गैजेट्स

Posted Date : 12-Nov-2018
  • फेसबुक ने अब कुछ ऐसा किया जिसकी काफी आलोचना हो रही है। फेसबुक अब टीनेज लड़कियों को अधेड़ पुरुषों से दोस्ती का सुझाव दे रहा है। जैसे ही खबर सामने आई तो सभी हैरान रह गए। जिन प्रोफाइल को फेसबुक सजेस्ट क रहा है, उनमें कई प्रोफाइल तस्वीरों तो अर्धनग्न हैं। हर जगह फेसबुक की आलोचना हो रही है और जल्द से जल्द सजेस्ट करने वाले ऑप्शन को बंद करने को कहा है। 
    'द टेलीग्राफÓ की शनिवार की रिपोर्ट के अनुसार, 13 साल की किशोरियों को सोशल नेटवर्क ने दोस्त बनाने के लिए 300 सुझाव दिए हैं, जिनमें कुछ अधेड़ उम्र के ऐसे पुरुष हैं, जो प्रोफाइल तस्वीरों में अर्धनग्न हैं। फेसबुक ने कहा है कि किशोर-किशोरियों के लिए सेवा से जुडऩा कोई खास नया अनुभव नहीं है और सोशल नेटवर्क ने अपने अनुशंसा तंत्र में सुरक्षा का प्रावधान किया है।
    इस पर फेसबुक ने कहा है कि साइन अप करने वाली किशोरियों के ऐसे सजेशन की कोई विशेष प्रणाली नहीं होती है। इस तथ्य के सामने आने पर यूके की परोपकारी संस्थान नेशनल सोसायटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ कू्रएल्टी टू चिल्ड्रन (एनएसपीसीसी) ने सोशल नेटवर्किंग साइट पर दोस्त बनाने के सुझाव रद्द करने की मांग की है। (आईएएनएस)

     

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Posted Date : 12-Nov-2018
  • - नील्स त्सिमरमन
    आप अपने स्मार्टफोन में जो भी सब करते हैं, वह सारा डाटा फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों के पास पहुंच जाता है। होलोचेन तकनीक इसे बदल सकती है। जानिए कैसे आपका डाटा सिर्फ और सिर्फ आप ही के हाथों में रहेगा।
    आपने कभी सोचा है कि किसी भी वेबसाइट पर पहुंचने के लिए आपको उसके नाम से पहले डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू क्यों लगना पड़ता है? दरअसल 1990 के दशक में ब्रिटेन के टिम बर्नर्स ली ने वल्र्ड वाइड वेब यानी डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू को ईजाद किया। इसे डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू इंटरनेट कम्यूनिकेशन प्रोटोकॉल भी कहा जाता है। अब लगभग तीन दशक बाद इसे टक्कर देने के लिए नई तकनीक बाजार में मौजूद है। इसे होलोचेन का नाम दिया गया है।
    होलोचेन के डिजाइनरों का दावा है कि यह तकनीक डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू के बाद से बनाई गई सबसे अहम तकनीक है और उसे टक्कर देने के लिए तैयार है। यह तकनीक यूजर्स को अपनी ऑनलाइन गोपनीयता बनाए रखने में मदद करती है। होलोचेन के संस्थापक और अमरीका के सॉफ्टवेयर इंजीनियर आर्थर ब्रॉक और एरिक हैरिस ब्राउन का दावा है कि यह तकनीक हमारी कल्पना से भी अधिक निर्णायक साबित होगी।
    क्या है होलोचेन?
    डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू प्रोटोकॉल की तरह ही होलोचेन एक ऐसी तकनीक है जो कंप्यूटर को आपस में संपर्क करने के लिए तैयार करती है। लेकिन डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू अधिकतर बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के सर्वर पर ही चलता है। इसके तहत आपका स्मार्टफोन या कंप्यूटर फेसबुक या गूगल जैसी बड़ी कंपनियों के सर्वर से जुडऩे के लिए रिक्वेस्ट भेजता है और फिर उन्ही सर्वरों से डाटा का आदान-प्रदान करता है। अधिकतर कंप्यूटिंग और डाटा स्टोरेज इन्हीं कॉरपोरेट सर्वर में होता है, जिसे कॉरपोरेट क्लाउड भी कहते हैं।
    इसके उलट होलोचेन तकनीक को पूरी तरह से पर्सनल कंप्यूटर और स्मार्टफोन के ही डिस्ट्रिब्यूटिड नेटवर्क पर चलाने के लिए बनाया गया है। इसका मतलब है कि होलोचेन में डाटा स्टोरेज किसी बड़े कॉरपोरेट सर्वर में नहीं होता, बल्कि नेटवर्क में जुड़े स्मार्टफोन और कंप्यूटरों में होता है। इसे पियर टू पियर टेक्नोलॉजी कहते हैं।
    ऐप का इस्तेमाल
    होलोचेन पर सभी तरह के ऐप बनाए जा सकते हैं। मसलन गूगल के जैसा सर्च इंजन, ईमेल ऐप, फेसबुक मैंसेंजर के जैसा मैसेजिंग ऐप, ट्विटर के जैसा शॉर्ट टैक्सट शेयरिंग ऐप और एयर बीएनबी के जैसा रहने की जगह तलाशने वाला ऐप। होलोचेन से बनाए गए ऐप को कॉरपोरेट सर्वर से जुडऩे की जरूरत नहीं होती। सारा डाटा यूजर के कंप्यूटर में ही स्टोर होता है। इस तरह से कॉरपोरेट सर्वर चलाने वाली बड़ी कंपनियों के पास यूजर का डाटा पहुंचता ही नहीं। तो फिर इसके अवैध इस्तेमाल की चिंता भी नहीं रहेगी। होलोचेन के डेवलपर यूजर को उनकी प्राइवेसी वापस लौटाना चाहते हैं। तकनीकी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि भविष्य में होलोचेन तकनीक काफी कारगर साबित हो सकती है।
    प्राइवेसी को बचाने वाली तकनीक
    पिछले 15 राष्ट्र पर गौर करें तो लगता है कि ऑनलाइन दुनिया में प्राइवेसी जैसे खत्म ही हो गई है। वेब अब ऐसा जाल बन गया है जिसे पूरी तरह से केवल कुछ गिने चुने कॉरपोरेट समूह ही नियंत्रित कर रहे हैं। साथ ही यूजर्स के निजी डाटा को मुनाफा कमाने के लिए प्रयोग कर रहे हैं। विज्ञापनों के जरिए ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए फेसबुक, ट्विटर, गूगल और बड़ी कंपनियां सोशल मीडिया पर यूजर्स की ओर से होने वाली हर हरकत पर नजर रख रही हैं। इन कंपनियों को यूजर्स की पंसद के वेब सर्च, ऑनलाइन वीडियो, फोटो, जीपीएस लोकेशन, ईमेल, यहां तक कि उनके एक-एक शब्द का पता रहता है। होलोचेन के डिजाइनर एरिक हैरिस ब्राउन इस बारे में कहते हैं कि फेसबुक के धंधे में हम स्वयं एक उत्पाद हैं और फेसबुक हमारे प्रोफाइल को उत्पाद बनाकर बेच रहा है।
    ब्रॉक और ब्राउन की टीम पर्सनल डाटा को कॉरपोरेट सर्वर तक न पहुंचाकर यूजर्स को अपनी जानकारी का नियंत्रण देना चाह रही है। ब्रोक कहते हैं कि होलोचेन एजेंट सेंटरिक है, डाटा सेंटरिक नहीं। वे समझाते हुए कहते हैं कि होलोचेन में यूजर्स एजेंट है और इसमें यूजर्स ही फैसला लेते हैं कि डाटा कहां जाएगा और किसे दिखेगा।
    2018 में हुआ रिलीज
    होलोचेन की तकनीक को पिछले दस राष्ट्र से विकसित किया जा रहा है। 2008 में जापान के सातोशी नकामोतो ने ब्लॉकचेन और बिटकॉइन तकनीक के बारे में बताते हुए अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की थी। कम ही लोग जानते हैं कि होलोचेन पर उससे भी पहले से काम चल रहा था। ब्लॉकचेन को लेकर पिछले 10 राष्ट्र में दुनिया ने काफी उत्सुकता दिखाई है। लेकिन अब इसकी पैरवी करने वालों को भी समझ आने लगा है कि इस तकनीक में कुछ गंभीर कमियां हैं। इसे ऐसे डिजाइन किया गया है कि एक चेन के अंदर होने वाली सारी गतिविधियों का लेखा-जोखा यूजर को स्टोर करना पड़ता है। इतना ही नहीं, अपने खाते में नई गतिविधियों को जोडऩा, समय के साथ कंप्यूटेशन पावर के लिहाज से बेहद खर्चीला हो जाता है।
    होलोचेन का भविष्य
    होलोचेन के डिजाइनरों का दावा है कि उन्होंने इन कमियों के बिना तकनीक को डिजाइन करने में सफलता पाई है। ब्रॉक के मुताबिक, ब्लॉकचेन के मुकाबले होलोचेन में होने वाली गतिविधियां समय और ऊर्जा के हिसाब से 10 हजार गुना सस्ती और कारगर होंगी। होलोचेन के डिजाइनरों की टीम ने 2018 की शुरुआत में आईसीओ (इनिशियल कॉइन ऑफरिंग) लॉन्च किया था और इसकी मदद से लाखों डॉलर जुटा कर होलोचेन का बीटा वर्जन भी लॉन्च किया।
    ब्रुक और ब्राउन का कहना है कि उनका मकसद अमीर होना नहीं, बल्कि जनता को ताकतवर बनाना है। अब वे दुनिया भर में हैकेथॉन आयोजित करने जा रहे हैं। ये ऐसी प्रतियोगिताएं हैं जिनके जरिए वे सॉफ्टवेयर डेवलपरों को खोजेंगे जो होलोचेन पर आधारित ऐप बना सकें। माना जा रहा है कि जब पहला ऐसा कारगर ऐप बना जाएगा, तब निश्चित ही होलोचेन को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। (डायचे वेले)

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Posted Date : 12-Nov-2018
  • लोग असली और सच्ची मोहब्बत पाने के लिए क्या-क्या जतन नहीं करते, अब उनकी मुश्किलों आसान करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आ गया है। यह मददगार सभी मुश्किलों को दरकिनार कर आपको मोहब्बत की मंजिल तक पहुंचा सकता है।
    अच्छे पार्टनर की तलाश करने वालों को अब तस्वीरें देखना, फेसबुक पर प्रोफाइलों को निहारने की जरूरत नहीं। बाजार में कुछ ऐसी डेटिंग ऐप दस्तक दे रही हैं जो आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से आपकी मोहब्बत की राह को आसान कर देंगी। ये डेटिंग ऐप ना केवल आपको ये बताएगी कि पहली मुलाकात में क्या बात करनी हैं बल्कि ये आपके लिए ऐसे साथी भी खोजेंगी जो आपके पसंदीदा सेलेब्रिटी जैसे दिखते हों।
    बाजार में टिंडर जैसी स्मार्टफोन ऐप पहले से ही है जो डेटिंग के लिए उपलब्ध लोगों की जानकारी आपको देते हैं, पर ऐसी ऐप में आपको साथी ढूंढने के लिए बहुत मशक्कत करनी होती है।
    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ऐप आपके लिए ना केवल आपकी मुलाकात की तैयारियां करेगी बल्कि यह सफर के शुरुआत से ही आपके साथ एक डेटिंग कोच की तरह काम करेंगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का एक ऐसा विज्ञान है जिसमें कंप्यूटर को इंसानी मस्तिष्क की तरह सोचने और फैसले लेने के लिए प्रोग्राम किया जाता है।
    ऑनलाइन डेटिंग की शुरुआत करने वाली ऐप ईहारमनी ने घोषणा की है कि वह एआई तकनीक से लैस ऐसा फीचर ला रही है जो यूजर्स को चैटिंग के बाद मिलने का भी सुझाव देगा। कंपनी के सीईओ ग्रांट लांगस्टन कहते हैं कि डेटिंग ऐप पर काफी सारी गतिविधियां होती हैं, लेकिन असल में कई लोगों को ये नहीं पता कि पूछना कैसे हैं, बात कैसे करनी है? ये देखकर हैरानी होती है कि कितने सारे लोगों को मदद की जरूरत है। हमें लगता है कि हम इस प्रक्रिया को ऑटोमेट कर सकते हैं।
    ब्रिटिश डेटिंग ऐप लवफ्ल्यूटर की एआई का इस्तेमाल यूजर्स की चैट को देखकर उनके आपसी तालमेल को समझने की तैयारी में है। इसके बाद उन्हें मुलाकात के बारे में सुझाव दिया जाएगा। फिलहाल लवफ्ल्यूटर पहली डेट पर जाने के जगहों का सुझाव जरूर देती है। ऐप के सहसंस्थापक डियागो स्मिथ कहते हैं कि ये फीचर पहली डेट की तैयारी का प्रेशर कम करता है। टिंडर के संस्थापक शॉन राड कहते हैं कि एआई यूजर्स को अच्छा अनुभव देगा और संभव है कि आईफोन का वॉयस अस्सिटेंट सिरी भविष्य में एक मैचमेकर की भूमिका निभाए।
    पूरी तरह आवाज से चलने वाली (वॉयस संचालित) ऐप एआईएमएम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का पहले से ही परीक्षण कर रही है। इस ऐप के तकरीबन एक हजार यूजर्स हैं। जब यूजर इस ऐप को खोलता है तो मीठी से आवाज में ऑपरेटर उससे पूछता है कि आप अपनी पहली डेट में क्या करना चाहेंगे या कहां की यात्रा करना पसंद करेंगे।
    इसके बाद यूजर को उसके व्यक्तित्व के मुताबिक जोड़ीदार बताए जाते हैं। अगर यूजर किसी को चुनता है तो फिर उसकी पूरी जानकारी ऐप उसे देती है। इसके कुछ दिनों बाद ऐप यूजर और उसके चुने गए पार्टनर के बीच फोन कॉल का समय तय करता है साथ ही पहली मुलाकात के लिए सलाह भी देता है। ऐप डेवलपर केविन तेमन कहते हैं कि ऐप आपको व्यक्तित्व के हिसाब से चीजें सुझाएगी, मसलन अगर यूजर परंपराओं को मानने वाला इंसान है तो मैं डिनर और वॉक का सुझाव दूंगा। पहली डेट के बाद ऐप उन लोगों की आगे की गतिविधियों पर भी नजर रखती है। वह देखती है कि दोनों यूजर एक दूसरे से मिल रहे हैं या नहीं।
    डेटिंग ऐप बडू अब एआई और फेशियल रिकॉग्निशन (चेहरे की पहचान करने वाला) फीचर का इस्तेमाल कर रहा है। इन फीचरों के चलते यूजर ऐसा मैच ढूंढ निकालते हैं जिसका चेहरा किसी न किसी से मिलता हो, मसलन उनके पंसदीदा सेलिब्रिटी या उनके पिछले बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड से। इस ऐप में यूजर किसी की तस्वीर अपलोड करते हैं और ऐप वैसा चेहरा ढूंढ निकालते हैं। दुनिया भर में करीब 40 करोड़ लोग इस ऐप को इस्तेमाल कर रहे हैं। हॉलीवुड अभिनेत्री किम कार्दशियन, गायिका बियोंसे जैसे चेहरे लोग सबसे अधिक ढूंढते हैं।
    हालांकि दुनिया में ऐसे भी बहुत से लोग हैं जिन्हें नहीं लगता कि आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस के जरिए इंसान अपनी मोहब्बत खोज सकता है। इस तकनीक में शंका जाहिर करने वालों में एक नाम संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंटोनियो गुटेरेश का भी है। गुटरेश कहते हैं कि मुझे इसमें थोड़ा संदेह है कि ये लोगों को साथी खोजने में कुछ मदद कर सकता है। (एएफपी)

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Posted Date : 05-Nov-2018
  • स्वाति झा
    हर किसी का सपना होता है कि उसके पास ढेर सारे पैसे हों, और हो भी क्यों न! भला पैसे के बिना भी कोई काम होता है? लेकिन, बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते, कमाने के लिए जी-जान एक करना पड़ता है। कहीं मेहनत से तो कहीं दिमाग से पैसे कमाए जाते हैं। आज लोग नौकरी के चलते घर से कोसों दूर जाकर रह रहे हैं, या फिर घंटों का सफर कर काम पर पहुंचते हैं। ऐसे में अगर कोई यह कह दे कि पैसे कमाने के लिए आपको कहीं जाने की जरुरत नहीं है और आप अपने घर पर रह कर भी पैसे कमा सकते हैं, तो क्या आप यकीन करेंगे? लेकिन यह सच है।
    आजकल स्मार्टफोन का जमाना है और प्ले स्टोर पर ऐसे बहुत सारे एप हैं जिनके जरिये आप घर बैठे पैसे कमा सकते हैं। खासकर घरेलू महिलाओं और स्टूडेंट्स के लिए ये एप पैसे कमाने का अच्छा जरिया बन सकते हैं।
    तो जानते हैं ऐसे ही पांच एप के बारे में जिनके जरिए ऑनलाइन कमाई की जा सकती है-
    लोको एप
    इस गेमिंग एप का पूरा नाम 'लोको लाइव ट्रिविया एंड च्जि गेम शोÓ है और इसे प्ले-स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। गेम में रोजाना 15-15 मिनट के दो लाइव च्जि सेशन होते हैं जिनका टाइम रात के 10 बजे और दिन में 1।30 बजे का है। च्जि के दौरान यूजर से कुल 10 सवाल पूछे जाते हैं, सारे सवालों के सही जवाब देने के बदले में उसे पेटीएम कैश मिलता है।
    च्जि में करेंट अफेयर, सामान्य ज्ञान, तकनीक, क्रिकेट, खेल, धर्म, राजनीति और बॉलीवुड जैसे विषयों पर आधारित सवाल पूछे जाते हैं। इसके अलावा इस एप को दोस्तों के साथ शेयर करने पर कुछ अतिरिक्त पैसे भी मिलते हैं। अच्छी बात यह है कि लोको एप हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। गेम में पेटीएम कैश प्राइज की राशि 500 रुपये से शुरू होती है, जोकि एक ही समय पर च्जि खेलने वालों की गिनती के मुताबिक बढ़ा दी जाती है।
    मीशो एप
    यह ऐसा एप है जिसमें आप को रीसेलर बनाया जाता है और आपको मीशो के उत्पादों को आगे अपने कस्टमर्स को बेचना होता है। हर उत्पाद का एक 'रिफरल लिंकÓ होता है जिसे यूजर को अपने वाट्सएप और फेसबुक कांटेक्ट से शेयर करना होता है। लिंक के जरिए बिक्री होने पर आपको तय कमीशन दिया जाता है। अगर आप कोई प्रोडक्ट बिकवाते हैं तो उसपर आपको अपना मार्जिन ऐड करने के बाद उसे सेल करना होगा। उदाहरण के तौर पर अगर आपने एक टी-शर्ट 250 रूपए में बेची जिसका वास्तविक मूल्य 100 रुपए और डिलीवरी चार्ज 70 रुपए है। तो आपको बतौर मार्जिन 80 रुपए आपके बैंक अकाउंट मे दिए जायेंगे। मार्जिन के अलावा आप मीशो से बोनस भी कमा सकते हैं। 2000 रुपए की बिक्री करवाने पर चार फीसदी, 5000 रुपए की बिक्री पर छह फीसदी, 10 हजार रुपए पर आठ फीसदी, 20 हजार रुपए पर 10 फीसदी और 50 हजार रुपए की बिक्री पर 12 फीसदी तक बोनस मिल सकता है।
    ड्रीम इलेवन
    क्रिकेट में रुचि रखने वालों के लिए यह एप बहुत काम का साबित हो सकता है। ड्रीम इलेवन से हर रोज कई लोग लाखों रुपये जीतते हैं। जब आप इस एप को डाउनलोड कर रजिस्टर कर लेते हैं तो एप में हाल में होने वाले मैचों की एक लिस्ट (तारीख के हिसाब से) खुल जाती है। इसके बाद आपको अपने मन-मुताबिक मैच सेलेक्ट करना होता है। उस मैच को ज्वाइन करने की एक कीमत तय होती है, जोकि आपको ऑनलाइन देनी होती है। इसके बाद आपको उस मैच की दोनों टीमों को मिलाकर 11 खिलाड़ी चुनने होते हैं, जो आपको उस मैच में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले लगते हों। अब चुने हुए 11 खिलाडिय़ों में से एक को कप्तान और एक को उपकप्तान बनाना होता है। मैच शुरू होने के बाद जो खिलाड़ी जैसा प्रदर्शन करेगा उसी हिसाब से आपको प्वॉइंट मिलते जाएंगे। अगर आपके कप्तान और उपकप्तान चल निकलते हैं तो आपके प्वॉइंट तेजी से बढ़ेंगे। मैच खत्म होने के बाद आप अपने रैंक के हिसाब से लाखों रुपये जीत सकते हैं।
    कीटू एप
    यह एप अलग-अलग ब्रैंड्स को एक ऐड प्लैटफॉर्म से जोड़ देता है। सीधी भाषा में समझें तो इस एप में विभिन्न ब्रांड्स के विज्ञापन दिखाए जाते हैं और इन विज्ञापनों को देखने पर यूजर को पैसे मिलते हैं। एप इंस्टॉल करने पर यह आपको विज्ञापन देखने के लिए नोटिफिकेशन भेजता है। विज्ञापनों को देखने पर आपके कीटू अकाउंट में एक रुपया प्रति विज्ञापन जुड़ जाता है। यह एप आपके पेटीएम और मोबिच्कि वॉलेट्स से लिंक्ड होता है, जहां आप एप से कमाए गए कैश को रिडीम कर सकते हैं।
    क्वाई एप
    एप के जरिए पैसा कमाने के मामले में क्वाई एप काफी चर्चा में रहा है। इस समय इस एप को इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगभग एक करोड़ पहुंच चुकी है। इस एप में आप सिर्फ वीडियो डाल कर पैसा कमा सकते हैं। इस एप में बनाए जाने वाले वीडियो की लिमिट सिर्फ 15 सेकेंड होती है। वीडियो बना कर डालने के दो से तीन घंटों के अन्दर आपको कॉइन मिलता है। ध्यान देने वाली बात कि चई एप डॉलर में पैसे देता है, क्वाई एप में आपको 100 कॉइन के ए डॉलर यानी 74 रुपए मिलेंगे। एक डॉलर से ऊपर का अमाउंट होने पर इसे अपने पेपैल अकाउंट में डाल सकते हैं। इस एप में वीडियो डाल कर पैसा कमाने के अलावा बीच-बीच में एक कॉन्टेस्ट भी होता है, अगर आप उस कॉन्टेस्ट में जीत जाते हैं तो आपको इनाम मिलता है। हालांकि, क्वाई एप में आप सिर्फ अपने ही कैमरे से वीडियो बना कर डाल सकते हैं, अगर आप किसी और का वीडियो डालते हैं तो आपकी अर्निंग नहीं होगी। (सत्याग्रह)

     

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Posted Date : 27-Oct-2018
  • गूगल प्ले स्टोर में मौजूद 90 प्रतिशत से ज्यादा एप उपभोक्ताओं की अनुमति के बिना उनके डाटा को गूगल के साथ साझा करते हैं।  एक रिपोर्ट में बताया गया कि ये डाटा उम्र, लिंग, स्थान और दूसरी एप संबंधित होता है जो किसी उपभोक्ता का पूरा प्रोफाइल तैयार करता है। इस प्रकार जमा किए डाटा (सूचनाओं) का प्रयोग विज्ञापन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि समाचार आधारित फ्री एप और बच्चों के लिए बनी एप सबसे ज्यादा डाटा गूगल के साथ साझा करती है।
    रिपोर्ट के मुताबिक एप न सिर्फ गूगल को बल्कि इनमें से 43 प्रतिशत एप फेसबुक और दूसरी कंपनियों जैसे ट्विटर, वेरिजॉन, माइक्रोसॉफ्ट और ऐमजॉन जैसी कंपनियों को उपभोक्ताओं की सूचनाएं उपलब्ध करवाती हैं। गूगल और फेसबुक उपभोक्ताओं की सूचनाओं को एकत्रित कर विज्ञापन के लिए इसका प्रयोग करने के लिए जानी जाती है।
    उधर, अपने ऊपर लगे आरोपों का खंडन करते हुए गूगल ने बीबीसी को बताया है कि गूगल और गूगल प्ले स्टोर में उनके पास स्पष्ट नीतियां और दिशा निर्देश हैं कि एप बनाने वाली कंपनियां और थर्ड पार्टी एप किसी उपभोक्ता के डाटा को कैसे संभालेंगी। गूगल ने बताया कि उन्होंने एप बनाने वालों को पारदर्शी रहने और उपभोक्ताओं की सूचना को बिना अनुमति के प्रयोग न करने की हिदायत दी हुई है। गूगल के मुताबिक अगर कोई एप इन नीतियों का उललंघन करता है तो कंपनी उन पर कार्रवाई करती है। (फाइनेंसियल टाईम्स)

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