विशेष रिपोर्ट

Posted Date : 14-Nov-2018
  • राजीव रंजन प्रसाद
    पत्रकार अम्बु शर्मा  की एक रिपोर्टिंग में बहुत ही दर्द भरे शीर्षक पर निगाह पड़ी -मैं बस्तर की वोटर हूं, लो मैंने वोट डाल दिया, नक्सलियों का खौफ है इस लिये पत्थर के टुकड़े से निशान मिटा रही हूं। यह नक्सलवादियों को लोकतंत्र का प्रत्युत्तर है। बस्तर में लाल आतंकवाद के चार दशक और राजबब्बर के खूनी-क्रांतिकारियों का कुल जमा हासिल गला काट कर मारे गये ग्रामीणों और सुरक्षाकर्मियों की संख्या में इजाफा भर है लेकिन वे बस्तर में लोकतंत्र की एक ईंट भी हिला नहीं सके हैं। 
    छत्तीसगढ़ में पहले चरण के मतदान सम्पन्न हो गये, राहत की बात कि नक्सलवादी कोई बहुत बडी घटना को अंजाम नहीं दे सके जैसा कि वर्ष 2013 के विधान सभा चुनाव से पहले वे करने में सफल हुए थे। इससे उलट बहुत ही मर्मस्पर्शी तस्वीरें सामने आयी हैं जो दिल दहलाती हैं और यह यकीन दिलाती हैं कि जहाँ ऐसे नागरिक हैं वहाँ एक दिन ऐसी सुबह जरूर आयेगी जो सुकून भरी हो। कहीं तो दस से पंद्रह किलोमीटर पैदल चल कर ग्रामीण, यहां तक कि महिलायें और बुजुर्ग भी मतदान करने पहुंचे, तो कहीं नावों के सहारे नदी पार कर मतदान केंद्र तक आदिवासी पहुंचे हैं और लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव को सफल बनाने में अपनी भूमिका का निर्वहन किया है।
    चुनाव नतीजे बताते हैं कि नक्सलवाद आखिरी सांसें ले रहा है। इसका कारण केवल मतदाता का साहस भर नहीं है। यदि पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार जो वोट पडे उनके प्रतिशत की विवेचना करें तो स्थिति आईने की तरह साफ हो जाती है। यह ठीक है कि कांकेर, कोण्डागांव, भानुप्रतापपुर, केशकाल, अंतागढ़, बस्तर तथा दंतेवाड़ा में मतप्रतिशत में कमी देखी गयी है परंतु यह गिरावट लगभग एक प्रतिशत से तीन प्रतिशत के मध्य ही है हो बहुत मामूली कही जा सकती है।
     इस गिरावट में भी सामान्य रूप से नक्सल प्रभावित विधानसभा क्षेत्र जैसे दंतेवाडा में यह लगभग 1प्रतिशत, बस्तर में यह लगभग 1प्रतिशत, कांकेर में लगभग 1 प्रतिशत तथा अंतागढ में लगभग 3 प्रतिशत देखी गयी है जिसे कमोबेश उतना ही कहा जा सकता है जैसी कि वर्ष 2013 में वोटिंग हुई थी। अब बात अत्यधिक नक्सल प्रभावित विधानसभा क्षेत्रों की करते हैं जिसमें नारायणपुर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 4 प्रतिशत, कोण्टा में लगभग 6 प्रतिशत और बीजापुर में लगभग 3 प्रतिशत मतदान में बढ़ोत्तरी हुई है, वह भी ग्रामीणों को मिली धमकी के बाद। ये आंकडे उत्साहवर्धक हैं तथा इनसे उम्मीद जगती है कि बुलेट पर बैलेट ही भारी पड़ेगा। कौन सा दल जीतता या हारता है अब अंतर इससे नहीं पड़ता, लोकतंत्र यहां अपनी जीत पर राहत की सांस ले ही सकता है।

     

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Posted Date : 14-Nov-2018
  •  प्रदीप मेश्राम
    राजनांदगांव, 14 नवंबर। डेढ़ दशक से सत्ता का केंद्र रहा राजनांदगांव जिला छत्तीसगढ़ गठन के बाद से सियासी धमाचौकड़ी के चलते राजनीतिक रूप से चमकता रहा है। प्रदेश की चौथी विधानसभा चुनाव में छह सीटों में हुए मतदान के बाद नई सरकार के गठन में राजनांदगांव जिले की सियासी योगदान पर चर्चाओं का दौर चल रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का निर्वाचन जिला होना भी कयासों को हवा देने का काम कर रहा है। बीते विधानसभा 2013 के चुनाव में वैसे भाजपा की आवाज को जिले की जनता ने अनसुना कर दिया था। इस बार भाजपा को पुराने नुकसान की भरपाई होने का भरोसा है।
    राजनीतिक पावर हब बना राजनांदगांव जिले में 2 में भाजपा और 4 में कांग्रेस का कब्जा रहा है। नई सरकार के लिए भाजपा को राजनांदगांव की सभी छह सीटों से जीत की उम्मीद है। 12 नवंबर को हुए मतदान के बाद राजनांदगांव की कुछ सीटें काफी चर्चित रही। जिसमें  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और कांग्रेस की करूणा शुक्ला  की राजनांदगांव विधानसभा तथा डोंगरगांव में भाजपा से पूर्व सांसद मधुसूदन यादव और कांग्रेस के निवर्तमान विधायक दलेश्वर साहू की चुनावी जंग प्रमुख रहा। 
    इसके अलावा खुज्जी, खैरागढ़ तथा मोहला-मानपुर में त्रिकोणीय मुकाबले के कारण पेंच फंसा रहा। खुज्जी में भाजपा के हिरेन्द्र साहू, कांग्रेस की छन्नी साहू तथा  छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस पार्टी के जरनैल सिंह भाटिया  के आपसी मुकाबले से सीट में घमासान रहा। इसी तरह खैरागढ़ में पूर्व सांसद देवव्रत सिंह (छजकां), पूर्व विधायक कोमल जंघेल (भाजपा) तथा कांग्रेस के निवर्तमान विधायक गिरवर जंघेल भी त्रिकोणीय लड़ाई में जीत की आस में है। अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित डोंगरगढ़ सीट में भी नगर पालिका अध्यक्ष तरूण हथेल ने कांग्रेस के भुनेश्वर बघेल और भाजपा की निवर्तमान विधायक सरोजनी बंजारे की राह में पेंच फंसा दी है।
    राजनांदगांव जिले की सभी छह सीटों में कांटे की टक्कर रही है। मतदान के बाद भी मतदाताओं ने अपनी चुप्पी साधे रखी। जिसके चलते किसी भी सीट में जीत का पुख्ता तौर पर दावा करने से राजनीतिक दल परहेज कर रहे हैं। बताया जाता है कि कांग्रेस ने इस बार पूरी रणनीति के तहत भाजपा को मुकाबले में कड़ी टक्कर दी। सत्तारूढ़ भाजपा का चुनावी मैनेजमेंट भी तगड़ा रहा। पार्टी के रणनीतिककारों ने कांग्रेस को घेरने के लिए चौतरफा स्टॉर प्रचारकों पर दांवा खेला। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के रोड़ शो ने कांग्रेस को एकजुट किया। वहीं अमित शाह और मुख्यमंत्री डॉ. सिंह के संयुक्त रोड शो ने कांग्रेस के मनोबल को तोडऩे के लिए दम लगाया।  प्रदेश के सबसे हाईप्रोफाईल सीट होने के कारण राजनांदगांव के चुनावी दंगल में राजनीतिक दलों ने पूरी ताकत झोंकी। भाजपा-कांग्रेस के साथ दो सीटों खुज्जी और खैरागढ़ में ही जोगी कांग्रेस की धमक सुनाई दी। मतदान के बाद लोगों की जुबान पर सभी छह सीटों के नतीजों से जुड़ी चर्चाएं चल रही है। मतदाताओं ने इस बार राजनीतिक पार्टियों के नब्ज को जोरदार तरीके से पकड़ा हुआ है। जिसके कारण राजनेता अपने जीत का खुलकर दावा  करने से परहेज कर रहे हैं। फिलहाल राजनांदगांव की सभी छह सीटों की तस्वीरें पूरी तरह से धुंधली है। 

    राजनांदगांव सीट (1957 से अस्तित्व में)
    1957 जेपीएल फ्रांसिस (पीएसपी)
    1962 एकनाथ (कांग्रेस)
    1967 किशोरीलाल शुक्ल (कांग्रेस)
    1972 किशोरीलाल शुक्ल (कांग्रेस)
    1977 ठा. दरबार सिंह (जनता पार्टी)
    1980 किशोरीलाल शुक्ल (निर्दलीय)
    1985 बलबीर खनूजा (कांग्रेस)
    1990 लीलाराम भोजवानी (भाजपा)
    1993 उदय मुदलियार (कांग्रेस)
    1998 लीलाराम भोजवानी (भाजपा)
    2003 उदय मुदलियार (कांग्रेस)
    2008 डॉ. रमन सिंह (भाजपा)
    2013 डॉ. रमन सिंह (भाजपा)
     2018 के विस चुनाव मैदान में 
    डॉ. रमन सिंह (भाजपा)
    करूणा शुक्ला (कांग्रेस)

    मोहला-मानपुर सीट पूर्व नाम अंबागढ़ चौकी (1957 से अस्तित्व में)
    1957 कनककुमारी (कांग्रेस)
    1962 देवप्रसाद (पीएसपी)
    1967 देवप्रसाद (पीएसपी)
    1972 गोवर्धन नेताम (कांग्रेस)
    1977 भूपेन्द्र शाह (जनता पार्टी)
    1980 गोवर्धन नेताम (कांग्रेस)
    1985 गोवर्धन नेताम (कांग्रेस)
    1990 सुरेश ठाकुर (भाजपा)
    1993 गोवर्धन नेताम (कांग्रेस)
    1998 संजीव शाह (भाजपा)
    2003 संजीव शाह (भाजपा)
    2008 शिवराज उसारे (कांग्रेस)
    2013 तेजकुंवर नेताम (कांग्रेस)
    2018 के विस चुनाव मैदान में 
    कंचनमाला भुआर्य (भाजपा)
    इंद्रशाह मंडावी (कांग्रेस)
    संजीत ठाकुर (छजकां)

    खैरागढ़ सीट (1957 से अस्तित्व में)
    1957 ऋतुपूर्ण किशोरदास (कांग्रेस)
    1962 ज्ञानेन्द्र सिंह (कांग्रेस)
    1967 विरेन्द्र बहादुर सिंह (कांग्रेस)
    1972 विजयलाल ओसवाल (कांग्रेस)
    1977 माणिक गुप्ता (जनता पार्टी)
    1980 रश्मिदेवी सिंह (कांग्रेस)
    1985 रश्मिदेवी सिंह (कांग्रेस)
    1990 रश्मिदेवी सिंह (कांग्रेस)
    1993 रश्मिदेवी सिंह (कांग्रेस)
    1995    (उप चुनाव) देवव्रत सिंह (कांग्रेस)
    1998 देवव्रत सिंह (कांग्रेस)
    2003 देवव्रत सिंह (कांग्रेस)
    2007 (उप चुनाव) कोमल जंघेल (भाजपा)
    2008 कोमल जंघेल (भाजपा)
    2013 गिरवर जंघेल (कांग्रेस)
    2018 के विस चुनाव मैदान में 
    कोमल जंघेल (भाजपा)
    गिरवर जंघेल (कांग्रेस)
    देवव्रत ङ्क्षसह (छजकां)

     डोंगरगढ़ सीट (1957 से अस्तित्व में)
    1957  विजयलाल (कांग्रेस)
    1962 गणेशमल भंडारी (कांग्रेस)
    1967 गणेशमल भंडारी (कांग्रेस)
    1972 हीराराम रामसेवक (कांग्रेस)
    1977 डॉ. विनायक मेश्राम (जनता पार्टी)
    1980 टुमनलाल (कांग्रेस)
    1985 धनेश पटिला (कांग्रेस)
    1990 धनेश पटिला (कांग्रेस)
    1993 धनेश पटिला (कांग्रेस)
    1998 धनेश पटिला (कांग्रेस)
    2003 विनोद खांडेकर (भाजपा)
    2008 रामजी भारती (भाजपा)
    2013 सरोजनी बंजारे (भाजपा)
     2018 के विस चुनाव मैदान में 
    सरोजनी बंजारे (भाजपा)
    भुनेश्वर बघेल (कांग्रेस)
    तरूण हथेल (निर्दलीय)

    डोंगरगांव सीट (1957 से अस्तित्व में)
    1957 धन्नालाल जैन (कांग्रेस)
    1962 मदनलाल तिवारी (पीएसपी)
    1967 मदनलाल तिवारी (एसएसपी)
    1972 जयराम आर्य (कांग्रेस)
    1977 विद्याभूषण ठाकुर (जनता पार्टी)
    1980 हीराराम वर्मा (कांग्रेस)
    1985 हीराराम वर्मा (कांग्रेस)
    1990 गीतादेवी सिंह (कांग्रेस)
    1993 गीतादेवी सिंह (कांग्रेस)
    1998 गीतादेवी सिंह (कांग्रेस)
    2003 प्रदीप गांधी (भाजपा)
    2004 (उप चुनाव)डॉ. रमन सिंह (भाजपा)
    2008 खेदूराम साहू (भाजपा)
    2013 दलेश्वर साहू (कांग्रेस)
    2018 के विस चुनाव मैदान में 
    मधुसूदन यादव (भाजपा)
    दलेश्वर साहू (कांग्रेस)

    खुज्जी सीट (1962 से अस्तित्व में)
    1962 टुमनलाल (कांग्रेस)
    1967 हरिप्रसाद शुक्ला (कांग्रेस)
    1972 डॉ. बल्देवप्रसाद मिश्र (कांग्रेस)
    1977 प्रकाश यादव (जनता पार्टी)
    1980 हरिप्रसाद शुक्ला (निर्दलीय)
    1985 इमरान मेमन (कांग्रेस)
    1990 जगन्नाथ यादव (जनता दल)
    1993 रजिंदरपाल सिंह भाटिया (भाजपा)
    1998 रजिंदरपाल सिंह भाटिया (भाजपा)
    2003 रजिंदरपाल सिंह भाटिया (भाजपा)
    2008 भोलाराम साहू (कांग्रेस)
    2013 भोलाराम साहू (कांग्रेस)
    2018 के विस चुनाव मैदान में 
    हिरेन्द्र साहू (भाजपा)
    छन्नी साहू (कांग्रेस)
    जरनैल सिंह भाटिया (छजकां)

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Posted Date : 14-Nov-2018
  •  चंद्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर, 14 नवंबर। विधानसभा चुनाव में कोरिया जिले की तीनों सीट पर मुकाबला बेहद रोमांचक होता जा रहा है। तीनों विधानसभाओं में त्रिकोणीय और चतुर्थ कोणीय घमासान देखा जा रहा है। मनेन्द्रगढ में भाजपा कांग्रेस के बागियों को कांग्रेस भाजपा की नींद हराम कर रखी है, जबकि बैकुंठपुर में जोगी कांग्रेस और गोंगपा ने दोनों दलों को बेचैन कर रखा है, जबकि भरतपुर सोनहत में कांग्रेस भाजपा के साथ गोंगपा के बीच कड़ी टक्कर देखी जा रही है। भाजपा की जीत की नैया तीनों विधानसभा में झारखंड से आए पदाधिकारी संभाल रहे है। कार्यकर्ताओं पर नजर से लेकर पन्ना प्रभारियों को मैनेज करने तक वो दिनरात जिले के छोटे से छोटे कस्बों में अपनी पैठ बना कर काम कर रहे है।  
    जोगी कांग्रेस और गोंगपा ने उड़ाई कांग्रेस-भाजपा की नींद
    बैकुंठपुर सीट की यदि बात की जाए तो बीते दो चुनाव से यह सीट भाजपा की झोली में आ रही है, इस सीट के अपराजित योद्धा डॉ रामचंद्र सिंहदेव की भतीजी अंबिका सिंहदेव इस बार अपना भाग्य आजमाने मैदान में हंै, उनकी टक्कर केबिनेट मंत्री भइयालाल राजवाडे से है। मंत्री राजवाड़े की समाज की बाहुल्यता देखते हुए जोगी कांग्रेस ने भी जनपद सदस्य बिहारीलाल राजवाड़े को मैदान में उतार दिया है। वो बीते एक साल से जनता के बीच अपना जनाधार बनाने में जुटे हुए हंै। उनके प्रचार ने भाजपा की नीेंद उड़ा रखी है। 
    वहीं गोंगपा भी बीते दो चुनाव से तीसरी शक्ति के रूप में उभर कर सामने आई है। इस बार भी गोंगपा अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है। दरअसल, गोंगपा के वोट बंटने से कांग्रेस को दो चुनाव में हार का सामना करना पडा है। यही कारण है कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को गोंगपा के वोटों को ना छूने की हिदायत दे रखी है। जोगी कांग्रेस और गोंगपा को मिलने वाले वोटों से ही कांग्रेस भाजपा की जीत या हार तय होना है। 
    इधर, जारी चुनाव में जातिवाद बेहद हावी होता दिख रहा है, बीते दो कार्यकाल राजवाडे समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर अन्य समाज के लोगों ने अपने पत्ते नहीं खोले है। मंत्री के बिगडे बोल और स्वेच्छानुदान की राशि को लेकर विपक्ष आरोप लगा रही है, इसका असर पूरे सरगुजा संभाग की सीटों पर देखा जा रहा है। सत्ता विरोधी लहर होने के कारण भाजपा को एक एक वोट के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार मतदाता खामोश नहीं मुखर है। 
    मनेन्द्रगढ़ में त्रिकोणीय मुकाबला
    कोरिया जिले की मनेन्द्रगढ़ सीट पर कांग्रेस भाजपा और जोगी कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखा जा रहा है। भाजपा के बागी लखनलाल श्रीवास्तव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों में सेंध मारी कर रहे है। वे मनेन्द्रगढ़ से खुद को आगे बता ही रहे है, वहीं कांग्रेस के चिरमिरी के बडे नेता प्रकाश तिवारी को जोगी कांग्रेस में ले आए है। जिससे मनेन्द्रगढ़ में भाजपा वोटर और चिरमिरी में कांग्रेस के वोटरों में सेध लगाने की तैयारी में जुटे हुए है। इसके अलावा कांग्रेस से इस बार चिरमिरी से डॉ विनय जायसवाल को प्रत्याशी बनाया है नगर निगम चिरमिरी के स्थानीय प्रत्याशी होने का लाभ लेने वो कोई कसर नहीं छोड़ रहे है, जबकि भाजपा के श्याम बिहारी जायसवाल खडग़वां तहसील में आने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ और चिरमिरी में कराए गए कार्यों को लेकर हर हाल में जीत के प्रति आश्वस्त है। वहीं गोंगपा के आदित्य राज डेविड ने भी मैदान में अपनी टीम उतार कर हर हाल में जीत दर्ज कराने अपनी ताकत झोंक रखी है। इस सीट पर जातिगत समीकरण भी लोगों के समझ से परे है। यही कारण है कि यहां कोई भी नही बता पा रहा है कि चुनावी उंट किस करवट बैठेगा। 
    भरतपुर सोनहत में चंपा और गुलाब के बीच टक्कर 
    कोरिया जिले की तीसरी सीट भरतपुर सोनहत विघानसभा में भाजपा के कमल फूल खिलाने के लिए चंपादेवी पावले मैदान में है तो उनकी कडी टक्कर कांग्रेस के गुलाब कमरो से है। वहीं गोंगपा के श्याम सिंह मरकाम ने भी अपना पूरा दमखम लगा दिया है। बीते 5 सालों से विपक्ष में रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले कांग्रेस के गुलाब कमरो पर पार्टी ने भरोसा जता कर दुबारा मैदान में उतारा है। वहीं कांग्रेस के गुलाब कमरों को भाजपा की चंपादेवी पावले ने 2013 के चुनाव में हरा दिया था।, जिसके बाद उन्हें भाजपा की सरकार ने संसदीय सचिव के पद से नवाजा है। परन्तु इस बार हवा कुछ बदली हुई है। जनकपुर में अवैध रेत उत्खनन से लेकर स्वेच्छानुदान भाजपा का पीछा नहीं छोड रहा है। आदिवासी सीट होने के कारण कांग्रेस भाजपा और गोंगपा के तीनों प्रत्याशी गोंड समाज से आते है। वहीं बसपा ने चेरवा समाज से कृष्णा प्रसाद चेरवा को मैदान में उतार दिया है, जिससे भाजपा की बेचैनी बढ़ी हुई है। वहीं 200 किमी क्षेत्रफल की विधानसभा होने के कारण एक बार जिस पोलिंग बूथ पर प्रत्याशी पहुंच जाते हंै दूसरी बार पहुंचना बेहद मुश्किल काम है। यहां भी सत्ता विरोधी लहर देखी जा रही है। यहां यह देखना होगा कि इस बार इस विधानसभा में चंपा को फूल खिलता है कि गुलाब का।

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Posted Date : 13-Nov-2018
  • -राजीव रंजन प्रसाद

    वर्ष 2013 का चुनाव भाजपा के लिए सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण था, एंटी इंकम्बेंसी की छाया में तो यह लड़ा ही जा रहा था साथ ही साथ बस्तर के झीरम घाटी में नक्सलियों ने बड़ी वारदात कर दी। झिरम घाटी के कुख्यात हमले में कॉग्रेस पार्टी के अग्रिम पंक्ति के सभी नेता मारे गये थे जिसकी आलोचना तथा दबाव भी सत्तारूढ़ भाजपा पर था। महेंद्र कर्मा का निधन का न केवल दंतेवाड़ा अपितु बस्तर की लगभग सभी सीटों पर प्रभाव पडऩा सुनिश्चित था। इस हत्याकाण्ड के पश्चात नक्सलवादी बहुत ही ताकतवर नजर आ रहे थे इस लिये चुनाव बहिष्कार की उनकी मुहिम का प्रभाव भी चुनावों में पडऩा तय था। ऐसे में जब चुनाव हुए तो भाजपा को बस्तर की केवल चार सीटों से संतोष करना पड़ा जबकि वर्ष 2008 के चुनावों में यहाँ से ग्यारह सीटें उनके पास थीं। कॉंग्रेस न केवल अपनी परम्परागत कोण्टा सीट भारी बहुमत से बचाने में सफल हुई थी अपितु इस चुनाव में क्षेत्र की आठ सीटें उसके हिस्से में रही थीं।
    वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों की वर्तमान स्थिति थोड़ी रुचिकर इसलिये हो गयी है चूंकि अजीत जोगी ने नया राजनैतिक दल जनता कांग्रेस छतीसगढ़ बना कर भाजपा और कॉंग्रेस दोनों की राजनैतिक दलों के समक्ष कड़ी चुनौती रख दी है। यह तीसरा पक्ष महत्वपूर्ण इस लिये है चूंकि थोड़े ही सही लेकिन बसपा के पास लगभग सभी विधान सभा सीटों में अपने वोट शेयर हैं। अजीत जोगी का बस्तर में कोई बहुत बड़ा प्रभाव देखने को मिलेगा इसकी उम्मीद कम है लेकिन संभव है वे कांग्रेस को नुकसान पहुँचाने में अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं। इस संभावना को देखते हुए वामदलों का जोगी के साथ जुडऩा आश्चर्यजनक हो सकता है चूंकि यदि भाजपा की जीत होती है तब इसमें अजीत जोगी फैक्टर की जितनी अधिक भूमिका होगी, वामपंथी रणनीति की उतनी ही व्यापक आलोचना तय है। यदि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात के सभी चुनावों का सार संक्षेप निकाला जाये तो कोण्टा और दंतेवाड़ा को छोड़कर किसी अन्य सीट पर वाम दलों ने अपनी ठीक ठाक उपस्थिति नहीं दर्शायी है। अब तीन तिगाड़ा किसका काम बिगाड़ा सिद्ध होता है इसे निर्णायक चुनाव परिणामों के साथ ही देखा समझा जा सकता है। भानुप्रतापपुर के चुनाव परिणामों पर भी सभी की दृष्टि रहेगी चूंकि यहाँ से युवा प्रत्याशी कोमल हुपेंडी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार हैं जिन्हें दल में मुख्यमंत्री प्रत्याशी के रूप में घोषित कर आगे किया है।
    सीटवार बात करें तो कांकेर सीट वर्तमान में केवल 3.81 फीसदी के मतांतर से काँग्रेस के पास है। इस सीट की महत्ता को समझते हुए न केवल राहुल गांधीं से स्वयं यहाँ जनसभायें की हैं बल्कि अपने ही वर्तमान विधायक का टिकट काट कर नये चेहरे पर दंव लगाया है। भाजपा ने भी नयी उम्मीदवार उतार कर कांकेर की लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है। अजीत जोगी की पार्टी कांकेर की सीट पर अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने में सफल सिद्ध हो सकती है। ध्यान दिया जाये तो कोण्डागाँव सीट पर भी जीत का अंतर केवल 4.42 फीसदी मतों का था, जहाँ से वर्तमान विधायक मोहन मरकाम कॉंग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। भाजपा ने यहाँ से अपनी भूतपूर्व विधायक लता उसेंडी पर पुन: दाँव लगाया है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि 5.39 फीसदी मत पिछले चुनावों में नोटा को मिले थे। यह वोटों की अच्छी खासी तादाद है। इस सीट पर कांटे का मुकाबला संभावित है, अजीत जोगी गठबंधन यहाँ वोटकटवा की भूमिका अदा कर कॉंग्रेस के लिये मुसीबत खड़ी कर सकता है चूंकि पिछले चुनाव में मिले मतों के अनुसार वामदल (4.16 फीसदी मत) और बसपा (2.67 फीसदी मत) मिल कर जोगी को मिलने वाले मतों को सम्मानजनक लडाई में बदल सकते हैं। भानुप्रतापपुर में कॉंग्रेस ने पिछला चुनाव लगभग 11.01 फीसदी के भारी मतांतर से जीता था। यहाँ पुन:भाजपा-कॉंग्रेस अपने पुराने प्रतिद्वंदियों के साथ लड रही है परंतु जोगी की पार्टी ने भी अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई है। आम आदमी पार्टी भी इस सीट पर पूरी ताकत से लड़ रही है अत: निर्णय जो भी हो पहली बार इस सीट पर देश-दुनियाँ अपनी निगाहें लगाये हुए है। केशकाल यद्यपि भाजपा का गढ़ रहा है लेकिन पिछले चुनावों में कांग्रेस ने यहाँ 6.51 फीसदी मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी। केशकाल में, पिछले चुनाव में नोटा पर 5.91 फीसदी मतदाताओं ने मुहर लगायी थी जो राजनैतिक दलों के लिये चिंता का विषय हो सकता है।
    नारायणपुर सीट को हाईप्रोफाईल कहा जा सकता है चूंकि यहाँ से भाजपा सरकार में मंत्री केदार कश्यप अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। जगदलपुर सीट पर साफ साफ राजनैतिक खींचातानी देखने को मिलेगी। यहाँ से लगातार जीतती आ रही भाजपा के लिये ही संभावनायें दिखती हैं चूंकि जितने अधिक दल और प्रत्याशी चुनाव मैदान में होंगे मतविभाजन उतना ही प्रबल होगा। पिछले चुनाव में भाजपा ने 17 प्रत्याशियों के बीच 13.17 फीसदी के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी। जगदलपुर से उलट चित्रकोट विधानसभा सीट की प्रवृत्ति अलग है। यहाँ पिछले चुनाव में कॉंग्रेस ने 11.37 फीसदी मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी। माकपा भी 9.30 फीसदी मतों के साथ अच्छी स्थिति में थी जबकि नोटा का बटन लगभग 9.09 फीसदी मतदाताओं ने दबाया था। ऐसी खिचड़ी परिस्थिति में चुनाव परिणाम पर जोगी फैक्टर को अपने पैर फैलाते देखे जाने की संभावना है। अंतागढ़ विधान सभा सीट वर्तमान में भाजपा के पास है तथा केवल 4.76 फीसदी मतों से यहाँ पिछली जीत दर्ज की गयी थी। यदि एंटेइनकम्बेंसी का प्रभाव रहा तथा जोगी की प्रभावी भूमिका नहीं रही तभी कॉंग्रेस यह सीट छीनने में सफल हो सकती है। बस्तर विधानसभा सीट पर पिछले चुनावों में कॉंग्रेस से 17.58 फीसदी मतों के बहुत भारी अंतर से जीत हासिल की थी अत: यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा इस अंतर को पाट पायेगी?
    दंतेवाड़ा सीट तो पारिवारिक झगड़ा ही है। सात प्रत्याशी मैदान में हैं तथा सभी आपस में किसी न किसी तरह रिश्तेदार ही हैं। मुख्य मुकाबला कॉंग्रेस की वर्तमान विधायक देवतीकर्मा (6.07 फीसदी मतों से पिछली जीत) और भाजपा के भीमा मण्डावी के मध्य ही होने की उम्मीद है तथापि सी पी आई के नंदाराम सोरी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने में सफल हो सकते हैं। इसी तरह कोण्टा में भाजपा के प्रत्याशी धनीराम बारसे और वर्तमान विधायक तथा कॉंग्रेस के प्रत्याशी कवासी लक्मा (8.05 फीसदी मतों से पिछली जीत) के बीच सीधी लडाई है लेकिन सीपीआई के मनीष कुंजाम भी इस सीट पर पर्याप्त दमखम रखते हैं। सीपीआई पिछले चुनावों में कोण्टा में 26.15 फीसदी मतों के साथ तीसरे स्थान पर रही थी लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि दूसरे स्थान पर रहे दल भाजपा (28.77 फीसदी मतों के साथ) से मतों का अंतर केवल 2 फीसदी ही था। छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच तथा आप आदमी पार्टी भी कोण्टा से चुनाव लड़ रहे हैं अत: मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। बीजापुर सीट पर पिछले दो चुनावों से भारतीय जनता पार्टी जीत दर्ज करती आ रही है, संभव है भाजपा के महेश गागड़ा यह सीट पुन: निकाल लें। इसका एक कारण 14.93 फीसदी मतों से उनकी भारी भरकम पिछली जीत है। दूसरा नक्सलियों के बहिष्कार के कारण परम्परागत वोटर ही बाहर निकलते हैं। बीजापुर में बतदान प्रतिशत हमेशा से बहुत कम रहा है, पिछले चुनाव में यह महज 44.96 फीसदी था।
    चुनावी गणित में मतों के अंतर अवश्य मायने रखते हैं किंतु मतदान कितना हुआ इस पर सभी राजनीतिक दलों की निगाह रहती है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जिन गावों में नक्सली भय से लोग मतदान के लिये बाहर ही नहीं आते वे इस बार बूथों तक पहुँचेंगे? जिन बूथों से गावों की दूरी कई किलोमीटर बढ़ गयी है क्या वह मतदान प्रतिशत में गिरावट का एक कारण नहीं सिद्ध होगी? कई पत्रकार मित्रों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चुनाव की स्थिति को ले कर अपने अनुभव मुझसे साझा किये हैं। जो बात बाहर निकल कर आयी है वह सुखद आश्चर्य पैदा करती है चूंकि आदिवासी मतदान में भाग लेना चाहते हैं। कई ग्रामीणों ने खुल कर कहा कि वे अगर वोट नहीं डालेंगे तो सड़क, बिजली पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं पर उनका हक समाप्त हो जायेगा। वस्तुत: सबसे बडा लोकतंत्र विवश है चूंकि आज भी एसे तंत्र विकसित नहीं हो सके जिससे कि हर इच्छुक मतदाता अपनी राय जाहिर करने के लिये उपस्थित हो सके भले ही वह 'इनमें से कोई नहींÓ वाले बटन को चटखा कर चला आये। चुनावों को प्रभावित करने वाला एक बड़ा पक्ष है बस्तर के अंदरूनी क्षेत्रों से विस्थापन। सलवा जुडुम की समाप्ति के साथ ही हजारों विस्थापित आदिवासी परिवारों के साथ अपनी पुनस्र्थापना की दिक्कतें आने लगीं। यह भी समझने योग्य बात है कि नक्सलवाद भी बड़े पैमाने पर विस्थापन को जन्म देता है तथा परिवार के परिवार भय से अथवा मुखबिर करार दिये जाने के बाद अपनी जमीन छोड़ देने के लिये बाध्य हो जाते हैं। यह एक बड़ा आंकड़ा है जो मतदाताओं की सूची के बहुतायत उपस्थित नामों को केन्द्रों से गायब पाता है। हमारे चुनाव विश्लेषण इन विस्थापितों के महत्व को हमेशा ही नजरंदाज कर देते हैं। एक सही चुनाव के लिये वास्तविक मतदाता और सही मतप्रतिशत की आवश्यकता है अन्यथा विजय खोखली ही है। प्रस्तुत आंकड़े बस्तर के चुनाव की जो भी दिशा-दशा बताते हों इनमें विस्थापित आदिवासी अनुपस्थित हैं। यही कारण है कि इस प्रश्न से बचा नहीं जा सकता कि क्या हमारे चुनाव वास्तविक लोकतंत्र के प्रतिनिधि हैं?

    नोटा का बढ़ता दखल  
    वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में मतदान से पहले ही यह आभास होने लगा था कि बस्तर भारतीय जनता पार्टी के लिये विपरीत परिणाम देने वाला है। जानकारों ने कोंटा और दंतेवाड़ा पर भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के पक्ष में अपने अनुमान (एग्जिट पोल) व्यक्त किये थे जबकि यह माना जा रहा था कि सात सीट कांग्रेस को, तीन भाजपा और दो कम्युनिष्ट पार्टियों को मिलेंगे। परिणाम चार सीट भाजपा तथा आठ कांग्रेस के पक्ष मे आया था। वामपंथी प्रत्याशियों की करारी हार यह बताती है कि बंदूख के साये से यदि वे बाहर न आये तो उनकी जमीनी लड़ाईयाँ भी असरकारक नहीं होंगी। उस समय सभी विश्लेषकों ने महेन्द्र कर्मा फैक्टर को बहुत हल्के में लिया और देवती कर्मा को कम कर के आंका गया। यह स्पष्ट है कि बस्तर में महेन्द्र कर्मा के प्रति सहानुभूति थी दंतेवाड़ा विधाससभा सीट पर 77 फीसदी मतदान के रूप में आदिवासियों ने अभिव्यक्त भी कर दी। यह इतना बड़ा मतप्रतिशत है जितना कि देश के सभ्यतम माने जाने वाले क्षेत्रों में वोट भी नहीं पड़ते। इस बार (2018 के विधानसभा चुनावों में) मतप्रतिशत में गिरावट दर्ज हुई है तथा चुनावी परिस्थितियाँ भी बहुत हद तक भिन्न हैं।
    आज बात करते हैं नोटा पर। नये चुनाव परिणाम अभी आने हैं अत: वर्ष 2013 के आंकडों के आंलोक में समझने की कोशिश करते हैं कि नोटा कितनी बड़ी भूमिका अदा कर सकता है। पिछले चुनावों में समग्र छत्तीसगढ़ में 3 फीसदी लोगों ने नोटा का बटन दबाया और किसी भी पार्टी के पक्ष में मतदान नहीं किया। यह इतना बड़ा वोटों का हिस्सा था जिसने निश्चित ही कहीं कांॅग्रेस का गणित बिगाड़ा तो कहीं भाजपा का। नोटा के जो आंकड़े बस्तर की बारह सीटों में सामने आये वह बताते हैं कि यह दोनों ही राजनीतिक पार्टियों के लिये खतरे की घंटी है, बहुतायत आदिवासी जनता ने लोकतंत्र पर तो भरोसा दिखाया किंतु प्रत्याशियों को नकार दिया। यदि नोटा में पड़े मत प्रत्याशियों के साथ जुड़े होते तो परिणामों में और भी उठापटक देखी जा सकती थी। कांकेर (5208 मत), कोण्डागाँव (6773 मत), भानुप्रतापपुर (5680 मत), केशकाल (8381 मत), नारायणपुर (6731 मत), जगदलपुर (3469 मत), चित्रकोट (10848 मत), अंतागढ (4710 मत), बस्तर (5529 मत), दंतेवाड़ा (9677 मत), कोण्टा (4001 मत), बीजापुर (7179 मत) में नोटा का बटन बहुत अच्छी मात्रा में दबाया गया। यह संख्या अधिकतम सीटों में माकपा, बसपा अथवा निर्दलीय प्रत्याशियों को मिले वोटों से अधिक है, कई स्थानों पर तो कांग्रेस और भाजपा के वोट हटा दिये जायें तो अन्य सभी पार्टोयों को प्राप्त कुल मतों का जोड़ भी नोटा की संख्या से कम है। बस्तर में नोटा के लिये न्यूनतम 3469 मत (जगदलपुर) से ले कर अधिकतम 10848 मत (चित्रकोट) प्राप्त हुए। मतप्रतिशत के हिसाब से अधिकतम बीजापुर मे 10.15 फीसदी मतदाताओं ने अपने 7179 फीसदी मतों का प्रयोग नोटा के रूप में किया था। नोटा यह बताता है कि बस्तर का जागरूक मतदाता यह जानता है कि उसे किसको वोट देना है और अगर किसी को भी नहीं देना तो भी लोकतंत्र को बचाने का अपना दायित्व उसने निर्वहन किया है; इस तरह प्रत्याशियों से नाराजगी भी दिखाई गयी और नक्सलियों को अंगूठा भी। वर्ष 2018 के चुनावों में नोटा क्या भूमिका अदा करता है यह देखा जाना रुचिकर होगा।

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Posted Date : 13-Nov-2018

  • बसपा का साथ, बिलासपुर-मुंगेली की कई सीटों पर त्रिकोणीय संघर्ष, कांग्रेस-भाजपा दोनों का भरोसा डगमगा रहा 
    राजेश अग्रवाल
    बिलासपुर, 13 नवंबर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस की बुनियाद जिले के कोटमी में पड़ी थी। यहीं से प्रदेश के मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाने का फैसला लिया था। जोगी कांग्रेस का दामन थामने वाले प्रदेश के चार में से तीन विधायक बिलासपुर से हैं और उनमें से दो चुनाव मैदान में उतर चुके हैं। मरवाही सीट पर खुद जोगी हैं, उनकी पत्नी डॉ. रेणु जोगी कोटा और सियाराम कौशिक बिल्हा से। इसके अलावा भी मुंगेली-बिलासपुर की कुछ और सीटों पर कांग्रेस-भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए उनकी पार्टी के उम्मीदवारों ने अपनी ताकत झोंक दी है। 
    पूर्व मुख्यमंत्री और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के संस्थापक अजीत जोगी ने पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के खिलाफ राजनांदगांव से चुनाव लडऩे का ऐलान किया था। बाद में एक वजह खड़ी हो गई, मरवाही के लोगों ने आकर उनसे दुबारा यहां से चुनाव लडऩे की अपील की। नाटकीय ढंग से विधायक अमित जोगी ने भी कहा कि वे जोगी और मरवाही की जनता के बीच नहीं आएंगे। इस तरह अब अजीत जोगी सबसे सुविधाजनक सीट मरवाही  से उम्मीदवार हैं। इसके पहले के चुनावों में भी वे डॉ. सिंह को चुनौती देने की घोषणा कर पीछे हट चुके हैं।
    छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भाजपा के रामदयाल उइके ने मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद जोगी के लिए सीट छोड़ी। जोगी ने फरवरी 2001 में हुए उप-चुनाव में भाजपा के अमर सिंह खुसरो को 50 हजार से अधिक मतों के रिकॉर्ड अंतर से हरा दिया। सन् 2003 के चुनाव में जोगी की सत्ता चली गई पर मरवाही के लोगों का लगाव उनसे कम नहीं हुआ। इस चुनाव में भाजपा के दिग्गज नेता नंदकुमार साय को उन्होंने करीब 54 हजार मतों से हराया। जोगी को करीब 70 फीसदी और साय को 20 फीसदी वोट मिले। सन् 2008 में जोगी ने फिर यहां से चुनाव लड़ा। इस बार उनका वोट प्रतिशत घटकर 56 प्रतिशत पर आ गया पर भाजपा का वोट प्रतिशत एक प्रतिशत ही बढ़कर 21 तक पहुंच पाया। भाजपा के ध्यान सिंह पोर्ते को उन्होंने 42 हजार मतों से परास्त किया। सन् 2013 में उनके पुत्र अमित जोगी ने रिकॉर्ड मतों से जीत के सिलसिले को बनाए रखा। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी समीरा पैकरा को 46 हजार 250 मतों से पराजित किया। सन् 2013 की विधानसभा में जीत का यह अंतर सर्वाधिक रहा। 
    2018 के चुनाव में फर्क यही है कि मरवाही में हर बार जोगी पिता पुत्र कांग्रेस के पंजा निशान पर चुनाव जीतते आए हैं। इस बार उन्होंने पार्टी बदल ली है। भाजपा ने इस इलाके में एक समय जबरदस्त पैठ रखने वाले स्व. भंवर सिंह पोर्ते की पुत्री अर्चना पोर्ते को टिकट दी है। उनकी बेटी ने शंकर कंवर से विवाह किया है, जो खुद भी भाजपा के एक बड़े नेता हैं। पति-पत्नी अलग-अलग उप-जाति के आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि ध्यान में रखना होगा कि स्व. पोर्ते की पत्नी हेमवंत पोर्ते ने एक बार एनसीपी से चुनाव लड़ा तो गिनती के मतों में सिमट गई थीं और जमानत भी नहीं बचा पाईं। 
    चर्चा है, समीरा पैकरा ने पिछले पांच साल तक जीत का अंतर पाटने के लिए क्षेत्र में काफी मेहनत की और टिकट को लेकर आश्वस्त थीं। उन्होंने अमित जोगी के खिलाफ जाति और जन्म प्रमाण पत्रों में फर्जीवाड़ा का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिकाएं भी दाखिल कर रखी हैं। पैकरा को पार्टी ने इस बार मौका नहीं दिया। 
    कांग्रेस प्रत्याशी गुलाब सिंह राज को भी एक अच्छा चयन बताया जा रहा है। वे इस आदिवासी बाहुल्य इलाके में पंजा निशान लेकर मैदान में हैं। इस बार जोगी एक नए चुनाव चिन्ह, हल जोतता किसान के साथ चुनाव मैदान में हैं। इन सब परिस्थितियों के बावजूद जोगी को वहां से हराया जा सकता है यह कहना आसान नहीं है। कहा जा रहा है, छत्तीसगढ़ में यदि छजकां की कोई सबसे पहली पक्की सीट है तो मरवाही ही है। 
    जोगी के खासे असर वाले बिलासपुर और मुंगेली जिले में हर जगह जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी यह साबित कर रहे हैं कि उनका चुनाव लडऩा सिर्फ औपचारिकता नहीं है, बल्कि वे जीतने के मकसद से मैदान में हैं। यदि चुनाव निकाल भी नहीं पाएं तो वे बाजी पलटने का माद्दा तो रखते ही हैं। 
    कौशिक ने लगाया दम, पूर्व विधायकों की बेटियों की किस्मत दांव पर
    तखतपुर सीट पर पिछली बार भी मुकाबला त्रिकोणीय था। भाजपा के राजू सिंह क्षत्री बहुत कम मतों-करीब 600 से कांग्रेस प्रत्याशी आशीष सिंह ठाकुर को हरा पाए। दोनों ने करीब 44-44 हजार वोट हासिल किए। चौंकाया बसपा के संतोष कौशिक की दमदार मौजूदगी ने। उन्होंने 29 हजार से अधिक वोट हासिल कर लिए। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बनने के बाद कौशिक जोगी के साथ आ गए। जिन उम्मीदवारों की घोषणा जोगी ने छह माह पहले कर दी थी, उनमें वे भी थे। कौशिक पिछले कई माह से जी-तोड़ जनसम्पर्क कर रहे हैं। भाजपा प्रत्याशी हर्षिता पांडेय और कांग्रेस प्रत्याशी रश्मि सिंह ठाकुर का नाम दोनों पार्टियों ने बहुत देर से तय किया। कौशिक जहां दो-दो बार क्षेत्र के ज्यादातर गांवों में पहुंच चुके हैं, वहीं प्रमुख दोनों दलों के उम्मीदवारों को अपना एक फेरा लगाने में मुश्किल आ रही है। हालांकि कांग्रेस-भाजपा से, प्रत्याशी मजबूत हैं। भाजपा की हर्षिता, पूर्व मंत्री व तखतपुर से पांच बार प्रतिनिधित्व करने वाले स्व. मनहरण लाल पांडेय की बेटी हैं। रश्मि सिंह के ससुर बलराम सिंह ठाकुर और पिता स्व. रोहणी कुमार बाजपेयी दोनों ही तखतपुर से विधायक रह चुके हैं। कौशिक की दमदार मौजूदगी ने दोनों को सांसत में डाल रखा है। 
    सियाराम जीतने की स्थिति में भले न हों, पर हराएंगे जरूर 
    जिले की हाई प्रोफाइल सीटों में बिल्हा शामिल है। यहां से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक मैदान में हैं। इस सीट से एक बार कांग्रेस तो दूसरी बार भाजपा या किसी तीसरे दल के जीतने की परम्परा रही है। कांग्रेस विधायक सियाराम कौशिक ने जोगी का दामन उनकी पार्टी का गठन होने के बाद से ही संभाल रखा था, पर तकनीकी रूप में डॉ. रेणु जोगी की तरह कांग्रेस में ही थे। पिछले चुनाव में तब के विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक को सियाराम  करीब ने करीब 11 हजार मतों से हराया। जोगी कांग्रेस से सियाराम कौशिक का नाम नामांकन के अंतिम दिनों में तय किया गया। चर्चा थी कि वे कांग्रेस में वापसी का रास्ता ढूंढ रहे थे। अब वे जोगी कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। कोटा की तरह यहां भी विधायक प्रतिनिधि ब्रजेश शर्मा सहित कांग्रेस के उनके कई करीबी कार्यकर्ता पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी राजेन्द्र शुक्ला से जुड़ गए हैं। आने वाले दो-चार दिनों में देखना होगा कि सियाराम कौशिक त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बना पाएंगे या नहीं। हां, यह अवश्य है कि सियाराम कौशिक की मौजूदगी की वजह से हार जीत का अंतर पिछली बार की तरह 11 हजार नहीं बल्कि उससे कम होगा। परम्परा दोहराई गई तो इस बार जीत की बारी धरमलाल कौशिक की है पर कांग्रेस उम्मीदवार ने पिछले दो तीन सालों से लगातार मेहनत की है। उन्होंने चुनावी तैयारियों के लिए जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद का भी त्याग किया। यह उन गिनी-चुनी सीटों में से एक है, जहां कांग्रेस ने उसी को प्रत्याशी बनाया जिसने चुनाव लडऩे की तैयारी काफी पहले शुरू कर दी थी। बिल्हा विधानसभा क्षेत्र में कौशिक वोट सियाराम और धरमलाल के बीच बंटते रहे हैं। इस बार धरमलाल की तरफ जातिगत वोट झुक सकते हैं। पर कांग्रेस प्रत्याशी शुक्ला के पक्ष में कुछ और भी अनुकूल परिस्थितियां हैं। बिल्हा विधानसभा क्षेत्र में मुंगेली जिले का सतनामी बाहुल्य पथरिया इलाका भी शामिल है, जहां गुरु बालदास का बड़ा प्रभाव है। गुरु बालदास ने पिछली बार कांग्रेस के विरोध में कई प्रत्याशी उतारे जिसका लाभ भाजपा को मिला था, इस बार वे कांग्रेस के साथ हैं।  
    ब्रजेश की मौजूदगी ने अमर-शैलेष को उलझाया
    बिलासपुर सीट पर अमर अग्रवाल और शैलेष पांडेय के बीच सीधा मुकाबला है। इस सीट पर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के उम्मीदवार ब्रजेश साहू भी त्रिकोणीय संघर्ष पैदा करने के लिए पसीना बहा रहे हैं। उनकी समाज के लोगों में पकड़ है तथा जोगी का भी असर है। उनका साथ कुछ बिल्डर भी दे रहे हैं क्योंकि वे क्रेडाई के अध्यक्ष हैं। पिछला चुनाव अमर अग्रवाल ने 15 हजार से अधिक मतों से जीता था। साहू की उम्मीदवारी कांग्रेस या भाजपा किसे नुकसान पहुंचाएगी, स्थिति अभी साफ नहीं है। साहू और आम आदमी के प्रत्याशी डॉ. शैलेष आहूजा यदि 10 हजार तक वोट बटोरने में कामयाब हुए तो नतीजों में उलटफेर हो सकता है। 
    नए प्रत्याशियों के बीच पुराने खिलाड़ी टाह बेलतरा में
    बेलतरा सीट पर भी छजकां का एक मजबूत उम्मीदवार है, जिन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों को संशय में डाल रखा है। यह सीट भाजपा के पास है। मौजूदा विधायक वयोवृद्ध बद्रीधर दीवान की टिकट काटकर जिला भाजपा अध्यक्ष रजनीश सिंह को तथा कांग्रेस ने कई दिग्गज दावेदारों को किनारे कर युवा राजेन्द्र साहू को टिकट थमाई है। दोनों ही स्थानीय है और पंचायत स्तर से, जमीन की राजनीति करते हुए उभरे हैं। दोनों युवा हैं और पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन इन दोनों के लिए बिलासपुर शहर से पहुंचे छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के उम्मीदवार अनिल टाह ने परेशानी खड़ी करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। टाह ने एक बार निर्दलीय और दो बार कांग्रेस की टिकट पर बिलासपुर के विधायक अमर अग्रवाल को चुनौती दी है और जीत के बहुत करीब पहुंचने के बाद उन्हें हरा नहीं पाए। टाह, अजीत जोगी के सबसे करीबी नेताओं में से एक हैं। टाह को चुनाव लडऩे और लड़ाने का पुराना अनुभव है। वे पिछले साल भर से बेलतरा सीट पर  सक्रिय हैं। 
    तखतपुर की तरह यहां भी जोगी कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार की पहले से घोषणा कर दी थी। बेलतरा सीट में बिलासपुर शहर का भी कुछ हिस्सा है। यहां मतदाताओं के बीच भी उनकी पैठ बन चुकी है। बेलतरा में बसपा का बड़ा प्रभाव है, पुरानी सीपत सीट पर एक बार बसपा यहां से चुनाव भी जीत चुकी है। अब यहां अनिल टाह त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बना चुके हैं। नुकसान किसका करेंगे या खुद चुनाव निकाल लेंगे यह जानने के लिए 11 दिसंबर तक प्रतीक्षा करनी होगी, जब नतीजे आएंगे। 
    जोगी से छिटके लहरिया की स्थिति मस्तूरी में डांवाडोल 
    यह जोगी के व्यक्तित्व का ही असर था कि बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोकगायक-नर्तक दिलीप सिंह डहरिया को उन्होंने 2013 के चुनाव में कांग्रेस की टिकट दिलाई और तब के मौजूदा विधायक डॉ. कृष्ण मूर्ति बांधी से उन्हें 23 हजार 900 मतों के विशाल अंतर से हराकर जीत दिला दी। नई पार्टी बनाने के बाद जोगी का जिन लोगों ने साथ न देकर कांग्रेस में ही बने रहने का फैसला लिया उनमें डहरिया भी शामिल थे। इस चुनाव में डॉ. बांधी फिर मैदान में हैं और समझौते के तहत यहां से बसपा के जयेन्द्र पाटले मैदान में हैं। डॉ. बांधी इस बार डहरिया से मिली हार का बदला लेने के लिए काफी दिनों से जुटे हुए हैं। 
    जोगी के बलबूते पिछला चुनाव जीते डहरिया की स्थिति डांवाडोल दिखाई दे रही है, बावजूद इसके कि उनके जीत का फासला पिछली बार काफी अधिक था। इस अनुसूचित जाति सीट पर जोगी का खासा असर है। उन्होंने हाल ही में बसपा उम्मीदवार पाटले के समर्थन में कई सभाएं की। यहां पर जोगी कांग्रेस ने राजेश्वर भार्गव को प्रत्याशी घोषित किया था, जिसे समझौते के बाद बदला गया। जोगी को मिल रहे बसपा के साथ ने उइके को परेशानी में डाल रखा है वहीं डॉ. बांधी को लगता है कि इस स्थिति का उन्हें फायदा मिलने वाला है।  

    डॉ. रेणु जोगी कोटा में परम्परा बदलने के इरादे से दे रहीं चुनौती 
    बिलासपुर जिले की सात सीटों में से एक मरवाही पर जोगी की जीत का क्रम तोडऩे में कांग्रेस भाजपा दोनों को बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। इसी से लगे कोटा विधानसभा क्षेत्र से हमेशा होने वाली कांग्रेस की जीत का इतिहास बदलने के उद्देश्य से मैदान में हैं। जोगी कांग्रेस की टिकट पर तीन बार की विधायक डॉ. रेणु जोगी मैदान में हैं। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद आखिरी क्षणों में उन्होंने जोगी की पार्टी से लडऩे का निर्णय लिया। डॉ. जोगी के पास कोटा क्षेत्र में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की अच्छी टीम रही है। उनके जोगी कांग्रेस में जाने के बाद बहुत से करीबी उनसे अलग हो चुके हैं। इसके बावजूद जोगी की सीट के बगल का इलाका, उनकी अपनी कर्मभूमि गौरेला-पेन्ड्रा का इसी इलाके में होना और तीन बार से विधायक होना, उनके पक्ष में है। ऐसी स्थिति में यह सवाल सबके जेहन में घूम रहा है कि क्या कोटा सीट कांग्रेस की बनी रहेगी? डॉ.जोगी खुद चुनाव निकालेंगी या फिर उनकी मौजूदगी का फायदा भाजपा को मिलेगा? भाजपा ने पिछली बार के उम्मीदवार काशीराम साहू को फिर टिकट दी है, जबकि एक पुलिस अधिकारी विभोर सिंह सरकारी नौकरी छोड़कर कांग्रेस की टिकट पर पहली बार मैदान में हैं। लोगों में यह चर्चा है कि हो सकता है कि कोटा में सदा कांग्रेस के जीतने की परम्परा इस बार टूट जाए। 

    जोगी के धरमजीत, लोरमी में कांग्रेस-भाजपा पर भारी पड़ रहे
    विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और जोगी के करीबी धर्मजीत सिंह ठाकुर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस की टिकट पर मैदान में हैं। 2013 के चुनाव में यहां बड़ा उलटफेर हुआ था। कांग्रेस प्रत्याशी तब के विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर के खिलाफ भाजपा ने नए प्रत्याशी तोखन साहू को मैदान में उतारा। ठाकुर 6241 वोटों से चुनाव हार गए। इसके पीछे एक बड़ा कारण सतनाम सेना के उम्मीदवार गुरु बालदास का चुनाव मैदान में अचानक उतरना था। सतनामी समाज के 16 हजार से अधिक वोट उन्होंने तोड़ लिए और भाजपा की जीत आसान हो गई। इस बार धर्मजीत जोगी कांग्रेस से मैदान में हैं। कांग्रेस ने एक नए उम्मीदवार शत्रुघ्न सिंह चंद्राकर को टिकट दी है, जबकि भाजपा ने तोखन साहू को फिर मैदान में उतारा है। इसी बीच गुरु बालदास कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। धर्मजीत सिंह ठाकुर को इस बार भी उनका समर्थन नहीं मिल रहा है। इस बार जोगी के प्रभाव वाले सतनामी वोट तो ठाकुर के पास आएंगे ही, बाकी वोट कांग्रेस को जा सकते हैं। धर्मजीत सिंह अपने क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे हैं और वन आच्छादित क्षेत्र के आदिवासी गांवों में उनकी पैठ बरकरार है। दूसरी ओर भाजपा से जवाहर साहू का अलग होकर कांग्रेस में शामिल होना तोखन साहू को नुकसान पहुंचा सकता है। एकबारगी परिस्थिति कांग्रेस के अनुकूल दिखाई देती है पर प्रत्याशी को लेकर कांग्रेस में विरोध के स्वर भी उठे हैं। धर्मजीत सिंह ने अपने असर से यहां त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बना ली है। यह सीट जिले की उन गिनी चुनी सीटों में है जहां से जोगी कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। बिलासपुर-मुंगेली जिले की 9 सीटों में एक मरवाही तो जोगी कांग्रेस के लिए अजेय मानी जा रही है पर यदि बेलतरा, तखतपुर, लोरमी और कोटा में इस दल का प्रदर्शन आक्रामक रहा तो प्रदेश की राजनीति की तस्वीर ही बदली नजर आएगी। बहुजन समाज पार्टी के साथ उनका गठबंधन भी कई सीटों पर उन्हें फायदा पहुंचाएगी। कई सीट ऐसी हैं जिनमें कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों की जीत तो होगी पर नतीजे उम्मीद के उलट होंगे। 

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Posted Date : 10-Nov-2018
  • सीधा मुकाबला कांग्रेस के शैलेष पांडेय से, आप  और जोगी कांग्रेस की वजह से हो सकता है नतीजे उलटफेर 
    बिलासपुर, 10 नवंबर। प्रदेश के कद्दावर मंत्रियों में से एक अमर अग्रवाल इस बार एक कठिन लड़ाई में उलझते जा रहे हैं। संभवत: यह उनके पिछले चुनावों से कहीं ज्यादा मुश्किल लड़ाई है। उनकी जीत हुई तो यह शहर की उपलब्धियों को नहीं, प्रबंधन और रणनीतिक कौशल को जाएगा। यदि कांग्रेस प्रत्याशी शैलेष पांडेय की हार होती है तो इसका सीधा मतलब यह होगा कि वे कांग्रेसियों को एकजुट करने में विफल रहे और पिछले चुनाव की तरह टिकट के दूसरे दावेदारों ने कांग्रेस को जिताने में कोई दिलचस्पी नहीं ली। 
    बिलासपुर विधानसभा सीट पर भाजपा के अमर अग्रवाल और कांग्रेस के शैलेष पांडेय के बीच है। भाजपा से अग्रवाल की टिकट तो पक्की समझी जा रही थी, पर शैलेष पांडेय का नाम कई पुराने और बड़े दावेदारों को किनारे कर आखिरी मौके पर तय किया गया। इसका असर भी दिखा। प्रदेश कांग्रेस महामंत्री अटल श्रीवास्तव के समर्थकों ने टिकट की घोषणा होते ही कांग्रेस भवन में अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ नारेबाजी की, धरना दिया और तोडफ़ोड़ की। प्रचार की रणनीति बनाने के लिए बुलाई गई पहली ही बैठक में एक अन्य दावेदार अशोक अग्रवाल ने प्रत्याशी शैलेष पांडेय को तैश में आकर चुनाव जीत लेने की चुनौती दी। अटल श्रीवास्तव ने भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर नाराजगी उतारी। एक और दावेदार अरुण तिवारी भी नाराज चल रहे हैं। हालांकि संगठन ने अटल श्रीवास्तव और उनके समर्थक महेश दुबे को लोकसभा चुनाव के लिए समन्वयक बनाकर व्यस्त कर दिया है पर अशोक अग्रवाल और अरुण तिवारी की नाराजगी का नतीजा यह दिखाई दे रहा है कि वे और उनके समर्थक पांडेय के पक्ष में घूमते नहीं दिखाई दे रहे हैं। 
    प्रत्याशी पांडेय ने अपने स्तर पर इनकी नाराजगी दूर करने की कोशिश की है। पांडेय की कांग्रेस प्रवेश लेकर चुनाव तैयारी की अवधि तकरीबन डेढ़ दो सालों की ही रही है, जबकि दूसरे दावेदार सालों से कांग्रेस में सक्रिय रहे हैं। इनमें से अटल श्रीवास्तव ने कभी पार्टी भी नहीं बदली और बीते सितम्बर माह में हुए लाठी चार्ज के बाद समझा जा रहा था कि उनकी दावेदारी अब पक्की हो चली है। पांडेय ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सीधे पकड़कर वोटरों से प्रत्यक्ष मिलने को प्राथमिकता दी है। उनके परिवार के सदस्य भी प्रचार में उतरे हैं। 
    दूसरी ओर, भाजपा प्रत्याशी अमर अग्रवाल ने शहर में अपनी काफी पैठ बना ली है। संगठन के अलावा उनके अपने समर्थकों की बड़ी टीम उनके साथ है। कांग्रेस में जहां, कई बड़े चेहरे वोटों को निकालने की क्षमता रखते हैं वहीं भाजपा में केवल अमर अग्रवाल अपने फैन्स के जरिये यह काम कर लेते हैं। भाजपा में तो सालों से किसी शहर अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की जाती। शायद इसलिए कि महत्वाकांक्षा जाग जाने के बाद वह अमर अग्रवाल के लिए चुनौती न बन जाए। उन्होंने प्राय: सभी वर्गों में पकड़ बनाकर रखी है। कभी खेल, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मदद करके, कभी उनके सम्मान में कार्यक्रम रखकर उनके साथ लगातार जुड़े रहने की गतिविधियां चलती रहती हैं। हर छोटे-बड़े आयोजन को समारोह पूर्वक कराया जाना और उनमें भीड़ जुटाना उनकी टीम के लिए बड़ा काम नहीं है। स्वच्छता और लिविंग फेसलिटी में बिलासपुर को राष्ट्रीय स्तर पर मिली अच्छी रेंकिंग को वे अपनी उपलब्धि बताते हैं। 
    इन सबके बावजूद अग्रवाल के लिए इस चुनाव को पिछले चुनावों के मुकाबले काफी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेसियों का कहना है कि वे लगातार 20 साल से बिलासपुर का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं पर बिलासपुर के विकास को अपेक्षित गति नहीं मिली। अरपा परियोजना साडा के गठन के बाद भी ठप पड़ी है और वह बड़ी महत्वाकांक्षी घोषणा के बावजूद सूखी और गंदली है। यहां रेत माफियाओं का बोलबाला है। दूसरी तरफ इसके दोनों ओर की जमीन की खरीदी-बिक्री पर लगाए गए सशर्त प्रतिबंध से भी लोगों में नाराजगी है। इसका असर बिलासपुर का जल स्तर घटने के रूप में सामने आया है। शहर की अंडरग्राउन्ड सीवरेज परियोजना उनके तीसरे कार्यकाल में भी पूरी नहीं हो पाई। शहर के लोग जगह-जगह खुदाई से परेशान होते हैं। मास्टर प्लान में देरी ने भी शहर को पीछे धकेला है।  बार-बार इस परियोजना की लागत बढ़ी पर नतीजा सामने नहीं आया। रोजगार के अवसर और औद्योगिक विकास भी आशाजनक नहीं रहा। नगर निगम में भ्रष्टाचार, सिम्स,जिला अस्पताल में सहित अन्य स्वास्थ्य केन्द्रों में लचर सुविधाएं, सड़कों पर धूल, जल जमाव और खराब ट्रैफिक व्यवस्था को भी कांग्रेस के लोग मुद्दा बनाते रहे हैं। कांग्रेस का मानना है कि लोग इन समस्याओं से त्रस्त हैं और बदलाव चाहते हैं। कांग्रेस भवन में हुए लाठी चार्ज की घटना का भी भाजपा को नुकसान होगा। 
    पर, भाजपा प्रत्याशी अमर अग्रवाल के लिए लड़ाई आसान नहीं होने का अकेला यह कारण नहीं है। इस चुनाव में पहली बार हो रहा है कि भाजपा के भीतर से भी उनके विरोध में आवाजें उठी। आरएसएस से जुड़े डॉ. मनीष राय पिछले दो तीन सालों से टिकट की मांग करते हुए सक्रिय रहे हैं और वे शहर की मौजूदा 'बदहालीÓ के लिए नेतृत्व को जिम्मेदार मानते आए हैं। 
    भाजपा कार्यालय में उनके साथ अमर समर्थक एक नेता के साथ उनका विवाद भी हो चुका है। भाजपा महिला मोर्चा की एक नेत्री किरण सिंह ने भी टिकट के लिए दावा किया। मगर, इसके बाद चौंकाने वाला एक नाम आया पेंड्रा के भाजपा नेता पूरन छाबरिया का। उन्होंने अमर अग्रवाल के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल दिया। वे नामांकन पत्र लेने जिला निर्वाचन कार्यालय पहुंचे थे, मंत्री अग्रवाल के विरोध की वजह मीडिया को बता ही रहे थे कि पुराने मामलों में उनको पुलिस ने वहीं से गिरफ्तार कर लिया। जमानत पर छूटकर छाबरिया नामांकन भरना चाहते थे, पर उन्हें प्रक्रिया पूरी करने में कुछ मिनटों की देरी हो गई और वे इससे चूक गए। उपरोक्त घटना उनके खिलाफ पार्टी के भीतर चल रही नाराजगी का संकेत हो सकती है। यह देखना होगा कि यह असंतोष उनके खिलाफ वोट में न तब्दील हो जाए। 
    बिलासपुर में इस बार भी सीधा संघर्ष कांग्रेस और भाजपा के बीच ही दिखाई दे रहा है हालांकि छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के उम्मीदवार ब्रजेश साहू और आम आदमी पार्टी के डॉ. शैलेष आहूजा मैदान में हैं। साहू बिलासपुर क्रेडाई और पिछड़ा वर्ग संगठन के अध्यक्ष हैं। साहू वोटों पर भाजपा का ज्यादा प्रभाव देखा गया है। डॉ. आहूजा सिंधी समाज से हैं और इस समुदाय का झुकाव भी भाजपा की ओर प्राय: होता है। ये दोनों उम्मीदवार बहुकोणीय संघर्ष की स्थिति बनाने में अब तक सफल नहीं दिखाई दे रहे हैं पर जहां जीत का अंतर कम होने वाला हो वहां, इनके द्वारा बटोरे जाने वोट अहम् हैं। यहां त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बन जाती यदि छजकां से अनिल टाह चुनाव लड़ते, जिन्होंने पहले तीन बार के चुनावों में यहां से अच्छा प्रदर्शन किया है। वे इस बार बिलासपुर ग्रामीण सीट बेलतरा शिफ्ट हो गए हैं।
    भाजपा प्रत्याशी के समर्थकों ने कोटा थाने में शैलेष पांडेय के खिलाफ दर्ज अपराधों को भी एक मुद्दा बनाया हुआ है। वे यहां के सीवी रामन यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार थे और इस समय जमानत पर हैं। वे इन्हें मीडिया द्वारा गढ़ा गया 'पैराशूटÓ चेहरा भी बताते हैं। इन मुद्दों का असर कितना होगा, यह कहा नहीं जा सकता पर कांग्रेस के प्रचलित चेहरों की जगह नए उम्मीदवार की छवि एक विनम्र प्रत्याशी की भी बनी हुई है। 
    सन् 2013 के चुनाव में भी मंत्री अमर अग्रवाल के खिलाफ माहौल महसूस किया जा रहा था, पर उन्होंने यह सीट तब 15 हजार से अधिक मतों से निकाल ली। इस बार फिर कहा जा रहा है कि अग्रवाल को जीत के लिए कड़ी टक्कर मिल रही है, मतदाता क्या फैसला देते हैं यह चुनाव परिणामों से ही मालूम होगा। 

    बिलासपुर से ऐसे खिसकी कांग्रेस की जमीन 

    बीते 20 साल में भाजपा और अपने-आपको मजबूत करने में अमर अग्रवाल को कांग्रेसियों की ही वजह से किस तरह से सफलता मिलती गई, यह दिलचस्प कहानी है। 
    सन् 1998 में एकीकृत मध्यप्रदेश के तत्कालीन मंत्री स्व. बीआर यादव की टिकट मढ़ोताल जमीन घोटाले में नाम आ जाने के कारण काट दी गई। तब उन्होंने अपने बेटे कृष्ण कुमार यादव (राजू) को टिकट दिलाई। कमलनाथ की मदद से उन्होंने टिकट हासिल तो कर ली, पर  वे स्थानीय कांग्रेसियों को यह समझाने में विफल रहे कि राजनीति में अभी-अभी कदम रखने वाले अपने बेटे के लिए ही वे क्यों अड़ गए। तत्कालीन सांसद अजीत जोगी के कट्टर समर्थक अनिल टाह जो बिलासपुर विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष थे, वे निर्दलीय चुनाव लड़ गए। इस चुनाव में अमर अग्रवाल को करीब 41 हजार वोट मिले। अनिल टाह 30 हजार वोट पाकर दूसरे स्थान पर आए। कांग्रेसियों के वोट बंटने के कारण अधिकृत  प्रत्याशी यादव 22 हजार मतों में ही सिमटकर रह गए। 17 सालों तक कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे यादव की राजनीति का इसी के साथ पटाक्षेप हो गया और अमर अग्रवाल भाजपा के विधायक बने।
    इसके बाद आया 2003 का चुनाव। मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अनिल टाह को कांग्रेस की टिकट दिलवाई। उस समय प्रदेश में कांग्रेस विरोधी माहौल, खासकर जोगी के खिलाफ वातावरण तैयार हुआ था। जग्गी हत्याकांड, वीसी शुक्ल का एनसीपी में जाना, और प्रदर्शनकारी भाजपा नेताओं पर लाठी चलाना जैसे मुद्दे हावी थे। अमर अग्रवाल के वोट भी इस चुनाव में बढ़े और वोट प्रतिशत भी। वे 46.61 प्रतिशत वोट लेकर चुनाव जीते, 61 हजार से अधिक मत हासिल किए। मगर यह जीत आसान बनाई कांग्रेस के नेताओं ने ही। टिकट की दावेदारी कर रहे अशोक अग्रवाल ने बगावत कर दी और समाजवादी पार्टी से लड़ गए। बीआर यादव एनसीपी का दामन थामकर मैदान में गए। 
    जाहिर है इन दोनों ने कांग्रेस के ही ज्यादातर वोट काटे। दोनों के मिले वोट 9641 (अशोक अग्रवाल 6179, यादव 3435) थे और अनिल टाह महज 5843 मतों से चुनाव हार गए। 55311 वोट हासिल करने के बावजूद और दूसरी बार चुनाव लड़कर भी उनके हाथ पराजय आई।  सन् 2003 में प्रदेश की बागडोर भाजपा के हाथ आ गई। बिलासपुर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जिला। अमर अग्रवाल मंत्री बनाए गए। 
    2008 का चुनाव आते-आते अमर अग्रवाल बिलासपुर में ही नहीं प्रदेश में एक ताकतवर मंत्री बन चुके थे। उन्होंने अपनी पार्टी के भीतर के विरोध को खामोश तो कर ही दिया था, कांग्रेसियों के बीच भी उनकी पैठ बन चुकी थी। इस बार फिर उनका मुकाबला अनिल टाह से हुआ, जो कांग्रेस की ही टिकट पर लड़े। कांग्रेसियों के एक बड़े धड़े का मानना था कि बार-बार चुनाव हारने के बाद भी टाह को टिकट क्यों दे दी जाती है। बाकी दावेदारों को मौका क्यों नहीं मिलता। कांग्रेस से बगावत इस बार हुई नहीं, पर वे लोग जिन्हें टाह की उम्मीदवारी पसंद नहीं थी, घर बैठ गए। टाह की किस्मत ने इस बार भी साथ नहीं दिया और तीसरी बार उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस बार भाजपा प्रत्याशी अमर अग्रवाल ने उन्हें सीधे मुकाबले में 9300 मतों के अंतर से हरा दिया। 
    2013 के चुनाव आते-आते मंत्री अमर अग्रवाल ने बिलासपुर में अपनी पकड़ बहुत मजबूत कर ली। पार्टी के भीतर उनका विरोध करने वाले हाशिये पर तो चले ही गए थे, खेल, सांस्कृतिक, व्यापारिक संगठनों के नाम पर कांग्रेस से जुड़े लोग भी उनके इर्द-गिर्द दिखाई देने लगे। इस बार जाना-पहचाना चेहरा होने और महिला प्रत्याशी होने के नाम पर तब की महापौर वाणी राव को कांग्रेस ने टिकट दी। उनको टिकट देते ही कांग्रेसियों के हाथ से एक बड़ा मुद्दा निकल गया। वह था अंडरग्राउन्ड सीवरेज परियोजना में लेट-लतीफी और इससे जुड़े कथित भ्रष्टाचार का मामला। मंत्री के रूप में अमर अग्रवाल लोगों को यह समझाने में सफल रहे कि इसके लिए कांग्रेस प्रशासित नगर निगम जिम्मेदार है। 
    राव भाजपा सरकार में भाजपा पार्षदों की बहुमत के बीच महापौर थी, दूसरी ओर कई कांग्रेसी पार्षद उनके खिलाफ खुद ही मोर्चा खोले हुए बैठे थे। नतीजतन, जब वह पार्टी टिकट लेकर आई तो महापौर के रूप में अपनी उपलब्धि बताने के लिए कुछ भी विशेष नहीं था। वे एक असहाय महापौर के रूप में रही, जिनकी अधिकारी भी नहीं सुनते थे और वार्डों के छोटे-छोटे काम नहीं होते थे। कई बार उन्हें सूचना के अधिकार के तहत अपने ही नगर-निगम में जानकारियां मांगनी पड़ी। 
    कई कांग्रेस पार्षद उनके साथ अनमने ढंग से घर से निकले तो कई बड़े नाम वाले नेताओं ने साथ देने के नाम पर औपचारिकता निभाई। इस चुनाव में अमर अग्रवाल रिकॉर्ड 15 हजार 599 मतों की बढ़त के साथ जीत गए। इसके बाद तो उनका भी रिकॉर्ड महापौर प्रत्याशी किशोर राय ने तोड़ दिया। जनवरी 2015 के चुनाव में वे 35 हजार 117 से चुनाव जीत गए। अब अमर अग्रवाल पांचवी बार चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेसियों के सामने अपनी खोई हुई जमीन को हासिल को वापस पाने की चुनौती है। 

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Posted Date : 06-Nov-2018
  • -ललित शर्मा 
    आज छोटी दीवाली है, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की इस चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहा जाता है। नरक चतुर्दशी को च्छोटी दीपावलीज् भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त इस चतुर्दशी को च्नरक चौदसज्, च्रूप चौदसज्, च्रूप चतुर्दशीज्, च्नर्क चतुर्दशीज् या च्नरका पूजाज् के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं। इस चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज जी की पूजा व उपासना की जाती है।
    शास्त्रों के अनुसार दस दिशाएं मानी गई है, जिसमें सभी दिशाओं के रक्षक दिग्पाल कह्रे जाते हैं। ऊर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारूत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत के रक्षक होते हैं। प्राचीन काल में इन दिग्पालों की स्थापना मंदिरों की भित्तियों में इनकी दिशाओं के अनुसार की जाती है। चित्र में भुवनेश्वर के राजा रानी मंदिर में स्थापित यम दिखाई दे रहे हैं।
    एक कथा के अनुसार रन्तिदेव नामक एक राजा हुए थे। वह बहुत ही पुण्यात्मा और धर्मात्मा पुरूष थे। सदैव धर्म, कर्म के कार्यों में लगे रहते थे। जब उनका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उन्हें लेने के लिए आये। वे दूत राजा को नरक में ले जाने के लिए आगे बढ़े। 
    यमदूतों को देख कर राजा आश्चर्य चकित हो गये और उन्होंने पूछा- मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया है तो फिर आप लोग मुझे नर्क में क्यों भेज रहे हैं। कृपा कर मुझे मेरा अपराध बताइये, कि किस कारण मुझे नरक का भागी होना पड़ रहा ह।  राजा की करूणा भरी वाणी सुनकर यमदूतों ने कहा- हे राजन एक बार तुम्हारे द्वार से एक ब्राह्मण भूखा ही लौट गया था, जिस कारण तुम्हें नरक जाना पड़ रहा है।
    राजा ने यमदूतों से विनती करते हुए कहा कि वह उसे एक वर्ष का और समय देने की कृपा करें। राजा का कथन सुनकर यमदूत विचार करने लगे और राजा को एक वर्ष की आयु प्रदान कर वे चले गये। यमदूतों के जाने के बाद राजा इस समस्या के निदान के लिए ऋषियों के पास गया और उन्हें समस्त वृत्तांत बताया। ऋषि राजा से कहते हैं कि यदि राजन कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करे और ब्राह्मणों को भोजन कराये और उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करे तो वह पाप से मुक्त हो सकता है। ऋषियों के कथन के अनुसार राजा कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करता है। इस प्रकार वह पाप से मुक्त होकर भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम को पाता है। 
    एक अन्य प्रसंगानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह में कृष्ण चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करके देवताओं व ऋषियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलवाई थी। इसके साथ ही कृष्ण भगवान ने सोलह हज़ार कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त करवाया। इसी उपलक्ष्य में नगरवासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया। तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा।
    एक अन्य कथानुसार भगवान राम के भक्त महावीर हनुमान जी का जन्म आज के ही दिन हुआ था। हनुमान जी को रूद्र के अवतारों में से एक माना जाता है। भगवान राम त्रेतायुग में धर्म की स्थापना करके पृथ्वी से अपने लोक बैकुण्ठ चले गये। लेकिन भगवान राम ने धर्म की रक्षा के लिए प्रलय काल तक हनुमान को पृथ्वी पर रहने का आग्रह किया। इसके लिए राम ने हनुमान ही को अमरता का वरदान दिया। 
     (लेखक सुपरिचित ब्लॉगर हैं)

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Posted Date : 05-Nov-2018
  • 5 नवम्बर :  धनतेरस को धन और आरोग्य के लिए भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। भगवान धन्वंतरि आरोग्य प्रदान करते हैं। अच्छा स्वास्थ्य सबसे बड़ा सुख है। यदि हम बीमारियों से दूर हैं तो यह समझ लेना चाहिए कि हम संसार के सुखी व्यक्ति हैं। इसलिए धन का संबंध यहां आरोग्य से किया गया। 

    आरोग्यता होगा तभी कोई व्यक्ति धन का भोग कर पाएगा। धन की तीन ही गति होती है उपभोग, दान और नाश। यदि हम धन का उपभोग नहीं करते और समय समय पर समुचित दान नहीं करते तो धन का नाश होना निश्चित है। आइये सुजीत जी महाराज से जानते हैं भगवान धन्वंतरि को बहुत ही सरल, सहज और भक्तिमय तरीके से कैसे प्रसन्न करें जिससे उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। 

    सबसे पहले मिट्टी का हाथी बनाएंगे।

    अब भगवान धन्वंतरि का चित्र या मूर्ति स्थापित करेंगे। काठ के आसन पर लाल वस्त्र बिछाकर दोनों को स्थान देते हैं।

    अब नीचे कुश के आसन पर  बैठकर पूजा करने के लिए बैठें। शुद्ध चांदी या ताम्र के आचमनी से तीन बार जल का आचमन करते हैं।

    श्री गणेश जी के पूजन से पूजा आरंभ करते हैं। अब सबको पुष्प चढ़ाते हैं।

    हाथ में अछत और पुष्प लेकर भगवान धन्वंतरि का ध्यान करते हैं।

    यदि आप किसी विशेष उद्देश्य से पूजा कर रहे हैं तो संकल्प भी कर सकते हैं।

    याद रहे भगवान को विधि विधान से पंचामृत स्नान कराते हैं। वस्त्र धारण कराएंगे। रोली या चंदन से तिलक करेंगे।अब सम्पूर्ण पूजन करेंगे जिसमें फल, पान का पत्ता, चांदी और स्वर्ण के सिक्के इनको अर्पित करके चालीसा पढ़ेंगे। अंत में हवन करके आरती करेंगे।

    भगवान धन्वंतरि से दोनों हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करें कि हे स्वास्थ्य के देवता, हे धन के देवता हमको निरोग कीजिये और धन प्रदान करिये और हमारे धन का व्यय रोग पर कदापि मत खर्च हो उतना हम किसी नेक कार्य या गरीबों में दान करेंगे। हे धन्वंतरि भगवान मैं आपके शरण में हूं ।

    आप हमको आरोग्य दीजिये। श्री धन्वंतरि देवः शरणम मम्।।इस मंत्र को कम से कम 108 बार जपें। साथ में धन प्राप्ति की प्रार्थना भी करें। इसके साथ श्री सूक्त के ऋग्वैदिक श्री सूक्तं के 16 मंत्रों का जप करें इससे आपको बहुत से सरल विधि से धन और आरोग्य दोनों की प्राप्ति होगी। (टाइम्स नाउ न्यूज़ डॉट कॉम)

     

     

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Posted Date : 03-Nov-2018
  • शशांक तिवारी
    रायपुर, 3 नवंबर (छत्तीसगढ़)। विधानसभा की पहले चरण की 18 में से 11 पर कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है। सिर्फ कोंटा सीट ही ऐसी है, जहां कांग्रेस और भाजपा से परे अन्य दल के प्रत्याशी की दमदार मौजूदगी दिख रही है। यहां तीनों में से कौन बाजी मारेगा, यह अनुमान लगा पाना फिलहाल कठिन दिख रहा है। इससे परे 6 सीटों पर जोगी पार्टी-बसपा गठबंधन और सीपीआई के प्रत्याशी अच्छे- खासे वोट बटोरने की स्थिति में दिख रहे हैं।  
    बस्तर संभाग और राजनांदगांव जिले की विधानसभा सीटों पर 12 तारीख को मतदान होगा। पहले चरण की सीटों पर कांग्रेस और भाजपा ने अपनी ताकत झोंक दी है। भाजपा ने यहां आक्रामक प्रचार की रणनीति बनाई है और प्रचार के लिए केंद्रीय मंत्रियों को उतारा है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी रविवार को बस्तर आने वाले हैं। कांग्रेस भी प्रचार में ज्यादा पीछे नहीं है। कांग्रेस के बड़े नेता अलग-अलग क्षेत्रों में चुनावी सभा को संबोधित कर रहे हैं। बसपा-जोगी पार्टी गठबंधन का भी प्रचार चल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी लगातार चुनावी सभा को संबोधित कर रहे हैं। 
    पिछले चुनाव में कांग्रेस को पहले चरण की 18 में से 12 सीटों पर जीत मिली थी। भाजपा को मात्र 6 सीटें मिली थी। इस बार भी पहले चरण की सीटों पर कांग्रेस अपनी बढ़त बरकरार रखने के लिए भरसक मेहनत कर रही है। फिलहाल पहले चरण की सीटों में प्रचार-प्रसार का आंकलन करने पर यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि कोंटा ही एकमात्र ऐसी सीट है जहां कांग्रेस के कवासी लखमा, भाजपा के बारसे धनीराम और सीपीआई के पूर्व विधायक मनीष कुुंजाम के बीच बराबरी का मुकाबला दिख रहा है। कोंटा में भाजपा, छिंदगढ़ में कांग्रेस और सुकमा इलाके में सीपीआई की पकड़ मजबूत दिख रही है। यहां मुकाबला त्रिकोणीय हैं। ऐसे में ऊंट किस करवट पर बैठेगा, इसका अंदाज लगा पाना फिलहाल मुश्किल है। कोंटा से परे भानुप्रतापपुर, दंतेवाड़ा, खैरागढ़, मोहला-मानपुर, डोंगरगढ़ और खुज्जी में अन्य दलों की दमदार मौजूदगी दिख रही है। जबकि  राजनांदगांव, डोंगरगांव, बीजापुर, चित्रकोट, बस्तर, जगदलपुर, कांकेर, नारायणपुर, कोंडागांव, केशकाल, अंतागढ़ में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर के आसार दिख रहे हैं। 
    जोगी पार्टी-बसपा गठबंधन के साथ-साथ सीपीआई कुल मिलाकर 5 और एक जगह डोंगरगढ़ में निर्दलीय उम्मीदवार जीत-हार में अहम भूमिका निभा सकते हैं। जोगी पार्टी के उम्मीदवार पूर्व सांसद देवव्रत सिंह खैरागढ़ सीट से चुनाव लड़ रहे हैं और वे यहां काफी कुछ वोट बटोरने की स्थिति में दिख रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा के असंतुष्ट नेताओं का साथ उन्हें मिल रहा है। कांग्रेस से मौजूदा विधायक गिरवर जंघेल और भाजपा के पूर्व संसदीय सचिव कोमल जंघेल मुकाबले में हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में किसान संघ से जुड़े लोगों का समर्थन गिरवर के पक्ष में दिख रहा है। ऐसे में यहां मुकाबला कांटे का हो चला है। 
    मोहला-मानपुर में वैसे तो कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है, लेकिन जोगी पार्टी के उम्मीदवार संजीत ठाकुर ने दोनों के नाक में दम कर दिया है। जाति समीकरण के लिहाज से कांग्रेस की स्थिति यहां मजबूत दिख रही है। इसी तरह भानुप्रतापपुर सीट से कांग्रेस के मनोज मंडावी और भाजपा के देवलाल दुग्गा के बीच मुकाबले में आम आदमी पार्टी के कोमल उपेंडी और जोगी पार्टी के मानक दरपट्टी निर्णायक भूमिका में दिख रहे हैं। उपेंडी को आम आदमी पार्टी ने सीएम प्रोजेक्ट किया है। इसके अलावा खुज्जी से जोगी पार्टी के उम्मीदवार जनरैल सिंह भाटिया, कांग्रेस प्रत्याशी छन्नी साहू और भाजपा के डॉ. नीरेंद्र साहू के बीच जगह बनाने की कोशिश कर रहे है। दंतेवाड़ा सीट से सीपीआई के नंदराम सोरी भी कांग्रेस की देवती कर्मा और भाजपा के भीमा मंडावी के बीच मुकाबले में हैं। पिछले चुनाव में भी सीपीआई उम्मीदवार ने यहां दस हजार से अधिक मत पाए थे। सीपीआई का ग्रामीण इलाकों में अच्छा आधार है। इस बार भी सीपीआई उम्मीदवार अच्छे-खासे मत पाने की स्थिति में दिख रहे हैं। इन सबके बावजूद मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच में ही है।  
    डोंगरगढ़ सीट मेें कांग्रेस और भाजपा के बीच निर्दलीय उम्मीदवार तरूण हथेल दमदार मौजूदगी का अहसास करा रहे हैं। तरूण नगर पालिका के अध्यक्ष हैं और वे निर्दलीय ही अध्यक्ष बने थे। उनका प्रचार-प्रसार ग्रामीण इलाकों में भी बेहतर ढंग से चल रहा है। बहरहाल, तीसरे दलों के उम्मीदवार जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। 

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Posted Date : 29-Oct-2018
  • नई दिल्ली, 29 अक्टूबर : धनतेरस 5 नवम्बर 2018 दिन सोमवार को मनाया जाएगा। भारतीय कैलेंडर के अनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन की देवी के उत्सव का प्रारंभ होने के कारण इस दिन को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। धनतेरस को धन त्रयोदशी व धन्वन्तरी त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय कलश के साथ माता लक्ष्मी का अवतरण हुआ उसी के प्रतीक के रूप में ऐश्वर्य वृद्धि, सौभाग्य वृद्धि के लिए बर्तन खरीदने की परम्परा शुरू हुई। 

    ज्योतिर्विद् पं.दिवाकर त्रिपाठी पूर्वांचली ने बताया कि इस दिन स्थिर लग्न में बर्तन आदि सहित कोई भी धातु खरीदना शुभफल दायक होता है। त्रयोदशी तिथि का मान 04 नवम्बर 2018 दिन रविवार को रात में 12:51बजे से 5 नवम्बर 2018 दिन सोमवार की रात 11:17 बजे तक है | अर्थात त्रयोदशी तिथि अर्थात धन त्रयोदशी तिथि 05 नवम्बर 2018 दिन सोमवार को सूर्योदय से रात 11:17 तक रहेगा। अतः गृहोपयोगी सामान त्रयोदशी तिथि के स्थिर लग्न में खरीदना श्रेयस्कर होता है। इस दिन सम्पूर्ण दिन उत्तरा हस्त नक्षत्र, विष्कुम्भ योग एवं वज्र योगा व्याप्त रहेगी। 

    ज्योतिर्विद् पं.दिवाकर त्रिपाठी ने बताया की इस दिन स्थिर लग्न में की गयी खरीदारी अति शुभफल दायक होती है ---
    त्रयोदशी तिथि में स्थिर लग्न
    (1) :- सुबह 07:07 से 09:15बजे तक
    (2) :-दोपहर 01:00 से 02:30 बजे तक
    (3) :- रात 05:35 से 07:30 बजे तक 
    होने के कारण इस बीच की गयी खरीदारी शुभफल दायी होता है | 
    इस दिन लक्ष्मी पूजन हेतु श्रेष्ठ मुहूर्त्त प्रदोष काल एवं वृष लग्न 05:35 से 07:30 बजे रात तक है। 

    इस दिन शुक्र तुला राशि मे स्वगृही होकर मालव्य योग के साथ विद्यमान है तथा मंगल अपनी उच्च राशि मकर में विद्यमान रहेंगे, देव गुरु बृहस्पति मंगल की राशि वृश्चिक में विद्यमान होंगे जो पूर्ण शुभफल दायक होंगे और व्यापारिक वृद्धि एवं चमक धमक में वृद्धि होगी। (हिंदुस्तान)

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Posted Date : 27-Oct-2018
  • नई दिल्ली 27 अक्टूबर : आज सुहागिनों का त्‍योहार करवा चौथ का व्रत है. करवा चौथ के व्रत का इंतजार हर सुहागिन को रहता है. करवा चौ‍थ पर महिलाएं अपने अखंड सुहाग के लिए व्रत रखती हैं. करवा चौथ के व्रत को बेहद कठिन माना जाता है. इस दिन निर्जला व्रत रखकर महिलाएं अपने सौभाग्य की कामना करती हैं. सोलह श्रृंगार कर चंद्रमा की पूजा करती हैं और चांद को छलनी में देखने के बाद पति के दर्शन करती हैं.

    पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 40 मिनट से 6 बजकर 50 मिनट तक रहेगा. पूजा के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने का समय शाम 7 बजकर 55 मिनट से 8 बजकर 19 मिनट तक होगा. इसी समय पर पूरे देश में चांद के दर्शन होंगे. (aajtk)

     सूर्योदय से पहले स्नान कर के व्रत रखने का संकल्प लें.

    - इसके बाद मिठाई, फल, सेवई और पूरी आदि ग्रहण करके व्रत शुरू करें.

    - फिर संपूर्ण शिव परिवार और श्रीकृष्ण की स्थापना करें.

    - गणेश जी को पीले फूलों की माला, लड्डू और केले चढ़ाएं.

    - भगवान शिव और पार्वती को बेलपत्र और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें.

    - श्री कृष्ण को माखन-मिश्री और पेड़े का भोग लगाएं.

    - उनके सामने मोगरा या चंदन की अगरबत्ती और घी का दीपक जलाएं.

    - मिट्टी के करवे पर रोली से स्वास्तिक बनाएं.

    - करवे में दूध, जल और गुलाबजल मिलाकर रखें और रात को छलनी के प्रयोग से चंद्र दर्शन करें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें.

    - इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार जरूर करें, इससे सौंदर्य बढ़ता है.

    - इस दिन करवा चौथ की कथा कहनी या फिर सुननी चाहिए.

    - कथा सुनने के बाद अपने घर के सभी बड़ों का चरण स्पर्श करना चाहिए.

    - फिर पति के पैरों को छूते हुए उनका आशीर्वाद लें .

    - पति को प्रसाद देकर भोजन कराएं और बाद में खुद भी भोजन करें.

     

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Posted Date : 25-Oct-2018
  • 25 अक्टूबर: करवा चौथ का व्रत हर महिला के लिए बेहद खास होता है। इस दिन सभी महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। करवा चौथ नजदीक आते ही सुहागिन महिलाएं कुछ दिन पहले से तैयारी शुरू कर देती हैं। इसके लिए आप व्रत और पूजा को इस विधि से करेंगे तो आपके सुहाग की उम्र और भी लंबी होगी। इस बार करवा चौथ का व्रत 27 अक्तूबर को रखा जाएगा।

    यह व्रत सुबह सूर्योदय से पूर्व प्रात: 4 बजे प्रारंभ होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद पूर्ण होता है। ज्योतिषाचार्य पंडित संतराम के अनुसार 05 बजकर 36 मिनट से 06 बजकर 53 मिनट तक पूजा का शुभ मुर्हूत है। वहीं चंद्र दर्शन का समय रात्रि 7 बजकर 55 मिनट पर होगा। ऐसे में सुहागिनें चांद को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलें। 

    कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करकचतुर्थी या करवा-चौथ व्रत करने का विधान है। इस दिन गेहूं अथवा चावल के दानें हाथ में लेकर कथा सुननी चाहिए। बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी पर शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की मूर्तियों की स्थापना करें। यदि मूर्ति ना हो तो सुपारी पर धागा बांध कर उसकी पूजा की जाती है। इसके बाद अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए देवी देवताओं का स्मरण करें और करवे सहित बायने(खाने) पर जल, चावल और गुड़ चढ़ायें।

    रात में चंद्रमा उदय होने पर छलनी की ओट में चंद्रमा का दर्शन करके अर्घ्य देने के पश्चात व्रत खोलना शुभप्रद रहता है। वहीं व्रत रखने वाली स्त्री को काले और सफेद कपड़े पहनने से बचना चाहिए। इस दिन लाल और पीले रंग के कपड़े पहनना विशेष फलदायी होता है। इस दिन महिलाओं को चाहिए कि वे पूर्ण श्रृंगार करें और अच्छा भोजन खाएं। इस दिन पति की लंबी उम्र के साथ संतान सुख भी मिल सकता है।

    मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले माता पार्वती ने यह व्रत शिवजी के लिए रखा था। इसके बाद ही उन्हें अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था। इसलिए इस व्रत में भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा की जाती है।  वहीं महाभारत में पांडवों की विजय के लिए द्रौपदी द्वारा भी इस व्रत को रखा गया था। (अमर उजाला)

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