विचार / लेख

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25-Sep-2020 9:21 PM

70 के दशक में हैजा भी महामारी के रूप में पूरे विश्व में फैला था, तब अमेरिका में किसी ने ओशो रजनीश जी से प्रश्न किया

-इस महामारी से कैसे बचे?

ओशो ने विस्तार से जो समझाया वो आज कोरोना के संबंध में भी बिल्कुल प्रासंगिक है।

ओशो- यह प्रश्न ही आप गलत पूछ रहे हैं, प्रश्न ऐसा होना चाहिए था कि महामारी के कारण मेरे मन में मरने का जो डर बैठ गया है उसके संबंध में कुछ कहिए!

इस डर से कैसे बचा जाए...?

क्योंकि वायरस से बचना तो बहुत ही आसान है, लेकिन जो डर आपके और दुनिया के अधिकतर लोगों के भीतर बैठ गया है, उससे बचना बहुत ही मुश्किल है।

अब इस महामारी से कम लोग, इसके डर के कारण लोग ज्यादा मरेंगे...।

‘डर’ से ज्यादा खतरनाक इस दुनिया में कोई भी वायरस नहीं है।

इस डर को समझिये, अन्यथा मौत से पहले ही आप एक जिंदा लाश बन जाएँगे।

यह जो भयावह माहौल आप अभी देख रहे हैं, इसका वायरस आदि से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक सामूहिक पागलपन है, जो एक अन्तराल के बाद हमेशा घटता रहता है, कारण बदलते रहते हैं, कभी सरकारों की प्रतिस्पर्धा, कभी कच्चे तेल की कीमतें, कभी दो देशों की लड़ाई, तो कभी जैविक हथियारों की टेस्टिंग!

इस तरह का सामूहिक पागलपन समय-समय पर प्रगट होता रहता है। व्यक्तिगत पागलपन की तरह कौमगत, राज्यगत, देशगत और वैश्विक पागलपन भी होता है।

इस में बहुत से लोग या तो हमेशा के लिए विक्षिप्त हो जाते हैं या फिर मर जाते हैं ।

ऐसा पहले भी हजारों बार हुआ है, और आगे भी होता रहेगा और आप देखेंगे कि आने वाले बरसों में युद्ध तोपों से नहीं बल्कि जैविक हथियारों से लड़ें जाएंगे।

मैं फिर कहता हूं हर समस्या मूर्ख के लिए डर होती है, जबकि ज्ञानी के लिए अवसर!

इस महामारी में आप घर बैठिए, पुस्तकें पढि़ए, शरीर को कष्ट दीजिए और व्यायाम कीजिये, फिल्में देखिये, योग कीजिये और एक माह में 15 किलो वजन घटाइए, चेहरे पर बच्चों जैसी ताजगी लाइये अपने शौक़ पूरे कीजिए।

मुझे अगर 15 दिन घर  बैठने को कहा जाए तो में इन 15 दिनों में 30 पुस्तकें पढूंगा और नहीं तो एक बुक लिख डालिये, इस महामंदी में पैसा इन्वेस्ट कीजिये, ये अवसर है जो बीस तीस साल में एक बार आता है पैसा बनाने की सोचिए....क्युं बीमारी की बात करके वक्त बर्बाद करते हैं...

ये ’भय और भीड़’ का मनोविज्ञान सब के समझ नहीं आता है।

‘डर’ में रस लेना बंद कीजिए...

आमतौर पर हर आदमी डर में थोड़ा बहुत रस लेता है, अगर डरने में मजा नहीं आता तो लोग भूतहा फिल्म देखने क्यों जाते?

यह सिर्फ एक सामूहिक पागलपन है जो अखबारों और टीवी के माध्यम से भीड़ को बेचा जा रहा है। लेकिन सामूहिक पागलपन के क्षण में आपकी मालकियत छिन सकती है...आप महामारी से डरते हैं तो आप भी भीड़ का ही हिस्सा है

ओशो कहते है...टीवी पर खबरें सुनना या अखबार पढऩा बंद करें, ऐसा कोई भी विडियो या न्यूज मत देखिये जिससे आपके भीतर डर पैदा हो।

महामारी के बारे में बात करना बंद कर दीजिए,  डर भी एक तरह का आत्म-सम्मोहन ही है। एक ही तरह के विचार को बार-बार घोकने से शरीर के भीतर रासायनिक बदलाव  होने लगता है और यह रासायनिक बदलाव कभी कभी इतना जहरीला हो सकता है कि आपकी जान भी ले ले, महामारी के अलावा भी बहुत कुछ दुनिया में हो रहा है, उन पर ध्यान दीजिए;

ध्यान-साधना से साधक के चारों तरफ  एक प्रोटेक्टिव आभा बन जाता है, जो बाहर की नकारात्मक उर्जा को उसके भीतर प्रवेश नहीं करने देता है, अभी पूरी दुनिया की उर्जा नाकारात्मक  हो चुकी  है।

ऐसे में आप कभी इस ब्लैक-होल में  गिर सकते हैं....ध्यान की नाव में बैठ कर हीं आप इस झंझावात से बच सकते हैं।

शास्त्रों का अध्ययन कीजिए,

साधू-संगत कीजिए, और साधना कीजिए, विद्वानों से सीखें

आहार का भी विशेष ध्यान रखिए, स्वच्छ जल पीएं,

अंतिम बात-

धीरज रखिए... जल्द ही सब कुछ बदल जाएगा...

जब तक मौत आ ही न जाए, तब तक उससे डरने की कोई जरूरत नहीं है और जो अपरिहार्य है उससे डरने का कोई अर्थ भी नहीं है, डर एक  प्रकार की मूढ़ता है, अगर किसी महामारी से अभी नहीं भी मरे तो भी एक न एक दिन मरना ही होगा, और वो एक दिन कोई भी दिन हो सकता है, इसलिए विद्वानों की तरह जीयें, भीड़ की तरह  नहीं!

 


25-Sep-2020 9:11 PM

नवनीत शर्मा/डॉ.अन्नपूर्णा

खेती के जिस व्यवसाय में देश की तीन चौथाई आबादी लगी हो उसका हाल में जारी ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ में अपेक्षित जिक्र भी न होना विचित्र है। क्या भूख, उत्पाहदन और ‘जीडीपी’ जनित अर्थव्यवस्था को साधे रखने तथा सर्वाधिक रोजगार देने वाली खेती शिक्षा सरीखे बुनियादी विषय में कोई अहमियत नहीं रखती? प्रस्तुत है, इसी विषय पर प्रकाश डालता नवनीत शर्मा और अन्नपूर्णा का यहा लेख।

-संपादक   

खुशहाल किसान की छवि में हम सर पर साफा बांधे, हाथों में हंसिया लिए, कानों में बाली पहने, मूछों पर ताव देते पुरुष को लहलहाते खेतों की तरफ देखते हुए कल्पित करते हैं। फिल्मी संकल्पना में भी खेत और किसान की खुशहाली सरसों के खेतों और बैसाखी के मेलों से ही की जाती है। अखबार पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है जैसे किसान बीसवीं सदी का वही मजबूर नायक है जो सूदखोरों, बिचौलियों और बाढ़-सूखे से त्रस्त है। इसी नायक की बढ़ती आत्महत्याओं की दर हमें यह सोचने का सहस ही नहीं देती कि कृषि बतौर पेशा या करियर 21वीं सदी के युवा का भी चयन हो सकता है।

आधुनिक किसान की प्रति छवि में अभी भी एक ठेठ-सा गंवईपन देखने के हम आदी है। ऐसे में पढ़-लिखकर खेती करना ऐसा लगता है कि डिग्रियों को जोत दिया गया है। यह बात इस सर्वेक्षण के सहारे भी पुष्ट होती है कि कृषि विश्वविद्यालयों में पढऩे के लिए आने वाले 52 प्रतिशत छात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि से होते हैं। जिस देश की 80 प्रतिशत आबादी अभी भी कृषि या उससे जुड़े व्यवसायों से जीवन-यापन करती हो, उस देश की ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ में इस पर एक पूरे अध्याय की उम्मीद की जाती है, पर शिक्षा शायद अभी भी उस औपनिवेशिक मनोदशा से नहीं उभर पायी है जिसका उद्देश्य ही पढ़-लिखकर ‘बाबू’ बनना है।

कौशल-परक शिक्षा में भी ‘खेती’ बतौर कौशल शायद ही स्थान पाये, क्योंकि ‘कुशल’ होने का सम्बन्ध एक निश्चित और मानकीकृत उत्पादन की क्षमता से ही होगा और भारतीय कृषि मंत्री जब यह बयान देते हों कि भारत में असल कृषि मंत्री तो ‘मानसून’ होता है तो खेती ‘कौशल’ कैसे बनेगी!

जमीन के मालिकाने, रैय्यतवाड़ी, बीज, सिंचाई, कटाई के संघर्षों के बाद फसल का सुरक्षित मंडी पहुंचना और उसका उचित मूल्य पर बिकना दिवास्वप्न-सा रहता है। खेती की शिक्षा पौधों की उपज भर का ज्ञान नहीं है, बल्कि यह एक समाज विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हस्तक्षेप है।

भुखमरी और अकाल से निपटने और सब तक भोजन और पौष्टिकता पहुंचाने की कवायद है। इस कृषि शिक्षा की तुलना में कहीं अधिक चिंता हम चिकित्सा शिक्षा की करते हैं, यह दीगर बात है कि कुपोषण और भूख के मसले तो केवल कृषि और उसकी पढ़ाई से ही हल किए जा सकते हैं।

बीसवीं सदी के पहले दशक में औपनिवेशिक शासन ने भी चिंता व्यक्त करते हुए छह कृषि अध्ययन संस्थानों की स्थापना की थी। उन्नीसवीं सदी के अंत में आए भीषण अकाल ने भी खेती की शिक्षा को पेशेवर तरीके से आजमाने का संबल दिया होगा। हालाँकि सन 47 में आज़ाद होने के तेरह साल बाद हमने कृषि शिक्षा की सुध ली। स्वतंत्र भारत में पहला कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर में 1960 में खुला, जबकि पहला ‘आईआईटी’ (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थाहन) 1950 में ही खोल दिया गया था। इस क्रम में हम भारत के उस रुझान को समझ सकते हैं जो आधुनिक भारत में गावों को कस्बों और कस्बों को शहरों में बदल देने की चाहत और खेती योग्य भूमि पर चमचमाते पंचतारा भवन बना देने को विकास मान लेता है।

खेती में बढ़ती लागत, मांग के अनुरूप फसल की उगाई, बीज की उपलब्धता से लेकर तैयार फसल को मंडी तक पहुंचाने की व्यवस्था, भंडारण की समस्या और सही समय पर उपज के प्रसंस्करण की अनुपलब्धता, भूमंडलीकरण के दबाव में ‘जीन संवर्धित’ (जीएम) बीजों की खरीद और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बढ़ती दखल न केवल खेती को एक नुकसान भरा पेशा बनाती है, वरन किसानों को आत्महत्या की तरफ भी धकेलती है। खेती बतौर पेशा पहले से ही युवाओं को लुभावना नहीं लगता और न ही उन्हें इसमें करियर बनाने की असीम संभावनाएं ही नजर आती हैं। युवा वर्ग उस पेशे के प्रति आकर्षित नहीं होता जिसमें हाथ और इच्छाओं दोनों का कुम्हलाना पहले से ही तय है।

कृषि विज्ञान में हुई अभूतपूर्व प्रगति ने कैसी भी परिस्थिति में उपज के लिए प्रजातियां विकसित कर ली हैं, परन्तु यह सब ज्ञान-विज्ञान अभी तक प्रयोगशाला की चौहद्दी में ही हैं और बड़े पैमाने पर खेती के चलन में नहीं आ सके हैं। प्रयोगशाला और खेत की दूरी पाटने के लिए ही ‘कृषि विज्ञान केंद्रों’ की संकल्पना की गयी है। आज लगभग हर जिले में एक ‘कृषि विज्ञान केंद्र’ है और सूचना तकनीक भी अपने स्तर पर किसानों तक ‘ज्ञान’ पहुंचाने के लिए प्रयासरत है। खेती करने की पारम्परिक समझ में वैज्ञानिक पुट को जोडऩे के प्रयास में ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ व्यापक स्तर पर ‘कृषि प्रौद्योगिक पार्कों’ को खोलने की संस्तुति करती है। इस नीति में पहले से मौजूद ‘कृषि विज्ञान केंद्रों’ तथा अशोक दलवाई की अध्यक्षता में बनी किसानों की आय को दोगुना करने वाली समिति की संस्तुतियों की विवेचना न करते हुए एक नए उपक्रम की स्थापना की सिफारिश की है।

प्रयोगशाला-जनित ज्ञान को किसान तक पहुंचाने के प्रयास में कोई मौलिक योगदान ‘राष्ट्री य शिक्षा नीति’ में नहीं दिखता और खेती की शिक्षा को बड़े चलताऊ नज़रिये से औपचारिकता पूरी करने हेतु एक पैबंद जैसा जोड़ दिया गया है। यह नीति प्राथमिक शिक्षा से लेकर अध्यापक शिक्षा तक के लिए एजेंडा तैयार करते हुए उन पर एक नई पाठ्यचर्या की तैयारी का सुझाव तो देती है, परन्तु कृषि शिक्षा की रूपरेखा के निर्माण और शिक्षण की योजना का उल्लेख नहीं करती। दूसरी तरफ, यह दस्तावेज चिन्हित करता है कि देशभर के तमाम विश्वविद्यालयों में से केवल 9 प्रतिशत में ही कृषि की पढाई होती है और उच्च शिक्षा में पहुंचने वाले समस्त विद्यार्थियों में से एक प्रतिशत से भी कम कृषि को बतौर अध्ययन का विषय चुनते हैं।

देश का कोई-न-कोई भाग हर साल सूखे, बाढ़ अथवा टिड्डियों जैसी समस्या की चपेट में होता है। साल-दर-साल अगली फसल की उम्मीद में किसान मानसून, मंडी और सरकारी सहयोग की अपेक्षा करता है। प्रत्येक वर्ष के राष्ट्रीय बजट में कृषि के लिए घटते आबंटन, तदनन्तर शिक्षा और शोध के लिए सरकारी मद का और भी कम होना कृषि विश्वविद्यालयों और ‘कृषि विज्ञान केंद्रों’ को सांस्थानिक और अकादमिक संकटों को झेलने के लिए मजबूर करता है।

इस संदर्भ में यह कोई आश्चर्य नहीं है कि आज़ादी के समय ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) में लगभग 58 फीसदी योगदान करने वाला कृषि-क्षेत्र अब केवल 15 फीसदी ही योगदान कर पा रहा है।

औद्योगीकरण, शहरीकरण और खेती के आंतरिक विरोधाभासों ने किसानों को बटाईदार से मालिकान खेतिहर बनने का सपना देखने का साहस भी छीन लिया है और साथ ही अपने बच्चों को भविष्य में खेती करते देखने का भी। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ ने जिन आत्मनिर्भर भारतीय नागरिकों के निर्माण का सपना संजोया है, जो न केवल ज्ञान, कर्म और व्यवहार, वरन विचार एवं बुद्धि के स्तर पर भी भारतीय हों। ऐसे नागरिकों की निर्मित में कृषि और कृषि शिक्षा के माध्यम से ‘उत्तम खेती, मध्यम बान’ की लोकोक्ति की संकल्पना को साकार किया जा सकता था, परन्तु ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ के वृहद्, विस्तृत और भविष्याग्रही दस्तावेज में भी खेती की शिक्षा खेत रही। (सप्रेस)

नवनीत शर्मा हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में अध्यापनरत हैं और अन्नपूर्णा स्वतंत्र कृषि वैज्ञानिक हैं जो महिलाओं के स्व-सहायता समूहों को संचालित करती हैं।


25-Sep-2020 8:42 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

इस बार संसद ने 8 दिन में 25 विधेयक पारित किए। जिस झपाटे से हमारी संसद ने ये कानून बनाए, उससे ऐसा लगने लगा कि यह भारत की नहीं, माओ के चीन या स्तालिन के रुस की संसद है। न संसदीय समितियों ने उन पर विचार किया और न ही संसद में उन पर संगोपांग बहस हुई। बहुत दिनों बाद मैंने टीवी चैनलों पर संसद की ऐसी लचर-पचर कार्रवाई देखी। मुझे याद है 55-60 साल पुराने वे दिन जब संसद में डा. लोहिया, आचार्य कृपालानी, मधु लिमये, नाथपाई और हीरेन मुखर्जी जैसे- लोग सरकार की बोलती बंद कर देते थे। प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों के पसीने छुड़ा देते थे। इस बार विपक्ष के कुछ सांसदों को सुनकर उनकी बहस पर मुझे बहुत तरस आया। सरकार ने तीन विधेयक किसानों और अन्य तीन विधेयक औद्योगिक मजदूरों के बारे में पेश किए थे।

इन विधेयकों का सीधा असर देश के 80-90 करोड़ लोगों पर पडऩा है। इन विधेयकों की कमियों को उजागर किया जाता, इनमें संशोधन के कुछ ठोस सुझाव दिए जाते और देश के किसानों व मजदूरों के दुख-दर्दों को संसद में गुंजाया जाता तो विपक्ष की भूमिका सराहनीय और रचनात्मक होती लेकिन राज्यसभा में जैसा हुड़दंग मचा, उसने संसद की गरिमा गिराई।अब 25 सितंबर को भारत-बंद का नारा दिया गया है। भारत तो वैसे भी बंद पड़ा है। महामारी कुलांचे मार रही है। अब किसानों और मजदूरों को अगर प्रदर्शनों और आंदोलनों में झोंका जाएगा तो वे कोरोना के शिकार हो जाएंगे। उन्हें क्या विपक्षी नेता सम्हालेंगे ? पक्ष और विपक्ष सभी के नेता तो इतने डरे हुए हैं कि भूखों को अनाज बांटने तक के लिए वे घर से बाहर नहीं निकलते। संसद से वेतन और भत्ते तो सभी ले रहे हैं लेकिन सदन में कितने सदस्य दिखाई पड़ते थे?

खैर, ये विधेयक अब कानून बन जाएंगे। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर भी हो जाएंगे। लेकिन सरकार और भाजपा का कर्तव्य है कि वह किसानों और मजदूरों से सीधा संवाद करे, विपक्षी नेताओं से सम्मानपूर्वक बात करे और विशेषज्ञों से पूछे कि किसान और मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए वह और क्या-क्या प्रावधान करे ? भाजपा सरकार को जो अच्छा लगता है, वह उसे धड़ल्ले से कर डालती है।उसके पीछे उसका सदाशय ही होता है लेकिन विपक्ष से मुझे यह कहना है कि वह इन कानूनों को साल-छह महिने तक लागू तो होने दे। फिर देखें कि यदि ये ठीक नहीं है तो इन्हें बदलने या सुधारने के लिए पूरा देश उनका साथ देगा। कोई भी सरकार कितनी ही मजबूत हो, वह देश के 80-90 करोड़ लोगों को नाराज़ करने का खतरा मोल नहीं ले सकती।

(नया इंडिया की अनुमति से)


25-Sep-2020 9:28 AM

- सुशीला सिंह

साल 1991, नवंबर महीने में बिहार राज्य में एक अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू हुई. हड़ताल कर रहे सरकारी कर्मचारियों की माँग थी कि केंद्र सरकार की तर्ज़ पर ही राज्य में जो वेतनमान लागू किया गया है उसमें हुई विसंगतियों को दूर किया जाए.

इस हड़ताल में एक चार्टर ऑफ़ डिमांड भी बनाया गया था जिसमें सबसे प्रमुख माँग समान वेतनमान लागू करने में विसंगतियों को दूर करना था. इस हड़ताल में स्कूल, यूनिवर्सिटी टीचर्स, बोर्ड कॉर्पोरेशन और बिहार राज्य कर्मचारी महासंघ भी शामिल था.

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन(ऐपवा) की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी कहती हैं कि उस दौर में महिलाएं आंदोलन में बहुत सक्रिय हो रही थीं और 1985 में ही किसान और मज़दूर अपने अधिकारों और सामंतवाद के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे थे और इसमें ग्रामीण और निम्नवर्गीय महिलाएं भी शामिल होने लगी थीं.

मीना तिवारी कहती हैं कि इन आंदोलन में महिलाओं के मुद्दों पर भी चर्चा होने लगी और उनके अधिकारों के लिए भी आवाज़ उठने लगी थी. इसमें संविधान में मिले अधिकार के बावजूद महिलाओं को वोट से दूर रखना, बराबर मज़दूरी की माँग जैसे मुद्दे गांव, देहात में महिलाएं उठा रही थीं. वहीं, शहरों में युवा महिलाओं पर भी इन मुद्दों का असर हो रहा था. राज्य में बुद्दिजीवी महिलाएं और कामकाजी महिलाएं, उनके लिए हॉस्टल और क्रेच की सुविधा देने की माँग उठाने लगीं. वहीं, इस बीच सरकारी कर्मचारियों का ये आंदोलन भी ज़ोर पकड़ रहा था.

जब ये हड़ताल चल रही थी उस दौरान सरोज चौबे ऐपवा में सचिव के पद पर थीं.

वे बताती हैं कि सरकारी महिला कर्मचारियों की संख्या बहुत कम थी और महिला संगठनों ने जब उन्हें हड़ताल में शामिल होने को कहा था तो उनमें हिचकिचाहट भी थी क्योंकि उनका मानना था कि जब इसमें पुरुष शामिल हो रहे हैं तो उनका बैठकों या आंदोलन में भाग लेने का क्या काम.

लेकिन अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ द्वारा संचालित इस हड़ताल में धीरे-धीरे महिला कर्मचारी, शिक्षिका, नर्स और टाइपिस्ट जुड़ती चली गईं. जब समस्याओं पर चर्चा हुई और सारी माँगों को सूचीबद्ध किया जा रहा था तभी हड़ताल में शामिल महिलाओं की तरफ़ से ये माँग उठी थी कि पीरियड्स के दौरान छुट्टी मिलनी चाहिए.

कैसे माने लालू प्रसाद

उस समय राज्य के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव. ये वो ज़माना था जब नीतिश कुमार जनता दल में ही थे.

अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष रामबलि प्रसाद कहते हैं कि केंद्रीय और राज्य स्तर पर समान वेतनमान के बीच विसंगतियां दूर करने और तमाम माँग मनवाने के लिए कोशिशें हो रही थीं और सरकार को ज्ञापन दिए भी गए लेकिन समाधान की ओर चीज़ें बढ़ती नज़र नहीं आ रही थीं.

फिर हमने हड़ताल करने की ठानी. वे बताते हैं कि इस दौरान मुख्यमंत्री और उनके प्रतिनिधियों के साथ कई बैठकों का दौर चलता था. जब पीरियड्स लीव वाला फ़ैसला लिया गया तो उस बैठक में रामबलि प्रसाद मौजूद थे.

रामबलि प्रसाद बताते हैं, ''मुख्यमंत्री और प्रतिनिधियों के साथ बैठक कई घंटे चलती थी. कई बैठक तो रात के आठ-नौ बजे शुरु होती और रात के दो बजे तक चलती रहती. जब हमारी माँगों पर चर्चा हो रही थी उसी समय महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान तीन दिन की छुट्टी का मुद्दा भी उठा. लालू प्रसाद ने उसे सुना और क़रीब पाँच मिनट के लिए चुप रहे और फिर इस पर सहमति जताते हुए कहा कि दो दिन छुट्टी दी जा सकती है और अपने अधिकारी को उसे नोट करने को कहा.''

बिहार सरकार की तरफ़ से राज्य की सभी नियमित महिला सरकारी कर्मचारियों को हर महीने दो दिनों के विशेष आकस्मिक अवकाश की सुविधा देने का फ़ैसला लिया गया.

बिहार में महिलाओं को पीरियड्स के दौरान मिली ये दो दिन की छुट्टी एक बड़ा और आंदोलनकारी क़दम था और शायद बिहार उस समय पहला ऐसा राज्य था जिसने सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए इस तरह का ऐलान किया था.

महिलाओं को सुविधा देने वाले इस फ़ैसले ने उनके लिए रास्ते तो खोल दिए थे लेकिन शर्म और झिझक का दरवाज़ा खुलना अभी बाक़ी था.

किसने खोला ये दरवाज़ा

प्रोफ़ेसर भारती एस कुमार पहली महिला मानी जाती हैं जिन्होंने यूनिवर्सिटी के स्तर पर ये लीव या छुट्टी लेने की शुरुआत की थी. वे उस समय पटना यूनिवर्सिटी में इतिहास के पीजी विभाग में प्रोफ़ेसर थीं.

उनका कहना है कि सरकार की तरफ़ से आदेश तो जारी हो गया था लेकिन यूनिवर्सिटी में इस अधिसूचना को नहीं लगाया गया था और वो कहीं फ़ाइल में बस पड़ा हुआ था.

जो हड़ताल हुई थी उसमें पटना यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (PUTA) और फ़ेडेरेशन ऑफ़ यूनिवर्सिटी (सर्विस) टीचर्स एसोसिएशन ऑफ़ बिहार(FUSTAB) भी शामिल हुआ था.

हम लोगों ने एसोसिएशन से भी पूछा कि इस बात पर सहमति बनी है न कि छुट्टी दी जाएगी, तो उन्होंने भी कहा कि ये फ़ैसला लिया जा चुका है और आदेश भी जारी किया जा चुका है. लेकिन वो बात यूनिवर्सिटी में सर्कुलेट होकर हम तक नहीं पहुँच रही थी. हम इस लीव को लेकर चर्चा करते थे लेकिन महिला शिक्षिकाएं इसे लेने में झिझक रही थीं.

वे बताती हैं, ''मैंने ये ठान लिया था कि मैं अपने पीरियड्स के लिए छुट्टी लूंगी. मैंने कहा कि मैं इसकी शुरुआत करुंगी. जब मेरे पीरियड्स का समय आया तो मैंने इस बारे में चिट्ठी लिखी और मेरे विभाग के हेड को दी. उन्होंने पहले मेरी चिट्ठी को देखा और फिर मुझे. मैंने चिट्ठी तो दे दी थी लेकिन मेरे पांव कांप रहे थे और मुझे बहुत झिझक भी हो रही थी. क्योंकि हमने तो बचपन से कभी पीरियड्स के बारे में खुलकर किसी से बात ही नहीं की थी और न कोई करता था. जब उन्होंने उस चिट्ठी को साइन करके क्लर्क को बढ़ाया. उनके चेहरे पर तंज़ वाली मुस्कराहट आई जैसे ये कहना चाहते हों कि अच्छा अब तुम लोगों को इसके लिए भी छुट्टी चाहिए''.

इसके बाद मैंने टीचर्स लेडीज़ क्लब में जाकर बताया कि हम जीत गए तो उन्होंने पूछा कि क्या मतलब? तो मैंने कहा कि मुझे छुट्टी मिल गई तो उन्होंने कहा कि अरे आपको मिल गई है तो हम भी अप्लाई कर सकेंगे.

वे बताती हैं कि छुट्टी तो मिल गई थी और ये हमारा हक़ भी था लेकिन इस छुट्टी के लिए आवेदन देने में महिलाओं को झिझक थी और उस टैबू को तोड़कर निकलने में वक़्त लगा लेकिन महिलाएं धीरे-धीरे आगे आईं और छुट्टी लेने लगीं.

क्या राज्यों में हो सकता है ये प्रावधान

नीति आयोग में लोकनीति विशेषज्ञ उर्वशी प्रसाद का भी कहना है कि बिहार में महिलाओं का अनुभव अच्छा रहा है. ये अब वहां एक समान्य चीज़ बन गई है और आपको पीरियड्स के वक़्त छुट्टी लेने के लिए कोई बहाने या कारण देने की ज़रुरत नहीं पड़ती.

अरुणाचल प्रदेश से आने वाली सांसद, निनांग एरिंग ने एक प्राइवेट मेंबर बिल, मेन्सटूरेशन बेनीफ़िट 2017 में लोकसभा में पेश किया था. इस बिल में सरकारी और नीजि क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान दो दिन की छुट्टी देने का प्रस्ताव दिया गया. साथ ही ये पूछा गया था कि सरकार क्या ऐसी किसी योजना पर विचार कर रही है. इस पर महिला और विकास मंत्रालय ने कहा था कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है.

यहां ये सवाल उठता है कि क्या अपने स्तर पर राज्य सरकारें इस तरह का क़दम नहीं उठा सकती हैं?

उर्वशी प्रसाद कहती हैं कि इस मुद्दे पर महिलाओं को आगे आना होगा और सरकार को हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं से पूछना चाहिए कि क्या इसकी ज़रुरत है? क्या इससे लाभ होगा?

क्योंकि जब मैटरनीटी लीव में छह महीने का प्रावधान किया गया तो कई संस्थानों की तरफ़ से ये भी कहा गया कि महिला को क्यों लें, उन्हें छह महीने की छुट्टी देनी पड़ेगी. ऐसे में कई चीज़ें महिलाओं की भलाई के लिए की जाती हैं और वो उनके लिए ही उल्टी साबित हो जाती हैं.

वहीं, कई बार समानता का भी सवाल उठता है कि महिला और पुरुष बराबर हैं तो ये छुट्टी क्यों? लेकिन इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता कि महिला और पुरुष का शरीर अलग है, उसे पीरियड्स होते हैं और वो मां बन सकती है जो पुरुष का शरीर नहीं कर सकता. ऐसे में ये तर्क ही बेमानी हो जाता है.

उर्वशी प्रसाद भी कहती हैं कि कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान ज़्यादा तकलीफ़ होती है, किसी को कम और किसी को बिल्कुल नहीं होती है. ऐसे में छुट्टी, घर से काम करने की आज़ादी जैसी सुविधा दी जानी चाहिए. जहां अब कोविड ने साबित कर दिया है कि घर से भी काम हो सकता है और सरकारी कर्मचारी तक कर रहे है. हां जो फ़ैक्टरी में काम करती हैं उनके लिए ये नहीं चल पाएगा इसलिए लचीला होने की ज़रुरत है. साथ ही जब समानता की बात होती है तो सरकारी नौकरियों में तो महिलाओं को बराबर वेतन मिलता है लेकिन निजी संस्थानों या असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले कम वेतन मिलता है तो समानता की बात तो वहीं झूठी साबित हो जाती है.

उनके मुताबिक़ ये बात भी बेमानी है कि इस तरह की लीव का महिलाएं फ़ायदा उठाती हैं. वे कहती हैं कि कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है लेकिन पुरुष भी ऐसे मामलों में फ़ायदा उठाते हैं. लेकिन राज्य सरकारों के स्तर पर ऐसी लीव का प्रावधान आएगा तो उसे लागू करना भी आसान हो सकता है.(bbc)


24-Sep-2020 7:01 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

संयुक्त राष्ट्र संघ के 75 वें अधिवेशन के उद्घाटन पर दुनिया के कई नेताओं के भाषण हुए लेकिन उन भाषणों में इन नेताओं ने अपने-अपने राष्ट्रीय स्वार्थों को परिपुष्ट किया, जैसा कि वे हर साल करते हैं लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल उठाए, जो विश्व राजनीति के वर्तमान नक्शे को ही बदल सकते हैं। उन्होंने सुरक्षा परिषद के मूल ढांचे को ही बदलने की मांग रख दी। इस समय दुनिया में अमेरिका और चीन ही दो सबसे शक्तिशाली राष्ट्र हैं। आजकल दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध मुक्का ताने हुए हैं। उनके नेता डोनाल्ड ट्रंप और शी चिन फिंग ने एक-दूसरे को निशाना बनाया। ट्रंप ने दुनिया में कोरोना विषाणु फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया और चीन ने कहा कि अमेरिका सारी दुनिया मे& राजनीतिक विषाणु फैला रहा है।

शी चिन फिंग ने कहा कि चीन की दिलचस्पी न तो गर्म युद्ध में है और न ही शीत युद्ध में। मोदी ने अपने आप को इस चीन-अमेरिकी अखाड़ेबाजी से बचाया और सुरक्षा परिषद का विस्तार करने की बात कही। उन्होंने कहा कि जमाना काफी आगे निकल चुका है लेकिन संयुक्तराष्ट्र संघ 75 साल पहले जहां खड़ा था, वहीं खड़ा है। सुरक्षा परिषद के सिर्फ पांच सदस्यों को वीटो (निषेध) का अधिकार है याने उन पांच सदस्यों में से यदि एक सदस्य भी किसी प्रस्ताव या सुझाव को वीटो कर दे तो वह लागू नहीं किया जा सकता।याने उनमें से कोई एक राष्ट्र भी चाहे तो सारी सुरक्षा परिषद को ठप्प कर सकता है। कौन से हैं, ये पांच राष्ट्र ? अमेरिका, चीन, रुस, ब्रिटेन और फ्रांस ! इन पांचों को यह निषेधाधिकार क्यों मिला था? क्योंकि द्वितीय महायुद्ध (1939-45) में ये राष्ट्र हिटलर, मुसोलिनी और तोजो के खिलाफ एकजुट होकर लड़े थे। जो जीते हुए राष्ट्र थे, उन्होंने बंदरबांट कर ली।

संयुक्तराष्ट्र यों तो लगभग 200 राष्ट्रों का विश्व-संगठन है लेकिन इन पांच शक्तियों के हाथ में वह कठपुतली की तरह है। उसकी सुरक्षा परिषद में न तो कोई अफ्रीकी, न लातीन-अमेरिका और न ही कोई सुदूर-पूर्व का देश है। भारत-जैसा दुनिया का दूसरा बड़ा राष्ट्र भी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। 10 अस्थायी सदस्यों में इस वर्ष भारत भी चुना गया है। पांचों महाशक्तियां अपना मतलब गांठने के लिए गोलमाल शब्दों में भारत को स्थायी सदस्य बनाने की बात तो करती हैं लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। भारत के नेता भी दब्बू हैं। वरना आज तक उन्होंने ये मांग क्यों नहीं कि या तो वीटो (निषेधाधिकार) खत्म करो या चार-पांच अन्य राष्ट्र को भी दो। वीटो अधिकार का कोई सुनिश्चित आधार होना चाहिए। भारत चाहे संयुक्तराष्ट्र के बहिष्कार की भी धमकी दे सकता है। वह अपने साथ दर्जनों राष्ट्रों को जोड़ सकता है। (नया इंडिया की अनुमति से)


24-Sep-2020 6:05 PM

क्या आपको पता है कि आपके पसंदीदा बॉयलर चिकन के शरीर का आकार, हड्डियों की बनावट और आनुवांशिकी उसके पूर्वज मुर्गों या जंगली मुर्गों से मेल नहीं खाते? यह जानने के बाद आपका अगला सवाल हो सकता है, इसका मुझ पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? ब्रिटेन में लीसेस्टर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस सवाल पर वर्षों तक गहराई से शोध किया। दिसंबर, 2018 में जब उन्होंने अपने निष्कर्षों के बारे में लिखा, तो दुनिया एक ऐसी वास्तविकता से रूबरू हुई जिसकी आशंका हमें लंबे समय से थी। उनका निष्कर्ष था, “बॉयलर चिकन पूरी तरह से मानव निर्मित है।” शोधकर्ताओं में से एक एलिसन फोस्टर ने कहा, “मुर्गों को पालतू बनाए जाने के बाद से उनकी कई अजीब और सुंदर नस्लें आई हैं लेकिन बॉयलर शायद इनका सबसे चरम रूप है।”

यह अध्ययन बॉयलर चिकन की शारीरिक संरचना का पता लगाने के लिए नहीं था। इसके पीछे की मुख्य वजह एंथ्रोपोसीन नामक एक नए मानव युग के आगमन की पड़ताल करना था। हमारी धरती पर मौजूदा वक्त में 2,300 करोड़ बॉयलर चिकन मानवों का भोजन बनने के लिए तैयार हैं। इस तरह ये चिकन भूमि पर पाए जाने वाले कशेरुकी यानी रीढ़ की हड्डी वाले जीवों की सबसे बड़ी प्रजाति है।

शोधकर्ता ऐसी चीज की तलाश कर रहे थे, जिसमें मानव हस्तक्षेप के भारी संकेत हों। इसका उपयोग वैज्ञानिक रूप से यह इंगित करने के लिए किया जाएगा कि मनुष्यों ने पृथ्वी पर जीवन और पर्यावरण को कैसे प्रभावित किया है। यह बदले में नए मानव युग की घोषणा करने के लिए एक संकेतक के रूप में उपयोग किया जाएगा। शोधकर्ताओं ने कहा, “आधुनिक चिकन अब अपने पूर्वजों से इतना बदल गया है कि इसकी विशिष्ट हड्डियां निस्संदेह उस समय के जीवाश्म संकेत बन जाएंगी जब मनुष्य ने ग्रह पर शासन किया था।”

रोमन काल के मुर्गों के साथ बॉयलर चिकन की हड्डियों की तुलना करना इस शोध में शामिल था। शोधकर्ताओं ने दोनों मुर्गों की हड्डियों में शायद ही कोई समानता पाई। बॉयलर चिकन अपने मध्यकालीन रिश्तेदार की तुलना में दो गुना बड़ा है। इसका कंकाल तो बड़ा होता ही है, साथ ही हड्डियों की रासायनिक बनावट भी अलग होती है। इसके अलावा इनमें आनुवंशिक विविधता की भी काफी कमी है। बॉयलर चिकन के वैज्ञानिक मूल्यांकन से पता चला कि उनका आहार भी लगभग समान होता है। ये सब सिर्फ एक उद्देश्य से पाले जाते हैं और वह है मानव उपभोग के लिए मांस उपलब्ध कराना।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष था, “आधुनिक चिकन के वर्तमान रूप के लिए केवल और केवल मानव हस्तक्षेप जिम्मेदार है। हमने उनके जीन को बदलकर उनके चयापचय को नियंत्रित करने वाले रिसेप्टर (ग्राही) को म्यूटेट (परिवर्तित होना) कर दिया है जिसके कारण वे हमेशा भूखे रहते हैं। इस कारण वे ज्यादा से ज्यादा खाते हैं और उनके आकार में वृद्धि होती है। इतना ही नहीं, उनका पूरा जीवन चक्र मानव प्रौद्योगिकी द्वारा नियंत्रित होता है। उदाहरण के लिए, मुर्गियां जिस कारखाने में अपने अंडों से निकलती हैं, वहां का तापमान और आर्द्रता कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं। पहले ही दिन से उन्हें बिजली की रोशनी में रखा जाता है ताकि उनके भोजन के घंटे बढ़ाए जा सकें। उन्हें मारा भी मशीनों की ही मदद से जाता है। इससे एक घंटे में हजारों मुर्गों का मांस तैयार हो जाता है।”(DOWNTOEARTH)


24-Sep-2020 5:36 PM

-दिनेश श्रीनेत

उसकी आँखों के पीछे कुछ सुलगता रहता था। एक नाराज़गी, जो जाने कब लंबी उदासी में तब्दील हो चुकी थी- उसके चेहरे का स्थायी भाव बन गई थी। वह मुस्कुराता तो लगता कि किसी पर एहसान कर रहा है। कंधों पर उसका कोट झूलता रहता था। कमीज़ अक्सर बाहर होती थी। उसका गुस्सा निजी हदों को पार कर जाता था। उसकी नाराज़गी पूरे सिस्टम से थी। हमें हमेशा महसूस होता था कि उसकी सुलगन कभी भी एक भभकती आग में बदल सकती है। और ये सलीम-जावेद का कमाल था, जिन्होंने क्रोध को कविता में बदल दिया था। अमिताभ के खामोश गुस्से वाले वाले उन किरदारों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सारी दुनिया से नाराज़ यह शख्स भी प्रेम करता था। उसकी आवाज़ में कोमलता आ जाती थी। उसके इस प्रेम में सामने वाले के प्रति सम्मान था। वह अपने प्रेम को अभिव्यक्त नहीं करना चाहता था। प्रेम पानी की तरह खुद ही उसके भीतर अपनी शक्ल ले लेता था। मुझे तीन चेहरे याद आते हैं, तीन फिल्में याद आती हैं और तीन गीत भी याद आते हैं। फिल्में हैं- 'काला पत्थर', 'त्रिशूल' और 'शक्ति'। 

'काला पत्थर' में अंधेरी रात और बारिश के बीच एक छतरी के नीचे जाते राखी और अमिताभ को हम देखते हैं। ढाबे की धधकती भट्टी और धुएं के बीच पंजाबी गीत के बोल उठते हैं-  
इश्क़ और मुश्क़ कदे न छुपदे
ते चाहे लख छुपाइये
अखाँ लख झुकाके चलिये
पल्ला लख बचाइए
इश्क़ है सच्चे रब दी रहमत
इश्क़ तो क्यूँ शर्माइए

राखी असहज हो उठी हैं मगर अमिताभ उसी तरह मंथर चाल से सिर झुकाए उनके साथ कदम मिलाते हुए आगे बढ़ रहे हैं। ये कुछ ही कदमों में सिमटा हुआ गीत है। उस समय के चलन के विपरीत न तो नायक नायिका ख्वाब देखते हैं और न ही उनकी ड्रेस बदलती है। निर्देशक यश चोपड़ा बड़ी खूबसूरती से कदमों का यह सफर नायक नायिका के साथ तय करते हैं। अमिताभ की खामोशी यहां बोलती है। उनकी आंखें, वे जिस तरह चलते हैं, जैसे उन्होंने एक हाथ में छतरी और दूसरे हाथ में बाक्स थाम रखा है। बारिश और प्रेम की अभिव्यक्ति के मिलते-जुलते बहुत से गीत हिंदी फिल्मों में हैं। उनमें से ये गीत बेहद खूबसूरत है मगर अंडररेटेड है, इसकी कोई चर्चा नहीं मिलती।
 
दूसरा एक पार्टी गीत है। ख़य्याम की खूबसूरत धुन मानों पर्वतों से आने वाली ठंडी हवा हो। पिछले गीत की तरह यहां भी बोल साहिर के हैं, फिल्म है 'त्रिशूल'। प्रेम में डूबा एक जोड़ा गीत शुरू करता है और साहिर उसे एक धारदार बहस में तब्दील कर देते हैं। निजी प्रतिशोध में सुलगता हुआ एक व्यक्ति जो अपने ही वजूद के एक हिस्से यानी अपने पिता से नफरत लेकर आया है प्रेम को किस तरह देखता है? साहिर लिखते हैं- 
किताबों में छपते है, चाहत के किस्से
हक़ीकत की दुनिया में चाहत नहीं
ज़माने के बाज़ार में, ये वो शै' है 
के जिसकी किसी को, ज़रूरत नहीं है
ये बेकार बेदाम की चीज़ है

इस झुंझलाहट के बीच राखी की मौजूदगी भी है। वे पार्टी ड्रेस में हैं और उन्होंने आरेंज साड़ी पहन रखी है। ऐसा लगता है कि जैसे वे उसे छटपटाते गु्स्से को समझ रही हैं। अमिताभ जब उनकी तरफ देखते हैं तो लगता है कि उनकी निगाहों में एक उम्मीद है कि कोई मुझे समझ पाएगा।
 
आखिरी गीत 'शक्ति' फिल्म से है। पूरी फिल्म में कंधे पर कोट थामे एक नाराज़गी से भरा शख्स यहां पर थोड़े सुकून में दिखता है। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट भी है और वह प्रेम का इज़हार भी कर पा रहा है। खुश वो इतने हैं कि खिलते हुए फूलों के बीच जाकर कहते हैं, "लगता है मेरा सेहरा तैयार हो गया..." उनके साथ एक सांवली, खूबसूरत, उनके ही जैसी गंभीर स्त्री है- स्मिता पाटील। हालांकि जब आप पूरी फिल्म देखते हैं तो इस गीत में निहित त्रासदी उभर कर आती है, क्योंकि उनके बीच यह खुशी लंबे समय तक टिकने वाली नहीं है। 

इन तीनों फिल्मों में अमिताभ जिस खूबसूरती से अपनी कठोरता, क्रोध, खुद के जीवन की त्रासदी के बीच प्रेम की कोमलता को अभिव्यक्त करते हैं, उसमें कविता छिपी है। वे एक साथ लाखों लोगों के दिल पर असर कर जाते हैं। समय की सीमा पार कर जाते हैं और उनकी खामोश सुलगती निगाहें, वो सौम्य प्रेम- हमेशा-हमेशा के लिए आपके मन में बस जाता है। यह अमिताभ के अभिनय का कमाल तो है ही, ये सलीम-जावेद थे जिन्होंने उदासी, गुस्से और प्रेम के इन रंगों का ऐसा खूबसूरत संतुलन बनाया था। टॉमस हार्डी के किरदारों की तरह त्रासदी कहीं बाहर नहीं इन किरदारों के भीतर ही थी। जमाने से नाराज़गी भी, प्रेम भी, जिंदगी जीने की ललक भी और मृत्यु भी। (फेसबुक से)


24-Sep-2020 4:42 PM

किसान भाइयों और बहनों, 
सुना है आप सभी ने 25 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया है। विरोध करना और विरोध के शांतिपूर्ण तरीके का चुनाव करना आपका लोकतांत्रिक अधिकार है। मेरा काम सरकार के अलावा आपकी गलतियां भी बताना है। आपने 25 सितंबर को भारत बंद का दिन गलत चुना है। 25 सितंबर के दिन फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण बुलाई गई हैं। उनसे नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो नशा-सेवन के एक अतिगंभीर मामले में लंबी पूछताछ करेगा। जिन न्यूज चैनलों से आपने 2014 के बाद राष्ट्रवाद की सांप्रदायिक घुट्टी पी है, वही चैनल अब आपको छोडक़र दीपिका के आने-जाने से लेकर खाने-पीने का कवरेज करेंगे। ज़्यादा से ज़्यादा आप उन चैनलों से आग्रह कर सकते हैं कि दीपिका से ही पूछ लें कि क्या वह भारत के किसानों का उगाया हुआ अनाज खाती हैं या यूरोप के किसानों का उगाया हुआ अनाज खाती हैं। बस यही एक सवाल है जिसके बहाने 25 सितंबर को किसानों के कवरेज की गुजाइश बनती है। 25 सितंबर को किसानों से जुड़ी खबर ब्रेकिंग न्यूज बन सकती है। वर्ना तो नहीं।

आप भारत बंद कर रहे हैं। आपके भारत बंद से पहले ही आपको न्यूज चैनलों ने भारत में बंद कर दिया है। चैनलों के बनाए भारत में बेरोजगार बंद हैं। जिनकी नौकरी गई वो बंद हैं। इसी तरह से आप किसान भी बंद हैं। आपकी थोड़ी सी जगह अख़बारों के जिला संस्करणों में बची है जहां आपसे जुड़ी अनाप-शनाप ख़बरें भरी होंगी मगर उन खबरों का कोई मतलब नहींं होगा। उन ख़बरों में गांव का नाम होगा, आपमें से दो-चार का नाम होगा, ट्रैक्टर की फोटो होगी, एक बूढ़ी महिला पर सिंगल कॉलम खबर होगी। जि़ला संस्करण का जिक्र इसलिए किया क्योंकि आप किसान अब राष्ट्रीय संस्करण के लायक नहीं बचे हैं। न्यूज चैनलों में आप सभी के भारत बंद को स्पीड न्यूज में जगह मिल जाए तो आप इस खुशी में अपने गांव में भी एक छोटा सा गांव-बंद कर लेना। 
25 सितंबर के दिन राष्ट्रीय संस्करण की मल्लिका दीपिका जी होंगी।उस दिन जब वे घर से निकलेंगी तो रास्ते में ट्रैफिक पुलिस की जगह रिपोर्टर खड़े होंगे। अगर जहाज से उडक़र मुंबई पहुंचेंगी तो जहाज में उनके अलावा जितनी भी सीट खाली होगी सब पर रिपोर्टर होंगे। उनकी गाड़ी से लेकर साड़ी की चर्चा होगी। न्यूज चैनलों पर उनकी फिल्मों के गाने चलेंगे। उनके संवाद चलेंगे। दीपिका ने किसी फिल्म में शराब या नशे का सीन किया होगा तो वही दिन भर चलेगा। किसान नहीं चलेगा। 

2017 का साल याद कीजिए। संजय लीला भंसाली की फिल्म पद़्मावत आने वाली थी। उसे लेकर एक जाति विशेष के लोगों ने बवाल कर दिया। कई हफ्ते तक उस फिल्म को लेकर टीवी में डिबेट होती थी। तब आप भी इन कवरेज में खोए थे। हरियाणा, मध्यप्रदेश, गुजरात सहित कई राज्यों में इस फिल्म के प्रदर्शन को रोकने के लिए हिंसा हुई थी। दीपिका के सर काट लाने वालों के लिए 5 करोड़ के इनाम की राशि का एलान हुआ। वही दीपिका अब नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो जाएंगी तो चैनलों के कैमरे उनके कदमों को चूम रहे होंगे। उनकी रेटिंग आसमान चूम रही होगी। किसानों से चैनलों को कुछ नहीं मिलता है। बहुत से एंकर तो खाना भी कम खाते हैं। उनकी फिटनेस बताती है उन्हें आपके अनाज की मु_ी भर ही जरूरत है। खेतों में टिड्डी दलों का हमला हो तो इन एंकरों को बुला लेना। एक एंकर तो इतना चिल्लाता है कि उसकी आवाज से ही सारी टिड्डियां पाकिस्तान लौट जाएंगी। आपको थाली बजाने और डीजे बुलाने की जरूरत नहीं होगी। 

2014 से आप किसान भाई भी तो यही सब न्यूज चैनलों पर देखते आ रहे थे। जब एंकर गौ-रक्षा को लेकर लगातार भडक़ाऊ कवरेज़ करते थे तब आपका भी तो खून गरम होता था। आपको लगा कि आप कब तक खेती-किसानी करेंगे, कुछ धर्म की रक्षा-वक्षा भी की जाए। धर्म के नाम पर नफरत की अफीम आपको थमा दी गई। विचार की जगह तलवार भांजने का जोश भरा गया। आप रोज न्यूज चैनलों के सामने बैठकर वीडियो गेम खेल रहे थे। आपको लगा कि आपकी ताकत बढ़ गई है। आपके ही बीच के नौजवान व्हाट्स एप से जोड़ कर भीड़ में बदल दिए गए। जैसे ही गौ-रक्षा का मुद्दा उतरा आपके खेतों में सांडों का हमला हो गया। आप सांडों से फसल को बचाने के लिए रात भर जागने लगे। 

मैं गिनकर तो नहीं बता सकता कि आपमें से कितने सांप्रदायिक हुए थे मगर जितने भी हुए थे उसकी कीमत सबको चुकानी पड़ेगी। यह पत्र इसलिए लिख रहा हूं ताकि 25 सितंबर को कवरेज होने पर आप शिकायत न करें। आपने इस गोदी मीडिया में कब जनता को देखा है। 17 सितंबर को बेरोजगारों ने आंदोलन किया, वे भी तो आपके ही बच्चे थे। क्या उनका कवरेज हुआ, क्या उनके सवालों को लेकर बहस आपने देखी?

याद कीजिए जब मुजफ्फरनगर में दंगे हुए थे। एक घटना को लेकर आपके भीतर किस तरह से कुप्रचारों से नफरत भरी गई। आपके खेतों में दरार पड़ गई। जब आप सांप्रदायिक बनाए जाते हैं तभी आप गुलाम बनाए जाते हैं। जिस किसी से यह गलती हुई है, उसे अब अकेलेपन की सज़ा भुगतनी होगी। आज भी दो-चार अफवाहों से आपको भीड़ में बदला जा सकता है। व्हाट्स एप के नंबरों को जोड़ कर एक समूह बनाया गया। फिर आपके फोन में आने लगे तरह तरह के झूठे मैसेज। आपके फोन में कितने मैसेज आए होंगे कि नेहरू मुसलमान थे। जो लोग ऐसा कर रहे थे उन्हें पता है कि आपको सांप्रदायिक बनाने का काम पूरा हो चुका है। आप जितने आंदोलन कर लो, सांप्रदायिकता का एक बटन दबेगा और गांव का गांव भीड़ में बदल जाएगा। गांव में पूछ लेना कि रवीश कुमार ने बात सही कही है या नहीं। 

भारत वाकई प्यारा देश है। इसके अंदर बहुत कमियां हैं। इसके लोकतंत्र में भी बहुत कमियां हैं मगर इसके लोकतंत्र के माहौल में कोई कमी नहीं थी। मीडिया के चक्कर में आकर इसे जिन तबकों ने खत्म किया है उनमें से आप किसान भाई भी हैं। आप एक को वोट देते थे तो दूसरे को भी बगल में बिठाते थे। अब आप ऐसा नहीं करते हैं। आपके दिमाग से विकल्प मिटा दिया गया है। आप एक को वोट देते हैं और दूसरे को लाठी मार कर भगा देते हैं। आप ही नहीं, ऐसा बहुत से लोग करने लगे हैं। जैसे ही आपकी बातों से विकल्प की जगह खत्म हो जाती है, विपक्ष खत्म होने लगता है। विपक्ष के ख़त्म होते ही जनता खत्म होने लगती है। विपक्ष जनता खड़ा करती है। विपक्ष को मार कर जनता कभी खड़ी नहीं हो सकती है। जैसे ही विपक्ष खत्म होता है, जनता खत्म हो जाती है। मेरी इस बात को गाढ़े रंग से अपने गांवों की दीवारों पर लिख देना और बच्चों से कहना कि आपसे गलती हो गई, वो गलती न करें। 

किसानों के पास कभी भी कोई ताकत नहीं थी। एक ही ताकत थी कि वे किसान हैं। किसान का मतलब जनता हैं। किसान सडक़ों पर उतरेगा, ये एक दौर की सख्त चेतावनी हुआ करती थी। हेडलाइन होती थी। अखबार से लेकर न्यूज चैनल कांप जाते थे। अब आप जनता नहीं हैं। जैसे ही जनता बनने की कोशिश करेंगे चैनलों पर दीपिका का कवरेज बढ़ जाएगा और आपकी पीठ पर पुलिस की लाठियां चलने लगेंगी। मुकदमे दर्ज होने लगेंगे। भारत बंद के दौरान आपको कैमरे वाले खूब दिखेंगे मगर कवरेज दिखाई नहीं देगा। लोकल चैनलों पर बहुत कुछ दिख जाएगा मगर राष्ट्रीय चैनलों पर कुछ से ज्यादा नहीं दिखेगा। अपने भारत बंद के आंदोलन का वीडियो बना लीजिएगा ताकि गांव में वायरल हो सके। 

आपको इन चैनलों ने एक सस्ती भीड़ में बदल दिया है। आप आसानी से इस भीड़ से बाहर नहीं आ सकते। मेरी बात पर यकीन न हो कोशिश कर लें। मोदी जी कहते हैं कि खेती के तीन कानून आपकी आजादी के लिए लाए गए हैं। इस पर पक्ष-विपक्ष में बहस हो सकती है। बड़े-बड़े पत्रकार जिन्होंने आपके खेत से फ्री का गन्ना तोड़ कर खाते हुए फोटो खींचाई थी वे भी सरकार की तारीफ़ कर रहे हैं।  मैं तो कहता हूं कि क्यों भारत बंद करते हैं, आप इन्हीं एंकरों से खेती सीख लीजिए। उन्हीं से समझ लीजिए। 

शास्त्री जी के एक आह्वान पर आपने जान लगा दी। उन्होंने एक नारा दिया जय जवान-जय किसान। उनके बाद से जब भी यह नारा लगता है कि किसान की जेब कट जाती है। नेताओं को पता चल गया कि हमारा किसान भोला है। भावुकता में आ जाता है। देश के लिए बेटा और अनाज सब दे देगा। आपका यह भोलापन वाकई बहुत सुंदर है। आप ऐसे ही भोले बने रहिए। सब न्यूज चैनलों के बनाए प्यादों की तरह हो जाएंगे तो कैसे काम चलेगा। बस जब भी कोई नेता जय जवान-जय किसान का नारा लगाए, अपने हाथों से जेब को भींच लीजिए। 

आप तो कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। न्यूज चैनल चाहते तो तभी बहस कर सकते थे। बाकी किसानों को पता होता कि क्या कानून आ रहा है, क्या होगा या क्या नहीं होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैंने तो कहा था कि न्यूज चैनल और अखबार खरीदना बंद कर दें। वो पैसा आप प्रधानमंत्री राहत कोष में दे दें। आप माने नहीं। जो गुलाम मीडिया का खऱीदार होता है वह भी गुलाम ही समझा जाता है। वैसे मई 2015 में प्रधानमंत्रीजी ने आपके लिए किसान चैनल लांच किया है। उम्मीद है आप वहां दिख रहे होंगे।
  
पत्र लंबा है। आपके बारे में कुछ छपेगा-दिखेगा तो नहीं इसलिए भी लंबा लिख दिया ताकि 25 तारीख को आप यही पढ़ते रहें। मेरा यह पत्र खेती के कानूनों के बारे में नहीं है। मेरा पत्र उस मीडिया संस्कृति के बारे में हैं जहां एक फिल्म अभिनेता की मौत के बहाने बालीवुड को निशाने बनाने का तीन महीने से कार्यक्रम चल रहा है। आप सब भी वही देख रहे हैं। आप सिर्फ यह नहीं देख रहे हैं कि निशाने पर आप हैं। 
-रवीश कुमार


24-Sep-2020 9:41 AM

राज्यसभा में विपक्ष की अनुपस्थिति में तीन श्रम विधेयकों को मंजूरी दे दी गई

- DTE Staff

राज्‍यसभा में 23 सितंबर 2020 को श्रम कानून से जुड़े तीन अहम विधेयक भी पास हो गए। लोकसभा में इन्हें 22 सितंबर को पास किया गया था। ये तीनों श्रम कानून उन चार कोड का हिस्सा हैं, जिन्हें श्रम मंत्रालय ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित करने के लिए तैयार किया था। संसद ने 2019 में मजदूरी पर इस कोड को पारित किया था, जिसे बाद में सरकार ने अधिसूचित किया था।

23 सितंबर को राज्यसभा ने जिन तीन विधेयक को पास किया, उनमें सामाजिक सुरक्षा बिल 2020, आजीविका सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता बिल 2020 और औद्योगिक संबंध (इंडस्ट्रियल रिलेशंस) संहिता बिल 2020 शामिल हैं। हालांकि विपक्षी दलों ने इनका विरोध किया और उनकी गैर-मौजूदगी में इन विधेयक को मंजूरी दे दी गई।

इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड के तहत कंपनियों को भर्ती और छंटनी को लेकर ज्‍यादा अधिकार दिए गए हैं। अभी के श्रम कानून के मुताबिक 100 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों को छंटनी या यूनिट बंद करने से पहले सरकार की मंजूरी नहीं लेनी पड़ती है, लेकिन अब नए विधेयक में यह सीमा बढ़ाकर 300 कर्मचारी कर दी है। इसका आशय यह है कि जिन कंपनियों में 300 तक कर्मचारी हैं, उन्‍हें कर्मचारियों की भर्ती या छंटनी के लिए श्रम विभाग की इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी। इसका फायदा बड़ी कंपनियों को मिलेगा, वे कर्मचारियों की छंटनी करने के अलावा कंपनी बंद करना भी आसान होगा। इसके अलावा नए विधेयक में राज्‍य सरकारों को अपनी जरूरत के अनुसार इस संख्या को बढ़ाने की शक्तियां भी प्रदान की गई हैं।

राज्यसभा में विधेयक के बारे में जानकारी देते हुए केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने कहा कि इससे बड़ी फैक्ट्रियों को निवेश करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जा सकेगा। साथ ही, कंपनी ज्‍यादा कर्मचारी रखेंगी, क्योंकि इस कानून से बचने के लिए कई कंपनियां 100 से अधिक कर्मचारियों की भर्ती नहीं करती थी। इसके अलावा विधेयक में फिक्‍स्‍ड-टर्म इम्‍प्‍लॉयमेंट को कानूनी वैद्यता देने की बात कही गई है। साथ ही, कॉन्‍ट्रैक्‍ट वर्कर्स के छंटनी के नियमों को भी आसान किया गया है।

श्रम मंत्री ने कहा कि सभी वर्कर्स को किसी न किसी प्रकार से सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने के लिए सामाजिक सुरक्षा संहिता बिल पारित किया गया है। इसमें असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले वर्कर्स को सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की बात कही गई है।

इसके अलावा आजीविका सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता बिल के तहत सरकार ने स्टाफिंग कंपनियों के लिए एकल लाइसेंस की अनुमति दी जाएगी। अनुबंध (कांट्रेक्ट) पर श्रमिकों को काम पर रखने के लिए इसकी जरूरत पड़ती है। पहले इसके लिए कई लाइसेंस लेने पड़ते थे, लेकिन अब इसमें बदलाव किया गया है। इसके अलावा अनुबंध पर काम करने वाले कर्मचारियों की सीमा 20 से बढ़ाकर 50 कर दी गई है। इससे सभी क्षेत्रों में ठेके पर काम पर रखने में नियोक्ताओं को आसानी होगी।(downtoearth)


24-Sep-2020 9:38 AM

विलुप्ति की टाइमिंग बताती है कि उनका गायब होना एक नई प्रजाति के उदय का नतीजा हो सकती है। यह प्रजाति थी होमो सेपियंस 

निक लॉन्गरिच 

तीन लाख साल पहले धरती पर मनुष्यों की 9 प्रजातियों का प्रादुर्भाव हुआ। वर्तमान में केवल एक प्रजाति ही बची है। इनकी एक प्रजाति थी होमो निअंडरथलेंसिस जिसे निअंडरथल्स के नाम से जाना जाता था। ये नाटे शिकारी थे और यूरोप के ठंडे मैदानों में रहने के अभ्यस्थ थे। इसी तरह डेनिसोवंस प्रजाति एशिया में रहती थी जबकि आदिम प्रजाति होमो इरेक्टस इंडोनेशिया और होमो रोडेसिएंसिस मध्य अफ्रीका में पाई जाती थी। इनके समानांतर कम ऊंचाई और छोटे मस्तिष्क वाली मनुष्यों की अन्य प्रजातियां भी थीं। दक्षिण अफ्रीका में होमो नलेदी, फिलीपींस में होमो लूजोनेंसिस, इंडोनेशिया में होमो फ्लोरेसिएंसिस (होबिट्स) और चीन में रहस्यमय रेड डियर केव प्रजाति के मानव होते थे। जिस तरह से हमें बहुत जल्दी नई-नई प्रजातियों का पता चल रहा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अभी और प्रजातियों की जानकारी सामने आएगी।

उपरोक्त प्रजातियां करीब 10 हजार साल पहले खत्म हो गईं। इन प्रजातियों की विलुप्ति को मास एक्सटिंग्शन यानी व्यापक विलुप्ति के रूप में देखा जा रहा है। क्या ये विलुप्ति प्राकृतिक कारकों जैसे ज्वालामुखी फटने, जलवायु परिवर्तन या एस्टोरॉइड प्रभाव का नतीजा थी? यह कहना मुश्किल है क्योंकि अब तक इसके प्रमाण नहीं मिले हैं। मनुष्यों की विलुप्ति की टाइमिंग बताती है कि उनका गायब होना एक नई प्रजाति के उदय का नतीजा हो सकती है। यह प्रजाति 2,60,000-3,50,000 साल पहले दक्षिणी अफ्रीका में पनपी और इसका नाम था होमो सेपियंस। आधुनिक मानव इसी प्रजाति से ताल्लुक रखता है। ये मानव अफ्रीका से निकलकर दुनियाभर में फैल गए और छठी विलुप्ति का कारण बने। करीब 40 हजार साल पहले हिमयुग के स्तनधारियों की समाप्ति से वर्षा वनों के नष्ट होने के बाद इसकी शुरुआत हुई थी। ऐसे में क्या कहा जा सकता है कि छठी विलुप्ति के पहले शिकार मनुष्य बने?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि हम बेहद खतरनाक प्रजाति हैं। हमने विशालकाय ऊनी हाथी मैमथ, ग्राउंड स्लोथ और विशाल पक्षी मोआ का इतना शिकार किया कि वे खत्म हो गए। हमने जंगलों और वनों को खेती के लिए बर्बाद कर दिया। हमने आधी से अधिक धरती की तस्वीर बदलकर रख दी। हमने धरती की जलवायु में तब्दीली कर दी। हम मनुष्यों की दूसरी प्रजातियों के लिए सबसे खतरनाक साबित हुए क्योंकि हम संसाधनों और जमीन के भूखे हैं। इतिहास इसका गवाह है। हमने युद्धों से असंख्य लोगों को विस्थापित किया और उनका नामोनिशान तक मिटा दिया। चाहे प्राचीन कार्थेज शहर में रोम द्वारा किया गया विनाश हो या पश्चिम में अमेरिकी जीत अथवा ऑस्ट्रेलिया पर ब्रिटेन का कब्जा। हाल की बात करें तो बोस्निया, रवांडा, ईराक, दरफूर और म्यानमार का संदर्भ लिया जा सकता है जहां अलग मतावलंबियों का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ। नरसंहार में शामिल होना मानव की प्रवृत्ति रही है। इसलिए यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि शुरुआती होमो सेपियंस कम प्रादेशिक, कम हिंसक और कम असहनशील थे। दूसरे शब्दों में कहें तो उनमें मानवीय गुण कम थे।

बहुत से आशावादियों ने शुरुआती शिकारियों और संग्रहकर्ताओं को शांति चाहने वाले व सभ्य समाज के रूप में चित्रित किया है। उनकी दलील है कि प्रकृति के बजाय हमारी संस्कृति हिंसा के लिए जिम्मेदार है। लेकिन फील्ड अध्ययन, ऐतिहासिक घटनाक्रम और पुरातत्व विज्ञान बताता है कि शुरुआती सभ्यताओं में होने वाले युद्ध भीषण, व्यापक और खतरनाक होते थे। गुरिल्ला युद्ध में नवपाषाण (न्यूलिथिक) के औजार जैसे डंडे, बरछी, कुल्हाड़ी, धनुष आदि बड़े विनाशक साबित होते थे। इन समाजों में पुरुषों की मौत का मुख्य कारण ऐसे हिंसक संघर्ष थे। ऐसी हिंसाओं में प्रथम और दूसरे विश्वयुद्ध से अधिक मौतें हुई हैं। प्राचीन हड्डियां और कलाकृतियां बताती हैं कि ऐसी हिंसा प्राचीन काल से हो रही है।

“केनेविक मैन” नामक किताब में उत्तरी अमेरिका के केनेविक शहर में मिले एक ऐसे कंकाल का अध्ययन किया गया है जिसके कूल्हे में भाले का अगला हिस्सा टूटा मिला है। यह कंकाल करीब 9,000 साल पुराना है। केन्या का 10,000 साल पुराना एक ऐतिहासिक स्थल नटारुक कम से कम 27 महिलाओं, पुरुषों और बच्चों की निर्मम हत्या की गवाही देता है। अत: यह मानना संभव नहीं है कि मनुष्यों की दूसरी प्रजातियां शांतिप्रिय थीं। पुरुषों की संयुक्त रूप से होने वाली हिंसा बताती है कि युद्ध के साथ मनुष्यों का विकास हुआ है। निअंडरथल के कंकाल युद्ध कौशल दर्शाते हैं यानी उनके शरीर की बनावट युद्ध में शामिल होने की प्रवृति को इंगित करती है। बाद में परिष्कृत हथियारों ने होमो सेपियंस को सैन्य लाभ दिया। शुरुआती होमो सेपियंस के हथियारों में जावलिन, भाले, तीर व डंडे शामिल थे। उन्नत हथियारों ने बड़ी संख्या में जानवरों का शिकार करने और पौधों को काटने में मदद पहुंचाई। इससे बड़ी संख्या में लोगों को भोजन उपलब्ध हो सका और हमारी प्रजाति को अपनी संख्या बढ़ाने में रणनीतिक मदद मिली।

श्रेष्ठ हथियार

गुफाओं में बनी चित्रकारी, नक्काशियां और संगीत के यंत्र एक बेहद खतरनाक संकेत देते हैं। वह संकेत है अपने विचारों को व्यक्त करने और संचार की बेहतर क्षमता। सहयोग करना, योजना बनाना या रणनीति बनाना, चालाकी और धोखा देना हमारे उत्तम हथियार बन गए। जीवाश्म रिकॉर्ड अधूरे होने की वजह से इन विचारों को ठीक से नहीं परखा जा सका है। लेकिन यूरोप एक ऐसा स्थान है, जहां तुलनात्मक रूप से पूर्ण पुरातात्विक रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। यहां के जीवाश्म रिकॉर्ड बताते हैं कि हमारे आने के कुछ हजार सालों में ही निअंडरथल्स विलुप्त हो गए। यूरेशियन लोगों में निअंडरथल्स के डीएनए के कुछ अंश मिले हैं जो बताते हैं कि उनकी विलुप्ति के बाद हमने केवल उनका स्थान ही नहीं लिया बल्कि हम मिले और हमारा मिलन होता गया। यानी हम अपनी संख्या दिन दूनी, रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ाते गए।

अन्य कुछ डीएनए भी आदिम प्रजातियों से हुए हमारे संपर्क पर रोशनी डालते हैं। पूर्वी एशियाई, पोलिनेशियन और ऑस्ट्रेलियाई समूहों के डीएनए डेनिसोवंस के मेल खाते हैं। बहुत से एशियाई लोगों में होमो इरेक्टस प्रजाति के डीएनए मिले हैं। अफ्रीकी जीनोम अन्य आदिम प्रजातियों के डीएनए पर रोशनी डालते हैं। ये तथ्य साबित करते हैं कि दूसरी प्रजातियां हमसे संपर्क में आने के बाद ही खत्म हुईं। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारे पूर्वजों ने अपने रिश्तेदारों को खत्म क्यों किया और मास एक्सटिंग्शन का कारण क्यों बने? क्या यह व्यापक नरसंहार था? इस प्रश्न का उत्तर जनसंख्या की वृद्धि में निहित है। मनुष्य बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं। अगर हम प्रजनन पर लगाम न लगाएं तो हर 25 साल में अपनी संख्या दोगुनी कर लेते हैं। ऐसे में अगर हम सामूहिक शिकार करने लग जाएं तो हमसे हिंसक और खतरनाक कोई नहीं हो सकता। अपनी संख्या पर लगाम नहीं लगाने और परिवार नियोजन पर ध्यान नहीं देने पर आबादी उपलब्ध संसाधनों का दोहन करने की दिशा में अग्रसर होती है। आगे का विकास, सूखे के कारण पैदा हुआ खाद्य संकट, भीषण ठंड और संसाधनों के अत्यधिक दोहन जनजातियों के बीच संघर्ष पैदा करता है। यह संघर्ष मुख्य रूप से भोजन पर अधिकार को लेकर होता है। इस तरह युद्ध जनसंख्या में हो रही वृद्धि को नियंत्रित करता है।

ऐसा भी नहीं है कि हमने योजनाबद्ध तरीके से दूसरी प्रजातियों को विलुप्त कर दिया। न ही यह हमारी सभ्यता द्वारा संयुक्त प्रयास का नतीजा था, लेकिन यह युद्ध का नतीजा जरूर था। आधुनिक मनुष्य ने हमले दर हमले कर अपने दुश्मनों को परास्त किया और उनकी जमीन हथिया ली। इसके बावजूद निअंडरथल्स को विलुप्त होने में हजारों साल लग गए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि शुरुआती होमो सेपियंस बाद की विजेता सभ्यताओं जितने सक्षम नहीं थे। ये विजेता सभ्यताएं बड़ी संख्या में थीं और कृषि पर आधारित थीं। चेचक, फ्लू, खसरा जैसी महामारियां भी इनके दुश्मनों पर बहुत भारी पड़ीं। भले ही निअंडरथल्स युद्ध हार गए हों लेकिन उन्होंने लंबा युद्ध लड़ा और कई युद्ध जीते भी। इससे पता चलता है कि उनकी बौद्धिकता भी हमारी बौद्धिकता के करीब थी।

(लेखक बाथ विश्वविद्यालय के इवोल्यूशनरी बायोलॉजी एंड जीवाश्म विज्ञान में सीनियर लेक्चरर हैं)(downtoearth)


23-Sep-2020 7:44 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

किसानों के बारे में लाए गए विधेयकों पर राज्यसभा में जिस तरह का हंगामा हुआ है, क्या इससे हमारी संसद की इज्जत बढ़ी है ? दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश भारत है। पड़ौसी देशों के सांसद हमसे क्या सीखेंगे ? विपक्षी सांसदों ने इन विधेयकों पर सार्थक बहस चलाने के बजाय राज्यसभा के उप-सभापति हरिवंश पर सीधा हमला बोल दिया। उनका माइक तोड़ दिया। नियम-पुस्तिका फाड़ दी। धक्का-मुक्की की। सदन में अफरा-तफरी मचा दी। उच्च सदन को निम्न कोटि का बाजार बना दिया। यही विधेयक लोकसभा में भी पारित हुआ है लेकिन वहां तो ऐसा हुड़दंग नहीं हुआ। जिसे वरिष्ठ नेताओं का उच्च सदन कहा जाता है, उसके आठ सदस्यों को निलंबित करना पड़ जाए तो उसे आप सदन कहेंगे या अखाड़ा ? विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि उपसभापति ने ध्वनिमत से इन किसान-कानूनों को पारित करके ‘लोकतंत्र की हत्या’ कर दी है और सत्तारुढ़ दल के नेता इसे विपक्षियों की ‘शुद्ध गुंडागर्दी’ बता रहे हैं। यह ठीक है कि ध्वनि मत से प्राय: वे ही विधेयक पारित किए जाते हैं, जिन पर लगभग सर्वसम्मति-सी होती है।

यदि एक भी सांसद किसी विधेयक पर बाकायदा मतदान की मांग करे तो पीठासीन अध्यक्ष को मजबूरन मतदान करवाना पड़ता है। इस संसदीय नियम का पालन नहीं हो पाया, क्योंकि विपक्षी सांसदों ने इतना जबर्दस्त हंगामा मचाया कि सदन में अराजकता फैल गई। विपक्ष का सोच है कि यदि बाकायदा मतदान होता तो ये विधेयक कानून नहीं बन पाते। विपक्ष को पिछले 6 साल में यही मुद्दा हाथ लगा है, जिसके दम पर देश में गलतफहमी फैलाकर कोई आंदोलन खड़ा कर सकता है। प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री ने साफ-साफ कहा है कि उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्यों, मंडियों और आड़तियों की व्यवस्था ज्यों की त्यों रहेगी लेकिन अब किसानों के लिए खुले बाजार के नए विकल्प भी खोले जा रहे हैं ताकि उनकी आमदनी बढ़े। इस नए प्रयोग के लागू होने के पहले ही उसे बदनाम करने की कोशिश को घटिया राजनीति नहीं कहें तो क्या कहेंगे ? सरकार ने छह रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में 50 से 300 रु. प्रति क्विंटल की वृद्धि कर दी है। प्रसिद्ध किसान नेता स्व. शरद जोशी के लाखों अनुयायियों ने इस कानून के पक्ष में आंदोलन छेड़ दिया है। मेरी राय में ये दोनों आंदोलन इस समय अनावश्यक हैं। जऱा सोचें कि कोई राजनीतिक दल देश के 50 करोड़ किसानों को लुटवाकर अपने पांव पर क्या कुल्हाड़ी मारना चाहेगा ?

(नया इंडिया की अनुमति से)

 


23-Sep-2020 7:20 PM

-विकास बहुगुणा

अर्थशास्त्र का एक नियम कहता है कि किसी चीज की कीमत उसकी मांग और आपूर्ति के समीकरण पर निर्भर करती है. यानी मांग ज्यादा है और आपूर्ति कम तो कीमत ज्यादा हो जाएगी और इसकी उल्टी स्थिति में कम. लेकिन जैसा कि हर नियम के साथ होता है, इस नियम के भी कुछ अपवाद हैं. पूरी दुनिया को हिला चुके कोरोना वायरस के टेस्ट की कीमत को भी इन अपवादों में शामिल किया जा सकता है. इस कीमत में पहले से काफी कमी होने के बावजूद.

उत्तर प्रदेश सरकार ने बीते दिनों कोविड-19 की पुष्टि के लिए होने वाले आरटी-पीसीआर टेस्ट के दाम पर लगी सीमा को और कम कर दिया है. पहले यह 2500 रु थी जो अब 1600 रु हो गई है. सरकार का कहना है कि कोरोना टेस्टिंग के लिए इससे ज्यादा पैसा वसूलने वाली लैब्स के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. पहले यह सीमा 4500 रु थी जिसे जून में 2500 रु कर दिया गया था. महाराष्ट्र और झारखंड सहित दूसरी राज्य सरकारों ने भी हाल में ऐसे कदम उठाए हैं. इस तरह देखें तो अब देश में हर जगह कोरोना वायरस की टेस्टिंग की कीमत 2000 रु या इससे नीचे आ गई है. मार्च 2020 तक इसके लिए पांच हजार रु तक वसूले जा रहे थे. लेकिन कइयों को यह कीमत अब भी ज्यादा लग रही है.

कोरोना वायरस का टेस्ट तीन तरह से किया जा सकता है. पहला तरीका जेनेटिक है जिसमें मरीज के गले या नाक से लिए गए किसी सैंपल में कोरोना वायरस के डीएनए का पता लगाया जाता है. इसे ‘रिवर्स ट्रांस पॉलीमेरेज चेन रिएक्शन’ यानी आरटी-पीसीआर टेस्ट कहते हैं. दूसरा तरीका एंटीजन टेस्ट है जिसमें सैंपल में वे खास प्रोटीन तलाशे जाते हैं जो कोरोना वायरस की सतह पर पाए जाते हैं और इस तरह शरीर में संक्रमण की पहचान की जाती है. इसकी विशेषता यह है कि यह करीब आधा घंटे में निपट जाता है. हालांकि यह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है क्योंकि इसमें 60 फीसदी तक गलत नतीजे मिलने की बात कही जा रही है.

तीसरा तरीका एंटीबॉडी टेस्ट है. इसमें खून का सैंपल लेकर यह देखा जाता है कि उसमें कोरोना वायरस से लड़ने वाली रक्त कोशिकाएं यानी एंटीबॉडीज मौजूद हैं या नहीं. अगर हैं तो पुष्टि हो जाती है कि संबंधित व्यक्ति को कोरोना वायरस का संक्रमण हो चुका है. हालांकि यह तरीका सक्रिय संक्रमण की पहचान के लिए इस्तेमाल नहीं होता. बाकी दोनों तरीकों में से पीसीआर टेस्ट को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कोरोना वायरस टेस्टिंग का ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ माना जाता है. यही वजह है कि यह सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है और इसको लेकर ही सबसे ज्यादा बहस भी हो रही है.

पहले यह समझते हैं कि आरटी-पीसीआर टेस्ट कैसे होता है. इसके लिए वायरसों से जुड़ी कुछ मोटी-मोटी जानकारियां समझनी होंगी. वायरस असल में कोशिकाओं में पाए जाने वाले अम्ल (न्यूक्लेइक एसिड) और प्रोटीन से बने सूक्ष्मजीव होते हैं. इन्हें एक जेनेटिक मटीरियल (आनुवांशिक सामग्री) भी कहा जा सकता है क्योंकि ये आरएनए और डीनए जैसी जेनेटिक सूचनाओं का एक सेट (जीनोम) होते हैं. जब कोई वायरस किसी जीवित कोशिका में पहुंचता है तो कोशिका के मूल आरएनए और डीएनए की जेनेटिक संरचना में अपनी जेनेटिक सूचनाएं डाल देता है. इससे वह कोशिका संक्रमित हो जाती है और अपने जैसी ही संक्रमित कोशिकाएं बनाने लगती है. यह ठीक वैसा ही है जैसा कोई सॉफ्टवेयर वायरस करता है. वह किसी सॉफ्टवेयर में प्रवेश करता है, उसे करप्ट करता है और उससे अपने मनचाहे काम करवाता है.

किसी व्यक्ति के शरीर में कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि के लिए उसके नाक या गले से स्वाब लेकर उसे लैब में भेजा जाता है क्योंकि कोरोना वायरस यहीं पैठ जमाए होता है. यह स्वाब मानव कोशिकाओं, वायरस और जीवाणुओं का मिश्रण होता है. इसके बाद कई तरह के केमिकल्स के जरिये इस सैंपल से प्रोटीन और दूसरी अवांछित चीजें हटाई जाती हैं. इसके बाद जो बचता है वह संबंधित व्यक्ति और वायरस (अगर वह संक्रमित है तो) दोनों के जेनेटिक मटीरियल का मिश्रण होता है. यानी सैंपल में दोनों का आरएनए होता है.

अब प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए इस आरएनए को डीएनए में बदलने की जरूरत पड़ती है. ऐसा रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस नाम के एक एंजाइम की मदद से किया जाता है. लेकिन इसके नतीजे में मिले डीएनए की मात्रा इतनी नहीं होती कि इसका ठीक से और सटीक विश्लेषण किया जा सके इसलिए इस डीएनए की असंख्य प्रतिलिपियां यानी कॉपीज बनाई जाती हैं. इस चरण को पॉलीमेरेस चेन रिएक्शन या पीसीआर कहते हैं. इसके लिए सैंपल में एक विशेष एंजाइम मिलाकर और उसे एक मशीन में रखकर इस मिश्रण को कई बार गर्म और ठंडा किया जाता है.

गर्म और ठंडा करने का हर चक्र कुछ ऐसी रासायनिक अभिक्रियाओं को जन्म देता है जिससे डीएनए की कॉपीज बनने लगती हैं. हर चक्र में यह संख्या दोगुनी हो जाती है. यानी पहले चक्र में दो कॉपीज बनती हैं तो दूसरे में चार और तीसरे में आठ. सटीक नतीजे के लिए औसतन ऐसे 35 चक्र दोहराये जाते हैं. इसका मतलब यह है कि यह चरण खत्म होने तक डीएनए की अरबों कॉपीज बन चुकी होती हैं. इसी दौरान सैंपल में एक फ्लूरोसेंट यानी चमकने वाली डाइ मिलाई जाती है और अगर इस प्रक्रिया के दौरान उसकी चमक एक खास स्तर को पार कर जाती है तो सैंपल में कोरोना वायरस के जेनेटिक मटीरियल की पुष्टि हो जाती है. यानी साफ हो जाता है कि मरीज कोरोना पॉजिटिव है. इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम 24 घंटे का समय लगता है. लेकिन अच्छी बात यह है कि मशीन में एक साथ कई सैंपल्स का परीक्षण किया जा सकता है.

इसी आरटी-पीसीआर टेस्ट की कीमत को लेकर कुछ समय से बहस गर्म है जिस पर अलग-अलग पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं. नोएडा में लॉजिस्टिक्स के कारोबार से जुड़े विभांशु द्विवेदी कहते हैं, ‘कुछ दिनों पहले हमारे पास दक्षिण अफ्रीका से एक रिक्वायरमेंट आई जिसमें क्लाइंट को कोरोना टेस्टिंग किट चाहिए थी. तो हमने इसकी कॉस्टिंग वगैरह पर काम किया. किट में एक कॉटन स्वाब स्टिक और कंटेनर होते हैं जिनकी मदद से मरीज के नाक या गले से सैंपल लिया जाता है और लैब तक पहुंचने तक सुरक्षित रखा जाता है. हमने कुछ मैन्युफैक्चरर्स से पता किया तो इन दोनों चीजों की लागत 12 रु के करीब आ रही थी. सात रु की स्वाब स्टिक और पांच रु का कंटेनर.’ सवाल है कि इसके बाद लैब संबंधी प्रक्रियाओं से जुड़े दूसरे तमाम खर्चों का भी हिसाब लगा लें तो क्या टेस्ट के लिए डेढ़ से लेकर दो हजार रु या कुछ समय पहले की साढ़े चार हजार रुपये की कीमत को सही ठहराया जा सकता है?

इस साल मार्च में कोरोना वायरस संक्रमण से निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान हुआ था. उस समय चुनिंदा सरकारी लैब्स को ही कोरोना टेस्ट की अनुमति थी. धीरे-धीरे प्राइवेट लैब्स को भी इस कवायद में शामिल किया गया और अब सरकार के ही मुताबिक देश भर में 1700 से भी ज्यादा लैब्स कोरोना वायरस की टेस्टिंग कर रही हैं. लेकिन इस टेस्टिंग की कीमत तय किए जाने को लेकर मापदंड क्या हैं, इसे लेकर अब भी ज्यादा जानकारी नहीं है. कई लोग मौजूदा कीमत के बारे में मानते हैं कि इसे काफी बढ़ा-चढ़ाकर तय किया गया है. उनके मुताबिक इससे सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें हो रही है जिन्हें अपना इलाज निजी अस्पतालों में कराना पड़ रहा है क्योंकि पीड़ितों को यह टेस्ट कई बार कराना पड़ता है.

स्वास्थ्य क्षेत्र पर नजर रखने वाली संस्था ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क से जुड़ीं मालिनी आइसोला का कुछ समय पहले हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल.इन से बात करते हुए कहना था, ‘ये टेस्ट उतना महंगा है ही नहीं जितना इसे बना दिया गया है.’ उनकी मांग थी कि सरकार को यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि वह जो कीमत तय कर रही है उसका आधार क्या है.

कोरोना वायरस संक्रमण के शुरुआती महीनों में पूरी दुनिया में उथल-पुथल मची हुई थी. सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) से लेकर टेस्टिंग किट तक कोरोना वायरस की पहचान, इससे सुरक्षा और इसके इलाज से जुड़ी हर चीज की एकाएक भारी मांग पैदा हो गई थी जबकि आपूर्ति कम थी. हालांकि जानकारों के मुताबिक उस समय भी कोरोना टेस्टिंग के दाम पांच या साढ़े चार हजार रखने को जायज नहीं ठहराया जा सकता था. अब तो न पीपीई की कमी है, न किट की और न ही एंजाइम या दूसरे केमिकल्स की. इसके बावजूद टेस्ट के दाम 1600 या 2000 रु क्यों हैं, कइयों के मुताबिक यह एक बड़ा सवाल है.

जैसा कि एक सरकारी संस्था में काम करने वाले बायोटेक्नॉलॉजिस्ट एन रघुराम कहते हैं, ‘हम शोध संबंधी काम के लिए अपनी लैब में आरटी-पीसीआर टेस्ट करते रहते हैं और इसकी लागत प्रति टेस्ट 500 रु से भी काफी कम आती है.’ हालांकि वे पौधों को संक्रमित करने वाले वायरसों का आरटी-पीसीआर टेस्ट करते हैं, लेकिन उनका दावा है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि टेस्ट की प्रक्रिया और उसमें काम आने वाली चीजें लगभग वही होती हैं. नाम न छापने की शर्त पर एक प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ाने वाले एक अन्य बायोटेक्नॉलॉजिस्ट कहते हैं, ‘सब कुछ मिलाकर आरटी-पीसीआर टेस्ट की कीमत 450-500 रु तक निपट जानी चाहिए.’

तो सवाल उठता है कि यह टेस्ट अब भी डेढ़ से दो हजार रु के बीच क्यों हो रहा है. कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट में अपने एक हलफनामे में इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने कहा था कि टेस्ट का दाम उस विशेष किट की कीमत के आधार पर तय किया गया है जो इस टेस्ट के लिए इस्तेमाल हो रहा है. जानकारों के मुताबिक पहला फर्क इसी से पैदा हो रहा है. एन रघुराम कहते हैं कि निजी और सरकारी लैब्स को किट्स सप्लाई कर रहे उत्पादक इन्हें बहुत ज्यादा कीमत पर बेच रहे हैं और इसलिए टेस्ट की कीमत भी बहुत बढ़ जा रही है. मसलन सैंपल निकालने और कलेक्ट करने के लिए 12 रु की लागत वाला किट अभी भी कम से कम 500 रु में बेचा जा रहा है.

उधर, टेस्टिंग के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों की दलील है कि सिर्फ किट की लागत का हिसाब लगाकर इस टेस्ट की कीमत तय नहीं की जा सकती. उनका कहना है कि आरटी-पीसीआर टेस्ट की प्रक्रिया में कई तरह के दूसरे संसाधन भी लगते हैं और आलोचकों को इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए. थायरोकेयर टेक्नॉलॉजीज के एमडी ए वेलुमनी के मुताबिक पूरे टेस्ट की कीमत में किट के दाम की हिस्सेदारी सिर्फ 25 फीसदी होता है. स्क्रोल.इन से बातचीत में वे कहते हैं, ‘जब आप एक फ्लाइट का टिकट खरीदते हैं तो उसकी लागत में सिर्फ ईंधन की कीमत शामिल नहीं होती. वह कुल रकम का एक हिस्सा भर होती है.’ इंदौर की एक निजी कंपनी सेंट्रल लैब का भी कहना है कि टेस्टिंग की कीमत तय करने में मुख्य भूमिका किट की नहीं होती.

लाल पैथ लैब्स के सीईओ ओपी मनचंदा भी इन दोनों की बातों से इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं, ‘कई ऐसे खर्च हैं जो करने पड़ रहे हैं, लेकिन उनकी बात नहीं होती. उदाहरण के लिए कर्मचारियों का बीमा.’ तर्क यह भी है कि संक्रमण की आशंका के चलते लैब कर्मचारियों पर परिवार की ओर से काम न करने का दबाव है इसलिए लैब्स को उन्हें ज्यादा पैसा भी देना पड़ रहा है. ए वेलुमनी कहते हैं, ‘इसके अलावा सैंपल लाने वालों को पीपीई किट देने पड़ते हैं. ऑफिस स्पेस और इसकी मेंटेनेंस का खर्च होता है. एचआर कॉस्ट है. सैंपल को लैब तक लाने में भी खर्च होता है.’ उदाहण के लिए यह व्यवस्था भी करनी पड़ती है कि लैब तक पहुंचने के समय सैंपल का तापमान दो से आठ डिग्री के बीच रहे. ऐसा न होने पर सैंपल खराब होने और नतीजा गलत आने का जोखिम रहता है.

इसके अलावा स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार कहते हैं कि अगर काम का दबाव ज्यादा हो तो लैब्स को शिफ्टें और कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी पड़ सकती है. साथ ही पीसीआर और दूसरी मशीनों की संख्या में भी बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है. पीसीआर मशीन में जितने ज्यादा सैंपल एक साथ जांचे जा सकें, एंजाइमों और नतीजनत लागत में उतनी ही अधिक बचत हो सकती है. लेकिन जब नतीजे जल्द से जल्द देने का दबाव हो तो मशीनों की कुल क्षमता से कम सैंपल्स के साथ भी टेस्ट शुरू करना पड़ता है.

हालांकि दूसरे वर्ग का दावा है कि इन सब कारकों को ध्यान में रखते हुए भी टेस्ट की कीमत में अभी कमी की गुंजाइश है. उसके मुताबिक मार्च की तरह अब पीसीआर मशीनों के क्षमता से कम सैंपल्स के साथ चलने जैसी स्थिति बिल्कुल नहीं है क्योंकि अब रोज ही 10 लाख से ज्यादा टेस्ट हो रहे हैं. यानी 1700 लैब्स के हिसाब से देखें तो एक लैब रोज औसतन करीब 600 टेस्ट कर रही है. विभांशु कहते हैं, ‘इसी तरह मार्च में जो स्टैंडर्डाइज पीपीई किट 1100 रु का मिल रहा था वो अब करीब 250 रु का आ रहा है.’ जानकारों के मुताबिक इसी तरह और भी खर्च काफी कम हुए हैं. जहां तक मशीनों की बात है तो करीब 100 सैंपलों की क्षमता वाला एक थर्मोसाइक्लर (जिसमें कूलिंग और हीटिंग को अंजाम दिया जाता है) डेढ़ से दो लाख रु में उपलब्ध है. कुछ जानकारों के मुताबिक टेस्टिंग के आंकड़े देखें तो लैब्स को इस तरह की मशीनों में एक या दो की ही बढ़ोतरी करनी पड़ी होगी जो कि कोई बहुत भारी निवेश नहीं है.

यानी दोनों तरफ से अपनी-अपनी दलीलें हैं. यही वजह है कि कई जानकार इस मामले में सरकार का भी दोष मानते हैं. उनके मुताबिक जब वह इस टेस्ट की कीमत तय कर रही है तो उसे यह जानकारी भी सार्वजनिक कर देनी चाहिए कि इसका आधार क्या है. इन लोगों के मुताबिक अगर ऐसा हो जाता तो कीमत को लेकर उठ रहे सवाल अपने आप ही खत्म हो जाते. वहीं, कुछ लोगों का यह मानना है कि यह जानकारी इसीलिए सार्वजनिक नहीं हो रही है क्योंकि इससे आरटी-पीसीआर टेस्ट के नाम पर हो रही मुनाफाखोरी को लेकर नए सवाल खड़े हो सकते हैं. (satyagrah)


23-Sep-2020 5:52 PM

-कनक तिवारी
दुर्लभ व्यक्तित्व के धनी प्रोफेसर पीडी खेरा से हम लोगों का बरसों का परिचयरहा है। कभी पता चला था कि ग्राम लमनी में बैगा आदिवासियों के बीच कोई एक व्यक्ति दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापकी से सेवानिवृत्त होने के बाद उनमें रच बस गया है। उनसे बार बार मिलना हुआ। लंबी बातें भी हुईं। 

एक बार अपने सात्विक अहंकार में हम कुछ मित्रों ने कुछ पुराने कपड़े इक_े किए अन्य सामानों के अतिरिक्त। उन्हें जा कर बैगा बच्चों और पुरुषों महिलाओं आदि के लिए देने की पेशकश की। दवाइयां खाद्य सामग्री आदि उन्होंने स्वीकार कर लीं। लेकिन अपनी अत्यंत संजीदगी और विनम्रता में बोले पुराने कपड़े इन्हें नहीं देना चाहिए। उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचती है। उन्हें लगता है कि वे समाज की अतिरिक्ताए हैं। हम शर्मसार हो गए और तत्काल हमने बिलासपुर लौट कर अपने आप को संशोधित किया और बच्चों के लिए नए कपड़े और खाद्य सामग्री वगैरह फिर से उन्हें भिजवाई। 

रायपुर में समाजशास्त्रियों के एक सम्मेलन में व्याख्यान देने बुलाया था। तब बहुत कम लोगों को समझ में आया था इस व्यक्ति को यहां बुलाए जाने का क्या अर्थ हो सकता है। उनकी कोई कुटिया जाकर देखे या उसे पोस्ट कर दे वह तस्वीर यदि किसी के पास है। तो मैं कह सकता हूं जिम्मेदारी के साथ कि गांधी की कुटिया भी इतनी अकिंचन नहीं थी नहीं थी। एक बार ही अपना भोजन पकाते और वही भोजन करते। इतनी सादगी बल्कि गरीबी ऐसा लगता था कि झोपड़ी में गांधी के अनुसार समाज का अंतिम व्यक्ति रहता है। आज हमारे समाज के हमारे छत्तीसगढ़ के मनुष्यता के सिरमौर हैं।

प्रोफेसर खेरा चले गए। आखिरी कुछ वर्षों में भी बहुत बीमार रहे हैं। उनके इलाज का प्रबंध तो हो सा गया था छत्तीसगढ़ में बिलासपुर में किया गया। लेकिन उम्र और स्वास्थ्य कभी किसी का साथ बहुत दिन तक नहीं देते। उन्होंने अपना पूरा जीवन छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासियों की सेवा में लगा दिया। सरकार ने बहुत देर से उनकी प्रतिभा को उनके महत्व को उनकी सेवा को पहचाना और कुछ उनके लिए करने की कोशिश की। तब तक देर हो चुकी थी। लेकिन केवल श्रद्धांजलि देने से काम नहीं बनेगा। जो काम उन्होंने अपने हाथ में लिया था। वह काम सरकार को अपनी कल्याणकारी योजनाओं में शामिल करना चाहिए। 

अभी तो बहुत कुछ नहीं कहा जा सकता। एक एकाकी जीवन जीने वाला महारथी हमारे बीच में से चला गया। उनकी झोपड़ी तो गांधीजी की झोपड़ी से ज्यादा मामूली थी। एक बार अपने हाथ से भोजन बनाना दिन भर उसी को खाना एक ही झोपड़ी में सब कुछ करना वही निवास वहीं सोना वहीं अध्ययन वही सेवा करने का जतन करना। ऐसे ऐसे लोग तो पैदा ही नहीं होंगे लगता है। वे प्राचीन भारतीय ऋषि परंपरा के प्रतीक थे।


23-Sep-2020 10:13 AM

कृषि लागत और मूल्य आयोग ने सिफारिश की है कि अनाज गोदामों में स्टॉक को कम करने के लिए सरकारी खरीद कम की जाए और अनाज का इस्तेमाल पशुओं के चारे के लिए किया जाए

- Richard Mahapatra

भारत सरकार इन दिनों गोदामों में बढ़ते अनाज की चुनौती से जूझ रही है। एक ओर जहां, सरकारी एजेंसी हर सीजन में अनाज खरीदने का लगातार रिकॉर्डतोड़ रही है। वहीं खरीफ के इस सीजन में बंपर उत्पादन होने की संभावना है। इसके चलते चुनौती यह है कि यह अनाज रखा कहां जाएगा? लेकिन दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि अगर यह अनाज बाजार में उतार दिया था तो कीमतों में जबरदस्त कमी आ सकती है। ऐसे में, यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि किसानों को उनके बंपर उत्पादन की सही कीमत नहीं मिल पाएगी।

इस साल मार्च से ही खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के अधिकारी अनाज गोदामों में बढ़ते स्टॉक के बारे में आगाह करते रहे हैं। लेकिन अब कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। सीएसीपी ने रबी और खरीफ सीजन के 2020-21 के विपणन सत्र के लिए जारी अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि बढ़ते बफर स्टॉक को देखते हुए सरकारी खरीद को रोक दिया जाना चाहिए। साथ ही, कहा है कि बफर स्टॉक को खुले बाजार में नहीं बेचा जाना चाहिए, क्योंकि यह बाजार की विकृति पैदा करेगा।

सीएसीपी ने यह भी सिफारिश की है कि सरकारी एजेंसियों को अतिरिक्त स्टॉक का निपटान करना चाहिए, भले ही इसका उपयोग पशु चारा के रूप में किया जाए। सीएसीपी ने एक और कठोर सिफारिश की है। सीएसीपी ने कहा है कि जो राज्य न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से ऊपर किसानों को अतिरिक्त बोनस देते हैं, उसे बंद कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे बाजार पर बुरा असर पड़ता है और निजी क्षेत्र द्वारा की जा रही बिक्री हतोत्साहित होती है।

2 अप्रैल, 2020 को, केंद्रीय पूल में 73.85 मिलियन (7.38 करोड़) टन खाद्यान्न था। यह न केवल अब तक का सर्वाधिक उपलब्ध स्टॉक है, जबकि तय नियमों के अनुसार केंद्रीय पूल में 21.04 मिलियन टन खाद्यान्न ही रिजर्व रखा जा सकता है। लेकिन केंद्रीय पूल के पास 300 प्रतिशत अधिक स्टॉक था। इसी समय केंद्रीय पूल में 49.15 मिलियन टन का चावल का स्टॉक था, जो आवश्यक स्टॉक का लगभग चार गुना था।

सरकार का नवीनतम अनुमान बताता है कि खरीफ की फसल ऐतिहासिक 140.57 मिलियन टन होगी। 21 सितंबर को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने विपणन सीजन 2021-22 के लिए सभी अनिवार्य रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि की घोषणा की। उम्मीद है कि सरकार फिर से भारी मात्रा में खाद्यान्नों की खरीद करेगी।

भारतीय खाद्य निगम के अनुमानों के अनुसार, चावल और गेहूं के स्टॉक 1 जुलाई, 2021 तक लगभग 92 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की उम्मीद है, जो मानदंडों से 2.2 गुना अधिक है।

2020-21 खरीफ विपणन सत्र के लिए सीएसीपी ने सिफारिश की है कि  स्टॉक में जमा अतिरिक्त चावल को  राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम  और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत तीन माह तक आवंटन बढ़ा कर बांटा जाए, ताकि गोदाम में जगह खाली हो सके और स्टोरेज लागत में भी कमी लाई जा सके। इसके अलावा सीएसीपी ने कहा है कि अनाज गोदामों से पुराने स्टॉक को हटाकर इथेनॉल उत्पादन के काम लाया जाए या जानवरों के चारे के तौर पर इस्तेमाल किया जाए।

दरअसल, इस तरह की सिफारिशें इसलिए की जा रही हैं कि क्योंकि सरकार द्वारा इससे पहले गोदामों में जमा अतिरिक्त स्टॉक को खुले बाजार में बिक्री के लिए लाया गया तो उसके उत्साहजनक परिणाम सामने नहीं आए। अप्रैल 2019 में केंद्र सरकार ने ओपन मार्केट सेल स्कीम नामक एक योजना के माध्यम से खुले बाजार में गेहूं और चावल बेचने का फैसला किया। इसके तहत, 2019-20 के लिए सरकार ने खुले बाजार में 5 मिलियन टन बेचने का लक्ष्य रखा, लेकिन सरकार इस लक्ष्य का पांचवां हिस्सा ही बेच पाई।

सीएसीपी ने कहा है कि किसानों से ज्यादा से ज्यादा की जा रही सरकारी खरीद की वजह से अनाज गोदामों में स्टॉक बढ़ गया है। इससे फसल विविधीकरण का लक्ष्य भी प्रभावित हो रहा है। इसलिए सरकार को अपनी इस खुली खरीद नीति की समीक्षा करनी चाहिए।

सीएसीपी एक और बड़ी सिफारिश पर राजनीतिक रूप से विवाद हो सकता है। सीएसीपी की सिफारिश है कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों से सरकारी खरीद बंद कर देनी चाहिए, क्योंकि यहां भूजल की काफी है। इसके दूसरी सिफारिश है कि राज्य सरकारें किसानों को एमएसपी के ऊपर बोनस देना बंद कर दें।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है: “ यदि पंजाब और हरियाणा के किसानों से केवल दो हेक्टेयर क्षेत्र में उगे धान की ही खरीद की जाए तो वर्तमान में की जा रही लगभग 15.3 मिलियन टन की सरकारी खरीद घटकर लगभग 10.3 मिलियन हो जाएगी। ” पंजाब में 95 प्रतिशत से अधिक धान किसान सरकारी खरीद प्रणाली के तहत आते हैं, जबकि हरियाणा में इन किसानों की संख्या 70 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में 3.6 प्रतिशत और बिहार में 1.7 प्रतिशत है।

ओवरफ्लो हो रहे स्टॉक के संकट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीएसीपी अब केंद्र सरकार को उन राज्यों से अनाज नहीं खरीदने की सिफारिश कर रहा है जो केंद्र सरकार द्वारा घोषित एमएसपी के ऊपर अतिरिक्त बोनस प्रदान करते हैं। उल्लेखनीय है कि केरल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा सहित कई राज्य किसानों को बेहतर कीमत दिलाने के लिए एमएसपी से अधिक का बोनस देते हैं।

सीएसीपी की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है, “खरीद पर उच्च और आकस्मिक शुल्क लगाने वाले और किसानों को बोनस का भुगतान करने वाले राज्यों से चावल और गेहूं की खरीद को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।“

आइए, एक बार फिर इस सीजन में होने वाली बम्पर फसल की बात करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या इससे किसानों को अधिक या बहुत अधिक आर्थिक आमदनी होगी। धान जैसे खाद्यान्नों का पूर्वानुमान बड़े स्टॉक के कारण कम हो जाएगा और वैश्विक स्तर पर इसकी मांग भी कम होगी। यदि सरकार अपने अत्यधिक स्टॉक के साथ बाजार में उतारने का फैसला करती है, इससे सप्लाई तो बढ़ जाएगी, लेकिन कीमतें कम हो जाएंगी।(downtoearth)


23-Sep-2020 10:10 AM

- Eesha 

सती प्रथा भारतीय समाज के इतिहास में सबसे शर्मनाक कुरीतियों में से एक है। जैसा कि हम सब जानते हैं, इस प्रथा के तहत विवाहित महिलाओं और लड़कियों को अपने मृत पति की चिता पर ज़िंदा जला दिया जाता था। छोटी-छोटी बच्चियों को भी इस नृशंस प्रथा का शिकार होना पड़ता था। ऐसा माना जाता था कि एक नारी का अस्तित्व उसके पति की मृत्यु के साथ खत्म हो जाता है और एक पत्नी को पति की मृत्यु होने पर भी उसका साथ नहीं छोड़ना चाहिए। सती प्रथा का उल्लेख कई विदेशी लेखकों की कृतियों में मिलता है, जो पर्यटक, वाणिज्यिक या औपनिवेशिक शासक के रूप में मध्यकालीन भारत में आए थे। जिन्होंने अपनी आंखों से इस कुप्रथा का पालन होते हुए देखा था। सुनने में अचरज होता है कि यह मध्ययुगीन प्रथा 20वीं सदी के आधुनिक, आज़ाद भारत में भी चलती आ रही थी, जबकि हमें पढ़ाया यही गया है कि सामाजिक आंदोलन इस पर पूरी तरह से रोक लगाने में सफल हुए थे, पर सच यही है। भारत में सती प्रथा की आखिरी घटना हुई थी 1980 के दशक में। सती प्रथा की आखिरी पीड़ित थी 1987 में राजस्थान की रहनेवाली एक 18 साल की लड़की ‘रूप कंवर।’ 

19वीं सदी में सती प्रथा भारत में कानूनी तौर पर रद्द हुई। कई भारतीय समाज सुधारकों के प्रयासों के चलते ब्रिटिश सरकार ने साल 1829 में देशभर में सती पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून जारी किया पर कानूनी प्रतिबंध लगने के बावजूद पूरे देश में इस प्रथा पर रोक नहीं लगाई जा सकी। नतीजन साल 1987 में सती प्रथा के कारण रूप कंवर को अपनी जान गंवानी पड़ी। रूप कंवर राजस्थान के सीकर ज़िले के एक राजपूत परिवार की लड़की थी। जनवरी 1987 में उसकी शादी देवराला गांव के रहनेवाले, 24 साल के माल सिंह शेखावत से करवा दी गई। माल सिंह कॉलेज में बी.एस.सी का छात्र था और शादी के कुछ ही महीनों बाद वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया, जिसकी वजह से उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। लंबे समय तक अपनी ज़िंदगी के लिए लड़ने के बाद, 3 सितंबर 1987 को माल सिंह शेखावत का देहांत हो गया। 

रूप कंवर की हत्या का मामला एकबार फिर यही दिखाता है कि कानून में चाहे कितने भी बदलाव आए, समाज और लोगों की मानसिकता को बदलना इससे कहीं ज़्यादा मुश्किल है।

4 सितंबर 1987 को माल सिंह का अंतिम संस्कार किया गया। उसकी चिता पर उसकी पत्नी रूप कंवर को भी ज़िंदा जला दिया गया। मरने के बाद रूप कंवर ‘सती माता’ बन गई। जिस जगह पर उसे जलाया गया था, आज वहां एक बड़ा तीर्थस्थल है जहां देवी के रूप में उसकी पूजा होती है। आज भी पूरे राजस्थान से सैकड़ों श्रद्धालु यहां ‘सती माता’ के दर्शन करने आते हैं। 

महिला संगठनों ने इस घटना पर खूब आपत्ति जताई थी। यह घटना एक महिला की नृशंस हत्या तो थी ही, ऊपर से इस हत्या को पीड़िता का ‘त्याग’ और ‘बलिदान’ बताकर इस अपराध का महिमामंडन किया जा रहा था। नारीवादी कार्यकर्ताओं और आंदोलनों के चलते साल 1987 में ही ‘सती निवारण कानून’ पारित किया गया। यह कानून सती प्रथा को परिभाषित करता है और इसका पालन करने या बढ़ावा देने वालों को एक साल से लेकर उम्रकैद तक की सज़ा सुनाता है। यह सज़ा सिर्फ़ औरत की हत्या करने के लिए ही नहीं बल्कि किसी भी तरह से सती प्रथा का समर्थन करने के लिए है। जैसे, पीड़िता को ‘देवी’ या ‘माता’ बनाकर पूजना, उसके नाम पर तीर्थस्थल या मंदिर बनाना, चंदा इकट्ठा करना वगैरह। इसी कानून के तहत देवराला गांव के 45 निवासियों को रूप कंवर की हत्या के लिए गिरफ़्तार किया गया था। हालांकि कोई ठोस सबूत न मिलने की वजह से आज वे सब बरी हो गए हैं।

देवराला का राजपूत समाज यह मानता है कि सती होना प्रेम और बलिदान का प्रतीक है। पति के प्रेम में जो औरत अपने प्राण त्याग देती है उसे साधारण औरत नहीं, देवी माना जाता है। उनका विश्वास है कि अदालत इन औरतों के प्रेम की भावना नहीं समझ पाती और सती प्रथा की घटनाओं को बेवजह हत्या और अपराध घोषित कर दिया जाता है। रूप कंवर के भाई गोपाल सिंह राठौर आज 61 साल के हैं। वे कहते हैं कि उन्हें अपनी बहन पर गर्व है कि उसने सती होने का निर्णय लिया था। गांव के कई लोग मानते हैं कि रूप कंवर सचमुच देवी थी। उनके अनुसार माल सिंह के मरने के बाद वह ज़रा भी नहीं रोई, बल्कि अपनी शादी के जोड़े और सोलह श्रृंगार में सजकर अपने पति की चिता पर बैठ गई। माल सिंह के सिर को अपनी गोद में रखा और भगवान का नाम लेने लगी। गांव वालों का कहना है कि चिता पर भी किसी इंसान ने आग नहीं लगाई, बल्कि चिता अपने आप जल उठी थी। जलती चिता पर बैठकर रूप कंवर मुस्कराती रही और उसने अपना दाहिना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में रखा था। 

कुछ लोग, जो इस घटना के समय वहां मौजूद थे, इस कहानी पर विश्वास नहीं करते। उनका कहना है कि रूप कंवर बुरी तरह रो रही थी और उसने खुद को कमरे में बंद कर दिया था। बाद में जब उसे बाहर निकाला गया, वह नशे की हालत में थी और ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। उसके ससुराल वालों ने उसे चिता पर लिटाया और उसकी छाती पर लकड़ियां रख दीं ताकि वह भाग न पाए, और इसी हालत में उसे जला दिया गया था। देवराला के निवासी मानते हैं कि आज सती प्रथा कानूनी रूप से प्रतिबंधित है, पर इसके बावजूद रूप कंवर के प्रति उनकी भक्ति ज़रा भी कम नहीं होती। वे मानते हैं कि रूप कंवर के पास दिव्य शक्ति थी जिसके रहते वह सती हो पाई, और जो हर औरत के पास नहीं रहती।

रूप कंवर की हत्या का मामला यही दिखाता है कि कानून में चाहे कितने भी बदलाव आएं, समाज और लोगों की मानसिकता को बदलना ज़्यादा मुश्किल है। सती प्रथा जैसे जघन्य कानूनन अपराध के लिए एक प्रगतिशील समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, फिर भी इसके शिकार हुई महिलाओं का महिमामंडन करके इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। रूप कंवर की मृत्यु को 33 साल पूरे होने को आए हैं, फिर भी समाज आज भी वैसा का वैसा ही है।

(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)

 

23-Sep-2020 10:05 AM

- Vandana

‘अच्छी लड़कियां हमेशा अपने पति की बात मानती हैं।’

‘अच्छी लड़कियों को घूंघट में रहना चाहिए।’

ये बातें गांव में किशोरियों के साथ बातचीत करते हुए कुछ छोटी बच्चियों ने अच्छी औरत और बुरी औरत पर अपने विचार रखते हुए कहा। मात्र नौ-दस साल की बच्चियों के मुंह से ऐसी बातें सुनना बेहद अजीब था, क्योंकि ये बच्चियां जिस परिवेश से आती है वह आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। यहां ज़्यादातर आदमी-औरत दोनों ही मज़दूरी का काम करते हैं। शायद इसलिए महिलाएं अन्य संभ्रांत परिवारों की महिलाओं की अपेक्षा में ज़्यादा स्वतंत्र है। वे घूंघट नहीं लेती है और न ही अपने पति की हर बात मानती है। कम ही सही लेकिन खुद पैसे कमाती हैं, इसलिए सभी नहीं लेकिन कुछ फ़ैसले ज़रूर खुद लेती हैं। अब ऐसे परिवार की बच्चियों का अच्छी औरत के नाम पर घूंघट करने और पति की बात मानने की बात करना अजीब था। जब मैंने उनसे पूछा कि ये सब तुम्हें किसने बोला? तो ज़वाब में बच्चियों ने कहा टीवी पर आता है। बौन्दिता ऐसे ही करती है।

ये बौन्दिता टीवी पर आने वाले सीरियल बैरिस्टर बाबू की नायिका है। सीरियल में बौन्दिता का किरदार एक आठ-नौ साल की बच्ची ने निभाया है। बैरिस्टर बाबू की कहानी आज से सौ साल पहले की है। कहने को तो सीरियल से जुड़े लोग इंटरव्यू में कहते हैं कि ‘ये सीरियल उस समय के समाजिक ढांचे की तरफ ध्यान दिलाता है। सामाजिक समस्याओं का समाधान सिर्फ तर्क से है इसीलिए शो की टैगलाइन भी ‘तर्क से फर्क’ रखी गई है और बौन्दिता जो कि एक बच्ची है, अपने तर्कों, सवालों और जिज्ञासा से सामाजिक खामियों को तार-तार करती है। बैरिस्टर बाबू की लड़ाई सामाजिक सोच से है।’ साथ ही यह भी कहा गया कि सीरियल रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ने की कहानी है।

बौन्दिता का किरदार बच्चियों को किताबों से दूर समाज के बनाए जेंडर के साँचे में ढलने और उसमें रहने को प्रेरित करता है।

लेकिन अब सोचने वाली बात ये है कि इस सीरियल को दिखाने का विचार आमलोगों तक ख़ासकर बच्चियों तक कैसे पहुंच रहा है? क्योंकि बच्चों को तो समाज क्या है इसका मतलब भी नहीं पता। समाज में बचपन से ही लड़की को लड़की की तरह रहने का पाठ पढ़ाया जाता है। हर पल डांट-मार और उपदेश देकर उनके लड़की के खांचे में ढालने की कोशिश की जाती है। ऐसे में बैरिस्टर बाबू सीरियल में बौन्दिता जैसे किरदार बच्चियों को घुट्टी की तरह दी जाने वाली सीख को और मज़बूत कर देते है। लैंगिक भेदभाव की जड़ें मज़बूती से बच्चियों के मन में पैठ जमा लेती हैं और उन्हें लगता है सारी डांट-मार और बंदिशें उन्हें अच्छा बनाने के लिए है। बौन्दिता क्या कह रही है, क्या कर रही है, ये सब समझना गांव की छोटी बच्चियों के लिए बेहद मुश्किल है, क्योंकि उन्हें शहरी बच्चों की तरह अच्छे क्या स्कूल भी नसीब नहीं है और न वैचारिक स्तर पर घर में भी कोई मज़बूत है। ऐसे में बौन्दिता के कपड़े, उसके माथे की बिंदी, चूड़ी, सिर का पल्लू और पति के नाम पर प्यार-सम्मान दिखाने का तरीक़ा उन्हें अलग ही दुनिया में ले जाता है।

कोरोना के दौर में स्कूल बंद है। गांव में बच्चों की पढ़ाई और दस साल पीछे जा रही है। छोटे बच्चे जिन्हें संज्ञा-सर्वनाम पढ़ना था वो क-ख भी नहीं पढ़ पा रहे है। पर घर में टीवी देखकर वो अब टीवी कलाकारों की कहानियों को जीने ज़रूर लगे हैं।

हो सकता है कि बहुत लोग मेरी बात से सहमत न हो और इसके लिए वे ऐसे टीवी सीरियल की खूबी बताएं। पर ऐसे लोगों से मैं यही कहूंगी कि सीरियल में कही जाने वाली बातें हम और आप समझ सकते है लेकिन छोटी बच्चियों को ये समझाना मुश्किल है। वे जो अपने सामने घटित होता देखती हैं वही समझती हैं, उसे ही सच्चाई मान लेती हैं। इसलिए ऐसे सीरियल और किरदारों पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि आज के ज़माने में यह दिखाना कि हर बौन्दिता को बैरिस्टर बाबू मिले इसकी संभावना न के बराबर है। सभी बच्चियां बौन्दिता जैसी समझदार हो ये ज़्यादा ही अपेक्षा है। पर ये तय है कि बौन्दिता का किरदार बच्चियों को किताबों से दूर समाज के बनाए जेंडर के सांचे में ढलने और उसमें रहने को प्रेरित करता है। इसलिए हमें और आपको भी इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी कि घर में बच्चे ऐसे सीरियल से बचे, क्योंकि इनसे बचना ही बच्चों के बचपन को बचाएगा।  

(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)

 

23-Sep-2020 9:14 AM

पहली पुण्यतिथि : ‘छत्तीसगढ़’ विशेष

-मो. उस्मान कुरैशी

आज से ठीक एक वर्ष पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर पी.डी. खेरा का 93 वर्ष की आयु में अपोलो हॉस्पिटल में देहावसान हो गया था। वे 36 साल पहले अचानकमार टाइगर रिजर्व घूमने के लिये आये थे और महानगर की आरामदेह जीवन शैली को त्यागकर यहीं के होकर रह गये। मिट्टी की एक झोपड़ी पर उन्होंने अपना बसेरा बना लिया। उन्होंने गरीब और वंचित बैगाओं की दशा सुधारने के लिये अपना शेष सारा जीवन लगा दिया। उनके स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा और आर्थिक दशा ठीक करने के लिये वे निष्काम भाव से काम करते रहे। इस खास रिपोर्ट में उनसे लिया गया 7 वर्ष पुराने एक साक्षात्कार का अंश भी है जो बैगाओं की सामाजिक, आर्थिक स्थिति पर गहरे चिंतन की अभिव्यक्ति है। प्रो. खेड़ा को चाहने वाले उनकी समझ को केन्द्र में रखते हुए जन-जातियों को बचाने का काम कर सकते हैं। सरकार नीतियां बना सकती है। उनकी पहली पुण्यतिथि पर पढ़ें स्वतंत्र पत्रकार मो. उस्मान कुरैशी की यह विशेष रिपोर्ट-

छत्तीसगढ के मुंगेली जिले में बाघ और जंगली जानवरों से समृद्ध अचानकमार टाइगर रिजर्व के भीतर लमनी गांव है। ठीक एक साल पहले 23 सितंबर 2019 की सुबह अनजान शहरी लोगों की बढ़ती भीड़ का जमा होते जाना, इस गांव में बसे बैगा आदिवासियों के लिए कौतूहल था। ऐसा नहीं था कि ऐसी गाडियों और शहरी लोगों को वे पहली बार देख रहें हो। देखते थे, इन गाड़ियों को तेज रफ्तार के साथ अपने गांव की सडक से गुजरते हुए या फिर सीधे विश्राम-गृह में घुसते हुए। आज सड़क पर गाडियां और शहरी लोग तेज रफ्तार से भाग नहीं रहे थे, उनकी तेज रफ्तार गाड़ियों के पहिए गांव में सड़क किनारे बनी मिट्टी की झोपडी पर आकर थम जा रहे थे। इस भीड़ की वजह थी जंगल में तीन दशक से रह रहा शहरी आदमी और आदिवासियों के हमदर्द ‘दिल्ली वाले साब’। यानी प्रो. पीडी खेरा। जो बरसों पहले उनके बीच उनके पोशाकों से इतर कुर्ते पाजामे में उनकी ही तरह मिट्टी की झोपड़ी में ठहर कर उनके बीच रच-बस गए थे।

गांव के लोग सालों देखते रहे कि कभी-कभी कुछ लोग उनसे आकर मिलते है, लंबी बातचीत भी होते देखते रहे पर कभी इनका उनके साथ सरोकार हो, ऐसा महसूस नहीं किया। जंगल में बसे बैगा आदिवासियों को बीती शाम ही खबर हो गई थी उनके सिर पर अब आसमान नहीं रहा। दावानल की तरह ही तो ये खबर पूरे जंगल में फैल गई थी। समझ नहीं पा रहे थे कि ये क्या हो गया। पूरा जंगल उदास था। जंगल से निकल कर अल-सुबह ये सड़क के किनारे अपने मसीहा के पार्थिव देह को विदा करने उमड़ पड़े थे।

कम नहीं होता 35 साल का लम्हा, युवाओं की दो पीढ़ियों को अपने ज्ञान और सेवा से सींच कर बड़ा किया था, ज्ञान की रोशनी से रास्ता दिखा रहे थे। आज वे कृतज्ञ दृष्टि से अपने मसीहा को विदा होते देख रहे थे। और वे देख रहे थे उन अनजान चेहरों को जो उनके काफिले का हिस्सा बने हुए थे। न जाने क्या सोचकर ही तो वे कोई 35 साल पहले सैकडों मील दूर बड़े शहर के अभिजात्य जीवन और अपने लोगों की भीड़ को छोड़कर इस जंगल में अनजान लोगों के बीच आ बसे। इनके बीच ऐसे रचे-बसे की उनको लगा कि ये उनके ही हिस्से है। फिर ये कौन सी भीड़ थी जो उनका पीछा करते जंगल के बीच बने मिट्टी की झोपड़ी तक आ पहुंची थी। ऐसी जगह, जहां उनके बैठने तक की जगह नहीं। जहां रखी चारपाई के आधे हिस्से में किताबें पसरी हुई थी। इस जनसैलाब में उनका कोई रिश्तेदार, नातेदार नहीं था। जो थे उनमें नेता, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, आला दर्जे के प्रशासनिक अफसर शामिल रहे. जिनको प्रोफसर डॉ, पीडी खेरा के त्याग, सेवा और समपर्ण ने मुरीद बना दिया था।

दिसम्बर 2013 में उनसे इस रिपोर्टर की लम्बी बात हुई थी। तब प्रो. खेरा ने बताया कि जब सन् 1984 में पहली बार जब यहां आए तो यहां के बैगाओं को देखकर लगा कि जीवन की सार्थकता यहीं है। सच्ची मानव सेवा यहीं हो सकती है। जब वे यहां आए आदिवासी बहुत पिछड़े थे। मन को शांति मिली पर रुकने में बड़ी कठिनाईयां आती रही। समझ गया कि यहां बसेरा बनाना आसान काम नहीं है। शुरू में यहां कुछ भी नहीं था। राशन दुकानें भी नहीं थीं। ये सब चीजें यहां का सौर उर्जा का स्टेशन हमारी दौड़-धूप से बना। टाटा की एक टीम आई थी हम अचानकमार में थे। हमने मिलकर ये स्टेशन शिफ्ट करवाया। पता ही नहीं लगता था कि इस जंगल का मालिक कौन है, क्योंकि सरकारी सेवायें इन तक पहुंचती ही नहीं थीं। बसों की यात्रा कर कलेक्टर दफ्तर के (तब बिलासपुर जिला) दर्जनों बार चक्कर लगाये तब एक चलित खाद्यान्न सेवा शुरू हुई।

बैगाओं की सेहत को लेकर उनकी चिंता

बैगाओं के स्वास्थ्य पर चिंता जताते प्रोफेसर खेरा कहते कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। खाना नही मिलता, क्योंकि शिकार पर रोक है। पहले गोश्त शिकार करके खाते थे अब खरीदना पड़ता है जो बहुत महंगा है। यहां इनको कम से कम सूअर रखने की इजाजत दी जाए। ज्यादातर लोग दारू पीते हैं। दारू पीयें और खाना ठीक नहीं मिले तो टीबी हो जाता है। और भी बहुत सी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।ये निरक्षर लोग हैं। गलती से अपना खुराक ठीक करने कभी सूअर को पकड़ कर खा भी लें तो वन विभाग वाले नहीं छोड़ते। वे जंगली सूअर न खाएं तो क्या खाएं। एक गिलहरी को खा लिया तो जेल भेज दिया। सरकार इस खत्म होती जाति बचाने की बात करती है पर उनके जीने के तौर-तरीके पर भारी दखल है। ये उनके लिये अच्छा नहीं है। बैगाओं के लिये खादी के थैले में उनके पास हमेशा मलेरिया, बुखार की दवायें रहती थीं। बच्चों को नहलाना-धुलाना, साफ धुले कपड़े पहनाना, उनके रोज का काम था।

झूम खेती पर रोक ने पहुंचाया नुकसान  

बैगाओं की संख्या लगातार घट रही है । पहले ये बहुतायत में थे अब वे जंगल में भी अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। बाहरी लोग बहुत आ गए हैं। उनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। बेटी की शादी होती है तो दामाद को भी यहां बसा लेते हैं। गोड़ हैं, अहीर हैं, सारी जातियां यहां आ गई। मूल तो असल में ये बैगा ही थे। वे झूम खेती (शिफ्टिंग कल्टिवेशन या बेवर खेती) करते थे। 20-25 लोगों का परिवार होता था, जितनी जरूरत होती थी उतना किसी भी जगह फसल उगा लेते थे। अब इस पर रोक लग गई है। जंगल के फल-फूल, पौधे पत्ते, धूप छांव सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। यह प्रथा बंद क्या हुई बैगा मारे गये, कुचल दिये गये। शहरों से डिग्री लेकर आये जंगल के अफसर इन बातों को क्या समझेंगे? वर्दी में आते हैं, सहमे हुए बैगा दुबक जाते हैं। जंगल में जो उपजता है, उसी पर बैगाओं का जीवन निर्भर है पर सब जंगल के अफसरों ने धीरे-धीरे अपने कब्जे में ले लिया। अब ये खायें तो क्या, जीवन बचायें तो कैसे?


22-Sep-2020 7:46 PM

भारतीय अर्थव्यवस्था को 5-6% की वृद्धि दर पर लौटने में 3 से 5 साल का वक़्त लगेगा. ये कहना है भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. डी. सुब्बाराव का. उन्होंने बीबीसी को ईमेल के ज़रिए दिए एक इंटरव्यू में ये कहा. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ये वृद्धि दर भी तब ही मुमकिन है जब सही तैयारी के साथ सही तरीक़े से सब कुछ किया जाएगा.

भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में क्या-क्या चुनौतियां होंगी और उनके क्या समाधान हो सकते हैं, उन्होंने विस्तार से बताया.

बड़ी चुनौतियां कौन सी हैं?

डॉ सुब्बाराव कहते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती है लोगों की नौकरियां जाने से बचाना और फिर से विकास शुरू करना.

वो कहते हैं, "महामारी अब भी बढ़ रही है, ऐसे में अभी भी कई ख़तरे हैं. कहा नहीं जा सकता कि महामारी के प्रकोप में कब और कैसे कमी आ सकती है. इसलिए अर्थव्यवस्था की चुनौतियों के पैमाने और जटिलताओं का बहुत ज़्यादा अंदाज़ा लगाना संभव नहीं है."

डॉक्टर सुब्बाराव ने कहा कि निस्संदेह मनरेगा अभी लाइफ़लाइन बना है लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं हो सकता.

वे कहते हैं, "अस्थायी राहत के तौर पर विस्तारित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार अधिनियम (मनरेगा) एक जीवन रेखा बन गया, लेकिन यह एक स्थायी समाधान नहीं हो सकता है."

डॉ. सुब्बाराव ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि महामारी से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्ती की स्थिति में थी. विकास दर एक दशक में सबसे कम - लगभग 4.1% पर थी, राजकोषीय घाटा (सरकार की कुल आय और व्यय के बीच का अंतर) अधिक था और वित्तीय क्षेत्र ख़राब ऋण की समस्या से जूझ रहा था.

वो कहते हैं कि महामारी का प्रभाव कम होने के बाद ये समस्याएं और बड़ी हो जाएंगी. "वापसी की हमारी संभावनाएं इस बात पर निर्भर करेंगी कि हम इन चुनौतियों का कितने प्रभावी तरीक़े से समाधान निकालते हैं."

जब उनसे पूछा गया कि उन्हें क्या लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था महामारी के प्रभाव से कब तक बाहर आएगी और कब वापसी करेगी? तो डॉ सुब्बाराव ने कहा, "अगर आपका मतलब है कि अर्थव्यवस्था में सकारात्मक वृद्धि कब से होने लगेगी तो ये अगले साल से संभव है, लेकिन इस साल के नकारात्मक आंकड़े को देखते हुए यह भी कह सकते हैं कि ये सकारात्मक वृद्धि बहुत ज़्यादा नहीं होगी."

इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों में लगभग एक चौथाई की गिरावट आई और कई अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि पूरे साल की ग्रोथ निगेटिव डबल डिजिट में रह सकती है.

"अगर आपका मतलब है कि वृद्धि दर में लंबे वक्त तक टिकने वाला 5-6% तक का सुधार कब आएगा, तो इसमें 3-5 साल लगेंगे और वो भी तब होगा जब सही तैयारी के साथ सही तरीक़े से सब कुछ किया जाएगा."

समाधानः अर्थव्यवस्था बेहतरी की ओर कैसे बढ़े?

वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ सुब्बाराव का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में कुछ सकारात्मक चीज़ें हैं और उस पर ही और काम किए जाने की ज़रूरत है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने शहरी अर्थव्यवस्था के मुक़ाबले बेहतर तरीक़े से रिकवर किया है. वो कहते हैं, "जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी तो मनरेगा के विस्तार की योजना ने एक लाइफलाइन दी, और महिलाओं, पेंशनभोगियों और किसानों के खातों में तुरंत पैसे डाले गए जिससे उनके हाथ में पैसे आए और फिर से मांग पैदा करने में मदद मिली."

"हाल में कृषि क्षेत्र में किए गए कई सुधार हालात बेहतर करने की दिशा में अच्छी शुरुआत है."

भारत का कंजम्पशन बेस भी देश के लिए एक बड़ी सकारात्मक चीज़ है. देश के 1.35 अरब लोग प्रोडक्शन को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं.

डॉ. सुब्बाराव कहते हैं कि अगर उन लोगों के हाथ में पैसा दिया जाता है तो वो खर्च करेंगे जिससे आख़िरकार खपत ही बढ़ेगी. लेकिन ये लक्ष्य हासिल करने के लिए "मज़बूत नीतियों और उनको दृढ़ निश्चय के साथ लागू करने की ज़रूरत होगी."

भारतीय केंद्रीय बैंक में पद संभालने से पहले वित्तीय सचिव रह चुके डी सुब्बाराव इस आम राय से सहमति जताते हैं कि मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को पैसा खर्च करना शुरू करना चाहिए. निजी खपत, निवेश और शुद्ध निर्यात ग्रोथ के अन्य फैक्टर हैं, लेकिन फिलहाल ये सभी मुश्किल दौर में हैं.

साथ ही वो कहते हैं, "अगर सरकार इस वक़्त ज़्यादा खर्च करना शुरू नहीं करती है, तो ख़राब ऋण (बैड लोन) जैसी तमाम समस्याओं से निपटना और मुश्किल हो जाएगा और अर्थव्यवस्था की हालत और खस्ता होती जाएगी."

हालांकि वो चेतावनी देते हैं कि "सरकारी उधार की सीमा निर्धारित करना बहुत ज़रूरी होगा, ऐसा नहीं हो सकता कि इसकी कोई सीमा ही ना हो."

सरकार के लिए चार सूत्रीय कार्ययोजना

उन्होंने उन प्रमुख क्षेत्रों का ज़िक्र किया जिन पर उनके मुताबिक़ सरकार को फोकस करना चाहिए.

उनके मुताबिक़ सबसे पहले, आजीविका की रक्षा करनी होगी और ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीक़ा मनरेगा का विस्तार करना है जो सेल्फ-टार्गेटिंग है.

दूसरा है, सरकार को रोज़गार बचाने और बैड लोन को बढ़ने से रोकने के लिए संकटग्रस्त उत्पादन इकाइयों की मदद करनी चाहिए.

तीसरा, सरकार को बुनियादी ढांचे के निर्माण पर खर्च करना चाहिए जो संपत्ति के साथ-साथ नौकरियों का निर्माण करेगा.

अंत में, सरकार को बैंकों में अतिरिक्त पूंजी डालनी होगी ताकि क्रेडिट फ़्लो को बढ़ाया जा सके.

इस पहेली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है नौकरियां पैदा करना. महामारी शुरू होने से पहले भी नौकरियों का सृजन एक बड़ी चुनौती थी.
रिसर्च फर्म, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आंकड़ों के मुताबिक़, अगस्त में भारत की बेरोज़गारी दर नौ सप्ताह के उच्चतम स्तर यानी लगभग 9.1% पर थी.

"ज़रूरत है कि अर्थव्यवस्था एक महीने में 10 लाख नौकरियां पैदा करे; हम इसकी आधी भी पैदा नहीं कर रहे. बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में पहली बार इसी वादे के साथ जीतकर आए थे कि वो "20 की उम्र वाले उन लोगों की ज़िंदगी बदल देंगे जो नए रोज़गार की तलाश कर रहे हैं. इस वादे का पूरा नहीं होना उनकी एक नाकामी मानी जानी चाहिए."

महामारी और फिर इसकी वजह से लगे लॉकडाउन ने नौकरियों के सृजन को कई गुनी बड़ी चुनौती दी है.

ये पूछे जाने पर कि नौकरियां आएंगी कहां से? डॉक्टर सुब्बाराव कहते हैं, "नौकरियों के सृजन के लिए भारत को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (विनिर्माण क्षेत्र) पर निर्भर होना पड़ेगा. इसीलिए, मेक इन इंडिया, मेक फॉर इंडिया और मेक फॉर द वर्ल्ड ये सभी महत्वपूर्ण नीतिगत उद्देश्य हैं."(BBCNEWS)


22-Sep-2020 6:57 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पाकिस्तान में पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने लगभग सभी प्रमुख विरोधी दलों की बैठक बुलाई, जिसमें पाकिस्तानी फौज की कड़ी आलोचना की गई। पाकिस्तानी फौज की ऐसी खुले-आम आलोचना करना तो पाकिस्तान में देशद्रोह-जैसा अपराध माना जाता है। नवाज शरीफ ने अब इस फौज को नया नाम दे दिया है। उसे नई उपाधि दे दी है। फौज को अब तक पाकिस्तान में और उसके बाहर भी ‘सरकार के भीतर सरकार’ कहा जाता था लेकिन मियां नवाज ने कहा है कि वह ‘सरकार के ऊपर सरकार’ है। यह सत्य है।

पाकिस्तान में अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक और मुशर्रफ ने अपना फौजी शासन कई वर्षों तक चलाया ही लेकिन जब गैर-फौजी नेता लोग सत्तारुढ़ रहे, तब भी असली ताकत फौज के पास ही रहती चली आई है। अब तो यह माना जाता है कि इमरान खान को भी जबर्दस्ती जिताकर फौज ने ही पाकिस्तान पर लादा है। फौज ही के इशारे पर अदालतें जुल्फिकार अली भुट्टो, नवाज शरीफ और गिलानी जैसे नेताओं के पीछे पड़ती रही हैं। ये ही अदालतें क्या कभी पाकिस्तान के बड़े फौजियों पर हाथ डालने की हिम्मत करती हैं ? पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा की अकूत संपत्तियों के ब्यौरे रोज उजागर हो रहे हैं लेकिन उन्हें कोई छू भी नहीं सकता। मियां नवाज ने कहा है कि विपक्ष की लड़ाई इमरान खान से नहीं है, बल्कि उस फौज से है, जिसने इमरान को गद्दी पर थोप रखा है।

यहां असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान के नेता लोग फौज से लड़ पाएंगे ? ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि फौज थोड़ी पीछे खिसक जाए। सामने दिखना बंद कर दे, जैसा कि 1971 के बाद हुआ था या जैसा कि कुछ हद तक आजकल चल रहा है लेकिन फौज का शिकंजा पाकिस्तानियों के मन और धन पर इतना मजबूत है कि उसे कमजोर करना इन नेताओं के बस में नहीं है। पाकिस्तान का चरित्र कुछ ऐसा ढल गया है कि फौजी वर्चस्व के बिना वह जिंदा भी नहीं रह सकता। यदि पंजाबी प्रभुत्ववाली फौज कमजोर हो जाए तो पख्तूनिस्तान और बलूचिस्तान टूटकर अलग हो जाएंगे। सिंध का भी कुछ भरोसा नहीं। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद पाकिस्तानी जनता के मन में भारत-भय इतना गहरा पैठ गया है कि उसका एकमात्र मरहम फौज ही है। फौज है तो कश्मीर है। फौज के बिना कश्मीर मुद्दा ही नहीं रह जाएगा। इसके अलावा फौज ने करोड़ों-अरबों रु. के आर्थिक व्यापारिक संस्थान खड़े कर रखे हैं। जब तक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान का मूल चरित्र नहीं बदलेगा, वहां फौज का वर्चस्व बना रहेगा।

(नया इंडिया की अनुमति से)


22-Sep-2020 3:03 PM

-कनक तिवारी

माननीय मुख्य न्यायाधीशजी
यह पत्र एक डेजिग्नेटेड सीनियर एडवोकेट की तरफ से लिखा जा रहा है, जो 50 वर्ष की प्रैक्टिस हो जाने की जिंदगी के साथ है। कुछ वर्षों से कई संवैधानिक संस्थाओं की दुर्गति बहुत तेजी से वे खुद भी कर रही हैं। मुख्यत: कार्यपालिका अर्थात केंद्रीय मंत्रिपरिषद की खलनायकी इतिहास में दर्ज हो रही है। उसने चुन चुनकर संवैधानिक संस्थाओं की रीढ़ की हड्डी तोडऩे में सफलता प्राप्त की है। 

सुप्रीम कोई की जो छवि बन गई है, उससे मुझ जैसे व्यक्ति का चिंतित होना जरूरी है। विशेषकर मौजूदा सरकार के पिछले 5, 6 वर्षों में जनहित के सभी बड़े मामले इस तरह उलझा दिए गए हैं कि सुप्रीम कोर्ट भी उससे उम्मीद के अनुसार कोई सार्थक फैसला नहीं कर पाया है। आप तो बस कुछ महीनों में चले जाएंगे। बाकी जज भी एक के बाद एक चले जाएंगे। वकील कुछ ज्यादा समय तक टिकते हैं। वे भी चले जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट रहेगा। जनता रहेगी। देश रहेगा। इतिहास रहेगा। 

संवैधानिक महत्व के कई प्रकरण जबरिया सुप्रीम कोर्ट में अटके हैं। कोर्ट की परंपरा के अनुसार इन पर फैसला हो जाना चाहिए था। कई जज ऐसे भी रहे हैं जिन्हें पूंजीपतियों और कॉरपोरेट हितों के मामले आनन फानन में निपटाने की बहुत जल्दी रही है। जनहित के पक्ष में बोलने वाले वकीलों को दंडित करने में कुछ जजों ने महारत हासिल कर ली थी। आपको यह पत्र कोई अनाड़ी नहीं लिख रहा है। उसने ईमानदारी से संविधान के मर्म को समझने की कोशिश की है। 
मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि सभी महत्वपूर्ण संवैधानिक मामले दो में से एक विकल्प के अनुसार निपटाने की अगर आप आज्ञा दें, तो आपका कार्यकाल जो 23 अप्रेल 2021 को खत्म हो रहा है, अर्थात मात्र छह महीने में, एक ऊंचाई हासिल कर सकता है। जज तो रिटायर होने के बाद ही इतिहास में जीवित रहता है। इसका इल्म तो आप जैसे वरिष्ठ जज को होगा ही। 

एक विकल्प यह है कि सबसे वरिष्ठ जज एन. वी. रमन्ना की अध्यक्षता में संविधान पीठ बने जिसमें क्रम से जजों रोहिंटन फली नरीमन, उदय यू. ललित, ए. एम. खानविलकर और धनंजय चंद्रचूड़ को रखा जाए। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के जो वरिष्ठ वकील सीधे जज बनाए गए हैं। वे संवैधानिक मामलों को लेकर अन्य जजों के मुकाबले होते हुए वकील के रूप में बेहतर बहस भी करते रहे हैं। ऐसी हालत में आर.एफ. नरीमन, यू.यू. ललित, एल. नागेश्वर राव और इंदु मल्होत्रा जैसे जजों को बेंच में आपकी अध्यक्षता में रखा जाए तो बहस बेहद उत्तेजक, उर्वर और अर्थमयी हो सकती है। महत्वपूर्ण मामलों में मास्टर ऑफ रोस्टर वाली थ्योरी अपनाकर कनिष्ठ जजों को महत्वपूर्ण मामलों में रख दिया जाता है। इसी कारण चार वरिष्ठ जजों को प्रेस कान्फरेन्स करनी पड़ी थी। आशय अवमानना करना या तुलना करना नहीं है। वरिष्ठता का ध्यान रखना अनुभव के प्रति सम्मान भी होता है। इसी आधार पर आप भी चीफ जस्टिस बने हैं। आगे भी यही होगा। 

एक विकल्प और है। यदि जस्टिस रमन्ना जस्टिस ललित जस्टिस चंद्रचूड़ के अतिरिक्त जस्टिस खन्ना जस्टिस गवई और जस्टिस सूर्यकांत में से  शामिल करके कोई बेंच बने तो फायदा यह होगा कि ये सब के सब  चीफ जस्टिस बनेंगे कम से कम 2026 तक। एक के बाद एक। तो सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक मामलों में विचारों में एकरूपता रहने की ज्यादा संभावना है।

कम से कम 15-20 महत्वपूर्ण मामले संविधान पीठ के लायक लंबित पड़े हैं। उनसे भारत के 137 करोड़ लोगों को अपने मूल अधिकारों के संदर्भ में लेना देना है। मेरा अनुरोध हवा हवाई नहीं है। मैं 80 वर्ष के ऊपर हूं। इस उम्र में लालच और लागलपेट से परे उठकर देश और युवा पीढ़ी का भविष्य देखना और चिंता करना मेरा कर्तव्य है। 

आप यदि कर सकें तो चीफ जस्टिस के रूप में आपका कार्यकाल देश को कई नए साहसिक, जरूरी और परिणामधर्मी आयाम दे सकेगा। इस बात के लिए माफ करेंगे कि मैंने पत्र आपको हिन्दी में लिखा। अंग्रेजी में बहस करने से भी देश का बहुत भला नहीं हुआ है। इसीलिए हम सबके आराध्य गांधी ने अंत में कहा था जाओ दुनिया से कह दो गांधी अंग्रेजी भूल गया है। कोरोना हट जाए। आप रिटायर हो जाएं। फिर आपसे मिलूंगा जरूर जिससे आपको आश्वस्त कर सकूं कि मैं इस पत्र के कथ्य को लेकर गंभीर रहा हूं। 


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