विशेष रिपोर्ट

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Posted Date : 17-Apr-2019
  • पीएम को जात बताने की जरूरत क्यों पड़ी, वे ही बता सकते हैं
    रायपुर, 17 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खुद को चोर बताने के जवाब में जाति कार्ड खेलने पर प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। मोदी ने भाटापारा की सभा में यह कहा कि यहां के साहू गुजरात के मोदी हैं। उनकी इस टिप्पणी को साहू वोटरों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री के छोटे भाई प्रहलाद मोदी ने कहा कि नरेन्द्र मोदी को अपनी जाति बताने की जरूरत क्यों पड़ी,  यह वे ही बता सकते हैं। उन्होंने कहा कि हम अपनी जात क्यों छिपाएंगे?

    प्रधानमंत्री के छोटे भाई प्रहलाद मोदी पिछले चार दिनों से छत्तीसगढ़ के दौरे पर थे। वे बिलासपुर-कोटा, भाटापारा, महासमुंद और अभनपुर में साहू समाज के पदाधिकारियों से रूबरू हुए। प्रहलाद मोदी के इस दौरे से राजनीतिक क्षेत्रों में हलचल मची हुई है। प्रदेश की लोकसभा की सीटों पर प्रचार जोरों पर है और ऐसे में प्रहलाद मोदी की सक्रियता को प्रदेश के सबसे ज्यादा साहू वोटरों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। 

    प्रहलाद मोदी ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि वे समाज के लोगों से मेल-मुलाकात के लिए आते हैं। उनका सिर्फ सामाजिक कार्यक्रम होता है। वे सक्रिय राजनीति में नहीं हंै और उनका किसी दल से कोई लेना-देना नहीं है। प्रधानमंत्री के खुद को साहू बताए जाने की जरूरत पर प्रहलाद मोदी ने कहा कि यह सवाल उनसे ही पूछा जाना चाहिए। जहां तक हमारा सवाल है हम मोदी (तेली) समाज के हैं और हमें अपनी जाति छिपाने की जरूरत नहीं है। 

    दरअसल, भाटापारा की सभा में चौकीदार चोर है, के कांग्रेस के नारे पर प्रधानमंत्री ने कहा कि नामदार गालियां दे रहे हैं। सारे मोदी को चोर कहते हैं। यहां बड़ी संख्या में साहू समाज के लोग रहते हैं। गुजरात में होते तो वे मोदी कहलाते।

    यह कांग्रेस की भाषा है। 
    उनकी इस टिप्पणी से प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। प्रधानमंत्री के खुद को साहू बताए जाने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ट्वीट किया कि गुजरात में चायवाला। यूपी में जाकर गंगा मां का बेटा। छत्तीसगढ़ में आते ही साहू। और अंबानी के यहां जाते ही चौकीदार। साथियों, बहुरुपिए से सावधान रहें! क्योंकि जैसे ही सावधानी हटी, वैसे ही पंचवर्षीय दुर्घटना घटी!! जानकारी और जागरूकता ही बचाव है। जय जोहार जय कर्मा माता!

     

     

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Posted Date : 16-Apr-2019
  • नांदगांव लोकसभा सीट 
    प्रदीप मेश्राम
    छत्तीसगढ़ संवाददाता
    राजनांदगांव, 16 अप्रैल।
    राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र में वैसे तो दर्जनभर उम्मीदवार चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं, पर मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन तक कांग्रेस प्रत्याशी भोलाराम साहू और भाजपा प्रत्याशी संतोष पांडे को एक-दूसरे के गृह जिले में अपनी पहचान बनाने में ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा। संतोष पांडे को शुरूआत से ही राजनांदगांव जिले में अपना परिचय बताने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ा। इसी जद्दोजहद से भोलाराम साहू को पांडे के गृह जिले कवर्धा जिले में करना पड़ा। दोनों के बीच यही बात एक समान रही कि एक-दूसरे के गृह जिले में पहचान बताने और बनाने के लिए कई तरह की पेचदगियों से दो-दो हाथ करना पड़ा। 

    राजनांदगांव लोकसभा चुनाव प्रचार मंगलवार की शाम थमेगा। यहां 18 तारीख को मतदान होगा। करीब 20 दिन के प्रचार में दोनों दल लोगों के बीच पहुंचाने के लिए जोर लगाते रहे। तकरीबन 300 किमी की लंबाई वाले इस लोकसभा का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रचार से अछूता रहा। आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहां राजनीतिक दलों की पहुंच नहीं हो पाई। कांग्रेस और भाजपा राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में समय के अभाव के चलते प्रचार से दूर रहे। खासतौर पर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की वालपेटिंग और बैनर-पोस्टर नजर नहीं आया है। चुनाव प्रचार में शहरी मतदाताओं ने एक तरह से मोदी के असर से उम्मीदवार संतोष पांडे को समझना शुरू कर दिया है। शहरी मतदाताओं के दिलो-दिमाग में राष्ट्रीय मुद्दे और मोदी के 5 साल के कार्यकाल का आंकलन साफतौर पर दिख रहा है। 

    पांडे का शुरूआती प्रचार तंत्र बेहद ही बिखरा रहा, किन्तु बमुश्किल धीरे-धीरे  प्रचार की व्यवस्था को सम्हाला गया। मोदी के बूते भाजपा इस चुनाव में अपनी नैया पार होने की आस में है। उधर कांग्रेस के भोलाराम साहू को सिर्फ प्रदेश के मंत्री मो. अकबर ने ही प्रचार की दिशा में आगे बढ़ाया है। हालांकि कांग्रेस के कई सीनियर नेता घर बैठकर तमाशा भी देख रहे हैं। बताया जा रहा है कि भोलाराम साहू की मेहनत ज्यादा असरकारक नहीं दिख रही है। इसके पीछे भोलाराम साहू का चुनिंदा नेताओं पर भरोसा करना एक बड़ा कारण है। कांग्रेस को इस चुनाव में बोनस और धान के मुद्दों से ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा है, लेकिन राज्य में सरकार होने का स्वभाविक लाभ भोलाराम को मिलता दिख रहा है। यह सीट करीब दो दशक से भाजपा के कब्जे में है। 

    कांग्रेस राज्य की कमान सम्हालने के बाद इस सीट पर अपनी जीत की संभावना तलाश रही है। प्रचार के दौरान भाजपा ने मोदी के लिए गए फैसलों को आम लोगों के बीच जमकर उछाला। चुनाव प्रचार में सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राईक को भी प्रचार  के दौरान बताया गया। वहीं कांग्रेस के पास पूरे प्रचार में मुद्दों की कमी रही। कुल मिलाकर कांग्रेस राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा लिए गए फैसलों का पुलिंदा लोगों तक पहुंचाया। राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के आठों विधानसभा में दोनों प्रत्याशी की इक्का-दुक्का बार ही पहुंच पाए। कवर्धा जिले के पंडरिया और कवर्धा विधानसभा में भोलाराम साहू और संतोष पांडे के बीच  थोड़ी खंदक की लड़ाई दिख रही है। जबकि राजनांदगांव के खैरागढ़, डोंगरगढ़, डोंगरगांव, राजनांदगांव, मोहला-मानपुर व खुज्जी विधानसभा में भी कांटे की स्थिति है। राजनांदगांव को 6 सीटों पर शहरी मतदाताओं पर भाजपा को ज्यादा भरोसा है। जबकि ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस अपनी पकड़ को मजबूत समझ रही है। 

    गत् लोकसभा में भाजपा ने करीब 2 लाख 35 हजार मतों से बाजी मारी थी। बीते चुनाव की तुलना में यह चुनाव एकतरफा नहीं दिख रहा है। भाजपा के अभिषेक सिंह ने कांग्रेस के कमलेश्वर वर्मा को आसानी से मात देकर जीत हासिल की थी। 5 वर्ष में राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र की सियासी स्थिति बेहद बदल गई है।  ऐसे में कांग्रेस और भाजपा में जीत को लेकर सिर्फ दावे ही दिख रहे हैं।

     

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Posted Date : 16-Apr-2019
  • कांग्रेस चुनाव प्रबंधकों से नाराज हैं कार्यकर्ता
    सात लाख से ज्यादा मत पाने वाले को ही विजयश्री
    भिलाई नगर, 16 अप्रैल।
    दुर्ग लोकसभा हाई प्रोफाइल सीट पर कांग्रेसी एवं भाजपा के उम्मीदवारों के मध्य ही सीधा मुकाबला है। कांग्रेस उम्मीदवार श्रीमती प्रतिमा चंद्राकर को सत्ता का साथ मिल रहा है वहीं भाजपा उम्मीदवार विजय बघेल को सरल एवं स्वच्छ छवि के कारण सीधे कार्यकर्ता सहयोग कर रहे हैं। दो दौर की समाप्ति के बाद भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल प्रचार-प्रसार में भी बढ़त बनाए हुए हैं और उनके पक्ष में राष्ट्रीय नेता द्वारा भी सभा ली गई। 

    दुर्ग लोकसभा सीट प्रारंभ में कांग्रेस का गढ़ रहा करती थी, इस गढ़ को भाजपा के नेता स्व. ताराचंद साहू द्वारा ध्वस्त किया गया था। वर्ष 2009 में इसे विजय अभियान को सुश्री सरोज पांडे ने कायम रखा था परंतु 2014 में कांग्रेस नेता ताम्रध्वज साहू ने सुश्री सरोज पांडे को परास्त कर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी को एकमात्र सीट पर विजय दिलाई थी। विधानसभा चुनाव में दुर्ग ग्रामीण विधानसभा से विजयी होने के कारण ताम्रध्वज साहू ने यह सीट खाली कर दी। हालांकि प्रतिमा चंद्राकर को राजनीति के गुण अपने पिता एवं कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले वासुदेव चंद्राकर से मिले लेकिन भाजपा प्रत्याशी से उनकी तुलना करें तो विजय बघेल ने अपना अस्तित्व लगातार संघर्ष करने के बाद जनता के मध्य स्वच्छ एवं सरल छवि बना कर स्थापित किया है। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ते हुए श्री बघेल ने भिलाई चरोदा पालिका के अध्यक्ष पद पर विजय हासिल की थी और इसी सफलता ने उन्हें वर्ष 2009 में भाजपा की सीट से विधानसभा चुनाव में विजयश्री दिलाई। उनके द्वारा वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में परास्त किया गया था। 

    दुर्ग लोकसभा सीट में कुल नौ विधानसभा का क्षेत्र शामिल है जिसमें से दुर्ग जिले की छ: विधानसभा सीट पाटन, दुर्ग ग्रामीण, दुर्ग शहर, भिलाई नगर, वैशाली नगर, अहिवारा तथा बेमेतरा जिले की बेमेतरा, साजा एवं नवागढ़ शामिल है। कुल नौ सीटों में वर्तमान में कांग्रेस के आठ विधायक और भाजपा का केवल एक विधायक है। अगर इन नौ सीटों को मिला दिया जाता तो सभी में कांग्रेस को कुल डेढ़ लाख से ज्यादा मतों से विजय मिली थी इसलिए भाजपा को दुर्ग लोकसभा सीट जीतने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। वर्ष 2014 में पूरे प्रदेश में लोकसभा चुनाव का औसतन मत प्रतिशत 59 रहा है। प्रदेश निर्वाचन आयोग द्वारा मतदान के प्रतिशत को लगातार बढ़ाने के लिए हुए प्रयास को देखते हुए प्रथम चरण 2019 में मतदान का प्रतिशत 66 रहा है। दुर्ग सीट पर मतदान का प्रतिशत लगभग 70 होने की संभावना राजनीतिक विशेषज्ञों द्वारा जताई जा रही है। ऐसे में लोकसभा सीट पर विजयी होने के लिए प्रत्याशी को करीब साढ़े सात लाख से अधिक मत हासिल करना होगा। विजय प्रतिशत को हासिल करने प्रतिमा चंद्राकर को पार्टी की ओर से जिले से तीन मंत्री रविन्द्र चौबे, ताम्रध्वज साहू और रूद्र गुरू का साथ मिल रहा है जबकि विजय बघेल की स्पष्ट व सहजता की वजह से स्वमेव कार्यकर्ता उनके प्रचार में जुटे हुए हैं। कार्यकर्ताओं से मिल रहे सहयोग की वजह से दो दौर के चुनाव प्रचार समाप्ति के बाद विजय बघेल ने बढ़त बना ली है। 
    शहरी क्षेत्र मेें भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल कांग्रेस प्रत्याशी की तुलना में आगे हैं वहीं ग्रामीण अंचलों में मतदाता मुखर नहीं हो पाया है इसलिए स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है। 

    कांग्रेस प्रत्याशी के चुनाव का संचालन प्रदीप चौबे और लक्ष्मण चंद्राकर जो कि वर्षों से मुख्य धारा से बाहर हैं, सम्हाल रहे हैं। जिससे पार्टी का बड़ा वर्ग और जमीनी कार्यकर्ता नाराज है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का स्पष्ट मत है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ही चुनाव प्रबंधन की जवाबदारी देनी थी। दूसरी ओर विजय बघेल के चुनाव संचालन की जवाबदारी महासमुंद के सांसद चंदूलाल साहू को दी गयी है जिनका सीधा संवाद भाजपा संगठन के प्रत्येक कार्यकर्ताओं से है। अच्छे प्रबंधन के आलावा साहू समाज को साधने में भी चंदूलाल की भूमिका महत्वपूर्ण है।   

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Posted Date : 16-Apr-2019
  • चंद्रकांत पारगीर

    बैकुंठपुर, 16 अप्रैल (छत्तीसगढ़)। कोरिया जिले के ग्रामीणों  को शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो पा रहा है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल प्रदान करने की सभी कोशिशें नाकामयाब हुई  है।  लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए गॉव व पारा में हैंडपंप खुदवाये गये है। उनमें अभी गर्मी के सीजन में पानी का स्तर कम हो गया और लाल पानी निकल रहा है जो पीने योग्य नहीं है  वे मजबूरी में लाल पानी पीने को मजबूर है। इस संबंध में कलेक्टर विलास संदीपान भोसकर ने कहा कि पेयजल के लिए आचार संहित आड़े नहीं आ सकती है, वे पीएचई विभाग को निर्देशित करेेंगे कि पेयजल की व्यवस्था सुदृढ़ करें।

    'छत्तीसगढ़' संवाददाता ने कोरिया जिले के जिलामुख्यालय बैकुंठपुर तहसील के कई ग्रामों को दौरा कर ढोढी और लाल पानी से परेशान ग्रामीण क्षेत्रों की पहचान की है। गॉवों में स्थित कुछ हैंडपंप ऐसे है जिनमें वर्ष भर लाल पानी निकलने की समस्या है। ऐसे पानी को किसी पात्र में कुछ घंटों के लिए रखे देने से बर्तन के तली में गंदगी बैठ जाती है और लगातार ऐसे पानी को रखने के लिए किसी एक बर्तन का उपयोग करते है तो बर्तन भी लाल हो जाता है। कई जगहों पर वर्ष 2011-12 में काफी संख्या में ऐसे हैंडपंपों पर आयरन रिमूवल प्लांट स्थापित किया गया था, परन्तु घटिया होने के कारण बमुश्किल 6 माह में ही बिगड गए, उसके बाद प्रशासन ने उन बिगड़े प्लांट को ठीक करने की कभी कोशिश नहीं की।

    वहीं शिकायत के बाद भी समस्या को दूर करने की दिशा में कदम नहीं उठाये गये जिससे कि मजबूर होकर वर्ष भर गंदे पानी पीते है जिससे कि कई तरह की बीमारियॉ होने की आशंका बढ़ जाती है। शुद्ध पेयजल के नाम पर हैंडपंप से अशुद्ध जल का सेवन आदिवासी परिवार कर रहे हैं। बैकुण्ठपुर जनपद क्षेत्र के जिला मुख्यालय से निकट के ही दर्जन भर पंचायतों में हैंडपंप से लाल पानी निकलने की शिकायत है जहां से कई परिवार प्रतिदिन दूषित पानी पी रहे है जो बीमार होने के लिए काफी है। 
    जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल की व्यवस्था न होने के कारण आज भी अनेक परिवार ढोढी का पानी पीने को मजबूर हंै।   ढोढी का पानी दिखने में तो साफ दिखाई देता है लेकिन वह पीने योग्य नहीं रहता। बैकुण्ठपुर जनपद क्षेंत्र सहित जिले भर के कई ग्राम पंचायत क्षेत्रों मे अनेक परिवार आज भी ढोढी के पानी के सहारे जीवन गुजार रहे है। ढोढी पर आश्रित होने वाले परिवारों को तब ज्यादा समस्या का सामना करना पडता है जब बरसात शुरू होती है।  

    गर्मी की शुरूआत होने के साथ ही जिले के विभिन्न पंचायतों में हैडपंप का जल स्तर नीचे चले जाने के कारण लोगों को पानी नही मिल पा रहा है तथा कई जगहों पर हैंडपंप बिगड़ गये है जिसकी शिकायत के बाद भी समय पर सुधार कार्य नही हो पा रहा है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के पास पर्याप्त मेकेनिक नहीं है जिसके चलते जिस रफ्तार से कार्य होना चाहिए उस हिसाब से नहीं हो रह है। ऐसा नहीं कि सुधार कार्य नहीं हो रहा है विभाग के लोग जुटे हुए है लेकिन कर्मियों की कमी के कारण  सुधार कार्य में देरी हो रही है। वर्तमान में कई पंचायत क्षेत्रों में हैंडपंप का जल स्तर नीचे चला गया है जहॉ अतिरिक्त पाईप लगाने की आवश्कयता है तथा बिगडे हेंडपंपों को जल्द सुधार की आवश्यकता है इसके अभाव में ग्रामीण परिवारों केा ढोढी के पानी दूर से लाना पड रहा है।

    इन जगहों के हैंंडपंपों से निकल रहा लालपानी
    कही ढोढी पर आश्रित परिवार
    ग्राम             पारा            पंचायत        कुल घर        समस्या
    बकिरा            उपरपारा         सलबा            22                    लालपानी
    सारा              पहटपारा         सारा             28                      लालपानी
    सलबा           ठाकुरपारा        सलबा           30 आंबा बच्चे        लालपानी
    गदबदी           चकदहियापारा  गदबदी          30                     लालपानी
    परचा              उपरपारा             बस्ती            20 आंबा बच्चे        लालपानी 
    भण्डारपारा       लोटानपारा          भण्डारपारा       12                     लालपानी
    भण्डारपारा       बायडॉड             भण्डारपारा        2                    कुऑ पानी
    परचा              महुआपारा       बस्ती            20                    लालपानी
    जलयाडॉड        पटेलपारा        सारा               5                    कुऑ पानी
    देवानीबांध        पटेलपारा        मनसुख          16                  ढोढी का पानी
    गदबदी            पंडोपारा          गदबदी            5                   लालपानी
    सारा               मझारपारा        सारा              5                   लालपानी
    बकिरा             खालपारा         सलबा            15                  ढोढी का पानी
    सलका             स्कूलपारा           सलका             8                   लालपानी
    भण्डारपारा        डुमरबहरा          भण्डारपारा         7                  लालपानी
    सलका             केनापारा           सलका            15                   लालपानी
    परचा               खालपारा           बस्ती              6                    कुऑ का पानी
    परचा               खालपारा            बस्ती            14                   लाल पानी
    बडगॉव             तुरापारा             बडगॉव           10                   कुऑ का पानी
    पतरापाली          स्कूलपारा          बडगॉव           19                    लालपानी
    कुरचाडॉड       बोईरपारा          जामपानी         40                   लाल पानी
    देवरी             चेरवापारा          मोदीपारा        12                   लाल पानी

    स्कूल व आंबा के बच्चे भी पी रहे दूषित पानी 
    यह बेहद गंभीर बात है कि छोटे बच्चों को भी शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो पा रहा है। कई पंचायत क्षेत्रों में स्थित आंबनबाड़ी केंद्र व स्कूल परिसर के पास खुदाये गये हैंडपंप से लाल पानी के साथ फ्लोराईड व आयरनयुक्त पानी निकल रहा है।  
    पूर्व में कुछ जगहों पर आयरन एवं फलोराईड रिमूवल प्लांट लाखों रूपये खर्च कर लगाये गये थे जो कुछ माह बाद ही बेकार हो गये है। पहले जैसी स्थिति थी लाखों खर्च करने के बाद भी वैसी ही स्थिति बनी हुई है।  

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Posted Date : 16-Apr-2019
  • बसपा की दमदारी से भाजपा उम्मीद से, कांग्रेस में एकजुटता 

    गोरेलाल तिवारी
    जांजगीर-चांपा/कसडोल, 16 अप्रैल।
    अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित जांजगीर-चांपा लोकसभा में वैसे तो कांग्रेस, भाजपा और बसपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है, लेकिन बसपा के वोट भाजपा और कांग्रेस में जीत-हार तय करेंगे। चुनाव प्रचार खत्म होने में पांच दिन बाकी हैं, लेकिन प्रचार सिर्फ नगरीय इलाकों तक ही सीमित है। गांवों में चुनाव प्रचार का शोर-गुल गायब है। 

    जांजगीर चांपा संसदीय क्षेत्र में दर्जन भर प्रत्याशी मैदान में हैं। यहां 23 तारीख को मतदान होगा। शहर और ब्लॉक स्तर पर कार्यकर्ताओं की बैठकों का सिलसिला तो चला है किंतु ग्रामीण अंचलों में कांग्रेस, बसपा और भाजपा तीनों पार्टियों की मतदाताओं के सम्पर्क का सिलसिला अथवा सामूहिक प्रचार का सिलसिला सुनियोजित ढंग से शुरू नहीं हुआ है। यहां कांग्रेस से रवि भारद्वाज, भाजपा से पूर्व सांसद गुहाराम अजगले और बसपा से दाऊराम रत्नाकर मुख्य मुकाबले में हैं। 

    जांजगीर संसदीय सीट पर हालांकि उक्त तीनों पार्टी जीत का दावा कर रही है किंतु विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जबरदस्त सफलता से पूरे संसदीय क्षेत्रों के सभी 8 विधानसभा में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में सक्रियता ज्यादा दिख रही है। संसदीय क्षेत्र में चुनावी माहौल ठंडा पड़ा हुआ है और ऐसा प्रतीत होता है कि आखिरी समय तक यही स्थिति रहने वाली है ।
    बसपा प्रत्याशी दाऊराम रत्नाकर के पक्ष में बसपा सुप्रीमो मायावती और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की सभा हो चुकी है। यहां जांजगीर-चांपा, अकलतरा में भाजपा और चंद्रपुर, कसडोल, बिलाईगढ़ व सक्ति में कांग्रेस के विधायक हैं। जबकि  पामगढ़ और जैजैपुर में बसपा के विधायक हैं। बसपा यहां सभी सीटों पर प्रभाव है। बसपा के संस्थापक स्व. कांशीराम पहला चुनाव जांजगीर-चांपा सीट से लड़े थे। यहां बसपा उम्मीदवार को एक लाख के आसपास वोट मिलते रहे हैं। इस बार बसपा उम्मीदवार दाऊराम रत्नाकर ज्यादा वोट पाने की कोशिश कर रहे हैं। 

    उनका कई इलाकों में अच्छा प्रभाव भी है। कांग्रेस प्रत्याशी रवि भारद्वाज क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे हैं। उनके पिता परसराम भारद्वाज अविभाजित मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे  हैं और पांच बार सांसद रह चुके हैं।  उनके समर्थक तकरीबन हर गांव में हैं। और इसका फायदा रवि को मिल रहा है। पूर्व विधायक महंत रामसुंदर दास ने चर्चा में बताया कि सभी 8 विधान सभा क्षेत्र में प्रत्याशी का पदाधिकारियों के साथ प्रारम्भिक जनसम्पर्क हो गया है। बताया गया कि किसान ऋण मुक्ति तथा 25 सौ रुपये धान का भाव दिए जाने से कांग्रेस के प्रति जनता का रुझान बढ़ा है। जो निश्चित ही जीत के रूप में परिणाम सामने आएगा ।कांग्रेस के लाल लक्ष्मण सिंह भटगांव, मनबोधी देवांगन टुंड्रा, योगेंद्र विमल देवांगन कटगी, मनीष मिश्रा अशोक यादव ,गणेश जायसवाल पलारी का भी कहना है कि ग्रामीण अंचलों में कार्यकर्ताओं का सम्पर्क शुरू हो गया है ।

    पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा ,जनता कांग्रेस के तालमेल से अस्त व्यस्त हो गया है। कसडोल बसपा की सीट पर अंतिम समय में जनता कांग्रेस से परमेश्वर यदु को भी खड़ा कर दिया गया। जिसके कारण पूरा समीकरण ही बिगड़ गया। इसी तरह अकलतरा विधानसभा में बसपा का मजबूत गढ़ बना हुआ था। जहां बसपा के चिन्ह पर ऋचा जोगी को खड़ा कर दिया गया । जिसका अंजाम यह हुआ कि उक्त सीट भाजपा की झोली में चली गई। यही वजह है कि बसपा प्रत्याशी दाऊ राम रत्नाकर को नाराज पदाधिकारियों कार्यकर्ताओं को संगठित करनें में दिक्कत हुई है। बसपा जमीनी कार्यकर्ताओं से सराबोर है ,जो उत्साहित तथा जुझारू टीम है । किंतु परेशानी यह है कि जनता कांग्रेस जोगी के काफी संख्या में थोक के भाव में कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। बसपा नेताओं का कहना है कि यदि जोगी कांग्रेस के लोग तथा स्वयं अजीत जोगी खुद सक्रिय हो जाए तो परिणाम पक्ष में आ सकता है। पर श्री जोगी ने सिर्फ मायावती के साथ ही मंच साझा किया। इसके बाद से प्रचार से दूर हैं। 

    दूसरी तरफ, दो बार की सांसद कमला पाटले की टिकट कटने से उनके समर्थकों में नाराजगी है। जिसमें हेलीकॉप्टर प्रत्याशी पूर्व के सांसद गुहाराम अजगले को घोषित किया गया। इसको लेकर पार्टी का एक खेमा अभी भी नाराज है। यहां चुनाव संचालन की जिम्मेदारी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल संभाल रहे हैं। ऐसे में भाजपा को बसपा व कांग्रेस के बीच की लड़ाई में फायदें की उम्मीद है। अजा वोट कांग्रेस का परम्परागत वोट रहा है, लेकिन पिछले सालों से बसपा ने इसमें पकड़ बनाई है और यही वजह है कि अजा वोटरों के छिटकने से कांग्रेस लगातार हारती चली गई। पर इस बार भाजपा में बहुत ज्यादा उत्साह नहीं होने से कांग्रेस को फायदा दिख रहा है। हालांकि गावों में भी मोदी फैक्टर दिख रहा है। इससे भाजपा को नैय्या पार होने की उम्मीद दिख रही है। बहरहाल, तीनों दलों के बीच नजदीकी मुकाबले के चलते हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान है। 

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Posted Date : 15-Apr-2019
  • कल थमेगा चुनावी शोर
    उत्तरा विदानी
    महासमुंद/रायपुर, 15 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
    महासमुंद लोकसभा में प्रचार खत्म होने में 24 घंटे बाकी रह गए हैं। ऐसे में दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है। दोनों ही दल के प्रत्याशी पहली बार चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस को राज्य सरकार किसान हित में लिए गए फैसले से फायदे की उम्मीद है, तो भाजपा को मोदी फैक्टर का सहारा है। 
    भाजपा ने दो बार के सांसद चंदूलाल साहू की टिकट काटकर खल्लारी के पूर्व विधायक चुन्नीलाल साहू को मैदान में उतारा है। जबकि कांग्रेस ने अभनपुर के विधायक धनेन्द्र साहू को टिकट दी है। धनेन्द्र साहू प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं। लिहाजा, वे यहां पहचान के मोहताज नहीं हैं और पार्टी के छोटे-बड़े पदाधिकारी से परिचित हैं। चुन्नीलाल के चुनाव प्रचार की कमान पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने संभाल रखी है और वे लगातार दौरा भी कर रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा से परे बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं। लेकिन मुकाबला दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है। 

    महासमुंद लोकसभा में साहू समाज के मतदाताओं की संख्या सर्वाधिक है। इसके साथ-साथ आदिवासी, कुर्मी और अनुसूचित जाति के मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। दोनों ही प्रत्याशी साहू समाज से आते हैं। ऐसे में समाज का वोट बंटना तय है। इन सबके बीच शहरी इलाकों में मोदी फैक्टर हावी दिख रहा है। यहां के ज्यादातर लोग नरेन्द्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते हैं। कुल मिलाकर भाजपा प्रत्याशी चुन्नीलाल साहू को मोदी फैक्टर से बड़े फायदे की उम्मीद है। शुरूआती दौर में अपने नाम और पहचान के आधार पर धनेन्द्र साहू भारी दिख रहे थे, लेकिन प्रचार के अंतिम चरण में मुकाबला कांटे का हो गया है। भाजपा प्रत्याशी चुन्नीलाल की स्थिति धमतरी, कुरूद व बिन्द्रानवागढ़ में अच्छी दिख रही है, तो कांग्रेस प्रत्याशी को महासमुंद जिले की विधानसभाओं महासमुंद, सराईपाली, बसना और राजिम से बढ़त मिलने की उम्मीद है। जबकि खल्लारी में दोनों बराबरी में दिख रहे हैं। 
    पिछले लोकसभा चुनाव में भी महासमुन्द जिले के सभी सीटों पर भाजपा के विधायक होते हुए भी भाजपा प्रत्याशी बढ़त नहीं मिली थी। राजिम में भी भाजपा विधायक होने के बावजूद चंदू साहू अजीत जोगी से पीछे चलते रहे और गरियाबंद, बिन्द्रानवागढ़, धमतरी के बूते चुनाव मात्र 12 सौ वोट से जीत सके थे। इस बार महासमुन्द जिले के सभी सीटें कांग्रेस के कब्जे में है। ऐसे में भाजपा प्रत्याशी को जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। मतदाता खामोश है, लेकिन किसानों के बीच कहीं न कहीं, धान का समर्थन मूल्य 25 सौ रूपए प्रति क्विंटल करने के साथ-साथ बोनस से राज्य सरकार से खुश हैं। 

    इससे धनेन्द्र साहू को फायदा मिल सकता है। धनेन्द्र के  सामने समस्या यह है कि भाजपा के लोग उन्हें बाहरी करार दे रहे हैं, जिसे लेकर उन्हें  सफाई देनी पड़ रही है। समाज के कई प्रमुख लोग चुन्नीलाल के माहौल बना रहे हैं, जिससे उन्हें दिक्कत हो रही है। भाजपा के पक्ष में प्रचार के लिए केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह आ चुके हैं। जबकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल धनेन्द्र साहू के पक्ष में आधा दर्जन से अधिक चुनावी सभा को संबोधित कर चुके हैं। बहरहाल, दोनों की बीच हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान है। 

     

     

     

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Posted Date : 13-Apr-2019
  • भाजपा को मोदी के नाम का मिल रहा लाभ, नमक-चना बंद करने से कांग्रेस की मुसीबत बढ़ी  
    काँकेर, 13 अप्रैल
    । काँकेर लोकसभा चुनाव में इस बार का चुनाव बड़ा ही दिलचस्प हो चूका है कांग्रेस भाजपा के दोनों उम्मीदवार की किस्मत का फ़ैसला अब बेहद करीब हो चला है जहां भाजपा को अब महज प्रधानमंत्री मोदी का ही सहारा दिख रहा है आम जनों की एक ही राय बनती दिख रही है कि नरेंद्र मोदी को पुन: प्रधानमंत्री बनाना है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की सरकार छत्तीसगढ़ में होने के बावजूद कांग्रेस की मुश्किलें कम होती नहीं दिखाई दे रही हंै। 

    एक ओर जिले के अधिकांश किसानों के कर्जमाफी की समस्याओं से उभर भी नही पाई है कि गरीबों को दिए जाने वाली खाद्यान्न प्रणाली के तहत नमक और चना को बंद किए जाने से गरीबों के भारी विरोध से भी कांग्रेस  की मुसीबत कम होती दिखाई नहीं दे रही है ऐसी स्थिति में कांग्रेस व भाजपा के बीच मुकाबला बड़ा ही रोचक होने की उम्मीदें  जताई जा रही है। 
    काँकेर लोकसभा हर हाल में दोनों राजनीतिक पार्टियों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है यानी काँकेर लोकसभा सीट 10 सालों से भाजपा के कब्जे में है। दूसरी ओर कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ऊर्जा से लबरेज कांग्रेस के पदाधिकारियों ने अपनी पूरी ऊर्जा फूंक कर लोकसभा सीट जिताने पसीना बहा रहे हैं लेकिन अपने ही पार्टी के पदाधिकारियों की अनदेखी के चलते युवा कार्यकर्ताओं में पार्टी के लिए काम में कोताही बरती जा रही है। 

    पार्टी नेताओं के तालमेल
    से बिगड़ सकता है  खेल 

     प्रत्याशी भले ही लोगो से मिलजुलकर डोर टू डोर जनसंपर्क करने में कोई कसर तो नही छोड़ रहे है लेकिन दोनों पार्टियों के जिला पदाधिकारी और मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं में आपसी तालमेल नहीं होने के चलते चुनाव में ठीक तरह से कोई भी कार्यकर्ता काम नहीं करने की जानकारी  मिली है। यही स्थिति कांग्रेस में भी आसानी से देखी जा सकती है । 
    जनसंपर्क के दौरान महज मु_ी भर कार्यकर्ता शामिल हो रहे हंै जिसके चलते लोगों में यह कयास लगाए जा रहे हंै कि मु_ी भर कार्यकर्ताओं के सहारे पार्टी फ़तेह हासिल कैसे कर पाएगी।
    पूछपरख कम होने से कार्यकर्ताओं में नाराजगी
    लोकसभा चुनाव में चुनाव संचालन कर रहे लोगों में कार्यकर्ताओं की अनदेखी से दोनों राष्ट्रीय पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ताओं में जमकर नाराजग़ी देखी जा रही है। आलम यह है कि कार्यकर्ताओ में जो जुनून बीते विधानसभा चुनाव के दौरान देखा गया था वह उत्साह  नहीं है। जो दोनों पार्टियों के लिए बड़ी मुसीबत पैदा कर सकता है। बहरहाल वक्त रहते नाराज़ कार्यकर्ता और जिला पदाधिकारी को मना लिए जाने के संकेत मिल रहे हैं।

     चना-नमक बंद करने से कांग्रेस की मुसीबत बढ़ी 
    लोकसभा चुनाव में इस बार छत्तीसगढ़ में वर्तमान सरकार के घोषणा पत्र के अनुसार 10 दिनों के भीतर किसानों के कर्जमाफी करने के वादे जिले के अधिकांश किसानों के कजऱ्माफ नहीं हो सका है। आए दिन किसान अपने कर्जमाफी को लेकर बैक के चक्कर लगा रहे हैं और बैंकों से किसानों को लगातार कजऱ् के नोटिस मिलने से किसानों में कांग्रेस के खिलाफ जमकर आक्रोश देखा जा रहा है। कर्जमाफी की आग अभी ठंडी भी नही हो पाई है कि  गरीब परिवार जिन्हें गुलाबी राशन कार्ड में सस्ते दामों में चावल शक्कर मिट्टी तेल चना और मुफ्त में नमक पिछ्ली सरकार द्वारा दिया जा रहा था लेकिन अचानक कांग्रेस ने गरीबों को नमक व चना को बंद करने से गरीबों में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश भड़का हुआ है। मुख्यालय से महज 3 किलोमीटर के आसपास मालगांव , कोडेजंगा, ठेलकबोड, कोकपुर, मनकेशरी के बीपीएल कार्डधारी कादिर खान, मुकेश सिन्हा, कैलाश ,नरेश, सुरेश, इंद्रा बाई, जयबती ने बताया कि बीते सरकार द्वारा गरीबों को राशन दिया जा रहा था। कांग्रेस सरकार ने चना नमक को बंद कर दिया है आज नमक चना को बंद किया है। कल राशन को बंद कर देंगे। गरीबों की सरकार बताने वाली कांग्रेस भी जुमलेबाज सरकार निकल गई।

     

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Posted Date : 12-Apr-2019
  • बिलासपुर में कांटे की टक्कर

    राजेश अग्रवाल
    बिलासपुर, 11 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
    कांग्रेस और भाजपा का धुआंधार प्रचार अभियान इस संसदीय सीट में सीधी टक्कर की स्थिति तो बना रहा है पर मुकाबला कांटे का हो गया है। कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव 27 साल बाद इतिहास पलटने के लिए तो भाजपा प्रत्याशी अरुण साव जीत का सिलसिला बनाए रखने के लिए मैदान में हैं। अपने सबसे मजबूत गढ़ में भी अजीत जोगी की पार्टी ने प्रत्याशी खड़ा नहीं किया। जिसके पाले में उनके वोट जाएंगे, जीत का सेहरा उनके माथे पर ही बंधेगा। 

    कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव भाजपा सरकार के 60 महीने और छत्तीसगढ़ सरकार के 60 दिनों की तुलना अपने प्रचार अभियान में कर रहे हैं। वे यह बता रहे हैं कि पांच साल में नोटबंदी, जीएसटी, के चलते किसानों व्यापारियों की कमर टूट गई। राफेल सहित भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आए। छत्तीसगढ़ की पिछली सरकार ने भ्रष्टाचार और अहंकार के रिकॉर्ड तोड़ दिए। श्रीवास्तव प्रदेश सरकार के फैसलों के नाम पर भी वोट मांग रहे हैं, जिनमें कर्ज माफी, धान का समर्थन मूल्य, बिजली बिल आधा करना तथा हजारों पदों पर नई भर्तियां करना शामिल है। प्रत्येक गरीब परिवार के लिए सालाना 72 हजार रुपये की घोषणा तथा 22 लाख पदों पर भर्ती की बात को भी वे चुनावी सभाओं में रख रहे हैं। 

    दूसरी ओर भाजपा प्रत्याशी अरुण साव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कड़े फैसले लेने वाली सरकार बता रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और सर्जिकल स्ट्राइक को जनता के सामने रखा है। किसानों और व्यापारियों के लिए संकल्प पत्र में पेंशन की घोषणा की जानकारी भी वे मतदाताओं को दे रहे हैं। दोनों ही प्रत्याशी अपने शीर्ष नेताओं के बलबूते मैदान में हैं। कांग्रेस प्रत्याशी के लिए छत्तीसगढ़ सरकार और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम पर तो भाजपा प्रत्याशी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि पर वोट मांग रहे हैं। 

    दोनों ही प्रत्याशी पहली बार मैदान में हैं। नगर निगम पार्षद और जनपद पंचायत सदस्य के चुनाव में दोनों हारे हुए हैं, चुनावी अनुभव बस इतना ही है। इसके बावजूद दोनों चेहरे पहचाने हुए हैं। बिलासपुर में कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव को हर कोई जानता है। बीते साल विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस भवन में लाठी चार्ज किया गया था। इसमें श्रीवास्तव घायल हुए थे। तब से वे न केवल बिलासपुर जिले में बल्कि प्रदेश में भी चर्चा में आ गये थे। वे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेहद करीबी लोगों में से एक हैं। बिलासपुर में बघेल का स्वागत वे बीते कई वर्षों से करते आ रहे हैं और बघेल भी उन्हें अपने बगल में रखते हैं। विधानसभा चुनाव की टिकट उन्हें मिलेगी, ऐसी चर्चा जोरों पर थी। नहीं मिली, शैलेष पांडेय को मिली और वे 20 साल से प्रतिनिधित्व कर रहे कद्दावर तत्कालीन मंत्री अमर अग्रवाल को हराने में सफल रहे। विधानसभा में टिकट से वंचित होने की भरपाई उन्हें लोकसभा टिकट देकर की गई है। 
    भाजपा शासनकाल में प्रदर्शन, धरना, गिरफ्तारी, जेल के बाद अटल श्रीवास्तव एक और लड़ाई में उतर चुके हैं। उन्हें जीत मिलती है तो विधानसभा चुनाव की तरह ही ये ऐतिहासिक होगी, क्योंकि खेलनराम जांगड़े के बाद लगातार यहां से भाजपा चुनाव जीतती रही है। 

    भाजपा से पुन्नूलाल मोहले, दिलीप सिंह जूदेव जीतते रहे। सन् 2014 में तो लखन लाल साहू ने पौने दो लाख मतों से कांग्रेस प्रत्याशी करूणा शुक्ला को हराया था। रणनीति के तहत साहू इस बार टिकट से वंचित हो गये पर उसी समाज के अरूण साव मैदान में उतारे गये हैं। बिलासपुर शहर मे उन्हें सिर्फ हाईकोर्ट अधिवक्ता के रूप में जाना जाता रहा है, पर ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी जान-पहचान बखूबी बनी हुई है। विधानसभा क्षेत्र मुंगेली, लोरमी, तखतपुर, कोटा व बिल्हा में उन्हें हर एक भाजपा कार्यकर्ता जानता है। जनसंघ के दौर में जिन गिनती के लोगों ने पार्टी को खड़ा करने के लिए काम किया, उनमें साव के पिता अभयराम साव भी शामिल थे। वे लखीराम अग्रवाल, निरंजन केशरवानी जैसे बड़े नेताओं के सहयोगी रहे। अरूण साव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् में सालों तक सक्रिय थे। वे भाजपा युवा मोर्चा में भी महामंत्री रहे। आरएसएस से उनका गहरा जुड़ाव रहा है। पर पिछले कुछ सालों से सक्रिय राजनीति से अलग रहे। 

    खास बात है कि दोनों ही प्रत्याशी युवा हैं और वे दोनों प्रचार अभियान बड़ी मेहनत से चला रहे हैं। अरुण साव को भाजपा का संगठित रूप से साथ मिल रहा है। सांसद लखन लाल साहू, नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल, विधायक रजनीश सिंह, डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी अपने-अपने इलाके में पार्टी का काम कर रहे हैं। भाजपा के लोगों में यह जीत नाक का सवाल बना हुआ है। 
    जिस तरह से पौने दो लाख वोटों से जीते हुए लखन लाल साहू की टिकट भी काट दी गई, हाईकमान के सामने कद्दावर नेताओं की घिग्घी बंधी हुई है। भाजपा नेताओं का मानना है कि प्रदेश में बुरी तरह हार जाने के बाद कम से कम दिल्ली में तो साख बची रहे। 

    अटल के पास भी अपनी ही टीम है। कई वरिष्ठ कांग्रेसी प्रचार अभियान से दूर दिखाई पड़ रहे हैं, पर कांग्रेस में ऐसा होता रहा है। विधानसभा चुनाव में शैलेष पांडेय भी अपनी ही टीम के भरोसे प्रचार करते रहे और भाजपा को पटखनी देने में सफल हो गये। अटल के समर्थक उन्हें अभी से जीता हुआ मानकर चल रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि लड़ाई कठिन है। 
    यह लड़ाई कुछ हद तक छत्तीगढ़ जनता कांग्रेस (जोगी) द्वारा उम्मीदवार खड़ा नहीं करने के कारण आसान हो गई है। विधानसभा चुनाव में लोकसभा की आठ सीटों पर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी ने तीन लाख 27 हजार वोट हासिल किये थे, जो प्रदेश की किसी भी संसदीय सीट में सर्वाधिक थी। बिलासपुर के अलावा कोरबा में इस पार्टी के लिए संभावनाएं थीं, पर उन्होंने चुनाव नहीं लडऩे का फैसला लिया। संभवत: इसके पीछे कार्यकर्ताओं में बिखराव और बहुजन समाज पार्टी द्वारा लिया गया एकतरफा फैसला, कारण था। बिलासपुर सीट पर सवाल बनकर खड़ा हुआ है कि आखिर बसपा के वोट किधर जायेंगे। तखतपुर, मुंगेली और मस्तूरी में हमेशा ही विधानसभा चुनावों के दौरान बसपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है, पर लोकसभा चुनाव में नहीं। बेलतरा (पुरानी सीट सीपत) ने तो बहुजन समाज पार्टी का विधायक भी दिया है। छजकां ने बसपा को समर्थन देने की बात कही है। बसपा उम्मीदवारों के पर्चा भरने कार्यक्रम में छजकां के नेता मौजूद भी रहे। पर यह एकतरफा लगाव दिखाई दे रहा है। जोगी की पार्टी से लोग सिर्फ जोगी के कारण जुड़े हैं।

     बसपा को जिले के जोगी के कार्यकर्ता साथ देंगे, इसकी संभावना क्षीण है। जोगी की पार्टी को चुनाव के पहले खूब झटके भी लगे। जीते हुए दो विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर व डॉ. रेणु जोगी के अलावा उनकी पार्टी के बाकी विधानसभा प्रत्याशी सियाराम कौशिक, संतोष कौशिक, चंद्रभान बारमते और ब्रजेश साहू उनका साथ छोडक़र कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। इन्होंने बड़ी संख्या में कांग्रेस के वोट काटे थे, जिसका नतीजा भी निकला कि कांग्रेस को सिर्फ दो विधानसभा सीटों बिलासपुर और तखतपुर में जीत मिल पाई। इसी वजह से उनकी घर वापसी का कांग्रेस के हारे प्रत्याशियों और कई बड़े नेताओं ने बहुत विरोध भी किया था। अब जब वे कांग्रेस में ले लिये गए हैं, इन्हें अपने खाते में पड़े वोट कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में दिलाने होंगे। 

    स्थिति ऐसी नहीं है कि जोगी कांग्रेस के वोट सब कांग्रेस की ओर मुड़ जायें। इन वोटों में बड़ी संख्या बसपा की भी थी, जिसके प्रत्याशी उत्तम गुरु मैदान में उतर चुके हैं। लोरमी, मुंगेली, पथरिया, जरहागांव और आंशिक रूप से तखतपुर में बसपा का अच्छा असर देखा गया है। इन्हीं सब इलाकों में अरुण साव जाना-पहचाना चेहरा भी है। इस तरह से वोटों का बिखराव तय है। ये बिखराव जिसके पक्ष में होगा, जीत उसी के नाम दर्ज होगी। 

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Posted Date : 12-Apr-2019
  • मप्र की सीमा से लगे कोरिया के कई गांव बुनियादी सुविधाओं को मोहताज
    चन्द्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर
    , 12 अप्रैल। जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में भी लोकसभा चुनाव को लेकर सुगबुगाहट तेज होती जा रही है।  यहां के निवासी विकास के नाम पर उनके साथ हुए धोखे को लेकर काफी गुस्से मे है। मप्र सीमा से लगे कोरिया के ये सरहदी गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।

    जानकारी के अनुसार कोरिया जिले के छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे ग्राम गोईनी, आन्नदपुर और मप्र के सिंगरौली जिले की बिन्दूल ग्राम पंचायत के बीच दोनों के अपने चेकिंग नाके लगे हुए है, चुनाव को लेकर सीमा पर आवाजाही की सघन जांच की जा रही है, परन्तु यहां सीमा पर दोनों राज्य के ग्राम प्रशासनिक उदासीनता के शिकार है और दुर्गम है। छत्तीसगढ के गोइनी के लोग मप्र के व्यापारियों पर आश्रित है। क्योंकि सोनहत से आन्नदपुर और फिर गोईनी पहुंचना बेहद मुश्किल भरा सफर है, बड़े बड़े चट्टानों पर बने उबड़ खाबड़ रास्तों से होकर यहां पहुंचना बहुत परेशानी भरा है। यहां के निवासी जग्गनाथ सिंह बताते हैं कि विधानसभा चुनाव में लोगों ने विकास के मुद्दे पर ही वोट किया, इस बार भी लोग विकास को ही ध्यान में रखकर वोट करेंगे। दरअसल, इन गांवों में ना तो आवागमन के लिए सड़क है, ना बिजली और ना पीने के पानी की सुविधाएं, जिसके कारण यहां के लोग बहुत परेशानी में जीवन यापन कर रहे है। 

    आवागमन है सबसे बड़ी परेशानी
    गोईनी और आन्नदपुर के लोगों को कोरिया जिलामुख्यालय आने के लिए दो दिन लगते है। गोइनी से रामगढ आना के बेहद मुश्किल भरा सफर होता है, उसके बाद रामगढ से सोनहत और फिर सोनहत से बैकुंठपुर आ पाते है। वहीं इस पूरे क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क बहुत बड़ी समस्या है, जिसके कारण लोग एक दूसरे से संपर्क करने में दिक्कत महसूस करते है, यही कारण है कि कई मरीज बिना इलाज के मौत के गाल में समा जाते हैं।

    'छत्तीसगढ़'  संवाददाता गुरूवार को आन्नदपुर पहुंचा, तो यहां के निवासी हीरालाल (70) की टीबी से मौत हो गयी, उसके डेढ़ माह पहले जिला अस्पताल से इलाज करवा कर वापस लएाए थे। पूरा गंाव शोक में था, ग्रामीण बताते है कि चुनाव में राजनैतिक दल तो आ रहे है, परन्तु हमारे क्षेत्र की ओर ध्यान देने की जिम्मेदारी अब नई सरकार पर है, हम लोगों को बीमारी होने पर सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है। 

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Posted Date : 11-Apr-2019
  • ई-टेंडरिंग घोटाले की एक वजह ऑनलाईन पर अंधविश्वास भी...

    अतुल पुरोहित
    भोपाल, 11 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
    मध्यप्रदेश के कई विभागों में टेंडर व्यवस्था में भ्रष्टाचार रोकने के लिए ई-टेंडर व्यवस्था लागू कर मध्यप्रदेश ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल बनवाया गया था। इसके माध्यम से विभिन्न विभागों के कार्यों के लिए ई-टेंडर व्यवस्था लागू की गई थी। लेकिन भ्रष्टाचारियों ने इसमें भी कलाकारी कर करोड़ों का घोटाला कर डाला। इसे व्यापमं से भी बड़ा घोटाला बताया जा रहा है। घोटाले के खुलासे के बाद ईओडब्लू ने सात कंपनियों सहित 5 विभागों के अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई है। ईओडब्लू के अधिकारी केएल तिवारी के मुताबिक, यह पूरा घोटाला 900 करोड़ रुपए का है, जिसे जनवरी 2018 से मार्च 2018 के बीच अंजाम दिया गया था। अब एक और बड़ा खुलासा हुआ है कि ई-टेंडर में गड़बड़ी का सिलसिला 2006 से चल रहा है। 

    2006 से ही ई-टेंडर में छेड़छाड़ कर चहेती कंपनियों को टेंडर दिलाने की शिकायत सामने आई, लेकिन 2018 में  ई-टेंडरिंग में बड़े पैमाने पर घोटाले का खुलासा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) में हुआ था। यहां पाया गया कि ई-प्रोक्योंरमेंट पोर्टल में टेम्परिंग कर करोड़ों रुपए मूल्य के 3 टेंडरों के रेट बदल दिए गए थे। यानी ई-पोर्टल में टेंपरिंग से दरें संशोधित कर टेंडर प्रक्रिया में बाहर होने वाली कंपनियों को टेंडर दिलवा दिया गया। इसकी भनक लगते ही तीनों टेंडर निरस्त कर दिए। इस घोटाले में विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग   के प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी ने अहम भूमिका निभाई। वर्ष 1994 बैच के आईएएस अधिकारी रस्तोगी ने विभागीय जांच की और राजगढ़ और सतना जिलों की ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाओं के टेंडर रद्द कर दिए। 

    ई-टेंडर प्रणाली 2006 में शुरू की गई थी, इस वर्ष दो कंपनियों (विप्रो और नेक्सटेन्डर कंपनी के कंसोर्टियम ) को टेंडर अवार्ड हुए और तीन पार्टियों-मैप आईटी, विप्रो कंपनी, और नेक्सटेन्डर कंपनी में एग्रीमेंट हुआ था। इसके बाद फरवरी 2013 में ई-टेंडर व्यवस्था के लिए फिर से टेंडर किये गए और इस बाद टीसीएस कंपनी और एन्टेरेस कंपनी के कंसोर्टियम को टेंडर अवार्ड हुए और तीन पार्टियों  1 विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग 2. टीसीएस कंपनी 3 एन्टेरेस कंपनी में एग्रीमेंट हुआ। इसके बाद 1 जनवरी 2014 से 31 नवंबर 2018 तक के लिए टेंडर किया गया। ई-टेंडर में गड़बडिय़ां और ई-टेंडर के रेट का मैनीपुलेशन और चहेती कंपनी को टेंडर देने की शिकायत 2006 से ही चल आ रही थी। लेकिन इसका खुलासा 2018 में एलएंडटी कंपनी द्वारा की गई गई शिकायत से हुआ। एलएंडटी कंपनी द्वारा मार्च 2018 में प्रमुख सचिव लोक सवास्थ्य यांत्रिकी विभाग से शिकायत की गई कि जल निगम के द्वारा किये गए तीन टेंडर उनको नहीं मिले क्यूंकि वह एल-1 नहीं था लेकिन ऐसा संभव नहीं है। 

    क्यूंकि पूरी संभावना थी कि ई-टेंडर प्रक्रिया में मैनीपुलेशन हुआ है, जिससे उन्हें टेंडर नहीं मिले। प्रमुख सचिव लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी के द्वारा अपने समक्ष में एलएनटी के अधिकारियों के सामने आईटी कंसलटेंट से पोर्टल खुलवाया एवं ई टेंडर को देखा गया तथा जब सिग्नेचर वेरीफाई किए गए तो पाया गया कि टेंडर करने एवं ओपन करने की हैश वैल्यू अलग अलग थी। इस तरह से जल निगम के तीन टेंडर ऐसे पाए गए जिनमें कंपनी को एल-1 होने के कारण टेंडर प्राप्त हुए थे।  उनके बिड सबमिशन एवं ओपनिंग की हैश वैल्यू आपस में मिलान नहीं कर रहे थे।

    क्या है ई टेंडर टेंपरिंग घोटाला
    मई 2018 में सबसे पहले लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी पीएचई विभाग में यह मामला सामने आया। जहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी ने पीएचई के प्रमुख सचिव प्रमोद अग्रवाल को पत्र लिखकर ई प्रोक्योरमेंट पोर्टल में टेंपरिंग कर 1000 करोड़ मूल्य के तीन टेन्डरों के रेट बदलने की जानकारी दी। इसके बाद ही 3 टेंडर निरस्त कर दिए गए इनमें से दो टेंडर उन पेयजल परियोजनाओं के थे जिनका शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करने वाले थे। दरअसल इस पूरे खेल में ई पोर्टल में टेंपरिंग से दरें संशोधित करके टेंडर प्रक्रिया से बाहर आने वाली कंपनी को टेंडर दिला दिया जाता था और मनचाही कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट दिलाने का काम बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया जाता था। इस खुलासे के बाद में मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ,जल निगम, महिला बाल विकास, लोक निर्माण, नगरीय विकास एवं आवास विभाग, नर्मदा घाटी विकास, जल संसाधन जैसे विभागों में भी इस तरह के मामले होने की खबरें मिली। मुख्यमंत्री ने इस मामले पर कार्रवाई करने के आदेश दिए तब मुख्य सचिव ने ईओडब्ल्यू पत्र लिखकर इस मामले में एफआईआर दर्ज करने को कहा था।  

    लाल क्रास से खुला मामला
    पीएचई विभाग के जल निगम ने जलप्रदाय योजना के तीन टेंडर 26 दिसंबर को जारी किए थे। इनमें सतना का 138 करोड और राजगढ़ जिले में 656 और 282 करोड़ के टेंडर थे। इनमें दो टेंडरों मेंं एलएंडटी कंपनी ने भी भाग लिया था। वह दोनों टेंडर में दूसरे नंबर पर रही। बाद में कंपनी ने पीएचई विभाग के प्रमुख सचिव प्रमोद अग्रवाल से शिकायत की। प्रमुख सचिव ने विभाग की लॉगिन से ई-टेंडर साइट को ओपन किया तो उसमें एक जगह लाल क्रॉस दिखाई दिया। उन्होंने विभाग के इंजीनियरों से इस बारे में पूछा तो उनका जवाब था कि टेंडर साइट पर यह निशान हमेशा आता है, लेकिन इसका कारण हमें नहीं पता। प्रमुख सचिव ने इसकी खोजबीन के लिए मैप आइटी के प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी को पत्र लिखा। जांच में सामने आया कि ई-प्रोक्योरमेँट में कोई छेड़छाड़ करता है तो लाल क्रास का निशान आ जाता है। जांच में ई-टेंडर में टेम्परिंग कररेट बदलने का तथ्य भी उजागर हुआ।  बता दें कि शिवराज सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए ई-टेंडर के नाम पर फर्जीवाड़ा करके कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया था। इसमें तत्कालीन शिवराज सरकार के कई अफसरों के शामिल होने की बात आई थी। जिसके बाद से इस मामले की जांच के लिए कांग्रेस ने भी प्रधानमंत्री को शिकायत की थी।

     

     

     

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Posted Date : 09-Apr-2019
  • चुनावी शोर, हफ्ता भर और

    शशांक तिवारी
    छत्तीसगढ़ संवाददाता
    रायपुर/कांकेर/बालोद, 9 अप्रैल।
    कांकेर लोकसभा में चुनावी शोर खत्म होने में हफ्तेभर का वक्त बाकी रह गया है, लेकिन भाजपा  में अंदरूनी कलह अभी तक दूर नहीं हुई है। ऐसे में भाजपा को यहां कब्जा बरकरार रखने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ रही है। इससे परे कांग्रेस यहां विधानसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराने पर जोर लगा रही है। इन सबके बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा से कुछ हद तक माहौल बदला है और धीरे-धीरे मुकाबला रोचक होते दिख रहा है।

    कांकेर लोकसभा क्षेत्र में कांकेर और बालोद जिले की विधानसभा सीटों के साथ-साथ धमतरी जिले की एक सीट नगरी सिहावा भी आती है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यहां जोरदार प्रदर्शन किया था और तीनों जिलों की सभी 8 सीटों पर कब्जा किया। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में भी कांकेर लोकसभा की सीटों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा था, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजे ठीक इसके विपरीत आए। कुछ इसी तरह की आस इस बार भी भाजपा के रणनीतिकारों को है। 

    भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी की टिकट काटकर पीएससी सदस्य रहे मोहन मंडावी को प्रत्याशी बनाया। जबकि कांग्रेस ने जिला पंचायत सदस्य वीरेश ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारा है। यहां से कुल 9 उम्मीदवार चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन मुकाबला भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशी के बीच में ही है। बाकी प्रत्याशी अब तक प्रभाव छोडऩे में सफल होते नहीं दिख रहे हैं। यहां दूसरे चरण में 18 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे।

    चुनाव प्रचार खत्म होने में हफ्तेभर का समय बाकी है, लेकिन कांकेर और बालोद के कई इलाकों में प्रत्याशी तो दूर, उनके कार्यकर्ता भी नहीं पहुंच पाए हैं। कांकेर का अंतागढ़ विधानसभा धुर नक्सल प्रभावित है, लेकिन यहां दोनों ही दलों के नेता पंखाजूर में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। यहां बंगाली समाज के लोगों के मतदाताओं की संख्या 80 हजार के आसपास है। बाकी कोयलीबेड़ा और अन्य इलाकों में नक्सल बहिष्कार का असर दिख रहा है और प्रचार भी यहां न के बराबर है। 

    भाजपा प्रत्याशी मोहन मंडावी धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं और वे रामायण मंडली के अध्यक्ष भी हैं। वे विशेषकर कांकेर जिले के गांवों में अच्छा प्रभाव रखते हैं। मगर, बालोद जिले की सीटों में उनके सामने पहचान का संकट है। कांग्रेस प्रत्याशी वीरेश ठाकुर भी कांकेर जिले में किसी पहचान के मोहताज नहीं है, लेकिन बालोद जिले की तीनोंंं सीटों में उन्हें जानने वाले नहीं के बराबर हैं। मगर, कांग्रेस के लिए अच्छी स्थिति यह है कि यहां की विधानसभा सीटों के विधायक कुंवर सिंह निषाद, श्रीमती अनिला भेडिय़ा और संगीता सिन्हा अच्छे खासे वोट से जीतकर आए हैं। निषाद तो 55 हजार से अधिक वोटों से जीतें। ये सभी वीरेश के लिए माहौल बनाने में जुटे हैं। 

    भाजपा ने बालोद में विधानसभा चुनाव के अंतर को पाटने की पूरी कोशिश की है। यहां बालोद की निकट गांव में प्रधानमंत्री श्री मोदी की सभा भी हुई थी। इसमें अच्छी खासी भीड़ उमड़ी। इससे परे बालोद नगर के अलावा आसपास के इलाकों में मोदी का क्रेज भी है। कुल मिलाकर यहां बड़ी संख्या में लोग मोदी को ही दोबारा पीएम देखना चाहते हैं, लेकिन दूर-दराज के इलाकों में प्रदेश सरकार की कर्जमाफी और बोनस नीति भारी दिख रही है। कांग्रेस को फायदें की उम्मीद से है। 

    खास बात यह है कि कांग्रेस बालोद से लेकर कांकेर तक एकजुट दिख रही है। कांग्रेस प्रत्याशी वीरेश ठाकुर के पिता सत्यनारायण ठाकुर एमएलए रह चुके हैं। ऐसे में विशेषकर भानुप्रतापपुर से उन्हें अच्छी बढ़त मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। इससे परे भाजपा प्रत्याशी मोहन मंडावी अंतागढ़ और केशकाल में अच्छी स्थिति  में है। जबकि कांकेर शहर में कांटे की टक्कर है। कांकेर शहर में मुस्लिम समाज के मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है और इनका रूझान कांग्रेस के पक्ष में दिख रहा है। यही नहीं, धमतरी जिले की नगरी-सिहावा सीट में भी भाजपा प्रत्याशी की स्थिति कुछ बेहतर दिख रही है। 

    कांग्रेस प्रत्याशी वीरेश ठाकुर के समर्थन में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, कांकेर और बालोद में सभाएं ले चुके हैं। भाजपा ने गुटबाजी पर लगाम लगाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है और प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी को चुनाव तक कांकेर में ही डेरा डालने के लिए कहा है। इसी तरह टिकट कटने से नाराज चल रही पूर्व विधायक श्रीमती सुमित्रा मारकोले और युवा नेता धीरज नेताम को समझाइश देने के लिए खुद वरिष्ठ नेता सौदान सिंह को आगे आना पड़ा। इन सबके बीच पूर्व सांसद सोहन पोटाई ने भी भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी है। वे चार बार सांसद रहे हैं और वे एक तरह से भाजपा प्रत्याशी के विरोध में निकल पड़े हैं। इससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। बाकी प्रत्याशी बहुजन समाज पार्टी से सूबे सिंह ध्रुव, शिवसेना से उमाशंकर भंडारी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से घनश्याम जूरी, अंबेडकराइट पार्टी ऑफ इंडिया से दुर्गा प्रसाद ठाकुर और भारतीय शक्ति चेतना पार्टी से मथन सिंह मरकम का कोई अता-पता नहीं दिख रहा है। बहरहाल, चुनाव प्रचार खत्म होने तक मुकाबला  कड़ा होने के संकेत भी दिख रहे हैं। 

     

     

     

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Posted Date : 09-Apr-2019
  • टीम की तैयारी शुरू, पार्क प्रबंधन पर कई चुनौतियां
    चंद्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर,
    9 अप्रैल। गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की उपस्थिति को लेकर पार्क प्रबंधन ने  सख्ती बरतना शुरू कर दिया है। सीनियर वाईत्ड लाइफ रीसर्च फेलो को भी रायपुर से कोरिया बुला लिया गया है और टीम बनाकर बाघिन पर नजर रखने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्क प्रबंधन बाघिन की गर्भवती होने से तो खुश है, परन्तु उनके संरक्षण को लेकर पार्क प्रबंधन के सामने कई चुनौतियां है।

    इस संबंध में पार्क परिक्षेत्राधिकारी एमएस मर्सकोले का कहना है कि बाघों के संरक्षण के लिए पार्क की पूरी टीम लगी हुई है, पार्क में स्थित बेरियर पर आने जाने वालों पर कड़ी नजर रखी जा रही है, शिकार से जुड़े लोगों की भी तलाशी तेज हो गयी है। इसके अलावा धनुष रखने वालों का सर्वे किया जाना है। वन्य जीवों के संरक्षण में गुरू घासीदास राष्ट्रीय पार्क पूरी तरह से संकल्पित है।  

    वहीं सीनियर वाईत्ड लाइफ रीसर्च फेलो नरेन्द्र मोहन का कहना है कि इस पार्क में काफी मात्रा में जंगली जीव जंतु उपलब्ध है, जो बाघ के लिए काफी उपयुक्त है, मंै बीते एक सप्ताह स्थानीय कर्मचारियों को बाघ के संरक्षण का प्रशिक्षण दूंगा और उनके मिलने वालें तमाम आंकड़ों को लेकर जानकारी जुटाई जाएगी। यहां बाघ की उपलब्धता से इस पार्क के लिए आगे बेहतर होने के संकेत अभी से दिख रहे है। 

    जानकारी के अनुसार वर्ष 2005 के वन्य जीव गणना में गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में 10 बाघों की उपस्थिति बताई गई थी, जिसके बाद कई बार बाघ देखा गया उसके पदचिन्ह भी पाए गए, परन्तु वर्ष 2008 से 2018 तक पार्क के संचालक ने इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया और 10 साल पार्क में बेवजह के निर्माण कार्यो को अंजाम दिया गया। वर्ष 2014 के बाद पहली बार राज्य में बाघ की उपस्थित देखी गयी है, जो बीते दो माह से गुरू घासीदास राष्ट्रीय पार्क मे दो बाघों नजर आए है। हालांकि दो से ज्यादा बाघों की उपस्थिति होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। पार्क के रेंज अफसर एमएस मर्सकोले और उनकी टीम अब बाघ को संरक्षित करने को लेकर रणनीति पर काम कर रहे है। हर दिन बाघ और बाघिन का लोकेशन ट्रेस किया जा रहा है। भैसों के मारने के बाद उसके द्वारा एक नील गाय को मारने की जानकारी भी मिली है, बीते कुछ दिनों से हर दिन किसी ना किसी को दिख रही है। 

    सीमित गति और सघन जांच
    पार्क प्रबंधन ने रामगढ़ आने जाने वालों पर कड़ी नजर रखना शुरू कर दिया है, दरअसल, बाघ का मूवमेंट ज्यादातर शाम होने के बाद ही देखा जा रहा है, कई बार मुख्यमार्ग पर टहलते लोगों को नजर आ रहा है। ऐसे में पार्क प्रबंधन ने शाम 7 बजे बाद सोनहत से रामगढ़ वाहन आने जाने पर  सतर्कता बरतने के साथ 20 किमी प्रति घंटा तक वाहन चलाए जाने की अपील की है। इसके अलावा पार्क के चारों ओर लगे बैरियर पर तैनात कर्मियों को सजग रहने के लिए वॉकी टॉकी दिया गया है। इसके अलावा धनुष तीर रखने वालों का सर्वे कराया जा रहा है, संदिग्धों की आवाजाही की जानकारी होने पर तत्काल पूछताछ की जा रही है। पार्क रेंजर मर्सकोले बाघिन के मूवमेंट की पल पल की की जानकारी एकत्रित कर रहे है। इसके लिए कई लोगों की नियुक्ति किया गया है, एक रेंज में कई नए कैमरे लगाए गए हंै, कैमरे में लगी बैटरी को समय-समय पर बदलने के बाद उसके द्वारा ली तस्वीरों की जांच की जा रही है, पदचिन्हों को ट्रेस कर बाघ की हर हरकत पर पैनी नजर रखी जा रही है। 

    बाघ को ढूंढना मुश्किल 
    सीनियर वाईल्ड लाइफ रीसर्च फेलो नरेन्द्र मोहन बताते हैं कि अगर एक बार बाघ जंगल में गुम हो गया तो उसे तलाशना नामुमकिन सा है। फिर चाहे आप ड्रोन को जंगल के ऊपर घुमा लें या सारी-सारी रात जागकर जंगल में बाघ के दोबारा शिकार की जगह आने का इंतजार कर लें। बाघ जब शिकार के लिए निकलता है तो उसके शिकार बनने वाले जानवर बहुत चौकन्ने हो जाते हैं। वो अलग तरह की आवाजें निकाल कर अपने साथियों और दूसरे जानवरों को बाघ के खतरे से आगाह करते  है। 

    वे बताते  है कि बाघ की पक्की खबर देने में अव्वल नंबर आता है लंगूरों का, जंगल में आस-पास तेंदुआ देखते ही लंगूर भौंकने जैसी आवाज निकालते हैं। वहीं, लंगूर जब बाघ को देखते हैं, तो दूसरी तरह की आवाज निकालते हैं। बाघों का प्रिय शिकार है चीतल हिरन। लंगूरों के भौंकने की आवाज सुनकर चीतल बहुत सतर्क हो जाते हैं। फिर वो चीतल भी पूरे झुंड को चेतावनी देने के लिए लगातार आवाज निकालने लगते हैं। वहीं, बाघ देखने पर सांभर हिरन अलग ही तरह की चरचराने वाली आवाज निकालते हैं। अब आप जंगल में बाघ देखने की फिराक में बैठे हैं। तो आप को इन आवाजों को पहचानना होगा, इनके संकेत को समझना होगा। क्योंकि इसी से आप को पता चलेगा कि आखिर बाघ किस तरफ शिकार के लिए निकला है। शिकार के वक्त शांत रहने वाले बाघ खुद भी अलग तरह की आवाज निकालते हैं। सेक्स के वक्त बाघ गुर्राहट भरी आवाज निकालते हैं। वहीं सेक्स के बाद इनकी आवाज गर्जना वाली होती है। 

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Posted Date : 08-Apr-2019
  • भाजपा को मोदी लहर की उम्मीद, शहरी इलाकों में बेहतर 

    कल थमेगा चुनाव शोर, 11 को वोट 

    शशांक तिवारी

    रायपुर/जगदलपुर-कोंडागांव, 8 अप्रैल (छत्तीसगढ़)। बस्तर लोकसभा में चुनावी शोर मंगलवार की शाम को थमेगा। प्रचार खत्म होने से पहले दोनों ही प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा ने अपनी ताकत झोंक दी है। यह सवाल आम लोगों की जुबान में हैं कि क्या कांग्रेस यहां 23 साल बाद अपना परचम लहरा पाएगी? दरअसल, विधानसभा के चुनाव नतीजों से कांग्रेस के लोग उत्साहित हैं और उम्मीद से हैं। इससे परे प्रचार के अंतिम क्षणों में भाजपा एकजुट दिख रही है और पार्टी के रणनीतिकारों को शहरी इलाकों में मोदी लहर चलने का भरोसा है। इन सबके बीच नक्सल बहिष्कार के चलते तीन-चार विधानसभाओं में पोलिंग कम होने की संभावना जताई जा रही है। 

    प्रदेश की अकेली बस्तर सीट में 11 तारीख को वोटिंग होगी। सालों बाद भाजपा ने दिवंगत आदिवासी नेता बलीराम कश्यप के परिवार से हटकर प्रत्याशी उतारे हैं। पार्टी ने पहली बार एक साथ प्रदेश के सभी सांसदों की टिकट काटकर नए चेहरे को चुनाव मैदान में उतारने का जोखिम लिया। इसमें तीन बार के सांसद दिनेश कश्यप भी प्रभावित  हुए और उनकी जगह बस्तर के जिलाध्यक्ष बैदूराम कश्यप को टिकट दी है। उनके मुकाबले कांग्रेस से विधायक दीपक बैज मुकाबले में हैं।  वैसे तो सीपीआई के रामुराम मौर्य समेत सात प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं, लेकिन मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है। 

    करीब 11 लाख 93 हजार मतदाता वाले इस लोकसभा क्षेत्र में दोनों ही दलों के राष्ट्रीय स्तर के कोई नेता प्रचार में नहीं आए हैं। वैसे चुनाव शुरू होने से पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की बस्तर इलाके में जनसभा हो चुकी है। भाजपा से पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह, प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी सहित कई नेताओं की सभाएं हो चुकी हैं।  कांग्रेस से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव कई सभाएं ले चुके हैं। यहां प्रचार की कमान उद्योग मंत्री कवासी लखमा संभाल रहे हैं। जबकि टिकट कटने से नाराज चल रहे कश्यप बंधु के हाथों में ही भाजपा चुनाव प्रचार की कमान हैं। पूर्व मंत्री केदार कश्यप चुनाव संचालक हैं और वे शुरूवाती नाराजगी के बाद सक्रिय भी दिख रहे हैं। बीजापुर इलाके में पूर्व मंत्री महेश गागड़ा डेरा डाले हुए हैं, तो दंतेवाड़ा में पार्टी के एकमात्र विधायक भीमा मंडावी मेहनत कर रहे हैं। 

    प्रचार के अंतिम दिनों में भाजपा एकजुट तो दिख रही है, लेकिन कई-कई इलाकों में कार्यकर्ता सक्रिय नहीं हैं और बीजापुर-दंतेवाड़ा और सुकमा अंदरूनी इलाकों में तरह से प्रचार से दूर हैं। पार्टी के रणनीतिकार इसको लेकर गंभीर हैं और अपनी पूरी ऊर्जा कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में लगा रहे हैं। मगर, शहरी इलाकों में स्थिति कुछ बेहतर दिख रही है। मसलन, नारायणपुर, जगदलपुर और दंतेवाड़ा में भाजपा अच्छी स्थिति में हैं। यहां कुछ हद तक नरेन्द्र मोदी को दोबारा पीएम बनाने का नारा माहौल बनाता दिख रहा है। कुल मिलाकर प्रत्याशी की छवि या कार्यप्रणाली कोई बहुत ज्यादा असर नहीं दिख रही है। कवासी लखमा और उनकी टीम काफी प्रचार कर रही है और इस बार कोंटा में बेहतर स्थिति नजर आ रही है। जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां से बढ़त मिली थी।  

    दूसरी तरफ, कोंडागांव, बस्तर, चित्रकूट और बीजापुर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के पक्ष में स्पष्ट माहौल दिख रहा है। जगदलपुर शहर में तो भाजपा की स्थिति बेहतर दिख रही है, लेकिन इससे सटे गांव में कांग्रेस उम्मीदवार मजबूत दिख रहे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी दीपक बैज युवा हैं और उनकी सक्रियता से कांग्रेस को फायदा मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस ने टाटा संयंत्र के लिए अधिग्रहित जमीन को लौटाने का काम किया है, इसका फायदा भी मिलते दिख रहा है। सीपीआई उम्मीदवार रामुराम मौर्य दंतेवाड़ा और कोंटा के साथ-साथ बस्तर में भी काफी कुछ वोट खींचने की स्थिति में दिख रहे हैं। बाकी प्रत्याशी कोई प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे हैं। बहरहाल, आखिरी के दिनों में भाजपा नेताओं की सक्रियता से चुनावी मुकाबला कुछ हद तक रोचक दिख रहा है। 

    नक्सली बहिष्कार का असर दिखेगा?
    बस्तर लोकसभा चुनाव में नक्सली बहिष्कार का असर दिख सकता है। नक्सली इस बार मतदान के दौरान हिंसा फैला सकते हैं। विधानसभा चुनाव में उन्होंने बहुत ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई थी। इस वजह से अंदरूनी इलाकों में भी अच्छा मतदान हुआ था, लेकिन लोकसभा चुनाव की स्थिति एकदम अलग दिख रही है। 
    नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार के पोस्टर अंदरूनी इलाकों में देखे जा सकते हैं। हाल यह है कि विशेषकर बीजापुर और दंतेवाड़ा व कोंटा, कोंडागांव के अंदरूनी इलाकों में भाजपा कार्यकर्ता प्रचार के लिए नहीं जा पा रहे हैं। अलबत्ता, इन इलाकों के गांवों में कांग्रेस के लोग ज्यादा सक्रिय हैं। भाजपा ने मुख्य सडक़ से सटे गांवों में ही प्रचार कर रही है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि इन गांवों में यहां ज्यादा मतदान होगा, तो भाजपा को इसका सीधा फायदा मिलेगा। 

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Posted Date : 07-Apr-2019
  • छत्तीसगढ़ संवाददाता
    उदयपुर, 7 अप्रैल।
    रामगढ़ जो कि हजारों वर्षों से अपने भीतर सैकड़ों रहस्य समेटे हुये है इसकी यात्रा लोगों को रोमांचित करती है। सरगुजा जिले के विकास खण्ड उदयपुर स्थित रामगढ़ उदयपुर बस स्टैण्ड से दक्षिण दिशा की ओर दो किमी की दूरी पर स्थित है विश्व की प्राचीनतम् नाट्य शाला सीताबेंगरा। किवदंती है कि इसी स्थान पर महाकवि कालीदास ने अपनी अनुपम कृति मेघदूतम की रचना की है। चारों ओर पहाड़ और  नीचे सुरंग नुमा गुफा है जिसे हाथी पोल हथफोड़  के नाम से जाना जाता है। यहां से एक किलोमीटर दूर लगभग 100 फीट से उंची पहाड़ी पर एक गुफा है जिसे लक्ष्मण गुफा के नाम से जाना जाता है। सीता बेंगरा से मुख्य मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर के करीब है। रास्ते में घाट पहाड़ से गुजरते हुये सबसे छोटेतुर्रा स्थित है जहां पहाड़ के बीचो बीच बारहों महीने शीतल जल निकलता रहता है और श्रद्धालुओं की प्यास बुझाता है। 
    यहां से कुछ दूर पैदल चलने पर मुर्गी गोड़ारी नामक स्थान है जहां से रामगढ़ की मुख्य मंदिर के लिए सीढिय़ां मिलती है। यहां से शुरू होती है रामगढ़ की विरल और असली यात्रा जहां कुल 631 सीढिय़ों की कठिन चढ़ाई चढऩे के दौरान रास्ते में प्राचीनतम सिंह द्वार श्रद्धालुओं का स्वागत करता है और थके हुये यात्रियों के बिश्राम का साधन भी है। कुछ क्षण रूक कर लोग आगे बढ़ते है। लगभग आधे घंटे की चढ़ाई के बाद हजारों वर्ष पूराने राम जानकी मंदिर के दर्शन होते है, जिसे देखकर श्रद्धालु अपना सारा दर्द भूल जाते है। इस मंदिर के भीतर हजारों वर्ष पुराना राम जानकी, लक्ष्मण, हनुमान और विष्णु भगवान की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर दर्शन और प्रसाद ग्रहण करने के बाद लोग यहां से पार्वती गुफा और जानकी तालाब के दर्शन को जाते है। इन सबके अलावा यहां दर्शनीय स्थल चंदन माटी तालाब है जहां उत्साही युवक अंदर जाकर चंदन की मिट्टी लेकर आते है उनका उत्साह देखते ही बनता है। कुछ पुरातत्व के महत्व की चीजें है जो उपेक्षा की शिकार है जिनके संरक्षण की आवश्यक्ता है, जिनमें प्रमुख रूप से भगवान आदिनाथ की बाल्यकाल से बोधी प्राप्ति तक की प्रतिमा है जो जीर्ण शीर्ण अवस्था में है संरक्षण के अभाव में अपनी पहचान खो रहा है। थोड़ी पहल से इसकी रंगत और बदल सकती है। 

    यहां रामनवमीं के पहले दिन से ही अच्छी खासी भीड़ श्रद्धालुओं की देखी जा सकती है। सप्तमी से दसमीं तिथि तक यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में पहुंच जाती है। सौर उर्जा से संचालित यह क्षेत्र रात्रि में जगमग रोशनी से शोभायमान होता है। रामगढ़ पहाड़ के हर भाग में विभिन्न प्रजातियों के पेड़ पौधों के अलावा दुर्लभ प्रजाति के प्राकृतिक औषधीय पौधे भी पाये जाते है। शासन द्वारा योजनाएं बनाकर उनके संरक्षण एवं संवर्धन का भी प्रयास किया जा रहा है। जैव विविधताओं से लबरेज इस प्राकृतिक उपहार को वन विभाग अगर सहेज पाने में सफल होता है तो हमारा रामगढ़ पूरे प्रदेश ही नही वरन पूरे देश में प्राकृतिक संतुलन और जैव विविधताओं के लिए मशहूर होगा।

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Posted Date : 07-Apr-2019
  • दुर्ग के नतीजे अप्रत्याशित व चौंकाने वाले भी रहे 
    बेमेतरा, 7 अप्रैल (छत्तीसगढ़)
    । 18 वीं लोकसभा के लिये मतदान में अब पखवाड़े भर का समय शेष है। कालांतर में केंद्र व राज्य के महत्वपूर्ण निर्णयों से दुर्ग के नतीजे भी प्रभावित होते रहे है।  लिहाजा  देशव्यापी जनता लहर में यहाँ जनता पार्टी के मोहन भैया जीते वहीं 1989 के बोफोर्स के कारण साँसत में रही।  राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को प्रभावहीन समझे जाने वाले जनता दल के पुरुषोत्तम  कौशिक ने पटखनी दी। दोनों मर्तबे हार के शिकार  बने कांग्रेस के चंदूलाल चंद्राकर। 
    सम्पन्न लोकसभा चुनाव परिणामों पर यदि नजऱ डालें तो कांग्रेस के इस अभेद्य दुर्ग के ये नतीज़े अप्रत्याशित व चौकाने वाले भी रहे हंै। लिहाजा जनता दल के प्रभाव नहीं होने तथा बाहरी होने के बावजूद कौशिक ने चार बार के सांसद रहे चंदूलाल चंद्राकर को लगभग एक लाख दस हज़ार  मतों से पराजित किया। 

    इसी अनुक्रम में 2014 में सरोज पांडेय की पराजय भी आश्चर्यजनक रही, जबकि  देशव्यापी मोदी लहर जिसमें प्रदेश की 11 में से 10 सीटों पर भाजपा की जीत के बाबजूद दुर्ग सीट कांग्रेस के कब्जे में चली गयी। तब एक साथ सांसद, विधायक एवम महापौर निर्वाचित होकर लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराने वाली सरोज पांडेय को कांग्रेसी ताम्रध्वज साहू ने लगभग 16 हज़ार मतों से पराजित कर दिया। 

    आश्चर्य जनक तथ्य यह भी है कि सरोज को शिकस्त देने वाले ताम्रध्वज को ठीक पहले 2013 के सम्पन्न विधानसभा चुनाव में  बेमेतरा से भाजपा प्रत्याशी ने लगभग सोलह हजार मतों से  हराया था। इस हार के बाद भी लोकसभा चुनाव जीतने के कारण ताम्रध्वज की  राजनीतिक उड़ान  कांग्रेस में शुरू हो गयी। सी डब्ल्यू सी सदस्य  से गृहमंत्री बनने तक के सफर की पृष्ठभूमि  इसी जीत ने तैयार की। हालांकि भाजपा में इस अप्रत्याशित  हार को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की भूमिका को लेकर सवाल भी उठे थे। लिहाज़ा  सरोज के संगठन में बढ़ते प्रभाव तथा प्रदेश में भावी सत्ता- संघर्ष की  आशंका इस पराजय की पृष्ठभूमि के मूल कारण माने गये थे। अलबत्ता इस पराजय से भाजपा में शुरू हुई गुटीय लड़ाई का पटाक्षेप सम्पन विधानसभा चुनाव में भारी पराजय के साथ  हुआ। 

     यदि आकड़ों की दृष्टि से देखे तो 2009 में सम्पन्न लोकसभा चुनाव के परिणाम बेहद दिलचस्प माने जा सकते हंै। चार-बार के सांसद  ताराचंद साहू ने भाजपा से बगावत कर स्वाभिमान मंच से चुनाव लड़ा। इस बार उनका सामना कांग्रेस के प्रदीप चौबे व भाजपा के सरोज पांडेय से था। इस त्रिकोणीय लेकिन रोचक मुकाबले में सरोज को 283170 चौबे को 273216 तथा ताराचंद को 261879 मत मिले। हारजीत महज़ 9954 मतों से ही हुआ। ताराचंद साहू को 28.92 प्रतिशत मिले। यानी विजयी प्रत्याशी से केवल 21291 मत कम। प्रदेश के चुनावी इतिहास में बतौर निर्दलीय किसी उम्मीदवार को  प्राप्त ये सर्वाधिक मत है। ईमानदार व मुखर छवि के प्रदीप चौबे केवल नौ हजार मतों से पिछडऩे के कारण संसद पहुचने से वंचित रह गए। 

     1967 में चौथी लोकसभा के लिए निर्वाचित विश्वनाथ यादव तामस्कर बेमेतरा के विधायक भी रहे। तत्कालीन सी पी एन्ड बरार विधानसभा में तामस्कर उपनेता प्रतिपक्ष थे। तामस्कर के करीबी बताते है कि उस समय वे विपक्ष के धुरंधर नेता थे। उनकी ईमानदारी व लोकप्रियता को देख तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र ने  प्रदेश में महत्वपूर्ण जिम्मेवारी देने का भरोसा दिला  उन्हें कांग्रेस प्रवेश करा दिया लेकिन प्रदेश कि राजनीति से दूर रखने की नियत से डी पी मिश्र ने उन्हें 1967 में लोकसभा  टिकट दे दिया। हालांकि वे काफी वोटों से चुनाव जीतकर  संसद पहुंच गये लेकिन अपने साथ हुए धोखे से वे आहत थे। 

     कांग्रेस प्रवेश के अनइच्छुक तामस्कर  को इस वादाखिलाफी ने सदमे में ला दिया। कार्यकाल समाप्ति के पहले ही 1971 में उनका असामयिक निधन हो गया। तत्पश्चात 1972 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के चंदूलाल चंद्राकर ने संयुक्त विपक्ष के महेश तिवारी को हराकर दुर्ग सीट पर कब्ज़ा बरकरार रखा। चंदूलाल चुनाव जीते जरूर लेकिन बेमेतरा विधानसभा में महेश तिवारी को लीड मिली।

     इस प्रकार अब तक सम्पन्न 17 चुनावों में कांग्रेस10,  भाजपा 5 तथा जनता पार्टी व जनता दल ने एक एक बार जीत दर्ज की। सर्वाधिक 4 बार कांग्रेसी चंदूलाल चंद्राकर व भाजपायी ताराचंद साहू सांसद बने। बाकलीवाल 3 मर्तबे जीते। वर्ष 1951 से लगातार कांग्रेस के इस गढ़ में 1977 के जनता लहर में मोहन भैया,1989 के बोफोर्स के चलते कौशिक ने सेंध जरूर लगाई लेकिन 1996  में ताराचंद साहू ने यह सीट जीत कर 2009 तक यानी लगभग 14 वर्षों तक भाजपा ने अपना कब्जा बरकरार रखा। 

    ताराचंद यदि राजनीतिक सत्ता संघर्ष के शिकार बन भाजपा से बाहर नही होते तो इस गढ़ को भेदना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर थी। लिहाज़ा ताराचंद साहू ने कांग्रेस के तमाम दिग्गजों जिसमे मुख्यमंत्री बघेल भी शामिल है को बारी बारी से हरा भाजपा को मुक्कमल जीत दिलाई।

    हालांकि परम्परागत इस कांग्रेसी सीट से 1996 में कांग्रेस  तथा 2014 में भाजपा के  हार के कारणों में काफी समानता भी है। 
    कांग्रेस के कतिपय नेताओ की गुटबाज़ी तथा फूल छाप कांग्रेसियों की मदद के चलते ताराचंद साहू पहली बार चुनाव जीते। इस जीत में असंतुष्ट कांग्रेसियों की अहम व निर्णायक भूमिका रही। कहते हंै इतिहास अपने को जरूर दुहराता है। आगे चलकर यही 2009 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी  सरोज पांडेय के साथ हुआ जब सत्ता संगठन से जुड़े कतिपय प्रमुख भाजपा नेताओं ने अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेसी ताम्रध्वज की मदद की। नतीजतन भाजपा अब फिर  बैकफुट पर है। 
    मोदी लहर व राज्य सरकार की उपलब्धियों के बीच सीधा व निर्णायक  लड़ाई है। मुख्यमंत्री का गृह निर्वाचन क्षेत्र है तथा दोनों उम्मीदवार  स्वजातीय हंै। दोनों से नजदीकी रिश्ता भी है एक से पारिवारिक जबकि दूसरे से राजनीतिक। हालांकि मतदाता अभी मौन हंै। लेकिन ये चुप्पी किसी बड़े निर्णय का संकेत भी साबित हो सकते हंै। अलबत्ता दोनों दल एक बार फिर नई रणनीति व जोश के साथ आमने-सामने हंै इस प्रत्याशा में कि किसी तरह इस दुर्ग पर अपना परचम एक बार फिर लहराया जावे।

     

    सीट पर कब किसका कब्जा 
    1951        डब्लू एस किरोलिकर        कांग्रेस
    1957               मोहनलाल बाकलीवाल           कांग्रेस
    1962               मोहनलाल बाकलीवाल           कांग्रेस
    1967               वीवाय तामस्कर                     कांग्रेस
    1971               चंदूलाल चन्द्राकर                   कांग्रेस
    1972               चंदूलाल चन्द्राकर                   कांग्रेस
    1977               मोहन भैय्या            लोक दल
    1980               चंदूलाल चन्द्राकर                   कांग्रेस
    1984               चंदूलाल चन्द्राकर                   कांग्रेस
    1989                पुरुषोत्तम कौशिक            जनता दल
    1991                चंदूलाल चन्द्राकर                 कांग्रेस
    1996                ताराचंद साहू                       भाजपा
    1998                ताराचंद साहू                       भाजपा
    1999                ताराचंद साहू                       भाजपा
    2004                ताराचंद साहू                       भाजपा
    2009                सरोज पांडेय                       भाजपा
    2014                ताम्रध्वज साहू                     कांग्रेस

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Posted Date : 05-Apr-2019
  • तीन करोड़ के सोने से सजा गर्भगृह
    प्रदीप मेश्राम
    राजनांदगांव, 5 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
    आस्था के अटूट केंद्र डोंगरगढ़ के नीचे स्थित मां बम्लेश्वरी के मंदिर का बाहरी आवरण बेहद ही खूबसूरत बन गया है। गुजरात के पेशेवर शिल्पकारों के हाथों  मंदिर के  बाहरी आवरण में भोरमदेव और प्रसिद्ध अक्षरधाम मंदिर की झलक दिख रही है।  करीब 10 साल की कड़ी मेहनत के बाद यह रूप सामने आया है। मंदिर के अंदरूनी और बाहरी स्वरूप को आकर्षक बनाने के लिए 2007 से गुजरात के शिल्पकार कार्य कर रहे हैं। 

    मंदिर ट्रस्ट के सुपरवाईजर बोधन जंघेल ने ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि मंदिर के बाहरी स्वरूप को खूबसूरत बनाने के लिए गुजरात के कलाकारों की मदद ली गई है। मंदिर के बाहरी आवरण में साफ तौर पर अलग-अलग अष्ट देवताओं की मूर्तियों को लगाया गया है। साथ में शिल्पकृति के जरिए कई  खूबसूरत मूर्तियां उकेरी गई है। बताया जाता है कि अक्षरधाम और भोरमदेव की तर्ज पर पूरा आवरण अपनी ओर खींचेगी। मंदिर ट्रस्ट ने करीब 10 साल में इस कार्य के एवज में 15 करोड़ रुपए व्यय किए हैं। 

    मंदिर ट्रस्ट के मुताबिक मंदिर के मां गर्भगृह को भी सोने की चमक से दमकाया गया है। इसके लिए करीब 3 किलो का सोना उपयोग किया गया है। साथ ही मां के मंदिर के अगल-बगल स्थित गणेश और कालभैरव मंदिर में भी दो किलो 900 ग्राम सोने का गुंबद स्थापित किए जाने का प्रावधान है। जल्द ही दोनों मंदिर में सोने के गुंबद लगाए जाएंगे।  जानकारी के मुताबिक अगले कुछ सालों में पूरे मंदिर  के स्वरूप को बदलने के लिए और भी ट्रस्ट द्वारा आर्थिक सहायता के तौर पर चंदा लिया जा रहा है। बहरहाल नवरात्रि में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को शिल्पकारों की कड़ी मेहनत से बने नए स्वरूप को देखने से सुखद अनुभव होगा। 

    कल से नवरात्र प्रारंभ

    कल शनिवार से चैत्र नवरात्र प्रारंभ होने के साथ ही मां बम्लेश्वरी के दर्शन के लिए श्रद्धाल पहुंचेंगे। श्रद्धालुओं की  सुरक्षा को लेकर जिला व पुलिस प्रशासन ने कड़े बंदोबस्त किए हैं। वहीं पदयात्रियों के लिए  जगह-जगह सेवा पंडाल भी लगाए जाएंगे।

     

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Posted Date : 04-Apr-2019
  • सैकड़ों जवानों कीसुरक्षा में भेजा जाता है

    यहां राशन, फिर भी कालाबाजारी

    अमन सिंह भदौरिया

    दोरनापाल, 4 अप्रैल (छत्तीसगढ़)। सुकमा जिले के जगरगुंडा ,चिंतलनार जैसे इलाके के लगभग 20,000 आदिवासियों के राशन की कालाबाजारी थमने का नाम नहीं ले रही है।  इन बीहड़ नक्सल प्रभावित इलाके के आदिवासियों के लिए राशन राज्य शासन जिला मुख्यालय से सैकड़ों जवानों की सुरक्षा में भेजता है। राशन वहां पहुंचने के बाद भी इन आदिवासियों के हिस्से नहीं आ पाता क्योंकि सेल्समैन इन्हें बांटते नहीं, यह अनाज व्यापारियों को बेच देते हैं। यही राशन, व्यापारी इन आदिवासियों को वनोपज के बदले बेच रहे हैं। एक रुपये में मिलने वाला अपने हक का  चावल ये आदिवासी 15 से 20 रुपये किलो खरीद रहे हैं।

    इस मामले पर कलेक्टर चंदन कुमार ने कहा कि मीडिया के माध्यम से मुझे पता चल रहा है कि जगरगुंडा जैसे इलाके में पीडीएस के चावल की कालाबाजारी चल रही है और साप्ताहिक बाजार से ग्रामीण पीडीएस का चावल खरीद रहे हैं। इस मामले पर जांच टीम गठित होगी और पूरी जांच की जाएगी। जांच में कोई दोषी पाया गया तो कार्यवाही की जाएगी । 

    कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ की टीम ने जगरगुंडा से इस मामले को प्रमुखता से उठाया था जिसके बाद कलेक्टर ने जांच के निर्देश भी दिए और जांच भी पूरी हुई पर अब तक किसी पर कोई कार्यवाही नही हुई बल्कि मामले को विभाग ने रफ़ादफ़ा कर दिया। जब ‘छत्तीसगढ़’ की टीम  दोबारा पर पड़ताल पर पहुंची तो पहले की ही तरह हालात नजर आए। न कोई डर,न कोई रोक-टोक मिला तो बस 15 रुपए किलो चावल और उसे खरीदते बेबस  आदिवासी। सरकारी मार्का लगे बोरे में भरा चावल बेखौफ बिक रहा था।  खुले आम जगरगुंडा पीडीएस के चावल से गल्ले की दुकान वनोपज खरीदने सजती है और तकरीबन 75 से 80 क्विंटल चावल की खपत सप्ताहिक बाजारों में होती है।

    ऐसे चल रहा पीडीएस का काला कारोबार

    मामला जगरगुंडा पंचायत का है जहां 8 उचित मुख्य की दुकानें हैं जिसमें आसपास के सभी ग्रामीणों के लिए 1 रुपये किलो या मुफ्त का राशन आता है ये ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पाता क्योंकि सेल्समैन इन्हें गुमराह करते हंै। जब 10-15 किमी से ग्रामीण पैदल राशन की उम्मीद में पहुंचते हैं तो उन्हें सिर्फ हवाला दिया जाता है कभी राशनकार्ड में संशोधन का, तो कभी दो महीने से राशन न आने का। वहीं  सेल्समैन महीनों से  लापता होता है।  नक्सल प्रभावित इलाका होने के चलते यहाँ न कोई सुनने आता है न कोई मदद को। कइयों ने बताया कि महीनों से उन्हें न राशन मिला और न ही राशन कार्ड । इस तरह इन आदिवासियों का राशन सेल्समैन बचा लेते हैं और 12 रुपये में इसे व्यापारियों को बेच देते है जो इन आदिवासियों तक 15 से 20 रुपए प्रति किलो  पहुंचता है।  

    78 परिवार को 9 माह से नहीं मिला राशन

    जब ‘छत्तीसगढ़’ की टीम जगरगुंडा राशन की दुकानों के सामने लगी भीड़ के पास पहुंची तो तारलागुड़ा पंचायत के ग्रामीण मिले जिन्हें 9 महीने बाद राशन दिया जा रहा था। तारलागुड़ा के बैनपल्ली गांव के जिन्होंने छत्तीसगढ़ को बताया कि गांव में 78 परिवार है जिसकी आबादी 444 है और इन्हें राशन 9 महीनों से नहीं मिला। ग्रामीणों की मानें तो ये आखरी बार जून 2018 में राशन लेने पहुंचे थे उन्हें राशन तो मिला मगर उनके राशनकार्ड संशोधन के नाम पर सचिव द्वारा जमा करवा लिए गए तब से उन्हें न तो राशन दिया गया और न ही राशन कार्ड । हर बार 10 किमी पैदल ग्रामीण राशन की आस में दुकान तो आते पर मिलती तो बस मायूसी । इन ग्रामीणों को 9 महीने बाद बगैर राशनकार्ड राशन दिया जा रहा था ।

    2 महीने से सेल्समैन लापता

    ग्रामीणों से पूछताछ के दौरान कोंडासांवली पंचायत के कामरगुड़ा गांव का भी एक मामला ‘छत्तीसगढ़’ को पता चला। यहां के एक राशनकार्डधारी ने बताया कि उसके पास राशन कार्ड  है। पर 2 महीने से  सेल्समैन ने राशन दुकान के ताले नहीं खोले हैं, लापता है। लगभग 70 कार्डधारी गांव में हैं।  ग्रामीण हर हफ्ते राशन की उम्मीद में आते हैं पर राशन की दुकान में हर हफ्ते ताला ही मिलता है और सेल्समैन भी नहीं मिला  तो बाजार जाकर वनोपज से चावल खरीदना पड़ता है। ज्यादातर ग्रामीण अशिक्षित हैं इसलिए न आवाज़ उठा पाते हैं और न ही शिकायत कर पाते।

    बैनपल्ली निवासी कलमु विजय  का कहना था कि मेरा राशनकार्ड जून से ही सचिव के पास जमा से सेल्स में ने कई सालों बाद जून 2018 में राशन दिया था फिर राशन देने के तुरंत बाद राशन दुकान में ही सचिव के कहने पर किसी जगदीश ने राशन कार्ड में सुधार के नाम पर पूरे गांव के 78 राशनकार्डों को जमा करा लिया तब से न तो राशन मिला और न ही राशन कार्ड ,रविवार को 9 महीने बाद हमे बिना राशन कार्ड ही राशन दिया गया ।

     ग्रामीण बैनपल्ली के ही कलमु देवा का कहना था कि 9 महीने से राशन नहीं दिया गया कारण भी नहीं बताया जाता था। कार्ड सचिव के पास जमा है। बिना राशन 78 परिवार को इधर-उधर से खरीदकर साप्ताहिक बाजारों से महंगा चावल खरीदना पड़ता है ।

     जगरगुंडा के गल्ला व्यापारी  महेश का कहना था कि आदिवासी वनोपज के बदले चावल खरीदते हैं जैसे कि अगर इमली 28 रुपये किलो है तो हम उन्हें इमली के बदले 2 बार चावल देते हैं। तराजू के एक पल्ले में इमली होगी तो दूसरे पल्ले में चावल बराबर होते ही चावल एक बार और नाप तौलकर दिया जाता है ऐसे ग्रामीणों को चावल 14 से 15 रुपए किलो पड़ जाता है।

     

     

     

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Posted Date : 02-Apr-2019
  • भाजपा आक्रामक, विरोध में दिग्विजय भी
    अतुल पुरोहित
    भोपाल, 2 अप्रैल (छत्तीसगढ़)।
    राज्य सरकार ने राजधानी स्तिथ आरएसएस कार्यालय समिधा से सुरक्षा हटा ली है7 चुनावी समय में सरकार के इस फैसले से सियासत गरमा गई है। भाजपा जहाँ इस मामले में आक्रामक हो गई है, वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इसका विरोध किया है। सोमवार रात 9:30 बजे अचानक एसएएफ का कैंप हटना शुरू हुआ और रात 11 बजे तक जवान अपना सामान लेकर चले गए। यहां 15 साल से एसएएफ का अस्थायी कैंप तैनात था। 2003 में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने ये व्यवस्था लगाई थी। 

    ईंट से ईंट बजा देने की चेतावनी 
    भाजपा के वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने ट्वीट कर इस मामले में नाराजगी जताई और सरकार को चेतावनी दे डाली है। भार्गव ने ट्वीट कर लिखा है कि भोपाल स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय से सुरक्षा का हटाया जाना कमलनाथ का बेहद ही निंदनीय कदम है। कांग्रेस द्वारा शायद फिर किसी हमले की योजना बनाई गई है। अगर  किसी स्वयंसेवक को खरोंच भी आई तो कांग्रेस सरकार की ईंट से ईंट बजा दी जाएगी। 
    वहीं बीजेपी प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने लिखा है कि वे अलगाववादी और आतंकवादी संगठनों को सुरक्षा देते हैं और हम राष्टवादी संगठनो को। जम्मू-कश्मीर की खीझ है कांग्रेस को। वे अपना कार्य करें हम अपना करेंगे। जनता सब देख रही है। संघ पर बौद्धिक और शारीरिक हमलावरों को राजनीतिक संरक्षण देने वालों की सरकार बन गई है मध्यप्रदेश में।

    मंत्रियों की भी सुरक्षा हटाए सरकार
    संघ के दफ्तर से सुरक्षा हटाए जाने पर पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने भी सवाल खड़े किए है। गौर ने कहा कि संघ ने सुरक्षा नहीं मांगी थी। अगर कांग्रेस ने सुरक्षा दी थी तो जारी रखना था। मंत्रियों के यहां भी सुरक्षा व्यवस्था है तो संघ कार्यालय से क्यों हटाई। चुनाव आयोग को आवश्यकता थी तो सभी मंत्रियों के यहां से भी सुरक्षा हटानी थी। 
    वहीं दिग्विजय सिंह द्वारा इस फैसले को गलत बताने पर गौर ने कहा कि उनका बहुत धन्यवाद वो समझदार व्यक्ति है। भारत की वो संस्थान जो पाकिस्तान के विरोधी है उनपर टारगेट है। संघ पाकिस्तान का सबसे बड़ा विरोधी है। कांग्रेस की पूरी छवि हिन्दू विरोधी है, चाहे राहुल हो या दिग्विजय सिंह। जय जय श्रीराम कहने से पाप नहीं धुलते।


    दिग्विजय ने भी फैसले को बताया गलत
    भोपाल से कांग्रेस के लोकसभा प्रत्याशी और वरिष्ठ नेता दिग्विजय ने भी इस फैसले को गलत बताया है। साथ ही संघ कार्यालय को पुन सुरक्षा देने की मांग की है। सिंह ने ट्वीटर के माध्यम से लिखा है कि भोपाल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कार्यालय से सुरक्षा हटाना बिल्कुल उचित नहीं है मैं मुख्य मंत्री कमल नाथजी से अनुरोध करता हूँ कि तत्काल पुन: पर्याप्त सुरक्षा देने के आदेश दें।

    ये है पूरा मामला
    सोमवार रात राज्य सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ई-2 अरेरा कॉलोनी स्थित कार्यालय समिधा से सुरक्षा-व्यवस्था हटा दी है। यहां दस साल पहले यानी 2009 से एसएएफ की एक- चार की गार्ड तैनात थी। समिधा के सामने सडक़ के किनारे एसएएफ स््रस्न का टेंट लगा हुआ था। सोमवार रात 9.30 बजे अचानक एसएएफ का कैंप हटना शुरू हुआ और रात 11 बजे तक जवान अपना सामान लेकर चले गए। पुलिस मुख्यालय ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के भोपाल स्थित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मुख्यालय समिघा से सोमवार को सुरक्षा हटा ली। यहां 15 साल से एसएएफ का अस्थायी कैंप तैनात था। 2003 में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ये व्यवस्था लगाई थी।

    प्रचार प्रमुख मध्यभारत प्रांत संघ - नरेंद्र जैन का कहना है कि न हमने सुरक्षा मांगी थी और न हटाने को कहा। सरकार ने सुरक्षा दी थी, अब हटा ली है। यह सरकार का निर्णय है। इस मामले में हम कुछ नहीं कहना चाहते।

    गृह मंत्री बाला बच्चन ने कहा कि चुनाव आयोग ने चुनाव की व्यवस्था के लिए फोर्स की मांग की है। इसके लिए समीक्षा के दौरान यह बात सामने आई कि कई जगहों पर बिना स्वीकृति के बल तैनात है। ऐसे सभी स्थानों से बल वापस बुलाने का निर्णय लिया गया। उसमें संघ कार्यालय भी शामिल है। 

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Posted Date : 02-Apr-2019
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    दिग्गजों का गढ़ रहा राजनांदगांव लोस का इतिहास रोचक भरा

    प्रदीप मेश्राम

    राजनांदगांव, 02 अप्रैल। अविभाजित मध्यप्रदेश में राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र का इतिहास रोचक मुकाबलों के लिए जाना जाता है। लोकसभा में राजनीतिक पार्टियों को आपसी मुकाबले में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। खैरागढ़ राजघराने से निकली यह सीट आम कार्यकर्ता के खाते तक भी गई। 1957 में दुर्ग लोकसभा से विभक्त होकर अस्तित्व में आई इस सीट ने कई बड़े राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। इस सीट की अपनी एक राजनीतिक खासियत रही है। लोकसभा के रूप में अस्तित्व में आने के बाद पहली बार 1999 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार  में राजनांदगांव लोकसभा को केंद्रीय मंत्री नसीब हुआ।  संसदीय इतिहास में भाजपा के डॉ. रमन सिंह ने पुराने रिकार्डों को ध्वस्त करते अपने सीट केंद्रीय मंत्री का ताज पहना। केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य राज्य मंत्री के रूप में डॉ. सिंह ने राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। यह दौर उस वक्त अजीबो-गरीब  राजनीतिक परिस्थिति से उथल-पुथल भरा रहा, क्योंकि 1996 से 1999 के बीच देश में राजनीतिक अस्थिरता के चलते औसतन डेढ़ वर्ष की अवधि में दो आम चुनाव हुए। जिससे देश की माली हालत खराब थी। 1999 में जैसे ही अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में  केंद्र में भाजपा सरकार पदारूण हुई। उसी के साथ ही राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र में एक नया इतिहास रचा और डॉ. रमन के रूप में पहला केंद्रीय मंत्री इस सीट को मिला। वैसे राजनीतिक रूप से हमेशा यह सीट बाहरी लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रही। 1972 में मुम्बई से आए राम सहाय पांडे ने बाजी मारी। इसी तरह 1988-89 में दुर्ग के धरमपाल गुप्ता ने भी सांसद के तौर पर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र का दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में हमेशा वजन रहा है। तीन बार के सांसद रहे खैरागढ़ रियासत के स्व. शिवेन्द्र बहादुर सिंह की एक समय राजनीतिक तूती बोलती रही। बताते हैं कि राजीव गांधी के सहपाठी रहे स्व. बहादुर ने राजनांदगांव सीट को 80-90 के दशक में बेहद हाईप्रोफाइल बना दिया था। चर्चा यह भी रही कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. गांधी की कक्षा में स्व. बहादुर कक्षा कप्तान भी थे। यही कारण है कि सियासी रिश्तों में दोनों नेताओं का बचपन में बिताया वह वक्त काफी कारगार साबित हुआ। स्व. बहादुर के रिश्ते गांधी परिवार के साथ काफी प्रगाढ़ रहे। 90 के दशक के समाप्ति के दौरान स्व. बहादुर का अचानक स्वर्गवास हो गया। उसके बाद यह सीट  खास वर्ग से निकलकर आम लोगों पहुंच गई। 2004 में सांसद बने प्रदीप गांधी की एक हरकत ने राजनांदगांव सीट को फिर से राजनीतिक सुर्खियों के बीच खड़ा कर दिया। कैश फॉर क्वेच्यन के नाम पर गांधी को रकम लेते एक टीवी चैनल ने कैमरे में कैद कर लिया। जिसके चलते देशभर के 11 सांसदों को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। 2009 के बाद से आज पर्यन्त इस सीट में राजनीतिक स्थिरता रही। करीब पिछले दो पंचवर्षीय में राजनांदगांव लोकसभा की स्थिति सामान्य रही।

    कुल मिलाकर पूर्व मुख्यमंत्री डॅॉ. रमन सिंह के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद राजनांदगांव की पहचान  राष्ट्रीय राजनीति में बेहद सुदृढ़ हुई। यह सीट हमेशा से राजनीतिक आकर्षण के कारण नेताओं को यह सीट अपनी ओर खींचती रही।


    1962 से 1967 राजा विरेन्द्र बहादुर सिंह
    1967 से 1972 तक रानी पद्मावती सिंह
    1972 से 1977 तक राम सहाय पांडे
    1977 से 1980 तक  मदन तिवारी
    1980 से 1985 तक  शिवेन्द्र बहादुर सिंह
    1985 से 1989 तक  शिवेन्द्र बहादुर सिंह
    1989 से 1991 तक  धरमपाल गुप्ता
    1991 से 1996 तक  शिवेन्द्र बहादुर सिंह
    1996 से 1997 तक  अशोक शर्मा
    1997 से 1999 तक  मोतीलाल वोरा
    1999 से 2003 तक  डॉ. रमन सिंह
    2004 से 2007 तक प्रदीप गांधी
    2007 से 2009 तक देवव्रत सिंह (उप चुनाव)
    2009 से 2014 तक मधुसूदन यादव
    2014 से 2019 तक अभिषेक सिंह

     

     

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Posted Date : 25-Mar-2019
  • सुनील कुमार

    रायपुर, 25 मार्च (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ में भाजपा के सभी ग्यारह उम्मीदवारों की घोषणा के बाद एक बड़ी अजीब सी नौबत राज्य के भाजपा नेताओं के सामने आ खड़ी हुई है। औपचारिक बातचीत में कोई भी इस नौबत को मंजूर करने से कतराएंगे क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय संगठन के सामने छत्तीसगढ़ भाजपा का कोई वजन रह नहीं गया है। किसी भी राष्ट्रीय पार्टी का वजन किसी प्रदेश में उसी हालत में रहता है जब देश में वह पार्टी विपक्ष में हो, और राज्य में वह मजबूती से सत्ता में हो। आज छत्तीसगढ़ को लेकर नौबत इसके ठीक उल्टी है, और खासे लोगों का यह मानना है, खासकर भाजपा के बहुत से लोगों का यह मानना है कि मोदी-शाह दिल्ली में फिर सत्ता में आ रहे हैं, और उसके बाद छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भाजपा के प्रादेशिक नेता और भी अप्रासंगिक हो जाएंगे। ऐसे में राज्य भाजपा के नेता आज लोकसभा का चुनाव तो लड़ ही रहे हैं, वे अपने खुद के अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। 
    इस बात को समझने के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखना होगा जिनमें 90 में से 75 सीटें भाजपा हार गई थी, और पन्द्रह बरस के मुख्यमंत्री की अगुवाई में भाजपा कुल 15 सीटों पर सिमट गई थी। अंकगणित के आधार पर इससे और महीन विश्लेषण करने वाले लोगों का हिसाब यह कहता है कि अगर कांग्रेस और भाजपा में आमने-सामने का मुकाबला होता तो भाजपा कुल तीन सीटों पर सिमट जाती। खैर, ऐसी काल्पनिक बातों का कोई खास महत्व नहीं होता, और विधानसभा चुनाव के आंकड़ों की एक दूसरी अहमियत भी है जिसे समझना जरूरी है। 

    राज्य की ग्यारह लोकसभा सीटों में से दस ऐसी थीं जिनमें भाजपा कांग्रेस से विधानसभा-नतीजों के आधार पर हार गई थी। महज बिलासपुर सीट ऐसी थी जिसमें एक कड़े त्रिकोणीय संघर्ष में भाजपा के वोट कांग्रेस से अधिक थे। लेकिन यह बात भी तय है कि वैसा त्रिकोणीय संघर्ष अब लोकसभा चुनाव में सामने नहीं आना है क्योंकि अजीत जोगी और मायावती के रिश्ते कुछ खट्टे हो चुके हैं कि विधानसभा चुनाव के बहुप्रचारित गठबंधन को अनदेखा करते हुए मायावती ने ग्यारह में से आठ सीटों पर अपने उम्मीदवार जोगी से किसी चर्चा के बिना ही घोषित कर दिए हैं। खुद जोगी की कही बातों के मुताबिक लोकसभा चुनाव को लेकर मायावती से उनकी कोई बातचीत भी नहीं हुई है, लेकिन उन्होंने यह आभास कायम रखना जारी रखा है कि मायावती से उनका कुछ तालमेल जारी है। ऐसे में जोगी-मायावती गठबंधन में प्रदेश की तीन सीटों पर संघर्ष का जो त्रिकोण खड़ा किया था, वह विधानसभा चुनाव के साथ ही कमजोर हो चुका है। और अब अगर कहें तो विधानसभा-नतीजों के आधार पर लोकसभा में भाजपा तमाम ग्यारह सीटों पर कांग्रेस से पीछे है। 

    आजाद भारत में किसी और पार्टी ने अपने किसी और राज्य में पहले ऐसा किया हो यह याद भी नहीं पड़ता है कि पार्टी के पिछले तमाम, ग्यारह में से दस, सांसदों को खारिज कर दे, हारे हुए ग्यारहवें उम्मीदवार को भी खारिज कर दे, और खुली मुनादी करे कि किसी सांसद के रिश्तेदार को टिकट नहीं मिलेगी, किसी जीते विधायक को टिकट नहीं मिलेगी, और न ही विधानसभा में हारे हुए किसी को टिकट मिलेगी। इतना कड़ा पैमाना अपने खुद के लिए लागू करना भाजपा के लिए अपने ही हाथ-पैर बांध देने सरीखा था, और भाजपा ने जरूर ही इसे सोच-समझकर किया होगा ऐसा मानना चाहिए। 

    इसके बाद आज नौबत यह है कि प्रदेश भाजपा का संगठन, पन्द्रह बरस के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, पिछले प्रदेश अध्यक्ष, और मौजूदा नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, इन सबको राष्ट्रीय संगठन ने एक किस्म से बेजुबान कर दिया, इनकी भूमिका को खारिज कर दिया, और अपने नए पैमानों की कड़ी अग्निपरीक्षा से गुजारकर तमाम नए उम्मीदवार तय किए।
    आज हालत यह है कि अपने सांसद बेटे अभिषेक सिंह की भी टिकट कट जाने के बाद रमन सिंह के कंधों पर राज्य में भाजपा के सांसद-प्रत्याशियों को जिताने की एक जिम्मेदारी तो है ही, और वे आज भी प्रदेश स्तर के सबसे बड़े प्रचारक बने हुए एक ऐसी बारात का दूल्हा बनने जा रहे हैं, जिनमें कोई भी बाराती उनकी पसंद के नहीं हैं। अब ऐसे में एक सवाल यह उठता है कि अगर मोदी-शाह की बनाई हुई छत्तीसगढ़ की लिस्ट खासी सीटें जीतती है, तो यह विधानसभा-नतीजों के ठीक खिलाफ बात रहेगी, और उससे यह भी साबित होगा कि मोदी अब भी लोकप्रिय हैं, और जनता ने पन्द्रह बरस के राज के बाद खारिज रमन सरकार को किया था, न कि भाजपा को।  दूसरी तरफ अगर दिल्ली में तय की गई यह लिस्ट अगर जनता खारिज कर देती है, तो उससे दिल्ली का फैसला गलत साबित होगा, और छत्तीसगढ़ के आज तक के भाजपा सांसदों और बाकी नेताओं के पास अपने अस्तित्व को लेकर यह तर्क बचेगा कि मोदी-शाह ने अपनी मनमानी करके देख लिया, वोटरों ने उनके फैसले को उसी तरह खारिज कर दिया जिस तरह उन्होंने छत्तीसगढ़ भाजपा को खारिज किया है। 

    यह एक बड़ी दुविधा की हालत है जब छत्तीसगढ़ के आज के तमाम दस भाजपा सांसदों के सामने व्यक्तिगत रूप से यह साबित करने की एक नौबत और जरूरत है कि विधानसभा चुनाव में जनता ने विधायक-प्रत्याशियों को जिस तरह खारिज किया था, जिस हद तक खारिज किया था, उसका सांसदों से लेना-देना नहीं था, और वह रमन सरकार के खिलाफ नाराजगी का वोट था। आज अगर नए उम्मीदवार हार जाते हैं, तो आज के मौजूदा भाजपा सांसद बिना कुछ कहे हुए भी चुनावी आंकड़ों से यह साबित कर सकेंगे कि उनकी टिकट काटना सही फैसला नहीं था। और छत्तीसगढ़ में आज भाजपा के सांसदों में से कुछ लोग तो कई-कई बार के सांसद हैं, कई लोग अपने कुनबे सहित चुनावी नेतागिरी में हैं, और कुछ लोग अतिसंपन्नता से लैस भी हैं। ऐसे में उनके पेट पर लात मारकर नए बने उम्मीदवारों को लेकर उनका क्या रूख रहेगा, यह देखना बड़ा दिलचस्प रहेगा। राजनीति में लोग संन्यास भाव से त्याग करने तो आते नहीं हैं, और यह सोच पाना बड़ा मुश्किल है कि जिन बैठे हुए सांसदों को झाड़ू के एक वार से किनारे कर दिया गया है, वे नए उम्मीदवारों को जिताने में जान लगा देंगे। 

    दूसरी तरफ विधानसभा चुनाव में जो 75 उम्मीदवार भाजपा की टिकट पर हारे हुए हैं, उनके सामने भी दुविधा और चुनौती की यह नौबत खड़ी है कि वे क्या लोकसभा में भाजपा को जिताकर यह साबित करेंगे कि वे निजी रूप से अलोकप्रिय थे, नाकामयाब थे, और अब मोदी के नाम पर उसी जनता ने उन्हीं के लड़े हुए विधानसभा क्षेत्रों से भाजपा को वोट दिया है। यह एक बड़ी असमंजस की नौबत रहेगी, और यह बात मौजूदा सांसदों, पिछले हारे हुए विधानसभा-प्रत्याशियों, और राज्य के भाजपा के दिग्गज नेताओं सब पर बराबरी से लागू असमंजस है। इस लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में भाजपा की भारी जीत से प्रदेश संगठन के तमाम नेताओं का वजन और खत्म हो जाएगा, मौजूदा दस भाजपा सांसदों का वजन और खत्म हो जाएगा, हारे हुए 75 भाजपा विधानसभा-प्रत्याशियों का वजन और खत्म हो जाएगा। पार्टी के अस्तित्व और अपने निजी अस्तित्व के बीच हितों का इतना बड़ा टकराव छत्तीसगढ़ में किसी पार्टी के सामने कभी नहीं था, और भाजपा के बहुत से नेता इस दुविधा को पार करने की कोशिश में लगे हुए हैं कि पार्टी की जीत और अपनी खुद की हार के बीच वे किस नौबत को हासिल करने की कोशिश करें। आने वाले नतीजे बड़े दिलचस्प होंगे क्योंकि इससे या तो मोदी-शाह कामयाब, और छत्तीसगढ़ भाजपा नाकामयाब रहेंगे, या फिर इसका ठीक उल्टा होगा। और जिन लोगों ने छत्तीसगढ़ के कुछ भाजपा-सांसद-परिवारों की संपन्नता को देखा है, वे इस बात को लेकर भी थोड़े से हैरान हैं कि पूरे कुनबे को खारिज कर देने के बाद अब उनकी इस संपन्नता का कोई इस्तेमाल करना चाहिए, या नहीं? कहने के लिए तो यह एक आदर्श स्थिति होगी कि छत्तीसगढ़ भाजपा के तमाम नेता जी-जान से मोदी छाप पर वोट पाने के लिए जुट जाएं, लेकिन सत्ता की राजनीति को कभी भी आत्मघाती खेल के रूप में दर्ज किया नहीं गया है। और छत्तीसगढ़ भाजपा में कई नेता बंद कमरे की भरोसे की बातचीत में यह मानते हैं कि यहां पर खारिज किए गए नेताओं और परिवारों का भविष्य मोदी-शाह के भविष्य के बाद भी जारी रह सकता है, अगर इस लोकसभा चुनाव में इस जोड़ी को वांछित सफलता नहीं मिलती है। ऐसे लोगों का यह भी मानना है कि देश में भाजपा के अपमानित नेताओं की बिखरी हुई आबादी चारों तरफ है।  

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