विचार / लेख

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Date : 05-Dec-2019

सचिन गोगोई

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त किए जाने और उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अब विवादास्पद नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) पर अपनी मुहर लगाकर पूर्वोत्तर भारत की जनता का सामना करने को तैयार हो गई है।
केंद्रीय कैबिनेट में इस विधेयक को मंजूरी मिल गई है और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसे अगले हफ्ते सदन में पेश किए जाने की संभावना है।
इस विधेयक में पड़ोसी देशों से शरण के लिए भारत आए हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है।
हालांकि इस बिल को लेकर विपक्ष बेहद कड़ा रूख अख्तियार कर रहा है और इसे संविधान की भावना के विपरीत बता रहा है वहीं केंद्र की तरफ से इसे शीर्ष प्राथमिकता देते हुए इसे सदन में रखे जाने के दौरान सभी सांसदों को उपस्थित रहने को कहा गया है।
नागरिकता संशोधन विधेयक में क्या है खास?
भारत के पूर्वोत्तर में इस नागरिकता संशोधन विधेयक का व्यापक रूप से विरोध होता रहा है जिसका उद्देश्य पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से गैर-मुसलमान अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए नियमों में ढील देने का प्रावधान है।
दरअसल सदन में इसे पारित करवाने का यह सरकार का दूसरा प्रयास है। इससे पहले भी मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान इसी वर्ष 8 जनवरी को यह लोकसभा में पारित हो चुका है। लेकिन इसके बाद पूर्वोत्तर में इसका हिंसक विरोध शुरू हो गया, जिसके बाद सरकार ने इसे राज्यसभा में पेश नहीं किया। सरकार का कार्यकाल पूरा होने के साथ ही यह विधेयक स्वत: ख़त्म हो गया।
मई में नरेंद्र मोदी की सरकार का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ। इस दौरान अनुच्छेद 370 समेत कई बड़े फैसले किए गए और अब नागरिकता संशोधन विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी के साथ एक बार फिर इसे संसद में पेश किया जाएगा।
पूर्वोत्तर में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध क्यों?
वैसे तो नागरिकता संशोधन विधेयक पूरे देश में लागू किया जाना है लेकिन इसका विरोध पूर्वोत्तर राज्यों, असम, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में हो रहा है क्योंकि ये राज्य बांग्लादेश की सीमा के बेहद करीब हैं।
इन राज्यों में इसका विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि यहां कथित तौर पर पड़ोसी राज्य बांग्लादेश से मुसलमान और हिंदू दोनों ही बड़ी संख्या में अवैध तरीके से आ कर बस जा रहे हैं।
विरोध इस बात का है कि वर्तमान सरकार हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की फिराक में प्रवासी हिंदुओं के लिए भारत की नागरिकता लेकर यहां बसना आसान बनाना चाहती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संसद के एजेंडे में इसे सूचीबद्ध करने के साथ ही पूर्वोत्तर में स्थानीय समूहों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। हालांकि, अब तक हिंसा की कोई ख़बर नहीं है लेकिन असमिया भाषा के एक स्थानीय अख़बार असमिया खबर ने अपने संपादकीय में चेतावनी दी है कि इस विधेयक पर आगे बढऩे की स्थिति में सत्तारूढ़ बीजेपी को स्थानीय जनता के गुस्से का सामना करना पड़ेगा।
इसमें लिखा गया है, इतिहास गवाह है कि ऐसी सरकारों का क्या होता है जो जनता के खिलाफ जाती हैं।
अग्रेजी भाषी की द पायनियर में असम में इसे लेकर विरोध और 18 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला जलाए जाने की ख़बर छापी गई।
असमिया प्रतिदिन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्षेत्र में आठ प्रभावशाली छात्रों के समूह, नॉर्थइस्ट स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन (एनईएसओ) ने सभी सात राज्यों में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन शुरू किया।
इस रिपोर्ट में एनईएसओ कार्यकर्ताओं का हवाला देते हुए कहा कि इस विधेयक को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम में इसके विरोध में उतरे अन्य समूहों में कृषक मुक्ति संग्राम समिति, युवा संगठन असम जतियाबाड़ी युवा छात्र परिषद और वामपंथी राजनीतिक गठबंधन समूह वाम-डेमोक्रेटिक मंच शामिल हैं।
सीएबी और एनआरसी में क्या है अंतर?
सरकार की तरफ से जिस विधेयक को सदन में पेश किया जाना है वह दो अहम चीज़ों पर आधारित है- पहला, गैर-मुसलमान प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देना और दूसरा, अवैध विदेशियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजना, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान हैं।
हिंदुस्तान टाईम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, गृह मंत्री अमित शाह ने 20 नवंबर को सदन को बताया कि उनकी सरकार दो अलग-अलग नागरिकता संबंधित पहलुओं को लागू करने जा रही है, एक सीएबी और दूसरा पूरे देश में नागरिकों की गिनती जिसे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर या एनआरसी के नाम से जाना जाता है।
अमित शाह ने बताया कि सीएबी में धार्मिक उत्पीडऩ की वजह से बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है।
उन्होंने बताया कि एनआरसी के जरिए 19 जुलाई 1948 के बाद भारत में प्रवेश करने वाले अवैध निवासियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर करने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
मूल रूप से एनआरसी को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से असम के लिए लागू किया गया था। इसके तहत अगस्त के महीने में यहां के नागरिकों का एक रजिस्टर जारी किया गया। प्रकाशित रजिस्टर में करीब 19 लाख लोगों को बाहर रखा गया था। जिन्हें इस सूची से बाहर रखा गया उन्हें वैध प्रमाण पत्र के साथ अपनी नागरिकता साबित करनी थी।
हालांकि, अमित शाह ने कहा कि नई राष्ट्रव्यापी एनआरसी प्रक्रिया में असम फिर से शामिल होगा।
न्यूज वेबसाइट स्क्रॉल के मुताबिक़ असम में एनआरसी की जो प्रक्रिया अपनाई गई थी उसमें कट ऑफ तारीख़ 24 मार्च 1971 थी जबकि नए प्रस्तावित देशव्यापी एनआरसी में यह तारीख 19 जुलाई 1948 है।
आखिर बीजेपी जनसाधारण के खिलाफ क्यों जाना चाहती है?
पूर्वोत्तर में व्यापक विरोध प्रदर्शन के बावजूद नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर आगे बढ़ रही बीजेपी का विश्वास मुख्य रूप से इस पूरे क्षेत्र में पार्टी को मिली चुनावी सफलता से उपजा है। जब केंद्र सरकार अपने पहले कार्यकाल के दौरान इस विधेयक को पास करवाने की कोशिश में लगी थी तब पूर्वोत्तर में कई समूहों ने बीजेपी का विरोध किया था। लेकिन, जब 2019 के चुनाव परिणाम आए तो पूर्वोत्तर में बीजेपी और इसकी सहयोगी पार्टियों ने अच्छा प्रदर्शन किया।
प्रमुख अंग्रेजी अखबार द हिंदू के मुताबिक, समूचे पूर्वोत्तर की 25 संसदीय सीटों में से बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों को 18 पर जीत मिली।
व्यापक विरोध के बावजूद, बीजेपी के असम प्रदेश अध्यक्ष रंजीत दास ने असमिया प्रतिदिन अख़बार को बताया कि इस क्षेत्र के लोग नागरिकता के मुद्दे पर उनकी पार्टी का समर्थन कर रहे हैं।
दास ने कहा, नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर असम के लोगों में डर कम हो गया है। बीते संसदीय और निकाय चुनाव में बीजेपी को वोट देकर असम के लोगों ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर कोई चिंता नहीं है। इसके साथ ही बीजेपी को इस बात की भी उम्मीद है कि हिंदुओं और गैर-मुसलमान प्रवासियों को आसानी से नागरिकता देने की वजह से उसे बहुत बड़ी संख्या में हिंदुओं का समर्थन मिलेगा।
न्यूज वेबसाइट द वायर के मुताबिक, नागरिकता संशोधन विधेयक के पारित हो जाने से बीजेपी को बहुसंख्यकों की पार्टी होने की छवि और मज़बूत करने में मदद मिलेगी। (बीबीसी)

 


Date : 05-Dec-2019

पुष्य मित्र

रेल से लेकर गैस तक, पेट्रोलियम से लेकर शिक्षा तक में जहां जहां सरकारी पैसा खर्च हो रहा था उसे बंद किया जा रहा है। टेक्स के पैसे से जनता को कोई सुविधा नहीं मिलने जा रही। अब सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में भी पूरी फीस चुकानी होगी। हां, कार्पोरेट को हर तरह की सुविधा की व्यवस्था है। उनका लोन राइट ऑफ़ किया जायेगा, उन्हें टेक्स में छूट दी जाएगी, जमीन सस्ते में मिलेगी, कर्मचारियों का सिर दर्द नहीं रहेगा। सस्ते में कोई भी जमीन या सरकारी कम्पनी खरीद सकते हैं। अब इससे बेहतर क्या सेवा की जाये?

राजनीति के जानकर जानते हैं कि इस देश की गद्दी का भविष्य आखिरकार चंद व्यापारी परिवार ही करते हैं। वे जब पलटते हैं तो कुर्सी के पाये हिलने लगते हैं। मनमोहन सिंह सरकार की कुर्सी किसी अन्ना आंदोलन, किसी हिंदुत्ववादी उभार की वजह से नहीं गई थी। उनके खिलाफ कार्पोरेट था। जो गरीबों की सब्सिडी खत्म करवाना चाहता था, श्रम कानूनों में ऐसे सुधार चाहता था जो मालिकों के हित में हो, जो सरकारी कम्पनियों को बेचने का पक्षधर था, जो भूमि अधिग्रहण कानून को कार्पोरेट के पक्ष में लचीला बनाना चाहता था, जो ऑनलाइन लेन-देन और कारोबार की बढ़ोत्तरी चाहता था, ताकि छोटे दुकान और कारोबार खत्म हो जाएं और पूरा व्यवसाय चंद बड़े घरानों तक सीमित हो जाये।
मनमोहन सिंह इन नीतियों के पक्षधर थे, मगर यूपीए की सरकार में पहले वाम दलों के शामिल रहने और नेशनल एडवाइजरी कौंसिल द्वारा लोगों के हित में तरह तरह के कानून बनवाने की वजह से पूंजीपतियों का टास्क वे पूरा नहीं कर पा रहे थे। अभी भी जब सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, मनरेगा (काम का अधिकार), भोजन का अधिकार, वनाधिकार जैसे कानूनों के बारे में सोचता हूं तो दंग रह जाता हूं कि क्या आज की कार्पोरेटपरस्त शासन व्यवस्था में ऐसे कानून बन भी सकते हैं। मगर जब ये कानून बन रहे थे, तब हमने इनकी कीमत नहीं समझी।
हमने समझा नहीं कि कैसे दस रुपये में आप सरकारी व्यवस्था से कोई भी सूचना निकाल सकते हैं। गाँव का निर्धनतम व्यक्ति भी सरकार से 100 दिन का न्यूनतम रोजगार मांग सकता है (भले इस कानून को लागू करने में हम बुरी तरह विफल रहे, मगर इसके बावजूद हमने देखा कि गाँव के मजदूरों की गाँव के किसान भी खुशामद करते और पंजाब-हरियाणा के एजेंट भी बिहार के गाँव में डेरा डाले रहते, मोबाइल, कपड़े और क्या-क्या ऑफऱ किया जाता), भोजन का अधिकार और गरीबों को राशन दुकान से मिलने वाले मुफ्त और सस्ते अनाज ने भी उनके जीवन की स्थिति में सुधार लाया। खोट इन व्यवस्थाओं के संचालन में थी, मगर उस सोच में नहीं, जिसकी वजह से इन्हें लागू कराया गया। मगर यह सब कार्पोरेट को खटकता था। फिर आखिरकार कार्पोरेट मोदी के पक्ष में लामबंद हो गया। मनमोहन सिंह तमाम कोशिशों के बावजूद अपनी सरकार को बचा नहीं पाये।
उन्होने कार्पोरेट को खुश करने की कोशिश में जो फैसले किए, जैसे 2जी स्पेक्ट्रम वितरण और कोल ब्लॉक आवंटन वही इनकी कब्रगाह बन गई। वहीं सूचना का अधिकार कानून इनके खात्मे की वजह बना जिसे इन्होंने लागू कराया था। जबकि जिन शर्तों पर रिलांयस टेलीकॉम को आगे बढ़ाया गया है और बीएसएनएल समेत दूसरी तमाम टेलीकॉम कम्पनियां पानी मांग रही हैं वह किसी से छिपा नहीं है।
उस जमाने के तमाम अधिकार आज धराशाई हैं। चाहे शिक्षा का अधिकार हो या रोजगार गारंटी, भोजन का अधिकार हो, या जंगल पर आदिवासियों का अधिकार। रेल से लेकर गैस तक, पेट्रोलियम से लेकर शिक्षा तक में जहां जहां सरकारी पैसा खर्च हो रहा था उसे बंद किया जा रहा है। टेक्स के पैसे से जनता को कोई सुविधा नहीं मिलने जा रही। अब सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में भी पूरी फीस चुकानी होगी। हां, कार्पोरेट को हर तरह की सुविधा की व्यवस्था है। उनका लोन राइट ऑफ़ किया जायेगा, उन्हें टेक्स में छूट दी जाएगी, जमीन सस्ते में मिलेगी, कर्मचारियों का सिर दर्द नहीं रहेगा। सस्ते में कोई भी जमीन या सरकारी कम्पनी खरीद सकते हैं। अब इससे बेहतर क्या सेवा की जाये?
मगर फिर भी कार्पोरेट नाराज है, गुस्सा जाहिर कर रहा है। क्योंकि सरकार कार्पोरेट को खुश करने में भी पारदर्शिता नहीं बरत रही। अंबानी और अडानी को छोडक़र सभी नाराज हैं, दुखी हैं, बाप बाप कर रहे हैं। उन्हें मालूम है कि जैसे एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया वगैरह खत्म हो गए, वैसे ही बजाज, टाटा, बिरला, जिन्दल सबको खत्म हो जाना है या नतमस्तक हो जाना है। पूरे बाज़ार को नियंत्रित करने के लिए सिर्फ अंबानी और अडानी ही बच जायेंगे। यह गुस्सा, यह छटपटाहट इसी वजह से है।
गुस्सा कई जगह है। देश में मोदी और शाह, अंबानी और अडानी ही बच जायें यह किसको कबूल होगा। मगर सवाल यह है कि उनके गुस्से, उनकी नाराजगी और उनकी वजह से कोई बदलाव आता है तो क्या वह बदलाव उस तरह जनता के पक्ष में कभी हो पायेगा, जैसे यूपीए 1 के वक़्त में हुआ था। जब टेक्स रिबेट की जगह जनता के अधिकारों की बात हो रही थी। जब जनता को सब्सिडी देना आर्थिक अपराध नहीं माना जाता था? यही मेरा सवाल है।


Date : 04-Dec-2019

डॉ. संजय शुक्ला

कुपोषण और एनीमिया के लिए सरकार के साथ-साथ समाज भी समान रूप से जवाबदेह है। अशिक्षा और रूढि़वादी व्यवस्था के चलते महिलाएं अपने आहार में संतुलित पोशक तत्व शामिल ही नहीं कर पा रहे हैं वहीं परिवार वालों के बाद बचे-खुचे खाने से अपनी पेट भरने की प्रवृत्ति ने महिलाओं के सेहत पर भारी असर डाला है।

‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ अवधारणा वाले छत्तीसगढ़ राज्य के भूपेश बघेल की अगुवाई वाले सरकार ने प्रदेश से कुपोषण और एनीमिया को खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री सुपोषण योजना का आगाज किया है। इस योजना के अंतर्गत राज्य के लगभग 40 फीसदी की आबादी जो गरीबी रेखा के नीचे जीवनव्यापन कर रही है, उन्हें पौष्टिक भोजन देने का लक्ष्य रखा गया है। दरअसल छत्तीसगढ़ जैसे विकासशील राज्य में कुपोषण सरकार के लिए अहम चुनौती बनी हुई है क्योंकि इससे प्रदेश का समावेशी विकास प्रभावित हो रहा है। 
गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वे के मुताबिक मौजूदा समय में राज्य में 5 वर्ष से कम आयु के 37.6 फीसदी यानी 5 लाख बच्चे कुपोषित और 15-49 आयु की 41.5 फीसदी महिलाएं एनीमिया यानी खून की कमी से पीडि़त हैं। कुपोषण और एनीमिया से जहां देश में लाखों बच्चों की मौत हो रही है, वहीं लाखों बच्चों का वजन जन्म के समय ही कम रहता है। फलस्वरूप उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है। आश्चर्यजनक है कि दुनिया के कुल कुपोषितों में से 19 करोड़ से ज्यादा लोग भारत में है तथा बच्चों में कुपोषण का राष्ट्रीय औसत 38 फीसदी है।  इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में भारत में कुपोषण की दर को बेहद चिंताजनक बताया है। 
बहरहाल छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले 18 वर्षों में प्रदेश से कुपोषण को खत्म करने में महत्वपूर्ण कामयाबी हासिल की है। राज्य गठन के दौरान साल 2000 में जहां प्रदेश में 70 फीसदी कुपोषण था वहीं अब 2018-19 में यह आंकड़ा 39.60 फीसदी है। प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र बस्तर के सुकमा में सर्वाधिक 45.12 फीसदी कुपोषण है जबकि दंतेवाड़ा, बस्तर, कांकेर, नारायणपुर, जशपुर व कबीरधाम जिलों में भी कुपोषण बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। आश्यचर्यजनक रूप से शहरी जिलों बिलासपुर, राजनांदगांव और रायगढ़ में कुपोषण के आंकड़े चौकाने वाले हैं।
 दरअसल दुनिया के विकासशील देशों के लिए कुपोषण जनस्वास्थ्य के लिहाज से अहम चुनौती है। प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल्स ‘लैंसेट’ में फीसदी एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक भारत के उत्तर भारतीय प्रदेशों उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कुपोषण बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है। 
बहरहाल किसी भी देश व समाज का आर्थिक और सामाजिक विकास उसकी बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था पर निर्भर होता है, स्वास्थ्य का सीधा संबंध पोषण से है। शरीर के लिए आवश्यक संतुलित आहार लंबे समय तक नहीं मिलने के कारण ही कुपोषण और एनीमिया जैसी स्थिति निर्मित होती है, परिणामस्वरूप बच्चों और महिलाओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है जिससे ये आसानी से कई रोगों का षिकार हो जाते हैं। 
आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष 2.70 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। इनमें से आधे बच्चे जन्म लेते ही मर जाते हैं, इसका प्रमुख कारण माताओं में खून की कमी है। भारत में जन्म के बाद जीवित रहने वाले लगभग 53 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं वहीं इस समस्या के कारण हर साल 10 लाख बच्चे मर जाते हैं। 
गौरतलब है कि दुनिया के एक तिहाई अविकसित बच्चे भारत में ही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 70 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिया से पीडि़त हैं इसका प्रमुख कारण उन्हें पर्याप्त संतुलित और पोशक खाद्य पदार्थों का न मिल पाना है। 
बहरहाल कुपोषण को तीन भागों में विभक्त किया गया है।  पहला स्टंटेड ग्रोथ यानि अवरूद्ध विकास, दूसरा वेस्टेड यानी शारीरिक कमजोरी तथा तीसरा अंडरवेट यानि उम्र के लिहाज से कम वजन होना। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार 5 वर्ष से कम आयु के 38.4 फीसदी बच्चों में स्टंटिंग की समस्या थी जबकि 35.7 प्रतिषत बच्चे कम वजन वाले हैं। 18 फीसदी बच्चों का जन्म लेते समय वजन कम था वहीं 5 वर्ष के 58 फीसदी बच्चे तथा 14 से 49 वर्ष की आयु के 53: महिलाओं में एनीमिया की समस्या है।
 इन सभी स्थितियों के लिए मुख्यतौर पर गर्भवती माता और बच्चों को मिलने वाले पोषक आहार में कमी व अन्य बीमारियां  जिम्मेदार हैं। बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पोषक और संतुलित आहार देने में हमारा देश इस कदर पिछड़ा हुआ है कि भारत को ‘वैश्विक कुपोषण का केन्द्र’ भी कहा जाने लगा है। 
बहरहाल कुपोषण के कारणों तथा इसे दूर करने के उपायों पर गंभीर विचार आवश्यक है। क्योंकि यह सीधे तौर पर देश और प्रदेश के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। दरअसल कुपोषण के लिए हमारे देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, परिस्थितियों के साथ-साथ भूखमरी, गरीबी, अशिक्षा, अस्वच्छता, रूढि़वादी असमानता, खाद्य सुरक्षा, कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रमों का सहीं क्रियान्वयन न होना, इन योजनाओं में भ्रष्टाचार तथा पोशक आहारों की गुणवत्ता में कमी होना इत्यादि प्रमुख कारण हैं। 
विडंबना है कि आजादी के सात दशक बाद भी कुपोषण कमी भी सियासी दलों के लिए राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाया जबकि ब्राजील जैसे देश में कुपोषण और भूख को राष्ट्रीय लज्जा माना जाता है। भारत में भूखमरी केवल सियासत का मुद्दा ही बनते रहा है, विकास के तमाम दावों को कुपोषण और भूखमरी की समस्या झुठला रहे हैं। 
गौरतलब है कि दुनिया की 23 फीसदी भूखमरी भारत में है, ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 103वें स्थान पर है जबकि इसके पहले हम 100वें तथा 2015 में 80वें पायदान पर थे। बहरहाल यह आंकड़ा उस देश का है जहां खाद्य सुरक्षा कानून लागू है तथा जहां लाखों टन आनाज हर साल खुले में सड़ जाते हैं।
 दरअसल कुपोषण और एनीमिया के लिए सरकार के साथ-साथ समाज भी समान रूप से जवाबदेह है। अशिक्षा और रूढि़वादी व्यवस्था के चलते महिलाएं अपने आहार में संतुलित पोशक तत्व शामिल ही नहीं कर पा रहे हैं वहीं परिवार वालों के बाद बचे-खुचे खाने से अपनी पेट भरने की प्रवृत्ति ने महिलाओं के सेहत पर भारी असर डाला है। 
गरीबी, सामाजिक व पारिवारिक कारणों के कारण महिलाओं को आमतौर पर पौष्टिक खाद्य पदार्थ जैसे दूध, घी, अंडा, दाल, हरी सब्जियां, फल इत्यादि सुलभ नहीं हो पाते फलस्वरूप वे एनीमिया का शिकार हो जाती हैं। अस्वच्छता के चलते भी देश में कुपोषण और एनीमिया के मामले बढ़ रही है, मिड-डे-मील तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों के मिलने वाले भोजन व खाद्य पदार्थों में मिलावट, खराब गुणवत्ता व इस योजना में जारी भ्रश्टाचार कुपोषण मुक्ति अभियान को पलीता लगा रहे हैं। 
गौरतलब है कि देश-प्रदेश की सरकारें कुपोषण मुक्ति अभियान पर हर साल अरबों रूपये खर्च कर रही हैं, इसके बावजूद नतीजा संतोषजनक नहीं है। केन्द्र सरकार द्वारा बीते साल 2018 में कुपोषण और एनीमिया से निबटने के लिए 9000 करोड़ रूपये की लागत वाले महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय पोषण मिषन कार्यक्रम की शुरूआत की गई है। 
इस अभियान से 10 करोड़ लोगों को लाभान्वित होने की उम्मीद है। देश की राज्य सरकारें कुपोषण की समस्या को खत्म करने के लिए तमाम जतन कर रहे हैं, सरकारों को कुपोषण मुक्ति अभियान में अनेक अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय संगठनों का सहयोग मिल रहा है। कुपोषण खत्म करने के उद्देश्य से 50 हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से गरीब और कुपोषित बच्चों को पौष्टिक भोजन, दूध, फल, अंडा, दलिया इत्यादि परोसा जा रहा है।  स्कूलों में मिड-डे-मील जैसी योजनाएं संचालित की जा रही है जिसमें स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है वहीं छत्तीसगढ़ सरकार ने इस योजना में नाष्ता और अंडा, सोयामिल्क सहित अनेक पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी शामिल किया है। 
बहरहाल इन योजनाओं के परिप्रेक्ष्य में अहम तथ्य यह भी है कि केवल योजनाओं और कार्यक्रमों के द्वारा ही कुपोषण के कलंक से मुक्ति नहीं मिल पाएगी बल्कि इस दिशा में सरकार के साथ-साथ समाज को भी दृढ़ इच्छाषक्ति प्रदर्षित करनी होगी। दरअसल सरकार की कोशिश के बाद भी कुपोषण मुक्ति अभियान में प्रभावी परिणाम न मिल पाने की बड़ी वजह आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जनजागरूकता का अभाव व कुपोषण मुक्ति योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में कमी है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि कुपोषण से निबटने के लिए न सिर्फ  कार्यक्रम बनाएं बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी सुनिष्चित किया जावे तभी छत्तीसगढ़ कुपोषण से मुक्त हो सकेगा।
(लेखक, शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में सहायक प्राध्यापक हैं।)

 


Date : 04-Dec-2019

प्रियंका दुबे

हैदराबाद की वेटनरी डॉक्टर लडक़ी के बर्बर बलात्कार और हत्या के बाद अपना पहला बयान जारी करते हुए तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में करवाने की घोषणा की है।
2012 के निर्भया हत्याकांड से लेकर आज तक, जब भी बलात्कार का कोई मामला राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ता है तो पहली प्रतिक्रिया के तौर पर राज्य सरकारें मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में स्थानांतरित कर देती हैं।
बीती जुलाई केंद्र सरकार ने बलात्कार और पोक्सो कानून (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस ऐक्ट) के तहत दर्ज होने वाले मामलों में सुनवाई की प्रक्रिया को तेज करने के लिए 1023 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की थी। इन नई प्रस्तावित अदालतों के ब्योरे में कानून मंत्रालय ने कहा कि ये फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (एफटीएससी) महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हुए यौन अपराधों के देश भर में 1.66 लाख लंबित मामलों के जल्दी निपटान के लिए गठित की जा रही हैं।
मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश के वह सभी जिले जहाँ पोक्सो के तहत दर्ज हुए लम्बित मामलों की संख्या 100 से ज़्यादा है, वहां यह नई अदालतें खास तौर पर सिर्फ पोक्सो से जुड़े केस ही सुनेंगी।
अदालत के निर्देश के अनुसार देश के कुल 389 जिलों में पोक्सो एफटीएससी के गठन की प्रक्रिया जारी है। बाकी बची 634 एफटीएससी बलात्कार के साथ साथ पोक्सो से जुड़े मामले भी देख सकती है। कुल 767 करोड़ रुपये की लागत से बन रही इन अदालतों से हर प्रति अदालत कम से कम 165 मामलों की सुनवाई पूरी करने की उम्मीद है। हालांकि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में फास्ट ट्रैक अदालतों का अस्तित्व दो दशक पुराना है।
फिर सवाल यह उठता है कि इन फास्ट ट्रैक कोर्ट्स को फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में तब्दील करने की जरूरत क्यों महसूस हुई। और यह कि पुरानी व्यवस्था में लगभग दो दशकों से सक्रिय यह फास्ट ट्रैक कोर्ट पीडि़ताओं को न्याय दिलाने में अब तक आखिर कितने कारगर रहे हैं ?
भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में सबसे पहले फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत 2000 में हुई। तब ग्यारवें वित्त आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों के अनुसार 502 करोड़ की लागत से देश में 1734 नई अदालतें बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ। वर्ष 2005 तक के लिए शुरू की गई इस योजना को बाद में बढ़ाकर 2011 तक जारी रखा गया।इसके बाद केंद्र सरकार ने तो फास्ट ट्रैक कोर्ट्स के लिए आगे बजट जारी नहीं किया लेकिन कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर बजट का प्रावधान कर इनको बनाए रखा।
26 जून 2019 को कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किए गए आँकड़ों के अनुसार मार्च 2019 तक देश में मात्र 591 फास्ट ट्रैक कोर्ट काम कर रही थीं जिनके ऊपर कुल 5.9 लाख लंबित केसों का बोझ था। इसी जवाब के अनुसार मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात जैसे बड़े राज्यों समेत देश के कुल 56 प्रतिशत राज्यों में फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं हैं। बजट की बात करें तो केंद्र सरकार बीते दो दशकों में कुल 870 करोड़ रुपए इन विशेष अदालतों पर खर्च कर चुकी है।
आँकड़ों से साफ है कि इतने खर्च और दशकों के निवेश के बाद भी फास्ट ट्रैक अदालतें न्यायिक व्यवस्था से लम्बित मामलों के बोझ कम करने में नाकाम रही हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता और वरिष्ठ वकील के सी कौशिक बाकी देशों की तुलना में भारत में जजों और जनता के असंतुलित अनुपात को दोषी मानते हुए कहते हैं, जब जजों और जनता का अनुपात इतना असंतुलित होगा तो फास्ट ट्रैक कोर्ट्स भी काम कैसे कर पाएँगे? आधारभूत संरचना के साथ साथ ज़्यादा जजों की नियुक्ति कर जज और जनता के अनुपात को व्यावहारिक बनाना होगा। तभी कोई भी अदालत काम कर पाएगी।
न्यायिक सुधारों पर काम करने वाली संस्था, दक्ष, के साथ जुड़े अनुरव कौल फास्ट ट्रैक अदालतों की अब तक की असफलता के लिए संसाधनों के आभाव को दोषी बताते हुए कहते हैं, फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा के अनुसार उनकी कार्यप्रणाली आम आदलतों से थोड़ी अलग होनी थी। उनके लिए समर्पित न्यायाधीशों का एक अलग पूल, नियमित सहायक स्टाफ और ऑडियो-वीडियो कांफे्रंस के जरिए बयान लेने में सक्षम एक तकनीकी अमला चाहिए था। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। इतने सालों में यही देखा गया कि किसी भी अदालत के मौजूदा जजों के पूल में से ही किसी एक को निकाल कर फास्ट ट्रैक अदालत में भेज दिया जाता था। इससे अदालत का कुल बोझ यहां से वहां तो सरकता लेकिन कम नहीं हुआ।
बिना एक समर्पित टेक्निकल सपोर्ट टीम से कोई भी अदालत त्वरित सुनवाई नहीं कर सकती। लेकिन नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी -दिल्ली के एक सर्वे के अनुसार भी अब तक भारत की ज़्यादातर फास्ट ट्रैक कोर्ट में न तो कोई निश्चित टेक्निकल सपोर्ट टीम रही और न ही नियमित स्टाफ। साथ ही अब तक भारत में विशेष या स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट बहुत कम रहे। ज़्यादातर फास्ट ट्रैक कोर्ट बलात्कार और पोक्सो के मामलों के साथ साथ पुराने लड़ाई झगड़ों के मामले भी सुलझाते रहे। इस सब बातों के सिवाय, फास्ट ट्रैक कोर्ट की प्रभावशीलता को मापने के लिए कभी कोई आधिकारिक सर्वे या शोध नहीं किया गया। इससे भी नुकसान ही हुआ।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सूरत सिंह फ़ास्ट ट्रैक अदालतों को पूरी न्यायिक व्यवस्था का ही एक अंग मान कर देखने का आग्रह करते हुए कहते हैं, जब देश की पूरे न्याय व्यवस्था लाखों की संख्या में लम्बित मामलों के बोझ तले दबी है तो फिर फास्ट ट्रैक अदालतों पर इसका असर कैसे न पड़ता? एक तो सिविक मूल्य नहीं हैं हमारे यहां मामलों में ढूँढने पर भी गवाह नहीं मिलते हैं। भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट का काम करना आसान नहीं है। हां अगर प्रतिदिन सुनवाई हो रही हो तो जरूर कुछ फर्क पड़ सकता है। लेकिन फिर भी बीती जुलाई 1023 नई एफटीएससी बनाए जाने की घोषणा को लेकर अनुरव आशान्वित हैं।
वो आगे कहते हैं, अब जब की पहली बार बलात्कारों और बच्चों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा के मामले सुनने के लिए 1023 नई अदालतें बनाई जा रही हैं, तो स्थिति सुधर सकती है। बशर्ते तकनीकी अमला, सहायक स्टाफ और समर्पित जजों का एक निश्चित पूल को इन एफटीएससी के लिए अलग से चिन्हित कर लिया जाए। (बीबीसी)

 


Date : 03-Dec-2019

हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार शरद जोशी का भोपाल गैस त्रासदी पर यह लेख धर्मयुग के 13 जनवरी 1985 के अंक में प्रकाशित हुआ था यूनियन कार्बाइड का कारखाना भोपाल शहर के एक छोर पर राक्षस की तरह खड़ा दूर तक फैली बस्ती की ओर देख रहा है। रविवार की उस ठंडी रात कुछ कोहरा था। सरकारी लट्टुओं से जो आभा फैल रही थी, वह अंधेरे को दूर नहीं कर पा रही थी। लोग ठंड में दुबके सो रहे थे। कारखाने के ठीक सामने सडक़ के उस पार कोई हजार गरीब परिवारों की बस्ती, जयप्रकाश नगर के लोग उस ठंड में कैसे सो पा रहे होंगे, समझना मुश्किल है। लकड़ी की कमजोर पटियों, जिन्हें भोपाल की बोली में ‘फर्रे’ कहा जाता है, से बने वे झोंपड़े। वहीं से एक रास्ता, जो बस स्टैंड हमीदिया रोड तक जाता है। रोड के एक छोर पर है रेलवे स्टेशन का इलाका और दूसरे पर ताजमहल कहलाने वाली इमारतें, ताजुल मसजिद और शाहजहांबाद। अगर उस रात कुछ हलचल होगी तो इस सडक़ पर। रेलवे स्टेशन पर लखनऊ से आने वाली किसी ट्रेन का इंतजार था। कुली यहां-वहां बिखरे बैठे थे। ऊंघते सुस्त यात्री। यहां-वहां आग ताप शरीर की कंपकंपी दूर करने का प्रयत्न करते समूह।
वह भोपाल के जीवन की सामान्य-सी रात थी। किसी को ख्याल नहीं था कि बहुत करीब बेरसिया रोड पर काली परेड के नाम से जाने जाते उस क्षेत्र पर बना कारखाना यूनियन कार्बाइड उनकी ओर राक्षसी आंखों से घूर रहा है और बड़ी जल्दी मौत अपनी काली परेड शहर में आरंभ कर देगी। वे नहीं जानते थे कि झीलों के इस शहर पर जहरीली गैस का एक झरना आज रात फूट पडऩे की तैयारी में है।
उस समय कारखाने के अन्दर क्या हो रहा था, ठीक से बयान नहीं किया जा सकता। भीषण नर-संहार के बाद से राक्षस ने अपने होंठ बंद कर लिए हैं। वह चुप है, कुछ नहीं बताता। हम नहीं जानते, हत्यारा कब बोलेगा; और जब बोलेगा, क्या सच बोलेगा? स्थिति का वर्णन ‘बताया जाता है’, ‘कहा जाता है’, आदि वाक्यांशों के सहारे ही किया जा सकता है। चश्मदीद गवाह और गैस का विस्फोट रोकने की कोशिश में बड़ी हद तक हिस्सेदार, शकील अहमद कुरेशी कस्तूरबा अस्पताल के एक वार्ड में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है। पुलिस उसे ऐसे घेरे है, जैसे वह कोई सतवन्त सिंह हो! उसका बयान लाखों डॉलर का है, वह बहुतों की छवि धूमिल कर सकता है; उसकी आवाज खरीदी और बेची जा सकती है। इसलिए उसे सुरक्षित और छुपाकर रखा जा सकता है।
अफसर रजाइयों में दुबके रहे
अत: बताया जाता है कि आधी रात को कारखाने के एक ऑपरेटर ने पहली बार यह महसूस किया कि गैस रिस रही है। सड़े बादाम की-सी गंध, जिसे ठीक से बयान नहीं किया जा सकता पर जिसे वे जानते हैं, वो वहां काम करते हैं। जो इस गुण में प्रशिक्षित हैं कि कैसे सायरन बजते ही हवा की उलटी दिशा में दौडऩा चाहिए। उनमें से एक प्लांट ऑपरेटर ने देखा कि रह-रहकर ‘मिक’ (मिथाइल आइसोसाइनेट) गैस- यदि वह गैस वही हो तो- पानी के साथ रिस रही है। शायद वहां ऐसा प्राय: होता हो! मिक या एम।आई।सी। गैस का यह रिसना तापमान बढ़ जाने से संभावित है और पानी की तेज धारा से उसका शमन किया जा सकता है। ऑपरेटर महोदय ने वही किया, पर टंकी का दबाव बतानेवाला पैमाना काम नहीं कर रहा था- इसलिए बात उनके वश की नहीं थी। उन्होंने शकील कुरैशी को बताया। शकील ने जाकर देखा कि गैस बड़ी तेजी से स्क्रबर से बाहर आ रही है- अर्थात वह हिस्सा, जहां अनुपयोगी गैस को कास्टिक सोडे के घोल से गुजारकर नाकाम किया जाता है। इसके बाद जो बच जाती है, उसे एक चिमनी से निकालकर जला दिया जाता है।
कीड़ों के लिए सेविन नामक जहर बनाने वाले इस कारखाने में उत्पादन एक-डेढ़ माह से रुका पड़ा था, अत: कोई साठ टन गैस टंकी में जमा थी, स्क्रबर अनुपयोगी पड़ा था और खर्च बचाने के चक्कर में चिमनी से मुंह पर जो लौ जलती रहती थी, वह भी बुझा दी गई थी। शकील कुरैशी समझ नहीं पा रहा था कि क्या उपाय करे। तभी खटके के साथ सीमेंट का एक टुकड़ा गिरा और लगा कि टंकी फटेगी। उसने सुपरिंटेंडेंट को रपट की। सुपरिंटेंडेंट ने कहा, मैनेजर से बात करो। मैनेजर ने कहा, चिमनी के पास लौ जला दो ताकि अतिरिक्त निकल रही गैस जल जाए।
 शकील ने साहब की आज्ञा सुन ली। पर वह जानता था कि वातावरण में फैल रही तीव्र ज्वलनशील गैस को अब आग छुआने का अर्थ होगा- एक जोरदार धमाके के साथ भीषण अग्निकांड। आज्ञा की उपेक्षा कर बार-बार गैस मास्क लगा रिसती गैस के पास जा उसका प्रवाह रोकने की चेष्टा शकील तथा अन्य कर्मचारियों द्वारा की जाती रही, पर गैस के उस प्राणलेवा कुहासे में वे रिसना बन्द नहीं कर पा रहे थे। इसी कोशिश में शकील कुरेशी बेहोश हो नीचे गिर पड़ा। शेष जितने थे, उल्टे पांव हवा से उल्टी दिशा में भागने लगे। हजारों की जानें जाने वाली थीं, पर अपनी भी तो बचानी थी। बड़े अफसर और बड़े इंजीनियर वगैरह घर पर सो रहे थे।
कारखाने में मौत की उस भोपाली रात क्या घट रहा था, कोई नहीं जानता। ऊपर की यह कहानी भी सरासर बनावटी और गढ़ी हुई हो सकती है। क्योंकि दूसरे दिन भोपाल में जो परस्पर कहा जा रहा था, वह दूसरा किस्सा है। उसके अनुसार गैस की रिसन के प्राथमिक लक्षण दिन में ग्यारह बजे के लगभग प्रकट होने लगे थे। शकील कुरैशी तथा अन्य कर्मचारी उसे बंद नहीं कर पा रहे थे। चार बजे के करीब वे लिखित में अपने अफसरों को आगाह कर चुके थे। पर पांच बजे बिना समस्या का निदान निकाले सब बड़े अधिकारी अपनी कारों और स्कूटरों से कारखाने से बाहर आ गए। किसी को न चिन्ता थी और न कल्पना कि यह रोजमर्रा की हल्की-फुल्की रिसन आज क्या रंग लाएगी। कहते हैं कि रात को फोन करके बुलाने पर भी बड़े इंजीनियर या मैनेजर कारखाने तशरीफ नहीं लाए। लापरवाही का नमूना पेश करते हुए वे अपनी रजाइयों में दुबके हुए थे।
गली-गली मंडराती गैस
सायरन बाद में बजा होगा, रिसन रोकने के जिम्मेदार पहले अहाते से बाहर हो गए और लगे दौडऩे बेरसिया रोड पर। और उस क्षण से वह जानलेवा गैस हवा के रुख के साथ भोपाल नगर की दिशा में बढऩे लगी। मौत की लंबी जीभ ने सबसे पहले झोंपडिय़ों में सोए लोगों के प्राण चाटने शुरू कर दिए। भोपाल मौत की बांहों में सिमटने लगा। गैस ऊपर आकाश में नहीं जा रही थी। वह दो मंजिला घरों तक की ऊंचाई वाले गुबार की तरह सडक़-सडक़, गली-गली चल रही थी, फैल रही थी। शुरू में बहुत तेज और बाद में धीमे-धीमे टहलती हुई, वह यहां-वहां से भोपाल को लील रही थी। 
सारा शहर धीरे-धीरे एक विराट गैस चैम्बर में बदल गया था। जयप्रकाश कॉलोनी, छोला, रेलवे कॉलोनी, टोला जमालपुर, काजी कैम्प, चांदवड़, विजयनगर, सिंधी कॉलोनी, कपड़ा मिल कॉलोनी पर गैस होश संभलने के पहले छा गई थी। दरवाजे-खिड़कियां बन्द करके सो रहे लोग नहीं जानते थे कि बाहर गली में मौत गैस बनकर मंडरा रही है, उनके उजालदानों और दरारों से गैस घर के अंदर पैठ रही है। वे समझ नहीं पाए कि यह जो सोते-सोते हल्की-सी घुटन और परेशानी वे महसूस कर रहे हैं, यह मृत्यु की पहली दस्तक है उनके शरीर के दरवाजे पर। आंखों में जलन-सी महसूस करनेवाले मां-बाप पहचान नहीं रहे थे कि मौत इस समय उनके आसपास लेटे बच्चों को थपथपी दे अंतिम नींद सुला रही है।
फिर सबको अहसास होने लगा कि वे इस समय किसी भयावह स्थिति से गुजर रहे हैं। जब शुद्ध हवा का झोंका पाने के लिए उन्होंने दरवाजा खोला, तब गैस और अंदर धंसी। देखा कि सडक़ों पर लोग अपने प्राण बचाने के लिए दौड़ रहे हैं। वे भी निकले और दौडऩे लगे। पर कइयों के लिए यह दौड़ लम्बी नहीं हो सकी। वे सांस लेने का प्रयत्न करते हुए यहां-वहां गिरने लगे। वे सब मृत्यु की लपेट में थे, दिशा अस्पष्ट थी, कोई अपना-पराया रह नहीं गया था। सब प्राण बचाने को भाग रहे थे। पुराने भोपाल से नए खुले भोपाल की तरफ, पुराने शहर से टीटी। नगर की तरफ, घुटन से हवा की तरफ। भागते, लडख़ड़ाते, गिरते, मरते, अंधेरे में रास्ता पहचानते वे मृत्यु से जीवन की ओर दौड़ रहे थे। यह अंतिम प्रयत्न था, अंतिम दौड़ थी। जहरीली गैस के कारण फेफड़ों में दम नहीं रह गया था। धीरे-धीरे, देखे-अनदेखे शहर लाशों और बेहोश पड़े लोगों से पटने लगा।
अब किसी से पूछो कि गैस की गन्ध कैसी होती है, तो वह अपने अनुभव को शब्द नहीं दे पाता। कहेगा- ऐसा लगता था कि जैसे गले में मिर्ची की धांस समा गई हो! (एम।आई।सी। से सिर भारी होता है, जबड़े कस जाते हैं। फॉसजीन से छाती में जलन हो, मृत्यु हो जाती है।) गला रुंध गया। कंठ में एक गोला-सा बनकर श्वास-प्रक्रिया को रुद्ध करने लगा। आंखों में जलन, आंसू, उल्टियां, मुंह में झाग। हर शख्स दमा के पुराने मरीज की तरह सांस लेता हुआ। पूरे शहर को ताजी हवा की तलाश थी! भोपाल में जिसकी कभी कमी नहीं रही, उसकी ऐसी कोताही कभी न हुई। पुराने भोपाल का हर घर मौत की काल-कोठरी बन गया था। गैस चेम्बर, आंखों से सूझता न था, सांस घुट रही थी, जान बाकी थी। पर आसपास पड़ी लाशें देख कर यह विश्वास टूट गया था कि हम जीवित रह पाएंगे। उस दिन शुद्ध हवा बैरन बन कहीं गायब थी। वायु मंडल में दबाव ऐसा था कि गैस को उडऩा नहीं था। वहीं रहकर सबके प्राण लेना था।
कीड़े मारने की दवाई में जो गैस उपयोग में आती थी, वह उन्हें कीड़ों की मौत मार रही थी। कुछ जो गहरी नींद सोए थे, इतनी गैस फेफड़ों में ले चुके थे कि वे सोते ही रहे। फिर नहीं उठे। पूरे परिवार मौत के मुंह में समा गए थे। लाशें बिछ रही थीं। उजाला फूटने तक सब उस हाहाकारी दृश्य से परिचित हो चुके थे। अवाक थे। किंकर्तव्यविमूढ़ थे। उन्होंने अपने जीवन में इतनी मौतें एक साथ नहीं देखी थीं। मृत्यु का साधारण-सा फार्मूला था कि जैसे ही गैस शरीर में जा शरीर के पानी के संपर्क में आती थी, एक दुष्ट रासायनिक प्रक्रिया इनका प्राणान्त कर देती थी। बस्तियां चसनाला हो रही थीं। प्रत्येक के मरने की कहानी शायद दूसरे से कुछ भिन्न है। कोई इसलिए मरा चूंकि उसने भागते हुए तेज श्वास-क्रिया द्वारा जहरीली गैस अधिक मात्रा में ले ली थी; और कोई इसलिए बचा क्योंकि वह भागा था। कुछ घर में मुंह ढककर सोने से बच गए थे और कुछ मुंह ढके सोए ही मर गए। मरनेवालों में बच्चों की गिनती सबसे ज्यादा थी। कहते हैं, गैस नसों में प्रवेश कर उन्हें फाड़ देती है। कारण जो भी हो, सुबह होते-होते भोपाल के पास अनगिनत लाशें थीं, आदमी, औरत, बच्चे, गाय, भैंसें, कुत्ते, बिल्ली।
देर रात स्टेशन पर सवारी का इंतजार करनेवाले तांगे का घोड़ा भी मरा और उस पर बैठा तांगाचालक भी। टिकट बाबू टिकट बेचते-बेचते चल बसा। देर रात जब रेल भोपाल आई, तब यात्रियों ने गैस को अनुभव किया और प्राण बचाने को आतुर भीड़ के संकट को समझा। सारा स्टेशन काल के गाल में था। आती हुई रेलों को भोपाल आने से रोकने की सूचना आसपास के स्टेशनों को देते हुए स्टेशन मास्टर हरीश धुर्वे चल बसे। सब कुछ बड़ी तेजी से एकाएक घटा। गैस का दायरा बढ़ रहा था। अब गैस पुराना भोपाल पार कर प्रोफेसर कॉलोनी से होती बाणगंगा क्षेत्र में उतर सरकारी कर्मचारियों की बस्ती तात्या टोपे नगर में प्रवेश कर रही थी। उसका कुछ प्रतिशत भोपाल के तालाबों में घुल रहा था। बाणगंगा की हवा में वह कुछ बिखरी, बंटी, कम हुई। उसका दूसरा रेला शायद एम।एल।ए। रेस्ट हाउस के पीछे से अरेरा कॉलोनी की तरफ बढ़ा। समूची त्रासदी में प्रकृति का इतना ही योग था कि हवा ने कारखाने से शहर की तरफ रुख लिया। इसके अतिरिक्त जो कुछ था, मनुष्य का किया-कराया था। हवा के रुख को बनाने में, हो सकता है, भोपाल की पहाडिय़ों का हाथ रहा हो। मध्यप्रदेश सरकार और यूनियन कार्बाइड को दोषी न ठहराने में लगे व्यक्ति चाहें तो इस तथ्य पर जोर दे सकते हैं। वे मृतकों की नासमझी को तो दोषी ठहरा ही रहे हैं।
जनता का आत्मनिर्णय
सुबह। अस्पतालों के बाहर, अंदर, गलियारों, बरामदों, मैदान और सडक़ पर बीमार और मृत पड़े थे। इतनी मृत्यु आंसुओं को सुखा देती है। चारों ओर एक भौंचक खामोशी नजर आ रही थी। किसी के मां-बाप गए, किसी के बच्चे। जो बिछुड़ गए थे, वे परस्पर तलाश में लग गए। लोग लाशों के समुदाय में कफन उठा-उठाकर अपनेवालों को पहचान रहे थे। खीज रहे थे, झींक रहे थे, आक्रोश में थे। उस जिन्दादिल शहर ने कभी सोचा न था कि उसके इतिहास में एक दिन ऐसा भी होगा। ऐसे में व्यवस्था गायब थी। वे छुटभैये नेता गायब थे जो कल रात तक वोटों की खींचतान में सरगना बने हुए थे। तभी एकाएक मृत्यु के उस कुहासे में मनुष्य की चेतना जागी। उसका मनुष्यत्व जागा। मां-बाप के रोके भी भोपाल के लडक़े-लड़कियां अपने घरों, अपने कमरों, अपने हॉस्टलों से निकल पड़े। जिससे जो बना, वह वही करने लगा। 
एकाएक भोपाल ने उस भारतीय आत्मा के दर्शन किए, जो गहराते संकट में आंसू पोंछकर चुनौती से जूझ जाना जानती है। वे अपनी आत्मा द्वारा अनुशासित हो एक-दूसरे से पूछते, एक-दूसरे की बात मानते, कामों में लग गए। बीमार बच्चों को रात से दूध नहीं मिला था। जिससे जितना बन पड़ा, दूध की थैलियां, ब्रेड आदि ले अस्पतालों में पहुंचने लगा। जिससे जो मांगा, वह लेने दौड़ पड़ा। निजी वाहन समाज सेवा में आ गए। इंतजार करती लाशों को अपरिचित ही सही, पर कन्धे मिलने लगे। बीमारों के आसपास पूछनेवाले जुटने लगे। युवा डॉक्टरों से लेकर मेडिकल कॉलेज के फर्स्ट ईयर की छात्राओं तक सभी डॉक्टर बन गए थे। इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र वालंटियर हो गए। घर-घर में मरीजों के लिए अतिरिक्त भोजन बनने लगा। लोगों ने जेब से नोट निकाल, आइ-ड्रॉप्स से लेकर गुलाब-जल की बोतलों तक जो भी खरीद सके, खरीदा और अस्पतालों में जाकर दिया। वह भोपाल की जनता का आत्मनिर्णय था। उसमें नेतृत्व नहीं था, व्यवस्था नहीं थी और आज लोग कहते हैं, यही उसका शुभ पक्ष था। क्योंकि जब से व्यवस्था और सरकार कार्यरत हुई, अनेक घोटाले, विसंगतियां और पाखंड आरंभ हो गए।
इधर मरीजों के इर्द-गिर्द तीमारदारों की संख्या बढ़ रही थी, पर मृत्यु की संख्या कम नहीं हो रही थी। सरकारी आंकड़े जब पांच सौ के आसपास थे, तब वास्तविकता यह थी कि हजार से ऊपर मर चुके थे। सरकारी मुंह जब दो हजार क्रॉस नहीं कर पा रहे थे, तब भोपाल पांच हजार से ज्यादा बता रहा था। मृत्यु का क्रम जारी था। आज सरकार पांच हजार कहती है, विरोधी छह हजार और लोग दस हजार। सरकार की गिनती करने का तरीका होता है। पर जाने कितने अनजाने परदेशी, भिखारी, कोढ़ी, गरीब, अपंजीकृृत कुली रेलवे के- उनके मरने पर किसने गिनती की? प्रश्न यह भी है कि गिनती बताने के परस्पर दावों से होता क्या है? हम मुद्दे से हटते हैं। त्रासदी की भयावहता का वर्णन करने से जो करुणा निस्सारित होती है, वह प्राय: अपराधियों को सिर छुपाने में मदद करती है। हत्यारे आपके आंसुओं का लाभ लेने लगते हैं। आपके साथ वे भी रोने लगते हैं। उस दिन मध्यप्रदेश शासन मगर के आंसू रोया।
पर भोपाल के यूनियन कार्बाइड नामक बहुराष्ट्रीय अपराधी कारखाने ने अपेक्षाकृत बेशर्मी से काम लिया। जब पुलिस कंट्रोल-रूम में जहरीली गैस प्रवेश कर रही थी और कर्मचारी खांसने-कराहने लगे थे, तब पूछे जाने पर यूनियन कार्बाइड वालों ने फोन पर जवाब दिया कि नहीं, गैस का कोई रिसन यहां से नहीं हुआ। जब अल्ल सुबह कुछ पत्रकार कार के शीशे चढ़ा कारखाने में पहुंचे, तो अधिकारी हंसकर बोले- गैस से कोई मर कैसे सकता है? देखिए, हम तो गैस के सबसे पास होकर भी जिन्दा हैं! ही ‘ही’! यह मगरूर और सीनाजोर तरीका उनका चरित्र और पुराना स्वभाव रहा है। सुबह हो रही थी। अपराधी हत्यारा जानता था कि उसकी मदद और रक्षा के लिए दूसरा अपराधी आ जाएगा। वह थी व्यवस्था, सरकार बहादुर या सत्ता, जो इतने सालों से इस जहर को अपने कागजी और शाब्दिक आंचल से ढके हुए हैं।
‘जनसत्ता’ दिल्ली के 16 जून, 1984 के अंक में राजकुमार केसवानी के लेख ‘भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने पर’ में यह साफ लिखा था कि किस तरह यह संस्थान देश को धोखा देते हुए भोपाल के गरीबों की जान से खेल रहा है। यह तो हो ही नहीं सकता कि खरीदे हुए बुद्धिजीवियों द्वारा ‘पारदर्शी शासन’ के नाम से अभिनंदनित सरकार के संवेदनशील बनने वाले नेता और मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने वह लेख पढ़ा न हो उस पत्र को भी न पढ़ा हो जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हुए राजकुमार केसवानी ने उन्हें भेजा था। विधान सभा में उठाए सवाल के आड़े-टेढ़े पेंचदार जवाब को लाजवाब तरीके से पेशकर कारखाने को बचाने की बात उन्हें याद होगी। उन्हें पता होगा कि उनकी ही सरकार के निष्ठावान आईएएस अधिकारी एम।एन। बुच ने जब यूनियन कार्बाइड को शहर से हटाने का नोटिस दिया था, बजाय कारखाना हटाने के एमएन बुच को हटाया गया था। इसी संवेदनशील सरकार के श्रममंत्री ने कुछ दिन हुए, कहा था कि आखिर यूनियन कार्बाइड 25 करोड़ की सम्पत्ति है; कोई पत्थर का टुकड़ा नहीं, जिसे मैं इधर-से-उधर रख दूं। उस रात वह पच्चीस करोड़ का अमेरिकी पत्थर भोपाल के सिर पर पड़ा था। लोगों ने संवेदनशीलता के पाखंड को अन्तिम बार पूरी तरह पहचान लिया था कि यह पारदर्शी परत वास्तव में कितनी ठोस रूप से जालिम और बेशर्म है।

अपने अपराध को ढकने के लिए सरकार ने रुख लिया कि वह जनता के हित में मुआवजे की लड़ाई लड़ेगी। कारखाने से शत्रुता प्रदर्शित करने का नाटक रचेगी। वह पीड़ा को नारों में बदल परिस्थितियों को भुनाएगी। सत्ता के नेताओं की नजर लोकसभा चुनाव के वोट पर थी। सारी सरकारी मशीन इस काम में जुट गई कि जनाक्रोश, बजाय उनके, कारखाने के खिलाफ पूरी तरह मुड़ जाए, मुड़ा ही रहे और यह काम इस सिफ्त से हो कि सरकार के साथ कारखाने का भी कुछ न बिगड़े। जहां तक भोपाल के सामान्य जन का सवाल था, उसने लाशों के ढेर के साथ यह भी देख लिया था कि सरकार यहां कुछ पहले ही मर गई है। (सत्याग्रह)


Date : 03-Dec-2019

तामेश्वर सिन्हा

इस साल के अगस्त में गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफैम और न्यूज़लांड्री मीडिया संस्थान ने हू टेल्स आवर स्टोरीज मैटर्स नामक एक रिपोर्ट जारी किया। इसमें कई (हिंदी और अंग्रेजी) अख़बार, न्यूज चैनल, पत्रिका, ऑनलाइन न्यूज पोर्टल में दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग आदि की हिस्सेदारी का विस्तृत विवरण है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन मीडिया संस्थानों में कुल 121 निर्णायक पदों में से 106 उच्च जाति के थे जबकि इनमें दलित और आदिवासी समुदाय का एक भी सदस्य नहीं था। हालांकि यह कोई नई खबर नहीं है। इसी तरह 2006 में मीडिया स्टडीज़ ग्रुप, दिल्ली के अनिल चमडिय़ा और सी।एस।डी।एस। के योगेंद्र यादव ने 37 मीडिया संस्थानों का अध्ययन किया और पाया कि फैसला लेने वाले 315 मुख्य पदों में केवल एक फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे; जबकि इनमें कोई भी दलित व आदिवासी नहीं था। इस तरह 2006 की पहली रिपोर्ट के 13 वर्षों बाद भी मीडिया संस्थानों ने कोई भी कदम नहीं उठाये और उनमें सामाजिक विविधता न के बराबर ही रही, जबकि इनमें पूरी तरह सवर्णों का कब्ज़ा रहा।
जहां देश के मीडिया में आदिवासी पत्रकारों की स्थिति और उपस्थिति न के बराबर है, छत्तीसगढ़ जैसा प्रदेश, जिसका करीब 60 फीसदी क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य है, वहां भी बहुसंख्यक होने के बाद भी पत्रकारिता में आदिवासी पत्रकारों की संख्या दो प्रतिशत भी नहीं है। प्रदेश के बड़े मीडिया संस्थानों की पत्रकारिता आदिवासी विहीन है। अभी कुछ वर्षों से ही आदिवासी युवक/युवतियां पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में आगे आ रहे हैं, लेकिन वे भी सरकारी साजि़श और हमलों के शिकार हो रहे हैं।
ज्ञात जानकारी के अनुसार, आदिवासी बाहुल्य बस्तर संभाग में केवल 6 आदिवासी पत्रकार हैं, और वो भी लगातार दबाव और चुनौती के माहौल में कार्य करते हैं। बाकि क्षेत्रों की स्थिति भी लगभग इसी समान है। साल 2015 में आदिवासी पत्रकार सोमारू नाग को फर्ज़ी नक्सल मामले में झूठे आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया था; तो वहीं हाल ही में आदिवासी पत्रकार लिंगाराम कोडोपी, जिन्होंने कुछ वर्षों पहले जेल में पुलिस द्वारा गंभीर प्रताडऩा झेली थी, ने सुरक्षा बलों द्वारा जान से मारने की धमकी देने का आरोप भी लगाया है। कोड़ोपी लगातार नक्सल उन्मूलन के नाम पर फर्जी मुठभेड़ों की रिपोर्टिंग करते आये हैं। बता दें कि पुलिस ने पत्रकार सोमारू नाग पर माओवादियों के साथ हिंसक गतिविधियों में भाग लेने का आरोप लगाया था और उन्हें दरभा इलाके से गिरफ़्तार किया था। उनके पक्ष में कोई भी सबूत अदालत में पेश कर पाने में पुलिस असफल रही थी जिसके बाद उन्हें जुलाई 2016 में बाइज्जत बरी कर दिया गया था। लेकिन इस दर्दनाक अनुभव ने सोमारू को इतना प्रभावित किया कि वो वापस पत्रकारिता में आज तक वापस कदम नहीं रख सका।
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के द्वारा अधिमान्यता प्राप्त पत्रकारों  की सूची में सालों से एक भी आदिवासी पत्रकार दर्ज नहीं है। इक्का-दुक्का जो आदिवासी पत्रकार लिख रहे हैं उनको भी अधिमान्यता में स्थान नहीं दिया गया है। यही नहीं आंकड़ों की बात करें तो बस्तर संभाग के 7 जिलो के जनसंपर्क कार्यालय में एक भी आदिवासी पत्रकार की किसी मीडिया संस्थान में नियुक्ति दर्ज नहीं है।
आदिवासी क्षेत्रों में लगातार शिक्षा के स्तर में कोई सुधार नहीं आए हैं, साथ ही शिक्षा को सिर्फ सरकारी नौकरियों तक ही सीमित कर दिया गया है। इसी कारण कॉलेजों में पत्रकारिता जैसे विषयों पर शिक्षा का रुझान कम है। आदिवासियों में जो पहले से ही व्यावसायिक अध्ययन कर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक बन चुके हैं, ऐसे पालक (अभिभावक) अपने बच्चों को भी व्यावसायिक अध्ययन की ओर भेजते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में पत्रकारों पर बढ़ते हमले भी एक अहम् कारण है कि युवाओं में पत्रकारिता को लेकर डर पैदा किया जाता रहा है। आदिवासी पत्रकारों पर उत्पीडऩ की घटनाएं भी स्थिति को और गंभीर बना देती है। बस्तर से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्र  राकेश दर्रों  कहते हैं कि पत्रकारिता पर कथित सवर्ण जातियों का कब्ज़ा आप देख ही सकते हैं। मुख्यधारा का मीडिया पूरी तरह से उनके ही कब्जे में है। आदिवासी तो दूर दलित बहुजनों के हाथ में भी कुछ नहीं है। दर्रो, विवि के निजी अनुभवों से बताते हैं कि, पत्रकारिता विभाग में आदिवासी छात्रों का दाखिला होता भी है तो ज्यादातर या ड्रॉप आउट हो जाते हैं, या रोजग़ार की कमी से कोई अन्य व्यवसाय की ओर चले जाते हैं।
ऐतिहासिक रूप से ये देखा जाए तो स्वतंत्रता से पहले से भी मीडिया पर पूंजीवादी वर्ग-जो कि इस देश में ज़्यादातर सवर्ण जातियों से हैं- का वर्चस्व शुरू से रहा है। बस्तर के आदिवासी पत्रकार मंगल कुंजाम, जिन्होंने 2018 ऑस्कर अवार्ड के लिए भारत की तरफ से सीधे ही आधिकारिक रूप से प्रवेश कर चुकी न्यूटन फिल्म के लिए किरदार और स्टोरी कॉन्सेप्ट पर कार्य किया है, कहते हैं कि आदिवासी पत्रकारों को मीडिया में मंच नहीं दिया जाता है।  आज की मीडिया उद्योपतियों की मीडिया है, अब एक आदिवासी औद्योगिक मीडिया तो खड़ा नहीं कर सकता? और जो एक-दो लिख रहे है वो सरकार और पुलिस के दमन का शिकार हो रहे हैं। लिंगा कोडोपी आदिवासी पत्रकार हैं लगातार लिखते हैं लेकिन उन पर हुए सुरक्षाबल के हमले को लेकर प्रदेश के तमाम संघ संगठन चुप्पी साधे बैठे हैं? कुंजाम मानते हैं कि मीडिया में ब्राह्मणवाद हावी है और आदिवासी पत्रकार लिखेंगे तो भी उन्हें जगह नहीं मिलेगी।
दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पत्रकार बप्पी राय के अनुसार बस्तर संभाग में आदिवासी पत्रकार केवल  एक–दो ही हैं।  वे कहते हैं कि अगर आदिवासी पत्रकार होते तो उनकी बोली–भाषा अच्छे से समझ पाते, और समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुंचा पाते। ये दुर्भाग्य है कि अंचल में मीडिया के क्षेत्र में आदिवासी पत्रकार ढूंढते रह जाओगे। बस्तर की मौजूदा पत्रकारिता में जो पत्रकार कार्य कर रहे हैं वह भी चुनौतीपूर्ण पत्रकारिता कर रहे हैं। 
आदिवासी समुदाय के पत्रकार नहीं होने के कारण आदिवासियों की मूल संस्कृति, संस्कार, समस्याएं देश और विश्व के पटल पर नहीं आ पातीं। कुछ वर्षों में बस्तर में यह भी देखने मे आया कि कुछ पत्रकार प्रशासन के द्वारा फाइनांस होकर हकीकत से परे खबर, रिपोर्टिंग किए जा रहे हैं-सरकार के मुखपत्र बन चुके हैं- जिसके कारण वास्तविक समस्याओं का निराकरण नहीं हो पाता है। वहीं दूसरी ओर बस्तर में बिना डिग्रीधारी पत्रकारों की संख्या सर्वाधिक है, उसमें भी कुछ आदिवासी सरपंच लोगों से उगाही की खबरें भी आती रहती हैं।
बस्तर के एक आदिवासी छात्र अनमोल मंडावी कहते हैं कि, इन दिनों पत्रकारिता जनजातीय मुद्दों पर केंद्रित रहनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी 32 फीसदी होने के बावजूद इस समाज के मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं। आदिवासी संबंधित पांचवी अनुसूची, छठवीं अनुसूची, पेसा एक्ट ऐसे कानून हैं जिन पर चर्चा होना आवश्यक है। छत्तीसगढ़ में मुख्यधारा के चार बड़े अखबारों के एक भी संपादक दलित, आदिवासी, बहुजन नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस स्थिति में अगर एक जिले या ब्लाक का हाशिये के समुदाय का संवाददाता अपनी कहानी भेजता है तो उसे प्रकाशन में शायद ही स्थान दिया जाएगा; यही हाल टीवी मीडिया का भी है। जो स्थानीय पत्रकार हैं भी उन्हें कई सवर्ण पत्रकार केवल सोर्स की तरह इस्तेमाल करते हैं।
अभी हाल ही में दैनिक पत्रिका द्वारा बस्तर की नैतिक शिक्षा केंद्र गोटुल को सेक्स केंद्र बता कर प्रकाशित किया गया था हालांकि विरोध के बाद पत्रिका ने वह आर्टिकल अपने वेब से हटा लिया था। ये पहली दफा नहीं है। नाम न लिखने की शर्त में एक बहुजन नौकरी पेशा लडक़ी कहती है, दरअसल अभी तक के नजरिए में मैने [सवर्ण] मीडिया को सिर्फ मूलनिवासियों के कार्टून बना के परोसते देखा हे कोई फोटो ले के बेचता है कोई आर्टिकल से बेचता है।
(लेखक बस्तर में स्थित एक सक्रिय युवा पत्रकार हैं और पत्रकारिता के माध्यम से समाजसेवा का उद्देश्य लेकर चल रहे हैं।)

 


Date : 01-Dec-2019

शुक्रवार को सामने आए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था में जुलाई से सितंबर के बीच देश का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी महज 4.5 फीसदी ही रह गई। यह आंकड़ा बीते 6 सालों में सबसे निचले स्तर पर है। पिछली तिमाही की भारत की जीडीपी 5 फ़ीसदी रही थी। जीडीपी के नए आंकड़े सामने आते ही विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया।
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, भारत की जीडीपी छह साल में सबसे निचले स्तर पर आ गई है लेकिन बीजेपी जश्न क्यों मना रही है? क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी जीडीपी (गोडसे डिवीसिव पॉलिटिक्स) से विकास दर दहाई के आंकड़े में पहुंच जाएगी।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इन आंकड़ों पर चिंता जताई है और कहा है कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था में जो बदलाव कर रही है वह बिल्कुल भी मददगार साबित नहीं हो रहे।
जीडीपी के ये आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कितने ख़तरनाक हैं यही जानने के लिए बीबीसी के बिजनेस संवाददाता अरुणोदय मुखर्जी ने बात की अर्थशास्त्री विवेक कौल से। 
जीडीपी के आंकड़े दिखाते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। अगर हम जीडीपी के अलग-अलग आंकड़ों को देखें तो विकास दर 4.5 प्रतिशत इसलिए रही है क्योंकि सरकारी खर्च 15.6 प्रतिशत बढ़ा है।
ऐसे में अगर हम सरकारी खर्च को अलग रखें और तब पूरी अर्थव्यवस्था को देखें तो हम पाएंगे कि स्थिति और भी ज़्यादा बुरी है। इस खर्च से अलग जो भारतीय अर्थव्यवस्था है उसकी विकास दर गिरकर लगभग तीन प्रतिशत हो गई है।
तो अभी भी जो थोड़ी-बहुत विकास दर दिख रही है वह इसलिए है क्योंकि सरकार पहले से बहुत ज़्यादा सरकारी खर्च कर रही है। इस बात को ऐसे भी समझ सकते हैं कि निजी क्षेत्रों की विकास दर लगभग नहीं के बराबर हो गई है।
सरकार के कदमों का क्या हुआ?
सरकार ने अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने के लिए कुछ क़दम उठाए थे जैसे कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की गई थी। इसके साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक ने कई बार ब्याज दरों में कटौती की है। लेकिन रेट कट करने से कुछ ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।
दरअसल, आरबीआई तो ब्याज दरों में कटौती कर सकता है लेकिन जब तक बैंक अपनी ब्याज़ दरें नहीं घटाएंगे तब कुछ असर नहीं दिखेगा। बैंक भी ब्याज दरें इसलिए नहीं काट रहे हैं क्योंकि वो जिस दर पर पैसा उठा रहे हैं, वह बहुत ज़्यादा है और यह तब तक कम नहीं होगा जब तक सरकारी खर्च कम नहीं होगा क्योंकि सरकार भी बाजार से ही पैसा उठाती है। अगर सरकार मौजूदा हालात में ख़र्च करना कम कर देगी तो और भी ज़्यादा दिक्कतें पैदा हो जाएंगी।
आम लोगों पर असर?
इस तरह के आंकड़ों को देखने के बाद लोगों का अपनी अर्थव्यस्था पर भरोसा कम होने लगा है। ऐसे माहौल में लोग अपने ख़र्चों में कटौती करने लगते हैं। जब बहुत ज़्यादा लोग अपने ख़र्च में कटौती करने लगते हैं तो फिर यह भी अर्थव्यस्था के लिए मुश्किलें पैदा करने लगता है, क्योंकि जब एक व्यक्ति पैसे ख़र्च करता है तो दूसरा व्यक्ति पैसे कमाता है। अगर समाज का एक बड़ा हिस्सा पैसे ख़र्च करना कम कर देगा तो इससे लोगों की आय कम होने लगती है और फिर वो लोग भी अपने ख़र्चे कम कर देते हैं। इस तरह से यह एक चक्र बनता है जिसका बहुत नकारात्मक असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
कितने गंभीर हैं ये आंकड़ें?
जीडीपी के आंकड़ों को बहुत ज्यादा गंभीरता से देखे जाने की जरूरत है, क्योंकि निजी क्षेत्र की विकास दर गिरकर तीन प्रतिशत हो गई है।
अगर हम निवेश में विकास दर को देखें तो वह गिरकर एक प्रतिशत पर आ गई है, इसका मतलब है कि निवेश लगभग नहीं के बराबर हो रहा है।
जब तक अर्थव्यवस्था में निवेश नहीं बढ़ेगा तब तक नौकरियां कहां से पैदा होंगी, जब तक नौकरियां पैदा नहीं होंगी तो लोगों की आय में वृद्धि कैसे होगी और जब लोगों की आय में वृद्धि नहीं होगी तो लोग खर्च नहीं करेंगे। जब लोग खर्च नहीं करेंगे तो निजी खपत कैसे बढ़ेगी। यह सब कुछ एक दूसरे के साथ इसी तरह से जुड़ा हुआ है।
क्या कदम उठाए सरकार?
जिस स्थिति में भारत की अर्थव्यवस्था है वहां पर कुछ भी तुरंत कदम उठाने से नहीं हो सकता। अभी सरकार को जो भी कदम उठाने हैं उनका असर लंबे समय के बाद देखने को मिलेगा। जैसे, अगर सरकार श्रम सुधार या भूमि सुधार की दिशा में काम करती है तो इनका सकारात्मक असर लंबे समय में धीरे-धीरे देखने को मिलेगा। इसलिए अर्थव्यवस्था को सुधारने का कोई शॉर्टकट नहीं होता, सरकार के पास कोई जादू की छड़ी भी नहीं होती जिसे घुमाते ही अर्थव्यवस्था सुधर जाए। (बीबीसी)

 

 


Date : 01-Dec-2019

चारु सिंह

हिंदी से फ़ारसी या अरबी के शब्दों को छांटकर बाहर निकाल देना असंभव है। एक हिंदी भाषी रोजाना अनजाने ही कितने फारसी, अरबी या तुर्की के शब्द बोलता है, जिनके बिना किसी वाक्य की संरचना तक असंभव है।

‘रूबरू’, ‘इश्तेहार’, ‘ज़ाहिर’, ‘राज़ीनामा’, ‘मुज़रिम’, ‘गुफ़्तगू’, ‘संगीन अपराध’ और ‘तफ़्तीश’- ये कुछ शब्द हैं, जिन्हें दिल्ली हाईकोर्ट ने 383 शब्दों की उस सूची में रखा है जिन्हें अब अदालती भाषा और प्राथमिकी (एफआईआर) से बाहर रखा जाना है।
अगस्त 2019 में हाईकोर्ट ने पुलिस आयुक्त से पूछा था कि अब तक उर्दू और फ़ारसी के शब्दों का इस्तेमाल प्राथमिकी दर्ज करने की भाषा में क्यों होता है, जबकि शिकायतकर्ता इसका इस्तेमाल नहीं करते।
कोर्ट का मानना है कि उर्दू के यह शब्द केवल वही व्यक्ति समझ सकते हैं जिनके पास उर्दू या फ़ारसी में डॉक्टरेट की डिग्री हो। अदालत ने हिदायत दी है कि पुलिस ऐसी साधारण भाषा का प्रयोग करे जिसे एक आम आदमी भी उसे पढक़र समझ सके। भाषा के किसी अध्येता के लिए यह सवाल दिलचस्प हो सकता है कि ‘गुफ़्तगू’ और ‘तफ़्तीश’ कब ऐसे बेगाने और अबूझ शब्द हो गए, जिन्हें समझने के लिए ‘डॉक्टरेट’ की डिग्री की जरूरत महसूस की जाने लगी।
दरअसल, अगस्त में एक वकील द्वारा दायर जनहित याचिका से शुरू हुआ यह मामला जो ‘उर्दू-फ़ारसी के शब्द’ बनाम ‘आसान भाषा के शब्द’ के रूप में अदालत के सामने आया, उसमें भाषा के अतीत में दिलचस्पी रखने वालों को एक ऐतिहासिक दोहराव की गंध महसूस होगी।
यही तो वे तर्क थे जिन्होंने 19वीं सदी के भारत में ‘हिन्दवी’, ‘भाखा’ या ‘हिन्दोस्तानी’ कहलाने वाली खड़ी बोली हिंदी के दो टुकड़े कर दिए थे। वह भी कचहरी का ही झगड़ा था जब फ़ारसी भाषा को कचहरी से हटाते हुए आम लोगों के बीच बोली और समझी जाने वाली भाषा के रूप में उर्दू को अपनाया गया था। वह उर्दू आज की उर्दू न थी।
अवध के गांव-देहात के शब्दों और देशीपन की रंगत लिए यह वह उर्दू थी जिसे हिंदी से अलग ठहराने के लिए केवल लिपिभेद ही एक तर्क हो सकता था। वह फ़ारसी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदवी ही थी। उसे बोलने और लिखने वाले हिंदू अधिक थे और मुसलमान कम। वह धर्म की भाषा न थी। धार्मिक पहचान की भाषा तो बिल्कुल भी नहीं। कचहरी की भाषा के इस झगड़े ने ही हिंदी और उर्दू को भी बांट दिया और आगे चलकर हिंदुस्तान को भी।इतिहासकार बताते हैं कि यह मुंशीगिरी जैसी सरकारी नौकरियों का झगड़ा था। हिंदुओं में फ़ारसी कलम की जानकार कुछ एक जातियां ही थीं। फ़ारसी लिपि के जानकार मुसलमान अधिक थे।
इस तरह अगर अदालत की लिपि फ़ारसी बनी रहती तो खड़ी बोली के वहां लागू हो जाने पर भी यह नौकरियां हिंदुओं को नहीं मिल पाती। इसलिए हिंदू मध्यवर्ग ने ‘गोरक्षा आंदोलन’ के साथ ‘नागरी आंदोलन’ को जोड़ते हुए एक लंबा आंदोलन चलाया।
यह आंदोलन कचहरियों में नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी को शामिल करने के लिए चलाया गया था। हिंदी और उर्दू जो दरअसल एक ही भाषा के दो रूप थे जिन्हें नागरी और फ़ारसी दोनों ही लिपियों में लिखा जाता था, इस वक्त धार्मिक गुटबंदी के कारण उन्हें एक दूसरे से अलग साबित करने की कोशिश शुरू हुई।
जिन्होंने इसे उर्दू कहा उन्होंने एहतियातन इसे अरबी-फ़ारसी की ओर मोड़ा और इसमें भारी-भरकम अरबी फ़ारसी के शब्द शामिल किए जाने लगे और संस्कृत व्युत्पत्ति वाले तथा देशी शब्दों को छोड़ा जाने लगा। यही काम हिंदी आंदोलन ने किया। हिंदी जो पिछले लगभग हज़ार वर्षों से फ़ारसी और अरबी के शब्दों से घुली-मिली थी और उनके सहारे ही अपने आधुनिक रूप को पा सकी थी, उसे जबरन उन शब्दों से दूर किया जाने लगा।
ऐसे फ़ारसी शब्द, जो 19वीं सदी की हिंदी में आम बोलचाल के शब्द हुआ करते थे, आज के हिंदी पाठक को अनोखे और बाहरी लग सकते हैं क्योंकि उस वक्त उन्हें उसी तरह बाहर का रास्ता दिखाया गया जैसे यह मुक़दमा दिखा रहा है। यह सब एक  अच्छी-भली समृद्ध भाषा के हाथ-पैर तोडक़र उसे अपाहिज किए जाने जैसा था। इसका नतीजा यह हुआ कि एक लंबे समय तक हिंदी ज्ञान-विज्ञान के विमर्शों के लिए एक असमर्थ भाषा बनी रही। जिससे इसे उबारने के लिए भारत सरकार ने तरह-तरह के शब्दावली आयोगों का गठन किया।
अदालत का वर्तमान आदेश जिस हिंदी से उर्दू या फ़ारसी के शब्दों को अपदस्थ करना चाह रहा है, दरअसल, वह आम बोलचाल की हिंदी नहीं बल्कि प्रशासनिक कार्यों में प्रयुक्त होने वाली टकसाली हिंदी होगी।
हिंदी साहित्य का इतिहास दिखलाता है कि सैकड़ों वर्षों से सहज प्रचलित अरबी-फ़ारसी आदि के शब्दों को जब हिंदी से बाहर किया गया उस वक्त हिंदी के आंदोलनकारियों को कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
जिस हिंदी को अंग-भंग करके हिंदी आंदोलन ने अशक्त बना दिया था उसके विकास के नाम पर कभी अंग्रेजी से उल्था करके तो कभी संस्कृत के शब्दों को अस्वाभाविक रूप से खींच-तानकर नए शब्द गढ़े गए, जिससे हिंदी किसी तरह प्रशासनिक या अकादमिक विषयों की अभिव्यक्ति का एक दोयम दर्जे का माध्यम बनी रह सकी।
यह जरूरत हिंदी या उर्दू को ही क्यों पड़ी  इसका उत्तर ‘छंटनी’ के उस इतिहास में है जिसमें संस्कृत के भारी-भरकम शब्दों को तो हिंदी भाषा की स्वाभाविक शब्दावली मान लिया गया लेकिन ‘ज़ाहिर’ या ‘हासिल’ या ‘रूबरू’ जैसे शब्दों को बाहरी और कठिन ठहराया  गया। हिंदी से फ़ारसी या अरबी के शब्दों को छांटकर बाहर निकाल देना असंभव है। अपने हर वाक्य में एक हिंदी भाषी रोज़ाना अनजाने ही कितने फ़ारसी, अरबी या तुर्की के शब्द बोला करता है जिनके बिना किसी वाक्य की संरचना तक असंभव है। सूची बहुत लंबी है लेकिन इक्का-दुक्का उदाहरणों से इसे समझा सकता है। आदमी, औरत, उम्र, कि़स्मत, कीमत, किताब, दुकान- जैसे कितने ही शब्द अपनी उत्पत्ति में अरबी भाषा के हैं।
ऐसे ही चश्मा, चेहरा, जलेबी, जहर, मकान, शादी, सरकार, लेकिन, लाल, वापस – फ़ारसी के शब्द हैं। इसी तरह बहादुर, कुर्ता, कैंची, चाकू, चम्मच, बीबी, बारूद, लाश जैसे रोज़मर्रा के इस्तेमाल होने वाले शब्द तुर्की भाषा के हैं। 
यह सभी शब्द हिंदी का अभिन्न हिस्सा हैं। क्या इनके बिना बोलचाल की हिंदी भी संभव हो सकेगी? पहले ही एक कृत्रिम लेकिन सफल धारणा समाज में बैठायी जा चुकी है जिसके अनुसार हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की। तमिल, मराठी, बांग्ला, पंजाबी आदि विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों में से कहीं भी हिंदुओं और मुसलमानों की दो अलग भाषाएं नहीं बतायी जातीं।
पश्चिमोत्तर प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) में अगर नौकरियों का झगड़ा, धर्म और भाषा का झगड़ा न बना दिया गया होता तो आज हिंदी और उर्दू भी तमिल या बांग्ला की तरह एक समूची भाषा होती।
अब दोबारा, बचे हुए फ़ारसी और उर्दू के शब्दों को छांटकर सरकारी कामकाज से बाहर करने की शुरुआत साझा इतिहास की उस याददाश्त को मिटाने का काम करेगी जो हिंदी में अब तक बच रहे फ़ारसी शब्दों की मौजूदगी से बनी हुई है।
हिंदी सिनेमा के तमाम गीतों को उर्दू या फ़ारसी के डॉक्टरेट ही नहीं गुनगुनाते। तमाम अरबी, फ़ारसी शब्दों को खुद में आत्मसात किए हुए ये गीत आम लोगों के लिए हिंदी के गीत हैं।
ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों के श्रोता उन्हें हिंदी गानों के रूप में जानते हैं। उनमें शामिल अरबी, फ़ारसी के शब्दों से किसी को शिकायत नहीं दिखती।
फ़ारसी के शब्द अदालत को भले ही ‘ल‘छेदार’, ‘ग़ैरजरूरी’ और कठिन लगते हों, उनकी कठनाई का तर्क आम लोगों को ऐसे गीत गुनगुनाने से नहीं रोक पाता बल्कि यह गीत और हिंदी सिनेमा हिंदी से सचेत रूप से बाहर किए जा रहे अरबी-फ़ारसी के इन शब्दों को वापस आम लोगों के बीच पहुंचाते रहे हैं।
‘शुकरान अल्लाह वल्हम दुलिलाह’ या ‘गुलपोश कभी इतराए कहीं / महके तो नजऱ आ जाए कहीं / तावीज़ बना के पहनूं उसे / आयत की तरह मिल जाए कहीं, इन्हें गुनगुनाते वक्त किसी हिंदू युवा को मज़हब का खय़ाल नहीं सताता।
शब्दों की उत्पत्ति अरबी है या फ़ारसी, इस पर तो वह कभी नहीं जाता। उसके लिए यह उसकी अपनी भाषा है। वह भाषा जिसमें वह सोचता है, गुनगुनाता है और प्रेम करता है।
३८३ शब्दों की इस सूची में ऐसे शब्दों को भी रखा गया है जिनसे आम हिंदी  भाषी अच्छे से परिचित है। ‘रूबरू’ और ‘इश्तिहार’  क्या ऐसे शब्द हैं जिन्हें विधिवत मुक़दमा चलाकर सरकारी कामकाज से बाहर किए जाने की ज़रूरत है? फिर, प्रश्न यह भी है कि प्राथमिकी दर्ज करने के लिए अगर इन शब्दों को हटाकर दूसरे शब्द लाए जाएंगे तो क्या वे देशज बोलियों के होंगे? होंगे तो वे भी प्रशासनिक शब्द ही, जिन्हें प्रशासनिक शब्दावली आयोग द्वारा तैयार किया गया होगा।
ऐसे में ‘ज़ाहिर’ की जगह ‘प्रकट’ लिखा जाएगा और ‘मुज़रिम’ की जगह ‘अपराधी।’ इससे क़ानूनी प्रक्रिया क्या सच में आम लोगों के लिए आसान हो जाएगी, या फिर यह हिंदी के शुद्धिकरण का ही एक और प्रयास बनकर रह जाएगा? (द वायर)
(चारु दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी में शोध कर रही हैं।)

 


Date : 01-Dec-2019

बाला सतीश/नवीन कुमार
क्या मीडिया से एक-एक करके लोग ऐसे ही आते रहेंगे और हर बार मुझे यही सब दोहराना होगा? क्या मीडिया से 100 अलग-अलग लोगों को आना चाहिए और एक ही सवाल मुझसे बार-बार पूछना चाहिए? ये सवाल उस लडक़ी के हैं जिनकी बहन को कथित रेप के बाद जलाकर मार दिया गया।
मृतक डॉक्टर ने आखऱिी बार अपनी बहन से फोन पर बात की थी लेकिन अब वो बहन लोगों ख़ास तौर पर मीडिया से बात कर-करके थक चुकी हैं।
उनका कहना है  एक ही सवाल सौ बार...पहले से ही दुखी हूं और अब बार-बार वही सब पूछा जा रहा है।
अब बहन साथ नहीं
घटना वाले दिन रात करीब नौ बजे तक पीडि़त युवती टोल प्लाज़ा अपनी स्कूटी लेने पहुंची थी। वहीं से उन्होंने आखिरी बार अपनी बहन को फोन किया और बताया कि उनकी स्कूटी पंचर है।
पीडि़त युवती ने फोन पर अपनी बहन को बताया कि उन्हें अकेले सडक़ पर खड़ा होने में डर लग रहा है, अचानक से कुछ लोग दिख रहे हैं, कुछ लोग उन्हें स्कूटी ठीक करने की बात भी बोल रहे हैं। लडक़ी ने फोन पर ही अपनी बहन को बताया था कि एक ट्रक ड्राइवर उनके पास रुका और उसने स्कूटी ठीक करने की बात कही। जब लडक़ी ने ट्रक ड्राइवर से स्कूटी ठीक करवाने से इंकार कर दिया तो उसके बाद भी वह ट्रक ड्राइवर उनका पीछा करता रहा।
लडक़ी की बहन ने उन्हें सलाह दी कि वह टोल प्लाज के पास ही खड़ी हो जाएं, इस पर लडक़ी राजी नहीं हुई और उन्होंने बताया कि सभी लोग उन्हें घूर रहे हैं जिससे उन्हें डर लग रहा है। इसके बाद लडक़ी ने अपनी बहन को थोड़ी देर में फोन करने की बात कही, लेकिन इसके बाद उनका फोन स्विच ऑफ हो गया।
वो कहती हैं इससे ज़्यादा क्या दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है। जि़ंदगी तो वापस नहीं लौट सकती है। ये किसी के भी साथ नहीं होना चाहिए। मैं सोच भी नहीं सकती कि ये सब कुछ मेरी अपनी बहन के साथ हुआ। अब मैं सिर्फ यही कह सकती हूं कि हर किसी को चौकन्ना रहना चाहिए। हर वक्त। हर जगह।
उस रात के उस आखिरी फोन कॉल को याद करत हुए वो कहती हैं मेरी बहन ने मुझे कहा भी कि वो डरी हुई है। लेकिन मैं ही नहीं समझ पायी कि सब कुछ इतना गंभीर है। अब मैं ये समझ पा रही हूं कि इस तरह की बात को किसी भी सूरत में हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इस बात का कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता है कि अगले ही पल किसके साथ क्या हो जाए।
अफसोस जताते हुए वो कहती हैं मैं अपनी बहन को बचा सकती थी, अगर मैंने मौके की नजाकत को उतनी ही गंभीरता से लिया होता तो...किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए भले ही वो कोई जानने वाला ही क्यों ना हो। मैं समझ रही हूं मुझे ये सबकुछ नहीं कहना चाहिए। लेकिन मैं ये बात इसलिए कह पा रही हूं कि मैंने सुना एक औरत अपने किसी जानने वाले के यहा जन्मदिन की पार्टी में गई...फिर उसका रेप हो गया और उसे मार डाला गया।
अगर आप किसी अपने के साथ हैं तो भी चौकन्ने रहिए। देर रात अगर कहीं जा रहे हैं तो किसी को घर पर बताकर जाएं।
इस घटना के सामने आने के बाद से एक बात यह भी उठी कि अगर पीडि़त महिला डॉक्टर ने बहन के बजाय पुलिस को 100 नंबर पर फोन करके मदद मांगी होती तो शायद उसे मदद मिल जाती और यह हादसा ना होता। इस पर पीडि़त डॉक्टर की बहन कहती हैं कि ये ठीक है कि मेरी बहन को पुलिस को फोन करना चाहिए था लेकिन उस वक्त किस तरह की स्थितियां थी ये तो कोई नहीं जानता। वो कहती हैं मैं हर उस महिला से जो घर से बाहर निकलती है उसे कहना चाहूंगी कि सतर्क रहें। कहीं भी अकेले ना जाएं।
कानून को लेकर क्या कुछ कहना है
पीडि़ता की बहन कहती हैं कि क़ानून और सख्त होना चाहिए ताकि इस तरह के हादसे ना हों। वो कहती हैं इंसानियत नाम की चीज नहीं रह गई है। नैतिकता को स्कूले के पाठ्यक्रम में होना चाहिए। शिक्षा दी जा रही है लेकिन अनुशासन नहीं। बच्चों को सही और गलत के बीच का फर्क समझाया जाना चाहिए। वो सिर्फ पैसे कमाने के लिए पढ़ाई ना करें।
मीडिया के व्यवहार पर क्या कुछ कहना है
मैं मीडिया की आलोचना नहीं करना चाहती। एक बार जब मेरे और मेरी बहन के बीच हुए अंतिम संवाद की क्लिप सार्वजनिक हो गई तो भी उसके बाद ये पूछना कि मेरे और उसके मध्य क्या बात हुई...कहां तक सही है। सब कुछ सामने है, फिर भी पूछा जा रहा है। वो ऐसा सिर्फ भावनाओं को दोबारा से जगाने के लिए कर रहे हैं लेकिन एक परिवार जो ऐसे दर्द से गुजर रहा हो उसके साथ ऐसा करना क्या सही है?
मीडिया पर सवाल उठाते हुए वो कहती हैं कि अगर मीडिया को कुछ पता ही करना है तो ये पता करे कि इस घटना के पीछे वजह क्या थी। बजाय बैकग्राउंड को कुरेदने के।
हम पहले से ही परेशान हैं। हर बार उसे खोने का दर्द महसूस कर रहे हैं। ऐसे में ये सवाल उस दर्द को बढ़ा ही रहा है। मैं सिर्फ यही कहना चाहूंगी कि जागरूकता बढ़ाइए ताकि एक सुरक्षित समाज बन सके। (बीबीसी)

 


Date : 30-Nov-2019

अभय शर्मा
श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे अपनी पहली विदेश यात्रा के तहत भारत पहुंच चुके हैं। करीब हफ्ते भर पहले ही उन्होंने श्रीलंका की सत्ता की बागडोर संभाली है। अपनी तीन दिवसीय इस यात्रा के दौरान शुक्रवार को उन्होंने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। श्रीलंकाई राष्ट्रपति से कई मुद्दों पर विस्तृत बातचीत के बाद नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका में विकास परियोजनाओं के लिए 40 करोड़ डॉलर की ऋण सुविधा देने का ऐलान किया है। साथ ही आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने श्रीलंका को पांच करोड़ डॉलर की अतिरिक्त सहायता देने की घोषणा भी की है।
गोटबाया राजपक्षे जिस दिन राष्ट्रपति चुनाव जीते उसी दिन से भारत ने उन्हें साधने के प्रयास तेज कर दिए थे। चुनाव परिणामों की आधिकारिक घोषणा भी नहीं हुई थी कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोटबाया को बधाई दे दी। वे श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को फोन पर सबसे पहले बधाई देने वाले विदेशी नेता थे। यही नहीं, चुनाव नतीजे आने के कुछ घंटे बाद ही भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर कोलंबो पहुंच गए। उन्होंने गोटबाया राजपक्षे को भारत आने का निमंत्रण दिया। श्रीलंकाई राष्ट्रपति के अपने पहले आधिकारिक दौरे पर दिल्ली आने को भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है।
लेकिन, इस सब के बीच एक बड़ा सवाल भारत की इस सक्रियता को देखकर उठता है। ऐसी क्या वजह है जो भारत श्रीलंका के नए राष्ट्रपति से बेहतर संबंध बनाने के लिए इतना आतुर है?
विदेश मामलों के विशेषज्ञ भारत की सक्रियता के पीछे की सबसे बड़ी वजह श्रीलंका के कद्दावर राजपक्षे परिवार का चीन के करीब होना बताते हैं। गोटबाया राजपक्षे के बड़े भाई महिंदा राजपक्षे ने ही पहली बार चीनी निवेश को श्रीलंका में हरी झंडी दिखाई थी। चीन से भारी भरकम कर्ज के बदले उन्होंने श्रीलंका में उसे अपने मन मुताबिक प्रोजेक्ट चुनने और निवेश करने की खुली छूट दे दी थी। इसी कर्ज के दबाव में कुछ साल बाद श्रीलंकाई सरकार को अपना बेहद महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह चीनी सरकार को 99 साल की लीज पर देना पड़ा था। गोटबाया राजपक्षे ने बतौर रक्षा सचिव 2005-15 तक श्रीलंकाई रक्षा मंत्रालय की कमान संभाली थी। उन्होंने ही चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों को श्रीलंका के समुद्री तटों के पास लम्बे समय तक रुकने की इजाजत दी थी।
अगर भारत से राजपक्षे परिवार के संबंध देखें तो एक घटना से इन्हें समझा जा सकता है। श्रीलंका में 2015 के राष्ट्रपति चुनाव में जब महिंदा राजपक्षे की हार हुई थी तो उन्होंने अपनी हार का ठीकरा भारत की ख़ुफिय़ा एजेंसियों पर फोड़ा था। उनका कहना था कि चीन से उनकी करीबियों की वजह से भारत नहीं चाहता कि वे श्रीलंका के राष्ट्रपति बनें। गौर करने वाली बात यह भी है कि इसी चुनाव में महिंदा राजपक्षे पर चीन से पैसा लेकर चुनाव लडऩे का आरोप लगा था।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि फिलहाल श्रीलंका में राष्ट्रपति के साथ-साथ प्रधानमंत्री का पद भी राजपक्षे परिवार के पास ही आ गया है। गोटबाया राजपक्षे ने राष्ट्रपति बनने के चार दिन बाद ही महिंदा राजपक्षे को देश का कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना दिया। वे अगले साल यानी 2020 की शुरुआत में होने वाले चुनावों तक यह जिम्मेदारी संभालेंगे।
विदेश मामलों के जानकार ऐसी भी कुछ वजहें बताते हैं जिनके चलते श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के चीन के करीब रहने की संभावना काफी ज्यादा नजर आती है। ये लोग कहते हैं कि ईस्टर बम धमाकों के बाद से श्रीलंका की अर्थव्यवस्था काफी खराब हालत में है। आलम यह कि एक डॉलर की कीमत करीब 180 श्रीलंकाई रुपयों के बराबर पहुंच गई है।
हमलों के बाद से श्रीलंका में पर्यटन का भी बुरा हाल है। ऐसे में श्रीलंका को मदद के लिए एक ऐसे हाथ की जरूरत है जो अर्थव्यवस्था को सुधारने में उसकी मदद कर सके। जानकार कहते हैं कि इन परिस्थितियों में बीजिंग श्रीलंकाई सरकार के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त खुद मंदी की स्थिति में है। गोटबाया राजपक्षे के चीन से पुराने संबंधों को देखते हुए भी उनके लिए चीन से डील करना ज्यादा बेहतर होगा।
श्रीलंका, चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना (बीआरआई) के साथ भी जुड़ा है और वह पहले से ही श्रीलंका में बड़े निवेश की बात कह चुका है। उसने श्रीलंका में 11 अरब डॉलर के भारी-भरकम निवेश की योजना बनाई है। इनमें से आठ अरब डॉलर उसे कर्ज के रूप में मिलेंगे। चीन श्रीलंका में बुनियादी ढांचा विकास की तमाम परियोजनाओं पर भी काम कर रहा है। इनमें एक ऑयल रिफाइनरी निर्माण, कोलंबो इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर, कैंडी को कोलंबो से जोडऩे वाला सेंट्रल हाईवे और कोलंबो बंदरगाह के निकट अरबों डॉलर की लागत से एक पोर्ट सिटी विकसित करने जैसी तमाम योजनाएं शामिल हैं।
कुछ विशेषज्ञ श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के चीन के करीब जाने की एक और वजह भी बताते हैं। श्रीलंका में जब अलगाववादी संगठन द लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू हुआ था तो गोटबाया ही श्रीलंका के रक्षा मंत्री थे। लिट्टे पर सैन्य कार्रवाई के दौरान हजारों तमिल नागिरकों की हत्या करने को लेकर यूरोप और अमेरिका गोटबाया राजपक्षे पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाते आ रहे हैं। कहा जाता है कि गृहयुद्ध के अंतिम चरण में श्रीलंकाई सेना द्वारा 40,000 से अधिक लोगों को मौत के घाट उतारा गया था।
यूरोप और अमेरिका के दबाव में संयुक्त राष्ट्र लगातार श्रीलंकाई सरकार से इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग कर रहा है। श्रीलंका की पिछली सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इस जांच को लेकर प्रतिबद्धता भी जताई थी। लेकिन, चुनाव प्रचार के दौरान गोटबाया राजपक्षे ने कई बार कहा कि वे ऐसी कोई जांच नहीं करवाएंगे।
अब गोटबाया के राष्ट्रपति बनने के बाद जांच की मांग और तेज होगी, लेकिन वे इसके लिए राजी नहीं होंगे। इस स्थिति में अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र श्रीलंका को दी जा रही कई तरह मदद बंद करके उस पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। जानकारों की मानें तो ऐसी परस्थितियों में चीन ही गोटबाया की मदद कर सकता है। चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का सदस्य तो है ही, साथ ही उसके यूरोपीय देशों से भी अच्छे कूटनीतिक संबंध हैं।
श्रीलंका इस समय 10 अरब डॉलर से ज्यादा के चीनी कर्ज में दबा हुआ है। श्रीलंका के लोग इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को जिम्मेदार मानते हैं। महिंदा राजपक्षे भी इस बात को अच्छे से समझते हैं। वे 2015 के राष्ट्रपति चुनाव में जनता के गुस्से का सामना भी कर चुके हैं। तब उन्होंने हार से बचने के लिए ही 2017 में होने वाले चुनाव को 2015 में कराने का निर्णय ले लिया था। दरअसल चीनी कर्ज की अदायगी 2017 से शुरू होनी थी और राजपक्षे जानते थे कि अगर 2017 में ही आम चुनाव भी हुए तो उन्हें भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
लेकिन, महिंद्रा राजपक्षे के दो साल पहले चुनाव कराने के बाद भी चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा चीनी कर्ज ही बना। श्रीलंका के लोगों ने चीन से पीछा छुड़ाने के लिए हर हाल में सरकार बदलने का मन बना लिया था। विपक्षी पार्टी के नेता मैत्रीपाला सिरीसेना ने इस मुद्दे का खूब फायदा उठाया और उन्हें बड़ी जीत मिली।
श्रीलंकाई राजनीति पर नजऱ रखने वाले जानकार कहते हैं कि श्रीलंका में अब अगला आम चुनाव 2020 की शुरुआत में होना है जिसमें गोटबाया राजपक्षे के भाई और कार्यवाहक प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे प्रमुख उम्मीदवार होंगे। ऐसे में अब ये दोनों ही यह कोशिश करेंगे कि आम चुनाव से पहले चीन से दूरी बनाकर रखी जाए जिससे आम चुनाव में उन्हें मुश्किलों का सामना न करना पड़े।
राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने ऐसे संकेत भी दिए हैं। बीते हफ्ते एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि वे भारत और चीन दोनों से बराबरी के रिश्ते बनाएंगे। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने आगे कहा, ‘हंबनटोटा बंदरगाह को 99 सालों के लिए चीन को लीज पर दिया जाना पिछली सरकार की गलती थी। इस समझौते पर दोबारा वार्ता चल रही है। छोटा हिस्सा देना अलग बात है, लेकिन रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण एक आर्थिक बंदरगाह को पूरी तरह दे देना गलत है। इस पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए।’

 


Date : 30-Nov-2019

ध्रुव गुप्त

अभी तेलंगाना में जिस तरह डॉ प्रियंका रेड्डी के साथ कुछ अपराधियों ने सामूहिक दुष्कर्म कर उसे जिंदा जला दिया, उससे पूरा देश सदमे में है। हाल के वर्षों में ऐसी असंख्य लोमहर्षक ख़बरों के साथ जीने को हम अभिशप्त रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे हम यौन मनोरोगियों के देश में हैं जिसमें रहने वाली समूची स्त्री जाति के अस्तित्व और अस्मिता पर घोर संकट उपस्थित है। आज यह सवाल हर मां-बाप के मन में है कि इस वहशी समय में वे कैसे बचाएं अपनी बहनों-बेटियों को? उन्हें घर में बंद रखना समस्या का समाधान नहीं। अपनी जि़ंदगी जीने का उन्हें पूरा हक़ है। वे सडक़ों पर, खेतों में, बसों और ट्रेनों में निकलेंगी ही। हर सडक़ पर, हर टोले-मोहल्ले में, हर स्कूल-कॉलेज में पुलिस की तैनाती संभव नहीं है। 
आमतौर पर कानून और पुलिस का डर ही लोगों को अपराध करने से रोकता है। यह डर तो अब अब रहा नहीं। वैसे भी हमारे देश के कानून में जेल, बेल, रिश्वत और अपील का इतना लंबा खेल है कि न्याय के इंतजार में एक जीवन खप जाता है। दरिंदों के हाथों बलात्कार की असहनीय शारीरिक, मानसिक पीड़ा और फिर अमानवीय मौत झेलने वाली देश की हमारी बच्चियों और किशोरियों के लिए हमारे भीतर जितना भी दर्द हो, हमारी व्यवस्था के पास उस दर्द का क्या उपचार है?
 संवेदनहीन पुलिस, सियासी हस्तक्षेप, संचिकाओं में वर्षों तक धूल फांकता दर्द, भावनाशून्य न्यायालय, बेल का खेल और तारीख पर तारीख का अंतहीन सिलसिला। कुछ चर्चित मामलों को छोड़ दें तो सालों की मानसिक यातना के बाद निचले कोर्ट का कोई फैसला आया भी तो उसके बाद उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय और दया याचिकाओं का लंबा तमाशा! स्थिति विस्फोटक हो चुकी है। लोगों का धैर्य जवाब देने लगा है। इन परिस्थितियों में इस बात की पूरी आशंका है कि लोग कानून को अपने हाथ में लेकर सडक़ों पर बलात्कारियों को सजा देने लगें। वैसे भी इन दिनों देश में कानून पर भीड़तंत्र हावी है। इस्लामी कानूनों के मुताबिक़ एकदम संक्षिप्त सुनवाई के बाद बीच चौराहों पर लटकाकर इन हैवानों को मार डालना कारगर क़दम हो सकता है, पर दुर्भाग्य से हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संभव नहीं।
कभी आपने सोचा है कि आज देश में बलात्कार के लिए फांसी और उम्रकैद सहित कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होने के बावज़ूद स्थिति में कोई बदलाव क्यों नहीं आ रहा है ? दरअसल बलात्कार को देखने और उसकी रोकथाम के प्रयासों की हमारी दिशा ही गलत है। हम स्त्रियों के प्रति इस क्रूरतम व्यवहार को सामान्य अपराध के तौर पर ही देखते रहे हैं, जबकि यह सामान्य अपराध से ज्यादा एक मानसिक विकृति, एक भावनात्मक विचलन है। इन्हें बढ़ावा देने के लिए इंटरनेट पर असंख्य अश्लील फिल्में और वीडियो क्लिप्स उपलब्ध हैं। स्त्रियों के साथ यौन अपराध पहले भी होते रहे थे, लेकिन इन फिल्मों की सर्वसुलभता के बाद बलात्कार के आंकड़े आसमान छूने लगे हैं। इन फिल्मों का सेक्स सामान्य नहीं है। यहां आपकी उत्तेजना जगाने के लिए अप्राकृतिक सेक्स, जबरन सेक्स, हिंसक सेक्स, सामूहिक सेक्स, चाइल्ड सेक्स और पशुओं के साथ सेक्स भी हैं। 
हद तो यह है ये फिल्में अगम्यागमन अर्थात पिता-पुत्री, मां-बेटे, भाई-बहन के बीच भी शारीरिक रिश्तों के लिए भी उकसाने लगी हैं। सब कुछ खुल्लम-खुल्ला। इन्टरनेट पर क्लिक कीजिये और सेक्स का विकृत संसार आपकी आंखों के आगे खुल जाएगा। परिपक्व लोगों के लिए ये यह सब मनोरंजन और उत्तेजना के साधन हो सकते हैं, लेकिन अपरिपक्व और कच्चे दिमाग के बच्चों, किशोरों, अशिक्षित या अल्पशिक्षित युवाओं पर इसका जो दुष्प्रभाव पड़ता है उसकी कल्पना भी डराती है।
स्त्री देह पर अनंत वर्जनाओं का आवरण डालकर उसे रहस्यमय बना देने वाली हमारी संस्कृति में ऐसी फिल्मों के आदी लोग अपने दिमाग में सेक्स का एक ऐसा काल्पनिक संसार बुन लेते हैं जिसमें स्त्री व्यक्ति नहीं, देह ही देह नजऱ आने लगती है। देह भी ऐसी जहां उत्तेजना और मजे के सिवा कुछ भी नहीं। नशा ऐसे लोगों के लिए तात्कालिक उत्प्रेरक का काम करता है जो लिहाज़ और सामाजिकता का झीना-सा पर्दा भी गिरा देता है।
 यह मत कहिए कि मां-बाप द्वारा बच्चों को नैतिक शिक्षा और अच्छे संस्कार देना इस समस्या का हल है। मोबाइल और इंटरनेट के दौर में ज्यादातर बच्चे मां-बाप से नहीं, यो यो हनी सिंह, सनी लिओनी और गूगल पर मुफ्त में उपलब्ध असंख्य अश्लील वीडियो क्लिप से ही प्रेरणा ग्रहण करेंगे। अगर बलात्कार पर काबू पाना है तो बलात्कारियों के खिलाफ एक तय समय सीमा में अनुसंधान, ट्रायल और सजा के कठोर प्रावधानों के अलावा बेहद आसानी से ऑनलाइन उपलब्ध अश्लील सामग्री को कठोरता से प्रतिबंधित करने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। कुछ लोगों के लिए अश्लील फि़ल्में देखना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मसला हो सकता है, लेकिन जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता सामाजिक नैतिकता और जीवन-मूल्यों को तार-तार कर दे, वैसी स्वतंत्रता को निर्ममता से कुचल देना ही हितकर है।

 


Date : 29-Nov-2019

अमरीका में मौजूद भारत के एक शीर्ष राजनयिक ने ऐसा बयान दिया है जिसके बाद पाकिस्तान को एक बार फिर भारत सरकार पर निशाना साधने का मौक़ा मिल गया।
न्यूयॉर्क में महावाणिज्यदूत संदीप चक्रवर्ती ने एक निजी कार्यक्रम में कहा कि भारत सरकार को कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए इसराइल जैसी नीति अपनानी चाहिए।
इस कार्यक्रम में भारतीय फिल्म जगत की कुछ जानी-मानी हस्तियां शामिल थीं, साथ ही अमरीका में रहने वाले कश्मीरी पंडित भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे। संदीप चक्रवर्ती का वीडियो सोशल मीडिया पर चल रहा है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है,भारत में आरएसएस की विचारधारा वाली सरकार की फासीवादी मानसिकता दिख रही है। भारत के कब्जे वाले कश्मीर में घेराबंदी को 100 दिनों से ज़्यादा समय हो चुका है।
 कश्मीरियों के मानवाधिकार को कुचला जा रहा है। लेकिन दुनिया के शक्तिशाली देश अपने व्यापारिक हितों के कारण चुप्पी साधे हुए हैं। सवाल उठता है कि संदीप चक्रवर्ती ने कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए इसराइल की जिस नीति को अपनाने की बात कही है, वह नीति आखिर है क्या और इसराइल इसमें कितना कामयाब हुआ?
युद्ध के बाद इसराइल 
की पुनर्वास नीति?
साल 1967 में मध्य पूर्व में चले युद्ध के दौरान इसराइल ने जितने भी इलाकों पर कब्जा जमाया वहां उन्होंने यहूदियों को बसाने की नीति पर काम किया। इन इलाकों में वेस्ट बैंक, पूर्वी येरूशलम और गोलान की पहाडिय़ां शामिल हैं। इस युद्ध से पहले वेस्ट बैंक और पूर्वी येरूशलम पर जॉर्डन का अधिकार था, जिसे जॉर्डन ने 1948-49 में अरब-इसराइल युद्ध के दौरान कब्जा लिया था।
इसराइल के सेटलमेंट वॉचडॉग पीस नाउ के अनुसार इन इलाक़ों में अभी कुल 132 बस्तियां और 113 आउटपोस्ट (अनाधिकारिक बस्तियां) हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार इन जगहों पर चार लाख से ज़्यादा लोग रहते हैं और इनका आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा इसराइल ने गजा पट्टी में भी कई बस्तियां तैयार की हैं, जिसे उसने 1967 युद्ध में मिस्र से अपने कब्ज़े में लिया था।
सर्वसम्मति से हुआ था फैसला
इसराइल के तेल अवीव शहर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्र बताते हैं कि इसराइल ने अरब देशों के खिलाफ छह दिन तक युद्ध लड़ा और उस युद्ध के बाद इसराइल ने एक बड़े इलाके पर अपना कब्जा जमा लिया। यह पूरा इलाका लगभग ख़ाली था, यहां कोई आबादी नहीं थी। जो लोग वहां रहते थे वो युद्ध की वजह से वहां से भाग गए थे।
हरेंद्र मिश्र बताते हैं, इस युद्ध के बाद इसराइल ने ग्रीन लाइन के बाहर के इलाके पर कब्जा किया। ग्रीन लाइन वो जगह थी जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मान्यता दे रखी थी कि वह इसराइल का इलाक़ा है। ग्रीन लाइन के बाहर का इलाका इसराइल की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन सकता था और इसराइल उसे ख़ाली नहीं छोड़ सकता था। 
तब इसराइल के सभी नेताओं ने सर्वसम्मति से यह फैसला किया कि वो उस पूरे खालीइलाके में बस्तियां बसाएंगे। उस समय इसराइल की राष्ट्रीय नीति का यह हिस्सा बन चुका था। वहां चाहे किसी भी विचारधारा के नेता हों, सभी इन बस्तियों को बसाने की नीति पर एकमत थे।
इन बस्तियों में ज़्यादा से ज़्यादा लोग रहने के लिए आएं इसके लिए इसराइली सरकार ने वहां के लोगों को कई तरह की छूट दी, उन्हें टैक्स में बहुत छूट दी गई थी। इसके अलावा कई दूसरी सुविधाएं भी प्रदान की गई थीं।
बस्तियों में रहने को राष्ट्रहित बताया गया
जब इसराइल में इन बस्तियों को बसाया जा रहा था और लोगों को वहां रहने के लिए उत्साहित किया जा रहा था तो लोगों के मन में इस भावना को भी बढ़ावा देने की कोशिश की गई कि इन बस्तियों में रहना एक तरह से राष्ट्रहित में किया गया काम है। हरेंद्र मिश्र बताते हैं, लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि अगर वो वेस्ट बैंक, गोलान की पहाडिय़ों या गजा पट्टी में जाकर बसेंगे तो यह राष्ट्रहित का काम होगा। इससे इसराइल ने इस पूरे इलाके में सुरक्षा की दृष्टि से अपनी गहरी पैठ जमा ली। लोगों के वहां पर बसने के बाद सुरक्षाबलों की तैनाती भी कर दी गई।
एक समय जरूर इसराइल में इन बस्तियों को बसाने पर सभी पार्टियां एकमत थी लेकिन अब कुछ राजनीतिक दल इनका विरोध करने लगे हैं। वामपंथी दलों का मानना है कि सरकार इन इलाक़ों में बहुत अधिक धन ख़र्च कर रही है।
इन्हीं बस्तियों पर आधारित साल 2010 में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि वेस्ट बैंक के पूरे इलाके के महज दो फीसदी हिस्से में ही बस्तियां बसाने का काम हो सका है। इनके आलोचकों का कहना है कि बस्तियां बसाने के उलट वहां पर खेती और सडक़ों का निर्माण अधिक हो चुका है। इस वजह से इस पूरे इलाक़े की सुरक्षा के लिए अधिक सुरक्षाबलों की जरूरत पड़ती है।
यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी ऐसी आवाज़ें उठी हैं जिसमें बस्तियों को गैरकानूनी बता दिया गया है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ये बस्तियां अंतरराष्ट्रीय नियमों के आधार पर नहीं बसाई गई हैं। इतना ही ट्रंप ने तो येरूशलम को इसराइल की राजधानी तक घोषित कर दिया था, जबकि पूर्वी येरूशलम अभी भी अरब बहुल इलाक़ा ही है।
क्या यहूदियों को ही बसाने 
के लिए बनी बस्तियां?
कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को बसाने के लिए इसराइली नीति का अनुसरण करने की बात उठी है तो सवाल उठता है कि क्या इसराइल ने जब बस्तियां बसाने का काम किया तब उन्होंने भी सिर्फ यहूदियों को बसाने का काम किया था।
इस पर हरेंद्र मिश्र कहते हैं, वेस्ट बैंक, गोलान की पहाडिय़ां और गजा पूरी तरह खाली था, इसलिए यहां नए लोगों को ही बसाना था और वो नए लोग निश्चित तौर पर यहूदी ही हो सकते थे। इसके साथ ही दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोगों को यहां पर बसाने का काम हुआ। यही वजह है कि इन इलाकों में दक्षिणपंथी राजनीति का बोलबाला अधिक है।
दुनिया के किसी भी हिस्से में यहूदी रहता हो तो उसे यह अधिकार प्राप्त है कि वह इसराइल में आकर बस सकता है। यही वजह है कि दुनियाभर से कई नए यहूदी इसराइल में आकर बसते रहते हैं। हरेंद्र मिश्र बताते हैं, भारत के उत्तर पूर्व में रहने वाले कुछ यहूदी भी इसराइल की इन बस्तियों में आकर रहने लगे हैं। बाहर से आने वाले इन यहूदियों पर इसराइल की संसद में एक बार सवाल भी उठ चुका है कि क्या इन नए यहूदियों को किसी विशेष योजना के तहत इन बस्तियों में बसाया जा रहा है।
यह नीति कामयाब हुई या नाकाम?
इसराइल में बस्तियों को बसाने की नीति किस हद तक कामयाब हुई इस पर कई सवाल हैं। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने साल 2016 में इन बस्तियों को कोई कानूनी वैधता नहीं दी थी। इस नीति की कामयाबी पर हरेंद्र मिश्र कहते हैं, अगर इस इलाके की सुरक्षा की बात की जाए तो इसराइल इसमें कामयाब रहा है क्योंकि वहां पर अब उनके अपने लोग रहते हैं इसलिए इसराइल को वहां किसी तरह के हमले का खतरा नहीं है, इसी मकसद से इसराइल ने इस नीति को अपनाया भी था।

 

 


Date : 29-Nov-2019

अनुराग भारद्वाज

हर दौर में जवानी क्रांतिकारी होती है और जिनको जवानी का अहसास होता है, वे बड़ा कर पाने का माद्दा रखते हैं। आज से गुजश्ता 100 साल पहले रूसी क्रांति का दौर था। तब जवानी का अहसास होना एक क्रांतिकारी बात थी। निज़ाम बदले, इस पर कसमें खाई जाती थीं। अली सरदार जाफऱी इसी दौर की पैदाइश थे और उस दौर की शायरी के ‘सरदार’ थे।
हम सरदार के बचपन की बात नहीं करेंगे। यहां मौज़ू उनकी जवानी और बुढ़ापा है। एक ख्व़ाब की तामीर है और उसका तिडक़ना है। तब उनकी उम्र 22 थी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी मंजिल। यहां, जांनिसार अख्तर, ख्वाजा अहमद अब्बास औक मजाज जैसों की संगत ने उन्हें साम्यवादी सोच की तरफ मोड़ दिया। एक दिन जवाहर लाल नेहरू का वहां आना, उनकी दुनिया में तूफान ले आया। नेहरू का राजकुमार सा चेहरा, राजाओं सी अमीरी, फकीराना अंदाज और जहीन बातें ऐसा तिल्सिम गढ़ती थीं कि जवान बेसाख्ता उनकी ओर खिंचे जाते। सरदार भी इस तिलिस्म न बच पाये और आज़ादी के आंदोलन में कूद पड़े।
1940 में प्रिवी कौंसिल (सुप्रीम कोर्ट) के मुख्य न्यायाधीश सर मोरिस ग्व्येर हिंदुस्तान आए।  दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका था। अंदेशा था कि सोवियत रूस और जर्मनी मित्र राष्ट्रों के खिलाफ लड़ेंगे। इसलिए, भारत में कम्युनिस्टों ने ब्रिटिश सरकार और मोरिस ग्व्येर के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। सरदार जाफऱी इसका हिस्सा थे। सो, ब्रिटिश सरकार ने 1940 में उन्हें कैद कर लिया। जेल में उनकी मुलाक़ात अंडमान निकोबार से लाए गए भगत सिंह के कामरेड साथियों से हुई। 1931 में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी ने उन पर काफी असर डाला। तब जाफऱी 18 साल के थे और ‘हाज़ीन’ के तख़ल्लुस से शायरी करने लगे थे।
1938 में उनके रचनात्मक सफऱ में ‘मंजि़ल’ के उन्वान से लघु कहानियां और ‘ये किसका खून’ और ‘पैकर’ नाम के दो नाटक जुड़ चुके थे। 1940 में वे इप्टा से जुड़ गए और फिर ताउम्र इसके मेंबर बने रहे। अंग्रेज़ी के लेखक मुल्क राज आनंद, सज्जाद ज़हीर, अख्तर हुसैन जयपुरी और सरदार जाफऱी ने प्रोग्रेस्सिव राइटर एसोसिएशन की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।
तरक्कीपसंद शायर रूमानीवाद से दूर भागते थे। इसके पीछे दो कारण कहे जा सकते हैं। एक तो यह कि ग़ालिब और मीर मुहब्बत और इबादत पर इतना लिख गए कि तकरीबन कोई भी  ख्याल उनकी कलमों से अछूता न रह पाया। बाद के शायर लिखते भी तो क्या? सरदार जाफऱी ने एक टीवी इंटरव्यू के दौरान कहा था कि शायरी करने वाला कोई भी शख्स ग़ालिब के असर से आज़ाद नहीं रह सकता। कोई ताज्जुब नहीं कि तरक्कीपसंदों की जमात में सबसे पहले खड़े होने वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ भी ग़ालिब से प्रभावित थे।
दूसरा यह, और जैसा ऊपर भी कहा गया है, वह दौर रूसी क्रांति का था। 1917 में रूस में ज़ारशाही खत्म हुई और लेनिन हावी हो गए। रूस की साहित्यिक दुनिया में मैक्सिम गोर्की, दोस्तोय्विसकी, पुश्किन आदि ख़ूब पसंद किए जा रहे थे।  उधर, हिंदुस्तान में कुछ अलग ही माजरा था। यहां मुगलों का पतन एक झटके में नहीं हुआ।  सो, दूसरी सत्ता धीरे-धीरे यहां काबिज़ हुई, और हुई तो उपनिवेशवाद आया जो पूंजीवाद का बिगड़ा स्वरूप था। इससे हिंदुस्तानी शायर बेज़ार हो गए।
तीसरा, महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का बवंडर सब कुछ उड़ाए ले जा रहा था। ऐसे में मानो ‘हुस्न को फूल, जवानी को कंवल’ कहना आउटडेटेड हो गया और ऐसा कहने वाले कहने वालों को गंवार ठहराए जाने का जोखिम। अब जवानी को नया मकसद मिला और निज़ाम (व्यवस्था) शायरी का विषय हो गया। निज़ाम पर हमला करना जवानी का मकसद बन गया। जाफऱी की शायरी भी इसी दौर का परचम उठाये चलती है। इस बात को और समझने के लिए हम उनकी शायरी को दो हिस्सों में बांट लेते हैं।
दक्षिण एशिया के लेखकों की तरक्कीपसंद जमात रूस के लेखकों से प्रभावित थी। जाफऱी साहब तो चिली के पाब्लो नेरूदा से नज़दीकी रिश्ता रखते थे। पर यह सोचकर हैरत होती है कि हिंदुस्तान जैसे देश में कोई साम्यवाद के स्थापित होने की बात कैसे सोच सकता था। आखिऱ, यह विचारधारा तो ईश्वर की सत्ता को नहीं मानती और यहां तो धर्म और ईश्वर सबसे बड़ा आधार हैं। तरक्कीपसंद शायर आखिऱ किस उम्मीद पर टिके हुए थे? 
जो बात यह जमात नहीं पकड़ पाई थी वह लगभग 500 साल पहले तुलसीदास ने भांप ली थी। उन्होंने सही कहा था, ‘कोऊ नृप होए, हमें का हानि’ ही हमारी सिद्दांत रहा है। हमें राजा के होने या न होने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता। गुरचरण दास ने अपनी कि़ताब ‘इंडिया ग्रोस एट नाइट’ में साफ़-साफ़ लिखा है कि भारत में राजा कमजोर था और समाज मजबूत। खैर, रूस में हो रहे प्रयोग ने यहां भी आशाएं जगाई थीं। पर ये कामयाब नहीं हो सकती थीं।
जाफरी के अशआरों ने रूमानीवाद से आगे निकलकर सर्वहारा के दर्द को उकेरा। समाज में फैली विसंगति के मवाद को बाहर निकाला। वे मिल मज़दूरों और कारखानों में खपते कामगारों की आवाज़ बने। एक ओर जहां फ़ैज़ ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ कह रहे थे, जाफऱी ने लिखा-
‘तू मुझे इतने प्यार से मत देख
तेरी पलकों के नर्म साये में
धूप भी चांदनी सी लगती है
और मुझे कितनी दूर जाना है...’

हिंदुस्तान के सर्वहारा का दर्द बयान करने 
वाले सबसे बड़े शायर थे जाफरी

इस दौर में शाया (प्रकाशित) होने वाली उनकी किताबें थीं ‘जम्हूर’, ‘नई दुनिया को सलाम’, ‘ख़ून की लकीर’, ‘पत्थर की दीवार’, ‘एशिया जाग उठा’ और ‘लहू पुकारता है’। इन सबमें कहीं-कहीं रूमानियत थी, और साम्यवाद का फ़लसफ़ा तो बहुत जगह था। यह भी तय है कि अली सरदार जाफऱी पर जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी और फिऱाक़ गोरखपुरी का बहुत असर था। उनके दोस्तों में कैफ़ी आज़मी, कृष्ण चंदर, राजेन्द्र सिंह बेदी, सआदत हसन मंटो, सिब्ते हसन, अले अहमद सुरूर और अहेतेशाम हुसैन जैसे अदीब थे। उनकी शायरी बेहद तल्ख़ थी मानो शोलों पर अशआर रख छोड़े हों। आजादी के बाद मंजऱ भी न बदला, और न वे बदले। अंग्रेज़ों ने तो जेल भेजा ही था। हिंदुस्तानी ‘गोरे’ भी इस काम में पीछे न रहे।
जवाहर लाल नेहरू ने राजनीति में साम्यवाद की जगह समाजवाद को तरजीह दी। मानो कि वे जानते थे कि साम्यवाद ज़्यादा दिन तक नहीं टिक पायेगा। हुआ भी यही। सोवियत रूस में निकिता खुश्चेव के राज से ही साम्यवादी विचारधारा का पतन शुरू हो गया, जो 1991 में आकर पूरी तरह नेस्तनाबूद हो गई। अली सरदार जाफऱी के दोस्तों ने जक़ावत (होशियारी) से पेश आते हुए शायरी में तब्दीलियां शुरू कर दीं। जाफऱी तब भी उम्मीद का दामन पकड़े हुए थे।
जब साम्यवाद ख़त्म हुआ तो लगभग सारे शायर बॉलीवुड में खप गए, पर अली सरदार जाफऱी ने सर्वहारा को अपनी शायरी के दामन में समेटे रखा। इस दौर में भी वो सरे-मिम्बर थे। पर विचारधारा से हटकर उन्होंने अब दूसरे मजमून पकड़ लिए थे। उन्होंने हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बनते-बिगड़ते रिश्तों की बेहतरी की उम्मीद की। इस वीडियो को सुनिए और दोनों मुल्कों के बीच मुहब्बत की कसक देखिये। देखिए कि जाफऱी हिंदुस्तान से किस कदर मुहब्बत करते थे। इस वीडियो में जाफऱी के पीछे जो शख्स हरकत कर रहे हैं, वो जॉन एलिया हैं!
ज़ाफरी साहब के कुछ बेहतरीन कामों में से हैं ‘दीवाने-ग़ालिब’ और ‘दीवाने-मीर’ का हिंदी रूपांतरण और गज़़लों के माने आसान लफ्ज़़ों में समझाना। बड़े-से-बड़ा फ़ारसी और उर्दू का जानकर भी यह मानने से गुरेज़ नहीं करता कि औरों के बनिस्बत जाफऱी साहब का दीवान सबसे बेहतर है। 1990 के आसपास उन्होंने दूरदर्शन के लिए ‘कहकशां’ और ‘महफि़ले-यारां’ नाम से दो सीरियल भी बनाये जो ख़ासे पसंद किए गए। मीरा और कबीर पर उनका काम भी साहित्य की दुनिया में मज़बूत हस्ताक्षर माना जाता है। ठीक इसी तरह, ‘लखनऊ की पांच रातें’ एक ज़बरदस्त यात्रा वृतांत है जो एक तरह से, मजाज़ और उनकी दोस्ती का सफऱनामा है। अपने दोस्तों की मंडली को याद करते हुए उन्होंने लिखा है, ‘हमारा सारा गिरोह तो वैसे हमखय़ाल था, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और सुभाष बोस के दरमियान बंटा हुआ था। हमारी बग़ावत का अंदाज़ रूमानी और इनफऱादी (व्यक्तिगत) था, जिसका सबसे हसीन पैकर मजाज़ की दिल-आवेज़ शख्सियत थी।’ इस कि़ताब के अफ़साने ऐसे दिलचस्प हैं कि बस। जाफऱी साहब अपने जीवन के आखिऱी दिनों में ‘सरमाया-ए-सुखन’ पर काम कर रहे थे।
बात ख़त्म करने से पहले, अफ़साने की इब्तिदा यानी शुरुआत पर चलते हैं। कि़स्सा यह है कि लखनऊ यूनिवर्सिटी में जाफऱी साहब जब इंग्लिश में एमए करने के लिए गए तो वहां उनकी मुलाक़ात सुल्ताना से हुई। मुहब्बत रंग लाई और 1940 में शादी हो गयी। अब कम्युनिस्ट शायरों की शादियां भी बड़ी अजीब होती हैं। तो जाफऱी साहब जब कोर्ट में शादी रजिस्टर कराने बाबत पेश हुए तो उनकी जेब में तीन रुपये थे। ‘नंगा क्या नहाये और क्या निचोड़े’ वाली बात थी। इस्मत चुगताई उस वक़्त मौजूद थीं। वे सभी दोस्तों को आइसक्रीम खिलाने ले गईं। इस जोड़ी का रिश्ता मरते दम तक रहा। एक नज़्म में ज़ाफरी साहब ने अपनी मुहब्बत को कुछ यूं बयां किया था-
‘जाड़ों की हवाएं दामन में
जब फ़स्ल-ए-खज़़ां को लायेंगी
रहरू के जवां क़दमों के तले
सूखे हुए पत्तों से मेरे
हंसने की सदायें आयेंगी
धरती की सुनहरी सब नदियां
आकाश की नीली सब झीलें

हस्ती से मेरी भर जायेंगी
और सारा ज़माना देखेगा
हर कि़स्सा मेरा अफ़साना है
हर आशिक़ है सरदार यहां
हर माशूक़ा सुल्ताना है’
यकीनन वह दौर अली सरदार जाफऱी का था। आज के युग में कोई सिस्टम बदलने की बात नहीं करता। तख़्त गिराने को बांहें नहीं फडक़तीं। विचारधाराओं का दौर अब नहीं रहा। यह एडजस्टमेंट का ज़माना है। स्टार्ट-अप्स का युग है। यह जॉन एलिया का दौर है। पर फिर भी ‘हर आशिक़ है सरदार यहां, हर माशूका सुल्ताना है’ कहने वाले सरदार जाफऱी को कुछ सख्त जान याद कर ही लेते हैं। (सत्याग्रह)

 

 


Date : 28-Nov-2019

सुदीप ठाकुर
महज तीन दिनों के भीतर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा करते समय देवेंद्र फडणवीस ने शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन से बन रही सरकार के बारे में टिप्पणी की थी कि यह तीन पहियों की ऐसी गाड़ी है, जिसका कोई भी पहिया एक दिशा में नहीं चल सकता!
फडणवीस ने चाणक्य द्वारा लिखी गई किताब 'अर्थशास्त्र' पढ़ी होती, तो शायद यह टिप्पणी नहीं करते। चाणक्य ने इस महान ग्रंथ के सातवें अध्याय में लिखा था, 'जिस प्रकार गाड़ी का एक पहिया दूसरों की सहायता के बिना अनुपयुक्त होता है, इसी प्रकार राज्य चक्र भी अमात्य आदि की सहायता के बिना एकाकी राजा द्वारा नहीं चलाया जा सकता। इसलिए राजा को उचित है कि वह योग्य अमात्यों को रखे और उनके मत को बराबर रखे।' (कौटलीय अर्थशास्त्र विद्याभास्कर, मेहरचंद लक्ष्मण दास, अध्यक्ष संस्कृत पुस्तकालय सैदपि_ा बाजार लाहौर द्वारा प्रकाशित किताब, पेज नंबर 35)
शनिवार तडक़े दोबारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय लगता है कि फडणवीस ने अमात्य यानी अपना मंत्री चुनते समय गलती कर दी, वरना उनके उपमुख्यमंत्री अजीत पवार तीन दिन में ही अपने चाचा शरद पवार के पास नहीं लौट जाते जिन्हें नया चाणक्य कहा जा रहा है!
महाराष्ट्र के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम में इतिहास के जिस शख्स को सबसे अधिक याद किया जा रहा है, वह चाणक्य ही है। हालांकि जो भाजपा चाणक्य से अपने अतीत को जोडक़र देखती रही है, वह सियासत के इस खेल में फिलहाल बुरी तरह मात खा गई है।
वैसे चाणक्य का भारत के लिए क्या महत्व है, यह जानने के लिए सुनील खिलनानी की किताब ढ्ढठ्ठष्ड्डह्म्ठ्ठड्डह्लद्बशठ्ठ: ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड द्बठ्ठ 50 रुद्ब1द्गह्य ( हिंदी में अवतरण: भारत के पचास ऐतिहासिक व्यक्तित्व) पढऩी चाहिए। इसमें खिलनानी ने ऐसी पचास शख्सियतों के बारे में लिखा है, जिन्होंने भारत के ढाई हजार वर्ष के ज्ञात सफर को प्रभावित किया है।
खिलनानी चाणक्य या कौटिल्य के अर्थशास्त्र से यह पंक्ति उद्धृत करते हैं, 'किसी धनुर्धारी द्वारा छेड़े गए तीर से किसी एक व्यक्ति की मौत हो सकती है या संभव है कि कोई नहीं मारा जाए, लेकिन रणनीति के उपयोग से बुद्धिमान व्यक्ति गर्भ में मौजूद शिशु तक को मार सकता है। ' यह पंक्तियां वाकई बेहद निर्मम हैं, लेकिन चाणक्य सत्ता हासिल करने के लिए साम दाम दंड भेद की नीति की वकालत करते हैं। आज की सत्ता की राजनीति इससे अलग कहां है?
सत्ता की जिन दुरभिसंधियों को हम आज देख रहे हैं, उसमें कहीं न कहीं चाणक्य के सूत्र भी जिम्मेदार हैं, जो भारतीय राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं। और यह किस्सा तो बेहद मशहूर है कि कैसे 1937 में कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में जवाहर लाल नेहरू ने चाणक्य के छद्म नाम से मॉडर्न रिव्यू में खुद की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा था।
नेहरू ने लिखा था, 'कांग्रेस अध्यक्ष में एक तानाशाह की सभी प्रवृत्तियां मौजूद हैं, व्यापक लोकप्रियता, दृढ़ उद्देश्य, ऊर्जा, गौरव, संगठनात्मक क्षमता, कठोरता और, भीड़ को आकर्षित करने की क्षमता, दूसरों के प्रति असहिष्णुता और बेबस और अक्षम लोगों के प्रति अवमानना का भाव।'
मगर आधुनिक भारत में जवाहरलाल नेहरू को नहीं, बल्कि सरदार वल्लभ भाई पटेल को चाणक्य के अधिक नजदीक माना जाता है। मई, 2014 के बाद से तो इस परियोजना पर खासा काम किया गया है। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल के 140 वें जन्मदिन के मौके पर 31 अक्तूबर 2015 को उन्हें कुछ इस तरह से याद किया था:
'.... हिंदुस्तान के इतिहास की तरफ देखें, तो चाणक्य ने चार सौ साल पहले देश को एक करने के लिए भगीरथ प्रयास किया था और बहुत बड़ी मात्रा में सफलता पाई थी। चाणक्य के बाद भारत को एकता के सूत्र में बांधने का अहम काम किसी महापुरुष ने किया तो वो सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया, और उसी के कारण तो आज कश्मीर से कन्याकुमार और अटक से कटक तक हम इस भारत मां को याद करते हैं, भारत मां की जय बोलते हैं...।' 
जी हां, प्रधानमंत्री मोदी ने चार सौ साल ही कहा था, इतिहास को लेकर इस तरह की उनसे यह कोई पहली चूक तो है नहीं।
आजाद भारत में जिस एक और शख्स ने चाणक्य के रूप में लंबे समय तक पहचान बनाए रखी, वह थे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र। उन्हें नेहरू के विरोधी के तौर पर जाना जाता था। नेहरू से उनका इतना मतभेद था कि वह 1951 जनसंघ ( आज की भाजपा) के अध्यक्ष बनने तक को तैयार हो गए थे। लेकिन यही डी पी मिश्र नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनते ही उनके चाणक्य बन गए! 1969 में कांग्रेस के ऐतिहासिक विभाजन के पीछे इंदिरा के इसी चाणक्य की अहम भूमिका थी।
भाजपा ने समय समय पर अपने चाणक्य बदले हैं। इसमें दो लोगों का जिक्र किया जा सकता है, एक हैं डी पी मिश्र के पुत्र ब्रजेश मिश्र और दूसरे हैं, उसके पूर्व लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी। 1998 में प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने पूर्व आईएफएस अधिकारी ब्रजेश मिश्र को अपना मुख्य सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया था। ब्रजेश मिश्र के निधन के बाद वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी ने लिखा था कि वाजपेयी ने उनमें अपने पिता की तरह चाणक्य जैसी चालाकी देखी थी।
आडवाणी को भी चाणक्य होने का थोड़े समय के लिए सौभाग्य मिला था। 2013 की ऐसी ही सर्दियों जब यह तय हो गया था कि भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी को नहीं नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाएगी, तो उन्हीं दिनों भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कहा था, 'जहां तक आडवाणी जी की बात है तो वह चाणक्य की तरह है। वह नंद वंश को बेदखल कर चंद्रगुप्त को सिंहासन पर बिठाएंगे।' 
मई, 2014 के बाद से अमित शाह भाजपा के नए चाणक्य बनकर उभरे हैं। महाराष्ट्र के ताजा घटनाक्रम से लगता है कि उन्होंने भी चाणक्य के अर्थशास्त्र का ठीक से अध्ययन नहीं किया है।
चाणक्य ने अर्थशास्त्र के नौवें अध्याय में लिखा था: 'देखा जाता है कि आदमियों की भी घोड़ों की तरह आदत होती है। घोड़ा जब तक अपने स्थान पर बंधा रहता है, बड़ा शांत मालूम पड़ता है, परंतु जब वह रथ आदि में जोड़ा जाता है, तो बिगड़ जाता है, बड़ी उछलकूद मचाता है। इसी प्रकार प्रथम शांत दीखने वाला पुरुष भी कार्य पर नियुक्त हो जाने पर कभी कभी विकार को प्राप्त हो जाता है। इसीलिए राजा को चाहिए कि वह कर्ता (अध्यक्ष), कारण (नीचे के कर्मचारियों) देश, काल, कार्य, नौकरों का वेतन, और उदय अर्थात लाभ के विषय में अवश्य जानता रहे।'
(कौटलीय अर्थशास्त्र विद्याभास्कर, मेहरचंद लक्ष्मण दास, अध्यक्ष संस्कृत पुस्तकालय सैदपि_ा बाजार लाहौर द्वारा प्रकाशित किताब, पेज नंबर 147)
महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के महा विकास अगाड़ी के नेता उद्धव ठाकरे का रथ तैयार है। क्या वह सारे घोड़ों को एकजुट रख पाएंगे?


Date : 28-Nov-2019

गिरीश मालवीय

2018 में लाला रामदेव लंबी लंबी फेंक रहे थे पतंजलि योगपीठ का 23वां स्थापना दिवस पर सार्वजनिक समारोह में उन्होंने कहा था कि पतंजलि की चैरिटी का लक्ष्य एक लाख करोड़ रुपये है।
लेकिन जब चैरिटी का समय आया तो रामदेव के अनन्य सहयोगी बाबा बालकृष्ण कटखने जानवर की तरह खूंटा छुड़ाकर भाग रहे हैं उत्तराखंड के आयुर्वेद के छात्रों को बालकृष्ण ने धमकी दे रहे हैं कि तुमने मेरा नमक खाया है, मैं तुमसे सवा तीन लाख रुपये वसूलकर रहूंगा...।
उत्तराखंड राज्य में आयुर्वेदिक औषधि की पढ़ाई कर रहे 13 प्राइवेट कॉलेजों के 3500 छात्र-छात्राएं पिछले कई महीनों से आंदोलन कर रहे हैं।  इन छात्रों के पक्ष में नैनीताल हाईकोर्ट पहले ही फैसला दे चुका है।  महीने भर के प्रदर्शन के बाद सरकार ने भी छात्रों की फीस कम करने का आदेश दिया है, इसके बाद भी पतंजलि के सीईओ बालकृष्ण छात्रों से पूरी फीस वसूलने पर अड़े हुए इस संबंध में 24 नवंबर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है इस वीडियो में पतंजलि आयुर्वेद कालेज के सीईओ बालकृष्ण  आंदोलन करने वाले बच्चों को धमकाते दिख रहे हैं। यह घटना पतंजलि कॉलेज के सीईओ बालकृष्ण के ऑफिस की बताई जा रही है।  घटना के विषय में छात्रों का यह आरोप भी है कि बालकृष्ण से मिलने पहले छात्रों की पिटाई की गई।  इस वीडियो में बालकृष्ण बच्चों से कह रहे हैं कि तुम लोगों ने पतंजलि का नमक खाया और अब नमक हरामी कर रहे हो, जो आन्दोलन करेगा उसका नाम काट दूंगा। तुम लोग हमारे ऋणी हो, हर एक बच्चे पर 1 लाख का ऋण है।  कोई कोर्ट के आदेश बाद भी मैं तुमसे सवा तीन रुपये लूंगा। 
2017 में लाला रामदेव जी का कहना था कि पतंजलि का सारा प्रॉफिट चैरिटी में जाता था, लेकिन जब उत्तराखंड के आयुष छात्र चैरिटी में नहीं पढ़ रहे बल्कि फीस देकर ही पढ़ रहे हैं और हाईकोर्ट के द्वारा दिए निर्देश के अनुसार ही फीस जमा कर रहे हैं तो भी बालकृष्ण अनिधिकृत रूप से छात्रों पर अनावश्यक दबाव रहे हैं।

 

 


Date : 28-Nov-2019

तृप्ति सोनी

छत्तीसगढ़ी राजभाषा बनना अतका आसान नइ रहिस

1 नवंबर 2000 के राज्य बने के बाद छत्तीसगढिय़ा मन के इही मांग रहिस के हमर महतारी भाखा छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा बनाए जाए। 30 मार्च 2001 के कांग्रेस के विधायक डोमेंद्र भेडिय़ा ह छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के दर्जा देय खातिर विधानसभा म अशासकीय संकल्प राखिन, जेला सर्वसम्मति ले पास कर देय गिस, फेर छत्तीसगढ़ी राजभाषा कब बनिस? संकल्प प्रस्ताव पास होय के 7 बछर बाद, अइसे काबर होइस, ये जानना बहुत जरुरी हे।
राजाभाषा मंच के प्रवक्ता अऊ छत्तीसगढ़ी ल मान देवाए बर अगवा हमर बबा नंदकिशोर शुक्लाजी ले गोठबात करे के बाद मंय ये बात ल लिखत हंव, अऊ उंखर देखाए प्रमाण बताथे के कइसे हमर महतारी भाखा ल पीछू धकेले के काम करे गिस। त बात अइसे हे के 2001 म विधानसभा म संकल्प त पास होगे, अब हमर इहां के नौकरसाह मन राष्ट्रपति ले अनुमति बर चि_ी-पाती लिखना सुरू करिन, जबकि राजभाषा बनाए खातिर राष्ट्रपति के अनुशंसा के जरुरत ही नइ रहिस, तभो ले धारा के फेर म हमर महतारी भाखा ल फंसा के राख दिन। 
छत्तीसगढिय़ा साहित्यकार, पत्रकार अऊ बुद्धिजीवी वर्ग ये डाहर धियान दिन, त पता चलिस के अइसे खेल चलत हे। तहां ले 30 मार्च 2007 के, उही दिन जेन दिन राजभाषा बर संकल्प लाए गेय रहिस, छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच के गठन करे गिस, जेमा जम्मो छत्तीसगढ़ के बडक़ा बुद्धिजीवी लोगन एकसंघरा सकलाइन अऊ राजभाषा बर आंदोलन करिन।
 किसिम-किसिम के तर्क देय गिस के छत्तीसगढ़ी राजभाषा बन जाही त काम काज बर लिपि नइ हे, एकर ब्याकरन नइ हे, ये ह बोली हरय भाषा नइ...त हमर साहित्यकार-पत्रकार मन जेमा बिसेस रुप ले नंदकिशोर बबा ह कहिन के छत्तीसगढ़ी के ब्याकरन त 1880-85 के बीच हीरालाल चन्नाहू बना डारे हें, येमा गौर करे के बात ये हे के हिंदी के ब्याकरन 1920 म बनिस ओकर पहिली ही छत्तीसगढ़ी ब्याकरन बन गेय रहिस, अब बात आइस लिपि के त देवनागरी ले श्रेष्ठ लिपि अऊ का हो सकत हे ये लिपि म बहुत काम होवत हे, जुन्ना साहित्यकार मन इही लिपि म छत्तीसगढ़ी साहित्य लिखत आत हें, अब रहिगे बात बोली के त भाषा शास्त्री मन के मानना हे के बोली ही भाषा होथे अऊ भाषा ही बोली।
 राजभाषा बर धारा 345 के तहत स्वीकृति मिलना रहिस फेर धारा 347 म अटका के राखिन, राजभाषा मंच ह ये बात ल तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह के संज्ञान म लाइस। 26-27 नवंबर 2007 के विधानसभा म राजभाषा बर बहस होइस, जम्मो विधायक छत्तीसगढ़ी म बहसबाजी करिन, अब संशोधन प्रस्ताव लाए गिस, फेर उही धारा के मामला म अटकाए के प्रयास होत रहिस, राजभाषा मंच ल पता चलिस त ओमन ये बात ल विपक्ष ल बताइन।  कांग्रेस के विधायक अऊ वर्तमान म मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, कृषि मंत्री रविंद्र चौबे, नंदकुमार पटेल ह जबर बहस करिन, ये बात सिद्ध होइस के राज्य सरकार अपन स्तर म राजभाषा के दर्जा देय सकत हे राष्ट्रपति के अनुमति के जरुरत ही नइ हे, तहां एक मत ले 28 नवंबर 2007 के प्रस्ताव पास होइस अऊ छत्तीसगढ़ी राजभाषा बनगे।
राजभाषा त बनगे फेर अधिकारिक रुप ले नइ बने रहिस, काबर के विधानसभा ले राज्यपाल कना अनुमति बर पारित विधेयक गेय ही नइ रहिस, तहां फेर राजभाषा मंच ह तत्कालीन राज्यपाल ई.एस.एल. नरसिम्हन ले भेंट करिन, राज्यपाल ह तुरंत संज्ञान लिन अऊ 11 जुलाई 2008 के राजपत्र म प्रकाशित होइस
फेर विडंबना हरय के छत्तीसगढ़ी ल राजभाषा के दर्जा त मिलगे फेर मान आज तक नइ मिल पाए हे। जेकर ताजा उदाहरन ये हवय के हमर इहां सरकारी काम काज छत्तीसगढ़ी म होबे नइ करय खाली खानापूर्ति होवत हे...।

 


Date : 27-Nov-2019

नरेंद्र मोदी ने 20 अक्तूबर 2013 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में अहमदाबाद में कहा था कि अगर सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो भारत की तस्वीर कुछ और होती।
इसी साल सितंबर महीने के दूसरे हफ्ते में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा था कि अगर वीर सावरकर देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो पाकिस्तान अस्तित्व में नहीं आता।
उद्धव ने सावरकर को भारत रत्न देने की भी मांग की थी। बीजेपी ने भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि वो सत्ता में आएगी तो सावरकर को भारत रत्न देगी। तब दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और जनता से इस गठबंधन को जिताने की अपील कर रहे थे।
अपने दूसरे कार्यकाल में नरेंद्र मोदी की सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया तो शिवसेना ने खुलकर समर्थन किया। इसे हटाए जाने के बाद पार्टी के मुखपत्र सामना में लिखा गया था कि कश्मीर मुसलमानों को तोहफे में नहीं दिया जा सकता।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बाल ठाकरे ने इसका समर्थन किया था और उन्होंने दावा किया था कि इसमें शिव सैनिक भी शामिल थे। बाबरी मस्जिद के खिलाफ लोगों को गोलबंद करने में बीजेपी के भी कई नेता शामिल रहे हैं।
इसी साल सितंबर में उद्धव ने ये भी कहा था कि कांग्रेस नेता मणिशकंर अय्यर को सावरकर का अपमान करने के लिए जूते से मारना चाहिए। मणिशंकर अय्यर ने 2018 में कहा था कि सावरकर ने टू नेशन थ्योरी का प्रस्ताव रखा था।
उद्धव ने ये बात सावरकर पर एक किताब के लोकार्पण के दौरान कही थी। उद्धव ने कहा था, ‘‘अगर सावरकर इस देश के प्रधानमंत्री होते तो पाकिस्तान का जन्म नहीं हुआ होता। हमारी सरकार हिन्दुत्व की है और हम उन्हें भारत रत्न देने की मांग करते हैं।’’ 
सावरकर गांधी की हत्या में सहअभियुक्त रहे थे। अदालत ने नाथूराम विनायक गोडसे और नारायण दत्तात्रेय आप्टे को फांसी की सज़ा सुनाई थी। विष्णु आर करकरे, मदनलाल के पाहवा, शंकर किस्टया, गोपाल गोडसे और डॉक्टर दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। वहीं विनायक दामोदर सावरकर को सबूतों के अभाव में जज ने बेगुनाह माना था। सावरकर हिन्दुत्व के पुरजोर समर्थक थे।
हालांकि सावरकर के बरी होने पर कई लोग सवाल उठा रहे थे। तुषार गांधी ने अपनी किताब लेट्स किल गांधी में लिखा है, ‘‘गांधी की हत्या में विनायक दामोदर सावरकर के रिहा हो जाने पर कई तरह के सवाल उठ रहे थे। सावरकर के ख़िलाफ़ मुकम्मल जांच नहीं की गई। पटेल ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि अगर सावरकर दोषी पाए जाते तो मुसलमानों के लिए परेशानी होती और हिन्दुओं के ग़ुस्से को नहीं संभाल पाते।’’ 
अब वही शिवसेना कांग्रेस के साथ सरकार बनाने जा रही है। उद्धव मुख्यमंत्री बनेंगे और ऐसा कांग्रेस के कारण होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस को अब वैसे लोग भी स्वीकार्य हैं जो सावरकर को भारत रत्न देने की मांग करते हैं, बाबरी मस्जिद विध्वंस का समर्थन करते हैं और जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के भी साथ खड़े हैं।
इन मुद्दों पर कांग्रेस की सोच बिल्कुल अलग है। संभव है कि अब भी अलग हो क्योंकि उसने अपनी सोच बदलने की कोई घोषणा नहीं की है। दूसरी तरफ़ शिवसेना से भी पूछा जा रहा है कि क्या उसने कांग्रेस के साथ आने के बाद हिन्दुत्व की राजनीति को अलविदा कह दिया है?
शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन ने मंगलावर की रात घोषणा की है कि उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री होंगे और शपथ ग्रहण समारोह शिवाजी पार्क में 28 नवंबर को होगा।
संयुक्त बैठक में एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा, ‘‘यह नए युग की शुरुआत है। महाराष्ट्र देश का अहम प्रदेश है। महाराष्ट्र परिवर्तन का इंतजार कर रहा है। यह सूबा एक बार फिर से नंबर वन होगा।’’  इस बैठक में उद्धव ठाकरे ने कहा कि सरकार बनाने के बाद वो दिल्ली अपने बड़े भाई से मिलने जाएंगे। ठाकरे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी कैंपेन के दौरान उन्हें छोटा भाई कहा था। उद्धव ने कहा, ‘‘यह सरकार बदले की भावना से काम नहीं करेगी लेकिन किसी ने बाधा पैदा करने की कोशिश की तो हमारी टीम माफ़ नहीं करेगी।’’ 
उद्धव ठाकरे से पहले देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार को इस्तीफ़े की घोषणा करते हुए कहा था, ‘‘शिवसेना ने झूठ बोला है और गठबंधन को धोखा दिया है। यह वैचारिक रूप से बेमेल गठबंधन है।’’ 
इसके जवाब में मंगलवार की रात उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘‘हां, ये सही बात है कि मैंने अपने पिता से अलग लाइन ली है। मैंने ऐसा क्यों किया इसे बताऊंगा। यह भी सही है कि मैं सोनिया गांधी की कांग्रेस और लंबे समय तक विरोधी रहे शरद पवार के साथ सरकार बना रहा हूं। मैंने ऐसा क्यों किया इस तर्क की भी व्याख्या करूंगा। लेकिन इससे पहले मुझे वो बताएं जिन्होंने मातोश्री आकर झूठ बोला। यह अपमान नहीं है तो क्या है? मेरा हिन्दुत्व कभी झूठ नहीं बोलता। अगर मैंने कोई वचन दिया है तो उसे पूरा करता हूं। बाला साहेब का यही सिद्धांत था।’’ 
इस बैठक में शरद पवार, उद्धव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बालासाहेब थोराट ने अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं से कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत साथ मिलकर काम करने की अपील की। इसी बैठक में उद्धव ने कहा, ‘‘आज मैं इस बात को लेकर निराश हूं कि मेरे पुराने सहयोगी ने मुझ पर भरोसा नहीं किया लेकिन जिनसे 30 सालों तक लड़ता रहा उन्होंने मेरे ऊपर भरोसा किया।’’ 
इसी बैठक में शरद पवार ने कहा, ‘‘जॉर्ज फर्नांडीस, मैं और बालासाहेब कभी भी सार्वजनिक रैलियों में नहीं उलझे। हम तीनों अच्छे दोस्त थे। कई बार मैंने दिवंगत मीनाताई ठाकरे के हाथों बने लज़ीज पकवान खाए हैं।’’  शिवसेना और कांग्रेस सत्ता में कभी साथ नहीं रहे लेकिन कई मुद्दों पर दोनों पार्टियां एक साथ कई रही हैं। शिवसेना उन पार्टियों में से एक है जिसने 1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल का समर्थन किया था। तब बाल ठाकरे ने कहा था कि आपातकाल देशहित में है।
आपातकाल ख़त्म होने के बाद मुंबई नगर निगम का चुनाव हुआ तो दोनों पार्टियों को बहुमत नहीं मिला। इसके बाद बाल ठाकरे ने मुरली देवड़ा को मेयर बनने में समर्थन देने का फ़ैसला किया था। 1980 में कांग्रेस को फिर एक बार शिव सेना का समर्थन मिला। बाल ठाकरे और सीनियर कांग्रेस नेता अब्दुल रहमान अंतुले के बीच अच्छे संबंध थे और ठाकरे ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में मदद की। 

 


Date : 27-Nov-2019

कृष्णकांत
सत्ता में कोई रहे, हम तो विपक्ष में ही रहेंगे क्योंकि हम जनता की तरफ हैं और जनता की बनाई हुई सत्ता का चरित्र हमेशा जनविरोधी होता है। यह हमें अच्छी तरह याद है कि तीन लाख किसानों की आत्महत्या की गिनती कांग्रेस ने ही गिनी थी। 
बिहार में नीतीश और लालू ने मिलकर बीजेपी को धूल चटा दी थी। बाद में बीजेपी और जदयू ने लालू के साथ वही किया था जो बीजेपी के साथ आज महाराष्ट्र में हुआ है। अचानक सरकार गिराकर लालू को सत्ता से बाहर किया गया था।
इसलिए बीजेपी का यह आरोप तो सही है कि शिवसेना ने गठबंधन तोडक़र वादाखिलाफी की, लेकिन इसके अलावा सारे आरोप अनर्गल हैं।
जैसे बीजेपी महबूबा मुफ्ती तक के साथ सरकार बनाने का अधिकार रखती है, वैसे ही कोई भी दल किसी के भी साथ सरकार बना सकता है। दलों की नैतिकता और विचारधारा की यह बहस और सवाल जनता का है। पार्टियां खुद उस दलदल में हैं। अगर अजित पवार के साथ सरकार चल जाती तो बीजेपी ने एक ऐसे आरोपी को डिप्टी सीएम बना दिया था जिस पर घोटाले के गंभीर आरोप हैं। खुद बीजेपी पर टेरर फंडिंग की आरोपी कंपनी से पैसा लेने का मामला अभी अभी सामने आया है। इलेक्टोरल बॉन्ड घोटाला भी अभी सामने आया है जिसके बारे में दस्तावेज सार्वजनिक हुए हैं। जिस तरह बीजेपी समझती है कि उसे हर राज्य में, बहुमत न होने के बावजूद सरकार बनाने का अधिकार है, वैसे ही हर दल सरकार बनाने का अधिकार रखता है।
यह भी स्पष्ट है कि कोई भी दल जनता के लिए सरकार नहीं बनाता। सब अपने लिए सरकार बनाते हैं और जितना संभव है लूटते हैं। मौजूदा महाराष्ट्र का नाटक इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
जो यह समझते हैं कि मोदी जी ईमानदार हैं तो इसका भी ताज़ा प्रमाण महाराष्ट्र है जब अचानक रात में एक असंवैधानिक शपथग्रहण करवाया गया। 80 घंटे भी सरकार नहीं चल पाई। अगर सुप्रीम कोर्ट न होता तो जाने क्या-क्या देखने को मिलता। अब लोग सवाल करेंगे कि कांग्रेस और एनसीपी ही कौन ईमानदार हैं, तो यह भी सही है। बनी सरकार गिराकर कुर्सी कब्जाने का खेल कांग्रेस का ही है जिसपर बीजेपी ज्यादा बेशर्मी से अमल कर रही है। इस अलोकतांत्रिक पाप की सबसे बड़ी गठरी कांग्रेस के सिर पर रखी है।
देश भर में अगर बीजेपी सिमट रही है तो इसका महत्व सिर्फ इतना है कि बीजेपी की निरंकुशता पर लगाम लगेगी। जो लोग मोदी की छवि को लेकर पागल हुए जा रहे थे वे भी यह समझ जाएंगे कि मोदी भी काजल की कोठरी में रहते हैं और उनका दामन भी उतना ही काला है।
सत्ता में कोई रहे, हम तो विपक्ष में ही रहेंगे क्योंकि हम जनता की तरफ हैं और जनता की बनाई हुई सत्ता का चरित्र हमेशा जनविरोधी होता है। यह हमें अच्छी तरह याद है कि तीन लाख किसानों की आत्महत्या की गिनती कांग्रेस ने ही गिनी थी। महाराष्ट्र किसानों की कब्रगाह है। यह उसकी महान नीतियों का नतीजा है। मोदीजी कांग्रेस से भी आगे निकल गए और आत्महत्या का आंकड़ा ही दबा लिया।
अब देखना है कि इस नई सरकार के पास इस कब्रगाह का क्या इलाज है?


Date : 26-Nov-2019

When he was y®, the renowned Bohemian novelist and short story writer FRANZ KAFKA (1883-1924), who never married and had no children, was strolling through Steglitz Park in Berlin, when he chanced upon a young girl crying her eyes out because she had lost her favorite doll. She and Kafka looked for the doll without success. Kafka told her to meet him there the ne&t day and they would look again.
The ne&t day, when they still had not found the doll, Kafka gave the girl a letter "written" by the doll that said, "Please do not cry. I have gone on a trip to see the world. I'm going to write to you about my adventures."
Thus began a story that continued to the end of KafkaÓs life.
When they would meet, Kafka read aloud his carefully composed letters of adventures and conversations about the beloved doll, which the girl found enchanting. Finally, Kafka read her a letter of the story that brought the doll back to Berlin, and he then gave her a doll he had purchased. "This does not look at all like my doll," she said. Kafka handed her another letter that e&plained, "My trips, they have changed me." The girl hugged the new doll and took it home with her.
A year later, Kafka died.
Many years later, the now grown-up girl found a letter tucked into an unnoticed crevice in the doll. The tiny letter, signed by Kafka, said, "Everything you love is very likely to be lost, but in the end, love will return in a different way."
(posted on facebook by Nitin Vohra)


Date : 26-Nov-2019

सिद्धार्थ

26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने संविधान के उस प्रारूप को स्वीकार किया, जिसे डॉ. बीआर आंबेडकर की अध्यक्षता में ड्राफ्टिंग कमेटी ने तैयार किया था। इसी रूप में संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ और भारत एक गणराज्य बना।
इसी की याद में 26 नवंबर के दिन को संविधान दिवस मनाने का चलन 2015 को शुरू किया गया। यह दिलचस्प है कि ये चलन उस साल शुरू हुआ जब डॉ. आंबेडकर की 125वीं जन्म जयंती मनाई जा रही थी। यह राष्ट्र की तरफ से डॉ. आंबेडकर को दी गई श्रद्धांजलि है।
सवाल उठता है कि संविधान सभा की ज्यादातर बैठकों में औसतन 300 सदस्य मौजूद रहे और सभी सदस्यों को संविधान के निर्माण में समान अधिकार प्राप्त था। तो आखिर क्यों डॉ. आंबेडकर को ही संविधान का मुख्य वास्तुकार या निर्माता कहा जाता है?
यह बात सिर्फ डॉ. आंबेडकर के व्यक्तित्व और विचारों के समर्थक ही नहीं कहते, बल्कि भारतीय संविधान सभा के सदस्यों ने भी इसे स्वीकारा और विभिन्न अध्येताओं ने भी किसी न किसी रूप में इसे मान्यता दी। नेहरू के आत्मकथा लेखक माइकेल ब्रेचर ने आंबेडकर को भारतीय संविधान का वास्तुकार माना और उनकी भूमिका को संविधान के निर्माण में फील्ड जनरल के रूप में रेखांकित किया। (नेहरू- ए पॉलिटिकल बायोग्राफी द्वारा माइकल ब्रेचर, 1959)।
संविधान सभा के समक्ष संविधान प्रस्तुत करते हुए अपने अंतिम भाषण में डॉ. आंबेडकर ने गरिमा और विनम्रता के साथ इतने कम समय में इतना मुकम्मल और विस्तृत संविधान तैयार करने का श्रेय अपने सहयोगियों को दिया। लेकिन पूरी संविधान सभा इस तथ्य से परिचित थी कि यह एक महान नेतृत्वकर्ता का अपने सहयोगियों के प्रति प्रेम और विनम्रता से भरा आभार है।
आंबेडकर संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे, जिसकी जिम्मेदारी संविधान का लिखित प्रारूप प्रस्तुत करना था। इस कमेटी में कुल 7 सदस्य थे। संविधान को अंतिम रूप देने में डॉ। आंबेडकर की भूमिका को रेखांकित करते हुए भारतीय संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के एक सदस्य टी। टी। कृष्णमाचारी ने नवम्बर 1948 में संविधान सभा के सामने कहा था- ‘सम्भवत- सदन इस बात से अवगत है कि आपने ( ड्राफ्टिंग कमेटी में) में जिन सात सदस्यों को नामांकित किया है, उनमें एक ने सदन से इस्तीफा दे दिया है और उनकी जगह अन्य सदस्य आ चुके हैं। एक सदस्य की इसी बीच मृत्यु हो चुकी है और उनकी जगह कोई नए सदस्य नहीं आए हैं। एक सदस्य अमरीका में थे और उनका स्थान भरा नहीं गया। 
एक अन्य व्यक्ति सरकारी मामलों में उलझे हुए थे और वह अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर रहे थे। एक-दो व्यक्ति दिल्ली से बहुत दूर थे और सम्भवत: स्वास्थ्य की वजहों से कमेटी की कार्यवाहियों में हिस्सा नहीं ले पाए। सो कुल मिलाकर यही हुआ है कि इस संविधान को लिखने का भार डॉ. आंबेडकर के ऊपर ही आ पड़ा है। मुझे इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि हम सब को उनका आभारी होना चाहिए कि उन्होंने इस जिम्मेदारी को इतने सराहनीय ढंग से अंजाम दिया है।’ (संविधान सभा की बहस, खंड- 7, पृष्ठ- 231)
संविधान सभा में आंबेडकर की भूमिका कम करके आंकने वाले अरूण शौरी जैसे लोगों का जवाब देते हुए आंबेडकर के गंभीर अध्येता क्रिस्तोफ जाफ्रलो लिखते हैं कि- हमें ड्राफ्टिंग कमेटी की भूमिका का भी एक बार फिर आकलन करना चाहिए। यह कमेटी सिर्फ संविधान के प्रारम्भिक पाठों को लिखने के लिए जिम्मेदार नहीं थी, बल्कि उसको यह जिम्मा सौंपा गया था कि वह विभिन्न समितियों द्वारा भेजे गए अनुच्छेदों के आधार पर संविधान का लिखित पाठ तैयार करे, जिस बाद में संविधान सभा के सामने पेश किया जाए। सभा के समक्ष कई मसविदे पढ़े गए और हर बार ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों ने चर्चा का संचालन और नेतृत्व किया था। अधिकांश बार यह जिम्मेदारी आंबेडकर ने ही निभाई थी। ( क्रिस्तोफ जाफ्रलो, भीमराव आंबेडकर, एक जीवनी, 130)
इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए प्रमुख समाजशास्त्री प्रोफेसर गेल ऑम्वेट लिखती हैं कि संविधान का प्रारूप तैयार करते समय अनके विवादित मुद्दों पर अक्सर गरमागरम बहस होती थी। इन सभी मामलों के संबंध में आंबेडकर ने चर्चा को दिशा दी, अपने विचार व्यक्त किए और मामलों पर सर्वसम्मति लाने का प्रयास किया।
आंबेडकर उन चंद लोगों में शामिल थे, जो ड्राफ्टिंग कमेटी का सदस्य होने के साथ-साथ शेष 15 समितियों में एक से अधिक समितियों के सदस्य थे। संविधान सभा द्वारा ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष के रूप में उनका चयन उनकी राजनीतिक योग्यता और कानूनी दक्षता के चलते हुए था।
संविधान को लिखने, विभिन्न अनुच्छेदों-प्रावधानों के संदर्भ में संविधान सभा में उठने वाले सवालों का जवाब देने, विभिन्न विपरीत और कभी-कभी उलट से दिखते प्रावधानों के बीच संतुलन कायम करने और संविधान को भारतीय समाज के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करने में डॉ. आंबेडकर की सबसे प्रभावी और निर्णायक भूमिका थी।
स्वतंत्रता, समता, बंधुता, न्याय, विधि का शासन, विधि के समक्ष समानता, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और धर्म, जाति, लिंग और अन्य किसी भेदभाव के बिना सभी व्यक्तियों के लिए गरिमामय जीवन भारतीय संविधान का दर्शन एवं आदर्श है। ये सारे शब्द डॉ. आंबेडकर के शब्द और विचार संसार के बीज शब्द हैं। इस शब्दों के निहितार्थ को भारतीय समाज में व्यवहार में उतारने के लिए वे आजीवन संघर्ष करते रहे। इसकी छाप भारतीय संविधान में देखी जा सकती है।
भारत का नया संविधान काफी हद तक 1935 के गर्वमेंट ऑफ इंडिया एक्ट और 1928 के नेहरू रिपोर्ट पर आधारित है, मगर इसको अंतिम रूप देने के पूरे दौर में आंबेडकर का प्रभाव बहुत गहरा था। डॉ. आंबेडकर भारतीय संविधान की सामर्थ्य एवं सीमाओं से भी बखूबी अवगत थे। इस संदर्भ में उन्होंने कहा था कि संविधान का सफल या असफल होना आखिरकार उन लोगों पर निर्भर करेगा, जिन पर शासन चलाने का दायित्व है। वे इस बात से भी बखूबी परिचित थे कि संविधान ने राजनीतिक समानता तो स्थापित कर दी है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक समानता हासिल करना बाकी है, जो राजनीतिक समानता को बनाए रखने लिए भी जरूरी है। (द प्रिंट)  
(लेखक हिंदी साहित्य में पीएचडी हैं और फ़ॉरवर्ड प्रेस हिंदी के संपादक हैं।)

 

 


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