विचार/लेख
स्वीडन में बढ़ते गिरोह अपराधों के बीच सरकार 13 साल के बच्चों को भी गंभीर आपराधिक मामलों में जेल भेजने के एक नए प्रस्ताव पर विचार कर रही है। यूरोप के कुछ अन्य देश भी ऐसा सोच रहे हैं।
डॉयचे वैले पर आंद्रेयास नॉल का लिखा-
आमतौर पर 13 से 14 साल के बच्चों को स्कूल में होना चाहिए लेकिन स्वीडन में आपराधिक गुट दिनदहाड़े लोगों पर हमले करने और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग जैसे अपराधों को अंजाम देने के लिए किशोरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। स्वीडिश कानून के तहत 15 साल से कम उम्र के किशोरों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। संगठित आपराधिक गिरोह इस बात का फायदा उठाते हैं।
अब बढ़ती गैंग हिंसा और संगठित अपराध से निपटने के लिए स्वीडन अपनी कानूनी व्यवस्था को सख्त करने पर विचार कर रहा है। संसद पहले ही ऐसे एक प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है। इसके तहत अगर 15 से 17 वर्ष के किशोरों को गंभीर अपराधों में दोषी पाया जाता है तो उन्हें विशेष किशोर कारागारों में जेल की सजा दी जा सकती है।
इसके अलावा स्वीडिश सरकार गंभीर अपराधों के मामले में अपराध की न्यूनतम आयु को अस्थायी तौर पर 13 वर्ष तक घटाने की योजना बना रही है। यह प्रावधान हत्या, गैर-इरादतन हत्या, बम विस्फोट और कई अन्य गंभीर अपराधों पर लागू किया जा सकता है। इस प्रावधान पर संसद जून के मध्य में मतदान करेगी और पांच वर्षों बाद इसके परिणाम की समीक्षा की जाएगी।
डेनमार्क की कोशिश हुई नाकाम
अपराध के लिए न्यूनतम उम्र को घटाने की बहस सिर्फ स्वीडन तक ही सीमित नहीं है। 2010 में डेनमार्क ने अपनी रूढि़वादी सरकार के नेतृत्व में अपराध की न्यूनतम उम्र को 15 से घटाकर 14 साल कर दिया था। इसके दो साल बाद ही इस सुधार को वापस ले लिया गया। इस सुधार के परिणाम पर हुए शोध में सामने आया था कि अपराध की न्यूनतम उम्र घटाने से कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके उलट प्रभावित युवाओं में दोबारा अपराध करने की संभावना बढ़ गई और स्कूल में उनका प्रदर्शन भी खराब हुआ।
डेनमार्क के इस कदम को अब कई विशेषज्ञ एक असफलता के तौर पर देखते हैं। उनका मानना है कि बच्चों को कम उम्र में अपराधी घोषित कर देना असल में युवा हिंसा की समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि कम उम्र में अपराधियों के संपर्क में आने से किशोर और ज्यादा आपराधिक माहौल में खिंच सकते हैं।
नीदरलैंड्स में 12 साल की उम्र से सजा का प्रावधान लेकिन जेल का नहीं
अन्य यूरोपीय संघ देशों से तुलना में नीदरलैंड्स और आयरलैंड ऐसे देश हैं जहां अपराधी ठहराए जाने की न्यूनतम उम्र काफी कम है। नीदरलैंड्स में तो 12 वर्ष की आयु से ही किशोरों पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है। आयरलैंड में भी आपराधिक जिम्मेदारी की न्यूनतम उम्र 12 वर्ष ही है। हालांकि कुछ गंभीर अपराधों में जैसे हत्या, गैर-इरादतन हत्या, बलात्कार और गंभीर यौन अपराधों के लिए 10 या 11 वर्ष की आयु के बच्चों को भी आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
इन देशों में कम आपराधिक उम्र का यह मतलब नहीं है कि बच्चों को भी वयस्कों की तरह कठोर जेल की सजा दी जाती है। नीदरलैंड्स में 12 से 15 वर्ष के किशोरों के लिए हिरासत में लिए जाने की अधिकतम अवधि एक वर्ष है और गंभीर अपराधों में दोषी पाए गए 16 और 17 वर्ष के किशोरों के लिए अधिकतम सजा आमतौर पर दो वर्ष होती है। हालांकि, इन देशों में बच्चों को हिरासत में लेने का मकसद केवल बच्चों को सजा देना ही नहीं है, बल्कि उनकी शिक्षा और सुधार पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
जर्मनी और स्पेन में यदि 12 साल का किशोर कोई गंभीर अपराध करता है, तो उसे कानूनी रूप से अपराधी नहीं माना जाता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर सकती है। इन देशों में भी युवाओं के लिए सामाजिक सेवाएं, पारिवारिक अदालतें और सुरक्षा संबंधी संस्थाएं हस्तक्षेप कर सकती हैं। कुछ मामलों में बच्चे को निगरानी केंद्रों में रखा जा सकता है, लेकिन इसे कानूनी रूप से आपराधिक सजा नहीं माना जाता है।
उन्हें अक्सर अपराधी के तौर पर नहीं बल्कि ऐसे नाबालिग के रूप में देखा जाता है, जिन्हें मदद की जरूरत है। स्पेन के कानून में यह बात विशेष रूप से स्पष्ट है। 14 साल से कम उम्र के किशोर आपराधिक कानून में नहीं, बल्कि देखभाल और बाल संरक्षण व्यवस्था की श्रेणी में आते हैं।
-दिनेश आकुला
उनकी मृत्यु के तेरह वर्ष बाद भी एक किस्सा मेरी स्मृतियों में आज भी उतना ही ताजा है।
रायपुर के लभांडी स्थित अपने निवास पर एक लंबी बातचीत के दौरान विद्या चरण शुक्ल ने मुझे 1977 की एक घटना सुनाई थी। आपातकाल समाप्त हो चुका था। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी और देश में उसके खिलाफ गुस्सा था। दिल्ली में आयोजित एक संगीत समारोह में देश के कई बड़े नेता मौजूद थे। मंच पर पंडित भीमसेन जोशी प्रस्तुति दे रहे थे।
गाते-गाते उन्होंने एक पंक्ति छेड़ी—
‘जिस नगरी में दया धरम नाहीं, उस नगरी में रहना क्या।’
सभागार में मौजूद लोगों ने तुरंत इसका राजनीतिक संदर्भ समझ लिया। हंसी, तालियां और फुसफुसाहटों का दौर शुरू हो गया। उस समय आपातकाल के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक विद्या चरण शुक्ल पहली पंक्ति में बैठे थे। उन्होंने मुझे बताया था कि पहले तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि अचानक लोग क्यों प्रतिक्रिया दे रहे हैं। वे दाएं-बाएं देखने लगे। कुछ क्षण बाद उन्हें अहसास हुआ कि यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि आपातकाल पर जनता का फैसला था।
सालों बाद जब वे यह घटना मुझे सुना रहे थे तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। कोई कटुता नहीं थी। मानो वे स्वीकार कर चुके थे कि राजनीति में अंतत: इतिहास ही अंतिम निर्णय देता है।
मेरा विद्या चरण शुक्ल से परिचय 1994 में हुआ था। उस समय मैं स्नातक के प्रथम वर्ष में था और रायपुर के एक अंग्रेजी अखबार में प्रशिक्षु रिपोर्टर के रूप में काम शुरू किया था। इसके बाद लगभग दो दशकों तक उनसे अनगिनत मुलाकातें हुईं। कई बार घंटों तक चलने वाली बैठकों में उन्होंने भारतीय राजनीति के ऐसे किस्से सुनाए जिन्हें केवल वही बता सकते थे, क्योंकि वे उन घटनाओं के प्रत्यक्ष सहभागी रहे थे।
वे अक्सर 1957 के अपने पहले लोकसभा चुनाव की चर्चा करते थे। महासमुंद से दूसरी लोकसभा के लिए सांसद चुने जाने के साथ उनकी राष्ट्रीय राजनीति की यात्रा शुरू हुई थी। पांच दशकों से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने सत्ता के शिखर भी देखे और राजनीतिक एकांत भी। लेकिन एक बात कभी नहीं बदली-लोगों से उनका संवाद।
25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुए माओवादी हमले और उसके बाद गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती होने तक मैंने उन्हें कभी गंभीर रूप से बीमार या अस्पताल में नहीं देखा था। वे उन नेताओं में थे जिन्हें देखकर लगता था कि समय भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
रायपुर के बाहरी इलाके लभांडी में स्थित उनका विशाल निवास हमेशा समर्थकों से भरा रहता था। चाहे वे 10 जनपथ की कृपा में हों या उससे बाहर, उनके दरबार में लोगों का आना-जाना कभी नहीं रुका। दोस्ती निभाना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी। यही कारण था कि उन्होंने सोनिया गांधी के खिलाफ शरद पवार का साथ दिया, भले ही इसके कारण उन्हें कांग्रेस छोडऩी पड़ी।
राजनीति के अलावा भी उनका एक अलग व्यक्तित्व था।
वे अपने स्वास्थ्य को लेकर बेहद सजग रहते थे। अक्सर गर्व से कहते थे कि उनकी कमर कभी 32 इंच से ज्यादा नहीं हुई। सुबह योग, फिर तैराकी और उसके बाद ताजे जूस से भरा एक बड़ा जग उनका रोज का कार्यक्रम था।
लेकिन इस अनुशासन के बीच उनकी एक कमजोरी भी थी-समोसा।
उन्हें समोसे बेहद पसंद थे। उससे भी ज्यादा रोचक था उन्हें खाने का उनका तरीका। वे समोसे को चाय में डुबोकर खाते थे। पहली बार यह देखकर मैं हैरान रह गया था। कोलकाता में जीवन का बड़ा हिस्सा बिताने के बावजूद मैंने समोसा खाने का ऐसा अंदाज पहले कभी नहीं देखा था।
वे हँसते हुए कहते, ‘एक बार करके देखो, स्वाद की दुनिया बदल जाएगी।’
संगीत उनके जीवन का दूसरा बड़ा प्रेम था। जीवन के अंतिम दिनों तक वे संगीत सुनते रहे। हालांकि एक बात का उन्हें हमेशा अफसोस रहा। उन्हें लगता था कि इतिहास ने किशोर कुमार के गीतों पर लगे प्रतिबंध का दोष गलत तरीके से उनके सिर मढ़ दिया।
आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने किशोर कुमार से कांग्रेस की एक रैली में गाने का अनुरोध किया था। किशोर कुमार ने मना कर दिया। इसके बाद उनके गीत आकाशवाणी और दूरदर्शन से गायब हो गए।
विद्या चरण शुक्ल हमेशा इस निर्णय में अपनी भूमिका से इंकार करते रहे।
वे कहते थे, ‘यह आकाशवाणी का फैसला था। न संजय गांधी ने मुझसे कहा था और न मैंने कोई आदेश दिया था।’
फिर मुस्कराकर जोड़ते थे, ‘मैं कभी किशोर कुमार से मिला नहीं, लेकिन उनके गीत आज भी सुनता हूं।’
आपातकाल को लेकर उनकी आलोचना करने वालों की भी कमी नहीं थी।
2004 में प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण रायपुर आए थे। उन्होंने मुझसे कहा था कि आपातकाल के दौरान विद्या चरण शुक्ल संजय गांधी के सबसे प्रभावशाली सहयोगियों में थे। लक्ष्मण का आरोप था कि उनके कार्टूनों को लेकर उन्हें दिल्ली बुलाया जाता था और घंटों इंतजार कराया जाता था।
विद्या चरण शुक्ल इन आरोपों को सिरे से खारिज करते थे।
वे कहते थे, ‘मैं केवल यह सुनिश्चित करता था कि सरकार के खिलाफ नकारात्मक प्रचार न हो।’
सही कौन था, यह इतिहास तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि आपातकाल की कहानी विद्या चरण शुक्ल के बिना अधूरी है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि वे वन्यजीवों के भी बड़े प्रेमी थे। नागपुर के मॉरिस कॉलेज से स्नातक करने के बाद उन्होंने ऑल्विन कूपर प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी शुरू की थी, जो मध्य भारत के जंगलों में वन्यजीव सफारी और फोटोग्राफी अभियानों का संचालन करती थी। खनन व्यवसाय में भी उनकी रुचि थी।
लेकिन उनकी असली पहचान राजनीति ही रही।
उन्होंने एक बार बताया था कि उनके पिता पंडित रविशंकर शुक्ल, जो अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे, ने अपने दोनों पुत्रों श्यामा चरण शुक्ल और विद्या चरण शुक्ल को बुलाकर पूछा था कि कौन किस स्तर की राजनीति करेगा। जब बड़े भाई श्यामा चरण शुक्ल ने प्रदेश राजनीति चुनी, तब विद्या चरण शुक्ल ने राष्ट्रीय राजनीति का रास्ता अपनाया।
सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहते हुए उन्होंने रायपुर को दूरदर्शन केंद्र दिलाया। उस समय यह देश का पांचवां दूरदर्शन केंद्र था। एक छोटे शहर के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में मैंने उन्हें बहुत कम बार गुस्से में देखा। लेकिन नवंबर 2000 उनमें से एक था।
छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हो चुका था। विद्या चरण शुक्ल को विश्वास था कि वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनेंगे। उन्होंने पूरी राजनीतिक रणनीति तैयार कर ली थी और बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन भी उनके साथ था।
लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने अजित जोगी को चुन लिया।
लभांडी स्थित उनके निवास पर उस दिन का माहौल आज भी याद है। दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद और प्रभा राव उन्हें मनाने पहुंचे थे। समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा और धक्का-मुक्की में दिग्विजय सिंह की शर्ट तक फट गई। बाद में विद्या चरण शुक्ल को इस घटना के लिए माफी मांगनी पड़ी।
अजित जोगी को लेकर उनकी नाराजगी कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
वे अक्सर कहते थे, ‘केक किसी बाहरी व्यक्ति को मिल गया।’
उनकी तीन बेटियां थीं, लेकिन कोई पुत्र नहीं था। उन्होंने अपने भतीजे अमितेश शुक्ल को राजनीति में आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन चीजें वैसी नहीं हो सकीं जैसी वे चाहते थे।
वे अपनी निजता को लेकर बेहद सजग थे। रायपुर स्थित उनके घर के सामने बनने वाले एक पांच सितारा होटल को उन्होंने पांचवीं मंजिल की अनुमति नहीं मिलने दी, क्योंकि वहां से उनके स्विमिंग पूल का सीधा दृश्य दिखाई देता।
16 अगस्त 2002 की एक घटना मैं कभी नहीं भूल सकता।
मैं विवाह के लिए रायपुर आया हुआ था। विद्या चरण शुक्ल उस समय अमेरिका यात्रा पर थे। लेकिन उन्होंने अपनी यात्रा बीच में छोड़ दी और विवाह में शामिल होने के लिए लौट आए। यह उनके स्नेह का ऐसा प्रमाण था जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
-कुमार सिद्धार्थ
भारत ने पिछले चार दशक में स्कूली शिक्षा के विस्तार की एक लंबी यात्रा तय की है। गांव-गांव स्कूल पहुँचे, नामांकन बढ़ा, बालिका शिक्षा में सुधार हुआ, बिजली, शौचालय, कंप्यूटर और स्मार्ट कक्षाओं जैसी सुविधाएँ तेजी से बढ़ीं। मध्याह्न भोजन, नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकें, छात्रवृत्तियाँ, स्कूल परिवहन, डिजिटल संसाधन और समग्र शिक्षा जैसी योजनाओं ने शिक्षा के विस्तार को नई गति दी है। ऐसे में शिक्षा की तस्वीर बदली हुई दिखाई देती है। इसलिए स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे जीवंत प्रवेश-द्वार भी माना जाता है।
हाल ही में नीति आयोग की जारी रिपोर्ट ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एन्हांसमेंट’ शिक्षा से जुड़े अहम प्रश्नों को फिर से हमारे सामने रखती है। रिपोर्ट का सार जितना सरल है, उतना ही असहज करने वाला भी है। रिपोर्ट कहती है कि भारत ने स्कूलों तक पहुंच की लड़ाई काफी हद तक जीत ली है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की लड़ाई अब भी अधूरी है।
शिक्षा के परिदृश्य को देखें तो आज शिक्षा के महकमे में लगभग 14.7 लाख स्कूल, 24 करोड़ से अधिक विद्यार्थी और लगभग एक करोड़ शिक्षक हैं। आकार के लिहाज से यह दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन इतनी विशाल व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन भवनों, योजनाओं और नामांकन से नहीं, बल्कि इस सवाल से होना चाहिए कि क्या बच्चे वास्तव में सीख पा रहे हैं?
नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि देश में आज भी एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहाँ केवल एक शिक्षक है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक जीवंत विडंबना है। एक ही शिक्षक पहली से पाँचवीं तक की कक्षाएँ पढ़ाता है, जो उपस्थिति दर्ज करने के साथ मध्यान्ह भोजन की निगरानी, सरकारी पोर्टलों पर डेटा अपलोड करने और प्रशासनिक दायित्वों में भी व्यस्त रहता है।
हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि शिक्षक सिर्फ पाठ्यपुस्तकें नहीं पढ़ाते, वे सीखने का वातावरण रचते हैं। वे जिज्ञासा को दिशा देते हैं, बच्चों में आत्मविश्वास जगाते हैं और कक्षा को संवाद का जीवंत मंच बनाते हैं। लेकिन जब वही शिक्षक व्यवस्था शिक्षा के इतर कार्यों में उलझ जाता है, तो कक्षा में ज्ञान का संवाद स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ता है। शिक्षा तब पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया बनकर रह जाती है, सीखने की प्रक्रिया नहीं।
रिपोर्ट का दूसरा संकेत छोटे स्कूलों की ओर भी है। देश के लगभग 35 फीसदी विद्यालयों में 50 से कम विद्यार्थी हैं। इनमें से हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहाँ दस से भी कम बच्चे पढ़ते हैं। पहली नजर में यह दूरस्थ इलाकों तक शिक्षा पहुँचने का प्रमाण लगता है। लेकिन दूसरी नजर में यह सवाल उठाता है कि इतने छोटे और अलग-थलग स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण कैसे संभव होगा? बहुस्तरीय कक्षाएँ, सीमित संसाधन, कभी शिक्षक की अनुपस्थिति, कभी विषय विशेषज्ञों का अभाव—ये सब मिलकर शिक्षा को उपस्थिति तक सीमित कर देते हैं।
ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में यह चुनौती और गहरी हो जाती है। कई स्थानों पर स्कूल भवन मौजूद हैं, लेकिन प्रयोगशालाएँ नहीं हैं; कंप्यूटर हैं, लेकिन इंटरनेट नहीं; पुस्तकालय हैं, लेकिन नियमित पठन संस्कृति नहीं। शिक्षा का ढांचा खड़ा है, पर उसके भीतर सीखने की आत्मा अभी भी कमजोर दिखाई देती है।
पिछले वर्षों में असर, नेशनल अचीवमेंट सर्वे और हालिया राष्ट्रीय मूल्यांकनों ने बार-बार यही संकेत दिया है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढऩे और गणित की बुनियादी दक्षताएँ चिंता का विषय बनी हुई हैं। तीसरी कक्षा का बच्चा दूसरी कक्षा का पाठ सहजता से नहीं पढ़ पा रहा। पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थियों का एक बड़ा हिस्सा सरल भाग, प्रतिशत या अनुपात जैसी बुनियादी गणितीय अवधारणाओं में संघर्ष करता दिखाई देता है। नीति आयोग की रिपोर्ट भी स्पष्ट करती है कि केवल नामांकन पर्याप्त नहीं, सीखना शिक्षा का असली पैमाना है।
यह स्थिति केवल शैक्षिक कमजोरी नहीं है, यह उस बुनियादी सीखने के संकट की ओर संकेत है, जो आगे चलकर माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और रोजगार क्षमता तीनों को प्रभावित करता है। जब नींव कमजोर होती है, तो आगे की पूरी शैक्षिक संरचना अस्थिर हो जाती है। यही कारण है कि आज उद्योग जगत भी बार-बार कौशल अंतराल की बात करता है।
नीति आयोग की रिपोर्ट एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाती है सरकारी स्कूलों में भरोसे का धीरे-धीरे क्षरण। दो दशक पहले तक देश के अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। लेकिन आज स्थिति बदल रही है। वर्ष 2005 में जहाँ लगभग 71 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 49.24 फीसदी रह गया है। यानी पहली बार सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों का अनुपात आधे से नीचे चला गया है।
ग्रामीण परिवार, जो कभी सरकारी विद्यालय को स्वाभाविक विकल्प मानते थे, अब सीमित आय के बावजूद निजी स्कूलों की ओर देख रहे हैं। यह केवल विकल्प का बदलाव नहीं, बल्कि भरोसे का बदलाव है। अभिभावक अक्सर अंग्रेजी माध्यम, अनुशासन, नियमित उपस्थिति और अपेक्षाकृत बेहतर जवाबदेही को निजी स्कूलों से जोडक़र देखते हैं, भले ही वास्तविक गुणवत्ता हर जगह समान न हो।
यह प्रवृत्ति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि सरकारी विद्यालय ही सामाजिक न्याय, अवसर की समानता और लोकतांत्रिक शिक्षा के सबसे बड़े माध्यम हैं। यही वे जगहें हैं जहाँ जाति, वर्ग, भाषा और आर्थिक असमानताओं के बीच लोकतांत्रिक सहअस्तित्व की पहली सीख मिलती है। यदि इन संस्थाओं पर भरोसा कमजोर पड़ता है, तो शिक्षा के साथ लोकतंत्र की बुनियाद भी कमजोर होती है।
पश्चिम बंगाल में बीते महीने सत्ता संभालने वाली बीजेपी सरकार ने ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य करने के बाद अब राज्य के तमाम मदरसों के सर्वेक्षण का आदेश दिया है. सर्वेक्षण रिपोर्ट पांच जुलाई तक सौंपनी होगी.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट -
पहली बार राज्य की सत्ता संभालने के एक महीने के भीतर ही सरकार के इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों का सवाल है कि क्या बंगाल सरकार भी पड़ोसी असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार की तर्ज पर अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने का प्रयास कर रही है। असम के मुख्यमंत्री पर लगातार विभिन्न फैसलों के जरिए अल्पसंख्यकों पर निशाना साधने के आरोप लगते रहे हैं। इससे पहले सरकार ने यहां तमाम मदरसों में 'वंदे मातरम' का गायन अनिवार्य कर दिया था। बीजेपी पंद्रह साल तक सत्ता में रही ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप लगाती रही है।
राज्य में फिलहाल वेस्ट बंगाल बोर्ड आफ मदरसा एजुकेशन के तहत 614 सरकारी मान्यता और सहायता-प्राप्त मदरसे हैं। इसके अलावा गैर-मान्यताप्राप्त और निजी संगठनों की ओर से या जकात से चलाए जाने वाले मदरसों की संख्या दो हजार से ज्यादा है। लेकिन इन तमाम मदरसों में सर्वेक्षण का आदेश दिया गया है।
क्या होगा मदरसों के सर्वे में
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि तमाम जिला शासकों को सर्वेक्षण के निर्देश भेज दिए गए हैं। उनको पांच जुलाई तक इसकी रिपोर्ट सौंपनी है। इसके तहत मदरसों में पढऩे वाले छात्र-छात्राओं की संख्या के अलावा उनको पढ़ाने वाले शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, आधारभूत ढांचा और आर्थिक स्रोत का ब्योरा हासिल किया जाएगा।
लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री खुदीराम टुडू का कहना है कि सरकार ने अवैध मदरसों को बंद कर वहां पढऩे वाले छात्रों को सरकारी स्कूलों या अनुमोदित मदरसों में स्थानांतरित करने की योजना बनाई है।
मंत्री ने डीडब्ल्यू को बताया, ‘सर्वेक्षण रिपोर्ट के बाद राज्य में चलने वाले तमाम गैर-अनुमोदित या अवैध मदरसों को बंद कर दिया जाएगा। शिक्षा के नाम पर अवैध गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। सरकार मदरसों में पढऩे वाले छात्रों को आधुनिक शिक्षा मुहैया कराना चाहती है ताकि आगे चल कर रोजगार की दौड़ में वो पिछड़े नहीं रहें।’
हाल के वर्षों में राज्य के विभिन्न इलाकों में तेजी से बढ़ते मदरसों पर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। कई बार वहां आतंकवादियों को शरण देने के भी आरोप लगे हैं। इनमें से ज्यादातर मदरसे जकात से चलते हैं। अब अल्पसंख्यक संगठनों को डर है कि यह सर्वेक्षण उनको निशाना बनाने के मकसद से ही शुरू किया गया है।
कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले के एक मदरसे में पढ़ाने वाले मोहम्मद हफीज (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘सरकार जकात से चलने वाले मदरसों में तमाम कमियां निकाल कर उनको किसी तरह बंद करने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन हम इसका विरोध करेंगे। इसके लिए कानून की मदद ली जाएगी।’
लेकिन मंत्री खुदीराम टुडू कहते हैं, ‘यह किसी धर्म पर हमला नहीं है। नियमों के मुताबिक चलने वाले मदरसों को सरकार आर्थिक सहायता देगी। वहां शिक्षा के स्तर को सुधारने और आधारभूत सुविधाएं बेहतर बनाने की योजनाएं लागू की जाएंगी।’
बीजेपी सरकार ने बीते महीने एक आदेश जारी कर तमाम मदरसों और सरकारी स्कूलों में सुबह वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया था। इस आदेश को लागू करने के लिए तमाम मदरसा प्रमुखों को सुबह-सुबह वीडियो बनाकर अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं। इस पर अल्पसंख्यक संगठनों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। एक संगठन ने इस फैसले के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की है। तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इसे मनमाना फैसला बताते हुए कहा है कि किसी भी धर्म में हस्तक्षेप उचित नहीं है। इससे राज्य का सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हो सकता है।
लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक और मदरसा शिक्षा मंत्री खुदीराम टुडू डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘जब सरकारी स्कूलों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य हो सकता है तो मदरसों को इससे अलग क्यों रखा जाएगा? सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोप निराधार हैं।’
-शिवांगी जायसवाल
पाँच जून, 2024 को दिल्ली में इंडिया गठबंधन ने आखिरी बैठक की थी। इसके ठीक दो साल बाद छह जून को दिल्ली में ही इस प्रमुख विपक्षी गठबंधन की बैठक हुई है।
इन दो सालों में बहुत कुछ बदल चुका है। तब 25 क्षेत्रीय पार्टियों ने बैठक में हिस्सा लिया था। इस बार ये संख्या घटकर 23 रह गई। तब पार्टी की बैठक में ग़ैर कांग्रेसी पाँच मुख्यमंत्री शामिल हुए थे। इस बार महज़ एक ग़ैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला थे।
अब आम आदमी पार्टी, आरजेडी, टीएमसी, डीएमके समेत अन्य कई पार्टियों के लिए राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। हालांकि गठबंधन को मजबूत करने के लिए इंडिया ब्लॉक ने अब हर दो महीने में बैठक करने का फैसला किया है।
इस बैठक में भी एसआईआर के मुद्दे को ज़ोरदार ढंग से आगे बढ़ाने के संकेत दिए गए हैं। साथ ही, संसद सत्र के दौरान एलओपी राहुल गांधी की अध्यक्षता में विपक्षी दलों की बैठक किए जाने का भी फैसला हुआ है। जिन पाँच अहम मुद्दों पर इस विपक्षी गठबंधन में सहमति बनी है, उसमें एक प्रमुख मुद्दा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से जुड़ा है।
बीजेपी के उभार के बाद देश भर में क्षेत्रीय पार्टियां कमजोर हुई हैं। क्षेत्रीय पार्टियों से चुनौती न केवल बीजेपी को मिलती थी बल्कि कांग्रेस को भी मिलती थी। ऐसे में इंडिया गठबंधन में अभी कांग्रेस मज़बूत स्थिति में है। अभी के हालात में आरजेडी और टीएमसी जैसी पार्टियां कांग्रेस को बहुत झुकाने की स्थिति में नहीं हैं।
नियमित बैठक से इंडिया गठबंधन को क्या फायदा होगा
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने इंडिया ब्लॉक की बैठक के बाद घोषित हुए पाँच मुद्दों में सबसे ज़्यादा अहम इस बात को माना कि वे हर दो महीने में एक बैठक करेंगे। उनका मानना है कि इसी से आगे का रास्ता निकलेगा।
वह कहती हैं, ‘इंडिया गठबंधन ने हर दो महीने में बैठक करने का फ़ैसला लिया है। बैठकर बात ही नहीं करेंगे, रणनीति ही नहीं बनाएंगे तो अलायंस का मतलब ही क्या है? फिर तो ये नारा ही है न।’
‘बीते दो साल में ये गठबंधन एक ऑप्टिक्स, एक नारा बनकर रह गया था। अब हर दो महीने में मिलेंगे, भले लड़ेंगे-भिड़ेंगे, जो भी बातें होंगी और जो भी मुद्दे सामने आएंगे, इससे कुछ तो निकलेगा। तो मैं मानती हूँ कि सबसे अहम है।’
वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता का कहना है कि इस समय इंडिया ब्लॉक पर बहुत दबाव है। उनके दो कद्दावर नेता ममता बनर्जी और एमके स्टालिन चुनाव हार चुके हैं।
उन्होंने कहा, ‘टीएमसी, डीएमके और सीपीआईएम के सत्ता से बाहर हो जाने से गठबंधन के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया था। कमजोर स्थितियों में दलों को अहसास हो रहा है कि अब जो भी उनके पास बचा है, उसे मिलकर बचाने की कोशिश करें।’
‘इन कमजोरियों ने इन दलों को एक साथ आने पर मजबूर कर दिया। हालांकि इसमें डीएमके, कांग्रेस के चलते गठबंधन से दूर हो गया।’
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का जोर इस बात पर है कि इंडिया गठबंधन को गठबंधन के ढांचे पर फोकस करना चाहिए। उनका मानना है कि उससे ही विपक्षी ब्लॉक को आगे बढऩे और एकजुट रहने का आधार मिलेगा।
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ‘बैठक होना तब तक सिफऱ् फोटो-ऑप लगता है, जब तक यह गठबंधन अपने संरचनात्मक पहलुओं पर बैठकर बात नहीं करता। क्या गठबंधन का कोई दफ़्तर बनेगा?
इस गठबंधन के जो दूसरे अनुभवी नेता हैं, क्या उन्हें कुछ कमेटियों में रखा जाएगा ताकि वे इस गठबंधन को कोई रूप दे सकें। इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, पर जहाँ तक मेरी जानकारी है, ऐसी कोई बात बैठक में नहीं हुई है।’
ब्लॉक की अगली बैठक हैदराबाद में एक अगस्त यानी दो महीने बाद होना तय हुआ है। पत्रकार रशीद किदवई और स्मिता गुप्ता दोनों ने ही कहा कि हैदराबाद में बैठक इसलिए रखी गई है क्योंकि वहाँ कांग्रेस की सरकार है।
ऐसे में ज़रूरी इंतज़ाम और मीडिया का ध्यान दोनों के बेहतर होने की संभावना है।
ममता बनर्जी को कितनी मदद करेगा इंडिया ब्लॉक
वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता इंडिया ब्लॉक की बैठक के दौरान ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के गले मिलने की तस्वीर का हवाला देती हैं।
उन्होंने कहा, ‘एक समय उन्हें ब्लॉक का अध्यक्ष बनाने की मांग उठी थी। कई बार ऐसा भी हुआ कि नाराजग़ी में वह अलायंस की मीटिंग में नहीं आईं। मगर अब जब उनकी पार्टी बिखरने की कगार पर है तो उन्हें इंडिया गठबंधन की बैकिंग चाहिए।’
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने कहा, ‘इस समय ममता बनर्जी को एक राजनीतिक संरक्षण की ज़रूरत है, क्या उन्हें इंडिया गठबंधन में कोई भूमिका मिलेगी ताकि आगे की लड़ाई के लिए तैयारी कर पाएं?’
रशीद किदवई का कहना है, ‘मैं जानता हूँ कि कांग्रेस में एक तबका चाह रहा है कि ममता की पार्टी निपट जाए और उनकी राजनीतिक धरोहर हमें मिल जाए।’
नीरजा चौधरी का कहना है कि ‘बैठक के बाद जो घोषणा की गई है कि निष्पक्ष चुनाव की मांग और एसआईआर को लेकर यह गठबंधन सीजेआई (सुप्रीम कोर्ट से चीफ जस्टिस) को पत्र लिखेगा, तो मैं मानती हूँ कि यह ममता को बैक करने के लिए किया जा रहा है।’
क्या राहुल गांधी का कद बढ़ेगा?
इंडिया ब्लॉक की प्रेसवार्ता में कांग्रेस अध्यक्ष खडग़े ने बताया कि ‘इंडिया गठबंधन, मॉनसून सत्र में सदन में समन्वय बनाए रखेगा। हर सुबह लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ सभी विपक्षी दलों की बैठक होगी।’
इस घोषणा को वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी काफ़ी अहमियत देती हैं। उनका कहना है कि इससे इंडिया गठबंधन के अंदर कांग्रेस और राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने की दिशा में एक क़दम आगे बढ़ा है।
दूसरी ओर रशीद किदवई कहते हैं कि इससे राहुल गांधी की लीडरशिप के प्रति संयुक्त विपक्ष के बीच स्वीकार्यता बढ़ेगी।
नीरजा चौधरी ने बीबीसी न्यूज हिन्दी से कहा, ‘यह अहम है कि संसद सत्र के दौरान विपक्षी दल हर दिन जो मीटिंग करेंगे, वह एलओपी राहुल गांधी की अध्यक्षता में होगी।
यानी राहुल गांधी संसद के फ्लोर कोऑर्डिनेशन में विपक्ष की रणनीति की अध्यतक्षा करेंगे। राहुल गांधी को अब तक इंडिया ब्लॉक ने अपना संयोजक तय नहीं किया है, लेकिन एक कदम उसकी ओर ले लिया है।’
नीरजा तर्क देती हैं कि ‘पहले रीजनल पार्टियां ही कांग्रेस की लीडरशिप को लेकर अडंगा लगाती थीं, जो अब कमजोर हो गई हैं। लेकिन कांग्रेस बड़े भाई की तरह संवेदनशीलता के साथ व्यवहार नहीं करेगी तो मामला गड़बड़ हो सकता है।’
-मनीष आजाद
‘Even the Rain’, क्या हो जब असल क्रांतिकारी और फिल्मी क्रांतिकारी एक हो जाये।
यही दिलचस्प कहानी है 2010 में आई एक महत्वपूर्ण फिल्म ‘Even the Rain‘ की। 2000 में स्पेन की एक फिल्म युनिट एक फि़ल्म की शूटिंग के लिए अमेरिका के सबसे गरीब देश बोलीविया में उतरती है। विषय है- कोलम्बस का लैटिन अमेरिकी देशों की विजय और इसके खिलाफ मूल नागरिकों का प्रतिरोध। ठीक वैसे ही जैसे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ बिरसा मुंडा जैसे आदिवासियों का प्रतिरोध।
स्पेन की फिल्म युनिट ने बोलीविया को इसलिए चुना क्योकि यहां गरीबी बहुत है, इसलिए फिल्म निर्माण का खर्च कम आएगा। यह तथ्य बखूबी यह स्पष्ट कर देता है कि कोलम्बस के अत्याचार पर फिल्म बनाने के बावजूद फिल्म युनिट कोलम्बस की परंपरा को ही ढो रही है। फिल्म में कास्ट किये गए लोकल एक्स्ट्रा लोगों को महज 2 डॉलर प्रतिदिन की दर से पेमेंट किया जाता है और उनसे बहुत तरह के अन्य श्रम साध्य काम [जैसे सेट बनवाना आदि] लिए जाते है। और इस तरह फिल्म निर्माण का खर्च बचाया जाता है। इन्ही लोकल एक्स्ट्रा लोगो से वह सलीब बनवाया जाता है, जिस पर कोलम्बस की सेना के खिलाफ विद्रोह करने वालों को फाँसी दी जानी है, जिसके लीडर का रोल इन्ही में एक स्थानीय डैनियल ही कर रहा है। अपना सलीब खुद तैयार करने या करवाने का यह दृश्य काफी प्रतीकात्मक है और बिना मुखर हुए काफी कुछ कह जाता है।
लेकिन फिल्म का क्लाइमेक्स वहाँ से शुरू होता है जब फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को यह पता चलता है कि डैनियल अपनी असल जिंदगी में भी एक विद्रोही की भूमिका निभा रहा है। वर्ड बैंक के एक प्रोजेक्ट के तहत सन 2000 में बोलीविया में पानी का सम्पूर्ण निजीकरण कर दिया गया था। यहां तक कि आप बारिश का पानी भी इक_ा नहीं कर सकते। यहीं से इस फि़ल्म का नाम ‘Even the Rain ‘ निकला। यहां पर असल न्यूजरील के इस्तेमाल के कारण फिल्म और असरकारक हो जाती है।
डैनियल फिल्म में ‘हेतू’ (Hatuey) की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जो कोलम्बस की सेना के खिलाफ लड़ते हुए शहीद होने वाले पहले विद्रोहियों (2 फरवरी 1512 को शहीद) में से एक था। जहाँ फिल्मकार ने फिल्म युनिट द्वारा लोकल लोगों के शोषण को कोलम्बस की परंपरा से जोड़ा है, वही डैनियल व अन्य स्थानीय लोगो द्वारा पानी के निजीकरण के विरोध को ‘हेतू’ (Hatuey) की विद्रोही परंपरा से जोड़ा है।
बहरहाल डैनियल के पानी के निजीकरण के खिलाफ चल रहे आंदोलन में शामिल होने के कारण शूटिंग में काफी बाधा उत्पन्न हो रही है। डायरेक्टर और प्रोड्यूसर डैनियल को बदल भी नही सकते, क्योकि फि़ल्म का काफी हिस्सा शूट हो चुका है। हद तो तब हो गयी जब आंदोलन में भागीदारी के कारण डैनियल को गिरफ्तार कर लिया गया। फिल्म का प्रोड्यूसर कोस्टा पुलिस को घूस देकर डैनियल को कुछ समय के लिए छुड़ा लेता है और पुलिस को आश्वासन देता है कि फि़ल्म में डैनियल को सूली पर चढ़ाने के बाद पुलिस आकर उसे सेट से गिरफ्तार कर ले।
बुर्जुआ कला पर यह बहुत बड़ा व्यंग्य है। ‘यूज एंड थ्रो’ का पूंजीवादी सिद्धान्त कला में भी घुस जाता है।
खैर शूटिंग के बाद जब पुलिस डैनियल को गिरफ्तार करने आती है तो फिल्म के सभी लोकल स्थानीय कलाकार पुलिस से भिड़ जाते है और डैनियल को भगा देते है। यह दृश्य फिल्म की जान है। यहाँ कला यथार्थ बन जाता है और यथार्थ कला हो जाती है।
डिस्क्लेमर: इस ख़बर में गांव के नाम में जाति-सूचक शब्द का उल्लेख केवल सामाजिक भेदभाव की वास्तविकताओं को सामने लाने के लिए किए गए हैं. इनका उद्देश्य किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव या पूर्वाग्रह को बढ़ावा देना, उसका समर्थन करना या उसे सामान्य मानना या बनाना नहीं है.
"आप कहां रहती हैं?"
इस सवाल के जवाब में मेनका भारती कुछ क्षण के लिए रुकती हैं.
उनके पीछे खेतों की ओर जाता एक कच्चा रास्ता है. घर के पीछे खड़े आम के पेड़ की छांव में बैठी मेनका फिर जवाब देती हैं, "हम अपने गांव का नाम बदलना चाहते हैं."
मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के बगौता ग्राम पंचायत में बसे चमरुआपुरवा गांव की गलियों में रोजमर्रा की ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती है.
राजधानी भोपाल से लगभग 330 किलोमीटर दूर बसे इस गांव से बच्चे स्कूल जाते हैं, लोग काम पर निकलते हैं और गांव के मुहाने पर बना प्राथमिक स्कूल यहां आने वालों को इसका नाम बताता है.
लेकिन यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि यह "सिर्फ़ एक नाम" नहीं है.
उनके मुताबिक, गांव का नाम सुनते ही कई लोग उनकी जाति का अनुमान लगाते हैं. और इसका असर उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी के कई पहलू जैसे पढ़ाई, किराये के मकान की तलाश और हर दिन की बातचीत तक में दिखाई देता है.
मेनका सकुचाते हुए बताती हैं कि उन्हें पहली बार इसका एहसास स्कूल में हुआ था.
"स्कूल में जो भैया थे, गाड़ी वाले, वो स्कूल के बाहर खड़े होकर जब बच्चों को बुलाते थे कि फलाना गांव के बच्चे जल्दी आओ तो सुनने में ही बहुत बुरा लगता था. उस वक्त तो ऐसा लगता था जैसे कोई गाली दे रहा हो."
जब हमने उनसे पूछा कि क्या लोग उनके गांव का नाम सुनकर किसी तरह की राय बना लेते हैं या उन्हें जज करते हैं, तो वह कहती हैं, "हां, जज तो करते हैं. यह नाम एक पहचान जैसा है. गांव का नाम ही एक तरह की पहचान बन जाता है."
मेनका अकेली नहीं हैं.
गांव के रहने वाले संजय अहिरवार कहते हैं कि उन्होंने पहली बार इसका असर तब महसूस किया जब वह उच्च शिक्षा के लिए उज्जैन गए.
वो कहते हैं, "वहां मेरे साथियों ने मुझसे पूछा कि मैं कहां से हूं. मैंने बताया कि मैं छतरपुर से हूं. फिर उन्होंने पूछा कि छतरपुर में कहां से, तो मैंने कहा कि बगौता से हूं. उन्होंने पूछा भाई ये तुम्हारे गांव का नाम है ? मैं चुप रहा, लेकिन उसके बाद मैंने आगे नहीं बताया कि मैं किस गांव से हूं."
संजय कहते हैं कि यह सिर्फ़ एक घटना नहीं थी.
किसी नए व्यक्ति को अपनी क्या पहचान बताएं?
संजय के पड़ोस में रहने वाले प्रवेश अहिरवार कहते हैं, "चार लोगों के बीच कोई नया आए, पूछे कि कहां से हो. तो वो बात आ ही जाती है. मैं नहीं बोलूं तो सामने वाला बोल देता है कि फलाने गांव से हैं. तब अच्छा नहीं लगता."
उनके लिए रोज़मर्रा का यह आम सवाल सिर्फ़ एक गांव के नाम का सवाल नहीं है.
संजय कहते हैं, "ये सिर्फ़ नाम नहीं है, बल्कि एक सिंबल यानी कि एक तरह की पहचान है. जाति गाली के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाली पहचान. जैसे आप अगर इतिहास देखें, तो चमार शब्द को गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, आज भी उसी तरह इसे गाली के तौर पर यूज़ किया जाता है. तो हमारे अंदर एक फीलिंग आती है कि सामने वाला हमें गाली दे रहा है."
मेनका, प्रवेश और संजय जैसे इस गांव के कई लोगों को इसी समस्या का सामना करना पड़ता है.
संजय बताते हैं कि अब उन्होंने इससे बचने का अपना तरीका बना लिया है.
"इसका कोई परमानेंट उपाय तो नहीं है. मैं कोशिश करता हूं कि पहले अपने जिले का नाम बता दूं. अगर फिर भी लोग पूछें तो पंचायत का नाम बता देता हूं. जितना हो सके, कोशिश करता हूं कि मेरे गांव का नाम न आए."
प्रवेश अहिरवार भी कहते हैं कि गांव का नाम सामने आते ही लोगों का रवैया बदल जाना असामान्य नहीं है.
'गांव का नाम सुनकर फोन काट दिया'
कमरा तलाशने के दौरान हुई एक घटना का जिक्र करते हुए वह कहते हैं, "जैसे मैंने अपना नाम बताया, अपना परिचय दिया, अपने गांव का नाम बताया, तुरंत फोन काट दिया."
जब हमने पूछा कि क्या यह अनुभव उन्हें कई बार हुआ तो वो कहते हैं, "अभी आपके सामने करता हूं कुछ लोगों को फोन, आप खुद देख लीजिए".
इसके बाद प्रवेश ने हमारे सामने किराए के मकान के लिए एक व्यक्ति को फोन लगाया. बातचीत सामान्य तरीके से शुरू हुई.
दूसरी तरफ़ मौजूद व्यक्ति ने उनसे अगले दिन आकर कमरा देखने के लिए कहा.
लेकिन कुछ देर बाद जब प्रवेश ने अपना परिचय दिया और बताया कि वह किस गांव से हैं, तो फोन कट गया.
प्रवेश ने दोबारा फोन लगाया.
फिर एक बार और.
लेकिन इस बार कॉल का जवाब नहीं मिला.
प्रवेश का कहना है कि कई बार लोग सीधे कुछ नहीं कहते, लेकिन व्यवहार बदल जाता है.
उन्होंने कहा, "जब मैं अपना पूरा पता बताता हूं, तो सामने वाले व्यक्ति का व्यवहार बदल जाता है. गांव का नाम सुनते ही उनके बात करने का तरीका, देखने का नजरिया और समझने का ढंग सब अलग हो जाता है. कई बार तो लोग मुझसे बात करना ही कम कर देते हैं या बिल्कुल बंद कर देते हैं."
यह समस्या सिर्फ़ एक समुदाय तक ही सीमित नहीं है.
गांव में रहने वाली प्रियंका साहू और उनके पति ने करीब तीन साल पहले यहां मकान बनवाया था.
उनके मकान के एक हिस्से में मरम्मत का काम चल रहा है.
प्रियंका ने शहर के करीब रहने के लिए यहां घर बनाया. लेकिन वो कहती हैं कि गांव के नाम से जुड़ी धारणाएं उनके भी हर दिन के कामकाज को कठिन बनाती हैं.
प्रियंका ने पीछे चल रही मशीनों को बंद करवाते हुए कहा. "यहां के लिए रिक्शा नहीं मिलता है. या तो तालाब के पास छोड़ देंगे या फिर रोड पर. जो यहां के रिक्शावाले हैं, वो ही यहां आते हैं. मेरा यह मानना है कि किसी व्यक्ति को उसकी जाति से जोड़कर देखना या पुकारना अपमानजनक है. लेकिन हमें हर दिन यही अपमान झेलना पड़ता है".
इसी गांव से कुछ दूर रहने वाले रुद्र प्रताप सिंह का भी मानना है कि ऐसे नामों को बोलने या बताने में दिक्कत होती है.
उन्होंने कहा, "जातिसूचक नाम तो बहुत सारी जगहों के हैं, जैसे चौबेपुर कॉलोनी. ये यहीं छतरपुर शहर में है, शायद इस नाम को लेने से किसी को अपनमानजनक न महसूस हो. लेकिन बगौता ग्राम पंचायत में जो गांव है उसका नाम लेने में वहां के लोगों को भी बुरा लगता है और हम लोगों को भी. इसका नाम तुरंत बदला जाना चाहिए और ऐसे नाम जहां जहां हैं उन सबको बदल देना चाहिए. इस से भेदभाव कम होगा".
गांव का नाम लेने में असहजता अब गांव के बुजुर्गों को भी होती है जिन्होंने पहले कभी इस पर कुछ खास विचार नहीं किया.
गांव के बुजुर्गों की राय भी हमेशा ऐसी नहीं रही.
67 साल के भुल्ली अहिरवार बताते हैं कि पहले उन्हें गांव के नाम में कुछ गलत नहीं लगता था.
हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें पहले भी यह नाम असहज करता था. वह हंसते हुए कहते हैं, "नहीं, नहीं... उस वक्त नहीं लगता था."
फिर कुछ देर रुककर कहते हैं, "पहले तो ऐसा ही होता था. हमारे जात बिरादरी के आधार पर यह नाम रखा गया. लेकिन धीरे-धीरे आदमी को ज्ञान हुआ. बच्चे पढ़ने लिखने लगे तो उन्हें परेशानी होने लगी. तब हमें भी ज्ञान हुआ और यह लगा कि यह गलत है. गांव के नाम ऐसा नहीं होने चाहिए."
कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे नाम बहुत पुराने हैं और यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें किन परिस्थितियों में रखा गया था. लेकिन उनका मानना है कि अगर किसी नाम को बताने में लोगों को असहजता महसूस होती है तो उस पर विचार होना चाहिए.
एक स्थानीय निवासी कहते हैं, "ये नाम आज से तो हैं नहीं, कई सालों से चले आ रहे हैं. लेकिन अगर कहीं बताने में बुरा लगता है, तो ऐसे कई नाम हैं, उनको समय के हिसाब से बदलना चाहिए."
हालांकि ऐसे नाम सिर्फ़ इसी गांव तक सीमित नहीं हैं.
देश के कई हिस्सों में मौजूद हैं ऐसे गांव
देश के कई हिस्सों में ऐसे गांव, सड़कें और बस्तियां मौजूद हैं जिनके नाम जातिसूचक हैं.
साल 2025 में महाराष्ट्र सरकार ने ऐसे गांवों, सड़कों और आवासीय बस्तियों के नाम बदलने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे. नए दिशा-निर्देशों में ऐसे नामों की जगह लोकतांत्रिक मूल्यों या प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के नाम अपनाने की बात कही गई.
इसी तरह अक्तूबर 2025 में तमिलनाडु सरकार ने जातिसूचक या भेदभावपूर्ण माने जाने वाले नामों की पहचान और उन्हें बदलने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए.
तमिलनाडु सरकार ने कहा कि ऐसे नामों वाले सड़कों, गलियों, आवासीय इलाकों, बस स्टैंडों, बाजारों, जल निकायों और ग्राम पंचायतों में भी बदलाव किया जाएगा.
उत्तर प्रदेश में भी यह मुद्दा राजनीतिक स्तर पर उठ चुका है. मार्च 2026 में सत्तारूढ़ बीजेपी के विधान परिषद सदस्य लालजी प्रसाद निर्मल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात कर ऐसे गांवों और कस्बों की सूची सौंपी जिनके नाम दलित समुदायों से जुड़े हैं. उन्होंने राज्य भर में ऐसे गांवों और कस्बों की पहचान कर सूची तैयार करने और उनके नाम बदलने की मांग की थी.
गांव का नाम बदलने की मांग उठी
छतरपुर के इस गांव के लोगों ने भी कई बार नाम बदलने की मांग उठाई है.
ग्रामीणों के अनुसार, हाल के समय में उन्होंने साल 2022 में ज़िला कलेक्टर और तहसीलदार को नाम बदलने के लिए ज्ञापन सौंपा था. हालांकि अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ है.
छतरपुर ज़िला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी नमः शिवाय अरजरिया कहते हैं कि ज़िले में ऐसे कई गांव हैं जिनके नाम जातिसूचक हैं और ऐसे गांवों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.
उनका कहना है, "जो भी इस प्रकार के नाम वाले गांव मौजूद होंगे, उनको सूचीबद्ध कराया जाएगा. फिर ग्राम पंचायत के प्रस्ताव और तय प्रक्रिया के अनुसार आगे कार्रवाई की जाएगी."
इलाके के ज़िला कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने भी इस बात पर खेद प्रकट करते हुए कहा, "आज एक दौर में भी ऐसे नाम होना उचित नहीं है. हम अपनी तरफ़ से भी कोशिश करेंगे कि ऐसे गांवों को चिन्हित करके और तय प्रक्रिया के अनुसार ग्रामीणों की सहमति से नाम बदले जाएं".
लेकिन सवाल यही है कि क्या गांव का नाम बदलने से सचमुच कुछ बदलेगा?
संजय को ऐसा लगता है. वो कहते हैं, "नाम बदल जाएगा तो बहुत कुछ बदलेगा. लोगों का नज़रिया बदलेगा. आगे आने वाले बच्चे जब बाहर जाएंगे तो बिना झिझक के अपनी पहचान बता पाएंगे."
मेनका की भी यही उम्मीद है. वो कहती हैं, "शायद तब, आप कहां रहती हैं जैसे एक साधारण सवाल का जवाब देने में मुझे झिझक नहीं होगी. मैं खुलकर अपनी पहचान बता पाऊंगी".
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
-तारन प्रकाश सिन्हा
जल संरक्षण की चर्चा अक्सर बांधों, नहरों और तालाबों से शुरू होती है, लेकिन किसी भी जल क्रांति की असली नींव न तो कंक्रीट की संरचनाएं होती हैं और न ही मशीनें। उसकी सबसे बड़ी शक्ति वह समाज होता है, जो पानी को अपना साझा उत्तरदायित्व मानता है।
आज जब दुनिया “ग्रीन वाटर” अर्थात मिट्टी में संचित नमी और वर्षा जल के संरक्षण की बात कर रही है, तब यह समझना भी आवश्यक है कि पानी केवल तकनीक से नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए लोगों का जुड़ना, समुदाय का जागना और साझी जिम्मेदारी की भावना विकसित होना उतना ही जरूरी है। जब पानी गांव में रुकता है, तब समृद्धि भी गांव में ठहरती है।
कुछ दशक पहले तक भारत की सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा थी। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नदियों को जोड़ा गया, बांध बनाए गए, नहरों का विस्तार हुआ और भूजल का व्यापक उपयोग किया गया। उस दौर की अपनी आवश्यकताएं थीं और अपनी उपलब्धियां भी। देश ने भूख के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीती।
लेकिन समय के साथ एक नया संकट सामने आया। जिस पानी ने हमें समृद्ध बनाया, हम उसी पानी को अपनी पहुंच से दूर करते चले गए। हर वर्ष पर्याप्त वर्षा होती रही, नदियां बहती रहीं, लेकिन खेतों में नमी घटती गई। बोरवेल गहरे होते गए और भूजल स्तर लगातार नीचे जाता गया। हम पानी निकालने की तकनीकों में आगे बढ़े, लेकिन पानी रोकने की संस्कृति पीछे छूटती गई।
यहीं से एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता महसूस होती है। क्या पानी केवल नदियों, बांधों और भूजल तक सीमित है, या वह नमी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जो वर्षा के बाद मिट्टी में ठहरती है, फसलों को जीवन देती है और धरती को हरा-भरा बनाए रखती है?
दुनिया आज इसी प्रश्न का उत्तर खोज रही है। जल प्रबंधन का केंद्र अब केवल “ब्लू वाटर” तक सीमित नहीं है, बल्कि “ग्रीन वाटर” की ओर भी बढ़ रहा है। ग्रीन वाटर वह जल है जो मिट्टी में संचित रहता है, फसलों का पोषण करता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविक नींव बनता है।
लेकिन ग्रीन वाटर का विचार केवल पानी का विचार नहीं है; यह समाज और सहभागिता का विचार भी है।
आखिर कोई गांव अपनी हर बूंद बारिश को कैसे सहेजेगा? कोई खेत अपनी नमी कैसे बनाए रखेगा? कोई तालाब वर्षों तक जीवित कैसे रहेगा?
इसका उत्तर किसी मशीन, ऐप या सरकारी आदेश में नहीं छिपा है। इसका उत्तर लोगों में छिपा है।
-अशोक पांडे
तुर्की के महाकवि नाजिम हिकमत (15 जनवरी 1902 - 3 जून 1963) कुल इकसठ साल पांच महीने जिए। उनके देश की सरकार उनसे डरती थी सो इनमे से अठारह साल जेल में कटे और तेरह निर्वासन में। नाजिम हिकमत को इतने लम्बे समय तक जेल में बंद रखने के सरकारी फैसले का दुनिया भर में विरोध हुआ और 1949 में उनकी रिहाई की मांग करते हुए पाब्लो पिकासो, पॉल रोब्सन, ज्यां-पॉल सार्त्र और पाब्लो नेरुदा जैसी हस्तियों ने एक विश्वव्यापी अभियान शुरू किया। सरकार ने इस अभियान को जऱा भी तवज्जो नहीं दी। अगले साल जेल में कैद नाजिम को विश्व शान्ति पुरस्कार देने की घोषणा भी हुई।
तुर्की की बुर्सा जेल में रहते हुए उन्हें दस साल बीत चुके थे जब एक कविता की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखा-
जब से कैद किया गया है मुझे
दस फेरे लगा चुकी धरती सूरज के गिर्द
और अगर आप धरती से पूछेंगे तो वो कहेगी:
‘वक्त के इतने जऱा से टुकड़े का
क्या जिक्र। ’
और अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूँगा:
‘दस साल मेरी जिन्दगी के।’
जिस साल मैं कैदखाने में आया था
मेरे पास एक पेन्सिल थी।
वह घिस गयी हफ्ते भर में।
और अगर आप पेन्सिल से पूछेंगे तो वो कहेगी:
‘एक पूरी जिन्दगी।’
और मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगा:
‘फक़़त एक हफ्ता बस।’
1940 की सर्दियों में जब उन्हें पहली बार इस जेल में लाया गया था, एक लेजेंड के तौर पर उनकी ख्याति वहां रह रहे कैदियों तक उनसे पहले पहुँच चुकी थी। इनमें से ज्यादातर कैदी नहीं जानते थे कि नाजिम बीसवीं सदी के सबसे बड़े तुर्की कवि थे अलबत्ता उन्हें इतना मालूम था कि उनके दुश्मन भी उन्हें मोहब्बत करते थे।
नाजिम को ओरहान कमाल नाम के एक अठाईस वर्षीय युवक के साथ कोठरी शेयर करनी थी। ओरहान भी सरकार-विरोधी काम करने के इल्जाम में पांच साल की सजा काट रहा था। एक छात्र के तौर पर ओरहान ने नाजिम हिकमत को न केवल पढ़ा था, एक प्रशंसक के रूप में उन्हें चिठ्ठियाँ भी लिखी थीं। यह अलग बात है कि ये चिठ्ठियाँ कभी भेजी ही नहीं जा सकीं क्योंकि नाजिम जेल में थे। पुलिस के छापे के दौरान ओरहान के घर से इन चिठ्ठियों के मिलने को भी उसके खिलाफ सुबूत के तौर पर पेश किया गया।
नाजिम हिकमत ओरहान के लिए रोल मॉडल और हीरो थे और किस्मत ने उसे उनके साथ एक ही कोठरी में बंद कर दिया था। नाजिम की संगत में ओरहान उनका शिष्य बन गया। कैद में भी नाजिम इतना सारा काम करते थे कि उनके श्रम और धैर्य को देख कर ही बहुत कुछ सीखा जा सकता था। नाजिम रोज लिखते थे। ‘ह्यूमन लैंडस्केप्स फ्रॉम माय कन्ट्री’ उन्होंने जेल में ही शुरू कर के पूरा किया। कविताओं और लेखों के अलावा वे लगातार अनुवाद भी किया करते थे। टॉलस्टॉय की ‘वार एंड पीस’ का अनुवाद उन्होंने बुर्सा जेल में ही किया। न जाने कितने कैदियों को उन्होंने लिखना, पढऩा और कपड़ा बुनना सिखाया।
ओरहान को उनके साथ तीन साल बिताने का मौक़ा मिला। ओरहान को कविता लिखने का शौक तो था लेकिन कवि की प्रतिभा नहीं थी। नाजिम ने उससे गद्य लिखने को कहा और लेखन की बारीकियां सिखाईं। इन तीन सालों में उनके बीच गुरु-शिष्य का एक अनूठा सम्बन्ध बना। इस सम्बन्ध का नतीजा यह निकला कि आगे चल कर ओरहान कमाल एक बड़ा उपन्यासकार बना। उसकी कहानियों पर फि़ल्में भी बनाई गईं। कमाल 1943 में जेल से रिहा हुआ। अपने उस्ताद को कृतज्ञता के साथ याद करते हुए कमाल ने ‘इन जेल विद नाजिम हिकमत’ शीर्षक संस्मरण भी लिखा जो एक महान मनुष्य, अध्यापक, क्रांतिकारी और सचेत साहित्यकार के तौर पर नाजिम की छवि को और भी पुख्ता बनाता है।
नाजिम न होते तो ओरहान कमाल लेखक नहीं बन सकता था।
इसी जेल में नाजिम को इब्राहीम बलबन नाम का अठारह साल का एक लडक़ा मिला। बलबन एक बेहद गरीब परिवार का का बेटा था और अवैध रूप से भांग की खेती करने के झूठे इल्जाम में उसे छ: महीने की जेल हुई थी। जुर्माना न भर सकने के कारण उसकी कैद में तीन साल और जुड़े और उसके बाद एक और झूठे मुकदमे में फंसा कर सजा को चार-छ: साल आगे खींच दिया गया। उन्हें अपने जीवन के सबसे खूबसूरत दौर के दस साल जेल में बिताने पड़े। भीषण गरीबी के कारण कुल तीसरी कक्षा से आगे न पढ़ सके बलबन को बचपन में चित्रों की नकल बनाने में आनंद आता था। जेल में उसने कहीं से एक पेन्सिल का जुगाड़ कर अपने इस पुराने शौक को पुनर्जीवित किया। नाजिम हिकमत खुद भी पेंटिंग किया करते थे। जब उन्हें बलबन के बारे में पता लगा उन्होंने अपने सारे रंग और ब्रश उसे तोहफे में दे दिए।
इब्राहीम बलबन तो ओरहान कमाल से भी सात साल छोटा था। नाजिम उसके भी उस्ताद बने। अपने से बीस साल छोटे इस छोकरे को नाजिम ने कला की बारीकियों के अलावा दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति के पाठ भी पढ़ाये। दोनों की दोस्ती 1947 में बलबन की रिहाई तक यानी सात साल चली। नाजिम के अनेक पोर्ट्रेट बनाने के अलावा अपनी इस दोस्ती पर इब्राहीम बलबन ने दो किताबें लिखीं।
पारिवारिक कलह के साथ ही वित्तीय और सामाजिक दबाव के कारण भारत में आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला पहलू सामने आया है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट –
एनसीआरबी की ओर से जारी ‘भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 (एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया)’ शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 के दौरान देश में करीब 1।70 लाख लोगों ने आत्महत्या कर ली। वर्ष 2023 के आंकड़ों के मुकाबले यह 0।4 फीसदी कम जरूर है। हालांकि इस दौरान शादीशुदी पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है। इसकी वजह यह है कि ऐसी एक आत्महत्या सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे परिवार की बर्बादी होती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पारिवारिक कलह बढ़ती आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह (33।5 फीसदी) के तौर पर सामने आई है। इसके अलावा नशाखोरी, शादी संबंधित विवाद, दहेज, वित्तीय बदहाली और बेरोजगारी का स्थान है। छात्र-छात्राओं आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह परीक्षाओं में नाकाम रहना है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की तादाद लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024 के दौरान आत्महत्या करने वालों में 67।5 फीसदी लोग विवाहित थे। पारिवारिक कारणों से विवाहित पुरुषों के आत्महत्या की बात जब सामने आती है तो कई बार उनकी पत्नियों की ओर उंगली उठती है। बीते सालों में दो तीन ऐसे मामले हुए जिसमें पत्नियों को जिम्मेदार बताया गया और ऐसे मामलों ने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरीं।
बढ़ते मामलों की वजह
हालांकि सवाल है कि क्या पारिवारिक कलह का मतलब सिर्फ पति-पत्नी विवाद है। महिला अधिकार कार्यकर्ता इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं। पश्चिम बंगाल राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष लीना गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, ‘पारिवारिक कलह का दायरा व्यापक है। यह सिर्फ पति-पत्नी के बीच आपसी विवाद नहीं हैं। भाई-बहन, माता-पिता और रिश्तेदारों से विवाद भी पारिवारिक कलह के दायरे में आता है। ऐसे में शादीशुदा पुरुषों की आत्महत्या के लिए सिर्फ पत्नियों या महिलाओं को दोषी ठहराना उचित नहीं है।’
उनका कहना है कि पुरुष शादी के बाद विभिन्न वजहों से मानसिक दबाव में रह सकते हैं। इसमें दफ्तर की राजनीति और नौकरी की दिक्कतों के अलावा आर्थिक मुश्किलों जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।
कोलकाता की महिला अधिकार कार्यकर्ता सुष्मिता बारुई भी यही बात कहती हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, ‘पारिवारिक कलह से होने वाली मौतों के लिए सीधे पत्नी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। एनसीआरबी ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा है। पारिवारिक कलह शब्द का दायरा बहुत बड़ा है। हमें तस्वीर के दूसरे पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए। देश में हर साल भारी तादाद में दहेज उत्पीडऩ के कारण महिलाओं की मौत की खबरें भी आती हैं।’
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सामाजिक स्थिति और कई अन्य वजहों से पुरुष ऐसी स्थिति में मन ही मन घुटते हुए मानसिक अवसाद का शिकार हो जाता है। महिलाओं के उलट ज्यादातर मामलों में किसी सहयोगी या परिजन से अपने मन की पीड़ा भी साझा नहीं कर पाता।
-डॉ. संजय शुक्ला
देश में इन दिनों परीक्षाओं पर सबसे बड़ा सवालिया निशान लग रहा है जिसके चलते जहां छात्र और अभिभावक उद्वेलित हैं वहीं इस मुद्दे पर सियासी पारा भी सरगर्म है। बीते दिनों राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ‘एनटीए’ द्वारा ली गई ‘नीट- यूजी 2026’ परीक्षा रद्द होने का मामला शांत ही नहीं हुआ था कि देश के विभिन्न यूनिवर्सिटीज में प्रवेश के लिए 30 मई को आयोजित ‘सीयूईटी-यूजी’ परीक्षा तकनीकी खामियों की वजह से घंटों बाधित रही। इस तकनीकी अव्यवस्था से जहां ‘एनटीए’ की खूब फजीहत हुई वहीं छात्रों में बेचैनी रही। इधर एनटीए की परीक्षा पर पूरे देश में छात्रों और युवाओं के बीच आक्रोश और आशंका का ज्वार उफान पर था कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ‘सीएसईबी’ के 12वीं परीक्षा के उत्तर पुस्तिकाओं के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम ‘ओएमएस’ में भारी पैमाने पर गड़बडिय़ों का भांडा फूट गया। सीबीएसई शुरुआत में किसी भी तकनीकी गड़बड़ी से इंकार करते रहा लेकिन जैसे - जैसे सबूत सामने आने लगे तब सरकार ने भी स्वीकार किया कि मूल्यांकन में तकनीकी गड़बडिय़ां हुई है। अलबत्ता सरकार ने ‘ओएसएम’ प्रणाली में हुई चूक तथा इसके लिए कंपनियों ‘वेंडर्स’ चयन में टेंडर प्रक्रिया में हुई कथित विसंगतियों के चलते सरकार ने सीएसईबी के चेयरमैन और सचिव को हटाते हुए मामले की जांच के लिए एक सदस्यीय समिति गठित कर दिया है।
गौरतलब है कि सीबीएसई की 12 वीं की परीक्षा में इस साल तकरीबन 17 लाख छात्र शामिल हुए थे। इस परीक्षा के परिणाम जारी होने के बाद छात्रों और अभिभावकों के बीच हाहाकार मच गया क्योंकि उन्हें उम्मीद से काफी कम अंक मिले थे। इसी के चलते देश भर के चार लाख छात्रों ने कापियों को दोबारा जांचने के लिए आवेदन किया है। छात्रों के मुताबिक उन्हें जो स्कैनिंग कॉपी दी गई वह या तो दूसरे छात्र का था अथवा उसमें से कुछ पन्ने गायब थे। छात्रों का यह भी कहना था कि स्कैनिंग कॉपी साफ नहीं है अथवा यह कई पन्ने कटे हुए हैं लिहाजा ‘ओएमएस’ पर सवाल उठना लाजिमी था। इधर सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि री- इवैल्यूएशन ( कापियों की दोबारा जांच) के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की कापियां फिर से जांची जाएंगी। सरकार के इस फैसले के बाद बोर्ड द्वारा री- इवैल्यूएशन पोर्टल शुरू किया गया है जिसमें हजारों छात्रों ने आवेदन जमा किया है जिसके आंकड़े लाखों तक पहुंचने की उम्मीद है।
दूसरी ओर बात आगामी 21 जून को दोबारा ली जाने वाली नीट परीक्षा की करें तो सरकार इस दिशा में में बेहद चाक- चौबंद नजर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट में एनटीए को भंग करने संबंधी याचिका की सुनवाई के दौरान एनटीए को नसीहत दिया है कि उसे यूपीएससी से सीखने की जरूरत है वहां कभी भी पेपर लीक नहीं होता। अदालत ने यह भी कहा कि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी पेपर लीक जैसी घटनाएं नहीं रूकेंगी। इधर केंद्र सरकार ने सुप्रीम अदालत को बताया है कि इस मामले की निगरानी स्वयं प्रधानमंत्री कर रहे हैं। इधर केंद्र सरकार की एक उच्च स्तरीय बैठक में दोबारा ली जाने वाली नीट के प्रश्नपत्रों के प्रिंटिंग प्रेस से परीक्षा केंद्रों तक अत्यंत सुरक्षित और त्वरित डिलीवरी का जिम्मा वायुसेना को सौंपने का प्रस्ताव किया गया है। यदि इस प्रस्ताव पर अमल होता है तब यह देश के इतिहास में पहला मौका होगा जब किसी परीक्षा को फूल प्रूफ कराने के लिए एयरफोर्स के लॉजिस्टिक हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया गया हो।
गौरतलब है कि बीते 3 मई को ली गई नीट में लगभग 23 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे जिन्होंने सालों से दिन-रात मेहनत किया था लेकिन एक झटके में उनके मेहनत पर पानी फिर गया। इधर नीट रद्द होने को लेकर देश भर में छात्रों और युवाओं का ग़ुस्सा उबाल पर है और राजस्थान सहित अन्य राज्यों में उग्र प्रदर्शन हुए हैं। आक्रोशित छात्रों का सरकार से सवाल है कि, कुछ लोगों की गलती का सजा लाखों बच्चों को क्यों दिया जा रहा है? छात्रों का यह सवाल पूरी तरह से जायज है। दूसरी ओर नीट रिटेस्ट के चलते अनेक छात्र मानसिक दबाव में हैं इन छात्रों का सिस्टम से भरोसा उठ चुका है। अनेक मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार उनके पास रोज लगभग दर्जन भर नीट के बच्चे आ रहे हैं जिनमें अवसाद के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। ऐसे बच्चों को तुरंत काउंसलिंग की जरूरत है इस दिशा में अभिभावकों को सचेत होना होगा।
बहरहाल मेडिकल दाखिला परीक्षा में पेपर लीक, नकल और फर्जीवाड़े की यह कोई पहली घटना नहीं है बल्कि कालांतर में भी इस प्रकार के अनेक घोटाले हुए हैं। साल 2024 के नीट परीक्षा परिणाम पर छात्रों और अभिभावकों की उंगलियां उठीं थी तब मामला सडक़ से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। देश आज भी मध्यप्रदेश में 2013 में हुआ व्यापम घोटाले को नहीं भूला है। छत्तीसगढ़ में साल 2011का पीएमटी पर्चा लीक कांड, उत्तरप्रदेश में 2021 का आयुष घोटाला इन परीक्षाओं की पवित्रता की पोल खोल रहे हैं। बहरहाल जिस तरह से साल दर साल नीट के पर्चे फूट रहे हैं और अनियमितता उजागर हो रही है उससे यह निश्चित है कि ‘नीट’ पूरी तरह से ‘क्लीन’ नहीं है। दूसरी ओर इस परीक्षा में अनियमितता और अनिश्चितता के चलते जहां केंद्र सरकार की किरकिरी हो रही है वहीं ‘एनटीए’ के साख पर भी पलीता लग रहा है। लिहाजा केंद्र सरकार और एनटीए को परीक्षा को ‘फूल प्रूफ’ बनाने की दिशा में गंभीरता और दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित करने की दरकार है।
दरअसल नीट सहित अन्य महत्वपूर्ण परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधलियों के मूल में मुख्य रूप से राजनीतिक हस्तक्षेप, कोचिंग माफियाओं की रसूख , धनबल का बढ़ता प्रभाव और विलंबित जांच और न्याय प्रक्रिया ही जिम्मेदार है। देश में अभी तक हुए मेडिकल घोटालों पर गौर करें तो इस मामले में संलिप्त बड़ी मछलियां आजाद हैं जबकि छोटे-मोटे कर्मचारी और अभ्यर्थी ही पकड़ में हैं।अतीत में हुए परीक्षा घोटाले के मामले आज भी अदालतों और जांच एजेंसियों के दफ्तरों में धूल खाते पड़े हैं। सरकार और एजेंसी इन परीक्षाओं की शुचिता और गोपनीयता पर कितना संजीदा है? इसका अंदाजा फाइलों में दफन नीट- यूजी 2024 पेपर लीक मामले को लेकर गठित डॉ. राधाकृष्णन समिति की उस रिपोर्ट से लगाई जा सकती है जिसमें उन्होंने नीट को ‘पेन एंड पेपर टेस्टिंग’ की जगह ‘कंप्यूटर बेस्ड टेस्टिंग’ ‘सीबीटी’ मोड पर लेने की सिफारिश किया था। अलबत्ता अब जाकर सरकार ने फैसला किया है कि अगले साल से नीट ऑनलाइन ली जाएगी जो मेहनती छात्रों के लिए राहत भरी खबर है।
3 जून विश्व साइकिल दिवस
-दिलीप कुमार पाठक
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब हर व्यक्ति समय की कमी और तनाव की शिकायत करता है, तब एक बेहद साधारण और किफायती समाधान हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है। वह समाधान है - साइकिल। आज 3 जून को पूरी दुनिया ‘विश्व साइकिल दिवस’ मना रही है। यह दिन किसी आधुनिक आविष्कार का जश्न नहीं, बल्कि उस सादगी और उपयोगिता को याद करने का अवसर है, जिसे हमने विकास की अंधी दौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया है। जब पूरी दुनिया महंगे ईंधन, ट्रैफिक जाम और जहरीले धुएं से हांफ रही है, तब साइकिल एक सुगम साधन की तरह नजर आती है। यह कोई साधारण सवारी नहीं, बल्कि बिना धुएं वाली वह मूक क्रांति है जो व्यक्ति की सेहत, जेब और धरती तीनों को एक साथ संवार सकती है।
आजकल की जीवनशैली को देखें तो हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आती हैं। घर से महज दो कदम दूर सब्जी की दुकान या दूध की डेयरी तक जाने के लिए भी लोग तुरंत मोटरसाइकिल या कार की चाबी उठा लेते हैं। नतीजा यह हुआ है कि शहरों की हवा भारी हो चुकी है, सडक़ों पर पैदल चलने की जगह नहीं बची और इंसानी शरीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है। लोग शारीरिक रूप से खुद को फिट रखने के लिए हर महीने जिम में हजारों रुपये खर्च करते हैं और एक ही जगह खड़े होकर ट्रेडमिल पर दौड़ते हैं। जबकि इसका सबसे आसान और प्राकृतिक विकल्प हमारी दिनचर्या में ही छुपा है। सुबह या शाम को सिर्फ आधा घंटा साइकिल चलाना दिल को मजबूत करता है, मानसिक तनाव को कम करता है और शरीर को ऊर्जा से भर देता है।साइकिल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह समाज में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करती। इसके लिए न तो महंगे पेट्रोल-डीजल की जरूरत होती है और न ही किसी भारी-भरकम मेंटेनेंस या सर्विसिंग के खर्च की। यह आत्मनिर्भरता और बचत का सबसे पहला और सच्चा पाठ पढ़ाती है।
-अशोक पांडे
हरियाणे की वही जिद्दी लडक़ी जो पेरिस ओलिम्पिक्स के फाइनल में पहुँचने वाली पहिला हिन्दुस्तानी पहलवान बनी थी। इतने बड़े स्तर की प्रतियोगिताओं में अमूमन फिसड्डी रहने वाले हमारे देश के लिए यह गौरव का विषय था। सारा देश फाइनल के इंतज़ार में था जब मुकाबले से ठीक पहले उसका वजऩ सौ ग्राम ज़्यादा पाया गया और वह डिसक्वालीफाई हो गई थी।
मुझे उम्मीद है इस त्रासदी की सभी को याद होगी। यह भी याद होगा जब इस घटना को एक साजि़श बताते हुए रोती हुई विनेश ने कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी थी। वह भारत लौटी तो एयरपोर्ट से घर तक आम जन ने उसका जैसा स्वागत किया वह राष्ट्राध्यक्षों तक में डाह पैदा कर सकता था। हम सब ने उसे अपनी बहन-बेटी माना और उसके रोने में साथ दिया।
फिर एक बदसूरत कहानी के टुकड़े एक-एक कर सामने आने लगे- महिला पहलवानों के साथ होने वाला सेक्सुअल अपमान, प्रशासकों द्वारा किया जाने वाला घनघोर पक्षपात और शर्मनाक बयानबाजी। देश ने देखा कि भारतीय कुश्ती के प्रशासन के सर्वोच्च पदों पर ऐसे लोग काबिज थे जिनके आपराधिक रेकॉर्ड्स थे और जो खिलाफत में उठने वाली हर आवाज़ को खामोश कर देना जानते थे।
विनेश ने आगे आकर सारे खुलासे किए, लू और बारिश के बीच भूख हड़ताल पर बैठी, और वह सब किया जो कोई भी गैरतमंद इंसान करता। समूचे तंत्र ने नंगे होकर उस छोटी-सी हिम्मती स्त्री को सबक सिखाने के लिए कमर कस ली और जहाँ-जहाँ संभव था उसे अपमानित और बदनाम करने में कोई कमी न छोड़ी।
संन्यास की घोषणा के बाद विनेश ने विधायक का चुनाव जीता और एक बच्चे की माँ बनी। पिछले साल के अंत में उन्हें अहसास हुआ कि कुश्ती से नाता जोडऩे का एक और जतन किया जाना चाहिए। उसने संन्यास वापस ले लिया और घोषणा की कि उनका अगला लक्ष्य 2028 के लॉस एंजेलिस ओलिम्पिक्स में मैडल जीतना है।
पिछले महीने विनेश यूपी के उसी गोंडा में एशियन गेम्स के ट्रायल से पहले के मुकाबलों में भाग लेने पहुँची जो भारतीय कुश्ती के माफिया हिस्ट्रीशीटर मुखिया का ठिकाना है।
सारा सिस्टम एकजुट हो गया कि यह हिम्मती लडक़ी खेल ही न सके। सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा जिसने विनेश के हक़ में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि विनेश देश का गौरव हैं।
आप यकीन करेंगे इस मामले में जब भारतीय कुश्ती संघ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा तो उसने अपनी अर्जी में विनेश के पेरिस में हुए डिसक्वालीफिकेशन को ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताया। कोर्ट ने इस बात पर भी संघ को लताड़ा और विनेश के पक्ष में फैसला दिया।
-राहुल सिंह
पिछले दिनों ‘हिन्दुस्तान टाइम्स‘ के पेज पर 30 अप्रैल 2026 को शुभम पांडे के अंग्रेजी समाचार का आशय है कि- 20 लाख डॉलर मूल्य की अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा 1939 में लक्ष्मण मंदिर के पास मिले कांस्य की विशाल धरोहरों में से एक इस प्रतिमा को रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में रखा गया था। यह प्रतिमा संग्रहालय से चोरी हो गई और 1982 तक अमेरिका में तस्करी करके ले जाई गई, और अंततः 2014 तक न्यूयॉर्क में एक निजी संग्रह में पहुंच गई। यही समाचार ‘अमर उजाला‘ के पेज पर ललित कुमार सिंह ने 01 मई 2026 को लिखा कि- अमेरिका ने लौटाई छत्तीसगढ़, रायपुर से चुराई गई कुल कीमत 20 लाख डालर की बेशकीमती ‘अवलोकितेश्वर‘ कांस्य प्रतिमा।
इसी दौरान मई पहले-दूसरे सप्ताह में संग्रहालय के पुरावशेषों के मूल दस्तावेज ‘अवाप्ति पंजियों‘ का दीमक के कारण नष्ट हो जाने की जानकारी भी आई। ऐसी स्थिति में संग्रहालय के पुरावशेषों के मिलान के लिए अवाप्ति पंजी की अन्य प्रति, पुराविदों द्वारा इस संग्रहालय के पुरावशेषों संबंधी शोधपत्र, संग्रहालय के पूर्व प्रकाशनों, लेख, समाचार तथा अन्य संबंधित कार्यालयीन अभिलेख सहायक हो सकते हैं। उक्त अवलोकितेश्वर प्रतिमा, जो रायपुर से चुराई गई बताई जा रही है, के संबंध में जानकारी कि वह कब चोरी हुई थी? चोरी की रिपोर्ट लिखाई गई थी? खोज-बीन के क्या प्रयास हुए थे आदि की जानकारी मुझे अब तक नहीं मिली है। मगर एक स्रोत जिसका हवाला नीचे दिया जा रहा है, सिरपुर की ‘अवलोकितेश्वर पद्मपाणि‘ का उल्लेख तथा चित्र उपलब्ध हुआ है, यदि यह वही प्रतिमा है तो इसका अवाप्ति पंजी क्रमांक-17, दर्शाया गया है।
महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के पुरावशेषों संबंधी आधारभूत काम यहां सहायक संग्रहाध्यक्ष रहे बालचन्द्र जैन जी ने किया है। उन्होंने 1960 में संग्रहालय के पुरातत्व उपविभाग में संग्रहीत वस्तुओं का सूचीपत्र प्रकाशित कराया था, जिसका भाग 3, धातु-प्रतिमाएं हैं।
पुस्तिका में दस चित्र फलक भी प्रकाशित हैं।
- मृदुलिका झा
सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के नए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम पर स्टूडेंट्स, अभिभावक और विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं।
ऐसा दावा किया जा रहा था कि इस सिस्टम को परीक्षा में जांच को सटीक और तेज़ बनाने के लिए लाया गया है, लेकिन यही अब सवालों के घेरे में आ गया है।
12वीं कक्षा के बहुत से स्टूडेंट धुंधली आंसर शीट, पोर्टल क्रैश और यहां तक कि आंसर शीट्स बदलने की शिकायत कर रहे हैं।
मुद्दा इतना तूल पकड़ चुका कि सीबीएसई के 12वीं बोर्ड परीक्षा में बैठे हर चार में से करीब एक छात्र ने अपनी जांची हुई आंसर शीट की स्कैन कॉपी मांगी है।
सीबीएसई के 26 मई 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक परीक्षा में शामिल 17 लाख 68 हजार 968 छात्रों में से 4 लाख 4 हजार 319 छात्रों ने स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया, जो कुल का करीब 23 फीसदी है।
बीबीसी ने यह समझने की कोशिश की कि स्टूडेंट्स किस-किस तरह की समस्याएं झेल रहे हैं।
विद्यार्थी, वकील और सीबीएसई से जुड़े एक टीचर से बातचीत में 5 सवाल सामने आए, जिनके जवाब लाखों स्टूडेंट्स समेत अभिभावक चाहते हैं।
क्या है पूरा मामला
13 मई को सीबीएसई के 12वीं कक्षा के नतीजे आए। पिछले साल के मुकाबले इस साल करीब 3 फीसदी कम स्टूडेंट पास हुए।
रिजल्ट जारी होते ही सीबीएसई के नए मूल्यांकन सिस्टम ओएसएम (ऑन स्क्रीन मार्किंग) पर सवाल उठने लगे, जिससे डिजि़टल तरीके से मूल्यांकनकर्ताओं ने आंसर कॉपी जांची थीं।
पहले का तरीक़ा यह था कि परीक्षा के बाद छात्रों की आंसर कॉपियां बंडल बनाकर टीचरों के पास भेजी जाती थीं। टीचर उन्हें हाथ में लेकर लाल पेन से जांचते थे, नंबर जोड़ते थे और साइन करते थे।
अब सीबीएसई ने नया तरीक़ा अपनाया है। पहले सभी कॉपियां स्कैन होती हैं यानी उनकी डिजि़टल फ़ोटो खींची जाती है। फिर यह फ़ोटो ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड हो जाती है।
टीचर अब असली कॉपी की जगह कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन पर वही कॉपी देखकर नंबर देते हैं, बिल्कुल वैसे जैसे हम फ़ोन पर किसी डॉक्युमेंट की पीडीएफ़ पढ़ते हैं।
विवाद बढऩे पर 15 मई को सीबीएसई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस नए ओएसएम सिस्टम का बचाव किया था।
साथ ही बताया था कि उसने बड़े स्तर पर इस सिस्टम के लिए तैयारी की थी और जहां ज़रूरत लगी, कॉपियों की रीस्कैनिंग और मैनुअल चेकिंग भी कराई थी।
सीबीएसई का कहना था कि उसने 100 टीचरों से कॉपी चेक कराकर ड्राईरन भी कराया था।
बोर्ड के मुताबिक़, सभी ख़ामियां ठीक कराने के बाद ही उसने ओएसएम प्रणाली से कॉपी चेक कराई।
लेकिन इसके आगे के घटनाक्रम लगातार विवाद बढ़ाते चले गए। इसी बीच एक छात्र वेदांत श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि बोर्ड ने उन्हें एक विषय की ग़लत आंसर शीट भेजी है।
मामला तब और बढ़ गया जब उन्हें दूसरे देश का बताकर ट्रोल किया गया। सीबीएसई ने वेदांत के केस में हुई तकनीकी समस्या को हल कर दिया, लेकिन नए असेसमेंट सिस्टम यानी ओएसएम पर लगातार सवाल उठने लगे।
इस पर 24 मई को सीबीएसई ने तकनीकी ख़ामियों की बात स्वीकारी और किसी भी संभावित समस्या की जांच एक्सपर्ट से कराने की बात कही।
फि़लहाल स्थिति ये है कि परीक्षा में बैठे लगभग 18 लाख विद्यार्थियों में से 4 लाख से कुछ ज़्यादा ने आंसर शीट की स्कैन्ड कॉपी की मांग की है। ध्यान रहे कि पुराने बंदोबस्त में मैनुअल चेकिंग होती थी।
1. नए सिस्टम में कॉपी जांचने की ट्रेनिंग क्या पर्याप्त थी?
सीबीएसई ने ओएसएम सिस्टम को लेकर कहा कि इससे जांच की प्रक्रिया ज़्यादा तेज़ और सटीक हो सकेगी। साथ ही मैनुअल ग़लतियां कम से कम रहेंगी, लेकिन अब इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं।
ओएसएम प्रणाली से कॉपी जांचने वाले परीक्षकों की ट्रेनिंग पर सवाल उठ रहे हैं।
नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध एक स्कूल की शिक्षिका कहती हैं, ‘पहले टीचर ऑफ़लाइन में भी गड़बडिय़ां करते थे। कभी टोटलिंग में नंबर छूट जाते थे, तो कभी सही जवाब को ग़लत मार्क कर दिया जाता था। इन सबसे बचने के लिए ऑन स्क्रीन का कांसेप्ट लाया गया।’
वे कहती हैं, ‘एग्जाम ऑफ़लाइन लिया जा रहा है और जांच ऑनलाइन हो रही है। इस प्रक्रिया के लिए परीक्षकों को लंबी ट्रेनिंग मिलनी चाहिए थी, लेकिन बोर्ड ने मान लिया कि टीचर तकनीक समझते ही होंगे। काफी सतही प्रशिक्षण के बाद सिस्टम लागू हो गया।’
वहीं एनडीटीवी से बात करते हुए शिक्षाविद डॉ। एसके दत्ता ने कहा कि कुछ शिक्षक ऑनलाइन तकनीक में माहिर हैं तो कुछ को अभी और प्रशिक्षण की जरूरत है और यह सच्चाई है।
सीबीएसई को सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि फि़लहाल ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों विकल्प एक साथ कऱीब एक साल तक चलाए जाएं और छात्रों को चुनने की आज़ादी दी जाए।
उनके अनुसार, जब तक शिक्षकों में इस तकनीक को लेकर पूरी परिपक्वता न आ जाए, तब तक पूरी तरह ऑनलाइन सिस्टम पर न जाएं।
हालांकि इस मामले में सीबीएसई बता चुका है कि आंसर शीट जांचकर्ताओं को प्रक्रिया समझने में मदद करने के लिए मॉक इवेलुएशन करने का मौक़ा दिया गया था।
जैसे किसी बड़े मैच से पहले टीम प्रैक्टिस मैच खेलती है, वैसे ही मॉक इवेलुएशन में परीक्षकों को असली कॉपियां जांचने से पहले नकली या पुरानी आंसर शीट दी जाती हैं।
इसका मकसद यह होता है कि जांचकर्ता नए सिस्टम को समझ सकें और ग़लतियां असली रिजल्ट में न हों।
सीबीएसई का कहना है कि उसने फऱवरी में यही किया था, ताकि टीचर ओएसएम यानी ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पर हाथ आज़मा सकें।
2. क्या ओएसएम को लागू करने से पहले उसकी स्वतंत्र तकनीकी जांच हुई थी?
लेकिन इसके लिए हुए ऑडिट और टेस्टिंग जैसी बातों को लेकर पब्लिक डोमेन में सीमित जानकारी है। इसे लेकर नेता विपक्ष राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि कंपनी पहले अलग नाम से तेलंगाना में काम करती थी।
उनका आरोप है कि साल 2019 और 2023 में बोर्ड परीक्षा से जुड़े विवादों में इस कंपनी का नाम आ चुका है। एनडीटीवी से बात करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दिया।
उन्होंने कहा, ‘राहुल गांधी कह रहे हैं, जिनकी कर्नाटक और तेलंगाना की सरकारों ने उसी कंपनी को काम पर लगाया। तो क्या राहुल गांधी दिल्ली के लिए अलग मानक रखेंगे और कर्नाटक-तेलंगाना के लिए अलग?’
‘इसके अलावा उसकी चयन प्रक्रिया पर भी कुछ सवाल उठे हैं। भारत सरकार के नीति-नियमों के तहत सेंट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेंट पोर्टल के जरिए इसे लगाया गया था। कंपनी की क्षमता पर भी सवाल आ रहे हैं, इसलिए हमने एक समिति बनाई है जो उसकी तकनीक और प्रक्रिया का मूल्यांकन करेगी।’
उन्होंने कहा, ‘प्रक्रिया का उल्लंघन करने का किसी को भी अधिकार नहीं है और जो भी दोषी होगा उसे जवाबदेही लेनी होगी।’
मामला तूल पकडऩे पर सीबीएसई ने आधिकारिक बयान दिया कि एजेंसी को अनुबंध देने के दौरान सभी नियमों का पालन किया गया। बयान के साथ ही बोर्ड ने टेंडर प्रोसेस का डेटा भी सार्वजनिक किया।
3.क्या स्टूडेंट्स का भरोसा अब रिजल्ट की बजाए वेरिफिक़ेशन पर है?
नीट से लेकर कई परीक्षाओं में पेपर लीक और तरह-तरह की गड़बडिय़ों के आरोपों ने क्या अभिभावकों समेत विद्यार्थियों का भरोसा कमजोर किया है?
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने इस मुद्दे पर वेदांत श्रीवास्तव के बड़े भाई सिद्धांत श्रीवास्तव से संपर्क किया। वे आंसर शीट की गड़बड़ी का मुद्दा उठाकर वायरल हो गए थे।
सिद्धांत कहते हैं, ‘नंबर कम होने पर हमने भाई की स्कैन कॉपी मंगाई, जो धुंधली दिख रही थी। गौर से देखने पर समझ आया कि हैंडराइटिंग वेदांत की है ही नहीं।’
‘तब हमने सोशल मीडिया का सहारा लिया था। तब से हमारे पास बहुत से बच्चों के मेल आ रहे हैं कि उन्हें भी ऐसा शक है कि उनके मार्क्स कम हुए हैं या पेपर की अदला-बदली हुई है।’
सिद्धांत कहते हैं, ‘ये समय बहुत क्रूशियल है। इस समय स्टूडेंट कॉलेज में एडमिशन की तैयारी या किसी दूसरी परीक्षा में लगे होते हैं। ऐसे में उन्हें यह डर है कि उनके मार्क्स सही मिले भी हैं या नहीं। वे लगातार स्कैन कॉपी और री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन कर रहे हैं।’
बोर्ड से चार लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स ने अपनी स्कैन आंसर कॉपी की मांग की है, जिसे नए सिस्टम से जोड़ा जा रहा है।
बीबीसी से बातचीत में दिल्ली में रहने वाली 12वीं की छात्रा धृति अग्रवाल कहती हैं, ‘11वीं में मैंने इकॉनॉमिक्स में पूरे स्कूल में टॉप किया था। प्री बोर्ड में भी बहुत हाई स्कोर किया था, लेकिन बोर्ड में कम नंबर मिले।’
उन्होंने कहा, ‘मैंने स्कैन कॉपी मांगी तो पता लगा कि मल्टीपल चॉइस क्वेश्चन के अलावा हर सही सवाल पर आधा-आधा नंबर काटा गया है। इससे बड़ा फर्क आ रहा है। ये कट-ऑफ़ में काफ़ी मायने रखेगा।’
वे कहती हैं कि अगर अब मुझे ये नंबर चाहिए तो हर सवाल के लिए 25 रुपए सबमिट करने होंगे।
बता दें कि सीबीएसई ने हर सवाल के उत्तर के दोबारा मूल्यांकन के लिए चार्ज की जाने वाली फ़ीस को 100 रुपए से घटाकर 25 रुपये कर दिया है।
4. क्या और ज़्यादा कॉपियां मैनुअल चेक करानी चाहिए थीं?
सीबीएसई की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया था कि उसने रिजल्ट जारी करने से पहले करीब 13 हज़ार कॉपियों की मैनुअल चेकिंग करायी थी, क्योंकि स्कैनिंग और री-स्कैनिंग के दौरान ये धुंधली पाई गई थीं और इन्हें डिजि़टली जांचना पर्याप्त नहीं था।
चूंकि सीबीएसई की ओर से आवेदक विद्यार्थियों को जो स्कैन आंसर कॉपियां मिल रही हैं, उनमें भी बड़ी तादाद पर स्कैनिंग या ब्लर दिखने की समस्या देखने को मिल रही है।
ऐसे में क्या और अधिक कॉपियों की मैनुअल जांच नहीं की जानी चाहिए थी?
बीबीसी से बात करने वाले स्टूडेंट्स ने चिंता ज़ाहिर की है कि स्कैन की गई आंसर शीट के कई पन्ने ब्लर मिल रहे हैं। ऐसे में वे किस तरह इनपर लिखे जवाबों के पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर पाएंगे?
साथ ही, कई विद्यार्थियों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि दोबारा कॉपी की चेकिंग भी ओएसएम से ही होनी है, कहीं दोबारा वे उसी समस्या का सामना न करें जो पहले थी।
इन स्टूडेंट्स का कहना है कि नए सिस्टम के कारण 12वीं के बाद अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन चाह रहे छात्र एक या दो नंबर से कट-ऑफ़ से चूक सकते हैं।
यानी मामूली फर्क़ भी उनके भविष्य पर असर डाल सकता है। यह बात भी उठ रही है कि जब मैनुअल जांच पर ही भरोसा करना है तो नया असेसमेंट लागू ही क्यों हुआ?
5. विवाद पर बोलने में क्या शिक्षा मंत्रालय ने देर कर दी?
सीबीएसई की निगरानी करने वाले शिक्षा मंत्रालय और शिक्षा मंत्री ने 13 मई को रिजल्ट आने के बाद काफ़ी समय तक ओएसएम विवाद पर चुप्पी साधे रखी।
यह मंत्रालय इस विवाद के शुरू होने से पहले नीट परीक्षा में लीक के दावों से घिरा हुआ था। हालांकि 28 मई को सीबीएसई के साथ एक अहम बैठक के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस पर बयान देकर ओएसएम गड़बडिय़ों पर जिम्मेदारी ली है।
उन्होंने कहा, ‘यह पहली बार था जब सीबीएसई ओएसएम का उपयोग कर रहा था। यह छात्र-केंद्रित और वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त प्रणाली है।’
उन्होंने यह भी कहा, ‘परिणामों में कुछ त्रुटियां सामने आई हैं, मैं इसकी जि़म्मेदारी लेता हूँ और आपको आश्वस्त करता हूँ कि इसका समाधान निकाला जाएगा। हम इस पर काम कर रहे हैं। हम किसी भी छात्र के सवाल को अनदेखा नहीं छोड़ेंगे।’
इससे पहले री-इवेलुएशन के लिए सीबीएसई के रिक्वेस्ट पोर्टल पर स्टूडेंट्स लॉगिन फ़ेल होने व पेमेंट गेटवे में गड़बड़ी की समस्याओं का सामना कर रहे थे।
तब शिक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी करके बताया था कि ख़ामियां सुधरवाने के लिए आईआईटी कानपुर व मद्रास के विशेषज्ञ टीम को सीबीएसई की मदद के लिए भेजा गया है।
हालांकि तब भी शिक्षा मंत्रालय ने अभिभावकों व विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कोई बयान नहीं दिया।
इसके बाद 27 मई को राहुल गांधी ने ओएसएम से जुड़ी अनियमितता का मामला उठाया तो 28 मई को शिक्षा मंत्री ने उनके दावे पर प्रतिक्रिया दी।
साथ ही उन्होंने कहा कि ओएसएम को लेकर सीबीएसई अपना पक्ष रख चुकी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि पाकिस्तान और कुछ अन्य मुस्लिम बहुल देश इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करें. अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने से पाकिस्तान को कुछ फायदे मिल सकते हैं, लेकिन इसके कई बड़े परिणाम भी होंगे.
डॉयचे वैले पर शामिल शम्स की रिपोर्ट –
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नई मांग के बाद पाकिस्तान मुश्किल स्थिति में फंस गया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए होने वाले किसी भी समझौते में पाकिस्तान को इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले तथाकथित ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ पर हस्ताक्षर करने चाहिए। ट्रंप ने सोमवार को कहा कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों को भी अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनना चाहिए। इस समझौते की शुरुआत साल 2020 में डॉनल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी।
सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने लिखा, ‘अमेरिका ने इस जटिल मुद्दे को सुलझाने के लिए जो मेहनत की है, उसके बाद कम से कम इन सभी देशों को एक साथ अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा होना चाहिए।’ उन्होंने जिन देशों का नाम लिया उनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (जो पहले से सदस्य है), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन (जो पहले से सदस्य है) शामिल हैं। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि सऊदी अरब और कतर को तुरंत इस समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए। बाकी देशों को भी उनका अनुसरण करना है।
अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिका की मध्यस्थता में हुए कई समझौतों की श्रृंखला है। इसका उद्देश्य इस्राएल और अरब देशों के बीच आर्थिक और राजनयिक रिश्तों को सामान्य बनाना है। इसके तहत पहला समझौता 15 सितंबर 2020 को इस्राएल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बीच हुआ था।
फायदे और नुकसान पर विचार
कुछ पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस मांग को खारिज कर दिया है। लेकिन अब तक सरकार या सेना की ओर से इस पर कोई साफ और एकजुट प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस बीच, पाकिस्तान ईरान और अमेरिका-इस्राएल के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अप्रैल में उसने अमेरिका को 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान पर हमलों को रोकने के लिए राजी कर लिया था।
पाकिस्तान अब भी युद्ध खत्म कराने की कोशिश कर रहा है। मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति कई बार पाकिस्तान की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने देश के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अपने 'पसंदीदा' लोगों में भी बताया। ट्रंप से बढ़ती नजदीकी की वजह से इस समय पाकिस्तान की वैश्विक अहमियत बढ़ी है। लेकिन ईरान युद्ध में मध्यस्थता करने की तुलना में अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना पाकिस्तान के लिए कहीं ज्यादा मुश्किल होगा।
राजनीतिक विश्लेषक रजा रूमी ने डीडब्ल्यू से कहा, ‘अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने के फायदे जरूर हैं। लेकिन राजनीतिक तौर पर इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है। पाकिस्तान को वॉशिंगटन और कुछ खाड़ी देशों से कूटनीतिक समर्थन मिल जाएगा। साथ ही आर्थिक और तकनीकी अवसर भी खुल सकते हैं।’ हालांकि, रूमी ने चेतावनी दी कि इस कदम से पाकिस्तान को बड़े खतरे भी हो सकते हैं। वह कहते हैं, ‘इससे फिलिस्तीन मुद्दे पर पाकिस्तान की स्थिति कमजोर पड़ सकती है, ईरान के साथ तनाव बढ़ सकता है और देश के अंदर अस्थिरता भी बढऩे की संभावना है।’
पाकिस्तान इस्राएल को आधिकारिक तौर पर नहीं मानता और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध भी नहीं हैं। हालांकि, पहले दोनों पक्षों के बीच कुछ अनौपचारिक संपर्कों की खबरें सामने आ चुकी हैं। रूमी बताते हैं, ‘जब तक फिलिस्तीन को अलग देश का दर्जा देने की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करना रणनीतिक फैसला कम और दबाव में झुकने जैसा ज्यादा लगेगा। फिलहाल इसके नुकसान, फायदों से ज्यादा दिखाई देते हैं।’
-प्रमोद जोशी
दही होता है या होती है? हाथी चलता है या चलती है? पतंग उड़ती है या उड़ता है? प्याज होती है या होता है? जेब होती है या होता है? चौपाल लगती है या लगता है? ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों शब्द हैं। हिंदी की वर्तनी को लेकर, जितनी ज्यादा बहस है, उतने समाधान नहीं हैं। हिंदी में 'शिकागो मैनुअल ऑफ स्टाइल' जैसा ग्रंथ बनाने की कोशिश नहीं हुई, जिसे कम से कम भाषा-बरतने वाले बड़े वर्ग का समर्थन मिले। केंद्रीय भाषा निदेशालय की वर्तनी पुस्तिका है, पर वह केवल वर्तनी तक सीमित है, और उसे भी पूरा समर्थन प्राप्त नहीं है। हिंदी की पाठ्य पुस्तकों, पत्र सूचना कार्यालय की प्रेस विज्ञप्तियों, रेलवे और मेट्रो स्टेशनों के सूचना पटों, यहाँ तक कि करेंसी नोटों में भी विसंगतियाँ हैं। सरकारी वैबसाइटों के हिंदी संस्करण गूगल ट्रांसलेटर की हिंदी के सहारे चलते हैं।
करीब डेढ़ दशक पहले मुझसे एक पत्रकार मित्र ने पूछा मॉनसून क्यों, मानसून क्यों नहीं? दक्षिण भारतीय भाषाओं में और अंग्रेज़ी सहित अनेक विदेशी भाषाओं में ओ और औ के बीच में एक ध्वनि और होती है। ऐसा ही ए और ऐ के बीच है। ष्टड्डद्यद्य को देवनागरी में काल लिखना अटपटा है। देवनागरी ध्वन्यात्मक लिपि है तो हमें अधिकाधिक ध्वनियों को उसी रूप में लिखना चाहिए। इसलिए वृत्तमुखी ओ को ऑ लिखते हैं। हिंदी के अलग-अलग क्षेत्रों में औ और ऐ को अलग-अलग ढंग से बोला जाता है। मेरे विचार से बाल और बॉल को अलग-अलग ढंग से लिखना बेहतर होगा।
बात औ या ऑ की नहीं। बात मानकीकरण की है। हिंदी का जहाँ भी प्रयोग है वहाँ की प्रकृति और संदर्भ के साथ कुछ मानक होने ही चाहिए। मीडिया की भाषा को सरल रखने का दबाव है, पर सरलता और मानकीकरण का कोई बैर नहीं है। हिंदी के कुछ अखबार अंग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। उनके पाठक को वही अच्छा लगता है, तब ठीक है। पर वे ‘टारगेट’ लिखेंगे या ‘टार्गेट’ यह भी तय करना होगा। प्रफेशनल होगा या प्रोफेशनल? वीकल होगा, वेईकल या ह्वीकल? विदेशी शहरों, व्यक्तियों, संस्थाओं वगैरह के नामों का कोई मानक नहीं है।
ऐसा मैं हिंदी के एक अखबार में प्रकाशित प्रयोगों को देखने के बाद लिख रहा हूँ। आसान भाषा बाज़ार की ज़रूरत है, सुसंगत भाषा भी उसी बाज़ार की ज़रूरत है। सारी दुनिया की अंग्रेज़ी भी एक सी नहीं है, पर एपी या इकोनॉमिस्ट की स्टाइल शीट से पता लगता है कि संस्थान की शैली क्या है। यह शैली सिर्फ भाषा-विचार नहीं है। इसमें अपने मंतव्य को प्रकट करने के रास्ते भी बताए जाते हैं।
हिंदी का विकास कम से कम पाँच उपभाषा अथवा बोली समूहों से हुआ है या हो रहा है। 'मैंने आपको बीस बार समझाया है,' इस वाक्य को आप जब 'मैं आपको बीस बार समझाया हूँ' के रूप में सुनते हैं, तब आपको इलाके के अंतर का पता लगता है। हिंदी के अखबारों का विस्तार हो रहा है और भाषा का भी हो ही रहा है। क्षेत्र-विस्तार के बाद भाषा-प्रयोगों में टकराहट भी होती है। जनपद का यूपी में अर्थ कुछ है, एमपी में कुछ और। राजस्थान में जिसे पुलिया कहते हैं वह यूपी में पुल होता है। ऐसा होने पर क्या करें, यह भी मानकीकरण का विषय है।
मानकों का निर्धारण भी स्थिर वस्तु नहीं है, बल्कि गतिशील है। आज नहीं तो कल हिंदी का निरंतर बढ़ता प्रयोग हमें बाध्य करेगा कि मानकीकरण के रास्ते खोजें। हिंदी में हिंदी पत्रकारिता का विस्तार जिस तेजी से हुआ है उस तेजी से उसका गुणात्मक नियमन नहीं हो पाया। एक से सौ तक की संख्याओं को हम कई तरह से लिखते हैं। मसलन सत्रह, सत्तरह, सतरह, सत्रा या अड़तालीस, अड़तालिस, अठतालिस वगैरह। एक विचार है कि एक से नौ तक संख्याएं शब्दों में फिर अंकों में लिखें। तारीखें अंकों में ही लिखें। प्रयोग में ऐसा नहीं हो पाता। प्रयोग करने वाले और इस प्रयोग को जाँचने वाले या तो एकमत नहीं हैं या इसके जानकार नहीं हैं।
-विष्णुकांत तिवारी
1971 में भारत पाकिस्तान समझौता (शिमला समझौता) हो रहा था। इसी दौरान जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी को एक शेर अर्ज किया।
‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।’
यह सुनकर इंदिरा गांधी ने कहा था कि हमारा शेर हमीं को अर्ज कर रहे हैं।
यह कहानी सुनाते हुए डॉ। अंजुम बाराबंकवी भावुक हो उठे।
वे भोपाल में मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र के घर पहुंचे थे। बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे।
परिवार के मुताबिक़, उन्होंने दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सांस ली।
बीबीसी से बात करते हुए उनकी पत्नी राहत बद्र ने निधन की पुष्टि की।
बशीर बद्र की दो शादियां हुई। उनकी पहली पत्नी से उनके दो बेटे और एक बेटी हैं। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने दूसरी शादी डॉक्टर राहत बद्र से की और उनके एक बेटे हुए तैय्यब बद्र।
तैय्यब बद्र के मुताबिक, ‘बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया से जूझ रहे थे और पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। उन्हें लोगों को पहचानने में भी दिक्कत हो रही थी।’
उर्दू शायरी को आसान और बोलचाल की भाषा में नई पहचान देने वाले बशीर बद्र उन शायरों में रहे, जिनके शेर साहित्यिक महफिलों से निकलकर आम लोगों की जबान तक पहुंचे।
उनकी गज़़लों में मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों, बिछडऩे का गम और रोज़मर्रा की जि़ंदगी के अनुभव दिखाई देते थे। उनके कई शेर आज भी मुशायरों, सोशल मीडिया पोस्ट, राजनीतिक भाषणों और आम बातचीत में अक्सर सुनाई देते हैं।
उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर लोग लगातार उनके शेर साझा कर रहे हैं। उनमें से एक शेर बार बार याद किया जा रहा है, जो उनके घर के बाहर भी तख़्ती में लिखा हुआ है-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जि़ंदगी की शाम हो जाए।
‘डिमेंशिया का पता चला तो महफि़लों में जाना छोड़ दिया’
पिछले कई सालों से डिमेंशिया से जूझ रहे बशीर बद्र को जानने वाले लोग कहते हैं कि यह विडंबना ही थी कि करोड़ों लोगों को अपने शेर याद करा देने वाला शायर धीरे धीरे अपनी याददाश्त खोता चला गया।
उनके बेटे कहते हैं, ‘बशीर साहब को जब ये पता चला था कि उन्हें डिमेंशिया हो गया है तो उन्होंने मुशायरों में शरीक न होने का फैसला लिया। उन्होंने कहा था कि वो एक शोमैन हैं और वो चाहते हैं कि दुनिया उसी बशीर बद्र को याद रखे जिसकी पकड़ हर लफ्ज़़ पर बहुत मजबूत थी।’
मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी की मौजूदा निदेशक डॉ। नुसरत मेहदी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ‘उन्होंने मुश्किल शायरी को आसान अल्फाज़ में कहने का हुनर हासिल किया था। यही वजह है कि हिन्दी और उर्दू, दोनों भाषा के लोग उन्हें पसंद करते थे।’
डॉ. मेहदी ने बताया कि वह मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी में उनके साथ काम कर चुकी हैं। बशीर बद्र कभी इसी अकादमी के अध्यक्ष भी रहे थे।
बशीर बद्र ने शायरी के साथ साथ आलोचना और अकादमिक लेखन में भी महत्वपूर्ण काम किया। उनकी किताबों में ‘इकाई’, ‘इमेज’, ‘आमद’, ‘आहट’, ‘आस’ और ‘कुल्लियाते बशीर बद’ शामिल हैं।
वहीं ‘आजादी के बाद उर्दू गज़़ल का तनक़ीदी मुताला’ और‘बीसवीं सदी में गजल’ जैसी किताबों को उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण माना जाता है।
बढ़ती गरीबी और तालिबान द्वारा महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदियां लगाने की वजह से अफगानिस्तान में घरेलू हिंसा बढ़ती जा रही है. हिंसा अब ज्यादा खतरनाक और छिपी हो गई है लेकिन इससे बच पाना ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है.
डॉयचे वैले पर रजा शिरमोहम्मदी का लिखा-
अफगानिस्तान गंभीर मानवीय संकट से गुजर रहा है। देश की आधी आबादी को मदद की जरूरत है। कई परिवार सिर्फ किसी तरह जिंदा रहने की कोशिश कर रहे हैं। भूख, बेरोजगारी और सेवाओं के चरमराने से वे परिवार के सदस्यों पर और ज्यादा निर्भर हो गए हैं।
साल 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से कई सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं जिनकी वजह से महिलाओं की जिंदगी सीमित हो गई है। उनके लिए पढ़ाई, काम करना और बाहर निकलना पहले से बहुत मुश्किल हो गया है। इन हालातों की वजह से घर के अंदर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से बचना, उसकी शिकायत करना और उसे सामने लाना और भी कठिन हो गया है।
जबरन विवाह और निर्भरता
महिला अधिकार कार्यकर्ता और स्थानीय पत्रकार एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। आर्थिक तंगी के कारण लड़कियों की जबरन और कम उम्र में शादी कर दी जाती है। उनकी अपने पति या ससुराल पर निर्भरता बढ़ जाती है। घरेलू हिंसा अक्सर छिपी रहती है या कम दिखाई देती है। जब सुरक्षा देने वाली व्यवस्था काम नहीं करती और परिवारों को लगता है कि कोर्ट से भी कोई मदद नहीं मिलेगी, तब हिंसा जानलेवा रूप लेती है।
अफगानिस्तान के पश्चिमी प्रांत गोर का एक मामला इस परिस्थिति को समझाता है। फरजाना की मौत गोर के पसाबंद जिले में हुई। तब वह केवल 18 साल की थी। स्थानीय स्रोतों ने डीडब्ल्यू को बताया कि उस पर घर के अंदर हमला किया गया था। एक डॉक्टर ने भी बताया कि फॉरेंसिक जांच में फरजाना के शरीर पर पिटाई और यातना के निशान मिले जिससे यह संकेत मिलता है कि उसकी हत्या की गई। फरजाना की शादी 50 वर्ष से अधिक आयु के एक व्यक्ति से हुई थी। उसकी पहले से दो पत्नियां थीं।
स्थानीय सरकारी कर्मचारी आमिर मोहम्मदी (बदला हुआ नाम) ने डीडब्ल्यू को बताया कि पति के दो बेटों पर फरजाना की हत्या में शामिल होने का आरोप है। मोहम्मदी ने फरजाना के परिवार से बात करने की कोशिश की, लेकिन परिवार ने सहयोग करने से मना कर दिया। उनका कहना था कि वे गरीब हैं। जबकि हत्या के आरोपी अमीर और प्रभावशाली हैं। मोहम्मदी के मुताबिक यह सामाजिक असमानता भी उतनी ही बड़ी समस्या है जितनी खुद यह हत्या।
वह डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘फरजाना जैसी कई लड़कियां गरीबी, जबरन शादी और बाल विवाह का शिकार हो रही हैं। परिवार अक्सर आर्थिक स्थिरता की उम्मीद में अपनी बेटियों की शादी उम्रदराज और पैसे वाले आदमियों से कर देते हैं। बंद दरवाजों के पीछे इन लड़कियों के साथ हिंसा हो रही है।’
पत्रकारों का कहना है कि हिंसा की जानकारी होने के बावजूद भी ऐसे मामले शायद ही कभी सार्वजनिक रिकॉर्ड तक पहुंच पाते हैं। नाम न बताने की शर्त पर अफगानिस्तान के एक स्थानीय पत्रकार ने डीडब्ल्यू से कहा, ‘अब रिपोर्टिंग करना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। तालिबान ने पत्रकारों और मीडिया पर बहुत सख्त नियम लगा दिए हैं। कोई भी इन मामलों पर रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं करता।’
भय और सत्ता के बल पर रुका हुआ न्याय
सामाजिक दबाव भी एक बड़ी वजह है। परिवार डर, बदनामी और प्रतिशोध के डर से शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं। अगर शिकायत दर्ज भी हो जाए, तो कई बार जांच में देरी हो सकती है।
गोर प्रांत के एक तालिबान अधिकारी ने, मीडिया से बात करने की अनुमति न होने के कारण नाम गुप्त रखते हुए, डीडब्ल्यू से बात की। वह बताते हैं कि एक युवती की हत्या के आरोप में पिता और उसके दो बेटों को गिरफ्तार किया गया है। मामले की जांच चल रही है।
हालांकि स्थानीय पत्रकार ने बताया कि उन्हें ऐसी जानकारी मिली है जिससे पता चलता है कि इस तरह के मामलों में आरोपी बाद में कबायली बुजुर्गों की मध्यस्थता से रिहा कर दिए गए। अक्सर पैसों के बदले समझौता कर दिया जाता है और इसमें पीडि़त परिवार की सहमति शामिल होती है। यह दिखाता है कि खासकर दूर-दराज इलाकों में आज भी अनौपचारिक न्याय व्यवस्था का कितना प्रभाव है।
-नासिरुद्दीन
शादी कोई जबरदस्ती बचाने की चीज नहीं है। न ही शादी बचाने का जिम्मा एक शख्स पर है। शादी दो लोगों की भागीदारी और साझेदारी है तो चलाने-बचाने का जिम्मा दोनों पर है।
इसलिए शादी बचाने, घर बसे रहने या घर टूटने से बचाने के मामले में बेटियों-बहनों या किसी भी स्त्री का एक के बाद एक जिंदगी गंवाते जाना जुर्म है। इस जुर्म के हम सब मुजरिम हैं।
दिल्ली के पास नोएडा में दीपिका नहीं रहीं। भोपाल में त्विषा नहीं रहीं। कर्नाटक के बेल्लारी में एश्वर्या की जान चली गई। दिल्ली की वीणा कुमारी भी नहीं रहीं। यह सब चंद दिनों के अंदर की ख़बरें हैं।
अपनी दास्ताँ बताने के लिए निक्की भी कुछ महीने पहले ही इस दुनिया में नहीं रहीं। उनसे पहले लखनऊ में मधु अपने घर में मरी हुई मिलीं।
ये सब युवा थीं। कुछ महीनों की शादीशुदा जि़ंदगी थीं। ख़बरों की मानें तो इनमें से किसी की मौत कुदरती नहीं है। असामान्य है।
सबके मामले में पति और दूसरे ससुराल?ियों पर दहेज के लिए हिंसा के आरोप लग रहे हैं। मुक़दमा भी इसी का हुआ है।
थोड़ी देर के लिए हम इस बहस में न पड़ें कि इनकी जान ली गई या इन्होंने जान दी। अहम बात है कि अब ये इस दुनिया में नहीं हैं। इनकी मौत की जड़ में जो चीज़ है, वह उनका स्त्री होना है।
गैरबराबरी का रिश्ता है शादी
हमारे मौजूदा समाज में शादी एक ग़ैरबराबरी वाला रिश्ता है-एक लडक़ी वाले हैं और एक लडक़ा वाला। आमतौर पर शादी में यही उनकी सामाजिक हालत तय कर देता है।
इसमें तराज़ू के दोनों पलड़े बराबर नहीं रहते हैं। एक का पलड़ा काफ़ी भारी रहता है। दहेज से दूसरे पलड़े को बराबर लाने की कोश?िश की जाती है।
मगर यह होता नहीं है। क्योंकि भारी पलड़े पर बैठे शख़्स का नाम लडक़ा या लडक़े वाला है।
अगर किसी तरह बराबरी हो गई तब तो ठीक है। वरना ताने, उत्पीडऩ और हिंसा का सिलसिला जान जाने तक चलता रहता है।
तब क्या ये सवाल पूछे जा सकते हैं। शादी में दो शख्स शामिल हैं। दहेज इनमें से किसके दिमाग़ की उपज है? किसे, किससे चाहिए?
दहेज की वजह से किसका मन और शरीर घायल होता रहता है? किसका मानसिक सुकून जाता है? दहेज के शोले किसे अपने आगोश में लेते हैं? दहेज की वजह से कौन जान से जाता है?
असल बातें तो ये ही हैं। इससे ही तय होना चाहिए कि इनकी मौत के गुनाहगार कौन हैं?
हर रोज 16 लड़कियों की मौत दहेज की वजह से
दिलचस्प है कि ये चार-पांच छिटपुट घटनाएं नहीं हैं। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में दहेज की वजह से मौत, धारा 304 बी और अब भारतीय न्याय संहता (बीएनएस) के तहत धारा 80 में दर्ज होती है।
ताज़ा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, साल 2024 में इन दोनों धाराओं में दहेज की वजह से मौतों की पाँच हज़ार 737 घटनाएँ दर्ज हुई हैं।
साल 2024 में दहेज हत्या की सबसे ज़्यादा घटनाएँ उत्तर प्रदेश (2,038), बिहार (1,078), मध्य प्रदेश (450), राजस्थान (386), पश्चिम बंगाल (337) से सामने आई हैं।
पति और ससुरालियों की क्रूरता बीएनएस की धारा 85 और आईपीसी धारा 498ए के तहत दर्ज होती हैं।
एनसीआरबी के मुताबिक, साल 2024 में ऐसी एक लाख 20 हजार 227 घटनाएँ दर्ज हुईं।
यानी साल 2024 में देश में हर रोज़ कऱीब 16 लड़कियों की जान दहेज की वजह से गई।
वहीं, लगभग 330 लड़कियों ने हर रोज़ ससुरालियों के उत्पीडऩ के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया।
लेकिन हम इनमें से उन्हीं की कहानी जान पाते हैं जो नहीं रहीं या जिनके मामले में मीडिया का ध्यान जाता है।
ज़्यादातर घटनाएँ हमारे नजर के सामने नहीं आतीं। अगर आती हैं तो वे सरसरी तौर पर गुजर जाती हैं। उससे हमारी जिंदगी के किसी कोने में कोई फर्क नहीं पड़ता।
पितृसत्ता, ग़ैरबराबरी और हिंसा
ताकतवर खासकर पितृसत्ता की ताकत की सोच से लैस लोग सिखा देते हैं कि हर गैरबराबरी और हिंसा पर हम शक़ करने लगे।
यही नहीं पीडि़त और दूसरे लोग ग़ैरबराबरी और हिंसा को आम बात मानकर आसानी से जि़ंदगी का हिस्सा मानकर मंज़ूर कर लें।
बाहर भी यही होता है और घर में भी। जाति और जेंडर आधारित भेदभाव में यह साफ़ देखा जा सकता है।
शादीशुदा जिंदगी में ताना हो या शारीरिक हिंसा- इसे महिला की जिंदगी का हिस्सा मानकर सामान्य बना दिया गया है। इस पर बात करना या फिक्र जाहिर करना गैरजरूरी मान लिया गया है।
हम अपनी बेटियों और बहनों को दहेज की माँग, उत्पीडऩ और हिंसा को जि़ंदगी का हिस्सा मानकर नजरंदाज करने और उससे तालमेल बैठाने या ‘एडजस्ट’ करने की सलाह देते हैं।
हम चेतते तब हैं जब बेटियों या बहनों की जान जा चुकी होती है।
महिलाएं सहती क्यों हैं?
एक सवाल जो बार-बार पूछा जाता है कि आखिर लड़कियाँ सहती क्यों हैं? वे ऐसी हिंसक शादी से बाहर क्यों नहीं निकलतीं?
सहने वालों में ग्रामीण पृष्ठभूमि की कम पढ़ी-लिखी महिलाएँ ही नहीं हैं, बल्कि शहरों-महानगरों की उच्च मध्य वर्ग की पढ़ी-लिखी लड़कियों की बड़ी तादाद भी है।
सहती इसलिए हैं कि हम उन्हें आँख खोलते ही सहने की ही परवरिश देते हैं। और लडक़ों को परवरिश देते हैं कि कैसे किसी पर काबू रखा जाए और सहने पर मजबूर किया जाए।
अगर दहेज को सिफऱ् क़ानून से रुकना होता तो अब तक रुक गया होता। हमारे समाज में इसके लिए जिस सामाजिक- सांस्कृतिक बदलाव की ज़रूरत है, वह अब तक नदारद दिखता है।
इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। पैदा होते ही लड़कियों की जिंदगी का सिरा शादी से जोड़ दिया जाता है। इसका एक इलाज लड़कियों और लडक़ी के घर वालों के पास है।
उनकी पहल के बिनिा मर्दों की व्यवस्था के इस हिंसक रूप से पार पाना मुमकिन नहीं है क्योंकि वे भी इस व्यवस्था के अटूट अंग हैं।
अगर घर वाले लड़कियों को बोझ मानेंगे या पराया धन मानेंगे तो शादी को ही उनकी जिंंदगी का आखिरी मकसद मानेंगे।
अगर वे लडक़ी को लडक़ों से कमतर मानेंगे, तो उस ग़ैरबराबरी के बोझ से हमेशा दबे रहेंगे। इसी का नतीजा है कि वे दहेज के जरिए वे उससे निजात पाने का रास्ता निकालते हैं।
इससे पहले वे बचपन से ही लडक़ी को हर तरह की ग़ैरबराबरी और हिंसा बर्दाश्त करने की आदत डलवाते रहते हैं।
इसलिए जब उसके साथ हिंसा होती और वह बताती है तो वे उसे ख़ुद भी बर्दाश्त करते हैं और उसे भी यही नसीहत देते हैं।
25 मई विश्व फुटबॉल दिवस
-दिलीप कुमार पाठक
फुटबॉल दुनिया का ऐसा खेल है, जिसे समझने के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं है, फुटबॉल किसी भी भाषा में आए समझ आता है। मैदान पर पैर की एक जादुई ड्रिबल, एक सटीक पास और नेट से टकराती गेंद-यह वह रोमांच है जो दुनिया के हर कोने को एक धागे में पिरो देता है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र ने 25 मई को आधिकारिक तौर पर ‘विश्व फुटबॉल दिवस’ घोषित किया है। यह फैसला सिर्फ इस खेल की लोकप्रियता का जश्न नहीं है, बल्कि इस बात का सम्मान है कि फुटबॉल दुनिया में शांति, एकजुटता और युवाओं को जोडऩे का सबसे खूबसूरत जरिया है। जब पूरी दुनिया इस खेल के रंग में रंगी है, तब भारत के लिए यह दिन एक नई ऊर्जा और बड़े सपनों के साथ आगे बढऩे का अवसर है।
अक्सर कहा जाता है कि भारत सिर्फ क्रिकेट का दीवाना है, लेकिन सच यह है कि हमारे देश में फुटबॉल को लेकर एक खामोश क्रांति आकार ले रही है। कोलकाता के मैदानों का पारंपरिक जोश हो, केरल की गलियों की दीवानगी हो या पूर्वोत्तर के पहाड़ों से निकलती नई प्रतिभाएं-फुटबॉल का जज्बा हमारी रगों में तेजी से दौड़ रहा है। इंडियन सुपर लीग की सफलता और जमीनी स्तर पर शुरू हुए नए फुटबॉल प्रोजेक्ट्स ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय युवाओं में इस खेल को लेकर गजब का आकर्षण है। अब समय आ गया है कि इस जुनून को एक सही दिशा देकर हम वैश्विक मंच पर अपनी बड़ी पहचान बनाएं। भारत इस क्षेत्र में बहुत कुछ कर सकता है और इसके लिए हमें एक सामूहिक प्रयास की जरूरत है। सबसे बेहतरीन शुरुआत स्कूलों और स्थानीय स्तर पर ‘फुटबॉल फॉर ऑल’ यानी सबके लिए फुटबॉल अभियान चलाकर की जा सकती है।
यदि हर पंचायत और नगरीय निकाय में बच्चों के लिए एक अदद मैदान और बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित कर दी जाएं, तो देश को हुनर खोजने के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। हमारे कॉर्पोरेट जगत के पास सीएसआर फंड के जरिए ग्रामीण इलाकों में छोटी-छोटी फुटबॉल अकादमियां खोलने का शानदार मौका है। जब सरकार, कॉर्पोरेट और समाज मिलकर काम करेंगे, तो भारत में प्रतिभाओं का एक ऐसा ताना-बाना तैयार होगा जो भविष्य में वैश्विक कप्तानों को जन्म देगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल भारत के लिए एक बहुत बड़ी ‘सॉफ्ट पावर’ बन सकता है। खेल एक ऐसा माध्यम है जो बिना किसी राजनीतिक तनाव के दो देशों के लोगों के दिलों को जोड़ देता है।
-प्रमोद भार्गव
देश के न्यायालयों में जजों की कमी और लंबित मामलों की बढ़ती सूची समानांतर है। हालांकि अब षीर्श अदालत में न्यायाधीशों की संख्या बढक़र 37 हो गई है। मुख्य न्यायाधीश को भी जोड़ दें तो यह संख्या 38 हो जाती है। अतएव माना जा रहा है कि अब न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आएगी और लंबित मामले कम होंगे। जजों की जल्द संख्या बढ़ाने के नजरिए से सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या ) अधिनियम 1956 में संशोधन के लिए संसद के सत्र की प्रतीक्षा करने की बजाय रष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से केंद्र सरकार ने अध्यादेश जारी करा लिया।इसे विधि आयोग ने अधिसूचित भी कर लिया।अब जल्दी ही एक साथ छह जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ कर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक बुला सकती है। इस अध्यादेश को मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।
देश की अदालतों में मामलों का अंबार इतना है कि इनका बोझ कम करना आसान नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय में 93 हजार उच्च न्यायालयों में 63 लाख 98 हजार और जिला अदालतों में 4 करोड़ 88 लाख प्रकरण लंबित हैं। जिला अदालतों में 4721 और हाईकोर्ट में 325 जजों के पद रिक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तो अनुच्छेद-224-ए को लागू करने का फैसला लेकर जजों की संख्या बढ़ा ली। उच्च न्यायालयों में भी 61 पदों पर भर्ती की सिफारिश कॉलेजियम के मार्फत कर दी।लेकिन निचली अदालतों में जजों की कमी कैसे पूरी हो, इसके उपाय भी होना चाहिए ? दरअसल अनुच्छेद-224-ए का पिछले छह दशकों से इस्तेमाल नहीं किया गया था। इसके तहत न्यायालय बड़ी संख्या में लंबित मामलों को निपटाने के लिए हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त जजों की दो से पांच साल के लिए नियुक्ति कर सकती है। तय है, जजों की कमी एक हद तक पूरी होगी। यदि सर्वोच्च न्यायालय अपने स्तर पर कार्य-संस्कृति में बदलाव के लिए ऐसे कुछ और फैसले ले, ले तो लंबित मामले भी जल्द से जल्द निपटने लग जाएंगे।
हमारे यहां संख्या के आदर्श अनुपात में कर्मचारियों की कमी का रोना अक्सर रोया जाता है। ऐसा केवल अदालत में हो,ऐसा नहीं है। पुलिस,शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों में भी गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध न कराने का यही बहाना है। जजों की कमी कोई भी नई बात नहीं है, 1987 में विधि आयोग ने हर 10 लाख की आबादी पर जजों की संख्या 10 से बढ़ाकर 50 करने की सिफारिश की थी। फिलहाल यह संख्या 22 है। हालांकि हमारे यहां अभी भी 14,000 अदालतों में करीब 18,000 न्यायाधीश काम कर रहे हैं। अदालतों का संस्थागत ढांचा भी बढ़ाया गया है। उपभोक्ता, परिवार और किषोर न्यायालय अलग से अस्तित्व में आ गए हैं। फिर भी काम संतोषजनक नहीं हैं। उपभोक्ता अदालतें अपनी कार्य संस्कृति के चलते अब बोझ साबित होने लगी हैं। बावजूद औद्योगिक घरानों के वादियों के लिए पृथक से वाणिज्य न्यायालय बनाने की पैरवी की जा रही है।
अलबत्ता आज भी ब्रिटिश परंपरा के अनुसार अनेक न्यायाधीश ग्रीष्म ऋतु में छुट्टियों पर चले जाते हैं। सरकारी नौकरियों में जब से महिलाओं को 33 प्रतिषत आरक्षण का प्रावधान हुआ है, तब से हरेक विभाग में महिलाकर्मियों की संख्या बढ़ी है। इन महिलाओं को 26 माह के प्रसूति अवकाश के साथ दो बच्चों की 18 साल की उम्र तक के लिए दो वर्श का ‘चाइल्ड केयर अवकाश‘ भी दिया जाता है। अदालत से लेकर अन्य सरकारी विभागों में मामलों के लंबित होने में ये अवकाष एक बड़ा कारण बन रहे हैं। इधर कुछ समय से लोगों के मन में यह भ्रम भी पैठ कर गया है कि न्यायपालिका से डंडा चलवाकर विधायिका और कार्यपालिका से छोटे से छोटा काम भी कराया जा सकता है। इस कारण न्यायलयों में जनहित याचिकाएं बढ़ रही हैं,जो न्यायालय के बुनियादी कामों को प्रभावित कर रही हैं। जबकि प्रदूशण, यातायात, पर्यावरण और पानी जैसे मुद्दों पर अदालत की दखल के बावजूद इन क्षेत्रों में बेहतर स्थिति नहीं बनी है। अदालतों के फैसलों में एकरूपता की बजाय विरोधाभास भी देखने में आ रहा है। यह भी मामले बढऩे का कारण बन रहा है।
न्यायिक सिद्धांत का तकाजा तो यही है कि एक तो सजा मिलने से पहले किसी को अपराधी न माना जाए,दूसरे आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति का फैसला तय समय-सीमा में हो। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहां ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। इसकी एक वजह न्यायालय और न्यायाधीशों की कमी जरूर है,लेकिन यह आंशिक सत्य है, पूर्ण नहीं मुकदमों को लंबा खिंचने की एक वजह अदालतों की कार्य-संस्कृति भी है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति राजेंद्रमल लोढ़ा ने कहा भी था ‘न्यायाधीष भले ही निर्धारित दिन ही काम करें, लेकिन यदि वे कभी छुट्टी पर जाएं तो पूर्व सूचना अवष्य दें। ताकि उनकी जगह वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके।‘ इस तथ्य से यह बात सिद्ध होती है कि सभी अदालतों के न्यायाधीष बिना किसी पूर्व सूचना के आकस्मिक अवकाष पर चले जाते हैं। गोया,मामले की तारीख आगे बढ़ानी पड़ती है। इन्हीं न्यायमूर्ति ने कहा था कि ‘जब अस्पताल 365 दिन चल सकते हैं तो अदालतें क्यों नहीं ?‘ यह बेहद सटीक सवाल था। हमारे यहां अस्पताल ही नहीं,राजस्व और पुलिस विभाग के लोग भी लगभग 365 दिन ही काम करते हैं। किसी आपदा के समय इनका काम और बढ़ जाता है। इनके कामों में विधायिका और खबरपालिका के साथ समाज का दबाव भी रहता है। बावजूद ये लोग दिन-रात कानून के पालन के प्रति सजग रहते हैं। जबकि अदालतों पर कोई अप्रत्यक्ष दबाव नहीं होता है।
यही प्रकृति वकीलों में भी देखने में आती है। हालांकि वकील अपने कनिष्ठ वकील से अकसर इस कमी की वैकल्पिक पूर्ति कर लेते हैं। लेकिन वकील जब प्रकरण का ठीक से अध्ययन नहीं कर पाते अथवा मामले को मजबूती देने के लिए किसी दस्तावेजी साक्ष्य को तलाष रहे होते हैं तो वे बिना किसी ठोस कारण के तारीख आगे खिसकाने की अर्जी लगा देते हैं। विडंबना है कि बिना कोई ठोस पड़ताल किए न्यायाधीश इसे स्वीकार भी कर लेते हैं। तारीख बढऩे का आधार बेवजह की हड़तालें और न्यायाधीषों व अधिवक्ताओं के परिजनों की मौतें भी हैं। ऐसे में श्रद्वांजली सभा कर अदालतें कामकाज को स्थगित कर देती हैं। जबकि इनसे बचने की जरूरत है। लिहाजा कड़ाई बरतते हुए कठोर नियम-कायदे बनाने का अधिकतम अंतराल 15 दिन से ज्यादा का न हो,दूसरे अगर किसी मामले का निराकरण समय-सीमा में नहीं हो पा रहा है तो ऐसे मामलों को विषेश प्रकरण की श्रेणी में लाकर उसका निराकरण त्वरित और लगातार सुनवाई की प्रक्रिया के अंतर्गत हो। ऐसा होता है, तो मामलों को निपटाने में तेजी आ सकती है। ऐसी ही सोच के चलते मुख्यमंत्रियों और न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने कहा था, ‘हम पूरी कोशिश करेंगे कि अदालतों में कोई भी मुकदमा पांच साल से ज्यादा न खिंचे।’ यह न्याय प्रक्रिया के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण था।
-गरिकिपति उमाकांत
शेख़ अम्मी रोजगार की तलाश में खाड़ी देशों में गई थीं। वहाँ उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा, इसलिए गृह राज्य आंध्र प्रदेश लौट आईं।
सोशल मीडिया पर ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें पुरुष और महिलाएं वीडियो पोस्ट कर कह रहे हैं कि वे ख़तरे में हैं और उन्हें मदद की ज़रूरत है।
विदेश में कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों को वापस लाने के लिए, डॉक्टर बीआर आंबेडकर कोनासीमा जि़ले में एक प्रवासन केंद्र की स्थापना की गई है।
जि़ला कलेक्टर इसके अध्यक्ष हैं। केंद्र का कहना है कि वह उत्पीडऩ के आरोपों की गहन जांच करेगा।
हालांकि, बीबीसी ख़ुद अम्मी के आरोपों की पुष्टि नहीं करता है। यह सवाल भी उठ रहे हैं कि खाड़ी के देशों में रोजग़ार के लिए जाने वालों को समस्याओं का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
शेख़ अम्मी के साथ क्या हुआ?
कोनासीमा जि़ले के द्राक्षारामम की निवासी अम्मी, दिसंबर 2025 में कडियाम क्षेत्र की सुल्ताना (महिला का नाम बदल दिया गया है) के माध्यम से क़तर गई थीं। वहाँ उन्होंने एक घर में रसोइया और अन्य घरेलू सहायिका के रूप में काम किया।
अम्मी ने बीबीसी को बताया, ‘उन्होंने मुझसे वहाँ बहुत काम करवाया, लेकिन मुझे ठीक से खाना नहीं दिया। मुझे मिर्च के साथ थोड़े से चावल खाने को मिलते थे। उससे मेरे पेट में दर्द होने लगा। मुझे वहीं सोना पड़ता था। दो महीने के अंदर ही मैं बीमार पड़ गई। मुझे दौरे पडऩे लगे और एक दिन हालत गंभीर हो गई और मुझे अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा, ‘मैं थक गई हूं, मैं कोई काम नहीं कर सकती।’ मालिकों ने मुझसे दो लाख रुपये वापस मांगे।’
‘उन्होंने कहा कि जब तक पैसे नहीं मिल जाते, वे मुझे नहीं भेजेंगे। उन्होंने कहा कि एजेंट को फ़ोन करने से उनका कोई लेना-देना नहीं है। एक पल तो मुझे लगा कि मैं वहीं मर जाऊंगी।
द्राक्षारामम में मेरे बेटे ने पैसे जुटाने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उसे पैसे नहीं दिए। आखिरकार, उसने अधिकारियों से शिकायत की। उन्होंने कार्रवाई की और वहाँ के दूतावास से बात की लेकिन मुझे जाने नहीं दिया।’
हालांकि, उन्हें क़तर भेजने वाली सुल्ताना अम्मी के आरोपों से इनकार करती हैं।
सुल्ताना ने बीबीसी को बताया कि वह एजेंट नहीं हैं, लेकिन दुबई में उनके कुछ परिचित लोग हैं। अगर कोई उनसे काम के लिए वहां जाने को कहता है, तो वह उन्हें भेज देती हैं।
सुल्ताना ने यह भी कहा कि उन्होंने शेख़ अम्मी को उनके कहने पर भेजा था, लेकिन वहां जाने के बाद उन्हें वहां का माहौल ठीक नहीं लगा। उनके साथ गए लोग ठीक थे।
गोदावरी जि़ले से खाड़ी देशों तक
गोदावरी जि़ले के हज़ारों लोग लंबे समय से रोजग़ार की तलाश में खाड़ी देशों में पलायन कर रहे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी, कोनासीमा, काकीनाडा और एलुरु जिलों के शिक्षित लोग वाइट कॉलर (कार्यालय) नौकरियों के लिए जाते हैं जबकि कम पढ़े लिखे लोग वहां ब्लू कॉलर नौकरियों के लिए जाते हैं।
पिछले दो-तीन दशकों से, निर्माण उद्योग के कुशल श्रमिक, जैसे कि राजमिस्त्री, बढ़ई, इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, और वेल्डर के साथ कुक, हाउसकीपिंग के काम करने के लिए खाड़ी देशों में जा रहे हैं। इन कामों में शारीरिक श्रम की भी ज़रूरत होती है।
हालांकि, डॉक्टर अंबेडकर कोनासीमा जि़ले के अधिकारियों के अनुसार, हाल के दिनों में खाड़ी देशों में अज्ञात एजेंटों के ज़रिए धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं और कुछ नियोक्ताओं से उत्पीडऩ के कारण, घर लौटने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है।
उन्होंने बताया कि हाल ही में, कोनासीमा जि़ले के 80 से अधिक श्रमिक जि़ला अधिकारियों की मदद से अपने गृहनगर लौट आए हैं।
कई आरोप
अन्नामय्या जि़ले के वायालापाडु की निवासी शहनाज़ ओमान गई थीं। शहनाज़ ने हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण से अपनी सुरक्षा के लिए अपील की थी, क्योंकि उन्हें वहां कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।
पवन कल्याण ने एक्स पर पोस्ट किया कि जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने विदेश मंत्रालय से उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया और उनके सहयोग से उन्हें सुरक्षित रूप से आंध्र प्रदेश लाया गया।
इससे पहले, जुलाई 2025 में असिलेटी निर्मला नामक एक यूजऱ ने नारा लोकेश (मंत्री और चंद्रबाबू नायडू के बेटे) को बताया था कि रोजग़ार के लिए मस्कट गई गुडीवाडा के पास जोन्नापाडु की निवासी जनार्दनपुरम दुर्गा को परेशानी हो रही है, उसे वापस लाया जाए।
इस पर नारा लोकेश ने ट्वीट किया कि उन्होंने अपनी टीम को दुर्गा को उनके गृहनगर लाने के लिए सभी ज़रूरी व्यवस्थाएं करने को कहा है।
धनलक्ष्मी की कहानी
वनपल्ली की कोल्लाडा धनलक्ष्मी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह खाना पकाने और अन्य काम करने के लिए कुवैत गई थीं। वह भी हाल ही में अपने गृहनगर लौटी हैं।
धनलक्ष्मी बताती हैं, ‘मैं इस उम्मीद से कुवैत गई थी कि दो-तीन साल रहूं और कुछ पैसे कमा लूं। मैं अपना घर बनाना चाहती थी। वहाँ पहुँचने के बाद मैंने काम किया लेकिन घर की बुज़ुर्ग महिला मुझे प्रताडि़त करती थी। उसे जो भी चीज़ मिलती, उससे मुझे पीटती थी। उसने मुझे जान से मारने की धमकी भी दी। यातना सहन न कर पाने के कारण मैंने अपने पति को कॉल किया। वह कलेक्टर के दफ्तर गए और मदद मांगी। वहां से दूतावास संपर्क किया गया। इस तरह मैं वहां से वापस लौटी।’
बीबीसी ने धनलक्ष्मी को कुवैत भेजने वाले काकीनाडा के राजू और रविंदर (नाम बदले हुए) से बात की।
उन्होंने कहा, ‘हम आधिकारिक एजेंट नहीं हैं। अगर कोई हमसे अनुरोध करता है तो हम अपने जान-पहचान के लोगों को भेजते हैं। हमारे भेजे गए किसी भी व्यक्ति को यह समस्या नहीं हुई। केवल धनलक्ष्मी को हुई। अगर हमें पहले से पता होता तो हम उन्हें इस तरह नहीं भेजते।’
शेषरत्नम ने बीबीसी को बताया, ‘मैं फिसल गई और मेरे पैर में चोट लग गई। लेकिन वहाँ के मालिकों को कोई परवाह नहीं थी। चोट एक बड़े घाव में बदल गई और बहुत दर्द होने लगा। दो हफ़्ते बाद, वे मुझे अस्पताल ले गए। डॉक्टरों ने घाव की सफ़ाई की और बताया कि मुझे डायबिटीज़ है। उन्होंने कहा कि चोट को पूरी तरह ठीक होने में समय लगेगा और तब तक मुझे कोई काम नहीं करना चाहिए। इसके बाद मालिकों ने मुझे दफ़्तर भेज दिया। वे मुझसे 1,60,000 रुपये वापस भी मांग रहे थे। हालांकि, यहां के अधिकारियों ने मुझे समझा-बुझाकर भारत वापस बुला लिया।’
बीबीसी ने पी। गन्नावरम क्षेत्र के एक अनधिकृत एजेंट संपथ (नाम बदला हुआ) से बात करने की कोशिश की, जिसने शेषरत्नम को मस्कट भेजा था, लेकिन वह उपलब्ध नहीं था।
अमलापुरम के रहने वाले श्रीनु ने बताया कि उन्हें रेस्तरां का काम सौंपने का वादा करके रेगिस्तान की तेज़ धूप में काम करने पर मजबूर किया गया। बिना भरपेट भोजन किए रेगिस्तान में काम करना वह सहन नहीं कर सके और वापस लौट आए।
बीबीसी ने श्रीनु को दुबई भेजने वाले अल्लावरम के अमर से बात की, तो उन्होंने कहा कि वे एजेंट नहीं हैं, बल्कि कभी-कभी दुबई में अपने रिश्तेदारों के ज़रिये लोगों को काम के लिए भेजते हैं।
उन्होंने कहा कि श्रीनु को वहां का माहौल पसंद नहीं आया और वह वापस लौट आए। उनके साथ गए दो अन्य लोग वहां काम कर रहे हैं।
बीबीसी ख़ुद उन आरोपों की पुष्टि नहीं करता है जो कुछ लोगों ने लगाए हैं कि खाड़ी देशों में उनके नियोक्ताओं ने उनका उत्पीडऩ किया।
बीबीसी ने वहां के एजेंटों और उन्हें रोजग़ार देने वाले परिवारों से संपर्क करने के प्रयास किए लेकिन न तो कथित पीडि़त और न ही अधिकारी मालिकों के बारे में कोई जानकारी दे पाए। इसकी वजह से बीबीसी उनसे संपर्क करने में असमर्थ रहा।
-सुसान चाको, ललित मौर्य
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक और न्यायिक सीमाओं को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 14 मई, 2026 को दिए अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सीवर लाइन बिछाने या दूसरे बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों का प्रबंधन और प्रशासन देखना अदालतों का काम नहीं है। ऐसी समस्याओं का समाधान करना संबंधित सरकारी एजेंसियों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भीड़भाड़ वाली कॉलोनियों में बुनियादी सुविधाओं की कमी से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए न तो हाई कोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट को प्रशासनिक संस्थाओं की भूमिका निभानी चाहिए। अदालतों का काम नीतियां बनाना या प्रशासनिक उपाय तय करना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करना है।
क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि यह मामला तब सामने आया जब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने दिल्ली हाई कोर्ट के 18 जून 2025 के अंतरिम आदेश को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने उस आदेश में ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की परेशानियों को दूर करने के लिए खुद पहल करते हुए दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और एम्स को कई निर्देश जारी किए थे।
ये निर्देश ग्रीन पार्क एक्सटेंशन से अरबिंदो तक सीवर लाइन के डिजाइन और निर्माण से जुड़े मामले में दिए गए थे। हालांकि बाद में, 27 अक्टूबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश के अमल पर रोक लगा दी। इसके बाद मामले पर विस्तार से सुनवाई हुई और केंद्र सरकार को भी इस मुद्दे पर विचार करने के लिए पक्षकार बनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दिल्ली सरकार पहले ही पक्षकार है। इसके अलावा दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड सहित कई स्थानीय एजेंसियां भी मामले से जुड़ी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि ग्रीन पार्क, ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के इलाकों के लोग जल निकासी की खराब व्यवस्था के कारण भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में मौजूद ड्रेनेज व्यवस्था बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब पर्याप्त नहीं रह गई है। इसी कमी के कारण इलाके में गंभीर जलभराव की समस्या भी पैदा हो रही है।
हालांकि साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि इन समस्याओं का समाधान करना और कानून के अनुसार जरूरी कदम उठाना संबंधित सरकारी एजेंसियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
किसी भी देश की मुद्रा की मज़बूती या कमज़ोरी वहाँ की अर्थव्यवस्था की सेहत की स्थिति बताती है.
आमतौर पर जिस देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही हो, उसकी मुद्रा मज़बूत होती है.
भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मौजूदा समय में भी बढ़िया है, इसके बावजूद 2018 से हर साल रुपया कमज़ोर हुआ है.
2013 में जब नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, तब उन्होंने कमज़ोर होते रुपये को लेकर तत्कालीन सरकार के ख़िलाफ़ एक कारगर राजनीतिक अभियान चलाया था.
उस समय बड़े बॉलीवुड सितारों, लोकप्रिय धर्मगुरुओं और कई मशहूर हस्तियों को यह कहते हुए देखा गया था कि भारतीय रुपया डॉलर के मुक़ाबले 60 के स्तर तक पहुँच गया है.
अब अक्सर सोशल मीडिया पर लोग सवाल करते पाए गए हैं कि जब बीजेपी के शासनकाल में रुपया लगातार गिरते हुए 97 के क़रीब आ गया, तब उनमें से किसी के पास कोई टिप्पणी क्यों नहीं है.
अगर रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर जाता है तो सरकार की असहजता और बढ़ सकती है.
भारत में कमज़ोर रुपए का मतलब है कि आयात महंगे हो जाते हैं. इससे तेल, रसोई गैस, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी ज़रूरी वस्तुओं की क़ीमत बढ़ती हैं. इनमें से अधिकांश भारत विदेशों से ख़रीदता है.
कमज़ोर रुपया उन परिवारों के लिए फ़ायदा भी लेकर आता है जो विदेशों में काम कर रहे भारतीयों के पैसों पर निर्भर हैं क्योंकि हर डॉलर के ज़्यादा रुपये मिलते हैं.
भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा रेमिटेंस हासिल करने वाले देशों में से एक है.
मार्च 2025 तक के वर्ष में प्रवासी भारतीयों ने देश में 135 अरब डॉलर से अधिक भेजे थे.
हालांकि ईरान युद्ध के कारण पर्सियन गल्फ़ के देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय श्रमिकों से आने वाला पैसा प्रभावित हो सकता है.
चिंताजनक हालात
भारतीय मुद्रा रुपए की जैसी हालत है, वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है.
एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपया 97 के क़रीब पहुँच चुका है. अभी 2026 में पाँच महीने भी नहीं पूरे हुए हैं और रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में 7.5% गिर चुका है.
रुपए को थामने की भारत की हर कोशिश बहुत कारगर साबित नहीं हो रही है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) पर दबाव बढ़ रहा है कि वह कुछ ठोस क़दम उठाए.
सरकार रुपए की कमज़ोरी को काबू में करने के लिए कई क़दम उठा रही है लेकिन इसका असर अभी दिख नहीं रहा है. सरकार ने सोना और चांदी पर आयात शुल्क दोगुने से ज़्यादा बढ़ा दिए हैं.
पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में बढ़ोतरी की है और खाद्य तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने पर भी विचार कर रही है. वहीं भारतीय रिज़र्व बैंक समय-समय पर घरेलू मुद्रा बाज़ार में डॉलर बेचकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है.
ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले बाद तेल की क़ीमतों में आई तेज़ बढ़ोतरी भारत के व्यापार घाटे को बढ़ा रही है. रुपए कमज़ोर होने का असर भारत के शेयर बाज़ार पर भी सीधा पड़ रहा है.
विदेशी निवेशक इस साल भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.
रुपए कमज़ोर होने से विदेशी निवेशकों को डॉलर में रिटर्न कम मिलता है. ऐसे में ये उन देशों की ओर रुख़ कर रहे हैं, जिनकी मुद्राएं डॉलर के सामने डटकर खड़ी हैं.
वैश्विक निवेशकों को लग रहा है कि रुपया आगे और कमज़ोर हो सकता है.
ऐसा अनुमान भी है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया 100 के स्तर तक पहुँच सकता है. यह एक ऐसा स्तर है, जिसे कभी अकल्पनीय माना जाता था.
सिटी ग्रुप का मानना है कि भारतीय कंपनियों के विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाने और निर्यातकों को अपनी विदेशी मुद्रा आय जल्दी भारत वापस लाने के लिए सख़्त नियम लागू किए जाने की संभावना है.
तेल की बढ़ती क़ीमतें
भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 90 प्रतिशत तेल आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने का मतलब है कि समान मात्रा में तेल ख़रीदने के लिए भारत को पहले से ज्यादा डॉलर ख़र्च करने पड़ रहे हैं.
इसके साथ ही पूंजी निकासी भी दबाव बढ़ा रही है. 2026 में वैश्विक निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.
पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के ख़िलाफ़ टैरिफ़ की घोषणा की तो रुपए में गिरावट और तेज़ हो गई.
इसके बाद अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला कर दिया और तेल की क़ीमतें बढ़ गईं. रुपया एक बार फिर से दबाव में आया और यह बढ़ता ही जा रहा है.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रुपये की कमज़ोरी की असली वजह बाहरी नहीं बल्कि घरेलू संरचनात्मक कमज़ोरियां भी हैं, जिन्हें तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद दूर नहीं किया जा सका.
2025 में रुपया एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा था और 2026 में भी यही स्थिति बनी रही.
2025 में रुपये की कमज़ोरी के पीछे ट्रंप के दोहरे अंकों वाले टैरिफ, भारतीय शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशकों का बाहर जाना और धीमी आर्थिक वृद्धि को माना गया.
मौजूदा कमज़ोरी इस डर को दर्शाती है कि ईरान युद्ध के कारण बढ़ी ऊर्जा क़ीमतें महंगाई बढ़ाएंगी, आर्थिक वृद्धि को कमज़ोर करेंगी और भारत के चालू खाते के घाटे को और बढ़ा देंगी.
ब्लूमबर्ग इकनॉमिक्स के अनुमान के अनुसार, अगर कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल और गैस क़ीमतें युद्ध से पहले के स्तर से 50 प्रतिशत ऊपर रहती हैं तो भारत का आयात बिल हर महीने पाँच अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.
आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव क्या कारण मानते हैं?
20 मई को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने लिखा था, ''रुपए में कमज़ोरी हालिया संकट की कहानी नहीं है. असल में रुपया पिछले कई वर्षों से लगातार दबाव में रहा है क्योंकि भारत से बाहर पूंजी बाहरी और घरेलू दोनों कारणों से जा रही है. विदेशी निवेशक दुनिया भर में बेहतर अवसरों की तलाश में भारत से पैसा निकालकर अन्य बाज़ारों की ओर बढ़ गए.
वैश्विक स्तर पर पूंजी अब तकनीक-आधारित अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर एआई, बायोटेक और डेटा सेंटर की ओर आकर्षित हो रही है. भारत अब भी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन इन अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में उसकी भूमिका सीमित दिखाई देती है. जैसे-जैसे पैसा इनोवेशन वाली इकॉनमी की ओर जा रहा है, रुपए पर दबाव बढ़ना लगभग तय है.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी लगभग 700 अरब डॉलर के आसपास है, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. लेकिन इससे अति-आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए. सामान्य समय में यह राशि बड़ी लग सकती है, लेकिन संकट के दौर में इसकी असली अहमियत उसकी विश्वसनीयता होती है.''
विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव
भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार 690 अरब डॉलर पर आ गया है. यह फ़रवरी 2026 के रिकॉर्ड 728 अरब डॉलर के स्तर से नीचे है.
भारत दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों में शामिल है. लेकिन आयात बिल बढ़ने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता जा रहा है. 31 मार्च को समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत ने ऊर्जा आयात पर 174 अरब डॉलर खर्च किए थे.
इसी अवधि में सोने का आयात 72 अरब डॉलर तक पहुँच गया था. वहीं चांदी का आयात क़रीब 150 प्रतिशत बढ़कर 12 अरब डॉलर हो गया था. उर्वरक आयात भी पिछले वित्त वर्ष में 77 प्रतिशत बढ़कर 14.6 अरब डॉलर पहुँच गया था.
इन चार वस्तुओं तेल, सोना, चांदी और उर्वरक पर भारत का आयात बिल केवल चार वर्षों में दोगुने से भी अधिक हो गया है. ज़ाहिर है कि आयात बिल बढ़ता है तो डॉलर ज़्यादा ख़र्च होता है. डॉलर कम होगा तो रुपया कमज़ोर होगा. यही वजह है कि सरकार अब इस बढ़ते आयात दबाव पर ब्रेक लगाने की कोशिश कर रही है.
निर्यात से ज़्यादा आयात
भारत अब भी जितना निर्यात करता है, उससे ज़्यादा आयात करता है. डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ अब भी अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात पर दबाव बनाए हुए हैं. हालांकि भारत कई देशों से मुक्त व्यापार समझौता कर रहा है.
जब पूंजी बाहर जा रही हो और विदेशी मुद्रा का प्रवाह धीमा हो, तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि सरकार ने अब पैनिक बटन दबाना क्यों शुरू कर दिया है.
विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सोने के आयात को सीमित करना अपेक्षाकृत कम तकलीफ़देह विकल्प माना जा रहा है.
अप्रैल में भारत की थोक महंगाई दर बढ़कर 8.3 प्रतिशत पहुंच गई. क़रीब चार सालों की यह सबसे तेज वृद्धि है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, निर्यात और आयात के बीच का अंतर जनवरी महीने में बढ़कर 34.68 अरब डॉलर हो गया था जबकि एक महीने पहले यह 25.05 अरब डॉलर था.
जनवरी में आयात सालाना आधार पर 19.2 प्रतिशत बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हो गया जबकि निर्यात केवल 0.6 प्रतिशत बढ़कर 36.56 अरब डॉलर रहा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


