विचार / लेख

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Posted Date : 22-Jul-2018
  • सिन्धुवासिनी
    मैं बहुत खुश हूं। अपने लिए तो खुश हूं ही, उन लाखों औरतों के लिए ज्यादा खुश हूं जो महंगे सैनिटरी नैपकिन नहीं खरीद सकतीं। बीबीसी से फोन पर बात करती जरमीना इसरार खान की आवाज खुशी से खनखनाती हुई लगती है। यह खुशी सैनिटरी नैपकिन्स के जीएसटी के दायरे से बाहर होने की है।
    केंद्र सरकार ने शनिवार को हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद सैनिटरी नैपकिन्स से जीएसटी हटाने का फैसला लिया है। इससे पहले सैनिटरी पैड्स पर 12 फीसदी का जीएसटी लगाया जा रहा था।
    जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से पीएचडी कर रहीं 27 साल की जरमीना ने दिल्ली हाईकोर्ट में सैनिटरी नैपकिन्स से जीएसटी हटाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी।
    सस्ते सैनिटरी नैपकिन्स के लिए अदालत का रुख क्यों?
    इसके जवाब में जरमीना कहती हैं कि मैं उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जैसी छोटी जगह से आती हूं। मैंने देखा है कि गरीब औरतें कैसे मासिक धर्म के दौरान अखबार की कतरनों, राख और रेत का इस्तेमाल करती हैं।
    मैं उनका दर्द समझती हूं। मैं खुद एक लड़की हूं और समाजशास्त्र की छात्रा हूं। मैं समाज में औरतों के हालात से अच्छी तरह वाकिफ हूं। मुझे मालूम है कि गरीब तबके की औरतें कैसी तकलीफों का सामना करती हैं। यही वजह है कि मैंने अदालत जाने का फैसला किया। जरमीना ने बताया जेएनयू में भी इस मुद्दे पर काफी चर्चा होती थी लेकिन कोई आगे बढ़कर पहल नहीं कर रहा था और आखिरकार उन्होंने पहल की।
    अदालत में क्या तर्क पेश किया था?
    जरमीना ने बताया कि मैंने कहा था कि अगर सिंदूर, बिंदी, काजल और कॉन्डोम जैसी चीजों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जा सकता है तो सैनिटरी नैपकिन्स को क्यों नहीं?
    दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार से सवाल भी किए थे। कोर्ट ने 31 सदस्यों वाली जीएसटी काउंसिल में एक भी महिला के न होने पर हैरानी जताई और पूछा कि क्या सरकार ने सैनिटरी नैपकिन्स को जीएसटी के दायरे में रखने से पहले महिला और बाल कल्याण मंत्रालय से सलाह-मशविरा किया था।
    हाईकोर्ट की बेंच ने यह भी कहा था कि सैनिटरी नैपकिन्स औरतों के लिए बेहद जरूरी चीजों में से एक है और इस पर इतना ज्यादा टैक्स लगाने के पीछे कोई दलील नहीं हो सकती। जरमीना का मानना है कि सरकार को यह फैसला लेने में इतनी देर लगानी ही नहीं चाहिए थी। हालांकि, वो खुश हैं कि देर से ही सही, सरकार ने सही फैसला लिया।
    दिल्ली हाईकोर्ट में जरमीना का पक्ष रखने वाले वकील अमित जॉर्ज का मानना है कि केंद्र सरकार ने ताजा फैसले के पीछे न्यायपालिका की बड़ी भूमिका है। जरमीना ने कहा कि अदालतों में इतनी याचिकाएं आईं तो जाहिर है मामला न्यायपालिका की नजरों में आ गया था। कोर्ट ने भले ही इस पर कोई फैसला नहीं दिया था लेकिन सरकार से कड़े सवाल पूछे थे। कोर्ट ने इस पर दोबारा विचार करने को कहा था। जिसका नतीजा आज हमारे सामने है।
    इस मामले में जरमीना के वकील अमित जॉर्ज कहते हैं कि सैनिटरी पैड्स कोई लग्जरी आइटम नहीं हैं। ये हर औरत की जरूरत है न कि चॉइस। इसके अलावा, इन पर लगे टैक्स का असर सिर्फ महिलाओं पर पड़ता है।
    भारतीय संविधान के अनुसार आप कोई भी ऐसा प्रावधान नहीं बना सकते जिसका बुरा असर सिर्फ महिलाओं पर पड़े, फिर चाहे वह कोई टैक्स ही क्यों न हो। सैनिटरी नैपकिन्स औरतों के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी हैं, इसलिए यह मामला अपने आप में काफी अलग है।
    सरकार की क्या दलीलें थीं?
    अमित ने बताया कि सरकार की दो दलीलें थीं। एक तो उनका कहना था कि सैनिटरी नैपकिन्स पर पहले से सर्विस टैक्स था और उन्होंने इसे हटाकर इसके दाम घटा दिए थे। यह तर्क तथ्यात्मक रूप से भ्रामक था क्योंकि कई राज्यों में सैनिटरी पैड्स पर लगने वाला सर्विस टैक्स काफी कम था और जीएसटी लगने के बाद इसके दाम और बढ़ गए थे। अमित के मुताबिक सरकार की दूसरी दलील यह थी कि अगर सैनिटरी पैड्स को जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया गया था भारत की छोटी कंपनियों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा और बाजार चीनी उत्पादों से भर जाएगा।
    अमित का मानना है कि चूंकि अब सरकार ने खुद ही अपना फैसला पलट दिया है तो जाहिर है उन्होंने जो दलीलें पेश कीं उनमें दम नहीं था। अमित ने बताया कि पिछले एक साल में दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले पर तीन सुनवाइयां हुई थीं। तीन सुनवाइयों के बाद सरकार ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की अपील की थी और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कुछ महीनों के लिए स्टे लगा दिया था।
    ऐसा इसलिए क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट में भी इसी मुद्दे पर सुनवाई चल रही थी। फिलहाल पिछले कुछ तीन-चार महीने से यह मामला ठंडे बस्ते में था। अमित ने कहा कि अब सरकार की तरफ से फैसला आ ही गया है तो इस मुद्दे पर दायर की गई याचिकाएं अब वापस ले ली जाएंगी।
    कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव भी सैनिटरी नैपकिन पर 12 फीसदी जीएसटी के खिलाफ आवाज उठाती आई हैं। जीएसटी काउंसिल के फैसले के बाद उन्होंने कहा कि मैं सरकार के फैसले का स्वागत करती हूं। हम तो पिछले एक साल से यही कहते आ रहे हैं कि सैनिटरी नैपकिन्स इतना रेवेन्यू देने वाला प्रोडक्ट है ही नहीं कि इस पर इतना टैक्स लगाया जाए।
    उन्होंने कहा, सैनिटरी नैपकिन्स महिलाओं के जीवन के अधिकार से जुड़ा है। यह उनके लिए किसी जीवनरक्षक दवा से कम नहीं। इस पर टैक्स लगाना महिलाओं के अधिकारों का हनन है। अब चूंकि इन्हें जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया गया है, ये गावों के बाजारों में आसानी से उपलब्ध होंगे।
    सुष्मिता कहती हैं कि औरतों से जुड़े मुद्दों पर फैसला करते वक्त औरतों को ही ध्यान में नहीं रखा जाता। इसकी एक वजह पॉलिसी मेकिंग और राजनीति में औरतों की भागीदारी न होना भी है। 
    एक साल बाद अचानक अपना ही फैसला पलटने के पीछे सरकार की क्या सोच होगी?
    इसके जवाब में सुष्मिता ने कहा कि सरकार ने जीएसटी लागू करने का फैसला ही बिना प्लानिंग के किया था। मुझे लगता है कि सरकार को ऐसे मुद्दों पर खुलकर सोचना चाहिए और सबकी जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए।
    नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (2015-16) की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं जबकि शहरों में 77.5 प्रतिशत महिलाएं। कुल मिलाकर देखा जाए तो 57.6 प्रतिशत महिलाएं इनका इस्तेमाल करती हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 22-Jul-2018
  • इमरान कुरैशी
    कुछ लोगों को यह बात गैरमामूली बात लग सकती है या फिर कुछ के लिए ये शायद चकित करने वाला हो सकता है, लेकिन केरल की कुछ महिलाओं के लिए यह जंग में जीत से कम नहीं है। ये वो महिलाएं हैं जिन्हें अपने काम के घंटों के दौरान बैठने की इजाजत नहीं थी।
    इन महिलाओं ने राज्य सरकार को उस नियम में बदलाव लाने के लिए मजबूर कर दिया, जिसके तहत रिटेल आउटलेट में नौकरी के दौरान उन्हें बैठने से रोका जाता था। महिलाओं ने इसके खिलाफ अभियान चलाया था।
    राज्य के श्रम सचिव के. बीजू ने बताया कि बहुत कुछ गलत हो रहा था, जो नहीं होना चाहिए था। इसलिए नियमों में बदलाव किया गया है। अब उन्हें अनिवार्य रूप से बैठने की जगह मिलेगी। साथ ही महिलाओं को शौचालय जाने के लिए भी पर्याप्त समय दिया जाएगा।
    इस प्रस्ताव के मुताबिक अब महिलाओं को उनके काम करने की जगह पर रेस्ट रूम की सुविधा दी जाएगी और अनिवार्य रूप से कुछ घंटों का ब्रेक भी मिलेगा। और जिन जगहों पर महिलाओं को देर तक काम करना होता है, वहां उन्हें हॉस्टल की भी सुविधा देनी होगी।
    अधिकारियों के मुताबिक अगर इन नियमों का उल्लंघन होता है तो व्यवसाय पर दो हजार से लेकर एक लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन की महासचिव और वकील मैत्रेयी कहती हैं कि यह बुनियादी जरूरत है, जिसके बारे में किसी ने लिखने की जरूरत ही नहीं समझी। हर किसी को बैठना, शौचालय जाना और पानी पीना होता है।
    महिला अधिकार के इस मुद्दे को साल 2009-10 में कोझिकोड की पलीथोदी विजी ने उठाया था। विजी कहती हैं कि बैठने को लेकर कानून बनना, नौकरी देने वाले लोगों के घमंड का ही परिणाम है। वो महिलाओं से पूछते थे कि क्या कोई ऐसा कानून है जिसके तहत आपको बैठने के लिए कहा जाए। नया कानून उनके इसी घमंड का ही तो नतीजा है।
    केरल की तपती गर्मी में महिलाएं पानी तक नहीं पी पाती थीं क्योंकि उन्हें दुकान छोड़ कर जाने की इजाजत नहीं होती थी। यहां तक की उन्हें शौच के लिए जाने तक का वक्त नहीं दिया जाता था। वो अपनी प्यास और शौच रोक कर काम करती थीं, जो कई बीमारियों को जन्म देती थी।
    इस तरह की महिलाएं एकजुट हुईं और उन्होंने संघ का निर्माण किया। कोझिकोड से शुरू हुआ अभियान अन्य जिलों में भी फैलने लगा। ऐसे ही एक संघ की अध्यक्ष माया देवी बताती हैं कि जो पहले से स्थापित कर्मचारी संघ थे उन्होंने यह मुद्दा कभी नहीं उठाया। यहां तक कि महिलाओं को भी इस अधिकार के बारे में मालूम नहीं था।
    पलीथोदी विजी सिलाई की एक दुकान में काम करती थीं। माया देवी त्रिशूर के कपड़े के शोरूम में नौकरी करती थी, जहां उनके अलावा 200 से अधिक और लोग भी काम करते थे। माया कहती हैं कि दुकान में ग्राहकों के न रहने की स्थिति में भी हम लोगों को बैठने की इजाजत नहीं थी। पीएफ और स्वास्थ्य बीमा के पैसे सैलरी से काट लिए जाते थे लेकिन उन्हें स्कीम के तहत जमा नहीं किया जाता था।
     साल 2012 में माया को 7500 रुपए प्रति महीना वेतन पर नौकरी दी गई थी, लेकिन उन्हें कभी भी 4200 रुपए से ज्यादा का वेतन नहीं मिला। जब उन्होंने इसका विरोध किया, उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। साल 2014 में वो और उनकी जैसी 75 महिलाएं एक साथ आईं और मिल कर इन अनियमितताओं के खिलाफ अपना अभियान शुरू किया।
    इसके बाद प्रबंधन ने उन्हें और अन्य छह कर्मियों का स्थानांतरण कर दिया और बाद में नौकरी से वो सभी नौकरी से निकाल दी गईं। केरल सरकार के बनाए नए नियमों का फायदा सिर्फ महिलाओं को ही नहीं, पुरुषों को भी मिला है। अब वो भी अपनी नौकरी के दौरान बैठ सकेंगे। जल्द ही सरकार इस संबंध में एक नोटिफिकेशन जारी करने वाली है।
    विजी का कहना है कि नोटिफिकेशन जारी होने के बाद वो नियमों को देखेंगी और अगर उसमें कोई कमी लगती है तो वो आगे भी अपना आंदोलन जारी रखेंगी, लेकिन फिलहाल के लिए केरल की महिलाओं ने बैठने के अधिकार की अपनी लड़ाई जीत ली है। (बीबीसी)

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Posted Date : 21-Jul-2018
  • फैसल फरीद
    जैसे ही ये मामला सुर्खियों में आया उत्तर प्रदेश में ऐसे कई मामले जिनमें हलाला प्रक्रिया अपनाने का दावा किया गया है मीडिया में सामने आ गए। देश में हलाला प्रथा को लेकर संभवत: पहला केस पुलिस ने बरेली में दर्ज किया है। मामला फिर से मुस्लिम समुदाय, अल्पसंख्यक आयोग और हलाला प्रथा की शिकार महिलाओं के इर्द गिर्द आ गया है।
    गौर तलब है कि मुसलमानों में खासकर सुन्नी समुदाय के लोग इस्लामिक शरिया को मानते हैं। इस वजह से निकाह, बहुविवाह, ट्रिपल तलाक और हलाला जैसे मामले सब आपस में कनेक्टेड होते हैं। लेकिन आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसको मीडिया द्वारा गलत प्रोपोगंडा बता रहा है। बोर्ड के अनुसार, हलाला शब्द कहीं मौजूद नहीं है लेकिन इसको लेकर तमाम बयानबाजी चल रही है। इस्लाम धर्म के अनुसार अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी को तीन तलाक कह देता है तो उसकी पत्नी उसके निकाह से बाहर हो जाती है। पत्नी तीन महीने अपनी इद्दत के गुजारने के बाद स्वतंत्र होती है और वो किसी से भी शादी कर सकती है। लेकिन अगर वो फिर से अपने पहले पति से निकाह करना चाहती है तो उसके लिए पहले उसे किसी दुसरे पुरुष से शादी करनी होगी और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने होंगे, फिर उस पुरुष से तलाक लेनी होगी और फिर इद्दत की अवधि बिताने के बाद वो पहले पति से शादी कर सकती है।
    इस पूरी प्रक्रिया को हलाला कहते हैं। लेकिन इसमें भी पहला पति दूसरे पति को तलाक देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। दूसरी बात ऐसी शर्त लगाना कि शारीरिक संबंध के बाद तलाक देना है वो भी नहीं किया जा सकता। इसके अलावा ये भी नहीं कहा जा सकता कि किसी खास पुरुष के साथ हलाला करें। जानकारों की मानें तो ऐसा इसलिए रखा गया है जिससे तलाक जैसी प्रक्रिया से लोग परहेज करें।
    बरेली जिले के किला थाना के अंतर्गत एक पीडि़ता ने मुकदमा दर्ज कराया कि वो तीन तलाक पीडि़त है और उसके साथ शरियत की आड़ में गलत बर्ताव हुआ है। पीडि़त महिला का कहना है कि उसके पति ने उसको तलाक दे दी और फिर उसके बाद उसकी शादी उसके ससुर से करवा दी गई फिर हलाला प्रक्रिया (शारीरिक संबंध बनवाना) की गई। पुलिस ने इस पर दुष्कर्म की धारा के तहत केस दर्ज किया है और जांच शुरू कर दी है। अब इसमें मामला ये फंस रहा है कि अगर आरोप सिद्ध हुए तो हलाला प्रक्रिया को ही दुष्कर्म माना जायेगा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या जो चीज शरिया में सही है वो कानूनी रूप से गलत कैसे होगी ? किला थाना के इंस्पेक्टर केके वर्मा ने मीडिया को बताया कि पीडि़ता का मेडिकल होगा, सबके बयान होंगे और नियमानुसार विवेचना होगी।
    सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी डाली गई है जिसमें कहा गया है कि मुसलमानों में बहुविवाह और निकाह-हलाला जैसी प्रथा ट्रिपल तलाक के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में रह गई थी। इस मामले की सुनवाई अब संवैधानिक बेंच करेगी। 
    पेटिशन में सेक्शन 2, मुस्लिम पर्सनल (शरीअत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 को चुनौती दी गयी है। पेटिशन अश्विनी उपाध्याय, समीरा बेगम, मोहसिन बिन हुसैन और नफीसा खान द्वारा दायर की गई है। इसमें से अश्विनी उपाध्याय को भाजपा नेता बताया जा रहा है। मामला इस वजह से और सुर्खियों में है क्यूंकि सुप्रीम कोर्ट इससे पहले मुसलमानों में ट्रिपल तलाक को अवैध ठहरा चुका है। जब हलाला प्रथा का मामला सुर्खियों में आया तो सबसे पहले बरेली से आवाज उठी। एक मुकदमा भी दर्ज हुआ। उसके बाद पीडि़ता के समर्थन में बरेली निवासी निदा खान आ गई। निदा खान के खिलाफ अभी फतवा आया है और उनको इस्लाम से बाहर कर दिया गया है और उनके मरने पर भी लोगों को शामिल न होने के लिए कहा गया है। अब निदा खान खुद आला हजरत प्रमुख मौलाना सुभान रजा खान उर्फ सुभानी मियां के छोटे भाई अंजुम मियां के बेटे शीरान रजा खान की पूर्व पत्नी है। इसके बाद निदा ने आला हजरत हेल्पिंग सोसाइटी बनाई जिससे वो तलाक पीडि़तों के हक में लड़ रही है। निदा सीधे आला हजरत खानदान की बहू थी जिसपर बरेलवी समुदाय के लोग आस्था रखते हैं। निदा खुल कर हलाला पीडि़ता के समर्थन में आ गई है।
    इस मुद्दे पर राजनीति भी गरमा गई है। उत्तर प्रदेश के सिचाईं मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा है कि निदा के साथ उनकी संवेदनाएं हैं और 21 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शाहजहांपुर रैली में आएंगे तो वो वहां निदा का दर्द उनको बताएंगे। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने भी एक टीम बरेली भेजी है जो हलाला पीडि़त से भी मिलेगी। आयोग के अध्यक्ष तनवीर हैदर उस्मानी ने बताया कि देश फतवों से नहीं चलेगा और पीडि़ता के साथ न्याय होगा।
    इन सब से इतर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड हलाला प्रकरण को बिना वजह की बहस मान रहा है। बोर्ड के सेक्रेटरी जफरयाब जीलानी के अनुसार हलाला शब्द कहीं नहीं है। ये कुरान और हदीस में कहीं नहीं है लेकिन इसको प्रचारित किया जा रहा है। 
    जीलानी बताते हैं, अगर कोई शौहर अपनी पूर्व पत्नी से दुबारा शादी करना चाहता है तो उस पत्नी को कहीं दूसरी शादी करनी पड़ेगी और दूसरी शादी खत्म होने के बाद ही वो पहले पति से शादी कर पाएगी। लेकिन इसमें जबरदस्ती करना, शादी तुड़वाना या शर्त के साथ करवाना बहुत सख्त मना है।  (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 21-Jul-2018
  • - हिमांशु शेखर
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल के आखिरी साल में अविश्वास प्रस्ताव पर अपेक्षा के अनुरूप ही सरकार को खास मुश्किल नहीं हुई। लेकिन विपक्षी नेताओं ने जिस तरह से अविश्वास प्रस्ताव पर बोला, उससे एक बात का स्पष्ट संकेत मिल रहा है - 2019 के लोकसभा चुनावों को विपक्ष किन मुद्दों पर ले जाने की योजना पर काम कर रहा है।
    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी और राष्ट्रीय जनता दल के जयप्रकाश नारायण यादव समेत दूसरे सभी विपक्षी नेताओं ने एक ही तरह के मुद्दों को उठाया। अलग-अलग नेताओं ने मुद्दों को पेश करने का तरीका भले अलग-अलग अपनाया हो लेकिन मुद्दे घुमा-फिराकर वही थे, जिन्हें राहुल गांधी ने बेहद आक्रामक ढंग से संसद में रखा।
    राहुल गांधी ने अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए प्रभावी ढंग से यह मुद्दा उठाया कि 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ने जो वादे किए थे, उन्हें मोदी सरकार ने पूरा नहीं किया। इसमें भी उन्होंने बड़ी चतुराई से वे मुद्दे ही उठाए जो सीधे आम लोगों के समझ में आ सकें। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि हर व्यक्ति से नरेंद्र मोदी ने यह वादा किया था कि बैंक खाते में 15 लाख रुपये आएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसे ही उन्होंने नौजवानों को हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे को भी उठाया।
    कांग्रेस को मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों को काफी झेलना पड़ा था। उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बेहद आक्रामक ढंग से कांग्रेस पर हमला बोला था। अविश्वास प्रस्ताव के दौरान भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बोलते हुए राहुल गांधी भी उसी तरह से आक्रामक दिखे। उन्होंने राफेल सौदे का मसला उठाया और कहा कि फ्रांस सरकार को सौदे से संबंधित जानकारी सार्वजनिक किये जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। मोदी सरकार फ्रांस के साथ एक समझौते का हवाला देकर राफेल सौदे की रकम को सार्वजनिक नहीं कर रही है। राहुल गांधी ने बगैर नाम लिए मोदी सरकार के खिलाफ यह आरोप भी लगाया कि इस सौदे से नरेंद्र मोदी के एक करीबी कारोबारी को 45,000 करोड़ रुपये का ठेका मिल गया। इसके अलावा अमित शाह के बेटे जय शाह का मसला भी राहुल गांधी ने इस तरह से उठाया कि आने वाले दिनों में वे इसे चुनावी सभाओं में और आक्रामक ढंग से उठाते हुए दिखे तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।
    ऐसे ही राहुल गांधी ने बड़ी चतुराई से 'बड़े कारोबारी बनाम किसानÓ को भी एक मुद्दा बनाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि बड़े कारोबारियों का तो ढाई लाख करोड़ रुपये का कर्ज माफ हो गया लेकिन केंद्र सरकार किसानों का कर्ज माफ करने से सीधे तौर पर मना कर रही है। जिस आक्रामकता के साथ राहुल गांधी ने इस पर अपनी बात को रखा और बाद में दूसरे विपक्षी नेताओं ने भी इसे अपने भाषण में शामिल किया उससे साफ है कि चुनावी सभाओं में यह विपक्ष के मुख्य मुद्दों में से एक होने वाला है।।
    इसके अलावा राहुल गांधी ने देश भर में दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों का भी जिक्र किया। इन्हीं बातों दिनेश त्रिवेदी ने भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कही गई बातों के जरिए उठाया। इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि भीड़तंत्र और दक्षिणपंथी संगठनों की हिंसा को भी विपक्ष चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
    राहुल गांधी ने महिलाओं की सुरक्षा का मसला भी उठाया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को सुरक्षा देने में नाकाम रहने की वजह से देश के बाहर भी भारत की छवि खराब हो रही है। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से राहुल गांधी लगातार महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं। इसका बहुत लोग यह मतलब निकाल रहे हैं कि कांग्रेस अपने चुनावी अभियान में महिलाओं का खास भूमिका देखती है।
    राहुल गांधी के भाषण में सांप्रदायिकता का मुद्दा नहीं था। इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि भाजपा चाहे चुनावों को जितना भी हिंदू-मुस्लिम के मुद्दे पर ले जाने की कोशिश करे कांग्रेस इसके चक्कर में न फंसने की पूरी कोशिश करने वाली है। विपक्ष के लिए अब सांप्रदायिकता के बजाय मोदी सरकार द्वारा उसके वादे नहीं पूरा किया जाना, भ्रष्टाचार और विकास ही अगले चुनाव के मुख्य मुद्दे रहने वाले हैं। एक संकेत यह भी मिल रहा है जिस तरह से सीधा हमला नरेंद्र मोदी 2014 के चुनावों में कर रहे थे उसी तरह के सीधे हमले की तैयारी नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी और विपक्ष की ओर से चल रही है।
    हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्षी नेताओं के आरोपों का जवाब दिया और सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करते हुए कांग्रेस को उसके कार्यकाल में की गई गलतियों की याद भी दिलाई। लेकिन प्रधानमंत्री न तो राफेल के मसले पर कुछ बोले और न ही अमित शाह के बेटे जय शाह के मसले पर। प्रधानमंत्री ने नाम लिए बगैर राहुल गांधी के कई आरोपों को आधारहीन बताया लेकिन एक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने जो मुद्दे उठाए, उनकी चर्चा अब देश के आम लोगों में भी हो रही है। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 21-Jul-2018
  • - अभय शर्मा
    पाकिस्तान में 25 जुलाई को होने वाले आम चुनाव के लिए प्रचार अपने चरम पर पहुंच गया है। इस चुनाव में 100 से ज्यादा राजनीतिक पार्टियां हिस्सा ले रही हैं। लेकिन, मुख्य मुकाबला इमरान खान, नवाज शरीफ और बिलावल भुट्टो जरदारी की पार्टी के बीच ही माना जा रहा है। हालांकि, इन तीनों के अलावा भी पाकिस्तान में कई ऐसे नेता हैं जिनकी पार्टियां देश के कुछ हिस्सों में मजबूत पकड़ रखती हैं। इन नेताओं के लिए कहा जा रहा है कि मुख्य पार्टियों को पूर्ण बहुमत न मिलने पर सरकार बनाने की चाबी इनके हाथ में होगी। आइए जानते हैं कि पाकिस्तान के इस चुनाव के बाद कौन किंग और किंग मेकर की भूमिका में दिख सकता है
    इमरान खान-पीटीआई
    पाकिस्तान की विश्व विजेता टीम के कप्तान रह चुके इमरान खान की स्थिति इस बार के आम चुनाव में सबसे मजबूत मानी जा रही है। हालांकि, इस स्थिति तक पहुंचने में उन्हें 22 साल का समय लग गया। इमरान खान 1996 में पहली बार राजनीति में उतरे थे। इसके एक साल बाद हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई) कोई भी सीट नहीं जीत सकी थी। 2002 के चुनाव में भी उनकी पार्टी की हालत पतली ही रही और इमरान केवल अपनी ही सीट जीत सके। कोई बेहतर रणनीति न होने की वजह से उन्होंने 2008 के चुनाव में न उतरने का फैसला किया। लेकिन, इसके बाद 2013 के चुनाव के लिए इमरान ने एक रणनीति के तहत काम किया। उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का बिगुल फूंका। साथ ही उन्होंने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमाई इलाकों में अमरीका के ड्रोन हमलों का पुरजोर विरोध किया।
    इन दो बड़े अभियानों का खासा असर पड़ा। उनकी पार्टी 2013 के आम चुनावों में वोट प्रतिशत के लिहाज से दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। साथ ही पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सरकार बनाने में भी कामयाब रही। हालांकि, इमरान खान इस प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि उन्हें इस चुनाव में सत्ता में पहुंचने की पूरी उम्मीद थी।
    इमरान ने इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी और अपने दोनों प्रमुख एजेंडों पर डटे रहे। उन्होंने 2013 में प्रधानमंत्री बने नवाज शरीफ के परिवार का नाम पनामा पेपर्स से सामने आने के बाद उनके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन छेड़ दिया। इमरान ने नवाज शरीफ के खिलाफ सड़क से लेकर अदालत तक लड़ाई लड़ी। 2017 में इसी मामले के चलते शरीफ को प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। नवाज शरीफ पर हुई अदालती कार्रवाई का श्रेय इमरान खान को भी दिया जाता है।
    नवाज शरीफ के खिलाफ भ्रष्टाचार की जंग का एक बड़ा फायदा इमरान को यह मिला कि महिलाओं और युवाओं का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ जुड़ गया। इस बार के चुनाव में इमरान के हक में एक बड़ी बात यह भी जाती है कि उनकी निजी जिंदगी से अलग उनके राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन पर कोई दाग नहीं है जो उन्हें विपक्षियों से अलग खड़ा करता है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में इमरान सबसे आगे बताए जा रहे हैं। हालांकि, इन सर्वेक्षणों में ये भी कहा गया है कि उनकी पार्टी अकेले दम पर सरकार नहीं बना सकेगी।
    शहबाज शरीफ, पीएमएल-एन के अध्यक्ष
    पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ पूर्व प्रधानमंत्री शरीफ नवाज शरीफ के छोटे भाई हैं। बीते साल सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवाज शरीफ को राजनीतिक रूप से अयोग्य घोषित किए जाने के बाद पीएमएल-एन की बागडोर शहबाज शरीफ को सौंपी गई। पीएमएल-एन इस बार का चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ रही है।
    पाकिस्तान की राजनीति में शहबाज शरीफ को राजनीतिक दांव-पेंच के लिहाज से एक कच्चा खिलाड़ी माना जाता है। शहबाज के साथ एक दिक्क्त यह भी है कि उनका पंजाब के बाहर कोई खास जनाधार नहीं है। ऐसा होने की वजह भी है। दरअसल, नवाज शरीफ के रहते उन्हें कभी राजनीतिक दांव पेंच चलने और पंजाब से बाहर निकलने की जरूरत ही नहीं पड़ी। पंजाब की गद्दी भी उन्हें अपने बड़े भाई के जनाधार के चलते ही मिली।
    हालांकि, शाहबाज शरीफ को पाकिस्तान में एक मजबूत प्रशासक के रूप में जाना जाता है। उन्हें पाकिस्तान में सबसे ज्यादा विकास कराने वाले मुख्यमंत्रियों में गिना जाता है। उन्होंने पिछले दो दशक में पंजाब में अरबों रुपए की परियोजनाओं के जरिए राज्य के बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक परिवहन की स्थिति में बड़े सुधार किए हैं। लाहौर, मुल्तान, इस्लामाबाद और रावलपिंडी में उनके द्वारा चलाई गई मेट्रो बस और ऑरेंज लाइन ट्रेन की पूरे देश में काफी चर्चा है।
    उनके विकास कार्यों के चलते ही माना जा रहा है कि शहबाज इस चुनाव में पंजाब की सत्ता में वापसी करने में सफल हो सफल हो सकते हैं। लेकिन, नवाज शरीफ के चुनावी राजनीति से दूर होने और इमरान खान जैसे मजबूत विपक्षी के चलते केंद्रीय स्तर पर उनके सफल होने को लेकर आशंकाएं बनी हुई हैं।
    बिलावल भुट्टो जरदारी, पीपीपी के मुखिया
    पाकिस्तान के इस बार के चुनाव में देश की सबसे पुरानी पार्टी की कमान बिलावल भुट्टो जरदारी के हाथ में है। उम्र और अनुभव दोनों में वे प्रमुख प्रतिद्वंदियों से काफी छोटे हैं। दिसंबर 2007 में मां बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद उन्हें पीपीपी का मुखिया चुना गया था, तब उनकी उम्र महज 19 साल थी। हालांकि, पार्टी की कमान उनके हाथ में होने के बाद भी वे सक्रिय राजनीति से दूर थे। साल 2015 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सक्रिय रूप से राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया है।
    इस चुनाव में बिलावल की सामने चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। उन्हें एक ऐसी पार्टी को चुनाव लड़वाना है जो बेनजीर भुट्टो की मौत और उनके पिता के भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते जनाधार के मामले में अब तक सबसे कमजोर स्थिति में नजर आ रही है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के अलावा पार्टी की स्थिति कहीं भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। हालांकि, यह भी बताया जाता है कि सिंध में भी पीपीपी के कई कद्दावर नेताओं के इमरान खान की पार्टी के साथ जाने से यहां भी पीपीपी की स्थिति पहले जैसी नहीं रह गई है।
    बिलावल भी इस बात को जानते हैं कि उनकी पार्टी देश की सत्ता में पहुंचने की स्थिति में अभी नहीं है। लेकिन, वह गठबंधन सरकार बनवाने की स्थिति में पहुंच सकती है। यही वजह है कि वे अपनी पूरी ताकत सिंध और बलूचिस्तान के उन इलाकों पर लगा रहे हैं जिन्हें कभी उनकी पार्टी का गढ़ कहा जाता था और जहां पार्टी के फिर खड़े होने की संभावना दिख रही है। बिलावल पर उनके प्रतिद्वंदी राजनीतिक रूप से अनुभवहीन होने का आरोप लगाते हैं। ऐसे में उनके सामने इस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर विपक्षियों को गलत साबित करने की भी चुनौती है।
    चौधरी निसार खान
    पिछले कुछ महीनों तक नवाज शरीफ के शागिर्दों में गिने जाने वाले चौधरी निसार खान यह चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर लड़ रहे हैं। उन्होंने नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार में दोषी पाए जाने के बाद उनसे नाता तोड़ लिया था। 63 वर्षीय निसार खान भले ही स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ रहे हों, लेकिन कहा जा रहा है कि वे अगली सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
    इसकी एक वजह उनके पाकिस्तानी सेना के साथकाफी अच्छे ताल्लुकात हैं। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि उन्होंने सेना के कहने पर ही स्वतंत्र रूप से जीप के निशान पर चुनाव लडऩे का फैसला किया। पाकिस्तान के इस चुनाव में जीप चुनाव चिन्ह काफी चर्चा में रहा है। इस पर दो दर्जन से ज्यादा ऐसे नेता चुनाव लड़ रहे हैं जो पिछले चुनाव में पीपीपी और पीएमएल-एन के सांसद थे। पाक मीडिया की मानें तो चुनाव केबाद ये सभी चौधरी निसार खान के नेतृत्व में एकजुट होंगे और और किसी पार्टी को बहुमत न मिलनेकी स्थिति में गठबंधन सरकार बनवाने में सहयोग करेंगे।
    मौलाना फजलुर रहमान, अध्यक्ष मुट्टाहिदा मजलिस-ए-अमल (एमएमए) गठबंधन
    मौलाना फजलुर रहमान के बारे में कहा जाता है कि पाकिस्तान में सरकार किसी की भी बने, उसमें इनकी भूमिका जरूर होती है। पिछले एक दशक में बनी दोनों सरकारों में इनकी हिस्सेदारी थी। 65 वर्षीय फजलुर रहमान की उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा और दक्षिण-पश्चिम बलूचिस्तान में अच्छी पकड़ मानी जाती है। उनके अफगान तालिबान जैसे गुटों के साथ-साथ पाकिस्तान की सेना से भी अच्छे संबंध हैं। मौलाना की सबसे बड़ी ताकत यही मानी जाती है।
    उनकी एक खासियत यह भी है कि वे चुनाव से पहले कई दलों का गठबंधन बनाने में कामयाब हो जाते हैं। इस बार भी चुनाव से ठीक पहले वे पाकिस्तान के पांच बड़े धार्मिक समूहों को एक छतरी के नीचे लाने कामयाब रहे। माना जा रहा है कि मौलाना का गठबंधन 'मुट्टाहिदा मजलिस-ए-अमलÓ (एमएमए) पाकिस्तान की अगली सरकार में बड़ी भूमिका निभाएगा।
    असफंदर वली खान, अध्यक्ष अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी)
    असफंदर वली खान चर्चित पश्तून नेता अब्दुल गफ्फार खान के पोते हैं। वे पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की पार्टी अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) के मुखिया हैं। वर्तमान में पाकिस्तान की संसद में सीनेटर असफंदर वली खान की पहचान एक स्पष्टवादी और साहसी राजनेता के रूप में होती है। उनकी पार्टी पाकिस्तान की उन गिनी-चुनी पार्टियों में आती है जिनकी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा है और जो आतंकवाद और चरमपंथी समूहों की प्रबल विरोधी हैं। असफंदर वली खान की पार्टी को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। वे और उनकी पार्टी के कार्यकर्ता तालिबान जैसे आतंकी समूहों के निशाने पर रहते हैं।
    2008 के चुनावों में उनकी पार्टी ने धार्मिक समूहों को हराकर खैबर पख्तूनख्वा में सरकार बनाई थी। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने पीपीपी को समर्थन दिया था। हालांकि, 2013 के चुनावों में असफंदर वली खान को इमरान खान से शिकस्त का सामना करना पड़ा था। लेकिन, इस बार उनकी पार्टी एएनपी के अच्छे प्रदर्शन की संभावना जताई जा रही है। इस बार राष्ट्रीय स्तर पर अगर कोई पार्टी बहुमत नहीं हासिल करती तो असफंदर वली खान सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 20-Jul-2018
  • - ध्रुव गुप्त
    आज हिंदी के महाकवि गोपाल दास नीरज का देहावसान हिंदी गीतों के एक युग का अंत है। 93 साल की उम्र एक जीवन के लिए कम नहीं होती, लेकिन गंभीर बीमारी की हालत में उनका ऐसे चुपचाप चले जाना हमारे अंतर्मन पर व्यथा के कुछ गहरे धब्बे ज़रूर छोड़ गया है। प्रेम और विरह के यशस्वी गीतकार नीरज के गीतों के श्रृंगार ने कभी हमारे युवा सपनों को आसमान और परवाज़ बख़्शा था। उनके गीतों में खामोशी से चीखती विगत प्रेम की वेदना ने कभी हमारी नम आंखों को रूमाल और आंसुओं को तकिया मुहैय्या कराया था। हमारी पीढ़ी के लोग उनके शब्दों में मुखर श्रृंगार और उदासियों की पीड़ा के साथ ही जवान और बूढ़े हुए। अपनी बेपनाह रूमानियत से नीरज जी ने हिंदी गीतों और गज़़लों को समृद्ध किया है। यह और बात है कि हिंदी की पूर्वग्रहग्रस्त आलोचना ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसके वे वाकई हकदार थे। साहित्य के अलावा हिंदी फि़ल्मी गीतों को नया तेवर, कोमलता और संस्कार देने के लिए भी उन्हें जाना जाता है।
     फिल्मी गीतकार के तौर पर उनकी पहली फिल्म थी संगीतकार रोशन के साथ 'नई उमर की नई फसलÓ जिसके गीतों - 'कारवां गुजऱ गया गुबार देखते रहेÓ, 'देखती ही रहो आज दर्पण न तुमÓ और 'आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट हैÓ ने धूम मचा दी थी। उनकी अन्य चर्चित फिल्में हैं - मेरा नाम जोकर, गैम्बलर, तेरे मेरे सपने, पहचान, पतंगा, चा चा चा, दुनिया, शर्मीली, प्रेम पुजारी, कल आज और कल, चंदा और बिजली, फरेब, लाल पत्थर और कन्यादान। अगाध प्रेम और शाश्वत विरह के इस महाकवि के महाप्रयाण पर उन्हें नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि।

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Posted Date : 20-Jul-2018
  • जगदीश्वर चतुर्वेदी
    यह 1982-83 का जमाना था, जेएनयू में मंचीय कविता का कोई आनंद नहीं लेता था,यह बात मुझे सही नहीं लगी, प्रत्येक होस्टल के सालाना 'होस्टल डेÓ मनाने की जेएनयू में शुरूआत हुई। उसी क्रम में भयानक सर्दी की रात में संभवत: सतलुज का 'होस्टल डेÓ मनाने का निर्णय लिया गया। मैं उसी होस्टल में रहता था, मैंने मैस सैकेट्री से कहा कि होस्टलडे पर मंचीय कवि सम्मेलन कराओ, वे लोग राजी हो गए, जिम्मेदारी मुझे दी गई। उन दिनों मैं जेएनयू एसएफआई यूनिट का अध्यक्ष था,मैंने सबसे पहले कवि नीरज से संपर्क किया वे राजी हो गए,बड़े खुश थे कि जेएनयू से बुलावा आया है।  उन्होंने पूछा क्या मिलेगा, मैंने कहा पैसा नहीं दे पाएंगे,बोले मैं तब भी जाऊंगा,बस यह ध्यान रखना कविता मेरी आजीविका है। मैंने कहा, पूरी कोशिश करूंगा आप निराश होकर नहीं लौटेंगे,उनके साथ मुकुट बिहारी सरोज,अशोक चक्रधर ,सोम ठाकुर आदि कवियों को बुलाया था। उस मौके पर मैंने अपने शिक्षक केदारनाथ सिंह से अनुरोध किया कि वे भी कविता पढ़ें,वे राजी नहीं हुए,बोले मैं मंचीय कवियों के साथ कविता नहीं पढ़ सकता,मैंने कहा यह तो सही नहीं है। 
    खैर,नीरज के अलावा मंच पर एक दर्जन कवि थे,कवि सम्मेलन के पहले डिनर के लिए मैस में ले गया,बोले ,मैं दारू के बिना डिनर नहीं करूंगा मैंने कहा मैं पीता नहीं हूं, इसलिए दारू का जुगाड़ नहीं कर सकता, वे मान गए, उन्होंने बिना दारू पिए डिनर किया और मंच को की घंटे तक संभाला,बोले ,मैं आज पहली बार बिना दारू के कविताएं पढूंगा,आमतौर पर पहले जमकर पीता हूं फिर कविता सुनाता हूं। तुमने मेरा ड्राई डे कर दिया।

     खैर,उन्होंने झेलम लॉन में सैंकड़ों छात्र-छात्राओं को रात ग्यारह बजे से लेकर रात दो बजे तक जमकर कविताएं सुनाईं,मंच पर नीरज एकदम झूम झूमकर कविताएं सुना रहे थे और जेएनयू के सैंकड़ों छात्र इतनी बड़ी संख्या में हिंदी कविता का आनंद ले रहे थे। मेरे अनुभव में हिंदी की कविताओं का पहली बार इतनी बड़ी संख्या में छात्रों ने आनंद लिया, कार्यक्रम रात साढ़े नौ बजे से रात दो बजे तक चला। नीरज को मैंने पांच सौ रूपये भेंट में दिए।
    उस कार्यक्रम में मुकुट बिहारी सरोज को आना था वे नहीं आ पाए,वे दूसरे दिन आए, वे शानदार कवि थे, माकपा के मेम्बर थे, ग्वालियर से दिल्ली आए और सीधे माकपा नेता प्रकाश कारात के पास गए बोले मेरा आज जेएनयू में कार्यक्रम है,प्रकाश ने मुझे फोन करके बताया कि मुकुटजी आ गए हैं, पार्टी ऑफिस आकर जेएनयू ले जाओ, मैंने कहा , कार्यक्रम तो कल हो गया,वे एक दिन बाद आए हैं,प्रकाश बोला ले जाओ, कविता पर कार्यक्रम रख दो, खैर, हमने उनके कार्यक्रम की व्यवस्था कर दी उन्होंने दो घंटे तक कविताएं सुनाईं। लेकिन जनप्रिय कविता का जो माहौल नीरजजी ने बनाया वह अविस्मरणीय है। यह जेएनयू में अपने किस्म का पापुलर कविता का अकेला अनुभव रहा। नीरजजी को लंबे समय तक जेएनयू के छात्र याद करते रहे। हमारी विनम्र श्रद्धांजलि। यहां उनकी एक कविता पढें जो आज के दौर के लिए प्रासंगिक है-

    है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
    जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए
    रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
    अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए
    अब भी कुछ लोगों ने बेची है न अपनी आत्मा
    ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए
    फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
    जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए
    छीनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
    आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए
    दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
    तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए।

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Posted Date : 20-Jul-2018
  •  प्रो. योगेंद्र यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, स्वराज इंडिया
    इधर लोकसभा में मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर बहस होगी। उधर अखिल भारतीय किसान संघ समिति के बैनर तले 201 किसान संगठनों के प्रतिनिधि संसद के बाहर प्रदर्शन कर इस सरकार में अविश्वास जताएंगे। दसों दिशाओं से किसानों का संदेश संसद के दरवाजे पर दस्तक देगा। लोकसभा के भीतर यह आवाज पहुंचे न पहुंचे, लेकिन हम सब दस दिशाओं से आने वाली इन आवाजों को सुन सकते हैं, उन दस कड़वे सच की शिनाख्त कर सकते हैं, जिनके चलते देश के किसान मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास मत पास कर चुके हैं।
    पहला सच- मोदी सरकार अपने चुनावी मेनिफेस्टो में किसानों को किए सभी बड़े वायदों से मुकर गई है। वादा था कि कृषि वृद्धि और किसान की आय में बढ़ोतरी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। सरकारी डायलॉग में तो बहुत वृद्धि हुई है, लेकिन सरकार के अपने ही आंकड़े देखें तो पिछले चार साल में कृषि क्षेत्र में वृद्धि की दर घट गई है। अगर इसके लिए दो साल पड़े सूखे को भी जिम्मेदार नहीं मानें, तो भी किसानों की वास्तविक आय पिछले चार साल में 2 फीसदी भी नहीं बढ़ी है और दावा छह साल में 100 फीसदी बढ़ाने का है।
     यह भी वादा था कि कृषि में सरकारी खर्च बढ़ेगा, पर वास्तव में जीडीपी के प्रतिशत के रूप में यह खर्च घटा है। वादा एक संपूर्ण बीमा योजना का था, बदले में मिली प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जिसमें पैसा किसानों के बजाय कंपनियों के पास गया। बुजुर्ग और छोटे किसानों, खेत मजदूरों के कल्याण की योजना का वादा ही भूला दिया गया। राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति की बात भी नहीं सुनी जाती। मंडी एक्ट में संशोधन का वादा भी अब याद नहीं।
     दूसरा सच-मोदी सरकार किसानों को लागत का डेढ़ गुना दाम देने के अपने सबसे बड़े चुनावी वादे से मुकर गयी। पहले तो फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर सरकार ने कहा कि इसे पूरा करना असंभव है। जब किसान संगठनों का दबाव बना, तो 2018 के बजट में अरुण जेटली ने लागत की परिभाषा ही बदल दी। संपूर्ण लागत (सी2) की जगह आंशिक लागत (ए2+एफएल) को आधार बनाकर किसानों के साथ धोखाधड़ी की।
     तीसरा सच-लागत का डेढ़ गुना एमएसपी का वादा तो दूर की बात है, मोदी सरकार ने पुरानी सरकारों की सामान्य एमएसपी वृद्धि की दर को भी बनाये नहीं रखा। आते ही सरकार ने एमएसपी पर राज्य सरकारों का बोनस रोक दिया। पांच साल में कुल मिलाकर मोदी सरकार की एमएसपी में बढ़ोत्तरी मनमोहन सिंह कि दोनों सरकारों से भी कम है। 
     इस साल हुई ऐतिहासिक बढ़ोतरी का प्रचार भी झूठ है, क्योंकि इससे ज्यादा बढ़ोतरी तो यूपीए की सरकार 2008-09 में चुनावी रेवड़ी बांटते वक्त कर चुकी थी। सरकार द्वारा घोषित आधी-अधूरी एमएसपी भी किसान तक नहीं पहुंची और पिछले साल में इसके चलते किसानों को कम से कम 50 हजार करोड़ रूपये का चूना लगा।
    चौथा सच- यह सरकार पहले दो साल में पड़े देशव्यापी सूखे के दौरान लापरवाही और अकर्मण्यता की दोषी है। कागज पर किसान को मुआवजे की दर बढ़ाने और गड़बड़ी की सीमा बदलने के सिवा दो साल तक सरकार ने सूखा नियंत्रण के जरूरी कदम नहीं उठाए। ऊपर से बहाने भी बनाये कि सूखा राहत तो उसकी जिम्मेदारी नहीं और उसके पास पैसा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को बार-बार केंद्र सरकार की लापरवाही पर टिप्पणी करनी पड़ी।
     पांचवा सच-सरकार ने रोजगार गारंटी योजना का गला घोंटने का हर संभव प्रयास किया। जब इस योजना को बंद करने की साजिश कामयाब नहीं हुई, तब इसके फंड रोकने और समय पर वेतन का भुगतान और मुआवजा न देने के जरिये इसका बंटाधार किया गया, जिससे छोटे किसान और खेतिहर मजदूर की स्थिति पहले से भी कमजोर हुई है।
    छठा सच- सरकार की आयात-निर्यात नीतियों के जरिये भी किसानों को धक्का पहुंचाया गया। चाहे 2014 में आलू पर न्यूनतम निर्यात मूल्य की सीमा या फिर इस साल गन्ने की बंपर पैदावार के बावजूद पाकिस्तान से चीनी का आयात हो, इस सरकार ने आयात-निर्यात नीति से किसान को नुकसान ही पहुंचाया है। नतीजा साफ है, 2013-14 में कृषि उपज का निर्यात 4,300 करोड़ डॉलर से घटकर 2016-17 में 3,300 करोड़ डॉलर पर आ पहुंचा। उधर अरहर, चना, गेहूं, चीनी और दूध पाउडर जैसी वस्तुओं के आयात से किसान की फसलों का दाम गिर गया।
    सातवां सच- नोटबंदी की तुगलक की योजना ने तो किसान की कमर ही तोड़ दी। मुश्किल से दो साल के सूखे से उबर रहा किसान जब पहली अच्छी फसल को बेचने बाजार पहुंचा, तो कैश खत्म हो गया था, मांग गिर चुकी थी, भाव टूट गये थे। 
    आठवां सच-गौ-हत्या रोकने के नाम पर पशुधन के व्यापार पर लगी पाबंदियों और जहां-तहां गौ-तस्करों को पकडऩे के नाम पर चल रही हिंसा ने पशुधन की अर्थव्यवस्था की कड़ी को तोड़ दिया है। एक ओर किसान की आमदनी को धक्का लगा है, वहीं दूसरी ओर खेतों में आवारा पशुओं की समस्या भयंकर रूप ले रही है।
    नौवां सच- सरकार की पर्यावरण नीति ने आदिवासी किसानों की बर्बादी का रास्ता बना दिया है। वन अधिकार कानून में आदिवासी किसान के अधिकारों को हटा दिया गया है। बाकी कानूनों में भी ऐसे बदलाव किए गए हैं, ताकि आदिवासी समाज की जल, जंगल और जमीन पर उद्योगों और कंपनियों का कब्जा आसान हो जाए।

    दसवां सच: किसान को कुछ देना तो दूर, मोदी सरकार ने किसान की अंतिम और सबसे बहुमूल्य संपत्ति छीनने की पूरी कोशिश की है. साल 2013 में सभी पार्टियों की सहमति से बने नये भूमि-अधिग्रहण कानून को अपने अध्यादेश के जरिये खत्म करने की मोदी सरकार ने चार बार कोशिशें की.
     
    कोशिश नाकाम होने के बावजूद मोदी सरकार की एजेंसियों ने भूमि अधिग्रहण में 2013 कानून का फायदा किसान को ना देने की पूरी व्यवस्था कर ली. अपनी राज्य सरकारों के जरिये इस कानून में ऐसे छेद करवाये गये, जिससे किसान को भूमि-अधिग्रहण में अपना जायज हिस्सा ना मिल सके.
     
    चौधरी चरण सिंह कहा करते थे कि इस देश की कोई भी सरकार किसान हितैषी नहीं रही है. बात सच थी. अब तो सरकारों के मूल्यांकन का असली पैमाना यही है कि कौन सरकार कितनी किसान-विरोधी है. निस्संदेह! इस पैमाने पर मोदी सरकार देश के इतिहास की सबसे ज्यादा किसान-विरोधी सरकार है. (www.prabhatkhabar.com)

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Posted Date : 19-Jul-2018
  • - पंकज कुशवाल
    पंजाब सरकार ने नशे के तस्करों को फांसी की सजा देने का प्रस्ताव केंद्र के पास भेजा है। राज्य के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने सरकारी कर्मचारियों का डोप टेस्ट अनिवार्य किए जाने संबंधी आदेश को भी मंजूरी दी है। पंजाब में नशा काफी समय से एक अहम मुद्दा बना हुआ है। माना जाता है कि अकाली दल की सत्ता से विदाई का बड़ा कारण राज्य में नशे की समस्या का गंभीर हो जाना भी था। यही वजह है कि उसे सत्ता से बाहर करने वाली कांग्रेस इस मोर्चे पर सुस्त नजर नहीं आना चाहती।
    पंजाब जैसे हालात अब उत्तराखंड में भी पनप रहे हैं। राज्य की राजधानी देहरादून में तो स्थिति बहुत गंभीर हो चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक इस शहर में नशे का सालाना कारोबार 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। इसके बावजूद उत्तराखंड सरकार नशे की समस्या को उतनी गंभीरता से लेती नहीं दिख रही। राज्य की राजनीति में भी नशे की समस्या कोई बड़ा मुद्दा नहीं दिखती। यानी इस मामले में उत्तराखंड पंजाब से भी आगे की राह पर चलता नजर आता है।
    देहरादून किसी जमाने में नौकरशाहों से लेकर सेना के आला अफसरों तक के लिए रिटायरमेंट के बाद का पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था। नहरों के साथ लीची और आम के बगीचों का यह शहर 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग हुए उत्तराखंड राज्य की अस्थाई राजधानी बना। इसके बाद देहरादून की आबादी में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। यहां सैकड़ों की संख्या में शैक्षणिक संस्थान खुल गए जिनमें देश भर से लाखों की संख्या में छात्र पहुंचने लगे। औद्योगिक मोर्चे पर भी बदलाव हुआ। अब सेलाकुई और पटेलनगर जैसे देहरादून के औद्योगिक क्षेत्रों में देश भर से मजदूर रोजी-रोटी की तलाश में पहुंचते हैं। इन सब कारणों के चलते देहरादून का फैलाव और इसकी आबादी कई गुना बढ़ गई है।
    इसके चलते नशे का कारोबार भी बढ़ा है। बाहर से आने वाले लाखों छात्रों और मजदूरों के रूप में नशे के सौदागरों को भी ग्राहकों की बड़ी आबादी मिल गई है। बीते साल नशे के मामले में हुई गिरफ्तारियों के आंकड़े बताते हैं कि इस हिमालयी राज्य की राजधानी के लिए नशा बड़ी चुनौती बन गया है। साल 2017 में पुलिस ने 13 जिलों से 10 करोड़ रुपये की कीमत से भी ज्यादा कीमत के नशे की खेप बरामद की है। इसमें से 70 फीसदी से ज्यादा देहरादून में बरामद हुई है। इस दौरान 1091 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इनमें से आधे से ज्यादा गिरफ्तारियां देहरादून में हुईं। यानी देखें तो हर दिन नशे के औसतन दो सौदागर पुलिस के हत्थे चढ़ रहे हैं।
    इस साल जनवरी से अप्रैल महीने तक ही आंकड़ा देखें तो देहरादून में दो करोड़ तक कीमत की नशे की खेप बरामद की जा चुकी है। इस दौरान हुई छापामारी में इस कारोबार में शामिल 275 लोग पकड़े गए। पूरे राज्य के लिए यह आंकड़ा करीब तीन करोड़ रु और 495 रहा। साफ है कि देहरादून उत्तराखंड में नशे के सौदागरों की पसंदीदा जगह बन गया है। नशे की यह खेप वह है जो पुलिस के हाथ लगी है। इससे कहीं ज्यादा खेप बाजार में खप जाती है। एक अनुमान के मुताबिक ही देहरादून में सालाना नशे का कारोबार 500 करोड़ रुपये से अधिक का है।
    यानी साफ है कि पुलिस की तमाम चौकसी और नशे के खिलाफ बड़े अभियान के बावजूद बड़ी संख्या में युवाओं और मजदूरों तक नशा पहुंच रहा है। देहरादून में नशे के ज्यादातर मामलों के तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में बैठे नशे के सौदागरों से जुड़ते हैं। अब तक नशे की खेप के साथ पुलिस के हत्थे चढ़े अपराधियों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, बरेली, बिजनौर और सहारनपुर से ताल्लुक रखने वालों की बड़ी संख्या है। ये अपराधी भारी तादाद में स्मैक, नशीली गोलियां-कैप्सूल- इन्जेक्शन, गांजा, ब्राउन शुगर, हेरोइन, भांग और अफीम जैसे नशे इस पहाड़ी राज्य में पहुंचा रहे हैं।
    तरह-तरह के नशों के कारोबार के तार भले ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़ते हों लेकिन, यह भी एक तथ्य है कि उत्तराखंड में नशे के तौर पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली चरस की आपूर्ति राज्य के पहाड़ी जिले कर रहे हैं। हाल के वर्षों में नशे के तस्करी में हुई धरपकड़ के आंकड़ों पर गौर करें तो इस पर्वतीय राज्य के पहाड़ी जिले चरस उत्पादन और तस्करी के अड्डे बन गए हैं। बीते साल ही राज्य के उत्तरकाशी जिले में 16.80, चमोली में 14.64, अल्मोड़ा में 13.56, बागेश्वर में 14.20, चंपावत में 30.98 और नैनीताल में 42.77 किलो चरस पुलिस ने तस्करों से बरामद की।
    इस सबके बावजूद उत्तराखंड में राजनीति की मुख्यधारा में यह मुद्दा कहीं नहीं दिखता। बीते साल हुए विधानसभा चुनावों के दौरान नशे की समस्या का जिक्र न भाजपा के घोषणापत्र में हुआ और न कांग्रेस के। उत्तराखंड क्रांति दल ने जरूर नशा मुक्त राज्य के संकल्प को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया था, लेकिन राज्य की राजनीति में उसकी स्थिति देखें तो इससे कोई उम्मीद पैदा होती नहीं दिखती। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 19-Jul-2018
  • -प्रभाकर
    असम के डायन विरोधी कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। लेकिन क्या असम में भी इस कानून का हाल झारखंड जैसा ही होगा? भारत के कुछ राज्यों में यह कुरीति बड़ी गहरी जड़ें जमाए हुए है। देश के विभिन्न राज्यों में डायन प्रथा के खिलाफ कानून होने के बावजूद अब तक इस सामाजिक कुरीति पर अंकुश नहीं लग सका है। असम सरकार का दावा है कि इस कानून के प्रावधान दूसरे राज्यों के ऐसे कानूनों के मुकाबले कठोर हैं। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि महज कानून बना कर सदियों पुरानी इस कुप्रथा को खत्म करना संभव नहीं है। इसके लिए बड़े पैमाने पर सामाजिक जागरूकता जरूरी है।
    सदियों पुरानी प्रथा
    देश में डायन प्रथा कब से शुरू हुई, इसका कोई प्रामाणिक इतिहास तो नहीं मिलता लेकिन यह सदियों पुरानी है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में डाकन या डायन प्रथा कोई छह-सात सौ साल पहले से चलन में थी। इसके तहत अपनी जादुई ताकतों के कथित इस्तेमाल से शिशुओं को मारने के आरोप में महिलाओं की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती थी। उस दौर में वहां हजारों औरतें इस कुप्रथा का शिकार हुई थीं। राजपूत रियासतों ने 16वीं सदी में कानून बना कर इस प्रथा पर रोक लगा दी थी। वर्ष 1553 में उदयपुर में पहली बार इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया था। बावजूद इसके यह बेरोक-टोक जारी रही।
    डायन प्रथा पर नहीं लग सका अंकुश
    कुछ जानकारों के मुताबिक, यह प्रथा असम के मोरीगांव जिले में फली-फूली। इस जिले को अब काले जादू की भारतीय राजधानी कहा जाता है। दूर-दराज से लोग काला जादू सीखने यहां आते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2000 से 2016 के बीच देश के विभिन्न राज्यों में डायन करार देकर 2,500 से ज्यादा लोगों को मार दिया गया। उनमें ज्यादातर महिलाएं थीं। इस मामले में झारखंड का नाम सबसे ऊपर है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में वर्ष 2001 से 2014 के बीच डायन होने के आरोप में 464 महिलाओं की हत्या कर दी गई। उनमें से ज्यादातर आदिवासी तबके की थीं। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि एनसीआरबी के आंकड़े तस्वीर का असली रूप सामने नहीं लाते। डायन के नाम पर होने वाली हत्याओं की तादाद इससे कई गुनी ज्यादा है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में डायन के खिलाफ लोगों की एकजुटता की वजह से ज्यादातर मामले पुलिस तक नहीं पहुंच पाते।
    कैसी बनती है डायन
    आखिर किसी को डायन करार देने का पैमाना क्या है? सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग्रामीण और खासकर आदिवासी लोग किसी प्राकृतिक विपदा या बच्चों की मौत किसी गंभीर बीमारी के फैलने की स्थिति में लोग पहले नीम हकीमों या ओझाओं की शरण में जाते हैं। जब उन झोला छाप डॉक्टरों और ओझाओं से कुछ नहीं हो पाता तो वह पास-पड़ोस की किसी महिला को इसके लिए जिम्मेदार बताते हुए उसे डायन करार दे देते है। मौजूदा दौर में भी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर नहीं होने की वजह से ऐसे डॉक्टर और ओझा ही लोगों का सबसे बड़ा सहारा है। ओझा की ओर से डायन करार दी गई महिला का उत्पीडऩ शुरू होता है जो उसकी जान के साथ ही खत्म होता है। ओझा के मुंह से निकला एक शब्द ही गांव के लोगों के लिए ब्रह्मवाक्य बन जाता है और लोग कानून हाथों में लेकर उस कथित डायन को उसके कर्मों की सजा दे देते हैं। ऐसी महिलाएं अक्सर किसी छोटी जाति की होती हैं। ग्रामीण इलाकों में संपत्ति हड़पने या आपसी रंजिश के लिए भी इस कुप्रथा की आड़ ली जाती है। खासकर किसी विधवा को डायन करार देकर मारने के बाद उसकी संपत्ति हड़पना आसान है। ऐसे मामलों में पुलिस या जिला प्रशासन भी खास कुछ नहीं कर पाता।
    झारखंड में आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले अजिथा सुशान जार्ज कहते हैं, डायन प्रथा में ओझाओं की भूमिका सबसे अहम है। अगर वह किसी का इलाज करने में नाकाम रहते हैं तो इसका ठीकरा किसी महिला पर फोड़ते हुए उसे डायन बता देते हैं। एक अन्य कार्यकर्ता जेवियर दास कहते हैं, झारखंड में तो यह कुप्रथा इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी हैं किसी प्राकृतिक विपदा या महामारी के फैलते ही लोग ओझाओं की मदद से डायन की तलाश में जुट जाते हैं। दिल्ली स्थित संगठन पार्टनर्सस फार ला इन डेवलपमेंट नामक एक संगठन ने अपने हालिया शोध में कहा है, डायन प्रथा की जड़ें पितृसत्तात्मक मानसिकता, आर्थिक झगड़ों, अंधविश्वास और दूसरी निजी और सामाजिक संघर्ष में छिपी हैं। ज्यादातर मामले पुलिस के पास ही नहीं पहुंचते। ऐसे में सरकारी आंकड़े इस भयावह समस्या की सही तस्वीर नहीं दिखाते।
    अधिकतर आदिवासी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में जमीन पर ज्यादा अधिकार प्राप्त होते हैं। इस संपत्ति पर अधिकार जमाने के लिए उन्हें डायन साबित करने की कवायद शुरू की जाती है खासकर उन महिलाओं को निशाने पर रखा जाता है जिनके परिवार में कोई नहीं होता।
    एक गैर-सरकारी संगठन सिटीजन फाउंडेशन के प्रमुख गणेश रेड्डी कहते हैं, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं होने की वजह से आदिवासी गांवों में अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं। इसके साथ ही साक्षरता दर भी बहुत कम है।
    जागरूकता पर जोर
    सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि महज कानून बना देने से सदियों पुरानी इस कुप्रथा को जड़ से मिटाना या इस पर अंकुश लगाना मुमकिन नहीं है। रेड्डी इस मामले में झारखंड का हवाला देते हैं जहां बरसों पहले डायन प्रथा के खिलाफ कानून बनने के बावजूद डायन के नाम पर होने वाली हत्याओं में कोई कमी नहीं आ है। असम में डायन प्रथा के विरोध में लंबे अरसे से सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता दिब्यज्योति सैकिया कहते हैं, असम में इस मुद्दे पर बना कानून दूसरे राज्यों के कानूनों के मुकाबले बेहतर है। लेकिन महज कानून बना कर समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी इस कुप्रथा का खात्मा संभव नहीं है।
    असम में अपने गैर-सरकारी संगठन मिशन बीरूबाला के जरिए इस कुप्रथा के खिलाफ लंबे अरसे से अभियान चलाने वाली बीरबाला राभा कहती हैं, असम में ऐसा कानून का बनना एक अहम कदम है। लेकिन इस कानून को कड़ाई से लागू करने और खासकर ग्रामीण इलाकों में सामाजिक जागरूकता फैलाने पर जोर देना होगा। कई बार बीरूबाला को भी डायन करार देकर उनकी हत्या के प्रयास किए गए हैं। राज्य में बीते 16 वर्षों के दौरान 114 महिलाओं समेत 193 लोगों को डायन करार देकर उनकी हत्या कर दी गई थी। जाने-माने फिल्मकार सीतानाथ लहकर कहते हैं, महज कानूनों के जरिए सदियों से जारी इस कुप्रथा को खत्म करना संभव नहीं है। इसके लिए बहुआयामी उपाय करने होंगे। वह कहते हैं कि सरकार को गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिल कर जागरूकता अभियान तो चलाना ही होगा, ग्रामीण इलाकों तक शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं भी पहुंचानी होंगी।
    अखिल असम छात्र संघ (आसू) के महासचिव लुरिनज्योति गोगोई कहते हैं, 21वीं सदी में भी ऐसी कुप्रथा का जारी रहना शर्मनाक है। कोई भी कानून सदियों पुरानी किसी प्रथा को खत्म नहीं कर सकता। सरकार को इसके लिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना होगा और जागरूकता फैलानी होगी।
    (भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों के देखते हुए कहा जा सकता है कि महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने हर राज्य के अपराध दर के अनुसार इन्हें महिलाओं के लिए यह रैंक दी है।)

    (डॉयचे वेले)

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Posted Date : 18-Jul-2018
  • पाकिस्तान में अगले हफ्ते आम चुनाव होने हैं। पुलिस ने जिन 17000 मामलों की छानबीन शुरू करने का एलान किया है वो पिछले चार दिनों में पंजाब प्रांत में दर्ज कराए गए हैं। पुलिस का कहना है कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज यानी पीएमएल एन के सैकड़ों सदस्यों को गिरफ्तार भी किया गया है। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम नवाज को पहले ही भ्रष्टाचार के मुकदमे में सजा के बाद गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस के बयान में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि संदिग्धों ने किन चुनाव नियमों का उल्लंघन किया है। 
    पाकिस्तान में इन दिनों यह चर्चा आम है कि देश की सेना पर्दे के पीछे रह कर इमरान खान और उनकी पार्टी को चुनाव में जीत दिलाने के लिए काम कर रही है। पाकिस्तान की सेना इससे पहले भी नवाज शरीफ को 1999 में सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा चुकी है। हालांकि सेना देश की राजनीतिक प्रक्रिया में दखल से लगातार इनकार कर रही है। उधर इमरान खान ने भी सेना के साथ किसी तरह के गठजोड़ से इनकार किया है। पुलिस के बयान में कहा गया है कि इमरान खान की पार्टी के 39 सदस्यों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है।
    पाकिस्तान के स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग ने चुनाव की वैधता पर चिंता जताई है। आयोग का कहना है, लोगों में यह धारणा बन रही है कि सभी पार्टियों को चुनाव अभियान चलाने के लिए बराबर आजादी नहीं दी जा रही है। प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता आईए रहमान का कहना है कि देश के लोकतांत्रिक शासन के साथ साथ समस्यापूर्ण रिश्तों में यह सबसे गंदा चुनाव है। मानवाधिकार आयोग ने अपने बयान में कई चेतावनियों की ओर इशारा किया है। इनमें एक यह आरोप भी है कि पीएमएल-एन के नेताओँ पर राजनीतिक निष्ठा बदलने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। कई उम्मीदवारों से तो पीछे हटने के लिए भी कहा गया है। 
    पिछले हफ्ते लाहौर में पीएमएल-एन की रैली से पहले पुलिस ने पार्टी के दसियों हजार कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया जो नवाज शरीफ का स्वागत करने जमा हुए थे। पीएमएल-एन के तीन स्थानीय नेताओं का कहना है कि पुलिस पार्टी के नेताओं को धमकियां दे रही है और उनके खिलाफ कार्रवाई कर रही है। खुफिया एजेंसियां और अर्धसैनिक बल पार्टी से जुड़े लोगों को रोक रहे हैं। रविवार को पाकिस्तान में प्रशासन ने नवाज शरीफ के खिलाफ एक आतंकवाद निरोधी कानून के तहत भी मामला दर्ज किया। उन पर 13 जुलाई को प्रतिबंधों की अनदेखी कर मार्च करने का आरोप लगाया गया है। 
    नवाज शरीफ को वतन वापस लौटने के तुरंत बाद गिरफ्तार कर लिया गया था। सोमवार को उन्होंने अपनी और अपनी बेटी-दामाद को मिली सजा के खिलाफ अपील की। अगर उनकी अपील स्वीकार हो जाती है तो उन्हें रिहा किया जा सकता है।
     हालांकि इसके आसार कम ही दिखते हैं। इस बीच देश में चुनाव के पूर्व हिंसा ने जोर पकड़ लिया है। इस सप्ताहांत चुनावी रैलियों पर हुए हमलों में 153 लोगों की जान गई। इन लोगों में एक प्रांतीय एसेंबली का उम्मीदवार भी शामिल था। रविवार की रात सेक्यूलर अवामी नेशनल पार्टी के दफ्तर पर भी गोलीबारी हुई जिसमें पूर्व सीनेटर दाउद अचकजई घायल हो गए। अब तक चुनाव से जुड़ी हिंसा में 170 लोग जान गंवा चुके हैं।
    मानवाधिकार आयोग ने अपने बयान में साढ़े तीन लाख सुरक्षकर्मियों को मतदान के दिन चुनाव केंद्रों के भीतर बाहर तैनात करने के फैसले पर भी सवाल उठाया है। रहमान ने चिंता जताई है कि इतनी बड़ी संख्या में मौजूद सुरक्षाकर्मी मतदाताओं को डरा धमका सकते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सुरक्षाकर्मियों को चुनाव से पहले प्रचार अभियान में जुटे नेताओं की सुरक्षा में लगाया जाना चाहिए। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 18-Jul-2018
  • डॉ. राजू पाण्डेय
    सुप्रीम कोर्ट ने आज देश भर में हो रही मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर सख्त रुख अख्तियार करते हुए कहा कि कानून व्यवस्था, समाज की बहुलवादी संरचना और विधि के शासन को बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने यह भी कहा कि नागरिक कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते हैं, वे स्वयं में कानून नहीं बन सकते। भय तथा अराजकता की परिस्थिति में सरकार को सकारात्मक कदम उठाना होता है। हिंसा की अनुमति किसी को भी नहीं दी जा सकती। 
    भीड़तंत्र की भयावह गतिविधियों को नई परिपाटी नहीं बनने दिया जा सकता, इनसे कठोरता से निपटने की जरूरत है। न्यायालय ने भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए निवारक, उपचारात्मक और दंडात्मक कदमों सहित कई दिशानिर्देश भी जारी किए और स्पष्ट किया कि लोकतंत्र को भीड़ तंत्र में बदलने नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने संसद से इस अपराध से निपटने के लिए कानून बनाने की अनुशंसा की है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र तथा राज्य सरकारों से कहा कि वे न्यायालय के निर्देशानुसार ऐसे अपराधों से निपटने के लिए कदम उठाएं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तुषार गांधी और तहसीन पूनावाला की जनहित याचिका पर सुनवाई की अगली तिथि 28 अगस्त तय की गई है। 
    मॉब लिंचिंग की घटनाएं पहले भी होती रही हैं किंतु तब ये किसी अव्यवस्था, अन्याय और अत्याचार के प्रति संचित जनाक्रोश की, किसी घटना-दुर्घटना के फलस्वरूप, अचानक विस्फोटक रूप से होने वाली अभिव्यक्ति के रूप में दिखती थीं। तब भी भीड़ की हिंसा के शिकार दोषी या निर्दोष जन हुआ करते थे। तब भी यह बर्बर और निंदनीय थी। उदाहरण स्वरूप- किसी ट्रक दुर्घटना में बालक की मृत्यु होने पर ट्रक को आग लगा देना और ड्राइवर को पीट पीट कर मार डालना- जैसी घटना को लिया जा सकता है। प्राय: यह देखा जाता था कि ऐसी घटनाओं वाले क्षेत्रों में अंधाधुंध औद्योगीकरण के कारण यातायात व्यवस्था पहले से अस्तव्यस्त रहती थी। 
    प्रशासन और सम्बंधित उद्योग से बारम्बार फरियाद के बावजूद भी इनके द्वारा कोई कदम न उठाए जाने के कारण पहले भी ऐसी दुर्घटनाएं घट चुकी होती थीं। मासूम बच्चे की मृत्यु संचित आक्रोश की अभिव्यक्ति के लिए एक कारण प्रदान कर देती थी। ऐसा ही तब होता था जब प्रशासन और कानून को ठेंगा दिखाने वाले किसी दुर्दांत अपराधी को उसके किसी जघन्य अपराध के बाद पीट पीट कर मार डाला जाता था। इन घटनाओं में भीड़ का मनोविज्ञान समझा जा सकता था और इसीलिए इनका पूर्वानुमान लगाना और हिंसा प्रारंभ हो जाने पर उसे नियंत्रित करना सरल होता था। इनकी पुनरावृत्ति की संभावना नहीं होती थी और इनके दोषियों को चिन्हित और दण्डित करना अपेक्षाकृत सरल होता था।
    किंतु आज की मॉब लिंचिंग साम्प्रदायिक और जातीय हिंसा का एक परिष्कृत औजार है। इसमें से आकस्मिकता का तत्व नदारद है। यह सुनियोजित है। यहां हिंसा के कारण को समझना आसान नहीं है। हिंसा का कारण यहां प्रत्यक्ष नहीं है। एक समुदाय या जाति के बहुत से व्यक्ति यहां सोशल मीडिया और अन्य साधनों द्वारा की जाने वाली कंडीशनिंग के कारण किसी दूसरी जाति या समुदाय के व्यक्ति को शत्रु समझने लगते हैं। भौतिक रूप से यह जाति और समुदाय वर्षों पुराने आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक सम्बन्धों में बंधे दिखते हैं किंतु मानसिक रूप से इनके मध्य संदेह और घृणा की दीवारें खड़ी हो चुकी होती हैं। फिर सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली किसी अफवाह के माध्यम से इस सम्मोहित भीड़ को काल्पनिक शत्रु पर हमला करने का संकेत दिया जाता है। 
    हमने अभी तक मिसाइलों द्वारा रिमोट कंट्रोल के जरिए हजारों मील दूर से दिए गए निर्देश पर लक्ष्यों को तबाह होते देखा था लेकिन किसी अज्ञात स्थान से सोशल मीडिया के जरिए एक पूरी भीड़ को हथियार में तब्दील कर देने का भयानक दृश्य आज की मॉब लिंचिंग में दिखाई देता है। युद्ध रणनीति में आए बदलावों को गोरिल्ला युद्ध की अराजक क्रूरता में देखा जाता है- हो सकता है भीड़ द्वारा हिंसा युद्ध रणनीति का नवीनतम हथियार बन जाए। सुप्रीम कोर्ट जब संसद को इस संबंध में कानून बनाने के लिए निर्देशित कर रहा था तब भी एक ऐसी घटना घट रही थी जो यह बताने के लिए पर्याप्त थी यह समस्या कानून बनाने से हल होने वाली नहीं है क्योंकि हिंसक भीड़ को यह प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि आधुनिक कानून पंगु है, अपर्याप्त है और भीड़ को स्वयं कबीलाई न्याय करना होगा; आधुनिक कानून की उदारता उसे भीड़ की हिंसा के अपराध के लिए नाममात्र के दण्ड का प्रावधान करने हेतु विवश कर देगी। 
    आज ही झारखंड के पाकुर जिले में स्वामी अग्निवेश पर दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा सांघातिक हमला किया गया। यह मानो सर्वोच्च न्यायालय को दक्षिणपंथी शक्तियों द्वारा दिया गया उत्तर था कि वे उसके कठोर रुख से जरा भी चिंतित या भयभीत नहीं हैं। वे उस न्याय सिद्धांत को जानते हैं जिसके अनुसार भले ही सौ दोषियों को छोडऩा पड़े किन्तु एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। वे न्याय प्रणाली में साक्ष्य के महत्व को भी समझते हैं और यह भी जानते हैं कि यदि प्रशासन का रुख उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण न होकर तटस्थता प्रधान ही रहा तब भी उनके विरुद्ध आवश्यक साक्ष्य एकत्रित करना एक दुष्कर कार्य होगा। 
    झारखंड वही राज्य है जहां के एक उच्च उपाधिधारी केंद्रीय मंत्री ने मॉब लिंचिंग के दोषियों को सम्मानित कर उनका मुंह मीठा कराया था और न्यायपालिका में अपनी आस्था व्यक्त की थी। निश्चित ही उन्होंने हिंसा के महिमामंडन का जो संदेश अपने कार्यकर्ताओं को देने की कोशिश की थी उसे उन्होंने भली भांति ग्रहण किया है। 
    स्वामी अग्निवेश की विचारधारा के प्रति दक्षिणपंथियों के असन्तोष से झारखंड सरकार अवश्य अवगत थी। अंतत: वे सत्ताधारी दल और उसके आनुषंगिक संगठनों के सदस्यगण ही थे जिनके विरोध के हिंसक रूप ले लेने की आशंका थी। किंतु स्वामी अग्निवेश की सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध नहीं किए गए और इस घटना को होने दिया गया। अब जांच का अंतहीन सिलसिला प्रारंभ होगा। यदि यह लापरवाही है तो इसे आपराधिक लापरवाही की संज्ञा ही दी जा सकती है अन्यथा घटना का स्वरूप तो षड्यंत्र का भी संकेत करता है। किंतु सरकार और प्रशासन तंत्र पर कार्रवाई कौन करेगा?
    जब जयंत सिन्हा और गिरिराज सिंह जैसे सरकार के महत्वपूर्ण मंत्री मॉब लिंचिंग के आरोपियों-दोषियों के समर्थन में खड़े नजर आते हैं और इनके इस समर्थन को उनकी व्यक्तिगत राय बताकर सरकार इससे पल्ला झाड़ लेती है बल्कि इसे आंतरिक लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उदाहरण के रूप में भी पेश किया जाता है तब यह समझना बहुत कठिन नहीं होता कि यह सब एक रणनीति का भाग है। कुछ लोग हिंसा का समर्थन करेंगे और कुछ विरोध लेकिन हिंसा जारी रहेगी। यहां भीड़ की हिंसा के समर्थक यह भूल जाते हैं कि जब वे गो हत्या के विरोधियों की हिंसा को न्यायोचित ठहराते हैं तब वे कश्मीर के पत्थरबाजों के समर्थकों में नई ऊर्जा भर देते हैं। वे अपनी सार्वजनिक अदालतों में सजा ए मौत देने वाले नक्सलियों की निंदा का अधिकार भी गंवा बैठते हैं। हिंसा के यह समर्थक परमाणु विखंडन की भांति हिंसा के विस्फोट की उस श्रृंखला प्रतिक्रिया(चेन रिएक्शन) को प्रारंभ कर चुके हैं जिसे रोकना असंभव है।
    आज जब सुप्रीम कोर्ट मॉब लिंचिंग के दोषियों के लिए सख़्त कानून और सजा का प्रावधान करने की बात कह रहा है तो यह आशंका होती है कि कहीं यह किसी विनाशक युद्ध के बाद मिसाइलों को सजा देने जैसी हास्यास्पद चेष्टा में न बदल जाए क्योंकि ब्रेन वाश की जा चुकी हिंसक भीड़ तो एक हथियार मात्र है। इस भीड़ को गढऩे वाले नेताओं, सोशल मीडिया विशेषज्ञों और राजनीतिक आस्था से संचालित नौकरशाहों पर जब तक शिकंजा न कसा जाएगा तब तक भीड़ की हिंसा पर अंकुश लगाना असंभव बना रहेगा। 
    हिंसा को राज्याश्रय प्रदान कर पुरस्कृत और प्रशंसित करने की प्रवृत्ति पर रोक आवश्यक है। भीड़ की हिंसा को उकसाकर इसके बाद हिंसक और हिंसा पीडि़त समुदाय की संवेदनाओं से खिलवाड़ कर अपनी राजनीतिक स्वार्थसिद्धि करने वाले राजनीतिक दलों को भी दण्डित किया जाना चाहिए।
    मॉब लिंचिंग देश और समाज को विघटित करने का सबसे आधुनिक और परिष्कृत जरिया है। भीड़ में दोषियों की पहचान और उन्हें दण्डित करना हमेशा से कठिन रहा है। किसी देश और समाज के हजारों लोगों को दंडित करना न प्रायोगिक है न उचित। हिंसक भीड़ को गढऩे वाले आरोपियों के लिए यह अत्यंत सुविधाजनक स्थिति है। अज्ञात स्थानों से अज्ञात लोगों द्वारा संचालित सोशल मीडिया एकाउंट्स के माध्यम से बिना खर्च के हिंसक भीड़ को तैयार कर उसे अपने लक्ष्य की ओर निर्देशित करना आमने सामने के युद्ध से कहीं सरल और सस्ता है। साइबर कानूनों का निर्माण और क्रियान्वयन होते होते जितना विध्वंस होना है वह हो चुका होगा।
    जिस तेजी और ताकत से हिंसा को महिमामंडित किया जा रहा है वह दिन दूर नहीं जब -सर्वाधिक रचनात्मक ढंग से हिंसा करती भीड़ के साथ एक सेल्फ़ी- जैसी प्रतियोगिताएं सोशल मीडिया पर आयोजित होने लगेंगी।

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Posted Date : 17-Jul-2018
  • - प्रकाश दुबे
    अपने हुए पराये 
     महबूबा मुफ्ती के दिल्ली दौरे क्योंं? टोह में जुटे लोग बेचैन हैं। दिल्ली पहुंचकर गैर भाजपा दलों से बातचीत करती हैं। महबूबा-उमर अब्दुल्ला और कांग्रेस के बीच बातचीत के दावे किए जाने लगे। केन्द्र सरकार चौंकी। भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री की पार्टी और मनोबल तोडऩे क ी फिराक में हैं। महबूबा को 15 दिन के अंदर दिल्ली में अकबर रोड वाली विशाल कोठी खाली करने का फरमान जारी किया। हैरान महबूबा ने सामान उठाया। अपने फ्लैट में चली गईं। उमर अब्दुल्ला ने 15 बरस पहले दिल्ली की कोठी खाली की थी लेकिन नाता तोडऩे वाली पत्नी उमर की पत्नी डटी रहीं। केन्द्र सरकार कोठी खाली नहीं करा सकी। अदालत का सहारा लेना पड़ा। मुफ्ती पर मेहरबानी नहीं की।                  
    बेटों की तिकड़ी 
     खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे। मुख्यमंत्री न बन सके येदियुरप्पा ने कुमारस्वामी को पूर्व मुख्यमंत्री धर्म सिंह की मौत का जिम्मेदार बताया। वर्ष 2004-5 में जनता एस ने धरम सरकार से समर्थन वापस लिया। मुख्यमंत्री पद से हटे धर्म सिंह ने प्राण त्याग दिए। कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी धर्मसिंह से संबंधों की दुहाई देने लगे। येदियुरप्पा के आरोप से विधानसभा गरमाई। कुमार के  बचाव में कांग्रेस के दो विधायक उठे। धर्मसिंह का बेटा अजय और लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता मल्लिकार्जुन खरगे का बेटा प्रियंक। दोनों ने आरोप को झूठा बताया। अजय ने बताया कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद धर्मसिंह लम्बे समय तक सक्रिय रहे। जीवित रहे। येदि चुप रहे।         
     जन्मदिन जेल में  
    शुरुआत हुई कोरेगांव की हिंसा और नक्सल निकटता के आरोप से। प्रधानमंत्री की सुरक्षा से तार जुड़ा। पुलिस को कुछ कर दिखाने का ऐसा अवसर कम मिलता है। सो, वकील सुरेन्द्र गडलिंग और अंगरेजी की प्रोफेसर शोमा सेन पुणे की यरवदा जेल में हैं। फिरंगी राज में महात्मा गांधी और कुछ वर्ष पहले संजय दत्त ने यरवदा में दिन काटे। संजू ने जन्मदिन मनाया था। गडलिंग का जन्मदिन 30 जुलाई और शोमा सेन का एक अगस्त को है। दोनों की फिलहाल बाहर आने की संभावना नहीं है। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के बयान से रहा सहा शक दूर हुआ। अभियुक्तों के शुभचिंतकों ने जन्मदिन के शुभकामना,बधाई संदेश और पत्र भेजने के लिए जेल का पता प्रसारित किया है।     
    बाबा रे बाबा 
     चुनाव निकट आए तो सरकारें साधु-संतों के आशीर्वा$द और वोट की तरकीब भिड़ाने लगीं। शिवराज ने भगवाधारियों को लालबत्ती का सुख देकर प्रसाद पाने की कोशिश की। एक साधु जी ने आत्महत्या कर ली। राजस्थान में वसुंधरा राजे ने आदेश जारी किया कि महीने के तीसरे शनिवार को हर पाठशाला में साधु-संत प्रवचन करेंगे। अंधा चाहे दो आंखें। प्रवचनकार चाहें श्रोता। भगवान से यह भेदभाव नहीं देखा गया। जगह-जगह फर्जी साधु पकड़े जाने लगे। महारानी वसुंधरा सपने में नहीं सोचती थीं कि दांव उल्टा पड़ेगा। राज्य में स्कृल खुले और हर पाठशाला को गश्तीपत्र जारी किया गया ताकि भूलकर किसी संत को न बुला लें। सरकार ने इस योजना को रद्द कर दिया है।      
    (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

     

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Posted Date : 17-Jul-2018
  • जेके कर
    दवा बाजार में केवल मरीज ही बेबस नहीं होता है बल्कि सरकार भी बेबस होकर खड़ी है। मरीज इसलिए बेबस है क्योंकि उसके पास बाजार में उपलब्ध दवा को ही खरीदने के अलावा और कोई चारा नहीं है। वहीं, सरकार इसलिए बेबस खड़ी है क्योंकि इन्होंने भारतीय दवा बाजार में हस्तक्षेप करने लायक अपने आप को नहीं बनाया है या हस्तक्षेप नहीं करना चाहती है। फलत: बाजार में मिलने वाले जीवनरक्षक तथा आवश्यक दवाओं के मूल्य इतने हैं कि उन्हें खरीदते वक्त मरीज के रिश्तेदार के भी बीमार पड़ जाने की संभावना होती है।
     सरकार को इसलिए बेबस कहा गया है क्योंकि उसके द्वारा दवाओं के मूल्य नियंत्रण के नाम जो कुछ किया जा रहा है वह दरअसल, बाजार पर ही आधारित है। इसके लिए अकेले वर्तमान एनडीए सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। पूर्ववर्ती यूपीए की दोनों सरकारें, एनडीए की सरकार, कांग्रेस की सरकार सभी ने भारतीय दवा बाजार में नेतृत्वकारी भूमिका का निबाह करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के दवा कंपनियों को बीमार कर दिया तथा इसमें देशी-विदेशी दवा कंपनियों को पैठ मजबूत करने के नीतिगत समर्थन दिया। भारत के दवा बाजार में निजी कंपनियों को बढ़ावा देने की तुलना उस उंट से की जा सकती है जिसने एक बार टेंट में गर्दन घुसाने का मौका देने के बाद अरब को ही टेंट के बाहर कर देता है।
    भारत में दवाओं के दाम कम करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों को पुनर्जीवित किये जाने की जरूरत है। इसी के साथ पेटेंट या एकाधिकार के खिलाफ भी भारतीय पेटेंट कानून की धाराओं के लचीलेपन का फायदा उठाकर जीवनरक्षक, आवश्यक तथा अन्य दवाओं के दाम कम किए जा सकते हैं। अब तक जनता को जेनेरिक बनाम ब्रांडेड दवाओं के बहस में उलझाकर रखा गया है लेकिन उन्हें महंगी दवाएं ही खरीदनी पड़ रही है। 
    दरअसल, सवाल दवाओं के जेनेरिक या ब्रांडेड होने का नहीं उनके उच्च गुणवत्ता तथा कम दाम का है। इसलिए इस बहस के जाल से निकलकर देश के नीति निर्माताओं को दवा के दाम सस्ते करने के लिए कठोर कदम उठाने की जरूरत है। 
    नेहरू-इंदिरायुगीन सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों के मृतप्राय हो जाने के कारण भारतीय दवा बाजार में देशी तथा विदेशी दवा कंपनियों की बन आई है। यहां पर हम समाजवाद की नहीं उन्मुक्त पूंजीवाद पर लगाम लगाने वाले राजकीय पूंजीवाद की वकालत कर रहे हैं। बेशक, यह आर्थिक रूप से समाजवाद के काफी करीब है परंतु इसके लिए मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेंगी।  
    साल 2016-17 में भारत का दवा बाजार करीब 2.19 लाख करोड़ रूपयों का था जिसमें से 1.07 लाख करोड़ रूपयों की दवा विदेशों को निर्यात की गई थी अर्थात भारत की जनता ने करीब 1.12 लाख करोड़ रूपयों की दवा खरीदी थी। जबकि देश की सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों आईडीपीएल, एचएएल, बीसीपीएल, आरडीपीएल तथा केएपीएल ने मिलकर मात्र 550 करोड़ रूपयों के दवा का उत्पादन किया। याने सरकारी कंपनियां देश की जरूरत का मात्र 0.5 फीसदी ही उत्पादन कर पाई हैं। 
    जाहिर है कि इस स्थिति में भारतीय जनता का स्वास्थ्य दवाओं के लिए निजी दवा कंपनियों पर 99.5 फीसदी निर्भर है। इसके अलावा यदि सरकारी दवा कंपनियों के कर्मचारियों की संख्या देखी जाए तो तथा इन सब में कुलमिलाकर 2 हजार 248 कर्मचारी काम करते हैं जबकि निजी दवा कंपनियों के केवल मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स की संख्या ही 2 लाख के करीब की है। इस तरह सरकार के पास दवा बाजार में हस्तक्षेप करने लायक साधन न होने के कारण विदेशी तथा देशी दवा कंपनियों की बन आई तथा उन्होंने इसका पूरा व्यवसायिक लाभ उठाया।
     हम सरकार के पास दवा बाजार में हस्तक्षेप की वकालत इसलिए कर रहे हैं क्योंकि ऐसा होने पर जनता के हित में नीतियों को अमलीजामा पहनाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर बीएसएनएल को ही लीजिए। याद कीजिये कि पहले पहल मोबाईल फोन में इनकमिंग कॉल पर भी पैसा लगता था। तब सबसे पहले बीएसएनएल ने ही इनकमिंग कॉल मुफ्त में प्रदान करना शुरू कर दिया था। जिससे बाजार की प्रतियोगिता में टिके रहने के लिए सभी निजी मोबाईल कंपनियों ने भी इनकमिंग कॉल को मुफ्त किया। इसके बाद बीएसएनएल ने ही सबसे पहले रोमिंग को मुफ्त किया था। उपरोक्त से आसानी से समझा जा सकता है कि सरकार के पास बाजार में हस्तक्षेप करने लायक साधन होना चाहिए। आज यदि देश की सरकारी कंपनियां याने की सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों की भारतीय दवा बाजार में धमक होती तो सरकार आसानी से जीवनरक्षक तथा आवश्यक दवाओं के दाम को कम करवा सकती थी।
    लेकिन इसके उलट 28 दिसंबर 2016 को हुए केन्द्रीय कबीना की बैठक ने सरकारी दवा कंपनियों की जमीनों को बेचकर देनदारियां चुकता करने तथा मौजूदा कर्मचारियों को रुखसत करने के लिये व्हीआरएस देने का निर्णय लिया है। सभी देनदारियों को चुकता करने के बाद तथा कर्मचारियों को व्हीआरएस के माध्यम से हटाने के बाद इन सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां को रणनीतिक बिक्री  के लिए  तैयार किया जाएगा। इसके बाद 1 नवंबर 2017 को हुई कैबिनेट कमिटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स ने मुनाफा कमाने वाली कर्नाटक एंटीबॉयोटिक एंड फॉर्मास्युटिकल्स को शत-प्रतिशत विनेश करने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दी है। जाहिर है कि वर्तमान एनडीए सरकार भी पूर्ववर्ती यूपीए तथा कांग्रेसी सरकारों के एजेंडे पर ही तेजी से चल रही है।
    एक समय था जब सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां बल्क ड्रग बनाती थी लेकिन आज देश का दवा बाजार बल्क ड्रग के लिए 75 फीसदी से लेकर 85 फीसदी तक पड़ोसी देश चीन पर निर्भर है। यदि किसी दिन चीनी सरकार ने भारत से व्यापार करने पर प्रतिबंध लगा दिया तो देश में त्राहि मच सकती है। सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों ने सरकारी कार्यक्रमों जैसे परिवार नियोजन की दवा, जीवनरक्षक घोल, मलेरिया की दवा की अबाध सप्लाई की थी।
     सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों ने बीमार होने के बावजूद भी साल 1994 में गुजरात में फैले प्लेग के समय, मुंबई में वर्षा के समय हुये लेप्टोस्पायरोसिस के समय तथा साल 1993 में लातूर में भूकंप के समय जीवनरक्षक दवाओं की लगातार सप्लाई करके देश को संकट से बचाया था। 
     सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों ने सरकारी कार्यक्रमों जैसे परिवार नियोजन की दवा, जीवनरक्षक घोल, मलेरिया की दवा की अबाध सप्लाई की थी। सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों ने बीमार होने के बावजूद भी साल 1994 में गुजरात में फैले प्लेग के समय, मुंबई में वर्षा के समय हुये लेप्टोस्पायरोसिस के समय तथा साल 1993 में लातूर में भूकंप के समय जीवनरक्षक दवाओं की लगातार सप्लाई करके देश को संकट से बचाया था। 1980 के दशक में तो सेना को इन्हीं सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां ही दवाओं की सप्लाई करती थी। यूपीए सरकार द्वारा शुरू किये गये जो जनऔषधालय चल रहे हैं उऩके लिये भी दवा की खरीदी निजी दवा कंपनियों से ही करनी पड़ती है। जब जनऔषधालय की शुरूआत की गई थी तो कहा गया था कि इसके लिये सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों से दवा की सप्लाई की जायेगी।
    इसके अलावा विदेशी दवा कंपनियां भी भारत के मरीजों को लूटती रही है। यह मुद्दा साल 2006 में गर्माया था। विदेशी दवा कंपनी नोवार्टिस रक्त कैंसर की अफनी पेटेंटेड दवा ग्लीवेक के एक माह की खुराक को 1 लाख 20 हजार रुपयों में मुहैय्या कराती थी। लेकिन भारतीय पेटेंट ऑफिस ने भारतीय पेटेंट कानून 1995 की धाराओं के आधार पर नोवार्टिस का एकाधिकार खत्म कर दिया। जिसके बाद भारतीय दवा कंपनी नेटको ने इसी दवा के एक माह की खुराक 9 हजार रुपयों में उपलब्ध करा दी। इसी तरह से जर्मन दवा कंपनी बायर ने साल 2006 में किडनी तथा लीवर कैंसर में लगने वाली दवा नैक्सावर के पेटेंट अधिकार के लिये आवेदन किया तथा साल 2007 में बायर को इसकी अनुमति भी दे दी गई थी। लेकिन पाया गया कि बायर इस दवा का कम मात्रा में आयात कर रही है तथा भारतीय कैंसर के मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। तब भारतीय पेटेंट कानून की धारा अनिवार्य लाइसेंसिंग के तहत सरकार ने 2012 में भारतीय दवा कंपनी नेटको को यह दवा बनाने की अनुमति दे दी। नेटको ने इसे भारतीय मरीजों के लिये 8880 रुपयों में उपलब्ध करा दिया जबकि बायर इसे लाख रुपये से उपर के दाम पर बेचती थी। इऩ दोनों मौके पर सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों के अक्षम होने के कारण आदेश एक निजी कंपनी को देना पड़ा था।
    क्या हमारें देश की सरकार सीमाओं की रक्षा का भार भारतीय सेना से लेकर किसी दूसरे निजी देशी या विदेशी की एजेंसी को दे सकती है? नहीं ना, इसी तरह से देश के जनता को लगने वाले जीवनरक्षक तथा आवश्यक दवाओं को उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी कैसे देशी-विदेशी दवा कंपनियों के भरोसे छोड़ा जा सकता है। जबकि दिन पर दिन नये-नये रोग बढ़ रहें है तथा नई-नई दवायें बाजार में आ रही हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों में मानव शरीर में प्रतिरोपित किये जाने वाले कार्डिक स्टेंट से लेकर ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट तक के सामान बनाये जा सकते हैं। एक समय था जब आईडीपीएल की ईकाई मेडिकल के उपकरण भी बनाया करती थी। वक्त रहते यदि उन्हें उन्नत किया जाता तो आज देश इस मामले में भी आत्मनिर्भर होता। आज की तारीख में मेडिकल इम्प्लांट में लगने वाले 65 फीसदी सामान विदेशों से ऊंचे दरों पर आयात करने पड़ते हैं।
    कुल मिलाकर, केवल सरकार एक बार निर्णय ले ले कि देश के जनता के कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता की दवा तथा अन्य साजो-सामान वह मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी वह खुद लेगी तो वाकई में अच्छे दिन आ गये हैं, ऐसा कहा जा सकता है।

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Posted Date : 16-Jul-2018
  • शिवम् विज 
    रेहम खान अपनी पुस्तक में 70 के दशक में एक बॉलीवुड सुपरस्टार के साथ अपने पूर्व पति इमरान खान के कथित सम्बन्धों का वर्णन करती हैं।
    ब्रिटिश-पाकिस्तानी पत्रकार रेहम खान की आत्मकथा रेहम खान ऐमेजान किंडल पर उपलब्ध है। पुस्तक में अपने पूर्व पति और पाकिस्तानी राजनेता इमरान खान के बारे में किए गए विवादास्पद दावों ने पाकिस्तान में आम चुनावों से पहले ही तूफान खड़ा कर दिया है।
    पुस्तक में भारत से जुड़ी चेजों में एक ऐसा खंड है जो 70 के दशक में एक बॉलीवुड सुपरस्टार के साथ इस पूर्व क्रिकेटर के प्रेम-प्रसंगों के बारे में बात करता है।
    रेहम लिखती हैं, इमरान उन सभी कहानियों की पुष्टि करने के लिए काफी उत्साहित थे जिनको मैं सिर्फ अफवाह मानती थी। इन कहानियों में से सबसे प्रसिद्ध कहानी 70 के दशक की एक बॉलीवुड सुपरस्टार के बारे में है।
    रेहम लिखती हैं कि अब तक सबसे सेक्सी मानी जाने वाली हिरोइनों में से एक के साथ इमरान के सम्बन्धों की अफवाहें थीं। जब हम लोग बड़े हो रहे थे तब हमने इनके बारे में सुना था। इमरान ने मुझसे इस बात की पुष्टि की कि वे अफवाहें नहीं बल्कि सच्चाई थी। हालांकि इमरान अदाकाराओं के साथ यौन संबंध बनाकर खुश थे, इमरान और उनका परिवार उन अदाकाराओं के बारे में निम्न स्तर की राय रखते थे। उन्होंने मुस्कुराहट के साथ याद करते हुए बताया कि अभिनेत्री के बारे में पूछते हुए, समाचार पत्रों द्वारा उनकी माँ को कैसे फोन किया गया था। उन्होंने जवाब दिया था कि मेरा बेटा कभी भी एक *** से शादी नहीं करेगा! और फोन पटक दिया था।
    रेहम का दावा है, इमरान ने उन्हें बताया कि उन्होंने उस रिश्ते को खत्म कर दिया था लेकिन वह बॉलीवुड सुपरस्टार रिश्ता खत्म नहीं कर सकी थी। लेकिन जब रेहम ने इसके बारे में दूसरों से पूछा तो कहानी इसके विपरीत निकली: इमरान ही इस रिश्ते को खत्म नहीं कर सके थे।
    रेहम लिखती हैं कि इमरान की कहानियाँ महिलाओं को हमेशा कम आँकती थीं। उन्होंने मुझे बताया कि कैसे वह बॉम्बे में उससे मिले, अपनी इच्छाएं पूरी कीं, और चल दिये। लेकिन इमरान के अनुसार, उस अभिनेत्री ने लंदन तक उनका पीछा किया और उनके पीछे पड़ गई। इसके कुछ महीनों बाद मैंने उस अभिनेत्री के एक फिल्म निर्माता दोस्त से इन दोनों कहानियों के बारे में जानकारी प्राप्त की जिन्होंने मुझे बताया कि असल में इमरान ने ही उसका पीछा किया था और वह उन पर पैसे खर्च करती थी। सत्तर के दशक की इस मदमस्त अदाकारा ने हमारे आपसी मित्र के साथ की गई बातचीत को फिल्मी अंदाज में नाम बड़े और दर्शन छोटे कहकर ताना मारा।
    क्या इमरान के भारतीय बच्चे हैं?
    रेहम इस बात का कड़ाई से दावा करती हैं कि इमरान के एक या दो भारतीय बच्चे हैं। वर्ष 2015 में अपनी शादी के जल्द बाद एक दिन वे टीरियन व्हाइट के बारे में बात कर रहे थे जो कि इमरान की उत्तराधिकारी पत्नी सीता व्हाइट की बेटी हैं। टीरियन को बाद में इमरान की पहली पत्नी ब्रिटिश उत्तराधिकारी जेमिमा खान के द्वारा गोद ले लिया गया था।
    रेहम दावा करती हैं कि टीरियन के बारे में बात करते हुए इमरान ने कहा कि जानती हो वह मेरी एकलौती संतान नहीं है। मेरे पाँच बच्चे हैं जिन्हें मैं जानता हूँ।
    रेहम ने पूछा कि क्या? तुम्हारी पाँच नाजायज औलादें हैं! तुम्हें कैसे पता?
    इमरान ने जवाब दिया कि उनकी माताओं ने मुझे बताया।
    सभी (सीता) व्हाइट से हैं?
    नहीं, कुछ भारतीय हैं। सबसे बड़ी संतान अब 34 वर्ष की है।
    कैसे इमरान? उसकी माँ ने कभी इसे सामने क्यों नहीं लाया?
    क्योंकि वह बहुत ज्यादा खुश थी! उनकी शादी हुए काफी समय बीत चुका था और वह गर्भवती न हो पाई थीं। वह बहुत ज्यादा उल्लास में थीं, इस बात को गुप्त रखने का वादा किया, और निवेदन किया कि मैं भी इसे राज रखूँ। तो मैंने कहा ठीक है।
    रेहम ने उन पर गुस्सा करते हुए पूछा कि और बाकी? वे इसके बारे में कभी बात क्यों नहीं करतीं?
    इमरान ने कहा कि क्योंकि वे सभी शादी शुदा थीं और वे अपनी शादी को बर्बाद करना नहीं चाहती थीं।
    क्या कोई और भी यह जानता है?
    केवल जेमिमा ही जानती है। मैंने उन्हें बताया था।
    संयोग से, इमरान खान ने अपने चुनावी हलफनामे में केवल दो बच्चों की ही घोषणा की है। उन्होंने टायरिन व्हाइट को अपने बच्चे के रूप में घोषित नहीं किया है जोकि चुनावी हलफनामे में झूठ बोलने का मामला हो सकता है और यह इस चुनाव में उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में आ सकता है। इस सबसे ऊपर रेहम खान का आरोप, कि उनकी पॉँच और नाजायज औलादें हैं, जिनमें से कुछ भारत में हैं, शायद इमरान के लिए कठिनाई खड़ी कर सकता है।
    रेहम ने इमरान से कहा, नरेंद्र मोदी से सीखें
    रेहम अपने पूर्व पति की प्रधानमंत्री बनने की तीव्र कामना के बारे में लिखती हैं। वह अक्सर प्रधानमंत्री के रूप मे अपने भविष्य पर चर्चा करते। अपने धरने के दौरान जब उन्हें एक नयी आशा होती, तब वह खड़े होकर एक विजय भाषण देने का दृश्य चित्रित करते। बेबी, तुम वहां नीचे बैठकर मुझे देखकर मुस्कुराओगी, तुम्हारा खूबसूरत चेहरा एक बल्ब की तरह चमक उठेगा। लेकिन रेहम को उनकी संभावनाओं पर संदेह था। उन्होंने महसूस किया कि उनको खुद को साबित करने की और चरण दर चरण कदम बढ़ाने की जरूरत है।
    वह लिखती हैं कि मुझे पता था कि ऐसा नहीं हो रहा था। जैसा कि हमने भविष्यवाणी की थी, यह सब खत्म हो गया था, लेकिन शादी के बाद कभी भी यह कह पाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैंने उनको आश्वासन दिया कि मेरे पास एक हरा रेशमी सूट तैयार रहेगा ज्मैं धीरे-धीरे और बार-बार भारत के प्रधानमंत्री मोदी देती, जो एक दशक से ज्यादा समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और फिर अन्य सभी नकारात्मकताओं के बावजूद अपने मजबूत शासन इतिहास के कारण शीर्ष पद के लिए चुने गए।
    रेहम ने महसूस किया कि इमरान को खैबर पख्तुनख्वा, जहां उनकी पार्टी सत्ता में है, में शासन के मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए था लेकिन इसके बजाय उन्होंने अगले चुनाव की प्रतीक्षा किए बिना, विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों के माध्यम से प्रधानमंत्री बनने की चाहत रखते हुए अधिकांश समय इस्लामाबाद में बिताया।
    रेहम लिखती हैं कि जब मैं उनसे जगह-जगह जाकर मुद्दों से रूबरू होने की बात करती, तो वह चिल्ला उठते थे कि क्या तुमको अंदाजा भी है कि मैं यह कब से कर रहा हूँ? मैं इस बकवास से बहुत तंग आ गया हूँ। कमबख्त 20 साल हो गए हैं! मैं यह और नहीं कर सकता! यह साफ था कि इमरान को लगा कि यह वह समय था जब उन्हें उनकी मेहनत का फल मिल जाना चाहिए था। मैं उन्हें समझाती कि लेकिन इमरान, नेल्सन मंडेला ने 27 साल जेल की एक सेल में बिताए। प्रधानमंत्री बनने से पहले 10 साल तक नरेंद्र मोदी एक मुख्यमंत्री थे। कट्टरपंथी विचारों के बावजूद भी उनके गुड गवर्नेंस के ट्रैक रिकार्ड के कारण लोगों ने उन्हें वोट दिया। केपी में खुद को साबित करो फिर केंद्र की ओर देखो।
    इमरान खान के ऊपर एक बॉलीवुड फिल्म?
    रेहम ने दावा किया कि एक ऐसा समय था जब उन्होंने इमरान खान के जीवन पर एक फिल्म बनाने की कोशिश की थी। वह लिखती हैं कि उन्होंने कुछ भारतीय प्रोड्यूसरों को आमंत्रित किया जिन्होंने इमरान पर फिल्म बनाने में रूचि दिखाई थी।
    रेहम लिखती हैं मैं एक फिल्म निर्माता से मिलना चाहती थी जो अपनी कहानियों में माता-पिता के रिश्तों को बहुत अच्छी तरह से चित्रित करने के लिए मशहूर थे। मैं उनसे मिली और उन्हें इमरान के जीवन के पहलुओं का एक विचार दिया, जिसे हम स्क्रीन पर देखना चाहते थे।
    वह इमरान के साथ बैठक में भाग नहीं लेती थीं। वह निर्माता का नाम जाहिर नहीं करती हैं और हम नहीं जानते कि उस विचार का क्या हुआ।
    जब इमरान ने रेहम को नहीं जाने दिया दिल्ली
    रेहम को दिल्ली में इंडिया 'टुडे कॉन्क्लेवÓ में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था लेकिन इमरान दिल्ली में सम्मेलन से पहले रेहम को मिल रही लोकप्रियता के बारे में परेशान थे। इमरान ने अपने सचिव अवन चौधरी के माध्यम से रेहम को अपनी आपत्ति से अवगत कराया।
    रेहम लिखती हैं कि कुछ दिनों बाद, अवन ने मुझे फोन करके इमरान का संदेश दिया कि मुझे भारत नहीं जाना चाहिए। मुझे सितंबर में इंडिया टुडे द्वारा महिला पत्रकारों के लिए आयोजित एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। स्पष्ट रूप से, दुबई के इमरान चौधरी ने इमरान (खान) को बताया था कि दिल्ली में मेरी यात्रा का प्रचार चल रहा था और यह यात्रा लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही थी।
    अवन ने मुझसे मेरे पति का लिहाज रखने के लिए कॉन्फ्रेंस में भाग न लेने के लिए कहा। यहाँ तक कि मेरे पति यह खुद मुझसे नहीं कह सके। मैं चिढ़ गयी लेकिन मैंने बात का बतंगड़ नहीं बनाया और इसे रद्द कर दिया। मैंने इमरान को यह कहते हुए एक रूखा संदेश भेजा कि भारत यात्रा आपके निर्देश के अनुसार रद्द कर दी गई है।
    इमरान ने रेहम को भारत के बारे में बोलने तक नहीं दिया
    रेहम का दावा है कि पाकिस्तान में अमरीकी राजदूत रिचर्ड ओल्सन राजनीति पर उनसे बात करना चाहते थे कि विशेषतौर पर भारत की, लेकिन इमरान इस पर खुश नहीं थे।
    रेहम लिखती हैं कि रिचर्ड ओल्सन इमरान के करीबी दोस्त और सहयोगी प्रतीत हुए और शायद तभी उस प्रारंभिक बैठक के बाद वह मेरे लिए सौम्य नहीं थे। इमरान ने मुझे उनके सामने कुछ भी न बोलने देने की बेतहाशा कोशिश की।
    अगर मुझे सिर्फ दिखावा करना होता तो शायद मैं यह कह सकती थी कि मेरे पति मुझे अपने महत्वपूर्ण सहयोगी के सामने मेरे वास्तविक विचारों को उजागर करने से रोकने की कोशिश मात्र कर रहे थे। शायद वे मुझे अपने जीवन में साथ रखना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तान के लिए मेरे सपने उस एजेंडे से असम्मत थे जिस पर उन्हें टिके रहने के लिए कहा गया था। हालांकि रिचर्ड ओल्सन मुझसे राजनीतिक मुद्दों पर, विशेष रूप से भारत के बारे में, जानकारी प्राप्त करने के लिए बहुत उत्सुक थे।
    मैं अपने पति की घबराहट को डिनर टेबल पर महसूस कर सकती थी क्योंकि रिचर्ड मेरे बगल मे बैठे थे। मैंने पीटीआई की विचारधारा के बारे में वही बोला जो में सोचती थी और मानती थी। (द वायर)

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Posted Date : 15-Jul-2018
  • पाकिस्तान में इन-दिनों चुनावी सरगर्मी जोरों पर है। पारंपरिक राजनीतिक दलों के अलावा कई कट्टरपंथी दल भी अपने उम्मीदवार उतार रहे हैं। एक पार्टी तो ऐसी भी है जो अमेरिका के वॉटेंड हाफिज सईद से चुनाव प्रचार करा रही है।
    मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले सईद पर अमेरिका ने 1 करोड़ डॉलर के ईनाम की घोषणा की हुई है। लेकिन वह पाकिस्तान की राजनीति में सक्रिय है। जानकार मानते हैं कि यह माहौल एक रुढि़वादी देश को कट्टरपंथ की ओर ढकेल सकता है।
    अमेरिका के विल्सन सेंटर में एशिया प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर माइकल कुग्लमैन कहते हैं, कट्टरपंथी समूहों का आम चुनावों में भाग लेना बहुत मायने रखता है। यह इन्हें न सिर्फ सत्ता में आने का मौका देता है बल्कि ये गुट अपनी राजनीतिक बढ़त का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा को जायज ठहराने के लिए कर सकते हैं।
    कैसे करते हैं काम
    पाकिस्तान का ऐसा ही एक राजनीतिक संगठन है मिली मुस्लिम लीग (एमएमएल)। अप्रैल, 2018 में अमेरिका ने एमएमएल को विदेशी आतंकवादी संगठनों की सूची में डाल दिया था। कहा गया था कि ये लश्कर ए तैयबा का साथी संगठन है जिसे बनाने में हाफिज सईद का भी हाथ है। हाफिज सईद पर 2008 में हुए मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड होने के आरोप लगते हैं। इसके अलावा उसे अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी करार दिया है।
    पहले पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने एमएमएल को 2018 के आम चुनावों के लिए रजिस्टर करने से मना कर दिया था। इसके बाद हाफिज सईद ने अपने साथियों को पहले से रजिस्टर पार्टी अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक पार्टी से टिकट दिलवाए।
    एक ही पार्टी
    कुग्लमैन मानते हैं कि ऐसे राजनीतिक संगठन आतंकवादी गुटों के कट्टरपंथी और उग्र विचारों को सामने लाते हैं। वह कहते हैं ऐसे विचारों के पाकिस्तान के माहौल में खपने की संभावना भी अधिक है। संसदीय चुनावों में पंजाब प्रांत की राजधानी लाहौर से खड़े उम्मीदवार मोहम्मद याकूब शेख खुले आम कहते हैं कि अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक और एमएमएल एक ही पार्टी है। अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक के 260 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। 
    हाल में दक्षिणी पंजाब के फैसलाबाद शहर में एक राजनीतिक मंच पर जब सईद ने कदम रखा तो उस पर फूलों की बारिश की गई। हाफिज सईद को दुनिया एक आतंकवादी के रूप में पहचानती है लेकिन जब उसके साथ समर्थकों की भीड़ नजर आए तो यह कुछ अजीब सा नजारा हो जाता है। सईद अपनी चुनावी रैली में भारत और अमेरिका के रुख को इस्लाम के लिए खतरा बताता है। उसने कहा, हिंदुओं, यहूदियों और ईसाइयों के खिलाफ हमारी जंग जारी रहेगी।
    सेना का रुख
    अधिकार समूह और सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि सेना इन कट्टरपंथियों गुटों का लाभ उठाकर पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सत्ता से दूर रखना चाहती है। देश के पिछले 71 साल के इतिहास में तकरीबन 31 साल सेना ने प्रत्यक्ष रूप से तो बाकी सालों में परोक्ष रूप से शासन किया है।
    अब इन चुनावों में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सेना से सीधे मुकाबला कर रहे हैं। शरीफ राजनीति में सेना के दखल की आलोचना कर रहे हैं। पाकिस्तान की एक अदालत ने भ्रष्टाचार और अवैध संपत्ति मामले में नवाज शरीफ को 10 साल की कैद और उनकी बेटी मरियम शरीफ को 7 साल की सजा सुनाई है। इसे पीएमएल-एन समर्थक राजनीतिक षड्यंत्र मानते हैं।  कुग्लमैन मानते हैं कि सेना कट्टरवादी गुटों का इस्तेमाल राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कर रही है, क्योंकि ये समूह पीएमएल-एन के समर्थकों को खिसका सकते हैं।
    आने वाली मुश्किल
    पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ पीस स्टडीज से जुड़े मोहम्मद आमिर राणा कहते हैं, कट्टरपंथी सुन्नी गुटों ने अपना नाम बदल लिया है लेकिन उनका एजेंडा पुराना है। राणा मानते हैं, चुनावी लाभ उन्हें मान्यता दे सकता है और वे अपना प्रभाव फैला सकते हैं।
    अल्लाह-ओ-अकबर पार्टी की तरह एक अन्य कट्टरपंथी समूह है तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान। जानकारों के मुताबिक अगर ये पार्टी चुनावों में थोड़ी-बहुत भी सीट जीत लेती है तो नीति-निर्माताओं के लिए विवादित ईशनिंदा कानून को खत्म करना आसान नहीं होगा। (डॉयचे वैले)
        

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Posted Date : 15-Jul-2018
  •  अभिमन्यु कोहाड़ 
    पिछले 20 साल में देश में 5 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं, नीति आयोग के अनुसार पिछले 5 साल में किसानों की वार्षिक आय में सालाना सिर्फ 0.44 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 17 राज्यों में एक किसान परिवार की औसत वार्षिक आय सिर्फ 20,000 रुपए है। चुनावों से पहले हर राजनीतिक पार्टी किसानों की स्थिति सुधारने के बड़े-बड़े वादे करती हैं लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद 5 साल तक किसान को फिर भूला दिया जाता है।  सरकारें किसानों के विषय में सिर्फ कुछ सार्थक करते हुए दिखने की कोशिश करती हैं लेकिन असल में कुछ सार्थक करती नहीं हैं। अक्सर पत्रकारों द्वारा हम से यह पूछ जाता है कि एक किसान नेता होने के नाते आपके अनुसार वो क्या कदम होने चाहिए जो सरकार किसानों की हालत सुधारने के लिए उठाये?
    मेरे अनुसार अगर सरकार किसानों के विषय पर गम्भीर है तो सरकार को 3 कदम उठाने चाहिए। 
    पहला कदम है किसानों की पूर्ण कजऱ् मुक्ति। कजऱ् मुक्ति की मांग पर कुछ सरकारी बुद्धिजीवी व शहरवासी कहते हैं कि जब किसान ने कजऱ् लिया है तो वो लौटा क्यों नहीं रहा है? लेकिन यह सवाल करने से पहले सरकारी बुद्धिजीवियों को अपनी सरकारों से यह सवाल करना चाहिए कि क्या सरकारों ने अपने वादों व अपने द्वारा बनाये हुए आयोगों की सिफारिशों को पूरा किया है? 2005-06 में स्वामीनाथन आयोग ने किसानों को लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की सिफारिश की लेकिन उस रिपोर्ट को 12 साल बीत चुके हैं व कांग्रेस और बीजेपी दोनों की सरकारें सत्ता में रह चुकी हैं लेकिन स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश को अब तक लागू नहीं किया गया है। 
    प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले किसानों से यह वादा किया था कि उनकी सरकार बनते ही वे किसानों को लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थित मूल्य देंगे। लेकिन पहले 4 साल में बीजेपी सरकार ने इस मुद्दे पर कोई निर्णय नहीं लिया। अब 2018 में इस मुद्दे पर बात भी की तो ए 2+एफएल लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की बात कह रहे हैं जबकि किसानों की मांग है सी 2 लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए। 
    अब अगर सरकारों ने अपने वादों के अनुसार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया होता तो किसानों के ऊपर कोई कजऱ् नहीं बनता, आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। 2016-17 की कमीशन फ़ॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट्स एंड प्राइस के अनुसार अगर स्वामीनाथन रिपोर्ट व मोदी जी के वादे के अनुसार किसानों को समर्थन मूल्य मिलता तो गेहूं पर किसानों को 119 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलते। 2016-17 में भारत में गेहूं की पैदावार 94.56 मिलियन टन यानि 94.56 करोड़ क्विंटल थी। अब हर क्विंटल पर किसान को 119 रुपए अधिक मिलते तो 1 साल में सिर्फ गेहूं की फसल पर किसानों को कुल 11252 करोड़ रुपए अधिक मिलते। 
    इसी तरह कपास की फसल पर किसान को 1720 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलने चाहिए थे, बाजरे पर 537 रुपए प्रति क्विंटल अधिक, धान पर 597 रुपए प्रति क्विंटल अधिक, चने पर 653 रुपए प्रति क्विंटल अधिक मिलने चाहिए थे लेकिन सरकारों ने किसानों को अपने वादों के अनुसार उचित दाम नहीं दिए। इस तरह अगर यूपीए व एनडीए अपने वादे ईमानदारी से पूरा करती तो किसानों को 12 साल में लगभग 6 लाख करोड़ रुपये ज्यादा मिलते। 
    इस समय एग्रो इंडस्ट्री के अलावा किसानों पर लगभग 6.35 लाख करोड़ का कर्ज है तो अगर सरकारें वादाखिलाफी नहीं करती तो किसानों के ऊपर इस समय कोई कजऱ् नहीं होता।
    दूसरा कदम जो सरकार को उठाना चाहिए वह है सी 2 लागत मूल्य पर 50 फीसदी जोड़कर किसानों को एमएसपी दिया जाए। सी 2 लागत मूल्य में बीज, कीटनाशक का खर्चा, मजदूरी, जमीन का किराया, लागत पर ब्याज आदि सब शामिल हैं। स्वमीनाथन आयोग ने भी सी 2 लागत मूल्य पर 50 फीसदी जोड़कर एमएसपी देने की सिफारिश की थी। लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी जी ने स्वामीनाथन आयोग के अनुसार ही सी 2 लागत मूल्य पर 50 फीसदी जोड़कर एमएसपी देने का वादा किया था लेकिन इसके बाद सरकार ने 2015 में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू नहीं कर सकते। 
    अभी कुछ दिन पहले सरकार ने ए 2+एफएल लागत मूल्य में 50फीसदी जोड़कर किसानों को एमएसपी दिया है। अगर सी 2 के आधार पर बढ़ोतरी की जाती तो धान पर लगभग 700 रुपए प्रति क्विंटल बढऩे चाहिए थे।
    तीसरा व अंतिम कदम जो सरकार को उठाना चाहिए वह है सभी फसलों की एमएसपी पर पूर्ण खरीद की गारंटी का कानून। इस समय देश में सिर्फ 6 फीसदी किसान एमएसपी पर अपनी फसल बेच पाते हैं। सरकार मुख्य तौर पर सिर्फ गेहूं व धान की खरीद एमएसपी पर करती है। सरकार को एक कानून बनाना चाहिए जिसके तहत किसान की फसल को किसी व्यापारी द्वारा एमएसपी से कम पर खरीदने को गैर-कानूनी घोषित कर दिया जाए, यह कानून पूरे देश में लागू होना चाहिए। अगर किसान एमएसपी पर अपनी फसल बेच ही नहीं पा रहा है तो एमएसपी बढ़ाने का कोई अर्थ नहीं है। मध्यप्रदेश में मंडी-एक्ट 1972 के अनुसार अगर कोई व्यापारी किसी किसान की फसल को एमएसपी से कम पर खरीदता है तो व्यापारी के खिलाफ मामला दर्ज कर के कारवाई की जाएगी लेकिन व्यापारियों व सरकार की सांठगांठ होने की वजह से यह कानून मध्यप्रदेश में भी जमीन पर लागू नहीं होता। सरकार को दूध व फल का भी एमएसपी घोषित करना चाहिए क्योंकि कई जगहों के किसान फल की खेती व दूध की डेयरी पर मुख्य तौर पर निर्भर हैं। अगर सरकार तत्काल यह तीन कदम उठाए तो देश के अन्नदाता किसान को बचाया जा सकता है अन्यथा किसान का बचना बहुत मुश्किल है। (फेसबुक पर पोस्ट)
    (लेखक राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। राष्ट्रीय किसान महासंघ देश के 132 किसान संगठनों का महासंघ है)

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Posted Date : 15-Jul-2018
  • नवीन जोशी,  वरिष्ठ पत्रकार
    स्वाभाविक है कि भाजपा 2019 में केंद्र की सता में बहुमत से वापसी की कोशिश करे, जैसे कि विरोधी दल उसे बेदखल करने के प्रयत्न में लग रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष काफी समय से चुनावी मोड में हैं।  अंदरखाने तैयारियां हैं ही, सरकारों के स्तर पर खुल्लम-खुल्ला लुभावनी चुनावी घोषणाएं होने लगी हैं। चर्चा यहां यह करनी है कि मोदी सरकार क्या उपलब्धियां लेकर जनता के पास जाना चाहती है और स्वयं जनता जनार्दन उसके लिए कैसा प्रश्नपत्र तैयार कर रही है? 
    साल 2014 में देश की जनता कांग्रेस नीत यूपीए शासन के भ्रष्टाचार से त्रस्त थी। वह बदलाव चाहती थी। भाजपा में तेजी से उभरे नरेंद्र मोदी ने अपने वक्तृत्व, तेजी और ताजगी से भ्रष्टाचार मिटाकर, काला धन वापस लाने एवं चौतरफा परिवर्तन के वादों से जो लहर पैदा की, उसने भाजपा को विशाल बहुमत से सत्ता में ला बिठाया। आज जब वे चार साल पूरे कर चुकने के बाद पांचवें वर्ष में जनता की परीक्षा में बैठनेवाले हैं, तो पास होने की कसौटी क्या होगी?
    सरकार के पास तो उपलब्धियां गिनाने के लिए हमेशा ही बहुत कुछ होता है। मोदी सरकार ने भी अपना चार साल का प्रभावशाली लेखा-जोखा पेश किया है, मगर पास-फेल करना जनता के हाथ में है। 
    आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार ने नोटबंदी जैसे दुस्साहसिक और जीएसटी जैसे साहसिक कदम उठाये। इनके नतीजों पर विवाद हैं। तमाम दावों के बावजूद अर्थव्यवस्था अच्छी हालत में नहीं है, विशेष रूप से वह हिस्सा, जो सीधे जनता को प्रभावित करता है। महंगाई लगातार बढ़ी है। पेट्रोल-डीजल के ऊंचे भावों ने उसे अनियंत्रित किया है।  बैंकों पर डूबे हुए कर्ज का बोझ बढ़ा, किंतु प्रयासों के बावजूद वसूली के प्रयास सफल होते नहीं दिखे। बेरोजगारों की संख्या बढऩे की तुलना में रोजगारों का सृजन अत्यंत सीमित हुआ। युवा वर्ग में आक्रोश है, जो तरह-तरह के असंतोषों में फूटा। 
    इस पूरे दौर में देश का किसान क्षुब्ध और आंदोलित रहा। बदहाली के कारण उनकी आत्महत्याओं का सिलसिला बिल्कुल नहीं रुका। हाल ही में खरीफ फसलों के समर्थन मूल्यों में अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि की जो घोषणा की गयी है, उससे भी किसान समुदाय का बड़ा हिस्सा प्रसन्न नहीं लगता। 
    आरोपों के अलावा मोदी सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों में क्लीन चिट हासिल है। यूपीए-2 सरकार के लिहाज से यह बड़ी राहत है, लेकिन आम जनता को रोजमर्रा के कामों में भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल गई हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है।  काले धन पर अंकुश नहीं लग सका। डिजिटल लेन-देन के मोर्चे पर भी शुरुआती उपलब्धि हाथ से फिसल गयी। नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने यह कहकर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है कि 2014 के बाद देश की अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से पीछे की ओर गयी है।
    सामाजिक क्षेत्र में सरकार कुछ करती दिखायी दी, लेकिन वास्तव में परिवर्तन कितना आया? हाशिये पर जीनेवाली बड़ी आबादी के हालात कितना सुधरे? स्वच्छता अभियान और 2019 तक देश को खुले में शौच-मुक्त करने की महत्वाकांक्षी, सराहनीय योजना पर स्वयं प्रधानमंत्री ने बहुत रुचि ली, किंतु आंकड़ों से इतर व्यवहार में वह कितना उतर पायी? 
    दलितों के कल्याण के वास्ते घोषणाएं बहुत हुईं, लेकिन उन्हें सचमुच कितनी आजादी और सामथ्र्य मिली? महिलाओं के प्रति समाज और राजनीति के नजरिए एवं व्यवहार में कितना फर्क आया? दैनंदिन जीवन में अनुभव करने के कारण जनता इन मुद्दों से सीधे जुड़ी रहती है। वह क्या महसूस करती है? यहां यह कहना जरूरी है कि देश की ये समस्याएं न आज की हैं, न इनके लिए मोदी सरकार जिम्मेदार है।  चूंकि स्वयं मोदी ने व्यक्तिगत रूप से भी इस बारे में जनता में बहुत ज्यादा उम्मीदें जगायीं, बढ़-चढ़कर दावे किये थे, इसलिए उनकी सरकार की जवाबदेही निश्चय ही बढ़ जाती है। 
    पिछले दिनों की चंद घटनाओं ने संकेत दिये हैं कि मोदी सरकार इन कसौटियों पर शायद असहज अनुभव कर रही है। प्रधानमंत्री का जोर आज भी परिवर्तन और विकास के मुद्दों पर है।  उनकी लोकप्रियता अधिक कम नहीं हुई है, लेकिन उनके मंत्री और भाजपा नेता क्या कर रहे हैं? केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने चंद रोज पहले झारखंड में उन आठ लोगों को जमानत पर छूटने पर माला पहनाकर मिठाई खिलायी, जिन्हें अदालत ने गोरक्षा के नाम पर हत्याओं का दोषी पाया है। 
    उसी दिन केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह बिहार के अपने निर्वाचन क्षेत्र में दंगा भड़काने के आरोप में जेल में बंद बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं के घर गये, उनके साथ हुए 'अन्यायÓ पर रोये और बिहार की अपनी ही सरकार को ही दोष देने लगे।  इन्हें हम इन नेताओं की स्फुट भटकनों के रूप में भी देख सकते थे, परंतु विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की अपने ही कैडर के हाथों अब तक जारी ट्रॉलिंग को किस रूप में देखें, जबकि पार्टी नेतृत्व और सरकार उनके पक्ष में आना तो दूर, मौन साधे रहे? राजनाथ सिंह और गडकरी उनके बचाव में आये, मगर काफी बाद में। फिर, पिछले महीने जम्मू-कश्मीर सरकार से भाजपा के अचानक अलग होने के फैसले से क्या समझा जाये, जबकि कश्मीर में शांति बहाली भाजपा सरकार का प्रमुख एजेंडा था? 
    तो, क्या इसे उग्र हिंदुत्व और प्रखर राष्ट्रवाद के पुराने एजेंडे को प्रमुख स्वर देने के रूप में देखा जाये? यह आशंका इसलिए बलवती होती है कि 2014 के चुनाव की पूरी तैयारी भाजपा ने इसी एजेंडे के तहत की थी। प्रधानमंत्री-प्रत्याशी के रूप में नरेंद्र मोदी परिवर्तन लाने, विकास करने तथा भ्रष्टाचार और परिवारवाद मिटाने की गर्जनाएं कर रहे थे, तो उनके कई नेता गोहत्या, खतरे में हिंदुत्व, देशद्रोह जैसे मुद्दे उछालने में लगे थे।  खूबसूरत सपने दिखाने और भावनाओं के उबाल का यह चुनावी मिश्रण-फॉर्मूला सफल रहा था। अब, जबकि सपनों को साकार करने के प्रयासों की परीक्षा होनी है, तब क्या फिर से धर्म और राष्ट्रवाद की भावनाओं का ज्वार उठाना भाजपा को आवश्यक लग रहा है? विपक्षी मोर्चेबंदी की काट के लिए उपलब्धियां पर्याप्त नहीं लग रहीं? ध्रुवीकरण का सहारा लिए बिना रास्ता कठिन लग रहा है?  
    सरकारों की परीक्षा का पैमाना जनता कब क्या बनाती है, यह स्पष्ट नहीं होता। साल 2004 में एनडीए के 'शाइनिंग इंडियाÓ को उसने नकार दिया और 2009 में यूपीए को अप्रत्याशित विजय दे दी थी। साल 2014 में जनता ने भाजपा को विशाल बहुमत दिया। तो अब 2019 के लिए भी प्रश्न-पत्र जनता बना ही रही होगी। https://www.prabhatkhabar.com/
     

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Posted Date : 14-Jul-2018
  • डॉ. विजय अग्रवाल 
    लोकसभा चुनाव से करीब 10 महीने पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह धमाकेदार घोषणा कर देश की सियासत को गर्मा दिया है कि वह हर जिले में दारुल कजा (शरिया अदालत) खोलेगी। ज़ाहिर है, इस प्रस्ताव का संबंध संवैधानिक अथवा लोकतांत्रिक स्वरूप से सीधे-सीधे न होकर हिन्दुस्तान बनाम इस्लाम से है, इसीलिए भारतीय जनता पार्टी ने इस प्रस्ताव के खिलाफ तत्काल अपनी तीखी प्रतिक्रिया दे दी कि यह इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ इंडिया नहीं है। आश्चर्य तो तब हुआ, जब समाजवादी पार्टी भी इसी पंक्ति में खड़ी दिखाई दी। यह सिक्के का दूसरा पहलू है।
    सिक्के के पहले पहलू के दर्शन 25 जून के अख़बारों में छपे कुछ चित्रों में देखने को मिले। इस चित्र से जुड़ी सुखद घटना भारत से लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर दूर उस सऊदी अरब में घटी थी, जो इस्लाम की जन्मभूमि रही है, और जहां इस्लाम की दो सबसे पवित्र मस्जिद अल हरम और मदीना स्थित हैं। गौर करने की बात यहां यह भी है कि इस ऐतिहासिक और क्रांतिकारी घटना का स्रोत बना वहां का राजमहल, जब राजकुमार मुहम्मद बिन सलमान ने अपने देश की महिलाओं को गाड़ी चलाने की इजाज़त देने संबंधी आदेश जारी किया। सुबह के अखबारों की ये तस्वीरें धूप से झुलसते चेहरों पर पानी की फुहारें बनकर उसे तरबतर कर गईं।
    केवल साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाला देश सऊदी अरब सुन्नी मुसलमान प्रधान देश है। साथ ही यह इस्लामिक जगत का भी एक महत्वपूर्ण मुल्क है। ऐसे में सऊदी की इस घटना का प्रभाव विशेषकर दक्षिण एशिया के सुन्नी मुसलमानों पर पडऩा लाजि़मी है।
    भारत के भी लगभग 19 करोड़ मुस्लिमों में सुन्नी बहुसंख्या में हैं। शियाओं की संख्या काफी कम है। साथ ही भारत के लगभग 50 लाख लोग सऊदी अरब में काम कर रहे हैं, जिन्हें भारत का संदेशवाहक कहा जा सकता है, फिर चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों। तो क्या ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि सऊदी की खिड़की से निकलने वाली उदारवादी विचारों की यह बयार 3,500 किलोमीटर का सफर तय कर हिन्दुस्तान की फिज़़ां को खुशनुमा बनाएगी?
    इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की बंद खिड़कियों में चरमराहट होने लगी है।  तीन तलाकज् पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है। मुस्लिम लॉ बोर्ड द्वारा शरीयत अदालतें बनाने के प्रस्ताव के समानांतर ही इस देश की सर्वोच्च अदालत ने हलाला तथा बहुविवाह प्रथाओं पर विचार करने के लिए एक संवैधानिक पीठ के गठन की घोषणा की है। ये दोनों घोषणाएं दिख तो समानांतर रही हैं, लेकिन इनकी दिशाएं एक नहीं हैं, सो, हो सकता है, इनके निष्कर्ष आगे जाकर टकराव में तब्दील हो जाएं। यहां सोचने की बात यह है कि यदि ऐसा होता है, तो फिर क्या होगा?
    इसमें भी कोई दो राय नहीं कि भारत का इस्लामिक समाज अपेक्षाकृत खुला हुआ समाज है। दिन-प्रतिदिन उसमें, विशेषकर उसके महिला वर्ग में, उदारवादी लोकतांत्रिक विचार सांस लेने लगे हैं। 
    इसके बेहतरीन प्रमाण के तौर पर चैनल पर आने वाले इश्क सुभान अल्ला धारावाहिक को पेश किया जाना गलत नहीं होगा। मुझे लगता है कि इस धारावाहिक का अंतिम निष्कर्ष, जिसके सुखद होने की संभावना अधिक है, इन दोनों के टकराव का अंतिम परिणाम होगा।इस प्रकार समाज चाहे कोई भी हो, इसकी खिड़कियां खुलेंगी और खुलनी ही चाहिए। https://khabar.ndtv.com/n

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Posted Date : 14-Jul-2018
  • अभय शर्मा
    बीते हफ्ते पाकिस्तान के नेशनल अकाउंटबिलिटी ब्यूरो (नैब) की एक विशेष अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम शरीफ को भ्रष्टाचार का दोषी पाते हुए 10 और सात साल की सजा सुना दी। नवाज शरीफ पर लंदन में स्थित एवनफील्ड में अवैध तरीके से चार फ्लैट खरीदने का आरोप था जिसे अदालत ने सही पाया। करीब एक महीने से लंदन में अपनी पत्नी का इलाज करा रहे नवाज शरीफ ने गिरफ्तारी के आदेश के बाद भी पाकिस्तान लौटने का निर्णय लिया। शुक्रवार रात लाहौर हवाई अड्डे पर उतरते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
    पाकिस्तान में आम चुनाव इसी महीने की 25 जुलाई को होने वाले हैं। इनमें अब तक नवाज शरीफ की स्थिति बेहद कमजोर नजर आ रही थी। वे खुद चुनाव नहीं लड़ सकते। उनकी बेटी, दामाद और बेटों को भी अदालत ने चुनाव में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित कर दिया है। शरीफ परिवार पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों की वजह से उनकी पार्टी पीएमएल-एन को भी भारी नुकसान हुआ है। कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए हैं। इस बार का चुनाव पार्टी उनके छोटे भाई और पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। पर शहबाज के साथ दिक्क्त यह है कि उनका पंजाब के बाहर कोई खास जनाधार नजर नहीं आता।
    लेकिन, विशेष अदालत का फैसला आने के बाद पाकिस्तान में चुनावी परस्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। पाकिस्तान के लगभग सभी जानकारों का मानना है कि पहले अदालत के फैसले और उसके बाद नवाज शरीफ के लंदन से पाकिस्तान लौट कर जेल जाने के निर्णय ने चुनावी समीकरणों को काफी हद तक पलट दिया है।
    अगर विशेष अदालत के फैसले पर नजर डालें तो इसमें कई झोल नजर आते हैं। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि नेशनल अकाउंटबिलिटी ब्यूरो यह साबित नहीं कर पाया कि नवाज शरीफ ने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्डरिंग के जरिये लंदन में फ्लैट खरीदे थे। लेकिन, नवाज शरीफ अपने निर्दोष होने का कोई पुख्ता सबूत नहीं दे सके हैं इसलिए अदालत ने यह मान लिया कि ये फ्लैट उन्होंने काले धन से ही खरीदे थे। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि अदालत ने मरियम शरीफ को केवल यह मानकर सजा सुना दी कि उन्होंने सच्चाई को छिपाने और जाली दस्तावेज बनवाने में अपने पिता की मदद की थी।
    पाकिस्तान के चर्चित वकील अली अहमद कुर्द और सलमान अकरम रजा सहित लगभग सभी कानूनी जानकार अदालत के इस फैसले को कानूनन दोषपूर्ण बताते हैं। उनका कहना है कि संदेह के आधार पर अदालत द्वारा इतना बड़ा फैसला सुनाया जाना सही नहीं है। कइयों के मुताबिक ऐसा पहली बार देखने में आया है कि कोर्ट ने जांच एजेंसी के सबूत न दे पाने के बाद भी आरोपित को सजा सुना दी।
    पाकिस्तान में अदालत के फैसले को लेकर कई और बातें भी कही जा रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अदालत के फैसले पर जज के दो जगह हस्ताक्षर हैं और दोनों ही जगह ये अलग-अलग तरह से किए गए हैं। साथ इस फैसले में कई जगह स्पेलिंग की गलतियां भी देखने को मिली हैं। इसे लेकर कहा जा रहा है कि अदालत से यह फैसला जल्दबाजी में दिलवाया गया जिससे मरियम शरीफ को चुनाव लडऩे से रोका जा सके। खबरें तो ये भी हैं कि यह फैसला पाकिस्तानी सेना की ओर से लिखकर दिया गया था जिसे जज ने अदालत में पढ़ दिया।
    पाकिस्तान की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि चुनाव से कुछ रोज पहले जनता के बीच इस तरह की बातें सामने आने से चीजें नवाज शरीफ के हक में जाएंगी और इससे उनकी पार्टी को ही फायदा होगा।
    पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार खालिद महमूद एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहते हैं, अभी तक इस चुनाव में इमरान खान का पलड़ा भारी नजर आ रहा था। लेकिन नवाज शरीफ के पाकिस्तान आने के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलेंगी। खालिद कहते हैं अदालत के विवादित फैसले के बाद नवाज शरीफ द्वारा जेल जाने का फैसला करना 'मौके पर चौकाÓ मारने जैसा है।
    दरअसल, नवाज शरीफ जानते हैं कि अदालत के इस फैसले के बाद भी अगर वे जेल जाते हैं तो निश्चित ही उन्हें जनता का भावनात्मक सपोर्ट मिलेगा। पाकिस्तान का इतिहास देखें तो जनता ने भावनाओं में बहकर कई बार मतदान किया है। जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी और फिर 2008 में बेनजीर भुट्टो को गोली मारे जाने के बाद जनता ने बिना लीडर वाली पार्टी को भी सत्ता में पहुंचा दिया था।
    पाकिस्तानी जानकारों की मानें तो शहबाज शरीफ और पार्टी के अन्य बड़े नेता अच्छे से जानते हैं कि उनकी पार्टी को केवल नवाज शरीफ के नाम पर ही वोट मिल सकते हैं। पाकिस्तान में शहरी आबादी और नौजवान भले इमरान खान के साथ हैं। लेकिन, ग्रामीण इलाके और 40 की उम्र से ऊपर की अधिकांश आबादी आज भी नवाज शरीफ को अपना नेता मानती है। यही वजह है कि पार्टी ने उनके जेल जाने को चुनाव में भुनाने की पूरी तैयारी कर ली है। बताया जाता है कि पार्टी की पूरी कोशिश है कि किसी तरह नवाज शरीफ के पाकिस्तान आने को ऐतिहासिक क्षण बना दिया जाए। पंजाब में पीएमएलएन के सभी उम्मीदवारों से बड़ी संख्या में लाहौर एयरपोर्ट के बाहर भीड़ जुटाने को कहा गया।
    पाकिस्तानी मीडिया की मानें तो पार्टी की रणनीति जनता के बीच यह संदेश भेजने की है कि नवाज शरीफ ने बड़ी कुर्बानी दी है, वे अपने साथ भेदभाव किए जाने और पत्नी की हालत नाजुक होने के बाद भी देश और अवाम के लिए वापस लौटे हैं। पार्टी के कुछ नेता मीडिया को यह भी बताते हैं कि अगर नवाज शरीफ और मरियम शरीफ को लंदन से पाकिस्तान आने में एक हफ्ते का समय लगा है तो इसके पीछे भी एक वजह है। उनके मुताबिक लंदन में शरीफ और उनकी बेटी के भावनात्मक भाषणों की वीडियो रिकॉर्डिंग्स तैयार की गई हैं जिन्हें तब चुनावी रैलियों में चलाया जा रहा होगा जब नवाज शरीफ और उनकी बेटी जेल में होंगे। (सत्याग्रह)

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