विशेष रिपोर्ट

Posted Date : 19-Jan-2019
  • बैंकों से नगद राशि नहीं मिलने का विकास कार्यों पर पड़ रहा असर

    किसानों को किस्तों में दिए जा रहे पैसे 20-25 दिनों से बंद है एटीएम  
    राज शार्दूल

    विश्रामपुरी, 19 जनवरी (छत्तीसगढ़)। जिला कोण्डागांव बैंकों में नगद राशि नहीं मिलने से व्यापारी किसानों के अलावा कर्मचारी-अधिकारी भी परेशान दिख रहे हैं। रोजमर्रा एवं जेब खर्च की राशि के लिए भी लोगों को यहां वहां भटकते देखा जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा खराब है। व्यापारियों एवं किसानों को ज्यादा ही परेशानी हो रही है कुछ व्यापारियों ने बताया कि वह बस्तर के बाहर खाता खुलवा कर यहां से रकम आरटीजीएस करवाने के पश्चात धमतरी, कांकेर एवं अन्य शहरों से राशि आहरण कर रहे हैं।
    विकास कार्यों पर भी दिख रहा असर
    क्षेत्र के लोग लगभग पखवाड़े भर से कैश की किल्लत को झेल रहे हैं। जिला मुख्यालय एवं शहरी क्षेत्रों में स्थिति तो कुछ ठीक-ठाक दिख रही है क्योंकि यहां अन्य उपभोक्ताओं के द्वारा जमा राशि जमा की जाती है, जिससे लेनदेन का कार्य कुछ हद तक चलता रहता है किंतु ग्रामीण क्षेत्र की बैंक की शाखाओं में बाहर से राशि बहुत कम जमा हो पाती है जिसके चलते यहां उपभोक्ताओं को नगद राशि देने में बैंक शाखाओं के पसीने छूट रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक एवं जिला सहकारी बैंक हितग्राहियों की समस्या को गंभीरता से लेते नहीं दिख रहे। बैंकों की लापरवाही का आलम यह है कि नगद राशि की भुगतान में लेट लतीफ तो करते हैं वहीं अन्य बैंकों के आए हुए चेक के कलेक्शन में भी लापरवाही बरत रहे हैं। जनपद पंचायत विश्रामपुरी से मिली जानकारी के अनुसार अतिरिक्त केंद्रीय सहायता योजना के अंतर्गत कलेक्टर कार्यालय के द्वारा 7 लाख 8 हजार 5 सौ आठ रुपए का चेक एक्सिस बैंक के नाम पर प्रदान किया गया था। यह चेक जनपद पंचायत को 20 दिसंबर को मिली थी जिसे दो दिन बाद जिला सहकारी बैंक की शाखा विश्रामपुरी में जमा किया गया। एक माह बाद भी उक्त राशि का अता पता नहीं है। जनपद से जुड़े अधिकारियों के द्वारा इस संबंध में बैंक से पूछताछ की जाती है तो संतोषजनक जवाब नहीं दिया जाता, जिससे वह परेशान हैं। वहीं पंचायत को यह राशि नहीं मिलने से विकास कार्य ठप पड़ा है। इसी प्रकार आदिवासी उपयोजना के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक को एक माह पूर्व लगभग 6 लाख का चेक दिया गया था। उक्त राशि को भी संबंधित के खाते में नहीं डाली गई है। राशि के लिए बैंक का कई चक्कर काट चुके हैं किंतु बैंक के अधिकारियों के उदासीन रवैया के चलते जनपद पंचायत एवं संबंधित ग्राम पंचायत को उक्त राशि नहीं मिल पा रही है।
    किश्तों में मिल रही है किसानों को धान की रकम
    क्षेत्र के किसान धान बेचकर नगद राशि के लिए तरस रहे हैं। शहरी क्षेत्र एवं जिला मुख्यालय के आसपास की स्थिति कुछ हद तक ठीक है किंतु ग्रामीण क्षेत्र एवं कस्बाई क्षेत्रों में किसान नगद राशि के लिए बेहद परेशान हैं। किसानों की स्थिति को देखें तो लगता है कि नोटबंदी जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। कई किसानों ने कहा कि ऐसी स्थिति नोटबंदी के समय भी देखी गई थी, नगर पंचायत क्षेत्र फ रसगांव विश्रामपुरी एवं माकड़ी क्षेत्र में किसानों के अलावा व्यापारियों एवं अधिकारी कर्मचारियों को भी नगद राशि के लिए भटकते देखा गया। जिला सहकारी बैंक के शाखा माकड़ी में किसानों को नगद राशि के लिए परेशान देखा गया। जहां लोग धान बेचकर राशि को किस्तों में ले जा रहे हैं। घर का कामकाज छोड़कर किसान बैंकों का चक्कर काट रहे हैं। कुछ लोग 35 किमी की दूरी तय कर कोण्डागांव  पहुंच कर एटीएम से रकम निकाल रहे हैं। माकड़ी एवं विश्रामपुरी के किसानों ने बताया कि उन्हें कभी 5 हजार तो कभी 10 हजार रुपये दिए जा रहे हैं। जिला सहकारी बैंक माकड़ी शाखा के अंतर्गत चंदापुर निवासी अनंतराम एवं सिवनी मारा गांव के सनत कुमार, मनसरी बाई उडीद गांव ने बताया कि वे धान तो बेच चुके हैं किंतु नगद राशि के लिए बैंक का चक्कर काटना पड़ रहा है। वे किस्तों में पैसे ले जा रहे हैं।
    अधिकारी भी रकम के लिए परेशान
    जनपद पंचायत विश्रामपुरी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी एके ठाकुर ने बताया कि वह स्वयं के बचत खाते से राशि निकालने के लिए विश्रामपुरी स्थित स्टेट बैंक गए थे। जहां राशि नहीं मिलने पर उन्होंने एटीएम का रुख किया तो पता चला कि एटीएम पखवाड़े भर से ज्यादा समय से बंद है। तत्पश्चात वे केशकाल स्थित एटीएम पर गए, जहां लंबी लाइन को देखते हुए वे बैरंग वापस लौटे तथा किसी से उधार लेकर अपना काम निपटाया। बांसकोट के संतोष साहू ने बताया कि पैसा नहीं मिलने से वे धमतरी में खाता खुलवा कर रखे हैं। यहां से रकम आरटीजीएस करने के पश्चात वह धमतरी जाकर रकम निकाल लेता है।
    बंद पड़े हैं एटीएम
    फ रसगांव एवं विश्रामपुरी स्थित एटीएम पखवाड़े भर से बंद पड़े हैं। करेंसी नहीं होने के कारण यहां रकम नहीं डाला जा रहा है। जिससे इन्हें बंद करना पड़ा है। फरसगांव  जो कि नगर पंचायत क्षेत्र है तथा नेशनल हाईवे पर स्थित होने के कारण एटीएम में लोग लेनदेन करते है। ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं को बेहद परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। फ रसगांव में यह स्टेट बैंक के द्वारा संचालित एक मात्र एटीएम है जिसके बंद होने से उपभोक्ताओं को खासकर बाहर से आने जाने वाले लोगों को काफ ी परेशानी हो रही है। विश्रामपुरी स्थित एटीएम भी लगभग 20 से 25 दिनों से बंद पड़ा है। यहां जिला सहकारी बैंक एवं ग्रामीण बैंक के द्वारा उपभोक्ताओं को एटीएम कार्ड जारी किया गया है। जिसे लेकर लोग भटकते रहते हैं तथा कई दफे एटीएम का चक्कर काट कर वापस लौट जाते हैं।
    करेंसी नहीं आने से है परेशानी
    कैश की समस्या के संबंध में भारतीय स्टेट बैंक प्रबंधन ने स्थिति में शीघ्र सुधार होने की उम्मीद जताई है। स्टेट बैंक की शाखा केशकाल के फ ील्ड ऑफि सर एवं विश्रामपुरी के प्रभारी विवेक स्वामी ने बताया कि करेंसी अभी बाहर से ही नहीं आ रहा है। संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण हेलीकॉप्टर से बस्तर में करेंसी पहुंचता है किंतु किन्ही कारणों से इस समय पहुंचने में देर हो चुकी है। जिसके चलते कुछ समस्या निर्मित हुई है जैसे ही करेंसी पहुंचेगा पूरी समस्या स्वत समाप्त हो जाएगी तथा लोगों को मनचाही रकम मिल पाएगी।

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Posted Date : 15-Jan-2019
  • विस चुनाव बहिष्कार की घोषणा के बाद राशि मंजूर पर काम शुरू नहीं
    बैकुंठपुर, 15 जनवरी। कोरिया जिले के बैकुंठपुर विधानसभा में आने वाला गांव बारबांध के आदिवासी परिवारों ने विघानसभा चुनाव का बहिष्कार की घोषणा के बाद जिला प्रशासन ने 1 करोड 20 लाख के निर्माण की स्वीकृति प्रदान की थी, परन्तु काम अब तक शुरू नहीं हो पाया है, जिसके बाद अब ग्रामीणों लोकसभा चुनाव के बहिष्कार का निर्णय लिया और ग्रामीणों का दल दिल्ली जाकर चुनाव आयुक्त और प्रधानमंत्री को ज्ञापन देने की तैयारी में जुटा हुआ है। 
    दैनिक छत्तीसगढ़ ने  10 अप्रैल 2010 को बैकुंठपुर विधानसभा के पहले पोलिंग ग्राम पंचायत जगतपुर के आश्रित ग्राम बारबांध की समस्याओं को लेकर खबर का प्रकाशन किया था, यहां के लोगों को राज्य सरकार ने मूलभूत सुविधाओं से महरूम रखा है। ग्रामीण सरकार से बेहद नाराज है। बीते सितंबर 2018 माह में बारबांध के 90 आदिवासी परिवार ग्रामीण एकत्रित हुए और बैठक कर फैसला लिया गया था कि वो अब आने वाले विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करेगें। ग्रामीणों को कहना है कि बीते कई सालों से वे कलेक्टर कार्यालय, जिला पंचायत से जनपद पंचायत के चक्कर लगा रहे है, परन्तु कोई उनकी सुनने को तैयार नही है। कुछ लोगों के यहां शौचालय निर्माण हुआ है जो बिना उपयोग के टूट गए है। जिला पंचायत  के सीईओ को इसकी जानकारी भी दी गई, परन्तु उन्होने उनकी बात सुनना भी ठीक नहीं समझा। ग्रामीण बताते हंै कि जनसमस्या शिविर में पहुंचे पूर्व मंत्री से जब ग्रामीणों ने समस्याओं की मांग की तो उनका कहना है कि लेने के समय तो चले आते हो, देते वक्त तुम लोग वोट नहीं देते हो। वहीं जिला प्रशासन ने 1 करोड 20 लाख के कार्यो की स्वीकृति प्रदान की, परन्तु काम शुरू नहीं हुआ, जिसके बाद ग्रामीणों में काफी रोष व्याप्त है। ग्रामीण अब लोकसभा चुनाव के बहिष्कार करने की बात कह रहे है। और वो सब इक्_े होकर दिल्ली जाकर चुनाव आयुक्त और प्रधानमंत्री को उनके कोरे विकास की गाथा सुनाने जाने का मन बना रहे हंै। 
    दरअसल, बारबांध में 90 घर है और सभी गोंड आदिवासी है, यहां से बीते दो चुनाव से गोंगपा का कब्जा रहा है। ऐसे में इस गांव के विकास के लिए कोई भी आगे नहीं आता है। विभिन्न समस्याओं को लेकर यहॉ के ग्रामीणों के द्वारा हर जगह शिकायत दी। जन समस्या निवारण शिविर से लेकर कलेक्टर जनदर्शन में लेकिन यहॉ के समस्या को दूर करने की दिशा में कभी पहल नहीं किया गया। ग्रामीण अनीता, प्रेमवती, सविता, चंद्रवती, कुसुम, दुर्गावती, इदंकुंवर, रजनी, शांति, श्यामवती, रामबाई, फूलमती, दीपा, रामबाई, रामप्रसाद, सुभाष, बनवारी, प्राणसिंह, आनंद सिंह, गोपाल सिंह आदि ग्रामीणों ने ग्राम बारबांध का उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि इस बार इस गांव वाले कोई भी मतदाता आगामी चुनाव में वोट नही डालेगा।
    ढोढी के पानी से 
    बुझती है प्यास
    बारबांध में एक भी हैंडपंप नहीं है, यहां तीन ढोढी है, जिनसे यहां के ग्रामीणों और मवेशियों की प्यास बुझती है। बारबांध में पीने के पानी के लिए ग्रामीण बेहद परेशान है। ग्रामीणों का कहना है सबसे ज्यादा परेशानी के दिन अब आने वाले है, क्योंकि बारिश का पानी भी ढोढी मे चला जाता है, जिससे उन्हें कई बार उल्टी दस्त जैसे गंभीर बीमारियों का सामना करना पडता है। इसके अलावा पीने के पानी के लिए उन्हें 2 से 3 किमी तक का सफर तय करना पडता है।
    खंभे आए और 
    वापस ले गए
    बारबांध में आजादी के बाद से बिजली नहीं हैै। पहाडी पर बसे इस गांव में एक साल पहले खंभे आए कुछ दिन वो यहां पडे रहे, अप्रैल माह में उन खंभों को ठेकेदार वापस ले गया, ग्रामीणों ने इसका विरोध किया, तो ठेकेदार ने कहा कि लोहे के खंभे यहां आएगें। वहीं गांव के नीचे हिस्से में कुछ दूरी पर खंभे खडे है परन्तु उनमें बिजली के तार नहीं है। ग्रामीणों की माने तो वे अंधेरे में ही जिंदगी गुजर बसर कर रहे है। मोबाइल जार्च करने उन्हें 8 किमी दूर जगतपुर आना पडता है। वहीं यहां प्रशासन ने सौर उर्जा की बिजली की भी व्यवस्था नहीं की है।
    दर्जनों बच्चों ने 
    छोड़ी पढ़ाई
    बारबांध में कक्षा 5वी तक विद्यालय है, इसके बाद यहां के छात्राओं को आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए 10 किमी दूर बरबसपुर या नागपुर जाना पड़ता है।
     जिस कारण दर्जनों छात्र छात्राओं ने अपनी पढ़ाई छोड दी है। पढाई छोड चुके नवजवान बताते है कि गांव में रोजगार है ना कृषि का काम, पूरा गांव मजदूरी के लिए चरचा, मनेन्द्रगढ़ और चिरमिरी जाता है।
    सरपंच सचिव कभी नहंी आते गांव
    ग्रामीण बताते है कि बारबांध में दो वार्ड है वार्ड नं. 10 और 11, यहां के पंच शंकरलाल और बल्ली सिंह का कहना है कि बारबांध की समस्याओं को लेकर सरपंच सचिव कभी गांव नहीं आते है। मंगलवार की बैठक को लेकर भी उन्हे बुलवाया गया था, परन्तु उनकी सुध लेने कोई नहीं आता है, गांव के दर्जनों मजदूरों की मजदूरी बकाया है, वे इसकी शिकायत मनरेगा लोकपाल से करने से जा रहे है।
    नहीं पहुंच पाती है 102, 108
    इस गांव में आने के लिए पहाड़ी के उपर से होकर गुजरना होता है, कच्च्ी सडक का निर्माण भी कई बार हुआ, परन्तु बारिश मे सड़क बह जाती है और बडे बडे पत्थरों के बीच यहां के लोगों को पैदल चल कर आना जाना पडता है। पहाड़ी पर काली मिट्टी होने के कारण बारिश में फिसलन से कई बार ग्रामीण घायल भी हो चुके है। वहीं गर्भवती माताओं को मुख्यमार्ग तक ले जाने के लिए चार लोगों की मदद से लेकर जाना पड़ता है, यहां 102 और 108 संजीवनी एक्सप्रेस नहीं पहुंच पाती है।
    कईयों की वृद्धापेंशन बंद
    गांव में लगभग एक दर्जन बुजूर्ग पुरूष और महिलाएं है, बीते कई माह से उन्हे वृद्धापेंशन नहंी मिली है, साथ कई परित्यक्ता और विधवा महिलाएं भी है जिनकी पेशन भी नही आ रही है। इसके अलावा कई ऐसी महिलाएं भी है जिन्हे पहले पेंशन मिलती थी परन्तु अब बंद हो गयी है ऐसी महिलाओं का राशन कार्ड भी काट दिया गया है।
    कोई योजना का नहीं मिल रहा है लाभ
    ग्रामीण बताते है कि गांव में घटिया शौचालय का निर्माण करवाया गया जिसके कारण कोई उपयोग नही करता है, कई लोगो का निर्माण भी नहीं कराया गया है। इसी तरह पीएम आवास एक दो लोगो को मिला है, परन्तु वो भी बीते दो साल से अधूरा है। कृषि विभाग के बीज कभी नहीं मिले है। दो दिन महिलाएं खून की कमी से यहां गुजर चुकी है।
    हैलिकॉप्टर से कर लिया सर्वे
    कोरिया जिले मे दो बार सूखा पडा, दोनों बार का मुआवजा यहां के ग्रामीणों को नहीं मिला, बीते 2016 के मुआवजे के लिए ग्रामीणों ने पटवारी से पूछा तो पटवारी का कहना है कि उसने हैलिकॉप्टर से उनकी फसलों को सर्वे किया है, किसी की फसल खराब नहीं हुई है इसलिए किसी को मुआवजा नहीं मिलेगा। लोगों ने बताया कि आज तक ऐसे कई परिवार है जिनका बंटांकन नहीं हो पाया है।

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Posted Date : 13-Jan-2019
  • विशेष संवाददाता

    रायपुर, 13 जनवरी (छत्तीसगढ़)। केन्द्र सरकार के तहत काम करने वाली देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई को छत्तीसगढ़ में बिना इजाजत काम करने के लिए दी गई छूट राज्य सरकार ने वापिस लेने की घोषणा की है। इसके पहले आन्ध्र और पश्चिम बंगाल इसी तरह का पत्र केन्द्र सरकार को भेज चुके हैं। आम तौर पर भारत के संघीय ढांचे में राज्य एक सामान्य अनुमति सीबीआई को दे देते हैं ताकि हर मामले पर अलग से इजाजत लेने की जरूरत न पड़े। 

    लेकिन छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार के इस आदेश के बाद जब भाजपा ने इसका जमकर विरोध किया, और यह कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सीबीआई से डर गए हैं, तो मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से यह बताया कि सीबीआई को दी गई अनुमति तो रमन सिंह की भाजपा सरकार ने 2012 में ही वापिस ले ली थी, और ऐसी चि_ी केन्द्र सरकार को भेजने के साथ-साथ उसका राजपत्र में प्रकाशन भी जुलाई 2012 में राज्य ने कर दिया था। 

    शासकीय प्रक्रिया के कुछ जानकार लोगों का यह मानना है कि राज्य जिस अनुमति को पहले ही वापिस लेकर उसका राजपत्र-प्रकाशन कर चुका था, उस अनुमति को दुबारा वापिस लेने के पत्र में पहले प्रकाशन का जिक्र होना चाहिए था। लेकिन इस कानूनी-तकनीकी मुद्दे से परे एक और बड़ा मुद्दा अभी बाकी है कि 2012 में ऐसी क्या स्थितियां थीं कि रमन सिंह सरकार ने सीबीआई के राज्य में आकर बिना इजाजत कोई जांच करने की छूट वापिस ली थी? 

    राज्य में काम कर रहे कुछ बड़े अफसरों का कहना है कि 2012 में केन्द्र में मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार थी, और उस वक्त सीबीआई कोयला-खदानों के आबंटन में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच कर रही थी, और छत्तीसगढ़ में भी कुछ कोयला खदानों के आबंटन जांच के घेरे में थे। इस राज्य में भी कुछ बड़े अफसरों से पूछताछ की जा रही थी, और तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह खुद ही खान मंत्री भी थे। उस वक्त राज्य के साथ-साथ केन्द्र सरकार के भी कई अफसरों से पूछताछ हो रही थी, और तत्कालीन कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता को बाद में अदालत से कैद भी हुई। उसी जांच के घेरे में छत्तीसगढ़ राज्य के कुछ बड़े अफसर भी थे। अब जब यह बात सामने आ रही है कि राज्य सरकार ने 2012 में सीबीआई को दी गई अनुमति वापिस ली थी, तो सरकार के कुछ जानकार लोग कोयला खदान-जांच की तारीखों को देखकर यह संबंध निकाल रहे हैं कि उस समय राज्य में जो लोग सीबीआई जांच और पूछताछ के घेरे में थे, क्या उनको बचाने के लिए रमन सरकार ने यह अनुमति वापिस ली थी? 

    लेकिन कुछ दूसरे जानकार लोगों का कहना है कि सीबीआई की जांच छत्तीसगढ़ की किसी कोयला खदान को लेकर नहीं थी, बल्कि राज्य के एक बड़े रिटायर्ड आईएएस अफसर से बयान लेने तक सीमित थी। इन सूत्रों का कहना है कि राज्य के एक चर्चित और विवादास्पद आईएएस अफसर बाबूलाल अग्रवाल के खिलाफ सीबीआई जांच करना चाहती थी लेकिन राज्य सरकार उसकी इजाजत नहीं दे रही थी। शायद इस अफसर को जांच से बचाने के लिए भी राज्य सरकार में कुछ लोगों ने वैसी तरकीब निकाली हो कि सीबीआई को मनचाही जांच से रोका जा सके। 

    अभी जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मीडिया ने सवाल किया, और उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि 2012 में रमन सिंह सरकार ने ही सीबीआई को खुली इजाजत वापिस लेने की चि_ी लिखी थी, और उसका राजपत्र में प्रकाशन किया था, तो भाजपा के पास इस पर कहने को कुछ बचा नहीं था। 

    लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक के रिकॉर्ड देखें, तो पहले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के अजीत जोगी के कार्यकाल में ही सीबीआई को खुली छूट देने की चि_ी केन्द्र सरकार को गई थी क्योंकि राज्यों से वैसी अनुमति देने की परंपरा रही है, और छत्तीसगढ़ ने मध्यप्रदेश द्वारा दी गई वैसी छूट की परंपरा निभाई, और सीबीआई के लिए अनुमति भेज दी थी। उस समय दिल्ली में एनडीए की अटल सरकार थी जिसके साथ अजीत जोगी का खुला और लंबा टकराव उनके पूरे कार्यकाल चलते रहा, लेकिन उन्होंने सीबीआई को इजाजत दी थी। दूसरी तरफ 2012 में रमन सिंह सरकार का दूसरा कार्यकाल चल रहा था, और केन्द्र में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार का। ऐसे में रमन सिंह सरकार ने सीबीआई को दी गई खुली छूट वापिस ले ली थी। 
    इस छूट को वापिस लेने के बाद अब भूपेश बघेल सरकार ने एक बार फिर यह अनुमति वापिस ली है जो कि 2012 के बाद से लागू थी ही नहीं, लेकिन कुछ मामलों में सीबीआई ने उसका इस्तेमाल किया था, और राज्य ने उस पर कोई आपत्ति भी नहीं की थी। लेकिन इस हफ्ते अनुमति वापिस लेने का यह पत्र केन्द्र सरकार को ठीक उस समय भेजा गया जब केन्द्र सरकार ने सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा को हटा दिया। इसे केन्द्र की मोदी सरकार का एक प्रतीकात्मक विरोध भी समझा जा सकता है क्योंकि दिल्ली में तीन लोगों की जिस कमेटी ने आलोक वर्मा पर फैसला लिया, उसमें लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने वर्मा को हटाने का विरोध किया था, और दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी और सुप्रीम कोर्ट के जज, जस्टिस सीकरी, ने वर्मा को हटाने की राय दी थी। 

    उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले भूपेश बघेल ने अपने पहले दिल्ली प्रवास के दौरान कांग्रेस पार्टी के अखबार नेशनल हेरल्ड के दफ्तर में जाकर अपनी एकजुटता जाहिर की थी क्योंकि केन्द्र सरकार ने नेशनल हेरल्ड से उसकी जमीन वापिस लेने का फैसला ले चुकी थी। ऐसे में भूपेश बघेल पहले और अकेले कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे जो कि अपना राजनीतिक रूख बताते हुए नेहरू के शुरू किए हुए इस अखबार का साथ देने वहां पहुंचे थे। इस बार सीबीआई से छत्तीसगढ़ में जांच की सामान्य छूट वापिस लेने का उनका फैसला उस वक्त आया है जब सीबीआई प्रमुख को हटाने के मुद्दे पर कांग्रेस और मोदी आमने-सामने हैं। 
    उल्लेखनीय है कि कोई राज्य अगर केन्द्र सरकार से सीबीआई को दी गई ऐसी खुली छूट वापिस भी लेते हैं, तो उससे दो किस्म के मामले प्रभावित नहीं होते। जिन मामलों की जांच जारी है, वे चलते रहते हैं। और जो मामले सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्टके आदेश पर जांचे जा रहे हैं, उनमें कोई राज्य सीबीआई को अपने इलाके में नहीं रोक सकते। इसलिए भूपेश बघेल सरकार का यह ताजा फैसला आगे किसी जांच पर ही लागू होगा।  

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Posted Date : 13-Jan-2019
  • ढाई महीने मेें समर्थन मूल्य पर साढ़े 61 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी

    छत्तीसगढ़ संवाददाता
    रायपुर, 13 जनवरी।
    प्रदेश की सहकारी सोसायटियों और खरीदी केंद्रों में करीब ढाई महीने में साढ़े 61 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी हो चुकी है और वहां अभी भी हर रोज करीब दो लाख मीट्रिक टन धान की आवक जारी है, जो पिछले साल इन्हीं दिनों की तुलना में दोगुनी है। अफसरों का कहना है कि धान खरीदी के लिए करीब 15 दिनों का समय और बाकी है। ऐसे में इस साल धान खरीदी का आंकड़ा करीब 80 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है। 

    प्रदेश के करीब दो हजार केंद्रों में समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी एक नवंबर से जारी है। शुरूआत में वहां धान की आवक हर रोज करीब 40-50 हजार मीट्रिक टन रही। बाद में धान की आवक वहां हर रोज एक लाख से ढाई लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गई, जो पिछले हफ्ते तक जारी रही। चालू हफ्ते में धान की आवक करीब 50 हजार मीट्रिक टन घटकर करीब दो लाख मीट्रिक टन के आसपास बनी रही। पिछले साल इन्हीं दिनों में केंद्रों में हर रोज करीब एक लाख मीट्रिक टन धान की आवक थी। खरीदी से जुड़े अफसरों का मानना है कि धान की आवक फिलहाल दो लाख मीट्रिक टन के आसपास बनी रहेगी। अंतिम हफ्ते में थोड़ी कमी आ सकती है। 

    अपेक्स बैंक से जुड़े अफसरों का कहना है कि ढाई महीने में साढ़े 61 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी पूरी कर ली गई है।  समर्थन मूल्य पर धान की यह खरीदी 31 जनवरी तक 75 से 80 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है, जो सरकार का लक्ष्य है। उनका कहना है कि नई सरकार आने के बाद किसानों में उत्साह देखा गया। वे 25 सौ रुपये प्रति क्विंटल की दर पर बिक्री के लिए धान लेकर पहुंच रहे हैं, हालांकि यह राशि फिलहाल उनके खाते में जमा नहीं हो रही है। उन्हें विश्वास है कि सरकार की घोषणा के मुताबिक बढ़ी हुई राशि उनके खाते में जमा हो जाएगी। 

    18 लाख टन धान जाम
    प्रदेश की सहकारी सोसायटियों में धान खरीदी के साथ वहां उसका उठाव भी किया जा रहा है। संबंधित ठेकेदार खरीदे गए धान का उठाव कर उसे मिलों और गोदामों तक पहुंचा रहे हैं। इसके बाद भी खरीदी केंद्रों में करीब 18 लाख मीट्रिक टन धान जाम है। अफसरों का कहना है कि यह धान करीब हफ्ते भर का है और उसका उठाव जल्द कर लिया जाएगा। 

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Posted Date : 12-Jan-2019
  • कोण्डागांव, 12 जनवरी। जिला अस्पताल आरएनटी के क्षय विभाग ने एक ऐसे मासूम में बलगम पॉजिटिव टीवी पाया है, जिसकी माता विक्षिप्त हो चुकी है, और उसके अपने ही पिता ने भीख मांगने के लिए सड़क पर छोड़ दिया। भीख मांगते हुए वह मुम्बई व मुजफ्फरपुर के चमड़े की फैक्ट्री में काम करने लगा। यहीं से उसे टीवी जैसी जानलेवा बीमारी हो गई।  हाल में जब वह कोण्डागांव के रविन्द्र नाथ टैगोर जिला अस्पताल पहुंचा तो उसे बेहतर डाईट के साथ उपचार शुरू कर दिया गया है।

     बलगम पॉजिटिव टीवी से ग्रसित मासूम सद्दाम (10) पिता मोहम्मद मुमताज बिहार  के मुजफ्फरपुर क्षेत्र के एक गांव का रहने वाला है। उसके बारे में उसके मौसा मोहम्मद इसराइल  व मौसी सनीमा ने बताया कि, समीना की बहन सलीमा खातून की कुछ साल पहले दिमागी हालत खराब हो गई। इसके बाद से उनका पूरा परिवार मानो उजड़ ही गया। पिता मोहम्मद मुमताज ने दूसरा निकाह कर लिया।   10 वर्षीय मासूम सद्दाम को पिता ने  घर से निकालते  भीख मांग कर  जीने की सीख दे दी।  सद्दाम  मुजफ्फरपुर की सड़कों पर भीख मांगने लगा। गुजारा नहीं होने पर उसने चमड़े की एक निजी कम्पनी में काम करना शुरू कर दिया। नन्हीं सी जान चमड़े की गंदगी और बदबू आखिर कब तक सह पाता, आखिर कार उसके फेफड़े में पानी भर गया, और वह ट्यूबरक्लोसिस से ग्रसित हो गया।
     तब किसी   ने सद्दाम के कोण्डागांव निवासी मौसा-मौसी मोहम्मद इसराइल-सनीमा को इस बात की सूचना दी। फिर क्या था, मौसा इसराइल ने अपने एक बेटे को भेज सद्दाम को कोण्डागांव बुला लिया। 
    रेयर केस में मिलता है बच्चों के 
    बलगम पॉजिटिव टीवी
     किसी व्यस्क में ट्यूबरक्लोसिस (टीवी) या क्षय रोग का होना लाजमी है। लेकिन मेडिकल टम्र्स में 10 साल के मासूम में बलगम टीवी का पॉजिटिव होना थोड़ा चौकाने वाला है। इसके बाद यदि बच्चे का डाईट मेंटेन नहीं हो, खुले में रहना खाना हो रहा हो साथ ही कोई केयर करने वाला भी ना हो तो ऐसे बच्चे को उपचार के दौरान विशेष देख रेख की आवश्यकता होती है। 
    सप्ताह भर पूर्व जब सद्दाम के मौसा मोहम्मद इसराइल को उसकी सूचना मिली तो उन्होंने उसे अपने पास बुला लिया। कोण्डागांव पहुंचने के बाद 10 जनवरी को मासूम को जिला अस्पताल आरएनटी में स्वास्थ्य परीक्षण किया गया, जहां जांच के बाद टीवी बलगम पॉजिटिव पाया गया। फिलहाल उसकी देखरेख के लिए परिजन और स्थानीय प्रशासन कोई कमी नहीं रख रहा।
    हवाईजहाज से मांॅ को ले गए फादर
     यू तो सद्दाम मात्र 10 वर्ष का है और उसकी जूबान अभी साफ नहीं है। वह तोतराते हुए जुबान से अपनी मॉ सलीमा खातून के बारे में बताया कि, वह कुछ साल पहले दिमागी तौर पर बीमार हो गई। इसके बाद कोई फादर आए और उसकी मॉ को हवाईजहाज से ईलाज के नाम से कहीं ले गए। सलीमा खातून के बारे में परिवार के किसी भी सदस्य को कोई जानकारी नहीं है। इस बारे में जब संबंधित संस्था से भी पूछ ताछ की जाती है तो वे भी इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते है।
    टीबी पीडियाट्रिक कोर्स के साथ 
    दिया जा रहा पोषण आहार - डॉ. राठौर
    मासूम सद्दाम खान के मामले पर जिला क्षय नियंत्रण अधिकारी डॉ. सूरज सिंह राठौर ने बताया कि, सद्दाम को कल उसके मौसा जांच के लिए लेकर पहुंचे थे। उसके मौसा के अनुसार सद्दाम को भूख ना लगना, खाना नहीं खाना और लगातार वजन कम होना जैसी शिकायत थी। इसके अलावा चर्चा के दौरान उसके मौसा ने बताया था कि, वह दूरस्थ शहरों में मेहनत मजदूरी कर जीवनयापन करता था। इस शिकायत पर उसका सीबी नेट के माध्यम से बलगम जांच किया गया, जहां टीवी पॉजिटिव पाया गया। टीवी पॉजिटिव पाए जाने पर टीबी पीडि़त बच्चों को दिए जाने वाला टीबी पीडियाट्रिक कोर्स शुरू किया गया है। इसके अलावा कुषोषण मुक्ति के लिए पोषक आहर का सप्लीमेंट भी दिया जाएगा, ताकि कुपोषण के साथ 6 माह में टीवी मुक्त हो जाए।

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Posted Date : 10-Jan-2019
  • रायपुर, 10 जनवरी (छत्तीसगढ़)। पिछली सरकार में प्रदेश के सरकारी टेंडरों में भारी गड़बड़ी का खुलासा हुआ है। महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि करीब 19 सौ से अधिक टेंडरों में ठेकेदारों द्वारा एक ही कम्प्यूटर का उपयोग कर ऑनलाइन टेंडर भरा गया। करीब 46 सौ करोड़ के इन टेंडरों में ठेकेदारों द्वारा कार्टेल बनाकर टेंडर हासिल किया गया। महालेखाकार ने इसकी स्वतंत्र एजेंसी से जांच की अनुशंसा की है। 
    रिपोर्ट में यह कहा गया कि प्रदेश में चिप्स के ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली के जरिए ऑनलाईन टेंडर का नियम है। यह तथ्य प्रकाश में आया है कि विभागों द्वारा चिप्स के चार मॉड्यूल को आंशिक रूप से अपनाया गया है। शेष चार मॉड्यूल का कस्टमाइजेशन के अभाव में उपयोग नहीं हो रहा था। यह बात सामने आई है कि पीडब्ल्यूडी ठेकेदारों को भुगतान के लिए ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली का उपयोग न कर ई-वक्र्स पोर्टल का उपयोग किया जा रहा था। 
    यह कहा गया कि प्रणाली में सुधार नहीं होने के कारण ई-वक्र्स पोर्टल का उपयोग किया गया। इसी बीच राज्यशासन की सशक्त समिति के एक निर्देश के आधार पर चिप्स ने ऑनलाईन प्रसंस्करण के लिए निविदाओं की प्रारंभिक सीमा 20 लाख से घटाकर 10 लाख करने के लिए सभी विभागों को निर्देशित किया था, लेकिन पीडब्ल्यूडी और डब्ल्यूआरडी के प्रमुख अभियंताओं ने अपने संभागों में 10लाख और उससे अधिक मूल्य के सभी टेंडरों को नवीन ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली के माध्यम से आमंत्रित करने के निर्देश जारी नहीं किए। इसके परिणाम स्वरूप मई-2016 और जून-2017 के बीच सभी 48 पीडब्ल्यूडी संभागों और 18 डब्ल्यूआरडी संभागों ने 108 करोड़ 35 लाख के 658 टेंडर मैनुअल रूप से आमंत्रित कर दिए। जिनमें से प्रत्येक में 10 लाख से 20 लाख के बीच थी। इस तरह नवीन ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली को अंदेखा किया गया। 
    डब्ल्यूआरडी सचिव ने कहा कि अभिरूचि की अभिव्यक्ति और आरएफपी के माध्यम से कराए गए कार्यों के अतिरिक्त 10 लाख से ऊपर की कोई भी निविदा मैनुअल रूप से जारी नहीं की गई थी। महालेखाकार ने डब्ल्यूआरडी सचिव के जवाब को गलत ठहराया है। यह बताया कि मई-2016 और जून-2017 के बीच डब्ल्यूआरडी द्वारा 34 निविदाएं मैनुअल रूप से आमंत्रित की गई थी। जिनमें प्रत्येक 10 लाख से अधिक मूल्य की थी। इसका विभाग की तरफ से कोई स्पष्टीकरण नहीं किया जा सका। एक तथ्य यह भी है कि ठेकेदारों द्वारा विभागीय अधिकारियों के साथ एक ही कम्प्यूटर का उपयोग किया गया और समान प्राथमिक और साझेदार की ईमेल आईडी का प्रयोग किया गया। महालेखाकार की रिपोर्ट के आधार पर डब्ल्यूआरडी द्वारा बाद में टेंडर को निरस्त किया जाना, इसका प्रमाण भी है। 
    महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि 17 विभागों द्वारा 4601 करोड़ के 1921 टेंडरों में अधिकारियों और निविदाकारों द्वारा एक ही मशीन का उपयोग किया गया है। इसकी पूरी स्वतंत्र एजेंसी से जांच की अनुशंसा की है। 

     

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Posted Date : 08-Jan-2019
  • किसी ने बकरे बेच दिए तो किसी ने कर्ज करके, घटिया पंप की मरम्मत करते निकल रहा दम

    बैकुंठपुर, 8 जनवरी (छत्तीसगढ़)। कोरिया जिले में डीएमएफ की राशि से किसानों के नाम पर योजना बनी। किसानों के  हर समूह को 1 लाख 36 हजार रू की राशि से नलकूप और पंप लगाकर देना था। पर किसानों से बोर खनन के नाम पर 15 हजार रुपये वसूले गए। एक किसान ने तो अपने बकरे बेचकर रुपये दिए तो एक ने कर्ज करके। वहीं घपला इस तरह कि एकल किसानों को समूह बना दिया गया। लगाए गए पंप इतने घटिया कि इसकी मरम्मत में ही किसान का दम निकल रहा है, काफी खर्च कर चुके हैं। इस मामले में बड़ी बात यह भी है कि जिस विभाग को इस कार्य की जिम्मेदारी दी गई है उसे इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है। पिछले वर्ष 46 किसानों का, और इस वर्ष 84 किसानों का चयन किया गया है। दोनों वर्ष की राशि 1 करोड़ 76 लाख 80 हजार होती है। 
    इस संबंध में कलेक्टर नरेंद्र दुग्गा का कहना है कृषि विभाग के ई एंड एम के द्वारा करवाया जा रहा है। पैसे लेना गलत है, मैं इसकी जांच करवाऊंगा।
    वहीं कृषि संचालक डीके रामटेके का कहना है हमारे पास कई किसानों के फोन आ रहे हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष का भी फोन आया था, हमने किसी  को भी नलकूप खनन का कार्यादेश नहीं दिया है। सूची के किसानों के नाम तो विभाग ने ही दिए होंगे, पर कौन खोद रहा है इसकी कोई जानकारी विभाग के पास नहीं है। 
    खडग़वां के विकास खंड कृषि विस्तार अधिकारी श्री मिश्रा का कहना है कि मैंने 2 जनवरी 2018 को आयोजित बैठक में किसानों के यहां की जा रही बोंरिग के संबंध में कृषि संचालक, एसडीओ सभी को बताया कि उनके क्षेत्र में ऐसा बीते वर्ष भी हुआ था और इस वर्ष भी जारी है। सभी ने मामले में अनभिज्ञता जताई। उन्हें भी इस मामले में कोई जानकारी नहीं है। हमारे पास और किसान आ रहे हैं, बोरिंग करने वाली कंपनी इसे कृषि विभाग से करना बता रही है। इधर, सामाजिक कार्यकर्ता व अधिवक्ता चंद्रभूषण चक्रधारी का कहना है कि मामले में वो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से शिकायत करेंगे। उन्होंने जिला प्रशासन से वर्तमान में हुए 84 किसानों के बोरिंग की राशि के भुगतान पर रोक की मांग की है। नहीं लगाए जाने पर आंदोलन की चेतावनी दी है।
    जिला प्रशासन ने 2017-18 में डीएमएफ के तहत कृषि विभाग को खडगवां के बचरापोडी क्षेत्र में 46 किसानों का नलकूप खनन और सबमर्सिबल पंप स्थापना की योजना बनाई, इसके लिए प्रत्येक किसान के लिए 1 लाख 36 हजार रू की राशि रखी गयी। जिसमें कुल 62 लाख 56 हजार रू की राशि स्वीकृत की गई, परन्तु इसकी जानकारी कृषि विभाग के अधिकारियों को नहीं दी गई, न ही किसी भी प्रकार का पत्राचार किया गया। बस, बोंरिग कम्पनी का एक व्यक्ति अपने को जिले के आला अधिकारी का व्यक्ति बताकर किसानों के पास पहुंचे। ग्राम बचरा के उदरसाय बताते हैं रात में बोरिंग की गाड़ी लेकर आए और कहा कि 15 हजार दो बोरिंग करना है। उनकी पत्नी बताती है कि बच्चों की पढ़ाई के लिए उन्होंने 4 बकरे रखे थे उन्हें  बेचकर 15 हजार रू गाड़ी वाले को देना पड़ा। वहीं दो से ज्यादा बार पंप खराब हो चुका है, उनका समूह बंद हो चुका है। 
    यहीं के अमीर साय बताते हैं कि उन्होंने 14 हजार रू ही दिए क्योंकि उनके पास एक हजार कम था, पंप एक बार खराब हुआ है उनका कोई समूह नहीं है। यहीं के गुलाब सिंह बताते हैं कि उन्होंने 15 हजार रू जुगाड़ करके गाड़ी वाले को दिए। 
    (बाकी पेजï 5 पर)
    डायमंड कम्पनी के नाम से डुप्लिकेट पंप लगा दिया है, 4 बार से ज्यादा बार खराब हो चुका है, अभी तक वो पंप को बनवाने में 12 हजार से ज्यादा खर्च कर चुके हैं। वहीं ग्राम तोलगा के जंगसाय के दोनों पुत्रों ने बताया कि उनसे भी 15 हजार रू नगद लिया गया, बताया गया कि 15 हजार में पंप की खुदाई हो रही है। सभी किसानों ने बताया कि बमुश्किल 150 से 200 फीट की खुदाई की गई और एक-एक केसिंग पाईप डाला गया। वहीं इस वर्ष अभी 84 किसानों के घर जा जाकर पंप की खुदाई जारी है। इसके लिए 1 करोड़ 14 लाख 24 हजार रू की स्वीकृति डीएमएफ के तहत ही दी गई है। 
    समूह के नाम पर स्वीकृति
    डीएमएफ की राशि किसानों के नाम पर खर्च करने के लिए इस नलकूप खनन के लिए किसानों का समूह दिखाया गया, परन्तु मौके पर किसी भी किसान का कोई समूह नहीं है, किसान बताते हैं कि वे किसी भी समूह में खेती नहीं करते है, सब अपने अपने खेत में सब्जी और धान उगाते हैं। उनसे जो राशि ली गई है उन्होंने खुद दी है, ना कि समूह के माध्यम से। 
    खनन राशि पीएचई से ज्यादा  
    वर्ष 2015-16 में तत्कालिन जिला प्रशासन ने डीएमएफ के तहत जो नलकूप खनन की स्वीकृति प्रदान की थी वो 1 लाख 20 हजार रू की थी, दूसरी ओर वर्तमान जिला प्रशासन 16 हजार रू ज्यादा की राशि देकर 1 लाख 36 हजार में स्वीकृति प्रदान कर रहा है, तब इसकी खुदाई  पीएचई विभाग कर रहा था। बीेते दो साल से इसका जिम्मा कृषि विभाग को दिया गया है, जबकि विभाग का कहना है कि वह खुदाई नहीं कर रहा है।
    नहीं है कृषि विभाग में ई एंड एम विभाग
    निर्माण एजेन्सी में इलैक्ट्रिक लाईट एंड मशीनरी विभाग अलग होता है, लोक निर्माण विभाग, आरईएस और जल संसाधन विभाग का अपना ई एंड एम विभाग अलग है, जो भवनों , डेमों में इलेक्ट्रिक लाईट एंड मशीनरी से जुड़े कार्य करता  है, इसके अलग अधिकारी होते हंै। परन्तु कृषि विभाग में ई एंड एम विभाग नहीं है, कृषि उपसंचालक ने भी कहा कि ऐसा कोई विभाग कृषि विभाग में नहीं है। 

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Posted Date : 08-Jan-2019
  • फ्लोराइड का कहर, 40 फीसदी 40 बरस में बूढ़े
    जगदलपुर, 8 जनवरी (छत्तीसगढ़)। बीजापुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 60 किमी दूर भोपालपट्नम का गेर्रागुड़ा बस्तर का एक ऐसा गांव है, जहां पर युवा 20 से 25 वर्ष की आयु में ही लाठी लेकर चलने को मजबूर  हैं और 40 साल के पड़ाव तक बूढ़े होने लग जाते हैं। पूरा गांव फ्लोराइड की मार सह रहा है। साल भर पहले  साफ पानी के लिए हर घर नल कनेक्शन तो दिया गया पर आपूर्ति अब तक नहीं हो सकी है।
    मामले में सीएमएचओ डॉ बीआर पुजारी का कहना है कि ग्रामीणों के शिकायत के बाद गांव में कैम्प लगाकर लोगों का इलाज किया गया था और कुछ लोगों को बीजापुर भी बुलाया गया था, चूंकि इस गांव के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण हड्डियों में टेड़ापन, कुबड़पन और दांतों में पीलेपन के साथ सडऩ की समस्या आती है। जिसका इलाज सिर्फ  शुद्ध पेयजल से ही हो पाएगा। शिकायत के बाद गांव के अधिकांश हैंडपंपों को सील करवा दिया गया था।
    वहीं फ्लोराइड समस्या के निदान के लिए पीएचई द्वारा निर्मित वाटर ओवरहेड टैंक से पेयजल आपूर्ति ना होने की बात पर ईई जगदीश कुमार का कहना है कि विभाग द्वारा टैंक के निर्माण पश्चात पंचायत को हैण्डओवर किया जा चुका है। आपूर्ति  की जिम्मेदारी अब पंचायत की है फि र भी अगर पानी की सप्लाई नहीं की जा रही है तो विभाग इसे अवश्य संज्ञान में लेगा।
    भोपालपट्नम के गेर्रागुड़ा का पानी जहर साबित हो रहा है।  यहां के हैंडपंपों और कुओं से निकलने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण पूरा गांव का गांव समय से पहले ही अपंगता के साथ-साथ लगातार मौत की ओर बढ़ रहा हैं।इस गांव में आठ वर्ष की  उम्र से लेकर 40 वर्ष तक का हर तीसरे व्यक्ति में कुबड़पन, दांतों में सडऩ, पीलापन और बुढ़ापा नजर आता है। 
    यहां के सेवानिवृत्त शिक्षक तामड़ी नागैया, जनप्रतिनिधि नीलम गणपत और फ्लोराइय युक्त पानी से पीडि़त तामड़ी गोपाल का कहना है कि गांव में पांच नलकूप और चार कुएं हैं, इनमें से सभी नलकूपों और कुओं में फ्लोराइड युक्त पानी निकलता है।
    लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने सभी नलकूपों को सील कर दिया था लेकिन गांव के लोग अब भी दो नलकूपों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि हर व्यक्ति शहर से खरीदकर पानी नहीं ला सकता है, इसलिए यहीं पानी पीने में इस्तेमाल होता है। गर्मी के दिनों में कुछ लोग तीन किमी दूर इंद्रावती नदी से पानी लाकर उबालकर पीते हैं।  
    तामड़ी नागैया का कहना है कि  तीस साल पहले तक यहां के लोग कुएं का पानी पीने के लिए उपयोग किया करते थे, परंतु जब से नलकूपों का खनन किया गया तब से यह समस्या विराट रूप लेने लगा और अब स्थिति ऐसी है कि गांव की 40 फ ीसदी आबादी 25 की उम्र में लाठी के सहारे चलने, कुबड़पन को ढोने और 40 वर्ष की अवस्था में ही बुढ़े होकर जीवन जीने को मजबूर है। लगभग 60 फ ीसदी लोगों के दांत पीले होकर सडऩे लगे हैं।
    पूरा गांव  चट्टान पर बसा हुआ है  बताया जा रहा है कि इसी वजह है कि पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है और इस भू गर्भ से निकलने वाला पानी यहां के ग्रामीणों के लिए जहर बना हुआ है।
    जानकार बताते हैं कि वन पार्ट पर मिलियन यानि पीपीएम तक फ्लोराइड की मौजूदगी इस्तेमाल करने लायक है, जबकि पीपीएम को मार्जिनल सेप माना गया है। डेढ़ पीएम से अधिक फ्लोराइड की मौजूदगी को खतरनाक माना गया है और गेर्रागुड़ा में डेढ़ से दो पीपीएम तक इसकी मौजूदगी का पता चला है।
    इस समस्या से निजात पाने के लिए एक साल पहले पीएचई विभाग ने इस गांव में एक ओवरहेड टैंक का निर्माण कर गांव के हर मकान तक पाइप लाइन विस्तार के साथ नल कनेक्शन भी दे रखा है, परंतु  अब तक  आपूर्ति नहीं हुई है। गांव के संपन्न लोग किसी तरह भोपालपटनम स्थित वाटर प्लांट से शुद्ध पेयजल खरीदकर  लेते हैं, परंतु गरीब तबके के लोग अब भी फ्लोराइड युक्त पानी पीने मजबूर हैं।

     

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Posted Date : 06-Jan-2019
  • 10 हजार से ज्यादा रोजी की तलाश में बाहर
    गोरेलाल तिवारी
    कसडोल, 6 जनवरी (छत्तीसगढ़)।
    कसडोल तहसील क्षेत्र के 230 ग्रामों से अब तक अनुमानित 10 हजार से अधिक गरीब मजदूर खाने-कमाने दीगर प्रांत चले गए। जिससे गांवों के कई घरों में ताले लगे नजर आते हैं। सरकारी मजदूरी योजना के अभाव में गरीबों को रोजी-रोटी की तलाश में शहरी क्षेत्रों तथा अन्य प्रांतों में परिवार सहित जाने के लिए मजबूर हंै। 
    शहीद के गांव सहित वन क्षेत्रों से सर्वाधिक
    कसडोल तहसील क्षेत्रों के प्राय: सभी क्षेत्रों से कमाने-खाने दीगर प्रांत जाने की खबर है, किंतु मैदानी क्षेत्रों के बजाय वन क्षेत्रों से सर्वाधिक जाने की खबर है। मैदानी क्षेत्रों के कसडोल, पीसीद, सेल, असनीद, कोसमसरा, सेमरिया, मोहतरा, चरौदा, सर्वा, टुंड्रा आदि 50 ग्रामों से 3 हजार से अधिक लोग जा चुके हैं।
     कसडोल से ली गई जानकारी के अनुसार 500 से अधिक गरीब मजदूर किसान जा चुके हैं। सबसे ज्यादा शहीद वीर नारायण सिंह के सोनाखान, भुसड़ीपाली, नवागांव, अर्जुनी, महराजी, कंजिया, चिखली, देवतराई पंचायतों के 30 ग्रामों से अनुमानित 2 हजार से ऊपर मजदूर परिवार जा चुके हंै। इसी तरह राजदेवरी, थरगांव, बिलारी, छाता, नगरदा, कुरमाझर, कुशगढ़, कुशभांठा, सोनपुर, बरपानी, चांदन, अमरूवा, रंगोरा, दुमरपाली, बया इलाके के 42 गांव से बड़ी संख्या में जाने की खबर है। इसी तरह जंगल क्षेत्र के ही बार अभ्यारण्य क्षेत्र के बार चरौदा, आमगांव, ढेबी, मुड़पार, रवान, भिंभोरी 22 गांव तथा गुडागढ़, बोरसी, बगार, परसदा, पुटपुरा, अर्जुनी, बलदाकछर 25 गांवों से भी मजदूरों के दीगर प्रांत जाने की खबर है। कुल मिलाकर उक्त ग्रामों से 5 से 7 हजार मजदूरों के जाने का अनुमान है।
    रोजगारमूलक कामों का अभाव
    क्षेत्र में मजदूरों के अन्य प्रांत जाने की असली वजह रोजगार मूलक कार्यों का पूर्णत: अभाव है। एक तो इस क्षेत्र में सरकार की कोई योजना नहीं है, जिसमें गरीब मजदूर परिवारों को रोजी के व्यापक काम मिल सके। शासकीय विभागों जल संसाधन, लोक निर्माण आदि सभी विभागों में ठेके प्रथा से काम कराया जाता है। जिसमें ठेकेदारों द्वारा मशीनों का उपयोग कराया जाता है। 
    वन विभाग में पिछले साल कैम्पा आदि अन्य मदों से करोड़ों का काम कराया गया। कटवाझर, डाढ़ा खार, खुदमुड़ी, परसदा, पुटपुरा, मुढ़ीपार, अर्जुनी, बलदाकछार, औरई, बरबसपुर आदि ग्रामों में करोड़ों के काम हुए। बताया गया कि सभी ग्रामों में गरीब मजदूर खाली बैठे रहे, किन्तु उन्हें काम नहीं दिया गया। यहां तक कि वन परिक्षेत्र सोनाखान, अर्जुनी, देवपुर, लवन, कोठारी बार में मिट्टी के काम को भी जेसीबी से कराया गया है। यही वजह है कि गरीब लघु एवं सीमांत कृषक मजदूर परिवार जिन्हें रोज कमाना और रोज खाना होता है, काम के तलाश में अन्यत्र जीवकोपार्जन के लिए घर छोड़कर जाना पड़ता है।
    क्षेत्र से 10 हजार से अधिक मजदूर अन्य प्रांत जा चुके हैं। क्षेत्र में श्रम मूलक विकास कार्यों का पूर्णत: अभाव है। यही वजह है कि काम की तलाश में प्रदेश के शहरी क्षेत्रों तथा व्यापक स्तर पर अन्य प्रांतों दिल्ली, गुजरात, यूपी, हरियाणा, पंजाब, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, आंध्रप्रदेश आदि में जाने की जानकारी मिली है। 
    कसडोल तहसील क्षेत्र में कसडोल, राजादेवरी, गिधौरी में जहां थाना है, वहीं गिरौदपुरी, सोनाखान बया लवन में पुलिस चौकी स्थापित है। इसके अलावा असनीद, नवगांव, देवपुर, महराजी, अर्जुनी, सलिहा, कुम्हारी, बरपानी, चांदन, देवगांव, कोरकोटी, पकरीद, चरौदा, बार रवाना बडग़ांव, दोन्द, अवरई, बरबसपुर, ठकुरदिया, कोसमसरा आदि चप्पे-चप्पे पर वन विभाग का बेरियर है। जिसके बावजूद मजदूर दीगर प्रांत जा रहे हैं।  
    पूस पुन्नी के बाद भारी तादाद में अन्य प्रांत जाने की तैयारी
    क्षेत्र में मजदूर दलालों का गांव-गांव गरीब परिवारों से लगातार संपर्क होने सैकड़ों दलालों के सम्पर्क की खबर है। क्षेत्र से लगातार गांव पहुंच चारपहिया वाहनों, मेटाडोर से कमाने खाने अन्य जगह जाने की खबर है। ग्रामीण अंचलों से मिली खबर के अनुसार दलालों तथा मजदूरों के बीच गोपनीय सांठगांठ होती है कि रात को वाहन मुहैया कराकर रातोंरात रेलवे स्टेशन पहुंचकर अन्य प्रांत भेजने सफल हो जाते हैं। 
    छत्तीसगढ़ का प्रमुख त्यौहारों में एक छेरछेरा पुन्नी 21 जनवरी के बाद हजारों की क्षेत्र से जाने की तैयारी को अंजाम दिया जा रहा है। सैकड़ों दलाल गांव-गांव गरीब मजदूरों के घर पहुंचकर तैयार करने में जुटे हुए हैं। 
    गौरतलब हो कि कसडोल तहसील क्षेत्र में करीब 50 हजार पंजीकृत कृषक मजदूर हैं, जो लघु एवं सीमांत कृषक की गणना में आते हैं। मजबूरी में उनको घर बार छोड़कर अन्य प्रांतों में रोजी रोटी की तलाश में जाना पड़ता है। पंचायतों तथा जनपद पंचायत में मजदूरों के जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं है। मजदूरों को दलाल गैरकानूनी रूप से प्रति वर्ष दीगर प्रांत भेजते हैं, जिसमें मजदूरों का शोषण किया जाता है।

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