संपादकीय

Posted Date : 19-Sep-2018
  • गोवा में कुछ महीने पहले जब विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा बहुमत में नहीं थी, और कांग्रेस की सरकार बनने का आसार दिख रहा था, लेकिन गठबंधन बनाने में कांग्रेस से शायद कुछ देर हो गई थी, और सरकार भाजपा ने बना ली थी। आंकड़ों के मुताबिक कुछ अस्थिर सा यह ढांचा चल रहा था, लेकिन मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर कैंसर के शिकार हो गए, और वे लंबे समय तक पहले तो अमरीका में इलाज कराते रहे, और फिर अब भारत में वे दिल्ली के एम्स में भर्ती हैं। भाजपा की यह मजबूरी हो सकती है कि ऐसी नाजुक सरकार में उसे ऐसे नाम पर बने रहने की मजबूरी है जो कि अधिक विधायकों को मंजूर हो, लेकिन इस राजनीतिक गणित से परे शासन-प्रशासन का गणित यह मांग करता है कि जिस तरह देश में एक कामकाजी प्रधानमंत्री होना चाहिए, उसी तरह प्रदेश में एक कामकाजी मुख्यमंत्री मौजूद होना चाहिए। गैरमौजूदगी के साथ सरकार चला पाना न तो मुमकिन है, और न ही जायज है। 
    ऐसे में भारतीय लोकतंत्र में एक स्वस्थ परंपरा बननी चाहिए कि शासन प्रमुख चाहे वे म्युनिसिपल या जिला पंचायत में हों या फिर वे देश-प्रदेश में हों, उनकी लंबी नामौजूदगी की हालत में उनका विकल्प संवैधानिक ढांचे में ही तय कर दिया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था हो जाने पर राजनीतिक दल, और उनके भीतर के गुट विकल्प की सोचने के लिए तैयार भी रहेंगे। दूसरी तरफ सार्वजनिक जीवन में जो लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष चुनाव से जनता का विश्वास जीतकर सत्ता पर आते हैं, उनको खुद को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि जिस जिम्मेदारी के लिए उनको चुना गया है, उसे अगर वे पूरा समय नहीं दे पाते हैं, तो उन्हें किसी और के लिए कुर्सी खाली करनी चाहिए। ऐसे ही मौके पर पार्टियों के सामने अपने किसी दूसरे नेता को मौका देने और उनको अपनी काबिलियत साबित करने देने का वक्त भी आता है, और इसे बहुत बड़ा मुद्दा नहीं मानना चाहिए। जिस तरह किसी खेल की टीम में एक खिलाड़ी के घायल हो जाने पर उसकी जगह दूसरे को मौका मिलता है, और बहुत से नए खिलाड़ी ऐसी ही चुनौतियों के मौकों पर अपना हुनर दिखाकर आगे की टीम में जगह बना जाते हैं। 
    राज्य हो या शासन-प्रशासन की कोई और इकाई, उसकी जिम्मेदारी को कम नहीं आंकना चाहिए। जब कभी ऐसी जिम्मेदारी को लेकर किसी कड़े फैसले का वक्त आए, तो फैसले की ताकत रखने वाले लोगों को, पार्टियों को, यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके पास जो अधिकार है, उससे कहीं अधिक उन पर जिम्मेदारी है, और उसे ध्यान में रखते हुए शासन-प्रशासन की सबसे अच्छी ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसमें निरंतरता भी बनी रहे। मनोहर पर्रिकर भारत में सबसे सज्जन और सबसे सादगी वाले, ईमानदार छवि वाले नेता माने जाते हैं। वे चाहे जिस पार्टी में हो, उनके व्यक्तित्व के इन पहलुओं की वजह से उनकी पार्टी का सम्मान बढ़ता ही है। ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़कर एक और मिसाल कायम करनी चाहिए।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 18-Sep-2018
  • भोपाल विश्वविद्यालय की खबर है कि वहां आदर्श बहू बनाने का एक कोर्स चलाया जाने वाला है। इसके बारे में कुलपति ने बताया कि वहां ऐसी बहुएं तैयार की जाएंगी जो पूरे परिवार को साथ लेकर चल सकें। इसके अलावा आदर्श बहू की कई ऐसी खूबियां भी गिनाई गई हैं जो कि भारतीय संस्कृति के लिए एक खास नजरिए के हिसाब से संस्कारी कही जा सकेगी। कुलपति का कहना है कि एक विश्वविद्यालय के तौर पर उनकी समाज के प्रति भी जिम्मेदारी है, और उनका मकसद ऐसी दुल्हनें तैयार करना है जो परिवारों को जोड़कर रख सकें। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के कुछ विश्वविद्यालय अपना मखौल उड़ाने का सामान खुद ही जुटाकर दे रहे हैं। कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के बारे में खबर आई और छपी थी कि वहां पर हनुमान पर दो दिन का एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ। अभी भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की खबर आई है कि वहां पर ज्योतिष, मीडिया, और विश्वसनीयता विषय पर एक व्याख्यान हुआ जिसमें एक चर्चित ज्योतिषी का भाषण हुआ। इस भाषण में ज्योतिष और आध्यात्मिकता के रिश्ते पर भी चर्चा हुई और इसी किस्म के कुछ दूसरे पहलुओं पर भी।
    आज जब भारत के विश्वविद्यालयों का हाल पढ़ाई के स्तर को लेकर चौपट हो रहा है, तब विश्वविद्यालय अपना मकसद छोड़कर भारतीय संस्कृति की एक खास तस्वीर को आगे बढ़ाने में राष्ट्रवादी इरादों से जुट गए हैं। धीरे-धीरे विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पीछे की सीट पर जाकर बैठ गए हैं, और उनके बाद सामाजिक विज्ञान भी करीब-करीब क्लास के बाहर निकाल दिया गया है। जिस मकसद से पत्रकारिता विश्वविद्यालय बनाए गए हैं, वे मकसद भी टीसी देकर बाहर कर दिए गए हैं, और अब धर्म, आध्यात्म, राष्ट्रवाद, राष्ट्रभाषा, भारतीय संस्कृति जैसे पहलुओं ने पूरे  कैंपस पर राज शुरू कर दिया है। 
    धर्मांधता और राष्ट्रवाद से किसी का भला नहीं होता है। कहने के लिए जिन शिक्षण संस्थाओं को विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है, उनके सोचने का दायरा विश्व छोड़, हिंदुस्तान छोड़, एक खास धर्म से जुड़ी संस्कृति तक सीमित कर दिया गया है, इससे खोखले होते इस धर्म को एक आक्रामक ताकत तो मिल सकती है, लेकिन इससे विश्वविद्यालय का लेबल लगी हुई पढ़ाई का कोई भला नहीं हो सकता। पत्रकारिता विश्वविद्यालय जैसे संस्थान एक पेशे के लिए लोगों को तैयार करने के लिए बनाए गए थे। अब वे हनुमान चालीसा पढ़ाकर उसे दुनिया का सबसे अच्छा संचार साबित कर रहे हैं। यह सोच उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वैज्ञानिक सोच के स्तर की तो है कि हमलावर बंदरों को भगाना हो तो हनुमान चालीसा पढ़ी जाए। कुछ इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ का पत्रकारिता विश्वविद्यालय हनुमान चालीसा पढ़ाता है कि पत्रकारिता का ज्ञान कहीं आसपास फटक भी रहा हो, तो वह दूर भाग जाए। 
    आज की 21वीं सदी में यह देश एक आदर्श बहू बनाने का कोर्स तो चलाना चाह रहा है, लेकिन वह लड़कों और आदमियों के लिए ऐसा कोई कोर्स चलाने की नहीं सोचता कि वे बलात्कारी न बनें। इस देश की उच्च शिक्षा 21वीं सदी से रिवर्स गेयर में चलती हुई 19वीं सदी तक पहुंची हुई दिख रही है, और बहुत सी सदियां पीछे जाना अभी बाकी भी हैं।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 17-Sep-2018
  • बस्तर के सैकड़ों किसान तीर-कमान के साथ पदयात्रा करते हुए 18 सितंबर को रायपुर पहुंच रहे हैं। उनका कहना है कि राज्य सरकार से काफी अपेक्षाएं थी, लेकिन सरकार खरी नहीं उतरी। कर्ज के बोझ तले आज वे पूरी तरह से डूब चुके हैं। किसानी आज घाटे का सौदा बन गया है। शासन ने किसानों के हित में अनेक योजनाएं तो जरूर बना दी लेकिन इन योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर पर उन्हें मिल रहा है या नहीं इसे देखने वाला कोई नहीं है, वे बिचौलियों के हाथों लूटे जा रहे हैं। 
    राजधानी तक का  221 किमी का सफर शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा है। पाठकों को याद होगा कि जब देश में कहीं जाट आंदोलन में तो कहीं और किसी जाति के आंदोलन में हफ्तों तक पटरियों पर ट्रेन बंद हो जाती है, सड़कों पर गाडिय़ां जलाने के साथ-साथ मुसाफिरों से बलात्कार होने लगते हैं, तो इसी देश के भीतर दूसरे हिस्सों तक ये खबरें पहुंचती हैं, और वहां भी आंदोलन हिंसक होने लगते हैं। लोगों को ऐसा भी लगता है कि जब तक आंदोलन हिंसक नहीं होंगे, तब तक उनकी सुनवाई नहीं होगी। इसलिए जब राज्यों में चुनाव करीब रहते हैं, तो हर कर्मचारी संगठन के आंदोलन होने लगते हैं कि उनकी पुरानी मांगों पर आंदोलन से सुनवाई हो सकती है। भारतीय लोकतंत्र में प्रदर्शन के दौरान हिंसा को दोनों तरफ से एक किस्म से अनिवार्य या अपरिहार्य मान लिया गया है, और देश भर में जगह-जगह सड़कों पर हिंसा और तोडफ़ोड़ दर्ज होती है।
    किसानों की मांगों को देश के बाकी हालात से काटकर नहीं देखा जा सकता। आज जब ग्राहक हर बार अपनी पिछली गाड़ी से बड़ी गाड़ी, अपने पिछले टीवी से बड़ा टीवी, और अपने पिछले मोबाइल फोन से अधिक बड़ा या अधिक महंगा फोन लेने में तकलीफ महसूस नहीं करते, तब आलू-प्याज, या अनाज के दाम देते हुए लोगों की जान निकलने लगती है। जबकि हकीकत यह है कि खेती अब बहुत महंगा कारोबार हो चुकी है। खेतिहर मजदूर बहुत महंगे हो गए हैं क्योंकि गांवों में सरकारी मजदूरी का रेट बहुत ऊपर चले गया है, और उतनी मजदूरी देकर किसान को कुछ कमाई बचना शायद नामुमकिन रहता है। इसके अलावा किसानों के परिवार के सारे लोग पहले खेती में उतरते थे, और वे खुद मजदूर की तरह भी काम कर लेते थे, लेकिन आज तो किसान की अगली पीढ़ी किसान बनना ही नहीं चाहती। और नौबत अगर सचमुच इतनी खराब न होती, तो इतनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या क्यों करते?
    अब अगर हम इस समस्या के समाधान की बात अगर करें, तो केन्द्र सरकार और अलग-अलग राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर किसानों की मदद के लिए कुछ फैसले लेती आई हैं। सस्ता खाद, सस्ती बिजली, सस्ते बीज, और उपज का अधिक समर्थन मूल्य, इन सबसे किसान कुछ हद तक जिंदा बच पाए हैं। कहीं-कहीं कर्जमाफी या ब्याजमाफी भी देखने में आती है, और उससे भी कुछ आत्महत्याएं रूकती हैं। लेकिन एक बड़ी बात यह है कि लगातार सरकारी अनुदान या मदद से चलने वाला कारोबार अपने खुद के पैरों पर खड़ा रहना भूल जाता है। इसलिए जरूरी यह है कि किसान की जिंदगी में मुमकिन कई दूसरी बातों को बढ़ावा दिया जाए ताकि कुल मिलाकर किसान का जिंदा रहना हो सके। जिसमें डेयरी या दूसरे किस्म के पशुपालन के काम हो सकते हैं, सब्जी या फल-फूल की खेती हो सकती है, मधुमक्खी पालन हो सकता है, और गांवों में हो सकने वाले कई तरह के कुटीर उद्योग हो सकते हैं जिनसे कि किसान को मजदूरी की तलाश में दूसरे राज्यों में न जाना पड़े, और खुदकुशी न करनी पड़े। लेकिन इनमें से कोई पहल होने के बजाय पिछले दिनों हुआ यह है कि गाय, गोवंश, और बाकी कुछ जानवरों को कटने से बचाने के नाम पर ऐसे कानून बनाकर लागू कर दिए गए हैं जिनसे बूढ़े या कमजोर जानवर खुद भूख से मर जाएंगे, और उनके मालिक किसान जहर से। जानवरों की खरीद-बिक्री, और उनके कटने का सिलसिला खेती के समय से ही चले आ रहा है, और उसे रातोंरात इस तरह से बदलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चौपट किया जा रहा है, और इसके भयानक नतीजे सामने आएंगे। जानवरों का इंसान की जिंदगी में एक उपयोग होता है, और वह उपयोग निपट जाने के बाद उन पर इंसान तभी कुछ खर्च कर पाते हैं, जब वे खुद का पेट भर पाते हैं, और कुछ बचा पाते हैं। अगर किसान से जानवरों की खरीद-बिक्री का हक इस तरह से छीन लिया जाएगा, तो खेती की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट लगेगी।
    किसानों के बहुत से मुद्दे हैं, और उनको महज किसानी-सब्सिडी से नहीं निपटाया जा सकता। गांवों की अर्थव्यवस्था को ग्रामोद्योग और कुटीर उद्योग की मदद से बढ़ाना होगा, उसके बिना कोई सीधा इलाज नहीं है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 16-Sep-2018
  • मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने कुछ राज्यों में आने वाले चुनाव के ठीक पहले दो-तीन खतरे गिनाए हैं जो कि भारत के चुनाव कानून के तहत बेकाबू हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल से निपटने के लिए मौजूद कानून नाकाफी हैं। इसके साथ-साथ उन्होंने मतदाताओं के बारे में सोशल मीडिया और दूसरे जरियों से डेटा जमा करने का खतरा भी गिनाया और फेक न्यूज से जनमत को खतरे का जिक्र भी किया। 
    सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग पिछले महीनों और बरसों में लगातार एक मुद्दे पर चर्चा करते आ रहे हैं कि चुनावी राजनीति से मुजरिमों को किस तरह दूर और बाहर रखा जाए। लेकिन बात किसी किनारे शायद इसलिए भी नहीं पहुंच पा रही है कि बहुत से राजनीतिक दलों के अपने-अपने पसंदीदा मुजरिम हैं, और उनमें से कोई भी इनसे छुटकारा नहीं चाहते। अपनी पार्टी से किस मुजरिम या संदिग्ध को, कटघरे में खड़े हुए, या कि जमानत पर छूटे हुए को टिकट दी जाए या नहीं, पार्टी में कोई ओहदा दिया जाए या नहीं, यह तो पार्टी की अपनी मर्जी पर रहता है। लेकिन किसी को जुर्म से परहेज दिखता नहीं है। नतीजा यह होता है कि हर किस्म के मवाली राजनीतिक ताकत से भी लैस होकर कभी किसी को गोली मारते हैं, तो कभी किसी सांसद को कत्ल की धमकी देते हैं, तो कहीं रेत और जंगल-माफिया बनकर सरकारी कर्मचारियों की हत्या करते हैं। इन सबके बाद भी अपराधियों से छुटकारा पाना बहुत से राजनीतिक दलों की नीयत में दिखता ही नहीं है। कर्नाटक के पिछले चुनाव में यह साफ देखने मिला कि जब बदनाम और कुख्यात हो चुके खदान-माफिया रेड्डी-बंधुओं को भाजपा ने टिकट नहीं दिया, तो उनके चुनिंदा आधा दर्जन से अधिक लोगों को टिकट दी, ताकि वे अपनी अथाह संपत्ति से उन्हें जिताकर ले आएं।
    ठीक इसी तरह चुनावों में कालेधन का इतना बड़ा बोलबाला हो गया है कि कई राजनीतिक दल औपचारिक रूप से टिकट मांगने वालों से पूछते हैं कि उन्हें चुनाव में पार्टी से आर्थिक सहायता लगेगी या नहीं। और यह सवाल चुनाव आयोग की छोटी सी खर्च-सीमा के बारे में नहीं रहता, बल्कि दो नंबर के पैसों के सैलाब के बारे में रहता है जिनसे बहुत से चुनावों का संतुलन बदल जाता है। भारत के चुनावों में जगह-जगह खर्च का असर देखने मिलता है, और उससे जमीन-आसमान का फर्क चाहे न पड़ता हो, उससे पलड़ा दूसरी तरफ झुक जरूर जाता है, और चुनाव की जीत-हार तो एक वोट से भी होती है। 
    जनता के बीच कम से कम एक तबका ऐसा है जो कि ऐसे भ्रष्ट को चुनना चाहता है जो कि चुनाव के बाद अगले पांच बरस भी जरूरत के वक्त, या कोई मौका आने पर लोगों की नगद-मदद करते रहें। लोग बिल्कुल दीन-हीन या पूरी तरह ईमानदार को मुश्किल से ही चुनते हैं क्योंकि ऐसे नेता बाद में क्या मदद करेंगे? इसलिए चुनावों में ऐसे रॉबिनहुड कहे जाने वाले नेता जीत की बड़ी संभावना रखते हैं जो कि पांच बरस तक जमकर लूटते हैं, और साथ-साथ उसका एक हिस्सा अपने इलाके के वोटरों पर खर्च भी करते चलते हैं। अब जैसा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है, और चुनाव के दौरान जब्त होने वाली मोटी रकमों से भी साबित होता है, चुनाव से कालेधन को अलग करना मौजूदा कानून के तहत नामुमकिन है। भारत में निष्पक्ष चुनाव, महज एक बेबुनियाद नारा है, और बहुत से मामलों में जीत सीधे-सीधे खरीदी जा सकती है, खरीदी जाती है। ऐसे में चुनाव कई बार महज यही साबित कर पाते हैं कि सबसे काबिल चुनाव-मैनेजर कौन हैं, और सबसे अच्छा भुगतान करने वाले कौन हैं। ऐसी चुनाव व्यवस्था पर खुशफहम लोकतंत्र उसी रफ्तार से खोखला होते चल रहा है, जिस रफ्तार से संसद और विधानसभाओं में अरबपति-खरबपति बढ़ते चल रहे हैं।
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 15-Sep-2018
  • गांधी जयंती, दो अक्टूबर तक देश भर में स्वच्छता अभियान छिडऩा एक बार फिर खबरों में आ रहा है। टीवी पर अमिताभ बच्चन लगातार विज्ञापनों और कार्यक्रमों के रास्ते स्वच्छता अभियान को बढ़ावा दे रहे हैं, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री टीवी और रेडियो पर आकर, पूरे देश से वीडियो कांफे्रंस करके बार-बार इसकी जरूरत को याद दिला रहे हैं।  कुछ बरस पहले जब मोदी ने इसे शुरू किया था, तब समारोहपूर्वक केन्द्र और राज्य सरकारों के मंत्री और अधिकारी सफाई अभियान चलाते हुए और झाड़ू लगाते हुए दिखते थे।  हो सकता है कि जनता को इस अभियान में हिस्सेदारी में कुछ समय लगे, और यह भी हो सकता है कि लोग अपना घर भी साफ रखना न सीख पाएं, लेकिन यह मुद्दा देश के लिए, या किसी भी दूसरे देश के लिए बहुत अहमियत रखता है।
    भारत जैसे देश में जहां पर कि शहरीकरण इतना बेतरतीब हुआ है, कि न तो गंदा पानी बाहर निकलने का पूरा शहरी ढांचा है, और न ही ठोस कचरे के निपटारे में शहरी म्युनिसिपल कामयाब हो पाए हैं। ऐसे ढांचे वाले देश में जब जनता एकदम ही गैरजिम्मेदार हो जाती है, तो वह घर के सामने की नाली को घूरे की तरह इस्तेमाल करती है, और अपने घर के कचरे को कोशिश करके सड़़क के दूसरी तरफ फेंकती है। हम अपने आसपास के रोज के तजुर्बे को देखें, तो शहरों में लोग मकानों को तोडऩे से निकला हुआ मलबा भी घूरों पर फेंकते हैं, और इतना ठोस कचरा-मलबा उठा पाना किसी भी म्युनिसिपल के बस का नहीं रह जाता है।
    आज सरकारी दफ्तरों की खुद की सफाई बहुत अधिक मायने नहीं रखती, और यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शुरू किया हुआ एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम अधिक है कि पहले अपना घर साफ करें, फिर शहर को साफ करने निकलें। लेकिन असल गंदगी शहरों के सार्वजनिक हिस्सों में है, जो कि अनुपात में इतनी अधिक है कि उसका निपटारा लोगों की आदतें सुधरने के साथ-साथ ठोस इंतजाम से ही हो सकेगा। हम सरकार की क्षमता और सीमा को समझते हैं, किसी भी देश या शहर की सरकार गंदे लोगों की गंदगी फैलाने की क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकती। ऐसे में महात्मा गांधी को याद करना जरूरी है जिन्होंने पौन सदी पहले इस देश में सफाई को जिंदगी की एक शैली बनाने को अच्छी तरह स्थापित किया था, और अपने आश्रमों के पखानों की सफाई खुद करना, अपने परिवार से करवाना भी शुरू किया था। यह सिलसिला भी जरूरी है, इसलिए कि जब लोग किसी जगह को खुद साफ करेंगे, तो लोग उसे गंदा करने से हिचकेंगे भी।
    लेकिन शहरीकरण के साथ-साथ कचरा इतना अधिक पैदा होता है, और बदमिजाज लोगों की आबादी के बीच में वह इस कदर फैला और बिखरा रहता है, कि उसे उठाना और ठिकाने लगाना खासा महंगा पड़ता है। और हाल के बरसों में हमने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल का बदलता हुआ मिजाज देखा है, उनको नाली, पानी, सफाई, रौशनी की बुनियादी शहरी जरूरतों को पूरा करने के बजाय सैकड़ों करोड़ के निर्माण के ठेके-टेंडर में दिलचस्पी अधिक होने लगी है, बड़े-बड़े कॉम्पलेक्स बनाना अच्छा लगने लगा है, और ऐसा क्यों होता है, यह सबको मालूम है। इस देश के शहरों में म्युनिसिपलों के तौर-तरीकों को, उनकी सोच को, और उनके काम के दायरे को बाजारू सोच से बाहर लाने की जरूरत है, उसके बिना कचरे का निपटारा वैसा ही ढीला पड़े रहेगा, जैसा कि पिछले एक बरस से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में देखने मिल रहा है।
    आने वाली गांधी जयंती तक सरकारी कार्यक्रमों में झाड़ू लगाते हुए बड़े-बड़े लोग तस्वीरें तो खिंचवा लेंगे, लेकिन यह अभियान, और इसका नारा, किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती रहेगी कि उस पर अमल किस तरह से हो पाएगा, किस हद तक हो पाएगा। लेकिन अपनी तमाम आशंकाओं के साथ हम इस पहल का स्वागत करते हैं कि सौ मील का सफर भी शुरू तो पहले कदम से ही होता है। प्रधानमंत्री ने जो पहल की है, वह अगर इस देश के लोग आगे बढ़ाते हैं तो यह देश बाकी सभ्य और साफ-सुथरे देशों की हिकारत से बच सकेगा। आज तो हाल यह है कि प्रवासी भारतीय भी अपनी जन्मभूमि की गंदगी को देखते हुए यहां लौटकर बसना ठीक नहीं समझते। हिन्दुस्तानियों का मिजाज ही गंदगी में जीने का दिखता है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 14-Sep-2018
  • अमिताभ बच्चन के ट्वीट देखें तो हैरानी होती है कि यह इंसान है या बुलडोजर? सुबह कभी तीन बजे तो कभी चार बजे का किया हुआ ट्वीट पढऩे मिलता है कि अभी-अभी केबीसी की शूटिंग, और फिर उसके बाद किसी एक साऊंड स्टूडियो से रिकॉर्डिंग करके लौट रहे हैं, और कुछ घंटे के भीतर फिर काम पर निकलना है। अमिताभ की उम्र 75 बरस हो गई है, और वे तरह-तरह के हादसों में कभी जानलेवा जख्मों से उबरकर मौत के मुंह से निकलकर आए हैं, तो कभी किसी और बुरी बीमारी से उनके जिंदा बचने की उम्मीद कम थी। आज भी वे मांसपेशियों की एक गंभीर बीमारी के शिकार हैं, लेकिन काम का उनका जज्बा, उनकी मेहनत, और बिना थके आगे चलते जाने का उनका मिजाज देखने लायक है। अलग-अलग देशों में, अलग-अलग मौसमों में, कभी बर्फीली आधी रात में सड़कों पर, तो कभी किसी गर्म देश में, उनके रात और दिन कैसे और कहां गुजरते हैं, यह देखना भी हैरानी खड़ी करता है। 
    उनकी मिसाल लेकर यहां पर लिखने का मकसद यह है कि यह वह इंसान है जो जब फिल्म उद्योग में पहुंचा था, तो दुबले बदन पर खजूर के पेड़ सरीखी ऊंचाई देखकर फिल्म निर्माताओं ने कहा था कि नीचे से पैर एक फीट कटवाकर आएं। उस वक्त तक किसी ने ऐसा ऊंचा अभिनेता देखा नहीं था, और उस वक्त की किसी अभिनेत्री के साथ अमिताभ की जोड़ी की कल्पना भी नहीं हो पाती थी। लेकिन वहां से चला कामयाबी का सफर एक वक्त उनकी अपनी कंपनी के दीवालिया हो जाने तक जारी रहा, और वे कर्ज में लद गए। उस वक्त का देश का सबसे ताकतवर, इंदिरा-राजीव का परिवार उनका एकदम करीबी था, लेकिन जाहिर है कि उन्होंने कर्ज चुकाने के लिए उस वक्त प्रधानमंत्री-परिवार की मदद नहीं ली, और मेहनत करके अपने दम पर उस मुसीबत से बाहर निकले। 
    आज आसमान छूती कामयाबी, और आसमान से भी ऊंची शोहरत के चलते हुए भी अमिताभ बच्चन के काम करने का जो फौजी अनुशासन है, वह देखने लायक है। जो फिल्म और टीवी उद्योग कामयाबी के साथ-साथ आने वाली बददिमागी के लिए बदनाम हैं, जहां कपिल शर्मा जैसे लोग एक-दो बरस की कामयाबी के नशे में धुत्त होकर धंधे से बाहर ही हो जाते हैं, वहां किसी ने कभी भी अमिताभ के काम पर न पहुंचने के बारे में नहीं सुना, और न ही किसी से उनकी बदसलूकी सुनी। जब परिवार में इतनी मेहनत से कमाई की जरूरत नहीं रह गई है, तब भी एक मशीन जैसी ताकत से अमिताभ रात-दिन मेहनत करते हैं, और उनको देखकर देश के बाकी लोग बहुत कुछ सीख भी सकते हैं। समाज के भले के लिए अमिताभ के किए हुए बहुत अधिक काम बहुत अधिक याद नहीं पड़ते, लेकिन किस इंसान के व्यक्तित्व और उनकी सोच में कमी या खामी नहीं रहती है। ऐसे में अमिताभ की जिंदगी के उतार-चढ़ाव बाकी उन लोगों को एक हौसला दे सकते हैं जो कि अपनी जिंदगी से थके हुए हैं, निराश हैं, या बेजा आदतों में डूबे हुए हैं। अमिताभ बच्चन किसी भी नशे से दूर रहकर जिस चौकन्नेपन के साथ अपने आपको पल-पल काम के लिए तैयार रखते हैं, उस रूख को देखकर भी कई पीढिय़ां बहुत कुछ सीख सकती हैं।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 13-Sep-2018
  • भारत में एक बार फिर दो राजनीतिक बवाल खड़े हो रहे हैं, भारत से बैंकों को लूटकर भागे हुए दारू कारोबारी विजय माल्या ने कहा है कि वे विदेश जाने के पहले वित्तमंत्री अरूण जेटली से मिलकर गए थे, और उन्हें बताकर गए थे कि वे बैंकों के कर्ज का निपटारा करना चाहते हैं। इस पर जेटली ने कहा है कि माल्या राज्यसभा सदस्य होने का बेजा फायदा उठाते हुए उनसे संसद के कारीडोर में जबर्दस्ती आकर मिले थे, और उन्होंने तुरंत ही कह दिया था कि उन्हें जो निपटारा करना है वह बैंकों के साथ करें, और इसके बाद उनसे बात करने से मना कर दिया था। जेटली की इस बात को गलत बताते हुए आज सुबह कांग्रेस की एक प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस सांसद पी.एल. पुनिया ने राहुल गांधी की मौजूदगी में कहा कि संसद के सेंट्रल हॉल में जेटली और माल्या की मुलाकात के वे गवाह हैं, और यह मुलाकात काफी देर तक चली थी, और इसकी जांच संसद के कैमरों की रिकॉर्डिंग से की जा सकती है। उन्होंने जेटली को खुली चुनौती दी कि यह आरोप अगर गलत साबित होगा तो वे राजनीति छोड़ देंगे, और अगर कैमरों ने जेटली-माल्या की काफी देर तक की बैठक दर्ज की होगी, तो जेटली राजनीति छोड़ दें। 
    दूसरी तरफ बीजेपी ने राहुल गांधी पर यह आरोप लगाया है कि नेशनल हेराल्ड मामले में उन्होंने एक ऐसी निजी कंपनी से कर्ज लेना बताया है जो कि दोनंबरी पैसों को एक नंबर का करने का कालाधंधा करती थी, और ऐसी दो सौ कंपनियां चलाने वाले एक मालिक ने आयकर विभाग को दिए अपने बयान में अपनी सारी कंपनियों को इसी किस्म का धंधा करने वाला बताया है। इसके साथ-साथ भाजपा ने राहुल और कांग्रेस पार्टी पर यह भी आरोप लगाया है कि वे समय-समय पर माल्या और उसकी कंपनियों के साथ यूपीए सरकार रहते हुए नर्मी दिखाते आए हैं, और वे माल्या से मिले हुए हैं। 
    आज यहां पर दो मामले ऐसे हैं जिनमें देश का पैसा डूबते हुए दिख रहा है, चाहे वह माल्या की कंपनियों में हो, चाहे वह एक ट्रस्ट नेशनल हेराल्ड में हो, जो कि नेहरू के समय से प्रकाशित हो रहे कांग्रेस के अखबार की मालिक कंपनी है, और उसके शेयर और मालिकाना हक को गलत तरीके से हासिल करने का मामला राहुल गांधी, सोनिया गांधी, और कांग्रेस पार्टी के इस ट्रस्ट के खिलाफ अदालत और आयकर में चल रहा है। इन दोनों मामले में हमारा यह कहना है कि सार्वजनिक जीवन में, और खासकर सत्ता से जुड़े हुए लोगों को अदालत की आड़ लेना बंद करना चाहिए। जब वे जनता के बीच वोट मांगने के लिए जाते हैं, तो अपने नोटों के हिसाब के लिए उनको बंद कमरों और अदालती मेहरबानी की आड़ नहीं लेनी चाहिए। उनको आरोप लगते ही बिना किन्तु-परन्तु के सीधे जनता के सामने खुद होकर अपना हिसाब रखना चाहिए, चाहे वह माल्या से जेटली की मुलाकात की बात हो, चाहे वह राहुल और सोनिया के शेयरों की और पैसों की बात हो, चाहे वह स्मृति ईरानी और नरेन्द्र मोदी की डिग्री की बात हो, चाहे वह दूसरे नेताओं पर लगे दूसरे तरह के आरोपों की बात हो। 
    सार्वजनिक जीवन के लोगों को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि जनता के जानने के हक को लेकर ही देश में सूचना के अधिकार का कानून बना है। ऐसे में सार्वजनिक जीवन के लोगों को न सिर्फ जनता के जानने के अधिकार का सम्मान करना चाहिए, बल्कि जनता को बताने की अपनी जिम्मेदारी भी पूरी करनी चाहिए। जनता के पूछने पर, सूचना के अधिकार की अर्जी लेकर महीनों और बरसों तक सरकारी दफ्तरों या पार्टी दफ्तरों में धक्के खाने पर भी अगर कोई जानकारी नहीं दी जाती है, तो इस बात की पूरी गुंजाइश रहती है कि ऐसी जानकारी में कोई न कोई घोटाला छुपा हुआ है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में आरोप लगते ही बिना किसी अदालती नोटिस के लोगों को खुद ही सब कुछ सामने रखना चाहिए, और लोगों के मन से संदेह खत्म करना चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 12-Sep-2018
  • भारत में बैंकों की कर्ज डूबत की भयानक हालत पर एक संसदीय कमेटी विचार कर रही है, और मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली इस कमेटी ने रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर रघुराम राजन को कमेटी के समक्ष इस मुद्दे पर अपनी राय रखने को बुलाया था। वे अभी अमरीका के एक विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं, और उन्होंने अपना एक लिखित विचार इस कमेटी को भेजा है जिसके कुछ हिस्से खबरों में सामने आए हैं। चूंकि यह संसद की एक कमेटी है, इसलिए यह कुछ विशेषाधिकारों से लैस भी है, और इससे वही बातें बाहर आ पाती हैं जिन्हें यह कमेटी बताना चाहती है। ऐसे में रघुराम राजन की यह बात सामने आ रही है कि उन्होंने अपने लिखित विचार में यह जानकारी दी है कि उन्होंने बैंकों के एनपीए की बुरी हालत के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को एक लिस्ट दी थी कि उनके हिसाब कौन-कौन से कर्जदार संदेहास्पद हैं। यहां पर सवाल यह उठता है कि उन्होंने यूपीए के प्रधानमंत्री कार्यालय को खबर दी थी, या कि एनडीए के प्रधानमंत्री कार्यालय को? क्योंकि वे इन दोनों के वक्त रिजर्व बैंक के गवर्नर थे, और मोदी सरकार आने के काफी बाद उनका कार्यकाल पूरा हुआ। 
    जब कभी सार्वजनिक या सरकारी-संवैधानिक ओहदे पर बैठे हुए लोग कोई ऐसी बात करते हैं, जो कि किसी के खिलाफ आरोप जैसी भी होती है, तो उसमें पूरी साफगोई होना जरूरी रहता है। रघुराम राजन ने जब कभी ऐसी लिस्ट पीएमओ भेजी होगी, वह आरबीआई की फाईलों में भी होगी, और उसकी तारीख राजन को लिखना चाहिए था। आज भारत में परस्पर राजनीतिक विरोध इतना कड़ा और कड़वा है कि भाजपा और कांगे्रस, दोनों के खेमे यह साबित करने में लग गए हैं कि राजन ने उनके नहीं, दूसरे पक्ष के पीएमओ को लिखा था। खैर, इस तथ्य से परे एक दूसरी बात यह तो है ही कि चाहे यह लिस्ट कभी भी भेजी गई हो, बाद में तो मोदी सरकार ही आई, और यह उसका हक भी था, और जिम्मेदारी भी थी कि ऐसी लिस्ट की जांच करवाती, और उस पर कार्रवाई भी करती। 
    यहां पर हमारा एक और सोचना है कि संसदीय समिति को राजन की चि_ी के हिस्से बाहर नहीं आने देना चाहिए, या तो पूरी चि_ी गोपनीय रखनी चाहिए, और अधिक बेहतर हो कि इस पूरी चिट्ठी को एक साथ जारी कर दिया जाए। खुद राजन का यह विशेषाधिकार है कि वे संसदीय समिति को भेजे गए जवाब को लोकतांत्रिक पारदर्शिता के मुताबिक जनता को जारी कर देते। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के लोगों को याद होगा कि राज्यों के विभाजन के बाद भोपाल में एक शराब कारोबारी पर आयकर छापा पड़ा था, और वहां नेताओं को भुगतान की जो डायरी जब्त हुई थी, उसमें सीएम के नाम से बड़ी-बड़ी रकमें लिखी गई थीं। उसके बाद छत्तीसगढ़ में तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तत्कालीन आबकारी मंत्री रामचंद्र सिंहदेव की पे्रस कांफे्रंस करवाई थी जिन्होंने अपनी साफ-सुथरी ईमानदारी छवि का इस्तेमाल करते हुए मीडिया को यह बताया था कि जिन तारीखों पर सीएम को भुगतान की बात लिखी गई है, उन तारीखों पर छत्तीसगढ़ राज्य ही नहीं बना था, इसलिए उसका जिक्र छत्तीसगढ़ के सिलसिले में नहीं किया गया होगा। सार्वजनिक जीवन मेें लोगों को अपने बयान संदेह से परे रखने चाहिए, ताकि उनकी बातों का इशारा किसी बेकसूर की तरफ न हो जाए। दूसरी तरफ कुल मिलाकर आज मोदी का पीएमओ ऐसी लिस्ट पर काबिज है, और अगर अब तक वह लिस्ट मनमोहन सिंह या नरेन्द्र मोदी किसी ने, या दोनों ने अनदेखी की होगी, तो कम से कम अब वे जनता के प्रति जवाबदेह हैं, और इस पर खुली जांच होनी चाहिए।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 11-Sep-2018
  • राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की चुनावपूर्व गौरवयात्रा में काले झंडे दिखाने वाले एक आदमी को वहां दर्जन भर पुलिसवालों ने घेरकर लाठियों से जिस तरह कूटा है, उसका वीडियो दिल दहलाने वाला है। दूसरी तरफ चार दिन पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के एक दौरे के पहले सड़क पर धरना दे रही स्कूली बच्चियों को भगाने के लिए पुलिस के साथ-साथ वहां के एसडीएम जिस तरह लाठी लेकर खुद भी टूट पड़े थे, उसका वीडियो भी फैला हुआ है। कुल मिलाकर सत्तारूढ़ नेताओं को किसी भी तरह की असुविधा से बचाने के लिए पुलिस लोकतांत्रिक प्रदर्शन करते हुए लोगों को भी जिस हिंसक तरीके से पीटती है, उसका किसी सत्तारूढ़ पार्टी से कोई लेना-देना नहीं होता है। हर पार्टी के राज में पुलिस की इस किस्म की हिंसा की लंबी भारतीय परंपरा बनी हुई है, और शायद ही कोई नेता ऐसे हों जो कि अपनी जनता के लोकतांत्रिक प्रदर्शन का सामना करने की पहल करते हों।
    अखबार के दफ्तर में बैठकर रोजाना हमें ऐसी दर्जनों तस्वीरें देखने मिलती हैं जिनमें पुलिस किसी सत्तारूढ़ नेता के पुतले को बचाने के लिए प्रदर्शनकारियों के साथ इतनी खींचतान करती है कि पुतले के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। अब किसी नेता का पुतला अगर जल ही जाए तो वह उस नेता का अधिक अपमान होगा, या फिर उस पुतले के टुकड़े-टुकड़े हो जाएं, तो वह अधिक बड़ा अपमान होगा? इसी तरह जहां पुतला जलने की आशंका होती है, वहां पुलिस पहले से पानी का इंतजाम करके रखती है कि अगर किसी तरह पुतला जला भी दिया गया, तो उसे फिर चाहे पास से पानी की बोतलें ही खरीदकर क्यों न बुझाना पड़े। कई तस्वीरों में ऐसा नजारा भी दिखता है कि प्रदर्शनकारी पुतला जलाने में कामयाब हो जाते हैं, और पुलिस को पानी नहीं जुटता, तो ऐसे में पुलिस जलते हुए पुतले को अपने बूटों से कुचल-कुचलकर आग बुझाने की कोशिश करती है। अब सवाल यह उठता है कि नेताजी के पुतले का जल जाना ठीक है, या फिर जलने के साथ-साथ पुलिस के बूटों तले कुचलकर अधजला बचना?
    दरअसल लोकतंत्र में कई बातों के लिए बर्दाश्त अगर न रहे, तो वह लोकतंत्र ही नहीं रह जाता। किसी को पुतला जलाने, या पुतले को फांसी पर टांगने, या किसी को काले झंडे दिखाने से उसका भला क्या नुकसान हो सकता है? लोगों की भड़ास अगर ऐसे काम करके निकलती है, तो सरकार द्वारा तय किए गए धरना-स्थल पर एक अंतिम संस्कार का कोना भी बना देना चाहिए जहां लोग पुतले को जला सकें, या फांसी दे सकें। हिंदुस्तान में मुजरिमों को पकडऩे के लिए भी पुलिस इतनी कम है कि उसे पुतलों को छीनने में, उसकी आग बुझाने में, काले झंडे छीनने में, बर्बाद नहीं करना चाहिए। लोगों को जब तक रोकथाम करने के लिए पुलिस दिखती है, तभी तक उनका कई किस्म के प्रदर्शन का उत्साह भी अधिक रहता है। इसलिए लोगों को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रदर्शन करने देना चाहिए, किसी के पुतले जलने से उनकी देह जलने का दिन न करीब आता, न दूर जाता। और फिर उत्तर भारत में तो लोग एकमत होकर रावण का पुतला जलाते ही हैं, समारोहपूर्वक जलाते हैं, और उसकी खुशियां भी मनाते हैं। हर पार्टी के लोगों को अपने रावण तय करने का हक होना चाहिए, और जलाने का भी।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 10-Sep-2018
  • आज देश भर में गैरभाजपा, गैरएनडीए बहुत सी पार्टियां पेट्रोलियम-महंगाई के खिलाफ भारत बंद करवाने में लगी हुई हैं। बंद से जितने किस्म के नुकसान हो सकते हैं उनके बारे में हमने अभी इसी जगह लिखा भी है, लेकिन उससे परे एक दूसरी बात यह है कि पेट्रोलियम-महंगाई अभूतपूर्व और अविश्वसनीय सी है, और इससे देश के आम लोगों को हो रहे नुकसान की कल्पना नहीं की जा सकती। आज जब विपक्ष सड़कों पर है, तभी राजनीतिक या गैरराजनीतिक, सभी किस्म के लोग सोशल मीडिया पर पेट्रोल-डीजल के आसमान छूते रेट को लेकर बिफरे पड़े हैं, और लोग मोदी सरकार के आने के ठीक पहले के चुनाव के वक्त सड़क किनारे लगाई गई उस होर्डिंग की तस्वीर भी पोस्ट कर रहे हैं जिसमें मोदी की तस्वीर के साथ यह नारा लिखा हुआ था- बहुत हुई पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार। इसके अलावा लोग मोदी और उनके मंत्रियों के ऐसे अनगिनत पुराने समाचार-वीडियो भी पोस्ट कर रहे हैं जिनमें वे मनमोहन सरकार के वक्त की पेट्रोलियम-महंगाई पर बवाल खड़ा कर रहे हैं, गैस सिलेंडर लेकर बैठे हैं। और कुछ लोग मुम्बई में पिछले दो दिनों में शिवसेना के लगाए हुए पोस्टरों की तस्वीरें भी पोस्ट कर रहे हैं जिनमें पेट्रोल-डीजल के रेट लिखकर मोदी सरकार से यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या ये ही अच्छे दिन हैं?
    अब सवाल यह उठता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से बहुत सस्ते में तेल खरीदकर मोदी सरकार ने अपने शुरूआती सालों में उस पर अंधाधुंध टैक्स बढ़ाया, और उसे ग्राहकों तक महंगे में पहुंचाया। राज्यों में से भी तकरीबन सभी इससे खुश थे क्योंकि उन्हें घर बैठे मोटी कमाई होने लगी थी क्योंकि जनता का काम तो डीजल-पेट्रोल के बिना चलता नहीं है। अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल का दाम बढऩे या डॉलर महंगा होने का तर्क दिया जा रहा है, लेकिन फिर भी ये आंकड़े तो आसानी से हासिल हैं कि मनमोहन सरकार के वक्त पेट्रोलियम पर टैक्स का क्या ढांचा था, और आज वह टैक्स कहां पहुंचा हुआ है। ऐसे में हमने पिछले बरसों में कई बार यह सुझाया है कि राज्यों को इस महंगे पेट्रोलियम पर अपना टैक्स प्रतिशत में न लेकर निर्धारित रूपयों में लेना चाहिए, ताकि राज्य की कमाई पहले जैसी ही रहे, और जनता की डीजल-पेट्रोल, रसोई गैस खरीदने की ताकत बनी रहे। कुछ महीने पहले केरल ने राज्य के टैक्स को कुछ कम किया था, और कल राजस्थान ने भी ऐसा किया है। 
    देश के बाकी प्रदेशों में भी जनता के बेहाल को देखते हुए राज्यों को अपने को हो रही अतिरिक्त कमाई का मोह छोडऩा चाहिए, और अपने स्तर पर डीजल-पेट्रोल को जितना सस्ता करना मुमकिन है, वह करना चाहिए। केन्द्र सरकार को भी, और सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया भाजपा को भी यह समझना चाहिए कि इस देश में कभी प्याज की महंगाई को लेकर सरकार पलट चुकी है, तो कभी शक्कर की महंगाई को लेकर। लेकिन डीजल-पेट्रोल इन दोनों सामानों के मुकाबले भी लोगों की जिंदगी में अधिक आग लगा रहे हैं, और ऐसे में सरकार को अपने खजाने को बढ़ाकर उसे दूसरी योजनाओं में खर्च करने के बजाय डीजल-पेट्रोल पर टैक्स घटाकर उसे सस्ता करने की फिक्र करनी चाहिए वरना चुनाव में फिक्र करके भी वह कहीं खड़ी नहीं रहेगी। यह नौबत बहुत ही भयानक है, और देश के बहुत से राजनीतिक विश्लेषक पिछले हफ्तों में लगातार यह सवाल उठा रहे थे कि कांग्रेस या बाकी विपक्ष पेट्रोलियम-महंगाई के मुद्दे पर सड़कों पर उतर क्यों नहीं रहे हैं। केन्द्र सरकार को जनता के बर्दाश्त का और इम्तिहान नहीं लेना चाहिए, और तुरंत ही अपना टैक्स घटाना चाहिए।
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 09-Sep-2018
  • चीन के सबसे अमीर आदमी और ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के संस्थापक जैक मा ने घोषणा की है कि वे कल, 10 सितंबर को अपने 54वें जन्मदिन पर कंपनी से रिटायर हो जाएंगे। चीन में 10 सितंबर अध्यापक दिवस होता है, जैक मा अलीबाबा शुरू करने के पहले अध्यापक थे, और अब कंपनी छोड़कर वे फिर अध्यापक होने जा रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें पढ़ाना पसंद है, और वे अब अपना समय, और पैसा, दोनों ही शिक्षा में निवेश करेंगे। 
    हिन्दुस्तान में लोगों के लिए यह सोचना कुछ मुश्किल बात है कि देश के सबसे रईस इंसान हो जाने के बाद भी वे 54 बरस जैसी उम्र में कारोबार छोड़ दें, और फिर से अपने पुराने पेशे में लौटकर पढ़ाने जैसा काम करें। लेकिन दुनिया में कई जगहों पर लोग ऐसा करते हैं, और जैक मा ने 20 बरस पहले ही पढ़ाना छोड़ा था, और अब दो लाख 88 हजार करोड़ की संपत्ति बनाने के बाद वे एक बार फिर अपने पुराने काम में जा रहे हैं, और जनकल्याण या समाज सेवा भी करने वाले हैं। बीस बरस पहले वे 34 बरस के रहे होंगे, और उस उम्र में पढ़ाना छोड़कर एक नए किस्म का कारोबार शुरू किया जो कि अपने आपमें एक हौसले की बात थी। और आज जब वे कमाई के आसमान पर हैं, तो कारोबार को छोडऩा उससे भी अधिक हौसले की बात है। 
    हिन्दुस्तान में आम लोग एक बार किसी काम में लग जाने पर उसे छोडऩे का हौसला नहीं दिखा पाते। बल्कि एक बार वे जब पढ़ते रहते हैं, तो पढ़ाई के बीच भी एक-दो बरस की छुट्टी लेकर दुनिया देखने का हौसला भी नहीं दिखा पाते, और समाज-परिवार का दबाव ऐसा और इतना रहता है कि एक बार में लगातार सारी पढ़ाई खत्म कर ली जाए। ऐसा करते-करते बहुत से नौजवान 30 बरस की उम्र पार कर चुके होते हैं, और उन्होंने अपनी पढ़ाई से परे, अपने घरेलू शहर से परे बहुत कुछ देखा हुआ नहीं होता है। जबकि दुनिया के विकसित देशों में बच्चे स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद कॉलेज की पढ़ाई शुरू करने के पहले एक बरस की छुट्टी भी ले लेते हैं, आगे की तैयारी करते हैं, दुनिया देखते हैं, आगे की पढ़ाई तय करते हैं। हिन्दुस्तान में बच्चे लगातार पढ़कर पोस्ट ग्रेजुएट तो हो जाते हैं, लेकिन उन्होंने दुनिया नहीं देखी होती है। ठीक इसी तरह जब लोग किसी एक काम में लग जाते हैं, तो फिर उस काम में ही कामकाजी जिंदगी के आखिरी दिन तक टिके रहते हैं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि हिन्दुस्तान में बेरोजगारी बहुत है और जब कोई कामकाज हाथ लग जाए तो वह आसानी से छूटता नहीं है, क्योंकि अगले किसी काम का ठिकाना नहीं रहता, और गरीब या मध्यमवर्गीय इंसान काम की गारंटी से अधिक शायद ही कुछ चाहते हैं।
    अमरीका में बिल गेट्स ने भी दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी, माइक्रोसॉफ्ट, बनाने के बाद, उसे दुनिया की एक सबसे कामयाब कंपनी बनाने के बाद उसके कारोबार से अपने को अलग कर लिया, और उससे होने वाली कमाई को वे और उनकी पत्नी एक ट्रस्ट बनाकर दुनिया भर में घूम-घूमकर समाजसेवा पर खर्च करते हैं। भारत में जिन लोगों के पास कमाने-खाने की मजबूरी नहीं होती, वे लोग भी कमाई जारी रखने के अलावा और कुछ करने का कम ही सोच पाते हैं, जबकि उनके आसपास रचनात्मकता या समाजसेवा की बहुत सी जरूरतें और संभावनाएं रहती हैं। आज इस मुद्दे पर लिखने का मकसद बस इतना सा है कि लोग अपने-अपने बारे में सोचें कि वे अपनी जरूरतें पूरी हो जाने के बाद किस तरह अपनी मर्जी का काम कर सकते हैं, या कि समाज की जरूरतों का काम कर सकते हैं।  
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 08-Sep-2018
  • एससी-एसटी एक्ट को लेकर देश एक अलग तनाव में घिर गया है। इसकी शुरूआत सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से हुई जिसमें इस एक्ट के इस प्रावधान को खत्म कर दिया गया था कि इन तबकों के किसी शिकायकर्ता की रिपोर्ट के बाद गिरफ्तारी अनिवार्य थी। अदालत ने इसे बाकी तबकों के हक के खिलाफ माना, और इस प्रावधान को खारिज कर दिया। लेकिन इसके खिलाफ कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, और बहुत सी दूसरी पार्टियों ने तुरंत विरोध किया, और संसद के भीतर यह मांग उठी कि सरकार तुरंत ही अध्यादेश लाकर इसके खिलाफ कानून में संशोधन करे। केन्द्र सरकार के सामने इतने बड़े राजनीतिक दबाव को मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था, खासकर तब जबकि एनडीए की कई पार्टियां और खुद भाजपा के कई नेता ऐसे संशोधन की मांग कर रहे थे। अब जब यह संशोधन हो गया तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए गैरराजनीतिक आधार पर देश की सवर्ण और ओबीसी आबादी का एक हिस्सा सड़कों पर आ गया है, और मध्यप्रदेश सहित कुछ राज्यों में जमकर प्रदर्शन हो रहा है कि सरकार के किए गए संशोधन को खत्म किया जाए, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाए। दूसरी तरफ कल सुप्रीम कोर्ट ने जब सरकार के संशोधन के खिलाफ लोग पहुंचे, और उस पर अमल पर रोक लगाने की मांग की, तो सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से इस पर उसका पक्ष पूछा है। 
    कुल मिलाकर देश के भीतर दलित-आदिवासी तबकों, और दूसरी तरफ बाकी तमाम तबकों के बीच एक वर्ण संघर्ष की नौबत आ गई है जो अभी तो बयानों और सड़कों पर प्रदर्शन तक सीमित है, लेकिन यह एक राजनीतिक और सामाजिक तनाव की ओर बढ़ भी रही है। उत्तरप्रदेश के भाजपा के उपमुख्यमंत्री ने कल सार्वजनिक बयान दिया है कि अगर दलित-आदिवासी तबके के किसी व्यक्ति ने ओबीसी के किसी व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई, तो ठीक नहीं होगा। यह बात कानूनी रूप से एक धमकी के दर्जे में भी आती है, और यह भाजपा के और केन्द्र सरकार के घोषित रूख के खिलाफ भी है। लेकिन केन्द्र सरकार द्वारा संसद में लाए गए संशोधन का भाजपा के ही कुछ बड़े सवर्ण नेता खुलकर सार्वजनिक रूप से विरोध भी कर रहे हैं। बाकी पार्टियों के सामने भी यह एक चुनौती है कि उसके नेताओं से जगह-जगह सवर्ण और ओबीसी समाज के लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संसद में उसे पलटने पर उनकी राय जानना चाह रहे हैं। 
    यह टकराव आज दो अलग-अलग स्तरों पर चल रहा है। एक तो अदालत और संसद के बीच परस्पर विरोधी राय का टकराव है। दूसरी तरफ यह देश के भीतर जातियों-वर्णों के बीच का एक टकराव है जो कि जरा से उकसावे और भड़कावे पर हिंसक भी हो सकता है। यह वक्त देश के भीतर समझदारी का नहीं रह गया है क्योंकि धर्म के आधार पर, आस्था और तथाकथित संस्कृति के आधार पर, खानपान और पहनावे के आधार पर, रोजी-रोटी के पेशे और प्रेम, विवाह के आधार पर लोगों के बीच पूरी तरह से अवैज्ञानिक टकराव खड़े किए गए हैं। लोगों की सोच अराजक हो गई है, और भीड़-हिंसा, भीड़-हत्या जनता का रूख हो गया है। लोगों को कहीं गाय के नाम पर कत्ल करना जायज लग रहा है, तो कहीं पर प्रेमी-प्रेमिका को मार डालना ठीक लग रहा है। सरकार, संसद, और राजनीतिक दलों के डर का हाल यह है कि समलैंगिकता की वैज्ञानिकता पर भरोसा रखने वाले राजनीतिक दलों का मुंह भी इस मुद्दे पर खुल नहीं रहा है, और इस पर भी सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना पड़ रहा है। केन्द्र सरकार तक ने सुप्रीम कोर्ट पर यह छोड़ दिया था कि समलैंगिकता की संवैधानिकता पर अदालत अपनी मर्जी से तय करे। जब अप्रिय लगने वाले फैसले लेने में संसद और पार्टियां डरने लगें, तो सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ रहा है। ऐसा ही एससी-एसटी एक्ट को लेकर हुआ, जिसमें रिपोर्ट दर्ज होने पर अपने आप गिरफ्तारी की मजबूरी पुलिस के सामने चली आ रही थी। 
    देश के गैर एससी-एसटी तबके के बहुत से लोगों का यह मानना है कि इस प्रावधान का बेजा इस्तेमाल होता है, इसलिए इससे ऐसी कड़ाई से गिरफ्तारी वाली शर्त को हटाना चाहिए। दूसरी तरफ दलित-आदिवासी समाज, नेताओं और कार्यकर्ताओं का यह मानना है कि देश में हर कानून का कोई न कोई बेजा इस्तेमाल होता है, इसलिए क्या तमाम कानूनों को खत्म कर दिया जाए? यह नौबत अब अदालत और सरकार के बीच एक टकराव की तरह आ गई है कि संसद में किए गए संशोधन पर अदालत में सरकार अब कितनी अड़ी रहे।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 07-Sep-2018
  • इस माह तीसरी बार भारत बंद का ऐलान हुआ है। सवर्णों के गुरुवार को बंद के बाद अब कांग्रेस ने जहां ईंधन की बढ़ती कीमतों के विरोध में 10 सितंबर को भारत बंद का ऐलान किया है, वहीं व्यापारियों के बड़े संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने 28 सितंबर को देश बंद का ऐलान किया है।  देश भर के करीब सात करोड़ छोटे व्यापारी इस बंद में शामिल होंगे।
    चाहे कोई भी राजनीतिक दल या संगठन बंद के पीछे हो, उसका नुकसान पूरे इलाके को झेलना पड़ता है। और भारत में कहने को चाहे पुलिस और स्थानीय सरकार लोगों की हिफाजत के लिए मौजूद हो, यह बात अपनी जगह तय है कि बंद के आतंक के चलते लोग अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए भी हौसला नहीं जुटा सकते।  कहने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बंद के खिलाफ कई तरह के फैसले दिए हैं, लेकिन सड़कों पर हिंसा पर उतारू भीड़ के सामने ऐसे कोई फैसले काम नहीं आते। और राजनीतिक दलों की सरकारें भी ऐसे बंद को लेकर भीड़ से किसी टकराव की न ताकत रखतीं और न ही उनकी नीयत बंद के सिलसिले को बंद करने की रहती। लेकिन यह सिलसिला सबसे कमजोर तबके पर सबसे बुरी मार करता है। जो लोग रोज कमाते-खाते हैं, जो रोज बिकने वाले सामान बेचते हैं, उनके उस दिन के चाय-समोसे अगले दिन दुगुने तो बिकने से रहे। यही हाल रोज के काम वाले मजदूरों का होता है और गरीब फेरीवालों का भी होता है। 
    केंद्र सरकार के किसी फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की रेलगाडिय़ों को रोक देने से दिल्ली की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है, दिल्ली तो विमान से सफर करती है, और आज तक हिंदुस्तान का कोई बंद हवाई अड्डों को तो बंद करवा नहीं पाया। फर्क तो पड़ता है उन मुसाफिरों को जो इन रेलगाडिय़ों से सफर करते हैं, बसों से चलते हैं या किराए के रिक्शे-आटो से चलते हैं। बंद करवाते जो नेता घूमते हैं, उनके घरों के लिए निजी गाडिय़ां रहती हैं। लेकिन जो मुसाफिर सामान सहित स्टेशन या बस अड्डे पर फंस जाते हैं, जो घर से अस्पताल नहीं जा पाते, उन पर बंद का फर्क पड़ता है। बड़ी-बड़ी होटलों में ऐसे बंद के दिन रेस्त्रां भी चलते हैं और शराबखाने भी। लेकिन जो गरीब यहां नहीं जा पाते, उनको खाना भी नसीब नहीं हो पाता। गैरबराबरी का यह सिलसिला कारखानों तक जारी रहता है। आज के बंद में कोई कारखाना तो बंद है नहीं, बड़ी कंपनियों के दफ्तर भी बंद नहीं हैं, लेकिन सबसे गरीब तबके की जिंदगी बंद है। इससे सरकार की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है? अगर बंद करवाने वाले यह सोचते हैं कि इससे सरकार को एक दिन में टैक्स का इतना नुकसान हुआ है, तो यह सोच झांसा देने वाली है। टैक्स वाले सारे बड़े सामान तो अगले दिन भी बिक जाएंगे, जो नहीं बिकेगा वह छोटे लोगों का सड़क किनारे का सामान। 
    इसलिए हम सरकार का विरोध करने के लिए बंद का तरीका जनतांत्रिक नहीं मानते, जनता के हितों के खिलाफ मानते हैं। और भीड़ की ताकत के बल पर ऐसे किसी बंद को कामयाब बना लेने से कुछ भी साबित नहीं होता। चूंकि भीड़ में सिर बहुत होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता, इसलिए लोग भीड़ से उलझते नहीं हैं।   बंद के बारे में जनता का खुद होकर किया गया स्वस्फूर्त बंद जैसी बातें  बयानों में जारी होने लगेंगी, यह सार्वजनिक बयानबाजी का फिर एक बड़ा झांसा होगा। कोई गरीब कभी बंद नहीं चाहते। इसलिए यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए और उस गरीब जनता को तकलीफ और नुकसान से बचाना चाहिए जिसे तकलीफ और नुकसान से बचाने के नाम पर यह ज्यादती की जाती है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 06-Sep-2018
  • सुप्रीम कोर्ट ने आज बेंच के सभी जजों के सर्वसम्मत फैसले से देश में समलैंगिकता को कानूनी दर्जा दे दिया है और कहा है कि डेढ़ सौ बरस पुराना यह कानून अलग यौनप्राथमिकताओं वाले एक अल्पसंख्यक तबके पर बहुसंख्यक तबके की मर्जी लादने वाला था जो कि मौलिक अधिकारों के खिलाफ था। इस तरह आज से इस देश में धारा 377 खत्म हो गई है, और किसी भी तरह की वयस्क समलैंगिकता जुर्म से बाहर हो गई है। 
    हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से इसी बात की वकालत कर रहे थे, और इसी जगह पर एक से अधिक बार लिख चुके थे। कुछ हफ्ते पहले भी हमने इस बारे में अपने तर्क लिखे थे- 'सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिकता पर बहस चल रही है कि उसे अपराध के दायरे से बाहर निकाला जाए या नहीं। अदालत में सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने अपनी कोई राय रखने के बजाय अदालत से कहा है कि वही इस बात को तय करे कि यह जुर्म माना जाए या नहीं। मतलब साफ है कि सरकार देश के एक बड़े तबके की नाराजगी को मोल लेकर समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर निकालने का अलोकप्रिय काम खुद नहीं करना चाहती, और वह चाहती है कि अदालत इसे करे। ऐसा नहीं रहता तो सरकार खुलकर इसका विरोध करती। यहां पर मौन: सम्मति लक्षणम् वाली बात लागू होती है। खैर, सरकार को अगर देर से यह बात समझ आ रही है तो भी ठीक है क्योंकि जिंदगी को प्रभावित करने वाली बहुत सी दूसरी बातों की तरह समलैंगिकता को भी जुर्म बनाने का काम अंग्रेजों ने किया था, और हिन्दुस्तानी लोग अब तक अंग्रेजों के इस पखाने के टोकरे को ढो रहे हैं। अंग्रेजों ने अपने देश में जिन कानूनों को खत्म कर दिया, उन्हें हिन्दुस्तान गर्व के साथ ढो रहा है, और कहने के लिए पश्चिमी संस्कृति का विरोधी भी है, और अपने आपको एक गौरवशाली संस्कृति का जन्मदाता भी मानता है।'
    इस मुद्दे पर चूंकि इन कुछ हफ्तों में हमारे कोई नए तर्क नहीं हैं, इसलिए हम उसी संपादकीय के हिस्से यहां दुहरा रहे हैं। हमने लिखा था-'भारत को यह पाखंड छोडऩा होगा कि समलैंगिकता कोई अप्राकृतिक बात है, या कि कोई ऐसी बीमारी है जिसके चलते लोगों का बच्चे पैदा करना खत्म हो जाएगा, और यह देश ही खत्म हो जाएगा, विवाह नाम की संस्था खत्म हो जाएगी। हकीकत तो यह है कि दुनिया के हर देश में, हर संस्कृति में समलैंगिक लोग हैं, औरतों में भी, और मर्दों में भी। दुनिया के हर देश में ट्रांसजेंडर हैं, और तरह-तरह की दूसरी यौन-प्राथमिकताओं वाले लोग हैं जिनकी अलग-अलग पसंद है। जो लोकतांत्रिक और सभ्य समाज हैं वहां पर प्रकृति की दी हुई इस विविधता को बराबरी का हक दिया गया है, और उसका सम्मान किया जाता है। योरप के बहुत से देशों में जहां-जहां यौन-विविधताओं वाले लोगों की प्राईड-परेड आयोजित होती है, वहां देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री उसमें शामिल होते हैं। अभी दो दिन पहले लंदन में ऐसा एक आयोजन हुआ तो लंदन के मेयर और एक ब्रिटिश मंत्री उस परेड में पहुंचे। '
    'भारत में समाज के एक बड़े तबके में यह धारणा मजबूती से बिठाई गई है कि समलैंगिकता एक बीमारी है, और उसका इलाज किया जा सकता है। बहुत से मां-बाप यह मानते हैं कि बच्चे अगर समलैंगिक हैं तो उनकी शादी कर देने से वे ठीक हो जाएंगे। बहुत से मां-बाप अपने ऐसे जवान बच्चों को मनोचिकित्सकों के पास ले जाते हैं, और मानते हैं कि परामर्श और दवा से वे ठीक हो जाएंगे। दुनिया के जिन देशों को हम अधिक लोकतांत्रिक और अधिक सभ्य कह रहे हैं, वहां भी समलैंगिकों को बराबरी का और सम्मान का दर्जा पाने में खासा वक्त लगा है, रातों-रात उन्हें किसी ने मंजूर नहीं कर लिया। इसलिए भारत में भी इसमें वक्त लग सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजों को दकियानूसी सोच की फिक्र किए बिना अब दुनिया में बहुत अच्छी तरह स्थापित हो चुके वैज्ञानिक तथ्य और सत्य के आधार पर, लोकतंत्र की फिक्र करते हुए अपना फैसला देना चाहिए। हमारा यह मानना है कि अगर जज बहुत ही दकियानूसी और पूर्वाग्रस्त नहीं होंगे, तो समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर करने का स्पष्ट फैसला देंगे। दो बालिग लोग आपस में कैसे संबंध रखें, यह किसी सरकार या अदालत की दखल का मामला नहीं बनता है। सरकार और अदालत को अपने दायरे में रहना चाहिए क्योंकि इन दोनों का अस्तित्व जनता से बनता है, जनता का अस्तित्व अदालत या सरकार से नहीं बनता। '
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 05-Sep-2018
  • कश्मीर की एक खबर है कि एक सौतेली मां ने नौ बरस की बच्ची के साथ लोगों से गैंगरेप करवाया, और उसकी आंखें फोड़कर, उस पर तेजाब डलवाकर उसकी हत्या भी करवा दी। इधर मध्यप्रदेश की खबर है कि एक अधेड़ आदमी ने अपनी मां से बलात्कार किया, और वह भी अपने बेटे की मौजूदगी में। इन दो खबरों का एक साथ आना विचलित करता है कि दुनिया में लोग अब भरोसा करें, तो किस पर करें? रिश्तों की जो भी सामाजिक मर्यादाएं हजारों बरस से चली आ रही है, वे इंसानी हवस के सामने हवा होते दिखती हैं, और यह बात भी है कि ऐसे शर्मनाक हादसे सामने कम आते हैं, दबा अधिक दिए जाते हैं। नतीजा यह होता है कि वर्जित संबंधों के बीच इस किस्म की ज्यादती का समाज में अनुपात लोगों को समझ भी नहीं पड़ता। यह भी एक वजह है कि लोग दूसरों के हादसे से खुद सावधान नहीं हो पाते। 
    एक वक्त था जब बड़े बुजुर्ग यह कहते थे कि इंसानों के बदन आग और घी की तरह रहते हैं, और उन्हें पास नहीं रहने देना चाहिए। बहुत से संबंधों को लेकर लोग ऐसे सावधान रहते भी थे। लेकिन दुनिया के किसी भी सावधान समाज में भी यहां की आज की चर्चा की दो घटनाओं जैसे मामलों को रोकने के लिए भला कोई क्या सावधान हो सकते हैं? ऐसे में यही समझना चाहिए कि दुनिया में जहां तक इंसानों का मामला है, उनके बीच कुछ भी हो सकता है, उनकी नीयत कितनी भी हिंसक हो सकती है, और उन्हें किसी वर्जना से, किसी भी किस्म के वर्जित संबंधों से कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए हर किसी को न सिर्फ अपने बच्चों को बचाकर रखना चाहिए, बल्कि खुद भी बचकर रहना चाहिए। परिवार के भीतर भी ऐसी नौबत नहीं आने देनी चाहिए कि संबंधों में कोई खतरा खड़ा हो सके। 
    लेकिन भारत में कुल मिलाकर परिवार के भीतर बच्चों के देह शोषण का मुद्दा पूरी तरह से दबा-छुपा रहता है, और उसकी चर्चा करना परिवार के भीतर भी दिक्कत की बात होती है, और कोई बच्चे हिम्मत करके मां-बाप से भी यह बात कहना चाहते हैं, तो उन्हें डांटकर, झिड़ककर चुप करा दिया जाता है। स्कूलों में भी शिक्षकों पर या तो इतना बोझ रहता है, या वे इतने बेपरवाह रहते हैं कि एक-एक बच्चे की ऐसी किसी शिकायत को सुनने का न उनमें सब्र रहता है, और न ही स्कूलों में इसके लिए कोई और इंतजाम रहता है। बहुत महंगे स्कूलों में इन दिनों बच्चों के लिए परामर्शदाता का इंतजाम रहता है, लेकिन भारत जैसे देश की पूरी आबादी को देखें, तो ऐसी सहूलियत उंगलियों पर गिनी जा सकती है, और वे प्रतिशत में कहीं नहीं बैठतीं। 
    ऐसे में समाज के कुछ लोगों को आगे आना चाहिए, और अपने-अपने इलाकों में बच्चों के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए, पहले तो उन्हें उनकी देह के बारे में शिक्षित करना चाहिए, फिर उन्हें सही और गलत स्पर्श के लिए सावधान करना चाहिए, और फिर उनका हौसला बढ़ाना चाहिए कि उन्हें कहीं भी खतरा दिखे तो वे आकर समाज के बड़े लोगों को बताएं। लेकिन ऐसा करते हुए एक सावधानी यह भी बरतनी चाहिए कि बच्चों के यौन शोषण में दिलचस्पी रखने वाले कुछ बड़े लोग ऐसे परामर्श केन्द्रों में घुसपैठ न कर लें। पूरी दुनिया में बच्चों की मदद करने वाले तमाम किस्म के केन्द्रों में यह खतरा बने रहता है, और उससे निपटना आसान भी नहीं रहता। तनाव और तकलीफ से गुजरते हुए हताश और निराश बच्चे का हमदर्द बनकर उसका शोषण कर पाना एक अधिक आसान काम रहता है। 
    इसके अलावा उत्तर भारत में अभी जगह-जगह ये घटनाएं सामने आई हैं कि किस तरह बालगृहों में उन्हें चलाने वाले लोग ही वहां के बच्चे-बच्चियों से जिस तरह थोक में संगठित बलात्कार का धंधा चला रहे थे, और अब गिरफ्तार होकर जेल में भी हैं, कमोबेश वैसा ही हाल देश में और जगहों पर भी हो सकता है। इसलिए दूसरी जगहों की ठोकर से बाकी जगहों को सबक लेना चाहिए, चाहे वह किसी जगह परिवार की भीतर बात हो, या किसी प्रदेश में चल रहे बालक-बालिका गृह की बात हो।
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 04-Sep-2018
  • छत्तीसगढ़ के धमतरी में दो दिन पहले एक प्रेमी जोड़ा पेड़ से टंगा मिला। पुलिस का अंदाज है कि परिवार शादी नहीं करने दे रहे थे, इसलिए प्रेमी ने प्रेमिका की मांग भरी होगी, और फिर वैसी ही हालत में दोनों एक साथ फंदे से झूल गए। कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश की एक खबर थी कि वहां एक परिवार में बारात पहुंचने वाली थी, और कुछ घंटे पहले ही दुल्हन ने अपने प्रेमी के साथ फांसी लगाकर जान दे दी। उन्हें लड़की के घरवालों ने शादी की इजाजत नहीं दी थी, और लड़की का रिश्ता कहीं और तय कर दिया था। इधर मानो इसी घटना की कार्बन कॉपी करते हुए छत्तीसगढ़ के मैनपुर में एक प्रेमी जोड़े ने एक साथ फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली क्योंकि परिवार उन्हें शादी नहीं करने दे रहे थे। भारत में होने वाली आत्महत्याओं में निराश प्रेमियों की आत्महत्या का एक बड़ा हिस्सा रहता होगा। लेकिन फिर भी खुदकुशी के आंकड़े तो पुलिस के रिकॉर्ड में आते हैं, और देश भर में गिने जाते हैं, पर आत्महत्या न करके घुट-घुटकर जीने वाले निराश प्रेमियों की निराशा की कोई गिनती नहीं हो सकती। 
    एक तरफ तो भारत में सरकार ने आधी-पौन सदी पहले आर्य समाज नाम की संस्था को शादी करवाने का अधिकार दिया गया, और इस संस्था द्वारा करवाई शादियों में से बड़ी संख्या में ऐसी शादियां होती हैं जो कि अंतरजातीय होती हैं, या दूसरे धर्म के लोगों में होती है। इसलिए एक तरफ तो कानून बनाकर बालिग जोड़ों को मर्जी से शादी करने की ऐसी छूट दी गई जिसमें परिवार के लोगों की अनुमति, सहमति, या मौजूदगी कुछ भी जरूरी नहीं है। सामाजिक रूप से भेदभाव और छुआछूत के शिकार दलित तबके के लोगों से गैरदलितों की शादी पर सरकार ने नगद पुरस्कार भी रखा हुआ है जो कि जाहिर तौर पर अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए है। लेकिन ऐसी तमाम बातों को शुरू हुए लंबा समय हो चुका है, और समाज है कि सुधरने का नाम भी नहीं लेता। आज भी हरियाणा और उसके आसपास के इलाकों में खाप पंचायतें गोत्र के भीतर या जाति के बाहर शादियों पर हिंसक फैसले देती हैं, उत्तर भारत में जगह-जगह प्रेम विवाहों की सजा देने के लिए एक परिवार दूसरे परिवार की महिलाओं से बलात्कार पर भी उतर आता है। कुल मिलाकर देश का माहौल प्रेम के लिए नफरत का है। 
    देश में कानून में बालिग लड़के-लड़कियों को साथ रहने की इजाजत दी है, लेकिन हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि किस तरह पुलिस जाकर छात्र-छात्राओं की नुमाइश लगा देती है, और उनकी तस्वीरों के साथ यह जानकारी फैलाती है कि वे लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते हैं, मानो यह कोई जुर्म हो। बाग-बगीचों में बैठे हुए लड़के-लड़कियों को पुलिस पीटती है, मानो मोहब्बत कोई खतरा हो, और नफरत एक बहुत बड़ी हिफाजत हो। यह सिलसिला इस देश को कई किस्म से गड्ढे में ले जा रहा है। दुनिया में वही देश आगे बढ़ते हैं जहां की नौजवान पीढ़ी को एक स्वस्थ वातावरण में आजादी के साथ जीने मिलता है। हिन्दुस्तान में सरकार के नुमाइंदे अपनी ही सरकार के कानूनों के खिलाफ जाकर बालिग प्रेमियों को अलग करने में हिंसा में जुट जाते हैं। मां-बाप धर्म और जाति को लेकर हिंसा करने लगते हैं। कई परिवार लड़के-लड़कियों को खुद की मर्जी से कुछ करने के खिलाफ उनको मार डालना बेहतर समझते हैं, और इसे ऑनर-किलिंग (सम्मान हत्या) कहा जाता है। 
    कृष्ण के श्रंृगार रस के इतिहास से भरे हुए इस देश में आज प्रेम से लोगों को दहशत होने लगी है। आज अगर कृष्ण होते भी, तो भी वे न रास रचा पाते, न गोपियों के साथ तालाब किनारे या पेड़ों पर बैठ पाते, वे कुछ भी नहीं कर पाते। इस देश ने अपने ही एक रसभरे पुराण और इतिहास को भूलकर एक ऐसा पाखंड बढ़ाना शुरू कर दिया है जिसमें प्रेम को हिंसा से भी बुरा करार दिया जाता है, और प्रेम को कुचलने के लिए कत्ल को गौरव मान लिया जाता है। ऐसे देश के नौजवान अपनी हसरतों के जख्मों के साथ भला किस तरह आगे बढ़ सकते हैं? ऐसी हिंसा ने देश की नौजवान पीढ़ी की मानसिकता को कुंठा और भड़ास से भरकर रखा है, और ऐसे में किसी तरह की कोई उत्पादकता देश को नहीं मिल सकती। इस देश के पाखंड का यह हाल है कि धर्म और आध्यात्म के नाम पर, बाबा और गुरू नाबालिग बच्चियों से बलात्कार करते हैं, और सजा पाने के बाद भी पूजे जाते हैं। ऐसे देश में एक स्वाभाविक प्रेम के लिए, जायज और बालिग प्रेम के लिए जो सालाना पर्व फैशन में हैं, वैसे वेलेंटाइन डे को पश्चिमी करार देते हुए बलात्कारी बापू उसे मातृ-पितृ दिवस में बदलने का फतवा देते हैं, और उनके भक्तों के साथ-साथ सरकारें भी इस फतवे को मान लेती हैं। अब तो कम से कम इस बलात्कारी के सजा पाने के बाद इस पाखंड को खत्म करना चाहिए, और सरकार को ऐसी हरकत से अपने हाथ खींचने चाहिए कि बालिग प्रेमी जोड़ों को प्रेम से रोके, और उस दिन को मां-बाप को समर्पित करे। जिंदगी में मां-बाप की अपनी जगह है, लेकिन उसका मतलब यह नहीं है कि बालिगों को अपनी पसंद के जीवनसाथी चुनने के लिए उनके साथ प्रेम करने की कोई जरूरत ही नहीं है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और प्रेमियों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाला यह हिंसक समाज न सिर्फ बेकसूर जिंदगियां खो रहा है, बल्कि उस पीढ़ी की राष्ट्रीय उत्पादकता की संभावनाओं को भी खो रहा है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 03-Sep-2018
  • पिछले दो-तीन बरस में शायद दो-तीन सौ से अधिक बार डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़े हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों से इसे जोड़ दिया गया है, और वहां भाव बदलते हैं तो हिन्दुस्तान में सरकार कई किस्म के अपने टैक्स और ड्यूटी कम-ज्यादा करके लोगों की जेब से अधिक से अधिक उगाही करने की तरकीब निकाल लेती है। इसके बाद राज्यों के टैक्स की बारी आती है और कुल मिलाकर पेट्रोल-डीजल को सीधे, या सामानों के लिए, इस्तेमाल करने वाली जनता की कमर टूट रही है। लेकिन इस सिलसिले के चलते हुए भी जो दूसरी बड़ी परेशानी है, वह है रोजाना बदलने वाले रेट की। जो लोग पेट्रोल पंप पर जाकर ईंधन डलवाना चाहते हैं, उन्हें खुद यह पता नहीं होता कि उस दिन का रेट क्या है, और सीमित पैसों वाले लोग लीटर के बजाय रकम का पेट्रोल डलवाते हैं। 
    इस सरकारी बेवकूफी को खत्म करके एक आसान रास्ता निकालने की जरूरत है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार के भाव कम-ज्यादा होने से भारत में खुदरा बिक्री के रेट बदलने हैं, तो उसके लिए हफ्ते का एक दिन तय कर देना चाहिए। हर सोमवार उस हफ्ते के लिए नए रेट आ जाएं, और लोग शनिवार-इतवार के खाली वक्त में चाहें तो पेट्रोल पम्प हो आएं। पेट्रोलियम से नफा-नुकसान रोजाना की बिक्री से जुड़ी हुई बात नहीं है। कई लाख करोड़ रुपये का एक ऑईलपूल पहले से चले आ रहा है जिसमें नफा या नुकसान इक_ा होते रहता है। सरकार को यह चाहिए कि एक हफ्ते के लिए रेट तय करना शुरू करे, और इस पर भी केन्द्र और राज्य के टैक्सों का ढांचा ऐसा होना चाहिए कि वह कुछ-कुछ पैसे कम-ज्यादा होने के बजाय सीधे रुपयों में कम-ज्यादा हो। अगर सरकार को इससे बचत होती हो, तो अगले हफ्ते रेट कम बढ़ें, और अगर इस हफ्ते नुकसान हो गया हो, तो अगले हफ्ते रेट ज्यादा बढ़े। 
    रोज डीजल-पेट्रोल के रेट बढ़ाना-घटाना एक परले दर्जे की बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं है। लोगों को, खासकर गरीब लोगों को अपने खर्च का अंदाज नहीं लगता, जेब में रखे हुए सीमित पैसे बार-बार टटोलने होते हैं। देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज डीजल-पेट्रोल का सीधा ग्राहक है। ऐसे में जनता की सुविधा को देखते हुए भी सरकार अपनी कमाई जारी रख सकती है। समझदार सरकार तो तेल कंपनियों को महीने में एक बार भाव घटाने-बढ़ाने के लिए कहती, और हर महीने अगले-पिछले महीनों का नफा-नुकसान बराबर कर लिया जाता। 
    आज देश की जनता को एक होकर यह मांग भी करनी चाहिए कि राज्य सरकारें डीजल-पेट्रोल पर अपना टैक्स घटाएं। केरल ने ऐसा किया है, और हर राज्य ऐसा कर सकते हैं। आज दिक्कत यह है कि सस्ते तेल पर भी केन्द्र सरकार लूट के अंदाज में टैक्स-ड्यूटी लगा रही है, और उसके लग जाने के बाद जो रेट बनता है, उस पर राज्य सरकार का टैक्स लग जाता है, और राज्यों को बिना किसी कोशिश के, बिना किसी जायज हक के, यह अतिरिक्त टैक्स मिल जाता है। गरीबों से ईंधन पर इतना टैक्स लेने के बजाय महंगी गाडिय़ों और दुपहियों पर खरीदी के वक्त ही इतना सालाना टैक्स तय कर देना चाहिए जो कि उनकी औसत खपत के आधार पर हो। महंगी गाडिय़ों को पेट्रोल पंप से तो डीजल-पेट्रोल महंगा अलग से बेचना मुमकिन नहीं है, लेकिन उनसे गाड़ी खरीदते समय ही अधिक टैक्स लिया जा सकता है। इसे लेने का एक दूसरा तरीका उन महंगी गाडिय़ों पर आयकर की छूट को खत्म करके निकाला जा सकता है जो ईंधन का खर्च बताकर आयकर में छूट पाती हैं। आयकर में छोटी गाडिय़ों पर ही ईंधन छूट मिलनी चाहिए, और बड़ी गाडिय़ों को इससे बाहर कर देना चाहिए। इससे भी सरकार बड़ी गाडिय़ों से ईंधन पर एक किस्म से वसूली कर सकेगी। डीजल और पेट्रोल की बिक्री की जगहों पर कोई फर्क करना मुमकिन नहीं है, लेकिन लाखों रूपए दाम की मोटरसाइकिलों को छोटे दुपहियों के दाम पर ईंधन क्यों दिया जाए? केन्द्र सरकार आज मनमाने तरीके से डीजल-पेट्रोल से उगाही कर रही हैं। इसे अधिक युक्तिसंगत, न्यायसंगत और सहूलियत का बनाने की जरूरत है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 02-Sep-2018
  • मोदी सरकार के एक मंत्री, अश्विनी चौबे ने कल कहा कि मोदी आसमान सरीखे हैं, और राहुल गांधी नाली के कीड़े समान हैं। वे उत्तर भारत के हैं इसलिए यह मानने में कोई शक नहीं होना चाहिए कि वे इन शब्दों का मतलब ठीक से जानते हैं। अब इस तरह की भाषा हर कुछ दिनों में कोई न कोई नेता इस्तेमाल करते हैं, और यह बात भाजपा के साथ कुछ अधिक चाहे जुड़ी हो, यह अकेले भाजपा की बात नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नीच आदमी कहने की वजह से कांग्रेस ने अपने एक बड़े नेता मणिशंकर अय्यर को कई महीनों के लिए पार्टी से निलंबित ही कर दिया था। आज की राजनीति में बढ़ती चली जा रही गंदगी के चलते लोगों के मुंह से ऐसा बकवासी पखाना बहते ही रहता है, लेकिन ऐसे में पार्टी का नजरिया अगर सामने नहीं आता है, अगर पार्टी उस पर कोई कार्रवाई नहीं करती है, तो फिर इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि पार्टी की अपने नेताओं की ऐसी गंदी बातों को मौन सहमति है। 
    अब यहां पर मीडिया के सामने, खासकर जिम्मेदार मीडिया के सामने यह दुविधा आ खड़ी होती है कि ऐसी बातों को वह पाठकों और दर्शकों को बताए, या इसे एक गंदी बात लिखकर इस सिलसिले का हौसला पस्त करे? कुछ लोगों का यह मानना है कि मीडिया को तमाम बातों को ज्यों का त्यों सामने रख देना चाहिए, और अपने पाठकों या दर्शकों को यह तय करने देना चाहिए कि ऐसी बकवास करने वाले लोगों के बारे में वे क्या राय बनाएं। दूसरी तरफ कुछ लोगों का यह मानना है कि लोगों के मुंह से निकलती गंदगी को अपने पाठकों या दर्शकों के सामने परोसना कोई बेबसी तो है नहीं, और इस काम से बचना चाहिए। आखिर देश की संसद और विधानसभा भी तो अपने सदस्यों की कही हुई कई बातों को असंसदीय करार देते हुए उन्हें सदन की कार्रवाई से निकाल देती हैं। अभी-अभी भारतीय संसद में, शायद पहली बार, अपने प्रधानमंत्री की कही एक बात को असंसदीय या आपत्तिजनक मानते हुए उसे कार्रवाई से हटा दिया। 
    इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया की मेहरबानी से बहुत से ऐसे वीडियो सामने आते हैं जिनमें कोई नेता अश्लील, हिंसक गालियां देते हुए भाषण देते हैं, और उनकी गालियों वाले हिस्से की आवाज को मिटाते हुए, इन शब्दों की जगह उनकी तस्वीर पर भी मुंह को धुंधला करते हुए ये वीडियो दिखाए जाते हैं, या आगे बढ़ाए जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ऐसे वीडियो मोबाइल पर आ जाते हैं जिनमें गालियां मिटाई नहीं गई होतीं, और कुछ लोगों के बीच बैठकर अगर इन्हें देखा जाता है, तो अचानक इनसे निकली गंदी गालियों से बड़ी शर्मिंदगी की नौबत आ जाती है। 
    मीडिया किसी एक सोच पर नहीं चलता, और उसके अलग-अलग लोगों की निजी सोच उनके बहुत से फैसले तय करती है। ऐसे में जाहिर है कि गालियों को छापने या दिखाने को लेकर भी कोई एक राय नहीं बन सकती। फिर भी हिन्दुस्तान में इतना तो है कि सार्वजनिक जीवन के बर्दाश्त को देखते हुए मीडिया गंदी गालियों को हटा देता है। दूसरी तरफ पश्चिम का अंग्रेजी मीडिया इनकी जगह कुछ ऐसे अक्षर छापता है जिनका कोई मतलब नहीं होता, और लोग समझ जाते हैं कि इन्हें गालियों की जगह छापा गया है। पश्चिमी मीडिया बहुत सी गालियों की जगह पहले और आखिरी अक्षर छापकर बीच के हिस्से को खाली छोड़ देता है, ताकि लोग खुद ही अंदाज लगा लें। 
    अब राहुल गांधी नाली के कीड़े के समान हैं या नहीं, भाजपा के एक मंत्री के बयान पर यह भाजपा को ही तय करना चाहिए, ठीक उसी तरह जिस तरह की मणिशंकर अय्यर के एक शब्द को लेकर कांग्रेस ने उन्हें निलंबित कर दिया था। कोई भी पार्टी ऐसे सार्वजनिक विवाद के बाद चुप रहकर न सिर्फ उस एक बयान को सहमति देती है, बल्कि पार्टी के और बहुत से लोगों को उसी तरह बकवास करके शोहरत पाने के लिए बढ़ावा भी देती है। हालांकि नाली के कीड़े के नजरिए से देखा जाए तो वह तो इंसानों की पैदा की हुई गंदगी में जीने वाला एक निरीह और बेकसूर प्राणी है जो कि न तो साम्प्रदायिक बकवास करता है, न लोगों को एक-दूसरे से लड़वाता है, न ही सत्ता पर काबिज होकर काली कमाई करता है, और न ही दूसरे कीड़ों के खिलाफ हिंसक बात ही करता है। यह इंसानों का आम मिजाज है कि वे एक-दूसरे को गाली देने के लिए आमतौर पर जानवरों, और दूसरे प्राणियों की मिसालों का इस्तेमाल करते हैं, बजाय दूसरे इंसानों की मिसाल देने के। चूंकि इंसानों से परे के प्राणी अपनी मानहानि का दावा करते हुए एक इंसान अनिल अंबानी की तरह दूसरे को पांच हजार करोड़ रूपए हर्जाने का मानहानि-नोटिस नहीं भेज सकते, इसलिए इंसान उनकी मिसालों का खुलकर बेजा इस्तेमाल करते हैं। 
    भाजपा के इस केन्द्रीय मंत्री के बयान के बाद कल से अब तक मीडिया का भाजपा से पूछा हुआ कोई सवाल और उसका कोई जवाब अब तक पढऩे में नहीं आया है, इसलिए यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि ऐसे बयान छापने और दिखाने वाले मीडिया को क्या अपनी ऐसी जिम्मेदारी समझ आती है कि वे ऐसे बकवासी नेता की पार्टी से भी पूछ लें कि क्या पार्टी इससे सहमत है?
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 01-Sep-2018
  • छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव को लेकर दो दिन चुनाव आयोग ने इस राज्य में आकर सबसे बात की, और मीडिया के सामने अपनी बात रखी, मीडिया के सवालों का जवाब भी दिया। लेकिन कुछ बुनियादी बातों का जवाब चुनाव आयोग के पास नहीं है क्योंकि वह शायद उसके दायरे में भी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में इन्हीं दिनों यह सुनवाई चल रही है कि राजनीति से, और खासकर संसद और विधानसभाओं से, अपराधियों को बाहर रखा जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट केन्द्र सरकार को भी घेर रहा है, और राजनीतिक दलों को भी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से भी इस बारे में राय मांगी है कि राजनीति से मुजरिमों को कैसे बाहर किया जाए। 
    अब देश के अधिकतर राजनीतिक दलों के अपने-अपने पसंदीदा मुजरिम हैं, जिनमें से कुछ से उसे धनबल हासिल होता है, कुछ से उसे बाहुबल हासिल होता है। और कुछ से चुनावों में जीत हासिल होती है क्योंकि मुजरिम रहते हुए भी वे अपने इलाकों में इतना दबदबा रखते हैं कि उन्हें टिकट देना जीत की गारंटी सरीखा होता है, और राजनीतिक दलों के बीच कई बार यह होड़ मची रहती है कि वे कैसे दूसरे राजनीतिक दल के मुजरिम को तोड़कर लेकर आएं। हर बार कुछ लोकतांत्रिक संस्थाएं यह विश्लेषण करके सामने रखती हैं कि चुनाव में खड़े हुए उम्मीदवारों में से किस पार्टी के कितने मुजरिम हैं, कितनों के खिलाफ लूट या हत्या के मुकदमे हैं, लेकिन आज के भारतीय लोकतंत्र में ये तमाम कोशिशें बेमतलब हैं, बेकार हैं। इसी सिलसिले में अभी-अभी सुप्रीम कोर्ट द्वारा उत्तरप्रदेश सरकार को जारी यह नोटिस देखने की जरूरत है जिसमें अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापिस कैसे लिया जा रहा है, इन पर उसका क्या कहना है। देश का मीडिया ऐसे कार्टून और लतीफों से भर गया है जिनमें योगी आदित्यनाथ ही जज हैं, वे ही सरकारी वकील हैं, वे ही पुलिस हैं, और वे ही कटघरे में खड़े हुए मुजरिम हैं। इस मुख्यमंत्री के खिलाफ दर्ज मामले मामूली नहीं है, और मुख्यमंत्री बनने के बाद तक इस आदमी ने जिस हद तक भड़काऊ और साम्प्रदायिक बयान सार्वजनिक रूप से दिए हैं, उनको देखकर लगता है कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की तमाम कोशिशें फिजूल हैं। मुजरिमों को न केवल संसद और विधानसभाओं से रोकना नामुमकिन है, बल्कि उनका मंत्री और मुख्यमंत्री बनना भी आज एक सहज और सरल बात हो चुकी है। 
    आज चुनाव आयोग एक ऐसी मशीन सरीखा हो गया है जो कि मतदान को ठीक से करवाने में महारथ हासिल कर चुकी है, और इससे परे उसकी अपनी कोई अक्ल नहीं रह गई है। धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर, किसी को गद्दार कहकर, किसी को धमकी देकर, कहीं साम्प्रदायिकता भड़काकर, तो कहीं राष्ट्रवादी हिंसा भड़काकर चुनाव में वोटों का ध्रुवीकरण किया जाता है, और इसके खिलाफ चुनाव आयोग के पास कोई कारगर हथियार नहीं है। चुनाव सुधार की बात बहुत होती है, लेकिन होते कुछ नहीं दिखता। जिस अंदाज में भारत में वोट खरीदे जाते हैं, वोटरों को घर बिठा दिया जाता है, या तीर्थयात्रा को भेज दिया जाता है, जिस अंदाज में खर्च की सीमा से दस गुना अधिक खर्च किया जाता है, और चुनाव आयोग के आंख-कान किसी काम नहीं आते, उसे देखते हुए चुनावों के निष्पक्ष होने की बात ही फिजूल लगती है। इस देश में चुनाव मैनेजमेंट और शॉपिंग का एक काम बनकर रह गए हैं, और इन दो कामों की खूबियां जिन पार्टियों में हो, वे कामयाब रहती हैं, वे सरकार बना लेती हैं। अब तो हालत इतनी खराब हो चुकी है कि किसी गरीब और ईमानदार को कोई राजनीतिक दल उम्मीदवार भी नहीं बनाते कि वे जीतेंगे कहां से। आज परले दर्जे के दुष्ट और भ्रष्ट को भी उम्मीदवार बनाने में पार्टियों के बीच खींचतान लगी रहती है, अगर उसके चुनाव जीतने की उम्मीद हो। 
    इसलिए भारत में होने वाले चुनावों को लेकर जिन लोगों के मन में लोकतंत्र की कामयाबी का फख्र भरा हुआ है, वे अपनी खुशफहमी में बैठे रहें। इस देश में यह लोकतंत्र की कामयाबी नहीं है, महज एक चुनावी मशीन की मशीनी कामयाबी है, उससे अधिक कुछ नहीं। बाकी तो सब धर्म, जाति, पैसे, और भड़काने की ताकत की जीत है, या हार है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 31-Aug-2018
  • दुनिया की एक सबसे महान टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स ने एक बच्ची को जन्म देने के बाद अपनी मेडिकल जरूरतों के मुताबिक पूरे बदन को ढांकने वाली एक ऐसी पोशाक पहनना शुरू किया जिससे उनके बदन में रक्त संचार ठीक से हो सकता था, और खून में थक्के जमने का खतरा घटता था। काले रंग की पूरे बदन की इस पोशाक को फ्रांस में दुनिया के एक सबसे बड़े टूर्नामेंट, फ्रेंच ओपन, करवाने वाले अधिकारियों ने खेल के खिलाफ माना, और सेरेना पर यह बंदिश लगा दी कि वह ऐसी पोशाक पहनकर मैच नहीं खेल सकती। नतीजा यह हुआ कि उसे आखिरी वक्त में दूसरे किस्म की पोशाक पहननी पड़ी। और टेनिस के नियमों में मर्दानगी के राज के आलोचक इसे एक बुरा फैसला मान रहे हैं, और उनका कहना है कि पोशाक की ऐसी रोक-टोक महिलाओं पर ही लादी जाती है। दूसरी तरफ पूरी दुनिया के टेनिस में महिलाओं के ऐसे छोटे कपड़े पहनने पर कोई रोक नहीं है जिससे उनका बदन उघड़ा रहता है, और उनकी तस्वीरें आमतौर पर वैसे ही पल की छपती हैं जब उनके कपड़े उठे रहते हैं, या उड़ते रहते हैं। 
    सेरेना विलियम्स एक अश्वेत खिलाड़ी हैं, और उन्हें अपने से हारने वाली बहुत सी गोरी खिलाडिय़ों से तरह-तरह की बुरी बातें सुनने की आदत भी पड़ी हुई है। इनमें से कुछ ने उन्हें जानवरों की तरह भी कहा है, क्योंकि वे सेरेना की ताकत का मुकाबला नहीं कर पातीं। किसी खेल में दुनिया की सबसे महान खिलाड़ी बन जाने के बाद भी, मां बनने के बाद की मेडिकल-मजबूरी को अनदेखा करके जब टेनिस के ठेकेदार इस तरह का हुक्म लादते हैं, तो उससे औरत की मर्जी के खिलाफ कुछ करने की मर्द की हसरत भी दिखती है, और एक अश्वेत के लिए हिकारत भी दिखती है। यह अलग बात है कि सेरेना ने इसके खिलाफ कोई मुद्दा बनाने से मना कर दिया है, और उनके समर्थन में ट्विटर पर किसी ने फ्रेंच ओपन के आयोजकों के लिए बड़ी खूब बात लिखी है, और कहा है कि सेरेना टेनिस खिलाड़ी नहीं हैं, वे खुद टेनिस हैं। फ्रांस की एक दूसरी टेनिस खिलाड़ी को अभी अमरीका में यूएस ओपन टूर्नामेंट के दौरान आयोजकों की ओर से एक नोटिस दिया गया क्योंकि उन्होंने गर्मी और पसीने से परेशान होकर एक ब्रेक में खुले में ही अपना टी-शर्ट ठीक करने की कोशिश की थी। लेकिन इस खिलाड़ी ने भी इस नोटिस का बुरा नहीं माना, और कहा कि फ्रांसीसी अधिकारियों ने सेरेना से जो किया है, वह इससे दस हजार गुना अधिक बुरा बर्ताव है। इस फ्रेंच खिलाड़ी ने कहा कि फ्रांसीसी टेनिस अधिकारी किसी और युग में जी रहे हैं, और वे सेरेना के कपड़ों के बारे में ऐसी बेहूदी बातें कर सकते हैं। 
    आज खेलों से लेकर हॉस्टलों तक लड़के और लड़कियों के अधिकार बराबर करने को लेकर पूरी दुनिया में संघर्ष चल रहा है। फ्रांस और अमरीका से दूर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में छात्राएं हड़ताल पर हैं क्योंकि वहां हॉस्टल में छात्रों को देर रात तक बाहर रहने की छूट है, और छात्राओं को उनसे घंटों पहले पहुंचने की बंदिश है। औरत और मर्द की गैरबराबरी का यह सिलसिला सदियों पुराना है, और वह आसानी से खत्म नहीं होने वाला है। अभी दो दिन पहले ही एक जैन संत ने लड़कियों को सामान बताते हुए उन्हें ही तमाम सेक्स-हमलों के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया था। दुनिया में बराबर के हक की लड़ाई जल्द खत्म होने वाली नहीं है। खेलों में भी लड़कियों की पोशाक पर जिस तरह की पुरूषवादी सोच हावी है उसके खिलाफ जगह-जगह आवाज उठनी चाहिए। सेरेना विलियम्स ने अपने लगातार चल रहे मैचों के बीच, एक देश से दूसरे देश भागते हुए, फ्रेंच टेनिस अधिकारियों के खिलाफ कुछ कहा नहीं है, लेकिन इस फैसले ने दुनिया भर से उनके लिए हमदर्दी और समर्थन जुटा दिया है। 
    - सुनील कुमार 

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