संपादकीय

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Date : 23-Jan-2020

एक बड़े अपहरण के बाद, और
रिहाई की कामयाबी के बाद...

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक उद्योगपति के अपहरण, और 25 करोड़ फिरौती की मांग के बाद पुलिस उसे छुड़ाकर लेकर आई तो यह एक  बड़ी कामयाबी की बात रही। एक पखवाड़ा जरूर लगा, लेकिन बिहार के पेशेवर अपहरणकर्ता-गिरोह को ढूंढना, और इस चौकन्नेपन के साथ ढूंढना कि अपहरण किए गए आदमी का कोई नुकसान भी न हो, जाहिर तौर पर एक मुश्किल काम था। कल आधी रात जब पुलिस इस उद्योगपति को लेकर लौटी तो मीडिया के सामने प्रदेश के पुलिस मुखिया ने बताया कि कितने अफसर और कितने कर्मचारी इस तलाश में झोंके गए थे। आज सुबह के अखबारों में बड़ी-बड़ी सुर्खियों में यही खबर पहले पन्ने पर थी।

लेकिन आज सुबह के अखबारों में ही, कम से कम एक प्रमुख अखबार में भीतर के एक पन्ने पर एक बड़ी सी सुर्खी थी कि इसी छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के सौ से अधिक बच्चे महीनों से गायब हैं, और रोती हुई एक मां कह रही है कि कोई उसके बेटे को ढूंढकर लाए। खबर में यह भी छपा है कि चेन्नई और हैदराबाद में ऐसे नाबालिग मजदूर बच्चों को दो-तीन हजार रूपए में बेचा जा रहा है। इन बच्चों में पंडो-आदिवासी समुदाय के बच्चे भी महीनों से गायब हैं, और लोगों को याद होगा कि इस जनजाति को राष्ट्रपति की दत्तक संतानें भी कहा जाता है। बच्चों की यह बिक्री सरकार की जानकारी में है, और देश की सर्वोच्च अदालत लंबे समय से इस बात की फिक्र कर रही है कि देश भर में लापता बच्चों की तलाश के लिए सरकार क्या कर रही है। 

यह बात सही है कि एक उद्योगपति का अपहरण, और करोड़ों की फिरौती की मांग एक बड़ी खबर बनती है, और उसकी तलाश में एक पखवाड़े पुलिस जुटी रहती है, कई राज्यों तक जाती है, लेकिन ऐसे ही दिन आई हुई यह दूसरी खबर यह सोचने पर मजबूर करती है कि इसी छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके जशपुर से किस तरह हजारों लड़कियां महानगरों में मजदूरी के लिए ले जाई जाती हैं, और उनमें से बहुत से बेबस लड़कियों से गलत धंधा भी करवाया जाता है। किस तरह छत्तीसगढ़ से हर बरस दसियों हजार लोग बेहतर मजदूरी की तलाश में उत्तर भारत से लेकर कश्मीर और लद्दाख तक जाकर बंधुआ मजदूरों की तरह काम करते हैं, कहीं वे आन्ध्र के ईंट भट्टों से रिहा करवाए जाते हैं, तो कहीं किसी और प्रदेश से। जब उनके बंधुआ होने की खबर आ जाती है, उसके बाद पुलिस या सरकार के दूसरे महकमे के लोग जाकर उनको छुड़ाते हैं। लेकिन जब ट्रेन और बसों से थोक में लोगों को ले जाया जाता है, तो वैसे मजदूर-दलाल पुलिस की निगाह में रहने के बावजूद उन इलाकों में लगातार काम करते हैं, और छत्तीसगढ़ के मजदूरों को, यहां की लड़कियों को, बच्चों को बाहर ले जाकर बेचते हैं, बंधुआ बनाते हैं। 

जिस तरह छत्तीसगढ़ का मीडिया दो उड़ानों के लेट होने को लेकर खबर बनाने में जुट जाता है, और दर्जन भर ट्रेनें उससे अधिक लेट हों, तो भी खबर नहीं बनती, उसी तरह का रूख सरकार और पुलिस का भी रहता है। किसी संपन्न की तलाश, और किसी विपन्न की तलाश में बहुत फर्क दिखाई पड़ता है। जिंदगी तो सबकी एक बराबर ही होनी चाहिए, लेकिन लोगों की संपन्नता उनको सरकार में, या मीडिया में, कम या अधिक महत्वपूर्ण बना देती है, और फिर खबरों के दबाव में, सत्ता तक पहुंच के दबाव में सरकारी कार्रवाई होती है। किसी संपन्न को बचाना अच्छी बात है क्योंकि उसका भी हक देश के कानूनी इंतजाम पर पूरा है। लेकिन आधी रात मीडिया से बात करने वाली पुलिस क्या आज मीडिया में ही आई इस दूसरी खबर पर कुछ बोलेगी? क्या सैकड़ों बच्चों के लापता होने, बाहर जाकर बंधुआ हो जाने या बिक जाने के बारे में कुछ कहेगी? क्या इन जिलों के जिम्मेदार अफसरों की कोई जवाबदेही तय होगी? क्योंकि कल इस बड़ी रिहाई के बाद तो यह बात भी कही गई कि डीजीपी से लेकर सीएम तक किस तरह लगातार इस मामले की जांच पर नजर रखे हुए थे, और दरियाफ्त कर रहे थे। यह बात जाहिर है कि सूरजपुर के सैकड़ों बच्चों की मिलकर भी उतनी न्यूजवेल्यू नहीं है जितनी कि एक बड़े उद्योगपति की है, लेकिन अब जब पुलिस का एक बड़ा अमला जुर्म को सुलझाने से फारिग हो चुका है, तो फिर सीएम से लेकर डीजी तक, और जिलों की पुलिस तक को विपन्न बच्चों की तलाश के सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर भी कुछ अमल कर लेना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 22-Jan-2020

ये विशेषण हैं, या गाली?

अखबारनवीसी के धंधे में जो लोग ईमानदारी, या गंभीरता, या दोनों एक साथ लेकर काम करते हैं, उन्हें कुछ शब्द खासा परेशान करते हैं। बहुत से लोग उनसे निष्पक्ष या तटस्थ रहने की उम्मीद करते हैं, बहुत से लोग उनकी तारीफ में यह कहते हैं कि वे बहुत निष्पक्ष लिखते हैं, या तटस्थ लिखते हैं, या उनका अखबार बड़ा निष्पक्ष है। यह लेबल बड़ा खतरनाक है, और यह विशेषण न होकर एक किस्म की आलोचना है। अखबार समाचार और विचार दोनों के लिए होते हैं, और समाचार को पल भर के लिए अलग भी रखें, तो भी विचार कैसे निष्पक्ष हो सकते हैं? अखबारों की दुनिया में तथ्य निष्पक्ष हो सकते हैं, आंकड़े निष्पक्ष हो सकते हैं, लेकिन विचार कैसे निष्पक्ष हो जाएंगे, वे कैसे तटस्थ हो जाएंगे? नतीजा यह होता है कि समाचारों के पन्नों पर बिना लाग-लपेट खबरों को ईमानदारी से सामने रख देने की निष्पक्षता को लोग विचारों के पन्ने या पन्नों पर भी चाहने लगते हैं, जो कि अखबारनवीस की ईमानदारी में मुमकिन नहीं है। अगर अखबार या संपादक की कोई सोच है, तो वह अखबार की राय में खुलकर सामने आएगी, वरना इन दिनों बहुत से अखबार बिना संपादक, बिना विचारों के पन्नों के भी निकल रहे हैं, और राय रखने वाले अखबारों के मुकाबले अधिक सहूलियत की जिंदगी भी जी रहे हैं। 

कुछ लोग समाचारों को बनाते हुए, उन्हें छापते हुए सांसारिकता से वैराग्य किस्म की एक ऐसी तटस्थता दिखाते हैं जिनमें वे खुद अदृश्य हो जाते हैं। आज ही एक अखबारनवीस का ट्वीट है कि एक व्यक्ति कह रहा है कि बाहर बारिश हो रही है, और दूसरा कह रहा है कि बाहर बारिश नहीं हो रही है, तो अखबारनवीस का काम इन दोनों के बयानों को छाप देने जैसा तटस्थ और निष्पक्ष नहीं हो सकता, उससे इतनी समझ और अक्ल की उम्मीद भी की जाती है कि वह खिड़़की से बाहर झांककर देखे कि बारिश हो रही है या नहीं, और अपना देखा सच भी इन बयानों के साथ समाचार में लिखे। न सिर्फ इस किस्म का वैराग्य, बल्कि कई दूसरे किस्मों की निष्पक्षता भी इन दिनों बड़ी सहूलियत से इस्तेमाल की जा रही हैं जिनमें लोगों की कही हुई बातों को ज्यों का त्यों लिख देना होता है, और उनसे असुविधा खड़ी करने वाली कोई भी बात नहीं पूछी जाती। और तो और देश के बड़े-बड़े लोगों के बड़े-बड़े इंटरव्यू लेने वाले बड़े-बड़े नामी-गिरामी मीडिया-मुखिया भी फूंक-फूंककर चलते हैं, और दिक्कत का कोई सवाल नहीं पूछते। 

सरकार और बाजार, इन दोनों को तो ऐसी निष्पक्षता ठीक लग सकती है, क्योंकि अगर लोगों ने विचारों में पक्ष लिया, अपने विचार लिखे, तो वे आमतौर पर ताकतवर के खिलाफ जा सकते हैं, और कमजोर के हिमायती हो सकते हैं। ऐसा ही हाल समाचारों को लेकर भी है कि अगर अखबारों के लोग जागरूक हुए, तो वे समाचारों से विचारों को अलग तो रखेंगे, लेकिन अपनी अक्ल और समझ को घर रखकर दफ्तर या प्रेस कांफ्रेंस में नहीं जाएंगे। यह पूरा सिलसिला बड़ा खतरनाक है, खासकर उस वक्त जब कोई राय न रखना, किसी का पक्ष न लेना, तटस्थ और मौन बने रहना एक किस्म से खूबी मान ली जाती है, और लोगों की तारीफ में इन बातों को विशेषण की तरह इस्तेमाल किया जाता है। कोई पत्थर ही तटस्थ रह सकता है, या ऐसे लोग ही तटस्थ रह सकते हैं जिनके दिमाग पत्थर जैसे ठोस हों, जिनका दिल भी पत्थर जैसा हो। बाकी तो तमाम लोग वक्त और हालात को देखकर कुछ न कुछ सोचेंगे, कुछ न कुछ सोचते हैं। यह सिलसिला खत्म करने की साजिश पहले के मुकाबले अब बहुत अधिक हो गई है, और शायद सोचने वाले, जिम्मेदारी से सोचने वाले दिमाग एक खतरनाक हथियार मान लिए गए हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 21-Jan-2020

भारत के इस बरस के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि  ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो होंगे। आज जब देश भर में मोदी सरकार महिलाओं के आंदोलन झेल रही है, तब साल भर के इस सबसे बड़े राजकीय समारोह के मेहमान की पसंद हैरान करती है। ब्राजील की राजनीति में इस नेता को सबसे दकियानूसी दक्षिणपंथी, महिला विरोधी, समलैंगिकों का विरोधी, नस्लभेदी माना जाता है। इस नेता को दुनिया भर में एक घटिया इंसान माना जाता है, और उसे भारत ने गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनाया है।

ब्राजील के इस नेता के बीते बरसों के बयान कैमरों पर दर्ज हैं, और अखबारी कतरनों में भी। बीस बरस पहले इसने ब्राजील की संसद को खत्म करके तानाशाही की वकालत की थी, और कहा था कि राष्ट्रपति सहित तीस हजार भ्रष्ट लोगों को गोली मार देनी चाहिए। उसके इस बयान पर वहां की संसद के नेताओं ने उसे संसद से निकालने की मांग भी की थी और राष्ट्रपति ने कहा था कि यह साफ है कि बोलसोनारो को लोकतंत्र छू भी नहीं गया है। इसके बाद टीवी कैमरों के सामने इसने एक साथी महिला सांसद के बारे में कहा- मैं तुमसे बलात्कार भी नहीं करने वाला हूं, क्योंकि तुम उस लायक भी नहीं हो।

बाद में बोलसोनारो ने संसद के भीतर भी इस बात को दुहराया जिस पर उसे चेतावनी भी दी गई और तीन हजार डॉलर का जुर्माना भी लगाया गया। अपने पूरे राजनीतिक जीवन में बोलसोनारो समलैंगिकों और ट्रांसजेंडरों के खिलाफ बयान देते आया है, जिसमें वह समलैंगिकों को पीटने की बात भी बोलते रहा, और कहा-मैं अपने बेटे के समलैंगिक होने पर उसे भी प्यार नहीं कर सकूंगा, मैं चाहूंगा कि वह किसी एक्सीडेंट में मारा जाए। अपनी वामपंथ विरोधी विचारधारा के चलते उसने तानाशाही के दिनों में ब्राजील में वामपंथियों को टॉर्चर करने वाले लोगों को देश का नायक कहा, और उनकी तारीफ की। ब्राजील का यह नेता अफ्रीकी नस्ल के लोगों के बारे में अपमानजनक बातें कहने के लिए जाना जाता है और उसका बयान है-ये लोग कुछ नहीं करते, ये लोग अपनी नस्ल भी आगे बढ़ाने के लायक नहीं हैं। इस बयान पर वहां की एक अदालत ने बोलसोनारो को अल्पसंख्यकों की बेइज्जती का दोषी पाया था, और उस पर पन्द्रह हजार डॉलर का जुर्माना लगाया था।

इस नेता के दिल में मानवाधिकारों के लिए कोई सम्मान नहीं है। उसने सार्वजनिक रूप से कहा है कि अपराधियों को गोली मारने वाले पुलिस अफसरों को ईनाम देना चाहिए। उसका बयान है-वह पुलिस अफसर जो जान से मारता नहीं, वह पुलिस अफसर ही नहीं है। बोलसोनारो  ने किसी गैरफौजी को प्रतिरक्षा मंत्री बनाने का भी विरोध किया था। इंटरनेट ब्राजील के इस घोर दक्षिणपंथी नेता के हिंसक बयानों से भरा हुआ है। अपने खुद के परिवार के बारे में इसका कहना था-मेरे पांच बच्चे हैं, लेकिन चार बच्चों के बाद एक कमजोर क्षण पर पांचवे की नौबत आई, और वह लड़की निकली। ब्राजील में बाहर से आए और बसे लोगों के बारे में इसका बयान था कि दुनिया भर की सबसे बुरी गंदगी ब्राजील आ रही है, जैसे कि हमारे पास अपनी खुद की समस्याएं कम हों। 

अब जब हिंदुस्तान गणतंत्र दिवस पर इस नेता का स्वागत करेगा, तो हिंदुस्तान के ये तमाम तबके, महिलाएं, दूसरे देशों से आकर बसे लोग, वामपंथी, अल्पसंख्यक, लड़कियां, समलैंगिक और ट्रांसजेंडर यह याद करेंगे कि उन्हें गालियां देने वाला इस देश का इस बरस का सबसे बड़ा मेहमान बनाया गया है।
-सुनील कुमार


Date : 20-Jan-2020

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले महीने अमरीका की अंतरिक्ष-फौज बनाने की घोषणा की थी, और अभी उस फौज की पोशाक सामने रखी गई हैं। धरती पर रेगिस्तान में, या जंगलों के बीच काम करने वाली फौज की वर्दी के कपड़े उस इलाके के प्राकृतिक नजारे से मिलते-जुलते बनाए जाते हैं, ताकि वे आसमान या जमीन से देखे जाने पर आसपास की चीजों से मिलते-जुलते दिखें, या बेहतर यह कहना होगा कि न दिखें। ऐसे में अमरीका की अंतरिक्ष-फौज के लिए बनाई गई पोशाक धरती के पेड़-पौधों, जमीन से मिलती-जुलती देखकर लोगों को हैरानी हुई है। कई लोगों ने अमरीकी सरकार से यह सवाल भी किया है कि अंतरिक्ष में इस फौज को कितने पेड़-पौधे मिलने की उम्मीद है? इस पर सरकार की ओर से सफाई दी गई है कि फौज के बाकी हिस्सों के लिए बनी हुई पोशाकों का ही अंतरिक्ष-फौज के लिए इस्तेमाल हो जाएगा, और किफायत रहेगी। 

लेकिन बात इतनी आसान लगती नहीं है। अंतरिक्ष-फौज अपने आपमें एक खर्चीला नजरिया है, और यह बाकी दुनिया पर एक किस्म से हमलावर पहल भी है क्योंकि अंतरिक्ष की सीमाएं देश की सरहदों से बंधी हुई नहीं है। समंदर को तो फिर भी तमाम देशों ने अपनी जमीन के आसपास तक अपनी सीमा तय कर रखा है, और बाकी का समंदर अंतरराष्ट्रीय माना जाता है। लेकिन अंतरिक्ष में ऐसा कुछ मुमकिन नहीं है। आज भी दुनिया के अलग-अलग देश अलग-अलग ग्रहों तक कई किस्म की यात्राएं कर रहे हैं, चांद पर कचरा छोड़कर आ रहे हैं, और अंतरिक्ष में कई किस्म का कबाड़ घूम रहा है जो कि अंतरिक्षयानों का छोड़ा हुआ है। ऐसे में एक पिछले अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के स्टारवॉर्स की सोच को फिर से जिंदा करके उसे आगे बढ़ाने का ट्रंप का फैसला एक अस्थिर और हमलावर दिमाग वाले नेता का युद्धोन्माद तो है ही, इसे किसी भी तरह से मासूम नहीं माना जाना चाहिए, और यह बात इस फौज की वर्दी पर भी लागू होती है जो कि धरती के जंगलों के बीच छुप जाने वाली दिखती है। 

लोगों को अभी कुछ बरस पहले आई हुई एक फिल्म, अवतार, याद रहनी चाहिए जिसमें एक किसी ग्रह पर एक खनिज की तलाश में धरती से हमलावर फौज पहुंचती है और वहां पर वहां के मूल निवासियों के साथ एक जंग छेड़कर उस ग्रह पर कब्जे की कोशिश करती है। वह पूरा ग्रह पेड़-पौधों से, कुदरती खूबसूरती से भरा हुआ ग्रह था, और आज भी जब अंतरिक्ष में फौजी कार्रवाई के बारे में कोई देश हमलावर-महत्वाकांक्षा रखता है, तो जाहिर है कि वह ऐसे ग्रहों की संभावनाओं को अनदेखा नहीं करेगा। अमरीका की इस नई फौज की वर्दी को इस तरह से ही देखना चाहिए कि यह ऐसे किसी दिन की कल्पना पर भी माकूल बैठती है जिसमें किसी दूसरे ग्रह पर फौजी कार्रवाई की हसरत रखी गई हो। लोगों को दुनिया के इस सबसे हमलावर देश, सबसे बड़े गुंडे, के नजरिये को कभी भूलना नहीं चाहिए कि वह किस तरह अपने आपको दुनिया के बाकी देशों से ऊपर गिनता है। अमरीकी फिल्मों में कई बार यह कहानी दिखाई जा चुकी है कि दूसरे ग्रहों से जब हमले होंगे, तो उसका सामना करने की जिम्मेदारी पूरी दुनिया में सिर्फ अमरीकी राष्ट्रपति उठाएगा। अमरीकी सरकार की वेबसाईटों को देखें, तो उनमें देश का नाम नहीं लिखा जाता, बस डॉटगवर्नमेेंट लिखा जाता है, माने वे धरती की अकेली सरकार हों। 

लेकिन वर्दी के हमारे खुद के सोचे हुए इस विवाद से परे देखें, तो अंतरिक्ष की फौज किसी दूसरे ग्रह के हमलावरों से निपटने के काम तो शायद सैकड़ों या हजारों बरस बाद आए, सबसे पहले तो वह इसी धरती पर सुरक्षा का शक्ति संतुलन खत्म करने का काम होगा। आज वैसे भी भुखमरी से भरी इस गरीब दुनिया में फौज पर खर्च अंधाधुंध बढ़ते चल रहा है, और गरीब देश पढ़ाई और इलाज से अधिक खर्च फौज पर किए जा रहे हैं। ऐसे में जंगी तैयारी को अंतरिक्ष तक ले जाना, इससे दुनिया की महाशक्तियों के बीच खर्च की एक अंधी दौड़ शुरू होगी, बढ़ेगी, और जाने कहां जाकर थमेगी। जिस तरह विज्ञान के कुछ दूसरे दायरों में मानव-क्लोनिंग जैसी मौजूदा तकनीकों पर और काम न करने की एक अंतरराष्ट्रीय सहमति बनी हुई है, उसी तरह की एक सहमति अंतरिक्ष के फौजी इस्तेमाल न करने की बननी चाहिए। जंग तो धरती और समंदर में भी, धरती के ठीक ऊपर के आसमान पर भी नहीें लड़ा जाना चाहिए, अंतरिक्ष तो दूर की बात है। लेकिन अगले चुनाव के मुहाने पर खड़े डोनल्ड ट्रंप को अपने देश के युद्धोन्माद लोगों को खुश करने के लिए यह एक आकर्षक और तुरत असर वाला झांसा सूझा है, जो कि हो सकता है कि चुनाव जीतने के बाद बहुत आगे न बढ़े, लेकिन उसके आगे बढऩे के खतरे को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। आज दुनिया के देशों के बीच सहमति कायम करने की कोई संस्था नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ एक पूरी तरह से बेअसर संगठन हो गया है जो कि पिछले कई दशकों में अमरीकी-इजराईली गुंडागर्दी को भी रोक नहीं पाया है। इसलिए अंतरिक्ष में जंगी तैयारियों के खिलाफ एक सहमति बनने की हमारी सोच आदर्शवाद अधिक है, उस पर अमल करते कोई नहीं दिखते, खासकर जिनके हाथों में सबसे अधिक ताकत है, वे तो बिल्कुल ही नहीं दिखते। यह लिखने का एक ही मकसद हो सकता है कि लोग कम से कम सामने खड़े इस खतरे के बारे में सोचें, और जंगखोर अमरीका के इस हिंसक और हमलावर, बेदिमाग और बददिमाग राष्ट्रपति के इरादों के खिलाफ सोचें। 
-सुनील कुमार


Date : 19-Jan-2020

नीति आयोग के एक सदस्य वी.के. सारस्वत ने कहा है कि कश्मीर में पोर्न देखने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल होता था। उनका यह भी कहना है कि वहां इंटरनेट बंद होने से अर्थव्यवस्था पर कोई खास असर नहीं पड़ा। जमीनी हकीकत यह है कि 5 अगस्त से कश्मीर में इंटरनेट बंद है और सभी तरह के कारोबार पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा है। तकलीफदेह बात यह है कि नीति आयोग का एक सदस्य, जिसे कश्मीर की अर्थव्यवस्था को लेकर फिक्र होनी चाहिए थी, उसे कश्मीर में लोगों के गंदी फिल्में देखने पर फिक्र हो रही है, और कारोबार का कुचला जाना दिख ही नहीं रहा है। 

दिक्कत यह है कि कश्मीर को अलग-थलग करके बदनाम करने की यह हरकत इस बात को पूरी तरह अनदेखा कर रही है कि बाकी देश में इंटरनेट पर पोर्न देखा जाता है या नहीं। यह कश्मीर के खिलाफ एक हिंसक पूर्वाग्रह है जो वहां के लोगों को बदनाम करने की सोची-समझी हरकत है। नीति आयोग के इस सदस्य को, या नीति आयोग को बाकी देश के बारे में भी आंकड़े जारी करने चाहिए कि किस-किस प्रदेश में नेट का इस्तेमाल किस हद तक पोर्नोग्राफी देखने के लिए होता है। और फिर इसमें ऊपर आने वाले तमाम राज्यों में भी इंटरनेट बंद कर देना चाहिए ताकि वहां भारतीय संस्कृति बचाई जा सके। नीति आयोग का सदस्य तकलीफ से गुजर रहे एक राज्य के बारे में यह कहे कि वहां इंटरनेट न हो तो क्या फर्क पड़ता है, वैसे भी आप इंटरनेट में क्या देखते हैं, गंदी फिल्में देखने के अलावा कुछ नहीं करते आप। भारत सरकार के इस सर्वोच्च तथाकथित नीति-निर्धारक आयोग के सदस्य का ऐसा बुरा हाल शर्मनाक है, और अगर यह कोई सभ्य लोकतंत्र होता, तो अब तक यह सदस्य बर्खास्त हो चुका होता। लेकिन आज हिन्दुस्तान में केन्द्र सरकार को पसंद और नापसंद बातों को लेकर लोग कितने भी आक्रामक हो सकते हैं, अगर वे सरकार के रूख का समर्थन करते हैं।  हमारा ख्याल है कि कश्मीर की जनता में से कोई इस बयान के खिलाफ अदालत में राज्य की मानहानि का मुकदमा भी अदालत में दायर कर सकते हैं क्योंकि इससे प्रदेश की तस्वीर पूरी दुनिया में खराब बन रही है। 
आज जिन लोगों को लगता है कि कश्मीर में इंटरनेट बंद होना कोई बड़ी बात नहीं है, उन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि उनकी अपनी जिंदगी भारत के दूसरे हिस्सों में बिना इंटरनेट कैसी रह जाएगी? आज कश्मीर के साथ ऐसी बदसलूकी हिन्दुस्तान के उन लोगों को अधिक सुहा रही है जिनको कश्मीर का एक इंच हिस्सा भी पाकिस्तान को देना कुबूल नहीं है। अपने देश के एक हिस्से को बाकी देश का दुश्मन मानें, उसे गद्दार मानें, और फिर वहां की जमीन को अपना बताएं। तो कश्मीर महज एक जमीन का नाम नहीं है, वह वहां के इंसानों का भी नाम है, वहां के इतिहास, वहां की संस्कृति, वहां के धड़कते बदनों के भीतर अरमानों का नाम भी है। कश्मीर को गंदी जुबान में गालियां देकर इस तरह बदनाम करना एक शर्मनाक हरकत है, और यह बात अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि ऐसा बयान देने वाला नीति आयोग का एक सदस्य है, उसे बर्खास्त भी करना चाहिए, और उसे अदालत में भी घसीटना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 18-Jan-2020

बाजार-कारोबार को लेकर सरकार तंगनजरिया क्यों?

नई पीढ़ी का एक नया नजरिया भी रहता है जो कि नई संभावनाएं तलाशता है। मुम्बई में ठाकरे परिवार पहली बार मुख्यमंत्री बना, और उद्ध्व ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे पर्यटन मंत्री बने। उन्होंने अभी यह तय किया है कि महानगर मुम्बई के बहुत से मॉल्स और रेस्त्रां चौबीसों घंटे खुले रहेंगे। कारोबारियों के साथ एक बैठक में, पुलिस की मौजूदगी में यह तय हुआ। आदित्य का कहना है कि इससे राज्य की कमाई बढ़ेगी, और हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा।

हमारे पुराने पाठकों को याद होगा कि हम हर कुछ बरस में प्रदेश सरकारों के लिए इसी जगह पर ऐसी सलाह लिखते आए हैं। शहरों को लेकर हमारा यह तर्क रहा है कि बाजार के दस-बारह घंटों में ही सरकारी दफ्तरों से लेकर स्कूल-कॉलेज तक का भी बोझ सडक़ों पर पड़ता है, और रात के घंटों में सडक़ें सुनसान हो जाती हैं। सडक़ों और पार्किंग का यह असंतुलित इस्तेमाल बेहतर करने की जरूरत है, और शहरियों को बाजार, सिनेमा, या रेस्त्रां की अधिक घंटों की सहूलियत भी मिलनी चाहिए। आज लोग अलग-अलग शिफ्टों में काम करते हैं, पढऩे और दूसरे इम्तिहान की तैयारियों वाले लोग रात-दिन किसी भी समय अपनी सुविधा और पसंद से पढ़ते हैं, और उन्हें खाने-पीने की जरूरत भी अपने वक्त पर पड़ती है। ऐसे में बाजार का जो हिस्सा देर रात तक या पूरी रात खुला रहना चाहे, उसे शासन-प्रशासन की ओर से इसकी छूट मिलनी चाहिए। इससे दिन और शाम के व्यस्त घंटों में लगने वाला ट्रैफिक जाम भी घटेगा, और बिजली की खपत भी अतिरिक्त बिजली वाले घंटों में खिसकेगी। आज आधी रात के बाद की कारोबारी बिजली की खपत भी कम रहती है, जो कि देर रात या सुबह तक की चहल-पहल से उन घंटों में बढ़ सकती है, और शाम के घंटों में कुछ कम भी हो सकती है। जिस तरह टीवी के चैनल रात-दिन काम करते हैं, मोबाइल फोन, प्लेन, ट्रेन, बसें, रात-दिन काम करते हैं, उसी तरह बाजार, सिनेमाघर, रेस्त्रां भी पूरे वक्त काम कर सकते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि रात में कारोबार बढऩे से सडक़ों पर पुलिस की हिफाजत बढ़ानी पड़ेगी, उनकी सोच शायद सही नहीं है। रात सडक़ों पर जुर्म इसलिए अधिक होते हैं कि सडक़ें सुनसान होती हैं। जब बाजारों की रौशनी रहेगी, चहल-पहल रहेगी, तो जुर्म कम होंगे।

अब दूसरे शहरों से देर रात आने-जाने वाले लोगों की गिनती बढ़ती चल रही है, पर्यटक बढ़ते चल रहे हैं, और इन्हें बाजार बंद होने से दिक्कत झेलनी पड़ती है। आज हिन्दुस्तान में कारोबार में मंदी है, बेरोजगारी बढ़ी हुई है, सरकार का टैक्स कलेक्शन घट रहा है, ऐसे में एक नई सोच से एक नई कोशिश की जानी चाहिए। यह भी याद रखना चाहिए कि मॉल्स, बाजार, सिनेमाघर, और रेस्त्रां पर कारोबारियों का पूंजीनिवेश तो हो ही चुका रहता है, उसे वे बारह घंटे चलाएं, या चौबीस घंटे। इसके बाद कोई नई लागत उन्हें नहीं लगेगी, महज बिजली और कर्मचारियों का खर्च ही लगेगा। बैंकों से ब्याज पर कर्ज लेकर कारोबार करने वाले लोगों पर बैंक का ब्याज-मीटर तो चौबीसों घंटे चलता है, इसलिए भी कारोबार की धारणा को सीमित घंटों से हटाकर पूरे वक्त की करने की जरूरत है।

आज शहरों में खुद कारोबारी अपने धंधे से निकलकर घर पहुंचते हुए इतने लेट हो जाते हैं, कि उसके बाद परिवार को लेकर बाहर नहीं निकल पाते। जिन परिवारों में अधिक लोग नौकरीपेशा हैं, उनके भी काम के घंटे अलग होने पर बाजार साथ जाने का वक्त नहीं मिलता है। पश्चिम के अधिकांश विकसित देशों में बाजार का एक हिस्सा दिन-रात काम करता है, और उससे लोगों को बड़ी सुविधा मिलती है। भारत की राज्य सरकारों को भी इस बारे में सोचना चाहिए कि जब रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर चौबीसों घंटे कारोबार हो सकता है, तो शहरों के बीच कारोबार के बने-बनाए ढांचे का बेहतर और अधिक इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता? इससे सडक़ों और पार्किंग का भी बेहतर इस्तेमाल होगा, और दिन-शाम के व्यस्त घंटों में शहरों का दमघोंटू ढांचा अधिक सुविधाजनक हो सकेगा। खुद सरकार का बड़ा पूंजीनिवेश सडक़ों और पार्किंग में हो चुका है, और उसे भी इसका अधिक इस्तेमाल, बेहतर इस्तेमाल करने के बारे में सोचना चाहिए। बंधी-बंधाई लीक पर चल रहा सरकारी इंतजाम अब पुराना और बेअसर हो चुका है, और एक नई सोच की जरूरत है।


Date : 17-Jan-2020

बाम्बे हाईकोर्ट ने कल वहां के एक अस्पताल को सरकारी मदद देने से हाथ खींच लेने पर महाराष्ट्र सरकार को फटकारा है, और कहा है कि सरकार के पास मूर्तियां लगाने के लिए पैसा है, लेकिन जनता के इलाज के लिए नहीं है? अदालत ने कहा कि राज्य सरकार सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा से भी ऊंची बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा लगवाना चाह रही है, इस सबके लिए पैसा है, लेकिन जिन लोगों का अंबेडकर ने पूरी जिंदगी प्रतिनिधित्व किया वो मर सकते हैं? अदालत ने पूछा कि लोगों को बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए इलाज की जरूरत है या प्रतिमाओं की? जनस्वास्थ्य कभी सरकार की प्राथमिकता नहीं रहा, और मुख्यमंत्री उद्घाटनों में व्यस्त हैं। अदालत ने यह भी कहा कि जिस तरह राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और गुजरात की सरकारें बच्चों के मरने पर कुछ नहीं कर रही हैं क्या यही नौबत महाराष्ट्र में भी आने वाली है? 

हिन्दुस्तान प्रतिमाओं के संक्रमण से घिरा हुआ देश है। जब तक किसी धर्म की प्रतिमाएं उसके धर्मालुओं के पैसों से बनती हैं, तब तक तो कोई बात नहीं है, लेकिन जब किसी धर्म पर सरकार खर्च करती है, या किसी महान व्यक्ति, या अन्य नेता की प्रतिमाओं पर बड़ी सरकारी रकम खर्च होती है, तो जाहिर है कि वह गरीब बच्चों के मुंह का कौर छीनकर, या गरीब मरीजों के इलाज में कटौती करके ही खर्च होती है। दिक्कत यह है कि भारतीय संसदीय व्यवस्था में जो बात संसद को कहना चाहिए, वह बात आए दिन अदालतें कह रही हैं, और सरकार तो मानो न संसद के प्रति जवाबदेह है, न ही अदालत के प्रति। जनता के प्रति सीधे जवाबदेह जो निर्वाचित जनप्रतिनिधि विधानसभा और संसद में ऐसी बातों को रखने वाले होने चाहिए, वे प्रतिमाओं से जुड़ी भावनाएं दुहने में लग जाते हैं, और सदनों में बड़ी-बड़ी रकम मंजूर करवाते हैं, उसकी मुनादी करवाते हैं। देश की जनता का एक बड़ा तबका इस हद तक कमअक्ल है कि उन्हें प्रतिमाओं से गौरव हासिल होता है, और बच्चों के जिंदा रहने या मर जाने से फर्क नहीं पड़ता। यह देश वैज्ञानिक चेतना से दूर धकेलकर एक ऐसे युग में ले जाया जा रहा है जहां प्रतिमाओं से ही सबसे अधिक गौरव हासिल होता है। देश भर में एकता को तबाह करने के साथ-साथ स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के नाम से सरदार पटेल की दुनिया भर की सबसे ऊंची प्रतिमा पर तीन हजार करोड़ रूपए से अधिक खर्च कर दिए गए। अब उसी किस्म का कोई खर्च महाराष्ट्र में शिवाजी की प्रतिमा पर होने वाला है, और यह भी तय किया गया है कि बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा की ऊंचाई भी शायद सौ फीट बढ़ाई जाएगी, और उत्तरप्रदेश में सरकारी खर्च पर राम की आसमान छूती प्रतिमा बनाई जाएगी। 

यह देश, जैसा कि बाम्बे हाईकोर्ट ने कहा है, कई प्रदेशों में बच्चों को बेमौत मरते देख रहा है, उनका इलाज नहीं हो रहा क्योंकि उत्तरप्रदेश में ऑक्सीजन नहीं है, राजस्थान में तमाम मशीनें खराब पड़ी हैं, और दूसरे प्रदेशों में भी कमोबेश यही हाल है, सिवाय दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जिन्होंने किसी प्रतिमा पर एक धेला खर्च नहीं किया, कोई स्मारक नहीं बनवाया, लेकिन दिल्ली की सरकारी स्कूलों को हिन्दुस्तान की सबसे अच्छी स्कूलें बनवा दिया है, और हर मोहल्ले में क्लीनिक खुलवा दिए हैं। देश की राजधानी दिल्ली में जाते तो सभी राज्यों के मंत्री-मुख्यमंत्री हैं, लेकिन दिल्ली से सबक लेने का काम कोई नहीं कर रहे हैं, और इसके लिए अदालतों को फटकार लगानी पड़ रही है। हम पिछले बरसों में लगातार भारतीय राजनीति की बुतपरस्ती के खिलाफ लिखते आए हैं कि जनता के पैसों से कोई भी प्रतिमा बनाना तुरंत बंद होना चाहिए, और जिस नेता की प्रतिमा बनवाना हो, उसे उनके मानने वाले लोग अपने पैसों से बनवाएं। यह देश टीकाकरण अभियान के लिए दूसरे देशों से मदद मांग रहा है, यहां सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत इतनी खराब है कि गरीब अपनी जमीन बेचकर भी निजी अस्पताल में इलाज कराने जाते हैं, और गरीब लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने के लिए पेट काटकर इंतजाम करते हैं। ऐसी बुतपरस्ती के खिलाफ जनता के बीच से ही एक बड़ी आवाज उठनी चाहिए। किसी भी प्रदेश या किसी भी म्युनिसिपल में प्रतिमा पर जनता का पैसा खर्च करना तुरंत बंद होना चाहिए, और देश की अदालतों को खुद होकर इस मुद्दे को एक जनहित याचिका के रूप में दर्ज करना चाहिए, सरकारों से जवाब मांगना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Jan-2020

हाल के कुछ बरसों में ही हिन्दुस्तान के लोगों के हाथ न सिर्फ स्मार्टफोन लगे हैं, बढ़े हैं, बल्कि उस पर वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर का इस्तेमाल भी जमकर बढ़ा है। आम लोग भी फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए हैं, और मुफ्त जैसे दाम वाले इंटरनेट पैकेज की मेहरबानी से लोग इन तमाम औजारों का जमकर उपयोग भी कर रहे हैं। दुनिया भर में लोग कितने घंटे अपने फोन पर रहते हैं, इसके एक सर्वे में हिन्दुस्तानियों को सबसे अधिक समय फोन की स्क्रीन पर गुजारने की जानकारी आई है। अब इसके ठीक पहले के बरसों का हाल देखें तो लोगों के पास दिन में एक या दो बार आने वाले अखबार रहते थे, और लोग घर या कारोबार की जगह पर टीवी समाचार बुलेटिन देख लेते थे। आज हालत यह है कि अधिक सक्रिय लोगों के फोन पर हर सेकंड कोई न कोई सूचना, संदेश, समाचार-लिंक आते ही रहते हैं, और लोगों को अगर घंटे-दो घंटे भी किसी जगह पर इंतजार करना पड़ता है, तो वह भारी नहीं पड़ता, बस इंटरनेट हो, और बैटरी चार्ज हो। 

अब सवाल यह उठता है कि लोगों की जिंदगी अभी कुछ बरस पहले तक सूचनाओं के ऐसे सैलाब के बिना अच्छी तरह चल रही थी। सूचनाओं के जो परंपरागत स्रोत थे, उनमें अखबार और टीवी के समाचार बुलेटिन ही थे। टीवी पर अखबारों का असर ऐसा रहता था कि अखबारों के अनकहे दबाव में टीवी की खबरों को अपनी विश्वसनीयता ठीकठाक रखनी पड़ती थी। लेकिन जैसे-जैसे समाचार और सूचना के बाजार में इन दोनों के मुकाबले नए ऐसे और खिलाड़ी उतर आए जो कि पूरी तरह इंटरनेट या फोन पर चलने लगे, तब से विश्वसनीयता और दबाव की तस्वीर एकदम बदल गई। टीवी के समाचार बुलेटिन भी किसी खबर को एक या आधे घंटे के बाद दुहराते थे, लेकिन अब समाचार पोर्टल या मोजो कहे जाने वाले मोबाइल-जर्नलिज्म ने यह तस्वीर बदल दी है। बहुत पहले एक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी के इतिहास पर लिखी गई एक किताब आई थी, जिसका नाम था- डेडलाईन एवरी मिनट। इसका मतलब यह था कि समाचार एजेंसियों पर खबर डालने का कोई वक्त तय नहीं होता, और हर पल उस पर कोई न कोई खबर आती रहती है, क्योंकि दुनिया में हर पल कोई न कोई अखबार, रेडियो-टीवी उस पर से खबर निकालते रहते हैं। अब वह किताब कोई आधी सदी बाद एक बार फिर सही साबित हो रही है क्योंकि इंटरनेट और मोबाइल फोन पर खबरों का मुकाबला इस कदर गलाकाट हो गया है कि लोग पल-पल खबर डाल देना चाहते हैं, फिर चाहे कुछ देर बाद ही उसकी जानकारी सुधारनी क्यों न पड़े। 

अब दूसरा सवाल यह है कि क्या लोगों को सचमुच ही ऐसे इन्फरमेशन-ओवरलोड की जरूरत है, क्या सूचनाओं का ऐसा सैलाब लोगों का नफा कर रहा है, या नुकसान कर रहा है? क्या लोग अपनी जरूरत से अधिक खबरें, जानकारी, और विचार पा रहे हैं, और पढ़ रहे हैं? क्या लोग अपने को मिलने वाले संदेशों में आने वाली जानकारी को आगे बढ़ाने के एक किस्म के सामाजिक दबाव में रहते हैं, क्योंकि उनके पास भी दोस्त और दूसरे लोग लगातार संदेश भेजते हैं। सवाल यह है कि किसी कामकाजी इंसान को, या जरा भी व्यस्त किसी इंसान को कितने समाचार-विचार की जरूरत होती है? कितनी ब्रेकिंग न्यूज उनके काम की होती हैं? जितना समय उनका दिन भर में इस काम में लग जाता है, वह वक्त क्या सचमुच ही उत्पादक रहता है, या काऊंटर-प्रोडक्टिव हो रहा है? और सबसे आखिर में एक बात यह भी कि क्या कुछ बरसों के भीतर लोग ऐसे सैलाब के साथ जीने के आदी हो जाएंगे, और जरूरत से अधिक सूचनाओं को अनदेखा भी करने लगेंगे? एक वक्त जब हिन्दुस्तानी टीवी पर महज एक सरकारी चैनल, दूरदर्शन आता था, उस वक्त लोग घंटों टीवी के उसी एक चैनल से बंधे रहते थे। तब के मुकाबले आज सैकड़ों चैनल हैं, लेकिन लोग आज सड़कों पर भी दिखते हैं, और टीवी के सामने बैठना पहले के मुकाबले कम हो गया है क्योंकि कम्प्यूटर-स्क्रीन और मोबाइल फोन ने उसकी जगह ले ली है। इस सदी का यह तीसरा दशक इन्फरमेशन-ओवरलोड के साथ जीने का एक दिलचस्प प्रयोग रहने जा रहा है, और मानव मनोविज्ञान इसे लेकर एक नई ब्रांच देख सकता है। 
-सुनील कुमार


Date : 15-Jan-2020

दिल्ली में जेएनयू पर हुए हमले के बाद जब दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही जांच पर चारों तरफ से शक जाहिर होने लगे, और जेएनयू की वामपंथी छात्रसंघ अध्यक्षा के बुरी तरह जख्मी होने के बाद भी उसके खिलाफ ही कुछ मिनटों के भीतर जुर्म दर्ज किया गया, तो पुलिस के इस रूख के खिलाफ कई संगठन अदालत गए। अदालत में जब यह बात सामने रखी गई कि मोबाइल फोन पर वामपंथ-विरोधी छात्रों के कई चैट ग्रुप में इस हमले की तैयारी की बात चल रही थी, तो अदालत ने ऐसे फोन जब्त करने का आदेश दिया है। एक दूसरे मामले में उत्तर भारत के एक प्रमुख नौजवान दलित कार्यकर्ता चन्द्रशेखर आजाद की गिरफ्तारी को लेकर दिल्ली की एक अदालत की एक महिला जज ने पुलिस पर बड़ी कड़ी टिप्पणियां की हैं और उनकी कही-लिखी अदालती बातों से देश में कई जलते-सुलगते मुद्दों पर सोचने की मजबूरी खड़ी होती है। आज जब देश की बड़ी-बड़ी अदालतें केन्द्र सरकार के खिलाफ जलती-सुलगती बातों पर याचिका सुनती हैं, तो अदालत के आदेश से ऐसा लगता है कि सुनवाई के दौरान जज छत पर जाला बुनती हुई मकड़ी को देख रहे थे। ऐसे में एक छोटे अदालत की महिला जज ने जिस तरह की चेतनाभरी बातें कही हैं, उनको जरूर गौर से पढऩा चाहिए। इसलिए भी पढऩा चाहिए कि ये बातें एक दलित नौजवान नेता की दिल्ली में गिरफ्तारी के पुलिस के तौर-तरीकों को लेकर भी है, जिस तबके के लिए आज जगह महज हाशिए पर है। 

हिन्दुस्तान के लोगों को देश की हवा को समझना चाहिए। जिस तरह देश भर में जगह-जगह छात्रों के आंदोलन चल रहे हैं, जिस तरह न सिर्फ मुस्लिमों के बीच, बल्कि सभी धर्मों के लोगों के बीच नागरिकता साबित करने के मुद्दे पर दहशत फैली हुई है, कई राज्यों में तो अनिश्चितता इतनी है कि लोग दहशत में भी मरे हैं, और खुदकुशी भी की है। ऐसे माहौल में देश के लोग अगर किसी भी तबके के लगाए गए नारों तक ही अपनी समझ सीमित रखेंगे, तो वे पांच बरस में एक दिन के जागरूक वोटर ही कहलाएंगे, इस देश के जागरूक नागरिक नहीं। इस हिन्दुस्तान में आधी सदी पहले एक आदमी कह गया था कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। सरहद के दूसरी तरफ एक क्रांतिकारी शायर कह गया था कि बोल कि लब आजाद हैं तेरे...। इन दो बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि वोट देने का दिन तो पांच बरस में एक बार का रहता है, बाकी दिन तो जुबान से ही काम चलाया जा सकता है, और चलाना चाहिए, जुबान भी चलाना चाहिए, की-बोर्ड और फोन पर ऊंगलियां भी चलानी चाहिए। 

आज हिन्दुस्तान में लोग खेमेबाजी के तहत किसी मुद्दे पर झूठ को आगे बढ़ाने में लग जाते हैं, जिंदगी के किसी अहम मुद्दे पर चल रही बहस के बीच जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने लगते हैं। झूठ को गढ़कर भी आगे बढ़ाते हैं, और दूसरों के गढ़े हुए झूठ को जानते-समझते भी आगे बढ़ाते हैं। जब देश भयानक आर्थिक संकट से गुजर रहा है, जब लोगों के बीच भेदभाव भयानक गहरी खाई से खड़ा कर दिया गया है, तब हकीकत को छुपाने के लिए झूठ के नारे यह भी साबित करते हैं कि उनको लगाने वाले लोग इतने झूठे हैं, साजिश में कितने शामिल हैं, और वे इंसानियत के खिलाफ किस हद तक बेरहम हो सकते हैं। आज जो लोग जेएनयू या किसी और जगह के छात्र-छात्राओं को बदनाम करने के लिए किसी और जगह की झूठी तस्वीरों को जेएनयू के नाम से पोस्ट करते हैं, उनको यह भी सोचना चाहिए कि किसी दिन उस यूनिवर्सिटी पर भी हमला हो सकता है जहां उनके अपने बच्चे पढ़ रहे हों, उनके सिर भी तोड़े जा सकते हैं, और झूठी तस्वीरों से, वीडियो के साथ झूठा ऑडियो जोड़कर उन्हें बदचलन और देश का गद्दार साबित किया जा सकता है। आज सोशल मीडिया पर पेशेवर अंदाज में झूठ और नफरत को बढ़ाने वाले लोगों को ऐसी तस्वीरों और ऐसे वीडियो को सामने रखकर कुछ मिनट के लिए यह भी सोचना चाहिए कि इसमें अगर उनकी बहन-बेटी के चेहरे हों, अगर उनके बेटे के वीडियो के साथ गद्दारी के नारों को कोई जोड़कर फैलाए, तो उस दिन वे उसे रोकने के लिए क्या कर पाएंगे? लोगों को कुदरत से कम से कम इतना तो सीखना चाहिए कि आम बोने पर आम के फल मिलते हैं, और बबूल बोने पर बबूल के।
-सुनील कुमार 


Date : 14-Jan-2020

सोशल मीडिया इन दिनों हिंदी के एक प्रमुख बुजुर्ग कवि बाबा नागार्जुन पर लगे एक ताजा आरोप से खौल रहा है। गुनगुन थानवी नाम की लेखिका ने अपना हादसा बयां किया है कि किस तरह जब वे सात बरस की थीं, और बाबा नागार्जुन उनके परिवार में एक मेहमान बनकर ठहरे थे, तो उन्होंने उनका यौन शोषण किया था। इस बात से लोग हक्का-बक्का हैं क्योंकि आपातकाल से लेकर उसके बाद के लंबे दौर तक नागार्जुन की जनता की जुबान में लिखी गईं कई कविताएं बड़ी इज्जत के साथ जनसंघर्ष का प्रतीक बनी हुई हैं, और नागार्जुन के व्यक्तित्व को हिंदी साहित्य में बड़े सम्मान से देखा जाता है। फेसबुक पर गुनगुन की पोस्ट के बाद बहुत से लोगों ने यह सोच भी सामने रखी है कि नागार्जुन जैसे महान लेखक ऐसा नहीं कर सकते, और ऐसी सोच को दूसरे लोगों ने झिड़की भी दी है कि किसी का बड़ा लेखक होना या महान होना उन्हें बलात्कारी होने से नहीं रोकता। कुछ लोगों को यह भी लग रहा है कि इतने वक्त के बाद ऐसा विवाद नहीं छेड़ा जाना चाहिए। 

लेकिन कुछ बरस पहले लोगों की प्रतिक्रिया इस पर यह आवाज उठाने वाली महिला के और खिलाफ रही होती, इन दिनों देश के बदले हुए माहौल में लोगों का कुछ बर्दाश्त भी दिखाई पड़ रहा है। अब लोग किसी लड़की या महिला की लगाई हुई तोहमत को एकदम से खारिज नहीं कर रहे हैं, और लोग यह मानते हैं कि एमजे अकबर या बाबा नागार्जुन जैसे लोग भी मातहत लोगों का, या आसपास के लोगों का यौन शोषण कर सकते हैं। अब देश और दुनिया की हवा कुछ बदली हुई है और लोग किसी लड़की या महिला को चुप रहने की नसीहत देने के बजाय उसकी उठाई आवाज को सुनते भी हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ दशक पहले जब पंजाब की एक महिला आईएएस ने वहां के सुपर कॉप कहे जाने वाले डीजीपी केपीएस गिल के खिलाफ देह शोषण का आरोप लगाया था, तो कुछ प्रमुख महिला पत्रकारों ने भी उसके खिलाफ लिखा था कि इस महिला को यह आरोप लगाने के पहले याद रखना था कि केपीएस गिल ने पंजाब में आतंक खत्म करने में कितना योगदान दिया था, और उसे याद रखते हुए उन्हें यह शिकायत नहीं करनी थी। आखिरी में अदालत से रिटायर्ड और बुजुर्ग गिल को इस मामले में सजा भी हुई थी।

दरअसल ऐसे मामलों में शिकायतों से किसी एक को सजा दिलवाने के बजाय एक दूसरा योगदान अधिक बड़ा होता है। जब अकबर के खिलाफ बात उठती है, तो नामीगिरामी मुखिया के ओहदों पर बैठे दूसरे लोगों को भी लगता है कि वे मातहत लोगों का देह शोषण नहीं कर सकते क्योंकि किसी दिन उनके खिलाफ भी मामला हो सकता है। यह चेतावनी किसी एक को मिली सजा के मुकाबले एक अधिक बड़ी बात रहती है, और गुनगुन थानवी का उठाया गया यह मामला इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण है कि परिवार में मेहमान बनकर ठहरे हुए लोग इस तरह घर के बच्चों का शोषण करने से पहले सौ बार सोचें। हम इस एक मामले को ऐसी शिकायतों के बाकी आम मामलों से अलग देखना नहीं चाहते, और जिन पर तोहमतें लगी हैं, वे बड़े हों या छोटे, चर्चित हों, या ताकतवर, उन्हें एक सरीखा इंसाफ मिलना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 13-Jan-2020

ब्रिटिश राजघराने के एक राजकुमार, प्रिंस हैरी औरों से काफी अलग हैं। अभी उन्होंने यह घोषणा करके राजघराने को हक्का-बक्का कर दिया कि वे अपने शाही दर्जे को छोड़कर एक आम नागरिक की तरह किसी और देश जाकर बसने वाले हैं। वे इस मायने में भी अलग थे कि उन्होंने अमरीका की एक तलाकशुदा युवती से शादी की थी, और राजमहल में रहते हुए भी वे एक आम किस्म की जिंदगी जीने की कोशिश करते थे, और दुनिया भर मेें कई किस्म के समाजसेवा के कामों से जुड़े हुए भी थे। उनकी मॉडल-अभिनेत्री रह चुकी पत्नी भी आम रहने की कोशिश करती थी, और राजघराने का शाही दर्जा छोड़कर बाहर आम जिंदगी जीने जाना आसान बात नहीं है। 

जिन लोगों को ब्रिटेन की शाही परंपरा का अंदाज नहीं है, उनकी जानकारी के लिए यह लिखना ठीक और जरूरी है कि यह घराना ही ब्रिटेन का संवैधानिक मुखिया है, जिस तरह भारतीय लोकतंत्र में निर्वाचित राष्ट्रपति होते हैं। भारत ने लोकतंत्र का मॉडल ब्रिटेन से लिया जरूर है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र अधिक लोकतांत्रिक और परिपक्व इस मायने में हैं कि कोई एक घराना इस देश का संवैधानिक प्रमुख नहीं रहता। बल्कि भारत में किसी एक घराने को कोई भी सरकारी या संवैधानिक दर्जा नहीं मिलता। ब्रिटेन का हाल यह है कि वहां राजघराने के भीतर सिंहासन के हकदार पहले से पीढिय़ों की एक व्यवस्था के तहत तय हो जाते हैं, और उनमें ऐसे प्रमुख के जिंदा रहते या सिंहासन पर काबिज रहते उनके नीचे के वारिस अपनी बारी का इंतजार करते जी सकते हैं, और मर सकते हैं। आज वहां की महारानी कई दशकों से राजगद्दी पर बनी हुई है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम के कुछ और देश ऐसे हैं जो कि ब्रिटिश राजघराने को ही अपना संवैधानिक मुखिया बनाकर चलते हैं, और ब्रिटिश महारानी दुनिया के कुछ और देशों में भी संसद को संबोधित करने जाती हैं, और वहां के नोट-सिक्कों पर उन्हीं का चेहरा चलता है। यह गुलामी की एक बड़ी अलग और अजीब सी सोच है जिसे मनोविज्ञान में गुलाम और मालिक के बीच रिश्तों की परिभाषा से बेहतर समझा जा सकता है। अच्छे-भले, पूरी तरह से विकसित देश जिस तरह दूसरे देश की महारानी को अपनी महारानी बनाकर चलते हैं, वह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता में बड़ी अटपटी बात लगती है। 

लेकिन हम आज के मुद्दे पर लौटें, तो जिस तरह प्रिंस हैरी और उनकी पत्नी खुद होकर शाही दर्जा छोड़कर आम जिंदगी में जाने वाले हैं, उससे हिन्दुस्तान के बहुत से छोटे-छोटे से शाही लोगों को भी कोई प्रेरणा मिलनी चाहिए। लोग अपनी लोकसभा सीट, विधानसभा सीट, या महापौर से लेकर पार्षद तक की सीट नहीं छोड़ पाते, और तब तक उन पर काबिज रहना चाहते हैं, जब तक उनकी अगली पीढ़ी विरासत की दावेदार न बन जाए, और लोग उन सीटों पर पार्टी से अपनी औलादों या पत्नियों के लिए टिकट न जुटा दें। इसी तरह राजनीतिक दलों में संगठन के पदों पर लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक कुनबे के भीतर जिस तरह काबिज होते हैं, वे ब्रिटिश राजघराने से कम नहीं रहते। उनको भी सोचना चाहिए कि क्या उनके भीतर इतनी क्षमता और प्रतिभा है कि क्या वे सार्वजनिक जीवन के पदों को विरासत में पाने के बजाय अपने दम पर कहीं कुछ करके दिखाएं? ब्रिटेन में तो राजघराने के एक वारिस के सिंहासन छोडऩे को लेकर वह घराना भी विचलित है, और कई दूसरे लोग भी। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसे कुनबापरस्त लोगों के सामने इस मिसाल को बार-बार रखना चाहिए जहां पर कि एक मजबूत और परिपक्व निर्वाचित लोकतंत्र के भीतर भी देश के कुछ सौ परिवार आजादी से लेकर अब तक संसद, विधानसभा, और पार्टी संगठनों पर काबिज हैं, और अपने क्षेत्र, अपने संगठन के लोकतांत्रिक विकास की राह में रोड़े बने हुए हैं। ऐसे रोड़ों को यह भी समझना चाहिए कि वे विरासत से बाहर जाकर अपना दमखम बेहतर तरीके से साबित कर सकते हैं। लेकिन अगर ऐसा होता है तो हिन्दुस्तान में अधिकतर राजनीतिक दल एकदम से अनाथ और बेसहारा हो जाएंगे, और उन दलों के भीतर संभावनाओं की एक ऐसी सुनामी आएगी कि अगले कुछ बरस तक वहां लोगों के पांव नहीं टिक पाएंगे, लेकिन आगे जाकर वहां एक मजबूती भी आ सकती है। लोगों के बीच विरासत के आभामंडल से बाहर निकलकर एक इंसान के रूप में जिंदा रहने का हौसला भी रहना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 12-Jan-2020

आज हिन्दुस्तान भर में स्वामी विवेकानंद की जयंती मनाई जा रही है, और इस दिन को युवा उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है क्योंकि विवेकानंद कुल 38 बरस रहकर चले गए थे, और एक नौजवान के रूप में ही उन्हें अपने एक अंतरराष्ट्रीय व्याख्यान से शोहरत मिली थी। अब पिछले खासे अरसे से विवेकानंद हिन्दुस्तान के हिन्दूवादी लोगों के पसंदीदा व्यक्तित्व बने हुए हैं। एक किस्म से उनके नाम पर चलने वाले आश्रम और संगठन हिन्दूवादी संघ परिवार के संगठन के रूप में भी देखे जाते हैं।  आज जब चारों तरफ विवेकानंद के नाम पर कार्यक्रम हो रहे हैं, तब कुछ लोगों को यह बात भी सालती है कि धर्म और आध्यात्म के भगवा कपड़ों में जीने वाले स्वामी विवेकानंद ने कट्टरता के खिलाफ जितना कुछ कहा, और सर्वधर्म उदारता को लेकर जितना कुछ कहा वह मानो खो ही गया। उनकी बातों में से कुछ बातों को संदर्भ के बाहर कट्टर बताने की कोशिशें होती रहीं, और विवेकानंद पर एक ऐसी सोच का कब्जा हो गया जो सोच उनकी खुद की कभी थी नहीं। 

लेकिन इस मौके पर ऐसी कुछ और बातों को भी याद करना चाहिए कि देश के महान व्यक्तित्वों को अगर कोई पार्टी या विचारधारा भुला देती हैं, तो किस तरह उसका अपहरण करके दूसरे लोग उन पर काबिज हो सकते हैं। अब जैसे सरदार वल्लभ पटेल का ही मामला लें, वे कट्टर गांधीवादी थे, कट्टर कांग्रेसी थे, नेहरू को अपने से महान नेता और प्रधानमंत्री पद के लिए अधिक काबिल मानने वाले थे, और  उनके फैसले, उनका लिखा हुआ बताते हैं कि वे किस तरह गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार मानते थे, और आरएसएस पर उन्होंने प्रतिबंध भी लगाया था। अब इसके बाद आज इस देश में आरएसएस की राजनीतिक शाखा, भाजपा ने सरदार पटेल का अनुयायी होने का एक हक सा हासिल कर लिया, उनकी विशाल प्रतिमा बनवाई, और गांधी-नेहरू के मुकाबले सरदार को खड़ा करके उन्हें एक बड़ी लकीर की तरह पेश किया। उसे लेकर भी देश के कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि कांग्रेस अपने इंदिरा-राजीव प्रेम में अगर इतनी मगन नहीं होती कि वह सरदार को पूरी तरह भुला ही न बैठती, तो भाजपा को सरदार-प्रेमी बनने का मौका नहीं मिला होता। चाहे भगत सिंह हों, चाहें सुभाषचंद्र बोस हों, चाहे विवेकानंद और सरदार हों, लोकतंत्र हर पार्टी, आंदोलन, और विचारधारा को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके प्रतीक चिन्हों को हाशिए पर पड़ा देखकर कोई और उन्हें इस तरह न अपना ले कि वही उसका सामाजिक-राजनीतिक फायदा उठा सके। भारत जैसे निर्वाचित लोकतंत्र में आदर्शों और प्रतीक चिन्हों को इस तरह लावारिस छोड़ देना ठीक नहीं होता है क्योंकि वे इस तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं। 

आज एक तरफ भाजपा और हिन्दूवादी विचारधारा और संगठन गाय को लेकर एक धार्मिक, साम्प्रदायिक, और भावनात्मक संघर्ष चलाए हुए हैं, और दूसरी तरफ विनायक दामोदर सावरकर की विरासत पर एकाधिकार भी जमाए हुए हैं। लेकिन देश की दूसरी प्रगतिशील और उदार विचारधारा ने सावरकर को अंग्रेजपरस्त-साम्प्रदायिक करार देते हुए सावरकर की लिखी उन वैज्ञानिक बातों को पूरी तरह अनदेखा ही कर दिया जो उन्होंने गाय की पूजा के खिलाफ लिखी थीं, गाय को खाने के पक्ष में लिखी थीं, और जमकर लिखी थीं। अब हिन्दूवादी विचारधारा के एक सबसे बड़े आदर्श की इस वैज्ञानिक सोच को भी बाकी लोगों ने जनता के सामने रखा नहीं, वरना इस हिन्दूवादी आदर्श के साथ आज के आक्रामक हिन्दुत्व के एक सबसे बड़े एजेंडा का विरोधाभास खुलकर सामने आ गया होता। लोकतंत्र इस किस्म की ऐतिहासिक अनदेखी और ऐसी चूकों का नुकसान बहुत अच्छी तरह दर्ज करता है। जो विवेकानंद धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बहुत सी बातें कहते आए थे, जिन्होंने दुनिया भर के शरणार्थियों को भारत में जगह देने की वकालत की थी, जिनकी बातें आज देश में नागरिकता की लड़ाई में आंदोलन के काम आ सकती थीं, उनसे महज धर्म और आध्यात्म की वजह से, महज भगवे रंग की वजह से परहेज उन्हें अलग कर गया। जिस तरह गांधी ने अपनी लोकतांत्रिक लड़ाई में सबको जोडऩे के बाद भी आंदोलन को धर्म से तोड़ा नहीं था, और धर्म के प्रति उदार विचारधारा जारी रखी थी, वैसी दूरदर्शिता न रहने से पिछली आधी सदी में देश की बहुत सी महान हस्तियां लोकतंत्र के हाथ से निकलकर महज एक विचारधारा की होकर रह गई हैं। लोकतंत्र में जनभावनाओं की बहुत अनदेखी ठीक नहीं होती है, यह याद करने का दिन भी आज है, विवेकानंद जयंती पर। 
-सुनील कुमार


Date : 11-Jan-2020

फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जेएनयू में हमले और हिंसा के शिकार छात्रों के साथ जाकर खड़ी क्या हो गई, देश भर में जेएनयू-विरोधी विचारधारा ने उस पर हल्ला बोल दिया। अगर यह बात वैचारिक असहमति तक रहती, तब भी ठीक था। लेकिन सोशल मीडिया पर दीपिका की जारी होने वाली फिल्म के बहिष्कार का फतवा दिया गया, और दसियों हजार की संख्या में लोगों ने इस फिल्म की अपनी बुक कराई हुई टिकटों को रद्द करवाने के सुबूत पोस्ट किए। यह एक अलग बात है कि आदतन झूठे लोगों ने एक ही रद्द करवाई हुई टिकट को दस-दस हजार ट्वीट के साथ चिपका दिया, और कुछ लोगों ने यह मजा भी लिया कि इस सिनेमाघर की इन सीटों को दुनिया में सबसे अधिक बार कैंसल होने का विश्व रिकॉर्ड बिना मेहनत हासिल हो गया। बात यहां तक भी रहती, तो भी ठीक था। लेकिन जेएनयू विरोधी लोगों ने दीपिका के बीते बरसों की एक-एक बात को ढूंढकर उन्हें घटिया साबित करने में इतनी मेहनत की कि वह भारत की कार्यसंस्कृति के मुकाबले बहुत अधिक कड़ी मेहनत साबित हुई। अगर सभी आम हिन्दुस्तानी जिंदगी के रोजमर्रा के काम में इतनी मेहनत करते तो हिन्दुस्तान जापान बन गया होता। लेकिन कुछ और जगहों पर बात कुछ और आगे तक बढ़ी। 

कांग्रेस के दो राज्य छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश यह घोषणा कर चुके हैं कि दीपिका पादुकोण की चर्चित फिल्म जो कि भारत में लड़कियों और महिलाओं पर तेजाब हमले की यातना, और उससे जीतकर निकलने पर बनी है, उसे राज्य में टैक्सफ्री किया गया है। किसी फिल्म पर मनोरंजन कर न लेना राज्य का अधिकार होता है, और देश भर के तमाम राज्यों में हर बरस कई ऐसी फिल्में रहती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनी एक फिल्म पर से भी कई राज्यों में टैक्स हटाया ही था। भारत में तेजाबी हमलों की शिकार युवतियों के संघर्ष की कहानी तो वैसे भी एक जलता-सुलगता सामाजिक मुद्दा है। लेकिन इस पर मध्यप्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष, विधायक गोपाल भार्गव ने बयान दिया कि दीपिका अगर किसी पोर्न फिल्म में अभिनय करती तो भी मध्यप्रदेश सरकार उसे टैक्सफ्री कर देती। 

अब यह हमला दीपिका पादुकोण नाम की उस अभिनेत्री पर है जिसने देश को बाहर भी बहुत सी शोहरत दिलवाई है, जिसके पिता अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी रहे हैं, और जिसे मोदी सरकार ने बहुत से सरकारी इश्तहारों की मॉडलिंग के लिए छांटकर उससे काम करवाया है। ऐसी अभिनेत्री के लिए, और खासकर तेजाबी-हमले जैसे दर्दनाक सामाजिक मुद्दे की फिल्म के संदर्भ में पोर्न फिल्म की मिसाल देना एक बहुत ही घटिया दर्जे का हिंसक बयान है। और यह बात भी समझने की जरूरत है कि यह बयान किसी नौसिखिए नेता का दिया हुआ नहीं है, बल्कि मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य की विधानसभा के प्रतिपक्ष के नेता का है जो कि मंत्री स्तर का दर्जा भी पाते हैं, और जो भाजपा के विधायक हैं जो कि भारतीय संस्कृति की बात करते थकती नहीं है। एक अच्छी और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेत्री के बारे में इस तरह की ओछी बात करना कांग्रेस सरकार पर हमला नहीं है, यह तमाम महिलाओं पर हमला है, और गोपाल भार्गव की पार्टी के बहुत से दूसरे नेता भी ऐसा करते आए हैं। लोगों को याद होगा कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल बहुत से मौकों पर महिलाओं के खिलाफ हिंसक और हमलावर बातें बोलते आए हैं। 

दीपिका पादुकोण के जेएनयू चले जाने से अगर उनके किरदार वाली फिल्म के सामाजिक मुद्दे को अनदेखा करके एक पोर्न फिल्म की मिसाल दी जा रही है, तो यह बहुत ही शर्मनाक बात है। कांग्रेस पार्टी इस बयान का जैसा भी विरोध करे, यह उसका अपना फैसला रहेगा, लेकिन देश के महिला संगठनों को, देश के मानवाधिकार संगठनों को, और सामाजिक चेतना वाले लोगों को ऐसे बयान को अनदेखा-अनसुना करके चुप नहीं बैठना चाहिए, बल्कि इतने कड़े शब्दों में इसके खिलाफ कहना चाहिए कि अगली बार ऐसा कुछ कहते हुए नेता कुछ सोचें। महिलाओं के खिलाफ इस किस्म की हिंसक सोच उन कई वजहों में से एक है जिनसे देश में इतने अधिक बलात्कार होते हैं, और लड़कियों पर तेजाबी हमले होते हैं। ऐसी तेजाबी जुबान की हिंसा को कम आंकना गलत होगा। 
-सुनील कुमार


Date : 10-Jan-2020

सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर पर केन्द्र सरकार के लगाए गए तमाम किस्म के प्रतिबंधों पर एक दार्शनिक किस्म की टिप्पणी की है कि प्रतिबंध अंतहीन नहीं हो सकते, और सरकार सात दिनों में इनके बारे में समीक्षा करे। कश्मीर पांच महीनों से बिना इंटरनेट जी रहा है, पूरे कश्मीर में लोकतांत्रिक अधिकार निलंबित हैं, तमाम नेता नजरबंदी में हैं, मीडिया पर एक अघोषित शिकंजा है क्योंकि बिना इंटरनेट आज अखबार निकलना मुमकिन नहीं है। बिना इंटरनेट और बिना वॉट्सऐप आज दुनिया के कारोबार ठप्प से रहते हैं, लोग टैक्स जमा नहीं कर पाते, किसी इम्तिहान या नौकरी के फॉर्म नहीं भर पाते, और कश्मीर ऐसे ही जी रहा है। सुप्रीम कोर्ट कई महीनों से कश्मीर पर सुनवाई से बचते चले आ रहा था, और अब जाकर उसने लोकतंत्र के एक किस्म के निलंबन के पांच महीने पूरे होने पर यह सुनवाई की है, तो एक किस्म से गेंद  सरकार के पाले में फेंक दी है कि सरकार ही अपने लगाए प्रतिबंधों की समीक्षा करे। सुप्रीम कोर्ट का यह एक बड़ा अजीब रवैय्या है जो कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि पर फैसले के वक्त से सामने आया है। उस फैसले में अदालत ने बाबरी मस्जिद को गिराने को गलत कहा था, लेकिन जमीन का मालिकाना हक मंदिर बनाने के लिए दे दिया था। पिछले महीने जब जामिया में सरकारी हिंसा के खिलाफ कुछ प्रमुख-जागरूक वकील सुप्रीम कोर्ट के सामने खड़े हुए, तो मुख्य न्यायाधीश ने एक बहुत अजीब सा रूख दिखाया था कि पहले हिंसा रूके तभी अदालत कोई सुनवाई करेगी, और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले को हाईकोर्ट ले जाने कहा। अभी कल ही पुलिस हिंसा के खिलाफ, नागरिकता-संशोधन कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत अमूर्त सी टिप्पणी की कि जब तक राष्ट्रव्यापी हिंसा रूक नहीं जाती, और जब तक चारों तरफ शांति नहीं हो जाती, तब तक अदालत सुनवाई नहीं करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि देश कठिन दौर से गुजर रहा है, और राष्ट्र मेें शांति स्थापित करने के प्रयास किए जाने चाहिए। 

अब सवाल यह उठता है कि जो लोग कानून के राज पर भरोसा करते हुए सरकारी हिंसा, या नकाबपोश गुंडागर्दी के खिलाफ अदालत जाते हैं, उन्हें अगर अदालत से यह मसीहाई नसीहत मिलती है कि पहले देश में शांति स्थापित हो जाए, पहले हिंसा रूक जाए, उसके बाद अदालत सुनवाई करेगी, तो इस आदेश का, इस जुबानी निर्देश का मतलब आखिर क्या निकलता है? लोग अदालत से बड़े स्पष्ट आदेश की उम्मीद में वहां जाते हैं, और खासकर वे लोग जाते हैं जो कि सरकारी हिंसा या अराजक हिंसा का मुकाबला करने की न ताकत रखते हैं, न नीयत रखते हैं। ऐसे में उनको देश की इस सबसे बड़ी अदालत से कैसा इंसाफ मिल रहा है? अदालत का यह रूख सरकार के रूख की एक प्रतिध्वनि सरीखा लगता है, जिसे थोड़े से आलोचनात्मक और कड़े शब्दों में गढ़कर जुबानी कहा गया है, और जिसे कोई कानूनी चुनौती भी नहीं दी जा सकती क्योंकि यह लिखित आदेश न होकर जुबानी नसीहत रहती है। यह रूख उन लोगों को तो अच्छा लग सकता है जो लाठी और रॉड लेकर वर्दी में या बिना वर्दी के, नकाब लगाकर या बिना नकाब के हिंसा कर रहे हैं, क्योंकि उनकी हिंसा रोकने के बारे में देश की सर्वोच्च अदालत कुछ नहीं कह रही, यह अदालत इतना भी नहीं कह रही कि अंतहीन वीडियो और तस्वीरों को देखकर उस पर दिल्ली की पुलिस एक रिपोर्ट दे कि उसने हिंसा के जिम्मेदारों की शिनाख्त कहां तक की है। यह अदालत सरकार से भी इस हिंसा पर कोई जवाब नहीं मांग रही, और अपनी सोच का इतना अतिसरलीकरण करके उसे अदालती रूख की तरह पेश कर रही है जिस पर कोई अमल नहीं हो सकती, जिसका कोई मायने नहीं निकाला जा सकता। 

जब इस देश के मीडिया के बहुत बड़े जिम्मेदार तबके को देश में जगह-जगह होती हिंसा के पीछे सरकार की, या सत्ता-सुरक्षा में हिंसा दिख रही है, जब बहुत से वीडियो ऐसा सुझा रहे हैं, तब भी सुप्रीम कोर्ट का ऐसा मसीहाई सलाहकार नजरिया तकलीफ देता है, निराश करता है। और यह बात अभी कुछ देर पहले कश्मीर को लेकर आए एक आदेश में भी साफ-साफ दिख रही है कि देश की सर्वोच्च अदालत केन्द्र सरकार से न जवाबतलब कर रही है, न उसकी जिम्मेदारी तय कर रही है, और न ही उसे किसी बात से रोक रही है। अदालत जाने वाले याचिकाकर्ताओं, और जिस सरकार के खिलाफ वे गए हैं, उन दोनों के बीच सर्वोच्च न्यायालय कोई भी फर्क करने से इंकार कर रहा है, और ऐसा लगता है कि देश में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए वह सरकार और छात्रों को, जनता को एक बराबरी से जिम्मेदार ठहरा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि कानून व्यवस्था को बनाए रखना, मानवाधिकार को कायम रखना, और कानून का पालन करना यह सत्ता की पहली जिम्मेदारी है, क्योंकि जनता के पास तो कोई सरकारी ताकत होती नहीं है जिससे वह हिंसा को रोक सके। और खासकर जब हिंसा सरकारी वर्दी करती है, तो जनता उसका हिंसक जवाब देने के बजाय अगर सुप्रीम कोर्ट जा रही है, तो वहां से उसे कोई हिफाजत मिलने के बजाय ऐसी नसीहत मिल रही है। 

दुनिया में किसी भी विकसित और सभ्य लोकतंत्र का इतिहास वहां की न्यायपालिका के इंसाफ और उसके रूख के इतिहास के बिना पूरा नहीं होता है। भारत का इस सदी का यह इतिहास अदालत के एक बार-बार के निराशाजनक रूख को दर्ज कर रहा है, और हकीकत यह है कि उससे देश के कानूनपसंद लोगों को बहुत से मामलों में कोई भी इंसाफ नहीं मिल रहा है। हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट जिस तरह दिल्ली में होने वाली जरा-जरा सी दिक्कत को लेकर पुलिस और बाकी अफसरों को, केन्द्र और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा करती है, उसकी सेहत पर इस बात से कोई फर्क पड़ते नहीं दिख रहा कि उसके जजों की हिफाजत करने वाली पुलिस उसकी नाकतले कितनी हिंसा कर रही है। उसकी सेहत पर इससे भी फर्क पड़ते नहीं दिख रहा कि आज वह सैद्धांतिक रूप से जिस इंटरनेट को एक बुनियादी हक मान रही है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्र का हिस्सा गिन रही है, उस इंटरनेट के पांच महीने से बंद होने को लेकर वह केन्द्र सरकार को ही समीक्षा करने को कह रही है। यह बात तो देश का विपक्ष संसद से लेकर सड़क तक केन्द्र सरकार के सामने इन डेढ़ सौ दिनों में डेढ़ सौ बार उठा चुका है, अब सुप्रीम कोर्ट सरकार को समीक्षा के लिए और सात दिन देकर कौन सा इंसाफ कर रहा है? जब इन पांच महीनों में सुप्रीम कोर्ट को बिना किसी याचिका के भी देश के हालात के बहुत से मामलों में खुद होकर दखल देनी थी, उसने वह तो किया नहीं, और आज वह सूक्तियों की जुबान में बात कर रहा है, जिस पर सरकार से लेकर गुंडों तक राहत की लहर दौड़ गई होगी। 
-सुनील कुमार


Date : 09-Jan-2020

देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार के मुजरिमों को फांसी की तारीख तय हुई तो मीडिया ने उस खबर को इस तरह लिया कि इन फांसियों के बाद अब देश में बहन-बेटियों पर से खतरा खत्म ही हो जाएगा। देश का एक तबका यह मानता है कि बच्चियों से बलात्कार या सामूहिक बलात्कार पर फांसी की सजा से बलात्कार घटने लगेंगे। लोग कड़ी सजा को बड़ी बाधा मान लेते हैं। ऐसा सरलीकरण कोई अटपटी बात नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग न्यायसंगत और तर्कसंगत तरीके से सोचने के बजाय नारों से निष्कर्ष निकालने में भरोसा रखते हैं। सरकार की कार्रवाई, अदालती फैसले, या मीडिया की सुर्खियां अगर नाटकीय हों, तो लोग उसी से प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन कोई देश बलात्कार जैसे भयानक हिंसक और गंभीर जुर्म को घटाना चाहता है, तो इनमें से कोई भी बात काम नहीं आने वाली है। 

हम इस मुद्दे पर न तो पहली बार लिख रहे हैं, और न आखिरी बार। आज जब पूरे देश में बड़ी संख्या में लोगों को बलात्कार का हौसला जुटने लगा है, तब आए दिन हमें इसके बारे में लिखना पड़ता है, और हर बार हम घूम-फिरकर उन्हीं बुनियादी बातों पर लिखते हैं कि कोई कड़ा और बड़ा कानून इसे नहीं रोक सकता, अगर समाज में लोगों की सोच को बदला नहीं गया। आज समाज की पूरी की पूरी भाषा इस बुरी तरह पुरूषवादी है, और महिलाओं के खिलाफ है, कि महिलाओं को किसी तरह के सम्मान का हकदार माना ही नहीं जाता। यह बात सुनने में छोटी लग सकती है, और लोगों को महत्वहीन लग सकती है कि न सिर्फ हिन्दी, बल्कि अंग्रेजी और उर्दू में भी महिला की जगह इतनी हिकारत की है कि कोई जंगली-जानवर सिर्फ नरभक्षी, आदमखोर, और मैनईटर हो सकते हैं, वे मानो नारी, औरत, और वूमैन को खाते भी नहीं। इसी तरह घर के बच्चों को शुरू से ही अपनी मां के साथ परिवार के बाकी पुरूषों के हिकारत के बर्ताव देखने की आदत हो जाती है, और जब वे इतने बड़े हो जाते हैं कि वे खुद भी बुरा बर्ताव कर सकें, तो वे भी अपने बाप-चाचा की तरह बहन-बीवी से बदसलूकी को ही सामान्य बर्ताव मानते हैं। 

इस लैंगिक असमानता के अलावा बलात्कार के लिए जिम्मेदार कुछ और पैमानों पर भी गौर करने की जरूरत है। जहां-जहां बलात्कारी और बलात्कार की शिकार लड़की या महिला की जाति पर गौर करने लायक नौबत है, तो यह समझना चाहिए कि अधिकतर मामलों में बलात्कारी ऊंची समझी जाने वाली जाति के होते हैं, और उसकी शिकार उससे नीची समझी जाने वाली जाति की। संपन्नता की बात करें तो बलात्कारी की संपन्नता उसके शिकार से अधिक होती है। अगर परिवार के भीतर होने वाले बलात्कारों की बात करें तो बलात्कारी की उम्र अधिक होती है, वह अधिक बलशाली होता है, और वह रिश्ते में ऊंचा होता है। कामकाज की जगह पर बलात्कार की बात करें तो शायद ही कहीं ऐसा होता हो कि छोटे ओहदे पर बैठा हुआ आदमी बड़े ओहदे पर बैठी हुई लड़की या महिला से बलात्कार करे। मतलब यह कि बड़ा ओहदा ही छोटे ओहदे से बलात्कार करता है। हिन्दुस्तान में महिलाओं से गैरबराबरी और बेइंसाफी के इस पूरे सिलसिले को इन तमाम पैमानों पर परखकर जब तक समाज के ढांचे में महिलाओं को बराबरी का हक, जाति व्यवस्था को तोडऩा, आर्थिक रूप से कमजोर को भी हक दिलवाना, और परिवार के भीतर बच्चों को जब तक अच्छे और बुरे स्पर्श के फर्क को समझाना नहीं हो पाएगा, एक फांसी तो क्या, दो-दो बार फांसी देने की सजा होने पर भी कोई फर्क नहीं होगा। 

आखिर में बलात्कार के एक और पहलू को समझने की जरूरत है कि जब तक पुलिस को संवेदनशील नहीं बनाया जाएगा, शिकायत के बाद मेडिकल जांच करने वाले डॉक्टरों, और अदालत के कर्मचारियों, जजों को संवेदनशील नहीं बनाया जाएगा, बलात्कार की शिकायत करने वाली लड़की-महिला से फैसला होने तक के बरसों में लगातार कहीं जुबान से, तो कहीं नजरों से, तो कहीं हिकारत से बलात्कार दुहराया जाता रहेगा। हिन्दुस्तानी समाज में बलात्कार को एक जुर्म की तरह खत्म नहीं किया जा सकता, महिला के साथ, जाति के साथ, गरीबी के साथ, अशिक्षा के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म किए बिना बलात्कार खत्म होने वाले नहीं हैं। फिलहाल इस देश को इन तमाम असल पहलुओं को छोड़कर निर्भया के बलात्कारियों को होने जा रही फांसी पर खुशी मनाने की पूरी छूट है, और मीडिया के साथ मिलकर देश की जनता इन फांसियों के बाद बाकी बहन-बेटियों की हिफाजत की खुशफहमी भी पाल सकती है, जिससे उनकी हिफाजत कमजोर होने के अलावा और कुछ नहीं होगा।
-सुनील कुमार


Date : 08-Jan-2020

बीती रात से अभी तक छत्तीसगढ़ में जगह-जगह सड़क दुर्घटनाओं में इतनी मौतें हुई हैं, और इतने दर्जन लोग जख्मी हुए हैं कि उन पर शोक-संवेदना जाहिर करने के बजाय सरकार को कमर कसकर बैठना चाहिए कि सड़कों पर मौतों को कैसे कम किया जाए। ये मौतें ओवरलोड मुसाफिर गाडिय़ों की भी हैं, नशे में चलाई जा रही गाडिय़ों से भी है, बिना हेल्मेट चलाए जाते दुपहियों की भी हैं, और अंधाधुंध रफ्तार से चलती गाडिय़ों की तो हैं ही। होता यह है कि सड़क हादसों में मरने वालों के बारे में पुलिस से लेकर मीडिया तक के लोग यह कहने से बचते हैं कि उनमें से कौन नशे मेें थे, यह भी नहीं लिखा जाता कि हादसों की जिम्मेदारी किन पर थी। हर कोई यह सोचते हैं कि जिन घरों तक लाशें पहुंची हैं, उन घरों तक यह खबर क्यों जाए कि वे लोग नशे में थे। नतीजा यह होता है कि ऐसे हादसा-मौतों का कोई विश्लेषण हो नहीं पाता। 

हिंदुस्तान दुनिया में सबसे अधिक सड़क-मौतों वाला देश है। इसकी कई किस्म की दिक्कतें हैं। पहली तो यह है कि इसे रोकने की जिम्मेदारी जिन दो विभागों पर है, आरटीओ और ट्रैफिक पुलिस को कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक सरीखा भ्रष्ट माना जाता है, और पाया जाता है। साफगोई से बोलने वाले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सरकारी कार्यक्रमों के मंच से आरटीओ के भ्रष्टाचार के बारे में खुलकर बोलते हैं। सड़क-हादसों की शुरूआत बिना गाड़ी चलाना सीखे ड्राइविंग लाइसेंस पा जाने वालों से होती है, या बिना लाइसेंस चलाने वालों से होती है। इसके बाद सड़कों पर बेकाबू रफ्तार, नशे में गाड़ी चलाना, ओवरलोड गाड़ी चलाना, नींद आते हुए गाड़ी चलाना जैसी बहुत सी नौबतें रहती हैं जिन्हें अगर ट्रैफिक पुलिस ईमानदार हो, तो रोका जा सकता है, या कम किया जा सकता है। लेकिन यह सामान्य ज्ञान की किताब में लिखी हुई किसी निर्विवाद जानकारी जैसी बात है कि आरटीओ और ट्रैफिक पुलिस की कुर्सियां ठेकों पर जाती हैं, और वहां उगाही का टारगेट दिया जाता है। इन विभागों का भ्रष्टाचार सीधे-सीधे मौतों को बढ़ा देता है, या उनको कम नहीं करने देता, इस मायने में यह भ्रष्टाचार जानलेवा है, और किसी भी सरकार को, सत्तारूढ़ लोगों को सड़कों पर जिंदगियां बेचकर ऐसी कमाई-उगाही के बारे में दुबारा सोचना चाहिए।

हिंदुस्तान में पिछले बरसों में दुपहिया-चौपहिया, सभी किस्म की गाडिय़ां दुनिया के बाकी विकसित देशों की रफ्तार वाली तो आ गई हैं, लेकिन यहां कि सड़कों का हाल खराब है, सड़कों पर चलने वाले लोगों में नियम-कायदे का सम्मान है ही नहीं। नतीजा यह होता है कि मरने वाले आधे लोग तो अपनी गलती से और अपने गलत काम से मरते हैं, और बाकी आधे लोग दूसरों की गलती या गलत काम से। हर प्रदेश को हर कुछ महीनों में हर सड़क हादसे की मौतों का विश्लेषण करना चाहिए कि किन बातों को काबू करने से मौतें कम हो सकती हैं। सड़क-मौतें लोगों को सस्ती लगती हैं क्योंकि सरकार पर सीधे-सीधे तोहमत नहीं लगती, और ड्राइवरों को कुसूरवार मान लिया जाता है। लेकिन रोकने लायक मौतें होने के लिए सरकार ही जिम्मेदार रहती है, और खासकर भ्रष्ट विभागों की शिनाख्त होते हुए भी उन पर काबू न पाने वाली सरकार तो ऐसी हर मौत के लिए जिम्मेदार रहती है। हर प्रदेश की सरकार अपने लोगों की जिंदगी बचाने के लिए ईमानदार कोशिश करे तो ऐसी मौतें आधी या चौथाई भी हो सकती हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 07-Jan-2020

देश के अलग-अलग तमाम बड़े अखबारों की सुर्खियां देखें, तो दिखता है कि जेएनयू में की गई हिंसा के खिलाफ देश भर के विश्वविद्यालयों में आवाजें उठी हैं, और प्रदर्शन हो रहे हैं। छात्र-छात्राओं और विश्वविद्यालयों से परे भी लोग सड़कों पर निकले, और जगह-जगह अलग-अलग कई तबकों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया, विश्वविद्यालयों में, या उन पर, हिंसा का विरोध किया। मुम्बई में ऐसे ही एक प्रदर्शन में एक युवती फ्री-कश्मीर लिखा हुआ एक पोस्टर लिए नजर आई, जिसके इस नारे को लेकर मीडिया में यह बहस छिड़ी हुई है कि क्या यह कश्मीर की भारत से आजादी का नारा है? पोस्टर थामी हुई मुम्बई की इस लेखिका ने साफ किया है कि उनके पोस्टर का मतलब कश्मीर में इंटरनेट जैसे बुनियादी हकों की आजादी से था, भारत से आजादी का नहीं। लेकिन जैसा कि बहुत से नारों के साथ होता है, इस नारे का भी एक गलत मतलब निकलने का खतरा तो इसके लिखते ही था। और खासकर तब जबकि एक नियमित लेखिका इसे लिख रही है। शायद इसकी जगह फ्रीडम इन कश्मीर जैसा कोई नारा लोगों को गलतफहमी से बचाता लेकिन आज जब जेएनयू के नाम का इस्तेमाल वहां से पढ़कर निकले हुए और आज देश के विदेश मंत्री जयशंकर भी टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसा नारा लगाने के लिए कर रहे हैं, तो किसी भी आंदोलन में लोगों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है। जयशंकर ने एक कार्यक्रम में कल कहा कि उनके वक्त जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग नहीं था। यह अलग बात है कि जेएनयू के छात्र आंदोलन का एक वीडियो अदालत में जाकर गढ़ा हुआ करार दिया जा चुका है जिसमें हिन्दुस्तान के टुकड़े होने की बात दिखाई गई थी। अदालत ने माना था कि यह वीडियो झूठे नारे जोड़कर बनाया गया था। 

न सिर्फ आज के हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया में कहीं भी किसी भी आंदोलन को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि जरा सी लापरवाही भी आंदोलन के मुख्य मकसद को पटरी से उतार सकती है। लोगों को याद होगा कि इसी जगह अभी कुछ दिन पहले ही हमने एक आंदोलन में इस्लाम के कुछ धार्मिक नारों को लगाने के बारे में लिखा था कि जब देश के सभी धर्मों के लोग इस आंदोलन से जुड़ रहे हैं, नागरिकता कानून में संशोधन का विरोध कर रहे हैं, तो वैसे आंदोलन को और व्यापक बनाने की जरूरत है, उसे ऐसा तंग नहीं बनाया जाना चाहिए कि गैरमुस्लिम या गैरधार्मिक लोग उससे जुडऩे में असुविधा महसूस करें, या परहेज करें। जब कभी समाज के व्यापक तबकों को लेकर कोई आंदोलन चलना चाहिए, या वह चलना चाहता है, तो फिर लोगों को उसे एक सीमित मकसद तक सीमित रखना चाहिए, जो कि कल के प्रदर्शन में जेएनयू या दूसरे विश्वविद्यालयों पर सरकार या गुंडों द्वारा की गई हिंसा के विरोध तक सीमित रहना चाहिए था। अगर किसी भी विश्वविद्यालय के छात्रों के उठाए गए सारे मुद्दों को लेकर अगर कोई प्रदर्शन किया जाएगा, तो उनमें से कई मुद्दों पर असहमत लोग उससे अलग होने लगेंगे। किसी प्रदर्शन या आंदोलन के आयोजकों, या उसमें शामिल लोगों को यह सावधानी बरतनी चाहिए कि वे अधिक से अधिक लोगों को अपने मुद्दे पर जोड़ें, न कि उससे अलग करें। अब जैसे जेएनयू में हिंसा पर अगर महाराष्ट्र की शिवसेना की बात करें, तो मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने बहुत कड़े शब्दों में इसकी निंदा की है, और जेएनयू पर हमले को मुम्बई पर हुए आतंकी हमलों सरीखा बताया है। इस बात ने खुद महाराष्ट्र में लोगों को हक्का-बक्का कर दिया है कि उद्धव ठाकरे ऐसी तुलना कर सकते हैं। लेकिन लोगों को यह भी याद रहना चाहिए कि कुछ हफ्ते पहले जब दिल्ली में जामिया-मिलिया यूनिवर्सिटी पर पुलिस की हिंसा हुई थी, तो उद्धव ठाकरे ने ही उसकी तुलना जलियांवाला बाग से की थी, जो कि एक ऐतिहासिक तुलना थी, और इस बार फिर जेएनयू के मामले में उन्होंने वैसा ही कड़ा वैचारिक रूख दिखाया है। लेकिन अगर इस आंदोलन के किसी पोस्टर से देश के लोगों में ऐसा संदेश जाएगा कि यह आंदोलन कश्मीर को भारत से अलग करने का हिमायती है, तो उससे कश्मीर का भला कुछ भी नहीं होगा, देश के छात्र आंदोलन का नुकसान बहुत बड़ा हो जाएगा। आंदोलन के एजेंडा को बहुत हल्का नहीं होने देना चाहिए, और आज हिन्दुस्तान में सड़कों पर उतरे लोगों को इसका ध्यान रखना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 06-Jan-2020

बीती शाम दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हॉस्टलों और वहां के शिक्षकों पर जिस तरह का हिंसक हमला हुआ है, उससे दिल्ली में हिफाजत की जिम्मेदार पुलिस के चेहरे पर शिकन पड़ी हो या न पड़ी हो, हिन्दुस्तान में बाकी जगहों पर बहुत से तबकों को बहुत बड़ी फिक्र हुई है, और हिन्दुस्तान में उच्च शिक्षा के एक उत्कृष्ट केन्द्र जेएनयू को दुनिया में जो-जो जानते हैं, वे भी फिक्रमंद हुए होंगे। कम से कम दुनिया के अच्छे विश्वविद्यालयों में, समाजशास्त्रियों, इतिहासकारों, और राजनीतिशास्त्रियों के बीच तो यह हमला अनदेखा नहीं रहा होगा। 

कल के हमले, और उसके बाद पुलिस की बड़ी मौजूदगी के बीच पुलिस की सहमति से लाठी-रॉड लिए हुए दर्जनों हमलावर अपने नकाब सहित, या बिना नकाब के भी जिस तरह विजेता की मुद्रा में जेएनयू से रवाना हुए हैं वह दिल्ली में पुलिस की नीयत, और देश की नियति के लिए बड़ी फिक्र खड़ी करने वाली बात है। इन दिनों अधिकतर मोबाइल फोन जिस तरह तस्वीरें और वीडियो तैयार कर पाते हैं, तो वैसे में कहीं वकीलों को, तो कहीं छात्रों को पीटने वाली पुलिस अपनी भारी मौजूदगी के बाद भी जिस तरह इस हमलावर फौज की वापिसी की हिफाजत कर रही थी, वह बहुत से सवाल खड़े करती है। देश के कुछ प्रमुख वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को ई-मेल करके खुद ही इस नौबत पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगने को कहा है। और बात सच भी है कि हिंसक और हथियारबंद हमलावर जब पुलिस के सामने से निकलकर नारे लगाते हुए जाते हैं, और पुलिस वहां एक किस्म से उनकी बिदाई का इंतजाम करते दिखती है, तो केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली-पुलिस से सप्रीम कोर्ट के अलावा और कौन जवाब मांग सकते हैं? 

देश के मीडिया के एक बड़े हिस्से ने जेएनयू पर हमले को एक हमले की तरह देखा है, और दिल्ली से दूर मुम्बई में एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने गिने-चुने शब्दों में एक सुर्खी बनाकर पूरे नजारे का सच लिखा है- यस्टरडे एएनयू, टुडे जेएनयू, टुमारो यू। देश के बहुत से राजनीतिक दल, गैरराजनीतिक संगठन, और देश के बहुत से विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच कल शाम के इस हमले को इसी तरह देखा जाएगा, देखा जा रहा है। दिल्ली से दूर छत्तीसगढ़ की राजधानी में कल रात ही छात्रों और नौजवानों ने शहर के बीच चौराहे पर इस हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन किया है। अब सवाल यह है कि झूठे और गढ़े हुए वीडियो की मदद से जेएनयू के छात्रनेताओं को देश का गद्दार, टुकड़े-टुकड़े गैंग, अरबन नक्सल जैसे कई तमगे देने की साजिश अदालत में फोरेंसिक जांच से साबित हो चुकी है। इसके बाद भी जब देश के बड़े-बड़े नेता अपने भाषणों में जेएनयू का जिक्र इन्हीं नामों के साथ करते हैं, जब वे एएमयू, जामिया, या जेएनयू को देशद्रोही साबित करने के भाषण देते हैं, जब देश के समाचार-टीवी चैनलों का एक बड़ा हिस्सा बेकसूर और बेगुनाह छात्र-छात्राओं को गद्दार कहते हुए थकते नहीं हैं, तो यह जाहिर है कि देश में एक ऐसा माहौल खड़ा किया जा रहा है जिसमें जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों पर हिंसा लोगों को जायज लगने लगे। यह इस देश में एक नवसामान्य नौबत बनाई जा रही है कि केन्द्र सरकार से असहमति रखने वाले लोग देश से असहमति रख रहे हैं, राष्ट्रीय हितों से असहमति रख रहे हैं। ऐसी तस्वीर बनाकर हिंसा को जायज ठहराने की यह कोशिश शायद बहुत लंबे न चल सके, अगर इस देश की न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारी समझ सकेगी। पिछले महीने जब दिल्ली में ही जामिया में हिंसा हुई, और वरिष्ठ-जिम्मेदार वकील सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश के पास सुनवाई के लिए पहुंचे, तो मुख्य न्यायाधीश का रूख यह था कि पहले हिंसा रूके, फिर वे मामले की सुनवाई करेंगे। जबकि जामिया की हिंसा में दिल्ली पुलिस खुलकर छात्राओं को भी लाठियों से पीटते दिख्र रही थी, और उसके अनगिनत वीडियो सुप्रीम कोर्ट के सामने एक दिन पहले से टीवी की खबरों, सोशल मीडिया, और अखबारों में आ चुके थे। जब अदालत का रूख ऐसी हिंसा, ऐसी सरकारी हिंसा के खिलाफ सुनवाई करने के बजाय पहले हिंसा को रोकने की शर्त वाला हो, तो वह अदालती रूख बहुत निराश करने वाला था, और आज भी अदालत से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। देश की सबसे बड़ी अदालत कहे गए शब्दों के बीच के न कहे शब्दों को साफ-साफ सुनकर भी अनसुना कर रही है, सोशल मीडिया पर लिखे गए हिंसक शब्दों के जुर्म को समझने से भी इंकार कर रही है, जब वह इसी दिल्ली में बैठकर पुलिस की हिंसा, पुलिस की हिफाजत में हिंसा, पुलिस की अनुमति-सहमति से दिखती हिंसा पर भी चुप्पी साधे हुए हैं, तो इस देश का इतिहास इस अदालती चुप्पी को भी दर्ज करेगा, और देश के अनगिनत लोगों की चुप्पी को भी दर्ज करेगा, जो जेएनयू से पढ़कर तो निकले हैं, लेकिन  आज वे मुंह बंद कर घर पर महफूज बैठे हैं। घूम-फिरकर आज अगर इस देश की अदालत अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाती है, तो जनता तो हर रोज अपनी मर्जी से वोट डालती नहीं है, उसे पांच बरस में एक बार ही मौका मिलता है। बाकी देश को याद रखना चाहिए कि कल एएनयू था, आज जेएनयू है, और कल उनकी बारी रहेगी।
-सुनील कुमार


Date : 05-Jan-2020

राजस्थान के एक जिला मुख्यालय कोटा में सरकारी अस्पताल में पिछले महीने भर में सौ बच्चों की मौत को लेकर देश भर में राज्य की कांग्रेस सरकार की जमकर आलोचना हो रही है। आलोचना की वजह मौतों के आंकड़े इतने अधिक होना भी है, और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की यह पहली प्रतिक्रिया भी है कि मौतें पिछले बरसों के मुकाबले कम हुई हैं। इस बात को लोगों ने बहुत अमानवीय माना है, और मुख्यमंत्री को संवेदनाशून्य कहा है। देश के सामने एक जिला मुख्यालय के सरकारी अस्पताल में बच्चों की इतनी अधिक मौतों के लिए बराबरी ढूंढने की पिछले बरस की एक ताजा मिसाल गोरखपुर की है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अपना गोरखपुर ऑक्सीजन की कमी से, और दूसरी वजहों से इसी किस्म की मौतें देख चुका है, यह एक अलग बात है कि वहां पर काम कर रहे एक समर्पित डॉक्टर, डॉ. काफिल को लापरवाही के जुर्म में गिरफ्तार भी किया गया था, लेकिन बाद में वे बेकसूर साबित होकर छूटे। उस वक्त उत्तरप्रदेश की जमकर खिंचाई हुई थी, क्योंकि सरकार चलाने के मामले में योगी ने कुछ दिन पहले ही बयान दिया था कि केरल को राज्य चलाना सीखने के लिए उत्तरप्रदेश को देखना चाहिए। दोनों ही मामलों में एक जैसी बात यह दिखती है कि मुख्यमंत्री के बयान जब इंसानियत कही जाने वाली बातों से परे रहते हैं, और सरकार की परले दर्जे की नालायकी को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं, तो जनता भडक़ती है, और देश भर से लोगों की नाराजगी सामने आती है, चाहे योगी ऐसा करें, चाहे गहलोत ऐसा करें। 
राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने मुख्यमंत्री गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच मुकाबला चलते रहता है, और अब कोटा में मौतों का आंकड़ा सौ के पार निकल जाने के बाद अस्पताल जाकर अब वहां जिंदा बचे बच्चों के परिवारों से बात करके पायलट ने कहा है-मेरे पास पीड़ा बताने के लिए शब्द नहीं है, जिनसे में मिला वो बहुत गरीब हैं। हमें जिम्मेदारी तय करनी पड़ेगी। जिस मां की कोख उजड़ती है उसका दर्द वो ही जानती है। ये कहना नाकाफी है कि पहले कितने मरे थे, अब क्या है। जिम्मेदारी तय करनी पड़ेगी। हम अब सरकार में हैं।
इस देश को सरकार की जिम्मेदारी तो तय करनी ही चाहिए, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को सत्ता पर बैठे लोगों को यह भी याद दिलाना चाहिए कि उन्होंने इंसान समझकर वोट दिया था, और लोग मंत्री-मुख्यमंत्री बनने के बाद भी इंसान की तरह ही काम करें, बर्ताव करें। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी चीज और सूझती है कि क्या यह वही कोटा नहीं है जहां पर देश के लाखों छात्र-छात्राओं के लिए आईआईटी, आईआईएम, और मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए तैयारी के देश के सबसे महंगे कारखाने चलते हैं? जो शहर दाखिले-इम्तिहान के नाम पर देश की सबसे बड़ी कमाई करता है, और जाहिर है कि स्थानीय सरकार को भी इन लाखों संपन्न बच्चों की मौजूदगी से फायदा होता ही होगा। ऐसे में जिस शहर में लाखों रूपए सालाना खर्च करके एक तबके के बच्चे एक कामयाब जिंदगी के मौके पर एकाधिकार की तैयारी करते हैं, उसी शहर के सरकारी अस्पताल में तीन चौथाई से अधिक जीवनरक्षक मशीनें खराब पड़ी हैं! इस सामाजिक विरोधाभास के बारे में भी कुछ सोचना चाहिए? हालांकि हम वहां परीक्षाओं की महंगी तैयारी करने वाले बच्चों से यह उम्मीद नहीं करते कि वे सरकारी अस्पताल को दुरूस्त रखने का काम करें, लेकिन यह सामाजिक विसंगति एक शर्मनाक नौबत बताती है कि एक ही शहर में हिन्दुस्तानी समाज के दो तबकों के बीच मौत और सुनहरी जिंदगी का कितना बड़ा फासला है! 

यह बात दबी-छुपी नहीं है कि केन्द्र और राज्य सरकारों का एक बड़ा तबका महंगे निजी अस्पतालों के हाथ बिका हुआ सा दिखता है, और प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक की जो स्वास्थ्य बीमा योजनाएं हैं, उनका भयानक जुर्म सरीखा बेजा इस्तेमाल करते हुए देश भर में अस्पताल पकड़ाते हैं, छत्तीसगढ़ में भी पकड़ाए हैं। लोगों के बीमा कार्ड पर और इलाज कराने की रकम अगर बाकी है, तो कुछ अस्पताल पूरे गांव के गांव की नौजवान युवतियों का गर्भाशय निकालकर फेंक चुके हैं, जबर्दस्ती कई किस्म के ऑपरेशन कर चुके हैं, और हजारों बच्चों के अच्छे-भले दांतों को और सीधा करने के नाम पर उनकी वायरिंग करके करोड़ों रूपए कमा चुके हैं। यह पूरा सिलसिला देश के निजी अस्पतालों में निजी इलाज का नहीं है, यह सरकार से मान्यता प्राप्त अस्पतालों में सरकार के दिए हुए बीमा कार्ड से रकम लूटने के लिए फर्जी इलाज, फर्जी ऑपरेशन करने का सिलसिला है, जो कि देश भर में अलग-अलग तरीके से चलता है। सरकारें जनता के इलाज की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पा रही हैं, और बीमा कार्ड देकर सरकारी अस्पतालों पर से जिम्मेदारी दूर धकेल दे रही हैं। लेकिन डॉक्टर ही तो मरीज के ईमानदार इलाज की कसम खाते हैं, अस्पताल तो कारोबार रहते हैं, और उनका अकेला ईमान अधिक से अधिक कमाई करना होता है। जब सरकार बीमा कार्ड देकर ऐसे अस्पतालों को कमाई का मौका भी देती है, तो बाजार और सरकार की मिलीजुली साजिश सरकारी अस्पतालों की बदहाली को बढ़ाते चलती है, सरकारी अस्पतालों पर से मरीजों का भरोसा हट जाए इसकी पूरी कोशिश करते चलती है। राजस्थान के कोटा की बात हो, या कि उत्तरप्रदेश के गोरखपुर की, इन जगहों की मौतें खबर इसीलिए बन पा रही हैं कि वे थोक में हो गई हैं, और मीडिया को बड़ी गिनती सुहाती है। वरना देश भर में इलाज की जो बदहाली है, उसमें केन्द्र और अधिकतर राज्य सरकारों का एक ही जैसा हाल है। ऐसा सुनते हैं कि दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने देश की सबसे अधिक आवाजाही वाली आबादी होने के बावजूद वहां पर एक बहुत उम्दा सरकारी चिकित्सा सेवा कायम की है, अगर यह बात सच है, तो बाकी राज्यों को भी जाकर उससे कुछ सीखना चाहिए, वरना उनके अपने वोटर उन्हें वक्त आने पर सिखा ही देंगे।

-सुनील कुमार


Date : 04-Jan-2020

झारखंड के नए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने घोषणा की है कि वे सत्ता पर बैठे लोगों को गार्ड ऑफ ऑनर की परंपरा को खत्म करेंगे। उन्होंने अभी-अभी मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें दिए गए गार्ड ऑफ ऑनर के मौके पर यह बात कही। वे एक मंदिर में गए थे, और वहां पुलिस काफी देर से उन्हें सलामी देने के लिए खड़ी कर दी गई थी। उन्होंने मंदिर से निकलते ही चप्पल पहनीं, और वैसे ही गार्ड ऑफ ऑनर लिया। उन्होंने कहा कि जूते-चप्पल का रिवाज अंग्रेजों द्वारा बनाया गया एक पाखंडी रिवाज था जिसे वे नहीं मानते। उन्होंने कहा कि पुलिस को वीआईपी-रूढि़वादिता में समय बर्बाद करने की जगह जनता की सेवा में लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों द्वारा मुख्यमंत्री के दौरे पर दी जाने वाली ऐसी सलामी को वे जल्द से जल्द खत्म करेंगे। 

आदिवासी बिरादरी से आए हुए हेमंत सोरेन की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने सामंती परंपरा तोडऩे का साहस किया है जिस पर जनता का मेहनत का पैसा बर्बाद होता है, और किसी बड़े सत्तारूढ़ नेता, या किसी बड़े अफसर को सलामी देने के लिए सलामी-गारद को दिन-दिन भर तैनात कर दिया जाता है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार ऐसे सामंती रिवाजों के खिलाफ लिखते हैं। छत्तीसगढ़ में राजभवन में सभागृह बना, तो राष्ट्रपति भवन के अंदाज में उसका एक सामंती नाम दरबार हॉल रख दिया गया। जनता के पैसों से जो राजभवन बना है, जिस राज्य में 40 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, वहां पर दरबार हॉल, दरबार, महलनुमा सरकारी-म्युनिसिपल दफ्तर, राज्यपाल के कार्यक्रमों के लिए बस भरकर पहले से पहुंचने वाला पुलिस बैंड, यह सब परले दर्जे का दिखावा है, जिसे जल्द से जल्द खत्म करना चाहिए। राज्यपाल के हर कार्यक्रम के पहले और बाद पुलिस बैंड राष्ट्रगान बजाता है, और वहां मौजूद लोग खड़े रहते हैं। अब सवाल यह उठता है कि एक राज्यपाल के लिए पूरे वक्त का ऐसा समर्पित पुलिस बैंड क्यों होना चाहिए, जिस पर गरीब जनता के लाखों रूपए महीने तनख्वाह और बाकी खर्च पर डुबाए जाते हों? एक-एक पुलिस कर्मचारी का सरकार पर बोझ 25-50 हजार रूपए महीने का होता है, और ऐसे आधा-एक दर्जन कर्मचारी बैंड बजाते गवर्नर के साथ क्यों घूमें? कायदे की बात तो यह है कि जिस तरह प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति बनने के बाद अपने लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल खत्म करवाया था, और जिसे देखकर बाद में कई, या सभी, राज्यपालों ने भी अपने लिए वैसा ही किया था, उस तरह का काम देश के सभी मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को करना चाहिए, सलामी-गारद खत्म होनी चाहिए, और पुलिस बैंड का ऐसा राजकीय इस्तेमाल भी खत्म होना चाहिए। किसी भी सभागृह में कोई भी एक व्यक्ति माईक पर राष्ट्रगान गा सकते हैं जिसे बाकी लोग दुहराएं, राष्ट्रगान के लिए भी अगर लाखों रूपए महीने का खर्च किया जाता है, तो यह गर्व की नहीं, शर्म की बात है। 

इसी तरह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कल जंगल-अफसरों की एक बैठक में कहा है कि अफसरों को जनसेवक की तरह काम करना चाहिए। राज्य सरकार को चाहिए कि वे जिलों में सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक, कलेक्टर के पदनाम को बदलकर जिला जनसेवक करे। आज कलेक्टर, जिलाधीश, जिलाधिकारी जैसे नामों से ऐसा लगता है कि वे जनता से लगान कलेक्ट करने का ही काम करते हैं, जबकि उनका जिम्मा टैक्स वसूली से अधिक जनकल्याण पर खर्च का हो चुका है, लेकिन अंग्रेजों के वक्त का दिया हुआ कलेक्टर पदनाम अब तक जारी है, जिसे अलग-अलग प्रदेशों में जिलाधीश जैसे नाम से भी बुलाते हैं जो कि किसी मठाधीश जैसा लगता है। सामंती शब्दावली महज कागज पर नहीं रहती, वह सत्ता की कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों की मानसिकता पर भी हावी हो जाती है, आज देश में जिला कलेक्टरों की बड़ी जिम्मेदारी जनसेवा की हो गई है, जनकल्याण और विकास की हो गई है। इसलिए कलेक्टर और जिलाधीश जैसे शब्द खत्म करने चाहिए। इसके साथ-साथ सरकार को अपनी भाषा से वीआईपी शब्द भी खत्म करना चाहिए जो कि मोटेतौर पर सत्तारूढ़ बड़े लोगों के अहंकार के हिंसक और अश्लील प्रदर्शन का ही शब्द हो गया है। भाषा की राजनीति और भाषा का समाजशास्त्र बदलने का काम आमतौर पर सत्ता पर काबिज लोग नहीं कर पाते क्योंकि वे उसका मजा लेने के आदी हो जाते हैं। आज राष्ट्रपति भवन से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इतने किस्म की पोशाकें, इतने किस्म के रिवाज और आडंबर दिखते हैं जिन पर जनता का पैसा खर्च होता है। अंग्रेज चले गए और ऐसी महंगी गंदगी छोड़ गए हैं जिन्हें ढोने में आज के काले देसी अंग्रेजों को मजा आता है। सुप्रीम कोर्ट में जजों और वकीलों की पोशाक देखें, तो जादूगरों जैसे काले लबादे पहनना एक बंदिश है, और ऐसी बंदिश की वजह से वहां के एयरकंडिशनरों को अतिरिक्त काम करना पड़ता है ताकि लोग लबादों के भीतर भी गर्मी महसूस न करें। हिन्दुस्तानी मानसिकता को अंग्रेजों का छोड़ा गया पखाना अपने सिर पर ढोना बंद करना चाहिए। हर राज्य को चाहिए कि वह अपने भीतर के ऐसे सामंती पाखंड की शिनाख्त करे, और ऐसा सिलसिला तुरंत खत्म करे। ऐसा ही काम राष्ट्रपति से लेकर अदालतों तक को करना चाहिए। हेमंत सोरेन ने एक अच्छा इरादा जाहिर किया है, और अंग्रेजों के छोड़े रिवाजों के पखानों से आजादी पाना ही सही लोकतंत्र होगा। 
-सुनील कुमार


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