विशेष रिपोर्ट

28-Jul-2020 4:07 PM

    29 जुलाई : राष्ट्रीय बाघ दिवस    

प्रदीप मेश्राम

राजनांदगांव, 28 जुलाई (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। राजनांदगांव जिले के घने जंगलों में भले ही बाघों का स्थाई ठिकाना नहीं है, लेकिन यहां के जंगल बाघों की निगाह में सुरक्षित कारीडोर रहा है। साल में कम से कम दो बार देश के दो बड़े प्रख्यात राष्ट्रीय अभ्यारण्य ताड़ोबा (गढ़चिरौली) और कान्हा नेशनल पार्क (मध्यप्रदेश) के बीच बाघ राजनांदगांव जिले के जंगल को एक सुरक्षित कारीडोर मानकर आवाजाही करते हैं। 

वन महकमे को बाघों की मौजूदगी के प्रमाण उनके पदचिन्हों से मिलता है।  बताया जाता है कि बाघनदी के रास्ते दोनों नेशनल पार्क से बाघों का आना-जाना होता है। यह बाघ एक तरह से इसे कारीडोर के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हालांकि बीते दो दशक में राजनांदगांव जिले में बाघों का स्थाई ठौर नहीं रहा है। 
बताया जा रहा है कि यहां की आबो-हवा पूरी तरह से अनुकूल है। पिछले कुछ सालों में बाघों का शिकार होने के कारण भी राजनांदगांव जिले से उनकी बसाहट खत्म हो गई है। ताड़ोबा और कान्हा नेशनल पार्क को बाघों के लिए ही जाना जाता है। बाघ औसतन सालभर में दो बार राजनांदगांव के भीतरी जंगलों से होकर दोनों पार्कों के बीच फासला तय करते हैं। बताया जाता है कि बाघनदी के रास्ते साल्हेवारा के जंगलों से होकर बाघ कान्हा नेशनल पार्क में पहुंचते हें। यह एक सुखद पहलू है कि बाघों  की आवाजाही के लिए यहां का जंगल अनुकूल है। 

बताया जाता है कि 70-80 के दशक में ही बाघों की नांदगांव जिले में दहाड़ सुनाई देती थी। साल्हेवारा क्षेत्र में विशेषकर बाघों का स्थाई डेरा रहता था। धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे बाघों की संख्या घटना के कारण जिले में उनकी धमक कम हो गई। इस संबंध में राजनांदगांव डीएफओ बीपी सिंह ने च्छत्तीसगढ़’ से कहा कि बाघ अब इस जिले को कारीडोर के रूप में उपयोग कर रहे हैं। एक निश्चित रास्ता बनाकर यहां से बाघों की आवाजाही होती है। 

मिली जानकारी के मुताबिक राजनांदगांव वन मंडल  925 वर्ग किमी में फैला हुआ है। बाघों के लिए बाघनदी से लेकर साल्हेवारा का इलाका बेहतर माना जाता है। इन इलाकों में पहाड़ी होने के कारण बाघों की सुरक्षा  में कोई अड़चने नहीं होती है। लंबे समय से साल्हेवारा क्षेत्र बाघों की मौजूदगी के लिए माना जाता  रहा है।
 
गौरतलब है कि 2012-13 में छुरिया इलाके में ग्रामीणों की भीड़ ने बाघ को मार डाला था। उस समय भी बाघ ताड़ोबा से भटककर राजनांदगांव जिले के जंगल में दाखिल हुआ था। दो साल पहले भी बाघनदी क्षेत्र में बाघ भटककर सडक़ में नजर आया था। कुल मिलाकर राजनांदगांव के जंगल में अनुकूल वातावरण है। बाघ के लिए हिरण और जंगली सूअरों की जिले में भरमार भी है। फिलहाल नांदगांव के जंगल से बाघों का सालों से गुजरने का सिलसिला जारी है। 


22-Jun-2020 7:57 PM

सुरेन्द्र सोनी

बलौदा (जिला जांजगीर चांपा), 22 जून। उत्तरप्रदेश के ईंट भठ्ठे में काम करने वाले 65 मजदूरों को ईंटा भठ्ठा ने पूरी मजदूरी ने देकर अकबरपुर रेलवे स्टेशन में छोड़ दिया, यहां से रेलवे ने रांची भेज दिया। रांची में भटकने के बाद प्रशासन ने छत्तीसगढ़ के बॉर्डर में उतार कर बस वापस लौट गई। पैदल ही छत्तीसगढ़ की सीमा रायगढ़ में पहुंचे। किसी तरह मजदूरों की गुहार पर अफसरों ने बस से रवाना किया गया, लेकिन बस चालक और कंडक्टर ने कोरबा बलौदा के बीच कनकी पंतोरा बेरियर के पहले ही इन्हें उतार दिया। बलौदा पुलिस थाना के बाद इन्हें जबरन उतार कर दो हजार लेकर बस चालक वहां से वापस लौट गया।

तीन चार दिनों से भूखे प्यासे मजदूर बच्चों के साथ शाम को सडक़ में खड़े रहे, लेकिन थाने से भी मदद नहीं मिली। नगर के युवक ने सूखा राशन दिया तो चूल्हा जलाकर भोजन बनाया। रात में ही मजदूरों ने मस्तूरी ब्लॉक बिलासपुर में परिजनों को वाहन के प्रबंध कराने की सूचना दिए। आज सुबह मस्तूरी बिलासपुर प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और परिजनों के सहयोग से मजदूर बलौदा से सुबह 8 बजे अपने गृह ग्राम के लिए रवाना हुए।

च्छत्तीसगढ़’ संवाददाता ने रविवार शाम 5 बजे  बलौदा के सब्जी बाजार में उतरे मजदूरों को देखा। मजदूरों ने बताया कि उत्तरप्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले के ईंटा भ_े में काम करने वाले महिला पुरुष और 20 बच्चे  सहित 65 मजदूरों को छत्तीसगढ़ जाने के लिए पांच दिन पहले ईंटा भ_ा मालिक ने अकबरपुर रेलवे स्टेशन में छोड़ दिया।

बारिश होने के कारण से ईंटे भ_े का काम बंद हो गया तो र्इंटा भ_ा मालिक ने काम बंद होने का हवाला देकर बाहर का रास्ता दिखा दिया, जबकि कोरोना काल के लॉकडाउन में इन लोगों से भरपूर काम लिया और इनकी मेहनत की कमाई भी पूरा नहीं देकर जगह खाली करने को कहा। जहां पर श्रमिक काम बंद होने से अपने राज्य अपने गांव जाने के लिए दिनभर इधर-उधर भटकते रहे।

बेहाल मजदूरोंं की काफी जद्दोजहदऔर गुहार लगाने के बाद वहां से रेलवे के द्वारा इनको एक ट्रेन जो झारखण्ड के मजदूरों को ले कर रांची झारखण्ड जा रही थी उसी में बैठा के रांची के लिए भेज दिया, जबकि इन्हें छत्तीसगढ़ के बिलासपुर आना था। रांची झारखण्ड में इन्हें उतार दिए और अपने साधन से छत्तीसगढ़ जाने को कह रेलवेस्टेशन से बाहर कर दिए रांची में फिर से मजदूर भटकते रहे। फिर वहां के प्रशासन के द्वारा इन्हें बस की व्यवस्था कर छत्तीसगढ़ के बॉर्डर में उतार कर बस वापस लौट गए।

वहां से सभी मजदूर बच्चों सहित भारी भरकम अपना सामान लादे पैदल ही छत्तीसगढ़ की सीमा रायगढ़ में पहुंचे यहां भी इन्हें सहयोग मिलने के बजाए ताने सुनने को मिला। किसी तरह मजदूरों की गुहार उच्चाधिकारियों तक गई जहां से इनके निवास स्थान तक पहुंचाने का भरोसा दिलाया कर बस में बैठाया गया और बस रवाना हुआ, लेकिन बस चालक और कंडक्टर ने कोरबा बलौदा के बीच कनकी पंतोरा बेरियर के पहले ही इन्हें उतार दिया। इसकी जानकारी वहां बेरियर के पास कोरबा एसडीएम को हुई तो उनके चर्चा के बाद  बस चालक बलौदा के बछोद पॉइंट तक छोडऩे पर राजी हुआ। इस बीच बस चालक के द्वारा डीजल हेतु पैसे की मांग की गई तब अधिकारियों ने असमर्थता बताई और मजदूरों को ही पैसे देने को कहा। लेकिन मजदूरों का कहना है कि पैसे देने की कोई सहमति नहीं हुई थी और इसी वजह से बस चालक ने बलौदा पुलिस थाना के बाद दैनिक सब्जी बाजार के पास इन्हें जबरन उतार कर इन लोगों से दो हजार लेकर बस चालक वहां से वापस लौट गया।

अब बेसहारा, तीन चार दिनों से भूखे प्यासे मजदूर छोटे छोटे बच्चों के साथ शाम को 5 बजे बीच सडक़ में खड़े रहे। उन्होंने नजदीक बलौदा के पुलिस थाना में मदद की गुहार लगाई, लेकिन बलौदा पुलिस ने भी इन्हें दूसरे जिले से हो कह कर वहां से भगा दिया।

जांजगीर-चांपा जिले बलौदा नगर के एक युवा गोपेश गौरहा ने देखा कि मजदूर और छोटे-छोटे बच्चे भूखे प्यासे हंै तो गोपेश ने उन सभी के लिए चावल, दाल सब्जी प्याज टमाटर, सोयाबीन बड़ी, और लकड़ी, दोना पत्तल की व्यवस्था कर उन्हें भोजन बनाने के लिए दिया। चार दिनों के भूखे प्यासे श्रमिकों ने सब्जी बाजार के सेड के नीचे ही चूल्हा जला कर भोजन बनाया और खा कर रात्रि वहीं विश्राम किये। तब तक बलौदा के अधिकारियों को इसकी खबर नहीं थी, जबकि बलौदा पुलिस इन्हें पहले ही आगे के लिए चलता कर दिए थे।

रात में ही मजदूरों ने मस्तूरी ब्लाक बिलासपुर  में अपने-अपने परिजनों को यहां पहुंचने और कोई वाहन के प्रबंध करने कराने की सूचना दिए। आज सुबह मस्तूरी बिलासपुर प्रशासन,जनप्रतिनिधियों और परिजनों के सहयोग से मजदूर बलौदा से सुबह 8 बजे अपने गृह ग्राम के लिए रवाना हुए।

 

 


17-Jun-2020 7:30 PM

बड़ा नाला लबालब होने से बच्चे आंगनबाड़ी-स्कूल नहीं जा पाते

चंद्रकांत पारगीर

बैकुंठपुर, 17 जून । कोरिया जिले का एक ऐसा आश्रित ग्राम जो बारिश में पूरी तरह अपने ग्राम पंचायत मुख्यालय से कट जाता है। बारिश के दिनों में बड़े नाले में पानी रहने के कारण कुछ बच्चे आंगनबाड़ी भी नहीं जा पाते है, तो कुछ स्कूल। वहीं जिले की बॉर्डर का अंतिम ग्राम होने के कारण विकास की किरण यहां अब तक नहीं पहुंच पाई है। काफी दूर होने के कारण अफसर ग्रामीणों की सुध नहीं लते है। यही कारण है कि ज्यादातर विकास कार्य कागजों में ही सिमट कर रह गए है। ‘छत्तीसगढ़’ ने मंगलवार को गांव जाकर हाल जाना व ग्रामीणों से बातचीत भी की।

ज्ञात हो कि कोरिया जिले के खडग़वां तहसील के ग्राम पंचायत मुगुम के आश्रित ग्राम कांसाबहरा जाने के लिए पंचायत मुख्यालय से दो किमी की दूरी तय कर एक जिंदा नाले को पार करना पड़ता है। बारिश के दिनों में इस नाले को पार करना बेहद कठिन काम होता है। ग्राम के कुछ लोगों के साथ कई मवेशी भी इस नाले के बहाव में कई बार बह चुके हैं। करीब 12 वर्ष पहले तत्कालीन संसदीय सचिव नाले तक पहुंचे थे और नाले पर पुल बनाने का आश्वासन दिया था। मंत्री बनने के बाद चुनाव के समय फिर वो नाले तक पहुंचे, वोट मांगा और इस बार फिर पुल बनाने का आश्वासन दे दिया, पर पुल आज तक नहीं बना और ग्रामीणों की परेशानियां भी खत्म नहीं हुई। वहीं ग्रामीणों को अपना राशन लेने ग्राम पंचायत मुगुम जाना पड़ता है, वह भी नाले को पार करके। वहीं कुछ बच्चों को आंगनबाड़ी जाना होता है तो 6वीं से आगे की पढ़ाई करने वाले बच्चों को भी मुगुम जाने के लिए इसी रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसे में नाले को पार करने का खतरा हमेशा बना रहता है। ग्राम से बाहर जाने का दूसरा रास्ता है जो कोरबा जिले की तरफ खुलता है। धनपुर से जंगल के बीच होकर ग्रामीण मुख्य मार्ग तक पहुंच जाते है परन्तु उनको अपने काम के लिए ग्राम पंचायत मुगुम की जाना पड़ता है, जो बिना नाला पार किए नहीं जा सकते है।

कागजों पर बन गए कई विकास कार्य

ग्राम पंचायत मुगुम का आश्रित ग्राम कांसाबहरा में कई कार्य स्वीकृत हुए और कागजों पर बन भी गए। ग्रामीणों की मानें तो यहां हैडपंप के करीब स्नानागार बनाया जाना था, पैसा आया और कागजों पर स्नानागार बनकर पैसा निकल भी गया, परन्तु भौतिक रूप में अब तक किसी भी हैंडपंप में स्नानागार नहीं बन सका है। वहीं देवगुड़ी में चबूतरा निर्माण होना था, यहां त्यौहार में पूरा गांव जुटता है, परन्तु यह भी कागजों पर भी बना दिया गया।

इसी तरह इस गांव में एक भी सीसी रोड का निर्माण नहीं हुआ है। बारिश के इस मौसम में सडक़ों पर पैदल चलना भी दूभर है। पीली और चिकनी मिट्टी होने के कारण पैदल लोग फिसल कर घायल हो रहे है। सडक़ों में कई वर्षों से मुरूमीकरण तक नहीं हुआ है। इसी तरह यहां सामुदायिक भवन भी आया था, परन्तु बना आज तक नहीं है।

किसी काम के नहीं शौचालय

कांसाबहरा में 303 वोटर है, यहां की जनसंख्या में 500 के आसपास है, ऐसे में वर्ष 2017-18 में कई ग्रामीणों के शौचालय आज तक नहीं बनाए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जो शौचालय बने भी है वो किसी काम के नहीं है, सिर्फ शौचालयों को खड़ा कर दिया गया, ना तो सोखता बनाया गया और ना ही शौचालय में शीट लगाई गई। वहीं शौचालय में काम करने वाले स्थानीय मजदूरों को आज तक मजदूरी नहीं दी गई है, और पूरे ग्राम पंचायत को ओडीएफ घोषित कर दिया गया। ग्रामीणोंं ने कई बार मजदूरी की मांग की, परन्तु किसी ने सुध नहीं ली।

आंगनबाड़ी स्कूल जर्जर

कांसाबहरा ग्राम में स्थित आंगनबाड़ी भवन जर्जर हो चुका है, वहीं प्राथमिक स्कूल की हालत बेहद खराब है, ग्रामीणों का कहना है कि दोनों ही भवन का प्लास्टर कई बार गिर चुका है, आंगनबाड़ी भवन की छत तो एकदम ही खराब हो चुकी है। स्कूल भवन के साथ रसोईघर की दीवार भी टूट कर गिर चुकी है। वहीं ग्रामीणों की मांग है कि उनके गांव में एक सामुदायिक भवन, एक मिनी आंगनबाड़ी के साथ जल्द से जल्द नाले पर पुलिया निर्माण करवाई जाए।

इस संबंध में बैकुंठपुर विधायक अंबिका सिंहदेव का कहना है कि बारिश के मौसम में वहां ये परेशानी प्राय: देखी जाती है। उक्त पुल निर्माण के लिए मेरे द्वारा प्रस्ताव बनाने को कहा गया है, मैं मुगुम गई थी तभी मुझे वहां के लोगों ने बताया था, दूसरी ओर से वहां दो हैंडपंप का खनन कार्य भी करवाया गया है, जो हैंडपंप बिगड़े है, उन्हें भी सुधार कार्य करवाने के लिए विभाग को कहा गया है।

हाथियों का रहवास

कोरिया जिले के खडग़वां में आने वाले हाथियों का कांसाबहरा रहवास माना जाता है, कुछ माह पूर्व आए हाथी का दल यहां दो माह रूका, कुछ ग्रामीणों की फसल खाई, एक दो ग्रामीणों के घरों को हल्का नुकसान पहुंचाया, ग्रामीण बताते हैं कि इस बार दो माह रूके हाथियों दल में दो शावकों का जन्म यही हुआ, उनके बच्चे जब तक चलने लायक नहीं हो जाते, तक तक उन्हें रूकना पड़ता है, ऐसे में हाथी रात के साथ साथ दिन भी गांव में घूमते रहते थे। इस दौरान किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई थी।

 

 

 


29-May-2020 8:17 PM

कहते हैं-अभी दिन बीता रहे, आगे रोजी-रोटी कैसे चलेगी?

तिलक देवांगन

रायपुर, 29 मई। लॉकडाउन में करीब तीन महीने से लगातार काम बंद होने से सैकड़ों प्रवासी मजदूर दुखी और चिंतित हैं। वे कहते हैं कि क्वारंटाइन सेंटर में जैसे-तैसे दिन बीता रहे हैं, लेकिन उनकी चिंता आगे परिवार के भरण-पोषण को लेकर हैं। गांव में खेती बहुत कम है या नहीं है। ऐसे में ही उन्हें बाहर कमाने-खाने के लिए जाना पड़ा था। उनकी मांग है कि सरकार गांव में ज्यादा से ज्यादा समय के लिए उन्हें रोजगार मुहैया कराएं।

‘छत्तीसगढ़’ ने आज लखनऊ से लौट कर क्वारंटाइन सेंटर में रखे गए कई मजदूरों से फोन पर चर्चा की। इस दौरान इन मजदूरों ने क्वारंटाइन सेंटर की व्यवस्था से लेकर अपनी रोजी-रोटी पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि गांव में उनके पास आय का कोई जरिया नहीं है। थोड़ी बहुत खेती-खार के भरोसे घर के बड़े बुजुर्गों का पेट चलता है। बाकी लोग रोजगार की तलाश में अलग-अलग जगहों पर चले गए थे और वहीं रेजा, कुली, राजमिस्त्री वगैरह का काम करते हुए परिवार चला रहे थे। लॉकडाउन में उन सभी का काम बंद हैं और अब वहां से आकर यहां क्वारंटाइन सेंटर में पड़े हैं।

बेमेतरा के आटेबंध गांव का दुखित साहू बताता है कि उसके घर खेती नहीं है और वह पिछले कुछ साल से लखनऊ में रोजी-मजदूरी कर रहा था। उसके साथ गांव के 80-85 और लोग भी गए थे। सभी मकान-भवन निर्माण काम से जुड़े थे। 12 मार्च के बाद से सभी का काम बंद है। सरकार ने 17 मई की रात घर वापसी करा उन्हें गांव के क्वारंटाइन सेंटर में रखा है। लेकिन आगे यहां रोजगार मिलेगा या नहीं, इसकी कहीं कोई गारंटी नहीं है। सभी दिन-रात यहीं सोचते हैं कि सेंटर से घर जाने के बाद आगे क्या होगा। उनका परिवार कैसे चलेगा।

नवागढ़ के झाल गांव का हरिशंकर, अपनी पत्नी लक्ष्मीन व एक बच्चे के साथ लखनऊ कमाने-खाने के लिए गया था। 12 दिन से ये लोग भी गांव के स्कूल में क्वारंटाइन में हैं। इन दोनों पति-पत्नी की चिंता भी रोजगार को लेकर बनी हुई है। लक्ष्मीन कहती है कि क्वारंटाइन सेंटर में उनकी दिन लगभग बीत गया। अब वापस घर जाने की बारी है। लेकिन चिंता यह है कि गांव में खाएंगे क्या और कमाएंगे क्या। उन्हें डर है कि उनके घर की हालत पहले जैसे फिर से खराब न हो जाए। राज्य सरकार से आग्रह है कि उन्हें गांव में पूरे दिन रोजगार दिलाएं।

साजा के बीजा गांव का राजू साहू 17 की रात अपने मां-बाप के साथ लखनऊ से गांव वापस आया। सभी क्वारंटाइन सेंटर में हैं। राजू बताता है कि गरीबी के चलते वे लोग पिछले दो-तीन साल से लखनऊ जा रहे थे। वहां उन्हें निर्माणाधीन मकान में मजदूरी मिल जा रही थी। घर में उसके दादा के पास आधा एकड़ खेती है, जिसके भरोसे पूरे परिवार को चलाना कठिन था। कुछ लोग बता रहे हैं कि मनरेगा के तहत गांव में रोजगार चल रहा है। सेंटर से निकलने के बाद उनका भी प्रयास होगा कि वहीं उन सबको भी रोजगार मिल जाए। काम न मिलने पर उसके घर फिर से गरीबी हावी हो जाएगी। क्योंकि तीन महीने से सभी तीनों खाली बैठे हैं।

14 दिन के राशन के लिए मिला है पांच सौ रुपये

साजा के बेलतरा गांव का थानेश्वर साहू अपनी पत्नी व बच्चे के साथ पिछले 12 दिन से गांव के क्वारंटाइन सेंटर में हैं। वह बताता है कि उसके यहां क्वारंटाइन सेंटर में सब कुछ अस्त-व्यस्त जैसा है। उसे यहां 14 दिन के राशन के लिए पांच सौ रुपये दिया गया था, जो कुछ ही दिन में खत्म हो गया। अब उनकी समस्या राशन को लेकर बनी हुई है। वे पंचायत सचिव वगैरह को कई बार बोल चुके हैं, पर उसकी यह समस्या दूर नहीं हो रही है। उन्हें और पैसा नहीं दे रहे हैं। उसका कहना है कि बीमारी के डर से किसी भी तरह से क्वारंटाइन सेंटर में दिन बीता रहा हैं, बाकी यहां कोई इंतजाम नहीं है।

नाश्ते में मिलता है थोड़ा सा पोहा या एक बिस्किट

पेंडरीकला(साजा) का बीरसिंग लखनऊ में राजमिस्त्री का काम करता था और उसे वहां साढ़े 6 सौ रुपये मजदूरी मिलती थी। साथ में उसकी पत्नी कीर्ति भी मजदूरी कर रही थी। अब दोनों यहां गांव में क्वारंटाइन सेंटर में हैं। उसका कहना है कि सेंटर में नाश्ता में कभी सिर्फ चाय तो कभी सिर्फ एक बिस्किट मिलती है। कभी-कभी मुश्किल से सौ ग्राम पोहा देते हैं। इस नाश्ते से उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं है, पर बच्चों की तकलीफ बढ़ गई है। सेंटर में जो 25-30 परिवार हैं, उनके बच्चे नाश्ते के समय रोते हुए और बिस्किट या पोहा मांगते हैं, पर उन्हें दोबारा कुछ नहीं मिल पाता। यह देखकर बड़ा दुख पहुंचता है।

क्वारंटाइन सेंटर में खुद खाना बना रहे मजदूर

बेरला के खिसोरा गांव का कृपा साहू अपनी पत्नी पुन्नी औ दो बच्चों के साथ लखनऊ से वापस आया है। वह पिछले 12 दिन से गांव के एक क्वारंटाइन सेंटर में है। यह मजदूर बताता है कि वह पिछले 18 साल से लखनऊ में रोजी-रोटी चला रहा था। उसके पास आधा एकड़ की खेती है, जिससे परिवार चला पाना कठिन है। इसी मजबूरी के चलते वह लखनऊ में पड़ा था। क्वारंटाइन सेंटर में आने के बाद उसे सब्जी, राशन, लकड़ी आदि सब सामान दे दिए गए हैं। वे लोग खुद खाना बना रहे हैं। उसके साथ सेंटर में 10-12 मजदूर और हैं, और सभी ऐसा ही कर रहे हैं।

सेंटर में 13 दिन बीत गए घर जाने पर रोजगार नहीं

माडरा(साजा)का सियाराम का भी यही कहना है कि क्वारंटाइन सेंटर में उन्हें दाल-चावल, सब्जी व अन्य सभी सामान दिए गए हैं और सभी इसी सेंटर में खुद खाना बनाकर खा रहे हैं। सेंटर में उनका 13 दिन बीत गया है और अब घर जाने की बारी है। सियाराम बताता है कि लखनऊ मेंं वह अपनी पत्नी संतोषी, एक बच्चे साथ रहता था। साथ में उसका एक छोटा भाई टेकराम भी था। सभी मकान में मजदूरी कर रहे थे और साढ़े तीन से चार सौ रुपये मजदूरी मिल रही थी। उनकी चिंता अब घर पहुंचने के बाद की हो रही है। क्योंकि गांव में उनके पास कोई रोजगार नहीं है।

शौचालय नहीं, गर्मी से बेहाल

ग्राम-कुर्रा(साजा)का रहने वाला मकसूदन अपनी पत्नी शकुंतला के साथ लखनऊ कमाने-खाने के लिए गया था। 17 की रात ये लोग भी टे्रन से रायपुर होकर वापस अपने गांव पहुंचे। उनके साथ गांव के आठ-दस लोग और हैं। उनका कहना है कि पिछले 12 दिन से सभी क्वारंटाइन सेंटर में हैं और भीषण गर्मी से बेहाल हैं। सेंटर में खाने-पीने के इंतजाम ठीक है, पर शौचालय नहीं है। उन्हें बाहर खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। सेंटर में सिर्फ एक पंखा है। ऐसे में भारी गर्मी से सभी लोग बेहाल हैं।

 

 


02-May-2020

कहा-ईपास ब्लॉक, नहीं हो पा रही घर वापसी ‘छत्तीसगढ़’ को जवान ने बताई समस्या

अमन सिंह भदौरिया

दोरनापाल, 2 मई (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। बेंगलुरु के आर्मी ट्रेनिंग सेंटर में फंसे सेवानिवृत्त आठ जवानों ने ‘छत्तीसगढ़’ के माध्यम से सरकार से मदद मांगी है। सभी आठ जवान 31 मार्च को ही सेवानिवृत्त हुए थे।

मामला बेंगलुरु के सेना सेवा कोर ट्रेनिंग सेंटर का है, जहां छत्तीसगढ़ के सात अलग-अलग जिले के 8 जवान बीते 31 मार्च को सेवानिवृत्त हो गए थे जिसके बाद से लॉक डाउन के चलते वह घर वापस नहीं जा पा रहे हैं। घर वापसी के लिए इन्होंने ई-पास में भी अप्लाई करने की कोशिश की मगर छत्तीसगढ़ का ई-पास ब्लॉक होने की वजह से उन्हें पास भी नहीं मिल पा रहा है।

जवानों ने च्छत्तीसगढ़’ को बताया कि उन्होंने इंस्टाग्राम के माध्यम से मुख्यमंत्री व गृहमंत्री को भी अपनी समस्या बता कर मदद मांगी मगर संपर्क नहीं हो पाया। जवानों ने बताया कि ना केवल छत्तीसगढ़ के 8 जवान बल्कि यूपी बिहार झारखंड व अन्य कई राज्यों के सेवानिवृत्त जवान भी ट्रेनिंग सेंटर में फंसे हुए हैं जो अपने घर वापस जाना चाहते हैं मगर शासन तक बात नहीं पहुंच पा रही।

जवानों ने कहा ना तो हम स्कूल कॉलेज के छात्र हैं और ना ही मजदूर, सरकार इन सभी की घर वापसी करवा रही है। अब हम सेना से भी सेवानिवृत्त हो चुके हैं इस वजह से घर वापसी के लिए सेना से भी मदद नहीं मिल पा रही है। सरकार जिस तरह बाहर राज्यों में फंसे मजदूरों व छात्रों को निकालकर घर वापसी करवा रही है इसी तरह हम जवानों की भी मदद करें या ई पास दिलवा दे ताकि हम अपने परिवार तक पहुंच सकें।

कर्नाटक राज्य के बेंगलुरु के ट्रेनिंग सेंटर में बीते माह सेवानिवृत्त हो चुके छत्तीसगढ़ के जवानों ने अब घर वापसी की इच्छा जताई है। जवान धर्मेंद्र सिंह राठौर ने फोन के माध्यम से छत्तीसगढ़ संवाददाता से संपर्क कर अपनी समस्या बताते कहा कि शासन स्तर तक उनकी बात नहीं पहुंच पा रही है। परिवार भी परेशान है। ऐसे में बगैर पास और अनुमति के वे घर नहीं लौट सकते। ई-पास के लिए भी अप्लाई करने की कोशिश की गई, मगर ई-पास ब्लॉक होने की वजह से उन्हें यह सुविधा नहीं मिल पा रही है।

ऐसे में शासन की मदद से ही वे घर लौट सकते हैं क्योंकि लॉकडाउन का तीसरा चरण जल्द ही लागू होगा जिसके बाद निकल पाना मुश्किल होगा। सभी 8 जवानों ने मीडिया के माध्यम से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल व गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू से मदद की अपील की है कि उन्हें कर्नाटक से घर वापसी करवाई जाए।

जवानों ने मुख्यमंत्री व गृहमंत्री को इंस्टाग्राम में भेजा संदेश

बेंगलुरु के ट्रेनिंग सेंटर में फंसे सेना के जवानों ने शासन प्रशासन से संपर्क करने की कोशिश की का माध्यम ना होने से मुख्यमंत्री भुपेश बघेल व गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू के इंस्टाग्राम में उन्हें संदेश देकर अपनी समस्या रख मदद मांगी। एक जवान ने इंस्टा के माध्यम से मुख्यमंत्री और गृह मंत्री को लिखा-मैं भारतीय सेना के ट्रेनिंग सेंटर एएससी सेना सेवा कोर से आपको अनुरोध कर रहा हूं। हम छत्तीसगढ़ के 8 सैनिक 31 मार्च को सेवानिवृत्त हो चुके हैं और अभी तक हमारे घर वापसी की किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। अनुरोध है कि हमें हमारे घर तक पहुंचाने की व्यवस्था करवाएं या फिर ई-पास दिलवाने की कृपा करें जिससे हम सब सेवानिवृत्त जवान आसानी से अपने परिवार तक पहुंच सकें। इस कृतज्ञ कार्य के लिए हम सभी जवान और हमारा परिवार आपका हमेशा आभारी रहेगा।

सेवानिवृत्त जवान धर्मेन्द्र सिंह राठौर का कहना है कि हमारे साथ 7 अन्य जवान छत्तीसगढ़ के हैं इसके अलावा यूपी बिहार अन्य राज्यों के जवान हैं जो 31 मार्च को सेवानिवृत्त होने के बाद से लाकडाउन के चलते घर नहीं लौट पा रहे हैं। हमने काफी कोशिश की शासन के लोगों से संपर्क कर अपनी समस्या रखने की मगर संपर्क नहीं हो पाया जिसके बाद आखरी रास्ता मीडिया ही दिखा उन तक सीधी बात रखने का । मैं छत्तीसगढ़ के माध्यम से मुख्यमंत्री व गृहमंत्री से अपील करता हूं कि हमारी मदद करें ताकि हम अपने परिवार तक पहुंच सकें इसके लिए हम सदैव आपके आभारी रहेंगे।

31 मार्च 2020 को सेवानिवृत्त हुए छत्तीसगढ़ के 8 जवानों की लिस्ट नाम व गृह जिलों समेत

- जिला बिलासपुर से प्रणव तिवारी

- जिला गौरेला पेंड्रा मरवाही से धर्मेंद्र सिंह राठौर

- जिला दुर्ग से छत्रपाल

- जिला रायगढ़ से नायक लव  कुमार बारिक, रजनीश बारा, नायक जितेंद्र राठौर

- भाटापारा से हेमलाल

- अंबिकापुर से एस सी मंडल


24-Apr-2020

पैसे नहीं, घंटों लाइन लगाने पर मिल रही 2-4 रोटी

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

रायपुर, 24 अप्रैल। प्रदेश के कबीरधाम, बेमेतरा, मुंगेली जिले के अलग-अलग गांवों से कमाने-खाने कानपुर उत्तरप्रदेश गए दर्जनों मजदूर अपने बीवी-बच्चों के साथ लॉकडाउन में फंस गए हैं। उनके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं है, जिससे वहां उनका गुजारा चल सके। पास की चौकी में घंटों लाइन लगाने के बाद दो-चार रोटी मिल पाती है। बाकी भूखे पेट उनका दिन बीत रहा है। दूसरी तरफ उनके एक-दो छोटे बच्चे गांव में बूढ़े मां-बाप के साथ हैं, जिसकी चिंता भी उन्हें सता रही है। उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार से जल्द वापसी की गुहार लगाई है।

प्रदेश के इन तीनों जिलों के फंसे मजदूरों ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में बताया कि करीब सौ मजदूर यहां होली मनाकर कमाने-खाने के लिए उत्तरप्रदेश के कानपुर पहुंचे। वे सभी वहां गुजैनी कच्ची बस्ती-सी ब्लॉक व अन्य जगहों पर रहकर दो-चार दिन मजदूरी कर पाए थे, कि लॉकडाउन लग गया। वे सभी वहां से  किसी भी तरह निकलकर अपने गांव वापस लौटना चाह रहे थे, लेकिन पुलिस सख्ती के चलते वहां से बाहर नहीं निकल पाए। ट्रेन-बस बंद होने से उनकी गांव वापसी का रास्ता बंद हो गया। अब वे सभी वहीं जैसे-तैसे पड़े हैं और लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि उनकी गांव वापसी हो सके।

कबीरधाम जिले के भगतपुर गांव का श्रवण चंद्रवंशी ने बताया कि उसके साथ उनके क्षेत्र से आए करीब 35-40 मजदूर हैं, जो कबीरधाम जिले के अलग-अलग गांव से कमाने-खाने पहुंचे हैं। सभी मजदूर कानपुर में एक ही जगह पर हैं और लॉकडाउन में जैसे-तैसे दिन बीता रहे हैं।

वह खुद अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ वहां फंसा है। होली त्योहार में यहां गांव आए थे। त्योहार के बाद सभी यूपी गए हैं। इस दौरान सभी लोग एक-दो या तीन-चार दिन ही मजदूरी कर पाए थे। करीब हफ्तेभर किसी सामाजिक संस्था ने मुफ्त खाना दिया। इसके बाद उन सभी लोगों को पास की एक पुलिस चौकी में खाने के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ रही है।

ग्राम-सोढ़ा (कबीरधाम) का कोमल चंद्रवंशी अपने परिवार के लक्ष्मण, कमला, प्रमिला, विकास, रोहित और रानी समेत 9 लोगों के साथ कानपुर में पड़ा है। होली के बाद वे सभी लोग वहां कमाने-खाने के लिए पहुंचे थे। लॉकडाउन में उन सभी की हालत पतली हो गई है। न खाने का ठिकाना, न सोने का। बदहाली में जिंदगी बीत रही है। उसका कहना है कि दो-चार दिन के लिए वे लोग छत ढलाई काम में जा पाए थे। बस, इसके बाद सभी फंसे पड़े हैं। कोमल व साथ रहने वाले मजदूरों का कहना है कि  गांव में थोड़ी बहुत खेती है, जिससे गुजारा नहीं चल पाता। ऐसे में उन्हें कमाने खाने के लिए यूपी तक दौड़ लगानी पड़ी। उन सभी को वहां चावड़ी से हर रोज काम मिल जाता है। चाहे वह भवन निर्माण संबंधी हो या और कोई।  मानिकचौरी (कबीरधाम)गांव के अजय साहू का कहना है कि यूपी में छग से उन्हें दो-तीन सौ ज्यादा मजदूरी मिल जाती है, इसलिए त्योहार के बाद वह वहीं कमाने के लिए चला गया। उसके साथ रूसे गांव का उसका एक साथी राकेश भी है। दोनों की शादी नहीं हुई है। उसका कहना है कि उसके क्षेत्र के करीब 40 लोग एक ही जगह फंसे हैं और सभी के सामने एक ही जैसी दिक्कत बनी हुई है। सभी के पास पैसे की कमी बनी हुई है। कई लोग के पास पैसे ही नहीं है। खाना पैकेट कड़ी धूप में पसीना बहाने के बाद मिल पाता है। गांव में खेती नही के बतौर होने से लोग वहां मजदूरी के लिए पहुंचे हैं। अब सभी को गांव वापसी की चिंता लगी हुई है।

भानपुर (कबीरधाम) का विजय साहू कानपुर में अपनी पत्नी कमला के साथ वहां है। उसके साथ करीब 12-15 मजदूर और हैं। उसका कहना है कि सभी लोग होली मनाकर कानपुर पहुंचे थे। वह खुद वहां सिर्फ एक दिन काम कर पाया था। अब सभी वहां लॉकडाउन में फंस गए हैं। उसका कहना है कि पास की एक पुलिस चौकी में घंटों लाइन लगाने के बाद उन्हें वहां खाने का पैकेट मिल पाता है। कई बार खाना नहीं मिलने पर अपने पास रखे बिस्किट आदि खाकर खाकर सो जाते हैं। कई बार पुलिस वाले वहां खाना देने के बजाय कई लोगों को भगा देते हैं। इस तरह उन सभी का दिन वहां बहुत ही कठिन हो गया है।

बेमेतरा जिले के बाघुल गांव का राजू साहू अपने भाई विजय साहू, लक्ष्मण, भांजा छोटू व अन्य रिश्तेदारों के साथ कानपुर यूपी गया है। उसका कहना है कि होली मनाकर सभी लोग एक साथ टे्रन से कानपुर पहुंचे। कोई दो दिन तो कोई चार दिन काम कर पाए थे, फिर लॉकडाउन लग गया और वे सभी फंस गए। उसका कहना है कि छत्तीसगढ़ में डेढ़ से दो सौ रुपये मजदूरी मिलती है।

यूपी में उन्हें तीन से पांच सौ रुपये तक मजदूरी मिल जाती है। चावड़ी से अलग-अलग जगहों पर मजदूरी के लिए जाते रहे। अब स्थिति यह है कि पास की एक पुलिस चौकी में घंटों लाइन लगाने के बाद खाना मिल पाता है। पैकेट में कभी दो तो कभी चार रोटी मिलती है। ऐसे में उन्हें कई बार भूखे पेट रात गुजारनी पड़ रही है।

मुंगेली जिले के ग्राम-डोणा का दिनेश साहू अपने परिवार समेत दो महीने पहले कानपुर पहुंचा। वहां उसका काम ठीक चल रहा था, कि लॉकडाउन लग गया। लगातार लॉकडाउन में उसका पास का राशन खत्म हो गया है। उसकी बस्ती में कभी-कभी कोई संस्था वाले खाना बांटकर चले जाते हैं। इस तरह उन लोगों का दिन बीत रहा है। उसका कहना है कि यूपी सरकार की ओर से उन्हें न कोई पैसा मिला और न कोई राशन। ऐसे में बस उन्हें अब गांव वापसी का इंतजार है। इसी जिले के पौनी गांव का मुंशी साहू का कहना है कि गांव में काम न मिलने से उसे मजदूरी के लिए यूपी जाना पड़ा। गांव में उसके मां-बाप के साथ उसकी पत्नी है और वह खुद कानपुर में फंसा है, जहां खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं है। वह गांव वापस जाना चाहता है, पर अब उसके पास पैसे भी नहीं है।

कानपुर कमाने-खाने के लिए कबीरधाम जिले के गांव निगापुर का ठाकुर राम साहू भी पहुंचा है  और वह लॉकडाउन के चलते परेशान है। उसका कहना है कि वह पिछले तीन साल से वहां कमानेे-खाने के लिए कानपुर जा रहा था, लेकिन इस बार वह बुरी तरह से फंस गया है, जहां से उसका निकल पाना कठिन हो गया है। गांव में उसके छोटे बच्चे हैं और पिता बिस्तर पर बीमार पड़ा है। मजदूरी कर अपने पिता का इलाज कराने का सोच रहा था, पर अब वह खुद कंगाल हो गया है। न उसके खाते में पैसा बाकी है और न घर में राशन। ऐसे में उसे एक-एक दिन निकाल पाना बहुत कठिन हो गया है। बहुत ही मुश्किल से खाने-पीने का इंतजाम हो पा रहा है।


23-Apr-2020

बाहर का खतरा टलते ही फौरन भेजने की व्यवस्था करेंगे-कलेक्टर 
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
महासमुन्द, 23 अप्रैल।
कल शाम ‘छत्तीसगढ़’ अखबार के जिला कार्यालय महासमुन्द में गांजर छात्रावास में क्वांरटीन एक व्यक्ति ने अपने मोबाइल नंबर से बात की। उसने ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि मैं घर वापस लौटना चाहता हूं। पिछले पंद्रह दिनों से बागबाहरा के एक शिविर में हूं। सुरेन्द्र सिंह बोल रहा हूं। उत्तरप्रदेश के जिला फरीदाबाद का रहने वाला हूं। ओडिशा काम करने गया था। लौटते समय यहां रोक लिया गया है। अब और कितने दिनों तक रखा जाएगा हमें। उत्तरप्रदेश में मेरा परिवार मेरा रास्ता देख रहा है। बच्चे रो रहे हैं। आपका नंबर एक युवक से मिला। आप मुझे गांव भिजवा दीजिए। अब मैं नहीं रह सकता। रह-रहकर सासें तेज हो जाती है। मुझे बीपी है। यहां शिविर में सभी को अपने घर जाना है, ज्यादा दिनों तक क्यों रखा जा रहा है हमें? 

कलेक्टर से इस संबंध में तत्काल ‘छत्तीसगढ़’ ने बात की तो वे कहते हैं कि बाहर अभी खतरा टला नहीं है। जाना सभी चाहते हैं अपने परिवार के पास लेकिन उन्हें हम सही सलामत उनके परिवारों को सौंपना चाहते हैं। जैसे ही माहौल ठीक होगा और ऊपर से आदेश आएगा, हम उन्हें घरों के लिए रवाना कर देंगे। 

कलेक्टर की बातें मोबाइल से सुरेन्द्र को बता दी गई। उन्हें समझाया गया कि रास्ते में यदि संक्रमण हो जाएं तो परिवार से मिलना तो दूर, वो आपका चेहरा भी नहीं देख पाएंगे। इसलिए माहौल ठीक होते तक यहीं रुकिए, आप हमारे मेहमान हैं। काफी टेंशन में थे सुरेन्द्र। आधे घंटे तक बातचीत के बाद बमुश्किल शिविर में रहने के लिए तैयार हुआ। बच्चों की तरह रोने लगा। फिर उसने कहा...तो ठीक है न..डॉक्टरों से कहिए कि हमसे मिलने आएं तो बीपी की दवाईयां साथ लेकर आएं। 

उनकी परेशानियां सुनकर कलेक्टर ने अपने अधिकारियों को सचेत कर दिया है कि किसी भी तरह की परेशानी मुसाफिरों को न हो। वैसे भी बातचीत में सुरेन्द्र ने इस बात का जिक्र जरूर किया कि उन्हें समय पर नाश्ता, खाना, पानी, साबुन, तेल सब कुछ मिल रहा है। अफसरों के अलावा कई लोग कुछ न कुछ आकर दे जाते हैं। ...लेकिन हमें अपने घर जाना है। यहां जिंदा तो हैं लेकिन जिंदगी गांवों में है। जल्दी भिजवा दीजिए। 

ज्ञात हो कि महासमुन्द जिला स्तर पर अब तक हुई कोरोना पड़ताल में 3 हजार 646 अंतरराज्यीय व 72 अंतरराष्ट्रीय यात्रियों का स्वास्थ्य परीक्षण कर होम क्वारंटीन किया जा चुका है। इसी क्रम में 47 व 22 जांच नमूने जोड़ कर कुल भेजे गए 69 प्रकरणों में 44 के ऋणात्मक परिणामों के अलावा 24 की रिपोर्ट आनी अभी बाकी है। वहीं एक सैंपल पहले ही निरस्त किया जा चुका है। सुबह से रात और फिर रात से सुबह, चौबीसों घंटे जिले में लगतार जारी है कोविड नियंत्रण रोकथाम। जहां, जिला कलेक्टर सुनील कुमार जैन के निर्देशन में प्रशासन, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग का संयुक्त दल कोरोना पर पैनी निगाह बनाई हुई हैं। 

हालांकि स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक जिले में अब तक करोना से संक्रमित एक भी प्रकरण नहीं पाया गया है। लेकिन होम क्वारंटीन किए जा रहे प्रकरणों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। प्राप्त अद्यतन जानकारी के मुताबिक दो मुख्य भागों में बांट कर कोरोना संदिग्ध प्रकरणों की पड़ताल की जा रही है। जिसमें पहले वे लोग आते हैं जिन्होंने हाल ही में देश के भीतर ही अलग-अलग राज्यों में यात्रा की है। इनका आंकड़ा तीन हजार छह सौ छियालीस तक आ पहुंचा है। वहीं, विदेश यात्रा कर लौटे लोगों में बहत्तर संक्रमण संदिग्ध प्रकरणों को जोड़ कर जिले में अब तक कुल तीन हजार सात सौ अठ्ठारह लोग शंका के घेरे में रखे जा चुके हैं। 

सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक डॉ. आरके परदल ने बताया कि इनमें से कुल छब्बीस सौ चैरान्नबे लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अठ्ठाइईस दिन के होम क्वारंटीन की अवधि को पूरा कर लिया है और किसी में भी कोरोना से संक्रमित होने के लक्षण सामने नहीं आने से वे सुरक्षित समझे जा रहे हैं। कुल एक हजार नौ संदिग्ध मरीज ऐसे हैं, जिनके क्वारंटीन के दिन अभी भरे नहीं। ऐसे में वे अब भी संक्रमण के संदेही कटघरे में बने हुए हैं। बहरहाल, शेष बचे होम क्वारंटीन प्रकरणों की नियमित रूप निगरानी जारी है। साथ ही क्वारंटीन केंद्र और अत्याधुनिक उपकरणों से लैस कोविड अस्पताल की सुविधाओं में भी कोरोना से निपटने के लिए पुख्ता इंतेजाम कर लिए गए हैं। जैसे ही हालात सुधरेंगे, सभी को घरों की ओर रवाना कर दिया जाएगा। 
 


27-Mar-2020

कोरोना प्रकोप, छोटे उद्योग 
बंद पर ब्लॉस्ट फर्नेस चालू!

सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल ने उद्योग सचिव को भेजा नोटिस
शशांक तिवारी
रायपुर, 27 मार्च (छत्तीसगढ़ संवाददाता)।
सरकार ने कोरोना संक्रमण की आशंका के चलते उद्योगों को बंद करने के आदेश तो दिए हैं, लेकिन ब्लॉस्ट फर्नेस में छूट दे दी गई है। जिसके कारण रायगढ़ के जिंदल सहित कई उद्योगों में यथावत उत्पादन हो रहा है। सरकार के फैसले पर कुछ मजदूर संगठनों ने आपत्ति उठाई है। सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल ने उद्योग विभाग के प्रमुख सचिव मनोज पिंगुवा को नोटिस भेजा है और उन्हें आदेश में ब्लॉस्ट फर्नेस की छूट को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की मांग की है, ऐसा नहीं करने पर न्यायालय में वाद दायर करने की चेतावनी दी है। 

रायगढ़ के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल ने फेसबुक पर लिखा है कि सरकारी आदेश से उद्योग बंद है। रामबाई की चक्की भी बंद है, लेकिन जिंदल की ब्लॉस्ट फर्नेस चालू है। रायगढ़ का जिंदल स्टील प्रदेश का निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा उद्योग है। सरकार ने कोरोना संक्रमण के चलते उद्योगों को बंद करने के आदेश दिए हैं। मगर इस आदेश में ब्लॉस्ट फर्नेस को छूट दी गई है। इस पर कुछ मजदूर संगठनों के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल ने भी आपत्ति की है। 

श्री अग्रवाल ने इस सिलसिले में प्रमुख सचिव मनोज पिंगुवा को फेसबुक के जरिए नोटिस भेजा है। उन्होंने नोटिस में उल्लेखित किया है कि कोरोना महामारी से बचने और उसके फैलने को रोकने की नीयत से प्रदेश के कुछ अत्यावश्यक उद्योगों को छोड़कर बाकी सभी उद्योगों को बंद करने का आदेश पारित किया गया है। इसमें ब्लॉस्ट फर्नेस को छूट दी गई है। 

श्री अग्रवाल ने कहा कि ब्लॉस्ट फर्नेस में केवल लोहे का उत्पादन होता है, जो कि अत्यावश्यक यथा खाने-पीने का सामान, दवाईयां और इससे संबंधित वस्तुएं इत्यादि की श्रेणी में नहीं आता है। ब्लॉस्ट फर्नेस और इससे जुड़ी कई अन्य इकाइयों में हजारों मजदूरों की जरूरत होती है। देश के प्रधानमंत्री तक ने लोगों को एक जगह एकत्र होने पर रोक लगा दी है। पूरे देश में कम्पलीट शटडाउन कर दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि आपने और सरकार ने बीना सोचे समझे, आम जनता और मजदूरों की चिंता किए बिना बगैर किसी निहित स्वार्थ से प्रेरित होकर आदेश पारित किया है। चूंकि घर से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई है। इसलिए यह पत्र रजिस्टर्ड पोस्ट से पे्रषित करने में असमर्थ हूं। यह नोटिस सोशल मीडिया के मार्फत प्रेषित की जा रही है। 

श्री अग्रवाल ने यह भी कहा कि उपरोक्त आदेश में ब्लॉस्ट फर्नेस में दी गई छूट तत्काल प्रभाव से निरस्त कर सूचित करें अन्यथा आपके खिलाफ सक्षम न्यायालय में वाद दायर किया जा सकेगा। जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी आपकी होगी और वाद में खर्च की भरपाई भी की जाएगी। 


24-Mar-2020

दीगर राज्यों से ट्रकों-किराए की गाडिय़ों में लौटते मजदूर

पिथौरा में आए 100 से अधिक को सेल्फ आइसोलेशन के निर्देश

रजिंदर खनूजा

पिथौरा, 24 मार्च (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। कोरोना वायरस की दहशत से नगर पूरी तरह सुनसान एवं शांत है। वहीं क्षेत्र से अन्य प्रांतों में काम के लिए गए मजदूरों की दबे पांव वापसी ने क्षेत्रवासियों की दहशत और बढ़ा दी है। क्षेत्र के विभिन्न गांवों में अब तक पहुंच चुके 100 से अधिक मजदूरों के बाद आज भी नागपुर से पिथौरा 8  मजदूरों का एक दल पहुंचा। नगर की स्थिति पर लगातार नजर बनाए कुछ पत्रकारों ने इसकी जानकारी पुलिस को दी। वहीं छत्तीसगढ़ संवाददाता को किराए की ऑटो में नागपुर से सरायपाली जाते मजदूर दिखे। ऐसे ही अन्य कई वाहनों में भी मजदूर दीगर राज्यों से आते दिखे।

दिन ब दिन कोरोना पॉजिटिव की बढ़ती संख्या ने क्षेत्रवासियों की चिंता बढ़ा दी है। लॉक डाउन की स्थिति में लोग दिन भर देश भर में कोरोना वायरस प्रभावित लोगों की तेजी से बढ़ती संख्या देख कर बेचैन होने लगे हंै। अधिकांश लोग अपने घरों में कैद है वहीं पुलिस पेट्रोलिंग वाहन भी घूम-घूम कर बगैर काम घूम रहे लोगों को घर भेज रही है, एवं सार्वजनिक स्थल एवं दुकानों में ग्राहकों की सीमित संख्या रखने की हिदायत देती दिख रही है।

लक्षण नहीं, होम आईसोलेट किया गया

दूसरी ओर स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अचानक सर्दी खांसी बुखार के मरीजों की बाढ़ सी आ गयी है। बीएमओ डॉ. तारा अग्रवाल ने बताया कि ओपीडी में भीड़ ना होने पाए इसके लिए कमरे से बाहर ही ओपीडी संचालित की जा रही है। मरीजों को उनकी पारी आते तक दूर दूर खड़े रहने की हिदायत दी गई है।

आज 8 मजदूर नागपुर से आये

आज सुबह से ही फोरलेन बाईपास के पास एक ट्रक से 8  मजदूरों का एक दल उतरा। ये मजदूर अपने ग्राम की ओर बढ़ते उसके पहले ही एक पत्रकार ने घटना की सूचना पुलिस को दी। सूचना के बाद स्थानीय एस डी ओ पी पुपलेश पात्रे ने बाइपास अपनी मोबाइल वेन भेज पर सभी मजदूरों से पूछताछ कर जांच हेतू स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र भेज गया।

खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. तारा अग्रवाल ने बताया कि इन सभी मजदूरों को लक्षण नहीं मिलने पर उन्हें उन्हीं के घर में सेल्फ आइसोलेट होने के निर्देश दिए गए हैं। डॉ. अग्रवाल के अनुसार अब तक पिथौरा क्षेत्र में उत्तर प्रदेश,जम्मू कश्मीर एवं महाराष्ट्र से कोई 100 से अधिक मजदूर आ चुके हैं जिन्हें सेल्फ आइसोलेट करने के निर्देश दिए गए हैं। सभी के रिकॉर्ड रखे जा रहे हैं। इसके अलावा ग्राम सरपंच,सचिव,आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं सहित ग्राम प्रमुखों को सेल्फ आइसोलेट किये गए लोगों की तबियत पता लगाते रहने निर्देशित किया गया है। सर्दी खांसी एवं बुखार की स्थिति में इसकी जानकारी तत्कार अस्पताल प्रशासन को देने की बात कही गईहै।

सख्ती लगातार जारी रहेगी-एसडीओपी

स्थानीय पुलिस के एसडीओपी पुपलेश पात्रे ने बताया है कि धारा 144 एवं शासन जिला प्रशासन के निर्देशों का पालन सख्ती से करवाया जाएगा। लोगों को यह भी समझाया जा रहा है कि खुद बचो बाकी लोगों को भी बचाओ।

ऑटो रिक्शा में नागपुर से सरायपाली

देश भर में यात्री वाहन एवं रेल बस बन्द होने के कारण अन्य प्रांतों में मजदूरी करने गए मजदूर बुरी तरह फंस गए है। इन मजदूरों को ईंट भट्ठा मालिकों ने तत्काल अपने घरों को जाने निर्देश देते हुए उनसे  भट्ठा खाली करवा दिया गया। खासकर उत्तर प्रदेश एवं महाराष्ट्र में तेजी से फैले कोरोना वायरस से भयभीत बेघर हो चुके मजदूर अब अपनी पूरी मेहनत के पैसों के अलावा भट्ठा मालिक से कर्ज लेकर 300 से 6 00 किलोमीटर दूर अपने घर पहुंचने के लिए ऑटो रिक्शा भाड़े में कर वापस आ रहे हैं। मंगलवार की सुबह नगर के बस स्टैंड में ऐसा ही एक मजदूर परिवार दिखा जिसके 6  सदस्य नागपुर से कोई 400 किलोमीटर दूर सराईपाली जाने के लिए निकले हंै। एक मजदूर ने कहा कि सरकार को अभी भी रास्ते मे फंसे मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए।