विचार / लेख

Previous123Next
Posted Date : 15-Nov-2018
  •  जावेद अनीस
    परम्परागत रूप से मध्यप्रदेश की राजनीति दो ध्रुवीय रही है। अभी तक यहां की राजनीति में कोई तीसरी ताकत उभर नहीं सकी है। हमेशा की तरह आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान भी मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि इस बार यह मुकाबला बहुत करीबी हो सकता है। इसे क्षेत्रीय पार्टियां एक अवसर के तौर पर देख रही हैं। प्रदेश की राजनीति में बसपा, सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे पुराने दल तो पहले से ही सक्रिय हैं लेकिन इस बार कुछ नये खिलाड़ी भी सामने आये हैं जो आगामी चुनाव के दौरान अपना प्रभाव छोड़ सकते हैं। आदिवासी संगठन जयस और मध्यप्रदेश में स्वर्ण आंदोलन की अगुवाई कर रहे सपाक्स  ने आगामी विधानसभा चुनाव लडऩे का ऐलान किया है। मध्यप्रदेश में अपना पहला विधानसभा चुनाव लडऩे जा रही आम आदमी पार्टी भी मैदान में  है।
    जाहिर है इस बार मुकाबला बहुत दिलचस्प और अलग होने जा रहा है क्योंकि ऐसा मान जा रहा है कि किसी एक पार्टी के पक्ष में लहर न होने के कारण हार-जीत तय करने में छोटी पार्टियों की भूमिका अहम रहने वाली है। इसीलिए क्षेत्रीय पार्टियों पूरी आक्रमकता के साथ अपने तेवर दिखा रही हैं जिससे चुनावके बाद वे किंगमेकर की भूमिका में आ सकें।
    कांग्रेस पिछले डेढ़ दशक से मध्यप्रदेश की सत्ता से बाहर है लेकिन इस बार वो पुरानी गलतियों को दोहराना नहीं चाहती है। कांग्रेस पार्टी पूरे जोर-शोर से तैयारियों में जुटी है। कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से पार्टी में कसावट आई है, गुटबाजी भी पहले के मुकाबले कम हुई है लेकिन गुटबाजी अभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, इसी तरह से मध्यप्रदेश में सत्ता के खिलाफ नाराजगी तो है लेकिन अभी तक कांग्रेस इसे अपने पक्ष में तब्दील करने में नाकाम रही है।
    पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा और गोंडवाना गणतंत्र जैसी पार्टियों ने 80 से अधिक सीटों पर 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए। जो कि हार-जीत तय करने के हिसाब से पर्याप्त है। कांग्रेस की अंदरूनी रिपोर्ट भी मानती है कि मध्यप्रदेश के करीब 70 सीटें ऐसी हैं जहां क्षेत्रीय दलों के मैदान में होने कि वजह से कांग्रेस को वोटों का नुकसान होता आया है जिसमें बसपा सबसे आगे है। इसीलिये कांग्रेस की तरफ से बसपा के साथ गठबंधन को लेकर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा था।
    वहीं दूसरी तरफ सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अच्छी तरह से जानती है कि कांग्रेस के हाथों मध्यप्रदेश की सत्ता गंवाना उसके लिये कितना भारी पड़ सकता है। भाजपा के लिये गुजरात के बाद मध्यप्रदेश सबसे बड़ा गढ़ है और कांग्रेस उसे यहां की सत्ता से बेदखल करने में कामयाब हो जाती है तो इसे इसका बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ मिलेगा। पिछले दो चुनाव की तरह मध्यप्रदेश में इस बार बीजेपी के लिए राह आसान दिखाई नहीं दे रही है। इस बार कांग्रेस कड़ी चुनौती पेश करती हुई नजर आ रही है।किसान आंदोलन, गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप तो पहले से ही थे, इधर उसे  सवर्णों की नाराजगी को भी झेलना पड़ रहा है।  पिछले दिनों सवर्णों के गुस्से को देखते हुये शिवराज सिंह ने ऐलान किया था कि  'प्रदेश में बिना जांच के एट्रोसिटी एक्ट के तहत मामले दर्ज नहीं किए जाएंगेÓ लेकिन इससे भी सवर्णों की नाराजगी कम नहीं हुई है उलटे सपाक्स ने सभी सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। अगर चुनाव तक भाजपा  सवर्णों की नाराजगी को शांत नहीं कर पाई तो इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है।
    मध्यप्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं जिनमें से 82 सीटें अनुसूचित जाति, जनजाति के लिये आरक्षित हैं जबकि 148 सामान्य सीटें की है, भाजपा की चिंता इसी 148 सामान्य सीटों को लेकर है जिस पर सपाक्स के आन्दोलन का प्रभाव पड़ सकता है।
    मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड, विंध्य, ग्वालियर-चंबल और उत्तर प्रदेश से लगे जिलों  में बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी का प्रभाव माना जाता है जबकि महाकौशल के जिलों में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का असर है।
    2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी ने 3 सीटें जीती थीं लेकिन इसके बाद से आपसी बिखराव के कारण उसका प्रभाव कम होता गया है। पिछले चुनाव के दौरान उसे करीब 1 प्रतिशत वोट मिले थे।ऐसा माना जाता है कि गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी का अभी भी  शहडोल,अनूपपुर, डिंडोरी, कटनी, बालाघाट और छिंदवाड़ा जिलों के करीब 10 सीटों पर प्रभाव है।
    2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी 8 सीटें जीतकर मध्यप्रदेश की तीसरी सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरी थी। प्रदेश में उसके एक भी विधायक नहीं हैं, पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान सपा को करीब सवा प्रतिशत वोट हासिल हुये थे। बहुजन समाज पार्टी के साथ कांग्रेस, सपा और गोंगपा से भी गठबंधन करना चाहती थी लेकिन इस पर भी अभी तक कोई फैसला नहीं हो सका है। इन सबके बीच सपा और गोंगपा के एक साथ मिलकर चुनाव लडऩे की संभावना बन रही है।
    2013 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। उसके चार प्रत्याशी जीते थे। इस चुनाव में बसपा को करीब 6।29 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि 11 अन्य सीटों पर उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे। इस पर बसपा 15 सीटें जीतकर सत्ता की मध्यप्रदेश में सत्ता की चाभी अपने हाथ में रखने का ख्वाब देख रही है। लेकिन ये आसान नहीं है। इस दौरान पार्टी के कई नेता पार्टी छोड़ चुके हैं जिसका असर आगामी चुनाव में पड़ सकता है। इसी तरह से कांग्रेस के साथ गठबंधन ना होने का नुकसान बसपा को भी उठाना पड़ेगा। बसपा अगर सभी सीटों पर चुनाव लड़ती है तो इसका सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को होगा।
    इन तीनों पार्टियों के वोटबैंक भले ही कम हो लेकिन यह असरदार हैं, इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनका प्रभाव पूरे प्रदेश में बिखरा न होकर कुछ खास जिलों और इलाकों में केंद्रित है। जिसकी वजह से यह पार्टियां अपने प्रभाव क्षेत्र में हार-जीत को प्रभावित करने में सक्षम हैं।
    आम आदमी पार्टी पहली बार मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में उतरने जा रही है। पार्टी काफी पहले ही प्रदेश सभी 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लडऩे की घोषणा कर चुकी है। पार्टी के प्रदेश संयोजक आलोक अग्रवाल को मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किया है। आलोक अग्रवाल लंबे समय से नर्मदा बचाओ आंदोलन में सक्रिय रहे हैं।
     'सपाक्सÓ  और 'जयसÓ जैसे संगठनों ने भी  विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान किया था  सपाक्स ने तो बाकायदा पार्टी बनाकर प्रदेश के सभी सीटों से राजनीति में उतरने का ऐलान कर दिया है जबकि 'जयसÓ के हीरालाल अलावा को कांग्रेस प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद से अब इसके चुनाव लडऩे की संभावाना नहीं है ।
    सपाक्स यानी सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों का संगठन है जो प्रमोशन में आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट के ख़िलाफ आन्दोलन चला रहा है। सपाक्स ने 2 अक्टूबर 2018, गांधी जयंती के मौके पर अपनी नयी पार्टी लॉन्च करते हुए सभी 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान किया है। सपाक्स का सवर्णों और ओबीसी समुदाय के एक बड़े हिस्से पर प्रभाव माना जा रहा है। सपाक्स के नेता हीरालाल त्रिवेदी ने कहा है कि उनके संगठन ने राजनीतिक दल के पंजीयन के लिये चुनाव आयोग में आवेदन किया है। यदि चुनाव से पहले पंजीयन नहीं होता है तो भी सपाक्स पार्टी निर्दलीय उम्मीदवार खड़ा करके चुनाव लड़ेगी। जानकार मानते हैं कि अगर सपाक्स चुनाव लड़ती है तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा हो सकता है। दरअसल इन दिनों मध्यप्रदेश में सपाक्स को मजाक के तौर पर नोटा कहा जा रहा है।
    हालाकि सपाक्स को लेकर दिग्विजय सिंह का एक बयान भी काबिले गौर है जिसमें उन्होंने सपाक्स को भाजपा द्वारा प्रायोजित आंदोलन बताते हुये इसके नेता हीरालाल त्रिवेदी को भाजपा से मिला हुआ बताया था। सपाक्स को लेकर दिग्विजय सिंह की तरह ही कई विश्लेषक भी यह मान रहे हैं कि दरअसल सपाक्स की पूरी कवायद भाजपा पर दबाव डालने की है जिससे अपने लोगों के लिये ज्यादा-ज्यादा टिकट हासिल किया जा सके।
    मध्यप्रदेश का चुनावी इतिहास देखें तो समय-समय पर कई राजनीतिक ताकतें उभरी हैं लेकिन उनका उभार ना तो स्थायी रहा है और ना ही उनमें से कोई पार्टी निर्णायक भूमिका में आ सकी हैं। इसी तरह से मध्यप्रदेश में गठबंधन की राजनीति भी नहीं हुई है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के अलावा किसी भी तीसरे दल के लिये उभरना आसान नहीं है, इसके लिये सिर्फ पार्टी ही काफी नहीं है बल्कि ऐसे नेता और नीति की भी जरूरत है जो प्रदेश स्तर पर मतदाताओं का ध्यान खीच सके। http://www.humsamvet.in/h

     

    ...
  •  


Posted Date : 15-Nov-2018
  • अखिलेश शर्मा
     राजस्थान में खुद को सत्ता के करीब पा रही कांग्रेस किसी तरह का जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं। सचिन पायलट और अशोक गहलोत की महत्वाकांक्षाओं से जूझ रही पार्टी ने अब बीच का रास्ता निकाला है। मध्य प्रदेश के उलट राजस्थान में इन दोनों ही नेताओं को चुनाव लडऩे के लिए कह दिया गया है। जल्दी ही उनके चुनाव क्षेत्रों का ऐलान भी कर दिया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो ये दोनों ही नेता मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में रहेंगे। यानी जो भी घमासान होना है वो चुनाव नतीजे आने के बाद ही होगा। पर एक कोशिश उम्मीदवारों की सूची को लेकर चल रहे घमासान को रोकने की भी दिखती है जो अलग-अलग गुटों के दावेदारों के बीच कुछ इस तरह फंसी है कि अभी तक बाहर ही नहीं आ सकी है। माना जा रहा है कि प्रदेश के सभी ताकतवर नेता अपने-अपने समर्थकों को अधिक से अधिक टिकट दिलवाने में लगे हैं ताकि चुनाव बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी करते समय अपने पक्ष में अधिक विधायकों का समर्थन दिखाया जा सके। इसीलिए बड़ा सवाल यही है कि गहलोत और पायलट को चुनाव लड़ाने से कांग्रेस के लिए राजस्थान में बात सुलझी है या फिर उलझी है? पायलट की सीट पर कौन रहेगा और को पायलट कौन होगा? यह सवाल पूछने पर गहलोत झल्ला जाते हैं। वे कहते हैं कि मीडिया बार-बार यह सवाल पूछती है। लेकिन इंदिरा गांधी के जमाने से ही और आजादी के बाद से ही आज तक कभी भी राजस्थान में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का नाम घोषित नहीं किया गया।
    लेकिन और दिनों के मुकाबले आज गहलोत अधिक आत्मविश्वास से भरे नजऱ आए। उनकी बॉडी लैंग्वेज और बगल में बैठे सचिन पायलट से उनकी गर्मजोशी यह दिखा रही है कि शायद फिलहाल दावेदारी के मुद्दे को किनारे कर चुनाव जीतने पर फोकस लगाने का फैसला किया गया है। उन्हें इस बात का एहसास है कि मीडिया के एक हिस्से में बार-बार उनके और सचिन के बीच टकराव को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता रहा है। इसे राजस्थान कांग्रेस में फूट और गुटबाजी के तौर पर भी पेश किया जाता है। वैसे राहुल गांधी ने ये कोशिश की है कि दोनों को एक साथ रखा और दिखाया जाए। इसीलिए उनके हर राजस्थान दौरे में ये दोनों नेता एक साथ दिखते हैं। अलग से भी उनकी कुछ तस्वीरें बार-बार सामने आती हैं यह दिखाने के लिए कि सब साथ-साथ हैं। आज दोनों नेताओं के चुनाव लडऩे का ऐलान भी हो गया।
    दोनों नेताओं के चुनाव लडऩे का यह फैसला उस दिन घोषित हुआ जिस दिन कांग्रेस ने राजस्थान में बीजेपी का एक बड़ा विकेट गिराया है। दौसा से बीजेपी के सांसद और पूर्व पुलिस महानिदेशक हरीश मीणा आज बीजेपी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हो गए। यह किरोड़ीमल मीणा के बीजेपी के दोबारा साथ आने और उन्हें राज्यसभा भेजने की बीजेपी की रणनीति का जवाब है। हरीश मीणा के भाई और पूर्व केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा कांग्रेस में ताकतवर नेता हैं। हरीश मीणा पिछले लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी में आए थे और अब विधानसभा चुनाव से पहले घर वापसी कर गए।
    बीजेपी के मौजूदा सांसद को तोड़ लेने की खुशी छुपाए नहीं छुपी। गहलोत ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से पूछा कि राजस्थान में मिशन 180 का क्या हुआ? ऐसा क्या हुआ कि अब बीजेपी का कोई नेता इस मिशन की बात नहीं कर रहा है? उन्होंने कहा कि इनका ग्राफ नीचे आ रहा है। एनडीए और मोदी का ग्राफ नीचे आ रहा है। दो लोग राज कर रहे हैं। शाह ने कहा था कि मिशन 180। अब क्या हुआ। अब कोई बीजेपी नेता राजस्थान में मिशन 180 की बात क्यों नहीं कर रहा।
    राजस्थान में कांग्रेस वसुंधरा सरकार की नाकामियों को मुद्दा बना रही है। उसकी कोशिश रोजगार, महंगाई, किसानों की आत्महत्या, रफाल, सीबीआई का दुरुपयोग जैसे मुद्दों को तूल देने की है। उसका आरोप है कि अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए ही बीजेपी और संघ परिवार राम मंदिर का मुद्दा उठा रहे हैं। गहलोत का कहना है कि अचानक राम मंदिर का मुद्दा छेड़ दिया गया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विज्ञान भवन में कहा ये आरएसएस का नहीं बल्कि वीएचपी का मुद्दा है। 
    फिर 15 दिन बाद कहा कानून बनाओ, फिर 15 दिन बाद कहा आंदोलन करेंगे। पूरा देश देख रहा है कि ये क्या हो रहा है। चुनाव आते ही राम मंदिर पर आ गए। तो साफ है कि राजस्थान में कांग्रेस के तेवर न सिर्फ आक्रामक हैं बल्कि वो एकजुट दिखने की कोशिश भी कर रही है। पर क्या वाकई ऐसा है? इसके जवाब के लिए 11 दिसंबर तक इंतजार करना होगा। ं( लेखक एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक हैं) https://khabar.ndtv.com/

     

    ...
  •  


Posted Date : 15-Nov-2018
  • -कुबूल अहमद  
    मिजोरम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता की हैट्रिक लगाने की जुगत में है। जबकि मिजो नेशनल फ्रंट और मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस सत्ता में वापसी के लिए जद्दोजहद कर रही हैं। यही वजह है कि पूर्वोत्तर के इस छोटे से राज्य में इस बार का चुनावी मुकाबला काफी दिलचस्प होता दिख रहा है।
    दस लाख आबादी वाले ईसाई बहुल मिजोरम में राजनीतिक समीकरण उलझे हुए हैं। तीन प्रमुख दलों के अलावा इस बार मिजोरम की क्षेत्रीय पार्टियों ने आपस में गठबंधन किया है।
    पीपुल्स रिप्रजेंटेशन ऑर आइडेंडिटी एंड स्टेट और मिजोरम, सेव मुजोरम फ्रंट एंड ऑपरेशन मिजोरम गठबंधन किया है। इसके साथ ही जोराम राष्ट्रवादी पार्टी और जोराम एक्सोदस मूवमेंट ने हाथ मिलाया है। जबकि बीजेपी अकेले मैदान में है।
    मिजोरम में विधानसभा की 40 सीटों के लिए इस महीने की 28 तारीख को होने वाले चुनावों में बीजेपी की राह आसान नहीं है। यहां मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के तौर पर सहयोगी होने के बावजूद पार्टी अबकी बार अकेले ही चुनाव लड़ रही है।
    फिलहाल राज्य में ललथनहवला के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस 2008 से यहां की सत्ता पर काबिज है। कांग्रेस लगातार तीसरी जीत पर नजर बनाए हुए है। मौजूदाी विधानसभा में कांग्रेस के 34 विधायक हैं जबकि एमएनएफ के पांच और मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस का एक विधायक है।
    कांग्रेस ने 2013 में अपनी सीटों में इजाफा किया था। जबकि 2008 में उसके पास 32 सीटें थीं। लगातार दो बार सत्ता में बने रहने के बाद आंतरिक कलह और सत्ता विरोधी लहर की वजह से कांग्रेस के लिए मिजोरम में मुश्किलें खड़ी होती दिख रही है। कांग्रेस के कई नेता पार्टी का साथ छोड़कर दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं।
    वहीं, बीजेपी इस बार सत्ता हासिल करने के लिए पूरा जोर लगा रही है। हालांकि यहां पर एमएनएफ भी दो बार 1998 और 2003 में सरकार बना चुकी है।
    राज्य की 87 फीसदी आबादी ईसाई है। ऐसे में बीजेपी पर लगा हिंदुत्ववादी का ठप्पा ही उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। इसी मद्देनजर एमएनएफ ने बीजेपी के साथ चुनाव में नहीं उतरी है। मिजोरम में बीजेपी पांच बार चुनाव लडऩे के बावजूद अपना खाता खोलने में नाकाम रही है। लेकिन अबकी पार्टी को इस राज्य से काफी उम्मीदें हैं।
    दरअसल पूर्वोत्तर के चार राज्यों में बीजेपी सत्ता में है और दो में सरकार में साझीदार है। ऐसे में कहीं न कहीं लोगों में उसे लेकर संभावनाएं भी दिख रही हैं। बीते महीने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यहां पार्टी के चुनाव अभियान की शुरुआत की थी।
    मिजोरम में क्षेत्रीय पार्टियां पूरी ताकत से लड़ रही है। अगर राज्य में कांग्रेस बहुमत के आंकड़े को नहीं छु पाता हैं, ऐसे स्थिति में क्षेत्रीय पार्टियों के बिना सरकार बनाना आसान नहीं होगा। (आज तक)

    ...
  •  


Posted Date : 14-Nov-2018
  • एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार
    नवगठित राज्य तेलंगाना 7 दिसंबर को विधानसभा के लिए मतदान करने जा रहा है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने समय से आठ महीने पहले ही इसे भंग कर दिया था, ताकि लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव की नौबत न आए और वे इसे स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित कर सकें। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता और केसीआर नाम से लोकप्रिय के चंद्रशेखर राव ने सोची-समझी रणनीति के तहत दो कयासों के आधार पर यह जोखिम लिया है। पहला यह कि मतदाता उन्हें एक और मौका देंगे, क्योंकि इस सूबे को गठित हुए महज साढ़े चार साल हुए हैं और उन्हें (केसीआर को इसके गठन का श्रेय दिया जाता है) अपना विजन पूरा करने के लिए और समय मिलना चाहिए। दूसरा, उनकी यह आश्वस्ति है कि सामाजिक कल्याण योजनाओं की शृंखला शुरू करने के कारण उन्हें वोटरों का साथ मिलेगा। 
    केसीआर के दांव की सफलता में कोई शक न होता, लेकिन अचानक ही मुकाबले में विपक्षी पार्टियों का महागठबंधन 'महाकुटुंबीÓ आ गया। इस महागठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस कर रही है और इसकी मुख्य ताकत कभी उसकी कट्टर विरोधी रही टीडीपी है। वाम पार्टियां और कोडंदरम द्वारा बनाई गई तेलंगाना जन समिति भी इस संयुक्त मोर्चा की घटक हैं।
    लगता है कि कर्नाटक में भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए चुनाव बाद जिस तरह कांग्रेस और जद (एस) की गठबंधन सरकार बनी, उसने चंद्रबाबू नायडू को प्रेरित किया होगा कि वह तेलंगाना में भी एक ऐसा गठबंधन बनाएं, जिसके बारे में कोई सोच भी न रहा हो। नायडू की टीडीपी की स्थापना 1980 के दशक में उनके ससुर एनटी रामा राव ने की थी और इसका मुख्य उद्देश्य उस 'अहंकारी कांग्रेसÓ को सबक सिखाना था, जिसने 'तेलुगु अस्मिता को चोट पहुंचाई थीÓ। मगर अब करीब चार दशक के बाद नायडू, केसीआर को हराने के लिए उसी कांग्रेस से हाथ मिला चुके हैं।
    एक लोकप्रिय कहावत है कि राजनीति में कोई स्थाई मित्र या दुश्मन नहीं होता, लेकिन तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के मामले में इन दोनों कद्दावर नेताओं, नायडू और केसीआर के बीच गहरे मतभेद हैं। दोनों नेता आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद से ही एक-दूसरे को चोट पहुंचाने में जुटे हुए हैं। हालांकि नायडू विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रहे, पर उनकी किस्मत ऊपर-नीचे भी खूब होती रही है। उन्होंने भव्य योजनाएं बनाई थीं, जिसमें सूबे के लिए एक नई विश्व स्तरीय राजधानी अमरावती भी शामिल थी। उन्हें भरोसा था कि इसके लिए केंद्र उन्हें अच्छी-खासी मदद देगा। दूसरी तरफ, तेलंगाना के गठन के बाद से अपने 'सरप्लसÓ बजट के साथ केसीआर ने लोक-कल्याण के कई कार्यक्रम शुरू किए और अपना राजनीतिक आधार मजबूत बनाया। वास्तव में, केसीआर को यह उम्मीद थी कि वह भाजपा और कांग्रेस को दूर रखते हुए एक फेडरल फ्रंट का नेतृत्व करेंगे, जो केंद्र में सरकार बनाएगी। मगर केंद्र से आंध्र प्रदेश के लिए विशेष राज्य का दर्जा पाने में विफल रहने वाले नायडू ने एनडीए से नाता तोड़ लिया। अब वह विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं, जिसमें कांग्रेस भी शामिल है। 
    भले ही नायडू ने पूरा जोर लगा रखा हो, मगर यह देखा जाना अभी बाकी है कि यह कोशिश कांग्रेस पार्टी के लिए तेलंगाना में, आंध्र प्रदेश में और फिर राष्ट्रीय स्तर पर कितनी सफल होगी? पहली नजर में तो यही लगता है कि कांग्रेस और टीडीपी के साथ आने से विधानसभा चुनावों में उनके वोट बढऩे चाहिए। मगर चूंकि राजनीति कोई अंकगणित नहीं है, इसलिए आलोचकों का कहना है कि यह समझौता कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकता है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि टीआरएस और भाजपा, दोनों के लिए नायडू सियासी दुश्मन हैं। 
    दोनों ही कांग्रेस के साथ 'अनैतिकÓ गठबंधन बनाने के लिए नायडू की ही आलोचना कर रहे हैं। टीआरएस नेताओं का तो यह भी कहना है कि आखिर वह पार्टी (टीडीपी) कैसे वोट मांग सकती है, जो खुलकर यहां के विकास का विरोध करती रही हो? कांग्रेस ने इसका कोई मुखर जवाब अभी तक नहीं दिया है। जहां तक आंध्र प्रदेश का सवाल है, तो वहां विधानसभा चुनाव 2019 में लोकसभा चुनावों के साथ होंगे। नायडू के लिए यह एक मौका है कि वह आंध्र के लिए कोई भी फैसला लेने से पहले तेलंगाना में कांग्रेस के साथ चुनाव में उतरने से हासिल नतीजों का गुणा-भाग कर सकें। रही बात राष्ट्रीय राजनीति की, तो भाजपा जैसे प्रतिद्वंद्वी से टकराने के लिए कांग्रेस और टीडीपी, दोनों के लिए साथ-साथ आगे बढऩा ही संभवत: सबसे अच्छा विकल्प होगा।
    तेलंगाना में मुस्लिम वोटों को सुरक्षित करने के लिए केसीआर ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ गठबंधन किया है, जबकि भाजपा के साथ चुनाव बाद गठबंधन का विकल्प खुला रखा गया है। भाजपा ने भी यही घोषणा की है कि वह अकेली चुनाव में उतरेगी और हरियाणा की तरह सूबाई सियासत में नई ईबारत लिखेगी, मगर तेलंगाना में हालात हरियाणा जैसे नहीं हैं। संसदीय चुनावों का सामना करने के लिए पार्टी को साफ तौर पर टीआरएस जैसे क्षेत्रीय दलों की जरूरत है। 
    देखा जाए, तो तेलंगाना का चुनाव दो विचारों की जंग है- पहले के खेवनहार क्षेत्रीय विकास के साथ केसीआर हैं और जिसे भाजपा का मूक समर्थन हासिल है। दूसरा है महागठबंधन, जो केंद्र में कांग्रेस की वापसी करा सकता है। कर्नाटक के उलट, तेलंगाना में कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा नहीं है। वैसे, गठबंधन का नेतृत्व उसी के हाथों में होगा, पर चुनावी नतीजा बड़े पैमाने पर इस पर निर्भर करेगा कि केसीआर व नायडू के बीच छद्म युद्ध किस तरह लड़ा जाता है?
    बहरहाल, अभी केसीआर लीड लेते दिख रहे हैं। कांग्रेस अब भी राज्य में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है। वह सत्ता-विरोधी रुझान और गठबंधन की ताकत में ही अपने लिए उम्मीद देख सकती है। केसीआर ने बड़ी चालाकी से समय-पूर्व चुनाव का दांव खेलकर कांग्रेस और भाजपा, दोनों से यह मौका छीन लिया है कि वे चुनावी जंग को राष्ट्रीय मुकाम पर ले जाएं। 
    हालांकि केसीआर की पहली चुनौती यही होगी कि वह एक बार फिर उत्तरी तेलंगाना में फतह करें, जिसने कुल 54 सीटों में से 45 सीटें उनकी झोली में दी थी और साल 2014 में बहुमत तक पहुंचाया था।  https://www.livehindustan.com/

    ...
  •  


Posted Date : 14-Nov-2018
  • प्रो. सतीश कुमार, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा
    श्रीलंका में आगामी पांच जनवरी, 2019 को संसदीय चुनाव होगा और 19 जनवरी तक नये संसद की बैठक बुलायी जाएगी, जिसमें नये प्रधानमंत्री का चयन होगा। श्रीलंका की राजनीति में आंतरिक राजनीतिक कलह कम और बाहरी प्रभाव ज्यादा सक्रिय है।  इसमें द्वंद्व भारत और चीन के बीच प्रभाव को लेकर है। श्रीलंका में 2015 से नये प्रधानमंत्री द्वारा कुछ ऐसे कदम उठाये गये, जिससे चीन की निष्कंटक विस्तार पर अंकुश लगा था। संभवत: चीन इससे बेचैन था। राष्ट्रपति सिरिसेना और प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे के बीच 2015 में राजनीतिक सूत्र बने थे, जो भारत के अनुकूल था। 
    चीन को लगने लगा कि यह गठबंधन उसके भावी योजनाओं पर भी प्रश्न उठाएगा, इसलिए इस गठबंधन की राजनीति को तोडऩा जरूरी है। इस पहल में चीन के पसंदीदा नेता पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे थे। उनके जरिये चीन ने श्रीलंका के लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया। पिछले कुछ महीनों से जो कुछ हो रहा है, वह आंतरिक नीतियों की वजह से कम और बाहरी प्रभाव से ज्यादा हो रहा है। अब चुनौती भारत के सामने है कि श्रीलंका की बेतरतीब व्यवस्था को वह अपने पक्ष में कैसे मोड़े। भारत के लिए श्रीलंका एक ऐसा सेतु है, जहां पर विदेशी ताकतों का ध्रुवीकरण खुद श्रीलंका के लिए भी असुरक्षा का कारण बन सकता है। 
    श्रीलंका मूलत: चीन की जाल में पूरी तरह फंस चुका है। राजपक्षे और सिरिसेना के बीच में नाटकीय संधि मिलन भी चीन की चाल बताता है। साल 2016 में नेपाल में भी दो विरोधी साम्यवादी गुटों को एक करने में चीन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी, जब प्रचंड और ओली आपस में मिलकर चुनाव लड़े थे और सत्ता पर काबिज हुए थे। उसके बाद से चीन की पहुंच नेपाल में और तेज हो गयी थी। ठीक वही फॉर्मूला श्रीलंका में भी चीन चला रहा है। चीन की कंपनी ने श्रीलंका में 1.5 अरब डॉलर के खर्च से एक नये कमर्शियल डिस्ट्रिक्ट का निर्माण किया है। हम्बनटोटा बंदरगाह भी चीन की गिरफ्त में है। चीन इसका उपयोग कमर्शियल चीजों के लिए करना चाहता है, लेकिन जैसे-जैसे चीन की कर्ज-जाल श्रीलंका को फांसता जा रहा है, उसमें इस बंदरगाह का प्रयोग सैनिक रूप में होना तय है। भारत के लिए यहीं से समस्या शुरू होती है। 
    साल 1978 में संवैधानिक परिवर्तन द्वारा श्रीलंका में राष्ट्रपति शासन व्यवस्था की नींव रखी गयी। इसके पहले प्रधानमंत्री ही शासन का प्रमुख होता था। साल 1978 के बाद राष्ट्रपति ही देश और सरकार दोनों का प्रमुख बन गया। 
    वह तीनों सेनाओं का भी प्रमुख है। श्रीलंका में जनता द्वारा ही राष्ट्रपति  चयनित होता है। उसका कार्यकाल पांच वर्षों का होता है और वह दो बार चुना जा सकता है। प्रधानमंत्री की राजनीतिक हैसियत राष्ट्रपति के सहयोगी के रूप में होती है। वह राष्ट्रपति के बाद दूसरे पायदान पर होता है। किसी कारणवश राष्ट्रपति  हटता है, तो नये राष्ट्रपति  की नियुक्ति तक प्रधानमंत्री ही राष्ट्रपति की भूमिका में होता है।  राजपक्षे श्रीलंका के सबसे पसंदीदा राजनेता हैं। साल 2005 से 2014 तक वह राष्ट्रपति  रहे। विगत तीस वर्षों से श्रीलंका के गृह युद्ध को खत्म करने का काम भी राजपक्षे ने ही किया। लेकिन, उनके कार्यकाल में नरसंहार भी जमकर हुआ। राजपक्षे की शासन व्यवस्था पर अधिनायकवादी त्रासदी का भी आरोप था।
    देश की संस्थाओं को तोड़ा-मरोड़ा गया, भाई-भतीजावाद की शुरुआत हुई। बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को पनपने के मौके मिले। चीन की विभिन्न परियोजनाओं में राजपक्षे सरकार ने खूब कमाया। राजपक्षे के कार्यकाल में सिरिसेना एक मंत्री होते थे। उनका मुख्य राजनीतिक उद्देश्य राजपक्षे द्वारा किये गये नरसंहार में संलिप्त दोषियों की शिनाख्त करना और उन्हें सजा दिलवाना था। दूसरा आयाम था चीनी हस्तक्षेप पर शिकंजा कसना। एक दिन अचानक संसद में राष्ट्रपति  द्वारा घोषणा कर दी गयी कि देश के नये प्रधानमंत्री राजपक्षे होंगे। बिना संसद में बहुमत सिद्ध करने का मौका दिये विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से नाटकीय ढंग से हटा दिया गया। प्रश्न उठता है कि क्या राष्ट्रपति ऐसा करने में संवैधानिक रूप से सक्षम हैं? 
    इसका उत्तर कठिन है। साल 2015 में 19वें संविधान संशोधन द्वारा यह तय किया गया था कि राष्ट्रपति  पांच वर्ष के पहले प्रधानमंत्री को बर्खास्त नहीं कर सकता। संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की स्थिति या स्वयं पद छोडऩे की स्थिति में ही राष्ट्रपति  किसी और को प्रधानमंत्री बना सकता है। लेकिन हुआ कुछ और। अब अगला निर्णय 16 नवंबर को होगा। विक्रमसिंघे के पास 106 सांसद हैं, राजपक्षे के साथ 95। बहुमत के लिए 113 सांसद चाहिए। प्रधानमंत्री चाहे राजपक्षे बनें या विक्रमसिंघे, यह तय है कि श्रीलंका की राजनीति कुत्सित हो गयी है, संवैधानिक संस्थाएं पंगु हो चुकी हैं और लोकतंत्र संकट में है। 
    दक्षिण एशिया के देशों के राजनीतिक ढांचे को तोडऩे का काम चीन कर रहा है। चीन की चाल का अहम आयाम लोकतंत्र को बनाना रिपब्लिक बना देना है, जहां सब कुछ पैसे के दम पर किया जा सके। वह पाकिस्तान को पूरी तरफ से अपने कब्जे में कर चुका है। नेपाल ओली के कार्यकाल में चीन की धुन पर नाच रहा है। अब श्रीलंका में भारत विरोधी परिवर्तन चीन के इशारे पर हो रहा है। मालदीव पहले से खतरे में है। भारत सरकार को चीन के जाल की काट खोजनी होगी। www.prabhatkhabar.com/

    ...
  •  


Posted Date : 14-Nov-2018
  • प्रभात उपाध्याय
    आज देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है। एक तरफ, पीएम मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए आजादी की लड़ाई में उनकी भूमिका और बतौर प्रथम प्रधानमंत्री देश के विकास में योगदान के लिए याद किया है। तो दूसरी तरफ, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मौजूदा सरकार पर नेहरू की विरासत को कमतर करने का आरोप लगाया है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब जवाहरलाल नेहरू की विरासत को लेकर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने हों। 
    एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हों। यह सिलसिला लंबे वक्त से चलता आ रहा है। विपक्ष के तमाम नेता जवाहरलाल नेहरू  के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े मसलों पर प्रश्न तो उठाते ही रहे हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएन) में ले जाने और चीन के साथ युद्ध में पराजय को लेकर उन पर निशाना साधते रहे हैं। यह आरोप भी लगता रहा है कि चीन को लेकर नेहरू नरम रुख (सॉफ्ट कॉर्नर) रखते थे। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि 1962 के युद्ध में चीन से पराजय के बाद जवाहरलाल नेहरू ने कड़ी प्रतिक्रिया दी, जो उनकी छवि और तमाम आरोपों से उलट थी।  1962 के युद्ध में चीन से हार के बाद जवाहरलाल नेहरू  की वैश्विक स्तर पर छवि कमजोर तो हुई ही। देश की सियासत में उनकी छवि पर भी बुरा असर पड़ा। विपक्ष पूरी तरह हमलावर था। हार के साल भर बाद अंतत: नेहरू ने अपनी चुप्पी तोड़ी। 
    विख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब इंडिया आफ्टर गांधी में लिखते हैं, जून 1963 में नेहरू ने एक प्रेस कांफ्रेंस की।  वह पिछले कई महीनों में पहली बार प्रेस के सामने आ रहे थे। और जब नेहरू ने बोलना शुरू किया तो करीब डेढ़ घंटे बोलते रहे। प्रेस कांफ्रेंस में चीनी प्रधानमंत्री के प्रति उन्होंने अपनी भड़ास जमकर निकाली। हार पर नेहरू ने कहा, च्चीन एक सैनिक मानसिकता का राष्ट्र है जो हमेशा सैन्य साजो-सामान को मजबूत करने पर जोर देता है। यह उनके अतीत के गृहयुद्ध की ही एक निरंतरता है। इसलिए आमतौर पर वे मजबूत स्थिति में हैंज्। नेहरू ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में विपक्षी नेताओ पर भी निशाना साधा और यहां तक कह डाला कि हमारे विपक्षी नेताओं की आदत है कि वे बिना किसी सिद्धांत के हर किसी से गठजोड़ कर लेते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि वे चीनियों से गठजोड़ कर लें।
    जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में विपक्षी नेताओं के गठजोड़ का जि़क्र किया था और कुछ दिनों बाद हुआ भी वैसा ही। विपक्ष के तमाम नेताओं ने नेहरू के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। जिसमें मीनू मसानी, जेबी कृपलानी और राम मनोहर लोहिया जैसे कद्दावर नेता शामिल थे। नेहरू सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया। बकौल रामचंद्र गुहा, यह एक ऐसा कदम था जिसकी आजादी के बाद से नवंबर 1962 तक किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। हालांकि सरकार के पास पर्याप्त बहुमत था और सरकार पर किसी तरह का खतरा नहीं था, लेकिन विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर बहस देखने लायक थी। बहस 4 दिनों तक चलती रही और कांग्रेस सरकार पर एक के बाद एक आरोप लगे।  (एनडीटीवी)

    ...
  •  


Posted Date : 13-Nov-2018
  •  नवीन जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
    हमारे देश में राजनीतिक दलों का पलटी मारना कोई नई बात नहीं है। मुलायम सिंह यादव से लेकर नीतीश कुमार तक और ममता बनर्जी से लेकर जयललिता तक कई बार आश्चर्यजनक रूप से पैंतरे बदलते रहे हैं।   बिल्कुल हाल में चंद्रबाबू नायडू का कांग्रेस से तालमेल करना कुछ  ज्यादा ही चौंका गया। वर्ष 1982 में जब 'तेलुगु देशम पार्टीÓ (टीडीपी) बनाकर लोकप्रिय अभिनेता से राजनेता बने एनटी रामाराव ने राजनीति में कदम रखा था, तो तेलुगू-स्वाभिमान को कुचलने और आंध्र प्रदेश के साथ लगातार अन्याय करने के लिए कांग्रेस को सबसे बड़ा शत्रु घोषित किया था। बाद में उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने बगावत करके टीडीपी पर अपना कब्जा जमाया, तब भी तेलुगू-स्वाभिमान और आंध्र-गौरव की अलख जगाये रखते हुए कांग्रेस और सोनिया गांधी पर कड़े प्रहार करना जारी रखा। उनका पूरा अस्तित्व कांग्रेस-विरोध पर टिका हुआ था।
     आज वही नायडू न केवल तेलंगाना का चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन करके लड़ रहे हैं, बल्कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस को केंद्र में रखकर विपक्षी एकता की मुहिम छेड़े हुए हैं। याद रहे कि टीडीपी पिछले चार साल तक एनडीए की सहयोगी और मोदी सरकार में भागीदार रही। इससे स्पष्ट है कि भाजपा से उनकी बड़ी नाराजगी है।   उनका आरोप है कि आंध्र प्रदेश के साथ जो छल-कपट पहले कभी कांग्रेस करती थी, वही अब भाजपा कर रही है। कांग्रेस को हमने सजा दे दी, पिछले लोकसभा चुनाव में उसे एक सीट नहीं मिली। अब भाजपा को सजा देने का समय आ गया है।
     नायडू ने पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, बसपा प्रमुख मायावती, सपा-बुजुर्ग मुलायम सिंह यादव, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, द्रमुक नेता स्टालिन, जनता दल (सेक्युलर) के देवगौड़ा और कुमारस्वामी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल और नेशनल कांफ्रेंस के फारूख अब्दुल्ला से मुलाकात की है। 
     ममता बनर्जी से भी वे संपर्क में हैं। आनेवाले दिनों में वे दिल्ली में विपक्षी नेताओं की बैठक बुला रहे हैं। उन्होंने साफ कहा है कि 2019 में मिलकर नरेंद्र मोदी को हराने के लिए विपक्षी एकता जरूरी है। कांग्रेस के बारे में वे कह रहे हैं कि विपक्षी एकता के जहाज का लंगर वही बन सकती है, भले ही हमारे उससे मतभेद रहे हों। यह भी उन्होंने साफ कर दिया है कि वे गठबंधन के नेता होने के दावेदार नहीं, बल्कि भाजपा विरोधी दलों को एक करने में सहायक होना चाहते हैं।   तो, क्या चंद्रबाबू नायडू विपक्षी एकता के वह नाविक बन सकते हैं, जो तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद भाजपा-विरोधी दलों को एक साथ खे सके? जब-जब केंद्र में सत्तारूढ़ मजबूत दल एवं नेता को हराने की जरूरत पड़ी, विरोधी दलों को एकजुट करने के लिए एक मध्यस्थ की भूमिका महत्वपूर्ण हुई। कभी यह काम जेपी ने किया, तो कभी हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे मंजे नेता ने। साल 2019 में यह भूमिका निभाने के लिए नायडू की राह आसान नहीं होगी, हालांकि उन्हें गठबंधनों को बनवाने-चलवाने का अनुभव है। 
     आंध्र के नवाचारी और विकासधर्मी मुख्यमंत्री के रूप में नायडू की देशव्यापी पहचान है। सूचना प्रोद्योगिकी के विकास और शासन-प्रशासन में उसके सार्थक उपयोग शुरू करने का श्रेय भी उन्हें है। वर्ष 1996 और 1997 में केंद्र में संयुक्त मोर्चा की तथा 1999 में एनडीए की सरकार बनवाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन दिनों उन्हें 'किंगमेकरÓ नाम से जाना गया था। क्या एक बार फिर वे उस भूमिका को सफलतापूर्वक निभा पायेंगे?
     बीते 27 अक्तूबर को मायावती से मिलकर ही नायडू को अनुभव हो गया होगा कि इस बार की राह बहुत कठिन होनेवाली है। ममता बनर्जी से मिलकर भी उन्हें ऐसा ही लगे, तो आश्चर्य नहीं। हालांकि, दोनों ही नेत्री अभी मोदी सरकार के बहुत खिलाफ हैं, लेकिन उनकी अपनी शर्तें हैं और महत्वाकांक्षाएं भी। 
     मायावती ने नायडू को किसी तरह का आश्वासन नहीं दिया। उल्टे, अजित जोगी ने मायावती को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन घोषित कर नायडू की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मायावती और अजित जोगी छत्तीसगढ़ में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। उधर, ममता बनर्जी ने बहुत पहले से जनवरी 2019 में कोलकाता में भाजपा-विरोधी दलों की बड़ी रैली करने का ऐलान कर रखा है। इसमें वे कांग्रेस से लेकर बसपा तक को बुला रही हैं। जाहिर है, उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। 
     नायडू की पहली बड़ी बाधा यही है कि नेता का नाम पहले तय करके कोई मोर्चा बनाना लगभग असंभव होगा। दूसरी बड़ी समस्या नायडू का कांग्रेस को विपक्षी एकता का लंगर घोषित करना बनेगी। भाजपा-विरोधी कई दल और नेता हैं, जो कांग्रेस को साथ लेने पर भले राजी हो जाएं, उसे एकता की धुरी बनाने के नाम पर बिदक जाएंगे  नायडू का एक फॉर्मूला काम कर सकता है। दिल्ली में राहुल समेत कुछ बड़े नेताओं से मिलने के बाद उन्होंने जो कहा, उससे इस फॉर्मूले के संकेत मिलते हैं। 
    उनका कहना है कि ममता बनर्जी बंगाल में, स्टालिन तमिलनाडु में, देवगौड़ा कर्नाटक में, मायावती-अखिलेश उत्तर प्रदेश में, शरद पवार महाराष्ट्र में, अब्दुल्ला कश्मीर में और वे खुद आंध्र एवं तेलंगाना में मजबूत हैं।  इसमें बिहार में लालू यादव की पार्टी को जोड़ा जा सकता है। यानी क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत भाजपा-विरोधी दलों को अपने-अपने राज्यों में मिलकर लड़ाया जाये। और जहां भाजपा से कांग्रेस की सीधी टक्कर है, वहां कांग्रेस का साथ दिया जाए। इस तरह राज्यवार अलग-अलग रणनीति से ही भाजपा को हराया जा सकता है। गठबंधन के नेता का सवाल चुनाव बाद के लिए छोड़ दिया जाये।
     नायडू शायद इसी सूत्र पर काम कर रहे हैं। वे भाजपा-विरोध को एकता की डोर बना रहे हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि देश में इस समय दो ही प्लेटफॉर्म हैं। एक, भाजपा और दूसरा, भाजपा-विरोधी। जो हमारे साथ नहीं है, वह भाजपा के साथ माना जाएगा। भाजपा को हराने को नायडू 'देश को बचानाÓ मान रहे हैं।  आम चुनाव में भाजपा को हराने की अनिवार्यता अनुभव करने के बाद भी कई क्षेत्रीय क्षत्रपों की दूसरी भी प्राथमिकताएं हैं। गठबंधन के सहारे कांग्रेस पुनर्जीवित हुई, तो कई क्षेत्रीय दल उसे अपने लिए खतरा मानते हैं। इसलिए अपना राजनीतिक मैदान बचाये रखना भी उनकी प्राथमिकता है। चूंकि तत्काल बड़ा खतरा भाजपा दिख रही है, इसलिए नायडू की मुहिम आगे बढ़ सकती है। https://www.prabhatkhabar.com/

    ...
  •  


Posted Date : 13-Nov-2018
  • बिलाल एम जाफऱी 
    कश्मीर पर सरकार के रवैये से उमर अब्दुल्ला खासे नाराज हैं उन्होंने तालिबान के साथ वार्ता करने पर मोदी सरकार पर सवालिया निशान लगाए हैं। उमर ने सरकार से पूछा है कि जब सरकार अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के लिए तालिबान के साथ बातचीत कर सकती है तो फिर वो अब तक कश्मीर के मसले पर क्यों खामोशी अख्तियार किए हुए है। तालिबान के साथ भारत सरकार की वार्ता पर उमर का मत है कि तालिबान से बात करने से बेहतर है कि सरकार घाटी के अलगाववादी नेताओं से बात कर उनकी समस्याओं का निवारण कर घाटी में शांति स्थापित करने में मदद करे।
    उमर चाहते हैं कि तालिबान से बात करने से पहले सरकार घाटी के अलगाववादी नेताओं से बात करे उमर के इस सवाल को देखकर कहना गलत नहीं है कि इस सरकार ने भारत सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ज्ञात हो कि भारत ने मॉस्को में होने वाली एक मीटिंग में तालिबान के साथ गैर-आधिकारिक तौर पर वार्ता का आमंत्रण स्वीकार किया है।
    यदि इस मसले पर हम उमर अब्दुल्ला के ट्वीट का अवलोकन करें तो मिल रहा है कि उन्होंने सरकार से पूछा है कि अगर भारत, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी संगठन घोषित तालिबान के साथ पहली बार वार्ता कर सकता है तो फिर वह जम्मू कश्मीर के मसले पर इसी तरह की वार्ता की मांग को अनसुना क्यों कर देता है। उमर ने सरकार की कार्यप्रणाली पर अंगुली उठाते हुए यह भी पूछा है कि जम्मू कश्मीर में अलगाववादियों के साथ गैर-आधिकारिक वार्ता करने में उसे क्या परेशानी है?
    उमर का मानना है कि कश्मीर में जारी संघर्ष भी अफगानिस्तान से मिलता जुलता है। उमर ने सवाल उठाया है कि मोदी सरकार तालिबान के साथ गैर-आधिकारिक वार्ता में शामिल होना चाहती है लेकिन हर बार अलगाववादियों के साथ बातचीत करने से साफ इनकार कर देती है। ध्यान रहे कि इस वार्ता पर विदेश मंत्रालय का तर्क है कि वार्ता पूर्ण रूप से गैर आधिकारिक स्तर की है और इसमें मंत्रलाय की तरफ से कोई भी अधिकारी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराएगा।
    गौरतलब है कि अफगानिस्तान में शांति कायम करने के उद्देश्य से रूस इस वार्ता की मेजबानी कर रहा है। रूस की तरफ से अमेरिका, पाकिस्तान और चीन समेत भारत को भी इसका आमंत्रण दिया गया है।
    इस पूरे मामले में हम भी उमर की बात से सहमत हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि लगातार मोदी सरकार द्वारा घाटी के अलगाववादी नेताओं को सिरे से खारिज किया जा रहा है। ऐसे में यदि कल अलगाववादी नेताओं का कोई समूह यूएन या अन्य किसी मंच पर ये मुद्दा उठाए कि मोदी सरकार उससे बात करने के लिए अब तक सामने नहीं आई है तो इससे और कुछ नहीं बस सरकार की किरकिरी होगी।
    भले ही भारत वहां पाकिस्तान पर दबदबा स्थापित करने के उद्देश्य से जा रहा हो। मगर वहां जाने से पहले उसे सोचना होगा कि दूसरों की समस्या सुनने से बेहतर है कि पहले वो अपने देश की समस्याओं का संज्ञान ले और उनका निवारण करने के भरसक प्रयास करे। https://www.ichowk.in/

    ...
  •  


Posted Date : 13-Nov-2018
  • मॉर्गन मीकर/वीसी
    म्यांमार में एक बौद्ध महिला ने दो मुस्लिम पुरुषों पर बलात्कार का आरोप लगाया और पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई। एक स्थानीय भिक्षु ने यह जानकारी फेसबुक पर पोस्ट की और जल्द ही वहां हिंसा भड़क गई। अगले दो दिन तक मंडाले शहर में बहुसंख्यक बौद्ध और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के बीच हिंसक टकराव होता रहा जिसमें दो लोगों की जान भी चली गई और 19 अन्य घायल हो गए। स्थानीय प्रशासन शांति कायम करने में तब कामयाब हुआ जब मंडाले शहर में फेसबुक को अस्थाई रूप से ब्लॉक कर दिया गया।
    बाद में पता चला कि जो कहानी फेसबुक पर चलाई गई थी, वह सच नहीं थी। इस मामले में पांच लोगों को अफवाह फैलाने का दोषी पाया गया जिसमें कथित रेप पीडि़ता भी शामिल थी। बाद में उसने बताया कि थाने में रेप की रिपोर्ट लिखवाने के लिए उसे पैसे दिए गए थे। यह 2014 का मामला है और यह बताता है कि कैसे झूठी अफवाहों के चलते असल जिंदगी पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
    पिछले साल करीब सात लाख रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार छोड़कर जाना पड़ा है। माना जा रहा है कि फेसबुक ने इस जातीय हिंसा को बढ़ावा देने के लिए पृष्ठभूमि प्रदान की। एक रिपोर्ट के मुताबिक म्यांमार में अल्पसंख्यकों ने फेसबुक का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए किया।एक गैर सरकारी संस्था की ओर से प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक सोशल मीडिया का इस्तेमाल तथ्यों और सूचनाओं को तोडऩे-मरोडऩे के लिए किया जा सकता है, जो बदले में विभिन्न समूहों के बीच हिंसा का कारण बन सकता है। सोशल मीडिया भले ही इस तरह के भेदभाव को इजाद ना करे, लेकिन जिस तरह से प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भावनात्मक सामग्री को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, वे मौजूदा पूर्वाग्रहों को बढ़ा सकते हैं। सोशल मीडिया से प्रेरित हिंसा उन देशों के लिए अनोखी नहीं है, जहां सालों से इंटरनेट पर सेंसरशिप रही है। इसके अलावा इंटरनेट पर गलत सूचना की वजह से श्रीलंका, इंडोनेशिया, भारत, मेक्सिको, अमेरिका और जर्मनी में भी हिंसक घटनाएं हुई हैं।ब्रिटेन की वॉरविक यूनिवर्सिटी में एक अध्ययन के जरिए जर्मनी में 2015 से 2017 के बीच हुए हर शरणार्थी विरोधी हमले की पड़ताल की गई। मालूम चला कि शरणार्थियों के खिलाफ अपराध उन क्षेत्रों में होने की संभावना अधिक थी, जहां फेसबुक का इस्तेमाल अधिक किया जा रहा था। यह भी पाया गया कि कभी-कभी जब धुर दक्षिणपंथी दल अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी अपने फेसबुक पेज पर शरणार्थियों के खिलाफ पोस्ट लिखता था, तो अपराध में बढ़ोतरी होती थी। शिक्षाविद यह कहने में सावधानी बरत रहे हैं कि कट्टरपंथी सामग्री पोस्ट करने, शेयर करने या उपभोग करने वाला विशाल समूह कभी अपराध नहीं करेगा। लेकिन बढ़ते सबूत हैं कि कुछ लोग अफवाहों और गलत सूचनाओं से इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि वे प्रतिक्रिया देने पर मजबूर हो जाते हैं। ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता भरत गणेश इन अफवाहों को दक्षिणपंथी गुटों से जोड़ कर देखते हैं। उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, उन्होंने ऑनलाइन ऐसा नेटवर्क बनाया है जिसमें नफरत और लोगों में इंसानियत खत्म करना स्वीकार्य है। वह आगे कहते हैं, इस तरह की भाषा को विश्वसनीय बनाना वास्तव में एक ऐसा माहौल तैयार करना है जहां विशेष समुदायों के खिलाफ घृणा और हिंसा वैध हो। अगस्त 2018 में ट्विटर और फेसबुक पर फैली झूठी अफवाहों की वजह से जर्मनी के खेमनित्स शहर में करीब छह हजार लोग प्रदर्शनों में शामिल हुए।
    शोधकर्ताओं का मानना है कि जिस तरह से सोशल मीडिया कंपनियां काम करती हैं, उससे अफवाहों को बढ़ावा मिलता है। लोगों को अपनी साइट पर लंबे समय तक रोके रखने के लिए फेसबुक और यूट्यूब ऐसे एल्गोरिदम का इस्तेमाल करती हैं, जिससे यूजर के सामने ऐसी पोस्ट आती है, जिससे वह सहमत हो। इसे फिल्टर बबल कहा जाता है। 
    विचारधारा के बुलबुले में फंसे यूजर्स ऐसी सामग्री देखते हैं, जहां उनके विचारों को कभी चुनौती नहीं दी जाती है। कॉनराड आडेनाउअर फाउंडेशन से जुड़ी आतंकवाद विरोधी सलाहकार लिंडा श्लेगल कहती हैं कि इस तरह का बुलबुला डिजिटाइज्ड आतंकवादियों को जन्म दे सकता है। उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, वे कट्टरता को बढ़ावा दे सकते हैं। अगर चरमपंथी दृष्टिकोण है, तो उसे बार-बार सत्य के रूप में सूचित किया जाता है। विचारधारा के बुलबुले में फंसे यूजर्स ऐसी सामग्री देखते हैं, जहां उनके विचारों को कभी चुनौती नहीं दी जाती है। कॉनराड आडेनाउअर फाउंडेशन से जुड़ी आतंकवाद विरोधी सलाहकार लिंडा श्लेगल कहती हैं कि इस तरह का बुलबुला डिजिटाइज्ड आतंकवादियों को जन्म दे सकता है। उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, वे कट्टरता को बढ़ावा दे सकते हैं। अगर चरमपंथी दृष्टिकोण है, तो उसे बार-बार सत्य के रूप में सूचित किया जाता है।
    यूट्यूब के एल्गोरिदम के लिए बतौर इंजीनियर काम कर चुके गीऑम शासलॉट मानते हैं कि फिल्टर बबल का लोगों में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे निपटने के लिए उन्होंने 2016 में एल्गोट्रांसपरेंसी नाम की वेबसाइट शुरू की। यह वेबसाइट कोशिश करती है कि यूट्यूब के एल्गोरिदम को आसान बनाया जाए और पता चल सके कि यह कौन से वीडियो प्रमोट करती है।
    शासलॉट बताया कि 2013 में उन्होंने यूट्यूब की नौकरी छोड़ी और उसके बाद वहां कई बदलाव किए गए, हालांकि ये नाकाफी थे। उनके मुताबिक, वे समस्या के मूल तक नहीं जाते हैं कि एल्गोरिदम का मकसद ही देखने के समय को बढ़ाना है। वे इसकी तुलना सड़क पर चल रही लोगों की लड़ाई-झगड़े से करते हैं जिसमें कुछ लोग शामिल होते हैं, कुछ लड़ाई को रुकवाते हैं और कुछ बस देखते रहते हैं।
    जिन वीडियो को ज्यादा लोगों ने देखा होगा, उसे देखने और भी ज्यादा लोग आएंगे और साइट पर अधिक समय बिताएंगे। इससे ज्यादा विज्ञापन आएंगे और यूट्यूब को ज्यादा आमदनी होगी। लेकिन इसका मतलब है कि साइट विवादित वीडियो को बढ़ावा दे रही है। सूचनाओं के संचालन को लेकर टेक कंपनियों के तौर-तरीकों पर लोग चिंता जाहिर कर रहे हैं क्योंकि जिससे वीडियो या कंटेंट से अधिक विज्ञापन मिलेगा, उसी से समुदायों के बीच हिंसक झड़प भी हो सकती है। शासलॉट मानते हैं कि यह आगे चल कर समाज के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होगा, लेकिन अफसोस एल्गोरिदम अभी इस बात को मापने के काबिल नहीं हैं। (डॉयचे वैले)

    ...
  •  


Posted Date : 12-Nov-2018
  • आशुतोष चतुर्वेदी
    पांच राज्यों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम, तेलंगाना और राजस्थान में विधानसभा चुनावों पर पूरे देश की निगाहें लगी हुईं हैं। नतीजे किस करवट बैठेंगे, इसको लेकर नेताओं की धड़कनें तेज हैं। छत्तीसगढ़ में 12 नवंबर को पहले चरण का मतदान है। छत्तीसगढ़ की प्रकृति झारखंड से बहुत मिलती-जुलती है, लेकिन राजनीतिक समीकरण अलग हैं। छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश में भाजपा का दबदबा रहा है और वह पिछले पंद्रह साल से सत्ता में है। लगातार चौथा कार्यकाल हासिल करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। कांग्रेस इन राज्यों में वापसी करना चाहती है।
     यही वजह है कि दोनों पार्टियों के लिए विधानसभा चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गए हैं। भाजपा और कांग्रेस, दोनों किसी अस्त्र को दागने से नहीं चूक रही हैं, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अब चुनाव जमीनी मुद्दों पर नहीं लड़े जाते। चुनावों में किसानों की समस्याएं, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की स्थिति, विकास जैसे विषय मुद्दे नहीं बनते। इस बार चुनाव के मुद्दों पर नजर डालें, तो शुरुआत विकास के मुद्दे से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह मुद्दा पीछे छूट गया। राहुल गांधी राफेल की खरीद में भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुख रूप से उठा रहे हैं। 
     कांग्रेस जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दे भी उठा रही है, वहीं भाजपा अरबन नक्सल और राम मंदिर मुद्दे जैसे मुद्दों को हवा दे रही है, जबकि इन राज्यों में किसानों का अंसतोष बड़ा विषय रहा है। उस पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हो रही है। पिछले कुछ चुनावों से कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों से दूरी बनाते हुए नरम हिंदुत्व की राह पकड़ी है और राहुल गांधी हर छोटे-बड़े मंदिर में मत्था टेकते नजर आ रहे हैं, जबकि यह भाजपा का कार्यक्षेत्र रहा है। भाजपा मुद्दों के अलावा अपने मजबूत संगठन के जरिये बूथ लेवल पर काम कर रही है। 
     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह सभी राज्यों के चुनाव प्रचार में सक्रिय हैं। सघन प्रचार और ध्रुवीकरण के जरिए भाजपा हवा का रुख अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, लेकिन स्थानीय फैक्टर पार्टियों का गणित बिगाड़ सकते हैं। माना जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में बसपा और अजित जोगी की जनता कांग्रेस का गठबंधन छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
     मीडिया हर विधानसभा चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल बताता है। यह सच है कि लोकसभा चुनावों से पहले ये अंतिम विधानसभा चुनाव हैं और इन चुनावों के नतीजे पार्टियों और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर डालेंगे। मुझे लगता है कि सेमीफाइनल के बजाय सांप-सीढ़ी के खेल से इसकी तुलना अधिक उपयुक्त है।  2019 से पहले के विधानसभा चुनाव आपको लोकसभा चुनाव की ऊपरी सीढ़ी के नजदीक ले जाते हैं। यदि इन विधानसभा चुनावों की सीढ़ी पर भाजपा और नरेंद्र मोदी सफलतापूर्वक चढ़ते गए, तो उनके लिए 2019 की लोकसभा की सीढ़ी बहुत आसान हो जाएगी। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में असफलता उनकी राह मुश्किल बना देगी।  हालांकि यह भी सही है कि कई बार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावी नतीजे उपचुनाव के परिणामों के एकदम उलट होते हैं, लेकिन अब बहुत समय नहीं बचा है। 
     इन विधानसभा चुनावों के तत्काल बाद लोकसभा चुनाव की बारी है। इस दृष्टि से मौजूदा नतीजे और महत्वपूर्ण हो जाते हैं। कांग्रेस के लिए हार कोई नई बात नहीं है। पार्टी कुछ समय से लगातार चुनाव हार रही है। हां, यदि जीत हुई, तो वह राहुल गांधी को स्थापित कर देगी, क्योंकि अब तक वह उपहास के पात्र रहे हैं और ऐसा माना जा रहा था कि जनता उन्हें ठुकरा चुकी है। इस बार राहुल गांधी नये तेवर में हैं। उनके भाषणों में जिन मारक मुद्दों और शब्दों का अभाव दिखता था, इस बार वे दिखाई दे रहे हैं। 
     हिंदी पट्टी के इन राज्यों का केंद्र में भाजपा की सरकार बनवाने में बड़ा योगदान रहा है, लेकिन राज्यों के नेतृत्व को लेकर लोगों में नाराजगी है। ऐसा लगता है कि हिंदी पट्टे के कुछ किले दरकने लगे हैं। सर्वे संकेत देते हैं कि राजस्थान में भाजपा की स्थिति ठीक नहीं है।   संदर्भ समझने के लिए राजस्थान के पिछले चुनाव परिणामों को जानना जरूरी है। राजस्थान में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 200 में से 163 सीटें जीती थीं, कांग्रेस को केवल 21 सीटें मिली थीं और शेष अन्य के खाते में गयीं थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राजस्थान में 25 में से 25 संसदीय सीटों पर कब्जा कर एक नया रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन उपचुनावों के बाद भाजपा की दो सीटें कम हो गयीं।
     मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा लंबे अरसे से सत्ता में है, लेकिन उससे किसानों में नाराजगी है। जीएसटी को लेकर व्यापारियों का एक वर्ग नाराज है। देखना होगा कि यह नाराजगी क्या असंतोष में बदली है यानी मतदाता यह सोचें कि इन्हें तो हराना है और इस बात की परवाह न करें कि विपक्ष का उम्मीदवार कैसा है।
     पहले होता यह था कि विधानसभा चुनावों में स्थानीय नेतृत्व की प्रमुख भूमिका होती थी, लेकिन अब खेल के नियम बदल गये हैं। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने हर चुनाव को अहम बना दिया है। प्रत्येक चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व की अहम भूमिका होने लगी है और विधानसभा चुनाव पूरी ताकत से लड़े जाते हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के मिजोरम विधानसभा चुनावों को लेकर मीडिया की कोई खास दिलचस्पी नजर आती है। 
    मिजोरम में 28 नवंबर को मतदान होना है, लेकिन चुनावी होड़ में यह राज्य दब-सा गया है। यहां अबकी बार भाजपा और उसका सहयोगी मिजो नेशनल फ्रंट सत्ता से कांग्रेस को हटाने के लिए पूरी कोशिश कर रहे है। हालांकि दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। पहले यहां शराबबंदी थी, लेकिन सत्तारूढ़ कांग्रेस ने इसे खत्म कर दिया। इस बार के चुनाव में शराबबंदी भी एक प्रमुख मुद्दा है।  हर चुनाव राजनीति को एक नया संदेश देकर जाता है। पिछले कर्नाटक विस चुनावों से विपक्षी एकता का संदेश निकला था। यह देश का दुर्भाग्य है कि अक्सर सरकारें अपनी असफलताओं के कारण चली जाती हैं, इसमें विपक्ष की कोई अहम भूमिका नहीं होती। कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि भाजपा सरकारें अपने बोझ से कैसे गिरें, उसे इसी का इंतजार है।
     सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ जनमत जगाने का काम वह नहीं करती। इन विस चुनावों में कांग्रेस नेताओं के सामने बड़ा अवसर है, लेकिन उनकी आपसी खींचतान की खबरें सामने आ रही हैं। मध्य प्रदेश में कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह हैं, तो राजस्थान में गहलौत और सचिन पायलट के बीच खींचतान है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से निकले अजीत जोगी पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जैसा कि कांग्रेसी भी कहते हैं, उन्हें विपक्ष की जरूरत नहीं होती, उनके लोग ही इस कमी को पूरा कर देते हैं। (लेखक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं।) https://www.prabhatkhabar.com/

    ...
  •  


Posted Date : 12-Nov-2018
  • नीरजा चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
    साल 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू विपक्ष को एक करने में जुट गए हैं। उनकी मुलाकात राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, मायावती, शरद पवार, एचडी देवगौड़ा जैसे तमाम दिग्गज राजनेताओं से हो चुकी है। माना जा रहा है कि वह उन सभी दलों के संपर्क में भी हैं, जो एनडीए के विरोधी खेमे में हैं। क्या चंद्रबाबू नायडू अपनी इस रणनीति में सफल होंगे? क्या 2019 का चुनाव एनडीए के लिए भारी पडऩे वाला है? एकजुट विपक्ष निश्चित तौर पर मतदाताओं को प्रभावित करेगा, मगर यह किस हद तक असरदार होगा, यह भी एक बड़ा सवाल है।
    बहरहाल, चंद्रबाबू नायडू की इस पूरी कवायद के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। पहला, विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए किसी सूत्रधार की जरूरत लंबे अरसे से महसूस की जा रही थी। वह एक ऐसा सूत्रधार हो, जो पहल करे, सभी नेताओं से बात करे, रोजाना मिले-बैठे और एक-दूसरे की बात कराए। चंद्रबाबू नायडू इस ढांचे में फिट बैठते हैं। 1996 में वह ऐसा कर भी चुके हैं। एक जगह तो उन्होंने कहा भी है कि 'दे आस्क मी टु डू इटÓ। इसका अर्थ है कि कुछ खास नेताओं ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा है। हालांकि यह किसने कहा है, यह अब तक साफ नहीं है।
    दूसरा अर्थ है कि अब यदि विपक्षी एकता की बात होगी, तो उसमें कांग्रेस भी शामिल रहेगी। बिना कांग्रेस नए गठबंधन की ताकत अधूरी मानी जाएगी। दरअसल, अब तक तमाम क्षेत्रीय पार्टियों का रवैया यही था कि पहले वे एकजुट हो जाएं और फिर यह तय हो कि उसमें कांग्रेस रहे या नहीं? तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव ने एक बार कहा था कि 'हम सिर्फ फेडरल फ्रंट बनाएंगेÓ। कांग्रेस के साथ आगे बढऩे की उनकी मंशा नहीं थी। मगर चंद्रबाबू नायडू के मैदान में उतरने के बाद अब यह लगने लगा है कि तमाम क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को साथ लेने पर एकमत हो गई हैं।
    चंद्रबाबू नायडू की नजदीकियां कांग्रेस से तब बढ़ीं, जब वह एनडीए से अलग हो गए थे। तेलंगाना में चुनावी समीकरण के तहत दोनों पार्टियां एक साथ आ गई हैं, लेकिन आंध्र प्रदेश में भी ऐसा होगा, यह अभी साफ नहीं किया गया है। नजर इस पर रहेगी कि तेलंगाना के चुनावी गठबंधन का आंध्र प्रदेश में कैसा असर पड़ता है? कुछ लोगों की नजर में यह उसी पार्टी का दामन थाम लेना है, जो आंध्र प्रदेश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार है। जबकि दूसरा धड़ा मानता है कि तेलंगाना एक सच्चाई है, इसलिए पुरानी कहानी मानकर उस प्रकरण पर मिट्टी डाल देनी चाहिए। ऐसे में, केंद्र की सियासत के लिए चंद्रबाबू नायडू का आगे बढऩा उनकी मजबूरी भी जान पड़ती है।
    हालांकि इस प्रयास का एक पहलू चंद्रबाबू नायडू का अपमान भी हो सकता है। यह सही है कि एक खास राजनीति के तहत उन्होंने एनडीए का साथ छोड़ा था, मगर जिस तरह से वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की कोशिश करते रहे और प्रधानमंत्री ने करीब एक महीने तक उन्हें वक्त नहीं दिया, इससे वह अपमानित महसूस कर रहे थे। जाहिर है, वह अब आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए होंगे।
    मगर सवाल यह है कि उनकी यह कवायद कितनी दूर तक जाएगी? फिलहाल इसका साफ-साफ जवाब तो नहीं दिया जा सकता, मगर यह तय है कि विपक्ष का एक होना जमीनी से अधिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा। यह एकता छह राज्यों में जमीनी असर डालती दिख रही है। ये राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, जहां मायावती और अखिलेश यादव का एक साथ आना भाजपा को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। दूसरा बिहार, जहां विपक्ष लगभग एकजुट हो चुका है, सिर्फ कुछ छोटी-छोटी पार्टियों को जोडऩा बाकी है। महाराष्ट्र भी इस कतार में शामिल है, जहां एनसीपी और कांग्रेस का गठबंधन बड़ा खेल कर सकता है। फिर, झारखंड, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में यह संभावित विपक्षी एका सीटों में बदलती दिख रही है। अगर इन सभी राज्यों में भाजपा के साथ उसकी सीधी चुनावी टक्कर हुई, तो उसे सौ के करीब सीटों का फायदा हो सकता है। बाकी जगह इसका मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ेगा। इस एकता को लेकर कई दल इसलिए भी उत्साहित हैं, क्योंकि 2014 के चुनाव में 31 फीसदी वोट भाजपा को मिले थे। इसका अर्थ है कि विपक्षी दलों के पास 69 फीसदी मत हैं। अगर इस मत का बड़ा हिस्सा गोलबंद हो जाता है, तो भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मगर एक सच यह भी है कि विपक्ष के पास नरेंद्र मोदी की तरह सर्वस्वीकार्य और चमत्कारिक चेहरा नहीं है।
     लिहाजा उसे मोदी की इस छवि का काट निकालना होगा। हालांकि उसके लिए राहत की बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की लोकप्रियता इन दिनों कम हुई है। बेशक कई लोग अब भी प्रधानमंत्री में काफी उम्मीदें देख रहे हैं, पर जिस तरह तमाम चीजों में मूल्य-वृद्धि हो रही है, वह सीधे-सीधे लोगों को प्रभावित कर रही है। मेरा मानना है कि सीबीआई, आरबीआई या राफेल जैसे मुद्दे लोगों को उस हद तक प्रभावित नहीं करेंगे, जितना कि उन पर महंगाई असर डालेगी। इसीलिए नजर मोदी-अमित शाह की जोड़ी पर भी रहेगी कि वह इसका क्या तोड़ निकालती है?
    जनता के इस बदलते मूड को विपक्षी नेतागण भांप गए हैं। उन्हें अब अपने लिए उम्मीदें दिखने लगी हैं। मगर इस एकता की दिशा तभी तय होगी, जब पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों का जनादेश सामने आएगा। अगर इनमें से दो राज्यों में भी कांग्रेस जीतती है, तो लोगों का रुझान उसकी तरफ बढ़ जाएगा। ठीक यही हालत भाजपा की भी है। यदि वह विधानसभा का अपना किला बचा ले गई, तो लोकसभा चुनाव में वह पूरे आत्मविश्वास के साथ विपक्षी एकता का मुकाबला करेगी। यानी जनता के बदलते मूड का इशारा भी है विपक्षी एकता की यह नई कवायद। https://www.livehindustan.com/

    ...
  •  


Posted Date : 12-Nov-2018
  • मनीष कुमार
     नोटबंदी के दो साल होने पर इस विषय पर बहस जारी हैं कि ये सफल था या विफल। शायद ये सफल होता तो भाजपा के नेता भी मानते हैं कि पूरे देश में कार्यक्रमों, विज्ञापन और कार्यकर्ताओं के ज़रिये वाह वाही का दौर चलता रहा। लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली के ब्लॉग के अलावा सरकार के तरफ़ से कुछ ख़ास देखने को नहीं मिला। जहाँ इस बात पर विवाद जारी हैं कि नोटबंदी ने देश को कितना नुकसान और कितना फायदा पहुंचाया वहीं इस बात पर कोई शक नहीं कि नोटबंदी के कारण बिहार में महागठबंधन के सरकार की विदाई की नीव पड़ी ।
    बिहार में भले महागठबंधन की सरकार जुलाई महीने के अंतिम हफ्तेमें टूटी और नये एनडीए सरकार का गठन हुआ लेकिन उस समय नीतीश कुमार ने बारह घंटे के अंदर अपनी यात्रा से निकलने के पहले नोटबंदी का समर्थन का ऐलान कर दिया था । जिससे उनकी पार्टी और सहयोगी जैसे राजद और कांग्रेस को पहली बार उनके स्टैंड से मुश्किल और सफ़ाई देनी पड़ी थी। 
    भाजपा के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार के इस क़दम का स्वागत किया। ख़ुद प्रकाश पर्व के दौरान जब पटना के गांधी मैदान में मुख्य समारोह में भाग लेने ख़ुद प्रधान मंत्रीनरेंद्र मोदी जब आए तब उन्होंने बिहार में शराबबंदी के लिए नीतीश कुमार की तारीफ़ की। जिससे यह साफ़ था कि इन दोनो नेताओं के बीच तनाव ख़त्म और संवाद जारी हैं । लेकिन इससे पूर्व वो या नीतीश की सोची समझी रणनीति कहिए या संयोग कि महागठबंधन में नीतीश नोटबंदी के मुद्दे पर अलग थलग पर गये थे। उनके सहयोगी हर दिन इस मुद्दे पर कोई ना कोई सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेते और नीतीश कुमार का गुणगान करते।  अपनी यात्रा के दौरान नीतीश जैसे मधुबनी पहुंचे तब उस समय केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली का फ़ोन नीतीश कुमार को आया, उस समय बिहार के वित मंत्री अब्दुल बारी सिड्डीकी भी मोजूद थे। सिद्धिकी जब पटना लौटे तो उन्होंने सभी को यह बात बताई। इसी दौरान लालू यादव निजी बातचीत में मानने लगे कि नीतीश कुमार ने अपना विकल्प खुला रखा हैं। उसी दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने पटना में एक धरना का आयोजन किया। ममता लालू यादव के घर चाय पीने पहुंची लेकिन नीतीश और ममता दोनो ने एक दूसरे से दूरी बनायी रखी । साफ़ था महागठबंधन में नीतीश के स्टैंड को ले के सब असहज महसूस कर रहे थे और उनकी सामप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ खडा रहने पर सवाल शुरू हो गया।  
    नीतीश पूरे देश में नोटबंदी के खिलाफ विरोध और अपने पार्टी के नेताओं के विरोध के बाबजूद इस आशा में थे कि कम से कम तीन लाख सिस्टम में वापस नहीं आएगा और उतनी राशि एक बार फिर छापकर केंद्र विकास की योजनाओं पर ख़र्च करने के नाम पर राज्यों को विशेष सहायता देगी। लेकिन ना नौ मन तेल हुआ और ना राधा नाची।  इसके बावजूद पंजाब और उतर प्रदेश विस चुनाव के परिणाम से नीतीश को इस बात का भरोसा हुआ कि भले नोटबंदी के उद्देश्यों के बारे में केंद्र सरकार ने जो भी लाभ गिनाया वो भले फैल हो चुका हैं लेकिन जनता में ख़ासकर आम जनता में इसका कोई आक्रोश और भाजपा को लेके ग़ुस्सा नहीं हैं। नीतीश का आकलन था कि ये सही क़दम हैं । इस समय तक लालू सरकार के कामकाज में दख़लअंदाजी बढ़ा चूके थे जिसका प्रमाण था कि एक बार भी नीतीश खुलकर जि़ला अधिकारियों और एसपी का तबादला नहीं कर पाए थे। उसपर लालू का बयान कि ज़्यादा सीट आने के बाद उन्होंने नीतीश को मुख्य मंत्री बनाया और तेजस्वी यादव का नीतीश के सामने सार्वजनिक मंच से कहना चाचा मुख्य मंत्री रहेंगे नीतीश का भाजपा के साथ सरकार वापसी का दरवाज़ा खोलता गया।  
    लेकिन उतर प्रदेश चुनाव के बाद नोटबंदी के बारे में जब भी नीतीश कुमार से पूछा जाता तो उनका जवाब होता था कि उन्हें उम्मीद हैं कि केंद्र सरकार बेनामी  संपत्ति पर चोट करेगी। लेकिन उन्हें इस बात का शायद अंदाज़ा नहीं था कि जल्द सता में सहयोगी लालू यादव और तेजस्वी यादव के एक नहीं कई संपती का ख़ुलासा शुरू हो जायेगा । हालांकि जो भी उजागर हुआ वो सार्वजनिक पहले से था लेकिन जहां मॉल के बदले होटेल मामला जो सबसे पहले 2008 में उजागर हुआ था तब केंद्र की सरकार में सहयोगी होने के कारण लालू यादव के खिलाफ कोई कारवाई नहीं हुई। लेकिन इस बार तुरंत सीबीआई जांच शुरू हो गई।
    हालांकि नीतीश कुमार के तरफ़ से शुरू में बीच बचाव किया गया लेकिन उन्हें लगने लगा कि ये एक ऐसा भ्रष्टाचार का मुद्दा मिल गया हैं जिसके आड़ में वो लालू और महगरबंधन की सरकार से मुक्ति पा सकते हैं । लेकिन भले ही सरकार से इस्तीफ़ा देने के बाद नीतीश सफ़ाई में कहते रहे कि सब कुछ इस्तीफ़ा के बाद हुआ लेकिन सब तैयारी पहले से थी जैसे एक ही दिन जनता दल विधायक दल और भाजपा विधायक दो की बैठक । राज्यपाल का कोलकाता से पटना में रहना । या अस्वस्थ्य रहने के बावजूद सपथ ग्रहण तक उन्हें अस्पताल में भर्ती नहीं कराया गया। इसलिए नोटबंदी सही या ग़लत बिहार में एक सरकार के विदाई और वक नयी सरकार के गठन का कारण ज़रूर बना । http://khabar.ndtv.com
     (लेखक एनडीटीवी इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं)

    ...
  •  


Posted Date : 11-Nov-2018
  • मनोरंजन भारती
    कर्नाटक में पांच सीटों पर उपचुनाव हुए हैं जिनमें से चार सीटों पर कांग्रेस-जेडीयू गठबंधन ने जीत दर्ज की है। कर्नाटक में विधानसभा की दो सीटों के लिए चुनाव हुए जिसमें जामकंडी सीट को कांग्रेस के न्यामागौड़ा ने करीब 40 हजार वोटों से जीता। जबकि रामनगरम की सीट को मुख्यमंत्री की पत्नी अनिता कुमारास्वामी ने एक लाख वोटों के जीता। यहां बीजेपी के साथ एक अजीब हादसा हो गया था। 
    बीजेपी के उम्मीदवार ने मतदान के तीन दिन पहले कांग्रेस में शामिल होने का ऐलान कर दिया जिससे बीजेपी के पास हाथ मलने के अलावा कोई और चारा नहीं रह गया था। वहीं बेल्लारी की लोकसभा सीट को कांग्रेस ने करीब ढाई लाख वोटों से जीता है जबकि जेडीएस के शिवरामेगौड़ा ने मांडया की सीट करीब सवा तीन लाख वोटों से जीती है। जबकि बीजेपी को केवल एक ही जगह सफलता मिली वो है शिमोगा जहां येदियुरप्पा की सीट से उनके बेटे राघवेन्द्र ने 50 हजार वोटों से जीत दर्ज की।
    यहां पर बेल्लारी लोकसभा सीट का जिक्र करना जरूरी है क्योंकि 2004 से लेकर अभी तक यह सीट बीजेपी के कब्जे में रही और सबसे मजेदार बात है कि एक उपचुनाव में बीजेपी यह सीट हार जाती है। 
    वह भी तब जब 7-8 महीनों बाद फिर से लोकसभा के चुनाव होने वाले हों। वैसे बेल्लारी की सीट से सोनिया गांधी भी जीत चुकी हैं 1999 में। मगर यह सीट उसके बाद कांग्रेस के हाथ से निकल गई। दरअसल बेल्लारी जाना जाता है रेड्डी बंधुओं के लिए खासकर जर्नादन रेड्डी और उनके दो भाई करूणाकरण और सोमशेखर रेड्डी के लिए। ये खनन माफिया के रूप में जाने जाते हैं जिनके पास अकूत संपत्ति है। एक समय में जर्नादन रेड्डी ने 43 करोड़ का सोने और हीरे से जड़ा मुकुट तिरूपति में भगवान को चढ़ाया था। ये हमेशा से बीजेपी के सर्मथक रहे हैं। वो तस्वीर लोगों को अभी भी याद है जिसमें सुषमा स्वराज ने जर्नादन रेड्डी और उनके भाई के सिर पर हाथ रखा हुआ है।
    खैर, इन तमाम चीजों के अलावा बेल्लारी का चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन को लेकर तमाम तरह की बातें कही जाती रही हैं। यहां तक कहा गया कि यह सरकार 2019 तक चल नहीं पाएगी यह भी कहा गया कि केवल येदियुरप्पा ही कर्नाटक को अच्छी सरकार दे सकते हैं। मगर इस जीत ने सभी अटकलों पर पानी फेर दिया। कर्नाटक ने यह साबित कर दिया कि जरूरी नहीं है कि चुनाव के लिए कोई देशव्यापी गठबंधन हो। 
    कर्नाटक ने साबित किया कि यदि कांग्रेस विभिन्न राज्यों में बीजेपी विरोधी पार्टियों से गठबंधन करती है तो भी बीजेपी को शिकस्त दी जा सकती है। जैसे कर्नाटक में जेडीएस, तमिलनाडु में डीएमके, आंध्र में तेलगुदेशम, बिहार में आरजेडी, उत्तरप्रदेश में सपा और बसपा, यदि ये समाकरण भी तैयार कर लिए जांए तो 2019 में बीजेपी को कङ़ी टक्कर दी जा सकती है।
    राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल और उत्तराखंड में कांग्रेस और बीजेपी की सीधी टक्कर है मगर बीजेपी की दिक्कत है वह इन राज्यों में अपने चरम सीमा तक जा चुकी है और उससे अच्?छा प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है। 
    यही वजह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कर्नाटक के इस उपचुनाव का महत्व काफी बढ़ गया है। इसने एक रास्ता दिखाया है कि किस तरह एक बड़ा और एक छोटा दल मिल कर जीत का रास्ता बना सकते हैं। बस साथ रहने की जरूरत है और 2019 के लिए एक नई सरकार के लिए दिल्ली दूर नहीं है।
    (लेखक एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर - पॉलिटिकल न्यूज़ हैं)

    ...
  •  


Posted Date : 11-Nov-2018
  • - ओम प्रकाश 
    पूरी दुनिया को युद्ध की आग में झोंकने वाले प्रथम विश्व युद्ध को खत्म हुए 100 साल पूरे हो गए हैं। यह 28 जुलाई 1914 को शुरू हुआ था, 11 नवंबर 1918 को युद्ध समाप्त होने तक करीब 55 लाख लोग मारे जा चुके थे। इस जंग ने न केवल लाखों लाशें बिछा दी थीं बल्कि कई मुल्कों का नक्शा और हुलिया भी बदलकर रख दिया था।
    इस युद्ध में अविभाजित भारत के करीब दस लाख सैनिकों ने विदेशों में अपनी सेवाएं दी थीं। जिनमें से करीब 65 हजार जवान मारे गए थे। ये सैनिक 1914 से 1918 के बीच फ्रांस, बेल्जियम, पूर्वी अफ्रीका और अफगानिस्तान आदि में भेजे गए थे।
    इसमें तिगांव नामक हरियाणा के एक गांव के 185 लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें से 37 लोग वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इस गांव के लोगों ने तुर्की, मेसोपोटामिया, साउथ पर्सिया, बुशायर और अफगानिस्तान जैसे जगहों पर जंग में हिस्सा लिया। यह फरीदाबाद जिले का सबसे बड़ा गांव बताया गया है।
    ये जांबाज ब्रिटिश इंडियन आर्मी की ओर से लड़े थे। क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। इस गांव में प्रथम विश्व युद्ध के नायकों से प्रेरणा लेने के लिए 'जीतगढ़Ó के नाम से स्मारक बनवाया गया है।
    हमारे जांबाजों ने ब्रिटेन और फ्रांस की तरफ से लंबी लड़ाई लड़ी। भारतीय लड़ाकों को उनके अदम्य साहस के लिए लगभग 9200 वीरता पदकों से नवाजा गया था। इन्हीं में से एक इस गांव के राम स्वरूप भी थे। उनका 1967 में देहांत हो गया था। उस वक्त 20 रुपये प्रति माह की पेंशन मिलती थी। उन्हें यूनाइटेड किंगडम अभियान पदक मिला था। उनके परिवार वालों ने इसे संभाल रखा है। इसमें उनका नाम भी लिखा हुआ है।
    भारतीय जवानों को मिस्र, गैलीपोली भी भेजा गया था। भारतीय सैनिकों ने तुर्क साम्राज्य के खिलाफ मेसोपोटामिया में अपनी सेवा दी थीं। यह महायुद्ध यूरोप, एशिया व अफ्रीका तीन महाद्वीपों और समुंदर, धरती और आकाश में लड़ा गया।
    बर्मिघम सिटी यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी साहित्य के प्रवक्ता इस्लाम ईसा ने अपने शोध में पाया है कि भारत से युद्ध में मदद के लिए 37 लाख टन सामान की आपूर्ति की गई थी। एक लाख 70 हजार पशु भेजे गए थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों के योगदान की याद में फ्रांस में एक स्मारक बनाया जा रहा है। बताया गया है कि यह यूरोप में ऐसा दूसरा स्मारक होगा।
    इतिहासकारों के मुताबिक 28 जून 1914 को ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के उत्तराधिकारी आर्चड्यूक फर्डिनेंड अपनी पत्नी के साथ बोस्निया की राजधानी सेराजीवो के दौरे पर थे। एक व्यक्ति ने दोनों पर बम फेंककर हत्या कर दी। इसके बाद शुरू हुआ वो घटनाक्रम जो प्रथम विश्व युद्ध कहलाया। वर्ष 1914 में युद्ध शुरू होने से पहले यूरोप के राष्ट्र दो विरोधी गुटों में बंट गए थे। एक ओर तो जर्मनी, आस्ट्रिया और इटली के राज्य थे और दूसरी ओर फ्रांस, रूस और इंग्लैंड के राज्य, 28 जुलाई 1914 को ऑस्ट्रिया के सर्बिया पर आक्रमण के साथ ही प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया। (न्यूज 18)

    ...
  •  


Posted Date : 11-Nov-2018
  • -हेमंत कुमार पाण्डेय
    आमतौर पर किसी भी चुनाव में राजनीतिक दलों के अभियान का पहिया जनता से जुड़े मुद्दों की धुरी पर घूमता है। लेकिन, इस बार छत्तीसगढ़ प्रमुख चेहरे भी चुनाव की दशा और दिशा तय करते दिख रहे हैं। सूबे के करीब 1.85 करोड़ मतदाताओं के सामने हैं भाजपा के डॉ.रमन सिंह, राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी और 'हाथ' का निशान। 'हाथ' का निशान इसलिए कि प्रमुख विपक्षी पार्टी ने अब तक अपनी ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा पेश नहीं किया है। इस बात को लेकर सत्ताधारी भाजपा लगातार कांग्रेस को घेर भी रही है। सत्ता पक्ष का दावा है कि डॉ. रमन सिंह के सामने मुख्य विपक्षी पार्टी के पास कोई चेहरा नहीं है। वहीं, कांग्रेस रमन सिंह सरकार की नाकामयाबियों की बात करके अपना 15 साल लंबा 'वनवास] खत्म करने की उम्मीद में दिख रही है। उधर, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के प्रमुख अजीत जोगी सूबे के लोगों को तीसरा विकल्प देने का दावा कर रहे हैं। इस कोशिश में उनके साथ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती भी हैं।
    बीते 15 वर्षों से सूबे में रमन सिंह राज्य में भाजपा के सबसे विश्वसनीय चेहरे साबित हुए हैं। उनकी पार्टी के चुनावी अभियान का केंद्र उनकी सरकार के दौरान किए गए काम ही हैं, 66 वर्षीय रमन सिंह खुद यह बात कहते हैं कि इस विधानसभा चुनाव को केंद्र की मोदी सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह न माना जाए। यानी वे 11 दिसंबर को आने वाले चुनावी नतीजे की जवाबदेही लेने को तैयार दिखते हैं। उनके इस दावे को थोड़ा बल इससे भी मिलता है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान की भाजपा सरकारों के खिलाफ जितनी मजबूत सत्ता विरोधी लहर की बात की जा रही है, उतनी डॉ.रमन सिंह सरकार के खिलाफ नहीं दिख रही।
    राजनीति में आने से पहले आयुर्वेदिक डॉक्टर रह चुके रमन सिंह ने पार्टी नेतृत्व का विश्वास अपने ऊपर बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है। राज्य में 'चावल वाले बाबा' के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले रमन सिंह सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कृषि क्षेत्र में किए गए कार्यों को अपनी सरकार की उपलब्धियों में शामिल करते हैं। साथ ही, उनका दावा है कि भाजपा सरकार के दौरान सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के मामले में भी काफी काम हुआ है। इसके अलावा भाजपा का दावा है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में बुनियादी विकास के जरिए इस समस्या से निपटने में कामयाबी मिली है। हालांकि, हालिया दिनों में नक्सलियों की हिंसक गतिविधियों की वजह से रमन सिंह एक बार फिर इस मुद्दे को लेकर विपक्ष के निशाने पर हैं।
    छत्तीसगढ़ में अब तक हुए विधानसभा चुनावों में अजीत जोगी कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहे हैं। चेहरा तो वे इस बार के चुनाव में भी हैं लेकिन इस बार उनकी रणनीति खुद को भाजपा और कांग्रेस से अलग तीसरे विकल्प के रूप में पेश करने की है। साल 2014 में कांग्रेस से अलग होने के बाद अजीत जोगी ने अपनी अलग पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का गठन किया। उनकी इस पार्टी के बसपा और सीपीआई के साथ चुनावी गठबंधन ने इस चुनाव को चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है।
    माना जा रहा है कि अगर इस बार जनता 'खिचड़ी जनादेश' देती है तो सत्ता की चाबी अजीत जोगी के पास जा सकती है। इस चुनाव में उनकी प्रमुख ताकत जातीय समीकरण बताए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि बसपा और सीपीआई के साथ आने की वजह से सूबे की आदिवासी और दलित प्रभुत्व वाली सीटों पर यह गठबंधन कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकता है। हालांकि, चुनावी नतीजों के बाद भाजपा का खेल बिगाडऩे के लिए कांग्रेस अजीत जोगी को आगे बढ़ाने पर मजबूर हो सकती है। पार्टी ने इस साल कर्नाटक में यही चाल चलकर भाजपा को रणनीतिक मात दी थी।
    साल 2013 में एक माओवादी हमले में अपना शीर्ष नेतृत्व खोने वाली कांग्रेस अभी भी इस चुनौती से जूझ रही है। भाजपा के डॉ. रमन सिंह को मुकाबला देने के लिए पार्टी के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं दिखता। हालांकि, पार्टी की मानें तो सूबे की कमान संभालने के लिए उनके पास कई योग्य नेता हैं। बीते अगस्त में विधानसभा में कांग्रेस नेता टीएस सिंह देव ने मुख्यमंत्री पद उम्मीदवार को लेकर कहा था कि विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस 'स्वयंवर' के जरिए इसका चयन करेगी। जानकारों के मुताबिक इस 'स्वयंवरÓ में वे खुद एक उम्मीदवार हैं। साथ ही, उनके साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत भी हैं।
    इसके अलावा कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी तीसरी और आखिरी सूची में दुर्ग-ग्रामीण सीट से पहले से घोषित उम्मीदवार प्रतिभा चंद्राकर का टिकट काटकर ताम्रध्वज साहू को चुनावी दंगल में उतार दिया है। ताम्रध्वज साहू फिलहाल छत्तीसगढ़ से एकमात्र लोक सभा सांसद हैं। साथ ही, वे पार्टी के राष्ट्रीय ओबीसी सेल के प्रमुख होने के अलावा कांग्रेस कार्यकारिणी में भी शामिल हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस को यदि जनादेश मिलता है तो ताम्रध्वज साहू मुख्यमंत्री पद के लिए मजबूत उम्मीदवार हो सकते हैं। (सत्याग्रह)

    ...
  •  


Posted Date : 10-Nov-2018
  •  रामचंद्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार
    बीते दशक  में मैं कई बार कैम्ब्रिज गया हूं और यह शहर मुझे खासा पसंद भी है। अच्छे-अच्छे कैफे और बुकशॉप, विश्व के किसी अन्य देश की अपेक्षा हार्वर्ड और एमआईटी जैसे बौद्धिक प्रतिभाओं वाला यह शहर किसी को भी आकर्षित करने की क्षमता रखता है।
    मेरे लिए मैसाचुसेट्स के इस शहर का आकर्षण इसलिए भी है कि यह मेरे दो पसंदीदा विद्वानों का शहर है। एक हैं आधुनिक चीन के महान इतिहासकार रॉडरिक मैकफारस्वायर, जिन्हें मैं रॉड कहना पसंद करता हूं। 1930 में लाहौर में जन्मे रॉड के पिता औपनिवेशिक सरकार के कर्मचारी थे। उनकी शुरुआती पढ़ाई स्कॉटलैंड के बोर्डिंग स्कूल और बाद की ऑक्सफोर्ड में हुई। स्नातक करने के बाद वह पत्रकार बन गए और बीबीसी के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू की अंतिम यात्रा और इकोनॉमिस्ट के लिए माओ की सांस्कृतिक क्रांति का कवरेज किया। बाद में ब्रिटिश संसद में लेबर पार्टी के सांसद भी रहे।  
    1960 में, पत्रकार रहते हुए ही रॉड ने चाइना क्वार्टरली की शुरुआत की, जो बहुत जल्द समकालीन चीन पर सबसे प्रमुख अंग्रेजी पत्रिका बन गई। उन्होंने चीन पर कई किताबें भी लिखीं। संसद में दोबारा न चुने जाने पर पत्रकारिता की बजाय उन्होंने अकादमिक क्षेत्र चुना। 1980 में हार्वर्ड में प्रोफेसर और बाद में इसी के एक प्रमुख सरकारी विभाग के अत्यंत लोकप्रिय मुखिया बने। शिक्षण व प्रशासनिक दायित्वों के साथ उन्होंने सांस्कृतिक क्रांति की उत्पत्ति पर तीन खंडों की ऐतिहासिक किताब भी लिखी।
    अमरीकी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के लिए सेवानिवृत्ति की कोई उम्र सीमा नहीं है। कुछ लोग तो अस्सी-नब्बे की उम्र तक पढ़ाते हैं। अधिसंख्य राजनेताओं की तरह अधिसंख्य अकादमिक भी नहीं जानते कि रिटायर कब होना है? रॉड मैकफारस्वायर कुछ अलग थे। उन्होंने अपने लिए नामांकित प्रतिष्ठित चेयर ऐसे समय में छोड़ी, जब किसी को भी इस पर यकीन नहीं हुआ। 
    रिटायरमेंट के बाद भी 'रॉड न्यूयॉर्क रिव्यू ऑफ बुक्सÓ में लिखने के साथ ही सेमिनारों और युवाओं से संवाद के किसी भी अवसर के रूप में उनकी सक्रियता बनी रही। लेकिन अन्य शिक्षाविदों या राजनेताओं की तरह उनके अंदर पिछली उपलब्धियों या पदों से चिपके रहने की कोई इच्छा नहीं थी।  मेरे एक अन्य पसंदीदा विद्वान ईएस (एनुगा) रेड्डी भी बहुत जल्द वहीं चले गए। रेड्डी का जन्म नेल्लोर में 1925 में हुआ था। मद्रास से डिग्री लेने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह न्यूयॉर्क चले गए। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा बने और 35 साल तक वहां अपनी सेवाएं दीं, जहां उनका अंतिम कार्यकाल असिस्टेंट सेक्रेटरी जनरल का था। संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने कई जिम्मेदारियां निभाईं। हालांकि, उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका नस्लभेद के खिलाफ स्पेशल कमेटी के मुखिया के तौर पर रही। 1960 से 1980 के बीच उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद के खिलाफ विश्व जनमत तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई। नस्लभेदी शासन के खात्मे के बाद रेड्डी दक्षिण अफ्रीका गए, तो उनका किसी नायक की तरह जबर्दस्त स्वागत तो हुआ ही, उच्च राजकीय सम्मान से भी नवाज गया। आज भी वहां उनके प्रति खासा सम्मान है।
    दक्षिण अफ्रीका में काम करने के दौरान ही रेड्डी का गहरा बौद्धिक झुकाव गांधीजी के प्रति हुआ। आज साबरमती के आश्रम से बाहर इस विषय से संबंधित लेखों और कतरनों का सबसे बड़ा संग्रह उन्हीं के पास है, जिसे वह किसी भी देश के बौद्धिकों या शोधार्थियों से खुलकर साझा करते हैं। दूसरों द्वारा लिखी गई ऐसी अनगिनत किताबों का उनका संग्रह उन्हें और विशिष्ट बनाता है। रेड्डी और उनकी तुर्की पत्नी मैनहट्टन में करीब 50 साल रहे। तुर्की के प्रख्यात कवि नाजिम हिकमत की कविताओं के कई अनुवाद उनकी पत्नी ने ही किए हैं। हालांकि कुछ साल पहले बेटी के आग्रह पर वे लोग कैम्ब्रिज में उसके साथ ही बस गए हैं। यहीं पिछले माह रेड्डी दंपति से उनके वेस्टर्न एवेन्यू स्थित नए अपार्टमेंट मिलना हुआ। हमारे बीच जो भी बातचीत हुई, उसके केंद्र में स्वाभाविक रूप से गांधी ही रहे। 
    इसी यात्रा में रॉड मैकफारस्वायर से भी उनके मेमोरियल ड्राइव स्थित अपार्टमेंट में मुलाकात हुई। पहुंचते ही एक अप्रत्याशित आश्चर्य से सामना हुआ जब रॉड ने कहा कि मैं तीसरा भारतीय हूं, जो हमेशा समय पर पहुंचता है। मैंने अन्य दो नाम पूछे, तो पता चला कि उनमें से एक थे देशभक्त और उदारवादी सांसद स्वर्गीय मीनू मसानी और दूसरे हैं अर्थशास्त्री से राजनेता बने कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी सुब्रमण्यम स्वामी।
    रॉड मैकफारस्वायर और एनुगा रेड्डी एक-दूसरे को नहीं जानते। संभव है, वे एक-दूसरे के बारे में भी न जानते हों। फिर भी इस लेखक के जेहन में यह एक प्राकृतिक जोड़ी के रूप में दर्ज है। 
    अकादमिक दुनिया और सार्वजनिक जीवन में दोनों का बड़ा योगदान है। दोनों की जड़ें अपने देश में तो गहरी हैं ही, इनकी ख्याति उन देशों में भी जबर्दस्त है, जो उनके नहीं हैं, चीन में रॉडरिक मैकफारस्वायर और दक्षिण अफ्रीका में एनुगा रेड्डी। और दोनों की कर्मभूमि भी संयुक्त राज्य यानी एक तीसरा देश रहा। 
    रॉड और रेड्डी में दूसरी समानताएं भी हैं। इन्हें न अपने अतीत पर घमंड है, न उसके पीछे छूट जाने का मलाल। दोनों स्वभाव से विनोदी हैं और अपने समय और संसाधनों के प्रति उदार। रेड्डी ने अपना दुर्लभ दक्षिण अफ्रीकी संग्रह येल यूनिवर्सिटी और गांधी से जुड़ी सामग्री नेहरू मेमोरियल म्यूजियम ऐंड लाइब्रेरी को दान कर दिए। रॉड चीनी सामग्री का अपना दुर्लभ पुस्तकालय किसी भारतीय विश्वविद्यालय को देना चाहते हैं। 
    अक्तूबर का आखिरी हफ्ता कैम्ब्रिज में हार्वर्ड स्क्वायर के आसपास की किताब की दुकानों और वाल्डन तालाब का आनंद लेते जरूर बीता, लेकिन इस यात्रा का मुख्य आकर्षण अपने इन दो पसंदीदा नायकों का 'दर्शनÓ और उनसे हुआ संवाद था। https://www.livehindustan.com/

    ...
  •  


Posted Date : 10-Nov-2018
  •  कुलदीप कुमार
    भारत अब तक बुरे तालिबान-अच्छे तालिबान के वर्गीकरण को अस्वीकार करता रहा है। रूस मॉस्को वार्ता का आयोजक है और इसमें पाकिस्तान, अफग़़ानिस्तान, चीन, ईरान, छह पूर्व सोवियत गणराज्य और अमेरिका के अलावा तालिबान का एक पांच-सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल भाग ले रहा है। अमेरिका की ओर से उसके मॉस्को-स्थित दूतावास का एक अधिकारी वार्ता में शिरकत कर रहा है। जाहिर है कि अमरीका इस वार्ता से खुश नहीं है क्योंकि यह उसकी घोषित नीति से मेल नहीं खाती और इसमें उसकी भूमिका भी हाशिए पर ही है।
    राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते खराब ही होते गए हैं जिसके नतीजे में पाकिस्तान रूस के निकट होता गया है। अफगानिस्तान में शांति स्थापित होना रूस के हित में भी है और उसे अच्छी तरह मालूम है कि पाकिस्तान के सहयोग के बिना अफगानिस्तान में कुछ भी करना संभव नहीं है। अमेरिका पाकिस्तान से कहता रहा है कि वह तालिबान और हक्कानी गिरोह के खिलाफ कार्रवाई करे। साथ ही वह उस पर आतंकवाद को पनाह देने और उसका निर्यात करने का आरोप भी लगाता रहा है।
     भारत का रुख भी लगभग यही  रहा है। लेकिन इस कारण उसे अफगानिस्तान में शांति बहाल करने की प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं मिल पाई और वह उससे बाहर ही रहा।
    अब जैसे-जैसे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अफगानिस्तान में स्थायी राजनीतिक व्यवस्था और शांति स्थापना तालिबान के बिना संभव नहीं है, वैसे-वैसे ही भारत को भी अपनी नीति में परिवर्तन की जरूरत महसूस होने लगी है। अब मॉस्को वार्ता में केवल अनौपचारिक रूप से  उपस्थित होने के बावजूद उसे अपनी आवाज उठाने का मौक़ा मिल गया है। पिछले वर्षों में तालिबान ने अपनी स्थिति मजबूत की है और अफगानिस्तान के काफी बड़े हिस्से में उसका सिक्का चलता है। भारत  अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए जो प्रयास करता रहा है, उन्हें भी तालिबान के हमलों को झेलना पड़ा है। इसलिए यदि उसके साथ किसी किस्म की क्षेत्रीय समझदारी बनती है तो वह भारत के हित में ही होगी। उधर अमरीका में भी पुरानी नीति पर पुनर्विचार हो रहा है और मॉस्को वार्ता से ठीक पहले ट्रंप प्रशासन ने अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए एक विशेष दूत जलमाय ख़लीलजाद की नियुक्ति की है और तालिबान से सीधे-सीधे बात न करने  की नीति को पलटने की तैयारी शुरू कर दी है। 
    इसका अर्थ यह है कि सभी तरफ से अफगानिस्तान में 17 वर्षों से चले आ रहे गृहयुद्ध को समाप्त करने के प्रति गंभीरता प्रदर्शित की जा रही है। ऐसे में मॉस्को में हो रही वार्ता का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। 
    उधर रूस पाकिस्तान को इस्लामिक स्टेट के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता है क्योंकि उसकी नजर में वह एक वैश्विक ख़तरा है जबकि तालिबान स्थानीय ख़तरा है। इसके पहले तालिबान केवल अपने-आपको अफगानिस्तान का वैध शासक मानता था और इसीलिए अफगानिस्तान की सरकार के साथ वार्ता की मेज पर बैठने से इंकार करता था। मॉस्को वार्ता का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें अफगानिस्तान सरकार और तालिबान दोनों के प्रतिनिधि शामिल हैं और सीधे एक-दूसरे के साथ संवाद में हैं। यानी राजनीतिक गतिरोध टूट रहा है और आगे की शांति वार्ता का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। (डॉयचे वैले)

    ...
  •  


Posted Date : 10-Nov-2018
  • विकासशील देशों में जहां एक तरफ जन्म दर बढ़ रही है, वहीं दर्जनों अमीर देशों में महिलाएं पर्याप्त बच्चे पैदा नहीं कर पा रही हैं, जिससे कि वहां का जनसंख्या स्तर बरकरार रहे। शुक्रवार को रिलीज हुए आंकड़ों से यह बात सामने आई है। दुनियाभर के देशों में जन्म, मृत्यु और बीमारी की दर से जुड़े आंकड़ों के विश्लेषण से एक चिंताजनक तस्वीर भी उभरी है। दरअसल, दुनियाभर में सबसे ज्यादा मौत अगर किसी एक बीमारी से हो रही है तो वह है हृदय की बीमारी। 
    वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी द्वारा स्थापित द इंस्टिट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवैल्युएशन ने ग्लोबल पब्लिक हेल्थ का विस्तृत अध्ययन करने के लिए 8,000 से ज्यादा डेटा स्रोतों का इस्तेमाल किया। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि जहां 1950 से 2017 के बीच दुनिया की आबादी बहुत ही तेजी से बढ़ी। वर्ष 1950 में जहां दुनिया की आबादी 2.6 अरब थी, वह 2017 में बढ़कर 7.6 अरब हो गई। जनसंख्या में यह वृद्धि क्षेत्रवार और आय के अनुसार बहुत अलग है। 
    आंकड़ों से जाहिर होता है कि दुनिया के करीब आधे देश बेबी संकट से जूझ रहे हैं, जहां जन्म दर जनसंख्या के स्तर को बरकरार रखने के लिए नाकाफी है, 195 देशों में से 91 देशों- मुख्यत: यूरोप और उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के देशों में, उतने बच्चे नहीं पैदा हो रहे हैं जो मौजूदा आबादी को बरकरार रखने में सक्षम हो। इन देशों में जन्म दर औसत वैश्विक जन्म दर से नीचे है। 
    दूसरी तरफ अफ्रीका और एशिया में फर्टिलिटी रेट का बढऩा जारी है। उदाहरण के तौर पर, नाइजीरिया में औसतन एक महिला अपने जीवनकाल में 7 बच्चे पैदा करती है। 
    आईएचएमई के डायरेक्टर क्रिस्टोफर मरे ने बताया, इन आंकड़ों से पता चलता है कि जहां कुछ देशों में बेबी बूम जैसे हालात हैं, वहीं कुछ अन्य देशों में बेबी संकट जैसे हालात हैं। हेल्थ मेट्रिक्स साइंसेज के प्रफेसर अली मोकदाद के मुताबिक जनसंख्या वृद्धि दर को निर्धारित करने वाला अगर कोई इकलौता सबसे अहम कारक है, तो वह है शिक्षा। उन्होंने बताया कि एक महिला जितनी अधिक शिक्षित होगी, वह उतना ही ज्यादा स्कूल-कॉलेज में समय बिताई होगी। इस तरह वह देर से गर्भवती होगी और उसके बच्चे भी कम होंगे। 
    आईएचएमई ने पाया कि साइप्रस धरती पर सबसे कम उर्बर देश है, जहां औसतन एक महिला अपने जीवनकाल में सिर्फ एक बच्चे को जन्म देती है। इसके उलट, माली, चाड और अफगानिस्तान जैसे कुछ देशों में औसतन एक महिला 6 से ज्यादा बच्चों को जन्म देती है। 
    अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि जिन देशों में लोग आर्थिक तौर पर बेहतर हैं, वहां बच्चों के जन्म होने की दर में गिरावट देखी जा रही है। प्रो. अली मोकदाद बताते हैं, एशिया और अफ्रीका में जनसंख्या अभी भी बढ़ रही हैं और लोग गरीबी से बाहर निकलकर बेहतर आय वर्ग में शामिल हो रहे हैं। जिन देशों में बेहतर आर्थिक विकास की उम्मीद है, वहां जन्म दर में भी गिरावट देखने को मिलेगी।
    द लैंसेट मेडिकल जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन दिखाता है कि पुरुषों की जीवन प्रत्याशा में बढ़ोतरी हुई है। साल 1950 में जहां यह 48 वर्ष थी, वहीं 2017 में यह बढ़कर 71 वर्ष हो गई। दूसरी तरफ 1950 में महिलाओं की जीवन प्रत्याशा 53 वर्ष थी, जो अब बढ़कर 76 वर्ष हो गई है।  (टाईम्स न्यूज)

    ...
  •  


Posted Date : 09-Nov-2018
  • मोहम्मद असगर
    बेहद मासूम। सुबह से बैठे हैं। उम्मीद है दीए बिकेंगे। जिन बच्चों को त्योहार पर उछल कूद करनी चाहिए वो बाजार में बैठे हैं। मजबूरी है, गरीबी की। बेबसी की। चार पैसे आ जाएं तो खुश हो जाएं, मगर बच्चों की लाचारी देखिए दीये नहीं बिक रहे। लोग बाज़ार आ रहे हैं तो लाइट खरीद रहे हैं। झालर खरीद रहे हैं। महंगे आइटम खरीद रहे हैं। अगर कोई दीया खरीद भी रहा तो बच्चों से नहीं, बड़े दुकानदारों से। 
    बच्चे बेबसी से लोगों को आते और जाते देख रहे हैं...। सोच रहा हूं जब ये बच्चे अपने पैरेंट्स के साथ खरीदारी करने आए बच्चों को देख रहे होंगे, तो इन दो मासूमों के दिल की कैफियत क्या होगी? क्या दिल में हलचल होगी...? 
    जहां ये बच्चे बैठे हैं वो जगह है यूपी का जि़ला अमरोहा, गांव सैद नगली। ये मेरा अपना गांव है, जहां मैं पला बढ़ा हूं।
    दिवाली का बाज़ार सजा है। तभी पुलिस का एक दस्ता बाज़ार का मुआयना करने पहुंचता है। 
    चश्मदीद का कहना है कि दस्ते में सैद नगली थाना के थानाध्यक्ष नीरज कुमार थे। दुकानदारों को दुकानें लाइन में लगाने का निर्देश दे रहे थे, उनकी नजर इन दो बच्चों पर गई। जो ज़मीन पर बैठे कस्टमर का इंतज़ार कर रहे हैं। चश्मदीद का कहना है कि मुझे लगा अब इन बच्चों को यहां से हटा दिया जाएगा। बेचारों के दीये बिके नहीं और अब हटा दिए जाएंगे। रास्ते में जो बैठे हैं...।  थानाध्यक्ष बच्चों के पास पहुंचे। उनका नाम पूछा। पिता के बारे में पूछा। बच्चों ने बेहद मासूमियत से कहा, हम दीये बेच रहे हैं। मगर कोई नहीं खरीद रहा। जब बिक जाएंगे तो हट जाएंगे। अंकल बहुत देर से बैठे हैं, मगर बिक नहीं रहे। हम गरीब हैं। दिवाली कैसे मनाएंगे?
    चश्मदीद का कहना है बच्चों की उस वक्त जो हालत थी बयां करने के लिए लफ्ज नहीं हैं। मासूम हैं, उन्हें बस चंद पैसों की चाह थी, ताकि शाम को दिवाली मना सकें। नीरज कुमार ने बच्चों से कहा, दीये कितने के हैं, मुझे खरीदने हैं...। थानाध्यक्ष ने दीये खरीदे। इसके बाद पुलिस वाले भी दीये खरीदने लगे। इतना ही नहीं, फिर थाना अध्यक्ष बच्चों की साइड में खड़े हो गए। बाज़ार आने वाले लोगों से दीये खरीदने की अपील करने लगे। बच्चों के दीये और पुरवे कुछ ही देर में सारे बिक गए। जैसे जैसे दीये बिकते जा रहे थे। बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं था।  जब सब सामान बिक गया तो थाना अध्यक्ष और पुलिस वालों ने बच्चों को दिवाली का तोहफा करके कुछ और पैसे दिए। पुलिस वालों की एक छोटी सी कोशिश से बच्चों की दिवाली हैप्पी हो गई। घर जाकर कितने खुश होंगे वो बच्चे। आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते। 
    मुझे लगता है, बच्चों को भीख देने से बेहतर है कि अगर वो कुछ बेच रहे हैं तो खरीद लिया जाए, ताकि वो भिखारी न बन जाएं। या किसी अपराध की तरफ रुख ना कर बैठें। उनमें इस तरह मेहनत करके कमाने का जज़्बा पैदा हो सकेगा। गरीबी ख़तम करने में सरकारें तो नाकाम हो रही हैं। 
    मगर हमारी और तुम्हारी इस तरह की एक छोटी कोशिश किसी की परेशानी को हल कर सकती है। जब मुझे इस बारे में पता चला तो आप सबसे शेयर करने का मन हुआ। सबके त्योहार हैप्पी हो इसी उम्मीद के साथ ये लिखा है, ताकि मैसेज ज़्यादा लोगों तक पहुंचे। और नीरज जी का बेहद शुक्रिया इस इंसानियत के लिए। मेरे गांव के किसी बंदे की लिस्ट में हो तो प्लीज़ टैग कर दें या ये शुक्रिया उन तक पहुंचा दें।

    ...
  •  


Posted Date : 09-Nov-2018
  • डॉ. अनुज लुगुन, सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
    मध्य अमरीकी देशों से करीब पांच हजार से ज्यादा लोगों का जत्था पैदल करीब डेढ़ हजार किलोमीटर की यात्रा कर अमरीका जा रहा है। इनमें बच्चे, औरत सब शामिल हैं। भूखे-प्यासे, नंगे पैर ये किसी उम्मीद की तलाश में निकल पड़े हैं। रास्ते में कहीं-कहीं कुछ संस्थाएं उनके लिए दवा और विश्राम की व्यवस्था कर रही हैं। उनकी आंखों की बेबसी द्रवित करने वाली है, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें अमरीका में शरण नहीं दिए जाने की बात कही है। 
     मैक्सिको की सीमा पर उन्हें रोकने के लिए ट्रंप ने सैनिक भी भेज दिए हैं और कहा है कि यदि वे नियंत्रित नहीं हुए, तो सेना उन पर गोली भी चला सकती है। यह पहली बार नहीं है। शरणार्थी संकट 21वीं सदी में भी हमारी सभ्यता के लिए नासूर बनकर उभर रहा है।  खाड़ी देशों से यूरोप की ओर पलायन का बहुत बड़ा कारण वहां हो रहे युद्ध हैं। आंतरिक अस्थिरता और बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप से खाड़ी देश युद्ध की गिरफ्त में हैं। विस्थापन और पलायन के मामलों में हम उसके कारणों को समझने के बजाय शरणार्थी लोगों को ही समस्या मान बैठते हैं। 
     हमारे लिए शरणार्थी समस्या बहुत बड़ी समस्या बन जाती है और हम उन्हें अपने शत्रु की तरह देखते हैं। सीरिया और अन्य खाड़ी देशों से पलायन के वक्त जर्मनी में वहां के नागरिक समुदायों के एक हिस्से ने बहुत कट्टरता से शरणार्थियों का विरोध किया था। लेकिन वहां के एक अखबार ने लिखा था कि लोग शरणार्थियों को शर्मनाक समझते हैं, जबकि इसका उल्टा है। लोग इसके दूसरे पक्ष को नहीं देखते हैं। 
     धनी लोग और उनका लाइफ स्टाइल दरअसल प्राकृतिक संसाधनों की लूट, पर्यावरण का नुकसान, पिछड़ेपन और गरीबी की कीमत पर खरीदा गया है। कोई दावा भी नहीं कर सकता कि पश्चिमी देशों की गलतियां इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। अखबार ने जर्मनी और यूरोपीय देशों की जिम्मेदारी की बात कही थी। सवाल है कि विकसित या अमीर देश धन कहां से और कैसे जुटाते हैं? 
     खाड़ी देशों में तेल को लेकर होनेवाली अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बात किसी से छुपी नहीं है। उसी तरह एशिया, अफ्रका और लैटिन अमरीकी देशों के साथ भी होता है।  अभी लैटिन और मध्य अमेरिकी देशों से हो रहे पलायन का बहुत बड़ा कारण वहां की आंतरिक अस्थिरता और बढ़ता हुआ अपराध है। होंडुरास, ग्वाटेमाला, अल साल्वाडोर या मैक्सिको जैसे देशों में अपराध की दर बहुत ज्यादा है। आंकड़ों से लगता है वहां की अर्थव्यवस्था और प्रशासन पर आपराधिक गिरोहों का नियंत्रण है। हत्या, मानव तस्करी और बाल यौन उत्पीडऩ कारोबार बन गया है। 
     वनडर्बिल्ट यूनिवर्सिटी के जोनाथन हिस्की के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में अल साल्वाडोर में चार हजार लोग आपराधिक गिरोहों द्वारा मारे गये हैं, जबकि वहां कोई युद्ध नहीं चल रहा है। सबसे बड़ा गैंग एमएस-13 माना जाता है। अल साल्वाडोर उसका सबसे बड़ा पनाहगाह है। उसी तरह 18- स्ट्रीट गैंग मेक्सिको का सबसे बड़ा आपराधिक गिरोह है। 
     इन गिरोहों की शाखाएं मध्य अमरीका और लैटिन अमेरिकी देशों में हैं। इन गिरोहों ने होंडुरास को दुनिया के सबसे खतरनाक जगहों में से एक बना दिया है। वहां की सरकारों का इन पर नियंत्रण नहीं है। माना जाता है कि ये सरकारों को फंडिंग करते हैं। यह स्थिति तब है, जब अमरीका इन देशों को आर्थिक मदद देता है और उसकी खुफिया एजेंसी सीआईए इन देशों पर कड़ी नजर रखती है। फिर अपराध कैसे फल फूल रहे हैं?
     मशहूर लेखक एदुआर्दो गालेआनो कहते हैं कि अमेरिकी देशों की अर्थव्यवस्था गुलाम अर्थव्यवस्था है। बाजारवादी अर्थव्यवस्था और उनकी नीतियों ने उनकी स्वायत्तता और संप्रभुता को लगभग खत्म कर दिया है। 
     इन देशों में अमीरी-गरीबी का फर्क बहुत तेजी से उभरा है। वैश्वीकरण ने न केवल सस्ते श्रमिकों की भीड़ पैदा कर दी, बल्कि उनके बीच की प्रतिस्पर्धा ने हिंसा को जन्म दिया। अन्याय और हिंसा यहां सबसे कुशलता से बनाए जाने वाले उत्पाद हैं। गालेआनो के अध्ययन बेलगाम बढ़ती अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को इसकी वजह मानते हैं। 
     लैटिन अमरीका और मध्य अमरीका से उठनेवाली वामपंथी आवाज पर अमरीका और सीआईए की कड़ी नजर होती है। वे किसी भी तरह उसे उभरने नहीं देते, न ही वहां अपराध का उन्मूलन उनके एजेंडे में है। मध्य अमरीका से हो रहे पलायन की वजहें इससे मुक्त नहीं हैं, न ही पलायन की जिम्मेदारी से अमरीकी नीतियां खुद को मुक्त मान सकती हैं। 
     दुनिया में बढ़ रही अमीरी-गरीबी की खाई शरणार्थी संकट का कारण बन रही है। विश्व बैंक भी इस बात को मानता है। विश्व बैंक के निदेशक रहते हुए जेम्स वोलफेंसन ने कहा था कि दुनिया अगर इसी तरह चलती रही, तो अमीरी-गरीबी की गैर-बराबरी आने वाली नस्लों पर टाइम बम की तरह फटेगी। ऐसे संकट को हम अपने देश में भी देख सकते हैं। 
     हमारे यहां बिहारी मजदूरों के साथ होने वाला व्यवहार इसका उदाहरण है। हम दिल्ली और बस्तर के बीच की गैर-बराबरी और उससे पैदा हो रहे संकट को देख सकते हैं।  खनन के क्षेत्र अति पिछड़े क्षेत्र होते हैं, लेकिन खनन करनेवाले अत्यधिक अमीर होते हैं। खनन क्षेत्र में पैदा होनेवाले संगठित गिरोह इसके परिणाम हैं। 
    रोहिंग्या मुसलमानों का सवाल इससे अलग नहीं है। संसाधनों की हिस्सेदारी की वजह से ही स्थानीय समुदाय शरणार्थियों को स्वीकार नहीं करते हैं। राजनीति की अवसरवादिता इस संकट को और वीभत्स बना देती है। https://www.prabhatkhabar.com/

    ...
  •  




Previous123Next