विशेष रिपोर्ट

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Date : 01-Oct-2019

स्वच्छ भारत अभियान, एक ही नाम पर दो शौचालय, राशि जारी लेकिन शौचालय नहीं, कोरिया जिला ओडीएफ घोषित

2 अक्टूबर स्वच्छ भारत अभियान के 5 वर्ष पूरे होने पर विशेष रिपोर्ट

चंद्रकांत पारगीर

बैकुंठपुर, 1 अक्टूबर। स्वच्छ भारत अभियान में टेक्निकल टाइपिंग मिस्टेक कर पंचायतों में एक ही नाम के हितग्राहियों को दो-दो बार राशि जारी कर दी गई। किसी नाम में एक अक्षर हटा दिया गया तो किसी में स्पेस देकर दुबारा उस नाम से राशि जारी कर दी गई। एक ही हितग्राही का मनरेगा से भी और एसबीएम से भी शौचालय स्वीकृत हो गया। मजे की बात तो यह कि इस कार्य की मॉनिटरिंग में लगी स्वच्छ भारत अभियान की टीम ने अभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया और एक ही शौचालय के लिए दो-दो तो कभी तीन बार राशि जारी कर दी गई। ‘छत्तीसगढ़’ ने जब स्वच्छ भारत अभियान की सरकारी वेबसाईड खंगाली तो इसका खुलासा हुआ।

इस संबंध में कलेक्टर डोमन सिंह का कहना है कि मामले की जांच करवाई जाएगी, खामियां पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई होगी।

जानकारी के अनुसार बीते वर्ष 2013-14 से 2017-18  तक 90,779 शौचालयों का निर्माण का सर्वे हुआ, जिसमें वर्ष 2013-14 में 26 12 बनाए जा चुके थे, जिसमें बाद 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत हुई और 2017-18  तक 8 8 ,16 7 शौचालयों का निर्माण पूर्ण होना बताया गया। जिसके बाद पूरा जिला ओडीएफ घोषित कर दिया गया। ये आंकडें केन्द्र सरकार की वेबसाईड मिनिस्ट्री ऑफ वॉटर एंड सेनिटेशन पर उपलब्ध है। सरकारी साईट पर छत्तीसगढ़ ने जिले के सभी तहसील के एक दो ग्राम पंचायतों को खंगाला, बैकुंठपुर के कंचनपुर और झरनापारा, भरतपुर के भगवानपुर, बहराशी, खडगवां के मेरो, इंदरपुर, बचरापोडी, सोनहत के ग्राम पंचायत सोनहत, मझारटोला की एंट्री किए गए डेटा को देखा, हर ग्राम पंचायत में 15 से 20 नाम ऐसे पाए गए जिन्हें मनरेगा और एसबीएम दोनों से शौचालय के 12 हजार रू जारी किए गए हैं, इसके अलावा कुछ पंचायतों में सिर्फ हितग्राही का नाम है पिता के नाम पर तीन अक्षर एंट्री कर दिए गए हैं, ऐसे सैकडों नामों को एंट्री किया गया है। चंूकि कम्प्यूटर एक नाम सिर्फ एक बार ही ले सकता है, इसलिए इन नामों में हल्का सा अंतर कर दो बार सॉफ्टवेयर में इंद्राज कर दिया गया। जैसे झरनापारा में rajesh पिता duhan singh फैमिली आई डी 78 942345 को को एसबीएम से राशि दी गई, और फिर इस नाम में RAJESH KUMAR  पिता DUHAN SINGH फैमिली आई डी 78 774547 करके दोबारा मनरेगा से भी स्वीकृति दे दी गई। इसी तरह कंचनपुर में dubraj bsaant  को एसबीएम से दो बार राशि जारी की गई, दूसरी बार दुबराज के नाम में एक स्पेश दे दिया गया। इसी तरह मेरो में shiv nath Pawan sai को दुबारा देने के लिए shiv nath Pawan sai कर कई लोगों के नाम से राशि दुबारा जारी कर दी गई है।

पंचायतों में 2 दर्जन से ज्यादा हितग्राही एक ही नाम के

स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण की बेबसाईट में कोरिया जिले की जो जानकारी इंद्राज की गई है उसका अवलोकन करने से स्पष्ट हो रहा है कि एक ग्राम पंचायत में 2 दर्जन से ज्यादा हितग्राही एक नाम के ही हैं साथ ही उनके पिता का नाम भी एक ही है। दूसरी ओर ग्राम पंचायतों के पदाधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं है। जानबूझ कर तकनीकी कमी करके बेबसाईट में फर्जी नामों को भी इंद्राज कर दिया गया है। दरअसल, स्वच्छ भारत अभियान संविदाकर्मियों के भरोसे है, मॉनिटरिंग के आभाव में एक ही नाम से दो-दो बार राशि जारी कर दी गई, जिन्हें इस कार्य के लिए रखा गया है उसमें भारी लापरवाही बरती गई है। यदि इसका भौतिक सत्यापन किया जाए तो इसमें करोड़ों की गड़बड़ी उजागर हो सकती है।

नाम है पर नहीं बने शौचालय

दूसरी ओर हर पंचायत में कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि उनके नाम से पैसा तो आया परन्तु शौचालय आज तक नहीं बना और राशि निकाल ली गई। खडगवां बचरापोडी ग्राम पंचायत के राकेश मोतीराम, राधेश्याम स्व सज्जनसाय, अशोक कुमार मोहरसाय, रविकुमार सुन्दरसाय, आन्नदराम रामलाल, गुलाबचंद शिवपूजन, नारेन्द्र कुमार श्रीकांत, सुन्दरसाय बीरन, कन्हैयालाल सुन्दरसाय, राजेशकुमार काशीराम, राजू काशीराम, लक्ष्मण रामंिसह, रामकुमार राम सिंह का कहना है कि उनके नाम से शौचालय स्वीकृत हुए हैं परन्तु आज तक बनाए नहीं गए हैं।

कब कितने बने शौचालय

तहसील       2014-2015        2015-16    2016 -17   2017-18

बैकुंठपुर     6 93  5198               13247           8 96 1

भरतपुर 28 5  7335        9218             925

खडगवां 394   4716        58 25             8 432

मनेन्द्रगढ़     46 2  38 35       106 31           1050

सोनहत 243   38 58        1916             552


Date : 28-Sep-2019

भोपाल के हनीट्रैप का शहद छत्तीसगढ़ के मंत्री, अफसरों तक लाता था वनमंत्री का खासमखास...

विशेष संवाददाता
रायपुर, 28 सितंबर (छत्तीसगढ़़)।
मध्यप्रदेश की सरकारी सत्ता में गहरे तक पैठ बना चुके हनीट्रैप के छत्तीसगढ़ कनेक्शन बढ़ते चले जा रहे हैं। अभी मिली जानकारी के मुताबिक इस राज्य में एक पिछले वन मंत्री के लेन-देन का बहुत सा काम देखने वाले, और उस विभाग से एनजीओ को फंड दिलवाने वाले एक नाम का पता चला है जिसे भोपाल के हनीट्रैप गिरोह की एक युवती ने पूछताछ में बताया है। 

भोपाल के उच्चस्तरीय सूत्रों के मुताबिक पूछताछ में एक युवती ने छत्तीसगढ़ के एक पिछले वनमंत्री के साथ काम करने वाले एक तरूण का नाम बताया है जिसने उसे मंत्री और कुछ अफसरों से मिलवाया था। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के इस हनीट्रैप में लोगों को सेक्स में फंसाकर ब्लैकमेल करने, या उनसे सरकारी रकम मंजूर करवाने के काम में लगी महिलाओं के छत्तीसगढ़ में भी कई मंत्रियों और अफसरों के साथ संबंध सामने आए हैं। 

ऐसे में जब मध्यप्रदेश के जांच अफसर अधिकृत तौर पर कोई जानकारी नहीं दे रहे हैं, तब हाथ के लिखे हुए दो पन्ने अभी सामने आए हैं जो हनीट्रैप की एक महिला के नाम वाले हैं, और जिनमें छत्तीसगढ़ के बहुत से नामों के साथ लेन-देन का जिक्र है। ये पन्ने सोशल मीडिया से तैरते हुए पहुंचे हैं, और इनमें कुछ वक्त पहले तक छत्तीसगढ़ में सबसे ताकतवर रहे अफसरों और मंत्रियों के नाम हैं, इससे कितना भुगतान मिला, या कितना बाकी है, या किस तरह मिला इसे केवल संख्याओं में लिखा गया है, उनके साथ पूरी रकम नहीं लिखी गई है। लेकिन यह बात साफ है कि छत्तीसगढ़ सरकार के कुछ विभागों से इन युवतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ के ही कुछ दलालों ने जाल बिछाकर करोड़ों रूपए के काम मंजूर करवाए थे, और उनमें से कई काम पूरे न करने पर भी उनके बिल लगाकर भुगतान की कोशिश की गई थी। 

इनमें बस्तर इलाके के लिए वन विभाग के तहत कई करोड़ के काम मंजूर करवाए गए थे, और ढाई करोड़ से अधिक के काम में से सरकार बदल जाने से 50 लाख से कम का ही भुगतान हो पाया था। विभाग के अफसर बताते हैं कि एक पिछले वनमंत्री के दबाव में उन्हें इन संगठनों को काम देना पड़ा, और बाद में सरकार बदली, जांच हुई, तो पता लगा कि काम हुआ ही नहीं है, केवल बिल लगा दिया गया था। 

यह भी पता लगा है कि मध्यप्रदेश पुलिस होटलों और क्लबों के कमरों के रजिस्टर या रिसेप्शन की वीडियो रिकॉर्डिंग से भी इन युवतियों से मिलने वाले नेताओं, अफसरों, और पत्रकारों-कारोबारियों की शिनाख्त कर रही है। इनमें से एक युवती ने पुलिस का गवाह बनना मंजूर किया है, और उससे पुलिस को सुबूत भी मिलते चल रहे हैं, और जानकारी के आधार पर पुलिस जांच आगे भी बढ़ रही है। 

छत्तीसगढ़ में सरकार के पास यह जानकारी पहुंची है कि यहां के सरकारी दफ्तरों में स्थानीय दलाल इन युवतियों को लेकर पहुंचते थे, और मंत्रियों के बंगलों से लेकर कुछ विभागों के रेस्ट हाऊस तक में उनसे मुलाकात करवाई जाती थी। पिछले एक वनमंत्री के जिस दलाल का नाम सामने आया है, उसने वन विभाग से कई और तरह के काम भी करवाए थे, और विभाग में यह आम चर्चा थी कि यह दलाल वनमंत्री का पूंजीनिवेश भी करता है। 

इस बीच छत्तीसगढ़ में स्थानीय स्तर पर पूरी तरह से छत्तीसगढ़ी हनीट्रैप के मामले भी सामने आ रहे हैं जो कि सरकार से भी जुड़े हुए हैं, और सरकार से बाहर के लोगों से भी। अभी कुछ महीने पहले रायपुर में एक पेशेवर स्टिंग ऑपरेटर के घर छापा मारकर बहुत से उपकरणों में जो सेक्स रिकॉर्डिंग जब्त की गई थी, उससे भी बहुत से मामले मिलने की चर्चा है, हालांकि अभी तक पुलिस ने ऐसी कोई जानकारी जारी नहीं की है। भोपाल का यह भांडाफोड़ होने के पहले से छत्तीसगढ़ में ऐसा सिलसिला चल रहा था, लेकिन अब भोपाल से छत्तीसगढ़ मंत्रालय और दूसरे दफ्तरों का सीधा रिश्ता भी जुड़ गया है, और इसकी जांच इस राज्य की पुलिस के बजाय मध्यप्रदेश पुलिस के हाथ है। 


Date : 27-Sep-2019

दंतेवाड़ा की जीत किसकी, हाट-बाजार योजना, और सुपोषण की?

छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 27 सितंबर।
 दंतेवाड़ा उपचुनाव में मतदाताओं ने भूपेश बघेल सरकार के कामकाज पर मुहर लगाई है। चुनाव से दो महीने पहले शुरू हुई सुपोषण अभियान और हाट बाजार योजना, धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में भी अपना प्रभाव छोडऩे में सफल रही है। इसका चुनाव में कांग्रेस को काफी फायदा मिला। इससे परे भाजपा को अपने पक्ष में सहानुभूति लहर चलने का भरोसा था। कार्यकर्ता भी एकजुट थे, लेकिन पार्टी के रणनीतिकार अपने पक्ष में माहौल बनाने में कामयाब नहीं हो पाए। चुनाव प्रचार के बीच अंतागढ़ को लेकर मंतूराम पवार के खुलासे ने भी भाजपा की नैय्या डुबोने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

दंतेवाड़ा विधायक भीमा मंडावी की नक्सल हत्या के बाद लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां से करीब साढ़े पांच हजार वोटों की बढ़त मिली थी। पार्टी ने उनकी पत्नी ओजस्वी मंडावी को चुनाव मैदान में उतारकर एक तरह से सहानुभूति लहर पैदा करने की कोशिश की। ओजस्वी शिक्षित महिला हैं और शहरी इलाकों में उनके पक्ष में सहानुभूति भी देखने को मिली। भाजपा ने दंतेवाड़ा, बचेली, किरंदुल और गीदम के नगरीय इलाकों में विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया था। यहां भाजपा ने स्थानीय नेताओं के बजाए चुनाव प्रचार की कमान शिवरतन शर्मा को सौंपी थी। साथ ही साथ पूर्व मंत्री महेश गागड़ा को भी लगाया गया था। पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के साथ-साथ दंतेवाड़ा के पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी भी चुनाव खत्म होने तक वहां डटे रहे। चौधरी ने अपने कलेक्टर रहते वहां कराए गए कार्यों का उल्लेख कर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में वोट मांगे, लेकिन वे बेदम साबित हुए। पूर्व सीएम अजीत जोगी भी अपने प्रत्याशी के समर्थन में धुंआधार प्रचार किया। 

जोगी पार्टी के उम्मीदवार का हाल यह रहा कि प्रत्याशी सुजीत कर्मा अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। उन्हें नोटा से भी कम वोट मिले। दूसरी तरफ, सीएम भूपेश बघेल ने चुनाव प्रचार अभियान शुरू होने से पहले ही सरकार के 8 महीने के कामकाज पर ही वोट देने की अपील की थी। यद्यपि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस यहां से पिछड़ी थी। लेकिन इस बार उन्होंने जमकर प्रचार किया। कांग्रेस का चुनाव संचालन उद्योग मंत्री कवासी लखमा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने संभाल रखी थी। 

कांग्रेस प्रत्याशी देवती कर्मा के पति महेन्द्र कर्मा की भी हत्या नक्सलियों ने की थी, लेकिन वे पिछला चुनाव मामूली वोटों से हार गई थीं। उनके पुत्र छविन्द्र कर्मा की नकारात्मक बयानबाजी से भी उन्हें नुकसान का अंदेशा जताया जा रहा था। इन सबके बावजूद कांग्रेस को यहां सरकार की मुख्यमंत्री हाट बाजार योजना और सुपोषण अभियान के साथ-साथ वनोपज की खरीदी के लिए की गई व्यवस्था के चलते काफी समर्थन मिला। हाट बाजार योजना के तहत हाट बाजार में डाक्टरों की टीम बीमार लोगों का मुफ्त इलाज करती है। साथ ही उन्हें निशुल्क दवाईयां भी उपलब्ध कराई जाती है। इस योजना का असर यह हुआ कि हर हाट बाजार में इलाज के लिए बीमार आदिवासी सरकारी एम्बूलेंस तक पहुंचने लगे है। यह एक  योजना है कि जिसका नक्सली भी विरोध नहीं कर पाए। एक जानकारी के मुताबिक अंदरूनी इलाकों में भी करीब 20 हजार से अधिक आदिवासी खुद चलकर  उपचार कराने पहुंचे थे। 
इसी तरह सरकार की सुपोषण अभियान का भी काफी असर देखने को मिला।  आदिवासी इलाकों में मध्यान्ह भोजन के साथ-साथ अंडे का भी वितरण किया गया। जबकि पिछली सरकार अंडा बांटने से कतराती रही है। इसी तरह 15 से अधिक वनोपज का समर्थन मूल्य पर खरीदी का भी आदिवासियों के बीच अच्छा संदेश गया और वे एक तरह से बिचौलियों के हाथों औने-पौने दाम पर वनोपज को बेचने की मजबूरी नहीं रह गई थी। यही नहीं, लोहंडीगुड़ा में आदिवासियों की जमीन वापस देने से भी विशेषकर बस्तर संभाग में सकारात्मक असर हुआ है। कांग्रेस-भाजपा से परे किरंदुल और अंदरूनी इलाकों में सीपीआई का भी अच्छा प्रभाव है, लेकिन कांग्रेस ने सीपीआई के वोटों पर भी सेंधमारी की है। सीपीआई को हमेशा यहां 10-15 हजार वोट आसानी से मिलते रहे हैं, लेकिन इस बार सीपीआई प्रत्याशी भीमसेन मंडावी जमानत नहीं बचा पाए। कुल मिलाकर सीपीआई के वोटों पर भी कांग्रेस ने सेंधमारी की है। 
चुनाव प्रचार के बीच अंतागढ़ उपचुनाव के मंतूराम पवार के खुलासे से भी भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई। उन्होंने पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह, अजीत जोगी और अन्य भाजपा नेताओं का नाम वापसी के लिए लेन-देन के आरोप लगा दिए। मंतूराम पवार भाजपा में थे और उनके वार से भाजपा के बड़े प्रचारक पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह पूरे समय सफाई देते ही नजर आए। इससे कांग्रेस को हमलावर होने का मौका मिला और उन्होंने चुनाव में खूब भुनाया। आखिरी के दिनों में सीएम भूपेश बघेल ने शहरी इलाकों में डटकर प्रचार किया और उनके धुंआधार प्रचार से कांग्रेस के पक्ष में माहौल बन गया। कुल मिलाकर कांग्रेस की देवती कर्मा पिछले चुनावों में दंतेवाड़ा से सबसे ज्यादा जीतने वाली प्रत्याशी रही हैं। कांग्रेस भारी जीत से गदगद है और चित्रकोट पर कब्जा बरकरार रखने की तैयारी में जुट गई है। 


Date : 27-Sep-2019

कोरिया में ऐतिहासिक-प्राकृतिक दर्शनीय स्थलों की भरमार, विश्व पर्यटन दिवस आज

चन्द्रकांत पारगीर
छत्तीसगढ़ संवाददाता
बैकुंठपुर, 27  सितंबर।
कोरिया जिला प्रकृति की गोद में बसा छग प्रदेश के उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र में स्थित एक छोटा व आदिवासी बाहुल्य जिला है। यहां वनों की सघनाता ज्यादा है इसके साथ ही यहां ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की भरमार होने के साथ ही कई प्राकृतिक दर्शनीय स्थल है। जिसके चलते कोरिया जिले में पर्यटन की अपार संभावना है लेकिन इस दिशा में समुचित प्रयास नहीं किये गये। यदि उचित प्रयास किया जाता है तो कोरिया जिले को प्रदेश के पर्यटन नक्शे में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकेगा। 

जिला गठन होने के पश्चात दो दशक से ज्यादा हो गया। वहीं छग राज्य स्थापना हुए दो दशक होने को है लेकिन कोरिया जिले के प्राकृतिक व दर्शनीय स्थलों की पहचान आज जिले में ही सिमटी है तथा कई ऐतिहासिक महत्व के धरोहर उपेक्षित पड़े हुए हैं। जिनमें खडगवां में कोटेश्वर महादेव, जनकपुर में बिखरे पड़े सतीगेट, सोनहत के बदरा स्थित रॉक पेंटिंग, पटना स्थित देवगढ़धाम, रामगढ स्थित गांगीरानी मंदिर, सोनहत का जोगीमठ सहित कई स्थान शामिल हंै। 

जानकारी के अनुसार कोरिया जिले के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में से एक अमृत धारा जल प्रपात है। इसके अलावा भी कई अन्य प्रमुख दर्शनीय व प्राकृतिक स्थल है जिसे पहचान दिलाने की जरूरत है, प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अमृतधारा जल प्रपात के अलावा जिले के अन्य दर्शनीय व ऐतिहासिक महत्व के दर्शनीय स्थलों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। यही कारण है कि कई महत्वपूर्ण स्थल अपनी पहचान जिले में ही नहीं बना सके। पर्यटन विकास के नाम पर सिर्फ अमृतधारा जल प्रपात स्थल का ही विकास कराया गया। जिसकी पहचान आज जिले के अलावा बाहर भी है। यहां पर हसदो नदी का पानी करीब 100 फीट से ज्यादा उचाई से गिरता है जो मनमोहक नजारा प्रस्तुत करता है। यहां पर सबसे ज्यादा सैलानी पिकनिक मनाने के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा गौर घाट जल प्रपात भी जिले के प्रमुख जल प्रपातों में से एक है जहां का नजारा भी सुन्दर है लेकिन यहां पर प्रशासन द्वारा किसी तरह की सुरक्षात्मक व्यवस्था नहीं बनाई है जिसके चलते यहां पर कई घटनाएं हो चुकी हैं तथा पहुंच मार्ग भी सही नहीं है। फिर भी यहां सैलानियों की भीड़ प्रतिवर्ष जुटती है। यदि इस जल प्रपात स्थल तक पहुंच मार्ग के साथ अन्य आवश्यक सुविधाएं तथा सुरक्षात्मक उपाय किए जाएं तो यह भी एक रमणीय स्थल है। जहां पर पहुंच कर प्रकृति के सुन्दर नजारे के साथ प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है। 

कई जलप्रपातों को पहचान की जरूरत
कोरिया जिले में अमृतधारा जल प्रपात गौर घाट जल प्रपात के अलावा भी कई सुन्दर जल प्रपात स्थित है जिनके बारे में पूरे जिले के लोगों को ही जानकारी नहीं है केवल क्षेत्रीय स्तर तक ही इनकी पहचान बनी हुई है। ऐसे जल प्रपात को पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करने की जरूरत है। 

जानकारी के अनुसार भरतपुर जनपद क्षेत्र में एक प्रमुख जल प्रपात रमदहा जल प्रपात है जो अपनी सुन्दरता के लिए क्षेत्र में प्रसिद्ध है लेकिन यहां पर आवश्यक सुविधाओं का अभाव बना हुआ है साथ ही प्रचार प्रसार के अभाव मेें इस जल प्रपात के बारे में जिले के कई क्षेत्रों के लोगों केा जानकारी ही नहीं है। रमदहा जल प्रपात जिले का एक सुन्दर जल प्रपात है जिसका नजारा काफी मनमोहक है। इसके अलावा सोनहत जनपद पंचायत क्षेत्र में बनिया वाटर फॉल प्रकृति के गोद में बसा हुआ है। घने वनों के बीच में कल कल बहती नदियां उंचाई से गिरते हुए सुन्दर जल प्रपात का नजारा बनाता है। यह भी गुमनामी के दौर से गुजर रहा है। इसके इलावा भी भरतपुर व सोनहत जनपद क्षेत्र में कई गुमनाम जलप्रपात है जिन्हे पहचान दिलाने की जरूरत है।

मुख्यालय के निकट सीता गुफा गुमनाम
कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर के निकट रामायण काल के समय का एक प्राचीन गुफा स्थित है जिसे सीता गुफा के नाम से जाना जाता है स्थानीय लेाग इस स्थल को समुंदई के नाम से जाते है। जानकारी के अनुसार समुंदई जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर से कुछ ही किमी की दूरी पर सोनहत मार्ग पर स्थित शिवघाट की ऊंची पहाड़ी में घने जंगलों के बीच में स्थित है। जिला मुख्यालय के निकट होने के बाद भी ऐतिहासिक महत्व का यह स्थल अपेक्षा के कारण विकसित नहीं हो सका है जिसके चलते यहां क्षेत्र के लोगों के अलावा जिले के दूर दराज के पर्यटक नहीं पहुंचते। यहां तक पहुंचने के लिए सडक़ भी नहीं बन पाया है। 

जानकारी के अनुसार बैकुंठपुर से सोनहत मार्ग पर शिवघाट के उपरी गांव पहाड़पारा से समुंदई क्षेत्र पहुंचा जा सकता है। लेकिन सोनहत जनपद के ग्राम पहाडपारा के बाद सुव्यवस्थित मार्ग नहीं होने के कारण जंगलों के बीच पैदल ही जाना पड़ता है। घने जंगलों के बीच पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक विशाल चट्टान को काटकर गुफा बना गया है जहां भगवान शिव की आराधना की जाती है। विभिन्न खास अवसरों पर गुफा के अंदर जवारा बोने के साथ साथ भजन कीर्तन भी होता है। 

मान्यता है कि भगवान राम सीता अपने वनवास के दौरान समुंदई क्षेत्र में कुछ दिनों तक इसी गुफा में रूके थे। चट्टानों को काटकर बनाई गयी गुफा में एक साथ करीब 15-20 लोगों के बैठने की जगह है। घने वनों के बीच गुफा के निकट की वर्तमान में सुन्दर जल प्रपात भी दिखाई देता है जो करीब  150 फीट से अधिक ऊंचाई से गिरता है। इसके नीचे एक और जल प्रपात है। क्षेत्र के कई लोग यहां पिकनिक मनाने आते हैं तथा विभिन्न त्यौहार के दौरान पूजा अर्चना करने आस पास के दर्जनों गांव के ग्रामीण पैदल पहुंचते हैं। 

हरचौका स्थित पुरातात्विक महत्व का स्थल 
 कोरिया जिले के भरतपुर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत हरचौका में मवई नदी जो कि छग व मप्र की सीमा को विभाजित करती है। नदी के तट पर ही चट्टानों को तरासकर गुफा बनाई गयी है जिसमें प्रत्येक दिशा में शिवलिंग है। बताया जाता है कि भगवान राम वन गमन के दौरान यहॉ पर कुछ दिनों के लिए रूके थे और शिवलिंग बनाकर पूजा अर्चना करते थे। इसके अलावा मान्यता यह भी है महाभारत काल में पांडव भाई भी अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में आये थे। एक पुजारी द्वारा गुफा के पास ही मवई नदी के तट पर स्थित चट्टान से रेत को साफ कर विशालकाय पैर का पंजा शिला में दिखाते हुए बताते है कि यह भीम का पंजा है। ऐसे ऐतिहासिक महत्व के स्थल को भी संवारने की जरूरत है तथा पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करने की जरूरत है।   

घाघरा मंदिर का अस्तित्व खतरे में 
कोरिया जिले के भरतपुर जनपद क्षेत्र अंतर्गत एक ऐतिहासिक महत्व का मंदिर ग्राम घाघरा में स्थित है जिसे घाघरा मंदिर के नाम से पहचाना जाता है जो बेहद प्राचीन मंदिर है लेकिन देख रेख के अभाव में मंदिर का अस्तित्व खतरे में पड गया है। जानकारी के अनुसार 15 वी शताब्दी में ग्राम घाघरा स्थित प्राचीन घाघरा मंदिर की स्थापना की गयी थी। जिसमें शिवलिंग स्थापित है। वर्तमान में प्राचीन घाघरा मंदिर जीर्ण शीर्ण हालत में पहुॅच गया है। यदि अब भी मंदिर के अस्तित्व केा बचाने की दिशा में ध्यान नही दिया गया तो जिले का सबसे पुराने मंदिरों में से एक घाघरा मंदिर का अस्तित्व मिट जोयगा। 

कई दर्शनीय व ऐतिहासिक महत्व के स्थल 
कोरिया जिले में  ऐतिासिक महत्व के स्थलों के साथ दर्शनीय स्थलों की कमी नही है। चांग देवी का मंदिर, नीलकंठ धाम, बौद्ध स्थल के साथ कई दर्शनीय स्थल है जिनके बारे में सिर्फ क्षेत्र के लेागों केा ही इसकी जानकारी है जिले के अन्य क्षेत्र के लोगो को जानकारी नही है। वही कोरिया जिले में क्षेत्रफल की दृष्टी से प्रदेश का सबसे बडा राष्टीय उद्यान गुरू घासीदास राष्टीय उद्यान सोनहत जनपद क्षेत्र में स्थित है। जो घने जंगलों से घिरा हुआ है यहॉ दर्जनों प्रकार के  वन जीव जंतु निवास करते है तथा कई बहुमूल्य पेड पौधों के अलावा जडी बुटी पाये जाते है।


Date : 26-Sep-2019

कोरिया में ऐतिहासिक-प्राकृतिक दर्शनीय स्थलों की भरमार

चन्द्रकांत पारगीर

छत्तीसगढ़ संवाददाता
बैकुंठपुर, 26  सितंबर। 
कोरिया जिला प्रकृति की गोद में बसा छग प्रदेश के उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र में स्थित एक छोटा व आदिवासी बाहुल्य जिला है। यहां वनों की सघनाता ज्यादा है इसके साथ ही यहां ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की भरमार होने के साथ ही कई प्राकृतिक दर्शनीय स्थल है। जिसके चलते कोरिया जिले में पर्यटन की अपार संभावना है लेकिन इस दिशा में समुचित प्रयास नहीं किये गये। यदि उचित प्रयास किया जाता है तो कोरिया जिले को प्रदेश के पर्यटन नक्शे में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकेगा। 

जिला गठन होने के पश्चात दो दशक से ज्यादा हो गया। वहीं छग राज्य स्थापना हुए दो दशक होने को है लेकिन कोरिया जिले के प्राकृतिक व दर्शनीय स्थलों की पहचान आज जिले में ही सिमटी है तथा कई ऐतिहासिक महत्व के धरोहर उपेक्षित पड़े हुए हैं। जिनमें खडगवां में कोटेश्वर महादेव, जनकपुर में बिखरे पड़े सतीगेट, सोनहत के बदरा स्थित रॉक पेंटिंग, पटना स्थित देवगढ़धाम, रामगढ स्थित गांगीरानी मंदिर, सोनहत का जोगीमठ सहित कई स्थान शामिल हंै। 

जानकारी के अनुसार कोरिया जिले के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में से एक अमृत धारा जल प्रपात है। इसके अलावा भी कई अन्य प्रमुख दर्शनीय व प्राकृतिक स्थल है जिसे पहचान दिलाने की जरूरत है, प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अमृतधारा जल प्रपात के अलावा जिले के अन्य दर्शनीय व ऐतिहासिक महत्व के दर्शनीय स्थलों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। यही कारण है कि कई महत्वपूर्ण स्थल अपनी पहचान जिले में ही नहीं बना सके। पर्यटन विकास के नाम पर सिर्फ अमृतधारा जल प्रपात स्थल का ही विकास कराया गया। जिसकी पहचान आज जिले के अलावा बाहर भी है। यहां पर हसदो नदी का पानी करीब 100 फीट से ज्यादा उचाई से गिरता है जो मनमोहक नजारा प्रस्तुत करता है। यहां पर सबसे ज्यादा सैलानी पिकनिक मनाने के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा गौर घाट जल प्रपात भी जिले के प्रमुख जल प्रपातों में से एक है जहां का नजारा भी सुन्दर है लेकिन यहां पर प्रशासन द्वारा किसी तरह की सुरक्षात्मक व्यवस्था नहीं बनाई है जिसके चलते यहां पर कई घटनाएं हो चुकी हैं तथा पहुंच मार्ग भी सही नहीं है। फिर भी यहां सैलानियों की भीड़ प्रतिवर्ष जुटती है। यदि इस जल प्रपात स्थल तक पहुंच मार्ग के साथ अन्य आवश्यक सुविधाएं तथा सुरक्षात्मक उपाय किए जाएं तो यह भी एक रमणीय स्थल है। जहां पर पहुंच कर प्रकृति के सुन्दर नजारे के साथ प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है। 

कई जलप्रपातों को पहचान की जरूरत
कोरिया जिले में अमृतधारा जल प्रपात गौर घाट जल प्रपात के अलावा भी कई सुन्दर जल प्रपात स्थित है जिनके बारे में पूरे जिले के लोगों को ही जानकारी नहीं है केवल क्षेत्रीय स्तर तक ही इनकी पहचान बनी हुई है। ऐसे जल प्रपात को पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करने की जरूरत है। 

जानकारी के अनुसार भरतपुर जनपद क्षेत्र में एक प्रमुख जल प्रपात रमदहा जल प्रपात है जो अपनी सुन्दरता के लिए क्षेत्र में प्रसिद्ध है लेकिन यहां पर आवश्यक सुविधाओं का अभाव बना हुआ है साथ ही प्रचार प्रसार के अभाव मेें इस जल प्रपात के बारे में जिले के कई क्षेत्रों के लोगों केा जानकारी ही नहीं है। रमदहा जल प्रपात जिले का एक सुन्दर जल प्रपात है जिसका नजारा काफी मनमोहक है। इसके अलावा सोनहत जनपद पंचायत क्षेत्र में बनिया वाटर फॉल प्रकृति के गोद में बसा हुआ है। घने वनों के बीच में कल कल बहती नदियां उंचाई से गिरते हुए सुन्दर जल प्रपात का नजारा बनाता है। यह भी गुमनामी के दौर से गुजर रहा है। इसके इलावा भी भरतपुर व सोनहत जनपद क्षेत्र में कई गुमनाम जलप्रपात है जिन्हे पहचान दिलाने की जरूरत है।

मुख्यालय के निकट सीता गुफा गुमनाम
कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर के निकट रामायण काल के समय का एक प्राचीन गुफा स्थित है जिसे सीता गुफा के नाम से जाना जाता है स्थानीय लेाग इस स्थल को समुंदई के नाम से जाते है। जानकारी के अनुसार समुंदई जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर से कुछ ही किमी की दूरी पर सोनहत मार्ग पर स्थित शिवघाट की ऊंची पहाड़ी में घने जंगलों के बीच में स्थित है। जिला मुख्यालय के निकट होने के बाद भी ऐतिहासिक महत्व का यह स्थल अपेक्षा के कारण विकसित नहीं हो सका है जिसके चलते यहां क्षेत्र के लोगों के अलावा जिले के दूर दराज के पर्यटक नहीं पहुंचते। यहां तक पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं बन पाया है। 

जानकारी के अनुसार बैकुंठपुर से सोनहत मार्ग पर शिवघाट के उपरी गांव पहाड़पारा से समुंदई क्षेत्र पहुंचा जा सकता है। लेकिन सोनहत जनपद के ग्राम पहाडपारा के बाद सुव्यवस्थित मार्ग नहीं होने के कारण जंगलों के बीच पैदल ही जाना पड़ता है। घने जंगलों के बीच पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक विशाल चट्टान को काटकर गुफा बना गया है जहां भगवान शिव की आराधना की जाती है। विभिन्न खास अवसरों पर गुफा के अंदर जवारा बोने के साथ साथ भजन कीर्तन भी होता है। 

मान्यता है कि भगवान राम सीता अपने वनवास के दौरान समुंदई क्षेत्र में कुछ दिनों तक इसी गुफा में रूके थे। चट्टानों को काटकर बनाई गयी गुफा में एक साथ करीब 15-20 लोगों के बैठने की जगह है। घने वनों के बीच गुफा के निकट की वर्तमान में सुन्दर जल प्रपात भी दिखाई देता है जो करीब  150 फीट से अधिक ऊंचाई से गिरता है। इसके नीचे एक और जल प्रपात है। क्षेत्र के कई लोग यहां पिकनिक मनाने आते हैं तथा विभिन्न त्यौहार के दौरान पूजा अर्चना करने आस पास के दर्जनों गांव के ग्रामीण पैदल पहुंचते हैं। 

हरचौका स्थित पुरातात्विक महत्व का स्थल 
 कोरिया जिले के भरतपुर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत हरचौका में मवई नदी जो कि छग व मप्र की सीमा को विभाजित करती है। नदी के तट पर ही चट्टानों को तरासकर गुफा बनाई गयी है जिसमें प्रत्येक दिशा में शिवलिंग है। बताया जाता है कि भगवान राम वन गमन के दौरान यहॉ पर कुछ दिनों के लिए रूके थे और शिवलिंग बनाकर पूजा अर्चना करते थे। इसके अलावा मान्यता यह भी है महाभारत काल में पांडव भाई भी अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में आये थे। एक पुजारी द्वारा गुफा के पास ही मवई नदी के तट पर स्थित चट्टान से रेत को साफ कर विशालकाय पैर का पंजा शिला में दिखाते हुए बताते है कि यह भीम का पंजा है। ऐसे ऐतिहासिक महत्व के स्थल को भी संवारने की जरूरत है तथा पहचान दिलाने की दिशा में कार्य करने की जरूरत है।   

घाघरा मंदिर का अस्तित्व खतरे में 
कोरिया जिले के भरतपुर जनपद क्षेत्र अंतर्गत एक ऐतिहासिक महत्व का मंदिर ग्राम घाघरा में स्थित है जिसे घाघरा मंदिर के नाम से पहचाना जाता है जो बेहद प्राचीन मंदिर है लेकिन देख रेख के अभाव में मंदिर का अस्तित्व खतरे में पड गया है। जानकारी के अनुसार 15 वी शताब्दी में ग्राम घाघरा स्थित प्राचीन घाघरा मंदिर की स्थापना की गयी थी। जिसमें शिवलिंग स्थापित है। वर्तमान में प्राचीन घाघरा मंदिर जीर्ण शीर्ण हालत में पहुॅच गया है। यदि अब भी मंदिर के अस्तित्व केा बचाने की दिशा में ध्यान नही दिया गया तो जिले का सबसे पुराने मंदिरों में से एक घाघरा मंदिर का अस्तित्व मिट जोयगा। 

कई दर्शनीय व ऐतिहासिक महत्व के स्थल 
कोरिया जिले में  ऐतिासिक महत्व के स्थलों के साथ दर्शनीय स्थलों की कमी नही है। चांग देवी का मंदिर, नीलकंठ धाम, बौद्ध स्थल के साथ कई दर्शनीय स्थल है जिनके बारे में सिर्फ क्षेत्र के लेागों केा ही इसकी जानकारी है जिले के अन्य क्षेत्र के लोगो को जानकारी नही है। वही कोरिया जिले में क्षेत्रफल की दृष्टी से प्रदेश का सबसे बडा राष्टीय उद्यान गुरू घासीदास राष्टीय उद्यान सोनहत जनपद क्षेत्र में स्थित है। जो घने जंगलों से घिरा हुआ है यहॉ दर्जनों प्रकार के  वन जीव जंतु निवास करते है तथा कई बहुमूल्य पेड पौधों के अलावा जडी बुटी पाये जाते है।


Date : 26-Sep-2019

भोपाल हनी ट्रैप में छत्तीसगढ़ में फंड 
देने वाले बड़े-बड़े लोग शामिल मिले
रायपुर, 26 सितंबर (छत्तीसगढ़)।
मध्यप्रदेश में भूकंप ला चुके हनी ट्रैप के तार छत्तीसगढ़ से पुख्ता जुड़े हुए मिल रहे हैं। अफसरों, मंत्रियों, और कारोबारियों को रूपजाल में फंसाकर, उनके सेक्स वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने का इतना बड़ा कारोबार देश में शायद पहली बार ही पकड़ाया है, और वह मध्यप्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की सत्ता को भी जकड़ा हुआ मिला है। 

मध्यप्रदेश पुलिस इस मामले की जांच बहुत ही गोपनीय तरीके से कर रही है क्योंकि इसमें भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के कई नेताओं के नाम भी जुड़े हुए हैं, और बड़े-बड़े दिग्गज ओहदों पर बैठे हुए आईएएस-आईपीएस भी हनी ट्रैप में फंसे हुए मिले हैं। यह मामला पकड़ाई गई युवतियों और महिलाओं के बयानों से परे, वीडियो रिकॉर्डिंग, और टेलीफोन कॉल डिटेल्स जैसे पुख्ता सुबूतों पर टिका हुआ बड़ा मजबूत मामला है जिसमें सरकार से सैकड़ों करोड़ के काम लिए गए, और शायद दर्जनों करोड़ की नगदी वसूली भी की गई। 

जांच करने वाले अफसरों से मिली जानकारी के अनुसार इस हनी ट्रैप में काम कर रही युवतियों ने तरह-तरह के एनजीओ के नाम से मंत्रियों और अफसरों से बड़े-बड़े प्रोजेक्ट मंजूर करवाए। एक जानकारी यह भी मिली है कि इसके एवज में देह लेने के साथ-साथ कुछ अफसरों ने नगद हिस्सा भी लिया, और उस लेन-देन की जानकारी भी जांच में मिल चुकी है। 

छत्तीसगढ़ के बारे में यह पता लगा है कि 2018 में यहां पर कंपनियों के सीएसआर बजट और सरकार के एनजीओ फंड से बड़ी-बड़ी रकमें दिलवाने की साजिश में एक पति-पत्नी भी छत्तीसगढ़ में पकड़ाए थे। यह जोड़ा भी इसी तरह से सत्ता पर बैठे मंत्रियों और बड़े अफसरों से प्रोजेक्ट मंजूर करवाकर देता था, और ऐसे ही एक काम के दौरान जब नगद कमीशन देने की बात आई, तो इस जोड़े ने अपने छापे हुए नकली नोट एक बड़े अफसर को दे दिए थे। नकली नोटों की शक्ल में बहुत बड़ी रकम दी गई थी, और उससे दस गुना अधिक सरकारी रकम मंजूर की गई थी। जब यह रकम नकली नोटों की निकली, तो अफसरों ने मिलकर इस जोड़े को गिरफ्तार करवा दिया था, और वह आज तक जेल में है। 

इसी तरह भोपाल से आई हुई युवतियां छत्तीसगढ़ में मंत्रियों और अफसरों से मिलती थीं, और उनसे तरह-तरह के काम अलग-अलग एनजीओ के नाम से मंजूर करवाती थीं। इसके एवज में इन लोगों की तरह-तरह से सेक्स-सेवा की जाती थी। इसके लिए छत्तीसगढ़ के बड़े लोग दूसरे प्रदेशों में जाकर भी इनके साथ वक्त गुजारते थे। 

इस अखबार 'छत्तीसगढ़' के हाथ छत्तीसगढ़ सरकार के एक बड़े व्यक्ति द्वारा पिछले बरस मंजूर किए गए एक बड़े अनुदान की एक रिकॉर्डिंग भी लगी है, लेकिन उसकी पुष्टि नहीं होने से उसका उपयोग नहीं किया जा रहा है। 

इसी बारे में तहकीकात करते हुए यह भी पता लगा है कि कई महीने पहले छत्तीसगढ़ में अपने आपको मॉडल कहने वाली एक युवती आंचल यादव को एक अफसर को सेक्स-वीडियो के बदले ब्लैकमेल करने का मामला सामने आया था, जिसमें उसकी गिरफ्तारी भी हुई थी, और जेल से जमानत पर छूटने के बाद उसके भाई ने ही परिवार पर अपमान का दाग करार देते हुए उसकी हत्या कर दी थी। उसके बारे में भी यही पता लगा है कि छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग के कुछ उच्चाधिकारी उसके जाल में फंसकर उसे बड़े-बड़े काम मंजूर करते थे, और कम से कम एक बड़े कारोबारी घराने का एक बड़ा अफसर उसका सरकार में उपयोग करता था। 

'छत्तीसगढ़' अखबार के हाथ इस तरह मंजूर किए गए एनजीओ-प्रोजेक्ट की जानकारी भी लगी है जिन्हें राज्य शासन के एक बड़े अफसर ने मंजूर किया था। जांच कर रही मध्यप्रदेश पुलिस ने इन तमाम लड़कियों से मिले दर्जनों सिमकार्ड के कॉल डिटेल्स तो निकाले ही हैं, इनके मोबाइल हैंडसेट पर अलग-अलग समय में इस्तेमाल किए गए ऐसे सिमकार्ड के कॉल डिटेल्स भी निकाले हैं जो आज इनके पास नहीं है, जिनका इस्तेमाल बंद हो चुका है। एक जांच अफसर के मुताबिक टेलीफोन के पुख्ता सुबूतों के आधार पर छत्तीसगढ़ के एक दर्जन से अधिक बड़े लोगों से इनके संपर्क के सुबूत मिल चुके हैं, और इन युवतियों के चलाए जा रहे एनजीओ को किस-किस मंत्री या अफसर ने प्रोजेक्ट मंजूर किए थे इसकी जांच के लिए भी टेलीफोन नंबर देखे जा रहे हैं। इनके पास से जब्त सेक्स-वीडियो संख्या में इतने अधिक हैं कि पुलिस उसके चेहरों की शिनाख्त के लिए छत्तीसगढ़ के लोगों से परिचित मध्यप्रदेश पुलिस कर्मचारियों को भी जांच में शामिल कर चुकी है। 

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश चूंकि एक ही राज्य थे, इसलिए दोनों राज्यों में नेता, अफसर, दलाल, कारोबारी, और कुछ पत्रकार भी बहुत से लोगों को जानते थे, और इन महिलाओं के साथ जाकर उनका काम करवाते थे। मध्यप्रदेश में ऐसे कई पत्रकारों का नाम जानने का दावा भाजपा के एक बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय ने दिया है, लेकिन इस मामले को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बहुत से नेता इसलिए चुप हैं कि पता नहीं उनके किसी करीबी का वीडियो सामने न आ जाए। 

भोपाल से एक जानकार सूत्र ने यह बताया है कि इन युवतियों के पास से जब्त तकरीबन सारे ही सेक्स-वीडियो असली पाए गए हैं, और इनकी ब्लैकमेलिंग गढ़े हुए वीडियो पर नहीं थी, असली रिकॉर्डिंग पर थी। 

 


Date : 18-Sep-2019

3 बरस से पहाड़ी कोरवा सहित दर्जनों का पीएम आवास अधूरा

क्रांति कुमार रावत

उदयपुर, 18 सितंबर (छत्तीसगढ़)। सरगुजा जिले के विकासखंड उदयपुर अंतर्गत दूरस्थ वनांचल क्षेत्र में स्थित ग्राम पंचायत केसमा के आश्रित ग्राम बनकेसमा लालपुर और डेवापारा में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) की स्थिति बद से बदतर है। ग्रामीणों का आरोप है कि 3 साल पहले आवास बनाना शुरू कर आधा-अधूरा छोड़ दिया। कहीं निर्माण सामग्री गिरा दी गई है तो कहीं कॉलम खड़े कर दिए हैं। कहीं छोटी दीवार उठा दी गई है तो कहीं प्लिंथ बना कर छोड़ दिया गया है, तो कहीं निर्माण स्थल में कॉलम खड़े करने के लिए गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए हैं। अब कोई एक कमरे में सांप बिच्छू और जंगली जानवरों के डर के बीच एक कमरे में, तो कोई आधे अधूरे आवास में बिना दरवाजे-खिड़कियों के बांस का दरवाजा लगा कर रहने को मजबूर है।

विशेष संरक्षित पहाड़ी कोरवा जन जाति की बिहानी बाई ने बताया कि पीएम आवास का निर्माण 3 साल पहले शुरू हुआ था और अभी तक निर्माण कार्य अधूरा है। पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम द्वारा इसका निर्माण कार्य कराया जा रहा था और आधा अधूरा निर्माण कराकर छोड़ दिया गया। अब बिहानी बाई अपने पति सालिक राम और बच्चों के साथ एक कमरे में सांप-बिच्छू और जंगली जानवरों के डर के बीच एक ही कमरे में किसी तरह गुजर बसर करने को मजबूर हैं क्योंकि आवास के बनने वाले दो कमरों में से एक का तो निर्माण छत डाल कर कर दिया गया है, परंतु सामने वाले कमरे का छत अभी तक भी खुला हुआ है।

आवास हितग्राही बिहानी बाई के पति सालिक राम ने बताया कि पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम के द्वारा निर्माण के लिए आवंटित राशि आहरण करा कर अपने पास रख लिया गया अब ना तो मकान निर्माण का काम पूरा करा रहा है और ना ही और कोई जवाब दे रहा है। पूछने पर केवल यही बताता है कि निर्माण का काम करवा दूंगा।

इसी तरह जमती बाई फूलों बाई गुड्डी बाई और सुखनी बाई चारों हितग्राहियों के आवासों का निर्माण एक साथ एक ही जगह पर तीन साल पहले शुरू कराया गया था। आवास का डिजाइन कुछ इस तरह से है जैसे कोई बाउंड्री बनाया जा रहा है। बीच-बीच में पतले-पतले कॉलम खड़े कर दिए हैं। अब ना तो छत है ना ही दीवार है न दरवाजे और न खिड़कियां हैं। इस बाउंड्री के अंदर घास फूस का छप्पर लगाकर हितग्राही अपना मवेशियों को बांध कर रखते हैं।

जमती बाई के पति सुनील ने बताया कि ग्राम पंचायत के तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम ने यह कहकर कि तुम लोग पहाड़ी कोरवा हो और आवास का निर्माण नहीं कर पाओगे, इसलिए निर्माण की राशि मुझे दे दो, मैं बहुत जल्दी ही निर्माण कार्य पूरा करा दूंगा। चार आवासों के एक साथ निर्माण के विषय में पूछने पर सुनील ने बताया, हमारा घर पहाड़ी के ठीक नीचे जंगल के किनारे हैं, वहां हाथियों का हमेशा आना-जाना लगा रहता है। इसलिए हमारे खानदान के 4 परिवार के सदस्यों के नाम से इस स्थान पर एक साथ ही आवास का निर्माण किया जा रहा था। इन आवासों का आकार भी बहुत छोटा है और शुरू कराते ही कुछ दिनों के बाद पंचायत के सचिव ने काम बंद करा दिया। अब जो भी यहां की हालत है, आपके सामने है।

बनकेसमा की ही निवासी पहाड़ी कोरवा महिला सांझी बाई अपने लकवा ग्रस्त पति सोमारू के साथ आधे अधूरे आवास में बिना दरवाजे खिड़कियों के बाँस की ठठरी का दरवाजा लगा कर रहने को मजबूर हैं। पूछने पर उसने भी बताया कि पंचायत के सचिव कामेश्वर राम ने ही निर्माण का जिम्मा लिया था परंतु आधा-अधूरा ही छोड़ दिया। उसके पति की हालत भी ऐसी नहीं है कि वह आधे-अधूरे काम को पूरा कर सके। एक पहाड़ी कोरवा वृद्ध महिला अपने पति के इलाज का जिम्मा देखे घर बनवाये या फिर पेट की चिंता करे। यही कहानी मनीराम, लझरु, सोहन और सनी राम की भी है।

ग्राम पंचायत केसमा के ही आश्रित ग्राम लालपुर में भी प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना की स्थिति बदतर है। लालपुर निवासी ग्रामीण आदिवासी जीतू राम ने मक्का लगे हुए बाड़ी की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इसी स्थान पर आवास का निर्माण होना था, परंतु आज तक भी खाते में रकम नहीं आने की वजह से आवास का निर्माण प्रारंभ नहीं किया जा सका है उसके नाम की राशि लगभग 80,000 रूपए किसी अन्य के खाते में जाना भी बताया जा रहा है।

 लालपुर निवासी एक अन्य ग्रामीण प्रेमसाय की कहानी किसी अजूबे से कम नहीं है। आवास निर्माण के नाम पर चिन्हित स्थान पर निर्माण में लगने वाले कॉलम के लिए छड़ में रिंग बांध कर 1 साल पहले छोड़ दिया गया है। इसके बाद ना तो कोई निर्माण सामग्री आई और ना ही काम शुरू हुआ। छड़ में जंग लगने की वजह से वह भी खराब होना शुरू हो गया है। इनके द्वारा यह भी बताया गया कि 2 साल पहले ग्राम पंचायत के सचिव द्वारा आवास निर्माण कराए जाने के नाम पर रकम पूरा निकलवा कर ले जाया गया है परंतु निर्माण आज तक शुरू नहीं कराया गया है। इन्होंने जांच कराकर संबंधित सचिव पर कार्रवाई की बात भी कही है।

लालपुर निवासी जवाहर सूरजलिया राजकुमार घूमी बाई और महकूल सिंह के भी आवासों की यही कहानी है। कहीं निर्माण सामग्री गिरा दी गई है तो कहीं कॉलम खड़े कर दिए हैं। कहीं छोटी दीवार उठा दी गई है तो कहीं प्लिंथ बना कर छोड़ दिया गया है।

ग्राम पंचायत केसमा के अंतर्गत ही ग्राम डेवापारा में सबलसाय आत्मज कष्टू और सुखसाय जो कि दोनों भाई है, उनके आवास निर्माण स्थल में कॉलम खड़े करने के लिए गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए हैं और किसी तरह की भी ना तो कोई दीवार और ना ही कोई कॉलम नजर आता है। पास में ही स्थित सीसी रोड में कुछ र्इंट और कुछ गिट्टी और थोड़ी बहुत रेत पड़ी हुई दिखाई देती है। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना से संबंधित मोबाइल ऐप में देखने पर इन दोनों आवासों के लिए आबंटित पूरी राशि का आहरण हो चुका है और निर्माण कार्य पूर्ण दिखाई देता है।

इस संबंध में तत्कालीन सचिव कामेश्वर राम से बात करने पर उनके द्वारा बताया गया कि कुछ हितग्राहियों के कहने पर मेरे द्वारा उन लोगों का निर्माण कार्य कराया जा रहा है। बारिश और स्थानांतरण की दिक्कत की वजह से कार्य अधूरा है। बारिश खत्म होते ही काम पूरा कराया जाएगा। कुछ निर्माण कार्य नेट में पेंडिंग दिखा रहा था, इसलिए उन लोगों का निर्माण कार्य पूर्ण दिखाया गया है।

इस संबंध में मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत उदयपुर पारस पैकरा से बात करने पर उनके द्वारा बताया गया कि मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है, जांच कराकर बता पाऊंगा।

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 ग्रामीण विकास मंत्रालय से जारी आंकड़े जो कि मोबाइल ऐप से प्राप्त हुए उनकी बात करें तो ग्राम पंचायत केसमा में कुल योग्य लाभार्थी 187 है। स्वीकृत आवास 127 है। पहली किश्त का भुगतान जिनको किया गया ऐसे हितग्राही 98 है। दूसरी किश्त का भुगतान किया गया सहित कई 96, तीसरी किश्त जिसका भुगतान किया गया ऐसे हितग्राही 87 हैं और जिनका आवास पूर्ण हो चुका है ऐसे हितग्राही 72 हैं। इन आधे अधूरे आवासों की स्थिति मोबाइल ऐप से देखने पर ज्यादातर आवास पूर्ण दिखाए जा रहे हैं और आबंटित राशि का भी आहरण पूर्ण दिखाया जा रहा है।


Date : 15-Sep-2019

पत्थलगांव-ठाकुरपोड़ी में आए 11 हाथी, कॉलर आईडी से मिल रही जानकारी

जितेन्द्र गुप्ता

छत्तीसगढ़ संवाददाता
पत्थलगांव, 15 सितंबर। 
वन मण्डल कापु से शनिवार सुबह 4 बजे हाथियों का दल पत्थलगांव से 7 किलोमीटर की दूरी में स्थित ग्राम ठाकुरपोड़ी के कक्ष क्रमांक पी 991 पहुंचा जिसकी सूचना पत्थलगांव वनमंडल के अधिकारियों को भी मिली एवं आसपास के गाँव वालों को एहतियात के तौर पर सतर्क करते हुए फारेस्ट की टीम को हाथियों पर नजर रखने कहा। पत्थलगांव के एसडीओ के साथ सभी स्टॉफ लगे हुए हैं। वहीं 11 हाथियों के दल में एक गौतमी हाथी भी है जो फीमेल है। उसके गले में कॉलर आईडी लगी हुई है। जिससे वह विभाग के अधिकारियों को सेटेलाईट के द्वारा हर छ: घंटे में सूचना प्राप्त होती रहती है। हाथियों के दल में निगरानी करने में वन विभाग को काफी आसानी हो जाती है। 

 मुख्य बातें जैसे ही गौतमी हाथी दल के पत्थलगांव में आने की खबर लगी तो पत्थलगांव एसडीओ आर.आर. पैकरा ने अंकित कुमार एवं उनके दो सहयोगियों के साथ हमारे संवाददाता जितेंद्र गुप्ता को साथ लेकर ग्राम ठाकुरपोड़ी  में आये गौतमी हाथी के दल को देखने निकल गए। अंकित कुमार का परिचय बता दें ये केंद्र सरकार से डेपुटेशन में छतीसगढ़ तीन साल के लिए आये हैं। ये हाथी के विशेषज्ञ है। इनका काम है हाथियों के आने-जाने के रास्तों से लेकर उनके फोटो लेकर डाटा कलेक्ट करना जिससे उन्हें हाथियों के बारे में रिसर्च किया जा सके। अंकित कुमार एवं इनकी पूरी टीम ने ही वर्ष 2018 जून में सरगुजा के मैनपाट में गौतमी हाथी को बेहोश कर उसके गले में कॉलर आईडी लगाई थी। कॉलर आईडी लगाने वाली टीम  के मुख्य हिस्सा रहे हैं। 

रास्ते में हमारे संवाददाता को उन्होंने बताया कि अभी पूरे छतीसगढ़ में हाथियों के 6 दल में रेडियो कॉलर आईडी लगाई गई थी जिसमें से 3 कॉलर आईडी खराब हो गई है। वर्तमान में तीन दल जिसमें एक गौतमी दल, एक गणेश दल एवं एक प्यारे दल में रेडियो कॉलर आईडी लगी हुई है जिससे इन तीनों दलों के लोकेशन की जानकारी हमें हर 6 घंटे में प्राप्त होती रहती है। कुछ 20 मिनट के सफर के बाद हम ठाकुरपोड़ी पहुँच गए और सड़क से लगभग एक से दो किलोमीटर अंदर खेत से लगी हुई काफी पेड़ों के बीच हाथियों के दल अपने खाने-पीने के लिए जद्दोजहद कर रही थी, वहीं कुछ दूर में ही गाँव के लगभग 500 से 700 आदमी इन हाथियों को देखने पहुंचे हुए थे। उन सभी को हाथियों से काफी दूर रहने कहा गया था।

उस समय 5 बजकर 35 मिनट हो रहे थे एक से डेढ़ घंटे में अँधेरा होने को था और अँधेरा होने पर उन  हाथियों को ढूंढना इतना आसान नहीं इसलिए जल्दी-जल्दी हाथी के विशेषज्ञअंकित एवं उनके दो सहयोगियों के साथ हमारे संवाददाता जितेंद्र गुप्ता साथ गये। हाथी से करीब 70 से 80 मीटर की दूरी  में उन्होंने हमारे संवाददाता को रोककर इससे ज्यादा नजदीक जाने से मना कर दिया एवं उनके ंसाथ आये हाथियों के जानकार सहयोगी में से एक व्यक्ति को मेरे साथ रहने कहकर अंकित एवं एक महावत हाथी के काफी नजदीक लगभग 50 मीटर तक पहुंचकर पेड़ की ओट से अपने लाये कैमरे से हाथियों के फोटो लिए। लगभग 30 से 40 फोटो अलग-अलग एंगल से लेकर जिसमें गौतमी हाथी भी थी उनके कई फ़ोटो लिए खासकर रेडियो कॉलर आईडी लगी गौतमी हाथी के काफी फोटो लिए लगभग 40 से 60 मिनट के बाद अँधेरा हो ही गया और फिर हम सभी को वहां से वापस लौटना पड़ा। 

 हाथियों के विशेषज्ञ अंकित कुमार ने बताया वो इतनी दूर से आए ही इसीलिए थे की गौतमी हाथी एवं उस दल का फोटो ले सकंू जिससे गौतमी हाथी लगे रेडियो कॉलर आईडी के सही लगे होने एवं उन सभी हाथियों के बारे में कई जानकारी को एकत्रित कर सकंू। गौतमी हाथी के लगे कॉलर आईडी के बारे में बताया कि उसमें हमेशा नजर रखी जाती है कि उसके लगे होने से हाथी को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है। उसमें बैटरी लगी हुई है। उस बैटरी की उम्र 6 साल है। हमें 6 साल तक जानकारी मिलती रहेगी। उन्होंने हाथियों के बारे में कई अहम जानकारी दिया जिसमें उन्होंने कहा कि हमारे छतीसगढ़ में छोटे छोटे जंगल होने के कारण इन हाथियों को यहां वहां भटकना पड़ता है। जंगलों का कम होना जंगलों के आसपास घर बनाकर रहते लोगों बिजली की बड़ी लाईनों के जंगलों के पास से गुजरना एवं जंगलों में सड़क बनाने जैसी बातों के चलते हाथियों के जंगल बंटते जा रहे हंै। वे जंगल का एरिया छोटा होने के कारण हाथियों को काफी मुश्किलें हो रही है।  उन्हें खाने पीने के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन जंगलों में उपलब्ध नहीं हो रहे है एवं उन जंगलों में भी लोगों का आना-जाना बना रहता है जिससे हाथियों को इधर-उधर भागना पड़ता है। हाथी हिंसक नहीं होते हैं। उन्हें परेशान करने की वजह से वे आक्रामक हो जाते हैं। इसलिए इन हाथियों से दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।

हाथियों के नजदीक कभी भी नहीं जाना चाहिए। ज्यादा नजदीक जाने पर ही ये हाथी लोगों के ऊपर हमला कर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि हाथी से काफी दूरी बना कर रहे। इस गौतमी दल के बारे में अपने लैपटॉप से जानकारी निकालकर उन्होंने बताया कि पिछले साल भी ये दल यहीं से गुजरा है एवं हो सकता है कि बगल के कुनकुरी जंगल तक जाए क्योंकि पिछले वर्ष लगभग एक हफ्ते तक ये दल कुनकुरी के जंगलों में बिताया था। हाथी जहां-जहां जाते हंै। वो जगह इनके घूमने की जगह बन जाती है। जहां-जहां हाथी कभी भी जाते हैं उन जगहों में हाथी वापस आ सकते है। संभावना ये भी रहती है कि हाथी के दल की स्थिति के अनुसार वे अपने रहने एवं उस जगह से दूर चलने की सोचते हं।  जिसमें महिला हाथियों के प्रेग्नेंट होने एवं बच्चे देने के कारण कुछ दिन वो दल रूक भी जाते हैं। अभी इस दल में तीन हाथियों में दांत है। तीन छोटे-छोटे बच्चे भी साथ है। कुल मिलाकर 11 हाथी विचरण कर रहे हैं।


Date : 11-Sep-2019

मदनवाड़ा नक्सल हमले की न्यायिक जांच के आदेश से प्रमोशन की कानूनी जंग लड़ते सिपाही को इंसाफ की आस 

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 11 सितंबर(छत्तीसगढ़)।
मदनवाड़ा-कोरकोट्टी नक्सल हमले की नए सिरे से न्यायिक जांच के राज्य सरकार के आदेश ने नक्सल घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे एक सिपाही की आऊट-ऑफ टर्न (ओटी) प्रमोशन को लेकर चल रही कानूनी जंग को मानो पंख लगा दिया है। 

12 जुलाई 2009 को हुए इस वारदात में गोलियों की बौछार के बीच चालक प्रधान आरक्षक ओंकार देशमुख (बैच 494)ने तत्कालीन एसपी विनोद चौबे के वाहन को धड़धड़ाते हुए निकालते नक्सलियों के पहले हमले को अपनी सूझबूझ से असफल कर दिया। जबकि वाहन में एसपी के सुरक्षाकर्मी संजय यादव को लगभग 50 से अधिक गोलियां लगी। वहीं एसपी के फालोवाहन के ड्रायवर बी. सीतराम राजू कमर में गोली लगने से घायल हुए थे। बाद में पूरी लड़ाई के खात्मे तक एसपी चौबे समेत 29 जवान शहीद हो गए। 

बताया जाता है कि बहादुरी के साथ नक्सलियों से भिडऩे के एवज में राज्य सरकार ने जवानों को ओटी के तहत प्रमोशन देने का ऐलान किया था। शुरूआत में मौखिक रूप से चालक देशमुख को सूची में नाम होने की जानकारी दी गई। लड़ाई में शामिल होने के लिए तत्कालीन दुर्ग रेंज आईजी मुकेश गुप्ता और रक्षित निरीक्षक गुरजीत सिंह को जहां वीरता पदक से नवाजा गया, वहीं 18 जवानों को ओटी दिए जाने का ऐलान किया, लेकिन चालक देशमुख का नाम गायब हो गया। 

 वारदात स्थल पर जाने से पहले विभागीय रोजनामचे में देशमुख की रवानगी का उल्लेख है। सूची में नाम नहीं होने के बाद प्रधान आरक्षक सन्न रह गया। बताया जाता है कि ओटी दिए जाने से पहले हुए विभागीय कथन में पूरी लड़ाई को लेकर एक अफसर की गैरमौजूदगी पर सही जानकारी देना ओंकार देशमुख को भारी पड़ गया। सूची में नाम नहीं होने के बाद यह सुरक्षाकर्मी अफसरों की चौखट पर पहुंच कर वास्तविक स्थिति को बयां करते थक गया। आखिरकार 2015 में हाईकोर्ट में प्रमोशन के लिए ओंकार देशमुख ने अपील की। 

बताया जाता है कि एक शीर्ष अफसर की आंखों में खटकने के कारण ओंकार को उसके हक से वंचित कर दिया गया। जबकि लड़ाई के दौरान बख्तरबंद वाहन में सवार सीआरपीएफ के एक चालक को सरकार ने ओटी दिए जाने की सिफारिश की। ओंकार देशमुख ने अपने साथ हुए कथित हेरफेर को लेकर हाईकोर्ट में पुख्ता दस्तावेज पेश किए है। 

पूर्व एसपी प्रवीर दास ने भी देशमुख के नाम का उल्लेख नहीं होने पर हैरानी जताई थी। वहीं पूर्व एसपी बीएन मीणा ने दोबारा पत्र लिखकर राज्य सरकार से ओटी देने की सिफारिश की थी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लड़ाई के दौरान कंट्रोल रूम के जरिए परिजनों को देशमुख के शहीद होने की जानकारी भी दे दी थी। 

पूरी लड़ाई में देशमुख कोरकोट्टी गांव में हुए नक्सली हमले के गवाह है। बताया जाता है कि एक आला अधिकारी ने लड़ाई में अपनी भूमिका को दमदारी से दिखाने के लिए कई तरह का बदलाव कर दिया। नतीजतन देशमुख इसी कुच्रक में फंसकर ओटी से वंचित हो गए। उधर लड़ाई में बतौर साहसी होने देशमुख को राजधानी रायपुर में एक कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सम्मानित किया। लेकिन सरकार में बैठे एक अफसर के इशारे पर इस सुरक्षाकर्मी को ओटी देने से दूर कर दिया गया।

बताया जाता है कि प्रधान आरक्षक के अपील के जवाब में सरकार ने दुर्ग रेंज के आईजी रहे मुकेश गुप्ता के अभिमत के आधार पर ओटी नहीं देने की हाईकोर्ट में जानकारी दी है। प्रधान आरक्षक की ओर से नक्सल जंग में जाने से पहले के कई प्रामणिक दस्तावेज जमा किए गए है। महकमे के कई अफसरों ने प्रधानआरक्षक के साथ हुए बर्ताव पर अफसोस भी जाहिर किया। अब जबकि सरकार ने इस वारदात की न्यायिक जांच की घोषणा की है तो प्रधान आरक्षक हाईकोर्ट से न्याय मिलने की आस में है।

 


Date : 10-Sep-2019

नान जनहित याचिकाओं की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट ने बनाई नई बेंच, सुनवाई तय 

रायपुर/बिलासपुर, 10 सितंबर (छत्तीसगढ़ )। बहुचर्चित नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला मामले की सुनवाई के लिए हाईकोर्ट में नई बैंच बनाई गई है। कोर्ट आधा दर्जन जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। बताया गया कि याचिकाओं में पांच घोटाले की जांच की मांग को लेकर दायर की गई थी। जबकि एक याचिका नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की है, जिसमें एसआईटी जांच रोकने की मांग की गई है। सुनवाई के लिए गुरूवार और शुक्रवार का दिन नियत किया गया है। 

जस्टिस पी सैमकोशी और जस्टिस आरपी शर्मा की पीठ नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला प्रकरण की सुनवाई करेगी। एक बार में एक याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई होगी। 12 तारीख को सबसे पहले हमर संगवारी संस्था की याचिका पर सुनवाई होगी। बाकी अन्य याचिका  सुदीप श्रीवास्तव, राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र पाण्डेय, मिड डे मिरर व अनिल टुटेजा और नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की है। 

याचिकाकर्ताओं में से श्री कौशिक को छोडक़र बाकी ने ईओडब्ल्यू की पिछली सरकार के कार्यकाल में जांच पर सवाल खड़े किए थे और इस घोटाले की सीबीआई अथवा एसआईटी जांच की मांग की गई थी। सरकार बदलने के बाद घोटाले की जांच के लिए एसआईटी बनाई गई है। मामले की जांच चल रही है। प्रकरण में कई नए खुलासे भी हुए हैं। इससे परे नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने नान घोटाले की जांच के लिए एसआईटी के गठन पर सवाल उठाए हैं और उन्होंने इसके गठन को ही चुनौती दी है। 

मिड डे मिरर संस्था ने फर्जी राशन कार्ड के जरिए घोटाले का आरोप लगाया था। इस मामले में भी सुनवाई होगी। बताया गया कि कोर्ट ने पहले डे-टू-डे 26 अगस्त से 2 सितंबर तक सीजे के डिवीजन बैंच में इस मामले की सुनवाई निर्धारित की थी।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कहा था कि मामले से संबंधित याचिकाकर्ता जो भी दस्तावेज सबमिट करना चाहे 14 अगस्त तक कर दें। मगर, प्रकरण से जुड़े दस्तावेज ट्रांसलेट करके कोर्ट को उपलब्ध नहीं कराया जा सका। इसको लेकर याचिकाकर्ताओं ने माफी मांगी। इसके बाद नई बैंच को सुनवाई का जिम्मा सौंपा गया है। 

आरोप है कि छत्तीसगढ़ में राइस मिलरों से लाखों क्विंटल घटिया चावल लिया गया और इसके बदले करोड़ों रुपये की रिश्वतखोरी की गई। इसी तरह नागरिक आपूर्ति निगम के ट्रांसपोर्टेशन में भी भारी घोटाला किया गया। इस मामले में 27 लोगों के खिलाफ मामला दर्र्ज किया गया था। जिनमें से 16 के खिलाफ 15 जून 2015 को अभियोग पत्र पेश किया गया था। फिलहाल सभी आरोपी जमानत पर हैं। 

 

 


Date : 09-Sep-2019

निर्देश के बाद भी बीमा कंपनी से भुगतान नहीं 

बैकुंठपुर, 9 सितंबर (छत्तीसगढ़)। ‘छत्तीसगढ़’ की खबर के असर के बाद कोरिया जिले की खरीफ फसल वर्ष 2014 में मौसम आधारित फसल बीमा योजना में हुए घोटाले में राज्य सरकार ने बीमा कंपनी को दोषी मानते हुए अंतर की राशि 12 प्रतिशत ब्याज के साथ एक माह की समय सीमा पर भुगतान करने के लिए निर्देशित किया था, परन्तु आज तक बीमा कंपनी ने राशि जमा नहीं की। दूसरी ओर राज्य शासन ने बीमा कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, परन्तु उप संचालक कृषि ने पत्र को दबा कर रख किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की। सूचना के अधिकार से मामले की जानकारी सामने आई।

इस संबंध में आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता का कहना है कि जिला कृषि विभाग के अधिकारी जानबूझ कर बीमा कंपनी को बचाने में जुटे हैं। यही कारण है कि 22 मई 2019 को जारी इस पत्र को उप संचालक कृषि ने ना सिर्फ दबा कर रखा, वरन किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की। सरकार ने राजनांदगांव और कोरिया के किसानों को बीमा कंपनी को किसानों की राशि 12 प्रतिशत के ब्याज के साथ देने का आदेश दिया है, उस आदेश को भी कंपनी ने नहीं माना। 

जानकारी के अनुसार राज्य के कृषि विकास एवं कल्याण विभाग ने 23 मई 2019 को जारी अपने आदेश में कोरिया और राजनांदगांव में मौसम आधारित फसल बीमा योजना खरीफ वर्ष 2014 में बीमा कंपनी द्वारा किसानों के साथ आंकड़ों में जालसाजी एवं धोखाधड़ी को सही माना था। राज्य सरकार ने बीमा कंपनी ने उल्लेखित प्रावधानों का उलंघ्घन करते हुए प्रमाणित जानकारी निर्धारित समयातंराल में संचालनालय कृषि को नहंीं दी थी। ऐसे मेें मौसमी राज्य सरकार ने आंकड़ों के आधार पर अंतर दावा राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर के साथ कृषकों को एक माह की समय सीमा में भुगतान करने को कहा था परन्तु बीमा कंपनी ने समयावधि निकल जाने के बाद भी किसानों की राशि नहीं लौटाई। जिसके बाद राज्य सरकार ने उपसंचालक कृषि कोरिया को बीमा कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा कृषि विकास कल्याण विभाग को अवगत कराने निर्देशित किया था। दो माह बीत जाने के बाद भी उप संचालक कृषि ने किसी भी तरह की कार्रवाई में दिलचस्पी नहीं दिखाई। आरटीआई एक्टिविस्ट रमाशंकर गुप्ता ने आरटीआई के तहत जानकारी निकाली तो इस बात का खुलासा हुआ है। 

क्या था मामला
कोरिया जिले के भरतपुर जनपद पंचायत क्षेत्र के आदिम जाति सेवा सहकारी समिति माड़ीसरई के 25 गांव के 546  कृषकों को कुल रकबा 76 2.15 हेक्टे. के लिए बीमा कंपनी पर धोखाधड़ी कर कम मुआवजा बांटने की शिकायत सामने आई थी। तत्कालीन कलेक्टर नरेन्द्र दुग्गा ने जांच के निर्देश दिए और जांच के बाद कंपनी दोषी पाई गई। मामले में कृषि उपसंचालक को कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने को कहा गया। जिसके बाद पुलिस ने दस्तावेज मांगे। कृषि विभाग के कार्यालय से दो बार दस्तावेज चोरी हो गए। फिर रायपुर से दस्तावेज पहुंचे और पुलिस को सौंप दिए गए। बावजूद इसके एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसी बीच दिसंबर में बीमा कम्पनी के प्रतिनिधि तत्कालीन कलेक्टर से मिले और मामला पलटने लगा। 

इधर, आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता एफआईआर का दबाव बनाए हुए थे। शिकायतकर्ता व अन्य के द्वारा उच्च न्यायालय में फसल बीमा के एक अन्य मामले में दायर याचिका खारिज हो गई।जिसे कोरिया जिले में हुए घोटाले से जोडक़र कृषि उप संचालक ने बीमा कंपनी पर एफआईआर को औचित्यहीन बताते हुए कलेक्टर जनदर्शन में दिए गए शिकायतकर्ता के समस्त शिकायत आवेदनों को निरस्त करने को कहा और तत्कालीन कलेक्टर ने तत्काल मामले को विलोपित भी कर दिया। 

इसकी जानकारी आरटीआई एक्टीविस्ट रमाशंकर गुप्ता को लगी। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी। दबाव बनाता देख कृषि उप संचालक ने 28  फरवरी 2019 को दोषी बीमा कंपनी बजाज एलायंस इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को पत्र लिख कर कहा कि किसानों को कम क्षतिपूर्ति देने की शिकायत रमाशंकर गुप्ता द्वारा करते हुए प्राथमिकी दर्ज करने का दबाव डाला जा रहा है तथा प्राथमिकी शिकायतकर्ता द्वारा राजनांदगांव में दर्ज की गई। जिस संबंध में पुलिस अधीक्षक राजनांदगांव के निर्णय, वक्तव्य को संलग्न कर इस कार्यालय को प्रेषित करें। जिससे कि कोरिया में एफआईआर को रद्द किया जा सके। वहीं प्रशासन अब भी हर संभव बीमा कंपनी को बचाने में जुटा हुआ है।

साक्ष्य के साथ की गई छेड़छाड़
बीमा कंपनी बजाज एलाएंस द्वारा वेदर सर्विस सेंटर स्काईमेट मुंबई द्वारा वर्षा के आंकड़े प्रस्तुत किये गए थे। जो पूर्व में भेज गये आंकड़ों से भिन्न थे। इस तरह बीमा कंपनी द्वारा आंकड़ों में परिवर्तन कर शासन को गुमराह करने की कोशिश की गई। इसके बाद भी बीमा वेदर सर्विस सेंटर स्काईमेड मुबई द्वारा वर्षा के आंकड़े प्रस्तुत किए गए जो पूर्व में भेजे गए से भिन्न थे। इस तरह बीमा कंपनी द्वारा आंकड़ों में परिवर्तन कर शासन को गुमराह किया गया।

कोरिया जिले में किसानों को मौसम आधारित फसल बीमा योजनांतर्गत अधिकृत बीमा कंपनी बजाज एलायंस द्वारा कोरिया जिले के भरतपुर जनपद क्षेत्र के ग्राम माडीसरई के कृषकों के साथ धोखाधड़ी कर कम क्षतिपूर्ति राशि दिए जाने के मामले में बीमा कंपनी पर प्राथमिकी दर्ज करने के मामले को लेकर उप संचालक कृषि द्वारा अनुमति मांगी गई थी।

 जिस पर शासन ने नियमानुसार बीमा कंपनी पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश जारी किये थे। लेकिन संचालनालय द्वारा आदेश को कई माह से दबाकर रखा गया। जिस कारण किसानों के साथ धोखाधड़ी कर कम क्षतिपूर्ति राशि देने के आरोप से घिरे बीमा कंपनी पर अब तक आपराधिक धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकी है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मामले में कृषि विभाग के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी की संलिप्तता होने के कारण इस मामले को दबाने का प्रयास करने का भी आरोप है।

 


Date : 07-Sep-2019

एमजीएम ने बैंक लोन के लिए 50,000 करोड़ के घोटाले वाली कंपनी को सहयोगी बताया था!

रायपुर, 7 सितंबर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ के डीजी स्तर के निलंबित अधिकारी मुकेश गुप्ता को उनके खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर पर सुप्रीम कोर्ट से स्थगन की राहत तो मिल गई है, लेकिन उनके खिलाफ चल रही जांच में अब तक हासिल कागजात उनके लिए आगे चलकर दिक्कत खड़ी करने वाले हैं। सुप्रीम कोर्ट का स्थगन अब तक दर्ज तीन एफआईआर पर ही है, लेकिन कई और मामलों की जांच चल रही है जिसमें उनकी अगुवाई में रायपुर में बन रहे एक बहुत बड़े अस्पताल का मामला भी है।

मुकेश गुप्ता ने छत्तीसगढ़ राज्य बनने से लेकर कुछ महीने पहले तक इस अस्पताल के काम को बहुत आगे बढ़ाया था। उनकी दूसरी पत्नी मिक्की की मौत की जांच की मांग मिक्की की मां और भाई बरसों से करते आ रहे थे, और अब भूपेश सरकार ने यह जांच शुरू करवाई है। मिक्की की स्मृति में बने एक बहुत बड़े आंखों के अस्पताल एमजीएम को लेकर यह जांच चल रही है कि उसके लिए इतने बड़े-बड़े दान कैसे जुटाए गए, और ट्रस्ट का काम सरकारी नियमों के मुताबिक चल रहा है या नहीं। इसे लेकर ट्रस्ट नियंत्रित करने वाले प्रशासनिक अधिकारी और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो, दोनों की ओर से कागजात जुटाए जा रहे हैं, और बैंकों से, ट्रस्टियों से तरह-तरह के कागज अधिकारियों को मिले हैं।

इन कागजों में एक कागज आज अचानक भारी सनसनीखेज साबित हो रहा है जिसमें एमजीएम ट्रस्ट ने अस्पताल के लिए बैंक लोन लेते हुए ट्रस्ट के महत्वपूर्ण सहयोगी संस्थानों के नाम की एक लंबी लिस्ट बैंक को दी थी। कई बरस पहले बैंक में जमा किए गए बहुत से लोन-कागजातों में ऐसी लिस्ट में प्रदेश की 66 बड़ी कंपनियों, फर्मों, और लोगों के नाम हैं जो कि जनता की जानकारी में अरबपति लोग हैं।

लेकिन इनमें प्रदेश के बाहर की एक ऐसी कंपनी को भी एमजीएम ने अपना महत्वपूर्ण एसोसिएट बताया है जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जांच चल रही है, और जिसके सारे डायरेक्टर आज जेल में हैं। पीएसीएल इंडिया लिमिटेड नाम की दिल्ली स्थित इस कंपनी ने निवेशकों से देश भर में लगभग 50 हजार करोड़ रूपए इक_े कर लिए थे और अब दीवाला निकाल देने के बाद सरकार इसकी संपत्तियों को जब्त करके पूंजीनिवेशकों को उनकी लगाई गई रकम का कुछ हिस्सा देने की कोशिश कर रही है। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में भी सरकार ने अपने छोटे-छोटे दफ्तरों के स्तर पर भी ऐसे लुटे हुए निवेशकों के दावा फॉर्म भरवाने का काम किया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की बनाई हुई जस्टिस लोढा कमेटी की निगरानी में इस कंपनी की जब्त संपत्तियों से पूंजीनिवेशकों की रकम निकालने की कोशिश हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि पीएसीएल नाम की इस कंपनी ने निवेशकों के धन को लूटने के लिए ही ऐसी योजना बनाई थी।

अब छत्तीसगढ़ में एमजीएम ट्रस्ट के बैंक में जमा किए हुए कागजातों में इस कंपनी का नाम इम्पॉर्टेंट एसोसिएट के रूप में निकलने से मुकेश गुप्ता के लिए एक नई परेशानी खड़ी हो सकती है। इस ट्रस्ट में मुकेश गुप्ता खुद ट्रस्टी तो नहीं हैं, लेकिन सारे ट्रस्टी उनके एकदम करीबी लोग हैं, और इस अस्पताल को उन्हीं के नाम से जाना भी जाता है। इसके साथ-साथ बैंक कर्ज के कागजात में स्टेट बैंक ने अपने अंदरुनी कागजातों में इस कर्ज को भरोसेमंद बताने के तथ्यों और तर्कों में मुकेश गुप्ता को इसके पीछे की मुख्य ड्राइविंग फोर्स भी लिखा है। बैंक ने मुकेश गुप्ता से हुई बातचीत का जिक्र भी इस लोन के सिलसिले में किया है, और उनकी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण भूमिका इस ट्रस्ट के पीछे बताई है।

जिन 66 कंपनियों, फर्मों, और लोगों को मिक्की मेमोरियल ट्रस्ट के इम्पॉर्टेंट एसोसिएट बताया गया है उनमें केन्द्र सरकार की एक सबसे बड़ी पब्लिक सेक्टर कंपनी एसईसीएल (साऊथ इस्टर्न कोल लिमिटेड), का नाम भी है। इस लिस्ट में आधा दर्जन दूसरे ट्रस्टों के नाम भी हैं।

 

इनके नामों का उपयोग ट्रस्ट के बंैक लोन के लिए किस तरह किया गया है इसकी जानकारी जांच एजेंसियां बैंकों से निकालने की कोशिश कर रही हैं। एक बड़े जांच अफसर ने ‘छत्तीसगढ़’ को मिले कुछ कागजातों को सही बताते हुए कहा है कि बैंक अफसर जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं, और इस ट्रस्ट के नाम से खोले और बंद किए गए दर्जनों बैंक खातों की जानकारी देने में आनाकानी कर रहे हैं। जांच एजेंसी का कहना है कि इस जांच पर किसी अदालत की कोई रोक नहीं है, और अगर जरूरत पड़ी तो बैंक की संबंधित ब्रांच पर छापा मारकर वहां से कागजात जब्त किए जाएंगे।


Date : 05-Sep-2019

शिक्षा का अलख जगाने रोज गांवों में फेरा लगा रहा, नक्सलगढ़ मदनवाड़ा में भृत्य तेजराम बने मिसाल

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 5 सितंबर(छत्तीसगढ़)।
शिक्षा के प्रति गहरे लगाव ने एक चपरासी के रोज ड्यूटी के बाद लोगों के चौखट पर पहुंचकर नौनिहालों को स्कूल भेजने की मुहिम ने नक्सलगढ़ मदनवाड़ा में शिक्षा का अलख जगा दिया है। मदनवाड़ा हाईस्कूल में पदस्थ भृत्य तेजराम निषाद स्कूल में शिक्षकों और विद्यार्थियों को पानी पिलाने समेत अन्य कार्य करने के बाद रोजाना साइकिल से धूर नक्सलग्रस्त गांवों का फेरा लगाकर अशिक्षा के जाल में फंसे ग्रामीणों को बच्चों को स्कूल भेजने पर जोर दे रहे हंै। अब बच्चों को पढ़ाने स्वमेव ग्रामीण सामने आने लगे हैं। 

तेजराम निषाद ने स्कूल में दर्ज संख्या को बढ़ाने के लिए यह सकारात्मक कदम उठाया है। कुछ दिनों में मदनवाड़ा, कारेकट्टा, मुंजाल, रेतेगांव, कलवर, हुरवे व हरेली गांव से विद्यार्थियों ने स्कूल में दाखिला लेना शुरू किया। तेजराम की कोशिशों से अब स्कूल की दर्ज संख्या में खासी वृद्धि हो गई है। 

बताया जाता है कि मदनवाड़ा हाईस्कूल खुलने के करीब दो वर्ष तक एक भी छात्र ने दाखिला नहीं लिया था। जिससे शिक्षकों और अन्य कर्मियों को विद्यार्थियों की गैरमौजूदगी खलती रही। ऐसे में शिक्षकों के सामने आने से पहले चपरासी निषाद ने गांवों में फेरा लगाकर ग्रामीणों को स्कूली शिक्षा महत्व से अवगत कराया। तालीम हासिल नहीं करने के स्थिति में बच्चों को भविष्य में होने वाली दिक्कतों से रूबरू कराया। बताया जाता है कि शुरूआत में ग्रामीण तेजराम को देखकर बिदकने लगे थे, लेकिन चपरासी की जिद ने आखिरकार रंग लाया और मदनवाड़ा स्कूल विद्यार्थियों से गुलजार होने लगा। 

करीब पांच साल पहले 2014-15 स्वीकृत स्कूल भवन 16-17 में पूर्ण हुआ। इसके बाद विद्यार्थियों को स्कूल में लाने के लिए तेजराम ने एक सकारात्मक कदम उठाया। बताया जाता है कि मानपुर में पदस्थ रहे निषाद ने खुद प्रशासन से मदनवाड़ा में अपनी पदस्थापना करने का आग्रह किया। मदनवाड़ा में नक्सलियों की तेज आमदरफ्त की परवाह किए बगैर निषाद ने गांवों में पहुंचकर ग्रामीणों को अपने साथ जोड़ा। नतीजतन आज मदनवाड़ा हाईस्कूल में शिक्षक आधुनिक और तकनीकी शिक्षा से बच्चों को दुनिया के साथ कदमताल करने के लिए तैयार कर रहे हंै।

 ज्ञात हो कि तेजराम ने शिक्षा का उन्मुक्त वातावरण बनाने के लिए अपनी बेटी को मानपुर से मदनवाड़ा में दाखिल कराया। नतीजतन उनकी बेटी ने कक्षा 10वीं में 73 फीसदी अंक हासिल की। वर्तमान में वह अंबिकापुर स्थित प्रयास विद्यालय में तालीम ले रही हंै।

कलेक्टर ने कहा सम्मानित करेंगे
चपरासी तेजराम निषाद की सराहना करते कलेक्टर जेपी मौर्य ने कहा कि निश्चित ही यह अनुकरणीय प्रयास है। उन्होंने कहा कि ऐसे निष्ठावान कर्मियों से अन्य शिक्षकों को सीख लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आगामी गणतंत्र दिवस में उनको प्रशासन की ओर से सम्मानित किया जाएगा। शिक्षा के प्रति लगाव से ही ऐसे बेहतरीन कार्य किए जा सकते हंै।

 


Date : 04-Sep-2019

शिक्षक नहीं, महीनों से स्कूल बंद गेट खुला, कार्यालय में ताला

5 सितंबर शिक्षक दिवस पर विशेष रिपोर्ट

चन्द्रकांत पारगीर
बैकुंठपुर, 4 सितंबर।
कोरिया जिले के झांपर का प्राथमिक स्कूल एक शिक्षक की लापरवाही के कारण सत्र शुरू होने के बाद से आज तक नहीं खुला है। पूर्व में ‘छत्तीसगढ़़’ ने वर्ष 2016  में इस स्कूल को एक साल से बंद रहने को लेकर खबर का प्रकाशन किया था, तब से स्कूल के हालात कुछ बदले थे परन्तु एक बार फिर महीनों से स्कूल बंद पड़ा हुआ है और नए सत्र में एक भी दिन स्कूल नहीं खुल पाया है जिससे अभिभावकों में काफी नाराजगी है। इतना होने के बावजूद झांपर बी ग्रेड का स्कूल है।

इस संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी संजय गुप्ता का कहना है कि मामले की जांच कर विधिवत कार्रवाई की जाएगी। कोरिया जिले के दुर्गम क्षेत्र में स्थित ग्राम झांपर भरतपुर जनपद के देवसील ग्राम पंचायत अंतर्गत आता है। यह सोनहत के रामगढ़ से 7 किमी दूर  है। यहां वर्ष 2008  में एक प्राथमिक शाला भवन का निर्माण कराया गया ताकि क्षेत्र के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मिल सके। दो शिक्षकों की नियुक्ति की गई जिनमें से एक का तबादला हो चुका है। शेष एक शिक्षक लम्बे समय से नदारत हैं। वर्ष 2016  के दिसंबर माह में जब ‘छत्तीसगढ़़’ यहां पैरी नदी पार कर पहुंचा था तब स्कूल बंद था, खबर के प्रकाशन के बाद तत्कालिन कलेक्टर एस प्रकाश दुर्गम क्षेत्र झांपर पहुंचें थे और उन्होनें एक पढ़े लिखे स्थानीय युवक को स्कूल में अध्यापन का जिम्मा सौंपा था, उस युवक को पढ़ाने के एवज में मानदेय भी दिया जाता था। इस बीच उनका स्थानंातरण हो गया और स्कूल में पढ़ा रहे युवक का मानदेय बंद कर दिया गया। 

गांव के जगदेव, जगन्नाथ, रधुनाथ, बलदेव, शिवधन सिंह, विश्वनाथ, सुखमन, धर्मपाल ने बताया कि दो वर्ष पहले जब पूरा प्रशासन गांव में आया था तब स्कूल खुलने लगा था और पढ़ाई होने लगी थी, परन्तु अब तो लम्बे समय से विद्यालय बंद पड़ा हुआ है, नए सत्र में एक भी दिन स्कूल नहीं खुल पाया है। एक मात्र शिक्षक जो आते ही नहीं है। स्कूल का गेट खुला रहता है। कार्यालय में हमेशा ताला लटका रहता है। बच्चों को पहाड़ा गिनती तक नहीं आती। स्कूल का शौचालय अधूरा है। मध्यान्ह भोजन का हाल बुरा है। 

15 अगस्त में नहीं फहरा झंडा
15 अगस्त के दिन इस स्कूल में झंडा नहीं फहराया गया। जिसके बाद भरतपुर तहसील में आने वाले इस गांव झांपर के अभिभावक अपने बच्चों के साथ भरतपुर बीईओ से मिले। उन्होनें स्कूल के शिक्षक के बारे में शिकायत की और अपने बच्चों के भविष्य के लिए चिंता जाहिर करते हुए दूसरे शिक्षक को पदस्थ करने की मांग की। परन्तु किसी भी तरह की बात नहीं बनी, जिसके बाद ग्रामीणों ने दोबारा ‘छत्तीसगढ़़’ को मामले की जानकारी दी। 

उल्लेखनीय है कि झापर दूरस्थ ग्राम है। आवागमन के लिए सडक़ भी नहीं है। वर्ष 2016  में यहां के दो भाई बहनों की सर्पदंश से मौत हो गई थी जिनके पीएम के लिए अस्पताल तक ले जाने में दो दिन लगा था।

 

 


Date : 31-Aug-2019

मकान-नौकरी के लिए ओलंपियन लगा रही दौड़, छग की पहली ओलंपियन की भूपेश-रमन से गुहार

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 31 अगस्त(छत्तीसगढ़)।
साल 2016 में रियो ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी के रूप में मैदान में उतरकर छत्तीसगढ़ की पहली ओलंपियन बनी रेणुका यादव पूर्ववर्ती भाजपा सरकार द्वारा मकान और डीएसपी की नौकरी दिए जाने की घोषणा के पूरी नहीं होने से परेशानी के दौर से गुजर रही हैं। अब यह अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी मकान-नौकरी को लेकर राजनेताओं और अफसरों की दहलीज के चक्कर लगा रही है। 

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पिछले कार्यकाल में रेणुका को आशियाना और नौकरी देने का ऐलान किया था। खेल के जरिए छत्तीसगढ़ को पहचान दिलाने के बाद रेणुका को जल्द ही सरकार की घोषणा से मांग के पूरी होने की उम्मीद थी। रियो ओलंपिक में चयन के बाद रेणुका को प्रदेश में यूथ-टैलेंट का प्रतीक माना गया। मुफलिसी के बाद भी रेणुका ने खेल में अपनी दमखम से खुद को भारतीय महिला हॉकी टीम में स्थापित किया। वर्तमान में रेणुका 2020 में टोक्यो में प्रस्तावित ओलंपिक की तैयारी भी कर रही हैं। 

बताया जाता है कि करीब तीन साल से रेणुका छत्तीसगढ़ सरकार के अलग-अलग राजनेताओं और अफसरों से अपनी व्यथा को जाहिर कर चुकी हंै। प्रदेश के नामचीन खिलाडिय़ों को 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर सरकार द्वारा सम्मान समारोह में शामिल हुईं रेणुका ने मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से पूर्ववर्ती सरकार के वादों से अवगत कराया। बताया जाता है कि ओलंपियन यादव नई सरकार से उम्मीद लगाए बैठी हंै। 

गौरतलब है कि रेणुका की पारिवारिक जिंदगी किसी फिल्मी स्टोरी से कम नहीं है। बेहद ही निर्धन परिवार की रेणुका में उत्कृष्ट हॉकी खिलाड़ी बनने की जिद थी। इसलिए वह अपने पिता और माता के साथ दूध का कारोबार करने के बाद खेल के लिए वक्त निकालती थी। यह बताना भी लाजिमी है कि रेणुका के खेल को निखारने के लिए मध्यप्रदेश के ग्वालियर स्थित अकादमी ने हाथ आगे बढ़ाया। तमाम चुनौती को पार करते हुए रेणुका राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनीं।

 इस संबंध में रेणुका यादव ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि पुरानी सरकार ने घर और डीएसपी की नौकरी देने का ऐलान किया था। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. सिंह से मिलकर मदद की गुजारिश की है। रेणुका ने बताया कि मौजूदा सीएम भूपेश बघेल से भेंटकर मांग पूरा करने का आग्रह किया है। 

गौरतलब है कि राज्य की ही पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सबा अंजुम को सरकार ने सीधे डीएसपी नियुक्त किया है। जबकि ओलंपिक जैसे खेल के महाकुंभ का हिस्सा बन चुकी रेणुका को लेकर सरकार ने सुध नहीं ली है।

 

 


Date : 30-Aug-2019

मरवाही से चुनाव लड़ते ही नेताम ने की थी जोगी की शिकायत, 18 साल में 5 कमेटियां और 3 रिपोर्ट बनीं, तीनों खिला

बिलासपुर, 30 अगस्त(छत्तीसगढ़)। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जाति को लेकर संतकुमार नेताम की शिकायत 18 साल पुरानी है जब जोगी ने तत्कालीन विधायक रामदयाल उइके के इस्तीफा देने के बाद मरवाही सीट से चुनाव लडऩे का फैसला लिया। नेताम के पक्ष में भाजपा के दिग्गज वकील सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में पैरवी कर चुके हैं लेकिन उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को लेकर संदेह था। नेताम ने भाजपा छोडक़र अब कांग्रेस की सदस्यता ले ली है। 

सिविल इंजीनियर संतकुमार नेताम भाजपा के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ में पदाधिकारी थे जब सन् नवंबर 2000 में मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने पद संभाला। उनकी जाति को लेकर नेताम ने पहली शिकायत राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग को की। यह मुद्दा उनके सामने तब आया जब मरवाही सीट से भाजपा के तत्कालीन विधायक रामदयाल उइके ने इस्तीफा दे दिया और इस सीट से जोगी की उम्मीदवारी घोषित की गई। उस समय आयोग के अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया थे। आयोग ने 16 अक्टूबर 2001 को अजीत जोगी का आदिवासी जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया। भूरिया कमेटी ने छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्य सचिव को जोगी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश भी दिया। इस आदेश को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। तत्कालीन चीफ जस्टिस की कोर्ट ने आयोग के फैसले पर 22 अक्टूबर 2001 को स्थगन दे दिया। इस मामले में नेताम भी प्रतिवादी थे।  मामले की सुनवाई होती रही। नेताम की ओर से पैरवी करने सुप्रीम कोर्ट से अरूण जेटली (स्व.) और रविशंकर प्रसाद भी पहुंचे।  इसके बाद 15 नवंबर 2006 को हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि आयोग को किसी की जाति निर्धारित करने या उसका प्रमाण पत्र रद्द करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने नेताम पर 10 हजार रुपये कास्ट किया साथ ही कहा कि इस केस में पक्षकार और सरकार के खर्च की वसूली भी उनसे की जाये। 

जनवरी 2007 में इस फैसले के ख़िलाफ़ नेताम ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। वहां भी नेताम के पक्ष में स्व. अरूण जेटली के अलावा रविशंकर प्रसाद और राजीव धवन जैसे नामी वकीलों ने पैरवी की। 

सुनवाई लम्बी चली। 13 अक्टूबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। इसमें राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को जाति निर्धारण का अधिकार नहीं होने के हाईकोर्ट के फैसले को यथावत रखा गया लेकिन राज्य सरकार को ‘माधुरी पाटिल केस’ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई गाइडलाइन के मुताबिक उच्च-स्तरीय जाति छानबीन समिति बनाई जाये। सुप्रीम कोर्ट  के आदेश के परिपालन में 13 जनवरी 2012 को आदिवासी विकास विभाग के तत्कालीन सचिव मनोज पिंगुआ की अध्यक्षता में समिति बनाई गई। इस समिति ने 22 जून 2013 को अपनी रिपोर्ट दी। समिति ने जोगी को आदिवासी नहीं माना। समिति की रिपोर्ट में कई खामियों का उल्लेख करते हुए इसे सितम्बर माह में अजीत जोगी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। 

हाईकोर्ट ने जोगी की याचिका स्वीकार की और राज्य सरकार को नोटिस तामील की। नोटिस मिलने के बाद राज्य सरकार ने पिंगुआ कमेटी की रिपोर्ट को ही वापस ले लिया और कोर्ट से कहा कि वह नये सिरे से कमेटी बनाकर रिपोर्ट देगी। इसके बाद राज्य सरकार ने आईएएस सी. मुरुगन और आशीष भट्ट की अलग-अलग कमेटियां बनाई, जो किसी-किसी कारण से रिपोर्ट नहीं दे सके। इसके बाद आदिवासी विकास विभाग की सचिव रीना बाबा कंगाले की अध्यक्षता में समिति बनाई। इस समिति ने भी 27 जून 2017 को सौंपी गई रिपोर्ट में जोगी को आदिवासी नहीं माना और तत्कालीन बिलासपुर कलेक्टर ने जोगी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया। इसे अजीत जोगी ने फिर हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट को उन्होंने दो बड़ी खामियों की ओर ध्यान दिलाया। एक तो इस समिति के गठन के बारे में राजपत्र में कोई प्रकाशन नहीं हुआ था, दूसरा समिति के अध्यक्ष, सचिव और उपाध्यक्ष तीनों ही पदों पर अकेले रीना बाबा कंगाले का नाम था और उनके ही हस्ताक्षर थे। जोगी को स्थगन मिला और कोर्ट ने नई समिति गठित करने का निर्देश दिया। इसके बाद तत्कालीन रमन सिंह सरकार ने डीडी सिंह की अध्यक्षता में समिति बनाई थी,जिसकी रिपोर्ट 23 अगस्त 2019 को सामने आई है। 

याचिकाकर्ता नेताम का कहना है कि जब उन्होंने जोगी की शिकायत की तो शुरू में पार्टी की ओर से साथ मिला पर बाद में उन्हें पूरी लड़ाई अकेले लडऩी पड़ी। दौड़-धूप व अदालत में उसके लाखों रुपये खर्च हुए। इस बीच उसे लगातार प्रलोभन और दबाव का सामना भी करना पड़ा। यह सिलसिला अभी इस माह समिति की रिपोर्ट आने के पहले तक चला। 

 नेताम का कहना है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का रवैया जोगी के प्रति नरम था, जिसके कारण पार्टी के लोगों ने भी उनसे दूरी बना ली। नेताम ने इसी के चलते भाजपा से इस्तीफा दे दिया। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। 


Date : 27-Aug-2019

जोगी परिवार को बड़ा झटका, छिन सकती है मरवाही सीट, कमेटी के फैसले को याचिकाकर्ता नेताम ने सत्य की जीत बताया, अमित जोगी ने कहा नौटंकी

कलेक्टर करेंगे छानबीन समिति का आदेश मिलने पर कार्रवाई 

राजेश अग्रवाल
बिलासपुर, 27 अगस्त (छत्तीसगढ़)।
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को अमान्य करने के हाईपावर कमेटी के फैसले का जिले की राजनीति में दूरगामी असर पडऩे वाला है। मरवाही सीट से उनका निर्वाचन न केवल निरस्त हो सकता है बल्कि वे आगे किसी भी आदिवासी सीट से चुनाव नहीं लड़ पायेंगे। इसका असर उनके पुत्र अमित जोगी की राजनीति पर भी पड़ेगा क्योंकि तब उनका भी आदिवासी होने का दावा समाप्त हो जाएगा। बिलासपुर कलेक्टर ने समिति की रिपोर्ट या आदेश मिलने के बाद कार्रवाई की बात कही है। अमित जोगी ने इस फैसले को नौटंकी करार देते हुए अदालत में चुनौती देने की बात कही है, वहीं इस मामले में लड़ाई लडऩे वाले संतकुमार नेताम ने फैसले को सत्य की जीत बताते हुए स्वागत किया है। 

ज्ञात हो कि बिलासपुर के इंजीनियर संतकुमार नेताम ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व मरवाही सुरक्षित सीट के मौजूदा विधायक अजीत जोगी के खिलाफ बीते 10 साल से विभिन्न आयोग व अदालतों में मुकदमे लड़ रहे हैं। उन्होंने जोगी के आदिवासी होने के दावे को चुनौती थी। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने नेताम की शिकायत पर जोगी के आदिवासी जाति के प्रमाण पत्र को निरस्त कर दिया था। इसे जोगी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पाया कि आयोग को जाति का निर्धारण करने का अधिकार नहीं है। उसने आयोग के फैसले को निरस्त कर दिया था। इसके बाद नेताम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले कुछ फैसलों में दिये गए गाइडलाइन के मुताबिक हाईकोर्ट को निश्चित समय में इस मामले को सुनने तथा राज्य सरकार को जाति छानबीन के लिए उच्च स्तरीय जांच कमेटी बनाने का निर्देश दिया था। 

तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में आईएएस रीना बाबा कंगाले की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय छानबीन समिति बनाई गई थी, जिसने 27 जून को 2017 को जोगी के जाति प्रमाण पत्रों को अमान्य कर दिया था। इसके बाद 30 जून को तत्कालीन बिलासपुर कलेक्टर ने उनके जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिये थे। हाईकोर्ट में इस समिति के गठन को ही अवैधानिक बताते हुए जोगी ने याचिका दायर की थी, जिसके बाद इस कमेटी की रिपोर्ट को निरस्त करते हुए हाईकोर्ट ने विधिपूर्वक नई उच्च-स्तरीय जाति छानबीन समिति बनाने का निर्देश दिया था। 

21 फरवरी 2018 को सरकार ने आदिवासी विकास विभाग के सचिव डीडी सिंह की अध्यक्षता में एक अन्य समिति बनाई, जिसने 26 अगस्त को जोगी के आदिवासी होने के प्रमाण पत्रों को अमान्य कर दिया है। पिछली बार जून 2017 में समिति की रिपोर्ट मिलने पर तत्कालीन कलेक्टर ने जोगी की जाति का प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया था। इस रिपोर्ट के पालन में जोगी परिवार को आदिवासी वर्ग के समस्त लाभ मिलने बंद हो सकते हैं। इससे मरवाही सीट पर उनका निर्वाचन भी निरस्त हो सकता है। प्रावधान यह भी है कि आरक्षित वर्ग के प्रमाण पत्र के आधार पर मिले सभी लाभ की भी रिकव्हरी की जाए और पाया जाता है कि प्रमाण पत्र फर्जी है तो आपराधिक प्रकरण भी दर्ज किया जाए। 

चूंकि अजीत जोगी के ही जाति प्रमाण पत्र को अमान्य कर दिया गया है इसलिए उनके पुत्र अमित जोगी का भी आदिवासी दर्जा छिन जाएगा। वे भी सुरक्षित सीट मरवाही से विधायक बनते रहे हैं।

जिले की मरवाही सीट जोगी परिवार की परम्परागत सीट है, जो आदिवासियों के लिए सुरक्षित है। यदि उन्हें हाईपावर कमेटी के फैसले के खिलाफ किसी सक्षम न्यायालय से स्थगन नहीं मिलता है तो वे आदिवासी होने की पात्रता खो देंगे, इससे उन्हें किसी भी आदिवासी सीट से चुनाव लडऩे का अवसर नहीं मिलेगा। अमित जोगी के निर्वाचन की वैधता को लेकर उनकी सन् 2013 के चुनाव में प्रतिद्वन्द्वी रहीं समीरा पैकरा ने भी जाति व जन्म प्रमाण पत्रों की वैधता पर अलग चुनौती दे रखी है, जो हाईकोर्ट में विचाराधीन है। पेन्ड्रा थाने में पैकरा ने अमित जोगी के खिलाफ इसे लेकर रिपोर्ट भी दर्ज करा चुकी हैं। 

विधानसभा चुनाव में जोगी की पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस उम्मीद से बहुत कम सीटों पर सिमट गई थी। बसपा के साथ मिलकर उन्होंने कुल सात सीटें हासिल की। बसपा ने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा, जोगी की पार्टी इस चुनाव में मैदान में नहीं उतरी। इस बीच उनके बेहद करीबी साथियों समेत अनेक बड़े नेताओं सहित जमीनी कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोडक़र कांग्रेस का दामन थाम लिया। लगातार झटके खाने के बाद हाल ही में पार्टी ने दंतेवाड़ा उप-चुनाव लडऩे की घोषणा की है। नगरीय निकाय तथा पंचायत चुनाव लडऩे का निर्णय भी लिया गया है। ऐसे में हाईपावर कमेटी के फैसले से जोगी व उनके परिवार को होने वाली राजनीतिक क्षति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। 

यह संयोग है कि दस दिन पहले ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जाति सम्बन्धी प्रत्येक विचाराधीन मामले का निराकरण एक माह के भीतर करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सबसे पहले बड़ा फैसला जोगी के मामले में ही आया है। 

जोगी के जाति प्रमाण पत्र को चुनौती देने वाले संतकुमार नेताम ने इस फैसले को अंतिम बताते हुए दावा किया कि इसे अब कहीं चुनौती नहीं दी जा सकती। यदि चुनौती दी भी गई तो जोगी को तत्काल कोई राहत नहीं मिलेगी क्योंकि फैसला देने वाली कमेटी ने निर्णय ही सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन पर किया है। उन्होंने कहा कि कई साल लम्बी लड़ाई के बाद आखिर आदिवासी समाज को न्याय मिला है। उन्होंने मरवाही सीट से निर्वाचन निरस्त करने, आदिवासी के रूप में पिता-पुत्र द्वारा लिए गए लाभ की रिकव्हरी करने तथा आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग की है। 

दूसरी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व विधायक अमित जोगी ने इसे ‘भूपेश छानबीन समिति’ बताते हुए कहा है कि समिति ने कोरे कागज में अपने दस्तख़त करके मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंप दिया था। सुनवाई केवल नौटंकी थी। सभी कानूनी प्रक्रियाओं, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और न्यायालय के दृष्टांतों के विपरीत बेतुका फैसला लिया गया, जिसे उच्च-न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जायेगी। हमें पूरा विश्वास है कि हमारे साथ अन्याय नहीं होगा। 

छानबीन समिति ने बिलासपुर कलेक्टर को कार्रवाई के लिए निर्देशित किया है लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक रिपोर्ट कलेक्टोरेट आई नहीं है। कलेक्टर डॉ. संजय अलंग ने कार्रवाई क्या की जा रही है, पूछे जाने पर कहा, पहले समिति का आदेश तो आ जाने दीजिए। 

 


Date : 27-Aug-2019

नक्सलगढ़ में लड़ते सिपाही से निरीक्षक बने अफसर ने मारे 41 नक्सली

अफसर लक्ष्मण केंवट को वीरता पदक के साथ महकमें से मिली रही शाबासी

प्रदीप मेश्राम

राजनांदगांव, 27 अगस्त (छत्तीसगढ़)। पुलिस और नक्सलियों की निर्णायक लड़ाई में राजनांदगांव के धूर नक्सलग्रस्त गातापार जंगल में पदस्थ इंस्पेक्टर लक्ष्मण केंवट अपनी बहादुरी की वजह से सुर्खियां बटोर रहे हैं। हाल ही में दूसरी बार वीरता पदक लेने वाले लक्ष्मण केंवट की नक्सलियों से लोहा लेने के जज्बे को देखकर अफसर उन्हें उदाहरण के तौर पर पेश कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस की ‘वन टाईम प्रमोशन’ नीति से आरक्षक से सीधे उपनिरीक्षक बने केंवट ने सरकार के उम्मीद पर खरा उतरते हुए अब तक 41 नक्सलियों को ढेर किया है।  केंवट के निशाने में आए नक्सलियों पर करीब 1.50 करोड़ रूपये का इनाम घोषित था। 

वर्ष 2007 में बतौर आरक्षक सूरजपुर जिले में महकमें में शामिल   केंवट ने वन-टाईम प्रमोशन नीति के तहत खुद को नक्सल इलाके में 10 साल के लिए झोंक दिया। बीजापुर में अपने पहले नक्सल मुठभेड़ में केंवट ने अपने बूते नक्सलियों को खदेडऩे की मुहिम शुरू की। साल 2014 में बीजापुर से सटे गुंडापुर गांव में एक नक्सली को मारकर केंवट ने अपना सफर शुरू किया। इस कामयाबी के लिए महकमें ने सीधे उपनिरीक्षक से निरीक्षक पद पर पदोन्नत कर दिया। 

वर्ष 2012 से बीजापुर में ‘लाल आंतक’ से भिड़ते हुए केंवट ने अपने सेना के साथ दो साल में 27 नक्सलियों को मार गिराया। बीजापुर में लगातार नक्सलियों के बढ़ती पैठ को कमजोर करने के लिए केंवट ने टीमवर्क के रूप में अपने मातहत जवानों के साथ औसतन हर सप्ताह नक्सलियों को घेरकर ढ़ेर करने का अभियान जारी रखा। बीजापुर में अपनी पदस्थापना के दौरान केंवट की साहसिक और लड़ाकू होने की कृतियां राजधानी रायपुर तक पहुंच गई। इस बीच केंवट के अदम्य साहस को देखते हुए शीर्ष अफसरो ने वीरता पदक के लिए उनके नाम की सिफारिश की। बताया जाता है कि अब भी केंवट के नाम अब भी आधा दर्जन वीरता पदक दिए जाने का प्रस्ताव महकमें में मौजूद है। 

बीजापुर में  रहते हुए केंवट ने नक्सलियों की गोरिल्लावार तकनीकी की बारीकियों को बखूबी समझा। नतीजनत नक्सलियों को उनके ही तकनीकी लड़ाई में केंवट ने मात देना शुरू किया। धीरे-धीरे केंवट गोरिल्लवार में पारंगत होकर नक्सलियों पर भारी पडऩे लगे। इसके बाद 2017 में राजनांदगांव जिले के उत्तरी इलाके साल्हेवारा और गातापार क्षेत्र में बीजापुर और सुकमा से नक्सलियों की बड़ी फौज के आमद देने की खुफिया सूचना के बीच केंवट ने यहां मोर्चा संभाल लिया। 

गातापार थाना के प्रभारी बनते ही केंवट ने नक्सलियों को घेरने के लिए योजनाबद्ध तरीके से हमला करना शुरू कर दिया। पठारी इलाका होने के बावजूद हार्डकोर महिला नक्सली जमुना को मारकर केंवट ने  नक्सलियों के महाराष्ट-मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ (एमएमसी) जोन की बुनियाद पर करारा प्रहार किया। जमुना को इससे पहले कई अफसरो ने घेरने की नाकामयाब कोशिश की। जमुना के मारे जाने के बाद नक्सलियों की बौखलाहट खुलकर सामने आने लगी।  अपने साथी की मौत होने के बाद से नक्सलियों की स्मॉल एक्शन टीम ने केंवट पर नजर रखनी शुरू कर दी। इसकी परवाह किए बगैर केंवट ने 3 अगस्त को एमएमसी जोन को नेस्तानाबूत करते हुए मिलिट्री इंचार्ज सुखेदव उर्फ लक्ष्मण समेत 7 नक्सलियों को मार गिराया।  इस घटना से नक्सलियों के विस्तार नीति को तगड़ा झटका लगा है। 

बताया जाता है कि नक्सलियों के लिए दर्रेकसा इलाका ‘ट्रांजिट रूट ’ के रूप में माना जाता है। नक्सलियों पर हर थोड़े दिन में प्रहार कर केंवट के अब महकमें में एक काबिल अफसर के रूप में गिनती हो रही है। 

चुनौतियों को अवसर में बदलकर केंवट बने मिसाल-डीआईजी
नक्सलियों से जूझते केंवट को महकमे के शीर्ष अधिकारियों से लगातार शाबासी मिल रही है। राजनांदगांव रेंज डीआईजी आरएल डांगी का कहना है कि केंवट में चुनौतियों को अवसर में बदलने का हुनर है। उनका कहना है कि नक्सलियों से लड़ते हुए इस अफसर ने नई मिसाल पेश की है। यह जज्बा ऐसे अफसरों के लिए सीख हो सकता है जो नक्सली इलाकों में अपनी तैनाती से बचने व समय काटने की सोच रखते हैं। केंवट ने पुलिस जवानों के मनोबल को बढ़ाने को जहां साहस दिखाया है वहीं नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई को देश की आन-बान से जोड़ा भी है। डीआईजी का कहना है कि मौका मिलने पर हर अफसर और जवान को ऐसे अभियान में बढ़ चढक़र हिस्सा लेना चाहिए।

 


Date : 22-Aug-2019

राज्यपाल के फर्जी दस्तखत से चिट्ठी, 
कांग्रेस विधायक खरीदने का जिक्र,
डीजीपी को जुर्म कायम करने दिया

विशेष संवाददाता
रायपुर, 22 अगस्त (छत्तीसगढ़)।
 छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुईया उईके के नकली दस्तखत से एक सनसनीखेज चिट्ठी बनाई गई है जिसमें उनकी तरफ से किसी भाजपा कार्यकर्ता को कांग्रेस विधायक खरीदने कहा गया है। यह चिट्ठी उनके पिछले कार्यालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के लेटरहैड पर टाईप है, और उसे छत्तीसगढ़ के किसी भाजपा कार्यकर्ता मोहित राम को लिखा बताया गया है। इस 'छत्तीसगढ़' ने जब यह पत्र भेजकर राज्यपाल का पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने इसे फर्जी बताया, और कहा कि वे पुलिस महानिदेशक को इस पर जुर्म कायम करने के लिए कह रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इसके पहले भी उनके फर्जी दस्तखत बनाकर एक और चिट्ठी जारी की गई थी। 

राज्यपाल ने 'छत्तीसगढ़' को बताया पूरा किस्सा
राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उईके ने 'छत्तीसगढ़' के संपादक को फोन करके इस बारे में खुलासे से बताया कि किस तरह से पिछले कुछ हफ्ते से ऐसी जाली चिट्ठियां बनाकर छत्तीसगढ़ के आदिवासी विधायकों के पते पर भेजी गई थीं। चूंकि विधायकों के पते सही नहीं लिखे हुए थे इसलिए ये चिट्ठियां प्रेषक के पते पर छिंदवाड़ा वापिस लौट गईं। उन्होंने बताया कि इन चिट्ठियों को भेजने वाले ने अपना नाम जितेन्द्र ठाकुर लिखा था। लेकिन छिंदवाड़ा में उनका नाम सब जानते हैं, और उनके पीए का नाम जितेन्द्र सोलंकी है, इसलिए ऐसी कई चिट्ठियां उनके पते पर पहुंचीं, जो कि उन्होंने भेजी ही नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे छिंदवाड़ा पुलिस में इस बारे में पहले ही रिपोर्ट दर्ज करा चुकी हैं, और पुलिस जांच कर रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का अंदाज है कि छिंदवाड़ा का कौन व्यक्ति यह काम कर रहा है, लेकिन जांच में साबित होने तक वे उसका नाम लेना उचित नहीं समझती हैं। उन्होंने कहा कि वे छत्तीसगढ़ पुलिस को अपना संदेह बता देंगी ताकि जांच में आसानी हो सके। उन्होंने फोन पर यह भी बताया कि लोकसभा चुनाव के मतदान के ठीक एक दिन पहले उनके फर्जी दस्तखत बनाकर ऐसी ही एक दूसरी  चिट्ठी फैलाई गई थी जिसमें लिखा गया था कि वे (अनुसुईया उईके) सुमित्रा महाजन और सुषमा स्वराज जैसी महिला नेताओं की उपेक्षा के खिलाफ भाजपा से इस्तीफा दे रही हैं। 

मतदान के ठीक पहले ऐसी चिट्ठी बनाकर लोगों को वॉट्सऐप पर भेजी गई थी। उन्होंने बताया कि छिंदवाड़ा पुलिस को जांच में कुछ समय लग रहा है क्योंकि वॉट्सऐप से जानकारी उसके अमरीका स्थित सर्वर से पुलिस जुटा रही है। उन्होंने कहा कि इस चिट्ठी में जैसे फूहड़ और बचकाने तरीके से बातें लिखी गई हैं, वे किसी विचलित और विक्षिप्त दिमाग की उपज लगती हैं, और उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि छत्तीसगढ़ पुलिस इस अपराधी तक पहुंच जाएगी। 


Date : 16-Aug-2019

पेन्ड्रा जिला, जोगी पति-पत्नी ने खुले मन से की भूपेश की तारीफ 

 21 साल पुराने फैसले पर अब जाकर लगी मुहर

राजेश अग्रवाल

बिलासपुर, 16 अगस्त (छत्तीसगढ़)। पेन्ड्रा इलाके को जिला बनाने के 21 साल पहले मप्र विधानसभा में लिये गए निर्णय को अमल में लाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ा दांव खेला है। जो काम अजीत जोगी अपने तीन साल और डॉ. रमन सिंह 15 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में नहीं कर पाये सात माह के भीतर उन्होंने कर दिखाया है। जोगी दम्पत्ति ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है, वहीं लोग आंकलन में लगे हैं कि इस निर्णय का राजनीतिक असर क्या होने वाला है। प्रशासनिक दृष्टि से जिले के रूप में बिलासपुर का कद घट जायेगा लेकिन संभाग के रूप में उसका वर्चस्व बना रहेगा। इस घोषणा के बाद प्रदेश के दूसरे स्थानों से जिला बनाने की मांग बलवती होने लगी है। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी में 16 अगस्त को इसी मुद्दे पर एक बैठक भी रखी गई है। 

दो दिन से पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही इलाके में जश्न का माहौल है। आदिवासी बाहुल्य, वनाच्छादित इस क्षेत्र के लोगों की बहुप्रतीक्षित मांग पूरी हो गई है। स्वतंत्रता दिवस पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही नाम से एक नया जिला बनाने की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही प्रदेश में अब 27 की जगह 28 जिले हो जायेंगे। वर्तमान जिला मुख्यालय बिलासपुर से पेन्ड्रा की दूरी नई सडक़ के रास्ते 101 किमी तथा मरवाही की 135 किलोमीटर है। मरवाही विकासखंड के अंतिम ग्राम बेलझिरिया की दूरी जिला मुख्यालय से 240 किमी है। इस इलाके की भौगोलिक स्थिति के कारण करीब चार दशक से इसे अलग जिला बनाने की मांग होती रही है। इसके लिए अधिवक्ता संघ, सर्वदलीय नागरिक मंच आदि ने आंदोलन तो किये ही हैं, हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी। सभी राजनीतिक दल इस मांग का समर्थन तो करते रहे लेकिन जिले का निर्माण नहीं किया गया। 

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी स्वयं इसी क्षेत्र से आते हैं, पर वे भी अपने तीन साल के कार्यकाल में इस मांग को पूरी नहीं कर पाये। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने कार्यकाल में नौ नये जिलों की घोषणा की थी लेकिन पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही को छोड़ दिया था। उनके इस फैसले को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाता रहा। कुछ लोग इसके पीछे तर्क देते हैं कि मरवाही इलाके में कुछ भी हो जाये, जोगी का प्रभुत्व बरकरार रहेगा, इसलिए जिला बना देने से भी किसी दूसरे को राजनीतिक लाभ नहीं मिलने वाला है। अब यह देखना है कि मुख्यमंत्री बघेल ने सिर्फ चुनावी वायदा पूरा करने के लिए यह निर्णय लिया है या फिर इसके पीछे जोगी परिवार के तिलस्म को तोडऩे का मकसद भी है। 

केबिनेट की पिछली बैठक में मुख्यमंत्री बघेल ने लम्बित जाति विवाद के मामलों को एक माह के भीतर निपटाने का निर्णय लिया था, जिसे जोगी को लेकर चल रहे जाति विवाद से भी जोडक़र देखा गया था। इसके बाद अब यह दूसरा फैसला मरवाही, पेन्ड्रा, गौरेला इलाके के मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की ओर मोड़ पायेगा या नहीं देखना दिलचस्प होगा। 

दिलचस्प बात है कि मध्यप्रदेश विधानसभा में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला की पहल पर पेन्ड्रारोड को जिला बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था और इसके बाद तीन जुलाई 1998 को राजपत्र में जिला बनाने की अधिसूचना प्रकाशित भी की जा चुकी थी। इसी दौरान छत्तीसगढ़ राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, जिसके चलते अधिसूचना के अमल पर विराम लग गया। अब पहली बार निर्वाचित कांग्रेस की सरकार ने 21 साल बाद इस बहुप्रतीक्षित मांग को पूरा कर दिया है। जिले के नाम को लेकर भी खींचतान रही है, जिसे देखते हुए इसे पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही जिला जैसा लंबा नाम देकर सबको संतुष्ट करने का प्रयास किया गया है। 

पूर्व मुख्यमंत्री व मरवाही के विधायक अजीत जोगी 15 अगस्त को कोटा विधायक डॉ. रेणु जोगी के साथ पेन्ड्रा में ही थे। जोगी ने इस घोषणा पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि अब उन्हें भरोसा हो गया है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की करनी और कथनी में कोई फर्क़ नहीं है। वे जो कहते हैं उसे पूरा करते हैं। कोटा की विधायक डॉ. रेणु जोगी ने भी कहा कि इस घोषणा से उनके जीवन का बहुत बड़ा संकल्प आज पूरा हो गया है।  नये जिले की घोषणा होते ही दो दिन से पेन्ड्रारोड में जश्न का माहौल है। लोगों ने रैलियां निकाली, मिठाईयां बांटी और आतिशबाजी की। 

नये जिले का कलेक्टोरेट फिलहाल गुरुकुल में बनाये जाने की संभावना है। यहां काफी जगह है। वैसे यहां पहले से ही अतिरिक्त जिलाधीश, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के कार्यालय हैं, साथ ही जिला स्तर के कई संस्थान भी स्थापित हैं।  पेन्ड्रा को नया जिला बनाने से बिलासपुर जिले का तीसरी बार विभाजन हो चुका है। पहले बिलासपुर जिले के अधीन जांजगीर-चाम्पा, कोरबा और मुंगेली आते थे, जो अलग जिले बनाये जा चुके हैं। पहले दो सन् 1998 में संयुक्त मध्यप्रदेश के दौरान तथा मुंगेली को छत्तीसगढ़ बनने के बाद 2011 में जिला बनाया गया। पुराने जिले का पंडरिया वाला हिस्सा कबीरधाम (कवर्धा) जिले में शामिल किया जा चुका है। नये जिले में कोटा अनुभाग को शामिल किये जाने की संभावना नहीं है किन्तु कोटा विधानसभा के कुछ क्षेत्र नये जिले में आएंगे।
 नये जिले में पेन्ड्रा और मरवाही को अलग-अलग अनुभाग में बांटा जा सकता है। जिला मुख्यालय बिलासपुर पहुंचने में कई दूरस्थ गांवों के लोगों को पूरा एक दिन लग जाता है। जिला स्तर के अधिकारी भी इस क्षेत्र का दौरा करने से कतराते हैं। भौगोलिक दूरी, दुर्गम और पहुंचविहीन गांवों से भरे यह इलाका अब विकास की नई ऊंचाईयों को छू सकता है।

बिलासपुर जिला इस विभाजन के बाद छोटा हो जायेगा। हालांकि इससे वर्तमान का सिर्फ एक अनुभाग पेन्ड्रा ही अलग होने जा रहा है, पर यहां की अधिकांश आबादी नये जिले में चली जायेगी। मुंगेली जिले के गठन के बाद अचानकमार अभयारण्य का अधिकांश हिस्सा बिलासपुर से कट चुका है, नये जिले में अभयारण्य के बाकी हिस्से भी जा सकते हैं। फिलहाल शिवतराई तक का हिस्सा बिलासपुर के पास है। जिले में तखतपुर-कोटा, बिल्हा, मस्तूरी, बिलासपुर अनुभाग शेष रहेंगे। धार्मिक नगरी रतनपुर के बिलासपुर का हिस्सा बने रहने की संभावना है।
 जिला छोटे हो जाने के बावजूद बिलासपुर का महत्व बरकरार रहेगा। पेन्ड्रारोड में रेल कनेक्टिविटी है किन्तु वहां बहुत सी एक्सप्रेस ट्रेन नहीं रुकती हैं। हालांकि नया जिला बनने के बाद रेलवे वहां अपनी सुविधा का विस्तार कर सकता है। कटनी, दिल्ली रूट का यह प्रमुख स्टेशन है। पर्यटन स्थल अमरकंटक के लिए पर्यटक यहीं पर उतरते हैं। बिलासपुर संभागीय मुख्यालय भी है। पहले से पांच जिले बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर-चाम्पा, मुंगेली और रायगढ़ इसके अधीन हैं अब छह जिले हो जायेंगे। कोटा, मरवाही, पेन्ड्रा, गौरेला इलाके में कांग्रेस की अच्छी पकड़ रही है। हालांकि पार्टी से अलग होने के बाद जोगी परिवार को मतदाताओं ने तवज्जो दी है। विधानसभा, लोकसभा में किसी तरह का बदलाव फिलहाल नहीं होना है तथापि अलग जिला पंचायत के गठन हो जाने पर स्थानीय लोगों को राजनीति में भागीदारी का अधिक मौका मिलेगा। 

मुख्यमंत्री बघेल ने केवल एक जिले की घोषणा अपने 15 अगस्त के उद्बोधन में की है। हालांकि सारंगढ़, चिरिमिरी-मनेन्द्रगढ़, प्रतापपुर-वाड्रफनगर, पत्थलगांव, अम्बागढ़ चौकी, पृथक भाटापारा जिला बनाने की मांग लगातार होती रही है। चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस का रुख इन मांगों पर सकारात्मक भी रहा है। इन स्थानों में अब जिला बनाने की मांग जोर पकड़ सकती है। मनेन्द्रगढ़-चिरिमिरी में इसे लेकर एक बैठक भी नागरिक मंच ने 16 अगस्त को रखी है। 

रवीन्द्रनाथ टैगोर व माधव राव सप्रे की समृद्ध स्मृतियां 
घोषित नया जिला पेन्ड्रा-गौरेला-मरवाही प्रसिद्ध तीर्थ स्थल अमरकंटक की तलहटी पर बसा है। नर्मदा नदी, सोन नदी का उद्गम स्थल भी इसी की सीमा पर है। महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्मृतियों को पेन्ड्रा जीता है। सन् 1918 में यहां के सेनेटोरियम में वे अपनी पत्नी का इलाज कराने के लिए काफी दिनों तक रुके। संयुक्त मध्यप्रदेश के प्रथम समाचार पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन माधवराव ‘सप्रे’ ने पेन्ड्रारोड से सन् 1900 में शुरू किया था। यह करीब तीन साल तक छपा। दोनों विभूतियों की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए इलाके के कई संस्थान और समितियों को उनका नाम दिया गया है। यह बताना भी अप्रासंगिक नहीं है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद प्रदेश को पहला मुख्यमंत्री अजीत जोगी के रूप में इसी क्षेत्र से मिला। 

 

 


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