विचार / लेख

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Date : 24-Jan-2020

आमिर अंसार

पूर्ण लोकतंत्र 8 से ज्यादा अंक हासिल करने वाले, त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र 6 से ज्यादा लेकिन 8 या 8 से कम अंक वाले, संकर शासन 4 से ज्यादा लेकिन 6 या 6 से कम अंक हासिल करने वाले और निरंकुश शासन 4 या उससे कम अंक वाले। भारत को त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र में शामिल किया गया है।

लोकतंत्र सूचकांक में भारत 10 नंबर गिरकर 165 देशों की सूची में 51वें स्थान पर पहुंच गया है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, एनआरसी और सीएए के चलते भारत की लोकतंत्र सूचकांक में रैकिंग गिरी है।
इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) की तरफ से जारी वैश्विक रैंकिंग के मुताबिक शून्य से 10 के पैमाने पर भारत का कुल स्कोर 2018 के 7.23 के मुकाबले में 2019 में 6।90 रह गया। 2006 में लोकतंत्र सूचकांक की शुरुआत के बाद भारत का यह अब तक सबसे खराब स्कोर है।
इस सूचकांक के मुताबिक 2019 में नॉर्वे 9.87 स्कोर के साथ पहले पायदान पर रहा। यह वैश्विक सूची 165 स्वतंत्र देशों और दो क्षेत्रों में लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति का हाल बताती है। ईआईयू की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की रैकिंग में गिरावट का मुख्य कारण देश में नागरिक स्वतंत्रता में कटौती है। ईआईयू ने भारत को कम स्कोर देने का कारण बताया, भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से दो महत्वपूर्ण अनुच्छेद हटाकर उससे विशेष राज्य का दर्जा छीना और उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। इस फैसले के पहले सरकार ने वहां सेना की भारी तैनाती की, कई पाबंदियां लगाईं और स्थानीय नेताओं को नजरबंद किया गया। वहां इंटरनेट पर रोक लगाई गई।
साथ ही रिपोर्ट ने विवादित नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) पर कहा, असम में एनआरसी लागू होने से करीब 19 लाख लोग अंतिम सूची से बाहर हो गए जिनमें बड़ी संख्या में मुसलमान शामिल हैं। नागरिकता संशोधन कानून से देश में बड़ी संख्या में मुसलमान नाराज हैं। सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है और कई बड़े शहरों में इस कानून के खिलाफ विरोध हो रहे हैं।
इस सूचकांक पर तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने डीडब्ल्यू से कहा, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री देश में जहर फैला रहे हैं। वे संसद जैसी प्रतिष्ठित संस्था को खत्म करने की धुन में हैं। असहमति के सभी रूपों का गला घोंटा जा रहा है। सरकार छात्रों की आवाज दबा रही है। भारत के विचार को खत्म किया जा रहा है। देश के छात्र और युवा गुस्से में हैं और जब यह होता है तो आपको पता होना चाहिए कि सरकार गंभीर संकट में है।
बीजेपी कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए के हटाने का बचाव करती आई है और कहती है कि 370 हटने से कश्मीर का विकास होगा। बीजेपी नेता सायंतन बसु कहते हैं, कुछ पश्चिमी संगठन इस तरह की समीक्षा करते रहते हैं। उसकी पारदर्शिता और मान्यता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। इस रिपोर्ट में हमने पाया कि स्कोर कम देने का कारण कश्मीर को बताया गया है लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि कश्मीर में 45 हजार लोग आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं। 
सरकार ने वहां माहौल को सामान्य करने के लिए कई कदम उठाए हैं। रिपोर्ट में कश्मीर का मुद्दा उठाना शर्मनाक बात है। कश्मीर में माहौल सामान्य हो, इसलिए सरकार यह कदम उठा रही है। कश्मीर में एक महीने के लिए सख्त कदम उठाए गए थे और उससे स्थिति सामान्य हुई है और लगातार हालात ठीक हो रहे हैं। अगर सरकार देश में किसी भी जगह लोकतांत्रिक आंदोलनों का दमन कर रही है तो आप इसका उदाहरण दीजिए।
पिछले साल कुछ भारतीयों के फोन पेगासस स्पाइवेयर के जरिए टैप होने का मामला भी सामने आया था और कई लोगों ने टैपिंग को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। इस मामले और वैश्विक सूचकांक में भारत की खराब स्थिति पर पत्रकार और पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रैटिक राइट्स के आशीष गुप्ता कहते हैं, सरकार ने मेरा फोन भी टैप किया था। कनाडा की संस्था ने इस मुद्दे पर मुझसे संपर्क भी किया था, फोन टैप करने वालों की सूची में मेरा नाम भी था। मुझे भी इस बात की जानकारी थी। आंदोलनों पर सरकार पहले भी दमन करती थी, कई बार लाठी और गोली भी चलती थी और कुछ मांगें मान ली जाती थी, कभी-कभी सरकार अपना फैसला भी रद्द कर देती थी लेकिन मौजूदा सरकार कोई भी फैसला नहीं बदलती है, तो इसलिए जितने भी आंदोलन हो रहे हैं उन्हें वह दबाना चाहती है और मांग पूरी नहीं करना चाहती। हमें डर है कि आने वाले सालों में इस सूचकांक में भारत की स्थिति और भी खराब होगी।
यह सूचकांक पांच श्रेणियों पर आधारित है चुनाव प्रक्रिया और बहुलतावाद, सरकार का कामकाज, राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता। इनके कुल अंकों के आधार पर देशों को चार प्रकार के शासन में वर्गीकृत किया जाता है। 
पूर्ण लोकतंत्र 8 से ज्यादा अंक हासिल करने वाले, त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र 6 से ज्यादा लेकिन 8 या 8 से कम अंक वाले, संकर शासन 4 से ज्यादा लेकिन 6 या 6 से कम अंक हासिल करने वाले और निरंकुश शासन 4 या उससे कम अंक वाले। भारत को त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र में शामिल किया गया है।
वहीं पाकिस्तान की इस सूचकांक में 4।25 स्कोर के साथ 108वें स्थान पर है। चीन 2।26 स्कोर के साथ 153वें स्थान पर है जबकि बांग्लादेश 80वें और नेपाल 92वें स्थान पर है। उत्तर कोरिया 167वें स्थान के साथ सबसे नीचे पायदान पर है। (डॉयचेवेले)

 

 


Date : 24-Jan-2020

जयंत जिज्ञासु
1990 की बात है। बिहार में खगडिय़ा जिले में पडऩे वाले अलौली में लालू प्रसाद यादव का एक कार्यक्रम था। इस दौरान उन्होंने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का जिक्र किया। लालू यादव का कहना था, ‘जब कर्पूरीजी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे। और, जब मैं रेजरबेसन (रिजर्वेशन) की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है।’ लालू प्रसाद यादव ने आगे इसका श्रेय उस ताकत को दिया जो कर्पूरी ठाकुर ने हाशिए पर रह रहे समुदायों को दी थी।
देखा जाए तो यही वह खूबी थी जिसके चलते बिहार के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के नाम के आगे जननायक की उपाधि जुड़ी। उनका नाम उन महान समाजवादी नेताओं की पांत में आता है जिन्होंने निजी और सार्वजनिक जीवन, दोनों में आचरण के ऊंचे मानदंड स्थापित किए थे।
पैमानों की इस ऊंचाई के कई किस्से हैं। 1952 में कर्पूरी ठाकुर पहली बार विधायक बने थे। उन्हीं दिनों उनका ऑस्ट्रिया जाने वाले एक प्रतिनिधिमंडल में चयन हुआ था। उनके पास कोट नहीं था। तो एक दोस्त से कोट मांगा गया। वह भी फटा हुआ था। खैर, कर्पूरी ठाकुर वही कोट पहनकर चले गए। वहां यूगोस्लाविया के मुखिया मार्शल टीटो ने देखा कि कर्पूरी जी का कोट फटा हुआ है, तो उन्हें नया कोट गिफ़्ट किया गया। आज जब राजनेता अपने महंगे कपड़ों और दिन में कई बार ड्रेस बदलने को लेकर चर्चा में आते रहते हों, ऐसे किस्से अविश्वसनीय ही लग सकते हैं।
एक और उदाहरण है। 1974 में कर्पूरी ठाकुर के छोटे बेटे का मेडिकल की पढ़ाई के लिए चयन हुआ। पर वे बीमार पड़ गए। दिल्ली के राममनोहर लोहिया हॉस्पिटल में भर्ती थे। हार्ट की सर्जरी होनी थी। इंदिरा गांधी को जैसे ही पता चला, एक राज्यसभा सांसद को वहां भेजा और उन्हें एम्स में भर्ती कराया। ख़ुद भी दो बार मिलने गईं। इलाज के लिए अमरीका भेजने की पेशकश की। सरकारी खर्च पर। कर्पूरी ठाकुर को पता चला तो उन्होंने कहा कि वे मर जाएंगे पर बेटे का इलाज़ सरकारी खर्च पर नहीं कराएंगे। बाद में जेपी ने कुछ व्यवस्था कर न्यूजीलैंड भेजकर उनके बेटे का इलाज कराया।
इसी तरह एक और किस्सा है कि प्रधानमंत्री चरण सिंह उनके घर गए तो दरवाज़ा इतना छोटा था कि चौधरी जी को सिर में चोट लग गई। पश्चिमी उत्तर प्रदेश वाली खांटी शैली में चरण सिंह ने कहा, ‘कर्पूरी, इसको जऱा ऊंचा करवाओ।’ जवाब आया, ‘जब तक बिहार के गऱीबों का घर नहीं बन जाता, मेरा घर बन जाने से क्या होगा?’
कर्पूरी ठाकुर का जीवन ताउम्र संघर्ष रहा। 1978 में बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए जब उन्होंने हाशिये पर धकेल दिए वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में 26 फीसदी आरक्षण लागू किया तो उन्हें क्या-क्या न कहा गया। लोग उनकी मां-बहन-बेटी-बहू का नाम लेकर भद्दी गालियां देते। अभिजात्य वर्ग के लोग उन पर तंज कसते हुए कहते - कर कर्पूरी कर पूरा, छोड़ गद्दी, धर उस्तरा। यह तंज इसलिए कि कर्पूरी ठाकुर नाई समुदाय से ताल्लुक रखते थे।
1978 में कर्पूरी ठाकुर की सरकार ने सिंचाई विभाग में 17000 पदों के लिए आवेदन मंगाए। हफ्ता भर बीतते-बीतते उनकी सरकार गिर गई। कई इन दोनों बातों का आपस में संबंध मानते हैं। उनके मुताबिक पहले होता यह था कि बैक डोर से अस्थायी बहाली कर दी जाती थी, बाद में उसी को नियमित कर दिया जाता था। माना जाता है कि एक साथ इतने लोग खुली भर्ती के ज़रिये नौकरी पाएं, यह सरकारी व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे एक वर्ग को मंजूर नहीं था सो कर्पूरी ठाकुर को जाना पड़ा।
लालू प्रसाद यादव के वे राजनीतिक गुरू थे। और हो सकता है कि जनता से संवाद की चतुराई का कुछ हिस्सा लालू यादव ने उनसे भी सीखा हो। इसका अंदाजा एक किस्से से भी लगाया जा सकता है। अपनी मौत से तीन महीने पहले कर्पूरी ठाकुर एक कार्यक्रम में शिरकत करने अलौली गए थे। वहां मंच से वे बोफोर्स पर बोलते हुए राजीव गांधी के स्विस बैंक के खाते का उल्लेख कर रहे थे। 
भाषण के दौरान ही उन्होंने धीरे से एक पर्ची पर लिखकर पूछा कि ‘कमल’ को अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं। लोकदल के तत्कालीन जि़ला महासचिव हलधर प्रसाद ने उस स्लिप पर ‘लोटस’ लिख कर कर्पूरीजी की ओर बढ़ाया। इसके बाद उन्होंने कहा, ‘राजीव मने कमल, और कमल को अंग्रेजी में लोटस बोलते हैं। इसी नाम से स्विस बैंक में खाता है राजीव गांधी का।’ ।
कर्पूरी ठाकुर जब मुख्यमंत्री थे तो उनके प्रधान सचिव थे यशवंत सिन्हा। वे आगे जाकर वाजपेयी सरकार में वित्त और विदेश मंत्री बने। किस्सा है कि एक दिन दोनों अकेले में बैठे थे तो कर्पूरी ठाकुर ने यशवंत सिन्हा कहा, ‘आर्थिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ जाना, सरकारी नौकरी मिल जाना, इससे क्या यशवंत बाबू आप समझते हैं कि समाज में सम्मान मिल जाता है? जो वंचित वर्ग के लोग हैं, उसको इसी से सम्मान प्राप्त हो जाता है क्या? नहीं होता है।’
आगे उन्होंने अपना उदाहरण दिया। वे मैट्रिक में फर्स्ट डिविजऩ से पास हुए थे। नाई का काम कर रहे उनके बाबूजी उन्हें गांव के समृद्ध वर्ग के एक व्यक्ति के पास लेकर गए और कहा, ‘सरकार, ये मेरा बेटा है, फर्स्ट डिविजन से पास किया है।’ उस आदमी ने अपनी टांगें टेबल के ऊपर रखते हुए कहा, ‘अच्छा, फर्स्ट डिविजऩ से पास किए हो? मेरा पैर दबाओ।’
इस तरह की तमाम चुनौतियों से पार पाते हुए कर्पूरी ठाकुर आगे बढ़े। 1967 में जब पहली बार नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ तो महामाया प्रसाद के मंत्रिमंडल में वे शिक्षा मंत्री और उपमुख्यमंत्री बने। उन्होंने मैट्रिक में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता समाप्त कर दी और यह बाधा दूर होते ही कस्बाई-देहाती लडक़े भी उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हुए, नहीं तो पहले वे मैट्रिक में ही अटक जाते थे।
1970 में 163 दिनों के कार्यकाल वाली कर्पूरी ठाकुर की पहली सरकार ने कई ऐतिहासिक फ़ैसले लिए। आठवीं तक की शिक्षा मुफ़्त कर दी गई। उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दजऱ्ा दिया गया। 
सरकार ने पांच एकड़ तक की ज़मीन पर मालगुज़ारी खत्म कर दी। जब 1977 में वे दोबारा मुख्यमंत्री बने तो एस-एसटी के अलावा ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करने वाला बिहार देश का पहला सूबा बना। 11 नवंबर 1978 को उन्होंने महिलाओं के लिए तीन (इसमें सभी जातियों की महिलाएं शामिल थीं), गऱीब सवर्णों के लिए तीन और पिछडों के लिए 20 फीसदी यानी कुल 26 फीसदी आरक्षण की घोषणा की। इसके लिए ऊंचे तबकों ने एक बड़े वर्ग ने भले ही कर्पूरी ठाकुर को कोसा हो, लेकिन वंचितों ने उन्हें सर माथे बिठाया। इस हद तक कि 1984 के एक अपवाद को छोड़ दें तो वे कभी चुनाव नहीं हारे।
सादगी के पर्याय कर्पूरी ठाकुर लोकराज की स्थापना के हिमायती थे। उन्होंने अपना सारा जीवन इसमें लगा दिया। 17 फरवरी 1988 को अचानक तबीयत बिगडऩे से उनका देहांत हो गया। आज उन्हें एक जातिविशेष के दायरे में सीमित कर दिया जाता है जबकि उनके दायरे में वह पूरा समाज आता था जिसकी तीमारदारी को उन्होंने अपना मिशन बना लिया था। (सत्याग्रह)


Date : 23-Jan-2020

रजनीश कुमार

सितंबर 2018 में नवाजुद्दीन सिद्दीकी नंदिता दास की फि़ल्म मंटो में सआदत हसन मंटो बने और ठीक पांच महीने बाद बाल ठाकरे बने।

नवाजुद्दीन कह सकते हैं कि एक कलाकार हर भूमिका निभाने के लिए आजाद होता है और उसके अभिनय में किसी किरदार को लेकर कोई दीवार नहीं होनी चाहिए।
अभिनेता मोहम्मद जीशान अयूब कहते हैं कि मंटो उनके पसंदीदा किरदार हैं लेकिन उन्हें बाल ठाकरे का रोल मिलता, तो वो स्क्रिप्ट पढऩे के बाद ही कोई फैसला लेते।
जीशान कहते हैं, बाल ठाकरे का किरदार निभाने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन मैं प्रोपेगेंडा नहीं करूंगा। मैं हिटलर को हिटलर दिखाने वाला किरदार करूंगा लेकिन राष्ट्रभक्त दिखाने वाला नहीं करूंगा।
वरिष्ठ फिल्म पत्रकार जिया उस सलाम कहते हैं कि कलाकार के किरदार में विविधता होनी चाहिए लेकिन मंटो की बात करने वाला कलाकार अचानक बाल ठाकरे की प्रोपेगेंडा फिल्म में काम कैसे कर सकता है? सलाम कहते हैं कि ये लालच और डर का तर्क है। क्या यही लालच सैफ़ अली ख़ान के भीतर भी हावी था?
तानाजी द अनंसग वॉरियर फिल्म में उदयभान राठौर के किरदार से सैफ अली खान सहमत नहीं थे लेकिन उन्होंने ये रोल निभाया। सैफ अली खान का कहना है कि अगली बार से वो ऐसे किरदार का अभिनय करने से पहले सोचेंगे।
उन्हें लगता है कि तानाजी में पॉलिटिकल नैरेटिव को बदला गया है और ये बहुत ही खतरनाक है। सैफ ने कहा कि उन्हें पता था कि फिल्म में इतिहास से छेड़छाड़ है।
जब सैफ को इतना कुछ पता था तब भी उन्होंने ये रोल क्यों किया? सैफ ने इसका जवाब दिया है कि इसके बावजूद उन्हें उदयभान राठौर का किरदार आकर्षक लगा।
सैफ के इन तर्कों को मशहूर फिल्मकार मुजफ्फर अली बेकार बताते हैं। वो कहते हैं, जब आपको पता था कि फिल्म का पॉलिटिकल नैरेटिव बदला गया है तब भी आपको यह किरदार आकर्षक कैसे लगा? ये कोई तर्क नहीं है। आप या तो ऐसे रोल मत कीजिए या फिर कीजिए। पता होते हुए ग़लत करने का क्या मतलब है?
तानाजी फिल्म में मुगल शासकों को विदेशी और हिंसक बताया गया है जबकि मराठों का महिमामंडन किया गया है।
उमराव जान जैसी फिल्में बनाने वाले निर्देशक मुजफ्फर अली कहते हैं, मसला केवल तानाजी का ही नहीं है। आप पद्मावत देख लीजिए। इसमें तो अलाउद्दीन खिलजी को किसी चपरासी की तरह दिखाया है। अलाउद्दीन खिलजी मध्यकाल का एक शासक था और आप उसके किरदार को ऐतिहासिक रिसर्च के आधार पर ही दिखाएंगे न कि हिन्दू-मुस्लिम दुर्भावना के साथ। फिल्मों में संकीर्ण एजेंडे को लेकर काम किया जा रहा है। इतिहास के किरदारों के साथ आप खेल नहीं सकते।
क्या फिल्मकार भारत के मुसलमान किरदारों को विकृत बनाकर पेश करते हैं? जाने-माने इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं, किसी भी शासक को हम धर्म के चश्मे से कैसे देख सकते है? अकबर के सबसे खास राजा मान सिंह थे। औरंगजेब के जमाने में राजा जसवंत सिंह और जय सिंह सबसे खास रहे। मराठे भी भरे हुए थे। मध्यकाल में कोई मुस्लिम शासन नहीं था। मुसलमान शासक जरूर थे लेकिन उस शासन में हिन्दू भी निर्णायक पदों पर थे। फिल्में बाजारू हो सकती हैं लेकिन इनमें इतिहास को बाजारू नहीं बनाया जा सकता है।
आशुतोष गोवारिकर ने 2008 में जोधा-अकबर फिल्म बनाई थी। इस फिल्म में हिन्दू राजकुमारी और मुगल शासक अकबर की प्रेम कहानी है।
मध्यकाल के जाने-माने इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं, अकबर के वक़्त में जोधा बाई नाम की कोई महिला नहीं थी। जहांगीर की एक पत्नी थी जिसका नाम जोधाबाई कहा जाता है। वो जोधपुर से थीं इसलिए जोधाबाई कहा जाता है। लेकिन अकबर की कोई पत्नी जोधाबाई नहीं थी। आशुतोष ने मशहूर इतिहासकार इरफान हबीब से जाकर पूछा था और उन्होंने मना किया था लेकिन फिर भी फिल्म बनाई।
इतिहासकार अकबर की पाँच पत्नियां बताते हैं, जिनमें किसी का भी नाम जोधाबाई नहीं था। ये थीं- सलीमा सुल्तान, मरियम उद ज़मानी, रजिया बेगम, कासिम बानू बेगम और बीबी दौलत शाद।
हरबंस मुखिया कहते हैं कि यह तर्क बहुत ही फर्जी है कि जो चलता है वही दिखाया जाता है। वो कहते हैं, दरअसल, जिसकी सरकार होती है और जिस तरह का राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है, उस तरह की फिल्में बनती हैं। कांग्रेस की सरकार में हिन्दू-मुस्लिम प्रेम पर जोधा-अकबर बनी और अभी की सरकार में उग्र राष्ट्रवाद और तानाजी जैसी फिल्में बन रही हैं। फिल्मकार भी ताक में रहते हैं कि किस राजनीतिक पार्टी को कैसी फिल्में बनाकर ख़ुश करना है। आखिर बीजेपी शासित राज्यों में तानाजी को टैक्स फ्री क्यों किया गया?
मुजफ्फर अली मानते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने भारतीय जनमानस का इतिहासबोध बिगाड़ा है। इस बात से हरंबस मुखिया भी सहमत हैं। इन दोनों का कहना है कि इतिहास को अपने तरीके से पेश करने की गलती आपके उस डिस्क्लेमर से माफ नहीं हो जाता है कि इस फिल्म के सभी किरदार काल्पनिक हैं। मुखिया कहते हैं कि अगर सभी किरदार काल्पनिक हैं तो नाम भी काल्पनिक रखो।
जाने-माने फिल्मकार आनंद पटवर्धन को लगता है कि फिल्मकार मुसलमान किरदारों को बायस्ड होकर देखते हैं। वो कहते हैं, पद्मावत फिल्म अलाउद्दीन खिलजी को हत्यारा, लंपट और दूसरे की पत्नी पर नजर रखने वाला दिखाया गया है। फिल्मकार को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि खिलजी का क्या योगदान था। ये बात सही है कि खिलजी ने अपने चाचा की हत्या कर सत्ता हासिल की थी लेकिन सम्राट अशोक ने भी अपने कई भाइयों को मारा था। क्या किसी ने फिल्म में सम्राट अशोक को हत्यारे की तरह दिखाया गया है? नहीं दिखाया है। हमारे फिल्मकारों का भी भारतीय समाज से वैज्ञानिक सोच खत्म करने में अहम योगदान दिया है।
मीनाक्षी जैन दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफेसर हैं और उन्हें दक्षिणपंथी इतिहासकार के तौर पर देखा जाता है। वो कहती हैं, ये बात बिल्कुल सही है कि अकबर की जोधाबाई नाम की कोई रानी नहीं थी। लेकिन हम अलाउद्दीन खिलजी से सम्राट अशोक की तुलना नहीं कर सकते हैं। अशोक ने तो बाद में हिंसा का रास्ता छोड़ दिया था। उन्होंने अपनी ग़लती मान ली थी। अलाउद्दीन खिलजी के जीवन ऐसा कोई परिवर्तन नहीं आया।
आनंद पटवर्धन को लगता है कि अभिनेताओं को केवल लालच पूरा करने के लिए काम नहीं करना चाहिए। वो कहते हैं, पिछले साल विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द ताशकंद फाइल्स में नसीरुद्दीन शाह ने काम किया। विवेक अग्निहोत्री का ऐसी फिल्में बनाना तो समझ में आता है लेकिन ऐसी प्रोपेगेंडा फि़ल्म में नसीर का काम करना चौंकाता है। हालांकि अब लगता है कि बदले हालात में नसीर और सैफ जैसे अभिनेता भी ख़ुद को बदलेंगे।
सैफ अली खान और अजय देवगन अभिनीत फिल्म तानाजी द अनंसग वॉरियर करोड़ों में कमाई कर रही है। इतनी कमाई करने के बाद सैफ अली खान ने कहा है कि वो अगली बार से ऐसे किरदारों को चुनते वक्त सतर्क रहेंगे।
साल 2014 में जब कथित लव-जिहाद का मामला उछाला जा रहा था तब सैफ अली खान ने इंडियन एक्सप्रेस में आर्टिकल लिखा और कहा था कि अंतर्धामिक विवाह जिहाद नहीं होता है।
सैफ ने उस आर्टिकल में लिखा था, मैं क्रिकेटर का बेटा हूं। मेरी परवरिश इंग्लैंड, भोपाल, पटौदी और मुंबई में हुई। मैं किसी भी हिन्दू और मुसलमान से ज्यादा भारतीय हूं क्योंकि मैं दोनों को जानता हूं। मेरा यह लेख आम लोगों पर टिप्पणी के लिए नहीं है और न ही भारत और गांवों में सांप्रदायिकता की समस्या पर है। यह इसलिए है कि इससे मेरे दोस्त और उनके परिवार प्रभावित हो रहे हैं। जब मेरे माता-पिता की शादी हुई तो इसे शुरुआत में सबने बहुत आसानी से स्वीकार नहीं किया था। तब भी धमकियां मिली थीं। दोनों तरफ के धार्मिक कट्टरपंथी खुलकर सामने आए थे लेकिन शादी हुई।
सैफ ने लिखा है, जब मेरी और करीना की शादी हुई तब भी जान से मारने की धमकी मिली। हम दोनों जिस धर्म और अध्यात्म में भरोसा करते हैं, उसे मानते हैं। हम एक दूसरे के विचार का आदर करते हैं। मुझे उम्मीद है कि हमारे बच्चे भी ऐसे ही करेंगे।
सैफ अब खुद से भी उम्मीद कर रहे हैं कि अगली बार वो उदयभान राठौर जैसा किरदार करने से पहले सोचेंगे। (बीबीसी)

 


Date : 23-Jan-2020

सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और विधायकों की अयोग्यता निर्धारित करने के लिए एक स्वतंत्र प्रणाली बनाने का सुझाव दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पीकर लंबे समय तक ऐसी याचिकाओं को अपने पास नहीं रख सकते। जस्टिस आरएफ नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कांग्रेस विधायक मोहम्मद फजुर्रहीम और के मेघचंद्र से कहा कि अगर विधानसभा अध्यक्ष बीजेपी के मंत्री की अयोग्यता की मांग करने वाली याचिका पर चार हफ्ते के भीतर फैसला नहीं ले पाते हैं तो वह फिर सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के वन मंत्री और बीजेपी विधायक टी श्यामकुमार सिंह को अयोग्य ठहराने की मांग करने वाली कांग्रेस नेताओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बातें कहीं। सुप्रीम कोर्ट टी श्यामकुमार सिंह को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित करने की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। 2017 में टी श्यामकुमार सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता था और बीजेपी में शामिल होने के बाद मंत्री बनाए गए थे।
कांग्रेस विधायक मोहम्मद फजुर्रहीम और के मेघचंद्र ने कोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर की है। मेघचंद्र ने फैसले के बाद राजधानी इम्फाल में पत्रकारों से बातचीत में कहा, यह हमारी जीत है। शीर्ष अदालत का यह फैसला और केंद्र को दिया गया सुझाव लागू होने की स्थिति में विधायकों की खरीद-फरोख्त पर अंकुश लगाने में असरदार साबित हो सकता है।
वहीं मोहम्मद फजुर्रहीम ने इस पर खुशी जताते हुए कहते हैं, गेंद अब विधानसभा अध्यक्ष के पाले में है। बीजेपी के मंत्री को अयोग्य ठहराने की हमारी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ऐसे कई मामलों को निपटाने में सहूलियत होगी।
वरिष्ठ पत्रकार आशीष गुप्ता कहते हैं, सोमनाथ चटर्जी जैसे स्पीकर बहुत कम होते हैं जो पार्टी का निर्देश नहीं मानते हैं और पार्टी से ऊपर उठकर काम करते हैं लेकिन ज्यादातर स्पीकरों के ऊपर पार्टी का बहुत का प्रभाव रहता है इसलिए कुछ मामलों में जरूर सवाल उठते हैं। कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है और कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर संसद को विचार करना चाहिए।
लोकसभा में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल सही बात कहा है। इस सुझाव पर जरूर विचार होना चाहिए। कुछ विधानसभाओं में स्पीकर के फैसलों को लेकर सवाल उठ चुके हैं। हम निजी तौर पर यह मानते हैं कि अयोग्य ठहराने का फैसला स्वतंत्र प्रणाली को देना चाहिए।
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे भी अयोग्य ठहराए जाने की याचिकाओं के निपटारे के लिए एक स्वतंत्र व्यवस्था के सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का स्वागत करते हैं। वह कहते हैं, यह स्वागत योग्य फैसला है। शायद इस फैसले से स्पीकर द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग के मामले खत्म हो जाएंगे जिसमें स्पीकर अयोग्यता पर त्वरित फैसले नहीं लेते है। साथ ही दवे कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का सुझाव मानने के लिए संसद बाध्य नहीं है लेकिन यह सुझाव सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने दिया है और संसद सदस्यों को इस पर विचार करना चाहिए।
उनके मुताबिक, यह किसी राजनीतिक दल से जुड़ा मामला नहीं है लेकिन यह स्पीकर की शक्तियों, उसके दुरुपयोग और अयोग्यता पर कार्रवाई नहीं करने या फिर उसमें देरी करने से जुड़ा मामला है जिस पर संसद को विचार करना चाहिए। अब सरकार इस पर कोई कदम उठाएगी या नहीं करेगी, यह फैसला तो सरकार को ही करना है। (डायचे वैले)


Date : 22-Jan-2020

मनीष सिंह
16 अगस्त 1908, जोहान्सबर्ग, जगह हमीदा मस्जिद के सामने का मैदान। भारतीय और एशियन समुदाय की भारी भीड़ गांधी के इशारे का इंतजार कर रही थी। गांधी टेलीग्राम पढ़ रहे थे, जो सरकार की ओर से आया था। लिखा था- काला कानून वापस नहीं लिया जाएगा।
गांधी ने आंदोलन दोबारा शुरू करने की घोषणा की। उस मैदान में हजारों लोगों में उस मैदान में अपने ने एनआरसी सर्टिफिकेट जला दिए। पूरे दक्षिण अफ्रीका में भयंकर बवंडर खड़ा हो गया। दुनिया सत्याग्रह नाम के नए-नए ईजाद हथियार का इस्तेमाल देख रही थी।
दरअसल 1906 में ट्रांसवाल की सरकार ने एक ट्रांसवाल एशियाटिक ऑर्डिनेंस जारी किया। हर भारतीय, अरब, चीनी और दूसरे काले एशियन्स को अपना रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। रजिस्ट्रार के पास जाकर अपना शारीरिक परीक्षण करवाना होगा, अंगुलियों की छाप देनी होगी। एक सर्टिफिकेट लेना होगा, जो सदा साथ रखना होगा। न होने पर फाइन या जेल हो सकती थी। आबाल-वृद्ध , कोई भी अगर बगैर रजिस्ट्रेशन पेपर्स के मिले, उसकी उंगलियों की छाप मैच न करे, तो सीधे जेल, या डिपोर्ट किया जा सकता था।
पहले से ही रंगभेद झेल रहे एशियन समुदाय को, इस कानून से जीना मुश्किल होने के आसार थे। गांधी जो अब तक समुदाय के जाने पहचाने चेहरे हो चुके थे, आगे आए। जोहान्सबर्ग के एम्पायर थिएटर में सारे समुदायों के लीडर्स को इक_ा किया। तीन हजार की भीड़ को संबोधित करते गांधी ने इस कानून को काला कानून कहा।
उन्होंने कहा- हम इस कानून को रिजेक्ट करते हैं। हमे मिलकर तय करना होगा कि हममें से कोई रजिस्ट्रेशन न कराए। मैं सबसे पहले अपना वचन देता हूँ। मैं अपना रजिस्ट्रेशन नही कराऊंगा। 
एक बूढ़ा मुसलमान उठा। वो सेठ हबीब था। सबसे पहला था वो, जिसने गांधी के सामने शपथ उठाई-  हम कागज नहीं बनाएंगे...।
ये गूंजता हुआ नारा हो गया। कानून का उल्लंघन, जेल, मारपीट, अपमान और दमन को सहना, लेकिन अड़े रहना, पीछे नही हटना। मजबूती से थमे रहना, अपना आग्रह मुस्कान के साथ बनाये रखना। हम कागज नही बनाएंगे। हम रजिस्ट्रेशन नहीं कराएंगे।
आंदोलन के इन तरीकों को शुरू में उन्होंने पैसिव रेजिस्टेंस कहा। मगर नाम कुछ जंच नही रहा था। उन्होंने साथियों से नाम सुझाने को कहा। एक साथी मगनलाल थे- उन्होंने कहा,  सदाग्रह!!
गांधी ने सुना , सोचा.. फिर एकाएक बोले- सत्य के प्रति निर्भीक आग्रह.. यही ! सत्याग्रह। यह गांधी की दिशा बन गई गांधी का हथियार बन गया। वक्त वो था, आज भी वही है। सवा सौ साल से दुनिया का कोई हिस्सा हो, वक्त हो, देश हो..
‘सत्याग्रह’ को हर आततायी खौफ से देखता है।

 

 


Date : 22-Jan-2020

रजनीश कुमार
साल 2003 के दिसंबर महीने में अमरीका ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल किया तो वहां के शिया मुसलमानों ने जश्न मनाया था। शियाओं को लगा था कि अमरीका ने सद्दाम हुसैन को हटाकर उनकी मनोकामना पूरी कर दी।
इराक के वर्तमान प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी तब शक्तिशाली शिया पार्टी के नेता थे। सद्दाम के अपदस्थ होने के बाद वो एसयूवी गाड़ी पर सवार होकर एक जुलूस में निकले थे। हर तरफ़ से वो बॉडीगार्ड से घिरे थे और जीत का जश्न मना रहे थे।
इसी जश्न में उन्होंने लंदन के पत्रकार एंड्र्यू कॉकबर्न से कहा था, सब कुछ बदल रहा है। लंबे समय से शिया समुदाय के लोग इराक़ में बहुसंख्यक होने के बावजूद अल्पसंख्यकों की तरह रह रहे थे। अब शियाओं के हाथ में इराक की कमान आएगी।
2003 के बाद से अब तक इराक के सारे प्रधानमंत्री शिया मुसलमान ही बने और सुन्नी हाशिए पर होते गए। 2003 से पहले सद्दाम हुसैन के इराक़ में सुन्नियों का ही वर्चस्व रहा। सेना से लेकर सरकार तक में सुन्नी मुसलमानों का बोलबाला था।
सद्दाम के दौर में शिया और कुर्द हाशिए पर थे। इराक़ में शिया 51 फीसदी हैं और सुन्नी 42 फीसदी लेकिन सद्दाम हुसैन के कारण शिया बहुसंख्यक होने के बावजूद बेबस थे। जब अमरीका ने मार्च 2003 में इराक पर हमला किया तो सुन्नी अमरीका के खिलाफ लड़ रहे थे और शिया अमरीका के साथ थे।
17 साल बाद अब समीकरण फिर से उलटता दिख रहा है। इसी महीने इराक की संसद में एक प्रस्ताव पास किया गया कि अमरीका अपने सैनिकों को वापस बुलाए। इस प्रस्ताव का इराक़ के प्रधानमंत्री अब्दुल महदी ने भी समर्थन किया। सबसे दिलचस्प ये रहा कि संसद में इस प्रस्ताव का सुन्नी और कुर्द सांसदों ने बहिष्कार किया और शिया सांसदों ने समर्थन किया।
संसद में बहस के दौरान सुन्नी स्पीकर ने शिया सांसदों से कहा था कि वो इराक़ के भीतर फिर से हिंसा और टकराव को लेकर सतर्क रहें। मोहम्मद अल-हलबूसी ने कहा था, अगर कोई ऐसा क़दम उठाया गया तो इराक  के साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय वित्तीय लेन-देन बंद कर देगा। ऐसे में हम अपने लोगों की जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाएंगे।
हालांकि ये सवाल भी उठ रहे हैं कि इराक़ की वर्तमान सरकार के पास वो अधिकार नहीं है कि अमरीकी सैनिकों को वापस जाने पर मजबूर करे। अब्दुल महदी केयरटेकर प्रधानमंत्री हैं।
लेकिन एक बात स्पष्ट है कि सुन्नी चाहते हैं कि अमरीकी सैनिक इराक़ में रहें और शिया चाहते हैं कि अमरीका अपने सैनिकों को वापस बुलाए। 2003 में सुन्नी इराक में अमरीका के खिलाफ लड़ रहे थे और अब इन्हें लग रहा है कि अमरीका यहां से गया तो वो सुरक्षित नहीं रहेंगे।
दूसरी तरफ, जिस अमरीका ने सद्दाम हुसैन को हटाया वही अमरीका अब इराक में शिया मुसलमानों को ठीक नहीं लग रहा। तो क्या अमरीका के प्रति इराक के भीतर सुन्नी मुसलमानों के मन में सहानुभूति पैदा हो रही है और अमरीका भी अब सुन्नियों का साथ देगा? दूसरा सवाल यह कि इराक़ के भीतर पूरा समीकरण कैसे उलट गया?
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, इराक़ के भीतर समीकरण वाक़ई बदल गया है। सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद अमरीका ने सुन्नी मुसलमानों से वादा किया था कि उन्हें इराक़ की सेना में शामिल किया जाएगा लेकिन अमरीका ने ये वादा निभाया नहीं। सद्दाम के बाद इराक़ की सरकार और सेना में शिया मुसलमानों का दबदबा बढ़ गया। अगर सुन्नियों को भी रखा जाता तो संतुलन रहता। इस संतुलन के नहीं होने की वजह से शिया बहुल देश ईरान का प्रभाव इराक़ की सरकार और सेना में बढ़ा और यह अमरीका के हक़ में नहीं रहा।
प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, जो हालत सद्दाम के इराक़ में शिया मुसलमानों की थी अब वैसी ही शिया दबदबे वाली इराक़ी सरकार में सुन्नियों की हो गई है। इराक की सरकार और सेना में शियाओं का नियंत्रण है। उत्तरी इराक में कुर्दों का अपना स्वायत्त इलाका है जबकि सुन्नी राजनीतिक रूप से बिल्कुल अनाथ हो गए हैं।
इराक़ के भीतर सुन्नियों को लगता है कि अगर अमरीकी सेना वापस चली गई तो उनके लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। ब्रिटिश अख़बार टेलिग्राफ़ यूके से सद्दाम की ख़ुफिय़ा सर्विस में काम कर चुके 55 साल के महमूद ओबैदी ने कहा है, अगर अमरीकी सेना वापस जाती है तो इराक़ में सुन्नियों के लिए यह डरावना होगा। 
अमरीका अतीत में हमारा दुश्मन रहा है लेकिन ईरान की तुलना में वो ठीक है। अगर अमरीका गया तो हम ईरानियों के सस्ते शिकार साबित होंगे। हमलोग अमरीका के कोई प्रशंसक नहीं हैं लेकिन जब तक यहां ईरान हमें अकेला नहीं छोड़ देता है तब तक अमरीका को नहीं जाना चाहिए।
एके पाशा को लगता है कि इराक में विभाजन बढ़ेगा। वो कहते हैं, कुर्दों का अपना स्वायत्त इलाक़ा है ही। शियाओं की सरकार और सेना है। सुन्नी भी अपना स्वायत्त इलाक़ा लेंगे। भविष्य में ऐसा ही होता दिख रहा है। इराक़ के शिया ईरान के साथ रहेंगे और सुन्नी सऊदी अरब के साथ जाएंगे।
मध्य-पूर्व की राजनीति के जानकार क़मर आग़ा को भी लगता है कि इराक़ में अमरीका को ईरान से लडऩे के लिए सुन्नियों के साथ ही जाना होगा। वो कहते हैं, सद्दाम हुसैन होते तो इस्लामिक स्टेट का जन्म नहीं होता। अगर इराक की सरकार में सुन्नियों को भी प्रतिनिधित्व मिला होता तो इस्लामिक स्टेट का उभार इतना भयावह नहीं हुआ होता। इस्लामिक स्टेट से लड़ाई ईरान ने भी लड़ी और अमरीका ने भी। 
एक लड़ाई से दोनों के अलग-अलग हित जुड़े थे। इस्लामिक स्टेट से लड़ाई लगभग ख़त्म हो चुकी है लेकिन अमरीका के लिए मध्य-पूर्व में सबसे बड़ी चुनौती अब ईरान है। इराक  की शिया सरकार और ईरान के संबंध को अलग करना अमरीका के लिए बड़ी चुनौती है। अब अमरीका कोशिश करेगा कि इराक़ की राजनीति में केवल शियाओं का ही वर्चस्व ना रहे। ऐसे में अमरीका इराक़ में सुन्नियों का पक्ष लेता दिख सकता है।
इराक़ की सरकार के अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने चेतावनी दी है कि ईरानी जनरल क़ासिम सुलेमानी के मारे जाने के विरोध में अगर अमरीकी सैनिकों को वहां से हटने पर मजबूर किया गया तो इराक़ के बैंक खज़़ाने को ज़ब्त कर लिया जाएगा।
अमरीकी विदेश मंत्रालय ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अमरीका फ़ेडरल रिज़र्व बैंक में इराक़ के केंद्रीय बैंक के अकाउंट को अपने नियंत्रण में ले लेगा। अगर अमरीका ने ऐसा किया तो इराक़ की खऱाब अर्थव्यवस्था और बदतर हालत में पहुंच जाएगी। बाक़ी के देशों की तरह इराक़ का भी देश के वित्तीय मामलों और तेल की बिक्री से हासिल होने वाले राजस्व के प्रबंधन के लिए न्यूयॉर्क फेड में अकाउंट है। अगर अमरीका ने इराक़ की इस अकाउंट तक पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया तो वो राजस्व का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा और नक़दी का संकट भयावह हो जाएगा। इराक़ की पूरी अर्थव्यवस्था समस्याग्रस्त हो जाएगी।
इराक़ की संसद ने इसी महीने इराक़ में मौजूद कऱीब 5,300 अमरीकी सैनिकों को वापस भेजने के लिए एक प्रस्ताव पास किया था। हालांकि यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं था लेकिन ईरान से भारी तनाव के बीच इराक़ में इस तरह का प्रस्ताव पास होना राष्ट्रपति ट्रंप को रास नहीं आया और उन्होंने इराक़ पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दे डाली।
अमरीका ने इराक़ से सेना वापसी को सिरे से ख़ारिज कर दिया है। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा है कि इराक़ में अमरीकी सैन्य ठिकाना इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ काम करता रहेगा। हालांकि विदेश मंत्रालय ने फेडरल रिज़र्व में इराक़ के अकाउंट को ज़ब्त करने की चेतावनी पर कोई टिप्पणी नहीं की।
वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार अमरीका ने इराक़ के केंद्रीय बैंक के अकाउंट को ज़ब्त करने की चेतावनी इराक़ी प्रधानमंत्री को फ़ोन पर दी थी।
न्यूयॉर्क का फेडरल रिज़र्व बैंक अमरीकी प्रतिबंध क़ानून के तहत किसी भी देश के खाते को ज़ब्त कर सकता है। इराक़ कोशिश कर रहा है कि अमरीका को बिना ग़ुस्सा दिलाए सैनिकों की वापसी की बात आगे बढ़ाए। इराक़ को लगता है कि ईरान समर्थक नेताओं और सैन्य गुटों के दबाव के बावजूद वो अमरीका से दुश्मनी मोल ना ले और संवााद से विवादों का समाधान करे।
सीएनएन से इराक़ के एक सीनियर नेता ने कहा कि सौहार्दपूर्ण माहौल में भी तलाक़ होता है तो बच्चों, पालतू जानवरों, फर्निचरों और पौधों को लेकर चिंता लगी रहती है क्योंकि इन सबसे भी एक किस्म का भावनात्मक रिश्ता होता है। दूसरी ओर इराक़ के प्रधानमंत्री अब्दुल महदी ने भी कहा है कि अमरीकी सैनिकों की वापसी बिना किसी टकराव के होनी चाहिए।
अमरीका में इराक़ के केंद्रीय बैंक के अकाउंट को अपने क़ब्ज़े में लेना महज़ सैद्धांतिक ख़तरा नहीं है बल्कि 2015 में ऐसा हो चुका है। अमरीका ने न्यूयॉर्क के फ़ेडरल रिज़र्व बैंक में इराक़ी अकाउंट तक इराक़ की सरकार की पहुंच कुछ हफ़्तों को लिए रोक दी थी। तब इस बात की चिंता थी कि इस अकाउंट के पैसे का इस्तेमाल ईरानी बैंक और इस्लामिक स्टेट के अतिवादी कर रहे हैं। इराक़ की अर्थव्यवस्था पर न्यूयॉर्क फ़ेड का नियंत्रण बहुत प्रभावी है।
अमरीका का मानना है कि इराक़ में प्रधानमंत्री अब्दुल महदी के शासन में ईरान का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में अमरीकी सैनिकों की वापसी होती होती है तो ईरान का प्रभाव और बढ़ेगा। ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी भी कई बार दोहरा चुके हैं कि अमरीका को इस इलाक़े से निकल जाना चाहिए।
अमरीका की एक चिंता यह भी है कि अमरीकी सैनिकों की वापसी से अमरीकी करंसी डॉलर की सुलभता ईरानी खातों तक बढ़ेगी। अमरीका ने जब से ईरान पर प्रतिबंध लगाया है तब से उसका एक लक्ष्य ये भी रहा है कि ईरान का विदेशी मुद्रा भंडार बिल्कुल न के बराबर कर दिया जाए।
दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अमरीकी डॉलर का ही इस्तेमाल होता है। इसके साथ ही ईरानी इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर को भी अमरीका और उसके सहयोगी देशों के मध्य-पूर्व में सैन्य अभियान के ख़िलाफ़ अपने अभियान के लिए डॉलर की ज़रूरत पड़ती है। अगर इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड कोर को डॉलर नहीं मिलेंगे तो सैन्य अभियान चलाना मुश्किल होगा।
न्यूयॉर्क फ़ेड दुनिया भर के 250 केंद्रीय बैंकों, सरकारों और अन्य सरकारी वित्तीय संस्थानों को वित्तीय सेवाएं देता है। न्यूयॉर्क फ़ेड ने कभी सार्वजनिक रूप से नहीं बताया कि इराक़ के केंद्रीय बैंक के अकाउंट में कितना पैसा है। लेकिन इराक़ के सेंट्रल बैंक के अनुसार 2018 के अंत में इराक़ ने फ़ेडरल रिज़र्व में एक ही दिन में तीन अरब डॉलर जमा किए थे। (बीबीसी)

 


Date : 22-Jan-2020

प्रकाश दुबे
केसर की क्यारी में मंत्रियों की झांकी

महाराष्ट्र पश्चिम बंगाल आदि राज्यों की झांकियां इस गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के राजपथ पर नजर नहीं आएंगी। आप अगर कहते हैं कि इन राज्यों के लोगों ने देश की आज़ादी में बड़ी कुर्बानी दी है तो हम कहें न कहें, कुछ लोग बिफर कर कहेंगे- मुद्दे का राजनीतिकरण करते हो। हमें चिंता खाए जा रही है उन मंत्रियों की, जिन्हें अपने राज्य में सम्मान नहीं मिलता। मसलन बाबुल सुप्रियो। मुख्यमंत्री के दर्शन के लिए केन्द्रीय राज्य मंत्री बार बार अर्जी लगाते हैं। ममता दीदी हामी नहीं भरती। बाबुल अकेले दुखी प्राणी नहीं हैं। प्रधानमंत्री ने ऐसे दर्जन भर मंत्रियों को कड़ाके की बर्फवारी देखने कश्मीर रवाना कर दिया। वहां कठिन परीक्षा है। लोगों को समझाना है कि संविधान से अनुच्छेद-370 निकालने से लेकर नागरिकता कानून बदलने तक सारे फैसले उनके हित में लिए जा रहे हैं। दिल्ली लौटकर मौखिक परीक्षा में प्रधानमंत्री को बताना होगा कि प्रजाजन संतुष्ट हुए या नहीं? प्रधानमंत्री की बत्ती राजपथ की परेड देखकर जली होगी। सोचा होगा- मंत्रियों का माद्दा भी माप लें।   
वोट दिलाऊ बजट
वित्त मंत्री निर्मल मन से बजट बनाने की तैयारी में जुटी हैं। नागरिकता की मार के बावजूद लोग बाग महंगाई की मार का जिक्र करते हैं। गृह मंत्री और पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के लोगों को काम में लगाया। पार्टीवाले ऐन चुनाव के बीच दिल्ली में लोगों से अच्छा बजट बनाने का नुस्खा पूछते हैं। एक फरवरी को संसद में बजट पेश होगा। सात दिन बाद आठ फरवरी को दिल्ली में विधानसभा के लिए मतदान होगा। आम आदमी पार्टी ने आलोचना नहीं की। हमें तो शक है कि आम आदमी पार्टी ने निर्भया के हत्यारों को फांसी की तारीख भी आठ फरवरी तय करने की मांग रखी होगी। ज्यादा जानकारी के लिए वित्त मंत्री सीतारामण या दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी से मिल सकती है।  
चले पवन की चाल
अभिनेता चिरंजीवी सही समय पर समझ गए कि एक दो फिल्में टिकट खिडक़ी पर पिटने के बावजूद वापसी की गुंजाइश बनी रहती है। राजनीति का कोई भरोसा नहीं। अपनी पार्टी को कांग्रेस में विलीन करने की कीमत पर राज्यमंत्री बनने के बाद चिरंजीवी तेलुगु फिल्मों में लौटे। खासी कमाई कर रहे हैं। छोटा भाई पवन कल्याण फिल्मों में किस्मत आजमाने के बाद राजनीति में कुलाटें भर रहा है। फिल्मों में बड़े भाई जैसी सफलता नहीं मिली। जन कल्याण के लिए पार्टी बनाई। भारतीय जनता पार्टी के विरोध में बयानबाजी करने लगे। कहने लगे-भाजपा तो आंध्र प्रदेश को बासी लड्डू बांटती है। विधानसभा चुनाव में चंद्र बाबू नायडू की पराजय के बाद सत्ता में शामिल होने के सपने खट्टे अंगूर साबित हुए। 
जगन्मोहन रेड्डी ने दूरी बना रखी है। वक्त और हालात देखकर पसंद बदलनी पड़ी। आंध्र की जनता की सेवा करने के नेक इरादे से पवन भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। नर्मदा तट पर रहने वाले लोग मकर संक्रांति के लड्डू महीने भर खाने में नहीं हिचकते। पवन ने सोचा-बासी ही सही। हैं, तो लड्डू। पत्थर से तोडक़र चबा लेंगे। वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति बनने के बाद आंध्रप्रदेश में भाजपा के पास एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसकी शक्ल जानी पहचानी लगे। भाजपा ने भी सोचा-फिल्मों का हीरो कहलाता है। चलेगा।
डांट-डपट कर विश्राम
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वालों की कई बुरी आदतें हैं। एक तो यह है कि राजनीति में बड़े ओहदे पर विराजमान व्यक्ति को डांटते हैं तो किसी को बतलाते नहीं है। अधिक बुरी बात यह है कि कुर्सीदार अनसुनी कर दे तब भी बिलबिलाकर परेशानी चेहरे से जाहिर नहीं करते। इस प्रसंग में अटकल लगाने की जरूरत नहीं है। हम प्रधानमंत्री की बात कर रहे हैं। अजी, गलत मत समझिए। प्रधानमंत्री को संघ का स्वयंसेवक होने पर गर्व है। ये दोनों विशेषताएं उनमें हैं। जनरल बिपिन रावत को चीफ आफ डिफेंस स्टॉफ की खास कुर्सी बनाकर बिठाया। हालात दुरुस्त होने में देरी पर सफाई देते हुए जनरल रावत ने बताया कि कश्मीर में बचपन से कट्टर बनाया जाता है। किसी भारतीय ने पहली बार खुलासा किया कि सेना कट्टरवाद विरोधी शिविर चला रही है। जिन परदेसी मेहमानों को जानकारी दी, उनमें से कुछ विस्मित थे। इसके बावजूद नतीजा 370 के आखिरी अंक जैसा। जनरल रावत को किसी ने फटकार नहीं लगाई।  
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 


Date : 21-Jan-2020

 -आमिर अंसारी

आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी सरकार का कहना है कि तीन राजधानियों के बनाने का मकसद सभी जगह पर समान रूप से विकास करना है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अलग-अलग राजधानी बनाने का विरोध किया है।
वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी राज्य में तीन राजधानी बनाकर विकास को विकेन्द्रीकृत करना चाहते हैं। आंध्र प्रदेश में विधानसभा में तीन दिनों का विशेष सत्र बुलाया गया है। इसमें तीन राजधानियां बनाने की योजना को आकार देने संबंधी विधेयक पेश किया गया। विपक्ष सरकार के इस फॉर्मूले  से सहमत नहीं है।
राज्य के मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने विशेष सत्र से पहले कैबिनेट की बैठक की और आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण पर सहमति दे दी गई। पूरे आंध्र प्रदेश में इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। आंध्र पुलिस का कहना है कि विजयवाड़ा, गुंटूर और अमरावती के अलावा राज्य के अलग-अलग हिस्सों में विपक्षी तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के 57 नेताओं को नजरबंद कर रखा गया है। वहीं विजयवाड़ा, अमरावती, गुंटुर में करीब आठ हजार पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है।
आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और टीडीपी के प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू ने पत्रकारों से कहा, पार्टी के नेताओं और अमरावती ज्वाइंट एक्शन कमेटी के सदस्यों की नजरबंदी बेहद गलत है। लोगों की आवाज को दबाना अलोकतांत्रिक है और संविधान के खिलाफ है। यहां तक कि इमरजेंसी का दौर भी इससे बेहतर था।
आलोचकों का कहना है कि 2015 में प्रदेश की राजधानी के तौर पर विकसित करने के लिए उस वक्त की सरकार ने कई समझौते किए थे और अब तीन-तीन राजधानी बनाना सिर्फ ध्यान भटकाने वाला काम है।
आंध्र प्रदेश के पत्रकार मोहम्मद मुबशिरुद्दीन खुर्रम कहते हैं, जो विकास संबंधी कार्य होने चाहिए थे वो नहीं हो रहे हैं। नई राजधानी के विकास के लिए लंबा वक्त और पैसे की जरूरत होगी। ऐसा लग रहा है तीन-तीन राजधानी सिर्फ दिखावे के लिए बनाई जा रही है, फायदा इससे कुछ नहीं होने वाला है। अलग-अलग राजधानी और जिलों में काम बंटने से कुछ लाभ नहीं मिलने वाला है। यह नया प्रयोग होने जा रहा जिसके विफल होने की पूरी संभावना है। 
तीन राजधानियों से क्या होगा?
आंध्र प्रदेश विधानसभा में पेश आंध्र प्रदेश विकेन्द्रीकरण और सभी क्षेत्रों का समावेशी विकास विधेयक 2020 के मुताबिक अमरावती को विधायी, विशाखापट्टनम को कार्यकारी और कुरनूल को न्यायिक राजधानी बनाया जाएगा। आंध्र प्रदेश के वित्त मंत्री बी राजेंद्रनाथ ने विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा, सरकार राज्य को चार क्षेत्रों में बांटकर कर आंचलिक विकास शुरू करना चाहती है, जिसमें हर क्षेत्र में तीन-चार जिले होंगे ताकि संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सके। राजेंद्रनाथ ने विधानसभा में कहा, हम आंचलिक विकास बोर्ड स्थापित करेंगे, जो विकास और तरक्की में तेजी लाने की सिफारिश करेगा। उनके मुताबिक , राजभवन और सचिवालय को विशाखापट्टनम ले जाया जाएगा।
टीडीपी राजधानी को स्थानांतरित करने के कदम का भारी विरोध कर रही है। कैबिनेट ने उस एपी कैपिटल रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी को भी रद्द करने का फैसला किया है जिसे पिछली टीडीपी सरकार द्वारा नई राजधानी के रूप में अमरावती के विकास की देखरेख के लिए बनाया गया था। इसके बदले वाईएसआर सरकार ने अमरावती महानगर क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण के गठन का फैसला किया है।
वाईएसआर कांग्रेस का आरोप है कि पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने अपना एक भी वादा पूरा नहीं किया और राज्य की जनता तीन राजधानियों को मंजूरी मिलने का बेसब्री से इंतजार कर रही है। वहीं चंद्रबाबू नायडू कहते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान अमरावती को राजधानी बनाए जाने में किसी भी तरह की अनियमितता नहीं बरती गई। साथ ही चंद्रबाबू का कहना है कि मौजूदा सरकार ने अगर समझौतों का सम्मान नहीं किया तो इससे राज्य की छवि खराब होगी और निवेशकों का विश्वास खत्म हो जाएगा।
अमरावती के विकास के लिए चंद्रबाबू नायडू ने कई कंपनियों से समझौते किए थे लेकिन तीन-तीन राजधानी बनने से इसका विपरीत असर भी पड़ सकता है। मुबशिरुद्दीन खुर्रम कहते हैं, अगर अमरावती के विकास को रोककर नई राजधानियों के विकास को आगे बढ़ाया जाता है तो इससे तो जनता पर ही बोझ बढ़ेगा क्योंकि हो सकता है कि सरकार राज्य में अप्रत्यक्ष कर बढ़ा दे। राज्य सरकार की हालत ऐसी नहीं है कि तीन-तीन राजधानियों को विकसित कर पाए। अमरावती के विकास के लिए भी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की बात हो रही थी, अब तीन राजधानियों के विकास के लिए भी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप होगी। (डॉयचेवेले) 


Date : 21-Jan-2020

-वात्सल्य राय

चुनाव की दहलीज़ पर खड़ी दिल्ली को लेकर एक सवाल चर्चा में है- क्या कोई चेहरा इस बार चुनाव की चाल बदल सकता है? ये वो सवाल है, जो अब आए दिन ट्विटर ट्रेंड में दिख रहा है और दोबारा सरकार बनाने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी को खूब रास आ रहा है।
 अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में ताल ठोक रही पार्टी का दावा है कि भाजपा और कांग्रेस के पास मौजूदा मुख्यमंत्री के मुक़ाबले कोई चेहरा नहीं है। आम आदमी पार्टी के नेता और तिमारपुर सीट से उम्मीदवार दिलीप पांडेय कहते हैं, ये आम आदमी पार्टी के लिए बहुत बड़ा एडवांटेज है। भाजपा के पास दिल्ली में न मुद्दे शेष हैं और न ही नेतृत्व बचा है।
दिल्ली की राजनीति पर नजऱ रखने वाले विश्लेषक इस सवाल का जवाब आंकड़ों के आधार पर देते हैं। मौजूदा सदी यानी साल 2000 के बाद दिल्ली में हुए विधानसभा के चार चुनावों में से तीन में जीत का सेहरा चुनाव में अगुवाई करने वाले नेताओं के सिर पर सजा।
साल 2003 और 2008 में कांग्रेस ने शीला दीक्षित की विकासपरक छवि के सहारे 47 और 43 सीटें जीतकर भाजपा के मंसूबों पर पानी फेर दिया। इस नतीजे के दम पर शीला दीक्षित ने दिल्ली में तीन बार मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया और पार्टी के सबसे कद्दावर नेताओं में शुमार होने लगीं।
वहीं, साल 2015 में किरण बेदी पर भारी पड़े केजरीवाल ने पूरे ज़ोर पर दिखती नरेंद्र मोदी की चुनावी लहर को दिल्ली विधानसभा में दाखिल नहीं होने दिया। आम आदमी पार्टी 70 में से 67 सीटें जीतने में कामयाब रही। 49 दिन की सरकार से इस्तीफ़ा देने के बाद सियासी वनवास की तरफ़ बढ़ गए केजरीवाल ने 2015 की जीत से भारतीय राजनीतिक पटल पर ज़ोरदार वापसी की।
2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुने गए तीन विधायकों में से एक विजेंदर गुप्ता इन आंकड़ों को ज़्यादा महत्व नहीं देते हैं। गुप्ता का दावा है कि चुनाव के पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम का एलान नहीं करना पार्टी की रणनीति है। वो कहते हैं, हर पार्टी का एक चुनावी समीकरण और रणनीति होती है। पार्टी जो भी कर रही है, सोच समझकर कर रही है।
लेकिन, ये रणनीति कई विश्लेषकों को भारतीय जनता पार्टी की कमज़ोर कड़ी दिखती है। दिल्ली की राजनीति पर करीबी नजऱ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं कि चेहरे का महत्व तो होता ही है और कोई चेहरा है तो उसे सामने लाया जाना चाहिए। जैसे किसी वक्त कांग्रेस के पास शीला दीक्षित का चेहरा था। तब उनकी छवि बदलाव और विकास से जुड़ गई थी।
प्रमोद जोशी की राय में ऐसे फैसले वोटरों की सोच को भी प्रभावित करते हैं। वो कहते हैं, दिल्ली का वोटर किसी के पीछे चलने वाला नहीं है। वो चीजों को देखता रहता है और समय पर फ़ैसले लेता है।
चेहरे की अहमियत भाजपा को भी खूब समझ आती है। साल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के चेहरे ने पार्टी को विरोधियों पर निर्णायक बढ़त दिलाई।
इतना ही नहीं महाराष्ट्र में दशकों पुरानी सहयोगी शिवसेना के साथ गठबंधन टूटने के बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एक न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा, ये मैंडेट (महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजे) देवेंद्र फडणवीस और नरेंद्र मोदी के नाम पर आया था। शिवसेना का एक भी प्रत्याशी, इनक्लूडिंग आदित्य ठाकरे, ऐसा नहीं था जिसने मोदी जी का कटआउट शिवसेना के सारे नेताओं से बड़ा नहीं लगाया था।
शाह दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी को मात देने के लिए मोदी मैजिक पर भरोसा कर रहे हैं। जनवरी के शुरुआती हफ्ते में दिल्ली की एक रैली में उन्होंने कहा, जहां पर भी मैं जाता हूं, वहां पूछते हैं, दिल्ली में क्या होगा? मैं आज आप सबके सामने जवाब दे देता हूं दिल्ली में नरेंद्र मोदीजी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने वाली है।
साल 2015 के विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने वाली भाजपा के प्रमुख ने अपने दावे के समर्थन में तर्क भी दिया। अमित शाह ने अरविंद केजरीवाल की चुनौती को खारिज करते हुए कहा, झांसा कोई किसी को कोई एक ही बार दे सकता है। बार-बार नहीं दे सकता। दिल्ली नगर निगम के चुनाव में आप पार्टी (आम आदमी पार्टी) का सूपड़ा साफ हो गया। 2019 के चुनावों में दिल्ली के 13750 बूथों में से 12064 बूथ पर भाजपा का झंडा फहराने का काम मेरे कार्यकर्ताओं ने किया। 88 फीसदी बूथों पर भाजपा ने विजय प्राप्त की है।
शाह का आकलन है कि बूथ कार्यकर्ताओं की मेहनत और मोदी का चेहरा साल 1998 से दिल्ली विधानसभा में बहुमत हासिल करने को तरस रही पार्टी की कसक मिटा सकता है।
विजेंदर गुप्ता भी ऐसा ही दावा करते हैं। वो कहते हैं कि लोगों को समझ आ गया है। दिल्ली के विकास को तेज़ गति बीजेपी दे सकती है। मोदी जी दिल्ली में विकास करना चाहते हैं। केजरीवाल सिर्फ दिल्ली को पीछे ले जाने का काम कर रहे हैं।
वो आगे कहते हैं, दिल्ली में पीने का पानी साफ नहीं है। लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। दिल्ली में प्रदूषण इतना है। पांच साल में सरकार ने इन दोनों मुद्दों पर कोई काम नहीं किया। हम दिल्ली में साफ पानी देंगे। साफ हवा दिल्ली की हो इसकी व्यवस्था देंगे। यूनिफ़ाइड ट्रांसपोर्ट सिस्टम लास्ट माइल कनेक्टिविटी के साथ देंगे।
दिल्ली के लोगों को मोदी के प्लान पर भरोसा है, ये दावा करते हुए वो कहते हैं, जिस तरह से मोदी जी 1731 कॉलोनियों को मालिकाना हक़ दिया है, ये कोई साधारण बात नहीं है।
भाजपा के नेताओं के दावों को लेकर प्रमोद जोशी कई सवाल खड़े करते हैं। वो कहते हैं, नपा या ननि के चुनाव अलग होते हैं। दिल्ली में राज्य के रूप में सफल होना है तो अलग रणनीति होनी चाहिए। पिछले कुछ समय से भारतीय जनता पार्टी किसी स्थानीय नेता को आगे नहीं कर पाई है। हो सकता है कि मनोज तिवारी कुछ इलाकों में बहुत लोगों को प्रभावित करते हों लेकिन उनके मुक़ाबले केजरीवाल आगे नजर आते हैं। 
वो ये भी याद दिलाते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में तीसरे नंबर पर आने के बाद आम आदमी पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया।
दिल्ली में केजरीवाल और मोदी के बीच मुकाबले के सवाल पर प्रमोद जोशी याद दिलाते हैं, 2019 के चुनाव परिणाम आ गए थे तब आम आदमी पार्टी ने ये कहा था कि दिल्ली में अगला चुनाव इस आधार पर होगा कि केंद्र में बीजेपी की सरकार और राज्य में आम आदमी पार्टी की सरकार है।
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में दूसरे नंबर पर वोट हासिल करने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता जेपी अग्रवाल की भी राय है कि विधानसभा चुनाव में मोदी के सहारे बीजेपी को बढ़त हासिल नहीं होगी।
वो कहते हैं, मोदी को आगे करने का मतलब ये है कि केंद्र की सरकार के मुद्दों पर वो दिल्ली का चुनाव लड़ेंगे। मोदी दिल्ली में मुख्यमंत्री बनने वाले नहीं हैं। वो दिल्ली के तीन चार जो नेता हैं, उनका नाम लेते हैं। उन्होंने मनोज तिवारी, विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता किसी के लिए नहीं कहा।
अग्रवाल ये भी नहीं मानते हैं कि केजरीवाल का नाम ऐसा करिश्मा है कि चुनाव की तस्वीर बदल जाए। वो कहते हैं, मेरा अनुभव ये कहता है कि मुद्दे ज़्यादा ज़रूरी होते हैं। लोग ये देखते हैं कि हक़ीकत में किसने क्या किया है। जहां हमने दिल्ली छोड़ी थी 2013 में उसका दस परसेंट भी विकास नहीं हुआ। लेकिन, आम आदमी पार्टी कांग्रेस और भाजपा के तमाम आरोपों को ख़ारिज कर रही है।
दिलीप पांडेय कहते हैं, पहली बार ऐसा हो रहा है कि काम पर चुनाव पर लड़ा जा रहा है। एक मुख्यमंत्री आकर कहता है कि हमने आपके लिए काम किया हो तो वोट देना, नहीं तो मत देना। 
दिल्ली सरकार ने घोषणा पत्र में लिखे सारे काम किए, वो काम भी किए जो घोषणा पत्र में नहीं लिखे थे। 200 यूनिट बिजली फ्री कर देंगे हमने ये घोषणा पत्र में नहीं लिखा था। महिलाओं की बस यात्रा फ्री कर देंगे हमने घोषणा पत्र में नहीं लिखा था।
चेहरे और काम दोनों को अहम बताते हुए वो कहते हैं, दिल्ली वाले बड़े समझदार हैं। उनके लिए मैसेज भी महत्वपूर्ण है और मैसेंजर भी। चेहरे की जो विश्वसनीयता है, जब उस चेहरे ने डिलीवर कर दिया, तब उस चेहरे की विश्वसनीयता और बढ़ गई है।
प्रमोद जोशी का भी आकलन है कि दिल्ली के दंगल में मौजूद महारथियों के बीच केजरीवाल अपना कद बढ़ाने में क़ामयाब रहे हैं। वो कहते हैं, लीडर के नाते केजरीवाल की जो नकारात्मकता थी, उन्होंने बीते छह महीने से चुप्पी साधकर अपनी स्थिति को बेहतर किया है। साथ ही वो ये भी जोड़ देते हैं कि भारत में चुनाव के बारे में एक मुश्किल बात ये है कि कई बार अंतिम क्षण में ऐसा कुछ न कुछ हो जाता है कि चुनाव की धारा बदल जाती है। (बीबीसी)


Date : 20-Jan-2020

अनुराग शुक्ला
कुछ जानकारों का मानना है कि सरकार आयकर के स्लैब में बहुत छेड़छाड़ करेगी, ऐसा नहीं लगता। हां, यह जरूर हो सकता है कि होम लोन आदि में कुछ छूट दे दी जाए। जानकारों का कहना है कि सरकार कमेटी की सिफारिशों पर अमल करेगी तो उच्च आय वर्ग पर टैक्स दर घटने के कारण उसका राजस्व तेजी से घटेगा।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय में अगले बजट की तैयारी शुरु हो चुकी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आम बजट से पहले लगातार बैठकें कर रही हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अर्थशास्त्रियों के साथ बैठक की है। बजट की तैयारी के साथ आने वाले बजट की संभावनाओं की भी चर्चा शुरु हो गई है। बजट के आकलन से जुड़ी चर्चाओं में सबसे महत्वपूर्ण चर्चा होती है आयकर की।
इस बार भी आयकर को लेकर चर्चा शुरु हो चुकी है। कई आर्थिक जानकार मान रहे हैं कि आने वाले बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मध्य वर्ग को राहत दे सकती हैं। ये चर्चाएं कभी सरकारी सूत्रों के हवाले से तो कभी सरकार को सलाह के रूप में शुरु हुई हैं। इनका सबसे बड़ा आधार यह है कि देश इस समय गहरी आर्थिक सुस्ती में डूबा है और लोग पैसा खर्च नहीं कर रहे हैं। इसलिए, सरकार मध्य वर्ग को आयकर में राहत देकर चाहती है कि वह पैसा खर्च करे। मध्य वर्ग के खर्च करने से खपत में तेजी आएगी और आर्थिक गतिविधियां तेजी पकड़ेंगी। सिद्दांत के तौर पर यह बात ठीक है और इसमें सूत्रों के हवाले से मिली जानकारियों को मिला देने के बाद इस बात की संभावना जताई जा रही है कि सरकार आयकर के मोर्चे पर राहत दे सकती है।
लेकिन, थोड़ा पीछे लौटते हैं और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बजट पर जाते हैं। उस समय भी देश में आर्थिक सुस्ती के संकेत मिलने शुरु हो गए थे। विशेषज्ञ कह रहे थे कि सरकार को ऐसे उपायों पर जोर देना चाहिए जिससे लोगों के हाथों में पैसे आएं और खपत बढ़े। उस समय की बजट पूर्व चर्चाओं में जानकारों ने लगभग मान लिया था कि सरकार आयकर के स्लैब में बदलाव करेगी। 
विश्लेषणों में यह चर्चा सबसे ज्यादा थी कि पांच लाख तक की आय को कर मुक्त कर दिया जाएगा। लेकिन, बजट आया तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। टैक्स स्लैब जस के तस रहे बल्कि अधिक आय वालों पर सुपर रिच टैक्स आयद कर दिया गया। यानी मोदी सरकार के कदम इतने अनपेक्षित होते हैं कि किसी एक नजरिये के आधार पर यकीनी तौर पर कुछ भी कह पाना मुश्किल होता है।
हालांकि, जानकार कह रहे हैं कि पिछले एक साल में आर्थिक सुस्ती गहरा चुकी है। इसलिए मोदी सरकार लोगों का खर्च बढ़ाने के लिए आयकर में कटौती का प्रयोग कर सकती है। यह बात सही तो है। लेकिन, इसके साथ कुछ दूसरी बातें भी हैं। आर्थिक सुस्ती के कारण सरकार का राजस्व गिरा है। जीएसटी के कलेक्शन में कमी आई है।  इसके अलावा मंदी से निपटने के लिए प्रत्यक्ष कर के मोर्चे पर सरकार ने कंपिनयों को कॉरपोरेट टैक्स की छूट भी दी है। इसके चलते सालाना राजस्व में सीधे-सीधे एक लाख 40 करोड़ रूपये की कमी आई है। यानी सरकार सुस्ती से निपटने के लिहाज से आयकर में कटौती कर तो सकती है। लेकिन उसके पास विकल्प काफी सीमित हैं क्योंकि उसे राजकोषीय घाटे का भी ख्याल रखना है।
यदि मोदी सरकार आयकर में कटौती करती है तो राजकोषीय घाटे के और बढऩे की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जानकारों के मुताबिक, इस बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.5 से 3.8 फीसद के बीच समेटने का लक्ष्य रख सकती है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में सरकार ने इसे 3.3 फीसद तक नियंत्रित रखने का लक्ष्य रखा था जो पहले ही ज्यादा था। सरकार राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बढ़ाने के बाद भी इस मोर्चे पर सतर्क रहेगी। इसलिए आयकर में बहुत ज्यादा राहत मिलेगी, यह कहना मुश्किल है।
हालांकि, इन सारी बातों के बाद भी आयकर को लेकर चर्चा तो है ही। सूत्रों के मुताबिक, सरकार का इस समय मुख्य ध्यान आर्थिक वृद्धि को तेज करने पर है। आर्थिक वृद्धि को तेज करने का सूत्र खपत बढ़ाने में ही छिपा है। इसके लिए जरूरी है कि लोगों के पास पैसा आए। 
जानकारों के मुताबिक, इसके लिए एक तो सरकार लोगों के हाथ में सीधे पैसे देने की योजनाओं पर जोर दे सकती है। पीएम किसान योजना में कुछ बढ़ोतरी की जा सकती है या ऐसी ही कोई अन्य योजनाओं लाई जा सकती है। इसके अलावा वह बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बड़े खर्चों की घोषणा कर सकती है ताकि लोगों के हाथ में काम आए और आर्थिक गतिविधियां बढ़ें। तीसरा विकल्प यह है कि इनकम टैक्स के जरिये मध्यम वर्ग को छूट दी जाए और उनकी खपत बढ़े।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार में बजट को लेकर चर्चा इन्हीं बिंदुओं के इर्द-गिर्द है। और इनके पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क हैं। सरकार का एक खेमा इनकम टैक्स कम करने के पक्ष में है। लेकिन, दूसरे का मानना है कि इनकम टैक्स में कटौती सिर्फ तीन करोड़ आयकर देने वालों को फायदा पहुंचाती है। 
जबकि बुनियादी ढांचे पर बड़े खर्च का फैसला ज्यादा फायदेमंद होगा। इससे कई कोर सेक्टर्स में तेजी आएगी और यह गुणात्मक रूप से असर करेगा। इस खेमे का यह भी तर्क है कि आयकर के जरिये खपत बढ़ाने की नीति तब फायदेमंद होती है जब उसमें निरंतरता हो। लगातार थोड़ा-थोड़ा आयकर घटने पर लोग अपने खर्च बढ़ाना शुरु करते हैं। 
एक साल आयकर कम करना फिर उसे जस का तस रखना और फिर अगले साल बढ़ा देना लोगों को अनिश्चितता में रख़ता है। इसलिए इनकम टैक्स कट आर्थिक वृद्धि को फौरन गति दे पाएगा, ऐसा नहीं लगता। इनका मानना है कि आयकर में राहत से फिलहाल आर्थिक वृद्धि को तो कोई मदद नहीं मिलेगी। हां। इससे राजस्व जरूर गिर जाएगा।
आयकर में कटौती पर कुछ और भी बातें है। प्रत्यक्ष कर पर गठित कमेटी ने इस सबंध में अपनी जो सिफारिशें दी थीं, वह कुछ यूं हैं: कमेटी के मुताबिक, 10 लाख तक की आय पर कर की सीमा दस फीसद होनी चाहिए। 
10 से 20 लाख की आय पर 20 फीसद और 20 लाख से दो करोड़ की आय पर 30 फीसद टैक्स होना चाहिए। दो करोड़ से ऊपर की आय पर कर 35 फीसद होना चाहिए। अब आयकर के मौजूदा स्लैब को देखते हैं। अभी 2.5 लाख तक की आय कर मुक्त है। 2.5 से पांच लाख तक की आय पर पांच फीसद टैक्स लगता है, पांच से दस लाख की आय पर 20 फीसद और दस लाख से ऊपर की आय पर तीस फीसदी।
यह वर्तमान टैक्स स्लैब्स और सिफारिशों की तुलना है। लेकिन यह यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कमेटी आयकर मुक्त आय की सीमा बढ़ाने की बात नहीं करती हैं। यानी आयकर मुक्त आय 2.5 लाख से बढ़ेगी, इसकी संभावना सीमित है। जबकि मध्यम वर्ग की ओर से यह सबसे बड़ी मांग है कि पांच लाख तक की आय को आयकर मुक्त कर दिया जाए। 
कुछ जानकारों का मानना है कि सरकार आयकर के स्लैब में बहुत छेड़छाड़ करेगी, ऐसा नहीं लगता। हां, यह जरूर हो सकता है कि होम लोन आदि में कुछ छूट दे दी जाए। जानकारों का कहना है कि सरकार कमेटी की सिफारिशों पर अमल करेगी तो उच्च आय वर्ग पर टैक्स दर घटने के कारण उसका राजस्व तेजी से घटेगा।
आने वाले बजट में आयकर कटौती की जो चर्चा है, उसमे कुछ और भी दिलचस्प है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार आयकर में राहत के प्रस्ताव पर कुछ इस तरह का भी विचार कर रही है कि टैक्स देने वालों को कम से कम 10 फीसदी कम टैक्स देना पड़े। यानी अगर आप सलाना एक लाख रूपये का टैक्स देते हैं तो आपको दस हजार का कम कर चुकाना पड़े। इसके लिए एक तरीका यह है कि आयकर के ढांचे को जस का तस रखते हुए आयकर से हर तरह के सरचार्ज हटा दिए जाएं। दूसरा तरीका यह है कि आयकर के स्लैब में बदलाव किया जाए।
यानी अगर आयकर में कटौती हुई भी तो वह कैसे और किस तरह होगी, इसकी सूरत बहुत साफ नहीं है। ऊपर से मोदी सरकार अपने फैसलों से सभी को चौंकाती रही है। पिछले साल जब सभी ने यह मान लिया था कि आयकर में छूट मिलेगी ही। तब उसने ऐसा नहीं किया था। इसके बाद मंदी से निपटने के लिए जब सभी लोग मान रहे थे कि सरकार लोगों के हाथ में पैसे पहुंचाने के लिए कुछ करेगी। तब सरकार ने सबको चौंकाते हुए कंपनियों को सौगात दी और कॉरपोरेट टैक्स में कमी कर दी। इसलिए आने वाले बजट में आयकर पर क्या बदलाव होगा, यह बजट आने के बाद ही ठीक-ठीक समझ आएगा। (सत्याग्रह)

 

 


Date : 20-Jan-2020

 डॉ. संजय शुक्ला

देश में डॉक्टरों के राष्ट्रव्यापी संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें उन्होंने फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को बतौर रिश्वत लड़कियां मुहैया कराने का जिक्र किया है। इस बयान के बाद डॉक्टरों के इस संगठन ने प्रधानमंत्री से इन आरोपों को साबित करने या माफी मांगने के लिए कहा है। बहरहाल यह पहला मौका नहीं है जब डॉक्टरों ने किसी मसले पर अपना गुस्सा जाहिर किया हो।
पिछले साल 2018 में प्रधानमंत्री मोदी ने लंदन में कहा था कि डॉक्टर विदेश जाकर कांफ्रेंस में हिस्सा लेते हैं ताकि दवा कंपनियों को प्रमोट किया जा सके।  इस बयान पर भी तब डॉक्टरों ने काफी हाय-तौबा मचाया था। साल 2012 में अभिनेता आमिर खान द्वारा डॉक्टरी पेशे में जारी भ्रष्टाचार और नैतिक पतन पर टीवी चैनल में प्रसारित कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ पर भी डॉक्टरों ने अपनी त्यौरियां चढ़ाई थी। बहरहाल प्रधानमंत्री द्वारा डॉक्टरों पर लगाए गए आरोपों की पड़ताल की जाए तो भले ही इन आरोपों में सौ फीसदी सच्चाई न हो लेकिन ये आरोप अर्धसत्य के पैमाने पर जरूर है। डॉक्टरी पेशा अपने नैतिक गिरवाट के कारण समाज के कसौटी पर हैं।
 पिछले साल नवंबर में पुणे की एक संस्था ‘‘सपोर्ट फॉर एडवोकेसी एंड टेऊनिंग टू हेल्थ इनीसिएटिव्स’’ ने अपने एक अध्ययन में दावा किया था कि डॉक्टर फार्मा कंपनियों से बतौर रिश्वत महंगी यात्राएं, गहने, बच्चों की पढ़ाई की मोटी फीस, पेट्रोल कार्ड और अन्य महंगे समान लेते हैं। मेडिकल क्षेत्र में बढ़ते कमीशनखोरी और गिरते नैतिकता के मद्देनजर मोदी सरकार ने डॉक्टरों को ब्रांडेड दवाओं की जगह जेनेरिक दवाएं लिखने के लिए भी अनेक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। वहीं दवा कंपनियों के लिए भी अनेक मार्गदर्शी आचार संहिताएं लागू की गई थीं, लेकिन यह सब महज कागजी ही साबित हो रहे हैं।
गौरतलब है कि डॉक्टरों को ‘गॉड ऑफ अर्थ’ यानि धरती का भगवान कहा गया है। आज डॉक्टरी पेशा ही ऐसा पेशा है जिसकी सर्वोच्च सामाजिक प्रतिष्ठा है तथा लोग सबसे ज्यादा विश्वास डॉक्टर पर ही करते हैं। भारत में पौराणिक काल से लेकर आधुनिक सभ्यता तक वैद्यों, हकीमों और डॉक्टरों का सम्मानजनक स्थान रहा है। विडंबना है कि नैतिक मूल्यों के क्षरण के आज के दौर में चिकित्सकों के सामाजिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठा पर अब आंच आने लगी है तथा उनके सफेद एप्रन पर बदनुमा दाग लगने लगे हैं। डॉक्टर और मरीज के बीच पहले जैसे विशवास नहीं रहा जो इस पेशे की अहम कड़ी है। फलस्वरूप कई बार मरीजों के परिजनों और डॉक्टरों के बीच हिंसक संघर्ष की वारदातें हो रही हैं, ऐसे वारदातों को सभ्य समाज में कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता।  बहरहाल डॉक्टरी पेशे के प्रति दुष्प्रचार के बारे में यह कहना सर्वथा उपयुक्त होगा कि यह अर्धसत्य है और इसके दो पहलू हैं। 
आज भी अधिकांश डॉक्टर मरीजों की सेहत और जिंदगी के बारे में काफी संजीदा रहते हैं। भारत जैसे गरीब देश में सरकारी अस्पताल दो तिहाई आबादी के लिए उपचार का एक मात्र विकल्प है। फलस्वरूप यहां मरीजों का काफी दबाव रहता है। इन अस्पतालों के वरिष्ठ डॉक्टर से लेकर जूनियर डॉक्टर सीमित तनख्वाह में 24 से 36 घंटे अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर बीमारों तथा गंदगियों के बीच लगातार काम करते हैं। 
एक डॉक्टर की जिंदगी में ऐसे क्षण बार-बार आते हैं जब कोई मरीज आखिरी सांस की डोर थामे जिंदगी के लिए निर्णायक जद्दोजहद कर रहा हो।  यह संघर्ष एकतरफा रोगी की नहीं बल्कि डॉक्टर के लिए खुद की होती है। बीमारी और मौत के मुंह से लौटकर सेहतमंदी और जिंदगी के मायने चिकित्सक से बेहतर कोई नहीं जान सकता। यह शत-प्रतिशत सच है कि हर डॉक्टर अपने मरीज की जान बचाने और उसे सेहतमंद रखने के लिए जी-जान से कोशिश करता है। 
यह भी विचारणीय है कि डॉक्टरों ने अपने व्यवसायिक जीवन में हजारों लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाला है ऐसे में यदि कोई अनहोनी हो जाए तो डॉक्टर को कटघरे में खड़ा करना कदापि उचित नहीं है। भारतीय चिकित्सकों की दक्षता और समर्पण के सैंकड़ों उदाहरण हैं, ये डॉक्टर न केवल देश में वरन विदेशों में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। आज भी देश के बेहतरीन डॉक्टरों को उनकी समर्पण और सेवा के लिए हर साल पद्म सम्मान जैसे पद्मश्री और पद्म भूषण से नवाजा जा रहा है। यह सम्मान उन डॉक्टरों के मरीजों के प्रति समर्पण, सेवा, प्रतिबद्धता और उनके मानसिक दबाव की कद्र कर रहा है। 
बहरहाल इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बाजारवाद और उपभोक्तावाद के इस दौर में डॉक्टरी पेशे की गरिमा में भी आंच आई है। दरअसल डॉक्टर और मरीज का संबंध परस्पर सम्मान, भरोसे और भावनाओं से बंधा होता है लेकिन हाल के वर्षों में इसमें काफी गिरावट आई है, इसके लिए समाज और चिकित्सक दोनों जिम्मेदार हैं। 
आज का मरीज डॉक्टर की दवाओं का अपने सेहत पर तुरंत असर चाहता है जिसके चलते मरीज एक डॉक्टर पर भरोसा खोकर दूसरे डॉक्टर का दरवाजा खटखटाने लगता है। इस प्रवृत्ति से डॉक्टर व मरीज के बीच का संबंध ओर भरोसा दोनो खत्म हो रहे हैं। दरअसल देश में डॉक्टरों की कमी, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के खस्ताहाल स्थिति, और चिकित्सा सेवाओं के निजीकरण ने चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को काफी नुकसान पहुंचाया है। 
दरअसल देश में आबादी की तुलना में डॉक्टरों की संख्या कम है, जानकारी के मुताबिक भारत में लगभग 5 लाख एलोपैथिक डॉक्टरों की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि डब्ल्यूएचओ के मानक के अनुसार 1100 आबादी पर 1 एलोपैथिक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन भारत में यह अनुपात 1681 लोगों के बीच 1 डॉक्टर का है। दुनिया के दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत में विषेशज्ञ डॉक्टरों की 50 फीसदी कमी है, ग्रामीण भारत में यह कमी 82 फीसदी है। पर्याप्त सरकारी प्रोत्साहन के बावजूद एलोपैथिक डॉक्टर गांवों में जाना नहीं चाहते। इन्हीं विसंगतियों के चलते भारत में लाखों गैर-प्रशिक्षित बेरोजगार और अमान्य डिग्रीधारी झोलाछाप डॉक्टरों ने ‘आओ डॉक्टर-डॉक्टर खेलें’ की तर्ज पर शहरों के स्लम एरिया एवं कस्बाई क्षेत्रों में अपनी जड़े जमा ली हैं। 
 

 


Date : 19-Jan-2020

संकेत उपाध्याय

सरकार बदली, मुद्दे बदले लेकिन लोकतंत्र और उसके तौर तरीके 2011 में भी वैसे थे, और 2020 में भी बिल्कुल वैसे ही हैं।

शाहीन बाग का महज नाम ले लेने से लगभग युद्ध छिड़ उठता है। प्रशासन की आंखों की किरकिरी बनी हुई हैं शाहीन बाग़ में धरने पर बैठी महिलाएं। और अब शाहीन बाग़ महज एक जगह का नाम नहीं रह गया, शाहीन बाग नागरिकता कानून के विरोध का एक प्रतीक बन चुका है। ऐसे ही आंदोलन अब देशभर के कई शहरों में शुरू हो गए हैं। यह किसी भी सरकार को तनाव में लाने के लिए काफी है। और इसको लेकर मोदी सरकार का नाखुश होना लाज़मी है।

लेकिन जितनी चीज़ें बदलती हैं, उतनी ही एक जैसी रहती हैं। मसलन, 2011 में पीए-2 के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी गई थी। अब 2019-20 में मोदी सरकार भी अपने दूसरे चरण में है। तब जंतर मंतर पर अन्ना हज़ारे की अगुवाई में नारा था लोकपाल लाओ, भ्रष्टाचार मिटाओ। पृष्ठभूमि यह थी कि 2जी घोटाला, कोयला घोटाला, एयरसेल मैक्सिस घोटाला देश को चूस रहा था। लोग भ्रष्टाचार से परेशान हो चुके थे।

अगर पीए के खिलाफ करप्शन का आरोप था तो इस सरकार के खिलाफ कम्युनल होने का है। शाहीन बाग से नारा लग रहा है कि नागरिकता कानून वापस लिया जाए और एनआरसी कभी न आए। देश-विदेश में भी सरकार के कानून लाने की मंशा पर संदेह उठाया गया है।

उस समय पीए की सरकार को लगता था कि करप्शन से जुड़ी बातचीत टीवी के चीखते-चिल्लाते स्टूडियो तक ही सीमित थी। आम जनमानस का इसमें कोई रोल नहीं था। चीखती-चिल्लाती टीवी डिबेट अभी भी चल रही है जिसमें सरकार अपने आपको आराम देना चाहती है। इस सरकार का भी यही दावा है कि ये कुछ चुनिंदा लोग एजेंडा के तहत कर रहे हैं और आम जनमानस को सीएए और एनआरसी से कोई आपत्ति नहीं है।

उस समय की पीए सरकार ने अन्ना हज़ारे पर खुद भ्रष्ट होने का आरोप लगाया था। तब कहा यह जाने लगा कि सरकार मूवमेंट को बदनाम करने की कोशिश कर रही थी। शाहीन बाग़ के संदर्भ में मोदी सरकार पर भी ठीक ऐसा ही आरोप लगता है कि वे आंदोलनकारियों को एजेंडा से ग्रसित बोलकर बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय भी पुलिस के दुरुपयोग के भयंकर आरोप सरकार पर लगे थे। बाबा रामदेव के समर्थकों पर तो सोते में आंसू गैस के गोले भी छोड़े गए। इसके बाद अदालतों ने देर रात कोई कार्रवाई न करने के निर्देश दिए। इस बार भी पुलिस की बर्बरता पर कई सवाल खड़े किए गए हैं। कई बार ये अफवाह फैली है कि शाहीन बाग धरने को पुलिस बल और तंत्र लाकर ख़त्म कर देगी।

और तो और, ट्रैफिक और आम जनमानस को होने वाली तकलीफ की बातें भी हर अन्ना जुलूस में होती थीं। शाहीन बाग़ के संदर्भ में आज भी बिलकुल वैसी ही बात हो रही है। अन्ना आंदोलन पूरे देश भर में होने लगा। शाहीन बाग़ भी अब एक जगह नहीं, एक आंदोलन का नारा बन गया है और कई शहरों में महिलाएं धरने पर बैठ गई हैं।

उस समय पीए सरकार भी बेतुकी धारा लगाकर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर चोट देती रही। कार्टून बनाने वाले जेल भेजे जाने लगे। आज भी आलम और आरोप कुछ ऐसे ही हैं। शांति से धरना करने वाले जेल भेजे जा रहे हैं। सदफ जफऱ और एसआर दारापुरी इसका एक उदाहरण है। सरकार बदली, मुद्दे बदले लेकिन लोकतंत्र और उसके तौर तरीके 2011 में भी वैसे थे, और 2020 में भी बिल्कुल वैसे ही हैं।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एडिटर पॉलिटिक्स हैं।)


Date : 19-Jan-2020

हृदयेश जोशी

साफ हवा को तरसते दिल्ली और उत्तर भारत के लोगों को राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। एक तरफ कोयला से चलने वाले बिजलीघर और दो साल तक जहरीला सल्फर छोड़ते रहेंगे, तो वहीं सरकार कोयले पर 400 रुपये प्रति टन का सेस हटाने जा रही है।

अब यह साफ हो गया है कि दिल्ली के पड़ोसी राज्यों के कोयला बिजलीघर बिना सल्फर इमीशन कंट्रोल टेक्नोलॉजी लगाए कम से कम दो साल और चलते रहेंगे। यह दिल्लीवासियों समेत उत्तर भारत के करोड़ों लोगों की सेहत के लिए अच्छी ख़बर नहीं है। फिलहाल सरकार ने प्रदूषण फैला रहे इन बिजलीघरों को चालू रखने की मौखिक सहमति दे दी है। कई अधिकारियों और पॉवर कंपनियों ने इसकी पुष्टि की है।

दिसंबर 2015 में सरकार ने दिल्ली के तीन पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा को 11 कोयला बिजलीघरों को नए उत्सर्जन मानकों के तहत 2017 तक सल्फर इमीशन कंट्रोल डिवाइस लगाने को कहा। पहली समयसीमा में फेल होने के बाद दो साल का एक्सटेंशन मिलने के बावजूद 31 दिसंबर 2019 तक भी इन बिजलीघरों ने यह तकनीक नहीं लगाई।

सरकार और कोल पावर कंपनियों का कहना है कि सल्फर डाई ऑक्साइड कंट्रोल डिवाइस न होने के बावजूद फिलहाल प्लांट चलाते रहेंगे। वेदांता के पंजाब स्थित कोल पावर प्लांट तलवंडी साबो पावर लिमिटेड (टीएसपीएल) ने हमारे सवालों के लिखित जवाब में कहा, इस मामले में टीएसपीएल ने दूसरी संबंधित पावर कंपनियों के साथ ऊर्जा मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड से बात की है। हमें इस मामले में (बिजलीघर चालू रखने के लिए) मौखिक सहमति मिल गई है लेकिन लिखित अनुमति का अभी इंतजार है। हमें मीडिया में छपी खबरों से लगता है कि ऊर्जा मंत्रालय ने इस विषय (सल्फर डाई ऑक्साइड टेक्नोलॉजी लगाने के लिए) में दिसंबर 2021 तक मोहलत मांगी है।

दिल्ली में हर साल अक्टूबर के बाद प्रदूषण का स्तर तेजी से बढऩे लगता है। वायु की गुणवत्ता का स्तर गिरकर बेहद खराब और उसके बाद खतरनाक हो जाता है। ऐसे में दिल्ली को प्रदूषण मुक्त करने की मांग हर कोने से उठने लगती है। इससे पहले हरियाणा के ऊर्जा मंत्रालय में एडीशनल चीफ सेक्रेटरी टीसी गुप्ता के अलावा कई दूसरे अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की थी कि कोयला बिजलीघर नियम पालन में फेल होने के बाद भी चलते रहेंगे। पंजाब में पावर कंपनी एलएंडटी ने तो अपने बिजलीघर बकायदा बयान जारी कर बंद किया लेकिन दो दिन बाद फिर से बिजली बनाना शुरू कर दिया।

दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण के खतरनाक स्तर को देखते हुए प्रदूषण फैला रहे इन कोयला बिजलीघरों को मिला यह दूसरा एक्सटेंशन आम आदमी के स्वास्थ्य पर कड़ी चोट है क्योंकि सल्फर डाइ ऑक्साइड गैस सांस संबंधी खतरनाक बीमारियों को बढ़ाने के साथ एयर क्वॉलिटी इंडेक्स को तेज़ी से बिगाडऩे में रोल अदा करता है।

पिछले तीन साल में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय  रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में हर साल 10 से 12 लाख लोगों की मौत के पीछे वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारी कारण है। आज दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में 20 से अधिक भारत के हैं जिनमें दिल्ली समेत उत्तर भारत के तमाम शहर शामिल हैं।

ऐसे में सरकार न केवल कोयला बिजलीघरों को जहरीला धुआं छोडऩे की छूट दे रही है बल्कि कोयले पर मौजूदा 400 रुपये प्रति टन का सेस हटाकर इन कोल पावर प्लांट्स को और शह दे रही है। यह सच है कि साफ ऊर्जा की घटती कीमतों की वजह से कोल पॉवर सेक्टर काफी आर्थिक दबाव में है।

पिछले एक दशक सोलर पावर की कीमत सात से आठ गुना गिरी है। जहां सौर और पवन ऊर्जा आज 2.5 रुपये से 3.00 रुपये प्रति यूनिट है वहीं कोयला 3.5  से 4.00 रुपये प्रति यूनिट है। यही वजह है कि पॉवर सेक्टर कर्ज में डूबा पड़ा है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद शहर की स्थिति सबसे खराब है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड द्वारा जारी डाटा के अनुसार बुधवार (30 अक्टूबर) को एक्यूआई 478 था। यह देश में सबसे अधिक है।  ताप बिजलीघरों (थर्मल पॉवर प्लांट्स) की कुल बैंक देनदारी 2.8 लाख करोड़ से अधिक हो चुकी है। लेकिन सरकार कोयला खनन और आयात पर सेस खत्म करके कोल पावर कंपनियों को जो राहत दे रही है उससे कोई मकसद हासिल होगा, इस पर जानकारों को संदेह है। देश का कुल कोयला उत्पादन कम से कम 60 करोड़ टन प्रतिवर्ष है। सामान्य गणना के हिसाब से भी 400 रुपये प्रति टन के इस सेस से सालाना 24,000 करोड़ रुपया जमा होता।

पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रही आई-फॉरेस्ट के संस्थापक और सीईओ चन्द्र भूषण कहते हैं, हमने सरकार को पहले भी सलाह दी थी कि इस फंड के ज़रिए कोयला बिजली कंपनियों को सस्ते या ब्याज रहित कर्ज दिए जाएं ताकि वह सल्फर इमीशन कंट्रोल डिवाइस लगाने और अन्य उत्सर्जन मानकों को पूरा करने के लिए कदम उठाते लेकिन सरकार ने तो इस टैक्स से बनाए गए फंड को ही जीएसटी घाटे की भरपाई में लगा दिया।


Date : 19-Jan-2020

कृष्णकांत

शब्बो खातून की शादी में बारात मुस्लिम परिवार की तरफ से आई थी, लेकिन बारात की अगवानी हिंदू परिवार कर रहा था। इसलिए उन दिनों शब्बो की शादी के चर्चे सबकी जबान पर थे।

यह कहानी करीब 20 साल पहले शुरू हुई थी जब शब्बो सिर्फ  4 साल की थी। इस छोटी सी उम्र में ऊपर वाले ने शब्बो से उसकी मां छीन ली। यही नहीं, बदकिस्मती से कुछ ही समय बाद शब्बो के बाप जान का भी इंतकाल हो गया। शब्बो अनाथ हो गई। कोई भी शब्बो की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था।

अब सवाल था कि 4 साल की बच्ची जाए कहां। ऐसे में उपेंद्र गुप्ता ने बच्ची की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया। उपेंद्र ने शब्बो को गोद ले लिया और अपने घर ले आए। अब उपेंद्र अपने बेटे के साथ एक बेटी की की भी परवरिश करने लगे।

अब हिंदू आंगन में मुस्लिम बेटी आई तो होली-दीवाली को ईद-बकरीद का साथ मिल गया। उपेंद्र के घर मे अब होली दीवाली के साथ ईद भी मनाई जाने लगी। भाई को राखी बांधने के लिए बहन मिल गई। उपेंद्र ने बच्ची को सिर्फ मां की गोद और बाप का साया ही नहीं, वह भी देने की कोशिश की, जो उसे उसके असली मां-बाप से मिलना चाहिए था।

परिवार में रहने के दौरान कई बार धार्मिक मान्यताओं ने उपेंद्र का रास्ता जरूर रोका, लेकिन उन्होंने इसका असर उस बच्ची पर नहीं पडऩे दिया।

लालन-पालन की उम्र गुजरती गई और शब्बो बड़ी हो गई। अब बारी थी उपेंद्र गुप्ता के और बड़े बनने की। उन्होंने इस बारे में कभी कोई छल करना ठीक नहीं समझा कि शब्बो के मां-बाप मुस्लिम थे और जन्म से वह भी मुस्लिम है।

उपेंद्र ने शब्बो की शादी के लिए लडक़ा खोजना शुरू किया तो अजीब मुसीबत पेश आई। अक्सर ऐसा होता कि जिस मुस्लिम परिवार से वे संपर्क करते, वह परिवार इस बात पर बड़ा नाक-भौं सिकोड़ता कि एक हिंदू शख्स उनके बेटे की शादी के लिए आया है। उपेंद्र को तमाम अवांछित सवालों के जवाब देने पड़ते। लेकिन उपेंद्र ने हार नहीं मानी। उनका भरोसा कायम रहा और आखिर वे कामयाब हुए। एक मुस्लिम परिवार ने शादी कबूल कर ली।

बारात आई तो गजब नज़ारा पेश हुआ। बारात में ज्यादार लोग मुस्लिम समुदाय के थे, लेकिन बारात का स्वागत करने के लिए ज्यादातर हिंदू थे। इस्लामिक रीति-रिवाज से दोनों का निकाह कराया।

मीडिया को भनक लगी तो लोग पहुंच गए माजरा लेने। उपेंद्र से पूछा गया कि आप तो हिन्दू हैं! उपेंद्र ने कहा, मैंने अपनी बेटी की तरह उसका पालन-पोषण किया। लेकिन विवाह के लिए बस यह ध्यान रखा कि वह जन्म से मुस्लिम है, बस इसीलिए मुस्लिम लडक़े से उसका विवाह कराया है। मेरे लिए मानवता मेरे धर्म से बढक़र है।

उपेंद्र गुप्ता के आसपास रहने वालों ने कहा, गुप्ता ने एक नजीर पेश की है कि लोगों के साथ सम्मान और गरिमा के साथ कैसे व्यवहार किया जाए। अगर वे चाहते तो शब्बो की परवरिश हिंदू रीति-रिवाज से करते और आसानी से उसका विवाह हिंदू लडक़े के साथ कर सकते थे, कौन रोकता? लेकिन उनके लिए मानवता सबसे ऊपर थी। जो भी लोग इस समाज के इस तानेबाने को समझ रहे थे, वे गर्व से भर उठे। समाज ने भी इस आयोजन में बढ़-चढ़ कर शिरकत की।

यह कहानी बिहार के पूर्णिया की है। जिन दिनों स्मार्ट फोन के जरिए युवाओं को सिर्फ यह बताया जा रहा था कि हिंदुओं के लिए मुसलमान खतरा हैं, उन्हीं दिनों एक पिता अपने पिता होने का फर्ज इस बात में समझ रहा था कि बेटी के धर्म, आस्था और जन्मना पहचान की रक्षा करना मानवता की गरिमा को बरकरार रखना है।

जब सियासत रोज-ब-रोज जनता को नफरत की घुट्टी पिलाती हो, तब ऐसी कहानियां लोगों को काल्पनिक लगती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम अपने साथ जीने-मरने वालों की तरफ नहीं देखते, हम सिर्फ उन चेहरों को देखते हैं जिनकी जबानें सिर्फ जहर उगलती हैं। हम उस जहर को ही जीवन की सच्चाई मान लेते हैं।

 


Date : 18-Jan-2020

कमलेश
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि ‘आरएसएस की आगामी योजना देश में दो बच्चों का कानून लागू कराना है।’  संघ प्रमुख का कहना था कि ये योजना संघ की है लेकिन इस पर कोई भी फैसला सरकार को लेना है। ऐसा पहली बार नहीं है कि जब दो बच्चों के कानून का मुद्दा उठ रहा है। पिछले साल अक्टूबर में असम में फ़ैसला लिया गया था कि जिनके दो से ज़्यादा बच्चे होंगे, उन्हें 2021 के बाद सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी।
इसके अलावा 11 और राज्यों में दो बच्चों का कानून लागू है लेकिन इसका दायरा थोड़ा सीमित है। जैसे गुजरात, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, ओडिशा में ये नियम सिफऱ् स्थानीय निकाय चुनाव लडऩे के संदर्भ में लागू किया गया है। जैसे पंचायत, जिला परिषद चुनाव और नगर निगम के चुनाव आदि।
हालांकि, महाराष्ट्र में ये नियम दो से ज़्यादा बच्चे होने पर राज्य सरकार में नौकरी पर भी प्रतिबंध लगाता है। राजस्थान में भी स्थानीय चुनाव लडऩे और सरकारी नौकरी दोनों पर प्रतिबंध लगाता है। लेकिन, मध्य प्रदेश में साल 2005 में दो बच्चों की बाध्यता को स्थानीय निकाय चुनावों से हटा दिया गया था। यहां आपत्ति जताई गई थी कि ये नियम विधानसभा और आम चुनावों में लागू नहीं है।
इसके बाद भी अधिक जनसंख्या वाले कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार में दो बच्चों वाला इस तरह का कानून लागू नहीं किया गया है। जब भी इस नियम की बात उठती है तो विवाद और विरोध पैदा हो जाता है। इसे लागू करने में आने वाली समस्याओं की बात होती है और साथ ही सरकार पर इसके ज़रिए मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने का आरोप भी लगाया जाता है।
अक्टूबर में ही असम के मामले पर ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल ने कहा था कि असम सरकार की ये नीति मुस्लिमों को बच्चे पैदा करने से नहीं रोक सकती। इसके बाद बीजेपी नेता मनोज तिवारी का कहना था कि दो बच्चों की नीति किसी ख़ास समुदाय के ख़िलाफ़ नहीं है और बदरुद्दीन अजमल एक अच्छी चीज को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
पिछले साल राज्य सभा में बीजेपी सांसद और आरएसएस विचारक राकेश सिन्हा ने संसद में जनसंख्या विनियमन विधेयक, 2019 पेश किया था जिसके तहत दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाले लोगों को दंडित करने और सभी सरकारी लाभों से भी वंचित करने का प्रस्ताव रखा गया था। दो बच्चों की नीति को बाध्यकारी बनाए जाने की संघ और कुछ अन्य की मांग के पीछे के राजनीतिक कारण तो बताए जाते ही हैं, इस तरह के प्रावधान की तुलना चीन की एक बच्चे वाली नीति से भी की जाती है। इसके फायदे भी बताए जाते हैं और इसके चलते सामने आए दुष्प्रभाव भी। ऐसे में हमने जानने की कोशिश की कि इन विवादों के बीच भारत में दो बच्चों का कानून लागू करना कितना व्यावहारिक है और इसके क्या प्रभाव हो सकते हैं।
कठोर कानून कितना फायदेमंद
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉप्युलेशन साइंसेज, मुबंई में जनसंख्या नीति और कार्यक्रम विभाग के प्रमुख डॉ. बलराम पासवान कहते हैं कि किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले जनसंख्या बढऩे के कारणों पर ध्यान देना जरूरी है।
डॉ. बलराम पासवान कहते हैं, जब भारत आज़ाद हुआ था तब 1950 में औसत प्रजनन दर छह के करीब थी यानी एक महिला औसतन छह बच्चों को जन्म देती थी। लेकिन अब प्रजनन दर 2.2 हो गई है और रिप्लेसमेंट लेवल पर पहुंचने वाली है। लेकिन, कुछ राज्यों में ऐसा नहीं है। दक्षिण भारत में ये हर जगह हो गया है लेकिन हिंदी बोलने वाली बेल्ट में प्रजनन दर अब भी तीन के बराबर है।
भारत में प्रजनन दर अब भी 2.1 फीसदी के एवरेज रिप्लेसमेंट रेट (औसत प्रतिस्थापन दर) तक नहीं पहुंची है। इस दर का मतलब होता है जब जन्म और मृत्युदर बराबर हो जाए। नीति आयोग के मुताबिक साल 2016 में भारत में प्रजनन दर 2.3 है। प्रजनन दर यानी एक महिला अपने जीवन काल में कितने बच्चों को जन्म देती है।
लेकिन, बिहार में ये दर 3.3 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 3.1 फीसदी, मध्यप्रदेश में 2.8 प्रतिशत, राजस्थान में 2.7 फीसदी और झारखंड में 2.6 फीसदी है। केरल, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल जैसे वो राज्य भी हैं जहां साल 2016 में प्रजनन दर 2 फीसदी से भी कम है। विश्व बैंक के एक अनुमान के मुताबिक भारत में 2017 में प्रजनन दर 2.2 रहेगी।
क्यों बढ़ती है जनसंख्या?
डॉ. बलराम पासवान कहते हैं, जनसंख्या बढऩे के चार प्रमुख कारण हैं। पहला ये कि हमारे देश में प्रजनन आयु वर्ग की महिलाएं बहुत ज़्यादा हैं। अगर आप दो बच्चों का कानून भी लागू कर देंगे तो भी जनसंख्या कम करने में बहुत मदद नहीं मिलेगी। इस वर्ग की महिलाएं अगर एक बच्चे को भी जन्म देती हैं तो भी बड़ी संख्या में जनसंख्या बढ़ेगी।
दूसरा कारण है कि ऐसे लोग बहुत हैं जिनमें अनचाहा गर्भधारण हो जाता है। वो सोचते हैं कि उन्हें एक या दो से ज़्यादा बच्चे नहीं चाहिए लेकिन वो इसके लिए गर्भनिरोध का इस्तेमाल नहीं करते। इस कारण उन्हें अनचाहे गर्भधारण का सामना करना पड़ता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक 12 से 13 फीसदी दंपत्ति ऐसे हैं जिन्हें अनचाहा गर्भधारण होता है। इस वर्ग को जागरूकता के जरिए दो बच्चों के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
तीसरा कारण है कि शिशु मृत्युदर कम हुई है लेकिन कुछ समुदाय ऐसे हैं जिनमें अब भी शिशु मृत्यु दर ज़्यादा है। वो देखते हैं कि उनके समुदाय में बच्चे एक साल के अंदर मर जाते हैं और इस डर से वो ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं। फिर ज़्यादा बच्चे पैदा करने से मां और बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, तो ये दुष्चक्र बन जाता है। चौथा कारण है कि कई इलाकों में अब भी 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी हो जाती है। इससे वो लडिक़यां अपनी प्रजनन आयु वर्ग में ज़्यादा बच्चों को जन्म देती हैं।
इन कारणों पर काम नहीं किया जाए तो किसी भी कानून से जनसंख्या पर नियंत्रण करना मुश्किल हो सकता है। अगर आप इन कारणों को दूर कर लेते हैं तो भी जनसंख्या कम हो सकती है। नीति कोई भी गलत नहीं होती बशर्ते कि उसे सही तरीके से लागू किया जाए। जिस तरह चीन में एक बच्चे की नीति का फ़ायदा हुआ उस तरह भारत में भी दो बच्चों की नीति का फायदा हो सकता है, लेकिन उससे पहले लोगों को शिक्षित और जागरूक करना ज़रूरी है वरना उनकी परेशानियां बढ़ भी सकती हैं।
वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय के सोशल वर्क विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर पुष्पांजलि झा कहती हैं कि भारत सख़्त नियमों से आसान नियमों की तरफ़ बढ़ा है और ये कानून एक तरह से फिर कठोर होना है।
पुष्पांजिली झा बताती हैं, शुरुआत से जो हमारी जनसंख्या नीति रही है उसमें छोटे परिवार को ही बढ़ावा दिया गया। पहले ये लक्ष्य आधारित था यानी कि तय संख्या में लोगों की नसबंदी करानी है। इसमें औरतों को महज़ एक शरीर के तौर पर देखा जाता था।
 लेकिन, उसके बाद वैश्विक स्तर पर कुछ बदलाव हुए और भारत में भी ये सोचा गया कि इसे ज़बरदस्ती लागू नहीं किया जा सकता। फिर इसे मांग आधारित बनाया गया यानी लोगों के पास विकल्प रखा गया।

चीन में भी पहले इसे कठोरता से लागू किया गया। इससे ये हुआ कि वहां लैंगिक अनुपात बढ़ गया। लड़कियों की संख्या बहुत कम हो गई। भारत में भी ये देखने को मिला की जब छोटे परिवार को बढ़ावा दिया गया तो लड़कियों की संख्या कम हो गई। इसलिए जरूरी होगा कि लड़कियों को बचाने पर भी ध्यान दिया जाए।
डॉ. बलराम पासवान कहते हैं कि अभी तक भारत की जो जनसंख्या नियंत्रण नीति रही है, वह चीन के जैसी मजबूत नहीं है। उनका कहना है कि इसे सख्ती से इसलिए लागू नहीं कर पाते क्योंकि भारत के समाज में इतनी तरह के समुदाय हैं कि कोई पसंद करेगा तो कोई नहीं। इसलिए कोई सरकार नहीं चाहेगी कि एक को खुश करें और एक को दुखी। इसलिए दो बच्चों के क़ानून को अगर लाया जाता है तो जनसंख्या बढऩे कारणों पर साथ में ध्यान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ऐसा लगता है कि इससे अल्पसंख्यकों को ही निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे क़ानून को एकतरफ़ा नहीं बल्कि संपूर्ण रूप से लागू करना होगा वरना ये समाज में उथल-पुथल पैदा कर देगा। दो बच्चों के कानून में आप किसी को कितना मजबूर कर सकते हैं? अगर फिर भी छोटा परिवार चाहिए ही तो उसके लिए ऐसे देशों के उदाहरण ले सकते हैं जिनमें बिना कठोर नियमों के भी जनसंख्या कम की गई है। आप लोगों को शिक्षित कीजिए, विकास की पहुंच निचले स्तर तक होनी चाहिए ताकि लोगों में छोटे परिवार के लिए खुद जागरूकता आए।
चीन को कितना हुआ फायदा
संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी नवीनतम विश्व जनसंख्या अनुमान के मुताबिक 2027 तक भारत की अनुमानित जनसंख्या चीन से आगे निकल जाएगी।
वर्तमान में भारत की जनसंख्या एक अरब 33 करोड़ के करीब है और चीन की जनसंख्या एक अरब 38 करोड़ है। 1979 में चीन में भी एक बच्चे की नीति अपनाई गई थी लेकिन उसे साल 2015 में वापस ले लिया गया। इस दौरान चीन को जनसंख्या कम करने में फायदा तो हुआ लेकिन इसके कुछ दुष्प्रभाव भी समाने आए।
डॉ. बलराम पासवान बताते हैं, चीन में एक बच्चे के क़ानून से लिंगानुपात बढ़ गया। लडक़ों के मुकाबले लड़कियों की संख्या कम होने लगी क्योंकि लोग एक बच्चे में बेटे को ही महत्व देते थे। दूसरा चीन की जनसंख्या बूढ़ी होने लगी यानी वहां जवान कम और बूढ़े लोग ज़्यादा हो गए। इसके अलावा लोगों को बुढ़ापे में संभालने के लिए कोई नहीं रहा। सामाजिक दायरा छोटा हो गया। हालांकि, चीन को इसे फायदा हुआ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
चीन में एक बच्चे की नीति 100 फीसदी जनसंख्या पर लागू नहीं थी। जैसे कि हांगकांग में और दक्षिणी-पश्चिमी चीन में जो ख़ास समुदाय हैं, उन पर ये नीति लागू नहीं थी। जो चीनी विदेश में रहते थे लेकिन चीन के नागरिक थे, उन पर भी यह लागू नहीं थी। बाकी नागरिकों पर इसे बहुत कठोर तरीके से लागू किया गया। इसमें सरकारी नौकरी पर प्रतिबंध से लेकर जुर्माने तक के प्रावधान थे।
डॉ. बलराम पासवान कहते हैं कि एक बच्चे की नीति के कठोर प्रावधानों के चलते ही चीन को इस नीति को ख़त्म करना पड़ा था। (बीबीसी)

 

 


Date : 18-Jan-2020

पुष्प रंजन
बात वेंकैया नायडू से ही शुरू करते हैं। बंगलुरू में राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यार्पण परिषद के रजत जयंती समारोह में मंगलवार को उन्होंने कहा- कैम्पस को राजनीति से दूर रखना चाहिए। यह घृणा पैदा करने वालों का अभयारण्य बनने लगा है।ज् नायडू देश के उपराष्ट्रपति हैं, तो उनकी बातों का वजन है। उनकी बातों का मतलब यही था कि छात्र घृणा की राजनीति से दूर रहें, कैम्पस में बस पढ़ाई करें। सत्य वचन! बस एक मुख़्तसर सा सवाल है, ये जो टुकड़े-टुकड़े गैंग  जुमला है, कहां से निकला और क्यों? जेएनयू से निकला घृणा फैलाने वाला यह जुमला, चुनावी सभा से लेकर टीवी की बहसों तक सरकार से असहमत लोगों की बौद्धिक लिंचिंग के लिए कितना कारगर हथियार है? अब कोई यह कहे कि एबीवीपी का जो नारा है- ज्ञान, शील और एकता, उसी पर उसके कैडर केंद्रित रहते हैं, तो ऐसे महानुभावों को दिल्ली में विधानसभा चुनाव प्रचार दिखा दीजिए। ज्ञान चक्षु खुल जाएंगे।
जब वेंकैया नायडू कैम्पस में थे, उनका अतीत क्या रहा है, संक्षेप में जान लें। कॉलेज के दिनों में वेंकैया नायडू अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य थे। आंध्र यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1972 में जय आंध्रा मूवमेंट के चर्चित चेहरों में से एक थे वेंकैया नायडू। 1974 के जेपी आंदोलन से जुड़ गये और आंध्र में जेपी मूवमेंट के संयोजक बन गए वेंकैया नायडू। उसके बाद की राजनीतिक यात्रा पर नहीं आऊंगा। बस इतना बताना था कि वेंकैया नायडू छात्र राजनीति की कोख से जन्मे नेता हैं। सर्वे करा लीजिए। पता चल जाएगा कि संसद में जो उच्च शिक्षित सभासद हैं, उनमें से शत-प्रतिशत लोग छात्र राजनीति में रहे हैं। मगर, पर उपदेश कुशल बहुतेरे  की पुरानी आदत जल्दी जाती नहीं।
वेंकैया जी, यदि छात्रों और कैम्पस को राजनीति से मुक्त रखना आप आवश्यक समझते हैं, तो शुरूआत अपने घर से ही कीजिए। भंग कर दीजिए एबीवीपी को। 1948 में बलराज मधोक ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी)की बुनियाद रखी थी। शुरू में ही तय हो गया था कि यह छात्र संगठन शिक्षा केंद्रों में कम्युनिस्टों का असर समाप्त करेगा। 9 जुलाई 1949 को एबीवीपी का पंजीयन किया गया। कैम्पस में इसे कैसे विस्तार देना है, इसकी जि़म्मेदारी 1958 में मुंबई विश्वविद्यालय में प्रोफेसर यशवंत राव केलकर ने संभाली थी। 1974 में जेपी आंदोलन के समय बिहार, गुजरात और दिल्ली में एबीवीपी की जड़ें विस्तार लेने लगीं। उन दिनों इसकी सदस्य संख्या 1 लाख 60 हजार थी। 2015 में इसकी संख्या 32 लाख बताई गई। उस समय सीपीएम की छात्र इकाई एसएफ़आई के सदस्यों की संख्या 43 लाख बताई गई थी। 9 अप्रैल 1971 को स्थापित, कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई की सदस्य संख्या 40 लाख है। चार साल में एबीवीपी का लक्ष्य 10 लाख नये सदस्यों को जोडऩा था। 
गौरतलब है कि एसएफ़आई की स्थापना 1970 में हुई और एनएसयूआई की 1971 में फिर भी 1949 में स्थापित एबीवीपी अपनी सदस्य संख्या इनके मुक़ाबले नहीं बढ़ा पाई। 1948 से 2015, कुल जमा 67 साल लगे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सदस्य संख्या 32 लाख तक पहुंचाने में। क्या उसकी वजह युवाओं में उस विचारधारा को अस्वीकृत करना भी रहा है?
क्या भारत में राजनीति से मुक्त कोई ऐसा कैंपस है? यह हमारे उपराष्ट्रपति की कल्पनाओं में ही संभव है। उन्हें ऐसा कहने की जरूरत दो कारणों से आन पड़ी है। पहला सीएए की वजह से असम, अलीगढ़ से लेकर, जामिया दिल्ली, हैदराबाद, मुंबई और बंगलुरू के शिक्षा केंद्रों का गर्माना और दूसरा हॉस्टल में मनमानी फीस को लेकर पहले से तपा हुआ जेएनयू। मतलब, आप देशभर में ऐसे कैंपस की कल्पना कर रहे हैं, जहां विद्यार्थी और अध्यापक केवल सत्ता के गुण गाएं। प्रतिरोध की बात बिल्कुल न करें। ऐसा होता तो 5 सितंबर, 1967 को राजस्थान विश्वविद्यालय से अंग्रेजी भगाओ आंदोलन का आगाज़ नहीं होता। 
उन दिनों जनसंघ और आरएसएस ने उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, बिहार के विश्वविद्यालयों में बाकायदा हिंदी सेना का गठन किया था। दिल्ली के मेयर हंसराज गुप्ता जो खांटी संघी कहे जाते थे, इस आंदोलन में कूद पड़े थे। इस अंग्रेजी विरोघी आंदोलन में मधु लिमये और समाजवादी युवक सभा का आना भी दिलचस्प था। बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां भी हुईं थीं। तो कैसे हम कहें कि राजनीति को कैम्पस की चहारदीवारी से बाहर रखें? यह स्थिति न पहले थी, न आगे रहेगी।
पता नहीं क्या सोचकर एक कराटे मास्टर को आपने जेएनयू का कुलपति बना दिया? एम.जगदीश कुमार आईआईटी दिल्ली में कराटे की क्लास चलाते थे, यह भी इनकी प्रोफाइल को सुशोभित करता है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के शिक्षक और नैनो डिवाइस पर काम करने वाले वाइस चांसलर एम.जगदीश कुमार उस अकादमिक पीढ़ी से बिल्कुल अलग हैं, जिसकी बुनियाद प्रख्यात कूटनीतिक व जेएनयू के पहले कुलपति जी. पार्थसारथी के कार्यकाल में रखी गई थी। मेरे समय में इक्कीस महीने एक हफ़्ते के लिए के.आर. नारायणन कुलपति हुए। देश के राष्ट्रपति पद को जब डॉ. नारायणन ने सुशोभित किया,वह जेएनयू के हर छात्र के लिए गर्व का विषय था।
एम.जगदीश कुमार से पहले के ग्यारह कुलपतियों की सूची देखिये, तो पता चलेगा कि सर्वाधिक गृह कलह इन्हीं के समय में हुई है। छात्रों को तो छोडिय़े, नकाबपोश गुंडे शिक्षकों को पीट रहे हैं। गल्र्स हॉस्टल में घुसकर लड़कियां दौड़ा-दौड़ा कर पीटी जा रही हैं। कुलपति एम.जगदीश कुमार के पास टीवी चैनलों को इंटरव्यू देने का भरपूर समय था, मगर मार खाये शिक्षकों-छात्रों से मिलने की फुर्सत नहीं थी। अराजकता का ऐसा अभूतपूर्व नंगा नाच तो तब भी नहीं हुआ था, जब 1983 में हुए छात्र आंदोलन में जेएनयू एक सेमेस्टर के वास्ते बंद हो गया था। हम सब उसके भुक्तभोगी थे, तिहाड़ जेल की यात्रा तक कर आए थे। 
आखिर ऐसा क्या था कि एक विप्लवी, यांत्रिक बुद्धि वाले व्यक्ति को वीसी बनाकर जेएनयू भेजना आवश्यक समझा गया? आप ध्यान से बीजेपी के नेता-प्रवक्ता इनके अनुषंगी संगठनों से जुड़े लोगों की बात सुनिये। एक ही छवि उकेरेंगे, ये लोग कम्युनिस्ट हैं, नक्सली विचारधारा को आगे बढ़ानेवाले, राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े करने वाले! उन्हें हर असहमत व्यक्ति टुकड़े-टुकड़े गैंग वाला दिखता है। एएमयू, जामिया, उस्मानिया मेें सीएए का प्रतिरोध यदि छात्र करते दिखते हैं टुकड़े-टुकड़े गैंग का ठप्पा लग जाता है।
 

 


Date : 17-Jan-2020

हैदराबाद सेंट्रल युनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र रोहित चक्रवर्ती वेमुला की आत्महत्या को आज चार साल हो गए हैं। 26 वर्षीय दलित छात्र रोहित वेमुला ने 17 जनवरी 2016 को युनिवर्सिटी के होस्टल के एक कमरे में फांसी लगाकर अपनी जान दे दी थी। उनकी आत्महत्या का मामला लंबे वक्त तक सुर्खियों में रहा और आज भी इस बारे में बात होती है। रोहित युनिवर्सिटी में आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन के सदस्य थे। वो कैंपस में दलित छात्रों के अधिकार और न्याय के लिए भी लड़ते रहे थे। यहां अंग्रेजी में लिखे उनके उस पत्र का हिंदी अनुवाद :
गुड मॉर्निंग,
आप जब ये पत्र पढ़ रहे होंगे तब मैं नहीं होऊंगा। मुझ पर नाराज मत होना।
मैं जानता हूं कि आप में से कई लोगों को मेरी परवाह थी, आप लोग मुझसे प्यार करते थे और आपने मेरा बहुत ख्याल भी रखा।
मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। मुझे हमेशा से खुद से ही समस्या रही है। मैं अपनी आत्मा और अपनी देह के बीच की खाई को बढ़ता हुआ महसूस करता रहा हूं। मैं एक दानव बन गया हूं।
मैं हमेशा एक लेखक बनना चाहता था। विज्ञान पर लिखने वाला, कार्ल सगान की तरह। लेकिन अंत में मैं सिर्फ ये पत्र लिख पा रहा हूं।
मुझे विज्ञान से प्यार था, सितारों से प्यार था, प्रकृति से प्यार था... लेकिन मैंने लोगों से प्यार किया और ये नहीं जान पाया कि वो कब के प्रकृति को तलाक दे चुके हैं।
हमारी भावनाएं दोयम दर्जे की हो गई हैं। हमारा प्रेम बनावटी है। हमारी मान्यताएं झूठी हैं। हमारी मौलिकता वैध है बस कृत्रिम कला के जरिए। यह बेहद कठिन हो गया है कि हम प्रेम करें और दुखी न हों।
एक आदमी की कीमत उसकी तात्कालिक पहचान और नजदीकी संभावना तक सीमित कर दी गई है। एक वोट तक।
आदमी एक आंकड़ा बन कर रह गया है। एक वस्तु मात्र। कभी भी एक आदमी को उसके दिमाग से नहीं आंका गया। एक ऐसी चीज जो स्टारडस्ट से बनी थी। हर क्षेत्र में, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में।
मैं पहली बार इस तरह का पत्र लिख रहा हूं। पहली बार मैं आखिरी पत्र लिख रहा हूं। मुझे माफ करना अगर इसका कोई मतलब न निकले तो।
हो सकता है कि मैं गलत हूं अब तक दुनिया को समझने में। प्रेम, दर्द, जीवन और मृत्यु को समझने में। ऐसी कोई हड़बड़ी भी नहीं थी। लेकिन मैं हमेशा जल्दी में था। बेचैन था एक जीवन शुरू करने के लिए।
इस पूरे समय में मेरे जैसे लोगों के लिए जीवन अभिशाप ही रहा। मेरा जन्म एक भयंकर हादसा था। मैं अपने बचपन के अकेलेपन से कभी उबर नहीं पाया। बचपन में मुझे किसी का प्यार नहीं मिला।
इस क्षण मैं आहत नहीं हूं। मैं दुखी नहीं हूं। मैं बस खाली हूं। मुझे अपनी भी चिंता नहीं है। ये दयनीय है और यही कारण है कि मैं ऐसा कर रहा हूं।
लोग मुझे कायर करार देंगे। स्वार्थी भी, मूर्ख भी। जब मैं चला जाऊंगा। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता लोग मुझे क्या कहेंगे।
मैं मरने के बाद की कहानियों भूत प्रेत में यकीन नहीं करता। अगर किसी चीज पर मेरा यकीन है तो वो ये कि मैं सितारों तक यात्रा कर पाऊंगा और जान पाऊंगा कि दूसरी दुनिया कैसी है।
आप जो मेरा पत्र पढ़ रहे हैं, अगर कुछ कर सकते हैं तो मुझे अपनी सात महीने की फेलोशिप मिलनी बाकी है। एक लाख 75 हजार रुपए। कृपया ये सुनिश्चित कर दें कि ये पैसा मेरे परिवार को मिल जाए। मुझे रामजी को 40 हजार रुपए देने थे। उन्होंने कभी पैसे वापस नहीं मांगे। लेकिन प्लीज फेलोशिप के पैसे से रामजी को पैसे दे दें।
मैं चाहूंगा कि मेरी शवयात्रा शांति से और चुपचाप हो। लोग ऐसा व्यवहार करें कि मैं आया था और चला गया। मेरे लिए आंसू न बहाए जाएं। आप जान जाएं कि मैं मर कर खुश हूं जीने से अधिक।
उमा अन्ना, ये काम आपके कमरे में करने के लिए माफी चाहता हूं।
आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन परिवार, आप सब को निराश करने के लिए माफी। आप सबने मुझे बहुत प्यार किया। सबको भविष्य के लिए शुभकामना।
आखिरी बार
जय भीम
मैं औपचारिकताएं लिखना भूल गया। खुद को मारने के मेरे इस कृत्य के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है।
किसी ने मुझे ऐसा करने के लिए भडक़ाया नहीं, न तो अपने कृत्य से और न ही अपने शब्दों से।
ये मेरा फैसला है और मैं इसके लिए जिम्मेदार हूं।
मेरे जाने के बाद मेरे दोस्तों और दुश्मनों को परेशान न किया जाए।
(बीबीसी)

 


Date : 17-Jan-2020

अनुराग भारद्वाज
हमको कुछ कहावतों ने मार डाला। क्यों? इसलिए कि बचपन से सुनते आये थे और उसी सुने को निभाते रहे। बड़ों ने कह दिया तो बस, बात ख़त्म। हमारे संस्कारों में बड़ों से बहस न करने को उनका बुनियादी अधिकार माना गया है।
लेकिन लोकतंत्र में बहस से ही बुनियादी अधिकार सुरक्षित होते हैं। ऐसी ही कई अहम बहसें करने वाले शख्स थे नानी पालकीवाला। नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए की गई उनकी इन बहसों ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक के खंभे हिला दिए थे। खासकर इंदिरा गांधी द्वारा लागू किए गए आपातकाल के विरोध में नानी पालकीवाला का योगदान हमेशा याद किया जाएगा।
सरनेम ‘पालकीवाला’ में उनके खानदान का पेशा निहित है। यानी उनके पुरखे पालकियों को बनाने और उनकी मरम्मत का काम करते थे। नानी पालकीवाला बचपन में हकलाकर बोलते थे। मुंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से इंग्लिश में एमए करने के बाद उनकी ख्वाहिश मुंबई यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बनने की थी। लेकिन उनकी जगह एक पारसी लडक़ी को ले लिया गया। कोई और वेकेंसी न होने पर, लॉ पढने के लिए कॉलेज में भर्ती हो गए। देखिए, किस्मत कैसे पलटती है। जब नानी देश भर में बतौर वकील मशहूर हुए, वे उस इंग्लिश की लेक्चरर का शुक्रिया अदा करने के लिए कई सालों तक उसे डिनर पर बाहर ले जाते रहे। क्योंकि उस दिन अगर उसकी जगह नानी का चयन हो जाता तो कहानी कुछ और ही होती।
लॉ पढऩे के बाद नानी पालकीवाला 1944 में मुंबई की मशहूर लॉ फ़र्म जमशेद जी कंगा के साथ जुड़ गए। बतौर असिस्टेंट उनका पहला केस ‘नुसरवान जी बलसारा बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे’ था जिसमें बॉम्बे शराबबंदी कानून को चुनौती दी गई। 1950-51 तक वे ख़ुद पैरवी करने लगे थे।
1954 में नानी पालकीवाला ने एंग्लो-इंडियन स्कूल बनाम महाराष्ट्र सरकार केस में पैरवी की थी। अदालत में जिरह के दौरान उन्होंने संविधान की धारा 29 (2) और 30 का हवाला दिया जिनके तहत अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की गयी है। हाई कोर्ट से सरकार के खिलाफ आदेश पारित करवाकर नानी जीत गए। राज्य सरकार इस मसले को सुप्रीम कोर्ट ले गयी, लेकिन नानी वहां भी जीत गए। कुछ ही सालों में वे इतने मशहूर हो गए उनकी दलील और पैरवी सुनने के लिए कोर्ट रुम में भीड़ जमा होती थी।
टैक्स और कॉर्पोरेट मामलों में नानी पालकीवाला को महारत हासिल थी पर वे जनता की आवाज़ बने। 1970 में उन्होंने ‘आरसी कूपर बनाम केंद्र सरकार’ नाम का एक अहम केस लड़ा था। इसमें इंदिरा गांधी सरकार द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण को चुनौती दी गई थी। नानी पालकीवाला ने इंदिरा सरकार द्वारा पारित बिल के खि़लाफ़ पैरवी कर जीत पाई। खिसियाकर, सरकार ने संविधान में संशोधन कर दिया।
नानी पालकीवाला ने राजाओं और नवाबों से जुड़ा प्रिवी पर्स (पूर्व राजाओं और नवाबों को सरकार से मिलने वाले भत्ते) का मामला भी लड़ा था । सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने दलील दी थी, ‘संवैधानिक वैधता से ज़्यादा बड़ी संवैधानिक नैतिकता है। धर्म (नैतिकता, वचनबद्धता और सच्चाई) लोगों के दिल में है। धर्म का लोप हुआ तो न संविधान, न कानून और न ही (इसमें) संशोधन लोकतंत्र को बचा पाएगा।’ यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में गया था जिसने सरकार को प्रिवी पर्स बंद न करने का आदेश दिया। इंदिरा सरकार ने फिर संविधान संशोधन करके प्रिवी पर्स की सहूलियत बंद कर दी।
नानी पालकीवाला के लिए ‘केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार’ केस आपातकाल के खि़लाफ़ उठी आवाज को मजबूत बनाने वाला हथियार था। ‘सरकार संविधान में बदलाव कर सकती है, पर इसकी आत्मा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती’ की आधारशिला पर लड़ा गया यह मामला उनके जीवन का सबसे महान केस था। उनका ही नहीं, इसे भारतीय संविधान की आत्मा को अक्षुण रखने वाला सबसे महान मामला कहा जाता है।
इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान नानी पालकीवाला ने सरकार की धज्जियां उड़ाकर रख दी थीं। इस दौरान उन्होंने भाषणों और कोर्ट में दलीलों से सरकार पर ज़बरदस्त प्रहार किया। सुनने वालों की तालियों का शोर और नानी की अकाट्य तर्कशीलता संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट की दीवारों को हिलाकर रखते थे।
1976 में स्वर्ण सिंह समिति ने अपनी रिपोर्ट ने संविधान में संशोधन के अनेक विवादास्पद प्रस्ताव दिए थे। इसमें एक सुझाव यह भी था कि संविधान की प्रस्तावना ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को ‘लोकतांत्रिक’ शब्द से पहले जोड़ा जाए और साथ ही ‘गरिमा’ को ‘एकता’ से पहले रखा जाए।
नानी पालकीवाला ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन हो सकता है लेकिन, प्रस्तावना में तब्दीली नहीं की जा सकती। उनका कहना था कि ‘समाजवादी’ शब्द जोडऩा भ्रम पैदा करता है क्योंकि यह सिर्फ प्रस्तावना है जिसमें धर्मनिरेपक्षता’ जैसे लफ्ज़ जोडऩा कोई मायने नहीं रखता। नानी पालकीवाला ने इसे कोरा राजनीतिक स्टंट बताया।
देखा जाए तो नानी कर यानी टैक्सेशन और कॉर्पोरेट मामलों के वकील थे और अर्थशास्त्र का ज्ञान उन्होंने चलते-फिरते ही हासिल किया था। पर बजट पर उनका भाषण सुनने के लिए लोग आतुर रहते। कहा जाता था कि बजट पर दो ही भाषण सुने जाने चाहिए। एक वित्त मंत्री का बजट पेश करते हुए और दूसरा नानी पालकीवाला का उसकी व्याख्या करते हुए। उनके व्याख्यान इतने लोग सुनते कि मुंबई में स्टेडियम बुक किए जाते थे।
मौजूदा दौर के मशहूर वकील फ़ली नरीमन नानी पालकीवाला के शिष्य रहे हैं। उनके मुताबिक 1970 के दशक में तत्कालीन कानून मंत्री पी. गोविंद मेनन ने नानी को अटॉर्नी जनरल बनने की पेशकश की थी। थोड़ी ना-नुकर के बाद नानी ने हामी भर दी। घोषणा वाले दिन से एक रात पहले लगभग तीन बजे उनकी आंख खुली और उनकी अंतरात्मा ने कहा कि इस पद को लेने के बाद वे जनता की आवाज नहीं बन पाएंगे। अगले दिन उन्होंने सरकार का प्रस्ताव ठुकरा दिया। कुछ इसी तरह जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनने का ऑफर आया तो उन्होंने तब भी विनम्रता से इसे अस्वीकार कर दिया।
1977 से लेकर 1979 तक नानी पालकीवाला अमेरिका में भारतीय राजदूत रहे। वहां एक बार अपने भाषण में उन्होंने कहा था, ‘भारत एक गऱीब देश है, हमारी गऱीबी भी एक ताक़त है जो हमारे राष्ट्रीय स्वप्न को पूरा करने में सक्षम है। इतिहास गवाह है कि अमीरी ने मुल्क तबाह किये हैं, कोई भी देश गऱीबी में बर्बाद नहीं हुआ’। उन्होंने आगे कहा, ‘हमारी सभ्यता 5000 साल पुरानी है। भारतीयों के जीन इस तरह के हैं जो उन्हें बड़े से बड़ा कार्य करने के काबिल बनाते हैं’। नानी अमेरिका में इतने लोकप्रिय हुए कि वहां के बड़े-बड़े विश्वविद्यालय उन्हें व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित करते थे।
1979 में चेन्नई में ‘शंकर नेत्रालय’ की स्थापना हुई थी। एक रोज़ इसके संस्थापक डॉक्टर बद्रीनाथ को नानी पालकीवाला ने अपने घर रात के भोजन पर आमंत्रित किया। उन्हें विदा करते हुए बाहर तक आए नानी ने सकुचाते हुए उनको एक लिफ़ाफ़ा थमा दिया। डॉक्टर ने भी शिष्टाचार के चलते उनके सामने लिफ़ाफ़ा नहीं खोला। घर जाकर उन्होंने देखा तो उसमें दो करोड़ रुपये का चेक था जो नानी ने अस्पताल के लिए दिया था।
नानी पालकीवाला की बात कहावत से शुरू हुई थी। उसी से ख़त्म की जाए तो बेहतर है। अंग्रेज़ी में कहते हैं कि ‘इग्नोरेंस ऑफ़ लॉ इज नो ब्लिस’। यानी कानून की जानकारी न होना आनंददायक नहीं है। हमें समझना होगा कि जितने हम अपने कर्तव्यों के लिए उत्तरदायी हैं, उतना ही राज्य हमारे अधिकारों के लिए। पर इसके लिए हमें कानून जानना होगा, संविधान पढऩा होगा। क्यों? इसलिए कि नानी पालकीवाला जैसे लोग बार-बार नहीं आते। (सत्याग्रह)

 


Date : 16-Jan-2020

दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों में महीने भर से भी कम का वक्त बचा है। प्रमुख पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देने में जुटी हुई हैं। 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को 70 में से 67 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। भारतीय जनता पार्टी तीन सीटों पर सिमट गई थी और कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया था।
ऐसा नहीं है कि पिछले चुनावों में भाजपा ने कोई कोर कसर छोड़ी थी। किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने के अलावा पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सभी प्रमुख बड़े नेताओं की कई रैलियां दिल्ली में आयोजित कराई थीं। इसके बावजूद उन चुनावों में भाजपा कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाई थी।
इस बार भी भाजपा की ओर से काफी जोर लगाने की तैयारी है। भाजपा अपने प्रचार अभियान में इस बात को प्रमुखता से उठा रही है कि इस बार दिल्ली में भी जनता बदलाव के मूड में है। लेकिन दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी का आत्मविश्वास भी साफ दिख रहा है। उसकी ओर से लगातार यह दावा किया जा रहा है कि दिल्ली प्रदेश की सत्ता में एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल की बेहद आसान वापसी होने जा रही है।
दिल्ली में जमीनी स्तर पर जो लोग राजनीतिक स्थितियों को देख रहे हैं, उन लोगों को भी यह लग रहा है कि एक बार फिर से यहां अरविंद केजरीवाल को बतौर मुख्यमंत्री वापसी करने में कोई खास दिक्कत नहीं होगी। लेकिन आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि पार्टी इस बार दिल्ली की पिछली बार से भी अधिक सीटों पर जीत हासिल करने पर काम कर रही है। आप के तीन अलग-अलग नेताओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि पार्टी इस बार विधानसभा की 70 में से सभी 70 सीटों पर जीत हासिल करने की रणनीति पर चल रही है।
आप की चुनावी रणनीति से बेहद करीब से संबद्ध एक नेता इस बारे में बताते हैं, ‘हमने 50 से 55 ऐसी सीटों की पहचान की है जहां हमारी जीत लगभग पक्की है। इसके बाद जो सीटें बच रही हैं, उनमें से तीन को छोडक़र सभी पर हमें पिछले चुनावों में जीत हासिल हुई थी। तकरीबन आठ से दस सीटें ऐसी हैं जहां हमारा अनुमान है कि हम कड़े मुकाबले में रहेंगे। वैसे तो हर सीट के लिए पार्टी अलग-अलग रणनीति बनाकर काम कर रही है। लेकिन जो सीटें हमारे लिए मुश्किल हैं, उन सीटों के लिए हमने अलग से रणनीति बनाई है। पार्टी को लगता है कि अगर अच्छे से कोशिश की जाए तो इन सभी सीटों पर भी जीत हासिल हो सकती है।’
इस बारे में वे आगे कहते हैं, ‘हम इस बार 70 में से 70 सीट जीतने की योजना पर काम कर रहे हैं। लेकिन अभी इस बारे में कोई सार्वजनिक बयान देना ठीक नहीं है। क्योंकि यह एक ऐसी बात है जिस पर लोग आसानी से यकीन नहीं करेंगे और उन्हें लगेगा कि आप लफ्फाजी कर रही है। लेकिन हमारी टीम ने हर सीट का जो आकलन किया है, उसके हिसाब से हमें यह बहुत हद तक संभव लग रहा है कि अगर 2015 में हम 67 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब हुए थे तो इस बार हम 70 सीटों तक भी पहुंच सकते हैं।’
आम आदमी पार्टी के एक और नेता इस बात की पुष्टि करते हैं, ‘दरअसल, पार्टी में इस योजना को लेकर काफी समय से बात चल रही थी लेकिन जब से चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर आप के साथ आए तब से इस पर और गंभीरता से बात शुरू हुई। आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर पार्टी के रणनीतिकारों को लग रहा है कि इस बार 70 में से 70 सीटों पर भी जीत हासिल की जा सकती है।’
दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 में से 70 सीटों पर जीत हासिल करने के प्रभावों के बारे में वे कहते हैं, ‘दिल्ली में अगर हम ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं तो इससे पूरे देश में एक संदेश जाएगा। अधिकांश विपक्षी पार्टियों को ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा का चुनावी रथ नहीं रोका जा सकता है। लेकिन अगर दिल्ली में भाजपा को एक सीट भी नहीं मिलेगी तब विपक्षी पार्टियों के बीच यह संदेश जाएगा कि भाजपा को न सिर्फ हराया जा सकता है बल्कि बहुत बुरी तरह से हराया जा सकता है। दिल्ली में अगर आप 70 सीटें जीतने में कामयाब होती है तो इससे भविष्य में विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने में भी मदद मिल सकती है।’
अब सवाल यह उठता है कि क्या जमीनी स्तर पर यह स्थिति है कि आम आदमी पार्टी इस बार दिल्ली विधानसभा की सारी की सारी सीटों पर जीत हासिल कर ले। इस बारे में जमीनी जानकारी रखने वाले कई लोगों को कई तरह के संदेह हैं। इन लोगों का कहना है कि आप को बहुमत भर सीटें तो आसानी से मिल सकती हैं लेकिन सभी सीटों पर जीत हासिल करना लगभग असंभव को हासिल करने जैसा है।
इस बारे में जब आम आदमी पार्टी के तीनों नेताओं से अलग-अलग बात हुई तो इन तीनों का लगभग एक ही तरह का जवाब था - 2015 में पार्टी 67 सीटों पर जीत हासिल करेगी, इसकी उम्मीद कितने लोगों को थी लेकिन फिर भी आप को इतनी बड़ी सफलता मिल गई। ये लोग इसी आधार पर मान रहे हैं कि एक बार फिर से आप एक नया चमत्कार दिल्ली में कर सकती है। हालांकि, आम आदमी पार्टी अपनी इस रणनीति में कितनी कामयाब होगी यह तो 11 फरवरी को ही पता चल पाएगा। लेकिन इतना तय है कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप इस योजना पर बहुत गंभीरता से काम कर रही है। (सत्याग्रह)

 


Date : 16-Jan-2020

विश्व में खुफिया कैमरे से महिलाओं को चोरी छिपे फिल्माने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। दक्षिण कोरिया में एक ऐसी ही घटना के बाद महिला ने आत्महत्या कर ली। शादी का हॉल बुक था, घर का सामान भी बस कुछ दिनों पहले ही खरीदा गया था। लेकिन कमी थी घर की दुल्हन की। जिसने डिजिटल तांक झांक का शिकार होने के बाद आत्महत्या कर ली थी। उत्तर कोरिया में हजारों महिलाएं इस डिजिटल महामारी से जूझ रही हैं। अस्पताल में काम करने वाली ली यू जूंग के सहकर्मी ने वहां के चेंजिंग रूम में उन्हें कपड़े बदलते समय चुपके से फिल्मा लिया था। इस वीडियो के लीक होने को वह बर्दाश्त नहीं कर सकी, और उसने अपनी जान दे दी। 

यू जूंग की मौत उत्तर कोरिया में पहली स्पाईकैम मौत बताई जा रही है। जिस आरोपी ने यू जूंग का चुपके से वीडियो बनाया था, उसके पास से कई महिलाओं के ऐसे ही आपत्तिजनक वीडियो मिले हैं। सभी को सस्ते और अवैध स्पाईकैम से फिल्माया गया था। यह स्पाईकैम चाबी के छल्ले जितना छोटा था। 26 साल की पैथोलॉजिस्ट के पिता ली यूंग टाई कहते हैं, मैं विश्वास नहीं कर पा रहा हूं कि वह अब दुनिया में नहीं रही। मै गुस्से में हूं। यू जूंग ने सितंबर 2019 में इमारत से कूद कर आत्महत्या की थी।
डिजिटल क्रांति से हालात 
और भी बदतर
दुनिया में डिजिटल क्रांति के बाद इसके दुरूपयोग भी बढ़े हैं। डिजिटल यौन अपराध बढ़ रहे हैं और दक्षिण कोरिया स्पाइकैम का वैश्विक केंद्र बन गया है। यहां छोटे, छिपे हुए कैमरों के जरिए पीडि़तों को नग्न, पेशाब करते हुए या सेक्स करते हुए रिकॉर्ड किया जा रहा है। इस अपराध का सबसे ज्यादा शिकार हो रही हैं महिलाएं।
ली यू जूंग की आत्महत्या से यह साफ हो गया है कि कैसे इस डिजिटल तांक झांक का असर महिलाओं की मानसिक स्थिति पर पड़ रहा है। हालांकि अपनी जान लेने से पहले ली यू जूंग अवसाद से निजात पाने के लिए दवाएं ले रही थी लेकिन इसके बावजूद वह घटना को बर्दाश्त नहीं कर सकी। पुलिस की गिरफ्त में आरोपी तब आया जब वह सुपरमार्केट में गैरकानूनी तरीके से लोगों का वीडियो बना रहा था। तलाशी लेने के बाद पुलिस को इसके पास से मृतका के अलावा कई महिलाओं की चोरी से ली गई नग्न तस्वीरें मिली। कोर्ट ने दोषी को 10 महीने की सजा दी है।
महिला के पिता इस मामूली सजा से बिल्कुल खुश नहीं है। इस तरह के अपराध की उत्तर कोरिया के कानून में पांच साल तक की सजा का प्रावधान है। महिला के पिता ने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन से बात करते हुए कहा, मैं चाहता हूं कि अदालत अवैध फिल्मांकन को यौन अपराध की श्रेणी में रखे। महिलाओं के अधिकारों पर काम करने वाली संस्थाएं भी ऐसे अपराध के लिए कठिन दंड चाहती हैं। उनके मुताबिक तांक झांक करने वालों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह अपराध यौन उत्पीडऩ से कम नहीं है।
ऐसी घटनाओं के बाद पीडि़त अकसर अवसाद में चले जाते हैं। जो कई बार आगे चलकर और विनाशकारी साबित होता है। सरकारी थिंक टैंक कोरियन वुमेन डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने दो हजार पीडि़तों का सर्वेक्षण किया। इस सर्वे में पाया गया कि चार में से एक अपने साथ हुई घटना के बाद आत्महत्या का सोचती थी। दुनिया भर में यौन शिकारी महिलाओं से बदला लेने के लिए चुपके से उनकी अश्लील तस्वीरें लेते हैं।
सरकारों से क्या चाहता है समाज
यह समस्या तकनीकी रूप से विकसित दक्षिण कोरिया में ज्यादा फैल रही है। ऐसी डिजिटल तांक झांक के खिलाफ हजारों महिलाएं विरोध के लिए सडक़ों पर उतरी हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2018 में स्पाईकैम पोर्न के छह हजार मामले सामने आए थे। यह अपराधी आमतौर पर सार्वजनिक जगहों जैसे शौचालय या होटलों में स्पाई कैमरा लगाते हैं। फिर ऐसे वीडियो को पोर्न साइट्स पर बेचते हैं।
दक्षिण कोरिया की पोर्न साइट को 2016 तक करीब 10 लाख से ज्यादा लोग देखते थे। समाजसेवियों की शिकायत के बाद इसे बंद किया गया। इसके संस्थापक को जेल भेज दिया गया। अभी भी पोर्न वेबसाइट पर फुटेज बेचने वाले को हर वीडियो के लिए करीब छह हजार रूपये मिलते हैं। सरकार तांक झांक और गैरकानूनी रिकॉर्डिंग को रोकने का दावा करती है। इसमें सजा को बढ़ाया जाना, हर दिन सार्वजनिक शौचालयों पर नजर रखना और ऑनलाइन उत्पीडऩ का शिकार हुए पीडि़तों की मदद के लिए टास्क फोर्स बनाना शामिल है।
समस्या  फिर भी बरकरार है। दक्षिण कोरिया के परिवार और लैंगिक समानता मंत्रालय ने रॉयटर्स से बातचीत में कहा कि अपराधियों को गंभीर सजा मिलनी चाहिए। देश की सर्वोच्च अदालत डिजिटल सेक्स अपराधों पर नए तरीके से सजा संबंधी दिशा-निर्देशों का मसौदा तैयार कर रही है। मंत्रालय के मुताबिक डिजिटल सेक्स अपराधों को खत्म करने के लिए महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। (डायचे वैले)

 


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