संपादकीय

Posted Date : 22-Jul-2018
  • भारत के पड़ोस का पाकिस्तान चुनाव से गुजर रहा है। राजनीतिक दल तो अपने नेताओं के जेल के बाहर या जेल के भीतर रहते हुए मुकाबले में हैं ही, उनसे परे आतंकी संगठन भी चुनाव लड़ रहे हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि इस चुनाव में फौज का बड़ा दखल माना जा रहा है। पाकिस्तान में जम्हूरियत की जड़ें कभी मजबूत नहीं हो पाईं और कई बार चुनाव हुए, उनके बीच कई बार फौजी हुकूमत भी कायम हुई और कम से कम एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री को वहां फौजी तानाशाह ने फांसी पर भी चढ़ा दिया। एक और भूतपूर्व प्रधानमंत्री को घरेलू आतंकी हमले में उड़ा दिया गया, जिसके पीछे उसके अपने कुनबे से लेकर फौज तक की दखल का अंदेशा जाहिर किया गया, और अच्छी बात यही रही कि किसी ने इस हमले और कत्ल के पीछे हिंदुस्तान या किसी विदेशी हुकूमत पर तोहमत नहीं लगाई। इस बार तो पाकिस्तान के चुनावों में सुर्खियां बताती हैं कि किस तरह इमरान खान की पार्टी इमामों के रहमो-करम पर चल रही है, नवाज शरीफ की पार्टी उनके जेल में रहते हुए भी मजबूती से मैदान में डटी हुई है। और इस पूरी राजनीति में फौजी दखल सिर चढ़कर बोल रही है। 
    यह कहने के लिए हमारे पास पाकिस्तान के हाईकोर्ट के एक जज का ताजा बयान है जो कि उन्होंने रावलपिंडी बार एसोसिएशन में कल ही अपने भाषण में दिया है। उन्होंने खुलकर कहा कि देश की ताकतवर फौजी खुफिया एजेंसी आईएसआई अदालतों से अपनी मर्जी के फैसले पाने के लिए चीफ जस्टिस और बाकी जजों पर दबाव डाल रही है। इस जज, शौकत सिद्दीकी ने यह भी कहा कि आईएसआई ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के मामले में भी चीफ जस्टिस और बाकी जजों पर दबाव बनाया था। यहां यह जिक्र जरूरी है कि पिछले दिनों नवाज शरीफ और उनकी बेटी को भ्रष्टाचार के आरोपों में कैद सुनाई गई है, और यह जानते हुए भी वे देश लौटे और जेल गए। 
    जज शौकत सिद्दीकी ने कहा कि आईएसआई न्याय प्रक्रिया और मीडिया दोनों पर काबू रख रही है। उन्होंने कहा कि आज के दिन कोर्ट आजाद नहीं है, और मीडिया को भी सेना से हुक्म मिल रहे हैं। मीडिया सच बयां नहीं कर रहा है, और वह भी फौज के दबाव में है। उन्होंने यह भी कहा कि आईएसआई ने अपने पक्ष में फैसले के लिए पसंदीदा बेंच बनवाई और जज से कहा कि चुनाव से पहले नवाज शरीफ और उनकी बेटी जेल के बाहर नहीं आने चाहिए।
    पाकिस्तान की हुकूमत में फौज का ऐसा दखल अनसुना नहीं है। वहां हमेशा से सरकार को फौज के साथ तालमेल करके चलना पड़ा है, और कई मौकों पर फौज के फैसलों को मानना भी पड़ा है। ऐसा न होने पर फौज ने चुनी हुई सरकार को हटाकर अपनी हुकूमत भी बना डाली है। लेकिन फौज के ऐसे हाल को देखते हुए पाकिस्तान के आसपास के दूसरे देशों को कुछ सोचना चाहिए, अपनी कुछ फिक्र करनी चाहिए। हिंदुस्तान के हालात वैसे तो बहुत अलग हैं, लेकिन हाल के बरसों में फौज और फौज के मामलों को जिस तरह चुनाव का मुद्दा बनाया गया, जिस तरह रिटायर्ड फौजियों को राजनीति में लाया गया, जिस तरह फौज को राष्ट्रवादी उन्माद को बढ़ाने के लिए लोकतंत्र से ऊपर बताने की कोशिश की गई, जिस तरह राजनीतिक बयानबाजियों में फौज को गौरवान्वित करके दूसरी पार्टियों को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है, उससे एक खतरनाक नौबत की तरफ यह लोकतंत्र बढ़ रहा है। जिस तरह पिछले बरसों में पड़ोसी देशों खासकर पाकिस्तान और चीन के बारे में बयान देने के लिए मौजूदा फौजी अफसरों का इस्तेमाल हिंदुस्तान में किया गया है, जिस तरह उनसे जंग के फतवे दिलवाए गए हैं, वह लोकतंत्र में फौज के एक गैरफौजी किरदार की जगह देने जैसा गलत काम हुआ है। भारत का लोकतंत्र बहुत मजबूत है और यहां पर फौज को सरकार के मातहत काम करने की लंबी आदत है। ऐसे में सियासती मामलों में न तो फौज के जिक्र का हथियार इस्तेमाल करना चाहिए, और न ही फौज को खुद होकर अपनी बैरकों से बाहर बयानबाजी में झोंकना चाहिए। 
    पता नहीं भारत के आज के संवैधानिक ढांचे में रिटायर्ड फौजी अफसरों के चुनाव लडऩे पर कोई रोक क्यों नहीं है, लेकिन हमारा मानना है कि अगर फौज को इस लोकतंत्र में राजनीति से परे रखना है, तो रिटायर होने के बाद भी फौजी अफसरों के चुनावी राजनीति में आने पर रोक लगनी चाहिए। ऐसा न होने पर फौज में रहते-रहते अफसरों में एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा आ सकती है जो कि किसी दिन लोकतंत्र को कमजोर करेगी। अपने-आपको ठोकर लगने के बाद तो संभलने की कोशिश हर कोई करते हैं, लेकिन पड़ोस के हाल को देखकर अगर हिंदुस्तान समय रहते नसीहत ले सके, तो उसे लेना चाहिए और फौज का राजनीतिक जिक्र करना बंद करना चाहिए, फौज से राजनीतिक बयान दिलवाना बंद करना चाहिए।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 21-Jul-2018
  • संसद में कल कांग्रेस के सांसद और पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने एक जोशीले भाषण के बाद पता नहीं क्या सोचकर जाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्यार की झप्पी देने के अंदाज में गले लगाया, और आकर खुद ही उसका मजा लेते हुए बैठ गए। इसके बाद लोकसभा के भीतर के कैमरों ने यह भी दर्ज किया कि किस तरह खुद ही मुस्कुराते हुए राहुल गांधी अपनी पार्टी के किसी सांसद की तरफ देखकर आंख मार रहे हैं, मानो यह कह रहे हों कि कैसी रही? 
    सत्ता और विपक्ष के बीच संसद में पिछले कुछ बरसों से जिस कदर की तनातनी चल रही है, उसे देखते हुए प्यार की यह झप्पी एक बड़ी अनोखी बात रही, और अटपटी बात भी रही। इसके कई मतलब निकाले जा सकते हैं, और राहुल गांधी ने खुद इसका एक मतलब बताया भी है कि वे मोदी के मन से नफरत हटाकर मोहब्बत भर देंगे, उन्होंने कहा कि आपके मन में मेरे लिए नफरत है, लेकिन मेरे मन में आपके लिए नफरत नहीं है। जो भी हो, संसद को छोड़कर जाने से बेहतर है गले लगना। और फिर मोदी तो गले लगने के ऐसे काम के भारी शौकीन हैं, और अब तक दुनिया के दर्जनों राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मोदी को अपने गले लगते पा चुके हैं। हमारा ऐसा ख्याल है कि मोदी दुनिया के सबसे अधिक गले मिलने वाले प्रधानमंत्री कबके बन चुके हैं यह एक अलग बात है कि देश के भीतर उनका आलिंगन लोगों को कम ही नसीब होता है। 
    संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बहुत से दूसरे नेताओं के अलावा राहुल गांधी ने भी बहुत सी बातें कहीं, और उनके जवाब में मोदी और भाजपा के कई लोगों को कई गुना अधिक बोलने का मौका इसलिए भी मिला क्योंकि संसद में सदस्य संख्या के अनुपात में पार्टियों को वक्त मिलता है। इसलिए कांग्रेस के मुकाबले करीब दस गुना समय भाजपा को मिला होगा, और पार्टियों ने अपनी घोषित रीति-नीति के मुताबिक बहुत सी बातें कहीं। लेकिन बाकी बातों से परे जिस एक बात को हम देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण मान रहे हैं, वह है महिला आरक्षण। संसद सत्र शुरू होने के पहले राहुल गांधी ने बाहर ही कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री से कहा था कि वे महिला आरक्षण विधेयक लेकर आएं, उस पर मतदान करवाएं, और कांग्रेस उस पर साथ देगी। 
    हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि अभी पिछले पखवाड़े ही हमने इसी जगह इस मुद्दे पर लिखा था कि हिंदुस्तान में महिला आरक्षण विधेयक अब खबरों के भी बाहर हो गया है। अब इसे संसद में गुजरे भी दस बरस हो गए हैं। राज्यसभा ने इसे 2010 में पास कर दिया था लेकिन लोकसभा ने इस पर कभी वोट नहीं किया। जबकि इसी संसद ने देश की पंचायतों और म्युनिसिपलों के लिए महिला आरक्षण कानून 1993 में ही बना दिया। अब उसे पच्चीस बरस हो गए हैं। जिस देश की संसद जानती और मानती है कि देश के हर गांव में महिला पंच, दलित महिला पंच, आदिवासी महिला पंच ओबीसी महिला पंच मिल सकती है, उस संसद को विधानसभा सीट और लोकसभा सीट पर महिला प्रतिनिधि मिलने की उम्मीद नहीं है। यह संसद का एक मर्दाना पाखंड है। जिस संसद में इसी दौर में सोनिया गांधी, मायावती, ममता बैनर्जी जैसी महिला मुखिया रही हों, उस संसद ने महिला आरक्षण की चर्चा ही छोड़ दी। आज अगर ये तीन महिलाएं एक साथ उठ खड़ी हों, तो बाकी पार्टियों को भी महिला आरक्षण, मजबूरी में ही सही, मानना पड़ेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि सत्ता की ताकत पाने के बाद भारत की महिला नेताओं के भीतर भी मर्दाना मिजाज कब्जा कर लेता है,और महिलाओं की चर्चा बंद हो जाती है।
    इस देश ने समय-समय पर तरह-तरह के गैर राजनीतिक या बहुदलीय आंदोलन देखे हैं। आज जब अगला आम चुनाव एक बरस दूर है, तो ऐसे ही एक आंदोलन की जरूरत है जिसे 2018 का कोई जेपी, कोई अन्ना, कोई केजरीवाल, कोई भी शुरू करे। यह आंदोलन ऐसी जागरूकता खड़ी करे कि मतदाता सिर्फ महिला उम्मीदवार को वोट करें। अगर किसी सीट पर दो महिलाएं हैं तो वे मर्जी से छांटें, अगर कोई अकेली महिला है, तो सिर्फ उसे वोट दें। एक बार अगर ऐसा आंदोलन जोर पकड़ लेगा तो अगले चुनाव के पहले महिला आरक्षण लागू हो चुका रहेगा। देश भर में लोग आज से सांसदों को घेरें, पार्टियों के नेताओं को घेरें और महिला आरक्षण पर सवाल पूछें, उन्हें मजबूर करें।
    अपने इस तर्क को एक पखवाड़े के भीतर ही यहां पर दुहराते हुए हम यह कहना चाहते हैं कि कांग्रेस सहित वे तमाम पार्टियां जो महिला आरक्षण की हिमायती हैं, उन्हें संसद के इसी सत्र में इस विधेयक पर जोर देना चाहिए, और इस बार यह खुलकर साबित हो जाए कि कौन महिला आरक्षण के पक्ष में है, और कौन उसके खिलाफ।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 20-Jul-2018
  • कई बार लोगों की चुप्पी उनकी कही बातों से अधिक सिर चढ़कर बोलती है। पिछले दिनों ऐसे दो मामले सामने आए। असम की बेटी हिमा दास ने एक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में देश के लिए पहला एथलेटिक गोल्ड मैडल हासिल किया तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिमा के वीडियो के साथ ट्वीट किया। उन्होंने खेल में प्रदर्शन या गोल्ड मैडल पाने, इस कामयाबी को हासिल करने पर तो कुछ नहीं कहा, उनकी ट्वीट में महज यही था कि किस तरह यह खिलाड़ी जीतने के बाद राष्ट्रीय ध्वज ढूंढती-मांगती रही, और राष्ट्रगान के समय उसका उत्साह कैसा था। प्रधानमंत्री से यह उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे मौके पर खिलाड़ी के प्रदर्शन पर कुछ कहें, अगर ऐसी खिलाड़ी एक गरीब परिवार से आई है तो वहां से ऊपर उठने के बारे में कुछ कहें। लेकिन मोदी की ट्वीट महज राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय भावना के प्रतीक राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के गौरव तक सीमित रह गई। इन बातों के लिए तारीफ अच्छी लगती अगर वे इसके साथ-साथ खेल के बारे में भी कुछ कहते। खेल के बारे में चुप्पी खटकने की तरह दिखती रही। ऐसा ही दूसरा मामला ट्विटर पर ही सामने आया जिसमें एक वरिष्ठ पत्रकार ने स्वामी अग्निवेश पर हमले की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा कि वे एक वक्त हरियाणा में मंत्री भी थे, और सुषमा स्वराज उस वक्त उनकी डिप्टी मिनिस्टर थीं। इसके जवाब में सुषमा ने तुरंत ही लिखा कि वे कैबिनेट मंत्री थीं, और कभी किसी की डिप्टी नहीं रहीं। लेकिन अपने ही पुराने मंत्रिमंडलीय साथी और एक हिन्दू पर हुए ऐसे शर्मनाक हमले के बारे में सुषमा ने एक लाईन भी नहीं कही, और हमले पर उनकी चुप्पी सिर चढ़कर बोलने लगी, ट्विटर पर कुछ जिम्मेदार लोगों ने तुरंत इसके बारे में लिखा। 
    जब देश में जुल्म हो रहा हो, तब लोग, इस देश के प्रमुख लोग अगर दूसरे देशों के मामलों पर तो हमदर्दी ट्वीट करें, लेकिन देश के मामलों पर चुप रहें, तो वह चुप्पी चीख-चीखकर बोलती हुई सुनाई देती है। भारत में इन दिनों ऐसा बहुत हो रहा है। एक बड़े नेता से जब प्रधानमंत्री की चुप्पी के बारे में एक अनौपचारिक चर्चा में पूछा गया तो उनका जवाब था कि अगर हमारी ही पार्टी के राज में कोई ऐसा मामला होता है, तो प्रधानमंत्री बोल भी क्या सकते हैं? क्या अपनी पार्टी की सरकार के खिलाफ बोलें? आखिर पार्टी भी तो चलानी है। 
    यह सोच प्रधानमंत्री के ओहदे को, या किसी केन्द्रीय मंत्री, किसी मुख्यमंत्री के ओहदे को घटाकर महज एक पार्टी का छोटा सा तंगदिल नेता बनाकर रख देती है। लोगों को सार्वजनिक जीवन में आने के बाद बहुत तुरत नफा और नुकसान से परे भी सोचना चाहिए क्योंकि सार्वजनिक जीवन का यह तकाजा रहता है, और जब किसी ओहदे की संवैधानिक शपथ ली जाती है, तो लोगों को अपने पार्टी के स्वार्थ से ऊपर भी कुछ सोचने की जरूरत रहती है। ऐसा भी नहीं है कि आज के सोशल मीडिया के अतिसक्रियता के युग में किसी की चुप्पी दबी-छुपी रह जाए। आज कोई बात छुपती नहीं है, लोग किसी गलती को करके बच नहीं सकते हैं। फिर यह भी है कि अब लोगों के कामकाज और चाल-चलन पर कुछ कहने का हक महज परंपरागत मीडिया का एकाधिकार नहीं रह गया है, और अब हिन्दुस्तान के हर नागरिक को खुलकर बोलने का मौका मिल चुका है अगर उन्हें कुछ शब्द टाईप करना आता है, और उनके पास एक साधारण सा फोन भी है।
    हिन्दुस्तान के इतिहास में ऐसे नेताओं को भी अच्छी तरह दर्ज किया गया है जिन्होंने अपनी पार्टी के हितों से परे जाकर भी देशहित या जनहित के काम किए। दूसरी तरफ ऐसे नेताओं को भी इतिहास अच्छी तरह दर्ज करता है जो कि देशहित और जनहित से ऊपर अपने पार्टी हित को मानते हुए कभी जरूरत के मौके पर चुप्पी साध लेते हैं, तो कभी गैरजरूरी मौके पर बोलने लगते हैं। इतिहास में नाम दर्ज कराने की हसरत जिस किसी में हो, उसे तंगदिली और तंगनजरिए से ऊपर उठना ही होता है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 19-Jul-2018
  • उत्तरप्रदेश के देवरिया की एक खबर है कि एक स्कूल में 7वीं की एक छात्रा ने पूरे स्कूल के दोपहर के भोजन में जहर मिला दिया, क्योंकि वह उसी स्कूल में कुछ समय पहले अपने भाई की हुई हत्या का बदला लेना चाहती थी। इस बच्ची को पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया, उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, और उसे बाल सुधार गृह भेजा जा रहा है। स्कूल में पढऩे वाली एक छोटी सी बच्ची के दिमाग में ऐसा भयानक ख्याल कैसे आया, यह अधिक फिक्र की बात है। दूसरी तरफ कल ही छत्तीसगढ़ में एक दूसरी भयानक खबर आई है जिसमें एक पति ने अपनी पत्नी के चाल-चलन पर शक करते हुए उसके गुप्तांग में बिजली का तार डालकर उसे करंट से जलाकर मार डाला। इन दोनों हत्याओं को देखने पर एक बात एक सरीखी है कि ये किसी तैश में पल भर में की गई हत्याएं नहीं हैं, बल्कि सोच-समझकर की गई हैं, और इसीलिए इनके पीछे की कू्ररता अधिक भयानक है, अधिक फिक्र का सामान है। 
    दुनिया में कई जगहों पर बड़ी संख्या में कत्ल इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन ऐसे कत्ल जो कि पूरी तरह सोच-समझकर और पूरी क्रूरता से किए जाएं, वे एक जुर्म से अधिक भी होते हैं, और वे समाज के लोगों की संवेदनाशून्य सोच का सुबूत भी होते हैं। फिक्र इस बात की नहीं कि कुछ कत्ल हुए, फिक्र इस बात की कि कातिल इस कदर बेपरवाह हो गए हैं। और धीरे-धीरे यह क्रूरता बढ़ती चल रही है। बड़ों से अब यह बच्चों तक पहुंच रही है, और आदमियों से औरतों तक में, जो कि कम हिंसक मानी जाती हैं। ये हत्याएं और इस किस्म के कुछ दूसरे कत्ल और बलात्कार के मामले समाज में खूंखार जुर्म के लिए लोगों के बीच बढ़ते हुए बर्दाश्त को बताते हैं कि कैसे लोग परिवार की, या पड़ोस की, या अपने स्कूल की कुछ बरस या कुछ महीने की बच्ची के साथ बलात्कार कर लेते हैं, या किस तरह कुछ नाबालिग लड़के किसी नाबालिग लड़की को पकड़कर गैंगरेप करते हैं। 
    दुनिया में कई किस्म के जुर्म ऐसे हैं जिनको होते हुए रोकना मुमकिन नहीं रहता, जब तक कि पुलिस ईश्वर न हो जाए। और जैसा कि पूरी दुनिया में चारों तरफ हो रहा बताता है, कि ईश्वर कहीं है नहीं, या है तो वह बेरहमी को खासा पसंद करता है। यह बात साफ रहनी चाहिए कि किसी की कत्ल की नीयत, या बलात्कार का इरादा उनके चेहरे पर लिखा नहीं होता, और ऐसे जुर्म अमूमन जब हो चुके रहते हैं, तब पुलिस के हाथ में अधिक से अधिक इतना ही रहता है कि वह ठीक से जांच करे, और सही मुजरिम को पकड़कर सजा दिलवाए। ऐसे में समाज को अपने भीतर चौकन्ना रहना होगा, और अपनी अगली-पिछली पीढिय़ों को भी हिंसा से दूर रखना होगा। समाज का ढांचा परिवारों से मिलकर बनता है, और लोगों को अपने परिवार के भीतर जुर्म और हिंसा से परहेज की सोच मजबूत करनी होगी। कोई भी मुजरिम एक मजबूत इरादों वाले और कानूनपसंद परिवार के बीच रहते हुए जुर्म के खतरे में कम ही पड़ते हैं। अगर पूरा परिवार आपसी बातचीत में जुर्म को बुरा मानकर, कानून की राह पर चलने पर अड़ा रहता है, तो परिवार के किसी सदस्य का मुजरिम बनने का खतरा खासा घट जाता है। फिर यह भी है कि हत्या या बलात्कार जैसा बड़ा और खूंखार जुर्म करने के पहले लोग आमतौर पर कई छोटे-मोटे जुर्म कर चुके रहते हैं, और जब परिवार उन मौकों पर अपने सदस्य पर काबू नहीं कर पाता, तब बात बेकाबू होती है। 
    सरकार और समाज इन दोनों को मिलकर तमाम लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि एक जुर्म से मुजरिम तो जेल जाते ही हैं, लेकिन उनका पूरा परिवार भी जेल के बाहर बहुत किस्म की तकलीफें झेलता है, सामाजिक अपमान और प्रताडऩा झेलता है। बहुत से परिवार घर के किसी एक मुजरिम की वजह से तबाह भी हो जाते हैं। हमने हर महीने ऐसी खबरें देखी हैं जिनमें पति-पत्नी में से एक ने दूसरे का कत्ल किया, और खुद जेल चले गए। ऐसे में बच्चे बुजुर्ग दादा-दादी या नाना-नानी के हवाले रह जाते हैं, और उनकी हालत कई मामलों में अनाथ बच्चों जैसी रहती है। समाज के लोगों के बीच जुर्म के बाद के ऐसे हाल की गंभीरता बड़ी तल्खी के साथ पेश की जानी चाहिए। जुर्म के पहले लोगों को रोकना जरूरी है, जुर्म के बाद तो महज सजा की गुंजाइश बचती है, किसी किस्म की भरपाई नहीं हो पाती, न मुजरिम के परिवार की भरपाई हो पाती, और न ही जुर्म के शिकार, या उसके परिवार की भरपाई हो पाती।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 18-Jul-2018
  • झारखंड में आदिवासियों के एक कार्यक्रम में पहुंचे स्वामी अग्निवेश को सत्तारूढ़ भाजपा के युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने खुली सड़क पर दिनदहाड़े पीटा, उनके कपड़े फाड़ दिए, और उनके साथ की गई मारपीट का एक हिंसक वीडियो भी बनाया गया। जिसे फैलाया भी गया। यह सब कुछ उस वक्त हुआ जब हिन्दुस्तान का सुप्रीम कोर्ट भीड़ द्वारा हत्या के खिलाफ एक कड़ा दिखने वाला फैसला दे रहा था, जो कि हकीकत में एक दिखावे का फैसला है, सुप्रीम कोर्ट की अपनी इज्जत को बचाने के लिए। स्वामी अग्निवेश एक सक्रिय हिन्दू हैं जो कि सुधारवादी आर्य समाज से जुड़े रहे, और फिर उससे भी अलग होकर वे राजनीति में, सामाजिक आंदोलनों में, बंधुआ मजदूरों की मुक्ति में काम करते-करते देश-विदेश में मशहूर हुए। वे नक्सलियों से भी लोकतांत्रिक बातचीत के हिमायती हैं, और इसीलिए बहुत से लोग उन पर नक्सल-समर्थक होने की तोहमत लगाते हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा की मौजूदा सरकार के चलते हुए ही जब वे 2011 में बस्तर गए थे, तब वहां पुलिस अफसरों के भड़कावे पर कुछ स्थानीय हिंसक शहरियों ने अग्निवेश पर हमला किया था, और उनका मुंह काला किया था। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी अग्निवेश का विरोध हुआ था, और उसमें खुलकर सत्तारूढ़ भाजपा के आक्रामक नौजवान शामिल थे। यह याद रखने की बात है कि स्वामी अग्निवेश खालिस छत्तीसगढ़ी हैं, जो बहुत बचपन में ही आन्ध्र से छत्तीसगढ़ आए थे, और यहीं के होकर रह गए थे। बाद में वे आर्य समाज आंदोलन में शामिल हुए, और फिर उससे अलग राजनीतिक दल हरियाणा में बनाया, चुनाव लड़ा,  और मंत्री भी बने। लेकिन छत्तीसगढ़ आना-जाना लगे रहा, और बस्तर में पुलिस हिंसा के शिकार आदिवासियों की मदद करने जब वे आए, तो उन पर पत्थर से हमला करवाया गया। 
    सुप्रीम कोर्ट का जिक्र हम इस सिलसिले में इसलिए कर रहे हैं कि भीड़ द्वारा हत्या को लेकर वह केन्द्र सरकार से संसद में एक कानून बनाने की बात कर रहा है। इससे बोगस और क्या बात हो सकती है कि जब मौजूदा कानूनों के तहत हत्यारी भीड़ को सजा दिलाने के लिए ढेरों वीडियो सुबूत रहते हुए भी जब सरकारें कार्रवाई न करे, और केन्द्र और राज्य के मंत्री हत्यारों को माला पहनाकर उनका सम्मान करे, तो नया कानून कौन सा तीर चला लेगा? सुप्रीम कोर्ट को नए कानून की चर्चा तो तब करने का हक रहता जब वह हत्यारों का सम्मान करने वाले मंत्रियों को नोटिस देकर कटघरे में खड़ा करता। जब वह राज्य सरकारों के अफसरों को कटघरे में खड़ा करता, और हत्यारी भीड़ पर कड़ी कार्रवाई न करने पर सवाल करता। अपने आपकी महानता साबित करने का यह एक राजनीतिक नुस्खा है जिसका इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट भी कर रहा है। जब मौजूदा कानून पर अमल की राजनीतिक शक्ति न बचे, तो सरकारें आमतौर पर नए कानून बनाकर अपनी इज्जत बचाती हैं। आज जब देश का माहौल खुलकर ऐसा लग रहा है कि सरकारों में बैठे लोग भीड़-हत्याओं के लिए लोगों को उकसा रहे हैं, तो सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय केन्द्र सरकार को एक फिजूल की नसीहत दे रहा है कि वह नया कानून बनाए। ऐसी भीड़ को तो आज के कानून के तहत भी उम्रकैद दी जा सकती है। 
    जहां तक स्वामी अग्निवेश पर हमले का सवाल है, तो वे हमेशा से धर्मान्ध और कट्टर हिन्दू हमलावरों की आंखों की किरकिरी बने रहे हैं। वे धर्म के भीतर एक विनम्रता के हिमायती हैं, वे भारत की संस्कृति के मुताबिक धर्मनिरपेक्षता के हिमायती हैं, और वे हिन्दू धर्म के भीतर पाखंड के खिलाफ और सुधार के हिमायती हैं। आज देश में गोमांस पर चल रही बहस पर उन्होंने लोगों के गोमांस खाने के हक पर बयान दिया था, और उसे लेकर वहां भाजपा के संगठनों के नौजवान बिखरे हुए थे। वे लोकतंत्र के भीतर सभी तबकों के साथ बातचीत के हिमायती भी हैं, और ऐसे तबकों में नक्सलियों से लेकर दूसरे ऐसे तबके भी शामिल हैं जो कि लोकतंत्र पर भरोसा नहीं रखते। अपनी इसी प्रगतिशील और उदार सोच की वजह से, पाखंड के खिलाफ सक्रियता की वजह से वे अलोकतांत्रिक और हिंसक धर्मान्ध लोगों के निशाने पर रहते हैं। लेकिन जिस राज्य में जिस पार्टी की सरकार है उस पार्टी के लोग अगर सड़कों पर ऐसी हिंसा करते हैं, तो यह उस पार्टी के लिए भी धिक्कार की बात है, और उसे राष्ट्रीय स्तर पर अपने लोगों की ऐसी हरकत पर जवाब देना चाहिए। झारखंड की भाजपा सरकार ने इस हमले की जांच के आदेश दिए हैं, और डेढ़-दो दर्जन लोग गिरफ्तार भी किए गए हैं, लेकिन इस हमले का वीडियो भाजपा को पूरी दुनिया में जैसी बदनामी दिला रहा है उसके चलते उसे एक राष्ट्रीय पार्टी होने का जिम्मा भी निभाना चाहिए, और इस पर बयान देना चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 17-Jul-2018
  • पश्चिम के जिन देशों में स्कूली बच्चों को यौन शिक्षा दी जाती है, वहां की एक शिक्षिका ने कमउम्र बच्चों के पूछे गए सवालों की एक लिस्ट तैयार की है। उनके सवाल बताते हैं कि जिन समाजों में बच्चों को सेक्स की वैज्ञानिक जानकारी देने से परहेज नहीं किया जाता, वहां भी बच्चों के मन में कितने किस्म की अधूरी या गलत जानकारी रहती है, और इस बारे में क्लास में पढ़ाना थोड़ा अटपटा होते हुए भी उन बच्चों के लिए इसे समझना कितना जरूरी होता है। भारत में पिछली आधी सदी से यह चर्चा ही चर्चा है कि बच्चों को यौन शिक्षा दी जाए, और इसके लिए स्कूल की बड़ी कक्षाओं के बच्चों से लेकर कॉलेज पहुंचे बच्चों तक के बारे में सोचा जाता रहा है, लेकिन समाज के एक दकियानूसी तबके के हमलावर तेवरों के चलते हुए यह कभी मुमकिन नहीं हो पाया। यहां तक कि जीव विज्ञान की कक्षा में बच्चों को मानवीय देहविज्ञान के बारे में पढ़ाने पर लोग झंडा-डंडा लेकर उसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हुए सड़कों पर उतर आते हैं। भारत पिछले बरसों में ऐसे भी बहुत से आंदोलन देखे जिसमें सिर्फ लड़कियों की क्लास को सेनेटरी पैड के बारे में बताने को भी भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया गया और स्कूलों पर प्रदर्शन किया गया। 

    इस विषय पर आज लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि पश्चिम के जिन बच्चों की चर्चा से आज यहां लिखा जा रहा है, उनके मन में भी सेक्स को लेकर, बच्चे पैदा करने को लेकर कई किस्म की ऐसी उत्सुकता है जिसे सुनकर शिक्षक-शिक्षिका पहले तो हँसते हैं, फिर उन्हें अच्छी तरह वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर समझाते हैं। जाहिर है कि भारत जैसे देश में भी बच्चों के मन में बहुत किस्म की उत्सुकता-जिज्ञासा रहती है, लेकिन सेक्स के बारे में कुछ भी जानने-समझने के लिए उनके पास गैरकानूनी रूप से भारत में लाए गए विदेशी अश्लील साहित्य या इंटरनेट पर मौजूद बहुत ही कू्रर और हिंसक पोर्नो ही रहते हैं। इससे परे सेक्स की पहली और आखिरी जो चर्चा बच्चों को सुनाई पड़ती है, वह बलात्कार की रहती है, और ऐसे अप्राकृतिक और हिंसक सेक्स की चर्चा से उनके दिल-दिमाग पर जाहिर तौर पर बुरा असर पड़ता है। 
    भारत को अपने पाखंड से बाहर निकलना चाहिए कि बच्चों को या किशोरों को सेक्स की बातें समझाना भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। हकीकत तो यह है कि यह देश दुनिया के कुछ सबसे पुराने सेक्स-ग्रंथों का जन्मदाता है, यहां पर किशोरों को सेक्स की बातों को समझने के लिए नगरवधुओं के पास भेजा जाता था, और इसे इसी किस्म से वर्जित विषय नहीं माना जाता था। आज हिंदुस्तान में नाबालिग बच्चे गिरोह बनाकर किसी नाबालिग लड़की से बलात्कार करते पकड़ा रहे हैं। हर दिन कहीं न कहीं से ऐसी खबर आती है। निर्भया सहित कई ऐसे चर्चित बलात्कार कांड हुए हैं जिनमें बालिगों के साथ-साथ नाबालिग बलात्कारी भी हिस्सेदार थे, और देश की अदालतों से लेकर संसद तक को यह सोचना पड़ रहा है कि क्या ऐसे जुर्म में हिस्सेदार नाबालिगों को सजा के मामले में बालिग ही माना जाए? जब समाज लगातार छोटे-छोटे बच्चों के साथ बलात्कार देख रहा है, और नाबालिग बच्चों को बलात्कार करते भी देख रहा है, तो अब हिंदुस्तानी समाज को अपने बच्चों को सावधान करने के लिए, और वैज्ञानिक जानकारी देने के लिए कम से कम स्कूल की बड़ी कक्षाओं से तो सेक्स-शिक्षा, यौन-शिक्षा, या देह-शिक्षा शुरू करनी चाहिए। इसके बिना अज्ञान में कई बच्चे सेक्स-अपराध के शिकार हो रहे हैं, और सेक्स-अपराध कर भी रहे हैं। यह देश जागने में जितनी देर करेगा, उसके बच्चों पर उतना ही अधिक जुल्म होगा।
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 16-Jul-2018

  • उत्तरप्रदेश की एक जेल में जिस तरह एक खूंखार माफिया कैदी को गोलियों से भूनकर रख दिया गया है, उससे वहां जेल के बाहर का हाल भी उजागर होता है। अब खबर यह है कि इस हत्या की जांच शुरू हो, उसके पहले ही उसी जेल में बंद एक दूसरे खूंखार अपराधी का बयान आया है कि उसने किस तरह यह हत्या की थी। जांच करने के लिए जिस पुलिस अफसर को जेल जाना था, उसने बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के वहां से जाने के लिए मना कर दिया, और उसकी हिफाजत के लिए ऐसी जैकेट पहनाकर उसे भेजा गया। दूसरी तरफ अब खबरें आ रही हैं कि इस तरह के कई माफिया सरगना जेल के भीतर से बड़े-बड़े सरकारी कंस्ट्रक्शन ठेके ले रहे हैं, और रेत की खदानों का सौ-सौ करोड़ तक का ठेका ले रहे हैं। एक खबर यह भी है कि जेल में मारे गए माफिया सरगना के गुर्गे बाहर लोगों से अभी भी उसके नाम पर उगाही कर रहे हैं कि जेल के भीतर हत्यारे की हत्या करवानी है, उसके लिए रकम चाहिए। 
    उत्तरप्रदेश का यह हाल रातोंरात नहीं हुआ है, और न ही योगी सरकार आने के बाद हालत कुछ सुधरी है। वहां पहले समाजवादी पार्टी की सरकार रहते हुए जिस तरह का जातिवाद पुलिस से लेकर बाकी सरकारी अमले मेें चला उससे ईमानदार और काबिल, जिम्मेदार और मेहनती कर्मचारियों और अफसरों के बीच काम करने की हसरत खत्म ही हो चुकी थी। अखिलेश यादव के पहले मायावती के राज में भी उत्तरप्रदेश का कुछ ऐसा ही हाल था, और वहां पर ठेकेदारी, रंगदारी, और राजनीति का ऐसा बुरा मिलाजुला धंधा दशकों से चल रहा है कि वह जेल के भीतर एक बड़ी चर्चित हत्या से तो खबरों में आया है, लेकिन उससे परे लोगों को वह दिखता नहीं है। इस प्रदेश में नए भाजपाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आने से बदला केवल यही है कि एक जाति के अफसरों की जगह दूसरी जाति के अफसर आ गए हैं, या कि एक पार्टी से जुड़े हुए अफसरों की जगह दूसरी पार्टी से जुड़े अफसरों ने मलाईदार कुर्सियां पा ली हैं। कुछ महीने पहले जब उत्तरप्रदेश में लगातार मुठभेड़ में कुख्यात लोगों को, या निगरानी बदमाशों को मार गिराया गया, तो उसके बाद भी जो दहशत खड़ी हुई उसमें बाकी लोगों की जानबख्शी के लिए और अधिक उगाही होने की भी खबरें हैं। 
    किसी प्रदेश में जब जुर्म का बोलबाला इतना हो जाता है कि जेलों की भीतर से सांसद और विधायक भी अपने-अपने गिरोह चलाते हैं, और पेशेवर मुजरिम किसी और को ठेकों में बोली नहीं बोलने देते, तो उस राज्य का कोई भला नहीं हो सकता। बिहार में भी दशकों तक ऐसा ही हाल था, और शायद वहां नीतीश कुमार ने हालात कुछ सुधारे हैं। उत्तरप्रदेश साख के मामले में बहुत कमजोर साबित हो रहा है। ताजमहल को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश या पर्यावरण के कानून मानने से लेकर आम जनता की जिंदगी की हिफाजत तक सभी का बुरा हाल है। जब राज्य सरकार इमारतों को रंगने को अपनी प्राथमिकता समझ लेती हैं, तो फिर उसका ध्यान बाकी जरूरी चीजों की तरफ जाए तो जाए कैसे? राज्य में सांसद और विधायक लगातार साम्प्रदायिक बातें करते घूमते हैं, और किसी को मुजरिमों से परहेज दिखता नहीं है। दिल्ली से लगा हुआ यह राज्य भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, और निकम्मेपन का शिकार होकर अपनी उस साख को पूरी तरह खो बैठा है कि यह राज्य देश को लगातार प्रधानमंत्री देता था। आज यह राज्य देश को जुर्म की और साम्प्रदायिकता की सबसे बुरी खबरें देता है। 
    किसी राज्य के ऐसे हाल को देखकर बाकी राज्यों को भी यह नसीहत लेनी चाहिए कि वे राजनीति, और खासकर चुनावी राजनीति के फेर में अगर मुजरिमों को बढ़ावा देते हैं, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, या हिंसा को बढ़ावा देते हैं तो उस राज्य का ऐसा हाल होता है। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 15-Jul-2018
  • भारत में सरकार और समाज दोनों के लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि किस तरह सोशल मीडिया या मैसेंजरों पर पोस्ट की गई बातों से नफरत और हिंसा में बढ़ोत्तरी हो रही है। आज जब इस पर हम लिख रहे हैं, तब कर्नाटक में एक इंजीनियर की लाश गिरी हुई है जिसे वॉट्सऐप पर फैलाई गई एक अफवाह के बाद लोगों ने मार डाला है। बच्चे चुराने की एक जागरूकता वाली पाकिस्तानी वीडियो को असल घटना बताकर भारत भर में इस बात की अफवाह फैलाई गई कि  लोग बच्चे चुरा रहे हैं और भीड़ ने जगह-जगह, अब तक शायद आधा दर्जन प्रदेशों में तमाम बेकसूर लोगों को मार गिराया है, जिनमें से एक भी बच्चाचोर नहीं था। ऐसे में वॉट्सऐप में एक पूरे पेज का इश्तहार देकर लोगों को आगाह किया है कि वे अफवाहें आगे बढ़ाने से बचें और कैसे बचें। लेकिन दूसरी तरफ आज देश का मुख्य धारा का मीडिया लगातार इसी किस्म की बातों को बढ़ाने में लगा हुआ है, और अभी जब दिल्ली में एक परिवार ने दर्जन भर लोगों ने रहस्यमय हालात में एक साथ खुदकुशी की, तो कुछ चैनलों ने इसे भुनाने के लिए तांत्रिकों और बाबाओं को लेकर उस घर में जाकर वहां से प्रसारण करने की हरकत की। शायद उस इलाके के उबलते हुए लोगों ने ऐसे मीडिया को वहां से खदेड़ दिया। 
    लेकिन आज वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के साथ परंपरागत मीडिया का एक बड़ा बुरा मुकाबला चल रहा है। अब जैसे कोई कैंसर के इलाज का दावा करे, तो उससे एक भी सवाल किए बिना देश का सबसे प्रमुख मीडिया भी इस अंदाज में खबर को फैलाने में जुट जाता है कि मानो कैंसर का इलाज खोज लिया गया है। चार लाईन के दावे के साथ चालीस लाईन की किताबी जानकारी अपनी तरफ से जोड़कर ऐसी रिपोर्ट को बहुत बड़ा बना दिया जाता है, और उसे बहुत बड़ी विश्वसनीयता दे दी जाती है। यह सिलसिला कम होने का नाम नहीं ले रहा है, और सरकार झूठी खबरों को फैलाने पर जिस सजा का इंतजाम करने जा रही है, वह सजा भी ऐसी झूठी बातों पर शायद लागू नहीं होगी जिसके पीछे लोगों की कोई बदनीयत न हो, और लोग अज्ञानी बनकर जिसे आगे फैलाने में जुट जाते हों। 
    दरअसल ऐसी नौबत के पीछे इंसान का वह मिजाज है जो कि सनसनी फैलाने से हासिल होने वाली खुशी का है। लोग अगर हकीकत को साफ और सपाट तरीके से अपने आसपास के लोगों को रूबरू बताएंगे, या कि सोशल मीडिया पर पोस्ट करेंगे, तो शायद ही कोई उस पर ध्यान देंगे। दूसरी तरफ जब बातों को अविश्वसनीय हद तक चटपटा बनाकर, सनसनीखेज बनाकर फैलाया जाता है, तो आसपास के लोग तुरंत ध्यान देते हैं। मनोविज्ञान के हिसाब से ऐसे लोग अटेंशन-सीकर कहलाते हैं, यानी लोगों का ध्यान खींचकर संतुष्टि पाने वाले लोग। ऐसे लोग गणेश की दूध पीने की अफवाह को चारों तरफ फैलाते हैं, और फिर मजे से देखते हैं कि किस तरह लोग उनकी बताई राह पर चल रहे हैं, और लोटा-चम्मच लेकर मंदिर जाकर गणेश के सामने कतार लगा रहे हैं। लोगों की अपनी जिंदगी में जब कुछ रोचक नहीं होता है, तो भी लोग ऐसी हरकतों में लग जाते हैं जिससे उन्हें दिमागी संतुष्टि हो, जिससे उन्हें यह लगे कि उन्हें किसी तरह की कामयाबी हासिल हो रही हो। बड़े-बड़े इलाज के बड़े-बड़े दावों को चारों तरफ प्रसाद की तरह बांटते हुए लोगों को कभी यह नहीं लगता कि वे खुद भी उसे एक बार परख लें या कि अब हर फोन में हासिल गूगल पर उसे तलाशकर उसका सच-झूठ जान लें। 
    जब देश मेें, खासकर भारत जैसे देश में लोगों के बीच में वैज्ञानिक सोच को सिलसिलेवार तरीके से घटाया गया है, और पौराणिक कथाओं से लेकर एक फर्जी, कभी मौजूद न रहने वाले इतिहास तक की कहानियां सुनाकर लोगों को इस बात पर भरोसा दिलाया गया है कि तमाम किस्म के चमत्कार इस देश में आम बात रहे हैं, तो फिर लोग उसी चमत्कारी दुनिया में उसी तरह जीना चाहते हैं जिस तरह कि बाहुबली नाम की फिल्म के कल्पना लोक में डूबे हुए लोग अपनी तर्कशक्ति छोड़कर महज नजारों को देखते रह जाते हैं। ऐसे हालात इस देश में आज जो हिंसा करवा रहे हैं, उसे हजार गुना अधिक बढ़ाना चुटकी बजाने जैसा आसान रह गया है, और किसी भी दिन इस देश में धर्म और जाति के नाम पर ऐसे दंगे फैलाए जा सकते हैं जिन्हें फिर सरकार की तरफ से कितने भी संदेेश भेजकर रोका नहीं जा सकेगा। इसलिए आज समझदार लोगों के बीच जरूरत इस बात की है कि जब कहीं, जहां कहीं उन्हें कोई झूठी जानकारी तैरते दिखे, तुरंत ही उस पर सच को ढूंढकर पोस्ट करें, या लोगों को जवाब में भेजें। ऐसी बातों को देखते हुए भी चुप रहने का मतलब यही होगा कि आने वाले वक्त को एक हिंसक झूठ के हवाले कर देना, और लोगों को विरासत में ऐसा मिजाज देना जो कि बारूद के ढेर की तरह का हो, एक चिंगारी की तरह के मैसेज के इंतजार में। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 14-Jul-2018
  • कल ही इसी जगह पर भारत की एक होनहार एथलीट, हिमा दास, के बारे में लिखा गया था जिसने एक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में विश्व चैंपियनशिप जीतकर गोल्ड मैडल हासिल किया। असम के एक गरीब किसान की गांव की इस बेटी की यह कामयाबी मानो काफी नहीं थी, इसलिए एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने अपने एक ट्वीट में लिखा कि सेमीफाइनल में जीत के बाद हिमा दास ने मीडिया से बातचीत की, उसकी इंग्लिश अच्छी नहीं थी, फिर भी उसने अपना बेस्ट दिया। इसे लेकर फेडरेशन को सोशल मीडिया पर अच्छा जमकर लताड़ा गया है कि एक खिलाड़ी के प्रदर्शन से अधिक फिक्र फेडरेशन को उसकी अंग्रेजी की है। 
    भारत में अंग्रेजी के भक्तों का जवाब देने के लिए एक बात लंबे समय से कही जाती है कि अंग्रेज चले गए, अंग्रेजी छोड़ गए। कहने के लिए राष्ट्रभाषा का झंडा लेकर चलने वाले इस देश के बड़े-बड़े आंदोलनकारी ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपनी औलादों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाना बेहतर समझा। ईसाई मिशनरियों के खिलाफ बड़बोले नेताओं के बच्चों को भी हमने ईसाई स्कूलों में पढ़ते देखा है। यह पाखंड इस देश में लोगों के मिजाज में ही है, और जगह-जगह, तरह-तरह से सामने आता है। इसलिए जब खेल संघ खिलाड़ी के लाए हुए सोने से संतुष्ट नहीं हैं, और उसकी अंग्रेजी पर मलाल जाहिर कर रहे हैं, तो उसका एक ही मतलब है कि इन लोगों का खेल संघों में रहने का कोई हक नहीं है। दूसरी तरफ इस देश को अंग्रेजी के अपने बावलेपन को लेकर भी दुबारा सोचना चाहिए। 
    हम तो अंग्रेजी के बिल्कुल भी खिलाफ नहीं हैं, और इस हिन्दी अखबार में भी अंग्रेजी के लेख गाहे-बगाहे छापते रहते हैं। लेकिन हिन्दी को मातृभाषा मानकर जिन लोगों को उसकी मां की तरह सेवा करना जरूरी लगता है, हम उस बावलेपन के भी खिलाफ हैं। एक भाषा महज भाषा होती है, एक औजार की तरह। उसका इस्तेमाल अगर अच्छा होता है, उससे कोई कामयाबी हासिल होती है, तो वह भाषा भी मायने रखती है, और उसका भी सम्मान बढ़ता है। दुनिया में नाकामयाब लोगों की भाषा का कोई नाम लेने वाले भी नहीं रहते। इसलिए हिन्दी को एक भाषा के रूप में अगर कामयाब नहीं बनाया जा सकता, तो इस देश में अंग्रेजी का आज का मौजूद बोलबाला इसी तरह जारी रहेगा। दुनिया में ऐसा भी नहीं है कि सभी कामयाब देश अंग्रेजी के बलबूते ही कामयाब होते हैं। चीन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस जैसे अनगिनत देश हैं जो कि अपनी खुद की भाषा में पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, साहित्य, इन सबको इतना संपन्न कर चुके हैं कि वे अंग्रेजी के मोहताज नहीं हैं। जिन लोगों को इन देशों से बात करनी होती है, वे इनकी भाषा को सीखकर भी बात करते हैं। 
    भारत में हिन्दी को कामकाज की एक कामयाब भाषा बनाने के बजाय उसकी सेवा करने की बात होती है, उसे मां बना दिया जाता है, और उसके साथ लोगों का रिश्ता भावनात्मक बनाकर उसे एक आक्रामक राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाता है। ऐसे में किसी भाषा का कोई भला नहीं हो सकता। दूसरी तरफ जहां अंग्रेजी की जरूरत है, या कि अंग्रेजी के बिना जहां काम नहीं चल सकता है, वहां पर अंग्रेजी से नफरत को एक आड़ बनाकर लोगों को उसे सीखने से रोका जाता है। इन सबके बाद जिनको अंग्रेजी नहीं आती उनको नीची निगाहों से देखा जाता है, और उन्हें हीनभावना में डाला जाता है। भारत को अपने इन तमाम पहलुओं के पाखंडों से बाहर निकलना होगा, तभी क्षेत्रीय भाषाओं की इज्जत बढ़ेगी, हिन्दी को उन पर लादना खत्म होगा, और जरूरत के मुताबिक अंग्रेजी सीखने को बढ़ावा भी देना होगा। जहां लोगों के बीच बातचीत और संवाद-संपर्क की एक औजार भाषा भावनात्मक रूप से देखी जाती है, वहां उससे किसी का भला नहीं होता, सिवाय राष्ट्रवाद के फतवों के। भारत के भीतर ही जिन राज्यों में अपनी क्षेत्रीय भाषा को इतना संपन्न बना लिया है कि वे अपना सारा कामकाज उसी भाषा में कर लेते हैं, वे हिन्दीभाषी प्रदेशों के मुकाबले अधिक कामयाब भी हैं। इसलिए लोगों को जरूरत के मुताबिक भाषा सीखनी चाहिए, और जब तक वे किसी भाषा को सीख न लें, उसे लेकर किसी किस्म की हीनभावना नहीं रखनी चाहिए। एक कामचलाऊ दर्जे की भाषा भी कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि उससे यह तो पता लगता ही है कि कोई उस भाषा को सीखने की कोशिश कर रहे हैं। - सुनील कुमार 

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Posted Date : 13-Jul-2018
  • फिनलैंड में चल रहे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में भारत के असम की एक गरीब खिलाड़ी हिमा दास ने गोल्ड मेडल हासिल करके सबको चौंका दिया। यह किसी एथलेटिक मुकाबले में भारत को मिला अपने किस्म का पहला गोल्ड मैडल है, और यह खिलाड़ी उस असम से आई है जहां पर एथलेटिक्स का ज्यादा चलन नहीं है, और वहां से ऐसे अधिक खिलाड़ी आते भी नहीं हैं। वह एक गरीब किसान की बेटी है, और महज कोच के दिए हौसले से उसने शहर में रहकर यह तैयारी की। उसके लिए शहर के हॉस्टल में जगह भी नहीं थी लेकिन उसे खास रियायत देकर वहां रखा गया, और उसने यह कामयाबी पाई। आज जब विश्वकप फुटबॉल में 40 लाख की आबादी वाला क्रोएशिया फाइनल में पहुंचता है, तो दुनिया के बड़े-बड़े देशों के लिए सोचने की बात हो जाती है। भारत में फुटबॉल खासा खेला जाता है, और इस देश की आबादी में दर्जनों क्रोएशिया समाए हुए हैं, लेकिन इस देश की पूरे विश्वकप फुटबॉल मुकाबलों में कोई भी जगह नहीं है, इसका दाखिला भी वहां नहीं है। भारत फीफा रैंकिंग में पहले सौ में बड़ी मुश्किल से आ पाया है, और उसकी रैंकिंग 99 नंबर की है। 
    लेकिन यह मामला बहुत आसान भी नहीं है। किसी देश में खेलों की कामयाबी बहुत सी बातों पर टिकी होती है। चीन की खेलों की तैयारी देखें तो सुनाई पड़ता है कि किस तरह ओलंपिक के लिए जिम्नास्ट तैयार करने वहां के खेल प्रशिक्षक और अफसर गली-गली घूमते हैं, और खेलते हुए बच्चों में से संभावनाओं को छांटकर ले आते हैं, और उन्हें बरसों तक केवल ट्रेनिंग देते हैं। यही वजह है कि चीनी जिम्नास्ट ढेर सा सोना ले जाते हैं। दूसरी तरफ अमरीका या रूस, ब्रिटेन या फ्रांस ऐसे देश हैं जहां पर स्कूलों के स्तर से ही खेलों को बढ़ावा दिया जाता है, सारी सहूलियतें दी जाती हैं, मैदान या इमारतें बनाई जाती हैं, सारे खेल उपकरण दिए जाते हैं, उम्दा दर्जे का प्रशिक्षण मौजूद रहता है, और वहां के बच्चे हर किस्म के मुकाबले में आगे बढ़ते हैं। भारत चूंकि अंग्रेजों का गुलाम रहा है इसलिए क्रिकेट यहां पर एक ऐसा वटवृक्ष हो गया है जिसके तले दूसरे खेलों की कोई अहमियत नहीं लगती है। बाजार का प्रायोजन का सारा पैसा मानो केवल क्रिकेट के लिए रहता है, और क्रिकेट ने अपने आपको एक साम्राज्य की तरह बना लिया है जो कि सरकार या सुप्रीम कोर्ट के काबू से भी बाहर हजारों करोड़ का धंधा हो गया है। इस देश में क्रिकेट का प्रशंसक होना स्कूल-कॉलेज के बच्चों के बीच खिलाड़ी होने की विकल्प की तरह रच-बस गया है। 
    लेकिन हम राज्यों में देखते हैं, तो बहुत से राज्यों से ऐसी खबरें आती है कि वहां के खिलाडिय़ों को न मैदान मिलते, न सामान मिलते, न ट्रेनिंग मिलती, न मुकाबलों में जाने-आने, रहने-खाने का इंतजाम मिलता। अधिकतर राज्यों में खिलाडिय़ों का सम्मान तब होता है जब वे जीतकर आ जाते हैं। लेकिन मैडल के पहले की तैयारी में तरह-तरह की दुखभरी कहानियां सुनाई पड़ती हैं, और सरकार में बैठे हुए लोग, या कि खेल संघों की राजनीति पर काबिज बड़े-बड़े नेता और अफसर ऐसे रहते हैं जिनके लिए खिलाडिय़ों की बुनियादी सहूलियतें मायने नहीं रखतीं। सरकारों में बैठे हुए लोगों की अधिक दिलचस्पी करोड़ों के खर्च वाले मुकाबलों में दिखती है, या कि करोड़ों-अरबों की लागत के बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने में दिखती है। ऐसे में अगर देखा जाए तो दुनिया भर से मैडल लाने वाले हिन्दुस्तानी खिलाड़ी ऐसे अफसरों और खेल संघों की वजह से जीतकर नहीं आते हैं, उनके बावजूद जीतकर आते हैं। 
    छोटे-छोटे से, बित्ते भर के देश पूरी दुनिया के मुकाबले में फाइनल पर पहुंचते हैं, और हिन्दुस्तान शुरू की 98 टीमों में भी नहीं है। यह नौबत रातों-रात बदली नहीं जा सकती, लेकिन इसे सुधारने के लिए यह जरूरी है कि खेलों को खेल संघों की राजनीति, आयोजनों के ठेके, और कांक्रीट के बड़े-बड़े ढांचों से परे होकर सोचना होगा। जब कभी भारत के किसी गरीब खिलाड़ी को मौका मिलता है, तो वे बहुत से खेलों में बहुत आगे तक बढ़कर दिखाते हैं, लेकिन यहां की अधिकतर आबादी के बच्चे गली-मुहल्ले के खेलों से आगे बाकी खेलों से पूरी तरह अछूते रह जाते हैं। इस नौबत को सुधारने का कोई आसान रास्ता यहां सीमित शब्दों में नहीं सुझाया जा सकता, लेकिन इस बारे में बहुत से स्तरों पर सोचने-विचारने की जरूरत है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिकता पर बहस चल रही है कि उसे अपराध के दायरे से बाहर निकाला जाए या नहीं। अदालत में सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने अपनी कोई राय रखने के बजाय अदालत से कहा है कि वही इस बात को तय करे कि यह जुर्म माना जाए या नहीं। मतलब साफ है कि सरकार देश के एक बड़े तबके की नाराजगी को मोल लेकर समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर निकालने का अलोकप्रिय काम खुद नहीं करना चाहती, और वह चाहती है कि अदालत इसे करे। ऐसा नहीं रहता तो सरकार खुलकर इसका विरोध करती। यहां पर मौन:सम्मति लक्षणम् वाली बात लागू होती है। खैर, सरकार को अगर देर से यह बात समझ आ रही है तो भी ठीक है क्योंकि जिंदगी को प्रभावित करने वाली बहुत सी दूसरी बातों की तरह समलैंगिकता को भी जुर्म बनाने का काम अंग्रेजों ने किया था, और हिन्दुस्तानी लोग अब तक अंग्रेजों के इस पखाने के टोकरे को ढो रहे हैं। अंग्रेजों ने अपने देश में जिन कानूनों को खत्म कर दिया, उन्हें हिन्दुस्तान गर्व के साथ ढो रहा है, और कहने के लिए पश्चिमी संस्कृति का विरोधी भी है, और अपने आपको एक गौरवशाली संस्कृति का जन्मदाता भी मानता है। 
    भारत को यह पाखंड छोडऩा होगा कि समलैंगिकता कोई अप्राकृतिक बात है, या कि कोई ऐसी बीमारी है जिसके चलते लोगों का बच्चे पैदा करना खत्म हो जाएगा, और यह देश ही खत्म हो जाएगा, विवाह नाम की संस्था खत्म हो जाएगी। हकीकत तो यह है कि दुनिया के हर देश में, हर संस्कृति में समलैंगिक लोग हैं, औरतों में भी, और मर्दों में भी। दुनिया के हर देश में ट्रांसजेंडर हैं, और तरह-तरह की दूसरी यौन-प्राथमिकताओं वाले लोग हैं जिनकी अलग-अलग पसंद है। जो लोकतांत्रिक और सभ्य समाज हैं वहां पर प्रकृति की दी हुई इस विविधता को बराबरी का हक दिया गया है, और उसका सम्मान किया जाता है। योरप के बहुत से देशों में जहां-जहां यौन-विविधताओं वाले लोगों की प्राईड-परेड आयोजित होती है, वहां देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री उसमें शामिल होते हैं। अभी दो दिन पहले लंदन में ऐसा एक आयोजन हुआ तो लंदन के मेयर और एक ब्रिटिश मंत्री उस परेड में पहुंचे। 
    भारत में समाज के एक बड़े तबके में यह धारणा मजबूती से बिठाई गई है कि समलैंगिकता एक बीमारी है, और उसका इलाज किया जा सकता है। बहुत से मां-बाप यह मानते हैं कि बच्चे अगर समलैंगिक हैं तो उनकी शादी कर देने से वे ठीक हो जाएंगे। बहुत से मां-बाप अपने ऐसे जवान बच्चों को मनोचिकित्सकों के पास ले जाते हैं, और मानते हैं कि परामर्श और दवा से वे ठीक हो जाएंगे। दुनिया के जिन देशों को हम अधिक लोकतांत्रिक और अधिक सभ्य कह रहे हैं, वहां भी समलैंगिकों को बराबरी का और सम्मान का दर्जा पाने में खासा वक्त लगा है, रातों-रात उन्हें किसी ने मंजूर नहीं कर लिया। इसलिए भारत में भी इसमें वक्त लग सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजों को दकियानूसी सोच की फिक्र किए बिना अब दुनिया में बहुत अच्छी तरह स्थापित हो चुके वैज्ञानिक तथ्य और सत्य के आधार पर, लोकतंत्र की फिक्र करते हुए अपना फैसला देना चाहिए। हमारा यह मानना है कि अगर जज बहुत ही दकियानूसी और पूर्वाग्रस्त नहीं होंगे, तो समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर करने का स्पष्ट फैसला देंगे। दो बालिग लोग आपस में कैसे संबंध रखें, यह किसी सरकार या अदालत की दखल का मामला नहीं बनता है। सरकार और अदालत को अपने दायरे में रहना चाहिए क्योंकि इन दोनों का अस्तित्व जनता से बनता है, जनता का अस्तित्व अदालत या सरकार से नहीं बनता।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 11-Jul-2018
  • सुप्रीम कोर्ट ने शहरों के ठोस कचरे के निपटारे को लेकर केन्द्र सरकार और राज्यों को नोटिस जारी किया है और दर्जन भर राज्यों पर इस बात के लिए जुर्माना भी लगाया है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद इस बारे में हलफनामा दाखिल नहीं किया है। इन राज्यों में छत्तीसगढ़ भी है जो कि कचरे से लदा हुआ राज्य है, और यहां पर कचरा उठाने के लिए बड़े-बड़े ठेके देने से परे और किसी काम में अधिकतर बड़े शहरों की दिलचस्पी नहीं दिखती है, यह एक अलग बात है कि पिछले दिनों दिल्ली में हुए एक किसी कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के कई म्युनिसिपल कई बातों के लिए पुरस्कार लेकर लौटे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि शहर कचरे से पटे हुए हैं, नाले-नालियां चोक हो चुके हैं, और पानी के लिए मानो सड़कें ही बच गई हैं। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई से परे एक दिलचस्प बात यह है कि इसी छत्तीसगढ़ में एक छोटे से जिला मुख्यालय अंबिकापुर में ठोस कचरे के निपटारे के लिए एक बड़ा कामयाब मॉडल पेश किया है जिसकी देश भर में जगह-जगह तारीफ हुई है, लेकिन इसी प्रदेश में उस मॉडल पर अमल होते नहीं दिख रहा है। ऐसा शायद इसलिए भी हो रहा है कि यह मॉडल केवल स्थानीय महिलाओं को लेकर उन्हें काम पर लगाकर बिना किसी ठेके के कचरा-निपटारे का है, और बड़े ठेके के बिना सरकार में बड़ी दिलचस्पी जाग नहीं पाती है। 
    हमने पिछले दिनों इसी जगह दिल्ली में देश की सबसे बड़ी पर्यावरण-संस्था सेंटर फॉर साईंस एंड एनवायरनमेंट के एक आयोजन का जिक्र किया था जिसमें देश के ऐसे कामयाब म्युनिसिपलों का सम्मान किया गया था जिन्होंने घरों से ही कचरे को अलग-अलग किस्म के आधार पर अलग-अलग इक_ा करने का काम किया, और उसके निपटारे की ठोस योजना बनाकर उस पर अमल भी किया। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में म्युनिसिपल कचरे को किसी भी तरह उठाने में अपने आपको झोंक दे रही है, लेकिन इसके बाद उस कचरे के किसी निपटारे के बजाय उसे कहीं खदानों में, तो कहीं मैदानों पर पाटा जा रहा है, और उसका कोई निपटारा नहीं हो रहा। जिस कचरे के बहुत बड़े हिस्से को दुबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है, उस कचरे को धरती पर एक स्थायी बोझ की तरह डाल दिया जा रहा है। अगर बदशक्ल घूरों को ध्यान से देखें तो यह समझ आता है कि उसका कुछ हिस्सा जानवर निपटाते हैं, और कुछ हिस्सा कचरा बीनने वाले लोग उठाते हैं, और उसे दुबारा कारखानों तक भेजने का काम करते हैं। अगर यह न हो तो म्युनिसिपल का काम दुगुना तो हो ही जाएगा। ऐसे में कचरे को उठाकर बाहर पहाड़ बनाना एक खतरनाक नासमझी है। इससे उबरकर यह देखना होगा कि कचरे को कैसे इक_ा करते समय ही अलग-अलग किया जाए, और फिर उसके सबसे अच्छे इस्तेमाल के तरीके काम में लाए जाएं। इसी देश में ऐसे म्युनिसिपल हैं जो कि कचरे से कमाई कर रहे हैं, बहुत से म्युनिसिपल ऐसे हैं जिन्होंने कचरे की कमाई से अपने करोड़ों के खर्च को घटाकर लाखों पर लाने में कामयाबी पाई है। जब देश में, और प्रदेश में भी ऐसे मॉडल हैं, तो फिर उनको अनदेखा करके दसियों करोड़ के कचरा-ठेका देना, कचरे का निपटारा न करना, जनता और धरती दोनों के खिलाफ एक जुर्म है। 
    छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को चाहिए कि देश में जगह-जगह कामयाब हो चुके मॉडल देखने के लिए अपने प्रदेश के म्युनिसिपलों के लोगों को भेजे, अपने ही प्रदेश के अंबिकापुर जैसे मॉडल को बाकी शहरों में लागू करे, और कचरा उठाने के काम में परंपरागत रूप से लगे हुए लाखों लोगों से रोजगार भी न छीने। कचरे से बड़े पैमाने पर खाद बनाई जा रही है, प्लास्टिक के कचरे को सड़क बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है, कचरे से धातु अलग करके कारखानों में भेजी जा रही है, कागज, कांच, इन सबको वापिस कारखानों में भेजा जा रहा है, लेकिन इसके लिए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और अफसरों के बीच ठेका-प्रेम से परे कल्पनाशीलता की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट को और अधिक सख्ती बरतनी चाहिए क्योंकि किसी पीढ़ी को यह हक नहीं है कि वह आने वाली तमाम पीढिय़ों के लिए कचरे के खतरनाक पहाड़ छोड़कर जाए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 10-Jul-2018
  • छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों से रोज सड़कों पर होने वाले प्रदर्शन बढ़ गए हैं। राजनीतिक दलों के नेताओं को मालूम है कि कुछ महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं, तो बहुत से नेताओं की नजरों में कोई न कोई सीट है, और पार्टियों के तो अपने मुद्दे हैं ही। ऐसे में दूरगामी प्रभाव वाले, या कि दीर्घकालीन हित वाले काम छेडऩे की कोई सोच भी नहीं रहे हैं। छत्तीसगढ़ सहित बाकी जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वे सभी इसी तरह के चुनावी मोड में आ गए हैं, और लंबी सोच को फिलहाल ताक पर धर दिया गया है। लोगों को याद होगा कि मोदी सरकार ने आने के बाद यह चर्चा शुरू की थी कि क्या देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाने चाहिए? हम यह भी सोचते हैं कि इसके साथ-साथ म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनाव भी क्यों न करवाए जाएं? दरअसल मोदी की पिछले आम चुनाव में लोकप्रियता और कामयाबी साबित होने के बाद भाजपा और एनडीए का ऐसा सोचना जायज है कि विधानसभाओं के चुनाव भी साथ-साथ निपट जाएं। अगर ऐसा हुआ रहता तो पंजाब या गोवा या मणिपुर में भी भाजपा-एनडीए को शायद जीत मिल सकती थी। इसके साथ-साथ देश में चुनावी खर्च भी कम हो सकता था, और सरकारों के काम करने के तरीके में भी ऐसा फर्क आ सकता था कि बिना चुनावी दबाव के सरकारें बाद में पांच बरस काम कर सकतीं।
    हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में देखते हैं कि छह-छह महीने में तीन चुनाव होते हैं, और सबसे पहले होने वाले विधानसभा चुनाव के साल भर पहले से सत्तारूढ़ पार्टी फूंक-फूंककर कदम रखने लगती है जो कि तीसरे चुनाव तक जारी रहता है। ऐसे में करीब ढाई बरस का समय सरकार चुनावी-दबाव में निकालती है, और उसके फैसले बहुत उत्पादक नहीं रह जाते। कुछ दूसरे राज्यों में ये चुनाव पांच बरसों में और अधिक बिखरे हो सकते हैं, और वहां पर राज्य सरकार अपना पूरा ही कार्यकाल चुनावी मोड में निकालती हो सकती है। इसलिए लोकतंत्र में यह एक अच्छी बात हो सकती है कि संसद, विधानसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं। अब यह देखें कि ऐसी सोच में दिक्कत क्या-क्या है।
    पहली बात तो यह कि देश भर में जब एक तारीख तय की जाएगी तो कई राज्य ऐसे होंगे जहां की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ रहेगा। लेकिन ऐसे में चुनाव आयोग पर यह फैसला छोड़ा जा सकता है कि कौन सी ऐसी तारीख छांटी जाए जिसमें अधिकतर राज्यों के चुनाव एक साथ करवाए जा सकें, और फिर हो सकता है कि उसके लिए संसद का कार्यकाल कुछ कम करना पड़े। ऐसा एक ही बार करना पड़ेगा, और उसके बाद जब तक कोई विधानसभा भंग न हो, राज्य के चुनाव संसद के साथ ही होते रहेंगे। हमारा मानना है कि देश-प्रदेश को चुनावी दबावों से मुक्त होकर पांच बरस काम करने का मौका मिलना चाहिए, और वह देश-प्रदेश सभी के लिए अधिक उत्पादक स्थिति रहेगी। अब राज्यों में सरकारों को भंग करना करीब-करीब खत्म हो चुका है, और राज्यों में मध्यावधि चुनाव की नौबत भी नहीं आती है। ऐसे में एक साथ चुनाव करवाने के बारे में जरूर सोचना चाहिए, ताकि सरकारें लुभावनी राजनीति से परे एक लंबा कार्यकाल गुजार सकें। 
    अभी इस पर छिड़ी हुई ताजा बहस में एनडीए और मोदी के साथ जो पार्टियां नहीं हैं, उनमें से भी समाजवादी पार्टी और टीआरएस ने खुलकर पूरे देश में सारे चुनाव एक साथ करवाने से सहमति जाहिर की है। कांगे्रस और भाजपा जैसी दोनों सबसे बड़ी, या फैली हुई पार्टियों ने अभी इस मुद्दे पर जुबान नहीं खोली है। और यह मामला इतना आसान भी नहीं है कि रातों-रात केंद्र सरकार इसे तय कर सके। लेकिन फिर भी बहस के लिए यह मुद्दा सार्वजनिक मंच पर आ गया है, मीडिया भी अलग-अलग राय सामने रख रहा है, आम आदमी पार्टी इसके खिलाफ है, और हमारा ख्याल है कि एक लंबे राजनीतिक विचार-विमर्श के बाद  इस मुद्दे पर बनी व्यापक सहमति संसद और विधानसभाओं के रास्ते होते हुए लागू हो सकती है। लोकतंत्र में जनमत का रूख देखने के लिए ऐसी बहस बहुत मायने रखती है। और फिलहाल हमें इस सोच में कोई सैद्धांतिक खामी नजर नहीं आ रही है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 09-Jul-2018
  • भारत में मुकेश अंबानी की कंपनी, रिलायंस जियो ने अपने आने के बाद से भारत के दूरसंचार उद्योग में जिस तरह की खलबली मचाई है, वह देखने लायक है। किसी कंपनी की कारोबारी-कामयाबी पर आमतौर पर यहां लिखने की कोई वजह नहीं बनती, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के मुकाबले से देश की जनता को सस्ते रेट में टेलीफोन और डेटा सेवाएं मिल रही हैं, इसलिए यह मायने रखता है। रिलायंस ने लोगों को मुफ्त में बात करना सिखाया, और केवल डेटा इस्तेमाल करने का भुगतान लिया। इससे गरीब और मध्यमवर्ग तक के लोगों पर बहुत बड़ा असर पड़ा, और बाकी लोगों को भी एक बेहतर कनेक्टिविटी वाली सेवा मिली। अब हो सकता है कि बाजार में अपने दैत्याकार एकाधिकार को कायम करने के बाद मुकेश अंबानी भी लोगों से अपनी कमाई बढ़ाना शुरू करे, लेकिन तब तक हो सकता है कि बाजार में कोई और भी आ जाए, कोई और नई तकनीक भी आ जाए। आज का कारोबार समझ के साथ-साथ कल्पनाशीलता और तकनीक के इस्तेमाल दोनों से जुड़ा रहता है, और इसके साथ-साथ मार्केटिंग की जरूरत तो हर किसी को रहती ही है। 
    अब रिलायंस ने घरों तक टीवी के सिग्नल पहुंचाने के कारोबार की घोषणा की है, और इन सिग्नलों के साथ-साथ लोगों को लैंडलाईन से फोन और इंटरनेट की सहूलियत भी मिलेगी। यह सब कुछ एक साथ घरों तक पहुंचाने का काम बाजार के तौर-तरीकों को बदलकर रख देगा। आज घरों तक टीवी सिग्नल पहुंचाने के लिए या तो स्थानीय केबल ऑपरेटरों का आमतौर पर स्तरहीन काम रहता है, या फिर जिन डीटीएच ऑपरेटरों का बाजार पर कब्जा है, उन्होंने ये सेवाएं बहुत ही महंगी कर रखी हैं। रिलायंस अपने आकार, अपनी तकनीक, और अपनी मार्केटिंग, इन तीनों की वजह से अब डीटीएच के कारोबार को उसी तरह झकझोरने जा रहा है जिस तरह उसने मोबाइल बाजार को हिलाया था। कुल मिलाकर यह ग्राहक के हित की बात है कि बाजार आपसी मुकाबले में अपना मुनाफा घटाए, और लोगों को कम दाम पर सामान या सेवा दे। इस हिसाब से अभी बाजार का यह मुकाबला लोगों को बेहतर और अच्छी सेवा देने जा रहा है। 
    लेकिन इसके साथ-साथ एक बात और समझने की जरूरत है कि कारोबारी अगर अपने काम को नहीं सुधारेंगे, अपने सामान और अपनी सेवा को नहीं सुधारेंगे, तो वे किसी भी दिन बाजार से बाहर हो सकते हैं। भारत में अलग-अलग इलाकों में काम करने के लिए कितनी ही दूरसंचार कंपनियों ने लाइसेंस हासिल किए थे, लेकिन उनमें से एक-एक कर अधिकतर कंपनियों को अपना धंधा समेटना पड़ा, और दूसरी बड़ी कंपनियों को बेचना पड़ा। उन बड़ी-बड़ी बाकी बची कंपनियों को आज जब रिलायंस से मुकाबला करना पड़ रहा है, तो उनका भी पसीना निकल रहा है। इस मिसाल से सबक लेकर हर किस्म के कारोबारी को चाहिए कि वे किसी भी अनदेखे, अनसोचे मुकाबले के लिए भी तैयार रहें, और अपने काम को लगातार बेहतर बनाते रहें। आज रिलायंस को एक अच्छी सेवा लेकर आने के एवज में रातोंरात करोड़ों ग्राहक इसलिए मिले कि बाजार में मौजूद अधिकतर दूसरी कंपनियों ने ग्राहकों की सेवा इतनी खराब कर रखी थी कि लोग उनसे दूर जाने के चक्कर में थे। कुछ दूसरे कारोबार अगर देखें तो कुछ ब्रांड अगर अपनी साख और सेवा अच्छी रखते हैं, तो नया दैत्याकार मुकाबला भी उनको कुचल नहीं पाता। 
    आज लोगों को घर पर टीवी का मनोरंजन जिंदगी की बाकी जरूरी सहूलियतों की तरह का एक अनिवार्य खर्च हो चुका है। मुकेश अंबानी की कंपनी ने पिछले कई बरस से लगातार हिन्दुस्तान और दुनिया की दूसरी फिल्म और टीवी कंपनियों से कार्यक्रम खरीदने का सिलसिला चला रखा था। और अब हो सकता है कि इस कंपनी की घोषणा के मुताबिक 11 सौ शहरों में घर-घर तक केबल पहुंचाकर टीवी-इंटरनेट के जरिये रिलायंस इन तमाम कार्यक्रमों की बिक्री भी शुरू करेगा, और उससे भी बाजार के आज के टीवी-इंटरनेट सेवा देने वाले कारोबारियों के सामने एक कड़ा मुकाबला खड़ा होगा। लेकिन मुकेश अंबानी मीडिया के कारोबार में एक सबसे बड़े मालिक बन जाने के बाद अब मनोरंजन, इंटरनेट, और दूरसंचार के कारोबार में सबसे बड़ा कारोबारी बनने की ओर चल पड़े हैं। ऐसे में मीडिया-मोनोपोली का भारत के लोकतंत्र पर कैसा असर होगा, इस पर इस देश में कोई चर्चा भी नहीं हो रही है। लेकिन इस मुद्दे के उस पहलू पर फिर कभी, और फिलहाल सस्ते टीवी सिग्नल की उम्मीद रखें। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 08-Jul-2018
  • केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा आमतौर पर कभी हिंसक और साम्प्रदायिक बयान देते नहीं देखे जाते जो कि कई केन्द्रीय मंत्रियों की अकेली पहचान बन चुकी है। लेकिन अब उन्होंने जो काम किया है उसने न सिर्फ भारत सरकार को शर्मनाक साबित किया है, बल्कि समूचे हिंदुस्तान का सिर झुका दिया है कि यह जनता के पैसों पर ताकत और ऐशोआराम करने वाले, संविधान की शपथ लेकर काम करने वाले इंसान की ऐसी हरकत झेलने के लिए मजबूर है। और ऐसे इंसान का खर्च ढोते रहना भी इस देश की जनता की मजबूरी है, इस देश का संविधान इतना लचीला हो गया है कि जिनके हाथ ताकत हो, वे उसे चुइंगगम की तरह चबा सकते हैं, और चबाकर थूक भी सकते हैं। दुनिया के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हार्वर्ड से पढ़कर आए जयंत सिन्हा से बेहतर तो देश के वे अनपढ़ आम लोग हैं जो बेकसूरों के कत्ल के हिमायती नहीं है। 
    झारखंड में कुछ वक्त पहले एक मुस्लिम मांस व्यापारी की गाड़ी रोकी गई और उसमें गोमांस होने की तोहमत लगाकर भीड़ ने गाड़ी जला दी थी, और उस मुस्लिम को दिनदहाड़े खुली सड़क पर पीट-पीटकर मार डाला था। कातिल भीड़ के चेहरों सहित इस कत्ल की तस्वीरें और वीडियो चारों ओर फैले थे जिन्होंने पूरे देश को बाकी दुनिया में बदनाम किया था। इससे परे ऐसी भीड़ हत्या ने देश के भीतर अल्पसंख्यकों में दहशत भर दी थी, जो कि शायद इस कत्ल का मकसद ही था। जिला अदालत ने इस भीड़-हत्या के दर्जन भर लोगों को उम्रकैद सुनाई थी और वे जेल में थे। झारखंड हाईकोर्ट ने इन लोगों की अपील पर इनकी सजा स्थगित कर दी और इन्हें जमानत दे दी। ये लोग जब जमानत पर छूटकर आए तो केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने अपने बंगले पर इनका स्वागत किया, इन्हें मालाएं पहनाईं और इन्हें बधाई देते हुए तस्वीरें खिंचवाईं, इस पर देश के जिम्मेदार और अमनपसंद लोग हक्का-बक्का रह गए। जयंत सिन्हा के पिता और निराशा में भाजपा छोड़ चुके पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने इस पर खुद ही ट्वीट करते हुए लिखा कि कल तक वे एक लायक बेटे के नालायक पिता थे लेकिन आज हालत उल्टी हो गई है। झारखंड के इस जिले के जिला भाजपा अध्यक्ष ने जमानत पर इस रिहाई पर खुशी मनाते हुए पार्टी दफ्तर में प्रेंस कांफ्रेंस की। 
    अब सवाल यह उठता है कि ऐसे किसी जुर्म के लोगों को जमानत मिलने पर अगर केन्द्र और राज्य की सत्ता में बैठी पार्टी और उसके नेता-मंत्री सार्वजनिक खुशी मनाते हैं तो यह इस धर्मनिरपेक्ष देश की आत्मा पर जोरों की एक लात है और तकलीफ यह है कि ऐसी लात का खर्च देश की जनता उठा रही है। चारों तरफ से धिक्कार के बाद जयंत सिन्हा ने एक ढुलमुल सा बयान दिया है कि उन्हें देश के कानून पर पूरा भरोसा है।
    अब अगर देश के कानून पर इतना ही भरोसा है, तो इस कानून ने आज की तारीख तक तो इन दर्जन भर लोगों को कातिल करार देकर इन्हें उम्रकैद दी है। इस सजा पर कुछ कहे बिना अदालत ने इनकी अपील पर महज सजा स्थगित करके उन्हें जमानत दी है,जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से उम्मीदें अभी बाकी हैं। ऐसे में भीड़-हत्या के कातिलों की जमानत पर माला पहनाकर उनका स्वागत करना क्या भारत के संविधान की शपथ है? जयंत सिन्हा अकेले नहीं हैं, उनकी तरह के बहुत से और मंत्री और दिग्गज नेता हैं लेकिन दिक्कत यह है कि जयंत सिन्हा तो ऐसे नहीं थे। तो अब क्या वे भी देश के ताजा माहौल में इसे जायज और जरूरत मान रहे हैं कि गैरगुंडों द्वारा की गई भीड़-हत्या की खुशी में हत्यारों को मालाएं पहनाएं?
    - सुनील कुमार 

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