संपादकीय

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Date : 17-Feb-2020

एक ट्रेन में भगवान बैठे, 
देश की बाकी रेलगाडिय़ों 
में भी तब्दीली की जरूरत

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र बनारस से काशी महाकाल नाम की एक मुसाफिर ट्रेन शुरू हुई है जो कि इंदौर तक जाएगी। स्थानीय सांसद होने के नाते मोदी ने इसे झंडी दिखाई, और भीतर एसी-3 के एक डिब्बे में एक बर्थ स्थाई रूप से भगवान शंकर को अलॉट करके वहां मंदिर बना दिया गया है, और ट्रेन में धार्मिक संगीत बजेगा, उसकी सजावट धर्म के हिसाब से होगी। अब यह एक नया सिलसिला सरकार ने एक फैसले के तहत लिया है जो कि मुम्बई जैसे शहर में लोकल ट्रेन में मुसाफिरों की बहुतायत पहले से बलपूर्वक लागू करते आई है। वहां लोकल में गणेशोत्सव के समय रोज के मुसाफिर एक डिब्बे में गणेश प्रतिमा बिठाते हैं, पूजा-आरती करते हैं, और ढोल-मंजीरे संग संगीत भी करते हैं। अब इस ट्रेन के साथ यह काम सरकारी स्तर पर शुरू कर दिया गया है, जिसका अंत पता नहीं कहां जाकर होगा। 

अब केन्द्र की मोदी सरकार के सबसे मजबूत भागीदार, अकाली दल के सामने यह चुनौती होगी कि अमृतसर तक जाने वाली मुसाफिर रेलगाडिय़ों में वह स्वर्ण मंदिर के तीर्थयात्रियों के हिसाब से कैसी सजावट करवाए, और कैसा संगीत बजवाए। हिन्दुस्तान में अकेले अमृतसर में शुरू से ही आकाशवाणी से स्वर्ण मंदिर की सुबह की  गुरूवाणी का जीवंत प्रसारण होते आया है। इसके बाद नीतीश कुमार भी एनडीए के एक बड़े भागीदार हैं, और बिहार में इसी बरस चुनाव भी है, ऐसे में नीतीश कुमार की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि उनके राज्य के बोधगया के हिसाब से उन्हें कुछ रेलगाडिय़ों को बुद्ध को समर्पित करवाना चाहिए, और आसपास से निकलने वाली ट्रेनों में एसी-3 नहीं, बल्कि एसी-1 में बुद्ध को बर्थ दिलवानी चाहिए, और बौद्ध संगीत भी बजना चाहिए। इसके बाद कई बार भाजपा की सरकार बनवाने वाले राजस्थान के अजमेर जाने वाली ट्रेन में वहां की दरगाह के हिसाब से साज-सज्जा होनी चाहिए, और पूरे रास्ते उसमें ख्वाजा की कव्वाली भी बजनी चाहिए। इससे कम में राजस्थान का सम्मान नहीं होगा, और प्रधानमंत्री मोदी के लोग बार-बार देश को याद दिलाते हैं कि वे केवल भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं हैं, वे पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए अब मौका है कि देश भर के लोग अपने-अपने तीर्थस्थानों के हिसाब से रेलगाडिय़ां बनवा लें। कोलकाता जाने वाली गाडिय़ों में काली मंदिर बनाए जा सकते हैं, और प्रधानमंत्री की निजी आस्था के हिसाब से बेलूर मठ की साज-सज्जा वाली कुछ गाडिय़ां भी बनाई जानी चाहिए। तिरूपति जाने वाली गाडिय़ों की साज-सज्जा कैसी होगी यह एकदम साफ है, और उस ट्रेन में खाने की जगह तिरूपति के प्रसाद के विख्यात लड्डू मिलने चाहिए। मुम्बई की कुछ गाडिय़ां हाजी अली के हिसाब से, कुछ गाडिय़ां पारसियों के अग्नि-मंदिरों के हिसाब से, कुछ गाडिय़ां सिद्धि विनायक के गणेश की साज-सज्जा की होनी चाहिए। शिरडी के सांई बाबा के हिसाब से भी पास के स्टेशन से गुजरने वाली गाड़ी बननी चाहिए, और असम में भाजपा की सरकार है, वहां की कामाख्या के हिसाब से भी गाडिय़ां सजनी चाहिए। 

फिर जब इतनी धार्मिक भावना से सब कुछ हो रहा है, तो इन ट्रेनों में जैमर लगाकर मोबाइल-इंटरनेट बंद करवाने चाहिए, क्योंकि जो ईश्वर की ट्रेन में बैठे हैं, उन्हें इधर-उधर की बात करने, नेट-सर्फिंग करने के बजाय केवल कीर्तन पर ध्यान देना चाहिए। यह भी याद रखना होगा कि जिस ट्रेन में खुद ईश्वर को बर्थ अलॉट की गई है, उसमें से शौचालयों को तो हटाना ही होगा क्योंकि ईश्वर के आसपास ऐसा रहना ठीक नहीं है। बल्कि बेहतर तो यह होगा कि जिन पटरियों से यह ट्रेन गुजरेगी, वहां पूरे रास्ते लोगों को पखाने से रोकना होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह आज गुजरात के अहमदाबाद में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की नजरों से झोपडिय़ों को रोकने के लिए ऊंची दीवार बनाई जा रही है। अभी तक तो ईश्वर मंदिर-मस्जिद या चर्च-गुरूद्वारे में रहते थे, इसलिए केवल उन जगहों को शौचालय-मुक्त कर देना काफी रहता था, लेकिन अब महाकाल काशी से इंदौर जाएंगे, और उनके गुजरते हुए पटरियों के किनारे शौच से धार्मिक भावनाएं बहुत बुरी तरह आहत होंगी। इसलिए पटरियों से पांच सौ मीटर दूर ही ऐसे गंदे काम की इजाजत देनी चाहिए जिस तरह कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईवे से पांच सौ मीटर दूर शराबखानों को इजाजत दी थी। 

भारत चूंकि एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और यहां पर सर्वधर्म समभाव की बात कही जाती है, इसलिए देश की बाकी ट्रेनों को भी उनकी मंजिलों के तीर्थस्थानों के हिसाब से ढालने की जरूरत है, क्योंकि आज देश के बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि इस देश का अब भगवान ही मालिक है। लेकिन चूंकि देश धर्मनिरपेक्ष है और भगवान शब्द केवल हिन्दुओं के हिसाब से रहता है, इसलिए बाकी धर्मों को भी बराबरी का सम्मान देते हुए इस नौबत को बदलना चाहिए, ताकि लोगों को लगे कि इस देश का अब ईश्वर ही मालिक है, ईश्वर शब्द में सभी धर्म आ जाते हैं। रेलगाडिय़ां पूरे भारत की एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है, और उसे ही सभी लोगों की भावनाओं का, खासकर धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने में जोता जा सकता है, इसलिए देश के बाकी तीर्थस्थानों के लिए भी गाडिय़ों को चलाया जाए, वर्तमान गाडिय़ों को बदला जाए, और देश में आस्था के एक नए युग को शुरू किया जाए। ईश्वर के आशीर्वाद से ही यह देश पटरी पर लौट सकता है, और लौटेगा। देश की मोबाइल कंपनियां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वैसे भी दुकानें बंद कर सकती हैं, ऐसे में लंबे-लंबे सफर में कीर्तन, कव्वाली, और दूसरे धर्मों की आराधना का बड़ा सहारा रहेगा। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Feb-2020

अखबार निचोड़ेंगे 
तो लहू टपकेगा...

आज एक हिन्दी अखबार की दो-तीन पन्नों पर छाई हुई सुर्खियां देखना भी भयानक है, उनके भीतर की जानकारी पढऩा तो और अधिक भयानक होगा ही। खबरों की हैडिंग्स हैं- शराबी पति ने इतना पीटा कि मौत, बेटे-बेटी के सामने बीवी को मौत के घाट उतारा, चरित्र पर संदेह हुआ तो मार डाला पत्नी को, बेटी करती थी मोबाइल पर ज्यादा बात, दूसरी जात में शादी के डर से बाप ने कर दी हत्या, अवैध संबंध के शक में बीवी को मार डाला (ऊपर की खबर से अलग, दूसरे शहर की खबर)। छत्तीसगढ़ में एक दिन में एक अखबार के एक संस्करण की इन खबरों से परे दूसरे इलाकों तक सीमित संस्करणों में और भी ऐसी खबरें हो सकती हैं। लेकिन इसमें एक अजीब और हैरान करने वाली बात यह है कि ये सारे जुर्म, ये तमाम हिंसा, अपने ही परिवार के लोगों के खिलाफ है। मतलब यह कि परिवार में एक की मौत, और दूसरे को जेल। ऐसे में घर पर अगर बच्चे ही बच गए, तो उनकी जिंदगी जीते जी ही खत्म सरीखी, और समाज की हिंसा को न्यौता देती हुई रह जाएगी। 

पारिवारिक हिंसा के बारे में अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह पर लिखा भी था जब एक आदमी ने अपनी बीवी की हत्या कर दी, जेल चले गया, और दो, चार, और छह बरस की तीन बेटियों को कचरा बीनने वाले रिश्तेदारों के साथ रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा। इसी अखबार में इन बच्चियों की खबर छपने के बाद ऐसे बेसहारा बच्चों के लिए चलने वाले एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के स्थानीय केन्द्र के लोग इन बच्चियों की मदद को पहुंचे, लेकिन गरीब परिवार ने उन्हें इस सुविधाजनक केन्द्र में भेजने से भी मना कर दिया। परिवार के भीतर हिंसा से नुकसान दोहरा होता है, एक या अधिक की मौत, और एक या अधिक को कैद। फिर हिन्दुस्तान में जिस तरह अदालतों का हाल है, परिवार के बचे हुए लोग उनमें तबाह हो जाते हैं। अब सवाल यह उठता है कि परिवार के भीतर होने वाली ऐसी हिंसा को पुलिस भी कैसे रोक सकती है, अगर पहले से उसके पास पारिवारिक तनाव या हिंसा की शिकायत न आई हो, और पहली बार में ही इतनी बड़ी हिंसा हो जाए, तो पुलिस के करने का कुछ नहीं रहता। 

लेकिन समाज में हिंसा पर काबू तो लगना ही चाहिए, इसलिए यह सोचने की जरूरत है कि इसे कम कैसे किया जा सकता है। सबसे पहले तो परिवार के भीतर ही दूसरे लोग इस तनातनी को घटा सकते हैं, और बीच-बचाव कर सकते हैं। अगर परिवार के भीतर ऐसी क्षमता नहीं है, तो अड़ोस-पड़ोस के लोग या साथ में काम करने वाले लोग, लोगों की हिंसक सोच को रोक सकते हैं। लेकिन जो एक बात ऐसी तमाम हिंसा के पीछे हावी दिखती है वह नशे की है। ऐसे अधिकतर मामले नशे में होते हैं, और गरीबों के बीच अपनी तमाम गरीबी के बावजूद अधिक नशा करने का चलन अधिक दिख रहा है। अब किसी की नशे की लत तो रातों-रात लगती नहीं है, इसलिए घर-परिवार, सहकर्मी और पड़ोस के लोग, लोगों को नशे से रोकने की कोशिश कर सकते हैं। इन दिनों समाज में बहुत सारे संगठन तरह-तरह से लोगों की मदद करते दिखते हैं, और ऐसे लोग भी अलग-अलग बस्तियों में जाकर, या शराब दुकानों पर जाकर लोगों को नशे के नुकसान समझा सकते हैं, हो सकता है कि कुछ लोग धीरे-धीरे समझ की तरफ लौटें। 

समाज और सरकार की यह मिलीजुली जिम्मेदारी रहनी चाहिए कि परिवार के भीतर नौबत हिंसा तक पहुंचने, या नशे की लत खतरनाक हद तक पहुंचने के खिलाफ परामर्श की सहूलियत उपलब्ध कराई जाए। आज तो देश में मनोचिकित्सक, परामर्शदाता इतने कम हैं कि वे अपने चैंबरों में मोटी फीस देने वाले लोगों को भी मुश्किल से नसीब हैं। विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे सामाजिक-पारिवारिक, या वैवाहिक परामर्श के कुछ छोटे कोर्स भी चलाए जिन्हें पूरा करने वाले लोग चाहे उससे कमा-खा न सकें, आसपास कुछ लोगों की मदद तो कर सकें। एक बात यह भी लगती है कि आज हिन्दुस्तान की हवा में जितने किस्म की हिंसा फैलाई जा रही है, फिर चाहे वह किसी धर्म या जाति के लोगों के खिलाफ क्यों न हों, उस हिंसक सोच का असर लोगों की दिमागी हालत पर होता है, और जब मारने को दूसरे धर्म के लोग न मिलें, तो हो सकता है कि लोग घर पर भी अपनी हिंसक सोच को पूरा करते हों। सजा पाने लायक हिंसा करने वाले लोगों के दिल-दिमाग पर सजा का खतरा कम दिखता है, और उनकी हिंसक भावना अधिक हावी दिखती है। आज समाज के जिम्मेदार लोगों को आसपास के ऐसे पारिवारिक तनाव में दखल देकर बीच-बचाव की कोशिश करनी चाहिए। आज की यह बात बहुत विचारोत्तेजक नहीं है, लेकिन यह गंभीर बात करना बहुत जरूरी है क्योंकि इसके बारे में अखबारी सुर्खियों से परे सोचना शुरू हो, कुछ करना शुरू हो। 
-सुनील कुमार


Date : 15-Feb-2020

अपने ही पौराणिक इतिहास को 
नकारता आज का हिन्दुस्तान...

हिन्दुस्तान की 21वीं सदी 18वीं सदी से भी अधिक पाखंड से भरी हुई है। देश के पौराणिक इतिहास को देखें तो सदियां शुरू होने के पहले की कहानियां बताती हैं कि किस तरह कृष्ण और राधा का प्रेम था जो कि विवाह से परे का था, किस तरह कृष्ण गोपियों के साथ श्रंगार रस में डूबी रासलीलाएं करते थे, और किस तरह हर पौराणिक काल में प्रेम की कहानियां भरी हुई थीं। आज झंडा-डंडा गिरोह प्रेम के पर्व, वेलेंटाइन डे पर जिस तरह हिंसा करते घूमता है, वही गिरोह इस देश में स्टेशनों के नाम संस्कृत में लिखने की मांग करता है, उर्दू में लिखे गए नाम हटाने की मांग करता है, और इस बात को अनदेखा करता है कि हिन्दुस्तान का संस्कृत-साहित्य किस तरह प्रेम और देह के श्रंगार रस से भरा हुआ रहा है। 

प्रेम की देसी कहानियों से भरे हुए इस देश में आज प्रेम किसी कुंवारी लड़की की अवैध कही जाने वाली, और अवांछित समझी जाने वाली संतान की तरह का अनचाहा काम हो गया है। आज नफरत का बोलबाला है, और प्रेम को देशनिकाला है। ऐसे देश में महाराष्ट्र के अमरावती जिले में कल प्रेमपर्व वेलेंटाइन-डे पर एक कॉलेज में छात्राओं को इक_ा करके उनको सार्वजनिक रूप से यह शपथ दिलवाई कि वे कभी प्रेम नहीं करेंगी, और प्रेम-विवाह भी नहीं करेंगी, वे माता-पिता की मर्जी से ही शादी करेंगी। कॉलेज का यह फैसला और उसकी हरकत देश के आज के माहौल में बड़ी तारीफ की हकदार है क्योंकि यह माहौल कट्टरता और नफरत से भरा हुआ है, और इसमें प्रेम की कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं गई है। यह एक अलग बात है कि केन्द्र सरकार के बनाए हुए कानून देश में सवर्णों के दलित-आदिवासियों से शादी पर लाखों का नगद पुरस्कार देते हैं, और समाज यह सोचता है कि ऐसी शादियां बिना प्रेम के ही हो जाएंगी। यह पूरा पाखंड सिर्फ धिक्कार के लायक है, और नौजवान पीढ़ी में ऐसी अवैज्ञानिक सोच भरने वालों के खिलाफ देश-प्रदेश के मानवाधिकार आयोगों को, महिला आयोगों को कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे कॉलेजों की मान्यता खत्म करनी चाहिए।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसा दुराग्रह महज हिन्दुस्तान में हो। इस देश के लोगों की नजरों में जो असली पश्चिम है, उस अमरीका में भी ऐसा देखने मिलता है, और वहां ईसाई बिरादरी के बड़े-बड़े जलसे किए जाते हैं जिनमें किशोरियां अपने माता-पिता की मौजूदगी में ऐसी कसमें खाती हैं कि शादी के पहले तक वे अपना कौमार्य बनाए रखेंगी, और उनके पिता उनकी हिफाजत करेंगे, वे अपने पिता के प्रति जवाबदेह रहेंगी। यह सोच खुद अमरीका के भीतर एक बहुत ही छोटे तबके की सोच है, और वहां के आज के सामाजिक वातावरण के भीतर इसे एक बीमार सोच भी माना जाता है, लेकिन यह सोच वहां है तो सही।  यह सोच किसी लड़के को ऐसी कसम नहीं दिलाती, न अमरावती में, न अमरीका में। कौमार्य का सारे का सारा बोझ महज लड़कियों पर है, और लड़के तो मानो अंगूठी में लगे हुए हीरे की तरह हैं जिनका कि कुछ नहीं बिगड़ सकता। हिन्दुस्तानी समाज की यही सोच बलात्कार की शिकार लड़की के बारे में लिखती है कि उसकी इज्जत लुट गई। समाज यह नहीं कहता कि जुर्म करने वाले बलात्कारी की इज्जत लुटी है जो कि सजा पाएगा, जेल जाएगा, और अपने परिवार को मुसीबत में छोड़ जाएगा, एक बेकसूर लड़की या महिला के साथ ऐसी हिंसा कर चुका है। बलात्कारी की इज्जत नहीं लुटती, बलात्कार की शिकार लड़की की इज्जत लुटना कहा जाता है! ऐसी ही मर्दाना सोच लड़कियों को प्रेम करने से रोक रही है, प्रेम विवाह करने से रोक रही है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले अपने आपको बापू कहने वाला आसाराम छत्तीसगढ़ आया था, और उस वक्त वह बड़ा इज्जतदार माना जाता था। उस वक्त उसने रमन सिंह की भाजपा सरकार पर असर डालकर वेलेंटाइन-डे को मातृ-पितृ दिवस में बदलवा दिया था, और सरकारी स्कूल-कॉलेज में भी यह नया त्यौहार मनाया जाने लगा था। यह एक अलग बात है कि बाद में यही बलात्कारी बापू अपने एक भक्त परिवार की नाबालिग लड़की से बलात्कार के बाद कैद भुगत रहा है, और वैसा ही जुर्म उसके बलात्कारी बेटे ने भी किया, और जेल गया। नौजवान पीढ़ी की प्राकृतिक भावनात्मक और देह की जरूरतों को कुचलकर इस किस्म की एक पाखंडी नैतिकता को थोपकर लोगों को लगता है कि वे हिन्दुस्तान का भला कर रहे हैं। वे दरअसल सड़कों पर हिंसा बढ़ा रहे हैं, नौजवान पीढ़ी को अपनी मर्जी की जिंदगी जीने से रोक रहे हैं। ऐसे बीमार दिमागवाले कॉलेज संचालकों के खिलाफ अदालतों में केस चलना चाहिए कि उन्होंने संविधान के किस प्रावधान के तहत ऐसी शपथ दिलवाई है। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Feb-2020

दिल्ली-स्कूलों के ब्लैकबोर्ड और
गांधी, नेहरू, पटेल नाम के डस्टर

हिन्दुस्तान इन दिनों बड़ी दिलचस्प बहसों से गुजर रहा है। गांधी ने भगत सिंह को फांसी से बचाने के लिए कोशिशें नहीं की थीं, क्या किया था, क्या नहीं किया था। एक और बहस चल रही है कि  नेहरू सरदार पटेल को अपने मंत्रिमंडल में लेना नहीं चाहते थे। केन्द्र की मोदी सरकार के विदेश मंत्री, और सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार पिछले दो दिनों में इन बहसों को आगे बढ़ाते दिखे हैं, और इतिहास के दूसरे बेहतर जानकार लोग ऐसे निष्कर्षों को खारिज करते हुए इन्हें बदनीयत का बता रहे हैं, और इतिहास की बेहतर किताबों को पढऩे की सलाह दे रहे हैं। लेकिन मीडिया का कुछ समय, और पन्नों पर कुछ जगह तो इन पर खर्च हो ही रही है, और मोदी सरकार-भाजपा को इससे एक फायदा यह हो रहा है कि दिल्ली के चुनावी नतीजों का सदमा भूलने में मदद मिल रही है, और चर्चा केजरीवाली-कामयाबी से हटकर गांधी और नेहरू की नाकामयाबी या बदनीयत पर आकर टिक गई है। 

आज हिन्दुस्तान में जलते-सुलगते इतने मुद्दे हैं कि वे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। और तो और भाजपा के एक सबसे पुराने सहयोगी, अकाली दल के मुखिया ने कल ही मोदी-सरकार को धर्मनिरपेक्षता की याद दिलाई है, और सभी अल्पसंख्यकों को साथ रखने की नसीहत दी है। देश में बेरोजगारी, गरीबी से लोगों का बहुत बुरा हाल है। देश के बड़े-बड़े तबके अपने को खानपान के मुद्दे पर, नागरिकता के मुद्दे पर, धर्म और जाति के मुद्दे पर खतरे में पा रहे हैं, और हिन्दुस्तान के इतिहास में यह पहला मौका है कि जनगणना के आंकड़े जुटाने जा रहे लोगों में से कुछ पर कहीं-कहीं हमले भी हुए हैं। पिछले दो बरस में जितने राज्यों में चुनाव हुए हैं, उनमें से सात राज्यों में भाजपा हार चुकी है, और दिल्ली की इतनी बड़ी हार उसके सामने है जिसके बारे में कल गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि गोली मारो सालों को जैसे नफरती नारों से भाजपा को नुकसान हुआ दिखता है। लेकिन जगह-जगह भाजपा के नेताओं के तेवर उसी किस्म के दिख रहे हैं, और योगीराज में उत्तरप्रदेश के एक सरकारी डॉक्टर, डॉ. कफील की रिहाई के ठीक पहले उन पर एनएसए लगा दिया गया है। उधर कश्मीर में दो-दो भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों की रिहाई के ठीक पहले उन पर जनसुरक्षा कानून लगाने के लिए बहुत ही फूहड़ किस्म के आरोप लगाए गए हैं, बहुत ही अलोकतांत्रिक किस्म से अधकचरी-कानूनी कार्रवाई की गई है। 

ऐसे माहौल में जब देश में आज के असल मुद्दे हर मोड़ पर पोस्टर लेकर खड़े हैं, तब गांधी और नेहरू को लेकर बहस छेड़कर उन पर तोहमतें लगाना मोदी सरकार को किसी किनारे नहीं पहुंचा रहा है। हिन्दुस्तान की जनता अच्छी तरह जानती है कि गांधी का अल्पसंख्यकों की हिफाजत के बारे में क्या सोचना था, सरदार पटेल का आरएसएस के बारे में क्या सोचना था, और नेहरू और पटेल इतने बड़े नेता थे कि उनकी सोच में कई जगह मतभेद होना बहुत जायज और जरूरी था, लेकिन दोनों के बीच परस्पर सम्मान इतना था कि तीन हजार करोड़ की प्रतिमा बनाकर भी उतना सम्मान नहीं दिखाया जा सकता। जब दो नेता आजादी के लिए लडऩे वाले, जेल जाने वाले, कुर्बानी देने वाले, और महान सोच वाले होते हैं, तो उनके बीच मतभेद तो होगा ही, मतभेद कभी औसत दर्जे के, चापलूस-पसंद नेताओं के बीच तो हो भी नहीं सकता। लेकिन आज हिन्दुस्तान के तमाम मोर्चों पर गांधी, नेहरू, और पटेल की सोच के ठीक खिलाफ काम करते हुए बात-बात पर संदर्भों से परे उनका हवाला देना, उनको स्वर्ग में आपस में लड़वाना, एक बहुत ही नाजायज हरकत है, और देश की अधिक आबादी इस झांसे में नहीं आएगी। दिल्ली चुनाव के नतीजों को खबरों से और नजरों से दूर कर देना भाजपा के लिए एक मजबूरी हो सकती है, लेकिन दिल्ली की स्कूलों के ब्लैकबोर्ड पर इतने बड़े-बड़े अक्षरों से लिखे गए जनमत को मिटा देने के लिए गांधी, नेहरू, सरदार को डस्टर की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। 

आज देश में एक तबका हफ्ते दस दिन तक बिना खाए-पिए महज नफरत पर जिंदा रह सकता है। ऐसा तबका ऐसे काल्पनिक इतिहास के ऐसे टकराव को सोशल मीडिया पर बढ़ावा देने का काम करे, वह तो समझ आता है, लेकिन जेएनयू में पढ़े हुए मोदी सरकार के विदेश मंत्री जयशंकर भी इतिहास को लेकर पसंदीदा कल्पनाएं लिखने में लग जाएं, यह बात बड़ी शर्मिंदगी की है। हो सकता है कि मीडिया में कुछ घंटे, और कुछ पन्ने ऐसी कहानियों से रंग दिए जाएं, लेकिन बीते कल के नाम पर गढ़ी गईं ये कहानियां आज की हकीकत को हाशिए पर धकेलने में कोई मदद नहीं कर पाएंगी।
-सुनील कुमार


Date : 13-Feb-2020

राजनीति से मुजरिमों को बाहर 
करने के सुप्रीम कोर्ट के 
फैसले से कोई उम्मीद नहीं

राजनीति के अपराधीकरण पर दायर की गई जनहित याचिकाओं का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने आज एक फैसला दिया है कि राजनीतिक दल जुर्म के इतिहास वाले उम्मीदवारों को चुनने के दो दिन के भीतर उनके बारे में आयोग को जानकारी दें, पार्टी की वेबसाईट पर इनके जुर्म की जानकारी डालें, और अखबारों में उस जानकारी को प्रकाशित भी करें। साथ ही यह भी आदेश जारी किया कि क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों को वो टिकट क्यों दे रहे हैं, इसकी वजह बतानी होगी और जानकारी वेबसाइट पर देनी होगी।

फैसले के कुछ घंटे बाद तक प्रमुख समाचार वेबसाईटों पर जो जानकारी आई है वह जानकारी चुनाव आयोग की आज की व्यवस्था से बहुत अलग नहीं लग रही है। आज भी उम्मीदवारों को खुद ही नामांकन के समय अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी हलफनामे के साथ लिखकर देनी होती है, और ऐसी जानकारी विज्ञापन के रूप में अखबारों में छपवानी भी पड़ती है। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश में महज एक बात अब तक नई दिखी है कि पार्टी ऐसे लोगों को टिकट क्यों दे रही है उसकी जानकारी उसे देनी होगी। यह बात बहुत अमूर्त और अस्पष्ट है। जिस तरह सार्वजनिक जीवन में हर डकैत को संत बनने का एक मौका देने की बात रहती है, तो राजनीतिक दल कह सकते हैं कि उनका जुर्मों से जुड़ा रहा नेता अब प्रायश्चित करके समाजसेवा करना चाहता है। इस रेडीमेड जवाब में कुछ झूठ भी नहीं रहेगा, और इससे राजनीति के आपराधीकरण में कोई कमी भी नहीं आएगी। राजनीतिक दल या उम्मीदवार तिकड़मों और तरकीबों से लबालब रहते हैं, और ऐसा मसीहाई-फैसला उनकी सेहत पर, उनकी मोटी चमड़ी पर, उनकी बेशर्मी पर कोई फर्क नहीं डालने वाला है। 

सुप्रीम कोर्ट की नीयत अच्छी हो सकती है, लेकिन महज अच्छी नीयत से दिया गया फैसला अमल के लायक भी हो, यह जरूरी भी नहीं है। यह फैसला वैसा स्पीकिंग-आदेश नहीं है जिस पर अमल करवाना चुनाव आयोग या अफसरों के लिए मुमकिन हो। राजनीतिक दलों को वजह ईजाद करने से कौन रोक सकता है, और कम से कम यह आदेश तो बिल्कुल ही नहीं रोक सकता। आज का यह आदेश आने के पहले तक तो फिर भी लोगों को शायद यह लग रहा होगा कि चुनाव से, संसद और विधानसभाओं से, मुजरिमों को बाहर रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट कोई अच्छा दमदार फैसला देगा, लेकिन इस फैसले के आने के बाद वह उम्मीद भी खत्म हो गई है। जिस तरह चुनाव आयोग अपने आपको बिना दांत और नाखून का ढकोसला साबित करते रहता है, कुछ वैसा ही सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भी है जिसमें मौजूदा नियमों से परे बस एक बात नई है कि राजनीतिक दलों को अपने चहेते जुर्म-इतिहासी लोगों को टिकट देने की वजह बतानी होगी। अब यह वजह तर्कसंगत और न्यायसंगत है या नहीं, इसका फैसला हर मामले में एक नया केस बनाकर सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग बाद में पता नहीं किस तरह तय करेंगे। कुल मिलाकर यह फैसला हासिल आया शून्य किस्म का है जिससे रही-सही उम्मीदें और खत्म हो गई हैं। 

लेकिन हम जुर्म के इतिहास वाले लोगों को कानून बनाकर रोकने को भी बहुत व्यवहारिक और लोकतांत्रिक विकल्प नहीं मानते हैं। ऐसे में किसी भी नेता की चुनावी जिंदगी खत्म करने के लिए उसके खिलाफ दस किस्म के झूठे मामले खड़े किए जा सकते हैं, और संसद से, विधानसभाओं से भले लोगों को भी बाहर रखा जा सकता है। यह समझने की जरूरत है कि देश का कोई भी कानून, अदालत का कोई भी फैसला कागजों पर अच्छा हो सकता है, लेकिन साथ-साथ यह भी हो सकता है कि उस पर अमल मुमकिन न हो। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि अगर चुनाव आयोग के औने-पौने, जैसे भी हों, नियमों को अलग रख दिया जाए, सुप्रीम कोर्ट में न लड़ा जाए, तो भी राजनीतिक दलों से नौबत को सुधारने की उम्मीद बिल्कुल ही फिजूल होगी। भारतीय लोकतंत्र आज महज हार-हार की एक नौबत को झेल रहा है जिसमें राजनीतिक दलों की नैतिकता गटर की गहराईयों को चीरते हुए किसी ट्यूबवेल की तरह पाताल तक चली गई है, और उनसे किसी अच्छे काम की उम्मीद नहीं की जा सकती। चुनाव आयोग अपनी दूसरी दर्जनों खामियों और कमजोरियों, बेबसी और पक्षपात के अलावा भी इस कदर बेअसर है कि वह बिना दिमाग और ईमान के महज एक मशीन की तरह काम कर पा रहा है, उससे अधिक कुछ नहीं। भारतीय चुनावों से, संसद और लोकसभा से मुजरिमों को बाहर रखना तो अधिकतर राजनीतिक दलों की सोच में भी नहीं है क्योंकि कई पार्टियों के मंच से, माईक से बलात्कार में गिरफ्तार लोगों के स्वागत होते हैं, और बड़े-बड़े केन्द्रीय मंत्री उन्हें मालाएं पहनाते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह निराश करने वाला है, और इस फैसले के बाद जरा से भी सुधार की कोई उम्मीद नहीं है। 
-सुनील कुमार


Date : 12-Feb-2020

शानदार केजरीवाल,
लेकिन यह कोई
राष्ट्रीय विकल्प नहीं...

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस बार मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का मुकाबला छठवें बरस के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और भाजपा के इतिहास के सबसे ताकतवर नेता अमित शाह से था। मैदान में कहीं भी कांग्रेस पार्टी नहीं थी, और न ही भाजपा थी। एक तरफ केजरीवाल और उनके मुद्दे, और दूसरी तरफ मोदी-शाह, और उनके मुद्दे। नतीजा लोगों के सामने है और सिर चढ़कर बोलता हुआ सा नतीजा है। अब यह कैसे हुआ, क्यों हुआ, जितने मुंह उतनी बातें। पर यह समझना भी जरूरी है कि शानदार स्कूल, शानदार इलाज, बेहतर सरकार, मुफ्त और रियायती बिजली-पानी को भयानक आक्रामक राष्ट्रवाद, धार्मिक ध्रुवीकरण, देश से गद्दारी की तोहमतें, नफरत, और मोदी को एक बार और जिताने के नारे मिलकर भी क्यों नहीं हरा पाए?

यह समझना आसान भी है और मुश्किल भी। केजरीवाल ने भाजपा के तमाम धारदार हथियारों का सामना करने से भी इंकार कर दिया था। वे दिल्ली में रहते हुए भी न जेएनयू के साथ थे, न जामिया के साथ थे, न शाहीन बाग के साथ थे। जब देश भर के भाजपा विरोधी दिल्ली पहुंचकर इन मुद्दों का साथ दे रहे थे, तब केजरीवाल इनसे परे बैठे हुए थे। नतीजा यह हुआ कि अरबन नक्सल, आतंकवादी, देश के गद्दार, बिरयानी परोसने वाले, जैसे कोई भी लेबल उन पर चिपक नहीं पाए। देश की सामाजिक बेचैनी से करवट बदल रहे माहौल से केजरीवाल अछूते रहे और वे दिल्ली के महज म्युनिसिपल कमिश्नर की तरह काम करते रहे, ईमानदार, काबिल, मेहनतकश, और कल्पनाशील म्युनिसिपल कमिश्नर की तरह। इसलिए यह एक राजनीतिक पार्टी की दूसरी राजनीतिक पार्टी पर जीत नहीं रही, यह जनकल्याणकारी सुशासन की नफरत पर जीत रही। इस जीत में आसान बात यह रही कि केन्द्र सरकार की अगुवाई में भाजपा ने नफरत के अपने निशाने एक-एक करके इतने बढ़ा लिए थे, कि वोटरों के बड़े तबके उसके खिलाफ गए। अब इस बारे में इतना अधिक लिखा जा चुका है कि जीत-हार के बाकी पहलुओं के बारे में भी सोच लिया जाना चाहिए।

केजरीवाल सरकार ने मेहनत करके जिस तरह दिल्ली की सरकारी स्कूलों को देश में सबसे अच्छा बनाया, जिस तरह उन्होंने केन्द्रीय बोर्ड के इम्तिहानों में इन स्कूलों को सबसे काबिल साबित किया, जिस तरह इस सरकार ने मुफ्त और रियायती, सस्ते बिजली-पानी का इंतजाम किया, प्रदूषण से लड़ाई लड़ी, उसे भी दिल्ली के लोगों ने देखा। इसके बाद केजरीवाल का आखिरी मास्टरस्ट्रोक था पब्लिक ट्रांसपोर्ट में महिलाओं के लिए मुफ्त सफर। दिल्ली की आधी वोटरों में से शायद नब्बे फीसदी की जिंदगी में इससे बड़ी राहत मिली। उन महिलाओं को भी जो शाहीनबाग में धरने पर बैठी हैं, और उन महिलाओं को भी जो बजरंग बली के मंदिर जाने के लिए मेट्रो का सफर करती हैं। ऐसा लगता है कि दिल्ली मेट्रो के किनारे खड़े बजरंग बली की आसमान छूती प्रतिमा को भी मेट्रो में मुफ्त चलती महिलाओं की राहत दिखी होगी और उन्होंने केजरीवाल को आशीर्वाद दिया। 

दूसरे राजनीतिक विश्लेषकों की जरूरी कुछ बातें भी गौर करनी चाहिए। केजरीवाल ने सीधे मोदी पर हमला नहीं किया और इस तरह मोदी प्रशंसकों की नाराजगी से बचे। दिल्ली में लोगों ने केजरीवाल को शहर चलाने फिर चुना है, लेकिन आज ही लोकसभा चुनाव हो जाए तो लोग फिर मोदी को चुनेंगे। कांग्रेस ने सोच-समझकर वोटों की कोशिश नहीं की, और भाजपा को हराने का पूरा मौका अकेले केजरीवाल को दिया। ऐसी कई बातें राजनीतिक विश्लेषकों ने लिखी है जिन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए। यह बात तो तकरीबन सभी ने लिखी है कि दिल्ली में विकास जीत गया और नफरत हार गई?

लेकिन आगे क्या? यह समझने की जरूरत है कि दिल्ली एक सीमित राज्य है, पूर्ण राज्य नहीं। और केजरीवाल पर न जमीन का जिम्मा है, न पुलिस का जिम्मा है, न अधिकार। ऐसे में देश के जलते-सुलगते मुद्दों से परे रहकर वे सिर्फ शहरी सरकार के सफल प्रशासक रहे हैं, और यह प्रयोग, इसकी कामयाबी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली के साथ ही खत्म हो जाते हैं। केजरीवाल-प्रयोग की दिल्ली से बाहर आज कोई संभावना नहीं दिखती। जो लोग केजरीवाल की शक्ल में देश में एक वैकल्पिक राजनीति देख रहे हैं, वे लोग कांच के मछलीघर में एक मछली की सफलता का समंदर तक विस्तार देख रहे हैं। केजरीवाल अगले संसदीय चुनाव में किसी मोदी-विरोधी गठबंधन का एक हिस्सा हो सकते हैं क्योंकि दिल्ली में सात लोकसभा सीटें हैं, आसपास के कुछ राज्यों में उनके कुछ वोट है, वे देश का एक सबसे चर्चित चेहरा हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय स्तर पर एक वैकल्पिक राजनीति नहीं दे रहे क्योंकि वे एक पूरी सरकार नहीं चला रहे थे। यह जरूर है कि केजरीवाल ने सरकार के जरूरी मुद्दों में ईमानदारी, जनकल्याण, विकास, कल्पनाशीलता, जवाबदेही को अनिवार्य साबित किया है जिन्हें नई सरकारें अवांछित बातें मानती हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि योगी आदित्यनाथ दिल्ली से कुछ सीखकर गए होंगे। बाकी फिर...।
-सुनील कुमार


Date : 11-Feb-2020

कारों को सड़क चाहिए
तो बस-मेट्रो को सस्ता
करने के लिए टैक्स दें

देश की सबसे बड़ी पर्यावरण संस्था सेंटर फॉर साईंस एंड एनवायरमेंट, सीएसई, के एक कार्यक्रम में अभी एक विशेषज्ञ ने आंकड़ों और तथ्यों के साथ यह पेश किया कि आने वाले बरसों में हिंदुस्तान में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल घटने वाला है और अधिक से अधिक लोग निजी गाडिय़ों से चलेंगे। अब इसके लिए शहरों में सड़कें कहां से आएंगी? लेकिन इसके पीछे की वजह अधिक फिक्र की है। देश के महानगरों में मजदूर तबके के लोगों की कमाई का पन्द्रह फीसदी तक हिस्सा पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर खर्च हो जाता है। दिल्ली के एक अध्ययन का नतीजा यह है कि कम दूरी पर जाने वाले बहुत से मजदूरों और दूसरे लोगों को बस-मेट्रो के मुकाबले निजी वाहन सस्ते पड़ते हैं। यह दिल्ली आज सड़कों पर थमी हुई गाडिय़ों से भरी दिखती है, कब, कहां पता नहीं कितना जाम लग जाए? 

लेकिन महंगी टिकटों के साथ भी शहरों के पब्लिक ट्रांसपोर्ट फायदे में नहीं चलते। तो आखिर रास्ता क्या निकले? एक रास्ता यह सुझाया गया है कि सड़कों पर कारों को जगह लगती है, इसलिए कार वालों पर टैक्स लगातार निजी गाडिय़ों को बढऩे से रोका जाए और इस टैक्स से बस-मेट्रो को शुरू किया जाए। अधिक लोग बसों से चलेंगे तो कार वालों को सड़क पर जाम कम मिलेगा। यह राय तर्कसंगत है लेकिन इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों में एक हौसले की जरूरत पड़ेगी। कार वालों पर और टैक्स कैसे लगाया जाए? बस-मेट्रो को और घाटे में कैसे चलाया जाए? जहां मंत्रियों और अफसरों की समझ सालाना बजट को पार नहीं कर पाती वह शहर की पांच-दस बरस की कैसे सोच पाएगी? फिर यह भी है कि औसत राज्य सरकारों में पांच बरस के अपने कार्यकाल के बाद का कहां से सोचेंगी? शहरी विकास और पर्यावरण के दूर के फैसलों पर आज पूंजी निवेश क्यों किया जाए?

कुल मिलाकर तस्वीर भयानक है, हिंदुस्तान के सभी शहरों में बस-ट्रेन बहुत से लोगों को निजी गाडिय़ों से महंगे पड़ रहे हैं। अधिकतर शहरों में बस-मेट्रो का ढांचा अधूरा है और लोगों को आखिरी मील सफर का कोई दूसरी तरीका निकालना ही पड़ता है। ऐसे में भी लोग निजी दुपहियों, निजी चौपहियों पर निर्भर होने को मजबूर होते हैं। आज तो अधिकतर शहर बहुमंजिला पार्किंग बना-बनाकर अधिक से अधिक कारों की संभावना बढ़ाते चल रहे हैं। यह संभावना नहीं आशंका है। शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट के विशेषज्ञों का मानना है कि पार्किंग की फीस इतनी बढ़ानी चाहिए कि लोग निजी गाड़ी के बजाय बस-मेट्रो पर निर्भर करें। लेकिन ऐसा फैसला भी वोट-केन्द्रित सरकारों को अलोकप्रिय लगेंगे और उनका हौसला नहीं होगा। 

हिंदुस्तान जैसे देश के मौजूदा अव्यवस्थित शहरों के लिए शहरी विकास और विस्तार की नई सोच आसान नहीं है लेकिन रियायती पब्लिक ट्रांसपोर्ट किसी भी शहर के लिए दस-बीस बरस बाद के हिसाब से एक समझदारी का पूंजी निवेश होगा। अमीरों की गाडिय़ों के खाली सड़कें मिलेंगी, उनका वक्त और पेट्रोल बचेगा, और गरीबों को दूर तक जाकर भी मजदूरी, काम करने का मौका मिलेगा। इस चर्चा के बीच दिल्ली की केजरीवाल सरकार के इस फैसले को अनदेखा नहीं करना चाहिए जिसमें उसने महिलाओं के लिए सारा सफर मुफ्त कर दिया है। इससे भी निजी गाडिय़ां कम होंगी और साथ-साथ महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी, बढ़ चुकी है। बाकी प्रदेशों को भी शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट बहुत अधिक सस्ता करना ही चाहिए, सुलभ भी। 
-सुनील कुमार


Date : 10-Feb-2020

जनता पर असर रखना
जनसुरक्षा पर खतरा?!

कश्मीर में दो भूतपूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की छह महीने की हिरासत खत्म होने के कुछ घंटे पहले इन दोनों पर जनसुरक्षा कानून लगाकर उन्हें अगले छह महीने बंद रखने का इंतजाम कर दिया गया। इस बारे में सरकारी कागजात के हवाले से कहा गया है कि उमर अब्दुल्ला का राज्य की जनता पर बड़ा असर है और वे अलगाववादियों द्वारा दिए गए चुनाव-बहिष्कार के फतवों के बीच भी वोटरों को मतदान केन्द्र तक लाने में कामयाब रहे। दूसरी तरफ महबूबा मुफ्ती को अलगाववादियों का समर्थक लिखा गया है। जिस कश्मीर में अपनी फौलादी पकड़ के बीच केन्द्र सरकार हालात सामान्य होने के दावे करती आ रही है, उस कश्मीर में कल की यह कार्रवाई सरकारी दावे को कमजोर या खोखला साबित करती है। उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारूक अब्दुल्ला, दोनों भूतपूर्व मुख्यमंत्री, एक वक्त भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के साथ रह चुके हैं। 

दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती दोनों ही एनडीए के साथ रह चुके हैं। अभी राष्ट्रपति शासन के पहले तक भाजपा महबूबा के साथ राज्य की गठबंधन सरकार में थी। अब भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के राष्ट्रपति शासन को महबूबा की पार्टी का झंडा हरा होना भी उनके खिलाफ कार्रवाई की एक वजह बताई गई है। इस पर महबूबा की बेटी ने लिखा है कि 2014 में गठबंधन सरकार बनाते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महबूबा की तारीफ की थी। और हरा झंडा तो उस वक्त भी था। उन्होंने यह भी सवाल किया है कि एनडीए की भागीदार नीतीश कुमार की जेडीयू का झंडा भी हरा है। भारतीय फौज की पार्टी भी हरी है। 

कश्मीर प्रशासन की कार्रवाई बदनीयत भी है, अधकचरी भी है और सबसे ऊपर वह बुरी तरह अलोकतांत्रिक भी है। जम्मू-कश्मीर के इस तरह टुकड़े कर दिए गए कि उसमें स्थानीय जनता की कोई राय ही नहीं ली गई, और उसके निर्वाचित नेताओं को ऐसे खोखले और मजाकिया आरोपों पर लगातार हिरासत में रखकर कश्मीर के सामान्य होने का दावा किया जा रहा है। एक निलंबित और स्थगित लोकतंत्र लोकतंत्र नहीं होता। केन्द्र सरकार कश्मीर में जनप्रतिक्रिया, जनभावना को कानून की ताकत से अंतहीन दबाते चल रही है, और इसी के लिए राज्य के लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाले नेताओं को अंतहीन हिरासत में रखा जा रहा है। सरकारी कार्रवाई के लिए दिए गए तर्क और उसकी भाषा लोकतंत्र की भावना को खारिज करने वाले हैं। किसी नेता की लोकप्रियता को जनसुरक्षा के लिए खतरा कहा जा सकता है? कश्मीर प्रशासन के पास केस तैयार करने के लिए पूरे छह महीने थे लेकिन उसने एक अलोकतांत्रिक और मखौल सरीखा दस्तावेज तैयार किया है। आने वाले दिन अदालत में इस पर बहस के होंगे।
-सुनील कुमार


Date : 09-Feb-2020

केजरीवाल की वापिसी के
आसार और कुछ बातें...

दिल्ली विधानसभा चुनाव के वोट गिर जाने के बाद किए गए एक्जिट पोल के नतीजे बहुत चौंका तो नहीं रहे हैं लेकिन हर किसी के लिए यह सोचने को मजबूर करने वाले जरूर हैं, अगर ये सही उतरते हैं। आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सत्ता पर वापिसी के आसार या गारंटी, सभी सर्वे एजेंसियों ने बताए हैं। अगर किसी टीवी चैनल या सर्वे एजेंसी का पूर्वाग्रह उसके एक्जिट पोल पर हावी भी होगा, तो भी घोर साम्प्रदायिक और मोदीभक्त हिंदी और अंग्रेजी चैनल भी भाजपा की शिकस्त और आम आदमी पार्टी की वापिसी बता रहे हैं। ऐसे में इन एक्जिट पोल नतीजों के सामने रहते हुए क्या आज किसी और मुद्दे पर लिखा जा सकता है?

दिल्ली विधानसभा के ये चुनाव केजरीवाल सरकार के कामयाब पांच बरसों की समाप्ति पर और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बरस में हो रहे हैं। मोदी देश भर में कामयाब रहे हैं, लेकिन केजरीवाल पिछले विधानसभा चुनाव में मोदी से अधिक कामयाब थे। उन्होंने दिल्ली से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था और भाजपा को हाशिए पर धकेल दिया था। इस बार केजरीवाल दिल्ली की जनता को अपनी दी गई नेमतों को लेकर सामने थे। सस्ती बिजली सस्ता पानी, बहुत अच्छे स्कूल अस्पताल, महिलाओं को मुफ्त सफर जैसी नेमतें। इसके अलावा केजरीवाल जमीन से जुड़े जनसेवक भी रहे।

दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी, अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने दिल्ली का चुनाव प्रधानमंत्री के चेहरे पर लडऩा शुरू किया, और फिर जैसे-जैसे मतदान करीब आया भाजपा केजरीवाल को अरबन नक्सली, आतंकवादी, पाकिस्तान से समर्थन प्राप्त, शाहीनबागी साबित करने में लग गई। केजरीवाल को गद्दार साबित करने के लिए भाजपा उन्हें शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को बिरयानी खिलाने वाला भी साबित करती रही। इन दोनों पार्टियों के बीच कांग्रेस के नेता संसदसे सड़क तक ऐसी प्रसंगहीन, बेतुकी, नाजायज, और अवांछित बातें करते रहे जिनसे मोदी के हाथ मजबूत होते गए और दिल्ली में धार्मिक ध्रुवीकरण शायद दिल्ली के इतिहास में सबसे अधिक हुआ।

लेकिन केजरीवाल की वापिसी महज इतने से नहीं हुई। दिल्ली देश भर से आकर पढऩे वाले छात्र-छात्राओं का महानगर भी है। इनको अमित शाह की मातहत दिल्ली पुलिस ने मवालियों के अंदाज में मारा, पीटा, पिटवाया और जेल में भी डाला। इनमें से दसियों हजार नौजवानों के परिवार भी दिल्ली के वोटर हैं। हमारा पुख्ता मानना है कि छात्रों से दुश्मनी निकालने, छात्राओं को पीटने में शाह की पुलिस ऐसी जुटी कि वह वोटर भी भाजपा से दूर भागती चली गई। एक्जिट पोल में भाजपा की सीटें बढ़ती दिख रही हैं लेकिन वे पाकिस्तान, मुस्लिम, अरबन नक्सल टुकड़े-टुकड़े गैंग, आतंकवादियों को बिरयानी जैसे आरोपों से हुए ध्रुवीकरण के कारण बढ़ी लगती हैं। एक और बात भूलना नहीं चाहिए कि दिल्ली देश की कारोबारी राजनीति भी है। व्यापारियों को नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक आर्थिक मंदी से लेकर निराशाजनक बजट से लेकर खराब बैंकिंग तक से घोर निराशा रही है। लोकसभा चुनाव में तो वोटरों के सामने मोदी के मुकाबले कोई विकल्प नहीं था, लेकिन विधानसभा में तो केजरीवाल बिना कुछ गलत किए महज अच्छा करने वाले विकल्प थे, इसलिए वोटरों ने मोदी-शाह को बेहतर नहीं माना।

अब एक आखिरी बात यह रह गई है कि केजरीवाल से पूछने को जी चाहता है कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? देश में जलते-सुलगते मुद्दों के प्रतीक दिल्ली में केन्द्रित हैं। जेएनयू से जामिया तक, और शाहीन बाग से सुप्रीम कोर्ट तक यह देश लोकतांत्रिक आंदोलनों पर अलोकतांत्रिक सरकारी जुल्म का इतिहास लिख रहा है। लेकिन केजरीवाल और उनकी पार्टी एक सरकारी विभाग की तरह काम कर रहे हैं जो कि किसी भी राजनीति से दूर हैं। देश की राजधानी चलाते हुए केजरीवाल एक गैरराजनीतिक अफसर की तरह काम कर रहे हैं। वे एक गैरराजनीतिक म्युनिसिपल चलाते अधिक लग रहे हैं। लेकिन सीमित अधिकारों वाली यह राज्य सरकार शायद केन्द्र सरकार के काबू वाली एक बड़ी म्युनिसिपल ही है।

दो दिन बाद नतीजे सामने आएंगे, तब कुछ और पहलुओं पर...।
-सुनील कुमार


Date : 08-Feb-2020

पड़ोसी देशों के लिए भारत का सही रूख

कुछ दिन पहले जब सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने यह सलाह दी कि हिंदुस्तान वायरसग्रस्त चीन से अपने छात्रों और बाकी नागरिकों को निकलने के साथ-साथ पाकिस्तान के छात्रों को भी निकालने में मदद करे तो भारत में कई लोग उबल पड़े। दुश्मन करार दिए गए देश के लोगों की मदद क्यों की जाए? फिर खुद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने वायरस के खतरे के बाद भी चीन से एकजुटता दिखाने के लिए पाकिस्तानी छात्रों को वहां से वापिस लाने से इंकार कर दिया। जान के खतरे से घिरे पाकिस्तानी छात्र इस पर अपने प्रधानमंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर लिख भी रहे हैं। 

ऐसे में भारतीय विदेश मंत्री का यह बयान मायने रखता है कि भारत सरकार अपने पड़ोसी तमाम देशों के छात्रों को वायरसग्रस्त चीनी प्रांत वुहान से निकालने और भारत लाने के लिए तैयार है। पड़ोसी देशों में से खासकर पाकिस्तान के साथ भारत के जैसे बुरे रिश्ते चल रहे हैं, उसके बीच भारत का यह प्रस्ताव मायने रखता है। फिर चाहे इसके पीछे उसकी मंशा पाक नागरिकों के बीच इमरान खान को लेकर छवि प्रभावित करने की भी क्यों न हो। अगर ऐसा होता है तो पाक छात्रों को निकालकर हिफाजत से हिंदुस्तान लाना और उन्हें अस्पतालों में रखना पूरी दुनिया में नोटिस किया जाएगा।

आज जाहिर तौर पर हिंदुस्तान अपने तमाम पड़ोसी देशों में चीन के तुरंत बाद का सबसे बड़ा देश है। और ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रति उसकी बड़ी जवाबदेही भी बनती है। नेहरू के वक्त से हिंदुस्तान बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण सामुदायिक जवाबदेही निभाते भी आया है और भारत को असाधारण अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिलते रहा है। आज नेहरू चाहे इस देश के मौजूदा इतिहास पुनर्लेखन में अवांछित खलनायक करार दिए जा रहे हों, लेकिन सैकड़ों बरस बाद भी यह देश नेहरू की दरियादिली और महानता को भूल नहीं सकेगा।

इसलिए आज भारत सरकार का प्रस्ताव, अपनी किसी भी घोषित या अघोषित नीयत से परे, नेहरू की नीति के अनुकूल है। आज चाहे बांग्लादेश आर्थिक पैमानों पर भारत से ऊपर दिख रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि बांग्लादेश भारत की ऐसी क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकता। यह भी याद रखने की जरूरत है कि पिछली विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने किस तरह पाकिस्तान के मरीजों के भारत में इलाज में मदद की थी। जरा-जरा सी ट्वीट पर भी वे ऐसे इंतजाम करती थीं।

किसी देश में आम जनता की सद्भावना पाने का सबसे अच्छा जरिया होता है वहां के मुसीबतजदा लोगों की मदद करना। भारत का ऐसा करने का एक लंबा इतिहास रहा है। नेहरू के वक्त से पड़ोसी देशों के लोगों को स्थायी शरण दी जाती रही है और 1971 में तो इंदिरा गांधी ने शायद विश्व इतिहास की सबसे बड़ी शरण दी थी जब पूर्वी पाकिस्तान से आए लाखों लोगों को उन्होंने बसाया। भारत को पड़ोसियों, और बाकी लोगों की मदद का सिलसिला जारी रखना चाहिए। 

-सुनील कुमार


Date : 07-Feb-2020

दूसरों की मुसीबत देख 
अपनी तैयारी टटोल लें

चीन में फैले, और वहां से बाकी कई देशों तक पहुंचे कोरोना वायरस के खतरे को सबसे पहले सामने रखने वाले चीनी डॉक्टर को पुलिस ने धमकी देकर चुप कराया था। लेकिन उसी की बात कुछ हफ्तों के भीतर सही निकली, और इस बीमारी का इलाज करते-करते वह डॉक्टर भी कल मर गया। अब तक की चीनी खबरों के मुताबिक सैकड़ों लोग इस वायरस से मारे जा चुके हैं, लेकिन चीन में खबरों में सरकार की जैसी फौलादी पकड़ रहती है, उससे लगता है कि यह गिनती कितनी भी हो सकती है। न भी हो तो भी चीन की अर्थव्यवस्था को इससे एक बड़ा झटका लगा है, और दुनिया के कई दूसरे देशों में जहां पर चीन से आए हुए पुर्जों और दूसरे सामानों से उद्योग-व्यापार चलते हैं, उन सबको भी एक झटका लगा है जो कि अभी तक तो थमा भी नहीं है। अभी कोई आसार नहीं दिख रहे कि चीन और बाकी देशों में इस वायरस का कहर कब तक थमेगा, कब तक सरकारों पर अचानक आया हुआ एक बड़ा आर्थिक बोझ हटेगा, और कब कारोबार पटरी पर लौटेगा। यह सब कुछ अभी बहुत अनिश्चित है, और यह अनिश्चितता बाकी दुनिया को ऐसे किसी बड़े खतरे की तरफ से आगाह करने वाली होनी चाहिए। 

हिन्दुस्तान आज ऐसी बुरी मंदी का शिकार है कि विश्व बैंक की प्रमुख अर्थशास्त्री का यह कहना है कि आज की वैश्विक मंदी के पीछे हिन्दुस्तान की मंदी एक बड़ा कारण है। यह बात हिन्दुस्तान के महत्व को बताने वाली तो है, लेकिन किसी खुशी की बात नहीं है। ऐसी मंदी के बीच चीन से कारोबार बहुत बुरी तरह खराब हुआ है क्योंकि लोगों की आवाजाही ही रूक गई है। हिन्दुस्तान से परे भी दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां पर चीन से कारोबार न हो, और शायद ही कोई ऐसा देश होगा जिससे हिन्दुस्तान का कारोबार न हो। इसलिए कोरोना वायरस का जितना असर इंसानी सेहत पर पड़ा है, उससे अधिक असर कारोबार की सेहत पर भी पड़ा है, और इन दोनों वजहों से दुनिया भर में एक बड़ा आर्थिक बोझ भी पड़ा है। अब बाकी देशों को भी, और हिन्दुस्तान को भी यह सोचना चाहिए कि इस किस्म की प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा के आने पर उसके खतरे, और उससे नुकसान, क्या इसके लिए देश तैयार है? 

लोगों को याद होगा कि 25 बरस पहले भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से गैस रिसी थी, हजारों लोग आनन-फानन मारे गए थे, और लाखों लोगों के बदन का इतना नुकसान हुआ था कि न सिर्फ वे अपनी पूरी जिंदगी इस जहर का शिकार रहे, बल्कि उस वक्त कोख में पल रहे बच्चों की जिंदगी भी बर्बाद हो गई। चौथाई सदी गुजर गई लेकिन दुनिया के इस सबसे बड़े औद्योगिक हादसे से भोपाल की जिंदगी अब तक उबर नहीं पाई, और उसका नुकसान कई पीढिय़ों तक जारी रहेगा। अब यह वायरस एक और चेतावनी है कि चीन जैसा विकसित देश भी इस वायरस से बचाव के लिए जरूरत के लायक मास्क नहीं बना पाया, और लोग तरह-तरह की चीजों से मुंह ढंककर काम कर रहे हैं। भारत जैसा देश तो किसी भी बड़ी त्रासदी या आपदा के लिए तैयार नहीं रहता, और यहां पर ऐसा कुछ हो जाए, तो गरीबी के बीच, अभाव और बेबसी के बीच यहां के लोग किस तरह मुसीबत से जूझ पाएंगे? चीन को लेकर तो आज अनगिनत तस्वीरें और वीडियो चारों तरफ फैल रहे हैं कि वहां की सरकार ने किस तरह दो-चार दिनों में ही बहुत बड़ा अस्पताल खड़ा कर लिया, लेकिन हिन्दुस्तान में तो राज्य सरकारों के अस्पतालों में जान बचाने वाली मशीनों में से तीन चौथाई से अधिक खराब रहती हैं, और उनकी खरीदी में भयानक भ्रष्टाचार के चलते नकली मशीनें खरीद ली जाती हैं, खराब दवाएं खरीदी जाती हैं। 

हिन्दुस्तान जैसे देश, और इसके प्रदेश को किसी भी मुसीबत से बचने के लिए पैसों की भी जरूरत होगी, तैयारियों की भी जरूरत होगी, सरकार में तेजी से काम करने की क्षमता भी लगेगी, और जनता के बीच जागरूकता का एक बेहतर हाल भी लगेगा। आज पूरी तरह से गंदा, लापरवाह, असंगठित, अनियोजित यह देश रोज की जिंदगी से भी जूझने के लायक नहीं है, किसी अकल्पनीय मुसीबत से जूझने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन आग लगने के पहले ही बुझाने की मशीनें लाकर रखनी होती हैं, आज कम से कम हिन्दुस्तानी प्रदेश की सरकारें अपने अस्पतालों का हाल तो टटोल लें। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Feb-2020

...तो फिर वह महज ऐसे 
ही लोकतंत्र की हकदार है

हिन्दुस्तान इन दिनों कई किस्म के भाषणों से गुजर रहा है। संसद का शायद ही कोई ऐसा सत्र होता हो जिसमें लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी पूरी तरह से अवांछित और नाजायज बात न बोलते हों। कई बार तो पार्टी ने उनके बयान से अपने को अलग किया, कई बार उन्हें खुद अफसोस जताना पड़ा, लेकिन फिर भी वे अगले संसद सत्र का इंतजार करते हैं, और इसी दर्जे की कोई बात बोलने का भी। नतीजा यह होता है कि विपक्ष को मोदी सरकार के खिलाफ बोलने के जितने मजबूत मुद्दे रहते हैं, वे अधीर रंजन चौधरी के पाकिस्तान, या मुस्लिम, या कश्मीर के बारे में कही गई बातों, या उनके विशेषणों और उनकी पौराणिक उपमाओंतले कुचलकर दम तोड़ देते हैं। यह सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। यह एक किस्म का भाषण हुआ। दूसरी तरफ संसद के बाहर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से लेकर केरल के भाजपा सांसद अनंत हेगड़े तक गांधी की स्मृति पर थूकने सरीखे बयान देने वाले बहुत सारे लोग हैं। इसके बाद नागरिकता को लेकर चल रहे आंदोलन पर लोगों को गद्दार कहने वाले, पाकिस्तानी कहने वाले नेताओं की भरमार है, और वे इतनी बड़ी तादाद में हिन्दुस्तानियों को पाकिस्तान भेजना चाहते हैं कि दिल्ली का पाकिस्तानी दूतावास उतनी वीजा अर्जियों पर फैसले भी नहीं ले पाएगा। फिर कुछ लोग गद्दारों को गोली मारना चाहते हैं, कुछ लोग शाहीन बाग की महिला आंदोलनकारियों को आत्मघाती-दस्ता बता रहे हैं। लेकिन ऐसी तमाम बयानबाजी के बीच हर कुछ हफ्तों में कांग्रेस के घोषित-अघोषित मुखिया राहुल गांधी भी कोई न कोई ऐसी बात कह बैठते हैं जिससे देश में असल मुद्दों पर बहस धरी रह जाती है, और लोग संसद के भीतर-बाहर इस पर उलझ पड़ते हैं कि क्या लोग सचमुच ही राहुल के कहे मुताबिक मोदी को लाठियां मारेंगे? 

हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में आज यह समझना मुश्किल हो रहा है कि लोग अनर्गल कही जाने वाली बातें कर क्यों रहे हैं? महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन ने चाहे-अनचाहे एक साथ बैठने वाले कांग्रेस, एनसीपी, और शिवसेना के नेता बिना किसी वजह के कभी सावरकर का मुद्दा छेड़कर एक-दूसरे का जीना हराम करने लगते हैं, तो कभी इंदिरा गांधी के तस्करों से मेलजोल को बहस का मुद्दा बना रहे हैं। यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि भाजपा के इस सबसे पुराने एक सहयोगी दल शिवसेना को उससे अलग करके जब उसकी अगुवाई में यह सरकार बनानी ही थी, तो इसके बनते ही इस तरह की बातें क्यों छेडऩी चाहिए जिससे कि विवाद खड़ा होना तय हो। यह काम महाराष्ट्र में भाजपा करती तब तो ठीक था क्योंकि विपक्ष में बैठे हुए उसके पास सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार खड़ी करने की जिम्मेदारी है, और इसकी संभावना भी है। लेकिन गठबंधन की तीनों पार्टियां एक-दूसरे के साथ बंद कमरे में बात करना सीख नहीं पा रही हैं, और कहीं दिल्ली से किसी बखेड़े का बयान शुरू होता है, तो कहीं मुम्बई से। 

मीडिया का तकरीबन पूरा हिस्सा गैरजरूरी मुद्दों में उलझकर रह गया है, और सबसे अधिक हिंसक, सबसे अधिक अलोकतांत्रिक, और सबसे अधिक अश्लील बातों को सबसे अधिक जगह भी मिल रही है। कोई हैरानी नहीं है कि लोगों ने टीवी पर खबरें देखना कम कर दिया है जो कि मोटेतौर पर इसी किस्म के बयानों पर जिंदा समाचार-माध्यम है। अब जब लोगों को कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान मिलता है कि देशभक्ति का नशा मोदी जितना भी नहीं होना चाहिए कि वे इस चक्कर में शादी ही न करें, तो बिना बात के बहुत सारे बयान वायरस की तरह पैदा होने लगते हैं, और आगे बढऩे लगते हैं। यह सिलसिला थका देने वाला है। मीडिया का गैरजिम्मेदार हिस्सा इसी पर जिंदा है, और इसी से अपना पेट भर रहा है। जिन नेताओं को कहने के लिए कोई गंभीर बात नहीं होती, जिनके पास कोई तर्क नहीं होता, वे इसी किस्म की बातों से खबरों में बने हुए हैं, और बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि सत्ता के सामने जब बहुत से असुविधाजनक सवाल खड़े हो जाते हैं, तो वह सोच-समझकर ऐसे बखेड़े खड़े करवा देती है जिनमें दो-तीन दिन देश उलझकर रह जाता है, और असुविधा टल जाती है। अब देश की जनता अगर ऐसी बकवास को ही खबर मानकर चलती रहेगी, तो फिर वह महज ऐसे ही लोकतंत्र की हकदार है। 
-सुनील कुमार


Date : 05-Feb-2020

हिंदुस्तानी फौज की मर्दाना
सोच बदलने की जरूरत

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि थलसेना के मोर्चों पर महिला अधिकारियों को मुखिया तैनात करना व्यावहारिक नहीं होगा क्योंकि फौज मेें सैनिक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और वे किसी महिला अफसर से हुक्म लेने की संस्कृति के नहीं रहते हैं। इसके अलावा सरकार ने कुछ और तर्क भी महिला कमांडिंग ऑफिसर बनाने के खिलाफ गिनाए हैं। सरकार का कहना है कि महिला अफसरों की पारिवारिक जिम्मेदारियां भी उन्हें मोर्चों पर तैनात करने में बाधा बन सकती हैं। सरकार ने समाज की वर्तमान सोच को गिनाया है और कहा है कि थलसेना के सैनिक अभी दिमागी रूप से महिला को मुखिया देखने के लिए तैयार नहीं है। सरकार का कहना है कि अगर उन्हें किसी दूसरे देश में युद्धबंदी बना लिया तो वह एक अलग किस्म का खतरा रहेगा। इसलिए सरकार लड़ाई के सीधे मोर्चे से महिला अधिकारियों को दूर रखती है।

अब यह मामला बड़ा दिलचस्प, लेकिन बड़ा ही निराशाजनक भी है। हिंदुस्तानी फौज आजादी की पौन सदी में भी अगर पुरुषप्रधान सोच से इस तरह लदी हुई है कि वह महिला कमांडर के मातहत काम नहीं कर सकती, तो यह सोच लड़ाई के सरहदी मोर्चे से परे भी फौज में जगह-जगह असर रखती होगी। यह भूलना नहीं चाहिए कि भारतीय सेनाओं में कई अफसरों को इस बात के लिए कड़ी सजा भी मिली है कि वे मातहत अफसरों की पत्नियों पर बुरी नजर रखते थे, और उनका देहशोषण करने की कोशिश करते थे। हम फौज से जरा नीचे अद्र्धसैनिक बलों में जाएं जहां कि बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती हंै, तो वहां भी सिपाही ऐसी ही पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते होंगे, और उनमें भी मर्दाना सोच भरी हुई होगी। और नीचे आएं तो राज्यों की पुलिस में भी ऐसा होगा, और ऐसा है भी। इसलिए इसे महज फौजी-सरहदी मोर्चे की बात न मानें, बल्कि वर्दियों की तमाम जगहों पर मर्दाना सोच के दबदबे की समस्या मानकर उसे दूर करने की बात सोचें।

देश में बात सिर्फ फौजी कमांडरों की वर्दियों की नहीं है, देश में दसियों लाख दूसरी वर्दियों में भी महिलाएं हैं जो कि गैरबराबरी झेल रही हैं, संभावनाओं से दूर रखी जा रही हैं। लेकिन हम सुप्रीम कोर्ट में सरकार की कही हुई बात को इस सरकार की नाकामयाबी मानने के बजाय पिछली तमाम सरकारों के सारे कामकाज के मिलेजुले असर और समाज की व्यापक सोच मानना बेहतर समझेंगे। समाज की हकीकत, हिंदुस्तानियों की दिमागी हालत के बारे में सोचे बिना अगर सीधे एक सरकारी फैसला लेकर लड़ाई के मोर्चे पर एक घरेलू टकराव खड़ा कर दिया जाता है तो यह ठीक नहीं होगा। लेकिन इसी सांस में हम यह तर्क भी रखना चाहेंगे कि सामाजिक-संस्कृति की आड़ लेकर कोई भी सरकार अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती, जो कि हिंदुस्तानी आदमी और औरत में बराबरी उपलब्ध कराने की है। सरकार को तुरंत ही ऐसी सामाजिक सोच, ऐसी संस्कृति, और ऐसे दिमाग को सेना जैसी नियंत्रित और अनुशासित संस्था में खत्म करने के बारे में एक ठोस योजना तुरंत ही सुप्रीम कोर्ट के सामने रखनी चाहिए, या सुप्रीम कोर्ट को केंद्र सरकार से ऐसी योजना मांगनी चाहिए। एक वक्त हिंदुस्तान में महिलाओं को उनके मृत पति के साथ सती बनाने की भी सोच थी, और उसके खिलाफ कोई कानून भी नहीं था। सामाजिक सोच को तोड़ते हुए कानून भी बनाया गया और उसे समाज सुधार के रास्ते लागू भी किया गया। इसलिए अगर हिंदुस्तानी फौज की सोच में इतना पाखंड भरा हुआ है, तो इसकी आड़ लेकर महिलाओं को संभावनाओं से दूर रखना बहुत गलत बात होगी, और इस पाखंड को बदलने के लिए फौज के मर्दों को सामाजिक-मनोवैज्ञानिक परामर्श देने की जरूरत है, उनका दिमाग बदलने की जरूरत है। हमने छत्तीसगढ़ के नक्सल मोर्चे पर देखा है कि किस तरह महिला कमांडो उन नक्सलियों के खिलाफ लड़ रही हैं जो पहले बहुत बार पुलिस का अपहरण भी कर चुके हैं। जरूरत हो तो केंद्र सरकार बस्तर के मोर्चे से कुछ सीखे।
-सुनील कुमार


Date : 04-Feb-2020

शाहीन बाग आंदोलन में 
मासूम बच्चे की मौत को
शहादत मानना गलत है

दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में नागरिकता-संशोधन के खिलाफ 50 से अधिक दिनों से सर्द रात-दिन धरने पर बैठी महिलाएं एक अलग किस्म का लोकतांत्रिक इतिहास लिख रही हैं, लेकिन इनके बीच चार महीने के एक बच्चे की जिंदगी खत्म हो गई क्योंकि उसकी मां घरवालों के मना करने पर भी धरने पर आमादा थी, और उस छोटे से बच्चे को लेकर वहां बैठती थी। रात-दिन ठंड से सर्दी, और फिर तबियत बिगड़ते हुए वह गुजर गया। अब परिवार इस मौत के लिए नागरिकता-संशोधन को जिम्मेदार ठहरा रहा है। 

किसी कानून के खिलाफ एक अहिंसक और लोकतांत्रिक आंदोलन का पूरी तरह महिलाओं पर इतने लंबे समय तक चलना, इतने मुश्किल हालात में चलना, और इतने दकियानूसी मुस्लिम समाज के बीच की महिलाओं के कंधों पर चलना एक अलग किस्म का इतिहास है। और जब भावनाएं भड़की हुई रहती हैं, तो जिंदगी और मौत की फिक्र कुछ कम हो जाती है। शाहीन बाग के प्रदर्शन में बढ़ते-बढ़ते देश के बहुत से शहरों में अपने बीज रोप दिए हैं, और कई जगहों पर ऐसा आंदोलन चल रहा है। लेकिन इस मौत से उठे सवाल नागरिकता-संशोधन के जटिल कानूनी सवालों से कुछ परे भी हैं, जिन्हें अनदेखा करना ठीक नहीं होगा। 

आज देश में लोकतंत्र के लिए लड़ी जा रही एक बड़ी लड़ाई के चलते हुए मां-बाप की अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही की बुनियादी बात किनारे नहीं की जा सकती। दुनिया में कहीं भी मुश्किल लड़ाई वाले आंदोलन अगर चलते हैं, तो उनमें हिस्सा लेने के लिए ऐसे छोटे बच्चों के अपने बुनियादी हकों को अनदेखा नहीं किया जा सकता, और न ही उनकी हिफाजत की अनदेखी की जा सकती है। जब पूरा देश सर्द लहर का शिकार है, तब दिल्ली में खुले में रात-दिन किसी भी बच्चे को इस तरह आंदोलन में शामिल रखना उसके मानवाधिकार के खिलाफ भी है, और आंदोलन में शरीक बाकी लोगों को इसमें दखल देकर इस मौत को रोकने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी थी। जब किसी छोटे बच्चे का मामला है, तो उसके मां-बाप के फैसले गलत होने पर परिवार के बाकी लोगों को दखल देनी थी, उनका भी बस नहीं चल रहा था तो बिरादरी के लोगों को समझाना था, और खासकर धरने जैसे बैठे हुए आंदोलन में शामिल बाकी लोगों को तो ऐसी लड़ाकू मां को समझाना ही चाहिए था जो कि बच्चे की जिंदगी खतरे में डाल रही थी। पूरा का पूरा आंदोलन महिलाओं का है, इसलिए वहां मौजूद महिलाओं में से तकरीबन सभी मां बन चुकी होंगी, और बच्चों की जरूरत को अच्छी तरह समझती होंगी। यह मौत एक सामूहिक और सामुदायिक गैरजिम्मेदारी का नतीजा भी है, और इसकी तोहमत नागरिकता-संशोधन कानून पर थोपना अपनी जिम्मेदारी से बचने की बात भी होगी। 

हिन्दुस्तान में गरीब या कम पढ़े-लिखे तबकों के बीच बच्चों के रख-रखाव को लेकर जिम्मेदारी में कई बार कमी नजर आती है। यही वजह है कि गरीब-अनपढ़ तबकों में लोग अपनी जरूरत और अपने फैसले से अधिक बच्चे पैदा करते हैं क्योंकि खानपान और इलाज के अभाव में, साफ-सुथरी जिंदगी के बिना उनके जिंदा रहने की संभावना औरों के मुकाबले कम रहती है। किसी भी धर्म में गरीबों के बीच बच्चे अधिक पैदा होते हैं क्योंकि वे कम बचते हैं। लेकिन शाहीन बाग में चल रहा आंदोलन वहां पर पहुंचने वाले बहुत से प्रमुख नेताओं का गवाह भी है, मीडिया का एक हिस्सा भी वहां लगातार मौजूद है, और आंदोलनकारियों के साथ बैठने वाले उनसे परे के जागरूक लोग भी हैं। ऐसे में देश भर के आंदोलनकारियों के बीच यह बात साफ होनी चाहिए कि आंदोलन के मुद्दे चाहे जो हों, छोटे बच्चों को उसमें झोंककर, उनको साथ रखकर, उनको खतरे में डालकर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। बच्चों की हिफाजत एक अलग ही मुद्दा है जिसे किसी भी मकसद के लिए, किसी भी आंदोलन के लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता। चाहे शाहीन बाग कितना भी बड़ा लोकतांत्रिक मुद्दा और आंदोलन क्यों न हो, हम इस मौत को एक शहादत का दर्जा देने के खिलाफ हैं, और मां-बाप, परिवार, बिरादरी, और आंदोलन, इन सबकी सामूहिक समझ की नाकामयाबी के एक बड़े सुबूत के अलावा यह और कुछ नहीं है। देश में किसी भी तरह के आंदोलन हों, उनकी एक पहली शर्त होनी चाहिए कि बच्चों को उससे परे रखा जाए, और बच्चों के अलावा बीमार-बूढ़ों को भी उससे परे रखा जाए। समझबूझ की नाकामी कभी किसी आंदोलन को कामयाब नहीं बना सकती। इस मासूम बच्चे की मौत से देश भर के आंदोलनकारियों को एक सबक लेना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 03-Feb-2020

बिना घुसपैठ किए दुनिया के एक
सबसे बड़े एप्लीकेशन को झांसा

दस-बीस बरस पहले एक अमरीकी फिल्म आई थी जिसमें कम्प्यूटरों में घुसपैठ करने वाले मुजरिम किसी बड़े अमरीकी शहर के ट्रैफिक को नियंत्रित करने वाले कम्प्यूटर-सिस्टम में घुसकर उसे अपने हिसाब से बदल देते हैं, मुजरिमों की गाडिय़ों को तेजी से निकल भागने के लिए पूरे रास्ते बत्तियां हरी कर देते हैं, और पीछा करती पुलिस की गाडिय़ों को हर जगह लालबत्ती का सामना करना पड़ता है। अब ऐसी रेडलाईट पार करके आगे बढ़ती पुलिस गाडिय़ां दूसरी गाडिय़ों से टकराती भी रहती हैं, और अपने कम्प्यूटर पर बैठे मुजरिम अपने साथियों के लिए रास्ता साफ करते चलते हैं। सार्वजनिक कम्प्यूटरों पर ऐसा काबू बहुत सी फिल्मों में दिखाया गया है, और यह एक असल खतरा है जो कि कम्प्यूटरों की हिफाजत के सरकारी इंतजाम के जरा भी कमजोर होने पर जमीन पर उतर सकता है। 

अभी एक कम्प्यूटर-जानकार ने इतने आसान तरीके से बिना किसी छेडख़ानी के दुनिया के सबसे बड़े कम्प्यूटर-नक्शे गूगल पर ट्रैफिक को बदलकर रख दिया कि उसकी तरकीब ने बड़े-बड़े कम्प्यूटर-सुरक्षा विशेषज्ञों को भी हक्का-बक्का कर दिया है। गूगल-मैप जैसे मोबाइल-एप्लीकेशन किसी सड़क पर ट्रैफिक के बोझ को आंककर उस हिसाब से सड़क को खाली, भरा, या जाम बताते हैं। गूगल-मैप इसके लिए उस सड़क पर उसका इस्तेमाल करते हुए चलने वाले मोबाइल फोन के डेटा को मिलाकर इस्तेमाल करता है, और सड़क पर ट्रैफिक के बोझ का हिसाब लगा लेता है। यह बात आमतौर पर तो सही होनी चाहिए, लेकिन गूगल के पूरे दिमाग को बेवकूफ बनाने का एक इतना आसान तरीका एक हैकर ने निकाला है कि उसके लिए उसे किसी फोन की हैकिंग भी नहीं करनी पड़ी। उसने 99 स्मार्टफोन लिए, और उन सबको एक ठेले पर रखकर, गूगल-मैप शुरू करके धीरे-धीरे चलने लगा। नतीजा यह हुआ कि गूगल-मैप को अचानक उस सड़क पर धीमी रफ्तार से चलने वाली 99 गाडिय़ां समझ में आने लगीं, और उसने उस सड़क को मैप पर बहुत व्यस्त दिखाने वाले लाल रंग से दिखाना शुरू कर दिया, और दूसरे लोगों को उस सड़क के बजाय दूसरी सड़क सुझाना शुरू कर दिया। एक जरा सी तरकीब से दुनिया के सबसे बड़े मैप-एप्लीकेशन को इस तरह झांसा दे दिया गया कि उसने मैप देखकर रास्ता तय करने वाले दूसरे लोगों को दूसरे रास्तों से भेजना शुरू कर दिया। 
 
जो लोग आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर बहुत भरोसा करते हैं, जो गूगल जैसे कम्प्यूटर-एप्लीकेशन को दैवीय ताकत से भी अधिक बड़ा मानते हैं, वे अपने कम्प्यूटरों को किसी हैकिंग या घुसपैठ से तो बचा सकते हैं, लेकिन ऐसे चतुर इंसानी दिमाग से कैसे बचा सकते हैं? इसलिए कम्प्यूटरों पर सार्वजनिक जीवन से जुड़ी सरकारी या कारोबारी बातों पर एक सीमा से अधिक निर्भरता में एक बड़ा खतरा मौजूद है। इंसान का दिमाग कम्प्यूटरों के मुकाबले अधिक कल्पनाशील है, और वह बहुत सी बातों में कम्प्यूटर को पछाड़ भी सकता है। आज बैंकों के जितने तरह के फ्रॉड सामने आते हैं, उनमें हिन्दुस्तान में सबसे अधिक मामले झारखंड के एक गांव से शुरू होते हैं जहां के लोग मोबाइल फोन पर लोगों को झांसा देकर उनके बैंक खातों में घुसपैठ करते हैं, और यहां से रकम दूसरे, तीसरे, और चौथे खातों में ले जाकर गायब कर देते हैं। झारखंड के इस गांव की जानकारी बरसों से खबरों में चली आ रही है, लेकिन भारत सरकार अपनी सारी ताकत और तकनीकी क्षमता के बावजूद ऐसे बैंक फ्रॉड रोक नहीं पा रही है। दूसरी तरफ भारतीय रेलवे की टिकट रिजर्वेशन की वेबसाईट को धोखा देने के लिए एक स्कूल-फेल नौजवान ने ऐसा एप्लीकेशन बनाया है जिसने दुनिया की सबसे बड़ी रेलवे की वेबसाईट को तोड़कर रख दिया है, उसे धोखा देकर मनमाना रिजर्वेशन करवा रहा है। अब खुद रेलवे ने चेतावनी जारी की है कि लोग किस-किस फर्जी वेबसाईट से बचें, जो कि रिजर्वेशन करवाने के नाम पर धोखा देती हैं। रेलवे ने ऐसे मोबाइल नंबर भी जारी किए हैं जो कि धोखा दे रहे हैं। यह सामान्य समझ के लोगों के लिए भी एक मुश्किल बात है कि सरकार की जानकारी में रहते हुए भी ये वेबसाईटें, और ये फोन किस तरह काम करते हैं, इनको पकड़ा क्यों नहीं जा सकता? यह पूरा सिलसिला बताता है कि भारत सरकार की साइबर-सुरक्षा की बड़ी-बड़ी बातें बहुत ही दलदली और पोली जमीन पर खड़ी हुई हैं, और उनमें कोई मजबूत हिफाजत नहीं है। इसके साथ-साथ यह भी समझना है कि आज दुनिया जिन लोकप्रिय एप्लीकेशनों पर निर्भर हो गई है, वे कितने नाजुक हैं, और उनके साथ कितने खतरे जुड़े हुए हैं। इन दोनों बातों को देखते हुए लोगों को अपनी खुद की जरूरतों की हिफाजत खुद भी करनी चाहिए। यह पूरी नौबत बताती है कि राज्य सरकारों को भी अपने-अपने इलाकों में लोगों को साइबर-सुरक्षा के प्रति जागरूक और शिक्षित करने की कितनी जरूरत है। 
-सुनील कुमार


Date : 02-Feb-2020

आबादी के एक बड़े हिस्से, 
और इतने राज्यों से टकराव
गैरजरूरी और नाजायज...

महाराष्ट्र के शिवसैनिक मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा है कि एनआरसी नामक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप को महाराष्ट्र में लागू नहीं किया जाएगा क्योंकि उससे हिन्दू और मुस्लिम दोनों के लिए नागरिकता साबित करना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। हालांकि उद्धव ने नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन किया है, लेकिन एनआरसी का विरोध करते हुए महाराष्ट्र में इसे लागू न करने की बात कही है। अब तक देश में दर्जन भर अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री नागरिकता संशोधन या एनआरसी लागू न करने की बात कर चुके हैं, और छत्तीसगढ़ सहित कुछ राज्यों में इसके लिए मंत्रिमंडल या विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके केन्द्र सरकार को भेजा भी है। दूसरी तरफ भाजपा और उसके समर्थक दलों के नेता जगह-जगह यह बयान भी दे रहे हैं कि संसद में जो कानून पास हो चुका है, उसे लागू करना, न करना राज्यों की पसंद पर निर्भर नहीं है, और वह पूरे देश में लागू है ही। 

केन्द्र और राज्यों के बीच अधिकारों के बंटवारे का यह एक बड़ा मुद्दा बनते दिख रहा है जिसमें देश की एक तिहाई या अधिक आबादी के राज्य केन्द्र सरकार के नागरिकता संशोधन के खिलाफ हैं, और उसे लागू न करने की घोषणा कर चुके हैं। यह टकराव आज तो तब दिख रहा है जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सिर्फ असम में ही नागरिकता साबित करनी पड़ रही है, और उसी में लोगों की जिंदगी हराम हो चुकी है। जो देश सड़कों और फुटपाथों पर जीता है, जो देश बेघर है, जिसके नाम कोई जमीन नहीं है, जिसके लोगों के पास बैंकों में खाते नहीं हैं, जहां पर लोग अपने जिंदा होने का सर्टिफिकेट मांगते बरसों तक सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते हैं, जहां जिंदा इंसान की तनख्वाह या पेंशन रोक दी जाती है कि उसके पास जिंदा होने का सुबूत नहीं है, जहां पुरानी पीढ़ी निरक्षर है, बिना कागजात है, जिनके घर बाढ़ में डूबकर सब कुछ खो चुके हैं, वैसे लोग कहां से नागरिकता साबित करेंगे? यह एक हैवानियत की सोच है कि गरीबों को मजदूरी से अलग करके, बूढ़ों और बीमारों को बिस्तरों से बाहर घसीटकर अंतहीन कतारों में खड़ा कर दिया जाए, और उन पर ही उनके हिन्दुस्तानी होने, उनके मां-बाप के हिन्दुस्तानी होने को साबित करने का बोझ डाल दिया जाए। 

केन्द्र सरकार ने नागरिकता संशोधन के एक अकेले मुद्दे पर पूरे देश की आम जनता के बीच, राज्य सरकारों के साथ, और राजनीतिक दलों के साथ इतना बड़ा टकराव खड़ा कर लिया है, और देश पर इतना बड़ा आर्थिक बोझ डालने का फैसला लिया है कि उसके चलते यह देश केन्द्र-राज्य संबंधों के सबसे बुरे दिन देखने जा रहा है। जहां तक नागरिकता संशोधन के हिमायती लोगों के तर्क हैं कि संसद में लागू किया गया कानून लागू करना राज्यों की मजबूरी है, तो यह ताजा-ताजा बात है कि सड़कों पर ट्रैफिक के जो नए नियम लागू किए गए हैं, उन्हें खुद भाजपा के ही कई राज्यों ने लागू नहीं किया है, और उसका जमकर विरोध किया है। ये नियम भी पूरे देश के लिए संसद में बनाए गए कानून के तहत ही लागू किए गए हैं, जिन्हें आज शायद ही कोई राज्य लागू कर रहा है, या उसके मुताबिक पहाड़ जितना जुर्माना कर रहा है। इसलिए अगर कोई कानून है तो उसे लागू करना किसी राज्य सरकार की बेबसी है, यह सोचना एक बेवकूफी है। लेकिन इसके साथ-साथ यह बात भी गौर करने की है कि अगर केन्द्र सरकार अपनी जिद पर अड़ जाएगी, और आधार कार्ड से लेकर पासपोर्ट तक, और बैंक खातों से लेकर सिमकार्ड तक के साथ अगर नागरिकता साबित करने की बंदिश जोड़ देगी, तो देश की दसियों करोड़ आबादी दूसरे दर्जे की नागरिक बनकर रह जाएगी, और केन्द्र और राज्यों के बीच एक ऐसा भयानक टकराव खड़ा होगा कि जिसका कोई हल नहीं निकलेगा। और देश में कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इससे गृहयुद्ध जैसी नौबत आ सकती है। हमारा ख्याल यह है कि केन्द्र सरकार ने यह एक निहायत ही गैरजरूरी और नाजायज टकराव खड़ा किया है जिसका अपार नुकसान सत्तारूढ़ पार्टी को होगा। आज केन्द्र सरकार जिस दर्जे की जिद पर अड़ी हुई है, वह पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और भारत की संसदीय व्यवस्था को एक बाहुबली फिल्म साबित करने पर उतारू है। लोकतंत्र इस तरह नहीं चलता है, और लोगों को केन्द्र सरकार के बारे में अपनी पसंद इस्तेमाल करने में अभी पूरे चार साल बाकी हैं। लेकिन ये चार बरस अगर केन्द्र और राज्यों के ऐसे बुनियादी टकराव से भरे हुए रहेंगे, तो उसका नतीजा कल आए हुए केन्द्र सरकार के बजट में दिख रहा है, और आगे यह बर्बादी बढ़ते ही चलेगी। किसी भी देश या प्रदेश की सरकार अपनी आबादी के इतने बड़े हिस्से की दुश्मन बनकर लंबे समय तक नहीं चल सकती। इस बात को न समझना, न मानना, गंभीरता से न लेना मोदी सरकार को भारी पडऩा तय है। आज देश भर में राज्य जिस तरह केन्द्र के खिलाफ खड़े हो रहे हैं, वह नौबत केन्द्र की ही जिंदगी को तकलीफदेह अधिक बनाएगी। 
-सुनील कुमार


Date : 01-Feb-2020

दूसरों के लिए अच्छी सोच 
भी आज बाकी है, जिंदा है

आज जब हिन्दुस्तान में चारों तरफ नफरत, हिंसा, अलगाव के फतवों और उनकी खबरों का सैलाब समंदरी खारे पानी की तरह आंखों से आंसू निकाल देता है तब देश के छोटे-छोटे गांव-कस्बे से इंसानों की ऐसी अच्छी खबरें भी आती हैं जो आंखों से एक दूसरे किस्म के आंसू निकाल देती हैं, और न सिर्फ हिन्दुस्तानियत पर, बल्कि इंसानियत पर भी एक बार फिर से भरोसा कायम करती हैं। उधर केरल के एक कस्बे में मुस्लिम समाज एक गरीब हिन्दू लड़की की शादी अपने खर्च से, अपनी मस्जिद में हिन्दू विधि-विधान से करवाता है, और उसी दक्षिण भारत में एक गांव की हिन्दू बहुल आबादी अपने गांव का सद्भाव दिखाने के लिए स्थानीय चुनाव में सोच-समझकर एक मुस्लिम को मुखिया बनाती है। सोशल मीडिया पर ऐसी सच्ची और खरी कहानियां भरी पड़ी हैं, और समाज के कुछ जिम्मेदार लोग इनको आगे भी बढ़ाते हैं। कहीं एक बेसहारा हिन्दू महिला को पूरी जिंदगी साथ रखने वाला मुस्लिम परिवार उसके गुजरने पर अपने बेटों से उसका हिन्दू रिवाज से अंतिम संस्कार करवाता है, तो किसी गांव में कोई भी मुस्लिम न रह जाने पर वहां की मस्जिद को कोई हिन्दू रोज झाड़ू लगाकर साफ करता है, और उसका रख-रखाव करता है। 

ऐसी तमाम कहानियों में, और जिंदगी की असली कहानियों में, एक बात एक सरीखी दिखती है कि ऐसे तमाम गांव, समुदाय, और लोग देश और प्रदेश की राजधानियों से दूर हैं, और उन पर किसी नेता का जहरीला असर अब तक नहीं हुआ है। लोग अगर भले हैं और अपनी जिम्मेदारियों से बहुत अधिक आगे जाकर बहुत भले काम कर रहे हैं, तो वे किसी नेता की प्रेरणा से ऐसा नहीं कर रहे हैं, वे ऐसे नेताओं के बावजूद, उनके असर से दूर रहकर अपने भीतर की इंसानियत के चलते ऐसा कर रहे हैं। दिल्ली में जामिया हो, या शाहीन बाग हो, वहां के आंदोलनों में लोगों को चाय पिलाने, या उन तक खाना पहुंचाने में सिक्ख समाज सबसे आगे जुटा हुआ है, यह एक अलग बात है कि सिक्खों की राजनीति करने वाला अकाली दल देश और दिल्ली में भाजपा के साथ है, और केन्द्र सरकार में ये दोनों भागीदार हैं। चाहे ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की आग हो, या हिन्दुस्तान में कहीं ट्रेन और सड़क हादसा हुआ हो, चाहे हिन्दुस्तान के किसी भी कोने से कश्मीरी छात्र-छात्राओं को निकाला गया हो, सिक्ख समाज ने सबसे आगे आकर उनके लिए खाना, उनके लिए ट्रेन या प्लेन की टिकटें जुटाईं, और अभी कुछ समय पहले तो कश्मीरी छात्राओं को वापिस कश्मीर पहुंचाने की जिम्मेदारी उठाते हुए सिक्खों ने रकम का इंतजाम किया, और उनमें से कुछ लोग छात्राओं को हिफाजत से दूसरे प्रदेश से ले जाकर कश्मीर छोड़कर आए। शायद ही कोई ऐसा धर्म हो जिससे जुड़े हुए कुछ अच्छे लोगों की कहानियां सामने न आती हों, और धर्म से न जुड़े हुए लोगों की भलमनसाहत की बातें तो आती ही रहती हैं। 

अब एक दिक्कत यह हो गई है कि हिन्दुस्तान में आज जब तक भलमनसाहत की असली कहानी लोगों तक पहुंचने के लिए जब तक अपने जूतों के तस्में बांध पाती है, तब तक हैवानियत फैलाने के लिए झूठ शहर का फेरा लगाकर आ जाता है। हिन्दुस्तान में आज सोच-समझकर एक साजिश के तहत फैलाई जा रही नफरत में उस सोच के लोगों को आपस में जोडऩे की ताकत गजब की है। एक-दूसरे से मोहब्बत करने वाले लोग कभी ऐसी किसी ताकत की जरूरत महसूस नहीं करते, लेकिन नफरत तो मानो फेविकोल के मजबूत जोड़ को फैलाते चलती है, और सोशल मीडिया पर बेधड़क अपनी फौज के लिए भर्ती करती चलती है। नतीजा यह होता है कि बालिग होने के पहले इनके झांसे में आया हुआ किशोर बंदूकबाज हो जाता है, और किसी धर्म पर हमला बोलते हुए गोलियां चलाने लगता है, उसे अपने ईश्वर की भक्ति भी मान लेता है, और देश से प्रेम भी। 

आज भले लोगों के कुछ और सक्रिय हो जाने की जरूरत है, क्योंकि सोशल मीडिया साजिश में जुटे हुए सामाजिक-मुजरिमों से भरा हुआ है, वहां पर नफरतजीवी हिंसक लोगों का राज है। मुख्य धारा के मीडिया में भी जिन लोगों ने देश और समाज के प्रति, इंसानों और अगली पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी की भावना है, उन्हें भी समाज की सकारात्मक बातों को कुछ अधिक हद तक आगे बढ़ाना होगा जिससे लोगों को यह भी लगे कि चारों तरफ हवा में बस जहर, नफरत, और हिंसा ही नहीं है, ऐसी हवा के बीच धड़कते दिलों में दूसरे इंसानों के लिए अच्छी सोच भी आज बाकी है, जिंदा है।
-सुनील कुमार


Date : 31-Jan-2020

राष्ट्रभक्त-रामभक्त की गोली,
या तमाशबीन बनी तैनात पुलिस
दोनों में अधिक खतरनाक क्या?

दिल्ली में कल जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर एक नौजवान पिस्तौल ताने पहुंचा और कई किस्म के राष्ट्रवादी नारे लगाते हुए, अपने को रामभक्त बताते हुए गोली चलाता है जिससे यूनिवर्सिटी के एक नौजवान का हाथ लहूलुहान होते दिखता है जिसे साथी ही अस्पताल ले जाते दिखते हैं। गांधी जयंती के दिन, गांधीवादी अहिंसक तरीके से आंदोलन कर रहे छात्र-छात्राओं को मारने की धमकी देते हुए ऐसी गोलीबारी जितनी खतरनाक है, उससे कई गुना अधिक खतरनाक वहां दर्जनों की संख्या में खड़ी हुई पुलिस है जो कि हवा में लहराती और गोली चलाती इस पिस्तौल के पूरे नजारे को तमाशबीन की तरह देखती रही, हाथ बांधे खड़े रही, और यह पूरा नजारा वीडियो पर कैद भी होते रहा। जिस देश की राजधानी में पुलिस इस बात के लिए तैनात की गई हो कि गांधी पुण्यतिथि पर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं को राजघाट जाने से रोका जाए, उस देश की राजधानी की यह पुलिस इस पिस्तौलबाज के नारे और फतवे देखते और सुनते हुए खड़ी रही, अपनी जगह से हिली नहीं, और वह धर्मान्ध नौजवान अपने को राष्ट्रवादी रामभक्त कहते हुए गोली चला चुका था। बाद में आई खबरें बताती हैं कि गोपाल नाम का यह नौजवान कई दिनों से अपने फेसबुक पेज पर तरह-तरह की हिंसक धमकियां पोस्ट कर रहा था, और इस गोलीबारी के तुरंत बाद शायद दिल्ली पुलिस ने उसका वह पेज बंद करवा दिया है। जिस वक्त यह पूरा नाटक चल रहा था, उस दौरान देश के अंग्रेजी चैनलों में अपने आपको सबसे बड़ा राष्ट्रवादी करार देने वाला अर्नब गोस्वामी का रिपब्लिक चैनल इस खबर को ठीक उल्टा दिखाते रहा कि जामिया मिलिया के प्रदर्शनकारी छात्रों में से एक पिस्तौल लहरा रहा है, गोलियां चला रहा है। जबकि बाकी तमाम मीडिया और देश देख रहे थे कि इसका ठीक उल्टा हो रहा था। 

आज लिखने का मुद्दा एक धर्मान्ध नौजवान, या कि जैसा कि दावा किया जा रहा है, एक नाबालिग का गांधी पुण्यतिथि पर गोडसे के अंदाज में गोलियां चलाना भी है, और यह भी है कि केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस का किस बुरी तरह साम्प्रदायीकरण हो चुका है, राजनीतिकरण हो चुका है। पुलिस अब मौके पर जात और धर्म देखकर कार्रवाई करती है, और जिस बेफिक्री के साथ वह लहराती पिस्तौल के साथ हवा में फहराती धमकी देखकर चुपचाप खड़ी थी, उस पर अगर इस देश में कोई जिम्मेदार अदालत बची है, तो वह इस पूरी पलटन की बर्खास्तगी का हुक्म देगी, और अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोडऩे के लिए सजा भी देगी। लेकिन अदालत का रूख भी इन दिनों देश की हवा के साथ-साथ बदला हुआ नजर आता है, और लोगों को अदालत से उस वक्त उम्मीद बहुत कम दिख रही है जब कटघरे में सरकार खड़ी हो, या उसके कटघरे में लाए जाने का एक खतरा मौजूद हो। ऐसे में जब देश की राजधानी में ही पुलिस की मौजूदगी में राष्ट्र और धर्म के लिए प्रेम दिखाते हुए ऐसी गोलीबारी हो रही है, तो फिर मीडिया के कैमरों से कुछ दूरी पर, योगी के उत्तरप्रदेश के भीतरी इलाकों में क्या होता होगा? 

इस देश में पुलिस कई वजहों से भारी भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, काम के अधिक बोझ के चलते वह बहुत काबिल भी नहीं रह गई है, उसमें जाति और धर्म का भेदभाव कूट-कूटकर भरा हुआ दिखता है, उसका नजरिया कई राज्यों में सत्ता की मेहरबानी से साम्प्रदायिक दिखता है, और अब अगर देश की राजधानी में वर्दी में थोक में तैनाती भी गोलीबारी को ऐसा अनदेखा करने का नजारा पेश कर रही है, तो यह इस देश की पुलिस को कुछ और दूरी तक बर्बाद करने वाला काम भी है। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि इसी दिल्ली में अभी चार दिन पहले केन्द्र सरकार के एक मंत्री ने एक चुनावी सभा में जेएनयू, शाहीन बाग, या जामिया मिलिया के प्रदर्शनकारियों के सिलसिले में नारे लगवाए थे कि देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को। अब ऐसे नारों के बाद एक रामभक्त राष्ट्रवादी गोली मारने पहुंच गया तो पुलिस मानो केन्द्रीय मंत्री के फतवे पर अमल करते हुए नजारा देखते खड़ी रही। देश की पुलिस का मनोबल इतना तोडऩा कि वह अपनी ही लाठी छूने की भी हिम्मत न करें, उसे इतना साम्प्रदायिक बना देना कि वह सत्ता को नापसंद धर्म पर कहर बनकर टूट पड़े, उसे इतना निकम्मा बना देना कि वह अपनी बुनियादी ड्यूटी को भी जरूरी न समझे, यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक है, और जब केन्द्र सरकार के मातहत देश की राजधानी में खड़ी पुलिस का यह रूख है, तो इस रूख के लिए भी केन्द्र सरकार सीधे जवाबदेह है। 

गांधी की पुण्यतिथि पर गोडसे की सोच एक बेकसूर नौजवान की हथेली से लहू बहा गई, और इससे भी अधिक खतरनाक बात यह रही कि खून के इस खेल को वहां तैनात पुलिस स्टेडियम की गैलरी से क्रिकेट की तरह देखती रही।  
-सुनील कुमार


Date : 30-Jan-2020

इस नौबत का मजा लेने के 
बजाय फिक्र करनी चाहिए

जो एक छोटी सी घटना होकर जांच का सामान हो सकती थी, उसने शहरी हिन्दुस्तान के एक तबके में खलबली मचा दी, और सोशल मीडिया उबलने लगा। हुआ यह कि एक टीवी समाचार चैनल के मुखिया, और देश भर में अपने हमलावर तेवरों, कांग्रेसविरोध, मुस्लिमविरोध, पाकिस्तानविरोध, और मोदीभक्ति के लिए मशहूर अर्नब गोस्वामी से एक हवाई सफर में कुणाल कामरा नाम के एक मशहूर कॉमेडियन ने सवाल करना शुरू किए और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी। आमतौर पर अपने चैनल के जीवंत प्रसारण में चीखने के लिए मशहूर अर्नब ने कुणाल के तीखे जुबानी सवालों के जवाब में मुंह भी नहीं खोला। लेकिन इस घटना पर केन्द्रीय विमानन मंत्री ने नाराजगी का एक ट्वीट किया, और उसके साथ ही इस एयरलाईंस ने कुणाल कामरा के सफर पर छह महीने के लिए रोक लगा दी। कुछ ही देर में एक-एक करके चार एयरलाईंस ने रोक लगाई, और इंटरनेट पर यह भी आने लगा कि भारतीय रेल भी बदसलूकी करने वाले मुसाफिरों पर ऐसी रोक लगा सकती है। इंटरनेट पर यह भी बहस चल रही है कि क्या एयरलाईंस की ऐसी रोक जायज और कानूनी है, या फिर मोदी की बुरी तरह खिल्ली उड़ाने वाले इस कॉमेडियन पर उसकी सोच या उसके काम की वजह से एक बहाना तलाशकर ऐसी रोक लगाई गई? लोगों ने कुणाल कामरा के लिखे हुए ऐसे कुछ ट्वीट भी पोस्ट किए हैं जिनमें उन्होंने राहुल गांधी की भी बहुत तेजाबी अंदाज में खिल्ली उड़ाई है। 

वैसे तो यह बात बहुत अधिक नहीं बढऩी थी क्योंकि कुणाल कामरा जिस आदमी से सवाल कर रहे थे, चाहे वे बिना हक के ही कर रहे थे, वह आदमी हर रात हिन्दुस्तान के अपने मनचाहे शिकारों से सवाल करता है, और यह कहते हुए करता है कि देश यह जानना चाहता है। लोगों को निशाना बनाते हुए अर्नब अपने आपको देश मानकर सवाल करता है, और मनचाहा जवाब न मिलने पर धज्जियां उड़ाने का अपना सर्वाधिकार सुरक्षित भी रखता है। अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के नाम पर कमाने, खाने, और चैनल के मालिक बनने तक का अर्नब का सफर ऐसे बहुत से जुबानी हमलों को बढ़ावा देने वाला है जिनमें हवाई सफर कर रहे नेताओं से जबर्दस्ती इंटरव्यू कर रही अपनी रिपोर्टर को वे एक नायिका की तरह पेश कर चुके हैं। तेजस्वी यादव से विमान में अर्नब के चैनल की रिपोर्टर हमलावर अंदाज में जबर्दस्ती इंटरव्यू करते उन्हीं के चैनल पर बहादुरी की तरह पेश की जा चुकी हैं। ऐसे में अभिव्यक्ति के कारोबार के एक मुखिया या सरगना को शायद एक कॉमेडियन के सवालों में कॉमेडी भी देखनी थी। लेकिन एक मुसाफिर की हैसियत से सवालमुक्त सफर का उनका हक अपनी जगह कायम तो है ही। 

अब यह मामला कानूनी जांच-पड़ताल के लिए जाएगा क्योंकि एयरलाईंस और भारत सरकार के नियम ऐसे प्रतिबंध के बाद एक जांच जरूरी मानते हैं। इसके साथ-साथ हो सकता है कि यह कॉमेडियन या उसके कोई हिमायती इन प्रतिबंधों को लोकतांत्रिक और सरकार के बदले की भावना करार देते हुए अदालत भी जाएं, और जनता की अदालत में तो यह मामला आज है ही। ऐसे में देश की किसी भी नागरिक पर उसकी जुबान की वजह से इस किस्म का व्यापक प्रतिबंध लगाना पहली नजर में गैरकानूनी और नाजायज दोनों ही इसलिए लगता है कि किसी के तीखे सवालों से विमान की हिफाजत खतरे में पडऩे का तर्क बहुत ही बचकाना या बदनीयत, या दोनों ही लगता है। खासकर तब जब अब तक की खबरों के मुताबिक अर्नब गोस्वामी की ओर से कोई रिपोर्ट नहीं लिखाई गई है, और एयरलाईंस ने भी पुलिस को कोई रिपोर्ट नहीं दी है। ऐसे में लोगों को यह भी याद पड़ रहा है कि किस तरह कुछ बरस पहले केन्द्र में सत्तारूढ़ एनडीए के उस वक्त के एक भागीदार दल, शिवसेना का एक सांसद एयरलाईंस कर्मचारी को अपनी चप्पल से पच्चीस बार पीटते कैमरे में कैद हुआ था, और उसने बाद में अपना यह जुर्म कबूल भी किया था। दिल्ली हवाई अड्डे पर उसने यह चप्पलबाजी इसलिए की थी कि उसे विमान में बिजनेस क्लास में सीट नहीं दी गई थी क्योंकि उस विमान में सिर्फ इकानॉमिक क्लास ही थी। इसकी शिकायत सरकारी एयरलाईंस के कर्मचारी ने दिल्ली पुलिस में की थी, और उसके बाद से अब तक इस सांसद पर हुई कार्रवाई सुनाई नहीं पड़ी है। अभी कुछ हफ्ते पहले दिल्ली से भोपाल आ रहे विमान में चर्चित सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने उस समय हंगामा खड़ा कर दिया जब इमरजेंसी दरवाजे के बगल की सीट उन्हें नहीं दी गई क्योंकि वहां सिर्फ मजबूत सेहत के लोगों को जगह दी जाती है जो कि किसी आपात स्थिति में और मुसाफिरों की मदद कर सकें, और साध्वी प्रज्ञा पहियों की कुर्सी पर चलने वाली, शारीरिक दिक्कतों वाली हैं। इस हंगामे की वजह से विमान पौन घंटे लेट उड़ पाया था, और आतंक के जुर्म वाले मुकदमे झेल रही, जमानत पर रिहा इस सांसद पर इस हंगामे और देर के लिए एयरलाईंस ने कोई कार्रवाई नहीं की थी, न ही भारत सरकार ने, या उसकी किसी एजेंसी ने। अब ऐसे में तमाम बड़े नेताओं की, और खासकर मोदी-शाह की, खिल्ली उड़ाने वाले एक कॉमेडियन पर ऐसी बड़ी कार्रवाई करने के लिए गलाकाट मुकाबला करने में जुट गईं एयरलाईंस मासूम नहीं लगती हैं। और फिर बिना किसी औपचारिक शिकायत के केन्द्रीय विमानन मंत्री का सोशल मीडिया पर उतरकर इस तरह का हमला करना भी जायज नहीं लगता है। एक बहुत ही तेज-तर्रार स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा के समर्थन में सोशल मीडिया जिस तरह टूट पड़ा है, उससे लगता है कि सरकार, और उसके दबाव में कार्रवाई कर रहीं उड़ान-कंपनियों से सरकार को बदनामी और सरकार की खिल्ली उड़ाने वाले इस कॉमेडियन को शोहरत ही मिली है। सरकार के शुभचिंतकों को इस नौबत का मजा लेने के बजाय अपनी सरकार की फिक्र करनी चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 29-Jan-2020

उस दिन देश की पुलिस भी 
जजों को बचाने नहीं रहेगी

दिल्ली का चुनाव बड़ा दिलचस्प हो गया है। इस केन्द्र प्रशासित प्रदेश की विधानसभा का चुनाव मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो अपने चेहरे पर लड़ ही रहे हैं, लगातार तीन कार्यकाल मुख्यमंत्री रहने वाली शीला दीक्षित की पार्टी इस कदर हाशिए पर जा चुकी हैं कि उसे लोग प्रासंगिक भी नहीं मान रहे हैं। यह भी नहीं मान रहे हैं कि वह वोट काटकर किसी दूसरे का बुरा भी कर सकती है। ऐसे में भाजपा कुछ राज्यों में मुख्यमंत्री के चेहरे सामने रखने के बाद शिकस्त खाकर अब बेचेहरा चुनाव लड़ रही है, और मोदी-शाह के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं। बात यहां तक रहती तब भी ठीक था, लेकिन भाजपा के कुछ बड़े नेता चुनाव प्रचार में जिस दर्जे की बातें कर रहे हैं, वे एक घनघोर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की हिंसक और अश्लील कोशिश से अधिक कुछ नहीं है। केन्द्र सरकार में वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर जिस तरह भाजपा की चुनावी आमसभा में, देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को, जैसे नारे लगवा रहे हैं, वह बात हक्का-बक्का करने वाली है। दूसरी तरफ मानो यह काफी नहीं था तो दिल्ली के भाजपा सांसद, और वहां के एक वक्त के मुख्यमंत्री साहेब सिंह वर्मा के बेटे, प्रवेश वर्मा ने देश की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी के साथ कैमरे पर बातचीत करते हुए शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन को लेकर कहा कि अगर ये प्रदर्शन जारी रहे तो प्रदर्शनकारी लोगों के घरों में घुस सकते हैं, और उनकी बहन-बेटियों से बलात्कार कर सकते हैं। प्रवेश वर्मा भाजपा के मौजूदा सांसद हैं, और उनकी यह भाषा है- दिल्ली वालों को सोच-समझकर फैसला लेना पड़ेगा, ये लोग आपके घरों में घुसेंगे, आपके बहन-बेटियों को उठाएंगे, उनको रेप करेंगे, उनको मारेंगे। 

पिछले जाने कितने ही ऐसे चुनाव हो चुके हैं जिनमें दिए गए भाषणों को लेकर यह लगता है कि अब सोच और जुबान दोनों गटर की गहराई पर पहुंच चुके हैं, और इससे अधिक घटिया और कुछ नहीं हो सकता। फिर कुछ महीनों के भीतर किसी और राज्य के चुनाव सामने आते हैं और कुछ दूसरे लोग उससे भी अधिक घटिया बात कहते हैं, उससे भी अधिक हिंसक, उससे भी अधिक हमलावर। और जैसा कि हाल के बरसों में चुनाव आयोग का रूख रहा है, वह ऐसे बयानों का पूरा असर हो जाने तक महज अपनी जांच करता है, नोटिस जारी करके जवाब मांगता है, और फिर आखिर में एक या दो दिनों के लिए ऐसे नेताओं को प्रचार से परे कर देता है। लेकिन ऐसे नेताओं के नेता, उनकी पार्टियां, देश की अदालतें मौन साधे हुए यह पूरा सिलसिला देखते रहते हैं। चुनाव आयोग एक पूरी तरह बेअसर और बोगस संस्था होकर रह गई है जो कि एक मशीनी अंदाज में चुनाव को निपटाती है, और अपने को कामयाब कहती है। तकनीक और प्रक्रिया की कामयाबी भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव आयोग की कामयाबी नहीं कही जा सकती। जब देश में नफरत और हिंसा को भड़काकर, साम्प्रदायिकता को खौलाकर, तेजाबी जुबान से हिंसा के फतवे जारी करके लोगों को गोली मारने की बात कही और कहवाई जा रही हो, तब चुनाव आयोग का हाथ पर हाथ धरकर बैठना देखने लायक है। 

हिन्दुस्तानी चुनावों में अब चुनाव आयोग एक मशीन से अधिक कुछ नहीं रह गया है, और सुप्रीम कोर्ट को यह सोचना चाहिए कि क्या यह मशीन काफी है, असरदार है, और क्या इसे इसी हाल पर छोड़ देना चाहिए? लेकिन अब सवाल यह उठता है कि यह सुप्रीम कोर्ट खुद किन्हीं ऊंचे आदर्शों पर काम करते नहीं दिखता, और इसके फैसले कई बार ऐसा महसूस कराते हैं कि यह अदालत सरकार के एक और विभाग की तरह काम कर रही है। यह सड़कों पर सत्तारूढ़ और सरकारी हिंसा को रोकने की अपील पर एक खोखला आदेश देती है कि पहले सड़कों पर हिंसा रूके, तब वह हिंसक घटनाओं पर सुनवाई करेगी। जिन्हें इस आदेश के पीछे और सामने के कानूनी पहलू समझ में आएंगे उन्हें यह आदेश एक लतीफे जैसा लगेगा कि मानो शहंशाह अकबर अनारकली से कह रहे हों कि सलीम तुझे मरने नहीं देगा, और हम तुझे जीने नहीं देंगे। देश की सबसे बड़ी अदालत हिंसा के शिकार लोगों से यह कहे कि जब हिंसा रूक जाएगी, तभी वे हिंसा पर सुनवाई करेंगे, तो यह हमलावरों का साथ देने जैसा अदालती रूख है। इसलिए ऐसी अदालत से चुनाव आयोग पर किसी कड़ाई बरतने की उम्मीद नहीं की जा सकती, और इसी दिल्ली में अपने बड़े बंगलों, और बड़ी अदालतों में महफूज बैठे जजों को इस बात में कुछ खतरनाक नहीं लगता कि देश की आबादी के एक हिस्से को देश का गद्दार कहकर उसे गोली मारने के नारे लगवाए जा रहे हैं। चूंकि ये नारे आज सुप्रीम कोर्ट जजों के खिलाफ नहीं हैं, चुनाव आयुक्तों के खिलाफ नहीं हैं, इसलिए वे बेफिक्र हैं। लेकिन ऐसी बेफिक्री लंबे समय तक चलेगी नहीं। एक दिन ऐसा आएगा जब सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला इस हिंसक भीड़ और इन हिंसक नेताओं को पसंद नहीं आएगा, उस दिन नारा लगेगा, कोर्ट के गद्दारों को, गोली मारो सालों को, और उस दिन देश की पुलिस भी जजों को बचाने के लिए नहीं रहेगी। 

लेकिन यही सुप्रीम कोर्ट है जिसने गुजरात दंगों में 33 लोगों को जिंदा जलाने वाले, हाईकोर्ट से सजा पाए हुए 17 लोगों को अभी इस शर्त पर जमानत दी है कि वे लोग आध्यात्म के रास्ते पर चलें। इस देश में आध्यात्म के रास्ते पर चलने वाले बहुत से बाबा, बापू, संत कहे जाने वाले लोग नाबालिगों से बलात्कार, लोगों को बधिया बनाने, और कत्ल करने-करवाने के एवज में जेल में कैद काट रहे हैं। अब जेल में सजा काट रहे ऐसे लोगों को आध्यात्म का काम करने की शर्त पर जमानत दी गई है जिन्होंने गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों में 33 लोगों को जिंदा जलाकर मार डाला था। इस फैसले के बाद क्या इस देश की जेलों में सजा के खिलाफ अपील करने वाले किसी भी और मुजरिम को एक दिन भी कैद में रखने का हक सुप्रीम कोर्ट को रह जाता है? 
-सुनील कुमार


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