों की आर्थिक स्थिति को अलग से आंकने के पैमाने बिल्कुल साफ रहने चाहिए, और दुनिया या किसी भी देश में गरीब आधी आबादी के हाल पर अलग से रिपोर्ट बननी चाहिए। हिन्दुस्तान में आज जीडीपी या सकल राष्ट्रीय उत्पादन की शक्ल में देश के हाल को आंका जाता है, लेकिन अडानी और अंबानी की दौलत दो या तीन गुना हो जाने से देश की नीचे की आधी आबादी की जिंदगी पर कोई फर्क पड़ सकता है क्या? क्या बाजार में एक करोड़ रूपए से अधिक दाम वाली कारों की बिक्री दोगुना हो जाने से मोपेड चलाने वाले गरीब की पेट्रोल खरीदने की ताकत को भी दोगुना आंकना ठीक होगा? यह पूरा सिलसिला आंकड़ों का फरेब है, और अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को लेकर जनसंगठनों को यह मांग करनी चाहिए कि गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों की अर्थव्यवस्था, उनकी आर्थिक हालत पर अलग से रिपोर्ट जारी की जानी चाहिए जिस तरह कि एक वक्त अलग से रेल बजट आता था। आज केन्द्र और प्रदेश सरकार को आर्थिक विकास के तमाम आंकड़ों में से बीपीएल समुदाय के आंकड़े अलग से सामने रखने चाहिए, लोगों को बीपीएल से जुड़े आंकड़े अलग से पूछने चाहिए। जब तक गरीबों के हिमायती पैमाने अलग से लागू नहीं होंगे, तब तक हिन्दुस्तान जैसे देश में दो सबसे अमीर लोगों की तिजोरियों को गरीबी की रेखा के नीचे की हंडियों को भरा दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहेगा।
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