विचार / लेख

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Date : 19-Oct-2019

राजेश अग्रवाल

गांधी का जाप करने वालों ने उनके ग्राम न्यायालय की घोर अवहेलना की

इस समय देश के शीर्ष से लेकर निचली अदालतों तक लम्बित मुकदमों की संख्या लगभग तीन करोड़ 50 लाख है। यदि इन्हें कम करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसी अनुपात में मुकदमे बढ़ते जाएंगे। अनुमान है कि सन् 2040 तक लंबित मामलों की संख्या बढक़र 15 करोड़ हो चुकी रहेगी। जाहिर है, असंख्य मुकदमे उन ग्रामीणों के हैं जिन्हें फैसले की आस में जमीन, मकान गिरवी रखने पड़ जाते हैं।

महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ। पूरे देश में प्राय: सभी राजनीतिक दलों में होड़ मची हुई है कि कौन उनका अनुसरण करने में आगे है। गांधी गांवों को सशक्त बनाना चाहते थे। पर ग्राम न्यायालयों के संदर्भ में देखा जाए तो उनकी इस अवधारणा को अमल में लाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। कानून बन जाने के बावजूद छत्तीसगढ़ समेत देश के प्राय: सभी राज्यों में इस अधिनियम की घोर उपेक्षा हो रही है।
सन् 1986 में लॉ कमीशन की 114वीं रिपोर्ट में ग्रामीणों को, जिनमें ज्यादातर गरीब हैं उनको पहुंच के भीतर न्याय देने, दूरी, समय, खर्च, श्रम हानि पर अंकुश लगाने के लिए ग्राम न्यायालय की सिफारिश की गई। करीब 22 साल बाद लॉ कमीशन की सिफारिश को मंजूर करते हुए संसद ने ग्राम न्यायालय को अधिनियमित किया, जिसे ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 कहा गया और इसे गांधी जयंती के दिन सन 2009 में दो अक्टूबर को लागू किया गया। अंतिम छोर के नागरिकों को न्याय प्रदान करना, सामाजिक, आर्थिक और अन्य अक्षमताओं के कारण किसी को भी न्याय से वंचित नहीं करना इस अधिनियम का उद्देश्य बताया गया। अधिनियम की कंडिका 3 और 4 में बताया गया है कि राज्यों में ग्राम न्यायालयों की स्थापना किस तरह से की जानी है।
मोटे तौर पर इसमें यह है कि राज्य सरकार उच्च न्यायालयों से परामर्श करके प्रत्येकपंचायत या पंचायतों का समूह बनाकर न्यायालयों की स्थापना करे। इसकी सीमाएं आवश्यकता अनुसार घटाई-बढ़ाई जा सकती हैं। धारा 5 और 6 में कहा गया है कि राज्य सरकार के परामर्श से उच्च न्यायालय प्रत्येक ग्राम न्यायालय के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति करेगा। उनकी शक्ति प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के बराबर होगी। इसी की धारा 9 में बताया गया है कि न्याय को अधिक सुलभ बनाने के लिए ये ग्राम न्यायालय चलित अदालतों के रूप में भी काम कर सकेंगे। 
धारा 11, 12 और 13 में सिविल और क्रिमिनल मामलों में इन अदालतों के क्षेत्राधिकार तय किये गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि धारा 16 के अंतर्गत, जिला न्यायालयों के मुकदमों को उच्च न्यायालय जब जरूरी समझे ग्रामीण अदालतों में सुनवाई के लिए भेज सकता है, ताकि मुकदमों का बोझ घटे। त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए धारा 19 के तहत आपराधिक मामलों में समरी ट्रायल तथा धारा 20 में दलीलों का प्रावधान किया गया है। इसी तरह दीवानी मामलों में भी धारा 24 के तहत विशेष प्रक्रियाओं का उल्लेख है, जिससे फैसला जल्द हो सके। धारा 26 में सिविल विवादों के समाधान और निपटारे के लिए ग्राम न्यायालयों के कर्तव्य निर्धारित किये
गए हैं। आमतौर पर जिन मामलों में अनेक दिक्कतों के कारण लोग मौजूदा अदालतों तक नहीं पहुंच पाते उन्हें इन ग्राम न्यायालयों में सुने जाने का प्रावधान किया गया है, जैसे जमीन का अधिग्रहण, कब्जा या मनरेगा की मजदूरी के भुगतान का विवाद। चूंकि ये अदालतें ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित होनी है इसलिए तारीख पर तारीख वाली स्थिति भी बहुत कम होगी क्योंकि ग्रामीण अपने आसपास होने वाली पेशी में सहज रूप से पहुंच जाया करेंगे।
सन् 2009 में अधिनियम लागू करते समय देशभर में कम से कम 5000 ग्राम न्यायालयों की स्थापना का लक्ष्य रखा गया था लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति हैरान करने वाली है। केन्द्र सरकार की 2018 में तैयार की गई अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 11 राज्यों ने सीमित संख्या में ग्राम न्यायालय स्थापित करने के लिए अधिसूचना जारी की, इनमें भी केरल, हरियाणा और महाराष्ट्र को छोडक़र वास्तविक रूप से काम कर रहे न्यायालयों की संख्या भी कम है। मध्यप्रदेश में नोटिफाई 89 में से 83, राजस्थान में 45 में से केवल 15 ग्राम न्यायालय कार्यरत हैं। कर्नाटक में दो ग्राम न्यायालयों का नोटिफिकेशन हुआ पर कार्यरत एक भी नहीं। 
यही स्थिति झारखंड, गोवा और पंजाब की है, जहां क्रमश: 6, दो और दो ग्रामीण अदालतों के लिए अधिसूचना निकाली गई पर काम एक भी नहीं कर रही है। ओडिशा में 16 ग्राम न्यायालयों की अधिसूचना जारी हुई जिनमें 13 काम कर रहे हैं। महाराष्ट्र में 23 और केरल में 29 ग्राम न्यायालयों के नोटिफिकेशन निकले और सभी काम भी कर रहे हैं।  हरियाणा में केवल दो ग्राम न्यायालयों के लिए नोटिफिकेशन जारी किया गया लेकिन दोनों काम तो कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा गांधीजी के नाम पर पदयात्राएं निकाल रही है पर न तो पिछली सरकार ने ग्राम न्यायालयों की स्थापना के लिए कोई दिलचस्पी दिखाई और न ही मौजूदा सरकार ने अब तक इस दिशा में कोई कदम उठाया है।
ग्राम न्यायालयों की स्थापना को लेकर राज्यों की उदासीनता से चिंतित करीब डेढ़ सौ स्वयंसेवी संस्थाओं के फेडरेशन सोसाइटीज फॉर फास्ट जस्टिस ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। बीते सितंबर माह में प्रारंभिक सुनवाई के बाद कोर्ट ने सम्बन्धित सभी राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। फेडरेशन के संयोजक प्रवीण पटेल बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया गया था। सभी तथ्यों से अवगत होने के बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। जब ज्ञापन सौंपा गया तो उन्होंने कहा कि आप इस बारे में केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से बात करिए। फेडरेशन ने ग्राम न्यायालयों की स्थापना की मांग को लेकर अम्बिकापुर से रायपुर तक पदयात्रा भी निकाली लेकिन नतीजा नहीं निकला।
इस समय देश के शीर्ष से लेकर निचली अदालतों तक लम्बित मुकदमों की संख्या लगभग तीन करोड़ 50 लाख है। यदि इन्हें कम करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसी अनुपात में मुकदमे बढ़ते जाएंगे। अनुमान है कि सन् 2040 तक लंबित मामलों की संख्या बढक़र 15 करोड़ हो चुकी रहेगी। जाहिर है, असंख्य मुकदमे उन ग्रामीणों के हैं जिन्हें फैसले की आस में जमीन, मकान गिरवी रखने पड़ जाते हैं। सन् 2008 में 5000 ग्राम न्यायालयों की स्थापना की परिकल्पना की गई थी। अब लक्ष्य अधिक होना चाहिए। यदि ये अदालतें गठित हो गईं तो ज्यादातर मुकदमों को वहीं पर निपटाया जा सकेगा और मौजूदा अदालतों की बोझ को एक बड़े स्तर तक कम किया जा सकेगा।
प्रसंगवश, यह बताना होगा कि सरकारें गहराई से विचार करती हैं कि किस कानून को लागू करना है किसे नहीं। वाणिज्यिक अधिनियम 2015 इसका सटीक और दिलचस्प उदाहरण है। 31 दिसम्बर 2015 को वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम की अधिसूचना जारी की गई। इसमें कहा गया कि यह कानून 23 अक्टूबर 2015 से लागू होगा। यानि अधिसूचना जारी होने के भी पहले की तारीख से। इससे यह पुष्टि होती है कि जब कार्पोरेट का हित हो तो सरकारें अदालतों को पुरानी तारीख से काम पर लगा देती हैं और अधिसूचना बाद में जारी की जाती है। 
हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में हैं। हम इसके स्वस्थ होने का दावा कैसे कर सकते हैं जब इसके तीनों अंग न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका जनहित में काम नहीं कर पायें। लोकतांत्रिक सरकार का कर्तव्य है कि वह लोगों की आकांक्षाओं, अपेक्षाओं पर जवाब दे और संविधान में दिए गए कानून के राज को स्थापित करे। 

संविधान की प्रस्तावना का हमारे ह्रदय में स्थान है जो कहता है कि समान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करना सबका अधिकार है। जीवन की स्वतंत्रता हमारा मौलिक अधिकार है यह संविधान में भी लिखा गया है और कई बार सर्वोच्च अदालतों ने इसकी स्पष्ट व्याख्या भी की है। क्या शीघ्र न्याय पाना निर्धन ग्रामीणों के मौलिक अधिकार में शामिल नहीं? आपराधिक मुकदमों का फैसला कई बरसों तक रुका रहता है दीवानी मुकदमे लड़ते-लड़ते तो पीढ़ी ही गुजर जाती है। शीघ्र न्याय का रोना दो-तीन दशकों से रोया जा रहा है पर निदान के लिए स्पष्ट प्रावधान होने के बाद भी सरकारें उदासीन हैं। फैसलों में असामान्य देरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर अविश्वास भर देता है, लोग निराश हो जाते हैं। आगे चलकर यह कानून के उल्लंघन और अराजकता का कारण भी बन जाता है। महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ पर सरकारें उनके सपनों को पूरा करने का संकल्प ले रही हैं। क्या छत्तीसगढ़ सरकार गांधीजी के इस सपने को पूरा करने के लिए पहल करेगी?

 


Date : 19-Oct-2019

सुहैल ए शाह

कश्मीर घाटी में हालात कैसे हैं, शायद इस समय किसी को बताने की भी जरूरत नहीं है। ऐसे हालात में बाकी लोगों के साथ-साथ कश्मीर के किसान भी परेशान हैं। इनमें एक बड़ी संख्या सेब उगाने वाले किसानों और व्यापारियों की है जो कश्मीर की अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा हैं।
लेकिन कश्मीर सेब के अलावा एक और चीज उगाने के लिए भी माना जाता है और वह है केसर, जिसे सैफ्रन या जाफरान भी कहा जाता है। केसर की खेती करने वाले किसानों के लिए परेशानी कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस वक्त जब पूरा कश्मीर मुश्किल हालात में है, ऐसा लग रहा है कि केसर के किसानों की मुश्किलें आसान हो रही हैं। इन आने वाले अच्छे दिनों के कई कारण हैं। इससे पहले कि ये कारण बताए जाएं, जरूरी है केसर की खेती के बारे में कुछ चीज़ें जान ली जाएं।
कश्मीर में केसर की खेती पुलवामा जिले के पंपोर और उसके आस-पास के करीब 226 गावों में होती है। माना जाता है राज्य के लगभग 150000 लोग इस खेती से जुड़े हुए हैं। दुनिया का सबसे महंगा मसाला कहे जाने वाले केसर की फसल अक्टूबर के आखिरी और नवंबर के पहले एक-दो सप्ताह में समेटी जाती है। इसकी अच्छी फसल होने के लिए जरूरी है सितंबर और अक्टूबर में बारिश होना, जो पिछले कई सालों से या तो नहीं हो रही थी या फिर इतनी ज़्यादा कि बाढ़ जैसा माहौल बन जाता था। 2014 के सितंबर में जब अभूतपूर्व बारिश के चलते खतरनाक बाढ़ आई थी उस साल केसर की फसल न के बराबर हुई थी।
सिंचाई की इस कठिनाई को दूर करने के लिए सरकार ने नेशनल सैफ्रन मिशन के तहत केसर के खेतों में ‘ड्रिप इरीगेशन’ सुविधा के लिए पाइप बिछाए थे। ‘लेकिन उनमें से कभी पानी नहीं निकला’ पंपोर के मुश्ताक़ अहमद गनाई, जो कि केसर के किसान हैं, सत्याग्रह को बताते हैं।
कृषि विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक ‘इस साल बचे हुए ड्रिप इरीगेशन का काम पूरा किया जाना था लेकिन सब कुछ बंद होने के चलते वह रुक गया है और कुछ पता नहीं है कि कब तक रुका रहेगा।’ ऐसे में केसर के किसानों की परेशानी दूर करने के लिए मानो प्रकृति खुद सामने आई है। सितंबर के आखिरी और अक्टूबर के पहले दो सप्ताह में कश्मीर घाटी में ठीक-ठाक बारिश हुई है, बिलकुल उतनी जितनी केसर की अच्छी फसल होने के लिए चाहिए।
‘हम लोग एक और साल अपनी फसल न के बराबर होने के लिए अपने आपको तैयार कर ही रहे थे कि बारिश हो गई। अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस बार फसल बहुत अच्छी होने वाली है,’ पंपोर के ही एक और किसान, फारूक अहमद भट, सत्याग्रह को बताते हैं कि इतनी बारिश जिससे केसर की ज़मीन में बस नमी रहे, एक लंबे अरसे बाद हुई है।
‘अब आशा यह है कि आगे मौसम ठीक रहे ताकि जब फूल निकलें तो वो बारिश से बर्बाद न हो जाएं’ फारूक सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं, ‘हम बस दुआ कर सकते हैं, बाकी ऊपर वाले के हाथों में है सब कुछ।’
फारूक और उनके साथ के कई अन्य किसान हमें बताते हैं कि पूरे साल उनकी जमीन बंजर पड़ी हुई थी ‘और अब इस समय भी ऊपर वाला साथ न दे तो एक और साल मुश्किलों में कटने वाला है,’ बारिशों की यह खुशी इन किसानों के लिए एक और खुशी के कुछ समय बाद ही आई है। हाल ही में कश्मीर के केसर को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पहचान मिली है, जियोग्राफिक इंडिकेशन रजिस्ट्रेशन के रूप में। इसका मतलब यह है कि अब कश्मीर का केसर जीआई टैग के साथ आएगा। यह टैग चीजों पर यह बताने के लिए लगाया जाता है कि यह दुनिया की किसी विशेष जगह से निकली हुई है और इस वजह से इसमें कुछ गुण ऐसे हैं जो और किसी में नहीं हैं।कृषि विभाग के प्रॉडक्शन डिविजन के सेक्रेटरी, मंजूर अहमद लोन, सत्याग्रह को बताते हैं कि इस विषय में आखिरी बैठक दिल्ली में 23 सितंबर को हुई थी। ‘भारत सरकार की मंजूरी के बाद यह जीआई टैग दिया गया है।’ वे कहते हैं कि यह उपलब्धि कश्मीर के केसर के लिए एक नया जीवनदान जैसा है। इससे कश्मीर के केसर की अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में कीमत भी बढ़ जाएगी और इसकी मार्केटिंग भी आसान हो जाएगी।
किसान भी इस बात से काफी खुश हैं। ‘पहले कश्मीर के केसर के नाम पर लोग बाहर पता नहीं क्या-क्या बेचते थे। अब केसर खरीदने वाला भी संतुष्ट रहेगा क्योंकि उसको कोई ठग नहीं सकता है’ मुश्ताक़ अहमद सत्याग्रह से कहते हैं।
तीसरी अच्छी खबर केसर के किसानों और व्यापारियों के लिए यह है कि नेशनल सैफ्रन मिशन के तहत इन लोगों को कश्मीर में ही अपनी एक मंडी मिलने वाली है। ‘स्पाइस पार्क’ के नाम से बनाई गई यह मंडी पंपोर से थोड़ी दूर दुस्सू गांव में स्थित है।’ कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक यह मंडी केसर के किसानों के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मार्केट का काम करेगी।
‘इस स्पाइस पार्क में दुनिया भर से व्यापारी आएंगे और यहां का केसर खरीदेंगे’ कृषि विभाग के एक व्यापारी सत्याग्रह को बताते हैं। वे कहते हैं कि सरकार हर साल इस स्पाइस पार्क में ‘ट्रेड फेयर’ आयोजित करके दुनिया भर के व्यापारियों को रिझाने की कोशिश करेगी।’ उम्मीद यह है कि यह स्पाइस पार्क इसी साल शुरू कर दिया जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो यह इन किसानों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण कदम होगा।’
किसान भी सरकार के इस कदम को लेकर काफी उत्सुक हैं। वे कहते हैं कि पहले वे मजबूर थे यहां के ही व्यापारियों को अपनी फसल देने के लिए। लेकिन ‘अब हमें दिल्ली या मुंबई जाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। लोग यहीं आएंगे और उम्मीद है कि हम लोगों को अच्छे पैसे मिलेंगे अपनी फसल के,’ अब इतनी खुशियों में ज़ाहिर है कि बाधाएं भी जरूर होंगी ही। पहली मुश्किल यह है कि इस समय सब कुछ बंद पड़ा हुआ है कश्मीर में और इन किसानों में से ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जिनकी ज़मीन उनके घरों से दूर स्थित है।
‘इस समय जरूरत है हर रोज ज़मीन पर जाने की। लेकिन वह ऐसे हालात में कैसे मुमकिन है’ दुस्सू में रहने वाले, बिलाल अहमद, जिनकी ज़मीन उनके घर से सात किलोमिटर की दूरी पर स्थित है, ने सत्याग्रह को बताया।

यह मुश्किल अगर किसी तौर हल हो भी जाती है तो फिर यह कि अभी पिछले साल का केसर भी दुकानदारों के पास ऐसा ही पड़ा हुआ है। इन किसानों की फसल का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय दुकानदार खरीद लेते हैं जो फिर यह केसर पर्यटकों को बेचते हैं। लेकिन इस बार पर्यटक आए ही नहीं बिलकुल और दुकानदारों के पास केसर पहले से ही पड़ा हुआ है।

‘अब उम्मीद स्पाइस पार्क पर लगी हुई है, लेकिन हालात ऐसे ही रहे तो वहां कौन आएगा’ फारूक अहमद सत्याग्रह से कहते हैं। खैर, आगे जो भी हो, फिलहाल तो इन किसानों के आने वाले दिन अच्छे ही लग रहे हैं। (सत्याग्रह)

 

 

 


Date : 18-Oct-2019
 राजेश
 
अरबी में एक कहावत है- जिसके पास स्वास्थ्य है, उसके पास उम्मीदें हैं। जिसके पास उम्मीदें हैं, उसके पास सबकुछ है। 
 
दुनिया को बचाए रखने के लिए इनसान को बचाए रखना जरूरी है, और इंसान को बचाए रखने के लिए उसके स्वास्थ्य को बचाए रखना। इस तरह इंसानी स्वास्थ्य को बचाए रखने की चिंता, दुनिया को बचाए रखने की ही चिंता है। 
 
अब सवाल यह उठता है कि हम इंसानी स्वास्थ्य को बचाए रखने की अपनी जिम्मेदारी किस तरह निभा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के अनेक देशों में स्थिति भयावह है। अनेक खतरों के साथ एक बड़ा खतरा हर समय दुनिया के सिर पर सवार रहता है, वह है कुपोषण का और यह खतरा इतना बड़ा है कि इसे महामारी तक कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक भारत में हर साल कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के दस लाख बच्चों की मौत हो जाती है। 
कुपोषण के निवारण से लेकर प्राथमिक सुविधाओं की उपलब्धता तक, स्वास्थ्य संबंधी हर तरह की चुनौतियों से भारत के अलग-अलग राज्य अपने-अपने तरह से निपट रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी यह लड़ाई पूरी ताकत के साथ लड़ी जा रही है, हालांकि बहुत से अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ में यह कहीं ज्यादा बड़ी है। 
आने वाले 1 नवंबर को छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण को 20 साल पूरे हो जाएंगे। यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड राज्य जब क्रमश: मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तरप्रदेश से अलग हुए थे, तब इन अंचलों की सामाजिक-आर्थिक-भौगोलिक और अधोसंरचनात्मक परिस्थितियां कैसी थीं। इनमें से भी छत्तीसगढ़ की परिस्थितियां ज्यादा दुरुह थीं। एक तो वनों से 43 प्रतिशत आच्छादित, ऊपर से नक्सल पीडि़त। अब भी राज्य के दुर्गम क्षेत्रों में निवास कर रही बड़ी आबादी तक मूलभूत सुविधाओं की पहुंच कठिन बनी हुई है और यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में कुपोषण की स्थिति अब भी भयावह बनी हुई है। 
छत्तीसगढ़ में पांच साल से कम उम्र के 37.06 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। 15-45 वर्ष उम्र की 41.50 प्रतिशत किशोरियां और महिलाएं एनीमिया से पीडि़त हैं। यह समझा ही जा सकता है कि इन पीडि़तों में सबसे ज्यादा आदिवासी और निम्न वर्ग के लोग ही हैं। यदि इस उक्ति को यहां एक बार फिर याद कर लिया जाए कि ‘कुपोषण एक तरह की महामारी है’, तब हालात की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन हालात डरावने तो हैं, निराशाजनक बिलकुल नहीं है। राज्य शासन ने छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्यगत चुनौतियों के कारकों को चिन्हित कर जिस नयी रणनीति के साथ काम शुरू किया है, उसके शुरुआती परिणामों ने ही नया उत्साह जगा दिया है। छत्तीसगढ़ की नयी सरकार ने च्च्गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ज्ज् को अपना ध्येय वाक्य चुना है, जिसका अर्थ है- हम नये छत्तीसगढ़ का निर्माण करेंगे। स्वास्थ्य और शिक्षा समेत सभी न्यूनतम सुविधाओं की पहुंच दुर्गम से दुर्गम क्षेत्रों तक सुनिश्चित करने के लक्ष्य को लेकर काम शुरू किया जा चुका है। और यह काम एक मुहिम के रूप में किया जा रहा है। 
गांधीजी की 150वीं जयंती, 2 अक्टूबर 2019 को, प्रदेश सरकार ने एक साथ पांच नयी योजनाओं की शुरुआत की है। इनमें से चार योजनाएं पोषण और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। 
मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ को कुपोषण से मुक्त करने के लिए अपनी सरकार को 3 साल का लक्ष्य दिया है। इसी के तहत बीते जुलाई माह से प्रदेश के सर्वाधिक पिछड़े जिलों दंतेवाड़ा और बस्तर से सुपोषण अभियान की शुरुआत की गई थी। इसके तहत पंचायतों में आंगनवाडिय़ों के माध्यम से बच्चों, किशोरियों और महिलाओं को पका हुआ, गर्म, पौष्टिक और रुचि के अनुसार आहार हर दिन उपलब्ध कराया जाने लगा। शुरुआती सफल नतीजों के बाद इसे धीरे-धीरे प्रदेश के अन्य जिलों में शुरु किया गया, और अंतत: 02 अक्टूबर 2019 से पूरे प्रदेश की सभी पंचायतों में लागू कर दिया गया। प्रयोगात्मक (पायलट) योजना के नतीजे इस प्रकार सामने आए हैं- माह अगस्त में 4,52,291 कुपोषित बच्चे, और 1,84,351 एनीमिया पीडि़त महिलाएं लाभान्वित हुईं। सितंबर माह में 4,76,930 कुपोषित बच्चों और 2,66,405 एनीमिया पीडि़त महिलाओं ने इस योजना का लाभ उठाया। 
नयी सरकार ने राज्य में पूर्व प्रचलित पीडीएस प्रणाली में संशोधन करते हुए नयी सार्वभौम पीडीएस-एपीएल प्रणाली लागू की है। नयी पीडीएस प्रणाली के जरिये भी हर वर्ग के लिए पोषण आहार की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है।
जिन प्राथमिक सुविधाओं के अभावों को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बड़े खतरों की सूची में शामिल किया है, छत्तीसगढ़ की नयी मुख्यमंत्री हाट-बाजार क्लीनिक योजना और मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना ने, उस खतरे को इस प्रदेश में न्यूनतम कर दिया है। इनमें से पहली योजना के तहत छत्तीसगढ़ के दूरस्थ अंचलों में, खासकर आदिवासी क्षेत्रों में अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लक्ष्य को लेकर काम किया जा रहा है। इन साप्ताहिक हाट-बाजारों में शासकीय क्लीनिक संचालित किए जाते हैं, जहां जांच, उपचार, दवाओं समेत नियमित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इन्हीं केंद्रों के माध्यम से महिलाओं, किशोरियों, बच्चों और अन्य वर्ग को स्वास्थ्य के संबंध में जागरुक भी किया जाता है। प्रदेश व्यापी शुरुआत करने से पहले इसे भी आदिवासी क्षेत्रों में प्रयोगात्मक तौर पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में संचालित किया जा रहा था। जो आंकड़े सामने आए उसके अनुसार अगस्त माह में 3005 हाट बाजारों में जाकर मेडिकल टीम ने 1,03,541 मरीजों का उपचार किया। सितंबर माह में 3813 साप्ताहिक हाट बाजारों में जाकर 1,23,513 मरीजों का उपचार किया।मुख्यमंत्री हाट-बाजार क्लीनिक योजना की ही तर्ज पर शहरी क्षेत्रों में मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना शुरू की गई है। इस योजना के तहत स्लम बस्तियों तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित की जा रही है। इन बस्तियों में ओपीडी समेत विभिन्न जांच एवं उपचार की सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं।
राज्य और जिला स्तर पर शासकीय और निजी अत्याधुनिक अस्पतालों, अत्याधुनिक उपकरणों, भवनों, सुयोग्य चिकित्सकों, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों, कार्यकर्ताओं की राज्य में भरपूर उपलब्धता के बावजूद छत्तीसगढ़ के एक बड़े हिस्से में स्वास्थ्य की रौशनी नहीं पहुंच पा रही थी, और असल में वहीं पर प्रदेश की आत्मा है। अब जाकर छत्तीसगढ़ का अंतस भी प्रकाशित हो रहा है। 
 
तारन प्रकाश सिन्हा, 
           आई0ए0एस0
आयुक्त, जनसंपर्क
छत्तीसगढ़

Date : 18-Oct-2019

-डॉ. श्रीकांत प्रधान, सहा. प्राध्या. राजनीति विज्ञान

महापौर का निर्वाचन प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष दोनों में गुणावगुण हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि 73वें संविधान संशोधन लागू होने के 25 वर्ष बाद नगरीय निकायों के प्रमुखों के लिए अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की आवश्यकता क्यों पड़ गई?  माननीय मुख्यमंत्री का कहना कि इसमें बुराई क्या है? तो प्रतिप्रश्न उनसे कि प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली में बुराई क्या है? अप्रत्यक्ष प्रणाली में बुराई नहीं होती तो उसे 73वें संविधान संशोधन में तिलांजलि क्यों दे दी गई थी?
मध्यप्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ में भी नगरीय निकायों के प्रमुख महापौर/अध्यक्षों का चुनाव जनता से कराने के बजाए पार्षदों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से करवाने का निर्णय मंत्रिमंडल उपसमिति ने लिया है। 15 अक्टूबर को हुई बैठक में मंत्रिमंडल उपसमिति ने नगरीय निकाय के चुनाव से संबंधित तीन बिंदुओं पर छत्तीसगढ़ नगरीय निकाय अधिनियम में संशोधन करने का सुझाव दिया है-प्रथम, महापौर अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रीति से कराने। दूसरा,पार्षदों का चुनाव ईवीएम से नहीं बैलेट पेपर से कराने और तीसरा, पार्षदों के चुनाव में खर्च की सीमा तय करने।
1993 के पूर्व 73वां संविधान संशोधन लागू होने के पहले संयुक्त मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों के प्रमुखों का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा होता था। इस प्रणाली की अपनी कुछ अलोकतांत्रिक परंपराएं विकसित हो गई थीं जो स्थानीय निकायों को कमजोर कर रही थीं। नगरीय स्थानीय स्वशासन को प्रभावी,शक्तिशाली तथा लोकउत्तरदायी बनाने के लिए 73वें संविधान संशोधन कर नगरीय निकायों को संवैधानिक आधार प्रदान किया गया, जिसमें नगरीय निकायों के प्रमुख का पद जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित कर दिया गया। वस्तुत: महापौर अध्यक्षों के अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के क्या गुणावगुण थे कि 73वें संविधान संशोधन में उसे तिलांजलि दे दी गई थी।
यदि निकाय प्रमुखों के अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के गुणों के बात करें तो पहला, इसमें महापौर सामान्य सभा की उपेक्षा नहीं करता है क्योंकि यहां एमआईसी (नगर निगम में मेयर इन काउंसिल और पालिकाओं में एमआईपी अर्थात मेयर इन पालिका) का महत्व कम होता है और अधिकांश विषय सामान्य सभा पर विचार के लिए रखे जाते हैं। दूसरा,इसमें महापौर/प्रमुख की सर्वोच्चता/विशिष्टता पर भी नियंत्रण रहता है क्योंकि पार्षदों का उस पर नियंत्रण रहता है। तीसरा, महापौर प्रमुख वही निर्वाचित होगा जिसके साथ पार्षदों का बहुमत होता, इससे महापौर को अच्छे प्रस्ताव सामान्य सभा में पारित करवाने में सहूलियत होती है। इतने गुणों के साथ कुछ अलोकतांत्रिक तौर-तरीके भी इस प्रणाली में देखने को मिले।पहला, सर्वाधिक अलोकतांत्रिक तरीका पार्षदों की खरीद-फरोख्त(हार्स ट्रेडिंग) का है।
यदि किसी दल के पार्षदों का स्पष्ट बहुमत है या संख्यात्मक अंतर अधिक है तो महापौर प्रमुख का चुनाव सरलता से हो जाता है। किंतु किसी निकाय में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला या पार्षदों की संख्या कम है तो धनबल और बाहुबल की राजनीति देखने को मिलती थी,जो पूर्णत:एक लोकतांत्रिक संस्था की प्रायोजित हत्या (ऑनर किलिंग) होती है। इसके लिए पार्षदों का अपहरण  जैसी घटनाएं भी शामिल हैं। दूसरा, इस पद्धति में पार्षदों के गुटों का निर्माण होता है और उचित महत्व न मिलने या सौदा ना जमने पर महापौर को अस्थिर करने का प्रयास करते हैं । तीसरा, यदि दल-बदल कानून लागू नहीं होता या दलगत आधार पर चुनाव नहीं होते है तो निकायों में विपक्षी दल को नष्ट करना साबित होता है। चौंथा, एक प्रमुख तथ्य यह भी कि इसमें राज्य में सरकार बदलने के साथ महापौरों को बदलने का खेल भी प्रारंभ हो जाता था। जब विधानसभा जैसे आधारभूत संवैधानिक संस्थानों में दलबदल का खेल हो रहा हो तो फिर नगरीय निकाय तो राज्य सरकारों की बपौती जैसी ही हैं।
महापौर/अध्यक्ष के निर्वाचन की वर्तमान प्रक्रिया प्रत्यक्ष निर्वाचन के लाभ एवं गुणों को ध्यान में रखकर 73वें संविधान संशोधन द्वारा इसे अपनाया गया। 
प्रथम, जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन होने से महापौर/अध्यक्ष जनता से जुड़े रहते हैं। राजनीतिक दलों के साथ महापौर/अध्यक्षों को इस बात का डर रहता है कि जनता की नाराजगी आगामी चुनाव में भारी पड़ सकती है।दूसरा, स्थानीय निकायों में राजनीतिक स्थिरता का प्रभाव कठोर नियमों पर दिखता है जो निकायों को वित्तीय एवं विकास के मार्ग पर ले जाता है। तीसरा, राज्य एवं निकायों में अलग-अलग दलों की सरकारें होने पर भी निकाय स्वतंत्रता पूर्वक निर्णय ले पाते थे। किंतु इस प्रणाली में भी कुछ कमजोरियां दृष्टिगत हो रही हैं। प्रथम, महापौर/अध्यक्ष जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित होने के कारण पार्षदों के प्रति उनकी जवाबदेही कम हो जाती थी। दूसरा, महापौर के दल के या पसंद के पार्षदों के वार्ड में अधिक काम होते हैं और अन्य वार्ड पार्षद के क्षेत्र में काम नहीं होता या कम काम होते हैं।चौंथा, महापौर द्वारा अपने पसंदीदा एवं नजदीकी पार्षदों की नियुक्ति एमआईसी  में कर अधिकांश प्रस्ताव को टुकड़ों में  तोडक़र एमआईसी से पारित करवाकर लागू कर दिए जाते थे तथा सामान्य सभा की उपेक्षा की जाती थी। पांच, इसमें महापौर/अध्यक्ष का कार्यकाल निश्चित होता है। इसके कारण महापौर का रवैया विशिष्टता (अधिनायकत्व/ सर्वोच्चता)का होता है। चौंथा, महापौर एक दल का हो तथा सामान्य सभा में दूसरे दल के पार्षदों का बहुमत हो तो अच्छे प्रस्ताव भी सामान्य सभा द्वारा नकार दिए जाते हैं। इससे निकायों की वित्तीय एवं विकासात्मक गतिविधियां प्रभावित होती है। पांचवां, महापौर एवं उनके एमआईसी द्वारा बड़े मुद्दे जो सामान्य सभा में चर्चा के लायक रहते हैं, उन्हें भी टुकड़ों में बांट कर उसकी महत्ता कम बताकर एमआईसी से पारित करवाकर लागू कर दिया जाता है।
मंत्रिमंडलीय उप समिति द्वारा ईवीएम की जगह पुराने मतपत्र से चुनाव कराने का निर्णय भी तुनकमिजाजी लगता है। भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा ईवीएम के एथिकल हैकिंग के लिए तीन दिन का ओपन हाउस चैलेंज रखा जाता है और कोई भी राजनीतिक दल या सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ वहां नहीं आता किंतु चुनाव में हारने का श्रेय अपने कर्मों की बजाय ईवीएम पर डाल देता है।
पार्षदों के चुनावी खर्च की सीमा तय करना राजनीतिक शुचिता के बिना वैसा ही जैसा कीचड़ में से नहाकर निकलना। अप्रत्यक्ष रीति से महापौर के चुनाव में होने वाले खर्च बचने की बात करना मानसिक दिवालियापन को दर्शाता है, क्योंकि इसमें पार्षदों की खरीद-फरोख्त की राशि शामिल नहीं है। आयोग या सरकारें चुनावी खर्च की सीमा तय करने के लिए नियम कुछ भी निर्धारित कर लें, पर  होता वही है जो प्रत्याशी करता है। एक छोटे महाविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में भी उम्मीदवारों द्वारा पांच से दस लाख रुपए छात्र संगठनों द्वारा खर्च किए जाते हैं तो यह चुनाव तो महापौर को चुने वाले पार्षदों का है।
वस्तुत: महापौर का निर्वाचन प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष दोनों में गुणावगुण हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि 73वें संविधान संशोधन लागू होने के 25 वर्ष बाद नगरीय निकायों के प्रमुखों के लिए अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की आवश्यकता क्यों पड़ गई?  माननीय मुख्यमंत्री का कहना कि इसमें बुराई क्या है? तो प्रतिप्रश्न उनसे कि प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली में बुराई क्या है? अप्रत्यक्ष प्रणाली में बुराई नहीं होती तो उसे 73वें संविधान संशोधन में तिलांजलि क्यों दे दी गई थी? प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्रों के अनुसार प्रदेश सरकार द्वारा नगरीय निकायों के चुनाव के पहले करवाई गई गोपनीय सर्वे रिपोर्ट में नगरीय क्षेत्रों के मतदाताओं की प्रदेश सरकार के प्रति नाखुशी है। कहा जा रहा है कि वर्तमान सरकार का कोई मंत्री  जनता के बीच में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं रख पाया या जनता में उनकी गहरी पैठ की कमी है। 
 

 


Date : 17-Oct-2019

पाबलो ओचोआ

इसमें कोई शक नहीं कि यह संपन्न होती दुनिया को लेकर एक अच्छी ख़बर है। 1990 से लेकर 2015 तक अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 190 करोड़ से घटकर 73 करोड़ 50 लाख रह गई। इसका मतलब है कि दुनिया की आबादी के जिस हिस्से को परिभाषा (1.90 अमरीकी डॉलर या इससे कम प्रतिदिन में गुजारा करना) के अनुसार गऱीब माना जाता था, वह इस दौरान 36 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत रह गया।

मगर गरीबी के खिलाफ लड़ाई की कहानी आसान नहीं है और गऱीबी रेखा का मानक तय करने वाले अर्थशास्त्रियों ने बीबीसी को बताया कि अभी विकास को लेकर जो नीतियां हैं, वे सही ढंग से बेहद गऱीब लोगों तक नहीं पहुंच पा रहीं हैं या उनके काम नहीं आ रहीं।

विश्व बैंक के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट रहे मार्टिन रवालियन कहते हैं, बढ़ती असमानता हमारे लिए गरीबी मिटाने और व्यापक सामाजिक प्रगति की राह में चुनौतियां पैदा कर रही है।

विश्व बैंक के अनुसार समग्र विकास के अभाव, आर्थिक सुस्ती और हाल ही में हुए संघर्षों ने कुछ देशों की प्रगति की रफ्तार में बाधा पैदा की है।

चीन और भारत में जहां कुल एक अरब लोगों को अब गऱीब की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, वहीं कुछ सब-सहारन अफ्रीका में बेहद गरीबी में रह रहे लोगों की संख्या आज से 25 साल पहले के मुकाबले बढ़ गई है। विश्व बैंक में पोवर्टी एंड इक्विटी ग्लोबल प्रैक्टिस की वैश्विक निदेशक कैरोलिना सांचेज-पारामो कहती हैं, पिछले करीब एक दशक में हम दुनिया में तरक्की की दो अलग-अलग रफ्तारें देख रहे हैं।

उन्होंने बीबीसी को बताया कि इसके लिए चार कारण जिम्मेदार हैं।

1. आर्थिक प्रगति की अलग-अलग रफ्तार

कैरोलिना सांचेज-पारामो कहती हैं, एक दशक में बुनियादी स्तर पर सब सहारान अफ्रीका और लातिन अमरीका में पूर्वी या दक्षिण एशिया की तुलना में ग्रोथ कम रही है। अगर आप कई देशों में बहुत तेज़ी से बढ़ती आबादी को मिला दें तो आपको प्रति व्यक्ति ग्रोथ और भी कम मिलेगी।

जब देश ही प्रगति नहीं कर रहे, तब गरीबी हटाने की दिशा में आगे बढऩा मुश्किल हो जाता है। यहां गरीबी पुनर्वितरण के माध्यम से हटाई जा सकती है जो कि बहुत मुश्किल है।

2. सबका विकास

गरीबी हटाने के लिए लगातार आर्थिक प्रगति करना एक ज़रूरी शर्त बेशक है लेकिन कैरोलिना सांचेज-पारामो कहती हैं यह एकमात्र शर्त नहीं है। कई देशों की ग्रोथ पर्याप्त रूप से समावेशी नहीं रही है क्योंकि वहां पर पूंजी पर ज़्यादा ज़ोर देने वाले उद्योग हैं जो कि अपेक्षाकृत कम नौकरियां पैदा करते हैं। उदाहरण के लिए सब-सहारन अफ्ऱीका में ऐसी स्थिति है।

सांचेज-पारामो कहती हैं, गरीबों के लिए श्रम ही आय का मुख्य स्रोत है। तो अगर श्रमिकों को अवसर ही नहीं मिलेंगे तो गरीबी में कमी भी कम ही देखने को मिलेगी।

3. आधारभूत सुविधाएं

अर्थव्यवस्था तब संपन्न होती है जब लोगों के पास न सिफऱ् अच्छी आमदनी हो बल्कि उन्हें शिक्षा, फाइनेंस और अच्छे आधारभूत ढांचे की सुविधा मिले।

कैरोलिना सांचेज-पारामो कहती हैं, इससे भी ग्रोथ मे सभी के शामिल होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं। वह दक्षिण और पूर्व एशिया में मलेशिया का उदाहरण देते हुए कहती हैं, यहां एक ही साथ कई चीजें हो रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से 2013 से ही मलेशिया में गरीबी शून्य है मगर देशक मानकों के हिसाब से नहीं। ब्राजील में कामयाब कैश ट्रांसफऱ कार्यक्रम के कारण गरीबी को पहले घटाया गया मगर फिर यह बढ़ गई। 1990 में 21.6 प्रतिशत थी, 2014 में 2.8 प्रतिशत रह गई लेकिन 2017 में 4.8 फ़ीसदी हो गई।

4. संघर्ष

कुछ देशों ने पहले जो सफलता हासिल की थी, वह हाल के सालों में राजनीतिक और हिंसक संघर्षों से फिर ख़त्म हो गई। कैरोलिना सांचेज़-पारामो के मुताबिक, इसी समय, उन देशों में गऱीबी और बढ़ती जा रही है जो संघर्षों में उलझे हैं जबकि अन्य देश तरक्की कर रहे हैं।

2015 में दुनिया के आधे गऱीब पांच ही देशों में थे- भारत, नाइजीरिया, डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो, इथियोपिया और बांग्लादेश।

ताजा अनुमानों के अनुसार नाइजीरिया ने सबसे ज्यादा गरीब नागरिकों के मामले में भारत को या तो पीछे छोड़ दिया है या फिर पीछे छोडऩे ही वाला है। कई अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्थाएं गरीबी के खिलाफ लडऩे की दिशा में अच्छा काम कर रही हैं, फिर भी 2030 तक 1.90 डॉलर या इससे कम में गुजारा करने वाले 10 में लगभग नौ लोग सब-सहारन अफ्रीका के होंगे।

गरीबों की मदद

2030 तक गरीबी मिटाना संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य है मगर जुलाई में आई इसकी रिपोर्ट बताती है कि उस समय दुनिया की छह फीसदी आबादी गरीब होगी। ऐसे में वल्र्ड बैंक का एक और लक्ष्य है कि इस संख्या को कम से कम 3 प्रतिशत से नीचे ले आएं। मगर चीजों को देखकर लगता है कि यह अनुमान भी शायद ही पूरा हो।

रवालियन कहते हैं कि अभी की विकास नीतियां उनके लिए तो कारगर हैं जो गरीब हैं मगर उतने नहीं। लेकिन वो मानते हैं कि जो बहुत गरीब हैं, उन तक नीतियां सही से पहुंच नहीं पा रहीं।

वो कहते हैं, अगर आप थोड़ा पहले की बात करें तो आज के अमीर देश 200 साल पहले उतने ही गरीब थे, जितने गरीब आज अफ्रीकी देश हैं। वे धीरे-धीरे मगर प्रभावी तरीक़े से गरीबों को आगे बढ़ाने में सफल रहे। आज की विकासशील दुनिया में इसका उल्टा हो रहा है। अमीर देशों ने सभी के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी नीतियों के माध्यम से यह काम किया। रवालियन कहते हैं, इसी मामले में आज की दुनिया पिछड़ रही है। यह गऱीबों की संख्या तो तेज़ी से कम कर रही है मगर सबसे गऱीब लोगों को आगे बढ़ाने में उतनी प्रभावी साबित नहीं हो रही।

असमानता की चुनौती

रवालियन बताते हैं कि प्रतिदिन 1.90 डॉलर या इससे कम में गुज़ारा करने का मानक बेहद गऱीब समाज में होने वाली प्रगति को मॉनिटर करने के लिए बनाया गया है।

मगर जैसे-जैसे कम आमदनी वाले देश अमीर होकर मध्यम आय वाले वर्ग में आ रहे हैं, बढ़ती असमानता सबसे गऱीब लोगों को उभरने में मुश्किलें पैदा कर देती है।

वो कहते हैं, हम 1.90 डॉलर प्रतिदिन या इससे कम खर्च वाले वैश्विक मानक के आधार पर गऱीबों की संख्या घटती हुई देख रहे हैं मगर अपने देश के मानक के आधार पर वे गरीब ही रहते हैं।

सांचेज़-परामो कहती हैं कि असमानता का मतलब सिर्फ आमदनी में असमानता नहीं है। वो कहती हैं, सबसे महत्वपूर्ण है समान मौक़े मिलना। यानी आप गरीब हों या न हों, नई नौकरियों और निवेश का लाभ उठाने का मौक़ा आपको भी मिलना चाहिए।

वह कहती हैं, हमारा मानना है कि समान अवसर न मिल पाने के कारण ही गऱीबी घटाने की कोशिशों को झटका लग रहा है। (बीबीसी)


Date : 17-Oct-2019

चारू कार्तिकेय

बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद की लंबी यात्रा एक अहम पड़ाव पर पहुंच चुकी है। बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय में पिछले 40 दिनों से रोज चल रही सुनवाई समाप्त हो गई और 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया। इस पीठ का नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई कर रहे हैं जो 17 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। लिहाजा यह माना जा रहा है कि फैसला 17 नवंबर से पहले आ ही जाएगा।

सुनवाई शुरू होने के पहले पीठ ने कोशिश की थी की दशकों से चले आ रहे इस विवाद का समाधान मध्यस्थता के जरिए हो और इसके लिए मध्यस्थों का एक तीन-सदस्यीय पैनल भी नियुक्त किया जाए। लेकिन यह पैनल भी मसले को सुलझा नहीं सका और अदालत को सुनवाई शुरू करनी पड़ी।

पीठ ने प्रतिदिन कड़ी समय सीमा में सुनवाई का संचालन किया और जब जब आवश्यकता पड़ी तब अतिरिक्त समय भी दिया। पर बुधवार को जब एक पक्ष ने और समय मांगा तो मुख्य न्यायाधीश ने बस, बहुत हो गया कहते हुए शाम 5 बजे सुनवाई समाप्त करने का वक्त तय कर दिया।

सुनवाई के आखिरी दिन अदालत में कुछ नाटकीय पल भी देखने को मिले जब मुस्लिम पक्ष में वकील राजीव धवन ने हिन्दू पक्ष द्वारा आखिरी दिन पेश किये गए एक नक्शे को भरी अदालत में फाड़ दिया। जस्टिस गोगोई इस पर नाराज भी हुए और वॉक-आउट करने की धमकी भी दी। लेकिन अंत में सुनवाई सिर्फ भोजनावकाश के लिए स्थगित हुई और उसके बाद फिर से शुरू हो गई।

बुधवार की सुबह एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। मुस्लिम पक्षों में से एक सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अदालत से कहा कि वह अपनी अपील को वापस ले लेना चाहता है, अगर उसकी कुछ शर्तें मान ली जाएं। इसका मतलब यह है कि विवादित भूमि पर राम मंदिर बने, इस से सुन्नी वक्फ बोर्ड को कोई ऐतराज नहीं होगा अगर उसकी शर्तें मान ली जाएं। कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शर्तों में ये मांगें शामिल हैं कि मुस्लिम पक्षों को बाबरी मस्जिद कहीं और बनाने के लिए जगह दे दी जाए, अयोध्या में स्थित 22 और मस्जिदों का जीर्णोद्धार हो, इसके बाद पूरे देश में सभी मस्जिदों को संरक्षण मिले, इत्यादि।

हालांकि पीठ ने वक्फ बोर्ड के इस कदम के बावजूद सुनवाई जारी रखी और फैसला सुरक्षित रख लिया। जानकारों का कहना है कि इसके आगे की कार्यवाही पीठ पर ही निर्भर करती है। वह वक्फ बोर्ड के कदम को दरकिनार भी कर सकती है या उसके आधार पर ही अपना फैसला भी दे सकती है।

क्या है विवाद

बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 16वीं शताब्दी में मुगल शहंशाह बाबर द्वारा बनवाई गई एक मस्जिद थी। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इस विवाद का जन्म हुआ कि जिस स्थल पर मस्जिद बनी हुई थी वह हिन्दू धर्म में भगवान माने जाने वाले राम की जन्मभूमि थी। कुछ हिन्दू संगठनों का कहना था की वहां पर राम का एक प्राचीन मंदिर था और बाबर ने उस मंदिर को तुड़वा कर वहां मस्जिद बनवाई।

1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर अचानक संदेहास्पद रूप से राम और उनकी पत्नी सीता की मूर्तियां दिखाई दीं और उसके बाद से मंदिर-मस्जिद विवाद और गहरा गया। उस समय की उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने पूरे परिसर पर ही ताला लगा दिया।

1986 में राजीव गांधी सरकार ने परिसर के ताले खुलवा दिए और उसके बाद बीजेपी ने राम जन्मभूमि राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत की। पूरे देश से कार्यकर्ताओं और हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों को अयोध्या आने का आह्वान किया गया और राम मंदिर बनाने के लिए लड़ जाने के लिए प्रेरित किया गया।

6 दिसंबर 1992 को इसी आंदोलन के तहत बीजेपी नेताओं की उपस्थिति में कार्यकर्ताओं की एक भीड़ मस्जिद के ऊपर चढ़ गई और उसे तोड़ दिया। इस घटना से देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे भडक़ उठे जिनमे कम से कम 2000 लोग मारे गए।

इसके बाद इस विवाद ने दो तरह के कानूनी विवादों का रूप ले लिया - एक मस्जिद को गिराने से संबंधित आपराधिक केस और दूसरा विवादित जमीन पर मालिकाना हक के लिए सिविल केस। आपराधिक मामले में सुनवाई तो आज तक चल रही है पर स्वामित्व वाले मामले में अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2010 में अपना फैसला सुना दिया था।

अदालत ने विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांट दिया। तीनों ही पक्षों ने उच्च न्यायालय के फैसले को नहीं माना और उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। 9 सालों तक सर्वोच्च न्यायालय में चलने के बाद अब जा कर इस मामले पर सुनवाई पूरी हुई है और अब सभी निगाहें 5 जजों वाली संविधान पीठ की ओर हैं।

क्या रहीं दलीलें

40 दिनों तक प्रतिदिन होने वाली इस सुनवाई में सभी पक्षों ने ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक जैसी हर तरह की दलीलें दीं।

हिन्दू पक्ष की दलीलों में शामिल थी

उस स्थान पर राम का जन्म हुआ था, यह आस्था ही अपने आप में सबूत है।

हिन्दू धर्म के ग्रंथों और पुराणों में और यात्रियों के वृत्तांत में भी इस आस्था का वर्णन है।

जिस तरह सडक़ पर नमाज अदा करने से सडक़ पर नमाजियों का मालिकाना हक नहीं बन जाता, ठीक उसी तरह विवादित स्थान पर भी लंबे समय से नमाज पढ़े जाने ने उसपर मुस्लिम पक्ष का स्वामित्व नहीं बनता।

मस्जिद के ढांचे के अंदर इंसानों की और जानवरों की छवियां हैं जिनका तस्वीरों में प्रमाण है। इस्लाम में प्रतिरूप निषेध हैं और इसीलिए यह संभव नहीं कि यहां मस्जिद रही हो।

पुरातत्व विभाग ने विवादित स्थल पर खुदाई भी की थी और 2003 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि वहां एक मंदिर था।

विवादित स्थल पर मस्जिद बनाने की इस्लाम में भी इजाजत नहीं है।

मुस्लिम पक्ष की मुख्य दलीलें थीं -

पुरात्तव विभाग की रिपोर्ट अधूरी थी और उस पर किसी के हस्ताक्षर भी नहीं हैं। लिहाजा उसे तरजीह नहीं दी जानी चाहिए।

हिन्दू सिर्फ परिसर के बाहरी आंगन की पूजा करते थे जिसे राम चबूतरा कहते हैं। 22-23 दिसंबर 1949 के बीच की रात में चुपके से राम और सीता की मूर्तियों को मस्जिद के अंदर पहुंचा दिया गया।

सिर्फ परिक्रमा करने से स्वामित्व साबित नहीं होता।

लगभग सभी राजपत्रों में मस्जिद के होने का जिक्र है और किसी भी राजपत्र में जन्मभूमि जैसे किसी स्थल का वर्णन नहीं है।

ब्रिटिश राज ने बाबर द्वारा दी गई और नवाबों द्वारा भी कायम रखी गई जागीर को मान्यता दी।

भूतकाल के राजाओं और शहंशाओं के कृत्यों की नैतिकता पर चर्चा करके इतिहास को फिर से लिखने का प्रयास ठीक नहीं क्योंकि एक बार इतिहास में पीछे जाना शुरू किया तो कहां जा कर रुकेंगे इसका फैसला कौन लेगा। (डायचेवैले)

 

 


Date : 16-Oct-2019

खुशबू शर्मा
सन् 1983 में जेएनयू के कुछ छात्रों को कुलपति के विरोध में प्रदर्शन करने पर गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में डाल दिया गया।  तेरह दिन जेल में रहने के बाद उनके खिलाफ किया गया मुकदमा वापस लेकर उन्हें छोड़ दिया गया।  इनमें से एक छात्र अभिजीत बनर्जी को इस साल का अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिया गया है।  इस नोबेल ने छात्र राजनीति की अहमियत, विश्वविद्यालयों के प्रारूप, आर्थिक तंत्र और सरकार के कई निर्णयों के ऊपर एक बार फिर बहस खड़ी कर दी है। 
अभिजीत बनर्जी, इस्थर डूफ्लो और माइकल क्रेमर को सयुंक्त रूप से ये नोबेल दुनियाभर में गरीबी दूर करने के लिए एक्सपेरिमेंट अप्रोच पर काम करने के लिए दिया गया है।  अभिजीत अभी केम्ब्रिज के एमआईटी (मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी) में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर है।  उन्होंने डूफ्लो और सेंधिल मुलायनाथन के साथ मिलकर 'अब्दुल लतीफ जमील पोवर्टी एक्शन लेब' नामक संस्था की 2003 में स्थापना की थी जो की दुनियाभर में गरीबी उन्मूलन के लिए शोध एवं इंटरवेंशन का काम करता है। 
अभिजीत ने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातक और जेएनयू से अर्थशास्त्र में एमए की शिक्षा लेकर हार्वर्ड से पीएचडी की है। देश में 2016 में जब डिमोनेटाईजेशन किया गया तब अभिजीत दुनियाभर के उन अर्थशास्त्रियों में से एक थे जिन्होंने इसकी आलोचना की थी और इसे गलत कदम बताते हुए कहा था कि इसके पीछे मुझे कोई तर्क नजर नहीं आता और ये गरीब एवं मध्यम वर्ग को बुरी तरह प्रभावित करेगा। 
 हाल ही में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में डिमोनेटाईजेशन इस देश में गरीबी का एक बड़ा कारण है। इसी तरह जीएसटी के मामले में 'वेल्थ टेक्स' की वकालत करते हुए उन्होंने उच्च आय वर्ग पर उच्च कर लगाने के लिए 'प्रोग्रेसिव टैक्सेशन' की बात की थी।  बताया जाता है कि कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनावों में अपने घोषणापत्र में 'न्याय' योजना इनसे परामर्श करके शामिल की थी।  जाने-माने अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन के विद्यार्थी रहे अभिजीत ने 16 अप्रेल 2019 को 'टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' में लिखे अपने लेख टाइम फॉर मिनिमम इनकम पीपल्स एस्पिरेशन हेव ग्रोन, फ्यूअर वांट टू सेल पकोड़ाज फॉर ए लिविंग में मोदी सरकार की अर्थनीति की आलोचना करते हुए 'युनिवर्सल बेसिक इनकम' की वकालत की थी।
ये नोबेल बुद्धिजीवियों और जेएनयू जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों पर लगातार हो रहे हमलों को एक करारा जवाब है।  जब फरवरी 2016 में जेएनयू पर बनावटी आरोप लगाकर 'देशद्रोहियों' का अड्डा बताने की साजिश रची गई तब अभिजीत ने 16 फऱवरी 2016 के हिन्दुस्तान टाइम्स में अपने लेख  'वी नीड थिंकिंग स्पेसेज लाइक जेएनयू एंड गवर्नमेंट मस्ट स्टेआउट ऑफ इट'  में साफ़ तौर पर लिखा था कि केम्पसेज को स्वतंत्र सोच का केंद्र होना चाहिए और सरकारों को उनमे किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।  लेकिन हम साफ तौर पर देशभर में ऐसी घटनाएं तो देख ही रहे है साथ ही लगभग सभी क्षेत्रों के साथ उच्च शिक्षा का भी पीछे के दरवाजे से हो रहा निजीकरण भी देख रहे है।  लेकिन बुद्धिजीवियों को गाली देने और कोसने के चलन के प्रभाव में इस बात पर शायद ही कोई गौर कर रहा है। 
ऐसे में कुछ सवाल हमारे सामने हैं जिन्हें अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।  अगर प्रेसीडेंसी कॉलेज और जेएनयू जैसे संस्थान नहीं होते तो कोई अभिजीत बनर्जी नोबेल ला पाता क्या? ये भी सोचिए की अगर देश का हर एक विश्वविद्यालय जेएनयू जैसा होता तो हम कितने अभिजीत बनर्जी बना चुके होते? बड़ा सवाल ये भी है की क्यों कोई अमत्र्य सेन और अभिजीत बनर्जी भारतीय विश्वविद्यालयों में नहीं रहता है? मन को टटोलिए की क्यों हम ज्यां द्रेज जैसे नामी बुद्धिजीवी द्वारा हमारे देश में जमीनी स्तर पर बेहतरीन काम किए जाने पर भी उचित सम्मान और उचित स्थान क्यों नहीं दे पा रहे है? 
जो समाज 'ज्ञान', 'विचारों' और 'विचारकों' को 'जानता', 'मानता' और 'संभालता' नहीं है वो समाज लगातार गर्त में जाता रहता है। अगर हम 'आजाद विचारों', 'नई सोच' और 'दार्शनिकता' का पालन-पोषण नहीं करेंगे तो भविष्य की दशा और दिशा क्या होगी? इस नोबेल के बहाने ही सही हो लेकिन हमें गंभीर जरुरत है बहुत सारी चीजों पर पुनर्विचार की। 
जेएनयू जैसे संस्थान इसमें पढऩे वाले विद्यार्थियों और पढ़ाने वाले शिक्षकों को क्रिटिकल और रेफ्लेक्टिव होकर सोचने और डोमिनेंट नैरेटिव्स को चैलेंज करने का पूरा अवकाश देते हैं।  अभिजीत बनर्जी को जिस काम के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया है, उस काम में जेएनयू के मूल्यों की परछाई साफ़ नजऱ आती है।  बनर्जी एक संम्पन परिवार से आते हैं, लेकिन अपनी 'सोशल लोकेशन' के इतर सोचकर उन्होंने वैश्विक गरीबी निवारण पर काम करना चुना।  यह अनायास ही नहीं है कि जेएनयू जैसे संस्थानों से निकले विद्यार्थी दुनियाभर में अलग अलग माध्यमों से मानवीय मूल्यों को स्थापित करने की लडाई लड़ रहे हैं।  यह सोचने की जरूरत है कि एक ऐसे संस्थानों को देशद्रोही करार देकर देश को न सिर्फ आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है बल्कि गहरी बौद्धिक क्षति भी हो रही है जिसकी भरपाई करना नामुमकिन है। 
 आज हमारे देश कि शिक्षा व्यवस्था वेंटीलेटर पर पड़ी है, विश्विद्यालयों पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। न सिर्फ निजीकरण बल्कि विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों और शिक्षकों को बदनाम किया जा रहा है।  वैषीले राजनीतिक माहौल का हिस्सा बनकर इस देश के लोगों ने नॉलेज क्रिएशन के गढ़ों यानि पब्लिक फंडेड एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की कब्र खोदना शुरू कर दिया है।  
यह रास्ता निश्चित तौर पर समाज के बौद्धिक पतन का रास्ता है।  इस मानसिकता का एक परिणाम यह भी निकला की जिस काम के लिए अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार दिया गया उसी काम पर आधारित न्याय योजना को देश की जनता ने लोकसभा चुनावों में ठुकरा दिया।  पूंजीपतियों पर कर लगाने से सरकार को प्राप्त होने वाले रेवेन्यु को गरीबों और आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों में रीडिसट्रिब्यूट किए जाने की बात पर देश भर के लोग रोष प्रकट करते नजऱ आते हैं।  यह इस बात का परिचायक है कि हम अपने बुद्धिजीवियों, अपने विश्वविद्यालयों को आंख बंद कर सिरे से खारिज कर देते हैं, बगैर ज्ञान और तर्क की ताक़त को समझे।  हमारे यूनिवर्सिटी सिस्टम के क्राइसिस का यही कारण है। 
हमें पुनर्विचार करना पड़ेगा की क्यों केम्पसेज को 'फ्री स्पेस' रखा जाना चाहिए जहां से 'फ्री थिंकिंग' के जरिये बहुत सारी समस्यायों से निजात पायी जा सके।  क्रिटिकल थिंकिंग को जगह देकर लगातार फैलाए जा रहे भ्रम और अज्ञान से निजात पाने की जरूरत  है।  जरूरत है जेएनयू जैसे सेंकड़ों-हजारों संस्थान देशभर में खोलने की जहां से हजारों-लाखों अभिजीत निकलकर समाज, देश और दुनिया की समस्याओं का समाधान खोज सके। 
वो बिना 'देशद्रोही' करार दिए जाने के किसी डर के सरकार की आलोचना कर सके और उसको सही सलाह देकर उचित कदम उठाने की मांग कर सके। अपने, परिवार, समाज, विश्वविद्यालयों, संस्थानों, देश और दुनिया के दिल-दिमाग के दरवाजे खोलकर देखिए कितने नोबेल आपके चारों तरफ घूमने लगेंगे। अभिजीत, अभिजीत जैसे क्रिटिकल थिंकर्स, जेएनयू जैसे संस्थानों, रोज गाली खाते-मुश्किलों को सामना करते बुद्धिजीवियों और हम सबको इस नोबेल की बधाई के साथ समाज और सरकार को सिर्फ एक ही संदेश- जितने नोबेल चाहिए, उतने जेएनयू बनाइए। 


Date : 16-Oct-2019

समीरात्मज मिश्र
सोमवार से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की अंतिम दौर की सुनवाई शुरू हुई। उसी दिन अयोध्या जिला प्रशासन ने एहतियात के तौर पर अगले दो महीने तक शहर में धारा 144 लगा दी, शहर के चारों ओर और शहर के भीतर जगह-जगह पुलिस और पैरा मिलिट्री के जवान मुस्तैद दिख रहे हैं, लेकिन अयोध्या शहर का मिजाज़ वैसा का वैसा ही था।
सरयू नदी की ओर से शहर के भीतर प्रवेश करने वाले मार्ग पर ट्रैफिक रोक दिया गया है क्योंकि बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हो रहे हैं।
बताया गया कि राम की पैड़ी पर अब सरयू नदी का पानी सीधे आएगा जिससे लोगों को स्नान में दिक्कत न हो और मुख्य घाटों पर श्रद्धालुओं का दबाव भी कम हो सके।
कुछ समय पहले तक सड़क के किनारे दिखने वाली झुग्गी-झोंपडिय़ों के अब निशान तक मौजूद नहीं हैं। स्थानीय निवासी और गाइड का काम करने वाले दयाराम दुबे बताते हैं कि उन लोगों को हटाकर कहीं और शिफ्ट कर दिया गया है क्योंकि बिना उनके हटे शहर का सौंदर्यीकरण संभव नहीं था।
दयाराम दुबे कहते हैं, शहर में इस बार दीपोत्सव कार्यक्रम पिछले दो बार की तुलना में और भव्य होगा। इस बार सिफऱ् रामघाट ही नहीं बल्कि पूरा शहर दीपों से रोशन होगा।
शहर के भीतर प्रवेश करने के लिए कारसेवकपुरम वाले रास्ते से ही होकर जाना पड़ रहा है। कारसेवकपुरम में पत्थर तराशने का काम उसी गति से चल रहा है, जैसा पिछले कई सालों से हो रहा है।
महाराष्ट्र के सतारा जिले से आए एक बुज़ुर्ग श्रद्धालु शारदानाथ बोले, लगता है जल्दी ही इन शिलाओं का उपयोग होने वाला है।हनुमानगढ़ी चौराहे पर कुछ लोगों से जिज्ञासावश हमने सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई पर बात की। बर्तन की दुकान के मालिक शैलेंद्र कुमार बोले, सुप्रीम कोर्ट इस महीने फैसला दे देगा और अगले महीने से शायद मंदिर निर्माण शुरू हो जाए। लेकिन क्या फ़ैसला मंदिर के लिए ही आएगा, ये तो मस्जिद के लिए भी आ सकता है? इस सवाल का जवाब उन्होंने कुछ ऐसी मुस्कराहट के साथ दिया जैसे फैसले के बारे में उन्हें सब कुछ पहले से ही पता हो।
हालांकि वहीं मौजूद कुछ लोग ऐसे भी थे जो अब भी मंदिर को लेकर हो रही कथित राजनीति पर खफा हैं। उन्हीं में से बीकॉम कर रहे एक युवक धर्मेंद्र सोनकर बेहद निराशा के साथ कहते हैं, मंदिर जब बन जाए तभी जानिए। हमें तो कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। वहीं रामजन्म भूमि की ओर जाने वाले मार्ग पर भी लोगों की आवाजाही अमूमन वैसी ही थी जैसी कि अक्सर होती है। बाज़ार से लेकर हनुमानगढ़ी होते हुए रामजन्मभूमि मार्ग तक ऐसा कुछ भी नहीं दिखा जिससे पता चले कि शहर में निषेधाज्ञा लगी है और लोग झुंड में नहीं जा सकते हैं। शहर में जगह-जगह ट्रैफि़क जाम की स्थिति अन्य दिनों की तुलना में कुछ ज़्यादा ही खऱाब दिखी क्योंकि निर्माण कार्यों की वजह से कुछ रास्ते पूरी तरह से बंद किए गए हैं।
अयोध्या में लंबे समय से चल रहे मंदिर मस्जिद मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में अंतिम दौर में चल रही है। आगामी 17 अक्टूबर तक सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों की संवैधानिक पीठ सुनवाई करेगी। माना जा रहा है कि अगले महीने की 17 तारीख़ से पहले शायद कोई फ़ैसला आ जाए। वहीं फैसले की आहट से पहले शहर में दस दिसंबर तक के लिए धारा 144 लगा दी गई है।
अयोध्या के जि़लाधिकारी अनुज कुमार झा के मुताबिक़, दीपावली से पहले होने वाला दीपोत्सव कार्यक्रम इससे प्रभावित नहीं होगा और न ही मंदिरों में लोगों की आवाजाही पर इसका कोई असर होगा। जि़लाधिकारी के मुताबिक, आने वाले दिनों में कई त्योहार हैं, जिसकी वजह से ये कदम उठाया गया है।
वहीं फैसले से पहले अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद की गर्माहट भी दिखने लगी है। विश्व हिन्दू परिषद ने इस बार दीपोत्सव कार्यक्रम के दौरान राम लला विराजमान परिसर में भी प्रशासन से दीप जलाने की अनुमति मांगी है तो दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष के कुछ लोगों ने इसका विरोध किया है।
वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र त्रिपाठी कहते हैं कि शहर में धारा 144 लगाने के पीछे इस तरह के विवाद भी हैं, सिर्फ फ़ैसले की आहट ही नहीं। विश्व हिन्दू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं, राम लला अंधेरे में हैं। दीपावली के मौक़े पर पूरा शहर दीपों से जगमगाएगा, ऐसे में भगवान राम अंधेरे में रहें तो ठीक नहीं है। हमने प्रशासन से इसकी अनुमति मांगी है और हमें उम्मीद है कि अनुमति मिल जाएगी।
अयोध्या मंडल के आयुक्त मनोज मिश्र ने इस अनुमति के लिए फि़लहाल साफ़तौर पर मना कर दिया है। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा, यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और पारंपरिक तरीक़े से वहां जो भी पूजा-अर्चना होती है, वही होगी। उससे हटकर कोई पक्ष कुछ करना चाहे तो उसे इसके लिए सुप्रीम कोर्ट से ही अनुमति लेनी पड़ेगी, प्रशासन से नहीं। लेकिन, मामले में एक पक्षकार हाजी महबूब के नेतृत्व में अयोध्या के स्थानीय मुसलमानों ने विश्व हिन्दू परिषद की इस कोशिश का तीखा विरोध किया है।
हाजी महबूब कहते हैं, दिया जलाने की इजाजज़ सुप्रीम कोर्ट ने वहां नहीं दे रखी है। यदि प्रशासन उन्हें ऐसी इजाज़त देता है तो हम वहां नमाज पढऩे की मांग करेंगे और फिर हमें नमाज़ पढऩे की भी इजाज़त प्रशासन को देनी पड़ेगी।
कई हिंदू संगठन अयोध्या में विवादित जगह पर राम मंदिर बनाने का वादा करते रहे हैं। मंदिर के लिए पत्थरों पर कारीगरी का काम कई सालों से चल रहा है।
मुस्लिम समाज के लोग इस बात को लेकर ज़रूर आशंकित हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद कहीं साल 1992 जैसे हालात दोबारा न बन जाएं। स्टेशन रोड पर रहने वाले अली गुफऱान कहते हैं कि अयोध्या के मुसलमानों को इसका विश्वास दिलाना होगा कि जिले में कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर प्रशासन पूरी तरह से सख़्त है। वो कहते हैं, प्रशासन ने एहतियातन जो क़दम उठाए हैं, वो इसीलिए उठाए हैं ताकि सभी लोगों में विश्वास पैदा हो सके।
लेकिन बाबरी मस्जिद के एक अन्य पक्षकार इक़बाल अंसारी लोगों से इन सब विवादों से दूर रहने की अपील करते हैं। इक़बाल अंसारी कहते हैं कि अब लोगों को कोर्ट के फैसले का ही इंतज़ार ही करना चाहिए और कुछ नहीं। इक़बाल अंसारी कहते हैं कि कोर्ट का फ़ैसला चाहे जो आए, वो मानेंगे। उन्होंने कहा, हमारे खिलाफ भी आता है तो भी मानेंगे क्योंकि अब और कहीं अपील करने का कोई मतलब नहीं है। बहुत लंबा खिंच चुका है ये मामला। अब यह विवाद ख़त्म होना चाहिए।
इस बीच, अयोध्या में एक ओर जहां दीपोत्सव कार्यक्रम के पहले शहर के सुंदरीकरण के लिए तमाम निर्माण कार्य हो रहे हैं वहीं सुरक्षा के लिए भारी संख्या में पुलिस बलों की भी जगह-जगह तैनाती की गई है। सुप्रीम कोर्ट में जारी अंतिम दौर की सुनवाई के बीच ऐसे कय़ास भी लगाए जा रहे हैं कि इस दौरान बातचीत के ज़रिए भी विवाद का हल निकालने की कोई अंतिम कोशिश की जा सकती है। (बीबीसी)

 


Date : 15-Oct-2019

जब अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई तो कई अर्थशास्त्रियों ने उनके योगदान को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के हार्ड वर्क से जोडक़र बताना शुरू किया है। यह एक तरह के प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान के चलते ही किया गया जिसमें उन्होंने कहा था- ‘हार्ड वर्क हार्वर्ड से कहीं ज़्यादा ताक़तवर होता है।’ 

भारतीय मूल के अमरीकी अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी को इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिए जाने के बाद उनका भारतीय कनेक्शन मीडिया की सुर्खियों में हैं।
अभिजीत बनर्जी आज भले भारत के नागरिक नहीं हों लेकिन सही मायनों में उनकी पर्सनालिटी अखिल भारतीय ही रही है। यकीन ना हो तो पढि़ए। अभिजीत बनर्जी का जन्म मुंबई में हुआ था और उनकी पढ़ाई-लिखाई पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में हुई, जबकि उच्च शिक्षा के लिए वे नई दिल्ली में रहे।
उनके माता-पिता निर्मला और दीपक बनर्जी, इस देश के जाने माने अर्थशास्त्री रहे हैं। उनकी मां निर्मला मुंबई की थीं, जबकि पिता कोलकाता के। ख़ास बात ये भी है कि अभिजीत बनर्जी का पूरा नाम अभिजीत विनायक बनर्जी है। इसमें बीच वाला विनायक, मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर का ही है।
अभिजीत बनर्जी ने कोलकाता के साउथ प्वाइंट स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज से बैचलर डिग्री हासिल की। इसके बाद वे जेएनयू चले आए, अर्थशास्त्र से एमए करने। 1981 से 1983 तक वे यहां पढ़ते रहे।
अभिजीत बनर्जी को कई बार इस सवाल का सामना करना पड़ा कि उन्होंने आखिर पढ़ाई के लिए जेएनयू में आने का चुनाव क्यों किया। ये भी कहा जाता था कि शायद उन्हें दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स में दाखिला नहीं मिला था।
लेकिन इस बारे में अभिजीत बनर्जी ने ख़ुद ही लिखा है, ‘‘सच्चाई ये है कि मैं डी-स्कूल (दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स) गया था और मेरे पिता भी शायद यही चाहते थे कि मैं वहां जाऊं। लेकिन जब मैंने इन दोनों जगहों (जेएनयू और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स) को देखा था मैंने अपना मन बना लिया था। जेएनयू की बात ही अलग थी। उसकी ख़ूबसूरती एकदम अलग तरह की थी। डी-स्कूल किसी भी दूसरे भारतीय संस्थान की तरह ही है। खादी या फैब इंडिया का कुर्ता-पाजामा पहने छात्र जेएनयू के पत्थरों पर बैठकर ना जाने क्या-क्या बहस किया करते थे।’’ 
‘‘ये सच है कि मेरे अभी जो जिगरी दोस्त हैं वो सब डी-स्कूल गए थे। हालांकि मैंने जेएनयू में भी कई दोस्त बनाए। अरुण रमन, जानकी नायर, मनोज पांडेए, प्रगति महापात्रा, संजय शर्मा, शंकर रघुरामन, श्रीकुमार जी, और वेणु राजामोनी और न जाने कितने और करीबी दोस्त बने। लेकिन सबसे ख़ास बात रही जेएनयू के शिक्षक जिनसे मुझे मिलने का मौक़ा मिला। जेएनयू में पहले ही दिन मुझे प्रोफ़ेसर मुखर्जी और प्रोफ़ेसर सेनगुप्ता से बात करने का मौका मिला जो मुझे आज भी याद है।’’ 
‘‘पहले ही दिन मुझे प्रोफेसर जैन को भी एक नजर देखने का मौक़ा मिला। सबसे ज़्यादा मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने अर्थशास्त्र के बारे में बात की और ये भी बताया कि किसी भी मामले में अलग-अलग नज़रिया रखना कितना महत्वपूर्ण है। डी-स्कूल में मुझे सिर्फ ये सुनने को मिलता था कि उच्च शिक्षा के लिए कौन अमरीका चला गया या जाने वाला है। या फिर कौन आईआईएम जा रहा है। मैं जानता था कि मुझे कहां जाना है।’’ 
हालांकि अभिजीत बनर्जी ने शायद ही कभी सोचा होगा कि जब उनके नाम की चर्चा दुनिया भर में हो रही होगी, उसके बैकग्राउंड में उनके यूनिर्वसिटी का नाम भी साथ-साथ चलेगा। ये यूनिवर्सिटी पिछले कुछ समय से मोदी समर्थक और भारतीय जनता पार्टी समर्थकों के निशाने पर रही है।
लेकिन ख़ास बात यह है कि फऱवरी, 2016 में जब जेएनयू को लेकर हंगामा शुरू हुआ तभी अभिजीत बनर्जी ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख लिखा था- ‘‘वी नीड थिंकिंग स्पेसेज लाइक जेएनयू एंड द गर्वनमेंट मस्ट स्टे आउट ऑफ़ इट’’  यानि हमें जेएनयू जैसे सोचने-विचारने वाली जगह की जरूरत है और सरकार को निश्चित तौर पर वहां से दूर रहना चाहिए।
इसी लेख में उन्होंने ये भी बताया था कि उन्हें किस तरह से 1983 में अपने दोस्तों के साथ तिहाड़ जेल में रहना पड़ा था, तब जेएनयू के वाइस चांसलर को इन छात्रों से अपनी जान को ख़तरा हुआ था। अपने आलेख में उन्होंने लिखा था, ‘‘ये 1983 की गर्मियों की बात है। हम जेएनयू के छात्रों ने वाइस चांसलर का घेराव किया था। वे उस वक्त हमारे स्टुडेंट यूनियन के अध्यक्ष को कैंपस से निष्कासित करना चाहते थे। घेराव प्रदर्शन के दौरान देश में कांग्रेस की सरकार थी पुलिस आकर सैकड़ों छात्रों को उठाकर ले गई। हमें दस दिन तक तिहाड़ जेल में रहना पड़ा था, पिटाई भी हुई थी। लेकिन तब राजद्रोह जैसा मुकदमा नहीं होता था। हत्या की कोशिश के आरोप लगे थे। दस दिन जेल में रहना पड़ा था।’’ 
अभिजीत बनर्जी समय समय पर मोदी सरकार की नीतियों की ख़ूब आलोचना कर चुके हैं। इसके साथ ही वे विपक्षी कांग्रेस पार्टी की मुख्य चुनावी अभियान न्याय योजना का खाका भी तैयार कर चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी उन्होंने पुरस्कार जीतने की बधाई दी है।
मोदी सरकार के सबसे बड़े आर्थिक फैसले नोटबंदी के ठीक पचास दिन बाद फोर्ड फाउंडेशन-एमआईटी में इंटरनेशनल प्रोफेसर ऑफ़ इकॉनामिक्स बनर्जी ने न्यूज 18 को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, ‘‘मैं इस फ़ैसले के पीछे के लॉजिक को नहीं समझ पाया हूं। जैसे कि 2000 रुपये के नोट क्यों जारी किए गए हैं। मेरे ख्याल से इस फैसले के चलते जितना संकट बताया जा रहा है उससे यह संकट कहीं ज्यादा बड़ा है।’’ 
इतना ही नहीं वे उन 108 अर्थशास्त्रियों के पैनल में शामिल रहे जिन्होंने मोदी सरकार पर देश के जीडीपी के वास्तविक आंकड़ों में हेरफेर करने का आरोप लगाया था। इसमें ज्यां द्रेज, जयति घोष, ऋतिका खेड़ा जैसे अर्थशास्त्री शामिल थे।
जब अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई तो कई अर्थशास्त्रियों ने उनके योगदान को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के हार्ड वर्क से जोडक़र बताना शुरू किया है। यह एक तरह के प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान के चलते ही किया गया जिसमें उन्होंने कहा था- ‘हार्ड वर्क हार्वर्ड से कहीं ज़्यादा ताक़तवर होता है।’ 
तीन लोगों में अभिजीत बनर्जी की पार्टनर इश्तर डूफ़लो भी शामिल हैं, जो अर्थशास्त्र में नोबेल जीतने वाली सबसे कम उम्र की महिला हैं। अर्थशास्त्र में नोबेल जीतने वाली वे महज दूसरी महिला हैं।
पुरस्कार की घोषणा होने के बाद इश्तर डूफ़ेलो ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा है, ‘‘महिलाएं भी कामयाब हो सकती हैं ये देखकर कई महिलाओं को प्रेरणा मिलेगी और कई पुरुष औरतों को सम्मान दे पाएंगे।’’ 
डूफ़ेलो से पहले अभिजीत बनर्जी ने पहली शादी अरुंधति तुली बनर्जी से की थी, तुली भी एमआईटी में साहित्य की लेक्चरर हैं। अभिजीत और अरुंधती, कोलकाता में एक साथ पढ़ा करते थे और साथ ही एमआईटी पहुंचे। दोनों का एक बेटा भी है। हालांकि बाद में दोनों अलग हो गए। फिर अभिजीत के जीवन में एमआईटी की प्रोफेसर इश्थर डूफेलो आईं। इन दोनों का भी एक बेटा है। ये लोग शादी से पहले ही लिव-इन में रहने लगे थे। बेटे के जन्म के तीन साल बाद 2015 में दोनों ने शादी की।
इस साल इकॉनमी के नोबेल पुरस्कार विजेताओं को 9।18 लाख अमरीकी डॉलर का पुरस्कार मिला है। ये पुरस्कार विजेताओं को आपस में बांटने होते हैं। यानी माइकल क्रेमर का हिस्सा रहने दें तो अभिजीत बनर्जी -इश्तर डूफ़ेलो को 6.12 लाख अमरीकी डॉलर मिलेंगे। अनुमान के हिसाब से देखें तो यही कोई चार करोड़ रुपये की रकम इन दोनों को मिलेगी। (बीबीसी)

 


Date : 15-Oct-2019

जन्मदिन

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सादगी, मितव्ययिता और ईमानदारी जैसे उन गुणों की मिसाल थे जो आज के राजनीतिक परिदृश्य में दुर्लभ हो चले हैं। 

चंद्रगुप्त मौर्य के गुरू और प्रधानमंत्री चाणक्य एक झोपड़ी में रहते थे। एक दिन एक मेहमान उनसे मिलने पहुंचा। चाणक्य एक दिए की रोशनी में बैठे कुछ लिख रहे थे। मेहमान के पहुंचने पर उन्होंने वह दिया बुझा दिया और एक दूसरा दिया जलाकर मेहमान से बातचीत करने लगे। हैरत में आए मेहमान ने थोड़ी देर बाद इसका कारण पूछा। 
चाणक्य ने बताया कि पहले वाले दिए में तेल सरकारी खर्चे में से डाला गया था। उसकी रोशनी में वे सरकारी काम कर रहे थे। आगंतुक उनका निजी मेहमान था इसलिए उन्होंने दूसरा दिया जला लिया जिसमें उनके पैसे से लाया गया तेल डाला गया था। संदेश यह था कि शासक को सरकारी और निजी खर्च में अंतर न सिर्फ समझना चाहिए बल्कि करना भी चाहिए।
सदियों पुराना यह किस्सा कितना सच है कितना नहीं कहना मुश्किल है। लेकिन एपीजे अब्दुल कलाम से जुड़े ऐसे कई किस्से लोगों की स्मृतियों में हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने इन किस्सों को अपने सामने घटते देखा है। दरअसल आज के दौर में जब जनसेवकों का एक बड़ा वर्ग राजा जैसा व्यवहार करता दिखने लगा है, कलाम ने सादगी, मितव्ययिता और ईमानदारी की कई अनुकरणीय मिसालें छोड़ी हैं। ये प्रेरणा भी हो सकती हैं और आईना भी।
एक बार कलाम के कुछ रिश्तेदार उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन आए। कुल 50-60 लोग थे। स्टेशन से सब को राष्ट्रपति भवन लाया गया जहां उनका कुछ दिन ठहरने का कार्यक्रम था। उनके आने-जाने और रहने-खाने का सारा खर्च कलाम ने अपनी जेब से दिया। संबंधित अधिकारियों को साफ निर्देश था कि इन मेहमानों के लिए राष्ट्रपति भवन की कारें इस्तेमाल नहीं की जाएंगी। यह भी कि रिश्तेदारों के राष्ट्रपति भवन में रहने और खाने-पीने के सारे खर्च का ब्यौरा अलग से रखा जाएगा और इसका भुगतान राष्ट्रपति के नहीं बल्कि कलाम के निजी खाते से होगा। एक हफ्ते में इन रिश्तेदारों पर हुआ तीन लाख चौवन हजार नौ सौ चौबीस रुपये का कुल खर्च देश के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने अपनी जेब से भरा था।
अपना कार्यकाल पूरा करके कलाम जब राष्ट्रपति भवन से जा रहे थे तो उनसे विदाई संदेश देने के लिए कहा गया। उनका कहना था, ‘विदाई कैसी?  मैं अब भी एक अरब देशवासियों के साथ हूं।’  इसी तरह एक बार कलाम आईआईटी (बीएचयू) के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनकर गए थे। वहां मंच पर जाकर उन्होंने देखा कि जो पांच कुर्सियां रखी गई हैं उनमें बीच वाली कुर्सी का आकार बाकी चार से बड़ा है। यह कुर्सी राष्ट्रपति के लिए ही थी और यही इसके बाकी से बड़ा होने का कारण भी था। कलाम ने इस कुर्सी पर बैठने से मना कर दिया। उन्होंने वाइस चांसलर (वीसी) से उस कुर्सी पर बैठने का अनुरोध किया। वीसी भला ऐसा कैसे कर सकते थे? आम आदमी के राष्ट्रपति के लिए तुरंत दूसरी कुर्सी मंगाई गई जो साइज में बाकी कुर्सियों जैसी ही थी।
कलाम से जुड़ा तीसरा किस्सा तब का है जब राष्ट्रपति बनने के बाद वे पहली बार केरल गए थे। उनका ठहरना राजभवन में हुआ था। वहां उनके पास आने वाला सबसे पहला मेहमान कोई नेता या अधिकारी नहीं बल्कि सडक़ पर बैठने वाला एक मोची और एक छोटे से होटल का मालिक था। एक वैज्ञानिक के तौर पर कलाम ने त्रिवेंद्रम में काफी समय बिताया था। इस मोची ने कई बार उनके जूते गांठे थे और उस छोटे से होटल में कलाम ने कई बार खाना खाया था। अपना कार्यकाल पूरा करके कलाम जब राष्ट्रपति भवन से जा रहे थे तो उनसे विदाई संदेश देने के लिए कहा गया। उनका कहना था, ‘विदाई कैसी, मैं अब भी एक अरब देशवासियों के साथ हूं।’
आज कलाम नहीं हैं। फिर भी वे एक अरब देशवासियों के साथ हैं। उनके ये किस्से आज भी कइयों को प्रेरणा देने का काम कर रहे हैं।
(सत्याग्रह)

 


Date : 14-Oct-2019

माशा
ओल्गा की स्पष्ट राय है कि पोलैंड को एक सहिष्णु देश बनना चाहिए- एक ऐसा देश जहां अल्पसंख्यकों के साथ कोई ज्यादती न हो।  उन्होंने कहा था कि अगर हमने अतीत में ज्यादतियां की हैं, तो हमें इसकी माफी मांगनी चाहिए। 

अंतरराष्ट्रीय साहित्य में रुचि रखने वालों के अलावा भारत में ओल्गा तोकार्चुक को कम लोग ही जानते हैं। हालांकि, उनकी रचनाओं का हिंदी में अनुवाद कमरे और अन्य कहानियां नाम से 2014 में हो चुका है, वे भारत में बुक फेस्टिवल में आ चुकी हैं, देश के कई हिस्सों में घूम चुकी हैं और साहित्यिक पत्रिका हंस में उनकी अनुदित कहानी छप चुकी है। लेकिन अब साहित्य का नोबेल मिलने के बाद उन्हें लेकर नए सिरे से जिज्ञासा बढ़ी है।
हमारे लिए उन्हें जानना जरूरी है। सिर्फ इसलिए नहीं कि पोलैंड की 57 साल की ओल्गा को 2018 के लिए नोबेल साहित्य पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है। इसलिए भी नहीं कि साहित्य के लिए अब तक सिर्फ 15 महिलाओं को नोबेल से नवाजा गया है और किसी महिला का नोबेल जीतना एक बड़ी बात है।
ओल्गा को जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वह भी अपने देश में बहुलतावाद की हिमायती हैं और उनकी देश की सरकार भी लगातार उन्हें देशद्रोही बताने पर तुली हुई है। भारत में भी कई लेखकों के साथ ऐसा हो रहा है।
ओल्गा अब तक कई किताबें लिख चुकी हैं। पिछले साल उनके उपन्यास ‘फ्लाइट्स’ को मैन बुकर पुरस्कार मिला, तब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें लोकप्रियता मिली। यह उपन्यास उन्होंने 2007 में पोलिश भाषा में लिखा था- जब उसका अंग्रेजी अनुवाद हुआ तब लोगों ने ओल्गा को जानना शुरू किया। उनकी एक और मशहूर किताब है, ‘ड्राइव योर प्लो ओवर द बोन्स ऑफ द डेड’। यह एक बुजुर्ग महिला की कहानी है जो हत्या की जांच करते हुए सत्ता, धन और पितृसत्ता से जूझती है। इस उपन्यास पर जब पोलिश फिल्मकार एग्निजेस्का हॉलैंड ने ‘पोकोट’ नामक फिल्म बनाई, तो पोलिश न्यूज एजेंसी ने उसे एंटी क्रिस्चियन फिल्म बताया जो इको टेररिज्म को बढ़ावा देती है।
अपने देश में ओल्गा देशद्रोही, धर्मद्रोही हैं। साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलना उनके देश के लिए गर्व की बात होनी चाहिए। लेकिन पोलैंड में इसका जश्न नहीं मनाया जा रहा। पोलैंड तो एक अलग ही बहस में अपनी ऊर्जा लगाए हुए है कि पोलिश होने के क्या मायने हैं। ओल्गा के नोबेल ने इस बहस की आग में घी डालने का काम किया है। लोग अलग-अलग किस्म की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कुछेक का कहना है कि ओल्गा ने देश के 20वीं शताब्दी के इतिहास की त्रासद परतें खोली हैं पर कई के लिए वह गद्दार हैं।
पोलैंड का इतिहास विभिन्न जातीय समूहों के घुल-मिल जाने का इतिहास है, जिसे अंग्रेजी में एथनिक मिक्सिंग कहते हैं। यानी वहां पोल, उक्रेनी, लिथुआन, जर्मन, रूथेन, यहूदी तथा कई अन्य समूहों के लोग मिल-जुलकर रहते आए हैं। ओल्गा इसी विविधता, अनेकता की पैरोकार हैं। उनकी किताबों में पोलैंड के इसी इतिहास के दर्शन होते हैं। पर पोलैंड की दक्षिणपंथी सरकार लगातार अनेकतावाद पर प्रहार कर रही है। पोलिश होने के मायने तलाशे जा रहे हैं। अपने और पराए की परिभाषाएं रची जा रही हैं।
सरकार साफ कह चुकी है कि प्रवासी देश के लिए खतरा हैं। इसीलिए 2015 में सत्ता संभालने के बाद पोलैंड की लॉ एंड जस्टिस पार्टी ने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के शरणार्थियों पर प्रतिबंध लगा दिया, पर ओल्गा उन सबकी हिमायती हैं। इसीलिए सरकार उनका विरोध कर रही है। पोलैंड की न्याय और कानून मंत्री कह चुकी हैं कि ओल्गा की रचनाओं से पोलैंड को बदनाम किया जा रहा है। वह इतिहास के बारे में झूठ बोल रही हैं। वह इतिहास जिसमें नाजियों के साथ मिलकर पोलैंड कितने ही नरसंहारों में शामिल रहा है।
जब लेखक, पत्रकार देशद्रोही बताए जाते हैं तो समझ लेना चाहिए कि समाज का बंटाधार होने वाला है। यह सत्ता के बढ़ते अहंकार का सबूत भी है। यह क्या इत्तेफाक है कि अपने देश में भी कलाकारों, साहित्यकारों, फिल्मकारों को लगातार देशद्रोही बताया जा रहा है। सवाल करना और उसके जवाब तलाशना मुश्किल होता जा रहा है।
जो चीज उन्हें भारत के कलाकारों, साहित्यकारों से जोड़ती है, वह यह है कि ये सभी लोग समाज को तर्कशील बनाना चाहते हैं। समाज में संवाद और विवाद की जगह सुरक्षित रखना चाहते हैं। ओल्गा जैसे तमाम लोग संकीर्णता से परे जाकर मानवीयता की भाषा में बात करने के हामी हैं। अगर ओल्गा अपने देश में सभी जातीय समूहों और शरणार्थियों की वकालत करती हैं तो मारे जाने से पहले गौरी लंकेश भी ट्विटर पर रोहिंग्या मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा करने की बात कर रही थीं। यह भी इत्तेफाक है कि गौरी लंकेश की तरह ओल्गा को भी हत्या की धमकियां मिलती रही हैं।
ओल्गा की भाषा पोलिश है। यह याद रखना इसलिए जरूरी है कि क्षेत्रीय भाषाओं में सच बोलना आज के दौर में बड़ा जोखिम है। वह चाहे पोलैंड हो या भारत के छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र या कर्नाटक जैसे राज्य। गौरी लंकेश का कन्नड़ या दाभोलकर या गोविंद पनसारे का मराठी में लिखना और बोलना सचमुच बहुत मुश्किल था। दुनिया के हर कोने में सत्ता उन लोगों से खतरा महसूस करती है जो जनता से जनता की भाषा में बात करते हैं और उन्हें तार्किक और लोकतांत्रिक होने की दिशा में प्रेरित करते हैं।
जैसे पोलिश होने के मायने बहुत वृहद हैं, उसी तरह भारतीय होने का अर्थ भी बहुत व्यापक है। आज भारतीय होने को खास तरह से राष्ट्रीय होने भर से जोड़ा जा रहा है और जैसा कि मशहूर साहित्यकार प्रेमचंद कई साल पहले लिख गए थे- देश के भीतर राष्ट्रीयता का प्रश्न हिंदू-मुस्लिम दायरे में बंटा हुआ है। उन्होंने ‘राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता’ नामक निबंध में राष्ट्रीयता को वर्तमान युग का कोढ़ बताया था। इस मायने में प्रेमचंद के विचार रवींद्रनाथ टैगोर से बहुत मिलते हैं, जो मानवता को राष्ट्रवाद के ऊपर रखते हैं।
ओल्गा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि पोलैंड को एक सहिष्णु देश बनना चाहिए। एक ऐसा देश जहां अल्पसंख्यकों के साथ कोई ज्यादती न हो। उन्होंने कहा था कि  ‘अगर हमने अतीत में ज्यादतियां की हैं, तो हमें इसकी माफी मांगनी चाहिए।’ ओल्गा के इस संदेश को दुनिया के हर कोने में सुना जाना चाहिए। अंध-राष्ट्रवाद के जुनून के बीच इस तरह के तार्किक और मानवीय आवाजों की जरूरत और ज्यादा है। ह्लद्धद्गश्चह्म्द्बठ्ठह्ल.द्बठ्ठ
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

 


Date : 13-Oct-2019

बड़ी चॉकलेट कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं से बाल मजदूरी को खत्म नहीं कर पा रही हैं। ज्यातर का कहना है कि वे तीसरी कंपनियों से कोको खरीदते हैं जहां मुख्यत: बाल मजदूरी होती है।
गोदीवा, लिंट और हर्षि जैसी बड़ी चॉकलेट कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं से बाल श्रम को दूर करने में सफल नहीं हो पा रही हैं, ये दावा किया है एक एक्टिविस्ट समूह द्वारा जारी की गई एक नई रैंकिंग ने। गोदीवा को सबसे खराब रैंक मिली है,  जिसका प्रदर्शन फरेरो और मोंडेलेज जैसे चॉकलेट से खराब पाया गया। ये बाल मजदूरी और वन-कटाई को कम करने के प्रयासों का आकलन करने वाला एक स्कोरकार्ड है जिसे एक्टिविस्ट समूह ग्रीन अमरीका ने छापा है। मार्स और नेस्ले को लिंट और हर्षि से थोड़ा बेहतर पाया गया, जबकि सबसे अच्छा ग्रेड आल्टर एको, डिवाइन और टोनीज चोकलोनेली जैसी सात छोटी कंपनियों को मिला है।
दुनिया के कोको का अधिकतर हिस्सा पश्चिमी अफ्रीका के देश घाना और आइवरी कोस्ट में गरीब किसान परिवार उगाते हैं और अनुमान है कि वहां करीब 16 लाख बच्चे इस उद्योग में काम करते हैं। कंपनियों का कहना है कि वो इस समस्या को ठीक करने की कोशिश कर रही हैं। ग्रीन अमरीका  के अनुसार कुछ कंपनियों के प्रयासों को शुरू हुए अभी काफी कम समय हुआ है जबकि कुछ और कंपनियों को पारदर्शिता न रखने के लिए निचले ग्रेड मिले हैं। ग्रीन अमरीका की श्रम न्याय प्रबंधक शार्लट टेट ने कहा, इस हेलोवीन पर और रोज ही, बच्चों तक ऐसी कैंडीज पहुंचाई जानी चाहिए जिन्हें बाल श्रमिकों ने न बनाया हो।
गोदीवा का कहना है कि वो कोको तीसरी पार्टियों से खरीदती है जिसकी वजह से उसे कम अंक मिले। कंपनी की एक प्रवक्ता ने ईमेल के जरिए बताया, हम अपने सप्लायरों के साथ गोदीवा आचार संहिता का पालन करने के लिए किए गए समझौतों के जरिए नैतिक रूप से चॉकलेट मंगाना सुनिश्चित करते हैं। इस संहिता में जोर-जबरदस्ती और बाल श्रम पर कड़ा प्रतिबन्ध है। और कंपनियों ने टिप्पणी के लिए किए गए अनुरोध का तुरंत जवाब नहीं दिया।अधिकतर बड़ी चॉकलेट कंपनियां इस पर मेहनत कर रही हैं कि उनके कोको का वो हिस्सा बढ़े जो फेयर ट्रेड और रेनफॉरेस्ट अलायन्स जैसे नैतिक समूहों या उनके अपने प्रमाणन कार्यक्रमों से प्रमाणित हो। कइयों ने 2020 तक 100 प्रतिशत प्रमाणित कोको ही इस्तेमाल करने का लक्ष्य बनाया है। 
लेकिन ग्रीन अमरीका का कहना है कि सिर्फ इतना काफी नहीं है, ये भी देखना आवश्यक है कि कंपनियों ने समुदायों का समर्थन करने और किसानों की आय को बढ़ाने वाले कदम भी उठाए हैं या नहीं। अंतरराष्ट्रीय कोको इनिशिएटिव के अनुसार कोको की खेती करने वाले अधिकतर परिवार विश्व बैंक की दो डॉलर प्रतिदिन की गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, जिसकी वजह से अपने आप बाल श्रम को बढ़ावा मिलता है। 
घाना और आइवरी कोस्ट ने कहा है कि वे दोनों देश इस साल एक लिविंग इनकम डिफरेंशियल नामक एक आय योजना लेकर आए थे, जिससे किसानों की गरीबी कम हो सके, लेकिन कोको कंपनियों का ध्यान उस योजना से कहीं ज्यादा उनकी अपनी निरंतरता पर है। दोनों देशों ने एक संयुक्त बयान में कहा, दोनों देश 2019/20 के लिए सभी  निरंतरता और प्रमाणन कार्यक्रमों का फिर से परीक्षण कर रहे हैं। (डॉयचेवेले)
सीके/एमजे (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)


Date : 13-Oct-2019

यौन उत्पीडऩ विवाद के चलते 2018 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया था। इस साल 2018 और 2019 के लिए इसकी घोषणा एक साथ की गई है। लेकिन, विवाद साहित्य के नोबेल का साथ नहीं छोड़ रहा। इस साल पुरस्कार की घोषणा के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है जो धीरे-धीरे पूरी दुनिया के साहित्य और अकादमिक जगत को घेरे में ले रहा है।
नोबेल फाउंडेशन ने वर्ष 2018 का नोबेल पुरस्कार पोलैंड की लेखिका ओल्गा तोकाचुर्क को देने की घोषणा की है जबकि 2019 के साहित्य का नोबेल पुरस्कार ऑस्ट्रियाई उपन्यासकार और पटकथा लेखक पीटर हैंडके को दिया गया है। पोलिश लेखिका ओल्गा तोकाचुर्क को नोबेल पुरस्कार मिलने का दुनिया भर में स्वागत किया गया है। इससे नोबेल समिति पर लगने वाले इन आरोपों की धार भी कम हुई है कि इनमें महिलाओं की उपेक्षा की जाती है।
लेकिन, पीटर हैंडेक को 2019 के साहित्य के नोबेल ने पूरी दुनिया के साहित्य जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। उन्हें नोबेल मिलने का तमाम प्रगतिशील लेखक और उदारवादी विरोध कर रहे हैं। नोबेल फाउंडेशन के पास ऑनलाइन याचिकाओं के जरिए विरोध दर्ज कराया जा रहा है और मांग की जा रही है कि पीटर हैंडके से नोबेल पुरस्कार वापस लिया जाए।  दुनिया के मशहूर लेखक सलमान रूशदी ने भी हैंडके को यह सम्मान दिए जाने की आलोचना की है।
लेकिन, ऐसा हो क्यों रहा है? 76 वर्षीय पीटर हैंडके के विरोध के तार दरअसल यूगोस्लाविया के गृह युद्ध से जुड़े हैं। ऑस्ट्रिया में पैदा हुए पीटर हैंडके को संयुक्त यूगोस्लाविया और सर्ब-राष्ट्रीयता का समर्थक माना जाता है। उन पर आरोप है कि उन्होंने यूगोस्लाविया के गृह युद्ध के दौरान बोस्निया और कोसोव में हजारों लोगों के नरसंहार को जायज ठहराया।
पीटर हैंडके पर लगने वाले आरोपों को ठीक से समझने के लिए थोड़ा सा यूगोस्लाविया के गृह युद्ध के बारे में भी समझना होगा। संयुक्त यूगोस्लाविया कई जातीयताओं और राष्ट्रीयताओं को समेटे हुआ था। इनमें सर्ब और अल्बानियाई मूल के मुसलमान और कई तरह की राष्ट्रीयताएं थीं। इनमें आपस में संघर्ष चल रहा था। क्रोएशिया, स्लोवानिया। बोस्निया सब अपना अलग मुल्क चाह रहे थे। लेकिन, 1990 के आसपास कम्युनिस्ट से सर्ब राष्ट्रवादी नेता बने स्लोबोदान मिलोसेविच एक महासर्बिया (सर्बिया यूगोस्लाविया से सबसे पहले अलग हुआ था) बनाना चाहते थे। इसके चलते बोस्निया में सर्ब और मुसलमानों के बीच टकराव छिड़ गया। नतीजे में हुए गृह युद्ध में हजारों लोग मारे गए। आरोप है कि सर्बिया की सेना भी बोस्निया के सर्ब लोगों का साथ दे रही थी।
इसके बाद सर्बिया के ही एक हिस्से कोसोव ने इससे अलग होने की जिद पकड़ ली। इसका नतीजा भयंकर गृह युद्ध के तौर पर सामने आया और नॉटो की सेनाओं को इस क्षेत्र में भयंकर बमबारी करनी पड़ी। इन सबके केंद्र में भी सर्बिया के राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविच थे जो कह रहे थे कि वे सर्बों के लिए इस्लामिक कट्टरपंथ से लड़ रहे हैं। बाद में जब सत्ता स्लोबोदान मिलोसेविच के हाथों से गई तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मिलोसोवच को युद्ध अपराधी मानते हुए हेग के युद्ध अपराध न्यायालय में पेश किया गया। इस मामले की सुनवाई के बीच में ही उनकी मौत हो गई।
लेकिन, इन सब बातों से पीटर हैंडके का क्या ताल्लुक? पीटर हैंडके जर्मनभाषी हैं और ऑस्ट्रिया में पैदा हुए। उनके नाना सर्ब थे। पीटर हैंडके अपने लेखन में सर्ब राष्ट्रीयता के प्रबल पक्षधर हैं। उन्होंने सर्बिया के नरसंहार के आरोपित तत्कालीन राष्ट्रपति स्लोबोदान मिलोसेविच का हमेशा बचाव किया। अपने यात्रा वृतांत 'ए जर्नी टू द रिवर्स: जस्टिस फॉर सर्बियाÓ में उन्होंने मिलोसेविच की जमकर प्रशंसा की। इसके अलावा जब युद्ध अपराध के मुकदमे के बीच स्लोबोदान मिलोसेविच की मौत हुई तो पीटर हैंडके उनके अंतिम संस्कार में पहुंचे और उनकी प्रशंसा की। उन्होंने मिलोसेविच को एक 'ट्रैजिक ह्यूमन बीइंगÓ बताया।
इससे पहले भी पीटर हैंडके ने 1996 में अपने लेखों में पश्चिमी मीडिया पर हमला करते हुए लिखा था कि वह यूगोस्लाविया के गृह युद्ध पर एकतरफा रुख अखित्यार कर रहा है। उन्होंने लिखा था कि पश्चिमी मीडिया को सर्बों में सारी बुराइयां दिखती हैं और मुस्लिमों में सारी अच्छाइयां। पीटर के इस लेखन की प्रतिक्रियावादी कहकर आलोचना की गई। लेकिन उनका यह रुख बरकरार रहा। कोसोव और बोस्निया में मिलोसेविच जैसे युद्ध अपराधी के समर्थन के आरोपों पर उन्होंने कहा कि युद्ध अपराधी वे नहीं हैं बल्कि कोसोव में नॉटो सेनाओं द्वारा की गई गोलाबारी युद्ध अपराध थी। कोसोव में सर्बों द्वारा मुस्लिमों के दमन की शिकायत पर संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में नॉटो सेनाओं ने वहां हमले किए थे, जिसके विरोध में उन्होंने जर्मनी का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार भी वापस कर दिया था।
साहित्य की अकादमिक समालोचना में पीटर हैंडके को भाषायी सौम्यता और जीवन अनुभवों को बहुत बारीकी से अपने कथा साहित्य में बुनने के लिए जाना जाता है। नोबेल पुरस्कार की घोषणा के दौरान भी उनके बारे में यह बात कही गई है। लेकिन, पीटर हैंडके को नोबेल मिलने के बाद यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या साहित्य का सौंदर्यबोध और उसकी गुणवत्ता स्वतंत्र और निरपेक्ष है? प्रगतिशील मूल्यों और मानवीय शुभेच्छा से उसका कोई ताल्लुक नहीं है? पीटर हैंडके के साहित्य सृजन पर बहस एक एक अलग मुद्दा हो सकती है, लेकिन उनके राजनीतिक विचार कम से कम वे तो नहीं हैं जिन्हें दुनिया प्रगतिशील, मानवीय मानती है। आमतौर पर किसी पुरस्कार पर अपनी प्रतिक्रिया न देने वाले लेखक संगठन पेन अमरीका ने भी कुछ ऐसे सवाल उठाए हैं और पीटर हैंडके को नोबेल मिलने की आलोचना की है।
हालांकि, पीटर हैंडके इसकी ज्यादा परवाह करते नहीं दिखते। वे अपने निबंधों और लेखन में साफ कहते हैं कि साहित्य कोई समाज बदलने का उपकरण नहीं है। उनके मुताबिक एक लेखक अपने जीवन में कई संक्रमण कालों से गुजरता है और यही उसकी सफलता है कि वह उनको सफलतापूर्वक दर्ज कर ले।
यानी पीटर हैंडके के लिए साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल जैसी कोई चीज नहीं है। वे किसी तरह की विचारधारा में बंधना पसंद नहीं करते। उनका मानना है कि विचारधारा की कोई परिधि नहीं होती और वे जहां हैं उसे वहीं से महसूस करते हैं। पीटर हैंडके ने 2014 में नोबेल पुरस्कारों की आलोचना करते हुए कहा था कि इन्हें खत्म कर देना चाहिए। खुद को नोबेल मिलने के सवाल पर उन्होंने कहा कि सर्बिया के मसले पर अपनी राय जाहिर करने के बाद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उन्हें यह पुरस्कार मिलेगा। लेकिन, आखिरकार पीटर हैंडके को यह पुरस्कार मिल गया।
पीटर हैंडके की राजनीतिक सोच जैसी भी है वे उसमें स्पष्ट दिखते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या नोबेल पुरस्कार समिति ने भी अपनी सोच बदल ली है। क्या उसकी नजर में आधुनिक प्रगतिशील मूल्य, मानवीयता और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता साहित्य के अंतर्निहित मूल्य नहीं रह गए हैं? या दशकों से इन्हीं उदारवादी मूल्यों के नाम पर एक छद्म घर कर चुका है, जिससे अब पीछा छुड़ाने की कोशिश की जा रही है। जाहिर है कि नोबेल पुरस्कार समिति सिर्फ यह कहकर अपना बचाव नहीं कर सकती कि वह पुरस्कार साहित्य के सौंदर्यबोध के लिए देती है न कि किसी के राजनीतिक विचारों के लिए।
यह बहस तब और भी मौजूं हो जाती है जब हम 2018 के लिए साहित्य का नोबेल पाने वाली ओल्गा तोकाचुर्क के लेखन को देखते हैं। ओल्गा का लेखन मानवाधिकारों के सशक्त समर्थन वाला और एक विश्वव्यापी दृष्टि वाला लेखन है। हालांकि, अपने देश पोलैंड में ओल्गा भी कम विवादों में नहीं रही हैं। 
लेकिन उनसे संबंधित विवादों की प्रवृत्ति पीटर हैंडके के ठीक विपरीत रही। ओल्गा की किताब 'द बुक्स आफ जेकबÓ का पोलैंड में खासा विरोध हुआ। और यह विरोध करने वाले पोलैंड के कट्टर राष्ट्रवादी थे। इनका कहना था कि यह पुस्तक पोलैंड की राष्ट्रीयता को चोट पहुंचाती है। इस विवाद के चलते ओल्गा को बहुत दिनों तक सुरक्षा में भी रहना पड़ा था।
यानी, इस साल घोषित साहित्य के दोनों नोबेल पुरस्कार अलग-अलग ध्रुवों पर बैठे लोगों को दिए गए हैं। ओल्गा मानवाधिकार की सतत समर्थक और विश्वव्यापी दृष्टि रखने वाली मानी जाती हैं। वहीं, पीटर हैंडके संस्कृति और राष्ट्रीयता के मूल्यों में गहरे से विश्वास करते हैं और वह विश्वास इस हद तक है कि वह एक गृह युद्ध की त्रासदी के बारे में मानवीय होने के बजाय नरसंहार तक का बचाव करते नजर आते हैं। बोस्निया, कोसोव और अल्बानिया के हजारों लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि पीटर को मिला नोबेल पुरस्कार उन गृह युद्ध में मारे गए लोगों की आत्मा को चोट पहुंचाने वाला है। अमेरिका में कोसोव की राजदूक वोल्रा सिटैकू ने इसे गलत निर्णय बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी हैं। वहीं, खबर है कि अल्बीनिया में तीस हजार से ज्यादा लोगों ने ऑनलाइन याचिका के द्वारा नोबेल समिति के सामने यह मांग की है कि इस निर्णय को वापस लिया जाए।
हालांकि, यह बहस इतनी आसान भी नहीं है। सिर्फ साहित्य में ही क्यों, राष्ट्रीयताओं के संघर्षों के घाव इतने गहरे होते हैं कि वे जब तब उभर आते हैं। 2018 के फीफा में कोसोव के गृह युद्ध के दौरान स्विटजरलैंड में शरण लेने वाले अल्बानियाई मूल के शेरेडेन शकीरी और ग्रेनिथ जाका स्विस टीम की तरफ से खेल रहे थे। लेकिन जब दोनों ने सर्बिया के खिलाफ गोल किया तो डबल ईगल का अल्बानिया राष्ट्रीयता का निशान बना सर्बिया को चिढ़ाया था। सर्बिया ने इसको लेकर फीफा के सामने आपत्ति भी उठाई थी। यानी पहचान की राजनीति जब-तब जाहिर ही हो जाती है।
लेकिन, साहित्य से तो उम्मीद की जाती है कि वह पहचान की इन रेखाओं को धूमिल करेगा। पीटर हैंडके को लेकर जिस तरह का विवाद हो रहा है, उससे तो लगता है कि अब साहित्य भी पहचान की इन लकीरों को पुख्ता करने का जरिया बन रहा है। इसको लेकर खुले मन से बहस इसलिए भी जरूरी है कि पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथ का उभार देखा जा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है, इसकी पड़ताल जरूरी है क्योंकि यह सांस्कृतिक चेतना से ज्यादा प्रभुत्व और घृणा पर आधारित है। ऐसे में साहित्य जगत को भी विचार करना होगा कि उदारवाद, लोकतंत्र और मानवाधिकार जैसे विराट मूल्यों की आड़ में कुछ ऐसा तो नहीं हुआ है जिससे यह नौबत आई है। (सत्याग्रह)

 


Date : 12-Oct-2019

अब्दुलअजीज, अमीनातु, अबसातु, अब्दुलमनफ. फरहाद, और हां मंसूर भी. ये सब वो नाम हैं जो जैनब गारबा ने भविष्य में होने वाले अपने बच्चों के लिए सोच रखे थे.

फिलहाल उनके दो बच्चे हैं. तीन साल का बेटा राशिद और उसका छोटा भाई बिलयामिनू, जिसका जन्म अभी हाल ही में हुआ है. अब जैनब ने गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करना शुरू किया और ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपनी योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. उनका पूरा ध्यान अपने दोनों बच्चों को एक बेहतर जिंदगी देने पर है. जैनब कहती हैं, च्च्मुझे गर्व है कि मैं गर्भनिरोधक इंप्लांट का इस्तेमाल कर रही हूं.ज्ज्
जैनब का फैसला वाकई बहुत बड़ा है. वह अफ्रीकी देश नाइजर में रहती हैं जहां प्रति महिला जन्मदर दुनिया में सबसे ज्यादा है. लेकिन नाइजर में पर्यावरणविद और युवा कार्यकर्ता ज्यादा से ज्यादा परिवारों से गर्भनिरोधकों को अपनाने को कह रहे हैं. उनके मुताबिक इससे जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने में मदद मिलेगी.
संयुक्त राष्ट्र के विकास कार्यक्रम के इस्सा लेले कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से नाइजर के तापमान में तेजी से इजाफा हुआ है और नदियों में पानी कम हुआ है. सूखे और बाढ़ की समस्या भी बढ़ी है. ऐसे में, जनसंख्या तेजी से बढऩे के कारण खाद्य और जल आपूर्ति के लिए जोखिम पैदा हो रहे हैं. पर्यावरण के लिए काम करने वाले एक समूह यंग वॉलेंटियर फॉर दि एनवार्नमेंट के निदेशक सानी आयोबा का कहना है कि नाइजर में प्रति महिला बच्चों का औसत 7.6 है.
आयोबा के अपने तीन बच्चे हैं. उनका कहना है, च्च्हम यह नहीं कह रहे हैं कि बच्चे पैदा ही मत कीजिए.ज्ज् उनका समूह लोगों से गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल कर बच्चों की जन्म दर को धीमा करने की वकालत करता है.
दुनिया भर में बढ़ती आबादी के कारण पृथ्वी के सीमित संसाधन दबाव में हैं. जितने ज्यादा लोग होंगे, उतना ज्यादा खाना, परिवहन, ऊर्जा और अन्य संसाधनों की जरूरत होगी और इन सब की वजह से आखिरकर जलवायु परिवर्तन बढ़ेगा. अमीर देशों में स्थिति ज्यादा खराब है. वहां गरीब देशों के मुकाबले लोगों को ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है.
लेकिन नाइजर जैसे देशों में भी होने वाले हर जन्म का मतलब है कि देश के सीमित संसाधनों का बंटवारा ज्यादा लोगों के बीच होगा. इससे दुनिया संकट की तरफ बढ़ रही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन की वजह से पहले ही खेती बाड़ी और खाद्य आपूर्ति प्रभावित हो रही हैं.
राजधानी नियामे के तालाज्ये इलाके में एक क्लीनिक में जैनब ने सितंबर में अपने बाजू में गर्भनिरोधक इंप्लांट कराया. एक मिडवाइफ ने सूईं की मदद से उनकी बांह में दो छेद किए और उनमें इंप्लांट लगा दिया. इस काम में पांच मिनट लगते हैं. लेकिन इससे तीन साल तक वह गर्भधारण नहीं कर पाएंगी. मिडवाइफ का कहना है कि इस इंप्लाट की कामयाबी दर 99 प्रतिशत है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में जनसंख्या का स्तर असमान रूप से बढ़ा है. 1950 में दुनिया में कुल आबादी जहां 2.6 अरब थी वहीं 2017 तक यह बढक़र 7.6 अरब हो गई. जनसंख्या वृद्धि के असमान स्तर में आय और इलाके के हालात की भी बड़ी भूमिका होती है.
नाइजर में अब तक गर्भनिरोध के तौर पर गोलियां ही सबसे लोकप्रिय रही हैं, लेकिन एक अंतरराष्ट्ररीय चैरिटी संस्था मैरी स्टॉप्स की तरफ से चलाए जा रहे इस क्लीनिक में गर्भनिरोधक इंप्लाट किए जा रहे हैं. इस क्लीनिक में बहुत सी महिलाएं आ रही हैं और अपनी त्वचा में इंप्लांट करा रही हैं.
नाइजर के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्रालय में परिवार नियोजन निदेशक इस्सोफोऊ हारोऊ कहते हैं कि सरकार परिवार नियोजन के कुछ पहलुओं का समर्थन कर रही है और इसके लिए धन भी आवंटित किया जा रहा है. लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने गर्भनिरोधक खरीदने के लिए जो 3.4 लाख डॉलर का राष्ट्रीय बजट निर्धारित किया है, वह पर्याप्त नहीं है.
नाकाफी बजट के साथ साथ समाज में गर्भनिरोधकों के लिए स्वीकार्यता भी बड़ी चुनौती है. नाइजर में 99 प्रतिशत आबादी मुसलमान है. देश के इस्लामिक एसोसिएशन के प्रमुख सिता अमादोऊ कहते हैं कि अगर बच्चों की ठीक से देखभाल हो सकती है तो इस्लाम परिवार में बच्चों की संख्या सीमित करने की वकालत नहीं करता. इसी कारण नाइजर में परिवार नियोजन के लिए काम करने वाले संगठनों का काम मुश्किल हो जाता है. वे पिछले साल से मुहिम चला रहे हैं कि परिवार नियोजन को अपना कर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटा जा सकता है.
कार्यकर्ताओं ने इस संबंध में संसद के सदस्यों और कैबिनेट मंत्रियों से भी मुलाकातें की हैं. इसके अलावा वे सामुदायिक नेताओं से भी मिले हैं. पिछले दिनों नियामे में हुए एक कार्यक्रम में आयोबा ने कहा, च्च्बात सिर्फ कृषि में निवेश की नहीं है, बल्कि हमें गर्भनिरोधकों और परिवार नियोजन में भी निवेश करना होगा.ज्ज् तभी वहां मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि मुस्लिम अधिकारी इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे। 
एके/एमजे (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

 


Date : 12-Oct-2019

लंबी लड़ाई के बाद 1947 में जब भारत को आजादी मिली तो एक तरफ उम्मीदें थीं और दूसरी तरफ कई आशंकाएं। पश्चिमी दुनिया के एक बड़े हिस्से को लगता था कि भारत लोकतंत्र की राह पर ज्यादा दूर तक नहीं चल पाएगा। इसकी एक वजह तो उसकी असाधारण विविधता थी जिसके चलते कहा जाता था कि इस एक देश में कई देश हैं। दूसरा कारण यह था कि जिस मजबूत विपक्ष को लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी माना जाता है वह यहां नदारद दिखता था।
इसी दौरान देश में कुछ हस्तियां हुईं जिन्होंने सत्ता का मोह छोडक़र उससे लोहा लिया और यह कमी पूरी की। इन व्यक्तित्वों ने तब सर्वशक्तिमान कहे जाने वाले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कई निर्णयों को चुनौती दी। इनमें राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण या जेपी का नाम लिया जाता है।
जेपी तो 1953 से ही सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर दलविहीन लोकतंत्र और ‘सर्वोदय’ का प्रयोग कर रहे थे। ऐसे में वे लोहिया ही थे जिन्होंने विपक्ष क्या होता है और उसे क्या करना चाहिए, का पाठ भारतीय लोकतंत्र को सिखाया। अपने प्रयासों से उन्होंने आजादी के बाद एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अपनी मौत से ठीक पहले यानी 1967 तक पानी पीने पर मजबूर कर दिया।
लेकिन ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। राम मनोहर लोहिया की रचनात्मक राजनीति और अद्भुत नेतृत्व क्षमता का प्रभाव इतना दूरगामी रहा कि उनके जाने के करीब 20 सालों बाद ही उनके सिद्धांतों को मानने वाली कई पार्टियां भारतीय लोकतंत्र के पटल पर छाने लगीं। ‘सामाजिक न्याय’ की उनकी संकल्पना तो आज राजनीति का मूल सिद्धांत बन चुकी है। यह राम मनोहर लोहिया की ही दूरदर्शिता थी कि तमाम वंचित जातियों और वर्गों की धीरे-धीरे ही सही, सभी क्षेत्रों में हिस्सेदारी बढ़ रही है।
बताया जाता है कि लोहिया शुरू में नेहरूवादी थे और गांधीवादी वे बाद में बने। मतलब यह है कि शुरू में वे गांधी की तुलना में नेहरू से ज्यादा प्रभावित थे। बाद में नेहरू से उनका मोहभंग होता गया और गांधी के सिद्धांतों और कार्यनीतियों पर उनका भरोसा बढ़ता गया।
उच्च शिक्षा के दौरान जर्मनी में राम मनोहर लोहिया की राजनीतिक सक्रियता की जानकारी कांग्रेस के नेताओं विशेषकर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को भी थी। इसलिए 1933 में पीएचडी करने के बाद देश लौटने पर नेहरू ने उन्हें कांग्रेस की विदेश मामलों की समिति में रखा था। अगले दो सालों तक उन्होंने भविष्य के भारत की विदेश नीति तय करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसलिए उन्हें भारत का पहला गैर-आधिकारिक विदेश मंत्री भी कहा जाता है। आजादी के बाद देश ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे निर्धारित करने में लोहिया का महत्वपूर्ण योगदान था।
कांग्रेस मॉडल के तहत कांग्रेस का सदस्य रहते हुए कोई किसी अन्य संगठन का भी सदस्य बन सकता था। इसलिए समाजवादी विचारधारा से प्रभावित जयप्रकाश नारायण जैसे कई कांग्रेसी नेताओं ने मई 1934 में ‘कांग्रेस समाजवादी पार्टी’ की नींव डाली। लोहिया का इसमें महत्वपूर्ण योगदान था।
लेकिन नेहरू से लोहिया के संबंध 1939 के बाद खट्टे होने लगे। संबंधों के खराब होने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध में भारत के शामिल होने के सवाल पर हुई। लोहिया चाहते थे कि अंग्रेजों की कमजोर स्थिति को और कमजोर करने के लिए भारत को युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए। उधर, नेहरू चाहते थे? कि भारतीय सेना इस महायुद्ध में अंग्रेजों का साथ दे।
नौ अगस्त 1942 को जब भारत छोड़ोंं आंदोलन छेड़ा गया तो अंग्रेजों ने पूरे देश में कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। ऐसा लगा अब यह आंदोलन विफल हो जाएगा। लेकिन कांग्रेस के भीतर जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं ने आंदोलन का अगले दो सालों तक सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। आंदोलन की घोषणा होते ही मुंबई में एक भूमिगत रेडियो स्टेशन से आंदोलनकारियों को ?दिशा-निर्देश दिए जाने लगे थे। ऐसा करने वाले कोई और नहीं लोहिया थे। अंग्रेज जब तक उस रेडियो स्टेशन को ढूंढ़ पाते तब तक लोहिया कलकत्ता जा चुके थे। वहां वे पर्चे निकालकर लोगों का नेतृत्व करने लगे। उसके बाद वे जयप्रकाश नारायण के साथ नेपाल पहुंच गए। वहां पर ये लोग ‘आजाद दस्ता’ बनाकर आंदोलनकारियों को सशस्त्र गुरिल्ला लड़ाई का प्रशिक्षण देने लगे।
अंग्रेजों को दो सालों तक छकाने के बाद जेपी और लोहिया मई 1944 में पकड़ लिए गए। इन दोनों पर मुकदमा चला और वे लाहौर जेल में बंद कर दिए गए। यहां से वे लोग अप्रैल 1946 में ही छूट पाए। जेल में अंग्रेजों ने लोहिया को जमकर यातनाएं दी थीं जिससे उनका स्वास्थ्य बिगडऩे लगा था।
लोहिया ने अपनी किताब ‘विभाजन के गुनहगार’ में बताया है कि दो जून 1947 की बैठक में वे और जेपी विशेष आमंत्रित सदस्य थे। बैठक का नजारा ऐसा था मानो नेहरू और पटेल पहले से सब कुछ तय कर आए हों। महात्मा गांधी के विरोध करने के बाद नेहरू और पटेल ने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे देने की धमकी दे दी। लोहिया लिखते हैं कि तब गांधी के पास विभाजन के प्रस्ताव पर मौन सहमति देने और विभाजन के गुनहगारों में शामिल हो जाने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं बच गया था।
गांधी के मरने के बाद कांग्रेस मॉडल को नेहरू ने 1948 में खत्म कर दिया। कांग्रेस के समाजवादी नेताओं को पार्टी का विलय कांग्रेस में करने या कांग्रेस छोडऩे का विकल्प दिया गया। लोहिया को तो नेहरू ने कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाने का प्रस्ताव दिया। लेकिन उन्होंने अन्य समा?जवादियों जिनमें जेपी भी शामिल थे, के साथ कांग्रेस छोडऩे का विकल्प चुना। यह समझते हुए भी कि कांग्रेस की छवि देशवासियों के दिलोदिमाग पर छप चुकी है और उसे हटाना आसान नहीं है, खासकर तब जब कोई स्थापित संगठन न हो और न ही मजबूत आर्थिक समर्थन। लेकिन लोहिया और उनके साथियों ने लोकतंत्र के हित मेंं विपक्ष की आवाज बनने और उसे बुलंद करने का फैसला लिया।
इसका परिणाम 1948 में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के गठन के रूप में हुआ। फिर 1952 में जेबी कृपलानी की ‘किसान मजदूर पार्टी’ के साथ विलय करके ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ का निर्माण किया गया। हालांकि मतभेदों के चलते लोहिया ने ?1955 में पीएसपी छोडक़र फिर से ‘सोशलिस्ट पार्टी’ को जिंदा करने का निर्णय किया।
लोहिया से सोशलिस्ट पार्टियों की इस टूट-फूट पर किसी ने पूछा तो उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा था, ‘समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और अमीबा में एकरूपता है। मतलब जैसे ही पार्टी मजबूत होकर बड़ी बनती है, अमीबा की तरह टूटकर फिर पहले की तरह छोटी हो जाती है।’ उनका यह कथन आज भी खुद को उनकी विरासत का उत्तराधिकारी कहने वाली पार्टियों पर लागू होता दिखता है।
लोहिया और अन्य समाजवादियों की पहले आम चुनाव में हार हुई। लेकिन यह हार इन नेताओं की अलोकप्रियता की वजह से नहीं बल्कि उनके संगठन के कांग्रेस की तुलना में कमजोर होने और कमतर आर्थिक संसाधन होने के चलते हुई थी। इसे मजबूत कांग्रेस को नियंत्रण में रखने की जिजीविषा ही कहेंगे कि इस हार के बाद कई सोशलिस्ट पार्टियां एकजुट हो गईं। इसी समय लोहिया के सिद्धांत पार्टी के अन्य नेताओंं को पच नहीं रहे थे। वे जैसे भी हो केरल में सत्ता में बने रहना चाहते थे। इसी बात पर लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोडक़र फिर से सोशलिस्ट पार्टी को जिंदा करने का निर्णय लिया।
इसके बाद वे घूम-घूमकर तमाम पिछड़ी जातियों के संगठनों को जोडऩे लगे। इसी सिलसिले में उन्होंने बीआर अंबेडकर से मिलकर उनके ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड क्लास एसोसिएशन’ के सोशलिस्ट पार्टी में विलय की बात शुरू की। बातचीत पक्की हो गई थी कि दिसंबर 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया। और उन्हें अपने साथ जोडऩे की उनकी मुहिम अधूरी रह गई। फिर भी ऐसे दूसरे संगठनों को जोडऩे का उनका प्रयास जारी रहा।
राम मनोहर लोहिया के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा रहा कि 1967 कांग्रेस पार्टी सात राज्यों में चुनाव हार गई और पहली बार विपक्ष उसे टक्कर देने की हालत में दिखने लगा। इस चुनाव के बाद लोहिया ने तय किया कि वे जेपी को मुख्यधारा में वापस लाकर विपक्ष को और मजबूत बनाएंगे। पर वे अक्टूबर में चल बसे।
हालांकि राम मनोहर लोहिया का प्रयास करीब एक दशक बाद रंग लाया जब 1975 में जयप्रकाश नारायण राजनीति की मुख्यधारा में वापस लौटे। आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में विपक्षी पार्टियों की एकजुटता रंग लाई और 25 सालों से केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।
राम मनोहर लोहिया ने जर्मनी में रहते कार्ल मार्क्स और एंगेल्स को खूब पढ़ा। लेकिन उन्होंने पाया कि भारत के संदर्भ में कम्युनिस्ट विचारधारा अपूर्ण है। मार्क्सवाद ने साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के संबंधों की जो व्याख्या की थी लोहिया उससे असहमत थे। बल्कि वे तो उसे उल्टा मानते थे। मार्क्सवाद मानता था कि पूंजीवाद के विकास से साम्राज्यवाद पनपता है। इसलिए पूंजीवाद के खात्मे से ही साम्राज्यवाद का विनाश होगा। लोहिया ने बताया कि मामला असल में उल्टा है। वह साम्राज्यवाद ही है जिससे पूंजीवाद का विकास हुआ। इसलिए पूंजीवाद का नाश करने के लिए जरूरी है कि साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंका जाए। उन्होंने ब्रिटेन के उदय को भारत जैसे उपनिवेशों के शोषण से जोड़ दिया और कहा कि भारत को आजाद किए बगैर पूंजीवाद की जड़ें कमजोर नहीं हो सकती। इस तरह लोहिया ने पूंजीवाद के विनाश के लिए भारत जैसे उपनिवेशों की आजादी को सबसे महत्वपूर्ण बताया।
लोहिया ने मार्क्स के वर्ग-सिद्धांत की भारत के संदर्भ में नई व्याख्या दी। उनके अनुसार भारत का समाज औद्योगिक समाज नहीं है। इस समाज में असमानता की मुख्य वजह जाति रही है। यहां पर शोषण का कारण जाति व्यवस्था रही है। इसलिए यहां पर ‘बुर्जुआ’ और ‘सर्वहारा’ वर्गों की मौजूदगी मार्क्सवाद के सिद्धांतों की तरह नहीं है।
राम मनोहर लोहिया का मानना था कि भारत की सवर्ण जातियों को बुर्जुआ माना जाना चाहिए और तमाम वंचित वर्गों, जिनमें आदिवासी, दलित, अन्य पिछड़ी जातियां और यहां तक कि सभी समुदायों की महिलाएं भी शामिल हैं, को सर्वहारा माना जाना चाहिए। भारत के संदर्भ में मार्क्सवाद की लोहिया की यह व्याख्या और इसके परिणाम क्रांतिकारी रहे।
आलोचकों का भी मानना है कि साठ के दशक से भारत में समाजवादी विचारधारा के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के पीछे लोहिया की इस अनूठी व्याख्या का ही योगदान रहा है। इसने जातिगत पहचानों को तो मजबूती दी ही है, राजनीति में वंचित जातियों की पैठ भी बढ़ाई है।
हर तरह की विषमता को खत्म करने की दिशा में सप्तक्रांति सिद्धांत को भी राम मनोहर लोहिया की अनूठी देन माना जाता है। इस सिद्धांत में सात बिंदु थे। मसलन रंगभेद खत्म हो, जातिगत भेदभाव बंद हो, औरत और मर्द में कोई अंतर नहीं है, राष्ट्रवाद को संकुचित नहीं व्यापक तरीके से समझा जाए, समाजवादी आर्थिक मॉडल श्रेष्ठ है, सभी देश निरशस्त्रीकरण के रास्ते चलें और भेदभाव से लडऩे का तरीका सत्याग्रह ही होना चाहिए।
लोहिया के प्रयासों का ही असर रहा कि तमाम पिछड़ी जातियों में आत्मविश्वास विकसित हुआ। उन्होंने कमोबेश सभी पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे बढ़ाया। उनके जाने के बाद उत्तर भारत के कई राज्यों में समाजवादी विचारधारा की सरकार बनी। इससे सामाजिक न्याय को अभूतपूर्व मजबूती मिली। किसी जानकार ने कहा है कि गांधी को छोड़ दिया जाए तो लोहिया का अनुसरण करने वाली पार्टियों और नेताओं की संख्या देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है। (सत्याग्रह)

 


Date : 11-Oct-2019

इंदिरा गांधी और उनके भ्रष्टाचारी-तानाशाही प्रतिष्ठान के विरुद्ध आंदोलन तो जेपी ने सन चौहत्तर में छेड़ा, लेकिन जवाहर भाई की इस बेटी से उनका मोहभंग दो साल पहले से हो चला था। चंबल घाटी और बुंदेलखंड में कोई चार सौ डाकुओं के समर्पण में इंदिरा गांधी, उनके गृह मंत्रालय, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की कांग्रेस सरकारों ने जेपी के प्रयोग में पूरा सहयोग दिया था। हालांकि उसका अंत सर्वोदय कार्यकर्ताओं से मध्य प्रदेश पुलिस की अशोभनीय होड़ के कारण खटास में हुआ था।
फिर भी इंदिरा गांधी चाहती थीं कि डाकू समस्या के सभ्य और मानवीय हल की शुरुआत के साथ जेपी देश से मृत्यु दंड समाप्त करने का अभियान भी चलाएं। उनने जेपी को इक्कीस और अ_ाईस अप्रैल को पत्र लिखकर ऐसा अभियान शुरू करने का आग्रह भी किया था। लेकिन सन चौवन से विनोबा के साथ सर्वोदय में काम करते हुए जेपी ने जनआंदोलन और सरकार के बीच सहयोग का जो रवैय्या अपनाया था वह डाकुओं के समर्पण के इतने सफल प्रयोग के साथ छीजने लगा।
इंदिराजी ने सन इकहत्तर के मध्यावधि चुनाव में भारी सफलता पाई थी। फिर बांग्लादेश का युद्ध उनने जीता और मार्च बहत्तर में विधान सभाओं के चुनावों में लगभग हर राज्य में कांग्रेस की जीत हुई और इंदिरा जी के चुने व्यक्ति हर जगह मुख्यमंत्री हुए। कांग्रेस इंदिरा जी के पल्लू में बंधी पार्टी हो गई और सर्वोच्च नेता के लिए पूरी और दयनीय वफादारी राजनीतिक व्यवहार की कसौटी बन गई। इंदिरा जी में सत्ता के इस अद्भुत विकेंद्रीकरण से जेपी चिंतित होने लगे। कांग्रेस के ही नेता उन्हें आकर बताते थे कि किस तरह पार्टी में पैसा इक_ा किया जा रहा है, कैसा अनाप-शनाप खर्च होता है और नीचे से लेकर ऊपर तक कितना भ्रष्टाचार है, जेपी ने देश के सोचने-समझने वालों की एक बैठक कर्नाटक के टिप्पुमुंडहल्ली नाम के हिल स्टेशन पर बुलाई। वहीं एक साप्ताहिक अखबार निकालने का भी तय हुआ जो बाद में एवरीमेन्स के नाम से दिल्ली में निकला।
उत्तर प्रदेश और ओडीशा के विधानसभा चुनावों के लिए चार करोड़ रुपए इक_े किए गए। इससे जेपी इतने चिंतित हुए कि इंदिरा जी से मिलने गए और कहा कि कांग्रेस अगर इतने पैसे इक_े करेगी और एक-एक चुनाव में लाखों रुपया खर्च किया जाएगा तो लोकतंत्र का मतलब क्या रह जाएगा। सिर्फ वही चुनाव लड़ सकेगा जिसके पास धनबल और बाहुबल होगा। मामूली आदमी के लिए तो कोई गुंजाइश रहेगी नहीं।
जेपी के दिए गए वर्णन के अनुसार ही इंदिराजी इस बातचीत के दौरान नाखूनों से मैल निकालतीं और उन्हें काटती रहीं। फिर कहा-जेपी कहां से ये गलत-सलत जानकारी आपको मिलती है? हमने कोई चार करोड़ रुपए इक_े नहीं किए। वहां के नेताओं-नंदिनी शतपथी और हेमवती नंदन बहुगुणा-ने क्या किया मुझे मालूम नहीं। लेकिन भ्रष्टाचार की ये सब गलत रपटें आप तक आती हैं। इंदिरा जी के रवैये से जेपी बहुत दुखी और बहुत गुस्से में आ गए लेकिन किया कुछ नहीं। प्रभावती के कैंसर से निधन के बाद जेपी बहुत अकेले हो गए। चिड़े-चिड़ी का घोंसला उजड़ जाने से और अकेलेपन की पीड़ा से उबरने में जेपी को लगभग एक साल लग गया। जेपी से ज्यादा प्रभावती इंदिरा को अपनी बेटी मानती थीं। वे उनकी सहेली कमला नेहरू की इकलौती बेटी थीं। प्रभावती रहतीं तो जेपी आंदोलन शुरू नहीं कर सकते थे।
दिसंबर तिहत्तर में जेपी ने ‘यूथ फॉर डेमोक्रेसी’ नाम का संगठन बनाया और देश-भर के युवाओं से अपील की वे लोकतंत्र की रक्षा में आगे आएं। गुजरात के छात्रों ने जब जनवरी चौहत्तर में चिमनभाई पटेल की भ्रष्टाचारी सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया तो जेपी वहां गए और उस नवनिर्माण आंदोलन का समर्थन किया। जेपी ने कहा कि उन्हें क्षितिज पर सन बयालीस दिखाई दे रहा है।
मार्च में पटना में छात्रों ने आंदोलन की शुरुआत की। यह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक रहेगा, इस शर्त पर जेपी ने उसकी अगुवाई करना मंजूर किया। यही बिहार आंदोलन और बाद में जेपी के कारण संपूर्ण क्रांति आंदोलन बना। सालभर में आंदोलन बिहार के गांव-गांव में फैल गया। संघर्ष समितियां बनीं, जनता सरकारें बनीं। इंदिरा गांधी बिहार सरकार को डिसमिस करने को तैयार थीं लेकिन विधानसभा भंग करके चुनाव करवाने को उनने असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक करार दिया।
संघर्ष बढ़ता गया। जून पचहत्तर में गुजरात में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई, जनता पक्ष जीता। उसी दिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। जेपी आंदोलन में शामिल विपक्ष ने इंदिरा गांधी से इस्तीफा मांगा। जेपी ने विपक्ष की मांग का समर्थन किया। देश में जो सरकार विरोधी माहौल बना और इंदिरा गांधी का सत्ता में रहना मुश्किल होने लगा तो उनने इमरजेंसी लगाई, सेंसरशिप लागू की, जेपी समेत सभी नेताओं को गिरफ्तार किया। विरोध न हो इसलिए कार्यकर्ता भी पकड़े गए। उत्तर भारत में संजय गांधी ने नसबंदी और गंदी बस्तियां हटाने की मुहिम शुरू की।
इमरजेंसी के उन्नीस महीने देश में काले महीने हो गए। फिर इंदिरा गांधी ने अपने किए पर जनादेश पाने के लिए आम चुनाव की घोषणा की। गुर्दे खराब हो जाने के कारण डायलिसिस पर जीते जेपी ने चुनाव की चुनौती मंजूर की। मार्च सतहत्तर के चुनाव में उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। इंदिरा और संजय गांधी दोनों चुनाव हार गए। यह पांच साल से चल रहे जेपी के इंदिरा विरोध का नतीजा था। जेपी को विश्वास हो गया था कि इंदिरा गांधी सारी सत्ता अपने हाथों में लेकर देश में संवैधानिक तानाशाही कायम करना चाहती हैं।
इंदिरा गांधी से उनका संघर्ष लोकतंत्र के लिए किया गया संघर्ष था। जेपी की नैतिक शक्ति और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान ने उन्हें वह अवसर दिया था कि वे इंदिरा गांधी और उनकी राज्य शक्ति को पराजित कर सकें। जेपी का आंदोलन नहीं होता तो विपक्ष एक नहीं होता और जेपी चुनाव अभियान की अगुवाई नहीं करते तो इंदिरा गांधी और उनकी कांग्रेस हारती नहीं। इंदिरा गांधी ने इस्तीफा दिया और जेपी के चुने गए मोरारजी देसाई ने चौबीस मार्च सतहत्तर को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
उसी शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में जनता गठजोड़ की तरफ से विजय रैली रखी गई थी। जनता के सभी विजयी नेताओं के अलावा जेपी भी उस सभा को संबोधित करने वाले थे। लेकिन अपनी राजनीतिक विजय के सबसे बड़े दिन जेपी विजय रैली में भाषण देने नहीं गए। यह वही रामलीला मैदान था जहां पच्चीस जून को भाषण देने के बाद जेपी को गिरफ्तार किया गया था। यहीं फरवरी सतहत्तर में जेपी ने जनता के चुनाव अभियान की शुरुआत की थी। अब इसी रामलीला मैदान में जनता का विजयोत्सव मनाया जा रहा था। लेकिन जेपी वहां नहीं गए। वे गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने कमरे से निकलकर सफदरजंग रोड की एक नंबर की कोठी में गए जहां पराजित इंदिरा गांधी रहती थीं। जैसे महाभारत के बाद भीष्म पितामह गांधारी से मिलने गए हों। इंदिरा गांधी के साथ उनके सिर्फ एक सहयोगी एचवाई शारदा प्रसाद थे और जेपी के साथ गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री राधाकृष्ण और मैं। अद्भुत मिलना था वह। मिलकर इंदिरा गांधी रोईं और जेपी भी रोए।
जेपी के बिना इंदिरा गांधी पराजित नहीं हो सकती थीं और जेपी उनसे संघर्ष नहीं करते तो देश में लोकतंत्र बच नहीं सकता था। लेकिन जेपी अपनी विजय पर हुंकार भरने के बजाय अपनी पराजित बेटी के साथ बैठकर रो रहे थे। ऐसा महाभारत लडऩेवाले एक ही कुल के दो योद्धा कर सकते थे। उस वक्त और आज की राजनीति में दो नेता तो ऐसा नहीं कर सकते। जेपी के लिए वे बेटी इंदु थी भले ही उनके खिलाफ जेपी ने आंदोलन चलाया और चुनाव अभियान की अगुवाई की। निजीतौर पर इंदिरा गांधी भी जेपी को अपना चाचा मानती रहीं लेकिन राजनीतिक लड़ाई उनने भी आखिरी दम तक लड़ी ही।
जेपी ने जैसे बेटी से पूछते हैं - इंदिरा जी से पूछा कि सत्ता के बाहर, अब काम कैसे चलेगा? घरखर्च कैसे निकलेगा? इंदिरा जी ने कहा कि घर का खर्च तो निकल आएगा। पापू (जवाहरलाल नेहरू) की किताबों की रॉयल्टी आ जाती है। लेकिन मुझे डर है कि ये लोग मेरे साथ बदला निकालेंगे। जेपी को यह बात इतनी गड़ गई शांति प्रतिष्ठान लौटते ही उनने उसी दिन प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई को पत्र लिखा। कहा कि लोकहित में इंदिरा शासन की ज्यादतियों पर जो भी करना हो जरूर कीजिए लेकिन इंदिरा गांधी पर बदले की कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। सबेरे जेपी विमान से पटना गए लेकिन वहां उनका डायलिसिस बिगड़ा तो वायुसेना के विमान से उन्हें मुंबई और जसलोक अस्पताल भेजा गया।
लेकिन इंदिरा गांधी पर जेपी की सलाह न मोरारजी देसाई को ठीक न लगी, न उनके गृहमंत्री चौधरी चरणसिंह को। इंदिरा गांधी को उनने पराजित तो कर दिया था और वे सत्ता से बाहर भी हो गई थीं लेकिन सभी बड़े जनता नेताओं के मन में इंदिरा गांधी का खौफ समाया हुआ था। वे उनकी राजनीतिक खुराफात करने की अपार क्षमता से डरे हुए थे। वे सत्ता में थे लेकिन सहमे हुए थे और उन्हें लगता था कि इंदिरा गांधी न जाने कब और कैसे उनसे सत्ता छीन लेंगी।
एक किस्सा आपको बताता हूं। पराजित होने के कोई दो-तीन महीने बाद इंदिरा गांधी अपने पहले सार्वजनिक कार्यक्रम में नई दिल्ली के कमानी सभागृह में भाषण देने आईं। चूंकि पराजय के बाद उनका यह पहला कार्यक्रम था प्रेस उसमें अच्छी संख्या में कवर करने को आई थी। दूसरे दिन दिल्ली के सभी अखबारों में पहले पेज पर उनकी फोटू और उनका भाषण काफी महत्व के साथ छापा गया था। बिहार आंदोलन और इमरजेंसी में उनका विरोध करने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पहले पेज पर भी इंदिरा गांधी का फोटू और भाषण छपा था।
रामनाथ गोयनका जब दिल्ली में होते तो गेस्ट हाऊस में सभी संपादकों के साथ लंच खाया करते थे। उस दिन भी लंच चल रहा था कि फोन आया। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का था और वे रामनाथ गोयनका से बात करना चाहते थे। भोजन करते हाथ से ही रामनाथ जी फोन लिया। मोरारजी शिकायत कर रहे थे कि यह क्या एक्सप्रेस में पहले पेज पर इंदिरा गांधी का इतना बड़ा फोटू और भाषण छापा गया है। अगर आप लोग ही उनको इस तरह की पब्लिसिटी देने लगे तो उनकी तो जनता में फिर मान्यता हो जाएगी। रामनाथ जी ने मोरारजी को कहा कि उनकी तो संपादकों पर कुछ चलती नहीं है और आप जानते ही हैं कि मैं कोई दखल नहीं देता। ये मुलगावकर यहीं बैठे हैं इनसे आप बात कीजिए। फोन उनने मुलगावकर दे दिया जो मार्च में ही इंडियन एक्सप्रेस के फिर प्रधान संपादक हो गए थे। मुलगावकर की मोरारजी से बात चल ही रही थी कि उन्हें उंगली गड़ाकर हाथ के इशारे से रामनाथ जी ने कहा कि बात करके फोन मुझे फिर देना। मुलगावकर ने उन्हें दे दिया। रामनाथ जी ने पूरी टेबल सुन सके इतनी जोर से मोरारजी को कहा – एक बात मुझे भी कहना है मोरारजी भाई : जनखों के हिमायती मारे जाते हैं और फोन रख दिया।
मोरारजी की शिकायत से रामनाथ गोयनका को ही नहीं हम सबको भी लगा था कि उन्हें डर है कि ऐसी पब्लिसिटी मिलती रही तो इंदिरा गांधी तो फिर प्रतिष्ठित हो जाएंगी और उनकी वापसी को कौन रोक सकेगा। इसीलिए जब बिहार के बेलची गांव में दलितों पर हिंसा हुई और इंदिरा गांधी वहां जाने के लिए निकलीं और बिहार में जैसा उनका स्वागत हुआ उससे छह महीने पहले ही चुनी गई जनता सरकार दहल गई।
चरणसिंह को लगा कि अब भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई तो और समय निकलने के बाद तो इमरजेंसी थोपने और भ्रष्टाचार करने जैसे ‘अपराधों’ पर कोई कार्रवाई हो ही नहीं सकेगी क्योंकि जनता उनकी तरफ हो चुकी होगी। इसलिए तीन अक्तूबर सतहत्तर को सीबीआई उन्हें भ्रष्टाचार निरोधक कानून के अंतर्गत गिरफ्तार करने पहुंची। इंदिरा गांधी ने वो नाटक किया कि सीबीआई तो ठीक राजनेता भी दंग रह गए। उनने अपने हाथ आगे कर दिए और कहा कि पकडऩे आए हो तो लगाओ हथकड़ी, लगाओ। सीबीआई के पुलिसवाले इसके लिए तैयार नहीं थे। वे किसी तरह उन्हें गाड़ी में बैठाकर दिल्ली के बाहर ले जाने लगे। इंदिरा गांधी अड़ गईं। वे गाड़ी से उतरकर पुलिया पर बैठ गईं और कहा कि मुझे आप दिल्ली से बाहर नहीं ले जा सकते। किसी तरह उन्हें घुमाफिरा कर सीबीआई वाले पुलिस लाइंस ले गए और वहां अफसरों की मेस में उन्हें एक कमरे में रखा गया। उनने जमानत पर छूटने से इनकार कर दिया। दूसरे दिन दिल्ली के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने उन्हें लाया गया। सीबीआई ने उन्हें न्यायिक हिरासत में रखने की मांग नहीं की। मजिस्ट्रेट दयाल ने इंदिरा गांधी को बिना शर्त रिहा कर दिया।
इस तरह इंदिरा गांधी को पकडऩे, जेल भेजने और सजा देने की जनता सरकार की कोशिश नौटंकी में समाप्त हुई। इंदिरा गांधी ने बहुत चतुराई से इसका पूरा लाभ लिया। उनने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई कहा। चरणसिंह और मोरारजी लाख इनकार करते रहे लोगों ने वही माना जो इंदिरा गांधी ने कहा था। जेपी ने कहा था कि बदले की कार्रवाई मत करना। मोरारजी और चरणसिंह ने वही करके इंदिरा गांधी की वापसी का रास्ता तैयार किया। (सत्याग्रह ब्यूरो)
 


Date : 11-Oct-2019

राम यादव
2019 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नाम प्रस्तावित करने की अंतिम तारीख 31 जनवरी 2019 थी। तब तक नॉर्वे की शांति पुरस्कार समिति को दुनिया के सभी कोनों से कुल 301 नामांकन मिल चुके थे। उनमें से 78 नाम संस्थाओं या संगठनों के थे, शेष 223 नाम एकल व्यक्तियों के थे। दुनिया इन नामों को 50 वर्ष बाद ही जान सकेगी। नोबेल शांति पुरस्कार के नियमों के अनुसार, प्रस्तावित नामों को 50 वर्ष बाद ही प्रकाशित किया जा सकता है।
नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता का चयन नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में स्थित एक अलग समति करती है। उसके सदस्य नॉर्वे की संसद द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। अध्यक्ष सहित उसके पांच सदस्य होते हैं और हर सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। उनका नॉर्वे का नागरिक होना अनिवार्य नहीं है। तब भी समिति के अब तक के इतिहास के सभी सदस्य नॉर्वे के ही नागरिक रहे हैं। नोबेल पुरस्कारों के प्रणेता, उद्योगपति अल्फ्ऱेड नोबेल की इच्छानुसार, विज्ञान और सहित्य के पुरस्कारों के विजेता तो स्वीडन स्थित समितियां चुनती हैं, जबकि शांति पुरस्कार का दायित्व नॉर्वे की समिति को दिया गया है। अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में इसका कोई कारण नहीं बताया था।
समिति के सामने जो 223 एकल व्यक्तियों के नाम हैं, उनमें से जिस नाम की इस वर्ष के शांति पुरस्कार के लिए हर जगह सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वह है स्वीडन की ग्रेटा तुनबेर्ग। अगर उन्हें यह पुरस्कार मिलेगा तो वे इसे पाने वाली सबसे कम उम्र की इंसान होंगी। 16 वर्ष की ग्रेटा स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के एक हाई स्कूल की छात्रा है। शुक्रवार 11 अक्टूबर निकट आने के हर दिन के साथ मीडिया में, और यूरोप के सट्टा बाज़ारों में भी, सबसे अधिक दांव उसी के नाम पर लगाए जा रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेने और उसकी रोकथाम के लिए जल्द ही कठोर क़दम उठाने की मांग करने वाली ग्रेटा तुनबेर्ग ने, एक ही वर्ष के भीतर, पूरी दुनिया में अपने नाम की धूम मचा दी है। इस धूम की शुरुआत 20 अगस्त 2018 को हुई। वह गर्मी की छुट्टियों के बाद स्वीडन के नये स्कूली वर्ष का पहला दिन था। दो लंबी चोटियों के बीच गोलमटोल चेहरे वाली छोटे कद की ग्रेटा उस दिन राजधानी स्टॉकहोम के संसद-भवन की दीवार से पीठ टिकाकर जमीन पर धरना देने बैठी थी। साथ में उसका स्कूली बस्ता और हाथ में एक तख्ती थी। तख्ती पर बड़े-बड़े लैटिन अक्षरों में लिखा हुआ था, ‘स्कोलस्ट्रइक फ्य़ौअर क्लीमातेत’ (जलवायु के लिए स्कूल जाने से हड़ताल)। उसके चेहरे और आंखों से ऐसी उदासी टपक रही थी, मानो उससे अधिक दुखी एवं एकाकी इस संसार में कोई नहीं है।
नौवीं कक्षा में पढ़ रही ग्रेटा उस समय 15 साल की थी। तभी से वह हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बदले जलवायुरक्षा की गुहार लगाती वही तख्ती हाथ में लिये संसद भवन के बाहर प्रदर्शन करने लगी। उसकी देखा-देखी, स्वीडन या यूरोप के ही नहीं, भारत सहित पूरी दुनिया के स्कूली बच्चों का ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ्य़ूचर’ (हर शुक्रवार भविष्य बचाने के लिए) नाम का एक विश्वयापी आंदोलन चल पड़ा।
दुनिया के ढेर सारे देशों के लाखों स्कूली बच्चे अब हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बजाय सडक़ों पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे हैं। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र जलवायु रक्षा शिखर सम्मेलन हो या स्विट्जऱलैंड में दावोस का ‘विश्व आर्थिक फ़ोरम’, 10-12 साल की किसी बच्ची-जैसी दिखती ग्रेटा को भाषण देने के लिए आमंत्रित करने वालों का हर जगह तांता लग गया है। मीडिया में उसका इंटरव्यू पाने की होड़ चल रही है। एक से एक नामी पुरस्कारों की उस पर वर्षा हो रही है। एक से एक नामी वैज्ञानिक उसे परामर्श दे रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र जो विश्वव्यापी चेतना अनेक वर्षों से नहीं जगा पाया, उसे ग्रेटा तुन्बर्ग ने युवाओं और छात्रों वाले अपने ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ्य़ूचर’ आंदोलन के द्वारा एक ही साल में ही कर दिखाया।
जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए ग्रेटा जो कुछ कहती है, पूरी ईमानदारी के साथ उस पर स्वयं भी अमल करती है। वह शुद्ध शाकाहारी बन गयी है। किसी ईंधन से चलने वाली बस, कार, विमान या जहाज से यात्रा नहीं करती। केवल साइकल, इलेक्ट्रिक कार, ट्रेन या बिना मोटर वाली नौका से कहीं आती-जाती है।
गत सितंबर में न्यूयॉर्क में हुए जलवायु रक्षा शिखर सम्मेलन में विश्व भर के नेताओं को झिडक़ी देने वाले अपने भाषण के लिए भी ग्रेटा स्वीडन से किसी विमान द्वारा नहीं, पहले ट्रेन से और बाद में अटलांटिक महासागार को पार करने के लिए कई लोगों के साथ एक पालदार नौका द्वारा गई थी। जलवायु परिवर्तन संबंधी सत्य के प्रति उसका अहिंसक आग्रह महात्मा गांधी के सत्याग्रह आन्दोलन की याद जगा देता है। अमेरिका में बस गए भारतीय मूल के लेखक सलमान रुश्दी ने एक जर्मन दैनिक से कहा, ‘‘वह मेरी हीरो है। निडर है। उसका हर शब्द सही होता है।’’
किसी सनक की सीमा तक जाते अपने दृढ़निश्चय और अपने ध्येय के प्रति किसी आस्था की सीमा तक पहुंचते समर्पणभाव के बारे में 16 साल की कच्ची आयु में ही ग्रेटा कहने लगी है, ‘‘मैं यथार्थवादी हूं। तथ्यों को देखती हूं।  जानती हूं कि क्या करने की जरूरत है। मुझे अपने काम के प्रति कोई संदेह नहीं है। मैं, बस, कर रही हूं। यदि मैं कुछ करने का मन बना लेती हूं, तो उसे करके ही रहती हूं। आगा-पीछा नहीं करती। मैंने अनेक वैज्ञानिकों से बातें की हैं। अनेक रिपोर्टें और लेख पढ़े हैं। भली-भांति जानती हूं कि जलवायु-परिवर्तन की स्थिति कितनी गंभीर है। बार-बार महसूस होता है कि यदि मैं अभी कुछ नहीं करती, तो बाद में पछताऊंगी।’’
इन्हीं सब बातों से प्रभावित हो कर नॉर्वे की संसद के तीन वामपंथी समाजवादी सांसदों और स्वीडन के दो बड़े नेताओं ने भी नॉर्वे की नोबेल शांति पुरस्कार समिति से ग्रेटा के नाम की सिफ़ारिश की है। इसका औचित्य बताते हुए उन्होंने लिखा, ‘’हम ग्रेटा को नामांकित कर रहे हैं, क्योंकि जलवायुसंकट युद्ध और संघर्ष का बहुत बड़ा कारक बन सकता है... ग्रेटा ने जिस विराट आन्दोलन को खड़ा कर दिया है, वह शांति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान है।’’
जो लोग, संगठन या व्यावसायिक प्रतिष्ठान ग्रेटा के आन्दोलन की सफलता में अपने हितों के लिए ख़तरा देखते हैं या उसकी प्रसिद्धि से जलते हैं, वे उसे बहुत कम आयु की लडक़ी, अधकचरी, अनुभवहीन या पर्दे के पीछे छिपे किन्हीं अदृश्य सूत्रधारकों की कठपुतली बताकर उसका विरोध भी कर रहे हैं। उसके आन्दोलन ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ्य़ूचर’ को हथिया लेने, भटका देने या उसमें फूट डालन देने के भी प्रयास हो रहे हैं। कुछ लोग उसे अकेले ही पुरस्कृत करने के बदले उसके आन्दोलन ‘फ्राइडेज़ फ़ॉर फ्य़ूचर’ को पुरस्कृत किये जाने का समर्थन करते हैं।
ओस्लो के शांति शोध संस्थान के प्रमुख हेनरिक उर्दाल की दृष्टि से यह संभावना नहीं के बराबर ही है कि ग्रेटा को इस वर्ष का नोबेल शांति पुरस्कार मिलेगा। उर्दाल के अनुसार, 16 वर्ष की उसकी बहुत कम आयु उसके आड़े आयेगी। ऩोबेल शांति पुरस्कार पाने वालों में सबसे कम आयु का अब तक का रिकार्ड पाकिस्तान की मलाला यूसुफज़़ई का है। वह वास्तव में ब्रिटेन में रहती है। उसे 2014 में जब यह पुरस्कार मिला था, तब उसकी आयु 17 साल की थी।
मलाला को पुरस्कार मिलने का मुख्य कारण यह था कि अताउल्ला ख़ान नाम के एक तालिबान लड़ाके ने, 9 अक्बूर 2012, को स्कूल जाने के दौरान उसकी हत्या करने के लिए उस पर गोली चलाई थी। उसे गर्दन और सिर में गोली लगी थी। पाकिस्तान में आरंभिक उपचार के बाद उसका ब्रिटेन में इलाज़ हुआ। उसकी हत्या के प्रयास को इस बात से जोड़ा गया कि तालिबान लडि़कियों और महिलाओं को शिक्षा और बराबरी का दर्जा दिये जाने के विरुद्ध है, जबकि मलाला शिक्षा और बराबरी की प्रबल समर्थक है।

पाकिस्तान, ब्रिटेन और अमरीका के मीडिया ने इस घटना को खूब उछालते हुए उसे ऐसा रंग दिया, मानो मलाला नारी शिक्षा और समानता की अपूर्व रणबांकुरी है। उसे नोबेल पुरस्कार मिलने से तालिबानी विचारधारा ध्वस्त हो जाएगी। स्वस्थ होने के बाद मलाला नारी शिक्षा और समानता के प्रचार से जुड़ी ज़रूर, पर उसकी प्रसिद्धि और उसे नोबेल शांति पुरस्कार मिलने का मुख्य कारण दो वर्ष पूर्व उसकी हत्या का प्रयास था, जब वह मात्र 15 साल की एक स्कूली छात्रा थी।
मलाला के बहुत से प्रशंसक अब इस बात से निराश भी हैं कि उसका रहन-सहन कुछ ज्यादा ही इस्लामी है। और उसके पहनावे से नारी समानता का बोध नहीं होता। पाकिस्तान, विशेषकर अपनी मातृभूमि स्वात की परिस्थितियों के बारे में वह चुप रहना ही पसंद करती है। दूसरी ओर, भारतीय कश्मीर की स्थिति के बारे में टीका-टिप्पणी करने के लिए वह अपने आप को कहीं अधिक अधिकृत समझती है। मलाला को लेकर उसके प्रशंसकों को अब जो मलाल है, वही ग्रेटा तुनबेर्ग को मात्र 16 साल की आयु में नोबेल शांति पुरस्कार देने के भी आड़े आ सकता है।
तब भी, मलाला और ग्रेटा के बीच बहुत बड़ा अंतर है। मलाला का भाग्य अपनी हत्या के एक प्रयास में घायल होने के बाद चमका, न कि अपने किसी चमत्कारिक विचार या मौलिक काम से। ग्रेटा की मौलिकता यह है कि उसने बहुत अल्प आयु में ही जलवायुरक्षा जैसे एक गूढ़ विषय के महत्व को जान लिया और एकनिष्ठ भाव से अपने आप को उसके प्रति समर्पित कर दिया।
स्वीडन की बर्फीली ठंड में हर शुक्रवार को स्कूल जाने के बदले वहां के संसद भवन के बाहर धरना देना कोई खिलवाड़ नहीं था। उसे देखकर दूसरे स्कूली छात्र और युवा भी उससे जुडऩे लगे। देखते ही देखते यह जुड़ाव जनसाधारण ही नहीं, राजनेताओं को भी झकझोर देने वाला एक अपूर्व रचनात्मक विश्वव्यापी आन्दोलन बन गया। यही ग्रेटा की ‘ग्रेटनेस’ (महानता) है। उसे यदि नोबेल शांति पुरस्कार मिलता है, तो यह पूरी तरह न्यायसंगत ही नहीं, नोबेल शांति पुरस्कार समिति की दूरदर्शिता को भी दिखायेगा। दुर्भाग्य से वह हमेशा न्यायसंगत या दूरदर्शी नहीं रही है। महात्मा गांधी या विनोबा भावे को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलना इसके दो सबसे बड़े उदाहरण हैं। (सत्याग्रह)

 

 


Date : 10-Oct-2019

शुभम उपाध्याय

अपवादों को छोड़ दें तो जगजीत सिंह के जाने के आठ साल बाद गजल अब कहीं नजर नहीं आती। युवाओं को भी उसके न होने से पैदा हुई खाली जगह से कोई फर्क पड़ता नहीं दिखता

पढऩे में कितना भी कटु क्यों न लगे, लेकिन गजल गायकी अब लुप्त है। गजल सम्राट जगजीत सिंह के चले जाने के बाद से ही। ऐसा होना ही था इसका अहसास पहली बार तब हुआ जब गुलजार की आवाज में जगजीत सिंह को श्रद्धांजलि देता ‘एक आवाज की बौछार था वो’ सुना। वो भावुकता वाले दिन थे : जिस गजल गायक की आवाज ने शब्दों को जीना सिखाया, जिसने शेर और मिसरों को स्कूली किताबों के बोरियत भरे दिनों में साथी बनाया और जिसने हर वो बात गाते हुए कही जिसे कहने के लिए दुनिया के पास समय नहीं था – उसके गुजर जाने पर गजल गायकी के दिन खत्म होने की जुंबिश तो होनी ही थी।
लेकिन अब उस भावुकता को गुजरे अरसा हो चुका है, और जगजीत सिंह के निधन के 8 साल बाद गजल गायकी का परिदृश्य भयावह हो चुका है। इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो गजल अब कहीं नजर नहीं आती। न कोई स्थापित गायक उन्हें गा रहा है, न कोई स्थापित गीतकार उन्हें लिख रहा है और न ही नौजवानों को उसकी अनुपस्थिति से पैदा हुए रिक्त स्थान से कोई फर्क पड़ रहा है। एक कमी है जिसे भरने का प्रयास कोई नहीं कर रहा। मुख्यधारा से इतर कुछ सुधीजन गजलें लिख रहे हैं और कुछ हैं जो आज भी गजल गायक कहलाने की हिम्मत रख रहे हैं लेकिन लगता है जैसे पापुलर कल्चर में- जिसकी परिधि में फिल्में और प्राइवेट एलबम आते हैं- गजल गायकी मर चुकी है। अपना मर्सिया पढ़े जाने का इंतजार कर रही है।
पूछने पर आज भी गुजरे जमाने के गजल गायक गजलों की शान में सलाम ही भेजते हैं। गजल गायकी को अपनी पसंदीदा शैली मानते रहने वाले हरिहरन कभी यह मानने को तैयार नहीं रहते कि गजल मर चुकी है और यही कहते हैं कि थोड़े बदलावों के साथ वो फिर वापस लौटेगी। पंकज उधास कहते हैं कि जो प्रतिष्ठा उसने खोई है गजल जल्द ही उसे अपनी पुरानी वाली खासियत के चलते वापस पा लेगी। रूप कुमार राठौड़ की पत्नी सोनाली राठौड़ कहती हैं कि गजल अपने आप में ही सबसे बड़ा हीरो है और उसे खुद को प्रमोट करने के लिए किसी शाहरुख या सलमान की जरूरत नहीं। शुभा मुद्गल कहती हैं कि गजल को सुनने के लिए उर्दू शायरी का भी आनंद लेना जरूरी है, लेकिन हमारी शिक्षा उर्दू पर ध्यान ही नहीं देती और इसीलिए लोग गजलों में गहरे नहीं उतरते। लेकिन सच यह भी है कि अब पुराने गजल गायक भी कोई नये प्रयास नहीं करते। न यूट्यूब का फायदा उठाकर किसी अनसुनी गजल को संगीतबद्ध करते हैं और न ही नये-महंगे कांसर्ट्स में पुरानी गजलें गाते रहने के अलावा इस जानर में कोई खास प्रयोग ही करते हैं।
अनूप जलोटा काफी पहले बाजार की मांग पर गजल गायकी से भजन गायकी की तरफ मुड़ चुके हैं और वापसी का कोई प्रयास करते नजर नहीं आ रहे। गालिब को पुन: परिभाषित करने वाले और लेखन की हर विधा पर लगातार किताबें लिखने वाले गुलजार का भी ‘छैंया-छैंया’ और ‘यार जुलाहे’ के बाद कोई नया गजल-संग्रह आया हो, याद नहीं पड़ता। फेसबुक-ट्विटर पर अपना रचनाकर्म साझा करने वाले कई नये गीतकार भी नज्म खूब साझा कर रहे हैं लेकिन गजल से वे भी दूरी बनाकर चल रहे हैं।
नए गीतकारों की गजल तो छोडि़ए कोई भी स्थापित गायक मीर तकी मीर, मोमिन, गालिब, दाग देहलवी, फैज अहमद फैज, नासिर कादरी, इकबाल, फराज, दुष्यंत कुमार, बशीर बद्र या निदा फाजली जैसे गजलगो तक की अनसुनी गजलों को गाने का प्रयास नहीं कर रहा। आखिरी बार हिंदी फिल्मों में अगर किसी ने गजल को खूबसूरती से अटेम्पट किया था तो वो शायद वरुण ग्रोवर थे, जिन्होंने ‘मसान’ के लिए दुष्यंत कुमार की गजल की टेक लेकर ‘तू किसी रेल सी गुजरती है’ लिखा था। लेकिन वो भी एक फिल्मी गीत था, शुद्ध रूप में गजल नहीं।
कोई भी स्थापित गायक मीर तकी मीर, मोमिन, गालिब, दाग देहलवी, फैज अहमद फैज, नासिर कादरी, इकबाल, फराज, दुष्यंत कुमार, बशीर बद्र या निदा फाजली जैसे गजलगो तक की अनसुनी गजलों को गाने का प्रयास नहीं कर रहा है
ऐसा नहीं है कि अब गजलें कोई सुनना नहीं चाहता। दीवाने आज भी कभी मल्लिका-ए-गजल बेगम अख्तर की पनाह में जाते हैं, कभी मेहदी हसन को तलाशते हैं तो कभी गुलाम अली की मुरकियों के पुन: मुरीद बन जाते हैं। सरलता की चाह में लोग पंकज उधास को ढूंढते हैं, तलत अजीज और फरीदा खानम संग हो लेते हैं, आबिदा परवीन को आईट्यून्स पर खोजते हैं और हर तरह की गजल से रूबरू होने के लिए जगजीत सिंह को अपना यार बना लेते हैं। नयी पीढ़ी तो वैसे भी हर उस चीज के पीछे भागती है जिसे सोशल मीडिया पर कूल बनाकर प्रस्तुत किया जाता है इसलिए उसे रिझाना मुश्किल नहीं है। एकबारगी ऐसा ही अभिनव प्रयास पंकज उधास की ‘चुपके-चुपके’ और ‘यूं मेरे खत का जवाब आया’ नाम की गजलों में जान अब्राहम संग कूल म्यूजिक वीडियोज बनाकर किया भी जा चुका है। लेकिन उसके लिए गजल बनानी पड़ेगी, उसे आवाम तक पहुंचाना पड़ेगा और महीने भर में सैकड़ों गाने रिलीज करने वाली हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पास गजल के लिए इतना भर वक्त भी नहीं है।
कहते हैं कि गजल हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है और इसका जन्म अरब देशों में हुआ। पहली गजल अरबी में कही गई और फिर सीमाएं लांघते हुए पहले इसकी जुबान फारसी हुई और फिर उर्दू। इसी बदलाव के साथ उसमें सूफियत समाई और उसका विस्तार इश्के मजाजी से होते हुए इश्के हकीकी हो गया। सांसारिक प्रेम से आध्यात्मिक प्रेम की तरफ। शुरुआती दौर में गजल की निंदा यह कहकर की गई कि यह विधा सिर्फ ‘औरतों की बातें’ करती है और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस विधा से जुड़ी एक कहानी कहती है कि गजल शब्द की उत्पत्ति गजाला (हिरणी) से हुई। जब गले में तीर लगने से हिरणी बेतहाशा दर्द में कराहने लगी तो आह निकलती उस आवाज के उतार-चढ़ाव पर पहली गजल कही गई। इसी भावार्थ एक कहानी गुलाम अली ने भी अपने कार्यक्रम में सुनाई थी और रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी ने इसी तर्ज पर बहुत पहले गजल की खूबसूरत व्याख्या की थी, ‘जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरणी का पीछा करता है और हिरणी भागते-भागते किसी ऐसी झाड़ी में फंस जाती है जहां से वो निकल नहीं सकती, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज निकलती है। उसी करूण आवाज को गजल कहते हैं। इसीलिए विवशता का दिव्यतम रूप में प्रकट होना, स्वर का करुणतम हो जाना ही गजल का आदर्श है।’ वाह!
कहते हैं कि गजल हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है और इसका जन्म अरब देशों में हुआ। पहली गजल अरबी में कही गई और फिर सीमाएं लांघते हुए पहले इसकी जुबान फारसी हुई और फिर उर्दू
कालांतर में हिरणी की इस आह की जगह प्रेमिकाओं ने ले ली और प्रेम व श्रृंगार रस में डूबकर गजलें उनकी व्यथा व विरह-कथा कहने लगीं। जैसा कि हिंदुस्तान के शुरुआती अहम उर्दू शायर मीर तकी मीर ने लिखा, ’नाजुकी उस के लब की क्या कहिए, पंखुडी एक गुलाब की सी है।’ गजल का सफर मीलों लंबा है और प्रेमिकाओं के हुस्न, यौवन और प्रेम से होता हुआ फैज अहमद फैज के पास आते-आते राजनीतिक भी हुआ। उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे से लिखा, ‘मता-ए-लौहो कलम छिन गई तो क्या गम है, कि खूने-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने’। लेकिन इससे बहुत पहले फारसी से उर्दू की तरफ आने में गजल को लंबा वक्त लगा और उर्दू का वो पहला शायर जिसका काव्य-संकलन (अर्थात् दीवान) प्रकाशित हुआ, उनका नाम मोहम्मद कुली कुतुबशाह था। वे दकन के बादशाह थे और इनकी शायरी में फारसी और उर्दू के अलावा उस वक्त की दकनी बोली भी शामिल थी।
कुतुबशाह से काफी पहले, 13वीं-14वीं सदी में आमजन की खड़ी बोली में लिखने वाले अमीर खुसरो हुए जिन्हें आम हिंदुस्तानी भाषा में गजल लिखने की परंपरा की शुरुआत करने वाला माना जाता है। चूंकि उनपर हजरत निजामुद्दीन औलिया का प्रभाव था इसलिए उनकी गजलें स्त्री की मोहब्बत में सराबोर होने के बावजूद सूफी मिजाज में गहरी डूबी होती थीं। अमीर खुसरो के बाद संत कबीर ने भी गजल को इसी रूप में अपनाया और उनसे व खुसरो से होकर गुजरने के बाद गजल गोलकुंडा के बादशाह मुहम्मद कुली कुतुबशाह के सानिध्य में आई। वहां से मुगल बादशाह शाहजहां के समय में औरंगाबाद और वली के साथ-साथ दिल्ली। औरंगजेब की हुकुमत वाले उन दिनों में फारसी का चलन था लेकिन बादशाह से लेकर आमजन तक ने उर्दू और हिंदवी के मेल से बनी इस गजल को हाथों-हाथ लिया और आने वाले वक्त में मीर तकी मीर से लेकर मिर्जा गालिब तक ने गजल के उस रूप को हमेशा के लिए स्थापित कर दिया जिसे आज भी नये तौर-तरीकों के साथ लिखा और गाया जाता है।
अलग-अलग दिशाओं की इन यात्राओं से बहुत पहले गजल अपने शुरुआती दौर में शहंशाहों के दरबारों में पली-बढ़ी और मातहतों द्वारा राजा-महाराजाओं की तारीफ में इसे ‘कसीदों’ की तरह पढ़ा गया। चूंकि ये बादशाहों की शान में पढ़ी जाती थी इसलिए धीरे-धीरे इसका अंदाज ऐसा विकसित हो गया कि बहर में पढ़ते ही (मीटर में) इस पर वाहवाही मिलती और गजल-शेर की तारीफ कर मातहत अपने बादशाहों को खुश किया करते (गजल की इस खासियत को रघुपति सहाय ‘बंदिश की चुस्ती’ कहा करते थे)।

कुतुबशाह से काफी पहले, 13वीं -14वीं सदी में आमजन की खड़ी बोली में लिखने वाले अमीर खुसरो हुए जिन्हें आम हिंदुस्तानी भाषा में गजल लिखने की परंपरा की शुरुआत करने वाला माना जाता है

हमारे गालिब भी इसी प्रथा के दरबारी शायर रहे जो राजाओं के कसीदे तो नहीं पढ़ते थे, लेकिन उनकी गजलें तुरंत मिलने वाली वाहवाही और त्वरित तारीफों की चाह से लबरेज रहा करती थीं। अनेकों वर्षों बाद आज भी उनकी शायरी की लोकप्रियता की एक वजह उनके रचनाकर्म का यह आयाम भी है, वरना शायर तो मीर तकी मीर भी बहुत अच्छे थे! ‘पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग तो सारा जाने है’, नहीं सुना क्या आपने?
मीर तकी मीर (1723-1810) को हमारे यहां उर्दू गजल का पिता भी कहा जाता है। खुदा-ए-सुखन भी। इन्होंने काफी कुछ फारसी में लिखा लेकिन जब उर्दू में लिखा तब आमजन से जोडक़र गजल को उसका असली रुतबा बख्शा। 18वीं शताब्दी आते-आते गजल मुगलों के साथ-साथ दक्षिण और उत्तर भारत के कई हिस्सों में फैल चुकी थी लेकिन दिल्ली में इसे शान और शौकत मीर की ही कलम से मिली। मीर के बाद मजहर, सौदा, मोमिन, जौक के अलावा मिर्जा गालिब (1796-1869) भी अगले दौर के अहम हस्ताक्षर बने और चचा गालिब तो कुछ ऐसे अमिट हुए कि न सिर्फ शायरी के सिरमौर कहलाए बल्कि जिनके नाम के बिना गजल की पहचान वैसी ही है जैसी अनगिनत आमों के बिना आम के किसी विशाल पेड़ की या किसी गुलजार के बिना त्रिवेणी की। गालिब के बाद आए शायरों में अलग से दाग देहलवी (1831-1905) का नाम अदब से लिया जाता है जिन्होंने गजल कहने का एक अलग मुहावरा गढ़ा और आने वाली कई पीढिय़ों के लिए वे गजल के स्कूल कहलाए।
कई बदलावों के साथ बहते-बहते गजल देर से ही सही हिंदी के आसमां के नीचे भी आई और दुष्यंत कुमार त्यागी ने हिंदी में कमाल की गजलें लिखीं। हिंदी में सर्वप्रथम गजलें लिखने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को दिया जाता है, लेकिन दुष्यंत कुमार हिंदी की गजलों के उस क्रांतिकारी हस्ताक्षर के तौर पर याद किए जाते रहेंगे जिनकी वजह से कई हिंदी भाषियों ने गजल को न सिर्फ समझा-पढ़ा बल्कि उनकी यह सोच कि ‘उर्दू और हिंदी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती है तो उसमें फर्क करना बड़ा मुश्किल होता है’ ने हमें गजल के सफर की उस यात्रा को भी इस लेख में साझा करने की वजह दी जिसमें वो बादशाहों की महफिलों में पैदा हुई, अनजान देशों और अजनबी भाषाओं में खेली और बड़े होते-होते हिंदुस्तान के आम आदमी के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई।

गालिब भी पुरानी प्रथा के दरबारी शायर रहे जो राजाओं के कसीदे तो नहीं पढ़ते थे, लेकिन उनकी गजलें तुरंत मिलने वाली वाहवाही और त्वरित तारीफों की चाह से लबरेज रहा करती थीं

दुष्यंत कुमार के बाद अदम गोंडवी की हिंदी गजलें (‘समय से मुठभेड़’) हमारे वक्त का सबसे जरूरी सामान हैं जिन्होंने यथार्थवादी गजल परंपरा को आगे बढ़ाने में दुष्यंत कुमार बराबर ही योगदान दिया। शेर और मिसरे जब आग बरसाते हैं तब वो अदम गोंडवी की गजलों में ही पाए जाते हैं। दुष्यंत और अदम से बहुत पहले सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से लेकर त्रिलोचन और शमशेर बहादुर सिंह तक ने भी उम्दा हिंदी गजलें लिखीं और इनमें से कई गुजरते वक्त के साथ इनकी कालजयी कविताओं बराबर ही मकबूल हुईं।
गजल गायकी के इतिहास की जगह गजल के इतिहास की छोटी-सी झलक यहां लिखने के पीछे की मंशा सिर्फ एक सवाल पूछना है। क्या वह समृद्ध विधा जिसका इतिहास इस कदर गौरवपूर्ण और बेमिसाल है, सिर्फ इसलिए खत्म हो जानी चाहिए कि अब वो बाजार के काम की नहीं रही? या फिर इसलिए क्योंकि कोई कहने-सुनाने वाला नहीं रहा, ‘जिसको मैं ओढ़ता बिछाता हूं, वह गजल आपको सुनाता हूं’?
बिलकुल नहीं।
(सत्याग्रह)


Date : 10-Oct-2019

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 'लिंचिंग' पर नई बहस शुरू कर दी है। उनके मुताबिक लिंचिंग जैसा भारत में कुछ नहीं है, बल्कि इसकी आड़ में साजिश चल रही है। फिर उन लोगों की हत्याओं को क्या कहा जाए जिन्हें भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला?
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि मई 2015 और दिसंबर 2018 के बीच 100 से भी ज्यादा घटनाएं हुईं, जिनमें कम से कम 44 लोगों को भीड़ ने मिल कर मार दिया और करीब 280 लोग घायल हो गए। मरने वालों में से 36, यानी करीब 82 प्रतिशत मुसलमान थे। दिल्ली के पास दादरी में सितंबर 2015 में 52 वर्षीय व्यक्ति मोहम्मद अखलाक की हत्या ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरी।
फ्रिज में गोमांस रखने के संदेह में उनके ही पड़ोसियों ने उन्हें इतना पीटा कि मौत हो गई। इसके बाद भारत के कई हिस्सों में इस तरह की घटनाएं देखने को मिलीं। इनमें कई हत्याओं के आरोप तथाकथित गोरक्षकों पर लगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इन घटनाओं की निंदा की और कहा कि ऐसे लोग गोरक्षक नहीं हो सकते। लेकिन इस तरह की घटनाएं बराबर होती रहीं। व्हाट्सऐप पर फैली अफवाहों की वजह से भी कई लोगों को भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया। ऐसे में व्हाट्सएप ने भी अफवाह न फैलाने की अपील करते हुए अखबारों में पूरे पूरे पेज के विज्ञापन छपवाए। बाद में उसने अपने ऐप में एक नई विशेषता भी जोड़ी जिसके जरिए हर फॉरवर्ड किया हुआ संदेश अब चिन्हित होता है। 
लिंचिंग की घटनाओं पर आधिकारिक आंकड़े मौजूद नहीं हैं। लेकिन डाटा पत्रकारिता करने वाली वेबसाइट इंडियास्पेंड के अनुसार, सिर्फ जनवरी 2017 और जुलाई 2018 के बीच में इस तरह की कम से कम 69 घटनाएं हुईं, जिनमें कम से कम 33 लोगों की जान चली गई। इस तरह की हत्याओं को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में भी कई याचिकाएं दायर की गईं। इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2018 में संसद को एक विशेष कानून लाने के लिए कहा ताकि इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।
अब तक लिंचिंग के खिलाफ कोई केंद्रीय कानून नहीं आया है। राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने डॉयचे वेले से बातचीत में कहा कि सरकार अभी तक ऐसा विधेयक संसद में इसलिए लेकर नहीं आई है क्योंकि सरकार को यह मुद्दा उतना जरूरी नहीं लगता। उनके मुताबिक कई ऐसे विषय हैं जिन पर कम समय में विधेयक लाए गए और पारित भी करवा लिए गए। उन्होंने उदाहरण के तौर पर तीन तलाक से संबंधित विधेयक की याद दिलाई और कहा कि इसी तरह लिंचिंग से लडऩे वाला विधेयक भी लाया जा सकता था।
मोहन भागवत ने भी जिस तरह से इस भीड़ हिंसा का व्याख्यान किया है और अपनी राजनीतिक विचारधारा को इससे अलग करने की कोशिश की है, उससे इसकी रोकथाम की कोई उम्मीद नहीं जगती। मनोज झा कहते हैं, यह सही है कि लिंचिंग शब्द विदेशी है लेकिन उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि इसे भारत में वैचारिक और राजनीतिक खुराक कहां से मिल रही है?
क्या है राज्यों में गाय की स्थिति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख हर साल विजयदशमी पर एक भाषण देते हैं। इस वर्ष भी संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने विचार संघ के स्वयंसेवकों और अधिकारियों के समक्ष रखे। इस बार उनके भाषण में कई अन्य विषयों के साथ साथ भीड़ द्वारा लोगों को पीट पीट कर मार दिए जाने की बढ़ती घटनाओं पर विशेष जोर था। 
भागवत ने कहा कि एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के व्यक्तियों पर आक्रमण कर उन्हें सामूहिक हिंसा का शिकार बनाने की यह प्रवृत्ति भारत की परंपरा नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं को 'लिंचिंग' जैसे शब्द देकर सारे देश को और हिन्दू समाज को बदनाम किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह देश के तथाकथित अल्पसंख्यक वर्गों में भय पैदा करने का एक षडय़ंत्र है और विशिष्ट समुदाय के हितों की वकालत करने की आड़ में लोगों को आपस में लड़ाने का उद्योग है जिसके पीछे कुछ नेता हैं।
कई बीजेपी नेताओं के नाम किसी ना किसी तरह लिचिंग के आरोपियों के सिलसिले में सुर्खियों में रहे हैं। अखलाक की हत्या के एक आरोपी के निधन पर हुई शोक सभा में केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा पहुंचे, तो झारखंड में लिचिंग की एक घटना के आरोपियों को जब जमानत मिली तो बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने फूलों के हार से अपने निवास पर इनका स्वागत किया था। यही नहीं, सिन्हा ने बाद में यह भी बताया कि उनमें से कम से कम 6 लोगों को केस लडऩे के लिए बीजेपी ने आर्थिक मदद की थी। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी प्रत्यक्ष रूप से तथाकतित गोरक्षा से जुड़ी हिंसा को प्रोत्साहन नहीं दिया है। लेकिन उन्होंने तुरंत इसकी निंदा भी नहीं की और अपनी पार्टी के उन नेताओं को दण्डित भी नहीं किया जिन्होंने इस हिंसा का समर्थन किया। अखलाक की हत्या के लगभग एक साल बाद उन्होंने दिल्ली में अपने एक भाषण में कहा कि गोरक्षा के नाम पर अपनी अपनी दुकानें चलाने वालों को देख कर उन्हें गुस्सा आता है। 2017 में भी उन्होंने एक भाषण दिया और उसमें भी गोरक्षा के नाम पर हिंसा की आलोचना की। लेकिन स्वयंभू गौ-रक्षकों पर उनकी अपील का कोई असर नहीं हुआ और ये घटनाएं इसी तरह चलती रहीं। (डायचेवैले)


Date : 09-Oct-2019

-दुष्यंत कुमार

अंग्रेज़ी में एक मुहावरा है, ‘फास्र्ट अमंग दि इक्वल्स’। इसी शीर्षक से ब्रिटिश लेखक जेफऱी आर्चर ने 80 के दशक में ब्रिटेन की सियासत पर एक काल्पनिक उपन्यास भी लिखा था। इसका मतलब है किसी विशेष समूह में शामिल व्यक्तियों में किसी एक का ओहदा, प्रतिष्ठा, हैसियत आदि सबसे ऊपर होना। इसे देश की केंद्रीय सरकार में प्रधानमंत्री के पद से समझा जा सकता है। मंत्रिमंडल में सभी मंत्री ही होते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की हैसियत बाक़ी सभी मंत्रियों से ज़्यादा होती है। उसके मुताबिक़ ही मंत्रिमंडल तय होता है। वह इसका मुखिया है। दुनिया के लिए प्रधानमंत्री ही देश का चेहरा होता है। और यही वह पद है जिस पर आज़ादी के बाद दलित वर्ग का कोई व्यक्ति अभी तक नहीं पहुंचा है।

ऊपर जो छोटी सी भूमिका है, उसका कांशीराम के जीवन की एक घटना और उद्देश्य दोनों से गहरा संबंध है। कहते हैं कि एक बार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कांशीराम को राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन कांशीराम ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि वे राष्ट्रपति नहीं बल्कि प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा देने वाले कांशीराम सत्ता को दलित की चौखट तक लाना चाहते थे। वे राष्ट्रपति बनकर चुपचाप अलग बैठने के लिए तैयार नहीं हुए।

यह कि़स्सा पहले भी बताया जाता रहा है। लेकिन इस पर खास चर्चा नहीं हुई कि आखऱि अटल बिहारी वाजपेयी कांशीराम को राष्ट्रपति क्यों बनाना चाहते थे। कहते हैं कि राजनीति में प्रतिद्वंद्वी को प्रसन्न करना उसे कमज़ोर करने का एक प्रयास होता है। ज़ाहिर है वाजपेयी इसमें कुशल होंगे ही। लेकिन जानकारों के मुताबिक वे कांशीराम को पूरी तरह समझने में थोड़ा चूक गए। वरना वे निश्चित ही उन्हें ऐसा प्रस्ताव नहीं देते।

वाजपेयी के प्रस्ताव पर कांशीराम की इसी अस्वीकृति में उनके जीवन का लक्ष्य भी देखा जा सकता है। यह लक्ष्य था सदियों से ग़ुलाम दलित समाज को सत्ता के सबसे ऊंचे ओहदे पर बिठाना। उसे ‘फ़र्स्ट अमंग दि इक्वल्स’ बनाना। मायावती के रूप में उन्होंने एक लिहाज से ऐसा कर भी दिखाया। कांशीराम पर आरोप लगे कि इसके लिए उन्होंने किसी से गठबंधन से वफ़ादारी नहीं निभाई। उन्होंने कांग्रेस, बीजेपी और समाजवादी पार्टी से समझौता किया और फिर ख़ुद ही तोड़ भी दिया। ऐसा शायद इसलिए क्योंकि कांशीराम ने इन सबसे केवल समझौता किया, गठबंधन उन्होंने अपने लक्ष्य से किया। इसके लिए कांशीराम के आलोचक उनकी आलोचना करते रहे हैं। लेकिन कांशीराम ने इन आरोपों का जवाब बहुत पहले एक इंटरव्यू में दे दिया था। उन्होंने कहा था, ‘मैं उन्हें (राजनीतिक दलों) ख़ुश करने के लिए ये सब (राजनीतिक संघर्ष) नहीं कर रहा हूं।’

अपने राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के दौरान कांशीराम ने, उनके मुताबिक़ ब्राह्मणवाद से प्रभावित या उससे जुड़ी हर चीज़ का बेहद तीखे शब्दों में विरोध किया, फिर चाहे वे महात्मा गांधी हों, राजनीतिक दल, मीडिया या फिर ख़ुद दलित समाज के वे लोग जिन्हें कांशीराम ‘चमचा’ कहते थे। उनके मुताबिक ये ‘चमचे’ वे दलित नेता थे जो दलितों के ‘स्वतंत्रता संघर्ष’ में दलित संगठनों का साथ देने के बजाय पहले कांग्रेस और बाद में भाजपा जैसे बड़े राजनीतिक दलों में मौक़े तलाशते रहे।

कांशीराम और उनकी विचारधारा को मानने वाले लोग कहते हैं कि इन जैसे नेताओं ने दलित संघर्ष को कमज़ोर करने का काम कामयाबी से किया। अपनी किताब ‘चमचा युग’ में कांशीराम ने इसके लिए महात्मा गांधी और कांग्रेस पार्टी को जि़म्मेदार ठहराया है। उन्होंने लिखा है कि अंबेडकर की दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग को गांधीजी ने दबाव की राजनीति से पूरा नहीं होने नहीं दिया और पूना पैक्ट के फलस्वरूप आगे चलकर संयुक्त निर्वाचक मंडलों में उनके ‘चमचे’ खड़े हो गए।

कांशीराम का मानना था कि जब-जब कोई दलित संघर्ष मनुवाद को अभूतपूर्व चुनौती देते हुए सामने आता है, तब-तब ब्राह्मण वर्चस्व वाले राजनीतिक दल, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, उनके दलित नेताओं को सामने लाकर आंदोलन को कमज़ोर करने का काम करते हैं। कांशीराम ने लिखा है, ‘औज़ार, दलाल, पि_ू अथवा चमचा बनाया जाता है सच्चे, खरे योद्धा का विरोध करने के लिए। जब खरे और सच्चे योद्धा होते हैं चमचों की मांग तभी होती है। जब कोई लड़ाई, कोई संघर्ष और किसी योद्धा की तरफ से कोई ख़तरा नहीं होता तो चमचों की ज़रूरत नहीं होती, उनकी मांग नहीं होती। प्रारंभ में उनकी उपेक्षा की गई। किंतु बाद में जब दलित वर्गों का सच्चा नेतृत्व सशक्त और प्रबल हो गया तो उनकी उपेक्षा नहीं की सजा सकी। इस मुक़ाम पर आकर, ऊंची जाति के हिंदुओं को यह ज़रूरत महसूस हुई कि वे दलित वर्गों के सच्चे नेताओं के ख़िलाफ़ चमचे खड़े करें।’

1958 में ग्रेजुएशन करने के बाद कांशीराम ने पुणे स्थित डीआरडीओ में बतौर सहायक वैज्ञानिक काम किया था। इसी दौरान अंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक छुट्टी को लेकर किए गए संघर्ष से उनका मन ऐसा पलटा कि कुछ साल बाद उन्होंने नौकरी छोडक़र ख़ुद को सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष में झोंक दिया। अपने सहकर्मी डीके खरपडे के साथ मिलकर उन्होंने नौकरियों में लगे अनुसूचित जातियों -जनजातियों, पिछड़े वर्ग और धर्मांतरित अल्पसंख्यकों के साथ बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लायीज फेडरेशन (बामसेफ़) की स्थापना की। यह संगठन आज भी सक्रिय है और देशभर में दलित जागरूकता के कार्यक्रम आयोजित करता है। 1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति की शुरुआत की जिसे डीएस4 के नाम से जाना जाता है, और 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का गठन किया। आगे चलकर उन्होंने मायावती को उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनाया। ऐसा देश के किसी भी सूबे में पहली बार हुआ था।


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