विचार / लेख

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Date : 26-Jun-2019

आपातकाल में जो और जैसे हुआ उसको प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी की इन पांच लघु व्यंग्य कथाओं के जरिये संक्षेप में, बड़ी सरलता से समझ सकते हैं। 

लक्ष्य की रक्षा
एक था कछुआ, एक था खरगोश जैसा कि सब जानते हैं। खरगोश ने कछुए को संसद, राजनीतिक मंच और प्रेस के बयानों में चुनौती दी- अगर आगे बढऩे का इतना ही दम है, तो हमसे पहले मंजिल पर पहुंचकर दिखाओ। रेस आरंभ हुई। खरगोश दौड़ा, कछुआ चला धीरे-धीरे अपनी चाल।
जैसा कि सब जानते हैं आगे जाकर खरगोश एक वृक्ष के नीचे आराम करने लगा। उसने संवाददाताओं को बताया कि वह राष्ट्र की समस्याओं पर गम्भीर चिंतन कर रहा है, क्योंकि उसे जल्दी ही लक्ष्य तक पहुंचना है। यह कहकर वह सो गया। कछुआ लक्ष्य तक धीरे-धीरे पहुंचने लगा।
जब खरगोश सो कर उठा, उसने देखा कि कछुआ आगे बढ़ गया है, मेरे हारने और बदनामी के स्पष्ट आसार हैं। खरगोश ने तुरंत आपातकाल घोषित कर दिया। उसने अपने बयान में कहा कि प्रतिगामी पिछड़ी और कंजरवेटिव (रूढि़वादी) ताकतें आगे बढ़ रही हैं, जिनसे देश को बचाना बहुत ज़रूरी है। और लक्ष्य छूने के पूर्व कछुआ गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
शेर की गुफा में न्याय
जंगल में शेर के उत्पात बहुत बढ़ गए थे। जीवन असुरक्षित था और बेहिसाब मौतें हो रही थीं। शेर कहीं भी, किसी पर हमला कर देता था। इससे परेशान हो जंगल के सारे पशु इक_ा हो वनराज शेर से मिलने गए। शेर अपनी गुफा से बाहर निकला – कहिए क्या बात है?
उन सबने अपनी परेशानी बताई और शेर के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई। शेर ने अपने भाषण में कहा-
‘प्रशासन की नजर में जो कदम उठाने हमें जरूरी हैं, वे हम उठाएंगे। आप इन लोगों के बहकावे में न आवें जो हमारे खिलाफ हैं। अफवाहों से सावधान रहें, क्योंकि जानवरों की मौत के सही आंकड़े हमारी गुफा में हैं जिन्हें कोई भी जानवर अंदर आकर देख सकता है। फिर भी अगर कोई ऐसा मामला हो तो आप मुझे बता सकते हैं या अदालत में जा सकते हैं।’
चूंकि सारे मामले शेर के खिलाफ थे और शेर से ही उसकी शिकायत करना बेमानी था इसलिए पशुओं ने निश्चय किया कि वे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।
जानवरों के इस निर्णय की खबर गीदड़ों द्वारा शेर तक पहुंच गई थी। उस रात शेर ने अदालत का शिकार किया। न्याय के आसन को पंजों से घसीट अपनी गुफा में ले आया।
शेर ने अपनी नई घोषणाओं में बताया – जंगल के पशुओं की सुविधा के लिए, गीदड़ मंडली के सुझावों को ध्यान में रखकर हमने अदालत को सचिवालय से जोड़ दिया है  जंगल में इमर्जेंसी घोषित कर दी गई। शेर ने अपनी नई घोषणाओं में बताया – जंगल के पशुओं की सुविधा के लिए, गीदड़ मंडली के सुझावों को ध्यान में रखकर हमने अदालत को सचिवालय से जोड़ दिया है, ताकि न्याय की गति बढ़े और व्यर्थ की ढिलाई समाप्त हो। आज से सारे मुकदमों की सुनवाई और फैसले हमारे गुफा में होंगे।
इमर्जेंसी के दौर में जो पशु न्याय की तलाश में शेर की गुफा में घुसा उसका अंतिम फैसला कितनी शीघ्रता से हुआ इसे सब जानते हैं।
 प्रगति
खरगोश का एक जोड़ा था, जिनके पांच बच्चे थे।
एक दिन भेडिय़ा जीप में बैठकर आया और बोला - असामाजिक तत्वों तुम्हें पता नहीं सरकार ने तीन बच्चों का लक्ष्य रखा है। और दो बच्चे कम करके चला गया।
कुछ दिनों बाद भेडिय़ा फिर आया और बोला कि सरकार ने लक्ष्य बदल दिया और एक बच्चे को और कम कर चला गया। खरगोश के जोड़े ने सोचा, जो हुआ सो हुआ, अब हम शांति से रहेंगे। मगर तभी जंगल में इमर्जेंसी लग गई।
कुछ दिन बाद भेडिय़े ने खरगोश के जोड़े को थाने पर बुलाया और कहा कि सुना है, तुम लोग असंतुष्ट हो सरकारी निर्णयों से और गुप्त रूप से कोई षड्यंत्र कर रहे हो? खरगोश से साफ इनकार करते हुए सफाई देनी चाही, पर तभी भेडिय़े ने बताया कि इमर्जेंसी के नियमों के तहत सफाई सुनी नहीं जाएगी।
उस रोज थाने में जोड़ा कम हो गया।
दो बच्चे बचे। मूर्ख थे। मां-बाप को तलाशने खुद थाने पहुंच गए। भेडिय़ा उनका इंतजार कर रहा था। यदि थाने नहीं जाते तो वे इमर्जेंसी के बावजूद कुछ दिन और जीवित रह सकते थे।
कला और प्रतिबद्धता
कोयल का कंठ अच्छा था, स्वरों का ज्ञान था और राग-रागनियों की थोड़ी बहुत समझ थी। उसने निश्चय किया कि वह संगीत में अपना कैरियर बनाएगी। जाहिर है उसने शुरुआत आकाशवाणी से करनी चाही। कोयल ने एप्लाय (आवेदन) किया। दूसरे ही दिन उसे ऑडीशन के लिए बुलावा आ गया। वे इमर्जेंसी के दिन थे और सरकारी कामकाज की गति तेज हो गई थी।
कोयल आकाशवाणी पहुंची। स्वर परीक्षा के लिए वहां तीन गिद्ध बैठे हुए थे। ‘क्या गाऊं?’ कोयल ने पूछा।
गिद्ध हंसे और बोले, ‘यह भी कोई पूछने की बात है। बीस सूत्री कार्यक्रम पर लोकगीत सुनाओ। हमें सिर्फ यही सुनने-सुनाने का आदेश है।’
‘बीस सूत्री कार्यक्रम पर लोकगीत? वह तो मुझे नहीं आता। आप कोई भजन या गजल सुन सकते हैं।’ कोयल ने कहा।
गिद्ध फिर हंसे। ‘गजल या भजन? बीस सूत्री कार्यक्रम पर हो तो अवश्य सुनाइए?’
‘बीस सूत्री कार्यक्रम पर तो नहीं है।’ कोयल ने कहा। ‘तब क्षमा कीजिए, कोकिला जी। हमारे पास आपके लिए कोई स्थान नहीं है।’ गिद्धों ने कहा।
कोयल चली आई। आते हुए उसने देखा कि म्यूजिक रूम (संगीत कक्ष) में कौओं का दल बीस सूत्री कार्यक्रम पर कोरस रिकॉर्ड करवा रहा है।
कोयल ने उसके बाद संगीत में अपनी करियर बनाने का आइडिया त्याग दिया और शादी करके ससुराल चली गई।
बुद्धिजीवियों का दायित्व
लोमड़ी पेड़ के नीचे पहुंची। उसने देखा ऊपर की डाल पर एक कौवा बैठा है, जिसने मुंह में रोटी दाब रखी है। लोमड़ी ने सोचा कि अगर कौवा गलती से मुंह खोल दे तो रोटी नीचे गिर जाएगी। नीचे गिर जाए तो मैं खा लूं।
‘लोमड़ी बाई, शासन ने हम बुद्धिजीवियों को यह रोटी इसी शर्त पर दी है कि इसे मुंह में ले हम अपनी चोंच को बंद रखें। मैं जरा प्रतिबद्ध हो गया हूं आजकल’
लोमड़ी ने कौवे से कहा, ‘ भैया कौवे! तुम तो मुक्त प्राणी हो, तुम्हारी बुद्धि, वाणी और तर्क का लोहा सभी मानते हैं। मार्क्सवाद पर तुम्हारी पकड़ भी गहरी है। वर्तमान परिस्थितियों में एक बुद्धिजीवी के दायित्व पर तुम्हारे विचार जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। यों भी तुम ऊंचाई पर बैठे हो, भाषण देकर हमें मार्गदर्शन देना तुम्हें शोभा देगा। बोलो मुंह खोले कौवे!’
इमर्जेंसी का काल था। कौवे बहुत होशियार हो गए थे। चोंच से रोटी निकाल अपने हाथ में ले धीरे से कौवे ने कहा - ‘लोमड़ी बाई, शासन ने हम बुद्धिजीवियों को यह रोटी इसी शर्त पर दी है कि इसे मुंह में ले हम अपनी चोंच को बंद रखें। मैं जरा प्रतिबद्ध हो गया हूं आजकल, क्षमा करें। यों मैं स्वतंत्र हूं, यह सही है और आश्चर्य नहीं समय आने पर मैं बोलूं भी।’ (सत्याग्रह)

 


Date : 25-Jun-2019

हिमांशु शेखर
अपने फैसलों से सबको जब-तब हैरान करने वाले प्रशांत किशोर ने हाल में आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की जीत में अहम भूमिका निभाई है। 

23 मई, 2019 को जब लोकसभा चुनावों के परिणाम आ रहे थे तो उस दिन चारों तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की चर्चा हो रही थी। दिल्ली में हर ओर अमित शाह के राजनीतिक कौशल और संगठन की क्षमता का बखान किया जा रहा था। कहा जा रहा था कि अगर उनकी दिन-रात की अथक मेहनत न होती तो भाजपा के लिए इतनी प्रचंड जीत संभव न होती। लेकिन दिल्ली से दूर दक्षिण भारत में भी उसी दिन एक असाधारण घटना घट रही थी। आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के रूप में भी एक चमकते सियासी सितारे का उदय हुआ था। 175 सीटों वाली विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस 150 से अधिक सीटें जीतने में कामयाब हुई। 25 में से 22 लोकसभा सीटों पर उशका कब्जा हुआ। जगन मोहन की इस सफलता के बीच अचानक से चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी चर्चा में आए। बहुत से लोगों को उसी दिन पता चला कि जगन के लिए चुनावी प्रबंधन का काम प्रशांत किशोर कर रहे थे।
पिछले साल जब यह खबर आई कि प्रशांत किशोर बिहार में सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में बतौर उपाध्यक्ष शामिल हो गए हैं तो कइयों को लगा कि अब वे शायद अपनी पुरानी भूमिका से दूरी बनाएं और पूरी तरह से सक्रिय राजनीति में रम जाएं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जेडीयू भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में है। लेकिन आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस एनडीए का हिस्सा नहीं है। इसके बावजूद प्रशांत किशोर ने जगन के लिए काम किया।
इससे पहले जब 2017 में प्रशांत किशोर ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ और उत्तर प्रदेश में भी थोड़े समय तक कांग्रेस के साथ काम किया था तो उस वक्त नीतीश कुमार एनडीए के पाले में नहीं थे। उस वक्त प्रशांत किशोर भी जेडीयू का हिस्सा नहीं थे। इसलिए वह सब सामान्य माना गया। लेकिन जेडीयू के उपाध्यक्ष होने के बावजूद प्रशांत किशोर का जगन मोहन रेड्डी के लिए काम करना कई लोगों के लिए हैरान करने वाला था।
हालांकि, प्रशांत किशोर अपने फैसलों से राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान करते रहते हैं। जगन मोहन रेड्डी के साथ उनके काम करने को लेकर चर्चाएं चल रही थीं कि यह खबर आ गई कि वे अब पश्चिम बंगाल में भाजपा की धुर विरोधी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के साथ काम करेंगे। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर की सेवाएं लेने का फैसला किया है। जब इस पर हो-हल्ला मचा तो उसके बाद हर किसी की नजरें जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर थीं। यह माना जा रहा था कि इस दौरान प्रशांत किशोर के इस निर्णय के बारे में कुछ जानकारी मिलेगी। लेकिन इस बैठक के बाद जेडीयू ने आधिकारिक तौर पर यह कह दिया कि प्रशांत किशोर की कंपनी किसी भी पार्टी के साथ काम करने को स्वतंत्र है और पश्चिम बंगाल में जेडीयू और तृणमूल कांग्रेस विरोधी खेमे में हैं।
तो क्या यह बात इतनी ही सरल है? इस सवाल पर जेडीयू के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘आपको क्या लगता है कि प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी को हां कहने के पहले नीतीश कुमार से इस संबंध में बात नहीं की होगी! याद रखिए कि इस बीच में दिल्ली से पटना तक कई राजनीतिक घटनाएं हुई हैं। दिल्ली की केंद्र सरकार में जेडीयू को वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो पटना में इसका जवाब नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए दिया। इसलिए यह अनायास नहीं है कि प्रशांत किशोर ममता बनर्जी के पास पहुंच गए हैं।’
प्रशांत किशोर एक योजना के तहत ममता बनर्जी के साथ काम कर रहे हैं, इसका अंदाजा इस बात से भी मिलता है कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस की ओर से उनकी सेवाओं के लिए पैसे भी नहीं मिल रहे हैं। खुद ममता बनर्जी ने ऐसे संकेत दिए जिनसे पता चलता है कि प्रशांत किशोर ने बगैर पैसे के उनके साथ काम करने का निर्णय लिया है। तृणमूल कांग्रेस मुखिया ने खुद कहा है कि प्रशांत किशोर से पैसों की कोई बात नहीं है और वे खुद ही बगैर पैसों के काम करना चाह रहे हैं।
अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब प्रशांत किशोर को पैसे नहीं मिल रहे हैं तो फिर वे एक ऐसे राज्य में क्यों काम कर रहे हैं जहां उनकी पार्टी की साझीदार भाजपा किसी भी कीमत पर सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है? इस बारे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार अभी से अपनी भविष्य की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
इन जानकारों के मुताबिक जिस तरह से भाजपा हर बात पर जेडीयू पर हावी होने की कोशिश कर रही है, उसमें 2020 का विधानसभा चुनाव एक निर्णायक मोड़ हो सकता है। संभव है कि गतिरोध मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषण को लेकर पैदा हो या फिर टिकटों के बंटवारे को लेकर। यह भी संभव है कि साथ चुनाव लडऩे के बावजूद भाजपा रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को अपने साथ मिलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना दावा ठोके। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार के सामने एनडीए से बाहर निकलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रशांत किशोर के रूप में जेडीयू उपाध्यक्ष को विपक्षी पार्टियों के बीच में रखने का फायदा उस वक्त नीतीश कुमार को मिल सकता है जब वे फिर से एनडीए का साथ छोडक़र विपक्ष की राजनीति में आएं। उस स्थिति में प्रशांत किशोर अपने अनुभव का लाभ लेते हुए विपक्षी दलों को एक साथ लाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
नीतीश कुमार और जगन मोहन रेड्डी के बाद अब ममता बनर्जी को भी मिला लें तो तीन बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व से प्रशांत किशोर के संबंध बहुत अच्छे हैं। इसी तरह से बिहार विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के सर्वेसर्वा लालू यादव से भी उन्होंने 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान सहज संबंध विकसित करने में सफलता हासिल की थी। विश्लेषकों का कहना है कि अब जब लालू यादव की पार्टी का लोकसभा चुनावों में खाता भी नहीं खुल पाया है तो नीतीश कुमार के एनडीए से निकलने की स्थिति में प्रशांत किशोर एक बार फिर से आरजेडी को जेडीयू के साथ लाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
विपक्षी एकजुटता में प्रशांत किशोर के कांग्रेस से संबंधों का भी उपयोग हो सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ उनके अच्छे संबंध बताए जाते हैं। कहा जाता है कि कि प्रियंका गांधी से भी उनके रिश्ते ठीक हैं। कांग्रेस में अभी बेहद प्रभावी लोगों में से एक कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ उन्होंने पंजाब विधानसभा चुनावों के वक्त काम किया है। इन सब बातों को देखते हुए कहा जा रहा है कि अगर भविष्य में कोई स्थिति ऐसी बनती है कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की कवायद हो तो प्रशांत किशोर इस काम में मुख्य भूमिका निभाते हुए नजर आ सकते हैं। (सत्याग्रह)

 


Date : 25-Jun-2019

-यश मेघवाल 
भारत में भी समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए प्रतिनिधियों का चुनाव होना चाहिए, या फिर जर्मनी की तरह मिली-जुली प्रणाली अपनाई जानी चाहिए.

भारत के आम चुनावों में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला है. इस अभूतपूर्व कामयाबी से जहां दक्षिणपंथी चिंतक और विचारक खुश हैं और इसमें अपनी विचारधारा की जीत देख रहे हैं. वहीं, आलोचकों की तरफ से कई तरह की व्याख्याएं भी आ रही हैं. जहां भाजपा समर्थक इसे मोदी लहर, विकास की राजनीति की जीत, हिंदुत्व की जीत और जाति की राजनीति का अंत मान रहे हैं. वहीं, आलोचक इस जीत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का असर, भारत पाकिस्तान के बीच तनाव का प्रभाव से लेकर, ईवीएम में गड़बड़ी तक देख रहे हैं. विपक्ष की तरफ से ये आरोप लग रहे हैं कि बीजेपी ने ये चुनाव ध्रुवीकरण और कदाचार के जरिए जीता है. उनका ये आरोप भी है कि चुनाव आयोग ने पूरी प्रकिया को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संचालित नहीं किया और इस चुनाव में एक संस्था के तौर पर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता खंडित हुई है.

चुनाव सुधार एजेंडे में
इस चुनाव के फौरन बाद बीजेपी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने चुनाव प्रक्रिया में बदलाव के लिए बातचीत शुरू कर दी है. नरेंद्र मोदी का सुझाव है कि पूरे देश में हर पांच साल में एक साथ लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव हों. वन नेशन, वन पोल पर विचार करने के लिए सरकार ने एक समिति भी बना दी है. अपनी पार्टी के प्रचंड बहुमत के कारण बीजेपी इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा सकती है और राज्यसभा में बहुमत मिल जाने के बाद इसे लागू भी करा सकती है. इस प्रस्ताव के कई नफा-नुकसान हैं और इस पर अन्य जगहों पर काफी बातचीत हुई है और आगे भी होगी. ये मुद्दा इस लेख का विषय नहीं है, इसलिए इस पर फिलहाल बात नहीं करते हैं.
इस लेख का विषय चुनाव सुधार से जुड़े अन्य पहलू हैं. क्या भारत को मतदान के लिए ईवीएम छोडक़र पेपर बैलेट की ओर लौटना चाहिए. क्या भारत को समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए जनप्रतिनिधियों का चुनाव करना चाहिए, या इस प्रणाली को पूरी तरह नहीं तो भी आंशिक तौर पर अपनाना चाहिए और चुनाव में मीडिया की भूमिका क्या और कितनी होनी चाहिए और इसका नियमन किस तरह होना चाहिए. चुनाव में धर्म का इस्तेमाल भी बहस का एक प्रमुख मुद्दा है. इस क्रम में हम खासकर जर्मन लोकतंत्र में मतदान की प्रणाली को भी देखेंगे.
पेपर बैलेट या ईवीएम: बहस जारी है
पेपर बैलेट या ईवीएम की बहस भारत में अब पुरानी पडऩे लगी है. हालांकि, इसे तमाम दलों के सहयोग से कांग्रेस के बहुमत वाली सरकार ने देश में लागू किया था और इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन का बिल संसद में पारित हुआ है. इस संशोधन के जरिए कानून में एक नई धारा 61 (ए) जोड़ी गई, जो मशीन से मतदान का आधार है. लेकिन, अब लगभग सारा विपक्ष और बीजेपी को छोडक़र ज्यादातर पार्टियां इस बारे में एकमत है कि चुनाव पेपर बैलेट से होना चाहिए. ये मामला बार-बार चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के सामने भी लाया जा रहा है. 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के लिए ईवीएम को दोषी ठहराने और इस मामले को सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट ले जाने वाली बीजेपी ने ईवीएम पर अपनी पोजिशन बदल ली है. बीजेपी कह रही है कि विपक्ष अपनी हार के लिए ईवीएम का बहाना बना रहा है.
हालांकि जर्मनी, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के सभी विकसित लोकतंत्र में कागज पर बने मतपत्र पर ही राष्ट्रीय चुनावों के लिए मतदान होते हैं और भारत को भी ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए. इसके कोई मजबूत तर्क नहीं है. ईवीएम के पक्ष में एकमात्र ठोस तथ्य ये है कि इससे चुनाव प्रक्रिया में समय बचता है. लेकिन, अब भारत में जिस तरह लंबे चरणों में मतदान होने लगे हैं और महीनों तक चुनाव प्रकिया चलती रहती है. उसे देखते हुए ईवीएम से समय बचने का तर्क अपने आप खारिज हो चुका है. ईवीएम के आने के बाद चुनावी प्रक्रिया लगातार लंबी होती चली जा रही है.
किस पद्धति से चुने जाएं जनप्रतिनिधि
दूसरा मुद्दा मतदान के जरिए जनप्रतिनिधि चुनने की पद्धति का है. भारत में मतदाता अपने चुनाव क्षेत्र से सांसद और विधायकों का चुनाव करता है. जो आगे सरकार का गठन करते हैं. हर नागरिक को, बगैर किसी भेदभाव के, मतदान का अधिकार देना भारतीय संविधान का एक प्रगतिशील कदम था और इसके लिए हमें तमाम संविधान निर्माताओं के साथ, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का भी आभारी होना चाहिए, जिन्होंने सार्वभौमिक मताधिकार के पक्ष में तर्क दिए.
इससे पहले, पूना पैक्ट (1932) होने तक बाबा साहेब ‘अछूतों’ (उस समय राजनीतिक विमर्श में यही शब्द प्रचलित था) के लिए सैपरेट एलेक्टोरेट के पक्ष में थे. उनका तर्क था कि अछूतों को हिंदू अपने समाज का हिस्सा नहीं मानते इसलिए उन्हें अपने प्रतिनिधि अलग से चुनने का अधिकार होना चाहिए. ऐसा अधिकार मुसलमानों और सिखों को दिया गया था. सेपरेट एलेक्टोरेट अलग लागू होता को कुछ खास सीटों पर दो प्रतिनिधि चुने जाते. पहले का निर्वाचन सारे वोटर मिल कर करते और दूसरा प्रतिनिधि अछूत मतदाता खुद चुनते. हालांकि, गांधी जी के अनशन और पूना पैक्ट के कारण अछूतों का सैपरेट एलेक्टोरेट लागू नहीं हो पाया. इसकी जगह रिजर्व चुनाव क्षेत्र की व्यवस्था आई.
राष्ट्रपति प्रणाली बनाम संसदीय प्रणाली
दूसरी बहस, राष्ट्रपति प्रणाली बनाम संसदीय प्रणाली की है. राष्ट्रपति प्रणाली में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे लोगों द्वारा होता है. जबकि, संसदीय प्रणाली में जनता द्वारा निर्वाचित सांसद प्रधानमंत्री का चुनाव करते हैं. हर देश अपनी लोकतांत्रिक परंपरा और स्थितियों के मुताबिक शासन प्रणाली चुनते हैं. अमेरिका में राष्ट्रपति प्रणाली है. वहां सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेजेन्टेटिव राष्ट्रपति को तानाशाह बनने से काफी हद तक रोकते हैं. मिसाल के तौर पर, वर्तमान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने चुनावी वादे के मुताबिक अमेरिका-मैक्सिको सीमा पर दीवार नहीं बना पा रहे हैं, क्योंकि दोनों ही सदनों की राय इसके पक्ष में नहीं बन पाई है.
दोनों ही प्रणाली के अपने नफा-नुकसान है. भारत एक विविधता से भरा देश है और यहां के लिए संसदीय प्रणाली ही बेहतर प्रतीत होती है. संविधान निर्माताओं की यही राय थी. हालांकि, केंद्र में नई सरकार बनने के बाद राष्ट्रपति प्रणाली बनाम संसदीय प्रणाली की बहस भी तेज होती दिख रही है. कई राजनीति विज्ञानी ये मान रहे हैं कि भारत भी राष्ट्रपति प्रणाली की ओर बढ़ रहा है.
जर्मनी का अनुभव और भारत के लिए सबक
जर्मनी में सरकार बनाने के लिए इन सबसे अलग एक प्रणाली अपनाई गई है. जर्मनी के नागरिक राष्ट्रीय चुनाव में दो वोट डालते है. एक वोट अपने निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवार के लिए और दूसरा वोट राजनीतिक दल के लिए. इस प्रक्रिया को व्यक्तिगत आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (क्कद्गह्म्ह्यशठ्ठड्डद्यद्ब5द्गस्र क्कह्म्शश्चशह्म्ह्लद्बशठ्ठड्डद्य क्रद्गश्चह्म्द्गह्यद्गठ्ठह्लड्डह्लद्बशठ्ठ स्4ह्यह्लद्गद्व) कहा जाता है. इस प्रणाली से यह तय होता है कि जर्मन संसद बुंडेस्टाग की 598 सीटों को विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्यों में कैसे विभाजित किया जाएगा. मत-पत्र की बाईं ओर पहला वोट उस निर्वाचन क्षेत्र में संसद सदस्य के लिए प्रत्यक्ष वोट होता है, ठीक वैसे ही जैसे भारतीय मतदाता अपने उम्मीदवार को चुनते हैं. जर्मनी में 299 निर्वाचन क्षेत्र हैं. इसलिए प्रत्यक्ष वोट से बुंडेस्टाग में आधी सीटें भरी जाती हैं. दूसरा वोट, मत-पत्र की दाईं ओर, राजनीतिक पार्टी के लिए होता है. राजनीतिक दल किसे संसद भेजेंगे, ये मतदाताओं को पता होता है. दूसरे मतों के परिणाम यह निर्धारित करते हैं कि पार्टियों की ओर से कौन से उम्मीदवार संसद की शेष सीटों पर चुनकर आएंगे हैं.
जब जर्मनी के नागरिकों का मत बंटा हुआ होता है. तो मतदाता कई बार पहले वोट में एक पार्टी के उम्मीदवार के लिए और दूसरे वोट में एक अलग राजनीतिक पार्टी के लिए वोट करते हैं. ऐसे में किसी एक पार्टी के बहुत ज्यादा ताकतवर हो जाने का खतरा नहीं होता. पिछले कई सालों से जर्मनी में गठबंधन द्वारा ही सरकार बनती है. जर्मन चांसलर (प्रधानमंत्री) का चुनाव बुंडेस्टाग (जर्मन संसद) में बहुमत के आधार पर होता है. भारत के मुकाबले चूंकि वहां पार्टियों को भी वोट पड़ता है, तो इस वजह से पार्टियों प्रतिनिधित्व का ख्याल रखती हैं. जर्मनी को इस चेक एंड बैलेंस की पद्धति का न सिर्फ राजनीतिक रूप से फायदा मिला है, बल्कि वहां की आर्थिक तरक्की के लिए भी इसे श्रेय दिया जाता है.
भारतीय निर्वाचन पद्धति की आलोचना
इसके उलट, भारत में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट विधि से जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं. यानी हर सीट पर सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार विजयी होता है. इसलिए जिन पार्टियों के वोट बिखरे हुए हैं, उन्हें कुल मिलाकर अच्छा-खासा वोट मिलने के बावजूद मुमकिन है कि उसके प्रतिनिधि जीतकर न आएं. ये पार्टियां जिन सामाजिक समूह का प्रतिनिधित्व करती हैं, उन समूहों की आवाज संसद में अनसुनी रह जा सकती है. मिसाल के तौर पर 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को यूपी में लगभग 20 परसेंट और देश में 4.1 परसेंट वोट मिले. इस नाते वह देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी, फिर भी लोकसभा में उसका कोई प्रतिनिधि नहीं था. इसी प्रकार 2019 लोक सभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को बिहार में 15 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन उसका एक भी सांसद नहीं जीत पाया. दोनों ही लोकसभा चुनाव में देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस इतनी सीटें नहीं जीत पाई कि उसे लोकसभा में विपक्ष का नेता पद मिल सके. ये भारत की निर्वाचन पद्धति का एक प्रमुख दोष है.
चुनाव सुधार के लिए निम्नलिखित सुझावों पर विचार किया जाना चाहिए.
1. चुनाव फरवरी या सितंबर के महीने में होने चाहिए, जब मौसम ऐसा होता है, जब ज्यादा से ज्यादा लोग मतदान कर पाएंगे. उस समय देश के ज्यादातर हिस्से बाढ़, लू या बर्फबारी से बचे होते हैं.
2. मतदान पेपर बैलेट से हो या ईवीएम से, इसे लेकर एक राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए.
3. चुनाव की नौबत बार-बार न आए, इसके लिए उपायों पर विचार होना चाहिए.
4. चुनाव के दौरान नेताओं के धार्मिक स्थलों पर जाने और धार्मिक नारों को उछाले जाने पर रोक लगनी चाहिए और उसका सख्ती से पालन होना चाहिए.
5. पेड न्यूज और फेक न्यूज पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए. इनके जरिए जनमत को प्रभावित करने की कोशिश होती है, जिसका चुनावों पर असर होता है.
6. भारत में भी समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए प्रतिनिधियों का चुनाव होना चाहिए, या फिर जर्मनी की तरह मिली-जुली प्रणाली अपनाई जानी चाहिए.
7. राज्यसभा और जिन राज्यों में विधान परिषद है, वहां भी एससी-एसटी का रिजर्वेशन होना चाहिए.
8. ओपिनियन पोल पर चुनाव आयोग को प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए. ऐसे मतदाताओं की संख्या हमेशा काफी होती है, जो जीतते दिख रहे उम्मीदवार या पार्टी को वोट दे देते हैं. चूंकि मीडिया को मैनेज करके अपने पक्ष में ओपिनियन पोल कराए जाने का वाकए हुए हैं, इसलिए इन पर रोक जरूरी है. द्धह्लह्लश्चह्य://द्धद्बठ्ठस्रद्ब.ह्लद्धद्गश्चह्म्द्बठ्ठह्ल.द्बठ्ठ
(लेखक ने क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी, लंदन से फाइनांस और इकॉनोमेट्रिक्स में मास्टर्स की पढ़ाई की है. इंडियन ओवरसीज कांग्रेस की छात्र शाखा के सह संस्थापक हैं.)

 

 

 

 


Date : 24-Jun-2019

-रामदत्त त्रिपाठी
मायावती ने रविवार को बहुजन समाज पार्टी में अपने भाई आनंद कुमार और अपने भतीजे आकाश को उच्च पदों पर बिठाकर उस कदम को उठाया है जिसका लोग लंबे समय से इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने अपने भाई आनंद को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और भतीजे आकाश को राष्ट्रीय कोर्डिनेटर बनाया है। लेकिन वह इसके लिए चुनाव खत्म करने का इंतजार कर रही थीं।
वह चुनाव से पहले ऐसा करने से झिझक रही थीं क्योंकि उन्हें लगता था कि लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा कदम उठाने से उनके ऊपर भी भाई-भतीजावाद की राजनीति करने का आरोप लगेगा। मगर अनौपचारिक रूप से दोनों ही पार्टी के कामकाज में काफी सक्रिय थे।
आनंद कुमार मायावती के कार्यक्रमों में अहम भूमिका निभाते थे। इसके साथ ही वह पार्टी के लिए फंड जुटाने का काम करते हैं। वहीं, मायावती ने आकाश को अपनी रैलियों में भी जगह दी और मंचों पर भी साथ बिठाया।
राजनीतिक मंचों पर मायावती और आकाश के बीच कम होती दूरी ये संकेत दे रही थी कि मायावती आकाश को अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में चुन लेंगी।
इसके कारणों पर गौर करें तो मायावती की बढ़ती उम्र एक बड़ा कारण है। इसके साथ ही वह पार्टी के जरूरी मसलों पर बाहरी लोगों पर भरोसा नहीं करना चाहती हैं। पार्टी में फंड जुटाना भी ऐसा ही एक काम है जिसके लिए वह किसी बाहरी व्यक्ति के भरोसे नहीं रहना चाहती हैं।
एक जमाने में उन्होंने राजाराम गौतम को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया था लेकिन बाद में उन्हें हटा दिया गया। अब उन्होंने राजाराम को अपना नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाया है। इसके साथ ही आकाश को भी यही पद दिया है। ऐसे में उन्होंने एक तरह से अपने उत्तराधिकार को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब दे दिया है।
कांशीराम ने जब बहुजन समाज पार्टी बनाई थी तो उसकी बुनियाद में बामसेफ संगठन था जिसमें दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक शामिल थे। बाद में इसे एक पार्टी का रूप दिया गया जिसमें 85 फीसदी जनता के प्रतिनिधित्व की बात की जाती थी। लेकिन मायावती ने सत्ता में आने के लिए बराबर समझौते किए।
1993 में उन्होंने मुलायम सिंह यादव और इसके बाद बीजेपी और कांग्रेस के सहयोग से वह मुख्यमंत्री बनीं। बीजेपी का सहयोग उन्होंने दो-तीन बार और लिया। इस तरह उन्होंने सर्वसमाज का नारा दिया। ब्राह्मणों को अपने साथ जोडऩे के लिए सतीश मिश्रा को अपने साथ मिलाया। ऐसे में मायावती सत्ता के लिए समय समय पर हर संभव गठजोड़ करती रही हैं। इस तरह उनकी पार्टी की छवि प्रभावित हुई। और उनकी पार्टी को वोट देने वाला दलित समाज बसपा से दूर होकर बीजेपी समेत दूसरे दलों के करीब चला गया।
दलित समाज में भी अब मायावती के प्रति उस तरह की वैचारिक श्रद्धा और विश्वास नहीं है, जैसा कि कांशीराम के नेतृत्व पर लोग भरोसा करते थे। मायावती अब सिर्फ अपने स्वजातिय लोगों की नेता बनकर रह गई हैं। इसीलिए, उन्होंने अखिलेश यादव के साथ भी गठजोड़ किया था जो कि बहुत कामयाब नहीं रहा।
अब सवाल ये उठता है कि ये फैसला करने के बाद मायावती के लिए आगे की राह क्या होगी। इसका जवाब ये है कि मायावती ने आगामी विधानसभा उपचुनाव अकेले लडऩे का ऐलान किया है। हालांकि, पहले बसपा उपचुनावों में शामिल नहीं हुआ करती थी।
खास बात ये है कि रविवार को कार्यकर्ताओं की बैठक में उन्होंने दो बातें कही हैं। इनमें से पहली बात उन्होंने ये कही कि अखिलेश यादव मुस्लिम उम्मीदवारों को ज़्यादा टिकट नहीं देना चाहते थे। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जब से चुनाव के नतीजे आए हैं तब से अखिलेश यादव ने उनसे बात नहीं की है। उनकी इस बात से आने वाले विधानसभा चुनावों में एक बार फिर सपा-बसपा गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लडऩे की संभावनाएं नजर आती हैं। (बीबीसी)


Date : 23-Jun-2019

हिमांशु शेखर

कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘एक देश, एक चुनाव’ के मुद्दे पर बुलाई सर्वदलीय बैठक से किनारा कर लिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक देश, एक चुनाव मुद्दे पर चर्चा के लिए आज बुलाई गई सर्वदलीय बैठक से कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने किनारा कर लिया है। कांग्रेस ने बैठक में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। वहीं, बसपा अध्यक्ष मायावती ने कहा कि अगर ईवीएम के मुद्दे पर बैठक होती तो वे इसमें जरूर हिस्सा लेतीं। सपा का कहना है कि वह लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने के विरोध में है। उधर, तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी की राय है कि सरकार को पहले इस मुद्दे पर श्वेत पत्र लाना चाहिए। हालांकि, वाम दल और एनसीपी प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई बैठक में हिस्सा ले रहे हैं।
पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार इस बात के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की कोशिश कर रही है कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभा के लिए एक साथ चुनाव हों। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार यह बात कह चुके हैं। कुछ समय पहले चुनाव आयोग ने भी कहा था कि वह ऐसा कराने के लिहाज से अपनी क्षमताएं विकसित कर रहा है।
आजादी के बाद शुरुआती सालों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। हालांकि, इसके लिए कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं थी। लेकिन सुविधा के नाते 1952 के पहले आम चुनाव के साथ ही राज्यों की विधानसभा के लिए भी चुनाव हुए थे। तकरीबन 15 साल तक विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ चले लेकिन बाद में यह चक्र गड़बड़ा गया। क्योंकि कुछ राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला और कुछ सरकारें अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले गिर गईं। अब एक बार फिर से दोनों चुनाव एक साथ कराने की बात चल रही है तो इसके फायदों को समझना प्रासंगिक है:
राजनीतिक स्थिरता
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का सबसे बड़ा फायदा यही बताया जा रहा है कि इससे राजनीतिक स्थिरता आएगी। क्योंकि अगर किसी राज्य में कार्यकाल खत्म होने के पहले भी कोई सरकार गिर जाती है या फिर चुनाव के बाद किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता तो वहां आनन-फानन में नहीं बल्कि पहले से तय समय पर ही चुनाव होगा। इससे वहां राजनीतिक स्थिरता बनी रहेगी। पांच साल तक किसी राज्य को अपनी विधानसभा के गठन के लिए इंतजार नहीं करना पड़े, इसके लिए यह सुझाव दिया जा रहा है कि ढाई-ढाई साल के अंतराल पर दो बार चुनाव हों। आधे राज्यों की विधानसभा का चुनाव लोकसभा के साथ हो और बाकी राज्यों का इसके ढाई साल बाद। अगर बीच में कहीं कोई राजनीतिक संकट पैदा हो और चुनाव की जरूरत पड़े तो वहां फिर अगला चुनाव ढाई साल के चक्र के साथ हो। विधि आयोग ने 1999 में अपनी 117वीं रिपोर्ट में राजनीतिक स्थिरता को ही आधार बनाकर दोनों चुनावों को एक साथ कराने की सिफारिश की थी।
चुनावी खर्च और अन्य 
संसाधनों की बचत
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे चुनावी खर्च में काफी बचत होगी। केंद्र सरकार की ओर से यह कहा जा रहा है कि दोनों चुनाव एक साथ कराने से तकरीबन 4,500 करोड़ रुपये की बचत होगी।
बचत की बात भी कई स्तर पर की जा रही है। अगर दोनों चुनाव एक साथ हों तो मोटे तौर पर सरकार का यह काम एक ही खर्च में हो जाएगा। उसे अलग से चुनाव कराने और सुरक्षा संबंधी उपाय नहीं करने होंगे। एक ही बार की व्यवस्था में दोनों चुनाव हो जाएंगे और इससे संसाधनों की काफी बचत होगी। सुरक्षा बलों को भी बार-बार चुनाव कार्य में इस्तेमाल करने के बजाए उनका बेहतर प्रबंधन करके जहां उनकी अधिक जरूरत हो, वहां उनका इस्तेमाल किया जा सकेगा। अगर एक साथ चुनाव होते हैं तो राजनीतिक दलों को भी दो अलग-अलग चुनावों की तुलना में हर स्तर पर कम पैसे खर्च करने होंगे। इन पार्टियों के स्टार प्रचारक एक ही सभा से दोनों चुनावों का चुनाव प्रचार कर सकेंगे। इससे हेलीकॉप्टर से लेकर सभा कराने तक, कई तरह के खर्च कम होंगे।
प्रशासन को सुविधा
एक साथ चुनाव होने से कई स्तर पर प्रशासकीय सुविधा की बात भी कही जा रही है। अलग-अलग चुनाव होने से अलग-अलग वक्त पर आदर्श आचार संहिता लगाई जाती है। इससे होता यह है कि विकास संबंधित कई निर्णय नहीं हो पाते हैं। शासकीय स्तर पर कई अन्य कार्यों में भी इस वजह से दिक्कत पैदा होती है। जानकारों के मुताबिक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से प्रशासनिक स्तर पर चुनावों की वजह से होने वाली असुविधा कम होगी और शासन तंत्र और प्रभावी ढंग से काम कर पाएगा।
आम जनजीवन में कम अवरोध
जब भी चुनाव होते हैं, आम जनजीवन प्रभावित होता है। चुनावी रैलियों से यातायात पर असर पड़ता है। कई तरह की सुरक्षा बंदिशों की वजह से भी आम लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर बार-बार होने वाले चुनावों के बजाए एक बार में दोनों चुनाव होते हैं तो इस तरह की दिक्कतें कम होंगी और आम जनजीवन में अपेक्षाकृत कम अवरोध पैदा होगा।
भागीदारी बढ़ सकती है
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में यह बात भी कही जा रही है कि इससे चुनावों में आम लोगों की भागीदारी भी बढ़ सकती है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि देश में बहुत से लोग हैं जिनका वोटर कार्ड जिस पते पर बना है, वे उस पते पर नहीं रहते बल्कि रोजगार या अन्य वजहों से दूसरी जगहों पर रहते हैं। अलग-अलग चुनाव होने की वजह से वे अपनी मूल जगह पर मतदान करने नहीं जाते। लेकिन कहा जा रहा है कि अगर एक साथ चुनाव होंगे तो इनमें से बहुत सारे लोग एक बार में दोनों चुनाव होने की वजह से मतदान करने अपने मूल स्थान पर आ सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो चुनावों में मत प्रतिशत और दूसरे शब्दों में आम लोगों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ सकती है। (सत्याग्रह)

 


Date : 23-Jun-2019

आशीष सक्सेना
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में चमकी बुखार ने देश को हिलाकर रख दिया है। हकीकत ये है कि केंद्र और बिहार के स्वास्थ्य विभाग संजीदगी दिखाता तो शायद ऐसी नौबत ही नहीं आती।
चमकी बुखार, जिसने तकरीबन 150 बच्चों की सांसें छीन लीं। यहां तक कि एक बच्चे ने तो स्वास्थ्य मंत्री के सामने दम तोड़ दिया। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में इस कहर ने देश के लोगों को हिलाकर रख दिया है। सियासत भी हो रही है इस मुद्दे पर, क्योंकि जिम्मेदारों ने संवेदनशील माहौल में जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई अब तक, वे सरकार में हों या विपक्ष में। कई दिन बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने महामारी पर शोध के लिए भी टीम भेजी है। हकीकत ये है कि केंद्र और बिहार राज्य का स्वास्थ्य विभाग संजीदगी दिखाता तो शायद ऐसी नौबत ही नहीं आती।
हर महामारी को रहस्यमयी तरीके से पेश करके नियति पर छोड़ देने का तरीका सरकारों ने ईजाद कर लिया है। सालभर पहले उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड क्षेत्र में रहस्यमयी बुखार ने 300 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। कभी कोई बीमारी बताई गई तो कभी कोई संकेत जताया गया। आखिरकार मलेरिया फाल्सीपेरम का ढोल बजा और उसी आधार पर इलाज तब तक चला, जब तक कि बुखार का प्रकोप मौसम ठंडा होने से ठंडा नहीं हो गया। इस रहस्य को रहस्य ही रहने दिया गया। इतने बड़े प्रकोप के बावजूद इस बार प्रदेश की योगी सरकार ने लाखों आबादी पर प्रतिरक्षा के लिए क्लोरोक्वीन की कुछ सौ गोलियां और कुछ मच्छरदानियों का इंतजाम किया है।
कभी दानी सम्राट हर्षवर्धन की रियासत का हिस्सा रहे मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार को भी कुछ ऐसा ही रहस्यमयी बनाने की कोशिश हो रही है। इस काम में मेन स्ट्रीम मीडिया सबसे ज्यादा भ्रम पैदा कर रहा है। स्वास्थ्य विभाग की भाषा में चमकी बुखार को एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम बताया जा रहा है। इसी के इर्द-गिर्द महामारी की चर्चा है। हालांकि इस रहस्य पर अभी भी पर्दा है कि वास्तव में इसका कारण क्या है। अगर चर्चा में है तो ये नई बात बिल्कुल भी नहीं है। न महामारी और न ही इस आधार पर होने वाली मौतें। शिकार होने वाले बच्चे भी उसी दलित-गरीब पृष्ठभूमि के हैं, जो हमेशा ही होते हैं।
इतना नासमझ कैसे हो सकता है स्वास्थ्य मंत्रालय!
चमकी बुखार या एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (एईएस) और जापानी इंसेफलाइटिस (जेई) के प्रकोप पर स्वास्थ्य मंत्रालय ऐसे हतप्रभ है, जैसे इससे पहले कुछ पता ही न हो। ऐसा हो भी सकता है, क्योंकि हमारे देश में गंभीर मसलों पर लंबी कसरत करने की न आदत है और न मंशा। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि जो हो रहा है, उसकी आशंकाएं, जरूरतों और बंदोबस्त के लिए कई शोध हो चुके हैं, लेकिन उस आधार पर कभी तैयारी नहीं की गई। भारत सरकार को न शोध कराने में अब कोई दिलचस्पी है और न ही मुफ्त के शोध से जनहित की कवायद में। निराशाजनक ये है कि धूल फांक रहे शोधों पर सरकार ने नजर डालना अभी भी मुनासिब नहीं समझा।
अमरीकी विवि की एक टीम सिर्फ इस बात के लिए डेढ़ दशक से जुटी है कि अटलांटिक महासागर में होने वाली उथल-पुथल से भारत में मलेरिया के प्रकोप की क्या स्थिति रहती है, लेकिन भारत सरकार इस शोध के अध्ययनों से कोई मतलब नहीं रखती। इसको भी देखना गंवारा नहीं समझा गया कि कितने तापमान पर कौन सा वायरस फैलाने वाले मच्छरों का संबंध है।
अनदेखा करने के बाद अब शोध कार्यों को अलविदा
हालत ये है कि मोदी सरकार पहले कार्यकाल में ही शोध कार्यों को लगभग अलविदा कर चुकी है। शोध के लिए अब जो बजट दिया जा रहा है, उससे परखनली और स्प्रिट का खर्चा भी निकल आए, वही बहुत है। सूत्रों का कहना है कि विश्वस्तरीय शोध संस्थान इंडियन वेटनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट को इस बार शोध कार्यों के लिए तीन वैज्ञानिकों पर एक लाख रुपये का बजट मिला है। यही हालत बाकी शोध संस्थानों की भी है। फिर भी कुछ सिरफिरे वैज्ञानिक-शोधकर्ता अपनी जेब से या जुगाड़-तुगाड़ से संसाधनों को जुटाकर मगजमारी कर देश की इज्जत बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
कपड़े फटने के बाद सूत कातने बैठने का कोई मतलब नहीं है। केंद्र में मोदी सरकार का पहला कार्यकाल शुरू होने से पहले जेई और एईएस पर कई अध्ययन हुए, जिनके आधार पर बचाव की तैयारी हो सकती थी। इन्हीं में से एक शोध में बताया गया कि बिहार से एईएस और जेई पर डेटा की कमी है, जबकि उत्तर प्रदेश और असम के बाद जेई मामलों की रिपोर्टिंग में ये राज्य तीसरे स्थान पर है। अध्ययन के दौरान वर्ष 2009-2014 की अवधि में एईएस के लिए 30 प्रतिशत घातक दर (केस फैटेलिटी रेट-सीएफआर) के साथ कुल 4400 मामले (733 मामले प्रति वर्ष) पाए गए। अध्ययन के दौरान ही लगभग 14 प्रतिशत सीएफआर के साथ जेई के कुल 396 मामले सामने आए, 56 मौतें हुईं।
इतने व्यापक अध्ययन धूल फांक रहे
एईएस और जेई महामारी गर्मियों और मानसून के महीनों के शुरू और अंत में हुई थी। पटना, जहानाबाद, नवादा, गया और पूर्वी चंपारण जैसे जिलों में एईएस और जेई मामलों की अधिकतम संख्या दर्ज की गई। शोध का नतीजा बताता है कि 2009 के बाद से बिहार में एईएस और जेई मामलों की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है।
2009 से 2014 तक, एईएस के मामले अप्रैल-मई में दिखाई देने लगे और जून के दौरान चरम पर पहुंच गए, अक्टूबर से गिरावट आई। हर साल एक समान पैटर्न देखा जाता है। दो बार महामारी चरम पर होती है, एक जून में और दूसरी सितंबर और अक्टूबर में। गंभीर केसेज का उच्चतम शिखर 2014 में था। वर्षों से जेई (पुष्ट) मामलों की प्रवृत्ति के साथ एईएस को भी दिखाती है।
अधिकांश पिछले अध्ययनों ने मई और अक्टूबर के बीच महामारी की सूचना दी, ऐसे क्षेत्र ज्यादातर भारत के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों थे। सक्सेना एट अल में एईएस मामलों की प्रवृत्ति का अध्ययन किया गया और सुझाव दिया कि जेई उत्तर भारत में बढ़ रहा है, जिसकी वजह से भविष्य में महामारी हो सकती है।
कर्नाटक में प्रत्येक वर्ष दो महामारियां होने की सूचना है, अप्रैल से जुलाई तक एक गंभीर रूप में और शेष भारत के साथ सितंबर से दिसंबर तक। तमिलनाडु में 561 एईएस केस एक अध्ययन के दौरान रिपोर्ट किए गए, जेई की पुष्टि 4।9 प्रतिशत में थी, जो 2007 में 4।1 प्रतिशत से बढक़र 2009 में 5।3 प्रतिशत की बढ़ती प्रवृत्ति के साथ थी। पटना, नालंदा, जहानाबाद, नवादा, गया, औरंगाबाद, वैशाली, मुजफ्फरपुर, शेहर और पूर्वी चंपारण जिलों में एईएस के मामलों की अधिकतम संख्या 4।7 से 24।8 प्रति एक लाख जनसंख्या पर थी। दिनेश एट अल और मिश्रा एट अल ने भी मामलों की लगभग यही सूचना दी।
हाई अलर्ट कर दिए दरकिनार
डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर से 2013 में जेई के 3187 मामले सामने आए थे। इनमें से 42 प्रतिशत दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के देशों से थे, जिसमें शीर्ष पर भारत दिखा। 2011 में कैम्पबेल समीक्षा में भारत को विस्तृत टीकाकरण कार्यक्रम की जरूरत बताई गई, ये भी कहा गया कि भारत मध्यम से उच्च घटनाओं वाले क्षेत्रों में आता है, श्रीलंका, थाईलैंड और वियतनाम की स्थिति में है।
भारत में जेई का पहला मामला 1955 में वेल्लोर, तमिलनाडु से सामने आया था और पहला बड़ा प्रकोप 1973 में पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले से सामने आया। तब से 19 राज्यों के 171 जिलों से एईएस और जेई केस रिपोर्ट किए गए। भारत में जेई वायरस 15 से अधिक प्रजातियों के मच्छरों से फैल सकते हैं जो कि क्यूलेक्स, एडीज और एनाफिलीज से संबंधित हैं। विशेष रूप से क्यूलेक्स ट्राइटेनियोरिन्चस के काटने से मनुष्यों में फैलता है। क्यूलेक्स को मुख्य वेक्टर माना जाता है। 2005 के दौरान 6000 से अधिक मामलों और 1500 मौतों के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश (यूपी) में जेई का बड़ा प्रकोप देखा गया। पूर्वी यूपी से सटे बिहार में, मुजफ्फरपुर जिले सहित कुछ जिलों में समय-समय पर महामारी के साथ एईएस और जेई के रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है।

डॉक्टरों के सिर ठीकरा फोडऩा गलत
जेई वायरस फैलाव मुख्य रूप से ग्रामीण कृषि क्षेत्रों में होता है, जो अक्सर चावल उत्पादन और बाढ़ सिंचाई से जुड़ा होता है। शोध बताते हैं कि एईएस का प्रेरक एजेंट मौसम और भौगोलिक स्थिति के साथ बदलता भी रहता है। रोगजनकों की विस्तृत श्रृंखला और रोगजनन के कारण तेजी से न्यूरोलॉजिकल हानि होती है, चिकित्सकों को संक्रमण की पहचान और उपचार के बीच बहुत कम वक्त की चुनौती का सामना करना पड़ता है। बिहार में एईएस की महामारी के पैटर्न को जानने के लिए बाकायदा अध्ययन हुआ है। इस आधार पर तो सरकार ही व्यवस्थाओं को ठीक कर सकती है, डॉक्टरों पर ठीकरा फोडऩे से क्या होगा।
 

 


Date : 22-Jun-2019

सांसदों के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में धार्मिक नारों से लेकर सांसदों को उकसाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो अगले पांच साल के दौरान लोकसभा के स्वरूप की भूमिका लिखने के लिए पर्याप्त है। लोकसभा के दोनों सदनों में तमाम मुद्दों पर बहस के दौरान गहमागहमी, तल्खी और यहां तक कि झड़पें भी हुई हैं लेकिन किसी लोकसभा के गठन के साथ ही बड़े पैमाने पर धार्मिक नारों और वो भी धर्म विशेष के सांसदों को लक्ष्य करते हुए लगाए जाने का ये शायद पहला मौका रहा हो।
हालांकि इसकी शुरुआत तो 17 जून से शुरू हुए शपथ ग्रहण कार्यक्रम के पहले दिन से ही हो गई लेकिन इसके दूसरे दिन तो इस सांप्रदायिक शुरुआत की चरम परिणति देखने को मिली। सत्रहवीं लोकसभा सत्र का दूसरा दिन सांसदों के शपथ लेने के दौरान कई तरह के नारों, खासकर धार्मिक नारों का गवाह बना।
भाजपा सांसद जहां जय श्रीराम, वंदे मातरम, भारत माता की जय जैसे नारे लगाते रहे तो दूसरी पार्टियों के सांसदों ने जय भीम, जय मीम, जय समाजवाद से लेकर अल्लाह-ओ-अकबर जैसे नारे भी लगाए। अपने अजीबोगरीब बयानों के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाले यूपी के उन्नाव से बीजेपी सांसद साक्षी महाराज तो सांसद के रूप में शपथ लेने के बाद मंदिर वहीं बनाएंगे के नारे लगाने लगे।
भगवा कपड़े पहने साक्षी महाराज ने संस्कृत भाषा में शपथ ली, शपथ में जय श्रीराम शब्द जोड़ा था और शपथ लेने के बाद ‘मंदिर वहीं बनाएंगे की भी शपथ एक बार संसद के भीतर भी ले ली। बाहर तो यह शपथ लेने की जैसे आदत सी पड़ गई होगी। बीजेपी सांसदों ने मेज थपथपाकर और जय श्रीराम के नारे दोहराकर उनका भरपूर उत्साहवर्धन भी किया और अपना समर्थन भी जताया।
सबसे दिलचस्प नजारा उस वक्त देखने को मिला जब हैदराबाद से एआईएमआईएम पार्टी के सांसद असदुद्दीन ओवैसी सांसद पद की शपथ लेने के लिए आगे बढ़े। तब बीजेपी सांसद जय श्रीराम, वंदे मातरम जैसे नारे काफी जोर-जोर से लगाने लगे। हालांकि ओवैसी ने इस पर आपत्ति भी की लेकिन जब उन्हें लगा कि ये सब उन्हें लक्ष्य करके हो रहा है तो खुद उन्होंने भी दोनों हाथ उठाकर और जोर से नारे लगाने को कहा।
शपथ लेने के बाद ओवैसी ने इन नारों का जवाब जय भीम, जय मीम, अल्लाह-ओ-अकबर ‘जय हिंद से दिया। बाद में मीडिया से बातचीत में उन्होंने बीजेपी सांसदों पर कुछ इस तरह तंज कसा, अच्छा है कि उन्हें इस तरह की बातें याद आ जाती हैं, जब वे मुझे देखते हैं। मुझे उम्मीद है कि उन्हें संविधान भी याद होगा और मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत भी।
बीजेपी सांसदों ने ये नारे हर उस बार लगाए, जब तृणमूल कांग्रेस के किसी भी सांसद ने शपथ ली। वहीं तृणमूल सांसदों ने भी इसकी प्रतिक्रिया में जय हिंदं और जय बंगाल का नारा लगाया। संभल से सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क की जब बारी आई तो जयश्री राम का नारा फिर तेज हो गया। शपथ लेने के बाद बर्क की बीजेपी सदस्यों से बहस भी हुई। शपथ लेने के बाद बर्क ने साफ तौर पर कहा कि संविधान जिंदाबाद है, मगर वंदेमातरम इस्लाम के खिलाफ है। बीजेपी सांसदों ने इस पर शेम-शेम के नारे भी लगाए।
लेकिन इन सबके बीच, अमरावती के निर्दलीय सांसद नवनीत राणा ने नारों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसे नारों की जगह संसद नहीं बल्कि मंदिर, मस्जिद और दूसरे धार्मिक स्थल हैं।       
दरअसल, धार्मिक पहचान से जुड़े ये नारे खुद को धार्मिक दिखाने से ज्यादा विपरीत धर्म के सांसदों को चिढ़ाने के अंदाज में लगाते देखे गए। ज्यादातर सांसदों ने नियमों के विरुद्ध शपथ लेने के बाद धार्मिक पहचान से जुड़े नारे लगाए। इसीलिए प्रोटेम स्पीकर को दर्जनों बार शपथ के अतिरिक्त कोई और बात रिकॉर्ड में न डालने की बात दोहरानी पड़ी।
संसद के इतिहास में ऐसा शायद पहली बार देखने को मिला हो जब सदस्यता की शपथ लेने वाले निर्वाचित सांसदों ने इस तरह के नारे लगाए हों। लंबे समय से संसद को कवर कर रहे तमाम पत्रकारों  से बातचीत के बाद यही पता चला कि संसद में बहस के दौरान तो ऐसे नारे जरूर सुनने को मिले हैं लेकिन शपथ ग्रहण के दौरान धार्मिक और सांप्रदायिक विभाजन का ये नजारा पहली बार दिखा है।
यही नहीं, संविधान विशेषज्ञ भी इसे सही परंपरा नहीं मानते। संविधान विशेषज्ञों की नजर में सांसदों को सिर्फ वही शब्द पढऩे होते हैं जो कि निर्धारित प्रारूप में लिखे होते हैं और उनके सामने होते हैं। इसीलिए इस तरह के नारों को बार-बार रिकॉर्ड से निकालने की अपील प्रोटेम स्पीकर करते रहे।
संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के महासचिव रह चुके सुभाष कश्यप कहते हैं, धर्म और संप्रदाय के पक्ष में शपथ ग्रहण के दिन शुरू हुई ये नारेबाजी न सिर्फ संवैधानिक तरीके से गलत है बल्कि चिंताजनक भी है। इस तरह की गतिविधियों की यदि इजाजत दी गई तो इसका परिणाम क्या होगा, ये सोचा भी नहीं जा सकता।
हालांकि जानकारों का ये भी कहना है कि ऐसी स्थिति में प्रोटेम स्पीकर ने कड़ा कदम न उठाकर और ऐसे सदस्यों को कोई चेतावनी न जारी करके भी गलत किया है। लोकसभा में वरिष्ठ अधिकारी रह चुके एक शख्स ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि सिर्फ कार्यवाही से हटाने का निर्देश देना भर पर्याप्त नहीं था बल्कि ऐसा न करने की बाकायदा चेतावनी दी जानी चाहिए थी और ऐसा करने वाले सदस्यों से दोबारा-तिबारा शपथ लेने को कहा जाना चाहिए था। (डॉयचे वैले)


Date : 22-Jun-2019

अनुराग शुक्ला

क्रिकेट का खेल समंदर में बहता हुआ अंग्रेजों संग भारत आया और बहुत दिनों तक उन्हीं का होकर रहा। दूर देश में पराये जनजीवन और भारत की उष्ण-कटिबंधीय मौसम की ऊब से तंग आकर अंग्रेज नाविक और उनके साथी क्रिकेट खेला करते थे। हिंदुस्तानी टुकुर-टुकुर इस अजनबी खेल को देखा करते।
फिर हिंदुस्तान के समुद्री तटों पर खेले जाने वाले इस अंग्रेजी खेल का कुछ नौजवानों ने अपने तरीके से भारतीयकरण करना शुरु किया। भारत में पहली बार अंग्रेजों के इस बेहद नफासत भरे खेल में हाथ आजमाने वाले ये नौजवान पारसी समुदाय के थे। तब के बंबई और आज की मुंबई में अपनी परंपरागत पोशाकों में क्रिकेट की बारहखड़ी सीखते इन पारसी लडक़ों ने ही भारतीय क्रिकेट की वह नींव रखी जिस पर आज टीम इंडिया नाम की क्रिकेट महाशक्ति की इमारत खड़ी है।
बंबई के पारसियों ने भारत में क्रिकेट की ऐसी शुरुआत की कि एक लंबे समय तक यह शहर देश के क्रिकेट का गढ़ बना रहा। हिंदुस्तान की आबादी में अपनी बहुत छोटी संख्या होने के बाद भी पारसी समुदाय ने केवल क्रिकेट का ढांचा खड़ा किया, बल्कि एक समय तो ऐसा था कि भारतीय क्रिकेट टीम में चार पारसी खिलाड़ी एक साथ खेल रहे थे।
लेकिन अतीत के इन पन्नों को पलटकर जब आप आज के भारतीय क्रिकेट पर नजर दौड़ाते हैं तो उसमें पारसी क्रिकेट समुदाय का प्रतिनिधित्व नगण्य नजर आता है। फारुख इंजीनियर आखिरी पारसी खिलाड़ी थे जो 1975 में भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए खेले। तब के बाद कोई भी पारसी खिलाड़ी भारतीय राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं बना पाया। घरेलू क्रिकेट में भी ढूंढने पर इक्का-दुक्का पारसी नाम ही नजर आते हैं।
तो ऐसा क्या हुआ कि देश को क्रिकेट का पाठ पढ़ाने वाला पारसी समुदाय पूरे क्रिकेट परिदृश्य से बाहर हो गया?
इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं। इस जवाब को जानने की कोशिश में एक और सवाल उठता है कि आखिर भारत में अंग्रेजों की देखादेखी सबसे पहले क्रिकेट खेलना इस छोटी सी आबादी वाले समुदाय ने ही क्यों शुरू किया था। इसकी गहरी सामाजिक वजहें और मनोविज्ञान है। इस्लाम के तेजी से फैलने के बाद पारसी समुदाय जब फारस (आज का ईरान) से विस्थापित होकर इधर-उधर हुआ तो हिंदुस्तान आने वाले पारसियों ने यहां के तटीय इलाकों में अपना आसरा तलाशा।
पारसी समुदाय ने पश्चिमी भारत में रहना शुरू किया। उसने गुजरात के सूरत, अंकलेश्वर, नवसारी और भरूच जैसे शहर-कस्बों में अपना रोजगार जमाया। पारसियों ने व्यापार और वाणिज्य को अपना व्यवसाय बनाया। इसकी बड़ी वजह यह थी कि तत्कालीन हिंदू समाज में व्यापार को धर्म के लिहाज से हीन कर्म समझा जाता था और इस क्षेत्र में पारसियोंं को किसी खाास प्रतियोगिता का सामना नहीं करना पड़ा।
एक प्रवासी जिंदगी और व्यापार इस समुदाय को सत्ता के करीब ले आया। फारस से उजड़े पारसियों ने हिंदुस्तान में धीरे-धीरे एक आर्थिक ताकत पा ली। पीढिय़ों तक चली इस सामाजिक प्रक्रिया में एक तेज मोड़ तब आया जब अंग्रेजों के भारत आने के बाद बंबई ने सत्ता के एक नए केंद्र के रूप में उभरना शुरु किया। ‘ए कार्नर ऑफ फॉरेन फील्ड’ में इतिहासकार रामचंद्र गुहा एक लेख का उद्धरण देते हैं जिसमें कहा गया है कि पारसी उसी रफ्तार से गुजरात से बंबई आए जिस रफ्तार से बंबई अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर उभरा।
रामचंद्र गुहा इसी किताब में लिखते हैं, ‘पारसी एक मध्यस्थ समुदाय था। उसने अपने बड़े व्यापारिक फायदों के लिए अंग्रेजों से मित्रवत संबंध बना लिए। पारसियों ने बंबई में व्यापारी और कमीशन एजेंट के रूप में अपनी शुरुआत की। फिर उन्होंने कानून और औपनेविशक प्रशासन में भी अपनी जगह बना ली।’
अंग्रेजों से मित्रवत संबंध बनाने की यह प्रक्रिया कई आयाम लिए हुए थी। क्रिकेट से पहले ही बंबई का पारसी समुदाय अंग्रेजों के पहनावे, उनकी भाषा और संगीत को काफी हद तक अपना चुका था। अंग्रेजों से एकसार होने में क्रिकेट इस बदलाव की आखिरी लेकिन बेहद मजबूत कड़ी बना। हिंदुओं और मुसलमानों का अभिजात्य और सत्ता के सानिध्य की चाह रखने वाला वर्ग इन सारी चीजों में पारसियों से काफी पीछे था। वास्तव में हिंदुओं और मुसलमानों ने इन मामलों में पारसियों की नकल ही की। अंग्रेज शासकों से मैत्री की इस प्रक्रिया में पारसी समुदाय ने क्रिकेट खेलना शुरू किया, जिसका बाद में भारत के तमाम राजे-रजवाड़ों ने भी अनुसरण किया।
धीरे-धीरे बंबई में क्रिकेट पारसियों में इस कदर लोकप्रिय हो गया कि 1850 से 1860 के बीच शहर में कम से कम 30 पारसी क्रिकेट क्लब स्थापित हो गए। उस समय के प्रतिष्ठित पारसी सोराबजी शापूरजी ने घोषणा की कि इन पारसी क्लबों के बीच होने वाले मैचों में सर्वश्रेष्ठ पारसी टीम को नकद इनाम मिलेगा। धीरे-धीरे क्रिकेट का बुखार सामुदायिक भावना से आगे निकल गया। रामचंद्र गुहा लिखते हैं, ‘बेहद प्रतिष्ठित पारसी सर कोवासाजी जहांगीर बार्ट ने उस समय के अखबार ‘रस्त-गुफ्तार’ में विज्ञापन दिया कि वे हर उस आदमी को क्रिकेट किट देंगे जो इसके लिए आवेदन करेगा।’
पारसी समुदाय के क्रिकेट में इस कदर रुचि लेने का एक असर यह भी हुआ कि अब हिंदू और मुस्लिम समुदाय के प्रभावशाली लोग भी अपने समुदाय में इस खेल के विस्तार में मदद करने लगे। क्रिकेट सामुदायिक प्रतिस्पर्धा का जरिया बन गया। इसके अलावा धीरे-धीरे राजनीतिक लोग भी इस खेल के संपर्क में आने लगे। पारसियों ने भले ही अंग्रेजों के करीब रहने के लिए क्रिकेट खेलना शुरू किया था,लेकिन बाद में उन्होंने बंबई में अपने मैदान को लेकर अंग्रेज पोलो खिलाडिय़ों से एक कानूनी लड़ाई भी लड़ी जिसमें उन्हें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं का समर्थन भी मिला।
ब्रिटिश राज में मशहूर बंबई चतुष्कोणीय क्रिकेट मुकाबलों की शुरुआत ही पारसियों और यूरोपीय लोगों के बीच मैच से हुई। बाद में 1906 में हिंदूओं की टीम और फिर मुस्लिम टीम की एंट्री के बाद यह मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया। खेलों में यूरोपीय खिलाडिय़ों को पहली बार हराने की चर्चा होती है तो आमतौर पर फुटबॉल में मोहन बागान की ईस्ट यार्कशायर पर जीत को याद किया जाता है। लेकिन इससे काफी पहले ही पारसी खिलाड़ी क्रिकेट में यूरोप की टीम को हरा चुके थे। इस जीत की कम चर्चा की वजह जाने क्या है, लेकिन यह जीत बताती है कि पारसी केवल अंग्रेजों से मित्रता के लिए क्रिकेट नहीं खेल रहे थे और वे इसमें काफी दक्ष हो चुके थे।
धीरे-धीरे हालात बदलने शुरू हुए। भारतीय क्रिकेट के प्रतिनिधि के तौर पर पारसियों का एकाधिकार हिंदू और मुस्लिम टीमों के खेलने के साथ टूटने लगा क्योंकि ये बड़े और सामाजिक-राजनीतिक रूप से ताकतवर समुदाय थे। साल 1906 में हिंदू टीम की यूरोपीय टीम पर जीत के चर्चे क्रिकेट के शौकीनों के बीच आज भी होते हैं, लेकिन पारसियों की क्रिकेट में उपलब्धियों के बारे में उतना नहीं लिखा गया। वर्ष 1886 और 1888 में पारसी क्रिकेट टीम ने ब्रिटेन का दौरा किया था। इस टीम ने वहां कई मैच खेले। भारतीय क्रिकेट के इतिहास में इसे पारसी टूर के नाम से जाना जाता है। (बाकी पेज 7 पर)
अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के जोर पकडऩे के बाद हिंदू-मुस्लिम समुदाय अपेक्षाकृत मुखर रहे। लेकिन कांग्रेस नेताओं से सहानुभूति होने के बाद भी आम पारसी अंग्रेजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में असहज रहा। ऐसे में उस समय के अखबारों और लेखों में हिंदू और मुस्लिम टीम के प्रदर्शन के चर्चे खूब मिलते हैं, लेकिन पारसियों के उतने नहीं जितने चर्चों के वे अपने खेल के लिहाज से हकदार थे।
हालांकि इस सबके बाद भी पेशेवर पारसी क्रिकेट, हिंदू और मुस्लिम टीमों के साथ यूरोपीय खिलाडिय़ों को टक्कर दे रहा था। 1932 में जब भारत ने अपना पहला आधिकारिक टेस्ट मैच खेला तो उस टीम में दो पारसी खिलाड़ी थे - फिरोज और सोराबजी। राजे-रजवाड़ों से सजी टीम में इन दोनों खिलाडिय़ों के चयन को ज्यादा पेशेवर कहा जा सकता है। इसके अलावा जनसंख्या में एक बहुत सा छोटा हिस्सा होने के बाद भी भारत की पहली टेस्ट टीम में दो पारसी खिलाडिय़ों की हिस्सेदारी बड़ी बात थी। इसके बाद लगातार पारसी क्रिकेटर टीम में अपनी जगह बनाते रहे।
1946 में रूसी मोदी ने लार्ड्स में इंग्लैंड के खिलाफ अपना टेस्ट डेब्यू किया था। हालांकि उन्हें पहला मशहूर पारसी क्रिकेटर बनाया रणजी ट्राफी में उनके धुआंधार प्रदर्शन ने। रूसी ने रणजी ट्राफी में बंबई के लिए खेलते हुए लगातार पांच शतक जड़े थे। इसके अलावा एक सत्र में एक हजार रन बनाने वाले वे पहले खिलाड़ी थे।
इसके बाद 1948 में भारतीय टीम में पॉली उमरीगर का आगमन होता है जो अपने दौर के महान क्रिकेटर थे। वे 1962 तक भारतीय टीम का हिस्सा रहे। उमरीगर ने 59 टेस्ट में 12 शतक लगाकर 3631 रन बनाए। वे इस बात के प्रतीक थे कि पारसी क्रिकेट भले ही किसी भी मकसद से शुरू हुआ हो, लेकिन समुदाय के खिलाडिय़ों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर की दक्षता हासिल कर ली है। उमरीगर ने आठ मैचों में भारत की कप्तानी भी की। रूसी सुर्ती भी उन खिलाडिय़ों में थे जो पारसी क्रिकेटरों का पेशेवर स्तर दर्शाते थे। हरफनमौला रूसी की तुलना महान क्रिकेटर गैरी सोबर्स से की जाती थी। उन्हें मजाक में ‘गरीबों का गैरी सोबर्स’ कहा जाता था।
60 के दशक की शुरुआत में पारसी खिलाडिय़ों का प्रदर्शन इतना जबर्दस्त था कि एक समय टीम में चार पारसी खिलाड़ी हो गए थे। 1960-61 में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट में पॉली उमरीगर और नरी कांट्रेक्टर पहले से ही थे। तभी रूसी सुर्ती ने भी इसमें जगह बना ली। ये तीन खिलाड़ी आगे भी कई मैचों में भारत के लिए एक साथ खेले। फिर फारुख इंजीनियर का चयन भी हो गया और भारतीय टीम में चार पारसी खिलाड़ी हो गए। हालांकि बाद में सुर्ती को इस टीम से ड्रॉप कर दिया गया। लेकिन फारूख इंजीनियर तब तक अपनी जगह पक्की कर चुके थे।
फारुख इंजीनियर भारतीय पारसी क्रिकेटरों में सबसे ज्यादा जाना-पहचाना नाम है। शानदार बल्लेबाज होने के साथ-साथ वे दक्ष विकेटकीपर भी थे। उन्हें देश का पहला विकेटकीपर बल्लेबाज माना जाता है। फारुख के बल्लेबाजी के मिजाज को इस बात से समझा जा सकता है कि एक मैच में उन्होंने 54 रन बनाए थे और नौ छक्के लगाए थे। यानी सारे रन छक्के मारकर ही बने थे।
जैसा कि पहले भी जिक्र हुआ, फारुख इंजीनियर जब टीम में थे तो एक वक्त टीम इंडिया में चार पारसी क्रिकेटर हो गए थे। लेकिन वह उत्थान शायद पारसी क्रिकेटरों के पराभव की भी शुरुआत थी। फारुख 1975 तक टीम का हिस्सा रहे और उसके बाद कोई भी पारसी भारतीय टीम का हिस्सा नहीं बन सका।
अब सवाल उठता है कि इतने गौरवशाली अतीत और एक समय तक भारतीय क्रिकेट टीम में दबदबा रखने वाले पारसी समुदाय का प्रतिनिधित्व शून्य कैसे हो गया? और वह भी ऐसे दौर में जब भारत में क्रिकेट लोकप्रियता की बुलंदियों को छू रहा था? क्रिकेट के जानकार मानते हैं कि इसकी पहली वजह तो पारसियों की बेहद कम जनसंख्या है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में पारसियों की मौजूदा जनसंख्या 80 हजार से एक लाख है। जाहिर है कि 126 करोड़ के देश में इतने छोटे समुदाय से अंतरराष्ट्रीय स्तर के क्रिकेटर निकलना आसान नहीं है।
लेकिन ऐसा तो पहले भी था जब पारसी समुदाय देश के क्रिकेट पर छाया हुआ था। तो फिर? कइयों के मुताबिक इसकी वजह क्रिकेट के बदलते मिजाज में खोजी जा सकती है। भारत के पारसियों की बड़ी आबादी मुंबई में रहती है। भारतीय क्रिकेट में पारसियों और मुंबई का दबदबा एक दूसरे के सामांतर था। लेकिन 83 के विश्वकप की जीत के बाद क्रिकेट की लोकप्रियता जैसे-जैसे छोटे शहरों की ओर गई तो बंबइया क्रिकेट का दबदबा भी घटने लगा। टीम में बंबई की जगह उत्तर प्रदेश और हरियाणा के खिलाड़ी जगह बनाने लगे। क्रिकेट की अभिजात्य और शास्त्रीय पहचान कमजोर होती गई और इसमें संघर्ष और मौलिकता का रंग घुलता गा। बंंबई के टूटते दबदबे ने पारसी क्रिकेट पर भी असर डाला क्योंकि भारत में इस समुदाय की शक्तिपीठ तो यही शहर था।
कई साल पहले बॉम्बे पारसी पंचायट के तत्कालीन अध्यक्ष दिनशॉ मेहता ने समुदाय के युवाओं में खेलों के प्रति घटते रुझान पर चिंता जताई थी। निराशा का आलम यह था कि उन्होंने कहा था कि पारसी युवा मैदान पर आने के बजाय फेसबुक पर वक्त बिताना ज्यादा पसंद करते हैं। यह एक सामान्य और सरलीकृत वजह मानी जा सकती है। लेकिन इसका सामाजिक पहलू यह है कि अपने में संकेंद्रित व्यापार और नौकरीपेशा रुझान वाला मध्यमवर्गीय पारसी समुदाय क्रिकेट जैसे अनिश्चित भविष्य़ वाले पेशे में आने से बचने लगा है। क्रिेकेट आज आपको सत्ता के करीब नहींं ले जाता बल्कि उसकी खुद की सत्ता है। लेकिन वह इसके लिए पूरा समर्पण मांगता हैै। गलाकाट प्रतिस्पर्धा में बीच का कोई रास्ता नहीं है। एक वर्ग के मुताबिक शायद इसलिए परंपरागत संरक्षणवादी मूल्यों में यकीन करने वाले पारसी समुदाय ने इस खेल में अपनी रुचि कम कर ली हैै।
नरी कांट्रेक्टर जैसे दिग्गज पूर्व क्रिकेटर इस बात को काफी पहले ही भांप गए थे। वे अक्सर अपने बयानों में कहते रहते थे कि पारसी संस्थाओं और क्लबों को पारसी क्रिकेट को बचाने के लिए आगे आना होगा। लेकिन शायद अब पारसी समुदाय भी क्रिकेट में वह प्रेरणा नहीं तलाश पा रहा है जो उसने पहले खोज ली थी। क्रिकेट को लेकर सामुदायिक रुचि इतनी घटी है कि कुछ साल पहले सिर्फ पारसी क्लबों के लिए होने वाले एक टूर्नामेंट में दूसरी टीमों को इसलिए प्रवेश देना पड़ा क्योंकि खेलने के लिए पर्याप्त पारसी क्लबों ने आवेदन ही नहीं किया था। (सत्याग्रह)


Date : 21-Jun-2019

-रशीद किदवई
नई दिल्ली, 21 जून । कांग्रेस तरह-तरह के अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। इसकी जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की है। हालांकि पार्टी के निष्ठावान नेता उत्तराधिकारी के मसले पर बात करने को तैयार नहीं हैं।
राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी जो खुद भी पार्टी प्रमुख रही हैं वो इस पसोपेश में हैं कि वो अपने बेटे के पद छोडऩे के फैसले का समर्थन करें या पार्टी नेताओं की निष्ठा का आनंद लें। मतलब ये है कि आखिर बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन। गांधी परिवार के प्रति निष्ठा की वजह से कांग्रेस की कार्यसमिति अंतरिम अध्यक्ष का नाम घोषित नहीं कर पा रही है। वहीं राहुल गांधी किसी का नाम लेकर ये नहीं दिखाना चाहते कि उन्होंने, अपना आदमी, ही अध्यक्ष बनाया है।
कांग्रेस के संविधान के मुताबिक पार्टी अध्यक्ष के इस्तीफे पर पार्टी की कार्यसमिति की बैठक में जल्द से जल्द चर्चा होनी चाहिए। जब तक नया अध्यक्ष न नियुक्त किया जाए तब तक अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के वरिष्ठतम सदस्य को पदभार संभालना चाहिए। इसके बाद देश की इस सबसे पुरानी पार्टी के पास सभी पार्टी पैनलों को भंग करके फिर से संस्थागत चुनाव कराने का विकल्प है।
पार्टी में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो कांग्रेस की सेवा कर सकें। ख़ासकर तब जब सोनिया गांधी रायबरेली और राहुल गांधी वायनाड से सांसद हों और प्रियंका गांधी एआईसीसी की महासचिव हों।
पार्टी के पास टैलेंट की भी कोई कमी नहीं है। पांच मुख्यमंत्री हैं- कमलनाथ, कैप्टन अमरिंदर सिंह, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल और वी नारायणसामी। पार्टी में गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, पी चिदंबरम, अहमद पटेल, मुकुल वासनिक, पृथ्वीराज चव्हाण, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, शशि थरूर, मनीष तिवारी, शिवकुमार, अजय माकन जैसे अनुभवी नेता भी हैं।
इनमें से कुछ भले ही हाल में हुए लोकसभा चुनावों में हार गए हों लेकिन उनके पास सार्वजनिक पदों पर रहने का बड़ा अनुभव है। इसके अलावा कांग्रेस के पास डॉ। मनमोहन सिंह, एके एंटनी, वीरप्पा मोइली, मल्लिकार्जुन खडग़े, सुशील कुमार शिंदे, मीरा कुमार, अंबिका सोनी, मोहसिना किदवई, शीला दीक्षित जैसे कई दिग्गज भी हैं जो दशकों के अपने अनुभव के आधार पर सलाह दे सकते हैं। पार्टी के नए प्रमुख को कांग्रेस संसदीय बोर्ड का गठन करना चाहिए जिसका गठन 1991 से नहीं हुआ है।
2017-18 में अशोक गहलोत पार्टी के मामलों के एआईसीसी महासचिव थे। इसी साल पार्टी ने गुजरात के विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया था और मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का चुनाव जीत लिया था। वो सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग से आते हैं और राजस्थान के बाहर भी कांग्रेस के नेताओं में उनकी स्वीकार्यता है। उन्हें अंतरिम अध्यक्ष बनाया जा सकता है। लेकिन पार्टी के भीतरी लोग दलित होने के आधार पर मुकुल वासनिक और साफ छवि के कारण एके एंटनी के नाम भी ले रहे हैं।
कांग्रेस को ये समझना चाहिए कि दलित आधार पर मीरा कुमार या मुकुल वासनिक जैसे सांकेतिक संदेशों ने काम करना बंद कर दिया है और ऐसे में इस आधार पर नियुक्ति करने से उसे कोई फायदा नहीं होगा। इसी तरह एके एंटनी राजनीतिक तौर पर अप्रसांगिक हो चुके हैं और उनकी मौजूदगी से पार्टी के लिए मुसीबतें ही बढ़ेंगी। पार्टी को इस समय निर्णायक नेतृत्व की जरूरत है।
कांग्रेस पार्टी को अब फिर से मूल्यों पर लौटकर अपने आप को एक नए दौर की पार्टी के तौर पर पुनर्जीवित करना होगा। नेहरू गांधी परिवार पर निराशाजनक निर्भरता पार्टी के सामने पहली चुनौती है लेकिन किसी वजह से पार्टी अब भी आगे की दिशा में बड़ा कदम उठाने से कतरा रही है। पार्टी के नेता ये बुनियादी बात ही नहीं समझ पा रहे हैं कि गांधी न उन्हें छोड़ रहे हैं और न ही राजनीति को। वो बस अटल बिहारी वाजपेयी की तरह भूमिका निभाना चाहते हैं, जो दशकों तक पार्टी में किसी पद पर नहीं रहे लेकिन पार्टी के अहम नेता और प्रमुख चुनाव अभियान संचालक बने रहे।
23 मई के बाद की कांग्रेस ने ऑस्टरिच जैसा रवैया अपना लिया है। कार्यसमिति की एक बैठक के अलावा पार्टी के नेताओं ने एआईसीसी का कोई सत्र या जमीनी आवाजों को सुनने के लिए कोई कार्यकर्ता सम्मेलन नहीं किया है। लोकसभा में पार्टी अपने 52 सांसदों का नेता चुनने के लिए चुनाव तक नहीं कर सकी है बल्कि पार्टी ने सोनिया गांधी को संसदीय दल का नेता चुनने के लिए अधिकृत किया, जिन्होंने अधीर रंजन चौधरी को संसदीय दल का नेता चुना।
कांग्रेस के लिए सबसे बुरा यही होगा कि कोई प्रॉक्सी अध्यक्ष पार्टी के बजाय गांधी परिवार के लिए काम करे। 1997 में जब सोनिया गांधी ने औपचारिक तौर पर पार्टी की सदस्यता ली तो सीताराम केसरी कुछ भी नहीं रहे, भले ही वो उस समय पार्टी के अध्यक्ष थे।
जनवरी से लेकर मार्च 2018 के बीच, जब केसरी को पद से हटाया गया था, तब ऑस्कर फर्नांडीज और वी जॉर्ज को उनके घर फ़ाइलों पर दस्तख़त कराते हुए देखा जाना आम बात थी। वो पार्टी के अहम पदों पर नियुक्तियों के दस्तावेज केसरी से हस्ताक्षर कराने आते थे।
हमेशा से ही दब्बू रहे केसरी, जॉर्ज या फर्नांडीज के कहने पर बताई गई जगह हस्ताक्षर करने पर कुछ परेशान ही रहते थे। गहलोत या उन जैसा कोई भी जिसे पार्टी अध्यक्ष बनाया जाए उसके साथ केसरी जैसा व्यवहार न किया जाए। (बीबीसी)
 


Date : 21-Jun-2019

प्राण चड्ढा
टाइगर की सही गिनती पता नहीं लेकिन रायपुर के आरटीआई एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला को जो जानकारी उपलब्ध की गई वह इस प्रकार है-
वन्य जीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के मुताबिक वर्ष 2008 से 2018 के बीच छत्तीसगढ़ में 29 बाघों का शिकार किया गया है,वन एवं पुलिस विभाग ने 58 शिकारियों को पकड़ा तो जरूर पर इनमें से कितनों को सज़ा हुई यह जानकारी उपलब्ध नहीं है।
कोई नहीं जानता छत्तीसगढ़ में टाइगर की सही संख्या क्या है। राज्य बनने के बाद अब तक वन्यजीवों के लिए सेंचुरी और नेशनल पार्क में वन्यजीवों के लिए पानी का सही प्रबंध नहीं, वन्यजीवों की वैज्ञानिक पद्धति से गिनती नहीं हो सकी। गांव पार्क एरिया में बसे है और हाथी की समस्या हाथी से बड़ी है। विशेषज्ञों का वन विभाग में टोटा है, और रेंजर और उससे ऊपर के अधिकारी आम तौर पर रात जंगल के बजाए शहर में अपने घर में आराम फरमाते हैं। फायर प्रोटेक्शन वर्क की कमी से हर साल जंगल जलने की खबरें अखबारों में सुर्खियों पाती हैं।
बहुत साल हुए सन् 80 के आसपास की बात है अचानकमार सेंचुरी के इंचार्ज एम आर ठाकरे मेरे मित्र रहे। तभी एक दिन उन्होंने पूछा, अचानकमार में कुल कितने टाइगर होंगे?
क्यों? 
ठाकरे सर ने कहा,क्या करें तुरन्त जवाब ऊपर देना है।
मंैने पूछा पिछली गिनती कितनी है। उन्होंने कहा- 13 है। मैंने कहा- सही गिनती करने वाला स्टॉफ आपके पास नहीं और वक्त भी नहीं, इसलिए दो तीन बढ़ा कर लिख दो। फिर अगले साल तो तीन शावक बढ़ गए। यूं ही हर साल बढ़ते 1994 तक आचनकमार में 28 टाइगर हो गए।
फिर मैं मप्र वाइल्ड लाइफ का मेंबर बना। अचानकमार को टाइगर रिजर्व बनाने ठाकरेजी ने सुंदर प्रपोजल बनाया मैंने भी अपनी अक्ल लगाई। यह प्रपोजल मप्र वाइल्ड लाइफ बोर्ड में प्रस्तुत किया सबके तारीफ की और आगे भेज दिया गया।
अगली बैठक में खुशी की उम्मीद थी। पर जो जानकारी आई वह पढ़ी गईं। ‘लिखा गया था अचानकमार 552 वर्ग किमी का है और यहां पहले से 28 टाइगर है इसलिए टाइगर प्रॉजेक्ट की आवश्यकता नहीं।’ 
मप्र वाइल्ड लाइफ़ बोर्ड में यह बात मंैने कलांतर छत्तीसगढ़़ राज्य निर्माण बाद पर बोर्ड के अध्यक्ष और सीएम डॉ. रमन सिंह के सम्मुख बैठक में रखी, वह मुस्कुरा कर रह गए, सम्भवत: उनके बुते से बाहर था टाइगर की सही गिनती जाहिर करना। जबकि अचानकमार में 4 या 5 से अधिक टाइगर न पहले थे और ना अभी हैं। लेकिन कागज के फर्जी टाइगर को जो अधिकारी कम करेगा उसकी तो नौकरी गई। 
छत्तीसगढ़़ में सबसे ज्यादा टाइगर अचानकमार में है, और आंकड़े फर्जी, तब बाकी सभी आंकड़े कैसे विश्वसनीय हो सकते हैं?  छत्तीसगढ़ में टाइगर की खाल पकड़ी जाती है तो ओडिशा के टाइगर की खाल बताकर दमन बचाने की कोशिश होती है। पर बाद पता चलता है उदंती सीता नदी याने छत्तीसगढ़ का ही टाइगर था।
बस्तर में इंद्रावती नेशनल पार्क में नक्सलियों के खौफ के कारण टाइगर गणना संभव नहीं। भोरमदेव और अचानकमार में कान्हा के टाइगर प्रवास पर आते हैं लेकिन चीतल साम्बर इतने नहीं कि वह स्थायी यहां रहने लगे। बार नवापारा में टाइगर नहीं, वहां शिकार के कारण वन्यजीव आदमी की गाड़ी देख सिर पर पांव रख भागते हैं। गुरुघासीदास नेशनल पार्क में दो टाइगर की खबर है। आंकड़ों और हकीकत में अंतर है,पहले सही वैज्ञानिक गणना हो और सही आंकड़े तब ही कोई निष्कर्ष सामने आ सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और वन्यजीव-पशुप्रेमी हैं।)

 


Date : 21-Jun-2019

जगदीश्वर चतुर्वेदी

योग करने के कई फ़ायदे हैं जिनको योगीजन टीवी पर बता रहे हैं। लेकिन सबसे बडा फ़ायदा है कि वह अब सरकारी फ़ैशन, वोट पाने का नारा, सरकारी जनसंपर्क और सरकारी जुगाड़ का अंग बन गया है। योग आसन था लेकिन अब योग शासन और मुनाफा है। 
मैं योग दिवस के पक्ष में हूँ ! मैं बाबा रामदेव आदि के भी पक्ष में हूं! क्योंकि इन लोगों ने योग को मासकल्चर का अंग बना दिया, कल तक योग ,कल्चर का अंग था। मैं बाबा रामदेव और मोदीजी से बहुत ख़ुश हूं कि उन्होंने योग को ग्लोबल ब्राण्ड बना दिया। पूंजीवादी विरेचन का हिस्सा बना दिया। उसे एक माल बना दिया। पहले योग ज्ञान का अंग था,इन दिनों उपभोग का हिस्सा है। यह योग के महापतन की सूचना है। योग आज कारपोरेट मुनाफा संस्कृति का एक आकर्षक माल है। हम इस प्रश्न पर विचार करें कि योग के वस्तुकरण से हिंदू परंपरा का लाभ हुआ या नुकसान?
योग करने के कई फ़ायदे हैं जिनको योगीजन टीवी पर बता रहे हैं। लेकिन सबसे बडा फ़ायदा है कि वह अब सरकारी फ़ैशन,वोट पाने का नारा, सरकारी जनसंपर्क और सरकारी जुगाड़ का अंग बन गया है। योग आसन था लेकिन अब योग शासन और मुनाफा है। पहले योग स्वैच्छिक था,आज माल है, कल अनिवार्य होगा! केन्द्र सरकार से लेकर तमाम देशी -विदेशी सरकारों तक योग अब शासन का अंग है, यूएनओ कोई जनसंगठन नहीं है वह सत्ताओं का संगठन है। योग को 117 देशों का समर्थन है योग अब आसन नहीं शासन की क्रिया है!
पतंजलि के योग को हिंदू समाज और उसके विद्वान सैंकड़ों साल पहले ठुकरा चुके थे, जिसे समाज खारिज कर चुका था उसे फिर से थोपने की कोशिश की जा रही है।कमाल का है हिंदू समाज,मुर्दों में प्राण फूंकने के ढोंग में माहिर ! जिस तरह फ्रिज का प्रचार होता है वैसे ही और उसी पद्धति से योग का मीडिया प्रचार चल रहा है। हमने फ्रिज खरीदा अब योग भी खरीदें !
एम्स के निदेशक ने कभी बीमारियों से बचने के लिए कोई एडवायजरी मीडिया में जारी नहीं की, यदि जारी भी की हो तो मीडिया ने कवरेज नहीं दिया,लेकिन योग से किन किन बीमारियों में फायदा पहुंच सकता है उसका आज मीडिया कवरेज चौंकाने वाला है साथ ही इस बात का प्रमाण है कि किस तरह सत्ता के दवाब में विज्ञान और विज्ञानचेतना पर हमले किए जा रहे हैं।
योग के नाम पर सिरों की गिनती हो रही है,इतने लोगों ने योग किया। सिरों की गिनती की फासिस्ट कला है। बाजार में ब्राण्ड प्रमोशन की कला है। इतने लोग मान रहे हैं, तुम भी मानो,इतने लोग इस्तेमाल कर रहे हैं तुम भी इस्तेमाल करो। यह नए किस्म की भेड़चाल है।
योग के प्रचार और इवेंट पर जितना पैसा खर्च किया जा रहा है उतना यदि चिकित्सा सुविधाएं पहुँचाने और पार्क बनाने पर खर्च किया जाता तो देश का ज्यादा भला होता। हर बार योग इवेंट करोडों रूपये कारपोरेट घरानों के पॉकेट में पहुंचा देता है।


Date : 20-Jun-2019

डॉ. संजय शुक्ला

कुपोषण, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर सहित अनेक संक्रामक व कुपोषण जनित रोगों के स्वास्थ्य सूचकांकों में भारत सोमालिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका जैसे देशों से काफी पीछे है। देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में विषमता का मुद्दा काफी गंभीर है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का 70 फीसदी बुनियादी ढ़ांचा देश के शीर्ष  20 शहरों में लगा है। ग्रामीण आबादी का 50 फीसदी हिस्सा उपचार हासिल करने के लिए 100 किमी से ज्यादा का सफर करता है। 

बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार यानि एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (ए.ई.एस.) से अब तक 133 बच्चों की मौत हो चुकी है तथा 151 बच्चे इलाज के लिए भर्ती हैं। गौरतलब है कि यहांॅ बीते 25 सालों से यह बीमारी अपना कहर बरपा रही है। बीते दस सालों में इस साल सबसे ज्यादा मौते हुई हैं, 2010 से अब तक चमकी बुखार से 476 बच्चों की मृत्यु हो चुकी है। मुजफ्फरपुर तथा इसके आस-पास के क्षेत्र में बदहवासी का आलम यह है कि लोग घर-बार छोडक़र जा रहे हैं। बहरहाल इस बीमारी ने फिर से सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। आलम यह है कि न तो डॉक्टरों को इस बीमारी का निदान यानि डायग्नोसिस पता है और न ही दवा का अता-पता इसके अलावा संसाधनों की कमी व अफरा-तफरी के चलते मासूम लगातार मौत के मुंह में समा रहे हैं।  
1994-95 में इस बीमारी का पता चलने के बाद अब तक इस रोग के रोकथाम और उपचार की दिशा में कोई शोध नहीं हुआ है। कुछ लोग कच्ची और अधपकी लिची को इस बीमारी का कारण बता रहे हैं लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह साबित नहीं हो सका है। यह परिस्थिति देश में चिकित्सा शोध की दशा और दिशा को भी इंगित करता है। बहरहाल यह पहला मौका नहीं है जब बच्चे बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की भेंट चढ़ रहे हों, 2018 में गोरखपुर के बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज में महज 36 घंटों के भीतर जापानी बुखार यानि इंसेफेलाइटिस से पीडि़त 30 मासूम बच्चों की मौत कथित तौर पर ऑक्सीजन की सप्लाई न होने के कारण हुई थी। इस दौरान लगभग 67 मासूम बच्चों की मौत इस बीमारी से हुई थी, गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1978 से अब तक गोरखपुर क्षेत्र में 20 हजार बच्चों की मौत इस बुखार से हो चुकी है। 
सरकारी रिकार्ड के अनुसार इस रोग से हर साल लगभग 500 से 600 बच्चे हर साल मरते हैं तथा इस बुखार से होने वाले विकलांग बच्चों के आंकड़े सरकारी तौर पर उपलब्ध नहीं है। यहां उल्लेखनीय है कि गोरखपुर तथा इसके आस-पास के क्षेत्र में हर साल जापानी बुखार अपना कहर बरपाती है। बहरहाल हमारे देष में केवल इंसेफेलाइटिस जैसे बीमारियों से ही नौनिहालों की जान नहीं जा रही है अपितु डायरिया, निमोनिया, कुपोषण जैसे अनेक ऐसे रोगों से भी बच्चों की मौतें हो रही हैं जिसका आसान उपचार और बचाव देश और दुनिया में मौजूद है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2.6 लाख से अधिक 5 वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों की मौत डायरिया और निमोनिया जैसे रोगों से हो रही है। मेडिकल जनरल लांसेट के ‘‘लांसेट इन्फेक्सियस डिजिजेज’’ के अनुसार भारत में हर साल 1 लाख बच्चों की मौत डायरिया से होती है तथा दुनिया भर में निमोनिया से होने वाली मौतों में करीब 70 फीसदी मौत भारत में होती है।
 बहरहाल यह पहला मौका नहीं है जब देश की सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली की तस्वीर देश के सामने आयी है। अहम प्रश्न यह कि अधोसंरचना और संसाधनों में अरबों रूपये खर्च करने के बावजूद देश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हालात अभी तक दयनीय क्यों बनी हुई है? सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों, नर्सों तथा अन्य संसाधनों की कमी लगातार बनी हुयी है। स्वास्थ्य सेवा के केन्द्र में डॉक्टर ही होता है परंतु भारत में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 50 फीसदी कमी है, ग्रामीण भारत में यह न्यूनता 82 फीसदी है। मानक के अनुसार प्रति 10 हजार की आबादी पर एक शिशुरोग विशेषज्ञ जरूरी है 
इस लिहाज से देश में 1.21 लाख शिशुरोग विशेषज्ञ उपलब्ध होना चाहिए लेकिन यह आंकड़ा महज 50 हजार का है। आधारभूत जरूरतों की कमी के कारण सरकार जितना पैसा स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभी खर्च कर रही है इस लिहाज से इसका अपेक्षित परिणाम आम लोगों को नहीं मिल पा रहा है। बीते अठ््ठारह बरस में केन्द्र सरकार का स्वास्थ्य बजट 2,472 करोड़ से बढक़र 52 हजार 8 सौ करोड़ पहुंच गया इसके अलावा राज्य सरकारों के द्वारा मुहैया कराया जाने वाला भारी-भरकम राशि अलग है परंतु सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति जस की तस बनी हुई है इन स्थितियों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य बीमा योजना ‘‘आयुष्मान भारत योजना’’ यानि मोदी केयर के सफलता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। 
दरअसल स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार में विभागीय भ्रष्टाचार, अनियमितताएं और योजनाओं के क्रियान्वयन में विभागीय लापरवाही व उदासीनता भी अहम कारण है। आलम यह है कि सरकारी अस्पताल में मरीजों को सामान्य रोगों के उपचार के लिए डॉक्टर, जरूरी दवाईयां तथा अन्य जांच की सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं, इन अस्पतालों के लिए खरीदे गए करोड़ों के मशीन व उपकरण धूल खाते पड़े हैं परिणामस्वरूप मरीजों को जरूरी जांच निजी लैबों से कराना पड़ रहा है। 
देश में एम्बुलेंस व्यवस्था के लिए सरकार हर साल हजारों करोड़ रूपये खर्च कर रही है इसके बावजूद एम्बुलेंस की उपलब्धता नहीं होने के कारण अनेक मौतें हो रही हैं या लोगों को अपने परिजनों का शव कंधे पर, खाट पर, साइकिल पर या ठेले पर ढोने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। आजादी के सात दशक के दौरान देश व प्रदेश की सरकारों ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार की दिशा में अनेक योजनाएं और कार्यक्रम लागू किया है। स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों का मानना है कि भारत को स्वास्थ्य के क्षेत्र में जितना खर्च करना चाहिए उस अनुपात में सरकार इस क्षेत्र को रकम मुहैया कराने में नाकाम रही है। 
लेकिन इस राय का उलट यह भी है कि सरकार जितना पैसा अभी खर्च कर रही है उसका भी कोई अपेक्षित परिणाम आम जनता को नहीं मिल पा रहा है। इसके पीछे भी प्रमुख कारण इन योजनाओं में जारी भ्रष्टाचार और विभागीय उदासीनता है। आलम यह है कि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के पीछे भारी-भरकम खर्च करने के बावजूद मरीजों को सरकारी अस्पताल में सामान्य रोगों के उपचार के लिए डॉक्टर, दवाईयां और अन्य जरूरी जांच की सुविधाएं नहीं मिल पा रही है। 
 विचारणीय है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला वाला हमारा देश स्वास्थ्य के कई मानकों में हमसे गरीब देशों के पीछे खड़ा है। मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ के अध्ययन के मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं के मामलों में 195 देशों की सूची में भारत पिछले रैंकिंग से 11 स्थान खिसक कर 154वें स्थान पर पहुंच गया है। दक्षिण एशिया में श्रीलंका, पहले पायदान पर है वहीं बांग्लादेश, चीन, भूटान भारत से आगे है। नवजात शिशु दर व टीबी रोकथाम में हमारा देश सोमालिया, आफगानिस्तान, पाकिस्तान और कांगो से पीछे है। मधुमेह, किडनी और हृदयरोग के इलाज में भारत अभी भी पिछले देशों की सूची में शुमार है।
 कुपोषण, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर सहित अनेक संक्रामक व कुपोषण जनित रोगों के स्वास्थ्य सूचकांकों में भारत सोमालिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका जैसे देशों से काफी पीछे है। देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में विषमता का मुद्दा काफी गंभीर है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का 70 फीसदी बुनियादी ढ़ांचा देश के शीर्ष  20 शहरों में लगा है। ग्रामीण आबादी का 50 फीसदी हिस्सा उपचार हासिल करने के लिए 100 किमी से ज्यादा का सफर करता है। 
शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति ज्यादा बदतर है। तेज और अनियोजित शहरीकरण के कारण झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाली शहरी निर्धन आबादी सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों पर ही निर्भर है। झुग्गी-झोपडिय़ां संक्रामक बीमारियों का सबसे बड़ा अड्डा बने हुए हैं। देश की एक बड़ी आबादी आज संक्रामक बीमारियों के साथ-साथ गैर संक्रामक बीमारियों से जूझ रही है। ‘इंडिया हेल्थ ऑफ नेशन्स स्टेटस’ के रिपोर्ट के मुताबिक देश में 1990 की तुलना में 2018 में जीवनशैली से जुड़ी यानि गैर संक्रामक रोगों जैसे मधुमेह, हृदयरोग और उच्चरक्तचाप के मामलों में दुगुनी बढ़ोतरी हुई है।
 एक आंकलन के अनुसार 2028 तक देश में इन रोगों से पीडि़तों की संख्या में भयावह वृद्धि होने की संभावना है। (बाकी पेज 7 पर)

 चिंताजनक स्थिति यह कि इस रोग के शिकंजे में देश के नई पीढ़ी आ रही है और जीवनशैली से जुड़े इन बीमारियों से अब ग्रामीण और गरीब तबका भी अछूता नहीं रहा है। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक 2030 तक देश में 3.60 करोड़ मौतें सिर्फ गैर संक्रामक बीमारियों से होंगी। इस लिहाज से देश के अस्पतालों में लगभग छ: से सात लाख अतिरिक्त बिस्तरों की जरूरत होगी जिसके लिए पच्चीस से तीस अरब डॉलर की दरकार होगी जो सरकार के बलबूते संभव नहीं है।
 खस्ताहाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि देश की स्वास्थ्य सेवाएं बड़ी तेजी से निजी क्षेत्रों की ओर खिसकती जा रही है। एक अन्य शोध के मुताबिक देश के 80 फीसदी मरीज इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं। फलस्वरूप देश में प्राइवेट हेल्थ केयर इंडस्ट्री खूब फल-फूल रही हैं। शोध संस्था क्रिसिल के रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्राइवेट हेल्थ केयर इंडस्ट्री 17 फीसदी की दर से बढ़ रही है। साल 2017 में इस इंडस्ट्री ने 4000 करोड़ का कारोबार किया है तथा अगले पांच साल में 8600 करोड़ का कारोबार करने की उम्मीद है। निजी स्वास्थ्य क्षेत्र भारत में सबसे मुनाफे वाला धंधा बन चुका है और देश में विकसित और विकासशील देशों से लगभग ढाई लाख मरीज इलाज के लिए भारत आ रहे हैं। 
‘मेडिकल टूरिज्म’ के नाम से पहचान बनाने वाले भारत में निजी स्वास्थ्य उद्योग लगभग 15 फीसदी वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है जो देश के विकास दर से दुगुनी है। देश में इस समय निजी अस्पतालों का बाजार 100 अरब डॉलर का है जो 2020 तक 280 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। परन्तु इस विकास का स्याह सच यह भी है कि देश की एक बड़ी आबादी इस पांच सितारा स्वास्थ्य सुविधाओं का उपभोग आर्थिक कारणों से नहीं कर पा रहा है। इस लिहाज से शहरी, कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित स्वास्थ्य केन्द्रों को संसाधन युक्त करने की ज्यादा जरूरत है क्योंकि आम आदमी की पहुंॅच इन अस्पतालों में ही है। 
विश्व स्वास्थ्य संगठन के रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं पर आय का 10 फीसदी हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है, भारतीय आबादी का 3.9 फीसदी हिस्सा यानि 5.1 करोड़ परिवार अपने घरेलू बजट का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा खर्च करने के लिए मजबूर हैं। महंगे इलाज के खर्चों को जुटाने के लिए लोगों को उधार लेने, संपत्ति गिरवी रखने या बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, आर्थिक असमर्थता और महंगे इलाज का खर्च उठाने के चलते देश के 4 करोड़ लोग हर साल गरीबी रेखा के नीचे पहुंच रहे हैं। इस लिहाज से यह जरूरी है कि देश के सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सेहत में सुधार के लिए सरकार द्वारा आवश्यक कदम उठाया जावे क्योंकि इसकी पहुंच देश के ग्रामीण आबादी तक है। बहरहाल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण और चिकित्सा शोध को प्रोत्साहित किए जाने पर ही देश के मासूमों की जान बचायी जा सकेगी और तभी भारत आयुष्मान हो सकेगा। 
सहायक प्राध्यापक, आयुर्वेद कॉलेज, रायपुर

 

 

 


Date : 20-Jun-2019

अनुराग शुक्ला

क्रिकेट विश्व कप में भारत- पाकिस्तान का बहुप्रतीक्षित मैच हो चुका है और इसमें भारत ने शानदार जीत हासिल की है। भारत-पाकिस्तान की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता के अलावा इस मैच की एक और खास बात यह थी कि इसमें सचिन तेंदुलकर मैच के टीवी प्रसारण के दौरान हिंदी में कॉमेंट्री कर रहे थे। हालांकि, इससे पहले वे विश्व कप के मैचों में अंग्रेजी में कॉमेंट्री कर चुके थे। इस विश्व कप में ही सचिन ने आधिकारिक तौर पर कॉमेंट्री करने की शुरुआत की है। हालांकि, इससे पहले वे यदा-कदा बतौर एक्सपर्ट हिंदी-अंग्रेजी के कॉमेंट्री बॉक्स में आते रहे थे।
क्रिकेट मैचों के टीवी प्रसारण पर पिछले कुछ सालों से हिंदी कॉमेंट्री पर काफी जोर दिया जा रहा है और टीवी पर हिंदी कॉमेंट्री लोकप्रिय भी हो रही है। लेकिन, इसके साथ-साथ लगातार इसकी गुणवत्ता पर भी सवाल उठते रहे हैं। हिंदी कॉमेंट्री में सचिन का आना इसीलिए भी ध्यान खींचने वाला है। उन्होंने पूर्व क्रिकेटर्स की ‘दशा खराब तो दिशा खराब’ और ‘पकड़ो कैच, जीतो मैच’ जैसी जुमलों से भरी कॉमेंट्री के बीच एक अलग रूख अपनाया और खेल की बारीकियों की अपनी समझ को बहुत आसान भाषा में दर्शकों तक पहुंचाया। भारत-पाक मैच के दौरान सचिन की कॉमेंट्री में क्या-क्या अलग था, इस पर आगे बात करने से पहले भारत में क्रिकेट कॉमेंट्री के परिदृश्य पर चर्चा करना जरूरी है।
एक जमाने में क्रिकेट मैचों के सीधे प्रसारण का जरिया रेडिया था। लेकिन, रेडियो कॉमेंट्री का मिजाज अलग होता था। मैच के पूरे रोमांच के साथ आंखों देखा हाल सुनाने के लिए कॉमेंटेटर के पास भाषायी दक्षता होना एक जरूरी चीज होती थी। इसलिए रेडियो के दौर में पेशेवर कॉमेंटेटर उभरे और खासे लोकप्रिय हुए। लेकिन, टीवी पर मैचों का प्रसारण शुरु होने के साथ कॉमेंट्री में पूर्व क्रिकेटर्स की आमद शुरु हुई। जाहिर है कि खिलाडिय़ों से पेशेवर कॉमेंटेटर्स की तरह के भाषायी लालित्य की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, लेकिन पूर्व खिलाडिय़ों की आमद ने मैच के वर्णन में एक अलग तरह का नयापन पैदा किया। कुछ चीजें छूटीं तो कुछ नई चीजें आ गईं।
टीवी कॉमेंट्री में खेल के तकनीकी पक्ष पर चर्चा इसका खास आकर्षण है। रेडियो कॉमेंट्री में सुनने वाले के सामने पूरा दृश्य का सजीव चित्र खींचना पड़ता था, वहीं, टीवी में मैच के दौरान क्या हो रहा है यह तो दर्शकों को दिख ही रहा होता है। ऐसे में टीवी स्क्रीन पर जो दिख रहा है कॉमेंटेटर अगर उससे इतर कुछ बता पाता है तब तो ठीक, नहीं तो दर्शकों की कॉमेंटरी सुनने में ज्यादा रूचि नहीं रह जाती। इन्हीं द्वंदों में उलझी टीवी की हिंदी कॉमेंट्री लोकप्रिय तो हो रही है, लेकिन उसकी गुणवत्ता पर अक्सर सवाल भी उठते रहते हैं।
टीवी पर हिंदी कॉमेंट्री सुनने वाले इस बात को महसूस कर सकते हैं कि खेल की तकनीकी जानकारी रखने वाले ये पूर्व कमेंटेटर धीरे-धीरे एक तय ढर्रे में बंध जाते हैं और मैच के दौरान बार-बार वही बातें दोहराते हैं। मसलन, फलां बल्लेबाज लेग स्टंप पर बहुत अच्छा खेलते हैं और अगर बॉलर इनके पैर पकड़ेगा तो बहुत पिटाई खाएगा। इस तरह के ‘शब्द-खेल’ एक-दो बारगी तो ठीक लगते हैं, लेकिन बार-बार उनका दोहराव वर्णन को बोझिल बना देता है।
जैसे, आकाश चोपड़ा अपनी कॉमेंट्री के दौरान खिलाडिय़ों के नाम के सहारे कौतुक पैदा करने की कोशिश करते हैं। अफगानिस्तान के बल्लेबाज नूर अली के आउट होने पर वे कहते हैं कि नाम इनका नूर है, लेकिन इनकी बैटिंग में नूर नहीं दिखा। इसी तरह भारतीय स्पिनर कुलदीप यादव के अच्छी गेंदबाजी करने पर वे अक्सर कुलदीपक शब्द के साथ उसका तुक मिलाते हैं। ये तुकबंदी एक प्रवृत्ति हो सकती है, लेकिन क्रिकेट के खेल का रोमांच सिर्फ इसी के सहारे नहीं बयान हो सकता है। स्टार स्पोर्ट्स के प्रेजेंटर जतिन सप्रू भी हिंग्लिश नुमा भाषायी जोड़तोड़ का सहारा लेते दिखते हैं। इन जुमलों से राहत तब मिलती है। जब खिलाड़ी अपने दौर के ड्रेसिंग रूम के चर्चे शुरु कर देते हैं, जिसे कमेंट्री का एक पक्ष कहा जा सकता है, लेकिन इसकी भी एक सीमा है।
अब फिर सचिन की कॉमेंट्री की तरफ लौटते हैं। विश्व कप में भारत-पाकिस्तान के मुकाबले के दौरान सचिन को लंबे समय तक हिंदी बोलते देखकर सबसे पहले तो बहुत सारे दर्शकों की यही धारणा टूटी होगी कि उनकी ‘आइला-जाइला’ वाली मुंबइया हिंदी है। इसके उलट उन्होंने बड़े साफ-सुथरे तरीके से आसान और अच्छी हिंदी बोली। इसके अलावा खेल के विभिन्न पहलुओं पर लगभग हर कॉमेंटेटर बात करता है, लेकिन सचिन ने ऐसा बिलकुल अलग अंदाज में किया।
रोहित शर्मा के खेल के बारे में बात करते हुए सचिन ने हमें समझाया कि ज्यादातर बल्लेबाज बैकफुट पर पुल शॉट खेलते हैं, लेकिन रोहित फ्रंटफुट पर भी पुल करने की क्षमता रखते हैं। बैकफुट पर आकर पुल करने पर आम तौर पर शॉट एक ही दिशा में जाता है और वहां पर फील्ड की घेराबंदी कर बल्लेबाज को आउट किया जा सकता है। लेकिन, रोहित जब फ्रंटफुट पर आकर पुल करते हैं तो यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि गेंद किधर जाएगी। ऐसे में फील्डिंग सेट करना टेढ़ी खीर होती है। बैट-पैड साथ होने और सिर के स्थिर होने जैसी बल्लेबाजी की सैद्धांतिक बातें ज्यादातर कॉमेंटेटर दोहराते हैं, लेकिन सचिन ने रोहित की बल्लेबाजी और केएल राहुल के फुटवर्क की निहायत क्रिकेटीय बातों का काफी सरलता से विश्लेषण किया जोकि कमाल था।
कॉमेंट्री बॉक्स में अक्सर पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों की मौजूदगी रहती है और उनका अनुभव बहुत बड़ा होता है। लेकिन, सचिन तेंदुलकर की तरह सभी उसे कॉमेंट्री में नहीं उतारते या उतार नहीं पाते हैं। (बाकी पेज 7 पर)

सचिन की कॉमेंट्री में यह दिखा कि अपने लंबे क्रिकेटीय जीवन के अनुभवों को उन्होंने बहुत बारीकी से महसूस किया है और उन अनुभवों के चलते उनके पास हर परिस्थिति में कहने के लिए पूरा एक खजाना है।
इंग्लैंड की ओवरकास्ट परिस्थितों में तेज गेंदबाजों के स्विंग मिलने और बल्लेबाजी के मुश्किल होने की बात आम है। लेकिन, सचिन ने बताया कि ऐसी परिस्थितों में स्पिनर्स अगर गेंद को हवा (फ्लाइट) दें तो उन्हें कैसे मदद मिलती है। बॉलिंग की दिशा और लंबाई ऐसी रखी जाए कि बल्लेबाज हवा के विपरीत शॉट खेलने को मजबूर हो जाए। हवा के खिलाफ लगाए गए शॉट कई बार बाउंड्री के अंदर रह जाते हैं और बल्लेबाज आउट हो जाता है। मैच के दौरान यह दिखा भी कि जब चहल और कुलदीप ने धीमी और फ्लाइटेड गेंदे फेंकनी शुरु कीं तो उन्हें सफलता मिली।
भुवनेश्वर कुमार के चोट लगने के बाद सचिन ने उनके हाव-भाव देखकर बता दिया कि उन्हें समस्या है और यह समस्या उनके घुटनों में है। यह बताता है कि सचिन अपने विशद अनुभव को कैसे आसानी से अपने वर्णन में समाहित कर लेते हैं। इसके अलावा मैच जब बारिश के चलते रूका और फिर सभी लोग खेल शुरु होने के लिए अंपायर की ओर देखने की बात कर रहे थे तो सचिन ने कहा कि अंपायर की तरफ देखने के बजाय हमें ग्राउंडस्टाफ की तरफ देखना चाहिए क्योंकि मैदान की हालत क्या है, यह उनके हाव-भाव देखकर पता चल जाएगा। फिर तेजी से दौड़ते ग्राउंड स्टाफ को देखकर उन्होंने कहा कि खेल जल्द शुरु हो जाएगा। और कुछ देर बाद अंपायर्स ने खेल शुरु होने की इजाजत दे भी दी। क्रिकेटिंग अनुभवों की इन्हीं बारीक बातों को अपनी कमेंट्री में समेटकर उन्होंने उसे भी अपने खेल की तरह दिलकश सहजता दी है।
सचिन ‘क्रिकेट के भगवान’ हैं। बतौर क्रिकेटर वे पूरी दुनिया के लिए मिसाल हैं और सभी उनसे कुछ न कुछ सीखते ही रहते हैं। लेकिन, क्रिकेट कॉमेंट्री में उनकी आमद से पूर्व खिलाड़ी कॉमेंटेटर्स भी चाहें तो काफी कुछ सीख सकते हैं। सचिन की हिंदी कॉमेंट्री सबसे ज्यादा यह बताती है कि आपको सबसे ज्यादा बात उस खेल की करनी चाहिए, जिसके आप माहिर हैं, न कि तुकबंदियों और घिसे-पिटे जुमलों के सहारे आपको अपना भाषायी कौशल दिखाने की कोशिश करनी चाहिए। (सत्याग्रह)


Date : 19-Jun-2019

-प्रदीप सुरीन
आप इसे चमकी बीमारी का नाम दे सकते हैं। डिजीटल युग में थोड़ा हैपनिंग और नया भी लगता है। लेकिन मुद्दे पर मेरी अपनी समझ कहती है कि ये दिमागी बुखार (एक्यूट एंसेफिलाइटिस सिंड्रोम) ही है। 
100 नवजातों से ज्यादा दम तोड़ चुके हैं, जनता को गुस्सा तो आएगा ही। ये सोशल मीडिया में नीतीश कुमार और मोदी सरकार को पानी पी-पीकर कोसने और गाली देने से कुछ नहीं होगा। हर साल, इसी मौसम में आपको गुस्सा क्यों नहीं आता? 
ये बीमारी मुजफ्फरपुर में कोई नई नहीं है। सालाना 100 से ज्यादा नवजातों का यहां मर जाना नया तो नहीं है। हर साल इससे भी ज्यादा बच्चे बीमारी से मरते हैं। आम लोग इसे चमकी बीमारी कह रहे हैं, डॉक्टर इसे एंसेफिलाइटिस का नाम देते हैं। कई साइंटिस्टों ने यहां तक कहा है कि लीची बागानों के आसपास रहने वाले बच्चे इस संक्रमण से मरते हैं।
क्या मेरे सोशल मीडिया में चीखने या वहां जाकर लोगों की मदद करने से समस्या हल होगी? नहीं, मेरा मानना है कि फिलहाल वहां जाकर कोई मदद भी मददगार नहीं हो सकती। दरअसल, अस्पताल पूरी समस्या के आखिरी पड़ाव पर आता है। बच्चे आखिरकार अस्पतालों में जाकर ही दम तोड़ते हैं इसीलिए स्वास्थ्य विभाग या स्वास्थ्य मंत्रालय पर नाकामी का ठीकरा फोडऩा आसान है। 
जबकि हकीकत ये है कि मुजफ्फरपुर में कुपोषण, साफ पीने का पानी और मच्छरों का संक्रमण सबसे बड़ी चुनौती है। खबरों में बच्चों के चमकी बीमारी से मरने की खबर तो आ रही है लेकिन कोई भी इस जिले में अति-कुपोषित और कुपोषित बच्चों को लेकर कोई बात नहीं कर रहा। 
बिहार के 'सुशासन' में बच्चों के भूखे रहने की बात कोई करता ही नहीं है। दूसरा इस क्षेत्र में मच्छरों का प्रकोप अन्य जिलों से ज्यादा है। ये एक खास किस्म के मच्छर हैं जो इस बीमारी को बच्चों में पहुंचाने का काम करते हैं। 
कमाल की बात यह है कि गोरखपुर में इसी बीमारी से लड़ऩे के लिए 4000 करोड़़ रुपए खर्च करके रिसर्च सेंटर बनाया गया, अस्पतालों में खास विभाग बनाए गए। मच्छरों से निबटने के लिए राज्य और केंद्र सरकार पैसा देती रही है। यहां कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी काम कर रही है। लेकिन इसके उलट मुजफ्फरपुर में सिर्फ केंद्र सरकार की एक टीम हर साल पहुंचती है और अपनी वाहियात सी रिपोर्ट बनाती और सरकार को सौंप देती है। इससे आगे कुछ नहीं।
जरुरत है कि मुजफ्फरपुर में भी कम से कम दो रिसर्च सेंटर बने। कुपोषण से लडऩे के लिए राज्य व केंद्र सरकार परिवारों को अनाज दें। मच्छरों की समस्या से निबटने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय साथ मिलकर काम करे और इन्हें पनपने से रोकें। साफ पीने के पानी का बंदोबस्त किया जाए। बिना इन ठोक कदमों के इस समस्या का निदान नहीं हो सकता। 
आमिर खान और प्रसून जोशी को 'कुपोषण भारत छोड़ो'  ऐड पर 400 करोड़ रूपये लूटा दिया गया। अच्छा होता अगर यही पैसा इन गरीबों को राशन देने में लगा देते।


Date : 19-Jun-2019

-प्रकाश दुबे

बिजली तड़की, बाकी चुप
बहुत पुरानी बात नहीं है। प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे मुंबई में उपनगरों की बिजली आपूर्ति करने वाली निजी कंपनी बीएसईएस के अधिकारी शाही को केन्द्र सरकार का बिजली सचिव बनवाना चाहते थे। बिजली मंत्री सुरेश प्रभू ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि सचिव नियुक्ति प्रधानमंत्री का अधिकार है। शाही सचिव बने। गैर आइएएस को केन्द्र सरकार में सचिव बनाने पर हंगामा मचा। कुपित ठाकरे ने शिवसेना कोटे से मंत्री बने प्रभू को हटवा दिया। प्रभू फिर मंत्रिमंडल से बाहर हैं। उन दिनों बीएसईएस का स्वामित्व अम्बानी के पास था। कई गैर आइएएस इन दिनों केन्द्र में कामकाज संभाल रहे हैं। अम्बानी को बड़े काम देखने हैं इसलिए उपनगर की बिजली-आपूर्ति का ठेका अडानी के पास है।  
सशक्तिकरण की शर्त
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की दूसरी पारी में केन्द्रीय वित्त मंत्री महिला है। देश के संभवत: किसी राज्य में महिला को वित्तमंत्री का स्वतंत्र प्रभार नहीं है। जेल की हवा खाने, सड़क पर उतर कर आंदोलन कर धूल फांकने के बाद जगन्मोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने सुचरिता को गृहमंत्री बनाया। सुचरिता अनुसूचित जाति में जन्मी। जगन के पिता डॉ. वाय.एस. राजशेखर रेड्डी ने अविभाजित आंध्र प्रदेश में सबिता इंद्रा रेड्डी  को गृहमंत्री बनाया था। सबिता कांग्रेस छोड़ चुकी हैं। हालांकि सुचरिता के जिम्मे पहला बड़ा काम यही है कि चंद्रबाबू नायडू के परिवारजनों और समर्थकों को कैसे अदालतों की परिक्रमा कराई जाए। हो सके तो वहां भिजवाया जाए, जहां महीनों जगन रेड्डी  रहकर आए हैं। उस जगह का नाम है-जेल।   
सबका मालिक एक नहीं
कम से कम एक साहसी राज्यपाल ऐसा है जिसने भ्रष्टाचार रोकने की कार्रवाई करते समय कारोबारियों के नाम और शक्ल से खौफ नहीं खाया। यही नहीं, सरे आम कह दिया कि अमुक कंपनी का बाजा बजा दिया। राम मनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह की वैचारिक परवरिश में पले बढ़े-बढे सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हैं। बतौर राज्यपाल कई मुख्यमंत्रियों से अधिक राज करेंगे क्यों कि राष्ट्रपति शासन की अवधि छह महीने बढ़ाई जा चुकी है। राज्यपाल ने तीन अरब रूपये के भ्रष्टाचार की जांच शुरु कराई। मुकेश अम्बानी की कंपनी ने योजना का धन जमा नहीं किया था। दलाली जैसी कुछ अनियमितताओं का भांडा नहीं फोड़ा। ठेका रद्द किया। प्रधानमंत्री को जानकारी दी। इसके  बावजूद मलिक का राज्यपाल का ओहदा कायम है। 
सर्प मित्र
वैज्ञानिक कम करिश्मेबाज नहीं होते। बरसों पहले डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने ईसाई पादरियों को मनाकर पूरा गिरजाघर शोध कार्य के लिए मांग लिया। धर्म के नाम पर खूनखराबा और बयानबाजी करने वाले ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देते। केरल में काकनाड में अंतरराष्ट्रीय ख्याति के मौसम वैज्ञानिक डॉ. पीवी जोसफ रहते हैं। 50 वर्ष के लम्बे कार्यकाल में भारत और पड़ोसी देशों को सामयिक सूचनाएं देकर परेशानियों से बचाया है। 
अब भी राष्ट्रीय तथा अंतररराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं। डॉ. जोसफ को बताया गया कि केरल में रामन थुरुतु में इंसानों कई गुना अधिक विषैले सांप हैं। थुरुतु यानी टापू-नन्हा सा द्वीप। डॉ.  जोसफ ने सहजता से कहा-मेरे घर के आसपास सांप हैं। चकित होकर पूछा-डर नहीं लगता। डॉ. जोसफ तथा उनकी पत्नी ने एक साथ कहा-हम उन्हें परेशान नहीं करते। वे हमें नहीं सताते। उन्हें आंगन में चूहे और मेंढक का शिकार मिल जाता है। अब तक जोसफ परिवार या सेवक-सेविका ने किसी सांप को न मारा, न  भगाया। डॉ. जोसफ को कंप्यूटर पर मौसम की जानकारी का विश्लेषण करते देखकर सांप क्या सोचते होंगे? मैंने न डॉ. जोसफ से पूछा, और न सांपों से। 
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


Date : 19-Jun-2019

-प्रभाकर एम
सब्र का फल मीठा होता है। अधीर रंजन चौधरी को अब इस कहावत का अर्थ शायद बखूबी समझ में आ गया होगा। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के राजकुमार, बेताज़ बादशाह, गरीबों के मसीहा और रॉबिनहुड के नाम से मशहूर चौधरी ही अकेली वह शख्सियत हैं जिनकी बदौलत बंगाल में सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आंधी में भी अब तक कांग्रेस का झंडा लहरा रहा है।
पार्टी के तमाम नेता इधर से उधर हो गए। लेकिन चौधरी अकेले ऐसे नेता हैं जिन्होंने बीते दो दशकों से अकेले अपने बूते मुर्शिदाबाद जिले को कांग्रेस का अजेय किला बनाए रखा है। दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अधीर की काफी सराहना की थी। दरअसल, अधीर ऐसे नेताओं में से हैं जिनकी लाख आलोचना की जाए, अनदेखी नहीं की जा सकती। शायद नियति और किस्मत इसे ही कहते हैं। लोकसभा चुनावों से ठीक पहले आलाकमान ने प्रदेश कांग्रेस की कमान चौधरी से लेकर सोमेन मित्र को सौंप दी थी। इससे चौधरी की नाराजगी स्वाभाविक थी।
वे लेफ्टफ्रंट और तृणमूल कांग्रेस के साथ किसी तरह के तालमेल के सख्त खिलाफ थे। अधीर शुरू से ही बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस से समान दूरी बरतने की वकालत करते रहे हैं।
शायद यही वजह है कि अबकी लोकसभा चुनावों से पहले अधीर के बीजेपी में शामिल होने की अफवाहें काफी तेज थीं। लेकिन उन्होंने संयम बरता और अब उनको लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता के तौर पर इसका इनाम मिला है।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि कांग्रेस आलाकमान ने बंगाल में वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले चौधरी को लोकसभा में संसदीय दल का नेता बना कर राज्य में संगठन की मजबूती के लिए उनके करिश्माई व्यक्तित्व पर भरोसा जताया है। वह प्रणब मुखर्जी के बाद इस पद पर पहुंचने वाले बंगाल के दूसरे सांसद हैं। हालांकि प्रणब को उस समय संसदीय दल का नेता बनाया गया जब केंद्र में मनमोहन सिंह सरकार सत्ता में थी।
स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर नक्सल आंदोलन के जरिए राजनीति में कदम रखने वाले अधीर चौधरी का लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता के तौर पर सफर आसान नहीं रहा है। बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे अधीर रंजन चौधरी पर अक्सर बाहुबली होने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन राज्य में कांग्रेस अगर अब भी चर्चा में है तो उसका श्रेय अधीर को ही जाता है। दो दशक पहले से ही ममता बनर्जी के धुर विरोधी रहे अधीर को अगर गंगा के किनारे बसे मुर्शिदाबाद का बेताज बादशाह माना जाता है तो उसकी कई ठोस वजहें हैं। दो दशक से भी लंबे अरसे से बंगाल में बेहद प्रतिकूल हालातों में भी पार्टी का परचम फहराने के बावजूद चौधरी को उनकी निष्ठा का खास फल नहीं मिला था।
मनमोहन सिंह सरकार में दो साल तक रेल राज्य मंत्री रहे अधीर खुद को दलित मंत्री कहते थे। यही नहीं, लोकसभा चुनावों से कुछ महीने पहले उनसे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी भी छीन ली गई। लेकिन बावजूद इसके अधीर पार्टी के लिए डटे रहे।
अपने करियर के शुरुआती दिनों में नक्सल आंदोलन में शामिल होने की वजह से अधीर को कई महीनों तक जेल में रहना पड़ा था। उसके बाद कुछ समय के लिए वे फ़ॉरवर्ड ब्लॉक में रहे। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में उन्होंने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। उस समय मुर्शिदाबाद जिले को आरएसपी का गढ़ माना जाता था।
वर्ष 1991 के विधानसभा में पहली बार मैदान में उतरे अधीर को सीपीएम समर्थकों की भारी हिंसा का सामना करना पड़ा था। कोई तीन सौ समर्थकों ने उनको खदेड़ दिया था। अधीर हालांकि तब लगभग 1400 वोटों से हार गए थे। लेकिन उनकी सांगठनिक क्षमता, साहस और सीपीएम के ख़िलाफ़ जुझारूपन ने इलाके के कांग्रेसियों में उनकी लोकप्रियता रातों-रात बढ़ा दी।
वर्ष 1996 के विधानसभा चुनावों में एक सीपीएम नेता के परिजन की हत्या के आरोप में जेल में रहने के बावजूद चौधरी नबग्राम विधानसभा सीट जीत ली।
मुर्शिदाबाद के एक पुराने कांग्रेसी नेता रमेंद्र नाथ चौधरी बताते हैं, उस समय अधीर के भाषणों के जेल के भीतर रिकॉर्ड किया जाता था और उनको पार्टी की रैलियों में चलाया जाता था।
दिलचस्प बात यह है कि ममता बनर्जी ने तब अधीर की उम्मीदवारी का भारी विरोध किया था। इन दोनों नेताओं के बीच सांप-नेवले की लड़ाई आज तक जस की तस है।
अधीर वर्ष 1996 में पहली बार विधायक बने और उसके तीन साल बाद सांसद। उन्होंने जिले की बरहमपुर लोकसभा सीट से 1999 में उस समय चुनाव लड़ा था जब वर्ष 1951 के बाद वहां कांग्रेस कभी नहीं जीती थी। वह सीट आरएसपी की गढ़ थी। उस साल जीतने के बाद चौधरी लगातार पांच बार जीत चुके हैं। अधीर ने खुद तो इलाके में अपनी बादशाहत कायम रखी ही है, उनकी पहल पर ही कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी ने भी वर्ष 2004 में जिले की जंगीपुर संसदीय सीट से अपने जीवन का पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता था।
साल 2004 और 2009 में इस अल्पसंख्यक-बहुल सीट से प्रणब की जीत के असली वास्तुकार अधीर ही थे। चौधरी को 10 फरवरी, 2014 को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था। वे बीते साल 21 सितंबर तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल के दौरान ही वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने वाम मोर्चे के साथ हाथ मिलाया था। हालांकि उससे कोई खास फायदा नहीं हुआ।
मुर्शिदाबाद में चौधरी की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने विधानसभा से लेकर पंचायत चुनावों तक कई बार आलाकमान की इच्छा के खिलाफ जाकर बागी उम्मीदवारों तक को जिताया है। लेकिन अधीर की शख्सियत ही ऐसी है कि बावजूद इसके केंद्रीय नेतृत्व ने उनके खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं की।
संसद के भीतर और बाहर चौधरी की छवि एक प्रखर वक्ता की है। बीते पांच वर्षों के दौरान वह संसद में कई बार मोदी सरकार पर तीखे हमले कर चुके हैं। लेकिन बीते साल नारदा और सारदा घोटालों के मुद्दे पर ममता बनर्जी सरकार पर तीखे हमलों ने आलाकमान की नजऱों में उनके नंबर बढ़ा दिए थे।
वर्ष 2016 के लोकसभा चुनावों में जहां बंगाल पर 34 साल तक शासन करने वाली सीपीएम का खाता तक नहीं खुल सका, वहीं कांग्रेस ने दो सीटें जीत लीं। यह कहना ज्यादा सही होगा कि मुर्शिदाबाद में अधीर कांग्रेस के पर्याय हैं। अब आलाकमान ने उनको संसद में अहम जिम्मेदारी सौंप कर दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी का चेहरा बनाने के संकेत दे दिए हैं।
राजनीतिक मोर्चे पर अपने भाषणों और रणनीति से विरोधियों को धूल चटाने वाले चौधरी का निजी जीवन इतना आसान नहीं रहा है।
दो अप्रैल, 1956 को जन्मे अधीर ने 15 सितंबर, 1987 को अर्पिता चौधरी से शादी की थी। लेकिन उनकी इकलौती पुत्री की अक्टूबर, 2006 में एक बहुमंजिली इमारत से गिर कर मृत्यु हो गई थी।
पुलिस के मुताबिक वह आत्महत्या का मामला था। उसके बाद इसी साल नौ जनवरी को अर्पिता का भी निधन हो गया। लेकिन चौधरी ने अपनी निजी जीवन की मुश्किलों और तकलीफों को कभी पार्टी के हितों के आड़े नहीं आने दिया।
अधीर अक्सर कहते रहे हैं कि वे एक पैदल सिपाही हैं जो युद्ध के मोर्चे पर हमेशा सामने खड़ा रहता है। इसलिए वह पैदल सिपाही की तरह लड़ते रहेंगे। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता बनने के बाद भी उन्होंने यही बात दोहराई।
अधीर के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या के आरोप तक शामिल हैं। इन मामलों में उनको कई बार जेल जाना पड़ा है। लेकिन खुद अधीर इन मामलों को विपक्षी दलों की साजिश बताते हैं।
एक पुराने कांग्रेस निहार रंजन मैत्र कहते हैं, आप अधीर पर बाहुबली होने का आरोप लगा कर उनकी लाख आलोचना कर लें, उनकी अनदेखी नहीं कर सकते। महज मुर्शिदाबाद ही नहीं बल्कि बंगाल कांग्रेस में उनकी कद-काठी का कोई दूसरा जुझारू नेता चिराग लेकर ढूढऩे से भी नहीं मिलेगा।
प्रदेश कांग्रेस ने भी अधीर के संसदीय दल नेता बनने का स्वागत किया है। प्रदेश अध्यक्ष सोमेन मित्र कहते हैं, अधीर चौधरी के लौटने पर उनका नागरिक अभिनंदन किया जाएगा। वह कहते हैं कि इससे वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में पार्टी एक बार फिर पूरी सांगठनिक ताकत के साथ मैदान में उतरेगी।
राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता अब्दुल मन्नान कहते हैं, अधीर को संसदीय दल का नेता बना कर आलाकमान ने व्यापक जनाधार वाले इस नेता को पहली बार योग्य पद दिया है। गनी ख़ान चौधरी और प्रियरंजन दासमुंशी के बाद अधीर ही अकेले ऐसे नेता हैं जिनका व्यापाक जनाधार है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस आलाकमान ने इस फैसले के जरिए यह संकेत दिया है कि बंगाल उसकी प्राथमिकता सूची में काफी ऊपर है और दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावो में पार्टी यहां पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरेगी। राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर उज्ज्वल कुमार मुखर्जी कहते हैं, शायद अब आलाकमान ने भी मान लिया है कि बंगाल में अधीर ही पार्टी का भविष्य हैं। (बीबीसी)


Date : 18-Jun-2019

-डॉ. ए.आर. दल्ला
 तुतमखामन ईसा से 1300 वर्ष पूर्व इजिप्त के राजा थे। उनका शव आज भी इजिप्त के पिरामिड में सुरक्षित रखा हुआ है।  लंदन में फिलहाल हुए अनुसंधान से मालूम हुआ कि तुतमखामन की मृत्यु 18 वर्ष की आयु में सिकल सेल रोग के कारण हुई थी। तीन हजार वर्षों के बाद भी हम सिकल रोग को पहचान नहीं सके थे।
 विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार विश्व के तीस करोड़ लोग सिकल सेल रोग से प्रभावित हैं। विश्व के आधे सिकल सेल रोगी मध्य भारत में रहते हैं। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, विदर्भ, पूर्वी गुजरात, ओडिशा, झारखंड और आंध्रप्रदेश में आदिवासी एवं पिछड़े वर्ग के 15 से 40 फीसदी लोग सिकल रोग के वाहक हैं। यह विंडबना ही है कि वर्ष 1952 तक भारत में इस बीमारी के विषय में विशेष जानकारी नहीं थी। समय के साथ मालूम हुआ कि मध्य भारत के आदिवासी पिछड़े और वंचित लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग इस बीमारी से ग्रस्त है। मध्यप्रदेश में के कई जिलों में 10 से 30 फीसदी लोग इस बीमारी से प्रभावित है। दुर्भाग्यवश मध्यप्रदेश में अभी तक इस बीमारी का संज्ञान नहीं लिया जा सका है।
 भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी छग राज्य शाखा के द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार छत्तीसगढ़ के 20 से 40 फीसदी आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग सिकल सेल से प्रभावित हैं। रेडक्रॉस सोसायटी के तत्कालीन चेयरमेन डॉ. ए.आर. दल्ला ने इस पर पुरजोर आवाज उठाई। राजनेताओं, चिकित्सकों और मिडिया के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के तत्कालीन राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने इसका संज्ञान लिया। छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री ने भूपेश बघेल आज से 14 वर्ष पूर्व 27 मई 2004 को छत्तीसगढ़ विधानसभा मे सिकल रोग नियंत्रण के लिए एक अशासकीय संकल्प रखा जो सर्वसम्मति से पास हुआ। यह आवाज राज्यसभा, लोकसभा, योजना आयोग तथा भारत के राष्ट्रपति से चलते हुए अंतरराष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र संघ तक पंहुची। 
दिनांक 8 दिसंबर 2008 को संयुक्त राष्ट्र संगठन ने अपनी आम सभा में एक प्रस्ताव पारित कर सिकल सेल रोग को एक 'गंभीर अनुवांशिक' रोग के रूप में स्वीकार किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान-की मून ने इस अवसर पर कहा कि ''मैं सिकल रोग नियंत्रण के प्रयासों को अपनी आवाज दे रहा हूं। सभी देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सिकल रोग से ग्रसित लोगों के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करें।''
 संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव में पांच बातें विशेष रूप से कही गई। प्रस्ताव में पहली बात यह कही गई कि सभी प्रभावित देश सिकल सेल रोग को एक मुख्य स्वास्थ्य समस्या के रूप में स्वीकार करें। दूसरा, संबंधित देश जनजागरण अभियान चलाकर सिकल रोग संबंधी भ्रांतियों को दूर करें। तीसरी बात में सभी राष्ट्रों से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का आग्रह किया गया। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने यह भी आग्रह किया कि प्रभावित सदस्य राष्ट्र अपने देश में राष्ट्रीय सिकल सेल नियंत्रण निवारण कार्यक्रम प्रारंभ करते हुए विशेष सिकल सेल नियंत्रण केन्द्रों का गठन करें। प्रस्ताव की पांचवी बात में विश्व के सभी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से आग्रह किया गया कि वे सिकल नियंत्रण के कार्यों में अपना सक्रिय सहयोग एवं आर्थिक योगदान देंवे। 
यह सर्वविदित है कि 'शिशु मृत्युदर' (नफेन्ट मारटेलिटी रेट) किसी भी देश के विकास का एक मुख्य पैमाना है। एक वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार सिकल प्रभावित क्षेत्रों में 5 वर्ष के अंदर की आयु में मरने वालों बच्चों की संख्या में 15 फीसदी बच्चे, सिकल सेल रोग के कारण मरते है। छत्तीसगढ़ में शासन द्वारा प्रोजेक्ट सिकल छत्तीसगढ़ शुरू किया गया है। मेडिकल कॉलेज रायपुर में अनुवांशिक रोग एवं मालेकुलर बायलाजी लैब के लिए करोड़ों रूपये के उपकरण उपलब्ध कराए हैं किन्तु अभी तक गर्भस्थ सिकल रोगी बच्चे की पहचान के लिए गर्भवती महिलाओं के गर्भजल जांच (एमिनोसेन्टेसिस) प्रारंभ नहीं हो सकी हैं। मुख्यमंत्री सिकल नियंत्रण कार्यक्रम के लिए मुख्यमंत्री द्वारा समुचित बजट आबंटन के बावजूद अभी भी गर्भवती महिलाओं एवं नवजात शिशुओं की सिकल जांच का कार्य प्रारंभ होना लंबित हैं। 
सिकल रोग में गोलाकार हिमोग्लोबीन के रक्त कण हंसिए (सिकल) के रूप में नुकीले और कड़े होकर शरीर की छोटी रक्त वाहिनियों में फंस जाते हैं। रक्त और ऑक्सीजन के मार्ग में अवरोध होने से प्रभावित अंग में असहनीय दर्द होता है जिससे रोगी चित्कार उठता है-इसे सिकल क्रायसिस कहते हैं।
कहा जाता है आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले लोग नहीं रोते। मगर आज सिकल रोग से उठने वाली पीड़ा (सिकल क्रायसिस) उन्हें रुला रही है। गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी इस क्रंदन को बढ़ा देती है।  
(पूर्व अध्यक्ष, भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी छग  एवं अध्यक्ष सिकल सेल संगठन छग)

 


Date : 18-Jun-2019

-अशोक वाजपेयी
प्रेम भारद्वाज द्वारा संपादित एक नयी पत्रिका 'भवन्ति' के प्रवेषांक के अवसर पर 'साहित्य में जनतंत्र' विषय पर एक परिचर्चा हुई। हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि पिछले लगभग सात दशकों में जो साहित्य लिखा-पढ़ा गया है, वह जनतंत्र के अंतर्गत लिखा-पढ़ा गया है और ऐसा हमारे और साहित्य के इतिहास में पहली बार हुआ है। जनतंत्र के पांच तत्व विशेष हैं-चुनने की स्वतंत्रता, दृष्टियों की बहुलता, प्रश्नवाचकता, संवाद और असहमति की जगह और हर तरह की अल्पसंख्यकता का समावेश। हमें यह भी याद करना चाहिये कि संवैधानिक जनतंत्र लागू होने के सदियों पहले से साहित्य में जनतंत्र रहा है। भक्ति काव्य में तो कविता और अध्यात्म को एक साथ प्रश्नवाची, जनसुलभ और जनतांत्रिक बना दिया गया था। कबीर और तुलसी दोनों ही प्रश्नवाची हैं। एक हर धार्मिक सत्ता को चुनौती देता है तो दूसरा दी गई सत्ता का रामराज्य के रूप में विकल्प सुझाता है जिसमें हर नागरिक को राजा द्वारा अनीति करने पर टोकने का अधिकार और अवसर हो।
राजनीतिक स्वतंत्रता हमें जब मिली उससे बहुत पहले से साहित्य में स्वतंत्रता थी। छायावाद, राष्ट्रीयतावादी काव्य, गद्य आदि सभी औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिरोध में थे और मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, प्रेमचंद, अज्ञेय आदि सभी स्वतंत्रतापूर्व के लेखक सत्ता-विरोधी थे। स्वतंत्रता मिलने और संविधान के अंतर्गत जनतंत्र स्थापित होने के थोड़े ही दिनों बाद मोहभंग हुआ और लोकतांत्रिक सत्ता के बारे में साहित्य में प्रश्न उठे। यह आकस्मिक नहीं है कि पिछले 70 के हिंदी साहित्य का मुख्य स्वर व्यवस्था-विरोध का रहा है। उसमें प्रश्नवाचकता, धर्मनिरपेक्षता, संवाद, असहमति, वाद-विवाद-संवाद आदि की जनतांत्रिक जगह और संभावना रही है। इधर हिंदी प्रदेश में जो व्यापक राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं। उनकी एक विडंबना यह है कि उसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ऐसी शक्तियों को अपना समर्थन फिर दिया है जो अब लोकतांत्रिक कटौती के लिए अधिकृत महसूस करेंगी।
इसकी फिर पुष्टि हुई है कि आज हिंदी साहित्य हिंदी समाज का असली और टिकाऊ प्रतिपक्ष है। हिंदी लेखक को यह स्वीकार करना चाहिए कि साहित्य राजनीति के लिए पूरी तरह से अप्रासंगिक हो गया है। इतना दिलासा हम अपने को दे सकते हैं कि कट्टरता-हिंसा-हत्या-घृणा-अन्याय-जातिवाद की राजनीति से हमारा कुछ लेना-देना नहीं है। हम बहुलता, प्रश्नवाचकता, सच और असहमति पर अपना इसरार तेज़ करेंगे तो आज की राजनीति और सत्ता के लिए हमारी अप्रासंगिकता बढ़ेगी। हम आज अप्रासंगिक माने जाकर ही सच बोल सकते हैं, जनतांत्रिक हो सकते हैं। हिंदी अंचल की राजनीति से अलग, उसके विरुद्ध हिंदी साहित्य संकीर्णता, हिंसा-हत्या-घृणा की मानसिकता, दलितों-स्त्रियों-मुसलमानों आदि पर अत्याचारों का विरोध कर अपना नैतिक, सांस्कृतिक और जनतांत्रिक धर्म निभा सकता है।
हिंदी समाज का अंत:करण संक्षिप्त हो रहा है। साहित्य इस समय अंत:करण होकर ही अपनी जनतांत्रिक भूमिका निभा सकता है। एक हताश प्रश्न उठता है, क्या हमारा जनतंत्र इस समय साहित्यातीत हो गया है? शायद जनतंत्र ने अपने मौजूदा स्वरूप में साहित्य को पीछे छोड़ दिया है। अब हम राजनीति के आगे चलने वाली मशाल नहीं, स्वयं जनतंत्र द्वारा उपजाये-पोसे-बढ़ाये अंधेरे में कुछ मोमबत्तियां भर हैं। रवीन्द्रनाथ ने कभी कहा था कि एक नन्हा सा दीपक भी संसार को आलोकित करता है।
समाजशास्त्री और कलाप्रेमी सुरेश शर्मा के लिए आयोजित स्मृति सभा में यह स्पष्ट हुआ है कि इस सौम्य, शान्त पर अपनी दृष्टि पर दृढ़ विचारक के लिए बौद्धिक समाज में कितना गहरा सम्मान रहा है। वे जड़ों पर जमे थे पर उनकी जिज्ञासा अथक थी। उन्होंने आदिवासी समाज, जीवन और विश्वदृष्टि का गहरा और ज़मीनी अन्वेषण किया था। आधुनिकता से उनकी एक बड़ी शिकायत यह थी कि उसने आदिवासी जीवनबोध और पेगन दृष्टि को अतिक्रमित कर दिया।
सुरेश शर्मा को गांधी-150 में, बहुत कृतज्ञतापूर्वक, उनके द्वारा बहुत जतन से संपादित 'हिन्द-स्वराज' के नये संस्करण के लिए भी याद किया जाना चाहिये। उनके निजी और सामाजिक व्यवहार में उनकी सौम्यता और दृढ़ता को एक तरह के गांधी-व्यवहार की तरह आसानी से देखा-समझा जा सकता है। अपने इतिहास और नृतत्व के अनुशासन से अलग सुरेश की कई क्षेत्रों के मूर्धन्यों से गहरी मित्रता और संवाद थे। उसमें दार्शनिक रामचन्द्र गांधी, चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन, लेखक निर्मल वर्मा, फ्रेंच बुद्धिजीवी एलांसूपियो आदि शामिल हैं। उन्होंने रज़ा की चित्रकला के बहाने 'शून्य' पर एक रोचक संवाद आयोजित किया था और कई बरस बाद रज़ा फ़ाउंडेशन के लिए 'शब्द और बिम्ब' पर एक अन्तरराष्ट्रीय परिसंवाद भी जो कि निर्मल वर्मा और जगदीश स्वामीनाथन की स्मृति में था।
सुरेश ने उदयन वाजपेयी के साथ एक लंबी बातचीत में कहा था, 'आधुनिक चेतना का स्वबोध यह है कि उसने मानव इतिहास में पहली बार सर्वव्यापकता के स्वप्न को साकार कर दिया है। उसका यह मानना है कि उसके पहले की सर्वव्यापकता की कल्पना संकीर्ण और आंशिक थी और वह कभी भी सचमुच साकार नहीं हो सकती थी। वह स्वप्न मात्र थी। आधुनिक चेतना यह मानती है कि उसने मानव कल्पना में निहित दीर्घ प्रामाणिक तत्वों को यथार्थ रूप दिया है। एक अर्थ में जो आधुनिकता के पहले धुंधले विराट अतीत में मात्र स्वप्न की मरीचिका या सान्त्वना थी, उसने उसे यथार्थ कर दिया है।  उसका दावा है कि वह स्वर्ग को एक अर्थ में ज़मीन पर ले आयी है। पेगन बोध में सत्य की सर्वव्यापकता ऐसी है कि ऐसा कोई स्थान नहीं, ऐसा कोई काल नहीं, कोई ऐसी भाषा नहीं जिसमें वह घटित न होता हो।'
उसी बातचीत में आगे सुरेश ने कहा, 'गांधी भले ही महान उपनिवेश-विरोधी आंदोलन के महान् नायक रहे हों, उनके लेखन-अभिव्यक्ति में राष्ट्र-राज्य के विषय या आदर्श पर लगभग कुछ नहीं है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के महान प्रणेता सावरकर के पास संस्कृति पर कहने को कुछ नहीं है। गांधी का बड़ा योगदान यह रहा है कि विराट राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करते हुए कठिन से कठिन संघर्ष के क्षणों में उन्होंने राष्ट्रवाद के प्रति अपनी आलोचनात्मक दृष्टि को जीवंत बनाये रखा।'
सुरेश ने यह भी स्पष्ट किया है कि ' इस तरह का सभी प्राणियों के प्रति दायित्वबोध दूसरी परम्पराओं में भी मिलता है पर यह दायित्वबोध केवल मनुष्य प्रजाति के लिए नहीं था। पेगन परंपराओं में उत्तरदायित्व सभी के प्रति माना जाता था जो सबसे अधिक जीवंत रूप में आदिवासी जीवन में दिखायी देता है।' बस्तर में गहन काम करनेवाले इस विचारक ने यह भी दजऱ् किया था। 'हमारे आदिवासी समुदायों में महिलाएं अंडा नहीं खातीं। उसके पीछे भाव यह है कि अंडे में जिस जीव के जीवन की संभावना सुषुप्त है उसे कम से कम एक बार पनपने का अवसर दिया जाना चाहिये। ऐसा न हो कि जीवन को अवसर न मिले प्रकट होने का और वह समाप्त हो जाए। जीवन को जीने से पहले ही समाप्त न करने का यह भाव सुन्दर है।'
सुरेश बार-बार पेगन दृष्टि की ओर लौटते थे, 'पेगन परम्परा में सृष्टि की कल्पना में कोई सर्जक नहीं है। यहां ऐसा नहीं माना जाता कि यहां जो कुछ भी आंखों के सामने का अनुभव है, वह परम सत्य से भिन्न है। यह अवश्य है कि सत्य पारगामी है पर वह सृष्टि से अलग नहीं है। पेगन बोध और दृष्टि के अनुसार परम सत्य समस्त जगत में व्याप्त है। उसकी उपस्थिति के संकेत और उसका यथार्थ मानव प्रजाति तक सीमित नहीं है।'
कई बार लगता है कि सुरेश शर्मा का विचार आधुनिक समय में पेगन दृष्टि और आदिवासी जीवन के लगातार अतिक्रमण पर एक तरह का बौद्धिक और मानवीय विलाप है। कम होता है पर होता है जब हम विचार को विलाप की तरह देख और महसूस कर सकते हैं।
यह कहना अपर्याप्त है कि कन्नड़ लेखक, रंगकर्मी और अभिनेता गिरीश कर्नाड की मृत्यु भारतीय रंगजगत, साहित्य जगत और सिनेमा जगत की गहरी क्षति है। इन सभी क्षेत्रों में उनका अवदान असाधारण रूप से उत्कृष्ट था। पर उन्हें याद उनकी सामाजिक सक्रियता, अन्याय, स्वतंत्रता की कटौती के मुखर विरोध और अपने सृजन और विचार में अथक प्रश्नशीलता के लिए भी किया जाएगा। वे कांग्रेसी सरकार में अनेक संस्थानों जैसे संगीत नाटक अकादमी, फि़ल्म इन्स्टीट्यूट, लंदन के नेहरू सेंटर आदि उच्च पदों पर आसीन रहे पर उन्होंने कभी किसी सत्ता का समर्थन नहीं किया और जब-तब अपनी असहमति सशक्त रूप से ज़ाहिर की।
हममें से कई याद कर सकते है कि साठ के दशक में मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर और बादल सरकार के साथ कर्नाड उन नाटककारों में से थे जिन्होंने भारतीय रंगमंच की शिथिल हो गयी प्रश्नवाचकता को उद्दीप्त और सजग करने में मूल्यवान भूमिका निभाई थी। मेरे घनिष्ठ मित्र यूआर अनन्तमूर्ति से, दुर्भाग्यवश, कर्नाड के गहरे मतभेद थे। लेकिन अब दोनों के न रहने से कन्नड़ परिदृश्य बहुत विपन्न हो गया है जैसे कि समूचा भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य भी। (सत्याग्रह)


Date : 17-Jun-2019

-नगीना खान
भारतीय वैज्ञानिक पी.एम. भार्गव अपनी किताब 'देवदूत शैतान और विज्ञान' में लिखते हैं कि  विज्ञान और धर्म के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि जहां विज्ञान अग्रमुखी है यानी आगे की ओर देखता है, वहीं धर्म पश्चमुखी है यानी पीछे की ओर देखता है। उदाहरण के लिए विज्ञान के अनुयायियों के लिए विज्ञान के प्रकाशन जितने आधुनिक होंगे, अद्यतन (अपडेट) होंगे, उतने ही बेहतर माने जाएंगे। जबकि धर्म के अनुयायी जिन शास्त्रों पर निर्भर होते हैं, वे आमतौर पर प्राचीन होते हैं।
 विज्ञान के क्षेत्र में वर्तमान वैज्ञानिकों का सबसे अधिक महत्व होता है, जबकि धर्मक्षेत्र, धर्म के वे संस्थापक सबसे सम्मानित माने जाते हैं जो सुदूर अतीत में कार्यरत रहे हों। विज्ञान के समर्थकों के लिए जो घटनाएं आज घट रही हैं और जो कल घट सकती हैं, उनका सबसे अधिक महत्व है, जबकि धर्म के अनुयायियों के लिए जो अतीत में घटा वही सर्वोपरि है। समय बीतने के साथ विज्ञान की तकनीकों में सुधार और निखार आता जाता है और इस सुधार की प्रेरणा विज्ञान की विधि के बुनियादी ढांचे में ही गुंथी हुई है।
 दूसरी ओर धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांड में समयानुसार बुनियादी तौर पर कोई खास सुधार नजऱ नहीं आता। अगर कुछ परिवर्तन धर्म में होते भी हैं तो धर्म से बाहर के दबाव से होते हैं, जैसे कि स्वयं विज्ञान के दबाव से।
विज्ञान का एक आंतरिक गुण है, प्रश्न पूछने का अधिकार। लोग प्रश्न पूछने के अधिकार का उपयोग करते हैं, उसी से ज्ञान का विस्तार होता है और विज्ञान प्रगति करता है। दूसरी ओर धर्म अपने सिद्धांतों और रूढि़वादी मान्यताओं के बारे में चाहता है कि उन पर कोई सवाल उठाए बिना सब लोग उन्हें स्वीकार कर लें। अगर धर्म पर सवाल उठाया जाए तो केवल किसी बात को समझने के लिए उठाया जा सकता है, शंका या संदेह प्रकट करने के लिए नहीं।
वैज्ञानिक तो किसी अपराध-बोध या संकोच के बिना यह स्वीकार कर सकता है कि 'मैं नहीं जानताÓ। लेकिन कोई धर्मगुरु ऐसा कहे तो उस पर तो पहाड़ ही टूट पड़ेगा। वह तो होता ही है सर्वज्ञ। प्रत्येक धर्म के संस्थापक अतीत कल से ही, ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर देते रहते हैं, जो कि पूछे जा सकते हैं। विज्ञान में तो ऐसा दावा करना आडंबर और विडम्बना माना जाएगा। ऐसा पाखंड धर्म ही दिखा सकता है।
इसीलिए जो देश विज्ञान और वैज्ञानिक अभिवृत्ति को जितना अधिक प्रयोग करते और स्वीकृति देते है वो उतना ही अधिक स्वतंत्र, सर्जनात्मक और विकसित होते जाते हैं और समस्त मानवता का कल्याण करते हैं। जबकि धर्म की तरफ मुडऩे वाले भेदभाव, विद्वेष, हिंसा और आतंक की तरफ बढ़ते जाते हैं। 


Date : 17-Jun-2019

-वुसअतुल्लाह खान
भारत को 89 रन से जीतने के लिए बधाई। रोहित शर्मा को 140 रन की बधाई। वैसे जिस बल्लेबाज ने वनडे इंटरनेशनल में तीन डबल सेंच्युरी खड़काई हों, उसके आगे 140 रन की पारी क्या मुश्किल। दुख बस इतना है कि एक बार जब बारिश शुरू हो ही गई थी तो घंटा-दो घंटा और बरस जाती तो उसका क्या बिगड़ जाता।
मगर जब टाईम खराब चल रहा हो तो सीधा भी उल्टा ही चलता है। जब पाकिस्तान ने 35 ओवर खेल लिए, उसके बाद थोड़ी बारिश का नुकसान ये हुआ डकवर्थ लुई फॉर्मूले के साथ मैच 50 ओवर से घटाकर 40 ओवर का कर दिया गया यानी अगली 20 गेंदों में पाकिस्तान को 130 रन बनाने थे।
इससे ज़्यादा बुरा मजाक और क्या हो सकता है। अब इस मजाक की भरपाई तभी हो पाएगी कि पाकिस्तान, जिसने की अब तक सिर्फ 3 प्वाइंट्स हासिल किए हैं, अगले 4 मैचों में एक भी ना हारे।
इस वक्त ये काम कोहकाफ में देव की कैद में तड़पती राजकुमारी को आजाद करवाने से भी ज़्यादा कठिन लग रहा है। भारत का अगला मैच अफगानिस्तान से और पाकिस्तान का दक्षिण अफ्रीका से है। अब मैं और क्या कहूं!
पर दिल को आखिरी तसल्ली ये है कि 1992 के वर्ल्ड कप में भी पाकिस्तान इसी स्थिति में था लेकिन आखिरी चार मैच जीत कर वो सेमीफाइनल और फिर फाइनल में पहुंच गया। लेकिन ना तो ये 1992 है और ना कप्तान सरफराज अहमद इमरान खान हैं।
इमरान खान जिन्होंने चुनाव से पहले मोदी जी की जीत की भविष्यवाणी की थी, इन्हीं इमरान खान ने मैच शुरू होने से पहले सरफराज को पैगाम भेजा था कि टॉस जीत जाओ तो बैटिंग पहले करना, स्पैशलिस्ट बैट्समैन और गेंदबाजों को पहले खिलाना और रेलू टाइप खिलाडिय़ों को पीछे रखना क्योंकि वो इस मैच का प्रेशर बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे।
मगर सरफराज ने वो सब किया जो मना किया गया था। टॉस जीत कर बैटिंग की बजाय गेंदबाजी ले ली। बैटिंग ऑर्डर भी अपनी मजऱ्ी का ही रखा।
गेंदबाजों ने जी भर के शॉर्ट पिच गेंदे करवाईं। शायद वो रोहित शर्मा का दिल नहीं तोडऩा चाहते थे जिन्हें शॉर्ट पिच गेंदे खेलना बहुत अच्छा लगता है। 
वैसे इमरान खान का मशविरा भी क्या कर लेता। आज तक वल्र्डकप में पाकिस्तान भारत से एक मैच भी नहीं जीत सका। 1992 में भी नहीं जब पाकिस्तान कप जीत कर घर ले आया था।
पर कोई बात नहीं। आएगा, आएगा... अपना टाइम आएगा। (बीबीसी ब्लॉग)


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