विचार / लेख

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Posted Date : 19-Jan-2019
  • डॉ. राजू पाण्डेय

    प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सहयोग से सत्ताधारी दल द्वारा कुछ गैर ज़रूरी और घातक मुद्दों को लगातार चर्चा में बनाए रखने की इतनी पुरजोर और कारगर कोशिश की जा रही है कि स्वयं को देश को दिशा देने की विलक्षण योग्यता से संपन्न समझने वाला बुद्धिजीवी वर्ग इनका समर्थन और विरोध कर इन्हें जीवित रखने में जाने अनजाने योगदान दे रहा है। दुखद यह है कि ये मुद्दे देश की संसद में भी उठ रहे हैं और इन पर हमारे निर्वाचित जन प्रतिनिधि चुनावी राजनीति के संकीर्ण लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अदूरदर्शितापूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
    जब सरकारें जनकल्याण की भावना के स्थान पर लाभ हानि के गणित द्वारा संचालित होने लगें और मानव श्रम को लागत बढ़ाने वाला तथा कार्यकुशलता में कमी लाने वाला माना जाने लगे तब नौकरियों और रोजगार के अवसरों में कमी आना स्वाभाविक है। ऐसी दशा में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण निर्धन की वसीयत की भांति है जो उत्तराधिकारियों को लाभ तो न देगी अपितु उनके मध्य वैमनस्य और विवाद अवश्य उत्पन्न करेगी। हम चर्चा कर रहे हैं कि यह संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल है। 
    यह न्यायालय के निर्देशों पर खरा नहीं उतरेगा। इसका क्रियान्वयन कठिन होगा। यह अंतत: जाति आधारित जनगणना के नतीजों को सार्वजनिक करने और जातियों की जनसंख्या के अनुरूप उनके लिए आरक्षण के विचार को बढ़ावा देगा। अनुसूचित जाति एवं जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के लोग आशंकित हैं कि कहीं यह आरक्षण के सामाजिक-शैक्षिक आधारों को कमजोर करने की साजिश तो नहीं है और उनके लिए निर्धारित कोटे में चोर-दरवाजे से कोई अतिक्रमण तो नहीं प्रारंभ हो गया है। इन वर्गों के आरक्षित पदों पर नियुक्ति के बैक लॉग का मसला समय समय पर चर्चा में आता रहा है और प्रभावित तबका शासन प्रशासन में सवर्णों के आधिपत्य और फलस्वरूप सरकारों में सदाशयता और इच्छा शक्ति के अभाव को इसके लिए उत्तरदायी ठहराता रहा है। जबकि सवर्ण मानसिकता इसके लिए दावेदारों की कमी और अयोग्यता को जिम्मेदार मानती है। हम सब चकित हैं कि यह 10 प्रतिशत का आंकड़ा किस जनसंख्यात्मक सर्वेक्षण के आधार पर प्राप्त किया गया और आठ लाख वार्षिक आय वाले लोगों को आर्थिक रूप से कमजोर किस आधार पर माना गया। लेकिन लोकसभा और राज्य सभा में यह बिल  पारित हो गया। पारित होने से पूर्व बुनियादी मुद्दों पर रस्मी और सतही चर्चा हुई। 
    वह भी संभवत: इसलिए कि अपने वंचित-आदिवासी- पिछड़े वोट बैंक को दिलासा दी जा सके और शायद अपने अंतर्मन में छिपी ग्लानि को भी इस तरह कम किया जा सके। बिल के विरोधियों में इस बात की खीज अधिक थी कि सरकार इसका चुनावी फायदा लेगी। इक्का दुक्का अपवादों को छोड़कर सबने बिल का समर्थन किया और इस तरह इस बात पर मुहर लग गई कि संख्याबल में कम होने के बाद भी भारत की चुनावी राजनीति में सवर्ण वर्ग के दबदबे के सम्मुख शरणागत होना ही पड़ता है। 
     गरीबी और बेरोजगारी के समाधान के रूप में आरक्षण को प्रस्तुत कर दिया गया है। सभी जानते हैं कि मलेरिया के लिए डायरिया की दवा कारगर सिद्ध नहीं होगी। किंतु राजनीतिक दलों ने रोगी को इस प्रकार प्रशिक्षित कर दिया है कि वह आश्वस्त है कि मलेरिया की औषधि ही डायरिया का निराकरण करेगी बल्कि वह तो इस दवा की मांग भी कर रहा है। उसे नहीं पता कि गरीबी और बेरोजगारी का इलाज इन राजनीतिक दलों के पास नहीं है इसीलिए आरक्षण देकर उसे छला जा रहा है।
    आर्थिक आधार पर आरक्षण का तर्क न्यायसंगत और प्रगतिशील लगता है किंतु छुआछूत या अस्पृश्यता जैसी भयंकर और घृणित कुरीति दुर्भाग्यवश हमारे समाज का अविभाज्य भाग रही है। यहां जाति के विमर्श को शोषण और असमानता को चिरस्थायी बनाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसीलिए जाति के आधार पर आरक्षण अपनी तमाम सीमाओं के बाद भी यहां एक अनिवार्यता का रूप ले लेता है। हो सकता है कि जातिगत आरक्षण ने वंचितों में सवर्णों को अपना आदर्श समझने वाले एक प्रभुत्व संपन्न वर्ग को जन्म दिया हो जो अपने साथियों से घृणा करता हो, यह भी संभव है कि राजनीतिक दलों में सवर्ण नेतृत्व की प्रभावशाली स्थिति और वंचित नेतृत्व की सवर्ण मानसिकता के कारण आरक्षण अपने उद्देश्यों को प्राप्त न कर पाया हो किंतु यह भी सच है कि जातिवाद और अस्पृश्यता जैसी भारतीय समाज की विचित्र समस्या का जातिगत आरक्षण जैसा ही कोई हल संभव है जिसमें अतार्किकता का पुट है और जिसके स्वरूप में जातिवाद को समाप्त करने के स्थान पर उसे शक्ति प्रदान करने की भी पूरी गुंजाइश अंतर्निहित है। 
    योग्य व्यक्तियों को नौकरी न मिल पाने का तर्क पहली नजर में सही लगता है किंतु इसमें एक दोष छिपा होता है। जिस क्षेत्र में हम योग्य और श्रेष्ठ होते हैं वहां तो हम इसका आश्रय ले लेते हैं किंतु जिस क्षेत्र में हम कमजोर और पिछड़े होते हैं वहां राज्य के संरक्षण, सहायता और सहयोग की मांग करने लगते हैं, राज्य का लोककल्याणकारी स्वरूप हमें प्रिय लगने लगता है लेकिन शक्तिसम्पन्न होते ही हम योग्यतम की उत्तरजीविता की चर्चा करने लगते हैं। सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर आरक्षण अजीबोगरीब परसेप्शन्स द्वारा देश को संचालित करने की बचकानी कोशिशों का एक नमूना है। एक परसेप्शन यह है कि सामान्य वर्ग की बेरोजगारी के लिए वंचितों को मिलने वाला आरक्षण जिम्मेदार है। दूसरा परसेप्शन यह है कि कुछ राजनीतिक दल सामान्य और सवर्ण वर्ग के गुप्त समर्थक हैं और उनके साथ खड़े हैं जबकि कुछ राजनीतिक दल सवर्णों के प्रच्छन्न विरोधी हैं। तीसरा परसेप्शन यह है कि हम भले ही आपके लिए कुछ न कर सकें हों लेकिन हम ही आपके वास्तविक साथी हैं और इसीलिए आपको हमें चुनना होगा। भारतीय राजनीति में इससे भी असंगत, हास्यास्पद और विडम्बनापूर्ण घटनाएं हुई हैं इसलिए सामान्य वर्ग के आरक्षण का यह प्रकरण हमें शायद न चिंतित करे किंतु इसके पीछे एक घातक विचार छिपा हुआ है। यह देश के अलग अलग वर्ग के लोगों में एक ऐसा भाव बोध उत्पन्न करने की रणनीति का हिस्सा है जिसके अनुसार उनकी बदहाली के जिम्मेदार राजसत्ता के कार्यक्रम और नीतियां न होकर समाज का ही कोई दूसरा वर्ग है जो उनका हक मार रहा है।
     घुसपैठियों का विमर्श भी कुछ इसी प्रकार का है। दूसरे देशों से अवैध रूप से हमारे देश में प्रवेश करने वाले घुसपैठियों और उनकी आपराधिक गतिविधियों से हम सबको कठोरता से निपटना होगा- इस बात पर सर्वसहमति है। लेकिन इसके बहाने अंतत: हमने धर्म के द्वारा संचालित होने वाले उन कट्टरपंथी मुल्कों को अपना रोल मॉडल बना लिया है जो हिंसा, गृह युद्ध और आतंकवाद से ग्रस्त होकर विकास की दौड़ में पिछड़े हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा तिरस्कृत हैं। सेकुलर भारत में घुसपैठियों को धर्म के आधार पर परिभाषित और चिह्नित करने वाला नागरिकता संशोधन बिल उन देशों में हिंदुओं के लिए भयंकर समस्या पैदा करेगा जहां वे अल्पसंख्यक हैं तथा उन्हें अत्याचारों का सामना करना होगा किंतु इससे भी अधिक चिन्ता का विषय यह है कि घुसपैठियों की परिभाषा धीरे धीरे संकीर्ण होती जाएगी और इस प्रक्रिया को रोक पाना कठिन होगा। 
    देश के भीतर एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में काम की तलाश में जाने वाले लोग भी घुसपैठियों की श्रेणी में आने लगेंगे। मूल निवासी और बाहरी का संघर्ष तेज होने लगेगा। अलग अलग धर्मावलंबियों में हिंदुस्तान की धरती पर मालिकाना हक जमाने की होड़ लग जाएगी। देश के निवासी अपनी दुर्दशा के लिए एक दूसरे को उत्तरदायी ठहराने लगेंगे। संदेह, अविश्वास, घृणा और हिंसा जब बेलगाम हो जाएंगे तो नतीजे विनाशकारी ही होंगे। ऐसे ही अनेक प्रयोग जारी हैं। धार्मिक सर्वोच्चता के लिए जनसंख्या बढ़ाने का विमर्श इसी प्रकार का है जिसमें यह बताया जा रहा है कि एक अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय जनसंख्या वृद्धि द्वारा  बहुसंख्यक बनने की चेष्टा कर रहा है और देश के संसाधनों का दोहन कर ताकतवर बन रहा है। 
    इसी प्रकार धर्मांतरण द्वारा देश में बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय को अल्पसंख्यक बनाने के षड्यंत्र का मिथक है। यथार्थ के धरातल और आंकड़ों की कसौटी पर ऐसे दावे खरे नहीं उतरते। हर धर्म में कट्टरपंथी हैं और उनकी कुंठित मानसिकता से उपजे अनर्गल विचारों को देश और समाज की प्रतिनिधि चिंतन धारा नहीं कहा जा सकता।
    यह परसेप्शन गढऩे और फिर उस परसेप्शन के आधार पर देश को चलाने की कोशिशों का दौर है। यह सोशल मीडिया में चलने वाली फेक न्यूज को जन आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति मान कर कानूनों के बनाए जाने का समय है। यह वह दौर है जब न्यायपालिका पर लोकप्रिय निर्णय लेने का दबाव बनाया जा रहा है। आश्वस्त करने वाली बात यह है कि जनता इन मुद्दों पर आपस में जूतमपैजार करते बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और प्रवक्ताओं से जरा भी प्रभावित नहीं है। वह रोटी, कपड़ा,मकान, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे जरूरी मुद्दों पर ठोस काम चाहती है। वह स्वयं पर आने वाले आभासी संकटों और इनसे बचाने वाले आभासी रक्षकों की हवाई मदद के खोखलेपन से भली भांति परिचित है। हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा के नतीजे यह दर्शाते हैं कि आभासी मुद्दे जनता को भटकाने में नाकाम रहे हैं।
     

     

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Posted Date : 19-Jan-2019
  • डॉ. अनुज लुगुन, सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

    भारत से अंग्रेजों का जाना अन्य भारतीयों की तरह ही आदिवासियों के लिए भी अंग्रेजों का जाना था और इसके साथ ही उन्होंने भी नेहरू के नेतृत्व के साथ एक उम्मीद भी जतायी थी। नेहरू स्वयं आदिवासियों को लेकर पंचशील सूत्रों के जरिये अपनी चिंता जता चुके थे, बावजूद इसके उन्होंने देश के विकास के लिए जो रास्ता तय किया, वह गांधीवादी रास्ता नहीं था। उनके द्वारा तय रास्ते का आशय साफ था- संसाधनों का अतिरिक्त दोहन। नेहरू द्वारा देश के विकास के लिए जिस 'विकास के मंदिरÓ की उद्घोषणा हुई, उसी में एक और औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया निहित थी।  यह सीधे-सीधे सांस्कृतिक औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया नहीं थी, लेकिन इसमें आदिवासी अस्तित्व-संकट के बीज छुपे थे। आदिवासी अस्तित्व संकट पर विचार करना केवल आदिवासी समाज के किसी एक पहलू पर विचार करना नहीं है। इस भ्रम ने ही आजादी से अब तक आदिवासी समाज का सबसे गलत विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
    आजादी के बाद जिन दिनों तेजी से औद्योगीकरण की प्रक्रिया आरंभ की गई, उसी दिन से आदिवासी समाज के साथ औपनिवेशिक व्यवहार शुरू हो गया था। बावजूद इसके कि इस शुरुआती दौर में अपनी जमीनें देने के बाद भी आदिवासियों के मन में देश के विकास या राष्ट्रहित के लिए अपनी सहमति थी, जो नेहरू युग के बाद सवाल में बदल गयी। यहां दो बातें साथ चल रही होती हैं- एक ओर तो आदिवासियों से उनकी जमीन छीनी जा रही है, दूसरी ओर आदिवासियों की सामाजिक-प्रशासनिक व्यवस्था पर बाह्य सत्ता का जबरन प्रवेश कराया जा रहा है। 
    स्थानीय स्तर पर आदिवासियों की अपनी प्रशासनिक व्यवस्था थी, जो कहीं से भी कभी भी अलोकतांत्रिक नहीं रही है, लेकिन लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण के नाम पर आदिवासियों की उन संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया गया। इस तरह की व्यवस्था ने आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी सुरक्षा अधिनियमों के होते हुए भी बहुत तेजी से गैर-आदिवासियों को कानूनी व्यवस्था देकर प्रवेश कराया। यह प्रवेश इसलिए चिंताजनक साबित हुआ, क्योंकि इसने फिर से आदिवासी समाज को शोषण के नए दौर में धकेल दिया। इस प्रक्रिया ने आदिवासियों के बीच अजनबियत का माहौल तैयार किया। एक ओर तो जमीन छिन जाने से विस्थापन के बरअक्स पुनर्वास की कोई ठोस वैधानिक व्यवस्था नहीं हुई, वहीं दूसरी ओर आदिवासी अर्थव्यवस्था जो कि कृषि और वनोपज से संयुक्त थी, वह ध्वस्त हुई। यानी जमीन भी गई, वन और वन के उत्पाद भी उनके हाथ से निकल गए। इसने आदिवासियों को सीधे आर्थिक रूप से प्रभावित किया और वे सारे दावे जो उनको विस्थापित करने के दौरान नौकरी और उनके विकास के लिए किए गए थे, सब धरे रह गए।  जिन जगहों से आदिवासी विस्थापित हुए वहां चमचमाते कल-कारखाने, बड़ी-बड़ी कॉलोनियां तो बसीं, लेकिन इससे आदिवासी न केवल एक कोने में धकेले गए, बल्कि उनका बहुत तेजी से किसान से मजदूर वर्ग में रूपांतरण हुआ। जो कॉलोनियां विकसित हुईं, उनमें रहने वाले आदिवासी नहीं थे। इसलिए वहां मौजूद दोनों जनसंख्या एक-दूसरे से अपरिचित थी। वहां अंतत: उस कॉलोनीवासियों का प्रभुत्व कायम हुआ और आदिवासी अपनी जिस संस्कृति पर गर्व करते थे, वहां वह हेय माना जाने लगा। कॉलोनी की संस्कृति गैर आदिवासी संस्कृति थी, जो अपने साथ सामंती और पितृसत्तात्मक संस्कार लेकर आयी थी, जिसने आदिवासी महिलाओं का रूपांतरण 'वेश्याओंÓ के रूप में भी किया।
    कॉलोनी के इर्द-गिर्द बसे आदिवासी इस प्रभुत्व से न केवल अपनी पहचान खोते गये, बल्कि उनका वहां झुग्गी-झोपडिय़ों में जो सामाजिक संरचना बनी, वह न अपने पूर्व के समाज की तरह थी और न ही उस कॉलोनी के समाज की तरह। बाद के दिनों में उस कॉलोनी के मध्यवर्गीय 'सहृदयोंÓ ने उसी सामाजिक ढांचे और स्वभाव को आधार बनाकर जब साहित्य लिखा, तो उसमें यह सहज ही निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि आदिवासी या तो वेश्यावृत्ति कर जीवन-यापन करते हैं, या आर्थिक समस्या ही उनकी मूल समस्या है।  दूसरी ओर जब आदिवासी समाज का मजदूर उस कॉलोनी में या कॉलोनी के बाजार में प्रवेश किया, तो वह यह समझ नहीं पाया कि वह अपने 'श्रमÓ को किस 'रूपÓ में परिभाषित करे, क्योंकि उसके पूर्व का सामाजिक परिवेश मौजूदा परिवेश से हर मामले में अलग था। यह केवल उनके किसान से मजदूर वर्ग में रूपांतरण के पहले चरण में ही नहीं हुआ, बल्कि यह संस्कारगत एवं अनुवांशिक वजहों से उसकी अगली पीढ़ी तक भी जारी रहा।
    नवउदारवादी दौर में जितनी तेजी से कॉलोनियों और औद्योगिक शहरों का विस्तार होना शुरू हुआ है उतनी ही तेजी के साथ आदिवासी समाज का औपनिवेशीकरण तेज हुआ है। नवउदारवादी भारत की कथित 'विकासÓ की परिभाषा में आदिवासी समाज के प्रति भयानक संवेदनहीनता बरती जा रही है। इस कथित 'विकासÓ ने अब सीधे रूप में आदिवासियों के सवालों को और उनके स्वर को सुनना बंद कर दिया है। अब आदिवासियों के लिए एक ही बात सामने है कि यदि आप सहमत हैं, तो हमारे साथ 'हांÓ मिलाइए, अन्यथा आप 'देशद्रोहीÓ समझे जाएंगे, क्योंकि आप देश के 'विकासÓ में बाधक हैं।आदिवासी समाज की अलग सांस्कृतिक विशिष्टता की बात करते हुए बाहरी समाज उस पर रीझ तो जाता है, लेकिन वही समाज जब अपनी उसी विशिष्टता के साथ जीने के लिए अपना हक मांगता है, तो उसे असामाजिक माना जाता है। ऐसा कर वह आदिवासी समाज की विशिष्टता को ही स्वीकार नहीं करता, बल्कि संवैधानिक व्यवस्थाओं को भी नकारता है। बाहरी समाज का आदिवासी समाज के प्रति यह ब्राह्मणवादी व्यवहार ही है। 
    दूसरा नजरिया आदिवासी समाज को आर्थिक रूप से पिछड़े समाज के रूप में चिह्नित करने का रहा है। खास तौर पर वामपंथी-प्रगतिशील विचारधाराओं का यह नजरिया भी आदिवासी समाज की वस्तुगत परिस्थितियों के आधार पर नहीं है, बल्कि बाह्य अवधारणाओं का ही आरोपण है।  आज के नव-बाजारवादी दौर में आदिवासी समाज के जिस 'विकासÓ की बात कही जा रही है, वह आदिवासी समाज को भी एक उपभोक्ता के रूप में बाजार में उतारने की है। इसी ने आदिवासी समाज की अस्मिता और अस्तित्व को संकट की स्थिति में ला खड़ा किया है। इन्हीं संदर्भों में आज के आदिवासी-प्रश्न का वैश्विक संदर्भ उभरता है, जो मौजूदा 'विकासÓ और 'सभ्यताÓ को फिर से परिभाषित और विश्लेषित करने की मांग करता है। https://www.prabhatkhabar.com/

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Posted Date : 18-Jan-2019
  • शिवप्रसाद जोशी

    भारत के 90 सांसदों और 160 शिक्षाविदों, सिविल सोसायटी के सदस्यों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, किसान नेताओं और संस्कृतिकर्मियों के एक समूह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिठ्ठी लिखी है। इस चिठ्ठी में ग्रामीण रोजगार की विराट परियोजना मनरेगा को बंद न करने और उसकी फंडिंग की किल्लत को दूर करने का आग्रह किया गया है।  साथ ही कहा गया है कि सरकार को मौजूदा ग्रामीण और कृषि संकट से निपटने के लिए किए जा रहे उपायों में मनरेगा को भी शामिल करना चाहिए।
    बताया जाता है कि वित्तीय वर्ष के खत्म होने से तीन महीने पहले ही पहली जनवरी को मनरेगा का 99 फीसदी फंड खत्म हो चुका है। चि_ी में कहा गया है कि बजट आवंटन में रुकावटें, भुगतान में देरी और मानदेय में कटौती जैसे मुद्दे इस योजना को बर्बाद कर रहे हैं और लोग संकट में हैं।
    खेती किसानी से होने वाली आय में गिरावट, बढ़ती हुई गैर बराबरी और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी ने लोगों को भारी मुसीबतों में धकेल दिया है। मनरेगा पर सत्ता अभिजात के बढ़ते हमलों की निंदा करते हुए अपील की गई है कि इस समय मनरेगा को चौतरफा हमलों से बचाए जाने की जरूरत है न कि उसकी ओर से आंख मूंद लेने की। आरबीआई के आंकड़ों में कहा गया है कि जीडीपी प्रतिशत मे मनरेगा को मिलने वाला बजट 2010-11 में 0.51 प्रतिशत से घटकर 2017-18 में 0.38 प्रतिशत रह गया है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के मुताबिक रोजगार से जुड़े 40 फीसदी परिवार अनुसूचित जाति (एससी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों से हैं।
    ग्रामीण महिलाओं की बढ़ी हुई भागीदारी भी मनरेगा का एक उजला पक्ष है। इस योजना के अंतर्गत समान काम के लिए समान मानदेय की व्यवस्था है। मनरेगा से आर्थिकी को एक लाभ ये भी बताया जाता है कि सौ रुपये का खर्च 400 रुपये के लाभ में तब्दील हो सकता है। लेकिन पिछले तीन चार वर्षों से देश के विभिन्न हिस्सों से मनरेगा के भुगतान में देरी या कटौती की खबरें भी मिली हैं, कहीं भ्रष्टाचार और दलालों का बोलबाला है तो कहीं काम नहीं है कि तख्तियां लग चुकी हैं।
    मामले का दूसरा पहलू ये है कि मनरेगा के बहाने खेती की अवहेलना हो रही है और किसानों को अपने ही घर में मजदूर बना दिया गया है। बेशक कुछ समस्याएं और मुद्दे पेंचीदा जरूर हैं। खराबी क्रियान्वयन में हो सकती है लेकिन अपनी अवधारणा में मनरेगा एक कल्याणकारी और ग्रामीण इलाकों को आत्मनिर्भर बनाने वाली योजना है। मनरेगा की संकल्पना से जुड़े ज्यां द्रेज जैसे अर्थशास्त्री भी उसमें सुधार की बात कह चुके हैं। लेकिन उसे व्यर्थ बताने वाली कॉरपोरेट और सत्ता की लॉबियां इन वर्षों में लगातार सक्रिय रही हैं जो उसे देश की आर्थिकी पर बोझ बताने की हद तक जाती हैं।  मनरेगा की निराशा के बीच ग्रामीण इलाके खेती के लिहाज से भी बदहाल हैं। पैदावार के लागत मूल्य का एक सीधा सा सवाल आजाद भारत में आज तक टेढ़ा ही बना हुआ है- उत्पादन मूल्य से लेकर किसानों को दिए जाने वाले कर्ज तक एक से एक आर्थिक दुश्वारियां बताई जाने लगती हैं लेकिन न उन्हें उचित दाम मिलता है न उचित पर्यावरण। किसान को अर्थव्यवस्था में एक व्यर्थता बताने की कोशिश की जा रही है।
    किसानों की कर्ज माफी के सवाल पर सरकारें और राजनीतिक दल वोट केंद्रित रणनीति बनाते बिगाड़ते हैं, बैंक कर्ज माफी पर हड़बड़ाने लगते हैं और अर्थव्यवस्था के ढह जाने का रुदन सुनाई देने लगता है। लेकिन यही कर्ज माफी जब बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट जगत के लिए होती है तो उस पर चुप्पी साध ली जाती है। एक आंकड़े के मुताबिक उद्योगपतियों का मई 2018 में खत्म होने वाली तिमाही तक करीब 10 करोड़ 17 लाख रुपये के कर्ज को एनपीए यानि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में फंसे कर्ज की श्रेणी में डाल दिया गया था। जबकि पूरे देश में विभिन्न राज्य सरकारों ने अब तक किसानों का करीब एक करोड़  84 लाख रुपये का कर्ज ही माफ किया है।
    इस बीच किसानों के हालात भी बदतर हुए हैं। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी दिसंबर के होलसेल प्राइस इंडेक्स (डब्लूपीआई) के आंकड़ों के मुताबिक, प्राथमिक खाद्य पदार्थों का डब्लूपीआई जुलाई 2018 से लगातार नकारात्मक रहा है। यानी कीमतें लगातार गिरी हैं। हाल की किसान महारैली, जुलूस और आंदोलनों के पीछे यही आक्रोश था।
    हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में बीजेपी सरकारों के पतन के पीछे भी इसी आक्रोश को एक बड़ी वजह माना गया। सरकार की प्रमुख खाद्यान्न व्यापार एजेंसी, नेफेड का कहना है कि 30 हजार करोड़ रुपये की दाल खरीदकर भी किसानों को उनकी लागत का मूल्य चुकाया नहीं जा सका है। कई दालों की कीमतें, न्यूनतम सर्मथन मूल्य से गिर गई हैं। नाफेड की मानें तो इसका कारण है बाजार में खरीद को लेकर उत्साह की कमी। बाजार नोटबंदी के बाद से कराह रहा है। किसानों पर दोतरफा मार पड़ी है। न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा है, अपना माल वो सस्ता बेचने, और अन्य चीजें महंगी खरीदने पर विवश हैं।
    ऊंची और उससे भी ऊंची जीडीपी वृद्धि के लिए लालायित सरकारें, इस वास्तविकता की अनदेखी करती आई हैं कि खेती की उपज में एक फीसदी की बढ़ोत्तरी, औद्योगिक उत्पादन में 0.5 फीसदी की बढ़ोत्तरी करती है। ये निर्विवाद तथ्य है कि देश की औद्योगिक वृद्धि, ग्रामीण क्षेत्र की वृद्धि में निबद्ध है। एक बात ये भी है कि कृषि पर जो सार्वजनिक संसाधन झोंके गए हैं उनमें निवेश का हिस्सा बहुत कम है। इसलिए कृषि संकट तमाम कोशिशों और छिटपुट तात्कालिक उपायों के बावजूद बना हुआ है।
    सीधे शब्दों में किसानों को मौजूदा आर्थिकी में टिके रहने की न सिर्फ जगह चाहिए बल्कि उसके लिए संसाधन और सुविधा भी चाहिए। ये उन पर दया नहीं बल्कि उनका अधिकार लौटाने की, देर आए दुरुस्त आए जैसी अक्लमंदी होगी।
    (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 18-Jan-2019
  •  प्रियदर्शन

    यह देखना दिलचस्प है कि जो लोग अब तक सामाजिक आधार पर आरक्षण को प्रतिभा के विलोम की तरह देखते रहे और इसे भारतीय व्यवस्था का नासूर मानते रहे, वे अपील कर रहे हैं कि गरीबों के हक की ख़ातिर यह आर्थिक आरक्षण मान लिया जाए- बिना यह बताए कि हर महीने 65,000 रुपये कमाने वाले लोग किस कसौटी से गरीब कहलाएंगे। वे बस 10 फीसदी आर्थिक आरक्षण को गरीबों का जायज़ हक मानकर इसे नौकरियों और शिक्षा में जल्द से जल्द लागू करने के हक में हैं। निजी क्षेत्र की नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में भले अब तक किसी भी तरह का सामाजिक आरक्षण लागू न हो पाया हो, लेकिन अब वहां भी आर्थिक आरक्षण देने की हड़बड़ी दिख रही है। कुछ राज्य सरकारों ने आर्थिक आधार पर आरक्षण का कानून पास होते ही इसे अमल में लाने का फ़ैसला भी कर लिया है। और अब मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि देश के 900 सरकारी विश्वविद्यालयों और 40,000 कॉलेजों में आर्थिक आरक्षण बिल्कुल इसी साल से लागू हो जाएगा। यही नहीं, करीब 350 निजी विश्वविद्यालयों और 25,000 से ज़्यादा कॉलेजों में भी इसी साल से आरक्षण की व्यवस्था लागू करने के लिए कानून लाया जाएगा।
    प्रकाश जावड़ेकर यहीं नहीं रुके, उन्होंने दो और घोषणाएं कर डालीं। उन्होंने कहा कि इन तमाम जगहों पर 25 फीसदी सीटें बढ़ाई जाएंगी, ताकि पहले से चले आ रहे आरक्षण पर कोई असर न पड़े। इसके लिए इन संस्थानों की क्षमता भी बढ़ाई जाएगी। एक-एक कर इन सारी घोषणाओं के पीछे का सच देखें। जिन सरकारी संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण के लिए 25 फीसदी सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव है, क्या वहां का बुनियादी ढांचा इस लायक है कि वह इस अतिरिक्त बोझ का वहन कर सके? अब तक लगभग सारी रिपोर्ट बताती हैं कि इस देश के ज़्यादातर शिक्षण संस्थानों में मौजूदा छात्रों को ही समुचित शिक्षा दे पाने के इंतज़ाम नहीं है। विदेशों के बड़े विश्वविद्यालयों के मुकाबले हमारे यहां छात्र-शिक्षक अनुपात बिल्कुल दयनीय है - कहीं-कहीं तो हास्यास्पद। सरकार शिक्षकों का यह मौजूदा कोटा ही नहीं भर पा रही। यही नहीं, शिक्षकों की नियुक्ति में जिस सामाजिक कोटे का ध्यान रखा जाना है, वह भी किसी को हासिल नहीं हो रहा। तो फिर अचानक छह महीनों में 25 फीसदी अतिरिक्त सीटों के लिए पैसे जुटा लिए जाने का जादू फिर कैसे घटित होगा? अचानक सरकार कितनी सारी नियुक्तियां कर लेगी, कितने नए क्लास रूम बना लेगी, कितने सारे अतिरिक्त कर्मचारी रख लेगी? यहां तो आलम यह है कि सरकारी नियुक्तियों के लिए रुटीन में जो पद निकाले जा रहे हैं, उन्हें भरने में बरसों लग जा रहे हैं।
    लेकिन फिर सरकार 25 फीसदी सीटें बढ़ाना ही क्यों चाहती है? वह मौजूदा छात्रों में ही आरक्षण क्यों नहीं देना चाहती? उसकी दलील है कि मौजूदा कोटे पर असर न पड़े, लेकिन आर्थिक आरक्षण का जो संविधान संशोधन विधेयक पारित किया गया है, उसमें यह बहुत स्पष्ट उल्लिखित है कि यह आरक्षण मौजूदा सामाजिक आरक्षण से अलग होगा। ज़ाहिर है, सरकार को मौजूदा कोटे की फिक्र नहीं, उन अगड़ों की है, जिनकी कुछ सीटें तथाकथित गरीब अगड़े ले उड़ेंगे। ज़ाहिर है, सरकार का यह हड़बड़ाया, आधा-अधूरा दख़ल पहले से पस्तहाल और साधनवंचित सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को कुछ और बदहाल करके छोड़ देगा, वहां डिग्रियां भले ही बंटनी शुरू हो जाएं, लेकिन शिक्षा का कुछ और तमाशा बन जाएगा।
    मामला सिर्फ सरकारी शिक्षण संस्थानों का नहीं है। अब तक सरकार ने इस बात की परवाह नहीं की कि निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों में सामाजिक आधार पर - एससी-एसटी या पिछड़े वर्गों को - आरक्षण की बाध्यता क्यों नहीं है। इन तमाम निजी संस्थानों में कहीं भी आरक्षण नहीं है, लेकिन अब चूंकि यहां 10 प्रतिशत आर्थिक आरक्षण की व्यवस्था का कानून बनाया जा चुका है, इसलिए जरूरी है कि यहां भी सामाजिक आरक्षण लागू हो। इसके लिए सरकार बजट सत्र में बिल लाने की बात कर रही है। उसे दरअसल सामाजिक आरक्षण की नहीं, आर्थिक आरक्षण की फि़क्र है। क्योंकि उसे मालूम है कि इन निजी संस्थानों में शिक्षा की फ़ीस इतनी ज़्यादा है कि ज़्यादातर पिछड़े तबकों के लोग उसका वहन ही नहीं कर सकते। लेकिन फिर आर्थिक आधार पर कमज़ोर लोग कैसे करेंगे? सरकार उन्हें आरक्षण तो दिला देगी, लेकिन क्या उनकी फीस भी भरेगी? या फिर निजी संस्थानों से उनकी फ़ीस माफ़ी का आग्रह करेगी? और क्या निजी संस्थान इसे मानेंगे? शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण का फ़ैसला वैसे भी अदालती मुकदमों में उलझा हुआ है। तो सरकार आखऱि चाहती क्या है? क्या उसकी हड़बड़ाई हुई कोशिशें चीज़ों को और नहीं बिगाड़ेंगी? और क्या निजी क्षेत्रों के शिक्षण संस्थान सीटें बढ़ाएंगे, तो अपने यहां नियुक्तियां भी बढ़ाएंगे? या वे पहले की तरह ही अपने शिक्षकों को मान्य कसौटियों से कम पैसे पर नियुक्त करेंगे और जब चाहेंगे, उन्हें निकाल देंगे?
    दरअसल भारत में पूरी शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा की विडम्बनाएं बहुत गहरी हैं। जिस तरह प्राथमिक शिक्षा में सरकार अपना निवेश बढ़ाने को तैयार नहीं है और निजी क्षेत्र के हाथ सब कुछ सौंप रही है, वही काम उच्च शिक्षा में भी होता दिख रहा है। हम लगातार एक रुग्ण शिक्षा-व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें एक तरफ तो साधनों से लाचार सरकारी संस्थान हैं और दूसरी तरफ सरोकारों से वंचित निजी संस्थान, जिन्होंने शिक्षा को दुकानदारी में बदल डाला है। शिक्षा कहीं से सरकार की प्राथमिकता सूची में नहीं दिखती। शिक्षा उसके लिए नौकरियों की तरह ही बस एक ज़रिया है, जिससे वह अलग-अलग वर्गों को लुभाने की कोशिश कर रही है। उसके ताजा फ़ैसले शिक्षा की इन विडम्बनाओं को कुछ और बढ़ाएंगे ही, यह अंदेशा बेमानी नहीं है। (ब्लॉग से)
     (सीनियर एडिटर एनडीटीवी इंडिया)
     

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Posted Date : 18-Jan-2019
  • यह तो काफी समय से माना जाता रहा है कि आपकी तोंद में जमा चर्बी आपके हृदय के लिए बुरी होती है मगर अब पता चल रहा है कि यह दिमाग के लिए भी बुरी होती है। युनाइटेड किंगडम में किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि जो लोग मोटे होते हैं और जिनकी कमर और कूल्हों का अनुपात अधिक होता है उनके मस्तिष्क का आयतन कम होता है। कमर और कूल्हे का अनुपात तोंद की चर्बी का द्योतक माना जाता है। अध्ययन में खास तौर से यह पता चला है कि तोंद की चर्बी का सम्बंध मस्तिष्क के ग्रे मैटर के कमतर आयतन से है।
    न्यूरोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता, लफबरो विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ स्पोर्ट्स, एक्सरसाइज़ एंड हेल्थ के मार्क हैमर का कहना है कि बड़ी संख्या में लोगों के अध्ययन के बाद पता चला है कि मोटापे का सम्बंध मस्तिष्क के सिकुडऩे से है। गौरतलब है कि मस्तिष्क के कम आयतन यानी मस्तिष्क के सिकुडऩे का संबंध याददाश्त में गिरावट और विस्मृति से देखा गया है। इस अध्ययन में यू.के. के 9600 लोगों के बॉडी मास इंडेक्स तथा कमर और कूल्हों का अनुपात नापा गया था और एमआरआई के द्वारा उनके मस्तिष्क का आयतन नापा गया था। अध्ययन में शामिल किए गए लोगों की औसत उम्र 55 वर्ष थी। शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन में भाग लेने को जो लोग तैयार हुए वे आम तौर पर स्वस्थ लोग थे। इसलिए इसके परिणामों को फिलहाल पूरी आबाद पर लागू करने में सावधानी की ज़रूरत है। 
    वैसे यह बात ध्यान देने की है कि उपरोक्त अध्ययन में मोटापे और मस्तिष्क के आयतन के बीच जो सह-संबंध देखा गया है वह कार्य-कारण सम्बंध नहीं है बल्कि मात्र इतना है कि ये दोनों चीज़ें साथ-साथ होती नजऱ आती हैं। अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि मोटापे से मस्तिष्क सिकुड़ता है। यह भी संभव है कि मस्तिष्क के कुछ हिस्सों के सिकुडऩे से मोटापा बढ़ता हो।
    वैसे तोंद में जमा चर्बी अन्य मामलों में भी हानिकारक है। पहले कुछ अध्ययनों से पता चल चुका है कि तोंद की चर्बी की बढ़ी हुई मात्रा का संबंध हृदय रोगों से है। इसके अलावा इसका सम्बंध टाइप 2 डायबिटीज़ तथा उच्च रक्तचाप से भी देखा गया है। (स्रोत फीचर्स)

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Posted Date : 17-Jan-2019
  • आर.राजागोपालन, वरिष्ठ पत्रकार

    कर्नाटक का राजनीतिक ड्रामा लोकसभा चुनावों का एक ट्रेलर है- गठबंधन सरकार के गिरने के बारे में राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी ही सुर्खियां हैं। भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपनी योजना की सफलता को सुनिश्चित करना चाहती हैं। भाजपा यह दिखाना चाहती है कि गठबंधन चाहे देश के स्तर पर हो या क्षेत्रीय स्तर पर, इसे टूटना ही है। 
    वहीं कांग्रेस यह जताना चाहती है कि 2019 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं होगा और जनता दल (सेक्युलर) के साथ उसका गठबंधन लोकसभा चुनावों तक रहेगा। 
    लोकसभा चुनाव के लिए जनता दल (सेक्युलर) यानी जेडीएस और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे की बातचीत शुरू होते ही कर्नाटक की राजनीति संकटग्रस्त हो गयी। दोनों दलों में तनातनी दिसंबर के मध्य में ही शुरू हो गयी थी। चूंकि, मुख्यमंत्री पद जेडीएस के पास है, इसलिए कांग्रेस उसे अधिक सीटें नहीं देना चाहती है। जेडीएस ने 28 में से 12 सीटें मांगी है। 
    बातचीत आधे-आधे के बंटवारे से शुरू हुई थी। बंटवारे पर खींचतान का नतीजा यह हुआ कि असंतुष्ट अस्थिरता का खेल खेलने लगे। स्वाभाविक रूप से भाजपा ने इसका फायदा उठाया है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री कुमारस्वामी पर किसानों की कर्जमाफी जैसे अपने वादे को पूरा करने का दबाव बनाया था। 
    इसमें सिर्फ 800 किसानों के कर्ज माफ हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने जेडीएस पर तंज किया कि कर्नाटक सरकार चुनावी घोषणापत्र को लागू करने में असफल रही है। इस घटनाक्रम से कांग्रेस के पैर उखड़ गये। कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने अपनी बाजी भी खूब खेली। इसी तरह से भाजपा के येदियुरप्पा भी सरकार गिराने की कोशिशों में शामिल हो गये।  
    पुत्र के राज्य में मुख्यमंत्री बनने से पिता देवगौड़ा प्रधानमंत्री पद के सपने देखने लगे। यह भी कांग्रेस के लिए एक बड़ी समस्या है कि पिता और पुत्र को कैसे संभाला जाये। लखनऊ में अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव तथा हैदराबाद में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के बेटे केटी राव और वाइएसआर कांग्रेस के नेता जगन रेड्डी जैसे युवा नेता लोकसभा सीटों के बारे में बैठकें कर रहे हैं, लेकिन कर्नाटक में कोई युवा चेहरा नहीं है। 
    मंत्री पद के लिए पुराने चेहरे ही आपस में भिड़े हुए हैं। कर्नाटक कांग्रेस के लिए लोकसभा सीटों पर समझौता चिंता का विषय नहीं है, वह सिर्फ इस लचर गठबंधन को आम चुनाव तक खींचना चाहती है। 
    कर्नाटक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व की विचारधारा का आधार है। राज्य में पहले भाजपा सरकार होने का श्रेय संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं को जाता है। लेकिन, वहां हिंदू चरमपंथ के विरोध में भी मजबूत ताकत मौजूद है। अल्पसंख्यकों की राज्य में बड़ी संख्या है। बंगलुरु में ही मुस्लिम आबादी के घनत्व और हिंदुत्व की भावना बढऩे से कांग्रेस का संगठनात्मक आधार घटता गया और जेडीएस जैसी तीसरी ताकत का उभार हुआ। कर्नाटक की राजनीति में मौजूदा संकट इस विचारधारात्मक मतभेद से भी सीधे तौर से जुड़ा हुआ है। 
    साल 2018 में कर्नाटक के मतदाताओं ने कांग्रेस के खिलाफ जनादेश दिया था। भाजपा को बड़ी जीत मिली थी। लेकिन, कांग्रेस ने पिछले दरवाजे से घुसकर कुमारस्वामी को सरकार बनाने के लिए उकसाया। दोनों पार्टियों के समर्थक अभी तक किसी स्पष्ट समझदारी पर नहीं पहुंच सके हैं। 
    सरकार गिराने के खेल का यह सार-संक्षेप है। डीके शिवकुमार जैसे असंतुष्ट कांग्रेस नेता, जो मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी लाचार हैं। या तो वे आंसू बहाते हैं या खुलेआम कहते हैं कि ईश्वर ही कर्नाटक को बचा सकता है। दोनों ने राज्य की राजनीति की गति को रोक दिया है। आखिर देवगौड़ा को राज्य-प्रशासन में क्यों हस्तक्षेप करना चाहिए? उन्हें पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव को कानून-व्यवस्था के बारे में चर्चा करने के लिए अपने घर क्यों बुलाना चाहिए? मुख्यमंत्री कुमारस्वामी पिता द्वारा अपने अधिकारों के हनन को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? कांग्रेस के नेता इन बातों से चिंतित हैं। 
    अब वे दो सवाल, जो कर्नाटक के लोगों के दिमाग में हैं- क्या कुमारस्वामी सरकार बचेगी? क्या जेडीएस और कांग्रेस के बीच कोई समझौता हो सकेगा? राज्य की नौकरशाही और प्रशासन ठप्प पड़े हुए हैं। 
    कर्नाटक की राजनीति का एक पर्यवेक्षक होने के नाते यह लेखक इतना जरूर कह सकता है कि जो भी हो रहा है, वह विचारधारात्मक मुद्दों की राजनीति नहीं है, बल्कि जाति और धर्म पर आधारित है। लिंगायत और वोक्कालिगा जैसी प्रभावशाली जातियां भी राजनीति द्वारा प्रेरित होकर जिला स्तर पर हस्तक्षेप करती हैं। 
    कांग्रेस नेतृत्व की नजर चुनावी फंड पर थी, जो किसी तरीके से सरकार गठन का बड़ा कारण था। बीते छह महीने में कांग्रेस को कुछ खेमों से चुनावी धन मिला भी है। लेकिन, इसी बीच कांग्रेस के हाथ में तीन सरकारें- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान- और आ गयीं। 
    अब लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के पास धन की कमी नहीं है। निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस की रुचि कुमारस्वामी प्रयोग को जारी रखने में नहीं है। इसी कारण सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस इस गठबंधन और सरकार की राह में रोड़े अटका रही है। कर्नाटक को स्थायी सरकार चाहिए और लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी होने चाहिए, ताकि लोग नये चेहरे और नया गठबंधन चुन सकें।   https://www.prabhatkhabar.com/

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Posted Date : 17-Jan-2019
  •  शशांक, पूर्व विदेश सचिव

    ब्रिटिश संसद की मौजूदा ब्रेग्जिट बिल पर रजामंदी न मिलने से इंग्लैंड में अनिश्चितता का माहौल बन गया है। हर तरफ सवाल यही है कि अब आगे क्या होगा? विश्व राजनीति में ब्रिटेन की हैसियत पर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि लेबर पार्टी के प्रमुख और ब्रिटिश संसद में नेता प्रतिपक्ष जेरेमा कॉर्बिन ने प्रधानमंत्री थेरेसा मे के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आगे बढ़ा दिया है,पर ऐसा नहीं है कि मे के लिए अब सारे रास्ते बंद हो गए हैं। बेशक इस प्रस्ताव के पारित होने का अर्थ होगा, थेरेसा मे का अपनी कुरसी गंवाना, लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री के सामने अब भी कई विकल्प मौजूद हैं। इसीलिए सांसदों के इस एक निर्णय से यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के रिश्तों का फैसला नहीं होने वाला। 
    यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के हटने की अंतिम तारीख 29 मार्च है। ऐसे में, प्रधानमंत्री थेरेसा मे 'प्लान बीÓ के साथ आगे बढ़ सकती हैं, और उन्होंने इसके संकेत भी दिए हैं। मे ने कहा है कि वह विपक्षी नेताओं के साथ 'सकारात्मक बातचीतÓ कर रही हैं, लिहाजा इस बात की संभावना ज्यादा है कि प्रधानमंत्री यूरोपीय संघ से और अधिक रियायतें लेने की कोशिश करेंगी और नए प्रस्ताव के साथ संसद में आएंगी। अगर दूसरा प्रस्ताव भी संसद में पारित नहीं हो पाता, तो सरकार तीसरे विकल्प में अपने लिए उम्मीद खोज सकेगी। मगर यहां मुश्किल यह भी है कि प्रधानमंत्री का समर्थन उनकी पार्टी के कुछ सांसद भी नहीं कर रहे। इसीलिए थेरेसा मे को अपने सांसदों का विश्वास सबसे पहले जीतना होगा।
    तमाम उपायों के बाद भी यदि सरकार ब्रेग्जिट बिल पर संसद का भरोसा नहीं जीत पाती है, तो इस मसले पर फिर से जनमत संग्रह हो सकता है। चूंकि 'ब्रेग्जिटÓ की प्रक्रिया को अगले दो महीने में उसके अंजाम तक पहुंचाना अनिवार्य है, इसलिए जनमत संग्रह फिलहाल एक मुश्किल काम लग रहा है। ठीक यही स्थिति आम चुनाव को लेकर भी है। अव्वल तो ब्रिटेन में 'फिक्स्ड टर्म पार्लियामेंट ऐक्टÓ है, जिसका अर्थ है कि संसद पांच साल की अपनी अवधि पूरी करेगी। लेकिन यदि बीच में ही सरकार के अस्तित्व पर संकट आता है, तो नए चुनाव हो सकते हैं। मगर इससे पहले थेरेसा मे को सांसदों का विश्वास फिर से जीतने का एक मौका दिया जाएगा।
    आगे की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। आम जनता में भी इसे लेकर एक उलझन है। ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से बाहर जाने का फैसला कई कारणों से लिया था, जिनमें से एक बड़ी वजह प्रतिस्पद्र्धा थी। यह प्रतिस्पद्र्धा कई स्तरों पर रही है। मसलन, यूरोपीय संघ के सदस्य होने के नाते यूरोपीय देशों को कई रियायतें देना ब्रिटेन की मजबूरी थी। चूंकि इंग्लैंड आर्थिकी के लिहाज से विश्व का एक प्रमुख ठिकाना है, इसीलिए दूसरे यूरोपीय देशों से अनगिनत प्रतिभाएं ब्रिटेन आ रही थीं। इससे स्थानीय नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर सिमट रहे थे। उन्हें दूसरे यूरोपीय देशों की प्रतिभाओं से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा था और कौशल में अपेक्षाकृत कमतर होने की वजह से उन्हें नुकसान भी हो रहा था। इसी तरह, अमेरिका के नजदीक होने के कारण ब्रिटेन विश्व राजनीति में अपनी एक अलग पहचान की ख्वाहिश भी पाले हुए था।  दरअसल, वह 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों को फिर से जीना चाहता था, जब उसके शासन क्षेत्र में सूरज कभी डूबता नहीं था। मगर यूरोपीय संघ की छाया में उसके लिए उस मुकाम तक पहुंचना संभव नहीं दिख रहा था। तुर्की जैसे नाटो सदस्य देश भी उसकी राह के रोड़े जैसे थे। ब्रिटेन यूरो मुद्रा अपनाने को लेकर भी बहुत संतुष्ट नहीं था। 
    लेकिन जब 'ब्रेग्जिटÓ को लेकर यूरोपीय संघ से बातचीत आगे बढ़ी, तो तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को यह एहसास हो गया कि यूरोपीय संघ उसे आसानी से छोडऩे को तैयार नहीं है। यूरोपीय संघ ने करीब 60 अरब यूरो वापस मांगने की बात कही, जो सब्सिडी आदि पर ब्रिटेन को उसने लाभ पहुंचाया था। 
    फिर स्पेन, आयरलैंड जैसे देश 'मुक्त आवागमनÓ को लेकर ब्रिटेन के दायित्व को खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं। इस तरह की बातें ही ब्रिटिश सांसदों के लिए चिंता का विषय थीं। ब्रिटिश सांसद अब भी अपनी सीमाओं पर नियंत्रण और देश में काम के वास्ते या बसने के लिए आने वाले लोगों की संख्या नियंत्रित करने के पक्ष में दिखते हैं, पर उनका ऐतराज उन दायित्वों को लेकर है, जो यूरोपीय संघ से अलग होने की सूरत में ब्रिटेन के हिस्से में आने की बात कही जा रही है। 
    जनमत संग्रह के बाद से अब तक यह साफ हो चुका है कि यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद भी ब्रिटेन उन दायित्वों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकेगा, जिसके सपने के साथ वहां के लोगों ने जनमत संग्रह का साथ दिया था। इसके अलावा, दूसरे यूरोपीय देशों की भी अपनी मांग है, जिसको पूरा करना ब्रिटेन के लिए जरूरी होगा। हालांकि इन तमाम मसलों में पश्चिम एशिया भी एक अहम कड़ी है, क्योंकि यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के लिए ब्रिटेन पर इसलिए भी दबाव बढ़ा, क्योंकि वहां अस्थिर पश्चिम एशिया से लोगों की आमद बढ़ गई थी। चूंकि तुर्की पर अमेरिका ने दबाव बढ़ा दिया है, इसलिए आशंका यह जताई जा रही है कि सीरिया के बाद तुर्की से भागने वाले लोग ब्रिटेन आ सकते हैं। 
    बहरहाल, भारत इसमें अपनी उम्मीदें देख सकता है। जिस तरह से दुनिया भर में दक्षिणपंथ का उभार हुआ है और शरणार्थियों की समस्या बढ़ी है, उसमें चीन और भारत जैसे एशियाई देश नेतृत्व की भूमिका में सामने आ सकते हैं। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ नए समझौते भी किए जा सकते हैं। हालांकि इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाएं। ऐसा करने पर ही बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत का रुख कर सकेंगी।  https://www.livehindustan.com/

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Posted Date : 17-Jan-2019
  •  विराग गुप्ता

    भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना आंदोलन में लोकपाल को हर मजऱ् की दवा बताया गया। सुशासन और अच्छे दिन के नाम पर आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी  ने दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली, पर लोकपाल का कोई अता-पता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस और उसके बाद ष्टक्चढ्ढ में आधी रात को तख्तापलट की घटना के बाद संस्थाओं में आंतरिक संघर्ष बढ़ता जा रहा है। इन घटनाओं से भारत के लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़े हो गए हैं।
    सुप्रीम कोर्ट में कुल 31 जजों का प्रावधान है, जिनमें पांच पद अभी खाली हैं। सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों के कॉलेजियम ने पिछले 12 दिसंबर को राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नन्दराजोग और दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेन्द्र मेनन को प्रमोट करने का फैसला लिया। जस्टिस लोकुर के रिटायर होने के बाद नए साल में जस्टिस अरुण मिश्रा कॉलेजियम में शामिल हो गए। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में कॉलेजियम ने 6 जनवरी को फिर मीटिंग कर कनार्टक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और दिल्ली हाईकोर्ट के जज संजीव खन्ना को सुप्रीम कोर्ट जज बनाने का फैसला लिया। जस्टिस माहेश्वरी वरिष्ठतम हैं, परंतु पूर्व में जस्टिस चेलमेश्वर ने उन पर गंभीर आरोप लगाए थे, जिन्हें दरकिनार उन्हें सुप्रीम कोर्ट में लाने की राजनीति हो रही है। दूसरी ओर, कम उम्र वाले जस्टिस संजीव खन्ना यदि सुप्रीम कोर्ट जज बने, तो वह अगले चीफ जस्टिस हो सकते हैं, जिस वजह से उनके नाम पर विशेष बहस है। 32 जजों की सीनियॉरिटी को दरकिनार कर जस्टिस संजीव खन्ना को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाए जाने पर न्यायिक जगत में अनेक सवाल खड़े हो रहे हैं। 
    जस्टिस संजीव खन्ना के चाचा जस्टिस एचआर खन्ना को दरकिनार कर श्रीमती इंदिरा गांधी ने जस्टिस एमएच बेग को 1977 में सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया था। आपातकाल की ज्यादतियों के साथ न्यायपालिका की घटनाओं को गैर-कांग्रेसी नेताओं द्वारा लोकतंत्र के लिए कलंक बताया जाता है। अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढा, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज कैलाश गंभीर और एडवोकेट प्रशांत भूषण ने जजों की प्रस्तावित नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं। सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोस्टर होने के साथ क्या मास्टर ऑफ कॉलेजियम भी हैं?
    देश में चपरासी की नियुक्ति के लिए भी सिस्टम बना हुआ है, लेकिन जजों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद और बंदरबांट होती है। जजों की नियुक्ति के लिए आयोग (एनजेएसी) के कानून को सन् 2015 में रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने कॉलेजियम सिस्टम को दागदार बताया। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कॉलेजियम सिस्टम में सुधार के लिए ग्लासनोस्त, यानी खुलापन और पेरेस्त्रोइका, यानी पुनर्निर्माण की बात कही थी। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर, यानी रूशक्क पर अभी तक बदलाव हुए नहीं और चार साल में सुधार की बजाय स्थिति और बदतर हो गई है।
    चुनावी साल में सीबीआई  पर नियंत्रण के लिए घमासान मचा है, जिसके निराकरण में सुप्रीम कोर्ट पूर्णत: विफल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक फैसले से पूर्व जज जस्टिस पटनायक को आलोक वर्मा के खिलाफ  सीवीसी जांच सुपरवाइज़ करने के लिए अधिकृत किया था। आलोक वर्मा के खिलाफ राकेश अस्थाना द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपों को जस्टिस पटनायक ने बहुत प्रामाणिक नहीं माना। दूसरी ओर, जस्टिस एके सीकरी ने उच्चस्तरीय नियुक्ति समिति में पीएम नरेंद्र मोदी के साथ बहुमत से आलोक वर्मा को हटाने का आदेश पारित कर दिया। विपक्ष में रहते हुए अरुण जेटली ने जजों द्वारा रिटायरमेंट के बाद पद हासिल करने पर आपत्ति की थी। जस्टिस सीकरी के मामले पर विवाद होने पर अब सरकार या सुप्रीम कोर्ट इस बारे में कठोर नियम क्यों नहीं बनाती?
    देश में नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार की जांच के लिए सीबीआई का ही सहारा है। भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद सीबीआई से आलोक वर्मा की विदाई कर दी गई है, जबकि दो पूर्व डायरेक्टर भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं।
     इससे ज़ाहिर है कि सीबीआई चीफ की नियुक्ति के लिए बनाई गई विशेष समिति का सिस्टम पूरे तौर पर विफल हो गया है। आलोक वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच करने वाले केंद्रीय सर्तकता आयुक्त (सीवीसी) पर भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं, तो जांच कैसे होगी? सीबीआई  को स्वायत्त बनाने की बजाय पिंजरे का तोता बनाए रखने की जद्दोजहद से पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे आएगी? सरकार और  सीबीआई विफल हो जाएं, तो लोगों को सुप्रीम कोर्ट का आसरा है। राजनेताओं के हस्तक्षेप के बढ़ते दौर में जजों में मचे दंगल से जनता का अदालतों पर भरोसा कम हो रहा है। यह कानून के शासन पर ब्रेक के साथ लोकतंत्र के लिए भी खतरे की घंटी है। https://khabar.ndtv.com
     (लेखक सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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Posted Date : 15-Jan-2019
  • -विभूति नारायण राय
    सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा की चौबीस घंटों की हालिया बहाली और फिर तबादले ने जो यक्ष प्रश्न खड़ा किया है, उसे एक राष्ट्रीय दैनिक में छपे कार्टून से बेहतर समझा जा सकता है। इस कार्टून में प्रधानमंत्री मोदी के हाथ में एक पिंजड़ा है और उसमें बंद तोते के बारे में कार्टूनिस्ट की जिज्ञासा है कि क्या यह भी फीनिक्स की तरह अपनी राख से पुनर्जीवित हो सकता है?  फीनिक्स सिर्फ मिथकों में पुनर्जीवन प्राप्त करता है, वास्तविकता कल्पना से बहुत भिन्न होती है। 
    सीबीआई जैसी किसी संस्था की जान तो उसकी साख में बसती है और पिछले दिनों जिस तरह से उसकी साख पर आघात लगा है, उससे नहीं लगता कि यह संस्था आसानी से उबर पाएगी। एक महीने के दौरान शीर्ष पर परिवर्तन होते ही जैसे अधीनस्थों के तबादले किए गए और फिर उन्हें रद्द किया गया, उनसे यह तो स्पष्ट हो ही गया कि इस प्रतिष्ठित संस्था में गुटबंदी बहुत गहरे पैठ गई है। इसी तरह, अफसरों के सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने से भी साफ है कि संस्था में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।
    कुछ  साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को पिंजड़े में बंद तोते की संज्ञा दी थी, तब किसी को आश्चर्य नहीं हुआ था। लंबे अरसे से वह अपने मालिकों की हां में हां मिलाती आ रही थी और देश इसका अभ्यस्त हो गया था। एक लंबे राष्ट्रीय विमर्श और न्यायिक सक्रियता से सरकार को सीबीआई डायरेक्टर या मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) की नियुक्ति से संबंधित सांविधानिक प्रक्रिया में ऐसे परिवर्तन करने पड़े, जिनसे यह अधिक पारदर्शी या समावेशी बन सके। 
    अब सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति एक कमेटी करती है, जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, लोकसभा में विरोधी दल का नेता व प्रधान न्यायाधीश होते हैं। पेच यह है कि सीबीआई के पर्यवेक्षण का जिम्मा केंद्रीय सतर्कता आयोग को मिला हुआ है और उसके मुखिया सीवीसी की नियुक्ति जो कमेटी करती है, उसके सदस्य होते हैं- प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और नेता, विरोधी दल अर्थात इसमें बहुमत सत्ता दल का ही होता है। स्वाभाविक है कि सीवीसी सरकार की पसंद का अफसर होगा, यानी सरकार का नियंत्रण इस महत्वपूर्ण जांच एजेंसी पर बना रहता है।
    पूरे प्रकरण में सबसे दुखद यह था कि जिस बागवान को उपवन की देखभाल करनी होती है, वही उसकी बर्बादी का बायस भी बनता रहा है। हालांकि इसके लिए सिर्फ मौजूदा सरकार को दोषी नहीं ठहरा सकते। पहले भी सरकारें भी इस बात का खास ध्यान रखती रही हैं कि आने वाला उनके कितने काम का है? इस बार कुछ ज्यादा छीछालेदर इसलिए हुई कि ज्यादा आत्मविश्वास से लबरेज सरकार ने सांविधानिक मर्यादाओं या मीडिया की बहुत परवाह नहीं की। खुद के बनाए डायरेक्टर आलोक वर्मा से जल्दी ही उसका मन भर गया और उसने उनके उत्तराधिकारी के रूप में जिसे चुना, वह इस पद के लिए सर्वथा अयोग्य था। राकेश अस्थाना की छवि अपने काडर में ही काफी विवादास्पद थी। न सिर्फ उनकी ईमानदारी पर प्रश्न चिह्न थे, उनके विरुद्ध खुद सीबीआई में प्रकरण लंबित थे। अखबारी खबरों के मुताबिक, उन्हें सीबीआई में लिए जाने का विरोध आलोक वर्मा ने भी किया था। इसे नजरंदाज करके न सिर्फ राकेश अस्थाना को प्रतिनियुक्ति दी गई, बल्कि उनसे वरिष्ठ अधिकारियों को भी संस्था से बाहर भेज दिया गया। 
    मकसद साफ था, जनवरी 2019 में आलोक वर्मा के रिटायर होने के बाद वरिष्ठतम अधिकारी के रूप में अस्थाना की सीबीआई डायरेक्टर के पद की दावेदारी सबसे प्रबल होती और सरकार उन्हें इस पद पर नियुक्त कराने में सफल भी हो जाती। यह न हो सका, तो सिर्फ इसलिए कि सरकार और शासक दल के महत्वपूर्ण लोगों के समर्थन के प्रति आश्वस्त अस्थाना अपने बॉस से ही भिड़ गए। ज्यादा गरम आलू की तरह सरकार को उन्हें उगलना पड़ रहा है। इस मामले में जिस सतर्कता आयोग की रिपोर्ट पर आधी रात को सीबीआई में तख्ता पलट हुआ और बाद में जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने भी जांच करके रिपोर्ट देने को कहा, उसके मुखिया की विश्वसनीयता तो पहले से ही संदिग्ध थी। आलोक वर्मा ने खुलेआम आरोप भी लगाया है कि सीवीसी के वी चौधरी उनसे राकेश अस्थाना को रियायत देने की सिफारिश लेकर उनके घर पर मिलने आए थे। के वी चौधरी की सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल लिफाफा बंद रपट अब तो अखबारों को भी उपलब्ध हो चुकी है और उसे पढ़कर अधिकांश जन निराश ही होंगे। इस जांच पर नजर रखने के लिए जिन जस्टिस पटनायक को नियुक्त किया था, खुद उन्हें बहुत से तथ्य नहीं बताए गए थे। उनका कहना है कि वर्मा के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध नहीं हैं और सीवीसी की रपट को अंतिम नहीं माना जा सकता।
    देश के प्रतिष्ठित न्यायविदों की सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे कोई बहुत सुखद नहीं हैं। जिन जस्टिस सीकरी को प्रधान न्यायाधीश के स्थान पर आलोक वर्मा के भविष्य पर फैसला लेने वाली कमेटी में भेजा गया था, उन्हें सरकार ने कुछ ही दिनों पहले लंदन के एक ट्रिब्यूनल में नामित किया था, जहां वह मार्च में रिटायर होने के बाद पदभार ग्रहण करते। हालांकि अब खबर है कि जस्टिस सीकरी ने इस पद पर जाने से इनकार कर दिया है।
    अपनी सारी कमियों के बावजूद सीबीआई एक ऐसी विवेचना एजेंसी थी, जिस पर नागरिकों का कुछ विश्वास शेष था। जिन अदालतों ने उसे तोता कहा, वे भी जरूरत पडऩे पर उसी को गंभीर मसले सौंपती थीं। कानून-व्यवस्था राज्य का विषय होने और पुलिस के बेशर्म इस्तेमाल पर पीडि़त पक्ष की तरफ से आम तौर पर मांग की जाती है कि उसका मसला सीबीआई को सौंप दिया जाए। यदि साख ही नहीं बची, तो किस विश्वास से लोग सीबीआई के पास जाएंगे? 
    1940 के दशक में विश्व युद्धों के परिप्रेक्ष्य में सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार से निपटने के लिए दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिश्मेंट के रूप में स्थापित और 1960 के दशक में सीबीआई बनने से लेकर आज तक के सफर में इस संस्था ने बड़े उतार-चढ़ाव झेले हैं, पर इस बार जैसा संकट इसके समक्ष आया है, वह अभूतपूर्व है। यह साख का संकट है और दुर्भाग्य से इसे उसके अपनों ने पैदा किया है। 
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Posted Date : 15-Jan-2019
  • डॉ. विजय अग्रवाल

     यह वह महाद्वीप है, जो दुनिया के कुल देशों के एक चौथाई (50) राष्ट्रों का भौगोलिक क्षेत्र है। इसके पास दुनिया की कुल आबादी के लगभग 11 प्रतिशत (75 करोड़) लोग हैं, जो एशिया महाद्वीप की दूसरी बड़ी जनसंख्या वाले हमारे देश का महज 58 फीसदी ही है। इस महाद्वीप के देशों ने ढाई-तीन सौ सालों तक उपनिवेशवाद के नाम से लगभग पूरी दुनिया पर शासन कर अकूत दौलत इक_ा की है। इस महाद्वीप के देश सीना खोलकर अपनी बहादुरी और वैभव का गान करते थे, तथा गर्दन ऐंठकर अपनी बुद्धिमत्ता का बखान करते हुए उसे दूसरों पर यह कहकर थोपते थे कि हम तुम जैसे असभ्य लोगों पर एहसान कर रहे हैं।
    आज इसी महाद्वीप का सीना सुलग रहा है। इसके एक तिहाई से ज़्यादा देश अनेक तरह के आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों, परस्पर संघर्षों तथा अन्य संकटों से जूझ रहे हैं। यदि इन सभी देशों के आंदोलनों का एक कोलाज बना दिया जाए, तो उसमें उन देशों की संघर्ष गाथा सुनाई दे जाएगी, जिन पर इन्होंने निर्मम शासन किया था, और जिनके स्वायत्तता संबंधी विरोधों को ये राष्ट्रद्रोह कहकर सूलियों पर चढ़ा दिया करते थे।
    ब्रेग्जि़ट को लेकर ब्रिटेन न केवल यूरोप में अपनी भूमिका को लेकर ही संघर्ष कर रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री इसे लेकर अपनी ही पार्टी के सांसदों साथ जूझ रही हैं। उनकी अपनी ही पार्टी के लोगों ने प्रधानमंत्री टेरेसा मे के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया। हालांकि अविश्वास प्रस्ताव तो पारित नहीं हो सका, लेकिन इसके कारण उनकी स्थिति न केवल उनकी अपनी कंजऱवेटिव पार्टी में कमज़ोर हो गई, बल्कि दुनिया की निगाहों में भी।
    दूसरा बड़ा उपनिवेशवादी राज्य फ्रांस पिछले लगभग डेढ़ महीनों से पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स बढ़ाने तथा कई अन्य मुद्दों को लेकर हिंसक विरोधों से जूझ रहा है। सोशल मीडिया की एक छोटी सी मुहिम से इसकी शुरुआत हुई थी और लाखों लोग पीली बनियान (येलो वेस्ट) पहनकर विश्व कला की नगरी पेरिस की सड़कों पर जमा हो गए। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य आर्थिक हताशा और गरीब परिवार के राजनीतिक अविश्वास को अभिव्यक्त करना है। हंगरी की संसद ने 13 दिसंबर को नया श्रम कानून क्या पारित किया कि उसके विरोध में लोग इस कंपकंपा देने वाली सर्दियों में भी रात-दिन प्रदर्शन कर रहे हैं।
    सर्बिया में लोग सरकार की हिंसा के विरोध में हिंसा पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारी विपक्ष के नेता बोर्को पर हुए जानलेवा हमले को सरकार की साजिश बता रहे हैं। अल्बानिया के विश्वविद्यालयों में वार्षिक फीस 160 से 2,560 यूरो तक है। जबकि वहां की औसत आय 350 यूरो प्रतिमाह है। फिलहाल वहां के छात्र सस्ती शिक्षा की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। छात्रों ने देशभर के राज्यमार्गों को जाम कर रखा है। जर्मनी में पर्यावरण को बचाने को लेकर लगातार आंदोलन हो रहे हैं। इसका नेतृत्व वहां की ग्रीन पार्टी कर रही है। इन आंदोलनों के कारण कुछ ही दिनों में इस पार्टी की लोकप्रियता में 10 प्रतिशत की वृद्धि हो गई है।
    इटली की इन दिनों यूरोपीय संघ के साथ कशमकश जारी है। इटली की लोकप्रियतावादी पार्टी ने अपनी जनता से बेरोजग़ारों को न्यूनतम आय देने जैसे लोक लुभावने वादे किए थे। फलस्वरूप यूरोपीय संघ ने इटली के खिलाफ एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए उससे अपने बजट की समीक्षा करने को कहा। पोलैंड और हंगरी की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हुए हमलों ने भी यूरोपीय संघ की उदारवादी बुनियाद के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। केरोलोनिया तो पिछले दो साल से स्पेन से अलग होने के लिए लगातार जूझ रहा है।
    कुल मिलाकर बात यह कि जिस महाद्वीप के देश अपने उदारवादी लोकतंत्र का डंका पीटते हैं, मुक्त बाज़ार व्यवस्था का राग अलापते हैं, अन्य देशों को उनकी आदिम वृत्तियों के लिए फटकारते हैं, वे आज स्वयं अपने ही देश में इन मामलों के लिए कठघरे में खड़े हैं? यहां एक बहुत चिंता पैदा करने वाला प्रश्न यह खड़ा होता है कि फिर किया क्या जाए? ज़ाहिर है, आंखें बंद कर विकसित देशों की व्यवस्था का अनुसरण एवं उनके विचारों का एकतरफा गुणगान दुनिया के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है। https://www.livehindustan.com/blog/

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Posted Date : 15-Jan-2019
  • -ओंकार सिंह जनौटी
    यूरोपीय संघ और अमरीका के पर्यावरण संगठनों ने इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों की मनमानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वे राइट टू रिपेयर यानि मरम्मत करने का अधिकार की मांग कर रहे हैं। यूरोपीय संघ के कई देशों के पर्यावरण मंत्री मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को इससे जुड़े प्रस्ताव भेज चुके हैं। प्रस्तावों में कहा गया है कि निर्माता ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाएं जो लंबे समय तक चलें और आसानी से रिपेयर किए जा सकें।
    प्रस्ताव लाइटिंग, टेलिविजन और लार्ज होम एप्लाइंसेस बनाने वाली कंपनियों को भेजे गए हैं। अमेरिका में भी 18 राज्य राइट टू रिपेयर जैसा कानून लागून करने पर विचार कर रहे हैं।
    मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब तक यूरोपीय संघ के प्रस्तावों का विरोध करती आई हैं। कंपनियों का कहना है कि रिपेयरिंग से जुड़े प्रस्तावित कानून बहुत सख्त हैं और इनसे नई खोजों में बाधा पड़ेगी। 
    वहीं ग्राहक अधिकारों की वकालत करने वालों का आरोप है कि यूरोपीय संघ रिपेयरिंग के मामले में मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर नर्म रुख दिखा रहा है। एक प्रस्ताव के मुताबिक कुछ प्रोडक्ट्स को सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के प्रशिक्षित कामगार ही रिपेयर करेंगे। यूरोपीय पर्यावरण ब्यूरो (ईईबी) के मुताबिक, इसकी वजह से स्वतंत्र मैकेनिक स्पेयर पार्ट्स और जानकारी हासिल नहीं कर सकेंगे। इससे संभावनाएं और किफायती मरम्मत की सीमाएं सीमित होंगी। स्मार्टफोन, टैबलेट और स्क्रीन को भी इसमें शामिल किए जाने की मांग हो रही है।
    एक शोध के मुताबिक 2004 में घरेलू कामकाज की 3.5 फीसदी इलेक्ट्रॉनिक मशीनें पांच साल बाद खराब हो रही थीं। वर्ष 2012 में यह खराबी का अनुपात बढ़कर 8.3 फीसदी हो गया। रिसाइक्लिंग सेंटरों में 10 फीसदी से ज्यादा ऐसी वॉशिंग मशीनें आईं, जो पांच साल से पहले ही खराब हो गईं। यूरोप में बिकने वाले कई लैंपों में बल्ब बदलने का विकल्प नहीं है। एक बल्ब के खराब होते ही पूरा लैंप बदलना पड़ता है। 
    एक अनुमान के मुताबिक 2018 में दुनिया भर में 5 करोड़ टन ई-कचरा जमा हुआ। इस कचरे में कंप्यूटर प्रोडक्ट्स, स्क्रीन्स, स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और हीटिंग या कूलिंग वाले उपकरण सबसे ज्यादा थे। इसमें से सिर्फ 20 फीसदी कचरे की रिसाइक्लिंग हुई, बाकी खुली जमीन या नदियों और समंदर तक पहुंच गए। उत्पादन और कचरा प्रबंधन में बहुत ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में हानिकारक रसायन भी होते हैं जो जमीन और भूजल को भी दूषित करते हैं।
    इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने के मामले में भारत दुनिया का पांचवा बड़ा देश है। भारतीय शहरों में पैदा होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे में सबसे ज्यादा कंप्यूटर होते हैं। ऐसे ई कचरे में 40 फीसदी सीसा और 70 फीसदी भारी धातुएं मिलीं। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 13-Jan-2019
  •   डॉ. राजू पाण्डेय

    जब से हिंदी पट्टी के तीन राज्यों-छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सत्ता परिवर्तन हुआ है और इसके लिए किसानों में व्याप्त असंतोष तथा गुस्से को एक प्रमुख कारण माना गया है तब से किसानों की समस्याओं के प्रति राजनीतिक दल न केवल गंभीर हुए हैं बल्कि पहली बार किसानों को निर्णायक भूमिका निभाने में सक्षम मतदाता-समूह के रूप में चिह्नित कर उन्हें लुभाने और उनके आक्रोश को शांत करने की कोशिशें होती दिख रही हैं। किसान आंदोलन में राजनीतिक दलों का प्रवेश एक आवश्यक परिघटना है और इन राजनीतिक दलों का आश्रय लेना किसानों की विवशता है। 
    किसान आंदोलन को नियंत्रित करने की राजनीतिक दलों की लालसा स्वाभाविक है क्योंकि किसान आंदोलन में प्रवेश कर वे न केवल किसानों की सोच को तात्कालिक आर्थिक राहत प्रदान करने वाले मुद्दों तक सीमित रख सकते हैं बल्कि उनके संतोष अथवा असंतोष को अपनी पार्टी के एजेंडे के अनुसार किसानेतर मुद्दों की ओर मोड़ सकते हैं। प्रमुख राष्ट्रीय दलों के नेताओं के किसानों के समर्थन में दिए जा रहे लच्छेदार भाषणों और बयानों के शोर में वे बुनियादी मुद्दे अनसुने रह जा रहे हैं जिन पर हर उस राजनीतिक दल की स्पष्ट राय जानने की जरूरत है जो आज स्वयं को सबसे बड़े किसान हितैषी दल के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। 
    दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों से यह पूछा जाना चाहिए कि विश्व बैंक एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव में क्या जानबूझकर कृषि क्षेत्र को निरन्तर उपेक्षित नहीं किया जा रहा है? जब रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहते हैं कि सबसे बड़ा सुधार तब होगा जब हम कृषि क्षेत्र से लोगों को निकाल कर शहरों में भेजेंगे क्योंकि इस तरह हम बाजार की सस्ते मजदूरों की आवश्यकता को पूर्ण कर पाएंगे तो क्या वे विश्व बैंक के इस सुझाव के क्रियान्वयन की ओर संकेत कर रहे होते हैं जिसके अनुसार 40 करोड़ लोगों को कृषि क्षेत्र से निकाल कर शहरों में भेजा जाना चाहिए ताकि उद्योगों की श्रमिकों की आवश्यकता पूर्ण हो सके। 
    इसी प्रकार जब देश के तत्कालीन प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन कहते हैं कि कृषि का मशीनीकरण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि कृषि उत्पादन में अनावश्यक रूप से बहुत लोगों के जुड़ाव के कारण उत्पादन लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तब वे विश्व बैंक के इसी एजेंडे के क्रियान्वयन की ओर संकेत दे रहे होते हैं भले ही उनका तर्क कृषि को फायदे का सौदा बनाने के लिए मानव श्रम की अनिवार्यता को कम करने का होता है। 
    अर्थव्यवस्थाओं के आंकलन की वर्तमान विधियों के अनुसार कृषि क्षेत्र की जीडीपी में घटती हिस्सेदारी विकसित अर्थव्यवस्था का द्योतक है। यह कहा जाता है कि ऐसा नहीं है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कृषि क्षेत्र का विकास अवरुद्ध हो जाता है बल्कि उद्योग, निर्माण और सेवा क्षेत्र में तीव्र गति से उन्नति होने के कारण कृषि क्षेत्र की भागीदारी जीडीपी में कम हो जाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी जीडीपी में 50 प्रतिशत थी जो वर्तमान में घटकर 17.32 प्रतिशत रह गई है। जबकि अब औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 29.02 प्रतिशत है। आज जीडीपी में सर्वाधिक 53.66 प्रतिशत योगदान सेवा क्षेत्र का है। आर्थिक विकास के इस मॉडल को कृषि और ग्रामीण विकास विरोधी तथा बेरोजगारी बढ़ाने वाला कहने का साहस हममें से शायद किसी के पास नहीं है।
    भारत में उदारीकरण का प्रारंभ तो 1991 में हुआ लेकिन उसके पूर्व भी हरित क्रांति युग में उन्नत तकनीक के प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादन में होने वाली असाधारण वृद्धि को किसानों की समृद्धि और खुशहाली के पर्याय के रूप में प्रस्तुत करने की भ्रामक चेष्टा होती रही है जबकि समय ने सिद्ध किया है कि उत्पादन में वृद्धि और किसानों की संपन्नता में व्युत्क्रमानुपाती संबंध बनता जा रहा है। हरित क्रांति के दौर से कृषि में प्रविष्ट होने वाले रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और उन्नत बीज कालांतर में कृषि पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण के साधन बने और किसानों की ऋणग्रस्तता एवं किसान आत्महत्याओं का एक बड़ा कारण भी। यह भी एक कटु सत्य है कि वह किसान ही सर्वाधिक ऋणग्रस्त हैं और आत्महत्या को तत्पर हैं जो उन नकदी फसलों के उत्पादन से जुड़े हुए हैं जिन्हें किसानों की अमीरी का निर्विवाद जरिया बताया जाता था।
    वर्तमान में हम जिस आर्थिक मॉडल को अपना चुके हैं वह यूरोप, अमरीका, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में किसानों की बदहाली और बर्बादी के लिए उत्तरदायी रहा है किंतु इस मॉडल को बड़े जोर शोर से खेती की समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। भारत जैसे देश में जहां कृषि से लगभग 60 करोड़ लोग सीधे जुड़े हुए हैं यदि वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के कथित व्यापक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कृषि क्षेत्र को बलिदान कर दिया जाता है तो इसके परिणाम इन लोगों के लिए विनाशकारी होंगे। 
    दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से यह पूछा जाना चाहिए कि कृषि और कृषकों के विकास का कोई अन्य वैकल्पिक मॉडल उनके पास है अथवा नहीं? क्या सत्ता में आने पर ये दल कृषि क्षेत्र में व्यापक निवेश करने को तैयार हैं? कृषि क्षेत्र से रोजगार प्राप्त करने वाली देश की आधी आबादी जब संपन्न होगी, उसकी क्रय शक्ति बढ़ेगी, उसकी जरूरतों में वृद्धि होगी तो क्या देश के आर्थिक विकास को नई गति नहीं मिलेगी? इन राजनीतिक दलों से यह प्रश्न किया जाना चाहिए कि उनकी प्राथमिकता क्या है? कृषि क्षेत्र में निवेश और उसके सुधार की चर्चा उस असंतोष को विस्फोटक रूप लेने से रोकने की रणनीति तो नहीं है जो तीव्र नगरीकरण के फलस्वरूप उत्पन्न होगा। अर्थव्यवस्था के वर्तमान मॉडल में कृषि और ग्रामीण विकास को क्या सौतेली संतानों का दर्जा नहीं दिया गया है जो सरकारों के भेदभाव और अत्याचार से तंग आकर औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के लिए जगह खाली कर रही हैं जिन्हें सगी संतानों का दर्जा प्राप्त है।
    इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि समर्थन मूल्य के निर्धारण और फसल की उत्पादन लागत की गणना का उनका फार्मूला क्या है? क्या यह सच नहीं है फसलों के समर्थन मूल्य के निर्धारण में ग्रामीण उत्पादक के बजाए उस शहरी उपभोक्ता के हितों का ज्यादा ध्यान रखा जाता है जो अधिक सजग है और मूल्य वृद्धि से असंतुष्ट होकर सरकार बदलने का माद्दा रखता है? इन दलों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि निर्धारित समर्थन मूल्य पर भी किसानों की फसल न खरीदे जाने की सर्वव्यापी समस्या के प्रति उनकी असंवेदनशीलता का कारण क्या है? यह कहा जाता है कि किसान को मिलने वाली कीमत और उपभोक्ताओं द्वारा चुकाए जाने वाले मूल्य में जमीन आसमान का अंतर होता है जिसके लिए बिचौलिये उत्तरदायी हैं। इन बिचौलियों को चिह्नित और नियंत्रित करने का प्रयास क्यों नहीं होता? किसानों को अपना उत्पाद सीधे उपभोक्ता को बेचने के मार्ग में आने वाली कानूनी अड़चनों को दूर करने के प्रयास औपचारिक ही क्यों होते हैं?
     इस विषय में किसानों को कानूनी अधिकार देकर उन्हें आवश्यक संरक्षण, प्रशिक्षण और सहयोग देने की कोई गंभीर कोशिश क्यों नहीं होती? किसानों की सारी समस्याओं के समाधान के रूप में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है और इसके मार्ग में आने वाली कानूनी और व्यवहारिक बाधाओं को दूर करने के लिए असाधारण तत्परता क्यों दिखाई जा रही है? कोआपरेटिव फार्मिंग और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में से कौन सी अवधारणा इन दलों की पसंद है और क्यों? यह कहा जा रहा है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कृषि को फायदे का सौदा बना देगी, इससे किसानों को अच्छे दाम मिलेंगे।
     खाद्य संरक्षण और खाद्य प्रसंस्करण की बेहतरीन सुविधाओं के लिए बुनियादी ढांचा तैयार होगा और उपभोक्ता को बेहतर विकल्प और सस्ते दाम मिलेंगे। किंतु क्या यह सच नहीं है कि इससे किसान कृषि भूमि के मालिक से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नौकर बनने की ओर अग्रसर होंगे तथा उत्पादक और उपभोक्ता दोनों की स्वतंत्रता धीरे धीरे इनके पास गिरवी रख दी जाएगी।  देश का 73 प्रतिशत धन 1 प्रतिशत अमीरों के पास है। क्या इन दलों की कृषि नीतियां इन उंगलियों पर गिने जा सकने वाले अमीरों हेतु तैयार की गई हैं? दोनों ही मुख्य राष्ट्रीय पार्टियां उसी पुराने तर्क और तरीके का आश्रय लेती रही हैं जो निजीकरण के लिए प्रयुक्त होता है। कुप्रबंधन को बढ़ावा देकर घाटे को आधार बनाते हुए निजी क्षेत्र को जादुई चिराग की भांति प्रस्तुत करने की रणनीति बासी और बेशर्म हो चुकी है। घाटे में चल रहे सेक्टर निजीकरण के बाद अपने मालिकों को मुनाफा देने लगते हैं। घाटा क्यों और मुनाफा किसके लिए? यह बुनियादी सवाल अनुत्तरित ही रहते हैं।
    कृषि विषयक कोई भी विमर्श कृषि भूमि के स्वामित्व की चर्चा के बिना अधूरा है। कृषि ऋणग्रस्तता पर राधाकृष्ण समिति की रिपोर्ट दर्शाती है कि कृषि भूमि के वितरण में असमानता का आलम यह है कि केवल 10 फीसदी लोगों के पास 54 प्रतिशत भूमि का स्वामित्व है। 60 प्रतिशत किसानों के पास .4 हेक्टेयर से कम कृषि भूमि है और 20 प्रतिशत ऐसे हैं जो लगभग 1.4 हेक्टेयर कृषि भूमि का स्वामित्व रखते हैं। हर राज्य के अपने लैंड सीलिंग एक्ट हैं और इनकी विभिन्नता इन्हें परिपूर्ण नहीं बनाती बल्कि उन चतुर युक्तियों की विशाल रेंज को प्रदर्शित करती है जो विधि विशेषज्ञों ने इस कानून को कमजोर कर इसका दुरुपयोग करने के लिए रची हैं। कमोबेश यही स्थिति भूमि अधिग्रहण कानून की है जिसे किसानों के बजाए उद्योगपतियों के पक्ष में ढालने और क्रियान्वित करने की कोशिशें इतनी जगजाहिर रही हैं कि अब कॉर्पोरेट मीडिया को इनमें इतनी सनसनी भी नजर नहीं आती कि ये सुर्खियां बटोर सकें। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को भूमि सुधार और भूमि के समान वितरण तथा साझा स्वामित्व के संबंध में अपनी नीतियों को सार्वजनिक विमर्श में लाना चाहिए। 
    सीएसडीएस की मार्च 2018 की स्टेट ऑफ इंडियन फार्मर्स शीर्षक रिपोर्ट यह दर्शाती है कि शासकीय योजनाओं से केवल ऐसे बड़े कृषक ही लाभ प्राप्त कर पाते हैं जिनके पास 10 एकड़ या उससे अधिक भूमि है। जबकि 1 से 4 एकड़ कृषि भूमि वाले 90 प्रतिशत कृषक सरकारी योजनाओं के लाभों से बिल्कुल वंचित हैं। जब हम किसान आंदोलनों की प्रकृति और किसान नेतृत्व में प्रतिनिधित्व का विश्लेषण करते हैं तब कभी कभी ऐसा लगता है कि आंदोलन को संचालित करने वाले वे बड़े किसान हैं जो कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश से चिंतित हैं। लघु और सीमांत कृषक तथा भूमिहीन कृषि मजदूर तो चर्चा के दायरे से ही बाहर हैं। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को इस निर्धन और असहाय वर्ग को सरकारी योजनाओं के दायरे में लाने और इन्हें भूमि का स्वामित्व दिलाने संबंधी अपनी कार्य योजना का खुलासा करना चाहिए।
    उन परिस्थितियों को बनाए रखना जो किसानों की ऋणग्रस्तता के लिए उत्तरदायी हैं और इसके बाद चुनावी फायदे के लिए ऋण माफी करना राजनीतिक पार्टियों की निर्मम चुनावी रणनीति का एक भाग रहा है और सत्तारुढ़ तथा प्रमुख विपक्षी दल से यह पूछा जाना चाहिए कि इस समस्या का कोई स्थायी समाधान निकालने की उनकी नीयत है भी या नहीं?
    पिछले चार सालों में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित और नियंत्रित अखिल भारतीय किसान सभा ने अनेक विशाल किसान आंदोलनों को नेतृत्व प्रदान किया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की दक्षिणपंथी विचारधारा का आश्रय लेने वाला भारतीय किसान संघ भी किसानों के बीच अपनी पैठ बनाता दिखता है किंतु स्वदेशी की वकालत करने वाला यह संगठन वर्तमान सरकार के कॉरपोरेट परस्त एजेंडे के सांकेतिक विरोध तक सीमित रह जाता है क्योंकि संकीर्ण राष्ट्रवाद और हिंदुत्व वादी विचारधारा को प्रश्रय देने का लक्ष्य इसकी पहली प्राथमिकता है। किसान हित इस लक्ष्य के सामने गौण और महत्वहीन हैं। वाम दल भी धीरे धीरे इसी सांस्कृतिक युद्ध में विजय को अपना पहला लक्ष्य बना रहे हैं और किसान आंदोलन की समाप्ति विपक्षी एकता का उद्घोष करने वाले ग्रुप फोटोग्राफ के साथ होने लगी है। किंतु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि मंच से किसान हित में जोशीले भाषण देने वाले नेता भी उसी उदारीकरण और वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के सूत्रधार और पैरोकार रहे हैं जो बढ़ती आर्थिक असमानता और किसानों की दुर्दशा हेतु उत्तरदायी है। 
    खेती का सवाल एक ऐसे बहुविकल्पीय प्रश्न में बदल चुका है जिसमें सभी विकल्प एक जैसे ही हैं केवल शब्दों और प्रस्तुति का हेर फेर है। अर्थव्यवस्था के वामपंथी अथवा गांधीवादी मॉडल को खारिज करने के लिए पूंजीवाद समर्थक अर्थशास्त्रियों ने तथ्यों की मनोनुकूल व्याख्या तथा भाषालंकार के कुशल संयोजन द्वारा ऐसा समा बांधा है कि इन विचारधाराओं के समर्थक भी संशय ग्रस्त होते लगते हैं। कृषि भूमि के शासकीय करण, साझा स्वामित्व और कोऑपरेटिव फार्मिंग जैसे प्रयासों की अपनी सीमाएं हैं किंतु इन सीमाओं को दूर करने के स्थान पर इन्हें बढ़ा चढ़ा कर पेश करने की प्रवृत्ति हम सभी पर हावी होती दिखती है। जब तक हम सब एक सशक्त वैकल्पिक आर्थिक मॉडल को तैयार कर उसे क्रियान्वित करने का साहस एवं आत्मविश्वास नहीं दिखाएंगे तब तक किसानों को बदहाली से निजात नहीं मिलेगी। 

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Posted Date : 13-Jan-2019
  • समीरात्मज मिश्र
    उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख पार्टियों- समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने 2019 में लोकसभा चुनाव एक साथ लडऩे का फैसला किया है और दोनों ने 38-38 सीटों पर लडऩे की घोषणा की है। लखनऊ के ताज होटल में एसपी नेता अखिलेश यादव और बीएसपी नेता मायावती ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वे रायबरेली और अमेठी की सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारेंगी और दो सीटें इसलिए छोड़ी जा रही हैं ताकि गठबंधन में अन्य दलों को भी शामिल किया जा सके। हालांकि पहले माना जा रहा था कि इस गठबंधन में कांग्रेस और आरएलडी भी शामिल होंगी लेकिन फिलहाल इनसे दूरी बनाकर रखी गई है। जानकारों का कहना है कि आरएलडी के साथ तो समझौते की बात अभी भी चल रही है लेकिन कांग्रेस गठबंधन में शामिल नहीं होगी, ये तय हो चुका है।
    साल 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिली थीं जबकि बीएसपी को एक भी सीट हासिल नहीं हुई। लेकिन पिछले साल जब फूलपुर और गोरखपुर की लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए तो समाजवादी पार्टी ने ये दोनों सीटें जीत लीं। इन सीटों पर बीएसपी ने उसे समर्थन दिया था। वहीं बाद में कैराना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी आरएलटी उम्मीदवार को एसपी और बीएसपी के अलावा कांग्रेस ने भी समर्थन दिया और गठबंधन की जीत हुई। यहीं से गठबंधन की राह निकल पड़ी।
    करीब 25 साल पहले अयोध्या आंदोलन के दौरान भी बीजेपी को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और बीएसपी प्रमुख कांशीराम ने हाथ मिलाया था। यह संयोग ही है कि इस बार भी इन दोनों दलों के एक साथ आने का कारण भी भारतीय जनता पार्टी ही है। 2014 के लोकसभा चुनाव और फिर 2017 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की इकतरफा जीत ने दोनों ही पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया और फिर उपचुनाव में मिली जीत ने इन्हें एक साथ आने का साहस, ऊर्जा और विश्वास दिया।
    जानकारों का कहना है कि राज्य में जिस तरह से जाति और धर्म के आधार पर मतदान होता है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि दोनों दलों का साथ आना बीजेपी के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। हालांकि बीजेपी अभी भी ये दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह इन सबसे बेफिक्र है।
    दिल्ली में चल रही बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने गठबंधन की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि अब की बार बीजेपी अस्सी में से 74 सीटें जीतेगी। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, अमित शाह का यह कहना ही उनकी चिंता को दिखा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों पार्टियों के पास एक अच्छा खासा जनाधार है। दोनों के ही पास समर्पित मतदाता। परिस्थितियों को देखकर लगता भी है कि दोनों ही पार्टियां अपने वोटों को एक दूसरे को ट्रांसफर कराने में कामयाब होंगी।
    साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 71 और उसकी सहयोगी अपना दल ने 2 सीटें जीतीं थीं। वहीं एसपी के खाते में पांच और कांग्रेस के खाते में सिर्फ दो सीटें ही आई थीं और बीएसपी का खाता भी नहीं खुला था। जहां तक मत प्रतिशत का सवाल है तो बीजेपी और अपना दल को करीब 43 फीसदी वोट हासिल हुए थे।
    यानी, दोनों के मत प्रतिशत में सिर्फ एक फीसद का अंतर था जबकि सीटों के लिहाज से देखें तो राज्य में 41 सीटें ऐसी थीं जहां एसपी और बीएसपी ने मिलकर बीजेपी से ज्यादा वोट हासिल किए थे। माना जा रहा है कि यदि वोटिंग पैटर्न वैसा ही रहा जैसा कि 2014 में था तो सीटों के लिहाज से गठबंधन को बड़ा फायदा तो बीजेपी को भारी नुकसान हो सकता है।
    हालांकि राजनातिक टिप्पणीकारों का यह भी कहना है कि चुनाव में पार्टियों का मिलना या गठबंधन होना गणित के आधार पर नहीं, बल्कि केमिस्ट्री के आधार पर परिणाम देते हैं। राजनीतिक विश्लेषक बद्री नारायण कहते हैं कि चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी वोटों की गणित के आधार पर नहीं की जा सकती।
    उनके मुताबिक, चुनाव परिणाम काफी हद तक उन मुद्दों पर निर्भर करता है जिन पर लोग वोट देते हैं। साथ ही सीट दर सीट उम्मीदवारों की स्थिति पर भी निर्भर करता है। 2014 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी। लोगों ने बदलाव और स्थिर सरकार के लिए वोट दिया। लेकिन अब लोग मौजूदा सरकार के प्रदर्शन के आधार पर वोट देंगे। गठबंधन से दोनों दलों के समर्पित मतदाता तो एक होंगे, वोटों का केंद्रीकरण होगा, इसकी वजह से अल्पसंख्यक मतदाता भी गठबंधन के उम्मीदवारों पर ही दांव लगाएगा, लेकिन हर सीट पर ऐसा जरूरी नहीं है।
    बद्री नारायण कहते हैं कि कांग्रेस, आरएलडी और शिवपाल यादव की नई बनी पार्टी चुनाव में किस स्थिति में रहते हैं, यानी एक साथ आते हैं या फिर अलग-अलग रहते हैं, इसके बाद ही गठबंधन के फायदे और नुकसान के बारे में कुछ भविष्यवाणी की जा सकती है, उससे पहले नहीं।
    दरअसल, इस गठबंधन में शामिल दोनों दलों के पास अपने जाति-आधारित वोट हैं और माना जा रहा है कि ये वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर हो सकते हैं। हालांकि बीएसपी के एक नेता इस पर शंका भी जाहिर करते हैं। उनका कहना है, बीएसपी का वोट तो एसपी उम्मीदवार को या फिर जहां भी मायावती जी कहेंगी, ट्रांसफर हो जाएगा लेकिन एसपी का मतदाता भी बीएसपी उम्मीदवार को वोट देगा, ऐसी उम्मीद करना ठीक नहीं है। राज्यसभा चुनाव में ही देखिए, एसपी के विधायकों ने धोखा दे दिया। तो अब आगे क्या उम्मीद की जाए। 
    हालांकि जानकारों का कहना है कि इन दोनों ही पार्टियों के समर्पित मतदाता बीजेपी सरकार में खुद को इतने पीडि़त और उपेक्षित पा रहे हैं कि गठबंधन के अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं रहेगा। लेकिन ये बात सिर्फ समर्पित मतदाताओं के बारे में ही कही जा सकती है, उस समुदाय के हर वोटर के बारे में नहीं।
    वैसे 1993 के विधानसभा चुनावों में जब एसपी और बीएसपी ने एक साथ चुनाव लड़ा था, तब दोनों के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर हुए थे लेकिन अब ऐसा होना कितना संभव है? वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, कड़वाहट तो दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं में बहुत बढ़ चुकी थी लेकिन दोनों ही देख रहे हैं कि जब उनके नेता एक साथ आ गए हैं तो शायद अब कार्यकर्ता और मतदाता भी साथ आ जाए। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 13-Jan-2019
  • - अनुराग मोदी

    संघ के लिए केंद्र में सत्ता मंजिल की सीढ़ी है, अपने आप में  मंजिल नहीं। उसने भाजपा को दो से अस्सी सीट पर पहुंचाने वाले, राम मंदिर मुद्दे के पुरोधा लालकृष्ण आडवाणी को किनारे कर मोदी के लिए हामी भरने में कोई देरी नहीं की। वो कभी ऐसे किसी भी नेता को मंजूर नहीं करेगा जो उसकी विचारधारा और ताकत से ज्यादा कद्दावर दिखने लगे।
    देश 2019 में होने वाले लोकसभा आम-चुनाव की दहलीज पर खड़ा है। और जैसा लाजमी है- भाजपा नेतृत्व ने अपनी पूरी ताकत इस बात को साबित करने में लगा रखी है कि मोदी का करिश्मा 2014 की ही तरह अभी भी बरकरार है। ऐसे समय में पहली बार पार्टी के अंदर से ही उन पर सवाल उठने लगे है।
    हिन्दी पट्टी के तीन राज्यों में पार्टी की हार के बाद भाजपा नेता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) के नजदीकी नितिन गडकरी ने हाल ही में दो अलग-अलग अवसर पर मोदी और शाह के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए दो बयान दिए।
    पहला बयान, जो उन्होंने 23 दिसंबर को पुणे में दिया, वहां कहा, 'सफलता के कई पिता होते है, वहीं असफलता अनाथ होती है। नेतृत्व में असफलता और हार की जिम्मेदारी लेने की प्रवृत्ति होना चाहिए। और जब-तक वो इसके लिए तैयार नहीं होते, तब-तक संघठन के प्रति उनकी निष्ठा साबित नहीं होती।Ó इसके दो दिन बाद उन्होंने एक और बयान में कहा, 'अगर मैं पार्टी का अध्यक्ष होता, तो पार्टी के एमपी और एमएलए के प्रदर्शन की जिम्मेदारी भी मेरी होती है।Ó
    यह बयान भले ही गडकरी ने दिए हों, लेकिन यह भाजपा उन सारे नेताओं की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जो मोदी-शाह की जोड़ी के चलते पिछले साढ़े चार वर्षों में नेपथ्य में चले गए। उन्हें संघ का भी आशीर्वाद प्राप्त है। अब सवाल यह उठता है, जब भाजपा के यह नेता और संघ यह जानता है कि 2019 में मोदी-शाह की चुनाव जीतने की क्षमता का कोई तोड़ नहीं है, तब वो मोदी-शाह के नेतृत्व पर सवाल क्यों उठा रहे है?
    भाजपा के यह नेता यह जानते है कि अगर मोदी वापस अपने दम पर पूरे बहुमत के साथ सत्ता में आने में सफल हो गए तो अपनी दूसरी पारी में पार्टी पर उनकी पकड़ और मजबूत हो जाएगी, या कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भाजपा पूरी तरह से मोदीमय हो जाएगी और वो सारे के सारे 'मार्गदर्शक मंडलÓ में भेज दिए जाएंगे।
    बीते साढ़े चार वर्षों में मोदी 'कांग्रेस मुक्त भारतÓ भले ही न कर पाएं, लेकिन उन्होंने भाजपा को उनके अलावा अन्य नेताओं से मुक्त जैसा कर दिया है। वो पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं चाहते जिसकी कोई जमीनी पकड़ हो। मगर, भाजपा को सत्ता में आने के लिए जोड़-तोड़ की जरूरत होती है, तो फिर भाजपा के और से गडकरी जैसे अनेक नेताओं की वकत बढ़ जाएगी। इतना ही नहीं उनके अस्तित्व को कांग्रेस के केंद्र में सत्ता में वापस आने से कोई खतरा नहीं है, उल्टा, उससे मोदी-शाह जोड़ी की पार्टी पर पकड़ ढीली होगी और उन्हें वापस पनपने का मौका मिलेगा।
    संघ की शिकायत यह है कि मोदी ने संघ से काफी हद तक हिंदुत्व का मुद्दा भी छीन लिया। मोदी ने हिंदुत्व के मुद्दे की परिभाषा और नेतृत्व दोनों बदल दिया, एक तो, उन्होंने अपने आपको सारे देश में हिंदुत्व का सबसे बड़ा मुखौटा बना पेश कर दिया है, और दूसरा उन्होंने इस काम के लिए योगी आदित्यनाथ के रूप में एक और मुखौटा मिल गया। एक तरह से हिंदुत्व के एजेंडे का नेतृत्व संघ और विश्व हिंदू परिषद के हाथों से निकालकर योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं के हाथ में दे दिया, जो संघ के कैडर भी नहीं है।
    मोदी के लिए अच्छा यह है क्योंकि इस तरह से वो संघ को भी उसकी जगह दिखा पाने में सफल होते है और योगी के पास राष्ट्रीय स्वयं सेवक जैसी कोई संगठनात्मक ताकत नहीं जिसके जरिए वो मोदी-शाह पर कोई दबाव बना सकें।
    इतना ही नहीं, मोदी-शाह ने संघ के 'हिंदू राष्ट्रÓ के मुद्दे को काफी हद-तक गोहत्या और मुस्लिम विरोध तक ही सीमित कर दिया और उन्होंने इस मुद्दे पर एक उग्र भीड़ खड़ी कर दी। संघ के पुराने दौर में गोरक्षा का मुद्दा कभी इतना हावी नहीं था।
    राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे संघ के अनेक मुद्दे पिछले पांच वर्षों से गायब है, यहां तक कि भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार तक  बना ली और संघ देखता रह गया। संघ के स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ जैसे अनेक फ्रंट तो बेमानी से हो गए है।
    मोदी सरकार ने जीएसटी और नोटबंदी जैसे दो बड़े फैसलों के अलावा जिस तरह से ई-कॉमर्स और एफडीआई को बढ़ावा दिया है, उससे संघ की आर्थिक रीढ़ की हड्डी और काफी प्रभावशाली वैश्य समाज नाराज हुआ है और संघ इस मुद्दे पर इस वर्ग की आवाज भी अपनी सरकार तक नहीं पहुंचा पाया, वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौर में स्वदेशी जागरण देशी व्यापारियों के हितों को लेकर काफी मुखर था।
    इसलिए, पिछले छह माह से संघ लगातार अपना अस्तित्व अनेक तरह से साबित करने में लगा है- कभी वो प्रणब मुखर्जी को अपने कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाता है, तो कभी दिल्ली में सभी वर्गों के साथ तीन दिन के लिए सभी वर्गों से संवाद रखते है। आखिरकार, संघ ने पिछले कुछ माह से राम मंदिर का राग वापस अलापा है।
    हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संघ के लिए केंद्र में सत्ता मंजिल की सीढ़ी है, अपने आप में  मंजिल नहीं। संघ ने पचास साल की लंबी मेहनत के बाद जनसंघ से भाजपा तक मोदी के नेतृत्व में बहुमत वाली अपनी सरकार बनाने का सफर तय किया है। वो कांग्रेस की तरह सत्ता में काबिज भर रहने की सोच रखने वाले लोगों का समूह भर नहीं है।
    उसके लिए विचारधारा सर्वोपरि है। उसके लिए बाजपेयी हो या आडवाणी सब एक मोहरा थे, जब उसे लगा कि मोदी के सहारे उसका सपना पूरा हो सकता है, तो उसने भाजपा को दो से अस्सी सीट पर पहुंचाने वाले और राम मंदिर मुद्दे के पुरोधा आडवाणी को बाजू कर मोदी के लिए हामी भरने में कोई देरी नहीं की।
    वो कभी भी ऐसे किसी भी नेता को मंजूर नहीं करेगी जो उसकी विचारधारा और ताकत से भी ज्यादा कद्दावर दिखने लगे। अगर वो ऐसा होने देती है, तो देखते-देखते वो नेता उसपर भी हावी हो जाएंगे और वो भी मार्गदर्शक मंडल की स्थिति में आ जाएगी। और, मोदी-शाह जिस तरीके से काम करते है, वो यह क्षमता रखते है।
    हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह मानता है कि भाजपा और संघ के बीच तनाव की जो खबरें बीच-बीच में आती हैं, उसका कोई बड़ा अर्थ निकालना सही नहीं है, वो मानते है- अंत: मोदी और संघ एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन, यह बाजपेयी और आडवाणी के दौर तक सही था, अब नहीं।
    मोदी और शाह, आडवाणी और बाजपेयी की तरह विचारधारा से चलने वाले नेता नहीं है, वो भले ही कभी संघ के स्वयं सेवक रहे हो, लेकिन आज वो कॉरपोरेट और राजनेताओं के एक ऐसे गुट का प्रतिनिधित्व करते है, जिसके लिए सत्ता की ताकत सबसे जरूरी है। संघ ने भले ही उनके सहारे अपना एजेंडा पूरा करने का सपना देखा हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी के 2014 के चुनाव प्रचार में लगने वाली हजारों करोड़ रुपए की राशि कॉरपोरेट समूह ने अपने एजेंडे के लिए खर्च की थी,  न कि संघ के एजेंडे के लिए।
    और शायद इसलिए 'भाजपा सरकारÓ की बजाए 'मोदी सरकारÓ के नारे पर सहमति हुई। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए, मोदी-शाह ने बाजपेयी और आडवाणी की तरह लंबे समय तक केंद्र की राजनीति में रहकर अपने व्यवहार, वरिष्ठता और वैचारिक क्षमता के दम पर पार्टी में पकड़ नहीं बनाई, बल्कि एक झटके में केंद्र की सत्ता में आकर पार्टी पर अपनी पकड़ बना ली।
    और यह सब संभव हुआ कॉरपोरेट मदद से खड़े किए गए प्रचार तंत्र से। और यह तंत्र अभी किसी और नेता के लिए खड़ा करना संभव नहीं है। आज मोदी-शाह के रूप में सत्ता और पार्टी का मुखिया पद दो जिस्म-एक जान जैसा अपने में समेट लिया और एक तरह से इनकी सत्ता और पार्टी पर उसी तरह की पकड़ हो गई जैसे कभी इंदिरा गांधी की कांग्रेस में थी।
    लेकिन, संघ कभी भी भाजपा को कांग्रेस की राह पर जाते नहीं देख सकता। चाहे उसे इसके लिए कितने भी कड़े कदम क्यों न उठाने पड़े। अब देखना यह होगा कि मोदी-शाह की जोड़ी भले ही कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार न कर पाई हो, लेकिन क्या मोदी-शाह युग के बाद से हाशिए पर पड़े भाजपा के नेताओं और संघ की जोड़ी  2019 में मोदी-शाह को अपनी जगह दिखा पाने में सफल हो पाती है और भाजपा को मोदी-शाह की जकडऩ से मुक्त कर पाती है?
    क्या मोदी-शाह संघ के निर्देशों का पालन कर उसकी ताकत को पुन: स्वीकार करते है? मेरा यह स्पष्ट मानना है कि 2019 का चुनाव सिर्फ कांग्रेस ही नहीं संघ और भाजपा के बचे-खुचे नेताओं का भी अस्तित्व तय करेगा। (द वायर)
    (लेखक समाजवादी जन परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं और मध्य प्रदेश के बैतूल शहर में रहते हैं।)

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Posted Date : 13-Jan-2019
  • - हिलाल अहमद 

    ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी को 'अल्पसंख्यकÓ शब्द से बेहद लगाव है। 'सबका साथ सबका विकासÓ घोषित मंत्र होने के बावजूद पिछले चार वर्षों में बहुसंख्य-अल्पसंख्यक तंत्र ही समुदायों और समूहों को परखने के एकमात्र पैमाने के रूप में स्थापित किया गया है।
    पारसियों को 'आदर्श अल्पसंख्यकÓ बताया गया, महिला वैज्ञानिकों को देश के 'सबसे बड़े अल्पसंख्यकÓ के रूप में चिन्हित किया गया, नागरिकता कानून में बदलाव के लिए कतिपय दक्षिण एशियाई देशों के गैरमुस्लिम धार्मिक समूहों की पहचान 'शोषित अल्पसंख्यकोंÓ के रूप में की गई। दिलचस्प बात यह है कि नए और सुपात्र अल्पसंख्यकों की खोज का यह मुश्किल काम हिंदुत्व की विचारधारा से आया है, जो अल्पसंख्यक की संवैधानिक व्याख्या में खुद को शामिल नहीं कर सकती।
    क्या इसका ये मतलब है कि हिंदुत्व ने अल्पसंख्यकों की राजनीति का एक नया मुहावरा गढ़ लिया है?
    या, यह हिंदू राष्ट्र की परियोजना के आंतरिक विरोधाभाषों को छुपाने का एक प्रयास है?
    हिंदू भी अल्पसंख्यक हैं!
    भाजपा नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने 2017 में सुप्रीम कोर्ट दायर एक जनहित याचिका में मांग की थी कि हिंदुओं को लक्षद्वीप, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, जम्मू कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में अल्पसंख्यक घोषित किया जाए।
    यह दलील दी गई कि हिंदुओं के अल्पसंख्यक अधिकार 'अवैध और मनमाने तरीके से बहुसंख्यक आबादी को दिए जा रहे हैंÓ क्योंकि ना तो केंद्र सरकार ने और ना ही राज्य सरकारों ने इन राज्यों में हिंदुओं को 'अल्पसंख्यकÓ घोषित किया है।
    जनहित याचिका में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून (1992) के अनुरूप पांच धार्मिक समुदायों को 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यकÓ घोषित करने वाली केंद्र सरकार की अधिसूचना को भी चुनौती दी गई है।
    याचिका में उक्त अधिसूचना को निरस्त करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख किया गया है कि अल्पसंख्यक के तौर पर किसी समुदाय की पहचान राज्य स्तर पर ही की जा सकती है। अल्पसंख्यक दर्जे की परिभाषा संबंधी कानूनी खामियों को ही 'हिंदुओं को हाशिये पर डाले जानेÓ के विचार को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
    उदाहरण के लिए, याचिका में हिंदू मानवाधिकार रिपोर्ट 2017 का उल्लेख किया गया कि वोट बैंक की राजनीति के कारण भारत में व्यवस्थित तरीके से हिंदुओं को हाशिये पर डाला जा रहा है। इस दलील पर जोर देने के लिए याचिका में कहा गया। संख्या बल में बहुसंख्य समुदाय का भी अल्पसंख्यकों वाला हाल हो सकता है जैसा कि दक्षिण अफ्रीका के रंगभेदी शासन में अश्वेतों का था। किसी राष्ट्र में संपूर्णता में बहुसंख्यक के रूप में मौजूद एक समुदाय उस राष्ट्र के किसी इलाके में गैर-प्रभुत्व वाली स्थिति में भी हो सकता है। 
    प्रभावशाली 'धर्मनिरपेक्ष यथार्थताÓ ऐसे विचारों की राजनीतिक गहराई में नहीं जाती। हमें याद रखना होगा कि हिंदुत्व प्रोजेक्ट की दिलचस्पी सिर्फ संख्याओं के खेल में ही नहीं है। इसके विपरीत, सोची-समझी रणनीति के तहत हिंदुओं की दुर्बलता की परिकल्पना की जा रही है ताकि बहुसंख्यक होने के बावजूद हिंदुओं के निश्चित रूप से हाशिये पर होने का प्रभावपूर्ण दावा किया जा सके।
    हिंदुओं के हाशिये पर होने का विचार एक बेहद सांप्रदायिक राजनीतिक तंत्र से निकला है, जो कि पिछले कुछ वर्षों, खास कर 1980 के बाद के काल में विकसित हुआ है। कथित रूप से हाशिये पर होने की इस दलील के तीन पहलू हैं जो कि हिंदुत्व समूहों द्वारा सार्वजनिक विमर्श में स्वीकार्यता के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
    पहला, भारत के हिंदुओं को एक समरूप समुदाय के तौर पर देखा जाता है, जिनका एक सुपरिभाषित धार्मिक दर्जा और एक अनूठी एवं अलग संस्कृति है। हिंदुओं की अनेक देवी-देवताओं में आस्था को उन्हें एकमात्र ईश्वर को मानने वालों से अलग दिखाने वाली विशेषता के रूप में पेश की जाती है।
    इसके तहत हिंदुओं के सांस्कृतिक अधिकारों के उल्लंघन का दो स्तरों पर उल्लेख होता है। यह दावा किया जाता है कि हिंदुओं के धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर संख्यात्मक रूप से बहुसंख्यक होने के बाद भी सांस्कृतिक रूप से वे अलग-थलग और शक्तिहीन हैं।
    दूसरी तरफ, कतिपय धार्मिक समुदायों को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक घोषित किया जाना राज्य स्तर पर हिंदू हितों के खिलाफ जाता है। दूसरा पहलू है, हिंदुओं के हाशिये पर होने के पक्ष में मात्रात्मक आंकड़ों और सबूतों को पेश किया जाना।
    हिंदू मानवाधिकार रिपोर्ट 2017 को, जिसे अश्विनी उपाध्याय ने अपनी जनहित याचिका में जमकर इस्तेमाल किया है, इस राजनीतिक रणनीति के उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों द्वारा प्रकाशित दस्तावेजों की तर्ज पर तैयार इस रिपोर्ट में भारत में हिंदुओं के मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं को भी रिकॉर्ड किया गया है। उल्लेखनीय है कि इसमें एससी/एसटी समुदायों के खिलाफ अत्याचार को भी हिंदुओं के खिलाफ अपराध के रूप में दर्ज किया गया है!
    तीसरा पहलू है, हिंदुत्व समूहों का हिंदुओं को हाशिये पर डाले जाने की दलील को सही ठहराने के लिए, खास कर सरकार की दखल को लेकर, दो काल्पनिक राजनीतिक दायरे निर्मित करना।
    आंतरिक दायरे को 'हिंदू आस्था और संस्कृतिÓ के क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसमें दखल देने का सरकार को कोई अधिकार नहीं है। बाबरी मस्जिद और सबरीमाला के मुद्दों पर हिंदुत्व समूहों द्वारा अख्तियार रुख को इसके प्रासंगिक उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है।
    इस बात को जोरदार ढंग से सामने रखा जाता है कि धर्म का आंतरिक पहलू होने के कारण हिंदू आस्था धर्मनिरपेक्ष कानूनों की परिधि से बाहर है। इसके अनुसार, चूंकि सरकार अल्पसंख्यकों के धार्मिक कानूनों में दखल नहीं देती है, इसलिए यह मांग करना वाजिब है कि हिंदू बहुसंख्यकों की आस्था को भी पर्याप्त सम्मान दिया जाए। जबकि, बाह्य राजनीतिक दायरे के संबंध में ये बात लागू नहीं होती, जहां हिंदुत्व खुलकर विधिक-संवैधानिक विमर्श की बात करता है।
    हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग करने वाली जनहित याचिका इस बाह्य-राजनीतिक दायरे को प्रतिबिंबित करती है, जिसमें शासन से निर्णायक कदम उठाने की मांग की जाती है। विगत में मराठों और जाटों को जाति आधारित आरक्षण दिए जाने की मांग को भाजपा का समर्थन भी हिंदुओं को हाशिये पर डाले जाने के तर्क के तहत ही था।
    हिंदुओं को हाशिये पर डाले जाने की दलील के इस तरह रणनीतिक इस्तेमाल से हिंदुत्व समूहों को अपनी राजनीति के इस बुनियादी विरोधाभास से बचने में मदद मिलती है कि काल्पनिक हिंदू गौरव के आक्रामक और हिंसक एजेंडे को छोड़े बिना हाशिये पर पड़े समुदाय का दावा कैसे किया जाए। विश्व हिंदू परिषद का नारा, गर्व से कहो हम हिंदू हैं, इस दुविधा को भलीभांति दर्शाता है। (दिप्रिंट)
    (हिलाल अहमद सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज में राजनीतिक इस्लाम के विशेषज्ञ और एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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Posted Date : 13-Jan-2019
  • हेमंत शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

    कुंभ की त्रिवेणी में नदी नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था बहती है। यही आस्था कुंभ का अमृत तत्व है। जन-आस्था के महाकुंभ से ही समाज चलता है। प्रयाग के इस महाकुंभ में जो दस करोड़ लोग आए, उन्हें किसी ने न्योता नहीं दिया था, न कोई विज्ञापन, न कोई अपील, न मुफ्त भोजन और न ही रहने का इंतजाम। जिंदाबाद के नारे लगाने के लिए उन्हें बसों में भरकर भी नहीं लाया गया, फिर भी हमारी सभ्यता का यह सबसे बड़ा जमावड़ा था।
    तमाम विघ्न-बाधा पार कर मजबूरी की गठरी सिर पर लादे लोग यहां आते हैं। उन्हें वही श्रद्धा यहां तक लाती है, जिस श्रद्धा और निष्ठा से देश चलता है। जो लोग कुंभ को महज एक पोंगा धार्मिक आयोजन समझते हैं, उन्हें न उसका धार्मिक अर्थ समझ पड़ता है, न लौकिक।
    गंगा यहां कितनी भी गंदी हो, यमुना भले कीचड़ हो गई हो। अनंतकाल से सरस्वती यहां लुप्त ही है। इसके बावजूद करोड़ों लोगों की आस्था ही त्रिवेणी को पवित्र और पुण्यदायी बनाती है। गंगा से अपना नाता कोई बावन बरस का है। उसके किनारे जन्मा। वहीं शरीर बना। कामना है, उसी गंगा में यह शरीर नष्ट भी हो। सबसे पहले मैं 1977 के महाकुंभ में गया था। छोटा था, अपनी चाची के साथ गया। मौसी की कुटिया में रहा। तब से हर कुंभ में जाता रहा। मेरे लिए यह चौथा महाकुंभ था। इस बार संगम के किनारे टेंट में एक रोज का 'कल्पवासÓ भी किया।
    साठ वर्ग किमी के दायरे में बसे तंबुओं के शहर में कोई दस करोड़ लोग आए। आप कितने भी तीसमार खां हों, मनुष्य जाति के इस सबसे बड़े मेले में आते ही आपका अस्तित्व खो जाता है। व्यक्तित्व भीड़ का हिस्सा होता है। छत्तीस साल से कुंभ में आते-जाते मेरे लिए कुंभ अब शाश्वत भारत में विलीन हो, उसे समझने का महापर्व है। जातीय और सामाजिक दायरों से मुक्त हमारी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
    कुंभ तो समूचे भारत को जोडऩे का काम शताब्दियों से कर रहा है। पर हमने गंगा के साथ क्या किया। गर्मियों में मैं अपने ननिहाल जाता, इलाहाबाद के बहादुरगंज में। पिताजी के साथ बहादुरगंज से दारागंज पैदल जाना होता। दारागंज का अपना साहित्यिक संसार था। जिसके केंद्र थे पं। श्रीनारायण चतुर्वेदी 'भैया साहब।Ó गंगा की चौड़ाई यहां किलोमीटर में थी।
    अपने पहले कुंभ 1977 में दारागंज से झूंसी तक गंगा का जो पाट मैंने देखा था, गंगा अब वैसी नहीं दिखती। अब गंगा यहां बरसाती नाले सी है, वह भी महाकुंभ के लिए सरकार ने पानी छोड़ा तब। क्या कर दिया हमने इस जीवनदायिनी के साथ? मेरे देखते-देखते गंगा प्रयाग में सरस्वती बनने के कगार पर है। यही हाल रहा तो मेरा बेटा गंगा को वैसे ही ढूंढेगा, जैसे संगम में नहाते वक्त हम सरस्वती को ढूंढ रहे थे।
    समुद्र-मंथन से निकला अमृत देवताओं और असुरों की छीना-झपटी से जिन चार जगहों पर छलका, उन्हीं स्थानों नासिक, उज्जैन, हरिद्वार और प्रयाग में हर तीसरे साल कुंभ आता है। उसी नक्षत्र और घड़ी में एक शहर का नंबर बारहवें साल में आता है। संयोग है कि अमृत के लिए सुरों-असुरों में बारह रोज तक युद्ध चला था।
    देवताओं का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के बराबर है। तब से जब भी सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में और बृहस्पति मेष राशि में आता है तो प्रयाग में महाकुंभ लगता है। सूर्य की गति को कौन रोक सकता है। इसलिए कुंभ अवश्यंभावी है। इस मेले का पहला लिखित वृत्तांत चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत में मिलता है।
    वक्त के साथ सुविधा के औजार कुंभ में भी पहुंचे। टीवी पर एक आधुनिका कह रही थी, 'कुंभ का आधुनिकीकरण हो गया। वहां बाजार पहुंच गया है।Ó कोई यह बता दे कि दुनिया का कौन सा सबसे बड़ा बाजार एक जगह पर दस करोड़ लोगों को इक_ा कर सकता है। जानना चाहिए कि कुंभ से बाजार पैदा होता है, बाजार से कुंभ नहीं। एक जमाना था, जब कुंभ शास्त्रार्थ का केंद्र हुआ करता था। तर्क और ज्ञान से धर्मयुद्ध जीते जाते थे। कुमारिल भट्ट और आचार्य शंकर का शास्त्रार्थ यहीं हुआ था।
    कुंभ को संस्थागत रूप आचार्य शंकर ने ही दिया था। उसके बाद मंडन मिश्र और शंकराचार्य, फिर मंडन मिश्र की पत्नी भारती और शंकराचार्य में शास्त्रार्थ के सूत्र भी यहीं मिलते हैं। वक्त बदला है, संत अब यहां धर्म पर नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री कौन बने, इस पर विचार करते हैं। अब शास्त्रार्थवाले साधु भी नहीं हैं। गोली, बंदूक, बलेरो, सफारी और आईपैड वाले साधु यहां जरूर मिलते हैं।
    दरअसल, त्रिवेणी की सरस्वती प्रतीक है, तीर्थकामी लोगों की। आस्था की सरस्वती नदी क्या कभी प्रयाग में थी भी? यह सवाल बड़ा है। सरस्वती का भी अस्तित्व तो अब विज्ञान प्रमाणित करता है, पर प्रयाग में नहीं। मानसरोवर से निकलकर यह नदी कच्छ के रन तक पहुंचती है। फिर प्रयाग में कैसे इसका प्रवाह? वह तो इस उत्तरी प्रांत में स्वतंत्र जलधारा के रूप में कभी बही भी नहीं।
    कहीं कोई प्रमाण नहीं है कि सरस्वती कभी यहां थी। दरअसल, वह यहां लोक के रूप में मौजूद थी। कुंभ में जनसमुद्र के तौर पर वह बहती है। इसी ज्ञानगोचर संगम में चारों शंकराचार्य और इन पीठों की रक्षा के लिए बने तेरहों अखाड़ों के महामंडलेश्वर के कुंभ में सबसे पहले स्नान की परंपरा है। इन अखाड़ों के प्रशासनिक प्रमुख तो इनके महंत होते हैं, पर उन्हें वैचारिक और आध्यात्मिक आधार महामंडलेश्वर देते हैं।
    इस दफा कुंभ में अक्षयवट के भी दर्शन हुए। अकबर के बनाए किले में यमुना के किनारे यह अक्षयवट बंद है। कहते हैं कि अक्षयवट प्रलय में भी नष्ट नहीं होता, इस पर विष्णु का निवास है। स्वयं भगवान् शिव ने इसे प्रयाग में लगाया था। वनगमन के दौरान राम, लक्ष्मण, सीता ने भी इसके दर्शन किए थे-ऐसा तुलसीदास लिखते हैं। बाद में यह किला सेना का आयुध डिपो बना और अक्षयवट से कूदकर साधु-संत मोक्ष के लिए आत्महत्या करने लगे। 'सुसाइड पॉइंटÓ बनने के बाद इस वट को किले में बंद कर आम लोगों की पहुंच से दूर किया गया, हर बार कुंभ के मौके पर वह खुलता है।
    कुंभ में डुबकी लगा हम लौट आए। गंगा की बदहाली से चित्त विचलित था। गंगा उदास है, प्रदूषित है। इसका पानी लगातार घट रहा है। इस नदी का भी सरस्वती की तरह लोप हो सकता है। नदियों ने महान संस्कृतियां पैदा की हैं। हम उसे नष्ट कर रहे हैं। जिसे हम बना नहीं सकते, उसे मिटाने का हक भी हमें नहीं है। कुंभ से लौटते वक्त हम यह तो संकल्प ले ही सकते हैं कि ऐसी जीवनशैली अपनाएं, जिससे पानी बरबाद न हो और वह जहर न बने। तभी गंगा हमें तार पाएगी। (फस्र्टपोस्ट)
    (यह लेख हेमंत शर्मा की पुस्तक तमाशा मेरे आगे से लिया गया है। पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है।)

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Posted Date : 12-Jan-2019
  • कुबूल अहमद  

    उत्तर प्रदेश की सियासत में मायावती और अखिलेश यादव की संयुक्त प्रेस वार्ता से नई इबारत लिखी है। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को मात देने लिए 23 साल पुरानी दुश्मनी भुलाकर सपा-बसपा सूबे में एक बार फिर गठबंधन की राह पर हैं। 1993 में राम मंदिर आंदोलन पर सवार बीजेपी को हराने वाली मुलायम-कांशीराम की जोड़ी की तरह मोदी लहर पर सवार पार्टी को हराने के लिए अखिलेश-मायावती की जोड़ी बन रही है। हालांकि 1993 से लेकर 2019 तक गंगा-गोमती और यमुना में बहुत पानी बह चुका है। यही वजह है कि माया-अखिलेश वाले इस गठबंधन के लिए 25 साल पहले जैसे नतीजे दोहराना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
    अखिलेश यादव और मायावती कांग्रेस को अलग रखकर सूबे में गठबंधन कर रहे हैं। इसकी घोषणा शनिवार को दोनों नेता अपनी ज्वाइंट कॉफ्रेंस में की। सीट शेयरिंग फॉर्मूला भी तभी सामने आएगा। माना जा रहा है कि सपा 36 और बसपा 37 सीट पर चुनाव लड़ेगी। आरएलडी के लिए 3 सीटें जबकि पीस पार्टी, निषाद पार्टी जैसे दलों के लिए 2 सीटें रिजर्व रखी जा सकती हैं। अमेठी और रायबरेली सीट पर गठबंधन अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगा।
    सपा-बसपा के गठबंधन के बाद  राजनीतिक पंडित मानकर चल रहे हैं कि बीजेपी के लिए सूबे की राह आसान नहीं होगी। इसके लिए वो 1993 में सपा-बसपा गठबंधन का उदाहरण दे रहे हैं, लेकिन मौजूदा सियासी माहौल को अगर राजनीतिक और जातीय समीकरण के मद्देनजर देंखे तो 25 साल पहले जैसे हालात आज नहीं हैं।
    मंडल आंदोलन के दौर में 
    मुलायम-कांशीराम
    दरअसल सपा-बसपा ने 25 साल पहले जब हाथ मिलाया था वह दौर मंडल का था, जिसने सूबे के ही नहीं बल्कि देश के पिछड़ों को एक छतरी के नीचे लाकर खड़ा कर दिया था। मुलायम सिंह यादव ओबीसी के बड़े नेता बनकर उभरे थे और राम मंदिर आंदोलन के चलते मुस्लिम मतदाता भी उनके साथ एकजुट था। इसके अलावा कांशीराम भी दलित और ओबीसी जातियों के नेता बनकर उभरे थे। ऐसे में जब दोनों ने हाथ मिलाया तो सामाजिक न्याय की उम्मीद जगी थी। इसी का नतीजा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी बीजेपी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई थी। हालांकि ये गठबंधन 1995 में टूट गया, जिसके बाद यादव और दलितों के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई।
    सूबे का जातीय समीकरण
    सूबे में इस समय 22 फीसदी दलित वोटर हैं, जिनमें 14 फीसदी जाटव और चमार शामिल हैं। ये बसपा का सबसे मजबूत वोट है। जबकि बाकी 8 फीसदी दलित मतदाताओं में पासी, धोबी, खटीक मुसहर, कोली, वाल्मीकि, गोंड, खरवार सहित 60 जातियां हैं। वहीं, 45 फीसदी के करीब ओबीसी मतदाता हैं। इनमें यादव 10 फीसदी, कुर्मी 5 फीसदी, मौर्य 5 फीसदी, लोधी 4 फीसदी और जाट 2 फीसदी हैं। बाकी 19 फीसदी में गुर्जर, राजभर, बिंद, बियार, मल्लाह, निषाद, चौरसिया, प्रजापति, लोहार, कहार, कुम्हार सहित 100 से ज्यादा उपजातियां हैं। 19 फीसदी के करीब मुस्लिम हैं।
    गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित बीजेपी के साथ
    बीजेपी यूपी में अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए 2014 और 2017 के विधानसभा चुनाव में गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को अपने साथ मिलाने में कामयाब रही है। इसी का नतीजा है कि पहले लोकसभा और फिर विधानसभा में बीजेपी के सामने सपा-बसपा पूरी तरह से धराशाही हो गई थीं। ओबीसी चिंतक राकेश कुशवाहा कहते हैं कि  बीजेपी ने सत्ता में आने के बाद सरकार में इन दलित व ओबीसी जातियों को हिस्सेदार भी बनाया है। इतना ही नहीं ओबीसी को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण को भी बीजेपी तीन कैटेगरी में बांटने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में सपा-बसपा गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन दलित और ओबीसी जातियों को अपने साथ जोडऩे की होगी। दरअसल सपा बसपा पर आरोप लगता रहा है कि वे यादव, मुस्लिम और जाटवों की पार्टी हैं। जबकि मौजूदा राजनीति में गैर-यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों के अंदर भी राजनीतिक चेतना जागी है, ऐसे में इन्हें साधे बिना बीजेपी को मात देना अखिलेश और मायावती के लिए टेढ़ी खीर होगा।
    सपा-बसपा के लिए चुनौतियां
    राजनीतिक विश्लेषक सुनील कुमार सुमन ने कहा कि यूपी में सपा-बसपा के बीच गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती वोटों को ट्रांसफर की है।  जिन सीटों पर समाजवादी पार्टी लड़ रही है, वहां बसपा का वोट तो ट्रांसफर हो सकता है, लेकिन जिन सीटों पर बसपा लड़ रही है वहां सपा के वोट ट्रांसफर होना मुश्किल हो सकता है। 
    ये आशंका इसलिए भी है कि अभी हालिया इलाहाबाद विश्वविद्यालय चुनाव के नतीजों को देखें तो समाजवादी छात्र सभा से अध्यक्ष पद पर उदय प्रकाश यादव ने बड़े अंतर से जीत हासिल की, लेकिन उपाध्यक्ष पद पर सपा प्रत्याशी मुनेश कुमार सरोज न सिर्फ बड़े अंतर से चुनाव हारे बल्कि तीसरे नंबर पर चले गए।
    वहीं, इस सीट पर एनएसयूआई के अखिलेश यादव चुनाव जीत हासिल की तीसरा सबसे बड़ा चैलेंज जिन सीटों पर गठबंधन से मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे, उन सीटों पर सपा और बसपा अपने वोटरों को कैसे ट्रांसफर कराएंगे? क्योंकि मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ज्यादा संभावनाएं रहती हैं।
    2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 संसदीय सीटों में से बीजेपी गठबंधन में 73 सीटें जीतने में सफल रही थी और बाकी 7 सीटें विपक्ष को मिली थीं। बीजेपी को 71, अपना दल को 2, कांग्रेस को 2 और सपा को 5 सीटें मिली थीं। बसपा का खाता तक नहीं खुल सका था। हालांकि सूबे की 3 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं, जिनमें से 2 पर सपा और एक पर आरएलडी को जीत मिली थी। इस तरह बीजेपी के पास 68 सीटें बची हैं और सपा की 7 सीटें हो गई हैं। (आज तक)

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Posted Date : 12-Jan-2019
  • प्रभाकर

    भारत में लगातार बढ़ते चिकित्सा खर्च की वजह से हर साल 23 फीसदी बीमार लोग अपना सही इलाज नहीं करा पा रहे हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्च का 70 फीसदी लोगों को अब भी अपनी जेब से भरना पड़ता है, जो कि उन्हें गरीबी रेखा के नीचे धकेल देता है। केंद्र सरकार की ओर से चलाई जा रही आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य योजनाओं के बावजूद इस तस्वीर में ज्यादा बदलाव नहीं आया है।
    स्वास्थ्य सेवाओं की सेहत खराब
    आधारभूत ढांचे की कमी, मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों, प्रशिक्षित डॉक्टरों और नर्सों के अभाव की वजह से देश में स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही बीमार हैं। आबादी लगातार बढऩे के बावजूद आधारभूत ढांचे में सुधार पर अब तक कोई ध्यान नहीं दिया गया। देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी खर्च बीते लगभग एक दशक से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 1.3 प्रतिशत पर ही स्थिर है। 
    छह फीसदी के वैश्विक स्तर की रोशनी में यह आंकड़ा बेहद दयनीय नजर आता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में वर्ष 2025 तक इसे बढ़ा कर जीडीपी का 2.5 फीसदी करने का प्रस्ताव है। भूटान, श्रीलंका और नेपाल जैसे गरीब देश भी स्वास्थ्य सेवाओं पर डीजीपी का क्रमश: 2.5 फीसदी, 1.6 फीसदी और 1.1 फीसदी खर्च करते हैं।
    देश की आबादी जितने समय में सात गुनी बढ़ गई, उस दौरान अस्पतालों की तादाद दोगुनी भी नहीं बढ़ सकी। मोटे अनुमान के मुताबिक, देश में फिलहाल छोटे-बड़े लगभग 70 हजार अस्पताल हैं। लेकिन उनमें 60 फीसदी ऐसे हैं जिनमें 30 या उससे कम बेड हैं। सौ या उससे ज्यादा बिस्तरों वाले अस्पतालों की तादाद तीन हजार से कुछ ज्यादा है। इस लिहाज से देखें तो लगभग सवा छह सौ नागरिकों के लिए अस्पतालों में महज एक बिस्तर उपलब्ध है। इससे हालात की गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे कम खर्च
    नेशनल हेल्थ प्रोफाइल, 2018 के मुताबिक, भारत उन देशों में शुमार है जहां स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी खर्च सबसे कम है। यहां वर्ष 2009-10 में स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रति व्यक्ति सालाना सरकारी खर्च 621 रुपए था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़ कर 1,112 रुपए (यानि करीब 15 डॉलर) तक पहुंचा। अब भी इसमें खास वृद्धि नहीं हुई है। इसके मुकाबले स्विट्जरलैंड का खर्च प्रति व्यक्ति 6,944 अमेरिकी डॉलर, अमरका का 4,802 डॉलर और इंग्लैंड का साढ़े तीन हजार अमरीकी डॉलर है। 
    स्वास्थ्य सेवाओं पर आम लोगों की जेब से खर्च होने वाली भारी रकम से सामाजिक-आर्थिक संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, सात फीसदी आबादी हर साल इसी वजह से गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) चली जाती है। ऐसे लोग इलाज के लिए भारी कर्ज लेते हैं। यही नहीं, 23 फीसदी बीमार लोग तो पैसों की कमी से अपना सही इलाज भी नहीं करा पाते।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से बीते साल जारी स्वास्थ्य वित्तीय प्रोफाइल में कहा गया था कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च का 67.78 फीसदी आम लोगों की जेब से जाता है जबकि इस मामले में वैश्विक औसत महज 18.2 फीसदी है। इसका भी सबसे बड़ा हिस्सा लगभग 43 फीसदी दवाओं पर खर्च होता है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आफ इंडिया (पीएचएफआई) में निदेशक शक्तिवेल सेल्वराज कहते हैं, जिन बीमारियों में लोगों को जेब से सबसे ज्यादा खर्च करना पड़ता है उनमें कैंसर, हादसों में लगी चोट, दिल की बीमारियां और मानसिक असंतुलन शामिल हैं।
    आयुष्मान भारत से उम्मीद
    केंद्र सरकार ने बीते साल आयुष्मान भारत नामक एक स्वास्थ्य योजना शुरू की थी जिसे मोदी केयर भी कहा जा रहा है। इस कार्यक्रम के जरिए सरकार का प्रयास देश के 10 करोड़ परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का है। इसके दायरे में आने वालों को स्वास्थ्य बीमा के जरिए उक्त सेवाएं मुहैया कराई जाएंगी। इलाज पर होने वाला पांच लाख रुपए तक का खर्च सरकार उठाएगी। इसके तहत देश भर 1.5 लाख हेल्थ एंड वेलनेस केंद्र बनेंगे, जो प्राथमिक उपचार मुहैया कराएंगे। इस योजना का खर्च केंद्र और राज्य दोनों मिलकर उठाएंगे। नीति आयोग के सदस्य और आयुष्मान भारत कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले डॉक्टर विनोद पाल कहते हैं, आयुष्मान दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य मिशन है जो स्वास्थ्य क्षेत्र की तस्वीर बदल देगा।
    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह योजना कागजों पर तो अच्छी लगती है। लेकिन इसे पूरी तरह अमली जामा पहनाने की राह में कई मुश्किलें हैं। इस क्षेत्र के एक विशेषज्ञ प्रोफेसर मनीष चटर्जी कहते हैं कि मौजूदा बुनियादी ढांचे पर इतने लोगों का इलाज होना बड़ी चुनौती है। चटर्जी बताते हैं कि सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का दबाव ज्यादा है, ऐसे में निजी संस्थानों को भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना होगा और सरकार को स्वास्थ्य पर बजट बढ़ाकर बुनियादी ढांचे पर काम करना होगा।
    विशेषज्ञों के मुताबिक, आयुष्मान की राह में सबसे बड़ी चुनौती यह आ रही है कि निजी अस्पताल सरकार की ओर से विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए तय की गई दरों पर सहमत नहीं हैं। एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर के महानिदेशक डॉ गिरधर ज्ञानी कहते हैं, सरकार को लगता है कि इन दरों पर इलाज संभव है। लेकिन यह दरें व्यवहारिक नहीं हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के फाइनेंस सेक्रेटरी डॉ विनोद कुमार मूंगा कहते हैं, इस योजना के पीछे सरकार की मंशा तो अच्छी है, लेकिन इसका क्रियान्वयन सबसे बड़ी चुनौती है।
    केंद्र और राज्य सरकारों के बीच घर्षण
    तमाम राज्यों को इस योजना में साथ लेना भी इसकी कामयाबी की राह में एक प्रमुख चुनौती है। इस पर होने वाले खर्च का 60 फीसदी हिस्सा केंद्र उठाएगा और 40 फीसदी राज्य। पूर्वोत्तर के अलावा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में केंद्र की हिस्सेदारी 90 फीसदी होगी। आयुष्मान का श्रेय केंद्र को मिलने की वजह से उसके सामने राज्यों को साथ जोडऩे की चुनौती भी है।
    पश्चिम बंगाल सरकार ने तो एक दिन पहले ही इस योजना से किनारा कर लिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं, बंगाल में आयुष्मान भारत योजना राज्य सरकार की स्वास्थ्य साथी योजना में मिला दी गई है। इसका 40 फीसदी खर्च राज्य सरकार वहन करती है। उन्होंने केंद्र पर इस योजना के प्रचार-प्रसार में पारदर्शिता नहीं बरतने का आरोप लगाते हुए कहा है कि अब बंगाल सरकार इसमें शामिल नहीं होगी। अब केंद्र सरकार इसका पूरा श्रेय ले सकती है।
    वह कहती हैं, बंगाल में वर्ष 2017 से ही स्वास्थ्य साथी नामक एक ऐसी योजना चल रही है। इसके तहत लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं। यह योजना पेपरलेस व कैशलेस है। इसके तहत लोगों को साल में बीमा के जरिए डेढ़ लाख रुपए तक की सहायता दी जाती है।
    विशेषज्ञों का कहना है कि आधारभूत ढांचे को मजबूत कर अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की तादाद बढ़ाना और तमाम राज्य सरकारों को भरोसे में लेना इस योजना को जमीनी स्तर पर लागू करने की राह में सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। इनको दूर नहीं करने तक यह बहुचर्चित योजना भी बेअसर ही रहेगी। डॉक्टर चटर्जी कहते हैं, ऐसी किसी योजना की कामयाबी के लिए पहले स्वास्थ्य क्षेत्र का इलाज जरूरी है। उसकी बदहाली दूर किए बिना स्वास्थ्य सेवाओं तक आम लोगों की पहुंच सुलभ करना संभव नहीं होगा।  (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 12-Jan-2019
  • मनोरंजन भारती

    कांग्रेस ने शीला दीक्षित को एक बार फिर दिल्ली की कमान सौंप दी है। वैसे इस खबर की चर्चा कई दिनों से थी मगर जैसे ही यह खबर आई तो लोगों ने कई तरह के सवाल पूछने शुरू कर दिए कि इतनी उम्र में यह जिम्मेदारी क्यों? वैसे यह लाजिमी भी था क्योंकि शीला दीक्षित 80 को पार कर गई हैं और एक तरह से सक्रिय राजनीति से दूर हो गई थीं। मगर कांग्रेस के पास लगता है कोई चारा नहीं था। अजय माकन के इस्तीफे के बाद उन्हें एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो सभी गुटों को एक साथ लेकर चल सके। इस लिहाज से शीला दीक्षित का चेहरा फिट बैठता था।
    शीला दीक्षित ने यूपी से राजनीति की शुरुआत की। कन्नौज से सांसद बनीं, तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं 1998 से 2013 तक। फिर केरल की राज्यपाल बनाई गईं। यानी उनके पास अनुभव की कोई कमी नहीं है। यह तो बात हुई शीला दीक्षित की, मगर अब बात करते हैं उनकी चुनौतियों की। दिल्ली में कांग्रेस की हालत फिलहाल शून्य की स्थिति में है। लोकसभा और विधानसभा में कांग्रेस का एक भी सदस्य नहीं है। मगर इतना जरूर है कि कांग्रेस का वोट शेयर 2015 के विधानसभा चुनाव में जहां नौ फीसदी था वह 2017 के नगरपालिका चुनाव में 26 फीसदी हो गया।
    जब हमने शीला दीक्षित से बात की तो उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। उनका कहना है कि दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच कोई भी गठबंधन नहीं होनी चाहिए। दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने लोगों से वादाखिलाफी की इसलिए शीली दीक्षित मानती हैं कि कांग्रेस को दिल्ली में अकेले चुनाव लडऩा चाहिए। हालांकि कांग्रेस में कई लोग ऐसे हैं जो मानते हैं कि दिल्ली में बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को एक साथ आना चाहिए। मगर शीला दीक्षित ऐसा नहीं मानती हैं। उन्होंने एक तरह से आम आदमी पार्टी के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया है।
    शीला दीक्षित मानती हैं कि दिल्ली में कांग्रेस का परंपरागत वोट है। उसे केवल प्रेरित करने की जरूरत है। उन्हें भरोसा दिलाने की जरूरत है और यही काम वे करेंगी। शीला यह भी मानती हैं कि दिल्ली में तीन कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति से उन्हें काफी मदद मिलेंगी। उनका कहना है कि पार्टी ने उनको नियुक्त कर काफी अच्छा काम किया है। गौरतलब है कि दिल्ली में कांग्रेस ने हीरून युसुफ,देवेन्द्र यादव और राजेश लिलोथिया को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है जो मुस्लिम, पिछड़ी और दलित जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    शीला दीक्षित यह भी कहती हैं कि दिल्ली के लोगों को मेरा काम याद है और मुझे अपना काम करने में कोई भी दिक्कत नहीं आने वाली है। शीला दीक्षित मानती हैं कि राहुल गांधी ने पिछले दिनों जैसा काम किया है, खासकर जिस तरह से तीन राज्यों में उन्होंने कांग्रेस की लड़ाई लड़ी है उससे लगता है कि वे काफी परिपक्व हो चुके हैं और अब वे पूरी तरह से प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार हैं। यदि कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है तो राहुल ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे। (सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर - पॉलिटिकल न्यूज़ एनडीटीवी इंडिया)

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Posted Date : 11-Jan-2019
  • चंदन कुमार शर्मा, प्रोफेसर  तेजपुर विवि, असम

    पूर्वोत्तर, खासतौर से असम को छोड़कर देश में कहीं भी नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दिख रही है। जन-प्रतिनिधि तक इस मसले पर उदासीन दिख रहे हैं। बुधवार को राज्यसभा में इस पर बहस होनी थी, लेकिन इसे पेश तक नहीं किया गया। ऐसा लगता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में अंदरखाने यह समझ बनी थी कि सिर्फ आरक्षण विधेयक पर ऊपरी सदन में चर्चा होनी चाहिए। संभव है कि केंद्र सरकार इस पर अध्यादेश ले आए। हालांकि इसकी वैधता ज्यादा से ज्यादा छह महीने ही होगी।
    नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ पूर्वोत्तर में दिख रही नाराजगी की कई वजहें हैं। औपनिवेशिक काल से अब तक यहां इतनी अधिक संख्या में अप्रवासी आ चुके हैं कि उनकी संख्या स्थानीय लोगों से ज्यादा हो गई है। 1947 में बंटवारे के समय तो यह खासतौर पर त्रिपुरा और असम में हुआ था। नतीजतन, त्रिपुरा में अब कुल आबादी में सिर्फ एक चौथाई स्थानीय रह गए हैं। इन राज्यों के स्थानीय वाशिंदे लगातार इन बाहरी नागरिकों को देश से बाहर करने की मांग करते रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान पूर्वोत्तर की चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी (तब वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे) ने भी वादा किया था कि यहां घुस आए बांग्लादेशियों को पकड़कर वापस उनके देश भेज दिया जाएगा। मगर अब तो नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिए उन्हें यहां हमेशा के लिए बसाने की कोशिश हो रही है। स्थानीय लोग इसीलिए उबल रहे हैं।
    नया विधेयक 1955 के नागरिकता कानून में संशोधन करके तैयार किया गया है। अगर इसे संसद की मंजूरी मिल जाती है, तो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को 11 साल की बजाय महज छह साल भारत में गुजारने पर नागरिकता मिल जाएगी। इसमें बेस ईयर को भी बढ़ा दिया गया है और अब 31 दिसंबर, 2014 तक इन तीनों देशों के जितने अल्पसंख्यक भारत आए हैं, उन सभी को नागरिक अधिकार मिल जाएंगे। 
    बांग्लाभाषी लोगों की बढ़ती संख्या पूर्वोत्तर खासतौर से असम के जनसांख्यिकीय स्वरूप को चिंताजनक रूप से बदल देगी। जनगणना में भी स्थानीय लोगों की आबादी तेजी से घटती दिख रही है, लेकिन इसे लेकर देश के बाकी हिस्सों में कोई चिंता जाहिर नहीं की जा रही। ऐसे में, पूर्वोत्तर के लोग अब स्वाभाविक ही पिछले सौ वर्षों में हुए जनसांख्यिकीय बदलाव की समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
    नए विधेयक के विरोध की एक वजह इसमें मौजूद धार्मिक विभेद भी है। 1955 के नागरिकता कानून में धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया है। मगर नया विधेयक कहता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक यानी गैर-मुस्लिम (हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी, ईसाई आदि) को ही नागरिकता मिलेगी। इन तीनों देशों से ज्यादातर हिंदू भारत आते हैं। इसका अर्थ है कि नया विधेयक परोक्ष रूप से इन देशों के हिंदुओं को भारत की नागरिकता देने की बात कहता है। धार्मिक पहचान को नागरिकता का आधार बनाना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। संविधान का अनुच्छेद 14 जाति और धर्म के आधार पर सबको समान अधिकार देने की वकालत करता है। फिर, यह विधेयक उन समुदायों को भी नजरंदाज करता है, जो बहुसंख्यक में शामिल होने के बावजूद इन देशों में अल्पसंख्यक की हैसियत में रहते हैं। पाकिस्तान में अहमदिया ऐसा ही एक संप्रदाय है। वहां अच्छी संख्या होने के बावजूद बोहरा समुदाय के लोगों की हालत ठीक नहीं है। इनमें से कई तो भारत आकर बस चुके हैं। नया विधेयक उन्हें यहां से बेदखल कर देगा। इस समय नागरिकता विधेयक को लाया जाना चुनावी एजेंडा ज्यादा लग रहा है। इसका असर पूर्वोत्तर (खासतौर से असम) और पश्चिम बंगाल में पड़ेगा। यह चुनावी वर्ष है और अगले चंद महीनों में देश में आम चुनाव होने वाले हैं, इसीलिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी इन राज्यों में भारी संख्या में मौजूद हिंदू बंगालियों को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। संभवत: इसीलिए इस विधेयक को शीत सत्र के बिल्कुल आखिरी दिनों में लाया गया। नागरिकता संशोधन पर गठित संयुक्त संसदीय कमेटी (जेपीसी) ने पूर्वोत्तर में ठीक से 'पब्लिक हिर्यंरगÓ भी नहीं की। उसने स्थानीय लोगों की चिंता पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। 
    यह हिर्यंरग बराक घाटी में की गई, जहां बांग्लादेशी हिंदू काफी अधिक संख्या में हैं, जबकि इसका विरोध ब्रह्मपुत्र घाटी में ज्यादा था। गुवाहाटी में सिर्फ एक दिन हिर्यंरग की गई और वहां उमड़ी भारी भीड़ को देखकर फिर से आने का वादा किया गया था। मगर वादे के बावजूद ब्रह्मपुत्र घाटी में संजीदगी से 'पब्लिक हिर्यंरगÓ न होना, संकेत है कि किस तरह इस मामले को निपटाने की कोशिश की जा रही है। हमारी नीति यह होनी चाहिए थी कि देश में जितने भी बाहरी हैं, उन्हें उनके देश भेज दिया जाए या फिर कोई सर्वमान्य समाधान निकाला जाए। मगर इस विधेयक से उन्हें यहां बसाने की योजना तैयार की गई है। नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 के पारित होने के बाद तमाम अप्रवासी अधिकृत रूप से भारत के नागरिक बन जाएंगे। ऐसे में, यहां की जनसांख्यिकी में भारी बदलाव आएगा,  जो किसी बड़े खतरे को न्योतने जैसा होगा। फिर यह कदम 'अखंड भारतÓ की उस संकल्पना के भी खिलाफ है, जिसकी बात अभी तक की जाती रही है, क्योंकि इन देशों में हिंदू रहेंगे ही नहीं। 
    अगर सरकार घुसपैठियों के प्रति संजीदा है, तो वह इन तीनों पड़ोसी देशों की हुकूमत से बात करके वहां के अल्पसंख्यकों का बेहतर रहन-सहन सुनिश्चित करे। इसकी कोशिश भी हो सकती है कि इन देशों में अल्पसंख्यक सम्मान के साथ अपना जीवन बिता सकें। वहां की सरकार अपने अल्पसंख्यक समुदायों की बेहतरी के काम कर भी रही है। लिहाजा इन समुदायों को मातृभूमि से काटकर भारत में बसाने की इस योजना का औचित्य नहीं दिखता। फिर, यह तो भारतीय संविधान के भी खिलाफ है। https://www.livehindustan.com/

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