संपादकीय

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Date : 25-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के कलेक्टर संजय अलंग एक जाने-माने साहित्यकार हैं, और वे सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय रहते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के बहुत से पहलुओं का इतिहास बताते हुए कई किताबें लिखी हैं, और देश भर में साहित्य की पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं छपती भी रहती हैं। ऐसे में यह माना जाता है कि यह अधिकारी दूसरों के मुकाबले कुछ अधिक संवेदनशील होगा, और ऐसी ही एक संवेदना अभी कल ही सामने आई है। वे कुछ अरसा पहले कलेक्टर की जिम्मेदारी के तहत जेल के दौरे पर गए थे, और वहां उन्होंने एक ऐसी छोटी बच्ची को देखा जिसका पिता जेल में बंद था, और बच्ची को महिला जेल में रखा गया था, जहां बाकी महिला कैदी और जेल कर्मचारी उसका ख्याल रखते थे। उस बच्ची से बात करके जब उन्होंने जाना कि वह किसी अच्छी स्कूल में पढऩा चाहती है, तो उन्होंने बिलासपुर की बड़ी महंगी निजी स्कूलों में बात की, और एक स्कूल ने उसकी मुफ्त पढ़ाई और हॉस्टल में मुफ्त रहने की जिम्मेदारी उठाई। इसके बाद संजय अलंग अपनी कार से उस बच्ची को जेल से स्कूल लेकर गए, और उसकी नई जिंदगी शुरू हुई। कलेक्टर की पहल पर जेल में अभी रह रहे सत्रह और बच्चों को भी दूसरी स्कूलों में दाखिल करवाया जा रहा है।

ये पूरी कहानी एक सरकारी अधिकारी के जिम्मेदार काम की है, और एक बच्ची की जिंदगी में आए एक ऐसे मोड़ की है जो कि उसे कहीं भी पहुंचा सकता है। कलेक्टर ने उस बच्ची का नाम और चेहरा सार्वजनिक नहीं होने दिया है, लेकिन स्कूल का नाम उजागर हुआ है, और उस बच्ची की बेचेहरा तस्वीरें जारी हुई हैं। इस कहानी का एक हिस्सा बहुत अच्छा है और यह दूसरे जिलों के लिए, जिलों में इस तरह से मां-बाप के साथ बंद दूसरे बच्चों के लिए एक मिसाल बन सकता है, लेकिन एक दूसरी बात भी इससे जुड़ी हुई है जिसका ख्याल रखना चाहिए। 

हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया में स्कूली बच्चों के बीच एक-दूसरे को परेशान करना एक बहुत आम बात है। बच्चों के बीच सामाजिक हकीकत की समझदारी आ नहीं पाती है, और वे परिवार के दूसरे लोगों के नजरिए से प्रभावित रहते हैं। अभी चार-छह दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अपनी बेटी की एक तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है कि उसकी क्लास का एक लड़का (और उन्होंने उसका नाम भी लिख दिया है), किस तरह उनकी बेटी की तस्वीर को लेकर उसे परेशान करता है। देश की एक सबसे ताकतवर महिला की बेटी के साथ जब ऐसी परेशानी हो सकती है, तो यह जाहिर है कि एक बहुत ही वंचित तबके से आई हुई, जेल से निकलकर स्कूल पहुंची हुई बच्ची की अगर ऐसी बेचेहरा भी नुमाइश होती हो, तो स्कूल मैनेजमेंट उसे अपनी सामाजिक जवाबदेही की मिसाल की तरह पेश करने की लालच में पड़ सकता है, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा गैरजिम्मेदारी से उसे एक दिलचस्प रिपोर्ट का सामान मान सकता है, और स्कूल के दूसरे बच्चे उसे एक कैदी की बेटी की तरह मानकर उसके साथ एक ऐसा अलग किस्म का बर्ताव कर सकते हैं जो कि उस छोटी बच्ची के मानसिक विकास में बड़ी बाधा बन सकता है। अभी ही खबरों में यह छप चुका है कि इस बच्ची का पिता जेल में पांच साल की सजा काट चुका है, और पांच साल बाकी है। जब यह बच्ची पन्द्रह दिनों की थी, तभी माँ की मौत हो गई, और घर पर कोई नहीं थे तो उसे पिता के पास जेल भेज दिया गया, और तबसे महिला कैदी उसे पाल-पोसकर बड़ा कर रही हैं। ऐसी जानकारियां और उसकी अब तक की सामने आईं बेचेहरा तस्वीरें उसी बच्ची की निजता को खत्म कर रही हैं, और इस मामले में उसका भला करते हुए भी उसे ऐसे प्रचार से, भेदभाव के खतरे से बचाना बेहतर होगा। आगे ऐसे दूसरे मामलों में इन बच्चों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा गवाहों को बचाने के लिए उन्हें एक नई शिनाख्त देकर किया जाता है।
-सुनील कुमार


Date : 24-Jun-2019

भारत की सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया की एक खबर है कि उसके एक सीनियर पायलट को सस्पेंड करके उसके खिलाफ जांच शुरू की गई है क्योंकि उस पर यह आरोप है कि ऑस्ट्रेलिया के सिडनी एयरपोर्ट पर एक दुकान से सामान चुरा लिया था। पायलट का कहना है कि वे खुशी की एक खबर के बीच एक तोहफा खरीदने गए थे और भुगतान करना भूल गए, हड़बड़ी में विमान उड़ाकर भारत आ गए। उनका कहना है कि उन्हें हिंदुस्तान से फोन पर यह खबर मिली कि वे दादा बन गए हैं, और वे अपनी बहू के लिए उपहार लेने गए थे।

यह बात सही हो सकती है कि उन्होंने इरादतन चोरी न की हो और हड़बड़ी में, खुशी में वे बिना भुगतान सामान लेकर निकल गए हों। लेकिन दूसरी तरफ यह जरूरी नहीं है कि वे मोटी तनख्वाह पाने वाले सीनियर पायलट थे, और वे भला चोरी क्यों करते। पैसे वालों लोगों में भी दुकानों से चोरी की आदत पाई जाती है, और अरबपति परिवारों से  सरकारी नौकरी में आने वाले लोग भी छोटे-बड़े सभी किस्म के भ्रष्टाचार करते मिलते हैं। लेकिन यह खबर सभी लोगों के लिए एक नसीहत देने वाली है, और उसी लिए हम यहां इस पर लिख रहे हैं। गलती हो, या गलत काम, अधिकतर मामलों में दोनों को ही सजा का हकदार पाया जाता है। सजा देते हुए उसने कमी-बढ़ोत्तरी हो सकती है, लेकिन सजा तो मिलती ही है। ऐसे में लोगों को जिंदगी के हर दायरे में एक बड़ी समझदारी और सावधानी रखनी चाहिए। 

हिंदुस्तान में दलितों और आदिवासियों के सम्मान की सुरक्षा के लिए कुछ खास कानून बनाए गए हैं जिनके तहत किसी दलित आदिवासी को उनके जातिसूचक उल्लेख का इस्तेमाल अगर अपमानजनक तरीके से किया जाता है, तो वह सजा के लायक जुर्म है। कानून कड़ा है, बचाव मुश्किल है। इस कानून की बाकी बारीकियों पर भी ध्यान देना चाहिए जिसमें कहा गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को घूरकर देखना भी उनका अपमान है। जब तक देश में जो कानून लागू है लोगों को उसके प्रति सावधान रहना चाहिए, क्योंकि एक छोटी सी गलती, या छोटा सा गलत काम भी लोगों को बड़ी लंबी तकलीफ में डाल सकता है।

हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के अधिकतर सभ्य देशों में कामकाजी महिला की सुरक्षा के लिए बड़े कड़े कानून हैं। हिंदुस्तान में हाल ही के बरसों में महिलाओं ने हौसला जुटाकर शिकायतें करना शुरू भी किया है, और पिछली केंद्र सरकार के एक मंत्री, और अपने वक्त के देश के सबसे नामीगिरामी संपादक एम.जे. अकबर ऐसी कई तोहमतों को झेलते हुए आज मानहानि का मुकदमा दायर करके अदालत में हैं, मंत्री का पद छोड़ देना पड़ा है, सामाजिक साख मिट्टी में मिल गई है। उनके खिलाफ जितनी शिकायतें हैं उसने यह अंदाज लगता है कि उन्होंने कोई गलती नहीं की, बल्कि गलत काम किया है, और यह एक लंबी सजा का मामला भी बन सकता है।

चूंकि बात गलतियों की भी हो रही है, इसलिए लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि देश में बाल मजदूरी के खिलाफ किस तरह का कानून है। आमतौर पर लोग घरों में बच्चों को खिलाने के लिए छोटी लड़कियों को काम पर रख लेते हैं या दफ्तर-दुकान पर चाय पिलाने के लिए छोटे लड़कों को रख लेते हैं। यह सिलसिला गैरकानूनी है, और खासा खतरनाक हो सकता है अगर कोई इसकी शिकायत कर दे, पड़ोस के लोग पीछे लग जाएं, या ऐसे बाल मजदूर के साथ कोई हादसा हो जाए। इसलिए लोगों को ऐसी गलती या गलत काम से भी दूर रहना चाहिए। 

इन दिनों लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि शादी का वायदा करके शारीरिक संबंध बनाए, और फिर शादी से मुकर गए तो उसके खिलाफ बलात्कार का जुर्म दर्ज हो गया। हमारी अपनी सोच बलात्कार की ऐसी परिभाषा नहीं मानती, और हम इसके खिलाफ कई बार लिख चुके हैं कि यह एक वायदाखिलाफी हो सकती है, लेकिन यह बलात्कार नहीं कहा जा सकता। लेकिन हमारे कहने से परे देश का कानून अलग है, और लोगों को उसे ध्यान में रखकर ही रिश्ते बनाने चाहिए।
एक अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस में सीनियर पायलट की एक छोटी सी चूक उसकी बाकी जिंदगी किस कदर बर्बाद कर सकती है, यह लोगों को एक बड़ी नसीहत रहना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 23-Jun-2019

विश्व कप क्रिकेट में बीती रात जब आखिरी ओवर में हिन्दुस्तान किसी तरह अफगानिस्तान से जीता तो भी हिन्दुस्तानी क्रिकेट प्रशंसकों को खुशी भी हुई, और अफगानिस्तान के लिए थोड़ा सा मलाल भी हुआ। लंबे बरसों से यह देश जिस तरह की दहशतगर्दी से गुजर रहा है, अमरीकी फौजी कार्रवाई को झेल रहा है, और अपने देश की सरकार में अस्थिरता देख रहा है, वैसे देश में क्रिकेट की ऐसी शानदार टीम बनना लोगों को हैरान करती है। अफगानिस्तान में क्रिकेट का कोई लंबा इतिहास नहीं रहा है, और पड़ोस का पाकिस्तान आजाद होने के पहले से अंग्रेजों की हुकूमत में हिन्दुस्तान के साथ एक ही टीम में क्रिकेट खेलते आ रहा था। अभी चार दिन पहले ही पाकिस्तान की टीम की जो धज्जियां हिन्दुस्तानी टीम ने उड़ाई हैं, उन्हें देखकर पाकिस्तान में वहां के खिलाडिय़ों को बड़ी बुरी बेइज्जती झेलनी पड़ रही है, जो कि नाजायज भी है। दूसरी तरफ अभी दो बरस पहले अफगानिस्तान की टीम को अंतरराष्ट्रीय दर्जा मिला, और टेस्ट मैच खेलने मिला। अफगानिस्तान की टीम का यह दूसरा ही विश्व कप है, और पिछला मुकाबला उन्होंने 2015 में ही पहली बार खेला था। ऐसे देश ने कल भारत के खिलाफ जो प्रदर्शन किया है, वह देखने लायक था, और हिन्दुस्तान के अनगिनत क्रिकेट प्रशंसकों ने रात से अब तक यह ट्वीट किया है कि हिन्दुस्तान ने मैच जीता, और अफगानिस्तान ने दिल। 

इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि लगातार अभाव और तनाव में संघर्ष करने वाले लोग कई बार इन दिक्कतों को अपने मन में ही संघर्ष छोड़ देने का एक बहाना बना लेते हैं। वे अपनी हार के लिए तश्तरी में तैयार इस तर्क को सहूलियत से इस्तेमाल कर लेते हैं कि ऐसे हालात में वे भला क्या जीतते। जिस अफगानिस्तान में तालिबानों ने लंबे अर्से से जिंदगी के हर पहलू पर इस्लामी पैमाने लादने का काम किया है, गीत-संगीत पर रोक लगा दी है, महिलाओं पर तो तरह-तरह की रोक है ही, और वहां की राजधानी में भी हर कुछ महीने में धमाके होते हैं जिनमें बहुत सी मौतें होती हैं। ऐसे में वहां के नौजवानों ने क्रिकेट के खेल में यह गजब की दिलचस्पी ली है, और दुनिया में सबसे अच्छी मानी जाने वाली एक टीम, हिन्दुस्तान की नाक में कल दम करके रख दिया था। आखिरी ओवर तक यह समझ नहीं पड़ रहा था कि नतीजा क्या होगा, यह तो गनीमत कि भारत के मो. शमी ने इस मुस्लिम देश की टीम के लगातार तीन विकेट लिए, और ट्विटर पर साम्प्रदायिकता फैलाने में जुट गए हिन्दुस्तानियों को अपने ट्वीट मिटाने पर मजबूर भी कर दिया। मैच चल ही रहा था कि मुस्लिमों से नफरत करने वाले कुछ हिन्दुस्तानियों ने यह लिखना शुरू कर दिया था कि अजहर से लेकर शमी तक ये लोग गद्दार हैं, देशद्रोही हैं। मैच के आखिरी ओवर ने ऐसे नफरतजीवी लोगों के मुंह पर कालिख पोत दी। कल रात मैच में यह देखना भी बड़ा शानदार लग रहा था कि हिन्दुस्तानी टीम की प्रायोजक एक चीनी मोबाइल कंपनी थी, और अफगानिस्तान की टीम का प्रायोजक हिन्दुस्तान का सबसे मशहूर ब्रांड, अमूल था। 

अफगानिस्तान टीम की इस मिसाल से परे इन दो-चार दिनों पर एक बात और कही जाए तो वह यह है कि पाकिस्तानी टीम की हार पर वहां के निराश क्रिकेटप्रेमियों ने खिलाडिय़ों के साथ जैसा बुरा सुलूक किया है, वह शर्मनाक है। टीम तो मैदान में हारी थी, पाकिस्तान के ऐसे लोगों की इंसानियत एयरपोर्ट और सड़कों पर कैमरों के सामने हार रही है। अपने खिलाडिय़ों को देश के खिलाफ गद्दार कहना एक बहुत ही घटिया बात है, और ऐसे लोगों को खेलप्रेमी कहलाने का भी कोई हक नहीं है। अब अगर मानो पाकिस्तान के साथ हुए मैच में जब हिन्दुस्तानी कप्तान विराट कोहली बिना आऊट हुए अपने को आऊट समझकर पैवेलियन लौट गए थे, तो उनकी जगह कोई अजहर या शमी होता, तो उन्हें गद्दार कहने वाले लोग कम नहीं होते। इसी तरह इसके कुछ ओवर बाद जब एक पाकिस्तानी खिलाड़ी के आऊट होने पर कप्तान कोहली अपील करना चाहते थे, और धोनी ने उन्हें समझाया कि खिलाड़ी आऊट नहीं है, और अपील नहीं की गई। इसके बाद वह खिलाड़ी आऊट निकला, लेकिन मौका निकल चुका था। अब अगर धोनी की जगह कोई मुस्लिम खिलाड़ी होता तो हिन्दुस्तान के बहुत से नफरतजीवी लोग उसे गद्दार लिखना शुरू कर देते। 

इन दो मैचों से अफगानिस्तान ने एक मिसाल पेश की है जिसने हिन्दुस्तान सहित बाकी दुनिया का भी दिल जीत लिया है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के कुछ घटिया लोगों ने अपने खिलाडिय़ों के खिलाफ नफरत उगली है, जिससे उनकी ही बेइज्जती अधिक हुई है, कोई खिलाड़ी गद्दार साबित नहीं हुए। खेलों में नफरत की जगह नहीं रहनी चाहिए, जीत-हार तो लगी रहती है। 
-सुनील कुमार


Date : 22-Jun-2019

बिहार के सरकारी अस्पतालों में बच्चों की थोक में हो रही मौतों के चलते आखिरकार देश के मीडिया के एक हिस्से ने भी यमदूतों को किनारे धकेलकर वार्डों पर हमला किया, और डॉक्टरों को खलनायक साबित करके एक किस्म से बिहारी मुख्यमंत्री स्वशासन बाबू नीतीश कुमार को बिना कहे बेकसूरी का एक सर्टिफिकेट दे दिया। यह काम कम से कम एक हिन्दी समाचार चैनल की एक चर्चित रिपोर्टर ने इतने अश्लील और हिंसक तरीके से किया कि मीडिया में मामूली शर्म रखने वाला तबका भी इस पर शर्म में डूब गया। लाशों पर मंडराने के लिए, या दम तोडऩे के करीब लोगों पर मंडराने के लिए जिन गिद्धों को बदनाम किया जाता है, उन्होंने भी यह नजारा देखकर मुंह मोड़ लिया। लेकिन कुछ लोगों ने इस हरकत के पीछे की नीयत को पहचाना कि किस तरह बिहार की सत्ता को मासूमियत और बेकसूरी का प्रमाणपत्र दिया गया, और यह साबित किया गया कि बंगाल के अस्पतालों में ऐसी मौतों के लिए मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी जिम्मेदार हैं, लेकिन बिहार में ऐसी सैकड़ों मौतों के लिए डॉक्टर और चिकित्सा कर्मचारी खलनायक हैं। 

यह नजारा देखकर थोड़ी सी हैरानी भी होती है कि किस तरह लालू यादव को बेदखल करके नीतीश कुमार सत्ता पर आए, और मुख्यमंत्री के तीसरे कार्यकाल से गुजर रहे हैं। इस बीच वे भाजपा के साथ रहे, भाजपा के खिलाफ रहे, मोदी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से खुलकर रूख जाहिर किया, और फिर मोदी का झंडा लेकर चलने लगे। ऐसे कई किस्म के बदलते रूख के बीच भी वे बिहार पर लगातार राज करते रहे, लगातार चुनाव जीतते रहे, और लगातार लोकसभा चुनावों में भी एनडीए को आगे बढ़ाते रहे। अब सवाल यह उठता है कि जाने-पहचाने जिलों में अगर संक्रामक बीमारियों से मौतों का ऐसा बुरा हाल है, और शिनाख्त रहते हुए भी इनसे निपटने का इंतजाम नहीं किया गया, तो भी नीतीश कुमार कैसे लगातार जीतते हैं? क्या इसलिए कि उनके पहले की सरकारें उनसे अधिक खराब थीं, और अब तक लोग उन बुरी यादों को भूल नहीं पाए हैं, और ऐसे अस्पतालों के बाद भी नीतीश को बेहतर मुख्यमंत्री मानते हैं? आखिर किसी इलाके या प्रदेश के वोटरों के सामने तुलना करने के लिए जो बात रहती होगी, उसी से तो तुलना करेंगे? आज नीतीश के अस्पतालों की तुलना कोई दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के मोहल्ला क्लीनिक से तो कर नहीं सकते जो कि देश में शायद सबसे इलाज दे रहे हैं? कोई बिहार के स्कूलों की तुलना दिल्ली के उन स्कूलों से तो कर नहीं सकते जिन्हें वहां की सरकार ने विश्व स्तर का बनाकर रखा है? 

बरस-दर-बरस बिहार में ऐसी मौतों के चलते हुए भी सत्तारूढ़ पार्टी की चुनावी जीत पर कोई दाग-धब्बा नहीं लगता, और इससे समझ पड़ता है कि मौजूदा सरकार लोगों की पुरानी यादों से अब भी बेहतर है। शायद यह भी एक वजह रही कि अभी ताजा आम चुनावों में बिहार में कांग्रेस-लालू का नामों-निशान मिट जाने जैसी नौबत रही, और नीतीश-भाजपा बुलडोजर की तरह आगे बढ़ते चले गए। लेकिन यहीं पर एक बात सामने आती है जिस पर उन तमाम पार्टियों को गौर करना चाहिए जो कि बड़ी जीत लेकर सत्ता पर आती हैं। बड़ी जीत लोगों की आंखों पर एक बड़ा पर्दा बनकर भी आती है, और सत्ता की चुनौतियों को उनकी जीत के नशे वाले आंखों से दूर कर देती है। ऐसी बड़ी जीत लोगों को अपनी जिम्मेदारियों का पूरा एहसास नहीं करवाने देती, और ऐसी बड़ी जीत लोगों को जनता से मिले हुए अधिकारों को लेकर एक खुशफहमी में भी डाल देती है कि अब उनका पसीना भी गुलाब के अत्तर सरीखे छोटी-छोटी शीशियों में बिकेगा। 

और दूसरी बात यह भी है कि चुनावी हार-जीत या सत्ता से परे, इस किस्म से बेकसूर बच्चों की थोक में होने वाली वे मौतें इतिहास में तो उन लोगों के नाम के साथ दर्ज हो ही रही हैं जो कि सत्ता पर हैं, सत्ता का सुख पा रहे हैं, और मौतों को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। बात महज बिहार की नहीं है, बात किसी दूसरे प्रदेश की भी नहीं है, बात पूरे देश की है कि मौतों पर किस नेता का क्या रूख रहता है। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से देश के हर आम इंसान के हाथ एक खास लोकतांत्रिक हथियार लगा हुआ है। और लोग इस बात को अच्छी तरह दर्ज भी कर रहे हैं कि बिहार  में सौ-सौ बच्चों की मौत के बाद देश के प्रधानमंत्री की किसी के सेहत के लिए पहली फिक्र सामने आई, तो वह एक हिन्दुस्तानी क्रिकेटर के अंगूठे टूटने पर आई। आज लोगों की कही बातें जितनी दर्ज हो रही हैं, उतनी ही लोगों की चुप्पी भी दर्ज हो रही है, और इन सबसे ऊपर बेकसूर मासूम बच्चों की ऐसी अकाल मौत के बाद उनकी बद्दुआ भी तो किसी न किसी को लगती होगी। 
-सुनील कुमार


Date : 21-Jun-2019

मोबाइल फोन पर एक गेम खेलते हुए एक छोटे बच्चे की खुदकुशी सामने आई है। इसमें खेलने वाले दूसरे लोगों ने उसे एक टास्क दिया था, और उसके मुताबिक उसने चूडिय़ां पहनी, मंगलसूत्र पहना, और फांसी लगा ली। यह बात दिल को दहलाने वाली है, और यह हादसा अपने आपमें अकेला नहीं है, हर कुछ हफ्तों में कोई बच्चा इसी तरह कुछ खेलते हुए जान दे रहा है। मोबाइल पर किसी एक गेम पर प्रदेश की सरकारें या देश की सरकार रोक लगाती हैं, और या तो उससे बचकर लोग यह खेलते रहते हैं, या फिर कोई नया कातिल-वीडियो खेल सामने आ जाता है। आज हालत यह है कि मोबाइल फोन के भयानक इस्तेमाल के चलते छोटे-छोटे दुधमुंहे बच्चे भी बड़ों को देख-देखकर उस पर वीडियो देखे बिना खाने-पीने से मना कर देते हैं, और उनको कुछ खिलाने के चक्कर में मां-बाप तुरंत समझौता कर लेते हैं। 

अब चौथाई सदी पहले तक हिन्दुस्तान में जो फोन किसी ने देखा-सुना नहीं था, उसने इस भयानक रफ्तार से, और इस भयानक हद तक घुसपैठ कर ली है कि पति-पत्नी में फोन के बुरी तरह इस्तेमाल को लेकर तलाक की नौबत आ रही है, अपनी मर्जी का फोन पाने के लिए जिद करते हुए बच्चे मांग पूरी न होने पर खुदकुशी कर रहे हैं। फोन पर तरह-तरह के एप्लीकेशन के चलते लोग लापरवाही में अपनी फोटो या वीडियो बांट रहे हैं, और उसके फैल जाने पर जान ले रहे हैं, या जान दे रहे हैं। कुल मिलाकर टेक्नालॉजी और उसके इस्तेमाल को लेकर लोगों में समझ की कमी खूनी हुई जा रही है। डिजिटल नशा सिर चढ़कर बोल रहा है, और दुनिया के दूसरे कई देशों की तरह इसके नशे से नशामुक्ति करवाने के लिए हिन्दुस्तान में भी अभियान चलाने की जरूरत आ खड़ी हुई है। 

दुनिया के बाल मनोचिकित्सकों का मानना है कि छोटे बच्चों के सामने फोन, कम्प्यूटर, या टीवी, किसी भी तरह की स्क्रीन एक दिन में तीस मिनट से अधिक नहीं रहनी चाहिए, वरना उनकी दिमागी सेहत पर, उनकी आंखों पर इसका बुरा असर पड़ता है। लेकिन बच्चों के इर्द-गिर्द रहने पर भी परिवार के बड़े लोग अपनी जरूरत, अपने शौक, या अपनी लत के चलते हुए ऐसे तमाम डिजिटल उपकरणों का घंटों इस्तेमाल करते हैं, और उनके चाहे-अनचाहे छोटे बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। सरकारें तो किसी खूनी खेल पर कानूनी रोक लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं, लेकिन घर के भीतर ऐसे प्रतिबंधित खेलों से परे परिवार के लोग कितनी देर तक किस स्क्रीन पर क्या देखते हैं, इस पर तो न कोई सरकार निगरानी रख सकती, न इसे रोकने का कोई कानून बन सकता। लोगों को खुद ही अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, और अपने न सही, अपने बच्चों के भले के लिए तमाम किस्म के डिजिटल उपकरणों का रोजाना का एक ऐसा कोटा तय करना होगा जिससे कि बच्चों के सामने ये सामान कम से कम शुरू हों। 

यह भी समझने की जरूरत है कि बच्चों के दिमाग विकसित होने के जो शुरूआती बरस रहते हैं, उसमें उनके सामने कल्पनाएं अधिक महत्वपूर्ण रहती हैं, बजाय रेडीमेड फिल्मों के, या कि गढ़े हुए संगीत के। जब वे खुद कुछ लकीरें बनाते हैं, या चीजों को ठोक-बजाकर आवाज पैदा करते हैं, तो वही उनके मानसिक विकास के लिए बेहतर होता है, फिर चाहे वह कार्टून फिल्मों की तरह अधिक चटख रंगों वाला न हो, या स्टूडियो में बनाए गए गीत-संगीत जितना मधुर न हो। इसलिए छोटे बच्चों को बड़ा करते हुए आज के वक्त यह सावधानी इसलिए भी अधिक जरूरी है क्योंकि हर आम परिवार में एक से अधिक ऐसे फोन या दूसरे उपकरण हो गए हैं जिन पर लगभग मुफ्त मिलने वाले इंटरनेट से ऐसी तमाम फिल्में बच्चों को दिखाई जा सकती हैं। ऐसा करना परिवार के बड़े लोगों को अपने दूसरे काम करने के लिए वक्त तो दिला देता है, लेकिन छोटे बच्चों को बहुत बुरी तरह ऐसे वीडियो, और फिर आगे जाकर ऐसे गेम का नशेड़ी भी बना देता है। परिवार के बड़े लोगों के एक सामाजिक-शिक्षण की जरूरत है ताकि वे उपकरणों के बीच रहते हुए भी अपने बच्चों को एक सेहतमंद माहौल में बड़ा कर सकें। इस बात की गंभीरता जिनको नहीं लग रही है, वे कल मोबाइल-गेम खेलते हुए इस तरह खुदकुशी करने वाले बच्चे की खबर कुछ बार जरूर पढ़ लें। 
-सुनील कुमार


Date : 20-Jun-2019

कई बरस पहले से कुछ जानकार और समझदार दूरदर्शी यह कहने लगे थे कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। और इस चर्चा के दस-बीस बरस के भीतर ही आज यह नौबत दिख रही है कि पानी के लिए हिन्दुस्तान के ही कई हिस्सों में हिंसा हो रही है। हिन्दुस्तान का एक बड़ा हिस्सा सूखा पड़ा है, और लोग अपनी प्यास बुझाने को गांव और इलाका छोड़कर जा रहे हैं, और उन्होंने अपने जानवरों को मरने के लिए छोड़ दिया है क्योंकि हिंसक और हमलावर गौरक्षकों की वजह से, और अंधाधुंध कड़े गौरक्षा कानूनों की वजह से पशुओं को बेच पाना मुमकिन नहीं रह गया है। लेकिन यह तो शहरी इंसान और जानवर की बात हुई, देश भर में जगह-जगह प्यासे जंगली-जानवर पास की बस्तियों में पहुंच रहे हैं, और एक अलग टकराव बढ़ते चल रहा है। 

जो धरती अपने गर्भ में पानी से लबालब थी, उसे टेक्नालॉजी और मुफ्त की बिजली ने मिलकर खाली कर दिया। धान उगाने वाले इलाकों में इस फसल के लिए खूब पानी लगता है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में किसानों को इसके लिए मुफ्त बिजली मिली हुई है। किसान की तो मदद हो गई, लेकिन धरती की कोख सूनी हो गई। जिस वक्त इस बात को लिख रहे हैं, उस वक्त टीवी स्क्रीन पर मध्यप्रदेश के खरगौन इलाके का एक वीडियो दिख रहा है जिसमें गांव का गांव इलाका छोड़कर जा रहा है क्योंकि पानी बचा ही नहीं। आज बीस जून को विश्व शरणार्थी दिवस भी है, और यह कैसा अजीब इत्तफाक है कि महज पानी के लिए लोग अपना इलाका छोड़कर कहीं शरणार्थी होने जा रहे हैं, हजारों-लाखों बरस से जंगलों में बसे हुए जानवर तो शरणार्थी हो ही चुके हैं। 

छत्तीसगढ़ में धरती के भीतर के पानी को बढ़ाने के लिए गांवों के आसपास के नालों को बिना किसी टेक्नालॉजी या शहरी सामान के, महज सामान्य समझबूझ और परंपरागत ज्ञान से ऐसा बदला जा रहा है कि उससे उनमें पानी थम सके, और आसपास की धरती में भी जा सके, बारिश के बाद भी लोगों को उससे पानी मिल सके। यह छोटे स्तर पर, कम खर्च पर, बहुत ही विकेन्द्रीकृत और मजदूरी से जुड़ी हुई स्थानीय तकनीक है, जो अगर कामयाब होती है तो कामयाबी आने वाले कुछ बरसों में ही दिखने लगेगी। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात पर गौर करने की जरूरत है ताकि धरती के भीतर बारिश के पानी को वापिस भेजने के लिए एक अलग कोशिश भी हो सके। यह बड़ी सामान्य ज्ञान की बात है कि हिन्दुस्तान में बारिश कुछ दिनों में बहुत अधिक होती है, और नदियों में बाढ़ आ जाती है, और उसका सारा पानी समंदर में चले जाता है। ऐसे में हर इलाके में नदियों तक पहुंचने वाले पानी को जगह-जगह रोककर उससे भूजल की री-चार्जिंग की एक बड़ी कोशिश ऐसी होनी चाहिए जो कि न तो अनिवार्य रूप से इंसान और जानवर की निस्तारी के मकसद से हो, और जो न ही अनिवार्य रूप से मजदूरी जुटाने के मकसद से हो। इन दोनों पैमानों से परे महज धरती के पेट को भरने के लिए, मतलब इंसानों को प्यासे मरने से रोकने के लिए, जगह-जगह बड़े पैमाने पर ऐसे री-चार्जिंग जलाशय बनाने चाहिए जो कि तेज बारिश के वक्त नदियों में बाढ़ लाने वाले पानी को पहले ही रोक सके। 

यह हमारा पसंदीदा विषय है, और इस पर कुछ दिन पहले भी हमने इसी जगह लिखा भी था। अभी राज्य सरकार नालों में पानी रोकने की जो व्यापक कोशिश कर रही है, वह अपनी जगह चलती रहे, लेकिन बड़े पैमाने पर बड़े जलाशय बनाकर बाढ़ की नौबत को रोकने,  पानी के उस तात्कालिक सैलाब को रोकने के लिए प्रदेश भर में बड़ी-बड़ी मशीनों से बड़े-बड़े जलाशय बनाने चाहिए, फिर चाहे वे आबादी से दूर हों, किसी इंसान या जानवर के सीधे काम न आए, जिनसे कोई मजदूर काम न पाए। धरती के पानी को वापिस डालने के लिए एक अलग सोच की जरूरत है, और आज राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में ऐसी कोई योजना दिखाई नहीं पड़ती है। यह काम अधिक लागत के बिना हो सकता है क्योंकि मशीनों से काम सस्ता पड़ता है, और जल्दी हो सकता है। इस बारिश में भी राज्य सरकार चाहे तो प्रदेश के नक्शे में पहले से दर्ज नदियों के कैचमेंट एरिया छांटकर वहां जगह-जगह सरकारी जमीनों पर ऐसे तालाब तुरंत खोदे जा सकते हैं, और इनका फायदा पूरे प्रदेश में जमीनी पानी का स्तर ऊपर आने की शक्ल में दिखने भी लगेगा। यह काम मजदूरी देने के मुकाबले कम लोकप्रिय या कम लुभावना रहेगा, लेकिन नालों के साथ-साथ ऐसे बड़े तालाब भी बनने से ही नदियों की बाढ़ में बर्बादी घटेगी, और वह अतिरिक्त पानी धरती के पेट को फिर भर सकेगा।
-सुनील कुमार


Date : 19-Jun-2019

आज इस वक्त छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार प्रदेश की सबसे व्यापक फैली हुई आनुवांशिक बीमारी सिकल सेल पर एक कार्यक्रम कर रही है जिसमें मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी में प्रदेश की इस गंभीर समस्या को लेकर चर्चा हो रही है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी और पिछड़ा वर्ग में सिकल सेल से प्रभावित लोग लाखों में हैं, और पांच वर्ष की उम्र से कम में मरने वाले बच्चों में से पन्द्रह फीसदी की मौत इसी बीमारी की वजह से होती है। बाद में भी लोग इसकी वजह से जान खोते हैं, या बहुत तकलीफ के साथ कम उम्र जीते हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा देश के कुछ और राज्यों में आदिवासी और ओबीसी तबकों में सिकल सेल का कहर बहुत है, और संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे रोकने के लिए बड़ी फिक्र जाहिर की है। 

लेकिन छत्तीसगढ़ में जो लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं, जो डॉक्टर इसके इलाज की कोशिश करते हैं, और सरकारी क्षेत्र में जिन लोगों पर इससे जूझने की जिम्मेदारी है, उन तमाम लोगों की जानकारी में यह बात अच्छी तरह है कि राजधानी रायपुर के मेडिकल कॉलेज में सिकल सेल पर बड़े पैमाने पर जो उत्कृष्ट शोध चल रहा था, उसके बीच से उस विभाग के मुखिया, उस काम में बरसों से लगातार जुटे हुए डॉक्टर को पिछली भाजपा सरकार ने व्यक्तिगत नापसंदगी के चलते इस कॉलेज से हटाकर बिलासपुर भेज दिया था, और उनके रहते जितनी रिसर्च हुई थी, वह धरी रह गई। वैसे तो सरकार में किसी को भी कहीं भेजा जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि एक थानेदार को दूसरे थाने में भेजने और एक चिकित्सा वैज्ञानिक को उसके शोध केन्द्र से दूर भेज देने में फर्क क्या इस सरकार को समझ आता है? यह काम एक ऐसे वैज्ञानिक-चिकित्सक के साथ किया गया जो कि प्रदेश की इस सबसे बड़ी बीमारी पर शोध कार्य में बहुत आगे पहुंचा हुआ था, और यह तबादला पिछली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में खरीदी के सैकड़ों-हजारों करोड़ के घोटाले में साथ न देने की वजह से किया गया था। आज जब उस घोटाले पर जुर्म दर्ज करके नई सरकार कई किस्म की जांच कर रही है, उस वक्त के घोटालेबाज जमानत पर हैं, या सैकड़ों करोड़ कमाकर पूछताछ की राह देख रहे हैं, तब आज का यह सरकारी जलसा इस हकीकत से पूरी तरह अछूता बना हुआ है कि पिछली सरकार ने किस भ्रष्टाचार में साथ न देने की वजह से ऐसे वैज्ञानिक का तबादला करके पूरे के पूरे शोध कार्य, अध्ययन, और चिकित्सा को गड्ढे में डाल दिया था। 

सरकार को लंबे समय से देखने का हमारा तजुर्बा बताता है कि राज्य में जिन मंत्रियों को चिकित्सा या स्कूल शिक्षा का जिम्मा दिया जाता है, उन्हें और कोई भी विभाग नहीं देना चाहिए क्योंकि ये दो विभाग किसी भी एक इंसान की मानवीय क्षमता, और हर दिन चौबीस घंटे काम करने से अधिक जरूरत वाले हैं। लेकिन भारत, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में विभागों का बंटवारा इस आधार पर होता है कि किस मंत्री के पास कितने हजार करोड़ का सालाना बजट है, और मीडिया में खुलकर इस बात की चर्चा इसी अंदाज में होती है कि मंत्रियों को मानो कितनी कमाई का मौका मिला है। यह नौबत पूरी तरह बदलनी चाहिए। स्वास्थ्य और स्कूल शिक्षा, ये दो विभाग किसी भी मंत्री के लिए पर्याप्त जिम्मेदारी जब तक मानी नहीं जाएगी, तब तक इनको सुधारना मुमकिन नहीं है। ये दोनों विभाग परले दर्जे के भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं, और पिछली सरकार के वक्त ये तबाह हो चुके हैं। इनके मंत्री, और इनके सचिव, दूसरी जिम्मेदारियों से मुक्त रखे जाने चाहिए। दुनिया के किसी भी विकसित देश में इन दोनों विभागों को बजट का बड़ा हिस्सा मिलता है, महत्व सबसे अधिक मिलता है, और अभी एक हफ्ते पहले ही भूटान की खबर आई है कि वहां पर डॉक्टरों और शिक्षकों को वहां के मंत्रिमंडल ने देश में सरकारी वेतन तय करते हुए सबसे ऊंची तनख्वाह वहां के डॉक्टरों, और शिक्षकों को देना तय किया है। 

चूंकि छत्तीसगढ़ की नई सरकार ने पिछली सरकार के वक्त सिकल सेल शोध कार्य को किनारे पटक देने के फैसले पर अब तक कुछ सोचा नहीं है, इसलिए इस बात को हम यहां जोर देकर लिख रहे हैं कि अगर राज्य सरकार के मन में प्रदेश की इस सबसे बड़ी आनुवांशिक बीमारी का भी महत्व अगर नहीं है, तो आज इस वक्त चल रहे सरकारी जलसे का कोई मतलब भी नहीं है। राज्य सरकार को इलाज और प्राथमिक शिक्षा को भ्रष्टाचारमुक्त रखना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही बातें किसी भी सभ्य लोकतंत्र में भविष्य की बुनियाद मानी जाती हैं। भ्रष्टाचार के लिए सरकार के पास बहुत से और विभाग हैं, और उसे वहीं से अपना काम चलाना चाहिए, अगर ईमानदारी असंभव सी है।
-सुनील कुमार


Date : 18-Jun-2019

दो दिन पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेश में प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण, खरीद और बिक्री पर रोक लगा दी है। यह भी फैसला लिया गया अब किसी भी सरकारी कार्यक्रम में प्लास्टिक से बने बर्तनों कप, प्लेट, चम्मच या कटोरी का इस्तेमाल नहीं होगा। यहां तक कि विज्ञापनों में और कैरी बैग के रूप में भी उपयोग नहीं किया जा सकेगा।   व्यापारी,  दुकानदारों को 100 रुपए के स्टांप पेपर पर इसके उपयोग नहीं करने का शपथ पत्र देना होगा। जो भी प्लास्टिक के उत्पाद बनेंगे, उस पर निर्माता का नाम, पंजीकरण नंबर और प्लास्टिक का प्रकार लिखना अनिवार्य होगा। राज्य सरकार इन सबकी जांच और निगरानी के लिए प्रदेश स्तर पर एक समिति का गठन करेगी। यह फैसला प्रदेश में सैकड़ों करोड़ के कारोबार और हजारों लोगों के रोजगार को तो प्रभावित करेगा, लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि इससे इस धरती के बर्बाद होने की रफ्तार कम भी हो सकती है।

आज तो बाकी हिन्दुस्तान की तरह छत्तीसगढ़ में भी हालत यह है कि एक-दो दिनों तक टंगने वाले जन्मदिन, या स्वागत के बैनर, बोर्ड, और होर्डिंग उसके बाद घूरों से होते हुए कचरे में बाकी पूरी जिंदगी के लिए हमेशा के लिए बोझ बन जाते हैं। इसी तरह आज छोटे-बड़े किसी भी कार्यक्रम के बाहर हजारों कप-प्लेट, गिलास का प्लास्टिक का कचरा इक_ा हो जाता है, और जो कि कभी सड़ता नहीं, हजारों, शायद दसियों हजार बरस के लिए वह धरती की छाती पर बोझ बना हुआ पड़े रहता है। लेकिन किसी भी सरकार के लिए यह एक अलोकप्रिय और साहसी फैसला है कि प्रदूषण पर एक साथ इतनी बड़ी और कड़ी कार्रवाई की जा रही है। अगर बाकी देश में इसी तरह कार्रवाई की जाती है तो धरती पर स्थायी प्रदूषण बहुत हद तक घट सकता है।

आज मशीनों से बनने वाले प्लास्टिक के सामान और मशीनों से होने वाली फ्लैक्स की छपाई का नतीजा यह हो गया है कि लोग इनका अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। जो कार्यक्रम कुछ घंटों के रहते हैं, उनका मंच भी फ्लैक्स से सजा दिया जाता है जिसका कोई उपयोग उसके बाद नहीं रहता है। एक समय ऐसा था जब कपड़े पर कलाकार हाथ से ऐसी ही लिखावट और सजावट करते थे, जिससे रोजगार भी मिलता था, और उस कपड़े का दुबारा इस्तेमाल भी हो जाता था। लेकिन मशीनों ने यह पूरा सिलसिला खत्म कर दिया था, और अब मिनटों के भीतर फ्लैक्स पर छपाई होकर पोस्टर और होर्डिंग बना दिए जाते हैं। इसी तरह अब गिलासों को धोकर इस्तेमाल करना, प्लेट को धोकर इस्तेमाल करना, यह सब खत्म हो गया, और अब अमीरों से लेकर धार्मिक कार्यक्रमों तक सब जगह यूज एंड थ्रो सामानों ने जगह बना ली है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल एक बहुत ही बड़ा फैसला है, और अगर इसमें कोई अदालती दखल न आए, सरकार किसी दबाव में अपना फैसला न बदले, तो यह पर्यावरण के हित में एक ऐतिहासिक फैसला रहेगा।
-सुनील कुमार


Date : 17-Jun-2019

नई लोकसभा आज से शुरू हुई तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक किस्म से विपक्ष को हिम्मत बंधाते हुए कहा कि वे संख्या में चाहे कम हों, वे लोगों के मुद्दे तो उठा ही सकते हैं, और उन्होंने विपक्ष से यह उम्मीद और अपील भी की कि वे जनता के हित के मुद्दों पर सरकार का साथ भी दें। अब पिछले आम चुनाव के बाद इस बार के आम चुनाव में भी मोदी से लगातार दूसरी बार हारने के बाद कांग्रेस और बाकी विपक्षी पार्टियां सदमे से उबरने के दौर में दिख रही हैं। आज संसद शुरू हो चुकी है लेकिन एनडीएविरोधी पार्टियों ने अब तक अपनी कोई बैठक नहीं की है, और न ही कांग्रेस अपने संसदीय दल का कोई नेता चुन सकी है। बीच में एक सुगबुगाहट हुई थी कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होने वाले शरद पवार अपनी पार्टी सहित कांग्रेस में वापिस आ सकते हैं, और उससे कांग्रेस को शायद लोकसभा में विपक्षी दल बनने के लिए जरूरी सांसद जुट जाएंगे, लेकिन फिर वह बात भी आई-गई हो गई। 

लोकसभा को देखें, तो विपक्ष के नेता का संसदीय दर्जा कई मायनों में काम का रहता है, और देश के कई संवैधानिक पदों पर, कई नाजुक संस्थानों के मुखिया चुनने के लिए संविधान में विपक्ष के नेता को कमेटी में रखने की शर्त भी है। ऐसी जगहों पर तो कांग्रेस या बाकी विपक्ष का एक नुकसान रह सकता है, लेकिन सदन की रोज की कार्रवाई अगर देखें, तो उसे लेकर किसी को हीनभावना में नहीं आना चाहिए, निराश नहीं होना चाहिए, और हथियार डालकर बैठ नहीं जाना चाहिए। आम चुनाव में मोदी को चुनौती देने वाले राहुल गांधी एक सीट से हारने के बाद भी दूसरी सीट से संसद पहुंच चुके हैं, और उन्हें वहां पर मुद्दे उठाने से लेकर मोदी को गले लगाने तक के कई मौके हासिल रहेंगे। कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस और डीएमके दो ऐसी बड़ी पार्टियां संसद में हैं जिनके सदस्य काफी संख्या में हैं। इसके अलावा देश के तकरीबन हर बड़े प्रदेश से एनडीएविरोधी कोई न कोई सांसद लोकसभा पहुंचे हैं, और दिल्ली जैसे जिस राज्य से कोई गैरभाजपाई सांसद लोकसभा में नहीं है, वहां के मुद्दों को भी दूसरी पार्टियां अखबार और टीवी से भी जान सकती हैं, और उन राज्यों में अपने विधायकों के मार्फत भी उन मुद्दों को लगातार जान सकती हैं जो किसी सांसद के मार्फत पता लगते। 

विपक्ष को यह याद रखने की जरूरत है कि 1984 में लोकसभा में भाजपा के कुल दो सांसद थे, मतलब यह कि देश के नक्शे का अधिकतर हिस्सा तो भाजपा के सांसदों के छूने का भी नहीं था। लेकिन वहां से बढ़ते हुए यह पार्टी पिछली सदी के आखिर में ही संसद में बहुमत का गठबंधन बनाकर केन्द्र सरकार बना चुकी थी। कुल डेढ़ दशक के भीतर बीजेपी ने यह पहाड़ की ऊंची चढ़ाई पूरी की थी। ऐसे में कोई वजह नहीं है कि एनडीए और भाजपा के खिलाफ अगले पांच-दस बरस में कोई ऐसा गठबंधन न बन सके जो कि सत्ता पर आ सके। लेकिन सत्ता से परे भी एक दूसरी बात यह है कि संसदीय लोकतंत्र में सत्ता में आना जितना महत्वपूर्ण होता है, विपक्ष में रहना भी लोकतंत्र के लिहाज से तो उतना ही महत्वपूर्ण रहता है, फिर चाहे विपक्ष में साधन-सुविधा और कमाई उतनी न हो। ऐसे ताजा इतिहास को देखते हुए, और संभावनाओं को देखते हुए, और आज की लोकतांत्रिक-संसदीय जिम्मेदारी को देखते हुए विपक्ष के दलों को, उनके सांसदों को अपनी जिम्मेदारी और अधिक गंभीरता से निभानी चाहिए। विपक्ष की पार्टियों को देखें, तो उनके हारे हुए सांसद भी अपने-अपने इलाकों के मुद्दों, और देश-विदेश के मुद्दों के जानकार रहे हैं, और वे संसद के बाहर से भी अपने सांसदों को मुद्दे दे सकते हैं, उनके लिए लगातार अध्ययन कर सकते हैं। सांसद या विधायक किसी भी पार्टी के व्यापक संगठन का एक हिस्सा ही रहते हैं, उनसे परे भी पार्टी संगठन के और बहुत से हिस्से रहते हैं जो कि संसद के लायक मुद्दों को उठाकर अपने या किसी दूसरे सहयोगी दल के सांसद को दे भी सकते हैं। 

आज जो दल विपक्ष में हैं, उनके ऊपर लोकतंत्र को मजबूत करने की एक बड़ी जिम्मेदारी है, और यह जिम्मेदारी जनता के प्रति है। जनता ने उन्हें सत्ता के लायक नहीं चुना लेकिन संसद में तो चुना है। इसलिए सरकार की गलतियों और गलत कामों पर संसद में आवाज उठाने की एक बड़ी जिम्मेदारी सामने है। और सरकार पर हमले से परे भी यह सोचने-समझने की जरूरत है कि विपक्ष सरकार को एक नई दिशा देने का काम भी कर सकता है। हिन्दुस्तान की इसी लोकसभा में ऐसे बहुत से दिग्गज और महान विपक्षी नेता रहे हैं जिनको सुनने के लिए प्रधानमंत्री सहित पूरी की पूरी सरकार डटी रहती थी, और जिनको सुनने के लिए संसद के दूसरे सदन के सदस्य भी आकर दीर्घा में बैठते थे। ऐसे लोग अपने वक्त और अपनी पार्टी से परे भी देश और दुनिया का ख्याल रखते हुए बड़ी महान सोच सामने रखते थे, जिसकी संभावना आज पूरी की पूरी खत्म नहीं हुई है। आज संसद में अपराधों से जुड़े हुए संभावित-मुजरिम अधिक हैं, लेकिन उनके बीच भी कुछ ऐसे लोग जरूर हैं जो कहने को खड़े होंगे, तो उनकी बात तमाम लोग सुनेंगे। 

संसद इस देश की सबसे बड़ी पंचायत है, और जनता को उतनी उम्मीद, वैसी उम्मीद किसी और से हो भी नहीं सकती। ऐसे में हर सांसद को अधिक तैयारी के साथ सदन के वक्त का एक-एक पल इस्तेमाल करना चाहिए, खासकर विपक्ष के सांसदों को। किसी संसदीय क्षेत्र के मुद्दों को उठाने के लिए वहीं के सांसद का होना जरूरी नहीं है, कोई भी सांसद देश के किसी भी हिस्से की बात उठा सकते हैं। सत्ता पक्ष के पास तो पूरी की पूरी सरकार है जिसके कामकाज से वह अपनी सोच सामने रख सकते हैं, लेकिन विपक्ष के पास तो जनता, देश-प्रदेश, और दुनिया के मुद्दों को उठाने के लिए खासी तैयारी जरूरी है, और विपक्षी पार्टियां चाहे जितनी भी कमजोर क्यों न हो गई हों, वे मेहनत करके संसद सत्र में अपने निर्वाचित सांसदों के मार्फत देश और दुनिया का भला कर ही सकती हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Jun-2019

भारत और पाकिस्तान के बीच अब से कुछ देर में क्रिकेट विश्वकप का मैच शुरू हो जाएगा, और अभी हमारे सामने जो हिंदुस्तानी टीवी चैनल हैं, वे हिंदुस्तान की जीत के लिए एक भावनात्मक उन्माद खड़ा कर रहे हैं, और शायद ऐसा ही कुछ पाकिस्तान में वहां की टीम के लिए हो रहा होगा। कुछ चैनलों पर दोनों देशों के भूतपूर्व खिलाडिय़ों के चेहरे स्क्रीन पर दिख रहे हैं, जो कि दोनों देशों के भूतपूर्व फौजियों के मुकाबले अधिक समझदारी की, कम नफरत की, और कुछ खेल की भी बात कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों सोशल मीडिया पर लगातार कुछ ऐसे मजाकिया वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें पाकिस्तान द्वारा रिहा किए गए भारतीय फौजी पायलट अभिनंदन को लेकर व्यंग्य गढ़ा गया है, और फिर सरहद के दूसरी तरफ से उसका वैसा ही जवाब भी बनाकर पोस्ट किया गया। मजाक से लेकर व्यंग्य तक, और फिर नफरत से लेकर हमलावर तेवरों तक, सोशल मीडिया दोनों तरफ के अलग-अलग मिजाज के अलग-अलग लोगों को देख रहा है, झेल रहा है। और दुनिया का तजुर्बा यही है कि जब भाईयों के बीच दीवार उठती है, तो कुछ अधिक ही ऊंची उठती है। भारत और पाकिस्तान के बीच भी यह हाल दोनों की आजादी के बाद से तकरीबन लगातार बना रहा है, या कि बनाकर रखा गया है। पूरी दुनिया में क्रिकेटप्रेमियों के बीच यह बात बहुत अच्छी तरह जानी और मानी जाती है कि भारत और पाकिस्तान के बीच के क्रिकेट मैच जितनी अधिक दिलचस्पी दुनिया के किसी भी और मैच के लिए कभी नहीं होती। और इन दोनों देशों के बीच खेला गया कोई भी मैच उस टूर्नामेंट के फाइनल मैच की तरह का रोमांचक हो जाता है। 

लेकिन जिनको सरहद पर गोलियों से मोहब्बत न हो, और जो सचमुच ही खेल को चाहते हैं, क्या उन्हेें ऐसे मैच को देखते हुए यह हैरानी नहीं होती होगी कि वे दूसरे देश की टीम के बेहतर खेल की भी तारीफ नहीं कर सकते? खेल दो देशों के बीच तनावतले कुछ ऐसा दब गया है कि एक बेहतरीन गेंद या एक बेहतरीन शॉट की तारीफ मन में भी उठने के पहले यह सोच लेना होता है कि क्या दूसरे देश के खिलाड़ी के काबिले तारीफ खेल पर भी मन में तारीफ उठना अपने देश के साथ गद्दारी होगी? लेकिन इन दोनों देशों के बीच समय-समय पर सरहदी तनाव के चलते, या आतंकी हमलों के चलते एक-दूसरे से क्रिकेट खेलना सरकारों में बंद भी करवाया हुआ है। खेल से इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच रिश्ते अच्छे हो सकते थे, ठीक उसी तरह जिस तरह कला, साहित्य, संगीत के चलते अच्छे हो सकते थे, एक देश से दूसरे देश में सामानों की आवाजाही के चलते अच्छे हो सकते थे, कहीं दरगाह और कहीं मंदिर-गुरुद्वारे में आवाजाही से अच्छे हो सकते थे। लेकिन दोनों मुल्कों की राजधानियों में बैठे नेताओं, अफसरों, और फौजियों के चलते रिश्तों की मोहब्बत मुमकिन नहीं हो पाती है, और फिर आग में घी डालने के लिए सरहद के दोनों तरफ टीवी के समाचार चैनल भी हैं, जिनका धंधा जंग के फतवों से एकदम ही बढ़ जाता है। अभी भी जिन समाचार चैनलों पर हमारी नजर जा रही है, वे अपने देश के लिए फतवे जारी करते हुए मीडिया की अपनी बुनियादी और परंपरागत भूमिका से कोसों दूर चल रहे हैं। इस मैच को देखते हुए भी समझदार लोगों को यह तो याद रखना ही चाहिए कि सरहद के आरपार एक शायर की लिखी गज़ल को दूसरे देश के गायक ने गाकर मशहूर कर दिया, और फिर उस गज़ल का इस्तेमाल दूसरे देश ने बखूबी किसी फिल्म में कर दिया। आम लोगों से लेकर खेल, कला, साहित्य, और संगीत के खास लोगों तक सरहद के दोनों तरफ खूब मोहब्बत है, बस राजधानियां और समाचार चैनल अपने पेट चलाने के लिए इसे तबाह न करें। अब से कुछ मिनटों में शुरू होने वाला यह मैच लोग बेहतर खेल का मजा लेने के लिए देखने की कोशिश करें, उसमें अपने देश के साथ कोई गद्दारी नहीं होगी।
-सुनील कुमार


Date : 15-Jun-2019

पश्चिम बंगाल में तनाव और झगड़े थमने का नाम ही नहीं लेते हैं। कभी ऐसा लगता है कि बात इतनी बड़ी तो नहीं थी, तो ऐसे में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अपने निहायत गैरजरूरी हमलावर तेवरों के सार्वजनिक प्रदर्शन से बनती हुई बात को बिगाडऩे के लिए ओवरटाईम करती दिखती हैं, और नतीजा वैसा ही होता है जैसा कि अभी डॉक्टरों की हड़ताल को लेकर हो रहा है। कोलकाता के सरकारी अस्पताल में एक मरीज के घरवालों ने डॉक्टरों को पीट दिया, और इस पर तुरंत ही डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। इस नौबत को देश भर में कई जगहों पर देखा जाता है, और सरकार गुनहगारों पर तुरंत कड़ी कार्रवाई करके, या डॉक्टरों की हिफाजत का इंतजाम करके मामले को सुलझाने की कोशिश करती है। लेकिन बंगाल में ममता बैनर्जी अस्पताल पहुंची तो वहां भी उनके गुस्सैल मिजाज ने बात को और बिगाड़ दिया, और अब डॉक्टर उनके दफ्तर जाकर बात करने को भी तैयार नहीं हैं, वे उनसे अस्पताल आकर अपनी चेतावनी वापिस लेने की बात कर रहे हैं। सैकड़ों डॉक्टरों ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है, और कोलकाता के समर्थन में बाकी प्रदेश, और बाकी देश के डॉक्टर भी आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन के आज 5वें दिन इसे लेकर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच एक और तनातनी खड़ी हो गई है, और ममता बैनर्जी राज्य के भीतर इस टकराहट को भाजपा की साम्प्रदायिक साजिश का नतीजा करार दे रही है। 

इस ताजा हालात के दो अलग-अलग पहलू हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि सरकारी हो या गैरसरकारी, अस्पतालों में किसी मरीज के इलाज को लेकर शिकायत, नाराजगी, और तोहमत के बाद मरीज के साथ के लोगों की तोडफ़ोड़ और मारपीट बहुत अनोखी बात नहीं है। कई बार ऐसा होता है, और छत्तीसगढ़ में कुछ बरस पहले ऐसे ही तेवरों का हौसला पस्त करने के लिए राज्य सरकार ने एक कानून बनाकर ऐसे हमलावरों के लिए अलग से कड़ी सजा का इंतजाम किया था जो कि आज भी लागू है। यह बात समझ में आती है कि अस्पतालों की कहीं पर लापरवाही भी होती होगी, कहीं पर भ्रष्टाचार भी होगा, कुछ जगहों पर हादसे भी होते होंगे, लेकिन इनमें से किसी भी बात की सजा अस्पताल के गलियारे में हिंसा से नहीं दी जा सकती। अगर बंगाली की राजधानी के सरकारी अस्पताल में ऐसा हुआ, और मुख्यमंत्री ने इसके बाद की हड़ताल में सीधे दखल देना तय किया, तो वे किसी समझौता-वार्ता के लिए एक बेहतर व्यक्ति नहीं हैं। उनका मिजाज ही उन्हें किसी भी समझौता-वार्ता से दूर रखने की सलाह देता है। ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री की मौके पर पहुंचकर सीधी दखल, गुस्से से भरी चेतावनी, हड़ताल के खिलाफ साजिश के आरोप, इन सबसे एक बात साबित होती है कि उनकी सरकार में अधिकारों और जिम्मेदारियों का विकेन्द्रीकरण नहीं है, और वहां पर जो हैं वह वे खुद ही हैं। नतीजा यह है कि अगर वे नाकामयाब हो जाती हैं, तो उसके बाद कुछ बचता नहीं है। यह नौबत किसी प्रदेश या सरकार के लिए अच्छी नहीं है कि अंतिम फैसला लेने वाले को शुरुआती दौर में ही टकराव में हिस्सेदार बना दिया जाए। 

दूसरी बात यह कि डॉक्टरी का काम समाज के दूसरे पेशों से अलग किस्म का है, और पुलिस, फायरब्रिगेड, के अलावा डॉक्टरी ही एक ऐसा काम है जिसके बिना किसी नाजुक मौके पर एक पल भी काम नहीं चल सकता। इसलिए रात-बिरात हर वक्त तनाव में पहुंचने वाले मरीज के साथियों से डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को बचाने का पुख्ता इंतजाम कानून बनाकर, और सुरक्षा व्यवस्था लागू करके किया जाना चाहिए। यह तो ठीक है कि आज सुरक्षा कैमरे लगे होने से बहुत से सुबूत दर्ज हो जाते हैं, लेकिन हिंसा के खतरे के बीच न डॉक्टर काम कर सकते, न अस्पताल के दूसरे कर्मचारी। इसलिए सुरक्षा को अस्पतालों, खासकर सरकारी अस्पतालों, के इंतजाम का एक जरूरी हिस्सा मानकर चलना चाहिए। महंगे निजी अस्पताल तो सुरक्षा कर्मचारियों का इंतजाम कर लेते हैं, लेकिन सरकारी अस्पताल अक्सर बेसहारा साबित होते हैं। पिछले एक दिन में देश भर में डॉक्टरों की हड़ताल के चलते अनगिनत मौतें हुई होंगी जो कि हड़ताल के साथ जुड़कर दर्ज नहीं हुई होंगी। ऐसी नौबत दुबारा आनी नहीं चाहिए, इसके लिए राज्यों के मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के मुकाबले अधिक समझदार साबित हों तो बेहतर होगा। अपने राज्य की अस्पताली हड़ताल के लिए किसी राजनीतिक दल या केन्द्र सरकार पर तोहमत लगाने के बजाय ममता बैनर्जी को अपना घर सुधारना चाहिए जो कि बुरी तरह अराजकता और बदइंतजामी का शिकार दिख रहा है। एक-एक कर बहुत से मामलों में अगर बंगाल में यही हाल बढ़ते चले गया, तो ममता की साख पूरी तरह चौपट हो जाएगी। आज हालत यह है कि बिहार में हर दिन दर्जन के हिसाब से बच्चों की मौत हो रही है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खलनायक की तरह नहीं दिख रहे हैं। दूसरी तरफ देश भर में अस्पतालों में जिसको जो दिक्कत डॉक्टरों की हड़ताल से हो रही है, वे लोग ममता को ही खलनायिका मान रहे हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Jun-2019

छत्तीसगढ़ में कल से आज तक दो अलग-अलग जिलों में दो घटनाएं हुई हैं जिन्हें जोड़कर देखने की जरूरत है, और देखकर फिक्र भी होती है। आज महासमुंद जिले के एक समाचार वेबसाईट वाले पत्रकार को पुलिस ने शांति भंग करने के आरोप में गिरफ्तार किया है, और उस पर आरोप है कि वह बिजली बंद होने को लेकर अपनी वेबसाईट पर जो लिख रहा था उससे लोगों में असंतोष भड़क रहा था। लेकिन दूसरी खबर इससे अधिक फिक्र की है, राजनांदगांव जिले में एक आदमी ने एक वीडियो बनाकर उसे फैलाया जिसमें राज्य सरकार पर उसका आरोप है कि उसने बिजली के इन्वर्टर बनाने वाली एक कंपनी के साथ मिलकर यह साजिश रची है कि बार-बार बिजली बंद की जाएगी ताकि उसके इन्वर्टर की बिक्री बढ़े। इसके बाद इस आदमी को राजद्रोह की धाराओं में गिरफ्तार करने की खबर है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल के कानूनी सलाहकार ने इसे राजद्रोह करार देते हुए थाने में रिपोर्ट लिखाई है, और उस पर यह कार्रवाई हुई है। 

इन दोनों बातों के कई पहलू बहुत बुरी तरह चौंकाने वाले हैं। इस बात में कोई शक नहीं है कि पूरे प्रदेश में जगह-जगह बिजली का इंतजाम गड़बड़ाया हुआ है। हो सकता है कि इसमें कुछ तोहमत कुदरत के हिस्से भी जाए कि आंधी-तूफान से तार और खंभे गिरे हैं, कुछ जगहों पर असामान्य गर्मी की वजह से ट्रांसफार्मर भी गड़बड़ाए हैं, लेकिन कुल मिलाकर जनता को बिजली की दिक्कत हो रही है, इसे अनदेखा करना खुद राज्य सरकार के लिए अच्छा नहीं होगा। लोगों का यह भी मानना है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को विधानसभा चुनाव के मुकाबले जो बड़ा नुकसान हुआ है, उसके पीछे लोगों की बिजली की दिक्कत भी कई वजहों में से एक वजह रही है। अभी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरगुजा विकास प्राधिकरण की बैठक में बिजली की शिकायतों को लेकर आधा दर्जन बिजली इंजीनियरों को निलंबित भी किया था, और उससे भी जाहिर है कि बिजली का मामला गड़बड़ तो है ही। 

ऐसी हालत में अगर जनता के बीच से कोई सरकार पर भ्रष्टाचार करके किसी साजिश के तहत बिजली गुल करने का आरोप भी लगा रहा है, तो उस पर कार्रवाई के लिए कुछ दूसरे साधारण कानून हो सकते हैं, और हमारे हिसाब से तो ऐसे कानूनों से भी कोई कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता तकलीफ के बीच अगर सरकार पर कोई आरोप लगाती है, तो सरकार में बर्दाश्त रहना चाहिए। ऐसे में जिस किसी की समझ से इस आदमी पर राजद्रोह के तहत जुर्म दर्ज करने की खबर है, वह समझ कानूनी रूप से कुछ कमजोर जान पड़ती है। राजद्रोह का अंग्रेजों का कानून हिन्दुस्तानी जनता को कुचलने के लिए बनाया गया था। राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि कांग्रेस सरकार में रहेगी तो राजद्रोह का कानून खत्म करेगी। राजनांदगांव में जिस दफा के तहत यह जुर्म दर्ज किया गया है, ठीक उसी दफा का जिक्र कांग्रेस के घोषणापत्र में था। और अभी चार दिन भी नहीं हुए हैं सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्वीट पर एक पत्रकार की गिरफ्तारी को लेकर योगी सरकार को जमकर फटकार लगाई थी, हालांकि जजों का कहना था कि उन्हें वह ट्वीट अच्छा नहीं लगा था, लेकिन अभिव्यक्ति का जवाब गिरफ्तारी नहीं हो सकती। 

ऐसे में भूपेश सरकार की इन दो जिलों की यह कार्रवाई चाहे जिस स्तर के अधिकारियों ने की हो, इन्हें तुरंत सुधारना चाहिए। अगर सरकार यह मानेगी कि बिजली की गड़बड़ी की खबरों को पोस्ट करना, या सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना जुर्म है, तो सरकार बिजली ठीक रखने की अपनी जिम्मेदारी से बचने का काम करेगी। लोकतंत्र में जनता की तरफ से आने वाली जायज, और नाजायज आलोचना भी, एक सबक और चेतावनी के रूप में लेनी चाहिए। राज्य सरकार को हमारी सलाह है कि अपने अधिकारियों पर काबू करे, और ऐसी कार्रवाई न करे जो कि न सिर्फ पूरी तरह अलोकतांत्रिक हैं, बल्कि जो अदालत में राज्य सरकार को शर्मिंदगी भी दिलाने वाली साबित होंगी। खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पिछले बरसों में विपक्ष के नेता के रूप में राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार के बहुत से आरोप लगाते आए हैं, और सरकारी इंतजाम के नाकाम रहने पर भी उन्होंने लगातार हमला बोला है। उनकी ऐसी सक्रियता ने ही उन्हें राज्य की सत्ता में आने का मौका दिया। इस ताजा-ताजा तजुर्बे को भूलकर जनअसंतोष पर ऐसी कड़ी कार्रवाई बिल्कुल ही नाजायज है, और मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से यह सिलसिला खत्म करना चाहिए, वरना अदालत में तो यह खत्म हो ही जाएगा। 
-सुनील कुमार


Date : 13-Jun-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछली भाजपा सरकार के वक्त शहर के सबसे व्यस्त इलाके में बनाए गए एक बहुत महंगे पैदलपुल को लेकर नई कांगे्रस सरकार बड़े असमंजस में है कि उसका क्या किया जाए? करीब 50 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, बरसों तक शहर का एक बड़ा हिस्सा सड़क के बीच निर्माण की दिक्कत झेल चुका है, और इस पर अभी शायद 25 करोड़ रुपये खर्च होना बाकी भी है। कांगे्रस पार्टी विपक्ष में रहते हुए लगातार इस स्काईवॉक का विरोध करते आई है, और अब भी पार्टी से लेकर मुख्यमंत्री तक का रुख इसे तोडऩे का है। सवाल यह उठता है कि इसे तोडऩे का मतलब पूरे का पूरा नुकसान है, और आगे पूरा करने का मतलब एक और बड़ा खर्च है, जिसके बाद भी यह अंदाज नहीं है कि वह किसी काम का रहेगा या नहीं। शहर के बड़े अस्पतालों, कोर्ट-कचहरी, कलेक्ट्रेट-सभागृह, जेल और सार्वजनिक पार्किंग जैसी जगहों को जोडऩे वाला यह पैदलपुल शुरू से कुछ विवादों में घिरा रहा कि इसका फैसला बिना विशेषज्ञ राय के लिया गया और इसकी योजना बहुत सोच-समझकर नहीं बनाई गई।

अब जितने मुंह, उतनी बातें। बहुत से लोगों को लग रहा है कि इसे तोड़ देना चाहिए, क्योंकि इसकी वजह से शहर के इस हिस्से की सड़कों के ऊपर गाडिय़ों के लिए फ्लाईओवर बनने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो जाती है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इसे एक बाजार बना देना चाहिए। लोगों की तकनीकी जानकारी कम रहती है, इसलिए एक सुझाव ऐसा भी आया है कि इसी स्काईवॉक पर बाद में मेट्रो ट्रेन भी चलाई जा सकती है। सरकारी विभाग और सत्तारूढ़ पार्टी सड़क पर लोगों से राय जान रहे हंै, और इनका पहले से घोषित रुख देखकर जाहिर है कि लोग उनकी मर्जी की ही राय अधिक दे रहे हैं।

खैर इस पैदलपुल का चाहे जो हो, इससे शहर को और प्रदेश को एक सबक तो लेना चाहिए कि बिना तकनीकी विशेषज्ञों की राय के सिर्फ सत्तारूढ़ नेताओं की व्यक्तिगत पसंद से जो बड़ी योजनाएं बनती हैं, वे बड़ी बर्बादी की वजह भी बनती हैं। इसी स्काईवॉक को लें तो इसे बनाने के पहले न तो म्युनिसिपल से इसकी इजाजत ली गई, और न ही टाऊनप्लानिंग से। नतीजा यह हुआ कि शहर में छोटे से छोटे निर्माण के लिए जिन विभागों से इजाजत लेनी होती है, उनसे कई किलोमीटर में फैले ऐसे फौलादी एनाकोंडा के लिए भी इजाजत नहीं ली गई। नतीजा यह हुआ कि सरकार के जिन जानकार विभागों को इस पर कुछ कहना था, उनके होंठ सिले हुए थे, और जिस विभाग को यह बड़ा ठेका देना था, वह विभाग बड़े उत्साह में था।

आज छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी में सरकारी जमीन पर दूसरी ऐसी कई बड़ी योजनाएं हैं जिनको बनाने के लिए म्युनिसिपल और विकास प्राधिकरण के बीच गलाकाट मुकाबला चल रहा है क्योंकि सैकड़ों करोड़ की योजनाओं से जुड़ा घोषित और अघोषित मुनाफा सबको मालूम है। शहर के सबसे घने एक इलाके में भैंसथान में एक कारोबारी इमारत, और पुरानी मंडी की जगह पर एक और कारोबारी केंद्र बनाने की बड़ी-बड़ी योजनाएं तैयार हैं, और इन दोनों के इर्दगिर्द चारों तरफ आज भी इनकी भीड़ के बिना भी सड़कें पूरी तरह, पूरे वक्त जाम रहती हैं। इसके बावजूद बरसों से स्थानीय नेता और अफसर पागलों की तरह इन योजनाओं के पीछे लगे हैं, और वे इसे शहर का विकास मान रहे हैं। इस शहर की बदनसीबी यह है कि यहां के निर्वाचित और मनोनीत नेता बरसों से इसे एक दुधारू गाय की तरह इस हद तक दुह रहे हैं कि दूध तो कब का निकला चुका है, अब गाय के थन से लहू निकल रहा है।

राज्य की कांगे्रस सरकार को शहरी विकास योजनाओं को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि शहर के बीच की खुली जगह एक बार खत्म हुई, तो मानो शहर के फेंफड़े का एक हिस्सा निकालकर फेंक दिया गया जो कि कभी वापिस नहीं लौटेगा। हमारे हिसाब से इस शहर को लेकर राज्य सरकार को एक लाईन का यह फैसला लेना चाहिए कि म्युनिसिपल सीमा के भीतर एक इंच का भी सरकारी निर्माण तब तक नहीं किया जाएगा जब तक किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक सुविधा के लिए वह जरूरी न हो। और अस्पताल या शौचालय किस्म के ऐसे निर्माणों के लिए भी सरकार को यह कड़ा फैसला लेना चाहिए कि पहले सरकार उतना हिस्सा किसी पुरानी इमारत को तोड़कर खाली करेगी, तभी वह किसी दूसरी जगह उतना निर्माण करेगी। जिस तरह पेड़ों की कटाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह नीति बनाई है कि मुआवजा-वृक्षारोपण किया जाए, और उसी शर्त पर जरूरी होने पर पेड़ काटे जाएं, इसी तरह राज्य सरकार को चाहिए कि घुटते दम वाले इस शहर में पहले कोई जर्जर सरकारी इमारत हटाए, और उसके बाद ही उतना ही निर्माण एम्बुलेंस, दमकल, या शौचालय जैसे इस्तेमाल के लिए करे। अपने खुद के दफ्तर या स्थानीय संस्थाओं की कारोबारी नीयत के लिए किसी भी किस्म का निर्माण अगर पूरी तरह बंद नहीं कर दिया गया, तो सरकार में बैठे लोग तो आज रिश्वत पा जाएंगे, लेकिन शहर हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगा। इस शहर में बसे हुए इंजीनियरों, और आर्किटेक्ट में से कुछ जागरूक लोगों को आगे आकर सरकार की गलत और खराब योजनाओं का खुलकर विरोध करना चाहिए, तभी जाकर यह शहर, या कोई भी और शहर बचेगा।
-सुनील कुमार


Date : 12-Jun-2019

केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तेजी से काम करने के लिए मशहूर हैं। महाराष्ट्र में मंत्री-मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने ऐसा कर दिखाया था और उस वक्त, उसके बाद, भाजपा के कुछ राज्यों में उन्हें निर्माण विभागों के मार्गदर्शन के लिए भी बुलाया जाता रहा है। अभी उनका एक शानदार बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि सरकार देश के बेरोजगार नौजवानों को काम देने के लिए देश भर के एक लाख किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों तरफ दो सौ करोड़ पेड़ लगाने जा रही है। उन्होंने कहा कि वे अफसरों से इसकी योजना बनाकर लेकर आने के लिए कह चुके हैं, इससे एक तरफ तो लाखों को रोजगार मिलेगा, और दूसरी तरफ पर्यावरण भी बचेगा। 

नितिन गडकरी ने दिल्ली में अभी इस बारे में कहा कि ऐसी ही एक योजना मनरेगा के तहत ग्रामीण और जिला सड़कों, और प्रादेशिक मार्गों के किनारे लागू की जा सकती है जिसमें हर बरस तीस लाख लोगों को रोजगार देने की क्षमता रहेगी। गडकरी ने कहा कि इसके लिए ग्राम पंचायतों को भी भरोसे में लिया जाएगा, और हर बेरोजगार नौजवान को पचास पेड़ों का जिम्मा दिया जाएगा जिनकी उपज से उनकी जिंदगी भी चलेगी। उन्होंने नदियों पर किए गए एक कार्यक्रम में बोलते हुए इस बात पर जोर दिया कि आज बारिश का जो साठ फीसदी पानी समंदर में चले जाता है, उसका एक चौथाई भी अगर भूजल री-चार्ज किया जा सके, तो उससे जल संकट दूर होगा, और लोगों को सिंचाई के अलावा घरेलू काम के लिए भी पानी दिया जा सकेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार बायोईंधन को बढ़ावा देकर पेट्रोल, डीजल, और गैस का आयात घटाने जा रही है जिससे छह लाख करोड़ रूपए सालाना बचेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनका विभाग दूसरे विभागों के साथ तालमेल करके गंगा-यमुना की सफाई की योजना बना रहा है। 

इस पूरे समाचार को पढ़कर जब इसे छापने की तैयारी की जा रही थी, तब एक छोटे से तथ्य पर जानकारी गई कि यह जून 2014 में छपा हुआ है, और न कि जून 2019 में। 

इस बयान को आज पूरे पांच बरस हो चुके हैं, और राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे कहीं पेड़ लगे हों ऐसा तो देखने में नहीं आया है। रोजगार गिरकर पिछले 45 बरसों में बेरोजगारी को सबसे ऊपर ले गए हैं। बेरोजगार नौजवानों को 50-50 पेड़ नहीं मिल पाए हैं, ठीक उनके खातों में 15-15 लाख रूपए की तरह। और गंगा-यमुना की सफाई पिछले पांच बरस में और घट चुकी है, और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगठन ताजा बदहाली पर फिक्र ही जाहिर कर रहे हैं। अभी तक कम से कम छत्तीसगढ़ में तो राज्य सरकार के स्तर पर ऐसी कोई भी चर्चा पिछले पांच बरस में सामने नहीं आई कि राजमार्गों और ग्रामीण सड़कों के किनारे मनरेगा से वृक्षारोपण करके उन्हें बेरोजगारों को सौंपा जाएगा, और 2014 से लेकर अब तक चार बरस तक इस राज्य में भाजपा की ही सरकार थी। 

जैसा कि हमने शुरू में ही लिखा है कि नितिन गडकरी तेजी से काम करने वाले मंत्री माने जाते हैं, और उनके कई ऐसे वीडियो तैरते रहते हैं जिनमें वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपनी योजनाओं और घोषणाओं पर सौ फीसदी अमल की बात कहते दिखते हैं। ऐसे में यह बात कुछ हैरान भी करती है कि एक लाख किलोमीटर के राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों तरफ वृक्षारोपण क्यों शुरू भी नहीं हो पाया, और यह बात तो जाहिर है ही कि ऐसा नहीं हो पाया इसलिए पर्यावरण को सम्हालने पर भी कोई काम नहीं हो पाया। पिछले लोकसभा चुनाव के समय लोग इस बात को उठा भी रहे थे कि भाजपा या एनडीए के पिछले पांच बरसों के वायदों पर भी कुछ सवाल-जवाब हो जाएं कि उनका क्या हुआ है, लेकिन ये बातें हिन्दुस्तानी बॉम्बर विमानों की गडग़ड़ाहट में दबकर रह गई थीं, यह तो भला हो अंग्रेजी अखबार द हिन्दू की इस पुरानी कतरन का जिसने ठीक पांच बरस पहले आज ही के दिन गडकरी की कही इन बातों को याद दिला दिया। गडकरी की इतनी शानदार घोषणा के साथ बस यही एक दिक्कत है कि वह पांच बरस पहले की है। 
-सुनील कुमार

 


Date : 11-Jun-2019

उत्तरप्रदेश में एक पत्रकार की ट्वीट को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए अपमानजनक करार देते हुए यूपी की पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था, और आज सुप्रीम कोर्ट ने इस पर राज्य को फटकार लगाते हुए उसे तुरंत रिहा करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस ट्वीट को पसंद नहीं किया है, लेकिन इस पर कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि उसे गिरफ्तार क्यों किया गया? किन धाराओं के तहत गिरफ्तारी हुई? अदालत ने पूछा कि इसमें शरारत क्या है? उल्लेखनीय है कि योगी के दफ्तर के बाहर एक महिला ने टीवी कैमरों के सामने खुलकर यह कहा था कि पिछले एक बरस से योगी से उनकी फोन पर बात हो रही है, जिसमें पे्रम की बात भी शामिल है, और अब वह योगी के साथ रहना चाहती है। इसके वीडियो को दिखाने वाले टीवी चैनल के पत्रकारों को भी यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया है, और इसे ट्विटर पर पोस्ट करने वाले प्रशांत कनौजिया नाम के इस पत्रकार को भी। इस पत्रकार की पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, और उस पर दो जजों की बेंच ने यह आदेश दिया है।

लोगों को याद होगा कि इसके पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की एक गढ़ी गई मजाकिया तस्वीर को पोस्ट करने पर बंगाल की एक भाजपा नेता को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, और उस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत उसकी रिहाई का आदेश दिया था। और भी कुछ राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं। इन दिनों सोशल मीडिया की वजह से पत्रकार भी अपने पेशेवर माध्यम से बाहर आकर भी लिखते हैं, पोस्ट करते हैं। दूसरी तरफ बहुत से स्वतंत्र पत्रकार भी सिर्फ सोशल मीडिया पर, या किसी वेबसाईट पर लिखते हैं। इन दोनों तबकों से परे अनगिनत लोग जो कि गैरपत्रकार हैं वे भी पत्रकारों से बेहतर भी लिखते हंै, और सोशल मीडिया पर अधिक मशहूर भी रहते हैं। कुल मिलाकर इंटरनेट और कम्प्यूटर ने मिलकर सोचने-समझने वाले भले और बुरे सभी किस्म के लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक नई ऊंचाई दे दी है, और इसके चलते सत्ता पर बैठे लोगों के लिए यह मुमकिन नहीं रह गया है कि वे एक-दो दर्जन मीडिया घरानों को प्रभावित करके तमाम आलोचनाओं से बच जाएं। ऐसे में सोशल मीडिया पर सक्रिय बहुत से गैरपत्रकारों को भी गिरफ्तार किया जा रहा है, और एक खबर के मुताबिक पिछले दो-चार दिनों में ही उत्तरप्रदेश में ऐसी कई गिरफ्तारियां हुई हैं।

दरअसल सत्ता का एक साईड इफेक्ट यह होता है कि उसका बर्दाश्त खत्म हो जाता है। ऐसे में अनगिनत लोगों को दबाव में लाने के लिए भी सत्ता के लोग कानूनों का इस्तेमाल करके ऐसे खोखले केस गढ़वाते हैं जो कि अदालत में जरा भी न टिकने वाले रहते हैं, लेकिन उनका मकसद अदालत में कुछ साबित करना नहीं रहता है, एक कानूनी-आतंक कायम करना रहता है। सुप्रीम कोर्ट का यह रूख देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने वालों के लिए हौसला लेकर आया है, और यह राज्य सरकारों या केंद्र सरकार के लिए एक चेतावनी भी लेकर आया है कि थानों के बेदिमाग और बददिमाग डंडों को चलाकर वे अपनी आलोचना के खिलाफ एक आतंक पैदा नहीं कर सकते। सभी राज्य सरकारों को इसे एक चेतावनी की तरह लेना चाहिए। खुद राहुल गांधी ने इस पर जो कहा है उसे भी देखना चाहिए- 'अगर मेरे खिलाफ झूठी या मनगढ़ंत रिपोर्ट लिखने वाले या आरएसएस/बीजेपी प्रायोजित प्रोपैगंडा चलाने वाले पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाए तो अधिकतर अखबार/न्यूज चैनलों को स्टाफ की गंभीर कमी का सामना करना पड़ सकता है। यूपी के सीएम का व्यवहार मूर्खतापूर्वक हैं और गिरफ्तार पत्रकारों को रिहा करने की जरूरत है।'

-सुनील कुमार


Date : 10-Jun-2019

अपने आसपास पिछले दो दिनों में दो बच्चों की आत्महत्याएं देखने मिलीं। एक गरीब मां-बाप की बेटी मोपेड पाने के लिए जिद कर रही थी, और पिता कोई इंतजाम नहीं कर पाया, तो उसने खुदकुशी कर ली। एक दूसरे परिवार में दुपहिया था, और कम उम्र लड़का उसे लेकर जाना चाहता था, मां-बाप ने उसे दुपहिया ले जाने की इजाजत नहीं दी, और उसने आत्महत्या कर ली। इन दोनों खबरों को देखकर दिल दहलता है कि बच्चों का क्या किया जाए? जो मां-बाप अपने बच्चों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई में जबर्दस्ती धकेलना चाहते हैं, और उसके दाखिले के इम्तिहान की तैयारी के लिए बच्चों को राजस्थान के कोटा जैसे कोचिंग-कारखाने में झोंक देते हैं, और वे बच्चे वहां आत्महत्या कर लेते हैं, उसमें तो मां-बाप की जिम्मेदारी समझ आती है। लेकिन आए दिन कहीं न कहीं से खबर आती है कि मां-बाप ने अधिक वक्त फोन पर गुजारने से मना किया, तो किसी बच्चे ने आत्महत्या कर ली, कहीं पसंद का मोबाइल खरीदकर मां-बाप नहीं दे पाए तो बच्चों ने आत्महत्या कर ली। 

समाज में आत्महत्या की खबरें जब आसपास बहुत अधिक तैरती हैं, तो बच्चों को वह एक विकल्प की तरह दिखने लगता है। इसलिए मनोवैज्ञानिक और परामर्शदाता अखबारों को भी यह सुझाते हैं कि आत्महत्या की खबरों को इतना अधिक या इतना बड़ा न छापा जाए कि वे दूसरे लोगों को अपनी समस्या का एक समाधान लगने लगें। लेकिन मीडिया के साथ अपनी दिक्कत है, खुद उसके लोग इतने सीखे हुए नहीं हैं कि वे खबरों के साथ ऐसा न्याय कर सकें, और समाज का इतना ख्याल रख सकें, इसलिए आत्महत्या की खबरें खासे खुलासे के साथ छपती हैं, बहुत से मामलों में तस्वीरों के साथ भी। लेकिन आत्महत्या की अधिक खबरें छात्रों से परे भी प्रेमी-जोड़ों की आती हैं, और उनके बारे में भी इस देश को गंभीरता से सोचने की जरूरत है। 

बहुत सी आत्महत्याएं तो ऐसी रहती हैं जिनमें परिवार के लोगों ने प्रेमी-जोड़े को शादी की इजाजत नहीं दी, और दोनों ने एक साथ जहर खाकर, एक साथ पटरी पर कटकर, या पेड़ से एक साथ टंगकर खुदकुशी कर ली। ये आत्महत्याएं पूरी तरह रोकने लायक हैं क्योंकि समाज और परिवार को अपने पुराने दकियानूसी नजरिए को बदलने की जरूरत है, बालिग नौजवानों को मर्जी से प्रेम-संबंध की इजाजत देने की जरूरत है, और ये खत्म हो जाएंगी। ये आत्महत्याएं रोकने लायक हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान के बहुत से समाज आज अपने परिवार की लड़की को मर्जी से प्रेम करते देखकर उसका कत्ल करके फख्र महसूस करते हैं, ऐसे परिवार किस तरह प्रेम या शादी की इजाजत देंगे? और ऐसे में जाहिर है कि हिन्दुस्तान में अगले कई दशक तक ये आत्महत्याएं बंद होने वाली नहीं हैं।

लेकिन बच्चों से लेकर बड़ों तक, और नौजवान प्रेमियों के बूढ़े मां-बाप तक, इन सभी को सामाजिक परामर्श की जरूरत है। देश में इतने मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता हैं नहीं कि पूरी आबादी की सोच सुधार सकें, इसलिए समाज के भीतर के दूसरे लोगों को ही आगे आकर सार्वजनिक मंचों से लोगों की सोच को बदलना होगा। दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान में धर्म और जाति के संगठन किसी भी सोच के संगठनों के मुकाबले हजार गुना अधिक मजबूत हैं, और धर्म-जाति की एकता उदारता पर नहीं टिकी रहती, कट्टरता पर टिकी रहती है। कट्टरता ही किसी धर्म या जाति के भीतर लोगों को बांधकर रखती है। इसलिए धर्म और जाति के मुखिया कट्टरता को कायम रखने और बढ़ाते चलने में भरोसा रखते हैं। ऐसे में इन संगठनों से परे के लोगों को ही प्रेम और विवाह को लेकर समाज की सोच बदलनी होगी।

दूसरी तरफ बच्चे अधिक संगठित रूप से स्कूल और कॉलेज आते-जाते हैं, वहां पर शिक्षकों के लिए यह आसान रहता है कि वे बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करे, और उन्हें किफायत से जीना भी सिखाएं। इसके लिए हो सकता है कि स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों को पेशेवर परामर्शदाता की तरह कुछ प्रशिक्षण देना भी जरूरी हो, लेकिन वह संस्थागत ढांचे में अधिक आसानी से हो सकता है, और किया जाना चाहिए। आज जब समाज में असमानता बढ़ते जा रही है, महंगे सामानों का छोटे-छोटे बच्चों में भी इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है तो बच्चों की हसरतें मां-बाप की क्षमता के बाहर जाकर सिर चढ़कर बोलना स्वाभाविक है, और उन पर काबू सिखाने की उतनी ही अधिक जरूरत भी है। 

आत्महत्याओं में एक और पहलू लिखने का रह गया है जो कि शादीशुदा जोड़ों में से किसी एक या दोनों के अवैध कहे जाने वाले विवाहेत्तर संबंधों का है। इस तरह के संबंध बड़ी संख्या में हत्या और आत्महत्या की वजह बन रहे हैं। इसके लिए भी सामाजिक स्तर पर समझ विकसित करने की जरूरत है, और साथ-साथ शादीशुदा जोड़ों के बीच संबंध ठीक रखने के लिए पेशेवर परामर्श की जरूरत भी है। आत्महत्या का यह आखिरी पहलू बहुत सी हत्याएं लेकर भी आता है, और इसलिए यह सबसे अधिक नुकसानदेह और खतरनाक है। इन सब बातों पर इस जगह पर लिखने की एक सीमा है, लेकिन समाज के जागरूक लोगों को इन मुद्दों पर अपने-अपने संगठनों, अपनी-अपनी संस्थाओं के मंच पर चर्चा करवानी चाहिए, और धीरे-धीरे ही समाज की सोच बदली जा सकती है, लोगों की सोच बदली जा सकती है, रातों-रात नहीं।
-सुनील कुमार


Date : 09-Jun-2019

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव ने कहा है कि सरकारी अस्पतालों का मैनेजमेंट सम्हालने के लिए अलग से मैनेजर या सीपीओ रखे जाएंगे। अभी सभी किस्म के छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों का गैरमेडिकल मैनेजमेंट भी डॉक्टर ही देखते हैं, और उनकी डॉक्टरी धरी रह जाती है। इतना ही नहीं बहुत से दूसरे दफ्तरों में भी फाईलों का काम निपटाने के लिए डॉक्टरों को जिम्मा दिया जाता है जिसमें उनका मेडिकल हुनर किसी काम का नहीं रहता। इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं, और अस्पतालों के साथ-साथ सरकारी कॉलेजों का यही हाल है जिनमें वरिष्ठ प्राध्यापक को प्राचार्य बनाने की परंपरा है, और कॉलेज का गैरशिक्षकीय मैनेजमेंट उन्हें देखना पड़ता है। पुलिस के छोटे-बड़े कई किस्म के कर्मचारियों-अधिकारियों को भी गैरपुलिसिया काम में लगाया जाता है, और यह सिलसिला तुरंत खत्म भी होना चाहिए। 

छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल, राजधानी रायपुर के मेकाहारा में हर दिन हजारों मरीज पहुंचते हैं, और यह प्रदेश का सबसे बड़ा कैंसर अस्पताल भी है। कैंसर के बड़े नामी-गिरामी वरिष्ठ चिकित्सक इस अस्पताल के अधीक्षक भी हैं, और उनके सिर पर लिफ्ट बनवाने से लेकर एसी सुधरवाने तक, धोबी और गार्ड का ठेका देने से लेकर दवा खरीदने तक, रंग-पेंट करवाने से लेकर पार्किंग के झगड़े निपटाने तक सौ किस्म के काम रहते हैं। हर महीने दसियों करोड़ रूपए के खर्च और बजट वाला यह अस्पताल चलाना प्रदेश के सबसे बड़े कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर पर एक अतिरिक्त बोझ है। जहां कैंसर मरीजों के लिए डॉक्टर ही काफी नहीं हैं, और मरीजों को लंबी कतार में लगकर इलाज और मौत दोनों का साथ-साथ इंतजार करना पड़ता है, वहां पर उनका विशेषज्ञ डॉक्टर एक ऐसे मैनेजमेंट में लगे रहता है जो कि कोई दूसरा प्रशासकीय अफसर बेहतर तरीके से कर सकता है, और किसी एक अफसर के लिए वह एक फुलटाईम काम से भी अधिक काम रहेगा। 

प्रदेश के तमाम बड़े अस्पतालों और जिला अस्पतालों के लिए अलग से एक प्रशासनिक ढांचा रहना चाहिए। आज सरकारी चिकित्सा सेवा में गांव-गांव तक डॉक्टरों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और जगह-जगह डॉक्टर गैरडॉक्टरी केकाम में लगे हैं। उसी तरह बड़े सरकारी कॉलेजों के लिए प्राध्यापकों से परे का एक मैनेजमेंट होना चाहिए। अगर कोई प्राध्यापक शिक्षा-मैनेजमेंट में जाना चाहते हैं, तो उन्हें आईआईएम जैसे किसी संस्थान से साल-छह महीने का कोई कोर्स करवाना चाहिए, और उसके बाद फिर उन्हें शिक्षा से अलग करके सिर्फ मैनेजमेंट में डालना चाहिए। छत्तीसगढ़ नया राज्य बनने के बाद हालत यह थी कि सरकारी कॉलेजों में जिन विषयों को पढ़ाने वाले बहुत सीमित थे, उनको भी उठाकर मंत्रालय या शिक्षा संचालनालय में रख दिया गया था। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होना चाहिए। 

आज कोई मुख्यमंत्री के बंगले पर पहुंचे, तो वहां रजिस्टर में मुलाकातियों का नाम लिखने का काम भी वर्दीधारी पुलिस करती है। जबकि इस काम में पुलिस का कोई इस्तेमाल नहीं है, और कोई साधारण टाइपिस्ट इस काम को बेहतर तरीके से कर सकते हैं। आन्ध्र में आज से दस-पन्द्रह बरस पहले बड़े शहरों के थानों में कम्प्यूटर पर पुलिस-रिपोर्ट लिखने के लिए पुलिस सेवा से बाहर के टाइपिस्ट रखे गए थे, जो अधिक तेजी से, बेहतर तरीके से कम्प्यूटर पर टाईप कर सकते थे। जिस काम में पुलिस के प्रशिक्षण की जरूरत न हो, वहां पर दूसरे हुनर के लोगों को रखा गया था। छत्तीसगढ़ में हम देखते हैं कि पुलिस अफसरों के घर-दफ्तर में चाय पिलाने का काम भी सिपाही करते हैं, दूसरी सौ किस्म की बेगारी भी सिपाही करते हैं। इनमें से किसी भी काम के लिए पुलिस के प्रशिक्षण, और इतनी तनख्वाह वाले कर्मचारियों की जरूरत नहीं रहती है। आम अर्दली जिस काम को कर सकते हैं, उसका पद शायद न रहने पर  उस काम में प्रशिक्षित पुलिस को झोंक दिया जाता है जो कि सरकारी साधन और क्षमता का निहायत बेजा इस्तेमाल है। 

भारत के अधिकतर राज्यों में सरकारी कामकाज पुराने ढर्रे पर चले आ रहा है, और लोग लीक से हटकर नए फैसले लेने की सोचते भी नहीं हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए और सरकार में ऊपर से नीचे तक तमाम कामों के बारे में देखना चाहिए कि लोग अपने बुनियादी काम, अपने बुनियादी हुनर से परे के किसी काम में अगर लगाए गए हैं, किसी काम में अगर उनकी लगातार तैनाती हो रही है, तो उसके लिए तुरंत एक बेहतर ढांचा तैयार करना चाहिए। एक तरफ तो प्रदेश के मरीज इलाज नहीं पा रहे, दूसरी तरफ डॉक्टरों से बाबूगिरी करवाई जा रही है। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 08-Jun-2019

मध्यप्रदेश के देवास के जंगलों में एक दर्जन से ज्यादा बंदरों की लाश मिली है। वहां गांव के लोगों ने वन विभाग को बताया तो अफसरों को पता लगा। अब अंदाज है कि जंगलों में पानी न रह जाने की वजह से बंदरों के बीच आपस में लड़ाई हुई होगी, और उसी में जख्मी होकर मरने वाले बंदरों की लाशें बिखरी मिली हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में जगह-जगह प्यासे हिरण जंगलों से निकलकर गांवों में पहुंच रहे हैं, और कहीं गांव वाले उन्हें मार रहे हैं, तो कहीं गांव के कुत्ते घेरकर हिरणों को मार रहे हैं। इनमें से बहुत कम खबरें पुलिस या वन विभाग तक पहुंचती हैं, क्योंकि गांव को लगता है कि कड़े नियम-कायदों के चलते लोगों की गिरफ्तारी हो जाएगी। जहां तक मुमकिन होता है, जंगलों के किनारे बसे हुए गांव ऐसे मामलों को दफन करने की पूरी कोशिश करते हैं, क्योंकि न तो जंगल अफसरों पर उनका भरोसा है, और न ही पुलिस पर। छत्तीसगढ़ के कई इलाकों से खबर आती है कि पानी की तलाश में, या खाने की तलाश में भालू गांव में घुस जा रहे हैं, कुएं में गिर जा रहे हैं, या पेड़ पर चढ़कर लोगों से अपनी जान बचा रहे हैं। भूख और प्यास से बेहाल जानवर जंगलों में जगह-जगह इंसानों से सामना होने पर अपनी जान बचाने की दहशत में उन पर हमले कर रहे हैं, और बहुत से लोग मारे जा रहे हैं। इन सबके अलावा इन दिनों छत्तीसगढ़ के जंगलों में जो सबसे बड़ा खतरा घूम रहा है, वह धरती के सबसे बड़े प्राणी हाथी का है। हाथी आए दिन कहीं न कहीं किसी को कुचल रहे हैं, किसी घर को तोड़ रहे हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में आज दर्जन भर हिरणों की लाश मिली है। जंगल में इनके पीने के पानी के गड्ढों में यूरिया घोलकर शिकारियों ने उसे जहरीला बनाया, और जंगल अफसरों का मानना है कि इसी पानी को पीकर हिरणों की मौत हुई है। 

छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों में हाथियों के आतंक को देखें तो एक बात बड़ी साफ समझ आती है कि सरगुजा और कोरबा जैसे इलाकों में हाथियों ने जगह-जगह इंसानों को मारा है। लेकिन महासमुंद और उसके आसपास के इलाकों में हाथियों ने डेरा जरूर डाला है, लेकिन आमतौर पर उन्होंने इंसानों को नहीं मारा है, या ऐसी घटनाएं बहुत कम हुई हैं। इन दोनों इलाकों के बीच जानकार लोग एक फर्क बताते हैं कि जहां हाथियों के खाने के लिए पेड़ों के पत्ते और चारा पर्याप्त हैं, वहां वे आक्रामक नहीं हो रहे हैं। लेकिन जहां पर उन्हें खाने-पीने नहीं मिलता, वहां वे भूख-प्यास के चलते आक्रामक और हिंसक हुए जा रहे हैं। यह एक बड़ा साफ-साफ फर्क बताता है कि जंगली जानवरों के खाने-पीने के साधनों को भी, उनके लिए हरियाली या शिकार करने के इलाकों को भी जब इंसान बर्बाद कर रहे हैं, जंगलों की अवैध कटाई कर रहे हैं, तो जानवर आबादी की तरफ बढ़ रहे हैं, मकान और फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं, और सामने पडऩे पर इंसानों की जिंदगी भी जा रही है। 

छत्तीसगढ़ जंगलों से भरा हुआ एक राज्य था, और सत्ता पर बैठे हुए लोगों की करवाई हुई अवैध कटाई, या लकड़ी के कारोबारियों के साथ अफसरों की मिलीभगत के चलते जंगल घटते चले गए। ना जाने कौन से उपग्रह फोटो दिखाकर यह साबित किया जाता है कि छत्तीसगढ़ में जंगल बढ़े हैं, जबकि चारों तरफ हकीकत यह है कि जंगल घट गए हैं, और जंगली जानवर बेघर हो गए हैं। वन विभाग को जंगली जानवरों की रखरखाव के लिए, उनके लिए पानी का इंतजाम करने के लिए जो बड़ा बजट केन्द्र और राज्य से मिलता है, वह वन विभाग के आम और व्यापक भ्रष्टाचार में बंट जाता है, और जंगली जानवर अफसरों का मुंह ताकते रह जाते हैं। राज्य सरकार को अपने इस एक सबसे ही भ्रष्ट विभाग को सम्हालना चाहिए, और वन्य प्राणी संरक्षण का जिम्मा किसी ऐसे अफसर को देना चाहिए जिसमें ईमानदारी कुछ बाकी हो, और जो संवेदनशील भी हो। आज जैसी हालत है, उसके चलते जंगल तो रातों-रात खड़े नहीं होंगे, जंगली जानवर जरूर अपनी भूख-प्यास को लिए हुए गांव-कस्बे और शहर तक आकर खड़े हो जाएंगे। पूरे प्रदेश में जगह-जगह पशुप्रेमी लोग वन विभाग के भ्रष्टाचार को लेकर सरकार और हाईकोर्ट में खड़े ही रहते हैं, लेकिन यह विभाग अब आरोपों के प्रति संवेदना खो चुका है, ठीक उसी तरह जिस तरह वह जंगलों के लिए, पेड़ों के लिए, और जंगली जानवरों के लिए संवेदना खो चुका है। यही वजह है कि इस विभाग में अभी पिछली रमन सरकार के चलते हुए एक-एक वन संरक्षक की पोस्टिंग के लिए एक-एक करोड़ रूपए का लेन-देन होने की चर्चा रहती थी, और नीचे के अफसरों में भी उसी अनुपात में कम लेन-देन से उन्हें कमाने वाली कुर्सियां मिलती थीं। ऐसे भ्रष्ट विभाग को कम भ्रष्ट बनाना भी मौजूदा सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। और आज की सरकार इस बात को भी ठीक से समझ ले कि भ्रष्टाचार केवल पिछली सरकार का खबरों में नहीं आता था, आज की सरकार भी अगर उसी रास्ते चलेगी, तो लोगों की नजरें आज भी सरकार पर हैं, और यह भी मानकर चलना चाहिए कि भूखे-प्यासे जंगली जानवरों की बद्दुआ भी कम असर नहीं रखती।
-सुनील कुमार


Date : 07-Jun-2019

हिन्दुस्तानी सड़कों पर हादसों में हर बरस लाखों मौतें होती हैं। डेढ़ लाख से अधिक मौतें 1915 में दर्ज हुई थीं, और वे तुरंत होने वाली मौतें थीं। दुर्घटना के जख्मों से कुछ समय बाद मरने वालों के आंकड़े इसमें शामिल नहीं थे। अपने आसपास हम देखें तो एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता है जब सड़क-मौतों की खबरें न आएं। अभी तीन दिन पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर में देर रात ढाबे पर आते-जाते एक मोटरसाइकिल पर सवार चार नौजवानों को कुचलते हुए कोई बड़ी गाड़ी भाग गई। अभी जब यह बात लिखी ही जा रही है, तो छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके से खबर आ रही है कि वहां एक दुपहिए पर सवार चार लोगों को एक मुसाफिर बस की टक्कर लगी, और चारों लोग मारे गए। अब जब एक दुपहिए पर चार बड़े लोग सवार होकर जा रहे हैं, तो गलती सिर्फ बड़ी गाड़ी की हो यह सोचना भी गलत है। लेकिन प्रदेश सड़क हादसों से कुछ सीख रहा हो ऐसा पिछले कई दशकों में नहीं लगा है। 

हिन्दुस्तानी सड़क हादसों के पीछे कुछ बहुत जाहिर सी वजहें हैं, और ये सारी की सारी टाली जा सकती हैं अगर सरकार और जनता दोनों के बीच अपनी जिम्मेदारी का अहसास थोड़ा सा बढ़ जाए। पिछले दो दशकों में भारत में गाडिय़ों की रफ्तार लगातार बढ़ती चली गई है क्योंकि दुनिया भर की कंपनियां यहां आईं, और तेज रफ्तार मॉडल लेकर आईं। दूसरी तरफ देश की औसत संपन्नता बढऩे से लोगों के बीच दारू पीना भी बढ़ा है। तीसरी बात यह कि सड़कें चौड़ी हुई हैं, पुल बने हैं, और लोगों को रफ्तार बढ़ाने का मौका भी मिल रहा है। इन सबसे ऊपर की बात यह है कि ट्रैफिक नियम लागू करने से जुड़े दो विभाग, आरटीओ, और ट्रैफिक पुलिस, तकरीबन सारे हिन्दुस्तान में बाकी विभागों के मुकाबले बहुत अधिक भ्रष्ट हैं। मध्यप्रदेश के आरटीओ के बारे में तो केन्द्रीय मंत्री नितीन गडकरी ने कुछ समय पहले कहा था कि ये चंबल के डाकुओं से बड़े लुटेरे हैं। और अपने आसपास जब हम देखते हैं तो यहां भी आरटीओ का हाल इससे जरा भी बेहतर नहीं दिखता है। 

छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में आज से 25-30 बरस पहले सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस का जितना काबू रहता था, उसका एक हिस्सा भी आज नहीं दिखता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सिर्फ ट्रैफिक सिग्नल, कैमरे लगाने जैसे खर्च हो रहे हैं, सड़कों पर सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना खर्च हो रहे हैं, लेकिन या तो ट्रैफिक पुलिस जरूरत जितनी नहीं है, या वह बेकाबू है, और बेअसर है। पहले के मुकाबले अभी ट्रैफिक नियम तोडऩे वाले अधिक दुस्साहसी दिखते हैं, और पुलिस महज उन्हें देखते हुए दिखती है। पूरे प्रदेश में शराब के नशे में गाडिय़ां चलाना बढ़ते चले जा रहा है, ट्रक और बस जैसे कारोबारी वाहन अंधाधुंध मनमानी कर रहे हैं, और जब कारोबारी गाडिय़ां कानून तोड़ती हैं, तो वह पुलिस और आरटीओ के साथ एक संगठित भ्रष्टाचार का सतह पर तैरता हुआ सुबूत होता है। 

सरकार अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी करे, तो मौतें बहुत हद तक थम सकती हैं, और सरकार की कमाई भी बढ़ सकती है। दूसरी तरफ लोगों के बीच जागरूकता न बढऩे से लोग हेलमेट-सीट बेल्ट के बिना चलते हैं, पिए हुए चलाते हैं, और रफ्तार को बेकाबू भी रखते हैं। यह पूरा सिलसिला सुधारने की जरूरत है। गाडिय़ों के रजिस्ट्रेशन से सरकार को होने वाली कमाई का एक अनुपात सीधे-सीधे ट्रैफिक पुलिस पर खर्च करना चाहिए। और पर्याप्त ट्रैफिक पुलिस तैनात करके नियम तोडऩे वालों की गाडिय़ां जब्त करने, और उनके ड्राइविंग लाइसेंस रद्द करने का काम भी बड़ी कड़ाई से करना चाहिए। किसी को भी ऐसी रियायत देने का सरकार को भी हक नहीं है जिससे वे लोग सड़क पर दूसरे पाबंद लोगों के लिए भी खतरा बनते हों। सड़कों पर नियम तोडऩे वाले महज खुद नहीं मरते हैं, औरों को भी मारते हैं, इसलिए इस मामले में उन पर दूसरों की जिंदगी खतरे में डालने के कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। जो मां-बाप छोटे-छोटे बच्चों को गाडिय़ां देते हैं, उन्हें भी तगड़े जुर्माने के साथ-साथ कुछ दिनों के लिए कैद भी होनी चाहिए। हमारा ख्याल है कि कुछ-कुछ दिनों के लिए अगर लोगों का जेल जाना होने लगेगा, तो उनके आसपास के सैकड़ों लोग सहम भी जाएंगे, और सुधर भी जाएंगे। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Jun-2019

आए दिन किसी न किसी प्रदेश से किसी विधायक, मंत्री, या सांसद का वीडियो तैरने लगता है जिसमें वे लोगों को धमकाते दिखते हैं, कहीं किसी को लात मारते दिखते हैं, साम्प्रदायिकता की नफरत फैलाते दिखते हैं, और महिलाओं के लिए अपमान की हिंसक बातें करना तो मानो सबसे ही लोकप्रिय काम नेताओं के बीच है। ऐसे में कहीं-कहीं पुलिस में केस दर्ज होता है जो कि ताकतवर के खिलाफ तो एक पूरी पीढ़ी निकल जाने तक नहीं निपट पाता, और कहीं-कहीं पार्टी अपने नेताओं को मामूली सी झिड़की देकर अपने हाथ झाड़ लेती है। लेकिन इससे परे एक संस्था और ऐसी है जिसे अपना घर सुधारने की जरूरत है। 

संसद और विधानसभाओं के सदस्य छोटी-छोटी बात पर कहीं किसी अफसर के खिलाफ विशेषाधिकार भंग का मामला ले आते हैं कि उन्हें सुविधा नहीं मिली, कहीं वे किसी अखबार के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मामला सदन में पेश कर देते हैं कि उसमें छपी हुई कोई बात उनका अपमान करती है, या सदन का अपमान करती है। लेकिन क्या कभी संसद और विधानसभाओं जैसे सदन इस बात पर सोचते हैं कि उनके सदस्यों की हरकतें आम जनता का कितना अपमान करती हैं, और इस तरह खुद सदन का कितना अपमान करती हैं? सदन के बाहर के लोगों को नोटिस देकर उनसे माफी मंगवाना तो आसान बात है क्योंकि संसद और विधानसभा को ऐसे विशेषाधिकार मिले हुए हैं कि वे किसी को कैद भी सुना सकते हैं। लेकिन इस तरह बांह मरोड़कर माफी मंगवाने से परे क्या कभी संसद और विधानसभा यह सोचते हैं कि उसके सदस्यों के आचरण से उसकी इज्जत कैसे मिट्टी में मिलती है? 

सांसद और विधायक अक्सर ही गाडिय़ों के नंबर प्लेट के नियम तोड़ते हुए, बिना इजाजत सायरन लगाकर उसे बिना जरूरत बजाते हुए दिखते हैं। छोटे पुलिस कर्मचारियों को आतंकित करने के लिए सांसद या विधायक की बड़ी-बड़ी सी तख्तियां लगा दी जाती हैं। और ऐसी तमाम गाडिय़ां संसद और विधानसभाओं के अहातों में पहुंचती भी हैं। हमारा सोचना है कि जिस सदन को भी अपने आपको सम्माननीय बनाकर रखना है, उसे अपने सदस्यों के चाल-चलन, उनके आचरण, और उनके बर्ताव को लेकर जागरूक रहना चाहिए। जब कोई सांसद या विधायक अलोकतांत्रिक या अशोभनीय बर्ताव करते हैं, तो वे सदन का इतना बड़ा अपमान करते हैं जितना कि कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकते। हर सदन को ऐसी शिकायत कमेटी भी बनाना चाहिए जिसके सामने आम जनता शिकायत रख सके कि सदन के सदस्यों ने उनके साथ क्या गलत किया है, और उसके सुबूत पेश कर सकें। संसद और विधानसभा अगर अपने आपको विशेषाधिकारों से घिरा हुआ टापू बनाकर बने रहना चाहते हैं, तो उनका सम्मान नहीं हो सकता। वे कड़े कानून बनाकर अपने को सम्मान दिलाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन जनता के मन से ऐसे लोगों के प्रति सम्मान नहीं निकल सकता जो कि आम लोगों को धकेलते हुए, सायरन बजाते हुए सड़कों से निकलते हैं। 

लोकतंत्र में संसद हो, सरकार हो, या न्यायपालिका हो, इन सभी संस्थाओं का दर्जा आम जनता के बुनियादी हक से नीचे ही रहेगा। जनता ही नहीं रहेगी तो लोकतंत्र की ये संस्थाएं क्या खाकर काम करेंगी? ऐसे में अपने आपको जनता की पहुंच से परे रखना, जनता से संवाद न रखना ठीक नहीं है। यह याद रखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में भी जनहित याचिका दायर करने का स्पष्ट प्रावधान है, और देश के बहुत से ऐतिहासिक फैसले जनहित याचिकाओं पर ही हुए हैं। ऐसे में संसद और विधानसभाओं को भी अपने आपको जनहित याचिकाओं के लिए खोलना चाहिए। बहुत से ऐसे मामले हो सकते हैं जिनमें बड़े कारोबारी हित जुड़े हों, और संसद या विधानसभा के सभी या अधिकतर दल उस मामले को न उठाएं। ऐसा राज्य की विधानसभा में अधिक मुमकिन रहता है जहां कम पार्टियां रहती हैं, और कारोबारी दोनों-तीनों पार्टियों को साध लेते हैं। ऐसे में बंधक रखा गए लोकतंत्र को आजाद करने के लिए जनता को भी अपनी आवाज सदन तक पहुंचाने का एक रास्ता खुला रहना चाहिए। यह एक पारदर्शी व्यवस्था रहनी चाहिए जिसे बाकी जनता भी देख सके। कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडेय ने ऐसी एक सोच सामने रखी थी, और फिर बाद में उसका पता नहीं क्या हुआ। छत्तीसगढ़ के मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरण दास महंत को इस बारे में पक्ष-विपक्ष से चर्चा करके जनता को एक हक देना चाहिए। ऐसी भागीदारी से विधानसभा का सम्मान बढ़ेगा, और किसी विधायक का बर्ताव सही न रहने पर उसके बारे में विधानसभा तक शिकायत करने का भी एक रास्ता निकलेगा। जनता को अपने मुद्दे सदनों में उठाने का एक मौका जरूर मिलना चाहिए, और सदन की कोई समिति ऐसी जनहित याचिकाओं पर विचार करने के लिए बनाई जा सकती है। 
-सुनील कुमार


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