विचार / लेख

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Posted Date : 26-Apr-2018
  • डॉ. अनुज लुगुन, सहायक प्रोफेसर दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
    साल 2000 की घटना थी। मणिपुर के मलोम कस्बे के बस स्टैंड में कुछ लोग अपने गंतव्य के लिए बस का इंतजार कर रहे थे, तभी वहां सेना पहुंची और अचानक दस लोगों को हिरासत में लेकर उन्हें गोलियों से भून डाला।  वहीं इरोम शर्मीला नाम की एक युवती भी थी, जो इस घटना को देख रही थी। उस घटना से विचलित होकर उसने सैन्य विशेषाधिकार कानून (एएफएसपीए- अफस्पा) को हटाने के लिए सोलह साल तक भूख अनशन किया। इसी तरह 2004 की घटना है। जब जवानों ने मनोरमा नाम की एक युवती का बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी। इसके विरोध में असम राइफल्स के मुख्यालय के बाहर मणिपुरी महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था। 
    इस तरह की घटनाओं ने सैन्य विशेषाधिकार कानून को और अधिक विवादित बना दिया। इस कानून से सबसे ज्यादा मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ और पूर्वोत्तर के नागरिक इस कानून को हटाये जाने के विरुद्ध लगातार संघर्ष करते रहे हैं। गौरतलब है कि इस सैन्य कानून की आड़ में सैकड़ों फर्जी मुठभेड़ हुए हैं। 
    इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और सीबीआई को फटकार लगायी और पिछले वर्ष साल 2000 से 2012 तक सेना और पुलिस द्वारा की गई 1,528 गैर-न्यायिक हत्याओं के मामलों की जांच का निर्देश भी दिया। अब सरकार मेघालय से और अरुणाचल प्रदेश से उसके कुछ जिलों को छोड़कर आफ्स्पा को हटा दिया है। साल 1958 में बना यह कानून पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में शांति और सुरक्षा स्थापित करने के उद्देश्य से अलग-अलग समय पर लगाया गया था। 
    इस कानून के द्वारा सेना को विशेष अधिकार दिया गया, जिसके तहत वह बिना वारंट के शक के आधार पर किसी को भी गिरफ्तार और पूछताछ कर सकती है। 2004 में मनोरमा हत्याकांड के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी, जिसने अपनी अनुशंसा में इस कानून को 'दमन का प्रतीकÓ बताते हुए इसे निरस्त कर देने की मांग की थी। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस अनुशंसा को खारिज कर दिया था। 
    यद्यपि इसके बाबजूद 2004 में ही मणिपुर सरकार ने कुछ जिलों से इस कानून को हटा दिया था। त्रिपुरा की तत्कालीन माणिक सरकार ने 2015 में उसे त्रिपुरा से हटा दिया था। साल 2015 में नागा विद्रोही गुट एनएससीएन-आइएम महासचिव टी मुईवा और सरकार के बीच हुई बातचीत के बावजूद इसे नागालैंड से नहीं हटाया गया है। 
    देश की सुरक्षा के नाम पर बने इस कानून से सबसे ज्यादा मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले प्रकाश में आये हैं। अभी यह जम्मू-कश्मीर में सबसे ज्यादा विवादित है। जब सैन्य विशेषाधिकार लागू हो जाता है, तो आम नागरिकों के अधिकार संकुचित होने लगते हैं। यह जनविरोधी होता है। 
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसका हमेशा नागरिकों के मौलिक अधिकारों से टकराव होता है। इसका सबसे दुखद पहलू यह होता है कि जिन क्षेत्रों में इस तरह के कानून होते हैं, वहां मीडिया भी एक हद तक सीमित हो जाती है, या एकपक्षीय हो जाती है। इससे सही सूचनाएं नहीं आती हैं। सुरक्षा और शांति के नाम पर 'प्रोपेगंडाÓ होने लगता है, जिससे एक ओर सैन्य दमन का 'जस्टिफिकेशनÓ किया जाता है, वहीं दूसरी ओर पीडि़त पक्ष बहुत आसानी से 'उग्रवादीÓ या 'आतंकीÓ घोषित कर दिया जाता है। 
    ऐसे में 'गिरफ्तारीÓ और 'एनकाउंटरÓ बहुत आसान हो जाता है, जिसकी सुनवाई भी नहीं होती। पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही फर्जी मुठभेड़ों की 1,528 मामलों की जांच के निर्देश दिये थे।  
    अफस्पा सुरक्षा और शांति के तर्क पर लागू किया जाता है। सरकार बाहरी घुसपैठ और आंतरिक विद्रोह की संभावनाओं से इसे लागू करती है। 
    इसी तर्क पर इसे मान्य किया जाता है। लेकिन इस पर हमें बीपी जीवन रेड्डी समिति की अनुशंसा को समझना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा था कि शांति और सुरक्षा कायम करने के लिए सेना रहे, लेकिन यह कानून हटा लिया जाना चाहिए। 
    सेना का होना एक बात है और सेना को खुली छूट देना दूसरी बात है। मानवाधिकार संगठन इस बात की कड़ी आलोचना करते रहे हैं कि कैसे सैन्य बलों को सशस्त्र खुली छूट दी जा सकती है? ऐसे में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का औचित्य क्या रह जायेगा? 
    अब यदि धीरे-धीरे इसे पूर्वोत्तर से हटाने की बात आगे बढ़ रही है, तो इसे इस रूप में भी देखा जाये कि इससे वहां नागरिक अधिकार बहाल होंगे और लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत होगा। पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक मूल्य खस्ताहाल हैं। पूर्वोत्तर के राज्य पहले से ही उपेक्षित महसूस करते रहे हैं। 
    उनकी राय में केंद्र यानी दिल्ली दोयम दर्जे का व्यवहार करता है। अफस्पा से उनकी यह धारणा और मजबूत हुई है। ऐसे में सुरक्षा और शांति के नाम पर बहुत समय तक सैन्य दबाव नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि इसका दुष्परिणाम यह होगा कि इससे भारतीय राज्य के प्रति अविश्वास और असंतोष और ज्यादा बढ़ेगा।
    पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों से अफस्पा को हटाने की बात यह उम्मीद जगाती है कि भविष्य में यह देश के सभी क्षेत्रों से हटा लिया जायेगा। ऐसा होना ही हमारे लोकतांत्रिक होने का प्रमाण होगा, अन्यथा हम अब भी उसकी मंजिल से काफी दूर हैं।
    https://www.prabhatkhabar.com/n

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Posted Date : 26-Apr-2018
  • - सुहैल ए शाह
    दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के एक छोटे से गांव कामड़ के रहने वाले मुहम्मद अमीन और उनकी पत्नी जाहिदा दोनों शिक्षक हैं। अपना घर, बगीचे और खेत छोड़ कर वे पिछले कई महीनों से श्रीनगर के राजबाग इलाके में एक बेडरूम वाले किराए के घर में रह रहे हैं। दोनों पति-पत्नी रोज 80 किलोमीटर का सफर तय करके अपनी ड्यूटी करने जाते हैं।
    सिर पर यह मुश्किल उन्होंने अरीबा के लिए ली है। अरीबा उनकी बेटी है जो 11वीं में पढ़ती है। उसे डॉक्टर बनाने का सपना लेकर पति-पत्नी ने इतनी मुश्किलें झेलते हुए उसको एक कोचिंग सेंटर में दाखिला दिलाया था। लेकिन अब अरीबा वहां नहीं जा पाएगी।
    इसकी वजह है जम्मू कश्मीर का ताजा फरमान। सरकार ने घाटी के सारे कोचिंग सेंटरों को अगले तीन महीने तक बंद करने का फैसला किया है। यह फैसला कश्मीर घाटी में कठुआ सामूहिक बलात्कार और हत्याकांड के विरोध में चल रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के चलते हुआ है। इन प्रदर्शनों में अभी तक 30 से ज्यादा छात्र घायल हो चुके हैं।
    शनिवार को ही राज्य के शिक्षा मंत्री अल्ताफ बुखारी ने प्रदर्शनकारी छात्रों को आगाह किया था। उन्होंने कहा था, सड़कों पे आये स्टूडेंट्स, जो सार्वजनिक संपत्ति को तहस-नहस करते हैं, को फसादी मानकर उनके साथ वैसा ही सुलूक किया जाएगा।
    बीते इतवार को बुखारी का कोचिंग सेंटर बंद करने का फैसला आया तो बच्चों के माता-पिता, कोचिंग सेंटर्स एसोसिएशन और अन्य नागरिकों ने इस फैसले को तानाशाही करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकार बच्चों से प्रदर्शन करने का बदला ले रही है। कोचिंग सेंटर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जुनैद यूसुफ पूछते हैं, यह तानाशाही नहीं है तो और क्या है? यह फैसला लेने से पहले हमसे एक बार पूछा भी नहीं जाता है। यह कौन सा लोकतंत्र है जहां 50,000 विद्यार्थियों के भविष्य का फैसला इस ढंग से लिया जाता है? यूसुफ करीब सौ कोचिंग सेंटरों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    उधर, बुखारी ने इस इलजाम को नकारते हुए इसको शिक्षा प्रणाली को बेहतर करने की दिशा में लिया गया फैसला करार दिया है। उनका कहना है, हम एक मीटिंग में शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने पर विमर्श कर रहे थे। ऐसे कई कारण हैं जिनसे छात्रों का ध्यान पढ़ाई से हट रहा है। वे स्कूलों से दूर हो रहे हैं और उनमें कोचिंग सेंटर भी एक कारण हैं। बुखारी ने लोगों के आक्रोश पर जताई है। उनका मानना है कि कोचिंग की जरूरत वहां होती है जहां शिक्षा व्यवस्ठा ठीक न हो जबकि राज्य की शिक्षा व्यवस्था अच्छी है।
    लेकिन सूत्रों की मानें तो कोचिंग सेंटर बंद करने का एक ही मकसद है और यह है छात्रों के विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाना। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं, 'कुछ कोचिंग सेंटर्स ऐसे हैं जहां के बच्चे रोज प्रदर्शन करने निकल पड़ते हैं और फिर प्रदर्शन हिंसक हो जाते हैं। सरकार का इन सेंटर्स को बंद करने का फैसले का मकसद महज इन प्रदर्शनों को रोकना है।Ó
    अब वजह जो भी हो, छात्र, उनके माता-पिता और जानकारों की मानें तो नुकसान बच्चों का ही होता दिख रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ये कोचिंग सेंटर कश्मीर के विद्यार्थियों के लिए एकमात्र शरण हैं। कश्मीर के वरिष्ठ शिक्षाविद, प्रोफेसर एजी मदहोश कहते हैं कि वजह जो भी हो समाधान कोचिंग सेंटर्स को बंद करना बिलकुल नहीं है। सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, 'पहली बात यह कि हम लोग एक जनतंत्र में रहते हैं और माता पिता पर कोई रोक नहीं होनी चाहिए कि वे अपने बच्चों को कहां से शिक्षा दिलाना चाहते हैं, और न ही यह रोक विद्यार्थियों पर होनी चाहिए।Ó
    एजी मदहोश का यह भी मानना है कि सरकार को कदम सरकारी स्कूलों का स्तर बेहतर करने के लिए उठाने चाहिए न कि उन संस्थानों को बंद करने के लिए जो श्रेष्ठ शिक्षा देने का बीड़ा उठाये हुए हैं। वे कहते हैं, जरूरत सरकारी शिक्षा प्रणाली को सशक्त करने की है। कोचिंग सेंटर्स तो वो कर रहे हैं जिसका ढांचा सरकार ने तैयार करके ऐसे ही छोड़ दिया।
    बच्चों के माता-पिता इस बात से बिलकुल सहमत हैं। अनंतनाग के मुहम्मद अमीन, जिनका जिक्र रिपोर्ट की शुरुआत में हुआ है, बताते हैं कि खुद एक सरकारी अध्यापक होने के बावजूद वे अपनी बेटी को कोचिंग के लिए श्रीनगर ले जाते हैं। वे कहते हैं, इसका मतलब तो यही है न कि सरकारी शिक्षा प्रणाली में कमियां हैं। और मैं अकेला नहीं हूं, मेरे जैसे हजारों पिता और हैं जो ऐसा ही सोचते हैं।
    इन कोचिंग सेंटर्स में खराबियां हो सकती हैं लेकिन विकल्प कहां हैं? स्कूलों का तो सरकार की गलत नीतियों की वजह से बुरा हाल है।
    कुछ लोगों के मुताबिक कश्मीर के हालात को मद्देनजर रखते हुए यह कहना भी ठीक होगा कि यहां का 'एजुकेशन सेक्टरÓ इन्ही संस्थानों पर निर्भर है। सत्याग्रह से बातचीत में कश्मीर के जाने-माने मनोचिकित्सक मुदस्सिर फिरदौसी कहते हैं, यही कथित कुख्यात कोचिंग सेंटर थे जो आगे बढ़ के अशांत 90 के दशक और 2008, 10 और 16 जैसे हलचल भरे वर्षों में स्कूलों का काम निभा रहे थे। इनमें खराबियां हो सकती हैं लेकिन विकल्प कहां हैं? स्कूलों का तो सरकार की गलत नीतियों की वजह से बुरा हाल है।
    बात फिर वहीं आ जाती है कि क्या वाकई सरकार ने यह फैसला शिक्षा प्रणाली को बेहतर करने के लिए लिया है क्योंकि पिछले दो वर्षों पर नजर दौड़ाई जाए तो ऐसा लगता नहीं है। लगता यह है कि कश्मीर में शिक्षा राजनीति का शिकार हो रही है। साल 2016 में जब हिज़्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी मारा गया था तो हिंसक प्रदर्शनों के चलते पूरी घाटी खून-खराबे के बीच लगभग छह महीने बंद रही। स्कूल इसका अपवाद नहीं थे। ये महीनों बंद रहे। दर्जनों स्कूलों में आग लगा दी गयी। उस समय के शिक्षा मंत्री नईम अख्तर ने अलगावादी नेता, सैय्यद अली गिलानी, के नाम एक खुले पत्र में स्कूलों को न खुलने देने का गिला किया था और लिखा था, 'शिक्षा एक ऐसी चीज है जिसकी हमें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए दरकार है। मानवता अभी शिक्षा का विकल्प नहीं ढूंढ पाई है।Ó
    बात तो अख्तर ने ठीक कही थी। लेकिन अप्रैल 2017 में जब पूरे कश्मीर के छात्र सड़कों पर उतर आये तो उनके पास स्कूल बंद करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा। पुलवामा के एक स्कूल में अप्रैल 14, 2017 को सुरक्षा बलों ने कथित तौर पर घुसकर छात्रों के साथ मार पीट की थी। अगले कई दिनों तक घाटी के कोने-कोने में छात्र सड़कों पर उतर के प्रदर्शन करते रहे जिसके चलते 20 दिन से ज्यादा स्कूलों में ताले पड़े रहे। नईम अख्तर की खूब आलोचना हुई लेकिन, जानकारों के मुताबिक वे करते भी क्या।
    अब 2018 में फिर से सारे छात्र सड़कों पर हैं और फिर प्रदर्शन हिंसक हो रहे हैं। और इस बार इल्जाम सैय्यद अली गिलानी ने लगाया है और भारत पर लगाया है। उन्होंने इस सारे किस्से को 'एजुकेशन वॉरÓ घोषित करते हुए एक बयान में कहा कि भारत कश्मीरी छात्रों को शिक्षा से वंचित रखना चाहता है। उनका कहना था, 'यह एक नयी जंग है - एजुकेशन वॉर। ये लोग हमसे हमारा मजहब तो छीन चुके हैं। अब शिक्षा छीनने की कोशिश हो रही है।Ó वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि कोचिंग सेंटर्स को तीन महीने बंद रखने का निर्णय राज्य सरकार की अपनी असफलता की पुष्टि है। पार्टी ने इस निर्णय की कड़ी निंदा की।
    तो आखिर गलती किसकी है? बुखारी की मानें तो जो छात्र सड़कों पर आते हैं वे फसादी हैं। गिलानी इसको 'एजुकेशन वॉरÓ कहते हैं, कांग्रेस इसे सरकार की असफलता की पुष्टि बताती है और बच्चों के माता-पिता इसे सरकार का छात्रों से बदला करार देते हैं। लेकिन जिस बैठक में कोचिंग सेंटर्स बंद करने का निर्णय लिया गया उसमें ही कुछ सरकारी कॉलेजों के प्रिंसिपलों ने आरोप लगाया कि छात्रों के विरोध प्रदर्शन सुरक्षा बलों की ज्यादतियों से हिंसक हो जाते हैं। ऐसे ही एक प्रिंसिपल का कहना था, 'पिछले साल कुछ पुलिसकर्मी मेरे कॉलेज के अंदर घुस आये थे। वे कैंपस के अंदर बच्चों पे निशाना साध के आंसू गैस फायर करने वाले थे। मैंने रोका तो उन्होंने मुझसे भी बदतमीजी की।Ó एक अन्य का कहना था कि अगर छात्र शांति से भी प्रदर्शन करते हैं तो पुलिस उनको फटकारने आ जाती है।
    कश्मीर पुलिस के डायरेक्टर जनरल, एस पी वैद ने इस मामले से अनभिज्ञता जताते हुए इस पर बात करने से मना कर दिया। सत्याग्रह ने जब उनसे बात करने की कोशिश की तो उनका इतना ही कहना था, 'मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता।Ó
    हालांकि अभी तक पुलिस और सरकार हिंसा के लिए छात्रों को ही दोषी ठहराती आयी है। सत्याग्रह ने कुछ छात्रों से बात की जिन्होंने कश्मीर और जम्मू या देश के अन्य राज्यों से अपने प्रदर्शनों की तुलना करते हुए निराशा जताई। एक का सवाल था, 'जम्मू में वकील तोड़ फोड़ करते हैं बलात्कारियों के पक्ष में और उन्हें कोई हाथ तक नहीं लगता और हम एक आठ साल की बच्ची के लिए इंसाफ मांगते हैं तो हम पर पैलेट चलाये जाते हैं। इस बार तो हम आजादी नहीं मांग रहे थे न।Ó एक अन्य का कहना था कि सरकार उनसे शांति से प्रदर्शन करने का हक भी छीन रही है। उसने कहा, 'ऐसा दुनिया के किस कोने में होता है कि शांति से प्रदर्शन कर रहे स्टूडेंट्स पर पैलेट गन्स का इस्तेमाल होता है। जाहिर है हमारे अंदर आक्रोश पैदा होगा।Ó
    इन छात्रों से पूछा गया कि क्या यह सब करने से उनकी शिक्षा पर असर नहीं पड़ेगा तो एक का कहना था, 'असंतोष का अधिकार लेना भी शिक्षा का एक हिस्सा है। च्च्शिक्षा सिर्फ क्लासरूम्स में नहीं मिलती।Ó
    सच्चाई जो भी हो लेकिन फिक्र की बात यह है कि बच्चों की शिक्षा खतरे में है। सरकार के कोचिंग सेंटर बंद करने के निर्णय के घंटों बाद छात्र फिर सड़कों पर उतर आये। पूरी घाटी से उनके प्रदर्शनों की खबरें आती रहीं और कई छात्र फिर पैलेटों से जख्मी हुए। (सत्याग्रह)

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Posted Date : 25-Apr-2018
  • विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी
    पिछले कुछ दिनों से भारतीय मर्दों या लड़कों के वहशीपन के किस्से मीडिया में छाए हुए हैं। ऐसा नहीं है कि ये पुरुष अचानक जानवर बन गए हैं। दुधमुंही बच्चियां, छोटी-बड़ी लड़कियां और यहां तक कि बूढ़ी औरतें भी पूरी तरह से भारतीय समाज में कभी सुरक्षित नहीं रही हैं। भारतीय संस्कृति की महानता के कुछ पैरोकारों के इन दावे पर कि इसके लिए तेजी से बढ़ती पाश्चात्य मूल्यों की नकल की प्रवृत्ति, फिल्में या महिलाओं के परिधान यौनिक उच्छृंखलता के जिम्मेदार हैं, सिर्फ हंसा जा सकता है। 
    इस पर कोई गंभीर विमर्श नहीं हो सकता, क्योंकि भारतीय परिवारों, गांवों और कस्बों में जहां इन सब चीजों का दखल कम था, वहां भी महिलाएं बलात्कार से सुरक्षित थीं या हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। कई समाजशास्त्रीय अध्ययनों से स्पष्ट है कि बच्चियां सर्वाधिक असुरक्षित अपने परिवार में या अपने परिचित माहौल में हैं। बलात यौन संबंधों की खबरें पीछे कुछ वर्षों से अधिक सिर्फ इसलिए आ रही हैं, क्योंकि अब मां-बाप, समाज या खुद पीडि़ता किसी दुर्घटना को छिपाने की जगह उन्हें खुलकर बताने में गुरेज नहीं करती। पश्चिम में 'मी-टूÓ आंदोलन दृष्टिकोण में आ रहे इसी परिवर्तन का एक उदाहरण है। 
    पाकिस्तान में, जो हमसे भी रूढ़ समाज है, हाल में एक फिल्मी सेलिब्रिटी के खिलाफ कई सहकर्मी महिलाओं द्वारा लगाया गया इसी तरह का आरोप उस समाज में भी परिवर्तन की बयार का ही नमूना है। इससे मिलता-जुलता एक आंदोलन भारतीय सोशल मीडिया में भी चल रहा है, जिसमें महिलाएं अधिकार के साथ घोषित कर रही हैं कि बलात्कार पीडि़ता अपना मुंह क्यों ढके, मुंह तो शर्म से अपराधी को ढकना चाहिए। भारत में विचलित कर देने वाली खबरों का जो विस्फोट हुआ है, उसे भी इसी सामाजिक साहस का उदाहरण माना जा सकता है। 
    डर यह है कि कहीं मीडिया के ऐसे तमाम शोर-शराबे सिर्फ वक्ती उबाल बनकर न रह जाएं। यह आशंका कुछ हद तक सरकार की फौरी प्रतिक्रिया से सही भी साबित हो रही है। सरकार ने आनन-फानन मेंअध्यादेश के जरिए 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को फांसी पर लटकाने का प्रावधान लाने का फैसला कर लिया है। तुरत-फुरत के चक्कर में हम यह भूल गए हैं कि अमेरिका, चीन और इस्लामी मुल्कों को छोड़कर ज्यादातर सभ्य समाजों में मृत्युदंड समाप्त किया जा चुका है या क्रमश: किया जा रहा है।
     भारत धीरे-धीरे इसे खत्म करने के स्थान पर इसके अंतर्गत आने वाले अपराधों की संख्या बढ़ा रहा है, वह भी तब जब हम सबको मालूम है कि हमारी जेलों में बहुत सारे मृत्युदंड प्राप्त कैदी काल कोठरियों में सड़ रहे हैं। दो-चार साल में राजनीतिक कारणों से उनमें से किसी एक को फांसी पर चढ़ा दिया जाता है। अपराध शास्त्र का एक पुराना सिद्धांत है कि दंड की गंभीरता नहीं, बल्कि उसकी सुनिश्चितता से अपराध रुकते हैं। यदि हम यह सुनिश्चित कर सकें कि बलात्कारी को एक निश्चित अवधि के दंड की सजा अवश्य मिलेगी, तब भी बहुत बड़ा परिवर्तन आ सकता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, बलात्कार के मामलों में दंड पाने वालों की संख्या एक चौथाई से भी कम है। कुछ मानवाधिकार संगठनों ने अभी से आशंका जाहिर करनी शुरू कर दी है कि फांसी का दंड निर्धारित होने के बाद लिखे जाने वाले मुकदमों की संख्या के साथ दंडित अभियुक्तों की संख्या में भी गिरावट आएगी। 
    पिछले दिनों दिल्ली महिला आयोग की एक्टिविस्ट अध्यक्ष स्वाति मालीवाल भी मृत्युदंड के पक्ष में अनशन पर बैठ गईं। सिर्फ उन्हें दोष देना व्यर्थ है, क्योंकि निर्भया कांड के बाद बहुत से मानवाधिकार कार्यकर्ता भी मृत्युदंड के पक्ष में खड़े हो गए थे। यह वही स्थिति है, जिसमें अंध देशभक्ति के ज्वार में बहने वाले आतंकवादियों को फांसी पर लटकाने की मांग करते हैं। निश्चित रूप यह किसी परिपक्व लोकतांत्रिक समाज की चेतना का लक्षण नहीं। हमें कानूनों और अदालती प्रक्रिया में ऐसे बदलाव पर क्यों नहीं सोचना चाहिए, जो अपराधी को निश्चित दंड दिलाने में समर्थ हों? 
    इस पूरी बहस में एक और मुद्दा छूटा जा रहा है। यह मुद्दा है भारतीय पुलिस के चरित्र और संगठन में बुनियादी परिवर्तन करने का। उन्नाव और कठुआ, दोनों ही मामलों में पुलिस पेशेवर संगठन की तरह व्यवहार न करके अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने में लगी थी। बलात्कार का आरोपी उन्नाव का विधायक सत्ताधारी पार्टी से संबंधित है।
     राजधानी से थाने तक जातिगत समीकरण उसके पक्ष में थे, इसलिए यह बड़ा स्वाभाविक था कि पीडि़ता साल भर तक बड़े-छोटे दरबारों के चक्कर लगाती रही और उसका मुकदमा तब दर्ज हुआ, जब उसके पिता की विधायक समर्थकों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। फिर मीडिया में मामला इतना उछल गया कि उसे दबाया नहीं जा सकता था। कठुआ में भी लगभग यही हुआ। सत्ता गठबंधन में शामिल दो दल, सांप्रदायिक कारणों से अलग-अलग पीडि़ता और दोषियों के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। मतभेद का सीधा असर कठुआ पुलिस पर दिखाई दे रहा था। पुलिस ने जो चार्जशीट दाखिल की है, उसका फैसला तो अदालत करेगी, पर जिस तरह से विवेचकों को मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार बदला गया, उससे मन में संदेह होना लाजिमी है। उन्नाव में आरोपियों द्वारा प्रयास किया गया कि मामला सीबीआई के पास न जाने पाए, जबकि कठुआ में आरोपी मांग कर रहे हैं कि विवेचना सीबीआई को सौंप दी जाए। 
    यह समय है कि जब वक्ती उबाल के ठंडे पड़ जाने के बाद पुलिस सुधारों पर गंभीरता से विमर्श किया जाए। पुलिस को ज्यादा पेशेवर, विवेचना में दक्ष, बेहतर उपकरणों से सुसज्जित और प्रशिक्षित करके हम कठुआ या उन्नाव की पुनरावृत्ति रोक सकते हैं। बावजूद इसके कि पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्यों का विषय है, इसमें कोई हर्ज नहीं है कि उन पर राजनीतिक आकाओं के नियंत्रण में कुछ कमी की जाए। तमाम पुलिस आयोगों की धूल खा रही फाइलों में यही सब अनुशंसाएं तो हैं, जिन्हें लागू करना अब बेहद जरूरी हो गया है।
     सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने कई निर्णयों में इन्हीं सब पर बल दिया है। दुराचार पर चल रही राष्ट्रीय बहसों के दौरान इस गंभीर मुद्दे की लगभग उपेक्षा हो रही है। आम चुनाव में अब सिर्फ एक वर्ष रह गया है और यदि जनमत तैयार करने वाली कोई सार्थक बहस चल सके, तो संभव है कि हमारे राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणापत्रों में पुलिस सुधारों को भी उनकी वाजिब जगह दे दें। https://www.livehindustan.com/blog/ 

     

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Posted Date : 25-Apr-2018
  • प्रकाश दुबे
    शौच और सोच
     जोर शोर के साथ स्वच्छ भारत अभियान शुरु हुआ था। दायें-बांयें झांक लो। ढोल की पोल खुल जाती है। रही सही कसर रेल ने पूरी कर दी। मंत्री पीयूष गोयल की मेज पर रपट पहुंची जिससे पूरा कमरा महक गया। रपट के मुताबिक रेलगाडिय़ों में जैविक शौचालय लगाए गए। लेकिन वे यशस्वी नहीं हुए। पर्यावरण की तरफ से बेफिक्र लोग कागज, प्लास्टिक पैकेट वगैरह डालने से बाज नहीं आए। शौचालय रुंधे। असफलता की बद बू से परेशान रेल मंत्रालय नया प्रयोग करने की पहल कर रहा है। पीयूष गोयल और रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष अश्विनी लोहानी माथा-पच्ची कर रहे हैं। प्रयोग क्या है? यह तो उनसे पूछना। बहरहाल स्वच्छता ने रेल भवन में नाक में दम कर रखा है।                                
    मुंहबोले का मौन
    नाना पाटेकर नागपुर के एक फौजी को जीजा कहकर हांक लगाते थे। प्रहार फिल्म की शूटिंग बेलगाम में हुई थी। कर्नल सुनील देशपांडे सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र के कर्ताधर्ता थे और प्रहार में नाना को सैनिक वाले करतब सिखाने वाले प्रशिक्षक भी। नाना और कर्नल का साले-जीजा का रिश्ता पुणे की देन है या नहीं? दोनों ने नहीं बताया। हुआ कुछ ऐसा, कि पिछले दिनों चाहकर भी कर्नल की नाना से बात नहीं हो सकी। नाना मुंबई और पुणे के बीच उलझकर भटकते रहे। फोन की घंटी तक थककर मौन हो जाती थी। कर्नल देशपांडे की सक्रियता में बीमारी लिपटी। मुंह बोले जीजा के मौन हुए। खबर सुनकर नाना ने सिर पीटा होगा। अभिनय नहीं, सचमुच।                                
     अमावस अशुभ 
      भारतीय जनता पार्टी साधु-संतों की पार्टी है। मठ-मंदिरों का आशीर्वाद है। साधु-संत-मठाधीश उम्मीदवार बनने के लिए तड़प रहे हैं। कांग्रेस का हाल अलग नहीं है। मुख्यमंत्री सिद्घरामैया से लेकर पार्टी अध्यक्ष तक शीश नवाते परिक्रमा कर रहे हैं। धर्म पगे चुनाव में चांद, सूरज और तारे आंखें तरेरने से बाज नहीं आ रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन के पहले दिन निर्वाचन कार्यालय सुनसान थे। दोनों प्रमुख दलों के किसी प्रत्याशी ने नामांकन नहीं भरा। हालांकि सूची जारी हो चुकी थी। भरपेट भोजन किया। बैठकें कीं। अमावस्या के पास वाले दिन नामांकन भरने से भविष्य अंधकारमय होने का खतरा था। अंधश्रद्घा कहें तो लोग बुरा मानेंगे।       
     उपकार मेें मुनाफा 
     जाड़ों में तापमान 35 के पार जाना और अप्रैल में बारिश होना देख चुके हैं। नया चमत्कार है-नितिन गडकरी का रेल मार्ग बनाना। जहाजरानी निगम, जल संसाधन और सड़कें गडकरी की मु_ïी में हैं। अकेला रेल मंत्रालय लेने से मना करने के बाद भी रेलमंत्री।  
       मुंबई से इंदौर को सीधे, तेज रेलमार्ग से सीधा जोडऩे के लिए गडकरी जहाजरानी निगम से निधि दिलाएंगे। शर्त यह है कि मध्य प्रदेश सरकार रेल पटरी के लिए सरकारी जमीन सौंपे। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन गदगद हैं। उनके क्षेत्र में गडकरी यूं ही परोपकार नहीं कर रहे हैं। इंदौर से जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट हजारों कंटेनर जाते हैं। रेल मार्ग से जल्दी पहुंचेंगे। जहाजरानी निगम का खर्च बचेगा। फायदा है।    
    (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

     

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Posted Date : 24-Apr-2018
  • कुछ साल पहले तक किसी पुराने या बुजुर्ग हाथ में मोबाइल दिखाई देता था तो एक खुशी होती थी। खुशी यही कि अब नई तकनीक इन तक पहुंच रही है। लेकिन आज इंटरनेट पर फेक न्यूज के बढ़ते प्रभाव ने समाज में एक चिंता पैदा कर दी है।
     कश्मीर में 8 साल की बच्ची से बलात्कार और फिर उसकी हत्या के मामले में भारत की आम जनता का गुस्सा किसी से छिपा नहीं है। लेकिन इस दौरान इंटरनेट पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक बच्ची गाना गा रही है। कहा जा रहा है कि वह वीडियो 8 साल की पीडि़ता का आखिरी वीडियो है। लेकिन तथ्यों की जांच करने वाली एक टीम इसे फेक करार दे रही है। टीम के मुताबिक फेक न्यूज का यह कोई पहला मामला नहीं है। क्योंकि हर रोज देश भर में ऐसी ही फेक खबरें वायरल होती है। भारत जैसे देश में ये खबरें जंगल की आग की तरह फैलती है। ऐसे में यूजर्स और जांचकर्ताओं के लिए पता लगाना कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर क्या सही है, क्या गलत, बेहद ही मुश्किल हो जाता है। जांच करने वाली छोटी टीमों की यही परेशानी है। उनके पास अलग-अलग भाषाओं में इतना कंटेट आता है कि उनके लिए जांच करना टेढ़ी खीर साबित होता है। स्वतंत्र जांचकर्ता यह समझते हैं कि भारत जैसे देश में जहां फेक न्यूज विवाद या हिंसा पैदा करने के लिए काफी है, उनका काम बहुत बड़ा और संवेदनशील है। पिछले साल फेक न्यूज के चलते लोगों की मौत और घायल होने तक की खबरें भी सामने आई थीं।
    तथ्यों की जांच
    तथ्यों को जांचने वाली बेवसाइट बूम के संस्थापक और संपादक गोविंदराज इथिराज के मुताबिक, उनकी टीम के पास फेक न्यूज के हर दिन दर्जनों मामले आते हैं। ये मामले गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। इथिराज मानते हैं कि भारत ही इकलौता ऐसा देश है कि जहां फेक न्यूज के चलते हिंसा भी भड़क सकती है। बूम ने ही उस वीडियो को खारिज किया है जिसमें गाना गाती एक लड़की को 8 साल की पीडि़ता बताया जा रहा था। बूम भारत में सोशल मीडिया पर चल रही खबरों से जुड़े तथ्यों को जांचने वाली स्वतंत्र एजेंसी है। इसमें फिलहाल 6 लोगों की टीम यह काम करती है। कर्नाटक विधानसभा चुनावों से पहले फेसबुक ने भी बूम के साथ साझेदारी करने की घोषणा की है। फेसबुक पिछले कुछ समय से चुनाव में गड़बड़ी फैलाने का आरोप झेल रहा है। यह पहला मौका है जब फेसबुक जैसी कंपनी ने जांचकर्ता एजेंसी के साथ कोई गठजोड़ किया हो।
    सस्ते फोन, सस्ता डाटा
    एंटी प्रोपेगेंडा साइट बताने वाली कंपनी आल्टन्यूज के संस्थापक प्रतीक सिन्हा कहते हैं, सस्ते डाटा प्लान और सस्ते स्मार्टफोन बाजार में उपलब्ध है जिसके चलत देश की आबादी का तकरीबन एक तिहाई हिस्सा इंटरनेट से जुड़ा हुआ है। ऐसे में लोगों के लिए सही और फेक खबर में अंतर करना मुश्किल हो जाता है। खासकर ग्रामीण इलाकों के लोग जो अब तक खबरों से दूर रहे थे, अचानक जानकारियां मिलने के बाद यह नहीं समझ पाते कि सही क्या है और क्या गलत। वह उस हर बात पर भरोसा कर लेते हैं जो उनके पास पहुंचती है।
    इथिराज कहते हैं कि कई बार ये फेक कंटेट ऐसे हिस्सों में घूमता है जहां के बारे में हमें नहीं पता होता। स्थानीय भाषाओं में यह वायरल हो जाता है। ऐसे में एक बार इसके जारी होने के बाद उसे आगे बढऩे से रोकना असंभव हो जाता है। जिस तेजी से यह बढ़ता है लोग उसे उसी तेजी से इसे सच मानने लगते हैं। इथिराज बताते हैं, इस समस्या से निपटने में पुलिस और प्रशासन दोनों ही असफल साबित हो रहे हैं।
    नेता भी शिकार
    फेक न्यूज पर मोदी सरकार ने पत्रकारों पर कार्रवाई करने जुड़ा फैसला एक दिन बाद ही पलट दिया था। फेक न्यूज का शिकार बीजेपी के मंत्रियों को भी होना पड़ा है। कुछ समय पहले यह भी खबर उड़ी थी देश की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारामन ने ऑस्कर विजेता किसी संगीत निर्देशक पर गौहत्या को लेकर ट्वीट किया है। लेकिन बाद में वह गलत साबित हुआ। गौहत्या भारत में फेक न्यूज का बड़ा मुद्दा रहा है। इसके अलावा साल 2014 के चुनावों के दौरान भी ऐसे मामले सामने आए थे। एक अन्य जांचकर्ता एजेंसी के मुताबिक देश में फेक न्यूज का असर साल 2019 में होने वाले आम चुनावों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे मे जरूरी है कि लोगों को सच बताया जाए। (डॉयचेवेले)

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Posted Date : 24-Apr-2018
  • विनीत खरे
    सुप्रीम कोर्ट में अंतर्कलह, चीफ जस्टिस पर लगे गंभीर आरोप और फिर उन पर महाभियोग के प्रस्ताव के बाद अब चर्चा हो रही है पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील शांति भूषण की याचिका की। सुप्रीम कोर्ट में किस केस की सुनवाई जजों की कौन सी बेंच करेगी, इसका फैसला मास्टर रोस्टर चीफ जस्टिस करते हैं। शांति भूषण ने इस व्यवस्था के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका मानना है इस बारे में फैसला पांच जजों के समूह या कॉलेजियम को करना चाहिए।
    याद रहे जनवरी में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने इतिहास में पहली बार पत्रकारों से बातचीत में कहा था कि लोकतंत्र खतरे में है। उन्होंने कहा था कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने चुने हुए मामलों को बिना किसी औचित्य के चुने हुए जजों को सुनवाई के लिए दिया। शांति भूषण की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो इस बारे में सर्वोच्च कानून अधिकारी अटॉर्नी जनरल के विचार सुनना चाहेंगे और मामले की अगली तारीख 27 अप्रैल तय की गई है।
    सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में शांति भूषण ने कहा है कि ऐसा नहीं हो सकता कि मास्टर ऑफ रोस्टर के पास बिना किसी रोकटोक के मनमानी शक्ति हो जिसे माननीय चीफ जस्टिस चुने हुए जजों को चुनकर और किसी विशेष जज को मामला देकर इस्तेमाल करें। याचिका के मुताबिक, ऐसा करने से लोकतंत्र का नाश होगा और संविधान ने आर्टिकल 14 के अंतर्गत जो कानून की गारंटी दी है उस पर असर पड़ेगा। याचिका में कहा गया है कि चीफ जस्टिस को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ जजों के साथ बातचीत और पूर्व में दिए गए आदेशों के अनुसार करना चाहिए। याचिका में उन आरोपों की ओर इशारा किया गया है कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों को सिर्फ चुनी हुई बेंच को सौंपा गया, हालांकि कई वरिष्ठ वकील और संविधान मामलों के जानकार ऐसे आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हैं।
    याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट पहले कह चुका है कि किस बेंच को कौन से केस दिया जाए, ये अधिकार सिर्फ चीफ जस्टिस के पास है। ऐसे में शांति भूषण की याचिका पर संविधान मामलों के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में हमेशा से ये परंपरा रही है कि रोस्टर चीफ जस्टिस के हाथ में होता है। वो ही ये तय करते हैं कि कौन सा मामला किस बेंच में जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ये परंपरा है।
    उधर, शांति भूषण का मानना है कि रोस्टर बनाना इतना महत्वपूर्ण काम है कि उसे एक व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। कोलिजियम इस बात को तय करे कि क्या बेंच बनेगी, कौन सा केस कहां जाएगा। शांति भूषण कहते हैं कि ये पहली बार हो रहा है कि चीफ जस्टिस स्वयं अपने अधिकार का प्रयोग करके कह रहे हैं, ये केस इस बेंच में जाएगा, ये उस बेंच में जाएगा और (वो मामलों को) सीनियर जजों को नहीं भेज रहे हैं। वो आरोप लगाते हैं कि सरकार को ऐसे जज सूट करते हैं जिन्हें सरकार जब चाहे धमका सकती है कि हमारे पास आपके खिलाफ ये सबूत हैं। ब्लैकमेल हो रहा है और वो हो ही रहा है। सरकार के मंत्री ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज कर चुके हैं।
    सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों के मीडिया में आने के बाद ऐसे आरोप लगे कि उच्चतम न्यायालय में सब कुछ ठीक नहीं है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू के भेजे महाभियोग प्रस्ताव में भी जस्टिस मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि ये प्रस्ताव रद्द हो गया। जानकार मानते हैं कि इस पूरे विवाद से न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट की छवि पर असर पड़ रहा है, मध्य और निचली अदालतों पर काम कर रहे न्यायाधीशों के मनोबल पर भी असर पड़ा है।
    राजनीतिक झुकाव के आरोपों पर संविधान मामलों के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं कि मैं नहीं समझता कि चीफ जस्टिस की छवि कभी प्रो-बीजेपी रही है। और किसी न्यायाधीश के लिए ये कहना कि वो किसी राजनीतिक दल का पक्ष ले रहा है। उसके लिए बहुत पर्याप्त सबूत होना चाहिए। मैंने जो कुछ सुना है उनको प्रो-कांग्रेस शायद ज्यादा कहा जाता रहा है। लेकिन प्रो-कांग्रेस या प्रो-बीजेपी किसी न्यायाधीश को कहना अनुचित है और नहीं होना चाहिए।
    सुभाष कश्यप कहते हैं कि जो कुछ हो रहा है, हुआ है उससे न सिर्फ चीफ जस्टिस की छवि को आघात पहुंचा है लेकिन जो चार जज हैं उनकी भी छवि खराब हुई है। सुभाष कश्यप कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में मचे घमासान का हल अदालत के भीतर ही होना चाहिए। वो कहते हैं, निजी तौर पर, नाइट क्लब और घरों में बैठकर लोग बहुत कुछ कहते रहे हैं लेकिन खुले में प्रेस कान्फ्रेंस में ऐसी बातों का उठना ऐसा कभी नहीं हुआ। अभी तक हम कहते थे कि लोकतंत्र की अंतिम पतवार न्याय पालिका है और वो पतवार भी टूटती नजर आ रही है। उधर शांति भूषण कहते हैं, अगर उनकी याचिका रद्द होती है तो वो पुनर्विचार याचिका और फिर क्यूरेटिव याचिका अदालत में दाखिल करेंगे। (बीबीसी)

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Posted Date : 24-Apr-2018
  • रजनीश कुमार
    सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग के नोटिस को राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की तरफ से अस्वीकार किए जाने के बाद कांग्रेस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि कांग्रेस ने जल्दबाजी में अपनी ही किरकिरी करा ली। कई ऐसी बातें सामने आई हैं जिनसे साफ होता है कि कांग्रेस ने महाभियोग का नोटिस देने में गंभीरता नहीं दिखाई। इस महाभियोग नोटिस पर कांग्रेस समेत सात दलों के 71 सांसदों के हस्ताक्षर थे। अब जो बात सामने आई है उससे पता चला है कि इनमें से सात रिटायर्ड सांसदों के भी हस्ताक्षर थे।
    आखिर ऐसा क्यों हुआ? वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा का कहना है कि महाभियोग पर पहले से ही सांसदों हस्ताक्षर करा लिए गए थे। अब ऐसे में सवाल उठता है कि पहले हस्ताक्षर करा लिए गए थे तो उपराष्ट्रपति को सौंपते यह क्यों नहीं देखा गया कि इसमें रिटायर्ड सांसदों के भी हस्ताक्षर हैं।
    बीजेपी का कहना है कि पहले से तैयार नोटिस को जज लोया पर आने वाले फैसले तक इंतजार किया गया। बीजेपी प्रवक्ता अमन सिन्हा का कहना है कि जब कांग्रेस को लगा कि जज लोया पर जस्टिस दीपक मिश्रा वाली बेंच का फैसला उनके पक्ष में नहीं है तो उपराष्ट्रपति को महाभियोग को नोटिस थमा दिया। सिन्हा का कहना है कि ऐसे में शक होना लाजिमी है कि कांग्रेस बदले की भावना से काम कर रही है। 
    क्या कांग्रेस ने जिस वक्त महाभियोग का नोटिस दिया उससे शक होता है?
    देश के जाने-माने कानूनविद फली नरीमन ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक काला दिन है।
    फली नरीमन ने कहा कि उनकी 67 साल की उम्र में ऐसा कभी नहीं हुआ। उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला जस्टिस दीपक मिश्रा का विरोध सुप्रीम कोर्ट के चार जज जस्टिस चेमलेश्वर, जस्टिस रंजन गगोई, कुरियन जोसेफ और मदन लोकुर की लाइन से बिल्कुल अलग था। नरीमन का कहना है कि उन चार जजों का विरोध बिल्कुल अलग था। उन्होंने कहा कि महाभियोग अति गंभीर कदम है और उसे साबित करने के लिए आपके पास ठोस सबूत होने चाहिए।
    कांग्रेस के भीतर भी इस महाभियोग को लेकर एक मत नहीं था। महाभियोग नोटिस के समर्थन में हस्ताक्षर किए गए सांसदों की सूची में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के नाम नहीं थे।
    यूपीए सरकार में कानून मंत्री रहे सलमान खुर्शीद, अश्विनी कुमार और वीरप्पा मोइली के भी नाम नहीं थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल का कहना है कि चिदंबरम के खिलाफ अदालत में मामले चल रहे हैं इसलिए उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए थे।
    ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस इतना अहम कदम उठाने जा रही थी तो पार्टी के भीतर सीनियर नेताओं की राय क्यों बंटी हुई थी?
    वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं, इसमें जो भी तथ्य हैं वो सामने हैं। हमें उन तथ्यों के आधार पर ही आकलन करना है। यह मामला इतना संवेदनशील है कि हर चीज काफी जटिल लगती है।
    विनोद शर्मा कहते हैं, कांग्रेस महाभियोग का नोटिस स्वीकार नहीं किए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रही है। अगर इस केस की सुनवाई भी जस्टिस दीपक मिश्रा की ही बेंच करती है तो एक संकट की स्थिति पैदा होगी। आखिर कोई अपने ही खिलाफ केस की सुनवाई कैसे कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जस्टिस दीपक मिश्रा पर कई तरह के संदेह जाहिर किए हैं। इसके साथ ही जजों की नियुक्ति पर कॉलेजियम की सिफारिशों को सरकार मंजूरी नहीं दे रही है। इतना कुछ चल रहा है ऐसे में विपक्षी पार्टियों का शक होना लाजिमी है। अब हमें ये देखना है कि मामले को कैसे सुलझाया जाए।
    शर्मा ने कहा, जस्टिस चेमलेश्वर ने साफ कहा है कि अगर जस्टिस गोगोई को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायधीश नहीं बनाया जाता है तो उनकी शंकाएं सही साबित होंगी।
    जजों की नियुक्ति पर कॉलेजियम की सिफारिशों को लेकेर जस्टिस कुरियन ने भी सीजेआई को चि_ी लिखी है। सरकार का कहना है कि सीजेआई को इस बारे में बता दिया गया है। हालांकि जजों का कहना है कि सरकार के जवाब को सीजेआई ने उन लोगों से साझा नहीं किया है।
    विनोद शर्मा का कहना है कि सीजेआई के खिलाफ जिस तरह के संदेह सामने आ रहे हैं उसमें विपक्ष के पास बहुत विकल्प नहीं थे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर से जैसी चीजें सामने आ रही हैं उससे सबको चिंता हो रही है।
    शर्मा ने कहा कि वेंकैया नायडू ने विपक्ष के महाभियोग के नोटिस को जल्दबाजी में खारिज किया है। उनका कहना है कि सीजेआई पर महाभियोग के आरोप में कितना दम है इसकी जांच करने के लिए पैनल बनाई जाती है पर उपराष्ट्रपति ने तो नोटिस ही स्वीकार नहीं किया।
    हालांकि फली नरीमन ने नायडू के कदम को सही बताया है। महाभियोग नोटिस खारिज किए जाने के बाद उन्होंने कहा, च्ज्सीजेआई के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए कोई ठोस वजह नहीं थी और ऐसे में इसे अस्वीकार किया जाना सही कदम है। वहीं कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी ने कहा, सुप्रीम कोर्ट को कुचला जा रहा है, दबाया जा रहा है। पहली बार चार जज हिन्दुस्तान की जनता से न्याय मांग रहे हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 23-Apr-2018
  • प्रियदर्शन
    भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रामुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर महाभियोग उचित है या अनुचित- इस प्रश्न पर दुर्भाग्य से हर कोई अपनी राय अपनी राजनीतिक पक्षधरता के हिसाब से तय करता मिलेगा। किसी कांग्रेस समर्थक से पूछिए तो शायद वह कहेगा कि महाभियोग बिल्कुल उचित है, किसी मोदी भक्त से पूछिए तो वह न्यायपालिका को लांछित करने के लिए कांग्रेस की भर्त्सना करेगा। हमारे सार्वजनिक विमर्श में हर चीज़ इतनी सपाट और श्रेणीबद्ध कर दी गई है और वह इतनी तात्कालिकता के प्रभाव की मारी है कि अक्सर बड़ा सवाल छोटी बहसों में खो जाता है। बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता याद आती है कि हम सबके हाथ में थमा दिए गए हैं छोटे-छोटे न्याय / ताकि जो बड़ा अन्याय है, उस पर पर्दा पड़ा रहे।
    तो क्या हम छोटे न्याय पर छीनाझपटी कर रहे हैं और बड़े न्याय का प्रश्न हमारी निगाहों से ओझल है? न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा का जो भी हो, लेकिन यह सवाल बचा हुआ है कि क्या भारतीय लोकतंत्र में न्याय वितरण की प्रणाली ऐसी है कि आम आदमी इस पर भरोसा कर सके, इससे एक नागरिक के रूप में जीने का साहस और अभ्यास अर्जित कर सके?
    इत्तिफ़ाक़ से जिस दिन मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग का प्रस्ताव आया, ठीक उसी दिन गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा 2002 के भयावह नरोदा पटिया दंगों की मुजरिम और सज़ायाफ़्ता रहीं पूर्व मंत्री माया कोडनानी को बरी किए जाने की ख़बर भी आई। 2002 की गुजरात हिंसा- 1984 की सिख विरोधी हिंसा की तरह ही- हमारी राजनीतिक, प्रशासनिक और न्यायिक विफलता का दुखता हुआ उदाहरण है। रेप के लिए फांसी की मांग और व्यवस्था कर रहे राजनीतिक दलों और नेताओं को यह दिखाई नहीं पड़ता कि जिन ख़ौफऩाक अपराधों के लिए फांसी पहले से तय है, उन पर भी न्याय नहीं हो पा रहा है। निस्संदेह, यह कहीं से गुजरात उच्च न्यायालय की विफलता नहीं है कि वहां से माया कोडनानी छूट जाती हैं- अदालत ने अपना काम सुलभ सबूतों और गवाहियों के आधार पर बिल्कुल उचित किया होगा- लेकिन यह सवाल पूछना तो कहीं से नाजायज़ नहीं है कि आखऱि गुजरात 2002 या 1984 के इंसाफ़ का क्या हुआ?
    और सिफऱ् यही दो मामले नहीं हैं- यह सच है कि हमारी पूरी न्याय प्रणाली- हमारी संसदीय राजनीति की तरह ही- बड़े पैसे वालों का खेल हो गई है। कचहरियों और निचली अदालतों में इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार है कि वहां जाना किसी दलदल में जाने जैसा लगता है। जहां वह भ्रष्टाचार नहीं है, वहां वकीलों की फीस इतनी ज़्यादा है कि उसे आम आदमी वहन नहीं कर सकता। इस देश के सबसे अच्छे वकील इस देश के सबसे भ्रष्ट लोगों की सेवा में लगे हैं। अगर अलग-अलग मामलों में शामिल वकीलों की सूची बनाएं तो देखकर हैरान रह जाएंगे कि राजनीतिक तौर पर जो वकील कुछ और होते हैं, वे न जाने किन-किन लोगों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। ऐसी हालत में इंसाफ़ होता नहीं, खऱीदा जाता है। इसके अलावा मुकदमे खिंचते-खिंचते इतने लंबे हो जाते हैं कि पीढिय़ां बदल जाती हैं। यह सच है कि यह बीमारी सिर्फ हमारी न्यायिक व्यवस्था की नहीं, शायद पूरी दुनिया की रही है। चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ब्लीक हाउस की शुरुआत ही जिस दृश्य से होती है, उसमें धुंध में डूबे लंदन की एक अदालत में जज एक ऐसा फ़ैसला पढऩे की कोशिश कर रहा है जिसका केस इतना पुराना है कि लडऩे वाले भी भूल गए हैं कि किस बात पर वे लड़ रहे हैं। फ्रैंज काफ़्का का उपन्यास द ट्रायल तो अदालती व्यवस्था के ऑक्टोपसी शिकंजे की एक भयावह दास्तान है।
    लेकिन भारतीय न्याय प्रणाली में हाल के दिनों में एक नई प्रवृत्ति दिखाई पड़ी है। अदालतें सियासी टकरावों का बोझ उठा रही हैं और सियासी पूर्वाग्रहों की छाया अदालतों पर पड़ रही हैं। इसकी ताज़ा मिसाल एससी-एसटी ऐक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के बदलाव के बाद पैदा हुआ हंगामा है। दरअसल भारतीय राजनीति दलित अस्मिता का मान रखने में नाकाम साबित हुई, भारतीय प्रशासन उन क़ानूनों की इज़्ज़त नहीं कर पाया जो दलितों को बचाव दे पाते- और ऐसे में अदालत से जो फ़ैसला आया, उसे भी दलितों ने अपने ही विरुद्ध पाया।
    यह हाल कई और मामलों का है। ऐसा लगता ही नहीं कि भारतीय राष्ट्र राज्य कानूनों के सहारे चल रहा है। क़ानून अमीर-गरीब का भेद ख़ूब पहचानते हैं- ताकत़ वालों में क़ानून तोडऩे की आदत हो गई है। दिल्ली में क़ानून की परवाह किए बिना जो कारोबारी दुनिया इन तमाम वर्षों में बड़ी हो गई, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने अंकुश लगाने की कोशिश की तो सभी राजनीतिक दल एक हो गए। सब चाहते हैं कि सबकी मिलीभगत से फफुंद की तरह दिल्ली के जिस्म पर फैला जो कारोबार है, उस पर क़ानून की मोहर लग जाए। राजनीतिक दल इस बात के लिए लड़ रहे हैं कि अध्यादेश लाएगा कौन, उसका समर्थन कौन करेगा।
    क़ानून तोडऩे और अपना क़ानून चलाने की मिसालें और भी हैं। सरकारी नेताओं के संरक्षण में पली-बढ़ी गौरक्षक सेनाएं बहुत अहंकार के साथ पुलिस और अदालत से पहले अपना काम कर गुजऱती हैं। किसी भी ट्रक पर मवेशी लदा देखकर उसे रोकना, ड्राइवर को पीटना और अगर खऱीद-फरोख़्त करने वाले अल्पसंख्यक हुए तो उन्हें दंडित करना आम है।
    जब क़ानून को लेकर यह रवैया और इंसाफ़ को लेकर यह नजरिया हो तो किसी महाभियोग पर राजनीति संभव है। न्यायपालिका को लेकर यह राजनीति पहले भी हुई है, इसकी मिसालें एकाधिक हैं। ऐसे में आम आदमी का इंसाफ़ उसे लगातार छलता है और इस नाइंसाफी को नेता अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं। दोनों स्थितियों में मारा वह नागरिक जाता है जो क़ानून के हिसाब से जीने की कोशिश करता है। दरअसल एक महाभियोग इस पूरी व्यवस्था और उसके तमाम पुर्जों के ख़िलाफ़ लाने की ज़रूरत है- जो न जाने कब आएगा। (लेखक एनडीटीवी इंडिया में सीनियर एडिटर हैं।) https://khabar.ndtv.com/n

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Posted Date : 23-Apr-2018
  • ओंकार सिंह जनौटी
    भारत में मुद्रा से जुड़े अधिकार केंद्रीय बैंक यानि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास हैं। बाजार और अर्थव्यवस्था की स्थिति को देखते हुए रिजर्व बैंक नोटों की छपाई का फैसला करता है। नए नोटों की छपाई के पीछे सबसे अहम भूमिका आम तौर पर मुद्रास्फीति निभाती है। मुद्रास्फीति बढऩे के दौरान सेवाओं और उत्पादों का मूल्य बढ़ जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो मुद्रा का मूल्य गिर जाता है। ऐसे में रिजर्व बैंक बाजार से नकदी सोखने की कोशिश करता है। इन कोशिशों के तहत नए नोटों की छपाई नहीं की जाती। साथ ही बैंकों के लिए रेपो रेट और कैश रिजर्व रेश्यो में इजाफा किया जाता है। रेपो रेट वह दर है जिसके तहत अल्प अवधि के लिए बैंक रिजर्व बैंक से कर्ज लेते हैं। अगर यह कर्ज महंगा हो जाए तो बैंक भी आम तौर पर कर्ज महंगा कर देते हैं और बाजार से ज्यादा नकदी बैंकों की तरफ लौटने लगती हैं।
    कैश रिजर्व रेश्यो के तहत बैंकों को अपनी कुल नकदी का एक खास हिस्सा रिजर्व बैंक के पास सुरक्षित रखना होता है। इस रेश्यो को बढ़ाते ही नकदी फौरन रिजर्व बैंक के पास लौटने लगती है।
    भारत में इस वक्त देखी जा रही नोटों की कमी को मुद्रा संकट कहना गलत होगा। मौजूदा समस्या नोटों की सप्लाई से जुड़ी है। एटीएम मशीनों का बड़ा नेटवर्क अचानक जरूरत के मुताबिक सप्लाई नहीं दे पा रहा है। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक हाल के समय में अचानक कैश की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है। यह असामान्य डिमांड हैं, लेकिन इसके कारण पता नहीं चले हैं।
    वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा के मुताबिक नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद देश ने मुद्रा संकट देखा। 1,000 के नोटों पर बैन लगाने के बाद सरकार ने 2,000 रुपये के नोट छापे। आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक बाजार में फैले नोटों में 2,000 रुपये के नोट की हिस्सेदार 50।2 फीसदी हो गई। इसके बाद जुलाई 2017 में इन नोटों की छपाई बंद हो गई। लेकिन छपाई बंद होने के बाद धीरे धीरे यह नोट भी बाजार से गायब हो गए हैं। अब इस बात का जवाब मिलना चाहिए कि ये नोट आखिर है कहां?
    विकास दर और पुराने खराब हो चुके नोटों की संख्या के आधार पर नई मुद्रा बीच बीच में जारी होती रहती है। भारत में नोट चार टकसाल और चार बैंक नोट प्रेस में नोट छापे जाते हैं। विदेश से आने वाले हाई सिक्योरिटी पेपर पर नोटों छापने के बाद रिजर्व बैंक अपने 18 इश्यू ऑफिसेस के मार्फत देश भर में नोट सप्लाई करता है। इन इश्यू ऑफिसेस के जरिए नई मुद्रा देश भर में फैले 4,200 से ज्यादा करेंसी चेस्ट में पहुंचती है। ये करेंसी चेस्ट आम तौर शहर या जिले का कोई बड़ा बैंक होता है। इसी करेंसी चेस्ट से मुद्रा सारे बैंकों की शाखाओं में पहुंचती है। कटे फटे और गल से चुके नोटों को कर्मशियल बैंक एक साथ जमा करते हैं और फिर करेंसी चेस्ट वापस भेजते हैं। यशवंत सिन्हा के मुताबिक इस वक्त करेंसी चेस्ट में भी 2,000 के नोट नहीं पहुंच पा रहे हैं और समस्या देश के कई इलाकों तक फैली हुई दिख रही है। (डॉयचे वैले)

     

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Posted Date : 22-Apr-2018
  • देविंदर शर्मा
    कृषि विशेषज्ञ 

    सबसे पहले अच्छी खबरें। लगातार तीसरे साल मानसून के सामान्य रहने की संभावना है। 'भारतीय मौसम विज्ञान विभाग' ने यह भविष्यवाणी की है कि आने वाले दिनों में चौतरफा अच्छी बारिश होगी और पूरे मानसून सीजन में 97 फीसदी बारिश होगी। 
    लेकिन बात यहीं पूरी नहीं हो जाती। हमें मौसम विज्ञानियों पर भरोसा है, मगर कई स्वाभाविक कारणों से सामान्य से कम वर्षा की 44 प्रतिशत आशंकाएं भी हैं। पिछले साल भी मौसम विज्ञान विभाग ने मानसून सीजन में औसतन 96 फीसदी बारिश होने का अनुमान जताया था, लेकिन देश के लगभग 240 जिलों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो गई। दूसरी तरफ, ठीक उसी दौरान कुछ इलाकों में न सिर्फ बारिश हुई, बल्कि मूसलाधार बारिश हुई। देश के लगभग 15 फीसदी भूभाग को बाढ़ का सामना करना पड़ा। डाउन टु अर्थ पत्रिका के मुताबिक, 'पिछले साल मानसून और चाहे जो हो, सामान्य तो कतई न था। कई हफ्तों और महीनों तक वर्षा न होने की कमी को चंद घंटों की जोरदार बारिश ने पूरी कर दी थी। यह वर्षा जल के सामयिक वितरण में भारी विषमता की ओर इशारा करता है।Ó     
    इसलिए हमें बेहतर मानसून की कामना करनी चाहिए। कुछ इलाकों में घनघोर वर्षा और दूसरे क्षेत्र में कम बारिश की बिना पर औसत आकलन तो कर लिया जाता है, लेकिन देखा यह गया है कि अक्सर ये आकलन भ्रामक ही साबित हुए। बहरहाल, मानसून की अगली भविष्यवाणी 15 मई के आसपास की जाएगी और वह भविष्यवाणी हमें बरसात के आरंभ होने व जून-जुलाई में वर्षा के फैलाव की साफ तस्वीर दे पाएगी। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती कि अच्छे मानसून की भविष्यवाणी अर्थव्यवस्था को एक फीलगुड फैक्टर तो देती ही है। समय से बुआई और वक्त पर कटाई ऐसी चीज है, जिसकी हर किसान बाट जोहता है। इस साल का अनुमान है कि बारिश पूरे मौसम में चौतरफा बरसेगी, खासकर जून और सितंबर के महीनों में। गरमी की ज्यादातर फसलों की बुआई अमूमन जुलाई-अगस्त में होती है, उस दौरान हालांकि कुछ कम वर्षा का अनुमान लगाया गया है, मगर इस कमी के भी सामान्य के आसपास रहने की ही भविष्यवाणी की गई है। अगर जुलाई-अगस्त में बारिश में देरी हुई, तो फिर बुआई में भी देरी होगी और इस देरी का मतलब है उत्पादन में गिरावट की आशंका।
    चूंकि हमारे देश का 60 फीसदी बुआई क्षेत्र मानसूनी बारिश पर निर्भर है, ऐसे में सामान्य वर्षा वाले मानसून की भविष्यवाणी ने निश्चय ही खुशी का माहौल बनाया है। यह देश के कुल 640 जिलों में से उन 240 जिलों के लिए खास राहत भरी खबर है, जिन्हें पिछले साल सूखे का सामना करना पड़ा था। इस सूखे से सबसे बुरी तरह प्रभावित कुछ जिले बुंदेलखंड और झारखंड के हैं, तो वहीं महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के कुछ इलाके पिछले कई वर्षों से लगातार सूखा झेल रहे हैं। जल संकट का आलम यह था कि पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ व गुजरात के कुछ इलाकों के किसानों से यह कहा गया कि वे धान की फसल न उगाएं। अगर कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन अच्छा होता है, तो पूरी अर्थव्यवस्था पर उसका दूरगामी प्रभाव पड़ता है। अच्छी पैदावार खाद्यान्न महंगाई दर को काबू में रखती है। अच्छे मानसून का सुखद असर यह भी होता है कि इसके कारण भूजल स्तर के रीचार्ज होने से सिंचाई के साथ-साथ पेयजल की उपलब्धता बढ़ जाती है, और बारिश का पानी देश के 81 बड़े जलाशयों को लबालब भर देता है। उच्च कृषि विकास दर का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्र की क्रय शक्ति के बढऩे से मैन्युफैक्चरिंग व औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि होती है। इसलिए चुनावी साल में अच्छा मानसून सत्तारूढ़ पार्टी के लिए भी सुखद साबित होता है, क्योंकि जनता की आम धारणा पर इन सभी का असर पड़ता है।
    हम सभी जानते हैं कि बारिश, अनाज के उत्पादन और आर्थिक विकास का सकारात्मक पारस्परिक संबंध है। लगातार दो सूखे वाले वित्तीय वर्ष 2014-15 और 2015-16 में देश में अनाज के उत्पादन में गिरावट आई थी, जिसके कारण उस दौरान कृषि विकास दर क्रमश: -0.8 और -0.1 प्रतिशत रही। लेकिन जब 2016-17 में मानसूनी बारिश सामान्य हुई, तो कृषि विकास दर उछलकर 6.8 प्रतिशत पर पहुंच गई। इस साल इसके तीन प्रतिशत रहने का अनुमान है। लेकिन पिछले दो वर्षों से अच्छे मानसून और रिकॉर्ड कृषि उपज के बावजूद किसानों की स्थिति क्या है? चारों तरफ, कृषि उत्पादों के दाम धराशाई हो गए। किसान उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की 15 से 40 फीसदी कम कीमत पर बेचने को मजबूर हुए। ऐसे तमाम वाकये देखने-पढऩे को मिले, जब टमाटर, आलू और प्याज जैसी कृषि उपजों को किसानों ने सड़कों पर फेंक दिया। कपास, सोयाबीन, दालों, सूरजमुखी, जौ, यहां तक कि गेंहू व चावल के दाम भी कम ही थे।
    अतिरिक्त उत्पादन किसानों के लिए स्वाभाविक रूप से अच्छी कीमत लेकर सामने नहीं आया। इसलिए, लगातार तीसरे साल अच्छे मानसून की भविष्यवाणी इस बात की गारंटी नहीं है कि यह कृषि आय में कोई स्थिरता लाएगी। पिछले कई वर्षों से किसानों की वास्तविक आय में सालाना महज 0.44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है और मुझे इसमें किसी बड़े बदलाव की कोई सूरत नहीं दिखती। अनेक अध्ययनों ने यह दिखाया है कि मानसून सामान्य रहे या कमजोर, वास्तविक कृषि आय में जड़ता बनी रहेगी। इसकी मुख्य वजह यह है कि खाद्यान्न महंगाई को काबू में रखने का सारा भार किसानों के कंधे पर डाल दिया गया है। कृषि को जान-बूझकर साधनहीन बनाया जा रहा है। इसलिए हमारे नीति-नियंताओं के सामने यह बड़ी चुनौती है कि वे कृषि आय को बढ़ाने के लिए फौरन वाजिब कदम उठाएं। यह वक्त 'दाम नीतिÓ से आगे 'आय नीतिÓ की तरफ बढऩे का है। मानसून अच्छा रहे या कमजोर, किसानों की जरूरत एक सुनिश्चित मासिक आमदनी है। उन्हें अब इंद्र देवता के भरोसे और ज्यादा नहीं छोड़ा जा सकता।
    https://www.livehindustan.com/

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Posted Date : 22-Apr-2018
  • -Aman Singh

    “What you do in Bijapur will decide where you are headed in life,” Chhattisgarh Chief Minister Raman Singh told Ayyaj Tamboli while posting him as the Collector about two years ago. For Ayyaj, the son of a government school teacher and an Anganwadi worker from rural Maharashtra, becoming the first doctor from his community may have been a great achievement in itself; he doubled it with his selection into the IAS. In his role as collector, Bijapur — a district with a population of just 255,000 deep inside Bastar — he has truly experienced the defining moment of his life. Bijapur is one of the 101 districts that the Niti Aayog identified as being the farthest behind among the 640 districts of India, in development terms.

    The Prime Minister announced the launch of a transformative programme for these ‘101 Aspirational Districts’ and inaugurated the world’s largest health care programme ‘Ayushman Bharat’ in Bijapur on April 14, the 127th birth anniversary of the Father of India’s Constitution.

    Bijapur, and indeed the entire Bastar region is mineral-rich and a classic victim of the ‘resource curse’. It was an example of the vicious circle of poverty, conflict and lack of development, each feeding off the others. A Venn diagram of the various factors that contribute to backwardness would place a very high percentage of the 101 districts in the intersection of high tribal population, mining activity, left wing extremism, high forest cover and hilly terrain. It should come as no surprise that 70 of these 101 districts are from seven states (Jharkhand, Bihar, Chhattisgarh, MP, UP, Assam, Rajasthan).

    The reasons for backwardness may vary but there is no doubt that this focused approach to removing disparity will be a game changer. The five thematic areas for a concentrated dose of development are health, education, agriculture and water resources, basic infrastructure, and financial inclusion and skilling. This is not just about investing in infrastructure but also building capacity and sustainability of the communities without which they could easily become ‘zombie districts’, dependent and addicted to grants in perpetuity. Remarkably, this is a time-bound, data-driven and outcome-oriented exercise in which the socio-economic indicators are supposed to equal the national average by 2022. Development does not get more inclusive than this.

    Being the Prime Minister’s brainchild, this initiative is getting all the impetus it deserves. Niti Aayog, under CEO, Amitabh Kant, is also completely invested in it. The District Collector is pivotal to this programme as a single point of accountability and responsibility. And attaching each district to a ministry and a joint secretary in the Central government to help resolve issues, is also providing them the necessary cover.

    Bijapur, along with Sukma and Dantewada, a veritable hotbed of left wing extremism, is creating a new template of development for Aspirational Districts by leveraging several discretionary and budgetary allocations through innovations and convergence. The benefits of centralised planning and budgeting notwithstanding, a country of India’s diversity and disparities cannot be served by a one-size-fits-all approach. Procedural relaxations coupled with untied funds like SCA, DMF and CSR are central to this transformation.

    In the last two years Ayyaj has brought a sea change in the health indicators in Bijapur. He set about fixing every aspect of the weak medical service delivery system. He upgraded the district hospital with state-of-the-art medical equipment that even most private hospitals would be envious of. This, and the higher salaries and incentives offered through DMF funds, helped attract specialist doctors and paramedics. In under two years, the number of specialist doctors has tripled from 7 to 20. In a very short span of time, MMR has halved from 480 to 229 and IMR is down from 84 to 48. Bijapur is a role model of health care transformation. Similar transformative stories are playing out in education, skilling, livelihood and infrastructure too, all over Bastar.

    Till the 90s, Bastar was the third largest district in India at over 39,000 sq km — larger than Kerala and even some countries like Belgium and Turkey. Since then it has been divided into the present day seven districts that constitute Bastar Division. The seven mostly young district collectors, working with a unity of purpose, are collaborating on several initiatives and celebrating each other’s success. A 500-seater BPO unit has come up in Dantewada thanks to the efforts by PM awardee, Saurabh Kumar, the Dantewada Collector and Ayyaj’s IAS batch mate. The journey of BPO from Bangalore to Bastar is another seismic event, the impact of which will be felt far beyond Bastar. For the PM’s visit to Bijapur, if Ayyaj was the groom, Saurabh was his ‘best man’, assisting him with the preparations.

    It was only when a visiting journalist pointed out to me that a Muslim Collector was the most visible face for the PM’s visit, that it struck me that 3 out of 27 Collectors in Chhattisgarh are Muslim — that’s over 11 per cent in a state with a Muslim population of around 2 per cent.

    The Aspirational Districts Programme is a silent war against all that has held back these 101 districts for decades. As Bijapur is showing, a cocktail of trust, freedom, political non-interference, flexibility, delegation and financial empowerment of collectors can do wonders. What the Prime Minister announced on Saturday was not just another programme, it has the potential to permanently transform the face of rural India. A new India may be just around the corner.

    (The writer is Principal Secretary, Government of Chhattisgarh and views expressed are his own.) (Article courtesy : Business Standard)

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Posted Date : 22-Apr-2018
  • प्रदीप सिंह
    यशवंत सिन्हा एक बहुत ही काबिल प्रशासनिक अधिकारी रहे, काबिल मंत्री रहे, उन्हें राजनीति की अच्छी समझ है साथ ही वे आर्थिक विषयों के अच्छे जानकार हैं। उन्हें विदेश नीति की भी अच्छी समझ रही है।  लेकिन कुछ लोग राजनीति में इसलिए होते हैं कि उन्हें हर समय राजनीति से कुछ चाहिए, यशवंत सिन्हा उन्हीं लोगों में से हैं जिन्हें हरवक्त यह अपेक्षा रहती थी कि पार्टी उनके लिए कुछ ना कुछ करती रहे। यशवंत सिन्हा जब चंद्रशेखर की पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में आए तब पार्टी ने उन्हें बिहार विधानसभा में विधायक दल का नेता बना दिया था।
    उसके बाद जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो उन्हें केंद्रीय मंत्री भी बनाया गया, पहले वित्त मंत्री, उसके बाद विदेश मंत्री। इस तरह यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी उन शुरुआती लोगों में से थे जो नरेंद्र मोदी के लिए प्रधानमंत्री पद का समर्थन करते हुए दिख रहे थे। साल 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त उन्होंने कहा था कि जब तक इस लोकसभा का कार्यकाल पूरा होगा तब तक मेरी उम्र 81-82 साल हो जाएगी, ऐसे में मेरे लिए राजनीतिक रूप से सक्रिय रहना बहुत ज्यादा संभव नहीं होगा।
    इसके बाद पार्टी ने उनके कहने पर उनके बेटे को टिकट दिया और बाद में बेटे को मंत्री तक बना दिया। अब जब ये दोनों बातें हो गईं तो वे कथित तौर पर चाहते थे कि पार्टी उन्हें झारखंड का मुख्यमंत्री बना दे, लेकिन पार्टी ने इसे स्वीकार नहीं किया, वजहें जो भी रही हों। इसके बाद वे कथित तौर पर चाहते थे कि पार्टी उन्हें ब्रिक्स बैंक का चेयरमैन बना दे, पार्टी ने यह भी नहीं होने दिया। इसके बाद से ही वे लगातार पार्टी विरोधी बयान देने लगे। हम कह सकते हैं कि हर अच्छी चीज का अंत होता है, आप अच्छे और योग्य व्यक्ति हैं। इसका मतलब यह नहीं कि आप बाकी लोगों का रास्ता रोक देंगे।
    क्या प्रधानमंत्री मोदी उनसे नाराज थे?
    यशवंत सिन्हा ने कहा है कि वे पिछले लंबे वक्त से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वक्त मांग रहे थे, उनसे मिलकर कुछ विषयों पर चर्चा करना चाह रहे थे। लेकिन यह भी देखना होगा कि प्रधानमंत्री से वक्त मांगने से पहले वे क्या-क्या कर चुके थे। 
    वे पार्टी के खिलाफ हर फोरम पर बोल रहे थे, लिख रहे थे। पार्टी के लोगों को पार्टी के खिलाफ तैयार करने की कोशिशें कर रहे थे। इन सब चीजों के बीच प्रधानमंत्री जानते थे कि वे उनसे क्यों मिलना चाहते हैं। प्रधानमंत्री यह भी जानते थे कि यशवंत सिन्हा उनसे मुलाकात कर क्या मांगना चाहते हैं। इस तरह अगर प्रधानमंत्री उनसे मुलाकात करते तो यशवंत सिन्हा इसका भी राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करते, यही वजह थी कि प्रधानमंत्री ने शायद उन्हें मिलने का वक्त नहीं दिया।
    एक तरह से कहें तो 2014 में जब यशवंत सिन्हा ने पार्टी विरोधी रुख अपनाया था तभी से पार्टी ने उन्हें खुद से अलग कर दिया था बस उन्हें पार्टी से निकाला नहीं था। यशवंत सिन्हा का राजनीतिक भविष्य अब महज एक साल का रह गया है। साल 2019 के चुनाव तक मोदी विरोधी जितनी भी ताकतें हैं वे उनका साथ देंगी। उनकी कोशिश रहेगी कि उनका बदला पूरा हो इसलिए वे बीजेपी के खिलाफ काम करेंगे।
    अगर 2019 में बीजेपी वापिस सत्ता में आ गई तो उसी के साथ यशवंत सिन्हा के राजनीतिक करियर का भी अंत हो जाएगा। लेकिन अगर बीजेपी हार गई तो शायद वे फिर से प्रासंगिक हो जाएं और क्या पता किसी पार्टी में शामिल भी हो जाएं, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि उनका एक साल का राजनीतिक जीवन निश्चित रूप से बाकी है।
    बीजेपी पर क्या असर?
    ऐसा नहीं लगता कि यशवंत सिन्हा के बीजेपी से बाहर जाने का बीजेपी पर कोई असर पड़ेगा क्योंकि पिछले 3-4 साल से वे पार्टी में रहकर भी एक तरह से पार्टी के खिलाफ ही काम कर रहे थे। वैसे भी बीजेपी के अन्य लोगों को छोड़ भी दें तो वे अपने बेटे को भी इस बात पर सहमत नहीं करवा पाए कि बीजेपी गलत कर रही है, इससे देश या जनतंत्र को खतरा है। उनका बेटा ही उनकी बातों में उनके साथ नहीं है। इसलिए यशवंत सिन्हा जानते हैं कि पार्टी के भीतर उनके साथ कोई नहीं है, लेकिन फिर भी वे इंतजार कर रहे थे कि पार्टी खुद उन्हें बाहर निकाले ताकि वे एक शहीदी मुद्रा में पार्टी छोड़ सकें।
    क्या बिहार की राजनीति पर असर पड़ेगा?
    बिहार की राजनीति की बात करें तो वैसे भी यशवंत सिन्हा का कोई खास महत्व नहीं हैं, वहीं झारखंड की राजनीति में हजारीबाग से बाहर वे किसी उम्मीदवार को जिताने का दम नहीं रखते हैं।
    दूसरी बड़ी बात यह है कि जब किसी कैडर वाली पार्टी से कोई नेता अलग होता है तो उस पार्टी का कैडर उस नेता के साथ नहीं जाता। चाहें तो कल्याण सिंह, शंकर सिंह वाघेला के उदाहरण देख सकते हैं। इन सभी नेताओं का बहुत बड़ा जनसमर्थन दिखाई देता था, लेकिन पार्टी से अलग होते ही ये अलग-थलग दिखने लगे।
    यशवंत सिन्हा के साथ शत्रुघन सिन्हा भी मौजूद थे, वे भी लगातार पार्टी विरोधी तेवर दिखाते रहे हैं। उनका भी जब आने वाले चुनावों में टिकट कटेगा तो वे भी राष्ट्र मंच के साथ चले जाएंगे। लेकिन इन दोनों नेताओं को देखें तो बिहार के पिछले तीन-चार चुनाव के दौरान किसी भी चुनाव प्रचार अभियान में इन्हें नहीं बुलाया गया। संगठन में इनके लिए कोई बड़ी भूमिका नहीं रही इसलिए ये नेता बिहार की राजनीति या जदयू-बीजेपी गठबंधन को कोई खास चुनौती नहीं दे पाएंगे। (बीबीसी)

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Posted Date : 22-Apr-2018
  • - पुलकित भारद्वाज
    साल 2007 में आई फिल्म, 'तारे जमीन परÓ में एक दृश्य है। इसमें नायक आमिर खान, डिस्लेक्सिया से पीडि़त बच्चे के पिता को 'ख्याल रखनेÓ से जुड़े जज्बात के बारे में बताते हैं। इस बातचीत में वे सोलोमन द्वीप (प्रशांत महासागर) के आदिवासियों की एक प्रथा का जिक्र करते हैं। जिसके अनुसार जब आदिवासियों को जंगल का कोई हिस्सा साफ करना होता है तो वे पेड़-दरख्तों को काटते नहीं, बल्कि सारे मिलकर उस पेड़ के पास पहुंच जाते हैं और उसे जीभर के गालियां देते हैं, कोसते हैं। देखते ही देखते कुछ ही दिनों में पेड़ मुरझाकर मर जाता है।
    कुछ हद तक विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है। एक अध्ययन के मुताबिक किसी सजीव का डीएनए उसके बाहरी माहौल से मिलने वाले संकेतों के हिसाब से शरीर में बदलावों को प्रेरित करता है। इन संकेतों में आसपास गूंजते शब्द और उसके प्रति अन्य सजीवों की भावनाएं भी शामिल होती हैं। पूरी तरह से भले न हो लेकिन विज्ञान के मुताबिक पेड़-पौधों में सजीवों की कई खूबियां पाई जाती हैं। और इसका मतलब है कि वे भी अपने आसपास के लोगों या अन्य जीवों की भावनाओं से प्रभावित होते होंगे। शायद यही कारण है कि जिन पौधों का पोषण अपने पास रखकर बहुत स्नेह से किया जाता है वे अपेक्षाकृत जल्दी बढ़ते हैं। लेकिन मकानों के सिमटते दायरों और रफ्तार से भागती जिंदगी में कई लोग चाहकर भी पेड़ों के प्रति अपने लगाव को इस तरह जाहिर नहीं कर पाते।
    ऐसे लोगों के लिए मेलबॉर्न शहर (ऑस्ट्रेलिया) के निवासी एक नजीर हो सकते हैं, जिन्होंने वृक्षों के प्रति अपना प्यार दिखाने के लिए एक डिजिटल तरीका ईजाद किया है। इसमें जरूरी नहीं कि आप किसी पेड़ का ख्याल सिर्फ पारंपरिक तरीकों जैसे निराई, गुड़ाई, बुवाई और खाद-पानी देकर ही रख सकें। यहां के लोगों ने पेड़ों के प्रति अपना लगाव दिखाने के लिए ई-मेल संदेशों का सहारा लेना शुरू किया है। वृक्षों के नाम लिखे इन संदेशों में उनके प्रति स्नेह और आत्मीयता के साथ उनका आभार भी जताया जाता है। जानकार कहते हैं कि इस तरह पेड़ों के प्रति लोगों की भावनाएं और उनका प्यार प्रत्यक्ष तौर पर न सही, लेकिन कहीं न कहीं पेड़ों की हिफाजत करने और उनकी संख्या बढ़ाने में निश्चित ही कारगर साबित होगा। यही कारण है कि कुछ लोग इस मुहिम को डिजिटल चिपको आंदोलन की संज्ञा दे रहे हैं।
    दरअसल यह पहल मेलबॉर्न में 13 साल के लंबे सूखे के बाद पेड़ों की घटती संख्या को देखते शुरू हुई थी। इसके तहत मेलबॉर्न के 77000 पेड़ों को अलग-अलग ई-मेल आईडी दी गई। इसके पीछे सोच थी कि स्थानीय निवासी इन पेड़ों की अवैध कटाई या इन पर मंडरा रहे खतरों के बारे में ई-मेल कर प्रशासन को आगाह कर सकें, ताकि समय रहते इन वृक्षों को बचाया जा सके। लेकिन लोगों ने इस सेवा का उपयोग अपने चहेते पेड़ों को आत्मीय पत्र भेजने के लिए शुरू कर दिया।
    मेलबॉर्न के पर्यावरण विभाग के प्रमुख एरॉन वुड कहते हैं कि इस पहल के बदले में किसी को उम्मीद नहीं थी कि इस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी। वे बताते हैं, 'यह अविश्वसनीय है, अभी हमें दुनियाभर से 3000 ई-मेल मिल चुके हैं। इन्हें भेजने वालों में रूस, जर्मनी, हंगरी, सिंगापुर, ब्रिटेन और हॉन्गकॉन्ग के निवासी शामिल हैं।Ó एरॉन आगे कहते हैं कि समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देने में यह कदम बहुत मददगार रहा है। वुड ने ऐसे ही कुछ खास ई-मेल मीडिया के साथ साझा किए हैं। ये ईमेल पढ़कर समझ आता है कि कैसे हम इंसानों का दूर-दराज के पेड़-दरख्तों के साथ भी एक भावुक रिश्ता बन सकता है-
    पत्र (1)
    प्रिय ग्रीन लीफ एल्म,
    मुझे उम्मीद है कि तुम्हें सेंट मैरी (मेलबॉर्न का एक शिक्षण संस्थान) में रहना पसंद है। अक्सर मुझे भी यहां अच्छा लगता है। कुछ ही समय में मेरी परीक्षाएं आने वाली हैं और मैं उनकी तैयारी में व्यस्त हो जाउंगा। लेकिन तुम तो पेड़ हो, तुम्हें कोई परीक्षा नहीं देनी पड़ती। मुझे लगता है कि हम दोनों के बीच करने के लिए ज्यादा बातें नहीं हैं। क्योंकि हम दोनों में ज्यादा कुछ समान नहीं हैं। तुम एक पेड़ हो... फिर भी मुझे खुशी है कि हम यहां एक साथ हैं।
    चीयर्स
    एफ
    पत्र (2)
    हैलो ग्रीन लीफ एल्म,
    एक बार फिर मैं (एफ।) तुम्हें पत्र लिख रहा हूं। पिछले सेमेस्टर में मुझे जो बैक आई थी, मुझे अभी उसके नंबर पता चले हैं। संदर्भ-प्रसंग से हटकर मैं तुमसे यह बात पूछना चाहता हूं कि इस धरती पर हमारा जीवन निर्धारित करने वाली और एक के बाद एक आने वाली उस हताशा से तुम कैसे जूझते हो जो हमारी आत्मा तक को मसलने वाला दर्द देती है। तुम काफी उम्रदराज होगे, नहीं? इसलिए मुझे लगता है कि शायद तुम्हें इस बारे में पता होगा।
    फिर से धन्यवाद
    तुम्हारा दोस्त
    एफ
    पत्र (3)
    हैलो वीपिंग मिर्टल,
    मैं तुम्हारे नजदीक ही बैठा हूं। जब मेरा ध्यान अरबन ट्री मैप पर गया, मुझे पता चला कि तुम्हारे नजदीक ज्यादा दोस्त नहीं हैं। मुझे लगता है यह उदास करने वाली बात है और इसलिए मैं तुम्हें बताना चाहता था कि मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा हूं।
    मैं तुम्हें धन्यवाद भी देना चाहता हूं क्योंकि तुम शहर की भागदौड़ के बीच सांस लेने के लिए हमें ऑक्सीजन देते हो।
    शुभकामनाओं के साथ
    तुम्हारा
    एन
    पत्र (4)
    प्रिय एल्म,
    तुम्हें बचा हुआ और फला-फूला देखकर मुझे खुशी है, क्योंकि तुम्हारे परिवार के कई सदस्य यहां यूके में रहते थे, लेकिन वे सभी एक भयानक संक्रमण की चपेट में आ गए और मारे गए।
    तुम बहुत पूरी सतर्कता से रहना। अगर तुम किसी अनजान कीड़े को देखो तो किसी वृक्षमित्र को एक बार ईमेल जरूर करना।
    मुझे तुम्हारी खास छाया और सुंदर डालियों की याद आती है। जिनका इंग्लैंड के भू-भाग की सुंदरता बढ़ाने में उससे कहीं ज्यादा योगदान था, जितना मैं कह सकता हूं।
    मेलबॉर्न जरूर एक सुंदर शहर होगा।
    शुभकामनाओं के साथ डी  (सत्याग्रह)

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Posted Date : 21-Apr-2018
  • डॉ. राजू पाण्डेय
    जब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव देव ने पौराणिक चरित्र संजय द्वारा धृतराष्ट्र को महाभारत युध्द का आंखों देखा हाल सुनाने के प्रसंग का हवाला देकर प्राचीन काल से भारत में टेक्नोलॉजी, इंटरनेट और सैटेलाइट होने की बात कही तो यह महज इस तरह के बयानों की एक अगली कड़ी भर थी। इससे पहले भी वर्तमान सरकार के मंत्रियों का यह अतीत प्रेम अनेक रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने गणेश भगवान को हाथी का सिर लगाने वाले प्लास्टिक सर्जन की प्रशंसा में कसीदे पढ़े थे। सन 2014 में ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि हीजनबर्ग का प्रिंसिपल ऑफ अनसरटैनिटी वेदों से लिया गया है। अपने कथन के समर्थन में उन्होंने ऑस्ट्रियन अमेरिकन लेखक काप्रा की पुस्तक द ताओ ऑफ फिजिक्स(1975)का हवाला दिया। बाद में यह तथ्य सामने आया कि यह पुस्तक क्वांटम सिद्धांत और उपनिषदों की दार्शनिक समानताओं पर केंद्रित थी और इसमें ऐसा कोई भी दावा नहीं किया गया था। इसी वर्ष तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कहा कि तथाकथित यौन शिक्षा को स्कूलों में प्रतिबंधित कर देना चाहिए। जनवरी 2018 में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी सत्यपाल सिंह ने कहा कि मनुष्यों के विकास संबंधी चाल्र्स डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से गलत है। स्कूल और कॉलेज पाठ्यक्रम में इसे बदलने की आवश्यकता है। मनुष्य जब से पृथ्वी पर देखा गया है, हमेशा मनुष्य ही रहा है। यहां यह जानना रोचक है डार्विन का सिद्धांत ईसाई और इस्लाम धर्म के अनुयायियों को भी स्वीकार्य नहीं रहा है। ईसाई धर्मगुरु बाइबिल के आधार पर यह मानते थे कि सृष्टि की रचना यीशु के जन्म से 4004 साल पहले हुई थी और ईश्वर ने मात्र एक सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी। इस्लामिक मान्यताओं के आधार भी सृष्टि अल्लाह के द्वारा 6 दिन में रची गई थी। इसके विपरीत हिन्दू धर्म में 84 लाख योनियों के बाद मानव जन्म की प्राप्ति का विचार डार्विनवाद से अधिक संगति दर्शाता है।
    गुजरात के स्कूलों में 2016-17 में शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति के संस्थापक दीनानाथ बत्रा की लिखी पुस्तकों को आधार बनाकर पाठ्यविषयवस्तु में अनेक ऐसे परिवर्तन किए गए जिन्हें अंधविश्वासों को प्रश्रय देने वाला और काल्पनिक इतिहास पर आधारित माना जा सकता है।
    भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशनों में पिछले तीन चार वर्ष में विज्ञान की खोजों और सिद्धांतों से अधिक भारत के मिथकीय इतिहास पर चर्चा होती रही है एवं इसे महिमामंडित किया जाता रहा है। 2015 की मुम्बई विज्ञान कांग्रेस में एक सेशन संस्कृत भाषा में प्राचीन विज्ञान पर केंद्रित था जिसमें श्री बोडस और श्री जाधव द्वारा प्राचीन भारतीय उड्डयन विज्ञान पर एक शोधपत्र प्रस्तुत किया जाना था। 2016 की मैसूर में हुई विज्ञान कांग्रेस में भारतीय शहरों में हवा की गुणवत्ता पर केंद्रित चर्चा में भगवान शिव को विश्व के महानतम पर्यावरणविद के रूप में चित्रित करते एक शोधपत्र का सार चर्चित हुआ था, यद्यपि शोध पत्र प्रस्तुत न किया जा सका। इसके बाद वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजीव शर्मा ने भी शंख ध्वनि के द्वारा रोगोपचार की चर्चा कर विवादित सुर्खियाँ बटोरी थीं। विज्ञान कांग्रेस के 2017 के तिरुपति अधिवेशन में भी प्रोफेसर जगदीश राय का एक शोधपत्र सूचीबद्ध किया गया था जो प्राचीन भारतीय चिंतन के विज्ञान, तकनीकी और औषधि शास्त्र पर प्रभाव के अध्ययन से संबंधित था किंतु इसे संभवत: विवादों को टालने के उद्देश्य से प्रस्तुत ही नहीं किया गया। 2018 की विज्ञान कांग्रेस में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री की हैसियत से डॉ हर्षवर्धन ने कहा कि स्टीफन हाकिंग के अनुसार आइंस्टीन के एक प्रसिद्ध समीकरण से कहीं बेहतर सिद्धांत वेदों में प्रतिपादित किए गए हैं। यद्यपि इस कथन को प्रमाणित न किया जा सका। हर्षवर्धन ने ट्वीट कर यह भी कहा कि हिन्दू धर्म के संस्कारों और रीति रिवाजों का गहन वैज्ञानिक आधार है तथा भारत की वर्तमान वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां दरअसल गौरवमयी अतीत की खोजों की ही बदौलत प्राप्त हुई हैं। नोबल पुरस्कार विजेता वेंकटरमन रामकृष्णन ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस को एक सर्कस की संज्ञा देते हुए कहा कि यह एक ऐसा संगठन है जहाँ विज्ञान की ही चर्चा नहीं होती है।
    उक्त सारे उदाहरण यह दर्शाते हैं कि पौराणिक और मिथकीय इतिहास को (जिसमें कल्पना और काव्यतत्व का प्राधान्य है) किस प्रकार आधुनिक विज्ञान के उद्गम के रूप में प्रतिष्ठित करने की चेष्टा हो रही है। यह आधुनिक विज्ञान की असाधारण उपलब्धि ही कही जाएगी कि उसने कवियों की कल्पना को यथार्थ में बदल दिया और आम मनुष्य को उन देवताओं और मिथकीय पुरुषों के समकक्ष ला खड़ा किया जिनकी क्षमताओं को अलौकिक मानकर इनके कार्यकलापों को चमत्कार की संज्ञा दी जाती थी। धार्मिक साधना पद्धतियों का अनुसरण कर जो शक्तियां इक्का दुक्का साधकों को उपलब्ध होती थीं वैसी ही शक्तियां हर मनुष्य को चाहे वह धनी हो या निर्धन बिना भेदभाव के विज्ञान ने उपलब्ध करा दीं। रेडियो, टेलीविजऩ,मोबाइल,इंटरनेट,वायुयान, विद्युत,अंग प्रत्यारोपण आदि कितने ही विज्ञान के उपहार हैं जिन्होंने आम आदमी की जिंदगी को बेहतर बनाया है। यदि हम पौराणिक कथाओं की काल्पनिकता को विज्ञान का उद्गम मानें तो यह हास्यास्पद तो है ही, चिंतनीय भी है।
    इस प्रकार की विचारधारा आत्मगौरव से अधिक आत्म प्रवंचना की ओर ले जाएगी। ऐसा नहीं है कि हमारे पास गौरव करने योग्य कुछ भी नहीं है। गणित और खगोलिकी में हमारे पास बौधायन, आर्यभट्ट,ब्रह्मगुप्त,भास्कराचार्य और महावीराचार्य हैं। विज्ञान में हमारे पास कणाद, वराहमिहिर और नागार्जुन हैं। चिकित्सा में हमारे पास चरक और सुश्रुत हैं, आयुर्वेद जैसी चिकित्सा पद्धति है, वैकल्पिक जीवन शैली का ज्ञान देते पतंजलि और उनका पातंजल योग सूत्र है। किन्तु आज के जीवन में इनकी उपयोगिता सिद्ध किए बिना इनकी सर्वश्रेष्ठता का कोई भी दावा स्वीकारणीय नहीं होगा। दुर्भाग्य से हम प्राचीन सिद्धांतों को आधुनिकता की कसौटी पर कसने के बजाए विज्ञान को धार्मिक पहचान से जोड़ कर विवादों को जन्म दे रहे हैं। वैज्ञानिक अविष्कारों को धर्म के साथ संयुक्त कर उन्हें व्याख्यायित करने का प्रयास नया नहीं है और पहले भी ईसाई मतावलम्बी बाइबिल के आधार पर और इस्लाम के अनुयायी कुरान के आधार पर इनकी व्याख्या करने का प्रयास कर चुके हैं। भारत में विज्ञान के इतिहास को वेदों तक सीमित कर हम बौद्ध वैज्ञानिकों की उपेक्षा तो कर ही रहे हैं बल्कि अरब देशों  की उस वैज्ञानिक ज्ञान की धरोहर को भी हाशिए पर डाल रहे हैं जो 8 वीं से 11वीं सदी के मध्य विकसित हुई और जो भारतीय, चीनी और यूनानी ज्ञान का समन्वय थी तथा जिसने बारहवीं शताब्दी में यूरोप में प्रवेश कर वैज्ञानिक-औद्योगिक क्रांति की आधार भूमि प्रदान की। वेद,कुरान और बाइबिल के आधार पर विज्ञान के सिद्धांतों और अविष्कारों की व्याख्या के प्रयासों में कुछ बातें साझा रही हैं -ये हास्यास्पद हैं, कुतर्क पूर्ण हैं, वैमनस्य उत्पन्न करने वाले हैं और विज्ञान के विकास में बाधक हैं।
    प्रोफेसर इरफान हबीब ने विज्ञान के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता बताते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है- जो यूरोप-केंद्रित इतिहास है, जिसे अंगरेजों तथा अन्य यूरोपीय भाषाओं के विद्वानों ने औपनिवेशिक दौर या उसके बाद में लिखा, उस इतिहास में यूरोपीय और अमेरिकी सभ्यताओं के अलावा जितनी भी सभ्यताएं दुनियाभर में हैं, उनके योगदान को हाशिये पर रखा गया। उन्हें कोई विशेष महत्व नहीं दिया गया। यूरोप-केंद्रित आधुनिक विज्ञान के इतिहास को विखंडित (डिकंस्ट्रक्ट) कर देखा जाना चाहिए। उसमें यह भी देखा जाना है कि आधुनिक विज्ञान सिर्फ इंग्लैंड या यूरोप का उत्पाद नहीं है, बल्कि वह सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। उसमें योगदान के मामले में हर सभ्यता और संस्कृति ने अपनी एक उत्कृष्ट भूमिका निभायी है। विभिन्न सभ्यताओं ने विभिन्न शताब्दियों में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपनी समझ का विस्तार किया और उसे साझा किया।
    इरफान हबीब विज्ञान इतिहासकार शैफर को उद्धृत करते हैं- यह कथा बहुत प्रचलित है कि आधुनिक विज्ञान पश्चिमी यूरोप से सारी दुनिया में प्रचलित हुआ, जिसकी शुरुआत करीब 500 साल पहले न्यूटन, कोपरनिकस और गैलीलियो, फिर डार्विन, आइंस्टीन आदि के साथ हुई थी। लेकिन, विज्ञान के वैश्वीकरण के बारे में यह कथन पूरी तरह से बेमानी है। यह सदियों से होती रही पूर्व और पश्चिम के बीच ज्ञान विनिमय की उल्लेखनीय प्रक्रिया को नजरअंदाज करता है। वर्तमान सरकार चाहे तो शोध और अन्वेषण के द्वारा विज्ञान के इतिहास के पुनर्लेखन द्वारा औपनिवेशिक वैज्ञानिक इतिहास को संशोधित कर वैश्विक स्वरूप दे सकती है।
    इरफान हबीब ने यह रेखांकित किया है कि विज्ञान का कोई धर्म नहीं होता, इसीलिए इस्लामिक साइंस और वैदिक साइंस जैसे विभाजन बेमानी और खतरनाक हैं। धर्म दैवी है और यह आस्था पर आधारित है जबकि विज्ञान संदेह और अनुसंधान की बुनियाद पर टिका है। आज जो वैज्ञानिक सत्य और तथ्य हैं, वे कल अस्वीकार भी किये जा सकते हैं तथा विज्ञान की यह सर्वसम्मत प्रक्रिया है। ऐसा धर्म के साथ नहीं होता।
    दरअसल धर्म यह देखकर आनंदित होता रहता है कि किस प्रकार विज्ञान उसकी दार्शनिक प्रस्थापनाओं को स्वीकार करता जा रहा है। सत्यान्वेषण में लगे विज्ञान में यह उदारता है कि जब क्वांटम सिद्धांत दर्शाता है कि मूलभूत कण दोहरा व्यवहार करते हैं और हीजनबर्ग अनिश्चितता का सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं या हाल ही में जब गॉड पार्टिकल की खोज होती है तो वह अपनी सीमाओं को खुले मन और मुक्त कंठ से स्वीकारता है। वह धर्म की दार्शनिक प्रस्थापनाओं के प्रति आदर भी व्यक्त करता है। धार्मिक सत्यानुभूति व्यक्ति विशेष तक सीमित होती है और अहस्तांतरणीय होने की सीमा तक निजी होती है। विज्ञान इस सत्यानुभूति को सार्वजनिक कर देता है। वह ज्ञान का लोकतंत्रीकरण कर देता है। कई बार ऐसा भी लगता है कि धर्म अपनी सर्वोच्चता के अहंकार में डूबा अपने स्थान पर स्थिर और निष्क्रिय खड़ा है और विज्ञान उसके क्षेत्र पर आधिपत्य जमाता हुआ धीरे धीरे धर्म के निकट पंहुच रहा है।
    धर्म में भी विज्ञान सम्मत होने की आकांक्षा बढ़ी है। यही कारण है कि धर्म और विज्ञान के समन्वय के प्रयास भी बढ़े हैं। समन्वय के इन प्रयासों में ऐसा नहीं है कि धर्म ने विज्ञान की तर्क पद्धति को अपनाया है। धर्म समर्थकों ने इस बात की चेष्टा अधिक की है कि वे धर्म को मनुष्य के भौतिक जीवन को संवारने वाला भी सिद्ध कर सकें। इस प्रयास में वे धर्म के दार्शनिक पक्ष को उपेक्षित करते और कर्मकांड पक्ष को विज्ञान सम्मत बताने की कोशिश करते नजर आते हैं। कर्मकांड विशुद्ध धार्मिक नहीं होते। इन पर स्थानीय पर्यावरण और संस्कृति की छाप भी होती है। इसी कारण इनमें से अनेक अनुभवजन्य मान्यताओं पर आधारित होते हैं और कुछ का वैज्ञानिक आधार भी दर्शाया जा सकता है। इस सफलता का श्रेय अकेले धर्म को देना ठीक नहीं है।
    जिस प्रकार दार्शनिक और धर्म गुरु अपने सिद्धांत को सर्वोत्कृष्ट और अपने सत्य को अंतिम समझने की गलती करते पाए जाते हैं उसी प्रकार वैज्ञानिक भी परिपूर्णता के भ्रम के शिकार हो जाते हैं और अहंकार उन पर हावी हो जाता है। महान व्यक्तियों की इस मनोदशा के कारण अप्रिय विवाद उत्पन्न हुए हैं। यह विवाद आंतरिक भी रहे हैं और अंतर अनुशासनात्मक भी किन्तु इन विवादों को सत्यान्वेषण के मार्ग से वैयक्तिक अहंकारजन्य विचलन के रूप में देखा जाना चाहिए न कि धर्म और विज्ञान की असहिष्णुता के रूप में इनकी व्याख्या की जानी चाहिए। सच्चा सत्यान्वेषी हमेशा अज्ञानता के बोध से ग्रसित होता है और इसी लिए विनम्र और सहिष्णु भी होता है।
    धर्म और विज्ञान के संबंधों पर बहुत व्यापक विमर्श हुआ है। कहा जाता है कि वैज्ञानिक सिद्धांतों और अविष्कारों का सकारात्मक लोककल्याणकारी उपयोग करने के लिए सक्षमता धार्मिक और नैतिक मार्गदर्शन से ही प्राप्त होती है। यह भी कहा जाता है कि बिना आस्था के धर्म और विज्ञान कार्य नहीं कर सकते। अनेक वैज्ञानिक ईश्वर पर आस्था नहीं रखते किन्तु अपने सिद्धांत पर तो आस्था रखते हैं और इस बात पर भी कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। यह भी रेखांकित किया गया है कि धर्म जिन विशेषताओं को ईश्वर के साथ संयुक्त करता है विज्ञान उन्हीं को प्रकृति के साथ। अंतर केवल शब्दों का है। अनेकानेक शोधों में यह भी बताया गया है अनेक शीर्ष वैज्ञानिक ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाले और धार्मिक रहे हैं, इस प्रकार वैज्ञानिक अन्वेषण और धार्मिक आस्था में कोई विरोधाभास नहीं है। चिंतकों का एक समूह यह मानता है कि अध्यात्म (स्पिरिचुअलिटी)और आधुनिक विज्ञान संगत होते जा रहे हैं। जबकि संस्थागत धर्म(इंस्टिट्यूशनल रिलिजन) और उसके कर्मकांड विज्ञान द्वारा खारिज किए जा रहे हैं।
    धर्म और विज्ञान के बीच सेतु बनाने की जैसी कोशिशें सरकार कर रही है उनसे न धर्म का हित होगा न विज्ञान का बल्कि मूढ़ता और जड़ता का प्रसार ही होगा। यदि यह राजनीतिक लाभ पाने के लिए उठाया गया कदम है तो यह कहना पड़ेगा अब राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गई है जब अज्ञानता के अंधकार का प्रसार कर अपनी स्वार्थ सिद्धि की निंदनीय कोशिशें की जा रही हैं।

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Posted Date : 21-Apr-2018
  • कांग्रेस ने उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा के खिलाफ राज्य सभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की अर्जी तो दे दी है। इसमें उसे छह दलों के लगभग 60 से अधिक सांसदों का समर्थन भी मिला है। इसके बावजूद सूत्रों के हवाले से आ रही खबरों की मानें तो सीजेआई के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करा पाना कांग्रेस के लिए अभी आसान नहीं है। इससे पहले उसे तीन तरह की चुनौतियों से निपटना होगा।
    द इंडियन एक्सप्रेस की खबरों से ही कांग्रेस की इन तीन चुनौतियों का संकेत मिल जाता है। इनमें पहली चुनौती- इस मसले पर उभरे आंतरिक मतभेदों से उबरने की है। अखबार के मुताबिक पार्टी के कई बड़े नेता सीजेआई के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने के पक्ष में नहीं हैं। इनमें पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री भी शामिल हैं। इन्हीं में से एक अश्वनी कुमार ने साफ कहा है कि पार्टी का 'यह कदम उल्टा पड़ जाएगा।Ó सलमान खुर्शीद ने भी कहा है कि वे इस कदम से 'दुखी हैं।Ó वीरप्पा मोइली ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है। लेकिन उनसे जुड़े सूत्र बताते हैं कि वे भी पार्टी के इस फैसले खुश नहीं हैं। गौरतलब है कि अश्वनी, खुर्शीद और मोइली तीनों केंद्र में कानून मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम व पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी सीजेआई के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने से जुड़ी अर्जी पर दस्तखत नहीं किए हैं।
    कांग्रेस के इन बड़े-बड़े नेताओं के विपरीत रुख के अलावा इस मसले पर पार्टी से बाहर भी आम सहमति नहीं दिखती। जैसे- टीमसी (तृणमूल कांग्रेस) प्रमुख ममता बनर्जी पहले महाभियोग प्रस्ताव का समर्थन करने की बात कह रही थीं। लेकिन अब उनसे जुड़े सूत्रों के हवाले से अखबार ने बताया है कि राजनीतिक मजबूरियों के चलते वे इस रुख से पलट सकती हैं। अब तक उन्होंने कांग्रेस के इस प्रस्ताव के समर्थन में इसीलिए कुछ कहा भी नहीं है। उनके रुख में बदलाव की एक और वजह ये भी है कि अब तक सीजेआई दीपक मिश्रा के खिलाफ ऐसे कोई पुख्ता सबूत सामने नहीं आए हैं कि उनमें 'ईमानदारी की कमीÓ है यह साबित किया जा सके। सूत्रों के मुताबिक काफी कुछ ऐसा ही रवैया कांग्रेस की एक अन्य सहयोगी- डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कडग़म) का भी लग रहा है। इस पार्टी के भी किसी राज्य सभा सदस्य ने महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की अर्जी पर दस्तखत करना जरूरी नहीं समझा है।
    तीसरी चुनौती स्वाभाविक तौर पर सत्ता पक्ष से पेश आ सकती है। महाभियोग प्रस्ताव की अर्जी अभी उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के पास है। वे इसे कब स्वीकार करेंगे, करेंगे भी या नहीं, इस पर कोई भी पुख्ता तौर पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। अलबत्ता कुछ सूत्र जरूर कहते हैं कि चूंकि महाभियोग प्रस्ताव पेश करने का कोई दमदार आधार अर्जी में बताया नहीं गया है। दूसरी बात- यह कदम राजनीति से प्रेरित भी लग रहा है। इसलिए बहुत संभव है कि उपराष्ट्रपति कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की यह अर्जी खारिज ही कर दें। (सत्याग्रह ब्यूरो)

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Posted Date : 21-Apr-2018
  • दुष्यंत दवे
    सीनियर एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट
    लॉ कमीशन यानी विधि आयोग देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ करवाने के पक्ष में है। इस संबंध में आयोग ने अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले इस पर संवैधानिक विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों और अन्य हितधारकों के विचार मांगे हैं।
    इसी साल फरवरी में इस तरह के कयास लगाए जा रहे थे कि प्रधानमंत्री 2019 लोकसभा चुनावों को समय से पहले करा सकते हैं। कुछ लोगों के अनुसार दिसंबर में छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के साथ ही लोकसभा चुनाव भी कराए जा सकते हैं।
    लेकिन भारत जैसे विशाल गणतंत्र में एक साथ आम चुनाव और विधानसभा चुनाव करवाना कितना संभव है?
    आज की स्थिति की बात करें तो ये संभव नहीं लगता है। बीते छह-बारह महीनों में अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनाव करवाए गए हैं और इन राज्यों में सरकार का कार्यकाल पांच साल तक का है। कोई भी सरकार या विधानसभा सदस्य ये नहीं चाहेंगे कि उनकी विधानसभा को भंग किया जाए और आम चुनाव के साथ फिर एक बार राज्यों के चुनाव करवाए जाएं। इसके लिए नेता राजी हों ये मुश्किल काम है।
    दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि एक साथ करने चुनाव करवाने में अन्य मुश्किलें भी हैं। आज के वक्त में एक राज्य में चुनाव आयोग एक साथ में चुनाव नहीं करवा पाता। कई बड़े राज्यों में चार-पांच चरणों में चुनाव करवाए जाते हैं। तो ऐसे में आम चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव करवाने की बात सोच पाना भी असंभव है। हाल में बिहार में उप-चुनाव हुए थे जिनमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में खराबी की बात सामने आई थी। जब कुछ सीटों पर चुनाव करवाने में तकनीकी समस्याएं आ सकती हैं तो बड़े पैमाने पर चुनाव करवाने में ऐसा नहीं होगा कहा नहीं जा सकता। मशीन की खराबी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ सकती है।
    साथ ही ऐसे में देश में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी सुरक्षाबलों को तैनात करने की समस्या भी सामने आ सकती है। हमारे पास इतने सुरक्षाबल भी नहीं हैं। अगर हम चुनाव में सभी सुरक्षाबल लगा देते हैं तो देश में जो माहौल है (पहले ही हिंसा और अपराध की घटनाएं बढ़ रही हैं) उस पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाएगा। आम चुनावों के मुद्दे और विधानसभा चुनावों के मुद्दों में भी फर्क होता है। जहां आम चुनावों में बड़े मुद्दे उठाए जाते हैं विधानसभा चुनावों में सीमित या राज्य-संबंधित मुद्दे होते हैं।
    भारतीय जनता पार्टी इस डिबेट को आगे बढ़ा रही है। राज्यों के चुनावों में एकतरफा वोटर को प्रभावित कर पाना आसान होता है, लेकिन लोकसभा में वोटर का मिजाज अलग होता है। शायद पार्टी समझ रही है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से उन्हें फायदा होगा।
    ये भूमिका चुनाव आयोग की होनी चाहिए। उसे समाज के सभी तबके के लोगों से बात करनी चाहिए और देश में इस मामले में एक डिबेट होनी चाहिए। ये एक लंबी डिबेट है और इसका हल छह-बारह महीनों में निकलेगा ऐसा नहीं है। ये काम लॉ कमीशन का नहीं है। ये कोई कानूनी मसला नहीं है। इस मामले को लॉ कमीशन शॉर्टकट में सुलझा लेना चाहती है जो सही नहीं है क्योंकि ये चुनाव से जुड़ा पेचीदा मामला है। लॉ कमीशन की ये कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण लगती है।
    पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवानी ने अगस्त 2003 में कहा था कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने पर केंद्र सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। महाराष्ट्र के पुणे शहर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने चुनाव के लिए साल की पहली तिमाही को सबसे उपयुक्त समय बताया था। उनका कहना था कि भारतीय जनता पार्टी की ये सीख है कि अगर सत्ताधारी पार्टी को हमेशा चुनाव के माहौल में काम करना पड़े तो अच्छी सरकार चलाने में रुकावट पैदा होती है।
    हालांकि उस वक्त के मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने लालकृष्ण अडवानी के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उन्होंने माना था कि चुनावी खर्च को कम करना महत्वपूर्ण है लेकिन एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव करवाने को उन्होंने अलोकतांत्रिक बताया था और कहा था कि इसे संविधान की अनुमति नहीं है।
    (वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे से बीबीसी संवाददाता मानसी दाश की बातचीत पर आधारित)

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Posted Date : 20-Apr-2018
  •  प्रो. योगेंद्र यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, स्वराज इंडिया
    एक शेर है- किसी का नाम न लो, बेनाम अफसाने बहुत से हैं।- प्रधानमंत्री के लंदन उवाच को सुनकर बरबस यह शेर याद आ गया। प्रधानमंत्री ने अपना मौन तोड़ा और कुछ कहा भी नहीं। न बच्ची का नाम लिया (वह तो शायद ठीक ही था), न कठुआ और उन्नाव का नाम लिया, न ही यह माना कि इन दोनों जगह उनकी पार्टी की सरकार है, न ही यह स्वीकारा कि इन कांडों में उनकी अपनी पार्टी के लोगों का नाम है। 
    मानो, कल के मौनी बाबा मनमोहन सिंह के चुप्पी वाले तंज और न्यूयार्क टाइम्स के संपादकीय का जवाब भर दे दिया। तुम कह रहे थे न बोलने को, तो लो सुन लो, कैसे बोलकर भी कुछ नहीं कहा जाता है।  साथ ही वे मासूमियत से कह गये कि ऐसे मसलों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। बलात्कार पर राजनीति न हो, एसएससी परीक्षा की धांधलियों पर राजनीति न हो, ऑक्सीजन की कमी से बच्चों के मरने पर राजनीति न हो और गरीबी पर राजनीति न हो, किसान की आत्ष्हत्या पर राजनीति न हो, तो आखिर राजनीति हो किस बात पर हो?
    हिंदू और मुसलमान पर? जाति, बिरादरी और आरक्षण पर? यहां सवाल यह भी है कि क्या महिला सुरक्षा के सवाल पर राजनीति नहीं होनी चाहिए? क्या इस मामले पर टिप्पणी करते वक्त धार्मिक सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए? पूरे देश की तरह पिछले दिन उन्नाव और कठुआ की शर्मसार करनेवाली घटनाओं के बारे में सोचते हुए ये प्रश्न मेरे मन में उठे। 
    पिछले हफ्ते मेरे एक साधारण से ट्वीट पर काफी बवाल मचा। इस ट्वीट में मैंने एक कार्टून को पोस्ट किया था। इस ट्वीट को बहुत पसंद किया गया। इसे 5,100 लोगों ने लाइक किया 2,100 ने रीट्वीट किया। इस पर 1,600 लोगों ने टिप्पणियां भी की। इनमें से कई टिप्पणियों में मुझे भद्दी गालियां दी गयी थीं। मुझे हिंदू धर्म, भगवान राम और रामभक्तों का दुश्मन बताया गया था। ये भी आरोप लगा कि में इस सवाल पर राजनीति कर रहा हूं। मैं सोचता रहा की मर्यादा पुरुषोत्तम के यह कैसे भक्त हैं, जिन्हें तनिक भी मर्यादा छू नहीं गई है। 
    मैंने फिर ट्वीट करके प्यार से समझाया कि इसका क्या अर्थ था और क्या नहीं। समझनेवाले समझ गए, लेकिन जिन्हें नहीं समझना था उनका कोई क्या करे। मैं सोचता रहा, इसकी निंदा करते वक्त क्या मुझे धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करना नहीं चाहिए था? हमारे लिए श्रीराम मर्यादा के प्रतीक हैं, उनके नाम पर गुंडागर्दी करनेवालों के खिलाफ रामायण के प्रतीक का इस्तेमाल करने से मैं परहेज क्यों करूं?   
    दरअसल, कठुआ में हुआ कांड हिंदू बनाम मुसलमान का मामला था ही नहीं। इस नृशंस रेप और हत्या की शिकार बच्ची को निशाना इसलिए नहीं बनाया गया कि वह मुसलमान थी, बल्कि इसलिए कि वह बकरवाल समुदाय की थी। इस घुमंतू समुदाय को उस इलाके में बसने से रोकने की साजिश थी। सच यह है कि बकरवाल, गुज्जर जैसे समुदाय के साथ कश्मीर के मुसलमान की ज्यादा सहानुभूति नहीं रही है।  इसलिए तीन महीने पहले हुई इस घटना के खिलाफ कश्मीर घाटी में कोई आक्रोश प्रदर्शन नहीं हुआ। इस बर्बर हत्याकांड की जांच करने और रपट देनेवाले पुलिस अफसर भी हिंदू थे, और मामले को अदालत में उठानेवाली बहादुर वकील भी हिंदू हैं। इसलिए यह शिकायत सही है कि इस मामले को अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध अन्याय की तरह पेश करना गलत होगा। 
    लेकिन, सच यह भी है कि मानवता के खिलाफ हुई इस हिंसा को सांप्रदायिक रंग देने की शुरुआत कठुआ और जम्मू के तथाकथित हिंदू नेताओं ने की। उन्होंने जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट का विरोध किया, अपराधियों को निर्दोष बताया, अपराधियों के खिलाफ मुकदमा रोकने की मांग की और बच्ची के लिए लड़ रही वकील को धमकाया।
    अब बीजेपी के नेता बड़ी मासूमियत से कहते हैं कि मामले को राजनीतिक और सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। जब सारा देश प्रधानमंत्री और बीजेपी के बड़े नेताओं की ओर देख रहा था, उन दो दिनों में वे सामान्य टिप्पणी करने से भी बचते रहे। इतना भी नहीं कहा कि बहुत बुरा हुआ। जब प्रधानमंत्री को मुंह खोलना पड़ा, तब भी उन्होंने एक अमूर्त सा वाक्य बोल दिया। ना किसी का नाम लिया, ना कोई ठोस कदम उठाया।
    उन्नाव की घटना में न तो हिंदू-मुसलमान का मामला था, न ही जातीय विद्वेष का मुद्दा। सीधे-सीधे कानून व्यवस्था का मामला था। एक कमजोर घर की नाबालिग बच्ची गांव के प्रभावशाली लोगों के खिलाफ रेप का आरोप लगा रही थी। 
    लेकिन, पुलिस ने कार्रवाई तो दूर, इसकी रिपोर्ट भी नहीं लिखी। मांग सिर्फ इतनी थी की एफआईआर दर्ज हो और अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई शुरू हो। जब नहीं हुई, तो लड़की के परिवार ने प्रदर्शन किया। आत्मदाह की धमकी दी। ऐसे में दोषियों के खिलाफ एक्शन लेने के बजाय पुलिस ने लड़की के पिता को ही गिरफ्तार किया। फिर उसकी इतनी पिटाई हुई कि उसने दम तोड़ दिया। तब इस मुद्दे पर देश का ध्यान आकृष्ट हुआ।
    सवाल है कि यह मामला राजनीतिक क्यों बना? क्योंकि आरोपियों में खुद शासक दल का एमएलए शामिल था। क्योंकि हाईकोर्ट को भी कहना पड़ा कि नीचे से ऊपर तक पुलिस-प्रशासन ने लड़की के बजाय आरोपियों की मदद की। क्योंकि लड़की के बाप को मारने की वारदात चश्मदीद गवाहों के अनुसार, विधायक के भाई ने की। क्योंकि डॉक्टर और पुलिस सबकी मिली-भगत से इस अपराध को छुपाया गया। क्योंकि अपराधियों और गुंडागर्दी के खिलाफ बड़े-बड़े बयान देनेवाले यूपी के मुख्यमंत्री इस मामले के सार्वजनिक होने के बाद भी चुप रहे।
    ऐसे में, जब मैं लोगों को यह कहते सुनता हूं कि इस मामले का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए, तो मुझे बड़ी हैरानी होती है। अगर दोनों मामलों का राजनीतिकरण नहीं होता, तो क्या इन बेसहारा परिवारों को न्याय मिलने की कोई भी उम्मीद होती? 
    क्या उत्तर प्रदेश सरकार और जम्मू के मंत्रियों पर कोई लगाम लगती? अगर निर्भया कांड के बाद सड़कों पर राजनीति नहीं होती, तो क्या वर्मा आयोग बैठता? जब तक महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर राजनीति नहीं होगी, तब तक क्या वर्मा आयोग की सिफारिशों को लागू किया जायेगा?
    जो कठुआ और उन्नाव की घटना से आहत हुए हैं, उन्हें अनुरोध करता हूं, आइए सब मिलकर राजनीति करें- सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति नहीं, सिर्फ तात्कालिक आक्रोश की राजनीति नहीं, सिर्फ टीवी कैमरा और तस्वीर की राजनीति नहीं। महिला सुरक्षा का सवाल एक गहरी और दीर्घकालिक राजनीति की मांग करता है।   http://www.prabhatkhabar.com/

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Posted Date : 20-Apr-2018
  • सुभाष गाताडे
    क्या किसी बच्चे को स्कूल में एडमिशन दिलाते वक्त उसके माता पिता से ऐसी जानकारी मांगी जा सकती है जो बेहद निजी हो। मसलन क्या संतान का कोई जेनेटिक डिसआर्डर तो नहीं है, बच्चे तथा उनके माता-पिता का आधार नम्बर क्या है, परिजनों की सालाना आय, पैन नम्बर और खातों की संख्या कितनी है। 
    एक ऐसे समय में जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकों की निजता की रक्षा के हक़ में अहम फैसला दिया है, उस माहौल में सूबा हरियाणा की खट्टर सरकार ने स्कूल में एडमिशन फॉर्म भरने के नाम पर छात्रों तथा उनके अभिभावकों से ऐसी जानकारी मांग रही है, जो इस अहम फैसले की बुनियादी भावना को ही प्रश्नांकित करती दिख रही है। इधर सरकार द्वारा शुरू किए गए 'प्रवेश उत्सवÓ के नाम पर हरियाणा के स्कूलों के शिक्षकों से गांव गांव जाकर छात्रों उनके अभिभावकों से संपर्क करने को कहा गया है और निजता के अधिकार का सरासर उल्लंघन करनेवाले इस फार्म के चलते उन्हें जगह जगह अभिभावकों के हाथों बेइज्जत होना पड़ रहा है।
    गौरतलब है कि महज सरकारी स्कूल ही नहीं बल्कि प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए ऐसे ही फार्म भरने को सरकार की तरफ से कहा गया है। रेखांकित करने वाली बात यह है कि जब इन फार्म के स्वरूप को लेकर ( जो एक तरह से नागरिकों की जासूसी करते प्रतीत होते हैं) हंगामा मचा, तब सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता ने यह भी कहा कि उन्हें ऐसे फार्म की कोई जानकारी नहीं है तथा उन्हें नहीं मालूम कि इन फार्म को किसने जारी किया ? अधिक विवाद फार्म में पूछी गई इस जानकारी से भी उठा है कि वह बताएं कि माता पिता किसी 'मलिन पेशेÓ में तो नहीं है। लाजिम है कि इसे लेकर विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सरकार नागरिकों का धार्मिक एवं नस्लीय प्रोफाइलिंग कर रही है।
    एक ऐसे समय में जबकि सूबा केरल सरकार की तरफ से बाकायदा विधानसभा में बताया गया कि केरल के स्कूलों में पढऩे वाले (पहली से बारहवीं कक्षा तक के) एक लाख चैबीस हजार से अधिक बच्चों ने अपने प्रवेश फार्म में धर्म या जाति का उल्लेख नहीं किया है।  इनमें से एक लाख 23 हजार बच्चे पहली से दसवीं कक्षा के हैं जबकि एक हजार से अधिक बच्चे ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में पढ़ते हैं। अर्थात केरल सरकार ने यह प्रगतिशील कदम बहुत पहले उठाया है कि वह अभिभावकों से उनकी निजी जानकारी मांगने में संकोच बरतती है, उस वक्त़ आयी यह ख़बर भारत के हर उस नागरिक को बेचैन कर सकती है, जो जानता है कि किस तरह हमारे देश में ऐसी श्रेणियों के नाम पर सरेआम भेदभाव चलता है।
    इस फार्म पर उठे विवाद के चलते सरकार ने इसे वापस लिया है, मगर 21 वीं सदी के इस अवसर में ऐसे फार्म का जारी हो पाना ही सरकार की संकीर्ण मानसिकता को रेखांकित करता है, जिसके खिलाफ आवाज़ उठाते रहने की जरूरत पड़ती रहेगी। याद रहे यह वही हरियाणा सरकार है जिसने गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले परिवारों को चिन्हित करने के लिए उनके घरों पर अलग ढंग से निशान बनाने की योजना बनायी थी, जो बदस्तूर जारी है। सभी जानते है कि किस तरह स्कूलों में जाति के नाम पर छात्रों के साथ तरह तरह का भेदभाव चलता है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ सूबा हिमाचल सूर्खियों में था जहां 'परीक्षा पर चर्चाÓ नाम से हुए प्रधानमंत्राी मोदी के सजीव प्रसारण के दौरान वहां के एक गांव में दलित छात्रों को बाकी छात्रों से अलग बिठाए जाने का मामला उठा था और अन्तत: सरकार को प्रधानाचार्य पर कार्रवाई करनी पड़ी थी।
    मिड डे मील बनाने में अगर कोई दलित नियुक्त हुआ तो किस तरह उसे वहां से पलायन के लिए मजबूर किया जाता है। छूआछूत के नाम पर छात्रा पीटे जाते हैं। मिसाल के तौर पर एबीपी न्यूज ने दो साल पहले जोधपुर की वह ख़बर छापी थी कि किस तरह एक दलित छात्रा को बुरी तरह पीटा गया था जब मिड डे मील के दौरान दलित तबके से सम्बधित उपरोक्त छात्रा की थाली किसी गैरदलित छात्रा की थाली से छू गई। 
    उसी बात पर आग बबूला होकर अध्यापक ने बच्चे की बुरी तरह पिटाई कर दी, जिसके चलते उसे अस्पताल भेजना पड़ा। वही बिकानेर के अन्य स्कूल में नोखा तहसील के मेघवालों की धानियों का- जहां कार्यरत अध्यापक ने दलित छात्रों की इस वजह से बुरी तरह पिटाई की थी कि उन्होंने प्यास लगने पर स्कूल में ही रखे उपरोक्त अध्यापक के घड़े से पानी पिया था। इतना ही नहीं स्कूलों में उन्हें 'जातिसूचकÓ काम भी करने पड़ते हैं। 
    ख़बरें यह भी आती रहती हैं कि किस तरह उनसे जबरन टायलेट साफ करवाए जाते हैं क्योंकि स्कूल में सैनिटेशन कर्मचारी नियुक्त नहीं किए गए हैं। स्कूल की सफाई में लगे ऐसे ही एक छात्रा ने अख़बार के प्रतिनिधि को बताया था कि उन्हें मैदान, क्लासरूम तथा टॉयलेट सभी साफ करना पड़ता है और 'चूंकि हम यहां पढ़ते हैं, हमें यह करना ही पड़ेगा वरना टीचर हमें ट्रांसफर सर्टिफिकेट देने की अर्थात स्कूल से निकाल देने की धमकी देते हैं।Ó
    एक तरफ 21 वीं सदी में सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने के इरादे और दूसरी तरफ समाज मन में गहराई में धंसी भेदभाव की भावना, जो समाज के सबसे वंचित कहे जाने वाले तबकों के नौनिहालों पर कहर बन कर बरपा करती है! आखिर हम किस ओर उन्मुख हैं?
    वर्ष 2014 में 'जाति की वास्तविकता को लेकर सम्पन्न अबतक के सबसे बड़े सर्वेक्षणÓ के नतीजे प्रकाशित हुए थे, जो दरअसल संविधान में दर्ज प्रतिबद्धता एवं जमीनी हकीकत के बीच व्याप्त अन्तराल को उजागर कर रहे थे। सर्वेक्षण के मुताबिक अस्पश्यता की औपचारिक समाप्ति के 64 साल बाद भी भारत के एक चैथाई लोग इस बात को स्वीकारते देखे गए कि वह किसी न किसी रूप में उस पर आज भी अमल कर रहे हैं। प्रस्तुत सर्वेक्षण को नेशनल कौन्सिल आफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च और अमेरिका की यूनिवर्सिटी आफ मेरीलेण्ड द्वारा संयुक्त रूप से अंजाम दिया गया था।
    देश के 42,000 घरों में सम्पन्न इस सर्वेक्षण में यह देखा गया कि अस्पश्यता की समस्या यहां उपस्थित सभी धर्मों में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन तथा सभी जाति समूहों में यहां तक की अनुसूचित जातियों-जनजातियों में भी  नजऱ आती है। 
    जातिसमूहों के हिसाब से देखें तो इस  पर अमल सबसे अधिक ब्राहमणों द्वारा, बाद में अन्य पिछड़ी जातियों द्वारा किया जाता है। बताया जा रहा है कि 'इंडिया हयूमन डेवलपमेण्ट सर्वेÓ  (जो गैरसरकारी स्तर पर सबसे बड़ा अखिल भारतीय सर्वेक्षण है)  के अन्तर्गत 2011-12 में सम्पन्न प्रस्तुत सर्वेक्षण के निष्कर्ष  जल्द ही प्रकाशित होंगे। 
    दिलचस्प था कि जिन लोगों ने यह कहा कि वह अस्पश्यता को नहीं मानते हैं, उन्हें जब यह पूछा गया कि क्या वह अनुसूचित तबके के किसी व्यक्ति को अपनी रसोई में घुसने देंगे तो सहभागियों में से 52 फीसदी ब्राहमणों ने, 24 फीसदी गैरब्राहमण फारवर्ड जाति से जुड़े लोगों ने, 33 फीसदी अन्य पिछड़ी जाति के लोगों ने 15 फीसदी अनुसूचित जाति के लोगो ंने तो 22 फीसदी अनुसूचित जनजाति से जुड़े लोगों ने साफ इन्कार किया। http://www.humsamvet.in/

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Posted Date : 19-Apr-2018
  • निखिल रंजन
    कॉमनवेल्थ के 53 देशों में दुनिया की करीब एक तिहाई आबादी रहती है। सदस्य देशों में लोकतंत्र, स्थिरता, सुरक्षा और समृद्धि के लिए काम करना इसका मकसद माना गया है। कॉमनवेल्थ के सदस्य आपास में कारोबार करते हैं और वे दूसरे समूहों में भी शामिल हैं जहां उनकी हिस्सेदारी ज्यादा भी होती है। खुद ब्रिटेन के लिए ही अगर देखें तो उसके निर्यात में कॉमनवेल्थ देशों की हिस्सेदारी महज 8-9 फीसदी है जबकि यूरोपीय संघ की करीब 44 फीसदी।
    अब जबकि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर होगा तब उसके लिए कॉमनवेल्थ की जरूरत समझी जा सकती है। ब्रिटेन की कोशिश है कि वह अपने पास मौजूद दूसरे विकल्पों के बारे में सोचे कॉमनवेल्थ उसके लिए मददगार हो सकता है। चर्चा हो रही है कि इसे कारोबार के लिहाज से अहम बनाया जाए। बीते 20 सालों में यह पहली बार है जब कॉमनवेल्थ देशों के राष्ट्रप्रमुखों के सम्मेलन की मेजबानी ब्रिटेन कर रहा है, बहुत से लोग इसे ब्रेक्जिट से भी जोड़ कर देख रहे हैं हालांकि कॉमनवेल्थ की बैठक के एजेंडे में यह मुद्दा शामिल नहीं है।
    विशेषज्ञों में इसे लेकर बहस हो रही है कि क्या कॉमनवेल्थ ब्रिटेन की उम्मीदें पूरी कर सकेगा। इसके सदस्य देशों में ही इसे लेकर बहुत उत्साह नजर नहीं आता। बहुत से देश ब्रिटेन के औपनिवेशिक अतीत को भी इसका हिस्सा मानते हैं। 
    लंदन के किंग्स कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय संबंध पढ़ाने वाले प्रोफसर हर्ष वी पंत कहते हैं, औपनिवेशिक दौर में ब्रिटेन की गुलामी झेल चुके देशों में इसे लेकर एक हिचक तो है ही, उन्हें लगता है कि वो क्यों एक बार फिर उस देश के नेतृत्व में काम करें जिसने उन पर राज किया। हालांकि एक सच यह भी है कि इन देशों का आपसी कारोबार करीब 800 अरब अमेरिकी डॉलर का है। कॉमनवेल्थ के सदस्य देशों को आपस में मुक्त रूप से व्यापार करने की सुविधा मिलती है और यह देश एक दूसरे के संसाधनों का लाभ उठाते हैं।
    कई लोगों का मानना है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका बढ़े तो यह गुट अपने लिए अहमियत हासिल कर सकता है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझीदारी इसे सफल बना सकती है। ब्रिटेन को भी शायद इसका कुछ अंदाजा है। 
    भारत को इस बैठक में खास अहमियत दी गई है। भारतीय प्रधानमंत्री को बैठक में शामिल होने का न्यौता खुद महारानी ने प्रिंस चाल्र्स के हाथों भेजा। इतना ही नहीं नरेंद्र मोदी अकेले नेता हैं जिनके साथ ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने इस दौरान द्विपक्षीय बातचीत की है। कई विशेषज्ञ तो यह भी मान रहे हैं कि अगर कॉमनवेल्थ में ऊर्जा भरनी है तो भारत जैसे देशों को निर्णायक भूमिका में आना होगा। प्रोफेसर हर्ष वी पंत ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, कॉमनवेल्थ को अगर सफल बनाना है तो भारत को इसमें बड़ी भूमिका निभानी होगी। उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में भारत प्रमुख है और इस वक्त उसके बगैर इसकी सफलता की बात नहीं सोची जा सकती। 
    कॉमनवेल्थ का नेतृत्व पारंपरिक रूप से ब्रिटेन की महारानी के हाथ में होता है और अब जब कि वो 92 साल की हो चुकी हैं तो वहां भी उनके उत्तराधिकारी की बात सोची जा रही है।
    कॉमनवेल्थ की समस्या यह है कि बीते सात दशकों में अंतरराष्ट्रीय कारोबार की दुनिया में यह उतना महत्व हासिल नहीं कर सका जितना शायद सोचा गया था। खुद भारत की ही इसमें दिलचस्पी बहुत नहीं रहती। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसमें जरूर दिलचस्पी दिखाई थी और पाकिस्तान की इसमें मौजूदगी को देखते हुए इसे जरूरी भी मानते रहे लेकिन बाद के प्रधानमंत्रियों ने इस पर बहुत ध्यान नहीं दिया। मौजूदा वक्त में जब भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका बढ़ाने के लिए बेचैन दिख रहा है तब मुमकिन है कि ब्रिटेन की पहल उसे इस गुट में ज्यादा सक्रिय कर दे, लेकिन इसमें समस्याएं भी होंगी। बहुत से देशों के लिए भारत की बढ़ती भूमिका के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल होगा, पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण हो सकता है।
    कॉमनवेल्थ देशों की राजव्यवस्था और प्रशासन में एक तरह की समानता है और ये सारे देश अंग्रेजी भी बोलते हैं। इन वजहों से उनके लिए आपस में व्यापार आसान है। हालांकि इन देशों के खुद यूरोपीय संघ और दूसरे कारोबारी गुटों से संबंध हैं और ब्रेक्जिट के बाद उनके लिए भी समस्या हो सकती है। मॉरीशस, सेंट लूसिया, बोत्स्वाना जैसे कॉमनवेल्थ के बहुत से देश हैं जो ब्रिटेन के जरिए यूरोपीय संघ के साथ कारोबार करते हैं। लंदन उनके लिए गेट की भूमिका निभाता रहा है लेकिन अब यह सब बदल जाएगा। भारतीय कंपनियों पर भी इसका असर होगा। प्रोफेसर पंत ने कहा, ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर आने के बाद उसके जो बदलाव होंगे उस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। ब्रेक्जिट के कारण दूसरे देशों के रिश्ते भी यूरोपीय संघ से बदलेंगे। ब्रिटेन ने सीधे भारत से समझौते करने की कोशिश की लेकिन भारत और दूसरे देशों ने यही कहा कि वो पहले यूरोपीय संघ से आगे के लिए अपने रिश्तों की रूपरेखा तय करे। ब्रिटेन के लिए भी थोड़ी असमंजस की भी स्थिति है। 
    कॉमनवेल्थ की सफलता के लिए उसमें बड़े सुधार की जरूरत है और बगैर उसके दुनिया के स्तर पर इसे बहुत महत्व मिलने के आसार नहीं दिखते। प्रोफेसर पंत कहते हैं, कॉमनवेल्थ की तरफ दुनिया का ध्यान तब जाएगा जब वो अपने अंदर व्यापक सुधार कर नए एजेंडे के साथ सामने आएगा। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस वक्त की जरूरतें अलग हैं और उनके हिसाब से ही इस संगठन में बदलाव करने होंगे। भारत और दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाएं इसे नई दिशा दे सकती हैं। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 19-Apr-2018
  • डॉ. संजय शुक्ला, व्याख्याता, आयुर्वेद
    छत्तीसगढ़ राज्य में चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, कानून, उच्चशिक्षा एवं पत्रकारिता से संबंधित राष्ट्रीय स्तर के अनेक उच्चशिक्षा संस्थान है। लेकिन विडंबना है कि हाल ही में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी उच्चशिक्षा संस्थानों से संबंधित देशव्यापी नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क-2018 (एन.आई.आर.एफ.) में प्रदेश का कोई भी विश्वविद्यालय या कॉलेज शीर्ष 100 की सूची में शामिल नहीं है। राज्य के उच्चशिक्षा संस्थानों को 150 से 200 के बीच के पायदानों पर ही संतोष करना पड़ा है। गौरतलब है कि राज्य स्थापना के बाद छत्तीसगढ़ बड़ी तेजी से मध्यभारत में 'एजुकेशन हबÓ के रूप में उभर रहा है, लेकिन प्रदेश के सरकारी उच्चशिक्षा का हाल शिक्षकों के भारी कमी के चलते बेहाल है। छत्तीसगढ़ विधानसभा के पिछले बजट सत्र में सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि उच्च शिक्षा विभाग के अधीन संचालित हो रहे 8 में से 7 विवि में प्रोफेसरों की भारी कमी है। राज्य में कुल 22 शासकीय और निजी विवि संचालित है, सरकारी क्षेत्र के 12 विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों से लेकर सहायक प्राध्यापकों की कमी लंबे अर्से से बनी हुयी है। जानकारी के अनुसार सरकारी उच्चशिक्षा के क्षेत्र में संचालित विश्वविद्यालयों  में प्रोफेसरों के 65 पदों में से केवल 25 पदों पर ही प्रोफेसर कार्यरत हैं। 
    आलम यह है कि प्रदेश के सबसे बड़े और पुराने विवि पं. रविशंकर शुक्ल विवि में प्रोफेसरों के 26 स्वीकृत पदों में से 12 पद ही भरे हैं, पत्रकारिता विवि में प्रोफेसरों के 5 पदों में से सभी पद खाली हैं। इसी प्रकार आदिवासी क्षेत्र जगदलपुर में संचालित बस्तर विवि में प्रोफेसरों के 10 स्वीकृत पदों में से सभी पद रिक्त हैं दूसरे आदिवासी क्षेत्र में स्थापित सरगुजा विवि में प्रोफेसरों के 7 पदों में से 6 पद खाली हैं। पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विवि में प्रोफेसरों के चारों पद रिक्त हैं तथा संगीत के इकलौते विवि इंदिरा कला संगीत विवि में प्रोफेसरों के 5 पदों में से 2 पद खाली हैं। राज्य में संचालित कृषि, पशुपालन व डेयरी, चिकित्सा और इंजीनियरिंग क्षेत्र के विवि में भी शैक्षणिक और गैरशैक्षणिक पदों की भारी कमी बनी हुयी है। इन विश्वविद्यालयों  में केवल प्रोफेसरों की ही कमी नहीं है वरन सह प्राध्यापक और सहायक प्राध्यापकों की भी अत्यधिक कमी बनी हुयी है। आश्चर्यजनक यह है कि इन विश्वविद्यालयों द्वारा कई नये रोजगार मूलक पाठ्यक्रम चलाये जा रहे हैं लेकिन इन विषयों को पढ़ाने वाले शिक्षक ही उपलब्ध नहीं है। इन विश्वविद्यालयों में वानिकी-वन्यजीव, बायोटेक्नोलॉजी, अंग्रेजी, विज्ञान, एम.सी.ए., एम.बी.ए., जैव प्रौद्योगिकी, फार्मेसी, विधि, जनसंचार, इलेक्ट्रानिक मीडिया, पत्रकारिता विभाग, प्रबंधन, माईक्रोबायोलॉजी, खाद्य प्रसंस्करण, होटल मैनेजमेंट, कामर्स, भौतिकी, रसायन, खगोल-भौतिक, सांख्यिकी, योग एवं इतिहास जैसे विषयों के अधिकांश पद खाली हैं। इन स्थितियों में अहम प्रश्न यह कि क्या यह पढऩे वाले छात्रों के साथ छलावा नहीं है?
    राज्य के विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों एवं अन्य शैक्षणिक पदों के पूर्ति के परिप्रेक्ष्य में जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि राज्य शासन द्वारा शासकीय, स्वायत्तशासी और अनुदान प्राप्त संस्थाओं में नयी भर्तियों पर रोक लगायी गयी है फ लस्वरूप इन पदों को भरने में कठिनाईयांॅ आ रही है। चूंॅकि इन पदों में संविदा नियुक्तियों पर भी रोक है इसलिये मासिक मानदेय पर अतिथि व्याख्याताओं के सहारे काम चलाया जा रहा है।
     बहरहाल विश्वविद्यालयों  में शैक्षणिक पदों की कमी का सीधा असर यहां के शिक्षा की गुणवत्ता और शोध गतिविधियों पर भी पडऩा लाजमी है, क्योंकि शिक्षक केवल शिक्षण कार्य ही नहीं करता है अपितु वह शोध कार्य भी करता है।  आलम यह है कि राज्य के बाहर के राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में प्रदेश में शोधार्थियों की संख्या अब लगातार कम होते जा रही है। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर के प्रतियोगी परीक्षाओं में भी छत्तीसगढ़ के सफल अभ्यर्थियों की संख्या भी उंगलियों में गिनने लायक है, जबकि आर्थिक रूप से पिछड़े ओडिशा एवं बिहार जैसे राज्यों में उच्चशिक्षा के स्थिति हमसे बेहतर है जिसका परिणाम वहां के छात्रों को राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में मिल रहा है।  
    राज्य में उच्चशिक्षा की गुणवत्ता और शोध के स्तर की पुष्टि मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी के हालिया रिपोर्ट से होती है। विश्वविद्यालयों की गिरती साख के लिए बहुत हद तक इन संस्थानों में होने वाली यहांॅ कि अवांछित गतिविधियांॅ भी है, पर्चे फूटने, परीक्षा की गोपनीयता भंग होना, कर्मचारी व छात्र असंतोष, दोषपूर्ण परीक्षा परिणाम और अंकसूचियों में गड़बड़ी तथा पी.एच.डी. में नकल प्रकरणों ने भी राश्ट्रीय परिदृश्य में राज्य के विश्वविद्यालयों  की गरिमा को कम किया है। विचारणीय है कि विश्वविद्यालयों के शिक्षा और गुणवत्ता की दयनीय स्थिति का खामियाजा यहां पढऩे वाले छात्र उठा रहे हैं, राश्ट्रीय स्तर पर राज्य के विश्वविद्यालयों की साख लगातार गिरती जा रही है। आज के दौर में जब बेरोजगार युवकों के लिये डिग्री की गुणवत्ता ही उसका भविष्य का निर्धारक हो तब सरकार को इन विश्वविद्यालयों की घटती साख के बारे में तत्काल सोचना होगा। विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के कमी से केवल शिक्षण और शोध कार्य ही प्रभावित नहीं हो रहे हैं वरन विवि अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) से मिलने वाले अनुदानों पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। क्योंकि यू.जी.सी. उन्हीं विश्वविद्यालयों को अनुदान देता है जिनका नैक ग्रेडिंग संतोषजनक हो लेकिन इस दिशा में शिक्षकों की कमी सबसे बड़ा रोड़ा बने हुये हैं। 
     राज्य में संचालित हो रहे उच्चशिक्षा के कालेजों के हालात और भी दयनीय है, इन कालेजों में प्राचार्य, प्राध्यापक, सह प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक, लायब्रेेरियन, क्रीड़ा अधिकारियों तथा अन्य गैर शैक्षणिक कर्मचारियों के हजारों पद रिक्त हैं। राज्य गठन के 17 वर्षों बाद भी प्रदेश के अधिकांश कॉलेजों में पूर्णकालिक प्राचार्य नहीं है। स्थिति यह है कि उच्चशिक्षा विभाग द्वारा कालेजों में रिक्त सहायक प्राध्यापकों के 27 विषयों के कुल 966 पदों पर नियुक्ति हेतु राज्य लोक सेवा आयोग के माध्यम से भर्ती की कार्यवाही की गयी थी। लेकिन तीन सालों के प्रक्रिया के बाद भी लगभग 501 पदों में योग्य उम्मीदवार नहीं मिलने के कारण ये पद फिर से रिक्त रह गये हैं। इन पदों के रिक्त होने का सबसे अहम कारण अभ्यर्थियों का पी-एच.डी. नहीं होना है जो यू.जी.सी. के मानकों के लिये अनिवार्य है। 
    गौरतलब है कि पिछले पांच सालों से कॉलेजों के सहायक प्राध्यापकों के एक हजार से ज्यादा खाली पदों पर संविदा शिक्षकों के बलबूते काम चलाया जा रहा है, इन कालेजों में सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति अंग्रेजी और विज्ञान विषयों की है। इन विषयों में योग्य अभ्यर्थी नहीं मिलने के कारण अधिकांश पद खाली रह गए हैं। इसके अलावा कॉलेजों में अधोभूत संरचना, प्रयोगशाला और उन्नत पुस्तकालय का आभाव है इन स्थितियों में शोध छात्राओं को मिलने वाली सुविधाओं का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कॉलेजों में शिक्षकों के भारी कमी के परिप्रेक्ष्य में विरोधाभाष यह भी है कि यहांॅ कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुयी है इसके बावजूद कॉलेज शिक्षकों को मंत्रियों के निजी स्टाफ और दिगर विभागों में संलग्नीकरण किया गया है। राज्य शासन के बार-बार निर्देशों के बावजूद अपनी ऊंॅची पहुंॅच के चलते अभी भी कई शिक्षक अपने मूल विभाग में नहीं लौटे हैं। उदारीकरण के इस दौर में राज्य में उच्चशिक्षा से संबंधित अनेक निजी विवि और कॉलेज संचालित हो रहे हैं लेकिन इन विश्वविद्यालयों एवं कालेजों की स्थिति भी बहुत ज्यादा संतोषजनक नहीं है। बहरहाल यदि राज्य में उच्चशिक्षा की व्यवस्था में पर्याप्त सुधार नहीं होगा तो नई पीढ़ी कुंठा और निराशा के अंधकार में भटक सकते हैं तथा छत्तीसगढ़ जैसा विकासशील राज्य नई पीढ़ी के नई ऊर्जा से वंचित हो सकता है इसलिये राज्य सरकार की जवाबदेही है कि वह प्रदेश में उच्चषिक्षा की दिशा और दशा सुधारने के लिये सार्थक पहल करे।
    (लेखक शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में सहायक प्राध्यापक है।) 
     

     

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