विचार / लेख

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Date : 21-Aug-2019

पुलकित भारद्वाज

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान कहते थे, ‘पूरी दुनिया में चाहे जहां चले जाएं हमें सिर्फ हिंदुस्तान दिखाई देता है और यहां चाहे जिस शहर में हों, सिर्फ बनारस दिखता है।’

मिजऱ्ा ‘ग़ालिब’ की ये पंक्तियां उनकी मसनवी चरा$ग-ए-द़ैर (मंदिर का दीया) की हैं। ये उन्होंने 1827 में बनारस यात्रा के दौरान लिखी थीं। ग़ालिब दिल्ली से कलकत्ता जाने के लिए निकले थे, लेकिन सुबह-ए-बनारस का मोह उन्हें यहां खींच लाया और फिर इसने कई महीने उन्हें बांधे रखा।
मां गंगा की आरती और अजानों की साथ गूंजती आवाजें, पानी पर सूरज की लालिमा का बनता सुर्ख़ अक्स और फिज़ा में बसी दीपकों में जलते घी की भीनी सी गंध। परंपराओं से भी पुराने बनारस की भोर न जाने कब से हर रोज किसी उत्सव की तरह आती रही है। इसने गा़लिब ही नहीं न जाने कितने ही दिलों को अपने मोहपाश में कैद किया चाहे वे भक्त शिरोमणि तुलसीदास हों या फिर ईरान के मशहूर शायर शेख अली हाजी। ये सभी इस सुबह पर अपना सब कुछ हार गए थे।
लेकिन पिछले कुछ सालों से सुबह-ए-बनारस कुछ मायूस और अधूरी सी लगती है। शायद इसलिए कि बनारस का वह कोना अब खाली हो गया है जहां से उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी सांसों को आवाज बनाकर शहनाई के जरिए इस सुबह का इस्तकबाल किया करते थे। वे ऐसे फनकार थे जिन्होंने दुनिया के सामने बनारस को अपनी और खुद को बनारस की पहचान बनाकर पेश किया था।
बनारस के साथ खान साहब का लगाव इतना गहरा था कि वे बनारस में कम बल्कि बनारस उनकी रूह में ज्यादा रहता था। वे कहा करते थे, ‘पूरी दुनिया में चाहे जहां चले जाएं हमें सिर्फ हिंदुस्तान दिखाई देता है और हिंदुस्तान के चाहे जिस शहर में हों, हमें सिर्फ बनारस दिखाई देता है।’ खान साहब मानते थे कि यह बनारस का ही कमाल था जिसने उनकी शहनाई के सुरों में रूमानियत भरी थी। इस बात का जिक्र उन पर लिखी किताब ‘सुर की बारादरी’ में यतीन्द्र मिश्र ने भी किया है। 
बकौल मिश्र, खान साहब कहा करते थे, ‘हमने कुछ पैदा नहीं किया है। जो हो गया, उसका करम है। हां अपनी शहनाई में जो लेकर हम चले हैं वह बनारस का अंग है। जल्दबाजी नहीं करते बनारस वाले, बड़े इत्मीनान से बोल लेकर चलते हैं। जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज़ करते जवान हुए हैं तो कहीं ना कहीं बनारस का रस तो टपकेगा हमारी शहनाई में।’
लेकिन गंगा का नाम लिए बिना जब बनारस खुद अधूरा माना जाता है तो खान साहब का किस्सा भला कैसे पूरे हो सकता है। जिक्र मिलता है कि एक बार अमरीका के शिकागो विवि ने उन्हें अपने यहां संगीत सिखाने का न्यौता भिजवाया था। साथ ही उन्होंने खान साहब के सामने बड़ी ही रोचक पेशकश भी रखी। विश्वविद्यालय वालों का कहना था कि खान साहब को अकेलापन महसूस न हो इसके लिए वे अपने कुछ करीबियों को भी शिकागो बुलवा सकते हैं और उनके वहीं रहने की सारी व्यवस्था करवा दी जाएगी। और उस्ताद को शिकागो अजनबी न लगे इसके लिए विश्वविद्यालय में उनके आसपास बनारस जैसा माहौल ही रखा जाएगा।  लेकिन खान साहब ने उन्हें ऐसा जवाब दिया जो हमेशा के लिए एक नज़ीर बन गया। उनका कहना था, ‘ये तो सब कर लोगे। ठीक है मियां! लेकिन मेरी गंगा कहां से लाओगे?’ कहना गलत न होगा, यदि बनारस उनकी शहनाई में रस भरता था तो गंगा उनके सुरों को चाल देती थी। मशहूर शास्त्रीय गायिका और खान साहब की मुंह बोली बेटी डॉ. सोमा घोष कहती हैं, ‘बाबा दूसरे संगीतकारों से अलग शुरुआत करते थे। वे सुरों को ऐसे घुमाते थे जैसे इतराती गंगा की लहरें मुड़ती हैं।’
यहां दिलचस्प बात यह है कि अपने दिल में बनारस और गंगा के लिए बेइंतहा मुहब्बत रखने वाले खान साहब की पैदाइश वहां की नहीं थी। खान साहब महज छह साल की उम्र में अपने पैतृक गांव डुमराव (बिहार) से बनारस, अपने मामू के पास चले आए थे। उनकी अम्मी ने उन्हें भेजा तो किताबी तालीम लेने के लिए था लेकिन वे सीख कुछ और गए। उनके मामू अली बख्श ‘विलायती’ काशी विश्वनाथ मंदिर के अधिकृत शहनाई वादक होने के साथ खान साहब के उस्ताद भी बन गए। नन्हें बिस्मिल्लाह बनारस की गलियों में खेलते-कूदते कभी मुंह से तो कभी छोटी नफीरियों से मामू की सिखाई बन्दिशों का रियाज करते बड़े होने लगे।
शुरुआत में आम बालकों की तरह खान साहब को भी रियाज करने में थोड़ी दिक्कत जरूर होती थी। लेकिन किशोरावस्था आते-आते उन्होंने इस फन में इतनी महारत हासिल कर ली थी कि वे शहनाई जैसे संगत वाद्य यंत्र को शास्त्रीय संगीत के मुख्य वाद्यों के बीच जगह दिलाने में सफल रहे। मामू की सिखाई तालीम का ही असर था कि वे शहनाई वादन में नित नए प्रयोग करते। जहां एक तरफ उन्होंने ‘कजरी’, ‘चैती’ और ‘झूला’ जैसी लोक धुनों को शहनाई के जरिए एक नए रूप में प्रस्तुत किया वहीं ‘ख्याल’ और ‘ठुमरी’ जैसी जटिल विधाओं को शहनाई के विस्तार में ला दिया। इस तरह खान साहब ने शहनाई को उन तमाम बुलंदियों तक पहुंचाया जहां इससे पहले यह कभी नहीं पहुंची थी।
उस जमाने में उस्ताद की शोहरत इतनी थी कि उन्हें आजाद भारत की पहली शाम पर लाल किले से अपनी प्रस्तुति देने का एहतराम मिला। ऐसा करने वाले उस जमाने के वे इकलौते संगीतकार थे। उसके बाद लगभग हर साल, लाल किले से उनकी शहनाई की मधुर तान के साथ ही स्वाधीनता दिवस मनाने का रिवाज सा शुरू हो गया। गुजरते वक्त के साथ उन्हें फिल्मों से भी बुलावा आने लगा। उन्होंने फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ (1959) से लेकर ‘स्वदेश’ (2004) तक में अपना संगीत दिया। लेकिन फकीराना स्वभाव के बिस्मिल्लाह को बॉलीवुड की चमक-दमक कभी प्रभावित नहीं कर सकी और वे हमेशा बनारस में ही रहे।
यतीन्द्र मिश्र के मुताबिक उन्होंने सिनेमा के अलावा रेडियो और टीवी के लिए भी अपने सुरों की सौगात दी थी। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर श्रोताओं के दिन का बिस्मिल्लाह करने वाली वाली मंगल ध्वनि के लिए उन्होंने विशेष रिकॉर्डिंग तैयार करवाई थीं। इनमें सुबह और शाम के अलग-अलग सात रागों को तीन-तीन मिनट के लिए बजाया गया। बीते सालों में चौदह रागों का यह संग्रह अब आकाशवाणी और दूरदर्शन की मंगल ध्वनि का पर्याय बन चुका है। कला और संस्कृति में खान साहब के इन्हीं अभूतपूर्व योगदानों को देखते हुए उन्हें भारतरत्न (2001) समेत न जाने कितने सम्मानों से नवाजा गया।
लेकिन अगर बिस्मिल्लाह सिर्फ एक आम फनकार होते तो शायद शोहरत तो उन्हें उतनी ही मिल जाती लेकिन वह मुकाम कभी नहीं मिल पाता जिसके लिए लोगों ने उन्हें अपने दिलों में जगह दी थी। दरअसल बिस्मिल्लाह की आत्मा में वही गंगा-जमुनी तहजीब बसती थी जिसे कबीर सरीखे संत- फकीर विरासत में छोड़ कर गए थे और जो बनारस की असल पहचान भी थी। उस्ताद साहब साम्प्रदायिक सद्भाव की जीती-जागती मूरत थे और उनके सुर भी किसी एक महजब तक कभी सिमट कर नहीं रहे। ‘सुर की बारादरी’ में यतीन्द्र मिश्र के मुताबिक खान साहब कहते थे, ‘संगीत वह चीज है जिसमें जात-पात कुछ नहीं है। संगीत किसी मजहब का बुरा नहीं मानता।’
 वे कहा करते थे कि सुर भी एक है और ईश्वर भी। शिया मुस्लिम बिस्मिल्लाह खान, जन्माष्टमी पर वृन्दावनी सारंग के सुर छेड़ते तो मोहर्रम के दिनों में आंखों में आंसू भरकर मातमी धुनों को बजाने के साथ होली की उमंग में राग ‘काफी’ से और मस्ती भर देते। वे पांच वक्त की नमाज भी पढ़ते तो देवी सरस्वती की उपासना भी उनके लिए जरूरी थी।
बाबा विश्वनाथ और उनकी सर्वव्यापकता पर खान साहब का अटूट विश्वास था। वे कहा करते थे, ‘लोग मंदिर के अंदर जाकर जल चढ़ाते हैं और प्रार्थना करते हैं। लेकिन मंदिर के अंदर भी वही पत्थर है और मंदिर के बाहर भी। हम बाहर हाथ लगा देते हैं और जो पढऩा होता है, पढ़ देते हैं।’ 
वे कहा करते थे, ‘हर रोज बाबा के मंदिर के पट हमारी शहनाई की आवाज सुनने के बाद खुलते हैं। जीवन में इससे ज्यादा और क्या चाहिए।’ इसके अलावा देवनदी गंगा को वे अपनी मां मानते थे और कहते, ‘गंगा में स्नान करना हमारे लिए उतना ही जरूरी है जितना शहनाई बजाना। चाहे कितनी भी सर्दी हो गंगा में नहाए बिना सुकून ही नहीं मिलता।’ गंगा के प्रति बिस्मिल्लाह की अगाध श्रद्धा पर नज़ीर बनारसी का यह शेर याद आता है -
सोयेंगे तेरी गोद में एक दिन मरके, हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के
हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर-कर के’
लेकिन कुछ कट्टरपंथियों को खान साहब के शहनाई वादन पर ऐतराज था। उनके मुताबिक संगीत बजाना इस्लाम के उसूलों की मुखालफत करने जैसा था। ऐसे ही जब किसी मौलवी ने उनसे संगीत के लिए मना किया तो उन्होंने अपनी शहनाई उठाई और ‘अल्लाह हूं...’ बजाने लगे। और मौलवियों से पूछा, ‘क्या मेरी ये इबादत हराम है?’ जाहिर है कि उनकी इस बात का जवाब किसी के पास नहीं था।
लेकिन तमाम पांबदियों के बावजूद अपने मजहब से उनका जुड़ाव कभी कम नहीं हुआ। वे हंसकर कहा करते थे, ‘भले ही कुरान पूरी है लेकिन उसकी शुरुआत तो बिस्मिल्लाह से ही होती है।’ हां, अपने मजहब में संगीत पर मनाही को लेकर उनके मन में हमेशा कसक जरूर रही। इस बारे में खान साहब कहा करते थे, ‘जब हमारे मजहब में संगीत हराम है तब हम यहां हैं। अगर इसे इजाजत होती तो हम कहां होते?’ इस मामले में उनके विचारों को यतीन्द्र मिश्र ने अपनी किताब में जगह दी है। उनके मुताबिक खान साहब कहते थे, ‘मुझे लगता है कि इस्लाम में मौसिकी को इसलिए हराम कहा गया है कि अगर इस जादू जगाने वाली कला को रोका न गया तो एक से एक फनकार इसकी रागनियों में डूबे रहेंगे और दोपहर और शाम की नमाज़ कजा हो जाएगी।’ इसके अलावा बिस्मिल्लाह खान धर्म के नाम पर की गयी किसी भी तरह की हिंसा के सख्त विरोधी थे। बनारस के संकटमोचन हनुमान मंदिर में विस्फोट की उन्होंने कड़ी निंदा करते हुए कहा था, ‘यह काम शैतान की ही औलादें कर सकती हैं, इंसान की नहीं।’
21 मार्च 1916 को जन्मे बिस्मिल्लाह खान ताउम्र कौमी एकता की मिसाल बने रहे और 21 अगस्त 2006 को इस दुनिया से रुखसत हुए। जीते जी उस्ताद कबीर की विरासत को बखूबी सजाते-संवारते रहे। ताज्जुब की बात कि इस मामले में अपनी मौत के बाद वे कबीर से भी एक कदम आगे निकल गए। कहा जाता है कि कबीर की मौत पर हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों में उनके मृत शरीर पर अधिकार को लेकर झगड़ा हो गया था। लेकिन फ़ातिमा कब्रगाह में नीम के पेड़ के नीचे जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को शहनाई के साथ दफनाया गया तो फ़ातेहा पढ़ते रिश्तेदारों के बीच उनके हिंदू मुरीद बड़ी सहजता से सुंदरकांड का पाठ करते नजर आए। (सत्याग्रह)

 

 


Date : 21-Aug-2019

ट्विटर और फेसबुक ने चीन पर आरोप लगाया है कि सरकार सोशल मीडिया का इस्तेमाल हांगकांग के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कर रही है। इसके खिलाफ कार्रवाई करते हुए ट्विटर-फेसबुक ने कई अकाउंट बंद किए हैं।

दुनिया के दो सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और ट्विटर ने चीन पर आरोप लगाया है कि वो उनके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर हांगकांग में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को गलत तरह से दिखा रहा है। ट्विटर ने एक ऑनलाइन बयान जारी कर कहा, हम हांगकांग के वर्तमान हालातों के बारे में ट्विटर पर चीन सरकार की ओर से चल रहे अभियानों को देख रहे हैं। यह खासकर वहां हो रहे प्रदर्शनों और उनकी राजनीतिक मांग के खिलाफ हो रहा है। करीब 936 ट्विटर अकाउंट ऐसे हैं जो चीन से संचालित किए जा रहे हैं। ये अकाउंट इन प्रदर्शनों की वैधता और उनके राजनीतिक तरीकों पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। ये सारे अकाउंट इस मामले में चीन की तरफदारी कर रहे हैं।
ट्विटर ने बताया कि दो लाख से ज्यादा स्वचालित अकाउंट या बोट्स को डिलीट कर दिया गया है। ये सब अकाउंट उन 936 ट्विटर अकाउंट द्वारा किए जा रहे ट्वीट्स को आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे। ट्विटर के एक अधिकारी ने कहा कि इन अकाउंट्स को कंपनी के सेवा नियमों का उल्लंघन करने की वजह से बंद किया गया है। उनके मुताबिक ट्विटर पर लोग इस तरह की गलत जानकारी लेने नहीं आते हैं और ट्विटर ऐसी गलत जानकारी लोगों तक नहीं जाने देगा। ट्विटर ने चीन की सरकारी कंपनियों से विज्ञापन लेना भी बंद कर दिया है। गौरतलब है कि ट्विटर ने 2017 में रूस की दो कंपनियों से भी विज्ञापन लेना बंद कर दिया था।
ट्विटर के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि यह अवांछित राजनीतिक गतिविधियों को रोकने के लिए ट्विटर द्वारा उठाया गया कदम है। ट्विटर पर पहले चुनावों के दौरान झूठे और भ्रमित करने वाली सामग्री को अपने प्लेटफॉर्म पर जगह देने और सरकार द्वारा चलाए जाने वाले प्रोपेगैंडा को अपने प्लेटफॉर्म पर प्रसारित करने का आरोप लग चुका है। पहले रूस पर आरोप लगा था कि उसने फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल कर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान लोगों के मन पर असर डाला जिससे लोगों ने रूस की पसंद के उम्मीदवार का समर्थन किया। ट्विटर के बाद फेसबुक ने भी चीन से चल रहे इस तरह के एजेंडे पर कार्रवाई की। हांगकांग में ट्विटर से ज्यादा फेसबुक का इस्तेमाल होता है। 19 अगस्त को फेसबुक ने सात फेसबुक पेज, तीन फेसबुक ग्रुप और पांच फेसबुक अकाउंट्स को सस्पेंड कर दिया है। इनमें से कुछ अकाउंट्स ने हांगकांग में प्रदर्शन कर रहे लोगों की तुलना आतंकवादियों और कीड़े-मकोड़ों से भी की थी। फेसबुक ने चीन द्वारा चलाए जा रहे ऐसे ऑपरेशनों का कोई डाटा तो साझा नहीं किया है लेकिन इतना बताया है कि ये सारे अकाउंट चीन से चलाए जा रहे थे।
फेसबुक के साइबर सिक्योरिटी हेड नथानिएल ग्लेइश्चर ने बताया, इन अकाउंट्स को चला रहे लोग गलत तरीकों का इस्तेमाल कर रहे थे। ये अकाउंट खुद को मीडिया संस्थान बताने की कोशिश कर रहे थे और लोगों को फर्जी न्यूज वेबसाइटों पर ले जाकर अपना एजेंडा लोगों तक पहुंचा रहे थे। इनकी अधिकांश पोस्ट हांगकांग में चल रहे प्रदर्शनों के बारे में ही थीं। इस काम को कर रहे लोगों ने अपनी पहचान छिपाने की पूरी कोशिश की लेकिन हमारी जांच में पता चला है कि ये सब चीन सरकार से जुड़े हुए हैं। (डॉयचेवेले)

 


Date : 21-Aug-2019

नई दिल्ली, 21 अगस्त । मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का निधन हो गया है। 89 वर्षीय बाबूलाल ने बुधवार सुबह भोपाल के नर्मदा अस्पताल में आखिरी सांस ली। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। बाबूलाल के निधन पर कई दिग्गज नेताओं ने शोक व्यक्त किया है। बीजेपी एमपी अध्यक्ष राकेश सिंह ने ट्वीट कर लिखा, अत्यंत दु:ख की बात है कि हमारे मार्गदर्शक भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल जी गौर अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने प्रदेश में संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ईश्वर दिवंगत आत्मा को श्रीचरणों में स्थान प्रदान करे।
बाबूलाल गौर एमपी के बड़े नेताओं में गिने जाते थे। बाबूलाल गौर का असली नाम बाबूराम यादव था। उनका जन्म 2 जून 1930 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। उन्होंने भोपाल की पु_ा मिल में मजदूरी करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की। स्कूल के समय से ही बाबूलाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा जाया करते थे। वह कई श्रमिक आंदोलनों से जुड़े और ट्रेड यूनियन पॉलिटिक्स में अपनी पकड़ जमाई। बाबूलाल भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक सदस्य थे।
गौर पहली बार 1974 में भोपाल दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में जनता समर्थित उम्मीदवार के रूप में निर्दलीय विधायक चुने गये थे। वे 7 मार्च, 1990 से 15 दिसम्बर, 1992 तक मध्य प्रदेश के स्थानीय शासन, विधि एवं विधायी कार्य, संसदीय कार्य, जनसम्पर्क, नगरीय कल्याण, शहरी आवास तथा पुनर्वास एवं भोपाल गैस त्रासदी राहत मंत्री रहे। वे 4 सितम्बर, 2002 से 7 दिसम्बर, 2003 तक मध्य प्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे। 
बाबूलाल गौर 23 अगस्त, 2004 से 29 नवंबर, 2005 तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। बाबूलाल के मुख्यमंत्री बनने के पीछे भी एक कहानी है। 2003 के विधानसभा चुनाव में उमा भारती की अगुआई में बीजेपी को बड़ी जीत हासिल हुई। जिसके बाद उमा भारती एमपी की मुख्यमंत्री बनीं। उमा भारती के सीएम पद संभालने के एक साल तक सब सही चल रहा था लेकिन फिर एक दिन 10 साल पुराने एक मामले में उमा भारती के खिलाफ 2004 में अरेस्ट वॉरंट जारी हुआ। जिसके बाद भारती को कुर्सी छोडऩी पड़ी और बाबूलाल गौर को एमपी का मुख्यमंत्री बनाया गया। बता दें कि उमा भारती के खिलाफ 1994 में कर्नाटक के हुबली शहर में सांप्रदायिक तनाव भडक़ाने के आरोप में अरेस्ट वॉरंट जारी हुआ था।
2005 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में वाणिज्य, उद्योग, वाणिज्यिक कर रोजगार, सार्वजनिक उपक्रम तथा भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग के मंत्री के रूप में शामिल किया गया था। वहीं, 20 दिसंबर, 2008 को उन्हें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में फिर से सम्मिलित किया गया था।(एनडीटीवी)
 


Date : 20-Aug-2019

-वंदना
'कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता
जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है
ज़ुबां मिली है मगर हमज़ुबां नहीं मिलता'

अगर आपसे पूछा जाए कि 1981 में आई इस फि़ल्मी गीत का संगीतकार कौन है तो जवाब होगा मशहूर संगीतकार ख़य्याम। वही संगीतकार ख़य्याम जिन्होंने 1947 में शुरू हुए अपने फि़ल्मी कॅरियर के पहले पांच साल शर्माजी के नाम से संगीत दिया। भारतीय सिनेमा के दिग्गज संगीतकार मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम हाशमी का सोमवार रात साढ़े नौ बजे 93 साल की उम्र में निधन हो गया। पिछले कुछ समय से सांस लेने में दिक्क़त के कारण उनका मुंबई के जुहू में एक अस्पताल में इलाज चल रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत फि़ल्म, कला, राजनीति और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने ख़य्याम के निधन पर शोक जताते हुए श्रद्धांजलि दी है।

ख़य्याम संगीतकार रहमान के साथ मिलकर संगीत देते थे और जोड़ी का नाम था शर्माजी और वर्माजी। वर्माजी यानी रहमान पाकिस्तान चले गए तो पीछे रह गए शर्माजी। बात 1952 की है। शर्माजी कई फि़ल्मों का संगीत दे चुके थे और उन्हें जिय़ा सरहदी की फि़ल्म फुटपाथ का संगीत देने का मौक़ा मिला। दिलीप कुमार पर फि़ल्माया गया गाना था -'शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगी हैं हम, आ भी जा, आ भी जा आज मेरे सनम...'  दूरदर्शन की एक पुरानी इंटरव्यू में ख़य्याम बताते हैं, 'एक दिन बातों का दौर चला तो जिय़ा सरहदी ने पूछा कि आपका पूरा नाम क्या है। मैंने कहा मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम। तो उन्होंने कहा कि अरे तुम ख़य्याम नाम क्यों नहीं रखते। बस उस दिन से मैं ख़य्याम हो गया।' इन्हीं ख़य्याम ने फि़ल्म कभी-कभी, बाज़ार, उमराव जान, रजिय़ा सुल्तान जैसी फि़ल्मों में बेहतरीन संगीत दिया।

18 फरवरी 1927 को पंजाब में जन्मे ख़य्याम के परिवार का फि़ल्मों से दूर दर तक कोई नाता नहीं था। उनके परिवार में कोई इमाम था तो कोई मुअजि़्जऩ। लेकिन उस दौर के कई नौजवानों की तरह ख़य्याम पर केएल सहगल का नशा था। वो उन्हीं की तरह गायक और एक्टर बनना चाहते थे। इसी जुनून के चलते वे छोटी उम्र में घर से भागकर दिल्ली चचा के पास आ गए। घर में ख़ूब नाराजग़ी हुई लेकिन फिर बात इस पर आकर टिकी कि मशहूर पंडित हुसनलाल-भगतराम की शागिर्दी में वो संगीत सीखेगें।

कुछ समय सीखने के बाद वे लड़कपन के नशे में वो कि़स्मत आज़माने मुंबई चले गए लेकिन जल्द समझ में आया कि अभी सीखना बाक़ी है। संगीत सीखने की चाह उन्हें दिल्ली से लाहौर बाबा चिश्ती (संगीतकार ग़ुलाम अहमद चिश्ती) के पास ले गई जिनके फिल्मी घरानों में ख़ूब ताल्लुक़ात थे। लाहौर तब फि़ल्मों का गढ़ हुआ करता था। बाबा चिश्ती के यहां ख़य्याम एक ट्रेनी की तरह उन्हीं के घर पर रहने लगे और संगीत सीखने लगे।

दूरदर्शन समेत अपनी कई इंटरव्यू में ख़य्याम ये किस्सा ज़रूर सुनाते हैं, 'एक बार बीआर चोपड़ा बाबा चिश्ती के घर पर थे और चिश्ती साहब सबको तनख्वाह बांट रहे थे। लेकिन बीआर चोपड़ा ने देखा कि मुझे पैसे नहीं मिले। चोपड़ा साहब के पूछने पर बाबा चिश्ती ने बताया कि इस नौजवान के साथ तय हुआ है कि ये संगीत सीखेगा और मेरे घर पर रहेगा पर पैसे नहीं मिलेंगे। लेकिन बीआर चोपड़ा ने कहा कि मैंने देखा है कि सबसे ज़्यादा काम तो यही करता है। बस बीआर चोपड़ा ने उसी वक्त मुझे 120 रुपए महीने की तनख्वाह थमाई और चोपड़ा ख़ानदान के साथ रिश्ता बन गया।'

ख़य्याम ने कई संगीतकारों की तुलना में कम काम किया लेकिन जितना भी किया बेमिसाल माना जाता है। एक संगीत प्रेमी के नाते जब भी मैं उनके गाने सुनती हूं तो उनमें एक अजब सा ठहराव, एक संजीदगी पाती हूं जिसे सुनकर महसूस होता है मानो कोई ज़ख्मों पर मरहम लगा रहा हो या थपकी देते हुए हौले-हौले सहला रहा हो। फिर चाहे आखिरी मुलाक़ात का दर्द लिए फि़ल्म बाज़ार का गाना- 'देख लो आज हमको जी भरके'  हो। या उमराव जान में प्यार के एहसास से भरा गाना हो 'जि़ंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है मुझे, ये जमीं चांद से बेहतर नजर आती है हमें'। 

इसके लिए ख़य्याम मेहनत भी ख़ूब करते थे। मसलन उनकी सबसे बेहतरीन पेशकश में से एक, 1982 की फिल्म, उमराव जान को ही लीजिए। ये एक उपन्यास उमराव जान अदा पर आधारित फि़ल्म थी जिसमें 19वीं सदी की एक तवायफ़ की कहानी है। ख़य्याम ने इस फि़ल्म का संगीत देने के लिए न सिर्फ वो उपन्यास पूरा पढ़ा बल्कि दौर के बारे में बारीक से बारीक जानकारी हासिल की- उस समय की राग-रागनियां कौन-सी थीं, लिबास, बोली आदि। एसवाई कुरैशी को दिए एक वीडियो इंटरव्यू में ख़य्याम बताते हैं, 'बहुत पढऩे-लिखने के बाद मैंने और जगजीत जी (उनकी पत्नी) ने तय किया कि उमराव जान का सुर कैसा होगा।

 हमने आशा भोंसले को उनके सुर से छोटा सुर दिया। मैंने अपनी आवाज़ में उन्हें गाना रिकॉर्ड करके दे दिया। लेकिन रिहर्सल के दिन आशा जी ने जब गाया तो काफ़ी परेशान दिखीं और कहा कि ये उनका सुर नहीं है। मैंने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की मुझे आशा का नहीं उमराव जान का सुर चाहिए। इस पर उनका जवाब था पर आपकी उमराव तो गा ही नहीं पा रही।'

''फिर हम दोनों के बीच एक समझौता हुआ। मैंने कहा कि हम दो तरह से गाना रिकॉर्ड करते हैं। आशा ने मुझे क़सम दिलाई कि मैं उनके सुर में भी गाना रिकॉर्ड करूंगा और मैंने उन्हें क़सम दिलाई कि वो मेरे वाले सुर में पूरी शिद्दत से गाएंगी। आशा ने उमराव वाले सुर में गाना गाया और वो इतना खो गईं कि वो ख़ुद भी हैरान थीं। बस बात बन गईं।'' 

उमराव जान के लिए ख़य्याम और आशा भोंसले दोनों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। अपने 88वें जन्मदिन पर बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था उमराव जान का संगीत देने से पहले वो बहुत डर गए थे क्योंकि उससे कुछ समय पहले ही फि़ल्म पाकिज़ा आई थी जो संगीत में एक बेंचमार्क थी। साथी कलाकारों के साथ संगीत को लेकर ऐसे कई किस्से ख़य्याम के साथ हुए। मान मनुहार से वे अपने गायकों को मना लिया करते पर थे वो अपनी धुन के पक्के। अतीत में चलकर ख़य्याम के फि़ल्मी सफऱ की बात करें तो उन्होंने 1947 में अपना सफऱ शुरु किया हीर रांझा से। रोमियो जूलियट जैसी फि़ल्मों में संगीत दिया और गाना भी गाया।

1950 में फि़ल्म बीवी के गाने अकेले में वो घबराते तो होंगे से लोगों ने उन्हें जाना जो रफ़ी ने गाया था। 1953 में आई फ़ुटपाथ से ख़य्याम को पहचान मिलने लगी और उसके बाद तो ये सिलसिला चल निकला। 1958 में फि़ल्म फिर सुबह होगी में मुकेश के साथ वो सुबह कभी तो आएगी बनाया,1961 में फि़ल्म 'शोला और शबनम'  में रफ़ी के साथ 'जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आँखें मुझमें रचा' तो 1966 की फि़ल्म 'आखिरी ख़त'  में लता के साथ 'बहारों मेरा जीवन भी सवारो'  लेकर आए।

दिलचस्प बात ये है कि राजकपूर के साथ उन्हें 'फिर सुबह होगी' मिलने की एक बड़ी वजह थी कि वो ही ऐसे संगीत निर्देशक थे जिन्होंने उपन्यास क्राइम एंड पनिशमेंट पढ़ी थी जिस पर वो फि़ल्म आधारित थी।

ख़य्याम ने 70 और 80 के दशक में कभी-कभी, त्रिशूल, ख़ानदान, नूरी, थोड़ी सी बेवफ़ाई, दर्द, आहिस्ता आहिस्ता, दिल-ए-नादान, बाज़ार, रजिय़ा सुल्तान जैसी फि़ल्मों में एक से बढ़कर एक गाने दिए। ये शायद उनके करियर का गोल्डन पीरियड था। ख़य्याम के जीवन में उनकी पत्नी जगजीत कौर का बहुत बड़ा योगदान रहा जिसका जि़क्र करना वो किसी मंच पर नहीं भूलते थे। जगजीत कौर ख़ुद भी बहुत उम्दा गायिका रही हैं। चुनिंदा हिंदी फि़ल्मों में उन्होंने बेहतरीन गाने गाए हैं जैसे बाज़ार में देख लो हमको जी भरके या उमराव जान में काहे को बयाहे बिदेस।।

अच्छे ख़ासे अमीर सिख परिवार से आने वाली जगजीत कौर ने उस वक्त ख़य्याम से शादी की जब वो संघर्ष कर रहे थे। मज़हब और पैसा कुछ भी दो प्रेमियों के बीच दीवार न बन सका। दोनों की मुलाकात तो संगीत के सिलसिले में हो चुकी थी लेकिन जब मुंबई की एक संगीत प्रतियोगिता में जगजीत कौर का चयन हुआ तो उन्हें ख़य्याम के साथ काम करने का मौक़ा मिला और वहीं से प्रेम कहानी शुरु हुई।

जगजीत कौर ख़ुद भले फि़ल्मों से दूर रहीं लेकिन ख़य्याम की फि़ल्मों में जगजीत कौर उनके साथ मिलकर संगीत पर काम किया करती थीं। दोनों के लिए वो बहुत मुश्किल दौर था जब 2013 में ख़य्या के बेटे प्रदीप की मौत हो गई। लेकिन हर मुश्किल में जगजीत कौर ने ख़य्याम का साथ दिया। दोनों की प्रेम कहानी देखकर ऐसा लगता है कि जगजीत कौर ने ख़य्याम के लिए ही उनके निर्देशन में ये गाना गाया हो

'तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हें ग़म की क़सम, इस दिल की वीरानी मुझे दे दो
मैं देखूँ तो सही दुनिया तुम्हें कैसे सताती है
कोई दिन के लिए अपनी निगहबानी मुझे दे दो'

यहां 1976 की फि़ल्म कभी-कभी के जि़क्र के बग़ौर ख़य्याम पर बात अधूरी है। बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ख़य्याम ने बताया था, 'यश चोपड़ा मुझसे अपनी फि़ल्म के लिए संगीत लेना चाहते थे। लेकिन सभी उन्हें मेरे साथ काम करने के लिए मना कर रहे थे। उन्होंने मुझे कहा भी था कि इंडस्ट्री में कई लोग कहते हैं कि ख़य्याम बहुत बदकि़स्मत आदमी हैं और उनका म्यूजि़क हिट तो होता है लेकिन जुबली नहीं करता। लेकिन मैंने यश चोपड़ा की फि़ल्म का संगीत दिया और फि़ल्म ने डबल जुबली कर सबका मुंह बंद कर दिया।' वाक़ई साहिर लुधियानवी की शायरी में डूबा और ख़य्याम के संगीत में निखरा कभी-कभी का एक एक गीत बेमिसाल है।

यहां याद आता है कभी-कभी का गीत-
'मैं पल दो पल का शायर हूँ'
'कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले
कल कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक्त अपना बर्बाद करे
मैं पल दो पल का शायर हूं...

ख़य्याम भले ही संगीत प्रेमियों से जुदा हो गए हों लेकिन बहुत सारे संगीत प्रेमियों के लिए वाक़ई उनसे बेहतर कहने वाला कोई नहीं होगा। वो दौर जिसे हिंदी फि़ल्म संगीत का गोल्डन युग कहा जाता है, उस दौर के अंतिम धागों से जुड़ी एक और डोर ख़य्याम के जाने से टूट गई है। (बीबीसी)


Date : 20-Aug-2019

-SUNIL KUMAR 
In his first Independence Day speech as Chhattisgarh Chief Minister, Congress's Bhupesh Baghel made a major political announcement - increasing the Other Backward Class (OBC) reservation from 14 to 27 percent - a dream of the Mandal Commission.
However, it was overshadowed by the decision to create 25 new tehsils in the state, adding to the existing 150, among others. The OBC quota announcement was a bolt from the blue, as it was not even part of the Congress party's election manifesto or campaign.
It was not promised, and probably was not discussed within the ruling party in the state. It appeared to be a surprise Independence Day gift to the OBC population, who form half the state's population, by one of their own leaders (Baghel himself is an OBC). Baghel has also pushed for an additional 1 percent to the existing Scheduled Caste quota, in a bid to raise it from 12 to 13 percent.
But the Scheduled Tribe quota has been left untouched. So now, Chhattisgarh has 13 percent reservation for SCs, 32 percent for STs, and the OBCs, who comprise 50 percent of the state's population, will get 27 percent.

Not the End of Reservation Politics
Once approved by the state Cabinet and an Ordinance or Act in the Assembly, Chhattisgarh will be among the states with the highest percentage of reservation in the country, beating even Tamil Nadu (69 percent reservation). However, Chhattisgarh's 'parent state' Madhya Pradesh, will be just a step ahead with 73 percent, for now.
This is not the end of reservation politics in Chhattisgarh. While most locals are yet to fully comprehend the repercussions, the youth, who are busy preparing for tens of thousands of government jobs, have been charged up - especially the General Category youth who will now stand a lower chance. They had 42 percent seats in jobs and educational institutes till 14 August, and will have 14 percent less from 15 August, once the additional OBC and SC quotas are implemented.
Within the General Category, the economically weaker section may get 10 percent very soon, and that would further reduce opportunities for the above EWS General Candidate to just 18 percent. Within a few months, opportunities for the above-EWS candidates may be reduced from 42 percent to just 18 percent.

Will MP's Actions On Reservation Impact Chhattisgarh?
Within days of Independence Day 2019, the General Category representatives met the chief minister, and demanded 10 percent EWS reservation for them, as implemented by PM Narendra Modi in the central government, and recently followed by the Congress government in Madhya Pradesh.
Chhattisgarh was a part of undivided Madhya Pradesh till October 2000, so it is a common and frequent practice to look to each other for precedence. MP had increased its OBC reservation from 13 to 27 percent last June, ahead of the Lok Sabha elections. It had also implemented 10 percent EWS quota within the General Category. The state is now facing a strong demand to reserve 7 percent for the Extremely Backward within OBC.
Chhattisgarh will be compelled to follow MP, and the quota announcement could further be extended to (total) 82 percent including EWS, before the municipal elections, which are scheduled to happen in 6 months.

Mandal Will Finally Rest In Peace
The Congress had outwitted the BJP in the Chhattisgarh assembly elections last November, but had suffered a shocking loss in the parliamentary elections soon after. So, the OBC card is expected to be a 'life-saving trick' for the state Congress in the local body elections, with around 50 percent OBC voters.
OBC reservation increased through an Ordinance or Act, should not face any problems in the state assembly, because non-Congress MLAs are not likely to commit 'political suicide' by opposing it.
Chief Minister Baghel himself is the most prominent OBC leader of Chhattisgarh, and had the biggest contribution to the Congress party's return to power after a fifteen-year gap. In the race to becoming CM, Baghel faced stiff opposition from another OBC leader, Tamradhwaj Sahu, a minister in the state and member of the Congress Working Committee.
So, within the OBC politics of Chhattisgarh, and the Congress party too, Baghel has outshone all other leaders with this surprise move. In all probability, he was not required to get a clearance from the Congress high command for this.
To counter the BJP's aggressive Hindu-nationalism, this is a state model of regionalism, appeasing a community with 50 percent vote share. Mandal will finally rest in peace - in Chhattisgarh!
(The writer is editor and publisher of 'Daily Chhattisgarh'. He tweets @editorsunil.  This article was published on The Quint, and reproduced here with courtesy to it. )
https://www.thequint.com/voices/opinion/chhattisgarh-obc-quota-chief-minister-bhupesh-baghel-congress-caste-politics


Date : 19-Aug-2019

निखिल रंजन

खूबसूरत झीलें, केसर की क्यारियां, पहाड़ों से उतरता दूधिया पानी और दिल छू लेने वाले नजारे, कश्मीर के पास लोगों का दिल चुराने की तमाम वजहें हैं लेकिन भारत की बात और है उसके लिए तो यह दिल से ज्यादा दिमाग की जरूरत है।

वास्तव में अनन्य विस्तार वाले हिमालय के पहाड़ और ग्लेशियर भारत की सुरक्षा जरूरतों के लिए इसे अनिवार्य बनाते हैं। इसके साथ ही कश्मीर से निकलने वाली नदियों का पानी भारत के एक बड़े भूभाग की प्यास बुझाता है और बिजली दे कर जीवन को गतिशील रखता है। 
भारत और पाकिस्तान के लिए अहम बनने में कश्मीर की भौगोलिक स्थिति की बड़ी भूमिका है। खासतौर से भारत तो इस इलाके को छोडऩे का जोखिम कभी नहीं उठा सकता। कश्मीर को छोडऩे का मतलब है कि नियंत्रण रेखा और उसके आसपास के इलाकों में हिमालय के पहाड़ से जो उसे कवच जैसी सुरक्षा मिली है, वह छिन जाएगी। कश्मीर के बाद का इलाका पूरा समतल है और युद्ध की स्थिति में दुश्मन देशों के लिए लाव लश्कर समेत भारत के भीतरी हिस्से में पहुंचना बिल्कुल आसान हो जाएगा। उस जगह से दिल्ली की दूरी 400 से 500 किलोमीटर के दायरे में आ जाएगी साथ ही रास्ता सपाट और मैदानी होगा।
प्राचीन काल में एशिया और यूरोप के बीच व्यापार का प्रमुख मार्ग रहा सिल्क रूट चीन और पाकिस्तान के बीच कश्मीर से होकर गुजरता है। यही रास्ता हमलावरों के लिए भी भारत तक पहुंचने का मार्ग रहा है और चीन इसे फिर से वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत नए सिरे से विकसित करने की तैयारी में है। चीन भारत का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और पाकिस्तान के लिए बड़ा मददगार है।
1960 में जब चीन और भारत के बीच सीमा विवाद हुआ था तो उसी के कुछ वर्षों बाद 1965 में पाकिस्तान ने सिल्क रूट खोल दिया। इससे चीन और पाकिस्तान के बीच कारोबार बढ़ाने में भी बहुत मदद मिली। यहां गिलगित में एक आधुनिक हवाई अड्डा भी है जिसका नियंत्रण पूरी तरह से चीन के हाथ में है। चीन यहां से भारत के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। वह भारत के अंदरूनी हिस्से तक पहुंच सकता है।
हिमालय के कारण भारत के उत्तरी क्षेत्र में जो सुरक्षा की स्थिति है वह पूरी तरह से सिल्क रूट के कारण नाकाम हो सकती है। इसके अलावा सियाचिन ग्लेशियर एक और इलाका है जो भारत के लिए कश्मीर को अहम बनाता है। फिलहाल यह भारत के नियंत्रण में है लेकिन यह अकेला ऐसा इलाका है जहां पाकिस्तान और चीन आपस में मिल कर भारत के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। काराकोरम दर्रे के इस इलाके में अगर पाकिस्तान और चीन की सेना आपस में जुड़ जाती है तो भारत का पूरा उत्तरी फ्रंट खतरे में पड़ जाएगा। 
सिर्फ इतना ही नहीं अगर कश्मीर एक स्वतंत्र देश बन जाए तो भी मुश्किलें कम नहीं होंगी। ऐसे में यह एक उग्र मुस्लिम चरमपंथियों की जमीन बन सकता है जो ना सिर्फ दक्षिण एशिया बल्कि उसके बाहर के मुल्कों के लिए भी मुसीबत खड़ी करेंगे। इसके नतीजे में देर सबेर विदेशी ताकतों को वहां दखल को न्योता मिल सकता है।
कश्मीर से बहने वाली नदियों में सिंधु एशिया की सबसे बड़ी नदियों में एक है। यह तिब्बत के पठारों से निकल कर मानसरोवर झील होते हुए लद्दाख के रास्ते गिलगित बल्तिस्तान से गुजरते हुए पाकिस्तान में दाखिल होती है। पाकिस्तान के बड़े हिस्से को हरियाली देने के बाद कराची में जा कर अरब सागर से मिलती है। सिंधु के अलावा झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास और सतलुज भी इस इलाके से निकलने वाली बड़ी नदियां हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुए समझौते के तहत इनमें से ब्यास, सतलुज और रावी के पानी पर भारत को अधिकार मिला जबकि सिंधु, चेनाब और झेलम का पानी पाकिस्तान को दिया गया।
इन नदियों के पानी के बिना भारत का पंजाब और पाकिस्तान का आधे से ज्यादा हिस्सा प्यासा रह जाएगा। पेयजल और सिंचाई के साथ-साथ यही पानी कई पनबिजली परियोजनाओं का भी मुख्य स्रोत हैं। अगर इन पर किसी एक देश का नियंत्रण हो जाए तो दूसरी की स्थिति बेहद खराब हो सकती है। पाकिस्तान को भले ही तीन नदियों का पानी मिलता है लेकिन भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर से हो कर निकलने के कारण भारत के पास उसके हिस्से वाली नदियों पर भी रणनीतिक बढ़त है। विवाद की स्थिति में भारत इनका इस्तेमाल कर सकता है। सिंधु नदी के जल बंटवारे को लेकर हुई संधि पर ऐसी तलवार लटक ही रही है।
अलग संस्कृति, भाषा, खानपान और रीति रिवाजों में बंटे भारत का सशक्त उत्तरी हिस्सा ही उसे देश के बाकी हिस्सों से जोड़े रखता है। देश के उत्तर पूर्व और दक्षिण के लोगों में भारत की साझी विरासत को लेकर वैसी भावना थोड़ी कम दिखाई देती है। ऐसी परिस्थितियों में यह समझना मुश्किल नहीं है कि कश्मीर के लिए भारत सिर्फ खूबसूरती का मसला नहीं है यह वो मजबूत धागा है जिसने उसके अलग अलग हिस्सों को उसके साथ जोड़ रखा है और जिसके ना होने पर उसकी एकजुटता खतरे में पड़ जाएगी।
हां यह स्वर्ग है और जिस शायर ने इसे धरती का अकेला स्वर्ग माना था वह भी गलत नहीं था, लेकिन यह ऐसा स्वर्ग है जिसकी भारत के लोगों को जीते जी जरूरत है, मरने के बाद नहीं।
भारत सरकार ने कश्मीर के विशेष स्वायत्त दर्जे को खत्म कर दिया है। वहां तनाव बढ़ रहा है। डीडब्ल्यू की ईशा भाटिया, शहजेब जिलानी और जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के क्रिस्टियान वागनर के बीच बातचीत।  जम्मू और कश्मीर के भारतीय हिस्से में बेरोजगारी राष्ट्रीय औसत की दोगुनी है। नियमित रूप से होने वाली अशांति का असर अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर है। निवेशकों के लिए अहम होगा कि सुरक्षा की स्थिति में कितना सुधार होता है। 
जम्मू कश्मीर के विशेषाधिकार को खत्म करने और उसे दो भागों में बांटने के फैसले पर पाकिस्तान भले ही हायतौबा मचा रहा हो लेकिन खाड़ी के देशों में लगभग खामोशी है। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से धारा 370 हटाने को अपनी जीत के तौर पर पेश किया, लेकिन सवाल यह है कि क्या वह कश्मीर घाटी के लोगों का दिल जीत पाएंगे? (डॉयचेवेले)


Date : 19-Aug-2019

अनुराग भारद्वाज

यह जांनिसार अख्तर की रोशन-खय़ाली ही थी कि जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें पिछले 300 सालों की हिन्दुस्तानी शायरी को एक जगह पर इकट्ठा करने का जिम्मा सौंपा था। 

बीसवीं सदी के हिंदुस्तान के शायरों और अफ्सानागारों की लिस्ट में एक से एक नाम आते हैं : सरदार जाफरी, कैफ़ी आज़मी, फैज़ अहमद फैज़, मज़ाज, शकील बदायूंनी, कृशन चंदर, राजिंदर सिंह बेदी, भीष्म साहनी। इन सबमें एक नाम है जिसकी शायरी का मयार माने दायरा इन सबसे कहीं ज़्यादा बड़ा है। वह नाम है- जांनिसार अख्तर। वालिद मुज़्तर खैराबदी और उनके भी वालिद मौलाना फज़़ले हक़ खैराबदी। ये वही फज़़ले हक़ खैराबदी हैं जिन्होंने ग़ालिब का दीवान, खुद ग़ालिब के कहने पर संकलित किया था।
 जांनिसार अख्तर की जिंदगी ग्वालियर से शुरू होती है और फिर भोपाल और मुंबई जाकर आज के दिन ख़त्म होती है। इस सफऱ के दौरान उन्होंने वे पड़ाव तय किये हैं जो उन्हें इस खानदान का वारिस होने का हक़ दिलाते हैं।
जांनिसार अख्तर देश के शायद सबसे पहले उर्दू के गोल्ड मेडलिस्ट होंगे। उन्होंने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमए किया था। हिन्दुस्तान के बंटवारे से पहले ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में उन्हें उर्दू पढ़ाने का काम मिला। दंगों की वजह से वे भोपाल चले आये और वहां सैफिया कॉलेज में उर्दू विभाग में लग गए। हालांकि नौकरी रास नहीं आई और जांनिसार मुंबई चले गए। अपनी बीवी साफिय़ा अख्तर, बच्चे जावेद अख्तर और सलमान अख्तर को खुदा के हवाले छोडक़र धक्के खाने। खैर, कहानी बहुत लंबी है और ज़बरदस्त भी, और ज़बरदस्त ही हैं उनके कलाम जो कई शानदार गज़़लों, नज्मों औप रुबाइयों में सिमटे हुए हैं।
बात पहले फिल्मों से। ‘रजिय़ा सुल्तान’ फिल्म का गाना आपको याद है? लता मंगेशकर की आवाज़ में ‘ऐ दिले नादां, आरज़ू क्या है, जुस्तजू क्या है’ इसी गाने से आपको जांनिसार अख्तर की शायरी का फ़ैलाव समझ आ जाता है।
पचास से साठ के दशक की कई फिल्में जैसे सीआईडी का गाना ‘आंखों ही आंखों में इशारा हो गया’ या फिर ‘प्रेम परबत’ का वह गीत ‘ये दिल और उनकी निगाहों के साये’। मशहूर फिल्म ‘नूरी’ का गीत ‘आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा’ के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला।
फिल्मों से ज़्यादा उनकी शायरी मशहूर हुई।
अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फक़त उनको सुनाने के लिए हैं
या फिर
जब ज़ख्म लगे तो क़ातिल को दुआ दी जाए
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए।
हम से पूछो कि गज़़ल क्या है गज़़ल का फन क्या
चंद लफ्ज़़ों में कोई आग छुपा दी जाए
बकौल निदा फ़ाज़ली ‘जांनिसार अख्तर ने शायरी को पारंपरिक रूमानी दायरे से बाहर निकालकर यथार्थ की खुरदरी धरती पर लाकर खड़ा कर दिया।’ दरअसल, जांनिसार अख्तर नर्म लबो-लहजे के पुख्ता शायर थे। अपनी पत्नी साफिय़ा अख्तर की मौत पर लिखी हुई नज़्म ‘ख़ाके दिल’ आज कल्ट का दजऱ्ा रखती है । उनकी एक और नज़्म ‘आखिऱी मुलाकात’ मैं जब वे कहते हैं-
मत रोको इन्हें मेरे पास आने दो
ये मुझ से मिलने आये हैं
मैं खुद न जिन्हें पहचान सकूं
कुछ इतने धुंधले साए हैं
तो उनके उन दिनों का तारूफ़ मिल जाता है जब वे गुमनामी में चले गए थे। जब गुमनामी से बाहर निकले तो इन्ही नज्मों ने उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान दिलवाया। कुछ और उनके कलाम जैसे ‘नजऱे बुतां’, ‘जाविदां’, ‘पिछली पहर’, ‘घर आंगन’ सब इसी कतार में नजऱ आते हैं।
ये उनकी रोशन खय़ाली ही थी कि तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने उन्हें पिछले तीन सौ सालों की हिन्दुस्तानी शायरी को एक जगह पर इक_ा करने का काम दिया। बाद में इंदिरा गांधी ने इसे ‘हिंदुस्तान हमारा’ के नाम से रिलीज़ किया।
निदा फ़ाज़ली ने जांनिसार पर एक किताब लिखी है - ‘एक जवान की मौत’। इसमें उन्होंने जांनिसार की जिंदगी का पूरा ख़ाका खींचा है। निदा फाजली की उनसे पहली मुलाकात जांनिसार और साहिर लुधियानवी के रिश्तों को हमारे सामने रख देती है।
साहिर लुधियानवी और जांनिसार के बीच प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन वाली दोस्ती थी जो शायद बाद में तिजारती मजबूरी बनी। जांनिसार अख्तर ने एक फिल्म बनायीं थी जिसका नाम था ‘बहू बेग़म’ इस फिल्म के गाने उन्होंने साहिर लुधियानवी से लिखवाए थे। फिल्म नहीं चली पर गाने हिट हुए। नतीजा, अख्तर साहब इंडस्ट्री से आउट हो गए। अब वे पूरी तरह से साहिर तक सिमट के रह गए।
निदा फ़ाज़ली लिखते हैं, ‘एक बार किसी दोस्त के साथ साहिर लुधियानवी के दरबार में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो कई नामी गिरामी लोगों के साथ, सोफ़े के कोने में सिमटे-सिकुड़े अख्तर साहब भी दिखाई दिए। बहुत सारे अख्तर एक जगह, एक रूप में नजऱ आये तो अजीब सा लगा। कहीं कुछ खो जाने का अहसास हुआ। अपने आप में खोये हुए खामोश, आंखों का दायरा सिर्फ हाथ और मेज़ पर रखे शराब के गिलास की दूरी तक सीमित।।।मुझसे परिचय हुआ तो मुझे भी वे बिना शब्दों की मुस्कान थमा कर , पहले की तरह अपना जिस्म सोफ़े पर छोड़ कर कहीं और ग़ायब हो गए।’
साहिर साहब को महफि़लें जमाने और उनमें ‘वाह साहिर वाह’ सुनने का शौक था। जांनिसार ‘बहू बेग़म’ के बाद एक तरह से बेरोजगार हो गए थे इस दौरान साहिर ही ने उनका हाथ थामा, दोस्ती के नाते नहीं, शायद किसी और नाते।
निदा फ़ाज़ली बताते हैं कि जांनिसार अख्तर सिर्फ उनके दोस्त ही नहीं ज़रूरत से ज़्यादा जल्दी शेर लिखने वाले शायर भी थे। साहिर को एक पंक्ति सोचने में जितना समय लगता था, जांनिसार उतने समय में पच्चीस पंक्तियां जोड़ लेते थे। बकौल निदा फाज़ली ‘एक तरफ़ ज़रूरत थी, दूसरी और दौलत।’ तो क्या मान लिया जाए कि वे कलाम जिनमें साहिर की बू नहीं आती , जांनिसार अख्तर ने लिखे हैं? हो सकता है। अगर उनका यह इशारा है तो फिर यकीन कर लेना चाहिए: शायरी तुझको गंवाया है बहुत दिन हमने।
जांनिसार के बेटे और जावेद अख्तर के छोटे भाई सलमान अख्तर एक किस्से को याद करके बताते हैं कि एक बार किसी खास महफि़ल में बेग़म अख्तर कुछ कलाम सुना रही थीं। ये कोई बीस-पच्चीस लोगों की महफि़ल थी। तभी अचानक उन्होंने देखा कि जांनिसार भी उस महफि़ल में चले आए हैं।  बेग़म अख्तर ने सिर्फ दो गज़़लें ही गाई थीं कि उन्होंने मेज़बान से थोड़ी देर के लिए विराम की मोहलत मांगी। जब मेज़बान को समझ नहीं आया कि क्यूं इतनी जल्दी वे विराम की बात कह रही हैं तो उन्होंने चुपके से उन्हें कहा कि इस महफि़ल में जांनिसार भी आए हैं ओर मैं उनका कोई कलाम नहीं सुना रही हूं। बेहतर होगा कि अगर उनके पास कोई जांनिसार के कलामों की किताब हो तो वे किसी कमरे में जाकर पढ़ लेंगी और याद करके महफि़ल में सुना देंगी।
मेज़बान जांनिसार से शनासा (परिचित) थी, उनके पास जांनिसार की कई किताबें थी तो उन्होंने जांनिसार से जाकर ही पूछा कि वो कौन सा कलाम बेग़म अख्तर की आवाज़ में सुनना चाहेंगे। जांनिसार ने कहा कि अगर बेग़म अख्तर को इतना भरोसा है कि वे चंद ही मिनटों में कोई कलाम याद करके धुन बना लेंगी, तो वे एक नई गज़़ल लिख देते हैं। वे ऊपर गए और महज़ तीन मिनट में एक गज़़ल लिख कर छोड़ आए। बेग़म अख्तर ने उसे पढ़ा, याद किया और धुन बना ली। वह कलाम था-
सुबह के दर्द को, रातों की जलन को भूलें,
किसके घर जाये कि उस वादा शिकन को भूलें।
वापस बात पर आते हैं। कहते हैं कि साहिर लुधियानवी जांनिसार को अपना दरबारी बना रहने के लिए हर महीने एक तय शुदा रकम देते थे और इसके बदले जांनिसार हमेशा ‘हां साहिर’ कहते थे। बाद इसके फिर कुछ यूं हुआ कि ये दोस्ती किसी बात पर टूट गई।  साहिर लुधियानवी अपने ‘रंग’ में आ गए, जांनिसार, खानदानी आदमी थे, तू-तड़ाक न सुन पाए, दोस्ती टूट गई। 
साफिय़ा अख्तर और जांनिसार अख्तर का निकाह 1943 में हुआ था। साफिय़ा मशहूर शायर मजाज़ की बहन थी। बेहद नफीस, पढ़ी लिखी-औरत थीं साफिय़ा जिन्होंने जांनिसार के लिए काफी दु:ख उठाये पर कभी कहा नहीं।
जांनिसार भोपाल की अच्छी खासी नौकरी छोडक़र मुंबई चले आए थे। साफिय़ा बच्चों को भी संभालतीं और नौकरी भी करतीं। जांनिसार का मुंबई का खर्च भी वे ही उठातीं। दोनों का रिश्ता तकरीबन नौ साल चला। साफिय़ा कैंसर से मर गईं। उन नौ सालों में दोनों लगभग एक-दूसरे से दूर ही रहे।  साफिय़ा जांनिसार को कामरेड कहकर बुलाती थी। साफिय़ा के जांनिसार को लिखे ख़तों से मालूम होता है कि उन्हें जांनिसार से कितनी मुहब्बत थी और वे जांनिसार से मिलने के लिए कितना तडपती थीं।
चंद ख़तों के मज़मून पेश हैं
तारीख 21, जनवरी 1951
कामरेड,
तुम्हारा ख़त मेरे हाथ में है... मुहब्बत को अदावत से न मिलाओ। तुम जानते हो ये मेरी ख्वाहिश थी कि में तुम्हारे साथ रहूं... मुझे हमेशा अपने इन दु:ख भरी राहों में अपने साथ रखो मेरे लबों पर हमेशा मुस्कराहट रहेगी। मुझे आजकल हल्का सा बुखार रहने लगा है। तुम फि़क्र न करना मैं किसी हकीम से दवा ले लूंगी।
तुम्हारी सफ्फो
शायद यहां उन्हें कैंसर ने घेर लिया था।
आखिऱी ख़त उन्होंने 29 दिसम्बर 1952 को लिखा जब वे मर रही थीं....
मेरे प्यारे अख्तर, मेरी जि़न्दगी
तुम्हारी नज़्म मिली। मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है, यकीन मानो अख्तर मेरे पास आओ, मुझे मरने मत दो, मैं मरना नहीं चाहती। मुझे तुम्हारी बाहों में सोने दो... मैं शायद ठीक हो जाऊं और फिर तुम्हारे इन रास्तों पर चल सकूं। 
तुम्हारी अपनी
सफ्फो।
इस ख़त के चंद दिनों बाद साफिय़ा इस दुनिया से रुखसत हो गईं। सोचकर अफ़सोस होता है कि जांनिसार इतने बेरुखे हो गए थे। उन्हें मालूम था कि साफिय़ा नहीं बचेंगी तो कुछ दिन क्या उनके साथ भोपाल में रहकर गुज़ार नहीं सकते थे?
हो भी सकता है कि वे साफिय़ा से मुहब्बत करते रहे हों पर ज़ाहिर न कर पाये हों। साफिय़ा की मज़ार के किनारे बैठकर उन्होंने एक नज़्म लिखी है- ‘खामोश आवाज़’

कितने दिन में आए हो साथी
मेरे सोते भाग्य जगाने
मुझसे अलग इस एक बरस में
क्या क्या बीती तुम पे न जाने
चुप हो क्या, क्या सोच रहे हो
आओ सब कुछ आज भुला दो
आओ अपने प्यार से साथी
फिर से मुझे इक बार जिला दो
तुमको मेरा ग़म है साथी
कैसे अब इस ग़म को भुलाऊं
अपना खोया जीवन बोलो
आज कहां से ढूंढ के लाऊं।
जो भी है, इस रिश्ते में सफिय़ा ने ज़्यादा दर्द झेला और शायद यही जावेद अख्तर और जांनिसार के रिश्तों की कड़वाहट का कारण बनी। अपनी किताब ‘तरकश’ में जावेद अख्तर ने कुछ यूं लिखा है, ‘18 अगस्त 1976 को मेरे बाप( जांनिसार अख्तर) की मृत्यु होती है (मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आखिऱी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उस पर लिखा था-‘जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे।’ उन्होंने ठीक लिखा था ।अब तक तो मैं अपने आप को एक बाग़ी और नारा बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हूं।।। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है। चाहूं तो कर सकता हूं। मगर आज तक की नहीं है। ये भी मेरी नाराजग़ी और बग़ावत का प्रतीक है। 1979 में पही बार शेर कहता हूं और ये शेर लिखकर मैंने अपनी विरासत और बाप से सुलह कर ली है।
जावेद की जांनिसार से बग़ावत इसलिए थी कि जांनिसार ने उनकी मां और उनका और सलमान अख्तर का ख्याल नहीं रखा। साफिय़ा बेवक्त ही इस दुनिया से रुखसत हो गई थीं, जावेद और सलमान कभी अपनी खाला, कभी नानी के गहर पर अजनबियों की तरह ही रहे। जब जावेद अख्तर मुंबई आये तो महज़ पांच या छ दिन ही जांनिसार अख्तर के घर पर रहे। सौतेली मां से नहीं बनी। अपनी ग़ुरबत(गऱीबी), रिश्तेदारों के ताने, मां की मौत इन सबके लिए उन्होंने जांनिसार को ही मुजरिम माना। तभी तो जावेद के एक शेर में लिखते है-
नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘सिनेमा के बारे में’ में जावेद इस पर खुलकर बात करते हैं। वे कहते हैं, ‘मेरी और मेरे वालिद यानी जांनिसार अख्तर की ये जंग खुल्लम-खुल्ला थी। और ये तब शुरू हुई जब मैं पंद्रह बरस का था। उनके घर से निकल जाने बाद मैं अपने दोस्त के घर पर रहा उन्हें ये नहीं मालूम था की मैं कहां हूं...हम पहले तो अपने वालिद की एक हीरो की तरह इबादत करते थे, लेकिन जब हमारी वालिदा गुजऱ गईं और हम आने रिश्तेदारों के साथ रहने लगे तो मुझे जरूर अपने वालिद का सुलूक काफ़ी खटकने लगा था  और मेरा रवैया ‘भाड़ में जाए’ वाला हो गया था।’ कहा नहीं जा सकता कि क्या सलमान अख्तर भी इतने ही तल्ख़ रहे होंगे। कुछ एक इंटरव्यू जो उन्होंने दिए हैं उनमें ये कडवाहट नजऱ नहीं आती। इसलिए बात को यही ख़त्म कर सकते हैं।
आप ये सोच रहे होंगे कि क्यूं निदा फाजली ने जांनिसार पर लिखी किताब का उन्वान ‘एक जवान मौत’ रखा। तो बात यह है साहब, जांनिसार को जवान लोगों की सोहबत रास आती थी। उन्होंने लिखा भी-
फिक्रो फन की सजी है नयी अंजुमन
हम भी बैठे हैं कुछ नौजवानों के बीच।
वे अक्सर कहा करते की आदमी ज़ेहन से बूढा होता है। या फिर यह संभव है कि इतने साल गुमनामी में रहना, बेटे की बेरुखी, साफिय़ा से इंसाफ न कर पाने की जि़ल्लत ने उन्हें एक तरह से बाग़ी बना दिया था।
हमेशा नर्म मिज़ाज वाले जांनिसार बाद के दिनों में बेधडक़ शराबनोशी में डूब कर कुछ कडवे हो गए थे।हमेशा महफिलें, हमेशा दाद पाने की चाहत, हमेशा कुछ आइनों के सामने होने की ख्वाहिश और हमेशा ‘हां जांनिसार’ सुनने की चाह। कुछ वैसे ही जैसे साहिर लुधियानवी।
निदा फ़ाज़ली लिखते हैं, ‘जांनिसार आखिऱी दम तक जवान रहे। बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास में एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो-अदब की की महफि़ल में हमेशा जवान रखेगा। (सत्याग्रह)
 


Date : 18-Aug-2019

चेलों पर अपने गुरू का असर जरूर रहता है। शेक्सपियर की कहानियों पर फिल्में बनाने के शौकीन विशाल भारद्वाज इस महान रचनाकार तक अपने गुरू गुलजार की वजह से पहुंचे थे। गुलजार ने भी शेक्सपियर के नाटक 'द कॉमेडी ऑफ ऐरर्सÓ से प्रेरणा लेकर 'अंगूरÓ बनाई थी। लेकिन यही गुलजार खुद शेक्सपियर तक अपने गुरू बिमल रॉय की वजह से पहुंचे थे और मजेदार बात ये कि सिर्फ पहुंचे नहीं बल्कि उनसे आगे भी निकल गए!
बिमल दा की ही 'बंदिनीÓ से गीत लेखन की शुरुआत करने वाले गुलजार ने इसके कुछ साल बाद बिमल रॉय द्वारा बतौर निर्माता बनाई एक फिल्म 'दो दूनी चारÓ (1968) में गीत लिखने के अलावा उसकी स्क्रिप्ट और डायलॉग भी लिखे थे। गुलजार के सखा देबू सेन द्वारा निर्देशित इस कॉमेडी फिल्म में किशोर कुमार और असित सेन के डबल रोल थे। यह फिल्म शेक्सपियर के नाटक 'द कॉमेडी ऑफ ऐरर्सÓ पर आधारित थी। इस फिल्म के 14 साल बाद ठीक इसी कहानी पर गुलजार ने संजीव कुमार और देवेन वर्मा को डबल रोल में लेकर अपने निर्देशन में 'अंगूरÓ बनाई थी। 'दो दूनी चारÓ में वे शेक्सपियर के नाटक को अपनी तरह से नहीं कह पाए थे लेकिन यहां अपने मन मुताबिक कहानी कह ली और क्या खूब कही!
बिमल रॉय की वो ब्लैक एंड वाइट फिल्म मजेदार जरूर थी लेकिन गुलजार की खट्टी-मीठी 'अंगूरÓ के आगे खट्टी-खट्टी ही लगती है। इसलिए बॉलीवुड में शेक्सपियर के इस नाटक का नाम आने पर सबसे पहले 'अंगूरÓ का ही जिक्र होता है। ऐसे उदाहरण विरले ही होते हैं जब कोई चेला किसी मामले में अपने दिग्गज गुरू से आगे निकल जाए। बॉलीवुड की सर्वकालिक महान कॉमेडी फिल्मों में शामिल 'अंगूरÓ और उसके निर्देशक गुलजार ऐसे ही उदाहरण हैं।
सन 1988 में बनकर तैयार एक फिल्म। गुलजार का निर्देशन और स्क्रिप्ट व गीत लेखन। शादी के बाद वाली इस आधुनिक कहानी में नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी और राज बब्बर का प्रेम त्रिकोण। फिल्म के लिए रचे आज तक सराहे जाते रहे पंचम दा के चार गीत। रिलीज हो चुका फिल्म का पोस्टर और ट्रेलर, लेकिन इतना सबकुछ पब्लिक डोमेन में होने के बाद भी आज तक रिलीज न हो पाई एक फिल्म। यही कहानी है गुलजार की बनाई 'लिबासÓ की, जिसकी न कभी सीडी-डीवीडी ही रिलीज हुई और न ही आम जनता इसे कभी किसी दबे-छुपे माध्यमों तले ही देख पाई।
'लिबासÓ के कभी न रिलीज होने की वजह कई सालों तक सेंसर बोर्ड को माना जाता रहा, लेकिन इसका कभी न रिलीज हो पाना गुलजार साहब और फिल्म के निर्माता की आपसी तनातनी का नतीजा है। कहते हैं कि 'लिबासÓ के निर्माता विकास मोहन फिल्म की कहानी में काफी बदलाव चाहते थे और गुलजार इसे बिलकुल अपने हिसाब से बनाना चाहते थे। फिल्म का अंत गुलजार ने एब्सट्रेक्ट रखा था, जिसमें शबाना का किरदार किस नायक को आखिर में अपनाता है यह उन्होंने दर्शकों की समझ पर छोड़ा था। लेकिन निर्माता चाहते थे कि शबाना राज बब्बर के किरदार को ही अपनाए और फिल्म की हैप्पी एंडिंग हो। गुलजार की पिछली कुछ फिल्में फ्लॉप होने के बावजूद उन्होंने स्क्रिप्ट में इस तरह के दखल को सिरे से नकार दिया और निर्माता ने 'लिबासÓ को रिलीज करने से ही इंकार कर दिया।
'लिबासÓ के बनकर तैयार हो जाने के चार साल बाद निर्माता ने पब्लिक के लिए इसका प्रदर्शन सिर्फ एक बार इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आफ इंडिया में किया लेकिन तारीफ मिलने के बावजूद इसे थियेटरों में रिलीज नहीं किया। फिल्म की तकदीर देखिए, बनकर तैयार होने के तकरीबन 26 साल बाद पिछले साल इसी फेस्टिवल में 'लिबासÓ दोबारा गिनी-चुनी पब्लिक को दिखाई गई और दर्शकों द्वारा एक बार फिर सराही गई। हालांकि दिखाए जाने पर इस बार भी निर्माता ने घनघोर आपत्ति ली और जाहिर हो गया कि आने वाले समय में भी थियेटरों तक 'लिबासÓ का पहुंच पाना मुमकिन नहीं है। हां, इस साल फरवरी में 'लिबासÓ के डिजिटल रिलीज की खबरें जरूर सुनने को मिली थीं, लेकिन यह कब-कैसे-कहां देखने को मिल सकेगी, इस बारे में कोई जानकारी अब तक नहीं मिल सकी है। (सत्याग्रह)


Date : 18-Aug-2019

 अनुराग शुक्ला
सोने की कीमतों में आग लगी हुई है। भारतीय बाजार में सोने की कीमतें अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर (38,470 प्रति दस ग्राम) पहुंच चुकी हैं। भारत में आभूषण संस्कृति के चलते सोने की स्थानीय मांग रहती ही है, लेकिन इस समय भारत के साथ-साथ दुनिया में भी सोने की कीमतें आसमान छू रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें बीते छह सालों के सर्वोच्च स्तर पर हैं।
सवाल उठता है कि दुनिया में इस कीमती धातु की मांग एकाएक क्यों बढ़ गई है। सोना परंपरागत तौर पर एक सुरक्षित निवेश रहा है, लेकिन पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के जुडऩे के बाद निवेश सलाहकारों ने यह धारणा स्थापित की कि सोने में निवेश के मुकाबले इक्विटी और अन्य चीजों में निवेश में ज्यादा रिटर्न है। दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में यह बात काफी हद तक सही भी थी, लेकिन इस सबके बावजूद जब भी दुनिया के आर्थिक हालात थोड़ा सुस्त होते हैं तो लोगों का रुख सोने की खरीद की ओर हो जाता है।
मौजूदा समय में भी सोने के प्रति आकर्षण और उसकी कीमतें बढऩे की एक वजह दुनिया के आर्थिक हालात हैं। आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) ने अपने हालिया आकलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को पहले से कम कर दिया है। इसके अलावा चीन और अमरीका के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव ने भी आर्थिक अनिश्चिताओं को बढ़ा दिया है। दुनिया भर के शेयर बाजारों में निवेशकों का मुनाफा कम हुआ है। भारत में शेयर बाजार और म्यूचअल फंड जैसे निवेशों में रिटर्न पिछले एक साल से बेहद कम है और कई मामलों में तो यह ऋणात्मक स्तर पर है। ऐसे में निवेशक एक बार फिर सोने की ओर लौट रहे हैं। भारत में थोड़ा ज्यादा, लेकिन पूरी दुनिया में कमोबेश ऐसे ही हालात हैं, इसलिए बतौर निवेश विकल्प सोने की मांग बढ़ी है।
शेयर बाजार, म्यूचअल फंड और कर्ज बाजार में बनी अस्थिरता से आम निवेशक सोने में पैसा लगाने की सोच रहा है, यह तो समझ में आता है क्योंकि मौजूदा विकल्पों में सोने में किया गया निवेश अपेक्षाकृत सुरक्षित नजऱ आ रहा है। लेकिन, आम निवेशकों के साथ दुनिया के कई सेंट्रल बैंक भी सोने की अपनी खरीद को लगातार बढ़ा रहे हैं। आधुनिक मुद्रा व्यवस्था में भी सेंट्रल बैंक अपने रिजर्व का एक हिस्सा सोने के रूप में रखते रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से देखा गया है कि कई केंद्रीय बैंक बड़ी मात्रा में सोना खरीद रहे हैं। इस साल सोने की कीमतों में 16 फीसद की उछाल आई है और जानकर मानते हैं कि इसकी एक वजह केंद्रीय बैंकों की सोने में बढ़ी दिलचस्पी भी है।
गोल्ड कॉउंसिल के अनुसार, पूरी दुनिया के सेंट्रल बैंक 2019 की पहली छमाही तक 374.1 टन सोना खरीद चुके हैं। केंद्रीय बैंकों ने इस साल अब तक जो 374.1 टन सोना खरीदा है उसमें से 224.4 टन साल की दूसरी तिमाही में खरीदा गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस साल की दूसरी तिमाही वही समय है जब चीन-अमरीका के बीच व्यापार युद्ध चरम पर पहुंच गया और समझौते की उम्मीद धूमिल हो गई। अमरीका ने चीन के उत्पादों पर भारी टैक्स लगा दिया। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए यह झटका देने वाली बात थी। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी दुनिया की अर्थव्यवस्था में वृद्धि के अपने आकलन को घटा दिया था और भारत जैसे मुल्क में आर्थिक सुस्ती मंदी में बदलने लगी । यानी जैसे-जैसे दुनिया की अर्थव्यवस्था में नरमी के संकेत बढ़े दुनिया के केंद्रीय बैंकों ने भी अपना स्वर्ण भंडार बढ़ाना शुरू कर दिया।
अगर मौजूदा हालात को देखा जाए तो अमरीका से व्यापारिक तनाव के चलते इसका सबसे ज्यादा असर चीन पर होने वाला है। व्यापार युद्ध को देखते चीन पिछले काफी दिनों से अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता और उसके दबदबे को कम करने की कोशिश कर रहा है। इन तमाम कोशिशों में से एक अपना स्वर्ण भंडार बढ़ाने की कोशिश भी है। यह कोशिश सतत लेकिन धीमी गति से काफी दिनों से चल रही है। अमरीका द्वारा चीनी उत्पादों पर टैक्स लगाने के बाद अमेरिकी डॉलर से निपटने के लिए पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना सोने की जमकर खरीद कर रहा है। इसके पीछे मंशा यह है कि अपनी मुद्रा के अवमूल्यन की स्थिति में वह सोने के सहारे डॉलर से निपट सकता है। यही वजह है कि चीन ने 2019 के पहले सात महीनों में करीब 85 टन सोने की खरीद की है।
सोना खरीदने से अमेरिकन डॉलर पर निर्भरता कैसे कम होती है, इसे मोटे तरीके से यूं समझा जा सकता है।
 ज्यादातर देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को अमेरिकी डॉलर में रखते हैं। कोई देश अपनी मुद्रा खर्च कर डॉलर लेता है। ऐसे में अगर डॉलर मजबूत होता है या उस देश की मुद्रा कमजोर (अवमूल्यन) होती है तो उसे डॉलर की खरीद करने में या अन्य देनदारियां डॉलर में चुकाना खासा महंगा पड़ता है। इसके बदले सोने के पर्याप्त भंडारण की स्थिति में केंद्रीय बैंक सोने को मुद्रा में बदलकर अपनी देनदारियां चुका सकता है। इससे डॉलर पर आत्मनिर्भरता भी घटती है और सोने के दामों में अपेक्षाकृत स्थायित्व के कारण नुकसान भी कम होता है।
अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा बढ़ाने की रणनीति पर रूस भी चल रहा है। हालांकि, वह फिलहाल सीधे किसी व्यापार युद्ध जैसी स्थिति में नहीं है, लेकिन वह बहुत सतर्क तौर पर अमरीकी डॉलर पर अपनी आत्मनिर्भरता कम कर रहा है। हालांकि, जानकार कहते हैं कि इसकी वजह आर्थिक से ज्यादा सामरिक है। शीत युद्ध खत्म होने के बाद भी रूस हमेशा इस बात के प्रति सचेत रहता है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में अमेरिका कुछ करता है तो वहां रूस का हित क्या होगा। मसलन अगर ईरान को लेकर अमेरिका आक्रामक रुख अख्तियार करता है और रूस उसका विरोध करता है तो पश्चिम के कई देश उस पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। क्रीमिया जैसे कई मसलों को लेकर उस पर कई प्रतिबंध पहले से ही लगे हैं। ऐसे में डॉलर पर कम से कम आत्मनिर्भरता रूस की नीति का स्थायी हिस्सा है जिस वजह से रूस का केंद्रीय बैंक सोने की खरीद कर रहा है। जानकारों के मुताबिक रूस जिस रफ्तार से सोना खरीद रहा है, उस हिसाब से वह साल के अंत तक वह अपने भंडार में 150 टन से ज्यादा सोना बढ़ा लेगा।
वल्र्ड गोल्ड कॉउंसिल के मुताबिक, तुर्की, कज़ाकिस्तान, चीन और रूस के सेंट्रल बैंक सोने के चार सबसे बड़े खरीददार हैं। चीन तात्कालिक आर्थिक वजहों से और रूस सामरिक वजहों से सोने की खरीद कर रहा है, लेकिन सवाल उठता है कि तुर्की और कज़ाकिस्तान जैसे देश बड़े पैमाने पर सोना क्यों खरीद रहे हैं। इसकी वजह यह है कि ये देश डॉलर के मुकाबले अपनी मुद्रा को गिरने से रोकना चाहते हैं। बीते साल तुर्की की मुद्रा लीरा डॉलर के मुकाबले खासी कमजोर हो गई थी। जानकर मानते हैं कि ज्यादातर देशों के केंद्रीय बैंक दुनिया के आर्थिक हालात और अमरीकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए सोना खरीद रहे हैं। भारत के रिजर्व बैंक ने भी 2019 के वित्तीय वर्ष में सोने की खरीद बढ़ाई है और अब आरबीआई का स्वर्ण भंडार दुनिया के सेंट्रल बैंकों में दसवें नंबर पर आ चुका है।
वल्र्ड गोल्ड कॉउंसिल के मुताबिक, 2019 में सोने की जो कुल मांग रही है, उसमें से 16 फीसदी केंद्रीय बैंकों की ओर से रही। आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के नौ केंद्रीय बैंकों ने काफी तेजी से सोने की खरीद की है। यानी डांवाडोल आर्थिक नीति और सामरिक चिंताओं के चलते आम निवेशक के साथ केंद्रीय बैंक भी सोने की ओर रुख कर रहे हैं। जानकर मानते हैं,सोने के भाव ने कई सालों बाद उछाल पकड़ा है और हाल-फिलहाल इसके घटने की कोई वजह भी नहीं दिख रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत 1500 डॉलर प्रति औंस है, विशेषज्ञ मानते हैं कि सोने का आकर्षण ऐसा ही बना रहा तो अगले दो सालों में सोना 2000 डॉलर प्रति औंस के पार भी जा सकता है। (सत्याग्रह)

 


Date : 17-Aug-2019

पाउल याएगर

स्पेस एक्स और गूगल पर भरोसा करें तो इंटरनेट कनेक्टिविटी संबंधी दिक्कत हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी। दोनों धरती के चप्पे-चप्पे को इंटरनेट से जोडऩा चाहती हैं। लेकिन क्या इसके पीछे एकाधिकार और कुटिल कारोबारी हित छुपे हैं?

जब हम ग्लोबल इंटरनेट एक्सेस की बात करते हैं तो हम देखते हैं कि अलग अलग देशों की बीच बहुत अंतर है। 96 फीसदी दक्षिण कोरियाई नियमित रूप से ऑनलाइन रहे हैं, वहीं सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में सिर्फ 5 फीसदी लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। ये स्थिति अजीब लगती है। लेकिन पूरी दुनिया को तारों के सहारे जोडऩा बहुत ही मुश्किल और खर्चीला है। लेकिन एक उपाय है, वायरलेस इंटरनेट, वो भी ऊपर से।
वायरलेस इंटरनेट कैसे काम करता है?
वायरलेस इंटरनेट ऐसे काम करता है- बहुत ही बड़ी रेंज वाला एक बहुत ऊंचा सेल टावर आस पास के कुछ छोटे टावरों को सिग्नल भेजता है। मोबाइल फोन इन्हीं लोवर रेंज टावरों से कनेक्ट होते हैं। अब तक ये बढिय़ा काम कर रहा है। लेकिन जैसे जैसे इन टावरों से दूरी बढ़ती है, कनेक्शन कमजोर होने लगता है। अगर दूर दराज के किसी इलाके में कुछ ही लोग रहें तो टेलिकम्युनिकेशन कंपनी वहां तक कनेक्शन पहुंचाने में पैसा शायद ही खर्चती है। इसीलिए स्पेस एक्स और गूगल जैसी कंपनियां कह रही हैं: दायरे को बढ़ाने के लिए क्यों न ऊपर जाया जाए?
अलग अलग रणनीति
स्पेस एक्स दुनिया को अपने स्टारलिंक  प्रोजेक्ट से जोडऩा चाहती है। यह छोटी सैटेलाइटों का एक सिस्टम है। उपग्रहों का वजन करीब 200 किलोग्राम होगा। स्पेस एक्स के रॉकेट ही इन्हें अंतरिक्ष में 340 से 1150 किलोमीटर की ऊंचाई में छोड़ेंगे। एक बार एक्टिवेट होने के बाद, ये सैटेलाइटें ग्राउंड स्टेशन से सिग्नल रिसीव करेंगी। उन्हीं सिग्नलों को धरती के बड़े इलाके में वापस भेजेंगी। यह दायरा ग्राउंड स्टेशन की क्षमता से कहीं ज्यादा होगा। सैटेलाइटें आपस में कनेक्ट रहेंगी। इससे सिस्टम ज्यादा स्थिर बनेगा और निश्चित रूप से तेज ट्रांसमिशन रेट देगा।
सैटेलाइटों की पहली किस्त आकाश में तैनात हो चुकी है। मई 2019 में स्पेस एक्स ने 60 सैटेलाइट इंस्टॉल कीं। ये उपग्रह पूरे अमेरिका को ध्यान में रखेंगे। पूरे विश्व में यह सेवा फैलाने के लिए स्टार लिंक को करीब 12,000 सैटेलाइटों की जरूरत पड़ेगी। इनकी अनुमानित लागत करीब 10 अरब अमरीकी डॉलर आएगी।
अल्फाबेट, गूगल की यह कंपनी इतना बड़ा इरादा नहीं रखती। कंपनी की इस योजना का नाम है प्रोजेक्ट लून। इसके लिए गुब्बारों (बैलून्स) का एक सिस्टम विकसित किया जा रहा है, इसी वजह से नाम है लून। ट्रांसमीटरों से लैस गुब्बारे पृथ्वी के वायुमंडल की दूसरी परत स्ट्रेटोस्फीयर में जाएंगे और एक दूसरे से कनेक्ट होंगे। करीब 18 किलोमीटर की ऊंचाई पर। यह सिस्टम भी स्पेस एक्स की ही तरह काम करेगा, लेकिन खर्चा काफी कम होगा।
क्या है चुनौतियां?
लेकिन गुब्बारों के साथ एक बड़ी समस्या भी है। वे नष्ट हो सकते हैं और उनकी उम्र भी करीब 200 दिन ही होगी। समयसीमा पूरी होने पर गुब्बारों को नेवीगेट कर चुनिंदा जगहों पर लाया जाएगा, जहां गूगल के कर्मचारी उन्हें बटोरेंगे। स्टारलिंक सिस्टम इसके मुकाबले बहुत ज्यादा टिकाऊ है।
स्ट्रेटोस्फीयर के साथ एक दिक्कत और है। वहां हवा होती है, ऐसे में गुब्बारों का क्या होगा। लेकिन गूगल इस मुश्किल को अवसर में बदलने की तैयारी कर रहा है। मौसम के व्यापक डाटा के जरिए गूगल गुब्बारों को नेवीगेट करने में हवा का सहारा लेना चाहता है। प्रोजेक्ट लून के साथ एक बहुत ही बड़ा फायदा जुड़ा है: यह कनेक्टिविटी बड़ी तेजी से सेट कर सकता है।
सरोकार से जुड़े सवाल
पुएर्तो रिको में 2017 में हरिकेन मारिया आया। इसके बाद लाखों लोग इंटरनेट से कट गए। लेकिन बहुत ही कम समय में गूगल ने बैलून नेटवर्क वहां सेट कर दिया। राहत और बचाव के काम में इससे काफी मदद मिली। लेकिन क्या वाकई हमें इसकी जरूरत है?
इसका जवाब है- हां। दूर दराज के उन इलाकों के लिए जहां अच्छी खासी आबादी है। इंटरनेट के बिना बहुत सारा सामाजिक संवाद संभव नहीं है। इसके अलावा अगर आधुनिक दुनिया में कारोबार करना हो तो इंटरनेट बहुत ही जरूरी है। सप्लाई चेन, लेन देन और कस्टमर केयर, ये सब अब ऑनलाइन होने लगा है। इसीलिए, अगर हम ये चाहते हैं कि दुनिया का


Date : 17-Aug-2019

अभय शर्मा

जम्मू-कश्मीर पर भारत के हालिया फैसले के खिलाफ पाकिस्तान को मुस्लिम देशों से समर्थन मिलने की बड़ी उम्मीद थी लेकिन इनमें से ज्यादातर अब तक तटस्थ ही दिखे हैं

मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के विरोध में पाकिस्तान ने बेहद कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उसने भारतीय उच्चायुक्त को निष्कासित कर दिया है और इसके साथ ही द्विपक्षीय व्यापार को भी निलंबित कर दिया है। इसके अलावा पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस को भी हमेशा के लिए बंद करने का ऐलान किया है। पाकिस्तान ने यह भी कहा है कि वह जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सहित तमाम वैश्विक मंचों पर उठाएगा और कोशिश करेगा कि विश्व समुदाय भारत पर इस निर्णय को वापस लेने का दबाव बनाए।
यह मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक पहुंचा भी। पाकिस्तान के करीबी सहयोगी चीन की वजह से परिषद में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। लेकिन यहां भी पाकिस्तान अलग-अलग नजर आया। चीन के अलावा उसे किसी से समर्थन नहीं मिला। इस बीच पाकिस्तान को मुस्लिम देशों से उम्मीद थी कि वे उसके समर्थन में बयान देंगे। लेकिन इस्लामिक सहयोग संगठन (आईओसी) और ज्यादातर मुस्लिम देशों - यूएई, सऊदी अरब, ईरान, मलेशिया और तुर्की - ने इस मसले पर जो प्रतिक्रिया दी है उससे पाकिस्तान को बड़ा झटका लगा है। ओआईसी और सभी ताकतवर मुस्लिम देशों ने भारत और पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे को द्विपक्षीय बातचीत के जरिए सुलझाने का सुझाव दिया है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने तो कश्मीर को भारत का आंतरिक मुद्दा तक बता दिया है।
मुस्लिम देशों के इस रुख पर पाकिस्तान के ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के कई लोग भी काफी हैरान हैं। सवाल उठता है कि समय-समय पर कश्मीर को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते रहने वाला मुस्लिम जगत आखिर इस समय चुप क्यों है? क्यों संभावना से उलट वह भारत के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहा?
विदेश मामलों के जानकार इसकी कई वजह बताते हैं। ये लोग कहते हैं कि इसकी पहली बड़ी वजह मध्यपूर्व के देशों के भारत के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्ते हैं। भारत की गिनती सऊदी अरब, क़तर, ईरान और यूएई के सबसे बड़े तेल और गैस के खरीदारों में होती है। पिछले कुछ सालों में इन सभी देशों के साथ उसने कई बड़े व्यापारिक समझौते भी किए हैं। भारत इन देशों में बड़ा निवेश कर रहा है और इन देशों की कंपनियां भी भारत में ऐसा ही कर रही हैं। हाल ही में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी कही जाने वाली सऊदी अरब की अरामको ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के तेल और पेट्रोरसायन कारोबार में करीब 15 अरब डॉलर के निवेश का ऐलान किया है।
इसी तरह 2015 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूएई की यात्रा पर गए थे तो दोनों देशों के बीच कई बड़े समझौते हुए थे। आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए यूएई ने भारत में अपने निवेश को आधारभूत संरचना कोष के जरिए 75 अरब डॉलर यानी पांच लाख करोड़ रुपए तक करने की घोषणा की थी। दोनों देशों के बीच तय हुआ था कि वे अगले पांच साल में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाकर लगभग 100 अरब डॉलर तक ले जाएंगे। सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि दोनों के बीच व्यापार लगातार बढ़ा है। वर्तमान में यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार और चौथा सबसे बड़ा तेल-गैस आपूर्तिकर्ता देश है।
मध्यपूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ‘यूएई और सऊदी अरब दोनों भारत में निवेश बढ़ाना चाहते हैं। दोनों मिलकर महाराष्ट्र में एक बड़ी रिफ़ाइनरी भी लगाने वाले हैं। इसमें 50 फीसदी साझेदारी उनकी होगी, बाक़ी आधी साझेदारी ओएनजीसी जैसी भारतीय कंपनियों की होगी। इसके अलावा यूएई की योजना तो भारत के प्राइवेट सेक्टर में भी बड़ा निवेश करने की है।’
पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक हुसैन हक्कानी अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं, ‘अन्य देश अपने हितों के बारे में पहले सोचते हैं, फिर पाकिस्तान के इन देशों से संबंध काफी कमजोर भी हैं। भारत का तुर्की के साथ सालाना व्यापार 8.6 अरब डॉलर का है जबकि पाकिस्तान का व्यापार महज एक अरब डॉलर ही है। इसी तरह मलेशिया के साथ भारत का व्यापार पाकिस्तान से 14 गुना अधिक है।’
विशेषज्ञों के मुताबिक अरब और बाकी बड़े मुस्लिम देश भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को दिन-प्रतिदिन मजबूत बनाना चाहते हैं। उन्हें अंदाजा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में कमी आने के बावजूद यह साढ़े छह से सात फीसदी की दर से आगे बढ़ सकती है और इसका आकार भी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था से नौ गुना है। दूसरी तरफ पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसकी विकास दर 3.5 फीसदी से भी कम है। कुछ जानकार कहते हैं कि भारत जहां अरब देशों में निवेश की बात करता है तो वहीं पाकिस्तान केवल कर्ज लेने के लिए वहां का रुख करता है।
जानकार कश्मीर मसले पर मुस्लिम देशों की चुप्पी के पीछे का एक बड़ा कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इन देशों से बनाए गए नए स्तर के राजनयिक संबंधों को भी मानते हैं। बीते सालों में इजरायल से बेहतर संबंधों की परवाह न करते हुए नरेंद्र मोदी ने न केवल फिलस्तीन, जॉर्डन और ओमान का दौरा किया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में फिलस्तीन के खिलाफ लाए गए प्रस्तावों पर भी खुद को तटस्थ रखा। यहां पर गौर करने वाली बात यह भी है कि नरेंद्र मोदी के रूप में कोई भारतीय प्रधानमंत्री 34 साल बाद यूएई, 58 साल बाद फिलस्तीन, 30 साल बाद जॉर्डन और 10 साल बाद ओमान पहुंचा था।
जानकारों की मानें तो अब मुस्लिम देशों की भारत को लेकर सोच बदली है। उन्हें यह अहसास हुआ है कि भारत से भी उनके बेहद करीबी रिश्ते हो सकते हैं, और इन रिश्तों को केवल पाकिस्तान के चश्मे से ही नहीं देखा जाना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक हाल-फिलहाल में अगर भारत ने हाथ बढ़ाया है तो मध्यपूर्व के देशों ने भी उसे गले लगाया है। कमर आगा कहते हैं, ‘पाकिस्तान की हमेशा ये कोशिश रही कि सऊदी अरब और यूएई कभी भारत के कऱीब न आएं, लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद हमने देखा कि लगभग 50 साल बाद सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस (मोहम्मद बिन सलमान) और फिर यूएई के क्राउन प्रिंस भी भारत आए। यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव है।’
मध्यपूर्व मामलों के कुछ जानकार तो यह भी बताते हैं कि जब से नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तब से मध्यपूर्व के देशों से भारत के कूटनीतिक रिश्तों में एक व्यक्तिगत पहलू भी विकसित हुआ है। कई मौकों पर इन रिश्तों का पता भी चला। 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूएई पहुंचे थे तो वहां के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद और उनके पांचों भाई एयरपोर्ट पर मोदी के स्वागत के लिए आए थे, जो छोटी बात नहीं है। इसके बाद जब यूएई के क्राउन प्रिंस और सऊदी के क्राउन प्रिंस बिन सलमान भारत आए तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें खुद लेने एयरपोर्ट पर पहुंचे थे। विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री को यूएई का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ज़ायेद मेडल’ मिलना बताता है कि भारत को लेकर यूएई का क्या रुख है।
बीते साल जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिलस्तीन सहित कई मुस्लिम देशों की यात्रा पर गए थे, तब भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने एक बयान में कहा था कि प्रधानमंत्री की इस यात्रा को बड़े परिदृश्य में देखने की जरूरत है। मंत्रालय का कहना था कि इस यात्रा का मकसद केवल अंतरराष्ट्रीय एजेंडों की दिशा तय करना ही नहीं बल्कि, घरेलू एजेंडों को पूरा करना भी है। इस हवाले से जानकार कहते हैं कि तब इस बयान का साफ़ मतलब था कि जब भारत कश्मीर जैसे मामलों में कुछ बड़ा करे तो मुस्लिम देश पाकिस्तान के पक्ष में खड़े न हों। अगर देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने इस लक्ष्य में पूरी तरह कामयाब हुए हैं। आज कश्मीर से धारा-370 हट चुकी है और ज्यादातर मुस्लिम देश तटस्थ हैं। (सत्याग्रह)

 

 

 


Date : 16-Aug-2019

हिमांशु शेखर

एक राजनेता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी की कार्यशैली में कई ऐसी विशेषताएं थीं जिनका इस पीढ़ी के नेताओं में अभाव दिखता है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन और कार्यशैली में कई ऐसी बातें रहीं हैं, जिनका इस पीढ़ी के नेताओं में अभाव दिखता है। और यह किसी एक पार्टी की बात नहीं। बहुतों का मानना है कि इस लिहाज से देखा जाए तो राजनीतिक वर्ग की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी को वास्तविक श्रद्धांजलि यही होगी कि उनकी कुछ बातों को वह जीवन में उतारे और भारत की राजनीतिक संस्कृति को समृद्ध करते हुए लोकतंत्र को मजबूत बनाने का काम करे।
सहयोगियों को भी विरोधियों के सम्मान की सीख
इस दौर में विपक्षी नेताओं पर निजी हमले करना बेहद आम हो गया है। यह प्रवृत्ति हर पार्टी के नेताओं में दिखती है। ऐसा करने वालों को अब पार्टी की ओर से रोका भी नहीं जाता। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी का इस मामले में एक अलग मानदंड था।
केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद वाजपेयी सरकार में भी मंत्री थे। उन्हें एक बार कोयला मंत्रालय का भी जिम्मा सौंपा गया था। एक बार रविशंकर प्रसाद ने बिहार जाकर लालू यादव के खिलाफ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। यह बात अटल बिहारी वाजपेयी को ठीक नहीं लगी। उन्होंने रविशंकर प्रसाद को चाय पर बुलाया और पूरी मुलाकात के दौरान कुछ नहीं कहा। परेशान रविशंकर जब जाने लगे तो वाजपेयी बोले, ‘रवि बाबू! अब आप भारत गणराज्य के मंत्री हैं, सिर्फ बिहार गणराज्य के नहीं, इस बात का आपको ध्यान रखना चाहिए।’ यह किस्सा वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी ‘हार नहीं मानूंगा: एक अटल जीवन गाथा।’ में दर्ज किया है।
संघीय ढांचे का सम्मान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहयोगात्मक संघीय ढांचे और टीम इंडिया की बातें तो करते हैं, लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार है, उन राज्यों में से कई मुख्यमंत्रियों ने यह आरोप लगाए हैं कि केंद्र सरकार संघीय ढांचे की भावना का सम्मान नहीं कर रही। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक कई मुख्यमंत्री इस तरह के आरोप केंद्र सरकार पर अक्सर लगाते रहते हैं। मनमोहन सिंह सरकार पर भी ऐसे आरोप लगते थे। उनके कार्यकाल में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता इस बारे में बेहद मुखर थीं।
अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ी एक घटना से इस पीढ़ी के नेता संघीय ढांचे के बारे में काफी कुछ सीख सकते हैं। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। सूबे के राज्यपाल से उन्हें कुछ दिक्कत हो रही थी। उन्होंने यह बात प्रधानमंत्री वाजपेयी को बताई। प्रधानमंत्री ने राज्यपाल को हिदायत दी कि वे चुनी हुई सरकार के कामकाज में दखल न दें। लेकिन इस दौर में ऐसा नहीं हो रहा है। अब तो उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में दखल देना पड़ रहा है। कुछ समय पहले दिल्ली में चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल के टकराव में देश की सबसे बड़ी अदालत को दखल देना पड़ा जबकि कायदे से यह विवाद राजनीतिक दखल से सुलझना चाहिए था।
दूसरी घटना भी मध्य प्रदेश से ही जुड़ी हुई है। 2002-03 में मध्य प्रदेश में सूखा पड़ा था। दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार के 10 साल पूरे होने वाले थे और कुछ महीनों बाद चुनाव होने वाले थे। भाजपा हरसंभव कोशिश कर रही थी कि अगले चुनाव में उसकी सरकार बन जाए। सूखा राहत के लिए केंद्र सरकार को भारी रकम जारी करनी थी। बताया जाता है कि इसी बीच मध्य प्रदेश से भाजपा के कई नेता प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिले और उनसे आग्रह किया कि वे पैसा जारी न करें, क्योंकि पैसा केंद्र देगा और इसका फायदा चुनावों में राज्य सरकार को मिलेगा।
विजय त्रिवेदी लिखते हैं कि यह सुनते ही वाजपेयी नाराज हो गए। उन्होंने कहा, ‘आप लोगों ने इस तरह की बात सोच कैसे ली? दिग्विजय सिंह अभी चुने हुए मुख्यमंत्री हैं और सूखा राहत का पैसा राज्य का अधिकार है तो उसे कैसे रोका जा सकता है? मैं पैसा जारी करूंगा और चुनाव कैसे लडऩा है, यह आप लोग देखिए।’
अपने पूर्ववर्तियों का सम्मान
आम तौर पर अब ऐसा होता है कि कोई भी नेता सत्ता में आता है तो वह और उसके सहयोगी पहले से सत्ता में रहे लोगों पर निशाना साधने लगते हैं। मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में भी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में काफी कुछ कहा जाता रहा है। अपने पूर्ववर्तियों का सम्मान कैसे करते हैं, यह मौजूदा पीढ़ी के नेताओं को वाजपेयी से सीखना चाहिए।
अटल बिहारी वाजपेयी 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री बनाए गए थे। उस समय की एक घटना का भी उनकी जीवनी में उल्लेख है। वाजपेयी जब पहले दिन अपने दफ्तर गए तो दीवारों पर नजर पड़ते ही लगा कि कुछ गायब है। वाजपेयी ने अपने सचिव से कहा, ‘यहां तो पंडित जी की फोटो लगी होती थी। पहले कई बार मैं इस दफ्तर में आया हूं, तब होती थी। अब कहां गई? उसे फिर से लगाइए।’ अफसरों को लगा था कि नए विदेश मंत्री को नेहरू की तस्वीर देखकर अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नेहरू पसंद नहीं थे। वाजपेयी भी नेहरू की नीतियों की आलोचना करते थे। लेकिन फिर भी अटल बिहारी वाजपेयी को यह ठीक नहीं लगा कि नेहरू की फोटो विदेश मंत्रालय से हटा दी जाए।
जोड़-तोड़ की राजनीति से तौबा
जोड़-तोड़ की राजनीति इस दौर की सियासत का एक कड़वा सच बन गई है। सत्ताधारी भाजपा इसमें सबसे आगे भले ही दिखती हो, लेकिन कोई भी ऐसा दल नहीं है जो इस तरह की राजनीति में शामिल न हो। जिसे जहां मौका मिलता है, वहां वह सरकार बनाने और सरकार बचाने के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति में शामिल हो जाता है।
इस बारे में भी अटल बिहारी वाजपेयी इस पीढ़ी के नेताओं को राह दिखा सकते हैं। जब जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ तो पार्टी के पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने। अपने पहले भाषण में उन्होंने कहा था, ‘भाजपा अध्यक्ष का पद अलंकार का विषय नहीं है। यह पद नहीं, दायित्व है, प्रतिष्ठा नहीं, परीक्षा है। हम राजनीति को मूल्यों पर आधारित करना चाहते हैं। इसे सिर्फ कुर्सी का खेल नहीं रखना चाहते।’ 
उन्होंने आगे कहा, ‘अब शिखर की राजनीति के दिन लद गए। जोड़-तोड़ की राजनीति का कोई भविष्य नहीं है। पैसा और प्रतिष्ठा के लिए पागल होने वालों के लिए जगह नहीं है। जिनमें आत्मसम्मान का अभाव हो, दिल्ली के दरबार में मुजरे झाडऩे वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं है।’ तेजी से रंग बदलनेवाली राजनीति की दुनिया में वही कह सकते थे कि ‘पार्टी तोडक़र सत्ता के लिए नया गठबंधन करके अगर सत्ता हाथ में आती है तो ऐसी सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा।’
खुद से ऊपर पार्टी
भाजपा और कांग्रेस समेत अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों में व्यक्ति पूजा स्पष्ट तौर पर दिखती है। इनमें एक नेता को दल से भी ऊपर समझा जाता है। इससे इन पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का स्पष्ट अभाव दिखता है। इस विषय पर भी इन दलों के नेता अटल बिहारी वाजपेयी से काफी कुछ सीख सकते हैं।
पहली घटना है लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा से जुड़ी है। वाजपेयी ने इस रथयात्रा का यह कहते हुए विरोध किया था कि राजनेताओं को धार्मिक मसलों में दखल नहीं देना चाहिए। लेकिन जब पार्टी इस यात्रा के पक्ष में दिखी तो उन्होंने पार्टी के फैसले को मानते हुए आडवाणी की यात्रा को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हरी झंडी दिखाई।
जब संसदीय दल की बैठक होती थी और संसद के अंदर पार्टी की रणनीति के तहत यह तय होता था कि किसी मसले पर सदन के वेल में जाना है तो अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर इससे असहमत रहते थे। वे कहते थे कि कुएं में कूदने की क्या जरूरत है? चर्चा कीजिए, बोलना सीखिये, इसका अभ्यास कीजिए। लेकिन यदि पार्टी में सबकी राय सदन की कार्यवाही में बाधा डालने या वेल में जाने की होती तो फिर वाजपेयी मान भी जाते थे और कहते थे कि जरूरी है तो कूदिए, कुएं में कूदिए।
गुजरात दंगों के बाद मुख्यमंत्री पद से नरेंद्र मोदी के इस्तीफे के मसले पर भी ऐसा ही हुआ। वाजपेयी मोदी का इस्तीफा लेना चाहते थे, लेकिन आडवाणी इसके पक्ष में नहीं थे। आडवाणी की राय के साथ पार्टी का बड़ा वर्ग खड़ा होते हुए उन्हें दिखा। अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बार भी पार्टी की बात मान ली। (सत्याग्रह)

 


Date : 16-Aug-2019

समीरात्मज मिश्र

साल 2017 में भीड़ ने गाय की तस्करी के शक में पहलू खान की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। कोर्ट ने इस मामले में संदेह का लाभ देते हुए सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है। इस मामले में कुल आठ अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया था जिनमें से दो नाबालिग हैं। इन दोनों की सुनवाई किशोर न्यायालय में चल रही है।
हालांकि सरकारी वकील का कहना है कि वो इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे जबकि बचाव पक्ष ने अदालत के फैसले को ऐतिहासिक बताया है। अभियुक्तों को सजा न दिला पाने के पीछे मुख्य वजह ये रही कि एक तो सरकारी पक्ष अदालत में सबूतों को साबित करने में नाकाम रहा, दूसरी ओर कुछ गवाह भी पलट गए।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस मामले में घटना के वीडियो साक्ष्य रहे हों, पीडि़त ने मरने से पहले खुद बयान दिया हो, सैकड़ों लोग उस घटना के गवाह रहे हों उस घटना को सही साबित करने में सरकारी वकीलों के साक्ष्य कैसे कम पड़ गए और उनकी दलीलें कैसे कमजोर रह गईं? जांच प्रक्रिया पर तो सवाल उठते ही हैं।
हिंदू धर्म में गाय का वध एक वर्जित विषय है। गाय को पारंपरिक रूप से पवित्र माना जाता है। गाय का वध भारत के अधिकांश राज्यों में प्रतिबंधित है उसके मांस के सेवन की भी मनाही है लेकिन यह राज्य सूची का विषय है और पशुधन पर नियम-कानून बनाने का अधिकार राज्यों के पास है।
सरकारी वकील का कहना है कि उन्हें जो भी साक्ष्य पुलिस से मिले, उनके आधार पर पीडि़त को न्याय दिलाने की पूरी कोशिश की गई लेकिन अदालत ने उनकी दलीलें नहीं मानीं। लेकिन कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की दलीलों को कमजोर समझा और साक्ष्य पर्याप्त नहीं रहे तो उसके पीछे कई कारण थे। मसलन, कोर्ट ने घटनास्थल के वीडियो को एडमिसेबल सबूत नहीं माना है क्योंकि वीडियो की फोरेंसिक जांच नहीं कराई गई थी। इसके अलावा पुलिस अदालत को इस बारे में भी संतुष्ट नहीं कर सकी कि वीडियो किसने बनाया था और वो पुलिस को कैसे मिला था।
दो साल पहले हरियाणा के मेवात जिले के रहने वाले पहलू खान जयपुर से दो गाय खरीद कर वापस अपने घर जा रहे थे। शाम करीब सात बजे बहरोड़ पुलिया से आगे निकलने पर भीड़ ने उनकी गाड़ी को रुकवाया और उनके साथ मारपीट की। इस दौरान पहलू खान के बेटे भी उनके साथ थे। इलाज के दौरान पहलू खान की अस्पताल में मौत हो गई।
इस मामले में दो सौ से ज्यादा लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी लेकिन राज्य पुलिस की क्राइम ब्रांच ने आरंभिक जांच के बाद सभी को क्लीन चिट दे दी और सिर्फ छह लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद ये सभी जुलाई से सितंबर 2017 के बीच जमानत पर रिहा हो गए।
इस मामले में नया मोड़ तब आया जब अदालत में सुनवाई के दौरान ही राजस्थान पुलिस ने कहा कि वो पहलू खान और उनके बेटों के खिलाफ गो तस्करी के मामले में केस दर्ज करके इसकी दोबारा जांच करेगी।
दरअसल, पुलिस ने इस मामले में दो एफआईआर दर्ज की थी। एक एफआईआर पहलू खान की हत्या के मामले में आठ लोगों के खिलाफ और दूसरी बिना कलेक्टर की अनुमति के मवेशी ले जाने पर पहलू और उनके दो बेटों के खिलाफ। दूसरे मामले में पहलू खान और उनके दो बेटों के खिलाफ इसी साल चार्जशीट दाखिल की गई है। पहलू खान के दोनों बेटे इस मामले में जमानत पर हैं।
देखा जाए तो घटना की एफआईआर में ही फैसले की पटकथा लिख दी गई थी। अपनी मौत से पहले पहलू खान ने साफ तौर पर छह लोगों की पहचान हमलावरों के रूप में की थी। लेकिन जो एफआईआर पुलिस ने दर्ज की उसमें इन छह में से किसी का भी नाम नहीं डाला। इसके अलावा पुलिस की जांच में ये बात भी आई कि जिस वक्त ये घटना हुई, उनमें से कोई भी व्यक्ति वहां मौजूद नहीं था।
कथित गोरक्षकों के हाथों पहलू खान की हत्या की घटना ने देश भर में राजनीतिक हलचल पैदा की। इस दौरान देश के अन्य हिस्सों से भी ऐसी खबरें आईं। ये घटना जब हुई उस समय राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी। जाहिर है, विवेचना पुलिस करती है और पुलिस राज्य सरकार के अधीन रहती है। अभियोजन पक्ष भी उन्हीं साक्ष्यों पर निर्भर रहता है जो पुलिस अपनी विवेचना के दौरान उसे मुहैया कराती है।
कांग्रेस पार्टी ने उस समय घटना को लेकर राज्य सरकार को जमकर घेरा था। हालांकि यह भी संयोग ही है कि इस साल जब पहलू खान और उनके बेटों के खिलाफ गो तस्करी के मामले में पुलिस ने चार्ज शीट लगाई तो खुद अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार घिरी नजर आई। हालांकि अशोक गहलोत ने तब दलील दी थी कि पुलिस ने जो जांच की थी वो पहले की है।
अलवर की जिला अदालत के इस फैसले के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कि उनकी सरकार भीड़ हत्या यानी मॉब लिंचिंग के शिकार हुए पहलू खान के परिवार वालों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है और राज्य सरकार इस मामले में निचली अदालत के फैसले को चुनौती देगी।
सरकार भले ही इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे लेकिन जिन गवाहों, सबूतों और साक्ष्यों के आधार पर अदालतें फैसले देती हैं, उनमें किसी तरह के बदलाव की संभावना ना के बराबर है। ऐसी स्थिति में इस बात का पता शायद ही चल सके कि आखिर पहलू खान की हत्या किसने की?
राजस्थान के अलवर में गौरक्षकों की पिटाई से एक व्यक्ति की मौत होने का मुद्दा जहां हर तरफ छाया हुआ है, वहीं केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी का कहना है कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं है।  अमेरिका ने भारत पर आरोप लगाया है कि वह बीफ खाने के संदेह में मुसलमानों पर हमला करने वाले गोरक्षकों पर कोई कदम नहीं उठा रहा है, जबकि धार्मिक भावना से प्रेरित होकर की गई ऐसी सैकड़ों हत्याओं की खबरें सामने आई हैं।  अल्पसंख्यकों पर हमला करने वाले गौरक्षकों को बचाता रहा प्रशासन मानवाधिकारों पर काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि भारत में प्रशासन और पुलिस अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले स्वघोषित गौरक्षक समूहों को कानून से बचाती रही है। राजस्थान के अलवर जिले में जिस मुस्लिम व्यक्ति की गौरक्षकों ने पिटाई की थी उसकी इलाज के दौरान मौत हो गई है। बीते सप्ताह अलवर के राजमार्ग पर गाय ले जा रहे 15 मुस्लिम लोगों के समूहों पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया था। 
भारत में गौहत्या को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। हाल में राजस्थान में तथाकथित गौरक्षकों द्वारा एक व्यक्ति को इतना पीटा गया कि उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। डालते हैं एक नजर इसके संवैधानिक प्रावधान पर। बनारस एयरपोर्ट से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर बसा रामेश्वर गांव आजकल चर्चा में है। वैसे तो गाय की वजह से भारत में तमाम विवाद हो रहे हैं लेकिन रामेश्वर गांव काउ टूरिज्म के लिए मशहूर हो रहा है।  (डॉयचेवेले)

 


Date : 13-Aug-2019

विशाल जायसवाल

दिसंबर 2017 में राहुल गांधी के लिए अध्यक्ष पद छोडऩे वाली सोनिया गांधी की मात्र 20 महीने बाद एक बार फिर से अध्यक्ष पद पर वापसी हुई है। बीते हफ्ते हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में उन्हें अंतरिम अध्यक्ष बनाने का फैसला लिया गया।
 
राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे के तीन महीने बाद भी जब कांग्रेस पार्टी में गैर-गांधी परिवार के किसी सदस्य को अध्यक्ष बनाने पर सहमति नहीं बनी तो बीते हफ्ते सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाने का फैसला लिया गया।
गांधी के इस्तीफे के बाद से अगले अध्यक्ष के चुनाव को लेकर पार्टी में लगातार असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। इसको लेकर बीते शनिवार को कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में दिन भर चली गहन चर्चा के बाद यह फैसला लिया गया।
बीते शनिवार को कांग्रेस की शीर्ष समिति की बैठक दो बार हुई। इसमें पार्टी संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, राहुल गांधी, महासचिव प्रियंका गांधी, वरिष्ठ अहमद पटेल, एके एंटनी, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खडग़े, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कई अन्य नेता शामिल हुए।
सुबह हुई पहली बैठक में नेताओं के पांच समूह बनाए गए थे, जिन्होंने देशभर के कांग्रेस नेताओं की राय ली। जिसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के अलावा राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता भी मौजूद थे। इन्होंने अपनी रिपोर्ट सीडब्ल्यूसी को सौंप दी। शाम को जब पार्टी की दूसरी बैठक हुई तो राहुल गांधी ने साफ तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालने से इनकार कर दिया। इसके बाद पार्टी नेताओं ने प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग उठाई। लेकिन इस पर भी सहमति नहीं बन पाई।
इसके बाद पार्टी नेताओं ने कहा कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी मिलकर पार्टी अध्यक्ष चुनें। लेकिन उन्होंने भी मना कर दिया। इसके बाद पार्टी नेताओं ने सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाने की मांग उठाई। इसके बाद कार्यसमिति ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष का पद संभालें, जब तक पूर्ण कालिक अध्यक्ष के लिए नियमित चुनाव नहीं हो जाता है। उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
दिसंबर 2017 में स्वेच्छा से अध्यक्ष पद छोडऩे के मात्र 20 महीने बाद सोनिया गांधी के एक बार फिर अध्यक्ष बनने से पता चलता है कि 134 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी अब तक के अपने सबसे गहरे संकटों में से एक से जूझ रही है।
सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष के रूप में चुने जाने पर वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, ‘उन्हें अध्यक्ष के रूप में चुनना पार्टी का एक अंदरूनी मामला था। पार्टी ने अपना विवेक इस्तेमाल किया। राजनीतिक नेतृत्व नेहरु-गांधी परिवार के हाथ में है और रहेगा। मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि उन्होंने सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया है।’
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे कहते हैं, ‘नेतृत्व के सवाल पर कांग्रेस एक गतिरोध पर फंसी हुई है। उन्होंने इसका एक तरीका निकाला है, इसके अलावा और भी विकल्प हो सकते थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने वे तरीके क्यों नहीं इस्तेमाल किए ये बहुत ताज्जुब की बात है।’
वे कहते हैं, ‘सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने का मतलब है कि पीछे की ओर लौटना। उनका स्वास्थ्य खराब है, वह बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं हो पाती हैं। इस बार चुनाव अभियान में भी उन्होंने उस तरह से खुल कर हिस्सा नहीं लिया जिस तरह से वह लेती थीं। उनको अध्यक्ष बनाना एक बीच की व्यवस्था है।’
बता दें कि, सोनिया गांधी ने अगस्त 2011 में अपनी बीमारी के लिए अमेरिका में सर्जरी कराई थी। इसके बाद से वह अक्सर अपनी जांच के लिए वहां जाती रहती हैं। इस साल जनवरी में स्वास्थ कारणों से ही उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली का दौरा रद्द करना पड़ा था।
वहीं, नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘कांग्रेस की दृष्टि से अंतरिम रूप में वह इस समय सबसे अच्छा चुनाव हैं। वह पार्टी के सभी समूह में स्वीकार्य हैं। यह पुराने और नए नेताओं में समन्वय नहीं होने का नतीजा है। मुकुल वासनिक का नाम पुराने नेताओं की ओर से आया था, लेकिन युवाओं को वह मंजूर नहीं था।’
वे कहती हैं, ‘राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद पार्टी एकदम दिशाहीन हो गई थी। अनुच्छेद 370 पर सभी को पता था कि कुछ होने वाला है लेकिन पार्टी ने तब जाकर अपना रुख साफ किया जब उसके कई नेता पार्टी लाइन से हटने लगे। ऐसी दिशाहिनता कभी नहीं दिखी है। ऐसे समय में यह जरुरी था कि कोई नेतृत्व करे तो सोनिया गांधी सबसे सही चेहरा हैं।’
राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद और सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाए जाने से पहले पार्टी के अंदर और बाहर नए और पूर्ण कालिक अध्यक्ष के रूप में लगातार कई नाम चल रहे थे। इन नामों में पार्टी के खास और पुराने नेताओं के साथ युवा नेता भी शामिल थे।
पुराने नेताओं में जहां मुकुल वासनिक का नाम सबसे आगे चल रहा था, वहीं पर मल्लिकार्जुन खडग़े, अशोक गहलोत, सुशील कुमार शिंदे सहित कई अन्य वरिष्ठ नेताओं के नामों की चर्चा थी।
दुबे कहते हैं, ‘गांधी परिवार अगर चाहेगा तो एक दिन में किसी गैर गांधी व्यक्ति को अध्यक्ष बना सकता है। मुकुल वासनिक का नाम चल रहा था और हम लोगों को एक दिन पहले तक यकीन था कि उन्हें अध्यक्ष बना दिया जाएगा। इसका मतलब है कि गांधी परिवार ही किसी को अध्यक्ष नहीं बनाना चाहता है। अगर तीनों गांधी किसी गैर-गांधी को अध्यक्ष बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं तो उन्हें रोकने वाला कौन है?’
किदवई कहते हैं, ‘मीडिया में कोई भ्रांति रही हो तो अलग बात है लेकिन कांग्रेसजन में यह बात साफ है कि उनके लिए नेहरु-गांधी परिवार का कोई विकल्प नहीं है।’
वे कहते हैं, ‘लोकसभा में जब अधीर रंजन चौधरी को नेता बनाया गया तब शशि थरूर और मनीष तिवारी चुनाव नहीं लड़े, इससे पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं में महत्वाकांक्षा ही खत्म हो गई है, तो उसमें सोनिया गांधी क्या करेंगी।’ पार्टी के वृद्ध नेताओं के अलावा कई युवा नेताओं के नामों पर भी जोर-शोर से चर्चा चल रही थी। इसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा का नाम सबसे आगे चल रहा था।
किदवई कहते हैं, ‘2019 के चुनाव में पार्टी के नए और पुराने दोनों ही नेता बुरी तरह चुनाव हारे। राजस्थान में अशोक गहलोत का बेटा हारा, सचिन पायलट ने जितने भी लोगों को समर्थन दिया सब धरासाई हो गए, सिंधिया खुद हार गए, कमलनाथ का बेटा जीता लेकिन कांग्रेस मध्य प्रदेश में तमाम सीटें हार गई।’ पार्टी में नए और पुराने नेताओं में मतभेद पर दुबे कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी में ओल्ड गार्ड और न्यू गार्ड की जो भी लड़ाई है वो गांधी परिवार के वफादारों की लड़ाई है। 

अब इसी चक्कर में हो यह गया है कि गांधी परिवार में मतभेद पैदा हो गया है। पार्टी में लंबे समय से प्रियंका गांधी को नेतृत्व दिए जाने की मांग की जाती रही है। शनिवार को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक के दौरान पार्टी के ही एक नेता जगदीश शर्मा अपने 10-20 कार्यकर्ताओं के साथ प्रियंका गांधी वाड्रा को अध्यक्ष बनाने की मांग कर रहे थे।
हालांकि, अपने इस्तीफे के दौरान ही राहुल गांधी ने साफ कर दिया था कि न तो वह और न ही गांधी परिवार का कोई दूसरा सदस्य इस जिम्मेदारी को संभालेगा। इससे प्रियंका गांधी को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपे जाने की संभावनाओं पर विराम लग गया।
दुबे कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि यह संकट गांधी परिवार के भीतर का संकट है। गांधी परिवार में एकता नहीं रह गई है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी में जैसे पहले यूनाइटेड फ्रंट होता था, अब वैसा नहीं रह गया है।’ वे कहते हैं, ‘राहुल गांधी ने खुद को एक कदम पीछे खींचा क्योंकि उन्हें लगता है कि जो पारिवारिक समर्थन मिलना चाहिए था, वो पारिवारिक समर्थन उन्हें नहीं मिला। वो तीन राज्यों के मुख्यमंत्री अपने मन के बनाना चाहते थे, लेकिन नहीं बना पाए। बाद में उन्होंने इस्तीफा दिया तो तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वे इस्तीफा चाहते थे तो उनसे इस्तीफा भी नहीं ले पाए। उनका इस्तीफा दिलवाने में उनकी मां और बहन ने मदद भी नहीं की।’
वे कहते हैं, ‘यही कारण था कि जाते-जाते वे कह गए कि किसी गैर-गांधी को अध्यक्ष बनाया जाए। इससे पूरा मामला गड़बड़ हो गया वरना बड़ी आसानी से प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाया जा सकता था। उसी चीज को दोबारा करने के लिए सोनिया गांधी बीच में आई हैं और कुछ दिनों बाद प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बना दिया जाएगा।’
शनिवार को हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक के दौरान नए अध्यक्ष के चुनाव को अपने प्रभाव से बचाने और लोकतांत्रिक दिखाने के लिए सोनिया और राहुल गांधी ने खुद को इस पूरी प्रक्रिया से अलग कर लिया था। कांग्रेस की शीर्ष समिति ने अध्यक्ष के चुनाव को लेकर क्षेत्रीय नेताओं की राय जानने के लिए पांच समूह बनाए थे। हर समूह एक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहा था, जिसमें पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और पूर्वोत्तर शामिल थे।
किदवई कहते हैं, ‘कांग्रेस कार्य समिति की कार्यवाही औपचारिकता थी या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि आप उसे किस चश्मे से देख रहे हैं।’ भाजपा का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, ‘भाजपा की एक राजनीतिक सोच है। वहां एक संघ परिवार है। 2013 में जिन हालात में चुनाव हुआ। वहां तो कोई मतगणना की नहीं गई थी। लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज जैसे नेताओं के रहने के बावजूद नरेंद्र मोदी को चुना गया था। 
मोदी ने अमित शाह को अध्यक्ष चुना। उसके लिए भी न कोई चुनाव हुआ और न किसी किस्म की कोई प्रक्रिया हुई। कांग्रेस ने तो 400 लोगों का परामर्श लिया, लेकिन वहां कितने लोगों से परामर्श लिया गया था।’ वहीं, अन्य राजनीतिक दलों का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, ‘समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव अध्यक्ष बन गए, मायावती तो पूरी जिंदगी अध्यक्ष रहने वाली हैं। वामपंथियों में भी पोलित ब्यूरो के लिए कोई चुनाव नहीं होता है।’
वे कहते हैं, ‘तमाम भारतीय राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र कहीं भी नहीं है। इसलिए कांग्रेस को एक हास्य का पात्र बनाना एक अभिजात्य सोच है।’ वे कहते हैं, ‘एक बात तो तय है कि गांधी परिवार के साथ या तो कांग्रेस का पतन होगा या फिर दोबारा वापसी होगी। कांग्रेस वालों ने तय कर लिया है कि इसके अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है।’
चौधरी कहती हैं, ‘कांग्रेस कार्य समिति में कोई और नाम नहीं लिया गया। उसमें केवल राहुल गांधी से इस्तीफा वापस लेने को कहा गया जो कि गैरजरुरी था। अगर राहुल गांधी के नेतृत्व के बाद किसी को भी अध्यक्ष बना दिया जाता तो राहुल के कदम का बड़ा असर देखने को मिल सकता था। उन्होंने एक नैतिक तरीका अपनाया था, जैसा कि नेता कम करते हैं।’ दुबे कहते हैं, ‘सोनिया गांधी पहले भी कांग्रेस को संकट से निकाल चुकी हैं, दो-दो बार चुनाव भी जीतवा चुकी हैं। वो होशियार महिला हैं, शांत होकर फैसले लेती हैं। वो अंदरूनी और बाहरी दोनों राजनीति से अच्छी तरह से बाकिफ हैं। उनके आने से कांग्रेस पार्टी में एक बार फिर से सुसंगति और एकता कायम हो जाएगी।’
1997 में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्य बनने वालीं सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाली नेता हैं। वह 1998 से 2017 तक 19 साल तक लगातार अध्यक्ष रह चुकी हैं। बता दें कि 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद 1998 में सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली थी। इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए उन्होंने चुनाव पूर्व गठबंधन बनाकर एक सफल प्रयोग किया था और भाजपा के इंडिया शाइनिंग के नारे को धूमिल कर दिया था।
फिर 2009 में वे भाजपा के लौह पुरुष कहे जाने वाले फायरब्रांड नेता लालकृष्ण आडवाणी के मजबूत नेतृव और कट्टर हिंदुत्ववादी एजेंडे को हराने में सफल हुईं। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में जब गठबंधन में दरार आ गई तब उन्होंने उसे भी बड़े ही साहस के साथ संभाला था।
2003 में जब राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी का हिस्सा बने तो परिवारवाद की राजनीति से इतर जाते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ देश की जनता में एक युवा और उभरते हुए नेता छवि दिखी। 2004 के लोकसभा चुनाव में वे गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। 2007 में पार्टी महासचिव बनाए जाने के बाद राहुल गांधी ने पार्टी के पुराने ढर्रे से अलग हटकर काम किया और युवाओं को आगे लाने का प्रयास करते रहे। इसके बाद जनवरी 2013 में जयपुर में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था।
ऐसा माना जा रहा था कि 2014 के लोकसभा चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं की लंबे समय की मांग को मूर्त रुप देते हुए उन्हें प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। हालांकि, 2014 में कांग्रेस पार्टी को लोकसभा चुनावों में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा और वह मात्र 44 सीटों पर सिमट गई।
दिसंबर 2017 में आखिरकार स्वास्थ कारणों का हवाला देते हुए सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया और राहुल गांधी की ताजपोशी कर दी गई। इसके बाद दिसंबर 2018 में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा का गढ़ माने जाने वाले राज्यों में जीत दर्ज की।
हालांकि, लोकसभा चुनाव 2019 में जहां कांग्रेस पार्टी को एक बार फिर से बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा तो वहीं राहुल गांधी परंपरागत अमेठी सीट से भी चुनाव हार गए। दो जगहों से चुनाव लडऩे वाले राहुल केरल की वायनाड सीट से सांसद चुने गए। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद 25 मई को हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में राहुल गांधी ने जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी थी। हालांकि, इस दौरान उन्होंने साफ कर दिया कि वे कांग्रेस पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाते रहेंगे। (द वायर)
 

Date : 13-Aug-2019

अरविंद कुमार

कांग्रेस ने अस्सी-नब्बे के दशक वाली ग़लती इस बार फिर से दोहरा दी। जाहिर है एक बार फिर उसे इसका परिणाम भुगतान पड़ेगा।

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद-370 में बदलाव के लिए उठाए गए क़दम पर कांग्रेस पार्टी जिस तरह से दिशाहीन नजऱ आई, उससे लगता है कि उसे इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। संसद के दोनों सदनों-राज्यसभा और लोकसभा में कांग्रेस जिस तरह भ्रमित नजर आई और उसके नेता जिस तरह अलग-अलग बयान देते नजर आए, उसका आकलन करने की कोशिश इस लेख में की जाएगी। साथ ही ये भी जानने की कोशिश की जाएगी कि कांग्रेस की भविष्य की संभावनाओं पर इसका क्या असर हो सकता है।
कांग्रेस की दिशाहीनता के सबूत
कश्मीर पर कांग्रेस की दिशाहीनता का नज़ारा सबसे पहले राज्यसभा में दिखा, जहां पार्टी के चीफ़ ह्विप-भुवनेश्वर कालिता ने सांसदों को ह्विप जारी करने से माना करते हुए राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। कलिता ने कश्मीर मामले पर पार्टी के स्टैंड को जन भावना के विरुद्ध बताया। कलिता के अलावा जनार्दन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, अदिति सिंह आदि ने भी पार्टी लाइन से हटकर कश्मीर मुद्दे पर मोदी सरकार के फैसले से सहमति दर्ज करायी। इससे ऐसा संदेश गया कि कांग्रेस के युवा नेतृत्व का एक हिस्सा जन भावना के साथ खड़ा है, वहीं पुराना नेतृत्व अपना रवैया बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसी ही स्थिति पार्टी द्वारा जल्दबाज़ी में बुलायी गयी कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में भी दिखी, जहां युवा नेतृत्व जन भावना का हवाला देकर सरकार के फैसला साथ खड़ा हुआ, तो पुराने नेता विरोध में रहे।
इस पूरे मामले में राहुल गांधी की भूमिका अजीब रही। पहले तो वो पूरे मामले पर चुप्पी साधे रहे, लेकिन युवा नेताओं के एक-एक करके पार्टी के स्टैंड के खिलाफ जाने पर ट्वीट करके पार्टी का स्टैंड क्लीयर करने की कोशिश की, लेकिन जब वे लोकसभा में पहुंचे तो उन्होंने इस मामले पर न बोलने का फ़ैसला किया। विदित हो कि लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कश्मीर पर जो कुछ बोला (वे लगभग ये बोल गए कि कश्मीर अंतरराष्ट्रीय मसला है)। वह यह दिखाता है कि इस मामले पर कांग्रेस ने किस तरीक़े से अपना होम वर्क नहीं किया था। राहुल गांधी लोकसभा में बोलकर अधीर रंजन चौधरी की ग़लती सुधार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। आने वाले समय में अधीर रंजन चौधरी की ग़लती की क़ीमत कांग्रेस को बार-बार चुकानी पड़ सकती है। इन सब के अलावा राहुल गांधी ने पार्टी की वर्किंग कमेटी की मीटिंग में वरिष्ठ नेताओं का साथ दिया, जिससे पता चलता है कि वो किस तरह से सिंडिकेट से घिरे हुए हैं।
कांग्रेस को संभावित नुकसान
जनसंघ के दिनों से ही बीजेपी वाली राजनीतिक धारा कांग्रेस को कश्मीर समस्या का असली दोषी बताती रही है। इस बार भी सदन में जिस तरीक़े से बहस हुई, उसमें इस समस्या का पूरा दोष कांग्रेस और ख़ासकर पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के माथे फोडऩे की कोशिश की गयी। बीजेपी और उससे जुड़े संगठन इस तरह की बात जन मानस में कई दशकों से प्रचारित कर रहे हैं। कांग्रेस ने कभी भी अपनी तरफ़ से इस तरह की सूचना/अप्रचार का जवाब देने की कोशिश नहीं की, जिसकी वजह से जनमानस में कश्मीर समस्या की एक उथली-सी समझ बन चुकी है। इसका वे जादुई समाधान चाहते हैं। मोदी सरकार ने जिस त्वरित गति से इस मामले पर निर्णय लिया है, वह जादुई समाधान जैसा दिखता है, जिसकी वजह से आम जनमानस में बीजेपी ने काफी समर्थन बटोरा। इस मामले पर कांग्रेस के रुख पर लोगों की जो प्रतिक्रिया आयी है, उससे पता चलता है कि यह पार्टी ज़मीन पर लोगों से कितना कट चुकी है।
कांग्रेस पर इतिहास का बोझ
जनमानस में जम्मू-कश्मीर की छवि ऐसी बना दी गई है जैसे कि वह एक मुस्लिम राज्य हो, जबकि सच्चाई यह है कि यह राज्य तीन क्षेत्रों से मिलकर बना था- जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख। जम्मू जहां हिंदू बहुल क्षेत्र है, तो कश्मीर में मुसलमान और लद्दाख में बौद्ध ज्यादा हैं। इन सब के बावजूद यह धारणा काफी लोकप्रिय है कि जम्मू-कश्मीर मुसलमान बहुल राज्य था। इसलिए कांग्रेस के इस राज्य की जनता के पक्ष में उठाए गए क़दमों को मुसलमानों के पक्ष में उठाया गया क़दम बता कर प्रचारित करना आसान हो गया था।
कश्मीर के बहाने कांग्रेस पर मुस्लिम परस्ती का आरोप वहां से पंडितों के पलायन की वजह से और भी जुड़ गया। वीपी सिंह के शासन काल में जगमोहन के राज्यपाल रहने के दौरान पंडितों का ज्यादा पलायन हुआ। उसके बाद आई कांग्रेस की सरकार ने स्थिति को सुधारने के लिए कुछ ऐसा ठोस नहीं किया, जिससे ये धारणा बनती की कांग्रेस को कश्मीरी पंडितों की परवाह है। उसी दौर में कांग्रेस ने शाहबानों के फैसले को बदलने के लिए संसद से कानून बनवा दिया था, जिससे कांग्रेस के सवर्ण वोटरों में यह संदेश गया कि कांग्रेस मुसलमानों के दबाव में है और सवर्णों के हित में वह कोई भी फैसला नहीं ले सकती। कश्मीर से पंडितों का पलायन उनके सामने उदाहरण था, जिसका परिणाम हुआ कि कांग्रेस को वोट देने वाला उच्च जाति का वोटर बीजेपी की तरफ़ चला गया। यह सब जानने के बावजूद कांग्रेस ने अस्सी-नब्बे के दशक वाली ग़लती इस बार फिर से दोहरा दी। ज़ाहिर है एक बार फिर उसे इसका परिणाम भुगतान पड़ेगा।
जम्मू-कश्मीर में नुकसान
जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन की चर्चा जिस ओर मुड़ गयी है, इस राज्य में भी उसका संभावित नुक़सान कांग्रेस को ही उठाना पड़ेगा। दरअसल इस राज्य के पुनर्गठन की बहस को आंतरिक उपनिवेशवाद की तरफ़ मोड़ दिया गया है, जिसमें कश्मीर घाटी के मुकाबले जम्मू और लेह-लद्दाख के पिछड़ेपन को भी मुद्दा बना दिया गया है। ऐसा तर्क दिया जा रहा है कि केंद्र से मिलने वाली ज़्यादातर राशि कश्मीर घाटी में ही ख़र्च की गई, जिससे अन्य क्षेत्रों का ख़ासकर लद्दाख का अपेक्षाकृत विकास नहीं हुआ। लद्दाख के लोग अपने लिए संघ शासित प्रदेश की मांग लम्बे समय से कर रहे थे।
सापेक्षिक पिछड़ेपन (रिलेटिव डिप्रिवेशन) के अलावा लद्दाख के लोगों का यह भी कहना रहा है कि उनके ऊपर कश्मीरियत के नाम पर कश्मीर घाटी की संस्कृति थोपी जा रही थी। नयी स्थिति में उनको इससे निजात मिल जाएगी। कश्मीर घाटी में विभाजन के समय पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदू शरणार्थी जम्मू-कश्मीर आकर बसे, लेकिन उनको अभी भी राज्य के स्थायी निवासी का दर्जा नहीं मिला है। नई व्यवस्था में उनकी यह समस्या हल हो सकती है। इस प्रकार हम पाते हैं कि राज्य के पुनर्गठन से कश्मीर घाटी के मुसलमानों के प्रभुत्व में कमी होती नजऱ आती है। जबकि तमाम अन्य छोटे-छोटे समुदायों को फ़ायदा भी मिलता दिखाई देता है। कांग्रेस को इन समुदायों का समर्थन गंवाना पड़ सकता है। (लेखक रॉयल हालवे, लंदन विश्वविद्यालय से पीएचडी स्क़ॉलर हैं । ये उनके निजी विचार हैं।)


Date : 12-Aug-2019

पवन वर्मा

12 अगस्त जन्मदिन पर

एक सबसे अच्छा लीडर वह जो अच्छे लीडर तैयार करे। इस मायने में विक्रम अंबालाल साराभाई काफी काबिल लीडर कहे जा सकते हैं। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने अंतरिक्ष विज्ञान में अपने करियर की शुरुआत उनके मार्गदर्शन में ही की थी। एक भाषण में कलाम का कहना था, ‘मैंने कोई बहुत ऊंचे दर्जे की शिक्षा नहीं ली है लेकिन अपने काम में बहुत मेहनत करता था और यही वजह रही कि प्रोफेसर विक्रम साराभाई ने मुझे पहचाना, मौका दिया और आगे बढ़ाया। जब मेरा आत्मविश्वास सबसे निचले स्तर पर था तब उन्होंने मुझे जिम्मेदारी दी और यह सुनिश्चित किया कि मैं अपने काम में सफल रहूं। यदि मैं असफल होता तब भी मुझे पता था कि वे मेरे साथ हैं।’ कलाम ही नहीं, इसरो के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरी रंगन से लेकर वरिष्ठ वैज्ञानिकों की एक ऐसी पीढ़ी साराभाई ने तैयार की थी जो भारतीय वैज्ञानिक जगत की रीढ़ कही जा सकती है।
12 अगस्त 1919 को जन्मे साराभाई उस पीढ़ी के सदस्य थे जो भारतीय पुनर्जागरण काल के नेताओं की कहानियां सुनते हुए बड़ी हुई थी या उन्हें देश में काम करते हुए देख रही थी। महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज इस दौर में मौजूद थे और उनकी मानवीय विचारधारा से साराभाई ताउम्र प्रभावित रहे। हालांकि जिस तरह के काम साराभाई ने किए हैं इस आधार पर उन्हें भी भारतीय पुनर्जागरण काल का प्रतिनिधि माना जा सकता है।
उस दौर में परमाणु वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा भारतीय वैज्ञानिक समुदाय के अगुवा थे। सिर्फ भारत में ही नहीं अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भी भाभा की खासी प्रतिष्ठा थी। परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन की गति-स्थिति से संबंधित बोर मॉडल देने वाले नील्स बोर के साथ-साथ उस जमाने के और दूसरे जाने-माने भौतिक विज्ञानियों के साथ भाभा काम कर चुके थे और वे परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के बड़े हिमायती थे। जैसे कलाम को साराभाई ने पहचाना था वैसे ही भाभा ने साराभाई की प्रतिभा को पहचाना था।
अपनी पढ़ाई के बीच 1939 में भाभा भारत आए थे और इसी समय दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया। इसके बाद उन्होंने यूरोप जाने का विचार छोड़ दिया और बैंगलोर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएस) से जुड़ गए। कैंब्रिज से लौटे साराभाई को भी अपने अध्ययन और शोध के लिए यही ठिकाना मिला और आखिरकार उनकी यहां भाभा से मुलाकात हुई। अद्भुत वैज्ञानिक मेधा से संपन्न इन दोनों वैज्ञानिकों की मुलाकात अपने-अपने अध्ययन क्षेत्रों के मुताबिक दो विपरीत ध्रुवों की मुलाकात थी। दोनों ने कॉस्मिक किरणों के क्षेत्र में अनुसंधान किया था लेकिन भाभा जहां अणु विज्ञान में दिलचस्पी रखते थे तो साराभाई के अध्ययन का क्षेत्र अंतरिक्ष विज्ञान था।
यह 1950 का दशक था। दुनिया के तमाम शीर्ष देशों में परमाणु अनुसंधान और अंतरिक्ष विज्ञान से संबंधित संस्थानों और परियोजनाओं को प्रोत्साहन दिया जा रहा था। भारत के पास इन दोनों क्षेत्रों का नेतृत्व करने के लिए दो प्रतिभाशाली वैज्ञानिक मौजूद थे। भारत में आजादी के तुरंत बाद 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग बनाया गया और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भाभा को इसका पहला अध्यक्ष नियुक्त किया। वे नेहरू के वैज्ञानिक सलाहकार भी थे।
वहीं दूसरी तरफ साराभाई ने 1947 में अहमदाबाद में ‘भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल)’ की स्थापना की थी। साराभाई के पिता उद्योगपति थे और भौतिक विज्ञान के अध्ययन-अनुसंधान के इस केंद्र के लिए उन्होंने अपने पिता से ही वित्तीय मदद मिली थी। उस समय साराभाई की उम्र महज 28 साल थी लेकिन कुछ ही सालों में उन्होंने पीआरएल को विश्वस्तरीय संस्थान बना दिया। और बाद में भारत सरकार से उसे मदद भी मिलने लगी।
पीआरएल मुख्यरूप से अंतरिक्ष विज्ञान के अनुसंधान से जुड़ी संस्था है लेकिन इसकी स्थापना और संचालन के अनुभव ने वैज्ञानिक साराभाई को एक कुशल प्रबंधक भी बना दिया था। इसके बाद उन्होंने पारिवारिक कारोबार में हाथ आजमाया और गुजरात के साथ-साथ देश के कई हिस्सों में उद्योगों की स्थापना की। उन्होंने साराभाई कैमिकल्स, साराभाई ग्लास, सेमिबायोटिक्स लिमिटेड, साराभाई इंजीनियरिंग ग्रुप जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों की स्थापना ही नहीं की थी बल्कि इन्हें अपने-अपने क्षेत्र में अगुवा भी बना दिया। यही नहीं देश के पहले प्रबंधन संस्थान इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (अहमदाबाद) की स्थापना भी साराभाई ने ही की थी। हालांकि इस सबके बावजूद उनका मन कॉस्मिक किरणों और अंतरिक्ष विज्ञान में ज्यादा रमता था।
जुलाई, 1957 में रूस ने दुनिया का पहला उपग्रह – स्पूतनिक, पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया था। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस और अमरीका सहित 50 से ज्यादा देशों ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक साल तक चलने वाली एक परियोजना के लिए गठबंधन किया था। साराभाई चाहते थे कि भारत भी इसका हिस्सा बने और उन्होंने इसके लिए सरकार को एक प्रस्ताव बनाकर भेज दिया। प्रधानमंत्री नेहरू निजी तौर पर भी साराभाई को जानते थे और होमी भाभा की वजह से उनकी प्रतिभा भी पहचानते थे। उनकी सरकार ने यह प्रस्ताव मान लिया। भारत की तरफ से इस प्रयोग को देखने-समझने की जिम्मेदारी साराभाई को ही दी गई थी।
स्पूतनिक की लॉन्चिंग के साथ अचानक दुनिया के तमाम देशों की दिलचस्पी अंतरिक्ष विज्ञान में हो गई थी। विक्रम साराभाई के लिए भी यह क्रांतिकारी घटना थी और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पंडित नेहरू को चि_ी लिख दी कि भारत को इस दिशा में काम करना चाहिए। उनकी सलाह मानते हुए सरकार ने 1962 में इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च (इनकॉस्पर) बना दी और नेहरू ने इसकी कमान साराभाई को सौंप दी। यही इनकॉस्पर बाद में इसरो बना था।
रूस के लिए स्पूतनिक का निर्माण और उसकी लॉन्चिंग अमेरिका से होड़ का नतीजा थी और दूसरी तरफ अमेरिका भी रूस पर बढ़त बनाने के लिए अपने अंतरिक्ष अभियानों पर भारी निवेश कर रहा था। उस दौर में भारत नया आजाद हुआ मुल्क था और जिसके पास संसाधनों की भारी कमी थी। ऐसे में देश के भीतर-बाहर यह सवाल भी उठा कि भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के विकास पर पैसा खर्च करने की क्या जरूरत है। साराभाई ने सरकार के सामने जब अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए परियोजना शुरू करने का प्रस्ताव रखा उसी समय इस सवाल का जवाब भी दिया। उनका कहना था, ‘हमारे सामने लक्ष्यों को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं है। आर्थिक रूप से समृद्ध देश चंद्रमा पर खोजबीन या दूसरे ग्रहों तक इंसानों को पहुंचाने जैसे अभियान चला सकते हैं लेकिन हमारी इन देशों से होड़ लगाने की कोई इच्छा नहीं है। लेकिन इस बात पर पक्का यकीन है कि अगर हमें राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी है तो इंसान और समाज की समस्याओं को सुलझाने में आधुनिक तकनीक के उपयोग में किसी से पीछे नहीं रहना है।’
साराभाई अब जल्दी से जल्दी भारत में अतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत करना चाहते थे। उन्हें इसके लिए अपने मार्गदर्शक और साथी वैज्ञानिक डॉ. भाभा का भरपूर सहयोग मिल रहा था। इन्हीं दोनों ने पहले रॉकेट परीक्षण के लिए केरल के थुंबा का चयन किया था और इनके निर्देशन में ही 1963 में यहां से पहला प्रायोगिक रॉकेट छोड़ा गया। यह अमरीका में बना रॉकेट था और अब साराभाई चाहते थे कि यहां से भारत निर्मित रॉकेट छोड़ा जाए।
भारतीय वैज्ञानिकों को देसी रॉकेट बनाने में चार साल का समय लग गया। हालांकि इस बीच में एक ऐसी घटना भी हुई जिससे साराभाई सहित पूरे भारतीय वैज्ञानिक समुदाय को भारी धक्का लगा था। दरअसल जनवरी, 1966 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की बैठक में भाग लेने विएना रवाना हुए थे और स्विटजरलैंड के ऊपर उनका हवाई जहाज क्रैश हो गया। इस हादसे में भारत ने अपना सर्वश्रेष्ठ परमाणु वैज्ञानिक खो दिया था। 
 


Date : 12-Aug-2019

एक शासकीय कर्मचारी होने के नाते शीर्षक में अंकित शब्दावली से न केवल बहुत अच्छी तरह परिचित हूं, बल्कि प्रताडि़त होने के कारण इसकी संवेदनशीलता और प्रभाव भी जानती हूँ! मेरे कई साथियों को शायद यह नागवार गुजऱे, कष्ट हो , खिसियाहट हो पर जो इस वेदना से गुजऱ चुके हैं या गुजऱ रहे हैं उनके रिसते हुए जख्मों पर ये मलहम ज़रूर लगाएगा ठंडक पहुंचाएगा। क्योंकि सीसीए  रूल की मर्यादा के कारण सबकी ज़ुबान बंद रहती है। अभिव्यक्ति की आज़ादी सिफऱ् ब्लैकमेलर पत्रकारों को, फि़ल्मी भांड को ही मिली हुई है। बाक़ी देशवासी किसी न किसी रूप से अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते ही किसी न किसी कानूनी शिकंजे में फंस जाते हैं और फिर भागते हैं उनके मित्र और परिजन कोर्ट की ओर उनको जमानत दिलाने को! 

हाल ही में एक मीम ट्वीटर पर डालने के कारण एक लडक़ी को हवालात की हवा खानी पड़ी थी सभी को स्मरण होगी वो घटना ! ख़ैर! मैं सिर्फ शासकीय कर्मचारियों की बात कर रही हूं। सच ये भी है कि सीसीए रूल का प्रतिबंध भी सीधे-साधे नियमानुसार काम करने वाले कर्मचारियों को ही प्रताडि़त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। चाटुकार और भ्रष्ट कर्मचारियों के लिए उसके मायने बदल दिए जाते है!
 हमारे कैडर की बात करें-मेरे एक साथी तहसीलदार पर लोकायुक्त के 59 केस दर्ज हैं, पर वो सदा मुख्यालय तहसीलदार के पद पर ही सुशोभित रहते हैं । सारे नियम दरकिनार क्योंकि सबसे बड़ा गुण वरिष्ठ अधिकारियों की चाटुकारिता और भ्रष्टाचार में निपुणता उनके सारे दुर्गुनों पर भारी पड़ती है! हम लोगों ने अकादमी में जो ट्रेनिंग की थी वो विभागीय परीक्षा के लिए और काम करने की क्षमता बढ़ाने के लिए की थी। पर पिछले 2-3 नायब तहसीलदारों के बैच को अपने साथ काम करते देख कर लगता है कि अकादमी में अब कार्य के प्रति निष्ठा और अनुशासन की ट्रेनिंग नहीं चाटुकारिता और भ्रष्टाचार की ट्रेनिंग दी जा रही है। हम वरिष्ठ तहसीलदारों को परे हटाकर इन नवनियुक्त साहबानो को मुख्यालय तहसीलदार के पद पर नवाज़ा जा रहा है। 
जिले के वरिष्ठतम अधिकारी, तहसील के वरिष्ठतम अधिकारी इन्हें अपने साथ गाड़ी में बैठा कर हमेशा घूमते नजऱ आएंगे।  आज भी वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष सीधे बैठने वाले हम लोगों के सामने ये नव नियुक्त अधिकारी बड़े साहब की बाज़ू में कुर्सी डालकर कानाफुसी करके बात करते हैं। आज तक समझ नहीं आया कि ऐसा क्या गुण हैं इन नए-नए साहिबान में?
सारे प्रदेश के जिलों में देख लीजिए। तहसीलदार होते हुए भी नायब तहसीलदार को कहीं मुख्यालय का प्रभार दिया गया है, कहीं बड़ी तहसीलों का प्रभार और ये हालात हैं कि तहसीलदारों को दरकिनार कर वरिष्ठतम साहिबान सीधे इन छोटे प्रभावशाली साहिबान से बात करते हैं। सारे नियम-क़ायदे ताक पर रखकर इनको ही प्राथमिकता दी जा रही है पता है क्यों ? क्योंकि ये साहिबान ट्रेनिंग में वरिष्ठों को पटाने की कला और चाटुकारिता सीखकर आए हैं, इसमें पारंगत हैं। काम से कोई लेना-देना नहीं। क्योंकि वरिष्ठतम साहिब ख़ुश तो किसी शिकवा-शिकायत पर किसी तरह की कार्रवाई होने का डर ही नहीं है। 
सीसीए रूल की बात करें तो सिर्फ ईमानदार और कार्य के प्रति निष्ठा रखने वालों पर ही यह लागू होता है, चाटुकारों पर क़तई नहीं! जिले में पदस्थापना में कोई वरीयता नहीं सिर्फ चाटुकारी में पारंगतता देखी जाती है ! वरिष्ठतम साहिब के पास इसका कोई तर्कयुक्त जवाब नहीं मिल सकेगा कि आपके द्वारा की गई जिले की पदस्थापना का नियमानुसार औचित्य क्या है ?? मेरे कई साथियों को लगेगा कि अपनी बात कहने के लिए इतनी बात की है मेने, सहीं भी है जब इतना कुछ बोला तो अपनी बात तो की ही जाएगी न !!!
हाल ही में मेरी पदस्थापना जि़ला शयोपुर हुई है, सारी 6 तहसील हैं जिसमें 2 पर तहसीलदार पदस्थ हैं वो भी दूरस्थ तहसील जहाँ कोई क्रढ्ढ भी उस तहसील के सारे कार्य सम्पादित कर सकता है वहाँ तहसीलदार पदस्थ हैं ।  मुख्यालय पर छोटे साहब तहसीलदार बने बैठे हैं ! मुझे निर्वाचन शाखा का प्रभारी बना कर कलेक्टर ओफिस में बैठा दिया गया है जहाँ कि तहसीलदार का कोई पद ही नहीं है, मेरी समस्या ये हैं कि महीना पूरा हो जाने पर मुझे वेतन कहाँ से मिलेगा ??कनिष्ठ साहिबान पर दो दो तहसील का प्रभार है कार्य में अत्यधिक निपुण जो ठहरे !! न न न जनता के काम नहीं वरिष्ठ साहिबान के काम !! अब कोई हमारे वरिष्ठतम साहिब से पूछेगा कि तहसीलदार के होते हुए नायब साहब क्यों बैठे हैं तहसीलदार कि कुर्सी पर ? और तहसीलदार को निर्वाचन शाखा में क्यों रखा गया है ?? बहुत सारे एसे तर्क दिए जाएँगे जिनका कोई सही लोजिक नहीं है पर मानना ही पड़ेगा वरिष्ठतम साहब जो कह रहे हैं उस तर्क की तह में जाएँगे तो बिलकुल आधार हीन होगा पर है तो है, कोई क्या कहा सकता ष्टष्ट्र रूल ज़ुबान पर ताला जो डाल कर रखता है ! घिन आती है इस व्यवस्था पर बहुत क्लेश होता है पर क्या करें कोई और रास्ता भी तो नहीं हैं न ‘नौकरी क्यों करी गरज पड़ी तो करी ‘वाली कहावत जो चरितार्थ होती है चुप हूँ !
हद तो ये है कि परिविक्षाधीन नायब साहब को ही तहसील का प्रभार दे दिया गया है शायद विभागीय परीक्षा भी पास की है या नहीं पता नहीं ! पर वरिष्ठ साहिबान की कृपा दृष्टि हो तो सब सम्भव है यहाँ !! मेरी एक साथी हैं प्रदेश के एक बड़े महानगर में तहसीलदार , मुझे लगता हैं सेवा का 90त्न उसी जिले में काटा है और अभी भी काट रहीं हैं अगर डिबेट करा ली जाए तो कई धाराओं में स्पष्टीकरण नहीं दे पाएँगी पर महानगर का पट्टा वरिष्ठ अधिकारियों ने बना दिया है तो बना दिया ! 
काहे का ष्टष्ट्र रूल काहे का निर्वाचन आयोग का नियम ! सब दरकिनार उनको मेरी पोस्ट से सबसे ज़्यादा मिर्च लगती है सो फिर लगेगी !! इसीलिए जानबूझकर जि़क्र किया है उनका मेने, ख़ुद समझे कौन हैं वो ?? ख़ैर ...!! कुछ लिखकर थोड़ी सी कुछ मानसिक क्लेश और व्यथा से राहत मिली है शेष फिर लिखूँगी क्योंकि ष्टष्ट्र रूल के अंतर्गत इस पोस्ट का स्पष्टीकरण भी देना होगा न ! उसके लिए भी मानसिक रूप से ख़ुद को तैयार कर रही हूँ क्योंकि सच कड़वा होता है जिसका स्वाद सबको पसंद नहीं आता ! आए न आए सच कहने की आदत ना कभी गई न जाएगी !! शेष अगली कड़ी में ! जय ष्टष्ट्र रूल ! जय हिंद 


Date : 11-Aug-2019

-प्रकाश दुबे
लाट साहब का कद घट जाएगा?  
जम्मू-कश्मीर में संविधान का अनुच्छेद-370 निष्प्रभावी करने के फेर में दो केन्द्रशासित प्रदेश बन गए। बेदी यह सोचकर खुश हो सकती हैं कि महत्वपूर्ण राज्य के राज्यपाल सत्यपाल मलिक और मैं बराबरी पर आ गए। खुशकिस्मत तो ईएल नरसिंहन हैं। छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बने थे। बरसों आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों की कमान संभाली। अब तेलंगाना के राज्यपाल हैं।  इंटेलिजेंस ब्यूरो के सेवानिवृत्त नरसिंहन से सबसे बड़े उत्तरप्रदेश के नेता मलिक का कद बहुत बड़ा है। इस अनदेखी को दूर करने के लिए ही शायद प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा लौटाने का संकेत दिया है।
कह दिया तो डरना क्या
प्रकाश जावड़ेकर के सितारे बुलंदी पर हैं। कर्नाटक के प्रभारी थे। वहां सरकार बन गई। राजस्थान के प्रभारी थे। विधानसभा में थोड़े अंतर से पिछडऩे के बाद लोकसभा चुनाव में विपक्ष का सफाया हो गया। अब दिल्ली विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी मिली है। संसद भवन में जावड़ेकर को निमंत्रित करने पहुंचे प्रतिनिधि बारम्बार सफाई दे रहे थे कि पै साथ आने वाले थे। जावड़ेकर ने पै की अनुपस्थिति की पूछताछ नहीं की। सहज भाव से कहा-कोई बात नहीं। कार्यक्रम में पहुंचने पर तुरंत हामी नहीं भरी। यानी विनम्रता पर सस्पेंस लपेट दिया। पै कौन से? मोहनदास? आर्थिक विषयों के जानकार पै ने कैफे काफी डे के मालिक सिद्धार्थ की आत्महत्या के सिलसिले में आयकर विभाग की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की थी। तहलका मचना ही था। उनके बाद किरण शा मजुमदार ने कहा कि एक आयकर अधिकारी मुझे भी नेक सलाह देने पहुंचे थे।  
राज्यसभा में राज्य
कभी-कभी सांस लेना कितना कष्टप्रद होता है? अस्थमा के मरीज जानते हैं। अनेक विधेयक पारित होने के कारण कई साल के बाद संसद ने राहत की सांस ली। राज्यसभा में बिना बखेड़ा विधेयक पारित होने से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य की तरफ सिर्फ उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू का ध्यान गया। राज्यसभा के सभापति का दायित्व संभालने वाले नायडू के मुताबिक बरसों बाद राज्यसभा ने अपने नाम के अनुसार आचरण किया। मोटर वाहन अधिनियम को संशोधित करते समय सदस्यों और मंत्री नितीन गडकरी ने राज्यों की अपेक्षा और जरूरतों का पूरा ध्यान रखा। सदन में उत्तर देते समय ही आश्वस्त किया कि राज्यों की अनदेखी नहीं होगी। कानून बनाते समय राज्य अनदेखी के शिकार हो जाते हैं। यही कारण है कि संसद सत्र समाप्त होने के तीसरे दिन राष्ट्रपति ने सम्मति दी।
चूल्हा अलग, ठिकाना तो... 
नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश में एक विधान, एक निशान-झंडा की पहल की। पटना उच्च न्यायालय के सामने उल्टी चुनौती है। उसे घर का बंटवारा करना है। इस घर में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों का बसेरा है। दोनों उसके मालिक नहीं हैं। घर का विभाजन दोनों टालना चाहते हैं। आप सोचते होंगे न, कि अजीब गुत्थी है। है तो। ऐश्वर्या राय ने अदालत से अलग रसोईघर सहित पाक व्यवस्था की मांग की है। गफलत में मत पड़ो, ज्ञानी पाठक। यह ऐश्वर्या किसी फिल्मी-चिल्मी दंपत्ति की बहू नहीं है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय की पोती है। सास-ससुर का नाम भी हम ही बताएं? राबड़ी-लालू के लिए सरकार ने 10, सरकुलर रोड पर विशाल बंगला आवंटित किया है। बहू ऐश्वर्या ने उच्च न्यायालय से अपने लिए अलग रसोई घर आदि की पृथक व्यवस्था मांगी है। ऐश्वर्या सास-ससुर के साथ रहती है। पिता चंद्रिका राय राष्ट्रीय जनता दल के विधायक हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 


Date : 11-Aug-2019

 

-थोमस कोलमन
जम्मू और कश्मीर के भारतीय हिस्से में बेरोजगारी राष्ट्रीय औसत की दोगुनी है। नियमित रूप से होने वाली अशांति का असर अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर है। निवेशकों के लिए अहम होगा कि सुरक्षा की स्थिति में कितना सुधार होता है।
सेव और खुबानी के बगीचे, हरी भरी वादियां, पहाड़ों से उतरता साफ पानी और गहरी नीली झीलें दरअसल कश्मीर में वह सब कुछ है जो उसे दुनिया भर के सैलानियों का आकर्षण बना सके। बार-बार स्थानीय प्रदर्शनकारियों और भारतीय सुरक्षा बलों की नियमित झड़पों की तस्वीर इसका रंग बिगाड़ देती है जिसकी वजह से बहुत से लोग यहां छुट्टी मनाने नहीं आ पाते। निवेशक भी कश्मीर से सिर्फ इसलिए कन्नी नहीं काटते हैं, क्योंकि वहां कोई जमीन नहीं खरीद सकते बल्कि इसलिए भी कि सालों से वहां सुरक्षा की स्थिति तनावपूर्ण है।
इसमें इलाके की स्वायत्तता खत्म कर उसे केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने से भी कोई बदलाव नहीं होगा। इस बात की कोई संभावना नहीं है कि अब इलाके में जमीन खरीदने की होड़ लग जाएगी। रियल स्टेट पर रिसर्च करने वाली संस्था प्रॉपइक्विटी के संस्थापक समीर जसूजा ने डीडब्ल्यू से कहा, जम्मू और कश्मीर इस वक्त रियल इस्टेट कंपनियों के रडार पर भी नहीं है। सबसे पहले इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि वहां कोई भारत विरोधी गतिविधि ना हो। जसूजा का मानना है कि रियल इस्टेट कारोबारी अभी एक साल स्थिति पर नजर रखेंगे।
कश्मीर यूनिवर्सिटी के भूतपूर्व डीन निसार अली का कहना है जहां पर्यटन के क्षेत्र में निवेश की योजनाएं हैं भी, वहां खराब ढांचागत संरचना की वजह से कामयाबी नहीं मिल रही है। निसार अली कहते हैं, बिजली की खराब आपूर्ति राज्य की प्रगति में बाधा डाल रही है। इसकी वजह से भारतीय और स्थानीय निवेशक भी सक्रिय नहीं हो रहे हैं। अब तक 55 टूरिस्ट डेस्टिनेशन तय किए गए हैं लेकिन बिजली की कमी के कारण वहां कुछ नहीं हो सका है। जम्मू कश्मीर का 80 फीसदी हिस्सा खेती पर निर्भर है। यहां गेहूं और बाजरे के अलावा चावल, मक्का और फलों की खेती होती है। यह इलाका दस्तकारी, कालीन, लकड़ी के सजावटी सामान, ऊन और रेशम के लिए मशहूर है। कश्मीरी बकरियों के रोएं से बनने वाला कश्मीर ऊन इलाके में ही नहीं पूरी दुनिया में विख्यात है। लेकिन इस बीच कश्मीर ऊन का बड़ा हिस्सा मंगोलिया और चीन से आ रहा है। कभी यहां लहलहाता पर्यटन उद्योग मुस्लिम अलगाववादियों और भारत सरकार के विवाद की भेंट चढ़ गया है।
निसार अली कहते हैं कि छोटे पारिवारिक उद्यम भी इस विवाद से अछूते नहीं है। उनका कहना है, छोटे उद्यम मझोले उद्यमों की तरह ही बुरे हाल में हैं। राज्य में कोई विदेशी निवेश नहीं हो रहा और यहां कोई विशेष आर्थिक क्षेत्र भी नहीं जो निवेशको को आकर्षित कर सके। सुरक्षा की खराब स्थिति के अलावा भ्रष्टाचार भी इलाके के विकास को प्रभावित कर रहा है। थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सुशांत सरीन ने डीडब्ल्यू को बताया कि ये ऐसी चीजें हैं जो निवेशकों को परेशान करती हैं। उम्मीद की जा रही है कि भारी निवेश आएगा लेकिन मैं समझता हूं कि यह बहुत हद तक प्रदेश की सुरक्षा की स्थिति पर निर्भर करेगा।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार जम्मू और कश्मीर में बेरोजगारी की दर भारत में सबसे ज्यादा है। बड़े अनौपचारिक श्रम बाजार के कारण इस आंकड़े को सावधानी से देखा जाना चाहिए। उद्योग के विकास में प्रदेश ने अपने सकल घरेलू उत्पाद का 0।9 फीसदी ही खर्च किया है। बहुत से पर्यवेक्षक इसीलिए प्रगति की संभावना परंपरागत उद्योग में देखते हैं। भारतीय निर्यात संगठन के अध्यक्ष शरद कुमार सर्राफ ने डीडब्ल्यू को बताया कि भविष्य में ज्यादा दस्तकारी वाले सामान निर्यात किए जा सकेंगे। शरद कुमार का कहना है, अब जबकि सरकार ने जम्मू कश्मीर के बाहर के निर्यातकों को निवेश की अनुमति दे दी है तो राज्य के दरवाजे खुल गए हैं।
कश्मीर के उद्योग और वाणिज्य संघ के मुताबिक भारत सरकार की घोषणा से पहले ही इलाके में अफरातफरी मच गई थी। लोग सामान, पैसा और पेट्रोल जमा करने लगे थे। इलाके के कुछ पेट्रोल पंपों पर सारा पेट्रोल बिक गया था। उद्योग और वाणिज्य संघ के अध्यक्ष शेख आशिक के अनुसार पर्यटकों और अमरनाथ यात्रा पर गए तीर्थयात्रियों को वापस लौटने के लिए कहा गया। बहुत से मजदूरों ने अशांति के डर से इलाका छोड़ दिया और काम पर नहीं गए। 
उन्होंने कहा, नीति में परिवर्तन की संभावना फरवरी 2019 से ही दिख रही थी और तब से कश्मीर की जनता इससे परेशान हो रही थी। जबसे श्रीनगर और जम्मू के रास्ते पर रोकटोक होने लगी पर्यटन बागवानी और दूसरे क्षेत्रों में काफी नुकसान हुआ। उसने पर्यटन की रीढ़ तोड़ दी और राज्य की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया।
निसार अली प्रांतीय वित्त आयोग के सदस्य भी हैं। उनका कहना है कि कश्मीर में अब जो भी हो इलाके के लोगों को आर्थिक भविष्य की जरूरत है। उन्होंने कहा, अगर हम राज्य में बेरोजगारी की समस्या दूर कर सकें तो कश्मीर की 95 फीसदी समस्या दूर हो जाएगी।
(डॉयचेवेले)


Date : 11-Aug-2019

-कुमार विक्रांत
सोनिया गांधी को कांग्रेस नेताओं ने एक बार फिर से पार्टी की बागडोर सौंप दी है। 72 दिन यानी करीब ढाई महीने की ऊहापोह की स्थिति के बाद सोनिया गांधी को फिर से कांग्रेस का सिरमौर बनाया गया है। दरअसल, राहुल गांधी ने 2019 के चुनावों की हार की जिम्मेदारी लेते हुए पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद से राहुल गांधी के मान मनौव्वल का दौर चल रहा था और नए अध्यक्ष की खोजबीन भी अंदरखाने जारी रही।
इसके लिए शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक बुलाई गई थी। कार्यसमिति के 5 ग्रुप बनाकर सभी राज्यों के नेताओं से राय मांगी गई। सभी ने एक स्वर में राहुल गांधी को अध्यक्ष बने रहने की राय सामने रख दी। शनिवार शाम को दोबारा बुलाई गई सीडब्ल्यूसी की  बैठक में रिपोर्ट पढ़ी गई। इसमें साफ कहा गया था कि राहुल गांधी के बिना कांग्रेस नहीं चल सकती। लिहाजा राहुल गांधी से अध्यक्ष बनने की अपील की गई। लेकिन उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया। इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति के सामने सवाल था कि अगला कौन? क्योंकि राहुल ने साफ कर दिया था कि अगला अध्यक्ष गैर-गांधी परिवार का हो, लेकिन ये भी सच्चाई सबके सामने थी कि किसी और नाम का सवाल ही नहीं उठता है। दिनभर की रायशुमारी में भी इक्का दुक्का लोगों ने ही गांधी परिवार से अध्यक्ष न होने की सूरत में किसी और का नाम दिया था।
इसी बीच, पी। चिदंबरम ने सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाये जाने का प्रस्ताव रख दिया, जिस पर सोनिया ने 'नोÓ कह दिया। बैठक में मौजूद प्रियंका गांधी ने भी इस पर ऐतराज जता दिया। हालांकि, उन्होंने कहा कि अगर सोनिया तैयार हैं तो कोई क्या कह सकता है? तभी एके अंटोनी उठते हुए बोले कि ऐसा नहीं हो सकता। इस पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हें बैठने के लिए कहते हुए कहा कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता? ऐसा होना ही चाहिए। जब राहुल गांधी सीडब्ल्यूसी का फैसला मानने को तैयार नही हैं तो मैडम को आगे आना ही चाहिए। वहीं मौजूद अम्बिका सोनी, आशा कुमारी और कुमारी शैलजा ने कहा कि गांधी परिवार के बिना पार्टी नहीं चल सकती और सोनिया गांधी से राहुल को मनाने के लिए कहा। लेकिन सोनिया गांधी ने साफ कर दिया कि राहुल के फैसले पर वो क्या कह सकती हैं?
बस यहीं पर तीनों नेताओं ने सोनिया से साफ-साफ कह दिया कि इस सूरत में उन्हें पार्टी संभालनी ही पड़ेगी। इस बात को पूरे सीडब्ल्यूसी सदस्यों के दोहराने पर आखिरकार सोनिया को मानना पड़ा। मुकुल वासनिक को अध्यक्ष बनाना तय था, लेकिन सोनिया गांधी को बोला गया कि राहुल गांधी नहीं समझ रहे, अगर कोई और अध्यक्ष बना तो विरोधी गांधी परिवार का पपेट कहेंगे। इसके बाद ही ना ना करते करते सोनिया गांधी मान गईं। (आजतक)


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