विशेष रिपोर्ट

Previous12Next
Date : 16-Aug-2019

पेन्ड्रा जिला, जोगी पति-पत्नी ने खुले मन से की भूपेश की तारीफ 

 21 साल पुराने फैसले पर अब जाकर लगी मुहर

राजेश अग्रवाल

बिलासपुर, 16 अगस्त (छत्तीसगढ़)। पेन्ड्रा इलाके को जिला बनाने के 21 साल पहले मप्र विधानसभा में लिये गए निर्णय को अमल में लाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ा दांव खेला है। जो काम अजीत जोगी अपने तीन साल और डॉ. रमन सिंह 15 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में नहीं कर पाये सात माह के भीतर उन्होंने कर दिखाया है। जोगी दम्पत्ति ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है, वहीं लोग आंकलन में लगे हैं कि इस निर्णय का राजनीतिक असर क्या होने वाला है। प्रशासनिक दृष्टि से जिले के रूप में बिलासपुर का कद घट जायेगा लेकिन संभाग के रूप में उसका वर्चस्व बना रहेगा। इस घोषणा के बाद प्रदेश के दूसरे स्थानों से जिला बनाने की मांग बलवती होने लगी है। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी में 16 अगस्त को इसी मुद्दे पर एक बैठक भी रखी गई है। 

दो दिन से पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही इलाके में जश्न का माहौल है। आदिवासी बाहुल्य, वनाच्छादित इस क्षेत्र के लोगों की बहुप्रतीक्षित मांग पूरी हो गई है। स्वतंत्रता दिवस पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही नाम से एक नया जिला बनाने की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही प्रदेश में अब 27 की जगह 28 जिले हो जायेंगे। वर्तमान जिला मुख्यालय बिलासपुर से पेन्ड्रा की दूरी नई सडक़ के रास्ते 101 किमी तथा मरवाही की 135 किलोमीटर है। मरवाही विकासखंड के अंतिम ग्राम बेलझिरिया की दूरी जिला मुख्यालय से 240 किमी है। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के कारण करीब चार दशक से इसे अलग जिला बनाने की मांग होती रही है। इसके लिए अधिवक्ता संघ, सर्वदलीय नागरिक मंच आदि ने आंदोलन तो किये ही हैं, हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी। सभी राजनीतिक दल इस मांग का समर्थन तो करते रहे लेकिन जिले का निर्माण नहीं किया गया। 

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी स्वयं इसी क्षेत्र से आते हैं, पर वे भी अपने तीन साल के कार्यकाल में इस मांग को पूरी नहीं कर पाये। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने कार्यकाल में नौ नये जिलों की घोषणा की थी लेकिन पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही को छोड़ दिया था। उनके इस फैसले को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता रहा। कुछ लोग इसके पीछे तर्क देते हैं कि मरवाही इलाके में कुछ भी हो जाये, जोगी का प्रभुत्व बरकरार रहेगा, इसलिए जिला बना देने से भी किसी दूसरे को राजनीतिक लाभ नहीं मिलने वाला है। अब यह देखना है कि मुख्यमंत्री बघेल ने सिर्फ चुनावी वायदा पूरा करने के लिए यह निर्णय लिया है या फिर इसके पीछे जोगी परिवार के तिलस्म को तोडऩे का मकसद भी है। 

केबिनेट की पिछली बैठक में मुख्यमंत्री बघेल ने लम्बित जाति विवाद के मामलों को एक माह के भीतर निपटाने का निर्णय लिया था, जिसे जोगी को लेकर चल रहे जाति विवाद से भी जोडक़र देखा गया था। इसके बाद अब यह दूसरा फैसला मरवाही, पेन्ड्रा, गौरेला इलाके के मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की ओर मोड़ पायेगा या नहीं देखना दिलचस्प होगा। 

दिलचस्प बात है कि मध्यप्रदेश विधानसभा में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला की पहल पर पेन्ड्रारोड को जिला बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था और इसके बाद तीन जुलाई 1998 को राजपत्र में जिला बनाने की अधिसूचना प्रकाशित भी की जा चुकी थी। इसी दौरान छत्तीसगढ़ राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, जिसके चलते अधिसूचना के अमल पर विराम लग गया। अब पहली बार निर्वाचित कांग्रेस की सरकार ने 21 साल बाद इस बहुप्रतीक्षित मांग को पूरा कर दिया है। जिले के नाम को लेकर भी खींचतान रही है, जिसे देखते हुए इसे पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही जिला जैसा लंबा नाम देकर सबको संतुष्ट करने का प्रयास किया गया है। 

पूर्व मुख्यमंत्री व मरवाही के विधायक अजीत जोगी 15 अगस्त को कोटा विधायक डॉ. रेणु जोगी के साथ पेन्ड्रा में ही थे। जोगी ने इस घोषणा पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि अब उन्हें भरोसा हो गया है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की करनी और कथनी में कोई फर्क़ नहीं है। वे जो कहते हैं उसे पूरा करते हैं। कोटा की विधायक डॉ. रेणु जोगी ने भी कहा कि इस घोषणा से उनके जीवन का बहुत बड़ा संकल्प आज पूरा हो गया है।  नये जिले की घोषणा होते ही दो दिन से पेन्ड्रारोड में जश्न का माहौल है। लोगों ने रैलियां निकाली, मिठाईयां बांटी और आतिशबाजी की। 

नये जिले का कलेक्टोरेट फिलहाल गुरुकुल में बनाये जाने की संभावना है। यहां काफी जगह है। वैसे यहां पहले से ही अतिरिक्त जिलाधीश, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के कार्यालय हैं, साथ ही जिला स्तर के कई संस्थान भी स्थापित हैं।  पेन्ड्रा को नया जिला बनाने से बिलासपुर जिले का तीसरी बार विभाजन हो चुका है। पहले बिलासपुर जिले के अधीन जांजगीर-चाम्पा, कोरबा और मुंगेली आते थे, जो अलग जिले बनाये जा चुके हैं। पहले दो सन् 1998 में संयुक्त मध्यप्रदेश के दौरान तथा मुंगेली को छत्तीसगढ़ बनने के बाद 2011 में जिला बनाया गया। पुराने जिले का पंडरिया वाला हिस्सा कबीरधाम (कवर्धा) जिले में शामिल किया जा चुका है। नये जिले में कोटा अनुभाग को शामिल किये जाने की संभावना नहीं है किन्तु कोटा विधानसभा के कुछ क्षेत्र नये जिले में आएंगे।
 नये जिले में पेन्ड्रा और मरवाही को अलग-अलग अनुभाग में बांटा जा सकता है। जिला मुख्यालय बिलासपुर पहुंचने में कई दूरस्थ गांवों के लोगों को पूरा एक दिन लग जाता है। जिला स्तर के अधिकारी भी इस क्षेत्र का दौरा करने से कतराते हैं। भौगोलिक दूरी, दुर्गम और पहुंचविहीन गांवों से भरे यह इलाका अब विकास की नई ऊंचाईयों को छू सकता है।

बिलासपुर जिला इस विभाजन के बाद छोटा हो जायेगा। हालांकि इससे वर्तमान का सिर्फ एक अनुभाग पेन्ड्रा ही अलग होने जा रहा है, पर यहां की अधिकांश आबादी नये जिले में चली जायेगी। मुंगेली जिले के गठन के बाद अचानकमार अभयारण्य का अधिकांश हिस्सा बिलासपुर से कट चुका है, नये जिले में अभयारण्य के बाकी हिस्से भी जा सकते हैं। फिलहाल शिवतराई तक का हिस्सा बिलासपुर के पास है। जिले में तखतपुर-कोटा, बिल्हा, मस्तूरी, बिलासपुर अनुभाग शेष रहेंगे। धार्मिक नगरी रतनपुर के बिलासपुर का हिस्सा बने रहने की संभावना है।
 जिला छोटे हो जाने के बावजूद बिलासपुर का महत्व बरकरार रहेगा। पेन्ड्रारोड में रेल कनेक्टिविटी है किन्तु वहां बहुत सी एक्सप्रेस ट्रेन नहीं रुकती हैं। हालांकि नया जिला बनने के बाद रेलवे वहां अपनी सुविधा का विस्तार कर सकता है। कटनी, दिल्ली रूट का यह प्रमुख स्टेशन है। पर्यटन स्थल अमरकंटक के लिए पर्यटक यहीं पर उतरते हैं। बिलासपुर संभागीय मुख्यालय भी है। पहले से पांच जिले बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर-चाम्पा, मुंगेली और रायगढ़ इसके अधीन हैं अब छह जिले हो जायेंगे। कोटा, मरवाही, पेन्ड्रा, गौरेला इलाके में कांग्रेस की अच्छी पकड़ रही है। हालांकि पार्टी से अलग होने के बाद जोगी परिवार को मतदाताओं ने तवज्जो दी है। विधानसभा, लोकसभा में किसी तरह का बदलाव फिलहाल नहीं होना है तथापि अलग जिला पंचायत के गठन हो जाने पर स्थानीय लोगों को राजनीति में भागीदारी का अधिक मौका मिलेगा। 

मुख्यमंत्री बघेल ने केवल एक जिले की घोषणा अपने 15 अगस्त के उद्बोधन में की है। हालांकि सारंगढ़, चिरिमिरी-मनेन्द्रगढ़, प्रतापपुर-वाड्रफनगर, पत्थलगांव, अम्बागढ़ चौकी, पृथक भाटापारा जिला बनाने की मांग लगातार होती रही है। चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस का रुख इन मांगों पर सकारात्मक भी रहा है। इन स्थानों में अब जिला बनाने की मांग जोर पकड़ सकती है। मनेन्द्रगढ़-चिरिमिरी में इसे लेकर एक बैठक भी नागरिक मंच ने 16 अगस्त को रखी है। 

रवीन्द्रनाथ टैगोर व माधव राव सप्रे की समृद्ध स्मृतियां 
घोषित नया जिला पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही प्रसिद्ध तीर्थ स्थल अमरकंटक की तलहटी पर बसा है। नर्मदा नदी, सोन नदी का उद्गम स्थल भी इसी की सीमा पर है। महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्मृतियों को पेन्ड्रा जीता है। सन् 1918 में यहां के सेनेटोरियम में वे अपनी पत्नी का इलाज कराने के लिए काफी दिनों तक रुके। संयुक्त मध्यप्रदेश के प्रथम समाचार पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन माधवराव ‘सप्रे’ ने पेन्ड्रारोड से सन् 1900 में शुरू किया था। यह करीब तीन साल तक छपा। दोनों विभूतियों की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए इलाके के कई संस्थान और समितियों को उनका नाम दिया गया है। यह बताना भी अप्रासंगिक नहीं है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद प्रदेश को पहला मुख्यमंत्री अजीत जोगी के रूप में इसी क्षेत्र से मिला। 

 

 


Date : 05-Aug-2019

कुपोषण की मार, बीजापुर में 36 फीसदी बच्चे जद में, करोड़ों खर्च पर, साल दर साल बढ़ रहा आंकड़ा

मोहम्मद ताहीर खान

बीजापुर, 5 अगस्त (छत्तीसगढ़)। बीजापुर की स्थिति कुपोषण के मामले में बेहद ही दयनीय है। यहां 36 फीसदी बच्चे अब भी कुपोषण की जद में है। जिले में  27886 नौनिहालों में से 10732 बच्चे यानि कि 36 फीसद बच्चे कुपोषण जैसी गंभीर बीमारी का दंश झेल रहे हैं। कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए सरकार द्धारा करोड़ों रूपये फूंके जाने के बाद भी इसमें में कोई सुधार नहीं आ सका है बल्कि स्थिति और भी भयावह हुई है।

बीजापुर जिला न केवल नक्सलवाद से बल्कि कुपोषण जैसी गंभीर बीमारी का भी दंश झेलने को मजबूर है। यहां 0 से 5 वर्ष के 27886 बच्चों में से 10732 बच्चे कुपोषण से ग्रसित है। जिसमें से 3633 बच्चे ऐसे हैं जो गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए जिले के कोने कोने में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा 1090 आंगनबाड़ी केन्द्र संचालित किये जा रहे हैं। यहां संचालित अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति भी बहुत ज्यादा बेहतर नहीं है। 1090 आंगनबाडी केद्रों में से 348 आंगनबाडी केन्द्र तो ऐसे हैं जो किराये के मकान या फिर झोपडिय़ों में संचालित हैं।  इस तरह कुपोषण से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से जिन आंगनबाडिय़ों का संचालन सरकार द्वारा किया जा रहा है उन्हे ही पोषण की जरूरत है।  

पिछले कुछ सालों से  कुपोषण का ये आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक 2014 में 7078 बच्चे कुपोषित पाये गये। साल  2015 में ये आंकड़ा बढक़र 10868 के पास पहुंच गया। जबकि 2016 में 10600 बच्चे कुपोषण के शिकार पाये। तो वहीं 2017 में 10160 बच्चे कुपोषित पाये गये।  

वर्ष 2018 में 3633 बच्चे ऐसे पाये गये जो कुपोषण से गंभीर रूप से बीमार थे। ऐसे बच्चों को पोषण पुनर्वास केन्द्रों में लाकर 15 दिनों तक डायटिशिन की निगरानी में  पौष्टिक आहार खिलाकर सुपोषित किया जाता है। जिले में इस वक्त स्वास्थ्य विभाग द्वारा 4 पोषण पुनर्वास केन्द्र संचालित किये जा रहे है। इन पोषण पुनर्वास केन्द्रों में साल 2018 में केवल 558 बच्चे ही सुपोषित हो पाये हैं। और इस साल के 7 महीनों में केवल 135 बच्चे ही सुपोषित हो पाये हैं।

इस मामले को लेकर सीएमएचओ डॉक्टर बीआर पुजारी का कहना है कि अभी स्वास्थ्य विभाग द्वारा चार पोषण पुनर्वास केंद्र( एनआरसी)चलाया जा रहा है। बीजापुर ,भोपालपटनम में दस-दस तथा भैरमगढ़ व उसूर में पांच पांच बैड के केंद्र चल रहे है। डॉक्टर पुजारी ने बताया कि उन्हें आईसीडीएस से जो आंकड़े मिले है। उनके मुताबिक 3 हज़ार 500 सौ बच्चों को एनआरसी में भर्ती करने की जरूरत हैं। उन्होंने बताया कि इसमें गंभीर कुपोषित बच्चों को 15 दिनों तक डायटीशियन डॉक्टरों की देख रेख में भर्ती किया जाता है। दिन में आठ टाइम उन्हें स्पेशल टाइड दिया जाता है। श्री पुजारी के मुताबिक अभी गंगालूर में भी एक एनआरसी खोलने पर विचार चल रहा है। ताकि उस क्षेत्र के लोगों को इसका लाभ मिल सके।

 

 


Date : 04-Aug-2019

7 इनामी नक्सली के सफाए से एमएमसी जोन को तगड़ा झटका

बस्तर के रास्ते नांदगांव से अमरकंटक तक ‘लाल गलियारा’ बनाने की नक्सल कोशिशें ध्वस्त

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 4 अगस्त (छत्तीसगढ़)।
नक्सल मोर्चे में राजनांदगांव पुलिस के हाथ शनिवार को मिली एक बड़ी नक्सल कामयाबी ने बस्तर के रास्ते राजनांदगांव से अमरकंटक तक ‘लाल गलियारा’ बनाने की नक्सल कोशिशों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। बागनदी की सीमा पर विपरीत मौसम के बावजूद 50 लाख के  7 नक्सलियों को एकमुश्त ढ़ेर कर पुलिस ने नक्सलियों के एमएमसी जोन को भी जोरदार झटका दिया है। बस्तर से लगातार ‘पलायन’ कर रहे नक्सलियों के लिए यह इलाका एक सुरक्षित मार्ग के रूप में बन गया था। पुलिस की मुस्तैदी से मिली सफलता के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अब इस रास्ते से बेखौफ नक्सल आवाजाही पर विराम लगेगा। 

बताया जाता है कि नक्सलियों ने बस्तर से बड़ी पैमाने पर राजनांदगांव, बालाघाट और कवर्धा की सीमा पर  नक्सलियों को शिफ्ट किया है। लंबे समय से नक्सलियों के शीर्ष नेताओं की एमएमसी जोन में आवाजाही हो रही है। छत्तीसगढ़ की गुप्तचर एजेंसियों को नक्सलियों के बड़े नेताओं के समय-बे-समय पहुंचने की पुख्ता जानकारी भी है। एमएमसी जोन को संगठित कर नक्सली पुलिस को पीछे ढक़ेलने की लंबे समय से नापाक कोशिश कर रहे हैं। बताया जाता है कि कल घटनास्थल पर किसी शीर्ष नेता की अगुवानी करने के लिए दर्रेकसा दलम और विस्तार दलम के 25 से अधिक नक्सली मौजूद थे। नक्सली लगातार सीमावर्ती इलाकों में मूवमेंट करते हुए पुलिस को चुनौती दे रहे थे। कल हुए मुठभेड़ से यह बात भी पुख्ता हुई है कि नक्सली  घातक हथियारों से लैस है। 

मुठभेड़ के बाद पुलिस ने  मौके से एके-47 समेत कुछ अत्याधुनिक हथियार बरामद किए हैं। बताया जा रहा है कि इस मुठभेड़ के साथ ही दर्रेकसा दलम का अस्तित्व भी खतरे में है। यह भी चर्चा है कि मारे गए नक्सलियों में अधिकांश दर्रेकसा दलम से है। वहीं  2 महिला नक्सली विस्तार दलम से जुड़े हुए थे। इस बीच मारे गए नक्सलियों पर छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में 50 लाख से अधिक का ईनाम घोषित था। अकेले राजनांदगांव पुलिस ने सभी पर 34 लाख का ईनाम तय किया था। 

हाल ही के कुछ महीनों में नक्सली लगातार पुलिस के हाथों मारे जा रहे हैं। बीते कुछ दिनों में राजनांदगांव पुलिस ने अपने बूते नक्सलियों को करारा जवाब दिया है। राजनांदगांव पुलिस ने दो माह पहले टाडा दलम की महिला कमांडर जमुना को मार गिराया था। इस घटना के बाद टाडा दलम की नींव हिल गई। लंबे समय से राजनांदगांव पुलिस नक्सलियों के बड़े ठिकाने पर धावा बोलने की योजना पर काम कर रही थी। आखिरकार पुलिस ने अब तक की सबसे बड़ी सफलता के साथ 7 नक्सलियों को मार गिराया। राजनांदगांव पुलिस के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इस बीच कल की घटना के बाद पुलिस उम्मीद कर रही है कि अब बागनदी के रास्ते नक्सलियों की बढ़ती रफ्तार कम होगी। माना जाता है कि मुठभेड़ के जरिए नांदगांव पुलिस ने सुरक्षित माने जाने वाले इस नक्सल मार्ग को पूरी तरह से ब्रेक लगा दिया है। साथ ही राजनांदगांव जिले से लेकर कवर्धा सीमा तक पुलिस ने सख्त पहरा भी बिठा दिया है।

रेड कारीडोर बनाने के भुलावे में न रहें नक्सली - डीआईजी डांगी
राजनांदगांव रेंज डीआईजी आरएल डांगी ने कल की कामयाबी को नक्सल मोर्चे पर ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि रेड कारीडोर बनाने के स्वप्र देख रहे नक्सलियों का मंसूबा कभी भी पूरा नहीं होगा। उन्होंने कहा कि पुलिस नक्सलियों को मुख्यधारा में वापस लाने की लगातार कोशिश कर रही है। इसके बावजूद नक्सली ढीडपन में अपने हरकतों के कारण पुलिस के हाथों मारे जा रहे हैं। पुलिस इंसानियत के तकाजे को देखते हुए नक्सलियों की घर वापसी कराने की कोशिश कर रही है। श्री डांगी ने कहा कि रेड कारीडोर बनाने का सपना रात ढलने के साथ ही खत्म होने जैसा है। श्री डांगी ने नक्सलियों के दोहरे मुखौटे को लेकर भी कटाक्ष किया है। उनका कहना है कि स्थानीय नक्सलियों के साथ भेदभाव कर शीर्ष नेतृत्व दीगर राज्यों के नक्सलियों को महत्व देता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में अब स्थानीय बाशिंदे दल में शामिल नहीं हो रहे हैं। जिससे नक्सल संगठन डगमगा रहा है। श्री डांगी ने एक बार फिर जनता को संदेश देते अपील करते कहा कि नक्सली किसी के हितैषी नहीं है। वह सिर्फ स्थानीय मुद्दों को जरिए लोगों का इस्तेमाल कर रहे हैं। डीआईजी ने मुठभेड़ में शामिल गातापार के थाना प्रभारी लक्ष्मण केंवट समेत अन्य जवानों को बधाई देते इनाम देने की घोषणा की है।

 


Date : 01-Aug-2019

दारू के समुद्र का रेट घोटाला पहुंच रहा 300 करोड़...

विशेष संवाददाता
रायपुर, 1 अगस्त (छत्तीसगढ़)।
छत्तीसगढ़ सरकार के एक सबसे कुख्यात और भ्रष्ट आबकारी विभाग में बरसों से राज करने वाले संविदा अफसर एस.आर. सिंह को धरती निगल गई है, या आसमान खा गया है, पता नहीं, लेकिन एसीबी-ईओडब्ल्यू उन्हें खोजने की बात जरूर कर रही है। भाजपा सरकार के पिछले पूरे पन्द्रह बरसों में आबकारी विभाग पर अकेले राज करने वाले, बार-बार संविदा नियुक्ति पाने वाले एस.आर. सिंह के भ्रष्टाचार की जांच किसी किनारे पहुंचती दिख रही है।

जानकार सूत्रों के अनुसार अलग-अलग कंपनियों से अलग-अलग ब्रांड की शराब खरीदने में रेट तय करते हुए जो घपले पकड़े गए हैं, वे कागजातों पर साबित होते दिख रहे हैं। एसीबी-ईओडब्ल्यू ने आबकारी विभाग के कई अफसरों और कर्मचारियों के बयान लेने के बाद अब इस भ्रष्टाचार का जो हिसाब लगाया है, उसमें एस.आर. सिंह के काम के एक हिस्से में ही तीन सौ करोड़ रूपए से अधिक का भ्रष्टाचार कागजों पर अब तक मिल गया है। 

भाजपा सरकार के रहते हुए भी आबकारी विभाग का भ्रष्टाचार सबकी जानकारी में था, और विभागीय अफसरों से लेकर मंत्री तक सबकी भागीदारी इसमें चर्चा में रहती थी। इस विभाग में पूरे भाजपा शासनकाल में मंत्री इसी एक भ्रष्ट अधिकारी एस.आर. सिंह के मार्फत सारा काम करते रहे, और कई मामलों में इस अफसर के ऊपर के अफसरों को भी सिर्फ दस्तखत करने के लिए कह दिया जाता था। अभी जांच में यह बात सामने आ रही है कि एस.आर.सिंह के बनाए गए कागजों पर ऐसी ही कार्रवाई करने के हुक्म मंत्री की तरफ से रहते थे। एस.आर. सिंह को रिटायर होने के बाद भी संविदा पर नियुक्त करने का सिलसिला ऐसा चला कि एक के बाद एक, आधा दर्जन से अधिक बार एस.आर. सिंह को संविदा नियुक्ति मिलती चली गई, और यह अफसर आबकारी विभाग को किसी स्थाई बार मालिक की तरह चलाते रहा। इसे बीच में रखकर शासन में बैठे सारे बड़े लोग अपनी मर्जी से शराब कंपनियों को कुचलने का काम करते रहे, या उन्हें सिर पर बिठाने का काम करते रहे। सरकार की शराब खरीदी की मनमानी के खिलाफ कुछ शराब कंपनियां हाईकोर्ट तक गईं कि सरकार कारोबारियों के बीच कैसा भेदभाव कर रही है। 

शराब के रेट तय करने में हुए भ्रष्टाचार की जांच जारी है, और अब तक एस.आर. सिंह के खिलाफ करीब तीन सौ करोड़ की गड़बड़ी पकड़ाई है, और आगे जांच जारी है। 

करोड़ों की संपत्ति का पता चला था...
एसआर सिंह के यहां अप्रैल में एक साथ छापेमारी हुई थी। छापे के दौरान उनकी करीब 15 करोड़ की संपत्ति का खुलासा हुआ है। इसमें रायपुर के बोरियाकलां में एक मकान, बिलासपुर में 2 मकान और 1 प्लाट का पता चला है। उनके मध्यप्रदेश के अनूपपुर में 3 मकान और जमीन हैं।
समुद्र राम सिंह का मुंगेली में करीब 10 एकड़ का फार्म हाउस भी है। साथ ही उनकी कई अन्य संपत्तियों के दस्तावेज भी मिले हैं। अनूपपुर में ही 40-50 एकड़ का भव्य फार्म हाउस का पता चला है। रायपुर, बिलासपुर और मध्यप्रदेश के करीब 8 ठिकानों में एक साथ कार्रवाई की गई थी। तब से एसआर सिंह गायब हैं। उनका देवपुरी के रावतपुरा कॉलोनी के अलावा बिलासपुर के नेहरू नगर में भी बंगला है। 

 

 


Date : 30-Jul-2019

जिंदगियां बचाने का ऐसा जुनून, नक्सल इलाके में इस तरह काम कर रहे हैं दर्जनों स्वास्थ्यकर्मी

मोहम्मद ताहीर खान


बीजापुर, 30 जुलाई (छत्तीसगढ़)। यहां स्वास्थ्य महकमे के एक दो नहीं बल्कि तीन दर्जन से ज्यादा स्वास्थ्य कर्मियों पर लोगों की जिंदगी बचाने का ऐसा जुनून है कि वे अपनी मौत की परवाह किए बिना ही हर दिन मौत का सामना करते हुए हजारों लोगों की जिंदगियां बचा रहे हैं। 

सीएमएचओ  डॉंक्टर बी.आर. पुजारी बताते हैं कि इन इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। मगर जिले में पदस्थ कर्मचारियों की बदौलत ये काम आसान हो जाता है। डॉ पुजारी का कहना है कि इन कर्मचारियों का हौसला बनाये रखने के लिए वे खुद भी अपने कर्मचारियों के साथ ऐसे इलाकों में पहुंचकर मेडिकल कैंप लगाते हैं।

 बीजापुर जिले के उन इलाकों में जहां लोकतंत्र नहीं बल्कि लालतंत्र का बोलबाला है। ऐसे दुर्गम इलाकों में अपनी जिन्दगी को दांव पर लगाकर स्वास्थ्य कर्मी लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचा रहे है। कभी उपनते नदी नालों में लकड़ी के बने पतले से नाव पर सवार होकर  तो कभी पहाड़ी रास्ते पर कई किलोमीटर पैदल चलकर हजारों आदिवासियों को मौत के मुंह से बाहार निकालते हैं। पहाड़ी रास्ते पर बड़ी मुश्किल से चढ़ाई करते टै्रक्टर पर सवार होकर जाते हंै तो कभी बाईक तो कभी कई किमी पैदल ही पहुंच कर पेड़ के नीचे मरीजों का ईलाज करते हंै। 
जिले में पदस्थ तीन दर्जन से अधिक स्वास्थ्य कर्मचारी आये दिन ऐसी ही मुसीबतों का सामना करते हुए नक्सल  इलाके में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाते हैं। दरअसल जिले का करीब 40 फीसदी इलाका ऐसा है जहां सीधे तौर पर माओवादियों की हुकूमत चलती है। ऐसे में इन इलाकों तक पहुंचने के लिए आजादी के सात दशक बाद भी  सरकार सडक़ या नदी नालों में पुल पुलिये का निर्माण नहीं करवा पाई है। नतीजतन ये पूरा इलाका शेष भारत से पूरी तरह से कटा हुआ है। ऐसे में इन इलाकों के बाशिंदों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना बहुत कठिन और चुनौती से भरा काम होता है। 

मगर जिले के भोपालपटनम, भैरमगढ, गंगालूर, पामेड, बीजापुर, फरसेगढ, कुटरू, चेरपाल  और मिरतुर में पदस्थ स्वास्थ्य कर्मचारी आये दिन अपनी जिन्दगी को दांव पर लगाकर इन इलाकों में पहुंचते हैं। पेड़ के नीचे मेडिकल कैम्प लगाकर ऐसे इलाके के मरीजों का ईलाज करते हैं। 

उल्लेखनीय कि  अशिक्षा और जागरूकता के अभाव में इस इलाके के ग्रामीण अंधविश्वास के कैद से बाहर नहीं निकल पाये हैं।   जब बीमार पड़ते हैं तब ये अस्पताल नहीं पहुंचकर गांव में ही सिरहा-गुनिया या जाड-फूंक का सहारा लेते हैं। इस कारण कईयों दफे छोटी-छोटी बीमारियों की वजह से ये आदिवासी वक्त बेवक्त ही काल के गाल में समा जाते हैं। 

 

 


Date : 28-Jul-2019

घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में अब 5 बाघ इनमें से एक पन्ना रिजर्व से भटका

29 जुलाई विश्व टाइगर दिवस

चन्द्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 28 जुलाई । कोरिया जिला स्थित गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में बीते एक साल से बाघों की संख्या में इजाफा होकर 5 हो गया है,जबकि गर्भवती बाघिन ने 1 बच्चे को जन्म दिया है, 5 बाघों में एक पन्ना टाइगर रिजर्व से भटककर आया पन्नालाल बताया जा रहा है।

इस संबंध में पार्क के रेंजर एमएस मर्शकोले का कहना है पार्क क्षेत्र में बाघों के भोजन के लिए पर्याप्त भोजन के कारण बाघिन और उसका शावक के साथ 3 और बाघ इन दिनों देखे जा रहे है, खुशी की बात ये है हमारे उद्यान में बाघिन ने एक शावक को जन्म दिया और दोनो सुरक्षित और स्वस्थ भी है। इसके अलावा एक बाघ सोनहत रेंज में बीते कई दिनों से है जबकि एक जनकपुर और एक कमर्जी क्षेत्र में है। जनकपुर में घूम रहा बाघ पन्ना टाइगर रिजर्व से आया हुआ लग रहा है। जिसे पन्नालाल के नाम से जाना जाता है।

जानकारी के अनुसार जिले में स्थित गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में बीते जनवरी माह से एक बाघिन यहां देखी गयी, बाद में विभाग को पता लगा कि वो गर्भवती है, उस पर विभाग ने नजऱ बनाये रखी, जून माह के अंतिम दिनों में उसने एक शावक को जन्म दिया, बाघिन के शावक के जन्म देने पर पार्क के अधिकारियों और कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गयी, उन्होंने इसकी जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को भी दी। बीते दो माह से पार्क के कर्मचारियों में माँ और बच्चे के पगमार्क इकठ्ठे किये, इसी बीच लगभग 4 वर्ष की उम्र का एक जवान बाघ सोनहत परिक्षेत्र में देखा गया, उसकी तस्वीरे भी ट्रैप कैमरे ने कैद की, उस पर भी विभाग नजऱ बनाये हुए है, लगभग 12 से 15 जानवरों का अभी तक वो शिकार कर चुका है, फिलहाल उसे सोनहत रेंज के गिधेर में देखा गया है।  वहीं संजय गांधी पार्क से लगा गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान का जनकपुर और कमर्जी परिक्षेत्र में एक-एक बाघ की जानकारी विभाग के पास है। 

जनकपुर में विचरण कर रहा बाघ पन्ना टाइगर रिजर्व से भटक कर आया पन्ना लाल बताया जा रहा है। बताया जाता है पन्नालाल पहले बांधवगढ़ में कई दिनों तक देखा गया, और फिर अचानक वहां से गायब हो गया, इधर गुरु घासीदास पार्क के जनकपुर में उसे देखे जाने पर उससे जुड़ी जानकारी जुटा कर भेजा गया, जिससे पता चला कि ये बाघ और कोई नही पन्नालाल ही है। जबकि कमर्जी में विचरण कर रहा एक बाघ ने 4 गाय भैस का शिकार कर चुका है। 
बारिश से हो रही है दिक्कत

बारिश शुरू होते ही पार्क क्षेत्र में लगे बेशकीमती ट्रैप कैमरों को विभाग ने निकाल लिए, ताकि वो खराब ना हो सके, जिसके बाद बाघों को ट्रैप नही किया जा पा रहा है। 

दूसरी ओर बाघिन और उसके एक बच्चे को कुछ गांव वालों ने देखा और दोनों के पगमार्क को विभाग ने पाया है, बारिश में कारण उनके पगमार्क भी मिलना काफी मुश्किल हो गया है। हालांकि विभाग मां और बच्चे पर नजऱ बनाये हुए है। विभाग की माने तो ये सोनहत रेंज के आसपास ही है। 

घोषित हो सकता है टाइगर रिजर्व
वर्ष 2001 में अस्तित्व में आये गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में वैसे तो कई बार बाघ आये और यहां से चले गए, वर्ष 2005 के बाद लंबे समय तक बाघ यहाँ नही दिखे, वर्ष 2019 के जनवरी माह से यह क्षेत्र बाघों के यहां आने और उनके रहने के लिए शानदार क्षेत्र के रूप में सामने आया, उसका मुख्य कारण है बाघों के लिए मिलने वाला पर्याप्त भोजन, यहां बड़ी मात्रा में नील गाय, हिरण, चीतल देखे जा रहे है, जो बाघों के यहां निवास करने का बड़ा कारण है। अब ये टाइगर रिजर्व बनने की घोषणा के काफी करीब है।

बदलाव से आया परिवर्तन
राज्य में नई सरकार बनते ही पार्क के अधिकारियों को बदला गया, पार्क में बदले अधिकारियों ने बाघों के संरक्षण को लेकर गंभीर प्रयास किये, उन्होंने यहां रहने वाले ग्रामीणों को समझाइश के साथ शिकारियों पर तेज नजऱ बनाई, कइयों को पकड़ का जेल भेजा, जिसका परिणाम यह हुआ कि अब इस पार्क में 5 बाघ मौजूद है।

धारियों से होती है अलग पहचान
वाइल्ड लाइफ के जानकार नरेंद्र बताते है बाघ के शरीर की धारियां हर बाघ में अलग होती है, इन धारियों से हर बाघ की अलग पहचान होती है, इनकी दोनो ओर की धारियो का डेटा एकत्रित है, जिसके आधार पर सबकी अपनी अलग पहचान है।


Date : 27-Jul-2019

स्काईवॉक, यह महंगा-खरीदा, आधा-पढ़ा उपन्यास पूरा पढऩा बड़े घाटे का सौदा होगा

सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नई प्रदेश सरकार आने के बाद से लगातार यह सवाल खड़ा है कि भाजपा सरकार ने शहर के बीच लोहे का एक ढांचा बनाकर सडक़ के ऊपर हवाई पैदलपथ बनाना शुरू किया था, उसका अब क्या होगा? कांग्रेस ने पिछले बरसों में विपक्ष में रहते हुए इस स्काईवॉक का जमकर विरोध किया था, उस पर भाजपा सरकार ने करीब 50 करोड़ खर्च किए थे, और अभी करीब 25 करोड़ की लागत बाकी है। उसका काम पिछली सरकार के रहते हुए ही निर्माण कंपनी के दीवालिया हो जाने की वजह से रूक गया था, और नई सरकार ने उस पर विचार जारी रखा है कि उसे पूरा किया जाए या उसे हटा दिया जाए। 

एक सरकार के रूप में भूपेश-सरकार के लिए यह फैसला आसान इसलिए नहीं है कि इसे हटाकर 50 करोड़ का नुकसान करने की बदनामी हाथ लगेगी, और इसे पूरा करेंगे तो और अधिक बर्बादी होगी, और यह बात भी सामने आएगी कि कांग्रेस का विरोध बोगस था। इसलिए सरकार जाहिर तौर पर सभी तबकों से, जानकारों और विशेषज्ञों से बात कर रही है। हमने भी इस अखबार में कुछ बार इस बारे में लिखा था, लेकिन कोई ठोस राय नहीं दी थी क्योंकि विशेषज्ञों को इस पर सोचना चाहिए। 

अब जब कई तबकों की राय सामने आ चुकी है, और राज्य सरकार के सामने एक कंपनी ने शहर के बीच से गुजरने वाली जी.ई. रोड पर दुर्ग से नया रायपुर तक एक हल्की ट्रेन चलाने का प्रस्ताव रखा है, तो तस्वीर कुछ साफ हो रही है। इस जी.ई. रोड पर इस स्काईवॉक का हिस्सा एक किलोमीटर लंबा ही है, लेकिन इसकी वजह से इस सडक़ पर ऊपर कोई फ्लाईओवर बनना नामुमकिन हो जाता है, या ऐसी कोई ट्रेन चलने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। इन दो किस्म की संभावनाओं को देखें तो यह बात साफ होती है कि स्काईवॉक से इस शहर को हासिल तो शायद बहुत कम होगा, लेकिन आगे की इन दो संभावनाओं के विकल्प पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। इस शहर में पिछले बरसों में दो बड़ी सडक़ें शहर के बीच बनाई गई हैं जिनसे तमाम शहर पर ट्रैफिक का बोझ कुछ कम हुआ है। लेकिन ट्रैफिक है कि इस रफ्तार से बढ़ते चल रहा है कि सडक़ों के बढऩे की रफ्तार उसका मुकाबला नहीं कर पा रही है। फिर यह भी है कि भिलाई की तरफ कुम्हारी से लेकर नया रायपुर तक जी.ई. रोड पर ट्रैफिक का दबाव कम होने का कोई जरिया बना नहीं है, कैनाल रोड, और एक्सप्रेस हाईवे इस सडक़ का विकल्प नहीं हैं, वे दूसरे इलाकों को जोड़ते हैं। 

ऐसे में यह बात अब साफ है कि स्काईवॉक को भूल जाना बेहतर है, और जी.ई. रोड पर भिलाई से लेकर मंदिर हसौद के पहले तक या तो एक फ्लाईओवर बनाना होगा, या फिर एक ट्रेन शुरू करनी होगी ताकि लोगों को सार्वजनिक यातायात मिले, तेज सडक़ मिले, और शहर के बीच सडक़ों पर से दबाव कम हो। स्काईवॉक के बारे में विशेषज्ञों से परे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की यह बात भी ध्यान देने लायक है कि इस शहर में 40-45 डिग्री तक जाने वाली गर्मी में इस फौलादी ढांचे के भीतर से लोग किस तरह आ-जा सकेंगे? 

भविष्य की संभावनाओं को खत्म करने का हक किसी पीढ़ी को नहीं रहता। शहर के एक छोटे से हिस्से में पैदल चलने वाले लोगों की सहूलियत के हिसाब से बनाए जा रहे स्काईवॉक से अगर हमेशा के लिए आर-पार पुल-ट्रेन की संभावना खत्म होती है तो ऐसी योजना काम की नहीं है। जिस कंपनी ने अभी छत्तीसगढ़ सरकार के सामने एक प्रस्तुतिकरण दिया है, और बिना सरकारी लागत के इसे बनाने का, और 30 बरस तक खुद टिकट लेकर उसके बाद सरकार को दे देने का जो प्रस्ताव रखा है, उससे यह बात जाहिर है कि इस सडक़ के ऊपर ट्रेन चलाना मुमकिन है, और उसका अध्ययन करके ही यह प्रस्ताव रखा गया है। 

जिस तरह किसी खरीदे गए उपन्यास को आधा पढऩे के बाद जब समझ पड़ता है कि उपन्यास बेकार है, तो दाम चुका देने की वजह से बाकी का आधा फालतू उपन्यास पढऩा समझदारी नहीं होती, उसी तरह रायपुर के इस स्काईवॉक को पूरा करना अब समझदारी नहीं दिख रही क्योंकि इसके बनने से भविष्य की संभावनाएं खत्म हो रही हैं जो कि इस शहर के लिए अधिक जरूरी हैं। राज्य सरकार को इसे हटाकर एक ट्रेन की योजना पर काम करना चाहिए जिससे शहर में गाडिय़ों की भीड़ से दम घुटना और न बढ़े। 

 


Date : 27-Jul-2019

बाबा मायाराम
छत्तीसगढ़ के मैकल पहाड़ की तलहटी में बसे आदिवासी वन अधिकार पाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। उनकी उम्मीदें राज्य में नई सरकार बनने से बढ़ गई हैं, जो स्वयं भी वन अधिकार देने की प्रक्रिया चला रही है। गांवों में जगह-जगह आदिवासी सामुदायिक वन अधिकार के लिए दावा कर रहे है।

हाल ही मैंने बिलासपुर जिले के करपिहा,जोगीपुर,बैगापारा, मानपुर,  सरईपाली आदि कई गांवों का दौरा किया, जहां वन अधिकार कानून के तहत् सामुदायिक वन अधिकार पाने के लिए आदिवासी कोशिश कर रहे हैं। यह  इलाका अचानकमार अभयारण्य से लगा है। यहां मैंने प्रेरक संस्था ( राजिम, रायपुर) और विकासशील फाउंडेशन से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ क्षेत्र का दौरा किया। यह संस्था आदिवासियों को वन अधिकार देने की पहल में आदिवासियों की मदद कर रही है।
बैगा और गोंड आदिवासी यहां के बाशिन्दे हैं। बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति में आते हैं। जंगल से उनका रिश्ता गहरा है। वे वनोपज एकत्र करने से लेकर, जंगल से बांस बर्तन बनाना, और जंगल से कई तरह के कांदा और हरी भाजियां, मशरूम, शहद आदि लेते हैं। इसी से उनकी आजीविका और जिंदगी चलती है। 

बैगाओं की एक पहचान बेंवर खेती ( झूम खेती) से होती रही है। बेंवर खेती में हल नहीं चलाया जाता है। छोटी-मोटी झाडिय़ां व पत्ते काटकर उन्हें बिछाया जाता है, सूखने पर उन्हें जलाया जाता है और फिर उस राख में बीज बिखेर दिए जाते हैं। जब बारिश होती है तो बीज उग जाते हैं। फसलें पक जाती हैं। बेंवर खेती में मिश्रित अनाज बोते थे। कुटकी, मडिय़ा, बाजरा, मक्का, झुरगा आदि। इन अनाजों के साथ दलहन और सब्जियां भी होती थीं। ये सभी पोषणयुक्त अनाज होते थे।  लेकिन अब बेंवर खेती कम हो गई है। अनाजों की जगह अब सिर्फ चावल ने ले ली है। हालांकि छत्तीसगढ़ में परंपरागत रूप से धान की 20 हजार से देसी किस्में हैं।

बैगापारा गांव के भुवन सिंह बैगा, मंगलूराम बैगा, फगनीबाई, रामबाई, सियाबाई और सोनिया ने बताया कि उनकी मुख्य आजीविका बांस के बर्तन बनाना है। झउआ, सूपा, बहरी ( झाडू), टोकनी, पंखा इत्यादि। ये लोग दूरदराज के जंगल से बांस लाकर बांस बर्तन बनाते हैं। इस काम के लिए पांच- छह घंटे पैदल चलकर जाना पड़ता है। इसमें झउआ 30 रूपए, सूपा 90 रूपए, बहरी 10 रूपए और टोकनी 25 रूपए में बिकती है। लेकिन एक तो बांस जंगलों में बहुत कम है, या बैगाओं के गांवों से बहुत दूर है। 
वे आगे बताते हैं कि अक्टूबर-नवंबर में ही खेती का काम मिलता है, जब फसल कटाई होती है। बाकी समय खाली समय में बांस बर्तन बनाकर बेचते हैं। जंगल से कई तरह के कंद जैसे कनिहा कांदा, कड़ुकांदा, जिमी कांदा, तीखुर कांदा, बेचांदी कांदा, छिंद कांदा, मूसली कांदा, नेसला कांदा आदि मिलते हैं। इसी प्रकार चरौटा भाजी, कोयलार भाजी, बोहार भाजी आदि मिलती हैं। 

खेकसा, ठेलका, डूमर, इमली फल मिलते हैं। कई प्रकार के फुटू ( मशरूम) मिलते हैं। जड़ी-बूटियां जंगल में मिलती हैं। छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज बैगा इन्हीं जड़ी बूटियों से करते हैं। ये बैगा अब जंगल में सामुदायिक अधिकार के लिए दावा कर रहे हैं, जिससे उनका जीवन चलता रहे। 

गोंड आदिवासी भी यहां बड़ी संख्या में हैं। बैगाओं से इनकी जीवनशैलील कुछ अलग है। गोंड आदिवासी खेती करते हैं। जोगीपुर गांव के गांववासी भी वन अधिकारों के लिए प्रयासरत हैं। यहां के पंचराम नेताम, चतुरसिंह, फागूराम मरकाम और अगनसिंह मरकाम बताते हैं कि एक समय में उनके जोगिया पहाड़ का जंगल अच्छा था। बारिश भी अच्छी होती थी। पानी भी भरपूर था। वहां जोगिया बाबा की पूजा होती थी। नवरात्र में चहल पहल होती थी, पूजा तो अब भी होती है। लेकिन अब वैसा जंगल नहीं रहा। लेकिन अगर उसे बचाने-बढ़ाने की कोशिश की जाए तो यह जंगल पहले जैसा ही हो जाएगा। बीच में वन सुरक्षा समितियों ने इसके संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया। अगर गांववालों को सामुदायिक अधिकार मिले तो यह जंगल भी अच्छा होगा, परंपरागत पानी स्रोत भी खुलेंगे। लोगों का निस्तार भी होगा। 

शिवतराई के आश्रित गांव सरईपाली की आदिवासी महिलाएं एकजुट होकर वन अधिकार पाने की लड़ाई में आगे हैं। इस गांव की आबादी 500 के करीब है। यहां गोंड आदिवासी हैं। यहां के जंगल में महुआ और आम हैं। जंगल भी पहले बहुत अच्छा था, कम हुआ है, पर अभी भी है। आदिवासी महिलाओं ने कहा जंगल बचाना और बढ़ाना बहुत जरूरी है। इसी से उनकी जिंदगी चल और बच सकती है।

यहां महुआ पेड़ के बारे में बताना जरूरी है। आदिवासियों में इस पेड़ का काफी महत्व है। वे इसकी पूजा करते हैं। इसके अलावा इसके फूल को खाते हैं, फल की भी सब्जी बनती हैं। इसके बीज से तेल पिराया जाता है, जिसे वे खाने के रूप में इस्तेमाल करते हैं। फूल को सुखाकर लड्डू बनाए जाते हैं। रोटी भी बनती है। महुआ के साथ तिल मिलाकर उसके लडडू बनाए जाते हैं। महुआ लाटा भी बनाया जाता है। इस तरह एक जमाने में महुआ आदिवासियों का प्रमुख भोजन हुआ करता था। इसकी लकड़ी घर बनाने के काम आती है।   

जंगल और आदिवासियों का सह अस्तित्व सैकड़ों सालों से रहा है। वे पीढिय़ों से जंगल में रहते आए हैं। जंगल से उनका गहरा रिश्ता है। जंगल के बिना उनकी जिंदगी नहीं चल सकती। आदिवासी उतना ही लेते हैं, जितनी उनकी जरूरत है। प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर आदिवासी रहते आए हैं।

प्रकृति के साथ उनका सह अस्तित्व है। जंगल, जंगली जानवर और आदिवासी साथ साथ रहते आए हैं। जंगल उन्हें कई तरह के खाद्य पदार्थ  जैसे कंद, हरी सब्जियां, मशरूम, शहद, फल, फूल गोंद, चारा, ईंधन आदि देता है। मधुमक्खी के छत्ते से लेकर पेड़ पौधों और जड़ी बूटी के गुणधर्म की जानकारी है, पहचान है।  बैगा तो जड़ी-बूटी के अच्छे जानकार माने जाते हैं। इसलिए उन्हें बैगा कहा जाता है।  

आदिवासियों की जंगल  से जुड़े परंपरागत ज्ञान की समृद्ध विरासत है। वे जंगल के जानकार हैं। मौसम आधारित भोजन जो जंगल से प्राप्त होने वाले गैर खेती खाद्य  से जुड़ा है, की विशेष जानकारी रखते हैं। जलवायु बदलाव के इस दौर में जंगल के खाद्य पदार्थ आदिवासियों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। उन्हें पोषणयुक्त भोजन मिलेगा। साथ ही जंगल के संरक्षण से मिट्टी-पानी का संरक्षण भी होगा। जैव विविधिता व पर्यावरण का संरक्षण भी होगा। लेकिन उन्हें अब तक इस जमीन का अधिकार नहीं मिला है। वन अधिकार कानून 2006 के तहत् यह अधिकार मिलने जा रहा है,जिससे आदिवासियों की आंखों में चमक आ गई है।
  

 


Date : 25-Jul-2019

पार्टी नाराज, मप्र नेता प्रतिपक्ष की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, बागी विधायकों पर कोई कार्रवाई नहीं

अतुल पुरोहित
भोपाल, 25 जुलाई (छत्तीसगढ़)।
विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के दौरान सरकार गिराने का बार बार दावा करने वाली बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। इस सियासी ड्रामे के बाद भोपाल से लेकर दिल्ली तक खलबली मच गई है। भाजपा हाईकमान ने प्रदेश संगठन से नाराज होकर रिपोर्ट मांगी है। संगठन मंत्री सुहास भगत से शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को तलब किया है।  

वहीं पार्टी ने विधायकों पर कार्रवाई करने से मना कर दिया है। पार्टी का मानना है कि जब भाजपा विधायक दल विधेयक पर वोटिंग नहीं चाहता था तो उसे बहिर्गमन करना चाहिए था। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव यदि बहिर्गमन का फैसला कर लेते तो भाजपा को किरकिरी का सामना नहीं करना पड़ता। पार्टी ने यह भी साफ कर दिया कि भाजपा ही विधेयक के समर्थन में थी तो इसमें कांग्रेस की जीत कैसी। किसी विधेयक का समर्थन करने से कोई विधायक कांग्रेस का सदस्य नहीं बन गया, इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई का सवाल ही नहीं है।

रूठों को मनाने पर फोकस
हाईकमान की नाराजगी के बाद संसद सत्र छोडक़र राकेश सिंह ने बुधवार रात भोपाल आकर पार्टी नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव, पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा, विश्वास सारंग सहित अन्य नेताओं के साथ बातचीत की। इस दौरान सबसे अहम मुद्दा कांग्रेस के समर्थन में गए दो विधायक नारायण त्रिपाठी और शरद कोल का रहा। पार्टी नेताओं ने कहा कि नाराज विधायकों को मनाया जाए और उनकी नाराजगी दूर की जाए। उनके खिलाफ कार्रवाई के सवाल पर नेताओं ने कहा कि उन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन नहीं किया है, इसलिए कार्रवाई का सवाल नहीं।वही आगे की रणनीति पर मंथन किया गया।

विधायकों के नदारद रहने पर हाईकमान नाराज
इसके साथ ही विधानसभा में विधायकों की गैर मौजूदगी पर सवाल खड़े किए हैं।  विधानसभा की कार्यवाही के दौरान बीजेपी के 22 विधायकों के सदन से नदारद रहने पर हाईकमान ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि विधानसभा की कार्यवाही के दौरान विधायकों को सदन में मौजूद रहने के लिए व्हिप जारी क्यों नहीं किया गया था।

बयान  से भार्गव की मुश्किलें
वही भाजपा ने भार्गव के  24 घंटे में कमलनाथ सरकार गिरा देंगे से किनारा किया है। पार्टी का कहना है कि वरिष्ठ नेताओं का इससे कोई लेना-देना नहीं है। ये उनका अपना बयान है। ये बयान उन्होंने क्यों और कैसे किन हालात में दिया, पता नहीं। हालांकि माना जा  रहा है कि इस बयान के बाद भार्गव की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसके पहले भी भार्गव पार्टी को नाराज कर चुके हैं। वहीं बीजेपी विधायकों ने भी नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्वग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि नेता प्रतिपक्ष विधायकों की कोई बात नहीं सुनते हैं। 

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश विधानसभा में बुधवार को दंड संशोधन विधेयक पर वोटिंग में इसमें कांग्रेस को बहुमत मिला। जबकि भाजपा को झटका लगा। कांग्रेस को 122 वोट मिले। जानकारी के अनुसार इस दौरान भाजपा के दो विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। इसमें मैहर से विधायक नारायण त्रिपाठी और दूसरे शरद कोल हैं, जो ब्यौहारी से विधायक हैं। वोटिंग के बाद सदन की कार्रवाई अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनैतिक गलियारों में हडक़ंप मच गया है। कर्नाटक की जीत के बाद एमपी में यह बीजेपी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है


Date : 22-Jul-2019

पूर्व गृहमंत्री पैकरा और कई आईएएस के खिलाफ चिटफंड धोखाधड़ी का जुर्म दर्ज

छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 22 जुलाई।
महासमुंद जिले के खल्लारी थाने में सनशाईन चिटफंड कंपनी के निदेशकों, संचालकों, प्रचारक और अनुमति देने वाले अफसरों के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। दर्ज एफआईआर में निदेशक बनवारी लाल बघेल, वकील सिंह बघेल, राजीव गिरी समेत पूर्व गृहमंत्री रामसेवक पैकरा, आईएएस रीना बाबा साहेब कंगाले, सिद्धार्थ कोमल परदेसी, भीम सिंह, नीलकंठ टेकाम, और अमृतलाल ध्रुव के नाम शामिल हैं। तीस जून 2019 को यह रिपोर्ट खल्लारी थाना के ग्राम खट्टी निवासी दिनेश पानीकर ने दर्ज कराई है।

इसी थाने में इसके एक हफ्ते पहले ऐसी ही एक दूसरी रिपोर्ट भी दर्ज हुई है जिसमें इन आईएएस अफसरों के अलावा एक आईपीएस अफसर रतन लाल डांगी का नाम भी है, और कुछ दूसरे आईएएस अफसरों के नाम भी हैं। लेकिन महासमुंद पुलिस ने ये दोनों एफआईआर वेबसाईट से हटा दी हैं, और इस अखबार की संवाददाता द्वारा जाकर वहां पूछने पर भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी। बड़े-बड़े अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो जाने से राज्य शासन और पुलिस मुख्यालय के अधिकारी हड़बड़ाए हुए हैं।

पीडि़त दिनेश पानीकर ने दर्ज एफआईआर में कहा है कि वह रोजी मजदूरी कर जीवन यापन करता है। उसने सनशाईन इंफ्राबिल्ड कारर्पोरेशन लिमिटेड में कुल 13 लाख 11 हजार 881 रुपये जमा किए थे। यह रकम मंैने खेत बेचकर जमा किए थे। इसमें मेरे और मेरे परिजनों के नाम से भी जमा निवेश हंै। उक्त कंपनी ने साढ़े 6 साल में रकम दो गुना देने का लालच दिखाया था। मैंने यह रकम उक्त कंपनी के कार्यालय अक्षत नगर पानी टंकी के पास मुकुटनगर में जमा किए थे। यह कंपनी रुपये वापिस न कर दफ्तर में ताला लगाकर भाग गई। कंपनी के  निदेशकों, संचालकों आदि के खिलाफ मैंने उच्च न्यायालय में भी आवेदन दिया था। 

दर्ज एफआईआर के अनुसार एसडीओपी और उच्च न्यायालय के आदेश के बाद दिनेश के अलावा एक अन्य शिकायतकर्ता नंदकुमार निषाद डूमरपाली खल्लारी के आवेदन पर सनशाईन चिटफंड कंपनी के निदेशकों, संचालकों और अनुमति देने वाले अफसरों के खिलाफ धारा 420 और 34 के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया है।

एफआईआर में पीडि़त दिनेश पानीकर के आवेदन की नकल भी संलग्न है जिसमें पुलिस अधीक्षक, थाना प्रभारी, छग प्रवर्तन निदेशालय, पीएमओ को संबोधित करते हुए सनशाईन चिटफंड कंपनी के निदेशकों, सदस्यों एवं अन्य के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का अनुरोध किया गया है। 

शिकायतकर्ता का कहना है कि वह मजदूर हंै, अपनी जमा पूंजी और जमीन बेचकर रकम जमा की थी। कंपनी द्वारा रकम नहीं लौटाने पर अन्य निवेशकों के साथ थाना प्रभारी को इसकी शिकायत की थी लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। कंपनी के निदेशक बनवारी लाल बघेल, वकील सिंह बघेल, राजीव सिंह, संजीव सिंह, सुरेन्द्र सिंह, धरम सिंह, कोर समिति के सदस्य राजीव गिरी और सीमा गिरी द्वारा संचालन छत्तीसगढ़ में किया जा रहा था। इस कंपनी के स्टार प्रचारक रामसेवक पैकरा थे।
कंपनी को बंद करने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी कंपनी छत्तीसगढ़ में कार्यरत रही। 

अधिकारी रीना बाबा साहेब कंगाले, अमृतलाल ध्रुव, सिद्धार्थ कोमल परदेसी, भीम सिंह और नीलकंठ टेकाम  इस कंपनी को क्लीन चिट देते रहे। जिसके कारण कोर समिति के सदस्य मुझे लगातार दिलासा देते रहे और भ्रम में रखा। इसी कंपनी के खिलाफ वर्ष 2015 में अंबिकापुर के थाना बौलौद और रायपुर के न्यू राजेन्द्र नगर में भी धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है।

 

 

 


Date : 20-Jul-2019

रिटायर्ड अफसरों की जारी सरकारी चाकरी के लिए क्रेडा ने 13 लाख वसूली निकाली

'विशेष संवाददाता
रायपुर, 20 जुलाई (छत्तीसगढ़)।
रिटायर्ड अफसरों के बंगलों पर सरकारी कर्मचारियों की बेगारी का मामला कुछ बढ़ रहा है। अभी प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त एम.के. राऊत के बंगले पर निजी सेवा करने वाले एक चतुर्थ वर्ग कर्मचारी के रिटायर हो जाने पर उसने अपने विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, में संविदा नियुक्ति की अर्जी दी। अर्जी आने पर लोगों को पता लगा कि विभाग में ऐसा भी कोई कर्मचारी काम करता है जिसे बीस बरस से दफ्तर में किसी ने देखा नहीं था। 

विभाग ने उसकी संविदा अर्जी खारिज कर दी क्योंकि उसी ओहदे पर बिना काम के बहुत से कर्मचारी विभाग में काम कर रहे हैं। यह कर्मचारी एम.के. राऊत के रिटायर हो जाने के बाद भी उन्हीं के बंगले पर लगा हुआ था, और उसे ग्रामीण विकास के एक दफ्तर में ही रहने के लिए उस वक्त से एक कमरा मिला हुआ था जब राऊत पंचायत-ग्रामीण विकास विभाग के सचिव थे। अब वह कमरा भी खाली करा लिया गया है। 

लेकिन एक दूसरे सरकारी दफ्तर में एक और नजारा सामने आया है। छत्तीसगढ़ शासन की सौर ऊर्जा एजेंसी क्रेडा के तीन कर्मचारी क्रेडा के सीईओ रहे एक आईएएस डी.एस. मिश्रा की निजी सेवा में लगे हुए थे। वे क्रेडा से हट गए, सरकारी नौकरी से रिटायर हो गए, और शासन ने उन्हें राज्य विद्युत नियामक आयोग का अध्यक्ष मनोनीत कर दिया। लेकिन ये कर्मचारी वहीं काम करते रहे। अब जब ग्रामीण विकास में यह मामला सामने आया, तो क्रेडा के अधिकारियों ने भी यह निकाला कि उनके कौन से कर्मचारी कहां काम कर रहे हैं। इस पर निकला कि डी.एस. मिश्रा के रिटायर होने के बाद से जो कर्मचारी उनकी सेवा कर रहे हैं उन तीनों के वेतन-भत्ते मिलाकर तेरह लाख रूपए से अधिक की वसूली क्रेडा ने निकाली है, और इसके लिए आयोग को नोटिस भेजा है। डी.एस. मिश्रा अपने सेवाकाल में एक बहुत ही कडक़ अफसर माने जाते थे, और उन्हीं की सेवा में लगे हुए ऐसे तीन लोगों के काम के एवज में तेरह लाख रूपए से अधिक का वसूली का नोटिस चौंकाने वाला है। 

ऐसा पता लगा है कि एसीबी-ईओडब्ल्यू में कर्मचारियों की ओर से यह शिकायत की जा रही है कि सरकारी कर्मचारियों से बेजा काम करवाकर उन्हें जिन विभागों से भुगतान करवाया जा रहा है उसकी वसूली या तो उनकी सेवा लेने वाले अफसरों-रिटायर्ड अफसरों से की जाए, या उन अधिकारियों से की जाए जिन्होंने अपने विभाग के लोगों की ऐसी नाजायज ड्यूटी लगाई है। 

ऐसे बहुत से मामलों के जानकार एक बड़े अफसर ने कहा कि खुले बाजार में ड्राइवर की सेवाएं आठ हजार रूपए महीने पर मिल जाती हैं, लेकिन निजी कामों के लिए झोंक दिए गए सरकारी ड्राइवरों की तनख्वाह पच्चीस हजार रूपए तक पड़ती है। इसी अनुपात में घरेलू कामकाज के लिए रखे गए नौकरों, और चौकीदारों का वेतन बनता है। बड़ी तनख्वाह और भत्ते पाने वाले लोग निजी खर्च पर ऐसे सेवक रखें तो उन्हें एक तिहाई या एक चौथाई खर्च पर वे मिल जाएंगे, लेकिन तीन-चार गुना शासकीय खर्च का ऐसा बेजा इस्तेमाल इस राज्य में एक आम बात बन गई है। 


Date : 19-Jul-2019

वन अधिकार से बैगाओं में उम्मीद

बाबा मायाराम
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में बैगा आदिवासी जंगल और जमीन का अधिकार लेने की प्रक्रिया में जुटे हुए हैं। वे गांव-गांव में दावा फार्म भर रहे हैं और नजरी नक्शा भी बना रहे हैं। व्यक्तिगत के साथ सामुदायिक वन अधिकार के लिए भी दावा कर रहे हैं। 
हाल ही में पंडरिया विकासखंड के गांवों में जाने का मौका मिला। पहले नवापारा- राजिम के सक्षम केंद्र में नए वन अधिकार कानून ( नुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी ( वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006) पर कार्यशाला थी। इसमें छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों से प्रतिभागी शामिल थे। यहां सामुदायिक अधिकार पर विस्तृत जानकारी दी गई। प्रेरक के रामगुलाम सिन्हा, जुनास दीप आदि ने प्रशिक्षण दिया।

प्रेरक संस्था से जुडक़र काम करने वाले नरेश बुनकर मुझे बैगा आदिवासियों के गांव ले गए। नरेश बुनकर बैगा आदिवासियों के बीच लम्बे समय से काम कर रहे हैं। 4 से 6 फरवरी (2019) के बीच करीब डेढ़ दर्जन गांवों का दौरा किया। इन गांवों में कुछ खुडिय़ा बांध, जो मनियारी नदी पर बना है, की तलहटी में बसे हैं। और कुछ डोंगर ( पहाड़) पर बसे हैं, जो पंडरिया के आगे मैकल पहाडिय़ों में जंगलों के बीच रह रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति के अंतर्गत आते हैं। बैगाओं का जीवन प्रकृति पर निर्भर रहा है। वे बेंवर (शिफ्टिंग कल्टीवेशन) खेती करते थे। बेंवर को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जानते हैं। मध्यप्रदेश के सतपुड़ा अंचल में दहिया खेती कहते हैं। कहीं झूम व पेंदा खेती भी कहा जाता है। 

बेंवर खेती में छोटे- पेडों व झाडिय़ों को काटकर बिछाया जाता है। झाडिय़ों के सूखने पर फिर उनमें आग लगाई जाती है। फिर जली राख में कई फसलों के बीजों को एक साथ फेंक दिया जाता है, जो बारिश होने पर ये बीज उग आते हैं और पक जाते हैं। जैसे-जैसे फसलें पक कर तैयार होती जाती हैं, वैसे-वैसे बैगा काटते जाते हैं। तीन साल में इसका स्थान बदल जाते थे,जिससे जमीन फिर से उर्वर बन जाए।  इस कारण इसे स्थानांतरित खेती भी कहते हैं।

बेंवर में बैगा कुटकी, सांवा, कांग, मडिय़ा, मक्का, ज्वार, राहर ( अरहर),उड़द, सिकिया, बदरा ( दाल) , झुंझरू, रवांस, डेंगरा, खीरा, बड़े लांझी आदि बोते थे। अब बैगा बेंवर नहीं करते हैं। लेकिन वे अब भी इन पौष्टिक अनाजों की खेती उनके खेतों में करते हैं।   
जंगल से उन्हें कई तरह के कांदा भी मिलते हैं, जो उनके भूख के दिनों के साथी हैं। इनमें डूनची कांदा, कनिहा कांदा, रबी कांदा, सेंदू कांदा, लोरनी कांदा, गीठ कांदा, कौजारी कांदा, सिडवां कांदा इत्यादि। जंगल से कई प्रकार की हरी पत्तेदार भाजियां भी मिलती हैं। जैसे सिरौती भाजी, पकड़ी भाजी, दौबे भाजी, सिहाड़ भाजी, कचनार, कोयलार, तिनपनिया, करमत्ता, चाटी और तिवड़ भाजी है। जंगल से मिलने वाले फलों में चार, तेंदू, महुआ, कुल्लू लासा (गोंद), हर्रा, बहेड़ा इत्यादि मिलते हैं। इसे गैर खेती भोजन भी कहते हैं। 

पौष्टिक अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के लिए बैगाओं ने बांहपानी गांव में अनाजों की प्रदर्शनी भी लगाई थी। जिसमें जन स्वास्थ्य सहयोग गनियारी के देशी बीजों के जानकार होमप्रकाश साहू, बैगाओं के बीच काम करनेवाले मध्यप्रदेश के नरेश विश्वास आदि शामिल हुए थे। प्रेरक संस्था ने देशी बीजों के संरक्षण व संवर्धन में अनूठा काम किया है। उनके देशी धान की करीब 350 किस्में हैं। इसके अलावा बाड़ी ( किचिन गार्डन) का काम भी कर रही है। प्रेरक संस्था ने जैविक खेती व घरों की बाडिय़ों ( किचिन गार्डन) का काम किया है। 
घमेरी गांव के मानसिंह बैगा कहते हैं कि अब जो चीजें हमें जंगलों से मिलती थी अब उनमें कमी आ रही है। उनका गांव भी बोइरहा डोंगर में था, लेकिन वहां गुजर होना मुश्किल था, इसलिए अब वे खुडिय़ा बांध की तलहटी में आकर बस गए। 
वे आगे बताते हैं कि हमने जमीन की लड़ाई लड़ी और वन अधिकार का पट्टा भी पाया। अब हम सामूहिक सामुदायिक पट्टे के लिए कोशिश कर रहे हैं। कांदावानी और बांहपानी पंचायत में उन्होंने सामुदायिक पट्टा भी हासिल किया है।

गांव बचाओ समिति के नरेश बुनकर ने बताया कि वनाधिकार के लिए बैगाओं को लम्बी लड़ाई लडऩी पड़ी है। पिछले वर्ष 2018 में यहां बैगा आदिवासियों ने टाईगर रिजर्व कोरिडोर के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीती है। गांवों तक यह खबर पहुंची कि अब कान्हा, भोरमदेव और अचानकमार अभयारण्य तक टाईगर रिजर्व कोरिडोर बनेगा। इसलिए बैगाओं की जंगल से निस्तारी पर रोक लगेगी। वन संरक्षण के नाम पर बैगाओं के जीवन पर आए इस संकट से बैगा संगठित हुए और इसके खिलाफ खड़े हो गए। 

वर्ष 2018 के मार्च महीने में तीन दिवसीय पदयात्रा तय हो गई थी। लेकिन पदयात्रा की शुरूआत में वनविभाग और पुलिस दल-बल के साथ यहां पहुंची और उनके ( नरेश बुनकर) समेत 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। यह खबर पाते ही बड़ी संख्या में आदिवासी एकत्र हुए और कुकदर थाना पहुंच गए, जहां उनको (नरेश बुनकर) और उनके साथियों को गिरफ्तार करके रखा गया था। यात्रा की शुरूआत में आदिवासियों की लड़ाई में अग्रणी नरेश बुनकर समेत 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया।  कुछ ही समय में जनदबाव में सभी को छोडऩा पड़ा और लिखकर यह आश्वासन देना पड़ा कि टाईगर रिजर्व कोरिडोर नहीं बनेगा। 

लेकिन इसके बावजूद भी पदयात्रा का कार्यक्रम नहीं रूका और यह पदयात्रा 17 मार्च को बांहपानी से चलकर 19 मार्च को पंडरिया तक गई। वहां गांधी चौक में बैगा सम्मेलन रखा गया जिसमें वनाधिकार और आदिवासियों की समस्याओं पर चर्चा हुई और संबंधित अधिकारियों को समस्याओँ से संबंधित ज्ञापन दिया गया।  कुल मिलाकर, इस पूरी लड़ाई में बैगा आदिवासियों की जीत छोटी जीत हुई और इससे उनमें हिम्मत आई। और बाद में दो पंचायतों बांहपानी और कांदावानी पंचायत को सामुदायिक पट्टा का अधिकार भी मिला।

इसी प्रकार, डोंगर के ऊपर के गांव बांहपानी, भलिन दादर, धुरसी, कांदावानी, कानाखेरू, छीरपानी, ठेंगाटोला, ढपरापानी में भी बैगा इसमें लगे हैं। बैगाओं की जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। उनकी जंगल आधारित खाद्य व भोजन व्यवस्था थी जिसमें अब कमी आ रही है। एक तो जलवायु बदलाव व मौसम बदलाव हो रहा है। जंगल कम हो रहे हैं। पानी के परंपरागत स्रोत भी सूख रहे हैं। कुछ गांवों में दूर से पानी लाना पड़ता है। उनकी जीवनशैली व खेती भी बदल रही है। बैगाओं का जीवन कठिन हो रहा है।     

अब नए वन अधिकार कानून से बैगाओं में आस जगी है। इलाके के और भी गांव वन अधिकार के तहत् उनके अधिकार पाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। और नई कांग्रेस की सरकार ने इस दिशा में पहल शुरू की है, खुद सरकारी महकमे ने जगह-जगह कार्यक्रमों के माध्यम से वन अधिकार कानून के दावा फार्म भरने की जानकारी और लोगों को इसके लिए उत्साहित कर रही है। इस सबसे बैगाओं की आंखें भी उम्मीद से चमक रही हैं। वे गांव – गांव से दावा फार्म भर रहे हैं। और प्रेरक संस्था में उनकी मदद कर रही है। जंगल और आदिवासी एक दूसरे के पूरक है। बैगाओं का जीवन जंगल पर है और जंगल के बारे में उनकी जानकारी, मान्यताएं और परंपरागत ज्ञान से जंगल के संरक्षण में भी मदद मिल सकती है। 
 

 

 


Date : 18-Jul-2019

रमन सिंह का गोद गांव मदनवाड़ा बेहाल दस साल में 10वीं में सिर्फ दस पास

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 18 जुलाई। 
नक्सल प्रभावित मदनवाड़ा में शिक्षा को लेकर अलख जगाने की प्रशासनिक और राजनीतिक कोशिशें फिसड्डी साबित हुई हंै। शिक्षा के जरिए नक्सलियों के फैले जाल को तोडऩे के लिए राज्य सरकार ने हाईस्कूल खोल दिया। दशकभर में हाईस्कूल से 10 वीं के महज 10 विद्यार्थी ही उत्तीर्ण होकर उच्च शिक्षा के लिए बाहर निकले।  पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के गोद लिए इस गांव में शिक्षा का स्तर साल-दर-साल गिरता ही जा रहा है। 

 मदनवाड़ा में शुरूआत के पांच साल एक भी छात्र उत्तीर्ण नहीं हुआ। हाईस्कूल खोले जाने की घोषणा के बाद   शिक्षक और विद्यार्थियों दोनों का टोटा रहा। नक्सल वारदात की वजह से सुर्खियों में रहे इस गांव में सरकारी मशीनरी की धमक जरूर बढ़ी है। 10 साल के भीतर बीते तीन साल में 5-5 विद्यार्थियों ने उत्तीर्ण  होकर शाला का थोड़ा मान बढ़ाया। 

संस्था के प्राचार्य पूरन सिंह जाड़े ने बताया कि वर्तमान में मात्र 29 विद्यार्थी अध्ययनरत हंै। जिसमें दो छात्र चालू शिक्षा सत्र में गैरहाजिर है। यानी 27 विद्यार्थी तालीम ले रहे हंै। बताया जाता है कि पूर्व सीएम रमन सिंह के गांव को गोद लेने के बाद विकास का पहिया थोड़े ही दिन घुमा।  सरकार ने  पांच शिक्षकों की पदस्थापना भी कर दी। जिसमें एक महिला शिक्षक भी शामिल है।  वर्ग-2 के दो और 3 व्याख्याता पंचायत स्कूल में पदस्थ है। 

प्राचार्य के मुताबिक ग्रामीणों की उदासीनता से शिक्षा के लिए एक उन्मुक्त वातावरण नहीं बन पा रहा है। इसके लिए जागरूकता का अभाव एक बड़ी समस्या है। बताया जाता है कि कुल 29 विद्यार्थियों में कक्षा नवमीं में 19 और 10वीं में मात्र 10 छात्र अध्ययरत हैं। मदनवाड़ा के इर्द-गिर्द करीब दर्जनभर गांव हंै। दोरदे, कलवर, बोरकन्हार और मसियापारा समेत कुछ गांवों में बच्चे पढ़ाई छोड़ घरेलू काम कर रहे हैं।

  इस संबंध में डीईओ जीडी मरकाम ने कहा कि किसी दिन दौरा कर वस्तुस्थिति की जानकारी लूंगा। दस साल में यदि सिर्फ कुछ छात्र उत्तीर्ण हुए हंै तो वाकई यह गंभीर मसला है। उधर मदनवाड़ा में पदस्थ शिक्षक भी विद्यार्थियों की कम मौजूदगी को लेकर फिक्रमंद है। बताया जाता है कि स्टॉफ की ओर से परिजनों के बीच जाकर बच्चों को स्कूल में दाखिला लेने पर जोर दे रहे हैं। इसके बाद भी हालत  सुधरी नहीं है।

 

 


Date : 17-Jul-2019

आजादी के 70 साल बाद भी यहां नहीं पहुंचा विकास, कड़ेनार के बच्चे तबेले से भी बुरे हाल में पढऩे मजबूर

शंभू यादव

कोण्डागांव, 16 जुलाई। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान वर्ष 1888 में कोण्डागांव जिले के बड़ेडोंगर में स्कूल की स्थापना हो चुकी थी। यहां स्कूल की स्थापना वर्ष 1888 में तो हो चुकी है, लेकिन आज भी जिले के कई ऐसे गांव हैं जहां स्कूल के नाम पर केवल एक झोपड़ी है। इतना ही नहीं उसमें पढ़ाने के लिए मात्र एक शिक्षक ही पदस्थ हैं।  हम बात कर रहे हैं मर्दापाल के कड़ेनार में संचालित स्कूलों की। यहां के स्कूल आज भी टीन के शेड के नीचे संचालित होते हैं। फिर चाहे मौसम कोई भी हो, बच्चों को यहीं बैठकर अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करनी होती है।

  कोण्डागांव जिला के मर्दापाल मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर, सुदूर अंचल में बसा है ग्राम पंचायत कड़ेनार। इस पंचायत की स्थिति के बारे में बात करें तो यहां पहुंचने के लिए आज भी कोई सड़क नहीं है। यदि ग्रामीणों को मुख्यालय पहुंचना होता है तो वह जंगल के अंदर से पगडंडी मार्ग से होते हुए मुख्यालय तक पहुंचते हैं। ऐसे गांव में शिक्षा का अलाव जलाए रखना अपने आप में एक चुनौती साबित होता है। इसके बाद भी ग्राम पंचायत कड़ेनार में प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं का स्थापना किया गया है। तत्कालीन सरकार ने कड़ेनार गांव में शिक्षा के अलाव जलाए रखने के लिए स्कूलों की स्थापना तो कर दी लेकिन शायद वे इन स्कूलों को वर्तमान समय में भूल चुके हैं। क्योंकि यहां संचालित स्कूल की स्थिति किसी तबेले से कम नहीं है। फिर भी यहां पदस्थ शिक्षक व अन्य कर्मी अपना काम बखूबी निभा रहे है।


एक की हालत सुधरी, तो दो की हालत जस के तस
कड़ेनार गांव में 3 प्राथमिक व माध्यमिक शालाओं का संचालन हो रहा है। इनमें से एक ग्राम पंचायत कड़ेनार मुख्यालय में, मदोड़ा में एक प्राथमिक शाला और इसी तरह प्राथमिक शाला तिरीनबेड़ा का संचालन हो रहा है। इन तीन स्कूलों में से पंचायत मुख्यालय में संचालित स्कूल के लिए किसी तरह छोटा सा भवन तो बना दिया गया है, लेकिन तिरीनबेड़ा और मदोड़ा दोनों स्कूलों की हालत किसी तबेला घर से कम नहीं है। ऐसा नहीं है कि यहां के शिक्षक और ग्रामीण गांव विकास के साथ-साथ स्कूल विकास की इच्छा ना रखते हो। वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए कई बार शासन-प्रशासन के अधिकारियों से लेकर मंत्री स्तर तक स्कूल की समस्या बता चुके हैं। एक ओर गांव के अनपढ़ ग्रामीण शिक्षा की महात्व को जानते हुए स्कूल भवन की लंबे समय से मांग करते आए है, लेकिन आफरसाही जगत में शिक्षा के लिए किए गए मांग को हर बार अनसुनी कर दिया जाता है। 

चुनाव  करवाना था बनवा दिया स्कूल भवन
गांव के बुजुर्ग और जानकारों ने जानकारी देते हुए बताया, गांव में दो नहीं बल्कि इन तीनों स्कूलों की हालत एक जैसी थी, तीनों स्कूल तबेला नुमा झोपड़े में ही संचालित होते थे। अब जब प्रशासन को इन स्कूल भवन के माध्यम से विधानसभा और लोकसभा चुनाव संपन्न करवाना था तो कड़ेनार मुख्यालय में संचालित स्कूल में भवन का निर्माण करवाया गया। निर्माण के बाद स्कूल में पहले तो चुनाव कार्य संपन्न हुआ उसके बाद कही जाकर बच्चों के लिए स्कूल के द्वार बच्चों के लिए खोले गए। ग्रामीणों ने प्रशासन पर यह भी आरोप लगाते हुए कहा कि, लंबे समय से गांव में स्कूल भवन की मांग करते आए हैं लेकिन प्रशासन कोई ना कोई बहाना करके टालमटोल करते आई है। लेकिन जब स्वयं के उपयोग की बारी आई तो प्रशासन ने स्कूल भवन का निर्माण करवा दिया। 

वर्ष 2007-08 में भवन के लिए 4 लाख  हुए थे स्वीकृत
प्राथमिक शाला तिरीनबेड़ा के शिक्षक रतन लाल कश्यप (सहायक शिक्षक एलबी) ने चर्चा के दौरान बताया कि, प्रथमिक शाला तिरीनबेड़ा की स्थापना वर्ष 1998 में शिक्षा गारंटी के तहत की गई है। रतन लाल कश्यप उसी समय से इस स्कूल में पदस्थ है। उन्होंने आगे बताया कि, वर्ष 2005 में इस स्कूल का शिक्षा गारंटी से प्राथमिक शाला में उन्नयन किया गया। इसके बाद वित्तीय वर्ष 2007-08 भवन निर्माण के लिए लगभग 4 लाख रुपए की स्वीकृति भी शासन स्तर से मिली, लेकिन स्वीकृति के 10 साल बाद भी यहां भवन निर्माण नहीं हो पाया है। भवन के ना होने से पहली से लेकर पांचवीं तक के सभी 33 स्कूली बच्चें एक ही झोपड़ी के अंदर बैठ कर पढ़ाई करते हैं। यहां पढऩे के दौरान कई बार ऐसे हालत भी उत्पन्न हो जाते है कि, पठन-पाठन सामग्री भींग जाते है। 

इसी क्षेत्र के विधायक रहे पूर्व शिक्षा मंत्री
ग्राम पंचायत कड़ेनार राजस्व जिला कोण्डागांव के नक्शे में ही शामिल है, लेकिन यह विधानसभा और पुलिस जिला नारायणपुर का एक हिस्सा है।  इसी क्षेत्र से केदार कश्यप भाजपा के विधायक रहे और प्रदेश सरकार में वे स्कूल शिक्षा मंत्री भी बनाए गए थे।  

जल्द ही स्कूल भवन का निर्माण करवाया जाएगा
इस मामले पर कोण्डागांव के शिक्षा अधिकारी राजेश मिश्रा से चर्चा किया गया तो उन्होंने कहा कि, पूर्व में कड़ेनार क्षेत्र में काफी परेशानी थी, जिसके कारण वहां स्कूल भवन निर्माण नहीं हो पाया। अब पंचायतों के माध्यम से भवन का निर्माण करवाया जाएगा। वहीं इस मामले पर कोण्डागांव के कलेक्टर नीलकंठ टीकाम ने कहा कि, पूर्व वर्ष में कड़ेनार माओवाद गढ़ हुआ करता था। अब यहां परिस्थितियां बदल चुकी है। जल्द ही यहां शाला भवन का निर्माण कर दिया जाएगा। इतना ही नहीं इस गांव में बच्चों को आवासिय सुविधा देने के लिए छात्रावास-आश्रम का भी संचालन किया जाएगा। 


Date : 15-Jul-2019

दो नेताओं पर कार्रवाई से भाजपा सकते में डेढ़ दशक सत्ता में रहे नेता अब शासन के निशाने पर

राजनांदगांव, 15 जुलाई (छत्तीसगढ़)। हाल ही में राजनांदगांव जिले में राज्य सरकार ने कथित गड़बडिय़ों का हवाला देकर दो भाजपा नेताओं के खिलाफ सख्त कदम उठाकर भाजपा में खलबली पैदा कर दी है। बताया जाता है कि राज्य सरकार के पास भाजपा नेताओं की कारगुजारियों का पुलिंदा है। लिहाजा सरकार के पास कार्रवाई के लिए पुख्ता आधार है। 

राजनांदगांव जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष सचिन बघेल को निलंबित कर सरकार ने कार्रवाई का आगाज किया है। भाजपा के कोषाध्यक्ष सौरभ कोठारी दूसरे भाजपा नेता हैं। जिनके प्रतिष्ठान पर नियम विरूद्ध कृषि उत्पाद की बिक्री किए जाने का आरोप है। राज्य सरकार ने कोठारी के गोदाम और दुकानों को सील कर दिया है। 

बताया जाता है कि भाजपा नेताओं के कथित आर्थिक कारनामों को लेकर सरकार के पास कई अहम दस्तावेज हैं। बताया जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में जिला भाजपा से जुड़े एक प्रमुख नेता पर भी शिकंजा कसा जा सकता है। यह पहला मौका है जब राज्य में सत्तासीन होने के बाद कांग्रेस ने जिला स्तर के भाजपा नेताओं को निशाने में रखा है। सिलसिलेवार हो रही कार्रवाई के बाद कई भाजपा नेता अपने ऊपर कार्रवाई की आशंका मात्र से हड़बड़ाए हुए हैं। बताया जाता है कि सरकार के मिजाज को भांपते हुए कुछ नेताओं ने प्रदेश संगठन से भी मदद के लिए गुहार लगाई है। 

सचिन बघेल और कोठारी से पहले राज्य सरकार ने जिले के ही पूर्व विधायक रामजी भारती को अनुसूचित जाति आयोग पद से हटाने का फरमान जारी किया था। हाईकोर्ट से स्थगन मिलने के बाद भारती अपने पद को बचाने में कामयाब रहे। जबकि बघेल को जवाब देने के लिए 15 दिन की मोहलत मिली है। कोठारी के निजी प्रतिष्ठान में सील लगाकर सरकार ने सीधे उनके कारोबार को एक तरह से चौपट किया है। बताया जाता है कि कोठारी के दुकान में कार्रवाई करने के लिए राज्य कृषि विभाग के अफसरों ने दबिश दी थी। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार भाजपा नेताओं के साथ किसी भी तरह की ढील देने के पक्ष में नहीं है। 

उधर दोनों भाजपा नेताओं पर हुए कार्रवाई पर संगठन में ही मतभेद है। विरोधी खेमे में इस कार्रवाई से खुशी की लहर है। भाजपा के कुछ असंतुष्ट नेताओं ने पूरे मामले में राज्य सरकार की कार्रवाई का दबे स्वर स्वागत किया है। माना जा रहा है कि सत्ता में काबिज रहे ऐसे नेताओं को उनके ही संगठन से समर्थन नहीं है। फिलहाल बघेल और कोठारी पर हुई सरकार की सख्ती ने दूसरे भाजपा नेताओं की नींद उड़ा दी है।

बाक्स में ... कृषि विभाग के एक अफसर पर टेड़ी हुई सरकार की नजर
भाजपा कोषाध्यक्ष सौरभ कोठारी के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हुई कार्रवाई के बाद अब कृषि विभाग के एक अफसर की भाजपा नेताओं के साथ बने रिश्तों की भी जांच हो रही है। बताया जा रहा है कि उक्त अफसर ने कृषि उत्पाद में गोपनीय साझेदार बनकर कृषि केंद्रों के संचालकों के साथ लंबी कमाई की है। चर्चा है कि किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में भी उक्त अफसर ने खुलकर घालमेल किया है। बताया जा रहा है कि किसानों को कीटनाशक दवाईयों एवं अन्य कृषि दवाओं पर मिलने वाली सब्सिडी को भाजपा नेताओं के साथ मिलकर हजम कर लिया है। बात यह भी है कि किसान आमतौर पर सामान खरीदी के बाद बिल नहीं मांगते हैं। इसी की आड़ में उक्त अफसर ने  सब्सिडी दर्शाते हुए दुकानदारों के साथ अपनी जेब भरी है। यह खबर राज्य सरकार के कानों तक पहुंच गई है। माना जा रहा है कि सब्सिडी में हुए घोटाले की जांच भी हो सकती है। भाजपा सरकार में उक्त अफसर का राजनांदगांव जिले में कार्यकाल लंबा रहा है। समझा जाता है कि सरकार विभागीय जांच के अलावा उक्त अफसर को राजनांदगांव जिले से बाहर का रास्ता दिखा सकती है।

 


Date : 12-Jul-2019

'लाल गलियारा' की  चाल फोर्स के दखल से धीमी, स्व. विनोद चौबे व 29 जवानों की शहादत के दस साल में नक्सल चुनौतियां बौनी

राजनांदगांव, 12 जुलाई।  दस साल पहले मानपुर के कोरकोट्टी व मदनवाड़ा में हुए वीभत्स नक्सल हमले में तत्कालीन एसपी विनोद चौबे और 29 जवानों की शहादत की घटना के बाद राजनांदगांव जिले का दक्षिणी क्षेत्र मानपुर नक्सल मकडज़ाल से बाहर निकलकर खुली हवा में सांस लेने लगा। हालांकि अभी भी नक्सलियों का एक बड़े हिस्सें में पैठ कायम है। 'लाल गलियारा ' बनाने की फिराक में जंगल में आंतक मचा रहे नक्सलियों को पीछे ढ़केलते फोर्स आगे बढ़ते दिख रही है। नक्सलियों की आमदरफ्त पर पुलिस काफी हद तक अंकुश लगाने में कामयाब हुई है।

 12 जुलाई 2009 को कोरकोट्टी में एसपी विनोद चौबे व 29 जवान शहीद हो गए थे। यह पहला मौका था जब पुलिस के इतिहास में किसी आईपीएस अफसर को शहादत मिली। इस घटना के बाद केंद्र सरकार ने भी नक्सल समस्या की गंभीरता को समझा और राज्य के साथ कई हिस्सो में ऑपरेशन शुरू किया।

 पुलिस के ऑपरेशन के साथ सरकार ने विकास के रास्ते नक्सलियों की दखल को कम किया। यही कारण है कि आज मानपुर इलाके की तस्वीर बदल गई है। 

नक्सलियों के अंदरूनी आवाजाही को रोकने के लिए पुलिस ने ताबड़तोड़ बेसकैंप खड़े कर दिए। बाद में कुछ बेसकैंपों को थाना का दर्जा दिया गया। मानपुर के औसतन हर 10 किमी में पुलिस थाना व कैंप के जरिए अपनी धाक जमा चुकी है। नक्सलियों को रणनीतिक तौर पर कमजोर करने के लिए मुख्य ठिकानो में पर बैसकैंप तैयार कर लिए गए है। महाराष्ट्र और कांकेर की सरहद पर राजनांदगांव पुलिस का सख्त पहरा है। मानपुर और औंधी क्षेत्र में सड़क मार्ग का जाल फैल गया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकार ने कई योजनाओं को मूर्तरूप दिया है। 

बीते दस साल में पुलिस के संसाधन में इजाफा हुआ है। प्रशासनिक मशीनरी को भी जंगल में काम करने के लिए भयमुक्त माहौल मिला है। यद्यपि मानपुर में नक्सल धमाको की गंूज को पुलिस ने कम किया है लेकिन यह भी कटु सत्य है कि राजनांदगांव का उत्तरी इलाका बकरकट्टा अब नक्सलियों के नए ठिकाने में बदल गया है। नक्सलियों ने इस क्षेत्र में भी जवानों को निशाना बनाया है। करीब तीन साल पहले उपनिरीक्षक युगल वर्मा समेत दो जवान शहीद हो गए थे। 
नक्सलियों के लिए यह इलाका पहाड़ी होने की वजह से शरणस्थली बना है। राजनांदगांव जिले के रास्ते लाल गलियारा बनाने में डटे नक्सलियों को पुलिस ने कभी हद तक रास्ते में लाने का प्रयास किया है। नक्सल मोर्चे में अभी भी पुलिस लंबी लड़ाई करते कई चुनौतियोंं से निपटना है। यह सच है कि मानपुर अब नक्सल चंगुल से बाहर निकलता विकास की राह में बढ़ रहा है।


Date : 06-Jul-2019

कमाई कई गुना बढ़ाकर मान ली, और दस्तावेजी खर्च को भी अनदेखा कर दिया...

एसीबी का कारनामा सीएम की जांच के घेरे में

रायपुर, 6 जुलाई (छत्तीसगढ़)। आबकारी विभाग के एक बाबू को बचाने के लिए राज्य सरकार के ईओडब्ल्यू/एसीबी के अधिकारी किस कदर जुट गए हैं, यह हैरान करने लायक मामला है। इस संस्था के अधिकारियों ने अपने ही डाले गए छापे में मिली जानकारी के खिलाफ जाकर इस बाबू पर चल रहे अदालती मामले का खात्मा करवाने के लिए नियमों और प्रक्रियाओं को जिस तरह कुचला है, उससे यह विभाग खुद ही एक अपराध करते दिख रहा है।

बिलासपुर के आबकारी विभाग के एक बाबू, दिनेश दुबे, के खिलाफ एक शिकायत के आधार पर 2017 में एक मामला दर्ज हुआ था, और इस पर 2018 में जांच का आदेश हुआ, और उसी वर्ष जांच पूरी भी हो गई। इसमें इस बाबू के पास करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति मिलना पाया गया था। लेकिन अभी पिछले पखवाड़े अचानक एसीबी में कुछ सबसे बड़े अफसरों ने एकाएक इस बाबू की फाईल का ऐसा मूल्यांकन किया कि उस पर रियायतों की बौछार कर दी, उसकी कमाई को अंधाधुंध बढ़ाकर उसे सही मान लिया, और उसके खर्च को एकदम जमीन पर लाकर यह साबित कर दिया कि उसकी संपत्ति अनुपातहीन है ही नहीं, और रातोंरात इसके खिलाफ चल रहे मामले का खात्मा बनाकर बिलासपुर की एक अदालत में पेश कर दिया गया। 

बिलासपुर और रायपुर में आबकारी विभाग और एसीबी के जानकार और विश्वसनीय सूत्रों से मिले कागजों के मुताबिक यह साबित होता है कि किसी शासकीय सेवक की आय और व्यय की गणना के लिए एसीबी के जो नियम हैं, उनको सबको दरकिनार करते हुए दिनेश दुबे के मामले में गणना की गई। जबकि इस कर्मचारी के बारे में आबकारी विभाग के चपरासियों ने एसीबी दफ्तर में यह लिखित जानकारी दी थी कि किस तरह नोटबंदी के दौरान 2016 में दिनेश दुबे ने उनके खातों में लाखों रूपए के हजार-पांच सौ के नोट डलवाकर बाद में उसमें से रकम निकलवा ली थी। अभी की जांच में इस तथ्य को पूरी तरह अनदेखा करके रिपोर्ट बनाई गई। 

एसीबी किसी भी शासकीय सेवक की तनख्वाह का 60 फीसदी खर्च मानता है, लेकिन इस एक मामले में इस बाबू का खर्च तनख्वाह का कुल 30 फीसदी माना गया। कागजात बताते हैं कि यह कर्मचारी 1993 से लेकर 2008 तक बिलासपुर में काम करने के लिए रायगढ़ और कोरबा से रोज आ-जाकर नौकरी करते रहा। और इसी दौरान उसने 1995 से 2008 तक अपनी नौकरी के बाहर संगीत की शिक्षा देना भी बताया है जिससे उसने 8 लाख रूपए से अधिक की कमाई बताई है। इस जांच में इस बात को पूरी तरह अनदेखा किया गया है कि इस कर्मचारी ने क्या खुद संगीत कहीं सीखा था, क्या वह संगीत सिखाने में सक्षम था, और क्या दूसरे शहर से आना-जाना करते हुए, वह भी विभाग की इजाजत के बिना आना-जाना करते हुए क्या उसके लिए संगीत सिखाना संभव था? 

जानकार सूत्र बताते हैं कि जांच में यह साफ-साफ मिला था कि इस कर्मचारी ने विभाग से न तो ऐसे किसी काम को करने की इजाजत ली थी, और न ही उसने ऐसी कोई कमाई विभाग को बताई थी। जब शासकीय कर्मचारी को आयकर देने के उद्देश्य से सारी कमाई बतानी पड़ती है, तब भी दिनेश दुबे ने ऐसी कोई कमाई नहीं बताई थी। अब अचानक उसने एसीबी जांच में ऐसा दावा किया, और एसीबी ने उसे आंख मूंदकर मान भी लिया है। 

अब जब शिकायत होने के बाद एसीबी के प्रभारी भूपेश बघेल ने सामान्य प्रशासन मंत्री की हैसियत से इस मामले की फाईल बुलवाई है, तो एसीबी में हडक़म्प मचा हुआ है। ऐसा पता चला है कि रातोंरात खात्मा पेश करने वाले एसीबी बिलासपुर के डीएसपी अजितेश सिंह 15 दिनों की छुट्टी पर चले गए हैं ताकि अदालत से लेकर शासन तक के सामने कोई जानकारी देने की नौबत न रहे। यह जांच अजितेश सिंह ने ही की थी, और अभी एसीबी के डीजीपी बी.के. सिंह के आदेश से इस मामले का खात्मा भी उन्होंने ही अदालत में पेश किया है। इस बारे में पूछने पर एसीबी के आईजी का काम देख रहे, एडीजी जी.पी. सिंह ने कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है, और उन्होंने कहा कि यह मामला अदालत में है, इसलिए वे इस पर कुछ कहना नहीं चाहते। एसीबी के सूत्र बताते हैं कि जी.पी. सिंह को परे रखकर ही यह फैसला लिया गया है, और उन्हें भी इसकी जानकारी तब मिली जब खात्मा अदालत में पेश हो चुका था। 

जांच के कागजात बताते हैं कि दिनेश दुबे ने खेती से अपनी कमाई अंधाधुंध बढ़ाकर दिखाई थी, जबकि उस जमीन में परिवार के 9 लोग शामिल हैं, और आयकर कटौती के समय अगर ऐसी आय की घोषणा नहीं की जाती है, तो उसे किसी जांच के समय वैध नहीं माना जाता। 
जांच में एक और साफ गड़बड़ी को अनदेखा किया गया है जिसमें इस कर्मचारी ने एक मकान को 2011 में खरीदना बताया गया है। उसने शासन को सूचित किया था कि यह रकम उसे अपने एक पुराने मकान को करीब 20 लाख रूपए में बेचकर मिली थी, और उससे उसने यह मकान खरीदा। जांच में कागजात से यह साफ हुआ है कि उसने यह मकान दिसंबर 2013 में बेचा था, और नया मकान मार्च 2011 में खरीदा जा चुका था। अब बेचने के पौने तीन साल पहले उस रकम से मकान खरीदना कागजात में ही साबित हो रहा है। लेकिन इस बात को भी जांच में अनदेखा कर दिया गया है। 

इस आरोपी, दिनेश दुबे, की पुत्री विदेश में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है, लेकिन वहां उसकी फीस, हवाई जहाज से आने-जाने के खर्च को गिना ही नहीं गया है। इसी तरह एक और मकान की खरीदी के लिए रकम कहां से आई इसका कोई खुलासा इस कर्मचारी ने विभाग को नहीं दिया था, लेकिन जांच में उसे भी अनदेखा किया गया है। 

ऐसी और भी बहुत सारी रियायतों के चलते इस कर्मचारी की कमाई को अंधाधुंध बढ़ाकर मान लिया गया है, और उसके खर्च को लगभग गिना ही नहीं गया है। अब यह पूरा मामला मुख्यमंत्री कार्यालय की जांच का विषय बन गया है, और सरकार के बड़े-बड़े लोग इस बात पर हैरान हैं कि भ्रष्टाचार में पकड़े गए और दस्तावेजी सुबूतों वाले किसी व्यक्ति को बचाने के लिए एसीबी ने इतनी रफ्तार से पूरी तरह गलत कार्रवाई कैसे की है? 


Date : 29-Jun-2019

उत्तरा विदानी-सुरेश नरेडिय़ा

बागबाहरा/ महासमुन्द, 29 जून। महासमुन्द जिले के बागबाहरा विकास खंड के ग्राम टेमरी के दो किसानों के नाम पर फर्जी पट्टा, ऋण पुस्तिका बनाकर सेंन्ट्रल बैंक से हजारों  का कर्ज  किसी अन्य के द्वारा लेने का मामला सामने आया है। चूंकि खसरा नंबर आन लाईन है, इसलिए ऋण पुस्तिका में जब कर्ज की बात सामने आई तो वे हैरान हैं। इनकी जमीन इस वक्त कर्ज नहीं पटाने के एवज बैंक में बंधक है और इससे इन किसानों को कर्ज मिलना भी संभव नहीं है। इनके सामने रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है।  
इनका कहना है कि जिन कागजात  से लोन लिया गया है इसमें तहसीलदार, पटवारी, किसान समेत सारे लोगों के हस्ताक्षर फर्जी हैं। ये काम किसका है, यह जांच का मुद्दा है। हैरानी की बात यह भी है कि  लोन देने से पहले बैंक ने इस बात की तफ्तीश भी नहीं की कि किसानों के नाम पर जमा किए गए नो ड्यूज सही हंै अथवा नहीं। 

सेन्ट्रल बैंक महासमुंद के  फील्ड अफसर देवाशीष का कहना है कि बैंक से उन्हें 2014 में कर्ज दिया गया। इसके लिए बकायदा गांव जाकर जमीन देखी गई। सारे कागजात देखे गए। लेकिन लोन लेने वाला फर्जी था, इसकी जानकारी बैंक कैसे कर सकता है। जब इन्होंने लोन लिया तब आनलाईन वर्क नहीं हो रहा था। हाल ही में कम्प्यूटर पर अपडेट करने के बाद किसानों को जानकारी मिली।

इधर किसानों ने थाने में इसकी शिकायत की है। थानेदार का कहना है कि पहले मामले की जांच करेंगे तभी रिपोर्ट लिखेंगे। 
कलेक्टर ने कहा है कि शीघ्र ही मामले की तह तक जाकर किसानों के साथ इंसाफ किया जाएगा और दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। यहां केवल दो किसान ही सामने आये हैं, लेकिन न जाने कितने ही किसानों के साथ इस तरह का आघात हुआ होगा।  
किसान नेक राम, उम्र 30 साल, पिता बिरसिंग, जाति तेली, ग्राम करहीडीह टेमरी कहता है-मेरी भूमि स्वामी हक की पटवारी हल्का नंबर 58-47 , ऋण पुस्तिका क्रमांक 1944384 पर कुल रकबा 1.15 हेक्टेयर भूमि है। जिस पर मेरे फर्जी हस्ताक्षर और ऋण पुस्तिका निकालकर पता नहीं किसने मेरे नाम से सेंट्र्ल बैंक महासमुन्द से 75 हजार रुपये का लोन लिया है। पांच साल के भीतर इसे पटाना है। मेरी आमदनी इतनी नहीं कि मैं कर्ज पटा सकूं। सामने धान की बोआई करना है। इसके लिए मुझे सोसायटी से खाद,बीज,दवाई चाहिए।  जमीन गिरवी हो चुकी है।
मैं अपने बच्चों और परिवार को क्या जवाब दूं और कैसे उनके हिस्से की रोटी बचाऊं। मन तो कर रहा है कि आत्महत्या कर लूं। 

मैंने कभी अपनी औकात से अधिक किसी से कर्ज नहीं लिया। मैं और मेरा परिवार बैंक के इतिल्ला के बाद खाना-पीना छोडक़र सिर्फ इस बात की चिंता में हैं कि हमारे साथ ऐसा क्यों किया गया? मेरे नाम से शपथ पत्र और नो ड्यूज भी है साहब, जिसके बारे में मैं जानता तक नहीं। मेरा हस्ताक्षर मिला लीजिये, नकली है। 

इसी तरह किसान भुलऊ राम उम्र 30 साल पिता बिसहत का कहना है-मेरी भूमि स्वामी हक की ग्राम टेमरी स्थित पटवारी हल्का नंबर 47 खसरा नंबर 5 की 1.37 हेक्टेयर जमीन पर पता नहीं किसने 90 हजार रुपये का ऋण ले रखा है। सेंट्रल बैंक से। बैंक से पत्र आया तो सबसे पहले परिवार वालों ने मुझ पर ही संदेह किया। बाद में पता चला कि इसी तरह नेक राम को कर्ज से लाद दिया गया है, तो परिवार के लोग चुप हुए।  हमारे कागजात का फर्जी नकल, तहसीलदार का फर्जी हस्ताक्षर, पटवारी का फर्जी हस्ताक्षर कर आखिर किसने ऐसा खेल होगा? अब सिर्फ एक ही रास्ता है कि मौत को गले लगा लूं लेकिन इससे मुझे ही गुनाहगार समझेंगे परिवार के लोग। कहेंगे परिवार पालने के डर से आत्महत्या कर लिया।  इन दोनों किसानों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से किसान होने के नाते निवेदन किया है कि मामले की जांच करंे और उनकी जमीन बचा लें।  
 


Date : 15-Jun-2019

कोरिया का उप स्वास्थ्य केंद्र, 4 कुर्सी, 2 खाट, यहीं जचकी
आधा दर्जन गांव के डेढ़ हजार इस पर निर्भर
चंद्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 15 जून (छत्तीसगढ़)।
कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड के ग्राम पंचायत बेलिया के आश्रित ग्राम पलारीडांड़ में संचालित यह उप स्वास्थ्य केन्द्र बीते 12 बरस से इस तरह चल रहा है। आधा दर्जन गांवों के डेढ़ हजार लोग इस पर निर्भर हैं। ग्रामीणों की मानें तो सन 2007 से शुरू इस स्वास्थ्य केन्द्र की सुध लेने कोई नहीं आया है। 

इस संबंध में बीएमओ डॉ आरपी सिंह का कहना है कि यहां के लिए नए भवन की स्वीकृति हो चुकी है लेकिन निर्माण शुरू नहीं हो सका है। फिलहाल वहां पर एएनएम एवं पुरूष स्वास्थ्य कार्यकर्ता के द्वारा टीकारण, मलेरिया जांच एवं अन्य स्वास्थ्य संबंधी सलाह एवं सेवाएं दी जा रही हैं। 

यह उप स्वास्थ्य केन्द्र सुदूर वनांचल ग्राम पलारीडांड़ में स्थित है यह उपस्वास्थ्य केन्द्र कच्चे  खपरैल एवं जर्जर मकान में संचालित है। यहां पर किसी भी भी प्रकार की कोई सुविधाएं नहीं है। महज औपचारिकता बतौर एक बोर्ड जरूर लगाया गया है जिसमें स्वास्थ्य कर्मचारी का नाम एवं उनके द्वारा किए जाने वाले टीकाकरण का समय व दिनांक भर लिखा जाता है। इस उपस्वास्थ्य केन्द्र पर ग्राम कछाड़ी, लोलकी, पलारीडांड़ ठकुरहत्थी जोगिया और मझगवां के लगभग 1500 से अधिक लोग निर्भर हंै। 

चार कुर्सियां, दो खाट
बाहर  एक बोर्ड लटकता हुआ दिखाई दे रहा है। बाहर कपड़े भी सूख रहे हंै। वहीं अंदर चार कुर्सियां और  दो रस्सी वाली खाट लगा दी गई है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रसव जांच कराने अथवा अचानक प्रसव होने की स्थिति में ग्रामीण कैसे करते होंगे? शासन के नियमों पर गौर करें तो उप स्वास्थ्य केन्द्र में मलेरिया, सिकल जांच, प्रसव पूर्व जांच और जरूरत पडऩे पर प्रसव भी कराया जाना होता है। यहां की महिलाओं ने बताया कि क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क भी नहीं है। रास्ता भी खराब है, अपातकालीन परिस्थिति में हमें भारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।  

नया भवन स्वीकृत पर निर्माण ठंडे बस्ते में 
पलारीडांड़ का उपस्वास्थ्य केन्द्र निजी कच्चे मकान में सचंालित जरूर है लेकिन स्वास्थ्य विभाग की मानें तो इसका किराया विभाग को नहीं देना पड़ता है। पालारीडांड के लिए नया भवन भी स्वीकृत भी हुआ है ,पर इसे सरकारी उदासीनता या लापरवाही  लंबे समय से  निर्माण नही हो पाया है।  

नई सरकार से उम्मीदें
भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल में इस पर कोई घ्यान नहीं दिया। सरकार बदलने के बाद ग्रामीणों को एकउम्मीद पुन: जगी है कि  उपस्वास्थ्य केन्द भवन का निर्माण होगा। हांलाकि क्षेत्र के ग्रामीण इसे ग्राम कछाड़ी में बनाने की मांग कर रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा को इसका लाभ मिल सके। 


Date : 13-Jun-2019

सरकारी बदली पर आबकारी में तबादले का लम्बा खेल, करोड़ों के आरोप से घिरे बाबू की फिर वहीं पोस्टिंग

एसीबी ने पिछले साल पकड़ी थी 5 करोड़ की अवैध कमाई

प्लेसमेंट कर्मचारियों ने बताया था अपने साथियों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार 

छत्तीसगढ़ संवाददाता
बिलासपुर, 13 जून।
आबकारी विभाग के जिस बाबू के खिलाफ़ करोड़ों रुपये की अवैध कमाई के आरोप में एंटी करप्शन ब्यूरो ने छापामार कार्रवाई की थी उसे फिर बिलासपुर में पदस्थ कर दिया गया है। कुछ दिन पहले ही आबकारी उपायुक्त ने आयुक्त को रायपुर पत्र लिखकर उसे यहां पदस्थ नहीं करने को लेकर आगाह भी किया था। इसके बावजूद आरोपों से घिरे बाबू को यहां स्थानांतरित कर दिया गया है। 

आबकारी विभाग में मनचाही जगह पर पोस्टिंग का लम्बा खेल चल रहा है। इस खेल में लिप्त लोगों पर सत्ता बदलने का भी असर नहीं हुआ है। 12 जून को आबकारी विभाग के अवर सचिव मरियानुस तिग्गा ने लिपिक दिनेश कुमार दुबे को बिलासपुर स्थानांतरित करने का आदेश जारी किया है। पूर्ववर्ती सरकार में आबकारी विभाग के मंत्री के बेहद करीबी माने जाने वाले बिलासपुर के सहायक आयुक्त आबकारी कार्यालय के सहायक ग्रेड- दो बाबू दिनेश कुमार दुबे की अवैध कमाई की लम्बी चौड़ी शिकायत प्रधानमंत्री से लेकर विभागीय मंत्री व अधिकारियों को तथा एंटी करप्शन ब्यूरो को की गई थी। शिकायत में उसके द्वारा की जा रही अवैध वसूली के तरीकों का खुलासा किया गया था बल्कि यह भी बताया गया था कि उनके दबाव के चलते कई प्लेसमेंट कर्मचारियों को आत्महत्या के लिए भी मजबूर होना पड़ रहा है। 

एंटी करप्शन ब्यूरो के तत्कालीन उप पुलिस अधीक्षक अजितेश सिंह ने शिकायतों और उसके साथ मिले दस्तावेजों की जांच की। सही पाये जाने पर बीते साल 12 अप्रैल को उसके ठिकानों पर छापा मारा था। यह पाया गया कि उसने 9 साल की नौकरी में वेतन के रूप में केवल 20 लाख रुपये आहरित किये जबकि उसकी मौजूदा सम्पत्ति 5 करोड़ रुपये से अधिक है। छापेमारी के बाद एसीबी ने उसके खिलाफ़ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा, 13 (1 ई) और 13 (2) के तहत अपराध कायम किया। एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच में बाबू के पास से कुदुदंड में 1200 वर्ग फ़ीट का एक दो मंजिला मकान, एक वर्ग फ़ीट का एक मकान, गंगा नगर में एक आलीशान बंगला, भारती नगर में दो हजार वर्गफ़ीट का मकान, पत्नी के नाम पर चकरभाठा में दो एकड़ जमीन, एसबीआई में चार संयुक्त खाते मिले जिनमें दस लाख रुपए जमा हैं। बाबू दुबे की बेटी यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई के दस्तावेज भी हाथ में आये। 

मस्तूरी के पास ग्राम पाराघाट निवासी बाबू दिनेश कुमार दुबे ने  2009 से आबकारी विभाग में लिपिक पद में नौकरी शुरू की थी।  इस हिसाब से 9 साल में वेतन 20 लाख रुपए होता है लेकिन एसीबी ने पाया कि उसके पास लगभग 5 करोड़ की संपत्ति है।

शराब दुकान के कर्मचारियों ने दुबे के खिलाफ़ शिकायत में कई गंभीर आरोप लगाये थे। उन्होंने दुबे को पांच करोड़ नहीं बल्कि 11 करोड़ का आसामी बताया था। सन् 2017 में उसके बैंक खाते का विवरण देते हुए शिकायत हुई। यह बताया गया कि तीन महीने में उसने शासकीय दुकानों से दो करोड़ रुपये से अधिक वसूली की। उसने अपने बेटे-बेटी के नाम पर रिकरिंग खाता खोल रखा है, जिसमें 10 हजार रुपये हर माह जमा होते हैं। नोटबंदी के दौरान कर्मचारियों और भृत्यों के खाते में उसने पांच लाख रुपये से अधिक जमा कराये। फर्जी परमिट देकर लाखों रुपये लेना और शासन को करोड़ों का नुकसान पहुंचाने की शिकायत  भी उसके खिलाफ है। 

इसके अलावा ट्रांसपोर्टरों से लाखों रुपये की रिश्वत तथा कमीशन का आरोप भी कर्मचारियों ने दुबे पर लगाया। शिकायत यह भी थी कि एक भाजपा कार्यकर्ता के साथ सरकारी वाहनों में बैठकर दुबे यह वसूली करता है। 

एक अन्य शिकायत में कर्मचारियों ने दुबे के साथ-साथ तत्कालीन जिला आबकारी अधिकारी एल.एल. ध्रुव के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की मांग की थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि उन पर दुकान बंद होने और खुलने से पहले अधिक दाम पर शराब बेचने के लिए दबाव डाला जाता है। ऐसा नहीं करने पर नौकरी से निकालने और जेल भेजने की धमकी दी जाती है। प्लेसमेंट कर्मचारियों ने कहा था कि इनके दबाव के चलते कई कर्मचारी आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने इन दोनों अधिकारियों, कर्मचारियों को हटाने की मांग की थी। 

दुबे को फिर बिलासपुर में पदस्थ किये जाने की जानकारी मिलने पर सहायक आयुक्त कार्यालय के सभी अधिकारी कर्मचारियों ने सहायक आयुक्त को ज्ञापन देकर दुबे को यहां पदस्थ नहीं करने की मांग रखी। इस पर बीते 24 मई को सहायक आयुक्त ने आयुक्त को पत्र लिखकर आवश्यक कार्रवाई के लिए अनुशंसा सहित लिखा। कर्मचारियों, प्लेसमेंट कर्मचारियों और आबकारी विभाग के बिलासपुर में पदस्थ प्रभारी अधिकारी के विरोध के बावजूद भ्रष्टाचार, अवैध वसूली की गंभीर शिकायतों से घिरे लिपिक दुबे को यहां पदस्थ कर दिया गया है, जिससे मालूम होता है कि आबकारी विभाग में तबादले का लम्बा खेल शुरू हो चुका है। 


Previous12Next