संपादकीय
भारत में शायद ही किसी शहर का एक दिन बिना किसी साइबर क्राइम के निकलता होगा, और औसत तो शायद लाखों साइबर क्राइम हर दिन होते हैं, जिनमें से हो सकता है कि आधे या चौथाई ही पुलिस तक पहुंचते हों। हिन्दुस्तान के लोग तरह-तरह की दर्जनभर तरकीबों से लूटे जा रहे हैं, लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का एक दूसरा ही मकसद है कि अब भारत के साइबर लुटेरे अमरीका और योरप के लोगों को भारत से फोन करके न सिर्फ ठग रहे हैं, बल्कि उन्हें डिजिटल गिरफ्तारी का डर दिखाकर, अपने आपको अमरीकी या यूरोपीय जांच एजेंसी का अफसर बताकर उनसे उगाही कर रहे हैं। उनसे अलग-अलग खातों में पैसा लेते हैं, और फिर उसे कई रास्तों से घुमाकर भारत ले आते हैं। अभी भारत में ईडी ने कुछ कॉल सेंटरों पर छापे मारे, तो पता लगा कि हिन्दुस्तानियों को पश्चिमी अंदाज में अंग्रेजी बोलना सिखाकर उन्हें कई अलग-अलग तरकीबों से पश्चिमी देशों के लोगों को लूटने में लगाया गया है। यह पूरी तरह से अहिंसक अपराध भारत में तो बहुत ही लोकप्रिय है, और अब भारत से यह अमरीका और योरप के देशों में भी पहुंच चुका है। दिलचस्प बात यह भी है कि ट्रम्प का 50 फीसदी टैरिफ इस भारतीय सेवा पर नहीं लग रहा है, बल्कि भारत का जितना आर्थिक नुकसान अमरीकी राष्ट्रपति से हो रहा है उसे भारत के ठग कुछ हद तक वापिस ला रहे हैं, यह अलग बात है कि यह पैसा सरकार या जनता के काम नहीं आ रहा है, जुर्म के हाथ मजबूत कर रहा है।
पश्चिम के देशों के कामकाज के घंटों में भारत के कॉल सेंटरों से कई तरह की सेवाएं दी जाती हैं। यहां महानगरों, और उपमहानगरों में अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर का बड़ा कारोबार है जिनमें काम करने के लिए युवक-युवतियां उन देशों के अंदाज में अंग्रेजी बोलना सीखे हुए रहते हैं, और वहां की कंपनियों के लिए यहां पर सस्ते में काम करते हैं। अभी जो साइबर मुजरिम भारत में पकड़ाए हैं, उनमें पुणे का एक ऐसा कॉल सेंटर है जो कि वहां पर गुजरात के अहमदाबाद के दो लोग चला रहे हैं, और पुलिस ने यहां 32 लोगों को गिरफ्तार किया है जो कि अमरीकियों के कम्प्यूटरों, और मोबाइल पर भारत में बैठे हुए तरह-तरह के खुफिया-घुसपैठिया सॉफ्टवेयर डाल देते हैं, और फिर उनके सिस्टम को धीमा कर देते हैं। इसके बाद वे अपने आपको माइक्रोसॉफ्ट या एप्पल जैसी टेक कंपनी का प्रतिनिधि बताकर उन्हें फोन करते हैं, और उनसे सिस्टम ठीक करने के नाम पर भुगतान लेते हैं। ऐसे भुगतान के साथ-साथ वे उन्हें डिजिटल गिरफ्तारी की धमकी भी देते हैं, और उनसे लगातार उगाही करते हैं। इस छापे में पुलिस को बड़ी संख्या में लैपटॉप और मोबाइल के साथ-साथ फंसाने, ठगने, और धमकाने की स्क्रिप्ट भी लिखी हुई मिली है।
आज कुछ अफ्रीकी देशों में बैठे हुए लोग अमरीका और ब्रिटेन के किशोर-किशोरियों को मोबाइल के जरिए सेक्स-वीडियो में फंसाते हैं, और उनका इतना सेक्सटॉर्शन करते हैं कि कई टीन-एजर खुदकुशी कर रहे हैं। भारत में भी साइबर-जुर्म में नाइजीरिया के कई लोग पकड़ाए हैं। भारत के भीतर भी धमकाने, ठगने, मोबाइल के जरिए बैंक खातों पर कब्जा करने, और उन्हें खाली कर देने के जुर्म रोज की बात हो गए हैं। एक वक्त था कि लुटेरों को चेहरे पर कपड़ा बांधकर, चाकू-पिस्तौल लेकर लूटना पड़ता था, लेकिन अब बिल्कुल अहिंसक तरीके से घर बैठे मोबाइल फोन, या ऑनलाईन पर और अधिक बड़ा काम हो जाता है, रकम लेकर या गहने लूटकर फरार भी नहीं होना पड़ता, मेहनत से लूटे गए सामान वापिस जाने का खतरा भी नहीं रहता, क्योंकि आज के साइबर-मुजरिम जालसाजी, ठगी, और लूट से हासिल रकम को तेजी से बाहर निकाल देने का इंतजाम पहले से रखते हैं।
यूपी के रायबरेली, दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट, और छत्तीसगढ़ के मगरलोड में दो दिनों के भीतर की तीन घटनाओं का भला आपस में क्या रिश्ता हो सकता है? इसे समझने के लिए इन तीनों की कुछ जानकारी देखनी होगी। रायबरेली में एक दलित नौजवान को भीड़ ने चोर समझकर घेर लिया। इसकी खबर मिलने पर पुलिस गाड़ी वहां पहुंची, और गाड़ी में बैठे-बैठे पुलिसवालों ने कहा उसे जाने दो, और चले गए। भीड़ ने पीट-पीटकर उसे मार डाला। जाहिर है कि इतनी मारपीट के दौरान उसका नाम तो किसी ने पूछा ही होगा, क्योंकि वह अपनी ससुराल आया हुआ था। यह नौजवान कमजोर और मानसिक बीमार भी लग रहा था, लेकिन पुलिस उसे भीड़ के बीच से ले जाने तैयार नहीं हुई, और भीड़ तो भीड़ होती है, उसने इस कमजोर गरीब को बहुत बुरी तरह पीट-पीटकर मार डाला, और उसके वीडियो भी बनाए। कानून अपने हाथ में लेने में लोगों को अब कुछ नहीं लगता, यह उन्हें अपना कानूनी हक लगता है। उधर दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अदालत में पहुंचकर एक हिन्दू-सनातनी बुजुर्ग वकील ने अपना जूता उतारकर चीफ जस्टिस पर फेका, और रोकने-पकडऩे पर वह यह कहते हुए गया कि सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान। उसने बाद में यह भी कहा है कि उससे भगवान ने यह काम करवाया है, और वे मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से नाराज था, और जेल में रहने में उसे कोई दिक्कत नहीं है। उसे कोई पछतावा नहीं है, दूसरी तरफ चीफ जस्टिस बी.आर.गवई ने इस सनातनी वकील की हरकत पर किसी कार्रवाई से इंकार कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे फोन पर बात करके अफसोस जाहिर किया है, लेकिन सनातन के नाम पर देश भर में दीवानगी का जो माहौल बना हुआ है, उसका सिर्फ एक नमूना ही सुप्रीम कोर्ट के दलित मुख्य न्यायाधीश को झेलना पड़ा है। अब हम तीसरी घटना पर आते हैं जो कि छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में मगरलोड नाम की जगह पर हुई है। इस कस्बे में एक पुराने झगड़े को लेकर एक नाबालिग मुस्लिम लडक़े को कई हिन्दू लडक़ों ने पीटा, और पीछा करते हुए उसके घर गए। वह अपने घर में घुसकर छुप गया, तो इस भीड़ ने घर को घेरकर हंगामा किया, उस मुस्लिम परिवार की लड़कियों से बदसलूकी-छेडख़ानी की। सत्रह बरस के इस लडक़े को बचाने के लिए परिवार ने उसे घर के भीतर एक कमरे में बंद कर दिया, और बाहर पुलिस पहुंचने के बाद भी हंगामा चलते रहा। इस बीच पता लगा कि दहशत में इस लडक़े ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। अब कई हिन्दू लडक़े गिरफ्तार हुए हैं, और कई और की शिनाख्त के आधार पर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज हुई है।
भारत दानदाताओं से भरा हुआ देश है। तिरुपति के मंदिर की कहानी ही साल में कई बार बड़े-बड़े अखबारों की खबर बनती है कि किस तरह वहां पर कोई दानदाता सौ-पचास किलो सोना चढ़ा गया, या किसी एक दानदाता ने वहां कितने करोड़ रूपए नगद दान कर दिए। वहां के अधिकतर दानदाता अपना नाम उजागर किए बिना दान भेज देते हैं, या सोना, नगदी वहां की पोटली में डालकर चले जाते हैं। देश के प्रमुख तीर्थों पर और भी जगहों पर ऐसा होता होगा क्योंकि अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हर दिन करीब एक लाख लोग लंगर में खाना पाकर जाते हैं, और इसका खर्च कोई न कोई तो उठाते ही होंगे, इस धार्मिक खाने के लिए किसी से कोई पैसा नहीं लिया जाता। फिर तीर्थस्थानों से परे बहुत से धर्मों के बाबाओं और प्रवचनकर्ताओं को भी ढेरों दान मिलता है, और लोग धर्म के तुरंत बाद धार्मिक कपड़े हुए, धर्म की बातें करने वाले लोगों को दान देते हैं।
एक और किस्म का दान देश में देखने मिलता है जिसमें किसी संस्था या संगठन के लोग उसका बिल्ला लगाए, उसके गमछे-दुपट्टे या टोपी से लैस होकर, कैमरे और वीडियो रिकॉर्डिंग का इंतजाम करके दान करने जाते हैं। ठंड में सडक़ किनारे पड़े गरीबों को एक कंबल ओढ़ाते हुए कई लोग तस्वीर खिंचवाते हैं, और फिर उसे हर सोशल मीडिया खातों में डालते हैं। कई ऐसे फोटो देखने मिलते हैं जिसमें अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मरीज को एक केला थमाते हुए एक दर्जन लोग उसमें हाथ लगाए रहते हैं, और मरीज हक्का-बक्का सा इस भीड़ को देखते हुए एक केला पाकर धन्य हो जाता है। अब मामला यहां तक रहता तब भी ठीक था, अभी एक सरकारी अस्पताल के मरीजों के बीच भाजपा के कई कार्यकर्ता पार्टी के दुपट्टे डाले हुए दिख रहे हैं, और इस वीडियो में साफ-साफ दिख रहा है कि बड़ा सा मोबाइल थामी हुई संपन्न से परिवार की दिखती हुई एक महिला पांच-पांच रूपए वाले बिस्किट के पैकेट लेकर चल रही है, अस्पताल की गरीब महिला मरीज को एक पैकेट थमाते हुए वह तस्वीर खिंचवाती है, और फिर पैकेट को लेकर अगले मरीज की तरफ आगे बढ़ जाती है। इस महिला मरीज को बस कुछ पल के लिए वह पैकेट छूने मिलता है। वार्ड में एक साथ भाजपा के दुपट्टों वाले बहुत सारे लोग मरीजों को कुछ देते, या महज थमाते, और फोटो खिंचाते दिख रहे हैं। वीडियो पोस्ट करने वाले व्यक्ति ने इसे राजस्थान का बताया है, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह कहां का है, देश में कहीं भी यह हाल हो सकता है। कुछ लोगों ने इस वीडियो पर यह भी कहा है कि मरीज महिला के हाथ में पहले से बिस्किट का पैकेट था, यानी उसे बिस्किट पहले मिल चुका था, और यह दूसरा पैकेट देते हुए पार्टी की महिला बोल-बोलकर फोटो खिंचवा रही है, और फोटो के बाद पैकेट लेकर चली जा रही है। इस वार्ड में जितने मरीज हैं, उससे अधिक संख्या में दानदाता दिख रहे हैं, किसी के हाथ में एक केला है, तो किसी के हाथ में बिस्किट का छोटा सा पैकेट, फोटो खिंचाने का उत्साह सबमें लबालब है।
सच जो भी हो, हम तो वीडियो पर जो देख रहे हैं उसी से आज की बात शुरू कर रहे हैं कि दान की हमारी भावना किस हद तक खुदगर्ज हो गई है कि पांच रूपए की मदद करते हुए भी कैमरे पर उसे दर्ज करवाना जरूरी लगता है ताकि बाद में उससे शोहरत पाई जा सके। क्या दान और शोहरत का कोई अनुपात होना चाहिए? साठ रूपए का कंबल देकर हजारों लोगों के बीच अपना प्रचार करना कहां तक जायज है? इसमें गैरकानूनी तो कुछ नहीं है, लेकिन क्या लोगों की नैतिकता उन्हें सुझाती कि वे प्रचार के अनुपात में दान भी करें? हम कई जगहों पर कॉलेज और विश्वविद्यालयों के एनएसएस के छात्र-छात्राओं को देखते हैं जो घास-फूस या झाडिय़ों को आधा-एक घंटा साफ करते हैं, अपना बैनर टांगते हैं, उसके सामने खड़े होकर फोटो खिंचाते हैं, और रिकॉर्ड के लिए सामान जुटाकर आगे बढ़ निकलते हैं। जितनी समाजसेवा, उससे अधिक खुद की प्रचारसेवा! दूसरी तरफ इसी देश में, या दुनिया के दर्जनों दूसरे देशों में किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय सबसे पहले, सबसे आगे बढक़र, पानी में डूब-डूबकर घरों तक खाना पहुंचाने, वहां से फंसे हुए लोगों को उठा-उठाकर नाव से बाहर निकालने वाले सिक्खों में ऐसा आत्मप्रचार नहीं दिखता। कुछ कार्यकर्ता खालसा एड नाम की संस्था के टी-शर्ट पहने हुए जरूर दिखते हैं, लेकिन यह प्रचार के लिए कम, पहचान के लिए अधिक रहता है। भारत की अनगिनत प्राकृतिक विपदाओं में हमने देखा है कि अगर कोई एक समाज सबसे आगे बढक़र नि:स्वार्थ भावना से बचाव और सेवा में लगता है, तो वह सिक्ख समाज है। हमने आज तक सिक्खों को अस्पताल में, या सडक़ पर एक केला देकर फोटो खिंचाते नहीं देखा है। बल्कि दिल्ली जैसे शहर में सडक़ किनारे कई सिक्ख बैठकर लोगों के पैरों के जख्म धोते हुए दिखते हैं, मरहम-पट्टी करते हुए दिखते हैं। स्वर्ण मंदिर में भी दुनिया भर से पहुंचे हुए अरबपति सिक्ख भी रसोई में काम करते हैं, लंगर में खाना परोसते हैं, जूठे बर्तन मांजते हैं, और जूते-चप्पल भी साफ करते हैं।
पटना से दिल्ली का सफर कर रहे केन्द्रीय कृषिमंत्री शिवराज सिंह चौहान यह देखकर कुछ हैरान रह गए कि उनके प्लेन के को-पायलट बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद राजीव प्रताप रूड़ी थे। आज शिवराज जिस मोदी सरकार में मंत्री हैं, उसी मोदी सरकार में राजीव प्रताप रूड़ी तीन बरस मंत्री रह चुके हैं। अब वे मंत्री नहीं हैं लेकिन एक कमर्शियल पायलट होने के नाते वे नियमित मुसाफिर उड़ानों को भी उड़ाते हैं। हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि इस देश के तमाम नेताओं में कुल दो ही ऐसे हैं जो मुसाफिर उड़ान उड़ाने वाले पायलट रहे, पहले राजीव गांधी, और अब राजीव प्रताप रूड़ी। उन्होंने यह बात तब कही थी जब संसद परिसर में राह चलते राहुल गांधी ने रूककर उनसे बात की थी, क्योंकि उन्हीं दिनों वे कांस्टीट्यूटशन क्लब का चुनाव भी लड़ रहे थे, जिसमें दलगत राजनीति से परे सभी सांसद एक-दूसरे से वोट मांग लेते हैं। अब चूंकि इस देश में राजनीतिक दलों के बीच कड़वाहट ने कुनैन को शक्कर की तरह मीठा दर्जा दे दिया है, इसलिए भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के बीच के चलते-चलते नमस्कार-चमत्कार को भी शक की नजरों से देखा गया था। ऐसी चर्चा के बीच ही रूड़ी ने यह साफ किया था कि वे मुसाफिर उड़ान भी उड़ाते हैं।
इस देश की राजनीति में किसी नेता को कोई पेशेवर काम करते देखना कुछ अटपटा लगता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि नेता बनने के बाद न सिर्फ नेताजी को, बल्कि उनकी आने वाली कई पीढिय़ों को भी किसी काम की कोई जरूरत क्यों होनी चाहिए? देश का माहौल कुछ ऐसा ही है कि लोग राजनीति में एक ऊंचाई पर पहुंचने के बाद उसी अनुपात में संपन्नता की ऊंचाई पर भी पहुंच जाते हैं, और दिखावे के लिए भी किसी काम करने की जरूरत महसूस नहीं करते। वैसे तो भूतपूर्व सांसद और विधायक की पेंशन भी अब जिंदा रहने जितनी हो गई है, लेकिन विधायक, सांसद, या मंत्री बनने के बाद लोग अपने पेशे या हुनर के काम को करते रहें, ऐसा कम ही सुनाई पड़ता है। आमतौर पर नेताजी और उनके बच्चे, बेटी-दामाद जमीन-जायदाद और कंस्ट्रक्शन के काम में लगते हैं क्योंकि उसी जगह पर कालेधन को बड़े अनुपात में खपाने की गुंजाइश रहती है। कुछ लोगों के आल-औलाद कारखाने खोल लेते हैं, और ये कारखाने सिर्फ मशीनों वाले नहीं रहते, कमाई करने वाले कई किस्म के धंधों वाले भी रहते हैं। इसलिए इस माहौल के बीच कुछ काम करने वाले नेता थोड़े से खटकते हैं मानो वे अपने साथी दूसरे नेताओं पर तंज कस रहे हों। तंज कसने के लिए हर बार शब्द ही नहीं लगते, कई बार बिना किसी को कहे हुए अपना खुद का कोई काम भी दूसरों पर तंज सरीखा लगता है। अब किसी बैठक में, या मंच पर जहां हर किसी के सामने महंगे ब्रांड की पानी की बोतलें रखी जाएं, वहां कोई घर से खुद उठाकर लाया गया पानी का फ्लास्क निकालकर पानी पीने लगे, तो वह औरों पर तंज ही रहता है। हो सकता है कि रूड़ी ने रोजी-रोटी के लिए यह उड़ान न उड़ाई हो, और कमर्शियल पैसेंजर प्लेन के पायलट का अपना लाइसेंस जिंदा रखने के लिए वे बीच-बीच में ऐसा करते हों, लेकिन जब एक साथी मंत्री बनकर सफर कर रहा हो, तब दूसरा साथी पायलट की वर्दी में प्लेन उड़ा रहा हो, तो यह भी कोई निजी पेशा या व्यवसाय न करने वाले महज मंत्री-नेता पर तंज सरीखा लग सकता है।
राहुल गांधी विदेश गए हुए हैं, और वहां उन्होंने भारत की कुछ मोटरसाइकिलों के साथ अपनी एक फोटो पोस्ट की है, और लिखा है कि भारत के बहुत से ब्रांड देश के भीतर किसी सरकारी मेहरबानी के बिना भी दुनिया भर में कामयाब हैं। उन्होंने कुछ और राजनीतिक बातें कही होंगी, लेकिन हम उनके बयान से परे इस मुद्दे पर आना चाहते हैं कि भारत के कौन से ब्रांड दुनिया के दर्जनों देशों में अपनी मजबूत जगह बना चुके हैं, और देश के भीतर उन पर किसी सरकारी मेहरबानी की कोई तोहमत भी आज तक नहीं लगी है। टाटा के अलग-अलग बहुत से सामान, और उसकी सेवाएं दुनिया के हर उपमहाद्वीप में पहुंची हुई हैं, और इसे एक बड़ी साख वाला ब्रांड माना जाता है। इसके कारोबार पर कभी किसी पार्टी की सरकार की खास रियायत नहीं रही। दूसरी तरफ सरकारी जमीन, खदान, नदी का पानी, या जंगल पाए बिना भी जो कंपनियां दुनिया भर में पहुंची हुई हैं, उनमें कम्प्यूटर सेवा देने वाली इंफोसिस और विप्रो जैसी कंपनियां हैं जो कि टाटा के साथ-साथ ही देश में सबसे अधिक सामाजिक सरोकार निभाने वाली भी हैं। सहकारिता की देश की सबसे बड़ी ईकाई, अमूल के मिल्क प्रोडक्ट दुनिया के दर्जनों देशों में कामयाब हैं, और वे बड़ी-बड़ी स्विस कंपनियों को टक्कर देते हैं। गुजरात में 1946 में आनंद जिले में सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रोत्साहन से कारोबारियों और ठेकेदारों के शोषण के खिलाफ यह सहकारी समिति शुरू हुई। और फिर आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड (अमूल) को डॉ.वर्गीज कुरियन ने आगे बढ़ाया। उन्होंने ही देश में श्वेत क्रांति लाई, और अमूल को एक ग्लोबल ब्रांड बनाया। आज भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाने में केरल के वर्गीज कुरियन का ऐतिहासिक और असाधारण योगदान था। वे केरल में पैदा हुए थे, मद्रास और अमरीका में पढ़े थे, और उन्होंने अमूल को गोबर से लेकर आसमान के सितारे तक पहुंचा दिया था। यह पूरी तरह से बिना किसी सरकारी रहमो-करम के बढ़ा हुआ सहकारी आंदोलन था, जो कि सरकार के परोक्ष नियंत्रण में रहने के बावजूद जिंदा रहने दिया गया, और नेहरू के वक्त से जो खुला हाथ डॉ.कुरियन को मिला, उससे उन्होंने देश के इस सबसे बड़े और सबसे कामयाब सहकारी आंदोलन को खड़ा किया। यह इस बात की मिसाल रहा कि कई सरकारें आई-गईं, आज भी अमूल देश का सबसे कामयाब मॉडल बना हुआ है।
लेकिन हम बिना सरकारी मदद वाली और दूसरी कंपनियों, या उनके ब्रांड को देखें, जो कि दुनिया भर में अपने दम पर कामयाब हैं, तो हल्दीराम के मीठे-नमकीन, रॉयल इनफील्ड की बुलेट मोटरसाइकिलें, महेन्द्रा एंड महेन्द्रा की हर तरह की गाडिय़ां, फैब इंडिया के कपड़े, पारले के बिस्किट लिस्ट में सबसे ऊपर हैं। इस देश में बिस्किट खाने वाले लोगों को शायद यह पता नहीं होगा कि पारले-जी दुनिया में सबसे अधिक बिकने वाला बिस्किट ब्रांड है, और इसे किसी देश-प्रदेश की सरकार की मेहरबानी नहीं लगी। ब्रांड की यह लिस्ट बहुत लंबी है, और कई ब्रांड तकनीकी सामानों के हैं, जिनसे कि आम लोग बहुत परिचित नहीं होंगे। लेकिन हम जो बात कहना चाहते हैं, वह यही है कि सफल कारोबारी जब कोई बहुत अच्छा सामान बनाते हैं, तो उसके लिए उन्हें सरकार की मेहरबानी नहीं लगती, सरकारी रियायतें नहीं लगतीं। यह संपादकीय लिखने वाले संपादक ने कम से कम एक दर्जन देशों में पारले-जी बिस्किट खरीदकर खाया है।
देश के भीतर कौन से कारोबारी सबसे अधिक सफल हैं, कोई एक हुरुन लिस्ट है जिसमें दुनिया के सबसे रईस लोगों का नाम है, और इसमें हिन्दुस्तान के लोगों का भी जिक्र है। हो सकता है कि सरकारी मेहरबानियों वाले लोग ऐसी लिस्टों में बहुत ऊपर हों, और ऐसी लिस्ट से बहुत नीचे के लोग दुनिया में अपने दम पर सबसे कामयाब ब्रांड बनाकर उसे चला रहे हों। अभी हमने जितने भी ब्रांड यहां गिनाए हैं, उनमें से किसी पर किसी भी पार्टी की सरकार की अलग से किसी मेहरबानी का कोई जिक्र नहीं होता। इसलिए कारोबार को भी सरकार की रियायत के बिना, मेहरबानी के बिना चलाया जा सकता है, अगर उस कारोबार का प्रोडक्ट बहुत अच्छा हो। यह एक अलग बात है कि प्रोडक्ट अच्छा न होने पर भी कंपनी बहुत अधिक मुनाफे में रह सकती है, अगर उसे सरकार की तरफ से टैक्स की, आयात-निर्यात नीति की, लाइसेंस या जमीन की, खदान और पानी की खास मदद मिलती हो। ऐसी कंपनियां कमाई बहुत अधिक कर सकती हैं, और हुरुन लिस्ट में वे छत पर बैठ सकती हैं, लेकिन असली कामयाबी तो अपने दम पर दुनिया के बाजारों में राज करने की है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस अमरीका को दुनिया का सबसे मुक्त बाजार कहा जाता है, वहां सरकारी मदद का हाल यह है कि अभी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प, और उनके एक भूतपूर्व लंगोटिया एलन मस्क के बीच जब रायता फैला, तो ट्रम्प ने धमकाया कि मस्क को बैटरी कारों के लिए कितनी सरकारी रियायत मिल रही है, और अंतरिक्ष योजनाओं के कितने सरकारी ठेके मस्क की कंपनी को मिले हुए हैं। ट्रम्प ने खुलकर कैमरों के सामने कहा कि मस्क के ये सब ठेके खत्म करने का समय आ गया है। लेकिन अभी जब एक चीनी कंपनी के अमरीका के सबसे लोकप्रिय प्रोडक्ट, टिक-टॉक को चीनी नियंत्रण से बाहर लाकर किसी अमरीकी कंपनी को उसका मुख्य भागीदार बनाने की बात आई, तो ट्रम्प ने यह साफ कर दिया कि अमरीकी कंपनी को वे ही छांटेंगे, और वही हुआ भी है। उन्होंने एक कंपनी को छांटा है जिसे टिक-टॉक को अपने शेयर बेचने होंगे। तो सबसे मुक्त बाजार वाले देश में भी सरकारी मेहरबानियां इस अश्लील और हिंसक तरीके से चल रही हैं।
भारत में इंदिरा गांधी के समय से यह चर्चा रहती थी कि रिलायंस कंपनी के धीरूभाई अंबानी को सरकारी नीतियों में आयात-निर्यात की शर्तों की ऐसी मेहरबानियां मिलती थीं कि वे जमीन से आसमान पर पहुंचे। बाद में अटल सरकार में भाजपा के एक सबसे ताकतवर नेता प्रमोद महाजन अंबानी और दूसरे कारोबारियों से अपने बहुत करीबी रिश्तों को लेकर जाने जाते थे, और 2002 में संचार मंत्री रहते हुए जब प्रमोद महाजन ने धीरूभाई पर टिकट जारी की थी, तो मंच पर उनका अंबानी के पोस्टर को सिर पर उठाया हुआ फोटो भी सबको याद है। ऐसा माना जाता था कि प्रमोद महाजन भाजपा के देश के एक सबसे बड़े फंड रेजर थे। ऐसा ही एक वक्त प्रणब मुखर्जी के बारे में इंदिरा और राजीव सरकार के समय माना जाता था। और भी सरकारों के अपने-अपने एजेंट, दलाल, फंड रेजर या कोषाध्यक्ष रहते आए हैं। मनमोहन सरकार के दस बरस में यह माना जाता था कि अहमद पटेल बड़े फंड का काम देखते थे, और कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा चिल्हर काम के लिए थे। अटल सरकार के वक्त उनके दत्तक-दामाद रंजन भट्टाचार्य का नाम आता था जो कि प्रधानमंत्री निवास से ही कारोबारी सौदों का काम करते थे। अब मोदी सरकार के समय संगठन की चर्चा इस बारे में नहीं होती, लेकिन अडानी और अंबानी पर खास मेहरबानियों की चर्चा जरूर होती है। देश में पिछले कई दशकों में क्रोनी कैपिटलिज्म की बात होती है, यानी पसंदीदा कारोबारी।
बुराई पर अच्छाई का त्यौहार दशहरा कल आकर चला गया। दो-तीन दिनों से बारिश चल रही थी, और रावण के बन रहे पुतले जगह-जगह भीग गए थे, कई जगहों पर वे जल नहीं पाए, और उसे एक साल की लीज और मिल गई। लेकिन रावण से परे उन इंसानों को देखें जो कि रावण दहन के लिए हर बरस दशहरा मैदान जाते हैं, और अपने को राम की तरह समझते हैं, उनका हाल देखें, तो लगता है कि रावण के टुकड़े तो इन तमाम लोगों के भीतर भरे हुए हैं। अब आज एक अखबार के आधे पेज पर ही छत्तीसगढ़ की जो खबरें छपी हैं, उन्हें देखकर लगता है कि क्या सचमुच ही रावण को जलाने का कोई मतलब रहता है, या फिर इस फर्जीवाड़े के बाद भी लोगों के भीतर का रावण उनसे कई तरह की हिंसा करवाते रहता है। अब ऐसी चार बड़ी खबरों में से पहले किसे बताएं, और बाद में किसे, यह तय करना खासा मुश्किल लग रहा है।
छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर की खबर है कि पेट्रोल पंप पर काम करने वाली एक युवती को कल उसके ही एक पिछले प्रेमी ने आकर खुलेआम, दिनदहाड़े, चाकू से गोदकर मार डाला। वह उसके किसी और युवक से बात करने को लेकर खफा था। प्रेमसंबंधों के बीच चाकू चलने और कत्ल करने की घटनाएं इतनी हो रही हैं कि प्रेम के प्रतीक के रूप में दिल के लाल निशान की जगह चाकू का ही निशान बना देना चाहिए, उससे कुछ लोग सावधान तो होंगे। एक दूसरी घटना जांजगीर-चाम्पा की है जहां एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद एक महिला देर रात घर अकेले लौट रही थी, और तीन मोटरसाइकिलों पर वहां से निकलते नौजवानों ने उसे घर छोडऩे के बहाने बिठा लिया, और बाजार में एक जगह ले जाकर 7 लोगों ने बलात्कार किया। सारे के सारे गिरफ्तार हो गए हैं, और बलात्कार के मामलों में जिस तरह के सुबूत जुट जाते हैं, उससे इन्हें सजा होने की काफी गुंजाइश भी रहती है। रोज ऐसी खबरें अखबारों में आती हैं, लेकिन इन 7 नौजवानों का या तो खबरों को पढऩे से लेना-देना नहीं था, या फिर उन्हें सजा की कोई परवाह नहीं थी। तीसरी घटना दुर्ग जिले की है जहां दो सगे भाईयों ने उनके पिता से अलग रह रही अपनी माँ के लिव-इन-पार्टनर को पीट-पीटकर मार डाला। उनका माँ से इस संबंध को लेकर तनाव बने रहता था, और अब गिरफ्तार दोनों भाई बरसों के लिए जेल जाएंगे, यह तय है। चौथी घटना बिलासपुर जिले की है जहां भाई के मर जाने के बाद भाभी को पेंशन मिल रही थी, और भतीजी को एसईसीएल में अनुकम्पा नियुक्ति मिलने की प्रक्रिया चल रही थी। ऐसे में मृतक के भाई ने भाभी-भतीजी को मारने के लिए पांच लाख रूपए में दो लोगों को ठेका दिया, और 70 हजार रूपए एडवांस भी दिए। भाड़े के हत्यारों ने उनके घर में छुपकर ही माँ-बेटी पर हमला बोला, माँ मारी गई, भतीजी बुरी तरह जख्मी अस्पताल में है, और उनकी जगह अनुकम्पा नियुक्ति पाने के बजाय सुपारी देने वाला देवर भी हत्यारों सहित गिरफ्तार हो चुका है।
अब तो हत्या और बलात्कार सरीखे गंभीर अपराधों में मुजरिमों का बच निकलना कम होते जा रहा है, और अखबारों में हर दिन ऐसे कई जुर्म की खबरों के साथ-साथ कुछ दूसरे ताजा-ताजा जुर्मों में गिरफ्तारियों की खबरें भी छपती हैं। इसके बावजूद अगर लोग कई बरस की कैद लायक जुर्म करने से परहेज नहीं करते हैं, कतराते नहीं हैं, तो यह समझने की जरूरत है कि उनकी जिंदगी में इतनी तकलीफ का खतरा उठाने लायक कौन सी बात है? इसे कुछ दूसरे तरह से भी समझा जा सकता है कि क्या उनकी जिंदगी में ऐसा कोई सुख नहीं है, ऐसी किसी खुशी की संभावना नहीं है कि वे उसकी चाहत में कैद और जेल से दूर रहना चाहें? जिन लोगों की जिंदगी में उम्मीदें रहती हैं, संभावनाएं रहती हैं, वे अपने आपको बचाकर रखना चाहते हैं। लेकिन जिनकी जिंदगी अभावों से भरी रहती है, आगे भी जिन्हें कोई रौशनी नहीं दिखती, वैसे लोग कैद जैसे खतरों की परवाह नहीं करते। आज सभी तरह के गंभीर अपराधों के मुजरिमों को देखें, तो वे जिंदगी में अच्छे-भले बसे हुए लोग नहीं रहते, वे आमतौर पर बेरोजगार, नशेड़ी, गरीबी से गुजरते हुए लोग अधिक रहते हैं। जिस देश में जुर्म जितना अधिक है, वह देश संपन्नता, सफलता, और खुशहाली से उतनी ही दूरी वाला देश रहता है। किसी भी देश-प्रदेश को जुर्म के आंकड़ों से यह सबक भी लेना चाहिए कि उनकी आबादी का कौन सा तबका कैद से डर नहीं रहा है। जब आपके बीच के लोग कैद से न डरते हों, तो आपको उनसे डरना चाहिए, वे खतरनाक होते हैं, क्योंकि वे बेधडक़ हो चुके रहते हैं, कानून का उन्हें कोई खौफ नहीं रहता। कोई भी समाज तभी तक सुरक्षित रह सकता है जब तक उसके लोग परिवार को छोडक़र जेल जाने से डरते हों, जिन्हें जिंदगी में सुख की चीजों की या तो चाहत रहती है, या जिन्हें सुख हासिल रहता है। सुख अपने आपमें जुर्म से दूर रहने की एक बड़ी वजह रहती है क्योंकि लोग सुख की आजाद जिंदगी को छोडक़र कैद की तकलीफों में जाना नहीं चाहते। यही वजह है कि संपन्न तबकों के लोग जेलों में गिने-चुने दिखते हैं, और अधिकतर मुजरिम ऐसे रहते हैं जिनकी जेल की जिंदगी बाहर की जिंदगी के मुकाबले बहुत अधिक खराब नहीं रहती है।
जैसे किसी बहुत मामूली सी साहित्यिक पुरस्कार के लिए कई बहुत ही औसत लेखक-कवि कोशिश करने लग जाते हैं, गुटबाजी करते हैं, लॉबिंग करते हैं, उससे भी बहुत घटिया दर्जे पर उतरकर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प नोबल शांति पुरस्कार के लिए दावा करते चल रहा है। शायद पूरी रात उसे सपने में नोबल शांति पुरस्कार का मैडल ही दिखते रहता है। अभी वह 50वीं बार भारत और पाकिस्तान के बीच का युद्ध रूकवाने का दावा कर रहा है, और भारत तकरीबन हर बार इसे गलत बतलाते आया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में साफ कहा था कि किसी भी देश के नेता ने भारत से ऑपरेशन सिंदूर रोकने को नहीं कहा था। जिस तरह एक राजनयिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिष्टाचार का तकाजा रहता है, भारत ने साफ शब्दों में ट्रम्प के दावों को सच से परे कहा है, लेकिन भारत के बहुत से हित अमरीका से जुड़े हुए हैं, इसलिए वह भारत के चुनाव आयोग की तरह राहुल गांधी के हर बयान का हमलावर जवाब मिनटों के भीतर नहीं दे रहा है। फिर भी भारत ने दर्जन भर से अधिक बार यह साफ किया है कि पाकिस्तान के साथ इसके रिश्तों में किसी तीसरे पक्ष की कोई गुंजाइश नहीं है, और ट्रम्प ने भारत से ऑपरेशन सिंदूर रोकने की कोई बात नहीं कही थी। भारत ने कहा है कि दोनों देशों फौजी अफसरों के बीच बातचीत के बाद इसे रोका गया था।
अब ट्रम्प ने एक बार फिर अपना पुराना राग दुहराया है कि उन्होंने दोनों देशों को कारोबार रोक देने की धमकी देकर यह युद्ध रोका है जो कि परमाणु युद्ध में बदलने का खतरा रखता था। उन्होंने कहा कि अभी पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर ने उनकी तारीफ करते हुए कहा है कि उन्होंने (ट्रम्प ने) लाखों जिंदगियां बचा ली। ट्रम्प ने कहा है कि 9 महीनों में उन्होंने इतने सारे जंग खत्म करवाए हैं, सात फौजी संघर्ष खत्म करवाए हैं, और अब वे इजराइल-हमास के बीच चल रहा जंग खत्म करवाने के करीब हैं। उन्होंने तो अपने दावे में यही कहा है कि कल उन्होंने (इजराइली प्रधानमंत्री के साथ बैठक के बाद) यह जंग भी करीब-करीब खत्म करवा दी है। उन्होंने इस बैठक के बाद जिस अंदाज में अपना गाजा शांति प्लान सामने रखा है, और इसे पश्चिम के इजराइल के आलोचक देशों के साथ-साथ अरब देशों ने भी अच्छा माना है, और तकरीबन तमाम पहलू ट्रम्प के इस योजना के साथ हैं।
फिर भी नोबल शांति पुरस्कार के लिए ट्रम्प की यह हड़बड़ी बड़ी घटिया किस्म की हरकत है। पूरी दुनिया में सबसे अधिक सम्मान वाला माना जाने वाला यह नोबल शांति पुरस्कार अपने खुद को दिलवाने के लिए इस तरह बेसब्र ट्रम्प दुनिया का पहला इंसान है। कल उसने जिस तरह इजराइल और फिलीस्तीन के बीच संघर्ष रोकने के लिए एक योजना की घोषणा की, उसके शब्दों से इजराइली प्रधानमंत्री भी पूरी तरह सहमत नहीं थे, और राजनीतिक विश्लेषकों ने ट्रम्प की हड़बड़ी, और उसके दावे को लेकर यह कहा कि वे हमास को कोई संदेश नहीं दे रहे थे, बल्कि नोबल पुरस्कार कमेटी को संदेश दे रहे थे कि शांति पुरस्कार वाले मैडल को पॉलिश करवाना शुरू कर दे। पिछली करीब आधी सदी में हमें और कोई भी सामाजिक आंदोलनकारी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, या शासन प्रमुख ऐसे याद नहीं पड़ते जिन्होंने ऐसी बेशर्मी के साथ अपने आपको नोबल पुरस्कार कमेटी के सामने पेश किया हो। एक बड़ा खतरा दुनिया के सामने आज यह है कि अगर किसी और को इस बरस यह पुरस्कार मिल गया, तो हो सकता है कि दुनिया से बदला लेने के लिए ट्रम्प दस-बीस जगह खुद ही जंग शुरू करवा दे। वैसे अब तक का रिकॉर्ड तो यही कहता है कि 24 घंटे में रूस-यूक्रेन जंग को रूकवाने का दावा करने वाला ट्रम्प आज महीनों बाद भी खाली हाथ बैठा हुआ है, और उसने इस चक्कर में नाटो के देशों के साथ अपने रिश्ते बर्बाद कर डाले हैं। पाकिस्तान से एक ताजा मोहब्बत के चलते उसने भारत के साथ चौथाई सदी में अच्छे हुए रिश्तों को तबाह कर दिया है। दिखावे के लिए यारी-दोस्ती की बातें फिजूल हैं क्योंकि ट्रम्प के फैसलों से भारत का उद्योग-व्यापार, यहां के कामगार, यहां से अमरीका जाकर काम कर रहे लाखों लोग, सब पर अनिश्चितता की एक तलवार टंग गई है।
आज लोगों को फोन पर तरह-तरह के फर्जी संदेश और ऑफर भेजकर ठगने का धंधा जोरों पर है। न सिर्फ हिंदुस्तान में, बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में साइबर ठगी, सेक्सटॉर्शन खूब चल रहा है। आज ही सुबह की रिपोर्ट है कि चीन म्यांमार में चल रहे फर्जी कॉल सेंटरों पर कार्रवाई करके चीनियों को गिरफ्तार कर रहा है, लेकिन जिस कंबोडिया के साथ चीन के अच्छे रिश्ते हैं, वहां भी फर्जी कॉल सेंटरों में दसियों हजार लोग काम कर रहे हैं, जो दुनिया भर के देशों में फोन करके उन्हें ब्लैकमेल करते हैं, ठगते हैं। भारत सरकार की रोक के बावजूद आज भी दूसरे देशों से चलाए जा रहे दर्जनों लोन एप्लीकेशन भारत में काम कर रहे हैं, और एक बार उनसे कर्ज ले लेने वालों का वे पूरा खून निचोड़ लेते हैं। डिजिटल अरेस्ट नाम की एक दहशत पैदा करके लोगों को एक-एक महीने तक फोन से ही अपने कब्जे में रखते हैं, और उनके बैंक खाते खाली करवा लेते हैं। इन तौर-तरीकों के बारे में हम हर कुछ महीनों में लिखते हैं कि कैसे सरकार को ऐसे साइबर-अपराधों की रोकथाम के लिए खुफिया एजेंसियां बनानी चाहिए।
लेकिन कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक महिला डॉक्टर के साथ हुई ठगी का तरीका बड़ा अटपटा है। अगर पुलिस में लिखाई गई रिपोर्ट, और सुबूत के तौर पर दी गई सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सब सही हैं, तो फिर यह एक नया खतरनाक सिलसिला शुरू होते दिख रहा है। इस ताजा घटना में एक महिला डॉक्टर के क्लीनिक में पहुंचे दो साधुओं ने डॉक्टर से बात करते हुए उसे हिप्नोटाईज कर लिया, और उससे एक यूपीआई खाते में हजारों रुपये ट्रांसफर करवा लिए और उसे देवी-देवताओं की फोटो और रूद्राक्ष की माला देकर चले गए। डॉक्टर का कहना है कि जब अगले दिन उसने अपने फोन पर रकम जाने की जानकारी देखी, और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग देखी, तो उसे ठगी का अहसास हुआ, और उसने पुलिस रिपोर्ट की। पुराने लोगों को याद होगा कि कुछ दशक पहले इस प्रदेश में सडक़ पर भगवान दिखाने के नाम पर जमकर ठगी होती थी, लोगों से उनके गहने उतरावाकर पोटली बनाकर ठग उन्हें कोई दूसरी पोटली थमा देते थे, और सौ कदम चलने कहते थे कि उसे बाद भगवान के दर्शन होंगे। इसमें आए दिन लोग ठगाते थे, लेकिन उस वक्त कोई सीसीटीवी कैमरे नहीं थे, इसलिए ठग पकड़ाते नहीं थे। अब मोबाइल फोन, लोकेशन, बैंक खातों में लेनदेन, और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की मेहरबानी से लोग न सिर्फ पकड़ाते हैं, बल्कि उनके खिलाफ सुबूत भी पुख्ता मिल जाते हैं।
अब अगर साधुओं के हुलिए में आकर ठग किसी को हिप्नोटाईज कर रहे हैं, तो यह तो एक बहुत ही खतरनाक नौबत है। आज भारत की हवा में धर्म जितना घुला हुआ है, किसी धार्मिक पोशाक में पहुंचे लोगों को तो बेरोकटोक महिलाएं घरों में आ जाने देंगी, और उनका सत्कार भी करने लगेंगी। अब अपनी क्लीनिक में काम करती हुई डॉक्टर, वहां पर दूसरे कर्मचारी के रहते हुए भी इस तरह की ठगी की शिकार हो गई है, तो घरेलू महिलाएं तो और अधिक खतरे में रहेंगी। सुबह होती नहीं है कि रिहायशी बस्तियों में धर्म के नाम पर, गाय या किसी अनाथाश्रम के नाम पर चंदा मांगने के लिए, या किसी यज्ञ हवन के नाम पर दान मांगते हुए धार्मिक चोलों में लोग पहुंचने लगते हैं। उन्हें कड़ाई से मना कर दिया जाए, तो उनके आशीर्वचन पलभर में श्राप में बदल जाते हैं। अगर डॉक्टर से ठगी की यह घटना सही है, तो पुलिस को इसे तेजी से हल करना चाहिए, साथ-साथ एक साधारण सावधानी भी चारों तरफ फैलानी चाहिए कि सम्मोहन करके ठगी करने वाले लोग घूम रहे हैं, लोग अनजाने लोगों से कुछ दूर ही रहें।
अब इस एक घटना से परे आम बात यह है कि चारों तरफ लोग जुर्म से मोटी कमाई करने को एक आसान रास्ता मानकर चल रहे हैं। वे सट्टेबाजी की बुकिंग कर रहे हैं, नशे की तस्करी और बिक्री कर रहे हैं, वैध-अवैध शराब की गैरकानूनी बिक्री कर रहे हैं, हर किस्म का साइबर क्राइम तो कर रही रहे हैं। इन सबको मिलाकर देखें तो लगता है कि लोगों को जेल जाने के खतरे का या तो पूरा अहसास नहीं है, या वे उस खतरे की कीमत पर भी जुर्म से कमाई करके आलीशान जिंदगी जीना चाहते हैं। इसी छत्तीसगढ़ के महादेव सट्टा नाम का दसियों हजार करोड़ का ऐसा साम्राज्य खड़ा हुआ कि उसका सरगना दुबई में बैठकर आज तक धंधा चल रहा है, और उसकी गिरफ्तारी की बस अफवाहें ही बीच-बीच में आती हैं। इस बीच जांच एजेंसियों का कहना है कि महादेव सट्टा की काली कमाई में नेताओं और अफसरों को सैकड़ों करोड़ रुपये मिले। अब जुर्म की कमाई अगर इतनी आसान और इतनी आलीशान है, तो बहुत हैरानी की बात नहीं है कि गांव-गांव तक लोग शेयर बाजार में पूंजी निवेश, और क्रिप्टोकरेंसी के धंधे का झांसा देकर लोगों को ठग रहे हैं।
कुछ हफ्ते पहले नेपाल में एक जनआंदोलन के बाद सत्तापलट हुआ, तो हमने लिखा था कि बाकी देशों को भी इससे सबक लेना चाहिए। अलग-अलग कई किस्म के देशों में जनता का आंदोलन सरकार को पलट चुका है, या सरकार को अपना रूख बदलने पर मजबूर कर चुका है। अरब स्प्रिंग कहे जाने वाले जनआंदोलन की शुरूआत 2010-11 में ट्यूनिशिया से हुई थी, बाद में यह मिस्र, लीबिया, यमन, बहरीन, और सीरिया जैसे देशों में फैल गया। कुछ देशों में इसने सत्ता प्रमुख को हटने या गिरने पर मजबूर किया, तो कुछ जगहों पर यह गृहयुद्ध बन गया। इसे जनजागरूकता का एक बड़ा आंदोलन कहा जाता है। फिर हाल के बरसों में हमने श्रीलंका, बांग्लादेश में जनता की बगावत, या जनक्रांति से सत्ता बदलते देखी है, और सबसे ताजा मिसाल तो नेपाल की अभी सामने है।
भारत एक बहुत बड़ा देश है, और ऊपर जिन देशों का हमने जिक्र किया है उन सबसे अलग यह एक बड़ा मजबूत लोकतंत्र है। यहां पर किसी जनआंदोलन से सत्तापलट जैसा कोई खतरा नहीं है, लेकिन जनआंदोलनों के सत्ता के लिए अपने खतरे रहते हैं, और लोगों को याद होगा कि 2014 में यूपीए सरकार के जाने की वजह दिल्ली में केजरीवाल, और उनके भागीदारों के चलाए जनआंदोलन भी थे। अन्ना हजारे, रामदेव, किरण बेदी, केजरीवाल, और श्रीश्री रविशंकर ने मिलकर जो माहौल बनाया था, और रामदेव 35 रूपए में डीजल-पेट्रोल, 40 रूपए में डॉलर, हर खाते में विदेशों से लौटे कालेधन के 15-15 लाख, देश के हर गांव को स्विटजरलैंड जैसा बनाना, ये सारे हसीन सपने भगवा लंगोटी के साथ देश को पेश कर रहे थे, और लोगों ने इस आंदोलन के बाद यूपीए सरकार को चुनाव में हटा दिया था। इस तरह भारत में जनआंदोलन कोई बगावत या क्रांति नहीं बनते, लेकिन वे एक सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकते हैं, कभी-कभी बने हैं।
अब हम लद्दाख की बात करना चाहते हैं जहां पर राज्य में छठी अनुसूची लागू करने की भाजपा के ही घोषणापत्र की बात दुहराते हुए एक गांधीवादी आंदोलनकारी सोनम वांगचुक आंदोलन कर रहे थे। उनका अनशन और आंदोलन अहिंसक चल रहा था, लेकिन लद्दाख में कुछ दूसरे आंदोलनकारी बेकाबू हो गए, पुलिस गाडिय़ों, और भाजपा दफ्तर को आग लगा दी। इस हिंसा का विरोध करते हुए सोनम वांगचुक ने अपना अनशन खत्म कर दिया, लेकिन इस केन्द्रशासित प्रदेश पर काबिज केन्द्र सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करके राजस्थान की जोधपुर जेल भेज दिया है। लोगों को अच्छी तरह याद है कि जब मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को तोडक़र तीन अलग-अलग इलाके बनाए थे, तो लद्दाख के सोनम वांगचुक ने मोदी सरकार की तारीफ की थी, उन्हें धन्यवाद दिया था। वे बुनियादी तौर पर एक पर्यावरणवादी हैं, और पूरी दुनिया में उन्हें उनके इस पहलू की वजह से बड़े सम्मान से देखा जाता है। वे मोदी सरकार की कुछ पर्यावरण पहल की तारीफ कर चुके हैं, सार्वजनिक रूप से भी, और केन्द्र सरकार को चिट्ठी लिखकर भी। ऐसे में लद्दाख में हुई आगजनी की हिंसा की तोहमत उन पर थोपते हुए उनको गिरफ्तार करके जिस तरह एक गर्म प्रदेश जोधपुर की जेल में भेजा गया है, उससे केन्द्र सरकार ने बातचीत की एक संभावना को खत्म कर दिया है। देश के सरहदी राज्यों को लेकर भारत सरकार पर अलग-अलग समय पर अलग-अलग दबाव बने रहते आए हैं, लेकिन केन्द्र सरकार और देश के हित में यही रहता है कि इन राज्यों में शांतिपूर्ण बातचीत के लिए कोई स्थानीय नेता रह सकें। कश्मीर के मामले में तो अभी-अभी यह तथ्य सामने आया है कि वहां के कुछ अलगाववादी नेताओं को भी भारत के अलग-अलग कुछ प्रधानमंत्रियों, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान में बसे नेताओं से बातचीत का जिम्मा दिया था। जब कभी किसी तनावग्रस्त इलाके में बातचीत के लिए नेता उपलब्ध हों, तो सरकार का काम आसान होता है। लेकिन आज लद्दाख में सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी से न सिर्फ वहां से दिल्ली को जोडऩे वाला एक पुल गिरा दिया गया है, बल्कि पूरी दुनिया में इस पर्यावरणवादी आंदोलनकारी की वजह से लद्दाख का मुद्दा खबरों में आ गया है, और दुनिया की नजरें लद्दाख पर टिक गई है। एक बहुत अच्छी अंतरराष्ट्रीय साख वाले शांतिप्रिय आंदोलनकारी को लद्दाख जैसे नाजुक इलाके से हटाना सरकार की एक बड़ी चूक है। हम देख रहे थे कि लद्दाख में चीन के साथ साढ़े 8 सौ किलोमीटर लंबी सरहद है, और लद्दाख के कई हिस्सों पर चीनी कब्जे को लेकर विवाद भी है। पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान इलाके से भी लद्दाख जुड़ा हुआ है, और अफगानिस्तान से भी। लद्दाख से बड़ी संख्या में पहाड़ी स्थितियों में काम करने के काबिल नौजवान भारतीय फौज में जाते हैं, और एक सरहदी राज्य को इस तरह उलझाना समझदारी नहीं है। कुछ रिटायर्ड फौजी अफसर कल ही यह याद दिला रहे थे कि लद्दाख ऐसी खिलवाड़ के लायक प्रदेश नहीं है।
लेकिन लगे हाथों हम असम की बात करना चाहते हैं जहां पर राज्य की आबादी के करीब 12 फीसदी आदिवासी समुदाय आंदोलन करते हुए सडक़ों पर हैं जिन्हें आरक्षण के तबके में शामिल नहीं किया गया है। पिछले कुछ महीनों में ये समुदाय लगातार बेचैन हैं, और अभी-अभी इनके बहुत बड़े-बड़े जुलूस निकले हैं, बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए हैं। लद्दाख और असम दोनों जगहों पर स्थानीय जनता को यह आशंका है कि उनकी जमीन बाहरी कारखानेदारों को, या खदान मालिकों को दी जा सकती है। असम में अभी एक स्वायत्तशासी परिषद, बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के चुनाव में केन्द्र और राज्य दोनों जगह सत्तारूढ़ भाजपा की करारी शिकस्त हुई है। वहां भाजपा की सीटें आधी रह गईं, और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने बहुमत पा लिया है। अब एक बड़े स्थानीय चुनाव में शिकस्त, राज्य में भाजपा के देश के सबसे हमलावर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ जनआक्रोश के साथ-साथ जब वहां के आदिवासी आंदोलन को देखें, तो लगता है कि इस एक और सरहदी राज्य में बेचैनी कुछ अधिक फिक्र की बात होनी चाहिए। असम का भूटान के साथ बॉर्डर तो ढाई सौ किलोमीटर से कुछ अधिक है, लेकिन वह अधिक फिक्र की बात नहीं है। बांग्लादेश के साथ ठीक इतना ही लंबा बॉर्डर है, और यह देश की एक बहुत संवेदनशील सरहद है।
तमिलनाडु के करूर नाम की जगह पर लोकप्रिय फिल्म अभिनेता विजय थलापथि की राजनीतिक रैली कल शाम जानलेवा हो गई, जब वे घंटों देर से वहां पहुंचे, और इंतजार करते हुए थके हुए लोग उनके करीब आने को बेकाबू होने लगे। मंच तक पहुंचने के लिए उनके लिए जो रास्ता रखा गया था, उसे छोडक़र वे भीड़ के बीच से मंच तक जाने लगे, और उनके करीब आने को टूट पड़े लोग भगदड़ में कुचले गए। अभी दोपहर तक 39 लोग मारे जा चुके हैं जिनमें आधे से अधिक महिलाएं और बच्चे हैं। 50 से अधिक लोग बुरी तरह जख्मी हैं, और अलग-अलग अस्पतालों में हैं। अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम तमिल राजनीति में सत्तारूढ़ डीएमके के खिलाफ अगले बरस का विधानसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं, और इसके चलते ही कल जिन दो जगहों पर उनकी आमसभा हुई, दोनों जगह पर वे घंटों लेट पहुंचे, और पहली जगह की भगदड़ में तो मौतें नहीं हुईं, लेकिन दूसरी आमसभा में हुई मौतों के बाद इस बड़े फिल्म अभिनेता ने श्रद्धांजलि के दो शब्द भी नहीं कहे, और विशेष विमान से चेन्नई चले गया। शासन-प्रशासन का कहना है कि इस रैली के लिए पुलिस ने जो सावधानियां बरतने के लिए कहा था, इस अभिनेता की पार्टी ने उनमें से कोई बात नहीं मानी, और उसके घंटों लेट पहुंचने की वजह से लोग चक्कर खाकर गिर रहे थे, और करीब आने के लिए भगदड़ भी हो रही थी। मुख्यमंत्री ने इसे तमिलनाडु में किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में अब तक हुई सबसे अधिक मौतों का हादसा कहा है। उल्लेखनीय है कि तमिल राजनीति में बड़ी संख्या में फिल्मी सितारों का इतिहास रहा है, और उनमें से कुछ मुख्यमंत्री भी बने हैं। वहां पर फिल्मी सितारों के लिए भी एक ऐसी दीवानगी रहती है जो कि देश में और कहीं भी नहीं दिखती, और यही दीवानगी लोगों को राजनीतिक सफलता के आसमान पर पहुंचा देती है। तमिल फिल्मों से जुड़े सीएन अन्नादुराई फिल्म स्क्रिप्ट लिखते थे, और फिल्मों के रास्ते उन्होंने द्रविड़ आंदोलन को भी लोकप्रिय किया था। एम.जी.रामचन्द्रन तमिल फिल्मों के सुपरस्टार थे, और वे दस बरस मुख्यमंत्री रहे, उनके बाद उनकी राजनीतिक वारिस कही जाने वाली जे.जयललिता तो छह बार मुख्यमंत्री बनीं, जो कि एनजीआर के साथ ही लोकप्रिय अभिनेत्री की जोड़ी थीं। एम.करूणानिधि ने 75 से अधिक तमिल फिल्में लिखीं, और वे पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। विजयकांत, और कमल हासन जैसे कुछ लोग भी राजनीति में आए, लेकिन बहुत आगे नहीं बढ़े। अब ताजा दाखिला विजय थलपथि का है, वे 2024 में राजनीतिक दल बनाकर 2026 के चुनावों की तैयारी में लगे हुए हैं। लेकिन तमिल फिल्म और राजनीति के रिश्ते पर आज की बात खत्म करने का हमारा कोई इरादा नहीं है, हम लोगों की भीड़ में भगदड़ से होने वाली मौतों की बात करना चाहते हैं। अभी कुछ अरसा पहले ही कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में क्रिकेट टीम के जीत के आने के बाद निकाले गए विजय जुलूस में भगदड़ हुई, और 11 प्रशंसक कुचलकर मारे गए, 50 से अधिक जख्मी हुए। कुछ गलत जानकारियों के चलते हुए ढाई लाख से अधिक लोग एक जगह जुट गए थे, और आयोजकों ने भीड़ काबू करने की कोई तैयारी नहीं की थी।
क्रिकेट और सिनेमा, सी से शुरू होने वाले ये दो शब्द हिन्दुस्तान में धर्म के तुरंत बाद का दर्जा रखते हैं। खबरों से लेकर वोटों तक ये दोनों चीजें लोगों को बुरी तरह प्रभावित करने की ताकत रखती हैं। इसीलिए किसी भी दूसरे खेल के मुकाबले क्रिकेट खिलाड़ी राजनीति से लेकर राज्यसभा और लोकसभा के मनोनयन तक सबसे अधिक जगह पाते हैं। इन्हीं को टक्कर देकर इनसे अधिक संख्या फिल्म से जुड़े लोगों की रहती है, जो कि राजनीतिक दलों में शामिल होते हैं, चुनाव भी लड़ते हैं, और संसद में मनोनीत भी किए जाते हैं। राजनीतिक दल भीड़ को जुटाने, और रुझाने की इनकी क्षमता अच्छी तरह जानते हैं, और इसीलिए इन्हें अपनी पार्टी में लेकर आने को एक किस्म से चुनावी जीत ही मान लिया जाता है। यहां तक कि चुनावी इस्तेमाल से परे भी बड़े-बड़े दिग्गज फिल्मकारों को संसद में मनोनीत करके राजनीतिक दल इस मनोनयन से मिली शोहरत को भी वोटरों के बीच भुना लेती है, फिर चाहे ये फिल्मकार संसद में पांच बरस में मुंह भी न खोलें। ऐसे लोग दक्षिण भारत में जब राजनीतिक दल बनाकर चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो राजनीतिक संतुलन बदलने की एक बड़ी संभावना भी पैदा हो जाती है। आज तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके के खिलाफ विजय थलपथि के उतरने से उन तमाम राजनीतिक दलों को खुशी हुई होगी जो कि अगले चुनाव में डीएमके की शिकस्त देखना चाहते हैं। जनता में दीवानगी का हाल दक्षिण भारत में चुनाव और फिल्म दोनों में देखने मिलता है, और फिल्म स्टार नेता की बेमौसम की इस राजनीतिक रैली में लोगों की बेतहाशा भीड़ बताती है कि फिल्म से राजनीति में आकर शोहरत और कामयाबी की उम्मीद लगाना गलत नहीं है। लेकिन जिस तरह फिल्म सितारे शूटिंग पर घंटों लेट पहुंचते हैं, उसी तरह कल यह फिल्म कलाकार 6 घंटे देर से पहुंचा, और दक्षिण की तेज धूप में सुबह से भूखे-प्यासे बैठे हुए लोग चक्कर खाकर गिरने लगे थे, और बाद में भीड़ बेकाबू हुई, भगदड़ में कई महिलाओं के पैर टूट गए, और रिकॉर्ड संख्या में 39 मौतें हुई हैं।
छत्तीसगढ़ के बेमेतरा के एक गांव में परसों शाम एक सतनामी नौजवान की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। इस युवक ने सतनामी समाज के खिलाफ दूसरी जाति के एक युवक की सोशल मीडिया पोस्ट हटाने को लिखा था, और हिन्दू धर्म के किसी नारे को लेकर स्कूल से किसी शिक्षक को हटाने का मामला था जिस पर सोशल मीडिया पर हुई असहमति कत्ल तक पहुंच गई। अब सतनामी समाज में समाज के एक लडक़े के कत्ल को लेकर बड़ा आक्रोश है, और शव को चौक पर रखकर चक्काजाम किया गया है। पीडि़त परिवार को एक करोड़ का मुआवजा, और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग भी की जा रही है। अभी हम सोशल मीडिया पोस्ट के बाद पैदा हुए, और बढ़े जातिवादी तनाव की बारीकियों पर जाना नहीं चाहते, लेकिन समाज की हवा में धर्म और जाति को लेकर जो तनातनी फैली हुई है, उसके बारे में हर जिम्मेदार तबके को फिक्र करने की जरूरत है। अभी दो-तीन दिन पहले ही इस जिले से लगे हुए कवर्धा में एक आदिवासी युवती के साथ तीन नौजवानों ने सामूहिक बलात्कार किया, और गृहमंत्री का अपना जिला, अपना चुनाव क्षेत्र होने से पुलिस ने तेजी से उन्हें गिरफ्तार भी किया है। अब वहां पर आदिवासी समाज आंदोलन कर रहा है, और 50 लाख मुआवजा मांग रहा है। लोगों को याद होगा कि पिछले बरस बलौदाबाजार जिले में सतनामी समाज के एक आंदोलन के बाद वहां तनाव इतना खड़ा हुआ कि कलेक्टर और एसपी के दफ्तर जला दिए गए थे। सरकार, और राजनीति, न तो मिलकर, और न ही अलग-अलग इस तनाव को निपटा पाए हैं।
छत्तीसगढ़ आज अलग-अलग धर्मों के बीच तनाव भी झेल रहा है, और हिन्दू धर्म के भीतर की अलग-अलग जातियां भी समय-समय पर एक-दूसरे से टकरा रही हैं। ओबीसी के भीतर भी अलग-अलग जातियों के बीच राजनीतिक खींचतान, और तनातनी बड़ी आम बात है। ऐसे में हिन्दू समाज जैसी कोई चीज नहीं है, और हिन्दुओं के बीच कई तरह की जातियां, और उनके भीतर की उपजातियों में टकराव की नौबत कई जगह आती है। आदिवासी से ईसाई बनने का बवाल खासकर बस्तर में अधिक चल रहा है, लेकिन अब तो पूरे प्रदेश के शहरी इलाकों में भी हर इतवार किसी न किसी जगह ईसाई परिवार में चल रही प्रार्थना को लेकर धर्मांतरण के आरोप लगाकर बजरंग दल जैसे संगठन वहां पहुंचकर कानून अपने हाथ में ले रहे हैं, और फिर पुलिस मानो उनकी मदद के लिए वहां पहुंच रही हैं। इससे परे एक नया घटनाक्रम अगर लोगों के ध्यान में नहीं आया है, तो उसे भी देखने की जरूरत है। भीम आर्मी नाम का संगठन जो कि हिन्दुत्ववादी संगठनों से परे मोटेतौर पर दलितों के बीच काम करता है, उसने अभी सामने आकर कुछ जगहों पर ईसाईयों पर हमलों का विरोध किया है, और ईसाईयों के साथ एकजुटता दिखाई है। पिछले ही इतवार को एक जगह भीम आर्मी के लोग लाठियां लेकर ईसाई परिवार के घर के बाहर और छत पर हिफाजत देने के लिए खुद तैनात हो गए थे कि ईसाई प्रार्थना का विरोध करने आने वाले लोगों से वे निपटेंगे। इस नौबत को समझने की जरूरत है कि धर्मांतरण के आरोप लगाते हुए कुछ संगठन कानून अपने हाथ में ले रहे हैं, और पुलिस की मौजूदगी में भी ईसाई प्रार्थना सभा के लोगों को मार रहे हैं। इसके साथ-साथ पुलिस उस ईसाई परिवार के, और उस घर में मौजूद लोगों के खिलाफ हिन्दू धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के जुर्म दर्ज कर रही है, और धर्मांतरण के भी। अगर आमतौर पर अनुसूचित जाति समाज के लोगों के बीच से आने वाले भीम आर्मी के लोग अगर ईसाई लोगों के साथ खुद होकर इस तरह खड़े हो रहे हैं, तो ऐसे सामाजिक नवध्रुवीकरण के खतरों को भी राज्य की राजनीतिक ताकतों को समझना चाहिए। एक-एक जानवर और लाउडस्पीकर पर खुद होकर संज्ञान लेने वाला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पता नहीं हर इतवार अब नियमित हो चली इस हिंसा को क्यों नहीं देख पा रहा है। आज जब प्रदेश में कुछ संगठन कानून को हाथ में लेने के अधिकारप्राप्त हैं, कुछ दूसरे संगठन इसके खिलाफ लाठियां लेकर मौके पर तैनात हो रहे हैं, तो ऐसे में अगर सरकार और राज्य की पुलिस अपनी न्यूनतम संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगी, तो कानून व्यवस्था की रस्सी जब हाथ से फिसलना तेज हो जाती है, तो फिर उसे थामना किसी के बस में नहीं रहता।
दुनिया के गोले पर अलग-अलग इलाकों की संस्कृतियां अलग-अलग हैं। संस्कृतियों के अलावा कुदरत के मुताबिक इन इलाकों की संपन्नता, विपन्नता, या इनकी जिंदगी के दूसरे हाल-बेहाल भी अलग-अलग हैं। योरप जैसे इलाके में आने वाले दर्जनों देशों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वे हमेशा से अफ्रीका जैसे सूखे और अकाल के शिकार देशों के मुकाबले बेहतर हालत में रहते हैं। अभी हम दुनिया के इतिहास में अधिक गहराई और खुलासे से जाना नहीं चाहते, लेकिन जिन इलाकों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने अधिक तरक्की की, औद्योगीकरण यहां बढ़ा, और यहां आर्थिक सफलता भी अधिक रही। दूसरी तरफ खाड़ी के कुछ ऐसे देश रहे जो जमीन के नीचे पेट्रोलियम भंडारों की वजह से दुनिया में अनुपातहीन तरीके से अधिक संपन्न रहे। अब इसके अलावा धर्म भी एक बड़ा मुद्दा रहा, खाड़ी के देशों सहित कुछ अफ्रीकी देशों में इस्लाम का बड़ा प्रचार रहा, और योरप सहित बहुत से इलाके ईसाइयत के प्रभाव वाले रहे। भारत और नेपाल दो ही देश हिन्दू धर्म के प्रभाव में रहे, और संख्या में इनसे कई गुना अधिक देश बौद्ध धर्मावलंबी रहे।
इस लंबी पृष्ठभूमि के बाद हम असल मुद्दे पर आना चाहते हैं कि मध्य-पूर्व और खाड़ी के देशों से गृहयुद्ध और जंग की वजह से बड़ी संख्या में शरणार्थी योरप के देशों में पहुंचे। इनके अलावा अफ्रीकी देशों से भी शरणार्थी योरप में घुसते ही हैं क्योंकि जान की बाजी लगाकर भी वे एक बेहतर जिंदगी चाहते हैं। योरप के कई देश बांहें फैलाकर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को अपने यहां बसाते रहे हैं, लेकिन हाल के बरसों में वहां माहौल कुछ बदल गया है। एक तो मुस्लिम शरणार्थियों के धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर, उनके पोशाक जैसे सामाजिक मुद्दों को लेकर योरप के बहुत से देशों के स्थानीय लोगों में एक बेचैनी चली आ रही थी। और उसका नतीजा फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, और इटली जैसे कई देशों में शरणार्थी, और प्रवासी विरोधी दक्षिणपंथी पार्टियों के उभार के रूप में सामने आया है। अब शरणार्थियों, जो कि मोटेतौर पर मुस्लिम हैं, उनके खिलाफ स्थानीयता का दावा करने वाले तबकों में एक प्रतिरोध विकसित होते चले गया, और यह महज रोजगार और आर्थिक अवसरों के टकराव तक सीमित नहीं रहा, यह बढ़ते-बढ़ते संस्कृतियों और सभ्यता के टकराव तक चले गया है। ये टकराव बहुत से देशों के चुनावों को इस तरह प्रभावित कर रहे हैं, जैसा कि इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। योरप से परे इजराइल तक में आज वहां की सरकार में एक ऐसी संकीर्णतावादी पार्टी गठबंधन की भागीदार है, जितनी संकीर्णता इजराइल की सरकार में पहले कभी नहीं थी। जब राष्ट्रीयता का उभार उन्माद तक पहुंच जाता है, तब अपने देश के बहुसंख्यक धर्म से परे के धर्मों को दुश्मन के पुतले की तरह खड़ा कर देना बड़ा आसान रहता है, और योरप के कई देशों में अभी लगातार यही चल रहा है। फिर मानो स्थानीय लोगों का प्रतिरोध काफी नहीं था, बाहर से पहुंचे हुए लोगों ने अपनी संस्कृति को लेकर जो कट्टरता जारी रखी, और योरप के उदार, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष माहौल में घुलने-मिलने से परहेज किया, उसने भी स्थानीयता के समर्थकों को प्रवासियों और शरणार्थियों के खिलाफ कर दिया। आज योरप के आधा दर्जन ऐसे देशों में वहां की उदारवादी पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो रहा है क्योंकि वे नस्लवादी, दक्षिणपंथी, और प्रवासी विरोधी पार्टियों के धार्मिक उन्माद की धार का मुकाबला नहीं कर पा रही हैं।
भारत में भी कई तरह के चुनावी-राजनीतिक कारणों से, धार्मिक और साम्प्रदायिक वजहों से अड़ोस-पड़ोस के देशों से आकर वैध-अवैध तरीके से बसे हुए बांग्लादेशी मुस्लिमों, और म्यांमार के मुस्लिम रोहिंग्या लोगों के खिलाफ भावना एक बड़ा चुनावी-राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। विदेशी और घुसपैठिया होना उसका एक पहलू है, और उसका दूसरा पहलू स्थानीय बहुसंख्यक हिन्दू समाज के मुकाबले इन दोनों देशों से आए घुसपैठिया या शरणार्थियों का मुस्लिम होना भी है। जिस तरह योरप के देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों का इस मुद्दे पर बड़ा उभार हुआ है, और करीब आधा दर्जन देशों में चुनावी नतीजों में उन्हें बड़ी कामयाबी मिली है, कुछ उसी किस्म का माहौल हिन्दुस्तान में भी बना हुआ है, और भाजपा की असाधारण चुनावी कामयाबी के पीछे ऐसे ध्रुवीकरण का योगदान भी गिना जाता है।
पिछले पखवाड़े जबसे यह घोषणा हुई थी कि बहुत से सामानों में जीएसटी घटेगा, तब से बाजार में सनसनी फैली हुई थी कि नवरात्रि के वक्त सरकार की तरफ से मिलने वाली यह रियायत बाजार को एक नया उत्साह देगी। ऐसा अंदाज है कि चीजों पर औसतन 7 फीसदी जीएसटी घटा है, और बाजार के जानकार बताते हैं कि लोग तो यह तय कर चुके रहते हैं कि किस त्यौहार पर उन्हें कितना खर्च करना है, इसलिए उतनी ही रकम से बाजार में खरीदी-बिक्री 7 फीसदी बढ़ जाने का भी एक अंदाज है। अर्थशास्त्री सोचते हैं कि इससे अर्थव्यवस्था का चक्का 7 फीसदी अतिरिक्त घूमेगा। फिर केंद्र और भाजपा की राज्य सरकारों ने इस रियायत को एक उत्सव की तरह मनाना तय किया है। भाजपा और उसके नेता औपचारिक रूप से इसे एक बचत उत्सव के रूप में मना रहे हैं।
आज बाजार में जब उत्साह का सैलाब आया हुआ दिख रहा है, और चर्चाएं इसे और आगे बढ़ा रही हैं, तो ग्राहक का अपनी क्षमता से बाहर जाकर खर्च करना एक स्वाभाविक बात होगी। सभी तरह के ऑटोमोबाइल पर बड़ी कटौती दिख रही है, और जो लोग अभी तक कोई दुपहिया या चौपहिया लेने के सपने महज इसलिए देखते रह जाते थे कि उनके पास दस-बीस फीसदी रकम कम पड़ती थी, वे अब एक बार कड़ा फैसला लेकर अपनी पसंद की कोई गाड़ी ले सकते हैं, क्योंकि घटी हुई जीएसटी से गाडिय़ों के दाम खासे कम हुए हैं। इसी तरह बाकी तमाम सामान के लिए भी बाजार रियायतें भी प्रचारित कर रहा है, और फाइनेंस कंपनियां भी लोगों को तथाकथित जीरो फाइनेंस पर लोन देने के लिए माला लेकर खड़ी हुई हैं। नवरात्रि के पहले दिन के कारों के उठाव के आंकड़े बताते हैं कि टाटा की 10 हजार, हुंडई की 11 हजार, और मारूति की 30 हजार गाडिय़ां एक दिन में उठी हैं। लोगों को याद होगा कि देश के हर शहर में कार डीलरों ने बड़े-बड़े मैदानों को किराए पर लेकर वहां कारों का खुला गोदाम बना रखा था क्योंकि कार फैक्ट्रियों के अहातों में कार रखने की जगह नहीं बची थी। अब ऐसा लगता है कि यह पूरा स्टॉक दीवाली तक लोगों के घरों में पहुंच जाएगा। शहरी सडक़ों पर त्यौहारी ट्रैफिक जाम में हजारों नई गाडिय़ों का जाम और जुड़ जाएगा।
उत्सव और उत्साह के इस माहौल में ग्राहक को अपना दिमाग, और अपना दिल भी, अपनी जगह पर मजबूती से जमाए रखना चाहिए। सपने तो पूरे परिवार के बहुत से होते हैं, लेकिन भारत के एक फीसदी से भी कम परिवार ऐसे हैं जो अपने हर सपने पूरे कर सकते हैं, या फिर यह भी हो सकता है कि उनके और बहुत से ऐसे सपने हों जिनका हमें अंदाज न लगता हो। ऐसे माहौल में लोग अपनी क्षमता से बाहर जाकर खरीददारी कर सकते हैं, और बाद में उसकी किस्तें पटाते हुए, उनकी क्षमता चुक सकती है। आज आसान फाइनेंस, और कुछ मध्यमवर्गीय लोगों के पास के क्रेडिट कार्ड की वजह से लोग अंधाधुंध खरीददारी की कगार पर खड़े हैं। सामान खरीदते हुए यह अंदाज नहीं लगता कि हर बरस गाडिय़ों के बीमे पर कितना पैसा लगता है, सर्विसिंग पर कितना पैसा लगता है, और पेट्रोल-डीजल पर तो लगता ही है जिसमें कि जीएसटी की कोई कटौती नहीं हुई है। मध्यम वर्ग के दिल-दिमाग में सपने उफनते रहते हैं, लेकिन उसके दिमाग की उंगलियां कैलकुलेटर पर नहीं चलतीं। नतीजा यह होता है कि एक बार की खरीदी के बाद के खर्च उसे नए चमचमाते सामानों की चमक में नहीं दिखते। वैसे भी हिन्दुस्तानी लोग मकान बनाते हुए, शादियां करते हुए, और साल के सबसे बड़े त्यौहार की खरीददारी करते हुए दिमाग का इस्तेमाल कम ही करते हैं। तर्क यह रहता है कि मकान तो जिंदगी में एक ही बार बनता है, शादी बार-बार तो होती नहीं, और त्यौहार तो साल का सबसे बड़ा त्यौहार है।
दुनिया में किसी को बेदिमाग कहना भी उसका एक किस्म से अपमान होता है, क्योंकि दिमाग तो सबके पास रहता है, फिर भी जिनमें बुद्धि की बड़ी कमी दिखती है, उन्हें बोलचाल में बेदिमाग कह दिया जाता है। फिर जो अपनी बुद्धि का बेजा इस्तेमाल ही करते हैं, उन्हें बददिमाग कह दिया जाता है। इससे परे कुछ लोग जो सनक में आकर कोई भी उटपटांग बात करते हैं, गलत-सलत फैसला ले लेते हैं, उन्हें सनकी कहा जाता है। ऐसे करीब डेढ़ सौ अलग-अलग विशेषणों को जोडक़र ही ट्रंप का परिचय दिया जा सकता है। कहने के लिए यह आदमी दुनिया के सबसे ताकतवर देश के सबसे ताकतवर ओहदे पर बैठा है, लेकिन यह पूरी तरह से तानाशाह हो चुका है, और इसने सबसे पहले तो अमरीकी लोकतंत्र को हरा दिया है। डोनल्ड ट्रंप ने पिछले राष्ट्रपति चुनाव को हारने के बाद जिस कबीलाई अंदाज में अपने समर्थकों को अमरीकी संसद पर हमला करने के लिए भडक़ाया था, उसके मामले-मुकदमे तो अमरीकी अदालतों में चल ही रहे हैं। इस आदमी की बदचलनी के मुकदमे भी अदालत में साबित हो चुके हैं, और यह बहुत ही उटपटांग किस्म का लोकतंत्र है कि ट्रंप के कुसूरवार साबित होने के बावजूद उसे कोई सजा नहीं हुई है। वह टैक्स चोरी के मामलों से घिरा हुआ है, बदजुबानी की उसकी मिसालें तरह-तरह की रिकॉर्डिंग में घूमती ही रहती हैं। आज की दुनिया में बद से शुरू होने वाले सबसे अधिक शब्द अगर किसी एक आदमी (इंसान लिखने से हम परहेज कर रहे हैं क्योंकि उसके साथ कुछ किस्म के मानवीय गुणों के जुड़े होने की उम्मीद जुड़ी रहती है) पर लागू होते हैं, तो वह डोनल्ड ट्रंप हैं। आप इंटरनेट, या एआई पर बद से शुरू होने वाले शब्दों को ढूंढें, तो उस फेहरिस्त से आपको ट्रंप की पूरी तस्वीर मिल पाएगी।
फिलहाल पिछले दो दिनों में इस कमीने इंसान ने कई किस्म की घटिया बातें कही हैं। अमरीका में नफरत फैलाने वाले एक संकीर्णतावादी प्रचारक, के कत्ल को उसने बिना किसी बुनियाद के अपने विरोधियों से जोडक़र उनको कातिल साबित करने की कोशिश की है। लेकिन यह तो कम घटिया हरकत थी, कल जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप को 15 मिनट बोलने का मौका मिला, तो उसने 56 मिनट से अधिक बकवास की। पूरी तरह से बेमौके, बेबुनियाद आरोप लगाते हुए उसने दुनिया के तमाम देशों की मौजूदगी में ब्रिटेन की राजधानी लंदन के मुस्लिम मेयर सादिक खान पर हमला किया। एक ब्रिटिश शहर के मेयर से दुनिया के तमाम देशों का क्या लेना-देना था? लेकिन ट्रंप अपनी नफरत और अपनी हमलावर जुबान का यह कातिल मेल मानो डॉक्टरी सलाह पर दिन में चार बार अपने मुंह से निकालता है, और राजनीतिक विश्लेषक हर दिन यह सोचते रह जाते हैं कि इन चारों में से सबसे अधिक घटिया कौन सी बात थी। ट्रंप ने योरप में प्रवासियों के संकट पर कहा- मैं लंदन को देखता हूं जहां एक बेहद खराब मेयर है, एक बहुत ही खराब मेयर। वे लंदन को शरिया कानून की ओर ले जाना चाहता है और वह एक अलग देश बन गया है।
अभी पिछले हफ्ते ट्रंप ब्रिटेन के दौरे पर था, और उसने सार्वजनिक रूप से कहा था कि लंदन का मेयर सादिक खान दुनिया के सबसे खराब मेयर में से है, और मैंने उनसे वहां मेरे स्वागत में न आने के लिए कहा है। मुझे लगता है कि वे आना चाहते थे लेकिन मैं नहीं चाहता कि वे आएं। सादिक खान लंदन के पहले मुस्लिम मेयर हैं, और उनके ऑफिस में ट्रंप के शरिया कानून वाले बयान के जवाब में कहा है- हम उनके (ट्रंप के) नफरत से भरे और दकियानूसी सोच वाले बयानों को जवाब देकर अहमियत देना नहीं चाहते। लंदन दुनिया का सबसे बेहतरीन शहर है जो प्रमुख अमरीकी शहरों की तुलना में अधिक सुरक्षित है। हमें खुशी है कि अमरीकी नागरिक रिकॉर्ड संख्या में लंदन में बसने आ रहे हैं। ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने सोशल मीडिया पर लिखा- सादिक खान लंदन में शरिया कानून लागू करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। वे ऐसे मेयर हैं जो (समलैंगिकों, और एलजीबीटीक्यू की) प्राइड मार्च में शामिल होते हैं, जो अलग-अलग पृष्ठभूमि और विचारों के लिए खड़े होते हैं, जो हमारे शहर को बेहतर बना रहे हैं, और हमें गर्व है कि वे हमारे मेयर हैं।
किसी देश की राजधानी में पहुंचने वाला दूसरे देश का राष्ट्रपति उस राजधानी के मेयर को लेकर इस तरह की घटिया और गंदी, नफरती और हिंसक बातें करे, और खुलकर यह कहे कि वह नहीं चाहता कि (उस शहर का प्रथम नागरिक) मेयर उसके स्वागत भोज में आए। पिछली आधी सदी की हमारी अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ और याददाश्त में ऐसा घटिया और कोई बयान दुनिया के किसी तानाशाह ने भी नहीं दिया, लेकिन गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स को इस गंदे आदमी का कार्यकाल पूरा होने पर यह तय करने के लिए एआई की मदद लेनी होगी कि उसका सबसे घटिया बयान कौन सा था।
लेकिन दूसरे देशों के साथ ट्रंप जो कर रहा है, वह उसके अपने देश के साथ कुछ अधिक हद तक हो रहा है। हम किसी टोने-टोटके पर भरोसा नहीं करते, लेकिन यह मानते हैं कि लोगों के अच्छे और बुरे काम लौटकर उनके पास जरूर आते हैं, चक्रवृद्धि ब्याज सहित। अमरीकी वोटरों ने जिस तरह इस घटिया आदमी को चुना था, उसके दाम आज हर अमरीकी चुका रहे हैं। अमरीका में लोकतंत्र को तबाह करके ऐसा बना दिया गया है जैसाकि वह फिलिस्तीन के गाजा की इमारतें हों। लोकतंत्र के इस मलबे पर खड़े रहकर यह बददिमाग आदमी (इंसान लिखना ठीक नहीं है) जिस तरह अमरीका की हर परंपरा को खत्म कर रहा है, वहां की अर्थव्यवस्था को खत्म कर रहा है, दुनिया भर में अमरीका के पिछली आधी सदी में कमाए गए दोस्तों को खत्म कर रहा है, अमरीकी साख को खत्म कर चुका है, दुनिया में सामाजिक सरोकार की अपनी जिम्मेदारी को इस माफियानुमा कारोबारी ने गटर में बहा दिया है, इन सब बातों को देखकर लगता है कि गाजा में आधे लाख से अधिक जो बेकसूर औरत-बच्चे इजराइली हमलों में, अमरीकी बमों से मारे गए हैं, उन सबकी सामूहिक बद्दुआ अमरीका को लग रही है, और अमरीका आज अपने इतिहास के सबसे अस्थिर दौर से गुजर रहा है, तबाही की तरफ बढ़ रहा है। जहां तक भारत के लिए ट्रंप के रुख की बात है, तो यह आदमी अब तक 35-40 बार यह झूठ बोल चुका है कि उसने भारत और पाकिस्तान के बीच जंग रुकवाई है। ये दोनों ही देश इस बात का खंडन कर चुके हैं, लेकिन बेशर्म ट्रंप की जुबान बंद होने का नाम नहीं लेती है, और इस झूठ के सहारे वह नोबल शांति पुरस्कार की सीढ़ी चढऩे की कोशिश कर रहा है, खुलकर कई बार यह बोल चुका है कि वह यह पुरस्कार चाहता है। अमरीकी इतिहास का यह सबसे घटिया राष्ट्रपति जिस अंदाज में हर दिन हजार-पांच सौ बेकसूर फिलिस्तीनियों का कत्ल करवा रहा है, उसके बाद भी उसे नोबल शांति पुरस्कार पाने की हसरत है, यह बात हैरान करती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को देखते हुए उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने अभी एक आदेश निकाला है जो कि जाति व्यवस्था से लदे हुए उत्तरप्रदेश के लिए बड़ी अटपटी बात होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी 16 सितंबर को यह निर्देश दिया है कि सडक़ों पर चलने वाली किसी गाड़ी पर जाति के नाम, नारे, या स्टिकर नहीं होने चाहिए। किसी भी तरह से गाड़ी चलाने वाले या मालिक की जाति की नुमाइश नहीं होनी चाहिए। अदालत ने कहा है कि ऐसे किसी भी जाति प्रदर्शन पर मोटर व्हिकल एक्ट के तहत कार्रवाई की जाए। इसके अलावा हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस के दस्तावेजों में, किसी नोटिस में, जब तक जाति का उल्लेख कानूनी रूप से जरूरी न हो, (जैसे एसटी-एससी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में जाति के आधार पर अलग कानून से कार्रवाई होती है) तब तक किसी की जाति का उल्लेख न किया जाए। अब यूपी सरकार ने पुलिस और अदालती रिकॉर्ड से जाति का कॉलम हटाने का आदेश निकाला है, और गाडिय़ों पर किसी भी जाति का जिक्र होने पर जुर्माना हो सकता है। सरकार ने यह भी कहा है कि सोशल मीडिया पर जाति गौरव, या जातियों के बीच मनमुटाव बढ़ाने वाले कंटेंट पर निगरानी की जाए, और कार्रवाई की जाए। यूपी सरकार ने तो यह भी कहा है कि पूरे राज्य में जाति आधारित रैलियों, और राजनीतिक आयोजनों पर रोक लगाई जा रही है। देश के मोटरवाहन अधिनियम में वाहनों पर जाति या धर्म से संबंधित कोई भी स्टिकर लगाना गैरकानूनी है, इसमें पांच सौ रूपए से लेकर पांच हजार रूपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। पिछले बरस 13 सितंबर के यूपी हाईकोर्ट के आदेश में धर्म संबंधी स्टिकर पर भी कार्रवाई करने की बात की गई थी, और कहा गया था कि सरकार जाति-धर्म से जुड़े सभी स्टिकर, बोर्ड, झंडे तुरंत हटवाए, और चालान करने के अलावा जरूरत होने पर गाड़ी जब्त भी की जाए।
अब यह मामला तो इलाहाबाद हाईकोर्ट और यूपी सरकार का है, लेकिन मोटरवाहन अधिनियम तो पूरे देश पर एक सरीखा लागू है। उसी के प्रावधानों को अदालत ने कड़ाई से लागू करने के लिए कहा है। इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्याय क्षेत्र से बाहर भी बाकी देश में भी इस पर अमल होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अलग मामलों में इसी तरह के आदेश दिए हैं कि गाडिय़ों पर जाति-धर्म, राजनीतिक पार्टी, या निजी पहचान के चिन्ह लगाना कानून गलत है। दिल्ली पुलिस ने 2022 में एक अभियान चलाकर जात-धरम के स्टिकर हटवाए थे। मध्यप्रदेश में 2023 में हाईकोर्ट के आदेश पर ऐसी ही कार्रवाई हुई थी। राजस्थान में 2022 में ऐसा किया गया था। हरियाणा और पंजाब में 2021-22 से पुलिस ऐसी कार्रवाई कर रही है, वहां हाईकोर्ट ने कहा था कि ऐसे स्टिकर जातिवाद और हिंसा को बढ़ावा देते हैं। इस तरह यह बात साफ है कि मोटरवाहन अधिनियम से लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों तक बार-बार यह बात सामने आई है कि गाडिय़ों पर जात-धरम की नुमाइश करना गैरकानूनी है, और जुर्माने से लेकर गाड़ी जब्ती तक कई तरह की कार्रवाई की जा सकती है।
अब हम जमीनी हकीकत पर आएं, तो न सिर्फ निजी गाडिय़ों पर, बल्कि सरकारी गाडिय़ों पर भी जात-धरम की नुमाइश धड़ल्ले से चलती है। मुस्लिमों के बीच जो शुभ संख्या मानी जाती है, वह 786 ऐसी बहुत सी सरकारी गाडिय़ों में नंबर प्लेट पर दिखती है जिन्हें सत्तारूढ़ नेता या अफसर अपने कार्यकाल में खरीदते हैं। अब यह धर्म से जुड़ा हुआ अंक जरूर है, लेकिन यह आरटीओ का दिया हुआ नंबर भी है। हो सकता है कि यह मामला मोटरवाहन अधिनियम, और अदालतों के आदेशों में न आए, लेकिन इस एक संख्या से लोगों को यह तो दिख ही जाता है कि यह किस धर्म के व्यक्ति की गाड़ी होने की संभावना है। लेकिन आरटीओ की दी हुई नंबर प्लेट से परे अगर देखें, तो उत्तर भारत के राज्यों में, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में दसियों लाख गाडिय़ां ऐसी हैं जिनमें जात और धर्म के स्टिकर लगे हैं, किसी धर्म के आराध्य की तस्वीरों के स्टिकर लगे हैं, तरह-तरह के धार्मिक नारे लिखे हैं। बहुत सी गाडिय़ां तो हम अपने आसपास ही ऐसी देखते हैं जिनमें नंबर प्लेट की जगह ब्राम्हण, ठाकुर, कुर्मी, जैसी कई तरह की जातियां लिख दी जाती हैं। कई गाडिय़ां ऐसी रहती हैं जिनकी नंबर प्लेटों पर नंबर तो नहीं रहता, लेकिन सिक्ख धर्म का निशान लगाया हुआ रहता है। और तो और अब तो कुछ ऐसे नंबर हैं जिनके अंकों को नंबर प्लेट पर इस तरह तोड़-मरोडक़र लिखा जाता है कि वे अंक नहीं दिखते, राम दिखते हैं। जात और धरम की नुमाइश, किसी भी ताकतवर, या अर्जी-फर्जी संगठनों के असली-नकली पदनामों वाली तख्तियां गाडिय़ों पर लगा दी जाती हैं, और ऐसी कई तख्तियां तो नंबर प्लेट की जगह लगा दी जाती हैं। मानवाधिकार के नाम पर देश में ढेर सारे फर्जी संगठन बने हैं, और उनके नाम, पदनाम के जिक्र वाली ऐसी नंबर प्लेट गाडिय़ों पर लगा दी जाती हैं जिनके पीछे पुलिस विभाग के रंग का बैकग्राउंड भी रहता है। मतलब यह कि अपनी असली या नकली ताकत की नुमाइश का कोई भी मौका लोग नहीं छोड़ते हैं।
मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक कुछ पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाडिय़ों की तस्वीरें और उनके वीडियो छाए हुए हैं जिनमें वे भारत के साथ हुए क्रिकेट मैच के दौरान तरह-तरह के इशारों से भारत की खिल्ली उड़ाते दिख रहे थे। कभी वे बल्ले को बंदूक की तरह दिखा रहे थे, तो कभी हाथों से हवाई जहाज गिरा देने के इशारे कर रहे थे कि किस तरह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने भारत के आधा दर्जन लड़ाकू विमान गिराए हैं। इनके अलावा हाथों की कुछ हरकतें अश्लील भी मानी जा रही है। इस टूर्नामेंट में इसके पहले भी पहले मैच के बाद भारत के खिलाडिय़ों ने पाकिस्तान के खिलाडिय़ों से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था जिसे खेलकूद की दुनिया में अशिष्टता माना जा रहा था। भारत में बहुत से तबकों की प्रतिक्रिया यह रही कि पहलगाम हमले के बाद और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान से जो तनातनी चल रही थी, पाकिस्तान पर भारत सरकार ने जो आरोप लगाए थे, उन्हें देखते हुए पाकिस्तान के साथ मैच खेलना ही नहीं था। भारत की नदियों से पाकिस्तान को जाने वाले पानी को लेकर भारत सरकार ने शुरू से कहा था कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते। ऐसे में भारत में बहुत से लोगों का यह मानना था कि पाकिस्तान के साथ क्रिकेट क्यों खेला जाए?
भारत सरकार की तरफ से यह सफाई दी गई थी कि चूंकि यह टूर्नामेंट दो देशों के बीच का नहीं था, बल्कि यह कई देशों के बीच का था, इसलिए भारत का इसमें खेलने से मना करना मुमकिन नहीं था। इस सरकारी कथन के जवाब में लोगों ने दुनिया के इतिहास के बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय, और बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंटों की लिस्ट गिना दी थी कि कब और किस देश ने कौन से टूर्नामेंट का बहिष्कार किया था। लोगों ने इस बात के लिए भी आलोचना की थी कि क्रिकेट के साथ विज्ञापनों और स्पांसरशिप की कमाई जुड़ी रहती है, प्रसारण से भी कमाई होती है, इसलिए सिर्फ कमाई को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान से मैच का बहिष्कार नहीं किया गया। खैर, हम दो देशों के बीच के रिश्तों में गैरजरूरी बहिष्कार के खिलाफ रहते आए हैं, और भारत सरकार के कथन से सहमति या असहमति से परे हमारा यह मानना है कि सरहद पर चल रहे तनाव से खेलकूद, कला, संस्कृति, फिल्म, टेलीविजन, साहित्य को अलग भी रखा जा सकता है। हमने इस बात की भी वकालत की थी कि पाकिस्तान से बड़ी संख्या में जो जरूरतमंद लोग बड़े इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते हैं, उसे जारी रखा जाना चाहिए। आम लोगों की आवाजाही चलने देनी चाहिए। लेकिन दोनों देशों ने अपनी-अपनी जमीन पर जब नफरत के फतवे हवा में गूंजते हैं, तो अक्ल किनारे धरी रह जाती है। राष्ट्रवादी और युद्धोन्मादी उन्माद लोगों के तर्क और न्याय की समझ को ढांक लेते हैं। ऐसे में हर चीज के बहिष्कार के फतवे होने लगते हैं, और इस बार के तनाव से पहले भी भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले तनाव के बाद से कारोबार पर रोक चली आ रही थी, जिससे इन दोनों ही देशों का बड़ा आर्थिक नुकसान हो रहा था।
अगर कुछ लोगों को लगता है कि सरहद की लड़ाई, या दूसरे की जमीन पर आतंकी हमले गैरफौजी, गैरराजनीतिक मामलों के बहिष्कार से थम जाएंगे, तो यह नासमझी की बात है। हम तो खून और पानी साथ-साथ बहने या न बहने जैसी बात के भी खिलाफ हैं। हम पड़ोसी देश के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने के हिमायती हैं क्योंकि देश गरीब हो या अमीर हो, पड़ोसी से दुश्मनी बड़ी महंगी पड़ती है। और पाकिस्तान के क्रिकेट-बहिष्कार से भारत को भला क्या ही हासिल हो गया रहता, आज पाकिस्तान ने सऊदी अरब से जो फौजी संधि की है, वह हमारे हिसाब से तो पाकिस्तान के परमाणु बम बनाने के बाद का सबसे ताकतवर फौजी फैसला है। अगर किसी सरकार, या राजनीतिक ताकत का बस चलता, तो उन्हें ऐसी किसी संधि को रोकने की कोशिश करनी थी, लेकिन वह तो हुआ नहीं, अब क्रिकेट या टीवी कलाकारों के बहिष्कार से सिर्फ फतवों का पेट भरता है, देश की हिफाजत नहीं बढ़ती। आज पाकिस्तान-सऊदी फौजी पैक्ट से सऊदी की अथाह दौलत का जितना कुछ भी सहारा दीवालिया पाकिस्तान को मिलेगा, वह कम नहीं रहेगा, और सऊदी को अपने दुश्मनों के किसी हमले, या उनके साथ जंग की नौबत में पाकिस्तान की परमाणु हथियार क्षमता का पूरा साथ मिलेगा। इधर हिन्दुस्तान के लोग पाकिस्तान से क्रिकेट के खिलाफ रोना रो रहे हैं, और उधर शायद भारत सरकार को पाक-सऊदी इस नए याराना की खबर भी नहीं हुई। जब भी कोई देश गैरजरूरी और सतही भावनात्मक, या चर्चित मुद्दों में उलझ जाता है, तो वह असल खतरों को अनदेखा करने की कीमत पर ही ऐसा कर पाता है।
पूरे देश से ही इन दिनों ऐसी खबरें आ रही हैं कि शेयर बाजार में पूंजीनिवेश का झांसा देकर, या क्रिप्टोकरेंसी में पैसा लगाकर, किसी चिटफंड कंपनी का सदस्य बनाकर लोगों को लूटा जा रहा है। यह लूट ठगी या जालसाजी से थोड़ी सी अलग इसलिए है कि डिजिटल अरेस्ट करने की धमकी देकर, जिन लोगों को ब्लैकमेल किया जाता है, निचोड़ लिया जाता है, उनसे ये मामले अलग हैं। ये मामले अधिक रकम कमाने की लालच में लोगों के खुद पूंजीनिवेश करने के हैं। इनमें दिया गया धोखा थोड़ा अलग किस्म का है, लेकिन अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुटाकर, नोटों के पेड़ पाने की लालच में ऐसा करने वाले लोग कम नहीं हैं। कल भी छत्तीसगढ़ के दुर्ग में एक आदमी-औरत पकड़ाए हैं जिन्होंने शेयर बाजार से अंधाधुंध कमाई का झांसा देकर लोगों से 12 करोड़ रूपए ठग लिए। शेयर बाजार में नामौजूद कंपनियों के नाम पर लोगों ने धोखा खाया। पिछले पांच बरस से हम हर हफ्ते चिटफंड कंपनियों के लोगों की गिरफ्तारियां देखते आ रहे हैं, लेकिन गिरफ्तारियों से बावजूद डूबी हुई रकम तो अब वापिस आ नहीं सकती।
आज बैंकों और कुछ दूसरे सरकारी वित्तीय संस्थाओं की बहुत सी भरोसेमंद योजनाएं हैं जिनमें लोग पैसा जमा करके, या लगाकर ठीकठाक कमाई कर सकते हैं। इनमें से जो योजनाएं शेयर मार्केट में पूंजीनिवेश की हैं, उनमें भी लोगों के पास यह अलग-अलग पसंद रहती है कि वे कुछ अधिक कमाई के लिए कुछ अधिक खतरे वाली कंपनियों में पूंजीनिवेश करना चाहते हैं, या अधिक सुरक्षित कंपनियों में पूंजीनिवेश वाली कम मुनाफे की योजनाओं में पैसा डालना चाहते हैं। खतरों से खेलने की ये सीमाएं सरकारी और बड़े निजी बैंकों में मौजूद हैं, और योजनाओं में काफी हद तक सीमाओं और संभावनाओं की जानकारी भी दी जाती है। ऐसी पॉलिसी या डिपॉजिट स्कीम बेचने के लिए इन सबके एजेंट भी हैं, लेकिन जो भी वित्तीय संस्थान धोखाधड़ी की नीयत नहीं रखते हैं, वे सपने नहीं दिखा सकते, वे सीमाएं और संभावनाएं बता सकते हैं। इस बीच लोगों को सपने देखने की चाह ऐसी रहती है कि वे जालसाजों की दिखाई राह पर दौड़ पड़ते हैं। आज चारों तरफ जो लोग जालसाजी के शिकार हैं, वे ऐसे ही लोग हैं जो कि नोटों का पेड़ पाने के लिए जमीन में नोट दफन करके उसे खाद-पानी देने को तैयार हो जाते हैं, और जालसाज उन नोटों को लेकर रफूचक्कर हो जाते हैं।
हम सरकार की कुछ दूसरी कमियों और खामियों की चर्चा तो करते रहते हैं जिनकी वजह से जालसाजी और धोखाधड़ी पनपती और बढ़ती हैं, लेकिन पूंजीनिवेश को लेकर हम यह नहीं कह सकते कि सरकार, या सरकार के मान्यता प्राप्त भरोसेमंद बैंकों की कमी है, उनकी योजनाएं नहीं हैं, इसलिए लोग जालसाजों की पूंजीनिवेश योजना की तरफ जाने को मजबूर होते हैं। भारत में आज सरकार की मान्यता प्राप्त और सरकारी निगरानी वाली हजारों योजनाएं लोगों के सामने हैं, लेकिन किसी भी कानूनी और जायज योजना की तरह उनके मुनाफे की एक सीमा है। और लोगों की टकसाल की रफ्तार से कमाई की हसरत ऐसी है कि उसे लेकर एक पुराना फिल्मी गाना याद आता है, कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोडऩे लगता है...। इस गाने में जिस प्रेम का जिक्र है, उसे अगर कमाई की चाहत की तरह देखें, तो लोग अपनी बुद्धि की सुझाई गई सीमा रेखा को अक्सर तोडऩे लगते हैं क्योंकि उन्हें किसी जालसाज के दिखाए गए हसीन सपनों की मृगतृष्णा हकीकत लगने लगती है।
अब कोई अनपढ़ हो, अखबारों से परे हो, तो उसे जालसाजी से अनजान रहने का संदेह का लाभ दिया जा सकता है। लेकिन जो लोग हर दिन के अखबार में एक-एक दर्जन जालसाजी की खबरें पाते हैं, वे भी अगर पहला मौका मिलते ही अगले जालसाज को अपनी सारी बचत देने को बेताब रहते हैं, तो उन्हें कौन बचा सकते हैं? अखबार आज भी अधिकतर आबादी को हासिल हैं। और अगर अखबार खुद ही किसी जालसाजी की योजना में हिस्सेदार न हों, तो वे दूसरी जालसाजी की खबरें भी छापते रहते हैं। कुल मिलाकर आज के इस डिजिटल दौर में लोगों को छपे हुए शब्दों से परे भी खबरें हासिल हैं, और उन्हें पढक़र सबक लेने को विलासिता मानते हुए 40 फीसदी जीएसटी भी नहीं है। ऐसे में अगर लोग आज भी अपनी मेहनत, या हराम की दौलत को दांव पर लगाने के लिए बेसब्र और उतारू रहते हैं, तो क्या किया जा सकता है? किसी को फर्जी ओटीपी भेजकर उसका बैंक खाता खाली कर देना एक अलग किस्म का जुर्म है, और उस जुर्म के शिकार मोटी कमाई की चाह में पूंजीनिवेश नहीं करते हैं। लेकिन जालसाजों की फर्जी योजनाओं में रातों-रात छप्परफाड़ कमाई की उम्मीद में अवैध प्लॉटिंग की जमीन खरीदने वाले जानते-बूझते लोगों की तरह पैसा लगाने वालों को कौन बचा सकते हैं? अवैध प्लॉटिंग में तो फिर भी प्लॉटिंग अवैध रहती है, जमीन के टुकड़े का अस्तित्व तो रहता है, फर्जी पूंजीनिवेश में तो फर्जी, पूंजी, और निवेश, ये तीनों ही शब्द फर्जी रहते हैं।
किसी देश के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों के बारे में वहां की जनता को भी अपनी सरकार के बयान से परे फिक्र रखनी चाहिए। सरकारों की अपनी सीमाएं रहती हैं कि वे सार्वजनिक रूप से क्या कहें, और क्या न कहें। हर सरकार तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प सरीखी गैरजिम्मेदार नहीं हो सकतीं, कि मुंह खोले और बकवास करे। इसलिए जनता को अपनी सरकार के कहे बिना भी कई चीजों को समझते रहने की कोशिश करनी चाहिए। अब अभी भारत के पड़ोसी, और फौजी मामलों में सबसे बड़े दुश्मन देश पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाला फौजी समझौता हुआ है। इस सैन्य समझौते के तहत अब पाकिस्तान और सऊदी अरब एक-दूसरे पर हुए किसी भी हमले की नौबत में उसे अपने पर हमला मानेंगे। पाकिस्तान ने चार कदम आगे बढक़र यह भी कहा है कि उसकी परमाणु क्षमता भी सऊदी अरब के साथ रहेगी। अभी तक इस समझौते की शब्दावली सामने नहीं आई है, लेकिन यह बात साफ है कि ये दोनों देश फौजी मामलों में एक-दूसरे के इतने करीब कभी नहीं थे। भारत के लिए यह फिक्र की बात इसलिए है कि पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न, और आर्थिक रूप से विपन्न देश है, और सऊदी अरब परमाणु हथियार के बिना है, लेकिन उसका बहुत बड़ा खजाना है। एक सहज बुद्धि से इन दो बातों को जोडक़र देखें तो ऐसा लगता है कि यह खाली पड़े पीपल को बेघर भूत मिलने सरीखा है, एक को घर मिला, और दूसरे को किराएदार।
हम अभी इस पूरे मामले की जटिलता को समझने की कोशिश ही कर रहे हैं, क्योंकि फिलीस्तीन पर हमला करते-करते अभी इजराइल ने फिलीस्तनी संगठन हमास के नेताओं को मारने के नाम पर एक मुस्लिम देश कतर पर जिस तरह हवाई हमले किए, उससे नुकसान तो बहुत कम हुआ, लेकिन मुस्लिम देश हड़बड़ाकर जिस तरह एक साथ बैठे हैं, वैसा शायद ही पहले कभी हुआ हो। गाजा में 65 हजार लोगों का कत्ल हो गया, लेकिन मुस्लिम देशों के चेहरों पर शिकन नहीं पड़ी, लेकिन संपन्न देशों के बीच के एक देश कतर पर जरा सा हवाई हमला हुआ, तो इस्लामिक देश इकट्ठे होकर इस्लामिक नाटो बनाने की बात करने लगे। लोगों को मालूम ही है कि नाटो एक सैनिक संगठन है जिसमें योरप के देशों के साथ-साथ अमरीका भी है, और यह संगठन हाल के बरसों की लड़ाई में यूक्रेन का साथ दे रहा है, और रूस के खिलाफ खड़ा हुआ है। इसी किस्म का कोई संगठन इस्लामिक देशों के बीच बन सके, यह बहुत आसान शायद न हो, लेकिन भारत के लोगों को यह याद रखना चाहिए कि अगर ऐसा कोई संगठन बनता है, तो पाकिस्तान तो उसका अनिवार्य हिस्सा रहेगा, और भारत उसके बाहर ही रहेगा। ऐसे में परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान रणनीतिक महत्व किसी भी तरह के इस्लामिक सैनिक संगठन में बहुत अधिक रहेगा, और हो सकता है कि यह उसकी मौजूदा फटेहाली का एक समाधान भी हो सके। यह बात कहना बहुत तर्कसंगत और न्यायसंगत तो नहीं होगा, लेकिन इस तस्वीर को देखने का एक सहज नजरिया यह भी हो सकता है कि अतिसंपन्न इस्लामिक देशों के हाथ आज के अतिविपन्न पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की ताकत एक किस्म से भुगतान पर हासिल रहेगी।
यह पूरी तस्वीर बहुत ही बिखरी हुई, और विशाल है, इसलिए हम सिर्फ इसके कुछ हिस्सों की चर्चा कर रहे हैं, कोई निष्कर्ष नहीं निकाल रहे हैं। सउदी अरब पाकिस्तान के साथ से हासिल किसी भी तरह की ताकत से ईरान और इजराइल, दोनों परस्पर दुश्मन देशों के खिलाफ अपना बाहुबल बढ़ा सकता है। इस तस्वीर में कुछ विरोधाभासी बातें भी हैं कि सऊदी अरब अमरीका से भी ठीक रखेगा, लेकिन इजराइल के खिलाफ रहेगा। आज इजराइल पर यह खतरा मंडरा रहा है कि अगर पाकिस्तान की परमाणु क्षमता तक सऊदी अरब की पहुंच हो गई है, तो यह सीधे-सीधे इजराइल के अस्तित्व पर एक खतरा भी है। दूसरी तरफ मुस्लिम देशों के संगठन इजराइल के खिलाफ तो हैं, लेकिन सारे के सारे देश इजराइल से फौजी-दुश्मनी निभाना चाहते हों, ऐसा भी नहीं है। इस तरह बड़े जटिल और विसंगतियों भरे हुए मुस्लिम देशों के आपसी रिश्तों पर यह ताजा पाक-सऊदी फौजी समझौता क्या फर्क डालेगा, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन यह बात तय है कि इजराइल और अमरीका अपने मुस्लिम-विरोधी रूख के चलते तमाम मुस्लिम देशों को एक साथ बैठने का एक मौका जुटाकर दे रहे हैं, और इनकी संपन्नता किस तरह एक फौजी ताकत में बदल सकती है, यह आने वाला वक्त बताएगा।
नेपाल में अभी हुए आंदोलन में राजधानी काठमांडू के बाहर भी सरकारी दफ्तरों, और सरकारी सम्पत्ति को खूब नुकसान हुआ। एक अमरीकी अखबार की रिपोर्ट बताती है कि संसद, सुप्रीम कोर्ट, और सैकड़ों सरकारी दफ्तरों में लगी आग से इमारतें जल गईं, और दसियों लाख फाईलें खत्म हो गईं। सुप्रीम कोर्ट में 60 हजार से ज्यादा मुकदमों की फाईलें पूरी तरह जल गईं, और कम से कम 20 मंत्रालयों की इमारतें, और तमाम कागज खत्म हो गए। संसद, राष्ट्रपति भवन, और प्रधानमंत्री कार्यालय के सारे कागज जल गए। जन्म-मृत्यु के रिकॉर्ड, कंपनियों के रिकॉर्ड, बैंकों के जमा और निकासी के रिकॉर्ड खत्म हो गए। कुल मिलाकर हालत यह है कि नेपाल ने आनन-फानन एक कामचलाऊ सरकार तो बना ली, लेकिन न मंत्रालय रह गए, न दफ्तर, और पुलिसवाले बिना इमारत, बिना गाड़ी, कहीं भी तम्बू लगाकर काम कर रहे हैं। जब जनआक्रोश बेकाबू होता है, और उसके निशाने पर सरकार ही रहती है, सरकार के कामकाज से उसे नफरत हो जाती है, वह सरकार को पलट देना चाहता है, तब वह इस तरह की आत्मघाती बर्बादी करता है जो कि सरकार के जाने के बाद भी कायम और जारी रहती है। अब जिस सरकार को हटाना था, वह श्रीलंका में भी हटा दी गई, बांग्लादेश और नेपाल में हटा दी गई, अफगानिस्तान और सीरिया में हटा दी गई, लेकिन जहां-जहां सार्वजनिक सम्पत्ति, और सरकारी कागजात को जलाया गया, उसकी कोई भरपाई नई और पसंदीदा सरकार के बन जाने पर भी नहीं हो पाएगी।
जले हुए नेपाल की इस हालत से छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में अभी कुछ अरसा पहले एक आंदोलन के बाद कलेक्टर और एसपी दफ्तरों की इमारतों को लगाई गई आग याद पड़ती है जिसमें बाहर खड़ी हुई गाडिय़ों सहित सब कुछ जला दिया गया था। यह मौका भी बड़ा अजीब था कि भारत के किसी जिले में कलेक्टर-एसपी के दफ्तर इस तरह जला दिए गए थे। आंदोलनरत मणिपुर में ऐसा हुआ कि वहां भी बहुत सारे सरकारी दफ्तर, और बहुत सी सार्वजनिक सम्पत्ति जला दी गई। ऐसी नौबत के बारे में देश को सोचना चाहिए कि मांगें पूरी होने के बाद भी यह नुकसान तो किसी तरह वापिस नहीं जाता। लेकिन जब हम देश के सोचने की बात करते हैं तो हमारे सामने कुल मिलाकर एक उन्मादी भीड़ रहती है, जिसका निशाना सार्वजनिक या सरकारी सम्पत्ति रहती हैं, और बहुत से मामलों में निजी सम्पत्तियां भी रहती हैं। कई आंदोलनों में निजी गाडिय़ों को, दुकानों और बाजारों को भी जला दिया जाता है जिनके बारे में ऐसे कानून बने हैं कि आंदोलनकारियों से ही ऐसे नुकसान की भरपाई की जाएगी। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड जल जाने की भला क्या भरपाई किसी से की जा सकती है?
देश में उत्तेजना और उन्माद के माहौल में भी, सार्वजनिक हिंसा के बीच भी निशाना किसे बनाया जाए, और किसे छोड़ा जाए, यह फर्क कर पाना आसान नहीं रहता है। किसी समझदार ने बहुत पहले यह लिखा था- कि भीड़ में सिर बहुत रहते हैं, दिमाग कोई नहीं रहता। इसलिए भीड़ से किसी तर्कसंगत, और न्यायसंगत फैसले और कार्रवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो लोग भी अपने देश या अपने समाज की शान में सामूहिक जनचेतना जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि जापान, या योरप के कुछ बहुत जिम्मेदार, सभ्य और विकसित लोकतंत्रों को छोड़ दें, तो बाकी जगहों पर सामूहिक जनचेतना हर जगह गौरवशाली नहीं रहती। बहुत सी जगहों पर, या कि अधिकतर जगहों पर सामूहिक जनचेतना बड़ी आसानी से नफरत और हिंसा की तरफ मुड़ जाती है, और मुल्क के कानून के खिलाफ हाथों में पत्थर उठा लेती है। सामूहिक जनचेतना का नाम बड़ा होता है, उसका दर्शन छोटा। लोकतंत्र अपनी व्यवस्था को बहुत सभ्य साबित करने के लिए, या अपने नागरिकों को परिपक्व दिखाने या बनाने के लिए सामूहिक जनचेतना जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है, लेकिन वे मृगतृष्णा सरीखे रहते हैं, उनका कोई अस्तित्व नहीं रहता। और फिर दूसरी तरफ देशों को अपनी सरकारी इमारतों और सार्वजनिक सम्पत्ति को बचाने के लिए जितनी बड़ी पुलिस और फौज की जरूरत रहती है, उसका खर्च बहुत संपन्न देश भी नहीं उठा पाते। जिन देशों में लोकतंत्र नहीं रहता है, वहां शाही या फौजी हुकूमत, कमजोर लोकतांत्रिक अधिकारों की वजह से आंदोलनों को कुचल पाते हैं, लेकिन जहां कहीं भी लोकतंत्र की जगह रहती है, वहां हालात बड़ी तेजी से बेकाबू हो जाते हैं, जैसे कि अभी-अभी नेपाल में चार दिन के भीतर ही हो गए थे।
महाराष्ट्र में अभी ठाणे की एक अदालत में 2015 के दंगों के मामले में सभी 17 आरोपियों को बरी कर दिया। इस दंगे में सार्वजनिक सम्पत्ति की बड़ी बर्बादी की गई थी, और पुलिसवालों को भी हमले में चोटें लगी थीं। एक जिला अदालत ने यह पाया कि हथियारों से लैस भीड़ में रेलवे स्टेशन पर भीड़ के बीच यह दंगा किया था, लेकिन पुलिस आरोपियों की न तो पहचान स्थापित कर सकी, और न ही सुबूत पेश कर सकी। जज ने माना कि जांच में बहुत कमजोरियां रहीं। और इस आधार पर सारे के सारे लोग अदालत से छूट गए। लोगों को याद होगा कि अभी पिछले महीनों में ही हफ्ते भर के फासले से दो फैसले आए, एक में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, और उनके साथ के लोग मालेगांव बम धमाके केस से बरी हो गए, और एक दूसरे मामले में मुम्बई ट्रेन विस्फोट के सारे मुस्लिम आरोपी बरी हो गए क्योंकि जांच एजेंसियां अदालत में उनके खिलाफ अपराध साबित नहीं कर पाई।
इससे भारत की पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों की हालत पर भी गंभीर सवाल उठते हैं, और इस बात पर भी कि क्या जांच एजेंसियां सत्तारूढ़ पार्टी के किसी दबाव में, या कि किसी और तरह के असर से जांच को इतना कमजोर कर देती हैं कि अदालत किसी को सजा नहीं दे पाती? जो लोग किसी मामले की जांच को करीब से देखते हैं, या कि पुलिस और न्याय प्रक्रिया को बेहतर तरीके से जानते हैं, उन्हें यह मालूम रहता है कि कमजोर कड़ी कहां-कहां रहती है। किन गवाहों को खरीदा जा सकता है, कौन से जब्त दस्तावेज गायब हो सकते हैं (जैसा कि साध्वी प्रज्ञा के केस में हुआ), अपराध अनुसंधान प्रयोगशाला में कौन-कौन से सुबूत बदलवाए जा सकते हैं, जांच अफसर को किस तरह दबाव या लुभाव से प्रभावित किया जा सकता है, और अदालत में पहुंचने के बाद न्याय प्रक्रिया को कैसे प्रभावित किया जा सकता है। भारत में लोग यह बात भी अच्छी तरह जानते हैं कि शिकायतकर्ता से लेकर गवाह तक को बाहर कैसे धमकाया जा सकता है। देश के बड़े-बड़े बहुचर्चित मामले ऐसे भी हैं जिनमें शिकायतकर्ता या गवाह का कत्ल हो जाता है। आसाराम का मामला हो, या मध्यप्रदेश में व्यापमं घोटाला हो, इनमें गवाह, आरोपी, या शिकायतकर्ता इतनी बड़ी संख्या में मारे गए कि उसके बाद न्याय प्रक्रिया मखौल सरीखी हो गई।
भारत में अभी तो लोग इसी बात पर फिक्रमंद रहते हैं कि निचली अदालतों में करोड़ों मामले बरसों से पड़े हुए हैं, और इनके निपटारे के लिए क्या किया जाए। दूसरी तरफ जिस पर अधिक चर्चा नहीं होती है, वह जांच एजेंसियों की है। देश के बहुत से कानून अभी इसी बरस बदले हैं, और जांच एजेंसियों के पुराने कर्मचारी इनसे अच्छी तरह परिचित भी नहीं है। अब अपराध की जांच के साथ कई तरह की शर्तें जोड़ दी गई हैं, और उन शर्तों को अगर बारीकी से पूरा नहीं किया जाएगा, तो आरोपियों के वकील बड़ी आसानी से पुलिस केस की धज्जी उड़ा देंगे। आज भी बहुत से मामलों में जहां यह जाहिर रहता है कि मुजरिम कौन हैं, वहां भी जांच या अदालती प्रक्रिया की कमजोरी की वजह से वे छूट जाते हैं। यह नौबत देश के लिए शर्मनाक है, लेकिन यह लोकतंत्र अधिक फिक्रमंद नहीं है। आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा धर्म में इस तरह जुड़ा हुआ है कि मानो ईश्वर हर चीज का इंसाफ कर देगा, हर गुनहगार को सजा दे देगा। जबकि ईश्वर का असर जज, सरकारी वकील, पुलिस, और गवाह पर आमतौर पर मुजरिम को बचाने के लिए पड़ता है, शिकायतकर्ता या जुर्म के शिकार को इंसाफ दिलाने के लिए नहीं। धर्म में बुरे को बचाने की अपार क्षमता रहती है, और देश की आबादी का तकरीबन पूरा ही हिस्सा किसी न किसी धर्म के नशे में डूबा हुआ है। उसे यह लगता है कि इस जन्म में जो बुरा उनके साथ हो रहा है, वह उनके पिछले जन्म के कुकर्मों का नतीजा है, और इस जन्म में वे जितना बर्दाश्त करेंगे, त्याग करेंगे, अगले जन्म में उन्हें उतना ही सुख मिलेगा। इसलिए वे इंसाफ की बात सोचते भी नहीं हैं। धर्म नाम का नशा लोगों की तर्कशक्ति, न्यायशक्ति, इन सबको कमजोर कर देता है। इसलिए लोग बेइंसाफी को देखते हुए भी उसके खिलाफ बागी नहीं होते हैं, और यही वजह है कि पुलिस, और दूसरी जांच एजेंसियां लापरवाही से लेकर मनमानी तक कई तरह की गलत बातें करती हैं, और मुजरिम बच निकलते हैं।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 24 साल पुराने एक बलात्कार-प्रकरण में जिला अदालत की दी गई सजा को अभी रद्द कर दिया है, और आरोपी को घटना के समय नाबालिग पाकर उसके मामले को अब किशोर न्याय बोर्ड को भेजा है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि इस मामले में बोर्ड छह महीने के भीतर फैसला दे। 2001 के इस मामले में 2002 में सात साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी, और इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। यह मामला परिवार के भीतर एक नाबालिग लडक़ी, और उसके मौसेरे भाई के बीच का था, और घर में हुए इस बलात्कार पर गांव की पंचायत के बाद पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई थी। स्कूली रिकॉर्ड के मुताबिक यह लडक़ा घटना के वक्त 17 बरस से कम का था।
अब इससे कई सवाल उठते हैं, जिन पर हम यहां चर्चा करना चाहते हैं। पहली बात तो यह कि घर के भीतर करीबी रिश्तेदार नाबालिग भाई-बहनों के बीच इस तरह का खतरा कहीं भी खड़ा हो सकता है, और परिवारों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने बच्चों को किस तरफ सही राह पर रख सकें। इसके लिए कई बार यह भी हो सकता है कि घर-परिवार के भीतर भी मां-बाप, या परिवार के दूसरे लोगों को एक सावधानी बरतनी होगी, ताकि ऐसी नौबत ही न आए, ऐसा खतरा ही खड़ा न हो सके। ये तो कमउम्र किशोर-किशोरियां थे, इसलिए यह माना जा सकता है कि बहुत अधिक परिपक्व नहीं थे। लेकिन परिवारों में बालिग रिश्तेदारों के बीच भी जगह-जगह जबर्दस्ती सेक्स के मामले सामने आते हैं, और उससे दर्जनों गुना अधिक मामले शायद कभी सामने आते ही नहीं हैं। इसलिए जैसा कि बड़े बुजुर्ग कहते आए हैं, आग और घी को पास नहीं रखना चाहिए। परिवारों को ऐसी स्थितियों का ध्यान रखना चाहिए जिनमें ऐसे वर्जित, या अवांछित संबंध हो सकते हैं। और बात सिर्फ अदालत से सजा दिलवाने तक की नहीं है, जब कभी परिवार में, करीबी रिश्तों में, या अड़ोस-पड़ोस में ऐसी अवांछित बातें होती हैं, तो उससे पारिवारिक और सामाजिक कड़वाहट भी पैदा होती है, और लंबे समय का नुकसान होता है। परिवार के भीतर ही एक बलात्कार की शिकार रहे, और परिवार के करीबी, या दूर के रिश्तेदार बरसों के लिए जेल में रहें, तो इससे परिवार का ढांचा भी चरमरा जाता है। सबसे अच्छी नौबत तो यही है कि लोग अपने बच्चों को किशोरावस्था में जाने के पहले भी अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में बताकर रखें, और उन्हें अकेले किसी खतरनाक नौबत में न छोड़ें। यह कहते हुए हमको इस बात का पूरा अहसास है कि गरीब मां-बाप के पास एक कमरे के मकान में न तो बच्चों को अलग से बचाकर रखने और सुलाने की गुंजाइश रहती है, और न ही मां-बाप दोनों मजदूरी पर जाते हुए बच्चों की चौकसी कर सकते। ऐसे में अड़ोस-पड़ोस के लोगों को मिलकर एक सामाजिक-सुरक्षा की सोच भी विकसित करनी चाहिए। यह बात भी हमारे लिए कहना आसान है, लेकिन इस पर अमल काफी मुश्किल होगी।
दूसरी बात यह कि जिला स्तर के सत्र न्यायालय ने 2002 में बलात्कार के इस मामले में आरोपी नाबालिग को जो सजा दी थी, उसे हाईकोर्ट ने खारिज करते हुए उसी लडक़े के स्कूली रिकॉर्ड के मुताबिक उसे नाबालिग माना है। अब सवाल यह उठता है कि स्कूली रिकॉर्ड तो सत्र न्यायालय में भी रखे गए होंगे, और उन्हीं के आधार पर सात बरस की कैद हुई। हाईकोर्ट ने कुछ अधिक बारीकी से ये दस्तावेज परखे होंगे, और अब तक बालिग मानकर सजायाफ्ता इस लडक़े को अब किशोर न्यायालय भेजा है। यह चूक किसी नाबालिग की जिंदगी में बहुत बड़ी हो सकती है, हुई है, जिसमें उसमें बालिगों की जेल में रखा गया होगा, और बालिग की तरह नाबालिग से बलात्कार की सात बरस की सजा सुनाई गई। हाईकोर्ट को इस एक मामले में दिए गए अपने फैसले से परे भी यह सोचना चाहिए कि आगे किसी नाबालिग के साथ उम्र की सीमा रेखा पर ऐसी चूक न हो, उसके लिए क्या सावधानियां बरती जाएं, इसकी एक लिस्ट बनानी चाहिए। यह एक अलग बहस का मुद्दा होगा कि बलात्कार और हत्या जैसे कुछ किस्म के मामलों में नाबालिग को बालिग मानकर केस चलाने, या बालिग होने की उम्र को कम करने पर सुप्रीम कोर्ट में एक अलग बहस चल रही है। हम उस बहस को यहां जोडऩा नहीं चाहते, क्योंकि हम यहां परिवार और जिला अदालत की सावधानी पर ही चर्चा केन्द्रित रखना चाहते हैं।
देश की एक पर्यावरण-संस्था आई-फॉरेस्ट की अभी जारी हुई राष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट कहती है कि भारत में एयरकंडीशनरों से निकलने वाली ग्रीन हाऊस गैसें अब देश में वाहनों के प्रदूषण से निकलने वाली गैसों के बराबर हो गया है। और अगर इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई, तो अगले दस बरस में एसी-प्रदूषण, वाहन-प्रदूषण से दुगुना हो सकता है। इस सर्वे में यह पाया गया है कि 42 फीसदी एयरकंडीशनरों को हर साल गैस री-फिलिंग की जरूरत पड़ती है। इस संस्था का कहना है कि एसी से गैस रिसाव कम करना, कुछ हद तक एक समाधान हो सकता है। एयरकंडीशनरों, और गाडिय़ों, दोनों से ही होने वाले गैस-उत्सर्जन से भारत के पर्यावरण को खतरा हो रहा है, और यह जलवायु परिवर्तन में एक जिम्मेदार पहलू है। विज्ञान की मामूली जानकारी बताती है कि ग्रीन हाऊस गैसों से लोबल वॉर्मिंग बढ़ती है, ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है, और ओजोन परत के कमजोर होने से, उसमें छेद होने से, सूरज की नुकसानदेह अल्ट्रावॉयलेट किरणें अधिक आती हैं जिससे पर्यावरण असंतुलन बढ़ता है, और प्राणियों में त्वचा कैंसर पैदा होता है।
अब हम इस अध्ययन, और पर्यावरण से जुड़ी बारीक तकनीक को छोडक़र एक बहुत ही मामूली समझ की बात करें तो यह बात जाहिर है कि भारत में एयरकंडीशनर लगाने और सुधारने का काम बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित लोग करते हैं। मोटेतौर पर बेरोजगार नौजवान जो कि मजदूरी के लायक रहते हैं, वे ही एसी उठाने, चढ़ाने, लगाने, सर्विस करने, और मरम्मत करने का काम करते रहते हैं। फिर भारत में बहुत हाईक्वालिटी के पुर्जों के इस्तेमाल का चलन भी कम है। एसी के भीतर लगने वाले पुर्जे, उसमें भरी जाने वाली गैस लोगों को अपनी नजरों से तो दिखती नहीं हैं, इसलिए वे पूरी तरह अप्रशिक्षित कर्मचारियों की कही बातों पर आश्रित रहते हैं। भारत में सर्विस का स्तर आमतौर पर बहुत घटिया है, नकली पुर्जों का चलन खूब है, और कामगारों में बेईमानी आम बात है। फिर गैस से जुड़ी हुई प्रणाली की बारीकी से जांच करने के बजाय लोग भारत की बहुत आम, जुगाड़-तकनीक से काम चला लेते हैं, और ऐसे में गैस लीक होने का खतरा अधिक रहता है। फिर भी हम यह नहीं मानते कि यह कारों से निकलने वाले प्रदूषण के साथ तुलना के लायक नहीं है, क्योंकि कारों का प्रदूषण नापने वाले सेंटर बिना कुछ जांचे फर्जी सर्टिफिकेट देते रहते हैं, और चूंकि भारत में बचाव लागू करने के सभी काम एक जैसी बेईमानी, लापरवाही, और गैरपेशेवर अंदाज से होते हैं, इसलिए किसी एक के आंकड़े ही गलत होते हों, ऐसा नहीं होता।
लेकिन इस खतरे को समझने की जरूरत है कि कारों का एक हिस्सा बैटरी से चलने वाला होते जा रहा है, और गाडिय़ों की बढ़ती संख्या में प्रदूषण उस अनुपात में नहीं बढ़ेगा। दूसरी तरफ एसी के नए-नए ग्राहक पैदा हो रहे हैं, पुराने ग्राहकों के घर-दफ्तर, या दुकान में एसी की गिनती बढ़ती जा रही है, और अब एसी शान-शौकत के बजाय मामूली सहूलियत का सामान बन चुका है, इसलिए उसका इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है, और उसी अनुपात में गैस लीक होना भी। अब विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के सामने यह चुनौती है कि पर्यावरण के लिए नुकसानदेह एसी-गैस को कैसे कम नुकसानदेह गैस से बदला जाए, और दूसरी तरफ कारों या दूसरी गाडिय़ों के प्रदूषण को कैसे घटाया जाए। आई-फॉरेस्ट के अध्ययन में इन दो परस्पर असंबद्ध बातों को तुलना के लिए जरूर सामने रखा गया है, लेकिन इन दोनों का आपस में कोई भी रिश्ता नहीं है, और इन दोनों का अलग-अलग समाधान किया जाना जरूरी है।
फिलहाल हम जितनी बातें कर रहे हैं, वे एक नासमझी की अधिक हैं। समझदारी तो यह होगी कि निजी गाडिय़ों के सार्वजनिक परिवहन के विकल्प सोचे जाएं, और उन पर तेजी से अमल किया जाए। फिर धरती के वायुमंडल की गर्मी अंधाधुंध बढऩे दी जाए, और अपने कमरों को ठंडा रखने के लिए एसी का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाए। ये दोनों ही बातें आज अदूरदर्शिता से सोची जा रही हैं। निजी गाडिय़ां अगर बैटरी वाली भी हैं, तो भी वे किसी बैटरी-बस के मुकाबले धरती पर बहुत अधिक बोझ है, बनाने में भी, और बिजली से बैटरी चार्जिंग में भी। जरूरत इस बात की है कि सार्वजनिक परिवहन की गाडिय़ां, चाहे वे बसें हों, चाहे मेट्रो या दूसरे किस्म की ट्रेन हों, उन्हें निजी गाडिय़ों के मजबूत विकल्प की तरह चलन में लाना होगा। दूसरी तरफ शहरों में पेड़ बढ़ाकर, जंगल लगाकर, निर्माण की नई ग्रीन-तकनीक का इस्तेमाल करके इमारतों को गर्म होने से बचाना होगा, वरना कांक्रीट के जंगल को कितने भी एसी कम पड़ते रहेंगे। और लोग अपने एक ककून जैसे छोटे से दायरे को ठंडा करने के लिए बाहर की हवा को कई गुना गर्म करते रहेंगे, जो कि धरती को जलाकर राख कर देगा। हमने इन दोनों जरूरतों से होने वाले प्रदूषण से चर्चा शुरू की है, लेकिन उससे काफी कुछ अधिक करने की जरूरत है।
अलग-अलग मंत्रालयों के लिए संसद की कमेटियां रहती हैं, जिनमें अलग-अलग पार्टियों के सांसदों को रखा जाता है, और वे किसी प्रस्ताव, योजना, या प्रस्तावित कानून पर विचार-विमर्श करते हैं। मंत्रालय सार्वजनिक इश्तहारों से भी लोगों से राय मांगते हैं, और कम से कम दावा तो यही करते हैं कि लोगों ने जो आपत्ति और सुझाव भेजे थे, उन पर सोच-विचार किया गया था। अब संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति ने अपनी एक रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को दी है जो कि संसद के अगले सत्र में पेश की जाएगी। इस कमेटी ने कहा है कि आज एआई से गढक़र जो फेक न्यूज बनाई और फैलाई जाती है, उसके पीछे के लोगों, और संस्थाओं की शिनाख्त करके उन पर मुकदमा चलाने के लिए ठोस कानूनी प्रावधान किए जाएं। एआई के इस्तेमाल से आज कई तरह की खराब चीजें बनाई जा सकती हैं। हम देश में एआई से गढ़ी हुई तस्वीरों, और वीडियो तो देख ही रहे हैं, अधिक करीब के छत्तीसगढ़ में भी कुछ नए-नए उगे हुए सोशल मीडिया अकाऊंट से कांग्रेस और भाजपा के नेताओं पर ऐसे हमले हो रहे हैं। देश में अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और उनकी गुजर चुकीं मां जैसे कोई किरदार गढक़र कोई एआई वीडियो बनाया गया है, और उसके खिलाफ भी पुलिस में शिकायत की गई है।
यह मामला बड़ा दिलचस्प है। एआई तो अभी कोई सालभर से ही ऐसी चीजों में इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों के खिलाफ गंदी और ओछी बातें लिखना तो दशकों से चल रहा है। दो दशक हो गए हैं कि लोग इंटरनेट, और सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक-दूसरे पर हमले के लिए कर रहे हैं, और भारत में हर दिन लाखों लोग विरोधियों को साम्प्रदायिक धमकियां देते हैं, सबसे गंदी गालियों के साथ कत्ल और बलात्कार की धमकियां देते हैं, और जिनसे असहमत हैं, उनके पूरे परिवारों को सोशल मीडिया पर प्रताडि़त करते हैं। ऐसे सारे ही हमलावर लोगों के हाथ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस नाम का एक और हथियार लग गया है। लेकिन इस बात को अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि इस साल भर के पहले भी ये हमलावर तो कोई दो दशक से मौजूद ही हैं, और खुलकर साम्प्रदायिक नफरत फैला रहे हैं, किसी महिला जर्नलिस्ट को प्रेस्टीट्यूट लिख रहे हैं, और उसे प्रॉस्टीट्यूट के बराबर रख रहे हैं। तो आज संसदीय समिति ने एआई को लेकर जो फिक्र जाहिर की है, वह दरअसल पिछले दशकों में खड़ी हुई इस हमलावर-‘बलात्कारी-हत्यारी’ फौज को लेकर होनी चाहिए थी। अब तक लोग बिना एआई के जो जुर्म कर रहे थे, उस जुर्म में अब एआई की मदद और जुड़ गई है, तो उसकी वजह से पहली बार उसे जुर्म मानना भोलेपन की नासमझी अधिक दिखती है। अगर इस देश में ऐसे ट्रोल करने वाले ‘बलात्कारी-हत्यारे’ पहले से काबू में किए गए रहते, वे जेल भेजे गए रहते, तो लोग ऐसी सार्वजनिक धमकियां देने को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानकर नहीं चलते रहते। अब जब लोग जहरीली-नफरती हिंसा फैलाने के आदी हो चुके हैं, और उस पर आज भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है, तो फिर महज एक तकनीक को कोसना हास्यास्पद लगता है। एआई के आगमन के पहले तक जो लोग जुबानी बलात्कार-कत्ल करने में सार्वजनिक रूप से फख्र हासिल करते थे, उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि देश और प्रदेशों की सरकारें उनके खिलाफ कुछ नहीं करेंगी। ऐसे में सिर्फ एआई को लेकर, या सिर्फ फेक न्यूज को लेकर फिक्र जाहिर करना पत्तों के इलाज के लिए दवा छिडक़ने जैसा है, क्योंकि उस पेड़ की जड़ों को तो पानी से सींचा ही जा रहा है।
न सिर्फ लोकतंत्र, बल्कि किसी भी तंत्र के तहत चलने वाला देश या समाज इस तरह टुकड़े-टुकड़े में सोचकर कतरे-कतरे में कार्रवाई नहीं कर सकता। लोगों की सोच को अलोकतांत्रिक, अमानवीय, और हिंसक करते चले जाना, और फिर उनसे यह उम्मीद करना कि वे एआई जैसे औजार का इस्तेमाल न करें, यह बचकानी बात है। कातिल की हत्यारी-सोच को रोकने की जरूरत है, उसके विकसित हो जाने के बाद उसे यह सिखाना कि वह लाल हत्थे के चाकू से कत्ल न करे, यह किस काम का रहेगा? लोकतंत्र एक जटिल व्यवस्था है, इसमें लोगों की सोच को कानून का सम्मान करने का बनाया जाना चाहिए, उन्हें यह नहीं सिखाया जा सकता कि कानून के एक से सोलह तक के पेज अनदेखा करके उन्हें तोडऩा जायज है, और सोलह से बत्तीस पेज के कानूनों का सम्मान करना जरूरी है।
चिकित्सा विज्ञान की नई खबर है कि सुअर की किडनी इंसानों में लगाने के लिए अमरीका में क्लिनिकल ट्रॉयल की मंजूरी मिल गई है। इस तकनीक में सुअर में कुछ डीएनए बदलाव करके उसे इंसानों के लायक बनाया जाता है, और फिर उनके अंग निकालकर जरूरतमंद इंसानों में लगाए जाते हैं। आज किडनी की जरूरत वाले इंसानी-मरीजों की कतार अगले कई साल के लिए लगी हुई है। किडनी की उपलब्धता कम रहती है, और मरीज उससे कई गुना अधिक रहते हैं। फिर आधुनिक जीवनशैली के चलते हुए तरह-तरह की बीमारियां बढ़ती चली जानी है, और दानदाताओं से या परिवार के सदस्यों से मिलने वाले अंग उस मांग को पूरा नहीं कर पाएंगे। आज भी नहीं कर पाते हैं। भारत में तो भला हो महिलाओं का जिनकी वजह से पुरूष मरीजों को अंग मिल जाते हंैं। आज की खास बात से थोड़ा अलग हटकर यह चर्चा जरूरी है कि भारत में 90 फीसदी अंगदान महिलाओं से आता है, लेकिन अंगदान पाने वालों में कुल 10 फीसदी महिलाएं हैं। मतलब यह कि पुरूष सिर्फ परिवार की सदस्य महिलाओं का फायदा उठाते रहते हैं।
अब हम एक बार फिर जेनोट्रांसप्लांटेशन पर आ जाए, जो कि एक प्राणी से दूसरे तरह के प्राणी में अंग प्रत्यारोपण के लिए बनाया गया शब्द है। इसमें सबसे अधिक संभावना आज सुअर के अंग इंसानों में लगने की दिख रही है। शरीर विज्ञान के हिसाब से सुअर के अंग आकार, आंतरिक ढांचे, और कामकाज के हिसाब से इंसानों के अंगों से बहुत मिलते-जुलते हैं। यह अलग बात है कि इंसान गाली बकने के लिए दूसरे बुरे, या गंदे लोगों को सुअर कहकर गाली देते हैं। अब पता नहीं आने वाले बरसों में जब बहुत से लोग सुअर की किडनी, लिवर, या दिल लगाकर घूमेंगे, तो उनके आसपास के लोग सुअर की गाली देना बंद कर पाएंगे या नहीं। फिलहाल तो यह है कि चिकित्सा वैज्ञानिकों ने अंग निकालने के लायक सुअर में उनके जींस की एडिटिंग करके उनमें इंसान के जींस डालकर उन्हें इस लायक तैयार किया है कि जब उनके अंग इंसानों में लगाए जाएं, तो इंसानी शरीर उसे खारिज न कर दे। अंग प्रत्यारोपण में यह सबसे बड़ी समस्या रहती है कि मरीज का शरीर नया अंग पाने के बाद उसे स्वीकार नहीं कर पाता, और खारिज कर देता है। ऐसे में किसी मरीज के लिए छांटे गए सुअर को जब पहले से उस इंसान के लायक तैयार किया जाएगा, तो इंसानी शरीर उस सुअर के अंग को विदेशी अंग मानकर खारिज नहीं करेगा।
इंसान वैसे भी अपनी जरूरत के लिए धरती के अधिकतर किस्म के जानवरों को खा लेते हैं। भारत जैसे देश में कुछ राज्यों में गाय खाने पर रोक है, दुनिया के बहुत से देशों में वन्यप्राणी का दर्जा प्राप्त जानवरों को मारने और खाने की छूट नहीं है। लेकिन सुअर को तो इंसानी खानपान के लिए बड़े पैमाने पर पाला जाता है, और गैरमुस्लिमों के बीच यह खासा लोकप्रिय है। ऐसे में इंसान के बदन की जरूरतों के लिए अगर सुअर के अंग निकाले जाते हैं, तो इससे न तो गाय सरीखी कोई धार्मिक भावना प्रभावित होती है, न ही वह वन्यप्राणी है, और न ही सुअर का किसी और किस्म का महत्व है। इसलिए जिन मुस्लिमों के बीच सुअर को अपवित्र माना जाता है, उन्हें छोड़ दें, तो बाकी लोगों को अपनी जिंदगी बचाने के लिए किसी जानवर के अंग लगवाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। आज भी इंसान, शाकाहारी इंसान भी जानवरों के कई तरह के हिस्सों से बनी हुई दवाईयां खा-पी लेते हैं, वे इस बात को अनदेखा कर जाते हैं कि वे गैरशाकाहारी चीज खा रहे हैं। जब जान बचाने की नौबत आती है तो अधिकतर लोग धार्मिक और दूसरी नैतिक मान्यताओं से समझौता कर लेते हैं। इसलिए अपने बदन के भीतर सुअर का एक हिस्सा लेकर चलना भी लोग सीख ही जाएंगे।
हाल के बरसों में अमरीका में जिन मरीजों में सुअर की किडनी लगाई गई, वो महीनों बाद तक जिंदा रहे, और उनमें से कुछ की मौत किसी दूसरी वजह से हुई, प्रत्यारोपित किडनी की वजह से नहीं। अब मानव-परीक्षण की इस नई इजाजत के बाद अमरीका में दर्जनों मरीजों को सुअर की किडनी लगाकर एक नई जिंदगी दी जाएगी, चिकित्सा विज्ञान को इतने प्रयोगों की वजह से काफी कुछ सीखने भी मिलेगा। 2022 में ही एक इंसानी मरीज को जीन-एडिटेड सुअर का दिल लगाया गया था, जो दो महीने तक चला था। प्रारंभिक प्रयोगों में ये दो महीने भी कम नहीं होते हैं, और इनसे सीखकर चिकित्सा विज्ञान आगे बेहतर काम करने के लायक हो जाएगा।
अमरीका के एक विश्वविद्यालय में सैकड़ों छात्र-छात्राओं के बीच एक खुली बहस में एक बड़े ट्रम्प-समर्थक और अमरीका के जाने-माने संकीर्णतावादी वक्ता और आंदोलनकारी चार्ली किर्क को एक नौजवान ने गोली मार दी। चार्ली किर्क ने बहुत पहले टर्निंग प्वाइंट यूएस नाम की एक संस्था बनाई थी, और वह स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालयों में उदारवादी सोच के खिलाफ संकीर्णतावादी सोच को पेश करने के अभियान में लगे रहता था। इस अभियान के लिए वह नफरत फैलाने की तोहमतें भी झेलता था, और बंदूकों से हर बरस अमरीका में होने वाली मौतों की कीमत पर भी वह बंदूकें रखने की आजादी की खुली वकालत करता था। जिस वक्त उसे विश्वविद्यालय में यह गोली मारी गई, उस पल भी वह बंदूकें रखने की आजादी की वकालत कर रहा था, बेकसूरों के कत्ल की कीमत पर भी। अमरीका में ऐसा माना जाता था कि कुछ राज्यों में चार्ली किर्क के रूढि़वादी अभियान ने ट्रम्प को चुनाव जीतने में मदद की। जाहिर है कि इस हत्या की खबर मिलते ही ट्रम्प ने राष्ट्रपति भवन में झंडा झुकवा दिया था, और किर्क को महान व्यक्ति करार दिया।
अमरीका का मीडिया किर्क के दिए गए नफरती, हिंसक, भेदभाव वाले, प्रवासी विरोधी, ट्रांसजेंडर विरोधी, और महिला विरोधी बयानों को अच्छी तरह दर्ज करता था। चार्ली किर्क की संस्था खुली बहस की वकालत करती थी, और इस बहस के दौरान, या इसके नाम पर यह गोरा अमरीकी लगातार नफरत की बातें फैलाता था। वह खुलेआम मंच और माईक पर कहता था कि अगर वह किसी उड़ान में किसी काले पायलट को देखता है, तो यही मनाता है कि वह ठीकठाक सीखा हुआ हो। इसी तरह सरहदी राज्यों में पड़ोस के देशों से आकर काम करने वाले मजदूरों के खिलाफ उसके बयान थे कि यह स्थानीय आबादी को बदल देने की एक रणनीति चल रही है ताकि गोरे-ग्रामीण अमरीका को बदल दिया जाए। महिलाओं और ट्रांसजेंडरों के खिलाफ, अल्पसंख्यकों के खिलाफ उसके बहुत से बयान आते थे, और उनकी वजह से भी वह अमरीका के संकीर्णतावादियों के बीच बड़ा मशहूर था।
हालांकि अभी नेपाल की घटनाओं को लेकर कुछ लोग भारत में भी यह बात कह रहे हैं कि इस देश को ऐसी हिंसा से अछूता रहना चाहिए, लेकिन भारत के नेताओं को नेपाल की घटनाओं से सबक लेना चाहिए जिनमें भ्रष्टाचार और कुनबापरस्ती, काली कमाई का अश्लील और हिंसक प्रदर्शन निशाने पर थे। हमने भी इसी जगह संपादकीय में, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल के वीडिटोरियल में भी इस बात की वकालत की थी कि दुनिया के तमाम देशों को दूसरे देशों की ऐसी घटनाओं से सबक लेना चाहिए। अमरीका में अपार बंदूकें रखने की असीमित छूट की वकालत करने वाले लोगों में से एक, चार्ली किर्क को इन्हीं आखिरी शब्दों के बीच एक नौजवान ने गोली मार दी। बाद में जब इस नौजवान की कुछ शिनाख्त के साथ उसकी तलाश शुरू हुई, तो उसके परिवार ने ही उसकी खबर जांच एजेंसियों को की, और यह बताया कि यह गोरा नौजवान किर्क की नफरती बातों को लेकर परेशान था, और हाल ही में एक घरेलू रात्रिभोज के दौरान उसने चार्ली किर्क के बयानों को लेकर कहा था कि वह नफरत फैला रहा है। यह पूरा परिवार ट्रम्प समर्थक है, लेकिन उनके बीच के इस नौजवान को इस आंदोलनकारी की हिंसक और नफरती बातें परेशान कर रही थीं।
जब हम अमरीका की इस हत्या के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि अंधाधुंध हथियारों का समर्थन, और नफरती हिंसा को बढ़ावा किस तरह ऐसे लोगों के लिए आत्मघाती साबित हो सकते हैं। जो राष्ट्रपति का बड़ा ही चहेता हो, और राष्ट्रपति के पास जिसके गुणगान के लिए बहुत कुछ हो, उसके लिए भी अमरीका के घर-घर में फैली हुई बंदूकों में से एक बंदूक की एक गोली ही काफी साबित हुई, और 22 बरस के नौजवान हत्यारे को चार्ली किर्क की बातें ही परेशान कर रही थीं। इस नौजवान ने यह भी परवाह नहीं की कि उसके राज्य में ऐसी हत्या पर मौत की सजा हो सकती है। एक संपन्न परिवार के इस नौजवान ने पिछले दो चुनावों में वोट नहीं डाला था, वह राजनीतिक रूप से सक्रिय भी नहीं था, और यह नौजवान चर्च का एक धर्मालु सदस्य भी था। स्कूल की एक राष्ट्रीय परीक्षा में उसने 99 फीसदी नंबर हासिल किए थे, और उसे यूनिवर्सिटी के लिए एक बड़ी प्रतिष्ठित स्कॉलरशिप भी मिली थी। वह शांत रहता था, हिंसा का उसका कोई इतिहास नहीं था, लेकिन पारिवारिक खाने पर ट्रम्प-समर्थक इस परिवार में यह बात हुई थी कि चार्ली किर्क नफरत से भरा हुआ है, और वह नफरत फैला रहा है।


