संपादकीय

Previous123456789Next
01-Dec-2020 3:41 PM 50

असल जिंदगी में कहावत और मुहावरों के मुताबिक भेड़ की खाल ओढ़े हुए भेडिय़े छुप जाते हैं, लेकिन जब से यह जिंदगी इंटरनेट जैसी सार्वजनिक जगह बन गई है, और इस पर किसी तस्वीर या वाक्य को ढूंढना पलक झपकने जितनी देर का काम हो गया है, तो ऐसे में यह खाल उजागर होने लगी है। कुछ लोगों ने इसे भुगतान वाला, या मुफ्त का पेशा बना लिया है कि झूठ को फैलाया जाए, गंदी और हिंसक बातें लिखी जाएं, और दुनिया का भला चाहने के लिए काम करने वाले लोगों को इतना परेशान किया जाए कि उनकी नींद हराम हो जाए, और वे भला चाहना, भला करना बंद करके चुप घर बैठें। अगर सोशल मीडिया पर तैरता शक सही है, तो ऐसे लोगों को परेशान करने के लिए पेशेवर लोगों की एक साइबर फौज बनाई गई है जो कि प्रशिक्षित शिकारी पशुओं की तरह किसी पर भी छोड़ दी जाती है, और वे लोग नेकनीयत लोगों की जिंदगी खराब करके छोड़ते हैं। 

दो दिनों से ट्विटर पर एक ट्वीट तैर रही है जिसमें देश की सबसे चर्चित अभिनेत्री और इतिहास के पन्नों से निकलकर वर्तमान में आ गई रानी लक्ष्मीबाई यानी कंगना रनौत, ने शाहीन बाग आंदोलन की सबसे बुजुर्ग महिला की तस्वीर, और अभी चल रहे किसान आंदोलन में झंडा लेकर सडक़ पर चल रही एक बहुत बुजुर्ग महिला को एक ही बताते हुए यह लिखा है कि टाईम मैग्जीन ने जिसे हिन्दुस्तान की सबसे ताकतवर महिला चुना है, वह सौ रूपए में उपलब्ध है। कंगना ने इसके साथ एक किसी व्यक्ति की पोस्ट की हुई एक ट्वीट भी जोड़ी है जिसमें उसने इन दोनों महिलाओं को एक बताया है। 

कंगना के ठहाकों को एक झूठ पर आधारित बताते हुए बहुत से लोगों ने इसे किसान आंदोलन में शामिल बुजुर्ग महिला, और शाहीन बाग आंदोलन की बुजुर्ग दादी इन दोनों का अपमान बताया है। कंगना रनौत ने अपनी ट्वीट डिलीट तो कर दी है, लेकिन अपनी बात पर अड़े रहने का दावा किया है, और उनकी ट्वीट को झूठा बताने वालों को जयचंद (गद्दार) कहा है। यह बहस आज चल ही रही है, और अब देश के कुछ साखदार मीडिया वेबसाईटों ने कंगना के दावे को झूठा करार दिया है, और खुलकर सच को लिखा है। वेबसाईटों ने दोनों तस्वीरों की साइबर जांच करके लिखा है कि ये दोनों अलग-अलग महिलाओं की फोटो है। लोगों ने शाहीन बाग की बिल्किस बानो को इंटरव्यू भी किया है जिसमें उसने कहा है कि यह उसकी फोटो नहीं है। दोनों तस्वीरों की डिजिटल जांच भी यही साबित करती है। 

अब सवाल यह है कि कुछ लोग शाहीन बाग के लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन के विरोधी हो सकते हैं, हकीकत यह है कि बहुत से लोग विरोधी हैं, दूसरी तरफ किसान आंदोलन की आलोचना करने वाले लोगों के बारे में कल ही हमने इसी जगह लिखा है। इन दोनों बातों को मिलाकर देखें, और फिर कंगना रनौत जैसी चर्चित और ताकतवर अभिनेत्री की सोशल मीडिया पर सक्रियता देखें, तो यह बात साफ है कि इस हमलावर तलवारबाज महिला के पास अपने दावे की जांच-परख के लिए देश की कुछ सबसे बड़ी ताकतें हैं। ऐसे में दो बुजुर्ग महिलाओं, दो संघर्षशील महिलाओं को झूठा, षडय़ंत्रकारी, बिकाऊ साबित करने की साजिश करके यह अभिनेत्री क्या साबित कर रही है? क्या इस देश में किसी गरीब को आंदोलन का हक नहीं है? क्या इस देश में गरीब, बुजुर्ग, महिला को बेइज्जत करने का हक एक अरबपति, चर्चित, और अभूतपूर्व ताकत-हासिल महिला को इस हद तक है? क्या मानहानि के सारे मुकदमों का हक महज कंगना जैसे संपन्न लोगों को है, और गरीबों की कोई इज्जत ही नहीं है? अगर इन गरीब बुजुर्ग महिलाओं की जगह कंगना की तस्वीरों को जोडक़र कोई सौ रूपए में बिकने वाली लिखते, तो अब तक देश की दो-चार सबसे बड़ी अदालतें महज कंगना का ही मानहानि मुकदमा सुनती रहतीं। इसलिए आज सवाल यह है कि किसी गरीब और बेकसूर को इस देश की ताजा-ताजा तस्वीर में आईं कंगनाओं के मुकाबले जिंदा रहने का कोई हक है या नहीं? 

जिस तरह टाईम पत्रिका ने हिन्दुस्तान की एक सबसे असरदार महिला के रूप में शाहीन बाग आंदोलन की बिल्किस बानो का नाम छांटा है, उसी तरह इस पत्रिका ने उसी लिस्ट में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी नाम छांटा है। अगर यह लिस्ट खिल्ली उड़ाने लायक है, तो लगे हाथों कंगना को नरेन्द्र मोदी के बारे में भी कह देना चाहिए कि इस पत्रिका की इस पसंद पर वे क्या सोचती हैं? क्या दिल्ली में कुछ ऐसे सामाजिक सरोकारी वकील हैं जो कि इन दो बुजुर्ग महिलाओं की ऐसी बेइज्जती करने वाली कंगनाओं के खिलाफ मुकदमा दायर करे, और कंगना से इन्हें सौ-सौ करोड़ रूपए दिलवाए? आज इस देश में इस बात का फैशन चला हुआ है कि सबसे संपन्न और सबसे ताकतवर लोग 5-5 सौ करोड़ रूपए के मानहानि दावे के मुकदमे कर रहे हैं। इन दो बुजुर्ग महिला आंदोलनकारियों के पास चाहे मुकदमे के लिए पैसे न हों, चाहे वे दौलतमंद न हों, लेकिन महान आंदोलनकारी होने का उनका जो मान है, उसकी हानि करने का हर्जाना कंगनाओं से क्यों वसूल न किया जाए? और अभी तो कंगना रनौत को कुछ और पैसे मिलने ही वाले हैं क्योंकि अदालत ने उसके दफ्तर में तोडफ़ोड़ का हर्जाना देने का हुक्म मुंबई महानगरपालिका को दिया है। अब यह देखना है कि ईमानदार और बेकसूर बुजुर्ग आंदोलनकारी महिलाओं की खिल्ली उड़ाने, उन्हें सौ रूपए में उपलब्ध बताने और उनकी एक संगठित और सुनियोजित बेइज्जती करने से उनकी इज्जत की जो तोडफ़ोड़ कंगना और उसके हमख्यालों ने की है, उसका क्या हर्जाना देश की अदालतें दिलाती हैं। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई न कोई ऐसे सरोकारी वकील होंगे जो कि इस मुद्दे को लेकर भारतीय सोशल मीडिया की गंदगी को उजागर करने की कोशिश करेंगे, और हिन्दुस्तान की कंगानाओं को यह सबक भी सिखाएंगे कि इज्जत महज पैसेवालों का एकाधिकार नहीं है, और तोडफ़ोड़ महज किसी दफ्तर की नहीं होती है, किसी की इज्जत की भी हो सकती है। देखें हमारी यहां लिखी गई बात किसी वकील को भी सूझती और सुहाती है कि नहीं।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 


30-Nov-2020 5:44 PM 73

हिन्दुस्तान के लोगों का कम से कम एक तबका अपनी राजनीतिक पसंद और नफरत के मुताबिक किसी पर ओछे हमले करने में बहुत से दूसरे देशों के लोगों को मात देते दिखते हैं। अभी जिन लोगों को किसानों के आंदोलन से नफरत है, और जो इसे गैरजरूरी या मोदी-विरोधी समझ रहे हैं, वे इसका मखौल उड़ाते हुए यह भूल जा रहे हैं कि दिन में तीन बार वे किसानों का उगाया हुआ ही खा रहे हैं। जब बाजार में सोना-चांदी आसमान पर पहुंच जाते हैं, तब फसल के दाम में पसीने के दाम जोडऩे में भी लोगों को तकलीफ होती है, किसी को किसानों की कार खटकती है, तो किसी को किसानों के ट्रैक्टर पर लगी गद्दी। इनमें से हर बात किसानों के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही है मानो उनका हक नंगा और भूखा रहना ही है, उससे अधिक कुछ भी मांग करना देश के साथ गद्दारी है। 

ऐसे में किसानों के आंदोलन को बदनाम करने के लिए एक वीडियो इस्तेमाल किया जा रहा है जिसमें कुछ सिक्ख (किसानों) के बीच बैठा एक आदमी केन्द्र सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर रहा है, और बीच में वह खालिस्तान के बारे में भी कुछ बोलते सुनाई पड़ता है। हमने कम से कम एक दर्जन अलग-अलग जगहों पर इस वीडियो को देखने-सुनने के बाद पाया जहां पर वह कोई उत्तेजक बात कह रहा है, वहां आवाज अचानक बदलती सुनाई पड़ती है, और ऐसा लगता है कि रिकॉर्डिंग में छेड़छाड़ की गई है। लेकिन इसकी जांच करने के लिए देश में भारत सरकार और प्रदेशों के पास साइबर-सहूलियतें हैं, और इसकी जांच की जा सकती है कि क्या आंदोलन के बीच अचानक सामने आया ऐसा एक वीडियो आंदोलन को बदनाम करने के लिए गढ़ा गया है या आंदोलन से जुड़े किसी एक व्यक्ति ने कोई उत्तेजक बात सचमुच ही कही है। जब पंजाब की अधिकतर आबादी किसानी से जुड़ी हुई है, और अधिकतर आबादी केन्द्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ है, तो उनमें से कोई एक व्यक्ति हो सकता है कि मन से खालिस्तान-समर्थक भी हो, लेकिन उससे बाकी तमाम आंदोलन का क्या लेना-देना? किसी पार्टी के कुछ नेता अगर बलात्कारी को माला पहनाते हैं तो क्या पूरी की पूरी पार्टी को बलात्कारी कहा जाएगा, जैसा कि आज किसानों को लेकर सोशल मीडिया पर सुनियोजित तरीके से खालिस्तानी लिखना शुरू किया गया है। लोगों को एक ताजा मामला भूलना नहीं चाहिए कि कन्हैया कुमार के बताए गए जेएनयू के एक वीडियो को लेकर अदालत ने बाद में यह पाया कि देश के टुकड़े-टुकड़े करने का कोई नारा नहीं लगाया गया था, और उस वीडियो को गढ़ा गया था। लेकिन उस झूठ को इतनी बार दुहराया गया था कि आज भी बड़े-बड़े नेता अपने भाषणों में टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। 

कन्हैया कुमार तो फिर भी वामपंथी विचारधारा का और सीपीआई का कार्यकर्ता था, और जेएनयू तो वामपंथ-विरोधियों की आंखों की किरकिरी रहता ही है इसलिए उसके खिलाफ एक वीडियो-ऑडियो गढक़र टुकड़े-टुकड़े गैंग विशेषण को उछालना एक राजनीतिक हरकत थी। लेकिन आज पंजाब के किसानों को अगर खालिस्तानी कहा जा रहा है, तो देश के बहुत से लोगों ने इस पर ऐतराज करते हुए यह लिखना शुरू किया है कि देश के मुस्लिम पाकिस्तानी करार दिए जा रहे हैं, देश के सिक्ख किसान खालिस्तानी करार दिए जा रहे हैं, तो फिर हिन्दुस्तानी है कौन? यह सवाल जायज है, और किसी तबके को बदनाम करने की यह साजिश नाजायज है। कल तक इसी पंजाब में भाजपा और अकाली दल की सरकार थी। भाजपा का एक सबसे पुराना भागीदार, अकाली दल तो धर्म पर आधारित सिक्ख समाज की ही राजनीति करता है। आज अकाली दल भाजपा और एनडीए से अलग है, तो क्या सिक्ख समाज को खालिस्तानी कहना किसी भी कोने से जायज है? यह सिलसिला खतरनाक है, देश के दलित-आदिवासियों को कहीं चमार, तो कहीं सरकारी दामाद कहा जाता है, दलितों को अछूत तो समझा ही जाता है, और उन्हें प्रताडि़त करने की जितनी पुरातनी प्रथाएं हैं, उनको नई-नई शक्लों में आज भी इस्तेमाल किया जा रहा है। यह देश आखिर है किसका? मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने पर आमादा है, दलित-आदिवासियों से मांस छुड़वाना चाहता है, ईसाईयों को धर्मांतरण के आरोप में जिंदा जलाया जाता है, सिक्खों को किसान मानने से इंकार किया जा रहा है, और उन्हें खालिस्तानी करार दिया जा रहा है। यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा? राजनीति इतनी ओछी नहीं हो जानी चाहिए कि वह लोगों को सम्प्रदायों में बांटकर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े कर दे, वह लोगों को देश के प्रति गद्दार और किसी दुश्मन देश के प्रति वफादार करार दे, राजनीति इतनी ओछी भी नहीं होनी चाहिए कि वह बेकसूरों पर देश के टुकड़े करने की तोहमत थोपे। राजनीति इतनी ओछी भी नहीं हो जानी चाहिए कि वह इस मुल्क की फौज में काम करते हुए जिंदगी गुजारने वालों को यहां का नागरिक मानने से इंकार कर दे, और देश के भीतर ही शरणार्थी शिविरों में डाल दे। पंजाब बिल्कुल दिल्ली के करीब है, और पंजाब के लोगों की इज्जत को इस तरह मिट्टी में मिलाना, उन्हें गद्दार करार देना उन लोगों को बहुत भारी पड़ेगा जिनके प्रशंसक और समर्थक ऐसा अभियान चला रहे हैं। आज हिन्दुस्तानी फौज में किसी एक राज्य से सबसे अधिक लोग हैं, तो वह पंजाब है। पंजाब के जो किसान आज सरकार के कृषि कानून के खिलाफ सडक़ पर हैं, उनके बच्चे फौजी वर्दियों में सरहदों पर तैनात हैं। आज जब वे फौजी अपने परिवार के लिए खालिस्तानी नाम की गाली सुन रहे होंगे, तब उनके दिल पर क्या गुजर रहा होगा? कुदरत ने मुंह में जुबान दी है इसलिए लोकतंत्र ने किसी को भी गद्दार करार देने का हक दे दिया है ऐसा भी नहीं है। यह सिलसिला अलोकतांत्रिक है, और जिन लोगों के समर्थन में यह चलाया जा रहा है उनकी जिम्मेदारी है कि वे इसे धिक्कारें। हालांकि हमारी इस नसीहत का किसी पर कोई असर होगा ऐसी उम्मीद नहीं है क्योंकि हरियाणा के भाजपा-मुख्यमंत्री किसानों के आंदोलन को खालिस्तानी समर्थकों का समर्थन जैसी बातें कहकर माहौल को और बिगाड़ ही चुके हैं। सिक्खों की कौम ऐसी तोहमतों को सुनने की आदी नहीं है क्योंकि वह मुल्क के लिए बढ़-चढक़र शहादत देने को आगे रहते आई है। केन्द्र सरकार को यह सोचना चाहिए कि एक किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए एक पूरी कौम को जिस तरह बदनाम किया जा रहा है, वह एक बड़ा जुर्म है, और केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इसके खिलाफ कार्रवाई करे। 

 क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

 


29-Nov-2020 5:56 PM 70

तमाम लोकतांत्रिक दुनिया में आज लोग सोशल मीडिया पर अपनी सोच सामने रखते हैं, और वह बहुतों के लिए बहुत मायने भी रखती है। पहले किसी औपचारिक समारोह में लोगों को सुनना-देखना हो पाता था, या बहुत करीबी 5-10 लोगों से रूबरू मुलाकात होने पर उनसे कोई बहस हो जाती थी, तर्क-वितर्क चलता था। लेकिन अब सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोग अनजाने लोगों की बातें भी देख-सुन लेते हैं, और उनके साथ किसी बहस में भी शामिल हो जाते हैं। सोशल मीडिया का मिजाज इस हद तक लोकतांत्रिक है कि बहुत से लोग उसे अराजक भी मानते हैं कि उस पर न तो किसी देश का कानून लागू होता है, और न ही किसी समाज के सांस्कृतिक नियम। लोग इन सबसे परे जाकर किसी की तारीफ लिखते हैं, तो किसी को धमकियां। 

ऐसे सोशल मीडिया की वजह से आज सुबह एक राजनीतिक व्यक्ति ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा कि अनजाने लोग उनके पेज पर अपनी राय पोस्ट न करें। सोशल मीडिया को एक मेला है जिसमें जो जैसे नियम चाहें वे अपने पेज के लिए लागू कर सकते हैं। और इन नियमों को तोडऩे वाले लोगों को ब्लॉक कर सकते हैं, उनका लिखा मिटा सकते हैं, या निजी मैसेज बॉक्स में उनके भेजे संदेश की फोटो अपने पेज पर सभी लोगों के देखने के लिए पोस्ट कर सकते हैं। अमूमन महिलाओं को निजी मैसेज बॉक्स में बहुत से लोग प्यार का इजहार करने लगते हैं, और पकडऩे को जब उंगली नहीं मिलती तो कंधे तक को कोसने लगते हैं। कभी गिड़गिड़ाने लगते हैं, तो कभी धमकाने लगते हैं। अब महिलाएं हिम्मत करके ऐसे संदेश भेजने वालों का भांडाफोड़ भी करने लगी हैं, और उनकी शिनाख्त के साथ उनके प्रेम-प्रदर्शन या सेक्स-प्रदर्शन को पोस्ट भी करने लगी हैं। इसलिए सोशल मीडिया ने महिलाओं को एक नया हक दिया है जो कि इसके आने के पहले तक हासिल नहीं सरीखा था। जैसे किसी मनचले ने नोटों पर एक लडक़ी का नाम लिखकर यह लिखना शुरू कर दिया कि फलां-फलां बेवफा है, जिस तरह लोग सार्वजनिक शौचालयों के दरवाजों के भीतर या पर्यटन केन्द्रों की दीवारों और पेड़ों पर किसी लडक़ी का नाम लिखकर भद्दी बातें लिख दिया करते थे, वह गुमनाम हरकत अब सोशल मीडिया पर मुमकिन नहीं है, और अब यहां शिनाख्त उजागर हो सकती है, और अगर झूठी शिनाख्त से किसी ने खाता खोला है, तो पुलिस बड़ी आसानी से उसका भांडाफोड़ कर सकती है। 

ऐसे सोशल मीडिया पर कल एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता ने लिखा- ‘विद्वान से विमर्श कीजिए, बराबर वाले से बहस, और मूर्ख से हाथ जोडक़र क्षमा मांग लीजिए।’ बात एकदम सही है और लोगों की अपनी मानसिक तरक्की के लिए जरूरी भी है। किसी को भी किसी बेवकूफ के साथ बहस करके अपना वक्त जाया नहीं करना चाहिए। मूर्खों के बारे में किसी ने बहुत पहले यह लिखा था कि वे आपको बहस में खींचकर एक तर्कहीन बात करने लगते हैं, आपको अपने स्तर तक ले आते हैं, और फिर आसानी से परास्त कर देते हैं क्योंकि वे उस स्तर की बहस के आदी हैं, उसमें उन्हें महारथ हासिल है। आज जिस तरह सोशल मीडिया पर लोगों का रोज खासा वक्त गुजरता है, उससे समझदारों का फायदा होता है क्योंकि वे अपने से अधिक समझदार को पढ़ते-सुनते हैं, और उनसे विचार-विमर्श करते हैं। लेकिन बहुत से लोग नफरती बातों में उलझे रहते हैं, और वे हर दिन अधिक हिंसक, और अधिक घटिया होते जाते हैं क्योंकि अपने से बेहतर सोच और समझ रखने वाले से किसी बहस में उलझने से मेहनत करनी पड़ती है, और अपनी बेवकूफी तुरंत उजागर भी हो जाती है। इसलिए बहुत से लोग अपनी किस्म की सोच रखने वाले लोगों के साथ नफरत और हिंसा का कीर्तन करते हुए सक्रिय रहते हैं जिसमें महज सिर हिलाना पड़ता है, और सिर के भीतर के दिमाग का कोई इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। 

सोशल मीडिया की इन्हीं खूबियों, और मजबूरियों की वजह से लोग वहां पर सावधानी से दोस्त बनाते हैं, और सावधानी से ही उनसे बात करते हैं। लेकिन यह रवैया उन्हीं लोगों का रहता है जो जिम्मेदार रहते हैं, जो गैरजिम्मेदार रहते हैं वे सोशल मीडिया पर किसी एक व्यक्ति, पार्टी, संगठन, या सोच के पक्ष में, या किसी के खिलाफ जिंदाबाद-मुर्दाबाद किस्म की नारेबाजी में लगे रहते हैं। जो लोग सोचे-विचारे बिना, दिमाग पर जोर डाले बिना किसी जुलूस में या भीड़ में नारे लगाते चलते हैं, उनके लिए भी सोशल मीडिया पर काफी जगह है, और उन्हीं के गुरूभाई, उन्हीं की गुरूबहनें वहां पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं। 

इस बारे में आज यहां लिखने का मकसद यह है कि लोग सोशल मीडिया पर रोज अपने पढऩे-लिखने, सोचने-विचारने में खासा वक्त खर्च करते हैं। अगर रोज के चौबीस घंटों में से एक घंटा भी लोग सोशल मीडिया पर लगाते हैं, तो वह जिंदगी का करीब चार फीसदी वक्त हो जाता है, और कामकाजी जिंदगी में इस एक घंटे का अनुपात और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि दिन के सोलह घंटे तो लोग सोने और काम करने में खर्च करते हैं, और उनके पास खुद के लिए आठ घंटे से ज्यादा अमूमन नहीं बचते। इस नजरिए से देखें तो यह एक घंटा उनकी सोचने-विचारने वाली जिंदगी का पन्द्रह फीसदी से ज्यादा हो जाता है। यह ध्यान में रखते हुए लोगों को अपने को बेहतर बनाने, या अपने को बदतर बनाने, दोनों किस्म की संभावनाओं वाले सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना चाहिए। वैचारिक हुआ-हुआ, या वैचारिक कीर्तन से किसी का कुछ भला नहीं होता, और न ही बेवकूफों से दिमागी कुश्ती करने का। इसलिए लोगों को सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी जानकारी और समझ बढ़ाने के लिए करना चाहिए, और ऐसा करने की अपार संभावना इस पीढ़ी से ही शुरू हुए इस सोशल मीडिया में है। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


28-Nov-2020 6:02 PM 133

पंजाब से दिल्ली पहुंच रहे किसानों की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, और जो वीडियो मीडिया में तैर रहे हैं उन्हें लेकर सामाजिक जिम्मेदारी की एक नई शक्ल दिख रही है। आंदोलन कर रहे और पुलिस की रोक को पार करके दिल्ली पहुंचने की कोशिश कर रहे किसानों को पानी की धार की मार से रोका गया, पुलिस ने सडक़ों को कहीं खोद दिया, तो कहीं चट्टानों से सडक़ पाट दी गई। लेकिन ऐसे किसी भी मौके पर पुलिस का जो आम हाल होता है, वह यहां भी था, और किसानों ने अपने खाने के इंतजाम में से पुलिस को खाना खिलाया, उन्हें पानी पिलाया। कुछ किसान नेताओं के ऐसे भाषण के वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें वे कह रहे हैं कि पुलिस अगर लाठी से पीटे, गोली चलाए, तो भी पुलिस के खिलाफ कुछ नहीं करना है, उसे हाथ भी नहीं लगाना है। 

हिन्दुस्तान के इस आंदोलन में ही नहीं, पूरी दुनिया में हर किस्म की अच्छी और बुरी नौबत पर सिक्ख समुदाय लोगों की मदद में जुट जाता है। म्यांमार से मारकर निकाले गए रोहिंग्या शरणार्थी हों, या अमरीकी लॉकडाउन की वजह से वहां भूखे रहने वाले लोग हों, सिक्ख समुदाय आनन-फानन लंगर शुरू कर देता है, और लोगों को खाना खिलाना धर्म का काम मानकर उसे बढ़ाते चलता है। अभी दो-चार दिन पहले ही अमरीका के न्यूयॉर्क में एक सडक़ का नाम बदलकर पंजाब रखा गया है क्योंकि उस सडक़ पर मौजूद एक गुरूद्वारे में लॉकडाउन के पूरे दौर में हर दिन 10 हजार से अधिक लोगों को खाना खिलाया। हिन्दुस्तान के भीतर भी किसी भी शहर में गुरुद्वारा ऐसी जगह होता है जहां लोगों का धर्म पूछे बिना उन्हें खाना खिलाया जाता है, किसी को मना नहीं किया जाता। जो लोग जरूरतमंद नहीं होते हैं, वैसे लोग भी हिमाचल के मणिकरण जैसे पर्यटनस्थल पर जाने पर खाने के लिए गुरूद्वारे पहुंच जाते हैं। इसलिए आज जब पानी की तोप से मार करती, या लाठी चलाती पुलिस को भी जब बिठाकर सिक्ख समुदाय, किसान खाना खिला रहे हैं, तो यह बाकी लोगों के लिए बहुत कुछ सीखने की मिसाल भी है। 

देश के अधिकतर दूसरे धर्मस्थलों पर लोगों के खाने का इंतजाम महज अपने धर्म के लोगों के लिए रहता है। कुछ जगहों पर तो लोगों को कुछ धार्मिक बातें बोलकर इसका सुबूत भी देना पड़ता है, तब उन्हें वहां खाना नसीब होता है, फिर चाहे वे भुगतान करके ही क्यों न खा रहे हों। अधिक धर्मों में इतने संगठित रूप से लोगों की मदद के लिए टूट पडऩे वाले लोग नहीं रहते। ऐसा भी अधिक धर्मों में नहीं होता कि धर्मस्थल पर जो सबसे छोटा काम होता है, उसमें भी उस धर्म के सबसे संपन्न लोग जुट जाते हैं। लोगों का तजुर्बा है कि देश-विदेश से आने वाले अरबपति सिक्ख भी अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में रसोई घर में काम करने लगते हैं, सफाई करने लगते हैं, और तो और वहां आने वाले दर्शनार्थियों के जूते-चप्पल साफ करते फर्श पर बैठे रहते हैं। 

एक बार फिर शुरू की बात पर लौटें तो हिन्दुस्तान में किसी भी प्रदर्शन में पुलिस के साथ होने वाले आम टकराव से परे यहां पर लोग जिस तरह पुलिस को खाना परोसकर खिला रहे हैं, उससे उनकी समझदारी भी झलकती है। मौके पर तैनात पुलिस महज प्यादा रहती है, उसे वहां तैनात करने वाली ताकतें दूर बड़े दफ्तरों में बैठी रहती हैं। इसलिए किसी प्रदर्शन को रोकने का फैसला लेना जिस पुलिस के हाथ नहीं रहता, और जो महज ऊपर के हुक्म को मानकर हर किस्म का तनाव झेलती है, उससे टकराना कोई समझदारी नहीं है। यह बात और जगहों पर भी प्रदर्शन करने वालों को समझनी चाहिए कि पुलिस शतरंज की बिसात पर सिर्फ प्यादे सरीखी रहती है जो सबसे पहले नाराजगी झेलती है, लोगों की मार झेलती है, और ऊपर के हुक्म से हिंसा भी करती है। दुनिया में जगह-जगह फौज और पुलिस के सामने प्रदर्शन करने वाले लोग दिखते हैं जो कि सिपाहियों और सैनिकों को फूल भेंट करते हैं। ये तमाम बातें लिखने का मकसद यह है कि सडक़ों पर एक गैरजरूरी टकराव टालना चाहिए, पुलिस को भी हिंसा से बचना चाहिए, और प्रदर्शनकारियों को भी पुलिस को दुश्मन नहीं मानना चाहिए। सिक्खों से सीखने को बहुत कुछ रहता है, दूसरों की मदद करना उनमें सबसे ऊपर है। जो सिपाही या सैनिक उनको रोकने को तैनात हैं, उन्हें भी बिठाकर खिलाना एक बहुत बड़ी सोच है, और इससे सभी को दरियादिली सीखनी चाहिए।  क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


27-Nov-2020 2:31 PM 102

दिल्ली के आसपास ही कई प्रदेशों से किसान देश की राजधानी पहुंच रहे हैं। वे केन्द्र सरकार के बनाए हुए किसान कानूनों के खिलाफ लंबा डेरा डालने की तैयारी से दिल्ली आ रहे हैं। लेकिन पिछले डेढ़-दो दिनों से उन्हें हरियाणा और यूपी में वहां की भाजपा सरकारों द्वारा जिस तरह से रोकने की खबरें आ रही हैं, वे हैरान करने वाली हैं। एक तरफ तो उत्तर भारत अभूतपूर्व ठंड की चपेट में हैं, दूसरी तरफ किसानों को रोकने के लिए पानी की तोप से धार मारकर उन्हें पीछे किया जा रहा है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी पोस्ट किया है कि इसके लिए टैंकरों में भरकर नालों का पानी लाया गया है ताकि उससे भीगे हुए किसान और न ठहर सकें। लेकिन पंजाब के किसानों के साथ महिलाएं भी आई हैं, और लंगर का लंबा इंतजाम रखा गया है। किसानों की भीड़ अब तक सरकारी जुल्म के सामने भी शांत बनी हुई है, और बहुत से ऐसे फोटो-वीडियो तैर रहे हैं जिनमें वहां तैनात पुलिसवालों को भी खाना-पानी किसान ही बांट रहे हैं। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर दशकों पहले की वे तस्वीरें पोस्ट की हैं जब किसानों के एक सबसे बड़े नेता टिकैत ने दिल्ली में किसानों की सभा की थी, उसमें पांच लाख लोग जुटे थे, और उस वक्त की केन्द्र सरकार ने उस सभा को रोकने की कोई कोशिश नहीं की थी। आज लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि जय किसान को रोकने के लिए जय जवान तैनात करके मोदी सरकार क्या साबित कर रही है? यह बात इसलिए भी उठ रही है कि राज्यों की पुलिस के साथ-साथ केन्द्रीय सुरक्षाबलों के जवान भी किसानों को रोकने के लिए तैनात किए गए हैं।

केन्द्र सरकार ने किसानों से तीन दिसंबर को बात करने की बात कही है। लेकिन बहुत से लोगों ने यह सवाल उठाया है कि किसानों को जितने खराब तरीके से, और पुलिसिया हिंसा से रोका जा रहा है, यह बातचीत करने वाली सरकार का रूख नहीं है। लोग यह भी कह रहे हैं कि अगर केन्द्र सरकार को तीन दिसंबर को बात करनी ही है, तो अभी क्यों नहीं कर सकती? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनके आसान जवाब नहीं हैं। 

यह भी बड़ी अजीब सी नौबत है कि पंजाब में भाजपा को छोड़ बाकी तमाम पार्टियां किसानों के आंदोलन के साथ हैं। भाजपा के एक सबसे पुराने गठबंधन-साथी अकाली दल, ने किसान कानूनों का ही विरोध करते हुए एनडीए गठबंधन से रिश्ता तोड़ा था, आज अकाली दल पूरी तरह किसानों के साथ खड़ा है, और पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी भी किसानों से बातचीत करने के लिए केन्द्र सरकार से बार-बार कह रही है। पंजाब में चुनावी जीत न पाने वाली आम आदमी पार्टी भी किसानों के साथ दिख रही है क्योंकि दिल्ली में उसकी सरकार ने पुलिस को स्टेडियम देने से मना कर दिया है जहां वह खुली जेल बनाना चाहती है। मोदी सरकार के छह बरसों में भाजपा के दो सबसे पुराने साथी-दल अलग हो गए हैं, महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा से खासी दूर चली गई है, और किसानों के मुद्दे पर अकाली दल अलग हो गया है। किसानों के बारे में केन्द्र सरकार के बनाए गए तीन कानूनों पर सत्तारूढ़ लोगों को छोडक़र किसी का भरोसा नहीं दिख रहा है, और लोगों के बीच यह आम धारणा है कि इनसे किसान बड़ी कंपनियों के हाथों का खेतिहर-मजदूर बनकर रह जाएगा, और हिन्दुस्तान की खेती कार्पोरेट सेक्टर के हाथों चली जाएगी। कुल मिलाकर केन्द्र के इन कानूनों के खिलाफ पूरे देश से इतने अधिक दल एकजुट हो गए हैं कि कई परस्पर विरोधी दल भी इस मुद्दे पर किसानों के साथ हैं।

कहां तो एक तरफ मोदी सरकार किसानों की कमाई को दोगुना करने का दावा कर रही थी, और कहां आज देश भर में किसानों का रहा-सहा भरोसा भी मोदी सरकार से उठ गया दिखता है। आज जिस तरह महीनों के रेल रोको आंदोलन के बाद पंजाब के किसान दिल्ली पहुंच रहे हैं, बाकी देश भर में जगह-जगह किसान संगठन अपने-अपने तरीके से आंदोलन कर रहे हैं, वह किसी भी केन्द्र सरकार के लिए बड़ी फिक्र की बात होनी थी। लेकिन दो चीजें हैं जो मोदी सरकार को किसी भी फिक्र से अछूता रख रही हैं। एक तो यह कि संसद में उसके पास किसी भी कानून को बनाने के लिए अपार बाहुबल है, और तमाम गैरएनडीए पार्टियां मिलकर एक भी हो जाएं, तो भी वे केन्द्र सरकार का कोई प्रस्ताव नहीं रोक सकतीं, अब तो बिना बहस महज ध्वनिमत से ही संसद में कानून बन जा रहे हैं। दूसरी बात यह कि तमाम नकारात्मक चर्चाओं के बीच भी, सरकार की बड़ी आलोचना के बीच भी देश में जब चुनाव होते हैं, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में या तो भाजपा और उसके गठबंधन-साथी वोटरों के वोट से चुनाव जीत जाते हैं, या फिर वे दूसरी पार्टियों के विधायकों के वोट से सरकार बना लेते हैं। ऐसे सिलसिले के चलते हुए भला किसको किसानों, या किसी दूसरे तबके की फिक्र हो सकती है? लोकतंत्र में इतनी बेफिक्री किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी, गठबंधन, या नेता को तानाशाह बना सकती है, उसे लोगों को अनसुना करने की आदत हो सकती है, और किसानों के मामले में, कई दूसरे मामलों में, केन्द्र सरकार का ऐसा ही रूख दिख भी रहा है। अपने दूसरे कार्यकाल में केन्द्र सरकार का ऐसा रूख देश के अलावा सत्तारूढ़ गठबंधन के भी खिलाफ है क्योंकि सरकार को जनता के मुद्दों पर गौर करना अब जरूरी नहीं रह गया है। भारत जैसे निर्वाचित लोकतंत्र में सत्तारूढ़ पार्टी की बड़ी फिक्र सत्ता पर दुबारा जीतकर आना रहती है। लेकिन यहां ऐसी कोई फिक्र चुनावों को लेकर नहीं हैं क्योंकि पिछले छह बरस में देश ने केन्द्र सरकार के बहुत से ऐसे फैसले देखे जिनकी वजह से एनडीए को आम चुनाव या प्रदेशों का चुनाव हारने का खतरा हो सकता था, लेकिन केन्द्र के फैसलों से आहत लोग भी जब मोदी के नाम पर वोट देने को टूट पड़ते हैं, तो फिर केन्द्र सरकार किसी मुद्दे की परवाह क्यों करे? इसकी ताजी मिसाल अभी बिहार में सामने आई जहां पूरे देश से तकलीफ में बिहार पैदल लौटने वाले मजदूरों ने भी कुछ इस अंदाज में दौड़-दौडक़र मोदी के नाम पर वोट दिया कि वे लॉकडाऊन की वजह से घर नहीं लौट रहे थे, वे चुनाव के पहले लौटकर मोदी को वोट देने पोलिंग बूथ पर कतार में लगने की हड़बड़ी में थे। यह एक बहुत रहस्यमय करिश्मा है, और इसके चलते हुए ही केन्द्र सरकार किसी भी मुद्दे की अनदेखी करने की हालत में है। फिलहाल किसानों का मुद्दा दिल्ली के इर्द-गिर्द के राज्यों से आगे बढक़र बाकी देश में कितना चल सकता है यह देखने की बात है। किसानों के साथ भाजपा-राज्यों की पुलिस जो बर्ताव कर रही है, वह बहुत ही खराब है, और उसे लोकतंत्र में बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


26-Nov-2020 5:59 PM 126

लंबे समय से कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सलाहकार रहे, और अभी हाल ही में पार्टी के कोषाध्यक्ष बनाए गए अहमद पटेल के गुजरने पर कुछ लोगों ने यह भी लिखा कि अब पार्टी लीडरशिप और नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच की आखिरी कड़ी खत्म हो गई। अहमद पटेल प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त से उनके परिवार के सबसे भरोसेमंद लोगों में से एक थे, और बाद के बरसों में आतंकी हमले में राजीव की शहादत के बाद सोनिया परिवार उन पर और अधिक निर्भर हो गया था। अहमद पटेल की कई खूबियां गिनाई जा रही हैं जिनमें सबसे अधिक जोर पार्टी और मुखिया-परिवार के प्रति वफादारी पर दिया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि वे नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा मौजूद रहते थे, वे सोनिया गांधी के लिए आंख-कान की तरह काम करते थे। 

अहमद पटेल पर यहां लिखना बिल्कुल भी मकसद नहीं है क्योंकि हम श्रद्धांजलि लेखन पर भरोसा नहीं करते। लेकिन एक बड़े संगठन की लीडरशिप के आंख-कान की तरह काम करने वाले एक आदमी की गिनाई जा रहीं तमाम खूबियों के बावजूद यह नौबत क्यों आ रही है कि ऐसा कहा जा रहा है कि यह परिवार जमीन से कट गया है? हम कांग्रेस के भीतर की उस गुटबाजी पर भी जाना नहीं चाहते जिसके तहत सोनिया के पसंदीदा अहमद पटेल को राहुल-प्रियंका द्वारा नापसंद करने की चर्चा होती है। हर लीडर की अपनी पसंद-नापसंद होती है लेकिन अगर अहमद पटेल इतने ही काबिल नेता थे तो उन्होंने इतने बरसों में सोनिया गांधी की लीडरशिप के किसी काबिल विकल्प के लिए कोशिश क्यों नहीं की थी? आज वे इसका जवाब देने के लिए तो नहीं हैं, और हो सकता है कि उन्होंने अपने बस चलते ऐसी कोशिश की भी हो, और नाकामयाब रहे हों। सवाल यह उठता है कि दशकों से कांग्रेस पार्टी में एक सबसे महत्वपूर्ण नेता बने हुए, और दस बरस से अधिक से सोनिया गांधी के सबसे करीबी पार्टी पदाधिकारी रहते हुए भी वे पार्टी को इस तरह तैयार नहीं कर पाए कि वह इस कुनबे के बिना खड़ी हो सके। तो फिर उनकी यह वफादारी पार्टी के लिए थी, या कुनबे के लिए? 

इस परिवार को ही पार्टी मान लेना ठीक उसी तरह गलत होगा जिस तरह आज की मोदी सरकार को ही देश मान लेने की गलती की जा रही है। मोदी सरकार से असहमत लोगों को देशद्रोही और गद्दार करार दिया जा रहा है। एक सरकार से असहमत रहते हुए भी देश के प्रति वफादार रहा जा सकता है, लेकिन भक्तिभाव के बीच ऐसी असहमति की गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। कुछ वैसा ही आज कांग्रेस पार्टी के साथ हो रहा है, कांग्रेस में मुद्दों पर चर्चा करने पर उसे पार्टी से गद्दारी करार दिया जा रहा है। और बीमारी के इस आखिरी महीने के पहले तक तो अहमद पटेल पार्टी के बहुत से मामले तय करने वाले रहते थे। ऐसे में यह कैसे माना जाए कि उन्होंने हमेशा कांग्रेस के ही भले का सोचा। जब एक नौबत ऐसी आ रही है कि कांग्रेस पार्टी का सोचना, और सोनिया परिवार का सोचना दो अलग-अलग मुद्दे बन गए हैं, और इस मामले में हितों का टकराव साफ दिख रहा है, तो ऐसे में अहमद पटेल सरीखी जगह पर बैठे हुए लोगों ने अगर पार्टी को वक्त पर सम्हालने का काम नहीं किया, तो फिर उनकी कामयाबी क्या रही? 

जिस तरह मोतीलाल वोरा की बढ़ती उम्र के बाद कोषाध्यक्ष का जिम्मा अहमद पटेल को दिया गया, वह तो एक जायज बात थी। लेकिन इस बात को पिछले डेढ़ दिन में दर्जनों लोगों ने लिखा है कि किस तरह अहमद पटेल के देश के प्रमुख कारोबारी घरानों से अच्छे निजी तालुकात थे। ऐसे में जाहिर है कि इन कारोबारी घरानों से अहमद पटेल के संबंध चुनावी चंदे से जुड़े हुए थे, और कोषाध्यक्ष न रहते हुए भी वे कोष के इंतजाम में लगे रहते थे। ऐसी जनचर्चा भी रहती थी कि महज छोटा चंदा ही मोतीलाल वोरा के बहीखाते तक जाता था, और तमाम बड़े चंदे अहमद पटेल देखते थे। यह पूरा सिलसिला पार्टी के भीतर उनकी ताकत का एक सुबूत था, लेकिन इस ताकत के चलते हुए भी कांग्रेस हाईकमान और पार्टी के ही बड़े-बड़े नेताओं के बीच जो संवादहीनता, और जो संपर्कहीनता बनी थी, उसकी जिम्मेदारी भी तो अहमद पटेल सरीखे ताकतवर लोगों पर आती थी। और लगातार इतने बरस सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द सबसे ताकतवर रहने वाले पार्टी नेता ने भी अगर संपर्क और संवाद बनाए रखने का जिम्मा पूरा नहीं किया, तो फिर क्या किया? 

अहमद पटेल का मामला यह मिसाल सामने रखता है कि पार्टी की लीडरशिप को अपने-आपको गिने-चुने लोगों से होते हुए ही उपलब्ध रहने की गलती नहीं करनी चाहिए। और यह बात सिर्फ कांग्रेस लीडरशिप को लेकर नहीं है, दूसरी बहुत सी पार्टियों के साथ ऐसी ही दिक्कत हो सकती है, और पार्टियों से परे सरकारों के साथ भी ऐसी दिक्कत हो सकती है, अगर उनके मुखिया बाकी लोगों से संपर्क के लिए अपने कुछ सहयोगियों पर पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं। भारत के देश-प्रदेश के इतिहास में ऐसे बहुत से शासनप्रमुख हुए हैं जो कि सत्ता में आने के बाद जड़ों से कट गए। कुछ उन्होंने खुद अपने आसपास के गिने-चुने लोगों को पूरा जिम्मा दे दिया, और फिर यह जिम्मा पाकर उन लोगों ने मुखिया को अपने घेरे में इस तरह समेट लिया कि मुखिया का बाकी सहयोगियों से भी जीवंत संपर्क खत्म हो गया। यह कुछ उसी किस्म का रहा जिस तरह जमीन के भीतर दबाई जाने वाली बिजली की केबल किसी खुदाई के दौरान कुदाली की मार से कट न जाए इसलिए बिजली के तारों के ऊपर मैटल का एक जाल गूंथकर उसे आर्मर्ड केबल बना दिया जाता है। सत्ता चाहे वह पार्टी की हो, या सरकार की, मुखिया के इर्द-गिर्द जब इनसुलेशन बढ़ते-बढ़ते फौलादी हो जाता है, एक आर्मर्ड केबल की तरह हो जाता है, तो मुखिया की उंगलियां अपनी ही सरकार या अपने ही संगठन की नब्ज पर से हट जाती हैं। आज अगर कांग्रेस हाईकमान लोगों की पहुंच के बाहर माना जाता है, ऐसा माना जाता है कि उनसे वे ही लोग मिल सकते हैं जिनसे वे लोग मिलना चाहते हैं, तो यह एक मुखिया की हिफाजत नहीं है, यह एक मुखिया को जड़़ों से दूर कर देना है। 

अहमद पटेल की सज्जनता और उनके अच्छे बर्ताव की बड़ी तारीफ हो रही है, लेकिन जिस तरह वे बाकी तमाम पार्टी के लिए इतने बरस तक जैसे एक बैरियर बने हुए थे, आज उनके हटने से लोगों का यह लिखना जायज है कि कांग्रेस हाईकमान की पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं से संपर्क की आखिरी कड़ी टूट गई। 

लीडरशिप के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि पहाड़ की चोटी पर जगह बहुत कम रहती है, और लीडर अपने इर्द-गिर्द के बहुत छोटे दायरे के बहुत गिने-चुने लोगों पर निर्भर हो जाने की चूक करते हैं। यह चूक लीडरशिप की जरूरत वाली किसी भी जगह पर हो सकती है, अमूमन हो जाती है। कांग्रेस के कामकाज में ऐसी एक कड़ी का खत्म हो जाना इस संगठन के एक व्यक्ति पर इस बुरी तरह आश्रित रहने का एक सुबूत भी है। किसी भी समझदार और दूरदर्शी संगठन, या सरकार को अपने लीडर को आर्मर्ड केबल की तरह घेरकर नहीं रखना चाहिए, उसे अधिक लोगों की राय सुनने का मौका देना चाहिए ताकि संभावनाएं अनसुनी न रह जाएं, और सहयोगियों और सलाहकारों की नापसंदगी और उनके पूर्वाग्रह अपने लीडर को घेरकर न रख लें। आज यहां लिखने का मकसद कांग्रेस के संगठन की फिक्र करना नहीं है, उसके लिए उसके पास बहुत से ऐसे लोग हैं जिनकी आज अपनी ही पार्टी की लीडरशिप तक कोई पहुंच नहीं है, हमारे लिखने का मकसद बाकी लोगों को अपने-अपने घर ठीक रखने के लिए सचेत करना है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


25-Nov-2020 7:44 PM 108

आज जब हिन्दुस्तान में भाजपाशासित कई प्रदेश तथाकथित लव-जेहाद के खिलाफ कानून बनाने की घोषणा कर चुके हैं, और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में इसे लेकर मुख्यमंत्री एक बैठक ले चुके हैं, तो उसी उत्तरप्रदेश के हाईकोर्ट का एक फैसला लोकतंत्र को मजबूती देने वाला भी आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने एक मुद्दा यह था कि प्रियंका नाम की एक हिन्दू बालिग युवती ने अपनी मर्जी से सलामत अंसारी नाम के नौजवान से शादी की, और शादी के वक्त उसने इस्लाम मंजूर कर लिया। इस पर लडक़ी के परिवार ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि यह शादी अपहरण करके जबर्दस्ती की गई है। अब हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इन दोनों को हिन्दू और मुस्लिम की तरह देखने से इंकार कर दिया, और कहा कि ये दोनों बालिग नागरिक हैं, और अपनी मर्जी से शादी करना उनका मूल अधिकार है। उनके इस अधिकार को किसी तरह कम नहीं किया जा सकता। यह फैसला देते हुए अदालत ने अपने ही कुछ पिछले फैसलों को गलत बताया जिनमें कहा गया था कि विवाह के लिए धर्मांतरण प्रतिबंधित है, और ऐसे विवाह अवैध हैं। 

आज देश में उछाले गए एक नारे से भडक़ी भावनाओं के बीच यह फैसला एक बड़ी राहत की तरह आया है और इससे भारतीय संविधान की यह सोच भी साफ होती है कि दो धर्मों के लोगों के बीच किसी बालिग शादी को लेकर लव-जेहाद विरोधी कानून सरीखा कुछ नहीं किया जा सकता। अब संविधान की इस बुनियादी सोच के खिलाफ जाकर अगर कोई राज्य ऐसा कोई कानून बनाते हैं तो शायद सुप्रीम कोर्ट के रहते हुए वह कानून लागू करने के लिए नहीं बनेगा, बल्कि भावनाओं को भडक़ाने के लिए बनेगा। 

हिन्दुस्तान में ऐसी अनगिनत मिसालें हैं जिनमें भाजपा के ही बहुत से मुस्लिम नेताओं ने हिन्दू लड़कियों से शादी की है। घनघोर हिन्दुत्व की बात करने वाले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने खुद एक गैरहिन्दू महिला से शादी की है, उनकी बेटी ने एक मुस्लिम से शादी की है, और सोशल मीडिया पर तैर रही बाकी चर्चा अगर सही है तो परिवार में एक-दो और लोग, एक-दो और धर्मों में शादी करने वाले हैं। किसी व्यक्ति के नाम की चर्चा ऐसे संदर्भ में ठीक नहीं है, लेकिन इस लोकतांत्रिक देश में संवैधानिक व्यवस्था के बीच काम करने वाली, और सत्ता तक पहुंचने वाली पार्टियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस संविधान की शपथ लेकर वे सरकारें चला रही हैं, उस संविधान के मूलभूत अधिकारों को बदलना किसी राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इसलिए दो धर्मों के लोगों के बीच किसी शादी के खिलाफ जिस तरह के कानून का फतवा दिया जा रहा है, वह कानून चुनावी राजनीति के ईंधन की तरह तो बन सकता है, लेकिन वह सुप्रीम कोर्ट में बिना कलफ के पजामे की तरह फर्श पर गिर पड़ेगा। हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में ही नहीं, अमरीका जैसे अधिक पढ़े-लिखे देश में भी लोग इतने कमसमझ रहते हैं कि उन्हें फर्जी मुद्दों के आधार पर भडक़ाना आसान रहता है। मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पिछले चार बरस से यही करते आए हैं। हिन्दुस्तान में भी अलग-अलग कई सरकारें कभी गाय के नाम पर तो कभी पाकिस्तान के नाम पर इसी तरह का काम करते आई हैं। अब सरकारी रिकॉर्ड से परे रहते आए एक शब्द, लव-जेहाद, को लेकर एक कानून बनाने की बात हो रही है। और यह कानून मानो इस देश के प्रति प्रेम, और इसके खिलाफ गद्दारी के बीच एक जनमतसंग्रह होने जा रहा है। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला बड़ी राहत देने वाला है, ऐसा नहीं कि उसने संविधान का कोई अनोखा विश्लेषण कर दिया है, और कोई अविश्वसनीय सा निष्कर्ष निकाल दिया है। उसने महज इतना किया है कि लोगों को दो दर्जन शब्दोंं में बतला दिया है कि अपने मर्जी से शादी करना अलग-अलग धर्मों के लोगों के बालिगों का बुनियादी अधिकार है, उस पर न कोई सरकार रोक लगा सकती, और न ही कोई अदालत। अब देखना यह है कि जिस इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह साफ-साफ पारदर्शी आदेश दिया है उस इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र के भीतर लखनऊ में बैठी यूपी सरकार किस तरह इसके खिलाफ एक कानून बनाती है। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


24-Nov-2020 4:55 PM 191

कुछ हफ्ते पहले जब करीब दो दर्जन बड़े कांग्रेस नेताओं ने कांग्रेस पार्टी के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए थे, और पार्टी के अनमने मुखिया राहुल गांधी की लीडरशिप का नाम लिए बिना यह बुनियादी सवाल उठाया था कि पार्टी इस तरह कैसे चल सकती है, तो उसके तुरंत बाद कांग्रेस संगठन की सबसे बड़ी कमेटी, कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक थी, और उसमें कुछ नहीं किया गया। इतना जरूर हुआ कि सवालिया नेताओं को बागी मानते हुए उनमें से कुछ के पर कतरे गए। लेकिन लोग चुप रहे क्योंकि पार्टी में सुधार की बात करने को बगावत मान लिया गया, और भाजपा के हाथ मजबूत करना करार दिया गया। लेकिन आग दबी भर थी, बुझी तो नहीं थी, इसलिए अभी कपिल सिब्बल ने फिर से यह सवाल उठाया है कि देश की सबसे पुरानी और इतनी बड़ी पार्टी डेढ़ बरस से बिना अध्यक्ष किस तरह रह सकती है? एक सवाल गुलाम नबी आजाद ने भी उठाया है कि फाईव स्टार होटलों से बैठकर चुनाव नहीं लड़े जा सकते।

कुल मिलाकर कांग्रेस में आज पार्टी के तौर-तरीकों को लेकर तीखे सवाल उठ खड़े हो रहे हैं, और जो लोग इन 23 लोगों की चि_ी में दस्तखत करने वाले नहीं थे, उनके मन में भी सवाल उठ रहे हैं। ये सवाल हर उस कांग्रेसी के मन में उठ रहे हैं जिसे कांग्रेस की फिक्र है, और कांग्रेस की हालत आज बहुत बड़ी फिक्र के लायक ही रह गई है। इस पार्टी से देश में सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ एक गठबंधन बनाने की उम्मीद की जाती है क्योंकि एनडीए के अलावा पूरे देश में मौजूदगी वाली यही एक पार्टी है। जिस यूपीए गठबंधन के तहत पिछला आम चुनाव लड़ा गया था, उसमें सिर्फ कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसकी मौजूदगी पूरे देश में है। और एनडीए और यूपीए से परे भी कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाले एनडीए के सामने खड़ी हो सके, और कुछ राज्यों में जिसका अस्तित्व हो। अधिकतर पार्टियां एक या दो राज्यों में मौजूदगी वाली हैं, और उन राज्यों से परे किसी और का भरोसा बैठना नहीं है।

दूसरी तरफ एक और बात को समझने की जरूरत है कि यह चर्चा हिन्दुस्तान के इस ऐसे दौर में हो रही है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा के मातहत एनडीए चुनाव जीतने वाली एक ऐसी मशीन बन चुकी है जो या तो मतदान केन्द्र में जीत जाती है, या फिर राजभवन और विधानसभा में। देश में यह तस्वीर अभूतपूर्व है, हिन्दुस्तान के चुनावी इतिहास के 10 बरस पहले तक के दौर में किसी ने ऐसे चुनावी माहौल की कल्पना भी नहीं की थी, जब एक-एक करके तमाम पार्टियां किनारे कर दी जाएंगी, और देश में सिर्फ कमल ही खिलने का माहौल रह जाएगा। आज एनडीए की दूसरी पार्टियां भी देश में जगह-जगह भाजपा की पीठ पर सवार होकर सत्ता तक पहुंच रही हैं, और पूरे देश की चुनावी राजनीति न सिर्फ भाजपा-केन्द्रित हो गई है, बल्कि मोदी-केन्द्रित हो गई है। ऐसे दौर में यूपीए नाम के गठबंधन की मुखिया कांग्रेस पार्टी की लीडरशिप अगर चुनावी मैदान से और देश की राजनीति से गायब सरीखी हो गई है, रोजाना एक या दो ट्वीट तक सीमित हो गई है, तो यह न सिर्फ गैरएनडीए विपक्ष के लिए खतरे की बात है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए भी खतरे की बात है। किसी भी मजबूत लोकतंत्र में सत्ता जितनी जरूरी होती है उतनी ही जरूरी मजबूत विपक्षी पार्टियां भी होती हैं।

अब मुद्दे की बात पर आएं तो कांग्रेस पार्टी को जिस एडहॉक तरीके से हांका जा रहा है, उससे वह किसी मंजिल तक नहीं पहुंच रही है। जब मोदी की लीडरशिप में भाजपा ने इस देश के चुनाव प्रचार, राजनीतिक और सामाजिक एजेंडे, धार्मिक मुद्दे, और चुनाव प्रचार के तरीके, इन सबके नए पैमाने गढ़ दिए हैं, जब जनधारणा को चिकनी गीली मिट्टी की तरह मोडक़र मनचाहा आकार देना मोदी के बाएं हाथ का खेल हो चुका है, तब कांग्रेस पार्टी इस तरह अपने एक हाथ पर दूसरा हाथ धरे बैठी रहे, तो वह हाशिए के सिरे पर पहुंच जाने से बस दो ही कदम तो दूर है। कांग्रेस पार्टी आज एक बहुत ही अजीब से मुहाने पर पहुंची हुई है, वह सोनिया-परिवार की लीडरशिप को बचाए रखे, या कि कांग्रेस पार्टी को बचाए रखे, यह मुद्दा तय करना है। हम लंबे समय से चली आ रही कुनबापरस्ती की तोहमतों के इतिहास में जाना नहीं चाहते, लेकिन आज हकीकत यह है कि अगर कांग्रेस पार्टी अपने अनमने और अघोषित मुखिया राहुल गांधी से परे कुछ नहीं सोच पाती है, तो उसके पास बहुत जल्द खोने को कुछ नहीं बचेगा।

हम जिस छत्तीसगढ़ में बैठकर यह बात लिख रहे हैं यहां पर हमने पिछले 15 बरसों के भाजपा शासन के दौरान कांग्रेस को संघर्ष करते देखा है। और खासकर आखिरी के शायद 5 बरसों में भूपेश बघेल की अगुवाई में प्रदेश कांग्रेस ने यहां जितनी धारदार और हमलावर विपक्षी लड़ाई की थी, वह देखने लायक थी। और ये हमारे विशेषणों की बात नहीं है, पिछले विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में जिस तरह कांग्रेस ने भाजपा को अपना रोड रोलर चलाकर चपटा कर दिया था, उसे 15 सीटों पर लाकर खड़ा कर दिया था, वह कांग्रेस की एक दमदार मेहनत के बिना नहीं हुआ था। हिन्दुस्तान बहुत बड़ा देश है, इसलिए यह कल्पना करना आसान या जायज नहीं होगा कि कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में ऐसी लड़ाई लडऩे वाला दमदार मुखिया चाहिए जैसा पिछले विधानसभा चुनाव के पहले छत्तीसगढ़ कांग्रेस को हासिल था। यह बात भूपेश बघेल के खिलाफ इस्तेमाल भी की जा सकती है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की काबिलीयत के पैमानों में भूपेश बघेल के विपक्ष के कार्यकाल का जिक्र किया जा रहा है। कांग्रेस देश भर में से जिसे चाहे उसको अध्यक्ष बनाए, लेकिन उस व्यक्ति को चौबीसों घंटे राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर चौकन्ना रहना होगा। कांग्रेस पार्टी, और उसके अगुवाई वाला गठबंधन आज देश में ऐसी हालत में नहीं हैं कि एक गैरगंभीर मुखिया के तहत वे जिंदा भी रह सकें। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस लीडरशिप के तौर-तरीकों पर गठबंधन के भागीदार दूसरे नेताओं ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं। उन्हें सार्वजनिक रूप से उठाना जायज था या नहीं, उस पर हम नहीं जाते, लेकिन वह सवाल तो जायज था। इसलिए इसके पहले कि यूपीए के बाकी साथी ऐसे सवाल उठाएं, वे इधर-उधर तितिर-बितिर हो जाएं, उसके पहले कांग्रेस को अपना घर सम्हालना चाहिए और पार्टी को सोनिया परिवार से बाहर का एक अध्यक्ष देना चाहिए। ऐसा करना राहुल गांधी के साथ भी इंसाफ होगा जिन्होंने पिछले डेढ़ बरस में अपने आपको पार्टी की औपचारिक लीडरशिप से अलग कर रखा है, और रोजाना एक ट्वीट, और बिहार चुनाव में तीन दिन प्रचार तक सीमित रखा है। कांग्रेस को एक पूर्णकालिक, महत्वाकांक्षी, मेहनती, और लीडरशिप की बाकी खूबियों वाला नेता चाहिए। जब पूरा देश नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के कदमोंतले रौंदा जा रहा था, उस वक्त भी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने यह साबित किया था कि 15 बरसों की विपक्षी कंगाली के बावजूद वह सत्तारूढ़ भाजपा को, मोदीछाप पार्टी को नेस्तनाबूत कर सकती है। आज देश भर में कांग्रेस को इसी किस्म की मेहनत की जरूरत है, एक विश्वसनीय नेता की जरूरत है जिस पर लोगों को यह भरोसा हो सके कि वे हर वक्त मोर्चे पर डटे रहेंगे, पार्टी के लोगों को हासिल रहेंगे। कांग्रेस पार्टी के मुसाहिबों को यह बात खल सकती है, खलेगी ही, लेकिन सच तो यह है कि पार्टी को एक जीवाश्म (फॉसिल) बनाकर सोनिया परिवार को उसका लीडर बनाए रखना समझदारी नहीं होगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


23-Nov-2020 5:19 PM 153

सुप्रीम कोर्ट कोरोना-मृतकों के अंतिम संस्कार को सम्मानपूर्ण तरीके से करने के मुद्दे पर खुद होकर सुनवाई कर रहा है। बहुत सी जगहों से खबरें आती हैं कि कोरोना से मरने वाले लोगों का अंतिम संस्कार या उनका कफन-दफन ठीक से नहीं हो रहा है, या परिवार के लोगों को आखिरी बार चेहरा देखने नहीं मिल रहा है। यह लोगों का, और मरने वालों का भी एक बुनियादी हक है, और इसलिए अदालत ने इस पर खुद सुनवाई शुरू की है।

लेकिन कोरोना-मृतकों के अंतिम संस्कार से बहुत से मानवीय पहलू सामने आ रहे हैं। बहुत से मामलों में घरवाले अंतिम संस्कार से इंकार कर दे रहे हैं, और सरकार के इंतजाम में मृतक के धार्मिक रिवाज के मुताबिक अंतिम संस्कार हो रहा है। कई जगहों पर तो सरकार के जो अफसर इस काम में लगे हैं, वे दर्जनों लाशों का अंतिम संस्कार करवाते हुए खुद भी कोरोनाग्रस्त हो रहे हैं। अभी एक वीडियो सोशल मीडिया पर आया है जिसमें जाहिर तौर पर मुस्लिम दिख रहे कई सामाजिक कार्यकर्ता शव वाहन से हिन्दू शव उतार रहे हैं, और हिन्दू विधि से अंतिम संस्कार कर रहे हैं, परिवार के लोग दूर खड़े देख रहे हैं। महामारी ऐसी भयानक है कि परिवार का डरना भी नाजायज नहीं है, और अपनी जिंदगी खतरे में डालकर सरकार या समाज के जो लोग यह काम कर रहे हैं, उनकी बेबसी को भी समझना चाहिए कि वे मृतक का चेहरा दिखाने जैसा अतिरिक्त खतरा उठाने की हालत में नहीं हैं।

फिर भी आज यहां हम मृतकों के बारे में नहीं लिख रहे हैं, जो अब तक मृतक नहीं बने हैं उनके बारे में लिख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी सुनवाई के दौरान दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, और असम की राज्य सरकारों से जवाब मांगा है कि वे इस महामारी की रोकथाम के लिए क्या कर रही हैं। वे अदालत ने कहा है कि गुजरात में हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। अदालत की इस फिक्र से परे भी पिछले कई हफ्तों से हमारा यह अंदाज था कि आने वाले महीनों में हिन्दुस्तान में कोरोना की एक दूसरी लहर आएगी। दरअसल दुर्गा पूजा से लेकर दीवाली तक, और छठ से लेकर कुछ और त्यौहारों तक लोगों ने जिस तरह जमकर लापरवाही दिखाई है, भीड़ में धक्का-मुक्की की है, बाजार पर टूट पड़े हैं, और फिर दीवाली मिलन से लेकर छठ के घाट तक जितनी बेफिक्री दिखाई गई है, उससे कोरोना भी शायद हक्का-बक्का हो गया होगा कि उसकी इज्जत जरा भी नहीं बची है। कल की ही मध्यप्रदेश की तस्वीरें हैं, सत्तारूढ़ भाजपा का एक छोटे से जिले में दीवाली मिलन हो रहा है, और शासन के कोरोना नियमों के मुताबिक दो सौ से अधिक लोग किसी आयोजन में नहीं जुट सकते, लेकिन भाजपा के इस कार्यक्रम में हजार से अधिक लोग थे। और वहां के लोगों ने इसे दीवाली मिलन के बजाय कोरोना मिलन करार दिया है, और अब तस्वीरों के सुबूत के साथ उम्मीद कर रहे हैं कि प्रशासन कार्रवाई करेगा। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री ने अपने सरकारी निवास पर पोला-तीजा की पूजा की थी, और सैकड़ों महिलाओं की भीड़ वहां जुटी थी। बात किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है या किसी एक प्रदेश की नहीं है, जब सरकारी नियमों से हिकारत दिखाने की बात आती है तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत में एक असाधारण एकता दिखने लगती है। यह देश वैसे तो क्षेत्रवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, जैसी कई सरहदों से बंटा हुआ है, लेकिन जब सरकारी नियम तोडऩे की बात आती है तो हर तबके के लोग, राजा और प्रजा, तकरीबन सारे ही लोग हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, आपस में सब भाई-भाई बन जाते हैं। (हम इस प्रचलित वाक्य को इस असहमति के साथ लिख रहे हैं कि इसमें बहनों की कोई जगह नहीं रखी गई है)।

ठंड के मौसम को लेकर पहले से यह आशंका थी कि कोरोना इस मौसम में अधिक आक्रामक हो सकता है। दिल्ली की एक अलग दिक्कत यह है कि वहां पर ठंड और प्रदूषण दोनों मिलकर लोगों का जीना हराम कर देते हैं, और बहुत से मरीजों को तो दिल्ली छोड़ देने की सलाह दी जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को डॉक्टरी सलाह पर दिल्ली से बाहर चले जाना पड़ा है। अब दिल्ली से बाकी पूरे देश का सरकारी और कारोबारी रिश्ता ऐसा जुड़ा हुआ है कि वहां अगर महामारी की नौबत खतरनाक होती है, तो वहां से बाकी पूरे देश तक उसके जाने का खतरा रहता है। और बाकी देश वैसे भी आज कोई कोरोनामुक्त है नहीं। पिछले एक महीने में अगर कोरोना पॉजिटिव की गिनती कुछ कम बढ़ी थी, तो इसकी एक वजह त्यौहार भी थे। लोग त्यौहारों की खरीदी और बिक्री में लगे थे, ऐसे में वे जांच कराना नहीं चाहते थे, और कोरोना के आंकड़े थोड़े से टले थे, कहीं गए नहीं थे। इस दौरान एक खतरनाक बात यह जरूर हुई कि बिना जांच के कोरोनाग्रस्त लोग घूमते रहे, बाजारों में, मंदिरों और दूसरे धर्मस्थलों में धक्का-मुक्की की नौबत रही, और इन सबका असर अब देखने मिल रहा है, और दिल्ली शहर में लगातार तीन दिन से सौ से अधिक लोग रोज कोरोना से मर रहे हैं।

हिन्दुस्तान में कोरोना को लेकर जो वैज्ञानिक चेतना लोगों में आनी चाहिए थी, जो सावधानी रहनी चाहिए थी, वह कहीं नजर नहीं आ रही। ताली-थाली, दिया-मोमबत्ती जैसे अवैज्ञानिक तरीकों को लोगों ने कोरोना से निपटने का जरिया मान लिया, और महामारी के खतरे की तरफ से बेफिक्र हो गए। धर्म वैसे भी अपने हथियार पर धार करने के बाद सबसे पहले अपने पैदाइशी दुश्मन, विज्ञान को मारने निकलता है। इन दोनों का अस्तित्व साथ-साथ रहना खासा मुश्किल होता है, और हिन्दुस्तान में लोगों की समझ आज विज्ञान से इतनी दूर कर दी गई है, धर्म के रंग में इतनी रंग दी गई है कि लोगों को महामारी के खतरे दिखना बंद हो गया है। कुछ हफ्ते पहले मुस्लिम समाज का एक बड़ा त्यौहार पड़ा तो ट्रकों पर सवार होकर हजारों लोगों का ऐसा जुलूस निकला जिसमें दो-चार फीसदी लोग भी मास्क लगाए नहीं दिख रहे थे। धर्म ने वैज्ञानिक समझ का कीमा बनाकर रख दिया था।

आज जब दुनिया के बहुत सारे देश, हिन्दुस्तान के मुकाबले बेहतर इलाज वाले देश कोरोना की दूसरी, और शायद तीसरी, लहर झेल रहे हैं, तब हिन्दुस्तान एक बड़े खतरे के मुहाने पर पहुंच गया है। बिहार में तो पूरे प्रदेश में चुनाव थे, लेकिन देश के कई प्रदेशों में उपचुनाव थे, और वहां जमकर लापरवाही बरती गई। भारत में महामारी के नियमों को लागू करने का रोजाना का जिम्मा राज्यों का है, इनमें केन्द्र की दखल कम रहती है। और आने वाले महीनों में देश के कई प्रदेश कोरोना की बहुत बुरी मार झेलते दिख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट राज्यों से जवाब मांगकर एक सैद्धांतिक बहस करे, उससे बेहतर यह है कि पूरे देश से मीडिया में आ रही तस्वीरों और वीडियो बुलवाकर सीधे कुछ हजार लोगों को जेल भिजवाए, ताकि बाकी लोग कुछ सावधान भी हो सकें। वोटों से बनने वाली, और वोटरों की दहशत में चलने वाली सरकारों से किसी कड़े अमल की उम्मीद नहीं की जा सकती। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने खुद होकर यह सुनवाई शुरू की है, इसलिए उसे सरकारों के हलफनामों पर अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए। उसे पुरानी कई मिसालों के मुताबिक ऐसे जांच कमिश्नर बनाने चाहिए जो सरकार से परे सीधे सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करे। कुल मिलाकर देश की जनता अगर अपने स्तर पर सावधान नहीं रहेगी, तो शायद चिकित्सा विज्ञान, सरकार, और अदालतें सब मिलाकर भी उसे कोरोना-मौत से नहीं बचा पाएंगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


22-Nov-2020 5:34 PM 199

हाल के बरसों में हिन्दुस्तानी की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने अनगिनत मामलों में एक ऐसा रूख दिखाया है जो कि देश की सत्ता सम्हाल रहे लोगों की पसंद की फिक्र करते दिखता है। सरकारी एजेंसियों या सरकार के तर्क मानने के लिए अदालत कुछ उत्साही दिखती है, और अदालत की अवमानना का खतरा खड़ा हो जाएगा अगर यह लिखा जाए कि बहुत से मामलों में अदालतें सरकार की असली पसंद के लिए लीक से हटकर भी सुनवाई करने को एक पैर पर खड़ी दिखीं, और एक गाना सा दिल्ली की अदालती हवा में गूंजता सुनाई देता रहा- हो तुमको जो पसंद, वही बात करेंगे। 

बहुत से चर्चित मामलों को लेकर जब देश की जनता यह उम्मीद कर रही थी कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के अधिकारों के बेजा दिखते इस्तेमाल को रोकने के लिए, उस पर सवाल खड़े करने के लिए तनकर खड़ी रहेगी, सुप्रीम कोर्ट के जजों का रूख, फैसलों का अंदाज इस बेजा का हिमायती दिखा। लोकतंत्र में संसद, सरकार, और अदालत, इन तीनों के बीच जो शक्ति संतुलन बनाया गया है, वह खोने में हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत ने खासा योगदान दिया दिखता है। सरकार की मनमानी पर काबू की जिम्मेदारी संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को दी थी, लेकिन एक के बाद दूसरे, और दूसरे के बाद तीसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट सरकार को मानो अपनी पहुंच से ऊपर का मान बैठी है। इस बारे में देश के बहुत से लोग बहुत कुछ बोल चुके हैं, और लिख भी चुके हैं, हम आज यहां जो लिख रहे हैं, वह पूरी तरह मौलिक और पहली बार नहीं है, लेकिन यह लिखना जरूरी इसलिए है कि लोगों को लोकतंत्र की इस जन्नत की हकीकत समझ पडऩा चाहिए।

हुआ यह है कि हिन्दुस्तान में कोई 45 बरस पहले आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने एक प्रतिबद्ध न्यायपालिका का फतवा दिया था। उस वक्त इंदिरा के झंडाबरदार इस नारे की गूंज को आगे बढ़ाते रहे। उसकी ठोस वजह भी थी, इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया था, और सत्ता पर बने रहने के लिए इंदिरा को इमरजेंसी लगानी पड़ी थी, और उस वक्त इंदिरा सरकार की आत्मरक्षा के लिए उसे यह लगना स्वाभाविक था कि न्यायपालिका सरकार के प्रति प्रतिबद्ध रहनी चाहिए। उस वक्त तो बहुत अधिक जज इंदिरा की मनमानी के खिलाफ अपना हौसला नहीं दिखा पाए थे, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट के एक-दो जज तो थे ही जो कि इंदिरा की मनमानी के खिलाफ खुलकर फैसला दे रहे थे। आज जब अर्नब गोस्वामी जैसे तथाकथित पत्रकार की जमानत अर्जी पर सुनवाई की बात आती है, या अर्नब के दूसरे मामले पर अर्जी लगती है, तो सुप्रीम कोर्ट के कोई जज आधी रात घर से सुनवाई को तैयार हो जाते हैं, तो किसी और जज को लगता है कि अर्नब के मामले में सुनवाई में एक दिन की भी देर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। दूसरी तरफ इस देश में सैकड़ों पत्रकार अलग-अलग राज्यों में महीनों से जेलों में सड़ रहे हैं, सामाजिक आंदोलनकारी मौत की कगार पर पहुंच हुए भी जमानत नहीं पा रहे हैं, और इस देश के अर्नबों को रातोंरात जमानत मिल जाती है। हो सकता है कि जज उनके मामले को लेकर सचमुच ही संतुष्ट हों कि उन्हें जमानत का हक है, लेकिन जाहिर तौर पर देश यह देख रहा है कि दूसरे पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और शिक्षक किस तरह महीनों और बरसों तक जेलों में बंद रखे जा रहे हैं, और उनके खिलाफ आखिर में चाहे सरकार की हार क्यों न हो जाए, इतने बरस कैद की सजा तो वे भुगत ही चुके रहेंगे। इसलिए देश के लोगों के बीच आजादी का हक जिस हद तक जजों की मर्जी, सत्ता की पसंद-नापसंद, और सबसे महंगे वकीलों को रखने की ताकत पर टिक गया है, वह हक्का-बक्का करता है। लोगों ने अभी यह भी लिखा है कि देश के सबसे महंगे वकील को रखने की ताकत किस तरह जमानत की संभावना को बढ़ा देती है। लोगों ने सुप्रीम कोर्ट को ही सीधे खुलकर अपने नाम से यह लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट को पसंद लोगों को आनन-फानन सुनवाई का मौका देकर अदालत बाकी आम लोगों के हक का मजाक उड़ा रही है। जिस तरह एक वक्त ताजमहल को लेकर एक शायर ने लिखा था कि इक शहंशाह ने बनवा  के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक..., उसी तरह आज सुप्रीम कोर्ट में महंगे वकीलों को रखने वाले शहंशाहों को बिजली की रफ्तार से मिलने वाले उनके पसंदीदा इंसाफ को देखकर यही लगता है कि यह उन बाकी तमाम गरीबों का मजाक है। 

दुनिया में हमेशा से यह माना जाता रहा है कि इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। आज लगता है कि सुप्रीम कोर्ट देश के सबसे महंगे वकीलों के क्लाइंट, सत्ता की असली पसंद, और खुद सुप्रीम कोर्ट के जजों के प्रति इंसाफ को फिक्रमंद रह गया है। अपनी अवमानना को लेकर सुप्रीम कोर्ट जितना संवेदनशील हो गया है, उसे ट्विटर पर अपना अपमान देखते हुए उसके ऊपर-नीचे के ऐसे ट्वीट दिखाई नहीं पड़ते जिनमें इसी देश की महिलाओं को अलग-अलग विधियों से बलात्कार करने की धमकियां दी जाती हैं। क्या सुप्रीम कोर्ट इस देश में इज्जत का हकदार एक ऐसा टापू बन गया है जिसके इर्द-गिर्द समंदर में डूबकर मर जाने के लिए बाकी तमाम नागरिक आजाद हैं? ट्वीट पढऩे के शौकीन सुप्रीम कोर्ट को देश की महिला आंदोलनकारियों, पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ बलात्कार की खुली धमकियों को अनदेखा करने की जो आदत है, वह आदत बताती है कि सुप्रीम कोर्ट की असली पसंद क्या है। 

देश की सबसे बड़ी अदालत में खास और आम के बीच ऐसी गहरी और चौड़ी खाई पहले शायद कभी नहीं रही, और जिसे सत्ता नापसंद करती हो, जो देश के सबसे महंगे वकील रखने की औकात न रखते हों, उनके प्रति न्यायपालिका की अनदेखी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो गई है, लेकिन अदालत को इतिहास से अधिक अपने भविष्य की फिक्र है जो कि लोगों को दिख रही है, समझ पड़ रही है, लेकिन अदालत इसकी तरफ से बेफिक्र है।  

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


21-Nov-2020 6:37 PM 219

कर्नाटक सरकार का एक फैसला सामने आया है कि वहां समाज कल्याण विभाग उन गांवों में सरकारी सैलून चालू करेगा जहां दलितों को सैलून में जाने से रोक दिया जाता है। देश भर के गांव-गांव में नाई की दुकान में भेदभाव की शिकायतें आती हैं, और उसका यह आसान इलाज कर्नाटक की भाजपा सरकार ने निकाल लिया है कि ऐसे सरकारी दलित-सैलून में सिर्फ दलितों के बाल काटे जाएंगे और उनकी हजामत की जाएगी। खबर बताती है कि उत्तर और मध्य कर्नाटक के कई जिलों में ऐसे मामले सामने आए हैं जब दलितों के बाल काटने से मना कर दिया गया। सरकार का कहना है कि जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए यह किया जा रहा है। यह फैसला मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा की अगुवाई में एसटीएससी अत्याचार अधिनियम समीक्षा बैठक में लिया गया है।

पहली नजर में यह फैसला दलितों के साथ इंसाफ और उन्हें एक सहूलियत देने वाला दिखता है। लेकिन दूसरी तरफ यह फैसला अपने पर अमल के पहले भी एक प्रस्ताव की शक्ल में जब सामने आया, तभी इसने यह साबित कर दिया कि भारतीय लोकतंत्र में दलितों को इंसाफ मिलना मुमकिन नहीं है। उनके बाल तभी कट सकते हैं जब सरकार उनके लिए अलग से दलित-नाई की दुकान खोले। यह फैसला सरकार का अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराना भी है क्योंकि ऐसा भेदभाव करने वालों को गिरफ्तार करके उन्हें सजा दिलाना सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है, और उसे किनारे धकेलकर यह जातिवादी, छुआछूत से भरा सरकारी फैसला लिया जा रहा है। इस फैसले का मतलब तो यही है कि जिन गांवों में दलितों को कुएं से पानी भरने नहीं मिलता, वहां दलितों के लिए अलग कुआं खुदवाने को एक इलाज मान लिया जाए। तो धीरे-धीरे दलितों के लिए अलग थाना, अलग कलेक्ट्रेट, अलग अदालत, और अलग मुख्यमंत्री क्यों न हो? अगर सरकार ही जातिवादी छुआछूत को कुचलने के बजाय उसे मान्यता देकर नीची समझी जाने वाली जातियों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर उनके लिए अलग दलित-सैलून खोले, तो इसका मतलब है कि कानून ने अराजकता के सामने हथियार डाल दिए, हथियार तो क्या हाथ भी डाल दिए। 

जो सरकार इस तरह का फैसला ले रही है, उसकी समझ कहीं भी दलितों के साथ इंसाफ की नहीं है। उसकी समझ अपने संवैधानिक दायित्व की भी नहीं है जिसकी कि शपथ लेकर वह सत्ता में आई है। हम कर्नाटक के मुख्यमंत्री या संबंधित मंत्रियों-अफसरों की जाति नहीं जानते, लेकिन यह बात साफ है कि इन लोगों को भारतीय समाज में जाति आधारित छुआछूत की समझ नहीं है, और इस छुआछूत को खत्म करने की इनकी नीयत भी नहीं है। सरकारों के साथ यह आम दिक्कत रहती है कि किसी जटिल समस्या वे एक लुभावना समाधान ढूंढकर उसका अतिसरलीकरण कर देते हैं, और ऐसे में सामाजिक गुनहगार बच जाते हैं। इस सिलसिले का कोई अंत नहीं होगा। आगे चलकर स्कूली बच्चों को दोपहर के भोजन में दलित बच्चों का खाना अलग बनने लगेगा, दलितों के हाथ का पका खाना दूसरी जाति के बच्चे नहीं खाएंगे, कहीं पर कोई सरकार या प्रशासन दलित बच्चों के लिए अलग आकार की थाली का इंतजाम कर देंगे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सरकारी जमीन पर सरकार ने दलितों के लिए एक सभागृह बनवाया है, लेकिन चूंकि उसके बगल के सरकारी बंगले में 20 बरस से मंत्री रहते आए हैं, इसलिए दलितों की शादी तो इस भवन में हो सकती है, उसमें संगीत नहीं बज सकता। इस तरह एक समुदाय के सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक जगह को इस आधार पर संगीत से वंचित कर दिया गया।
 
सरकार की जिम्मेदारी भेदभाव को कड़ाई से खत्म करने की है क्योंकि संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने बहुत से ऐसे फैसले दिए हैं जिनमें दलित-आदिवासी तबकों की विशेष सुरक्षा और उनके विशेष अधिकारों की बात की गई है। मध्यप्रदेश में जहां दलित दूल्हों को घोड़ी पर चढऩे नहीं मिलता वहां पर सरकार इसका एक आसान इलाज ढूंढ सकती है। वह दलित बारातियों के लिए सौ-दो सौ हेलमेट का इंतजाम कर सकती है, और दलित दूल्हे के लिए पुलिस लाईन से घोड़ी का इंतजाम कर सकती है, इसके बाद पुलिस के घेरे में बारात निकाली जा सकती है। लेकिन क्या यह हिफाजत लोकतंत्र की नाकामयाबी का सुबूत नहीं रहेगी? कर्नाटक सरकार का यह फैसला भारी शर्मिंदगी का एक कलंक है, सरकारों को जुर्म के सामने इस तरह घुटने टेकते देखना इस लोकतंत्र में शर्मनाक नौबत है। आने वाले दिनों में हमें उम्मीद है कि भारत में दलितों की हकीकत को समझने वाले कुछ सामाजिक कार्यकर्ता जरूर इस मुद्दे को उठाएंगे, और अगर इसे कोई अदालत तक ले जाए तो यह सरकारी फैसला खारिज होना तय है क्योंकि यह भेदभाव को मान्यता देता है, और उस पर कार्रवाई के बजाय उसके रास्ते से हटकर छुपकर आगे निकल जाने वाला है। यह देखना भी दिलचस्प हो सकता है कि यह फैसला लेने वाली कर्नाटक की कमेटी ने किस दर्जे के कितने दलित थे, और उन्होंने बैठक में क्या राय रखी थी? 

 (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


20-Nov-2020 3:48 PM 112

मध्यप्रदेश में उपचुनाव में दो तिहाई सीटें जीतकर अपनी सरकार बचाने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आधा दर्जन मंत्रालयों को मिलाकर एक गाय-मंत्रिमंडल बनाया है। पशुपालन, वन, पंचायत, ग्रामीण विकास, गृह, और किसान कल्याण विभागों का गाय के मुद्दे से कुछ न कुछ लेना-देना रहता है, इसलिए इनको मिलाकर एक काऊ-कैबिनेट बना दी गई है ताकि मध्यप्रदेश में गायों की रक्षा हो सके। 

पिछले बरसों में देश के अलग-अलग राज्यों ने गोवंश को बचाने की लुभावनी नीति बनाते हुए ऐसे कड़े कानून बनाए कि लोगों के लिए जानवर खरीदकर लाना-ले-जाना, बूढ़े और अनुत्पादक हो चुके जानवरों को बेचना नामुमकिन सा हो गया है। अगर सरकारी विभागों की निगरानी से किसी तरह लोग बच भी निकलते हैं, तो सडक़ों पर गौरक्षक नाम के हिंसक और हथियारबंद जत्थे मौके पर ही भीड़त्या के लिए तैयार रहते हैं। कुल मिलाकर भारत के किसानों से, दूध उत्पादकों से जानवरों का जो रिश्ता था उसे खतरे का एक सामान बना दिया गया है। अब मध्यप्रदेश की सरकार दूसरे राज्यों से गौरक्षा के मामले में आगे बढ़ते हुए एक गाय-मंत्रिमंडल बना रही है। इस प्रदेश में लड़कियों और दलितों को अगर हिफाजत से जीना है, तो उन्हें भी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह उन्हें गाय बना दे। 

हिन्दुस्तान चुनाव जीतने में मदद करने वाले भावनात्मक और लुभावने मुद्दों से घिरते चल रहा है। अभी 20 बरस पहले तक मध्यप्रदेश का हिस्सा रहे छत्तीसगढ़ में भी गाय से जुड़े कुछ फैसले किए गए हैं, लेकिन वे ग्रामीण विकास और रोजगार से जुड़े हुए अधिक हैं, यह एक अलग बात है कि आरएसएस ने जाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की तारीफ की है कि गाय की रक्षा के लिए उन्होंने जो फैसले लिए हैं, उनके लिए संघ आभार और अभिनंदन करता है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने अपनी परंपरागत लीक से हटकर धर्म और हिन्दुओं से जुड़ी हुई गाय को लेकर काफी कुछ किया है। राम के वनवास के दौरान उनके छत्तीसगढ़ से भी गुजरने की जो प्रचलित कहानी है, उसके मुताबिक भूपेश सरकार राम वन गमन पथ को पर्यटन के मुताबिक विकसित कर रही है। गाय का गोबर खरीद रही है, गाय और दूसरे दुधारू पशुओं को गांवों में गौठान बनाकर रखने की एक मौलिक और महत्वाकांक्षी योजना पर काम बहुत बढ़ चुका है। अब देखना यह है कि हिन्दुओं के इन भावनात्मक मुद्दों पर सरकार की जो रकम खर्च हो रही है, क्या उसका कोई उत्पादक इस्तेमाल भी हो रहा है, या यह सरकारी खर्च पर चलने वाली एक लुभावनी योजना ही रह जाएगी? 

आज हिन्दुस्तान में हिन्दू-मुस्लिम प्रेमियों के बीच गिनी-चुनी शादियां होती हैं। अगर परिवार और समाज बवाल न करें, राजनीतिक दल मुद्दा न बनाएं, तो ऐसे कोई सुबूत नहीं हैं कि अंतरधार्मिक शादियों से किसी एक धर्म का नुकसान हो रहा है, या किसी दूसरे धर्म की आबादी बढ़ रही है। लेकिन इसे लवजेहाद का जुबानी तमगा देकर एक के बाद दूसरा भाजपाशासित राज्य इसके खिलाफ कानून बनाने की बात कर रहा है। अभी हमें ऐसे किसी कानून की संवैधानिकता समझ नहीं पड़ी है क्योंकि भारत का संविधान बालिग लोगों को मर्जी से शादी की छूट देता है, और उन्हें कानूनी संरक्षण देता है। ऐसे में अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच किसी शादी को लेकर कैसे कोई कानून बन सकता है, यह समझ से थोड़ा परे है। और फिर यह भी हो सकता है कि सरकारें ऐसे किसी कानून की संवैधानिकता की कमजोरी जानते हुए इस पर आगे बढ़ रही है क्योंकि यह बहुसंख्यक समुदाय को खतरा बताकर हिफाजत देने का एक लुभावना काम हो सकता है। जो भाजपा-सरकारें अपने प्रदेशों की हिन्दू लड़कियों को मुस्लिम लडक़ों से शादी करने से रोकना और बचाना चाहती हैं, वे सरकारें अपने प्रदेशों में हिन्दुओं के हाथों हिन्दू लड़कियों, और दूसरे धर्मों की लड़कियों पर बलात्कार रोकने के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रही हैं। बहुत से मामलों में तो भाजपा के सांसद और विधायक बलात्कारियों का साथ देते खड़े दिखते हैं। अब सवाल यह है कि लड़कियों को बलात्कार से बचाना प्राथमिकता नहीं है, बल्कि लड़कियों को अपनी मर्जी से शादी करने देने से रोकना राज्य सरकारों की बड़ी प्राथमिकता बन गई है। खुद भाजपा के बड़े-बड़े नेता ऐसे हैं जिन्होंने खुद ने, या परिवार के लोगों ने दूसरे धर्मों में शादियां की हैं, बहुत सी शादियां मुस्लिम युवकों से हिन्दू युवतियों की भी हुई हैं। लेकिन एक सामाजिक खतरा बताते हुए, एक धार्मिक मुद्दा बनाते हुए लवजेहाद नाम के एक शब्द को गढक़र हिन्दू वोटरों के बीच अपनी पैठ बढ़ाई जा रही है। जब कभी किसी अदालत में कुछ कहने की बात आती है, या इन्हीं सरकारों से कोई सूचना के अधिकार में पूछते हैं, तो सरकार का जवाब होता है कि उसके रिकॉर्ड में लवजेहाद नाम का कोई शब्द नहीं है। लेकिन अब कानून बनाकर इसके खिलाफ कुछ करने की मुनादी बहुत से भाजपा राज्यों ने कर दी है। 

हम इन दो मुद्दों को एक साथ इसलिए उठा रहे हैं कि गाय का मामला, और हिन्दू लड़कियों का मुस्लिमों से शादी का मामला, ये दोनों ही मामले सरकारों के लोक-लुभावने धार्मिक मुद्दों को कानूनी जामा पहनाने की एक कोशिश अधिक दिख रही है, अपने प्रदेशों में जलते-सुलगते असल मुद्दों से निपटने की कोशिश नहीं दिख रही है। लेकिन जब तक हिन्दुस्तान के वोटरों का एक बड़ा तबका ऐसे ही भावनात्मक मुद्दों पर सरकारें बना रहा है, चतुर पार्टियों को इसी एजेंडा को आगे बढ़ाने में समझदारी दिख रही है। 

फिलहाल मध्यप्रदेश में गाय-मंत्रिमंडल बनने के बाद यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वहां के घूरों पर जिंदा गाय को अब बेहतर क्वालिटी का पॉलीथीन खाने मिलेगा ताकि उसके पेट में जमा होने वाले पॉलीथीन की घटिया क्वालिटी से उसे नुकसान होना बंद हो सके। 

 (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


19-Nov-2020 8:17 PM 211

उत्तरप्रदेश से बच्चों के सेक्स-शोषण का एक भयानक मामला सामने आया है जिसमें सिंचाई विभाग का एक इंजीनियर, रामभवन सिंह, बच्चों को इधर-उधर से जुटाकर उनका यौन शोषण करता था, और उनके वीडियो बनाकर इंटरनेट पर बेचता था। दस साल से वह यह काम करते आ रहा था, लेकिन उसके रिश्तेदारों को भी इसकी भनक नहीं लगी थी। अब जब किसी सुराग से पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया है, तो उसके पास बच्चों के पोर्नो का जखीरा मिला है। अब तक की जांच से पता लगा है कि वह गरीब परिवारों के 5 से 16 बरस तक की उम्र के बच्चों को अपना निशाना बनाता था। उसके पास से इतने डिजिटल सुबूत बरामद हो चुके हैं कि इस मामले में शक की कोई गुंजाइश नहीं है। इसकी जांच सीबीआई कर रही है, और यह अफसर बच्चों को मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने के बहाने बुलाता था और उनका सेक्स-शोषण करता था। 

किसी का नाम भगवान के नाम पर रख देने का उस पर कोई असर होता हो ऐसा रामभवन नाम के इस अफसर की हरकतें देखकर नहीं लगता। लेकिन इतने बड़े मामले का भांडाफोड़ होने से इसकी गिरफ्तारी के साथ-साथ अब आगे उन लोगों की गिरफ्तारी भी होनी चाहिए जो कि बच्चों के पोर्नो खरीदते हैं। इंटरनेट के जानकार लोग यह जानते हैं कि इंटरनेट पर आसानी से पकड़ में न आने वाला एक डार्क वेब होता है जिस पर तरह-तरह के मुजरिम काम करते हैं और वहां ऐसे वीडियो की खरीद-बिक्री भी होती है। हिन्दुस्तान में सीबीआई को तलाशते हुए योरप की किसी पोर्नो वेबसाईट पर एक हिन्दुस्तानी बच्चे का ऐसा पोर्नो मिला और वहां से ढूंढते हुए जांच एजेंसी रामभवन तक पहुंची।

इस मामले का भांडाफोड़ होने से हिन्दुस्तान के लोगों की आंखें खुलनी चाहिए कि बच्चों का यौन-शोषण कोई विदेशी सोच नहीं है, यह देशों की सरहदों से परे इंसानों के बीच एक आम बात है, और ऐसे अधिकतर लोग बच्चों का सेक्स-शोषण करने के बाद भी बच निकलते हैं क्योंकि बच्चे अपने घर या स्कूल में अपने शोषण की बात बताते भी हैं तो भी उनके ही लोग उस पर भरोसा नहीं करते। धीरे-धीरे बच्चों में बताने का हौसला खत्म होने लगता है। अब अगर एक अफसर 50 से अधिक बच्चों का शोषण कर चुका है, उसके कब्जे से दर्जनों वीडियो और सैकड़ों तस्वीरें मिली हैं, वह इंटरनेट पर पोर्न साईट्स को ये वीडियो बेच देता था, और बच्चों से सेक्स भी करते रहता था, 10 बरस तक उसका कोई भांडाफोड़ नहीं हो सका, तो यह नौबत भारतीय समाज के एक खतरनाक हाल को बताती है। 

दुनिया के बाकी तमाम देशों के साथ-साथ हिन्दुस्तान के समाज को जागरूक होने की जरूरत है क्योंकि गरीब और बेघर बच्चे, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, शिक्षकों और खेल प्रशिक्षकों की पहुंच के भीतर के बच्चे हमेशा ही खतरे में रहते हैं। हिन्दुस्तान में मां-बाप अपने बच्चों की शिकायतों को इसलिए भी सुनना नहीं चाहते क्योंकि ये शिकायतें कई तरह की असुविधा खड़ी करने वाली रहती हैं, रिश्तेदारों या पहचान वालों से रिश्ते बिगड़ते हैं, पुलिस थाने और कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगते हैं, और जैसे कि आम हिन्दुस्तानी सोच है, सेक्स-हमले के शिकार लोगों के लिए ही यह मान लिया जाता है कि उनकी इज्जत लुट गई है। इस देश में बलात्कार की इज्जत नहीं लुटती, बलात्कार के शिकार की इज्जत लुटती है। ऐसे देश में शिकायत लेकर किसी बच्चे का सामने आना नामुमकिन सा रहता है। 

हिन्दुस्तान अपने डिजिटल विकास पर बड़ा गर्व करता है। लेकिन यहां चारों तरफ साइबर-ठगी चलती रहती है, साइबर-जालसाजी, और साइबर-जुर्म एक बड़ा कारोबार बन चुका है। ये तमाम जुर्म सरकार के काबू के बाहर दिखते हैं। इसी तरह चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सरकार की पकड़ बहुत कम दिख रही है जबकि कई अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियां और दूसरे संगठन लगातार चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर नजर रखकर संबंधित सरकारों को सावधान करने का काम करते हैं। हिन्दुस्तान सरकार को ऐसे डिजिटल औजार विकसित करने चाहिए जो कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी का किसी भी शक्ल में इस्तेमाल करने वाले लोगों को पकड़े। हाल के महीनों में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में भी बहुत से लोग दिल्ली से मिली सूचना के आधार पर गिरफ्तार किए गए हैं, लेकिन वॉट्सऐप जैसे तकनीक के चलते लोग दूसरे किस्म के सेक्स-पोर्नो के साथ-साथ बच्चों के सेक्स-पोर्नो भी एक-दूसरे को भेजते रहते हैं। ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि उनकी खबरें पढक़र बाकी लोगों को एक सबक मिल सके। 

लेकिन बच्चों के सेक्स-शोषण का मुद्दा एक अलग पहलू भी रखता है। छोटे-छोटे सामानों का लालच, कई बार तो बेघर बच्चों के लिए एक रात सिर छुपाने की जगह या कंबल मिल जाना भी उन्हें अपने बदन का समझौता करने पर मजबूर कर देता है। इस देश में जब तक बच्चों की आम हालत नहीं सुधरेगी, जब तक वे बेघर और अनाथ बने रहेंगे, तब तक मोटेतौर पर उनका शोषण नहीं थम सकेगा। इसलिए चाइल्ड पोर्नोग्राफी का यह मामला बच्चों से बलात्कार के अनगिनत मामलों का एक पुख्ता सुबूत भी है। और सरकार को इस जुर्म का व्यापक प्रचार करके देश के बाकी मां-बाप, समाज के लोगों को सावधान भी करना चाहिए कि उनके इर्द-गिर्द ऐसी कोई हरकत दिखे तो वे तुरंत पुलिस को खबर करें। एक अफसर 10 बरस तक दर्जनों बच्चों का सेक्स-शोषण करते रहा, उसकी रिकॉर्डिंग करते रहा, उसे दुनिया भर में बेचते रहा, और किसी को उसकी खबर नहीं लगी, यह बात भी हैरान करने वाली है।

यह मामला सरकार और समाज दोनों के सावधान और चौकन्ने होने का है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


18-Nov-2020 3:50 PM 173

दुनिया को पिछली एक सदी में सबसे अधिक तहस-नहस करने वाले कोरोना और उससे जुड़े लॉकडाउन ने न सिर्फ जिंदगी खत्म की है, जीने के तरीके खत्म किए हैं, बल्कि लोगों पर एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक हमला भी किया है। आज दुनिया के बहुत से देशों में लड़कियां और महिलाएं देह बेचने को मजबूर हुई हैं। इसके अलावा बच्चों की तस्करी बढऩे की भी खबरें हैं जिनमें से अधिकतर का इस्तेमाल सेक्स-ट्रेड में होता है। यह तो पूरे वक्त बदन बेचने के धंधे की बात है। लेकिन एक सामाजिक हकीकत को एक सहज समझ से देखें, तो जब-जब कोई बहुत बुरा अकाल पड़ता है, कोई ऐसी प्राकृतिक विपदा आती है जिससे अर्थव्यवस्था और रोजगार तहस-नहस हो जाते हैं, तो वैसे में घर चलाने की बुनियादी जिम्मेदारी ढोने वाली महिलाओं और लड़कियों के बदन पर पहला बोझ पड़ता है, और उनमें से बहुत सी घर के बाकी लोगों का भी पेट भरने के लिए अपना बदन बेचने पर मजबूर होती हैं। आज अफ्रीका के एक देश इथोपिया की एक ऐसी ही रिपोर्ट है कि वहां नाबालिग बच्चियां भी किस तरह मजबूरी में बदन बेच रही हैं क्योंकि उनके जिंदा रहने का और कोई जरिया नहीं बचा है। 

लोगों को याद होगा कि हमने पिछले महीनों में एक से अधिक बार इसी जगह पर अमरीका में 1930 के दशक में आई भयानक मंदी के बारे में लिखा था कि उस दौर में अमरीकी समाज में अनगिनत घरेलू लड़कियों और महिलाओं को देह के धंधे में उतरते देखा था। जब जिंदा रहने के लिए, खाने के लिए और कोई भी जरिया न रह जाए, तो दुनिया में तकरीबन तमाम जगहों पर औरतों और लड़कियों पर देह बेचने का दबाव बनने लगता है। बात कहने में बहुत कड़वी लगेगी, लेकिन हकीकत यह है कि परिवार के बाकी लोग भी बुझे हुए चूल्हे को देखते हुए परिवार की शर्मिंदगी की ओर से आंखें बंद कर लेते हैं, और यह देखना बंद कर लेते हैं कि चूल्हा सुलग कैसे रहा है। जब बदन में भूख सुलगती है, तो वह तमाम नाजायज काम करने को मजबूर कर देती है। अमरीका की सदी की सबसे बड़ी मंदी में नए लोगों को देह बेचने के धंधे में उतरते देखा था जिन्होंने कभी खुद के बारे में भी ऐसा नहीं सोचा होगा। 

हिन्दुस्तान में चूंकि वर्जित संबंधों से लेकर वेश्यावृत्ति तक ऐसे मामले माने जाते हैं जिन पर चर्चा न करने से ही यह देश गौरवशाली बने रह सकता है। यही वजह है कि दिल्ली और मुम्बई सहित तमाम महानगरों में संगठित रूप से जाने-पहचाने इलाकों में लाखों महिलाएं देह बेचती हैं, और स्थानीय शासन-प्रशासन, कानून और अदालत सब यह मानकर चलते हैं कि हिन्दुस्तान में इनका कोई अस्तित्व नहीं है। आज यह पहला मौका आया है जब हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने खुलकर यह आदेश दिया कि सेक्स-कर्मियों को राज्य सरकारें कोरोना के इस दौर के चलते भूखों मरने से बचाने के लिए मुफ्त अनाज दे। एक किस्म से अदालत ने न सिर्फ इन लोगों का अस्तित्व माना, बल्कि सेक्स का धंधा ठप्प होने की वजह से उनके जीने में खड़ी हुई मुश्किल को भी माना, और जिंदा रहने के लिए अनाज पाने के बुनियादी हक को भी माना। लेकिन आज की यह बात पहले से चले आ रहे सेक्स-ट्रेड के बारे में नहीं है। हम आज उन लड़कियों और महिलाओं, और बच्चों, के बारे में चर्चा करना चाहते हैं जो कि बेरोजगारी और गरीबी के इस दौर में मजबूरी में यह धंधा करने के लिए दुनिया भर में  बेबस हुए हैं। ऐसा भी नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने ऐसी नौबत का अंदाज नहीं लगाया था। जब-जब ऐसी ऐतिहासिक मंदी आती है, जिंदा रहने के लिए लोगों को अपने बदन, और अपने परिवार के दूसरे बदन बेचने के लिए भी मजबूर होना पड़ता है। जो लोग संगठित रूप से किसी चकलाघर में जाकर नहीं बैठते, वे भी अपने काम की जगहों पर, अपने अड़ोस-पड़ोस में, रिश्तेदारी और जान-पहचान में समझौता करके अपने बदन के एवज में जिंदा रहने का जरिया जुटाते हैं। इनमें तकरीबन तमाम मजबूर लड़कियां और महिलाएं ही रहती हैं, और बच्चों को सेक्स-ट्रेड में धकेलने के लिए पूरे वक्त साजिश करते हुए गिरोह रहते हैं। 

जिन देशों से अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं या दूसरे जिम्मेदार अखबारनवीस रिपोर्ट बना रहे हैं, वैसे हालात हिन्दुस्तान में न हों, उसकी कोई वजह नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि इस देश के लोग इस देश में देह के धंधे को मानने से बचते हैं, और अपने आत्मगौरव को कायम रखने के लिए ऐसा जाहिर करते हैं कि सेक्स-ट्रेड कोई पश्चिमी संस्कृति है जिससे कि हिन्दुस्तान अछूता है। यह एक अलग बात है कि वात्सायन के भी पहले से इस देश में शहर-कस्बों में नगरवधुओं का चलन रहा है, मंदिरों में देवदासियां रही हैं, और भी तरह-तरह के परंपरागत तबकों को औपचारिक मान्यता देकर इस देश ने वेश्यावृत्ति को चकलों से परे भी एक पर्दा ढांककर जिंदा रखा था, और आज भी रखा हुआ है। 

आज की यह भयानक आर्थिक मंदी, और बेरोजगारी हिन्दुस्तान में दसियों लाख लड़कियों और महिलाओं को अब तक कुछ मौकों पर, या पूरी तरह से देह बेचने को मजबूर कर चुकी होगी। ऐसी कोई वजह नहीं है कि ऐसी बदहाली में आत्महत्याओं के बीच लोग ऐसे समझौते न कर रहे हों। सरकार और समाज चूंकि इस नौबत को ही मानने से बचते हैं, बच रहे हैं, इसलिए इस समस्या के किसी समाधान की कोई संभावना नहीं है। लेकिन फिर भी जिन लोगों में थोड़ा-बहुत भी सरोकार है उन्हें इस बारे में सोचना चाहिए, और यह भी सोचना चाहिए कि खुदकुशी से लेकर वेश्यावृत्ति तक पर जो तबका आज मजबूर नहीं है, वह दूसरों को इस नौबत से बचाने के लिए क्या कर सकता है? समाज में ऐसी मजबूरी शुरू कुछ लोगों से हो सकती है, लेकिन वह आसपास के और गैरमजबूर लोगों को भी लपेटे में ले सकती है, और ग्राहक तो कभी मजबूर होते नहीं हैं। इसलिए किसी देश को अपने समाज को ऐसी नौबत से अगर बचाना है, तो उन्हें लोगों की मदद करने के लिए संगठित कोशिशें करनी होंगी। महज सरकार की तरफ देखना कोई हल नहीं होगा क्योंकि सरकारें इस मजबूरी को ही अनदेखा करके अपनी जिम्मेदारी से बचने का लंबा तजुर्बा रखती हैं। लोगों को समाज के कमजोर तबकों की महिलाओं, लड़कियों, और बच्चों को बचाने के लिए गंभीर और ईमानदार कोशिश करनी चाहिए, यह मानकर, यह सोचकर कि उनका खुद का परिवार ऐसी नौबत में रहता, तो वे क्या करते?  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


17-Nov-2020 2:29 PM 146

कांग्रेस पार्टी के सामने बिहार के चुनावी नतीजों से परे भी एक चुनौती है। बिहार में वह सत्तारूढ़ नहीं थी, सत्तारूढ़ गठबंधन में भी नहीं थी, और वह साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर समान सोच रखने वाली आरजेडी और वामपंथी दलों के साथ एक गठबंधन में भी जो कि सत्ता से दस कदम ही दूर रह गया। और यह बात आंकड़ों से लेकर तर्कों तक से साबित होती है कि कांग्रेस की बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी शिकस्त के चलते ही महागठबंधन की सरकार नहीं बन पाई। कांग्रेस ने 70 सीटें हासिल करके उम्मीदवार खड़े किए थे, और उनमें से कुल 19 जीत पाए। जबकि कुल 29 सीटों पर लडऩे वाले वामपंथी उम्मीदवारों ने 16 सीटें हासिल की। महागठबंधन की अगुवा पार्टी, आरजेडी के एक नेता शिवानंद तिवारी ने कांग्रेस को महागठबंधन पर बोझ बताते हुए कहा कि उसने प्रत्याशी तो 70 उतारे थे, लेकिन इतनी भी रैलियां चुनाव प्रचार के दौरान नहीं कीं। राहुल गांधी महज तीन दिनों के लिए प्रचार में आए, और प्रियंका गांधी नहीं आईं। शिवानंद तिवारी ने कहा कि जब चुनाव प्रचार अपने चरम पर था तब राहुल गांधी शिमला में प्रियंका के घर पर पिकनिक कर रहे थे, पार्टी को क्या ऐसे चलाया जाता है? 

यह बात सही है कि बिहार चुनाव प्रचार की खबरों के बीच जब यह खबर आई थी कि राहुल गांधी शिमला में छुट्टी मना रहे हैं, तो वह बड़ी हैरानी की बात थी। बिहार में उसके 70 उम्मीदवार लड़ रहे थे, और बाकी देश में जगह-जगह उपचुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार थे, लेकिन राहुल किसी और प्रदेश में नहीं गए थे। वे महज बिहार प्रचार में शामिल हुए थे, और जैसा कि शिवानंद तिवारी ने कहा है कि वे तीन दिनों के प्रचार पर पहुंचे थे। बिहार के नतीजे आए ही थे कि खबरों में बने हुए अमरीका से राहुल गांधी के बारे में एक खबर आई। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की एक किताब छपकर आ रही है जिसमें उन्होंने राहुल से अपनी मुलाकात और अपने तजुर्बे के बारे में लिखा है- राहुल गांधी में एक तरह की घबराहट और अपरिपक्वता नजर आते हैं, जैसे किसी छात्र ने अपने शिक्षक को प्रभावित करने के लिए खूब पढ़ाई तो की हो लेकिन उस विषय की पूरी योग्यता उसके पास न हो। ओबामा ने राहुल गांधी को नर्वस बताया था और जुनून की कमी बताई थी। 

ओबामा की ऐसी कोई निजी वजह नहीं है कि वे भारत की कांग्रेस पार्टी या उसके भविष्य के नेता राहुल गांधी पर कोई अवांछित हमला करें। उन्होंने बस अपने विचार सामने रख दिए। लेकिन ओबामा से परे खुद राहुल की पार्टी के एक बड़े नेता, यूपीए सरकार में पूरे दस बरस मंत्री रहने वाले कपिल सिब्बल ने कल एक अंग्रेजी अखबार, इंडियन एक्सप्रेस, को दिए गए इंटरव्यू में बिहार के चुनावी नतीजों के साथ-साथ देश भर में हुए उपचुनावों के नतीजों की बात की, और कांग्रेस पार्टी में इस पर आत्मविश्लेषण की जरूरत बताई। लोगों को याद है कि सिब्बल उन 23 कांग्रेस नेताओं में थे जिन्होंने अगस्त में पार्टी लीडरशिप को पार्टी के तौर-तरीके बदलने के लिए एक चिट्ठी लिखी थी। उस चिट्ठी को भी गिनाते हुए सिब्बल ने कहा कि पार्टी के पास अब आत्मचिंतन का भी समय खत्म हो गया है। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों में कांग्रेस सत्तारूढ़ पार्टी का विकल्प है, वहां भी जनता ने कांग्रेस के प्रति विश्वास नहीं जताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में इतना साहस और इच्छा होने चाहिए कि सच्चाई को स्वीकार करें। उन्होंने यह भी कहा कि इतने लोगों ने जो चिट्ठी लिखी थी, पार्टी के भीतर तब से अब तक उस पर कोई चर्चा नहीं हुई और पार्टी लीडरशिप की ओर से किसी चर्चा की कोशिश होते भी नहीं दिख रही है। 

हम शिवानंद तिवारी या बराक ओबामा की कही बातों को अनदेखा करते हुए भी यह लिखना चाहेंगे कि बिहार चुनाव प्रचार के बीच जब राहुल के शिमला जाने की बात आई, तो हमें हैरानी हुई थी कि कुल 14 दिन चलने वाले चुनाव प्रचार में भी अगर राहुल गांधी अपने उम्मीदवारों पर मेहनत नहीं कर रहे हैं, तो वे जाहिर तौर पर और निश्चित रूप से गठबंधन के साथ भी ज्यादती कर रहे हैं जिसने कांग्रेस को अनुपातहीन ढंग से अधिक, 70 सीटें दी थीं। सीटें पाने के लिए कांग्रेस ने दबाव डाला था, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान जिन भरोसेमंद अखबारनवीसों ने मैदानी रिपोर्टिंग की थी, उनका यह मानना था कि कई सीटों पर तो कांग्रेस चुनाव लड़ते ही नहीं लग रही थी। कपिल सिब्बल की यह बात ध्यान देने लायक है कि एक वक्त जिस उत्तरप्रदेश पर कांग्रेस ने राज किया था, जहां से एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री भेजे थे, उस उत्तरप्रदेश में आज कांग्रेस कुछ सीटों पर दो फीसदी वोट भी नहीं पा सकी। 

कांग्रेस पार्टी चुनावी राजनीति से परे किसी देश सेवा या समाज सेवा में लगी हुई संस्था नहीं है। उसकी नीयत चाहे देश सेवा और समाज सेवा की हो, हालांकि उसके नेताओं को देखें तो ऐसा भी नहीं लगता है, कांग्रेस का अस्तित्व चुनाव लडऩे और जीतने पर टिका हुआ है। और कांग्रेस पार्टी ने पिछले छह बरस में लगातार संसद में मौजूदगी खोई है, और एक-एक करके अधिकतर राज्य खोए हैं। शिवानंद तिवारी, ओबामा, और कपिल सिब्बल सहित 23 कांग्रेस नेता, इन सबकी जरूरत भी नहीं है यह समझने के लिए कि कांग्रेस लीडरशिप किस तरह एक मकसद खो चुकी, जुनून खो चुकी, जवाबदेही खो चुकी लीडरशिप हो गई है जिससे इतने बड़े देश और उसके दो दर्जन से अधिक प्रदेश के मोर्चों को सम्हालने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। हकीकत तो यह है कि कांग्रेस आज अपना संगठन भी नहीं सम्हाल पा रही है क्योंकि जैसा कि कपिल सिब्बल ने याद दिलाया है, कांग्रेस कार्यसमिति एक मनोनीत मंच है जिससे कि मनोनयन करने वाले के खिलाफ सोचने की भी उम्मीद नहीं की जा सकती, किसी आलोचनात्मक नजरिये की भी नहीं। 

लेकिन यह कहना ठीक नहीं होगा कि कांग्रेस के पास खोने को बचा ही क्या है। एकबारगी ही हमें तीन ऐसे राज्य याद पड़ते हैं जहां पर कांग्रेस की सरकार है, और कम से कम एक ऐसा राज्य याद पड़ता है जहां वह गठबंधन में है। इसलिए कांग्रेस के पास आज भी खोने के लिए तीन-चार राज्य तो बचे हैं ही, लेकिन क्या कांग्रेस इसी में खुश है?   (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

 


16-Nov-2020 1:24 PM 155

आज देश में केन्द्र की मोदी सरकार के कामकाज के मीडिया कवरेज में सबसे खास दर्जा पाई हुई समाचार एजेंसी एएनआई ने जम्मू-कश्मीर से तस्वीरों सहित एक खबर पोस्ट की है। उधमपुर की इस खबर में बताया गया है कि किस तरह एक मुस्लिम परिवार पिछले 25 बरसों से हर त्यौहार पर फूल बेचते आ रहा है। तस्वीरों में दिखाया गया है कि यह परिवार दीवाली पर भी फूल बेच रहा है, और इस पर एक दुकानदार ने कहा है कि इनकी त्यौहार मनाने की भावना साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है। 

ऐसी खबरें बहुत से बड़े और प्रमुख अखबारों या टीवी चैनलों पर भी अजब-गजब जैसी हैरानी के साथ दिखती हैं। कभी कोई रिक्शेवाला किसी सवारी का छूटा हुआ बैग लौटाने की मशक्कत करता है, तो उसे लेकर भी ईमानदारी अभी जिंदा है किस्म की सुर्खियां अखबारों में देखने मिलती हैं। ऐसी हैडिंग से लगता है कि ईमानदारी अमूमन मर चुकी है, और गिने-चुने लोगों में ही यह जिंदा है। हकीकत यह है कि आमतौर पर सुर्खियां बटोरने वाले नेताओं, अफसरों, कारोबारियों में जरूर ईमानदार लोगों का अनुपात घट गया है, लेकिन मेहनतकश आम लोगों में तो लोग ईमानदार ही हैं। इसलिए जब कोई गरीब किसी पाए हुए सामान को पहुंचाने की कोशिश करते हुए थाने पहुंचते हैं, या सडक़ किनारे राह देखते खड़े रहते हैं, तो वे अपने बुनियादी चरित्र के मुताबिक काम करते हैं। 

अब जिस खबर को लेकर आज की बात लिखी जा रही है, वह खबर हैरान नहीं करती, उसे खबर बनाया गया है, यह हैरान करता है। लोग दूसरे धर्म के त्यौहारों या जलसों पर अपने सामान बेचते हैं, या अपनी सेवाएं बेचते हैं, तो यह साम्प्रदायिक सद्भाव से भी पहले अपने खुद के जिंदा रहने की एक कोशिश होती है। हिन्दुस्तान में हिन्दुओं की शादियों में मेहंदी लगाने वाली से लेकर दुल्हन के कपड़ों को सिलने, उनमें जरी-गोटा लगाने, उसके लिए लाख की चूडिय़ां बनाने जैसे दर्जनों काम आमतौर पर मुस्लिम ही करते दिखते हैं। शादी की घोड़ी मुस्लिम लेकर आते हैं, बैंडपार्टी में बड़ी संख्या में मुस्लिम होते हैं, आतिशबाजी, लाउडस्पीकर, और जनरेटर से लगाने वाले सेट मुस्लिम ही होते हैं। यह तो हुई शादी-ब्याह की बात, लेकिन लोगों ने रूबरू देखा हुआ है कि अमरनाथ यात्रा से लेकर दूसरी अनगिनत तीर्थयात्राओं तक कांवर ढोने के काम में मुस्लिम लगे रहते हैं, और तीर्थयात्री तो जिंदगी में दो-चार बार अमरनाथ जाते होंगे, ऐसे कांवर उठाने वाले, घोड़े वाले मुस्लिम तो तीर्थयात्रा के दिनों में रोजाना ही यात्रियों को ले जाते हैं। अभी दो दिनों से दिल्ली के बहुत से लोगों ने हजरत निजामुद्दीन दरगाह की तस्वीरें पोस्ट की हैं जहां दीवाली पर खास साज-सज्जा की गई है, और वहां के लोग बताते हैं कि दीवाली मना रहे हिन्दू भी साल के इस खास दिन दरगाह पर भी प्रार्थना करने आते हैं। पूरा देश हाल के बरसों तक अलग-अलग धर्मों के तानों-बानों से बुना हुआ एक कपड़ा रहा है जिसे अब तार-तार करने की बहुत सी कोशिशें हो रही हैं। 

लोगों को एक मुस्लिम फूल वाले को हिन्दू त्यौहार पर फूल बेचते देखने के लिए जम्मू-कश्मीर जाने की जरूरत नहीं है, अपने ही शहर में देख लें, जैन-मारवाड़ी, या गुजराती मेवे वाले रमजान और ईद के वक्त क्या खजूर सामने सजाकर नहीं रखते, या मुस्लिम मेवे वाले हिन्दू त्यौहारों के समय मेवे की खास पैकिंग बनाकर नहीं सजाते? यह तो बिना किसी साम्प्रदायिक सद्भाव के भी कारोबारी समझदारी है कि ग्राहक किसी भी धर्म के हों, उनके नोट का तो एक ही धर्म होता है। ऐसा कौन सा शहर होगा जहां फूल बेचने वाले अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग होंगे? एक कारोबारी समझदारी को जब मीडिया एक साम्प्रदायिक सद्भाव समझ ले, तो यह जाहिर है कि देश की हवा दिल्ली के बाहर भी बहुत खराब हो चुकी है, और दिमाग पर भी असर कर चुकी है। 

हिन्दुस्तान गंगा-जमुनी तहजीब का देश रहा है, और बीच के इन कुछ बरसों को छोड़ दें, तो शायद आगे भी रहेगा। दिक्कत यह है कि जिन पेशों में लोगों से समझदारी और जिम्मेदारी की उम्मीद की जाती है, उनकी अपनी कमसमझी उनकी खबरों में सिर चढक़र बोलती है। और यह तो दिखने वाली खबरों में बोलती है, न दिखने वाली खबरों में, न लिखी जाने वाली खबरों में असली सद्भाव की जाने कितनी ही बातें दब जाती होंगी। इसलिए मीडिया के कारोबार में लगे लोगों में, समाचार और विचार लिखने वाले लोगों में, व्याकरण चाहे कमजोर हो, लोकतंत्र और इंसानियत की बुनियादी समझ मजबूत रहना चाहिए। इस देश में हिन्दुओं का कोई त्यौहार मुस्लिमों के बनाए सामानों, और उनके किए गए कामों के बिना पूरा नहीं होता है, और तो और हिन्दुओं के उपवास में आम नमक से परे जिस सेंधे नमक का इस्तेमाल होता है, वह भी पाकिस्तान के सिंध के इलाके से निकलकर आता है, और उसके बिना तो यहां हिन्दुओं का उपवास न हो सके। 

इसलिए मीडिया के लोगों को साम्प्रदायिक सद्भाव नाम के शब्दों को एकदम हल्का भी नहीं बना लेना चाहिए कि दीवाली पर हिन्दुओं को फूल बेचना मुस्लिम कारोबारी का कोई साम्प्रदायिक सद्भाव है। साम्प्रदायिक सद्भाव की असली मिसालें हमारी जिंदगी में कदम-कदम पर भरी हुई हैं, और मीडिया में आमतौर पर सुर्खियों पर काबिज नेताओं को छोड़ दें, तो साम्प्रदायिक सद्भाव तो इस देश की बुनियादी समझ है।   (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


13-Nov-2020 3:45 PM 125

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने मंत्रिमंडल के साथ कल दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में लक्ष्मी पूजा करने जा रहे हैं। पूरा मंत्रिमंडल लक्ष्मी पूजा करे ऐसा देश का यह पहला मौका रहेगा, और वे किसी निजी प्रार्थना के साथ नहीं, बल्कि दिल्ली के कल्याण की सार्वजनिक प्रार्थना के साथ यह पूजा करेंगे। भारत का संविधान हर मुख्यमंत्री को इस किस्म की लचीली आजादी देता है कि वे अपने धर्म का सार्वजनिक रूप से भी प्रदर्शन कर सकें। वे पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने मंत्रिमंडल जैसी एक औपचारिक संवैधानिक शक्ति को लेकर एक धार्मिक अनुष्ठान करना तय किया है। फिर भी दीवाली की लक्ष्मी पूजा को हम धार्मिक परंपरा के साथ-साथ एक सांस्कृतिक परंपरा भी मानते हैं, और इसमें हम कोई बुराई नहीं देखते। नेहरू के वक्त भी भारत के सरकारी दफ्तरों और सरकारी कारखानों में लक्ष्मी पूजा होती थी जो कि धार्मिक होने से अधिक सांस्कृतिक होती थी, और अनगिनत मामलों में सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्रों के मुस्लिम या ईसाई, या किसी और धर्म के गैरहिन्दू भी पूजा में बैठते थे। कभी किसी धर्म को इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई थी। इसलिए हम भारत की एक मजबूत सांस्कृतिक परंपरा की एक कड़ी के रूप में ही केजरीवाल की इस पहल को ले रहे हैं, और इसमें बुनियादी रूप से आलोचना के लायक कुछ नहीं है। 

लेकिन एक दूसरा सवाल यहां उठ खड़ा होता है, अक्षरधाम मंदिर में इस पूजा को करने का। दिल्ली में मंदिरों की कोई कमी तो है नहीं, और लक्ष्मी पूजा मंदिरों में होती भी नहीं है, लोग अपने घर-दफ्तर, दुकान-कारोबार में ऐसी पूजा करते हैं। इसलिए केजरीवाल यह पूजा कहीं भी कर सकते थे, इसके लिए अक्षरधाम मंदिर की जरूरत नहीं थी। अब अक्षरधाम मंदिर के साथ कुछ दिक्कतें हैं जिनको समझना जरूरी है। स्वामीनारायण सम्प्रदाय का यह मंदिर दिल्ली में एक दर्शनीय ढांचा तो है, लेकिन बहुत लोगों को यह बात नहीं मालूम है कि पूरे का पूरा स्वामीनारायण सम्प्रदाय महिलाओं से परले दर्जे का भेदभाव करता है। इससे सन्यासी या स्वामी किसी महिला को देख भी नहीं सकते, सुन भी नहीं सकते। इसके प्रमुख स्वामी जिस सभागार में बैठते हैं, उसके खुले दरवाजे के सामने से किसी महिला को भी निकलने की इजाजत नहीं होती है। लंदन में बसे एक लेखक ने इंटरनेट पर लिखा है कि उसकी चार बरस उम्र की बेटी   लंदन में स्वामीनारायण स्कूल में पढ़ती है। स्कूल के सभागार में सम्प्रदाय के एक संत का कार्यक्रम था। तमाम लड़कियों को हॉल के पीछे बिठाया गया था। जब बच्चों से कहा गया कि वे कोई सवाल कर सकते हैं, तो इस बच्ची ने कुछ पूछने के लिए हाथ उठाया। उसे अनदेखा कर दिया गया, और उसे बिठा दिया गया। बाद में एक लडक़े के पूछे गए सवाल का जवाब संत ने दिया, लेकिन इस बच्ची की तरफ देखा भी नहीं। एक और मौके पर जब यही लेखक स्वामीनारायण मंदिर में अपनी छह महीने की बेटी को गोद में लेकर गया तो उसे वहां सभागार में भीतर जाने नहीं मिला क्योंकि उसकी गोद में लडक़ी थी, फिर चाहे वह छह महीने की थी। इस सम्प्रदाय के कार्यक्रमों में जाने के बाद भी इस लेखक ने लिखा कि शुरूआत से सम्प्रदाय के स्कूलों में और कार्यक्रमों में यह सीख मिल जाती है कि लड़कियां और महिलाओं का दर्जा नीचा है। 

स्वामीनारायण सम्प्रदाय को लेकर यह विवाद कोई नया नहीं है, बहुत बार महिलाओं के साथ इस सम्प्रदाय के भेदभाव सामने आते रहते हैं, लेकिन जैसे कि कोई भी सम्प्रदाय अपनी कट्टर बातों पर ही जिंदा रहता है, यह सम्प्रदाय भी महिलाओं के खिलाफ परले दर्जे का भेदभाव करते हुए अपनी शुद्धता को इस तरह साबित करते रहता है जिससे बिना कहे यह बात साबित होती है कि महिलाएं नीचे दर्जे की हैं। अगर इसके पीछे सम्प्रदाय के संत-सन्यासी का ब्रम्हचर्य कायम रखने की कोई नीयत है, तो इस सवाल का क्या जवाब हो सकता है कि चार बरस या छह महीने की बच्ची की ओर देखने से भी अगर इसके स्वामी और सन्यासी का ब्रम्हचर्य खतरे में पड़ता है, तो इनको अपने इलाज की जरूरत है, न कि किसी अनुशासन की।
 
ऐसा भी नहीं है कि केजरीवाल सरकार किसी दूसरे देश से आकर दिल्ली के इस मंदिर में पूजा कर रही है, और उसे इस सम्प्रदाय से जुड़े ऐसे विवादों की खबर नहीं है। हिन्दुस्तान में किसी भी जागरूक व्यक्ति को इसके बारे में मालूम है, और राजनीति में देश की राजधानी की मुख्यमंत्री को इसकी खबर न हो, ऐसा तो हो नहीं सकता। ऐसे में एक देवी, लक्ष्मी, की पूजा के लिए ऐसे मंदिर को छांटना जहां महिलाओं के साथ भेदभाव होता है, उन्हें हिकारत और नीची नजर से देखा जाता है, यह एक बहुत खराब फैसला है। ऐसे भेदभाव वाले सम्प्रदाय का सरकार को सरकारी स्तर पर बहिष्कार करना चाहिए, केजरीवाल चाहें तो निजी स्तर पर वे किसी भी साधू, सन्यासी, या तथाकथित संत के भक्त हो सकते हैं। इस देश में इंदिरा गांधी ने जाकर मचान पर लटके बैठने वाले देवरहा बाबा के लटके हुए पैर के नीचे अपना सिर टिकाकर आशीर्वाद लिया था, इस देश में बलात्कारी आसाराम के भक्तों में नरेन्द्र मोदी से लेकर दिग्विजय सिंह तक हजारों नेता थे। निजी स्तर पर केजरीवाल किन पैरों पर अपना सिर टिकाते हैं, यह उनका निजी हक हो सकता है, हालांकि इस देश के एक सबसे महान नेता जवाहरलाल नेहरू ने पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के धार्मिक कर्मकांडों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर असहमति और नाराजगी जाहिर की थी, लेकिन नेहरू के वक्त की समझदारी नेहरू के साथ खत्म हो गई, उनकी ही अगली पीढ़ी ने, उनकी ही पार्टी ने उस समझदारी को नेहरू की पहली बरसी के पहले ही कबाड़ी को बेच दिया था। इसलिए अब तमाम लोग, वामपंथियों को छोडक़र, एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। हैरानी यह है कि सोशल मीडिया, और बाकी मीडिया पर केजरीवाल की लक्ष्मी पूजा की घोषणा के बाद से अभी तक ऐसे कोई सवाल हमको तो नहीं दिखे हैं जो कि उनके पूजास्थल की पसंद को गलत बता रहे हों। हो सकता है आगे जाकर कुछ लोग इस पर लिखें, लेकिन हम इस मंदिर में जाकर पूरे मंत्रिमंडल द्वारा पूजा करने के सख्त खिलाफ हैं।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


12-Nov-2020 5:24 PM 172

देश की अर्थव्यवस्था कितनी ही खराब क्यों न हों, महीनों बाद ठीक से खुले बाजार, और दीवाली जैसा बड़ा त्यौहार, इन दोनों के चलते कुछ खरीददारी होते दिख रही है। और इसके साथ ही लोगों के घरों में तरह-तरह से पैकिंग पहुंच रही है। संपन्न तबका ऑनलाईन खरीदी कर रहा है क्योंकि बाजार जाने से बचना हो जाता है, समय बचता है, और बहुत से सामान बाजार के मुकाबले ऑनलाईन सस्ते मिलते हैं। ये सारे सामान खासी पैकिंग सहित आते हैं। संपन्न तबकों में दीवाली पर तोहफों का लेन-देन भी होता है, और तोहफे ऐसी पैकिंग में ही रखे जाते हैं कि वे खासे बड़े लगें, उनमें माल कम होता है, पैकिंग अधिक होती है। कुल मिलाकर यह वक्त लोगों के घरों में उनकी खरीदी, और तोहफे पाने की क्षमता के अनुपात में कागज, पुट्ठे, और पॉलीथीन के इकट्ठा होने का है।

घरों के बाहर डाल दिए गए कचरे को देखें, या म्युनिसिपल की कचरा गाडिय़ों को देखें, इनमें फ्रिज-टीवी जैसे बड़े सामानों के बड़े बक्से भी दिखते हैं, और कई दूसरे किस्म की पैकिंग भी। जो राज्य सभ्य और समझदार हैं, या जिन शहरों की म्युनिसिपल जागरूक और जिम्मेदार है, वहां पर घरों में ही कचरे की छंटनी लागू की गई है, और अलग-अलग किस्म का कचरा सीधे री-साइकिलिंग तक चले जाता है, दुबारा इस्तेमाल हो जाता है।

त्यौहार के इस मौके पर लोगों को कचरे की चर्चा बुरी लग सकती है क्योंकि अभी तो घर को सजाने, रौशन करने, पूजा की तैयारी करने, और मिठाई बनाने का मौका है। यह भी भला कोई वक्त है कचरे की चर्चा करने का? लेकिन हमारे हिसाब से यही वक्त कचरे की चर्चा का है क्योंकि इसी वक्त घर पर पैकिंग जैसा कचरा खूब सा निकल रहा है, या निकल सकता है, घरों की सफाई में भी सूखा कचरा निकल सकता है, और इन सबको अगर कचरा बीनने वालों को सीधे ही बुलाकर दे दिया जाए, तो धरती पर कचरे का निपटारा भी अच्छे से हो सकता है, और कचरा बीनकर धरती को जिंदा रहने लायक रखने वाले लोगों की दीवाली भी हो सकती है। जब ये लोग घूरे पर मिले-जुले कचरे में से बीन-बीनकर कागज और पु_े के सामान अपने बोरों में भरते हैं, पॉलीथीन और प्लास्टिक दूसरे बोरे में भरते हैं, तो इन्हें अगर घूरे से परे लोगों के घरों से सीधे ही यह कचरा मिल जाए, तो उनकी भी जिंदगी बदल सकती है, और धरती की भी। जिन लोगों को यह लगता है कि धरती की जिंदगी अनदेखी की जा सकती है, उन्हें यह समझना चाहिए कि धरती की जिंदगी से बेहतर जिंदगी इंसानों की कभी भी नहीं हो सकती। धरती जितनी बर्बाद रहेगी, इंसानों की जिंदगी उससे कुछ अधिक ही बर्बाद रहेगी।

दीवाली पर जो भयानक कबाड़-कचरा घूरों पर पहुंचता है, कचरा ले जाने वाली गाडिय़ों पर लदता है, उसे देखकर समझ आता है कि जो कंपनियां भारी-भरकम पैकिंग में सामान बेचती हैं, उन पर पैकिंग का एक गार्बेज-टैक्स (कचरा-टैक्स) क्यों नहीं लगाना चाहिए? हर प्रदेश को चाहिए कि अपने प्रदेश में आने वाले सामानों में से इस्तेमाल होने वाले सामान, और पैकिंग के सामान का अलग-अलग वजन लिखना अनिवार्य करे, और पैकिंग के सारे सामान पर एक निपटारा-टैक्स लगाए कि धरती पर लादे जा रहे इस प्रदूषण से निपटना भी सामान बनाने और बेचने वालों की जिम्मेदारी है। एक इत्र की शीशी 50 एमएल इत्र की होती है, लेकिन उसकी बोतल का कांच, उसका ढक्कन, उसका पु_े का डिब्बा 200 ग्राम से अधिक का होता है। बहुत सी चीजों में इसी तरह गैरजरूरी पैकिंग रहती है, और कारोबार की गैरजिम्मेदारी तोडऩे के लिए राज्यों को इस तरह का कचरा-निपटारा-टैक्स लागू करना चाहिए। समझदार राज्य यह नहीं देखेंगे कि शुरूआत में कारोबार को दिक्कत होगी, टैक्स बहुत कम मिलेगा, और मेहनत अधिक करनी पड़ेगी। समझदार राज्य यह देखेंगे कि धरती पर इस किस्म की पहल करने वाले वे पहले राज्य की तरह दर्ज हो सकते हैं, और ऐसा रिकॉर्ड बनाने से परे वे अपने प्रदेश में कचरे के बोझ को घटा भी सकते हैं।

लेकिन यह तो हुई सरकार की बात, हम त्यौहार के मौके पर जनता की बात कर रहे हैं, और धरती को साफ रखने वाले, खतरा उठाकर मेहनत करने वाले लोगों की बात कर रहे हैं। लोगों को चाहिए कि अपनी बाकी जिंदगी, और अपनी अगली पीढ़ी की पूरी जिंदगी के लिए एक जिम्मेदार नागरिक बनकर रहें। इंसान की कोई औकात नहीं है कि वह धरती को खत्म कर सके, लेकिन कुछ सौ बरस में वे धरती को इतना बर्बाद जरूर कर सकते हैं कि धरती उनके खुद के रहने लायक न रह जाए। लोगों को दीवाली की साफ-सफाई में घर के गैरजरूरी सामानों को निकालकर आसपास के उन लोगों को देना चाहिए जिन्हें कि उनकी जरूरत है, और जो पुराने सामानों को इस्तेमाल करने से परहेज नहीं करेंगे। इसके अलावा किसी भी किस्म के घूरे को बढ़ाना अपने खुद के लिए आत्मग्लानि का काम होना चाहिए क्योंकि फिजूल के सामान और कचरे को अलग-अलग करके आसपास से निकलने वाले कचरा बीनने वालों को देकर सबका भला किया जा सकता है। घर के एक कोने में कागज-पु_े, प्लास्टिक, पॉलीथीन जैसे सामानों को इक_ा करके रखना चाहिए, और कचरा बीनने वालों को बुलाकर दे देना चाहिए। उन्हें अगर एक बार बता देंगे कि हर महीने-पन्द्रह दिन में आते-जाते वे कचरे का पूछ लिया करें, तो आपका खुद का, कचरे वालों का, और धरती का, सबका भला हो सकता है, होगा।

दीवाली का मौका मरम्मत का रहता है, सुधार का रहता है, और लोगों के घर-दुकान से बहुत सारा बिल्डिंग-मलबा भी निकलता है। आमतौर पर लोग गैरजिम्मेदार रहते हैं, और ऐसे मलबे को भी घूरे पर डाल देते हैं जो कि म्युनिसिपल पर बहुत बड़ा बोझ रहता है। ऐसे कचरे को अलग से निपटाना चाहिए, और कोई कल्पनाशील और जिम्मेदार म्युनिसिपल हो तो वह शहरों में कई जगहों पर ऐसे छोटे क्रशर लगा सकती हैं जो कि मलबे को फिर से रेत-गिट्टी जैसा बारीक बनाकर पाटने या भवन निर्माण के किसी काम के लायक बना दे।

देश में ही कई प्रदेशों में जिम्मेदार म्युनिसिपल कार्पोरेशनों ने ऐसा किया है। एक तरफ तो इंदौर जैसा शहर सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना खर्च करके सबसे साफ शहर का तमगा हासिल करता है, दूसरी तरफ दक्षिण भारत के कुछ म्युनिसिपल ऐसे हैं जिन्होंने कचरे को छांटना और उसे म्युनिसिपल की तय जगह तक पहुंचाना नागरिकों की ही जिम्मेदारी बना दिया है। वे कचरे पर खर्च करने के बजाय उससे सिर्फ कमाई कर रहे हैं, और वहां के नागरिक जिम्मेदार बनने के बाद अब अगली पीढ़ी को भी जिम्मेदारी सिखा रहे हैं। लेकिन देश के बाकी अधिकतर प्रदेशों में राज्य सरकारों से लेकर म्युनिसिपलों तक लोग लुभावने और फिजूल के कामों में लगे हैं, और बुनियादी काम किनारे खिसका दिए गए हैं।

एक बार फिर आखिर में हम लोगों से कहना चाहते हैं कि किसी गैरजिम्मेदार सरकार और म्युनिसिपल के तहत जीते हुए भी जिम्मेदार नागरिक बना जा सकता है। जो गरीब लोग कचरा बीनकर जिंदा रहते हैं, उनकी मदद भी की जा सकती है, और यह सब करते हुए इस धरती को भी अपनी अगली पीढ़ी के जिंदा रहने लायक छोड़ा जा सकता है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

 


11-Nov-2020 6:03 PM 117

बिहार के इस बार के चुनावी नतीजे बीती रात आधी रात के बाद तक आते रहे, और आज सुबह अलग-अलग पार्टियों की सीटों और उनके वोटों की तस्वीर साफ हुई। वैसे तो भाजपा ने अपने राष्ट्रीय नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दम पर यह चुनाव लड़ा था, और एक किस्म से मोदी ही चुनाव मैदान में थे, इसलिए जीत के हकदार मोदी ही हैं। उनकी पार्टी ने कई किस्म से कई मोर्चों पर शानदार प्रदर्शन किया और सत्ता पर अपने गठबंधन की वापिसी सुनिश्चित की। दूसरी तरफ बिहार में सरकार बनाने का मोदी से भी अधिक श्रेय कांग्रेस को जाता है जिसने गठबंधन में 70 सीटें हासिल कीं, और उनमें से 51 सीटें हार गई। मोटेतौर पर यही 51 सीटें तेजस्वी को सत्ता से दूर रखने वाली रहीं। अगर कांग्रेस कम सीटों पर लड़ी होती, और उन सीटों पर वामपंथियों को मौका दिया गया होता, तो आज तेजस्वी मुख्यमंत्री होता। वामपंथियों को 28 सीटें दी गईं जिनमें से 16 सीटें उन्होंने जीतकर गठबंधन को दीं। ऐसा अनुपात अगर कांग्रेस की जीत का होता तो फिर बात ही क्या थी।

सीटों के आंकड़े कई मायनों में बहुत दिलचस्प हैं। भाजपा ने अपनी 21 सीटें बढ़ा लीं, और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सीएम घोषित किया था, लेकिन नीतीश की पार्टी जेडीयू की सीटें 28 घट गईं। अब रामविलास पासवान के गुजरने के बाद उनके बेटे चिराग ने नीतीश के खिलाफ खुली बगावत करते हुए एनडीए छोड़ दिया था, और सिर्फ एक मुद्दे पर पूरा चुनाव लड़ा कि वे अगली सरकार बनाकर नीतीश कुमार को जेल भेजेंगे। अब चिराग पासवान ने 135 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, और उनका एक उम्मीदवार जीता भी है। लेकिन जिस दम-खम के साथ उन्होंने अपना सीना चीरकर मोदी की छवि दिखाने का दावा किया, और मोदी के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की पार्टी को जमकर हराया भी, वह देखने लायक था। आंकड़े बताते हैं कि करीब डेढ़ दर्जन सीटों पर नीतीश की पार्टी की हार चिराग पासवान की पार्टी की वजह से हुई है। अब मोदी का नाम जपने वाले चिराग ने अपने समर्थकों से भाजपा के पक्ष में वोट डालने कहा होगा, और नीतीश के खिलाफ वोट डालने कहा होगा। यह भी एक वजह है कि भाजपा को फायदा हुआ, और जेडीयू को नुकसान हुआ। ऐसी चर्चा चारों तरफ हर राजनीतिक विश्लेषक की कलम से कुछ हफ्तों से आ रही थी कि भाजपा नीतीश कुमार का कद काटकर छोटा करने जा रही है, भाजपा की ऐसी कोई साजिश अगर थी, तो वहां तक तो हमारी पहुंच नहीं थी, लेकिन चुनावी नतीजे आज यह सवाल भी खड़ा कर रहे हैं कि क्या अब भी भाजपा को नीतीश को सीएम बनाना चाहिए? और यह सवाल भी कि क्या नैतिकता के नाते नीतीश को खुद ही पीछे नहीं हट जाना चाहिए? कुल मिलाकर आज नीतीश की हालत यह है कि सुबह से एक दर्जन कार्टूनिस्ट नीतीश को मोदी की जेब में, मोदी के कंधे पर सवार, मोदी की उंगली पकडक़र चलते हुए बना चुके हैं। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन भी जाते हैं तो भी यह हार रहेगी, और तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री नहीं भी बनते हैं तो भी वे जीते हुए हैं क्योंकि वे विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बन चुके हैं। इस मौके पर बेमौके की एक बात यह है कि खुद तेजस्वी यादव के लिए नेता प्रतिपक्ष का एक कार्यकाल, जिसमें वामपंथी उनके करीबी सहयोगी रहेंगे, वह उनके लिए निजी रूप से मुख्यमंत्री के कार्यकाल के मुकाबले बेहतर होगा।

बिहार चुनाव के विश्लेषण में वहां के अधिक जानकार लोगों ने दो बातें लिखी हैं जिन पर गौर करना चाहिए। पहली बात तो यह कि दलितों के वोट वाली पार्टी को जब तेजस्वी के गठबंधन से निराशा हुई, तो वे छोडक़र निकल गए, और एनडीए जाकर मोदी से कुछ सीटें पाईं, कई सीटें जीतकर दीं, और जाहिर है कि बहुत सी दूसरी सीटों पर उन्होंने एनडीए को अपने समुदाय के वोट भी दिलवाए होंगे। बिहार के जानकार लोगों का यह भी मानना है कि मुस्लिम समाज की राजनीति करने वाले ओवैसी ने तेजस्वी यादव के गठबंधन को मिलने वाले मुस्लिम वोटों में खूब घुसपैठ की, और खुद भी 5 सीटें पाईं, और कुछ दर्जन सीटों पर वोट पाकर गठबंधन की संभावनाएं खत्म कीं। ओवैसी से राजनीतिक विश्लेषकों को यही उम्मीद थी, और उन्होंने उसे पूरा किया। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने आज सुबह ही ओवैसी को वोटकटवा कहकर उन्हीं अटकलों और आरोपों को आगे बढ़ाया है कि ओवैसी गालियां तो बीजेपी को देते हैं, लेकिन उनकी हरकतों से फायदा भी बीजेपी को ही मिलता है। 

कुल मिलाकर बिहार का यह चुनाव वामपंथियों के शानदार प्रदर्शन का रहा, उन्होंने अपनी सीटें बढ़ाईं, अपने वोट बढ़ाए, उन्हें मिली सीटों पर जीत का प्रतिशत शानदार रहा। तेजस्वी यादव ने हाशिए पर से जीत से दस कदम पीछे तक का यह सफर शानदार तरीके से तय किया। मोदी के करिश्मे और चुनाव जीतने की उनकी तकनीक के बारे में हम कल भी इसी जगह लिख चुके हैं। 

बिहार के ये चुनाव खासे जटिल थे, एनडीए में बड़ी फूट थी, गठबंधन को छोडक़र लोग निकले थे, ओवैसी ने भारतीय राजनीति में अपनी एक चर्चित उपयोगिता जमकर साबित की, और आखिर में कांग्रेस के बारे में यह कहना होगा कि उसने इतना बड़ा कौर मुंह में भर लिया था कि जो उसकी चबाने की क्षमता से अधिक बड़ा था। जिन 70 सीटों पर कांग्रेस ने उम्मीदवार खड़े किए, उतनी जगह चुनाव लडऩे की उसकी तैयारी भी नहीं थी, ऐसा भी एक वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा है, और चुनावी नतीजे भी साबित करते हैं कि यह अंदाज हो सकता है सच हो। अधिक सीटें हासिल करने में तो कांग्रेस गठबंधन के भीतर जीत गई, लेकिन मतदाताओं के सामने इनमें से बड़ी संख्या में सीटें भी हार गई, और तेजस्वी की मुख्यमंत्री बनने की मजबूत संभावना को भी हरा दिया। फिर भी एक बात है, भाजपा के लोग नाशुकरे नहीं हैं, बहुत से भाजपा नेता खुलकर इस बात को मंजूर कर रहे हैं कि कांग्रेस ने एक बार फिर भाजपा को सरकार में आने में पूरी मदद की। अब यह बात कांग्रेस की नीयत में तो नहीं होगी, लेकिन यह उसकी नियति जरूर बन गई है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

 


10-Nov-2020 8:57 PM 176

नाम में चाणक्य होने से, या किसी के लिए चाणक्य का विशेषण इस्तेमाल करने से चाणक्य की कहानियां सच नहीं होने लगतीं। टुडेज चाणक्य नाम की एक चुनावी सर्वे या ओपिनियन पोल करने वाली एजेंसी ने बिहार के आखिरी मतदान के बाद तेजस्वी यादव की लीडरशिप वाले महागठबंधन को एनडीए गठबंधन से तीन गुना अधिक सीटें मिलने का अनुमान घोषित किया था। और एनडीए जिस दम-खम से, स्पष्ट बहुमत से बिहार पर काबिज होते दिख रहा है, उससे एग्जिट पोल नाम की सर्वे-तकनीक अधकचरी साबित हो रही है। बहुत सारे एग्जिट पोल तेजस्वी-गठबंधन के पक्ष में दिखने से पिछले तीन दिनों में देश के मीडिया और सोशल मीडिया में तेजस्वी यादव को अगला मुख्यमंत्री घोषित कर दिया गया था, लेकिन क्रिकेट में आखिरी रन और चुनाव में आखिरी वोट की गिनती के पहले हड़बड़ी में कोई नतीजे निकालने से साख चौपट होती है। 

बिहार में वोटों की गिनती अभी चल ही रही है लेकिन तमाम सीटों पर गिनती जारी है, और भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन की लीड 129 सीटों पर दिख रही है, और तेजस्वी यादव की लीडरशिप वाले गठबंधन की लीड 104 सीटों पर दिख रही है। सीटों का यह फासला पिछले कई घंटों से बना हुआ है, और यह इतना बड़ा है कि इसे पाटकर महागठबंधन का फिर से आगे आना अब नामुमकिन सा लग रहा है। एक बार फिर एनडीए बिहार की सत्ता पर दिख रहा है, जो कि पिछले चुनाव में नहीं जीता था, लेकिन नीतीश कुमार के गठबंधनबदल की वजह से सत्ता पर आ गया था। उस हिसाब से एनडीए वहां दुबारा नहीं जीता है, वह सत्ता पर काबिज जरूर रहते दिख रहा है। 

बिहार के नतीजों ने बहुत सारी बंधी-बंधाई राजनीतिक जुमलेबाजी को फ्लॉप कर दिया है। लेकिन लोगों को आज रात तक पूरे नतीजे आ जाने के बाद यह सोचना पड़ेगा कि एनडीए के भीतर मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कद और कितना छोटा हो गया है क्योंकि उनकी पार्टी की सीटें न सिर्फ अपने गठबंधन के भीतर भाजपा से काफी कम है, बल्कि तेजस्वी की आरजेडी से भी कम हैं। ऐसी नौबत में भाजपा अपने चुनाव पूर्व के वायदे और घोषणा के मुताबिक नीतीश कुमार को दुबारा मुख्यमंत्री बनाए तो यह भाजपा का नीतीश पर एक किस्म का अहसान होगा जिसके चलते सरकार के भीतर नीतीश मौजूदा कार्यकाल के मुकाबले कमजोर रहेंगे, और नैतिक रूप से दबे रहेंगे।
 
बिहार के चुनावों में एनडीए और भाजपा की अगर हार हुई रहती, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नाकामयाब करार देने की तैयारी में बहुत सारे लोग बैठे थे। और लोगों को यह भी लग रहा था कि यह लालू यादव को तीखे साम्प्रदायिकता-विरोधी तेवरों को जनसमर्थन की वापिसी दिख रही है, तकलीफ के साथ हजारों किलोमीटर पैदल चलकर बिहार लौटने को मजबूर मजदूरों की बद्द्ुआ एनडीए को लगी है, बिहार के नौजवान बेरोजगारों की नाउम्मीदी ने एनडीए को हराया है। ऐसी बहुत सी बातें लोगों ने पिछले चार दिनों में ट्वीट भी की थीं, बयानों में भी कही थीं, और आज टीवी चैनलों के विश्लेषणों के लिए राजनीति के तथाकथित विशेषज्ञों ने ऐसे जुमलों की तैयारी भी कर रखी होगी, लेकिन उनमें से किसी को इस्तेमाल करने की नौबत नहीं आई।
 
बिहार विधानसभा चुनाव के साथ-साथ देश के बहुत से राज्यों में विधानसभा और लोकसभा के उपचुनाव भी हुए, जहां पर बिहार से परे के मुद्दे थे, लेकिन जहां-जहां के नतीजे सामने दिख रहे हैं, वे सारे के सारे एनडीए या भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं। चूंकि बिहार का घड़ा मोदी के सिर पर फोडऩे की तैयारी थी, इसलिए सेहरा भी उन्हीं के सिर बंधना चाहिए क्योंकि बिहार में भी नीतीश तो डूब चुके हैं, वे कमल के फूल को थामकर किसी तरह सतह पर बने हुए हैं, और उसी की मेहरबानी से एक बार और मुख्यमंत्री बन सकते हैं। 

बहुत से लोगों ने अमरीका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के साथ मोदी के गहरे सार्वजनिक रिश्तों को लेकर ट्रंप के चुनावी नतीजों से बिहार के नतीजों को जोडक़र अटकलें लगाई थीं। लेकिन यह जाहिर है कि ट्रंप तो भारतवंशी वोटों के लिए मोदी के मोहताज थे, मोदी बिहार के वोटों के लिए किसी तरह अमरीका पर आश्रित नहीं थे। आज बिहार के अलावा देश भर में बिखरे हुए उपचुनावों में जिस तरह भाजपा आगे रही है, उन सबके पीछे अगर कोई एक अकेली वजह हो सकती है, तो वह सिर्फ मोदी है।
 
मतलब यह कि भारत के चुनावी फैसले तय करने में आज अगर कोई ब्रांड सबसे अधिक असर रख रहा है, तो वह मोदी का है। फिर चाहे मोदी कार्टूनिस्टों के पसंदीदा निशाना क्यों न हों, चाहे उनकी दाढ़ी से लेकर उनके कपड़ों के रंग तक का मजाक क्यों न बनाया जा रहा हो, नाम तो चुनावों में एक ही नेता का चल रहा है, और वह मोदी का है। आज बिहार चुनाव और बाकी प्रदेशों के उपचुनावों में मोदी के मुकाबले जो भी पार्टियां और जो भी नेता थे, उन सबके लिए यह आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का एक समय है कि क्या मोदी ब्रांड के चुनावी-मुकाबले के लिए कोई हथियार और औजार अभी बाकी हैं, या फिर बाकी पार्टियां बिल्ली की तरह छींका टूटने के इंतजार में बैठी रहेंगी कि एक दिन मोदी अपने करमों से ही डूबेंगे, और उस दिन उनकी बारी आएगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 


Previous123456789Next