विशेष रिपोर्ट

Posted Date : 18-Jul-2018
  • कांग्रेस गिनाने की तैयारी में जुट गई
    - शशांक तिवारी

    रायपुर, 18 जुलाई (छत्तीसगढ़)। प्रदेश भाजपा ने डेढ़ सौ से अधिक चुनावी वादे किए थे। सरकार के कार्यकाल का अंतिम चरण है, लेकिन कई वादे पूरे नहीं हुए। मेट्रो शुरू हुई और न ही मोनो रेल का कोई अता-पता है। राज्य स्तर पर कृषि मूल्य आयोग, गोचर भूमि विकास बोर्ड और वित्त विकास निगम व फिल्म विकास निगम के गठन का वादा किया गया था, लेकिन इसको भी अमलीजामा पहनाया नहीं जा सका। अलबत्ता, कई योजनाएं चल रही है और कुछ वादों पर आधा अधूरा काम हुआ है। 
    हालांकि कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में कहा कि चूंकि राष्ट्रीय स्तर पर फसलों के मूल्य निर्धारण के लिए आयोग बना हुआ है। इसलिए यहां अलग से आयोग गठित नहीं किया जा सकता। मूल्य निर्धारण के लिए राज्य में अलग से कमेटी बनी हुई है। यह कमेटी अपना सुझाव देती है। उन्होंने राज्य में गोचर भूमि विकास बोर्ड का गठन न होने पर कहा कि मंत्रिमंडल उप समिति की सिफारिश पर चारागाह भूमि संरक्षित करने के लिए रेवन्यू लॉ में परिवर्तन कर दिया है। इसलिए अलग से अब बोर्ड गठन की जरूरत नहीं है। 
    विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा ने चुनाव घोषणा पत्र जारी किया गया था। कुल मिलाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, नगरीय विकास और ग्रामीण विकास, महिला-युवा व रोजगार से जुड़े 151 बिन्दुओं पर वादे किए थे। साथ ही 20 बिन्दुओं पर वचन पत्र जारी किया गया था। इसमें किसानों के लिए 33, गांव-गरीब, मजदूर को लेकर 23, महिलाओं के लिए 6 , युवाओं के लिए 15, अनुसूचित जाति, वनवासी व पिछड़ा वर्ग के लिए 16 और शासन-प्रशासन, सहकारी व गैर सहकारी वर्ग के लिए 11 वादे किए गए थे। भाजपा सरकार के कार्यकाल को कुछ महीने ही बाकी रह गए हैं। ऐसे में कई वादों का कोई अता-पता नहीं है। 
    बताया गया कि अक्टूबर पहले हफ्ते में चुनाव आचार संहिता लगने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में अधूरे वादों को पूरा करने में कम समय बाकी रह गया है। और हाल यह है कि कई घोषणाओं का कोई अता-पता नहीं है। कुछ योजनाओं का स्वरूप भी बदला गया। भाजपा ने मेट्रो और मोनो रेल परियोजना शुरू करने का वादा किया था। यह कहा था कि प्रथम चरण में रायपुर से राजनांदगांव और फिर रायपुर से बिलासपुर तक शुरू किया जाएगा। यह घोषणा पूरा होना तो दूर, शुरू भी नहीं हो पाई है। 
    हालांकि सरकार ने इसके लिए पहल की थी। मेट्रोमैन के नाम से चर्चित ई श्रीधरन यहां आए थे, लेकिन मेट्रो की इस पूरी योजना को प्रदेश की जरूरतों के हिसाब से खर्चीली बताया गया और यह योजना बंद हो गई। इसी तरह मोनो रेल को लेकर भी केन्द्रीय नगरीय विकास विभाग के अफसरों ने प्रेजेंटेशन दिया था, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। 
    आवास एवं पर्यावरण विभाग के सचिव संजय शुक्ला ने 'छत्तीसगढ़Ó कहा कि सरकार ने कहा कि मेट्रो और मोनो रेल योजना का अध्ययन करने के बाद यह पाया गया कि यह योजना रायपुर-बिलासपुर जैसे शहरों के लिए काफी खर्चीली है। इसकी जगह सुगम यातायात के लिए बीआरटी योजना शुरू की गई। यह सफलतापूर्वक चल रही है। 
     इसी तरह किसान कल्याण कोष का गठन का वादा किया गया था। इस कोष की स्थापना किसानों की सहायता के लिए करने का विचार था, लेकिन इसका भी कोई अता पता नहीं है। घोषणा पत्र में वित्त विकास निगम और फिल्म विकास निगम के गठन की भी घोषणा की गई थी, लेकिन यह भी अब तक अस्तित्व में नहीं आ पाया है। इसी तरह छत्तीसगढ़ी लोक कला अकादमी का भी गठन नहीं हो पाया है।  संस्कृति विभाग के अफसरों के मुताबिक फिल्म विकास निगम के गठन पर सुझाव देने के लिए कमेटी बनाई गई है और इसको लेकर सुझाव भी दिए गए हैं। अकादमी का भी गठन नहीं हो पाया है, लेकिन यह कार्रवाई प्रक्रियाधीन है। 
    धान-बोनस अधूरा, 21 सौ 
    नहीं हुआ समर्थन मूल्य

    भाजपा के घोषणा पत्र में समर्थन मूल्य पर 3 सौ रूपए प्रति क्विंटल बोनस देने की घोषणा की गई थी, लेकिन बीच के तीन सालों में बोनस नहीं दिया जा सका। यह बताया गया कि केन्द्र सरकार ने समर्थन मूल्य पर बोनस देने पर रोक लगा दी है। बाद में अकाल की स्थिति को देखते हुए केन्द्र ने इसकी अनुमति दी है। किसानों को 21 सौ करोड़ रूपए बोनस के रूप में दिया गया है। यानी यह घोषणा आधा-अधूरा ही पूरा हो पाया है। 
    पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर का कहना है कि प्रति एकड़ किसानों का धान के समर्थन मूल्य पर पिछले तीन साल में 13 हजार 5 सौ रूपए बोनस बकाया है। भाजपा ने 21 सौ रूपए धान का समर्थन मूल्य देने के लिए पहल का वादा किया था। हालांकि इस सिलसिले में कई बार चिट्ठी लिखी गई, लेकिन केन्द्र ने समर्थन मूल्य पर 2 सौ रूपए ही वृद्धि की है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कह चुके हैं कि 3 सौ रूपए बोनस मिलाकर राशि इसके आसपास पहुंच रही है।  
    महिला-शिक्षित बेरोजगारों को तीन 
    फीसदी ब्याज पर ऋण का पता नहीं

    भाजपा ने चुनाव घोषणा पत्र में शिक्षित बेरोजगारों को तीन फीसदी ब्याज पर ऋण देने का जिक्र किया था, लेकिन आज तक इस घोषणा को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। 
    यह कहा गया कि अंत्या व्यवसायी वित्त विकास निगम के माध्यम से अनुसूचित जाति, जनजाति पिछड़ा वर्ग के बेरोजगारों को ऋण उपलब्ध कराया जाता है। निगम के एक सदस्य पवन मेश्राम का कहना है कि कुछ योजनाओं के जरिए तो तीन फीसदी ब्याज से भी कम में आरक्षित बेरोजगारों को ऋण उपलब्ध कराया जाता है। मगर, अनारक्षित वर्ग के बेरोजगारों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। इस बारे में सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि मुद्रा योजना के जरिए बेरोजगारों को ऋण उपलब्ध कराया गया है। हालांकि, इसका ब्याज दर घोषणा से ज्यादा है। महिलाओं को उद्योग और व्यापार के लिए तीन फीसदी ब्याज पर ऋण देने की घोषणा की गई थी, लेकिन महिला कोष के जरिए ऋण तो उपलब्ध कराया जा रहा है, लेकिन पांच से छह फीसदी दर पर। 
    सरकारी कर्मचारियों को लेकर वादा भी पूरा नहीं
    सरकार ने चुनाव घोषणा पत्र के वादे के अनुरूप प्रशासनिक पुर्नगठन आयोग बनाया है, लेकिन अब तक आयोग ने रिपोर्ट नहीं दी है। जबकि पूर्व सीएस एस के मिश्रा की अध्यक्षता में गठित आयोग का कार्यकाल दिसम्बर तक के लिए बढ़ा दिया गया है। 
    अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के अध्यक्ष सुभाष मिश्रा का कहना है कि सरकार ने चुनाव पूर्व किए गए एक भी वादे को पूरा नहीं किया है। उन्होंने बताया कि प्रशासनिक सुधार आयोग को कई सुझाव भी दिए गए हैं, लेकिन रिपोर्ट का कोई पता नहीं है। अधिकारियों-कर्मचारियों को सेवाकाल के दौरान कम से कम चार स्तरीय वेतनमान देने की बात कही थी, लेकिन एक-दो संवर्ग के लोगों को ही इसका लाभ मिल रहा है। 
    श्री मिश्रा ने कहा कि अति संवेदनशील नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कार्यरत शासकीय कर्मचारियों को जोखिम भत्ता देने का वादा किया गया था, लेकिन यह राशि ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर है। घोषणा पत्र में शासकीय शालाओं में या उनके निकट शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारी वर्ग के लिए आवासीय भवन के निर्माण की बात कही गई थी, लेकिन इसका भी पालन नहीं किया गया। श्री मिश्रा ने कहा कि कर्मचारी संगठन वादा निभाओ रैली निकालने की तैयारी कर रहे हैं। 
    छत्तीसगढ़ को विशेष राज्य का 
    दर्जा दिलाने का प्रयास अधूरा

    भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि छत्तीसगढ़ को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए विशेष प्रयास किया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है। 
    हालांकि यूपीए सरकार के  कार्यकाल में सरकार की तरफ से इस दिशा में काफी प्रयास किए गए थे। तब योजना आयोग से लेकर अलग-अलग फोरम में काफी पत्र व्यवहार किया गया था। विशेष राज्य के लिए अनिवार्य शर्त यह रहती है कि सीमावर्ती राज्य होना चाहिए। इसके अलावा पहाड़ी और पिछड़ापन भी देखा जाता है। चूंकि छत्तीसगढ़ देश के मध्य में स्थित है। इसलिए पिछड़ेपन की अनिवार्यता की शर्त को पूरा नहीं करता है। 
    स्कूलों की फीस निर्धारण के लिए नियामक 
    आयोग के गठन का प्रारूप तैयार नहीं

    अशासकीय स्कूलों-कॉलेजों के फीस नियामक आयोग का गठन का वादा किया गया था, लेकिन इस पर भी अमल नहीं हुआ। हालांकि इंजीनियरिंग कॉलेजों में फीस तय करने के लिए आयोग बना हुआ है। सभी 146 ब्लॉक मुख्यालय में स्कूल खोले जाने की योजना थी, लेकिन ज्यादातर ब्लॉकों में यह खुल नहीं पाया। 
    नगरीय विकास-पंचायत की 
    कई घोषणाओं पर अमल नहीं 

    नगर पंचायत स्तर तक सभी कस्बों और शहरों का मास्टर प्लान बनाकर सुनियोजित विकास का वादा किया गया था, लेकिन इस दिशा में अभी मास्टर प्लान बनाने का ही काम चल रहा है। आवास एवं पर्यावरण विभाग के सचिव संजय शुक्ला ने कहा कि सभी 168 निकायों में मास्टर प्लान तैयार करने का काम चल रहा है। 
    सभी शहरों में ऑक्सीजोन के निर्माण की घोषणा की गई थी, लेकिन इनमें रायपुर, बिलासपुर जैसे शहरों में कुछ काम हुआ है। बाकी शहरों में कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है। 

     

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Posted Date : 11-Jul-2018
  • एक था जगरगुण्डा
    बस्तर में जन्मे, पले, बढ़े  राजीव रंजन प्रसाद का बस्तर के इतिहास, साहित्य, संस्कृति और पुरावैभव पर निरंतर लेखन जारी है। इसी क्रम में नक्सलियों की उपराजधानी कहे जाने वाले जगरगुंडा के ताजा हालात पर उनका समापन आलेख।

    जगरगुण्डा, दर्द की अनंत कथा से आशावाद की नई कविता बनने की ओर अग्रसर है। यह परिक्षेत्र एक जीवित उदाहरण है जो स्पष्ट कर सकता है कि सशस्त्र क्रांति अब दूर की कौड़ी क्यों है और उसके कारण किस तरह की सामाजिक-आर्थिक त्रासदी से दो-चार होना पड़ सकता है। जगरगुण्डा ने सलवाजुडुम के दौरान और उसके पश्चात की परिस्थितियों में जो कुछ भुगता है उसकी भरपाई संभव नहीं, लेकिन बहुत कुछ अवश्य सीखा जा सकता है। जगरगुण्डा की परिस्थितियाँ सत्तर के दशक में बस्तर के अंदरूनी परिक्षेत्रों में लागू की गई उस ट्राईबलआईसोलेशनथ्योरी को नकारती है जिसकी भूमिका थी कि जहाँ सड़के पहुँचती है, उसकी बीमारी साथ पहुँचती है। एक पूरी सामाजिकता को अलग-थलग रखने की बौद्धिकता ने बस्तर को न केवल माओवाद की सौगात दी थी अपितु इसी कारण जगरगुण्डा जैसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। माओवादियों ने भी आईसोलेशनथ्योरी को ही अपना हथियार बनाया था और अब जगरगुण्डा को ही सकारात्मक उदाहरण की तरह लिया जा सकता है कि दो ओर से सड़कें बन जाने के पश्चात यहाँ की परिस्थितियाँ किस तेजी से बदलने लगी हैं।  
    सुखद है कि दशकों से नक्सलवादियों की दहशत से बंद हो गया दंतेवाड़ा-जगरगुण्डा मार्ग अब लगभग पूरा हो गया है। इस मार्ग से यदि जगरगुण्डा पहुँचना हो तो दंतेवाड़ा से अरनपुर तक सीधा और मैदानी रास्ता है लेकिन यहाँ से आगे बढ़ते ही नयनाभिराम घाटियाँ समुपस्थित होती हैं। अरनपुर से कोंडासामली तक का रास्ता बेहद घुमावदार, रोमांचित करने वाला किन्तु सुन्दर है। अरनपुर से आगे घाट की ओर बढ़ते ही पडऩे वाले पहले सीआरपीएफ कैम्प का नाम शहीद जवान कमल सिंह के नाम पर कमल कैम्प रखा गया है। कमल सिंह अरनपुर-जगरगुण्डा मार्ग निर्माण के दौरान गश्त करते हुए नक्सलियों द्वारा लगाये गये प्रेशरबम की चपेट में आकर शहीद हो गये थे। शहीद जवानों के नाम पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कैम्प का होना निश्चय ही एक अच्छी पहल है। यद्यपि अब अनेक सीआरपीएफ कैम्प के आगे शहीद जवानों की स्मृति में स्तम्भ उनके नामोल्लेख के साथ भी खड़े किये गये हैं। बस्तर का यह वर्तमान किसी दौर में दर्द भरे इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी बनेगा।
    बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुंदरतम घाटियों वाले बस्तर में अरनपुर अपनी दम-खम के साथ उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम है। आकाशनगर, कैलाशनगर, केशकाल जैसे क्षेत्रों से दीख पड़ती नैसर्गिक सुन्दरता के समतुल्य और कई मायनों में उससे भी अधिक रम्य है अरनपुरघाटी। घाटी की लम्बाई-चौडाई ही नहीं अपितु गहराई भी दर्शनीय है तथा ऊपर से निहारने पर भय पैदा करती है। इस स्थान की दुर्गमता देख कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्यों नक्सली यहाँ लंबे समय तक अपनी उपस्थिति बनाये रखने में सफल हुए थे। अरनपुर घाटी की सबसे महत्वपूर्ण बात है जैव-विविधता जिसके दर्शन अब अन्यत्र कम ही होते हैं। बांस के दूर दूर तक फैले हुए झुरमुट और सूंड की तरह हिलते सियाड़ी के दोमुहे पत्तों वाले पेड़ की लतिकाओं के बीच बहुत सी वन-औषधियाँ अपना स्थान बनाए हुए हैं। 
    यह घाटी निश्चय ही पादप-विज्ञानियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। अरनपुर घाटी उन विद्यार्थियों के लिये लाभप्रद है जो वनस्पति विज्ञान के निकटवर्ती महाविद्यालयों में अध्येता हैं। यह घाटी प्रकृति प्रेमियों के लिये एक वरदान है चूंकि यहाँ सूर्योदय और सूर्यास्त की दृश्यावलियाँ मसूरी अथवा नैनीताल से कम नयनाभिराम नहीं हैं। यदि पर्यटन विकास के दृष्टिगत अरनपुर घाटी के विषय में योजना बनाई जाये, घुमावदार मार्ग पर अवलोकन स्थल निर्मित किए जायें, भ्रमणार्थियों के लिये कुर्सियाँ आदि लगवाई जाये तो पूरे क्षेत्र का कायाकल्प हो सकता है।
    मुझे अपने दौरे में कोण्डासामली से वापस लौटना पड़ा था, तब वहाँ पुल का काम चल रहा था। यहाँ से केवल कुछ सौ मीटर की दूरी पर ही जगरगुण्डा की अवस्थिति है। सुखद अहसास के साथ वापस लौटा हूँ कि आशा की किरणें घटाटोप अंधकार तक पहुँच गई हैं। जगरगुण्डा की परिस्थ्तियाँ सामान्य होते ही दंतेवाड़ा से दोरनापाल पहुँचने के लिये छोटा और वैकल्पिक मार्ग आरंभ हो जायेगा जो आवागमन और कारोबार के लिये अच्छी खबर है। जगरगुण्डा का पुनर्निर्माण नक्सलगढ़ की उपराजधानी के ध्वस्त होने की भी कथा है जिसे रणनीतिक तरीके से हासिल किया गया है। इसी तौर की प्रतिलिपि कर अबूझमाड़ और दक्षिण-बस्तर के अन्य अंदरूनी क्षेत्रों पर प्रशासनिक पहुँच हासिल की जा सकती है।
     उम्मीद है कि शीघ्र ही बीजापुर की ओर से भी सड़क जगरगुण्डा तक पहुँचेगी और पूरी तरह है अंचल अपने पुराने दिनों की निश्चिंतता और सम्पन्नता को हासिल कर लेगा। 

     

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Posted Date : 11-Jul-2018
  • सभी 12 सीटों पर सीधे मुकाबले के आसार

    शशांक तिवारी

    रायपुर, 11 जुलाई। भाजपा ने बस्तर पर विशेष रूप से फोकस किया है। बताया गया कि पार्टी बस्तर की ज्यादातर विधानसभा सीटों पर नए चेहरे को उतार सकती है। इस दिशा में अभी से बेहतर प्रत्याशी की तलाश हो रही है। 
    पिछले विधानसभा सीटों में 12 से 8 सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। जिन चार सीटों पर पार्टी को जीत हासिल हुई, उनमें से भी  एक में पार्टी की स्थिति खराब बताई जा रही है। यहां के विधायक केदार कश्यप और महेश गागड़ा सरकार में मंत्री हैं और जगदलपुर विधायक संतोष बाफना राज्य पर्यटन बोर्ड के अध्यक्ष पद पर हैं। बावजूद इसके बस्तर की सीटों में पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं मानी जा रही है। 
    बताया गया कि पार्टी ने बस्तर में वर्ष-03 की सफलता को दोहराने के लिए अलग प्लान तैयार किया है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में बताया कि पार्टी इस बार ज्यादातर सीटों पर नए चेहरे को प्रत्याशी बना सकती है। यानी पूर्व विधायक अथवा पूर्व प्रत्याशियों की जगह संगठन या फिर जिला-जनपद या निकाय में बेहतर काम करने वाले प्रतिनिधियों को मौका मिल सकता है।  
    पार्टी के रणनीतिकार बस्तर संभाग के कांकेर और कोंडागांव जिले की सीटों को लेकर ज्यादा चिंतित हैं। यहां अंतागढ़ को छोड़कर बाकी जगह पार्टी प्रत्याशियों को करारी हार का सामना करना पड़ा था। जिले में पिछले दो चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। कांकेर विधानसभा सीट वर्ष 2003 के बाद अब तक नहीं जीत पाई है। सूत्र बताते हैं कि पिछले चुनाव में टिकट वितरण में वरिष्ठ नेता महावीर सिंह राठौर की राय को तव्वजो दी गई। इसका नुकसान भी उठाना पड़ा। यही वजह है कि तीसरी बार सरकार बनने के बाद संगठन और सरकार में राठौर को कोई महत्व नहीं दिया गया। जबकि वे अपैक्स बैंक के अध्यक्ष रह चुके हैं। 
    सूत्र बताते हैं कि मौजूदा चार विधायकों में से कम से कम एक की टिकट कटना तय माना जा रहा है। इससे परे संगठन को मजबूत बनाने की दृष्टि से कई अहम कदम भी उठाए गए हैं। यहां छोटे-बड़े कार्यक्रमों में पार्टी के प्रदेश स्तर के नेता शामिल हो रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने विकास यात्रा के दौरान बस्तर में सबसे ज्यादा समय दिया था। दूसरे चरण की यात्रा में भी वे बस्तर दौरे पर जाएंगे। इससे परे युवा मोर्चा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक भी गुरूवार से शुरू हो रही है। इस बैठक में बस्तर को लेकर भी विशेष चर्चा होगी। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के अलावा पार्टी के प्रमुख नेताओं का उद्बोधन भी होगा। 
    पार्टी नेता मानते हैं कि बस्तर में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है और कांग्रेस यहां मजबूत स्थिति में भी है। बाकी दलों का यहां कोई प्रभाव नहीं है। ऐसे में भाजपा यहां विशेष ध्यान दे रही है। 

     

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Posted Date : 10-Jul-2018

  • एक था जगरगुण्डा

    बस्तर में जन्मे, पले, बढ़े  राजीव रंजन प्रसाद का बस्तर के इतिहास, साहित्य, संस्कृति और पुरावैभव पर निरंतर लेखन जारी है। इसी क्रम में नक्सलियों की उपराजधानी कहे जाने वाले जगरगुंडा के ताजा हालात पर उनके आलेख हम प्रकाशित कर रहे हैं।


    अनेक प्रयत्नों के पश्चात मैं जगरगुण्डापहुँच सका था। सलवाजुडुम के दौर और पिछले लगभग बारह वर्षों में शेष दुनियाँ से अलग-थलग,टापू बन चुके जगरगुण्डा से बहुत सी अद्भुत और अनकही कहानियों-जानकारियों को एकत्रित करने के लोभ में शाम हो गयी। दक्षिण बस्तर के अतिसम्वेदनशील क्षेत्रों में कार्य करने का अपना जोखिम है। ग्रामीणों के अतिरिक्त जगरगुण्डा के पुलिस अधिकारियों ने भी उजाला रहते क्षेत्र से बाहर निकल जाने के लिये हमें आगाह किया था। अधिक से अधिक जानने-समझने की उत्कंठा के कारण शाम गहरी होने लगी। लौटते हुए जब तक हम चिंतलनार पहुँचे अंधेरा गहरा हो गया था। पूरे रास्ते किसी वाहन की आमद तो दूर की बात है, कोई व्यक्ति भी दिखाई नहीं पड़ा। यहाँ से थोड़ा आगे बढ़ते ही हमारी गाड़ी का टायर पंचर हो गया। भयावह सूनसान में जहाँ इस समय कोई भी आवागमन असम्भव था, अंधकार में गाड़ी को रोकना दुस्साहस था। यह पूरा क्षेत्र नक्सल गतिविधियों के लिये कुख्यात है तथा निकटस्थ क्षेत्रों ताडमेटला, चिंतलनार, चिंतागुफा आदि में अनेक भयावह घटनायें नक्सलियों ने पिछले कुछ वर्षों में अंजाम दी हैं। ड्राईवर ने पंचर का निरीक्षण करने के पश्चात झुंझलाहट में कहा कि जिस टायर के पंचर होने की संभावना थी वह तो सही सलामत है जबकि नया टायर जमीन से लग गया है। मोबाईल की रोशनी में स्टेप्नी गाड़ी पर चढ़ाने के पश्चात हम ब-मुश्किल पाँच सौ मीटर आगे गये होंगे कि उसकी आशंका सही सिद्ध हुई और दूसरा टायर भी पंचर हो गया। अब हम वास्तविक परेशानी में थे। 
    घटाटोप अंधकार तथा आवागमन रहित सड़क में कोई मदद मिलने की संभावना नहीं थी। वातावरण का अपना मनोवैज्ञानिक दबाव अलग था जिस कारण पूरी रात वहीं गाड़ी के भीतर गुजारने की कल्पना डरावनी थी। किसी तरह की आहट अथवा सीटियों की आवाजों से अनेक काल्पनिक आशंकायें प्रबल हो रही थीं। हमारे पास सीआरपीएफ की मदद प्राप्त करने का विकल्प था लेकिन अंदाजन उस क्षेत्र से कांकेर लंकाकैम्प लगभग ढाई किलोमीटर की दूरी पर होना चाहिये था। मरता क्या न करता वाली स्थिति थी,अंतत: हमने निश्चय किया कि पंचर अवस्था में ही गाड़ी को ढाई किलोमीटर चला कर सुरक्षित स्थान तक पहुँचा जाये। सड़क निर्माणाधीन होने के कारण अत्यधिक खस्ताहाल थी। सामान्य परिस्थिति में कोई भी वाहनचालक पंचरगाडी को आगे ले जाने का दुस्साहस नहीं करता किंतु नक्सलगढ़ की उपराजधानी में इस तरह फँसे हुए हम विकल्पहीन थे।  हम धीरे-धीरे चलते हुए कांकेर लंका पहुँचने में सफल हुए। अब तक पंचर टायर चिथड़ों में बदल गया था। 
    कैम्प में अपना परिचय देने और वांछित पूछताछ के बाद हमें मदद मिली। मैं अपने पाठकों और वास्तविक शोधार्थियों के उस मिथक को तोडऩा चाहता हूँ कि जंगल में बैठी हमारी फोर्स दुव्र्यवहार करती है अथवा उनका रवैया गैर-दोस्ताना रहता है। युद्धरत क्षेत्र में आपको समुचित पहचान पत्र लेकर चलना चाहिये, इतना ही नहीं पूछताछ से परेशान होने की बजाय थोड़ा धैर्य रखना ही उचित है। हमें एयरपोर्ट पर इससे अधिक कड़ी जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है तब परेशानी नहीं होती फिर ऐसे जटिल क्षेत्रों में सुरक्षाकर्मियों से पूछताछ के दौरान हमारा अहं क्यों सामने आने लगता है? मुझे प्रसन्नता है कि समुचित स्वागत प्राप्त हुआ, चाय-नाश्ते की व्यवस्था की गयी। अधिकारियों ने बताया कि इस समय कैम्प से किसी वाहन को ले जाने की अनुमति असम्भव है,साथ ही आस-पास सड़क बनाने में लगी किसी गाड़ी को ले कर आगे जाना भी ठीक नहीं था। कैम्प में जवानों के आतिथ्य में हम सुरक्षित थे और विपरीत परिस्थिति में यहाँ रात काटी जा सकती थी। सौभाग्य से वहाँ टेलीफोन नेटवर्क उपलब्ध था। फोन कर स्थिति बताने के पश्चात दोरनापाल से पत्रकार मित्रों ने वैकल्पिक टायरों की व्यवस्था की और उसे कैम्प तक पहुँचाया। आखिरकार लगभग रात्रि के साढ़े नौ बजे हम आगे बढऩे में सफल हो सके। जवानों की इस सहायता के लिये धन्यवाद एक छोटा शब्द था, धन्यवाद ज्ञापित करते हुए मैंने अपनी पुस्तक 'दंतक्षेत्र' कमाडिंग अधिकारी को भेंट की। कभी-कभी सोचता हूँ कि शोध से जुड़े ऐसे अनुभव ही गहरे संस्मरण बन जाते हैं। अब मेरा अगला लक्ष्य पुन: जगरगुण्डा था लेकिन अब रास्ता नकुलनार-अरनपुर हो कर....। 

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Posted Date : 09-Jul-2018
  • अमन सिंह भदौरिया 
    दोरनापाल, 9 जुलाई (छत्तीसगढ़)। सुकमा जिला मुख्यालय से  94 किमी दूर जगरगुंडा धुर नक्सल प्रभावित इलाका है जहां हर बरस राशन की गाडिय़ां हजारों जवानों की सुरक्षा में पहुंचाई जाती हैं। वह राशन जगरगुंडा तक तो पहुंचता है मगर ग्रामीणों तक नहीं, पर खुले बाजार में वही चावल वनोपज के बदले खपाया जा रहा है। ग्रामीण 1 रुपये में मिलने वाले इस चावल को 15 से 16 रुपये में खरीदने मजबूर हैं। खाद्य विभाग को इसकी जानकारी नहीं मिली है। वहीं विभाग की मानें तो पिछली बार जांच के बाद दोषियों के खिलाफ एफआईआर कराई गई थी मगर दोषियों पर कार्यवाही नहीं होती।  
    मिली जानकारी के अनुसार पहले इन दुकानों का संचालन चिंतलनार में होता रहा जिसके बाद इन दुकानों को जगरगुंडा स्थान्तरित किया गया। कालाबाजारी  की  सूचना मिलते ही 'छत्तीसगढ़Ó की टीम रविवार को जगरगुंडा के साप्ताहिक बाजार में पहुंची तो मौके पर राठौर राईस मिल छिंदगढ़ का लॉट नम्बर 546 तकरीबन 50 से 60 बोरा पाया। 'छत्तीसगढ़Ó ने इससे कलेक्टर जयप्रकाश मौर्य को अवगत कराया।  उनका कहना है कि जगरगुंडा के पीडीएस के मामले की जांच होगी। इस मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है। जांच में यदि कोई दोषी पाया जाता है तो कार्यवाही होगी।
    ज्ञात हो कि बीते कई हफ़्तों से जगरगुंडा इलाके में आदिवासियों को पीडीएस का चावल नहीं मिल रहा है। हाल ही में बारिश को देख नॉन ने 4 माह का राशन भेजा था और ग्रामीणों के अनुसार उसी चावल को सेल्समेन सीधे व्यापारियों को 10 रुपये किलो की दर से बेच रहे हंै जो साप्ताहिक बाजार में पहुंच ग्रामीणों को 15 से 16 रुपये किलो में वनोपज के बदले मिल रहा है। 
    कानून व्यवस्था का डर न तो सेल्समेनों में है और न वनोपज के बदले चावल खपा रहे व्यापारियों को, क्योंकि 2012 से अब तक राशन हेराफेरी के दर्जनों मामले सामने तो आये मगर जिला स्तर से लेकर प्रदेशस्तर तक जांच में स्पष्ट पाए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। कार्यवाही के नाम पर हर बार राशन की एजेंसी बदल पंचायत से मार्केटिंग और मार्केटिंग से पंचायत किया गया।
    इस संवाददाता को जगरगुंडा में चल रही राशन की काला बाजारी की सूचना एक दिन पहले ही  मिल गयी कि साप्ताहिक बाजार में 8 लेम्प्सों का चावल खपाया जा रहा है। सेल्समेनों में ग्रामीणों को दिया जाने वाला राशन बेच डाला है और हर बाजार में 150 से 160 बोरा चावल खपाया जा रहा है। 
    सुबह  7:30 को जगरगुंडा पहुंच जैसे ही बाजार में दाखिल हुए वैसे ही चावल से लदा एक ट्रैक्टर दिखा जो दो गल्ला व्यापारियों के गल्ले के बीच मिला। साथ ही अन्य व्यापारी के गल्ले के पास सील पैक चावल का ढेर भी मिला।  धीरे-धीरे इक्का दुक्का बोरा चावल मिलाकर लगभग 50 से अधिक सीलबंद चावल मिला।
    ज्ञात हो कि  साप्ताहिक बाजार सुबह साढ़े 5 बजे ही शुरू हो जाता है और 8 बजे तक व्यापार लगभग ख़त्म भी हो जाता है। कुछ महिलाएं भी मौके पर चावल ले जाती मिलीं। उन्होंने बताया कि चावल उन्हें वनोपज के दुगुने वजन के हिसाब से साप्ताहिक बाजार से मिला।
    4 महीने के अग्रिम स्टॉक से भी हेरफेर
    नाम न बताने की शर्त पर स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि 4 माह के अग्रिम स्टॉक से भी सेल्समेनों द्वारा हेर फेर किया जा रहा है। बारिश को देखते हुए नागरिक आपूर्ति निगम द्वारा जगरगुंडा समेत अन्य राशन की दुकानों में राशन का कोटा पहुंचा दिया था। 
     ग्रामीणों के अनुसार सेल्समेनों द्वारा 4 माह के स्टॉक से बड़ी मात्रा में चावल और अन्य राशन बेच डाला है। एक माह का राशन बांटने के बाद ही सेल्समेनों ने चावल बेचा जो साप्ताहिक बाजार तक पहुंचा और ग्रामीण वही राशन साप्ताहिक बाजार से लेने को मजबूर हंै। बताया जा रहा है कि सेल्समेनों द्वारा प्रति किलो 10 रुपये बेचा गया है ।  
    नागरिक आपूर्ति निगम के अनुसार 7-8 मई को 4 माह जून से सितम्बर तक का आबंटन जारी कर  4 ट्रक में 17 टन, नॉन की 3 ट्रक में 10 टन व 2 ट्रक में  50 टन राशन जगरगुंडा भेजा गया था । जिसमें 3433 क्विं. चावल, 124 क्विं. शक्कर, 249 क्विं. चना, 205 क्विं. नमक भेजा गया था। 
    राशन कार्ड नहीं
    रविवार बाजार आये दर्जनों ग्रामीणों ने बताया कि उनके पास राशन कार्ड नहीं है इस वजह से भी कई लोगों को राशन बाजार से वनोपज के बदले 15 रूपये किलो खरीदना पड़ता है। जबकी पंचायतों में  खाद्य विभाग द्वारा सैकड़ों राशन कार्ड बनाए गए हंै जिनके नाम पर प्रतिमाह राशन का आबंटन भी जारी होता है। बावजूद कइयों ने कहा कि अपना राशन कार्ड आज तक नहीं देखा।  
    नाम न बताने की शर्त पर जगरगुंडा व चिंतलनार के कुछ  ग्रामीणों ने बताया कि जगरगुंडा की 8 राशन की दुकान कुन्देड, मिलमपल्ली, सुरपनगुड़ा, पेंटाचिमली, सिलगेर, कोंडासांवली, गुमोड़ी,गोंदपल्ली के सेल्समेन  मनमानी कर रहे हंै। कुछ दिन पहले ही राशन की गाडिय़ों में भर भर कर राशन लेम्प्सों में उतरा है। कई घरों में 50-50 बोरा चावल तक तलाशी के दौरान मिल सकता है।  वहीं छोटी-बड़ी गाडिय़ों में भी राशन जगरगुंडा चिंतलनार से कुछ लोग बाहर ले जाते हैं। नक्सल इलाका होने की वजह से खाद्य विभाग के लोग भी गांव तक सर्वे करने नहीं आते कि राशन का वितरण सही तरीके से हो रहा है या नही ।
    जगरगुंडा के सुकलाल कश्यप का कहना है कि 4 माह का राशन आया था 1 माह का बाँटा गया फिर  स्थानीय व्यापारियों को 20-20 और 50-50 बोरा चावल बेचा गया है।  सेल्समेन अपनी मनमानी करते हैं । रविवार को भी बहुत सारा सोसाइटी का चावल बाजार में खपाया गया। चावल वनोपज के बदले महुआ 2 किलो, टोरा 1 किलो के हिसाब से ग्रामीणों को चावल मिलता है।
    कोई कार्रवाई नहीं
     प्रदेश महासचिव युवा कांग्रेस दुर्गेश राय का कहना है कि इसमें खाद्य विभाग की लापरवाही है जो मामले को नजर अंदाज कर रही है सही तरीके से मॉनिटरिंग नहीं कर पा रही है। जिला मुख्यालय में बैठ औपचारिकता निभा रही है कहीं न कहीं खाद्य विभाग की मिलीभगत है।  युवा कांग्रेस ने इसकी जांच कर इससे पहले रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी थी सरकार की गैरजिम्मेदारी की वजह से आज सेल्समेनों व चावल माफियाओं के हौसले बुलंद हैं आज तक जांच के बाद कोई कार्यवाही नहीं हुई। 

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Posted Date : 08-Jul-2018
  • चिकन-मटन का बना विकल्प, बाजार में 6सौ रुपये किलो तक
    चंद्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर, 8 जुलाई (छत्तीसगढ़)। बारिश शुरू होते ही कोरिया जिले में पुटू, खुखड़ी (एक प्रकार का मशरूम) चिकन और मटन का बेहतर विकल्प बन गया है।  सुदूर वनांचलों  से नगरों तक आ रहे खुखडी और पुटू के लिए बस जेब ढीली करनी होगी। यहां सोनहत रामगढ़ से आने वाले पुटू, खुखड़ी की मांग रायपुर बिलासपुर से लेकर झारखंड, बिहार में भी ज्यादा है। फिलहाल ये 400 से 600 रुपये प्रति किलो खूब बिक रहा है।
    बारिश के साथ ही कोरिया जिले के ग्रामीण इलाकों में तरह-तरह के खुखड़ी उगने लगे हंै। ग्रामीणों के साथ साथ अब शहरी क्षेत्र के लोग  प्रमुख सब्जी के रूप में उपयोग करते हैं। छत्तीसगढ़ ने इस पहली बारिश के मौसम में निकलने वाली खुखड़ी की कई किस्मों की तलाश की। सोनहत, रामगढ और कोटाडोल के जंगलों में  रंग-बिरंगी खुखड़ी के साथ अलग-अलग पेड़ों से निकलने वाली खुखड़ी भी  देखे। इसकी कई किस्में खाने लायक होती हंै तो कई विषाक्त भी। इसकी पहचान कर खुखड़ी चुना जाता है।  ग्रामीणों को सब्जी  के साथ ही यह अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन जाता है। 
    ग्रामीणों के अनुसार पुटू जिस जगह पर निकलता है उस स्थान पर सिंदूरी रंग का एक छोटा कीड़ा भी पाया जाता है।  इससे वे अंदाजा लगा लेते हंै कि इस ओर सफेद पुटू मिल सकता है। जो खाने में स्वादिष्ट होता है।
    दुर्लभ है खुखड़ी
    माना जाता है कि बरसात के मौसम में बिजली कड़कने से धरती फटती है और इसी समय धरती के अंदर से सफेद रंग की खुखड़ी निकलती है। पहली पहली बारिश में निकलने वाली इस खुखड़ी का जीवन सिर्फ कुछ दिनों का रहता है और इसका सीजन भी, शुरूआती बारिश के बाद 20 से 30 दिन ही।  इसके बाद अगले वर्ष तक इंतजार करना पड़ता है।  
    खुखड़ी की कई किस्में
    खुखड़ी मशरूम की तरह दिखता है। खुखड़ी में भी कई किस्म हैं। ग्रामीणों की मानें तो खुखडी की किस्मों को ग्रामीण अलग अलग नाम से बुलाते है। पतेरी खुखड़ी के अलावा रेत से निकलने वाली बालू खुखड़ी, पन्ना, जामुन, बडख़ा, भूंडू, बोरडा, टंकस खुखड़ी कहते हैं। सबसे ज्यादा बालू, भंूडू और टंकस खुखड़ी को लोग ज्यादा खाते हैं। जबकि सोरवा खुखड़ी का उपयोग सब्जी के अलावा दवाई बनाने में भी किया जाता है। 
    सबसे स्वादिष्ट खुखड़ी पतेरी
    खुखडिय़ों में सबसे ज्यादा स्वादिष्ट पतेरी नामक खुखड़ी है। इसका स्वाद अन्य सभी खुखडिय़ों की अपेक्षा श्रेष्ठ स्वाद वाला होता है। खुखड़ी की जानकारी  देते चिकू सनमानी कहते हैं, अपने नाम के जैसा यह जंगलों में पत्तों के बीच में छुपा रहता है। इसे खोजना कठिन है। ग्रामीण  जंगलों में  गिरे पत्तों को हटाकर इसकी तलाश करते है। यह खुखड़ी भी जिस स्थान पाया जाता है भारी मात्रा में निकलता है। इसके ऊपर का कुछ ही हिस्सा जमीन के उपरी भाग में हल्का दिखाई देता है।  इसकी आवक होने में अभी देरी है।  यह खुखडी अपने स्वाद के लिए मशहूर है। जिसके चलते बाजार में आने के साथ ही यह हाथों हाथ बिक जाती है। शुरूआती दौर में यह खुखरी भी 4 से 5सौ रूपये किलो तक स्थानीय बाजार में बिकती है। ग्रामीण दिन भर इसकी तलाश में जंगलों की खाक छानते रहते हैं। 
    जंगली पुटू की विशेष मांग
    कोरिया के जंगलों में सामान्य पुटू के अलावा जंगली पुटू भारी मात्रा में निकलता है। यह पुटू बरसात शुरू होने के कुछ दिन में ही निकलता शुरू हो जाता है। यह पुटू जमीन के अंदर रहता है इसकी तलाश करना मुश्किल होता है। लेकिन जानकार ग्रामीण इसकी तलाश कर लेते हंै। ग्रामीण बताते हैं कि जंगली पुटू जमीन के अंदर रहता है, जहां पर यह मिलता है वहां की जमीन थोड़ी उठी हुई दिखाई देती है जिसकी थोड़ी खुदाई करने पर एक ही स्थान पर भारी मात्रा में यह निकलता है। खासकर यह जंगलों में ही निकलता है। शहर के बाजार में जंगली पुटू की आवक बढ़ गई है। शुरूआत में जंगली पुटू शहर के बाजार में 4 सौ रूपये प्रति किलो के दर से बिका। जिले के रामगढ़ से लेकर भरतपुर क्षेत्र के जंगलों से भारी मात्रा में जंगली पुटू की आवक शहरों में होती है।

    गर्भवती इसे न खाएं
    डॉइटेशन पूजा त्रिपाठी का कहना है कि खुखड़ी सभी अवस्था के लोग खा सकते हैं, इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा पाया जाता है।  इसे कच्चा खाना नुकसानदेह होता है। सभी खुखडिय़ों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इनकी कुछ प्रजातियां जहरीली होती हैं। इन्हें खाने से हीमोग्लोबिन बना रहता है। इसमें प्रचुर मात्रा में फॉलिक एसिड एवं लौह तत्व पाया जाता है जो कुपोषण से बचाता है। गर्भवतियों  को इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

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