विचार / लेख

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Posted Date : 23-May-2018
  • कुलदीप कुमार
    अनिश्चितताएं नई चुनौतियां लाती हैं लेकिन साथ ही नए मौके भी। भारत मौजूदा अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय माहौल को इसी तरह देखता है और उससे अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की विदेशनैतिक पहलकदमियां किसी नर्तक के दक्षता से पेश किए जटिल तालों की तरह है जो अलग अलग कलात्मक रुचि वाले दर्शकों को लुभाने को निकला हो।
    भारतीय कूटनीति का एक नया तत्व आसपड़ोस के देशों के अलावा दुनिया में उभरती हकीकतों के व्यापक परिपेक्ष्य में विश्व नेताओं के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को फाइन ट्यून करने के लिए अनौपचारिक शिखर वार्ता है, जिसने हाल के समय में महत्व अख्तियार कर लिया है। पिछले महीने मोदी की चीनी नेता शी जिनपिंग के साथ वुहान में मुलाकात हुई थी और अब उन्होंने सोमवार को सोची में रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन से मुलाकात की है।
    रूस पिछली सदी का सोवियत संघ नहीं है जिसके समर्थन का भारत भरोसा कर सकता था। फिर भी दोनों देश पुराना जोश बनाए रखते हुए नई अंतररराष्ट्रीय परिस्थितियों में ढलने की कोशिश कर रहे हैं। भारत हथियारों की खरीद पर निर्भरता घटाने के लिए रूस से दूर होने की प्रक्रिया में है जबकि रूस पाकिस्तान के साथ रिश्ते कायम करने की धीमी लेकिन सधी हुई कोशिश कर रहा है। इसका एक संकेत पाकिस्तान को सैनिक ट्रांसपोर्ट बेचने की तैयारी है। पूरा सैनिक संबंध इससे बस एक कदम दूर है। इसीलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि मोदी ने भारत रूस संबंधों को विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक सहयोग बताया।
    हालांकि अनौपचारिक शिखर वार्ता के नतीजे अभी सामने नहीं आए हैं, यह कहा जा सकता है कि मोदी और पुतिन ने रूस और रूसी कंपनियों के साथ कारोबार करने वाली कंपनियों पर ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के संभावित असर पर चर्चा की है। सरकारी बयान में कहा गया है कि उन्होंने द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के पूरे आयाम पर चर्चा की। ईरान परमाणु डील से अमेरिका का हटना भी भारत और रूस दोनों के लिए चिंता का कारण है, जैसे कि उत्तर कोरिया से सीधे बात करने की अमेरिका पहल।
    अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में रूस की संदिग्ध भूमिका की वजह से ट्रंप प्रशासन रूस के साथ खास अच्छी स्थिति में नहीं है। यूरोप अमेरिका का कट्टर सहयोगी है और वह पुतिन के इरादों पर हमेशा संदेह करता रहा है। भारत भी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के 2000 के भारत दौरे के बाद से सामरिक तौर पर अमेरिका के करीब आ रहा है, उसके पास कूटनीतिक कलाबाजी की बहुत जगह नहीं है। भारत को रूस-अमेरिका-चीन मैट्रिक्स के मद्देनजर भी अपने संबंधों को चुस्त करने की जरूरत है। खासकर इसलिए भी कि राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वे चीन को विश्व का नया आर्थिक और सैनिक महाशक्ति बनते देखने को तैयार नहीं हैं। 
    पाकिस्तान के साथ चीन के निकट संबंधों, पाक प्रशासित कश्मीर में उसकी भूमिका और सीमा पर गोलीबारी के बावजूद दोनों देशों ने अपने व्यापारिक संबंधों को बिगडऩे न देने की कोशिश की है। रूस ने शंघाई सहयोग संगठन में भारत को सदस्यता पाने में मदद दी थी। भारत इन संबंधों को अपने विदेशनैतिक लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। मोदी ने पूर्व राष्ट्रपति अटल बिहारी वाजपेयी के हवाले से कहा कि भारत चाहता है कि रूस एक महत्वपूर्ण और आत्मविश्वासी देश बने जिसकी बहुध्रुवीय दुनिया में अहम भूमिका हो। ये अमेरिका और चीन दोनों को ही परोक्ष इशारा था कि एक महाशक्ति वाली दुनिया खत्म हो गई और शीतयुद्ध के बाद की दुनिया बहुध्रुवीय दुनिया है।
    भारत अभी भी रक्षा और कारोबार के मामले में कमजोर है। उसे रूस से 12 अरब डॉलर का सैनिक साजोसामान खरीदना है। पिछले पांच सालों में उसके रक्षा आयात का 62 प्रतिशत रूस से आया है। ये संबंध दोनों ही देशों के हित में है और ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिकी नीतियों के उतार चढ़ाव को देखते हुए स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों में तेजी आई है। मोदी के एक दिन के सोची दौरे ने रूस भारत संबंधों में उम्मीदें बढ़ा दी हैं। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 23-May-2018
  • मनोरंजन भारती
    एचडी कुमारस्वामी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात की हैकर्नाटक में साझा सरकार का रास्ता साफ है, उसे कोई रोक नहीं सकता। हां, इतना ज़रूर है कि नई-नई शादी में जैसे शुरुआत में दिक्कतें आती हैं, तो वे तो होंगी ही। फिर दोनों को एक दूसरे की आदत पड़ जाएगी। क्या करें, मजबूरी जो है। कहने को तो सांप्रदायिक ताकतों को रोकना है, मगर असली लालच तो कुर्सी का ही है। भाजपा अध्यक्ष कहते हैं कि जनादेश कांग्रेस-जेडीएस के खिलाफ है और जनता ने उन्हें नकार दिया है। मगर कांग्रेस का कहना है कि उन्हें भाजपा से दो फीसदी वोट अधिक मिले हैं, यानी सरकार बनाने की हकदार वही है, और इसमें यदि जेडीएस का वोट जोड़ दें, तो आंकड़ा 55 फीसदी के पार चला जाता है।
    सरकार के मुखिया भले ही एचडी कुमारस्वामी हों, मगर कांग्रेस बागडोर अपने हाथ में रखने वाली है। दो उपमुख्यमंत्री कांग्रेस के होंगे, जिनमें से एक दलित और एक लिंगायत होगा। मंत्रियों में भी अधिक लोग कांग्रेस के ही होंगे। यानी, सरकार अच्छा काम न करे, तो बदनामी मुख्यमंत्री की और सब ठीकठाक हुआ, तो वाहवाही सबकी। मगर इतना सब होने के बावजूद कर्नाटक का प्रयोग भारतीय राजनीति के लिए संभावनाओं के कई दरवाज़े खोल रहा है। दक्षिण फतह करने के भाजपा के मंसूबे पर फिलहाल रोक लगती दिख रही है, क्योंकि अब सबकी निगाहें राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों पर होंगी।
    मगर उससे पहले भाजपा का एक इम्तिहान इसी महीने की 28 तारीख को उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा उपचुनाव में होना है। यहां मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा), मायावती की बहुजन समाज पार्टी  और अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल मिलकर चुनाव लडऩे जा रहे हैं। कैराना भाजपा की सीट है, जो उनके सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद खाली हुई है। सपा और बसपा ने यहां मिलकर चुनाव लडऩे की घोषणा पहले ही कर दी थी, लेकिन राजनीति के कई जानकारों को इस पर शंका थी, लेकिन अब हालात साफ हो चुके हैं। तो क्या पहले कर्नाटक और अब कैराना 2019 में भारतीय राजनीति में एक नए प्रयोग का जनक होने वाले हैं।
    यदि कैराना का प्रयोग सफल रहता है, तो यह तीसरा मौका होगा, जब भाजपा अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में पिछड़ती दिखेगी। इससे पहले गोरखपुर और फूलपुर उपचुनावों के नतीजों को भी लोग भूले न होंगे। राजनीति के कई जानकारों का मानना है कि यदि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा कांग्रेस और अजित सिंह साथ आते हैं, तो भाजपा 23 सीटों तक सिमटकर रह जाएगी, जो बहुत बड़ा झटका होगा। बिहार में आरजेडी और जीतनराम मांझी हाथ मिलाकर यादवों, मुस्लिमों और दलितों के एक तबके को जोड़कर नीतीश कुमार को अच्छी टक्कर देने की हालत में हैं। वैसे भी बिहार में लालू प्रसाद यादव को जितने लम्बे अरसे तक जेल में रखा गया, एनडीए के लिए दिक्कतें उतनी ही बढ़ती जाएंगी, क्योंकि यादव और मुस्लिम इक_े होकर सौ फीसदी पोलिंग करने की कोशिश करेंगे।
    राजस्थान में भाजपा की हालत सबको मालूम है। मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की जोड़ी से कांग्रेस को काफी उम्मीदें हैं। मतलब, जैसे-जैसे 2019 नजदीक आता जाएगा, देश का राजनीतिक परिदृश्य भी लगातार बदलेगा। ममता बनर्जी क्या रुख अपनाएंगी, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव क्या करेंगे और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू का क्या रुख होगा। यही नहीं, वामदलों की क्या भूमिका होगी, और क्या वे ममता बनर्जी वाले फ्रंट का हिस्सा होंगे। ऐसे ही कुछ सवाल हैं, जो यह तय करेंगे कि 2019 के लोकसभा चुनाव की तस्वीर क्या होगी, और अंत में भानुमति के इस कुनबे का नेता कौन होगा। यह वह यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर ढूंढना अभी बाकी है। मगर, जो भी हो, 2019 का आम चुनाव मजेदार बहुत होगा। 
    (लेखक एनडीटीवी इंडिया में च्सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर-पॉलिटिकल न्यूज़ हैं।)
    https://khabar.ndtv.com

     

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Posted Date : 23-May-2018
  • मानवाधिकार संगठन एम्नेस्टी इंटरनेशनल की जांच के मुताबिक रोहिंग्या मुसलमान चरमपंथियों ने पिछले साल अगस्त में दर्जनों हिंदू नागरिकों की हत्या की थी। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले समूह का कहना है आरसा नाम के संगठन ने एक या संभवत: दो नरसंहारों में 99 हिंदू नागरिकों को मार डाला था। हालांकि आरसा ने इस तरह के किसी हमले को अंजाम देने से इंकार किया है।
    ये हत्याएं उसी समय की गई थीं जब म्यांमार की सेना के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत हुई थी। म्यांमार की सेना पर भी अत्याचार करने का आरोप है। म्यांमार में पिछले साल अगस्त के बाद से 7 लाख रोहिंग्या और अन्य को हिंसा के कारण पलायन करना पड़ा है। इस संघर्ष के कारण म्यांमार की बहुसंख्यक बौद्ध और अल्पसंख्यक हिंदू आबादी भी विस्थापित हुई है।
    एम्नेस्टी का कहना है कि उसने बांग्लादेश और रखाइन में कई इंटरव्यू किए, जिनसे पुष्टि हुई कि अराकान रोहिंग्या सैलवेशन आर्मी (आरसा) ने ये हत्याएं की थीं।
    यह नरसंहार उत्तरी मौंगदा कस्बे के पास के गांवों में हुआ था। ठीक उसी समय, जब अगस्त 2017 के आखिर में पुलिस चौकियों पर हमले किए गए थे। जांच में पाया गया है कि आरसा अन्य इलाकों में भी नागरिकों के खिलाफ इसी पैमाने की हिंसा के लिए जिम्मेदार है।
    रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि कैसे आरसा के सदस्यों ने 26 अगस्त को हिंदू गांव अह नौक खा मौंग सेक पर हमला किया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्रूर और बेमतलब हमले मे आरसा के सदस्यों ने बहुत सी हिंदू महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को पकड़ा और गांव के बाहर ले जाकर मारने से पहले डराया।
    इस हमले में जिंदा बचे हिंदुओं ने एम्नेस्टी ने कहा है कि उन्होंने या तो रिश्तेदारों को मरते हुए देखा या फिर उनकी चीखें सुनीं।
    अह नौक खा मौंग सेक गांव की एक महिला ने कहा कि उन्होंने पुरुषों को मार डाला। हमसे कहा गया कि उनकी तरफ न देखें। उनके पास खंजर थे। कुछ भाले और लोहे की रॉड्स भी थीं। हम झाडिय़ों में छिपे हुए थे और वहां से कुछ-कुछ देख सकते थे। मेरे चाचा, पिता, भाई... सभी की हत्या कर दी गई।
    यहां पर आरसा के लड़ाकों पर 20 पुरुषों, 10 महिलाओं और 23 बच्चों को मारने का आरोप है जिनमें से 14 की उम्र 8 साल से कम थी।
    एम्नेस्टी ने कहा कि पिछले साल सितंबर में सामूहिक कब्रों से 45 लोगों के शव निकाले गए थे। मारे गए अन्य लोगों के शव अभी तक नहीं मिले हैं, जिनमें से 46 पड़ोस के गांव ये बौक क्यार के थे।
    जांच से संकेत मिले हैं कि हिंदू पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का ये बौक क्यार गांव में उसी दिन नरसंहार हुआ था, जिस दिन अह नौक खा मौंग सेक पर हमला किया गया था। इस तरह मरने वालों की कुल संख्या 99 हो जाती है।
    सितंबर 2017 में बड़े स्तर पर रोहिंग्या मुसलमान भागकर बांग्लादेश आए थे। उन्होंने म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा किए गए अत्याचारों की दास्तां सुनाई थी। ठीक उसी समय म्यांमार की सरकार ने एक सामूहिक कब्र मिलने का दावा किया था। सरकार का कहना था कि मारे गए लोग मुसलमान नहीं, हिंदू थे और उन्हें आरसा के चरमपंथियों ने मारा है।
    पत्रकारों को कब्रों और शवों को दिखाने के लिए ले जाया गया था मगर सरकार ने रखाइन में स्वतंत्र मानवाधिकार शोधकर्ताओं को आने की इजाजत नहीं दी। इस कारण इस बात को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही थी कि आखिर अह नौक खा मौंग सेक और ये बौक क्यार गांवों में हुआ क्या था।
    उस समय म्यांमार की सेनाओं के अत्याचारों के कई गवाह सामने आए थे, मगर वहां की सरकार इन आरोपों से इंकार कर रही थी। ऐसे में सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ था। उस समय आरसा ने कहा था कि वह इस नरसंहार में शामिल नहीं था। इस संगठन की ओर से पिछले चार महीनों में कोई बयान सामने नहीं आया है।
    म्यांमार को शिकायत थी कि रखाइन से एकतरफा रिपोर्टिंग की जा रही है मगर बीबीसी समेत विदेशी मीडिया ने पिछले साल सितंबर में हिंदुओं की हत्या की खबर कवर की थी।
    एम्नेस्टी ने म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए अभियान को गैरकानूनी और हिंसक बताते हुए उसकी भी आलोचना की है। मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक रोहिंग्या आबादी पर म्यांमार के सुरक्षा बलों के जातीय नरसंहार वाले अभियान के बाद आरसा ने हमले किए थे।
    संगठन का कहना है कि उसे रखाइन और बांग्लादेश की सीमा पर दर्जनों लोगों के इंटरव्यू और फोरेंसिक पैथलॉजिस्ट्स द्वारा तस्वीरों की जांच के बाद ये बातें पता चली हैं।
    एम्नेस्टी के अधिकारी तिराना हसन ने कहा कि यह जांच उत्तरी रखाइन राज्य में आरसा की ओर से मानवाधिकारों के उल्लंघन पर रोशनी डालती है, जिसे खबरों में ज्यादा तरजीह नहीं मिली।
    जिन जिंदा बचे लोगों से हमने बात की, उनके ऊपर आरसा की क्रूरता की जो छाप छूटी है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन अत्याचारों की जवाबदेही उतनी ही जरूरी और अहम है, जितनी जिम्मेदारी उत्तरी रखाइन प्रांत में म्यांमार के सुरक्षा बलों के मानवता के खिलाफ किए अपराधों की बनती है।
    पिछले साल अगस्त के बाद से 7 लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश आ गए हैं जिनमें महिलाएं और बच्चे बड़ी संख्या में हैं। रोहिंग्या, जिनमें ज्यादा अल्पसंख्यक मुस्लिम हैं, म्यांमार में बांग्लादेश के अवैध प्रवासी समझे जाते हैं। जबकि वे कई पीढिय़ों से म्यांमार में रह रहे हैं। बांग्लादेश भी उन्हें नागरिता नहीं देता। (बीबीसी)

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Posted Date : 22-May-2018
  •  विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी 
    जिन्ना भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प उपस्थिति हैं। उनका जिक्र किए बिना आप 20वीं शताब्दी में एक राष्ट्र राज्य में तब्दील होते भारत को नहीं समझ सकते। विश्व में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण विरला ही मिलेगा, जब किसी अकेले व्यक्ति ने हवा में नक्शा खींचकर उसे एक भौगोलिक हकीकत के रूप में जमीन पर उतार दिया हो। यह कहना सरलीकरण होगा कि जिन्ना को लेकर हालिया विवाद सिर्फ कर्नाटक के चुनावों को ध्यान में रखकर उठा था। जिन्होंने विवाद उठाया था, वे जिन्ना की तस्वीर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के छात्र संघ दफ्तर में न टंगी होती, तब भी कोई और मुद्दा उठाकर सांप्रदायिक विभाजन करते। चुनावों का मौसम न भी हो, तब भी विभक्त भारतीय समाज के किसी भी गंभीर विमर्श में जिन्ना का प्रेत मौजूद रहता ही है। 
    शिक्षाविद् और कानून विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा का कहना सच है कि भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों का सबसे बड़ा नुकसान जिन्ना ने किया था। पाकिस्तानी मोहाजिर नेता अल्ताफ हुसैन की तरह वह भी मानते हैं कि विभाजन के कारण इस खित्ते के मुसलमान तीन टुकड़ों में बंट गए व कमजोर हुए। इसके बावजूद एएमयू छात्र संघ इस बात पर क्यों अड़ा है कि जिन्ना की तस्वीर दीवार से नहीं उतरेगी? तर्क दिए जा रहे हैं कि यह तस्वीर तो दशकों से टंगी है, फिर अभी अचानक क्यों हाय-तौबा मचाई जा रही है या संसद में टंगे एक ग्रुप फोटोग्राफ में भी जिन्ना झांकते दिख रहे हैं, उसे क्यों नहीं हटाते?
    भारतीय उपमहाद्वीप दुनिया की दो बड़ी धार्मिक आस्था- हिंदू व इस्लाम के पारस्परिक लेन-देन की अद्भुत प्रयोगशाला रहा है। हजार से भी अधिक वर्ष के इनके साथ ने अनंत संभावनाओं वाली दुनिया निर्मित की है। दोनों ने मिलकर संगीत, स्थापत्य, परिधान, विभिन्न दृश्य व श्रव्य कलाओं, साहित्य, यहां तक कि पाक शास्त्र में भी बेहतरीन मिली-जुली उपलब्धियां हासिल की हैं। पर यह सोचना कि दुनिया के दो बड़े धर्मों के अनुयायी साथ रहते हुए सिर्फ रचनात्मक लेन-देन करते रहे, सरलीकरण ही होगा। यह सोचना भी सरलीकरण होगा कि दोनों के बीच लड़ाई-झगड़े सिर्फ ब्रिटिश उपनिवेशवाद की देन थे। अंग्रेज न लड़ाते, तो ये न लड़ते। संघर्ष के बीज तो दोनों के भीतर कहीं गहरे छिपे हैं, अंग्रेजों ने तो सिर्फ खाद-पानी देने का काम किया।
     जिन्ना भी इसी मेल-जोल और लड़ाई-झगड़े की उपज हैं। एक तटस्थ व वस्तुपरक मूल्यांकन ही समझा सकता है कि एक समय में हिंदू-मुस्लिम एकता के हामी या तिलक और भगत सिंह के लिए अदालत में बहस करने वाले जिन्ना क्यों पृथक मुस्लिम राष्ट्र के पुरोधा बने और कैसे सिर्फ दस वर्षों (1937-1947) में उन्होंने इसे हासिल करके दिखा दिया? इसके लिए पहले तो हमें अपने दिमाग में लगे इस जाले को साफ करना होगा कि 'दो राष्ट्रों का सिद्धांतÓ जिन्ना के दिमाग की उपज है।        
    19वीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध र्में हिंदू-राष्ट्र शब्द का प्रयोग शुरू हो गया था और इसमें सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक योगदान महर्षि अरबिंदो घोष के मामा राज नारायण बसु और उनके सहयोगी नाभा गोपाल मित्र का है। मित्र ने भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से परे एक हिंदू राष्ट्र का सपना देखा। उत्तर भारत में आर्य समाजी भाई परमानंद ने 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हिंदुओं के अलग राष्ट्र की परिकल्पना की थी। यहां तक कि वे 1908-09 में आबादी की अदला-बदली कर हिंदुओं और मुसलमानों को अलग-अलग इलाकों में बसाने की वकालत कर रहे थे। 
    1924 में लाला लाजपत राय ने लगभग वही खाका पेश कर दिया, जिस पर आगे चलकर रेडक्लिफ लाइन खींची गई। उनके अनुसार, फ्रंटियर, पश्चिमी पंजाब, सिंध और पूर्वी बंगाल के रूप में मुसलमानों के चार राज्य बनने चाहिए थे। मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने तो इन सबके बाद दो राष्ट्रों के सिद्धांत को मूर्त रूप देना शुरू किया। मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन (1930) में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की सांस्कृतिक खाई को रेखांकित करने वाला इकबाल का भाषण, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्र चौधरी रहमत अली द्वारा पहली बार (1933) पाकिस्तान शब्द का इस्तेमाल और लाहौर सम्मेलन (1940) में मुस्लिम लीग द्वारा स्वायत्त मुस्लिम राज्यों का प्रस्ताव लाला लाजपत राय की स्थापना के तार्किक विस्तार ही हैं। 1947 में लालाजी की कल्पना पूरी हुई। फर्क सिर्फ इतना था कि चार राज्यों की जगह एक मुस्लिम राष्ट्र बना। 
    पता नहीं, इतिहास में काश का कोई अर्थ होता भी है या नहीं। पर आज हम कह सकते हैं कि काश, 1937 में कांग्रेस ने युक्त प्रांत में सरकार बनाते समय मंत्रिमंडल में वायदे के मुताबिक दो जगह मुस्लिम लीग को दे दी होती; काश, कैबिनेट मिशन प्लान नेहरू और पटेल ने मान लिया होता; काश, जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन डे जैसा कार्यक्रम न आयोजित किया होता... ऐसे कई काश हैं, जिनके भिन्न उत्तर होते, तो देश का विभाजन न होता और करोड़ों लोगों के विस्थापन और खून-खराबे से बचा जा सकता था। फैजान मुस्तफा को इस पर भी आश्चर्य है कि कानून के माहिर जिन्ना क्यों नहीं भांप पाए कि आजाद भारत में एक धर्मनिरपेक्ष संविधान ही बनेगा और उसमें मुसलमानों को बराबरी का हक मिलेगा? 
    शायद यह जिन्ना की बौद्धिक सीमा थी। उनके समकालीन सभी बड़े नेता- गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद आदि प्रकांड विद्वान और विचारक थे, जिसका नमूना उनका लेखन है। जिन्ना अपवाद थे। उन्होंने एक अखबार डॉन  जरूर शुरू किया, पर उसमें उनका लिखा कुछ भी नहीं मिलता। इससे उनके अंदर जो हीन ग्रंथि पैदा हुई, शायद वह भी जिम्मेदार थी कई बड़े फैसलों की। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेसी नेताओं द्वारा उनकी अपमानजनक उपेक्षा की गई, पर यदि उनके अंदर बौद्धिक प्रौढ़ता होती, तो उन्होंने जल्दबाजी में वे सब फैसले न लिए होते, जिनके लिए वह बाद में पछताए। यह तो उनके करीबियों ने लिखा है कि पाकिस्तान बनाने के बाद वह अंतिम दिनों में अफसोस करते रहे। एक बार धर्माधारित राज्य बनाने के बाद नेशनल असेंबली में 11 अगस्त के उनके इस वक्तव्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि पाकिस्तान में कोई हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई नहीं होगा और राज्य सबके साथ बराबरी का व्यवहार करेगा। 
    एएमयू के छात्रों की जिद कि वे जिन्ना का चित्र नहीं हटाएंगे, सिर्फ दक्षिणपंथी हिंदुत्व की मदद करेगा, क्योंकि कुछ भी हो, यह जिन्ना ही थे, जिनकी वजह से 'दो राष्ट्रों के सिद्धांतÓ को एक भौगोलिक स्वरूप मिला था।  https://www.livehindustan.com/blog/

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Posted Date : 22-May-2018
  • खुर्शीद अनवर खान
    21 मई, 1991 को शाम के आठ बजे थे। कांग्रेस की बुज़ुर्ग नेता मारगाथम चंद्रशेखर मद्रास के मीनाबक्कम हवाई अड्डे पर राजीव गांधी के आने का इंतज़ार कर रही थीं। थोड़ी देर पहले जब राजीव गांधी विशाखापट्टनम से मद्रास के लिए तैयार हो रहे थे तो पायलट कैप्टन चंदोक ने पाया कि विमान की संचार व्यवस्था काम नहीं कर रही है। राजीव मद्रास जाने का विचार त्याग गेस्ट हाउस के लिए रवाना हो गए। लेकिन तभी किंग्स एयरवेज़ के फ्लाइट इंजीनियर ने संचार व्यवस्था में आया नुख़्स ठीक कर दिया।
    विमान के क्रू ने तुरंत पुलिस वायरलेस से राजीव से संपर्क किया और राजीव मद्रास जाने के लिए वापस हवाई अड्डे पहुंच गए। दूसरे वाहन में चल रहे उनके पर्सनल सुरक्षा अधिकारी ओपी सागर अपने हथियार के साथ वहीं रह गए। मद्रास के लिए विमान ने साढ़े छह बजे उड़ान भरी। राजीव खुद विमान चला रहे थे। जहाज ने ठीक आठ बज कर बीस मिनट पर मद्रास में लैंड किया। वो एक बुलेट प्रूफ़ कार में बैठ कर मार्गाथम, राममूर्ति और मूपानार के साथ श्रीपेरंबदूर के लिए रवाना हो गए।
    दस बज कर दस मिनट पर राजीव गाँधी श्रीपेरंबदूर पहुंचे। राममूर्ति सबसे पहले मंच पर पहुंचे। पुरुष समर्थकों से मिलने के बाद राजीव ने महिलाओं की तरफ़ रूख़ किया। तभी तीस साल की एक नाटी, काली और गठीली लड़की चंदन का एक हार ले कर राजीव गाँधी की तरफ बढ़ी। जैसे ही वो उनके पैर छूने के लिए झुकी, कानों को बहरा कर देने वाला धमाका हुआ।
    उस समय मंच पर राजीव के सम्मान में एक गीत गाया जा रहा था...राजीव का जीवन हमारा जीवन है...अगर वो जीवन इंदिरा गांधी के बेटे को समर्पित नहीं है... तो वो जीवन कहाँ का?
    वहाँ से मुश्किल से दस गज़ की दूरी पर गल्फ़ न्यूज़ की संवाददाता और इस समय डेक्कन क्रॉनिकल, बंगलौर की स्थानीय संपादक नीना गोपाल, राजीव गांधी के सहयोगी सुमन दुबे से बात कर रही थीं।
    नीना याद करती हैं, मुझे सुमन से बातें करते हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरी आंखों के सामने बम फटा। मैं आमतौर पर सफ़ेद कपड़े नहीं पहनती। उस दिन जल्दी-जल्दी में एक सफ़ेद साड़ी पहन ली। बम फटते ही मैंने अपनी साड़ी की तरफ देखा। वो पूरी तरह से काली हो गई थी और उस पर मांस के टुकड़े और ख़ून के छींटे पड़े हुए थे। ये एक चमत्कार था कि मैं बच गई। मेरे आगे खड़े सभी लोग उस धमाके में मारे गए थे।
    नीना बताती हैं, बम के धमाके से पहले पट-पट-पट की पटाखे जैसी आवाज़ सुनाई दी थी। फिर एक बड़ा सा हूश हुआ और ज़ोर के धमाके के साथ बम फटा। जब मैं आगे बढ़ीं तो मैंने देखा लोगों के कपड़ो में आग लगी हुई थी, लोग चीख रहे थे और चारों तरफ भगदड़ मची हुई थी। हमें पता नहीं था कि राजीव गांधी जीवित हैं या नहीं।
    जब धुआँ छटा तो राजीव गाँधी की तलाश शुरू हुई। उनके शरीर का एक हिस्सा औंधे मुंह पड़ा हुआ था। उनका कपाल फट चुका था और उसमें से उनका मगज़ निकल कर उनके सुरक्षा अधिकारी पीके गुप्ता के पैरों पर गिरा हुआ था जो स्वयं अपनी अंतिम घडिय़ाँ गिन रहे थे। बाद में जीके मूपनार ने एक जगह लिखा, जैसे ही धमाका हुआ लोग दौडऩे लगे। मेरे सामने क्षत-विक्षत शव पड़े हुए थे। राजीव के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्ता अभी जि़ंदा थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। कुछ बुदबुदाए और मेरे सामने ही दम तोड़ दिया मानो वो राजीव गाँधी को किसी के हवाले कर जाना चाह रहे हों। मैंने उनका सिर उठाना चाहा लेकिन मेरे हाथ में सिफऱ् मांस के लोथड़े और ख़ून ही आया। मैंने तौलिए से उन्हें ढंक दिया।
    मूपनार से थोड़ी ही दूरी पर जयंती नटराजन अवाक खड़ी थीं। बाद में उन्होंने भी एक इंटरव्यू में बताया, सारे पुलिस वाले मौक़े से भाग खड़े हुए। मैं शवों को देख रही थी, इस उम्मीद के साथ कि मुझे राजीव न दिखाई दें। पहले मेरी नजऱ प्रदीप गुप्ता पर पड़ी। उनके घुटने के पास ज़मीन की तरफ मुंह किए हुए एक सिर पड़ा हुआ था। मेरे मुंह से निकला ओह माई गॉड...दिस लुक्स लाइक राजीव।
    वहीं खड़ी नीना गोपाल आगे बढ़ती चली गईं, जहाँ कुछ मिनटों पहले राजीव खड़े हुए थे।
    नीना बताती है, मैं जितना भी आगे जा सकती थी, गई। तभी मुझे राजीव गाँधी का शरीर दिखाई दिया। मैंने उनका लोटो जूता देखा और हाथ देखा जिस पर गुच्ची की घड़ी बँधी हुई थी। थोड़ी देर पहले मैं कार की पिछली सीट पर बैठकर उनका इंटरव्यू कर रही थी। राजीव आगे की सीट पर बैठे हुए थे और उनकी कलाई में बंधी घड़ी बार-बार मेरी आंखों के सामने आ रही थी। जहाँ राजीव का शव पड़ा हुआ था वहीं लाल कारपेट के एक हिस्से में आग लगी हुई थी।
    वहाँ मौजूद इंस्पेक्टर राघवन ने उसके ऊपर कूद कर जलती हुई कारपेट को बुझाया। इतने में राजीव गांधी का ड्राइवर मुझसे आकर बोला कि कार में बैठिए और तुरंत यहाँ से भागिए। मैंने जब कहा कि मैं यहीं रुकूँगी तो उसने कहा कि यहाँ बहुत गड़बड़ होने वाली है। हम निकले और उस एंबुलेंस के पीछे पीछे अस्पताल गए जहाँ राजीव के शव को ले जाया जा रहा था।
    दस बजकर पच्चीस मिनट पर दिल्ली में राजीव के निवास 10, जनपथ पर सन्नाटा छाया था। राजीव के निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज अपने चाणक्यपुरी वाले निवास की तरफ निकल चुके थे।जैसे ही वो घर में दाखिल हुए, उन्हें फ़ोन की घंटी सुनाई दी। दूसरे छोर पर उनके एक परिचित ने बताया कि मद्रास में राजीव से जुड़ी बहुत दुखद घटना हुई है।
    जॉर्ज वापस 10 जनपथ भागे। तब तक सोनिया और प्रियंका भी अपने शयन कक्ष में जा चुके थे। तभी उनके पास भी ये पूछते हुए फ़ोन आया कि सब कुछ ठीक तो है। सोनिया ने इंटरकॉम पर जॉर्ज को तलब किया। जॉर्ज उस समय चेन्नई में पी। चिदंबरम की पत्नी नलिनी से बात कर रहे थे। सोनिया ने कहा जब तक वो बात पूरी नहीं कर लेते वो लाइन को होल्ड करेंगी।
    नलिनी ने इस बात की पुष्टि की कि राजीव को निशाना बनाते हुए एक धमाका हुआ है लेकिन जॉर्ज सोनिया को ये ख़बर देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। दस बजकर पचास मिनट पर एक बार फिर टेलीफ़ोन की घंटी बजी।
    मैडम मद्रास में बम हमला हुआ है
    रशीद किदवई सोनिया की जीवनी में लिखते हैं, फ़ोन मद्रास से था और इस बार फ़ोन करने वाला हर हालत में जॉर्ज या मैडम से बात करना चाहता था। उसने कहा कि वो ख़ुफिय़ा विभाग से है। हैरान परेशान जॉर्ज ने पूछा राजीव कैसे हैं? दूसरी तरफ से पाँच सेकंड तक शांति रही, लेकिन जॉर्ज को लगा कि ये समय कभी ख़त्म ही नहीं होगा। वो भर्राई हुई आवाज़ में चिल्लाए तुम बताते क्यों नहीं कि राजीव कैसे हैं? फ़ोन करने वाले ने कहा, सर वो अब इस दुनिया में नहीं हैं और इसके बाद लाइन डेड हो गई।
    जॉर्ज घर के अंदर की तरफ़ मैडम, मैडम चिल्लाते हुए भागे। सोनिया अपने नाइट गाउन में फ़ौरन बाहर आईं। उन्हें आभास हो गया कि कुछ अनहोनी हुई है।
    आम तौर पर शांत रहने वाले जॉर्ज ने इस तरह की हरकत पहले कभी नहीं की थी। जॉर्ज ने काँपती हुई आवाज़ में कहा, मैडम मद्रास में एक बम हमला हुआ है। सोनिया ने उनकी आँखों में देखते हुए छूटते ही पूछा, इज़ ही अलाइव? जॉर्ज की चुप्पी ने सोनिया को सब कुछ बता दिया।
    रशीद बताते हैं, इसके बाद सोनिया पर बदहवासी का दौरा पड़ा और 10 जनपथ की दीवारों ने पहली बार सोनिया को चीख़ कर विलाप करते सुना। वो इतनी ज़ोर से रो रही थीं कि बाहर के गेस्ट रूम में धीरे-धीरे इक_े हो रहे कांग्रेस के नेताओं को वो आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। वहाँ सबसे पहले पहुंचने वालों में राज्यसभा सांसद मीम अफज़़ल थे।
    उन्होंने मुझे बताया कि सोनिया के रोने का स्वर बाहर सुनाई दे रहा था। उसी समय सोनिया को अस्थमा का ज़बरदस्त अटैक पड़ा और वो कऱीब-कऱीब बेहोश हो गईं। प्रियंका उनकी दवा ढ़ूँढ़ रही थीं लेकिन वो उन्हें नहीं मिली। वो सोनिया को दिलासा देने की कोशिश भी कर रही थीं लेकिन सोनिया पर उसका कोई असर नहीं पड़ रहा था।
    अचानक प्रियंका ने हालात को कंट्रोल में लिया। उन्होंने जार्ज की तरफ़ मुड़ कर पूछा, इस समय मेरे पिता कहाँ हैं? जार्ज ने उन्हें जवाब दिया, वो उन्हें मद्रास ला रहे हैं। प्रियंका ने कहा, कृपया तुरंत मद्रास पहुंचने में हमारी मदद कीजिए। इतने में राष्ट्रपति वैंकटरमण का फ़ोन आया। संवेदना व्यक्त करने के बाद उन्होंने पूछा, क्या इस समय मद्रास जाना अक्लमंदी होगी?
    प्रियंका ने ज़ोर देकर कहा कि हम इसी समय मद्रास जाना चाहेंगे। भारत के पूर्व विदेश सचिन टीएन कौल उन्हें अपनी कार में बैठा कर हवाई अड्डे पहुंचे। मद्रास पहुंचने में उन्हें तीन घंटे लगे। पूरी उड़ान के दौरान किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। सिफऱ् सोनिया की सिसकियों की आवाज़ें आती रहीं।
    जब वो मद्रास पहुंचे तो अभी वहाँ अंधेरा ही था। जैसे ही सोनिया ने वहाँ राजीव के पुराने दोस्त सुमन दुबे को वहां देखा, वो उनसे लिपट कर रोने लगीं। लेकिन वो शव को नहीं देख पाईं। वो देख भी नहीं सकती थीं।
    उन्हें बताया गया कि शव इतनी बुरी हालत में था कि उसे इंबाम तक नहीं किया जा सकता था। उन्होंने सिफऱ् दो ताबूत रखे देखे। एक में राजीव का शव रखा हुआ था और दूसरे में उनके सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्ता का।
    यहाँ पर पहली बार प्रियंका के आँसू निकल पड़े जब उन्हें एहसास हुआ कि अब वो अपने पिता को कभी नहीं देख पाएंगी।
    सोनिया गाँधी की एक और जीवनीकार जेवियर मोरो अपनी किताब च्द रेड साड़ीज् में लिखते हैं, तभी सोनिया ने एक ऐसा काम किया जिसे अगर राजीव जीवित होते तो बहुत पसंद करते। उन्होंने नोट किया कि प्रदीप गुप्ता के ताबूत पर कुछ भी नहीं रखा है। वो उठीं और उन्होंने मोगरे की एक माला उठा कर अपने हाथों से उसे उसके ऊपर रख दिया।
    इस केस की जाँच के लिए सीआरपीएफ़ के आईजी डॉक्टर डीआर कार्तिकेयन के नेतृत्व में एक विशेष जाँच दल का गठन किया। कुछ ही महीनों में इस हत्या के आरोप में एलटीटीई के सात सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया। मुख्य अभियुक्त शिवरासन और उसके साथियों ने गिरफ़्तार होने से पहले साइनाइड खा लिया।
    डॉक्टर कार्तिकेयन ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, आप कह सकते हैं हमारी पहली सफलता थी हरि बाबू के कैमरे से उन दस तस्वीरों का मिलना। हमने आम लोगों से सूचनाएं लेने के लिए अख़बारों में विज्ञापन दिया और एक टॉल फ्री नंबर भी दिया। हमारे पास कुल तीन चार हज़ार टेलीफ़ोन कॉल आए। हर एक कॉल को गंभीरता से लिया गया। हमने चारों तरफ़ छापे मारने शुरू किए और जल्द ही हमें सफलता मिलनी शुरू हो गई।
    पहले दिन से ही मैं इस काम में 24 घंटे, हफ़्ते के सातों दिन बिना किसी आराम के लगा रहा। मैं रोज़ रात के दो बजे काम के बाद कुछ घंटों की नींद लेने के लिए गेस्ट हाउस पहुंचता था। सारी जाँच तीन महीने में पूरी हो गई लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट्स आने में समय लगा लेकिन हत्या की पहली वर्षगाँठ से पहले हमने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी थी।
    कुछ दिनों बाद सोनिया गांधी ने इच्छा प्रकट की कि वो नीना गोपाल से मिलना चाहती हैं।
    नीना गोपाल ने बताया, भारतीय दूतावास के लोगों ने दुबई में फ़ोन कर मुझे कहा कि सोनियाजी मुझसे मिलना चाहती हैं। जून के पहले हफ्ते में मैं वहां गई। हम दोनों के लिए बेहद मुश्किल मुलाक़ात थी वो। वो बार-बार एक बात ही पूछ रहीं थी कि अंतिम पलों में राजीव का मूड का कैसा था, उनके अंतिम शब्द क्या थे।
    मैंने उन्हें बताया कि वह अच्छे मूड में थे, चुनाव में जीत के प्रति उत्साहित थे। वो लगातार रो रही थीं और मेरा हाथ पकड़े हुए थीं। मुझे बाद में पता चला कि उन्होंने जयंती नटराजन से पूछा था कि गल्फ़ न्यूज़ की वो लड़की मीना (नीना की जगह) कहां हैं, जयंती मेरी तरफ आने के लिए मुड़ी थीं, तभी धमाका हुआ।
    इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीसी एलेक्ज़ेंडर ने अपनी किताब च्माई डेज़ विद इंदिरा गांधीज् में लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ घंटों के भीतर उन्होंने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट के गलियारे में सोनिया और राजीव को लड़ते हुए देखा था।
    राजीव सोनिया को बता रहे थे कि पार्टी चाहती है कि, मैं प्रधानमंत्री पद की शपथ लूँ। सोनिया ने कहा हरगिज़ नहीं। वो तुम्हें भी मार डालेंगे। राजीव का जवाब था, मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। मैं वैसे भी मारा जाऊँगा। 
    सात वर्ष बाद राजीव के बोले वो शब्द सही सिद्ध हुए थे।

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Posted Date : 20-May-2018
  • -उर्मिलेश
    वरिष्ठ पत्रकार

    बहुमत के बगैर भाजपा कर्नाटक में भी गोवा और मणिपुर की तर्ज पर किसी न किसी तरह अपनी सरकार बनाने का जुगाड़ कर रही थी। सरकार बनी पर तीसरे दिन ही उखड़ गई। तमाम हथकंडे अपनाए गए पर वो सदन में बहुमत नहीं साबित कर सकी। राजभवन का चेहरा भी खराब हुआ। अतीत में कई प्रदेशों में ऐसा कई-कई बार हो चुका है।
    बेंगलुरु में राज्यपाल ने जिस तरह 117 सदस्यों के समर्थन वाली कांग्रेस-जनता दल(एस) गठबंधन को नजरंदाज कर 104 सदस्यों के समर्थन वाली भाजपा को सरकार बनाने और फिर बहुमत साबित करने का 15 दिनों का लंबा वक्त दिया, उसके पीछे छुपी मंशा और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के जुगाड़-प्रोजेक्ट का बुरी तरह पर्दाफाश हुआ। कर्नाटक के इस सियासी उलटफेर को पूरा देश देख रहा था। निस्संदेह, तीन-चार दिनों के घटनाक्रम और उसके नतीजे से विपक्ष के हौसले बुलंद होंगे।
    विपक्ष को एक बार फिर इस बात का एहसास हुआ कि देश की सत्ता-राजनीति का संचालन कर रही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी सियासी तौर पर अपराजेय नहीं है। इससे सन् 2019 की चुनावी तैयारी में विपक्ष को मनोवैज्ञानिक फायदा होगा। उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा!
    दिल्ली, बिहार और पंजाब के प्रांतीय चुनावों में विपक्षी दलों या उनके गठबंधनों ने मोदी-शाह की विजययात्रा को शानदार ढंग से रोका था। लेकिन असम, त्रिपुरा, गोवा और पूर्वोत्तर के कुछ अन्य राज्यों में भाजपा के सत्ता पर काबिज होने में कामयाब होने से विपक्षी खेमा एक बार फिर हताश दिखने लगा था। कर्नाटक के चुनावी नतीजे भी विपक्षी खेमे के लिए निराशाजनक रहे। कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सत्ता में वापसी के लिए जरूरी बहुमत हासिल नहीं कर सके। यहां किसी दल को बहुमत नहीं मिला।
    समय रहते हालात भांपकर कांग्रेस ने देर किए बगैर जनता दल(एस) की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा ने चुनाव प्रचार के दौरान की सियासी कटुता को भुलाते हुए कांग्रेस के बढ़े हाथों को झटका नहीं! 
    भ्रष्टाचार और अपराध के खात्मे के नारे के साथ 2014 में सरकार बनने वाली भाजपा ने धनबल, बाहुबल और राजभवन के जरिए दक्षिण के इस महत्वपूर्ण राज्य की सत्ता में काबिज़ होने की हरसंभव कोशिश की। राजभवन और केंद्र के सियासी सूरमाओं ने बहुमत के लिए जरूरी संख्या होने के बावजूद कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन को सत्ता से वंचित करने की भरपूर कोशिश की। बेंगलुरु में बीएस येदियुरप्पा की अल्पमत सरकार बैठा दी गई। पर धनबल-बाहुबल से लैस कांग्रेस-जनता दल(एस) के प्रांतीय नेताओं की मजबूत लामबंदी और कानून का दरवाजा खटखटाने की कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति के आगे भाजपाई खेल खराब हो गया।
    19 मई को कर्नाटक के सियासी नाटक को देश भर में लोग टीवी चैनलों के जरिये कुछ उसी तरह देख रहे थे, जैसे वे संसदीय आम चुनाव के नतीजे देखते हैं।
    बहुमत हासिल करने में नाकाम येदियुरप्पा ने विधानसभा में जैसे ही अपने इस्तीफे का ऐलान किया, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, बिहार के विपक्षी नेता तेजस्वी यादव, यूपी के दो-दो पूर्व मुख्यमंत्रियों अखिलेश यादव और सुश्री मायावती और हाल तक भाजपा के सहयोगी रहे आंध्र के मुख्यमंत्री व तेलुगू देशम पार्टी के अध्यक्ष एन चंद्रबाबू नायडू सहित अनेक विपक्षी नेताओं ने कर्नाटक के घटनाक्रम को लोकतंत्र की जीत बताया।
    पहले भी कई बार देखा गया कि विधायिका या संसदीय मामलों के विवादों में जब कभी न्यायपालिका से विपक्ष को कुछ राहत मिली तो लोकतंत्र की जीत के जयकारे लगने लगे। पर इस मुद्दे पर ज़्यादा संगत और वस्तुगत होकर सोचने और समझने की जरूरत है। 1950 में हमें एक बहुत संतुलित और खूबसूरत संविधान मिला। तब से अब तक जरूरत के हिसाब से उसमें ढेर सारे संशोधन होते रहे। पर संसद या विधानसभाओं में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने या दल-बदल संबंधी किसी मामले के उभरने की स्थिति में सरकार के गठन या उसके बने या न बने रहने को लेकर सबसे संगत और सर्व-स्वीकार्य रास्ता क्या हो, इस पर हमेशा बवाल उठता है।
    फिर न्यायालय द्वारा दिये एस आर बोम्मई फैसले, रामेश्वर प्रसाद फैसले या पंछी आयोग की सिफारिशें गिनाई जाने लगती हैं। दल-बदल कानून की अपने-अपने ढंग से व्याख्या होने लगती है। राजभवन विवादों के केंद्र बन जाते हैं। ऐसे ज्यादातर मौकों पर राज्यपाल प्रांतों में अपने को संविधान के संरक्षक के बजाय केंद्र के सूबेदार की तरह पेश करते नजर आते हैं।
    अनेक बार जनादेशों का सियासी अपहरण तक हुआ है। ऐसे विवादों में राजनीतिक दल विधायिका के स्तर पर समाधान नहीं खोज पाते और मामले अदालतों में पहुंचते हैं। जो क्षेत्रीय दल धनबल और समर्थ कानूनविदों के मामले में कमजोर होते हैं, वे आमतौर पर ताकतवर दलों के आगे समर्पण कर जाते हैं। 
    कानूनी सलाहकारों के मामले में सक्षम और समृद्ध दल अंत तक न्यायालयों के जरिये समाधान हासिल करने की कोशिश करते हैं। अतीत में भी देखा गया है कि ऐसे कई मामले न्यायालयों द्वारा निपटाए गए। कर्नाटक में भी यही हुआ। विधायिका अगर विवादास्पद मामलों को अपने स्तर पर हल नहीं कर पा रही तो यह उसकी बड़ी विफलता है। निकट अतीत में हमने कई बार देखा कि रवि राय या सोमनाथ चटर्जी जैसे बेहद सम्मानित लोकसभाध्यक्षों ने विधायिका के मसलों को न्यायालय ले जाने की प्रवृत्ति को लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमज़ोरी माना। पर अब तो प्रो-टेम स्पीकर की नियुक्ति के मामले में भी न्यायालय जा रहे हैं।
    राज्यपाल द्वारा येदियुरप्पा को बहुमत के बगैर शपथ कराना और फिर बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का वक्त देना, दोनों कदम शुरू से ही विवादास्पद माने गए। सर्वोच्च न्यायालय ने 15 दिन के वक्त संबंधी राज्यपाल के फ़ैसले को पलट दिया। बहुत संभव है, अगर न्यायालय ने ऐसा आदेश न दिया होता तो कर्नाटक की सियासत और बदरंग होती! सवाल उठता है, राजभवनों से ऐसे पार्टीजऩ फ़ैसले होते ही क्यों हैं? कर्नाटक में ये पहली बार नहीं हुआ है। आखिर ये सिलसिला थमता क्यों नहीं?
    विवादास्पद फैसला देने वाले राज्यपालों की सूची बनाई जाए तो उसमें विभिन्न दलों के नेता रहे दो दर्जन से ज्यादा राज्यपालों के नाम आएंगे। इसी तरह सदन के पीठासीन अध्यक्षों/ पदाधिकारियों की सूची भी लंबी होगी।
    लगभग अड़सठ साल के संवैधानिक लोकतंत्र में अगर भारत के राजनीतिक दल और विधायिका ऐसे स्वाभाविक संसदीय-विधायी मामलों का अपने स्तर पर समाधान नहीं कर पा रही हैं तो निस्संदेह यह लोकतंत्र के पिचकते चेहरे का खौफनाक सच है! आखिर कोई दल या नेता बहुमत न होने के बावजूद सत्ता पर क्यों काबिज रहना चाहता है? लोकतंत्र-विरोधी इस मनोवृत्ति को कहां से जमीन मिलती है? अगर बीते छह-सात दशकों के अनुभव राज्यपालों की नियुक्तियों के मामले में इतने कड़वे हैं तो संविधान सभा की बहसों की रोशनी में इनकी नियुक्ति के लिए नया विधान क्यों नहीं बनाया जाता!
    भारत के संविधान के अनुच्छेद-153 से 170 में दर्ज प्रावधानों को देखें तो बिल्कुल साफ नजर आता है कि राज्यपाल का निर्धारित कार्यभार इतने भारी-भरकम पद के बगैर भी संपन्न हो सकता है! अनुभव इतने कड़वे हैं तो औपनिवेशिक सत्ता-व्यवस्था में सृजित हुए गवर्नर या राज्यपाल पद को जारी रखने की जरूरत ही क्यों है? लोकतंत्र में एक जनता द्वारा निर्वाचित सरकार का शीर्ष संवैधानिक पदाधिकारी केंद्र से मनोनीत क्यों हो? इन सवालों पर क्यों नहीं बहस होती। कर्नाटक के सियासी नाटक का पटाक्षेप भले हुआ है लेकिन उससे उभरे सवालों का मुकम्मल जवाब खोजा जाना बाकी है। (बीबीसी)

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Posted Date : 20-May-2018
  • हरिवंश चतुर्वेदी 
    निदेशक, बिमटेक 

    देश के शीर्षस्थ विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में प्रवेश की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। 1922 में स्थापित इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में 16 संकाय, 86 विभाग और 77 संबद्ध कॉलेज हैं, जिनके विभिन्न कोर्सों में उपलब्ध 70 हजार सीटों के लिए लगभग ढाई लाख विद्यार्थी हर साल आवेदन करते हैं। देश के हर कोने से प्रतिभाशाली विद्यार्थी यह सपना लेकर इन दिनों राजधानी पहुंचते हैं कि किसी तरह डीयू के किसी नामी-गिरामी कॉलेज में दाखिला मिल सके।
    दिल्ली की तरह चेन्नई, बंगलुरू, मुंबई, पुणे, हैदराबाद, कोलकाता और चंडीगढ़ जैसे महानगरो के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भी इसी तरह की भीड़ दिखाई देती है। इन दिनों देश के लाखों सुशिक्षित और प्रबुद्ध अभिभावकों की चिंता का प्रमुख विषय उनके बच्चों का बड़े शहर के किसी अच्छे कॉलेज में मनचाहे कोर्स में दाखिला न मिल पाना है। प्रवेश सूची के जारी होने तक उनकी सांस में सांस अटकी रहती है कि आखिर मनचाहे कालेज में उनके बच्चे का दाखिला हो पायेगा या नहीं? डीयू में दाखिले का सीजन तो अभी शुरू हुआ है और अगले माह के अंत तक खत्म हो पायेगा, किन्तु पूरे देश में यह प्रक्रिया सितंबर अंत तक चलेगी। 
    इसी के साथ देश में ऐसे विश्वविद्यालय, कॉलेज और कोर्स भी है जहाँ पर पिछले एक दशक से प्रवेशार्थियों की कमी चली आ रही है। विज्ञान, लिबरल आर्टस और समाज विज्ञान की तुलना में सामान्यता: इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कोर्स के लिए हर साल लाखों युवा प्रवेश परीक्षाओं में बैठतें हैं। लेकिन पिछले एक दशक से इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फार्मेसी वगैरह के अनेकों कॉलेज प्रवेशार्थी न मिलने के कारण बन्द होने के कगार पर हैं। कुछ तो बंद भी हो चुके हैं। जब भारत आजाद हुआ तो देश के 25 विश्वविद्यालयों और 700 कॉलेजों मे सिर्फ एक लाख विद्यार्थी पढ़ाई कर रहे थे। आज देश के 858 विश्वविद्यालयों में और 45000 कॉलेजों में 3़5 करोड़ से ज्यादा विद्यार्थी उच्चशिक्षा पा रहे हैं। अगर उच्चशिक्षा में क्वालिटी के पैमाने पर चुनाव किया जाये तो बमुश्किल 20 प्रतिशत विश्वविद्यालय और कॉलेज ही उस पर खरे उतरेंगे। ये वहीं कॉलेज हैं जो ऐतिहासिक विरासत, कुशल प्रबंध, ब्रांडिग, अलुमनाई या स्वायत्तता के कारण अपनी धाक जमाए हुए हैं।
    डीयू की तरह कई केंद्रीय विश्वविद्यालय भी लाखों प्रवेशार्थियों को हर साल आकर्षित करते हैं। इनके डिग्रीधारियों को समाज, सरकार और उद्योगजगत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। जेएनयू़, बीएचयू़, एएमयू, जामिया मिलिया, कोलकाता विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय वगैरह की आकर्षण शक्ति के कई कारण हैं। इनमें से हरेक केंद्रीय विश्वविद्यालय के पास अमूल्य ऐतिहासिक विरासत है। कई विश्वविद्यालय 100 वर्ष से ज्यादा पुराने हैं जिनके लाखों अलुमनाई देश और दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में यश प्राप्त कर चुके हैं। इन विश्वविद्यालयों की कामयाबी के अन्य कारण केन्द्रीय सरकार से प्रचुर फण्ड प्राप्त होना, विशाल कैम्पस, शिक्षक व छात्र वर्ग में विविधता, एडमिशन में पारदर्शिता और राजनैतिक दखलंदाजी से मुक्ति आदि हैं। ऐसा नहीं है कि इन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कोई कमी न हो। परंतु ज्यादातर स्थानों पर जागरूक शिक्षक समुदाय के मुखर रवैये से राजनीतिक दखलंदाजी पर नियंत्रण रहता है। फिर  हमारे पास अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान हैं जिनकी उत्कृष्टता का लोहा सारी दुनिया में माना जाता है।  
    1991 के बाद, आर्थिक उदारीकरण के दौर में तकनीकी व पेशेवर शिक्षा का तेजी से विकास हुआ क्योंकि अर्थव्यवस्था को इंजीनियरों, प्रबंधकों और डॉक्टरों की ज्यादा जरूरत थी। इस दौर में तकनीकी व पेशेवर शिक्षा मेंं ज्यादातर संस्थान निजी क्षेत्र में स्थापित हुए। आज इंजीनियरिंग, प्रबंध, मेडिकल, फार्मेसी आदि क्षेत्रों में 85 प्रतिशत से ज्यादा संस्थान निजी क्षेत्र में हैं। देश के किसी भी शहर या ग्रामीण क्ष़ेत्र में आप को ऐसे होर्डिंग्स मिल जायेंगे जो कि बीटेक, एमबीए जैसे कोर्सो के लुभावने विज्ञापन दिखाते हैं और 100 प्रतिशत प्लेसमेंट के दावे करते है। इनमें से ज्यादातर संस्थान व्यावसायिक उद्देश्यों से चलाए जाते हैं और उच्चशिक्षा की बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं करते हैं। इन निजी संस्थानों के संचालन का एक विशिष्ट मॉडल है जिसमें संस्थान की आकर्षक बिल्डिंग बनाने, टीवी चैनलों व प्रिंट मीडिया में मंहगे विज्ञापन करने और एडमिशन मार्केटिंग पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाता है। मेरिट आधारित प्रवेश, अच्छी फैकल्टी, गवर्नेंस, वित्तीय पारदर्शिता, शोध व अनुसंधान आदि महत्वपूर्ण तत्व आमतौर पर उपेक्षित रहते हैं। नितांत व्यावसायिक ढंग से चलाये जाने वाले कॉलेजों और प्राईवेट विश्वविद्यालयों से अब मध्यवर्ग का मोहभंग शुरू हो चुका है इसी कारण ये लगातार बंद हो रहे हैं।
    इसी के साथ यह भी सच है कि निजी क्षेत्र के सभी संस्थान इस तरह के व्यावसायिक मॉडल पर नहीं चलाये जाते। इनमें से कई संस्थान देश के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों, व्यवसाइयों, पेशेवरों, चैरिटेबिल ट्रस्टों और सोसायटियों द्वारा स्थापित किये गये हैं। इनके संस्थापकों ने दूरदर्शिता और सामाजिक जिम्मेदारी को ध्यान में रखा, ऐसी संस्थाएं राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी ख्याति स्थापित करने में कामयाब रहीं हैं। हमारे पास अनेक ऐसे उदाहरण भी हैं जहां विश्वस्तरीय क्वालिटी की तकनीकी व पेशेवर शिक्षा प्रदान की जा रही है। सरकार के पास सभी वर्गों को उच्चशिक्षा प्रदान करने के संसाधन नहीं हैं, ऐसी निजी संस्थानों को प्रोत्साहना देना आवश्यक होगा।
    आजादी के 70 वर्षों बाद, हम आज इस स्थिति में हैं कि हमारे कुछ विश्वविद्यालय, तकनीकी और पेशेवर संस्थान विश्वस्तरीय क्वालिटी की उच्चशिक्षा प्रदान कर रहें हैं। पर हमारी ज्वलंत समस्या राज्य विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में दी जा रही स्तरहीन शिक्षा की है। हमारे 90 प्रतिशत युवाओं को जिस तरह डिग्रियां बांटी जा रही हैं, उससे उनके जीवन को कोई दिशा नहीं मिल सकेगी। भारत में उच्चशिक्षा का प्रमुख मुद्दा बमुश्किल 20 प्रतिशत प्रवेशार्थियों को क्वालिटी शिक्षा मिल पाना है। जब तक उच्चस्तरीय क्वालिटी संस्थानों का विस्तार नहीं होगा, कुछ खास विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भीड़भाड़ की समस्या बनी रहेगी।
    https://www.livehindustan.com/blog/

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Posted Date : 19-May-2018
  • शाह मीर बलोच
    पाकिस्तान में आम चुनावों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। सेना और सत्ताधारी पीएमएल (एन) के बीच विवाद की ताजा वजह है नवाज शरीफ का वो बयान जिसमें उन्होंने 2008 के मुंबई हमलों में पाकिस्तान की भूमिका को स्वीकारा है। पाकिस्तानी सरकार और सेना के बीच रिश्ते पहले से ही खराब चल रहे थे, लेकिन मुंबई हमलों को लेकर नवाज शरीफ के बयान ने आग में घी डालने का काम किया है। चौतरफा आलोचना के बावजूद नवाज शरीफ अपने विवादाति बयान से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। 
    अपने बयान की वजह से नवाज शरीफ सेना समर्थक दूसरे राजनेताओं के निशाने पर आ गए हैं। कई लोग नवाज शरीफ पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग कर रहे हैं। पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ के नेता इमरान खान कहते हैं, नवाज शरीफ पर आर्टिकल 6 के तहत आरोप तय होने चाहिए। पाकिस्तान संविधान के आर्टिकल 6 के तहत देशद्रोह पर मौत की सजा देने की बात कही गई है।
    समय पर चुनाव?
    यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान में इस साल चुनाव चुनाव होने हैं। मौजूदा संसद का कार्यकाल मई में खत्म हो रहा है और जुलाई में चुनाव हो सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान में बहुत से लोगों का मानना है कि देश में मौजूदा हालात के मद्देनजर चुनाव समय पर नहीं होंगे। वहीं अधिकारी चुनाव समय पर कराने की बात कर रहे हैं। पाकिस्तानी चुनाव आयोग के प्रवक्ता अल्ताफ अहमद ने डीडब्ल्यू को बताया, सब कुछ योजना के मुताबिक हो रहा है और चुनाव समय पर होंगे। अगर प्रधानमंत्री ने संसद को 31 को भंग कर दिया तो चुनाव आयोग के पास चुनाव कराने के लिए 60 दिन का समय होगा।
    पाकिस्तान के राजनीतिक दलों को भी चुनाव समय पर होने की उम्मीद है। सत्ताधारी पीएमएल (एन) के चेयरमैन राजा जफर उल हक के अनुसार, चुनाव में विलंब नहीं किया जाएगा। वहीं पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ के प्रवक्ता चौधरी फवाद हुसैन का भी यही कहना है कि चुनावों में देरी करने का कोई मतलब नहीं है। एक चुनाव विश्लेषक ताहिर मेहदी कहते हैं, पाकिस्तान अपने आम चुनावों में विलंब नहीं कर सकता है क्योंकि उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जवाब देना है। इसलिए मुझे लगता है कि चुनाव समय पर ही होंगे। लेकिन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के प्रेस सेक्रेटरी रहे फरतुल्लाह बाबर कहते हैं कि देश में कुछ अलोकतांत्रिक ताकतें चुनावी प्रक्रिया में रोड़ा अटकाना चाहती हैं, लेकिन वे कामयाब नहीं होंगी।
    पर्दे के पीछे से सत्ता
    पाकिस्तान में 2013 में ऐसा पहली बार हुआ था जब सुगम तरीके से एक चुनी हुई सरकार ने दूसरी चुनी हुई सरकार को सत्ता हस्तांतरण किया था। इससे उम्मीद जगी थी कि पाकिस्तान में अब सैन्य तख्तापलट का दौर पीछे जा चुका है और देश लोकतांत्रिक रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। लेकिन जिस तरह हाल में नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया, उसके बाद संदेह होने लगा कि इसके पीछे सेना का हाथ है। भ्रष्टाचार के मामले में नवाज शरीफ को अयोग्य करार दिए जाने के बाद प्रधानमंत्री पद छोडऩा पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपनी पार्टी के अध्यक्ष पद से भी हटने के लिए मजबूर किया। इतना ही नहीं, वह चुनाव भी नहीं लड़ सकते हैं।बहुत से लोगों को लगता है कि नवाज शरीफ को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह सेना से टकरा रहे हैं। 
    कई विश्लेषकों का कहना है कि नवाज शरीफ को सियासी पटल से हटाने की कोशिशों से पता चलता है कि देश की सेना संस्थागत रूप से कितनी ताकतवर है और उसे अपनी ताकत दिखाने के लिए अब तख्तापलट करने या फिर मार्शल लॉ लगाने की जरूरत नहीं है, बल्कि सेना ने अब पर्दे के पीछे से सत्ता चलाने का हुनर सीख लिया है। ऐसे में, यह सवाल भी उठ रहे हैं कि पाकिस्तान में होने वाले चुनाव कितने निष्पक्ष और स्वतंत्र होंगे। पीएमएल (एन) के जफर उल हक कहते हैं, अगर चुनाव स्वंतत्र और निष्पक्ष नहीं हुए तो उन्हें स्वीकार नहीं किया जाएगा क्योंकि चुनावों को पारदर्शी होना चाहिए। 
    चीन की मदद
    इस साल की शुरुआत में अमरीका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य मदद रोक दी। इसके कारण पाकिस्तान वित्तीय और राजनयिक समर्थन के लिए चीन के और ज्यादा करीब जाने को मजबूर हुआ है। वैसे चीन दशकों से पाकिस्तान का अहम सहयोगी रहा है और हाल के सालों में उसने पाकिस्तान में भारी निवेश किया है। वह 60 अरब डॉलर की लागत से चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर बना रहा है। विश्लेषक कहते हैं कि चीन पाकिस्तान को मदद देकर क्षेत्र में भारत का असर कम करना चाहता है और निकट भविष्य में इस नीति में किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है।
    विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक समृद्धि के लिए राजनीतिक स्थिरता बहुत जरूरी है। अगर राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो फिर स्थितरता भी डांवाडोल होती है। पाकिस्तानी सीनेटर अकरम दश्ती ने डीड़ब्ल्यू से बातचीत में कहा कि हालात अस्थिर होंगे तो इससे राजनीतिक और चुनाव से जुड़े मामलों में सैन्य प्रतिष्ठान का दखल बढ़ेगा। वह कहते हैं, सेना नवाज शरीफ को सत्ता से बाहर करने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगी। संक्षेप में कहें तो पाकिस्तानी सेना कभी इस बात को मंजूर नहीं करेगी कि राजनीतिक पार्टियां उससे ऊपर हो जाएं क्योंकि वे इस देश को अपनी मर्जी से चलाना चाहते हैं। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 19-May-2018
  • मनींद्र नाथ ठाकुर , एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू
    वर्तमान सरकार ने ग्रामीण विकास के लिए एक नया प्रयास किया था। सांसदों को एक-एक गांव गोद लेने की सलाह दी गयी थी। उनसे कहा गया था कि इस गांव को विकास का प्रतिमान बनाया जाये।  लेकिन, आखिरकार यह भी जुमला ही प्रतीत हो रहा है। पिछली सरकार के समय राष्ट्रपति कलाम साहब ने भी एक सपना देखा था कि ग्रामीण इलाकों में शहरों की सुविधाएं दी जाएं। लेकिन उससे भी कोई फर्क नहीं आया। दरअसल, सवाल यह पूछना होगा कि क्या शहरी सभ्यता में गांव की नियति उसकी अंत्येष्टि में ही है? ग्रामीण सभ्यता को बचा पाना शायद मुश्किल ही है। क्या फर्क है दोनों सभ्यताओं में? 
    यदि आप गांधी को पढ़ें, तो बात समझ में आने लगती है। नगर पहले भी थे, लेकिन वे ग्रामीण सभ्यता के नगर थे। आज का गांव शहरी सभ्यता का गांव है। आज का शहर बाजार है, उसके रिश्ते भी बाजारू हैं। प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन ने कभी इससे खिन्न होकर लिखा था 'एहन शहर के हमर प्रणाम, जकर हर घर में छै दुकानÓ यानी इस सभ्यता में घरेलू रिश्ते भी धीरे-धीरे बाजारू हो जाते हैं।
    हाल ही में मुझे अपने एक शिक्षक के लिखे पुस्तक विमोचन में बिहार के एक शहर अररिया जाने का मौका मिला। उन्होंने अररिया का एक संक्षिप्त इतिहास लिखने का प्रयास किया है। यह पुस्तक सत्तर साल के एक बुद्धिजीवी का उस शहर से, उसकी मिट्टी से मोह का प्रतीक है। उनके पुराने छात्रों का उनके प्रति स्नेह देखकर अद्भुत लगा। अपनी जवानी में एक छोटे से कमरे में रहते थे और जिला स्कूल पूर्णिया में अंग्रेजी पढ़ाते थे। 
    उस खंडहरनुमा कमरे में इतनी ताकत थी कि असम के एक बड़े पुलिस अधिकारी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक शिक्षक और अनेक ऐसे छात्रों को पिछले पैंतीस वर्षों से उनसे और आपस में जोड़े रखा। उस सभ्यता के शिक्षकों में यह क्षमता है, जिनके लिए शिक्षक होना केवल वेतनभोक्ता कर्मचारी होने से कहीं ज्यादा एक गुरु होना है। 
    मुझे पुस्तक विमोचन का यह कार्यरफमम ग्रामीण सभ्यता के शहर की आखिरी घटना जैसी दिखा रही थी। अब शहर बड़ा होता जायेगा, लोग अजनबी होते जायेंगे। फिर अपराध होगा, समाज का अवमूल्यन होगा। 
    राज्य सरकार पुलिस को मजबूत करेगी, लेकिन अपराध भी उसी गति से बढ़ता जायेगा। अररिया और सीमांचाल के अन्य शहरों की एक बड़ी खासियत है कि यहां अनेक संस्कृतियों का संगम है। यहां सिख, ईसाई, हिंदू, मुस्लिम, आदिवासी, पठान, मारवाड़ी, न जाने कितने ही तरह के लोग रहते हैं। उतनी ही भाषाएं हैं और उनमें रचनाएं भी हुई हैं। हिंदी, उर्दू, बांग्ला, फारसी, मैथिली, सूरजापूरी, संस्कृत, न जाने कितनी भाषाओं में रचनाएं हुई हैं और कितनी ही लोकपरंपराएं हैं। 
    मजे की बात यह है कि ये संस्कृतियां आपस में इस तरह से घुली-मिली हैं कि आप इनके बीच आसानी से भेद-भाव नहीं कर सकते हैं। इन सबका एक साथ जीवित रहना शायद इसलिए भी संभव है कि यह इलाका अभी शहरी विकास के मापदंड पर बहुत नीचे है।
    ऐसा कहना उचित नहीं होगा कि उनमें आपस में मतभेद नहीं है या फिर ग्रामीण समाज शोषण मुक्त है या रहा होगा। लेकिन उन मतभेदों को मिटाने का, उसे कम करने का 'पंच परमेश्वरÓ उनका अपना तकनीक निश्चित रूप से रहा होगा। 
    गांधी उस सभ्यता की कहावतों को बचाना चाहते थे और उसकी कमियों को दूर करना चाहते थे। अररिया में मुझे कुछ ऐसे लोग भी मिले, जो इस प्रयास में लगे हैं। एक ऐसा ग्रुप है, जिसमें आइआइटी, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, कॉर्नेल विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, आंबेडकर विवि के छात्र-छात्रा रह चुके युवक-युवतियां शामिल हैं। इन सब लोगों ने ग्रामीण समाज की सेवा का व्रत लिया है।  गांधी शायद राजनीति को भी सेवा के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। मुझे इस छोटे से युवा दल की आंखों में वही सपना दिखा। हाल के दिनों में ऐसे कई संगठनों से मेरा संपर्क हुआ है, जिनमें इन संस्थाओं से शिक्षित छात्र अपनी मोटी तनख्वाह वाली नौकरियां छोड़कर अपना सहयोग दे रहे हैं। मैं अक्सर उनसे पूछता हूं कि ऐसा निर्णय उन्होंने क्यों लिया? उनका उत्तर मुझे आश्वस्त करता है कि अभी हमारी सभ्यता में काफी जान बची हुई है। 
    इसमें कोई शक नहीं कि उनका प्रयास सराहनीय है। लेकिन, शायद ग्रामीण विकास पर पुन: चिंतन की जरूरत है। इस नये प्रयास में राजनीतिक चेतना का अर्थ केवल लोगों को उनके अधिकारों का बोध कराना न हो, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रयोग भी शामिल हों। भारत में ऐसे कई प्रयोग हो भी रहे हैं, लेकिन उनका आपस में कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के प्रयोग को ही लें। ग्रामीणों और कामगारों के इस आंदोलन ने छत्तीसगढ़ी भाषा का एक विद्यालय बनाया, जिसमें स्थानीय ज्ञान को शामिल करते हुए पाठ्यक्रम बनाया गया। 
    लोगों को खेल, तकनीकी, स्वास्थ्य सब की शिक्षा दी गयी। शंकर गुहा नियोगी अस्पताल बनाया गया। नब्बे के दशक में जब मैं वहां शोध के सिलसिले में गया था, तब उस अस्पताल को देखकर आश्चर्यचकित था। उसमें सर्जरी की फीस 50-60 रूपये ही हुआ करती थी। ऐसा ही एक प्रयोग पलामू जिला के बरवाडीह में देखने को मिला। 
    प्रसिद्ध मृदा वैज्ञानिक पीआर मिश्रा ने इस आदिवासी इलाके में सहकारी खेती का अद्भुत नमूना पेश किया था।  ग्रामीण संस्कृति को बचाने का यह सराहनीय प्रयास था। एक प्रयोग बेगूसराय के गोदरगांवा का विप्लवी पुस्तकालय भी है, जिसमें केवल पुस्तकें ही नहीं हैं, बल्कि नाटक समारोह, साहित्य सम्मेलन और कई बौद्धिक गतिविधियां भी वहां होती हैं। इसके अलावा राजेंद्र सिंह का अलवर प्रयोग भी है, जिसमें जनसहयोग से नदियों को पुनर्जीवित किया गया। अब जरूरत है इन सबसे आगे जाकर ग्राम स्वराज के नये प्रयोग करने की, जो राजनीतिक भी हो, सामाजिक और आर्थिक भी हो। 
    इस तरह के प्रयोग के लिए उन सब लोगों को जोडऩे की जरूरत है, जो गांव से बाहर रहने लगे हैं, ज्ञान-विज्ञान में शिक्षित हुए हैं। उन शिक्षकों में यह ऊर्जा पैदा करनी होगी कि अपने छात्रों को उनके समाज से जोड़ सकें। निश्चित रूप से उनके मन में भी अपने गांव-समाज का इतिहास लिखने और गढऩे की चाहत होगी। अब सवाल है कि क्या सांसदों में ऐसी चाहत को विकसित किया जाना संभव है? https://www.prabhatkhabar.com/

     

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Posted Date : 19-May-2018
  • सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी शनिवार शाम तक सदन में बहुमत साबित करे। कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने के बाद भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। राज्यपाल वजूभाई वाला ने सबसे अधिक सीटों पर जीत हासिल करने वाली पार्टी यानी भाजपा को सरकार बनाने के न्यौता दिया। लेकिन कांग्रेस और जेडीएस ने इसका विरोध किया क्योंकि उनका दावा है कि दोनों दल मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में हैं। भारतीय राजनीति में यह दिलचस्प मौका पहली बार नहीं आया है। राजनीति का इतिहास इससे भरा पड़ा हैं।
    चरण सिंह
    1979- शपथ के 15 दिनों में ही गिर गई चरण सिंह की सरकार
    देश में आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद विरोध की लहर तेज होती देख प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी।
    चुनाव में आपातकाल लागू करने का फैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ। तीस वर्षों के बाद केंद्र में किसी गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। चरण सिंह उस सरकार मे गृहमंत्री और उप-प्रधानमंत्री बनें।
    पार्टी में अंदरूनी कलह के चलते मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई, जिसक बाद कांग्रेस और सीपीआई की मदद से चरण सिंह ने 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
    राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 20 अगस्त तक का वक्त दिया। लेकिन एक दिन पहले यानी 19 अगस्त को ही इंदिरा गांधी ने अपना समर्थन वापस ले लिया और फ्लोर टेस्ट का सामना किए बिना उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया।
    वीपी सिंह
    दूसरी कहानी है 1989 की। एक साल पहले यानी 1988 में जय प्रकाश नारायण के जन्मदिन 11 अक्टूबर को जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) का विलय हुआ और नई पार्टी जनता दल का गठन हुआ।
    वीपी सिंह को जनता दल का अध्यक्ष चुना गया। इनकी अगुवाई में कई क्षेत्रीय दल एक झंडे के नीचे आए और नेशनल फ्रंट का गठन हुआ। साल 1989 में चुनाव हुए। नेशनल फ्रंट को अच्छी सफलता मिली पर इतनी नहीं कि वो सरकार बना सके।
    नेशनल फ्रंट ने भाजपा और वाम पार्टियों का बाहर से समर्थन पाकर सरकार बना ली। वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। एक साल हुए ही थे कि भाजपा ने रथ यात्रा की शुरुआत की। रथ कई राज्यों से होते हुए बिहार पहुंचा। बिहार में जनता दल की सरकार थी और लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे।
    उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के रथ की गति पर लगाम लगा दी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। फिर क्या था, भाजपा ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई।
    भारतीय राजनीति के इतिहास का अगला पन्ना पलटते हैं और साल 1990 की बात करते हैं। वीपी सिंह के इस्तीफे के बाद जनता दल के नेता चंद्रशेखर ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ दी और समाजवादी जनता पार्टी का गठन किया।
    चुनाव हुए और उनकी पार्टी ने 64 सीटों पर जीत हासिल की। संसद के फ्लोर टेस्ट में कांग्रेस ने उन्हें मदद की और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन गए।
    तकरीबन सात महीने बाद कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा। दो मार्च 1991 को हरियाणा पुलिस के सिपाही प्रेम सिंह और राज सिंह राजीव गांधी के निपास 10 जनपथ के बाहर जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किए गए। दोनों सादे कपड़ों में थे और गिरफ्तारी के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि वो कुछ सूचना जुटाने वहां भेजे गए थे।
    मामले को लेकर राजनीतिक भूचाल आ गया और कांग्रेस ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। इसके बाद संसद में फ्लोर टेस्ट की नौबत आई। फ्लोर टेस्ट होना ही था कि इससे पहले चंद्रशेखर ने सबको चौंकाते हुए 6 मार्च 1991 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
    मायावती
    यह फ्लोर टेस्ट की दिलचस्प कहानी है उत्तर प्रदेश की। साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर समाजवादी पार्टी का गठन किया। एक साल बाद उत्तर प्रदेश में विवादित ढांचा ध्वस्त कर दिया गया। राज्य की सत्तारूढ़ कल्याण सिंह की सरकार को इस घटना के बाद बर्खास्त कर दिया गया था।
    इसके बाद चुनाव होने थे। समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी का गठबंधन हुआ। इन दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई, हालांकि गठबंधन की यह सरकार अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
    बसपा ने अपना समर्थन वापस ले लिया, उत्तर प्रदेश विधानसभा में फ्लोर टेस्ट हुआ और भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं और समाजवादी पार्टी खुद को ठगा हुआ महसूस कर सत्ता से बाहर हो गई।
    अटल बिहारी वाजपेयी
    साल 1998 में लोकसभा चुनाव हुए थे। चुनावों में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था लेकिन अन्नाद्रमुक की मदद से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने केंद्र में सरकार बनाई।
    13 महीने बाद अन्नाद्रमुक ने अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार अल्पमत में आ गई। विपक्ष की मांग पर राष्ट्रपति ने सरकार को अपना बहुमत साबित करने को कहा। संसद में फ्लोर टेस्ट हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिर गई। किसी को ऐसा होने की उम्मीद नहीं थी।
    जिस एक वोट से सरकार गिरी वह वोट था ओडिशा के मुख्यमंत्री गिरधर गमांग का। गमांग उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री थे और सांसद भी। वो इस फ्लोर टेस्ट में अपना वोट डालने विशेष रूप से दिल्ली आए थे। (बीबीसी)

     

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Posted Date : 18-May-2018
  • लगभग 20,000 वर्ष पूर्व की बात है जब देशज अमरीकियों के पूर्वजों ने साइबेरिया की ओर से बेरिंग भूमि सेतु पर से होकर अलास्का में कदम रखे थे। इन लोगों को वहां की लंबी-ठंडी रातों के चलते धूप के लिए तरसना पड़ा था। इतने सुदूर उत्तरी इलाके में धूप की कमी के चलते उन्हें रिकेट्स तथा स्वास्थ्य संबंधी कई अन्य समस्याओं ने परेशान किया होगा। किंतु यह आबादी जीवित रही और हज़ारों वर्षों तक फली- फूली। हाल में हुए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि उनके जीवित रह पाने का श्रेय एक जेनेटिक उत्परिवर्तन को जाता है। प्राचीन दांतों के विश्लेषण से पता चला है कि इस आबादी में संयोगवश यह उत्परिवर्तित जीन मौजूद था।
    इस जीन का नाम ईडीएआर है। देशज अमरीकियों और एशियाई लोगों में इस जीन का जो रूप पाया जाता है उसका सम्बंध मोटे बालों, ज़्यादा पसीना ग्रंथियों और सामने के दांत (कृंतक दंत) के बेलचेनुमा आकार से देखा गया है। इसी जीन का एक परिवर्तित रूप (वी 370 ए) चीन में करीब 30,000 वर्ष पूर्व प्रकट हुआ था। चीन की जलवायु उस समय कहीं अधिक गर्म और उमस भरी थी। इसके आधार पर शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि संभवत: ज़्यादा पसीना ग्रंथियां होना उस जलवायु में लाभदायक रहा होगा। किंत पता यह चला कि यह जीन करीब 20,000 वर्ष पूर्व एशियाई लोगों और देशज अमरीकी समुदायों में तेज़ी से फैला था जबकि वहां की जलवायु ठंडी और शुष्क थी। 
    मगर कैलिफोर्निया विकाविद्यालय की लेसली ह्लूस्को के दल के ताज़ा अध्ययन से पता चला है कि यह परिवर्तित जीन इतना अधिक लाभदायक था कि देशज अमरीकी आबादी में तेज़ी से फैला। इस टीम ने युरोप, एशिया और उत्तरी व दक्षिण अमरीका के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से 5000 से ज़्यादा लोगों के दांतों का अध्ययन किया। देखा गया कि बड़ी संख्या में लोगों के दांत बेलचेनुमा थे जो जीन वी 370ए की उपस्थिति का संकेत है। जहां एशिया के 40 फीसदी नमूनों में यह जीन पाया गया वहीं देशज अमरीकियों के तो समस्त 3183 जीवाश्मों में यह जीन था।
    इससे तो लगता है कि जो लोग बेरिंग सेतु पार करके यहां आए थे उनमें एशिया में प्रकट हुआ यह जीन रहा होगा और यहां यह तेज़ी से कई आबादियों में फैल गया होगा। शोधकर्ताओं का मत है कि इतने अधिक उत्तरी अक्षांश पर रहने वाले लोगों के शिशुओं के लिए धूप की कमी के चलते विटामिन डी का निर्माण मुश्किल रहा होगा। वयस्कों के विपरीत, शिशु समुद्री भोजन खाकर विटामिन डी प्राप्त नहीं कर सकते।
    यह भी देखा गया है कि वी 370 एचूहों में स्तनों में दुग्ध नलिकाओं में ज़्यादा शाखाएं पैदा करने में मददगार होता है। इसे आधार पर ह्लूस्को की परिकल्पना है कि इन अतिरिक्त शाखाओं के चलते माताएं ज़्यादा दूध पैदा कर पाई होंगी और बच्चों को ज़्यादा पोषण दे पाई होंगी। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेज़ में टीम ने यह संभावना व्यक्त की है कि ऐसी माताओं के बच्चे ज़्यादा जीवित रहे होंगे और उनके ज़रिए यह जीन फैला होगा। अभी बात परिकल्पना के स्तर पर ही है क्योंकि यह प्रमाणित करना बाकी है कि ज़्यादा शाखाएं ज़्यादा दूध उत्पादन में मददगार होती हैं। (स्रोत )

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Posted Date : 18-May-2018
  • चीन के पश्चिमी इलाके में खास शिविर चल रहे हैं जिनमें रखे गए लोगों को अपने धार्मिक विचार त्यागकर चीनी नीति और तौर तरीकों का पाठ पढाया जा रहा है। यहां लोगों को न सिर्फ खुद की और अपने परिजनों की आलोचना करनी होती है बल्कि चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी का शुक्रिया भी अदा करना होता है।
    ऐसे ही एक शिविर में जब एक कजाख मुसलमान ओमिर बेकाली ने यह सब करने से इनकार कर दिया तो उन्हें लगातार एक दीवार पर पांच घंटे खड़े रहने की सजा दी गई। इसके एक हफ्ते बाद उन्हें एक कालकोठरी में भेज दिया गया और 24 घंटे तक खाना नहीं दिया गया। 20 दिन बाद बेकाली आत्महत्या करना चाहते थे। 
    अब कजाखस्तान के अल्माटी में रहने वाले 42 वर्षीय बेकाली अपना अनुभव बताते हुए रो पड़ते हैं। वह कहते हैं, बहुत ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव डाला जाता है जहां आपको अपनी खुद की आलोचना करनी है, अपने विचारों को त्यागना है, अपने समुदाय को छोडऩा है। वह कहते हैं कि अब भी हर रात वह शिविर के अनुभव के बारे में सोचते रहते हैं।  2017 के मध्य से चीन के शिनचियांग प्रांत में अधिकारी हजारों और संभवत: लाखों मुस्लिम चीनियों का ब्रेनवॉश करने की कोशिश में लगे हैं। कई बार इनमें विदेशी नागरिक भी शामिल होते हैं। एक अमरीकी आयोग ने इसे आज की दुनिया में अल्पसंख्यक लोगों का सबसे बड़ा कैदखाना बताया।
    इन शिविरों का मकसद वहां रखे गए लोगों की राजनीतिक सोच को तब्दील करना, उनके धार्मिक विचारों को मिटाना और उनकी पहचान को नए सिरे से आकार देना है। चीनी अधिकारी इस बारे में आम तौर पर कोई भी टिप्पणी करने से बचते हैं लेकिन कुछ अधिकारियों ने सरकारी मीडिया में कहा है कि अलगाववाद और इस्लामी चरमपंथ से निपटने के लिए वैचारिक परिवर्तन बहुत जरूरी है। चीन में हाल के सालों में उइगुर चरमपंथियों के हमलों में सैकड़ों लोग मारे गए हैं। अलग अलग जगहों पर चीनी शिविरों में रहने वाले तीन कैदियों और एक पूर्व इंस्ट्रक्टर ने भी बेकाली की कही बातों की पुष्टि की है। इन सभी की बातों से पता चलता है कि कथित तौर पर फिर से शिक्षित करने के इन शिविरों में क्या हो रहा है।
    यह कार्यक्रम धुर राष्ट्रवादी और सख्त स्वभाव वाले राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शासन में चीन के ताकतवर सुरक्षा तंत्र की अहम निशानी है। हालांकि इसका मूल शिक्षा के जरिए इंसान को तब्दील करने की प्राचीन चीनी सोच में छिपा है। माओ त्सेतुंग ने भी इसे आजमाया था, जब उन्होंने अपनी सांस्कृतिक क्रांति को बर्बर तरीके से लोगों पर थोपा था। अब शी जिनपिंग भी कहीं ना कहीं उसी को आगे बढ़ा रहे हैं।  लोगों को नजरबंद रख कर उनकी सोच बदलने का यह कार्यक्रम बेहद गोपनीय तरीके से चलाया जा रहा है। इस बारे में कोई सार्वजनिक आंकड़े मौजूद नहीं हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय का अनुमान है कि कम से कम दसियों हजार लोगों को बंदी बनाकर रखा गया है। वहीं तुर्की में रहने वाले शिनचियांग के निर्वासित लोगों के एक टीवी स्टेशन ने लीक सरकारी चीनी दस्तावेजों के आधार पर दावा किया है कि चीनी शिविरों में लगभग नौ लाख लोगों को रखा गया है। दूसरी तरफ, यूरोपियन स्कूल ऑफ कल्चर एंड थियोलॉजी के रिसर्चर आड्रियान सेंस का कहना है कि यह आंकड़ा दस लाख से भी ज्यादा हो सकता है।
    जब चीनी विदेश मंत्रालय से इस बारे में टिप्पणी मांगी गई तो जवाब मिला कि उन्होंने कभी ऐसी किसी स्थिति के बारे में कुछ नहीं सुना है। शिनचियांग में चीनी अधिकारियों ने पूछने पर भी इस बारे में कुछ नहीं कहा। लेकिन चीन के सर्वोच्च अभियोजक चांग चुन ने शिनचियांग में अधिकारियों से कहा कि इस कार्यक्रम का विस्तार किया जाए ताकि चरमपंथ से लड़ा जा सके। 
    चीन में जन्मे बेकाली 2006 में कजाखस्तान चले गए और तीन साल बाद उन्हें वहां की नागरिकता भी मिल गई। लेकिन 25 मार्च 2017 को वह अपने माता पिता से मिलने शिनचियांग गए थे। अगले दिन पुलिस पकड़ कर उन्हें अपने साथ ले गई। उन्होंने बेकाली को एक टाइगर चेयर पर बिठाया और उनके पैर और हाथों को बांध दिया गया। फिर बेकाली को कलाइयों के जरिए एक दीवार से लटकाया गया। बेकाली से उनके काम के बारे में पूछताछ की गई जो चीनी लोगों को कजाख टूरिस्ट वीजा के लिए आमंत्रित करने से जुड़ा था। 
     बेकाली कहते हैं, मैंने कोई अपराध नहीं किया था। सात महीने बाद बेकाली को उनकी कोठरी से बाहर निकाला गया और उनके हाथ में रिहाई का पेपर थमा दिया गया। लेकिन वह अब भी आजाद नहीं थे। बेकाली को कारामे नाम की दूसरी जगह पर ले जाया गया जहां तीन इमारतों में एक हजार लोगों को रखा गया था।
    ये लोग सूरज उगने से पहले ही जग जाया करते थे, चीनी राष्ट्रगान गाते थे और सुबह साढ़े सात बजे चीनी ध्वज फहराते थे। वे ऐसे गीते गाते थे जिनमें कम्युनिस्ट पार्टी की तारीफ की गई हो। इसके अलावा उन्हें चीनी भाषा और इतिहास पढ़ाया जाता था। उन्हें बताया जाता था कि भेड़ चराने वाले शिनचियांग के मध्य एशियाई लोग पिछड़े हुए थे। फिर उन्हें 1950 के दशक में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने मुक्त कराया।
    जब इन लोगों को सब्जियों का सूप और डबल रोटी खाने को दी जाती थी तो उससे पहले उन्हें धन्यवाद पार्टी! धन्यवाद मातृभूमि! धन्यवाद राष्ट्रपति शी! कहना पड़ता था। बेकाली को लगभग 24 घंटे ही आठ अन्य लोगों के साथ ताला लगे एक कमरे में रखा जाता था। उनके बिस्तर और बदबूदार टॉयलेट साझा ही थे। रूम ही नहीं बल्कि टॉयलेट में भी कैमरे लगे हुए थे। नहाना ही नहीं बल्कि हाथ पैर भी कम ही धोने दिए जाते थे।
    चार घंटे के सत्रों में इंस्ट्रक्टर उन्हें इस्लाम के 'खतरों' के बारे में बताते थे. कैदियों के लिए क्विज रखी गई थीं, जिनका सभी जवाब न देने वाले व्यक्ति को घंटों तक दीवार के पास खड़ा रहना पड़ता था. इंस्ट्रक्टर पूछते थे, "आप चीनी कानून को मानते हो या फिर शरिया को? क्या आप इस बात को समझते हैं कि धर्म क्यों खतरनाक है?" क्लास में मौजूद 60 लोगों को बारी बारी से सबके सामने अपनी और अपने धर्म की आलोचना करनी पड़ी थी.
    बेकाली ने एक व्यक्ति को कहते हुए सुना, "मुझे मेरे पिता ने पवित्र कुरानी पढ़ाई और मैंने इसे पढ़ा क्योंकि मुझे बेहतर पता नहीं था." बेकाली के मुताबिक एक अन्य व्यक्ति ने कहा, "मैं चीन से बाहर गया, यह जाने बिना कि विदेश में मुझ पर चरमपंथी विचारों का असर हो सकता है. अब मुझे पता है."
    एक हफ्ते बाद बेकाली को इस सेंटर में पहली बार एकांत कोठरी में रखा गया. जब एक अधिकारी उनसे मिलने आया तो वह उस पर चिल्लाए, "मुझे पीछे ले जाओ और गोली मार दो या फिर मुझे वापस जेल में भेज दो." अधिकारी भी चिल्लाया, "मैं अब यहां और नहीं रह सकता."
    फिर 24 नवंबर को अचानक बेकाली को रिहा कर दिया गया. पहले बेकाली नहीं चाहते थे कि समाचार एजेंसी एपी उनकी इस कहानी को छापे क्योंकि इससे चीन में रहने वाले उनके परिवार को कैद किया जा सकता है. लेकिन 10 मार्च को पुलिस उनकी बहन अदीला बेकाली को ले गई. इसके एक हफ्ते बाद उनकी मां अमीना सादिक को भी वे ले गए और 24 अप्रैल को उनके पिता एब्रायम को भी. इसके बाद बेकाली ने अपना विचार बदला और दुनिया को अपनी कहानी बताने का फैसला किया. वह कहते हैं, "चीजें पहले ही बहुत आगे बढ़ चुकी हैं और अब मेरे पास खोने को कुछ भी नहीं बचा है." (एके/एमजे (एपी))

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Posted Date : 18-May-2018
  • अजय साहनी, रक्षा विशेषज्ञ
    जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने रमजान शुरू होने से लेकर अमरनाथ यात्रा तक के दौरान घाटी में सीजफायर की अपील की थी, जिसे केंद्र सरकार ने मान लिया था। हालांकि, इस सीजफायर में किसी नये ऑपरेशन को नहीं शुरू करना था, लेकिन जवाबी कार्रवाई तो हर हाल में करनी ही होती है। फिर भी मैं कहूंगा कि सीजफायर का यह फैसला जरूरी नहीं था, क्योंकि सेना के कामकाज को धार्मिक अवसरों से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।  वहां घाटी में अमन-शांति हो, इस बात से कभी इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन एक राज्य के मुख्यमंत्री की आस्था उसकी व्यक्तिगत आस्था से बिल्कुल अलग होती है। 
     महबूबा मुफ्ती ने जनता के बीच जिस तरह से इसका एलान या अपील की थी, कि ऐसा होना चाहिए, इसमें किसी तरह का कोई गहरा विचार-विमर्श नजर नहीं दिखता है। जबकि, सीजफायर एक रणनीति का मामला है, ताकि उसका फायदा उठाकर आपको कोई नुकसान न पहुंचाने पाये। इसलिए पहले गंभीरता से विचार करना चाहिए था और पूरी तैयारी के साथ कोई निर्णय लेना चाहिए था। 
     जब भी कभी सीजफायर का निर्णय लिया जाता है, तो उसके लिए पहले एक ठोस तैयारी होती है और संवेदनशील क्षेत्रों की मौजूदा गतिविधियों व परिस्थितियों पर विचार-विमर्श किया जाता है, ताकि सीजफायर के उल्लंघन की स्थिति में किसी बड़ी क्षति को टाला जा सके। 
     सीजफायर के पहले बहुत काम करने की जरूरत होती है। सेना, पुलिस, अलगाववादी संगठन, चरमपंथी आदि से किसी न किसी तरह से बातचीत करनी होती है, उनसे विचार-विमर्श होता है, तब कहीं जाकर सीजफायर का फैसला लिया जाता है। लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं किया गया, सिवाय इसके कि जनता के बीच इसकी घोषणाभर कर दी गयी। 
     इसके पहले भी महबूबा मुफ्ती ने ऐसे और भी फैसले लिये हैं। मसलन, उन्होंने ही यह बात कही थी कि पत्थरबाजों को छोड़ दिया जाये। बहरहाल, मजे की बात तो यह है कि सीजफायर की घोषणा के बाद इस बात पर चर्चा और बहस शुरू हुई कि सीजफायर होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए।   आस्था या किसी धार्मिक अवसर पर शांति की बहाली की अपील होनी चाहिए, लेकिन इस बात की अनदेखी किये बगैर तो कतई नहीं कि इससे किसी को कोई नुकसान हो। 
     दरअसल, हमारे देश में जिस तरह का माहौल बना हुआ है, उसमें यह एक समझ बनती दिखती है कि अगर सरकार किसी एक समुदाय को ध्यान में रखकर कोई फैसला लेती है, तो जाहिर है कि उसके खिलाफ कोई बोलना नहीं चाहेगा। मसलन, अगर मैं यह कहूं कि अमुक क्षेत्र में अमन होना चाहिए, लेकिन इसके जवाब में आप कहते हैं कि यह सही कदम नहीं है, तो इसका मतलब यह हुआ कि आप अमन के दुश्मन हो गये। ऐसे में अगर कोई यह कहे कि रमजान में सीजफायर नहीं होना चाहिए, तो लोग उसे हिंसा का समर्थक मान लेंगे।  बस यही बात महबूबा के इस फैसले में नजर आती है और कोई बता नहीं रहा है कि यह फैसला तब तक नहीं लेना चाहिए, जब तक कि ठोस तैयारी के साथ मुस्तैदी न हो। क्योंकि सच्चाई तो यही है कि सीजफायर के बाद भी दुश्मनों के हमले नहीं रुके और न ही आगे ये रुकने वाले हैं। 
    इसका मतलब साफ है कि जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री ने बहुत ही बेकार किस्म का राजनीतिक सट्टा खेला है, जिसका कुछ भी फायदा नहीं मिलनेवाला है। क्योंकि इसके पहले जो राजनीतिक तैयारी होनी चाहिए थी, वह कहीं नजर नहीं आ रही है। 
     अगर आंकड़ों पर गौर करें, तो इस साल पाकिस्तान की तरफ से सीजफायर का उल्लंघन की घटनाएं भी खूब बढ़ी हैं और बीते सालों के मुकाबले ज्यादा बढ़ी हैं। जाहिर है, इन उल्लंघनों को देखते हुए भी गंभीर विचार-विमर्श के बाद किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए था। 
    किसी राज्य के मुख्यमंत्री के किसी एलान को केंद्र नकारता नहीं है, खास तौर पर ऐसा केंद्र जो हिंदुत्ववाद से जुड़ा हुआ है, वह तो बिल्कुल भी नहीं नकार सकता। 
     क्योंकि केंद्र को पता है कि अभी वह नकारेगा, तो लोग सरकार को मुस्लिम िवरोधी मानने लगेंगे और उसके लिए यह गलत राजनीतिक कदम जैसा होगा। सीजफायर के ऐलान से पहले यह नहीं सोचा गया कि इसका सेना के चल रहे ऑपरेशनों पर क्या असर पड़ेगा।   यह नहीं सोचा गया कि पहले इस संबंध में अपने दुश्मन से कोई समझौता कर लिया जाये, यह अलग बात है कि हमारे दुश्मन इस बात को मानने से रहे, बल्कि वे तो ऐसे मौके खोजकर अपने हमले तेज करने की फिराक में रहते हैं। 
     दोनों तरफ से आपसी सहमति-समझौता तो जरूरी है कि इधर से हम कुछ नहीं करेंगे, उधर से आप भी कुछ मत करना। तब कहीं जाकर ही सीजफायर की स्थिति बनती है। और जब वे ऐसे समझौते मानने से रहे, तो फिर हमें ही एकतरफा सीजफायर क्यों करनी चाहिए? 
    पूरी तरह से यह फैसला एक गैरजिम्मेदाराना फैसला है और इसमें केंद्र को महबूबा मुफ्ती ने फंसा दिया है। लेकिन, केंद्र को भी इस पर राय-मशवरे के साथ गंभीर विचार-विमर्श और तैयारी के बाद ही सीजफायर के फैसले तक पहुंचना चाहिए था। http://www.prabhatkhabar. com/

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Posted Date : 18-May-2018
  • भरत शर्मा
    कर्नाटक में नाटक जारी है। बीएस येदियुरप्पा राज्य के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं। जनता दल सेक्युलर के एचडी कुमारास्वामी मुख्यमंत्री बनने का इंतजार कर रहे हैं। और भाजपा-कांग्रेस के बीच एक बार फिर सियासी तलवारें खिंच गई हैं। कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने कहानी खत्म नहीं की, बल्कि शुरू की। भाजपा के पास नंबर कम हैं, लेकिन उसे सरकार बनाने का न्योता मिला है।
    और वो बहुमत के लिए जरूरी विधायक जुगाड़ लेने का दावा कर रही है। कांग्रेस-जनता दल (एस) के पास पर्याप्त सीटें हैं लेकिन उसे सरकार बनाने का न्योता नहीं मिला है।
    टेलीविजन स्क्रीन पर पिछले दो दिनों से जो चेहरे नजर आ रहे हैं, उनमें भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी, अमित शाह, बीएस येदियुरप्पा, प्रकाश जावड़ेकर, अनंत कुमार, जेपी नड्डा और रविशंकर प्रसाद हैं। जनता दल-सेक्युलर की तरफ से एचडी देवगौड़ा और कुमारास्वामी ने मोर्चा संभाला है।
    कांग्रेस के किले में तैनात सिपहसालारों में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के अलावा गुलाम नबी आजाद, अशोक गहलोत दिख रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के जिस चेहरे को सबसे ज्यादा दिखना चाहिए था, वो अभी पर्दे के पीछे ही दिख रहे हैं। राहुल गांधी।
    15 मई को नतीजे आने वाले दिन उन्होंने एक ट्वीट में लिखा था कि इन चुनावों में कांग्रेस को वोट देने वालों का शुक्रिया। हम आपके समर्थन का सम्मान करते हैं और आपके लिए लड़ेंगे भी। साथ ही कार्यकर्ताओं और नेताओं का भी साधुवाद जिन्होंने लडऩे का हौसला दिखाया। लेकिन इसके बाद दो दिन सियासी पारा चढ़ा रहा और ड्रामा जारी रहा लेकिन राहुल गांधी ने इस पर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
    जब ये तय हो गया है कि गुरुवार सवेरे नौ बजे येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, तो राहुल ने चंद मिनट पहले एक और ट्वीट किया कि भाजपा के पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है लेकिन इसके बावजूद वो कर्नाटक में सरकार बनाने पर जोर दे रही है।
    ये कुछ और नहीं बल्कि संविधान का मजाक है। आज सवेरे भाजपा जब खोखली जीत का जश्न मना रही है, तो देश लोकतंत्र की हार पर दुखी है। इसके कुछ देर बाद रायपुर में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने येदियुरप्पा की ताजपोशी पर हमला बोलते हुए कहा कि तानाशाही में ऐसा ही होता है।
    लेकिन क्या दो ट्वीट और एक जनसभा में चंद लाइनें कर्नाटक में भाजपा को बैकफुट पर लाने के लिए काफी साबित होंगी। राहुल के ट्वीट के जवाब में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जवाबी हमला बोला।
    उन्होंने लिखा कि कांग्रेस अध्यक्ष को अपनी पार्टी का इतिहास शायद याद नहीं है। उनकी पार्टी की विरासत आपातकाल, आर्टिकल 356 का दुरुपयोग, अदालत, मीडिया और सिविल सोसाइटी पर हमला करने से जुड़ी रही है।
    शाह ने एक और ट्वीट किया कि किसके पास कर्नाटक की जनता का जनादेश है? 104 सीटें जीतने वाली भाजपा या फिर कांग्रेस जो घटकर 78 सीटों पर आ गई और जिसके मुख्यमंत्री-मंत्री अपनी सीटें नहीं बचा सकें। या फिर जनता दल सेक्युलर, जिसने 37 सीटें जीतीं और दूसरों पर जमानत तक जब्त हो गई। लोकतंत्र की हत्या उसी पल हो गई थी जब कांग्रेस ने जनता दल सेक्युलर के सामने अवसरवादी ऑफर रखा। ये कर्नाटक के भले के लिए नहीं था बल्कि सियासी फायदे के लिए था। शर्मनाक!
    अमित शाह कर्नाटक के नतीजों और सरकार बनाने की कोशिशों पर पहली बार नहीं बोले। नतीजों वाली शाम उन्होंने दिल्ली में भी बात की थी। लेकिन राहुल 17 मई दोपहर तक सामने नहीं आए थे।
    यहां तक कि बीएस येदियुरप्पा की शपथ का विरोध करने के लिए कांग्रेसी नेता विधानसभा के बाहर बैठे लेकिन राहुल नजर नहीं आ रहे। क्या राहुल गांधी कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनाने की काशिशों पर ज्यादा सक्रियता दिखाकर अपना कद नहीं बढ़ा सकते थे? अगर राजनीति में ये सब हथकंडे दिखाने जरूरी हैं, तो राहुल ने अवसर क्यों नहीं लपका?
    वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि राहुल गांधी ने कर्नाटक के मोर्चे पर अपने वरिष्ठ नेताओं को लगाया। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि भाजपा को इस बार गोवा और मणिपुर जैसा मौका नहीं मिला।
    कांग्रेस ने एग्जिट पोल के बाद ही सक्रियता दिखानी शुरू कर दी थी और रविवार को ही रणनीति को अंतिम रूप दिया गया। कुमारस्वामी और देवगौड़ा से बातचीत की गई। इस बार भाजपा गच्चा खा गई।
    नीरजा कहती हैं कि जिस वक्त नतीजे अंतिम नंबर की ओर बढ़ रहे थे, कुछ ही घंटों में दोनों दलों के बीच समझौता हो गया। ये साम, दाम, दंड, भेद का दौर है और कांग्रेस ने यही किया।
    राहुल का सामने आना ऑपरेशन का ही हिस्सा हो सकता है। लेकिन ये बात सही है कि अगर कांग्रेस नेताओं के साथ राहुल भी प्रदर्शन में शामिल होते तो इसका फायदा हो सकता था।
    एक तरह से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का मतलब ये समझा जाता है कि आपने राजनीतिक रूप से हार मान ली है। लेकिन कांग्रेसी नेताओं का धरने पर बैठना ये दिखाता है कि वो दो मोर्चों पर लड़ रही है।
    नीरजा चौधरी के मुताबिक कि ये बात सही है कि अगर वो अटल बिहारी वाजपेयी की तरह धरने पर बैठ जाते तो पूरे देश के मीडिया का फोकस उन पर चला जाता। अटल बिहारी वाजपेयी के धरने पर बैठने का किस्सा उत्तर प्रदेश से जुड़ा है।
    फरवरी, 1998 में उत्तर प्रदेश में अंतिम दौर का चुनाव होने से पहले ही तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने लोकतांत्रिक कांग्रेस के नए नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी।
    कल्याण सिंह की अगुवाई वाली भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और पाल को नई सरकार बनाने का न्योता दिया गया। इस पर अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि वो कल्याण सिंह को बहुमत साबित करने का मौका दिए बगैर सरकार बर्खास्त करने के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठेंगे।
    ये ऐलान होते ही सारे देश के मीडिया का फोकस वाजपेयी की तरफ हो गया था। हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि राजनीति में असल खेल पीछे रहकर खेला जाता है और राहुल गांधी इस बार सक्रिय हैं और संभलकर चाल चल रहे हैं।
    वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक उर्मिलेश कहते हैं कि किसी भी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष किस तरह काम करते हैं, ये उनका अपना फैसला है। हर नेता का अपना स्टाइल होता है। राहुल गांधी का भी अपना है। उन्हीं के फैसले पर ही कर्नाटक में सब कुछ हो रहा है। लेकिन क्या कांग्रेस की सक्रियता की वजह सोनिया गांधी नहीं है, उन्होंने कहा कि कांग्रेस की पूरी कमान राहुल के हाथों में हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 17-May-2018
  • आर राजगोपालन, वरिष्ठ पत्रकार
    व्यावहारिक अर्थों में कर्नाटक में भाजपा की विजय और कांग्रेस की पराजय हुई है। कांग्रेस विधानसभा में अपनी 125 सीटों से नीचे उतरकर 78 पर पहुंच गयी और दक्षिण का यह महत्वपूर्ण राज्य उसके हाथ से निकल गया। भाजपा अपनी सीटों में काफी बढ़ोतरी करने के बाद भी बहुमत हासिल करने से रह गयी। 
    कांग्रेस की पराजय का अर्थ जहां राहुल की विफलता है, वहीं भाजपा की विजय का सीधा श्रेय नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के संयुक्त असर को जाता है। 
    कर्नाटक के इन चुनावी नतीजों ने कई प्रश्न पैदा कर दिये हैं। राहुल द्वारा कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभालने के बाद उसकी एक के बाद दूसरी पराजय का अर्थ क्या यह निकाला जाना चाहिए कि अपनी पार्टी के सर्वोच्च नेता के रूप में वे असफल हैं? 
    क्या इसका एक अर्थ यह भी होगा कि 2019 के आगामी लोकसभा चुनाव में सत्तापक्ष को विपक्षी पार्टियों के समूह से कोई मजबूत चुनौती नहीं मिलेगी? क्या कांग्रेस भी अपनी राष्ट्रीय हैसियत खोकर एक क्षेत्रीय पार्टी में तब्दील हो जायेगी? क्या कांग्रेस को अपने नेतृत्व के प्रश्न पर एक बार फिर विचार कर सोनिया या प्रियंका को ही पार्टी का मुखड़ा बनाना होगा? 
    यह सही है कि कर्नाटक में येदियुरप्पा का अपना प्रभाव है, जिसका फायदा भाजपा को मिला, पर नरेंद्र मोदी की 21 नाटकीय रैलियों ने पासा पलटने में खासा योगदान किया। लिंगायत मतों को विभाजित करने हेतु कानून लाने की अपनी चाल चलकर कांग्रेस ने एक बड़ी भूल कर दी, जिसका पूरा फायदा भाजपा ने उठा लिया। 
    कर्नाटक के इन चुनावों ने कई मुद्दे उछाले, जिनमें धनबल के इस्तेमाल की कोशिशें भी शामिल हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा आरआर नगर के लिए मतदान की तिथि इसलिए बढ़ा दी गयी कि वहां के कांग्रेस उम्मीदवार पर मलिन बस्तियों के बाशिंदों के लगभग दस हजार मतदाता पहचान पत्र बटोर कर अपने पास रख लिये जाने का आरोप लगा। भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कर्नाटक में व्यक्तिगत रूप से कुल 45 हजार किलोमीटर की यात्राएं कर 845 नुक्कड़सभाओं और अन्य सभाओं को संबोधित किया। 
    अपने इन संबोधनों में उन्होंने मतदाताओं के सामने मुख्यत: दो मुद्दे रखे- पहला यह कि सोनिया और राहुल गांधी ने नेशनल हेराल्ड की पांच हजार करोड़ रुपयों की संपत्ति की धोखाधड़ी की और दूसरा, कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपनी कलाई पर लगभग 70 लाख रुपये की घड़ी पहना करते हैं। सामान्य मतदाताओं पर इन दोनों बातों का बड़ा असर हुआ।
    इसी दौरान हुआ एक और दिलचस्प वाकया पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा राष्ट्रपति को एक पत्र द्वारा यह बताना भी रहा कि नरेंद्र मोदी संविधान का उल्लंघन करते हुए कांग्रेस को धमका रहे हैं। यह सवाल सहज ही पैदा होता है कि राहुल गांधी ने यह पत्र स्वयं क्यों नहीं लिखा? क्या वे ऐसे किसी पत्र के सियासी नतीजों से भयभीत थे? ऐसी संभावनाएं हैं कि चूंकि कर्नाटक चुनाव समाप्त हो चुके हैं, सो सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) पी चिदंबरम जैसे कांग्रेस नेताओं के विरुद्ध अपनी कार्रवाइयां तेज कर सकते हैं। 
    क्या कांग्रेस को यह भय है कि इन कार्रवाइयों की चपेट में कांग्रेस के कई और नेता भी आ सकते हैं? क्या राष्ट्रपति को संबोधित इस पत्र के द्वारा वस्तुत: वे नरेंद्र मोदी को इसके लिए बाध्य करना चाहते हैं कि इन कार्रवाइयों की गति धीमी की जाए? 
    ऐसी आशंका इसलिए पैदा होती है कि चुनावों के दौरान नेताओं द्वारा कई तरह की बातें कहना स्वाभाविक है, मगर क्या उस दौर की समाप्ति के बाद भी कांग्रेस द्वारा मोदी के ऐसे किसी भाषण को लेकर इतना आगे जाना चाहिए था? क्या कांग्रेस को भी प्रधानमंत्री के विरुद्ध गंदी भाषा के प्रयोग से बचना नहीं चाहिए था? 
    कांग्रेस ने राहुल गांधी के विमान में तकनीकी खराबी को एक साजिशी मुद्दा बनाकर मतदाताओं की सहानुभूति बटोरने की कोशिश की, पर जब केंद्र सरकार और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय ने अपना पक्ष रखा, तो राहुल और उनके सहायकों को चुप्पी साध लेनी पड़ी। कर्नाटक पुलिस ने भी कांग्रेसी कहानी से इनकार कर दिया। 
    जहां तक आगामी लोकसभा चुनावों का प्रश्न है, तो 35 के लगभग क्षेत्रीय पार्टियों को क्या अब कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार्य होगा? डीएमके नेता स्टालिन और टीआरएस नेता चंद्रशेखर राव ने मिलकर एक गठजोड़ बनाने का फैसला किया है, मगर उन्होंने कांग्रेस को विश्वास में लेने की कोशिशें नहीं कीं। राहुल गांधी अपनी युवा टीम पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो चले हैं। इन नतीजों के संकेत हैं कि उन्हें बुजुर्गों के अनुभव भी साथ रखने चाहिए। 
    कर्नाटक के इन नतीजों ने राज्य में वर्ष 2019 के मुकाबले के लिए मोदी के हाथ मजबूत कर दिये हैं, जबकि कांग्रेस में बेचैनी का आलम स्वाभाविक है।  इस पराजय के असर से राहुल द्वारा भविष्य में और गलतियां की जाने की ज्यादा संभावनाएं होंगी। स्वभावत: यह सवाल उठ रहा है कि इसी वर्ष के अंत में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में होनेवाले चुनाव कैसे गुल खिलायेंगे? (अनुवाद- विजय नंदन) http://www.prabhatkhabar.com/

     

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Posted Date : 17-May-2018
  • अजय चंद्राकर,  मंत्री, पंचायत एवं ग्रामीण विकास छ.ग.
    भारत में स्थानीय स्व-शासन की संकल्पना प्राचीन युग से चली आ रही हैैै। प्राचीनकाल से अंग्रेजों के शासन काल तक ग्रामीण समुदायों ने इस व्यवस्था को जीवंत बनाये रखा था। हमारे ग्रामों में विभिन्न समुदाय, एक दूसरे के सहायक और परस्पर निर्भर भी थे। प्राचीन रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं ने सामुदायिक भवनों को बनाये रखने में सहायता की। कई साम्राज्य बने और ध्वस्त हुए, लेकिन इन ग्रामीण समुदायों ने अपने अस्तित्व एवं भावना को सदैव बनाये रखा। यही हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों का आधार रहा है। 
     वर्ष 1948 में तैयार संविधान मसौदे में पंचायत राज संस्थाओं का कोई उल्लेख ही नहीं था। महात्मा गांधी  ने गंभीर आलोचना की और तत्काल इस पर संविधान निर्माताओं का ध्यानाकर्षण किया इसके फलस्वरूप उनके आग्रह पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में पंचायत को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों में ग्राम पंचायतों के संगठन के रूप में स्थान दिया गया। कालांतर में पंचायतों के स्वरूप, कार्यों एवं दायित्वों में एकरूपता लाने के उद्देश्य से विभिन्न समितियों का गठन किया गया लेकिन इसका कोई ठोस परिणाम नहीं आया। पंचायतीराज आधुनिक इतिहास में 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ । इस संशोधन से संविधान के भाग-9 में पंचायत जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत अनुच्छेद 243(क) से अनुच्छेद 243(ण) तक विस्तार किया गया।
    डॉ. रमन सिंह के सत्ता में आते ही सामाजिक न्याय की स्थापना एवं आर्थिक विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 में  संशोधन किए। वर्ष 2003 से 2018 तक किये गये इन संशोधनों का प्रभाव यह रहा कि पंचायत राज संस्थाओं में आरक्षण के प्रावधानों के फलस्वरूप 50 प्रतिशत की जगह वर्तमान में महिलाओं की भागीदारी 56.65 प्रतिशत तक बढ़ी है।  आज प्रदेश खुले में शौचमुक्त हो रहा है।  िपंचायती राज संस्थाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त पदाधिकारियों की सहभागिता बढ़ रही है। छ: ग्राम सभाओं की अनिवार्यता ने विकास के मुद्दों पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के अवसर निर्मित किये हैं। स्थायी समिति में सचिवीय व्यवस्था के प्रावधान ने ग्राम पंचायत विकास योजना निर्माण को गति प्रदान की है एवं पंचायतें सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हैं। देश के किसी भी  राज्य में खाद्यान्न एवं स्वच्छता के संबंध में अपने पंचायत राज अधिनियम में स्वच्छता, खाद्यान्न सुरक्षा हेतु इस प्रकार के प्रावधान नहीं किये हैं। 01 क्विंटल खाद्यान्न मूलभूत की राशि से पंचायतों में रख जरूरतमंद व्यक्ति को नि:शुल्क प्रदाय कर खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रदेश द्वारा एक छोटा सा बीज रोपा गया जो देश के अन्य राज्यों के लिये रोल मॉडल बना। 
    73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों को विभिन्न विकास गतिविधियों को क्रियांवित करने के लिये पर्याप्त निधियां एवं वित्तीय प्रवाह उपलब्ध कराने हेतु राज्य स्थापना के साथ ही राज्य वित्त आयोग का गठन किया गया।इसमें पंचायतों में स्वयं के स्त्रोत संसाधनों से प्राप्त राजस्व का 06.15 प्रतिशत व्यय का मूलभूत कार्यों हेतु प्रावधान किया गया। 
     73वॉं संविधान संशोधन विधेयक मील का पत्थर है, इसके 03 वर्ष बाद पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के लिये पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत का विस्तार) अधिनियम, 1996 लागू किया गया जिसे संक्षिप्त में पेसा अधिनियम, 1996 भी कहा गया। देश में पंाचवीं एवं छठी अनुसूची के क्षेत्रों में स्व-शासन में परम्परओं एवं रूढिय़ों को मान्यता दी गई है । परन्तु देश के पंाचवीं अनुसूची अंतर्गत दस राज्यों एवं छठी अनुसूची के पूर्वोत्तर राज्यों के विषय में किसी वक्तव्य में चर्चा नहीं की जाती जिसके कारण इन महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों के विषय में जागरूकता की कमी रही है । डॉ. रमन सिंह के सरकार में आते ही इसमें तेजी आई एवं छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 के धारा 129 ÓकÓ से ÓचÓ में किये प्रावधानों के क्रियान्वयन में गति आई। राजनीतिक इच्छाशक्ति एवं ईमानदारी से किये गये प्रयासों से परवान चढ़ी पंचायतराज प्रणाली के माध्यम से ग्राम सभा क्रांति का सूत्रपात हुआ जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव प्रदेश के पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की पंचायतों पर भी पड़ा है।     
    आदिवासी बाहुल्य पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के लिये पेसा अधिनियम के वर्ष 1996 में लागू होने के पूर्व भी सदियों से आदिवासी समुदायों में पारम्परिक रूप से स्व-शासन की प्रथा रही है। वर्तमान परिदृश्य में  शासन का प्रयास पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को सशक्त करने का है, पर कुछ तत्वों द्वारा Óपत्थलगड़ीÓ जैसे पवित्र एवं पारम्परिक प्रथा को व्यक्तिगत हित के लिये तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत कर  भोले-भाले आदिवासियों को भटकाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को खंडित करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।  आदिवासी परम्पराओं को ढाल बनाकर विकासोन्मुखी सरकार के विरूद्ध सीधे-सादे आदिवासियों को बरगलाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने की मंशा से यह कृत्य  है, जिसका निहित उद्देश्य संवैधानिक ना होकर मात्र व्यावसायिक एवं कूटनीतिक लाभ लेना है। यदि ऐसा नहीं होता तो पत्थलगड़ी को कभी परम्पराओं के अभिलेख के रूप में, तो कभी संविधान द्वारा दिये अधिकारों की रक्षा के नाम पर, तो कभी  पत्थरों पर उकेरे गये पेसा के अधिकारों के रूप में, तो कभी धर्म एवं धर्मांतरण के नाम पर तो कभी कभी गांव की सीमा के सीमांकन के नाम पर दुष्प्रचार कर हथकंडे के रूप में दुरूपयोग नहीं किया जाता। जिन अधिकारों को पत्थलगड़ी के माध्यम से मांगे जाने का भ्रामक आंदोलन  चलाया जा रहा है, वो सरकार द्वारा पहले ही ग्राम सभाओं और पंचायतों को प्राप्त हैं। संविधान एवं पेसा अधिनियम के प्रावधानों अनुरूप जल, जंगल एवं जमीन संबधी अधिकार ग्राम सभाओं को प्राप्त है। आवश्कता ग्राम सभाओं द्वारा उन संवैधानिक अधिकारों का सही उपयोग करने की है। उससे बड़ी आवश्यकता है कि ग्राम सभाएं वास्तविक रूप से इन अधिकारों का सदुपयोग कर, उन्हें सौंपे गये संवैधानिक अधिकारों और दायित्वों का निर्वहन करें एवं जागरूक हो जल, जंगल एवं जमीन की रक्षा करें। 
    हमारे देश के संविधान में सभी को एक स्थान से दूसरे स्थान जाने की पूरी स्वतंत्रता  है। हमारी संस्कृति तथा संविधान में किसी के मौलिक अधिकारों के हनन की परम्परा नहीं रही है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 कहीं नहीं कहता है कि केन्द्र या राज्य सरकार का क्षेत्राधिकार बाधित है। पत्थलगड़ी के सच और सोच को जानें एवं पत्थलगड़ी की आड़ में असंवैधानिक तथा भारत की एकता एवं अखंडता को खंडित करने फैलाए जा रहे जहरीले भ्रम का विरोध करें। पत्थलगड़ी हमारे आदिवासी समुदाय की प्राचीन परम्परा एवं रूढिय़ों का अभिन्न अंग है जिसे हमें संजोकर रखना है एवं उन्हें यथोचित सम्मान देना है । 
    छत्तीसगढ़ में पंचायतराज संस्थाएं तथा ग्राम सभा लोकतंत्र का आधार स्तंभ एवं मेरूदंड हैं तथा हमारी संस्कृति और स्वतंत्रता की संरक्षक भी।  हम सदियों पुराने विश्वास के सम्मानित शिलालेखों के आधार पर सकारात्मक सोच एवं नये विश्वास के साथ छत्तीसगढ़ के सामान्य एवं अनुसूचित क्षेत्रों में नया विकास गढ़ें। 

     

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Posted Date : 16-May-2018
  • कुलदीप कुमार
    भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो-दिवसीय नेपाल यात्रा को स्वाभाविक रूप से अलग-अलग नजरिये से देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का विचार है कि इस बात की परवाह किये बगैर कि नेपाल में इस समय कम्युनिस्ट सत्ता में हैं, नरेंद्र मोदी ने अपनी यात्रा का फोकस अपने हिन्दू होने को रेखांकित करने और नेपाली जनता के बजाय भारतवासियो और शायद कर्नाटक के चुनावों के मद्देनजर उस राज्य के वोटरों को संबोधित करने पर ही केंद्रित रखा। इसके विपरीत कुछ का मानना यह भी है कि इस यात्रा से भारत-नेपाल संबंधों में सुधरने की गति तेज होगी और दोनों देशों के बीच कई अनसुलझी और जटिल समस्याओं के सुलझने का रास्ता खुलेगा। 
    स्वयं मोदी ने यह जुमला बोला है कि इस समय भारत-नेपाल संबंध सबसे नीचे के आधार शिविर पर हैं। भारत शेरपा की भूमिका निभाकर पर्वतारोहियों को आधार शिविर से सीधे माउंट एवरेस्ट तक ले जाने के लिए तैयार है। लेकिन भारत में बोले गए अनेक जुमलों की जो गति बनी, उसे देखकर अनेक लोगों के मन में संशय है कि क्या मोदी इस बार वास्तव में गंभीर हैं?
    मोदी ने अपनी यात्रा सीता की मायके जनकपुर से शुरू की और वहां आने वालों के लिए रखी गई पुस्तिका में च्च्सिया रामज्ज् लिख कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लोगों ने इस पर भी कटाक्ष किया क्योंकि अयोध्या आंदोलन के समय से ही पिछले तीस वर्षों में संघ परिवार ने केवल च्च्जय श्री रामज्ज् का नारा लगाया है और च्च्जय सिया रामज्ज् के पारंपरिक अभिवादन और उद्घोष को नकारा है। वहां से वे हवाई जहाज से सीधे काठमांडू गए और जोमसोम में मुक्तिनाथ मंदिर में दर्शन के लिए गए। वहां के स्थानीय लोग इस यात्रा से नाराज बताए जाते हैं क्योंकि परंपरा तोड़ कर उन्हें मंदिर के गर्भगृह में ले जाया गया और इस सबको टीवी पर प्रसारित भी किया गया। इससे लगा कि नेपाल में होते हुए भी मोदी कर्नाटक के हिन्दू मतदाता को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।  
    मोदी की नेपाल यात्रा में केवल एक ही ठोस काम हुआ है और वह है 6000 करोड़ रुपये की लागत से बन रही 900 मेगावॉट बिजली की उत्पादन क्षमता वाली परियोजना अरुण-3 का शिलान्यास जो मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री के पी ओली ने किया। इसके अलावा मोदी ने वे सभी वादे दुहराए हैं जो भारत पिछले वर्षों में करता आया है लेकिन जिन पर समयबद्ध तरीके से अमल नहीं किया गया। 
    मसलन भारत नेपाली विमानों को अधिक वायुमार्ग उपलब्ध कराएगा, तराई में सड़कों के निर्माण का काम पूरा किया जाएगा और महाकाली परियोजना की विस्तृत रिपोर्टों पर काम शुरू करने में तेजी लाई जाएगी। यहां यह याद दिलाना अप्रासंगिक न होगा कि दोनों देशों ने महाकाली परियोजना पर 1996 में यानी 22 वर्ष पहले हस्ताक्षर किए थे। फिलहाल जिस योजना पर काम होता नजर आ रहा है वह रक्सौल और काठमांडू को रेल लाइन से जोडऩे की है।  
    नेपाल अभी तक 2015-16 में भारत द्वारा थोपी गई आर्थिक नाकेबंदी को भूला नहीं है। ओली खुद भी चीन-परस्त माने जाते हैं। यदि इस यात्रा के परिणामस्वरूप वे चीन और भारत के साथ एक-सी दूरी बनाकर चलने पर भी राजी हो जाते हैं, तो इसे यात्रा की सफलता ही माना जाएगा। अवसर के अनुरूप ओली ने भी बहुत-सी बातें कही हैं, मसलन लोग आते-जाते रहते हैं लेकिन भारत-नेपाल तो हमेशा बने रहेंगे, लेकिन कितनी बातों पर वे टिकते हैं, इसे अभी देखा जाना है। 
    मोदी की नेपाल यात्रा समाप्त होने के एक दिन बाद ही ओली को अपने देश में हो रही आलोचना के मद्देनजर यह मानना पड़ा कि यात्रा के दौरान कुछ बातें ऐसी हुईं जो च्च्राष्ट्रीय हितोंज्ज् के दायरे में नहीं आतीं। शायद उनका इशारा अतिवामपंथी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किए जाने की ओर था। इन्हें इसलिए गिरफ्तार किया गया था ताकि मोदी की यात्रा निर्विघ्न समाप्त हो जाए। दोनों देशों के अधिकारियों ने यात्रा को बेहद सफल बताया है। देखना है कि आने वाले वर्षों में ये आशाएं किस हद तक पूरी होती हैं।  (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 16-May-2018
  • -इमरान कुरैशी
    कर्नाटक की राजनीति के इतिहास में यह अभी तक का सबसे विचित्र दौर है। जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी के बगल में राज्य की सत्ता गंवाने वाले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया खड़े हैं और दोनों ही एक-दूसरे की बातों पर सहमतियां जताते हुए देखे जा सकते हैं। राजभवन में राज्यपाल वजुभाई वाला के समक्ष कुमारस्वामी और सिद्धारमैया अपनी अगली सरकार बनाने का दावा पेश कर रहे हैं। यह दृश्य उन लोगों के लिए विचित्र है जो कर्नाटक की राजनीतिक गतिविधियों को पिछले 12 साल से देख रहे हैं।
    कर्नाटक की राजनीति के हालिया इतिहास पर अगर नजर दौड़ाएं तो हम पाएंगे कि सिद्धारमैया ने पूर्व प्रधानमंत्री और अपने गुरु एच डी देवगौड़ा का साथ इसलिए छोड़ दिया था क्योंकि कई वर्षों तक देवगौड़ा के साथ निष्ठापूर्ण तरीके से काम करने के बाद, पार्टी में सत्ता की चाबी देवगौड़ा ने अपने बेटे कुमारस्वामी के हाथों में सौंप दी थी। पार्टी के भीतर खुद के अस्वीकृत होने के बाद सिद्धारमैया ने अहिंदा (अल्पसंख्यक, ओबीसी और दलित) बनाया और कांग्रेस की मदद से उन्होंने एक बड़ी छलांग लगाई।
    देवगौड़ा के साथ शुरू हुई इसी दुश्मनी के चलते सिद्धारमैया ने वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले अधिकारियों के साथ भी भेदभाव किया, दरअसल देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं। इसके जवाब में कुमारस्वामी ने चतुराई दिखाते हुए सिद्धारमैया के देवगौड़ा पर किए जा रहे राजनीतिक हमले को पूरे वोक्कालिगा समुदाय पर हो रहे हमले के रूप में दिखाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही वोक्कालिगा वोट की गोलबंदी होने लगी और इसका नतीजा यह हुआ कि चामुंडेश्वरी विधानसभा से सिद्धारमैया को हार का सामना करना पड़ा।
    सिद्धारमैया और कुमारस्वामी के बीच यह वैचारिक मतभेद ही था कि साल 2013 के विधानसभा चुनाव में जब पार्टी हाई कमान ने सिद्धारमैया से वोक्कालिगा वोटबैंक पर पकड़ मजबूत बनाने की बात कही तो वे इसमें आना-कानी करने लगे। इसके बदले उन्होंने लिंगायत वोटबैंक की तरफ अपना ध्यान लगाया जहां अखिल भारतीय वीरशैव महासभा में लिंगायत को अलग अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग उठ रही थी। लेकिन सिद्धारमैया और उनके साथी लिंगायत समुदाय के अंतर्गत आने वाले लोगों को अल्पसंख्यक दर्जे के फायदे समझा पाने में नाकामयाब रहे। राजनीतिक विशेषज्ञ मदन मोहन की माने तों कांग्रेस का तटस्थ रहना उसके लिए सबसे उल्टा साबित हुआ है।
    एक और विशेषज्ञ महादेव प्रकाश कहते हैं, सिद्धारमैया ने हमेशा अपनी सरकार को अहिंदा सरकार होने का दावा किया। इसके साथ ही वो लगातार लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय की तरफ भी अपना झुकाव दिखाते रहते थे। इन दोनों समुदायों के वोटर सिद्धारमैया के खिलाफ एकजुट हुए, जबकि अहिंदा वोटर उनके खिलाफ पूरी तरह एकजुट तो नहीं हुए, लेकिन ऐसा लगता है कि इनमें से भी सिर्फ कुरुबा (जिस जाति से सिद्धारमैया आते हैं) और मुस्लिमों ने ही उन्हें वोट किया। लेकिन धारवाड़ यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर हरीश रामास्वामी के विचार थोड़ा अलग हैं। वे कहते हैं, मोदी की रैली ने कई जगहों पर वोट को बीजेपी की तरफ मोड़ दिया। वहीं कांग्रेस ने भी तीन बड़ी गलतियां कीं। सिद्धारमैया को अपनी लड़ाई सिर्फ बीएस येदियुरप्पा तक ही सीमित रखनी चाहिए थी। राहुल गांधी के मैदान में उतरने से यह लड़ाई राहुल बनाम मोदी बन गई। इसके साथ ही प्रो.रामास्वामी यह भी कहते हैं कि मोदी का असर अभी भी है, खासकर युवा वोटर और वे लोग जो अंतिम समय तक अपने वोट को लेकर अनिश्चित रहते हैं वे मोदी की तरफ आकर्षित हो जाते हैं। वे कहते हैं, जब तक मोदी मैदान में नहीं उतरे थे तब तक युवाओं का वोट काफी हद तक सिद्धारमैया के साथ दिख रहा था।
    वहीं मदन मोहन कहते हैं, यह भी एक प्रमुख बात है कि जिस तरह मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने देवगौड़ा और साथ ही साथ मोदी को नजरअंदाज किया, यह जनता को पसंद नहीं आया। कांग्रेस की हार में इसका भी एक बड़ा योगदान रहा। अपना नाम ना जाहिर करने की शर्त पर एक बीजेपी नेता ने कहा कि इस बात में कोई शक नहीं है कि अगर मोदी प्रचार के लिए नहीं आते तो उनकी पार्टी कर्नाटक में 100 का आंकड़ा भी मुश्किल में छू पाती।
    वहीं बीजेपी के बहुमत के जादुई आंकड़े तक ना पहुंच पाने के पीछे राजनीतिक चिंतक पार्टी के भीतर चुनाव लडऩे के लिए हुए मतभेदों के ना सुलझ पाने को एक बड़े कारण के रूप में देखते हैं। प्रो.रामास्वामी कहते हैं, यह पूरा वोट मोदी के लिए सकारात्मक संदेश तो है, लेकिन हमें इसे पूरी तरह सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ हुए वोट के तौर पर नहीं देखना चाहिए। 
    कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों और वहां मौजूद राजनीतिक चिंतकों के बीच इस बात पर भी आम सहमति है कि सिद्धारमैया के जनकल्याणकारी योजनाओं को लोगों ने पसंद तो किया, लेकिन वे उन्हें वोट में तब्दील नहीं करवा पाए। अंत में कांग्रेस के एक नेता के शब्दों में कहें तो जाति ने उन्हें हरा दिया। (बीबीसी)

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Posted Date : 16-May-2018
  • -सागरिका घोष
    कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के जादू और हिंदुत्व कार्ड के प्रभाव ने चुनावों को जीतने में अपना महत्व साबित कर दिया है। बीजेपी ने जिस तरह उस राज्य में कांग्रेस को मात दी है जहां उसके स्थानीय नेता भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त हैं और सत्ताविरोधी लहर भी साफ नहीं थी तो क्या इसे कांग्रेस मुक्त भारत का संकेत माना जाना चाहिए?
    कर्नाटक के रोमांचक चुनावी मुकाबले में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा था कि 21वीं शताब्दी में वह 7वीं शताब्दी के शासक पुलकेशिन द्वितीय की तरह हैं और जिस तरह पुलकेशिन द्वितीय ने उत्तर भारत के ताकतवर राजा हर्षवर्धन को मात दी थी वह भी ठीक ऐसा ही करेंगे। लेकिन दुर्भाग्य से 21वीं शताब्दी के हर्षवर्धन ने पुलकेशिन द्वीतीय को मात दे दी है और दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी सिद्धारमैया के गढ़ में उनसे आगे निकल गई है।
    मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी ने कर्नाटक के चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए 100 सीटों के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को पार कर लिया है। हालांकि, वह बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई है। बीजेपी और कांग्रेस के बीच मत प्रतिशत क्रमश: 37 फीसदी और 38फीसदी है। लेकिन मत प्रतिशत में जिस तरह कांटे की टक्कर है वो बताती है कि बीजेपी कांग्रेस की अपेक्षा अपने वोट शेयर को सीटं में बदलने में ज्यादा माहिर है। क्योंकि बीजेपी के वोट जहां पर हैं, एकजुट हैं। ऐसे में वह ज्यादा सीटों पर जीत हासिल कर लेती है जबकि उसका वोट प्रतिशत कम रहता है।
    इस चुनाव में तीसरी सबसे बड़ी ताकत जनता दल सेक्युलर की कमान पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी के हाथों में है। जेडीएस की मजबूत स्थिति बताती है कि वोक्कालिगा क्षेत्र में जाति आधारित क्षेत्रीय राजनीति में परिवर्तन नहीं हुआ है और इस क्षेत्र में जेडीएस ने न सिर्फ कांग्रेस की चुनौती का सामना करके उसे मात दी है, बल्कि यह पार्टी कर्नाटक की क्षेत्रीय पहचान का समर्थन करने वाली प्रमुख पार्टी के रूप में भी सामने आई है।
    इस चुनाव से कांग्रेस को ये सबक लेना चाहिए कि कांग्रेस बीजेपी को सीधे टक्कर देकर चुनाव नहीं जीत सकती है और उसे क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ करना पड़ेगा। इस चुनाव में कांग्रेस ने कड़ी मेहनत की, लेकिन बीजेपी ने उससे भी ज्यादा मेहनत की। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पिछड़ी जातियों का एक गठबंधन बनाने में सफल हुए, कर्नाटक राज्य का झंडा फहराया, मेट्रो स्टेशनों के नाम हिंदी से बदलकर कन्नड़ में किए और लोक कल्याण से जुड़ी तकरीबन 11 भाग्य योजनाएं भी शुरू कीं। इन योजनाओं में चावल और दूध बांटा जाता था जिससे गरीब मतदाताओं को अपनी ओर लाया जा सके, लेकिन बीजेपी ने इस रणनीति के जवाब में, विशेषकर तटीय कर्नाटक में हिंदुत्व कार्ड खेला।
    यही नहीं बीजेपी ने उन जातियों के साथ रणनीतिक गठजोड़ किया जो कांग्रेस की पहुंच से बाहर थीं। इसके बाद 21 रैलियों के साथ नरेंद्र मोदी का प्रभावशाली प्रचार अभियान शुरू किया गया। मोदी की रैलियों में रॉक कंसर्ट जैसा माहौल होता है, ऊंची आवाज में भाषण होते हैं और सुनने वालों के बीच से ऊंची आवाजों में जय श्री राम के नारे सुनाई देते हैं। इन रैलियों में जब मोदी सामने आते हैं तो वह एक ऐसे नेता और गुरु के रूप में सामने आते हैं जिन्हें देखकर-सुनकर दिल को राहत मिलती हो। और स्टेज पर भावनाएं उद्देलित करने वाला संगीत बज रहा होता है जिससे उन्हें देखने आई भीड़ अपनी जगह पर खड़े हुए तालियां बजाती रह जाती है।
    ये रियलटी टीवी और इंदिरा गांधी के दौर में होने वाली राजनीति जैसी दिखती है, लेकिन इसकी आक्रामकता बहुत ज्यादा है। इस चुनाव में मोदी ने 20 से ज्यादा रैलियां कीं तो वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने 62 रैलियां कीं।
    अमित शाह बीते तीन महीने से कर्नाटक को हर हफ्ते में तीन दिन दे रहे थे। मैंने संघ पैदल सेना को अपनी आंखों से देखा है जो हर सुबह गांवों से लेकर कस्बों तक घर-घर जाकर मतदाताओं से मिलती थी। कई बार पूरे अभियान के दौरान चार-चार बार वह इन मतदाताओं से मुलाकात करते थे।
    कर्नाटक एक राज्य स्तरीय चुनाव ही है, लेकिन धारणा के आधार पर इसका महत्व बहुत ज्यादा है क्योंकि इसके ठीक एक साल बाद 2019 के आम चुनाव होने वाले हैं। साल 2019 के आम चुनाव अभी भी मोदी के लिए बाएं हाथ का खेल नहीं हैं। कांग्रेस की हार राहुल गांधी के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए बहुत बड़ा झटका है क्योंकि अब कांग्रेस सिर्फ पंजाब, मिजोरम और पुडुच्चेरी में ही मौजूद है। इस चुनाव में कांग्रेस की इतनी बड़ी हार हुई है कि इससे 2019 के लिए मनोबल में कमी आई है। लेकिन अगर सर्दियों में होने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ पर नजर डालें तो बीजेपी आखिरी के दो राज्यों में सत्ताधारी पार्टी है और राजस्थान में उसे उप चुनाव में लगातार हार का सामना करना पड़ा है।
    बीजेपी के प्रदर्शन की बात करें तो ये उस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करती है जहां ये सत्ताधारी पार्टी न होकर (गुजरात में ये देखा जा चुका है) चुनौती देने की स्थिति में होती है। लेकिन कर्नाटक में मजबूत नेता, अपने काम के लिए चर्चित मुख्यमंत्री और जातियों के मुफीद गठबंधन की मौजूदगी में जीत हासिल करना कांग्रेस को भविष्य के लिए मजबूती दे सकता है, लेकिन उस चुनाव में जहां इसे जीतना चाहिए था, जीत सकती थी, जीतती हुई दिखी, लेकिन कांग्रेस ये चुनाव हार गई।
    गुजरात में नैतिक जीत के बाद राहुल गांधी को एक असली जीत की जरूरत थी, लेकिन कोशिश करने के बावजूद वह ऐसा करने में सफल नहीं हो सके। ऐसे में क्या उनके द्वारा कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व किए जाने पर सवाल उठेंगे? मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के सामने इस समय एक तरह से किसी भी तरह का विपक्ष मौजूद नहीं है।
    मोदी अब 2019 के चुनाव को राष्ट्रपति चुनाव जैसा रंग देने की कोशिश करेंगे जो उनके व्यक्तित्व पर आधारित होगा और इंदिरा गांधी के 1971 वाले चुनावी नारे मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, वो कहते हैं इंदिरा हटाओ जैसा कोई नारा लेकर आएंगे।
    अगर किसी चुनाव में मोदी बनाम सभी का समीकरण होगा तो वह मोदी कल्ट को मजबूत ही करेगा। लेकिन मोदी कर्नाटक में मिशन 150 को हासिल करने में असफल हुए हैं जबकि कर्नाटक में जाति और समुदाय अभी भी उतने ही बंटे हुए हैं जैसे हमेशा से बंटे हुए थे।
    भारत में असंख्य जाति और संस्कृतियों के समूह में स्थानीय राजनीतिक शक्तियों के लिए हमेशा जगह बनी रहेगी, चाहे नई दिल्ली में कितना भी शक्तिशाली राजनीतिक व्यक्ति राज करता रहे। (बीबीसी)
    (लेखिका टाईम्स ऑफ इंडिया की सलाहकार संपादक हैं)

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Posted Date : 15-May-2018
  • आकार पटेल, कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
    वर्ष 1998 की 11 और 13 मई को राजस्थान के पोखरण में भारत ने पांच परमाणु परीक्षण किए थे। यह 24 वर्ष पूर्व 1974 में पोखरण में ही हुए परमाणु परीक्षण के बाद हुआ था। इंदिरा गांधी ने परीक्षण कर उन नियमों का उल्लंघन किया था, जिनके तहत परमाणु तकनीक कनाडा से ली गई थी और इसके लिए उन्हें प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा था। पहला परमाणु परीक्षण निश्चित रूप से अस्थिर समय में किया गया था। इस परीक्षण के 10 वर्ष पूर्व 1960 के मध्य में चीन परमाणु शक्ति और संयुक्त राष्ट्र में परमाणु बम हासिल करनेवाला पांचवा वीटो धारक बन गया था।
    तब दुनिया के ज्यादातर देश युद्धरत थे। जब इंदिरा गांधी ने परीक्षण किया था, तब अमरीका का वियतनाम में खूनी संघर्ष और अफगानिस्तान में सोवियत संघ की घुसपैठ खात्मे की ओर थी। उस दौर में दुनिया में संघर्ष आम बात थी। कोरियाई युद्ध के दौरान अमरीका के शीर्ष जनरल मैकआर्थर ने चीन और उत्तर कोरिया के खिलाफ परमाणु हमले की लापरवाह धमकी दी थी, इसलिए अमरीका भी चिंतित था। करीब पांच दशक पहले इंदिरा गांधी द्वारा किए गए परीक्षण की यही पृष्ठभूमि थी।
    वर्ष 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में इस तरह का कोई दबाव नहीं था। यह शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद का, सोवियत संघ के बिखराव और सूचना तकनीक क्रांति के उभार का दौर था। यह वह वक्त था जब ताईवान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया जैसे देशों के आर्थिक विकास ने साबित कर दिया था कि शक्ति धन में निहित होती है, न कि हथियारों में। उत्तर कोरिया, एक बड़ी सैन्य ताकत था, लेकिन वहां लाखों लोग गरीब थी।
    1998 में हुए परीक्षण को लेकर कोई बहस नहीं हुई थी। वाजपेयी सरकार अपने पहले 13 दिन के शासनकाल के दौरान ही परमाणु परीक्षण करना चाहती थी, लेकिन चिंतित नौकरशाही इसके लिए तैयार नहीं हुई थी। यह दर्शाता है कि परमाणु परीक्षण को वास्तव में कितने हल्के में लिया गया था। परमाणु परीक्षण के बाद पटाखों और मिठाईयों के साथ उत्सव मनाया गया था, जिससे परीक्षण के बाद कोई बहस नहीं हो सकी और न ही सवाल पूछे गये या जवाब दिये गये। आइये, बीस वर्ष बाद हम कुछ सवालों पर नजर डालते हैं।
    पहला सवाल, क्या इस परीक्षण से भारत परमाणु शक्ति बन गया? इसका उत्तर है- नहीं। इंदिरा गांधी और भारत को 1974 के बाद विश्व ने दंडित किया और उसे परमाणु तकनीक देने से मना कर दिया, क्योंकि हमने परीक्षण कर नियमों का उल्लंघन किया था। वर्ष 1998 के परीक्षण में इसे ही दोहराया गया। दूसरा सवाल, क्या इससे भारत सुरक्षित हुआ? नहीं, पोखरण के एक वर्ष बाद मई, 1999 में पाकिस्तान ने हमें कारगिल युद्ध के लिए उकसाया। उसके 10 वर्ष बाद मुंबई में हमला हुआ। वास्तव में कश्मीर में संघर्ष का सबसे हिंसक दौर पोखरण परीक्षण के बाद 2001 में देखा गया, जब 4,500 लोग मारे गये थे।
    तीसरा सवाल, क्या इससे हमारी परमाणु तकनीक बेहतर हुई? इसका उत्तर भी नहीं है। मनमोहन सिंह सरकार ने अमरीका के साथ एक सौदा किया था, लेकिन वह परवान नहीं चढ़ सका। चौथा, क्या इससे भारत का रुतबा बढ़ा? नहीं। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद् का सदस्य बनना चाह रहा है। परमाणु परीक्षण से उसमें कोई मदद नहीं मिली, बल्कि नुकसान ही हुआ। नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य बन जाए, लेकिन अभी तक वैसा नहीं हो सका है। पांचवां सवाल, क्या परीक्षण के बाद परमाणु तकनीक के कारण हमें ज्यादा विद्युत उत्पादन में मदद मिली? नहीं। भारत का ध्यान आजकल परमाणु की बजाय सौर ऊर्जा उत्पादन पर है। 
    छठवां, क्या इसने दक्षिण एशिया क्षेत्र में शक्ति केंद्र को बदल दिया? नहीं। पोखरण के कुछ ही दिनों बाद पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के चगाई क्षेत्र में परीक्षण किया और आज इस उपमहाद्वीप में परमाणु गतिरोध उत्पन्न हो गया है। संघर्ष बढऩे के डर से हम ज्यादा लंबे समय तक परंपरागत श्रेष्ठता का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। चीन ने हमारे क्षेत्र में मजबूती से आर्थिक पहल को बढ़ावा दिया है और आज हमारी चिंता उसकी सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि उससे हमारे विकल्पों को बचाने की है। 
    सूत्र बताते हैं कि परमाणु हथियारों के निर्माण में पाकिस्तान हमसे आगे निकल चुका है। इसमें कोई विवाद नहीं है कि 1998 में हमारे द्वारा उठाये गये कदम ने इसे बढ़ावा दिया है। ये सवाल हमें 1998 में खुद से पूछना चाहिए था, पर हमने नहीं पूछा। किसी भी परिपक्व समाज और एक लोकतंत्र में दूरगामी परिणामों वाले किसी कदम को उठाने से पहले बहस होनी चाहिए। लेकिन हमने इसे पटाखे फोडऩे जैसा कृत्य समझा। इन सारी बातों को जानने के बाद भी क्या हमें और परीक्षण करना चाहिए? 
    इस प्रश्न को मैं पाठकों के ऊपर छोड़ता हूं। परमाणु परीक्षण से होनेवाला एक भी फायदा मुझे नहीं दिखा। हां, मैं एक महत्वपूर्ण नुकसान देख पा रहा हूं। पिछली शताब्दी के तिमाही में 1998-1999 अकेला ऐसा वर्ष था, जब भारत में विदेशी निवेश नकारात्मक रहा।
    उस वर्ष विदेशी मुद्रा भारत से बाहर चली गयी, क्योंकि पूंजी को कभी भी इस तरह की अनिश्चितता पसंद नहीं आती। भारत और इसकी अर्थव्यवस्था को इस कारण होनेवाले नुकसान पर कभी चर्चा नहीं हुई। और, इसकी 20वीं वर्षगांठ पर किसी उत्सव का न होना यह सिद्ध करता है कि हम ऐसे आगे बढ़ गए, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। https://www.prabhatkhabar.com/

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