विशेष रिपोर्ट

Date : 15-Jun-2019

कोरिया का उप स्वास्थ्य केंद्र, 4 कुर्सी, 2 खाट, यहीं जचकी
आधा दर्जन गांव के डेढ़ हजार इस पर निर्भर
चंद्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 15 जून (छत्तीसगढ़)।
कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड के ग्राम पंचायत बेलिया के आश्रित ग्राम पलारीडांड़ में संचालित यह उप स्वास्थ्य केन्द्र बीते 12 बरस से इस तरह चल रहा है। आधा दर्जन गांवों के डेढ़ हजार लोग इस पर निर्भर हैं। ग्रामीणों की मानें तो सन 2007 से शुरू इस स्वास्थ्य केन्द्र की सुध लेने कोई नहीं आया है। 

इस संबंध में बीएमओ डॉ आरपी सिंह का कहना है कि यहां के लिए नए भवन की स्वीकृति हो चुकी है लेकिन निर्माण शुरू नहीं हो सका है। फिलहाल वहां पर एएनएम एवं पुरूष स्वास्थ्य कार्यकर्ता के द्वारा टीकारण, मलेरिया जांच एवं अन्य स्वास्थ्य संबंधी सलाह एवं सेवाएं दी जा रही हैं। 

यह उप स्वास्थ्य केन्द्र सुदूर वनांचल ग्राम पलारीडांड़ में स्थित है यह उपस्वास्थ्य केन्द्र कच्चे  खपरैल एवं जर्जर मकान में संचालित है। यहां पर किसी भी भी प्रकार की कोई सुविधाएं नहीं है। महज औपचारिकता बतौर एक बोर्ड जरूर लगाया गया है जिसमें स्वास्थ्य कर्मचारी का नाम एवं उनके द्वारा किए जाने वाले टीकाकरण का समय व दिनांक भर लिखा जाता है। इस उपस्वास्थ्य केन्द्र पर ग्राम कछाड़ी, लोलकी, पलारीडांड़ ठकुरहत्थी जोगिया और मझगवां के लगभग 1500 से अधिक लोग निर्भर हंै। 

चार कुर्सियां, दो खाट
बाहर  एक बोर्ड लटकता हुआ दिखाई दे रहा है। बाहर कपड़े भी सूख रहे हंै। वहीं अंदर चार कुर्सियां और  दो रस्सी वाली खाट लगा दी गई है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रसव जांच कराने अथवा अचानक प्रसव होने की स्थिति में ग्रामीण कैसे करते होंगे? शासन के नियमों पर गौर करें तो उप स्वास्थ्य केन्द्र में मलेरिया, सिकल जांच, प्रसव पूर्व जांच और जरूरत पडऩे पर प्रसव भी कराया जाना होता है। यहां की महिलाओं ने बताया कि क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क भी नहीं है। रास्ता भी खराब है, अपातकालीन परिस्थिति में हमें भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।  

नया भवन स्वीकृत पर निर्माण ठंडे बस्ते में 
पलारीडांड़ का उपस्वास्थ्य केन्द्र निजी कच्चे मकान में सचंालित जरूर है लेकिन स्वास्थ्य विभाग की मानें तो इसका किराया विभाग को नहीं देना पड़ता है। पालारीडांड के लिए नया भवन भी स्वीकृत भी हुआ है ,पर इसे सरकारी उदासीनता या लापरवाही  लंबे समय से  निर्माण नही हो पाया है।  

नई सरकार से उम्मीदें
भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल में इस पर कोई घ्यान नहीं दिया। सरकार बदलने के बाद ग्रामीणों को एकउम्मीद पुन: जगी है कि  उपस्वास्थ्य केन्द भवन का निर्माण होगा। हांलाकि क्षेत्र के ग्रामीण इसे ग्राम कछाड़ी में बनाने की मांग कर रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा को इसका लाभ मिल सके। 


Date : 13-Jun-2019

सरकारी बदली पर आबकारी में तबादले का लम्बा खेल, करोड़ों के आरोप से घिरे बाबू की फिर वहीं पोस्टिंग

एसीबी ने पिछले साल पकड़ी थी 5 करोड़ की अवैध कमाई

प्लेसमेंट कर्मचारियों ने बताया था अपने साथियों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार 

छत्तीसगढ़ संवाददाता
बिलासपुर, 13 जून।
आबकारी विभाग के जिस बाबू के खिलाफ़ करोड़ों रुपये की अवैध कमाई के आरोप में एंटी करप्शन ब्यूरो ने छापामार कार्रवाई की थी उसे फिर बिलासपुर में पदस्थ कर दिया गया है। कुछ दिन पहले ही आबकारी उपायुक्त ने आयुक्त को रायपुर पत्र लिखकर उसे यहां पदस्थ नहीं करने को लेकर आगाह भी किया था। इसके बावजूद आरोपों से घिरे बाबू को यहां स्थानांतरित कर दिया गया है। 

आबकारी विभाग में मनचाही जगह पर पोस्टिंग का लम्बा खेल चल रहा है। इस खेल में लिप्त लोगों पर सत्ता बदलने का भी असर नहीं हुआ है। 12 जून को आबकारी विभाग के अवर सचिव मरियानुस तिग्गा ने लिपिक दिनेश कुमार दुबे को बिलासपुर स्थानांतरित करने का आदेश जारी किया है। पूर्ववर्ती सरकार में आबकारी विभाग के मंत्री के बेहद करीबी माने जाने वाले बिलासपुर के सहायक आयुक्त आबकारी कार्यालय के सहायक ग्रेड- दो बाबू दिनेश कुमार दुबे की अवैध कमाई की लम्बी चौड़ी शिकायत प्रधानमंत्री से लेकर विभागीय मंत्री व अधिकारियों को तथा एंटी करप्शन ब्यूरो को की गई थी। शिकायत में उसके द्वारा की जा रही अवैध वसूली के तरीकों का खुलासा किया गया था बल्कि यह भी बताया गया था कि उनके दबाव के चलते कई प्लेसमेंट कर्मचारियों को आत्महत्या के लिए भी मजबूर होना पड़ रहा है। 

एंटी करप्शन ब्यूरो के तत्कालीन उप पुलिस अधीक्षक अजितेश सिंह ने शिकायतों और उसके साथ मिले दस्तावेजों की जांच की। सही पाये जाने पर बीते साल 12 अप्रैल को उसके ठिकानों पर छापा मारा था। यह पाया गया कि उसने 9 साल की नौकरी में वेतन के रूप में केवल 20 लाख रुपये आहरित किये जबकि उसकी मौजूदा सम्पत्ति 5 करोड़ रुपये से अधिक है। छापेमारी के बाद एसीबी ने उसके खिलाफ़ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा, 13 (1 ई) और 13 (2) के तहत अपराध कायम किया। एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच में बाबू के पास से कुदुदंड में 1200 वर्ग फ़ीट का एक दो मंजिला मकान, एक वर्ग फ़ीट का एक मकान, गंगा नगर में एक आलीशान बंगला, भारती नगर में दो हजार वर्गफ़ीट का मकान, पत्नी के नाम पर चकरभाठा में दो एकड़ जमीन, एसबीआई में चार संयुक्त खाते मिले जिनमें दस लाख रुपए जमा हैं। बाबू दुबे की बेटी यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई के दस्तावेज भी हाथ में आये। 

मस्तूरी के पास ग्राम पाराघाट निवासी बाबू दिनेश कुमार दुबे ने  2009 से आबकारी विभाग में लिपिक पद में नौकरी शुरू की थी।  इस हिसाब से 9 साल में वेतन 20 लाख रुपए होता है लेकिन एसीबी ने पाया कि उसके पास लगभग 5 करोड़ की संपत्ति है।

शराब दुकान के कर्मचारियों ने दुबे के खिलाफ़ शिकायत में कई गंभीर आरोप लगाये थे। उन्होंने दुबे को पांच करोड़ नहीं बल्कि 11 करोड़ का आसामी बताया था। सन् 2017 में उसके बैंक खाते का विवरण देते हुए शिकायत हुई। यह बताया गया कि तीन महीने में उसने शासकीय दुकानों से दो करोड़ रुपये से अधिक वसूली की। उसने अपने बेटे-बेटी के नाम पर रिकरिंग खाता खोल रखा है, जिसमें 10 हजार रुपये हर माह जमा होते हैं। नोटबंदी के दौरान कर्मचारियों और भृत्यों के खाते में उसने पांच लाख रुपये से अधिक जमा कराये। फर्जी परमिट देकर लाखों रुपये लेना और शासन को करोड़ों का नुकसान पहुंचाने की शिकायत  भी उसके खिलाफ है। 

इसके अलावा ट्रांसपोर्टरों से लाखों रुपये की रिश्वत तथा कमीशन का आरोप भी कर्मचारियों ने दुबे पर लगाया। शिकायत यह भी थी कि एक भाजपा कार्यकर्ता के साथ सरकारी वाहनों में बैठकर दुबे यह वसूली करता है। 

एक अन्य शिकायत में कर्मचारियों ने दुबे के साथ-साथ तत्कालीन जिला आबकारी अधिकारी एल.एल. ध्रुव के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की मांग की थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि उन पर दुकान बंद होने और खुलने से पहले अधिक दाम पर शराब बेचने के लिए दबाव डाला जाता है। ऐसा नहीं करने पर नौकरी से निकालने और जेल भेजने की धमकी दी जाती है। प्लेसमेंट कर्मचारियों ने कहा था कि इनके दबाव के चलते कई कर्मचारी आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने इन दोनों अधिकारियों, कर्मचारियों को हटाने की मांग की थी। 

दुबे को फिर बिलासपुर में पदस्थ किये जाने की जानकारी मिलने पर सहायक आयुक्त कार्यालय के सभी अधिकारी कर्मचारियों ने सहायक आयुक्त को ज्ञापन देकर दुबे को यहां पदस्थ नहीं करने की मांग रखी। इस पर बीते 24 मई को सहायक आयुक्त ने आयुक्त को पत्र लिखकर आवश्यक कार्रवाई के लिए अनुशंसा सहित लिखा। कर्मचारियों, प्लेसमेंट कर्मचारियों और आबकारी विभाग के बिलासपुर में पदस्थ प्रभारी अधिकारी के विरोध के बावजूद भ्रष्टाचार, अवैध वसूली की गंभीर शिकायतों से घिरे लिपिक दुबे को यहां पदस्थ कर दिया गया है, जिससे मालूम होता है कि आबकारी विभाग में तबादले का लम्बा खेल शुरू हो चुका है। 


Date : 10-Jun-2019

हाथियों को हक देने कोरबा जिले में एलिफेंंट रिजर्व पर राज्य का विचार
छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 10 जून।
हाथियों की समस्या  निपटाने के लिए सरकार ठोस कार्ययोजना तैयार कर रही है। इस कड़ी में बरसों से लंबित कोरबा के लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने पर विचार हो रहा है। खास बात यह है कि करीब 8 सौ वर्ग किमी का यह इलाका घना जंगल है और कोयला खदानें भी हैं। यह सब देखकर पिछली सरकार एलीफेंट रिजर्व पर रूचि नहीं ले रही थी। 

विधानसभा के बजट सत्र में भी अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत ने लेमरू एलीफेंट रिजर्व के प्रस्ताव पर भी जानकारी चाही थी। यह विषय विधानसभा के प्रश्न-संदर्भ समिति के पास है। समिति ने इसको लेकर सरकार से जानकारी भी ली है, लेकिन वनमंत्री मोहम्मद अकबर ने 'छत्तीसगढ़' से चर्चा में सिर्फ इतना ही कहा कि हाथियों की समस्या गंभीर है और इस पर कैबिनेट में चर्चा होगी। 

माना जा रहा है कि हाथियों की समस्या के गंभीर रूप धारण करने के बाद अब कैबिनेट इसके निराकरण की दिशा में कोई ठोस फैसला ले सकती है। हाल यह है कि हाथी अब रायपुर शहर की सीमा तक पहुंच गए हैं। जशपुर-सरगुजा, कोरिया और कोरबा में हाथियों का उत्पात जारी है। अब तक कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। कहा जा रहा है कि यह समस्या इसलिए भी गंभीर हो रही है कि प्रदेश में एलीफेंट रिजर्व नहीं है। जबकि केन्द्र सरकार ने वर्ष-2007 में कोरबा का लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व करने की घोषणा की थी, लेकिन राज्य सरकार का रूख सकारात्मक नहीं रहा। यही वजह है कि एलीफेंट रिजर्व अधिसूचित नहीं किया जा सका। 

सरकार बदलते ही अब प्रदेश में हाथियों की समस्या से निपटने के लिए चिंतन-मनन का दौर चल रहा है। बताया गया कि खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस सिलसिले में बैठक भी ले चुके हैं। बैठक में वनमंत्री मोहम्मद अकबर के साथ-साथ मुख्य सचिव सुनील कुजूर और अन्य अफसर भी थे। सूत्र  बताते हैं कि श्री बघेल ने लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने के पुराने प्रस्ताव पर गहन मंत्रणा भी हुई है। 

सरकार और वन्यप्राणी विशेषज्ञों का मानना है कि लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व बनाने से हाथियों की समस्या से काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। हसदेव अरण्ड के इस इलाके में भरपूर पानी है। इससे हाथियों को इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा। मगर, इसको लेकर कई तरह की दिक्कतें भी हैं। यह पूरा इलाका कोयले से भरा पूरा है। एसईसीएल की तीन खदानें हैं। इसमें से दो बंद हो चुकी है और एक खदान चालू है। चूंकि यहां अंडरग्राउंड माइनिंग हो रही है इसलिए कोई विशेष दिक्कत नहीं है। मगर, कई और खदानों के लिए निजी कंपनियों को पीएल दिया जा चुका है। ऐसे में एलीफेंट रिजर्व बनाना आसान नहीं है। इसको लेकर कंपनियों का भी काफी कुछ दबाव रहेगा।

बताया गया कि केन्द्र के प्रस्ताव के बाद एलीफेंट रिजर्व घोषित करने की प्रक्रिया भी रमन सरकार में शुरू हुई थी। खनन संभावनाओं को देखते हुए लेमरू वनपरिक्षेत्र के 817 वर्ग किमी क्षेत्र को घटाकर 4 सौ किमी कर दिया गया था। बाद में यह भी प्रस्ताव अधिसूचित नहीं किया जा सका। चर्चा है कि कंपनियों के दबाव की वजह से ऐसा नहीं हो पाया है। मगर, भूपेश सरकार अब पुराने प्रस्ताव के मुताबिक ही एलीफेंट रिजर्व बनाने की दिशा में काम कर रही है। इस सिलसिले में कोरबा डीएफओ से वनविभाग ने जानकारी भी बुलाई है और कोरबा डीएफओ में आंकड़ों समेत तमाम जानकारियां भेज भी दी गई है। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में लेमरू वनक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने का वादा किया था। सरकार अब इस दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। इस पर जल्द ही फैसला होने की उम्मीद है।  


Date : 08-Jun-2019

अपनी जमीन पर तालाब बना दान 

राजेश अग्रवाल

बिलासपुर, 8 जून (छत्तीसगढ़)। एक-एक इंच जमीन के लिए रिश्तों में आज जहां कड़वाहट आ जाती है वहीं ग्राम पकरिया के तीन भाईयों ने लगभग 10 लाख रुपये खर्च कर गांव के लोगों की आम निस्तारी के लिए अपनी 4 एकड़ जमीन पर तालाब बना दिया। आज इस तालाब की  पूजा अर्चना की गई और इसका गवाह पूरा गांव बना। 

तखतपुर से 6 किलोमीटर दूर ग्राम पकरिया में बिना किसी सरकारी मदद के गांव के लोगों की आम निस्तारी के लिए तालाब खोदवाने का अनुकरणीय कार्य गांव के ही ठाकुर परिवार ने किया। शिक्षक  रामस्नेही क्षत्री, अधिवक्ता रवि क्षत्री व कृषक रामू क्षत्री गांव में हर वर्ष होने वाले जल संकट से रूबरू हुआ करते थे। गांव में मात्र एक सरकारी तालाब है। इस तालाब में गर्मी आते-आते सूख जाता था। इसके बाद गांव में ग्रामीणों और जानवरों के लिए आम निस्तारी के लिए समस्या खड़ी हो जाती थी। गांव में संसाधन पानी की कम हो जाने के कारण ग्रामीण परेशान हो जाते थे। 

इस तकलीफ को देखते हुए तीनों भाईयों ने लगभग तीन साल पहले निर्णय लिया कि गांव में लोगों को आम निस्तारी की पानी की समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए गांव में ही तालाब का निर्माण कराया जाए। इस निर्णय को मूर्त रूप देने के लिए पिछले तीन वर्षों से लगातार  प्रयास चल रहा था। पकरिया तखतपुर मुख्य मार्ग पर ही इनकी 4 एकड़ जमीन है, जिसकी कीमत वर्तमान में 50 लाख रूपये है। इस कीमती जमीन को उन्होंने तालाब के खोदने के लिए चयन किया।  इस जमीन को पिछले तीन साल गांव के ही मजदूरों को रोजगार भी उपलब्ध कराया। कुछ कार्य जेसीबी से करवाकर तालाब को तैयार कराया गया। आज 2019 में जून माह में तालाब तैयार हो गया, जिसकी पूजा अर्चना पूरे विधि-विधान से की गई। इस तालाब में पानी भरने के बाद गहराई का पता चल सके इसके लिए लगभग 30 फीट लकड़ी का खम्भा 6 जून को बिलासपुर से लाया गया। इसे बीच तालाब में पूजा अर्चना के बाद लगाया गया। तालाब की गहराई पता करने का यह पारम्परिक तरीका है। पूजा-अर्चना में मुख्य यजमान रागिनी रवि क्षत्री थीं। पुजारी रघुनंदन दीवान ने पूजा अर्चना  पूरी कराई। 

ठाकुर परिवार के तीन भाई रामस्नेही, रवि और रामू ने मिलकर एक परोपकार की एक मिसाल कायम की। उन्होंने बिना किसी सरकारी मदद के अपनी जेब से ही पैसे खर्च कर तीन साल में इस तालाब का निर्माण करवाया जिसमें लगभग 10 लाख रूपये खर्च हो गए। पर आज इस बात को लेकर वे राहत महसूस कर रहे हंै कि वे आने वाली उनकी पीढ़ी को हमेशा गांव वाले इस बात के लिए भी याद रखेंगे।  

सरई का खम्भा क्यों?
नये तालाब में जो खम्भा लगाया जाता है वह सरई की लकड़ी का होता है। ऐसी मान्यता है कि सरई तालाब के पानी को  शुद्ध रखता है और जो भी पानी में गंदगी होती है उसे यह सरई की लकड़ी  सोंख लेती है।

 


Date : 25-May-2019

सुप्रीम कोर्ट से मंजूर कैम्पा के करोड़ों रुपयों की अफसरों ने की राजधानी रायपुर में बर्बादी और अफरा-तफरी

तिलक देवांगन
रायपुर, 25 मई (छत्तीसगढ़)।
महाराजबंध तालाब के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के नाम पर वन विभाग ने साढ़े 5 करोड़ रूपए फूंक दिए, पर काम पूरा नहीं हो पाया। हाल यह है कि वन विभाग निर्माण कार्य को पूरा बताकर तालाब को नगर निगम को सौंपने के लिए तैयार है, लेकिन निगम उसे अपने कब्जे में लेने के लिए तैयार नहीं है। निगम का कहना है कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी काम थोड़ा बहुत ही हुआ है। निगम के पदाधिकारी इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। यह पूरा मामला देश में पेड़ों की कटाई के एवज में सुप्रीम कोर्ट में जमा कराई गई रकम का है जो कि राज्यों को वृक्षारोपण के लिए कैम्पा योजना के तहत आबंटित की जाती है।

करीब डेढ़  साल पहले वन विभाग ने कैम्पा मद की राशि से शहर के महाराजबंध तालाब के लिए करीब साढ़े 7 करोड़ मंजूर कर वहां संरक्षण, संवर्धन व सौंदर्यीकरण का काम शुरू कराया था, लेकिन अधिकांश काम अब भी अधूरे पड़े हैं। खासकर तालाब सफाई, गार्डन, नाली, चारदीवारी, पाथवे, लाइटिंग, ड्रेनेज सिस्टम, घाट निर्माण, बैठक व्यवस्था व टायलेट, पानी शुद्धिकरण उपकरण काम अभी भी अटका हुआ है। जबकि इस तालाब का संरक्षण, सौंदर्यीकरण तेलीबांधा तालाब की तरह होना था। तत्कालीन वन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने उस समय पद पर काबिज सीसीएफ अरुण पांडेय व रायपुर डीएफओ उत्तम गुप्ता को बुलाकर जमकर फटकार लगाई थी। उन्होंने लोगों और निगम पदाधिकारियों की शिकायत पर स्वीकृत राशि से तालाब संरक्षण और सौंदर्यीकरण का काम समय पर पूरा करने के निर्देश दिए थे, पर वन विभाग ने इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं कराया। जमीनी स्तर पर तालाब का हाल बेहाल हो गया है। 

बताया गया कि जानकारी के मुताबिक तालाब सौंदर्यीकरण के लिए कैम्पा मद से करीब 7 करोड़ 41 लाख खर्च की योजना बनाई थी। इस पर 5 करोड़ से अधिक रुपये खर्च कर दिए गए हैं। दिसंबर 2018 तक की जानकारी के हिसाब से मंजूर राशि में से करीब पौने 3 करोड़ खर्च होना बाकी है। तत्कालीन वन मंत्री, विधायक श्री अग्रवाल को तालाब सौंदर्यीकरण में भारी गड़बड़ी की शिकायत मिली है। दूसरी ओर लगातार शिकायत के बाद वन विभाग ने अब नगर निगम को एक पत्र लिखकर तालाब को वापस निगम को सौंपने की बात कही है। पत्र में कहा गया है कि तालाब सौंदर्यीकरण को लेकर विवाद चल रहा है, ऐसे में वहां आगे काम कराना मुश्किल है, पर निगम फिलहाल तालाब को अपने कब्जे में लेने के लिए तैयार नहीं है। निर्माण कार्यों पर एनजीटी की रोक भी लगी हुई है। 

निगम जोन-6 कमिश्नर विनय मिश्रा का कहना है कि निगम पदाधिकारियों, पार्षदों व क्षेत्र के लोगों की शिकायत मिल रही है कि तालाब का काम पूरा नहीं हो पाया है। दूसरी ओर वन विभाग, तालाब का काम पूरा कराने के बजाय उसे वापस निगम को सौंपने की तैयारी में है। निगम कमिश्नर को वहां से एक पत्र भी लिखा गया है, जिसमें विवाद के चलते काम पूरा न कराने और निगम को सौंपने की बात कही गई है। उनका कहना है कि तालाब में करोड़ों रुपये फूंक दिए गए है, पर वहां काम पूरा नहीं हो पाया है। ऐसे में निगम फिलहाल उसे अपने कब्जे में लेने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि निगम की ओर से वहां फिर से करोड़ों रुपये खर्च किए जाएंगे। 

निगम जोन छह अध्यक्ष सालिक सिंह ठाकुर का आरोप लगाते हुए कहना है कि तालाब सौंदर्यीकरण में भारी गड़बड़ी हुई है। तालाब के तीन ओर पाथवे का काम भी पूरा नहीं हो पाया है। लाइटिंग, नाली अधूरी है। लोहे की लगी ग्रिल पुरानी हो चुकी है या जंग लगकर टूट रही है। जलकुंभी ऊपर से हटा दिए गए हैं। तालाब सीमांकन का काम पूरा नहीं हो रहा है। वन विभाग को सीमांकन करा कब्जा हटाने की मांग की जा रही है, पर वहीं से प्रतिवेदन नहीं भेजा जा रहा है। ऐसे में तालाब के एक ओर कब्जा बना हुआ है। नाप-जोख के हिसाब से जिस ओर कब्जा है, वहां तालाब में 20 फीट तक कब्जा है।  उनका कहना है कि वन विभाग आधे-अधूरे सौंदर्यीकरण वाले तालाब को निगम को सौंपने का प्रयास कर रहा है, लेकिन निगम उसे अपने कब्जे में लेने के लिए तैयार नहीं है। उनका कहना है कि वहां करीब साढ़े  5 लाख खर्च किए गए हैं, पर काम कहीं नहीं दिख रहा है। ऐसे में निगम को वहां सौंदर्यीकरण व अन्य कार्यों के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे और निगम ऐसा नहीं चाहता। उन्होंने तालाब सौंदर्यीकरण व सीमांकन आदि में गड़बड़ी की जांच की मांग की है। 

 


Date : 22-May-2019

शिकायत के बाद आईटी ने सवा सौ एकड़ जमीन अटैच की

विशेष संवाददाता
रायपुर, 22 मई (छत्तीसगढ़)।
आयकर विभाग ने बेनामी पूंजी निवेश को पकडऩे की एक बड़ी कार्रवाई करते हुए रायपुर के एक बड़े कारोबारी पगारिया परिवार की बेनामी जमीनों को जब्त किया है। इस परिवार ने आदिवासियों की जमीनों को अपने परिचित आदिवासियों के नाम पर खरीदा, और उसे अपने कब्जे में भी रखा। बेनामी पूंजी निवेश का यह ऐसा बड़ा मामला है जिसमें राजनीतिक प्रभाव से होने वाली कमाई से ये जमीनें खरीदने की बात जांच में स्थापित हुई है। आयकर विभाग की कार्रवाई में अभी दो आदिवासियों के नाम पर खरीदी गई ऐसी करीब 14 करोड़ रूपए की जमीन पकड़ाई है। और इन दो आदिवासियों ने एक लखेश्वर बघेल मौजूदा कांग्रेस विधायक हैं, और बस्तर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष भी हैं। दूसरे आदिवासी, राजेश कर्मा एकदम ही गरीब किसान हैं जिसके नाम पर करोड़ों की जमीन खरीदी गई है। इन तीनों नामों से कई जिलों में खरीदी गई 136 एकड़ से अधिक जमीनें आयकर विभाग ने अटैच कर ली हैं।

रायपुर के उपमहापौर रहे, और मैट्स यूनिवर्सिटी के चांसलर गजराज पगारिया, और उनके छोटे भाई सुशील पगारिया ने अपने अलावा अपनी मां की ओर से भी ऐसी बेनामी जमीनें खरीदी थीं। आयकर विभाग को शिकायत मिलने के बाद जब जांच की गई तो पाया गया कि पारिवारिक संपत्ति बंटवारे में रायपुर के जिला न्यायाधीश की अदालत में जो बंटवारानामा दस्तखत किया गया, उसमें भी इन सारी आदिवासी जमीनों को आपस में बांटा गया, और अदालत के डिक्रीनामे में ऐसी सारी आदिवासी जमीन सुशील पगारिया के हिस्से में दे दी गई। 
आयकर विभाग द्वारा अटैच की गई जमीनों में से सौ एकड़ से कुछ कम जमीन लखेश्वर बघेल के नाम की है, 25 एकड़ से कुछ अधिक जमीन स्व. ईश्वरी बघेल के नाम की है, और 18 एकड़ से अधिक जमीन राजेश कर्मा के नाम की है।

जानकार सूत्रों के मुताबिक आयकर विभाग की जांच में सुशील पगारिया ने बताया कि पारिवारिक-कारोबारी विवाद में मां और भाई की लिखाई गई रिपोर्ट के आधार पर उसे जेल में रखा गया था। उसके जेल में रहते हुए ही गजराज पगारिया और उनकी मां ने एक बंटवारानामा तैयार करके जिला न्यायाधीश की एक जिला अदालत में पेश किया, और सुशील पगारिया को इस पर दस्तखत के लिए जेल से एक जिला अदालत लाया गया। इस बंटवारेनामे में सैकड़ों जमीनों के खसरा नंबर थे जिन्हें बांटा गया था, और मौके पर ही सुशील पगारिया को इस पर दस्तखत करने पड़े। बाद में जेल से छूटने पर उन्होंने यह पाया कि आदिवासियों के नाम पर खरीदी गई जमीनों को बड़े भाई ने सुशील के नाम पर ही डाल दिया। 

इसके बाद आयकर विभाग की एक जांच में सुशील पगारिया ने यह बेनामी पूंजी निवेश मंजूर भी किया। 

बस्तर जिले की तहसील बस्तरनार में एक आदिवासी राजेश कर्मा से आयकर विभाग ने उनके नाम पर दर्ज कई जमीनों के बारे में पूछताछ की। इस पर राजेश कर्मा ने एक से अधिक तरह के बयान विभाग को दिए जिसमें एक में उन्होंने इन जमीनों को अपना नहीं माना, और बयान में कहा कि उनकी सालाना आय कुल दस हजार रूपए है, और उन्होंने बैंक के अपने खाते का भी कभी उपयोग नहीं किया है। उन्होंने विभाग को दिए गए बयान में कहा कि न तो उनकी आय करयोग्य रही, न ही उन्होंने कभी आईटी रिटर्न भरा, और न ही उनके पास पैन है। 

वे थोड़ी सी खेती और महुआ बीनकर काम चलाते हैं, और खुद कोई जमीन नहीं ले पाए हैं। उन्होंने बयान में बताया कि उनके पिता गरीबी रेखा के नीचे दर्ज हैं, और उन्हें इंदिरा आवास, सरकारी गैस कनेक्शन मिला है। राजेश कर्मा ने पुरखों की तीन एकड़ जमीन के अलावा अपने पास कोई भी जमीन होने से मना कर दिया था। 
लेकिन आयकर विभाग को दिए गए एक बयान के बाद अपने वकील की तरफ से उन्होंने उनके नाम पर खरीदी गई जमीन अपनी होने का दावा किया, जिसे आयकर विभाग ने मानने लायक नहीं पाया, और ऐसी जमीनों को अटैच कर लिया। 

इस मामले में गजराज पगारिया के छोटे भाई सुशील पगारिया का भी एक लंबा बयान आयकर विभाग ने लिया है जिसमें उन्होंने खुलासे से आदिवासी जमीनों को लेने की जानकारी दी है, और बहुत सी सनसनीखेज बातें भी हलफनामे पर विभाग को बताई है। सुशील पगारिया ने बताया कि गजराज पगारिया के साथ उनका एक संयुक्त कारोबार रहा है, और दो नंबर के पैसों से उनके परिवार ने लखेश्वर बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर आदिवासी जमीनें खरीदी हैं। उन्होंने आयकर जांच में बताया कि चूंकि वे आदिवासी जमीन कानूनन नहीं खरीद सकते, इसलिए उनके परिवार ने नगद भुगतान करके लखेश्वर बघेल, श्रीमती भगवती बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर  ऐसी जमीनें खरीदीं। सुशील पगारिया ने बताया कि उनका पारिवारिक व्यवस्थापन विलेख रायपुर की अदालत में पेश किया गया था, और उसमें भी इन जमीनों का उल्लेख है। उन्होंने कहा कि वे इन जमीनों की पूरी सूची खसरा-रकबा सहित विभाग को दे रहे हैं। 

सुशील पगारिया ने विभाग के सवाल के जवाब में हलफनामे पर आयकर को कहा  कि इन जमीनों के लिए नगद रूपया राजनीतिक रूप से की गई अघोषित कमाई से आया है। सुशील ने बताया कि उनके बड़े भाई गजराज पगारिया राजनीति में हैं, जनता कांग्रेस दल (जोगी) के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी हैं, और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम करते हैं। सुशील पगारिया ने यह भी कहा कि गजराज पगारिया 1994 से 1999 तक रायपुर के उपमहापौर थे। इन सब कामों से इनके पास बड़ी मात्रा में नगद रकम इक_ा हुई, और इसका कोई हिसाब नहीं है। इन्हीं नगद रूपयों से वे आदिवासी जमीनें आदिवासियों के नाम पर खरीदी गईं। इस बयान में कहा गया कि 1994 से लेकर 2004 तक इस तरह कमाई गई रकम से आदिवासी जमीनें खरीदी गईं। 
आयकर विभाग को दिए बयान में सुशील पगारिया ने यह भी बताया कि गजराज पगारिया पहले 1990 से 1994 तक कांग्रेस नेता श्री विद्याचरण शुक्ल के साथ रहे, फिर पांच साल रायपुर के उपमहापौर रहे, और इस पूरे दौर में उन्होंने नगद सृजन किया। बाद में जोगी कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे, और वहां भी नगद सृजन का बहुत बड़ा काम हुआ। उन्होंने बताया कि लखेश्वर बघेल से उनके परिवार का बहुत अच्छा संबंध है, और लखेश्वर बघेल पगारिया परिवार की ही एक रिहाइशी इमारत महावीर प्लाजा में रहते हैं। 

सुशील पगारिया ने आयकर विभाग को बताया कि अदालत में 2017 में पारिवारिक संपत्ति के व्यवस्थापन की डिक्री हो जाने के बाद भी जमीनों के कागजात गजराज पगारिया ने उन्हें नहीं दिए हैं, इसलिए वे विभाग को कागजात नहीं दे सकते। सुशील पगारिया ने बताया कि बंटवारे के समय वे जेल में थे, और गजराज पगारिया, उनकी मां ने बंटवारे के कागज बनवाए थे, उन्हें इस पर दस्तखत करने के लिए जेल से सीधे लाया गया था, इसलिए उन्हें यह मालूम भी नहीं था कि अदालत से आदिवासी जमीन की जानकारी छुपाकर, उसे फैसले में रखवाकर अदालत को गुमराह किया गया है। ऐसी जमीनें बस्तर के अलावा महासमुंद जिले में भी लखेश्वर बघेल के नाम पर जमीन खरीदी गई है, लेकिन इनके कागज गजराज पगारिया के पास ही हैं। 

आयकर विभाग ने सुशील पगारिया से नगद रकम आने और उसे रखने के बारे में भी कई सवाल किए। सुशील पगारिया ने यह भी बताया कि जिन आदिवासियों के नाम पर जमीनें खरीदी गईं उसमें उन आदिवासियों का कोई पैसा नहीं लगा है। 

विभाग को गजराज पगारिया की ओर से दिए गए लिखित जवाब में कहा है कि वे चूंकि राजनीति में सक्रिय रहे, इसलिए उन्होंने कारोबार चलाने का जिम्मा (इस केस के शिकायतकर्ता, अपने छोटे भाई सुशील पगारिया को दे दिया था।) उन्होंने विभाग को अपने वकील की तरफ से तैयार किए गए अंग्रेजी के एक लंबे जवाब में यह भी कहा कि आज उनका भाई सुशील पगारिया इस मामले का शिकायतकर्ता है, लेकिन हकीकत यह है कि इन जमीनों की सुशील पगारिया द्वारा खरीदी की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि पारिवारिक बंटवारे में सुशील पगारिया ने इन जमीनों को जुड़वाया। गजराज पगारिया ने विभाग को एक जवाब में कहा है कि बंटवारे में लिखित शर्तों से यह साफ होता है कि ये जमीनें न केवल शिकायकर्ता सुशील पगारिया के मालिकाना हक की हैं, बल्कि शुरू से ही उनके कब्जे में भी है, और उनसे गजराज पगारिया का कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने किसी भी बेनामी संपत्ति से अपने किसी भी रिश्ते की बात नकार दी है। 

राजेश कर्मा ने बाद में एक हलफनामा देकर अपने नाम पर बताई गई सारी संपत्ति को अपना कहा और यह कहा कि आयकर विभाग ने उनका जो बयान लिया था उसे वह पूरी तरह समझे बिना दे चुके थे, और इस हलफनामे से वे इस सारी संपत्ति को अपना खरीदा हुआ बता रहे हैं। 

कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ने आयकर विभाग को दिए गए हलफिया बयान में कहा कि वे चुनाव आयोग के समक्ष अपनी सारी संपत्ति का हलफनामा 2018 में दे चुके हैं, और उसके अलावा उनके पास कोई भी और चल-अचल संपत्ति नहीं है। लखेश्वर बघेल ने सुशील पगारिया के हलफनामे की बातों को गलत कहा है, और कहा है कि उन्होंने उनके और पत्नी के नाम की सारी जमीनों को अपनी पारिवारिक कमाई से खरीदा है। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि पगारिया परिवार के बंटवारे में उनकी संपत्तियों को दिखाना कोई साजिश है, और वे उसके खिलाफ अलग से मुकदमा करेंगे। 

फिलहाल विभाग ने लखेश्वर बघेल, उनकी पत्नी स्व. भगवती बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर खरीदी गई ऐसी सारी संपत्ति जिसका जिक्र पगारिया परिवार के बंटवारे में सुशील पगारिया को देने का किया गया है, उसे अटैच कर लिया है। 

सुशील पगारिया का कहना है कि...
आयकर विभाग की इस कार्रवाई के बारे में पूछने पर सुशील पगारिया ने इस अखबार ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि जब वे जेल में बंद थे, और कैंसर से बुरी तरह पीडि़त थे, मुंबई में उनका कैंसर का इलाज चल रहा था, तब उन्हें अचानक अदालत बुलाकर संपत्ति का बंटवारा दस्तखत करवाया गया था। ये कागज उन्होंने पहले नहीं देखे थे इसलिए उनको इसमें आदिवासी जमीन उनके हिस्से में डाल देने की जानकारी भी नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे पिछले कई बरस से कैंसर के शिकार हैं, और दुबारा इलाज के लिए जब उन्हें यहां से डॉक्टर मुंबई भेज रहे थे, तब उनके बड़े भाई गजराज पगारिया और उनकी मां ने इलाज के लिए भी उनकी जमानत का विरोध किया था और हाईकोर्ट तक में अपने वकील खड़े किए थे। अब जब अदालत से बंटवारा हो गया है, तो भी गजराज पगारिया किसी संपत्ति के कोई कागज उन्हें नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने तमाम बातें सच-सच आयकर विभाग को शपथपत्र पर बता दी हैं, और हर सवाल का जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे में बेनामी आदिवासी जमीनों को बड़े भाई और मां ने उनके (सुशील पगारिया के) हिस्से में डाल दिया है, और यह बात पता लगते ही उन्होंने खुद ही इसे आयकर को बताया है, और हाईकोर्ट में भी इसके खिलाफ शिकायत की है कि अदालती बंटवारे में ऐसा किया गया है। उन्होंने कहा कि जिस अदालत में बंटवारा हुआ, उसे भी गजराज पगारिया ने अंधेरे में रखा और वहां सच को छुपाया।


Date : 08-May-2019

अतुल पुरोहित

भोपाल, 8 मई (छत्तीसगढ़)। देश में चार चरणों के मतदान के बाद भोपाल संसदीय सीट देश की सबसे चर्चित सीट में से एक है। भारतीय जनता पार्टी का फोकस अब इसी सीट पर ज्यादा है। यही वजह है कि संघ की आंतरिक रिपोर्ट के बाद भाजपा ने बड़े नेताओं को भोपाल संसदीय क्षेत्र में उतार दिया है। जो गली-गली जाकर चुनाव प्रचार में जुटे हैं। हाल ही में संघ और भाजपा नेताओं की बैठक के बाद गुजरात के प्रभारी ओम माथुर को भोपाल चुनाव की कमान सौंपी गई है। जबकि यहां प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे पहले से चुनाव में जुटे हैं। 

मप्र में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भाजपा के इकमात्र ऐसे नेता हैं, जो अभी तक 150 से ज्यादा सभाएं कर चुके हैं। संघ के दखल के बाद तय हुआ कि शिवराज दिन में दूसरी संसदीय क्षेत्रों में प्रचार करेें, जबकि शाम को प्रज्ञा के समर्थन में भोपाल में सभाएं कर रहे हैं। प्रदेश में पहले एवं दूसरे चरण की 13 सीटों पर मतदान हो चुका है। अब से इन क्षेत्रों में काम कर रहे भाजपा नेता भी भोपाल में समय देंगे।

भाजपा के मोर्चें अभी तक दूसरे संसदीय क्षेत्रों में काम कर रहे थे, लेकिन आज से भाजयुमो, महिला मोर्चा, अल्पसंख्यक मोर्चा, अजा-अजजा मोर्चा, पिछड़ा वर्ग मोर्चा भी सक्रिय रूप से चुनाव प्रचार में जुट रहे हैं। 

भोपाल से प्रज्ञा भारती का नाम तय होने के बाद भाजपा कार्यकर्ता असंतुष्ट होकर घर बैठ गए। पिछले कुछ दिनों तक भाजपा कार्यकर्ताओं में निष्क्रियता थी, लेकिन राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल और प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे द्वारा ब्लॉक स्तर पर बैठक लेने के बाद स्थानीय विधायक, पदाधिकारियों को मैदान में उतार दिया है। इसके बाद से विधयाक, पार्षद एवं अन्य पदाधिकारी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर घूम रहे हैं। बूथ स्तर पर बैठकों का दौर जारी है। 

आज पार्टी अध्यक्ष अमित शाह खुद यहां साध्वी के पक्ष में प्रचार करने आएंगे। वे यहां एक बड़ा रोड शो भी करेंगे। इस दौरे को खास और वोटर्स तक अपनी सीधी पहुंच बनाने के लिए बीजेपी ने स्पेशल 5 की टीम बनाई है, जो विभिन्न समीकरणों के अनुसार तमाम रणनीतियां निर्धारित करेंगे। ये स्पेशल 5 की टीम राष्ट्रीय उपाध्यक्षों की है, जिसमें प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे, गुजरात प्रभारी ओम प्रकाश माथुर, प्रभात झा, स्टार प्रचारक शिवराज सिंह चौहान और स्टार प्रचारक उमा भारती शामिल हैं, जो भोपाल पर अपने पूरी नजर जमाए हुए हैं। वहीं शाह के रोड शो को सफल बनाने के लिए बीजेपी राष्ट्रीय महासचिव और  प्रभारी अनिल जैन को जिम्मेदारी सौंपी गई हैं। हालांकि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और गुजरात प्रभारी ओम प्रकाश माथुर तो पहले ही भोपाल में डेरा डाल लिया है, वे अब चुनाव होने तक मध्य प्रदेश में रहेंगे। 

 


Date : 07-May-2019

गोरेलाल तिवारी
अनुदान योजना का लाभ राजादेवरी कसडोल विकासखण्ड का वनों से आच्छादित राजादेवरी के 42 गांव तथा अभ्यारण्य क्षेत्र के 15 ग्रामों में छुटपुट हुई रबी फसल धान की हरियाली स्वाभाविक रूप से देश के उन्नत प्रांत पंजाब को याद दिलाती है ।उक्त क्षेत्र की हरियाली जहां भीषण तपन पर ठंडकता आत्मा को तृप्त करती है वहीं पूरे क्षेत्र की हरियाली अच्छी फसल की जगी उम्मीद ने किसानों को प्रफुल्लित कर दिया है। 
कसडोल, 7 मई।  विकास खण्ड के 230 ग्रामों जिसमें नगरपंचायत कसडोल एवम टुंड्रा सहित 110 ग्राम पंचायत शामिल हैं। इसमें राजादेवरी क्षेत्र के 42 गांव तथा अभ्यारण्य क्षेत्र बार कोठारी के करीब 15 गांव में रबी फसल धान की खेती हुई है। क्षेत्र में अनाज की रबी फसल धान ,गेहूं की खेती के अलावा दलहन तिलहन की खेती पर भी किसानों ने ध्यान दिया है। 

कृषि विभाग  के अनुसार कसडोल क्षेत्र में 11हजार एकड़ में धान की खेती के अलावा करीब 3हजार एकड़ से अधिक कृषिभूमि में गेहूं की फसल किसानों ने लिया है । गेहूं के फसल की कटाई मिजाई का काम सम्पन्न हो गया है । कृषि विभाग ने कहा है कि दलहन तिलहन की भी करीब 1500 एकड़ में खेती होने का अनुमान है । इसमें मैदानी क्षेत्रों के ग्राम मोहतरा चरौता छेछर ,भडरा,सिनोधा ,कोसमसरा सेमरिया मालिडीह नवापारा नारायणपुर खैरा, बरबसपुर आंवराई अर्जुनी आदि करीब 50 ग्रामों में भी छुटपुट दलहन तिलहन के अलावा गेहूं धान की खेती हुई है । एक अनुमान के अनुसार मैदानी क्षेत्रों के ग्रामों जिसमें टुंड्रा इलाके के कुछ ग्राम भी शामिल है एक हजार से अधिक कृषि भूमि में धान की खेती हुई है ।

धान की हरियाली 
कृषि विकास खण्ड कार्यालय से मिंली जानकारी के अनुसार कसडोल विकास खण्ड क्षेत्र के राजा देवरी 42 गांव तथा बार कोठारी अभ्यारण्य क्षेत्र के बार ,चरौदा,मुड़पार ,पांडादाह ,दोन्द ,लाटा दादर ,मोहदा, ढेबी, ढेबा, लोरिद खार ,अकलतरा देवगांव गबोद आदि करीब 15 ग्रामों में भी रबी फसल धान की खेती किया गया है । उक्त ग्रामों सहित राजादेवरी क्षेत्र के 42 गांव में कई गई सर्वेक्षण किसानों से की गई जानकारी तथा कृषि विभाग ने 10 हजार एकड़ से अधिक कृषि भूमि में रबी फसल धान की खेती हुई है । 

पूरा राजा देवरी क्षेत्र की मनमोहक हरियाली तपती धूप में ठंडक हवा शुकुन देने लगती है । राजदेवरी 42 गांव जोंक नदी के बीचों बीच दो भागों में बंटी हुई है । जिसके पूर्वी जोंक के अंतर्गत थरगांव कुशगढ़ ,कुशभांठा ,बरपानी, सोनपुर नगरदा नगेड़ी ,नगेड़ा,छाता बिलारी ,कुरमाझर आदि पंचायतों सहित 20 गांव करीब आते हैं । इसी तरह पश्चिमी जोंक के अंर्तगत चांदन देवरी, देवगांव, बाघमाडा, देवरूनग छतवन रिकोकला अमरूवा दुमरपाली रंगोरा चेचरापाली ,बया कोसम सरा, धमलपुरा,कोरकोटी पंचायत सहित 22 गांव आते हैं । हालात का जायजा लेने पर उन्नत कृषक विजय बरिहा ,इंद्रजीत पटेल ग्राम देवगांव ,मुन्नालाल नायक ,घूरऊठाकुर चान्दन, प्रदीप नायक सुखरी ,दरसराम नेताम छतवन ,भोजराम यादव ,उमाशंकर यादव ,बादल प्रधान ,लक्ष्मण पटेल ग्राम रंगोरा ,सन्तोष पटेल लक्षमी लाल नायक चेचरापाली नें बताया है कि रबी फसल धान अच्छी पैदावार होने की उम्मीद जगी है।

 दलहन तिलहन खेती बोर से
 राजा देवरी क्षेत्र का 42 गांव तथा बार,कोठारी वनक्षेत्र के 15-20 ग्रामों में निजी बोर भूमि गत जल स्रोत के माध्यम से ही ब्यापक स्तर पर रबी फसल धान,गेहूं,दलहन तिलहन की खेती होते आ रही है । हरेभरे जंगलों ,पहाड़ों की वादियों से घिरे इस क्षेत्र में जोंक नदी ,कन तरा नाला सहित छोटे बड़े नदी नालों का प्रचुर जल स्रोत है । यही वजह है कि खरीफ फसल धान को अंतिम पानी की जरूरत पड़ती है तो किसान बोर की सिंचाई से पूरा करते हैं पिछले 3 दशक से जहां प्रारम्भ में मध्यम वर्गीय कृषक ही बोर उत्खनन कराकर रबी फसल लेते थे ।किंतु प्रदेश और केंद्र सरकार की कृषि उन्नत कृषि अनुदान योजना का लाभ सीमांत और लघु कृषक भी पिछले 3 दशक से लेने लगे हैं। राजादेवरी क्षेत्र में विद्युतीकरण का जाल बिछा हुआ है । यही वजह है कि लगातार बोर की संख्या में इजाफा हो रहा है। क्षेत्र के किसानों  के अनुसार करीब 3500 बोर कनेक्शन खेतों में होने का अनुमान है। इसी तरह वन क्षेत्र जहां अभ्यारण्य बार कोठारी परिक्षेत्र के ग्रामों में सौर ऊर्जा बोर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। जिसकी संख्या लगातार बढ़ रही है।

रबी फसल का आकर्षण बढ़ा 
कसडोल विकासखण्ड कृषि विकास अधिकारी नें समय से पूर्व वांच्छित धान गेहूं दलहन तिलहन बीजों को उपलब्ध कराया गया है जिसके कारण ब्यापक स्तर पर रबी फसल की खेती संम्भव हुई है। इसी तरह जिला सहकारी बैंक शाखा कसडोल एवम टुंड्रा के अंतर्गत 14 कृषि साख समितियों के गोदामों में खाद की व्यवस्था की गई थी। पूरे क्षेत्र की धान फसल में हरियाली छाई हुई है। इस साल दिसंबर  में मौसम की बेरुखी की वजह से जमीन गीली रहने के कारण धान बोनी का काम जनवरी तक 70 प्रतिशत ही हो पाई थी। शेष 15 फरवरी तक पूरा कर लिया गया है। धान में ज्यादातर दूध भराई तथा धान की बालियां निकलनी शुरू हो रही है । किसानों का कहना है कि अधिकतर जल्द पकने वाली अर्ली व्हेराईटी का धान ज्यादा बुवाई किया गया है । फसल में बीमारी से निजात मिंली है , किंतु लो वोल्टेज एवम बिजली घण्टों तक बंद रहने की समस्या से किसान चिंतित हैं । राजदेवरी क्षेत्र तथा अभ्यारण्य क्षेत्र में यदि जल स्रोत को एनीकटों के माध्यम से संरक्षण मिल जाय तो रबी फसल की खेती में बेतहाशा वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। 

 

 


Date : 30-Apr-2019

1 मई मजदूर दिवस 

चंद्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 30 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
कोरिया जिले के दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की लंबित मजदूरी नहीं मिल रही है। कई मजदूरों के खाते होल्ड पर हंै, जिसके कारण उनकी बेटियों की शादी नहीं हो पा रही है। डीएमएफ और मनरेगा के तहत हुए कार्यों का भुगतान एक साल से लंबित है। कई मनरेगा मजदूरों को साल भर से  काम  नहीं मिला है।

मजदूरों के खाते पर होल्ड के संबंध में लीड बैक मैनेजर श्री नायक कहते हंै कि केवायसी नहीं होने के कारण खाते पर आटोमैटिक होल्ड लग चुका है, ऐसे में खाता धारक को स्वयं बैंक जाना होगा, तभी होल्ड हटेगा, कुछ लोगों का होल्ड हटा है।  वहीं मर्सरा में मजदूरी के संबंध में सप्लायर संदीप जायसवाल का कहना है कि मर्सरा का काम डीएमएफ मद से करवाया जा रहा है। उक्त कार्य के भुगतान का बिल बीते एक साल से  लंबित है। यह सही है कि ग्रामीणों की मजदूरी मनरेगा  भुगतान नहीं होने के कारण फंसी हुई है। 

इस संबंध में  छग प्रदेश आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री डॉ विनय शंकर सिंह का कहना है कि गांव गांव में होल्ड खातों को लेकर जन जागरण चलाया जाएगा। पूर्व सरकार की कार्यप्रणाली में कई खामियां थी अब मजदूरों के हितों का ध्यान रखते हुए उनकी समस्याओं के निदान की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। वहीं भाजपा के जिला महामंत्री देवेन्द्र तिवारी का कहना है कि मनरेगा का भुगतान काफी दिनों से लंबित है, इसके लिए प्रशासनिक प्रयास के साथ कांग्रेस की सरकार को भी मामले में संजीदगी दिखाने की जरूरत है। इस दिशा में वे भी सार्थक पहल करेंगे।

जानकारी के अनुसार कोरिया जिले में मजदूरों के खाते  होल्ड पर हंै, उन्हें बैंक  जाना होगा ये कोई उन्हें बताने वाला नहीं है।  मनरेगा की मजदूरी सालों से लटकी है, डीएमएफ के तहत कराए गए कार्यो की मजदूरी भी एक साल से अटकी हुई है। डीएमएफ और मनरेगा के तहत कराए कार्यो में  कुछ ठेकेदारों का सामग्री भुगतान तो कर दिया गया है, परन्तु मनरेगा का भुगतान नहीं हो पा रहा है।

इधर, ग्राम पंचायतों में रोजगार सहायकों के आगे प्रशासन बेबस है। ग्राम नेरूआ के कई मजदूरों को काम इसलिए नहीं मिला क्योकि उन्होंने रोजगार सहायक से काम करने की डिमांड की। अब अफसरों से इसकी कई शिकायत के बाद भी रोजगार सहायक को  हटाया नहीं गया है। यही हाल ग्राम कोरमो, बडगांवखुर्द, बरौता, सहित ज्यादातर भरतपुर तहसील के कई ग्राम पंचायत ऐसे है जहां मजदूरों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। चूंकि रोजगार सहायक ही मनरेगा में मजदूरों के काम की डिमांड भेजते है, ऐसे में हर ग्राम पंचातय में उनके चहेतों मजदूरों को  डिमांड भेजकर उन्हें ही काम पर रखते हैं।

बेटियों की शादियां रुकीं
इन दिनों विवाह  का सीजन है।  जिले के भरतपुर तहसील के दर्जनों ग्राम पंचायत के मजदूरों के खाते  बीते एक साल से होल्ड पर हैं जिसके कारण वे  आर्थिक तंगी से गुजर रहे हंै।  बेटियों की शादी रुक गई है। ग्राम पंचायत खमरौद निवासी रामकली अपनी बेटी प्रेमवती का विवाह नहीं कर पा रही है, बीते 2 वर्ष से उसका खाता  होल्ड पर है।   खाते में पैसा होते हुए भी  वह मजबूर है। ग्राम गिधेर के परशुराम मोहरनिया की बेटी का विवाह भी इसी कारण से रूका हुआ है। ग्राम नेरूआ के दया सिंह नाहर और ग्राम बरौता की गीता पति भनि की बेटी का विवाह भी इसी कारण रूका हुआ है। इसके अलावा, उदयभान, सुरजपाल सिंह, धरमू, श्यामवती, इतवरिया, लक्ष्मनिया, माहबली सहित भरतपुर तहसील के लगभग हर ग्राम पंचायत की यही कहानी है। 

अब मजदूरी के लिए परेशान
विकासखंड भरतपुर के ग्राम पंचायत मर्सरा ग्रामीण आत्माराम, ठाकुर प्रसाद यादव, कैलाश, शंकर, छोटेलाल, राममन यादव, माया देवी, गोपीचंद्र, राकेश, भोली, सुनील, भारती, लगनधारी यादव, लक्ष्मीनारायण ने बताया कि उनकी मांग पर 40 लाख रू कच्ची डेम का साईड रिटर्निंगवाल, आरसीसी नाली, पाईप लाईन एवं वेस्ट वियर निर्माण का कार्य स्वीकृत किया गया था। इस कार्य के लिए ग्रामीण यांत्रिकी सेवा को निर्माण एजेंसी नियुक्त किया गया था। जिसके द्वारा फरवरी 2018 में कार्य प्रारंभ किया गया। जिसमें उक्त ग्रामीण मजदूरों ने कार्य किया इसके साथ ही ट्रैक्टर भी काम पर लगाये गये थे। ठेकेदार द्वारा 10-15 लाख रूपये का कार्य कराने के बाद डीएमएफ की राशि नहीं मिलने के कारण कार्य को बंद कर दिया। ऐसे में बीते 1 साल से ज्यादा समय से कार्य में लगे सभी मजदूरों को उनकी बकाया मजदूरी के साथ ट्रैक्टर का भाड़ा भी नहीं मिला है। 

जंगल गिट्टी पीओआर ग्रामीणों ने भरा 
ग्राम पंचायत मर्सरा में कच्ची डेम पर अधूरे निर्माण में जिस गिट्टी का उपयोग किया गया, गिट्टी तोडऩे  में लगी मजदूर गुलबसिया, बिग्गी बाई, श्यामवती बताती है उन्होंने गिट्टी तोडक़र 50 चट्टा निर्माण कार्य मेंं दिया, जबकि जंगल में गिट्टी तोड़वाने के लिए गांव के चंद्रा यादव, शंकर यादवा और जय प्रकाश के नाम पर वन विभाग ने पीओआर काटा और उन्होंने विभाग को 10 हजार रू दंड भी दिया, परन्तु उनकी मजदूरी अब तक नहीं मिली है।

बांद का काम रुका
वर्ष 1985 में मर्सरा गांव के रामदास और चतुरगुन यादव ने नाले के पानी को रोका और डीजल पंप के सहारे गेहूं की फसल उगाने लगे। वर्ष 1996 में ग्रामीण आगे आए और इस बांध को बड़ा रूप दिया, तब ग्रामीणों ने खुद से पहले 60 हजार और फिर 40 हजार चंदा कर बांध की मरम्मत की। वर्ष 2012-13 में तत्कालीन डीएफओ के मेचियो ने ग्रामीणों की हौसला अफजाई की और उन्हें नहर बनाने में सरकारी मदद की। उसके बाद आई बारिश में बांध फूट गया, तत्कालीन कलेक्टर ने बांध की मरम्मत के लिए 20 लाख रू दिए, और बांध की पिचिंग के लिए ढाई लाख रू भी मिले। आज भी  मजदूर रामदास और चतुरगुन कहतेे हैं  कि  हमारी मांग पर कलेक्टर ने 40 लाख रू दे दिए, परन्तु अब हम सब मजदूरी को लेकर परेशान है और काम भी बंद  है।

 

 


Date : 29-Apr-2019

ईओडब्ल्यू की जांच में तेजी

रायपुर, 29 अप्रैल (छत्तीसगढ़)। ईओडब्ल्यू ने ई-टेंडरिंग घोटाले की पड़ताल तेज कर दी है। साइबर एक्सपर्ट की मदद से ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल के सभी डाटा निकाल लिए गए हैं।  इसके बाद अब संबंधित विभाग के अफसरों से पूछताछ शुरू हो रही है। ईओडब्ल्यू ने इस सिलसिले में चिप्स के अफसरों को पूछताछ के लिए बुलाया है। 

ईओडब्ल्यू के एसपी इंदिरा कल्याण एलेसेला ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि साइबर एक्सपर्ट की मदद से सारे डाटा निकाल लिए गए हैं। इसका मिलान हो रहा है और संबंधित विभाग के अफसरों से पूछताछ भी की जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि चिप्स के अफसरों को पूछताछ के लिए बुलाया गया है। साथ ही साथ बिलासपुर निगम और एक अन्य विभाग के अफसरों से भी पूछताछ की जाएगी। 

कहा जा रहा है कि ई-टेंडरिंग घोटाले करने के लिए बनाए गए फर्जी इमेल आइडी और आइपी नंबरों को साइबर एक्सपर्ट ने रिकवर कर लिया है। जांच के दौरान उन कम्प्यूटरों को भी चिन्हाकित कर लिया गया है, जिसके जरिए निविदा जारी की गई थी लेकिन, साफ्टवेयर के माध्यम से इसे निकाल लिया गया है।

बताया गया कि साईबर एक्सपर्ट की मदद से ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल के डाटा निकाल लिए गए हैं। गौरतलब है कि 17 विभागों के अधिकारियों द्वारा 4601 करोड़ के टेंडर में 74 ऐसे कम्प्यूटर का इस्तेमाल निविदा अपलोड करने के लिए किया गया था। उसी कंम्प्यूटर से निविदा की सारी औपचारिकता भी पूरी की गई थी। कैग की रिपोर्ट के अनुसार 10 से 20 लाख के 108 करोड़ रुपए के टेंडर मैन्युअली जारी किए गए थे। जिन 74 कंप्यूटरों से टेंडर निकाले गए उसी से टेंडर वापस भरे भी गए। ऐसा 1921 निविदाओं में किया गया था।
यह भी कहा गया कि नवंबर 2015 से मार्च 2017 के बीच 74 कम्प्यूटर के जरीए 1459 निविदा जारी की गई थी। चर्चा है कि चिप्स के दफ्तर से फर्जी ई-मेल एड्रेस बनाए गए थे। इसे उपयोग करने के बाद कम्प्यूटर से मिटा दिया गया था। इसकी भी पड़ताल हो रही है। संबंधित विभागों से पूछताछ और जानकारी लेने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। 


Date : 28-Apr-2019

कई बार हो चुकी है शिकायत, कार्रवाई शून्य

रामानुजगंज, 28 अप्रैल। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत रामचंद्रपुर विकासखंड में 22 करोड़ 85 लाख 85 हजार रुपए खर्च कर 24 हजार 792 शौचालय बनाए गए हैं।जिले के विकासखंड को गत 29 सितंबर 2017 को ओडीएफ घोषित किया गया है परंतु जमीनी हकीकत इससे परे है। विकासखंड के 82 ग्राम पंचायतों में ऐसा कोई ग्राम पंचायत नहीं है जो खुले में शौचमुक्त हो। अभी भी हजारों शौचालय अपूर्ण है वहीं बने शौचालयों के अधिकांश दरवाजे टूट गए। वहीं कईयों के छप्पर भी उजड़ गए हैं।स्थिति ऐसी है कि शौचालयों के लिए बने ढक्कन आज भी गांव गांव में सैकड़ों की संख्या में जहां तहां पड़े हुए हैं जो ओडीएफ घोषित होने के डेढ़ वर्ष बाद भी नहीं लग पाए है। रामचंद्रपुर विकासखंड में शौचालय निर्माण में बरती गई अनियमितता एवं फर्जीवाड़े की शिकायत कई बार उच्च अधिकारियों एवं मुख्यमंत्री तक की गई  है।                                     
गौरतलब है कि रामचंद्रपुर विकासखंड के 82 ग्राम पंचायतों में स्वच्छ भारत मिशन अंतर्गत शौचालय का निर्माण कराया गया जिसमें 12 ग्राम पंचायतों में 12 हजार प्रति शौचालय राशि भुगतान की गई।ग्राम पंचायत विजयनगर,चेरा, सुंदरपुर,जामवंतपुर, कमलपुर, मेघुली,सलवाही,मरमा,डिंडो,बगरा है। विकासखंड के करीब-करीब सभी ग्राम पंचायतों में प्रशासन के दबाव में तो ओडीएफ घोषित कर दिया गया परंतु स्थिति यह है कि कोई भी ऐसा ग्राम पंचायत नहीं है जो पूर्णत: खुले में शौच मुक्त हो। ओडीएफ ग्राम पंचायत के नाम से पूरे विकासखंड में शासकीय रुपयों का बंदरबांट किए जाने का आरोप ग्रामीणों ने लगाया है। हजारों ऐसे हितग्राही हैं जिनके नाम से तो शौचालय कागजों में पूर्ण कर लिया गया परंतु आज भी उनके शौचालय पूर्ण नहीं हो पाए हैं। विकासखंड का ऐसा कोई भी गांव नहीं होगा जहां से शौचालयों में हुए अनियमितता की शिकायत उच्च अधिकारियों से नहीं की गई हो परंतु आज तक किसी भी ग्राम पंचायत में इसकी जांच नहीं हो पाई है।                            
भूपेश बघेल ने जांच कराने की कही थी बात 
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल विधानसभा चुनाव के पूर्व रामानुजगंज के लरंग साय कम्युनिटी हॉल में कांग्रेस के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे तब इनके सामने कई ग्राम पंचायतों के लोगों द्वारा शौचालयों में हुए अनियमितता की शिकायत की थी। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने पर शौचालयों में हुई गड़बड़ी की जांच की बात मंच से भूपेश बघेल द्वारा कही गई थी।                                                                  
टीएस सिंह देव ने भी कहा था जांच कराएंगे- पंचायत मंत्री टीएस सिंह देव भी विधानसभा चुनाव के पूर्व ग्राम पंचायत महावीरगंज में कांग्रेसी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे तब उनके सामने भी शौचालय निर्माण में हुए अनियमितता की शिकायत हुई थी तो उन्होंने कहा था कि यदि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनती है तो हम इसकी जांच अवश्य कराएंगे।                         

 जांच ठंडे बस्ते में डाला
रामचंद्रपुर विकासखंड में शौचालय निर्माण के नाम पर हुए फर्जीवाड़े की शिकायत के बाद जनपद सीईओ द्वारा जांच कमेटी गठित की गई थी परंतु उक्त जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।                                       

 मनरेगा पीओ ने दिया इस्तीफा 
स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत हुए शौचालय निर्माण में बड़ी फर्जीवाड़े के उच्च स्तरीय जांच की सुगबुगाहट के बीच तत्कालिक मनरेगा पीओ द्वारा व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया गया है। विकासखंड में अभी भी हजारों शौचालय अपूर्ण हैं उन्हें कब पूर्ण किया जाएगा यह भी एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।


Date : 26-Apr-2019

न पेंशन, न शौचालय, न सिलेंडर, न आवास, न रोजगार, न बिजली 
62 में 50 परिवार के पास राशनकार्ड नहीं, वनोपज से राशन

अमन सिंह भदौरिया 
दोरनापाल, 26 अप्रैल (छत्तीसगढ़)। सुकमा जिले में बेरोजगारी व पलायन की समस्या से सबसे ज्यादा जूझ से कोंटा ब्लॉक में कल जिस बिरला पंचायत के मरईगुड़ा राजस्व में समाजसेवियों के प्रयास से 25 आदिवासी परिवार 15 साल बाद अपने गृह ग्राम लौटे।  जिस गांव को इस परिवार ने 15 साल पहले छोड़ शांति का जीवन जीने तेलंगाना में बसेरा किया उस गांव की पड़ताल में उस वक्त छत्तीसगढ़ की टीम भी पहुंची। ये गांव एर्राबोर से 8 किमी अंदर है  यहां पहंचने के लिए  कच्चे रास्ते हैं । गांव में पहुंचते ही छत्तीसगढ़ ने गांव में एक चौपाल लगाई जिसमे समस्याओं का अंबार निकला।

बिरला पंचायत अंतर्गत मरईगुड़ा राजस्व के मुखिया सोढ़ी जोगा बताते है कि गांव में लगभग 62 परिवार है जिसमे लगभग 200 सदस्य हैं और इनमें केवल 12 परिवार के पास राशनकार्ड है 50 परिवार सालों से पीडीएस योजना से वंचित है 50 बच्चे जिनमें 1 कुपोषित है । गांव में पक्का स्कूल भवन नही 2006 में नक्सलियों ने तोड़ दिया था जिसके बाद ग्रामीणों ने मिलकर झोपड़ी का स्कूल बनाया जिसमे 8 बच्चे अध्ययनरत है शेष 42 बच्चे बाहर आश्रम पोटाकेबिन में पढ़ रहे हैं । शिक्षक भी यहां सप्ताह में केवल 2 दिन स्कूल पहुंचते हैं। गांव में 40 वृद्धा व विधवा हैं मगर अब तक एक को भी पेंशन नही मिल रहा। बिजली नहीं तो अंधेरे में रात गुजारना पड़ता है कि मड़कम सोमा ने बताया कि सुजला योजना के तहत साल भर पहले गांव में लगभग 50 सोलर के सेट लगाए गए थे पर वो कुछ महीने में ही खराब हो गए फिर इसे देखने तक कोई नहीं आया।
रोजगार नहीं
आम तौर पर बेरोजगारी पूरे भारत की समस्या है मगर नक्सलप्रभावित जिले के तौर पर जाना जाने वाले सुकमा में आदिवासियों के पास रोजगार के अवसरों की कमी यहां की प्रमुख समस्या है । क्योंकि अशिक्षित वर्ग केवल वनोपज और खेतीबाड़ी पर निर्भर है । ऐसे में जीवनशैली में सुधार और पेट पालने खाली समय ज्यादातर आदिवासी तेलंगाना में मिर्ची तोडऩे मजदूरी करने जाते हैं । जोगा ने बताया कि हम मनरेगा के तहत भी काम करना चाहते हैं अगर प्रशासन अवसर दे तो कई परिवार को पलायन से रोका जा सकता है। काम न मिलने से ही हमे बाहर राज्यों में जाना पड़ता है । वनोपज से गुजारा होना मुश्किल है। ग्रामीणों ने छत्तीसगढ़   के माध्यम से केंद्र व राज्य सरकार से ये अपील की है कि उनके लिए रोजगार के अवसर दिए जाएं इसमे आने वाली कमियों को दूर किया जाए तो पलायन को रोका जा सकता है।
 राशन कार्ड न आधार कार्ड
ग्रामीणों से जब  मूलभूत योजनाओं के लाभ के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि गांव में 62 परिवार है जिनमें केवल 12 परिवार ही राशन की योजना का लाभ ले रहा है । क्योंकि बाकी परिवारों के पास सालों से राशनकार्ड नहीं है। मुखिया जोगा ने बताया कि 3 साल पहले सभी के पास राशनकार्ड थे पर सेल्समैन दीपक द्वारा राशन दुकान में ही कार्ड जमा करवा लिया गया था तब से अब तक राशन कार्ड नहीं मिला और जब ग्रामीणों द्वारा सचिव से राशनकार्ड बनवाने को कहा जाता है तो कलेक्ट्रेट जाकर राशन कार्ड बनवा लो ये जवाब मिलता है। 

सोढ़ी जोगा ने बताया उक्त योजना से वंचित परिवार एर्राबोर साप्ताहिक बाजार से पीडीएस का सरकारी चांवल गल्ला व्यापारियों से वनोपज के बदले खरीदते हैं । 'छत्तीसगढ़' ने मौजूद सेल्समैन से जब पूछताछ कि तो उसने बताया राशनकार्ड तो बन जाएगा पर ग्रामीणों के पास आधारकार्ड नहीं है । वहीं ग्रामीणों ने ये भी बताया कि कई ऐसे परिवार हैं जिनके पास आधार कार्ड नहीं जब सचिव से गांव में आधारकार्ड  बनाने वाले को बुलवाकर आधारकार्ड बनवाने को कहा जाता है तो जवाब में मिलता हैं कि बहुत काम हो जाता है समय नहीं मिल पाता है।
मूलभूत योजनाओं का लाभ नहीं  
बिरला पंचायत के मरईगुड़ा राजस्व में  कई योजनाओं का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है कोंटा ब्लॉक को ओडीएफ घोषित किया गया है पर इस गांव में एक भी शौंचालय नही ग्रामीण खुले में शौच को मजबूर हैं । पक्के छत का वादा प्रधानमंत्री आवास योजना अब तक इस गांव में नहीं पहुंच पाई सभी कच्चे मकान है केवल फॉर्म भराया गया । सुजला योजना के तहत गांव में अब तक एक भी घरों तक गैस सिलेंडर नही पहुंची महिलाएं लकड़ी से धुंए में खाना पकाती हैं । पेंशन योजना का भी लाभ यहां नही मिल पा रहा है । गांव में 4 हैंडपंप हैं जिसमे से 2 में आयरनयुक्त गन्दा पानी आता है । 2 अन्य में अब तक चबूतरा निर्माण नही हुआ। मनरेगा के तहत काम करना चाहते हैं ग्रामीण । सोलर 6 माह में खराब चिमनी के सहारे रात काट रहे हैं।  स्कूल भवन नही तो झोपड़ी में स्कूल संचालित है।

आंध्र से लौटे ग्रामीण  माड़वी गंगा वर्ष 2006 सलवाजुड़ुम हुआ तो पहले के लोग आंध्र चले गए वहां भी जमीन नही मिला। वापस आकर अच्छा लगा । आंध्र में भी तकलीफ हुई वहां जमीन भी नही मिला आंध्र में मजदूरी करके पेट पाल रहे थे पर वहां अधिकार नही दिया जा रहा है । वापस आकर यहां खेतीबाड़ी करेंगे। रोजगार मिला तो जरूर करेंगे।

मुखिया ,मरईगुड़ा सोढ़ी जोगा का कहना था कि हमारे गांव में मूलभूत समस्याए है बेरोजगारी प्रमुख है। योजनाओं से ग्रामीण वंचित हैं राशन नही मिल पाता । शासन प्रशासन से अपील है कि गांव की समस्या पर गौर कर समस्या को दूर करें रोजगार देवें ताकि पलायन को रोका जा सके हम मनरेगा में भी काम करने को तैयार हैं अवसर मिल जाए।

पेंशन के लिए जो पात्र हैं उनको पेंशन मिलेगा। राशनकार्ड के लिए ग्रामीणों के पास आधारकार्ड नही है योजना से वंचित परिवार गल्ला व्यापारियों से जो राशन खरीद रहे होंगे वो मरईगुड़ा पंचायत का नही होगा बाकी पीडीएस का चांवल होगा तो वो जानें। सचिव मेरे सामने ही बैठा है  मैं उससे बात करता हूँ क्या मामला है योजनाओं का लाभ ग्रामीणों को उनकी पात्रता के हिसाब से दिया गया है और जिन्हें नहीं मिल रहा उन्हें भी जल्द दिया जाएगा।  
बीएस मंडावी, जनपद सीईओ


Date : 17-Apr-2019

पीएम को जात बताने की जरूरत क्यों पड़ी, वे ही बता सकते हैं
रायपुर, 17 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खुद को चोर बताने के जवाब में जाति कार्ड खेलने पर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। मोदी ने भाटापारा की सभा में यह कहा कि यहां के साहू गुजरात के मोदी हैं। उनकी इस टिप्पणी को साहू वोटरों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री के छोटे भाई प्रहलाद मोदी ने कहा कि नरेन्द्र मोदी को अपनी जाति बताने की जरूरत क्यों पड़ी,  यह वे ही बता सकते हैं। उन्होंने कहा कि हम अपनी जात क्यों छिपाएंगे?

प्रधानमंत्री के छोटे भाई प्रहलाद मोदी पिछले चार दिनों से छत्तीसगढ़ के दौरे पर थे। वे बिलासपुर-कोटा, भाटापारा, महासमुंद और अभनपुर में साहू समाज के पदाधिकारियों से रूबरू हुए। प्रहलाद मोदी के इस दौरे से राजनीतिक क्षेत्रों में हलचल मची हुई है। प्रदेश की लोकसभा की सीटों पर प्रचार जोरों पर है और ऐसे में प्रहलाद मोदी की सक्रियता को प्रदेश के सबसे ज्यादा साहू वोटरों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। 

प्रहलाद मोदी ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि वे समाज के लोगों से मेल-मुलाकात के लिए आते हैं। उनका सिर्फ सामाजिक कार्यक्रम होता है। वे सक्रिय राजनीति में नहीं हंै और उनका किसी दल से कोई लेना-देना नहीं है। प्रधानमंत्री के खुद को साहू बताए जाने की जरूरत पर प्रहलाद मोदी ने कहा कि यह सवाल उनसे ही पूछा जाना चाहिए। जहां तक हमारा सवाल है हम मोदी (तेली) समाज के हैं और हमें अपनी जाति छिपाने की जरूरत नहीं है। 

दरअसल, भाटापारा की सभा में चौकीदार चोर है, के कांग्रेस के नारे पर प्रधानमंत्री ने कहा कि नामदार गालियां दे रहे हैं। सारे मोदी को चोर कहते हैं। यहां बड़ी संख्या में साहू समाज के लोग रहते हैं। गुजरात में होते तो वे मोदी कहलाते।

यह कांग्रेस की भाषा है। 
उनकी इस टिप्पणी से प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। प्रधानमंत्री के खुद को साहू बताए जाने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ट्वीट किया कि गुजरात में चायवाला। यूपी में जाकर गंगा मां का बेटा। छत्तीसगढ़ में आते ही साहू। और अंबानी के यहां जाते ही चौकीदार। साथियों, बहुरुपिए से सावधान रहें! क्योंकि जैसे ही सावधानी हटी, वैसे ही पंचवर्षीय दुर्घटना घटी!! जानकारी और जागरूकता ही बचाव है। जय जोहार जय कर्मा माता!

 

 


Date : 16-Apr-2019

नांदगांव लोकसभा सीट 
प्रदीप मेश्राम
छत्तीसगढ़ संवाददाता
राजनांदगांव, 16 अप्रैल।
राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र में वैसे तो दर्जनभर उम्मीदवार चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं, पर मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन तक कांग्रेस प्रत्याशी भोलाराम साहू और भाजपा प्रत्याशी संतोष पांडे को एक-दूसरे के गृह जिले में अपनी पहचान बनाने में ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा। संतोष पांडे को शुरूआत से ही राजनांदगांव जिले में अपना परिचय बताने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ा। इसी जद्दोजहद से भोलाराम साहू को पांडे के गृह जिले कवर्धा जिले में करना पड़ा। दोनों के बीच यही बात एक समान रही कि एक-दूसरे के गृह जिले में पहचान बताने और बनाने के लिए कई तरह की पेचदगियों से दो-दो हाथ करना पड़ा। 

राजनांदगांव लोकसभा चुनाव प्रचार मंगलवार की शाम थमेगा। यहां 18 तारीख को मतदान होगा। करीब 20 दिन के प्रचार में दोनों दल लोगों के बीच पहुंचाने के लिए जोर लगाते रहे। तकरीबन 300 किमी की लंबाई वाले इस लोकसभा का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रचार से अछूता रहा। आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहां राजनीतिक दलों की पहुंच नहीं हो पाई। कांग्रेस और भाजपा राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में समय के अभाव के चलते प्रचार से दूर रहे। खासतौर पर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की वालपेटिंग और बैनर-पोस्टर नजर नहीं आया है। चुनाव प्रचार में शहरी मतदाताओं ने एक तरह से मोदी के असर से उम्मीदवार संतोष पांडे को समझना शुरू कर दिया है। शहरी मतदाताओं के दिलो-दिमाग में राष्ट्रीय मुद्दे और मोदी के 5 साल के कार्यकाल का आंकलन साफतौर पर दिख रहा है। 

पांडे का शुरूआती प्रचार तंत्र बेहद ही बिखरा रहा, किन्तु बमुश्किल धीरे-धीरे  प्रचार की व्यवस्था को सम्हाला गया। मोदी के बूते भाजपा इस चुनाव में अपनी नैया पार होने की आस में है। उधर कांग्रेस के भोलाराम साहू को सिर्फ प्रदेश के मंत्री मो. अकबर ने ही प्रचार की दिशा में आगे बढ़ाया है। हालांकि कांग्रेस के कई सीनियर नेता घर बैठकर तमाशा भी देख रहे हैं। बताया जा रहा है कि भोलाराम साहू की मेहनत ज्यादा असरकारक नहीं दिख रही है। इसके पीछे भोलाराम साहू का चुनिंदा नेताओं पर भरोसा करना एक बड़ा कारण है। कांग्रेस को इस चुनाव में बोनस और धान के मुद्दों से ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा है, लेकिन राज्य में सरकार होने का स्वभाविक लाभ भोलाराम को मिलता दिख रहा है। यह सीट करीब दो दशक से भाजपा के कब्जे में है। 

कांग्रेस राज्य की कमान सम्हालने के बाद इस सीट पर अपनी जीत की संभावना तलाश रही है। प्रचार के दौरान भाजपा ने मोदी के लिए गए फैसलों को आम लोगों के बीच जमकर उछाला। चुनाव प्रचार में सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राईक को भी प्रचार  के दौरान बताया गया। वहीं कांग्रेस के पास पूरे प्रचार में मुद्दों की कमी रही। कुल मिलाकर कांग्रेस राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा लिए गए फैसलों का पुलिंदा लोगों तक पहुंचाया। राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के आठों विधानसभा में दोनों प्रत्याशी की इक्का-दुक्का बार ही पहुंच पाए। कवर्धा जिले के पंडरिया और कवर्धा विधानसभा में भोलाराम साहू और संतोष पांडे के बीच  थोड़ी खंदक की लड़ाई दिख रही है। जबकि राजनांदगांव के खैरागढ़, डोंगरगढ़, डोंगरगांव, राजनांदगांव, मोहला-मानपुर व खुज्जी विधानसभा में भी कांटे की स्थिति है। राजनांदगांव को 6 सीटों पर शहरी मतदाताओं पर भाजपा को ज्यादा भरोसा है। जबकि ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस अपनी पकड़ को मजबूत समझ रही है। 

गत् लोकसभा में भाजपा ने करीब 2 लाख 35 हजार मतों से बाजी मारी थी। बीते चुनाव की तुलना में यह चुनाव एकतरफा नहीं दिख रहा है। भाजपा के अभिषेक सिंह ने कांग्रेस के कमलेश्वर वर्मा को आसानी से मात देकर जीत हासिल की थी। 5 वर्ष में राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र की सियासी स्थिति बेहद बदल गई है।  ऐसे में कांग्रेस और भाजपा में जीत को लेकर सिर्फ दावे ही दिख रहे हैं।

 


Date : 16-Apr-2019

कांग्रेस चुनाव प्रबंधकों से नाराज हैं कार्यकर्ता
सात लाख से ज्यादा मत पाने वाले को ही विजयश्री
भिलाई नगर, 16 अप्रैल।
दुर्ग लोकसभा हाई प्रोफाइल सीट पर कांग्रेसी एवं भाजपा के उम्मीदवारों के मध्य ही सीधा मुकाबला है। कांग्रेस उम्मीदवार श्रीमती प्रतिमा चंद्राकर को सत्ता का साथ मिल रहा है वहीं भाजपा उम्मीदवार विजय बघेल को सरल एवं स्वच्छ छवि के कारण सीधे कार्यकर्ता सहयोग कर रहे हैं। दो दौर की समाप्ति के बाद भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल प्रचार-प्रसार में भी बढ़त बनाए हुए हैं और उनके पक्ष में राष्ट्रीय नेता द्वारा भी सभा ली गई। 

दुर्ग लोकसभा सीट प्रारंभ में कांग्रेस का गढ़ रहा करती थी, इस गढ़ को भाजपा के नेता स्व. ताराचंद साहू द्वारा ध्वस्त किया गया था। वर्ष 2009 में इसे विजय अभियान को सुश्री सरोज पांडे ने कायम रखा था परंतु 2014 में कांग्रेस नेता ताम्रध्वज साहू ने सुश्री सरोज पांडे को परास्त कर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी को एकमात्र सीट पर विजय दिलाई थी। विधानसभा चुनाव में दुर्ग ग्रामीण विधानसभा से विजयी होने के कारण ताम्रध्वज साहू ने यह सीट खाली कर दी। हालांकि प्रतिमा चंद्राकर को राजनीति के गुण अपने पिता एवं कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले वासुदेव चंद्राकर से मिले लेकिन भाजपा प्रत्याशी से उनकी तुलना करें तो विजय बघेल ने अपना अस्तित्व लगातार संघर्ष करने के बाद जनता के मध्य स्वच्छ एवं सरल छवि बना कर स्थापित किया है। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ते हुए श्री बघेल ने भिलाई चरोदा पालिका के अध्यक्ष पद पर विजय हासिल की थी और इसी सफलता ने उन्हें वर्ष 2009 में भाजपा की सीट से विधानसभा चुनाव में विजयश्री दिलाई। उनके द्वारा वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में परास्त किया गया था। 

दुर्ग लोकसभा सीट में कुल नौ विधानसभा का क्षेत्र शामिल है जिसमें से दुर्ग जिले की छ: विधानसभा सीट पाटन, दुर्ग ग्रामीण, दुर्ग शहर, भिलाई नगर, वैशाली नगर, अहिवारा तथा बेमेतरा जिले की बेमेतरा, साजा एवं नवागढ़ शामिल है। कुल नौ सीटों में वर्तमान में कांग्रेस के आठ विधायक और भाजपा का केवल एक विधायक है। अगर इन नौ सीटों को मिला दिया जाता तो सभी में कांग्रेस को कुल डेढ़ लाख से ज्यादा मतों से विजय मिली थी इसलिए भाजपा को दुर्ग लोकसभा सीट जीतने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। वर्ष 2014 में पूरे प्रदेश में लोकसभा चुनाव का औसतन मत प्रतिशत 59 रहा है। प्रदेश निर्वाचन आयोग द्वारा मतदान के प्रतिशत को लगातार बढ़ाने के लिए हुए प्रयास को देखते हुए प्रथम चरण 2019 में मतदान का प्रतिशत 66 रहा है। दुर्ग सीट पर मतदान का प्रतिशत लगभग 70 होने की संभावना राजनीतिक विशेषज्ञों द्वारा जताई जा रही है। ऐसे में लोकसभा सीट पर विजयी होने के लिए प्रत्याशी को करीब साढ़े सात लाख से अधिक मत हासिल करना होगा। विजय प्रतिशत को हासिल करने प्रतिमा चंद्राकर को पार्टी की ओर से जिले से तीन मंत्री रविन्द्र चौबे, ताम्रध्वज साहू और रूद्र गुरू का साथ मिल रहा है जबकि विजय बघेल की स्पष्ट व सहजता की वजह से स्वमेव कार्यकर्ता उनके प्रचार में जुटे हुए हैं। कार्यकर्ताओं से मिल रहे सहयोग की वजह से दो दौर के चुनाव प्रचार समाप्ति के बाद विजय बघेल ने बढ़त बना ली है। 
शहरी क्षेत्र मेें भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल कांग्रेस प्रत्याशी की तुलना में आगे हैं वहीं ग्रामीण अंचलों में मतदाता मुखर नहीं हो पाया है इसलिए स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है। 

कांग्रेस प्रत्याशी के चुनाव का संचालन प्रदीप चौबे और लक्ष्मण चंद्राकर जो कि वर्षों से मुख्य धारा से बाहर हैं, सम्हाल रहे हैं। जिससे पार्टी का बड़ा वर्ग और जमीनी कार्यकर्ता नाराज है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का स्पष्ट मत है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ही चुनाव प्रबंधन की जवाबदारी देनी थी। दूसरी ओर विजय बघेल के चुनाव संचालन की जवाबदारी महासमुंद के सांसद चंदूलाल साहू को दी गयी है जिनका सीधा संवाद भाजपा संगठन के प्रत्येक कार्यकर्ताओं से है। अच्छे प्रबंधन के आलावा साहू समाज को साधने में भी चंदूलाल की भूमिका महत्वपूर्ण है।   


Date : 16-Apr-2019

चंद्रकांत पारगीर

बैकुंठपुर, 16 अप्रैल (छत्तीसगढ़)। कोरिया जिले के ग्रामीणों  को शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो पा रहा है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल प्रदान करने की सभी कोशिशें नाकामयाब हुई  है।  लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए गॉव व पारा में हैंडपंप खुदवाये गये है। उनमें अभी गर्मी के सीजन में पानी का स्तर कम हो गया और लाल पानी निकल रहा है जो पीने योग्य नहीं है  वे मजबूरी में लाल पानी पीने को मजबूर है। इस संबंध में कलेक्टर विलास संदीपान भोसकर ने कहा कि पेयजल के लिए आचार संहित आड़े नहीं आ सकती है, वे पीएचई विभाग को निर्देशित करेेंगे कि पेयजल की व्यवस्था सुदृढ़ करें।

'छत्तीसगढ़' संवाददाता ने कोरिया जिले के जिलामुख्यालय बैकुंठपुर तहसील के कई ग्रामों को दौरा कर ढोढी और लाल पानी से परेशान ग्रामीण क्षेत्रों की पहचान की है। गॉवों में स्थित कुछ हैंडपंप ऐसे है जिनमें वर्ष भर लाल पानी निकलने की समस्या है। ऐसे पानी को किसी पात्र में कुछ घंटों के लिए रखे देने से बर्तन के तली में गंदगी बैठ जाती है और लगातार ऐसे पानी को रखने के लिए किसी एक बर्तन का उपयोग करते है तो बर्तन भी लाल हो जाता है। कई जगहों पर वर्ष 2011-12 में काफी संख्या में ऐसे हैंडपंपों पर आयरन रिमूवल प्लांट स्थापित किया गया था, परन्तु घटिया होने के कारण बमुश्किल 6 माह में ही बिगड गए, उसके बाद प्रशासन ने उन बिगड़े प्लांट को ठीक करने की कभी कोशिश नहीं की।

वहीं शिकायत के बाद भी समस्या को दूर करने की दिशा में कदम नहीं उठाये गये जिससे कि मजबूर होकर वर्ष भर गंदे पानी पीते है जिससे कि कई तरह की बीमारियॉ होने की आशंका बढ़ जाती है। शुद्ध पेयजल के नाम पर हैंडपंप से अशुद्ध जल का सेवन आदिवासी परिवार कर रहे हैं। बैकुण्ठपुर जनपद क्षेत्र के जिला मुख्यालय से निकट के ही दर्जन भर पंचायतों में हैंडपंप से लाल पानी निकलने की शिकायत है जहां से कई परिवार प्रतिदिन दूषित पानी पी रहे है जो बीमार होने के लिए काफी है। 
जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल की व्यवस्था न होने के कारण आज भी अनेक परिवार ढोढी का पानी पीने को मजबूर हंै।   ढोढी का पानी दिखने में तो साफ दिखाई देता है लेकिन वह पीने योग्य नहीं रहता। बैकुण्ठपुर जनपद क्षेंत्र सहित जिले भर के कई ग्राम पंचायत क्षेत्रों मे अनेक परिवार आज भी ढोढी के पानी के सहारे जीवन गुजार रहे है। ढोढी पर आश्रित होने वाले परिवारों को तब ज्यादा समस्या का सामना करना पडता है जब बरसात शुरू होती है।  

गर्मी की शुरूआत होने के साथ ही जिले के विभिन्न पंचायतों में हैडपंप का जल स्तर नीचे चले जाने के कारण लोगों को पानी नही मिल पा रहा है तथा कई जगहों पर हैंडपंप बिगड़ गये है जिसकी शिकायत के बाद भी समय पर सुधार कार्य नही हो पा रहा है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के पास पर्याप्त मेकेनिक नहीं है जिसके चलते जिस रफ्तार से कार्य होना चाहिए उस हिसाब से नहीं हो रह है। ऐसा नहीं कि सुधार कार्य नहीं हो रहा है विभाग के लोग जुटे हुए है लेकिन कर्मियों की कमी के कारण  सुधार कार्य में देरी हो रही है। वर्तमान में कई पंचायत क्षेत्रों में हैंडपंप का जल स्तर नीचे चला गया है जहॉ अतिरिक्त पाईप लगाने की आवश्कयता है तथा बिगडे हेंडपंपों को जल्द सुधार की आवश्यकता है इसके अभाव में ग्रामीण परिवारों केा ढोढी के पानी दूर से लाना पड रहा है।

इन जगहों के हैंंडपंपों से निकल रहा लालपानी
कही ढोढी पर आश्रित परिवार
ग्राम             पारा            पंचायत        कुल घर        समस्या
बकिरा            उपरपारा         सलबा            22                    लालपानी
सारा              पहटपारा         सारा             28                      लालपानी
सलबा           ठाकुरपारा        सलबा           30 आंबा बच्चे        लालपानी
गदबदी           चकदहियापारा  गदबदी          30                     लालपानी
परचा              उपरपारा             बस्ती            20 आंबा बच्चे        लालपानी 
भण्डारपारा       लोटानपारा          भण्डारपारा       12                     लालपानी
भण्डारपारा       बायडॉड             भण्डारपारा        2                    कुऑ पानी
परचा              महुआपारा       बस्ती            20                    लालपानी
जलयाडॉड        पटेलपारा        सारा               5                    कुऑ पानी
देवानीबांध        पटेलपारा        मनसुख          16                  ढोढी का पानी
गदबदी            पंडोपारा          गदबदी            5                   लालपानी
सारा               मझारपारा        सारा              5                   लालपानी
बकिरा             खालपारा         सलबा            15                  ढोढी का पानी
सलका             स्कूलपारा           सलका             8                   लालपानी
भण्डारपारा        डुमरबहरा          भण्डारपारा         7                  लालपानी
सलका             केनापारा           सलका            15                   लालपानी
परचा               खालपारा           बस्ती              6                    कुऑ का पानी
परचा               खालपारा            बस्ती            14                   लाल पानी
बडगॉव             तुरापारा             बडगॉव           10                   कुऑ का पानी
पतरापाली          स्कूलपारा          बडगॉव           19                    लालपानी
कुरचाडॉड       बोईरपारा          जामपानी         40                   लाल पानी
देवरी             चेरवापारा          मोदीपारा        12                   लाल पानी

स्कूल व आंबा के बच्चे भी पी रहे दूषित पानी 
यह बेहद गंभीर बात है कि छोटे बच्चों को भी शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो पा रहा है। कई पंचायत क्षेत्रों में स्थित आंबनबाड़ी केंद्र व स्कूल परिसर के पास खुदाये गये हैंडपंप से लाल पानी के साथ फ्लोराईड व आयरनयुक्त पानी निकल रहा है।  
पूर्व में कुछ जगहों पर आयरन एवं फलोराईड रिमूवल प्लांट लाखों रूपये खर्च कर लगाये गये थे जो कुछ माह बाद ही बेकार हो गये है। पहले जैसी स्थिति थी लाखों खर्च करने के बाद भी वैसी ही स्थिति बनी हुई है।  


Date : 16-Apr-2019

बसपा की दमदारी से भाजपा उम्मीद से, कांग्रेस में एकजुटता 

गोरेलाल तिवारी
जांजगीर-चांपा/कसडोल, 16 अप्रैल।
अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित जांजगीर-चांपा लोकसभा में वैसे तो कांग्रेस, भाजपा और बसपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है, लेकिन बसपा के वोट भाजपा और कांग्रेस में जीत-हार तय करेंगे। चुनाव प्रचार खत्म होने में पांच दिन बाकी हैं, लेकिन प्रचार सिर्फ नगरीय इलाकों तक ही सीमित है। गांवों में चुनाव प्रचार का शोर-गुल गायब है। 

जांजगीर चांपा संसदीय क्षेत्र में दर्जन भर प्रत्याशी मैदान में हैं। यहां 23 तारीख को मतदान होगा। शहर और ब्लॉक स्तर पर कार्यकर्ताओं की बैठकों का सिलसिला तो चला है किंतु ग्रामीण अंचलों में कांग्रेस, बसपा और भाजपा तीनों पार्टियों की मतदाताओं के सम्पर्क का सिलसिला अथवा सामूहिक प्रचार का सिलसिला सुनियोजित ढंग से शुरू नहीं हुआ है। यहां कांग्रेस से रवि भारद्वाज, भाजपा से पूर्व सांसद गुहाराम अजगले और बसपा से दाऊराम रत्नाकर मुख्य मुकाबले में हैं। 

जांजगीर संसदीय सीट पर हालांकि उक्त तीनों पार्टी जीत का दावा कर रही है किंतु विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जबरदस्त सफलता से पूरे संसदीय क्षेत्रों के सभी 8 विधानसभा में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में सक्रियता ज्यादा दिख रही है। संसदीय क्षेत्र में चुनावी माहौल ठंडा पड़ा हुआ है और ऐसा प्रतीत होता है कि आखिरी समय तक यही स्थिति रहने वाली है ।
बसपा प्रत्याशी दाऊराम रत्नाकर के पक्ष में बसपा सुप्रीमो मायावती और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की सभा हो चुकी है। यहां जांजगीर-चांपा, अकलतरा में भाजपा और चंद्रपुर, कसडोल, बिलाईगढ़ व सक्ति में कांग्रेस के विधायक हैं। जबकि  पामगढ़ और जैजैपुर में बसपा के विधायक हैं। बसपा यहां सभी सीटों पर प्रभाव है। बसपा के संस्थापक स्व. कांशीराम पहला चुनाव जांजगीर-चांपा सीट से लड़े थे। यहां बसपा उम्मीदवार को एक लाख के आसपास वोट मिलते रहे हैं। इस बार बसपा उम्मीदवार दाऊराम रत्नाकर ज्यादा वोट पाने की कोशिश कर रहे हैं। 

उनका कई इलाकों में अच्छा प्रभाव भी है। कांग्रेस प्रत्याशी रवि भारद्वाज क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे हैं। उनके पिता परसराम भारद्वाज अविभाजित मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे  हैं और पांच बार सांसद रह चुके हैं।  उनके समर्थक तकरीबन हर गांव में हैं। और इसका फायदा रवि को मिल रहा है। पूर्व विधायक महंत रामसुंदर दास ने चर्चा में बताया कि सभी 8 विधान सभा क्षेत्र में प्रत्याशी का पदाधिकारियों के साथ प्रारम्भिक जनसम्पर्क हो गया है। बताया गया कि किसान ऋण मुक्ति तथा 25 सौ रुपये धान का भाव दिए जाने से कांग्रेस के प्रति जनता का रुझान बढ़ा है। जो निश्चित ही जीत के रूप में परिणाम सामने आएगा ।कांग्रेस के लाल लक्ष्मण सिंह भटगांव, मनबोधी देवांगन टुंड्रा, योगेंद्र विमल देवांगन कटगी, मनीष मिश्रा अशोक यादव ,गणेश जायसवाल पलारी का भी कहना है कि ग्रामीण अंचलों में कार्यकर्ताओं का सम्पर्क शुरू हो गया है ।

पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा ,जनता कांग्रेस के तालमेल से अस्त व्यस्त हो गया है। कसडोल बसपा की सीट पर अंतिम समय में जनता कांग्रेस से परमेश्वर यदु को भी खड़ा कर दिया गया। जिसके कारण पूरा समीकरण ही बिगड़ गया। इसी तरह अकलतरा विधानसभा में बसपा का मजबूत गढ़ बना हुआ था। जहां बसपा के चिन्ह पर ऋचा जोगी को खड़ा कर दिया गया । जिसका अंजाम यह हुआ कि उक्त सीट भाजपा की झोली में चली गई। यही वजह है कि बसपा प्रत्याशी दाऊ राम रत्नाकर को नाराज पदाधिकारियों कार्यकर्ताओं को संगठित करनें में दिक्कत हुई है। बसपा जमीनी कार्यकर्ताओं से सराबोर है ,जो उत्साहित तथा जुझारू टीम है । किंतु परेशानी यह है कि जनता कांग्रेस जोगी के काफी संख्या में थोक के भाव में कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। बसपा नेताओं का कहना है कि यदि जोगी कांग्रेस के लोग तथा स्वयं अजीत जोगी खुद सक्रिय हो जाए तो परिणाम पक्ष में आ सकता है। पर श्री जोगी ने सिर्फ मायावती के साथ ही मंच साझा किया। इसके बाद से प्रचार से दूर हैं। 

दूसरी तरफ, दो बार की सांसद कमला पाटले की टिकट कटने से उनके समर्थकों में नाराजगी है। जिसमें हेलीकॉप्टर प्रत्याशी पूर्व के सांसद गुहाराम अजगले को घोषित किया गया। इसको लेकर पार्टी का एक खेमा अभी भी नाराज है। यहां चुनाव संचालन की जिम्मेदारी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल संभाल रहे हैं। ऐसे में भाजपा को बसपा व कांग्रेस के बीच की लड़ाई में फायदें की उम्मीद है। अजा वोट कांग्रेस का परम्परागत वोट रहा है, लेकिन पिछले सालों से बसपा ने इसमें पकड़ बनाई है और यही वजह है कि अजा वोटरों के छिटकने से कांग्रेस लगातार हारती चली गई। पर इस बार भाजपा में बहुत ज्यादा उत्साह नहीं होने से कांग्रेस को फायदा दिख रहा है। हालांकि गावों में भी मोदी फैक्टर दिख रहा है। इससे भाजपा को नैय्या पार होने की उम्मीद दिख रही है। बहरहाल, तीनों दलों के बीच नजदीकी मुकाबले के चलते हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान है। 


Date : 15-Apr-2019

कल थमेगा चुनावी शोर
उत्तरा विदानी
महासमुंद/रायपुर, 15 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
महासमुंद लोकसभा में प्रचार खत्म होने में 24 घंटे बाकी रह गए हैं। ऐसे में दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है। दोनों ही दल के प्रत्याशी पहली बार चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस को राज्य सरकार किसान हित में लिए गए फैसले से फायदे की उम्मीद है, तो भाजपा को मोदी फैक्टर का सहारा है। 
भाजपा ने दो बार के सांसद चंदूलाल साहू की टिकट काटकर खल्लारी के पूर्व विधायक चुन्नीलाल साहू को मैदान में उतारा है। जबकि कांग्रेस ने अभनपुर के विधायक धनेन्द्र साहू को टिकट दी है। धनेन्द्र साहू प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं। लिहाजा, वे यहां पहचान के मोहताज नहीं हैं और पार्टी के छोटे-बड़े पदाधिकारी से परिचित हैं। चुन्नीलाल के चुनाव प्रचार की कमान पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने संभाल रखी है और वे लगातार दौरा भी कर रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा से परे बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं। लेकिन मुकाबला दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है। 

महासमुंद लोकसभा में साहू समाज के मतदाताओं की संख्या सर्वाधिक है। इसके साथ-साथ आदिवासी, कुर्मी और अनुसूचित जाति के मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। दोनों ही प्रत्याशी साहू समाज से आते हैं। ऐसे में समाज का वोट बंटना तय है। इन सबके बीच शहरी इलाकों में मोदी फैक्टर हावी दिख रहा है। यहां के ज्यादातर लोग नरेन्द्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते हैं। कुल मिलाकर भाजपा प्रत्याशी चुन्नीलाल साहू को मोदी फैक्टर से बड़े फायदे की उम्मीद है। शुरूआती दौर में अपने नाम और पहचान के आधार पर धनेन्द्र साहू भारी दिख रहे थे, लेकिन प्रचार के अंतिम चरण में मुकाबला कांटे का हो गया है। भाजपा प्रत्याशी चुन्नीलाल की स्थिति धमतरी, कुरूद व बिन्द्रानवागढ़ में अच्छी दिख रही है, तो कांग्रेस प्रत्याशी को महासमुंद जिले की विधानसभाओं महासमुंद, सराईपाली, बसना और राजिम से बढ़त मिलने की उम्मीद है। जबकि खल्लारी में दोनों बराबरी में दिख रहे हैं। 
पिछले लोकसभा चुनाव में भी महासमुन्द जिले के सभी सीटों पर भाजपा के विधायक होते हुए भी भाजपा प्रत्याशी बढ़त नहीं मिली थी। राजिम में भी भाजपा विधायक होने के बावजूद चंदू साहू अजीत जोगी से पीछे चलते रहे और गरियाबंद, बिन्द्रानवागढ़, धमतरी के बूते चुनाव मात्र 12 सौ वोट से जीत सके थे। इस बार महासमुन्द जिले के सभी सीटें कांग्रेस के कब्जे में है। ऐसे में भाजपा प्रत्याशी को जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। मतदाता खामोश है, लेकिन किसानों के बीच कहीं न कहीं, धान का समर्थन मूल्य 25 सौ रूपए प्रति क्विंटल करने के साथ-साथ बोनस से राज्य सरकार से खुश हैं। 

इससे धनेन्द्र साहू को फायदा मिल सकता है। धनेन्द्र के  सामने समस्या यह है कि भाजपा के लोग उन्हें बाहरी करार दे रहे हैं, जिसे लेकर उन्हें  सफाई देनी पड़ रही है। समाज के कई प्रमुख लोग चुन्नीलाल के माहौल बना रहे हैं, जिससे उन्हें दिक्कत हो रही है। भाजपा के पक्ष में प्रचार के लिए केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह आ चुके हैं। जबकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल धनेन्द्र साहू के पक्ष में आधा दर्जन से अधिक चुनावी सभा को संबोधित कर चुके हैं। बहरहाल, दोनों की बीच हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान है। 

 

 

 


Date : 13-Apr-2019

भाजपा को मोदी के नाम का मिल रहा लाभ, नमक-चना बंद करने से कांग्रेस की मुसीबत बढ़ी  
काँकेर, 13 अप्रैल
। काँकेर लोकसभा चुनाव में इस बार का चुनाव बड़ा ही दिलचस्प हो चूका है कांग्रेस भाजपा के दोनों उम्मीदवार की किस्मत का फ़ैसला अब बेहद करीब हो चला है जहां भाजपा को अब महज प्रधानमंत्री मोदी का ही सहारा दिख रहा है आम जनों की एक ही राय बनती दिख रही है कि नरेंद्र मोदी को पुन: प्रधानमंत्री बनाना है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की सरकार छत्तीसगढ़ में होने के बावजूद कांग्रेस की मुश्किलें कम होती नहीं दिखाई दे रही हंै। 

एक ओर जिले के अधिकांश किसानों के कर्जमाफी की समस्याओं से उभर भी नही पाई है कि गरीबों को दिए जाने वाली खाद्यान्न प्रणाली के तहत नमक और चना को बंद किए जाने से गरीबों के भारी विरोध से भी कांग्रेस  की मुसीबत कम होती दिखाई नहीं दे रही है ऐसी स्थिति में कांग्रेस व भाजपा के बीच मुकाबला बड़ा ही रोचक होने की उम्मीदें  जताई जा रही है। 
काँकेर लोकसभा हर हाल में दोनों राजनीतिक पार्टियों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है यानी काँकेर लोकसभा सीट 10 सालों से भाजपा के कब्जे में है। दूसरी ओर कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ऊर्जा से लबरेज कांग्रेस के पदाधिकारियों ने अपनी पूरी ऊर्जा फूंक कर लोकसभा सीट जिताने पसीना बहा रहे हैं लेकिन अपने ही पार्टी के पदाधिकारियों की अनदेखी के चलते युवा कार्यकर्ताओं में पार्टी के लिए काम में कोताही बरती जा रही है। 

पार्टी नेताओं के तालमेल
से बिगड़ सकता है  खेल 

 प्रत्याशी भले ही लोगो से मिलजुलकर डोर टू डोर जनसंपर्क करने में कोई कसर तो नही छोड़ रहे है लेकिन दोनों पार्टियों के जिला पदाधिकारी और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं में आपसी तालमेल नहीं होने के चलते चुनाव में ठीक तरह से कोई भी कार्यकर्ता काम नहीं करने की जानकारी  मिली है। यही स्थिति कांग्रेस में भी आसानी से देखी जा सकती है । 
जनसंपर्क के दौरान महज मु_ी भर कार्यकर्ता शामिल हो रहे हंै जिसके चलते लोगों में यह कयास लगाए जा रहे हंै कि मु_ी भर कार्यकर्ताओं के सहारे पार्टी फ़तेह हासिल कैसे कर पाएगी।
पूछपरख कम होने से कार्यकर्ताओं में नाराजगी
लोकसभा चुनाव में चुनाव संचालन कर रहे लोगों में कार्यकर्ताओं की अनदेखी से दोनों राष्ट्रीय पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ताओं में जमकर नाराजग़ी देखी जा रही है। आलम यह है कि कार्यकर्ताओ में जो जुनून बीते विधानसभा चुनाव के दौरान देखा गया था वह उत्साह  नहीं है। जो दोनों पार्टियों के लिए बड़ी मुसीबत पैदा कर सकता है। बहरहाल वक्त रहते नाराज़ कार्यकर्ता और जिला पदाधिकारी को मना लिए जाने के संकेत मिल रहे हैं।

 चना-नमक बंद करने से कांग्रेस की मुसीबत बढ़ी 
लोकसभा चुनाव में इस बार छत्तीसगढ़ में वर्तमान सरकार के घोषणा पत्र के अनुसार 10 दिनों के भीतर किसानों के कर्जमाफी करने के वादे जिले के अधिकांश किसानों के कजऱ्माफ नहीं हो सका है। आए दिन किसान अपने कर्जमाफी को लेकर बैक के चक्कर लगा रहे हैं और बैंकों से किसानों को लगातार कजऱ् के नोटिस मिलने से किसानों में कांग्रेस के खिलाफ जमकर आक्रोश देखा जा रहा है। कर्जमाफी की आग अभी ठंडी भी नही हो पाई है कि  गरीब परिवार जिन्हें गुलाबी राशन कार्ड में सस्ते दामों में चावल शक्कर मिट्टी तेल चना और मुफ्त में नमक पिछ्ली सरकार द्वारा दिया जा रहा था लेकिन अचानक कांग्रेस ने गरीबों को नमक व चना को बंद करने से गरीबों में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश भड़का हुआ है। मुख्यालय से महज 3 किलोमीटर के आसपास मालगांव , कोडेजंगा, ठेलकबोड, कोकपुर, मनकेशरी के बीपीएल कार्डधारी कादिर खान, मुकेश सिन्हा, कैलाश ,नरेश, सुरेश, इंद्रा बाई, जयबती ने बताया कि बीते सरकार द्वारा गरीबों को राशन दिया जा रहा था। कांग्रेस सरकार ने चना नमक को बंद कर दिया है आज नमक चना को बंद किया है। कल राशन को बंद कर देंगे। गरीबों की सरकार बताने वाली कांग्रेस भी जुमलेबाज सरकार निकल गई।