संपादकीय
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 24 साल पुराने एक बलात्कार-प्रकरण में जिला अदालत की दी गई सजा को अभी रद्द कर दिया है, और आरोपी को घटना के समय नाबालिग पाकर उसके मामले को अब किशोर न्याय बोर्ड को भेजा है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि इस मामले में बोर्ड छह महीने के भीतर फैसला दे। 2001 के इस मामले में 2002 में सात साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी, और इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। यह मामला परिवार के भीतर एक नाबालिग लडक़ी, और उसके मौसेरे भाई के बीच का था, और घर में हुए इस बलात्कार पर गांव की पंचायत के बाद पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई थी। स्कूली रिकॉर्ड के मुताबिक यह लडक़ा घटना के वक्त 17 बरस से कम का था।
अब इससे कई सवाल उठते हैं, जिन पर हम यहां चर्चा करना चाहते हैं। पहली बात तो यह कि घर के भीतर करीबी रिश्तेदार नाबालिग भाई-बहनों के बीच इस तरह का खतरा कहीं भी खड़ा हो सकता है, और परिवारों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने बच्चों को किस तरफ सही राह पर रख सकें। इसके लिए कई बार यह भी हो सकता है कि घर-परिवार के भीतर भी मां-बाप, या परिवार के दूसरे लोगों को एक सावधानी बरतनी होगी, ताकि ऐसी नौबत ही न आए, ऐसा खतरा ही खड़ा न हो सके। ये तो कमउम्र किशोर-किशोरियां थे, इसलिए यह माना जा सकता है कि बहुत अधिक परिपक्व नहीं थे। लेकिन परिवारों में बालिग रिश्तेदारों के बीच भी जगह-जगह जबर्दस्ती सेक्स के मामले सामने आते हैं, और उससे दर्जनों गुना अधिक मामले शायद कभी सामने आते ही नहीं हैं। इसलिए जैसा कि बड़े बुजुर्ग कहते आए हैं, आग और घी को पास नहीं रखना चाहिए। परिवारों को ऐसी स्थितियों का ध्यान रखना चाहिए जिनमें ऐसे वर्जित, या अवांछित संबंध हो सकते हैं। और बात सिर्फ अदालत से सजा दिलवाने तक की नहीं है, जब कभी परिवार में, करीबी रिश्तों में, या अड़ोस-पड़ोस में ऐसी अवांछित बातें होती हैं, तो उससे पारिवारिक और सामाजिक कड़वाहट भी पैदा होती है, और लंबे समय का नुकसान होता है। परिवार के भीतर ही एक बलात्कार की शिकार रहे, और परिवार के करीबी, या दूर के रिश्तेदार बरसों के लिए जेल में रहें, तो इससे परिवार का ढांचा भी चरमरा जाता है। सबसे अच्छी नौबत तो यही है कि लोग अपने बच्चों को किशोरावस्था में जाने के पहले भी अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में बताकर रखें, और उन्हें अकेले किसी खतरनाक नौबत में न छोड़ें। यह कहते हुए हमको इस बात का पूरा अहसास है कि गरीब मां-बाप के पास एक कमरे के मकान में न तो बच्चों को अलग से बचाकर रखने और सुलाने की गुंजाइश रहती है, और न ही मां-बाप दोनों मजदूरी पर जाते हुए बच्चों की चौकसी कर सकते। ऐसे में अड़ोस-पड़ोस के लोगों को मिलकर एक सामाजिक-सुरक्षा की सोच भी विकसित करनी चाहिए। यह बात भी हमारे लिए कहना आसान है, लेकिन इस पर अमल काफी मुश्किल होगी।
दूसरी बात यह कि जिला स्तर के सत्र न्यायालय ने 2002 में बलात्कार के इस मामले में आरोपी नाबालिग को जो सजा दी थी, उसे हाईकोर्ट ने खारिज करते हुए उसी लडक़े के स्कूली रिकॉर्ड के मुताबिक उसे नाबालिग माना है। अब सवाल यह उठता है कि स्कूली रिकॉर्ड तो सत्र न्यायालय में भी रखे गए होंगे, और उन्हीं के आधार पर सात बरस की कैद हुई। हाईकोर्ट ने कुछ अधिक बारीकी से ये दस्तावेज परखे होंगे, और अब तक बालिग मानकर सजायाफ्ता इस लडक़े को अब किशोर न्यायालय भेजा है। यह चूक किसी नाबालिग की जिंदगी में बहुत बड़ी हो सकती है, हुई है, जिसमें उसमें बालिगों की जेल में रखा गया होगा, और बालिग की तरह नाबालिग से बलात्कार की सात बरस की सजा सुनाई गई। हाईकोर्ट को इस एक मामले में दिए गए अपने फैसले से परे भी यह सोचना चाहिए कि आगे किसी नाबालिग के साथ उम्र की सीमा रेखा पर ऐसी चूक न हो, उसके लिए क्या सावधानियां बरती जाएं, इसकी एक लिस्ट बनानी चाहिए। यह एक अलग बहस का मुद्दा होगा कि बलात्कार और हत्या जैसे कुछ किस्म के मामलों में नाबालिग को बालिग मानकर केस चलाने, या बालिग होने की उम्र को कम करने पर सुप्रीम कोर्ट में एक अलग बहस चल रही है। हम उस बहस को यहां जोडऩा नहीं चाहते, क्योंकि हम यहां परिवार और जिला अदालत की सावधानी पर ही चर्चा केन्द्रित रखना चाहते हैं।
देश की एक पर्यावरण-संस्था आई-फॉरेस्ट की अभी जारी हुई राष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट कहती है कि भारत में एयरकंडीशनरों से निकलने वाली ग्रीन हाऊस गैसें अब देश में वाहनों के प्रदूषण से निकलने वाली गैसों के बराबर हो गया है। और अगर इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई, तो अगले दस बरस में एसी-प्रदूषण, वाहन-प्रदूषण से दुगुना हो सकता है। इस सर्वे में यह पाया गया है कि 42 फीसदी एयरकंडीशनरों को हर साल गैस री-फिलिंग की जरूरत पड़ती है। इस संस्था का कहना है कि एसी से गैस रिसाव कम करना, कुछ हद तक एक समाधान हो सकता है। एयरकंडीशनरों, और गाडिय़ों, दोनों से ही होने वाले गैस-उत्सर्जन से भारत के पर्यावरण को खतरा हो रहा है, और यह जलवायु परिवर्तन में एक जिम्मेदार पहलू है। विज्ञान की मामूली जानकारी बताती है कि ग्रीन हाऊस गैसों से लोबल वॉर्मिंग बढ़ती है, ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है, और ओजोन परत के कमजोर होने से, उसमें छेद होने से, सूरज की नुकसानदेह अल्ट्रावॉयलेट किरणें अधिक आती हैं जिससे पर्यावरण असंतुलन बढ़ता है, और प्राणियों में त्वचा कैंसर पैदा होता है।
अब हम इस अध्ययन, और पर्यावरण से जुड़ी बारीक तकनीक को छोडक़र एक बहुत ही मामूली समझ की बात करें तो यह बात जाहिर है कि भारत में एयरकंडीशनर लगाने और सुधारने का काम बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित लोग करते हैं। मोटेतौर पर बेरोजगार नौजवान जो कि मजदूरी के लायक रहते हैं, वे ही एसी उठाने, चढ़ाने, लगाने, सर्विस करने, और मरम्मत करने का काम करते रहते हैं। फिर भारत में बहुत हाईक्वालिटी के पुर्जों के इस्तेमाल का चलन भी कम है। एसी के भीतर लगने वाले पुर्जे, उसमें भरी जाने वाली गैस लोगों को अपनी नजरों से तो दिखती नहीं हैं, इसलिए वे पूरी तरह अप्रशिक्षित कर्मचारियों की कही बातों पर आश्रित रहते हैं। भारत में सर्विस का स्तर आमतौर पर बहुत घटिया है, नकली पुर्जों का चलन खूब है, और कामगारों में बेईमानी आम बात है। फिर गैस से जुड़ी हुई प्रणाली की बारीकी से जांच करने के बजाय लोग भारत की बहुत आम, जुगाड़-तकनीक से काम चला लेते हैं, और ऐसे में गैस लीक होने का खतरा अधिक रहता है। फिर भी हम यह नहीं मानते कि यह कारों से निकलने वाले प्रदूषण के साथ तुलना के लायक नहीं है, क्योंकि कारों का प्रदूषण नापने वाले सेंटर बिना कुछ जांचे फर्जी सर्टिफिकेट देते रहते हैं, और चूंकि भारत में बचाव लागू करने के सभी काम एक जैसी बेईमानी, लापरवाही, और गैरपेशेवर अंदाज से होते हैं, इसलिए किसी एक के आंकड़े ही गलत होते हों, ऐसा नहीं होता।
लेकिन इस खतरे को समझने की जरूरत है कि कारों का एक हिस्सा बैटरी से चलने वाला होते जा रहा है, और गाडिय़ों की बढ़ती संख्या में प्रदूषण उस अनुपात में नहीं बढ़ेगा। दूसरी तरफ एसी के नए-नए ग्राहक पैदा हो रहे हैं, पुराने ग्राहकों के घर-दफ्तर, या दुकान में एसी की गिनती बढ़ती जा रही है, और अब एसी शान-शौकत के बजाय मामूली सहूलियत का सामान बन चुका है, इसलिए उसका इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है, और उसी अनुपात में गैस लीक होना भी। अब विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के सामने यह चुनौती है कि पर्यावरण के लिए नुकसानदेह एसी-गैस को कैसे कम नुकसानदेह गैस से बदला जाए, और दूसरी तरफ कारों या दूसरी गाडिय़ों के प्रदूषण को कैसे घटाया जाए। आई-फॉरेस्ट के अध्ययन में इन दो परस्पर असंबद्ध बातों को तुलना के लिए जरूर सामने रखा गया है, लेकिन इन दोनों का आपस में कोई भी रिश्ता नहीं है, और इन दोनों का अलग-अलग समाधान किया जाना जरूरी है।
फिलहाल हम जितनी बातें कर रहे हैं, वे एक नासमझी की अधिक हैं। समझदारी तो यह होगी कि निजी गाडिय़ों के सार्वजनिक परिवहन के विकल्प सोचे जाएं, और उन पर तेजी से अमल किया जाए। फिर धरती के वायुमंडल की गर्मी अंधाधुंध बढऩे दी जाए, और अपने कमरों को ठंडा रखने के लिए एसी का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाए। ये दोनों ही बातें आज अदूरदर्शिता से सोची जा रही हैं। निजी गाडिय़ां अगर बैटरी वाली भी हैं, तो भी वे किसी बैटरी-बस के मुकाबले धरती पर बहुत अधिक बोझ है, बनाने में भी, और बिजली से बैटरी चार्जिंग में भी। जरूरत इस बात की है कि सार्वजनिक परिवहन की गाडिय़ां, चाहे वे बसें हों, चाहे मेट्रो या दूसरे किस्म की ट्रेन हों, उन्हें निजी गाडिय़ों के मजबूत विकल्प की तरह चलन में लाना होगा। दूसरी तरफ शहरों में पेड़ बढ़ाकर, जंगल लगाकर, निर्माण की नई ग्रीन-तकनीक का इस्तेमाल करके इमारतों को गर्म होने से बचाना होगा, वरना कांक्रीट के जंगल को कितने भी एसी कम पड़ते रहेंगे। और लोग अपने एक ककून जैसे छोटे से दायरे को ठंडा करने के लिए बाहर की हवा को कई गुना गर्म करते रहेंगे, जो कि धरती को जलाकर राख कर देगा। हमने इन दोनों जरूरतों से होने वाले प्रदूषण से चर्चा शुरू की है, लेकिन उससे काफी कुछ अधिक करने की जरूरत है।
अलग-अलग मंत्रालयों के लिए संसद की कमेटियां रहती हैं, जिनमें अलग-अलग पार्टियों के सांसदों को रखा जाता है, और वे किसी प्रस्ताव, योजना, या प्रस्तावित कानून पर विचार-विमर्श करते हैं। मंत्रालय सार्वजनिक इश्तहारों से भी लोगों से राय मांगते हैं, और कम से कम दावा तो यही करते हैं कि लोगों ने जो आपत्ति और सुझाव भेजे थे, उन पर सोच-विचार किया गया था। अब संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति ने अपनी एक रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को दी है जो कि संसद के अगले सत्र में पेश की जाएगी। इस कमेटी ने कहा है कि आज एआई से गढक़र जो फेक न्यूज बनाई और फैलाई जाती है, उसके पीछे के लोगों, और संस्थाओं की शिनाख्त करके उन पर मुकदमा चलाने के लिए ठोस कानूनी प्रावधान किए जाएं। एआई के इस्तेमाल से आज कई तरह की खराब चीजें बनाई जा सकती हैं। हम देश में एआई से गढ़ी हुई तस्वीरों, और वीडियो तो देख ही रहे हैं, अधिक करीब के छत्तीसगढ़ में भी कुछ नए-नए उगे हुए सोशल मीडिया अकाऊंट से कांग्रेस और भाजपा के नेताओं पर ऐसे हमले हो रहे हैं। देश में अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और उनकी गुजर चुकीं मां जैसे कोई किरदार गढक़र कोई एआई वीडियो बनाया गया है, और उसके खिलाफ भी पुलिस में शिकायत की गई है।
यह मामला बड़ा दिलचस्प है। एआई तो अभी कोई सालभर से ही ऐसी चीजों में इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों के खिलाफ गंदी और ओछी बातें लिखना तो दशकों से चल रहा है। दो दशक हो गए हैं कि लोग इंटरनेट, और सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक-दूसरे पर हमले के लिए कर रहे हैं, और भारत में हर दिन लाखों लोग विरोधियों को साम्प्रदायिक धमकियां देते हैं, सबसे गंदी गालियों के साथ कत्ल और बलात्कार की धमकियां देते हैं, और जिनसे असहमत हैं, उनके पूरे परिवारों को सोशल मीडिया पर प्रताडि़त करते हैं। ऐसे सारे ही हमलावर लोगों के हाथ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस नाम का एक और हथियार लग गया है। लेकिन इस बात को अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि इस साल भर के पहले भी ये हमलावर तो कोई दो दशक से मौजूद ही हैं, और खुलकर साम्प्रदायिक नफरत फैला रहे हैं, किसी महिला जर्नलिस्ट को प्रेस्टीट्यूट लिख रहे हैं, और उसे प्रॉस्टीट्यूट के बराबर रख रहे हैं। तो आज संसदीय समिति ने एआई को लेकर जो फिक्र जाहिर की है, वह दरअसल पिछले दशकों में खड़ी हुई इस हमलावर-‘बलात्कारी-हत्यारी’ फौज को लेकर होनी चाहिए थी। अब तक लोग बिना एआई के जो जुर्म कर रहे थे, उस जुर्म में अब एआई की मदद और जुड़ गई है, तो उसकी वजह से पहली बार उसे जुर्म मानना भोलेपन की नासमझी अधिक दिखती है। अगर इस देश में ऐसे ट्रोल करने वाले ‘बलात्कारी-हत्यारे’ पहले से काबू में किए गए रहते, वे जेल भेजे गए रहते, तो लोग ऐसी सार्वजनिक धमकियां देने को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानकर नहीं चलते रहते। अब जब लोग जहरीली-नफरती हिंसा फैलाने के आदी हो चुके हैं, और उस पर आज भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है, तो फिर महज एक तकनीक को कोसना हास्यास्पद लगता है। एआई के आगमन के पहले तक जो लोग जुबानी बलात्कार-कत्ल करने में सार्वजनिक रूप से फख्र हासिल करते थे, उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि देश और प्रदेशों की सरकारें उनके खिलाफ कुछ नहीं करेंगी। ऐसे में सिर्फ एआई को लेकर, या सिर्फ फेक न्यूज को लेकर फिक्र जाहिर करना पत्तों के इलाज के लिए दवा छिडक़ने जैसा है, क्योंकि उस पेड़ की जड़ों को तो पानी से सींचा ही जा रहा है।
न सिर्फ लोकतंत्र, बल्कि किसी भी तंत्र के तहत चलने वाला देश या समाज इस तरह टुकड़े-टुकड़े में सोचकर कतरे-कतरे में कार्रवाई नहीं कर सकता। लोगों की सोच को अलोकतांत्रिक, अमानवीय, और हिंसक करते चले जाना, और फिर उनसे यह उम्मीद करना कि वे एआई जैसे औजार का इस्तेमाल न करें, यह बचकानी बात है। कातिल की हत्यारी-सोच को रोकने की जरूरत है, उसके विकसित हो जाने के बाद उसे यह सिखाना कि वह लाल हत्थे के चाकू से कत्ल न करे, यह किस काम का रहेगा? लोकतंत्र एक जटिल व्यवस्था है, इसमें लोगों की सोच को कानून का सम्मान करने का बनाया जाना चाहिए, उन्हें यह नहीं सिखाया जा सकता कि कानून के एक से सोलह तक के पेज अनदेखा करके उन्हें तोडऩा जायज है, और सोलह से बत्तीस पेज के कानूनों का सम्मान करना जरूरी है।
चिकित्सा विज्ञान की नई खबर है कि सुअर की किडनी इंसानों में लगाने के लिए अमरीका में क्लिनिकल ट्रॉयल की मंजूरी मिल गई है। इस तकनीक में सुअर में कुछ डीएनए बदलाव करके उसे इंसानों के लायक बनाया जाता है, और फिर उनके अंग निकालकर जरूरतमंद इंसानों में लगाए जाते हैं। आज किडनी की जरूरत वाले इंसानी-मरीजों की कतार अगले कई साल के लिए लगी हुई है। किडनी की उपलब्धता कम रहती है, और मरीज उससे कई गुना अधिक रहते हैं। फिर आधुनिक जीवनशैली के चलते हुए तरह-तरह की बीमारियां बढ़ती चली जानी है, और दानदाताओं से या परिवार के सदस्यों से मिलने वाले अंग उस मांग को पूरा नहीं कर पाएंगे। आज भी नहीं कर पाते हैं। भारत में तो भला हो महिलाओं का जिनकी वजह से पुरूष मरीजों को अंग मिल जाते हंैं। आज की खास बात से थोड़ा अलग हटकर यह चर्चा जरूरी है कि भारत में 90 फीसदी अंगदान महिलाओं से आता है, लेकिन अंगदान पाने वालों में कुल 10 फीसदी महिलाएं हैं। मतलब यह कि पुरूष सिर्फ परिवार की सदस्य महिलाओं का फायदा उठाते रहते हैं।
अब हम एक बार फिर जेनोट्रांसप्लांटेशन पर आ जाए, जो कि एक प्राणी से दूसरे तरह के प्राणी में अंग प्रत्यारोपण के लिए बनाया गया शब्द है। इसमें सबसे अधिक संभावना आज सुअर के अंग इंसानों में लगने की दिख रही है। शरीर विज्ञान के हिसाब से सुअर के अंग आकार, आंतरिक ढांचे, और कामकाज के हिसाब से इंसानों के अंगों से बहुत मिलते-जुलते हैं। यह अलग बात है कि इंसान गाली बकने के लिए दूसरे बुरे, या गंदे लोगों को सुअर कहकर गाली देते हैं। अब पता नहीं आने वाले बरसों में जब बहुत से लोग सुअर की किडनी, लिवर, या दिल लगाकर घूमेंगे, तो उनके आसपास के लोग सुअर की गाली देना बंद कर पाएंगे या नहीं। फिलहाल तो यह है कि चिकित्सा वैज्ञानिकों ने अंग निकालने के लायक सुअर में उनके जींस की एडिटिंग करके उनमें इंसान के जींस डालकर उन्हें इस लायक तैयार किया है कि जब उनके अंग इंसानों में लगाए जाएं, तो इंसानी शरीर उसे खारिज न कर दे। अंग प्रत्यारोपण में यह सबसे बड़ी समस्या रहती है कि मरीज का शरीर नया अंग पाने के बाद उसे स्वीकार नहीं कर पाता, और खारिज कर देता है। ऐसे में किसी मरीज के लिए छांटे गए सुअर को जब पहले से उस इंसान के लायक तैयार किया जाएगा, तो इंसानी शरीर उस सुअर के अंग को विदेशी अंग मानकर खारिज नहीं करेगा।
इंसान वैसे भी अपनी जरूरत के लिए धरती के अधिकतर किस्म के जानवरों को खा लेते हैं। भारत जैसे देश में कुछ राज्यों में गाय खाने पर रोक है, दुनिया के बहुत से देशों में वन्यप्राणी का दर्जा प्राप्त जानवरों को मारने और खाने की छूट नहीं है। लेकिन सुअर को तो इंसानी खानपान के लिए बड़े पैमाने पर पाला जाता है, और गैरमुस्लिमों के बीच यह खासा लोकप्रिय है। ऐसे में इंसान के बदन की जरूरतों के लिए अगर सुअर के अंग निकाले जाते हैं, तो इससे न तो गाय सरीखी कोई धार्मिक भावना प्रभावित होती है, न ही वह वन्यप्राणी है, और न ही सुअर का किसी और किस्म का महत्व है। इसलिए जिन मुस्लिमों के बीच सुअर को अपवित्र माना जाता है, उन्हें छोड़ दें, तो बाकी लोगों को अपनी जिंदगी बचाने के लिए किसी जानवर के अंग लगवाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। आज भी इंसान, शाकाहारी इंसान भी जानवरों के कई तरह के हिस्सों से बनी हुई दवाईयां खा-पी लेते हैं, वे इस बात को अनदेखा कर जाते हैं कि वे गैरशाकाहारी चीज खा रहे हैं। जब जान बचाने की नौबत आती है तो अधिकतर लोग धार्मिक और दूसरी नैतिक मान्यताओं से समझौता कर लेते हैं। इसलिए अपने बदन के भीतर सुअर का एक हिस्सा लेकर चलना भी लोग सीख ही जाएंगे।
हाल के बरसों में अमरीका में जिन मरीजों में सुअर की किडनी लगाई गई, वो महीनों बाद तक जिंदा रहे, और उनमें से कुछ की मौत किसी दूसरी वजह से हुई, प्रत्यारोपित किडनी की वजह से नहीं। अब मानव-परीक्षण की इस नई इजाजत के बाद अमरीका में दर्जनों मरीजों को सुअर की किडनी लगाकर एक नई जिंदगी दी जाएगी, चिकित्सा विज्ञान को इतने प्रयोगों की वजह से काफी कुछ सीखने भी मिलेगा। 2022 में ही एक इंसानी मरीज को जीन-एडिटेड सुअर का दिल लगाया गया था, जो दो महीने तक चला था। प्रारंभिक प्रयोगों में ये दो महीने भी कम नहीं होते हैं, और इनसे सीखकर चिकित्सा विज्ञान आगे बेहतर काम करने के लायक हो जाएगा।
अमरीका के एक विश्वविद्यालय में सैकड़ों छात्र-छात्राओं के बीच एक खुली बहस में एक बड़े ट्रम्प-समर्थक और अमरीका के जाने-माने संकीर्णतावादी वक्ता और आंदोलनकारी चार्ली किर्क को एक नौजवान ने गोली मार दी। चार्ली किर्क ने बहुत पहले टर्निंग प्वाइंट यूएस नाम की एक संस्था बनाई थी, और वह स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालयों में उदारवादी सोच के खिलाफ संकीर्णतावादी सोच को पेश करने के अभियान में लगे रहता था। इस अभियान के लिए वह नफरत फैलाने की तोहमतें भी झेलता था, और बंदूकों से हर बरस अमरीका में होने वाली मौतों की कीमत पर भी वह बंदूकें रखने की आजादी की खुली वकालत करता था। जिस वक्त उसे विश्वविद्यालय में यह गोली मारी गई, उस पल भी वह बंदूकें रखने की आजादी की वकालत कर रहा था, बेकसूरों के कत्ल की कीमत पर भी। अमरीका में ऐसा माना जाता था कि कुछ राज्यों में चार्ली किर्क के रूढि़वादी अभियान ने ट्रम्प को चुनाव जीतने में मदद की। जाहिर है कि इस हत्या की खबर मिलते ही ट्रम्प ने राष्ट्रपति भवन में झंडा झुकवा दिया था, और किर्क को महान व्यक्ति करार दिया।
अमरीका का मीडिया किर्क के दिए गए नफरती, हिंसक, भेदभाव वाले, प्रवासी विरोधी, ट्रांसजेंडर विरोधी, और महिला विरोधी बयानों को अच्छी तरह दर्ज करता था। चार्ली किर्क की संस्था खुली बहस की वकालत करती थी, और इस बहस के दौरान, या इसके नाम पर यह गोरा अमरीकी लगातार नफरत की बातें फैलाता था। वह खुलेआम मंच और माईक पर कहता था कि अगर वह किसी उड़ान में किसी काले पायलट को देखता है, तो यही मनाता है कि वह ठीकठाक सीखा हुआ हो। इसी तरह सरहदी राज्यों में पड़ोस के देशों से आकर काम करने वाले मजदूरों के खिलाफ उसके बयान थे कि यह स्थानीय आबादी को बदल देने की एक रणनीति चल रही है ताकि गोरे-ग्रामीण अमरीका को बदल दिया जाए। महिलाओं और ट्रांसजेंडरों के खिलाफ, अल्पसंख्यकों के खिलाफ उसके बहुत से बयान आते थे, और उनकी वजह से भी वह अमरीका के संकीर्णतावादियों के बीच बड़ा मशहूर था।
हालांकि अभी नेपाल की घटनाओं को लेकर कुछ लोग भारत में भी यह बात कह रहे हैं कि इस देश को ऐसी हिंसा से अछूता रहना चाहिए, लेकिन भारत के नेताओं को नेपाल की घटनाओं से सबक लेना चाहिए जिनमें भ्रष्टाचार और कुनबापरस्ती, काली कमाई का अश्लील और हिंसक प्रदर्शन निशाने पर थे। हमने भी इसी जगह संपादकीय में, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल के वीडिटोरियल में भी इस बात की वकालत की थी कि दुनिया के तमाम देशों को दूसरे देशों की ऐसी घटनाओं से सबक लेना चाहिए। अमरीका में अपार बंदूकें रखने की असीमित छूट की वकालत करने वाले लोगों में से एक, चार्ली किर्क को इन्हीं आखिरी शब्दों के बीच एक नौजवान ने गोली मार दी। बाद में जब इस नौजवान की कुछ शिनाख्त के साथ उसकी तलाश शुरू हुई, तो उसके परिवार ने ही उसकी खबर जांच एजेंसियों को की, और यह बताया कि यह गोरा नौजवान किर्क की नफरती बातों को लेकर परेशान था, और हाल ही में एक घरेलू रात्रिभोज के दौरान उसने चार्ली किर्क के बयानों को लेकर कहा था कि वह नफरत फैला रहा है। यह पूरा परिवार ट्रम्प समर्थक है, लेकिन उनके बीच के इस नौजवान को इस आंदोलनकारी की हिंसक और नफरती बातें परेशान कर रही थीं।
जब हम अमरीका की इस हत्या के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि अंधाधुंध हथियारों का समर्थन, और नफरती हिंसा को बढ़ावा किस तरह ऐसे लोगों के लिए आत्मघाती साबित हो सकते हैं। जो राष्ट्रपति का बड़ा ही चहेता हो, और राष्ट्रपति के पास जिसके गुणगान के लिए बहुत कुछ हो, उसके लिए भी अमरीका के घर-घर में फैली हुई बंदूकों में से एक बंदूक की एक गोली ही काफी साबित हुई, और 22 बरस के नौजवान हत्यारे को चार्ली किर्क की बातें ही परेशान कर रही थीं। इस नौजवान ने यह भी परवाह नहीं की कि उसके राज्य में ऐसी हत्या पर मौत की सजा हो सकती है। एक संपन्न परिवार के इस नौजवान ने पिछले दो चुनावों में वोट नहीं डाला था, वह राजनीतिक रूप से सक्रिय भी नहीं था, और यह नौजवान चर्च का एक धर्मालु सदस्य भी था। स्कूल की एक राष्ट्रीय परीक्षा में उसने 99 फीसदी नंबर हासिल किए थे, और उसे यूनिवर्सिटी के लिए एक बड़ी प्रतिष्ठित स्कॉलरशिप भी मिली थी। वह शांत रहता था, हिंसा का उसका कोई इतिहास नहीं था, लेकिन पारिवारिक खाने पर ट्रम्प-समर्थक इस परिवार में यह बात हुई थी कि चार्ली किर्क नफरत से भरा हुआ है, और वह नफरत फैला रहा है।
ऐसा एक भी दिन नहीं गुजर रहा जब अखबारों में साइबर धोखाधड़ी की दर्जन भर अलग-अलग किस्मों की खबरें न हों। अब जालसाजी और धोखाधड़ी का एक नया तरीका सामने आया है, लोगों के पास ट्रैफिक चालान का मैसेज आता है, और लोग उसके साथ के लिंक को क्लिक करते हैं ताकि देख सकें कि किस बात का चालान है, कब का चालान है, और क्लिक करते ही उनके फोन से जुड़े हुए बैंक खाते खाली हो जाते हैं। इस लिंक से कोई ऐसा स्पाइवेयर फोन में आ जाता है जो कि उसकी जानकारी हैकरों तक पहुंचा देता है। आज लोग दस-बीस रूपए तक की मामूली खरीदी का भी मोबाइल फोन से भुगतान करते हैं, और भुगतान के एप्लीकेशन बैंक खातों से जुड़े रहते हैं, फोन पर लोग सीधे मोबाइल बैंकिंग भी करते हैं। इसके पहले से जो दूसरा तरीका ठगों के बीच बड़ा लोकप्रिय है, वह किसी के फोन पर आए ओटीपी को पूछना, और ओटीपी बताते ही बैंक खाते खाली हो जाते हैं।
देश की आबादी के बहुत बड़े हिस्से के पास इन दिनों स्मार्टफोन है, और आधार कार्ड तो तकरीबन हर किसी के पास है। बहुत बड़ी संख्या में लोग ऐसे हैं जो कि मोबाइल बैंकिंग, या दूसरे भुगतान तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। दसियों करोड़ लोग ऑनलाईन खरीदी करते हैं, और डिलिवरी करने आने वाले लोगों को बताने के लिए कंपनी ओटीपी भेजती है। आधार कार्ड के उपयोग पर सरकार की तरफ से ओटीपी आता है, बिजली विभाग या राशन विभाग की तरफ से ओटीपी आते हैं। कुल मिलाकर जिंदगी के हर छोटे-बड़े काम के लिए इन दिनों मोबाइल फोन पर तरह-तरह से संदेश आते हैं, लिंक आते हैं, और ओटीपी आते हैं। आम लोगों की बात तो छोड़ दें, जो बड़े-बड़े अफसर रहे हुए हैं, वे भी जालसाजों की तरकीबों को नहीं समझ पाते, और उनका मोबाइल फोन पल भर में उनके औजार से बढक़र, उनके अपने खिलाफ एक हथियार बन जाता है, और उनके बैंकों में जमा रकम को जालसाजों के खातों में डाल देता है। बहुत से लोग किसी फोन दुकान पर जाकर, या मोबाइल कंपनी के सर्विस सेंटर जाकर अपने फोन को सुधरवाते हैं, या समझते हैं, और दुकान के लोग कुछ भी डाउनलोड करते हुए हर तरह की मंजूरी देते चलते हैं। लोग खुद जितने एप्लीकेशन इस्तेमाल करते हैं, उसके लिए वे सैकड़ों तरह की मंजूरी दे चुके रहते हैं। अब इनमें से कौन-कौन सी चीजें हैकरों के काम आती हैं, कहां-कहां बनाए गए पासवर्ड लीक हो जाते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। लोग मोबाइल फोन, और सरकारी या कारोबारी कामकाज पर इतने आश्रित हो गए हैं कि वे इनके बिना एक दिन भी गुजार नहीं सकते, और कामकाज की व्यस्तता इतनी रहती है, समझ इतनी कम रहती है कि वे किसी खतरनाक जाल में फंस जाते हैं।
आम जनता का ही ऐसा हाल होता हो, वह भी नहीं है। अभी पिछले दो महीनों में हमारे ही शहर में दो अलग-अलग बैंकों में वहां के बड़े खातेदारों के बारे में एक नकली संदेश भेजकर, या नकली चिट्ठी भेजकर लोगों के खातों से दसियों लाख रूपए दूसरे खातों में ट्रांसफर करवा दिए गए। बैंक अफसरों ने यह काम या तो साजिश में हिस्सेदारी के साथ किया, या परले दर्जे की नालायकी से किया। बैंकों के जो आम नियम हैं, उनको तोड़ते हुए इतनी बड़ी-बड़ी रकम भेजी गई कि अफसरों को इतनी नासमझी या मासूमियत की छूट नहीं दी जा सकती। लेकिन यह भी तय है कि किसी भी खातेदार की इतनी बड़ी रकम गायब हो जाने का पता तो उन्हें चलना ही था, और ऐसे दो मामलों में बैंक अफसर अभी फंसे हुए हैं। चारों तरफ बैंक अफसर बड़े गरीब-गरीब लोगों के नाम से खोले गए फर्जी बैंक खातों, और फिर ऐसे खच्चर-खातों में मूसलाधार बारिश की तरह बरसने वाले करोड़ों रूपयों को अनदेखा करने के मामले में भी गिरफ्तार होते चल रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब बैंकों की साख मिट्टी में मिल चुकी है, वे हर तरह के धोखेबाजों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, हैकर तरह-तरह के पासवर्ड पा जा रहे हैं, तो फिर आम जनता जालसाजी से बच कैसे सकती है? एक सवाल यह भी उठता है कि हर तरह के कामकाज को बैंकों के मार्फत करना, और डिजिटल तरीके से करना सरकार ने ही अनिवार्य किया हुआ है। आज लोग ऐसी टेक्नॉलॉजी की अधिक समझ नहीं रखते हैं। फिर हर कामकाज के लिए आधार कार्ड, ओटीपी का इस्तेमाल, ऑनलाईन ट्रांजेक्शन लोग कर तो रहे हैं, लेकिन अपनी रकम और निजता की हिफाजत करने की समझ उनमें नहीं है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया खातों के लिए लोग तरह-तरह के पासवर्ड और ओटीपी इस्तेमाल करते हैं, जिनके खतरे भी उनको नहीं मालूम है। आज लोग दस-बीस रूपए का किराना, या दो कप चाय भी मोबाइल ऐप से ऑर्डर करके बुलाते हैं, उसका भुगतान करते हैं, और ओटीपी बताकर डिलिवरी लेते हैं।
छत्तीसगढ़ में सडक़ों पर मवेशियों का गाडिय़ोंतले मरना एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। चूंकि इन जानवरों में अधिकतर गौवंशी हैं, इसलिए उनकी मौत ऐसे सडक़ हादसों में मरने वाले इंसानों के मुकाबले कुछ अधिक धार्मिक भावनाएं जगाती हैं। गाय के नाम पर लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं, मरते तो कोई नहीं हैं, मार कई जगह देते हैं। इसलिए सडक़ों पर गौवंश का कुचला जाना, अगर हादसे में गाड़ीवालों की मौत न हो, तो भी उन्हें पीटकर तो मारा ही जा सकता है। इसलिए आवारा मवेशी लिखने पर जिन लोगों की भावनाएं लहूलुहान हो जाती हैं, वे लोग लहूलुहान सडक़ों पर बिखरी गायों, और गोवंश की लाशों का कोई इलाज नहीं ढूंढ पाते हैं। अब कल ही छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में रायपुर-जबलपुर नेशनल हाईवे पर एक तेज रफ्तार वाहन ने 12 मवेशियों को रौंद दिया, और गाड़ी भाग निकली। सडक़ पर बिखरी हुई लाशों को देखने से समझ पड़ता है कि ये गाय और उसके परिवार के ही मवेशी रहे होंगे। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सडक़ों पर से जानवरों को हटाने के लिए लगातार सुनवाई कर रहा है, सरकार को कटघरे में खड़ा कर रखा है, लेकिन सरकार है कि वह आवारा मवेशियों के लिए कोई कटघरे नहीं बनवा पा रही है। दिखावे के लिए कभी पुलिस तो कभी आरटीओ अधिकारी सडक़ के जानवरों के गलों में रात में चमकने वाले टेप को पट्टे की तरह बांध देते हैं, लेकिन इन जानवरों के जो इंसानी मालिक हैं, उनकी गिरफ्तारी शायद पूरे प्रदेश में दो-तीन मामलों में ही हो पाई है। अगर देश के कानून के मुताबिक, हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक, और जनता की हिफाजत का ख्याल रखकर राज्य सरकार कार्रवाई करती, तो हर शहर-कस्बे से दो-चार लोग गिरफ्तार हुए रहते, और गिरफ्तारी की दहशत में ही लोग अपने जानवरों को अपने घर के भीतर कर लेते। लेकिन गौवंशी जानवरों को लेकर जनता की भावनाओं को दुहने से अधिक और कुछ होते नहीं दिखता है, न उनके लिए बाड़े बन पाए, न उनकी जिंदगी बचाने का कोई भी इंतजाम है। सडक़ों पर थोक में जानवर मारे जाते हैं, और इस बार तो उस कवर्धा में ये मौतें हुई हैं जो कि प्रदेश के डिप्टी सीएम, और गृहमंत्री, और हिन्दुत्व के झंडाबरदार विजय शर्मा का इलाका है। प्रदेश के सडक़ हादसों में न तो बोरियों और बकरियों की तरह ढोए जाते इंसानों की मौतें थम रही हैं, और न ही सडक़ पर छोड़ दी गई गायों की।
किसी प्रदेश में सिर्फ सडक़-पुल, रेल और प्लेन की आवाजाही का ढांचा मायने नहीं रखता, कानून व्यवस्था कैसी है, सडक़ सुरक्षा कैसी है, यह भी मायने रखता है। दूसरे प्रदेशों से जो पर्यटक यहां आते हैं, या पूंजीनिवेशक अगर यहां आते हैं तो उन पर भी सडक़ों के हाल का असर सबसे पहले होता है। सबसे पहले वे स्थानीय अखबारों को देखते हैं कि इस प्रदेश में कानून व्यवस्था का हाल कैसा है, हादसे किस किस्म के होते हैं, जुर्म कैसे-कैसे हो रहे हैं। इसके बाद ही वे यहां अधिक घूमना-फिरना, या कोई कारोबार शुरू करना सोचते हैं। सरकार एक तरफ तो देश-विदेश से पूंजी जुटाने की कोशिश करती है, दूसरी तरफ म्युनिसिपल और जिला प्रशासन, जिला पंचायत और पुलिस के हवाले जो जिम्मा है, उसमें कमी रहने पर वह सिर्फ स्थानीय लोगों को नहीं खटकती बल्कि बाहर से आए हुए लोगों को भी खटकती है। किसी प्रदेश के सुरक्षित होने का मतलब सिर्फ लुटेरों से सुरक्षित होना नहीं रहता, वह सडक़ का सफर सुरक्षित रहना भी रहता है। छत्तीसगढ़ में सडक़ हादसों में कोई कमी आ नहीं रही है, और मौतें बहुत बड़ी संख्या में हो रही हैं।
दुनिया में कई बड़ी घटनाओं के पीछे साजिश होने की सोच भी बहुत से लोगों की रहती है। कोरोना का वायरस कहां से निकला, कैसे फैला, इसे लेकर भी लोगों की तरह-तरह की साजिश की कल्पनाएं थी। इसके बाद अमरीका के आज के स्वास्थ्य मंत्री ने भी कोरोना के उस दौर में वैक्सीन का विरोध किया था कि उससे कई दूसरी बीमारियां फैल रही हैं। इस बार रॉबर्ट कैनेडी (जूनियर) को स्वास्थ्य मंत्री बनते हुए संसदीय कमेटी की सुनवाई में मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ा था। खैर, वह तो पुरानी बात हो गई, पूरी दुनिया में लोग तरह-तरह की साजिशों की कल्पना के साथ जीते हैं क्योंकि वह बहुत सनसनीखेज रहती हैं। दूसरी तरफ कई साजिशें सच भी साबित होती हैं। अब पिछले दो दिनों में नेपाल में जो हुआ है, वह दुनिया के इतिहास में एक बिल्कुल ही अलग किस्म की घटना है, और कुल दो-चार दिनों के आंदोलन में जिस तरह पूरी सरकार को उखाड़ फेंका है, देश के बड़े-बड़े नेताओं, कई मंत्रियों, और भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों के घरों को जला डाला गया, एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी को घर में ही जिंदा जला दिया गया, संसद को आग लगा दी गई, वह सब कुछ हैराने करने वाला था। कल ही हमने इसी जगह पर कल दोपहर तक की घटनाओं को लेकर लिखा था, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर उसके कुछ घंटे बाद कहा भी था। अब आज सुबह एक बिल्कुल ही नई साजिश की थ्योरी सामने आई है, जो कि अधिक लोगों के दिमाग में नहीं रही होगी। अभी हमारे बहुत ढूंढने पर भी इस लेख का कोई स्रोत हमें नहीं मिला है, इसलिए हम बिना किसी नाम के इस साजिश की कल्पना को यहां सामने रख रहे हैं।
सोशल मीडिया के पीछे उनकी कंपनियों के जो एल्गोरिदम काम करते हैं, उसके जानकार एक व्यक्ति ने लिखा है कि पिछले तीन सालों में भारत के तीन पड़ोसी देशों, श्रीलंका (2022), बांग्लादेश (2024), और अब नेपाल (सितंबर 2025) में यह बात सामने आई है कि सोशल मीडिया किस तेजी से गुस्से को सडक़ की ताकत में बदल सकता है, और किसी देश की सुरक्षा व्यवस्था न उसे काबू कर सकती, न उसे जवाब दे सकती। इस लेख में आगे लिखा गया है कि नेपाल में नेताओं के परिवारों की ऐशोआराम की जिंदगी को लेकर सोशल मीडिया पर जो पोस्ट चल रही थी, उन्होंने नौजवानों में, खासकर बेरोजगार नौजवानों में बड़ा गुस्सा भरा था, और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम में ऐसी पोस्ट को, और कुल मिलाकर उससे उपजे गुस्से को अंधाधुंध बढ़ाया। लेख में यह सवाल उठाया गया है कि क्या इन तीन देशों के सोशल मीडिया से उपजे असंतोष को किसी प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया गया है? लेख में बड़ी बारीकी से बयान किया गया है कि जब किसी आंदोलन को भडक़ाने का फैसला सोशल मीडिया के कम्प्यूटरों के एल्गोरिदम करते हैं, तो लाखों उंगलियां हजारों लाठियों से ज्यादा ताकतवर साबित होती हैं। बांग्लादेश में जुलाई 2024 में शेख हसीना के खिलाफ जो बगावत हुई, उसमें भी सोशल मीडिया ने ही आंदोलन को हवा दी, छात्रों के पेज, और दूसरे देशों में बसे हुए बांग्लादेशियों के यूट्यूब चैनलों को खूब बढ़ाया गया, और आंदोलन में सत्ता पलट कर दी। इसके पहले 2022 में श्रीलंका में भी सोशल मीडिया ने यही किया था, और सत्ता पलट के जरा पहले सरकार ने इसे भांपकर सोशल मीडिया पर बैन लगाया था, लेकिन वहां से भी राष्ट्रपति को देश छोडक़र भागना पड़ा था। इस लेख में इन तीनों देशों, और खासकर नेपाल का बारीकी से विश्लेषण हुआ है कि घंटे-घंटे में वहां क्या-क्या हुआ, किस तरह 36 घंटे में पूरी सरकार गिर गई। इस लेख में बाकी देशों को नसीहत दी गई है कि लाठी तो सरकार की है, लेकिन सोशल मीडिया पर रफ्तार किसी और की है।
अभी हम इसकी सच्चाई पर नहीं जाते, लेकिन हम इसे एक अटकल या एक कल्पना मानते हुए यह जरूर देखते हैं कि जो सोशल मीडिया अमरीकी राष्ट्रपतियों के चुनाव के वक्त रूस के असर में काम करने की तोहमत झेलता है, जो फेसबुक भारत के चुनावों में किसी एक पार्टी या नेता, या विचारधारा के इश्तहार सोची-समझी रणनीति से अधिक दिखाता है, वह सोशल मीडिया क्या अब कुछ ताकतों के हाथों में हथियार बनकर किसी कमजोर लोकतंत्र में सत्तापलट करवाने जितना मजबूत हो चुका है? वैसे भी आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लोकतंत्र को प्रभावित करने, लोगों के चुनावी रूझान को पलट देने की ताकत वाला बताया जाता है। यह बात भी बार-बार आती है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अपने मालिकों के हाथ में एक हथियार अधिक रहेगा, और औजार कम। नेपाल में सोशल मीडिया पर बैन को लेकर जिस तरह वहां नौजवान पीढ़ी में बेचैनी भडक़ी, उसकी दुनिया में कोई दूसरी मिसाल नहीं है। इसलिए आज ऐसी किसी आशंका को, ऐसे खतरे को बारीकी से देखने-समझने की जरूरत है कि दुनिया के किसी कोने में बैठे हुए कुछ लोग सोशल मीडिया कारोबारियों के साथ मिलकर, एआई का इस्तेमाल करके किसी देश में नफरत, हिंसा, बेचैनी को क्या इस हद तक बढ़ा सकते हंैं कि वहां गृहयुद्ध छिड़ जाए, या वहां सत्ता पलट जाए?
कल सोमवार का दिन नेपाल में एक अलग किस्म की क्रांति का रहा, जेन-जी कही जाने वाली नौजवान पीढ़ी के 25 बरस तक उम्र के लोग सरकार के खिलाफ न सिर्फ सडक़ों पर थे, बल्कि उन्होंने संसद-परिसर में भी भीतर जाकर प्रदर्शन किया, और सरकार में भ्रष्टाचार का विरोध किया, सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ नेपाल के इतिहास का सबसे बड़ा आनन-फानन हुआ जनप्रदर्शन दर्ज किया। नौजवान पीढ़ी वहां बेरोजगारी से त्रस्त है, वह रात-दिन यह देखती-सुनती है कि सत्तारूढ़ तबका किस तरह और किस हद तक भ्रष्ट है, और उसके आल-औलाद अपनी रईसी के फोटो-वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहते हैं। ‘टैक्स हमारा, रईसी तुम्हारी’ के नारे के साथ नौजवानों ने वहां ऐसा भयानक प्रदर्शन किया कि उसे रोकने की कोशिश में सरकारी कार्रवाई ने 19 लोगों की मौत हो चुकी है, और नौजवानों का भयानक आक्रोश देखते हुए तीन मंत्रियों के इस्तीफे हो चुकी है। और आज की नौबत सरकार की गिरने सरीखी है। वहां के दो भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों सहित इस्तीफा देने वाले मंत्रियों के घरों में तोडफ़ोड़ और आगजनी की गई है। इस्तीफा देने वाले एक मंत्री ने यह कहा है कि सवाल पूछने वालों का दमन करना गलत है। दो शब्दों में कहें तो नौजवान पीढ़ी का यह आंदोलन पिछले ही हफ्ते हर किस्म के सोशल मीडिया पर सरकार की लगाई गई रोक से विस्फोट की तरह शुरू हुआ, वरना उसके पहले भी वह लंबे समय से सोशल मीडिया पर भ्रष्ट सत्ता और सत्ता की भ्रष्ट औलादों की रईसी की आलोचना करते हुए जारी था।
एक दिलचस्प बात यह है कि नेपाल बीते कुछ बरसों से वहां 2008 में खत्म हुई राजशाही की बहाली का आंदोलन भी देख रहा है। वह एक अलग आंदोलन है, और कल के जेन-जी पीढ़ी के इस ताजा आंदोलन से उसका कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन दोनों ही आंदोलन सरकार के खिलाफ जनता की भारी बेचैनी के हैं। एक विश्लेषण में इन दोनों आंदोलनों को अलग-अलग पटरियों पर साथ-साथ एक ही दिशा में दौड़ती हुई दो रेलगाडिय़ों की तरह माना गया है जो कि एक ही तरफ जा रही है। राजतंत्र समर्थक आंदोलन इस बरस मार्च के महीने में फिर जोर पकड़ चुका है, और उसमें राजा की बहाली, और नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग हो रही है। राजतंत्र खत्म होने के दो दशकों के भीतर नेपाल ने माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन भी देख लिया है, और उससे जनता अब थक चुकी है, उसके खिलाफ उठ खड़ी हुई है। एक तरफ राजतंत्र का दमन का बहुत पुराना और बड़ा लंबा इतिहास रहा है, और दूसरी तरफ माओवादी सरकार के प्रधानमंत्री भी लगातार तानाशाह होते चले जा रहे थे, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ तरह-तरह की कार्रवाई कर रहे थे। 4 सितंबर को उनकी सरकार ने 26 अलग-अलग सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया था, और नौजवान पीढ़ी को लगा कि अब उसके पास अपनी आवाज उठाने का कोई जरिया नहीं रह गया है। नेपाल की एक अदालत ने सोशल मीडिया पर नियंत्रण के लिए नियम-कानून बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन उसका गलत मतलब निकालकर सरकार ने उस पर पूरी रोक ही लगा दी, और कल के आंदोलन के बाद वह रोक हटा भी दी गई है। कल की पुलिस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार गृहमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है, और कल की मौतों और घटनाओं की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई है।
नेपाल की घटनाओं का और अधिक विश्लेषण हमसे अधिक जानकार विशेषज्ञ करते रहेंगे, और उन्हें हम इसी संपादकीय पेज पर देते भी रहेंगे। लेकिन यहां दो चीजें देखने-समझने लायक हैं। लंबे राजतंत्र को उखाड़ फेंकने वाले नेपाल ने वामपंथी और मध्यमार्गीय, मिलेजुले शासन को देखने के बाद अब एक बार फिर राजतंत्र और हिन्दू राष्ट्र की बहाली का आंदोलन देखा है। यह एक जटिल नौबत है जिसे सिर्फ राजनीतिक विचारधारा, और व्यवस्था खारिज करने की भाषा में हम देखना नहीं चाहते। ऐसे अतिसरलीकरण से बचते हुए हम अभी सिर्फ यही कहेंगे कि माओवादियों की खुद की, और गठबंधन सरकार शासन व्यवस्था में इतनी असफल रही है कि आबादी के एक हिस्से को ताजा-ताजा खोए हुए राजतंत्र की हसरत फिर से हो रही है। फिर नेपाल में अगर हिन्दू राष्ट्र का दर्जा फिर से कायम करने की मांग हो रही है, तो इसे दुनिया के कुछ बिल्कुल ही अलग हिस्सों में, बिल्कुल ही अलग वजहों से देखे जा रहे दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी धार्मिक उभार से जोडक़र देखने की जरूरत है। चाहे भ्रष्टाचार और कमजोर शासन की वजह से हो, या किसी और वजह से, नेपाल आज राजा और धर्म की तरफ वापिस जाना चाहता है, और जिस नौजवान पीढ़ी ने न राष्ट्रीय धर्म देखा, न राजतंत्र देखा, वह बिल्कुल ही अलग मुद्दों को लेकर इस सरकार को उखाड़ फेंकना चाहती है। दो अलग-अलग, लेकिन मजबूत, आंदोलनों से गुजरते हुए नेपाल से भारत के हित गहराई से जुड़े हुए हैं क्योंकि भारत और चीन दोनों ही नेपाल को अपने पाले में बनाए रखना चाहते हैं, और हाल के बरसों में नेपाल के भारत से रिश्ते खराब ही हुए हैं। रिश्ते खराब होने के बावजूद नेपाल में लाखों भारतीय बसे हैं, और हजारों भारतीय कारोबारी वहां की अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं। दूसरी तरफ नेपाल के लोग बिना किसी नागरिकता के भी भारत में रहने, और कामकाज करने, नौकरी करने का हक रखते हैं, इस तरह दोनों देशों में एक-दूसरे के नागरिकों की बड़ी मौजूदगी, और अर्थव्यवस्था में उनकी हिस्सेदारी की वजह से मामला बड़ा जटिल है। नेपाल में तो भारत की करेंसी भी चलती है, और जब भारत में नोटबंदी हुई थी तो नेपाल में लोग खासी मुश्किल में भी आ गए थे। इसलिए नेपाल की आज की स्थिति को देखना, और अपने हित में काम करना भारत के लिए भी जरूरी है क्योंकि वह हाल के बरसों में पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, और म्यांमार से रिश्ते बिगाड़ चुका है। यह महज संयोग की बात नहीं है कि चीन ने इन तमाम देशों से तरह-तरह के गहरे रिश्ते बनाए हैं, और भारत के इर्द-गिर्द यह चीनी मोतियों की एक माला सरीखी बन गई है।
मध्यप्रदेश में अभी अनूपपुर के पास एक गांव में 60 साल के एक आदमी की लाश कुएं में मिली, तो पुलिस ने जल्द ही मामले को सुलझा लिया, और हत्यारों को गिरफ्तार किया। इस आदमी की तीसरी बीवी ने अपने प्रेमी और उसके साथी के साथ मिलकर पति को मारा था, और इस कुएं में डाल दिया था। पति की कहानी भी बड़ी दिलचस्प थी। जब पहली बीवी घर छोडक़र चली गई, तो उसने पत्नी की छोटी बहन से शादी कर ली। फिर जब उससे कोई संतान नहीं हुई, तो उसने इन दोनों बहनों की एक और तीसरी बहन से शादी कर ली। घर पर एक जमीन दलाल का आना-जाना था, उससे इस तीसरी पत्नी के रिश्ते बन गए। आखिर में उसने प्रेमी और उसके एक साथ के साथ मिलकर पति की हत्या की, और कुएं में फेंक दिया। इन दिनों एक भी सुबह ऐसी नहीं रहती जब अखबार में इस तरह की कोई एक खबर, कम से कम एक, न रहे। आमतौर पर तो एक से ज्यादा खबरें ऐसी रहती हैं कि पति-पत्नी, और प्रेमी-प्रेमिका में से किन्हीं तीन, या चार के बीच हिंसा में एक या अधिक लोगों की जान चली जाती है, और जो जिंदा रह भी जाते हैं, उन्हें लंबी कैद भी मिलना तय सरीखा रहता है।
अभी इंदौर और मेघालय के बीच खबरों में बना हुआ राजा रघुवंशी हत्याकांड सुनवाई के लिए मेघालय की अदालत में पहुंचा है जहां करीब 8 सौ पेज के आरोप पत्र में मेघालय पुलिस ने बताया है कि किस तरह केरल के राजा रघुवंशी का कत्ल उसकी नवविवाहिता सोनम ने बड़ी बारीक साजिश रचकर हनीमून के दौरान ही मेघालय के शिलांग में अपने प्रेमी राज कुशवाहा के साथ मिलकर कर दिया था। पुराने प्रेमी से वफा, मौजूदा पति से बेवफाई, और फिर कत्ल, ऐसा कई मामलों में हो रहा है। आज भी पतियों के हाथ मारी जाने वाली पत्नियों की संख्या मरने वाले पतियों के मुकाबले बहुत अधिक जरूर होगी, लेकिन पति किसी प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल कर दे, ऐसा कम सुनाई पड़ता है। अब यह भी सोचने की जरूरत है कि जब कुल मिलाकर पत्नियों का कत्ल करने वाले पतियों का अनुपात बहुत अधिक है, तो फिर प्रेमिका के लिए पति को मार डालने वाले पति अधिक क्यों नहीं है? इसकी एक वजह तो यह भी हो सकती है कि पति को ऐसे प्रेमसंबंध छुपाने की उतनी अधिक जरूरत नहीं रहती, और भारतीय समाज में मर्द एक से अधिक औरतों से रिश्ते रखकर भी चल सकता है। दूसरी तरफ इसी समाज में महिला के अगर एक से अधिक मर्दों से संबंध हैं, तो उसे सामाजिक मुजरिम मान लिया जाता है, और आगे-पीछे उसे हिंसा का शिकार होना पड़ता है, कभी पति के हाथों, तो कभी प्रेमी के हाथों। जब कोई शादीशुदा महिला पति को छोडक़र प्रेमी के साथ शादी करना चाहती है, तो ऐसी जिम्मेदारी से बचने वाले प्रेमी भी शादीशुदा प्रेमिका का कत्ल कर देते हैं।
ऐसा लगता है कि भारत में मरने-मारने तक नौबत इसलिए अधिक पहुंचती है क्योंकि यहां तलाक का चलन कम है। गिनाने के लोग गिना सकते हैं कि भारत में इतने फीसदी लोगों का तलाक होता है। लेकिन शादीशुदा जोड़ों की संख्या के अनुपात यह बहुत कम है, और अधिकतर लोग खींचतान कर, समानांतर दूसरे रिश्ते रखते हुए भी जिंदगी गुजार लेते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे और दूसरी सरकारी रिपोर्ट बताती है कि भारत में तलाक की दर एक से दो फीसदी के बीच है। अमरीका में यह 40 फीसदी, और योरप में 30 से 50 फीसदी के बीच है। लेकिन उन पश्चिमी देशों में पति-पत्नी के बीच जान लेने या देने के आंकड़े भारत के मुकाबले बहुत कम हैं। इसकी वजह बड़ी साफ-साफ है कि जब कानूनी रूप से जीवनसाथी से छुटकारा पाना मुमकिन है, तो फिर उसे मार डालने की जरूरत कम रहती है। लेकिन अगर उससे छुटकारा पाने की कोई आसान तरकीब न हो, अदालत और समाज तलाक को बुरा मानते हों, तो फिर उसे निपटा देना ही एक जरिया बचता है। अभी हम आंकड़े देख रहे थे, तो भारत में एक लाख शादीशुदा जोड़ों में एक से लेकर डेढ़ तक आपसी कत्ल हैं। अमरीका में यही आंकड़े आधे फीसदी के हैं, और योरप में 0.2 से 0.5 तक हैं।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा के बलरामपुर में गणेश विसर्जन के दौरान तेज शोरगुल वाले संगीत में नाचते-नाचते एक नाबालिग लडक़े की तबियत बिगड़ी, और अस्पताल ले जाने पर वह मरा हुआ वहां पहुंचा। यह अभी साफ नहीं है कि इस लडक़े की मौत शोरगुल की वजह से हुई, या अधिक नाचते हुए उसका हार्ट फेल हुआ। जो भी हो यह तो साफ है कि 15 साल का एक लडक़ा विसर्जन के शोरगुल के बीच इस तरह मारा गया कि उसमें शोरगुल का हाथ भी हो सकता है। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट बीते बरसों से डीजे कहे जाने वाले, संगीत के नाम पर इस भारी शोरगुल पर रोक लगाने की नाकामयाब कोशिश कर रहा है। इसके पहले भी इस राज्य में लाउडस्पीकरों पर बैंड और संगीत के हल्ले में मौतें हो चुकी हैं, और ऐसे ही झगड़ों में कत्ल भी हो चुके हैं। जिस राजधानी रायपुर को पुलिस के हिसाब से एक आदर्श व्यवस्था की जगह होना चाहिए, कल वहां सडक़ों पर अंधाधुंध बदअमनी चलती रही, हाईवे पर गणेश के कार्यक्रमों के बड़े-बड़े ढांचे बनाए गए, और खुद प्रशासन ने शोरगुल की जो सीमा तय की है, उससे दुगुनी ऊंची आवाज तो रिकॉर्ड की गई है, लेकिन पूरे शहर में जगह-जगह गाडिय़ों पर लादे गए स्पीकरों से जो भयानक नजारा पेश किया गया, वह पूरी तरह बेकाबू नौबत है। प्रदेश में इक्का-दुक्का जगहों पर कुछ स्पीकरों को जब्त कर लिया गया है, लेकिन सडक़ों पर अराजकता हाईकोर्ट का मुंह चिढ़ाते हुए प्रदेश में जगह-जगह जारी है। इस मुद्दे पर लगातार लिखने, और अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल, पर लगातार बोलने की वजह से हमारे पास ही लोगों के भेजे हुए दर्जनों वीडियो इकट्ठे हो गए हैं कि हाईकोर्ट के आदेशों को कुचलते हुए कैसे प्रदेश की सडक़ों पर भयानक शोरगुल किया जा रहा है। जिन रास्तों से प्रतिमाओं और विसर्जन के जुलूस निकलते हैं वहां के लोगों का जिंदा रहना मुश्किल हो रहा है, और उस सडक़, और आसपास के लोग ऐसे दिनों पर किसी रिश्तेदार या परिचित के यहां दूर जाकर रहते हैं। हमारे पास ऐसे लोगों की भी जानकारी आई है जो इन दिनों अपने घर में नहीं रह पाते, जिनका ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है, और हर बरस जिन्हें दूसरों के घरों में शरण लेनी पड़ती है।
बोलचाल में जिसे डीजे कहा जाता है, उस बारे में यह साफ कर देना जरूरी है कि इसका मतलब डिस्क-जॉकी होता है, ये ऐसे लोग होते हैं जो तरह-तरह के रिकॉर्ड (डिस्क) या दूसरे माध्यमों पर रखा गया संगीत मिलाकर पेश करते हैं, और पार्टियों में एक बड़े संगीत-टेबिल के पीछे हेडफोन लगाकर तरह-तरह के संगीत की मिक्सिंग करते अमूमन कोई नौजवान दिखता है। अभी छत्तीसगढ़ की सडक़ों पर बैंड, नगाड़ा पार्टी, और पहले से रिकॉर्ड किया गया संगीत जिस तरह से जीना हराम करता है, वह डीजे से अलग है, लेकिन प्रचलन में हर किस्म के संगीत के शोरगुल को डीजे कहा जाने लगा है, और हाईकोर्ट भी यही भाषा इस्तेमाल कर रहा है। खैर, भाषा की बारीकियों पर गए बिना हम यह कहना चाहते हैं कि धार्मिक आयोजनों के दौरान किसी भी तरह के शोरगुल, अराजकता, रौशनी को फेंकने के तरह-तरह के नए लैम्प, इनमें से किसी को भी काबू नहीं किया जा सकता, क्योंकि हजारों धर्मान्ध-उन्मादियों की भीड़ को काबू में करने के लिए उनसे अधिक संख्या में पुलिस लगेगी, जो कि मुमकिन ही नहीं है। इसलिए सरकार और हाईकोर्ट इन दोनों को हर त्यौहार पर सडक़ों पर होने वाली इस टकराहट, नागरिकों की नर्क सरीखी जिंदगी, और हाईकोर्ट की परले दर्जे की बेइज्जती को रोकने के लिए कोई दूसरा रास्ता ही निकालना चाहिए।
हमने पिछले महीनों में कुछ बार यह भी सुझाया है कि जब धर्म बना था, तब तो न बिजली थी, न लाउडस्पीकर थे। इसलिए लाउडस्पीकर किसी भी धार्मिक प्रथा का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। हर उपासना स्थल से बेदर्दी से लाउडस्पीकरों को स्थाई रूप से हटा देना चाहिए। और इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को चाहिए कि वह दस फीट से अधिक दूर तक आवाज फेंकने वाले हर तरह के स्पीकर पर रोक लगा दे। पत्तों का इलाज करने से तब तक कोई समस्या हल नहीं होगी, जब तक बीमारी को जड़ से खत्म नहीं किया जाएगा। और जड़ है लाउडस्पीकर, या बड़े-बड़े स्पीकर। हम हाईकोर्ट को भी यह सुझाना चाहते हैं कि आज जिंदगी का जनहित का ऐसा एक भी काम नहीं है जो कि बड़े स्पीकरों के बिना पूरा न हो सके। ये बड़े स्पीकर शोर फैलाने वालों के अलावा और किसके काम के हैं? इन स्पीकरों की खरीद-बिक्री, और इनके इस्तेमाल पर पूरी रोक के बिना छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट अगले सौ बरस तक सरकार को नोटिस जारी कर सकता है, उसके बाद भी उसका कोई असर नहीं होगा। धर्मान्ध भीड़ के सामने पुलिस अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक का काम नहीं कर सकती। गब्बर सिंह के गिरोह को पकडऩे के लिए लाठी लिए हुए दो पुलिस जवानों को भेजने से भला कभी डकैती रूकेगी? इसलिए हाईकोर्ट को सबसे पहले तो दस फीट से दूर तक आवाज फेंकने वाले हर किस्म के स्पीकर, और लाउडस्पीकर पर तुरंत रोक लगा देनी चाहिए। सरकारें चलाने वाले राजनीतिक दल हर कुछ बरस में किसी न किसी चुनाव में वोट के लिए जनता के पास जाते हैं। और जनता का धर्मान्ध हिस्सा उन्हें डराता है। इसलिए राजनेता चाहे वे सत्ता में हों, चाहे विपक्ष में, वे अराजकता को खुलकर बढ़ावा देते हैं, और अदालती आदेशों की हेठी करना उन्हें एक किस्म से जनता की वाहवाही भी दिलाता है। इसलिए अदालत सत्ता पर बैठे लोगों से कोई उम्मीद नहीं कर सकती। और यह बात तो पूरी तरह फिजूल की है कि बड़े स्पीकरों के रहते हुए उन्हें चलाने वाले लोगों से उम्मीद की जाए कि वे शोरगुल एक ऐसी सीमा से ऊपर न जाने दें जिसे नापने के उपकरण खुद सरकार के पास नहीं हैं, नीयत तो है ही नहीं।
महाराष्ट्र से एक परेशान करने वाला वीडियो सामने आया है जिसमें एक जिले में तैनात आईपीएस महिला अधिकारी जब अवैध मुरम खुदाई रोकती है, तो स्थानीय लोग सीधे उपमुख्यमंत्री अजीत पवार को फोन लगाते हैं, और फोन इस अफसर को बात करने के लिए देते हैं। सामने से जब कहा जाता है कि वे उपमुख्यमंत्री अजीत पवार बोल रहे हैं, तो इस पर अंजना कृष्णा नाम की यह अफसर कहती है कि वे उनके मोबाइल पर फोन करें। इस पर अपने को अजीत पवार बताने वाला व्यक्ति खूब भडक़ता है, और इस अफसर को खूब डांटता है कि इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि वह उनका चेहरा नहीं पहचानतीं। इसी मौके के कुछ वीडियो में अवैध खुदाई करने वाले अधिकारियों को धक्का देते भी दिख रहे हैं।
कुल मिलाकर मुद्दा यह है कि गलत काम करते पकड़ाई भीड़ के नेता ने अपने नेता, डिप्टी सीएम को फोन लगाया, और उन्होंने नेतागिरी की आदत के तहत कार्रवाई रोक देने के लिए कहा। इस पर डिप्टी सीएम की शिनाख्त के लिए जब इस अफसर ने अपने फोन पर कॉल करने कहा, तो अजीत पवार भडक़ गए। यहां पर कई सवाल खड़े होते हैं। राजधानी में बैठा डिप्टी सीएम गलत काम रोकते अफसर को अपने कार्यकर्ताओं के फोन पर रोककर सरकार का हौसला पस्त करता है, और मुजरिमों का हौसला बढ़ाता है। एक महिला पुलिस अफसर के साथ किसी मंत्री को बेहतर तरीके से पेश आना चाहिए था, लेकिन हर पार्टी, हर गठबंधन की सरकार में डिप्टी सीएम रहते-रहते अजीत पवार यह बुनियादी तमीज खो चुके हैं। एक आईपीएस अधिकारी से भी कुछ बेहतर तरीके से पेश आने की उम्मीद की जाती है क्योंकि वे अखिल भारतीय मुकाबले में चुनकर बेहतर साबित हुए लोगों में से रहते हैं, और कई अफसर राज्य के बाहर से भी आते हैं। ऐसे में उन्हें स्थानीय कार्यकर्ताओं के सामने बेइज्जत करना, डांटना-फटकारना सरकारी अमले की हिम्मत तोडऩा है। लेकिन इतना तो हम फिर भी कहेंगे कि अजीत पवार ने वही किया जो उनके दर्जे या पेशे के अधिकतर सत्तारूढ़ नेता करते हैं। कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह ऐसे विधायक के बारे में लिखा था जो एमपी में अपने जिले के कलेक्टर को मारने पर उतारू हो गए थे, बाद में सरकार और संगठन ने मिलकर उस मामले को ठंडा किया। दो दूसरे मामले बिहार के थे जहां पर मंत्री को लोगों ने पत्थर मार-मारकर भगाया, और वे किसी तरह लंबी दौड़ लगाकर अपने शरीर को बचा पाए। महाराष्ट्र को कुछ अधिक पढ़ा-लिखा, विकसित और सभ्य प्रदेश माना जाता है, लेकिन डिप्टी सीएम अजीत पवार की बदतमीजी देखने लायक है। अगर यह पूरा वीडियो और ऑडियो नहीं होता, तो वे सार्वजनिक आलोचना से बच भी गए रहते, और पूरे मामले को झूठा करार दे देते। लेकिन वीडियो टेक्नॉलॉजी की वजह से अब बहुत सारी घटनाओं को पूरी तरह से नकार देना संभव नहीं है। यह बात नहीं भूलना चाहिए कि आज मोबाइल फोन पर ही तरह-तरह के झांसे देने की घटनाएं हर मिनट कहीं न कहीं होती हैं, ऐसे में अगर एक अफसर ने डिप्टी सीएम से अपने खुद के फोन से कॉल करने को कहा है, तो क्या गलत किया है।
एक महिला आईपीएस अधिकारी होने की वजह से हम उनके साथ हुई बदसलूकी की अधिक आलोचना कर रहे हैं, ऐसा भी नहीं है। हम एक ट्रैफिक सिपाही पर भी सत्ता की बददिमागी उतरते देखकर उसके खिलाफ लिखते हैं। मध्यप्रदेश में जब कलेक्टर बंगले पहुंचकर विधायक ने उन पर हाथ उठाया, तो प्रदेश के आईएएस अफसरों की एसोसिएशन ने मुख्य सचिव से मिलकर विरोध दर्ज किया, लेकिन नेता पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, सत्तारूढ़ भाजपा ने भी अपने विधायक को गोलमाल शब्दों से बचाया। छोटे कर्मचारियों के साथ सत्ता की हिंसा होने तक उनके संघ अधिक मजबूती से उठ खड़े होते हैं, और छत्तीसगढ़ में अभी पिछले महीनों में एक कलेक्टर को मातहत लोगों से बदसलूकी करने पर माफी मांगनी पड़ी थी। अजीत पवार जैसा दुव्र्यवहार जो भी नेता करते हैं, उनके खिलाफ प्रदेश की अदालतों को खुद होकर नोटिस लेना चाहिए, और सत्ता को कटघरे में खड़ा करना चाहिए। सरकार में काम कर रहे लोग कई बार उन पर हो रहे जुल्मों का खुलकर विरोध नहीं कर पाते, ऐसे में सत्ता से बाहर के लोगों को पहल करनी चाहिए, जिसमें एक बड़ी जिम्मेदारी राज्य की न्यायपालिका की बनती है। वैसे तो मानवाधिकार आयोग, और महिला आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं भी ऐसी नौबतों के लिए बनाई गई है, लेकिन उन पर सत्ता के मनोनीत लोग बैठते हैं, और वे सत्ता के हर जुर्म को ढांकने में लगे रहते हैं। वह एक अलग लंबी बहस का मुद्दा है, लेकिन हम इतना जिक्र करना चाहेंगे कि संवैधानिक पदों पर सत्ता की पसंद को बिठाने के हम इसलिए भी खिलाफ हैं कि अपने अन्नदाता के लिए ऐसे लोग कोई असुविधा पैदा करना नहीं चाहते।
शिक्षक दिवस पर भारत में आज के दिन परंपरागत रूप से शिक्षकों के संस्मरण और उनके गुणगान छपते हैं। कुछ महानतम वैज्ञानिकों की कही या लिखी गई, या महज उनके नाम से प्रचलित और प्रचारित बातें भी सोशल मीडिया पर देखने मिल रही है कि अच्छे शिक्षक वे नहीं होते जो बच्चों को सिखाते हैं, बल्कि वे होते हैं जो बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। किसी एक लेखक-शिक्षक ने आज फेसबुक पर यह भी लिखा है कि शिक्षक की परंपरागत भूमिका एआई के आने के बाद अब एकदम से बदल गई है क्योंकि एआई के बाद लोगों को उस तरह सीखने की जरूरत भी नहीं रह गई है जैसी कि पहले थी। अब जरा सोचें, कि पहले पहाड़े की किताब आती थी, और लोग न सिर्फ दो-चार-आठ-दस का पहाड़ा पढ़ते थे, याद करते थे, बल्कि वे सवैया और डेढ़ैया जैसे कुछ पहाड़े भी पढ़ते थे जो सवा या उससे ज्यादा गुना का हिसाब रहता था। अब केलकुलेटर आए, तो पहाड़ा याद करना निरर्थक हो गया। पहाड़े की जो किताब बालभारती के साथ जबर्दस्ती बेची जाती थी, वह अप्रासंगिक हो गई। अब हिसाब-किताब के लिए इम्तिहानों में भी केलकुलेटर की छूट मिलने लगी है, मतलब यह कि अब पहाड़ा याद रखने की जरूरत नहीं है। इसी तरह इंटरनेट, गूगल, और विकिपीडिया आने के बाद सामान्य ज्ञान की बहुत सारी बातें, ऐतिहासिक और दूसरे किस्म के तथ्य याद रखने की जरूरत नहीं है क्योंकि पलक झपकते पूरी जानकारी स्क्रीन पर रहती है। इसलिए याददाश्त का वह हिस्सा भी अब गुरूमंत्र नहीं रह गया। एआई के बाद तो तस्वीर और बहुत दूर तक बदलने वाली है, या कि बदल चुकी है।
हमने एआई से ही पूछा कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस आ जाने के बाद अब स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई में क्या फर्क आएगा? उसने इस सवाल और इसके पूछे जाने के वक्त की तारीफ की, और कहा कि एआई हर छात्र-छात्रा के सीखने के तरीके, और उसके प्रदर्शन का अलग-अलग विश्लेषण कर सकता है, और हर छात्र-छात्रा के लिए अलग-अलग पाठ तैयार कर सकता है, उनकी क्षमता और जरूरत के मुताबिक उस रफ्तार से पढऩे की सामग्री बना सकता है। किसी एक छात्र-छात्रा को विषय के जिस हिस्से में दिक्कत हो, उसके लिए उस हिस्से का पाठ्यक्रम एआई बढ़ा सकता है, और जिस हिस्से में उन्हें बड़ी आसानी हो, उस हिस्से से उन्हें तेजी से आगे बढ़ा सकता है। किसी छात्र-छात्रा की गलतियों को एआई तुरंत पकडक़र उन्हें सुधारने के अलग-अलग तरीके तब तक बता सकता है, जब तक उन्हें वह बात ठीक से समझ न आ जाए। इससे स्कूल या क्लासरूम की पढ़ाई जिसमें कि हर किसी के लिए एक सरीखी ताकत लगाई जाती है, वह तस्वीर बदल जाएगी, और छात्र-छात्राओं के लिए एआई निजी ट्यूशन जैसे काम करने लगेगा, मानो वह उन्हीं को अकेले को पढ़ा रहा हो।
एआई ने ही यह भी सुझाया है कि आज शिक्षकों का बहुत सा समय छात्र-छात्राओं को अभ्यास देने में लगता है, और बाद में उन्हें जांचने-परखने में। एआई इस सारे काम को बड़ी आसानी से पल भर में कर सकता है ताकि शिक्षकों के लिए बहुत सा समय बच जाए। इस बचे हुए समय का इस्तेमाल शिक्षक सचमुच पढ़ाने में, प्रेरणा देने में, कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता में इस्तेमाल कर सकते हैं। एआई स्कूलों की हाजिरी जैसे दूसरे बहुत सारे काम खुद कर सकता है ताकि तमाम छात्र-छात्राओं से जुड़ी हुई जानकारियों को दर्ज करने, और जवाब-तलब करने का बोझ शिक्षकों पर से हट जाए। इसके अलावा एआई खुद शिक्षकों के ज्ञान, और उनकी क्षमता को बढ़ाने का काम भी कर सकता है, वे पल भर में जानकारी पाकर उसे अपनी मर्जी और समझ से ढाल सकते हैं, और अपने खास अंदाज में क्लासरूम में रख सकते हैं।
एआई ने अपनी सहूलियतें गिनाते हुए आगे कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ऐसे आभासी शिक्षक और चैटबोट सामने रख चुका है जिनसे छात्र-छात्राएं 24 घंटे में कभी भी कोई भी सवाल पूछ सकते हैं, जवाब पाकर उससे जुड़े और सवाल भी पूछ सकते हैं, जब तक, तब तक कि उनकी जरूरत पूरी न हो जाए। एआई किसी लिखी गई सामग्री को पढक़र भी सुना सकता है ताकि आंखों पर जोर कम पड़े, और सिर्फ कानों से काम चल जाए। जिन लोगों ने एआई का अधिक इस्तेमाल नहीं किया है, वे इस बात को समझ सकते हैं कि यह गूगल की तरह सिर्फ सर्च करके, या विकिपीडिया की तरह उसमें पहले से दर्ज जानकारी को सामने रखने का काम नहीं करता, बल्कि विश्लेषण भी करता है, लिखता भी है, पहले से लिखे हुए का रूपांतरण भी कर देता है, इस तरह यह सर्चइंजन की अगली पीढ़ी नहीं है, बल्कि यह एक अलग ही बुद्धि है, जो कि छलांगें लगाकर इंसान की बुद्धि को पार करने की रफ्तार से आगे बढ़ रही है। जहां तक स्कूल-कॉलेज की किताबों, और पढ़ाई से मिलने वाले ज्ञान की बात है, तो इन मामलों में एआई काफी हिस्से में शिक्षक-शिक्षिकाओं से बेहतर साबित होगा। फिर भी व्यक्तित्व का कुछ ऐसा मौलिक हिस्सा रहेगा जिसे कि एआई नहीं पा सकेगा। यही मौलिकता शिक्षकों को दूर तक ले जाएगी, या कि इस काम में बने रहने में मदद करेगी।
कुछ महीने पहले से ब्रिटेन से ऐसी खबरें आ रही हैं कि वहां एआई ने चिकित्सा वैज्ञानिकों को कैंसर मरीजों की ऐसी दवाइयां बनाने में मदद की है जो कि किसी एक खास मरीज के लिए ही बनी है। अब हर मरीज की जरूरत के लिए एआई अलग-अलग दवा बना सकता है जो कि उसके लिए अधिकतम फायदे की, और न्यूनतम नुकसान की होगी। यह महीनों से शुरू हो चुका है, और कैंसर के बहुत से मरीज अकेले उनके लिए बनी हुई दवा पा रहे हैं, और यह सिर्फ एआई से मुमकिन हो पाया है। अब स्कूल-कॉलेज में भी हर छात्र-छात्रा की क्षमता और दिलचस्पी के मुताबिक अगर एआई अलग कोर्स, किताब, व्याख्यान, सवाल-जवाब तैयार कर दे, तो यह एक किस्म की क्रांति रहेगी। अभी तक तो पूरी की पूरी क्लास के लिए ये चीजें एक जैसी रहती हैं, और गिने-चुने शिक्षक-शिक्षिका ही ऐसे रहते हैं जो कि अलग-अलग बच्चों की अलग-अलग जरूरतों को आंककर उनके लिए ये बारीकियां अलग करते हैं। अब एआई से अगर यह होने लगता है, तो यह शिक्षण में उत्कृष्टता की एक अभूतपूर्व स्थिति रहेगी, जिसकी कल्पना भी अभी नहीं की जा सकती।
केन्द्र सरकार ने जीएसटी के कई स्लैब घटाकर अब कुल दो स्लैब रखे हैं जिनमें 99 फीसदी सेवा और सामान आ जाएंगे। बहुत थोड़े से गिने-चुने दारू-तम्बाकू किस्म के सामानों के लिए बहुत अधिक जीएसटी वाला एक स्लैब पहले भी था, और अभी भी रखा गया है। लेकिन जिंदगी की तकरीबन तमाम चीजें अब 5 फीसदी, और 18 फीसदी जीएसटी के दायरों में आ जाएंगी। सरकार का दावा है कि पहले जो दूसरी स्लैब चली आ रही हैं, उन्हें इन दो स्लैब में मिला दिया गया है, और हर सामान या सेवा पर टैक्स पहले के मुकाबले कम होगा, या उतना ही बना रहेगा। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि लोग त्यौहारों के इस मौसम में खर्च का अपना जो बजट रखते हैं, उसमें तो कोई कटौती करेंगे नहीं, और जो कुछ भी बचत होगी, उससे अतिरिक्त खरीददारी ही होगी, और बाजार में उतना ही पैसा आएगा। कुछ लोगों का यह भी अनुमान है कि इससे बाजार में अधिक रकम आएगी, और अर्थव्यवस्था का चक्का घूमेगा।
जीएसटी जब से लागू हुआ था तब से उसकी विसंगतियों ने लोगों को बड़ा परेशान किया था, लेकिन अब जब सारे कारोबारियों ने जीएसटी हिसाब-किताब का सिस्टम बना लिया है, तब स्लैब घटाकर कुल दो स्लैब कर देना उनके काम को आसान ही करेगा। ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार को बीते बरसों में जीएसटी से उम्मीद से भी अधिक, छप्पर फाडक़र जितनी कमाई हुई है, उसके चलते उसने अब कुछ रियायतें देने की सोची है। इसके पीछे बिहार, और बंगाल के चुनावों को प्रभावित करने की नीयत भी हो सकती है, अमरीकी टैरिफ की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था पर जो बोझ पड़ रहा है, उससे लोगों को उबारने के लिए भी जीएसटी रियायत दी गई है, ऐसा भी कुछ लोगों का मानना है। तीसरी बात यह कि सरकार की जिन-जिन बातों को लेकर आलोचना हो रही थी, उस तरफ से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी ऐसा किया गया हो सकता है। जो भी वजह हो, यह तो सरकार के हाथ में ही रहता है कि वह कब कौन से फैसले लेकर जनता के बीच चल रही कोई सुगबुगाहट या नाराजगी दूर करने की कोशिश करे।
हम बहुत सी छोटी-छोटी चीजों पर घटे हुए जीएसटी की अधिक चर्चा करना नहीं चाहते क्योंकि वह तो खबरों में आ चुकी बात है, लेकिन जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा इन दोनों पर अब तक लग रहे 18 फीसदी जीएसटी को खत्म कर देना एक बड़ी बात है, जिससे बीमा प्रीमियम घट जाएगा, और लोग अपनी जिंदगी का, और इलाज के लिए बीमा करवाने की तरफ बढ़ेंगे। आज देश की आधी आबादी के पास भी जीवन और इलाज बीमा नहीं है। दूसरी तरफ बड़ी कारों, बहुत बड़े इंजन की मोटरसाइकिलों, और तम्बाकू पान-मसाला, कोल्डड्रिंक, इन सबको 40 फीसदी जीएसटी में रखा गया है, जो कि अच्छी बात है। इससे किसी उच्च-मध्यवर्गीय तबके का भी कोई लेना-देना अनिवार्य रूप से नहीं है, बाकी अपने नशे और शौक के लिए तो गरीब भी अगर तम्बाकू-गुटखा खाए, तो वह कैंसर के सरकारी इलाज का टैक्स भी देते चले। बुरी लत, और महंगे शौक के कुछ सीमित सामानों पर लगा यह टैक्स जायज ही दिखता है। 2017-18 के जीएसटी संग्रह से 2024-25 का जीएसटी संग्रह दोगुना से अधिक बढ़ गया है।
आम जनता को किसी समझदारी की बात सिखाना तालाब तक घोड़े को ले जाकर पानी पिलाने के मुकाबले अधिक मुश्किल काम है। इसलिए हमारे यह कहने का कोई खास मतलब रहेगा नहीं कि जिन लोगों ने अपना बीमा नहीं कराया है, वे जीएसटी से होने वाली बचत से अपनी जिंदगी और अपनी सेहत का बीमा करवा लें। मौत और बीमारी पहले से चिट्ठी लिखकर नहीं आते, और देश की शायद तीन चौथाई से अधिक आबादी इस खर्च के लिए तैयार नहीं रहती है। परिवार के किसी कमाऊ सदस्य की मौत के लिए तो शायद 90 फीसदी आबादी तैयार न हो। ऐसे में बीमा टैक्सफ्री कर दिया गया है, तो लोगों को जीएसटी की बचत का उसमें पूंजीनिवेश करना चाहिए। हम यह बात इसलिए भी सुझा रहे हैं कि हेल्थ बीमा करने वाली कंपनियों के लिए भारत में एक रेगुलेटरी एजेंसी बनाई गई है, लेकिन उसकी सारी कोशिशों के बावजूद आज भी देश में अधिक उम्र तक पहुंच गए लोगों के लिए नया बीमा पाना असंभव सा है। इसलिए सबके भले के लिए यह है कि कम या अधिक, अपनी जरूरत और क्षमता के मुताबिक इलाज-बीमा हर किसी को उम्र रहते, और बीमारियों से घेरने के पहले करवा लेना चाहिए, ताकि जिंदगी का आखिरी हिस्सा अभाव और तनाव में न गुजरे।
अमरीका में ट्रम्प के कुछ बड़े करीबी रहे सहयोगी उन पर यह आरोप लगा रहे हैं कि अपने पारिवारिक कारोबार को बढ़ाने के लिए वे पाकिस्तान के साथ हमबिस्तर हो रहे हैं, और भारत से दूरियां खड़ी की हैं। इनमें ट्रम्प के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे हुए दो लोग हैं, और एक वरिष्ठ सांसद ने भी ऐसी ही बात कही है। अमरीकी शासन व्यवस्था बड़ी अजीब है, वहां राष्ट्रपति को संविधान में ही तानाशाह सरीखे हक दे दिए गए हैं, उसे संसद में जाना नहीं पड़ता, वहां जवाबदेही नहीं रहती, और संसद राष्ट्रपति का कुछ बिगाड़ भी नहीं सकती। जब तक बजट या संविधान संशोधन जैसे कुछ मामले न हो, राष्ट्रपति को संसद की जरूरत भी नहीं रहती। ट्रम्प ने यह भी साबित कर दिया है कि बड़ी लोकतांत्रिक समझी जाने वाली अमरीकी शासन प्रणाली में किस तरह राष्ट्रपति अदालतों के भी पर कतर सकता है, और अदालत से मुजरिम से मुजरिम साबित होने के बाद भी राष्ट्रपति बन सकता है। अमरीकी लोकतंत्र के विरोधाभास, उसकी विसंगतियां, और उसमें तानाशाही की संभावनाएं अमरीकी इतिहास में पहली बार इस बुरी तरह सामने आ रही हैं। आज की ही खबरें बताती हैं कि अमरीकी कारोबार के कुछ बहुत बड़े लोग ट्रम्प के सख्त खिलाफ हो गए हैं, और उन्होंने अमरीका को तानाशाही की तरफ बढऩे का खतरा याद दिलाया है। ऐसा लगता है कि अभी भारत के साथ व्यापार शर्तों में मनमानी करके ट्रम्प ने भारत को जिस तरह चीन और रूस के खेमे में धकेल दिया है, उससे भी अमरीकी लोग परेशान हैं, कि यह दुनिया में अमरीका के खिलाफ जाता हुआ एक शक्ति संतुलन है।
हमारे पाठकों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले हमने लिखा था कि रूस, भारत, चीन, और ब्राजील को मिलकर एक साथ आना चाहिए, और उससे अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की मनमानी पर लगाम लग सकेगी। पिछले चार-छह दिनों में चीन में ठीक यही नजारा देखने मिला है। आज अमरीकी राष्ट्रपति का एक सलाहकार भारत को याद दिला रहा है कि वह लोकतांत्रिक देश है, और वह चीन और रूस सरीखे तानाशाही वाले देशों के साथ जा रहा है, जबकि उसे अमरीका के साथ रहना चाहिए था। इस सलाहकार को पहली सलाह तो खुद अमरीकी राष्ट्रपति को देनी थी कि वह एक लोकतांत्रिक नेता और देश की तरह बर्ताव करे, दुनिया के सबसे बड़े मवाली की तरह नहीं जो कि अलग-अलग शहरों में नशे के धंधे, चकलाघर, जुआघर, और सट्टे के कारोबार का एकाधिकार बांटने के लिए अपने मर्जी से सबसे कम या अधिक महीना बांधता है। ट्रम्प न सिर्फ एक फौजी तानाशाह की तरह काम कर रहा है, बल्कि वह एक माफिया सरगना की तरह भी काम कर रहा है। इसलिए उसके किसी सलाहकार का दुनिया को लोकतांत्रिक-नैतिकता सिखाने का कोई हक नहीं बनता। चीन में अभी हुए शंघाई सहयोग संगठन के कार्यक्रम में ईरान नहीं था, लेकिन अमरीका के खिलाफ दुनिया में जब भी कोई गठबंधन बनेगा, ईरान उसमें शामिल होना चाहेगा। इसी तरह उत्तर कोरिया बाकी दुनिया के लिए अछूत बना हुआ है, वह अमरीकी आर्थिक प्रतिबंधों का शिकार है, लेकिन वह रूस का फौजी साथी है, और यूक्रेन के मोर्चे पर रूस की फौज में हजारों उत्तर कोरियाई सैनिक भी शामिल थे। अभी भी चीन और रूस के साथ उत्तर कोरिया के तानाशाह की तस्वीरें दुनिया में एक बदले हुए माहौल को दिखा रही हैं।
अमरीकी लोकतंत्र जिस तरह के पूंजीवाद पर खड़ा है, उसके नुकसान उसे अभी देखने मिल रहे हैं। किसी राष्ट्रपति का पूरा परिवार कारोबार में लगा हुआ है, और देश की विदेश नीति, अलग-अलग देशों के साथ उसके सौदे और उसकी शर्तें, इन सबमें राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के परिवार के हितों का ध्यान रखा जा रहा है। यह बात ट्रम्प के आलोचक नहीं, बल्कि ट्रम्प के सबसे करीबी सहयोगी रहे लोग बोल रहे हैं। फिर अभी कुछ महीने पहले तक जो ट्रम्प की नाक के बाल थे, टेस्ला और एक्स के मालिक एलन मस्क अपने कारोबार की मनमानी दुनिया की सरकारों पर थोप रहे थे, और बिना किसी सरकारी जिम्मेदारी के वे अमरीका पहुंचे हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अपने पूरे परिवार सहित मिले थे। जाहिर है कि यह मुलाकात पहले से तय थी क्योंकि मोदी मस्क के बच्चों के लिए तोहफे लेकर गए थे। ट्रम्प का बेटा, ट्रम्प का दामाद, ये सब दुनिया भर के देशों में, वहां की सरकार, और वहां के कारोबार के साथ तरह-तरह के सौदों में लगे हुए हैं। हितों का ऐसा खुला टकराव भारत जैसे देश में सोचा भी नहीं जा सकता, लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था के चलते अमरीका में यह धड़ल्ले से चल रहा है। दुनिया के कुछ और लोकतंत्र में दबे-छुबे, पर्दे के पीछे कारोबार के साथ सरकार की हमबिस्तरी चलती है, लेकिन अमरीका में ट्रम्प ने मानो न्यूयॉर्क के टाईम स्क्वायर पर सरकार और कारोबार के लिए एक पलंग लगवा दिया था।
एशिया का नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला मैग्सेसे पुरस्कार इस बरस भारत की एक गैरसरकारी संस्था ‘एजुकेट गर्ल्स’ को मिला है जिसकी संस्थापक सफीना हुसैन कन्या-शिक्षा के लिए लगातार लगती रहती है। 1957 में फिलीपींस के राष्ट्रपति रैमन मैग्सेसे की स्मृति में यह पुरस्कार हर बरस चार वर्गों में लोगों या संस्थाओं को दिया जाता है। इस बार भारत के इस कन्या-शिक्षा एनजीओ को यह सम्मान मिलने से भारत में लड़कियों की कुल जमा स्थिति, और उनकी पढ़ाई की हालत के बारे में एक बार फिर चर्चा छिड़ सकती है, छिडऩी चाहिए। सफीना हुसैन ने 2007 से राजस्थान से काम शुरू किया, और 50 गांवों से शुरू पायलट प्रोजेक्ट के तहत ग्रामीण लड़कियों को स्कूल लाने, या स्कूल छोड़ चुकी लड़कियों को वापिस लाने, और उन्हें वहां पर बनाए रखने पर मेहनत की। अब तक यह राजस्थान, और बाहर करीब 30 हजार गांवों तक पहुंच चुका है, और 20 लाख से अधिक लड़कियां इस कोशिश से स्कूल वापिस आई हैं। इस संस्था के आंकड़े बताते हैं कि इसकी कोशिशों से स्कूल पहुंचने या लौटने वाली लड़कियों में से 90 फीसदी ने पढ़ाई जारी रखी है। सफीना दिल्ली में पैदा हुईं, और एक मौसी की मदद से उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामी से पढ़ाई की, फिर अमरीका में कुछ काम किया, और फिर भारत आकर सामाजिक क्षेत्र में काम शुरू किया। 2007 में राजस्थान के पाली जिले में समाज के सहयोग से, और सरकारी स्कूलों के साथ मिलकर शुरू यह प्रोजेक्ट लड़कियों की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है।
आने वाले दिनों में लोगों को सफीना हुसैन और उनके संगठन के बारे में काफी कुछ पढऩे और सुनने मिलेगा, लेकिन हम आज उनके उठाए मुद्दे को लेकर आगे बात करना चाहते हैं कि भारत में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई की क्या चुनौतियां हैं? राजस्थान, हरियाणा, या उत्तर भारत के कई दूसरे प्रदेशों और क्षेत्रों में परिवार और समाज ही लडक़े-लड़कियों में बड़ा फर्क करते हैं। घर के रोजाना के खानपान से लेकर, इलाज की जरूरत पडऩे पर लडक़ी का इलाज परिवार की प्राथमिकता नहीं रहती। लड़कियां पढऩे में लडक़ों के मुकाबले अधिक गंभीर और तेज रहती हैं, मौका मिलने पर वे मेरिट लिस्ट, दाखिला इम्तिहान, या नौकरी में भी लडक़ों से आगे रहती हैं, लेकिन घर के भीतर से शुरू भेदभाव उनकी क्षमता और संभावना दोनों के पर कतरने में लगे रहता है, और देश के, खासकर उत्तर भारत, और हिन्दी प्रदेशों में लड़कियों के साथ भेदभाव अधिक हद तक हिंसक रहता है, यही वजह है कि दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में लड़कियां उत्तर के मुकाबले अधिक आगे बढ़ती हुई दिखती हैं। लेकिन पूरे देश में जो एक समस्या एक सरीखी है वह खेल के मैदान, क्लासरूम, प्रयोगशाला, और किसी भी दूसरी स्कूल-कॉलेज की गतिविधि में लड़कियों पर लडक़ों और पुरूषों की ओर से मंडराते हुए खतरे की है। अड़ोस-पड़ोस से लेकर रिश्तेदारों तक, और स्कूल-कॉलेज से लेकर नौकरी या कामकाज की जगह तक लड़कियों को भेदभाव के अलावा शोषण का भी शिकार होना पड़ता है, और भारतीय सामाजिक और न्याय व्यवस्था ने इंसाफ मिलने की गुंजाइश पहाड़ की चढ़ाई जैसी रहती है। ऐसे में स्कूल शिक्षा से लेकर बाद में किसी कामकाज तक लडक़ी और महिला पर मंडराता हुआ खतरा उनके आगे बढऩे की संभावनाओं को सीमित करते रहता है।
लेकिन सफीना हुसैन की जिस कोशिश को यह बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है, वह किसी राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी की सोच से परे, कई पार्टियों के शासन वाले राज्यों में बराबरी से चल रही है, और सरकारों के साथ मिलकर चल रही है। यह तालमेल जरूरी इसलिए भी है कि भारत में कई तरह के सामाजिक कार्यक्रम और आंदोलन इसलिए दम तोड़ देते हैं कि वे अपने बुनियादी एजेंडे से परे जाकर सरकार या राजनीतिक व्यवस्था से एक टकराव की तरफ मुड़ जाते हैं। अब किसी भी व्यक्ति या संस्था की ताकत और क्षमता सीमित रहती हैं, इसलिए इस बात पर गौर करना जरूरी रहता है कि सरकारें, या पार्टियां किसी से टकराव के बिना संस्थाओं को अपने बुनियादी मुद्दे की पहली प्राथमिकता को ही आखिरी प्राथमिकता भी बनाना चाहिए। अब कुछ लोगों को यह लग सकता है कि छात्राओं को स्कूल पहुंचाने वाली संस्था को स्कूलों के दूसरे मुद्दे भी उठाना चाहिए, और पाठ्यक्रम में हो रहे फेरबदल पर भी बात करनी चाहिए। लेकिन जो संस्था ऐसा करेगी, वह सरकार और सत्तारूढ़ पार्टियों के निशाने पर आ जाएगी, और बच्चियों को स्कूल पहुंचाने की उसकी कोशिश किनारे कर दी जाएगी। ऐसे में हम इस बात को महत्वपूर्ण मानते हैं कि पिछले दो दशक में सफीना हुसैन और उनके संगठन ने कई राज्यों में अपना काम फैलाया, और वहां आती-जाती राजनीतिक ताकतों से अपने को अछूता भी रखा।
ऑस्ट्रेलिया में कल का दिन भारी टकराव का रहा। सिडनी, मेलबोर्न सहित बहुत से बड़े शहरों में अप्रवासियों के खिलाफ रैलियां निकलीं, और ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों ने हजारों की संख्या में सडक़ों पर आकर बहुत बुरे नस्लवादी प्रदर्शन किए। पश्चिम के मीडिया में इन्हें नवनाजीवादी प्रदर्शन कहा गया जो कि दूसरे देशों से आए हुए लोगों की राष्ट्रीयता, उनके धर्म, और उनके रंग पर निशाना बनाते हुए थे। इनके पीछे सिर्फ वहां के राष्ट्रवादी और नस्लवादी संगठन ही नहीं थे, विपक्ष के कई नेता भी इसमें शामिल हुए, और उन्होंने भी उत्तेजक और भडक़ाऊ बातें कहीं। योरप के कुछ देशों की तरह ऑस्ट्रेलिया में भी हाल के बरसों में दक्षिणपंथी उग्रवाद बढ़ते चल रहा है, और इसी साल की शुरूआत में देश की संसद में नाजी सलामी को कैद के लायक जुर्म बनाया है। कई जगहों पर अपने आपको राष्ट्रवादी कहने वाले ऐसे लोगों के प्रदर्शन के खिलाफ दूसरे प्रदर्शनकारियों के सडक़ों पर उतर जाने से आपस में टकराव भी हुए। ऑस्ट्रेलिया में वन-नेशन नाम की पार्टी लगातार राष्ट्रवादी उग्रवाद को बढ़ा रही है, और इसे वहां के कुछ दूसरे धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने नफरत की सौदागर पार्टी कहा है। कुछ दूसरे नेताओं ने इसे विभाजन बोने वाली हरकत बताया है, और ऑस्ट्रेलिया के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाले लगातार बढ़ते उग्रवाद का दर्जा दिया है।
इटली, जर्मनी, फ्रांस की तरह ऑस्ट्रेलिया में भी दूसरे देशों से आकर काम करने वाले लोगों के खिलाफ एक तनाव खड़ा हो रहा है। लेकिन ‘मार्च फॉर ऑस्ट्रेलिया’ नाम से किए गए ऐसे प्रदर्शनों में नफरत की भाषा में ऑस्ट्रेलिया के लोगों को भी थोड़ा हक्का-बक्का कर दिया है। लोग इन्हें ऑस्ट्रेलिया की बहुसांस्कृतिक सामाजिकता के खिलाफ मान रहे हैं, और इन्हें लेकर फिक्रमंद हैं। दरअसल अमरीकी राष्ट्रपति पद पर पहुंचने के बाद से डोनल्ड ट्रम्प ने जिस तरह दूसरे देशों से वहां पहुंचे लोगों के खिलाफ नफरत और हिंसा की बातें कहीं, उनकी गूंज दुनिया में कई दूसरी जगहों पर भी हुई। शुरूआती महीनों में ट्रम्प के दाएं हाथ रहे एलन मस्क ने तो जर्मनी के चुनावों में वहां की सबसे दक्षिणपंथी और नस्लवादी पार्टी को खूब बढ़ावा दिया, और उसकी जीत की कामना की। ट्रम्प की पहचान ही एक घोर राष्ट्रवादी और नस्लवादी की है जिसे दूसरे देशों से आए लोग इतने नापसंद हैं कि अमरीकी अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने की कीमत पर भी वह अमरीका से बाहरी मजदूरों और कामगारों को निकाल रहा है। ट्रम्प के शुरूआती हफ्ते ऐसे वैध-अवैध रूप से आए हुए, और शायद अधिक वक्त तक ठहर चुके लोगों को अमरीकी फौजी विमानों में सामानों की तरह लादकर, हथकड़ी-बेड़ी से जकडक़र उनके देशों में छोडऩे के रहे। भारत में भी ऐसे कई विमान देखे जिनमें हथकड़ी-बेड़ी से जकड़े हुए हिन्दुस्तानी लाकर यहां पटके गए थे।
आज दुनिया में एक देश की प्रतिक्रिया दूसरे देश पर भी होती है। योरप के देशों की प्रतिक्रिया अमरीका में हुई, और भारत में आज जिस तरह अवैध बांग्लादेशियों के नाम पर एक आक्रामक सरकारी कार्रवाई चल रही है, उसकी प्रतिक्रिया पड़ोस के देशों पर भी हो रही है, और इस देश में उन लोगों के बीच भी हो रही है जो बांग्लादेशियों की तरह भारत की बांग्ला जुबान बोलते हैं, और मुस्लिम होने की वजह से उन्हें बांग्लादेशी कहकर सरहद के पार फेंक दिया जा रहा है। दुनिया के एक देश की कट्टरता, और चुनावों में उसकी सफलता से दुनिया के दूसरे देशों में ऐसी ही मिसालें बढ़ती चल रही हैं, और लोगों को याद होगा कि किस तरह ट्रम्प के संग रहते हुए मस्क ने सार्वजनिक रूप से हिटलर की नाजी सलामी दी थी। अभी का ऑस्ट्रेलिया का ताजा प्रदर्शन भारत के लोगों के खिलाफ अधिक था, और वहां बड़ी संख्या में पहुंचे हुए और काम कर रहे भारतवंशियों को ऑस्ट्रेलिया में रोजगार खा लेने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की खबरें बताती हैं कि ट्रम्प से प्रेरणा लेकर लोग आप्रवासियों के खिलाफ हिंसक हो रहे हैं। वहां के स्थानीय लोगों में भी एक हिटलरी सोच वाले लोग अपने आपको देश के कानून से ऊपर मानते हैं, और वे सरकार के आदेशों, और कानूनों के खिलाफ मनमानी करते हैं। अब इस सोच के लोग लगातार उग्रवादी, और हिंसक भी होते चल रहे हैं, और कानून जगह-जगह अपने हाथ में ले रहे हैं। यह सब देखकर लगता है कि दुनिया के एक देश से हिंसा का नारा जब उठता है, तो उसकी गूंज कई देशों में वहां के स्थानीय मुद्दों को लेकर फैलती है।
भारत के अलग-अलग शहरों में महिलाओं की सुरक्षा, और उन पर खतरों को लेकर बनने वाली एक सालाना रिपोर्ट में कोहिमा, विशाखापट्टनम, भुवनेश्वर, आइजोल, गंगटोक, ईटानगर, और मुम्बई को सबसे सुरक्षित माना गया है। दूसरी तरफ पटना, जयपुर, फरीदाबाद, दिल्ली, कोलकाता, श्रीनगर, और रांची को सबसे ही असुरक्षित माना गया है। ये आंकड़े अभी दो दिन पहले जारी 2025 के एक सर्वे पर आधारित हैं जिनमें 31 शहरों का सर्वे किया गया था। यहां पर महिलाओं से बात करके यह पूछा गया था कि वे इन शहरों में अपने आपको कितना महफूज महसूस करती हैं। यह सर्वे राष्ट्रीय महिला आयोग ने जारी किया है, और कुछ विश्वविद्यालयों, और कुछ संगठनों ने मिलकर इसे पूरा किया है। सर्वे के कुछ और आंकड़ों को देखें, तो 24 बरस से कम उम्र की महिलाएं सबसे अधिक खतरे में हैं, और इस आयु वर्ग 14 फीसदी ने किसी न किसी तरह का शोषण बताया है। ऐसी घटनाओं पर महिलाओं की प्रतिक्रिया भी समझने की जरूरत है, 28 फीसदी महिलाओं ने हमलावर, या शोषण करने वाले का सामना किया, 25 फीसदी घटनास्थल को छोडक़र चली गईं, 21 फीसदी ने भीड़ के बीच जाकर अपनी सुरक्षा की, और 20 फीसदी ने पुलिस या अधिकारियों तक इसकी शिकायत की। शिकायत करने वाली महिलाओं में से कुल एक चौथाई को यह भरोसा है कि उनकी शिकायत पर कार्रवाई होगी। महिलाओं में से आधी से अधिक को इस बात की पक्की जानकारी नहीं है कि उनके कामकाज की जगह पर यौन शोषण के खिलाफ कोई नीति लागू है, या नहीं। ऐसे और भी बहुत से आंकड़े इस सर्वे से सामने आए हैं, और अलग-अलग प्रदेशों या शहरों को, या विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों को अपने-अपने इलाकों के बारे में अधिक खुलासे से समझना चाहिए, और कुछ करना चाहिए।
महिलाएं जहां अपने आपको सबसे अधिक असुरक्षित पाती हैं, उनमें दो शहर ध्यान खींचते हैं, जयपुर, और दिल्ली। भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों में से शायद आधे ऐसे रहते हैं जो भारत के एक पर्यटन गोल्डन ट्रैंगल को घूमकर वापिस चले जाते हैं। दिल्ली, आगरा, और जयपुर, ये तीनों शहर सडक़, ट्रेन, और प्लेन से बहुत अच्छे से जुड़े हुए हैं, इनके बीच आवाजाही में बड़ा कम समय लगता है, और तीनों ही शहरों में पर्यटकों के हिसाब से रहने, घूमने-खाने का इंतजाम अंतरराष्ट्रीय स्तर का है। फिर इन तीन जगहों पर पर्यटक इतिहास, हस्तकला, खानपान की विविधता, और भारत के इतिहास के पिछले कई सौ बरसों की झलक पाते हैं, और सीमित बजट में, सीमित समय के लिए भारत आने वाले पर्यटकों के लिए इतना काफी भी होता है। इन तीनों में से किसी भी शहर जाएं, वहां चेहरे-मोहरे, और पोशाक से विदेशी दिखने वाले सैलानियों की भीड़ दिखती है। अब अगर भारत आकर इसी त्रिकोण से होकर अगर करीब आधे, या उससे अधिक सैलानी लौट जाते हैं, तो यह जाहिर है कि वे इन तीन में से दो शहरों, दिल्ली, और जयपुर को महिलाओं के लिए असुरक्षित देखकर लौटते हैं। हर कुछ दिनों में किसी गोरी -विदेशी पर्यटक महिला का ऐसा वीडियो सामने आता है जिसे घेरकर हिन्दुस्तानी उसके साथ बलपूर्वक सेल्फी ले रहे हैं, या उसे होली के रंग लगा रहे हैं, और कुछ मामलों में उसे दबोच भी रहे हैं। पर्यटकों और शोहदों-मवालियों की ऐसी भीड़ बताती है कि ये कोई प्रमुख पर्यटन केन्द्र ही है, और अधिक संभावना इस बात की है कि सबसे बुरे सात शहरों में ये भी शामिल हों। लगे हाथों दो और शहरों की चर्चा जरूरी है जहां पर्यटक बड़ी संख्या में जाते हैं, और ये दो शहर भी महिलाएं असुरक्षित पाती हैं, कोलकाता, और श्रीनगर भी इसी दर्जे में हैं।
अभी कुछ अरसा पहले जब अमरीकी सरकार ने भारत आने वाले अपने नागरिकों को यह नसीहत जारी की थी कि भारत में महिलाएं कई प्रदेशों में अकेले सफर न करें, उन पर कई तरह के यौन हमले होने का खतरा रहता है, तो उसे ट्रम्प की नाराजगी से जोडक़र देखा गया था। लेकिन न सिर्फ अमरीका बल्कि योरप के कई देश भी ऐसी एक सावधानी अपने नागरिकों को भारत के बारे में जारी कर चुके हैं, करते रहते हैं कि यहां महिलाओं पर खतरा रहता है। और इस बात में कोई दुर्भावना भी नहीं है। न केवल विदेशी महिलाओं को, बल्कि देशी महिलाओं को भी तरह-तरह के शोषण झेलने पड़ते हैं, और सीमित समय के लिए भारत आने वाली महिलाओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने हर बुरे तजुर्बे की शिकायत पुलिस तक करें। ऐसा करने पर उन्हें गिने-चुने दिनों में से दो-चार दिन इसी पर बर्बाद करने होंगे, और ऐसा तो देश के भीतर भारतीय पर्यटक भी करना नहीं चाहते। नतीजा यह होता है कि छेड़छाड़ या शोषण करने वाले अधिकतर लोगों को अपने बच जाने का भरोसा रहता है, और वे यह सिलसिला जारी रखते हैं।
भारत के किसी शहर या प्रदेश में जाने वाले विदेशी पर्यटकों को हर बार अपनी सरकार की सलाह या चेतावनी की जरूरत नहीं पड़ती। किसी प्रदेश के अखबारों को एक नजर देख लिया जाए, या इंटरनेट पर खबरों को ढूंढ लिया जाए, तो भी आसानी से पता लग जाता है कि किस शहर, या प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ कितने जुर्म हो रहे हैं। अब तो जो एआई औजार हैं, वे खबरों, और इंटरनेट पर मौजूद जानकारी का विश्लेषण करके भी बता देते हैं कि किन शहरों, और इलाकों में महिलाओं पर कितने हमले होते हैं। यह नौबत बताती है कि भारत की पर्यटक-संभावनाएं महिलाओं के शोषण की वजह से भी बुरी तरह मार खाती हैं, और देश के भीतर भी अकेली महिला अधिक जगहों पर अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, यानी अकेली महिला सैलानी या तो कम निकलती हैं, या सीमित जगहों पर ही जाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो मामलों को लेकर सख्त बेचैनी जाहिर की है और एक किस्म से हाईकोर्ट को यह याद दिलाया है कि वह किसी की जमानत की अर्जी पर तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख नहीं बढ़ा सकता। इस मामले में जमानत अर्जी पर सुनवाई 21 बार टल चुकी थी। मुख्य न्यायाधीश और दो अन्य जजों की बेंच के सामने जेल में बंद इस आरोपी के वकील ने याद दिलाया कि कुछ दिन पहले ही एक दूसरे केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति को यह देखकर जमानत दे दी थी कि हाईकोर्ट ने उसकी जमानत अर्जी पर सुनवाई 43 बार टाल दी थी। यह आदमी साढ़े तीन बरस से जेल में बंद था, और उसकी जमानत अर्जी पर सुनवाई हो ही नहीं रही थी, इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने क्या सोचकर उस सुनवाई को आगे टालते चल रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह सब देखकर कहा- हम बार-बार कह रहे हैं कि नागरिकों से जुड़े मामलों को तेजी से सुना, और तय किया जाए। हम हाईकोर्ट की इस आदत को मंजूर नहीं कर सकते कि निजी आजादी से जुड़े मामलों को बार-बार टाल दिया जाए। ऐसे मामलों को सबसे तेजी से निपटाना चाहिए। हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से गुजारिश करते हैं कि इस मामले को जल्द निपटाएं। अब कम से कम अगली तारीख पर हाईकोर्ट को उसकी जमानत अर्जी पर फैसला करना ही होगा।
ये दोनों मामले देश की कई केंद्रीय जांच एजेंसियों, और राज्य की पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों के चलाए जा रहे बहुत से दूसरे मुकदमों की तरह हैं जिनमें एजेंसियां किसी एक या दूसरे बहाने से जमानत का विरोध करती हैं। दिल्ली में हुए दंगों में जिनके खिलाफ यूएपीए के तहत मामले दर्ज किए गए थे उनमें से बहुत सारे लोगों को पांच बरस गुजर जाने पर भी जमानत नहीं मिली है, और मामले की सुनवाई भी आगे नहीं बढ़ी है। अब अगर ये लोग अदालत से बेकसूर साबित होते हैं, तो पांच बरस की इस कैद की यह लोकतंत्र क्या भरपाई कर सकता है? और ऐसी बेगुनाही कई दूसरे मामलों में साबित होती रहती है, उसमें अनोखा कुछ भी नहीं है। अभी-अभी एक हफ्ते के फासले में ही मुंबई ट्रेन ब्लॉस्ट और मालेगांव बम धमाकों के दो अलग-अलग मामलों में सारे ही आरोपी छूट गए। इनमें साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जैसी चर्चित भूतपूर्व सांसद भी शामिल थीं। देश की एक सबसे ताकतवर बनाई गई जांच एजेंसी ने बम धमाकों के इन मामलों के मुकदमे चलाए थे।
भारत की अदालतों में मुकदमों और अर्जियों की तारीखें आगे बढऩे का सिलसिला उसी तरह चलता है जिस तरह भारत के सरकारी दफ्तरों पर बने हुए एक टीवी सीरियल में दिखाया गया था। हिंदुस्तानी इंसान मुसद्दीलाल बनकर रह गए हैं। अब ऐसे कितने फीसदी लोग होंगे जो हाईकोर्ट का फैसला होने से पहले सुप्रीम कोर्ट तक जा सकें? भारत के कानून में सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि जमानत एक अधिकार होना चाहिए, और उसे खारिज करके जेल एक अपवाद रहना चाहिए। हाल ही के महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी और सीबीआई सरीखी कई जांच एजेंसियों को जमकर फटकारा है कि वे लगातार जमानत का विरोध करते चलते हैं, या किसी-किसी मामले में एक मामले में जमानत का आसार दिखते ही दूसरा मामला दर्ज कर लेते हैं। लेकिन जेल में अधिक से अधिक समय तक रखने की अंग्रेजों के समय से चली आ रही सोच भारत की बड़ी जांच एजेंसियों, और राज्य की पुलिस तक में बराबरी से हावी है।
मध्यप्रदेश का एक वीडियो दो दिन से सोशल मीडिया पर घूम रहा है, और इन दिनों किसी वीडियो के साथ जोड़ी जा रही सच्ची या झूठी जानकारी की जांच-पड़ताल के बाद अब उसकी जानकारी सही पाकर अब उस पर लिख रहे हैं। भिंड जिले के कलेक्टर-बंगले के गेट पर विधायक अपने दर्जन-दो दर्जन समर्थकों के साथ नारेबाजी कर रहे हैं, और कलेक्टर को गेट के आर-पार से तरह-तरह की धमकियां दे रहे हैं। बीच-बीच में वे खूब गाली-गलौज पर उतरते हैं, फिर अपने समर्थकों को कलेक्टर चोर होने के नारे लगाने के लिए कहते हैं, और नारेबाजी के बीच एक बार फिर वे कलेक्टर को धमकाने में लग जाते हैं। विधायक समर्थकों का बनाया हुआ वीडियो ही बताता है कि विधायक कलेक्टर को मारने के लिए हाथ उठाते हैं, इस दौरान कोई एक सुरक्षागार्ड बीच-बचाव करता है। झगड़ा खाद संकट का बताया जाता है, लेकिन असल मुद्दा शायद रेप-चोरी का था। जो भी हो, सत्तारूढ़ पार्टी का एक बुजुर्ग सा दिखता विधायक जिस हमलावर हाथापाई के अंदाज में कलेक्टर बंगले पहुंचकर कलेक्टर से बदसलूकी करता है, उससे विधायक के साथ-साथ सरकार के तेवर भी उजागर होते हैं।
कई लोगों का यह मानना रहता है कि चूंकि कलेक्टर जिले का सबसे अधिक अधिकारसंपन्न, और सबसे अधिक जिम्मेदार समझे जाने वाला वरिष्ठ अधिकारी रहता है, इसलिए उसके साथ बदसलूकी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। हम तो ऐसे किसी ओहदे के दिखावे को सही नहीं मानते, और चपरासी से लेकर कलेक्टर तक, या सिपाही से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक हर किसी का सम्मान उनके सरकारी, या अदालती, या संवैधानिक कामकाज के हिसाब से बराबर ही रहना चाहिए, लोकतंत्र में सिपाही से बदसलूकी तो ठीक है, लेकिन बहुत बड़े अफसर, या हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के जज से बदसलूकी पर जुर्म दर्ज हो जाए, यह तो ठीक नहीं है। यह भी बात समझने की जरूरत है कि बड़े अफसर, नेता, या जज तो अपने से मातहत कर्मचारियों के सुरक्षा घेरे में रहते हैं, और बदसलूकी के उन तक पहुंचने का मतलब नीचे के लोगों से बदसलूकी हो चुकना भी रहता है। इसलिए सरकार हो, अदालत हो, या कोई और संवैधानिक संस्था, इनमें से किसी के भी छोटे या बड़े कर्मचारी-अधिकारी का सम्मान बराबर ही रहना चाहिए, और अगर कोई भी व्यक्ति इनके ओहदों से जुड़े कामकाज को लेकर इन पर हमला करे, तो उसके लिए जो नियम है वे एक बराबरी से लागू होने चाहिए, चाहे कर्मचारी को थप्पड़ मारने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री हों, या मातहत से बदसलूकी करने वाले जज ही क्यों न हों।
भारत में ऐसे तो कहने के लिए लोकतंत्र की पौन सदी पूरी हो रही है, और चारों तरफ जलसे चल रहे हैं, लेकिन लोगों की सोच अब तक सामंती बनी हुई है। किसी के सिर पर सत्तारूढ़ पार्टी का होने का गुरूर रहता है, किसी के सिर पर किसी ‘बड़े’ व्यक्ति की औलाद होने का अहंकार रहता है, और बहुत से लोगों पर अपनी संपन्नता का घमंड उनकी गाड़ी के हॉर्सपावर के साथ जुडक़र काम करता है। बड़े शहरों की जितनी संपन्न रिहायशी इमारतें होती हैं, वहां कर्मचारियों के साथ बदसलूकी हिन्दुस्तानियों के आम मिजाज में बैठी हुई है। कई ऊंची बिल्डिंगों में तो घरेलू कामगारों, और चौकीदारों को लिफ्ट में चढऩे की भी मनाही रहती है, और ढेरों वीडियो आते हैं जिनमें कोई संपन्न महिला संपन्नता और दारू के नशे में छोटे-छोटे कर्मचारियों को मां-बहन की गालियां बकते दिखती हैं। लोगों की सोच ऐसी सामंती है कि वे सरकारी अमले को अपने बाप का नौकर मानकर उनसे बदसलूकी को अपना हक मान लेते हैं। फिर यह भी है कि जिनके पास उस वक्त थोड़ी-बहुत ताकत रहती है, उनके आभामंडल के दूसरे लोग उस ताकत को अपनी बपौती मानकर चलते हैं।
मध्यप्रदेश के ही एक डीजीपी के बददिमाग बेटे ने उनके एक जिले के दौरे के दौरान पुलिस के एक डीएसपी के साथ बड़ी बदसलूकी की थी, तो जिले के आईपीएस अफसर ने डीजीपी के बेटे को थप्पड़ मारी थी, और बाद में कई तरह की जांच भी भुगती थी। लेकिन ऐसा जवाब देने का हौसला कितने लोगों का हो सकता है कि वे अपने मातहत के सम्मान की रक्षा के लिए खुद का कॅरियर इस तरह दांव पर लगाएं? छत्तीसगढ़ में भी बहुत से ऐसे मौके आए हैं जब सत्ता की बददिमागी में लोगों ने मातहत कर्मचारियों और अधिकारियों को पीटा है, और ऐसे हर मौके पर हमने उसके खिलाफ लिखा है। मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ विधायक, और कलेक्टर के बीच की ऐसी तनातनी सत्ता की बददिमागी का एक बड़ा सुबूत है। कोई पार्टी अपने विधायक का तो तबादला कर नहीं सकती, कलेक्टर को ही वहां से हटा सकती है, लेकिन ऐसे में हमलावर विधायक का दिमाग और आसमान पर पहुंच जाएगा, और वह अगले कलेक्टर को अपने जूते की नोंक पर लेकर चलेगा।
सोशल मीडिया राजनीतिक दलों के लोगों, और उनके खेमेबाज तथाकथित पत्रकारों के बयान लगातार ब्लॉक करने लायक रहते हैं क्योंकि राजनीति घटिया के जवाब में और अधिक घटिया होने के लिए बेसब्र, और उस पर उतारू रहती है। दूसरी तरफ खेमेबाज जर्नलिस्ट किसी नेता या पार्टी के हिमायती और ढिंढोरची एक्टिविस्ट की तरह काम करने, और उस शिनाख्त को अपने माथे पर सजाकर चलने में फख्र हासिल करते हैं। ऐसी खेमेबाजी के बीच किसी ईमानदार अखबारनवीस के लिए अपने को काबू में रखना, और अपने पेशे के साथ ईमानदार बने रहना किसी सुनामी में पैर जमाए रखने की तरह होता है, खासा मुश्किल, तकरीबन नामुमकिन।
लेकिन जब बहुत से लोग चुनौती देने के अंदाज में हमारे अखबार को यह कहते हैं कि फलां ने इस जुबान में कहा या लिखा है, तो उसका जवाब तो इसी जुबान में हो सकता है, तो हम हाथ जोडक़र यह कहते हैं कि किसी भी तरफ की बदजुबानी में हमारी दिलचस्पी नहीं है। और यह बात सच भी है, जब गंदी जुबान के सैलाब, और गढ़ी गई तस्वीरों या वीडियो की आंधी आती है, और वह खासी बड़ी संख्या में पाठक और दर्शक दे जाती है, तो इस धंधे में बने रहने के बावजूद अपने पर काबू रखना कुछ मुश्किल लगता है क्योंकि आखिर जिंदा तो पाठकों या दर्शकों के बल पर ही रहा जा सकता है। यह भी समझने की जरूरत है कि आज जिस तरह की भाषा प्रचलन में आम और सर्वमान्य मान ली गई है, उसके बिना भी लिखते हुए, या बोलते हुए हमें कभी भाषा की किसी खूबी की कमी नहीं खली। अच्छी से अच्छी, और बुरी से बुरी बात बिना घटिया जुबान के कही जा सकती है। फिर हमें यह भी लगता है कि घटिया के मुकाबले घटिया जुबान या बातें बोलना, इससे तो जवाब देने वाले भी अपने आपको घटिया ही साबित करते हैं। आज भी सामान्य शिष्टाचार के दायरे में भी बड़ी-बड़ी बातें कही जा सकती हैं, तकरीबन हर बार।
सार्वजनिक जीवन के मुद्दों और लोगों पर लिखते हुए कई बार विशेषणों की जरूरत पड़ती है, और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प जैसे व्यक्ति के बारे में लिखते हुए हम इसी संपादकीय कॉलम में जब बददिमाग, बेदिमाग, बदचलन, घटिया, तानाशाह जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, तो इनमें से कोई भी विशेषण नहीं रहता, वह इस घटिया आदमी के बारे में अदालतों में साबित हो चुका तथ्य ही रहता है। इसलिए जब किसी के बारे में इस्तेमाल किया जाने वाला आलोचना का विशेषण तथ्यों से साबित हो चुका रहता है, तो वह विशेषण भी नहीं रहता, महज तथ्य हो जाता है। हम अपनी आलोचना या तारीफ की भाषा को इसी सीमा के भीतर रखते हैं।
अब जब तारीफ की बात निकली है, तो सार्वजनिक रूप से किसी की तारीफ आलोचना की तरह ही होती है, जिसमें विशेषणों का तथ्यों से बड़ा ही कम लेना-देना होता है। किसी के गुजरने पर, या किसी के अभिनंदन के मौके पर, और बहुत से लोगों की जुबान में तो हर बरस आने वाली सालगिरह के मौके पर भी इतने विशेषण इस्तेमाल किए जाते हैं कि उन्हें पाने वाले को भी इस पर भरोसा नहीं होगा कि वे इतने अच्छे हैं। फिर भी किसी की झूठी तारीफ, चाहे वह मुसाहिबी की हद पार करती हो, किसी दूसरे का कोई नुकसान नहीं करती। लेकिन आजकल तारीफ से परे, किसी की आलोचना या निंदा में जिस जुबान का इस्तेमाल हो रहा है, वह तो लोकतांत्रिक, और मानवीय सीमाओं से बाहर-बाहर ही चलती दिखती है। ऐसी जुबान सिर्फ यही साबित करती है कि तथ्य और तर्क चुक चुके हैं, और इन विशेषणों के बाद अगली बारी नाली के कीचड़ की होगी। दिलचस्प यह भी है कि ऐसे कीचड़ के आकांक्षी पाठक और दर्शक बढ़ते चले जा रहे हैं, और कीचड़ के मुकाबले का जीवंत प्रसारण न करना मीडिया के धंधे में खासे घाटे का काम रहता है।
ऐसी तमाम नौबत के बावजूद अपने अखबार के लिए हमारा यह मानना रहता है कि अखबारों को अपने पुराने दिनों के तौर-तरीकों को याद रखना चाहिए जब वे मीडिया नहीं गिनाते थे, वे सिर्फ प्रेस कहलाते थे। उन दिनों सोशल मीडिया था नहीं, नतीजा यह होता था कि प्रेस को, यानी अखबारों को सोशल मीडिया सरीखे किसी प्लेटफॉर्म से प्रभावित होने की जरूरत नहीं रहती थी। अखबार प्रभावित होते नहीं थे, करते थे। और उनकी मौलिकता ही उनकी ताकत रहती थी जिसकी वजह से वे प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। इन दिनों कल के प्रेस कहे जाने वाले, और आज मीडिया में शुमार होने वाले अखबारों को सोशल मीडिया से प्रभावित होने से कोई परहेज नहीं है, और इसीलिए अब उनसे प्रभावित होने वाले लोगों, और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गिनती सीमित होने लगी है। जब सोशल मीडिया, जिस पर कोई संपादक नहीं है, की जुबान अखबार भी इस्तेमाल करने लगे, या संपादक और पत्रकार अपने सोशल मीडिया पेज पर उस जुबान में लिखने और बोलने लगें, तो फिर उनका असर सोशल मीडिया से अधिक कैसे हो सकता है? आज जब अखबार इस बात के लिए बेताब रहते हैं कि वे एक हरकारे या डाकिये की तरह ओछी जुबान में दिए गए एक बयान को दूसरों तक पहुंचाने के बाद उनसे इसका जवाब लेकर बाकियों तक पहुंचाने को अपनी गौरवशाली पत्रकारिता मानें, तो हम इस धंधे में पिछड़ जाना बेहतर समझते हैं।
देश में चुनाव आयोग भारी शक के घेरे में है। जिस तरह से पिछले कुछ चुनावों में शाम को मतदान का समय खत्म होने के बाद एकाएक वोटों का सैलाब आया, उसने बहुत सी सीटों पर नतीजे बदल दिए। अब अगर सचमुच ही किसी मतदान केन्द्र पर वोट का समय खत्म होने के बाद इतनी लंबी कतारें लगी थीं, तो कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग से ऐसे केन्द्रों के वीडियो मांग रही है, और डरा-सहमा चुनाव आयोग भारतमाता के पल्लू के पीछे जा छुपा है, और तर्क दे रहा है कि माताओं-बहनों के वीडियो देना क्या ठीक होगा? माताओं और बहनों के जो वीडियो चुनाव आयोग मतदान केन्द्र पर खुद ही बनाता है, और प्रचार में उसका इस्तेमाल करता है, वही वीडियो तो प्रमुख विपक्षी दल मांग रहा है, उसमें मां-बहन की आड़ क्यों लेना? खैर, चुनाव आयोग के तौर-तरीके एक कांग्रेसविरोधी राजनीतिक दल सरीखे हो गए हैं, और राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस के मिनटों बाद, जब तक सत्तारूढ़ पार्टियों के प्रवक्ताओं के भी बयान नहीं आते, तब तक चुनाव आयोग राहुल गांधी को एक राजनीतिक जुबान वाला नोटिस जारी कर चुका रहता है। ऐसे में गुजरात का एक ताजा मामला जो कि चुनाव आयोग के ही आंकड़ों का है, वह हैरान करता है।
एक प्रमुख अखबार, भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि गुजरात में दस गुमनाम सरीखे दलों को पिछले पांच बरस में 43 सौ करोड़ रूपए चंदा मिला बताया गया है, और चुनाव आयोग की रिपोर्ट में इनका खर्च कुल 39 लाख बताया गया है जबकि इन पार्टियों की ऑडिट रिपोर्ट में यह खर्च 35 सौ करोड़ रूपए दिखाया गया है। ये पार्टियां कागजी किस्म की दिख रही हैं, और 2019, 2024 के लोकसभा चुनाव, और इनके बीच हुए 2022 के विधानसभा चुनाव में इन्होंने कुल 43 प्रत्याशी उतारे, किसी को भी पांच हजार वोट भी नहीं मिले, और सभी पार्टियों ने कुल मिलाकर चुनाव आयोग को तो 39 लाख का हिसाब दिया, जबकि सीए की ऑडिट रिपोर्ट में 35 सौ करोड़ खर्च दिखा दिया। पहली नजर में यह पूरा मामला कालेधन का दिखता है कि जिन पार्टियों का किसी ने नाम भी न सुना हो, उन्हें करोड़ों रूपए चंदा मिला, और अधिकतर रकम को सीए की रिपोर्ट में खर्च दिखा दिया। हो सकता है कि कालेधन को सफेद करने की लॉंड्री चलाने वाले लोगों ने इसे कोई तरकीब बना लिया हो, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब इन पार्टियों को इस तरह का अविश्वसनीय चंदा मिल रहा है, तो क्या इस पर इंकम टैक्स या ईडी की नजर नहीं जाती? और फिर जब ये हजारों करोड़ का खर्च दिखा रही हैं, तो भी किसी जांच के घेरे में इनको नहीं लाया जाता? जो चुनाव आयोग राहुल गांधी के जूतों के फीते बंधे न रहने पर उन्हें नोटिस देने के इरादे में दिखता है, उसे इन गैरमौजूद, और कागजी दलों का हजारों करोड़ का लेन-देन नहीं दिखता?
इससे एक दूसरा सवाल यह उठता है कि देश में कालेधन का इतना अधिक बोलबाला अभी तक कैसे बना हुआ है? नोटबंदी को बरसों हो चुके हैं, पांच सौ रूपए से बड़े तमाम नोट बंद हो गए हैं, अधिकतर लेन-देन बैंकों के मार्फत होने लगा है, चारों तरफ छोटे-छोटे लेन-देन भी अब मोबाइल फोन के जरिए हो रहे हैं, तो फिर दो-नंबर की इतनी रकम आती कहां से है? अभी भी हर कुछ दिनों में सडक़ों पर ऐसी गाडिय़ां पकड़ाती है जिनमें कोई खुफिया बक्सा बनाया गया है, और करोड़ों रूपए की नगदी ले जाई जा रही है। कारोबारी लोगों से पता लगता है कि हवाला कारोबार उसी तरह चल रहा है, जैसा पहले चलता था। व्यापार में आज भी देश में कहीं से भी, कहीं भी, कितनी भी रकम नगदी भेजी जा सकती है, और इसके लिए नोट सफर नहीं करते, केवल फोन पर सब काम हो जाता है। तो नोटबंदी के बाद क्या नगदी पर कोई भी रोक नहीं लग पाई? अभी दो दिन पहले ही कर्नाटक के कांग्रेस विधायक पर छापा पड़ा, तो दस करोड़ से अधिक के नगदी नोट मिले। पिछले दिनों बिहार में एक-एक करके कई अफसरों पर छापे पड़े, तो वे करोड़ों के नोट जलाते हुए मिले। दिल्ली में हाईकोर्ट के एक जज के बंगले से जले हुए नोटों से भरी हुई बोरियां मिलीं। आखिर इतने नोट जब जलाए जा रहे हैं कि कहीं बोरियां भरी हुई हैं, कहीं नालियां चोक हो जा रही हैं, तो देश में समानांतर अर्थव्यवस्था तो जारी ही है।
आज के अखबारों में दो खबरों को मिलाकर देखने की जरूरत है। पहली खबर मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की है जिसके साथ एक भयानक वीडियो भी है। एनडीटीवी की खबर बताती है कि वहां एक रिटायर्ड डीएसपी को रिटायरमेंट के वक्त जो भुगतान मिला है, उसे पाने के लिए उस बुजुर्ग की बीवी, और उसके दो जवान बेटे मिलकर उसे पीट रहे हैं, और पड़ोसियों की दखल भी उसे बचा नहीं पा रही है। छोटे से अंतरंग कपड़ों में इस बुजुर्ग को जमीन पर गिराकर अलग रहने वाले उसके बीवी-बेटे उस पर जुल्म कर रहे हैं। एक बेटा उसकी छाती पर चढक़र बैठ गया है, और बीवी ने उसके पैरों को रस्सी से बांध दिया है। इसके बाद उसे रस्सी से बांधकर खींचा जा रहा है, और बीवी उसका एटीएम कार्ड छीनकर भाग गई है। यह वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने इसकी जांच शुरू की है। इन दिनों जब उत्तर भारत में, और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे हिन्दीभाषी इलाकों में कई तरह के त्यौहार मनाए जा रहे हैं, महिलाएं कई तरह की कामना करते हुए उपवास रख रही हैं, तब यह वीडियो देखना भी दिल दहलाता है कि एक रिटायर्ड बुजुर्ग से उसकी जिंदगी भर की बचत लूटने के लिए बीवी-बेटे यह कैसी हिंसा कर रहे हैं!
एक दूसरी खबर छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की है। दैनिक भास्कर ने इसे पहले पन्ने पर छापा है कि किस तरह जून-जुलाई के महीनों में जिला पंजीयन कार्यालय में 103 मामलों में संपत्ति का हित त्याग किया गया, जिनमें 90 फीसदी हित त्याग बहनों ने किया है। भाईयों के हित में बहनों के इस हित त्याग का बड़ा गुणगान इस खबर में किया गया है कि यह छत्तीसगढ़ की माटी में पली-बढ़ी बहनों का भाई के लिए त्याग है, रिश्तों की गहराई और संवेदनशीलता की सबसे बड़ी मिसाल है। समाचार में ही एक विचार भी लिखा गया है कि मायके से एक लोटा पानी, और तीज की एक साड़ी की ही आस रहती है, और इसके लिए छत्तीसगढ़ की बहन-बेटियां करोड़ों की संपत्ति भी ठुकरा देती है, जबकि कानून बेटे-बेटी दोनों को बराबरी का हक देता है।
परिवार के भीतर संपत्ति के बंटवारे के यह दो मामले एक तो हिंसा का है, और दूसरा त्याग बताया जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि दुर्ग जिले के जिस त्याग की महिमा का गुणगान समाचार में किया गया है, वह त्याग क्या अकेली महिला का ही जिम्मा होता है जो कि 90 फीसदी महिलाएं ऐसा करती हैं? या फिर यह उनके भाईयों का भी जिम्मा होना चाहिए कि वे भी अपनी बहन के लिए कुछ करने को तैयार रहें, और वे भी बहन के लिए हित त्याग करें? भारत में महिला जब छोटी बच्ची रहती है, तब से उसे त्याग सिखाया जाता है, और त्याग का गुणगान किया जाता है। प्रायमरी स्कूल की किताब में पढ़ाया जाता था, कमल घर चल, कमला नल पर जल भर। वही सोच लड़कियों के बड़े होने पर भी जारी रहती है, वही सोच लडक़ों को जुल्मी बनाती है, और लड़कियों को अपार सहने की जिम्मेदारी देती है।
मध्यप्रदेश के मामले में चूंकि पुलिस जुर्म दर्ज करके मां-बेटों को ढूंढ रही है, इसलिए हम उस पर कुछ कहना नहीं चाहते, सिवाय इसके कि हर किसी को ऐसी नौबत का ख्याल रखते हुए अपने पैसों की फिक्र करनी चाहिए, और उन्हें अपने आखिरी वक्त के लिए संभालकर रखना चाहिए। अलग रहने वाले मां-बेटे भी आकर अगर रिटायर्ड की ऐसी दुर्गति करके उसकी बचत नोंचना चाहते हैं, तो बाकी लोगों को भी सावधान रहना चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग की जो तथाकथित त्याग की खबर है, उस बारे में समाज को अलग से सोचना चाहिए। भारत के कानून में भाई-बहनों का हक संपत्ति पर बराबरी का है। और समाज के भीतर सोच क्या है, वह इस समाचार में दिए गए आंकड़ों से ही साफ हो जाती है कि हित त्याग करने वालों में 90 फीसदी बहनें हैं। समाज की ऐसी सोच को देखते हुए कानून को अपने आप पर गौर करना चाहिए कि बराबरी का हक देने की बात तो उसने कही है, लेकिन वह बात महिलाओं से त्याग की उम्मीदों के चलते परास्त हो जा रही है। कुछ जगहों पर तो ऐसा हो सकता है कि शादीशुदा बहन को संपत्ति की जरूरत न हो, लेकिन 90 फीसदी मामलों में बहन को जरूरत न हो, और भाई को जरूरत हो, यह बात तो गले नहीं उतर सकती। यह सीधे-सीधे समाज की इस सोच से जुड़ी हुई बात दिखती है कि बहन की शादी में जो देना था दे दिया, अब मां-बाप की संपत्ति पर उसका और कोई हक नहीं होना चाहिए। लडक़ी की शादी में खर्च एक ऐसा सामाजिक दिखावा रहता है जो कि जुर्म की हद तक बिखरा हुआ रहता है, और उससे ब्याह कर जाती हुई बेटी की बाकी जिंदगी कोई मदद नहीं मिलती। लडक़े-लड़कियों के मां-बाप सामाजिक दिखावे के लिए इस तरह का दिखावा करते हैं, और इसके साथ ही मां-बाप, और भाई भी लडक़ी से हाथ धो लेते हैं कि अब तुम्हारी अर्थी ससुराल से ही उठना चाहिए। अब यह अर्थी ससुराल से कैसे उठती है, यह दिल्ली के इलाके में अभी सामने आया है जिसमें दहेज की मांग करते हुए पत्नी को जलाकर मार डालने का जुर्म दर्ज हुआ है।
सरकारों के काम करने का तरीका बड़ा दिलचस्प रहता है कि हर सरकार, और सरकार के ढांचे में ऊपर बैठे लोग अपने से नीचे के लोगों पर जिम्मेदारियां डालते चलते हैं, और वे बेअक्ली की हद तक नीचे चली जाती हैं मानो कोटवार ही हर समस्या को हल करेगा। अभी सुप्रीम कोर्ट ने सडक़ों से कुत्तों को हटाने का फैसला बदला तो जिम्मेदारी सरकार पर आ गई कि कुत्तों की नसबंदी करवाई जाए क्योंकि सडक़ों से हटाना तो अब है नहीं। केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिख दी कि 70 फीसदी कुत्तों की नसबंदी करवाई जाए, और उन्हें एंटी रेबिज टीका लगाया जाए। समाचार बताता है कि अब तक केन्द्र इस बारे में केवल सुझाव देते आया था, लेकिन अब उसने राज्यों को एक स्पष्ट लक्ष्य दिया है, और हर महीने इसके पूरे होने के आंकड़े भेजने को भी कहा है। केन्द्र सरकार नसबंदी और टीकाकरण पर हर कुत्ते पर आठ सौ रूपए, और हर बिल्ली पर छह सौ रूपए राज्य को देगी। इसके अलावा संक्रमित या हिंसक कुत्तों को रखने के लिए अलग से आश्रय केन्द्र बनाने के लिए भी केन्द्र सरकार कुछ रकम देगी। जब सुप्रीम कोर्ट अगली किसी पेशी पर सरकार से इस बारे में पूछेगा, तो केन्द्र सरकार के पास चिट्ठियों की फाइल रहेगी कि उसने राज्यों को क्या-क्या लिखा है, और कितने पैसे दिए हैं। राज्य सरकारें यह काम म्युनिसिपल और पंचायतों को देगी, और ये स्थानीय संस्थाएं कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करने वाली कुछ एजेंसियों, या कुछ एनजीओ के मार्फत इस काम को करवाएंगी।
भारत में सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार और बेईमानी के आम पैमानों को देखें तो लगता है कि जहां सडक़, बांध, पुल, या इमारत बनाने में भी परले दर्जे का भ्रष्टाचार होता है, वहां पर कुत्तों को टीका लगा है या नहीं, उनकी नसबंदी हुई है या नहीं, इसकी जांच-परख कैसे हो सकेगी? अगर निगरानी का काम किसी और संस्था को दिया जाएगा, तो वह संस्था भी रहेगी तो हिन्दुस्तानियों की ही, देश के प्रति ईमानदार रहने वाले जापानी तो हिन्दुस्तान की फुटपाथी-कुत्ता योजना चलाएंगे नहीं। जहां स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की गिनती ज्यादा बताकर, उनके नाम पर यूनिफॉर्म, दोपहर का भोजन, किताब-कॉपी का घोटाला चलते ही रहता है, जहां पर मेडिकल कमिशन ऑफ इंडिया की जांच टीम को धोखा देने के लिए भाड़े के मरीज लाकर अस्पतालों में भर्ती कराए जाते हैं, वहां पर सडक़ों के कुत्तों की नसबंदी और उनका टीकाकरण कितनी ईमानदारी से हो सकेंगे? यह योजना सरकारों को बहुत सुहा सकती है, क्योंकि इसमें लंबी-चौड़ी ‘गुंजाइश’ रहेगी।
जब सुप्रीम कोर्ट के कहे हुए किसी बात को कड़ाई से लागू करवाना रहता है, तो ऊपर से लेकर नीचे तक उस काम के लिए बजट भी मंजूर हो जाता है, और काम को समय पर करने के लिए दबाव भी बने रहता है। लेकिन सडक़ों पर कुत्तों की बढ़ती हुई आबादी से जूझ पाना सुप्रीम कोर्ट के जजों के काबू के बाहर का है। सरकार खर्च के आंकड़े जरूर अदालत को बताती रहेगी, लेकिन वह खर्च कितना काम में आएगा, कितना नाली में बहते जाएगा, यह समझना मुश्किल है। भारत के कुछ आंकड़े बताते हैं कि देश में सिर्फ एक महानगर मुम्बई में पिछले एक दशक में बड़े पैमाने पर नसबंदी से कुत्तों की संख्या में 21 फीसदी गिरावट हुई है। लेकिन चेन्नई के आंकड़े बताते हैं कि 2018 से 2024 तक वहां सडक़ों पर कुत्ते तीन गुना से अधिक हो गए हैं। अकेली दिल्ली में 10 लाख कुत्तों का अनुमान है, जिनमें से पिछले छह महीने में 65 हजार कुत्तों की नसबंदी का दावा किया गया है, लेकिन एक लाख के करीब लोगों को इस शहर में कुत्तों ने काटा भी है। भारत में करीब सवा पांच करोड़ फुटपाथी कुत्तों का अंदाज है, और एक कुत्ते के नसबंदी और टीकाकरण पर डेढ़-दो हजार रूपए का खर्च आम है, कहीं-कहीं यह दो हजार रूपए से अधिक भी है। जिस तरह इंसानों की दवाईयां, इंसानों के बाकी चिकित्सा-उपकरण की खरीदी भारी भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, उससे यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है कि बेजुबान, महज भोंकने वाले कुत्तों को महंगे टीके लगे, या सिर्फ कागजों पर टीकाकरण हो गया, नसबंदी ऑपरेशन हुआ, या कागजों पर नसबंदी दिखा दी गई, इसकी जांच कौन करेंगे? इसी देश में आपातकाल के दौरान सबका देखा हुआ है कि नसबंदी के आंकड़े किस तरह फर्जी भरे जाते थे ताकि संजय गांधी को खुश किया जा सके।
अभी अमिताभ बच्चन के एक लोकप्रिय कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में विशेष आमंत्रित मेहमानों के दर्जे में भारतीय फौज की उन महिला अधिकारियों को अमिताभ के सामने बिठाया गया जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मीडिया को ब्रीफ किया था। उस बात की भी कुछ लोगों ने आलोचना की थी कि फौज की जिम्मेदारियों का इस तरह से लोक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए। खैर, वह बात आई-गई हुई, अब दिल्ली में मिस यूनिवर्स बनी स्मृति छाबड़ा का एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें वे कर्नल सोफिया कुरैशी, और विंग कमांडर व्योमिका सिंह दोनों को टू-इन-वन दिखा रही हैं। वे भारत के प्रतीक, शायद इंडिया-गेट की प्रतिकृति के नीचे एक फौजी यूनिफॉर्म पहनकर परेड के अंदाज में चलकर आती हैं, और फौजी सलामी देती हैं। इसमें एक बड़ी दिक्कत यह है कि वे जो यूनिफॉर्म पहने दिखती हैं, वह शिव के अर्धनारीश्वर रूप की तरह आधी थलसेना की है, और आधी वायुसेना की। कोई और कार्यक्रम रहता, मिस यूनिवर्स किसी और धर्म की रहती, तो अब तक उसका किसी पड़ोसी देश का वीजा बन गया रहता। अब सवाल यह उठता है कि लोकप्रियता के लुभावने अभियानों में फौज का कितना इस्तेमाल करना चाहिए?
दुनिया भर में फौज की टीमें उनका हौसला बरकरार रखने के लिए, उन्हें फिटनेस की तरफ बढ़ाने के लिए तरह-तरह के रोमांचक अभियानों में लगाई जाती हैं। कहीं वे पर्वतारोहण करती हैं, कहीं वे समंदर पर अकेले बोट के सफर पर चली जाती हैं। लेकिन इसका रोमांच और हौसले से सीधा लेना-देना रहता है। फौज के लोग आमतौर पर स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस की परेड जैसे कार्यक्रमों तक सीमित रखे जाते हैं। ऐसे में कौन बनेगा करोड़पति तक फौज का जो विस्तार हुआ, वह मिस यूनिवर्स की रैम्पवॉक-परेड तक बिखर गया। कुछ लोगों को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगेगा, लेकिन जिस फौज को अपनी संवेदनशील भूमिका को ध्यान में रखते हुए अपने दायरे को सीमित रखना चाहिए, जिसे सोशल मीडिया से भी दूर रहने को कहा जाता है, इधर-उधर दोस्ती करने से भी जिसे रोका जाता है, उसे, या उसकी वर्दी को अर्धनारीश्वर की तरह पेश करना फौज की गंभीरता को कम करना है या नहीं, उस बारे में भी सोचना चाहिए। अभी वह विवाद तो खत्म हुआ ही नहीं है जिसमें मध्यप्रदेश के एक भाजपा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर की मीडिया प्रभारी कर्नल सोफिया को मंच से चीख-चीखकर आतंकियों की बहन कहा था, और जो सुप्रीम कोर्ट की बड़ी कड़ी फटकार के बाद भी माफी मांगने के लिए भी तैयार नहीं हैं।
फौज को लेकर न तो कोई राष्ट्रवादी उन्माद जायज है, और न ही फौज का कोई मनोरंजक इस्तेमाल। फौज को उसकी पूरी जरूरी-गंभीरता के साथ अलग-थलग रहने देना चाहिए। देश वैसे भी इस विवाद को बरसों से झेल रहा है कि फौज से निकलने के बाद अफसरों का तुरंत ही राजनीति में आ जाना, और चुनाव लडऩा कितना जायज है, और कितना नहीं। यह बात सिर्फ फौजी अफसरों के लिए हो रही हो ऐसा भी नहीं है, यह बात जजों के बारे में भी हो रही है कि एक दिन पहले तक राजनीतिक रूझान वाले मामलों पर सक्रियता से फैसले देने वाले जज कार्यकाल के बीच इस्तीफा देकर अगले दिन एक राजनीतिक दल में आ जाएं, और उसके उम्मीदवार बनकर चुनाव भी लड़ लें। फौज हो या अदालत, इनको घरेलू जमीन पर, और अपने दायरे में किसी लगाव या दुराव से परे रहना चाहिए। एक वक्त था जब सरहद पर जवानों के मनोरंजन के लिए सुनील दत्त और नरगिस जैसे कलाकार लगातार वहां जाते थे। अब फौजी अफसर ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बोलने के लिए देश के सबसे बड़े, और खालिस बाजारू टीवी कार्यक्रम पर जा रहे हैं। इस सिलसिले की संवेदनशीलता हो सकता है कि बहुत लोगों को समझ भी न आए क्योंकि आम जनता जटिल पहलुओं को समझने से अपने आपको आजाद रखती है, और यह भी मानकर चलती है कि किसी जटिलता का अस्तित्व भी नहीं है। लेकिन जब जिंदगी के किसी एक दायरे में किसी संवेदनशील सरहद को पार किया जाता है, तो उसकी मिसाल का कई और जगहों पर बेजा इस्तेमाल भी होता है।


