संपादकीय
किसी जिंदगी में कैसा-कैसा उतार-चढ़ाव हो सकता है, यह देखना हो तो 9 महीने की उम्र में भारत से अमरीका गए वेदम सुब्रमण्यम की जिंदगी को देखना चाहिए। 1962 में वे परिवार सहित अमरीका पहुंचे, अमरीकी संस्कृति के हिसाब से उन्हें उनके संक्षिप्त नाम सुबु से बुलाया जाने लगा, और कॉलेज छात्र रहते हुए उनके एक सहपाठी का कत्ल हो गया, बिना सुबूत, बिना हथियार, बिना हत्या के इरादे के, सिर्फ परिस्थितियों को देखते हुए सुबु को सजा सुना दी गई। 1983 में सुनाई गई उम्रकैद अभी 2025 में अमरीका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एफबीआई की इस रिपोर्ट पर खारिज की गई जिसमें कहा गया था कि जिस बंदूक से गोली चलना बताया गया है, उससे गोली चली ही नहीं थी। अब इसी महीने 3 तारीख को जब उनकी बहन उनकी रिहाई के लिए जेल पहुंची, तो अमरीका से प्रवासियों को बाहर निकालने वाली एजेंसी आईस ने उन्हें फिर गिरफ्तार करके एक हिरासत केन्द्र में रख दिया, क्योंकि उनके खिलाफ 1999 का एक और मामला दर्ज था। अब उन्हें विदेशी अपराधी कहकर भारत भेजने की तैयारी हो रही है जहां वे 9 महीने की उम्र के बाद कभी रहे नहीं, जहां उनके कोई रिश्तेदार भी नहीं रह गए। वेदम सुब्रमण्यम 64 बरस की उम्र में अमरीका और भारत के बीच हिरासत में अटके हुए हैं, और यह नौबत 43 बरसों की बेगुनाही वाली कैद के बाद अब एक छोटे से मामले को लेकर अचानक फिर सामने आई है। अमरीका में भारतवंशी लोग बरसों से सुबु की रिहाई के लिए लगे हुए थे, और रिहाई का दिन आकर, उन्हें एक दूसरी हिरासत में भेजकर चले गया।
किसी देश के कानून के बारे में हम कोई राय कायम करना नहीं चाहते, लेकिन जिंदगी कैसे खेल खेलती है, यह जरूर सोचने की जरूरत है। हर किसी को अपनी जिंदगी में कई तरह के नाटकीय मोड़ झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। दो दिन पहले बीबीसी की एक रिपोर्ट बता रही थी कि किस तरह अमरीका में भारतीय सामानों पर 50 फीसदी टैरिफ लगने की वजह से भारत में अच्छे-खासे चलते कारोबार बंद हो रहे हैं, और उनमें काम करने वाले कामगार और मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं। कालीन बनाने वाले बुनकरों के बच्चों की पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई है क्योंकि अमरीकी कारोबारियों ने कालीन आयात करने के ऑर्डर रद्द कर दिए हैं। अब एक वक्त जो कारोबार डॉलर में कमाई करते थे, आज उनके पास रूपयों में देने के लिए भी मजदूरी नहीं है। जिंदगी की ऐसी कहानियों को हम अहमियत इसलिए देते हैं कि हममें से किसी का भी दिल-दिमाग यह मानने को तैयार नहीं रहता कि इतना बुरा कुछ उनके साथ हो सकेगा। अब दो दिन पहले की ही छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर की एक घटना है। एक नौजवान दुकान बंद करके घर जा रहा था, और दुपहिया रात में सामने खड़ी ट्रक से जा टकराया, उसकी मौके पर ही मौत हो गई। यह जानकारी फोन पर उसके भाई को मिली, और वह दुपहिए पर सवार होकर इस घटनास्थल की तरफ निकल पड़ा, रास्ते में उसकी टक्कर एक कार से हो गई, और सडक़ पर वह भी मर गया। एक ही रात, एक ही शहर में दो सगे भाई इस तरह गुजर जाएंगे, क्या उनकी बूढ़ी मां ने कभी ऐसी कल्पना की होगी? कौन यह सोच सकते थे कि दो अलग-अलग हादसों में दो सगे भाईयों की एक सरीखी मौत हो जाएगी? लेकिन जिंदगी कई तरह के खेल खेलती है।
कई ऐसे मामले सुनाई पड़ते हैं जिनमें पति-पत्नी किसी झगड़े की वजह से एक-दूसरे को मार देते हैं, और खुद भी मर जाते हैं। कुछ दूसरे मामलों में एक को मारकर दूसरे को जेल जाना भी मंजूर रहता है। पीछे उनके छोटे-छोटे से बच्चे रह जाते हैं। अभी एक मामला हमारे पास ही ऐसा हुआ जिसमें एक गरीब परिवार के तीन या चार छोटे-छोटे बच्चे मां के पास बैठे हुए ही थे, और पिता की किसी बात को लेकर मां से बहस हुई, और उसने बच्चों की मौजूदगी में अपनी पत्नी को काट डाला। वह तो मर गई, पति जेल चले गया, और तीन-चार बच्चे बेसहारा हो गए। गरीबों के बीच में आसपास के रिश्तेदारों की भी इतनी क्षमता तो रहती नहीं है कि बिना मां-बाप के तीन-चार बच्चों को और लोग पाल लें। अब इनका भविष्य, और उसके भी पहले उनका वर्तमान कैसा होगा, यह सोचने की बात है। अभी कल की ही खबर है कि एक परिवार में घर के मुखिया की शराबखोरी की आदत, और नशे में रोज झगड़ा झेल-झेलकर थके हुए मां-बेटे ने ही मिलकर बाप को मार डाला, और अब मां-बेटा दोनों गिरफ्तार भी हो गए। इस तरह की घटनाएं रोज हो रही हैं। इनके बाद परिवार की क्या हालत होती होगी, यह कल्पना बहुत मुश्किल नहीं है।
इन दिनों चलते हुए साइबर क्राईम की वजह से लोगों को ब्लैकमेल करना, उनकी पाई-पाई निचोड़ लेना, उन्हें खुदकुशी को मजबूर कर देना, यह चलते ही रहता है। अब सोचिए कि किसी की जिंदगी भर की कमाई अगर ऐसी एक अकेली जालसाजी और धोखाधड़ी में पूरी की पूरी चली जाए, तो जिंदगी क्या रह जाएगी? कैसे कटेगी? ऐसा कई जगह हो रहा है। लोगों को डिजिटल अरेस्ट करके रखा जा रहा है, उनके कुछ नग्न या अश्लील वीडियो भी बना लिए जा रहे हैं, और ब्लैकमेलर जोंक की तरह उनके बदन के खून की एक-एक बूंद चूस ले रहे हैं। दुनिया भर की साइबर-सुरक्षा एजेंसियां, और पुलिस मिलकर भी मुजरिमों का कोई मुकाबला नहीं कर पा रही हैं, जो कि हर दिन अपना जाल अधिक बड़ा करते चल रहे हैं।
दुनिया में आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए सबसे अधिक खबरों में बना हुआ चैटजीपीटी बताता है कि उससे बातचीत करने वाले लोगों में से हर हफ्ते 10 लाख लोग खुदकुशी का इरादा जाहिर करते हैं। पूरी दुनिया में करोड़ों लोग इसका इस्तेमाल करते हैं, फिर भी 10 लाख का आंकड़ा बहुत बड़ा है। जिन लोगों ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बातचीत नहीं की है, उन्हें अंदाज नहीं होगा कि वह एक दोस्त और शुभचिंतक की तरह बात करता है, कभी परामर्शदाता बन जाता है, तो कभी दुनिया भर के मुद्दों पर सलाह की जानकारी देने लगता है। हाल के महीनों में यह बात भी सामने आई है कि एआई कई लोगों को भावनात्मक रूप से ऐसा जोड़ लेता है कि पश्चिमी देशों में दसियों लाख किशोर-किशोरियां उसे ही अपने प्रेमी-प्रेमिका की तरह देखने लगते हैं, उसके साथ दिल का रिश्ता जोड़ लेते हैं। कुछ महीने पहले यह बात भी आई थी कि एआई चैटबॉट ने भावनात्मक रूप से अस्थिर लोगों को खुदकुशी की राह दिखाने की कोशिश भी की थी। और लोगों को लगता है कि वे दुनिया के सबसे उम्दा एआई से बात कर रहे हैं, जिसकी बात सही और सच होने की ही गुंजाइश अधिक है। अभी ताजा खबर बताती है कि दुनिया के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि एआई चैटबॉट से भावनात्मक मदद लेने वालों में से जो कमजोर मानसिक स्थिति से गुजर रहे हैं, वे खतरे में पड़ सकते हैं।
अब हम कमजोर मानसिक स्थिति की एक दूसरी खबर देखें, तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक सरकारी साईंस कॉलेज में पढऩे वाली छात्रा अपने बीमार पिता से मिलकर आई थी, और किराए के मकान में जहां वह रहती थी, वहां उसने खुदकुशी कर ली। आज की ही एक दूसरी खबर है कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के परिवार में एक कमउम्र लडक़े ने खुदकुशी कर ली है। ऐसी खबरें चारों तरफ से आती हैं, और दिल दहलाती हैं कि प्रेम, कर्ज, इम्तिहान में नाकामयाबी, परिवार में डांट, मोबाइल फोन न मिलने, मोबाइल गेम न खेलने देने जैसे किसी भी बहुत छोटे मामले को लेकर लोग खुदकुशी करने लगे हैं। इसके लिए न तो कोई उम्र सीमा रह गई है, न आय सीमा। आदिवासी इलाकों में भी हॉस्टल में रह रही छात्राओं की खुदकुशी की खबर तकरीबन हर पखवाड़े या महीने देखने मिलती है। यह नौबत देश में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति बताती है।
हिन्दुस्तान की बात करें तो यहां पर दो पीढिय़ों के बीच खुलकर बात करने के रिश्ते नहीं रहते। नई पीढ़ी अगर अपनी मर्जी से प्रेम और विवाह करना चाहती है, तो उसके मां-बाप, चाचा-ताऊ मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं, और कभी भाड़े के हत्यारों से, तो कभी अपने सामाजिक अहंकार का पेट भरने के लिए अपने हाथों से तथाकथित ऑनरकिलिंग कर देते हैं। ऐसे समाज में नौजवान पीढ़ी अपनी हसरतों को खुलकर किसी के सामने रख भी नहीं पाती। देश में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता, या किसी और किस्म के रिलेशनशिप-सलाहकार गिने-चुने हैं। भारत के अधिकतर नौजवानों को अपनी उलझन सुलझाने के लिए कोई जरिया हासिल नहीं है। ऐसे में हम हर दिन कहीं न कहीं एक प्रेमीजोड़े की खुदकुशी की खबर पढ़ते हैं, और अलग-अलग खुदकुशी करने वाले लोग तो एक साथ खबरों में आते भी नहीं हैं। शादीशुदा जिंदगी के रिश्ते इतने हिंसक हो चुके हैं कि पति-पत्नी के बीच शक आकर एक अलग किस्म का त्रिकोण बना देता है, और बात मरने-मारने पर आ जाती है, पहले मार देने, और फिर मर जाने पर। फिर यह भी है कि पति-पत्नी के बीच किसी एक प्रेमी या प्रेमिका के आ जाने से जो खूनी त्रिकोण बनता है, वह आमतौर पर एक या दो के कत्ल करवाता है, और बचे हुए को जेल भिजवाता है। भारत रिश्तों में शक से लेकर रिश्तों के टूटने तक किसी चीज को झेलने की दिमागी हालत में नहीं है, और आने वाले कुछ दशकों में देश की मानसिक स्वास्थ्य सेवा की इतनी क्षमता विकसित होते नहीं दिखती जो कि 140 करोड़ आबादी के बीच पनपती मानसिक कुंठाओं, और हिंसक भावनाओं का कोई इलाज कर सके।
भारत धर्मप्रधान देश है। एक समय यह कृषिप्रधान हुआ करता था, बाद में कृषि, सरकारी समर्थन मूल्य, कर्जमाफी, मुफ्त बिजली, और सरकार के आयात-निर्यात नियमों की मोहताज होकर रह गई। देश में हरितक्रांति जरूर आ गई, लेकिन खेतों में हरियाली लाने वाले किसान सरकार की योजनाओं, चुनावी घोषणाओं, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की नीतियों के सहारे ही रह गए। ऐसे देश में खेती के बाद दूसरे नंबर का सबसे महत्वपूर्ण काम धर्म का है। देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग धर्मों में, अलग-अलग जातियों में तरह-तरह के धर्म साल भर चलते ही रहते हैं। दुनिया के कुछ विकसित देशों की तरह भारत में अभी लोगों का अनास्थावादी, या नास्तिक होना लोकप्रिय नहीं हुआ है, इसलिए नास्तिकता मोटेतौर पर किताबों तक सीमित है, और असल जिंदगी में अधिकतर लोग धर्मालु हैं। लेकिन जिस तरह एक किताब या फिल्म का नाम है, फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, भारत में भी लोगों के शंकालु से लेकर धर्मालु तक, और धर्मान्ध से लेकर साम्प्रदायिक होने तक, ऐसे 50 अलग-अलग शेड दिखते हैं।
धार्मिक त्यौहारों की सोचते हुए एक बात लगती है कि किस धर्म, या किस जाति के कौन से त्यौहार कितने उस समुदाय के भीतर के हैं, और कितने सचमुच ही सामाजिक हैं, दूसरे समुदायों के लिए भी हैं। त्यौहारों का ऐसा अनौपचारिक विश्लेषण सुझाता है कि त्यौहारों को कुछ पैमानों पर कसा जा सकता है कि उनका सामाजिक योगदान कितना है। अब जैसे किसी धर्म के किसी त्यौहार का मूल्यांकन करने के लिए यह सोचना चाहिए कि उसे मनाते हुए उस तबके के भीतर अमीर और गरीब का फर्क कितना झलकता है? क्या गरीब भी उस त्यौहार को मना सकते हैं, या फिर वह गरीबों पर महज बोझ रहता है? क्या लोगों के बीच इस त्यौहार पर अपने से कमजोर लोगों की मदद करने की कोई सोच रहती है, या फिर लोग अपने ही परिवार, दोस्तों, और अपने ही आय वर्ग के बीच मस्त रहते हैं? किसी त्यौहार का मूल्यांकन इस पर भी होना चाहिए कि मनाने वाले परिवारों में महिलाओं को कितने हक मिलते हैं? क्या उन्हें सिर्फ पकाने और सजाने का, पूजा और मनाने का अतिरिक्त बोझ ही मिलता है, और उपवास से खाली पेट मिलता है, या फिर खुशियां मनाने में बराबरी का मौका और हक भी मिलता है? यह भी देखा जाना चाहिए कि उस त्यौहार से जुड़ा हुआ उपवास सिर्फ महिलाओं के मत्थे पड़ता है, या फिर चर्बी से लदे हुए मर्द भी एकाध दिन अपने बदन को राहत देते हैं? मूल्यांकन इस बात को लेकर भी होना चाहिए कि त्यौहार मनाने के तौर-तरीके गरीबों पर अधिक भारी पड़ते हैं क्या? फिर यह भी देखना चाहिए कि कौन सा त्यौहार कितना प्रदूषण छोड़ जाता है, नदियों में, तालाबों पर, सडक़ों पर, शामियानों में, कहां-कहां पर वह ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, धरती और जल प्रदूषण छोड़ जाता है? त्यौहारों को लेकर यह भी देखना चाहिए कि उनमें कट्टरता कितनी है? अंधविश्वास और पाखंड कितना है? वैज्ञानिक पैमानों पर त्यौहार कितने सकारात्मक, और कितने नकारात्मक होते हैं? इन सभी बातों को देखना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि आमतौर पर जो महिलाएं त्यौहार मनाती हैं, उनके परिवार के लडक़े या पुरूष उनका कितना हाथ बंटाते हैं? कुछ बरस पहले की एक तस्वीर याद पड़ती है जिसमें एक नामी-गिरामी टीवी जर्नलिस्ट रहे रवीश कुमार छठ पर सिर पर टोकरी रखे हुए शायद अपनी मां के साथ चलते हुए दिखते हैं। तो किस त्यौहार का बोझ पुरूष भी उठाते हैं?
हमें त्यौहारों का मूल्यांकन करते हुए यह भी सूझता है कि कौन सा त्यौहार दूसरी जाति, या दूसरे धर्म के लोगों के लिए कितना खुला रहता है? दूसरे समुदायों का उनमें कितना स्वागत होता है? बंगाल की याद पड़ती है कि वहां की विश्वविख्यात दुर्गा पूजा में हिन्दू जितने शामिल होते हैं, उतने ही मुस्लिम भी शामिल होते हैं, मूर्तिकार और साज-सज्जा करने वाले मुस्लिम ही अधिक रहते हैं, और वे पूजा के पूरे जलसों में शामिल रहते हैं। वहां पर यह त्यौहार धार्मिक न होकर सामाजिक अधिक रहता है। लोगों को अपने-अपने इलाकों में यह देखना चाहिए कि उनके त्यौहार कितने धार्मिक हैं, और कितने सामाजिक। एक वक्त गुजरात में गरबा पूरी तरह से सामाजिक था, कहीं से यह सुनाई भी नहीं पड़ता था कि उसमें गैरहिन्दू न पहुंचें। लेकिन बाद में माहौल बदलते चले गया, और अब तो ऐसी तख्तियां लगने लगी हैं, और एक सामाजिक त्यौहार पूरी तरह से एक धर्म का त्यौहार हो गया है। हर धर्म को यह हक है कि वह अपने त्यौहारों को अपने समुदाय का रखे, या सभी समाजों का उसमें स्वागत करे, इसमें बिना बुलाए दूसरे धर्म के लोगों को वहां जाकर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह डांस नहीं करना चाहिए।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दो रात पहले छत्तीसगढ़ महतारी की सडक़ किनारे चबूतरे पर स्थापित प्रतिमा किसी ने तोडक़र गिरा दी। इसे लेकर कुछ छत्तीसगढ़ी संगठनों ने बड़ा उग्र प्रदर्शन किया, कांग्रेस के पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मुद्दे को लपककर मौजूदा भाजपा सरकार पर बड़ा हमला किया, और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कड़ी जांच और कार्रवाई का भरोसा दिलाया। आज सुबह से उस टूटी प्रतिमा की जगह दूसरी प्रतिमा स्थापित की गई, और पहली खबर यह आई है कि किसी मानसिक विक्षिप्त ने यह प्रतिमा तोड़ दी थी। और भी जगहों पर कई बार ऐसा होता है कि कोई विक्षिप्त, या नशेड़ी व्यक्ति किसी प्रतिमा को नुकसान पहुंचा दे। इन दिनों अधिक प्रचलित हो चले सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से बहुत से मामले पकड़ में आ जाते हैं, और सुबूत की रिकॉर्डिंग भी मिल जाती है।
आज हम इसी एक मामले को लेकर नहीं लिख रहे हैं, बल्कि देश भर में चारों तरफ कहीं महान व्यक्तियों (महापुरूष लिखना लैंगिक असमानता की बात होगी), कहीं किसी धर्म के आराध्य लोगों की प्रतिमाएं लगी रहती हैं, कहीं सडक़ किनारे पेड़ के नीचे सिंदूर पुते पत्थर भी आस्था के प्रतीक रहते हैं, और इन सबकी कोई हिफाजत तो रहती नहीं है। छत्तीसगढ़ महतारी का प्रतीक अभी कुछ बरस पहले ही बना, और उसका उपयोग शुरू हुआ। लेकिन गांधी और अंबेडकर, इन दोनों की प्रतिमाएं देश भर में शायद देश के ताजा इतिहास के लोगों में सबसे अधिक लगी दिखती हैं। और इन दोनों की प्रतिमाओं पर ही जगह-जगह हमले होते हैं, इन्हें तोड़ा-फोड़ा जाता है, चूंकि गांधी को मानने वाले लोग कोई उग्र या आक्रामक समूह नहीं हैं, इसलिए उनकी प्रतिमा टूटने पर हल्ला नहीं मचता, उसे जोड़-जाडक़र खड़ा कर दिया जाता है। अंबेडकर को मानने वाले लोग अनुसूचित जाति में अधिक हैं, और वे इसे अपनी जाति का अपमान मानते हैं, जो कि रहता भी है, और वे लोग तुरंत ही विरोध करने को एकजुट हो जाते हैं। फिर सडक़ किनारे, पेड़तले कुछ किस्म के ईश्वर अधिक संख्या में चारों तरफ रहते हैं, और जब कभी कोई तनाव खड़ा करना रहता है, उस इलाके की ऐसी आस्था-शिलाएं बड़े काम की साबित होती हैं। और तो और कहीं-कहीं किसी थानेदार को हटाने के लिए भी इस तरह का तनाव खड़ा किया जाता है।
छत्तीसगढ़ में अभी इस बात को लेकर भी थोड़ी सी तनातनी चल रही थी कि रेलवे स्टेशनों और रेलगाडिय़ों में छठ के गीत बज रहे हैं, क्योंकि छठ त्यौहार का मौका है। खासकर कुछ ऐसे संगठन, और लिखने वाले, जो कि उग्र क्षेत्रवाद का झंडा उठाकर चलते हैं, उन्हें इस संगीत से याद पड़ा कि छत्तीसगढ़ी त्यौहारों पर तो ऐसा कुछ बजता नहीं है। फिर यह भी है कि दुनिया में कहीं भी उग्र क्षेत्रवाद दूसरे क्षेत्रों के विरोध पर पनपता है, पलता है, और बढ़ता है। इसलिए एक तरफ यह संगीत, और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा को तोड़ा जाना, इन दोनों ने मिलकर इस मौके पर देसिया और परदेसिया का फर्क भी बयानों में और सोशल मीडिया पोस्ट पर ला दिया। हालांकि छत्तीसगढ़ महतारी इस राज्य का इस तरह का प्रतीक नहीं है कि जिससे कोई भी तबका, किसी भी प्रदेश के लोग, किसी भी जाति या धर्म के लोग चिढ़ सकें। यह प्रतीक जाति-धर्म से परे का है, और इसके साथ कोई परदेसिया-विरोधी जैसी आक्रामक सोच भी जुड़ी हुई नहीं है। इसलिए इस प्रतिमा को किसी वैचारिक विरोध की वजह से तोड़ा गया हो, ऐसा हमें बिल्कुल नहीं लगा था, और शायद ऐसा ही साबित भी होगा।
लेकिन लगे हाथों क्षेत्रवाद के बारे में सोच लेना जरूरी है। जिस देश में राष्ट्रवाद उग्र होता है, और पूरे देश पर एक साथ आक्रामक तरीके से लादा जाता है, वहां पर अलग-अलग इलाकों में मानो प्रतिक्रिया के रूप में क्षेत्रवाद सिर उठाने लगता है क्योंकि उसे अपने अस्तित्व को साबित करने का एक मौका मिल जाता है। फिर राष्ट्रवाद के नीचे जब अलग-अलग इलाकों में इस तरह स्थानीयतावाद, या क्षेत्रीयतावाद पनपने लगता है, तो वह अपने लिए उसी तरह काल्पनिक और अस्तित्वहीन दुश्मन ढूंढ लेने लगता है जैसा कि राष्ट्रवाद अपने लिए ढूंढ चुका रहता है। राष्ट्रवाद से लेकर क्षेत्रवाद तक ऐसे एक काल्पनिक दुश्मन की जरूरत जरूरी रहती है। इसमें थोड़ी दिक्कत तब आ जाती है जब किसी इलाके के घोर उग्रवादी स्थानीयतावादी लोग अड़ोस-पड़ोस के प्रदेशों से भी आए हुए लोगों के चेहरे काल्पनिक दुश्मन के पुतले पर चिपकाने लगते हैं, और फिर एक ही धर्म या एक ही जाति के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्र का मुद्दा अधिक हमलावर होने लगता है। इस तरह किसी देश में राष्ट्रवाद की एक नकारात्मक, आक्रामक, और हिंसक प्रतिक्रिया जगह-जगह देखने मिलती है। दुनिया की बहुत सी संस्कृतियां राष्ट्रवाद के ऐसे नुकसान देख, और झेल चुकी हैं, और राष्ट्रवादी उन्माद के नतीजे में क्षेत्रवाद भी जगह-जगह हावी होता है। लोग बोली और पहरावे को लेकर, खानपान और दुकानों के नाम को लेकर, और सार्वजनिक जगहों पर सफाई और संगीत को लेकर छोटे बच्चों की तरह देखादेखी के मुकाबले में उतर आते हैं, और फिर बालिग लोगों की तरह हमलावर हो जाते हैं।
अमरीका में अभी कुछ हफ्तों के भीतर ही एक और सडक़ हादसा हुआ जिसमें भारत से वहां जाकर गैरकानूनी रूप से रह रहे सिक्ख नौजवान जशनप्रीत सिंह ने नशे और लापरवाही की हालत में एक हाईवे पर बुरा एक्सीडेंट किया, सडक़ पर ढेरों गाडिय़ां एक-दूसरे से टकराईं, और इसमें तीन लोग मारे गए। लोगों को याद होगा कुछ हफ्ते पहले भी भारत के ही एक सिक्ख नौजवान ने अमरीका में लापरवाही से बड़ी ट्रक मोड़ी थी, और इसी तरह का एक्सीडेंट हुआ था। आज की ट्रंप सरकार तो देश के बाहर से आए हुए और गैरकानूनी रूप से बसे हुए लोगों को बाहर निकाल रही है, लेकिन ऐसे लाखों लोग वहां पर बसे हुए हैं जो कि अवैध तरीके से घुसे हुए, या रूके हुए हैं, और इनमें से हर महीने हजारों लोग उनके देश भेज दिए जा रहे हैं। भारत में भी अमरीका से निकाले गए, और हथकड़ी-बेड़ी में जकडक़र लाकर यहां छोड़े गए लोगों के शुरू के कुछ विमान तो पंजाब में ही उतरे थे, क्योंकि इनमें वहीं के लोग ज्यादा थे।
जब कभी किसी देश की पहचान लेकर कहीं गए हुए, या वहां बसे हुए लोग कोई गलत काम करते हैं, तो उनके देश की बदनामी भी होती है, और अगर वे धर्म के प्रतीक चिन्ह पहने रहते हैं, तो उनके धर्म की साख पर भी आँच आती है। कोई भी धर्म अपने को मानने वाले लोगों के चाल-चलन से भी पहचाना जाता है, फिर चाहे उस धर्म की किताबें और नसीहतें कुछ और क्यों न कहती हों। भारत से गए हुए लोग ही अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया में सबसे अधिक संख्या में हैं, या सबसे अधिक खबरों में रहते हैं। वे भारत के खालिस्तानी आंदोलन को भी इन देशों में चलाते हैं, भारत के माफिया गिरोह भी इन देशों तक अपना विस्तार कर चुके हैं, और वहां भी गोलीबारी करवाते रहते हैं, या कत्ल भी। अभी तो कुछ देशों में भारत सरकार के कुछ अफसर भी घिरे हुए हैं कि उन्होंने वहां की जमीन पर भारत के दुश्मन माने जाने वाले लोगों का कत्ल करवाया, या कत्ल करने की सुपारी दी। इन सबसे एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में भारत का नुकसान हुआ, जो कि जारी भी है, और इसके अलावा जो लोग इस तरह की हरकतों से जुड़े रहते हैं, उनके धर्म भी नुकसान पाते हैं।
ट्विटर, यानी एक्स के मालिक एलन मस्क ने कल ही एक समाचार की कतरन पोस्ट की है जिसमें फ्रांस में एक विदेशी आप्रवासी ने एक फ्रेंच बच्ची से बलात्कार करके उसका कत्ल कर दिया था, और जब तक मुजरिम को सजा होती, तब तक अपनी बेटी को खोने वाले पिता ने भी नशे में डूबकर जिंदगी खो दी। अब इस एक घटना ने आप्रवासियों के खिलाफ नफरत का एक नया सैलाब ला दिया है। इसी तरह ब्रिटेन में अभी बाहर से आकर बसे कुछ मुस्लिमों ने कुछ जुर्म किए, तो उससे मुस्लिमों के खिलाफ भी नाराजगी फैली, और विदेशी शरणार्थियों के खिलाफ भी। ऐसा दुनिया के कई देशों में हो रहा है, और कुछ देशों में तो वहां की सबसे दक्षिणपंथी पार्टियां ऐसे ही शरणार्थी-मुद्दों को लेकर सत्ता पर आ गईं। भारत में भी आज बांग्लादेश और म्यांमार से आए हुए शरणार्थियों का एक बड़ा मुद्दा चुनावी बहस का सामान बना हुआ है, और धर्म के साथ-साथ राष्ट्रीयता भी निशाने पर है।
लोग जब अपनी पहचान को लिए चलते हैं, तो उन्हें अपनी जड़ों के सम्मान के प्रति अधिक सावधान रहना चाहिए। जब धार्मिक कपड़े, प्रतीक चिन्ह, या झंडे लिए हुए लोग कोई हिंसा करते हैं, तो पहला नुकसान वे अपने ही धर्म की साख का करते हैं, दूसरे लोगों का नुकसान तो बाद में होता है। लोगों को सोशल मीडिया पर यह लिखने का मौका मिलता है कि अगर आपका धर्म आपको हिंसा के लिए उकसाता है, तो आपको एक नए धर्म की जरूरत है, या फिर सारे धर्मों को छोड़ देने की। इसी तरह जब लोग अपनी जमीन से दूर जाकर कहीं और बसकर या रहकर काम करते हैं, तो उनकी हरकतें उनके देश को भी नाम दिलाने या बदनाम करने का काम करती हैं। अब आज दुनिया के दर्जनभर से अधिक देशों से गृहयुद्ध या आतंक की वजह से जो बेदखली चल रही है, और लोग जान बचाकर पश्चिम के देशों में गैरकानूनी तरीके से भी घुसने की कोशिश में अपनी जान दे दे रहे हैं, उससे भी उन देशों में संस्कृतियों का एक टकराव खड़ा हो रहा है, और संकीर्णतावादी-राष्ट्रवादी लोगों को एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी मिल रहा है। योरप के कई देशों ने इतनी संकीर्ण पार्टियों की इतनी सफलता कई दशकों में नहीं देखी थीं, जितनी कि आज शरणार्थियों और घुसपैठियों की वजह से, उनका खतरा गिनाते हुए मुमकिन हो पा रही है।
सर्वधर्म समभाव की सोच अच्छी है, लेकिन हर धर्म की सोच एक सरीखी है नहीं। खासकर लोकतंत्र को लेकर कुछ धर्म पश्चिमी लोकतंत्रों का अधिक सम्मान कर पाते हैं, और कुछ धर्म अपने को लोकतंत्रों से ऊपर साबित करने में ही लगे रह जाते हैं। पश्चिम में जहां भी उदार लोकतंत्र दुनिया के शरणार्थियों के प्रति अपनी वैश्विक जिम्मेदारी अधिक हद तक निभाने की कोशिश कर रहे हैं, वहां-वहां उन्हें कुछ देशों से आए हुए, और एक-दो धर्मों वाले ऐसे लोगों की चुनौती झेलनी पड़ रही है जो कि लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों को अपने धर्म के खिलाफ मानते हैं। योरप की संस्कृतियों में बसने के बाद भी कई मुस्लिम देशों से आए हुए लोग अपनी लड़कियों और महिलाओं के लिए अपने देश के घरेलू संस्कृति जारी रखना चाहते हैं, और लोकतंत्र से उनका एक टकराव खत्म होता ही नहीं है। बुर्का से लेकर हिजाब तक, और बाल विवाह से लेकर ऑनरकिलिंग तक बहुत से मामलों में शरणार्थी समुदाय स्थानीय सरकारों से टकराते हैं, और धीरे-धीरे उनके प्रति योरप के स्थानीय लोगों के बीच हमदर्दी खत्म होती जाती है।
दुनिया में वायु प्रदूषण पर आने वाली सालाना ग्लोबल रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में वायु प्रदूषण से करीब 80 लाख लोग मारे गए। इनमें से आधे लोग तो भारत और चीन में मरे हैं, 20-20 लाख! दुनिया में होने वाली हर 8 में से एक मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई है। अमरीका और स्विटजरलैंड के प्रतिष्ठित संस्थानों की इस रिपोर्ट का हर बरस इंतजार रहता है, और भारत में जिस तरह किसी भी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट को पढऩे के भी पहले कचरे की टोकरी में डाल दिया जाता है, वैसा ही कुछ इसके साथ भी होगा, और यह कहा जाएगा कि यह हिन्दू त्यौहार, दीवाली के फटाखों को बदनाम करने की एक और कोशिश है। लेकिन हम किसी धर्म या देश की फिक्र किए बिना वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित इस रिपोर्ट पर फिक्र करना चाहते हैं क्योंकि इन करीब 80 लाख में 90 फीसदी मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हुई हैं। भारत के अलावा बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी दो-दो लाख से अधिक मौतें वायु प्रदूषण से हुई हैं, और छोटे से म्यांमार में भी ऐसी एक लाख मौतें दर्ज हुई हैं। यह रिपोर्ट एक भयानक वैज्ञानिक पहलू भी सामने रखती है कि प्रदूषण का असर हवा साफ होने के बाद भी लंबे समय तक बने रहता है, और 2023 में दुनिया में 79 लाख मौतें तो हुई ही हैं, 23 करोड़ से अधिक स्वस्थ जीवन वर्ष भी बर्बाद हुए हैं, यानी लोगों की जिंदगी में इतने बरसों के बराबर की उम्र घट गई है।
भारत धार्मिक प्रदूषण को धार्मिक स्वतंत्रता मानकर चलता है। सडक़ों पर फटाखे और आतिशबाजी, वायु प्रदूषण से परे के ध्वनि प्रदूषण और अब रौशनी के प्रदूषण भी शहरों का जीना हलाकान कर रहे हैं। लोग धर्मोन्माद में डूबे हुए न अपने फेंफड़ों की फिक्र करते, और न ही अपने जाने वाले बुजुर्गों की, और अभी-अभी आए हुए बच्चों की। हालांकि राम के लौटने पर अयोध्या में जो पहली दीवाली मनाई गई थी, उस वक्त बारूद या फटाखे नहीं थे, और घी-तेल के दीयों ने अयोध्या को बहुत अच्छी तरह रौनक किया होगा, आज तो हाल यह कि किसी मोहल्ले या कॉलोनी में लोग घंटे भर की मेहनत के बाद अपने घर के चारों तरफ दीये जलाते हैं, और पड़ोस में कोई एक बड़े धमाके वाला बम पल भर में सारे दीये बुझा देता है। अब अगर चीनी झालरों की रौशनी है तब तो ठीक है, वरना अयोध्या की शैली के दीयों का जलना अब मुश्किल है क्योंकि जिनके पास जितना दम है, उनके पास उतना बड़ा बम है। सुप्रीम कोर्ट इस कदर बेफिक्र और बेअसर हो चुका है कि उसकी लगाई रोक को दिल्ली की गली-गली में पैरोंतले कुचला जाता है, और कोर्ट के बदन पर, उसके आत्मसम्मान और स्वाभिमान पर कोई खरोंच भी नहीं आती, क्योंकि उसे मालूम है कि खरोंचों के जख्म दिखाना धर्म के खिलाफ मान लिया जाएगा। इस बार के दिल्ली के आंकड़े बताते हैं कि बीते कई बरसों में कभी दीवाली पर इतना वायु प्रदूषण नहीं था।
कुछ लोगों को यह लगता है कि दीवाली के आसपास की बारूदी हवा एक-दो दिन फेंफड़ों को परेशान करती है, और उसके बाद उसका असर खत्म हो जाता है। ऐसे लापरवाह लोगों को चिकित्सा विज्ञान बताता है कि वायु प्रदूषण सिर्फ सांस की बीमारी तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे डायबिटीज, हृदय रोग, और डिमेंशिया जैसी दिमागी बीमारी भी जुड़ी हुई हैं। 2023 की इस रिपोर्ट से पता लगता है कि दुनिया में इस बरस वायु प्रदूषण से हुए डिमेंशिया से ही सवा 6 लाख से अधिक लोग मरे, और एक करोड़ 16 लाख स्वस्थ जीवन-वर्ष खत्म हो गए। अब ऐसी बीमारियों की लिस्ट को कितना गिनाएं कि वायु प्रदूषण से सेहत का कैसा-कैसा नुकसान हो रहा है। हृदय रोग से होने वाली हर चौथी मौत वायु प्रदूषण की वजह से हो रही है, और डायबिटीज की हर छह में से एक मौत भी इसी वजह से।
मोदी सरकार के नीति आयोग के मुखिया रहे अमिताभ कान्त ने अभी दीवाली पर दिल्ली के प्रदूषण को देखते हुए एक बड़ी तल्ख टिप्पणी की थी, और अपनी निराशा जाहिर की थी कि सुप्रीम कोर्ट ने सांस लेने और जीने के हक के ऊपर लोगों के फटाखे फोडऩे के हक को रखा। अब हालत यह है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार कृत्रिम वर्षा की तैयारी कर रही है, जिसके बारे में वैज्ञानिकों को गंभीर संदेह है कि इससे कोई भी फायदा होगा। यही दिल्ली सरकार, और यही केन्द्र सरकार फटाखों के हक के लिए सुप्रीम कोर्ट में लड़ती रहीं, और यह कैसी लोकतांत्रिक विसंगति है कि फेंफड़ों और फटाखों में से किसी एक को छांटने की नौबत आने पर इन सरकारों ने फटाखों को छांटा! और इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज और मुख्य न्यायाधीशों में ईश्वरीय-दैवीय प्रेरणा से फैसले लिखने का चलन मान्यता पा चुका है, तो जज फेंफड़ों को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं, और ग्रीन फटाखों के नाम पर रईसों और कारोबारियों को मनमानी करने देते हैं। जजों को उनके बंद एसी-बंगलों से निकालकर दीवाली की रात दिल्ली की अलग-अलग संपन्न हिन्दू बस्तियों में सडक़ किनारे बैठाना चाहिए, तभी उन्हें हकीकत का अहसास होगा, और उनके फैसले दैवीय या अलौकिक होने के बजाय हकीकत पर टिके होंगे।
अमरीका में रक्षामंत्री को अब युद्धमंत्री का पदनाम दिया गया है। राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप नोबल शांति पुरस्कार के लिए ओवरटाईम कर रहे हैं, दुनिया को धमका रहे हैं, बांह मरोड़ रहे हैं, और इसके साथ-साथ वे रक्षामंत्री को अब युद्धमंत्री का पदनाम दे चुके हैं। दुनिया के अलग-अलग बहुत से मोर्चों पर अमरीकी हितों की रक्षा करने के बजाय अब अमरीकी सेना का प्रभारी मंत्री युद्धमंत्री कहला रहा है, जाहिर है कि इस सरकार और इस फौज का क्या नया रूख रहेगा। ऐसे में अभी कुछ दिन पहले युद्धमंत्री पीटर हेगसेथ ने यह कहा कि अमरीका अपने फौजियों के बाल कटवाने जा रहा है, और दाढ़ी मुंडवाने जा रहा है। उन्होंने कहा कि गैरपेशेवर दिखने का युग खत्म हो गया है, और अब फौज में दाढ़ी वाले लोग नहीं रहेंगे। इसका विरोध करते हुए अमरीका के एक सांसद थामस आर.सुओजी ने रक्षामंत्री को लिखा है कि यह सिक्खों और मुस्लिमों को फौज के बाहर का रास्ता दिखाने का काम होगा। पिछले महीने ही यह निर्देश जारी हो चुका है, और धार्मिक आधार पर सिक्खों, मुस्लिमों, यहूदियों, और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों को दाढ़ी और बाल या पगड़ी बनाए रखने की इजाजत खत्म की जाती है।
अमरीका और भारत में सिक्खों ने इस फौजी फैसले का बहुत विरोध किया है, और मुस्लिम संगठनों ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दर्ज की है। अगर अमरीकी सरकार इस फैसले पर अड़ी रहती है, तो अपनी धार्मिक मान्यताओं को कड़ाई से मानने वाले सैनिकों के पास फौज छोडऩे के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा, और फौज में इन धर्मों के नए लोग जा भी नहीं पाएंगे। यह फैसला ट्रंप के चुनावी नारों से लेकर राष्ट्रपति बनने के बाद के उनके फैसलों तक कई बातों में दिखते रहा है। अमरीका में देश के बाहर से आए हुए लोग कैसे घटाए जा सकते हैं, इस पर ट्रंप रात-दिन मेहनत कर रहे हैं। फौज से इन धर्मों के लोगों को अगर हटना पड़ता है, तो जाहिर है कि उनमें से कई लोग देश छोडक़र जाने की भी सोचेंगे, और वह ट्रंप की गोरी नीतियों को माकूल भी बैठेगा। दिलचस्प बात यह है कि अभी जब जर्मन चांसलर ट्रंप से मिले, तो उन्होंने ट्रंप को उनके पिता का जर्मनी का जन्म प्रमाणपत्र तोहफे में दिया। बहुत से लोगों का यह मानना है कि यह तोहफा एक किस्म का व्यंग्य था कि ट्रंप खुद अमरीका में बहुत पुराना नहीं है, और उसके पिता तो जर्मनी में पैदा हुए थे। ट्रंप लगातार धर्म, नस्ल, रंग, और राष्ट्रीयता के आधार पर जो भेदभाव करते चल रहा है, फौज को लेकर उसका यह फैसला उसी की एक कड़ी है। लेकिन अमरीका में जो लोकतंत्रवादी हैं, वे इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि ट्रंप किस तरह, और किस हद तक अमरीकी जनजीवन में विविधता को खत्म करते चल रहा है, और वह इस देश को पूरी तरह से एक गोरा और ईसाई देश बनाने पर आमादा है।
अमरीका के लोकतंत्र और वहां की जिंदगी के हर दायरे में विविधता का ही एक सबसे बड़ा योगदान रहा। दुनिया भर से वहां पहुंचने वाले प्रतिभाशाली लोगों ने मिलकर ही अमरीका को कामयाब बनाया। हर प्रतिभा को बढ़ावा देते हुए उसका इस्तेमाल करके अमरीकी अर्थव्यवस्था आसमान पर पहुंची। ऐसे मेल्टिंग पॉट कहे जाने वाले देश को आज जिस तरह से एक धर्म, एक रंग, और कुल दो जेंडर तक सीमित किया जा रहा है, उसका बड़ा नुकसान अमरीका को आने वाले बरसों में होगा, और कुछ अर्थशास्त्री इस खतरे के बारे में लिख भी रहे हैं। आज अमरीका को ट्रंप के विविधता-विरोधी रूख के नुकसान का ठीक-ठीक अंदाज इसलिए नहीं लग रहा है कि आज पूरी दुनिया में ट्रंप एक बिफरे हुए सांड की तरह (सांड से माफी के साथ) तबाही कर रहा है, और दुनिया भर पर टैरिफ, दुनिया भर से रिश्तों में उठा-पटक की वजह से खुद अमरीका की जिंदगी और वहां के कारोबार में एक ऐसा रेतीला -धूलभरा अंधड़ आया हुआ है कि लोगों को आज नुकसान और खतरा दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। लेकिन अमरीकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, और अमरीकी लोगों के लिए रोजगार को अधिक बचाकर रखने के नाम पर ट्रंप जो कुछ कर रहा है, उससे अमरीका का ही बड़ा नुकसान हो रहा है। दुनिया भर से वहां पहुंचे हुए लोग जितने मेहनतकश रहते हैं, जितनी कम तनख्वाह या मजदूरी पर काम करते हैं, अपने देशों से हुनर सीखकर वहां आए रहते हैं, वह सब अमरीका में आज आसानी से हासिल नहीं है। कोई अमरीकी उतना हुनर सीखकर, उतने कम पैसों पर उतनी मेहनत करने के लिए शायद ही तैयार होंगे। लेकिन इससे ट्रंप अपनी एक नफरती जिद तो पूरी कर ही रहा है कि अमरीका में दूसरी राष्ट्रीयता, दूसरी नस्ल से आए हुए लोगों की गिनती घटानी है। अमरीकी फौज से ट्रंप ने ट्रांसजेडरों को पहले ही बाहर कर दिया है, और अमरीका में कुल दो ही सेक्स को मान्यता दी है। लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ जाकर इस पुरातनपंथी फैसले से ट्रंप अमरीका में सदियों से धीरे-धीरे स्थापित मूल्यों को खत्म कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कई बार किसी एक देश का मीडिया सच से ऊपर अपने देश के रणनीतिक हितों को रखते हुए झूठी खबरें भी फैलाने में लग जाता है, और यह पत्रकारिता के प्रति ईमानदारी के बजाय राष्ट्रवाद या राष्ट्रप्रेम को महत्व देना मान लिया जाता है। ऐसे में आज जब झूठी खबरें, या वीडियो गढक़र फैलाना आम हो चला है, और एआई का इस्तेमाल ऐसी चुनिंदा खबरों को चारों तरफ फैलाने में किया जा रहा है, तो सच और झूठ का फर्क कर पाना थोड़ा मुश्किल रहता है। सोशल मीडिया पर आई खबरें यह पता नहीं लगने देतीं कि उनमें खबर क्या है, और झूठ क्या है। फिर सोशल मीडिया एक अलग सिद्धांत पर काम करता है कि जब तक कोई झूठ का भांडफोड़ करे, तब तक उसे इतनी जगह, इतने दूर तक फैला दो कि भांडाफोड़ वहां तक पहुंच ही न सके। हम खबरों के धंधे में होने की वजह से सोशल मीडिया पर जाने-माने लोगों के फैलाए हुए ऐसे झूठ लगातार देखते हैं, जो कि सोच-समझकर फैलाए जाते हैं। उनका यह मकसद होता है कि बाद में चाहे भांडाफोड़ हो जाए, लेकिन तब तक वे जंगल की आग की तरह दूर-दूर तक फैल चुके रहें।
ऐसे में अभी बांग्लादेश की एक खबर आई है, जिसे हम किसी भरोसेमंद समाचार स्रोत पर नहीं ढूंढ पा रहे हैं। इसलिए इस खबर पर शक के साथ ही इस पर चर्चा कर रहे हैं। इसके मुताबिक आज की बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के वरिष्ठ सलाहकार आसिफ महमूद शोजिब भुयान ने अभी सोशल मीडिया पर कहा है कि बांग्लादेश में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी आर्मी (आईआरए) की स्थापना चल रही है। इसके लिए कुछ पाकिस्तान समर्थक अधिकारियों के साथ-साथ पाकिस्तान की मिलिट्री इंटेलीजेंस (आईएसआई), और तुर्की की एक एजेंसी (एमआईटी) के प्रतिनिधि बांग्लादेश के चुनिंदा सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। इस खबर में भारतीय अफसरों के नाम बिना लिखा गया है कि भारत इसे बांग्लादेश को इस्लामी राज्य में बदलने के एक कदम की तरह देख रहा है। खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज की खबरों में दिलचस्प यही रहता है कि किसी स्रोत का जिक्र नहीं रहता। फिर भी हम यह मानकर चल रहे हैं कि यह खबर सच हो सकती है क्योंकि बांग्लादेश आज जितनी उथल-पुथल से गुजर रहा है, और हाल के महीनों में पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते जितने सुधरे हैं, और गाढ़े हुए हैं, उनमें यह बिल्कुल मुमकिन है। दूसरी तरफ तुर्की आज के वक्त में मुस्लिम देशों का एक बड़ा हिमायती होकर खड़ा है, और भारत-पाकिस्तान के किसी भी संघर्ष और तनाव में वह पाकिस्तान के साथ खुलकर है। ऐसे में अगर तुर्की एक नया बांग्लादेश बनाने में ढाका के साथ है, तो उसमें भी कोई हैरानी नहीं होगी।
अब भारत के लिए ऐसी नौबत में फिक्र की बात यह है कि बांग्लादेश पिछले उथल-पुथल के बाद से जिस तरह अस्थिर चल रहा है, और वहां पर भारतविरोधी माहौल जितना आक्रामक है, वह भारत के लिए अच्छा नहीं है। एक तरफ श्रीलंका अलग किस्म की अस्थिरता से गुजर रहा है, और पाकिस्तान का भी कई मायनों में ऐसा ही हाल है, बल्कि वह तो अपने कुछ हिस्सों में गृहयुद्ध सा झेल रहा है। भारत का एक और पड़ोसी म्यांमार फौजी और अलग किस्म के आतंकी गृहयुद्ध को झेल रहा है, और उसका दबाव भारत पर है। फिर एक बात यह भी ध्यान रखने की है कि भारत के ये सारे ही पड़ोसी देश चीन के प्रभाव में हैं, और भारत के मुकाबले चीन की दखल वहां पर बहुत अधिक है। सबसे ताजा अस्थिर देश नेपाल वहां पर भारतविरोधी भावनाओं को देख रहा है, और वहां की नई नौजवान पीढ़ी भारत के सख्त खिलाफ दिख रही है जो कि हाल के इस सत्ता पलट की जिम्मेदार रही है। इस तरह भारत के अड़ोस-पड़ोस का एक भी देश ऐसा नहीं रह जाता जिसका कोई भी वजन हो, और जो भारत के साथ हो। भूटान किसी रणनीतिक महत्व का नहीं है, और वह चीन और भारत के बीच एक संतुलन बनाकर चलता है।
लोग जिंदगी के बारे में कहते हैं कि वह हमेशा इंसाफपसंद नहीं रहती, लाईफ इज नॉट ऑलवेज फेयर। होता भी यही है, बहुत से लोगों को जिंदगी में तकलीफें इतनी अधिक झेलनी पड़ती हैं कि लगता है कि जिंदगी उनसे कोई बदला निकाल रही है। अब यह मामला इंसानी जिंदगी से बढक़र आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तक पहुंच गया है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च से एआई मॉडल्स की एक कमजोरी पता लगी है कि जब इन्हें सिर्फ जीतने, अधिक लोकप्रिय बनाने, या अधिक टिप्पणी, लाईक्स, शेयर हासिल करने के मुकाबले में उतारा जाता है, तो ये सच को छोडक़र आगे बढ़ जाते हैं। इनमें से कोई भी काम करने के लिए, या किसी सामान को किसी भी तरह बेचने के लिए, किसी चुनाव में वोट बंटरोने के लिए, या सोशल मीडिया पर किसी इश्तहार की तरफ लोगों का ध्यान खींचने के लिए जब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को झोंका जाता है, तो वह नैतिक-अनैतिक में फर्क छोड़ देता है, झूठ बोलने से उसे कोई परहेज नहीं रहता, वह चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने लगता है, और गलत जानकारी देने में भी उसे कोई बुराई नहीं लगती क्योंकि उसे मुकाबला करना है। एआई इस तरह के मुकाबलों में जितना कामयाब होता है, उतने ही अधिक अनैतिक तौर-तरीके उसने इस्तेमाल किए होते हैं। ऐसा लगता है कि मानो कोई बाजारू कारोबारी धंधे के मुकाबले में कुछ भी नैतिक-अनैतिक नहीं मान रहा, और सही-गलत कुछ भी करके आगे बढ़ रहा है।
बच्चों से लेकर बड़ों तक खेला जाने वाला भारत में हिन्दीभाषियों के बीच जिसे व्यापार कहा जाता है, वह अंग्रेजी में मोनोपोली कहलाता है, यानी एकाधिकार। बचपन में खेले गए व्यापार की कुछ याद अभी तक ताजा है, और वह बताती है कि किस तरह रेलवे के साथ-साथ एयरलाईंस भी खरीद लेने वाले कारोबारी के सामने से निकलने के लिए अधिक भुगतान करना होता है, और इसके साथ-साथ बस सर्विस और शिप भी किसी ने खरीद ली है, तो उसका एकाधिकार उसे कई गुना अधिक कमाई दिलाता है। आज से 50 बरस पहले हमने व्यापार खेलते हुए जिन बातों को देखा था, वह आज हिन्दुस्तान में अडानी जैसी कंपनियां सचमुच ही कर रही हैं, एयरपोर्ट, बंदरगाह, रेलवे स्टेशन, खदान, बिजलीघर, और भी जाने क्या-क्या। अभी अमरीका में ट्रंप के एक सबसे पसंदीदा कारोबारी का नाम चीनी कंपनी टिकटॉक के संभावित अमरीकी भागीदार का नाम सामने आया जो कि एक-एक करके अमरीका के तमाम महत्वपूर्ण और संवेदनशील कारोबारों में दखल दे चुका है, और अब वह टिकटॉक को कंट्रोल करने वाला भी होने जा रहा है। उसने अभी एक इंटरव्यू में यह कहा कि जिस व्यापार में एकाधिकार न किया जा सके, वह कोई व्यापार ही नहीं होता।
अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को कोई तोहमत क्यों दी जाए, क्योंकि यह तो आज की ताकतवर ह्यूमन इंटेलीजेंस भी कह रही है। और ट्रंप के पसंदीदा लोगों से यह उम्मीद तो उन लोगों के परिवार, या ट्रंप, किसी को भी नहीं होगी, कि वे सच ही बोलेंगे, और नैतिक काम ही करेंगे। खुद ट्रंप ऐसी नैतिक सोच से कोसों दूर है, और नैतिकता कहीं दिख जाए तो ट्रंप अपनी बुलेटप्रूफ कार से उतरने को तैयार नहीं होता। ऐसे में एआई ने अगर चुनाव के लिए वोट जुटाने, सामान के लिए ग्राहक जुटाने, सोशल मीडिया पोस्ट के लिए वाहवाही जुटाने के लिए अनैतिक काम किया, तो वह तो साफ-साफ ट्रंप का असर दिख रहा है। यह एक अलग बात है कि ट्रंप ने आज अमरीकी विश्वविद्यालयों पर जो आतंक फैलाने की कोशिश की है, तो कई जगहों पर शोधकर्ता एआई की नैतिकता को ट्रंप की अनैतिकता से जोडक़र देखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे।
पंजाब में एक डीआईजी ने जब एक कारोबारी से रिश्वत उगाही की कोशिश की, तो उसने सीबीआई को शिकायत की, और कुछ लाख रूपए लेते हुए यह डीआईजी गिरफ्तार तो हुआ ही, इसके साथ-साथ जब उसके ठिकानों पर छापा पड़ा, तो साढ़े 7 करोड़ की नगद नोट, 5 करोड़ का सोना मिला, और इसके अलावा भारत, दुबई, और कनाडा में 71 प्रॉपर्टियों के सुबूत भी मिले। इस डीआईजी अर्चना सिंह भुल्लर ने अपने इलाके के कारोबारियों और सट्टेबाजों सरीखे मुजरिमों से महीना बांध रखा था। एक पुलिस अफसर ने लोगों से रकम निचोडऩे के लिए कई एजेंट तैनात कर रखे थे, और वे उसके लिए बैग और लिफाफे लेकर आने के एवज में कमीशन पाते थे। इस देश में बरसों पहले एक नोटबंदी हुई थी, और यह माना जा रहा था कि उसके बाद कालाधन खत्म हो जाएगा। अभी किसी पीडब्ल्यूडी अफसर के घर, तो किसी आबकारी अफसर के घर के छापों में करोड़ों की नगदी मिली है, और अब पंजाब में इस डीआईजी से। फिर यह भी है कि यह राज्य सरकार ने अपनी निगरानी से की हुई कार्रवाई की हो, ऐसा भी नहीं है। शिकायतकर्ता सीबीआई तक पहुंचा, और सीबीआई ने रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा। क्या कोई यह सोच सकते हैं कि किसी राज्य की सरकार को उसके ऐसे अरबपति बन चुके अफसर की खबर न हो कि वह परले दर्जे का भ्रष्ट है? शायद ऐसे ही नजारे के लिए किसी ने एक गाना लिखा था- पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग तो सारा जाने है...।
आज जब हिन्दुस्तान का तकरीबन पूरा हिस्सा लक्ष्मी पूजा की तैयारी में लगा हुआ है, और गैरहिन्दू कारोबारी भी अपने व्यापार की जगह पर बराबरी के उत्साह से लक्ष्मी पूजा करते हैं, तब कुबेर सरीखा यह खजाना कई लोगों के मुंह चिढ़ाता है। पंजाब पुलिस में दर्जनों डीआईजी होंगे, और उनमें से एक डीआईजी अगर 71 प्रॉपर्टी का मालिक मिल रहा है, जिसने घर पर साढ़े 7 करोड़ की नगदी रखी हुई है, सोना जिसके पास किलो के हिसाब से है, तो फिर देश में इस स्तर के हजारों अफसर हैं। इस स्तर से परे भी सरकार के कई ऐसे कमाऊ विभाग हैं जिसमें अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों की जरूरत नहीं पड़ती, और मझले दर्जे के विभागीय अफसर ही छापे में सैकड़ों के आसामी मिलते हैं। हमारा अपना अंदाज यह है कि किसी भी भ्रष्ट अफसर पर छापे में उसकी काली कमाई के पांच-दस फीसदी से अधिक की बरामदगी नहीं होती। इसके कोई सुबूत दर्जे के आंकड़े हमारे पास नहीं है, लेकिन हम आसपास पर्याप्त संख्या में भ्रष्ट लोगों को देख चुके हैं, और उनके पैसे खपाने की क्षमता भी जाहिर रहती है।
लक्ष्मी पूजा की चर्चा हमने इसलिए की है कि लोग मानते हैं कि पूजा करने से लक्ष्मी मिलती है। और पूजा करने के साथ-साथ धर्म की जो दूसरी मान्यताएं रहती हैं, उन्हें भी कई लोग मानते हैं कि दान-धरम करना चाहिए। लेकिन जब भ्रष्ट अफसरों और नेताओं को देखें, तो लगता है कि ऐसी कौन सी देवी हो सकती है जो ऐसे लोगों के भ्रष्टाचार का साथ देती होगी? अभी दो-चार साल के भीतर ही बंगाल में एक कोई ऐसे मंत्री पकड़ाए थे जिनकी प्रेमिका का एक खाली फ्लैट फर्श से छत तक नोटों से भरा हुआ था। भला धर्म की कौन सी धारणा इस तरह की कमाई का साथ दे सकती है? लक्ष्मी पूजा के ठीक पहले पंजाब के डीआईजी का कुबेर का ऐसा खजाना मिलना, दो दिन पहले गोहाटी में नेशनल हाईवे के एक बाबू के घर से 2 करोड़ 62 लाख रूपए नगद मिलना, ऐसी अंतहीन खबरों से हर हफ्ते यह समझ आता है कि नोटबंदी के बावजूद बैंक की किसी छोटी ब्रांच जितनी नगदी एक-एक अफसर के घर से निकलना देश की हकीकत है। सरकार किसी भी पार्टी की रहे, बहुत से नेता और अफसर इसी तरह कुबेर रहते हैं। काली कमाई का ऐसा जखीरा धर्म के असर से कायदे से तो भस्म हो जाना चाहिए था, लेकिन वह बढ़ते ही चलता है। सौ-पचास में से कोई एक मामला भांडाफोड़ होने से पकड़ाता है, वरना वह दुनिया भर में पूंजीनिवेश में खप जाता है।
दीवाली का मौका यह भी याद दिलाता है कि भारत में कारोबार करने के लिए व्यापारियों को सरकार में किस तरह, और किस हद तक रिश्वत देनी पड़ती है। अब लक्ष्मी पाने के लिए अगर उसकी इस तरह की पूजा अनिवार्य हो जाती है, तो फिर कौन सी सरकार ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का दावा कर सकती है? भारत में यह सिलसिला भयानक है। इसका एक और बड़ा बुरा नुकसान होता है, कि मोटी रिश्वत, कमीशन, या रंगदारी देने की लागत व्यापार के खर्च में ही जुड़ जाती है, और इससे बाजार में एक गैरबराबरी का मुकाबला भी खड़ा हो जाता है। रिश्वत देने वाले लोग सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए कई तरह की छूट पाने लगते हैं, और उन्हीं के व्यापार में उन्हीं के मुकाबले जो दूसरे लोग रिश्वत नहीं देते, रियायत नहीं पाते, वे धीरे-धीरे मुकाबले से बाहर होने लगते हैं। यह कहा जाता है कि नकली नोट धीरे-धीरे असली नोटों को चलन से बाहर करने की क्षमता रखते हैं, ठीक उसी तरह खराब और भ्रष्ट व्यापारी धीरे-धीरे बाजार से अच्छे और ईमानदार व्यापारियों को बाहर करने की क्षमता रखते हैं।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के एक प्रोफेसर, विनय पांडेय ने एक रिसर्च-नतीजे का दावा किया है कि 37 फीसदी शादियां इसलिए टूट रही हैं क्योंकि वर-वधू की कुंडलियां नहीं मिलाई जा रही हैं। उनका कहना है कि ग्रहदोष होने के बावजूद शादियां की जा रही हैं, और कुंडली की वजह से ही ऐसे पति-पत्नी शादी के बाद प्रेम-प्रसंगों में पड़कर नए जीवनसाथी ढूंढ रहे हैं, या एक-दूसरे का कत्ल करवा रहे हैं। प्रोफेसर पांडेय का कहना है कि उन्होंने अपने रिसर्च स्कॉलरों के साथ मिलकर छह महीने में इस शोध को पूरा किया है। उनका कहना है कि आजकल लड़के-लड़की की कुंडली में गुण मिलाए नहीं जाते, और आधुनिक बनने के चक्कर में लोग सनातन रस्में नहीं निभाते हैं। उनका कहना है कि मंत्रों के उच्चारण की जरूरत भी आजकल नहीं समझी जाती, और नतीजा यह है कि पति-पत्नी एक-दूसरे का कत्ल कर रहे हैं।
इस देश को सबसे पहले तो अमरीका से कभी-कभार हिंदुस्तान आने वाली सुनीता विलियम्स का सम्मान करना बंद कर देना चाहिए क्योंकि वह तो अंतरिक्ष में जाकर उन ग्रहों को अधिक करीब से देखती हैं जो कि पंडित विनय पांडेय, आशुतोष त्रिपाठी, और अमित कुमार मिश्रा की इस रिसर्च की भावना को चोट पहुंचाती है। जब भारत के कुछ विश्वविद्यालयों में अब ज्योतिष के तहत ग्रहों को पढ़ाया जा रहा है, तो नासा जैसी फ्रॉड अंतरिक्ष एजेंसी को ऐसे भारतीय विश्वविद्यालयों का अमरीकी अध्ययन केंद्र खोलना चाहिए ताकि एलन मस्क सरीखों पर अधिक पैसा बर्बाद न हो, और नासा ज्योतिष विज्ञान से ही सबकुछ सीख ले। भारत का इसरो मंगल पर अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी कर रहा है, उसमें एक-दो ज्योतिषी भी भेजने चाहिए जो मंगल से पूछ सकें कि वह शादी के वक़्त लड़के-लड़कियों की कुंडली में कुंडली मारकर क्यों बैठ जाता है, और रिश्ते नहीं होने देता? यह सिलसिला देश के लिए इतना खतरनाक हो चुका है कि बड़े-बड़े अखबार, टीवी चैनल, और करोड़ों हिट्स पाने वाली वेबसाइटें भी तथाकथित ज्योतिष पर आधारित कॉलम या कार्यक्रम दिखाने में लगे रहते हैं। यह पूरा सिलसिला देश में दहशत पैदा करके दुहने का है। ऐसे सारे ज्योतिषी चुनावों के समय बिल से निकलकर आते हैं, तरह-तरह की घोषणाएं करते हैं, और चुनावी नतीजे आने पर उनमें से अधिकतर पांच बरस के लिए फिर बिल में चले जाते हैं। भारत में कई चीजों को विज्ञान कहने का शौक है, इसमें ज्योतिष भी एक है। इसे न सिर्फ पेशेवर लोग विज्ञान कहते हैं, बल्कि सरकारों के धार्मिक और राजनीतिक रुझान के चलते कई विश्वविद्यालयों में इसके कोर्स शुरू कर दिए गए हैं। नतीजा यह है कि इस पूरी तरह अवैज्ञानिक विषय को एक वैज्ञानिक मान्यता दिलवा दी गई है। अब इसका अगला कदम यही हो सकता है कि चुनाव आयोग अपने अधिकृत ज्योतिषी रखे, और बिना मतदान के उनसे नतीजे निकलवा ले। चूंकि ये ज्योतिषी वैज्ञानिक का दर्जा भी प्राप्त होंगे, इसलिए उन पर ईवीएम जैसा शक भी विपक्षी पार्टियां नहीं कर सकेंगी।
इस मुद्दे से थोड़ा सा ऊपर उठकर अगर देखें, तो यह दिखता है कि जितनी अवैज्ञानिक बातें रहती हैं, वे अपने आपको विज्ञान का दर्जा दिलाने के लिए लगी रहती हैं। कुछ लोग तरह-तरह की धार्मिक बातों को विज्ञान का दर्जा दिलवाना चाहते हैं। अभी-अभी एक साध्वी का बयान आया कि गाय का पचास ग्राम घी जलाने से चालीस टन ऑक्सीजन पैदा होती है। अब विज्ञान की समझ रखने वाले लोग ऐसे दावों के झांसे में नहीं आएंगे, लेकिन धर्म पर अंधभक्ति रखने वाले लोग यह मान लेंगे कि साध्वी कह रही हैं तो सच ही होगा। ऐसा होने पर धर्म के लोग कोरोना के दौरान ऑक्सीजन के लिए गिरते-पड़ते अस्पतालों में क्यों पहुंचे थे? लोगों को वह तस्वीर भी याद होगी कि रामदेव नाम का एक भगवा लंगोटीधारी तबीयत खराब होने पर भागे-भागे जाकर एम्स में भर्ती हुआ था, और तुरंत ऑक्सीजन लेने लगा था। कायदे से तो उसे गाय के घी का दीया जलाकर उसके धुएं को सूंघना चाहिए था, या किसी गौशाला में बैठकर गाय की छोड़ी हुई सांस सूंघना चाहिए था जिसके बारे में दावा किया जाता है कि गाय ऑक्सीजन ही लेती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है। यह बड़े ही मजे की बात है कि धर्म बार-बार विज्ञान के बेजा इस्तेमाल की कोशिश में लगे रहता है, जबकि विज्ञान है कि वह धर्म की दुकान के सामने से निकल जाता है, उस तरफ झांकता भी नहीं है। इसी से पता चलता है कि दोनों में से अधिक अहमियत किसकी है। अंधभक्तों की बहुतायत धर्म के साथ हो सकती है, लेकिन उनमें से किसी को भी अगर कहकर देखें कि विज्ञान की दी हुई चीजों का इस्तेमाल न करें, बिजली, फोन, पेट्रोल, और पंप से आया हुआ पानी इस्तेमाल न करें, तो उनकी आस्था का वजन समझ में आ जाएगा, वह गैस के गुब्बारे से भी हल्की साबित होगी।
छत्तीसगढ़ के बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर में इस पल नक्सलियों के हथियार डालने का एक समारोह चल रहा है जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने दोनों उपमुख्यमंत्रियों सहित मौजूद हैं, और 210 नक्सली भी संविधान की कॉपी हाथ में लिए हुए खड़े हैं। उनके डाले गए डेढ़ सौ से अधिक हथियार भी इस मौके पर नुमाइश में हैं, और सरकार ने इसे किसी रणनीति के तहत आत्मसमर्पण कहने के बजाय इसे पुनर्वास के लिए हथियार छोडऩे की बात कही है। साथ ही बस्तर के आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों के हाथों से इन नक्सलियों का स्वागत फूल देकर करवाया गया है, जिससे यह प्रतीकात्मक माहौल बना है कि नक्सली जंगल और बंदूक छोडक़र आदिवासी समुदाय में लौट रहे हैं। आज के इन नक्सलियों में एक करोड़ के ईनाम वाला एक माओवादी रूपेश भी शामिल है। कल से अबूझमाड़ के अलग-अलग इलाकों से निकलकर ये नक्सली बसों तक पहुंच रहे थे, और वहां से जगदलपुर रवाना हो रहे थे। उनके साथ छत्तीसगढ़ के कुछ उत्साही पत्रकार भी चल रहे थे, और आज के इस हथियार डालने का कल से इंतजार चल रहा था।
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यह हथियारबंद नक्सलियों का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण है जिसे सरकार और नक्सली दोनों ही हथियार डालकर पुनर्वास की तरफ आगे बढऩा कह रहे हैं। हम अभी इस रणनीतिक शब्दावली की बारीकी और उसके पीछे की वजह पर जाना नहीं चाहते, क्योंकि यह पल लोकतंत्र की जीत का है, केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, गृहमंत्री विजय शर्मा की कामयाबी का है। यह एक बड़ी खबर इसलिए भी है कि पिछले 22 महीने में छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार आने के बाद जिस बड़े पैमाने पर मुठभेड़ों में नक्सलियों को मारा गया था, वह सिलसिला आज जारी रह सकता था क्योंकि नक्सल आंदोलन कमजोर हो गया है, और सुरक्षा बल आगे बढ़ते चले गए हैं, उन्होंने नक्सल कब्जे से कई इलाकों को छुड़ा लिया है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार और संविधान के खिलाफ हथियारबंद आंदोलनकारियों को भी मारने के बजाय उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में लाना एक अधिक बड़ी कामयाबी रहती है। हम बीते दशकों में कई बार शांतिवार्ता से नक्सल हिंसा को खत्म करने की वकालत करते आए हैं, और अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने पर्दे के पीछे की बातचीत से यह माहौल बनाया कि हथियारबंद नक्सलियों ने इतनी बड़ी संख्या में हथियार छोड़े। इस कार्यक्रम में अभी सरकार की तरफ से यह भी साफ किया गया है कि पुनर्वास के लिए आए इन नक्सलियों के सामने ऐसी कोई शर्त नहीं है कि उन्हें जिला पुलिस बल में शामिल होना है। गृहमंत्री विजय शर्मा ने यह साफ किया कि जिला पुलिस बल में कुल 10 फीसदी ही पूर्व नक्सली हैं, बाकी दूसरे लोग हैं। इस पुलिस बल में शामिल होने की शर्त किसी नक्सली के सामने नहीं रखी गई है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनने के बाद से 22 महीनों में नक्सल मोर्चे पर पौने पांच सौ से अधिक नक्सली मारे गए हैं, दो हजार से अधिक ने आत्मसमर्पण किया, और करीब 19 सौ लोग नक्सल आरोपों में गिरफ्तार हुए। हमने पहले भी इसी जगह कई बार इस बात को लिखा कि इतनी बड़ी संख्या में नक्सलियों के मारे जाने पर भी गिनती की कुछ मौतों को लेकर ही यह बात उठी कि मरने वाले नक्सली न होकर आम ग्रामीण थे। जबकि इसके पहले फर्जी मुठभेड़ों की शिकायतों से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, और सुप्रीम कोर्ट में मामले खड़े ही रहते थे, न्यायिक जांच में भी करीब डेढ़ दर्जन बेकसूर लोगों को मारने की बात साबित हो चुकी थी। इस बार मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई तो जमकर की, लेकिन ऐसे आरोप नहीं लग पाए, जो कि एक बड़ी कामयाबी की बात है। अब आज जो हथियार डाले गए हैं, वे बतलाते हैं कि सरकार के किसी न किसी स्तर से नक्सल लीडरशिप, और आम नक्सलियों की बातचीत चल रही थी, और उसी के चलते हुए आज से आत्मसमर्पण नहीं कहा गया, और आदिवासी समुदाय को बीच में रखा गया कि नक्सलियों ने उनके सामने हथियार डाले, और समुदाय ने पुनर्वास के लिए उनका स्वागत किया। हमें शब्दावली की ऐसी चतुराई में कुछ भी खराब नहीं लग रहा है क्योंकि इससे जो नतीजा निकल रहा है, वह लोकतंत्र की मजबूती का है। आज ये डेढ़ सौ से अधिक बंदूकें बस्तर में कभी सुरक्षाबलों को मार रही थीं, तो कभी बेकसूर ग्रामीणों को। इन बंदूकों से परे बस्तर के नक्सल इलाकों में चारों तरफ जमीनी सुरंगें भी लगी हुई थीं, और यह माना जाना चाहिए कि इन नक्सलियों से मिली जानकारी से अबूझमाड़ के इलाके में यह खतरा कुछ कम हो सकेगा।
गुजरात के जूनागढ़ जिले में गिरनार पहाड़ी पर गोरखनाथ मंदिर में तोडफ़ोड़ की खबर 5 अक्टूबर को आई। मंदिर की प्रतिमा को तोडक़र पहाड़ी से फेंक दिया गया था, और भक्तजनों में भारी नाराजगी फैली थी। पुलिस की पहली खबर में अज्ञात लोगों द्वारा की गई तोडफ़ोड़ बताया गया था। अब 14 तारीख को पुलिस ने इस मामले का खुलासा किया, और बताया कि यह तोडफ़ोड़ करने वाले कोई बाहरी लोग नहीं थे, बल्कि मंदिर के ही एक कर्मचारी, और एक स्थानीय फोटोग्राफर ने यह काम किया था, दोनों गिरफ्तार हो गए हैं, और उन्हें अपना जुर्म कुबूल कर लिया है। इस भांडाफोड़ के पहले तक लोग बहुत विचलित थे कि एक हिन्दू मंदिर में ऐसी तोडफ़ोड़ की गई है, और पुलिस ने डेढ़ सौ से अधिक जगहों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग की जांच की, मंदिर के आसपास के इलाकों में धर्मशालाओं को भी जांचा, आने-जाने वाले पांच सौ भक्तों की आवाजाही परखी, और दो सौ लोगों से बयान लिए। इतनी मेहनत के बाद जो दो लोग पकड़ाए, वे 42 बरस का किशोर कुकरेजा, और 50 बरस का रमेश भट्ट, ये दो लोग थे। इनमें कुकरेजा मंदिर का ही कर्मचारी था जो कि चाहता था कि मंदिर में भीड़ बढ़े, दान अधिक आए, उसकी शोहरत अधिक हो, इसलिए उसने यह साजिश की कि मंदिर खबरों में आ जाए। उसने मंदिर आने-जाने वाले स्थानीय फोटोग्राफर रमेश भट्ट के साथ मिलकर एक रात पुजारी का कमरा बाहर से बंद किया, और प्रतिमा को तोडक़र पहाड़ से नीचे फेंक दिया। और पुलिस में रिपोर्ट लिखाई की चार अज्ञात लोगों ने मंदिर में आकर सब तोड़ दिया।
अब देखा जाए कि मंदिर की इस तोडफ़ोड़ से अगर तनाव खड़ा हुआ रहता, तो वह कहीं तक भी जा सकता था। रिकॉर्डिंग में कोई ऐसी चीज सामने आ जाती जिससे किसी दूसरे धर्म के लोगों की उसी वक्त के आसपास मंदिर तक की आवाजाही दिखती, तो गुजरात तो वैसे भी लंबे समय से साम्प्रदायिक तनाव से गुजरा हुआ प्रदेश है। दूसरी तरफ देश में जगह-जगह, कई जगह धार्मिक तनाव खड़ा करने के लिए इस तरह की साजिश की गई है। यूपी में तो देश के सबसे प्रखर हिन्दुत्ववादी, योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं, और उनकी पुलिस के एक हिन्दू आईजी ने एक साम्प्रदायिक साजिश का भांडाफोड़ किया था। उन्होंने अपने इलाके की एक घटना बताई थी कि एक जगह गाय को काटकर फेंक दिया गया था, और उसके पास एक मुस्लिम नौजवान का आधार कार्ड पड़ा मिला था। बाद में हिन्दू एसपी, हिन्दू थानेदार, और बाकी तमाम हिन्दू पुलिस कर्मचारियों की जांच में पता लगा था कि उस इलाके के एक हिन्दू संगठन का मुखिया इस साजिश के पीछे था। उसने दो-तीन दूसरे हिन्दुओं को पैसा देकर गाय कटवाकर फिंकवा दी थी ताकि उस इलाके में साम्प्रदायिक तनाव फैले, और वहां के थानेदार का तबादला हो जाए जो कि इस हिन्दू नेता को मनमाने जुर्म नहीं करने दे रहा था। सारे सुबूतों के आधार पर, गाय काटने वाले लोगों के बयानों के आधार पर यूपी पुलिस ने इस हिन्दू नेता को गिरफ्तार किया, और इलाके में साम्प्रदायिक दंगा होने का खतरा खत्म हुआ।
महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई में सडक़ों की बदहाली को लेकर अभी बाम्बे हाईकोर्ट ने सख्त तेवर दिखाए हैं, और यह कहा है कि सडक़ों के गड्ढों की वजह से अगर किसी की मौत होती है, तो उसे सडक़ ठेकेदार और म्युनिसिपल के पैसों से मुआवजा दिया जाएगा। ऐसी मौत पर परिवार को 6 लाख रूपए मुआवजा दिया जाए, और जख्मी होने पर 50 हजार रूपए से लेकर ढाई लाख रूपए तक का। हाईकोर्ट के दों जजों की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि बिना गड्ढों वाली अच्छी हालत की सडक़ पाना नागरिकों का अधिकार है, और ऐसा मुहैया न करा पाना संविधान में दिए गए जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा। इस फैसले के साथ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पिछले बरसों के रूख को देखें तो यह समझ पड़ता है कि देश में जगह-जगह इसी तरह की हालत चल रही है। बहुत से राज्यों में सडक़ें नामौजूद सरीखी हैं। अब बाम्बे हाईकोर्ट का यह ताजा आदेश वैसे तो मुम्बई महानगरपालिका के इलाके को लेकर है, लेकिन इससे परे गैरशहरी इलाकों में भी सडक़ों की बहुत खराब हालत है। छत्तीसगढ़ में जगह-जगह ट्रकों और बसों के मिट्टी और दलदल के बीच से किसी तरह रेंगते हुए निकलने के वीडियो देखकर लगता है कि इन ड्राइवरों के हौसले, और ट्रकों के इंजन में ऐसी कितनी ताकत रहती है कि वे यह जगह पार कर पा रहे हैं, जो कि सडक़ है, और मौके पर नहीं है!
आज देश में केन्द्र सरकार की तरफ से बड़ी-बड़ी सडक़ परियोजनाओं का खूब प्रचार होता है, कहीं उसे कोई स्वर्णिम नाम दिया जाता है, तो कहीं भारतमाला नाम, और बहुत भारी बजट से बहुत अच्छे किस्म की ये सडक़ें महानगरों को जोडऩे वाली रहती हैं, जिनके आसपास रहने वाले लोग भी तरह-तरह के टोलटैक्स की वजह से उसके इस्तेमाल से बचते हैं। लेकिन केन्द्र की ऐसी नामी-गिरामी परियोजनाओं से परे जब बात राज्यों के भीतर की दूसरी सडक़ों की आती है, तो राष्ट्रीय राजमार्ग हो, या प्रादेशिक राजमार्ग, उनकी हालत खराब दिखती है। सिर्फ टोल सडक़ों की हालत जरा बेहतर रहती है क्योंकि निजी ठेकेदार उन्हें बनाते हैं, और बाद में 25-30 बरस तक वहां वसूली करते हैं। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट ने केन्द्र और राज्य दोनों के अफसरों को कटघरे में खड़ा कर रखा है, क्योंकि टोल सडक़ों की हालत भी बहुत खराब है, ठेकेदार रखरखाव की शर्त को पूरा नहीं करते, और सिर्फ वसूली-उगाही करते रहते हैं। देश में कई बड़ी अदालतें ऐसी टोल वसूली के खिलाफ आदेश कर चुकी हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है।
अब टोल सडक़ों से परे राज्यों के भीतर की सडक़ों को देखें, तो अधिकतर राज्यों के पास उन्हें बेहतर तरीके से बनाने के बजट नहीं रह गए हैं। अभी बिहार चुनाव ताजा मिसाल है जहां पर ताजा चुनावी वायदों में ही राज्य का 60 फीसदी बजट चले जाने का अंदाज है। मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके साथ के भाजपा वाले गठबंधन ने जितने चुनावी वायदे किए हैं, उसे लेकर यह फिक्र जाहिर की जा रही है कि बहुत बुरी तरह कमजोर अर्थव्यवस्था किस तरह यह बोझ उठा सकेगी? इसके बाद वहां पर तनख्वाह भी बंट पाएगी या नहीं, और ऐसे में सडक़ सुधारने की फिक्र भला कौन पूरी कर पाएंगे? और बात सिर्फ बिहार की नहीं है, आगे-पीछे बहुत से राज्यों का यही हाल है। मतदाताओं तक सीधा फायदा पहुंचाने की चुनावी रणनीति अगले पांच बरस तक सरकारों के पास विकास कार्य और ढांचागत विकास के लिए बहुत कम गुंजाइश छोड़ती है। ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ पार्टियां सरकार चलाने के बजाय चुनाव लडऩे को ही पांच बरस की अपनी जिम्मेदारी मान लेती हैं, और जिस तरह दाखिला इम्तिहानों में कामयाबी को ही पढ़ाई मान लिया जाता है, स्कूल-कॉलेज के कोर्स को कोई महत्व नहीं दिया जाता है, उसी तरह वोटरों को रिझाने पर ही पूरी मेहनत लगा दी जाती है, और राज्यों का विकास थम जाता है, या बहुत धीमा हो जाता है।
पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में अभी एक मेडिकल छात्रा के साथ कॉलेज के पास ही गैंगरेप हुआ, जिस पर बेहद दुख जाहिर करते हुए मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने इसे स्तब्ध कर देने वाला भी कहा। उन्होंने कहा कि कोई भी आरोपी बख्शा नहीं जाएगा, और कॉलेजों में सुरक्षा के लिए सरकार कड़ी हिदायत जारी करेगी। लेकिन इसके साथ-साथ ममता बैनर्जी के बयान के एक दूसरे हिस्से को लेकर भारी नाराजगी फैली है। ममता ने यह कहा था कि बलात्कार की शिकार लडक़ी रात साढ़े 12 बजे हॉस्टल-कॉलेज से बाहर कैसे आई थी, इस पर भी गौर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि लड़कियों को देर रात बाहर नहीं निकलने देना चाहिए, खासकर सुनसान इलाकों में सतर्क रहना चाहिए, कॉलेजों को छात्राओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। इसके बाद राज्य में प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने ममता की जमकर आलोचना की, और इस गैंगरेप पीडि़त छात्रा के पिता ने ममता के बयान को गैरजिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि क्या महिलाओं को अपनी नौकरी छोडक़र घर बैठ जाना चाहिए? ऐसा लगता है कि बंगाल औरंगजेब के शासन में है। उन्होंने कहा कि वह अपनी बेटी को वापिस ओडिशा ले जाएंगे। यह छात्रा आधी रात के बाद कॉलेज कैम्पस के बाहर किसी दोस्त से मिलने, या उसके साथ निकली थी, और वहां से कुछ लोगों ने उसे पास में किसी सुनसान जगह पर ले जाकर उससे गैंगरेप किया था।
ममता बैनर्जी का इतिहास बलात्कार के मामलों में बड़े गैरजिम्मेदार बयानों का रहा है। वे जैसे ही मुख्यमंत्री बनी थी, एक बच्ची से बलात्कार हुआ था, और उसकी रिपोर्ट होने पर ममता ने उसे अपनी सरकार को बदनाम करने की राजनीतिक साजिश कहा था, हमने इसी संपादकीय की जगह पर कई बार उस घटना का जिक्र किया है, और ममता की गैरजिम्मेदारी को याद किया है। अपने राज में होने वाले किसी भी तरह के जुर्म को लेकर ममता तुरंत ही मुजरिमों के वकील की तरह बहस करने लगती हैं, और हर बात को राजनीतिक साजिश करार देने लगती हैं, जिससे कि उनकी साख महिलाओं के खिलाफ जुर्म के मामले में पूरी तरह चौपट हो चुकी है। लोगों को याद होगा कि बंगाल में संदेश खाली नाम की जगह पर ममता की तृणमूल कांग्रेस के एक नेता, शेख शाहजहां, और उनके साथियों पर बहुत से हिन्दू महिलाओं से बलात्कार, और उनके यौन शोषण के आरोप लगे थे। इस पर पूरे देश में बंगाल सरकार और टीएमसी के खिलाफ नाराजगी फैली थी, लेकिन उन्होंने एक रैली में कहा था कि संदेश खाली में बलात्कार की कोई घटना नहीं हुई, और भाजपा माहौल खराब करने की कोशिश कर रही है। इसके बाद लोकसभा चुनाव प्रचार में ममता ने संदेश खाली को भुला देने की अपील की थी, और कहा था कि भाजपा ने महिलाओं को पैसे देकर झूठे बयान दिलवाए हैं। इसके बाद कोलकाता के आर.जी.कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक जूनियर डॉक्टर से बलात्कार और उसके कत्ल पर ममता ने कहा था कि लड़कियां रात में ड्यूटी न करें। जब कोई मुख्यमंत्री अपने प्रदेश के सबसे भयानक जुर्म पर हर बार या तो राजनीतिक साजिश की आड़ ले, या जुर्म के शिकार लोगों को ही सावधान रहने की जिम्मेदारी सिखाए, तो ऐसी मुख्यमंत्री की कोई साख नहीं रह जाती। 2011 से लेकर अब तक ममता बैनर्जी का यही ट्रैक रिकॉर्ड है, और राष्ट्रीय महिला आयोग के अलावा सुप्रीम कोर्ट की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि ममता को अपने गैरजिम्मेदार बयान और झूठे आरोपों के लिए कटघरे में खड़ा करे।
अब जब ममता बैनर्जी के बारे में हम अपनी सोच साफ कर चुके हैं, तो बंगाल की इस ताजा घटना को लेकर कुछ सोचने की जरूरत है। सरकार और कॉलेज इन दोनों ने सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए, वह तो है ही, लेकिन क्या इस छात्रा ने अपनी हिफाजत की पर्याप्त फिक्र की थी? एमबीबीएस दूसरे साल की पढ़ाई में आधी रात के बाद कॉलेज के बाहर आने-जाने की कोई शैक्षणिक जरूरत हमें नहीं मालूम है। और अगर ऊंची क्लास में पहुंचने के बाद भी रात-बिरात छात्राओं की ड्यूटी मरीजों के लिए लगती है, तो भी वह कॉलेज-कैम्पस के भीतर-भीतर होती है। हमने योरप के ऐसे कई विश्वविद्यालय और शहर देखे हैं जहां पूरी रात सडक़ों पर छात्राओं का अकेले आना-जाना होते रहता है, लेकिन बलात्कार की कोई घटना वहां नहीं होती। समाज में लड़कियों के देर रात अकेले आने-जाने को लेकर जहां भी एक सहनशीलता है, वहां लड़कियां सुरक्षित हैं। लेकिन भारत में अधिकतर शहरों में, या यह कहना बेहतर होगा कि तकरीबन तमाम शहरों में आधी रात के काफी पहले से किसी लडक़ी का अकेले आना-जाना लोगों के लिए सनसनी की बात रहती है। लोग अपनी गाडिय़ों से उसका पीछा करने लगते हैं, उसके करीब जाने लगते हैं, और उसे ले जाने की कोशिशें करते हैं। इतनी देर रात अकेले आने-जाने वाली लडक़ी या महिला को आम लोग आसानी से हासिल हो जाने वाली, धंधे वाली लडक़ी समझ लेते हैं। जब समाज की हकीकत यह है, तो फिर आधी रात को अकेली लडक़ी के महिला अधिकारों की एक हसरत तो की जा सकती है, लेकिन हकीकत में इस हसरत के सांस लेने की गुंजाइश बड़ी कम है। भारत के सामाजिक वातावरण को समझने की जरूरत है क्योंकि यहां पर परंपरागत रूप से, ऐतिहासिक रूप से लडक़ी या महिला को उपभोग का सामान ही अधिक माना जाता है, उसके नागरिक अधिकार कहीं भी बराबर नहीं गिने जाते।
आज 13 अक्टूबर की सुबह जब हम यह लिख रहे हैं, उसी पल इजराइल के एयरपोर्ट पर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का विमान उतरा है, और दूसरी तरफ फिलीस्तीन के हमास के कब्जे से इजराइली बंधकों का एक जत्था रिहा होकर रेडक्रॉस के मार्फत इजराइल की जमीन पर पहुंच गया है। दो बरस एक हफ्ते बाद की यह रिहाई करीब दो दर्जन जिंदा, और दो दर्जन गुजर चुके बंधकों की रिहाई वाली रहेगी, और इसके एवज में इजराइल सैकड़ों फिलीस्तनी कैदियों को रिहा करने जा रहा है जिसमें कुछ दर्जन ऐसे स्वास्थ्य कर्मचारी भी हैं जो कि इजराइली हमले में घायल हुए फिलीस्तीनियों के इलाज में लगे हुए थे। यह मौका दुनिया के इस हिस्से के लिए बड़ी अहमियत इसलिए रखता है कि पूरे मध्य-पूर्व में, खाड़ी के देशों में, अकेला इजराइल परमाणु हथियार संपन्न देश है, और मुस्लिम देशों में से कुछ के साथ उसके फौजी तनातनी के रिश्तों का बड़ा लंबा इतिहास रहा है। इजराइल और गाजा के बीच के हथियारबंद टकराव में इजराइली फौजी हमलों में अब तक 67 हजार से अधिक फिलीस्तीनी मारे गए हैं, जिनमें से अधिकतर तो निहत्थे नागरिक थे, महिला-बच्चे थे।
दुनिया के इतिहास के इस पल को देखें, तो यह लगता है कि ट्रम्प ने जिस अंदाज में इजराइल और गाजा के हथियारबंद संगठन हमास के बीच यह समझौता कराया है, वह ट्रम्प ही करवा सकता था, और शायद इसी अंदाज में करवा सकता था। इसके पहले उसने परदे के पीछे से शायद निहत्थे फिलीस्तीनियों पर फौजी हमले बढ़ाने की छूट भी दी होगी, और माहौल में जब तनाव बहुत अधिक बढ़ गया, तब उसे सुलझाने का शायद नाटक भी किया होगा। उसने नोबल शांति पुरस्कार कमेटी की बैठक के ठीक पहले इस समझौते की घोषणा की, और यह उम्मीद भी की कि इस बरस का यह पुरस्कार उसे मिले, यह एक अलग बात है कि यह उसे न मिलकर उसकी एक कट्टर समर्थक महिला को वेनेजुएला में अपने आंदोलनों की वजह से मिला है।
हम एक बार फिर आज के गाजा के मुद्दे पर लौटें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया की बहुत सी दूसरी ताकतें फिलीस्तीन को बचाने में बेअसर साबित हुईं। जिन देशों ने अभी कुछ हफ्ते पहले फिलीस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी, उनमें से भी ब्रिटेन और जर्मनी तो ऐसे थे जो कि इजराइल को हथियार बेच ही रहे थे, उन्होंने हथियार बेचना बंद नहीं किया था, इजराइल के खिलाफ कोई फैसला नहीं लिया था। ऐसे में अमरीका, जो कि पूरी तरह से इजराइल का सरपरस्त बना हुआ है, उसे एक के बाद एक अमरीकी राष्ट्रपति फिलीस्तीन पर बरसाने के लिए हथियार और बम देते आ रहे थे, उस अमरीका ने इजराइल और हमास दोनों की बांहें मरोडऩे का दिखावा करते हुए वह करवाया है, जो कि इजराइल चाहता था, और इसे एक समझौते की तरह पेश किया गया। लेकिन इससे भी हमें कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि पश्चिम के बड़े-बड़े देशों ने इस समझौते से सहमति जताई है, और मध्य-पूर्व के अधिकतर मुस्लिम देशों ने हामी भरी है। भारत जैसा दूर बैठा देश भी इस समझौते की तारीफ कर रहा है, और इसके खिलाफ कोई आवाज उठी नहीं है। मतलब यह कि बाहुबली ट्रम्प ने लोगों की बांह मरोडक़र अपनी मर्जी का यह समाधान लागू करवा दिया है। हम हर दिन फिलीस्तीन में होती दर्जनों मौतों को किसी भी तरह रोकने के हिमायती थे, और फिलहाल वहां के दसियों लाख लोगों को सांस लेने, पेट में दो कौर डालने, और शायद मरहम लगाने का एक मौका मिला है। इसके साथ-साथ ट्रम्प के प्लान में गाजा के पुनर्निर्माण की जो बात है, उस सच को अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि मजहब के गद्दार मुस्लिम देशों ने दुनिया के इस सबसे गरीब और जुल्म के शिकार, जख्मी और बेघर हो चुके देश के लिए कुछ भी नहीं किया, जबकि यह भी उन्हीं के मुस्लिम ब्रदरहुड वाला देश है। यह बताता है कि मजहब के दावे करने वाले लोग किस हद तक बेरहम और बेइंसाफ हो सकते हैं। आज यही मुस्लिम देश ट्रम्प के हाथों बांह मरोड़ी जाने पर फिलीस्तीन का साथ देने के लिए खड़े हुए हैं, लेकिन 67 हजार लोगों के मारे जाने पर इन लोगों ने कफन-दफन के मौके पर कहे जाने वाले दो शब्द भी नहीं कहे थे।
हिमाचल की एक खबर आई है कि वहां के एक बुजुर्ग वैद्य रामकुमार बिंदल ने एक नौजवान मरीज महिला के साथ इलाज के नाम पर छेडख़ानी की, और यौन हमला किया। किसी तरह वह युवती बचकर निकली, और जाकर महिला थाने में रिपोर्ट की। 81 बरस का यह वैद्य हिमाचल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राजीव कुमार बिंदल का बड़ा भाई भी है। अब इस उम्र में उसने 25 बरस की एक मरीज का यौन शोषण करने की कोशिश की। इस मामले में भाजपा ने कुछ नहीं कहा है, और महिलाओं के संगठनों ने कड़ी कार्रवाई की मांग की है। कल-परसों की ही खबर है कि पश्चिम बंगाल में एक बार फिर एक मेडिकल छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ है, और वह गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है, यह सबको याद होगा कि किस तरह कोलकाता के एक मेडिकल कॉलेज में 2024 में एक जूनियर डॉक्टर के साथ बलात्कार करके उसका कत्ल कर दिया गया था, और उसके खिलाफ बंगाल में एक बहुत बड़ा जनआंदोलन खड़ा हुआ था। एक अलग खबर मध्यप्रदेश से आई है जहां बुरहानपुर के सरकारी स्वास्थ्य केन्द्र में चीरघर में रखी गई एक महिला की लाश को स्ट्रेचर पर से एक आदमी घसीटकर ले जाता है, और उसके साथ बलात्कार करता है। 2024 का यह वीडियो अभी सामने आया, और पुलिस ने सीसीटीवी रिकॉर्डिंग से इस आदमी, भाईलाल को गिरफ्तार भी कर लिया है। उसके खिलाफ शव के साथ यौन छेड़छाड़ का जुर्म दर्ज किया गया है। रिकॉर्डिंग बताती है कि यह घटना सुबह पौने 7 बजे हुई जिस वक्त चारों तरफ रौशनी हो चुकी थी। इस आदमी ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया है। ट्विटर पर एक पत्रकार ने जब अस्पताल का यह वीडियो पोस्ट किया, और लिखा कि भारतीय समाज बीमार है, और महिला मरने के बाद भी ऐसे भयानक बर्ताव से बच नहीं सकती, तो उसके नीचे एक आदमी ने टिप्पणी की है- आंटी तेरा शोषित वंचित है यह। इन लोगों को मुजरिम जनजाति के दर्जे में रखने की एक वजह थी।
हिमाचल की इस खबर को देखें, तो रामकुमार बिंदल जो कि बलात्कार करते हुए पकड़ाया है, वह तो शोषित वंचित और मुजरिम जनजाति का नहीं है। वह तो वहां की सबसे ऊंची कही जाने वाली जाति का है, और जिसका नाम भी माँ-बाप ने भगवान के नाम पर रखा था। उम्र भी वानप्रस्थ आश्रम में जाने की हो गई थी, और पेशा भी मरीजों को ठीक करने का था। लेकिन कोई भी बात काम नहीं आई। बलात्कारी हर धर्म, हर जाति, हर उम्र, हर पेशे के होते हैं। और बलात्कार की शिकार आमतौर पर उनसे कमजोर धर्म, कमजोर जाति, आर्थिक रूप से कमजोर होती हैं। फिर सामूहिक बलात्कार के मामलों में तो सर्वधर्म, समभाव काम आता है, और बलात्कारी सारे धार्मिक भेदभाव छोडक़र, जातियों का फर्क छोडक़र किसी लडक़ी या महिला को घेरकर उससे बलात्कार करने के लिए एक हो जाते हैं। लोगों को जम्मू के कठुआ का सामूहिक बलात्कार याद होगा जिसमें 8 बरस की मुस्लिम खानाबदोश लडक़ी आसिफा बानो के साथ 6 मर्दों और एक नाबालिग ने बलात्कार किया था, और इसका एक मकसद जम्मू-कश्मीर की इस बंजारा जाति के लोगों को आतंकित करना भी था, ताकि वे लोग यह हिन्दू-बहुल इलाका छोडक़र चले जाएं। बलात्कार करने वाले 8 लोगों में अपहरण, बलात्कार, और कत्ल की साजिश बनाने वाला सांजीराम नाम का आदमी था जो कि एक मंदिर का पुजारी था, उसका बेटा और भतीजा भी इसी बलात्कार में शामिल थे, और उन्होंने फोन कर-करके दूसरे लोगों को बलात्कार के लिए बुलाया था। 8 बरस की बच्ची पर 7 लोगों का यह बलात्कार जम्मू के कठुआ के रसना गांव में देवस्थान मंदिर में हुआ था।
बलात्कार के मामलों में मर्द का गुफाकाल का बाहुबल काम आता है, या फिर उसकी संपन्नता, और जाति-धर्म का बाहुबल। और दूसरे धर्म या जाति से जितना भी परहेज रहता है, वह बलात्कार के मामलों में खत्म हो जाता है। जब किसी लडक़ी या महिला से बलात्कार करना होता है, तो वह अछूत भी नहीं रह जाती। उसके बदन के सबसे अंतरंग हिस्से जिन्हें कि कुछ मायनों में गंदा भी माना जा सकता है, वे भी, और वे ही, मर्द की सबसे बड़ी दिलचस्पी की जगह बन जाते हैं, और किसी जात-धरम की लडक़ी-महिला के गुप्तांगों में दाखिले से भी किसी ऊंची कही जाने वाली जाति या अहंकारी धर्म को छुआछूत नहीं लगता। यह बात जिंदा पर भी लागू होती है, और लाश के साथ बलात्कार करने वालों पर भी।
नवंबर का महीना छत्तीसगढ़ के लिए बड़ी गहमागहमी का रहेगा, पहला हफ्ता राज्य के स्थापना के जलसे का रहता है, और इस बार रजत जयंती वर्ष होने से उत्साह कुछ अधिक रहेगा। इसमें प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति के आने की खबर है, और नवंबर के आखिरी हफ्ते में ही छत्तीसगढ़ में देश के सभी पुलिस महानिदेशकों की एक कांफ्रेंस होना तय है, उसमें फिर प्रधानमंत्री और केन्द्रीय गृहमंत्री जैसे देश के कुछ सबसे बड़े लोग पहुंचेंगे। सरकार में इस बात को लेकर कुछ खलबली है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से यह खबर भेजी गई है कि किफायत बरतने के लिए आने वाले सभी लोगों के ठहरने का इंतजाम सरकारी भवनों में ही किया जाए, और कार्यक्रम का आयोजन भी सरकारी भवनों में हो। डीजी कांफ्रेंस तो राज्य में पहली बार हो रही है, लेकिन वह हर बरस किसी न किसी राज्य में होती ही है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इतने बड़े सरकारी आयोजन में किफायत बरतने के लिए सिर्फ सरकारी इंतजाम इस्तेमाल करने को कहा गया है।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम राज्य बनने के बाद से लगातार यह बात उठाते चले आ रहे हैं कि सरकारी आयोजनों को महंगे होटलों में नहीं करना चाहिए, और न ही महंगे होटलों को खाने-पीने का काम देना चाहिए। यह सब कुछ उसी गरीब जनता की जेब से जाता है जो कि केन्द्र सरकार से हर महीने पांच किलो अनाज पाती है, और जिसे एक रूपए किलो चावल देकर तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह चाऊंर वाले बाबा बन गए थे। हम उस समय से ही यह लिखते आ रहे थे कि प्रदेश में जो बहुत से फिजूल के महज नाम के लिए बनाए गए निगम-मंडल हैं, जिन्हें किसी नेता की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए, उसे सहूलियत देने के लिए बनाया जाता है। ऐसे में इस राज्य को एक अतिथि सत्कार मंडल की जरूरत है जो कि हर किस्म के सरकारी आयोजनों के लिए एक स्थाई सम्मेलन स्थल विकसित करे, और सस्ते सरकारी इंतजाम में जनता के पैसों के सारे ही बड़े आयोजन हो सकें। आज दर्जनों बड़ी-बड़ी होटलों का कारोबार सरकार पर टिका रहता है, और बड़े से बड़े सरकारी आयोजन में होटल मालिक इस अंदाज में घूमते हैं कि मानो वे ही मेजबान हैं।
अगर प्रधानमंत्री की तरफ से सचमुच यह पहल की गई है, तो यह एक बहुत अच्छी बात है, और सरकारों को किफायत के बारे में सोचना चाहिए। छत्तीसगढ़ को राज्य बने 25 बरस हो गए हैं, लेकिन आज तक यहां सरकार के पास राष्ट्रीय स्तर का एक सम्मेलन स्थल भी नहीं है। हर बरस दर्जनों ऐसे सरकारी और राजनीतिक आयोजन होते हैं जिनमें एक-एक करोड़ रूपए तो शामियानों पर ही खर्च हो जाते हैं। आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के बीच दर्जनों एकड़ जमीन सरकारी कॉलोनियां तोडक़र खाली हुई है, और सरकार अगर चाहे तो यहां पर भी एक सम्मेलन स्थल बन सकता है, और नया रायपुर नाम की राजधानी तो आज खाली ही पड़ी हुई है, वहां एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन स्थल बन सकता है। सरकार के पास जमीन अपनी है, और उसे अपना ढांचा तैयार करके कारोबारियों पर पैसा बर्बाद करना बंद भी करना चाहिए। आज बिखरे हुए होटलों के बीच किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लायक कोई इंतजाम यहां नहीं हैं। नया रायपुर अपने आपमें हजारों लोगों के किसी सम्मेलन की मेजबानी करने जितनी जगह वाला देश का एक शानदार नियोजित बना हुआ शहर है। उससे लगा हुआ ही एयरपोर्ट है, और यहां आसानी से एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन स्थल कामयाब किया जा सकता है।
मध्यप्रदेश में अभी साढ़े 7 हजार पुलिस सिपाहियों की भर्ती के लिए लोगों से अर्जियां बुलाई गई। न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 10वीं पास होना चाहिए। सिपाही बनने के लिए 9 लाख 76 हजार लोगों ने अर्जियां भरी। इतने लोग आवेदन कर रहे थे कि इस तारीख को बढ़ाना पड़ गया। 10वीं पास की जगह ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट लोग भी कतार में लगे हुए हैं। 12 हजार इंजीनियरों ने अर्जी डाली है, और करीब 42 पीएचडी प्राप्त लोग हैं। पिछले ही बरस हरियाणा में सफाई कर्मचारियों की ठेका-मजदूरी के काम के लिए 46 हजार से अधिक ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट लोगों ने आवेदन किया था। एक अखबार में छपे एक लेख में कल ही बताया गया है कि किस तरह राजस्थान में 2017 में 18 चपरासियों की भर्ती में 12 हजार से अधिक लोग इंटरव्यू में पहुंचे थे जिनमें इंजीनियर, वकील, और सीए भी थे। एक दूसरा आंकड़ा बताता है कि 2024 में आईआईटी से निकले हुए 5 छात्र-छात्राओं में से 2 को काम नहीं मिला, और यह देश का सबसे बड़ा तकनीकी शिक्षा संस्थान है। इसी तरह एनआईटी, और आईआईआईटी से निकले हुए लोग भी सरकारी आंकड़ों के मुकाबले पूरी तरह नौकरी नहीं पा रहे हैं। इस तरह देश में पढ़े-लिखे लोगों के बीच बेरोजगारी का बड़ा ही खराब हाल है।
उत्तरप्रदेश में 2021-22 में स्कूली शैक्षणिक योग्यता वाले चपरासी के काम के लिए 3 लाख 70 हजार लोगों ने आवेदन किया था जिनमें 28 हजार ग्रेजुएट थे, 37 सौ एमए थे, और साढ़े 4 सौ पीएचडी प्राप्त थे। 2022 में बिहार में रेलवे चपरासी और ट्रैकमैन जैसे ग्रुप डी के कर्मचारियों की भर्ती में 35 हजार पद थे, जिनके लिए सवा करोड़ लोगों ने अर्जियां डाली थीं। इनमें बी-टेक, एम-टेक, और एमबीए भी शामिल थे। 2023 में मध्यप्रदेश में सिपाही भर्ती में 10वीं पास की जरूरत पर 75 सौ पदों के लिए 11 लाख 80 हजार लोगों ने आवेदन किया था जिनमें 65 फीसदी ग्रेजुएट थे, 18 फीसदी पोस्ट ग्रेजुेएट थे, और बहुत से इंजीनियर, और कम्प्यूटर ग्रेजुएट भी सिपाही बनने के लिए कतार में लगे हुए थे। 2022-24 में छत्तीसगढ़ में सिपाही और शिक्षक भर्ती में सिर्फ 30 फीसदी उम्मीदवार न्यूनतम योग्यता वाले थे, और 70 फीसदी आवेदक जरूरत से बहुत अधिक पढ़ाई किए हुए थे। 2023 में तमिलनाडु में सफाई कर्मचारियों की भर्ती में प्राथमिक शिक्षा की ही शैक्षणिक योग्यता रखी गई थी, और 7 हजार पदों के लिए आवेदन करने वालों में 12 सौ ग्रेजुएट भी थे, और 180 पोस्ट ग्रेजुएट।
ऐसे आंकड़े हर बरस कई बार देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं, और लोगों के मन में यह निराशा भी पैदा करते हैं कि इतना पढ़-लिखकर क्या होना है, चपरासी की नौकरी भी नहीं मिलेगी, और हकीकत भी यही है। अब यह सोचा जाए कि 10वीं पास लोगों के सिपाही बनने की जगह अगर पीएचडी प्राप्त लोग सिपाही बनते हैं, तो 10वीं के बाद उनके कम से कम 10-12 बरस इस पीएचडी में लगे होंगे। इतने ही बरस प्राथमिक शिक्षा के बाद ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट बनने में तमिलनाडु के बेरोजगारों को लगे होंगे। मतलब यह कि लोग अपनी पढ़ाई-लिखाई के मुकाबले बहुत ही कम शैक्षणिक योग्यता वाले काम पाने को भी बड़ी किस्मत मान रहे हैं। लेकिन लोगों के पढऩे-लिखने में उनका वक्त लगता है, मां-बाप पर बोझ पड़ता है, और सरकार पर तो बोझ पड़ता ही है। भारतीय सेना के लिए अग्निवीर बनने की शैक्षणिक योग्यता किसी भी तरह से स्कूली पढ़ाई से अधिक नहीं है, लेकिन जिन लोगों ने आवेदन किया उनमें यूपी-बिहार में 35-40 फीसदी उम्मीदवार ग्रेजुएट या उससे अधिक पढ़े हुए थे, जो कि कुछ साल रोजगार मिल जाने के लिए यहां पहुंचे थे। एमपी और राजस्थान में एमबीए, बीसीए, और इंजीनियर अग्निवीर बनने पहुंचे थे, जो कि कुल चार साल की नौकरी है। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक आधा लाख से कम नियुक्तियों के लिए 30 लाख से अधिक अर्जियां 2023 में आई थीं, और इनमें 25 फीसदी से अधिक ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट थे।
हरियाणा के एक सीनियर आईपीएस अफसर ने दर्जनभर आईएएस-आईपीएस अफसरों पर प्रताडऩा का आरोप लगाते हुए खुदकुशी कर ली। उनकी पत्नी भी आईएएस हैं, और इस वक्त वे मुख्यमंत्री के साथ विदेश दौरे पर गई हुई थीं, और लौटकर उन्होंने भी कई अफसरों के खिलाफ उनके पति को प्रताडि़त करने, और आत्महत्या के लिए उकसाने की रिपोर्ट दर्ज कराई है। वाई.पूरन कुमार नाम का यह एडीजी किसी भी राज्य के पुलिस ढांचे में सबसे ऊपर से ठीक नीचे रहता है, और वे पिछले कई बरस से उनके साथ जाति आधारित भेदभाव की शिकायत करते आए थे। उन्हें सरकारी मकान, गाड़ी, पोस्टिंग में भी भेदभाव झेलना पड़ता था, ऐसा उनका आरोप था। वे लगातार सरकार के भीतर इन बातों को उठाते रहते थे, लेकिन यह वही हरियाणा है जहां अशोक खेमका नाम के एक आईएएस अफसर को इसी राज्य में नौकरी करते-करते तकरीबन हर बरस दो बार ट्रांसफर किया गया था। तीस साल में 55 से ज्यादा ट्रांसफर। अब आईएएस-आईपीएस की नौकरियां केन्द्र सरकार के मातहत रहती हैं, और इन्हें अलग-अलग राज्यों में भेजा जाता है, जहां से असंतुष्ट रहने पर ये केन्द्र सरकार को भी लिख सकते हैं। अशोक खेमका को सौ फीसदी ईमानदार अफसर माना जाता था, और देश में सबसे भ्रष्ट प्रदेशों में से एक हरियाणा में उन्होंने अपने इन्हीं ईमानदार तेवरों की वजह से सत्ता की नाराजगी झेली। हर छह-सात महीने में उनका तबादला कर दिया जाता था, और इसमें कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारें बराबरी से शामिल रही। 2012 में उन्होंने रॉबर्ट वाड्रा-डीएलएफ जमीन सौदे को रद्द कर दिया था, और फिर उन्हें इतना प्रताडि़त किया गया कि वे कई बार सार्वजनिक रूप से बोल चुके थे कि ईमानदारी भारत की शासन व्यवस्था में जुर्म बन चुकी है। लेकिन अशोक खेमका लगातार लड़ते रहे, और उन्होंने कभी खुदकुशी सरीखी बात भी नहीं की।
हम खुदकुशी जैसे नाजुक मामले पर बात करते हुए किन्हीं भी दो इंसानों की तुलना नहीं करते, लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि आईएएस-आईपीएस जैसी बड़ी सेवाओं के लोग भी खुदकुशी करते हैं, इसलिए इस पर चर्चा जरूरी है। एक दलित अफसर, कर्मचारी, या इंसान को हिन्दुस्तान में कई तरह के सामाजिक भेदभाव झेलने पड़ते हैं, अभी दो दिन पहले ही हमने इसी जगह पर लिखा है कि किस तरह यूपी के रायबरेली में एक दलित को भीड़ ने चोरी के आरोप में पीट-पीटकर मार डाला, और योगी की पुलिस इस भीड़ का चक्कर लगाकर उस अकेले कमजोर गरीब दलित को उसी हिंसक भीड़ के बीच छोडक़र चली गई थी। नतीजा साफ था कि यह भीड़ क्या करने वाली थी, और पुलिस का भी नजरिया साफ था कि उसे इस भीड़त्या को रोकने के लिए कुछ नहीं करना है। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट में एक दलित मुख्य न्यायाधीश को जूता फेंककर मारा गया, और उसके पीछे सनातनी, और हिन्दू धार्मिक तर्क के नारे लगाए गए, इंटरव्यू दिए गए। दलितों की प्रताडऩा कोई नई बात नहीं है, यह एक सामाजिक हकीकत है कि जाति व्यवस्था की नफरत आरक्षण से किसी जगह पर पहुंचे हुए लोगों के लिए खत्म नहीं होती है, बढ़ जाती है। लेकिन हम कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा जरूरी समझते हैं।
भारत में शायद ही किसी शहर का एक दिन बिना किसी साइबर क्राइम के निकलता होगा, और औसत तो शायद लाखों साइबर क्राइम हर दिन होते हैं, जिनमें से हो सकता है कि आधे या चौथाई ही पुलिस तक पहुंचते हों। हिन्दुस्तान के लोग तरह-तरह की दर्जनभर तरकीबों से लूटे जा रहे हैं, लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का एक दूसरा ही मकसद है कि अब भारत के साइबर लुटेरे अमरीका और योरप के लोगों को भारत से फोन करके न सिर्फ ठग रहे हैं, बल्कि उन्हें डिजिटल गिरफ्तारी का डर दिखाकर, अपने आपको अमरीकी या यूरोपीय जांच एजेंसी का अफसर बताकर उनसे उगाही कर रहे हैं। उनसे अलग-अलग खातों में पैसा लेते हैं, और फिर उसे कई रास्तों से घुमाकर भारत ले आते हैं। अभी भारत में ईडी ने कुछ कॉल सेंटरों पर छापे मारे, तो पता लगा कि हिन्दुस्तानियों को पश्चिमी अंदाज में अंग्रेजी बोलना सिखाकर उन्हें कई अलग-अलग तरकीबों से पश्चिमी देशों के लोगों को लूटने में लगाया गया है। यह पूरी तरह से अहिंसक अपराध भारत में तो बहुत ही लोकप्रिय है, और अब भारत से यह अमरीका और योरप के देशों में भी पहुंच चुका है। दिलचस्प बात यह भी है कि ट्रम्प का 50 फीसदी टैरिफ इस भारतीय सेवा पर नहीं लग रहा है, बल्कि भारत का जितना आर्थिक नुकसान अमरीकी राष्ट्रपति से हो रहा है उसे भारत के ठग कुछ हद तक वापिस ला रहे हैं, यह अलग बात है कि यह पैसा सरकार या जनता के काम नहीं आ रहा है, जुर्म के हाथ मजबूत कर रहा है।
पश्चिम के देशों के कामकाज के घंटों में भारत के कॉल सेंटरों से कई तरह की सेवाएं दी जाती हैं। यहां महानगरों, और उपमहानगरों में अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर का बड़ा कारोबार है जिनमें काम करने के लिए युवक-युवतियां उन देशों के अंदाज में अंग्रेजी बोलना सीखे हुए रहते हैं, और वहां की कंपनियों के लिए यहां पर सस्ते में काम करते हैं। अभी जो साइबर मुजरिम भारत में पकड़ाए हैं, उनमें पुणे का एक ऐसा कॉल सेंटर है जो कि वहां पर गुजरात के अहमदाबाद के दो लोग चला रहे हैं, और पुलिस ने यहां 32 लोगों को गिरफ्तार किया है जो कि अमरीकियों के कम्प्यूटरों, और मोबाइल पर भारत में बैठे हुए तरह-तरह के खुफिया-घुसपैठिया सॉफ्टवेयर डाल देते हैं, और फिर उनके सिस्टम को धीमा कर देते हैं। इसके बाद वे अपने आपको माइक्रोसॉफ्ट या एप्पल जैसी टेक कंपनी का प्रतिनिधि बताकर उन्हें फोन करते हैं, और उनसे सिस्टम ठीक करने के नाम पर भुगतान लेते हैं। ऐसे भुगतान के साथ-साथ वे उन्हें डिजिटल गिरफ्तारी की धमकी भी देते हैं, और उनसे लगातार उगाही करते हैं। इस छापे में पुलिस को बड़ी संख्या में लैपटॉप और मोबाइल के साथ-साथ फंसाने, ठगने, और धमकाने की स्क्रिप्ट भी लिखी हुई मिली है।
आज कुछ अफ्रीकी देशों में बैठे हुए लोग अमरीका और ब्रिटेन के किशोर-किशोरियों को मोबाइल के जरिए सेक्स-वीडियो में फंसाते हैं, और उनका इतना सेक्सटॉर्शन करते हैं कि कई टीन-एजर खुदकुशी कर रहे हैं। भारत में भी साइबर-जुर्म में नाइजीरिया के कई लोग पकड़ाए हैं। भारत के भीतर भी धमकाने, ठगने, मोबाइल के जरिए बैंक खातों पर कब्जा करने, और उन्हें खाली कर देने के जुर्म रोज की बात हो गए हैं। एक वक्त था कि लुटेरों को चेहरे पर कपड़ा बांधकर, चाकू-पिस्तौल लेकर लूटना पड़ता था, लेकिन अब बिल्कुल अहिंसक तरीके से घर बैठे मोबाइल फोन, या ऑनलाईन पर और अधिक बड़ा काम हो जाता है, रकम लेकर या गहने लूटकर फरार भी नहीं होना पड़ता, मेहनत से लूटे गए सामान वापिस जाने का खतरा भी नहीं रहता, क्योंकि आज के साइबर-मुजरिम जालसाजी, ठगी, और लूट से हासिल रकम को तेजी से बाहर निकाल देने का इंतजाम पहले से रखते हैं।
यूपी के रायबरेली, दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट, और छत्तीसगढ़ के मगरलोड में दो दिनों के भीतर की तीन घटनाओं का भला आपस में क्या रिश्ता हो सकता है? इसे समझने के लिए इन तीनों की कुछ जानकारी देखनी होगी। रायबरेली में एक दलित नौजवान को भीड़ ने चोर समझकर घेर लिया। इसकी खबर मिलने पर पुलिस गाड़ी वहां पहुंची, और गाड़ी में बैठे-बैठे पुलिसवालों ने कहा उसे जाने दो, और चले गए। भीड़ ने पीट-पीटकर उसे मार डाला। जाहिर है कि इतनी मारपीट के दौरान उसका नाम तो किसी ने पूछा ही होगा, क्योंकि वह अपनी ससुराल आया हुआ था। यह नौजवान कमजोर और मानसिक बीमार भी लग रहा था, लेकिन पुलिस उसे भीड़ के बीच से ले जाने तैयार नहीं हुई, और भीड़ तो भीड़ होती है, उसने इस कमजोर गरीब को बहुत बुरी तरह पीट-पीटकर मार डाला, और उसके वीडियो भी बनाए। कानून अपने हाथ में लेने में लोगों को अब कुछ नहीं लगता, यह उन्हें अपना कानूनी हक लगता है। उधर दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अदालत में पहुंचकर एक हिन्दू-सनातनी बुजुर्ग वकील ने अपना जूता उतारकर चीफ जस्टिस पर फेका, और रोकने-पकडऩे पर वह यह कहते हुए गया कि सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान। उसने बाद में यह भी कहा है कि उससे भगवान ने यह काम करवाया है, और वे मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों से नाराज था, और जेल में रहने में उसे कोई दिक्कत नहीं है। उसे कोई पछतावा नहीं है, दूसरी तरफ चीफ जस्टिस बी.आर.गवई ने इस सनातनी वकील की हरकत पर किसी कार्रवाई से इंकार कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे फोन पर बात करके अफसोस जाहिर किया है, लेकिन सनातन के नाम पर देश भर में दीवानगी का जो माहौल बना हुआ है, उसका सिर्फ एक नमूना ही सुप्रीम कोर्ट के दलित मुख्य न्यायाधीश को झेलना पड़ा है। अब हम तीसरी घटना पर आते हैं जो कि छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में मगरलोड नाम की जगह पर हुई है। इस कस्बे में एक पुराने झगड़े को लेकर एक नाबालिग मुस्लिम लडक़े को कई हिन्दू लडक़ों ने पीटा, और पीछा करते हुए उसके घर गए। वह अपने घर में घुसकर छुप गया, तो इस भीड़ ने घर को घेरकर हंगामा किया, उस मुस्लिम परिवार की लड़कियों से बदसलूकी-छेडख़ानी की। सत्रह बरस के इस लडक़े को बचाने के लिए परिवार ने उसे घर के भीतर एक कमरे में बंद कर दिया, और बाहर पुलिस पहुंचने के बाद भी हंगामा चलते रहा। इस बीच पता लगा कि दहशत में इस लडक़े ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। अब कई हिन्दू लडक़े गिरफ्तार हुए हैं, और कई और की शिनाख्त के आधार पर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज हुई है।
भारत दानदाताओं से भरा हुआ देश है। तिरुपति के मंदिर की कहानी ही साल में कई बार बड़े-बड़े अखबारों की खबर बनती है कि किस तरह वहां पर कोई दानदाता सौ-पचास किलो सोना चढ़ा गया, या किसी एक दानदाता ने वहां कितने करोड़ रूपए नगद दान कर दिए। वहां के अधिकतर दानदाता अपना नाम उजागर किए बिना दान भेज देते हैं, या सोना, नगदी वहां की पोटली में डालकर चले जाते हैं। देश के प्रमुख तीर्थों पर और भी जगहों पर ऐसा होता होगा क्योंकि अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हर दिन करीब एक लाख लोग लंगर में खाना पाकर जाते हैं, और इसका खर्च कोई न कोई तो उठाते ही होंगे, इस धार्मिक खाने के लिए किसी से कोई पैसा नहीं लिया जाता। फिर तीर्थस्थानों से परे बहुत से धर्मों के बाबाओं और प्रवचनकर्ताओं को भी ढेरों दान मिलता है, और लोग धर्म के तुरंत बाद धार्मिक कपड़े हुए, धर्म की बातें करने वाले लोगों को दान देते हैं।
एक और किस्म का दान देश में देखने मिलता है जिसमें किसी संस्था या संगठन के लोग उसका बिल्ला लगाए, उसके गमछे-दुपट्टे या टोपी से लैस होकर, कैमरे और वीडियो रिकॉर्डिंग का इंतजाम करके दान करने जाते हैं। ठंड में सडक़ किनारे पड़े गरीबों को एक कंबल ओढ़ाते हुए कई लोग तस्वीर खिंचवाते हैं, और फिर उसे हर सोशल मीडिया खातों में डालते हैं। कई ऐसे फोटो देखने मिलते हैं जिसमें अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मरीज को एक केला थमाते हुए एक दर्जन लोग उसमें हाथ लगाए रहते हैं, और मरीज हक्का-बक्का सा इस भीड़ को देखते हुए एक केला पाकर धन्य हो जाता है। अब मामला यहां तक रहता तब भी ठीक था, अभी एक सरकारी अस्पताल के मरीजों के बीच भाजपा के कई कार्यकर्ता पार्टी के दुपट्टे डाले हुए दिख रहे हैं, और इस वीडियो में साफ-साफ दिख रहा है कि बड़ा सा मोबाइल थामी हुई संपन्न से परिवार की दिखती हुई एक महिला पांच-पांच रूपए वाले बिस्किट के पैकेट लेकर चल रही है, अस्पताल की गरीब महिला मरीज को एक पैकेट थमाते हुए वह तस्वीर खिंचवाती है, और फिर पैकेट को लेकर अगले मरीज की तरफ आगे बढ़ जाती है। इस महिला मरीज को बस कुछ पल के लिए वह पैकेट छूने मिलता है। वार्ड में एक साथ भाजपा के दुपट्टों वाले बहुत सारे लोग मरीजों को कुछ देते, या महज थमाते, और फोटो खिंचाते दिख रहे हैं। वीडियो पोस्ट करने वाले व्यक्ति ने इसे राजस्थान का बताया है, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह कहां का है, देश में कहीं भी यह हाल हो सकता है। कुछ लोगों ने इस वीडियो पर यह भी कहा है कि मरीज महिला के हाथ में पहले से बिस्किट का पैकेट था, यानी उसे बिस्किट पहले मिल चुका था, और यह दूसरा पैकेट देते हुए पार्टी की महिला बोल-बोलकर फोटो खिंचवा रही है, और फोटो के बाद पैकेट लेकर चली जा रही है। इस वार्ड में जितने मरीज हैं, उससे अधिक संख्या में दानदाता दिख रहे हैं, किसी के हाथ में एक केला है, तो किसी के हाथ में बिस्किट का छोटा सा पैकेट, फोटो खिंचाने का उत्साह सबमें लबालब है।
सच जो भी हो, हम तो वीडियो पर जो देख रहे हैं उसी से आज की बात शुरू कर रहे हैं कि दान की हमारी भावना किस हद तक खुदगर्ज हो गई है कि पांच रूपए की मदद करते हुए भी कैमरे पर उसे दर्ज करवाना जरूरी लगता है ताकि बाद में उससे शोहरत पाई जा सके। क्या दान और शोहरत का कोई अनुपात होना चाहिए? साठ रूपए का कंबल देकर हजारों लोगों के बीच अपना प्रचार करना कहां तक जायज है? इसमें गैरकानूनी तो कुछ नहीं है, लेकिन क्या लोगों की नैतिकता उन्हें सुझाती कि वे प्रचार के अनुपात में दान भी करें? हम कई जगहों पर कॉलेज और विश्वविद्यालयों के एनएसएस के छात्र-छात्राओं को देखते हैं जो घास-फूस या झाडिय़ों को आधा-एक घंटा साफ करते हैं, अपना बैनर टांगते हैं, उसके सामने खड़े होकर फोटो खिंचाते हैं, और रिकॉर्ड के लिए सामान जुटाकर आगे बढ़ निकलते हैं। जितनी समाजसेवा, उससे अधिक खुद की प्रचारसेवा! दूसरी तरफ इसी देश में, या दुनिया के दर्जनों दूसरे देशों में किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय सबसे पहले, सबसे आगे बढक़र, पानी में डूब-डूबकर घरों तक खाना पहुंचाने, वहां से फंसे हुए लोगों को उठा-उठाकर नाव से बाहर निकालने वाले सिक्खों में ऐसा आत्मप्रचार नहीं दिखता। कुछ कार्यकर्ता खालसा एड नाम की संस्था के टी-शर्ट पहने हुए जरूर दिखते हैं, लेकिन यह प्रचार के लिए कम, पहचान के लिए अधिक रहता है। भारत की अनगिनत प्राकृतिक विपदाओं में हमने देखा है कि अगर कोई एक समाज सबसे आगे बढक़र नि:स्वार्थ भावना से बचाव और सेवा में लगता है, तो वह सिक्ख समाज है। हमने आज तक सिक्खों को अस्पताल में, या सडक़ पर एक केला देकर फोटो खिंचाते नहीं देखा है। बल्कि दिल्ली जैसे शहर में सडक़ किनारे कई सिक्ख बैठकर लोगों के पैरों के जख्म धोते हुए दिखते हैं, मरहम-पट्टी करते हुए दिखते हैं। स्वर्ण मंदिर में भी दुनिया भर से पहुंचे हुए अरबपति सिक्ख भी रसोई में काम करते हैं, लंगर में खाना परोसते हैं, जूठे बर्तन मांजते हैं, और जूते-चप्पल भी साफ करते हैं।
पटना से दिल्ली का सफर कर रहे केन्द्रीय कृषिमंत्री शिवराज सिंह चौहान यह देखकर कुछ हैरान रह गए कि उनके प्लेन के को-पायलट बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद राजीव प्रताप रूड़ी थे। आज शिवराज जिस मोदी सरकार में मंत्री हैं, उसी मोदी सरकार में राजीव प्रताप रूड़ी तीन बरस मंत्री रह चुके हैं। अब वे मंत्री नहीं हैं लेकिन एक कमर्शियल पायलट होने के नाते वे नियमित मुसाफिर उड़ानों को भी उड़ाते हैं। हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि इस देश के तमाम नेताओं में कुल दो ही ऐसे हैं जो मुसाफिर उड़ान उड़ाने वाले पायलट रहे, पहले राजीव गांधी, और अब राजीव प्रताप रूड़ी। उन्होंने यह बात तब कही थी जब संसद परिसर में राह चलते राहुल गांधी ने रूककर उनसे बात की थी, क्योंकि उन्हीं दिनों वे कांस्टीट्यूटशन क्लब का चुनाव भी लड़ रहे थे, जिसमें दलगत राजनीति से परे सभी सांसद एक-दूसरे से वोट मांग लेते हैं। अब चूंकि इस देश में राजनीतिक दलों के बीच कड़वाहट ने कुनैन को शक्कर की तरह मीठा दर्जा दे दिया है, इसलिए भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के बीच के चलते-चलते नमस्कार-चमत्कार को भी शक की नजरों से देखा गया था। ऐसी चर्चा के बीच ही रूड़ी ने यह साफ किया था कि वे मुसाफिर उड़ान भी उड़ाते हैं।
इस देश की राजनीति में किसी नेता को कोई पेशेवर काम करते देखना कुछ अटपटा लगता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि नेता बनने के बाद न सिर्फ नेताजी को, बल्कि उनकी आने वाली कई पीढिय़ों को भी किसी काम की कोई जरूरत क्यों होनी चाहिए? देश का माहौल कुछ ऐसा ही है कि लोग राजनीति में एक ऊंचाई पर पहुंचने के बाद उसी अनुपात में संपन्नता की ऊंचाई पर भी पहुंच जाते हैं, और दिखावे के लिए भी किसी काम करने की जरूरत महसूस नहीं करते। वैसे तो भूतपूर्व सांसद और विधायक की पेंशन भी अब जिंदा रहने जितनी हो गई है, लेकिन विधायक, सांसद, या मंत्री बनने के बाद लोग अपने पेशे या हुनर के काम को करते रहें, ऐसा कम ही सुनाई पड़ता है। आमतौर पर नेताजी और उनके बच्चे, बेटी-दामाद जमीन-जायदाद और कंस्ट्रक्शन के काम में लगते हैं क्योंकि उसी जगह पर कालेधन को बड़े अनुपात में खपाने की गुंजाइश रहती है। कुछ लोगों के आल-औलाद कारखाने खोल लेते हैं, और ये कारखाने सिर्फ मशीनों वाले नहीं रहते, कमाई करने वाले कई किस्म के धंधों वाले भी रहते हैं। इसलिए इस माहौल के बीच कुछ काम करने वाले नेता थोड़े से खटकते हैं मानो वे अपने साथी दूसरे नेताओं पर तंज कस रहे हों। तंज कसने के लिए हर बार शब्द ही नहीं लगते, कई बार बिना किसी को कहे हुए अपना खुद का कोई काम भी दूसरों पर तंज सरीखा लगता है। अब किसी बैठक में, या मंच पर जहां हर किसी के सामने महंगे ब्रांड की पानी की बोतलें रखी जाएं, वहां कोई घर से खुद उठाकर लाया गया पानी का फ्लास्क निकालकर पानी पीने लगे, तो वह औरों पर तंज ही रहता है। हो सकता है कि रूड़ी ने रोजी-रोटी के लिए यह उड़ान न उड़ाई हो, और कमर्शियल पैसेंजर प्लेन के पायलट का अपना लाइसेंस जिंदा रखने के लिए वे बीच-बीच में ऐसा करते हों, लेकिन जब एक साथी मंत्री बनकर सफर कर रहा हो, तब दूसरा साथी पायलट की वर्दी में प्लेन उड़ा रहा हो, तो यह भी कोई निजी पेशा या व्यवसाय न करने वाले महज मंत्री-नेता पर तंज सरीखा लग सकता है।
राहुल गांधी विदेश गए हुए हैं, और वहां उन्होंने भारत की कुछ मोटरसाइकिलों के साथ अपनी एक फोटो पोस्ट की है, और लिखा है कि भारत के बहुत से ब्रांड देश के भीतर किसी सरकारी मेहरबानी के बिना भी दुनिया भर में कामयाब हैं। उन्होंने कुछ और राजनीतिक बातें कही होंगी, लेकिन हम उनके बयान से परे इस मुद्दे पर आना चाहते हैं कि भारत के कौन से ब्रांड दुनिया के दर्जनों देशों में अपनी मजबूत जगह बना चुके हैं, और देश के भीतर उन पर किसी सरकारी मेहरबानी की कोई तोहमत भी आज तक नहीं लगी है। टाटा के अलग-अलग बहुत से सामान, और उसकी सेवाएं दुनिया के हर उपमहाद्वीप में पहुंची हुई हैं, और इसे एक बड़ी साख वाला ब्रांड माना जाता है। इसके कारोबार पर कभी किसी पार्टी की सरकार की खास रियायत नहीं रही। दूसरी तरफ सरकारी जमीन, खदान, नदी का पानी, या जंगल पाए बिना भी जो कंपनियां दुनिया भर में पहुंची हुई हैं, उनमें कम्प्यूटर सेवा देने वाली इंफोसिस और विप्रो जैसी कंपनियां हैं जो कि टाटा के साथ-साथ ही देश में सबसे अधिक सामाजिक सरोकार निभाने वाली भी हैं। सहकारिता की देश की सबसे बड़ी ईकाई, अमूल के मिल्क प्रोडक्ट दुनिया के दर्जनों देशों में कामयाब हैं, और वे बड़ी-बड़ी स्विस कंपनियों को टक्कर देते हैं। गुजरात में 1946 में आनंद जिले में सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रोत्साहन से कारोबारियों और ठेकेदारों के शोषण के खिलाफ यह सहकारी समिति शुरू हुई। और फिर आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड (अमूल) को डॉ.वर्गीज कुरियन ने आगे बढ़ाया। उन्होंने ही देश में श्वेत क्रांति लाई, और अमूल को एक ग्लोबल ब्रांड बनाया। आज भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाने में केरल के वर्गीज कुरियन का ऐतिहासिक और असाधारण योगदान था। वे केरल में पैदा हुए थे, मद्रास और अमरीका में पढ़े थे, और उन्होंने अमूल को गोबर से लेकर आसमान के सितारे तक पहुंचा दिया था। यह पूरी तरह से बिना किसी सरकारी रहमो-करम के बढ़ा हुआ सहकारी आंदोलन था, जो कि सरकार के परोक्ष नियंत्रण में रहने के बावजूद जिंदा रहने दिया गया, और नेहरू के वक्त से जो खुला हाथ डॉ.कुरियन को मिला, उससे उन्होंने देश के इस सबसे बड़े और सबसे कामयाब सहकारी आंदोलन को खड़ा किया। यह इस बात की मिसाल रहा कि कई सरकारें आई-गईं, आज भी अमूल देश का सबसे कामयाब मॉडल बना हुआ है।
लेकिन हम बिना सरकारी मदद वाली और दूसरी कंपनियों, या उनके ब्रांड को देखें, जो कि दुनिया भर में अपने दम पर कामयाब हैं, तो हल्दीराम के मीठे-नमकीन, रॉयल इनफील्ड की बुलेट मोटरसाइकिलें, महेन्द्रा एंड महेन्द्रा की हर तरह की गाडिय़ां, फैब इंडिया के कपड़े, पारले के बिस्किट लिस्ट में सबसे ऊपर हैं। इस देश में बिस्किट खाने वाले लोगों को शायद यह पता नहीं होगा कि पारले-जी दुनिया में सबसे अधिक बिकने वाला बिस्किट ब्रांड है, और इसे किसी देश-प्रदेश की सरकार की मेहरबानी नहीं लगी। ब्रांड की यह लिस्ट बहुत लंबी है, और कई ब्रांड तकनीकी सामानों के हैं, जिनसे कि आम लोग बहुत परिचित नहीं होंगे। लेकिन हम जो बात कहना चाहते हैं, वह यही है कि सफल कारोबारी जब कोई बहुत अच्छा सामान बनाते हैं, तो उसके लिए उन्हें सरकार की मेहरबानी नहीं लगती, सरकारी रियायतें नहीं लगतीं। यह संपादकीय लिखने वाले संपादक ने कम से कम एक दर्जन देशों में पारले-जी बिस्किट खरीदकर खाया है।
देश के भीतर कौन से कारोबारी सबसे अधिक सफल हैं, कोई एक हुरुन लिस्ट है जिसमें दुनिया के सबसे रईस लोगों का नाम है, और इसमें हिन्दुस्तान के लोगों का भी जिक्र है। हो सकता है कि सरकारी मेहरबानियों वाले लोग ऐसी लिस्टों में बहुत ऊपर हों, और ऐसी लिस्ट से बहुत नीचे के लोग दुनिया में अपने दम पर सबसे कामयाब ब्रांड बनाकर उसे चला रहे हों। अभी हमने जितने भी ब्रांड यहां गिनाए हैं, उनमें से किसी पर किसी भी पार्टी की सरकार की अलग से किसी मेहरबानी का कोई जिक्र नहीं होता। इसलिए कारोबार को भी सरकार की रियायत के बिना, मेहरबानी के बिना चलाया जा सकता है, अगर उस कारोबार का प्रोडक्ट बहुत अच्छा हो। यह एक अलग बात है कि प्रोडक्ट अच्छा न होने पर भी कंपनी बहुत अधिक मुनाफे में रह सकती है, अगर उसे सरकार की तरफ से टैक्स की, आयात-निर्यात नीति की, लाइसेंस या जमीन की, खदान और पानी की खास मदद मिलती हो। ऐसी कंपनियां कमाई बहुत अधिक कर सकती हैं, और हुरुन लिस्ट में वे छत पर बैठ सकती हैं, लेकिन असली कामयाबी तो अपने दम पर दुनिया के बाजारों में राज करने की है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस अमरीका को दुनिया का सबसे मुक्त बाजार कहा जाता है, वहां सरकारी मदद का हाल यह है कि अभी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प, और उनके एक भूतपूर्व लंगोटिया एलन मस्क के बीच जब रायता फैला, तो ट्रम्प ने धमकाया कि मस्क को बैटरी कारों के लिए कितनी सरकारी रियायत मिल रही है, और अंतरिक्ष योजनाओं के कितने सरकारी ठेके मस्क की कंपनी को मिले हुए हैं। ट्रम्प ने खुलकर कैमरों के सामने कहा कि मस्क के ये सब ठेके खत्म करने का समय आ गया है। लेकिन अभी जब एक चीनी कंपनी के अमरीका के सबसे लोकप्रिय प्रोडक्ट, टिक-टॉक को चीनी नियंत्रण से बाहर लाकर किसी अमरीकी कंपनी को उसका मुख्य भागीदार बनाने की बात आई, तो ट्रम्प ने यह साफ कर दिया कि अमरीकी कंपनी को वे ही छांटेंगे, और वही हुआ भी है। उन्होंने एक कंपनी को छांटा है जिसे टिक-टॉक को अपने शेयर बेचने होंगे। तो सबसे मुक्त बाजार वाले देश में भी सरकारी मेहरबानियां इस अश्लील और हिंसक तरीके से चल रही हैं।
भारत में इंदिरा गांधी के समय से यह चर्चा रहती थी कि रिलायंस कंपनी के धीरूभाई अंबानी को सरकारी नीतियों में आयात-निर्यात की शर्तों की ऐसी मेहरबानियां मिलती थीं कि वे जमीन से आसमान पर पहुंचे। बाद में अटल सरकार में भाजपा के एक सबसे ताकतवर नेता प्रमोद महाजन अंबानी और दूसरे कारोबारियों से अपने बहुत करीबी रिश्तों को लेकर जाने जाते थे, और 2002 में संचार मंत्री रहते हुए जब प्रमोद महाजन ने धीरूभाई पर टिकट जारी की थी, तो मंच पर उनका अंबानी के पोस्टर को सिर पर उठाया हुआ फोटो भी सबको याद है। ऐसा माना जाता था कि प्रमोद महाजन भाजपा के देश के एक सबसे बड़े फंड रेजर थे। ऐसा ही एक वक्त प्रणब मुखर्जी के बारे में इंदिरा और राजीव सरकार के समय माना जाता था। और भी सरकारों के अपने-अपने एजेंट, दलाल, फंड रेजर या कोषाध्यक्ष रहते आए हैं। मनमोहन सरकार के दस बरस में यह माना जाता था कि अहमद पटेल बड़े फंड का काम देखते थे, और कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा चिल्हर काम के लिए थे। अटल सरकार के वक्त उनके दत्तक-दामाद रंजन भट्टाचार्य का नाम आता था जो कि प्रधानमंत्री निवास से ही कारोबारी सौदों का काम करते थे। अब मोदी सरकार के समय संगठन की चर्चा इस बारे में नहीं होती, लेकिन अडानी और अंबानी पर खास मेहरबानियों की चर्चा जरूर होती है। देश में पिछले कई दशकों में क्रोनी कैपिटलिज्म की बात होती है, यानी पसंदीदा कारोबारी।


