विचार / लेख

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Posted Date : 24-Apr-2019
  • -शिवप्रसाद जोशी

    स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका के इतिहास में ये पहला मौका है जब  देश के मुख्य न्यायाधीश पर यौन उत्पीडऩ के आरोप लगे हैं। कोर्ट की ही एक पूर्व कर्मचारी के आरोपों को खारिज करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने इसे न्यायपालिका को अस्थिर और निष्क्रिय करने की साजिश करार दिया। आनन-फानन में एक बेंच बुलाकर मीडिया से संयम बरतने की अपील कर आलोचना का शिकार बने जस्टिस गोगोई ने इस मामले में अपने बाद सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश एसए बोबड़े को आगे की कार्यवाही के लिए कहा है। 
    कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी ने जस्टिस गोगोई पर यौन उत्पीडऩ और मानसिक यंत्रणा का आरोप लगाते हुए 22 जजों को एफिडेविट दिया था। इस एफिडेविट के आधार पर ही चार प्रमुख अंग्रेजी वेबसाइटों ने खबर प्रकाशित की थी।
    देश के जाने-माने अधिवक्ताओं, कानून और संविधान के विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने गोगोई के  कदम को न्यायप्रियता और न्यायिक नैतिकता के विपरीत बताया है। सुप्रीम कोर्ट की सीनियर अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह का बयान है कि चीफ जस्टिस को बेंच का कतई भी हिस्सा नहीं होना चाहिए था। 
    वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा है कि 'फेयर प्ले' का बुनियादी नियम यही है कि अपने ही मामले में व्यक्ति जज नहीं हो सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि स्वयं प्रेरित या स्वत: संज्ञान वाली रिट पेटिशन पर ये मामला बेंच के सामने आया जिसमें उसने 'अंतर्निहित अख्तियार' के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल किया है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की शीर्ष संस्था- सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन ने भी एक प्रस्ताव पास कर इस मामले में हुई 'प्रक्रियात्मक त्रुटि'  के प्रति अपना असंतोष जाहिर करते हुए फुल कोर्ट बुलाने की मांग की है। उपयुक्त जांच और कार्रवाई के लिए एक आंतरिक कमेटी के गठन की मांग भी की गई है। कमोबेश ऐसी मांगों का प्रस्ताव अधिवक्ताओं की शीर्ष संस्था सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी किया है।
    उधर ये आरोप भी जोर पकड़ रहे हैं कि चीफ जस्टिस को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है ताकि उन्हें इस्तीफा देने पर विवश होना पड़े। जबकि कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई उनकी अध्यक्षता वाली बेंच के जरिए होनी है। इसी सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के एक वकील का बयान भी मीडिया में आया है जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि इस मामले को प्रचारित करने के लिए उन्हें डेढ़ करोड़ रुपए की रिश्वत की पेशकश भी की गई थी।
    चीफ जस्टिस द्वारा गठित विशेष बेंच ने यौन उत्पीडऩ के आरोपों से जुड़े मामले की विशेष बेंच के जरिए सुनवाई की जिसमें जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना के अलावा वो खुद भी थे। इस असाधारण मामले में लगता यही है कि सुप्रीम कोर्ट की अब तक की कार्यवाही एक तरह से अपनी शुद्धता का आवरण ढकाए रखने की कोशिश है और वो अपने अहम के खोल को उतारने में हिचक रहा है। अभी इस मामले में क्या सही है क्या गलत और कौन सही है और कौन गलत- कहना कठिन है- यौन उत्पीडऩ के आरोपों की सच्चाई भी प्रमाणित नहीं है- लेकिन आरोप अगर सामने आए हैं तो जांच के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी को तत्काल सक्रिय कर देने से शायद इतनी छीछालेदर न होती।
    नहीं भूलना चाहिए कि जस्टिस गोगोई उन चार जजों में शामिल थे जिन्होंने पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के कार्यकाल में रोस्टर प्रणाली पर सवाल उठाए थे और मीडिया से मुखातिब होते हुए आरोप लगाया था कि अन्य वरिष्ठ जजों को सुनवाई का मौका नहीं दिया जाता है। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में वो अभूतपूर्व प्रेस कांफ्रेंस थी। और अब जब ये मामला सामने आया तो पूछा जा रहा है कि आखिर जस्टिस गोगोई इस बात को कैसे भूल गए और कैसे उन्होंने खुद को तो बेंच में रख लिया लेकिन अपने बाद वरिष्ठता में सबसे ऊपर आने वाले जजों को भूल गए। ये भी सवाल उठा है कि उन पर आरोप हैं तो वो कैसे बेंच में आ सकते हैं। जानकारों ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु को रेखांकित किया है कि बेंच में कोई महिला जज भी नहीं थीं। इस मामले की स्वतंत्र जांच में निहायत सावधानी, संयम और प्रक्रियात्मक पारदर्शिता बरते जाने की जरूरत है। 
    सुप्रीम कोर्ट ने ही तो महिलाओं के सम्मान और गरिमा से जुड़े इतने महत्त्वपूर्ण और दूरगामी फैसले सुनाए हैं और आज जब उसकी अपनी संस्था सवालों के 'कटघरे'  में है तो वो ये कहकर मामले से पल्ला नहीं झाड़ सकता कि न्यायपालिका पर साजिशी कुठाराघात हुआ है।  पाठकों आपको ध्यान होगा इसी सुप्रीम कोर्ट पर अयोध्या मामले और सबरीमाला मामले पर दिए गए फैसलों की वजह से आरोपों और निंदाओं की झड़ी लगा दी गई थी।
     अदालत में विचाराधीन मामलों पर हिंदूवादी गुटों और नेताओं की ओर से कैसे कैसे उग्र बयान आए थे और कोर्ट को क्या क्या नहीं कहा गया था- ये सब पब्लिक डोमेन में है, लेकिन अदालत नहीं डगमगाई, तो क्या उसे अब अपने अंदरूनी संकट के समय अपनी कार्यवाहियों में ढुलमुल सा दिखना चाहिए? ये वक्त उसकी साख और ईमान के कड़े इम्तहान का है।
    जस्टिस गोगोई ही थे जिन्होंने जुलाई 2018 में तीसरी रामनाथ गोयनका व्याख्यानमाला के तहत अपने भाषण में संवैधानिक नैतिकता की सर्वोच्चता पर बल देते हुए कहा था, ''एक संस्था के रूप में न्यायपालिका, सामाजिक भरोसे से संपन्न है। इसी तथ्य ने उसे विश्वसनीय बनाया है और इसी विश्वसनीयता से उसे वैधता दिलाई है। 
    अगर न्यायपालिका अपनी नैतिक और संस्थागत पकड़ बनाए रखना चाहती है तो उसे असंक्रमित (स्वच्छ) बने रहना होगा। उसे हर वक्त स्वतंत्र और तीक्ष्ण बने रहना होगा। जंजीर की मजबूती अपनी सबसे कमजोर कड़ी पर ही निर्भर रहती है।'' (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 24-Apr-2019
  • महाभारत की जटिल कथा और इसके तमाम पात्रों को अपने चेहरे से दर्शकों के मन में उतारने वालीं तीजनबाई का आज जन्मदिन है

    -सुशांत कुमार शर्मा
     
    मशहूर रंगकर्मी बादल सरकार ने कभी सेटरहित मंच की अवधारणा दी थी। माने नाटक खेलने के लिए ऐसा मंच बनाने का सुझाव जिस पर कोई सज्जा या सेट न हो। यह बात लगभग असंभव सी ही लगती है। लेकिन इसी असंभव के बीच आती हैं तीजनबाई। उनकी प्रस्तुति देखकर लगता है कि बादल सरकार की सेटरहित मंच की अवधारणा की सटीक उदाहरण ही नहीं, उस अवधारणा की प्रेरणा भी तीजनबाई स्वयं हैं।
    साधारण परिचय के तौर पर कह दिया जाता है कि तीजनबाई छत्तीसगढ़ की लोकगायन शैली पंडवानी की गायिका हैं। पर कुछ चीजें शुरुआत में ही स्पष्ट कर लेनी चाहिए। पहली कि पंडवानी गायन शैली न होकर गीति-नाट्य शैली है और तीजनबाई इस गीति-नाट्य शैली की पहली महिला कलाकार।
    थोड़ा और प्रयास करते हुए यह कह सकते हैं कि जैसे तीजनबाई और पंडवानी की नाट्य शैली एक मिश्रित कला है ठीक वैसे ही तीजनबाई एक मिश्रित कलाकार हैं। वे स्वयं नायक भी हैं, नायिका भी, गायिका भी, निर्देशिका भी और अभिनेता भी। संवादों की लेखिका (मौखिक) भी हैं और उनके अनुकूल बनी पात्र भी।
    तीजनबाई कभी स्कूल नहीं गईं। वे खुद ही कहती हैं, 'हमारे जमाने में लड़कियों का स्कूल जाना अच्छा नहीं मानते थे, सोचते थे, ऐसे भी खाना ही बना रही है, वैसे भी तो खाना ही बनाएगी, कभी नहीं भेजा गया हमें पढऩे। सो भइया हम ठहरे निरच्छर, अंगूठा छाप।' दर्शकों से राब्ता कायम करते वक्त वे बेहद ईमानदार रहती हैं। कहती हैं, 'आप लोग पढ़े-लिखे हो, कोई भूल-चूक कथा हो जाए, कथा इधर-उधर हो जाए तो माफ कर देना।' अपना परिचय देते हुए कहती हैं, 'हममें भी हर कमी है, चोरी भी की है बचपन में, खाने के लिए करती थी। दरवाजे को खींचकर ऊपर की ओर उठा देना और घुसकर चौके में खा लेना, फिर उसी तरह बंद कर अपने भाई-बहनों के बीच भूखे बने बैठे रहते थे, यही हमारी चोरी थी।' इतनी बड़ी कलाकार होने के बावजूद भी विनम्रता का स्तर ऐसा कि अपनी हिंदी के बारे में तीजनबाई कहती हैं, 'हम ठहरे निरच्छर, हिंदी बहुत टूटी है हमारी, छत्तीसगढ़ी बोलती हूं। तो भईया कौनो गलती होए तो माफ करना...'
    सौंदर्य के सामंती रीतिकालीन प्रतिमानों और अत्याधुनिक जीरो फिगर के सांचे में तीजनबाई नहीं अटतीं। लेकिन उतना ही बड़ा सत्य यह भी है कि तीजनबाई सर्वांग आकर्षण से भरी हुई हैं। उनका आकर्षण ही उनका सौंदर्य है। वो सौंदर्य जो उनकी साधना में बसा है। यह वही सौंदर्य है जो बूढ़े हो चले केलुचरण महापात्र में बालकृष्ण का सा बचपन और बिरजू महाराज जैसे मर्दाना चेहरे में युवती राधा का लावण्य भर देता है। यह वही सौंदर्य है जो 90 वर्ष की सितारा देवी को 16 वर्ष की युवती बनाता रहा है। यूं कहें तो साधना ने इन सभी कलाकारों को उस चरम पर पहुंचा दिया है जहां सौंदर्य की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। वहां नाम ने रूप को अपने अधीन किया है, कला ने सौंदर्य को दासी बना रखा है।
    यही बात तीजनबाई पर भी लागू होती है। आयताकार बड़ा सा भारी-भरकम चेहरा, अपेक्षाकृत मझोली नाक, उनींदी सी छोटी-छोटी आंखें, पतले सुतवां होंठ और पान में सने दांत, आंखों के साम्राज्य को कपाल की सीमा में प्रवेश कराती और चौड़े कपाल के अधिकाधिक क्षेत्र को कब्जे में करती चौड़ी भौंहें, गालों के ऊपर और आंखों के नीचे उठे से दो गोलक जो नाक से विद्रोह कर अपनी ऊंचाई का लोहा मनवाना चाहते हों और असफल से होकर बैठ गए हों। तीजनबाई की मुखाकृति की यही स्थिति है। बहुत सी खाली जगह चेहरे पर मानो यूं लगता है विधाता ने बाईसाहब के चेहरे को चेहरा नहीं बल्कि एक ऐसा सांचा बनाया हो जिसमें भावों के अनुकूल चेहरे भरे और निर्मित किए जा सकें। अगर यह कहा जाए कि महाभारत की जटिल कथा और पात्रों की अधिकता का निष्कर्ष तीजनबाई का चेहरा है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
    मुझ जैसे जिन लोगों ने बचपन में बीआर चोपड़ा का धारावाहिक महाभारत देखा है उनके लिए यह सोचना मुश्किल है कि इस कथा को सेट रहित खाली मंच पर भी उतारा जा सकता है। पर कथा प्रस्तुत करते समय तीजनबाई को देखकर मैंने महसूस किया कि उनकी स्वयं की बनावट और उनका भव्य श्रृंगार उस पूरी महाभारतकालीन भव्यता को मंच पर उतार देने में सक्षम है। उनकी आत्मविकसित प्रतिभा ने उनके अभिनय को ऐसा मांज दिया है कि जब उन्हें भव्यता की आवश्यकता होती है तो अपनी भंगिमा को विस्तार देकर और स्वर को तारसप्तक के निषाद तक ले जाकर वे उसे प्राप्त कर लेती हैं और जहां सादेपन या सूनेपन की आवश्यकता होती है, स्वयं को समेट अपनी सारी भव्यता को समेटकर मंच की उदासी स्वयं पर ओढ़ लेती हैं। ऐसा करते समय उनका स्वर मध्य सप्तक के षड्ज या ऋषभ पर होता है। देखने वालों ने प्राय: ध्यान दिया होगा स्वर जैसे ही तेज होते हैं तीजनबाई इकतारे को एक हाथ में पकड़कर आकाश की ओर उठा देती हैं और दूसरा हाथ दर्शकों की ओर लहरा उठता है। उधर, करुण दृश्य के निर्माण में वे इकतारे को प्राय: कमर से टिकाकर शिशुवत रख लेती हैं और दोनों हाथ जुड़ जाते हैं।
    स्वयं के संकुचन-विमोचन की यह कला, भव्यता एवं सौम्यता के अनुरूप स्वयं को ढालने की कला तीजनबाई ने किसी नाट्यविद्यालय से नहीं सीखी वरन यह कई पीढिय़ों के संचित तप और स्वयं की साधना का परिणाम है। मुझे नहीं लगता कि तीजनबाई से इस पूरी प्रक्रिया की व्याख्या करने को कहा जाए तो वे कर सकेंगी। उनके लिए ये सूक्ष्म अभिनय तत्व हैं। आंगिक अभिनय के नाम पर वे नृत्य नहीं प्रस्तुत करतीं। वे जिस किसी पात्र का नाम लेती हैं, उसके संवाद बोलती हैं, उनका हाव-भाव ठीक उसके अनुरूप हो जाता है। बोलते समय अलग-अलग पात्रों के लिए अलग-अलग पिच का उपयोग वे सहज ही कर जाती हैं। उनके गहने आधुनिक और फैंसी न होकर प्राचीन जड़ाऊ से होते हैं। इनसे जिन कैशिकी वृत्ति (चार नाट्य वृत्तियों में से एक जिसमें शारीरिक चेष्टाओं द्वारा नाटक की शोभा बढ़ाई जाती है।) का निर्माण वे करती हैं, वह आश्चर्य में डाल देता है।
    तीजनबाई के मंच पर विंग्स तक नहीं होते। अलग-अलग भूमिकाओं के लिए अलग-अलग पात्र तो क्या बार-बार विंग में जाकर नई-नई भंगिमाओं के साथ आने की आवश्यकता उन्हें नहीं होती। वे संपूर्ण कथा एवं संपूर्ण पात्रों के साथ अकेली मंच पर आती हैं और पूरी कथा का अभिनय कर जाती हैं। मंच पर लगे दो माइकों के बीच के दो कदम भर के अंतराल में चहलकदमी करती बाईसाहब क्षण-क्षण परिवर्तन को पूरी कथा चलने तक हमारे मनोमस्तिष्क पर अंकित कर देती हैं। क्षण भर का किरदार लेकर उनके चेहरे पर आने वाले भाव सदा के लिए ह्रदय में पैठ जाते हैं।
    तीजनबाई के इस अभिनय में सहायकों की भी अपनी भूमिका होती है जो किसी भी तरह कम नहीं आंकी जा सकती। सबसे पहला सहायक है वह इकतारा। इकतारा एक अद्भुत साज है। एक तो वह सदा संतों के हाथ में दिखता है, दूसरे यह कि उसमें तार दो हैं और नाम इकतारा। अगर अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार उसको एक बिंब बनाऊं तो ऐसा लगता है कि आत्मा और परमात्मा रूपी दो तारों को एकतार करने की प्रेरणा देता है यह इकतारा। संतों के हाथ में वह साज नहीं प्रतीक है स्वयं को ईश्वर से एकतार कर देने का।
    तीजनबाई का इकतारा विशेष है। मोर के पंखों से सजा वह इकतारा मंच पर द्वापर युग का प्रतिनिधि (कृष्ण) है। उसका लाल रंग महाभारत की रक्ताभा और महीन तार उस युग से आज तक के जीवन के शाश्वत स्पंदन का बोध कराते हैं। तीजनबाई को वह इकतारा तीजनबाई तक सीमित नहीं रहने देता, कभी भीम तो कभी अर्जुन, कभी कर्ण तो कभी पितामह भीष्म बनाता रहता है और ठीक इसके एवज में तीजनबाई उसे कभी भीम का गदा और कभी अर्जुन का गांडीव बनाती रहती हैं। वह ऊपर की ओर उठकर भीम का गदा बनता है तो नीचे झुककर दु:शासन का हाथ, जिसे भीम-रूपी तीजनबाई दोनों हाथों से पकड़कर ऐंठती और उखाड़ फेंकती हैं। वह इकतारा साज तो कम ही रहता है, बार-बार पात्र बन जाता है। वह मृत्यु से तो निर्मित ही हुआ है और नियति से एक साज बना है लेकिन इन दोनों द्वारों को पारकर वह निर्जीव इकतारा एक सजीव पात्र बनकर बाई के हाथ में आता है।
    तीजनबाई के साथी कलाकारों में कोरस गाने वाले साजिंदे अपनी एक विशेष स्थिति रखते हैं। युद्ध की गर्जना और तुमुल कोलाहल की वाचिक अभिव्यक्ति की सजीवता में वे बाई के बहुत बड़े पूरक बन जाते हैं। उनमें विशेष हैं हारमोनियम मास्टर, गाने के साथ-साथ मंच पर विदूषक की भूमिका में उनका स्वर होता है। बाई यूं तो वैदुष्य कला में भी माहिर हैं लेकिन हारमोनियम मास्टर का दखल लाजवाब है। बाई जब किसी पात्र को संबोधित करती हैं तो उनका 'काए!' कहना हंसाए बिना नहीं छोड़ता।
    बाई मंच पर हमारे अतीत और गौरव की प्रतिनिधि होती हैं जबकि अन्य कलाकार आज के उपभोक्तावादी एवं फैशनवादी समाज की प्रवृत्ति के नुमाइंदे। बाई की भव्यता जब इन्हें नकारती है तो ऐसा लगता है कि हमारे अतीत का शौर्य एवं पराक्रम, आधुनिकता के इस मशीनीकरण और फैशनधर्मिता को नकार रहे हैं। तीजनबाी दिखाती हैं कि हमारी मूल्य रहित तरक्की हमारे मूल्यवान अतीत के समक्ष कितनी बौनी है। यह वह युक्ति है जो प्रत्येक से यह सवाल करती है, 'बताओ तुम आगे बढ़े हो या तुम्हारा अध:पतन हुआ है?'
    यह तो ज्ञात नहीं कि पंडवानी के वे पद जो तीजनबाई और कलाकार गाते हैं वे पारंपरिक हैं या तीजनबाई के बनाए हुए। यह भी नहीं पता वह गायन शैली पारंपरिक है या बाई की स्वनिर्मित। लेकिन कथा का जो समायोजन जो प्रस्तुति में होता है, वह स्वयं में अद्भुत है। यदि हम चाहें तो बाई की प्रस्तुति को तीन अंकों के नाटक के रूप में लिख और देख सकते हैं। वे आधुनिक असंगत नाटक की तीनअंकीय विधि को अनजाने में ही प्रस्तुत करती हैं।
    पंडवानी की प्रस्तुति में उसके गीतों एवं संवादों की महत्वपूर्ण योजना है। प्राय: हम देखते हैं कि जब भी पुराणकालीन कथा का कार्यक्रम होता है तब उस परिवेश को निर्मित करने के लिए संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का सहारा लिया जाता है। माताश्री, तातश्री जैसे संबोधन और संस्कृत क्रियापदों की योजना से काल का परिवेश निर्मित होता है। लेकिन यह मानना पड़ेगा कि बघेली, छत्तीसगढ़ी आदि भाषाएं अपने किसी विशेष गुण के कारण अपने सामान्य रूप में ही उस परिवेश का निर्माण कर देती हैं। चाहे वो आल्हाखंड हो या पंडवानी, इनकी भाषा वीर रस के बहुत करीब है। प्राय: भोजपुरी को वीर और करुण, ब्रज और अवधी को माधुर्य, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी तथा बघेली को वीर रसों के अनुकूल पाया जाता है।
    भाषा के साथ-साथ उनकी छंद योजना भी काबिल-ए-तारीफ है। जैसा कि हमें ज्ञात है कि आल्हा छंद में 31 मात्राएं हैं। यह चौपाई से एक मात्रा कम लेता है लेकिन 16-16 के बजाए 16-15 का क्रम चौपाई के लालित्य एवं शांत रस को शौर्य एवं वीरता से भर देता है। पंडवानी की छंद शैली भी कुछ ऐसी ही है। चौदह-चौदह मात्राओं के दो चरण और बीच में बहर-ए-तबील जैसी लंबी पंक्तियां एक विशेष योजना का निर्माण करती हैं। लेकिन पंडवानी की प्रस्तुति न तो पूर्णत: छंदबद्ध होती है, न पूर्णत: कथा। बल्कि यह गद्य-पद्य मिश्रित चंपू शैली की नाट्य प्रस्तुति है जिसमें गद्य को पूरी नाटकीयता और पद्य को पूरी गीतिमयता से बरता जाता है।
    अभिनय करते समय बाई की देहयष्टि तरल हो जाती है। माने विभिन्न रूपाकार ग्रहण कर लेने वाली लहराती हुई काया। तीजनबाई भीम बनकर इकतारे को गदा बनाती हैं और जरा सा झुककर उसे यूं आगे की ओर बढ़ाती हैं, जैसे सच में भीम ने रथ के चक्के में गदा अड़ाकर रथ को रोक लिया हो। ठीक वैसे ही इकतारे को कमर पर टिकाकर रखती हैं और हाथ जोड़कर पलभर में अर्जुन बन गईं। त्रिभंगी मुद्रा में खड़ी होकर जरा हौले से मुस्कुरा क्या देती हैं और साक्षात् कृष्ण हो जाती हैं। यह तरल देहयष्टि अभिनय के दौरान अपना स्वरूप बदलती रहती है और कहीं किसी खास क्षण में ठोस होकर जम जाती है। आधुनिक रंगमंच की भाषा में 'फ्रीज' हो जाती है। और उसी मुद्रा में आंखों में हमेशा के लिए स्थित रह जाती है। इस तरह इस गीति-नाट्य की लोक परंपरा का भार पहली बार किसी महिला के रूप में अपने कंधों पर लेने वाली यह कलाकार अपनी प्रस्तुति से तो मंत्रमुग्ध करती ही है, अपनी विनम्रता के प्रदर्शन से भी दर्शकों को गुलाम बना लेती है।
    आज तीजनबाई 62 साल की हो गई हैं। एक अनोखी लोक परंपरा का संरक्षण करती यह कलाकार एक असाधारण मिसाल भी है। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 23-Apr-2019
  • वरिष्ठता के चलते लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह ने ख़ुद के बजाय केएम करिअप्पा को सेनाध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया था

    -अनुराग भारद्वाज
    ठाकुर नाथू सिंह राठौड़ ब्रिटेन की सैंडहस्र्ट रॉयल मिलिट्री एकेडमी से पास आउट होने वाले दूसरे भारतीय ऑफिसर थे जो 3 स्टार रैंक वाले जनरल बने। पहले थे राजेन्द्र सिंह जड़ेजा जो केएम करिअप्पा के बाद सेनाध्यक्ष हुए। ठाकुर नाथू सिंह के साथ यह तथ्य भी जुड़ा हुआ है कि वे ऐसे अधिकारी थे जिन्हें सरकार ने पहला सेनाध्यक्ष बनने का मौका दिया था पर उन्होंने करिअप्पा को अपना वरिष्ठ बताते हुए उनके लिए यह पद छोड़ दिया। नाथू सिंह राठौड़ की शख्सियत में और भी कई रंग हैं जो उन्हें देश के सबसे चर्चित फौजी अफसरों में से एक बनाते हैं।
    ठाकुर साहब के लिए राष्ट्र सेवा से भी बढ़कर राष्ट्र था। बात चौंकाने वाली लग सकती है पर हकीकत यही है। 1921 में सैंडहस्र्ट एकेडेमी में ट्रेनिंग के दौरान ब्रिटिश जनरल ने भाषण देते हुए कहा कि चूंकि अंग्रेज़ लंबे समय के लिए हिंदुस्तान में रहने वाले हैं, इसलिए जो काबिल हैं, वही भारतीय फौज ज्वाइन करें। बताया जाता है कि यह सुनकर नाथू सिंह कमांडेंट के पास गए और कहा कि अगर अंग्रेज भारत नहीं छोडऩे वाले तो वे सेना में कमीशन लेने के इच्छुक नहीं हैं।
    अपने राष्ट्रवादी नजरिए के लिए अकादमी में नाथू सिंह राठौड़ को बागी के तौर पर ही देखा जाता जबकि उनके साथ ट्रेनिंग लेने वाले भारतीय कैडेट्स उन्हें फौजी गांधी कहते। मेजर जनरल वीके सिंह 'लीडरशिप इन इंडियन आर्मीÓ में लिखते हैं कि यह तमगा उन्हें पसंद नहीं था और वे सुभाष चंद्र बोस को पसंद करते थे।
    सैंडहस्र्ट से पास होने के बाद सेकेंड लेफ्टिनेंट नाथू सिंह राठौड़ ने 1/7 राजपूत राइफल्स ज्वाइन की। वे राजपूत थे और राजपूताना (राजस्थान) की डूंगरपुर रियासत से ताल्लुक रखते थे। ख़ुद को ऊंची जाति का मानने के कारण एक बार उन्होंने ऑफिसर्स मेस में अंग्रेजों के साथ खाना खाने से मना कर दिया और इस वजह से उन्हें फौज से बख्र्वास्त किए जाने की नौबत आ गई पर उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और अकादमी में रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें दूसरा मौका दिया गया। फिर इसके बाद कभी कोई शिकायत नहीं आई।
    भारतीय फौज में होते हुए भी नाथू सिंह राठौड़ इंडियन नेशनल कांग्रेस के चोटी के नेताओं से संपर्क में रहे। कहते हैं कि एक दफ़ा उन्होंने मोतीलाल नेहरु से फौज छोड़कर राजनीति में आने की इच्छा जताई पर मोतीलाल ने यह कहकर उन्हें मना कर दिया कि आजादी के बाद देश को सेना के लिए अच्छे अफसरों की जरूरत रहेगी। ध्यान देने की बात है कि जनरल थिमय्या को भी मोतीलाल नेहरू ने यही सलाह दी थी।
    नाथू सिंह फौजी कैप नहीं लगाते थे उन्हें राजपूती साफा पसंद था। इससे जुड़े किस्से को समझने के लिए एक बात बताना जरूरी है। भारतीय सेना में जो अफसर सैंडहस्र्ट से पासआउट होते थे उन्हें किंग्स कमीशंड ऑफिसर(केसीओ) और जो इंडियन मिलिट्री अकादमी से पासआउट थे उन्हें वाइसराय कमीशंड ऑफिसर (वीसीओ) कहा जाता था। वीसीओ को ब्रिटिश अफसर 'साहिब' कहकर बुलाते। एक दफ़ा कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल सर विलियम बर्डवुड गार्ड ऑफ ऑनर ले रहे थे। साफा पहने नाथू सिंह को देख कर बर्डवुड ने कहा 'कैसा है, साहिब?' वे तुरंत जवाब देते हुए बोले, 'बहुत अच्छा है, साहिब'। जब उनको बताया गया कि नाथू सैंडहस्र्ट से पासआउट हैं तो गलती सुधारते हुए वे बोले- 'हाउ आर यू, मिस्टर नाथू सिंह?' नाथू ने फिर जवाब दिया: 'वैरी वेल, सर'
    आजादी के बाद उन्हें कुरुक्षेत्र में शरणार्थी शिविर की देखभाल करने का जिम्मा मिला जहां तकरीबन 20000 शरणार्थी रह रहे थे। एक दिन यहां निरीक्षण पर आईं एडविना माउंटबेटन उनके काम से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने महात्मा गांधी को यह कैंप देखने का न्यौता दिया। नाथू सिंह राठौड़ ने गांधी से उस ऐतिहासिक मुलाकात में कई सवाल पूछ लिए, मसलन उनका अहिंसा का सिद्धांत इस माहौल में कैसे काम करेगा? 1921 में उन्होंने (गांधी) किस आधार पर कहा था कि एक साल में आजादी मिल जाएगी। क्यों नहीं मिली? बताते हैं गांधी के पास कोई उत्तर नहीं था।
    1946 में तत्कालीन ब्रिटिश कमांडर औचिनलेक ने नाथू सिंह राठौड़ को पहला कमांडर इन चीफ बनाने का प्रस्ताव दिया था। जब तत्कालीन रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह ने उन्हें यह सूचना दी तो उन्होंने कहा कि वे इस पद को पाकर यकीनन ख़ुशकिस्मत समझेंगे पर वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। पूछने पर उन्होंने बताया कि लेफ्टिनेंट जनरल करिअप्पा उनसे कुछ महीने वरिष्ठ हैं और काबिल भी। संभव है उन्हें उम्मीद रही हो कि उन्हें अगला सेनाध्यक्ष बनाया जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ और वे लेफ्टिनेंट जनरल के पद से रिटायर हो गए।
    राष्ट्रवादी नाथू सिंह ने देश और सेना के विभाजन पर बड़ी बेबाक राय दी। बलदेव सिंह को लिखे पत्र में कहा कि देश का विभाजन भारत मां के बलात्कार समान है। सेना के मुल्कों में बांटे जाने पर उन्होंने लिखा कि इससे कुछ ही सालों में देश में गृह युद्ध के हालात पैदा हो जाएंगे। जनरल वीके सिंह लिखते हैं कि उन्होंने नेहरू और अन्य नेताओं द्वारा विभाजन के मसले पर सेना की राय न लेने के लिए उन्हें कभी माफ नहीं किया।
    नाथू सिंह राठौड़ और जवाहरलाल नेहरू के बीच रिश्ते कभी सामान्य नहीं थे। फिर चाहे वह कश्मीर का मुद्दा रहा हो या सेना का भारतीयकरण। 1948 में जब कश्मीर में कबायलियों का आक्रमण हुआ तो उन्होंने नेहरू को लाहौर पर आक्रमण करने का सुझाव दिया। नाथू सिंह का मानना था कि इस सूरत में पकिस्तान सरकार समझौता करने पर मजबूर हो जाएगी। नेहरू ने उनके सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया। वीके सिंह लिखते हैं कि 1965 की भारत-पाक लड़ाई में लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय सेना के इसी प्लान को मंज़ूरी दी थी और यह कामयाब हुआ था। जब सेना लाहौर से कुछ ही किलोमीटर दूर रह गई तो घबराकर पाकिस्तान ने युद्ध विराम की अपील कर दी थी।
    जवाहरलाल नेहरू ने कई दफा फौज के आधुनिकीरण और सशक्तिकरण की बात तो कही थी पर वास्तव में इसके कोई संजीदा प्रयास नहीं किये थे। शायद उन्हें लगता था कि लोकतंत्र में फौज को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए। पकिस्तान के सैन्य इतिहास के जानकार परवेज हुडबॉय कहते हैं कि भारतीय कमांडर इन चीफ के बंगले को अपना आधिकारिक निवास बनाना इस बात को दर्शता है कि नेहरू लोकतांत्रिक ढ़ांचे में फौज को किस स्थान पर रखना चाहते थे। नेहरू का नजरिया पूर्णतया गलत नहीं था। दक्षिण एशिया और अफ्रीका के मुल्कों में आजादी के कुछ समय बाद लोकतांत्रिक सरकारों के तख्ता के बाद फौजी शासन लागू हो गए थे। पर सेना की हद तक की अनदेखी भी उचित नहीं। चीन से हुए युद्ध में हमारी हार इसकी मिसाल कही जा सकती है।
    नाथू सिंह राठौड़ और जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा एक बड़ा मशहूर वाकया है। एक उच्चस्तरीय बैठक में ये दोनों मौजूद थे। नेहरू ने सेना में पेशेवर भारतीय अफसरों की कमी के चलते पाकिस्तान की तरह ब्रिटिश अफसरों की मौजूदगी बरकरार रखने का का प्रस्ताव दिया। नाथू सिंह ने तुरंत कहा कि जो भारतीय अफसर इस मीटिंग में मौजूद हैं उन्हें 25 वर्षों का फौजी अनुभव है और वे वरिष्ठ पदों को सुशोभित कर सकते हैं। आगे उनका कहना था, 'और रही बात तजुर्बे की, तो क्या आपको प्रधानमंत्री बनने का तजुर्बा है?' मीटिंग में सन्नाटा छा गया। पर अंतत: नेहरू का प्रस्ताव ही स्वीकार किया गया था।
    इतिहास गवाह है कि कश्मीर युद्ध के दौरान भारतीय सेना के तत्कालीन अध्यक्ष रॉय के बुचर, जो कि ब्रिटिश नागरिक थे, ने पाकिस्तान सेना के खिलाफ लडऩे से मना कर दिया था क्योंकि उधर भी अंग्रेज अफसर ही थे। इसी प्रकार जब सरदार पटेल ने हैदराबाद पर कार्रवाई करने का आदेश दिया था तो तब भी बूचर ने आनाकानी की थी। यह अलग बात है कि टेल के आगे उनकी नहीं चली।
    नाथू सिंह राठौड़ को लैंडरोवर कार बड़ी पसंद थी। उनके बेटे लैंडरोवर को सड़क के रास्ते यूरोप से भारत लाये। पाकिस्तान सीमा में घुसने से पहले उन्हें रोक दिया गया। तब नाथू सिंह ने अपने दोस्त पाकिस्तानी जनरल अयूब खान को फोन किया। जब तक गाड़ी पाकिस्तानी सीमा में रही, अयूब ने उसके साथ मिलिट्री की पायलट जीप को चलने का निर्देश दिया। आज के दौर की बात होती तो कई नाथू सिंह को देशद्रोही कह देते कि वे पाकिस्तानी जनरल के दोस्त हैं।
    खैर, इस किस्से को समेटा जाए। ठाकुर साहब के बागी और बेबाक तेवर अफसरों को कम पसंद आते थे और इस वजह से वे सेना की सर्वोच्च कुर्सी पर नहीं बैठ सके, जबकि ब्रिटिश कमांडर औचिनलेक के वे सबसे पसंदीदा भारतीय अफसर थे और उन्होंने ही 'बागी' नाथू सिंह को कमांडर इन चीफ बनाने का सुझाव दिया था। अंग्रेजों का सेंस ऑफ जस्टिस बेहद कमाल का था। हिंदुस्तान में अब तो सुदर्शन फाकिर की गजल का शेर मौज़ूं होता है, 'मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक में फैसला देगा।' (सत्याग्रह)
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Posted Date : 22-Apr-2019
  • -हिमांशु शेखर

    फिलहाल यह तय हुआ है कि जननायक जनता पार्टी हरियाणा की दस में से सात सीटों पर चुनाव लड़ेगी और आम आदमी पार्टी तीन सीटों पर।
    आम आदमी पार्टी और जननायक जनता पार्टी का गठबंधन हरियाणा की राजनीति पर क्या असर डाल सकता है? हरियाणा में आम आदमी पार्टी (आप) ने प्रदेश की बिल्कुल नए राजनीतिक दल जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के साथ गठबंधन किया है. गठबंधन में शामिल इन दोनों दलों ने यह तय किया है कि जेजेपी हरियाणा की दस में से सात सीटों पर चुनाव लड़ेगी और दिल्ली प्रदेश की सत्ताधारी आप तीन सीटों पर. कौन सी पार्टी किस सीट पर चुनाव लड़ेगी, यह अभी तय नहीं हो पाया है.
    हरियाणा में हुए इस गठबंधन को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं. पहले आप यह चाह रही थी कि हरियाणा में उसका कांग्रेस के साथ गठबंधन हो जाए. लेकिन बात नहीं बनी. आम आदमी पार्टी को लगता है कि दिल्ली और पंजाब के बाद अगर किसी राज्य में उसके लिए सबसे अधिक राजनीतिक संभावनाएं हैं तो वह हरियाणा ही है. ऐसे में वह पिछले काफी समय से हरियाणा में पैर जमाने की कोशिश कर रही है.
    आप नेताओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि पार्टी हरियाणा में इस बार कम से कम खाता खोलना चाहती है. आप को यह भी लगता है कि अगर लोकसभा चुनावों में उसका सम्मानजनक प्रदर्शन रहा तो वह नवंबर-दिसंबर, 2019 में होने वाले हरियाणा विधानसभा चुनावों के लिए प्रदेश के किसी प्रमुख दल के साथ और सम्माजनक गठबंधन में शामिल होने के अवसर तलाश सकती है और नई राज्य सरकार में गठबंधन के सहारे ही उसकी हिस्सेदारी कायम हो सकती है.
    दूसरी तरफ ओमप्रकाश चौटाला के इंडियन नेशनल लोक दल से निकली जननायक जनता पार्टी है. ओमप्रकाश चौटाला के पोते और लोकसभा सांसद दुष्यंत चौटाला इस पार्टी के कर्ता-धर्ता हैं. इसका गठन हाल ही में हुआ है. लेकिन हरियाणा में विधानसभा की एक सीट के लिए हुए उपचुनाव में इस पार्टी ने अपना दम दिखाया. दुष्यंत चौटाला की सभाओं में काफी लोग आ रहे हैं. कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि पूरे हरियाणा में युवाओं के बीच सबसे लोकप्रिय नेता दुष्यंत चौटाला हैं. वे किसानों की बदहाली के मुद्दे को बेहद प्रभावी ढंग से लगातार उठा रहे हैं.
    दरअसल, आप और जेजेपी ने गठबंधन तो कर लिया है, लेकिन अभी कोशिशें इस बात की भी चल रही हैं कि इस गठबंधन में कांग्रेस को भी शामिल कर लिया जाए. अभी हरियाणा में स्थिति यह है कि चार प्रमुख राजनीतिक ताकतें मैदान में हैं. एक केंद्र और प्रदेश की सत्ताधारी भाजपा है तो दूसरी कांग्रेस. प्रदेश की तीसरी ताकत इंडियन नेशनल लोक दल है और चौथी ताकत के तौर आप और जेजेपी का गठबंधन है.
    राजनीतिक जानकार यह भी मान रहे हैं कि अगर कांग्रेस इस गठबंधन में नहीं शामिल हुई तो पूरी ताकत लगाकर आप और जेजेपी यह कोशिश करेंगे कि उनके गठबंधन को इंडियन नेशनल लोक दल से अधिक वोट मिलें. इसका मतलब यह हुआ कि यह गठबंधन इंडियन नेशनल लोक दल को पीछे छोड़कर प्रदेश में तीसरी ताकत बनना चाहता है. ऐसी स्थिति में इस गठबंधन को लोकसभा चुनावों में तो कोई खास फायदा नहीं होगा, लेकिन कुछ ही महीने बाद हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनावों में उसके लिए सकारात्मक स्थिति बन सकती है.
    विधायकी के चुनावों में क्षेत्र छोटा होने का फायदा इस गठबंधन को कुछ विधानसभा सीटों पर जीत के रूप में मिल सकता है. इसके अलावा लोकसभा के प्रदर्शन के आधार पर वह विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस पर हाथ मिलाने का दबाव बना सकता है. आप के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल को यह भी लगता है कि अगर उनकी पार्टी हरियाणा में मजबूत होती है तो इसका फायदा उन्हें आठ-नौ महीने के अंदर दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी मिल सकता है.
    कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि लोकसभा चुनावों में आप और जेजेपी गठबंधन की वजह से सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोक दल को हो सकता है. क्योंकि यह माना जा रहा है कि यह गठबंधन सत्ताविरोधी माहौल का फायदा उठाकर विपक्षियों के वोट में ही सेंध लगाने का काम करेगा. अगर ऐसा होता है तो इसका सबसे अधिक फायदा भाजपा को होगा और 2014 की तरह एक बार फिर से हरियाणा में वह बेहतरीन प्रदर्शन दोहरा सकती है.
    हालांकि, इस गठबंधन के अलग चुनाव लडऩे से विपक्षी वोटों में बिखराव का अहसास कांग्रेस को भी है. यही वजह है कि कांग्रेस की ओर से अब भी इसके साथ किसी तरह के गठजोड़ की संभावनाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई. कांग्रेसी सूत्र बता रहे हैं कि इस दिशा में बातचीत चल भी रही है. कुल मिलाकर देखें तो यह गठबंधन अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी कितनी बढ़ा पाएगा यह तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह साफ दिख रहा है कि कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोक दल की स्थिति को कमजोर करने का काम वह जरूर करेगा. (सत्याग्रह)

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Posted Date : 22-Apr-2019
  • सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर उनकी पूर्व जूनियर असिस्टेंट ने यौन उत्पीडऩ के आरोप लगाए हैं। जस्टिस गोगोई आने वाले कुछ दिनों में कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई करने वाले हैं।
    सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील डॉक्टर सूरत सिंह का कहना है कि क्योंकि चीफ़ जस्टिस अगले कुछ दिनों में कई अहम मुद्दों पर सुनवाई करने वाले हैं, ऐसे में ये उनके लिए किसी लिटमस टेस्ट से कम नहीं होगा।
    सूरत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट से रिपोर्टिंग करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहंती को बताया, आने वाला समय मुश्किल भरा होगा और सीजेआई मोदी की बायोपिक से लेकर राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि के मामले और चुनाव संबंधी मामलों पर सुनवाई करेंगे और ये उनके लिए लिटमस टेस्ट होगा।
    पूर्व जूनियर असिस्टेंट के यौन उत्पीडऩ के आरोप की खबर कुछ वेबसाइट्स पर प्रकाशित होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में शनिवार को तीन जजों की बेंच बैठी थी।
    अवकाश होने के बावजूद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना की तीन जजों की बेंच ने मामले पर गौर किया।
    यौन उत्पीडऩ के आरोप पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहुत गंभीर खतरे में हैं और यह न्यायपालिका को अस्थिर करने की एक बड़ी साजिश है। 
    चीफ जस्टिस का कहना था कि यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाने वाली महिला के पीछे कुछ बड़ी ताकतें हैं। उन्होंने कहा कि अगर न्यायाधीशों को इस तरह की स्थिति में काम करना पड़ेगा तो अच्छे लोग कभी इस ऑफिस में नहीं आएंगे।
    जस्टिस गोगोई पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फे्रंस करने वाले चार न्यायाधीशों में शामिल थे। उस वक्त भी जस्टिस गोगोई सहित चारों न्यायाधीशों ने आरोप लगाया था कि न्यायपालिका पर बहुत दबाव है।
    भारतीय जनता पार्टी की सांसद मीनाक्षी लेखी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के रफाल डील को लेकर दिए एक बयान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की है।, चौकीदार चोर है, के बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को नोटिस जारी किया है। राहुल गांधी को इस मामले में सोमवार तक जवाब देना है। मामले की अगली सुनवाई मंगलवार यानी 23 अप्रैल को होनी है।
    याचिकाकर्ता मीनाक्षी लेखी का कहना है कि राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ, चौकीदार चोर है, 30 हजार करोड़ रुपये दिए ...जैसे बयान देते रहे हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कभी इन शब्दों का इस्तेमाल किया ही नहीं।
    एक अन्य बेहद अहम मामला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक पर चुनाव आयोग की रोक के खिलाफ फिल्म के निर्माता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। चीफ जस्टिस गोगोई इस मामले की सुनवाई कर सकते हैं।
    चीफ जस्टिस गोगोई तमिलनाडु में कथित तौर पर चुनावों को प्रभावित करने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर मतदाताओं को पैसे बांटने के मामले पर दायर याचिका की भी सुनवाई करेंगे।
    सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते इस मामले में चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। इस मामले की सुनवाई 22 अप्रैल को हो सकती है। इसके अलावा चीफ जस्टिस गोगोई जनहित से जुड़ी याचिकाओं पर भी सुनवाई कर सकते हैं।
    चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने यौन उत्पीडऩ के आरोप पर कोई आदेश पारित नहीं किया और मीडिया से न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संयम बरतने के लिए कहा। चीफ जस्टिस ने कहा कि ये आरोप बेबुनियाद हैं। चीफ जस्टिस ने कहा कि जिस महिला ने कथित तौर पर उन पर आरोप लगाए हैं वो आपराधिक रिकॉर्ड की वजह से चार दिनों के लिए जेल में थीं और कई बार उन्हें अच्छा बर्ताव करने को लेकर पुलिस से हिदायत भी दी गई थी।
    वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने सोशल मीडिया पर लिखा था, एक महिला ने गंभीर आरोप लगाए हैं। जैसा कि मैंने प्रेस में छपी खबरों में पढ़ा हैं उन्होंने अपनी शिकायत सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दी है। स्वाभाविक रूप से, इन आरोपों को सत्यापित किया जाना बाकी है। उन्होंने लिखा था, शिष्टता की मांग थी कि भविष्य में कार्रवाई के निर्धारण के लिए पहले अवर न्यायाधीशों की एक बेंच गठित की जाती। अप्रत्याशित सुनवाई में साजिश की बात करके आपने वास्तव में इस शिकायत को बंद कर उस संस्था की स्वतंत्रता से समझौता किया है जिसके प्रमुख स्वयं आप हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 22-Apr-2019
  • -वुसअतुल्लाह खान
    जिसने मुझे कोई नुकसान पहुंचाया या रंज दिया उसे मारना या उसके हाथों मर जाना तो फिर भी समझ में आता है। कमरे में बंद होकर या खुले में आत्महत्या करना भी समझ आता है कि जहर खाने, पंखे से लटकने या खुद को गोली मारने का कोई कारण होगा। ऐसा कारण जो जरूरी नहीं कि मेरी और आपकी समझ में भी तुरंत आ जाए।
    मगर ऐसे इंसानों को मारना जिन्हें न आप और न ही वो आपको जानते हों, वो जवान, बच्चे, बूढ़े और महिलाएं जो न आपसे कभी मिले, न मिलेंगे। इन सबके लिए ये चाहना कि वो सब भी मेरे साथ मर जाएं और कितना अच्छा हो कि मेरे ही हाथों मरें। और फिर इस मौत में भी अपने लिए स्वर्ग और जिन्हें मैं मार रहा हूं, उन्हें नरक भेजने का फैसला भी खुद ही करना। पागलपन की अगर कोई भी आखिरी सीमा हो सकती है तो इसके अलावा और क्या होगी।
    आत्मघाती या मेरे दिमाग़ को आत्मघाती बारूद में बदलने वाला, दोनों की असल जगह मानसिक रोगों को अस्पताल या कोई बंदीखाना है। मगर पता तब चलता है जब पता चलने का कोई फायदा ही न हो।
    मुझे सब्र आ जाए अगर आत्मघाती सिर्फ खुद को या आसपास के लोगों की मौत का ही कारण बन जाए। मगर ऐसी घटनाओं में सिर्फ हत्यारा और बेगुनाह इंसान और इमारतें थोड़ी खत्म होती हैं।
    ऐसी घटना में एक नस्ल का दूसरी नस्ल पर से, एक धर्म का दूसरे धर्म पर से, एक देश का दूसरे देश पर से और एक समाज का दूसरे समाज पर से मामूली विश्वास भी धीरे-धीरे उठता चला जाता है। और आखिर में एक जंगल और इस जंगल में सिर्फ भेडिय़े बचते हैं और वो एक-दूसरे को खाना शुरू कर देते हैं। पर ये कैसे हो सकता है कि श्रीलंका में इतने इंसानों के चीथड़े उडऩे का किसी को फायदा ही न पहुंचा हो? हर ऐसी घटना खून की वो बोतल है जो हर तरह के अतिवाद को एक नया जोश, नई जिंदगी देती है और उसकी उम्र बढ़ा देती है।
    भले ही वो मुसलमान, सिंहल, हिंदू जायनिस्ट या बर्मी बौद्ध अतिवादी हों, बहुमत को अल्पसंख्यक के भूत से डराने का कारोबार करने वाला हो या फिर इस संसार में बर्मा, रवांडा और बोस्निया में नरसंहार का बाजार लगाने वाला।
    शिंजियांग के वीगर नस्ल के लोगों को नई शिक्षा के नाम पर कैंपों में धकेलने वाला कोई चीनी कर्मचारी हो, कालों को जिंदा जलाने के बारे में सोचने वाला कोई गिरोह हो, अपने सिवा किसी भी दूसरे मुसलमान को काफिर समझकर मार डालने वाला जिहादी हो या फिर सोशल मीडिया के डिजिटल आतंकवादी...
    सब के सब किसी एक व्यक्ति या गुट के किए गए इस भयंकर जुर्म का अपने-अपने तौर पर लाभ उठाते हैं और यूं नफरत का झाड़-झंखाड़ ऑर्गैनिक अंदाज में फैलता ही चला जाता है। मगर इनमें से कोई भी मंगल से इस पृथ्वी पर नहीं उतरा। ये सब हममें से हैं, हमारे आसपास ही हैं, हमारे अपने दिमाग में छिपे हुए हैं। और मांग हमारी ये है कि सरकार कुछ करे। 
    क्या बात है हमारी और आपकी इस मांग की। अल्लाह-अल्लाह, सुबहान अल्लाह! (बीबीसी)

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Posted Date : 21-Apr-2019
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर ख़ुद को 'पिछड़ाÓ बताया है।  महाराष्ट्र में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'कांग्रेस और उसके साथी दलों ने मुझे कई बार गालियां दी हैं। क्योंकि मैं एक पिछड़े वर्ग से आता हूं। लेकिन इस बार उन्होंने मुझे गाली देते-देते पूरे पिछड़े समुदाय को 'चोरÓ बता दिया है।Ó नरेंद्र मोदी के इस बयान के बाद यह बहस फिर छिड़ गई है कि वे पिछड़े समाज से आते हैं या नहीं।

    2014 से पहले कभी भी ख़ुद 
    को पिछड़ा नहीं बताया

    जानकार सवाल उठाते हैं कि बतौर नेता नरेंद्र मोदी को अपनी पिछड़ी जाति का ध्यान 2014 के आम चुनाव से क्यों आया। जाने-माने बुद्धिजीवी व दलित चिंतक कांचा इलैया कारवां पत्रिका में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखते हैं, 'गुजरात के 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में मोदी ने ख़ुद को पिछड़ा दिखाने में कोई फायदा नहीं समझा। तब उन्होंने ख़ुद को एक बनिये के रूप में पेश किया। चूंकि बनिया समुदाय देश का अब तक का सबसे ताकतवर औद्योगिक और व्यापारिक समुदाय है, (इसलिए) उसने मोदी को अपने में से ही एक माना और उनका स्वागत दोनों बाहें फैलाकर किया। यह सिर्फ 2014 के आम चुनावों के दौरान हुआ कि मोदी को अचानक अपने पिछड़े होने का ख्याल आया।'
    कांचा इलैया जैसे अन्य कई जानकारों के मुताबिक नरेंद्र मोदी जिस मोध घांची समाज से आते हैं, उन्हें गुजरात में पिछड़ा या नीची जाति नहीं समझा जाता। वे वर्ण व्यवस्था के हवाले से कहते हैं कि इसमें पिछड़े समाज के लोगों को पढऩे की मनाही होती है, जबकि मोध घांची समुदाय पारंपरिक रूप से साक्षर रहा है। यह बात भी गौर करने वाली है कि जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं तो पिछड़ी जातियों की सूची में मोध घांची समुदाय को शामिल नहीं किया गया था। यह काम 1994 से 1999 के बीच हुआ। यह बात इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि हाल के बरसों में सामाजिक रूप में मजबूत समुदायों (जाट, पाटीदार, मराठा आदि) में ख़ुद को ओबीसी में शामिल कराने की होड़ देखने को मिली है।

    'हम तेली, ठाकुरों के बाप हैं'
    नरेंद्र मोदी भले ही खुद को पिछड़ा बताएं, लेकिन उनके भाई प्रह्लाद मोदी कहते रहे हैं कि वे तेली समाज से हैं। साल 2018 में उन्होंने तेली समाज के इतिहास के बारे में बताते हुए कहा था कि वे और महात्मा गांधी इसी समाज के हैं। वहीं, हाल में उन्होंने छत्तीसगढ़ में फिर इस बात को दोहराया। प्रह्लाद मोदी ने कहा, 'महात्मा गांधी ने देश को स्वतंत्रता दिलाई। वे भी तेली थे। आज देश को खा जाने वालों के एक परिवार (गांधी परिवार) को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए कोई (नरेंद्र मोदी) आया है, वह भी एक तेली का बेटा है। हम ठाकुरों के बाप हैं। जिस दिन हमारी मानसिकता पलट जाएगी सब ठीक कर देंगे।Ó
    प्रह्लाद मोदी के इस बयान को मोध घांची समाज के पारंपरिक काम से देखे जाने की जरूरत है। ये लोग तेल बनाने और बेचने के व्यापार के लिए जाने जाते हैं। वर्ण व्यवस्था के हिसाब से देखें तो यह काम करने का अधिकार वैश्य समाज के लोगों के पास है। यानी भले ही मोध घांची समाज को 1999 में गुजरात में ओबीसी का दर्जा मिल गया था, लेकिन उनका सामाजिक दर्जा कभी भी पिछड़ा नहीं था। (सत्याग्रह ब्यूरो)

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Posted Date : 21-Apr-2019
  • - डॉ. दिनेश मिश्र
    देश में अब कुछ समय बाद मतदान  का अगला चरण होने वाला है, इस चुनावी माहौल में नई सरकार बनने की अटकलें भी शुरू हो रही हैं इन सब में सबसे जरूरी बात होती है मतदान करना अपने मत के अधिकार का प्रयोग करना। इस चुनाव में लाखों मतदाता ऐसे हैं जो पहली बार किसी चुनाव में अपने मतों का दान करेंगे और अपने पसंद के उम्मीदवार को जीते जीतने का मार्ग प्रशस्त करेंगे, इसलिए यह आवश्यक है कि हर मतदाता को सोच-समझ कर अपने मत मत देने के अधिकार का प्रयोग करना चाहिए ताकि नई सरकार बनने में उनका भी योगदान रहे। 
    पिछले कई चुनावों में यह देखा गया है कि अनेक क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत आधे से भी कम रहा है जबकि इस दिन शासकीय तौर पर छुट्टी भी होती है तथा बूथों की संख्या बढऩे से अब इतनी लंबी लाइन भी नहीं होती कि किसी व्यक्ति को घंटों खड़े होकर लंबा इंतजार करना पड़़े इसलिए मताधिकार का उपयोग जरूर करना चाहिए। 
    कई बार यह भी देखने में आया है कि छुट्टी घोषित होने पर अनेक  व्यक्ति सैर सपाटा और पिकनिक चले जाते हैं तो कुछ लोग मतदान करने की बजाए दूसरे काम को आवश्यक  मानकर उसे पूरा करने लग जाते हैं जिसके फलस्वरूप मतदान का प्रतिशत गिर जाता है,जबकि एक मतदाता को मतदान करने की सुविधा प्रदान करने के लिए शासकीय कर्मचारियों की पार्टी  कड़ी मेहनत करती हैं। अलग-अलग स्थानों से कर्मचारी पुलिस अधिकारी मतदान के सुचारू रूप से संचालन के लिए आते हैं। कई स्थानों पर तो उन्हें जान का खतरा भी होता है और कई बूथों तक पहुंचने  के लिए तो उन्हें मीलों पैदल भी चलना पड़ता है।  एक वोटर अपना वोट देने के लिए तो सिर्फ उसी दिन कुछ समय जा रहा होता है, पर इस पूरी प्रक्रिया के लिए बहुत सारे कर्मचारी 3 -4 दिनों की ड्यूटी निभाते हैं। 
    मतदान का सामान लेकर जाना पोलिंग करवाना और उसके बाद  सारा सामान सुरक्षित जमा करना बहुत जिम्मेदारी का काम होता है, इसलिए हर वोटर को अपनी जिम्मेदारी निभाना चाहिए और वोट देने जाना चाहिए। कई देशों में तो मतदान को अनिवार्य घोषित कर दिया गया तथा यदि कोई व्यक्ति मत नहीं दे पाता है जो उसे बाकायदा फार्म भरकर के कारण बताना पड़ता है तब उसके लिए अलग से पोलिंग की व्यवस्था की जाती है और यदि मतदान नहीं देने का कारण संतोष प्रद नहीं पाया जाता तो उस व्यक्ति पर कार्यवाही  हो जाती है। कुछ स्थानों पर तो ऑनलाइन वोटिंग शुरू हो गई है।  वोटिंग का रेट बढ़ाने के लिए यह भी एक अच्छा विकल्प है क्योंकि अब हमारे देश में भी बहुत सारे युवा नेट का तथा ऑनलाइन सुविधाओं का उपयोग करते हैं। बैंकिंग हो या किसी प्रतियोगिता का फॉर्म भरना है ऐसी बहुत सारी स्थानों पर ऑनलाइन सुविधाएं उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं उसी प्रकार यदि वोटिंग ऑनलाइन होने लगे तो भी मतदान के प्रतिशत बढ़ जाएगा। जो लोग वोटिंग के दिन से अपने शहर से किसी कारण से बाहर हैं तो भी इस विकल्प का उपयोग करके अपने पसंद के प्रत्याशी को वोट दे सकते हैं। 
    सरकार एवं चुनाव आयोग को इस विकल्प पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि किसी स्थान पर 25 से 30 परसेंट तक ही वोटिंग होती है और कहीं कहीं 50 फीसदी ही पोलिंग होती है और इसमें से जो प्रत्याशी 25-30 परसेंट वोट पाता  है और विजयी हो जाते हैं जो कि सही नहीं कहा जा सकता। उसी प्रकार मतदान का प्रतिशत कम ज्यादा होने से किसी किसी स्थान पर 20 से 25000 वोट पाने वाला व्यक्ति जीत जाता है तो कहीं दूसरी तरफ वोटिंग  में फर्क होने से 45 -50 हजार वोट पाने वाले व्यक्ति हार जाता है। इसलिए चुनाव आयोग को यह स्पष्ट निर्देश  जारी करना चाहिए कि कोई प्रत्याशी को चुनाव जीतने के लिए कम से कम निश्चित मत आवश्यक है, नहीं तो उस जगह का चुनाव रद्द कर दिया जाएगा। इससे भी प्रत्याशी अपने अपने क्षेत्रों में वोटिंग का प्रतिशत बढ़ाने के लिए गंभीरता से कार्य  करेंगे। 
     (वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ एवं अध्यक्ष अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति)

     

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Posted Date : 21-Apr-2019
  • -दिव्या आर्य

    भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने एक तीन सदस्यीय बेंच के साथ शनिवार को खुद पर लगे यौन उत्पीडऩ के आरोपों की सुनवाई की और इन आरोपों को गलत बताया। कई महिला वकीलों ने इस तरह की सुनवाई को यौन उत्पीडऩ की शिकायत के लिए तय प्रक्रिया का उल्लंघन बताया है।
    वहीं सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने उसी प्रक्रिया का हवाला देते हुए चिंता जताई कि उत्पीडऩ के मामले में लोगों के नाम सार्वजनिक करना मना है पर यहां उन्हें सार्वजनिक किया गया। गोगोई के लिए काम कर चुकीं उनकी जूनियर असिस्टेंट ने उन पर यौन उत्पीडऩ के आरोप लगाए हैं जिन्हें कुछ पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया है। महिला ने सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को चि_ी लिखकर इन आरोपों की जांच के लिए विशेष कमिटी के गठन की मांग की है।
    आरोपी के तौर पर मुख्य न्यायाधीश का नाम सार्वजनिक करना, मुख्य न्यायाधीश का अन्य दो जजों के साथ बैठकर आदेश पारित करना और सुप्रीम कोर्ट में यौन उत्पीडऩ की शिकायतों की सुनवाई करने के लिए कमेटी होने के बावजूद पीडि़ता की विशेष कमेटी की मांग करना कितना जायज है?
    यौन उत्पीडऩ की रोकथाम के लिए बनाए गए कानून, सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) 2013 में यौन उत्पीडऩ की परिभाषा और ऐसे मामलों की सुनवाई के बारे में स्पष्ट निर्देश हैं।
    किसी के मना करने के बावजूद उसे छूना, छूने की कोशिश करना, यौन संबंध बनाने की मांग करना, सेक्सुअल भाषा वाली टिप्पणी करना, पोर्नोग्राफी दिखाना या कहे-अनकहे तरीके से बिना सहमति के सेक्सुअल बर्ताव करना यौन उत्पीडऩ है। अगर ऐसा बर्ताव काम की जगह पर हो या काम करने के संदर्भ में हो तो उसकी शिकायत वहां बनी, इंटर्नल कम्प्लेंट्स कमेटी, में की जानी चाहिए।
    कानून के सेक्शन 16 के मुताबिक शिकायत की सुनवाई के व़क्त दोनों पार्टियों की पहचान गुप्त रखी जानी चाहिए। मौजूदा मामले में ऐसी किसी कमेटी ने सुनवाई फिलहाल शुरू नहीं की है।
    वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर के मुताबिक, सेक्शन 16 के प्रावधान को इस कानून के उद्देश्य (महिलाओं के उत्पीडऩ की रोकथाम) को ध्यान में रखते हुए पढऩा चाहिए, कानून और पब्लिक पॉलिसी ये मानती है कि प्रताडऩा से बचाने के लिए औरत की पहचान छिपाना जरूरी है। इस प्रावधान का उल्लेख, अभियुक्त की पहचान छिपाने के संदर्भ में करने को वो बेतुका बताती हैं।
    कानून के मुताबिक दस से ज़्यादा कर्मचारियों वाले हर संस्थान के लिए एक, इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी, बनाना अनिवार्य है जिसकी अध्यक्षता एक सीनियर महिला करे, कुल सदस्यों में कम-से-कम आधी महिलाएं हों और एक सदस्य औरतों के हक में काम कर रही किसी गैर-सरकारी संस्था से हो। मौजूदा मामले में काम की जगह सुप्रीम कोर्ट है जहां, इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी, मौजूद है जिसके सभी सदस्य मुख्य न्यायाधीश से जूनियर हैं।
    किसी भी प्रशासनिक जांच के निष्पक्ष होने के लिए ये जरूरी है कि जांच करने वाला व्यक्ति आरोपी से पद के मामले में नीचे न हो इसीलिए शिकायत करने वाली महिला ने रिटायर्ड जजों की विशेष जांच कमेटी के गठन की मांग की है।
    ऐसी किसी कमेटी के गठन से पहले ही मुख्य न्यायधीश ने अपनी अध्यक्षता में आज इस मामले की सुनवाई की है। दिल्ली हाई कोर्ट में वरिष्ठ वकील रेबेका मेमन जॉन इसे, एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी कदम, बताते हुए कहती हैं कि मुख्य न्यायाधीश पर भी वही कायदे लागू होने चाहिए जो आम नागरिकों पर होते हैं।
    बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ऐसी सुनवाई कर हम कानून के मूल सिद्धांत को भूल रहे हैं कि आप अपने मामले में खुद जज नहीं हो सकते, हर शिकायत की निष्पक्ष तरीके से सुनवाई बेहद जरूरी है, फिर उसके बाद चाहे जो कार्रवाई तय हो।
    वृंदा ग्रोवर के मुताबिक, पब्लिक इंटरेस्ट, के तहत अहम सार्वजनिक पदों पर नियुक्त लोगों के बर्ताव के बारे में की जाने वाली शिकायत सार्वजनिक होनी ही चाहिए। वो कहती हैं, न्यायपालिका में लोगों के विश्वास को बनाए रखने के लिए, पारदर्शिता के लिए, पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
    रेबेका मेमन जॉन मानती हैं कि मुख्य न्यायाधीश, बहुत सेंसेटिव, पद है और इसकी स्वायत्तता सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है पर साथ ही वो कहती हैं, शिकायत को न्यायसंगत प्रक्रिया के तहत जांचना अनिवार्य है।
    कानून के मुताबिक, इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी, दोनों पक्ष की बात सुनकर और जांच करके यह तय करती है कि शिकायत सही है या नहीं। सिर्फ एक पक्ष की बात से जुर्म तय नहीं किया जा सकता। सही पाए जाने पर नौकरी से सस्पेंड करने, निकालने और शिकायतकर्ता को मुआवजा देने की सजा दी जा सकती है।
    ये कानून औरतों को अपने काम की जगह पर बने रहते हुए दोषी को सजा दिलाने का उपाय देता है। यानी यह जेल और पुलिस के कड़े रास्ते से अलग न्याय के लिए एक बीच का रास्ता खोलता है जैसे संस्था के स्तर पर आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई, चेतावनी, जुर्माना, सस्पेंशन, बर्ख़ास्त किया जाना वगैराह। औरत चाहे और मामला इतना गंभीर लगे तो पुलिस में शिकायत किए जाने का फैसला भी किया जा सकता है।

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Posted Date : 20-Apr-2019
  • 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में दार्जिलिंग में जीत हासिल करने वाली भाजपा का मुकाबला पश्चिमी बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस से है

    -हेमंत कुमार पाण्डेय
    उत्तर भारत में किसी संभावित नुकसान की भरपाई के लिए भाजपा ने इस आम चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 23 पर जीत हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। 2014 के चुनाव में पार्टी ने केवल दो सीटों- दार्जिलिंग और आसनसोल पर कब्जा किया था। इनमें उत्तर बंगाल स्थित दार्जिलिंग से एसएस अहलूवालिया ने तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी बाइचुंग भूटिया को मात दी थी। 2009 के चुनाव में भी इस सीट पर भाजपा के जसवंत सिंह ने जीत दर्ज की थी। यानी पिछले दो चुनावों में दार्जिलिंग के मतदाताओं ने इस राष्ट्रीय पार्टी पर भरोसा जताया है। इस आम चुनाव में यहां भाजपा की चुनौती इस भरोसे को ही कायम रखने की है।
    भाजपा ने इस बार दार्जिलिंग से राजू सिंह बिष्ट को चुनावी दंगल में उतारा है। पेशे से कारोबारी बिष्ट का संबंध मणिपुर से है। बताया जाता है कि उनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से भी रहा है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने दार्जिलिंग से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के विधायक अमर सिंह राय को उम्मीदवार बनाया है। राय टीएमसी के चुनावी चिन्ह के साथ मतदाताओं के बीच हैं।
    टीएमसी ने भाजपा उम्मीदवार के बाहरी होने को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। हालांकि, भाजपा को पहाड़ स्थित प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) का साथ मिला हुआ है। साथ ही, जीजेएम के बिमल गुरूंग गुट ने भी राजू सिंह बिष्ट को समर्थन देने की बात कही है। साल 2017 के आंदोलन के बाद जीजेएम दो गुटों में बंट गया था। इनमें से एक गुट बिमल गुरूंग का है और दूसरा बिनय तमांग का। तमांग अब ममता बनर्जी के साथ मिल गए हैं। दार्जिलिंग संसदीय सीट किसी उम्मीदवार की जीत में जीएनएलएफ और जीजेएम की अहम भूमिका रहती है।
    साल 2017 के गोरखा आंदोलन के बाद दार्जिलिंग में यह पहला संसदीय चुनाव है। 104 दिनों के इस आंदोलन के दौरान 11 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी। ममता बनर्जी की सरकार पर आरोप है कि उसने क्रूरता के साथ इस आंदोलन का दमन किया। वहीं, अलग गोरखालैंड राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों के प्रदर्शन को रोकने के लिए केंद्र की ओर से अर्द्धसैनिक बलों को भी भेजा गया था। इस तरह दार्जिलिंग के गोरखाओं को अलग राज्य को लेकर केंद्र और राज्य दोनों से निराशा हाथ लगी है। एक ओर जहां ममता बनर्जी सरकार अलग राज्य की मांग को हमेशा से खारिज करती रही तो दूसरी ओर, आंदोलनकारियों को भाजपा और इसके सांसद एसएस आहलूवालिया का भी साथ नहीं मिला।
    इसलिए माना जा रहा है कि दार्जिलिंग के मतदाताओं की नाराजगी को कम करने के लिए अहलूवालिया को इस सीट से फिर नहीं उतारा गया। वैसे इस बार भाजपा ने चुनावी घोषणापत्र में अलग गोरखालैंड राज्य बनाने का वादा भी नहीं किया है। पार्टी ने अपने घोषणापत्र में कहा है, 'हम दार्जिलिंग हिल्स, सिलिगुड़ी तराई और डुआर्स क्षेत्र की समस्या का स्थायी राजनीतिक समाधान खोजने की दिशा में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।Ó इससे पहले 2014 के चुनाव में पार्टी ने गोरखालैंड राज्य का वादा किया था।
    माना जा रहा है कि गोरखालैंड को लेकर पार्टी द्वारा अपने कदम पीछे खींचने की वजह राज्य की अन्य सीटों पर होने वाला संभावित नुकसान है। राज्य का दक्षिणी हिस्से में रहने वाली बड़ी आबादी राज्य के विभाजन के खिलाफ है। इसलिए माना जा रहा है कि अगर भाजपा ऐसा करती है तो उसके चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के मंसूबों पर पानी फिर सकता है। ठीक यही स्थिति तृणमूल कांग्रेस के साथ भी है। इस बात को ध्यान में रखते हुए ही ममता बनर्जी गोरखालैंड राज्य की मांग का बड़ी सख्ती से विरोध करती हैं। बहुत से लोग मानते हैं कि इस सख्ती की प्रतिक्रिया में ही दार्जिलिंग की बड़ी आबादी भाजपा के साथ आ सकती है।
    जिस तरह गोरखालैंड आंदोलन को दबाया गया उसे लेकर भी लोगों में ममता बनर्जी के खिलाफ नाराजगी है। इस नाराजगी को दूर करने के लिए तृणमूल कांग्रेस अपनी सरकार के उन्नति यानी विकास कार्यों पर जोर दे रही है। साथ ही, वह भाजपा पर क्षेत्र के लोगों को धोखा देने का आरोप भी लगा रही है। हालांकि, जीएनएलएफ के प्रमुख मन घिसिंग ने हाल में राजू सिंह बिष्ट के समर्थन में कुर्सियांग की जनसभा में जो कहा वह तृणमूल की परेशानी बढ़ाने वाला है। उन्होंने कहा था, 'हम लोग बंगाल से राजनीतिक और प्रशासनिक विभाजन चाहते हैं। यदि तृणमूल जीत हासिल करती है तो यह असंभव है।Ó
    दूसरी ओर, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर दिया गया बयान भी पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी करने वाला बन गया। हाल में कलिम्पोंग की एक जनसभा में उन्होंने कहा कि केंद्र में फिर उनकी सरकार बनने पर एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जाएगा। जानकारों के मुताबिक इससे गोरखा मतदाताओं में एक आशंका पैदा हो गई है। अधिकांश गोरखाओं का संबंध पड़ोसी देश नेपाल से है। भाजपा ने नागरिकता संशोधन विधेयक को फिर से लाने का वादा भी किया है। इस विधेयक के जरिए बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने संबंधी प्रावधानों में ढील देने की बात कही गई है। इसकी वजह से दार्जिलिंग के स्थानीय निवासियों को अपनी सभ्यता-संस्कृति पर बुरा असर पडऩे की भी आशंका है। हालांकि, इसके बाद भाजपा की जिला इकाई ने साफ किया कि इनसे दार्जिलिंग के लोगों को आशंकित होने की जरूरत नहीं है।
     इन बातों के आधार पर कहा जा सकता है कि दार्जिलिंग की लड़ाई फतह करना भाजपा और तृणमूल दोनों के लिए बड़ी चुनौती है। यदि टीएमसी जीत हासिल करने में सफल होती है तो यह उसके लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। इस संसदीय सीट से पार्टी का कोई उम्मीदवार अब तक जीत हासिल नहीं कर पाया है। वहीं, भाजपा की जीत इस बात की पुष्टि करेगी कि गोरखालैंड राज्य बनाने का वादा पूरा न करने और करीब-करीब अनजान से चेहरे को बतौर उम्मीदवार उतारने के बाद भी क्षेत्र के मतदाताओं ने उस पर अपना विश्वास बनाए रखा है। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 19-Apr-2019
  • -कृष्ण प्रताप सिंह
    गत लोकसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने सासंदों व सत्ताधीशों की विलासितापूर्ण जीवनशैली के खिलाफ सादगी को भी मुद्दा बनाया था। लेकिन इस बार इस मुद्दे का कुछ अता पता ही नहीं है। कभी यह सादगी हमारे सांसदों के बीच एक स्थापित परंपरा हुआ करती थी।
    गुलजारीलाल नंदा, जिन्होंने देश की संकट की घड़ी में कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री पद का कार्यभार भी संभाला, जीवन भर किराये के साधारण से मकान में रहे। एक बार किराया नहीं दे पाये तो मकान के मालिक ने उनका सामान बाहर फिंकवा दिया था। बैंक में भी वे अपने पीछे दो हजार चार सौ चौहत्तर रुपये ही छोड़ गए थे। उन्हीं जैसे कांग्रेस के एक उच्चविचार के सादगीपसंद नेता थे- रफी अहमद किदवई। देश की आजादी से अपने निधन तक वे केंद्र में मंत्री रहे। लेकिन उनके न रहने पर उनकी पत्नी और बच्चों को उत्तर प्रदेश में बाराबंकी के टूटे-फूटे पैतृक घर में वापस लौट जाना पड़ा।
    पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री आबिद अली साइकिल से ही संसद आते-जाते थे और एक समय उनके पास कपड़ों का दूसरा जोड़ा भी नहीं था। रात में लुंगी पहनकर कपड़े धोते और सुखाकर उसे ही अगले दिन पहनकर संसद जाते थे। नौ बार सांसद रहे कम्युनिस्ट नेता इंद्रजीत गुप्त ने कभी अपने लिए कोई बंगला आबंटित नहीं कराया। उनकी अपनी गाड़ी भी नहीं थी। जहां भी जाते, ऑटो रिक्शे में बैठकर अथवा पैदल जाते।
    उन्हीं की तरह हीरेन मुखर्जी भी नौ बार सांसद रहे। वे सारा वेतन और भत्ता पार्टी कोष में दे देते और 200 रुपये में महीने भर गुजारा करते थे। सांसद एचवी कामथ की कुल संपत्ति थी-एक झोले में दो जोड़ी कुर्ता पायजामा, हालांकि वे पूर्व आईसीएस भी थे।
    समाजवादी सांसद भूपेंद्र नारायण मंडल यात्राओं के वक्त अपना सामान खुद अपने कंधे पर उठाते थे और चुनाव क्षेत्र में बैलगाड़ी से दौरे करते थे।
    एक साथ लड़ी सांसदी व विधायकी
    चुनाव लोकसभा के हों या विधानसभा के, कई नेता दो-दो सीटों से चुनाव लड़ते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव दो-दो सीटों से चुनाव लड़े थे।
    नरेंद्र मोदी गुजरात की बड़ोदरा व उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से, तो मुलायम उत्तर प्रदेश की ही मैनपुरी व आजमगढ़ सीटों से। इस बार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ऐसे नेताओं की सूची में अपना नाम लिखा लिया है। वे उत्तर प्रदेश की अपनी परंपरागत अमेठी सीट के साथ केरल की वायनाड सीट से मैदान में हैं। लेकिन क्या आप किसी ऐसे नेता को भी जानते हैं, जो दो ऐसी सीटों से एक साथ चुनाव लड़े, जिनमें एक लोकसभा की हो और दूसरी विधानसभा की?
    उत्तर प्रदेश में हरदोई के दिग्गज नेता परमाई लाल ने 1989 में हरदोई लोकसभा और अहिरौरी विधानसभा क्षेत्र से एक साथ जोर आजमाया। मतदाता व किस्मत दोनों उनके साथ थे।
    सो, वे दोनों सीटें जीत गए. समस्या हुई कि कौन-सी सीट रखें और कौन-सी छोड़ दें, यानी विधानसभा में जायें या लोकसभा में? इष्ट मित्रों से मशवरा करके उन्होंने लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी और विधायक बनकर ही संतुष्ट हो लिए। (द वॉयर) (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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Posted Date : 19-Apr-2019
  • -प्रभाकर
    यह है पश्चिम बंगाल के अकेले पर्वतीय पर्यटन केंद्र दार्जिलिंग की संसदीय सीट। बीते दो साल में पर्वतीय इलाके के बदलते राजनीतिक समीकरणों की वजह से अबकी बीजेपी के सामने जहां पिछली बार जीती इस सीट को बचाने की कड़ी चुनौती है वहीं तृणमूल कांग्रेस भी पहली बार यहां जीत के लिए जूझ रही है।  

    अप्रैल के महीने में जहां देश के दूसरे हिस्से तपने लगे हैं वहीं दार्जिलिंग का गुलाबी सर्दी वाला सुहाना मौसम भारी तादाद में सैलानियों को लुभा रहा है। हालांकि इस ठंडे मौसम में भी चुनावी सरगर्मी के चलते इलाके में राजनीतिक माहौल लगातार लगातार गरमा रहा है।

    इस सीट पर कब्जा बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इलाके में चुनावी रैलियां कर चुके हैं। दूसरी ओर, ममता ने भी इलाके में तीन-तीन रैलियां की हैं। इस बार हालांकि कांग्रेस और सीपीएम भी हमेशा की तरह मैदान में हैं लेकिन असली लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही है। अपनी जीत के दावे तो तमाम दावेदार कर रहे हैं लेकिन उनको खुद अपने दावों पर ही भरोसा नहीं है। इसकी वजह है इलाके में राजनीतिक समीकरणों में आने वाला बदलाव। बीते पांच साल में इलाके में बहुत कुछ बदल गया है। पहले इस इलाके पर एकछत्र राज करने वाला गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अब दो गुटों में बंट चुका है। बीते तीन दशकों से यहां लगभग हर चुनाव अलग गोरखालैंड के मुद्दे पर ही लड़ा जाता रहा लेकिन अब यह मुद्दा सिरे से गायब है। इस बार तो हर राजनीतिक दल विकास के लंबे-चौड़े दावों के साथ मैदान में हैं।
    अब इन पहाडिय़ों की दीवारों पर ना तो गोरखालैंड के समर्थन में नारे लिखे नजर आते हैं और ना ही सैकड़ों रैलियों के गवाह रहे शहर के प्रमुख इलाके चौकबाजार में कोई पोस्टर या बैनर नजर आता है। चौकबाजार में मोमो की दुकान चलाने वाले 72 साल के नोरबू लामा कहते हैं, यह पहली बार है कि जब किसी की जुबान पर गोरखालैंड शब्द नहीं है। हर पार्टी का उम्मीदवार विकास के नाम पर ही वोट मांग रहा है।
    दरअसल, दो साल पहले गोरखालैंड की मांग में आंदोलन के दौरान इन पहाडिय़ों में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा व आगजनी ने तमाम समीकरण को उलट-पुलट दिया है। उस दौरान 104 दिनों तक चली हड़ताल और राज्य सरकार की ओर से विभिन्न धाराओं में कई मामले दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी के डर से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष विमल गुरुंग भूमिगत हैं।
    मोर्चा के एक अन्य नेता विनय तामंग ने अब पार्टी के एक बड़े गुट की कमान संभाल ली है और वह ममता बनर्जी के साथ हैं। अस्सी के दशक में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएप) के प्रमुख सुभाष घीसिंग के दौर से ही पर्वतीय इलाके में मतदान की हवा जस की तस रही है। यहां सत्तारुढ़ दल जिसका समर्थन करता है, जीत का सेहरा उसके माथे ही बंधता रहा है। इंद्रजीत खुल्लर से लेकर सीपीएम के आर।बी।राई और कांग्रेस के दावा नरबुला हों या फिर बीजेपी के जसवंत सिंह या फिर एस. एस. आहलूवालिया, तमाम लोग इसी फार्मूले से जीतते रहे हैं। बीते लोकसभा चुनावों में आहलूवालिया ने गोरखा मोर्चा के समर्थन से तृणमूल उम्मीदवार बाइचुंग भूटिया को लगभग दो लाख वोटों के अंतर से हराया था।
    आहलूवालिया के प्रति आम लोगों की नाराजगी को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने अबकी राजू सिंह बिष्ट नाम के मणिपुर के एक कारोबारी को मैदान में उतारा है जबकि तृणमूल कांग्रेस ने गोरखा मोर्चा के विधायक अमर सिंह राई को अपना उम्मीदवार बनाया है। उनके अलावा कांग्रेस की ओर से शंकर मालाकर और सीपीएम के पूर्व सांसद सुमन पाठक भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। मोर्चा के गुरुंग गुट के अलावा जीएनएलएफ ने भी बीजेपी को समर्थन देने का एलान किया है।
    यह पहला मौका है जब राजनीतिक दिग्गज भी इलाके में चुनावी बयार का सटीक अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं। मोर्चा अध्यक्ष रहे विमल गुरुंग भले भूमिगत हों, वह अपने वीडियो संदेशों के जरिए लोगों से तृणमूल कांग्रेस और मोर्चा के तामंग गुट को हराने की अपील कर रहे हैं। दूसरी ओर, ममता के समर्थन से गोरखालैंड टेरीटोरियल एडिमिस्ट्रेशन (जीटीए) का अध्यक्ष बनने के बाद विनय तमांग ने इलाके में कई विकास योजनाएं शुरू की हैं। सड़कों के अलावा पेय जल की सप्लाई का काम बी शुरू किया गया है। बीते पांच साल में ममता बनर्जी खुद दर्जनों बार पहाडिय़ों का दौरा कर चुकी हैं। उन्होंने कालिम्पोंग को अलग जिला बना दिया है। यही वजह है कि वह विकास की गति तेज करने के नाम पर वोट मांग रही हैं।
    तृणमूल कांग्रेस नेता और राज्य के पर्यटन मंत्री गौतम देब कहते हैं, सरकार ने इलाके में शांति बहाल की है। विकास की कई योजनाएं शुरू हो रही हैं और सैलानियों की आवक लगातार बढ़ रही है। इस पर्वतीय इलाके की अर्थव्यवस्था अंग्रेजी के तीन टी पर निर्भर है। वह है टी यानी चाय, टिंबर यानी लकड़ी और टूरिज्म यानी पर्यटन। 
    तृणमूल उम्मीदवार अमर सिंह राई कहते हैं, अबकी गोरखालैंड नहीं बल्कि विकास ही यहां सबसे बड़ा मुद्दा है। इलाके में बीते एक दशक से भाजपा सांसद होने के बावजूद विकास का कोई काम ही नहीं हुआ है।ज्ज् दूसरी ओर, बीजेपी उम्मीदवार राजू सिंह बिष्ट भी विकास के जरिए दार्जिलिंग की समस्या के स्थायी राजनीतिक समाधान के वादे पर वोट मांग रहे हैं। पार्टी के घोषणापत्र में गोरखा तबके की 11 जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वादा किया गया है। लेकिन मोर्चा नेता विनय तमांग कहते हैं, च्च्विकास के नाम पर होने वाले चुनाव में अबकी बीजेपी की पराजय निश्चित है। लोग उसके वादों की हकीकत जान चुके हैं। दूसरी ओर, विमल गुरुंग गुट का दावा है कि अबकी चुनावी नतीजे से साफ हो जाएगा कि पहाडिय़ों में किसकी बादशाहत है। यहां अब भी गुरुंग ही शीर्ष नेता हैं। गोरखा नेता विमल गुरुंग 2017 में हुए हिंसक आंदोलन के बाद से ही भूमिगत हैं।
    बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष चंद्र कुमार बोस कहते हैं, दार्जिलिंग हमारे लिए एक सुरक्षित सीट रही है। लेकिन बहदले राजनीतिक समीकरणों के चलते इस बार ऐसा नहीं है। अबकी इस सीट पर कड़े मुकाबले में बाजी किसके हाथ लगेगी, इसका पूर्वानुमान लगाना बहुत मुश्किल है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस सीट की नतीजा इस बात पर निर्भर है कि इलाके के लोग अब भी विमल गुरुंग को पहाडिय़ों का बादशाह मानते हैं या फिर उनकी जगह अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और गोरखा नेता विनय तमांग का जादू सिर चढ़ कर बोलेगा।  (डॉयचे वैले)

     

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Posted Date : 19-Apr-2019
  • 1967 के आम चुनाव के बाद देश के राजनीतिक फलक में एक बड़े बदलाव की शुरुआत हुई थी

    -अनुराग भारद्वाज
     
    1967 में कांग्रेस इंदिरा गांधी की सरपरस्ती में पहला आम चुनाव लडऩे जा रही थी। इससे पहले 1964 से लेकर 1966 तक देश चार प्रधानमंत्रियों को देख चुका था। जवाहरलाल नेहरू ने देश में गणतंत्र की ठोस नींव रख दी थी। उनके बाद लाल बहादुर शास्त्री के 15 महीने का कार्यकाल भी निर्णायक था। इंदिरा गांधी कोई बहुत तजुर्बेकार नेता नहीं थीं। लेकिन लाल बहादुर शास्त्री की असमय मौत के बाद बने हालात में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के समूह, जिसे ‘सिंडिकेट’ कहा जाता था, को लगा कि उनसे बेहतर कोई और विकल्प नहीं हो सकता। उन्हें नेहरू का जायज़ राजनैतिक उत्तराधिकारी भी माना जाता था। लिहाज़ा, कांग्रेस के अध्यक्ष के कामराज ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को राज़ी कर इंदिरा गांधी को अगला प्रधानमंत्री चुन लिया था। इधर, 1967 के आम चुनाव आ गए थे उधर, देश के अंदरूनी हालात कुछ ठीक नहीं थे।
    लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में हिंदी को राजभाषा बनाये जाने से देश में अफरातफरी मची हुई थी। यूं तो देश में कृषि वैज्ञानिक के स्वामीनाथन के निर्देशन में हरित क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन अनाज की तंगी जारी थी। उधर, क्षेत्रीय ताकतें मुखर हो रहीं थी। मुद्रास्फीति बढ़ी हुई थी। पंचवर्षीय योजनाएं भी कुछ ज़्यादा कारगर साबित नहीं हो रही थीं। अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी। इसको देखते हुए इंदिरा गांधी ने पहली बार रुपये का अवमूल्यन किया था। पर यह भी कुछ ख़ास काम नहीं आया। 1962 और 1965 की लड़ाइयों में देश की माली हालत काफी खस्ता हो गयी थी। ‘गूंगी गुडिय़ा’ कही जाने वाली इंदिरा की पार्टी और मंत्रिमंडल पर पकड़ मजबूत नहीं थी। मोरारजी देसाई और दूसरे नेताओं का विरोध तीव्र था। जबलपुर और राउरकेला में दंगे हो चुके थे। उधर पूर्वोत्तर में मिजो आंदोलन की आग सुलग रही थी। कुछ राज्यों में अकाल के हालात भी थे।
    उधर, पड़ोस में भी हालात दुरुस्त नहीं थे। पाकिस्तान और बर्मा में फौजी सरकारें बन चुकी थीं। चीन का साम्यवाद भी भारत के राज्यों पर असर डाल रहा था। अमेरिका ने 1965 की लड़ाई में पाकिस्तान का साथ दिया था। रूस की बेरुखी भी जाहिर थी। ऐसे मुश्किल हालात में विदेशी राजनैतिक विश्लेषक कयास लगा रहे थे कि हिंदुस्तान में कानून व्यवस्था बिगड़ जाने से हिंसा उपजेगी और पाकिस्तान और बर्मा की तरह, यहां भी सेना का शासन लागू हो सकता है। इस लिहाज से 1967 के आम चुनाव ख़ास हो चुके थे।
    कई मायने में यह चुनाव ऐतिहासिक था। यह आखिऱी बार था जब केंद्र और राज्य के चुनाव साथ-साथ हुए थे। इंदिरा गांधी ने रायबरेली की सीट से पहली बार अपनी दावेदारी पेश की थी। चूंकि देश जवाहर लाल नेहरू के प्रभाव से अब मुक्त हो रहा था, इसलिए अन्य राजनैतिक पार्टियां जैसे स्वतंत्रता पार्टी, जनसंघ, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया तमाम प्रकार के गठजोड़ करने लगी थीं।
    इतिहासकार बिपिन चन्द्र ने लिखा है कि 1967 के आम चुनावों के बाद से भारत के मध्यमवर्गीय और रईस किसान राजनीति में कूदे। उन्होंने कई गठजोड़ किये और अपने फायदे के लिए राजनैतिक पार्टियों के साथ अपना मोलभाव शुरू कर दिया।
    इन चुनावों के बाद केंद्र में कांग्रेस चौथी बार सरकार बनाने में सफल रही। कुल 520 सीटों में उसे 283 सीटें मिलीं। हालांकि उसके प्रदर्शन में गिरावट का यह नया स्तर था। 1952 में पार्टी ने 74 फीसदी सीटें जीती थीं। 1957 में यह आंकड़ा 75, 1962 में 72 और 1967 में 54 फीसदी हो गया। उसका वोट प्रतिशत गिरकर महज 40 फीसदी ही रह गया था।
    दूसरी ओर, क्षेत्रीय राजनैतिक दलों का अपने राज्यों पर प्रभुत्व तब हकीकत बनकर पहली बार सामने आया था जो कई राज्यों में बरकरार है। 67 के उस चुनाव में छह राज्यों से कांग्रेस की सरकारों का सफाया हो गया। केरल की कम्युनिस्ट सरकार को तो इंदिरा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू के रहते ही असंवैधानिक ठहराकर वहां राष्ट्रपति शासन लगवा दिया था। यहां उसे करारी हार मिली। अपनी किताब इंडिया आफ्टर नेहरू में रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि कांग्रेस की सबसे बड़ी हार उसके गढ़ माने जानेवाले तमिलनाडु (तब मद्रास) में हुई। यहां द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) ने 234 विधानसभा सीटों में से 138 जीतकर मैदान मार लिया। यहां कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मद्रास के भूतपूर्व मुख्यमंत्री के कामराज भी हार गए थे।
    पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। यही हाल उसका उड़ीसा में हुआ। गुजरात भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया था। उधर किसान नेता चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और कुछ अन्य नेताओं के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बना ली। रामचंद्र गुहा के मुताबिक अल्पसंख्यक वर्ग का कांग्रेस से मोहभंग होना पार्टी के कमजोर होने का एक बहुत बड़ा कारण था।
    हमने ऊपर लिखा है कि 1967 में यह आखिरी बार था जब लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए थे। पिछले कुछ समय में यह सुगबुगाहट फिर से उठने लगी है। हालांकि पिछली बार ऐसा होने पर देश की सबसे मजबूत पार्टी कांग्रेस का ग्राफ धड़ाम से नीचे आ गिरा था। देखने वाली बात होगी कि यदि एक बार फिर लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं तो देश की मौजूदा सबसे मजबूत पार्टी भाजपा का क्या होगा। 1967 इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उस साल राष्ट्रपति चुनाव भी हुए थे जिसके नतीजे के तौर पर देश को डॉ. जाकिर हुसैन की शक़्ल में पहला मुस्लिम राष्ट्रपति मिला। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 19-Apr-2019
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर ख़ुद को ‘पिछड़ा’ बताया है। बुधवार को महाराष्ट्र में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस और उसके साथी दलों ने मुझे कई बार गालियां दी हैं। क्योंकि मैं एक पिछड़े वर्ग से आता हूं। लेकिन इस बार उन्होंने मुझे गाली देते-देते पूरे पिछड़े समुदाय को ‘चोर’ बता दिया है।’ नरेंद्र मोदी के इस बयान के बाद यह बहस फिर छिड़ गई है कि वे पिछड़े समाज से आते हैं या नहीं।
    2014 से पहले कभी भी ख़ुद को पिछड़ा नहीं बताया
    जानकार सवाल उठाते हैं कि बतौर नेता नरेंद्र मोदी को अपनी पिछड़ी जाति का ध्यान 2014 के आम चुनाव से क्यों आया। जाने-माने बुद्धिजीवी व दलित चिंतक कांचा इलैया कारवां पत्रिका में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘गुजरात के 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में मोदी ने ख़ुद को पिछड़ा दिखाने में कोई फायदा नहीं समझा। तब उन्होंने ख़ुद को एक बनिये के रूप में पेश किया। चूंकि बनिया समुदाय देश का अब तक का सबसे ताकतवर औद्योगिक और व्यापारिक समुदाय है, (इसलिए) उसने मोदी को अपने में से ही एक माना और उनका स्वागत दोनों बाहें फैलाकर किया। यह सिर्फ 2014 के आम चुनावों के दौरान हुआ कि मोदी को अचानक अपने पिछड़े होने का ख्याल आया।’
    कांचा इलैया जैसे अन्य कई जानकारों के मुताबिक नरेंद्र मोदी जिस मोध घांची समाज से आते हैं, उन्हें गुजरात में पिछड़ा या नीची जाति नहीं समझा जाता। वे वर्ण व्यवस्था के हवाले से कहते हैं कि इसमें पिछड़े समाज के लोगों को पढऩे की मनाही होती है, जबकि मोध घांची समुदाय पारंपरिक रूप से साक्षर रहा है। यह बात भी गौर करने वाली है कि जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं तो पिछड़ी जातियों की सूची में मोध घांची समुदाय को शामिल नहीं किया गया था। यह काम 1994 से 1999 के बीच हुआ। यह बात इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि हाल के बरसों में सामाजिक रूप में मजबूत समुदायों (जाट, पाटीदार, मराठा आदि) में ख़ुद को ओबीसी में शामिल कराने की होड़ देखने को मिली है। इनमें से कुछ समुदाय ऐसा कर पाने में सफल भी हुए हैं।
    ‘हम तेली, ठाकुरों के बाप हैं’
    नरेंद्र मोदी भले ही खुद को पिछड़ा बताएं, लेकिन उनके भाई प्रह्लाद मोदी कहते रहे हैं कि वे तेली समाज से हैं। साल 2018 में उन्होंने तेली समाज के इतिहास के बारे में बताते हुए कहा था कि वे और महात्मा गांधी इसी समाज के हैं। वहीं, हाल में उन्होंने छत्तीसगढ़ में फिर इस बात को दोहराया। प्रह्लाद मोदी ने कहा, ‘महात्मा गांधी ने देश को स्वतंत्रता दिलाई। वे भी तेली थे। आज देश को खा जाने वालों के एक परिवार (गांधी परिवार) को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए कोई (नरेंद्र मोदी) आया है, वह भी एक तेली का बेटा है। हम ठाकुरों के बाप हैं। जिस दिन हमारी मानसिकता पलट जाएगी सब ठीक कर देंगे।’
    प्रह्लाद मोदी के इस बयान को मोध घांची समाज के पारंपरिक काम से देखे जाने की जरूरत है। ये लोग तेल बनाने और बेचने के व्यापार के लिए जाने जाते हैं। वर्ण व्यवस्था के हिसाब से देखें तो यह काम करने का अधिकार वैश्य समाज के लोगों के पास है। यानी भले ही मोध घांची समाज को 1999 में गुजरात में ओबीसी का दर्जा मिल गया था, लेकिन उनका सामाजिक दर्जा कभी भी पिछड़ा नहीं था। (सत्याग्रह ब्यूरो)

     

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Posted Date : 18-Apr-2019
  • राजीव गांधी में उनकी मां के जैसी आक्रामकता और व्यापक अपील नहीं थी। इस वजह से 1989 के आम चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा बढ़ गया

    -अनुराग भारद्वाज
    आम चुनाव में अब ज़्यादा समय नहीं बचा है। आश्चर्यजनक रूप से इसमें मुद्दे और हालात वही दिख रहे हैं जो 30 साल पहले हुए चुनाव में थे। 1989 में हुआ आम चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास खास मुकाम रखता है। यहां से राजनीति हमेशा के लिए एक अलग राह पर चल पड़ी थी और आज भी यह उसी राह पर सफर कर रही है। आइये, 1989 के चुनाव के मुद्दों और हालात पर बात करते हैं।
    कांग्रेस पार्टी को उसी की सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जबरदस्त तरीके से घेर लिया था। असल में वीपी सिंह ने कॉरपोरेट घरानों द्वारा टैक्स में की गयी हेराफेरी से नाराज़ होकर उनपर छापे डलवाये थे। इससे बवाल मच गया। राजीव गांधी ने उन्हें वित्त मंत्रालय से निकालकर रक्षा का भार दे दिया और फिर मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
    जैसे ही वीपी सिंह को मंत्रिमंडल से बाहर किया गया उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। इससे उनकी लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो गई। उन्होंने बाहर निकलते ही भारतीय सेना के लिए खरीदी गईं बोफोर्स तोपों की खऱीद में धांधली का आरोप लगाया। कहा गया कि राजीव गांधी और उनके करीबियों को 64 करोड़ की दलाली खिलाई गई है और इसके लिए फ्रांस की तोपों के बनिस्बत स्वीडन की तोप बोफोर्स को तवज्जो दी गयी है। सबसे पहले यह ख़ुलासा 1987 में ही स्वीडन के रेडियो चैनल ने किया था। वीपी सिंह ने मुद्दा लपक लिया, या हो सकता है उनको जानकारी मुहैया करायी गयी हो।
    कांग्रेस जिस तथाकथित रफाल घोटाले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर है उसमें फ्रांस की कंपनी शामिल है और यह सबसे पहले फ्रांस के ही मीडिया में उजागर हुआ था। देखिए, इतिहास का पहिया बार-बार एक जैसे ही घूमता है। बस किरदार बदल जाते हैं।
    रामचंद्र गुहा 'इंडिया आफ्टर गांधी' में लिखते हैं कि लोगों ने राजीव गांधी से 'मिस्टर क्लीन' का ताज लेकर वीपी सिंह को पहना दिया। जनता की नजर में वे भ्रष्टाचार के शिकार और उसके खिलाफ लडऩे वाले मसीहा बनकर उभरे। राजीव ने 1988 में इलाहाबाद की सीट से वीपी सिंह के मुकाबले एक राजपूत को ही चुनाव लड़वाया। वीपी सिंह भारी मतों से जीतकर संसद में फिर प्रवेश पा गए और सरकार पर ताबड़तोड़ हमले करने लगे।
    शाहबानो मामले में मुस्लिम समाज के तुष्टिकरण का इल्जाम झेलने की भरपाई करने के लिए राजीव सरकार ने बाबरी मस्जिद खोल कर इसमें रखी राम लला की मूर्ति को पूजने का अधिकार दिलवा दिया। धर्मांधता का जिन्न बाहर आ गया। भाजपा ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ ले लिया। 'राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे' और 'ये तो सिर्फ झांकी है, मथुरा काशी बाकी है' जैसे नारे पूरे उत्तर भारत में गूंजने लगे।
    आशुतोष वार्ष्णेय अपनी किताब 'अधूरी जीत' में लिखते हैं कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का मतलब हर मजहब से समान दूरी बनाने का था, जबकि इंदिरा और राजीव गांधी की नजर में 'हर धर्म से समान नजदीकी बनाना धर्मनिरपेक्षता थी।'
    राम मंदिर मुद्दा धीरे-धीरे गरमाया जाने लगा। विश्व हिंदू परिषद के राम शिला पूजन के ऐलान को भाजपा ने समर्थन दिया। सेक्युलर राष्ट्रवाद की प्रतिक्रिया में उभरा हिंदू राष्ट्रवाद स्वतंत्र भारत के प्रशासकीय सिद्धांतों और बौद्धिक ढांचे के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आ गया था। इसकी परिणिति अक्टूबर 1989 में बिहार के भागलपुर दंगे के रूप में हुई। इसे आजाद भारत में यानी 1947 के बाद सबसे लंबे समय तक चला दंगा कहा जाता है जिसमें मारे गए लोगों का ठीक-ठीक आंकड़ा आज भी उपलब्ध नहीं है।
    1984 में भाजपा सिर्फ लोकसभा में सिर्फ दो ही सीटें जीत पाई थी। 1989 में वह जनमानस पर व्यापक प्रभाव डाल रही थी तो इसकी वजह बाबरी मस्जिद बनाम राम मंदिर का मुद्दा ही था। इस तरह देखें तो भाजपा की राजनीतिक गूंज बढ़ाने में राजीव गांधी का बड़ा हाथ था।
    जब तक जवाहर लाल नेहरू राजनीतिक क्षितिज पर थे, क्षेत्रीय पार्टियों का विशेष आधार नहीं था। उनके बाद 1967 के आम चुनाव में क्षेत्रीय दलों की ताकत पहली बार देखने को मिली थी। इसके बाद इंदिरा गांधी ने राज्यों और केंद्र के चुनाव अलग-अलग करने का फैसला लिया था। उनका तर्क था कि चुनाव में केंद्र और राज्यों के मुद्दे भिन्न होते हैं। 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार को अब तक ही सबसे ताकतवर चुनौती का सामना करना पड़ा। दक्षिण में डीएमके, पश्चिम बंगाल में सीपीएम, पंजाब में अकाली और आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव की तेलुगू देशम पार्टी काफी मजबूत स्थिति में थी।
    भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे राजीव गांधी के पास अपनी मां जैसी आक्रामकता नहीं थी और न ही उनमें इंदिरा जैसी 'मास अपील' थी। वे हर कदम पर हिचकते हुए प्रतीत होते थे। सो राज्यों में वैकल्पिक नेतृत्व उभरने लगे और कांग्रेस को उनसे पार पाने में काफी मुश्किल पेश होने वाली थी। कमोबेश ऐसे ही हालात इस बार भी हैं। भाजपा और एनडीए की काट करने के लिए स्थानीय पार्टियों का दामन थामना कांग्रेस की मजबूरी है।
    1988 में सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चौतरफा घिर गई थी। विचलित होकर, राजीव गांधी सरकार ने संसद में प्रेस की आजादी को खत्म करने के मकसद से मानहानि बिल पेश किया। इससे, कांग्रेस का रहा-सहा खेल बिगड़ गया। इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका की अगुवाई में पत्रकारों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया। हारकर, सरकार को इसे वापस लेना पड़ा। साल 1989 के चुनाव में विपक्ष ने यह मुद्दा बेहद गर्मजोशी से उठाया था।
    मौजूदा हालात तो सबके सामने ही हैं। 2018 में एनडीटीवी के दफ्तर और उसके मालिकों के घरों पर डाले गए छापों के विरोध में अरुण शौरी के नेतृत्व में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में कांफ्रेंस आयोजित की गई थी। शौरी ने मौजूदा हुक्मरान पर निशाना साधते हुए भाषण की शुरुआत एक शेर से की थी। 'तुम से पहले वो जो इक शख्स यहां तख्त-नशीं था। उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था'। इसी साल राजस्थान में वसुंधरा राजे की भाजपा सरकार ने विधानसभा में कमोबेश ऐसा ही बिल पेश करके 1988 की गलती को दोहराया। पर कमाल देखिये, 1988 की तरह एकजुट न रहकर मीडिया इस मुद्दे पर बंट गया। जहां एक स्थानीय हिंदी अखबार के संपादक रोज मुख्य पृष्ठ पर इस बिल के विरोध में संपादकीय लिख रहे थे, अन्य हिंदी अखबार चुपचाप तमाशा देख रहे थे। वसुंधरा राजे को भी इस विधेयक को वापस लेना पड़ा था।
    नौसिखिया राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस के विरोध में विपक्ष एक हो गया था। राजीव गांधी भी भ्रष्टाचार पर बात करते थे। उनका कहना था कि केंद्र राज्यों में जनता की मदद के लिए एक जो एक रुपया भेजता है वो पहुंचते- पहुंचते 15 पैसे ही रह जाता है। जनता को उनकी बात तो पसंद आई लेकिन, वे और उनकी पार्टी नहीं। कांग्रेस की हार हुई। उसे कुल 197 सीटें ही मिली। वीपी सिंह के जनता दल पार्टी को 143 और 'कमल' को 85 सीटें मिलीं। दूसरी बार ग़ैरकांग्रेसी सरकार बनी जिसका मुखिया पूर्व कांग्रेसी ही था। गठबंधन हक़ीक़त बनकर उभरे। वीपी सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार को भाजपा और अन्य पार्टियों से बाहर से समर्थन दिया। राजीव गांधी विपक्ष में बैठे।
    यह भाजपा के उभार वाला चुनाव था। उसने समझ लिया था कि चुनाव कैसे जीता जाता है। अगले साल यानी 1990 में उसके नेता लालकृष्ण आडवाणी राम मंदिर के लिए रथ यात्रा पर निकल पड़े। भाजपा के पक्ष में शुरू हुई ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हुई और अगले ही साल हुए आम चुनाव में उसकी सीटों का आंकड़ा 120 तक पहुंच गया। अब आडवाणी शून्य में यात्रा किये जा रहे हैं। उनका जमाना बीत गया। धु्रवीकरण का काम अब उनके शिष्य उनसे बेहतर कर लेते हैं। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 18-Apr-2019
  • -कुलदीप मिश्र
    भोपाल से भाजपा की प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने मालेगांव धमाकों में लगे आरोप पर फिर सफाई दी है। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि उन्होंने, कोई कुकर्म नहीं किया जो मालेगांव का भूत हमेशा उनके पीछे लगा रहेगा। उन्होंने हिंदू धर्म को शांति का प्रतीक बताया और मुसलमानों को, हमारे अपने लोग, कहा। उन्होंने, हिंदू आतंकवाद, की धारणा को खारिज करते हुए इसे कांग्रेस नेताओं के दिमाग की उपज बताया। उन्होंने ये भी कहा कि यूपीए सरकार में गृह सचिव रहे और अब भाजपा नेता आरके सिंह की ओर से अतीत में, हिंदू आतंकवाद, शब्द इस्तेमाल किए जाने की जानकारी उन्हें नहीं है।
    29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में एक बाइक में लगाए गए दो बमों के फटने से सात लोगों की मौत हो गई थी, जबकि सौ से ज़्यादा लोग घायल हो गए थे। साध्वी प्रज्ञा पर पहले महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) लगाया गया था लेकिन बाद में कोर्ट ने उसे हटा लिया और उन पर गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला चला। साध्वी प्रज्ञा मालेगांव बम धमाकों के मामले में नौ साल तक जेल में रहीं और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। प्रज्ञा आरोप लगाती हैं कि तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने उन्हें झूठे मामले में फंसाया है। भाजपा ने उन्हें भोपाल से वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनावी मैदान में उतारा है।
    साध्वी की तरह रहने वाली प्रज्ञा गेरुआ वस्त्र पहनती हैं और, हरिओम, उनका अभिवादन होता है। बीबीसी ने उनसे बात की तो पहले उन्होंने यही कहा कि मैं बात करूंगी लेकिन आप मुझे मैडम न कहें। साध्वीजी कहें।
    आगे उनसे हुई बातचीत 
    0 दिग्विजय सिंह के खिलाफ भाजपा को अपने संगठन का कोई पुराना नेता नहीं मिला जो आपको उतारा गया। इसे आप कैसे देखती हैं?
    00 आप क्या समझते हैं कि मुझे उतारना भाजपा की मजबूरी रही या मैं योग्य नहीं हूं?
    भाजपा का काम समाज से चलता है। यहां एक परिवार को अधिकार नहीं है कि वही राजनीति करेगा। यहां जो योग्य है और जिसे अवसर मिलता है, वो चुनाव में खड़ा हो जाता है।
    0 भाजपा ने आपसे संपर्क किया या आपकी ओर से किया गया?
    00 नहीं ये तो प्रक्रिया थी। ऐसा तो नहीं है कि ये एकाध दिन की प्रक्रिया है। ये चलती है। किसने क्या किया ये तो मुझे याद नहीं है। पर संपर्क हुआ। निश्चित तौर पर योजनाएं तय होती हैं। समाज के समक्ष किसे नेतृत्व करना है, ये उनकी ओर से तय होता है।
    0 अपने प्रति दिग्विजय सिंह के लिए कोई संदेश है आपका?
    00 आज भी मैं यही कहूंगी। साधु-संन्यासी यही कहते हैं कि अधर्म का मार्ग छोड़कर धर्म का मार्ग पकडि़ए। असत्य का मार्ग छोड़कर सत्य का मार्ग पकडि़ए। बस इतना ही कहूंगी।
    0 आपको क्यों लगता है कि दिग्विजय अधर्म के मार्ग पर हैं?
    00 मैं स्वयं प्रत्यक्ष प्रमाण हूं इसका (लंबा विराम)। उन्होंने जो षड्यंत्र किए उन षड्यंत्रों का और जो मैंने सहा है उनके षड्यंत्रों के कारण, मैं उसका प्रत्यक्ष प्रमाण हूं।
    0 आप मालेगांव धमाका मामले की ओर इशारा कर रही हैं, जिसका जिक्र बार-बार होता है। आप अभी जमानत पर बाहर हैं। बरी नहीं हुई हैं। जब आप चुनाव में उतरेंगी तो इसका भूत आपका पीछा नहीं छोड़ेगा। आप पर एक दाग तो है ही।
    00 मैं एक ही बात कहूंगी। मैं तो किसी भी प्रकार से, अंश मात्र भी, कोई हमारी कहीं लिप्तता नहीं है। फिर भी जो जेल में बैठ चुके हैं और जो अभी जमानत पर हैं, कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सभी जमानत पर हैं। हम तो इन्हीं के द्वारा प्रताडि़त हैं, हम तो इन्हीं के द्वारा डाले गए हैं। ये तो षड्यंत्र करके ही ऐसा किया उन्होंने।
    पीछा छोडऩे का अर्थ ये नहीं है कि मैंने कोई कुकर्म या दुष्कर्म किया है, जिसके कारण मेरे पीछे कुछ लगा हुआ है। बल्कि इनके कुकर्म को हम भोग रहे हैं। न मैंने कोई भ्रष्टाचार किया है, न कोई अनाचार किया है। न कोई घपला किया है और न देश के विरुद्ध बोला है।
    0 लेकिन आपकी छवि हिंदू अतिवाद की है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। और इसकी आलोचना दिग्विजय सिंह लगातार करते रहे। आपके आने से लोग कह रहे हैं कि भोपाल की सीट पर धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण होगा।
    00 मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि जो इन्होंने हिंदुत्व की परिभाषा दी है, कभी उन्होंने हिंदुत्व को आतंकवादी कह दिया, कभी सॉफ्ट हिंदुत्व कह दिया, कभी कट्टर कह दिया। लेकिन हिंदुत्व का चिंतन कितना व्यापक है, वो एक श्लोक से ही प्रकट होता है- वसुधैव कुटुम्बकम। सर्वे भवंतु सुखिन:, सर्वे संतु निरामय: इतनी बड़ी सोच, इतना बड़ा चिंतन, इतना वृहद हमारा धर्म है कि उसमें कहीं कट्टर या सॉफ्ट जैसी चीजें नहीं आतीं।
    हिंदुत्व पूरी पृथ्वी पर सुखमय जीवन देखना चाहता है। पृथ्वी ही क्या हमारे यहां तो सब जगह शांति का संदेश दिया गया है। (इसके बाद वह शांति पाठ पढऩे लगती हैं।)
    0 आपने वसुधैव कुटुम्बकम का जिक्र किया, अक्सर संघ परिवार भी इसका जिक्र करता है। इसका अर्थ है कि पूरा विश्व ही हमारा परिवार है। तो क्या इस परिवार में मुसलमान शामिल नहीं हैं?
    00 मुसलमान कहां से आए? भारत में जो हिंदू हैं, वे कन्वर्टेड लोग हैं। सनातन से निकले लोग हैं। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार इनके पूर्वजों ने या वर्तमान में किसी न किसी कारण से उन्होंने अपना धर्म छोड़ दिया। तो वो कहीं से थोड़े ही आए हैं, वे हमारे लोग हैं।
    इस भारत का खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं। उनके भी कर्तव्य हैं देश के लिए। जैसे हम संतान हैं देश की, ऐसे ही वे भी संतान हैं। हम क्यों ऐसा कहेंगे कि वे अलग हैं और हम अलग हैं। जब हमारी संस्कृति ऐसी है कि हम सबको आत्मसात करते हैं। भारत ही है, जहां सब समा जाते हैं। लेकिन बताइए कोई और ऐसा देश है जहां कोई देश में रहकर देश के विरुद्ध बात कर सकता हो।
    0 आप ये कह रही हैं कि भारत के मुसलमान देश के ख़िलाफ़ बात करते हैं?
    00 मैं मुसलमानों की बात नहीं कर रही हूं। मैं उनकी बात कर रही हूं जो किसी भी वर्ग में आते हैं, लेकिन देश के विरुद्ध बात करते हैं।
    0 हिंदू आतंकवाद शब्द का जिक्र आपने किया। यूपीए सरकार के समय ये शब्द सुनने को मिला था। उस वक्त तत्कालीन गृह सचिव आरके सिंह ने हिंदू आतंकवाद शब्द दिया था। वो आज भाजपा के टिकट पर बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं।
    00 जी नहीं, ये शब्द दिग्विजय सिंह और पी चिदंबरम ने कहे थे।
    आरके सिंह तब गृह सचिव थे, पी चिदंबरम के अधीन काम करते थे। उन्होंने मीडिया के सामने हिंदू आतंकवाद शब्द कहा था।
    मुझे ऐसा ध्यान नहीं है। मैंने तो इनके (दिग्विजय-चिदंबरम) मुख से ही ये शब्द सुना है और मैं वही मानती हूं। जब प्रामाणिक होगा तब मैं इसके बारे में कुछ कहूंगी। और देखिए ये पार्टी जो है ना, क्यों होता है कि यही पार्टी देश और धर्म की बात करती है। मेरी विचारधारा के समकक्ष ये पार्टी थी इसलिए मैंने इसे जॉइन किया और मैं प्रत्याशी बनी हूं।
    0 क्या आपको लगता है कि जब आपका मुश्किल समय था, जब आप लगातार कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रही थीं और आप पर मकोका लगा था, तब भाजपा ने आपका साथ नहीं दिया, बल्कि आपसे किनारा कर लिया।
    0 देखिए मैंने किसी के कारण देशभक्ति नहीं की है। देशभक्ति मेरी रग रग में है, वही मेरे जीवन का आधार है। इसी के लिए मेरा जन्म भी हुआ है। और मैं किसी को ये नहीं कहूंगी कि किसी ने मेरे लिए किया या नहीं किया, पर जो भी देश-धर्म के लिए काम करते हैं, उन्होंने मेरे लिए अवश्य किया है। मैं उन्हें साधुवाद देती हूं।

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Posted Date : 17-Apr-2019
  • -बी सतीश
    वेमुरु हरिप्रसाद आंध्र प्रदेश सरकार में तकनीकी सलाहकार हैं। इसके अलावा वो नेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं। साल 2010 में हरिप्रसाद तब सुर्खियों में आए जब उन पर कथित तौर पर ईवीएम से छेड़छाड़ करने और ईवीएम चुराने के आरोप लगे। अब वह तेलुगु देशम पार्टी से जुड़े हैं। अब उनके नाम के साथ तेलुगु देशम पार्टी ने भारत के चुनाव आयोग को प्रस्तावित टीम का नाम सौंपा तो चुनाव आयोग ने उनकी उपस्थिति पर आपत्ति जताई, इसे लेकर वह एक बार फिर सुर्खियों में है।
    हरिप्रसाद कहते हैं, किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से छेड़छाड़ की जा सकती है। इसके लिए एक रसीद होनी चाहिए। तभी हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनका दुरुपयोग नहीं हुआ है।
    हरिप्रसाद 2009 से ईवीएम के मुद्दों पर सक्रिय हैं। वह इलेक्शन वॉच के संयोजक वीवी।राव को तकनीकी सहायता भी प्रदान कर चुके हैं, राव ने ईवीएम पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ किया।
    भारत के चुनाव आयोग ने सितंबर, 2009 में अपने सामने उन्हें ईवीएम हैक करने के लिए आमंत्रित किया था। हालांकि चुनाव आयोग ने हरिप्रसाद की टीम को अपना काम पूरा करने से पहले रोक दिया। इसके बाद चुनाव आयोग ने कहा कि उनकी टीम ईवीएम हैक नहीं कर पायी।
    हरिप्रसाद ने कहा कि आयोग ने उन्हें काम पूरा नहीं करने दिया। उन्होंने इस पूरी घटना का वीडियो रिकॉर्डिंग जारी कराने की भी अपील की थी। वीवी राव कहते हैं, हमारे काम में बाधा डालने के लिए, भारत का चुनाव आयोग खोखली दलील लेकर आया था कि ईवीएम खोलने से ईसीआईएल के पेटेंट का उल्लंघन होगा।
    साल 2010 में महाराष्ट्र से ईवीएम चुराने के आरोप में हरिप्रसाद को गिरफ्तार किया गया था। हरिप्रसाद 29 अप्रैल, 2010 को एक तेलुगू चैनल पर लाइव ये दिखा रहे थे कि कैसे एक ईवीएम को हैक किया जा सकता है। जिस ईवीएम पर हरिप्रसाद ये डेमो दिखा रहे थे उसका इस्तेमाल महाराष्ट्र चुनाव में किया गया था।
    12 मई, 2010 को महाराष्ट्र के राज्य चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र पुलिस से इसकी शिकायत की जिसके बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
    इस पूरी घटना को राव याद करते हुए कहते हैं, 2009 में हमने ईवीएम से संबंधित 50 सवालों के साथ चुनाव आयोग से संपर्क किया था। उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिलने पर हमने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ईवीएम पर अपनी पहली याचिका के दौरान हरिप्रसाद ने हमें तकनीकी सहायता मुहैया करायी।
    कुछ अन्य विदेशी विशेषज्ञों ने हरिप्रसाद के साथ काम किया है। हम एक तेलुगू चैनल पर ईवीएम को कैसे हैक किया जा सकता है इसका लाइव कर रहे थे। ये ईवीएम महाराष्ट्र के एक व्यक्ति ने हमें मुहैया कराई थी। इस मामले में बाद में हरिप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद उन्होंने तेलुगू देशम पार्टी के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाई। हालांकि, हरिप्रसाद को 2010 में इसी मुद्दे पर सैन फ्रांसिस्को की संस्था इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन ने उन्हें पायनियर पुरस्कार से सम्मानित किया। मिशिगन विश्वविद्यालय के तीन प्रतिनिधियों, हरिप्रसाद सहित नेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के चार प्रतिनिधियों और नीदरलैंड के एक प्रतिनिधि को ये पुरस्कार दिया गया।
    2010 में उन्होंने अमरीका में आयोजित कम्प्यूटिंग मशीनरी सम्मेलन के 17वें एसोसिएशन में भारत के इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के सुरक्षा विश्लेषण पर एक पेपर प्रकाशित किया था। हरिप्रसाद ने अपने लिंक्डइन अकाउंट पर ईवीएम के मुद्दे पर अपना बचाव किया।
    उन्होंने लिखा, मैंने सुरक्षा के लिहाज से ईवीएम का पहला स्वतंत्र ऑडिट किया है। मुझे इसके लिए जेल भेजा गया, मेरे खिलाफ जांच की गई। मैंने ये सबकुछ अकेले सह लिया ताकि जो लोग इसमें मेरे साथ थे वे बच सकें। उन्होंने यह भी लिखा कि ईवीएम के मुद्दे पर एक साल तक चुनाव आयोग के सामने गुहार लगाने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला है।
    वर्तमान में हरिप्रसाद आंध्र प्रदेश सरकार की विभिन्न तकनीकी पहलों पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
    वह आंध्र प्रदेश ई-गवर्निंग काउंसिल के सदस्य थे और आंध्र प्रदेश की रियल-टाइम गवर्नेंस कमेटी के तकनीकी सलाहकार के रूप में भी काम कर चुके हैं। अब वह एपी फाइबर ग्रिड परियोजना के प्रभारी हैं और फाइबर ग्रिड के साथ आंध्र प्रदेश में कनेक्टिविटी के काम की देखरेख करते हैं।
    विधानसभा में वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने आरोप लगाया था कि आंध्र प्रदेश सरकार ने हरिप्रसाद को 333 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट दिलाया। हालांकि चंद्र बाबू नायडू ने इन आरोपों का खंडन किया।  हाल ही में जब तेलुगु देशम पार्टी के ऊपर मतदाताओं के डेटा इस्तेमाल करने का आरोप लगा तो हरि प्रसाद ने टेलीविजन स्टूडियो में आयोजित बहस में सरकार का बचाव किया। उनके भाई वेमुरु रविकुमार तेलुगु देशम पार्टी के एनआरआई मामलों के प्रभारी हैं।
    नेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के साथ, वह सीथपल्ली गैस पावर प्राइवेट लिमिटेड, फ्यूचर स्पेस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, मैक्सिमाइजऱ टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड और टेक्नोलॉजी ट्रांसपेरेंसी फाउंडेशन के निदेशक मंडल का भी हिस्सा रह चुके हैं।
    हाल ही में हरिप्रसाद ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया, चुनाव आयोग के नियम के मुताबिक वीवीपैट की पर्ची पारदर्शी खिड़की पर 7 सेकंड के लिए नजऱ आनी चाहिए। लेकिन वास्तव में ये पर्ची केवल 3 सेकंड के लिए दिखती है। (बीबीसी)

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Posted Date : 17-Apr-2019
  • बी सतीश
    नई दिल्ली, 17 अप्रैल । वेमुरु हरिप्रसाद आंध्र प्रदेश सरकार में तकनीकी सलाहकार हैं। इसके अलावा वो नेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं। साल 2010 में हरिप्रसाद तब सुर्खियों में आए जब उन पर कथित तौर पर ईवीएम से छेड़छाड़ करने और ईवीएम चुराने के आरोप लगे। अब वह तेलुगु देशम पार्टी से जुड़े हैं। अब उनके नाम के साथ तेलुगु देशम पार्टी ने भारत के चुनाव आयोग को प्रस्तावित टीम का नाम सौंपा तो चुनाव आयोग ने उनकी उपस्थिति पर आपत्ति जताई, इसे लेकर वह एक बार फिर सुर्खियों में है।
    हरिप्रसाद कहते हैं, किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से छेड़छाड़ की जा सकती है। इसके लिए एक रसीद होनी चाहिए। तभी हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनका दुरुपयोग नहीं हुआ है।
    हरिप्रसाद 2009 से ईवीएम के मुद्दों पर सक्रिय हैं। वह इलेक्शन वॉच के संयोजक वीवी।राव को तकनीकी सहायता भी प्रदान कर चुके हैं, राव ने ईवीएम पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ किया।
    भारत के चुनाव आयोग ने सितंबर, 2009 में अपने सामने उन्हें ईवीएम हैक करने के लिए आमंत्रित किया था। हालांकि चुनाव आयोग ने हरिप्रसाद की टीम को अपना काम पूरा करने से पहले रोक दिया। इसके बाद चुनाव आयोग ने कहा कि उनकी टीम ईवीएम हैक नहीं कर पायी।
    हरिप्रसाद ने कहा कि आयोग ने उन्हें काम पूरा नहीं करने दिया। उन्होंने इस पूरी घटना का वीडियो रिकॉर्डिंग जारी कराने की भी अपील की थी। वीवी राव कहते हैं, हमारे काम में बाधा डालने के लिए, भारत का चुनाव आयोग खोखली दलील लेकर आया था कि ईवीएम खोलने से ईसीआईएल के पेटेंट का उल्लंघन होगा।
    साल 2010 में महाराष्ट्र से ईवीएम चुराने के आरोप में हरिप्रसाद को गिरफ्तार किया गया था। हरिप्रसाद 29 अप्रैल, 2010 को एक तेलुगू चैनल पर लाइव ये दिखा रहे थे कि कैसे एक ईवीएम को हैक किया जा सकता है। जिस ईवीएम पर हरिप्रसाद ये डेमो दिखा रहे थे उसका इस्तेमाल महाराष्ट्र चुनाव में किया गया था।
    12 मई, 2010 को महाराष्ट्र के राज्य चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र पुलिस से इसकी शिकायत की जिसके बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
    इस पूरी घटना को राव याद करते हुए कहते हैं, 2009 में हमने ईवीएम से संबंधित 50 सवालों के साथ चुनाव आयोग से संपर्क किया था। उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिलने पर हमने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ईवीएम पर अपनी पहली याचिका के दौरान हरिप्रसाद ने हमें तकनीकी सहायता मुहैया करायी।
    कुछ अन्य विदेशी विशेषज्ञों ने हरिप्रसाद के साथ काम किया है। हम एक तेलुगू चैनल पर ईवीएम को कैसे हैक किया जा सकता है इसका लाइव कर रहे थे। ये ईवीएम महाराष्ट्र के एक व्यक्ति ने हमें मुहैया कराई थी। इस मामले में बाद में हरिप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद उन्होंने तेलुगू देशम पार्टी के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाई। हालांकि, हरिप्रसाद को 2010 में इसी मुद्दे पर सैन फ्रांसिस्को की संस्था इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन ने उन्हें पायनियर पुरस्कार से सम्मानित किया। मिशिगन विश्वविद्यालय के तीन प्रतिनिधियों, हरिप्रसाद सहित नेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के चार प्रतिनिधियों और नीदरलैंड के एक प्रतिनिधि को ये पुरस्कार दिया गया।
    2010 में उन्होंने अमरीका में आयोजित कम्प्यूटिंग मशीनरी सम्मेलन के 17वें एसोसिएशन में भारत के इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के सुरक्षा विश्लेषण पर एक पेपर प्रकाशित किया था। हरिप्रसाद ने अपने लिंक्डइन अकाउंट पर ईवीएम के मुद्दे पर अपना बचाव किया।
    उन्होंने लिखा, मैंने सुरक्षा के लिहाज से ईवीएम का पहला स्वतंत्र ऑडिट किया है। मुझे इसके लिए जेल भेजा गया, मेरे खिलाफ जांच की गई। मैंने ये सबकुछ अकेले सह लिया ताकि जो लोग इसमें मेरे साथ थे वे बच सकें। उन्होंने यह भी लिखा कि ईवीएम के मुद्दे पर एक साल तक चुनाव आयोग के सामने गुहार लगाने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला है।
    वर्तमान में हरिप्रसाद आंध्र प्रदेश सरकार की विभिन्न तकनीकी पहलों पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।
    वह आंध्र प्रदेश ई-गवर्निंग काउंसिल के सदस्य थे और आंध्र प्रदेश की रियल-टाइम गवर्नेंस कमेटी के तकनीकी सलाहकार के रूप में भी काम कर चुके हैं। अब वह एपी फाइबर ग्रिड परियोजना के प्रभारी हैं और फाइबर ग्रिड के साथ आंध्र प्रदेश में कनेक्टिविटी के काम की देखरेख करते हैं।
    विधानसभा में वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने आरोप लगाया था कि आंध्र प्रदेश सरकार ने हरिप्रसाद को 333 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट दिलाया। हालांकि चंद्र बाबू नायडू ने इन आरोपों का खंडन किया।  हाल ही में जब तेलुगु देशम पार्टी के ऊपर मतदाताओं के डेटा इस्तेमाल करने का आरोप लगा तो हरि प्रसाद ने टेलीविजन स्टूडियो में आयोजित बहस में सरकार का बचाव किया। उनके भाई वेमुरु रविकुमार तेलुगु देशम पार्टी के एनआरआई मामलों के प्रभारी हैं।
    नेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के साथ, वह सीथपल्ली गैस पावर प्राइवेट लिमिटेड, फ्यूचर स्पेस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, मैक्सिमाइजऱ टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड और टेक्नोलॉजी ट्रांसपेरेंसी फाउंडेशन के निदेशक मंडल का भी हिस्सा रह चुके हैं।
    हाल ही में हरिप्रसाद ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया, चुनाव आयोग के नियम के मुताबिक वीवीपैट की पर्ची पारदर्शी खिडक़ी पर 7 सेकंड के लिए नजऱ आनी चाहिए। लेकिन वास्तव में ये पर्ची केवल 3 सेकंड के लिए दिखती है। (बीबीसी)

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Posted Date : 17-Apr-2019
  • जुबैर अहमद
    बंगलुरु से, 17 अप्रैल । बंगलुरु साउथ चुनावी क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के युवा उमीदवार तेजस्वी सूर्य पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन उनके भाषणों से ऐसा नहीं लगता।
    रविवार को पहली बार वोट देने वाले युवाओं से कनेक्शन बनाने वो एक कॉलेज पहुंचे। विद्यार्थियों के साथ खड़े वो खुद भी एक विद्यार्थी लगते हैं। लेकिन सफ़ेद शर्ट और काली पेंट पहने 28 वर्षीय तेजस्वी बोलने में किसी वरिष्ठ नेता से कम नहीं। उनका अंदाज नेताओं वाला नहीं है। लोगों के बीच बैठे वो अपने मोबाइल फोन पर उसी तरह से लगे रहते हैं जैसे आज के युवा। वो सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय हैं और अपनी चुनावी मुहिम के वीडियो रोज सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर चढ़ाना नहीं भूलते हैं।
    सभा में वो दो घंटे देर से पहुंचे लेकिन जब तेजस्वी ने बोलना शुरू किया तो वहां मौजूद युवाओं ने बार-बार तालियों से उनकी प्रशंसा की। भीड़ में कुछ बुर्के वाली मुस्लिम महिलायें भी ताली बजा रही थीं। उस समय तेजस्वी की निगाहें उन पर भी गयीं।
    पेशे से वकील, कर्नाटक के चिकमगलूर जि़ले में पैदा हुए तेजस्वी को एक फायरब्रांड राष्ट्रवादी हिंदू के रूप में जाना जाता है। वो बीजेपी के हिंदुत्व विचारधारा की पैदावार हैं और पार्टी में एक बड़े नेता बन कर उभरने की क्षमता रखते हैं। उनसे जुड़े बयानों में एक ये है कि उनकी पार्टी केवल हिन्दुओं के लिए है। मैंने भाषण के बाद उन्हें इस बयान का हवाला देकर उनसे पूछा कि क्या वो मुस्लिम इलाकों में भी जाकर वोट मांग रहे हैं तो वो भडक़े और कहा कि ये सवाल सांप्रदायिक चश्मे से पूछा गया है।
    ये याद दिलाने पर कि उनके सांप्रदायिक बयानों पर ये सवाल आधारित है उन्होंने कहा, मैं माइनॉरिटी-मेजॉरिटी नहीं मानता। हमारे लिए हमारे चुनावी क्षेत्र के सभी वोटर बंगलोरियन हैं। उन्होंने अपने पुराने बयानों पर टिप्पणी करते हुए कहा, अगर कांग्रेस मुस्लिम वोट मांगे तो वो सेक्युलर है और अगर हम हिन्दुओं की बात करें तो सांप्रदायिक?
    तेजस्वी पार्टी की युवा विंग अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के रास्ते बीजेपी में आये और अच्छा बोलने के गुण के कारण पार्टी के ऊंची पायदानों पर चढ़ते गए। वो इस समय पार्टी के कर्नाटक यूनिट के महासचिव हैं।
    इस चुनावी क्षेत्र से पार्टी ने जब उनके नाम का ऐलान किया तो सभी हैरान रह गए। बंगलुरु दक्षिण लोकसभा सीट 1996 से पूर्व मंत्री अनंत कुमार के पास था। उनकी 2018 में अचानक मृत्यु ने निर्वाचन क्षेत्र में एक रिक्तता पैदा कर दी। अनंत कुमार की पत्नी तेजस्विनी के लिए भाजपा ने तेजस्वी सूर्य को प्राथमिकता दी। इस फैसले से वो आज भी नाराज बताई जाती हैं। मगर उन्होंने पार्टी के फैसले को स्वीकार कर लिया है। पार्टी के एक कार्यकर्ता ने कहा कि उन्हें इस सीट को नहीं छोडऩा चाहिए था। वो निर्दलीय उमीदवार बन कर चुनाव लड़तीं तो उनकी जीत यकीनी थी।  लेकिन तेजस्वी के लिए समस्या दूर नहीं हुई है। हमने इस चुनावी क्षेत्र में कुछ दिनों तक घूमने के बाद ये अंदाजा लगाया कि उन्हें उम्मीदवार बनाये जाने के फैसले से पार्टी के कुछ नेता अब भी नाराज हैं। लेकिन तेजस्वी कहते हैं ये बात अब पुरानी हो चुकी है। हमें पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं का आशीर्वाद हासिल है।
    तेजस्वी का मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज नेता बी।के हरिप्रसाद से होगा जो उनसे दोगुनी उम्र के हैं। तेजस्वी जिन मुद्दों को चुनावी रैलियों में उजागर कर रहे हैं उनमे बंगलुरु को वल्र्ड क्लास शहर बनाने का वचन शामिल है। लेकिन उनके लिए इस चुनाव का मुख्य मुद्दा नरेंद्र मोदी को एक बार फिर प्रधान मंत्री बनाना है। वो कहते हैं, इस चुनाव का मुख्य एजेंडा यह है कि लोग नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं या नहीं। लोग एक आवाज में कह रहे हैं कि वो मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। इस चुनाव का ये मुख्य मुद्दा है। उनके अनुसार मोदी का एक बार प्रधानमंत्री बनने का मतलब होगा भारत सुरक्षित हाथों में है, प्रगति की राह पर आगे बढ़ रहा है। बंगलुरु साउथ चुनावी क्षेत्र बीजेपी का गढ़ समझा जाता है।
    दक्षिण भारत के पांच राज्यों में केवल कर्नाटक एक ऐसा राज्य है जहाँ बीजेपी अन्य सभी पार्टियों पर हावी है। पिछले आम चुनाव में इसे 28 सीटों में से 17 सीटें मिली थीं।
    कर्नाटक को छोडक़र दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों में बीजेपी इतनी कमजोर क्यों है? इसके जवाब में तेजस्वी कहते हैं, बीजेपी कांग्रेस पार्टी के मुकाबले में एक नयी पार्टी है। किसी भी पार्टी को अपने पैर जमाने में समय लगता है। हम कम समय में तेजी से आगे बढ़े हैं और हमारा ग्रोथ होती रहेगी। जिस आसानी से वह रैलियों को संबोधित करते हैं वह सराहनीय है।  (बीबीसी)

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Posted Date : 16-Apr-2019
  • लोकसभा चुनाव के पहले फेज में 91 सीटों पर 11 अप्रैल को चुनाव हो चुका है। अब बारी है 18 अप्रैल के दूसरा फेज की, जब 13 राज्यों की 97 लोकसभा सीटों पर मतदान होगा। इसलिए यहां ये जानना जरूरी है कि इन 97 सीटों पर  2014 का रिजल्ट क्या था? अर्थात दूसरे फेज का चुनावी इतिहास किस गठबंधन के पक्ष में है?
    इसलिए इस चुनावी गुत्थी को समझने के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के चार आंकड़ों को परखना जरूरी है। पहला 13 राज्यों का ओवर ऑल परिणाम, दूसरा एनडीए  का परिणाम , तीसरा यूपीए  का परिणाम और चौथा अन्य दलों का परिणाम।
    पहला, 2014 लोकसभा चुनाव के कुल 97 सीटों का परिणाम इस प्रकार रहा- एनडीए को 71 सीटें, यूपीए को 17 सीटें और अन्य को 9 सीटें मिलीं। यानी एनडीए को 73 फीसदी सीटें मिली जो कि अभूतपूर्व परिणाम था। यूपीए और अन्य को क्रमश: 18 फीसदी एवं 9 फीसदी सीटें मिली।
    दूसरा, यदि 2014 लोकसभा चुनाव में एनडीए के परिणाम को देखें तो भाजपा को 71 में से 27 सीटें मिली थी और एआईएडीएमके को 37 सीटें मिली। तीसरे नंबर पर थी शिवसेना जिसे 4 सीटें मिली थीं।
    तीसरा, यदि 2014 लोकसभा चुनाव में यूपीए के परिणाम को देखें तो कांग्रेस को 17  में से 12  सीटें मिली थीं और आरजेडी और जेडीएस दोनों को 2- 2 सीटें मिली थीं।
    चौथा, यदि 2014 लोकसभा चुनाव में अन्य के परिणाम को देखें तो बीजेडी को 9 में से 4 और सीपीएम को 2 सीटें मिली थीं।
    अब सवाल है कि लोकसभा चुनाव 2019 के दूसरे फेज का चुनावी इतिहास किस गठबंधन के पक्ष में जाता है? 2014 लोकसभा चुनाव के कुल 97 सीटों का परिणाम स्पष्ट रूप में  एनडीए के पक्ष में जाता है। यानि एनडीए को 97 में से 71 सीटें मिली जो जीत का 73 फीसदी प्रतिशत बनता है जबकि  यूपीए को 17 सीटें और अन्य को 9 सीटें मिलीं जो कि क्रमश: 18 फीसदी एवं 9 फीसदी बनता है।
    तमिलनाडु का चुनावी परिणाम निर्णायक साबित होगा क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में 39 में से भाजपा को 1, पीएमके को 1 और एआईएडीएमके को 37 सीटें मिली थीं, जबकि यूपीए गठबंधन का सफाया हो गया था। दूसरा कर्नाटक का परिणाम भी बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। अर्थात इन दो राज्यों का परिणाम भविष्य को काफी हद तक तय करेगा। अब प्रश्न उठता है कि क्या 2019 लोक सभा चुनाव में एनडीए को फिर से 97 में से 71 सीटें मिलेंगी? इतिहास तो पक्ष में है लेकिन अबकी बार परिणाम क्या होगा इसका खुलासा तो मई 23 को ही हो पाएगा और तब तक हमें करना होगा इंतजार। (टाईम्स नाऊ)

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