विचार / लेख

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Posted Date : 21-Sep-2018
  • -दिनेश गुप्ता
    मध्यप्रदेश में एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ चल रहे सवर्ण आंदोलन के बीच बहुजन समाज पार्टी ने राज्य की 22 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर कांग्रेस से गठबंधन की अटकलों पर विराम लगा दिया है। बीएसपी ने जिन विधानसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है, उनमें कुछ कांग्रेस के कब्जे वाली सीटें हैं। कांग्रेस और बीएसपी के बीच गठबंधन न बन पाने को भारतीय जनता पार्टी की पहली रणनीतिक जीत मानी जा रही है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बजाए बीएसपी द्वारा अजीत जोगी की पार्टी से समझौता भी इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि बीजेपी समझौते को रोकने में पूरी तरह से सफल रही है। मायावती सम्मानजनक सीटें लेकर ही कांग्रेस से समझौता करने का एलान कर चुकी थीं। कांग्रेस अपनी शर्तों पर समझौता करना चाहती थी।
    समझौते में सिर्फ तीस सीट देना चाहती थी कांग्रेस
    मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बीएसपी के बीच समझौते की संभावनाएं लगभग समाप्त हो गईं हैं, इस बात का संकेत जारी सूची से भी मिलता है। जारी सूची में बीएसपी ने उन स्थानों पर भी अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं, जहां कि वर्तमान में कांग्रेस के विधायक हैं। कांग्रेस के कब्जे वाली ऐसी सीटों की संख्या कुल चार है। इनमें करैरा और चितरंगी को छोड़कर बाकी दो सीटें सामान्य सीटें हैं। करैरा की सीट अनुसूचित जाति तथा चितरंगी की सीट जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। कांग्रेस के कब्जे वाली जिन सामान्य सीटों पर बीएसपी ने अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं उनमें वर्तमान विधानसभा उपाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह अमरपाटन से विधायक हैं। जबेरा से प्रताप सिंह विधायक हैं।
    कांग्रेस ने कुल तीस सीटें समझौते में देने की रणनीति बनाई थी। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ इसी रणनीति पर मायावती और एसपी प्रमुख अखिलेश यादव से समझौते की बातचीत कर रहे थे। मायावती पचास से अधिक सीटों की मांग कर रहीं थीं। राज्य में बीएसपी के वर्तमान में कुल चार विधायक हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को लगभग सात प्रतिशत वोट ही मिले थे। बहुजन समाज पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष प्रदीप अहिरवार कहते हैं कि पार्टी ने तय किया है कि राज्य की सभी 230 सीटों पर उम्मीदवार उतारे जाएंगे। समझौते के सवाल पर भी अहिरवार यही बात दोहराते रहे कि हम सभी सीटों पर उम्मीदवार जल्द घोषित करेंगे।
    पिछले विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने 227 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। इनमें 194 उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए थे। लगभग दर्जन भर सीटें ऐसी थीं जहां बीएसपी उम्मीदवार दूसरे और तीसरे नंबर पर रहा था। जहां बीएसपी तीसरे नंबर पर थी उनमें अधिकांश पर बीजेपी को लाभ हुआ था। कांग्रेस इसी अंक गणित के आधार पर मायावती के लिए सिर्फ दर्जन भर सीटें ही छोडऩा चाहती थी। समाजवादी पार्टी के लिए भी इतनी ही सीटें कांग्रेस ने तय कर रखी थीं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के लिए पांच-छह सीटें कांग्रेस ने चिन्हित की हैं। कांग्रेस ज्यादा सीटें देकर वोटरों के बीच यह संदेश नहीं देना चाहती थी कि वह अपने दम पर सरकार नहीं बना सकती।
    राज्य में इन दिनों एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ सवर्ण सड़कों पर उतरकर आंदोलन कर रहे हैं। सवर्णों की नाराजगी से बीजेपी को नुकसान होने की संभावना ज्यादा प्रकट की जा रही है। लेकिन, इस बात पर अभी भी संदेह है कि सवर्णों का वोट कांग्रेस के पक्ष में जाएगा। राज्य में कोई ऐसा तीसरा दल नहीं है जो अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में हो। कांग्रेस के रणनीतिकारों का यह भी मानना रहा है कि मौजूदा हालात में बीएसपी से समझौता न करने से ही सवर्ण मतदाता कांग्रेस के पक्ष में आ सकता है। राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित कुल सीटों की संख्या 35 है। इनमें से सिर्फ चार सीटें कांग्रेस के पास हैं।
    बीजेपी के पास 28 सीटें हैं। इन सीटों पर सवर्ण, कांग्रेस और बीजेपी में से जिस भी दल के पक्ष में मतदान करेंगे,उसे लाभ हो सकता है। अनुसूचित जाति वर्ग के वोटर को लेकर यह मान्यता है कि वह मायावती के साथ ही रहता है। विधानसभा के पिछले तीन चुनाव में बीएसपी की मौजूदगी का लाभ बीजेपी को मिलता रहा है। बीजेपी के रणनीतिकार लगातार कोशिश कर रहे थे कि कांग्रेस और बीएसपी का समझौता न हो। बीजेपी की कोशिश सफल होती दिखाई दे रही है। बीएसपी की पहली लिस्ट जारी होने के बाद बीजेपी ने सवर्ण वोटरों की नाराजगी दूर करने की कोशिशें तेज कर दी हैं।
    राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ शब्दों में कहा कि सरकार ऐसे निर्देश जारी करेगी, जिससे एट्रोसिटी एक्ट में गिरफ्तारी जांच के बाद ही हो? बीजेपी ने अपने ताकतवर ब्राहण नेताओं को भी सवर्णों को मनाने के लिए सक्रिय कर दिया है। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे एवं मुरैना से सांसद अनूप मिश्रा प्रमुख हैं। बीजेपी चुनाव में स्वर्गीय वाजपेयी के नाम का उपयोग भी लंबे समय बाद कर रही है।
    बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों की पहली सूची में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित पांच सीटें भी हैं। ये चितरंगी, धोनी, जैतपुर, बांधवगढ़ और सिहोरा हैं। इन सीटों पर बीएसपी का उम्मीदवार होने का सीधा नुकसान कांग्रेस को ही होना है। राज्य के आदिवासी वोटरों पर बीएसपी का कोई खास असर नहीं है। बीएसपी ने क्षेत्र के जातिगत समीकरणों के आधार पर उम्मीदवार घोषित किए हैं। बीएसपी की पहली सूची में ग्वालियर-चंबल और रीवा-शहडोल संभाग के अलावा बुंदेलखंड की भी कुछ सीटें हैं।
    अधिकांश सीटों पर उत्तरप्रदेश की राजनीति का असर देखा जाता है। मायावती ने रीवा-शहडोल संभाग में कुर्मी-पटेल और कोल वोटर को ध्यान में रखकर उम्मीदवार तय किए हैं। सामान्य सीटों पर पिछड़े वर्ग को ज्यादा महत्व दिया गया है। बीएसपी अपना जनाधार बढ़ाने के लिए राज्य में पिछले कुछ दिनों से पिछड़े वर्ग का आरक्षण बढ़ाने की मांग कर रही है। राज्य में आदिवासी और पिछड़ा वर्ग कभी भी अनुसूचित जाति वर्ग के साथ नहीं रहा है। (फस्र्टपोस्ट)
    (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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Posted Date : 21-Sep-2018
  • -सौरभ शुक्ला
    जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एनडीटीवी से खास बातचीत में कहा कि जम्मू-कश्मीर एक मुश्किल प्रदेश है, लेकिन उतना भी मुश्किल नहीं था। मैं वहां सीधे लोगों से मिल रहा हूं और मैंने वहां राजभवन सब के लिए खोल दिया है। मैं अपने व्हहाट्सएप पर तक मिली शिकायतों का समाधान कर रहा हूं। 
    सवाल- पहली बड़ी चुनौती पंचायत के चुनाव हैं और एनसी और पीडीपी पहले ही बायकॉट कर चुकी है?
    सत्यपाल मलिक- हम शांति से चुनाव कराने की कोशिश कर रहे हैं। ये दोनों ही पार्टी बॉयकाट कर विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही हैं। इन दोनों पार्टी के कैंडिडेट्स बिना सिंबल के इनके समर्थन से चुनाव लड़ेंगे, ये सिर्फ दिखावा कर रहे हैं। हमने सुरक्षा के सारे इंतजाम कर लिए हैं। हम हर कैंडिडेट का 10 लाख का बीमा कर रहे हैं। 
    सवाल- 35 ए को लेकर आपका क्या स्टैंड है?
    सत्यपाल मलिक- मैं कह चुका हूं कि 35ए पर कोई फैसला चुनी हुई सरकार का प्रमुख ले सकता है। मैं तो चुनी हुई सरकार का आदमी हूं नहीं। मामला कोर्ट में हैं और सेंटर भी चाहता है कि पंचायत चुनाव के बाद सुनवाई हो। 
    सवाल- बीजेपी अध्यक्ष रविंद्र रैना कहते हैं कि आप उनके आदमी हैं?
    सत्यपाल मलिक- मैं किसी का आदमी नहीं हूं। मैं संविधान का आदमी हूं और मैं इन जैसे लोगों को कोई अहमियत नहीं देता हूं। 
    सवाल- नए तरह का आतंकवाद सामने आ रहा है पुलिस वालों पर हमला किया जा रहा है?
    सत्यपाल मलिक- इन चीजों को मीडिया बढ़ा-चढ़ाकर बताती है। मैंने शहीद पुलिसवालों के परिवार को मिलने वाले 50 लाख से बढ़ा कर 70 लाख कर दिया है। मैं विश्वास पैदा करने की कोशिश कर रहा हूं। आतंकवादियों से हम सख्ती से निपट ही रहे हैं। 
    सवाल- एसपी वैध को डीजीपी पद से क्यों हटाया गया?
    सत्यपाल मलिक- इसको लेकर बहुत विवाद है लेकिन मैं साफ कर दूं। वैध को हटाने का फैसला दो महीने पहले हो चुका था। मैं तो उनको बहुत पसंद करता था। आतंकी के पिता को छोडऩे वाली वजह नहीं थी। 
    सवाल- कश्मीरी आप पर क्यों विश्वास करें?
    सत्यपाल मलिक- वहां समस्या हमें हूरियत से नहीं अलगाववादियों से नहीं हमारी समस्या 13 से 20 साल के लड़के हैं जिनका सिस्टम से भरोसा उठ चुका है। हमने फैसला किया हैं कि पुलिस किसी युवा को 6 बजे के बाद नहीं रोकेगी। हम कोशिश कर रहे हैं कि आईपीएल मैच कश्मीर में कराए जाएं। हमारी बात टीम बनाने को लेकर आईपीएल चेयरमैन से भी बात हुई है। हमने फैसला लिया है कि सभी त्योहारों जैसे ईद, रमजान आदि में 24 घंटे बिजली दी जाएगी। मुझे प्रधानमंत्री ने पूरा मैंडेट दे रखा है। पिछले एक महीने में पत्थरबाजी की घटनाएं कम हुई है।  (एनडीटीवी)

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Posted Date : 21-Sep-2018
  • -इमरान कुरैशी
    केरल की रहने वाली गीता शाजन तीन दिनों से माला जप रही हैं और ईसा मसीह से अपनी बेटी को सुरक्षित रखने की प्रार्थना कर रही हैं। यही इकलौता तरीका है जिससे उनका डर कुछ कम होता है। उनकी छोटी बेटी नन बनने के लिए पढ़ाई कर रही है।
    मंगलवार को गीता और उनके पति शाजन वर्गीस कोच्चि स्थित वांची स्क्वायर गए थे। वहां नन और ईसाई समाज के कुछ लोग एक नन से बलात्कार के अभियुक्त बिशप की गिरफ्तारी की मांग करते हुए धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। इस विरोध प्रदर्शन में तीसरी बार शामिल होने पहुंचीं गीता ने बीबीसी से कहा, एक मां के तौर पर मैं अपनी बेटी के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हूं। इसे सबसे सुरक्षित जगह माना जाता है, लेकिन लगता है कि यह सुरक्षित नहीं है।
    शाजन वर्गीस याद करते हैं, उनकी (नन की) कहानी सुनते ही मेरी पत्नी रोने लगी। वो चाहती थी कि हमारी दूसरी बेटी नन वाली पढ़ाई छोड़ दे और वहां से अलग हो जाए।
    गीता की आंखों में फिर आंसू आ गए। उन्होंने कहा, मैं ईसा मसीह में भरोसा करती हूं। मैंने माला जपनी शुरू कर दी और फिर तय किया कि अगर आप सच्चे श्रद्धालु हैं तो आपको डरना नहीं चाहिए। लेकिन मुझे अब भी इन ननों के लिए डर लगता है जो यहां विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।
    गीता को डर इसलिए भी है क्योंकि उनकी 26 साल की बेटी को मई 2019 में पढ़ाई पूरी करने तक परिवार से संपर्क करने की इजाजत नहीं है। वांची स्क्वायर पर पांच नन बीते तेरह दिनों से विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। उनकी मांग है कि नन से बलात्कार के अभियुक्त जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल की तुरंत गिरफ्तारी की जाए। नन और पादरी इससे पहले सरकारी कार्रवाई या ढिलाई के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं, लेकिन चर्च के अंदरूनी मामले पर उन्हें कभी इस तरह प्रदर्शन करते नहीं देखा गया।
    करीब छह दशकों से केरल के समाज और राजनीति पर नजर रख रहे वरिष्ठ पत्रकार बीआरपी भास्कर कहते हैं, लोग स्वाभाविक तौर से चर्च के खिलाफ सड़कों पर उतरे हों, इसके उदाहरण यहां नहीं हैं। चर्च आज इस स्थिति का सामना इसलिए कर रहा है क्योंकि उसने नन की शिकायत के बाद बिशप के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। यहां प्रदर्शन कर रही पांच ननों में से एक सिस्टर सिल्वी (बदला हुआ नाम) भी हैं। वह बिशप पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली नन की सगी बहन हैं। उनकी एक और बहन तीन दिन के अनशन के बाद अस्पताल में भर्ती हैं।
    सिस्टर सिल्वी ने कहा, हमने कार्डिनल और दूसरे बिशपों से भी शिकायत की। हमने मदर जनरल से शिकायत की। उन्होंने कहा कि वो हिज एक्सीलेंसी (बिशप फ्रैंको मुलक्कल) के खिलाफ कार्रवाई कैसे कर सकती हैं, क्योंकि वे उनके अधीन हैं। उन्होंने बताया, चर्च ने हमें खारिज कर दिया, तब हमने पुलिस को शिकायत दी। हमने सोचा कि अगर हम अंदर बैठे रहेंगे तो वे हमें बाहर निकाल फेंकेंगे। तो हमने बाहर आने का फैसला किया क्योंकि अगर लोग हमारे साथ आएंगे तो सरकार और चर्च पर दबाव बनेगा।
    बीते वर्षों के दौरान केरल में चर्च इस तरह के कुछ विवादों में रहे हैं। कुछ पादरियों पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ के आरोप लगे हैं। इनमें दो नाबालिग लड़कियां भी शामिल हैं जो गर्भवती हो गई थीं। चर्च जाने वाले लोग सिस्टर अभया का अनसुलझा मामला भी नहीं भूले हैं।
    कुछ ही महीने पहले एक गृहिणी ने आरोप लगाया कि जब वो नाबालिग थी तो चार पादरियों ने उनके साथ बलात्कार किया था। उन पादरियों को इस मामले में जमानत लेने के लिए पहले हाई कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।
    क्या ऐसे मामलों के सामने आने का मतलब ये समझा जाए कि ईसा मसीह के प्रतिनिधि समझे जाने वाले पादरियों और जन साधारण के बीच भरोसे की लकीर धुंधली हो रही है?
    हैदराबाद विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में प्रोफेसर डॉ. वीजे वर्गीस कहते हैं, इसमें शक नहीं है कि पादरियों की छवि धूमिल हो रही है। चर्च एक संस्थान के तौर पर ऐसे पादरियों को खुले या छिपे तौर पर जो समर्थन देता है, उससे हालात और खराब हुए हैं।
    नन से बलात्कार के ताजा मामले में मिशनरीज ऑफ जीसस समुदाय ने प्रदर्शन कर रही ननों के खिलाफ और अभियुक्त बिशप के पक्ष में बयान भी जारी किया है। ये बयान बलात्कार का आरोप लगाने वाली नन की तस्वीर के साथ जारी किया गया था, जिसके बाद समुदाय के प्रवक्ता के खिलाफ मामला भी दर्ज किया गया। लेकिन जब बिशप फ्रैंको मुलक्कल जांच टीम के बुलाने पर पूछताछ के लिए त्रिपुनितुरा पहुंचे तो उनकी कार पर काले शीशे चढ़े थे। इस पर एक टीवी पत्रकार ने कहा था, अजीब है कि चर्च ने बलात्कार का आरोप लगाने वाली नन की तस्वीर सार्वजनिक कर दी, जबकि अभियुक्त बिशप को उनकी कार में भी देखना मुश्किल है।
    इस प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे सेव आवर सिस्टर्स (एसओएस) एक्शन कमेटी के प्रवक्ता फादर ऑगस्टिन पैटोली कहते हैं कि इस तरह के मामलों पर एक्शन न लेने के चलते चर्च के भीतर ही विरोध की आवाजें उठी हैं और यह खीझ और विरोध का मिजाज अचानक पैदा नहीं हुआ है। केरल में अब जब भी चर्च से जुड़ा कोई विवाद पैदा होता है तो पारदर्शिता और सुधारों के पक्ष में एक नया समूह या संगठन अस्तित्व में आ जाता है।
    हालांकि फिल्मकार डॉ. आशा जोसेफ नहीं मानतीं कि चर्च से लोगों का भरोसा कम हो रहा है। वो कहती हैं, लोग ऐसा नहीं कहेंगे। वे चर्च जाते रहेंगे। चर्च से आस्था के पैमाने पर ही सवाल किए जा रहे हैं। लेकिन मलयालम लेखक और उपन्यासकार पॉल जखारिया कहते हैं कि ताजा मामले में कुछ भी नया नहीं है और ऐसी कहानियां वो पांच दशकों से सुनते रहे हैं। उनके मुताबिक, यह चर्च, समाज और सरकार की जिम्मेदारी है कि वे आत्ममंथन करें कि नन को ऐसा कदम क्यों उठाना पड़ा और उसे क्यों पुलिस के पास जाना पड़ा।
    जखारिया कहते हैं, चर्च केरल के एक औसत ईसाई व्यक्ति के लिए एक सामाजिक जरूरत है। बपतिस्मा से लेकर शादी समारोह और अंतिम संस्कार तक, हर ईसाई को चर्च की जरूरत होती है। इसलिए लोग बड़े बड़े चर्च बनवाने में खासा पैसा लगाते हैं। मेरा चर्च एक बहुत छोटा चर्च हुआ करता था, अब वह एक भव्य इमारत में तब्दील हो चुका है, जिसे 20 करोड़ रुपयों में बनाया गया। ये पैसा लोगों ने ही वहन किया।
    वो कहते हैं, केरल के एक आम व्यक्ति के लिए चर्च उसके परिवार को एक शक्ति से जुडऩे की सुविधा देता है। इसलिए ये घटना चर्च की छवि में कोई बड़ा धब्बा नहीं लगाने वाली है और मुझे जाने क्यों लगता है कि चर्च भी ये बात जानता है। यही सच है। (बीबीसी)

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Posted Date : 20-Sep-2018
  •  डॉ. अनुज लुगुन, सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया 
    वर्ष 2019 के चुनाव के मद्देनजर तैयारियां हो रही हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार ने अपने चुनावी वादों के मुताबिक सफलता हासिल नहीं की है। इस दौरान धर्म के नाम पर उन्मादी भीड़ ने खूब उत्पात मचाया है। विरोधी विचार वालों और सत्ता से असहमत होनेवाले पक्षों पर हमले भी बहुत हुए हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ दल के पास नैतिक रूप से अपने पुराने वायदों के साथ जनता के सामने आना कठिन है। इसके बावजूद वह अपनी चुनावी तैयारी और रणनीति में कमजोर नहीं है। वहीं दूसरी ओर भाजपा विरोध में सभी विरोधी दल एकजुट होकर महागठबंधन बना रहे हैं। इस बीच एससी/एसटी एक्ट को लेकर पक्ष और विपक्ष दोनों ने भारत बंद कराकर अपनी ताकत प्रदर्शित करने की कोशिश की है। 
    आरक्षण विरोध और उसके समर्थन में दो पक्षों के बीच तीखी टकराहट हुई है और विपक्ष ने तेल की कीमत बढ़ाये जाने को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की है। इन्हीं सबके बीच एक और महत्वपूर्ण घटना घटित हुई है, वह है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ का चुनाव और उसमें लेफ्ट यूनिटी को सभी सीटों पर मिली जीत।
    जेएनयू छात्र संघ का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह राजनीति के वैचारिक बहस का केंद्र है। भाजपा ने वामपंथ का गढ़ कहे जानेवाले जेएनयू में अपनी पैठ बनाने की पुरजोर कोशिश की है। उसे देशद्रोहियों के अड्डे के तौर पर दुष्प्रचारित भी किया गया। लेकिन, वाम छात्र संगठनों ने उसे इस बार के चुनाव में भी उसे पराजित कर उसके उद्देश्य को पूरा होने नहीं दिया।
    इसके आलावा एक तीसरा पक्ष भी इस छात्र राजनीति में उभर कर आया है, वह है बहुजन राजनीति का पक्ष। एक ओर राजद ने अपनी कोशिश की, तो दूसरी ओर आदिवासी-दलित-पिछड़ों के नाम से गठित बहुजन छात्र संगठन 'बिरसा फुले आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशनÓ यानी बापसा (बीएपीएसए) ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की है। बापसा का कहना है कि 'लाल भगवा एक हैं, सारे कॉमरेड फेक हैं।Ó  बापसा का यह पक्ष क्या भविष्य की राजनीति का संकेत है? इस छात्र राजनीति में वाम और नीला अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे। क्या वाम और नीला का यह बंटवारा सिर्फ कैंपस के अंदर की बात रहेगी या आनेवाले चुनाव के दिनों में भी यही विभाजन देखने को मिलेगा? यह सवाल इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि बीच-बीच में 'लाल-नीलाÓ के एक होने की आवाज आती रहती है।
    बापसा का स्वतंत्र चुनाव लडऩा बहुजन राजनीति के उस पक्ष का संकेत है, जिसमें वह ब्राह्मणवाद के विरोध की लड़ाई और सामाजिक न्याय के मुद्दे को ठीक से न उठाये जाने को सवर्ण मानसिकता का सूचक मानता है। यह बहुजन को उस एकीकरण की दिशा में आगे ले जाने की कोशिश करता है, जिसके ने होने की वजह से वंचितों को राजनीतिक शक्ति नहीं मिल सकी है। बापसा एक सवाल की तरह है वाम प्रगतिशील संगठनों के लिए। भारतीय वाम का नेतृत्व भले ही सवर्णों के हाथ में हो उसका वैचारिक आधार और उसका लक्ष्य वंचित और वंचितों की मुक्ति है। लेकिन, संसदीय वाम उनको नेतृत्व देने के मामले में असफल रहा है। यह बहुजनों के वाम से अलगाव का बड़ा कारण है। 
    वाम और बापसा के आमने-सामने होने से जो टकराहट उभरी है वह इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि आम बर्ताव में एक दूसरे के खिलाफ यह भी आरोप लगता है कि वाम में शामिल दलित पिछड़े भटके हुए लोग हैं और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने में जुटे दलित-पिछड़े-आदिवासी अवसरवादी हैं। छात्र राजनीति के इस चेहरे से हम मुख्यधारा की संसदीय राजनीति के बारे में कोई अनुमान लगा सकते हैं या नहीं? यह सवाल है।  यह तो तय है कि बहुजन एकता की वैचारिकी मजबूत हो रही है। उसी की ताकत का परिणाम है कि 'लाल-नीलाÓ के एक होने की बात भी उठ रही है और उसे भविष्य के विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है। 
    लेकिन नयी उभरती बहुजन राजनीति की बड़ी चुनौती यह होगी कि वह खुद को कैसे लालू-मुलायम-मायावती की राजनीति से आगे ले जाती है। सामाजिक न्याय के प्रश्नों को मुखरता से उठाने के बावजूद यह आर्थिक सवाल बना रह जायेगा कि देश की अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी गिरफ्त से कैसे मुक्त किया जाये? वंचितों के सामाजिक सवालों को मुखरता के साथ राजनीति के केंद्र में लाने के बावजूद कोई वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था न देने की वजह से ही बहुजन में बिखराव हुआ और उसका भरपूर लाभ उठाकर भाजपा ने सभी विपक्षियों को एक कोने में धकेल दिया। 
    राजनीतिक रणनीतियों के बीच में सबसे जरूरी मुद्दा है हमारा बदलता समाज विज्ञान। उदारवाद के बाद के ढाई दशकों में सवर्ण और अवर्ण दोनों पक्षों की युवा पीढ़ी तैयार हुई है। संचार क्रांति की 'फोर जीÓ स्पीड वाले दौर में इनके पास न सामाजिक न्याय जैसे सामाजिक मुद्दों को समझने का धैर्य है, और न ही पूंजीवाद की क्रूरता को विश्लेषित करने का संयम है। 
    हाल के दिनों में हुई झड़पों में इसी युवा वर्ग की भागीदारी सबसे ज्यादा दिखी है। यही युवा वर्ग अवसरों से सबसे ज्यादा वंचित है। यही बेरोजगारी की मार झेल रहा है।  बाजार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार इत्यादि को औसत आय वाले आम युवाओं की खरीद से दूर कर दिया है। इसके बावजूद वह अपने ही बुनियादी मुद्दों पर एकजुट नहीं है। सत्ता की विफलताओं पर सवाल उठाने के बजाय यह एक दूसरे से ही भिडऩे को तैयार हैं। छद्म देशभक्ति और देशद्रोह जैसे गैर रचनात्मक मुद्दों में उलझा यह युवा बदलते हुए समाजशास्त्र को समझ नहीं पा रहा है। अद्र्ध-सामंती और अद्र्ध-पूंजीवादी प्रवृत्तियों से नियंत्रित यह युवा वर्ग आपने दायरे से बाहर न किसानों-आदिवासियों की जमीन लूट को लेकर संवेदनशील दिखायी देता है और न वंचितों और अल्पसंख्यकों पर होनेवाले उत्पीडऩ से चिंतित होता है। 
    परिणामस्वरूप वह धार्मिक उन्माद और मॉब लिंचिंग की अराजक भीड़ में तब्दील हो रहा है। अपने समय में उग्र हुई इन परिस्थितियों पर स्वयं भाजपा उतनी संवेदनशील नहीं दिखी है और न ही उसने कोई सामाजिक और आर्थिक विकल्प प्रस्तुत किया है।  और शायद ही महागठबंधन बदले हुए सामाजिक विज्ञान के लिए कोई नया विकल्प तैयार कर पायेगा। तो क्या फिर चुनाव सिर्फ सीट जुटाने की कवायद भर रह जायेगा? जब तक हमारे सामाजिक न्याय के मुद्दे और आर्थिक मुद्दे क्रांतिकारी तरीके से हल नहीं हो जाते हैं, यह सवाल बना रहेगा। https://www.prabhatkhabar.com/

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Posted Date : 20-Sep-2018
  •  प्रभाकर
    अदालत ने इन 40 लाख व्यक्तियों के दावे और आपत्तियां स्वीकार करने का काम शुरू करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक यह प्रक्रिया 25 सितंबर से शुरू होकर 60 दिनों तक चलेगी। इसके तहत अपनी नागरिकता साबित करने के लिए लोग पहले सूचीबद्ध 15 में से 10 दस्तावेजों को दिखा सकते हैं।
    अदालत ने एनआरसी के संयोजक पर मसौदे से संबंधित जानकारियां केंद्र से साझा करने पर भी फिलहाल रोक लगा दी है। इस मामले की अगली सुनवाई 23 अक्तूबर को होगी। ध्यान रहे कि एनआरसी के अंतिम मसौदे की विश्वसनीयता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इनमें दशकों से असम में रहने वाले लाखों हिंदीभाषी लोगों के नाम भी शामिल नहीं हैं।
    सुप्रीम कोर्ट के जज रंजन गोगोई और न्यामूर्ति आरएफ नरीमन की एक खंडपीठ ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई के बाद एनआरसी के अंतिम मसौदे से बाहर रखे गए 40 लाख लोगों के दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया 25 सितंबर से शुरू करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा है कि एनआरसी मुद्दे की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उन लोगों को दूसरा मौका देना जरूरी है जिनके नाम इसके मसौदे से बाहर हैं।
    इससे पहले पांच सितंबर को इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने एनआरसी के संयोजक प्रतीक हाजेला से पूरी कवायद पर विस्तृत गोपनीय रिपोर्ट मांगी थी। केंद्र व राज्य सरकारों की दलील थी कि नागरिकता साबित करने के लिए 15 में से किसी एक दस्तावेज को दाखिल करने की अनुमति दी जानी चाहिए। लेकिन खंडपीठ ने इनमें से पांच दस्तावेजों पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इनकी पुष्टि में दिक्कत है। हालांकि बाकी दस दस्तावेज समुचित प्राधिकरण की ओर से बनाए गए हैं जिनकी पुष्टि की जा सकती है।
    सुनवाई के दौरान एडवोटेकट जनरल केके वेणुगोपाल ने दलील दी कि इन पांच दस्तावेजों को बाहर करने से निरक्षर लोगों की बड़ी आबादी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। असम के अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि राज्य सरकार अंतिम एनआरसी में एक भी अवैध आप्रवासी का नाम नहीं चाहती। लेकिन साथ ही यह भी नहीं चाहती कि समुचित कागजात के अभाव में किसी वैध नागरिक का नाम इस सूची से बाहर हो जाए।
    वेणुगोपाल ने सवाल किया कि आखिर अदालत पांच दस्तावेजों को सूची से बाहर रखने पर जोर क्यों दे रही है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि गोपनीय रिपोर्ट में कुछ बातें ऐसी हैं जिनको जनहित में सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा। अदालत ने कहा है कि वह 30 दिनों के बाद राज्य की जमीनी स्थिति की समीक्षा के बाद इस सवाल पर फैसला करेगी कि उन पांचों दस्तावेजों को दाखिल करने की अनुमति दी जाए या नहीं।
    असम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर और उसकी निगरानी में 2015 में एनआरसी को अपडेट करने का काम शुरू हुआ था। दो साल से भी लंबे समय तक चली जटिल कवायद के बाद बीते साल 31 दिसंबर को एनआरसी के मसविदे का प्रारूप प्रकाशित किया गया था, जिसमें 3।29 करोड़ में से 1।90 करोड़ नाम ही शामिल थे।
    एनआरसी के तहत 25 मार्च 1971 से पहले बांग्लादेश से यहां आने वाले लोगों को स्थानीय नागरिक माना जा रहा है। देश के विभाजन के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले अवैध आप्रवासियों की पहचान के लिए राज्य में 1951 में पहली बार एनआरसी को अपडेट किया गया था। उसके बाद भी बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ लगातार जारी रही। खासकर 1971 के बाद यहां इतनी भारी तादाद में शरणार्थी पहुंचे की राज्य में आबादी का स्वरूप ही बदलने लगा।
    उसी वजह से अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने अस्सी के दशक की शुरुआत में असम आंदोलन शुरू किया था। लगभग छह साल तक चले इस आंदोलन के बाद 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। उस समझौते में अवैध आप्रवासियों की पहचान के लिए एनआरसी को अपडेट करने का प्रावधान था। लेकिन किसी न किसी वजह से यह मामला लटका रहा।
    एनआरसी के संयोजक प्रतीक हाजेला ने जुलाई में अंतिम मसौदा जारी करते हुए कहा था कि एनआरसी के तहत 2 करोड़ 89 लाख 677 लोगों को भारतीय नागरिक पाया गया है। इनके नाम मसविदे में शामिल हैं। उन्होंने कहा था कि जिन लगभग 40 लाख लोगों के नाम इस सूची में शामिल नहीं हैं, उनको भी अपने दावे और आपत्तियां पेश करने का पर्याप्त मौका दिया जाएगा। अब अदालती फैसले ने सूची से बाहर रहे 40 लाख लोगों के मन में उम्मीद की एक नई किरण पैदा कर दी है। 
    असम के विभिन्न राजनीतिक दलों ने एनआरसी के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तो स्वागत किया है लेकिन साथ ही कहा है कि नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी 15 दस्तावेजों की सूची में से पांच के नाम नहीं हटाए जाने चाहिए। फिलहाल शीर्ष अदालत ने जिन 10 दस्तावेजों के सहारे दावे व आपत्तियां जमा करने और नागरिकता साबित करने को मंजूरी दी है, उनमें जमीन से संबंधित दस्तावेज, स्थानीय आवास प्रमाणपत्र, भारतीय जीवन बीमा निगम की पॉलिसी, पासपोर्ट, सरकारी लाइसेंस, केंद्र या राज्य सरकार के उपक्रमों में नौकरी का प्रमाणपत्र, बैंक या पोस्ट ऑफिस के खातों का ब्योरा, समुचित अधिकारियों की ओर से जारी जन्म प्रमाणपत्र, बोर्ड या विश्वविद्यालय की ओर से जारी शैक्षणिक प्रमाणपत्र और न्यायिक या राजस्व अदालतों में किसी मामले की कार्यवाही का ब्योरा शामिल है। लेकिन यह तमाम दस्तावेज 24 मार्च 1971 के पहले के होने चाहिए।
    सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता साबित करने के लिए 1951 के एनआरसी, 1971 के पहले की मतदाता सूची, नागरिकता प्रमाणपत्र, शरणार्थी पंजीकरण प्रमाणपत्र और राशनकार्ड जैसे बाकी पांच दस्तावेजों के इस्तेमाल पर फिलहाल रोक लगा दी है। अखिल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ (आम्सू) ने उम्मीद जताई है कि अगली सुनवाई में अदालत बाकी पांच दस्तावेजों के इस्तेमाल की भी अनुमति दे देगी। आम्सू के अध्यक्ष अजीजुर रहमान कहते हैं, हमें अदालत और न्याय प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है। उम्मीद है कि अगली सुनवाई में दावों व आपत्तियों के लिए बाकी पांच दस्तावेजों के इस्तेमाल की भी अनुमति मिल जाएगी।
    राज्य में सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस ने भी इन पांचों दस्तावेजों के इस्तेमाल की अनुमति देने का समर्थन किया है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रंजीत दास कहते हैं, लाखों लोगों ने इन दस्तावेजों के जरिए एनआरसी में अपने नाम शामिल करने का आवेदन दिया है। उम्मीद है कि इनके इस्तेमाल की अनुमति मिल जाएगी। दास का सवाल है कि जब पहले इन दस्तावेजों को स्वीकार किया गया था, तो बाद में अचानक इन पर रोक क्यों लगा दी गई।
    विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता देबब्रत सैकिया कहते हैं, एनआरसी के लिए पहले योग्यता के जो मानक तय किए गए थे, उनमें 1951 की एनआरसी और 1971 से पहले की मतदाता सूची को भी जरूरी दस्तावेजों की सूची में शामिल किया गया था। उम्मीद है कि इनके इस्तेमाल पर लगी रोक स्थायी नहीं होगी।
    बावजूद इसके एनआरसी से बाहर रहे लोगों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से काफी प्रसन्नता है। सिलचर में तीन पीढिय़ों से रहने वाले पवन चंद्र दास कहते हैं, हमें इस बात की खुशी है कि अदालत ने हमारी दिक्कत को समझा है। उम्मीद है कि अब हमारे परिवार के तमाम लोगों के नाम भी एनआरसी में शामिल हो जाएंगे। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 19-Sep-2018
  • मोंटेक सिंह अहलूवालिया,  पूर्व उपाध्यक्ष, योजना आयोग 
    लेहमन ब्रदर्स के पतन की 10वीं वर्षगांठ पर उम्मीद के मुताबिक विचारों की बाढ़ दिखी है। गुणा-भाग इन सवालों पर हो रहे हैं कि इस संकट की वजह क्या थी? क्या बेहतर तरीके से इससे निपटा गया, और हमने इससे किस तरह के सबक सीखे? ज्यादातर लेखों की बुनियाद समान है, सिवाय एक को छोड़कर, जो पूरी तरह मूल विचार लग रहा है। इसे पेश किया है अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टीन लेगार्ड ने। उनका कहना है कि वित्तीय संस्थानों के शीर्ष पदों पर यदि महिलाओं की संख्या ज्यादा होती, तो इस संकट का खतरा कम होता। 
    बहरहाल, 2008 में जब यह संकट गहराया, तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने 'नए ब्रेटन वुड्सÓ की जरूरत बताई थी। इसका अर्थ था कि हमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पुनर्गठन के साथ-साथ नए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे की दरकार है। नए जी 20 की बैठक में यह एजेंडा रखा भी गया था कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में सुधार किए जाएं। आज सवाल यह है कि दुनिया को फिर से ऐसी किसी वैश्विक मंदी से बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को मजबूत करना कितना फायदेमंद रहा? मेरी नजर में इसका संक्षिप्त जवाब यही है कि इन सस्थानों ने ज्यादा कुछ नहीं किया। 
    अमेरिकी वित्तीय प्रणाली को स्थिर करने में जिन निर्णयों का बड़ा योगदान था, उनमें एक था-  बेन बर्नान्के का फैसला कि नकदी से सिस्टम को भर दिया जाए और ब्याज दर कम रखे जाएं। और दूसरा- अमेरिकी ट्रेजरी विभाग का यह निर्णय कि मुश्किलों में पड़ी हुई परिसंपत्तियों को खरीदते हुए सिस्टम में 800 अरब अमेरिकी डॉलर झोंक देने चाहिए। ये कदम किसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान की सलाह पर नहीं उठाए गए थे। अगर ऐसा कोई मशविरा लिया गया होता, तो आसन्न खतरा बताकर कई चेतावनियां जरूर दे दी गई होतीं।
    यूरोपीय बैंकिंग सिस्टम इसीलिए लगातार मुश्किलों से जूझता रहा, क्योंकि वह अपनी समस्याओं को दूर करने को लेकर ज्यादा संजीदा नहीं था। आईएमएफ को 500 अरब अमरीकी डॉलर की अतिरिक्त सहायता देकर मजबूत जरूर बनाया गया था, और इसका इस्तेमाल यूरोजोन संकट के समय छोटे-छोटे यूरोपीय देशों को आर्थिक मदद देने के लिए किया भी गया। मगर पुर्तगाल, यूनान, इटली, स्पेन जैसे देशों की जरूरतें पूरी करने के लिए कोष के पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे और यह आमतौर पर यूरोपीय सेंट्रल बैंक के साथ मिलकर काम करता रहा। अंतत: यूरोपीय सेंट्रल बैंक ही बड़ी तब्दीली लाने में सफल रहा। 
    हालांकि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में कुछ सुधार भी हुए। आईएमएफ के लिए 500 अरब अमेरिकी डॉलर का कोटा बढ़ाया गया और कोटे के शेयरों में भी बदलाव किए गए। इसके बोर्ड में यूरोपीय देशों की सीटें घटाकर दो कर दी गईं, ताकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिल सके। ये सभी सही दिशा में उठाए गए कदम थे। हालांकि एक महत्वपूर्ण आयाम में कोई बदलाव नहीं किया गया। असल में, अमरीका ने अपना 16 फीसदी वोट शेयर बरकरार रखा, जिसके कारण वह संरचनात्मक बदलावों पर वीटो कर सकता है। वित्तीय स्थिरता मंच में संशोधित करके उसे वित्तीय स्थिरता बोर्ड (एफएसबी) बनाना भी एक उल्लेखनीय सुधार था। इसमें भारत समेत तमाम उभरते देशों का प्रतिनिधित्व है। 
    रही बात आर्थिक नियमन की, तो इस क्षेत्र में भी कुछ अच्छे काम हुए हैं। बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए बने 'बेसल-तीनÓ मानक का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि बैंकों में पूंजी बढ़ी है। 'कैपिटल बफरÓ (पूंजी का भंडार) के महत्व की समझ भी पुख्ता हुई है, पर व्यवहार में यह कैसे अमल में लाया जाएगा, यह साफ नहीं हो पाया है। 'क्रॉस बॉर्डर रिजॉल्यूशनÓ के क्षेत्र में भी मनमाफिक काम नहीं हो पाया। 
    बैसल-तीन के तहत पूंजी-पर्याप्तता का मानदंड मार्च, 2017 तक लागू किए जाने की बात थी, पर इसे बढ़ाकर करके अब मार्च, 2019 कर दिया गया है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए इससे समस्या खड़ी हो सकती है, जो डूब कर्ज यानी एनपीए से बुरी तरह जूझ रहे हैं। एनपीए के खात्मे के लिए प्रावधान बनाने से पूंजी-प्रवाह पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। यह तो अभी नहीं कहा जा सकता कि मार्च 2019 तक पूंजी की कमी किस सीमा तक होगी, पर इतना तय है कि यह काफी बड़ी होगी।
    2008 की वैश्विक मंदी की एक दिलचस्प बात यह थी कि अत्यधिक जोखिम लेने और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करने के बाद भी किसी को आपराधिक गुनहगार नहीं ठहराया गया। क्रिस्टीन लेगार्ड ने इसकी ओर इशारा किया है, हालांकि मैं नहीं समझता कि सजा कोई बड़ी तब्दीली लाती। जिस लोकप्रियतावादी राजनीति का उभार हम हाल के वर्षों में देख रहे हैं, उसे बढ़ाने में आर्थिक प्रवृत्तियां शायद खुद सक्षम थीं। हां, भारत में बैंकों की जवाबदेही का मसला प्रासंगिक जरूर है, खासतौर से बढ़ते एनपीए को देखते हुए। रघुराम राजन ने बताया है कि सभी एनपीए धोखाधड़ी के कारण नहीं बढ़े हैं, बल्कि कई की वजह तो कमजोर बैंकिंग व्यवस्था है। इसीलिए इसे रोकने के लिए महज आपराधिक अभियोजन पर्याप्त नहीं होगा।  
    यह कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक वित्तपोषण का भार उठाने को तैयार नहीं थे। हमें यह जानना चाहिए कि क्या वाकई में ऐसा ही था? फिर इस कमजोरी को दूर करने की योजना पर गंभीर चिंतन भी जरूरी है। हमें यह भी सोचना होगा कि भविष्य में इन समस्याओं से कैसे बचा जाएगा? इतिहास गवाह है कि वित्तीय संकट आश्चर्यजनक रूप से नियमित तौर पर आते हैं; भले ही वे पहले जैसे गंभीर न हों। फिलहाल कई देश कर्ज-संकट से जूझ रहे हैं। हमें यह आकलन करना होगा कि क्या यह वैश्विक मंदी की आहट है? अगर यह स्थिति मंदी का कारण नहीं है, तब भी इसके असर की पड़ताल तो हमें करनी ही चाहिए। हमें इस पर भी विचार करना चाहिए कि मौजूदा स्थिति भारत को किस तरह प्रभावित कर सकती है? जी-20 को तो खैर इन सवालों से जूझना ही चाहिए। https://www.livehindustan.com/blog

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Posted Date : 19-Sep-2018
  • समीर मिश्रा
    गुजरात में पाटीदार समुदाय को आरक्षण दिलाने के लिए उपवास पर बैठे हार्दिक पटेल ने 18 दिन बाद अपना अनशन और उपवास तो तोड़ दिया लेकिन आरक्षण की उनकी मांग को मानना तो दूर, सरकार का कोई प्रतिनिधि हाल-चाल लेने भी नहीं पहुंचा। हालांकि इसकी वजह यह भी हो सकती है कि हार्दिक पटेल अकसर सरकार के खिलाफ आंदोलन करते रहे हैं लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि जनहित जैसे मुद्दों पर यदि कोई मांग होगी, तो वो सरकार से ही की जाएगी, किसी और से नहीं।
    पाटीदार समुदाय को आरक्षण दिलाने को लेकर हार्दिक पटेल पहले भी गुजरात में आंदोलन कर चुके हैं। हार्दिक पटेल का आंदोलन, आरक्षण को लेकर चल रहे उन्हीं आंदोलन की श्रृंखला की एक कड़ी है, जो बीते कई सालों से देश के अलग-अलग हिस्सों में चली आ रही है।
    गुजरात में पटेल समुदाय, राजस्थान में गुर्जर समुदाय, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाट समुदाय, आंध्र प्रदेश का कापू समुदाय और देश भर में ऐसे ही न जाने कितने समुदाय और कितनी जातियां आरक्षण पाने के लिए लाइन में खड़ी हैं। इसके अलावा कई जातियां पिछड़े वर्ग से अनुसूचित वर्ग में और कथित तौर पर सवर्ण कही जाने वाली तमाम जातियां, अब आरक्षण के स्वरूप को ही बदलकर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रही हैं। भारत में निजी क्षेत्र के इतने विकास के बावजूद आज भी सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र सरकारी क्षेत्र ही है, जहां करोड़ों लोग या तो सीधे तौर पर नौकरी कर रहे हैं या फिर किसी अन्य तरीके से वहां से रोजगार पाए हुए हैं। इसके अलावा सरकारी नौकरी अभी भी कई मायनों में निजी क्षेत्र की तुलना में बेहतर समझी जाती है, चाहे स्थायित्व की बात हो या फिर रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं का मुद्दा हो। ये अलग बात है कि पिछले करीब एक दशक से रिटायरमेंट के बाद पेंशन सुविधा खत्म कर दी गई है। बावजूद इसके, सरकारी नौकरी के प्रति लोगों का आकर्षण कायम है।
    नई पेंशन योजना के तहत कर्मचारियों के वेतन और डीए की दस फीसदी धनराशि की कटौती की जा रही है और इतनी ही रकम सरकार की तरफ से अंशदान के रूप में कर्मचारी के पेंशन फंड में जमा की जा रही है। सेवानिवृत्ति के वक्त कर्मचारियों को इसमें से 60 फीसदी रकम ही वापस की जाएगी और बाकी की 40 फीसदी धनराशि पर मिलने वाले ब्याज को पेंशन के रूप में दिया जाएगा। करोड़ों की बेरोजगार आबादी के लिए सरकारी नौकरियां न सिर्फ ऊंट के मुंह में जीरा जैसी ही हैं, बल्कि उदारीकरण के बाद से आबादी के अनुपात में इनकी संख्या में काफी कमी भी आई है। इसलिए हर कोई नौकरी पाने के लिए आरक्षण जैसे शॉर्ट-कट को पाने की कोशिश में लगा है। ये अलग बात है कि प्रतियोगिता, होड़ और हताशा आरक्षण पाने वाले समुदाय में भी है और अनारक्षित समुदाय में भी। हां, अंतर जरूर कम हो जाता है।
    देश के कई राज्यों में आरक्षण को लेकर अलग अलग समुदायों की तरफ से मांग उठती रही है और हमेशा सरकारें या राजनीतिक दल इन मांगों को पूरा करने के नाम पर कुछ न कुछ वादे भी करते रहे हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक कोई भी राज्य 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता। कुछ राज्यों, जैसे तमिलनाडु में आरक्षण की पचास प्रतिशत की सीमा को बढ़ाया भी गया है लेकिन ज्यादातर राज्यों में अभी इसी आधार पर आरक्षण का आवंटन किया गया है।
    मौजूदा व्यवस्था के तहत देश में अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 7।5 प्रतिशत और अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। आरक्षण आंदोलनों का सबसे गंभीर पहलू इनका हिंसक हो जाना है। चाहे वो मराठा आंदोलन हो, जाट आंदोलन हो या फिर गुर्जर आंदोलन।आरक्षण को लेकर देश भर में जो विवाद हैं, वे मुख्य रूप से दो स्तरों पर हैं। 
    एक ऐसा तबका है जो खुद को सामाजिक और शैक्षिक तौर पर पिछड़ा मानता है लेकिन उसे किसी तरह का आरक्षण नहीं मिला है। जाट, मराठा, पाटीदार, कापू जातियों के आंदोलन इसी श्रेणी में आते हैं।
    दूसरा वर्ग वो है जो अभी तक पिछड़ा वर्ग में है लेकिन उसे लगता है कि उसकी सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक हैसियत उन वर्गों की तरह है, जिन्हें अनुसूचित जाति या जनजाति में शामिल किया गया है। यानी ये अपने से नीचे वर्ग में आने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। इन्हें लगता है कि पिछड़े वर्ग के आरक्षण के तहत उन्हें इसका ज्यादा फायदा नहीं मिल पा रहा है। राजस्थान में गुर्जर, झारखंड में कुर्मी और उत्तर प्रदेश में कई पिछड़ी जातियों की यही मांग है।
    पिछले कुछ समय से देश में वह वर्ग भी मुखर हुआ है, जो अब तक न तो किसी तरह का आरक्षण पा रहा था और न ही मौजूदा व्यवस्था में उसके पाने की उम्मीद है। यानी सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से जिसे अभी तक समृद्ध समझा जाता रहा है। सच्चाई यह है कि यह वर्ग सामाजिक रूप से भले ही कथित तौर पर उच्च वर्ग में आता हो लेकिन शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ापन इस वर्ग में भी कमोवेश वैसा ही है जैसा कि आरक्षण पाने वालों में है। इन वर्गों की ओर से यह आवाज भी उठती रहती है कि जातिगत आरक्षण खत्म किया जाए और आर्थिक रूप से गरीबों को आरक्षण दिया जाए।
    आरक्षण को लेकर पिछले कुछ समय से राजनैतिक सरगर्मी भी देखी जा रही है। भाजपा और कांग्रेस समेत कई विपक्षी नेता भी समय-समय पर आरक्षण को लेकर बयान देते रहे हैं। साथ ही आरक्षण खत्म करने को लेकर मोदी सरकार पर आरोप भी लगते रहे हैं। ये अलग बात है कि ऐसा न करने की खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार कसम खा चुके हैं।
    आरक्षण को लेकर सवाल कई उठते हैं और उठते रहेंगे क्योंकि यह सीधे अलग-अलग सामाजिक वर्गों के सीधे फायदे से जुड़ा है और कुछ वर्गों को इसमें अपना नुकसान दिखता है। राजनीतिक दलों के अलावा प्रबुद्ध वर्ग भी इसे हवा देते रहते हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि अब समय आ चुका है जब इसकी व्यापक समीक्षा की जाए और पारंपरिक तौर पर चली आ रही इस व्यवस्था में संविधान संशोधन के जरिए व्यापक बदलाव किया जाए।(डॉयचे वैले)

     

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Posted Date : 19-Sep-2018
  • डॉ. विजय अग्रवाल
    आइए, पहले जानते हैं कि बातें क्या हैं, और वह भी यह जाने बिना कि ये किसने कही हैं-अमरीका  विकसित नहीं बल्कि विकासशील देश है। विश्व व्यापार संगठन की गलत नीतियों के कारण चीन आर्थिक महाशक्ति बनता जा रहा है। अमरीका के सैन्य खर्च का ज़्यादातर हिस्सा दूसरे देशों की रक्षा में खर्च होता है, जिनमें कई देश ऐसे हैं, जो अमेरिका को पसंद नहीं करते। मैं नहीं जानता कि आप उस शख्स के खिलाफ महाभियोग कैसे लगा सकते हैं, जिसने इतना अच्छा काम किया हो। मैं बता रहा हूं कि यदि कभी भी मेरे खिलाफ महाभियोग लग गया, तो बाज़ार चरमरा जाएगा, और इसके बाद हर कोई बहुत गरीब हो जाएगा।
    आपको यह समझने में कोई विशेष दिक्कत नहीं हो रही होगी कि दंभ से भरी इस तरह की अनैतिहासिक एवं अनर्गल बातें कौन कह सकता है। सूत्र (क्लू) के रूप में यहां इतना बताना ही पर्याप्त होगा कि निश्चित रूप से ऐसा व्यक्ति विश्व के किसी शक्तिशाली राष्ट्र से जुड़ा ही हो सकता है। वे अमेरिकी अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लगभग पौने तीन साल की कार्यशैली से खुश हो सकते हैं, जो अमेरिकन फस्र्ट के नारे पर विश्वास करते हुए अपने देश के लिए एक स्वर्णयुग की कल्पना कर रहे हैं, लेकिन सच यह है कि अधिकांश अमरीकी उनकी कार्यशैली से बेहद नाखुश हैं। यह अकारण नहीं है कि वहां अब तक जितने भी राष्ट्रपति हुए हैं, उनमें वह इतनी जल्दी अलोकप्रिय होने वाले प्रथम राष्ट्रपति हैं।
    यदि कोई भी नेता अन्य देश में लोकप्रिय या अलोकप्रिय होता है, तो उसमें उस देश के अपने हितों और अहितों का तत्व सबसे प्रमुख होता है, लेकिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सामान्यतया अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इस मूल से भी परे जा चुके हैं। इसका मुख्य कारण यह जान पड़ता है कि शायद उनका चित्त स्थिर नहीं है। एक मिनट पहले वह यदि कोई रुख लेते हैं, तो अगले ही पल वह ठीक उसका विपरीत रुख ले लेते हैं। इसके कारण वह अब केवल दुनिया के लिए ही नहीं, बल्कि अपने साथ काम करने वालों के लिए भी भरोसे के आदमी नहीं रह गए हैं।
    उनके अपने निवास व्हाइट हाउस में उनकी सलाहकार रहीं ओमारोसा मेनीगाल्ड न्यूमन ने उनके बारे में एक बड़ी चटखारेदार बात लिखी है। सलाहकार होने के कारण उन्होंने ट्रंप को बहुत करीब से देखा है। ट्रंप ही उन्हें अपने सलाहकार के रूप में लेकर आए थे और उन्होंने ही कुछ समय बाद उन्हें व्हाइट हाउस से बाहर का रास्ता दिखा दिया। ऐसा उन्होंने न्यूमन के साथ ही नहीं किया है, बहुत से अन्य लोगों के साथ भी किया है। उनके साथ काम करने वालों को यह भरोसा नहीं है कि ऐसा उनके साथ नहीं हो सकता।
    न्यूमन ट्रंप को एक ऐसा आत्मकेंद्रित व्यक्ति बताती हैं, जिसका स्वयं पर जऱा भी नियंत्रण नहीं है। वह लिखती हैं कि  अपने से बाहर कुछ न सोच पाने वाला यह इंसान ऐसे मानसिक पतन का शिकार है, जो घृणा से प्यार करता है, निन्दा और अपमान उसे ऊर्जा देते हैं, तथा भ्रम और अराजकता की स्थिति में जिसे खुशी मिलती है। 
    भले ही इसके जवाब में ट्रंप न्यूमन को नौटंकीबाज़ तथा उसकी बातों को घटिया बातें बताएं, लेकिन कुछ समय पहले ब्रिटेन की महारानी एवं कनाडा तथा जर्मनी के सरकारों के प्रमुखों के साथ उन्होंने जिस तरह का अपमानजनक व्यवहार किया है, तथा उनके अन्य निर्णयों को देखते हुए न्यूमन की बातों को झुठलाना कठिन ही नहीं, असंभव है। यही कारण है कि आज ट्रंप केवल दुनिया के लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने देश के लिए भी इतने अविश्वसनीय लगने लगे हैं।
    डोनाल्ड ट्रंप के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह जान पड़ती है कि उन्होंने न तो इतिहास पढ़ रखा है कि वह दुनिया को जान सकें और न ही वे अमेरिका के पिछले सवा दो सौ साल के छोटे-से इतिहास से ही परिचित हैं कि वह अमेरिका को समझ सकें। अन्यथा वह कभी अमेरिका के च्फ्री माइंड, फ्री मार्केटज् तथा च्फ्री जनताज् के मूलभूत सिद्धांतों पर इतनी बुरी तरह आक्रमण नहीं करते। उन्हें मालूम होता कि अमेरिका के निर्माण में अमेरिका से अधिक अमेरिका से बाहर के लोगों का योगदान रहा है। आज अमेरिका जिस संपत्ति के टीले पर बैठा हुआ है, वह मूलत: प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाश से इक_ी की गई दौलत है।
    भले ही ट्रंप आज दुनिया के धनी उद्योगपतियों में से एक हैं, लेकिन लगता तो यही है कि उन्हें अर्थशास्त्र की भी जानकारी नहीं है। यदि होती, तो वह कभी अमेरिका जैसे देश को विकासशील बताने जैसी मूर्खतापूर्ण बातें नहीं करते। वह अमेरिका को च्डेवलपिंग नेशनज् बता रहे हैं, तो उन्हें चाहिए कि वह फिर अफ्रीका के पिछड़े और एशिया के विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को कोई नाम दें।
    कुल मिलाकर लगता यही है कि डोनाल्ड ट्रंप कुछ भी कह सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए दुनिया को चाहिए कि वह भविष्य की समस्त संभावनाओं और आशंकाओं को ध्यान में रखकर भविष्य के स्वरूप पर विचार करे। (एनडीटीवी)

     

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Posted Date : 18-Sep-2018
  •  प्रो. सतीश कुमार, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा
    पिछले दिनों नेपाल के दो महत्वपूर्ण निर्णय इस बात की पुष्टि करते हैं कि नेपाल न केवल चीन ने नजदीक जा रहा है, बल्कि भारत के विरोध में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहा है। काठमांडू में हुए बिम्सटेक मीटिंग के दौरान उसने खुद को अलग कर लिया। ठीक उसके बाद चीन के साथ सैनिक अभ्यास में शामिल हो गया, जिसकी शुरुआत 17 सितंबर से होगी। यह एक सोची-समझी योजना थी। दूसरी तरफ, चीन ने नेपाल को भारत से दूर खींचने के लिए अपने बंदरगाहों की तरफ से रास्ता खोल दिया। अभी तक नेपाल में आनेवाली चीजें कोलकोता पोर्ट से आती  थीं।  चीन  की  यह चाल भारत-नेपाल की विशेष मैत्री को तोडऩे के लिहाज से किया गया है। भारत ने इन दोनों परिवर्तनों पर गहरी चिंता जाहिर की है। नेपाल अपनी आंतरिक राजनीति को इसका कारण मानकर इसकी व्याख्या कर रह रहा है। लेकिन, कहानी कुछ और ही है।
    चीन के राष्ट्रपति ने नेपाल को भरोसा दिलाया है कि नेपाल को मौलिक औद्योगिक सुविधाओं को बनाने की पूरी मदद करेंगे। पनबिजली, सीमेंट और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए चीन 2.24 बिलियन डॉलर की राशि नेपाल के लिए घोषित किया है। नेपाल ने सितंबर 2017 में ही यह घोषित कर दिया था कि वह  चीन के वन बेल्ट वन रोड का हिस्सा बनेगा। ओली ने चीन यात्रा के दौरान इस निर्णय को अमलीजामा पहना दिया। 
    शी जिनपिंग ने यह विश्वास दिलाया है कि नेपाल की आर्थिक समस्याओं को दूर करने की चीन पूरी कोशिश करेगा। नेपाल और चीन के बीच 4.6 बिलियन की लागत से नेपाल के बीहड़ पहाड़ी इलाकों में सब्जी और अन्य फसल के उत्पादन के लिए फूड पार्क बनाए जाएंगे। कई वर्षों से लंबित 164 मेगावॉट क्षमता की जलविद्युत परियोजना का निर्माण भी शुरू किया जाएगा।
    यहां पर कई सवाल हैं, जो भावी रणनीति को तय करेंगे। यह संघर्ष वर्षों पुराना है। साल 1950 की संधि नेपाल के शासकों को आंख में सुई की तरह चुभती रही है। उनका हर बार एक ही शगल रहा है कि भारत की दादागिरी रही है। 
    हर बार नेपाल की आंतरिक मुठभेड़ के लिए भारत पर दोष मढ़ा गया। चूंकि नेपाल की आर्थिक रीढ़ भारत के सहारे चलती है और 90 फीसदी नेपाल का व्यापार भारत के माध्यम से होता है। विदेशों से आनेवाले सामान भी भारत के रास्ते से ही वहां पहुंचते हैं। यही कारण था कि केपी शर्मा ओली ने अपनी पहली यात्रा भारत से शुरू की।  
    चीन का वन बेल्ट रोड केवल नेपाल को मजबूत बनाने के लिए नहीं है। इसका अर्थ भारत को कमजोर बनाने के लिए भी है। इसके कई प्रमाण हैं। राजा महेंद्र ने कहा था कि चीन जब आएगा, तो टैक्सी में नहीं आएगा, बल्कि पूरी क्षमता के साथ आएगा। महेंद्र के पुत्र राजा वीरेंद्र ने भारत और चीन से बराबर दूरी बनाने की नीति को लागू करने की पहल शुरू की। 
    जब बहुमत के साथ उनकी सरकार बन गयी, तो साम्यवादी एजेंडा लागू करना आसान हो गया। चूंकि चीन का तिब्बत वाला हिस्सा आज भी पिछड़ा हुआ है। इसलिए चीन अब नेपाल में अपने व्यापार को नया स्वरूप देकर एक तीर से दो निशाने करना चाहता है। एक ओर तिब्बत के लिए आर्थिक साधन जुटाना चाहता है, दूसरी ओर नेपाल की ऊंची पहाड़ी के रास्तों से नेपाल में अपनी गहरी पैठ बनाना चाहता है। ये दोनों समीकरण भारत के लिए आपत्तिजनक हैं।  चीन रेललाइन की शुरुआत करके भारत से नेपाल की निर्भरता को खत्म करना चाहता है। सिंगते से काठमांडू रेललाइन बनाने की शुरुआत हो चूकी है। पिछले साल चीन ने नेपाल को पुलिस मुख्यालय बनाकर दिया। चीन पोखरा में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी बना रहा है।  चीन की रणनीति है कि नेपाल को अपने प्रभाव में जकड़ लिया जाए। आर्थिक समीकरण के जरिए ऐतिहासिक प्रभाव को पूरी तरह से खत्म करना चाहता है। चीन की ग्लोबल कंपनी ने हल ही में नेपाल में इंटरनेट का जाल बिछाने की भी ठीकेदारी ली है। इसके पहले भारतीय कंपनियों द्वारा नेपाल में इंटरनेट की तारें जुड़ी हुई थीं। अब इसका कंट्रोल रूम हांगकांग में है। चीन इस तरह से भारत के हर उस पहल का विकल्प खोजने की ताक में है, जिससे नेपाल कभी भी भारत की ओर मुड़कर नहीं देखे। चीन अब नेपाल को पेट्रोलियम मुहैया करवाकर भारत की उपयोगिता को कम करना चाहता है। विगत की घटनाओं को एक आधार बनाकर चीन ने नेपाल को पेट्रोलियम सुविधा की व्यवस्था करने की गारंटी दी है। नेपाल ने कई पनबिजली योजनाओं की ठीकेदारी चीन को दी है। चीन चाहता है कि भारत अपने लिए भी बिजली खरीदे। 
    इस तरह भारत-नेपाल संबंध के ऊपर चीन की छाया निरंतर गहरी होती जा रही है। ऐसे में केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का पिटारा लेकर नेपाल को अपनी तरफ नहीं खींचा जा सकता। नेपाल अब भारत को खोजे, उसके पहले भारत को चाहिए कि वह नेपाल को अपना बनाये। भारत द्वारा चलायी जा रही परियोजनाओं की गति बढ़ानी होगी। 
    यह सच है कि राजनीतिक रंग समय के साथ फीका पड़ जाता है, लेकिन भौगोलिक समीपता कभी नहीं बदलती। नेपाल-भारत के बीच यह विशेषता आज भी है और कल भी रहेगा। जरूरत है अपनी व्यवस्था को दुरुस्त करने की। नेपाल में चीन वह स्थान कभी नहीं बना सकता, जो भारत का है। तात्कालिक परिवर्तन केवल राजनीतिक खेल है, जो वहां की कम्युनिस्ट सरकार खेल रही है। स्थितियां जरूर बदलेंगी। https://www.prabhatkhabar.com/ 

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Posted Date : 18-Sep-2018
  • प्रकाश दुबे
    आए हमारी महफिल में  
    इस मुस्कान में कुछ झेंप थी, कुछ पश्चाताप और असहजता। पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा को चुनाव में बहुत कुछ कहा था प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने। बाद में हरकारे भेजकर मनाने का प्रयास किया। डीके शिवकुमार के फार्म हाउस पर छापा पड़ा था। अभी फिर जांच दल पहुंचे। ऐंठकर शिवकुमार ने कहा था-छापों से नहीं डरते हम। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी तो थे ही। ये सब मिलकर कर्नाटक के लिए राहत सहायता मांगने पहुंचे। पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा ने तुरंत बड़ी राशि की मांग रखी। देने और न देने के असमंजस में फं से प्रधानमंत्री मोदी ने अतिवृष्टिï का आंकलन करने के  लिएअफसरों की दो अलग-अलग टीमें भेजने पर हामी भरी। सारे कन्नड़ नेता एकसाथ बोले-और सूखे के लिए?   
    उड़ अकेला 
    उड़ रहे हैं सुरेश प्रभू। इसलिए नहीं, कि नागरिक उड्डïयन मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार उन्हें सौंपा गया है। वे सरकार की आबरू और वोट बचाने के लिए दुनिया घूम रहे हैं। वाणिज्य मंत्री प्रभू रूस, कोरिया होते हुए अर्जेंटाइना पहुंच रहे हैं ताकि भारतीय माल की खरीदी का सौदा हो जाए। जितनी देर आम आदमी बस में नहीं बैठता होगा उतना समय हवाई जहाज में निकाल जाता है। गणेश चतुर्थी कोंकणवासियों का सबसे बड़ा पर्व है। प्रभू आकाश मार्ग में प्रभू के करीब थे। यह बात अलग है कि मंत्री प्रभू उस प्रभु को नहीं भूले। वहां से प्रभू ने गणपति को याद करते हुए परिवार और आत्मीयजनों को शुभकामना संदेश भेजे। बीस देशों का दौरा। करार कराना हंसी-खेल नहीं है।             
     करेला और नीम चढ़ा
     केरल का सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल बाढ़ और वर्षा की समस्या पर प्रधानमंत्री से मिलना चाहता था। केरल में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट और विपक्ष में बैठे कांग्रेस के नेताओं ने प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार दोनों को राज्य के नेताओं ने आड़े हाथों लिया।
     पहला आरोप  केन्द्र सरकार पर उपेक्षा का है। शिकायत भी है कि खाड़ी देश, थाइलैंड मदद करने तैयार हैं। के न्द्र सरकार ने विदेशी धन लेने पर टांग अड़ा रखी है। देश-विदेश में आलोचना से प्रधानमंत्री आहत हैं। कांग्रेस सांसद वेणुगोपाल ने मुलाकात का समय मांगा। कर्नाटक कें चुनाव प्रभारी रहे वेणु से वैसे भी कुपित थे। प्रधानमंत्री कार्यालय ने मिलने से मना कर दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने मुफ्त सलाह दी-गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलो।   
    करिश्मा कानून का
    भारत के भावी मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नाम ऐसा कीर्तिमान है जो शायद ही कभी टूटे। न्यायमूर्ति गोगोई ने वर्ष 2016 में उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश तथा भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू को अदालत की अवमानना का नोटिस भेजा। बड़बोले काटजू ने पत्रकारों को अनपढ़ कहा। 
    उच्चतम न्यायालय पर हमला बोल दिया। न्यायपालिका और वकील  हतप्रभ। गोगाई का तर्क साफ और सादा था-निर्णय की आलोचना करने का अधिकार है। न्यायाधीश पर आक्षेप लगाना या आलोचना करने का नहीं। काटजू को माफी मांगनी पड़ी। संयोग यह कि पिता मात्र 66 दिन असम के मुख्यमंत्री रह सके। गोगोई 366 से कुछ अधिक दिन मुख्य न्यायाधीश रहेंगे।  
    (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

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Posted Date : 18-Sep-2018
  • जगदीश्वर चतुर्वेदी
    जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव आयोग के सदस्यों का चुनाव प्रत्येक स्कूल की आमसभा में होता है, चुनाव आयोग के लिए कोई भी छात्र अपने नाम का प्रस्ताव पेश कर सकता है, शर्त एक है कि वह किसी संगठन का सदस्य न हो और उस पर किसी को कोई आपत्ति न हो, यानी सर्वसम्मति से नाम चुने जाते हैं,बाद में चुने गए सदस्यों में से चुनाव आयोग अध्यक्ष का चुनाव होता है। यह समूची प्रक्रिया पारदर्शी है, इसे सब देख सकते हैं। 
    यह चयन प्रक्रिया अपने आप में विलक्षण है। इसका दूसरा उदाहरण कहीं नहीं मिलता। छात्र संघ के चुनाव का संचालन पूरी तरह छात्रों के द्वारा होता है, उनके ही लोग चुनाव आयोग में चुनकर आते हैं, इनमें कोई सरकारी या वि वि प्रशासन का व्यक्ति नहीं रहता। चुनाव आयोग अपने फैसले लोकतान्त्रिक तरीके से लेता है। वह पूरी तरह स्वायत्त होता है।यह सारी दुनिया में असाधारण उदाहरण है।
    जेएनयू छात्रसंघ के खर्चे का पैसा विश्वविद्यालय नहीं देता बल्कि छात्र देते हैं। दाखिले के समय छात्रसंघ सदस्यता शुल्क हरेक छात्र स्वेच्छा से देता है। यह पैसा यदि कोई छात्र न देना चाहे तो नहीं भी दे सकता है। छात्रसंघ सदस्यता शुल्क स्वैच्छिक है। यह देश में विलक्षण प्रावधान है।बाकी सब जगह छात्रसंघ सदस्यता शुल्क अनिवार्य रूप से वसूला जाता है। यह शुल्क विश्वविद्यालय प्रशासन सीधे छात्रसंघ के बैंक अकाउंट में स्थानांतरित कर देता है,उस पैसे से छात्रसंघ अपने खर्चे करता है, हरेक खर्चे का हिसाब रखा जाता है और साल में एक बार विवि एकाउंटेंट खाते, खर्चे आदि की जांच करता है। 
    आज तक बैंक खाते और खर्च में कभी कोई घोटाला या बेईमानी नहीं हुई, छात्रसंघ अपने सभी खर्चों का पूरा ब्यौरा हर साल छात्रसंघ की कौंसिल और आमसभा तक पेश किया जाता है। जेएनयू देश के विश्वविद्यालयों में से एक विवि नहीं है बल्कि वह सत्ता के खिलाफ वैकल्पिक संस्थान है। यही वजह है वह केन्द्र सरकार को हजम नहीं होता। चाहे वह सरकार किसी भी दल की हो। विवि जब अपने को वैकल्पिक संस्थान बना लेता है तो जनतंत्र और जनता की ताकत बन जाता है। वाम का योगदान यह है कि उसने जेएनयू को वैकल्पिक संस्थान बनाया। इसलिए वाम पर सब रंगत के सत्ताधारी नाराज रहते हैं।
    यह वाकया है सन् 1984 का मैं किसी मीटिंग के सिलसिले में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के ऑफिस गया था, मैं ऑटो से गया था, ऑटो वाले को मैंने पैसे देकर विदा किया और टहलते हुए यूनियन ऑफिस पहुंच गया,वहां मौजूद डूसू अध्यक्ष ने प्यार से स्वागत किया और पूछा कैसे आए, मैंने कहा ऑटो से। उसे यह सुनकर आश्चर्य हुआ,वह बोले आपके पास कार नहीं है? 
    मैंने कहा नहीं, उन्होंने सवाल किया क्या यूनियन के पास कार है, मैंने कहा नहीं। उन्होंने तत्काल कहा मैंने तो अध्यक्ष बनते ही यूनियन फंड से नई गाड़ी ली है और फिर वो गाड़ी दिखाने ले गया। मैंने कहा जेएनयू के किसी अध्यक्ष के पास कार नहीं है। सब वे-कार हैं। संभवत: यह आज भी वास्तविकता है।

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Posted Date : 18-Sep-2018
  • - शुभम सिंह ठाकुर
    कुछ समय पहले चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग का बयान आया कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच शांतिपूर्ण संबंध चाहते हैं। चीनी प्रवक्ता का यह भी कहना था कि वे इसके लिए रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। कुछ लोगों के अनुसार यह एक सामान्य सा बयान था। दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे संबंधों का फायदा चीन को भी होना है, इसलिए वास्तव में वह दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध चाहता है।
    चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का एक हिस्सा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सी-पैक) भी है। इस गलियारे के जरिए चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का इस्तेमाल कर अफ्रीका से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया तक अपनी बादशाहत कायम करना चाहता है। लेकिन ऐसा तभी होगा जब इस पूरे क्षेत्र में शांति होगी और भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहतर होंगे। लू कांग के इस बयान को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।
    अमरीका और चीन के बीच व्यापार युद्ध चल रहा है। दोनों देश एक दूसरे के लिए अपने बाजार तक पहुंच मुश्किल बना रहे हैं। जानकार बताते हैं कि अमरीका जैसे बड़े बाजार में अपनी स्थिति बिगड़ती देख चीन अब उसके विकल्प के तौर पर दूसरे बाजारों की तलाश में है। ऐसे में वह विशाल भारतीय बाजार को बहुत अहम मानकर चल रहा है। यही वजह है कि वह भारत के साथ अपने रिश्ते ठीक करना चाहता है। चीन और पाकिस्तान करीबी सहयोगी रहे हैं जबकि भारत और पाकिस्तान के संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे हैं। जानकारों के मुताबिक ऐसे में भारत के साथ अपने संबंध ठीक करने से पहले चीन को भारत और पाकिस्तान बीच सुलह करानी होगी। यही वजह है कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच रचनात्मक भूमिका निभाने की बात कह रहा है।
    जानकारों के मुताबिक एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि चीन की वैश्विक शक्ति या ग्लोबल पॉवर बनने की महत्वाकांक्षा पिछले कुछ समय में काफी प्रबल हुई है। इसीलिए वह भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करना चाहता है। अगर उसके प्रयासों से भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते ठीक हो जाते हैं, तो यह चीन के पक्ष में पूरी दुनिया में एक बड़ा संदेश होगा। यानी चीन इसे आर्थिक ही नहीं, भू-सामरिक नजरिये से भी देख रहा है।
    यानी चीन को पाकिस्तान और भारत के बीच रिश्तों के बेहतर होने का फायदा मिलेगा। लेकिन पाकिस्तान को भी इसका फायदा ही होना है। उसकी अर्थव्यवस्था अभी बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। खबरों के मुताबिक पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से लोन की मांग करने वाले हैं। इस पर पाकिस्तान के अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि इमरान खान को आईएमएफ से लोन की मांग करने के बजाए भारत के साथ व्यापार को बेहतर करने पर विचार करना चाहिए। इमरान खान ने भी अपने चुनावी भाषणों के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार संबंधी गतिविधियों को बढ़ाने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी। इन बातों को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि इमरान शायद इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम उठाएं।
    भारत अफगानिस्तान के साथ व्यापार करना चाहता है। इसके लिए पाकिस्तान से होकर जाने वाला रास्ता सबसे छोटा और उपयुक्त है। लेकिन पाकिस्तान इसके लिए अपनी जमीन के उपयोग की इजाजत नहीं देता। इधर अफगानिस्तान भी भारत को माल निर्यात करना चाहता है लेकिन, पाकिस्तान ने उसपर भी कई तरह की शर्त लगा रखी हैं। मसलन अफगानिस्तान भारत को माल भेज तो सकता है लेकिन, भारत अफगानिस्तान को नहीं भेज सकता। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि अफगानिस्तान से माल, ट्रक के जरिए भारत आ तो सकता है, लेकिन ट्रक को खाली ही वापस जाना पड़ता है। इससे मालवाहकों को भारी नुकसान होता है। जिसकी वजह से अफगानिस्तान भी भारत को माल नहीं भेज पाता।
    कई मानते हैं कि अगर पाकिस्तान जिद छोड़ भारत और अफगानिस्तान को अपनी जमीन का उपयोग करने दे तो उसे ट्रांजिट फीस के तौर पर काफी फायदा होगा। इतना ही नहीं, इसके जरिये पाकिस्तान, दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया को जोडऩे वाला व्यापार का एक बड़ा हब भी बन सकता है। पाकिस्तान के ऐसा करने से जाहिर तौर पर भारत और अफगानिस्तान के निर्यात में भी बढ़ोतरी होगी।
    इस तरह देखा जाए तो पाकिस्तान का यह एक कदम सभी संबंधित देशों के लिए फायदे का सौदा साबित होगा। लेकिन जानकारों के मुताबिक सबसे पहले पाकिस्तान को अपनी धरती पर आतंकवाद को पनाह देना बंद करना होगा, ताकि भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक संबंध ठीक हो सकें। तभी आर्थिक संबंध भी ठीक हो पाएंगे। (सत्याग्रह)

     

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Posted Date : 18-Sep-2018
  • पेरियार को राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती और विनोबा भावे सरीखे समाज सुधारकों की पांत में रखा जाता है। लेकिन वे एक मंझे हुए राजनेता भी थे...

    - अनुराग भारद्वाज
    तमिलनाडु की सामाजिक और राजनीतिक बुनावट पर ईवी रामास्वामी यानी पेरियार का असर कितना गहरा है, इसका एक अंदाजा इससे भी लग सकता है कि साम्यवाद से लेकर दलित आंदोलन, तमिल राष्ट्रवाद, तर्कवाद और नारीवाद तक हर धारा से जुड़े लोग उनका सम्मान करते हैं। सम्मान ही नहीं करते बल्कि उन्हें मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। उन्हें एशिया का सुकरात भी कहा जाता है।
    एक धार्मिक हिंदू परिवार में पैदा हुए पेरियार धर्म के घनघोर विरोधी रहे। ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म की कुरीतियों पर उन्होंने छोटी उम्र से ही प्रहार करना शुरू कर दिया था। वे न मूर्ति पूजा को मानते थे, न ही वेदांत को और न ही बाकी हिंदू दर्शन में उनकी आस्था थी। उन्होंने न केवल धर्म ग्रंथों की होली जलाई बल्कि रावण को अपना नायक भी माना।
    पेरियार महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हुए थे। इसी दौरान उन्होंने 1924 में केरल में हुए वाइकोम सत्याग्रह में अहम भूमिका निभाई। अब तक तमिलनाडु में उनका कद काफी ऊंचा हो चुका था। वाइकोम सत्याग्रह के बाद लोगों ने उन्हें 'वाइकोम वीरनÓ यानी 'वाइकोम का नायकÓ की उपाधि दी थी। यही वह दौर था जब कांग्रेस में ब्राह्मणों और कथित उच्च वर्ग से उनका टकराव बढऩे लगा और उन्होंने पार्टी छोड़ दी।
    बाद में पेरियार ने दलित-हरिजनों और महिलाओं के लिए 'सेल्फ रिस्पेक्टÓ आंदोलन यानी आत्मसम्मान आंदोलन भी चलाया। माना जाता है कि इन आंदोलनों के चलते तमिल और दक्षिण भारत की एक बड़ी आबादी समाज सुधार की तरफ प्रेरित हुई थी। यही वजह है कि पेरियार को राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती और विनोबा भावे सरीखे समाज सुधारकों की पांत में रखा जाता है। लेकिन इनसे अलग वे एक मंझे हुए राजनेता भी थे।
    पेरियार की राजनीति
    केरल का वाइकोम सत्याग्रह दलितों को यहां स्थित एक प्रतिष्ठित मंदिर में प्रवेश दिलाने और मंदिर तक जाती सड़कों पर उनकी आवाजाही का अधिकार दिलाने का आंदोलन था। महात्मा गांधी के साथ और कई बड़े नेताओं ने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया था। पेरियार ने भी इस आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी और उन्हें इसके लिए जेल भी भेजा गया। आखिरकार यह आंदोलन सफल हुआ था।
    इसके बाद पेरियार तमिलनाडु में नायक बन गए थे। वाइकोम सत्याग्रह ब्राह्मणवाद के खिलाफ ही था और पेरियार खुद ब्राह्मणों के मुखर विरोधी थे। माना जाता है कि दक्षिण में उनकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता के चलते कांग्रेस में मौजूद ब्राह्मणों का एक बड़ा तबका खासा आहत था। उधर दूसरी तरफ पेरियार का मानना था कि वाइकोम सत्याग्रह में उनकी भूमिका दबाने की कोशिश की गई थी।
    यहां पेरियार के कांग्रेस नेताओं से टकराव के लिए एक और घटना का जिक्र किया जा सकता है। उस समय तमिलनाडु के कुछ गुरुकुलों को कांग्रेस पार्टी वित्तीय मदद देती थी। यहां कई गुरुकुलों में ब्राह्मण और अन्य जाति के बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था अलग-अलग थी और खाने में भी गुणवत्ता का अंतर था। पेरियार इसके खिलाफ आवाज उठाना चाहते थे लेकिन पार्टी ने कभी इसको तवज्जो नहीं दी।
    इसी क्रम में 1925 के दौरान पेरियार ने तमिलनाडु कांग्रेस के सामने पार्टी नेतृत्व में गैर-ब्राह्मणों को अधिक भागीदारी देने से जुड़ा एक प्रस्ताव रखा। लेकिन इसे पार्टी ने सिरे से खारिज कर दिया। इस घटना के बाद पेरियार ने खुलकर कांग्रेस में बगावत कर दी। उन्होंने उसी समय अपने समर्थकों के बीच ऐलान भी किया कि वे एक दिन राज्य से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर देंगे।
    अपनी राजनीतिक आवाज को धार देने के लिए पेरियार ने 1938 में जस्टिस पार्टी का गठन किया। फिर 1944 में इसे भंग करके उन्होंने द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) बनाई। कांग्रेस को तमिलनाडु से बाहर करने का पेरियार का सपना 1968 में पूरा हुआ जब डीएमके ने पहली बार राज्य में सरकार बनाई।
    पेरियार को अपने वक्त से आगे का आदमी भी कहा जाता है। यह महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर उनके विचारों से भी जाना जा सकता है। उन्होंने बाल विवाह खत्म करने, विधवा महिलाओं को दोबारा शादी का अधिकार देने, शादी को पवित्र बंधन की जगह साझीदारी के रूप में समझने जैसे तमाम मुद्दों पर अभियान चलाए। अपने भाषणों में वे लोगों से कहा करते थे कि वे कुछ भी सिर्फ इसलिए स्वीकार न करें कि उन्होंने वह बात कही है। पेरियार का कहना था, इस पर विचार करो। अगर तुम समझते हो कि इसे तुम स्वीकार सकते हो तभी इसे स्वीकार करो, अन्यथा इसे छोड़ दो। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 18-Sep-2018
  • -सत्याग्रह ब्यूरो
    भारतीय बैंकों का हजारों करोड़ों रुपए का कर्ज चुकाए बिना देश छोड़कर भाग गए कारोबारी नीरव मोदी और विजय माल्या से जुड़ी दो खबरें सामने आई हैं। इनमें एक संकेत आम है कि सीबीआई जैसी केंद्र की शीर्ष एजेंसियां इन दोनों कारोबारियों के मामलों में ढिलाई या कहें कि लापरवाही बरत रही हैं। वह भी तब जबकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर विपक्षी पार्टियां लगातार आरोप लगा रही हैं कि वह नीरव मोदी और विजय माल्या के मामलों में पक्षपात कर रही है।
    पहली खबर द टाइम्स ऑफ इंडिया से। पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) से करीब 13,600 करोड़ रुपए की कर्ज धोखाधड़ी करने वाले नीरव मोदी के बारे में अखबार की खबर से पला चलता है कि अब तक सीबीआई और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने उसके मामले को ब्रिटेन के सामने उतनी मजबूती से रखा नहीं है जितना रखना चाहिए था। अखबार के मुताबिक नीरव के लंदन में होने की पुष्टि होने के बाद भारतीय एजेंसियों ने ब्रिटेन से उसके प्रत्यर्पण की कोशिश शुरू की है। इस बाबत ब्रिटिश एजेंसियों को औपचारिक आग्रह पत्र भेजा जा चुका है। इसके साथ नीरव के मामले में अब तक हुई जांच के निष्कर्ष, गवाहों के बयान और अन्य सबूतों की जानकारी भी नत्थी है।
    लेकिन इस सबके बावजूद कहीं कुछ कमी रह गई, ऐसा लगता है। क्योंकि ब्रिटेन की ओर से भारतीय एजेंसियों बताया गया है कि नीरव से जुड़े जो भी सबूत, गवाहों के बयान आदि पेश किए गए वे उसके साथ साझा किए जा सकते हैं। हालांकि इस पर भारतीय एजेंसियों ने अपनी आपत्ति जता दी है। साथ ही यह दलील दी है कि अगर ये जानकारियां नीरव के साथ साझा की गई तो वह इनका दुरुपयोग कर सकता है। इनको ध्यान में रखकर अदालत में प्रत्यर्पण के मामले को कमजोर करने की कोशिश भी कर सकता है। इसी आधार पर भारतीय एजेंसियों ने आग्रह किया है कि अदालत में प्रत्यर्पण का मामला शुरू होने से पहले भारत द्वारा उपलब्ध कराए गए कोई भी दस्तावेज नीरव के साथ साझा न किए जाएं। लेकिन ब्रिटिश एजेंसियां इस आग्रह को मानेंगी, इसकी संभावना कम दिखती है।
    इसी तरह एक अन्य जानकारी विजय माल्या के बारे में भी सामने आई है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में खबर दी है। इसमें बताया गया है माल्या के खिलाफ जारी अपने लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) को सीबीआई ने खुद ही कमजोर किया था। अखबार ने बताया है कि माल्या के खिलाफ पहला एलओसी 16 अक्टूबर 2015 को जारी किया गया था। इसमें देश के सभी हवाईअड्डों आदि की सुरक्षा में तैनात एजेंसियों से कहा गया था कि माल्या को भारत के बाहर न जाने दिया जाए। लेकिन इस एलओसी में 24 नवंबर 2015 को बदलाव कर दिया गया। अबकी बार इसमें लिखा गया कि माल्या के, आने-जाने के बाबत सूचना दी जाए। खास बात ये कि इसी तारीख को माल्या दिल्ली पहुंचा था और इसके ठीक चार महीने बाद वह वह देश छोड़कर भाग गया।

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Posted Date : 17-Sep-2018
  • रामचंद्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार 
    भारत-पाकिस्तान के बीच तमाम अंतर्विरोधों में से एक अपने-अपने राष्ट्रपिता को देखने के नजरिए का भी है। गांधी की तो हर भारतीय अपने तरीके से व्याख्या कर सकता है। नक्सली उन्हें दबे पांव आगे बढऩे वाला प्रतिक्रियावादी कहते हैं, तो हिंदुत्ववादियों की नजर में वह मुसलमानों के प्रति ज्यादा ही उदार थे। आंबेडकरवादियों की नजर में जातिवाद पर उनका विरोध गंभीर नहीं था, तो नारीवादी उन्हें लैंगिक भेदभाव के मामले में ढुलमुल बताते हैं। आधुनिकतावादियों की नजर में वह अतीत का महिमामंडन करने वाले हैं, तो परंपरावादियों की नजर में शास्त्रों का अनादर करने वाले।
    उधर पाकिस्तान में उनके राष्ट्रपिता पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं हो सकती। पाकिस्तान बनने के कुछ ही समय बाद लाहौर के एक कवि ने जिन्ना के बारे में लिखा, 'आपकी अकेली सांस ही देश के लिए काफी है ऐ कायदे-आजम/ आप अकेले ही काफी हैं, इस देश को एक रखने के लिए।Ó पाकिस्तान में जिन्ना इसी भक्तिभाव से याद किए जाते हैं। कई पाकिस्तानी कहते रहे हैं कि वह सिर्फ पांच या दस साल और जिंदा रह जाते, तो मुल्क को भ्रष्टाचार, गरीबी, आतंकवाद, कट्टरतावाद या सैन्य तानाशाही का रोग न लगता। दलीय प्रतिबद्धताओं में अलगाव के बावजूद वहां जिन्ना पर एका है। डॉन  ने बीते हफ्ते अपने संपादकीय में भी लिखा- 'जिन्ना का पाकिस्तान सहिष्णु, प्रगतिशील, समावेशी और लोकतांत्रिक है। क्या पाकिस्तान का नेतृत्व अपने संस्थापक पिता के आदर्शों पर लौटेगा?Ó
    बतौर भारतीय, पाकिस्तानियों को अपने राष्ट्रपिता को देखने का नजरिया देना मेरा काम नहीं, पर इतिहासकार के रूप में उन्हें और खुद को याद दिलाना मेरी जिम्मेदारी है कि जिन्ना के वक्त में ही उनके समकालीन उनके बारे में क्या सोचते थे। यहां गांधी-नेहरू की बात नहीं करूंगा, जिनके विचार जगजाहिर हैं।
    शुरुआत अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र रहे मौलाना शौकत अली से। ये उन्हीं अली बंधुओं में से हैं जो असहयोग आंदोलन में गांधी के साथ और जिन्ना के खिलाफ मुखर थे। 1926 में आंदोलन पूरी तरह शांत पड़ते ही जिन्ना ने बंबई विधानसभा के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी। शौकत अली ने इससे असहमति जताते हुए अपील जारी की और बताया कि वह 'जिन्ना को बंबई के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने के लिए अनुपयुक्तÓ क्यों मानते हैं? ये कारण थे- जिन्ना बंबई के मुसलमानों के बारे में कुछ नहीं जानते और इससे भी बड़ी बात कि जानना भी नहीं चाहते। दूसरे, जिन्ना ने शैक्षिक रूप से पिछड़े मुसलमानों के लिए कुछ नहीं किया। तीसरे, जिन्ना ने मुस्लिम जमात के हर अभियान से तो खुद को अलग रखा ही, खिलाफत और असहयोग आंदोलनों का भी विरोध किया। चौथा, यह मुस्लिम लीग का संकीर्ण और पुरातन संविधान था कि जिन्ना आसानी से इसके स्थाई अध्यक्ष तो बन गए, लेकिन इसे खत्म कर दिया। पांचवां, जिन्ना न तो अनुशासन कायम रख सकते हैं, न ही उस पार्टी संगठन के अधीन काम कर सकते हैं, जहां उन्हें अपने बराबर वालों या वरिष्ठों से तालमेल बिठाना पड़े। शौकत अली ने अपनी बात खत्म करते हुए लिखा- 'इस्लाम पर जिन्ना की अज्ञानता डराने वाली है और उन पर बदकिस्मत मुसलमानों का प्रतिनिधित्व सौंपने का भरोसा नहीं किया जा सकता। यहां तक कि एक लैंपपोस्ट भी उनसे कम नुकसानदेह होगा...Ó। 
    फिर भी जिन्ना चुनाव जीत गए। उनके सितारे तेजी से चमके और शौकत अली की शोहरत कम होती गई। 1938 में शौकत अली के इंतकाल तक जिन्ना भारतीय मुसलमानों के निर्विवाद नेता बन चुके थे। मार्च 1940 में लाहौर में जिन्ना ने मुस्लिम लीग के वार्षिक सम्मेलन की अध्यक्षता की, जिसके बाद एक प्रशंसक ने लिखा- 'यही वक्त था, जब जिन्ना को पहली बार अपने होने का एहसास हुआ होगा। उन्हें समझ में आया होगा कि उनके चाहने वाले उन्हें कितना चाहते हैं और वे भारतीय मुसलमानों का कितना भरोसा अर्जित कर चुके हैं?Ó
    वहीं भारतीय मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग वाला 'पाकिस्तान प्रस्तावÓ पारित हुआ। पंजाब के गवर्नर को भेजे गए अपने नोट में आईसीएस अफसर पेंडरेल मून ने लाहौर बैठक की तीन खास बातें रेखांकित कीं- पहली, 'मुसलमानों के असली प्रतिनिधि के रूप में मुस्लिम लीग का महत्व अचानक बढ़ गया है।Ó 
    दूसरी, 'जिन्ना की प्रतिष्ठा काफी बढ़ी है और वह अखिल भारतीय स्तर पर मुसलमानों के निर्विवाद नेता बन चुके हैं।Ó तीसरी- 'मुसलमान अब कम से कम ऊपरी तौर पर तो भारत के बंटवारे के पक्ष में एक हो चुके हैं।Ó
    इसी के तीन माह बाद लिबरल नेता वीएस श्रीनिवासन शास्त्री ने गांधी को लिखा- 'कोई सोच भी नहीं सकता कि जिन्ना का असर किस कदर बढ़ चुका है। आज कांग्रेस किसी भी तौर पर उनकी अनदेखी या उपेक्षा करने की स्थिति में है, तो ब्रिटिश सरकार भला ऐसा कैसे कर पाएगी?Ó वह देख रहे थे कि अंग्रेजों के लिए अब 'मुसलमानों की नाराजगी, कांग्रेस के संतुलित रुख की अपेक्षा ज्यादा घातक होने वाली थी।Ó  
    दूसरी ओर, गांधीजी के निजी सचिव महादेव देसाई मानते थे कि 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की रचना के मूल में ही ब्रिटेन के निर्माता थे, जिन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विभाजन रेखा मजबूत की।Ó महादेव ने लिखा- हम इस सबके लिए किसी को दोष नहीं दे सकते। न तो उस खतरनाक सोच को, न ही इस विचार की मौलिकता के लिए जिन्ना साहेब को। 
    1940 तक नहीं लगता था कि पाकिस्तान बन ही जाएगा। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लीग और जिन्ना का असर तेजी से बढ़ा। युद्ध खत्म होने के बाद ब्रिटिश भारत के चुनावों में जिस तरह मुस्लिम सीटों पर लीग जीती, उससे आजाद पाकिस्तान के सपने को मजबूती मिली। दिसंबर 1946 में एक आईपीएस अफसर मैलकम डार्लिंग ने पंजाब के एक प्रमुख मुसलमान और कोट के सरदार के हवाले से लिखा- 'जब तक वह अपनी बात पर सफल हैं, इस बात का कोई मतलब नहीं कि उन्हें मुस्लिम धर्म का एबीसी आता है या नहीं।Ó यह इतिहास की एक और विडंबना ही थी कि एक ऐसा आदमी जो मुसलमानों के बारे में कुछ नहीं जानता और जानना भी नहीं चाहता था, वह इंसान ब्रिटिश भारत के हाथ से निकालकर एक आजाद मुस्लिम राष्ट्र बनवाने में सफल हो गया।  https://www.livehindustan.com/blog

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Posted Date : 17-Sep-2018
  •  पुष्य मित्र
    कल एक मित्र से बात हो रही थी। वे कह रहे थे, बताइए राजद जैसी पार्टी जिसकी छवि गुंडों वाली पार्टी की रही है, ने जेएनयू के लिए जयंत जैसा सुलझा और विचार संपन्न कैंडिडेट चुना है। जबकि नीतीशजी की पार्टी को देखिए, सेकेंड लाइन में खाली ठेकेदार और रंगदार मिलेंगे, गुंडों की बीवियां मिलेंगी और नेताओं के बच्चे मिलेंगे। राजद जहां अपनी छवि को बदलने के लिए जमीन से जुड़े विचार में पगे लोगों को सामने ला रहा है, जबकि दूसरी पार्टियां इस बारे में सोच भी नहीं रही है।
    उनकी बात मुझे सच लगी। यह सिर्फ नीतीशजी के जदयू की बात ही नहीं है। तमाम पार्टियों में जो नए लोग आ रहे हैं, वे धन बल में मजबूत, धंधेबाज और दूसरे तरह की पृष्ठभूमि के हैं। आम लोगों के बीच से कोई समझदार और विचारशील व्यक्ति राजनीति में आ सके, इसके तमाम रास्ते बंद हैं। फिर चाहे कांग्रेस की बात हो, भाजपा की बात हो या बसपा-सपा-तृणमूल जैसी पार्टियों की ही बात क्यों न हो। ऐसे में राजद जैसी पार्टी द्वारा जयंत जिज्ञासु जैसे युवक को लोगों के सामने पेश करना और जयंत का इस मौके का भरपूर लाभ उठा लेना सचमुच बहुत सकारात्मक बात है।
    जयंत को उम्मीदवार बनाते ही मैंने इस बात की बधाई राजद को दी थी, जयंत को नहीं। और यह राजद को मेरी पहली बधाई थी। अमूमन मैं इस दल से असहमत ही रहता हूं। आज जेएनयू के चुनाव का नतीजा जो भी हो मगर दिलचस्प तरीके से लेफ्ट यूनिटी के निशाने पर एबीवीपी कम जयंत अधिक था। लोग उससे शहाबुद्दीन के मसले पर सवाल कर रहे थे, लालू के गुंडाराज की मीमांसा करने कह रहे थे और भी कई तरह से घेर रहे थे। मगर यह कुछ अधिक ही था, एक नये छात्र नेता से उसकी पार्टी के 24-25 साल के कामकाज का हिसाब लेना ठीक नहीं। आप यह समझिये कि आखिर पार्टी बदल तो रही है।
    सवाल उन दलों से भी कीजिए, जिन्हें आप पसंद करते हैं और वे नई पीढ़ी के नाम पर नासमझ हुड़दंगियों को बढ़ावा दे रहे हैं। आखिर क्यों प्रेसिडेंशियल स्पीच के दौरान लेफ्ट यूनिटी का उम्मीदवार भी जयंत से उन्नीस रह गया। विद्यार्थी परिषद में तो नेता ही हुड़दंगी को बनाया जाता है। वही उम्मीदवारी की अर्हता है। कांग्रेस सचिन पायलट को सात ताले में छिपा कर रखती है, कि कहीं उसकी छवि राहुल पर ग्रहण न बन जाये। 
    हालांकि वहां नई पीढ़ी के नाम पर जो लोग हैं, वे नेताओं के बच्चे ही हैं। भाजपा भी उसी रास्ते पर है, हालांकि उसे भी वरुण गांधी से भय आता है। यहां तक कि लेफ्ट में भी ले दे के कन्हैया नये नेता के रूप में आए हैं, जो इतने घिस चुके हैं कि उनमें कुछ भी फ्रेशनेस बची नहीं।
    मगर लगता है, जयंत का किस्सा दूसरे दलों को प्रेरित करेगा। सोशल मीडिया ने ऐसे कई युवकों को मंच दिया है, पहचान दी है, जो वैचारिक रूप से सक्षम हैं। उनकी छवि बेदाग है। अब तक पार्टियां इन्हें आइटी सेल के स्वयंसेवकों के तौर पर ही इस्तेमाल करती आयी है, पर शायद अब पार्टियां रिस्क ले। अगर ऐसा होता है तो भले ही कुछ अरसे के लिए, मगर देश की राजनीति में थोड़ी ताजगी जरूर आएगी।

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Posted Date : 16-Sep-2018
  • -जावेद अनीस
    इस साल के अंत तक मध्यप्रदेश में चुनाव होने हैं, लेकिन इधर पहली बार दोनों प्रमुख पार्टियों से इतर राज्य के आदिवासी समुदाय में स्वतन्त्र रूप से सियासी सुगबुगाहट चल रही है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी तो पहले से ही थी जिसका कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में अहम् रोल माना जाता है।अब 'जयसÓ  यानी  'जय आदिवासी युवा शक्तिÓ  जैसे संगठन भी मैदान में आ चुके हैं जो विचारधारा के स्तर पर ज्यादा शार्प है और जिसकी बागडोर युवाओं के हाथ में हैं। जयस की सक्रियता दोनों पार्टियों को बैचैन कर रही है। डेढ़ साल पहले आदिवासियों के अधिकारों की मांग के साथ शुरू हुआ यह संगठन आज 'अबकी बार आदिवासी सरकारÓ के नारे के साथ 80 सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी कर  रहा है। 
    जयस द्वारा निकाली जा रही आदिवासी अधिकार संरक्षण यात्रा में उमड़ रही भीड़ इस बात का इशारा है कि बहुत ही कम समय में यह संगठन प्रदेश के आदिवासी सामाज में अपनी छाप छोडऩे में कामयाब रहा है। जयस ने लंबे समय से मध्यप्रदेश की राजनीति में अपना वजूद तलाश रहे आदिवासी समाज को स्वर देने का काम किया है। 
    आज इस चुनौती को कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां महसूस कर पा रही हैं शायद इसीलिये जयस के राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हीरालाल अलावा कह रहे हैं कि आज आदिवासियों को वोट बैंक समझने वालों के सपने में भी अब हम दिखने लगे हैं। आदिवासी वोटरों को साधने के लिए आज दोनों ही पार्टियों को नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ रही है। शिवराज अपने पुराने हथियार 'घोषणाओं'  को आजमा रहे हैं तो वहीं कांग्रेस आदिवासी इलाकों में अपनी सक्रियता और गठबंधन के सहारे अपने पुराने वोटबैंक को वापस हासिल करना करना चाहती है।
    मध्यप्रदेश में आदिवासियों की आबादी 21 प्रतिशत से अधिक है। राज्य विधानसभा की कुल 230 सीटों में से 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा करीब 30 सीटें ऐसी मानी जाती हैं जहां पर्याप्त संख्या में आदिवासी आबादी है। 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में भाजपा को 32 तथा कांग्रेस को 15 सीटों मिली थी। 
    दरअसल मध्यप्रदेश में आदिवासियों को कांग्रेस का परंपरागत वोटर माना जाता है लेकिन 2003 के बाद से इस स्थिति में बदलाव आना शुरू हो गया जब आदिवासियों के लिए आरक्षित 41 सीटों में कांग्रेस को महज 2 सीटें ही हासिल हुई थीं जबकि भाजपा के 34 सीटों पर कब्ज़ा जमा लिया था। 2003 के चुनाव में पहली बार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी जो कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने में एक प्रमुख कारण बना। 
    वर्तमान में दोनों ही पार्टियों के पास कोई ऐसा आदिवासी नेता नहीं है जिसका पूरे प्रदेश में जनाधार हो, जमुना देवी के जाने के बाद से कांग्रेस में प्रभावी आदिवासी नेतृत्व नहीं उभर पाया है पिछले चुनाव में कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया था लेकिन वे अपना असर दिखाने में नाकाम रहे, खुद कांतिलाल भूरिया के संसदीय क्षेत्र झाबुआ में ही कांग्रेस सभी आरक्षित सीटें हार गईं थी। वैसे भाजपा में फग्गन सिंह कुलस्ते, विजय शाह, ओमप्रकाश धुर्वे और रंजना बघेल जैसे नेता जरूर हैं लेकिन उनका व्यापक प्रभाव देखने को नहीं मिलता है, इधर आदिवासी इलाकों में भाजपा नेताओं के लगातार विरोध की खबरें भी सामने आ रही हैं जिसमें मोदी सरकार के पूर्व मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते और शिवराज सरकार में मंत्री ओमप्रकाश धुर्वे शामिल हैं। ऐसे में 'जयसÓ की चुनौती ने भाजपा की बैचैनी को बढ़ा दिया है और कांग्रेस भी सतर्क नजर आ रही है।
    2013 में डॉ हीरा लाल अलावा द्वारा जय आदिवासी युवा शक्तिÓ (जयस) का गठन किया गया था जिसके बाद इसने बहुत तेजी से अपने प्रभाव को कायम किया है। पिछले साल हुए छात्रसंघ चुनावों में जयस ने एबीवीपी और एनएसयूआई को बहुत पीछे छोड़ते हुए झाबुआ, बड़वानी और अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल जि़लों में 162 सीटों पर जीत दर्ज की थी। आज पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों अलीराजपुर, धार, बड़वानी और रतलाम में 'जयसÓ  की प्रभावी उपस्थिति लगातार है यह क्षेत्र यहां भाजपा और संघ परिवार का गढ़ माना जाता था।
    दरअसल 'जयसÓ   की विचारधारा आरएसएस के सोच के खिलाफ है, ये खुद को हिन्दू नहीं मानते है और इन्हें आदिवासियों को वनवासी कहने पर भी ऐतराज है। खुद को हिंदुओं से अलग मानने वाला यह संगठन आदिवासियों की परम्परागत संस्कृति के संरक्षण और उनके अधिकारों के नाम पर आदिवासियों को अपने साथ जोडऩे में लगा है। 
    अब अगर हम लगभग पिछले 50 दिन का आकलन करें तो महागठबंधन 3 महत्वपूर्ण अवसरों पर पूरी तरह बिखरा नजर आया। 20 जुलाई को विपक्ष के द्वारा लाये गये अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार को 325 वोट की तुलना में विपक्ष को महज 126 वोट मिले। बहस के दौरान भी विपक्ष सरकार को घेरने में भी असफल रहा।
    9 अगस्त को राज्य सभा के उप सभापति के चुनाव में भाजपा ने अपने सहयोगी दल जेडीयू के उम्मीदवार को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। कोई भी विपक्षी दल अपना उम्मीदवार तक खड़ा करने को तैयार नहीं था। अंत में कांग्रेस को अपना उम्मीदवार खडा करना पड़ा। और चुनाव में जहां जेडीयू प्रत्याशी को 125 वोट मिले वहीं इस महागठबंधन को महज 105 वोट मिले। 41 सालों के बाद पहली बार राज्य सभा में कांग्रेस का उप सभापति नही था।
    10 सितंबर को पेट्रोल-डीजल के दामों के विरोध में बुलाए गये भारत बंद में तमाम विपक्षी दलों ने कांग्रेस का साथ देने से इंकार कर दिया। उन्होंने महंगाई के विरोध में अपना विरोध आंदोलन अलग से किया। सपा, बसपा जैसी पार्टियों ने अपने आपको इस विरोध से अलग रखा। मायावती ने भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस पर भी हमला बोला और दोनों पार्टियों को इस मंहगाई के लिये जिम्मेदार बताया।
    अब सवाल ये उठता है कि जो विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव, राज्य सभा के उप सभापति और महंगाई जैसे मुद्दे पर एकजुट नहीं हो सकता वो तमाम विरोधाभास और महत्वाकांक्षा को ताक पर रखकर 2019 में कैसे भाजपा का मुकाबला करेगा।

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Posted Date : 16-Sep-2018
  • -कृष्णमोहन झा
    पेट्रोल एवं डीजल के दामों में रोजाना होने वाली बढ़ोतरी से केंद्र की मोदी सरकार भले ही चिंतित न हो, परंतु इससे 22 विरोधी दलों ने एक बार फिर एकजुटता अवसर प्रदर्शित करने का अवसर पा लिया है। इन विरोधी दलों ने देशव्यापी बंद का आव्हान किया जो शत-प्रतिशत सफल तो नहीं रहा, लेकिन उन राज्यों में इसका मिला जुला असर अवश्य मायने रखता है, जहां भाजपा की सरकारें है। केंद्र की मोदी सरकार सहित विभिन्न राज्यों की भाजपाई सरकारों ने इस बंद को पूरी तरह नकार दिया है। भारत बंद को पूरी तरह औचित्यहीन व अनावश्यक बताते हुए सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह इस मामले में कुछ भी नहीं कर सकती है। सरकार का कहना है कि पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। तेल कंपनियां ही अंतराष्ट्रीय बाजार भाव के हिसाब से दामों को तय करती हंै।
    मामले में केंद्र सरकार के मंत्रियों ने जिस तरह सरकार का बचाव किया है उससे तो यही लगता है कि इसमें सरकार बिल्कुल असहाय हो गई है। जनता की तकलीफ को देखते हुए भी सरकार की यह असहाय मुद्रा चकित करने वाली है। क्या सरकार जनता को अब यही संदेश देना चाहती है कि उसे पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि के इस सिलसिले में अभ्यस्त हो जाना चाहिए। पेट्रोलियम पदार्थों में मूल्य वृद्धि कोई नई बात नही है। कुछ समय पूर्व ही कीमतों की वृद्धि ने जनता को त्रस्त कर दिया था औऱ एक बार फिर वही विकट स्थिति जनता की परेशानी बढ़ा रही है। यदि सरकार के हाथों में कुछ नही है औऱ वह इस पर अंकुश नहीं लगा सकती है तो फिर कीमत में बढ़ोतरी का यह सिलसिला कहा जाकर रुकेगा। 
    जनता यह समझने में भी असमर्थ है कि यदि पेट्रोल डीजल की कीमतों पर सरकार का कोई नियंत्रण नही है तो फिर चुनावों के समय इनकी कीमतों में अचानक स्थिरता क्यों आ जाती है। यह पहले भी कई बार देखा जा चुका है कि चुनाव के समय तो दाम स्थिर रहते हैं ,लेकिन उसके तुरंत बाद दामों में इजाफा हो जाता है। आखिर चुनाव के समय सरकार एवं तेल कंपनियों के बीच ऐसी क्या अण्डरस्टैंडिंग हो जाती है जिससे दाम स्थिर रहते है। 
    एक बात यह भी आश्चर्य जनक है कि जब तेल कंपनियां सरकारी नियंत्रण से मुक्त है तो  चुनाव के समय भी उन्हें सरकार की बात मानने के लिए बाध्य नही होना चाहिए। अगर यह भी मान लिया जाए कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों कुछ निर्धारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों के अनुसार किया जाता है तथा बाजार में क्रूड ऑयल कि कीमतों में उतार चढ़ाव उसके उत्पादन से जुड़ा है तब भी सरकार से यह सवाल तो किया ही जा सकता है कि वह लगने वाले टैक्स पर पुनर्विचार क्यों नही करती? किन्तु सरकार तो इस मामले में पूरी तरह पल्ला झाड़ रही है। वह केवल बाजार भाव का ही राग अलाप रही है। 
    यह तो पहले से ही तय था कि विरोधी दलों द्वारा जो भारत बंद का आयोजन किया जाएगा उसका कोई असर सरकार पर नही होगा। सरकार यदि इस बंद के बाद तेल कंपनियों से दामों को लेकर पुनर्विचार करने  का कहती ,तब तो यह माना जा सकता था कि वह  विपक्ष के दबाव में है। सरकार ने तो बंद की आंशिक सफलता को भी नकारते हुए स्पष्ट कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता केवल विकास है। सरकार इस बात से भी फूली नही समा रही है कि देश की अर्थव्यवस्था 8.2 प्रतिशत हो गई है और वह  अब फ्रांस को भी पीछे छोड़कर दुनिया की छठवीं बड़ी अर्थव्यवस्था हो गई है। शायद सरकार यह मानती है कि यदि देश की आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी के लिए थोड़ी तकलीफ भी सहना पड़े तब भी जनता को शिकायत नही करना चाहिए। 
    सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव मे बढ़ोतरी के कारण ही तेल की कीमतें बढ़ रही है। चलों यह मान लेते है तो क्या सरकार जनता की मांग पर उत्पाद शुल्क एवं वेट में कमी कर राहत नही दे सकती है। यह भी तब जब केंद्र सहित लगभग 20 राज्यों में भाजपा की सरकारें है ,लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि केंद्र की मोदी सरकार ने अभी तक राज्यों को इस बाबत सलाह देना भी मुनासिब नही समझा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तो साफ कर दिया है कि सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर से एक्साइज ड्यूटी नही घटाएगी। इसलिए इससे यह कहा जा सकता है कि जनता को अभी और दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। 
    खैर मोदी सरकार जनता की तकलीफों से मुंह मोड़ रही है तो आगामी लोकसभा चुनाव में उसे जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन शायद सरकार ने मन ही मन यह सोच रखा है कि चुनाव के समय इन पदार्थों के दाम स्थिर हो जाएंगे तब जनता का आक्रोश अपने आप ठंडा पड़ जाएगा। विपक्षी दलों की एकता तब तक बिखर चुकी होगी। 
    अब यह विपक्षी दलों को तय करना है कि वे अपनी एकजुटता मजबूत करते है या उसमे सेंध लगने देने का खतरा मोल लेने की तैयारी कर चुके है।  आज यह स्थिति हो चुकी है कि चार साल बीतने के बाद भी मोदी सरकार जनता को अच्छे दिनों के दर्शन तो करा नही पाई है ,उल्टे वह जनता को ही तकलीफों के सहारे जीने की आदत डालने की सलाह दे रही है।  
    (लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिजिय़ाना मीडिया समूह के राजनीतिक संपादक है)

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Posted Date : 16-Sep-2018
  • भारत में सोने के आभूषणों का बाजार 2017 में 75 अरब अमेरिकी डॉलर था जिसके वर्ष 2025 तक बढ़ कर सौ अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के अनुमान के मुताबिक, भारत में हर साल 150 से 200 टन तक सोना तस्करी के जरिए पहुंचता है। केंद्रीय एजंसियों का कहना है कि म्यांमार से सोने की तस्करी ने दुबई और बैंकॉक के पारंपरिक रूट को भी पीछे छोड़ दिया है। त्योहारों का सीजन सामने होने की वजह से इसमें हाल में काफी तेजी आई है।
    म्यांमार की भौगोलिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर निगरानी में ढील ने इसे तस्करों के लिए काफी मुफीद बना दिया है। सीमा पर स्थित जंगल और पहाड़ी इलाके तस्करों को रास आने लगे हैं। भारतीय बाजारों में म्यांमार के मुकाबले कीमतों में प्रति ग्राम तीन से चार हजार रुपए के भारी अंतर ने भी इसे मुनाफे का सौदा बना दिया है। 
    इसी साल अप्रैल में मणिपुर के एक पूर्व विधायक का पुत्र भी तस्करी के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। भारत की 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा म्यांमार से लगी है। इसमें से अरुणाचल प्रदेश के साथ 520 किलोमीटर और नागालैंड के साथ 215 किलोमीटर लंबी सीमा शामिल है। लेकिन मणिपुर से लगी 398 किलोमीटर और मिजोरम से लगी 510 किलोमीटर लंबी सीमा केंद्रीय एजंसियों के लिए भारी सिरदर्द बन रही है। म्यांमार से सोने की तस्करी इन दोनों राज्यों की सीमा से ही हो रही है। राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के एक अधिकारी बताते हैं, इन दोनों राज्यों में सीमा पर स्थित जंगल और पहाड़ की वजह से वहां कड़ी निगरानी संभव नहीं है। तस्कर इसी स्थिति का लाभ उठा कर सोने के साथ पहले मणिपुर और मिजोरम पहुंचते हैं और फिर वहां से इस सोने को खास कर सड़क और रेल मार्ग से स्वर्ण उद्योग के गढ़ कहे जाने वाले कोलकाता, मुंबई और दिल्ली में पहुंचाया जाता है। वह बताते हैं कि इसके लिए कमीशन के आधार पर एजेंटों की बहाली की जाती है ताकि किसी के गिरफ्तार होने की स्थिति में भी तस्कर गिरोह के दूसरे सदस्यों के बारे में पता ना चल सके।
    डीआरआई के एक अधिकारी बताते हैं, भारत में सोने की बढ़ती मांग और खपत और कीमतों में भारी अंतर की वजह से ही म्यांमार ने सोने की तस्करी के मामले में दुबई और बैंकाक जैसे शहरों को पीछे छोड़ दिया है। बीते साल से इन दोनों शहरों के मुकाबले म्यांमार से आने वाली सोने की तादाद बढ़ी है। आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। एक किलो सोने की तस्करी पर तस्करों को खर्च काट कर 90 हजार से 1.10 लाख रुपए तक मुनाफा होता है। डीआरआई सूत्रों का कहना है कि म्यांमार में उग्रवादी संगठनों की सक्रियता की वजह से सोने के तस्करों को काफी मदद मिलती है। इसमें उन संगठनों को भी खासा कमीशन मिलता है। इसलिए वे तस्करों को सीमा पार करने में सहायता करते हैं। 
    केंद्रीय एजंसियों ने वर्ष 2016 में असम के शहर गुवाहाटी में सोने की तस्करी के एक गिरोह का भांडा फोड़ते हुए दावा किया था कि वह बीते ढाई वर्षों के दौरान भारत म्यांमार सीमा के रास्ते दो हजार करोड़ रुपए से ज्यादा कीमत का लगभग सात हजार किलो सोना तस्करी के जरिए देश में लाया था। दुनिया भर में सोने की कुल खपत का 29 फीसदी भारत में होता है। सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इस क्षेत्र का योगदान सात फीसदी है। जेम्स एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक देश में लगभग 50 लाख लोग प्रत्यक्ष तौर पर इस कारोबार से जुड़े हैं। वर्ष 2017 में यहां सोने की मांग 737.5 टन रही थी।  
    वर्ष 2017-18 के दौरान भारत से 32.71 अरब अमेरिकी डॉलर के सोने के गहनों और बेशकीमती रत्नों का निर्यात भी किया गया था। अब काउंसिल ने वर्ष 2020 तक 60 अरब डॉलर के निर्यात का लक्ष्य तय किया है। वर्ष 2022 तक इस क्षेत्र में लगभग 82 लाख लोगों को रोजगार मिल सकता है। सुरक्षा एजेंसियों और विशेषज्ञों का कहना है कि मणिपुर में म्यांमार से लगी खासकर मोरे सीमा तस्करों के लिए सबसे मुफीद ठिकाने पर उभरी है। वहां खुले सीमा व्यापार का लाभ उठा कर सोने के तस्कर माल के साथ आसानी से सीमा पार कर लेते हैं। एजेंसियों का कहना है कि बड़े पैमाने पर वहां से होने वाली तस्करी को रोकने के लिए सीमा पर निगरानी सख्त करने और इस बारे में म्यांमार सरकार से बातचीत कर एक एकीकृत योजना बनाने की जरूरत है।
    मणिपुर में एक सुरक्षा विशेषज्ञ एन रमेश सिंह कहते हैं, इतने बड़े पैमाने पर तस्करी के जरिए देश में आने वाले सोने का अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पडऩा लाजिमी है। इससे सरकार को भी हर साल राजस्व के तौर पर करोड़ों का नुकसान होता है। ऐसे में तमाम एजेंसियों को आपसी तालमेल के जरिए इस पर अंकुश के लिए ठोस योजना बनानी होगी। वह कहते हैं कि जितना सोना पकड़ा जाता है उससे कई गुना ज्यादा सोना सुरक्षित रूप से भारतीय बाजारों में पहुंच जाता है और यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 15-Sep-2018
  •  अखिलेश शर्मा
    बीएसपी प्रमुख मायावती को उनके गढ़ में ही घेरा जा रहा है। एक तरफ मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में कांग्रेस के साथ समझौते को लेकर तस्वीर साफ नहीं हो पा रही है तो अब उत्तर प्रदेश में नए समीकरण बनते दिख रहे हैं। पिछले साल सहारनपुर में हुई हिंसा के आरोपी और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून एनएसए के तहत जेल में बंद भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर उर्फ रावण की समय से पहले रिहाई इसी की ओर इशारा कर रही है। चंद्रशेखर की रिहाई कल देर रात की गई। यूपी सरकार की ओर से कहा गया कि उनकी मां की अपील के बाद यह फैसला किया गया। लेकिन हकीकत यह भी है कि लंबे समय से उनकी रिहाई की मांग की जा रही थी। इसके लिए कई दलित संगठन सक्रिय थे। वैसे तो इसे बीजेपी का सियासी दांव माना जा रहा है। पर रिहाई के बाद चंद्रशेखर ने कहा कि 2019 में बीजेपी को जड़ से उखाड़ फेंक दिया जाएगा।
    चंद्रशेखर की रिहाई के कई सियासी पहलू हैं। सबसे बड़ा तो मायावती से जुड़ा है। पिछले साल सहारनपुर में राजपूत-दलितों के संघर्ष के बाद भीम सेना सुर्खियों में आई। इस इलाके की बड़ी दलित आबादी पारंपरिक रूप से बीएसपी की समर्थक रही है। लेकिन भीम सेना के उदय के साथ ही चंद्रशेखर तेज़ी से बीएसपी के कोर वोट बैंक यानी जाटवों में मशहूर हो गए। 
    अपना जनाधार खिसकता देख मायावती भी सक्रिय हुईं और उन्होंने सहारनपुर का दौरा भी किया था। वहां यह कहने से नहीं चूकीं कि किसी संगठन के बजाए बीएसपी के झंडे तले कार्यक्रम करना चाहिए ताकि उसे रोकने की किसी की हिम्मत न हो। जाहिर है, मायावती को भीम सेना की बढ़ती ताकत का एहसास हुआ। दिल्ली के जंतर मंतर पर भीम सेना की ताकत को देखकर भी कई राजनीतिक दल चौकन्ने हो चुके हैं। मायावती भीम सेना को बीजेपी-आरएसएस की साजिश बताने से भी नहीं चूकीं।
    हालांकि शुरुआती दिनों में मायावती पर हमला बोल चुके चंद्रशेखर अब नर्म पड़ चुके हैं। जेल से रिहा होने के बाद वे मायावती को अपनी बुआ बता रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल तो बीजेपी की रणनीति को लेकर है। एससी एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के बाद बीजेपी राज्य के दलित वोट बैंक को अपने साथ लेना चाहती है। पार्टी के बड़े दलित नेताओं से कहा गया है कि वे अलग-अलग जगहों पर दलित बस्तियों में सम्मेलन करें और उन्हें बताएं कि बीजेपी ने दलितों के लिए क्या किया। पार्टी की असली चुनौती पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव वोट बैंक में सेंध लगाने की है जो बीएसपी का जनाधार है। साथ ही, वो दलित-मुस्लिम गठजोड़ को भी तोडऩा चाहती है जिसके चलते कैराना और नूरपुर में हार हुई। बीजेपी ने आगरा से बेबी रानी मौर्य को राज्यपाल बनाया और सहारनपुर से जाटव नेता कांता कर्दम को राज्यसभा भेजा।
    राज्य में बीएसपी, सपा, कांग्रेस और आरएलडी का महागठबंधन अंतिम शक्ल लेने को है। ऐसे में बसपा के जाटव और सपा के यादव वोट बैंक में दरार डालने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। शिवपाल सिंह यादव के सपा से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना लेने से यादव वोटों में टूट की संभावना बढ़ गई है। वहीं भीम सेना चाहे अभी गैर राजनीतिक संगठन हो, लेकिन चुनावों में अपने उम्मीदवार खड़े कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटव वोटों में सेंध लगा सकती है। 
    जाहिर है यह बीजेपी के लिए फायदे का सौदा है। उधर, कांग्रेस मायावती और चंद्रशेखर दोनों को साथ रखना चाहती है ताकि वोटों का बिखराव न हो। इसके लिए गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी को जिम्मेदारी सौंपी गई है। पर मायावती और चंद्रशेखर को एक ही साथ रखना शायद एक बड़ी चुनौती हो। मायावती यह भी कह चुकी हैं कि वे महागठबंधन के पक्ष में हैं लेकिन सम्मानजनक सीटें मिलनीं चाहिए। वे कह चुकी हैं कि वे कांग्रेस के साथ सिर्फ यूपी ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी तालमेल करना चाहती हैं। पर हाल ही में पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों पर उनके एक बयान से यह साफ इशारा मिला कि सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस के साथ उनकी बातचीत शायद सिरे नहीं चढ़ पा रही।
    मायावती का यह बयान कांग्रेस के लिए परेशानी पैदा करने वाला है। बीएसपी एक जमाने में बीजेपी-कांग्रेस को सांपनाथ- नागनाथ बताया करती थी। वे अब चाहती हैं कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस कितनी सीटें देती है, उसके बाद ही उत्तर प्रदेश में तालमेल की बात हो। लेकिन राजस्थान में कांग्रेस इकाई बीएसपी से तालमेल की जरा भी इच्छुक नहीं है। वहां उन्हें लगता है कि बीएसपी के बिना भी बीजेपी को हराया जा सकता है क्योंकि उसका असर कुछ सीटों पर ही सीमित है। मध्यप्रदेश में बीएसपी कड़ी सौदेबाजी कर रही है।
    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने एनडीटीवी से कहा कि उन्होंने शुरुआत में पचास सीटें मांगी थीं। लेकिन अब बीजेपी को हराने के साझा लक्ष्य के मद्देनजर उनका रुख नर्म हो रहा है। अगले दस दिनों में समझौता हो जाएगा। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक मध्यप्रदेश में 20-22 सीटें बीएसपी को दी जा सकती हैं और कांग्रेस वहां हर हाल में बसपा के साथ गठबंधन करना चाहती है।
    पिछले विधानसभा चुनाव में बीएसपी को 6।29त्न वोट मिले थे। बीएसपी ने 230 में से 227 सीटों पर चुनाव लड़ा था और चार सीटें जीती थीं। राज्य में दलितों की आबादी करीब 15 फीसदी है। वहां 35 सीटें आरक्षित हैं जिनमें से बीजेपी ने 28 सीटें जीती थीं।
    छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस बीएसपी की मांग से परेशान है। बीएसपी ने शुरू में कहा कि जिन-जिन सीटों पर कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव में हारी, वे सब उसे दे दी जाएं। फिर 90 में से 15 सीटों की मांग की गई। कांग्रेस 8-9 सीटें दे सकती है। पिछले चुनाव में बीएसपी को वहां एक सीट पर जीत मिली थी और 4.2 फीसदी वोट मिले थे। 
    ये दोनों ही राज्य वे हैं जहां बीजेपी फिलहाल सवर्णों और दलितों के बीच पिस रही है। खासतौर से मध्यप्रदेश के चंबल ग्वालियर संभाग में पहले एससी-एसटी कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ बुलाए गए दो अप्रैल के बंद के दौरान हिंसा हुई तो बाद में इस फैसले को बदलने के केंद्र सरकार के कदम के खिलाफ बुलाए गए सवर्णों के बंद के दौरान तनाव रहा। ऐसे में कांग्रेस को भी दलित वोटों के लिए मायावती के समर्थन की दरकार है। 
    मगर यह तय है कि अगर कांग्रेस और बसपा का समझौता होता है तो यह मायावती की शर्तों पर होगा, कांग्रेस की नहीं। पर सवाल यह भी उठता है कि अगर मायावती की ताकत और जनाधार में सेंध लगाने की कोशिशें होंगी तो क्या कांग्रेस के और नजदीक जाना उनकी मजबूरी नहीं बन जाएगी? (राजनीतिक संपादक एनडीटीवी इंडिया) 

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