संपादकीय

Posted Date : 15-Nov-2018
  • भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति, या राजनीतिक चुनाव एक ऐसा जटिल समीकरण हैं कि जिसका जोड़-घटाना, जिसका गुणा-भाग लोगों के सिर के ऊपर से निकल जाता है। हर प्रदेश में सरकारें अपनी राजनीतिक विचारधारा और वायदों के मुताबिक अलग-अलग किस्म से काम करती हैं। कहीं वे कम बेईमान होती हैं, और कहीं पर अधिक बेईमान भी। गिनी-चुनी एक-दो सरकारें ऐसी भी रहती हैं जो बेईमानी से परे रहती हैं, लेकिन फिर भी वे पश्चिम बंगाल या त्रिपुरा की तरह सत्ता से बाहर कर दी जाती हैं। दूसरी तरफ बहुत सी जगहों पर भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट पार्टियां चुनाव जीत भी जाते हैं। लोगों को अविभाजित मध्यप्रदेश के आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कही हुई एक बात याद पड़ती है, और खटकती भी है, कि चुनाव विकास से नहीं, मैनेजमेंट से जीता जाता है। दिग्विजय सिंह की मैनेजमेंट की समझ कमजोर रही होगी जो वे दस बरस मुख्यमंत्री रहकर मध्यप्रदेश खो बैठे, और ऐसा खोए कि उनकी पार्टी तब से अब तक सत्ता पर वापिस नहीं आ सकी। 
    लेकिन कुछ दूसरे प्रदेशों में ऐसा भी देखने में आया है कि सरकार ने खूब जमकर काम किया, जनकल्याण का काम भी किया, और प्रदेश का विकास भी किया। और इसके साथ-साथ चुनाव के वक्त पर जमकर तैयारी की, और जमकर खर्च भी किया। मैनेजमेंट भी अच्छा किया, और इन सबसे सत्ता में वापिसी भी हुई। इसलिए भारत के प्रदेशों में राज्य सरकारों का चुनाव कई बार समझ से परे भी हो जाता है कि जिसके जीतने की उम्मीद रहती है, वह पार्टी निपट जाती है, और पीछे चल रही पार्टी को लोग घोड़ी पर बिठाकर दूल्हा बना देते हैं। 
    छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, हिन्दी भाषी भारत के ये तीन राज्य अभी चुनाव से गुजर रहे हैं। इन तीनों में भाजपा की सरकार हैं, और इन तीनों राज्यों का वोटरों का मिजाज अलग-अलग किस्म का माना जाता है। इन तीनों में सरकार के मुखिया, मुख्यमंत्रियों के तौर-तरीके अलग-अलग माने जाते हैं, दिखते हैं। तीनों राज्यों में मुद्दे अलग-अलग हैं, और एक तरफ जहां राजस्थान आंदोलनों का शिकार रहा है, जहां पर मुख्यमंत्री का मिजाज राजसी है, जहां मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष से टकराव भी लेते रहती हैं, वहां पर सत्ता जाने की खबर सुनाई पड़ रही है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश है जहां पर भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने गरीबों के कल्याण के दिखने वाले अनगिनत कार्यक्रम लागू किए, अपने आपको खुद होकर प्रदेश की महिलाओं का भाई, बच्चियों का मामा घोषित किया, जहां एक आक्रामक हिन्दुत्व का एजेंडा सामने रखा, और बुरी चर्चाओं से घिरे हुए साधुओं को भी मंत्री का दर्जा दिया, लेकिन प्रदेश जातिवाद और साम्प्रदायिकता से उठ नहीं पाया। अब इस दौर का तीसरा राज्य छत्तीसगढ़ है जहां मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने एक सज्जन आदमी की छवि पाई है जो कि लोगों से राजनीतिक बदला नहीं लेता। उन्होंने पिछले पन्द्रह बरस में पार्टी के भीतर बेमिसाल और बेचुनौती लीडरशिप भी पाई है, और सबसे गरीब लोगों के लिए लागू की गई योजनाओं में अभूतपूर्व कामयाबी भी दर्ज की है। लेकिन बाकी दोनों राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी सत्तारूढ़ नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं, सरकारी मशीनरी में भी ईमानदारी कम है, और हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद राज्य में बेमिसाल ढांचा विकसित हुआ है। छत्तीसगढ़ में अधिक करीब से देखने पर यह भी दिखा है कि सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार ने मिलकर मौजूदा चुनाव के साल भर पहले से मिलकर जमकर तैयारी की है, और शायद इससे अधिक कोई चुनावी तैयारी हो नहीं सकती है। ऐसी चर्चा जरूर है कि पार्टी ने मुख्यमंत्री की मर्जी के खिलाफ बहुत से ऐसे लोगों को टिकट दिया है जिनके जीतने पर खतरा है। लेकिन यहां पर दिग्विजय सिंह की वह बात लागू होती है कि चुनाव मैनेजमेंट से जीता जाता है, और छत्तीसगढ़ में सत्ता में यह मैनेजमेंट खूब कर रखा है। पन्द्रह बरस से विपक्ष में रही कांग्रेस पार्टी के पास इस मैनेजमेंट के मुकाबले की क्षमता नहीं है, तैयारी नहीं है, लेकिन कांग्रेस जनता के भरोसे है कि वही अगर सत्ता पर बिठाने पर आमादा हो जाएगी, तो उसे कौन रोक सकता है। छत्तीसगढ़ के चुनाव शुरू हो चुके हैं, और आज से हफ्ते भर के भीतर आखिरी वोट भी डल चुका होगा। इतने जटिल समीकरण वाले भारतीय चुनाव के नतीजों का कई किस्म से विश्लेषण किया जा सकेगा कि किन बातों की वजह से कौन सी पार्टी या कौन से नेता जीते या हारे। फिलहाल छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से डॉ. रमन सिंह ने दिग्विजय के शब्दों में मैनेजमेंट तो पूरा किया ही है, लेकिन दिग्विजय को गैरजरूरी लगने वाला विकास भी उन्होंने खूब किया है, अब देखना यह है कि पन्द्रह बरस के बाद जनता पर सत्तारूढ़ पार्टी, उसके उम्मीदवारों, और उसके कामकाज का मिलाजुला असर वोटों में तब्दील करने का मैनेजमेंट कामयाब होता है या नहीं।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 14-Nov-2018
  • देश की एक प्रमुख पत्रिका के ताजा अंक में कई और महिला पत्रकारों के शोषण के मामले उठाए गए हैं। और अब पत्रिका की इस रिपोर्ट से कई खबरें बन रही हैं, और बड़े-बड़े लोगों के नाम सामने आ रहे हैं कि उन पर किस तरह के आरोप लगे हैं। ऐसे ही एक बड़े नाम को लेकर यह जानकारी सामने आई है कि जिस मीडिया संस्थान से उसे हटाया गया था, अब उसी में बड़े ओहदे पर उसे वापिस लाया गया है क्योंकि वह कामयाबी दिलाने वाला माना जाता है। कई दूसरे संस्थानों की खबरें आ रही हैं कि उन्होंने शिकायतें मिलने पर भी अपने बड़े-बड़े लोगों के खिलाफ न ठीक से जांच की, और न ही कोई कार्रवाई की। 
    मी-टू नाम से दुनिया भर में चल रहा यह आंदोलन जितना जोर पकड़ रहा है, और जितने बड़े-बड़े लोगों को अपना काम खोना पड़ रहा है, साख खोनी पड़ रही है, उससे एक बात अच्छी भी होने जा रही है। ऐसी तोहमतों के चलते दूसरी महिलाओं का हौसला बढ़ रहा है, और ऐसे मामले भांडाफोड़ होने से कामकाज की जगह पर महिला-शोषण में दिलचस्पी रखने वाले बड़े ओहदों वाले लोगों की अक्ल ठिकाने आना तय है। दस-बीस बरस पहले, या दस-बीस हफ्ते पहले जो बातें हो गई हैं, वे बिना किसी सुबूत, महज बयान की बुनियाद पर पता नहीं अदालत में कितनी टिक पाएंगी, लेकिन उससे यह तो जरूर ही हो रहा है कि आगे ऐसा शोषण करने के पहले लोग सौ बार सोचेंगे कि उनके भविष्य में जाकर कभी ऐसी बातें कब्र फाड़कर निकल सकती हैं, और उनका बुढ़ापा बर्बाद कर सकती हैं।
    दूसरी तरफ संस्थानों के मैनेजमेंट के लिए भी अब संभलकर बैठने के दिन आ गए हैं क्योंकि वे ऐसे हर शोषण के खिलाफ माहौल बनाने और कार्रवाई करने की एक पारदर्शी प्रक्रिया बनाने के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार हैं। जब महिलाओं में देश के कानून और अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, जब उनमें बोलने का हौसला बढ़ रहा है, जब एक महिला का साथ देने दूसरी महिला भी सामने आ रही है, तब संस्थानों के लिए पहले की तरह का लापरवाह बर्ताव जारी रखना बड़ा महंगा और भारी पड़ सकता है। हमारा ख्याल है कि अब यह समय आ गया है कि सरकार, समाज, और ट्रेड-उद्योग के संगठनों को मिलकर, दूसरे किस्म के संस्थानों के संगठनों को मिलकर यह जागरूकता फैलाने की जरूरत है कि कैसी-कैसी सावधानी बरती जानी चाहिए, और शिकायत आते ही किस तरह की कार्रवाई करनी चाहिए। दूसरी बात यह भी है कि परिवार के स्तर पर भी लोगों को अपने नौजवान, अधेड़ या बूढ़े सदस्यों के सामने ऐसे खतरों को रखना चाहिए, और उनसे भी सावधानी बरतने को कहना चाहिए क्योंकि कानूनी जिम्मेदारी चाहे शोषण के आरोप झेलने वाले को अकेले झेलनी पड़े, सामाजिक प्रताडऩा तो परिवार के तमाम लोगों को झेलनी पड़ती है। आज शोषण की शिकार महिलाओं को अपनी बात उठाने के लिए स्थापित मीडिया की जरूरत भी नहीं रह गई है, और वे मुफ्त के सोशल मीडिया पर जाकर भी अपनी तकलीफ बयां कर सकती हैं। इसलिए यह हर किसी के अधिक सावधान होने का वक्त है, अपने-आपको अधिक काबू में रखने का वक्त है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 13-Nov-2018
  • भारत आए हुए ट्विटर के सीईओ के साथ राहुल गांधी सहित कुछ लोगों की मुलाकात हुई और इस बात पर फिक्र हुई कि अफवाह और फेक न्यूज को कैसे रोका जाए। आज ही देश के एक बड़े हिन्दी समाचार चैनल ने सार्वजनिक रूप से कुछ तस्वीरों को दिखाकर कहा है कि उसके स्क्रीनशॉट के साथ दिखाई गईं ये तस्वीरें नकली हैं, और एक नेता के जो बयान उसकी स्क्रीन पर दिखाए जा रहे हैं उनसे उनका कोई लेना-देना नहीं है। अभी-अभी बीबीसी और कुछ दूसरे संस्थानों ने फेक न्यूज पर फिक्र करते हुए एक कार्यक्रम भी किया है। जिन लोगों के हाथ में मोबाइल फोन है, और जो वॉट्सऐप जैसे संदेशों को देखते हैं, या फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर रहते हैं वे जानते हैं कि किस तरह और कितने झूठ रात-दिन फैलाए जा रहे हैं। इन दिनों हिन्दुस्तान के तीन बड़े राज्यों में चुनाव चल रहा है, इसलिए झूठ को गढऩे और फैलाने का काम भारी रफ्तार से चल रहा है, और पहली नजर में किसी समझदार को जो झूठ दिख जाए, उसे भी लोग शायद जानते-समझते हुए आगे बढ़ाते चलते हैं।
    अब एक तरफ तो भारत में आईटी कानून इतना कड़क बनाया गया है कि उसमें लंबी-चौड़ी सजा का इंतजाम है, लेकिन उसका असर शून्य दिखता है। झूठ को आगे बढ़ाते हुए शायद ही कोई जरा सी भी फिक्र करते हों कि उन पर कोई कानूनी कार्रवाई हो सकती है। नतीजा यह है कि किसी अच्छे काम को तो आगे बढ़ाने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं रहती, नफरत और झूठ को आगे बढ़ाने में लोग अपना ढेर सारा वक्त लगाकर दूसरे नफरतजीवी लोगों को अपने से जोड़ते हैं, उनसे रिश्ता कायम रखते हैं। ऐसे में भारत में जिन एजेंसियों पर ऐसे झूठ पकडऩे की जिम्मेदारी है, उनको अधिक इंतजाम करने की जरूरत है। ऐसा भी नहीें है कि ऑनलाईन और डिजिटल माध्यमों से फैलाए जा रहे झूठ की साजिश को पकडऩा मुश्किल हो। आज भारत में अधिकतर लोग डिजिटल-शिक्षित नहीं हैं, और वे लापरवाही से सुबूत छोड़ते चलते हैं। वे मानो कदम-कदम पर उंगलियों के निशान और जूतों के निशान छोड़ते जाते हैं। ऐसे में नमूने के तौर पर ही अगर हर दिन दो-चार लोग सजा पा सकें, तो भी बाकी लोगों का हौसला पस्त होगा। 
    दरअसल डिजिटल औजार इस तेजी से बाजार में आए हैं कि उनको हथियार में तब्दील करना आसान काम था, और उनको पकडऩे का इंतजाम उसके मुकाबले खासा मुश्किल। नतीजा यह है कि जिस तरह बैंक और एटीएम या क्रेडिट कार्ड फ्रॉड करने वाले ठग पुलिस या जांच एजेंसियों से सौ कदम आगे-आगे चलते हैं, उसी तरह इंटरनेट और सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाले लोग भी पुलिस से बहुत आगे चलते हैं। भारत में राज्य सरकारों को, और केन्द्र सरकार को भी अपने पुराने ढर्रों को बदलने की जरूरत है, और आज की टेक्नालॉजी के साथ बढ़ रहे फेक न्यूज जैसे अपराधों को रोकने के लिए उसे भी नई कंपनियों के अंदाज में नए विशेषज्ञों की सेवाएं लेनी पड़ेगी। वर्दीधारी पुराने पुलिस वाले इस काम को नहीं कर पाएंगे, लेकिन आज इससे जो खतरा पैदा हुआ है वह पूरे देश की एकता को टुकड़ा-टुकड़ा कर देने वाला है, और सरकारों से परे आम लोग भी ऐसे झूठ का भांडाफोड़ कर सकते हैं, यह सबकी साझी जिम्मेदारी है। 
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 12-Nov-2018
  • पखवाड़े भर पहले सुप्रीम कोर्ट ने देश की राजधानी दिल्ली समेत पूरे एनसीआर में 15 साल पुराने पेट्रोल वाहन और 10 साल पुराने डीजल वाहन चलाए जाने पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसी गाडिय़ां यहां चलती नजर आएं तो उन्हें तुरंत जब्त कर लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे पुराने वाहनों को बैन करने के एनजीटी के 2015 के आदेश को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं। एनसीआर में  ऐसे वाहनों के खिलाफ पहले से अभियान चल रहा है। 
    दिल्ली में कई बरस पहले पन्द्रह बरस से अधिक पुरानी डीजल गाडिय़ां पर रोक लगाई गई थी, और उस वक्त बड़े विरोध के बीच भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की वजह से वह लागू हुई, और कुछ बरस शायद दिल्ली में डीजल-प्रदूषण घटा भी था। अब वहां पर ऐसे ही प्रतिबंध को बढ़ाया जा रहा है, और विरोध के बीच लोगों को उम्मीद है कि इस रोक से हवा कुछ और साफ हो सकती है। लगातार ऐसे मेडिकल सर्वे के आंकड़े आ रहे हैं कि देश की इस राजधानी में किस तरह ग्यारह फीसदी लोग अस्थमा जैसी सांस की बीमारियों को झेल रहे हैं क्योंकि वे दिल्ली की हवा का प्रदूषण नहीं झेल पा रहे हैं। 
    लेकिन बात आज सिर्फ दिल्ली की नहीं है, देश के दूसरे शहरों की भी है। एक तरफ तो केन्द्र सरकार राज्यों को तोहफे के टोकरे की तरह कुछ स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए देने जा रही है, दूसरी तरफ जो मौजूदा शहर हैं, उनकी बदहाली किसी से छुपी हुई नहीं है। भारत के अधिकतर शहरों का ढांचा बढ़ती हुई आबादी के लायक बना भी नहीं था, उनका योजनाबद्ध विकास भी नहीं हुआ था, और देश में शहरों की तरफ लोगों का गांव छोड़कर आना बड़ी रफ्तार से हुआ है। इसके साथ-साथ शहरी आबादी की संपन्नता बढऩे से, और सार्वजनिक परिवहन की सहूलियत न रहने से देश के अधिकतर शहरों में निजी गाडिय़ां खूब बढ़ीं, उन गाडिय़ों से प्रदूषण बढ़ा, और उन गाडिय़ों से होने वाले ट्रैफिक जाम से प्रदूषण और भी बढ़ गया। लेकिन आज देश के अधिकतर राज्य स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव बनाकर केन्द्र सरकार से सैकड़ों-हजारों करोड़ पाने की उम्मीद में हैं, लेकिन मौजूदा शहरों को स्मार्ट बनाना, उन्हें जीने लायक बनाना प्राथमिकता में नहीं दिखता। 
    देश की राजधानी में बढ़ती गाडिय़ों और बढ़ते ट्रैफिक जाम की वजह से जो प्रदूषण बढ़ा था, उसको कम करने में पुरानी गाडिय़ों को हटाना एक इलाज रहा, और दूसरी बड़ी बात दिल्ली मेट्रो रही, जिस पर रोज दसियों लाख लोग चलते हैं, और बिना प्रदूषण बढ़ाए चलते हैं। समय भी बचता है, किफायत भी होती है, और पार्किंग की जगह भी नहीं लगती। यह काम मुम्बई में आधी-पौन सदी से चल रहा है, और वहां की लोकल ट्रेन मुम्बई की जिंदगी की नस-नाड़ी जैसी है, जिसके बिना एक पल भी मुम्बई की धड़कन नहीं चल सकती। इनसे सबक लेकर देश के बाकी शहरों को सार्वजनिक परिवहन पर जोर देना चाहिए, और उनको कमाई का धंधा बनाने के बजाय राज्य सरकारों को घाटे में भी बसें चलानी चाहिए, क्योंकि उनसे शहर की मौत टलेगी। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में बरसों से यह देख रहे हैं कि केन्द्र सरकार की मदद से सिटी बसें तो आ गईं, लेकिन न तो उनका आल-जाल ऐसा बनाया गया कि लोग निजी गाडिय़ों पर निर्भर न रहें। आज भी चुनिंदा रास्तों पर बसें चलती हैं, और लोगों का बाकी रास्तों पर जाना इन बसों से नहीं हो पाता। ऐसे में निजी गाडिय़ों का इस्तेमाल कम नहीं हो सकता। 
    दूसरी बात यह कि केन्द्र सरकार की मदद से मिलने वाली ऐसी बसों की जानकारी राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को महीनों पहले से रहती है, लेकिन हाल यह है कि इनको खड़ा करने की जगह का इंतजाम भी बसों के आने के बाद तक नहीं हो पाता, और इस्तेमाल भी शुरू नहीं हो पाता। देश के छोटे शहरों में भी सड़क पर गाडिय़ों का प्रदूषण भयानक बढ़ा हुआ है, और सार्वजनिक-सिटी बसों को चलाना एक किस्म से बीमारी को रोकने का काम भी मानना चाहिए। लोगों को अस्थमा जैसी बीमारी हो, और फिर उसके बाद सरकार इलाज पर खर्च करे, उसके बजाय वह खर्च आज अगर सड़क पर प्रदूषण घटाने में हो, तो वह अधिक काम का है और सरकार को सस्ता भी पड़ेगा। राज्यों को अपने शहरों में पुरानी गाडिय़ों पर रोक लगाने, और डीजल की गाडिय़ों को शहर के  बाहर करने जैसी सावधानी किसी अदालती आदेश के पहले भी खुद होकर करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई चौकन्नापन दिखाई नहीं पड़ता है, और नई राजधानी, या स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव को ही प्रदेश का भविष्य मानना ठीक नहीं है। मौजूदा शहरों में बसों का इंतजाम इतना पुख्ता करना चाहिए कि लोग अपनी निजी मोटरसाइकिलों, या गाडिय़ों को जरूरी न पाएं।
    - सुनील कुमार 

     

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Posted Date : 11-Nov-2018
  • एक बड़े हिन्दी समाचार चैनल की एक वीडियो क्लिप चारों तरफ तैर रही है जिसमें भाजपा के सबसे हिंसक बात करने वाले राष्ट्रीय प्रवक्ता संदीप पात्रा एक मुस्लिम नेता को जीवंत प्रसारण के बीच धमकाते हुए कह रहे हैं- अरे सुनो, अल्लाह के भक्त हो तो बैठ जाओ, वरना किसी मस्जिद का नाम बदलकर भगवान विष्णु के नाम रख दूंगा। 
    अपने पैनल पर बुलाए गए किसी प्रवक्ता की कही ऐसी बातों पर टीवी चैनल को भी कोई दिक्कत नहीं रही, दूसरी तरफ उस पैनल में बैठे हुए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के प्रवक्ताओं ने भी इस पर कुछ नहीं कहा। यह नौबत देश में खुलकर साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने में एक मौन सहमति का कुसूरवार इन तमाम लोगों को साबित कर रही है, और चैनल, बाकी पैनलिस्ट एक मुस्लिम नेता को ऐसे हमले के सामने अकेला छोड़कर, और चुप रहकर अपना नजरिया साफ कर दे रहे हैं। कोई हैरानी नहीं है कि देश के मुस्लिम धीरे-धीरे कांग्रेस को छोड़कर जा चुके हैं, और समाजवादी पार्टी भी मुस्लिमों के बीच अपनी बुनियाद खोती जा रही है। अब सवाल राजनीति से परे मीडिया का है जो कि पिछली चौथाई सदी में इस्तेमाल में आया शब्द है, जिसके पहले तक इसके लिए प्रेस या अखबारनवीसी का इस्तेमाल होता था। 
    राजनीति में तो लोगों के गंदे और हिंसक बयान चलते ही आए हैं, लेकिन अब समाचार चैनल अपने आपको मुकाबले में दूसरे चैनलों से आगे बढ़ाने के लिए ऐसी गलाकाट स्पर्धा में लगे दिखते हैं जिसमें अक्सर यह लगता है कि उस पर होती नोंक-झोंक, उस पर चलती हिंसक और साम्प्रदायिक बातचीत के पीछे एक सोची-समझी साजिश रहती है। कमअक्ल दर्शकों को बांधे रखने के तौर-तरीकों को रोज नया-नया ढूंढना आसान नहीं होता है, और ऐसे में चैनल कहीं किसी बाबा को पकड़ लाते हैं, तो कहीं किसी बेबी को, और उनसे हिंसक, सनसनीखेज, या अश्लील बातें करवाते हैं। दर्शकों के साथ दिक्कत यह है कि वे दिमाग पर जोर डालने वाली गंभीर बातों को देखना-सुनना नहीं चाहते, और वे अपनी जिंदगी का बचाखुचा वक्त ऐसी ही बकवास की छाया में सुकून से गुजार देना चाहते हैं। नतीजा यह है कि यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है, और लोग दूसरे को पीछे छोडऩे के लिए दूसरे से अधिक नीचे गिरने के मुकाबले में लगे रहते हैं।
    अब सवाल यह है कि इस देश में संवैधानिक दर्जा प्राप्त एक प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया है जो कि बाकी मीडिया का कामकाज तो देखता है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का काम उसके दायरे में नहीं आता। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुकर्मों पर जब उसकी निगरानी रखने वाले नेशनल ब्रॉडकॉस्टर्स एसोसिएशन की अनदेखी इस तरह हावी है, तो मीडिया का यह हिस्सा देश में आग लगाने पर उतारू दिखता है। एक दूसरी बात यह भी है कि देश का कानून भी भड़काऊ और उकसाऊ बातों पर समय रहते कोई कार्रवाई करने में पूरी तरह बेअसर दिख रहा है क्योंकि बरसों तक, अधिकतर मामलों में दशकों तक कोई कार्रवाई नहीं होती है। और अब भारत में धीरे-धीरे माहौल यह बन रहा है कि हिंसक बातें कहना लोकतांत्रिक है। जिस तरह शहरों में लोग गंदी हवा को शहरी हवा मान बैठे हैं, जिस तरह कॉमेडी शो में अश्लीलता और फूहड़ता को कॉमेडी मान लिया गया है, जिस तरह सरकारी काम को लेटलतीफी वाला और रिश्वत से ही होने वाला मान लिया गया है, उसी तरह अब सार्वजनिक बहसों में हिंसा और साम्प्रदायिकता, धमकी और गालियों को लोकतांत्रिक मान लिया गया है। यह सिलसिला थमना चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 10-Nov-2018
  • दो दिन बाद इसी वक्त छत्तीसगढ़ में डेढ़ दर्जन सीटों पर वोट डलते रहेंगे। मतदाताओं के सामने उम्मीदवारों का चेहरा, उनके चुनाव चिन्ह, उन्हें वोट देने पर बनने वाले मुख्यमंत्री, इन तमाम सवालों की भीड़ खड़ी होगी। अगर वोटर जिम्मेदारी से वोट डालें, तो यह बात एक बड़ी पहेली की तरह रहती है कि उसकी पसंद क्या होगी। और अगर वोटर लापरवाही से काम करे, तो लापरवाही से तो हर काम आसान हो जाता है, खासकर ऐसा काम जिसके लिए बाद में कोई जवाबदेही नहीं रहती, कोई सुबूत नहीं रहता। भारत के चुनाव में वोटरों का एक बड़ा हिस्सा घर बैठे रहता है, या मटरगश्ती करते रहता है, लेकिन वोट डालने नहीं जाता जो कि मुफ्त का काम है, और जिससे अगले पांच बरस तक उसका खुद का भविष्य तय होता है।
    भारत में औसत मतदान साठ फीसदी के आसपास होता है, और इसका मतलब है कि चालीस फीसदी लोग वोट नहीं डालते। दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ में पिछला चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच कुल पौन फीसदी वोटों के फासले से तय हुआ था, और वोट न डालने वाले लोगों में से थोड़े से लोग और वोट डालने आ जाते, तो पता नहीं तस्वीर क्या होती। चुनाव आयोग सहित बहुत सी संस्थाएं लगातार यह कोशिश करती हैं कि मतदान बढ़े। और यह मतदान बढऩा लोगों के लिए खासी दिक्कत की बात हो सकता है क्योंकि लोग पिछले चुनावों के साठ फीसदी, या उससे कम मतदान को ही पैमाना बनाकर आगे का काम करते हैं। किसी भी राजनीतिक दल या नेता की यह तैयारी नहीं रहती कि पिछले चुनाव के मुकाबले दस फीसदी वोट बढ़ जाएं, तो उनका क्या होगा। लेकिन मतदाता की जागरूकता बढऩा इसलिए जरूरी है कि पिछले चुनावों के आंकड़ों को लेकर जब लोग अगले चुनाव तक सीमित दिलचस्पी से सत्ता या विपक्ष का काम करते हैं, तब उनको एक झटका लगना जरूरी है ताकि पांच बरस वे टिक कर न बैठे रहें, और मेहनत करते हुए अपने पंजों पर रहें।
    चूंकि दो दिनों में ही मतदान शुरू होना है, इसलिए आम जनता के बीच के लोगों को यह चाहिए कि वे खुद तो वोट देने जाएं ही, अपने साथ वे किसी ऐसे व्यक्ति को जरूर ले जाएं जो कि खुद होकर वोट डालने जाने के उत्साही न हों। आधे से अधिक लोग वोट डालने जाते ही हैं, वे जाते हुए या लौटने के बाद एक-दो ऐसे लोगों को तलाश लें जो कि वोट डालने नहीं गए हैं, तो वोट साठ से सौ फीसदी की तरफ बढऩा शुरू हो जाएगा। यह भागीदारी इसलिए जरूरी है कि कम वोटों के पडऩे पर कई बार इतने वोटों से ही सरकार बन जाती है कि जिससे अधिक वोट घर बैठे रहते हैं। कई जगहों पर पिछले चुनाव में नोटा में इतने वोट पड़े थे जितने कि जीतने वालों की लीड में भी नहीं थे। इसलिए अगर देश की जनता का सही फैसला पाकर अगली सरकार बननी है, तो अधिक से अधिक लोगों को वोट डालने के लिए भेजना चाहिए, ले जाना चाहिए। यह एक मौका उन जिम्मेदार लोगों के लिए है जो खुद तो वोट डालने जाते हैं। ऐसे लोग अपने साथ एक-एक, दो-दो और लोगों को भी ले जाएं, तो उससे देश में राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए पूरे पांच बरस मेहनत के रहेंगे, आज की तरह की नौबत नहीं रहेगी।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 09-Nov-2018
  • कल देश की एक प्रतिष्ठित समाज-विज्ञान अध्ययन-शोध संस्थान सीएसडीएस का एक चुनावपूर्व सर्वे आया है जिसके मुताबिक राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनने का आसार है, वहां सत्तारूढ़ भाजपा पर जनता की खासी नाराजगी उतरते दिख रही है। पहले की खबरें भी कुछ ऐसी ही थीं। मध्यप्रदेश में भाजपा की सीटें घटती दिख रही हैं, कांग्रेस की बढ़ती दिख रही हैं, लेकिन सत्ता पर भाजपा काबिज बनी रहेगी ऐसा अंदाज लग रहा है। इसी के साथ छत्तीसगढ़ के बारे में इस सर्वे का अंदाज  है कि भाजपा की सीटें खासी बढ़ रही हैं, करीब दस-बीस फीसदी, और कांग्रेस की सीटें खासी घट रही हैं, दस-बीस फीसदी से कहीं अधिक, और जोगी-बसपा गठबंधन व अन्य मिलकर चार-छह सीटें पा सकते हैं। इन तीनों राज्यों में सबसे अधिक बेहतर संभावना छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार की दिख रही है जो कि पिछले पन्द्रह बरस से यहां काबिज है। राजस्थान में हर पांच बरस में सत्ता-पलट की परंपरा के मुताबिक भाजपा को पांच बरस में ही वोटर खारिज करते दिख रहे हैं। 
    छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिए यह एक बड़ी खुशी की बात हो सकती है, और यह एक धोखा भी हो सकता है अगर भाजपा के लोग इस पर भरोसा करके अभी से निश्चिंत हो जाएं कि वे जीत ही रहे हैं। सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ का यह चुनाव, मप्र-छत्तीसगढ़ के इतिहास में सबसे अनिश्चितता भरा चुनाव होने जा रहा है क्योंकि एक बार जोगी एक अलग क्षेत्रीय पार्टी बनाकर मैदान में हैं, और वे मायावती की बसपा के साथ भी हैं। इन दोनों को मिलाकर एक ऐसी ताकत बन सकती है जो कि भाजपा और कांग्रेस किसी के भी सपने तोडऩे का काम करे। इसी सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक भाजपा को 43 फीसदी, कांग्रेस को 36 फीसदी, और जोगी-बसपा को 15 फीसदी वोट मिलते दिख रहे हैं। इस सर्वे के आंकड़ों का ही विश्लेषण करें तो भाजपा करीब 7 फीसदी आगे दिख रही है, जबकि वह पिछले चुनाव में कांग्रेस से महज पौन फीसदी आगे थी। सर्वे के इन आंकड़ों को सच भी मान लें, तो भी यह बात तो है ही कि जोगी-बसपा को मिलने वाले 15 फीसदी वोट अगर घटते हैं तो वे भाजपा और कांग्रेस के बीच का संतुलन किसी भी तरफ बिगाड़ सकते हैं। 
    भाजपा को आज छत्तीसगढ़ में अगर सचमुच सरकार बनाना है,तो इस सर्वे के आंकड़ों को अधिक गंभीरता से लिए बिना उसे जमकर मेहनत करनी होगी क्योंकि छत्तीसगढ़ में हवा इस सर्वे के आंकड़ों की तरह आत्मविश्वास से भरी हुई निश्चित और निश्चिंत नहीं दिख रही है। भाजपा को ऐसे सर्वे से मिले आत्मविश्वास से बचना चाहिए क्योंकि चुनाव के माहौल में कई किस्म की लुकी-छुपी चीजें भी निकलकर बाहर आती हैं, और खेल बिगाड़ जाती हैं। आज ही सुबह भाजपा के एक सांसद का एक स्टिंग ऑपरेशन सामने आया है जिसमें वह आरएसएस को कोसता हुआ और भ्रष्ट कहता हुआ दिख रहा है। इस सांसद का बेटा आज भाजपा का उम्मीदवार है, और उसकी ऐसी बातें सुनकर संघ-भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर क्या असर होगा? एक दूसरी घोषणा सामने आई है जिसमें भाजपा के कई मंत्रियों, सांसदों, और नंदकुमार साय जैसे वरिष्ठ नेता की तस्वीरें खुफिया कैमरे के एंगल से मिल गई दिखाई गई हैं, और कहा गया है कि ये सारे स्टिंग सामने आने वाले हैं। 
    चुनाव के इस आखिरी पखवाड़े में जो सो गया, वह खो गया। अगर सचमुच ही ऐसे आधा दर्जन स्टिंग ऑपरेशन सामने आने हैं, तो सीएसडीएस का चुनावी सर्वे तो इनमें से किसी के भी असर का अंदाज नहीं लगाता है। सर्वे के नतीजे सामने आने के बाद ऐसे स्टिंग सामने आने शुरू हुए हैं। इसलिए कांग्रेस और भाजपा दोनों का अधिक भरोसे में रहना आत्मघाती होगा। चूंकि सर्वे के नतीजे भाजपा को भारी लीड से जीतता हुआ बताते हैं, इसलिए अधिक बड़ा खतरा भाजपा पर है कि उसके कार्यकर्ता-नेता हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएं। वैसे भी समझदार को यह मानकर भी चलना चाहिए कि कभी-कभी चुनावी सर्वे गलत भी साबित होते हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ की त्रिकोणीय चुनावी तस्वीर में न तो किसी को आत्मविश्वास खोना चाहिए, और न ही अतिआत्मविश्वासी होना चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 06-Nov-2018
  • छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, इन तीन राज्यों के चुनावों में राजनीतिक मिजाज कुछ-कुछ एक सा रहता है, और कुछ-कुछ अलग-अलग भी। चूंकि इन तीनों जगहों पर मोटे तौर पर दो ही राष्ट्रीय पार्टियों में मुकाबला रहता है इसलिए उनकी संस्कृति कुछ हद तक तो हावी रहती है, और कुछ हद तक चीजों को काबू भी रखती है। इन तीनों राज्यों में छत्तीसगढ़ सबसे बेहतर इसलिए है कि यहां साम्प्रदायिकता की जगह नहीं है, मंदिर-मस्जिद जैसे भावनात्मक और भड़काऊ मुद्दे नहीं हैं, जाति के आरक्षण के हिंसक आंदोलन नहीं हैं, और राजनीति जातियों की उस किस्म की गुलाम नहीं है जैसी राजस्थान या मध्यप्रदेश में है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति कम हिंसक प्रचार देखती है, और इसके पीछे की वजहों को समझने की जरूरत है। 
    राजस्थान और मध्यप्रदेश के मुकाबले यह राज्य जंगलों में बसी हुई एक अधिक बड़ी आबादी का है, और यहां पर दलित और आदिवासी वोट मिलाकर आधे से जरा ही कम हैं। यह प्रदेश साम्प्रदायिक दंगों से मुक्त रहा है, और हर पार्टी को यह बात अच्छी तरह समझ भी आती है कि दंगाई सिक्के यहां के बाजार में चलते नहीं हैं। यह प्रदेश मध्यप्रदेश और राजस्थान के मुकाबले कम सामंती है, और यहां की राजनीति में राजपरिवारों की वैसी दबंग-दखल नहीं है जो कि इन दो बड़े प्रदेशों में है। इन तीनों राज्यों में से खासकर मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह सरकार ने जितने घोर धर्मान्ध और हमलावर तरीके से राजनीति पर धर्म को लादा था, वैसी कोई मिसाल छत्तीसगढ़ में नहीं है। और कुछ महीनों के भीतर ही शिवराज सिंह से यह भुगतना भी पड़ा कि किस तरह भगवों को मंत्री का दर्जा देने का नतीजा होता है, एक शेर को खड़ा तो कर दिया गया, लेकिन उसने बनाने वाले शिवराज को ही नोंच खाया। ऐसे में छत्तीसगढ़ बेहतर राजनीति का केन्द्र बना हुआ है। 
    कुछ लोग इसके पीछे कांग्रेस और भाजपा की वाहवाही कर सकते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ की जमीन का मिजाज ही अमनपसंद है, और धार्मिक उन्माद यहां पर काम नहीं करता। जब प्रदेश की आधी आबादी दलित और आदिवासी हों, तो वहां पर साम्प्रदायिकता का हथियार काम नहीं आ सकता। इसलिए यह राज्य अपनी आम जनता के मिजाज के मुताबिक किसी भी तरह की हिंसा से दूर बसा हुआ है, और चुनावों में भी यही बात दिखती है। दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ के चुनावों में सबसे अधिक हमलावर, हिंसक, धर्मान्ध, साम्प्रदायिक, और आपत्तिजनक-गैरजिम्मेदार बयान उन नेताओं के आते हैं जो इस राज्य के बाहर से आते हैं, और अपनी पार्टियों के बड़े नेता कहलाते हुए वे यहां मीडिया या जनता के सामने गैरजिम्मेदार बात कह जाते हैं। दोनों ही पार्टियों को इसका बड़ा नुकसान होता है, लेकिन चूंकि यह सिलसिला दोनों खेमों में बराबरी से जारी है, इसलिए मुकाबले में बराबरी जारी रहती है। 
    इस राज्य को जरूरत है अपनी इस खूबी का अहसास करने की, और इस पर फख्र करने की। इस सिलसिले को जारी रखना जरूरी है, और जब देश में चारों तरफ भड़काऊ बातों की सुनामी सी आई दिखती है, तब यह राज्य अपने सीधे और सरल मिजाज के साथ, किसी राजनीतिक दल का मोहताज हुए बिना, शांति का टापू सरीखा बना रहता है, दूसरों के सामने मिसाल बना रहता है। आज सुबह से सोशल मीडिया पर एक लतीफा चल रहा है कि किस तरह दिल्ली में कुछ नेताओं के भाषणों पर अभी रोक लगा दी गई है क्योंकि वहां की हवा में वैसे भी जहर बहुत अधिक हो गया है। छत्तीसगढ़ में मामूली तनाव की बातों को छोड़ दें, तो यहां के स्थानीय नेताओं की जुबान हिंसक बातों के राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे ही है, बहुत नर्म है। इसे ऐसा ही बनाए रखना जरूरी है। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 05-Nov-2018
  • मध्यप्रदेश की चुनावी खबर है कि वहां भाजपा के मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल गौर अपने लिए और अपनी बहू के लिए भाजपा की टिकटें चाहते हैं, और न मिलने पर दो सीटों से निर्दलीय चुनाव लडऩे की धमकी भी दे दी थी, बाद में उन्होंने अपना बयान बदला।े दूसरी तरफ मध्यप्रदेश से ही एक बड़े भाजपा नेता का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे यह कहते हुए बताए गए हैं कि किस तरह दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ में भाजपा कुछ सीटों को बेच रही है। इस बात की सच्चाई कितनी है यह तो नहीं मालूम, लेकिन चुनाव के वक्त तमाम बड़ी पार्टियों में यही हाल रहता है। अभी सीबीआई में तीन करोड़ की रिश्वत की खबर आई तो लोगों ने सोशल मीडिया पर तंज कसा कि बसपा की मुखिया मायावती जितने में एक विधानसभा की टिकट बेचती हैं, उतने में सीबीआई बिक गई। 
    अब खरीदी-बिक्री के ऐसे मामलों को चुनाव आयोग कुछ भी नहीं कर पाता है क्योंकि उसकी ताकत सड़कों पर नगदी और चुनावी तोहफों की आवाजाही पर नजर रखने तक सीमित है, और बंद कमरों में जब लोग अपनी आत्मा, ईमानदारी, और प्रतिबद्धता बेचते हैं, तो वह चुनाव आयोग के दायरे से बाहर होता है। ऐसे में भारतीय लोकतंत्र में दलबदल के दलदल और खरीद-बिक्री की गंदगी को रोकने का एक रास्ता चुनाव कानून में संशोधन करके लाया जा सकता है। अगर भारत में यह चुनाव कानून हो जाए कि लोग नामांकन के एक बरस पहले से अपनी पार्टी घोषित करें, और उसके बाद अगर उन्हें चुनाव लडऩा है, तो या तो निर्दलीय लड़ें, या न लड़ें। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक राजनीतिक दल दूसरी पार्टी की ऐसी गंदगी को लाकर अपने सिर पर बिठाने से परहेज नहीं करेंगे जो किसी भी तरह से चुनाव जीतने की ताकत रखती है। पार्टियां तो एक-दूसरे के मुजरिमों को भी लाकर अपने सिर पर बिठा लेती हैं, और चुनाव के वक्त तो यह सिलसिला बड़ा तेज हो जाता है। 
    लंबे समय पहले हरियाणा में दलबदल ऐसे थोक में होता था कि वहां आयाराम-गयाराम की राजनीति कहलाती थी। आज भी दलबदल एक बड़ा हथियार है, और पार्टी से बगावत भी उतना ही बड़ा हथियार है। अगर नेताओं और पार्टियों में सिद्धांत और ईमानदारी जरा भी नहीं बचे हैं, तो देश के चुनाव-कानून में फेरबदल करके चुनावी राजनीति की गंदगी साफ करनी चाहिए। आज कानपुर के करीब गंगा अधिक गंदी है कि देश की चुनावी राजनीति, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। देश के लोगों का यह हक कि वे जिन्हें प्रतिनिधि चुनने जा रहे हैं, उन पर ईमानदारी का एक न्यूनतम पैमाना तो थोप सकें। राजनीतिक दलों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे साल भर पहले से पार्टी में आए हुए लोगों में से ही किसी को उम्मीदवार बनाएं। सिर्फ वामपंथी दलों में ऐसी नैतिकता बची हुई है, और उस पार्टी की गिनती अब सफेद शेरों से भी कम रह गई है। बाकी पार्टियों पर कानून से ही ईमानदारी थोपनी होगी, और नेताओं पर बारह महीने पहले हलफनामा देने की शर्त लगानी होगी। ईमानदारी की कम से कम एक बरस की तो एक्सपायरी डेट रहे। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 04-Nov-2018
  • पाकिस्तान में ईश्वर की निंदा के आरोप में निचली एक अदालत से सजा पाई हुई एक महिला को सुप्रीम कोर्ट ने बरी क्या कर दिया, देश में बवाल मच गया है। इस ईसाई महिला, आसिया बीबी, को मोहम्मद पैगंबर का अपमान करने के मामले में निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी, और आठ बरस की लंबी अदालती लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसे बेकसूर पाया। लेकिन देश में मजहबी कट्टरपंथियों ने सड़कों पर इतना बवाल किया है कि आसिया बीबी का परिवार देश छोड़कर जाने में ही अपनी हिफाजत देख रहा है, और उनका वकील भी देश छोड़कर जा रहा है। दूसरी तरफ खबर यह है कि हिंसक प्रदर्शनों को रोकने के लिए पाकिस्तान की इमरान खान सरकार ने कट्टरपंथियों के साथ यह समझौता किया है कि आसिया बीबी को देश छोड़कर जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। दस बरस की कैद काटकर निकलने के बाद भी यह महिला सिर छुपाए घूम रही है। यह एक अलग बात है कि सरकार उसकी हिफाजत का दावा कर रही है। सड़कों पर हो रहे हिंसक प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भी हिंसक फतवे दे रहे हैं, और पाकिस्तान के अमन-पसंद लोगों को यह समझ आ रहा है कि वहां का ईशनिंदा कानून अल्पसंख्यकों को फंसाने का जरिया बन गया है, और साथ ही वह मुस्लिमों को और अधिक हिंसक-कट्टरपंथी बना रहा है। इस बीच फैसला देने वाले वकीलों ने कहा है कि वे इस्लाम के हिसाब से फैसला नहीं देते, देश के संविधान के हिसाब से फैसला देते हैं। 
    यह सिलसिला बहुत खतरनाक इसलिए है कि वहां पर बहुसंख्यक मुस्लिम समाज पूरी तरह से इस कानून को लागू करने को लेकर हमेशा हिंसक रहा, और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक हथियार बनाया गया। पाकिस्तान घोषित रूप से एक इस्लामिक देश है, इसलिए वहां पर बहुसंख्यक तबका अपने धर्म को दूसरों पर थोपने को अपना हक मानता है। इस मुद्दे पर लिखना आज यहां जरूरी इसलिए है कि पाकिस्तान के ठीक पड़ोस में बसा हुआ हिन्दुस्तान तरह-तरह से बहुसंख्यक तबके की तानाशाही का खतरा झेल रहा है। न सिर्फ केन्द्र में सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया भाजपा के कई नेता, कई मंत्री, और मुख्यमंत्री अयोध्या की विवादित जमीन पर मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाकर कानून में संशोधन के लिए खुले फतवे दे रहे हैं, और हर दिन अलग-अलग कोनों से इसके लिए बयान आ रहे हैं। भाजपा की एक भूतपूर्व सहयोगी पार्टी शिवसेना भी इस मुद्दे को लेकर सरकार के खिलाफ जुटी हुई है क्योंकि 1992 में जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, तब शिवसेना पहली पार्टी थी जिसके मुखिया ने सार्वजनिक रूप से इस विध्वंस की जिम्मेदारी ली थी और बयान दिया था कि बाबरी मस्जिद के गुम्बद शिवसैनिकों ने गिराए हैं। 
    आज भी संवैधानिक पदों पर बैठे हुए बहुत से लोग लगातार यह बात करते हैं कि हिन्दुओं के देश भारत में अगर कानून बनाकर मंदिर नहीं बनाया जाएगा तो कहां बनाया जाएगा? इस देश पर हिन्दुओं का दूसरे धर्मों से अधिक हक गिनती मेें अधिक होने का हो सकता है, लेकिन किसी एक धर्म को दूसरे धर्म से अधिक संवैधानिक अधिकार नहीं दिए गए हैं। ऐसे में एक हिन्दू राष्ट्र बनाने की कल्पना कुछ उसी किस्म की है जिस तरह से एक मुस्लिम पाकिस्तान बनाया गया था। जो लोग यह सोचते हैं कि हिन्दुस्तान को एक हिन्दू-पाकिस्तान बनाना बेहतर होगा, उन्हें आज पाकिस्तान में चल रही धर्मान्ध और साम्प्रदायिक कट्टर-हिंसा को भी समझ लेना चाहिए, और उसके खतरों को देख लेना चाहिए। वैसे भी हाल के बरसों में भारत में जिस तरह से बहुसंख्यक तबके के धार्मिक और सांप्रदायिक उन्माद ने सड़कों पर अभूतपूर्व हिंसा दिखाई है, उससे भी यह सबक अब तक ले लिया जाना था, लेकिन लिया नहीं गया है। दुनिया के इतिहास में वे ही देश अधिक समझदार रहते हैं जो कि दूसरों के हादसों से सबक लेकर वक्त के पहले खुद सम्भल जाते हैं। भारत में धार्मिक और साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ाने वालों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे अपनी अगली पीढ़ी को आज के पाकिस्तान सरीखा माहौल देकर जाना चाहते हैं? आज पाकिस्तान में अधिकतर धार्मिक हत्याएं बहुसंख्यक मुस्लिम तबके के हाथों मुस्लिमों की ही हो रही है, गैरमुस्लिमों की नहीं। एक हिन्दू पाकिस्तान बनकर भारत अपनी बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के लिए ही अधिक खतरनाक होगा।
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 03-Nov-2018
  • हिन्दुस्तान एक तरफ दुनिया की सबसे ऊंची सरदार-प्रतिमा पर खुशी और गौरव में डूबा हुआ है, दूसरी तरफ ब्रिटिश मीडिया में इस खबर को कुछ दूसरे तरीके से भी लिया जा रहा है। सरदार पटेल की यह प्रतिमा इसलिए अंतरराष्ट्रीय खबर है कि इसकी 597 फीट की ऊंचाई को तय करने का पैमाना यह रखा गया था कि वह अमरीका की विश्वविख्यात स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुनी ऊंची रहेगी। जब भारत में ही इसे एक अंतरराष्ट्रीय और विश्व मुकाबला बना दिया था, तो अब दुनिया के दूसरे देशों का भी यह हक बनता है कि वे इसे अपने पैमानों पर आंकें। ब्रिटेन में इस प्रतिमा पर खर्च किए गए 330 मिलियन पाऊंड को इस हिसाब से भी देखा जा रहा है कि जिन 56 महीनों में यह प्रतिमा बनी है, उन महीनों में ब्रिटेन ने भारत को 1176 मिलियन की मदद की है। ब्रिटिश करदाताओं के बीच यह चर्चा है कि भारत को दी गई मदद के बीच अगर भारत के पास एक प्रतिमा पर खर्च करने को इतनी रकम है, तो उसे कोई मदद क्यों दी जाए? एक ब्रिटिश सांसद पीटर बोन ने बीती रात कहा कि हमसे मदद लेने वाला देश प्रतिमा पर ऐसा खर्च करे यह पूरी तरह बेवकूफी का काम है, और इसे देखकर लोग पागल हो रहे हैं। इससे यह साबित होता है कि हमें भारत को कोई मदद नहीं देनी चाहिए, अगर वे ऐसी महंगी प्रतिमा का खर्च उठा सकते हैं, तो वे किसी मदद के हकदार नहीं हैं। 
    अभी सरदार प्रतिमा का जश्न खत्म हुआ भी नहीं है कि उत्तरप्रदेश से खबर आ रही है कि वहां पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दीवाली के वक्त यह मुनादी कर सकते हैं कि अयोध्या में सरयू नदी के तट पर सौ-डेढ़ सौ मीटर ऊंची राम प्रतिमा बनाई जाएगी। और इस खबर के आते ही वहां के भगवा बयानबाजों ने तुरंत यह मांग शुरू कर दी है कि यह प्रतिमा सरदार प्रतिमा से ऊंची होनी चाहिए। उधर दूसरी तरफ पिछले दो दिनों में ही सरदार प्रतिमा के लोकार्पण के बाद यह खबर आ चुकी है कि वह कुछ ही समय तक दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा रहेगी, और इसके बाद जल्द ही मुम्बई के समुद्र तट पर पानी के बीच बनने वाला शिवाजी स्मारक इस प्रतिमा की ऊंचाई का रिकॉर्ड तोडऩे जा रहा है। लोगों को यह भी याद होगा कि किस तरह मायावती ने उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए अपने, कांशीराम के, और अंबेडकर के बुत बनवाकर राज्य के सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च किए थे, और अपनी पार्टी के निशान हाथी की विशाल पत्थर-प्रतिमाएं बनवाकर अपनी फजीहत भी करवाई थी। 
    आज जब इस देश में यह चर्चा चल रही है कि केन्द्र सरकार एक कानून बनाकर अयोध्या के विवादग्रस्त हिस्से में मंदिर बनवाए, या मंदिर बनाने का कानून बनाए, तो देश में कुछ समझदार और जिम्मेदार लोगों के बीच यह बात भी उठ रही है कि प्रतिमाओं पर खर्च होने वाले तीन-तीन हजार करोड़ रूपयों से देश में क्या-क्या हो सकता था? कितने स्कूल बन सकते थे, कितने अस्पताल बन सकते थे, और कितने करोड़ बच्चे कुपोषण से बाहर आ सकते थे। जो देश गंदगी, प्रदूषण, कुपोषण में विश्व कीर्तिमान स्थापित कर रहा हो, उसके सामने इन दिक्कतों से जूझना एक बड़ी चुनौती रहेगी, बजाय प्रतिमा बनवाने के। हजारों करोड़ की प्रतिमा बनवाने के लिए महज मंत्रिमंडल से एक प्रस्ताव लगता है, और बच्चों के मुंह से निवाला छीनकर विश्व रिकॉर्ड बनाया जा सकता है। प्रतिमाओं के बीच यह दौड़ कभी खत्म नहीं हो सकती, और राजनीतिक इस्तेमाल करने के लिए, वोटों की थप्पियों को प्रभावित करने के लिए प्रतिमाओं का ऐसा झूठा गौरव एक लगातार-मुकाबला बन सकता है। हिन्दुस्तान को अगर एक जिम्मेदार लोकतंत्र बनना है, तो उसे ऐसी बुतपरस्ती से उबरना होगा। जिन पार्टियों को, जिन संगठनों को अपने किसी आराध्य देव की प्रतिमा बनानी हो, उन्हें अपनी जमीन पर अपने खर्च से ऐसा काम करना चाहिए, न कि जनता की जमीन पर जनता के पैसों से इस काम को करें। हमारा ख्याल है कि ऐसी बर्बादी और फिजूलखर्ची रोकने के लिए किसी जनहित याचिका के रास्ते सुप्रीम कोर्ट को इसमें शामिल करना चाहिए, और यह सिलसिला खत्म करना चाहिए। राज्य या केन्द्र, किसी भी सरकार को गरीब जनता के खून-पसीने की ऐसी बर्बादी का हक लोकतंत्र में नहीं मिल सकता। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 02-Nov-2018
  • पिछले कुछ दिनों में लगातार छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में दोनों बड़ी पार्टियों, कांग्रेस और भाजपा, के उम्मीदवारों को जिस तरह से छांटा गया है, उसे देखकर फिक्र होती है कि क्या भारत का लोकतंत्र महज इतनी ही मेहनत, और इतनी ही तैयारी के लायक है? क्या कुल एक पखवाड़े के चुनाव प्रचार के बाद लोग जनता के सामने विधायक बनने की अपनी खूबी रख पाते हैं? और क्या वे इसी पखवाड़े में अपने मुकाबले खड़े लोगों की खामियों को सामने रख पाते हैं? और फिर पार्टियों की भी बात है जिनके घोषणा पत्रों की भी कोई खबर नहीं है, और छत्तीसगढ़ में तो आज के दस दिन के बाद पहले दौर का मतदान भी है। 
    पार्टियों की आज की आपाधापी और उनकी अधकचरी तैयारी को देखें तो लगता है कि क्या लोकतंत्र महज रातोंरात चुनाव जैसा कोई सामान है जो कि हर पांच बरस में सामने आता है, लेकिन पांच हफ्ते की भी तैयारी जिसके लिए जरूरी नहीं समझी जाती। जिस ब्रिटिश संसदीय प्रणाली और परंपरा पर भारत की संसदीय व्यवस्था बनाई गई है, उसमें भी विपक्ष अपने पांच बरसों में इससे बेहतर तैयारी करता है। आज हालत यह है कि छत्तीसगढ़ में पन्द्रह बरसों से विपक्ष में बैठी हुई कांग्रेस के पास इतनी भी तैयारी नहीं दिखती है कि इन बरसों में भाजपा के जो बड़े नेता सत्ता पर रहे, उनके कारनामों पर कोई रिपोर्ट तक कांग्रेस के हाथ नहीं है। जबकि कोई भी जिम्मेदार विपक्ष होता तो महज अखबारी कतरनों को हर दिन इक_ा करके पांच बरस में ही हर मंत्री या सत्तारूढ़ नेता के खिलाफ एक पुख्ता दस्तावेज तैयार हो सकता था। यह गुंजाइश विपक्ष के पास ही अधिक रहती है क्योंकि विपक्ष के तो कोई ऐसे भ्रष्टाचार हो नहीं सकते जिन्हें सत्ता गिनाए। ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में एक शैडो कैबिनेट, छाया मंत्रिमंडल, होता है जिसमें सत्तारूढ़ मंत्रियों के कामकाज पर बारीकी से नजर रखने के लिए अलग-अलग नेताओं को तैनात किया जाता है। और ऐसे छाया-मंत्रियों के मुखिया संसद में विपक्ष का नेता होते हैं। हर सत्तारूढ़ मंत्री के गलत कामों, और गलतियों का दस्तावेज तैयार करते हुए ऐसे नेता अगले चुनाव के वक्त सत्ता की खामियों के बड़े जानकार हो जाते हैं, और ऐसे परिपक्व विपक्ष से लोकतंत्र मजबूत होता है। 
    हम भारत के अधिकतर राज्यों के विपक्ष को देखते हैं तो लगता है कि सत्ता से परे रहने के इन बरसों को विपक्ष महज बयानबाजी का दौर मान लेता है, और सत्ता पर निगरानी की अपनी जिम्मेदारी को वह औपचारिक तरीके से नहीं निभाता। ऐसा अगर हुआ रहता तो भांडाफोड़ के चलते सत्ता के बहुत से लोगों को उनकी पार्टी दुबारा उम्मीदवार नहीं बना पाती। दिक्कत यह है कि कांग्रेस और भाजपा जैसी दो बड़ी और पुरानी पार्टियां नारेबाजी की विपक्षी भूमिका से परे कुछ सोच नहीं पाती हैं, कर नहीं पाती हैं। नतीजा यह होता है कि जनता के सामने सरकार की नाकामयाबी, और उसका भ्रष्टाचार भरोसेमंद तरीके से सामने नहीं आता। और चुनावी नारों के शोरगुल में कही हुई घिसी-पिटी बातें कोई विश्वसनीयता नहीं रखतीं। ऐसे में यह लगता है कि इस देश में लीडरशिप को लेकर, चुनाव, और राजनीति को लेकर कुछ औपचारिक कोर्स भी चलाने की जरूरत है। बेहतर नेताओं से पार्टियां बेहतर हो सकती हैं, और बेहतर पार्टियों से लोकतंत्र बेहतर हो सकता है। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 01-Nov-2018
  • छत्तीसगढ़ में आज से सरकारी धान खरीदी शुरू हो गई है। इधर दीपावली को  हफ्ता भर भी नहीं बचा है। इस बरस धान के साथ बोनस की घोषणा के कारण पहले ही दिन से खरीदी केंद्रों में पहुंचने लगे हैं। दो माह पहले ही छत्तीसगढ़ सरकार ने बीते बरस की धान खरीदी पर 13 लाख किसानों को 24 सौ करोड़ रूपए बोनस देने की घोषणा की है। यह बोनस दसियों लाख लोगों की जिंदगी में एक बड़ी राहत लेकर आया है। सरकार ने कई विभागों का खर्च रोककर धान बोनस के लिए आज इंतजाम कर रखा है।
    छत्तीसगढ़ में सरकार पहले से दो मोर्चों पर किसानों और गरीबों के लिए एक बड़ा काम करते आ रही थी। राज्य की धान खरीदी की नीति, और उस पर अमल देखने के लिए देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री-मंत्री, और अधिकारी आते रहे हैं। यह नीति इतनी कामयाब है कि पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी मात्रा में धान सीमा पार करके लाया जाता है, और छत्तीसगढ़ के किसानों के कागजात के साथ मंडी में बेच दिया जाता है। नतीजा यह भी होता है कि छत्तीसगढ़ को धान उत्पादक में बढ़ोत्तरी का केन्द्र सरकार का ऐसा पुरस्कार-सम्मान भी मिल जाता है, जो कि सच्चे आंकड़ों पर टिका हुआ नहीं रहता। दूसरी तरफ राज्य के गरीबों को रियायती राशन देने की सरकार की योजना देश में सबसे सफल पीडीएस प्रणाली मानी गई है, और सुप्रीम कोर्ट से लेकर केन्द्र सरकार तक ने बाकी राज्यों को छत्तीसगढ़ की योजना का अध्ययन करने, और अमल करने को कहा है।
    छत्तीसगढ़ की आबादी का पौन से अधिक हिस्सा खेती से जुड़ा हुआ है। दूसरी तरफ देश में सभी चीजें महंगी होती चल रही हैं, सिवाय किसानों की उपज के। अनाज उगाने वाले किसानों से लेकर सब्जी उगाने वाले किसानों तक की हालत बहुत खराब है, और कई राज्यों में लगातार आत्महत्याएं होती हैं। राज्य सरकारें आमतौर पर किसानों की आत्महत्या को किसानी-आत्महत्या मानने से इंकार करती हैं, और कहती हैं कि किसान बहुत से निजी कारणों से भी आत्महत्या करते हैं जिनका कि खेती में घाटे या कर्ज से लेना-देना नहीं होता है। दूसरी तरफ किसानों के मुद्दे को लेकर आंदोलन करने वाले लोगों का यह मानना है कि किसानों की जिंदगी में कोई निजी तकलीफें भी अगर रहती हैं तो उनकी जड़ें किसानी के घाटे से ही जुड़ी रहती हैं। छत्तीसगढ़ में किसानों के लिए ब्याज पर तकरीबन सौ फीसदी की छूट को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक बड़ी मदद बताते हैं, और राज्य सरकार की तरफ से किसान की उपज के हर दाने को खरीदने की घोषणा भी की गई है। यहां पर यह लिखना भी जरूरी है कि राज्य में किसानों की कर्ज-भुगतान की स्थिति सबसे अच्छी है, और छत्तीसगढ़ी किसान कर्ज वापिस करने में भरोसा रखते हैं।
    इस सिलसिले में हमारी एक सलाह है कि किसानों के हाथ जब इतनी बड़ी रकम आएगी, तो उसके समझदार-इस्तेमाल के बारे में भी सरकार को एक जागरूकता लानी चाहिए। यह धान-बोनस बंटना शुरू हो, उसके पहले ही सरकार को किसानों को यह समझाना चाहिए कि वे इस रकम का अपने परिवार के लिए कैसे बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं, वरना अनायास मिली कोई भी रकम कभी तीर्थयात्रा पर खर्च हो जाती है, तो कभी गैरजरूरी कार-मोटरसाइकिल खरीदने में। लोगों के बीच परिवार के भले के लिए रकम का इस्तेमाल सरकार को समझाना चाहिए।
    लगे हाथों हम किसानों की जिंदगी में आई एक नई परेशानी की भी चर्चा करना चाहते हैं। गाय और गोवंश को बचाने के लिए जितने तरह के नियम-कायदे छत्तीसगढ़ सहित बहुत से राज्यों ने लागू किए हैं, और केन्द्र सरकार ने भी एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज कड़ा कानून बनाया है, उससे भी किसानों के लिए यह मुश्किल हो गया है कि वे खेती में जानवरों का इस्तेमाल करें। भाजपा सरकारों को अपनी धार्मिक भावना को परे रखकर कृषि अर्थव्यवस्था में इस्तेमाल होने वाले जानवरों की खरीद-बिक्री, और बुढ़ापे में उनके कसाईघर भेजे जाने के बारे में फिर से सोच-विचार करना चाहिए, क्योंकि छत्तीसगढ़ में गौशालाओं में सरकार के करोड़ों के अनुदान के बावजूद बूढ़े जानवरों को जैसी मौत मिल रही है, वह कसाईघरों में कटने से जरा भी बेहतर नहीं है। कृषि अर्थव्यवस्था में जानवरों पर लगाई गई नई पाबंदियों से वे जानवर मर नहीं पा रहे हैं, और किसान न खुद जी पा रहे हैं, न उन जानवरों को खिला पा रहे हैं।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 31-Oct-2018
  • केन्द्र की मोदी सरकार जलसों से परे एकाएक दो-तीन मोर्चों पर घिर गई दिखती है। सीबीआई में सरकार की फजीहत जारी ही है, कि देश की बैंकिंग को नियंत्रित करने वाली एक स्वायत्त संस्था, आरबीआई के भीतर से सरकारी दखल के खिलाफ कड़ा विरोध सतह पर तैरने लगा है। हालात इतने खराब हैं कि वित्तमंत्री अरूण जेटली ने आरबीआई पर तोहमत लगाई है कि जब बैंक लोन डूब रहे थे, तब आरबीआई परे देख रहा था। आज की अटकलें यह हैं कि आरबीआई गवर्नर, उर्जित पटेल, जो कि मोदी के ही बनाए हुए हैं, इस्तीफा दे सकते हैं, और केन्द्र सरकार आरबीआई के पर कतरने के लिए संविधान से केन्द्र को मिली हुई एक ऐसी शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है जो कि आज तक कभी इस्तेमाल नहीं की गई है। इससे परे सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण, अरूण शौरी, और यशवंत सिन्हा की एक याचिका पर केन्द्र सरकार से राफेल लड़ाकू विमान खरीदी को लेकर बहुत सी जानकारियां मांगी हैं, जो कि केन्द्र सरकार के लिए परेशानी भी बन सकती है। इसी सुनवाई के दौरान जब प्रशांत भूषण ने अदालत से कहा कि राफेल मामले की सीबीआई जांच की जाए, और वह कोर्ट की निगरानी में हो तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इसमें वक्त लग सकता है, और पहले सीबीआई को अपना घर तो ठीक कर लेने दीजिए। जाहिर तौर पर मुख्य न्यायाधीश सीबीआई के भीतर चल रही खूनी मारकाट के बारे में बोल रहे थे जो कि सरकार के पसंदीदा कहे जा रहे अफसर और राफेल जांच में दिलचस्पी ले रहे अफसर के बीच की लड़ाई के दौरान चल रही है। 
    आज एकाएक देश के बहुत सारे अखबारों में अलग-अलग अखबारनवीस यह लिख रहे हैं कि नारों और जुमलों से परे मोदी सरकार काबू खोते जा रही है, और देश की संवैधानिक संस्थाओं पर, स्वायत्त संस्थाओं पर केन्द्र सरकार गलत हद तक जाकर काबिज होकर इस खोए हुए काबू को वापिस पाने की कोशिश कर रही है। यह सिलसिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी पार्टी, और उनके सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए जितनी भी फिक्र का हो, यह देश के लोकतंत्र के लिए भी फिक्र की बात है कि आज सत्ता और विपक्ष के बीच बातचीत के लिए, सीबीआई और अदालत ही जगह बच गई हैं। सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर गालियों से परे शायद ही कोई बात हो पाती है, और अक्ल की बात की गुंजाइश इन पर कम ही दिखती है। हिंसा की धमकी, बलात्कार की धमकी, किसी को देशद्रोही करार देना, इतनी आम बात हो गई है कि ऐसे लोग न तो कानून से डरते हैं, और न ही इस बात का कोई असर उन पर होता कि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री खुद ऐसे हिंसक लोगों को फॉलो कर रहे हैं, और वे लोग अपनी न सही, देश के प्रधानमंत्री की इज्जत का ख्याल करके हिंसक धमकियां न दें। 
    देश के कई अखबारों ने यह भी लिखा है कि सीबीआई के घरेलू मामलों को केन्द्र सरकार ठीक से नहीं देख पाई, और नतीजा यह निकला कि वह अदालती दखल के कटघरे में पहुंच गए, और अब सरकार के काबू से बाहर भी हो गए। अब हाल यह है कि सीबीआई के कई अफसर एक-एक करके अलग-अलग कोर्ट पहुंच रहे हैं कि जिस अफसर के भ्रष्टाचार की जांच चल रही थी, उसके खिलाफ उनके पास सुबूत है। यह नौबत सरकार के लिए शर्मिंदगी की हो सकती है, और ऐसी ही शर्मिंदगी की नौबत राफेल विमान खरीदी को लेकर हो सकती है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया और जानकारी सीलबंद लिफाफे में मांगी है। कुल मिलाकर मोदी के आलोचकों के हाथ इतनी कामयाबी तो लगी है कि वे कुछ मामलों में सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जवाबदेह बनने होने को मजबूर कर सके हैं। कई लोगों का यह मानना है कि यह देश के लिए मायने रखने वाले मुद्दों की अनदेखी करके महज भावनात्मक मुद्दों की राजनीति करने का नतीजा है। अब मोदी का कार्यकाल अपने आखिरी बरस में चल रहा है, और जैसे-जैसे आम चुनाव करीब आ रहा है, वैसे-वैसे इन कुछ जलते-सुलगते मुद्दों पर अदालत में कार्रवाई आगे भी बढ़ती जा रही है। किसी भी जिम्मेदार और समझदार सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह नौबत खतरे की निशान की तरफ बढ़ते हुए बाढ़ के पानी की तरह की है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 30-Oct-2018
  • सीबीआई में छुट्टी पर भेजे गए दो सबसे बड़े अफसरों में से एक, राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे तमाम अफसरों का तबादला कर दिया गया है। इनमें से एक अफसर आज सुप्रीम कोर्ट पहुंचा कि उसके पास अस्थाना के खिलाफ सुबूत हैं, और इसलिए उसका तबादला किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इस मामले की अर्जेंट सुनवाई से मना कर दिया है, लेकिन इससे देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के भीतर के हालात और अधिक खुलकर सामने आ रहे हैं। और यह बात महज सीबीआई के भीतर हो, ऐसा भी नहीं है। भाजपा के एक सबसे अधिक सक्रिय सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि सीबीआई के छुट्टी पर भेजे गए डायरेक्टर आलोक वर्मा एक ईमानदार अफसर थे, और उनके साथ-साथ छुट्टी पर भेजे गए स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना एक भ्रष्ट अफसर हैं। उन्होंने सीबीआई की हालत पर फिक्र भी जाहिर की है, और डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी को इसलिए भी जाना जाता है कि वे अपनी बात पर अड़े रहकर सुप्रीम कोर्ट तक जाते हैं, और बहुत से मामलों में अपने पक्ष में अदालती राहत भी पाते हैं। दूसरी तरफ उनकी बात को इस रौशनी में भी देखना चाहिए कि वे वित्तमंत्री अरूण जेटली के खिलाफ सारे ही वक्त एक अभियान चलाते रहते हैं, और भाजपा के भीतर का यह घरेलू टकराव बहुत से लोगों की समझ में भी नहीं आता है। हाल ही में जो ताजा जानकारियां सामने आई हैं वे बताती हैं कि राकेश अस्थाना के खिलाफ चल रही जांच में एक मामला उनकी बेटी की शादी में करोड़ों के खर्च का भी दिखता है जिसे कारोबारियों ने मुफ्त में किया हुआ बताते हैं। एक सरकारी अधिकारी किस तरह संदिग्ध कारोबारियों के इतने उपकार ले सकता है यह अपने आपमें एक शक की बात है। और राकेश अस्थाना गुजरात में तैनात रहते हुए ऐसे आरोपों से घिरे थे, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जानकारी में इनमें से कोई भी बात न हो ऐसा हो नहीं सकता। 
    अब इसे सीबीआई के भीतर महज आपसी लड़ाई या गुटबाजी कहना ठीक नहीं होगा। किसी भी संस्था के भीतर जब चीजें इतनी सड़ जाती हैं, जब भ्रष्ट लोग ऊंची कुर्सियों पर काबिज हो जाते हैं, तो वहां पर एक-दूसरे के जुर्म को छुपाकर संस्था का एक सजा-संवरा चेहरा दिखाना भी हो सकता है, और सड़े हुए हिस्से को काटकर अलग करना भी हो सकता है। हम हमेशा से ऐसे भ्रष्टाचार के भांडाफोड़ के हिमायती रहे हैं जिसे छुपाकर संस्था अपनी साख बचा सकती है। ऐसा स्थायित्व और ऐसी निरंतरता किसी संस्था से परे किसी सरकार को भी तबाह करने की ताकत रखते हैं। इसलिए बेहतर यही है कि देश की सबसे बड़ी संस्थाओं के भ्रष्टाचार पर निगरानी के लिए एक अलग से कारगर संस्था बननी चाहिए जो कि लोकपाल की शक्ल में शायद बन सकती थी, लेकिन बन नहीं पाई है। पिछले चुनावी नारों के बावजूद इस संस्था का बनना किसी किनारे नहीं पहुंच पाया है। 
    अब सीबीआई का मामला सुप्रीम कोर्ट की नजरों में है, और उसकी निगरानी में एक जांच भी इसमें चल रही है, इसलिए अगले दस दिन उसके नतीजों का इंतजार करने के अलावा और कोई रास्ता है नहीं। लेकिन भारत में संस्थानों की अधिक पारदर्शिता के लिए जो कुछ हो सके उसकी कोशिश करनी चाहिए। यह मामला सिर्फ देश की किसी एक सरकार की साख का नहीं है, बल्कि पूरे देश की साख का है। हम अमरीका में सुप्रीम कोर्ट के किसी जज की नियुक्ति के पहले जिस तरह वहां पर संसदीय समिति के सामने उसकी लंबी सुनवाई देखते हैं, वैसी सुनवाई भारत में भी होनी चाहिए ताकि नियुक्त होने वाले लोगों के बारे में जो शक हों, उन सब पर उनसे जवाब मांग लिया जाए। आज बंद कमरे में तीन-चार लोग मिलकर देश का भविष्य तय करने लगते हैं, जिसमें पारदर्शिता की कमी है। देश में बहुत सी ऐसी अदालती नियुक्तियां हैं जिनमें समय रहते अगर संसद के लोगों को सवाल पूछने का मौका मिले, तो लोगों की खामियां और उनके गलत काम पहले ही सामने आ जाएं, और उन्हें नियुक्त करने की नौबत न आए। भारत के संविधान में संशोधन करके ऐसी संसदीय जनसुनवाई शुरू करनी चाहिए जिसका प्रसारण भी देश की आम जनता के सामने हो।
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 29-Oct-2018
  • कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही पार्टियां अपने बड़बोले नेताओं की अटपटी, गंदी, और आक्रामक बातों को लेकर समय-समय पर परेशानी में फंसती हैं, और अब तो कुछ ऐसा हो गया है कि इनको अपनी बातों पर शर्म आना भी बंद हो गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नीच आदमी कहने पर सार्वजनिक दबाव में कांग्रेस को अपने एक बड़े नेता मणिशंकर अय्यर को कुछ अरसे के लिए पार्टी से निलंबित भी करना पड़ा था, लेकिन उससे भी पार्टी की बाकी नेता कोई सबक लेते दिखते नहीं हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश के सबसे बड़े कांग्रेस नेता रहे दिग्विजय सिंह को आज पार्टी ने इन दोनों राज्यों में चुनाव अभियान से परे रखा है, और ऐसा परे रखा है कि आज जब मध्यप्रदेश में उज्जैन से राहुल गांधी प्रचार शुरू कर रहे हैं, तब भी दिग्विजय वहां मौजूद नहीं हैं। चुनाव आयोग को प्रचारकों की जो लिस्ट दी गई है उसमें भी दिग्विजय का नाम नहीं है। लेकिन बात इतने पर थमती नहीं है। एक तरफ तो आज राहुल गांधी महाकाल मंदिर में शिवलिंग पर पूजा करके आगे बढ़ रहे हैं, और दूसरी तरफ उनकी पार्टी के एक दूसरे बड़बोले नेता शशि थरूर की कही हुई एक बात पार्टी को शर्मिंदगी में डाल रही है। 
    बेंगलुरू के एक साहित्य समारोह में अपनी किताब का प्रचार करते हुए शशि थरूर ने भाषण में कहा कि आरएसएस के एक व्यक्ति ने मोदी के बारे में यह कहा था कि वे शिवलिंग पर बैठे हुए बिच्छू की तरह हैं, जिसे न हाथ से हटाया जा सकता, और न चप्पल मारी जा सकती, क्योंकि वह शिवलिंग पर बैठा है। हो सकता है कि यह बात एक सामान्य समझबूझ के हिसाब से ठीक हो कि बिच्छू को न तो हाथ से पकड़ा जा सकता, और न ही शिवलिंग पर बैठे बिच्छू पर चप्पल चलाई जा सकती। लेकिन एक तरफ जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी रात-दिन अपने जनेऊ की नुमाइश करते हुए अपने को हिन्दू साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, उस बीच में शिवलिंग के जिक्र वाली बात में ऐसी अटपटी बात किसी को नहीं सुहा सकती है। शशि थरूर के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने हिन्दुस्तान के बाहर कितना वक्त गुजारा है कि भावनाओं की उनकी समझ पश्चिमी अधिक है, और हिन्दुस्तानी कम है। ऐसे में जब वे धर्म को लेकर अमरीका की अपनी समझ के आधार पर हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म को लेकर बात करते हैं, तो वह बात अटपटी हो जाती है। यह बात वैज्ञानिक रूप से सही हो सकती है, लेकिन चुनाव के मुहाने पर खड़ी पार्टी वैज्ञानिक तर्क के आधार पर वोट नहीं पाती, वोटरों को रिझाने के लिए लोगों को धर्म और जाति के लिए अपने मन का सच्चा या झूठा सम्मान दिखाना पड़ता है।
    कांग्रेस और भाजपा के बीच तनातनी का हाल यह है कि एक-दूसरे की छोटी-छोटी बातों पर भी मोटे-मोटे विवाद खड़ा करना इन दोनों का हक सा बन गया है। ऐसे में कम से कम इन दोनों पार्टियों को तो यह चाहिए कि वे अपने लोगों को यह सिखाएं कि हमला करते हुए उन्हें कहां जाकर रूकना है। और फिर ऐसे विवाद कोई नई बात नहीं है। लोगों को याद होगा कि चुनाव प्रचार करते हुए नरेन्द्र मोदी ने शशि थरूर की उस वक्त की पत्नी के लिए सौ करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसी बात कही थी, या खालिस हिन्दुस्तानी राहुल गांधी के लिए भाजपा के कई नेता इटैलियन जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। हो सकता है कोई वक्त ऐसा रहा हो जब लोगों के बीच बर्दाश्त कुछ अधिक रहा हो, लेकिन अब वैसी बात नहीं है। अब एक-दूसरे की बातों में जहर देखने का ही संबंध रह गया है। ऐसे में लोगों को धार्मिक मामलों पर, या जाति को लेकर किसी मुद्दे पर जुबान को लगाम देनी चाहिए। कांग्रेस पार्टी की छवि लंबे समय से एक गैरहिन्दू पार्टी की बनी हुई है, और अब हिन्दुत्व के प्रति उसका ताजा लगाव भी यह मांग करता है कि उसके नेता धर्म के मामले में बकवासी जुबान में बात न करें। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 28-Oct-2018
  • अमरीका में कल एक यहूदी धर्मस्थल पर हमला हुआ, और एक गोरे अमरीकी ने गोलियों से ग्यारह लोगों को मार डाला। जब तक इस आदमी की शिनाख्त सामने नहीं आई थी, ऐसी आशंका थी कि यहूदियों के देश इजराइल के जिस किस्म के जानलेवा हमले फिलीस्तीन पर चल रहे हैं, उनके जवाब में किसी फिलीस्तीनी ने ऐसा हमला किया हो, लेकिन बाद में पता लगा कि यह एक स्वघोषित यहूदी-विरोधी का काम था जो कि सोशल मीडिया पर लगातार यहूदी-विरोधी फतवे पोस्ट करता था, और जिसके पास कई बंदूकें थीं, और जो गोली चलाने की ट्रेनिंग भी ले रहा था। अब अमरीका की ऐसी सोशल-मीडिया वेबसाईट को भी लग रहा है कि उसने समय रहते सरकारी एजेंसियों को ऐसी भड़काऊ बातों की जानकारी न देकर एक चूक की थी। दूसरी तरफ अमरीका में खुफिया और निगरानी एजेंसियां लगातार ऐसे लोगों पर नजर रखती हैं जो कि हिंसक फतवे जारी करते हैं, या हथियार रखते हैं, और धमकियां देते हैं। इस हमलावर के बारे में यह जानकारी आई है कि इसके नाम पहले कोई जुर्म दर्ज नहीं था, और यह बंदूकों का शौकीन गोरा, ईसाई होने के बावजूद ट्रंप का आलोचक भी था। 
    अब इस हमलावर के बारे में सिर्फ यही बात दिखाई पड़ती है कि वह यहूदियों से नफरत करता था, और उसके चलते ऐसी हिंसा तक पहुंचा। दूसरी तरफ भारत मेें आज देखें तो देश भर में जगह-जगह धर्म को लेकर हिंसा चल रही है, कहीं मंदिरों में महिलाओं को बराबरी का हक देने के खिलाफ लोग हिंसा पर उतारू हैं, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी अनसुना कर रहे हैं, दूसरी तरफ लोग मंदिर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले को भी अदालत से परे कानून बनाकर निपटाना चाहते हैं। मतलब यह कि अपनी धर्मान्धता के लिए लोगों को जहां लगे वहां वे कानून बनाकर मंदिर बनाना चाहते हैं, और जहां उनकी धर्मान्धता को ठीक लगे वहां वे कानून के फैसले को कुचलकर भी मंदिरों से महिलाओं को दूर रखना चाहते हैं। आज देश में सत्ता से जुड़े नेताओं से लेकर, मोदी के धुर-विरोधी प्रवीण तोगडिय़ा जैसे लोग भी अयोध्या में मंदिर का काम शुरू करने पर आमादा हैं, और अगले लोकसभा चुनाव के पहले यह एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश चल रही है। कल ही केरल गए हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सार्वजनिक मंच से यह कहा है कि कोर्ट और सरकारों को ऐसे मामलों पर फैसला नहीं देना चाहिए, जिन्हें लागू नहीं किया जा सकता। वे खुलकर सबरीमाला मंदिर में अदालती फैसले के बावजूद महिलाओं को रोकने के हिमायती बने रहे। 
    लोकतंत्र और धर्म, इन दोनों का मिजाज साथ-साथ चल नहीं सकता। लोकतंत्र संविधान को महत्व देता है, और दूसरी तरफ धर्म का मिजाज किसी भी कानून से परे का, हिंसक और हमलावर रहता है, और आमतौर पर धर्म नफरत पर जीता है। इस देश में धर्म ने पहले भी थोक में कत्ल करवाए हैं, और धार्मिक आस्था आज भी देश की तरक्की के खिलाफ आकर खड़ी हो जाती है। धार्मिक आस्था लोकतंत्र के खिलाफ भी खड़ी रहती है, और संविधान को हिकारत से देखती है। संविधान को हिकारत से देखने वाले लोग इसी संविधान के तहत उन्हें मिले हुए अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करते हुए संसद तक पहुंचते हैं, अपनी जरूरत के लिए सरकार और अदालत तक दौड़ लगाते हैं, और जब उन्हें अपनी धर्मान्धता अधिक प्यारी होती है, तब वे लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों को कुचलते हुए किसी मस्जिद के गुम्बदों तक पहुंच जाते हैं। 
    भारत एक धर्मालु देश तो है, लेकिन उसे धर्मान्ध देश बनाने पर आमादा ताकतें इस देश की तरक्की को रोक रही हैं, उसकी संभावना खत्म कर रही हैं। जनता का एक बड़ा तबका इसके खतरों को समझने की समझ नहीं रखता है, और उसे धार्मिक उन्माद के नारों के बीच बेसमझ बनाकर रखने की साजिश बड़ी कामयाब हुई है। अमरीका में किसी धर्म से नफरत का नतीजा कल सामने आया है, और हिन्दुस्तान भी धार्मिक-नफरत के साथ जीते हुए ऐसी हिंसा से बहुत दूर नहीं रहने वाला है। 
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 27-Oct-2018
  • आए दिन हिन्दी के अखबारों में यह पढऩे मिलता है कि किसी एक आदमी ने, या कुछ लोगों ने मिलकर, किसी एक महिला या लड़की की इज्जत लूट ली। बड़े-बूढ़े समाज के भीतर यह नसीहत देते ही रहते हैं कि लड़की को अपनी इज्जत बचाने की खुद भी फिक्र करनी चाहिए। और अभी दो दिन पहले झारखंड की एक खबर आई कि एक लड़की के साथ उसके चाचा ने बलात्कार किया, और पंचायत ने फैसला दिया कि उन दोनों को जिंदा जला दिया जाए। 
    समाज का यह मर्दाना रूख न तो नया है, और न ही इक्कीसवीं सदी में पहुंची हुई दुनिया में भी यह कम हिंसक हुआ है। बलात्कार करने वाले लोग अपनी इज्जत नहीं खोते, और जिस लड़की के साथ बलात्कार होता है, उसकी इज्जत चली जाती है! यह हिंसक नजरिया मर्दों को यह बलात्कारी मर्दानगी जारी रखने का हौसला देता है क्योंकि इससे मर्द की इज्जत तो जाती नहीं। लोग लड़कियों और महिलाओं को ही अकेले न निकलने, कपड़े सावधानी से पहनने, और मर्दों के बीच न उठने-बैठने की दर्जनों नसीहत देते दिख जाते हैं, लेकिन लड़कों को कैसा रहना चाहिए, उन्हें क्या-क्या नहीं करना चाहिए, ऐसी नसीहत देते कोई परिवार शायद ही दिखते हों। नतीजा यह होता है कि जब बलात्कारी अपने पूरे परिवार की इज्जत को मिट्टी में मिला देता है, तब भी इज्जत लुट जाने की बात लड़की के लिए ही लिखी जाती है। बोलचाल में कहा जाता है कि वह अब कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगी, मानो बलात्कारी का चेहरा दमक रहा हो, और वह अखबार के पहले पन्ने के लायक हो। 
    जब से भारत में कुछ प्रमुख महिलाओं ने उनके साथ हुए यौन शोषण, या यौन प्रताडऩा की शिकायतें की हैं, तब से सोशल मीडिया पर महिलाओं के पूरे तबके के खिलाफ तरह-तरह के लतीफे बन रहे हैं, तरह-तरह के कार्टून बन रहे हैं, और मर्दों की सारी रचनात्मक कल्पनाशीलता जोरों से इस्तेमाल हो रही है। बलात्कार को लेकर मजाक के इस हद तक आम हो जाने का यह शायद पहला ही मौका है, और कुछ प्रमुख मर्दों पर लगी तोहमतों को लेकर मानो जवाब में बाकी तमाम मर्द-बिरादरी जवाबी हमले के तेवरों में आ गई है। दरअसल मर्दों के पूरे तबके को यह मालूम है कि यह सिलसिला महानगरों और प्रमुख महिलाओं से आगे बढ़कर छोटे शहरों और आम महिलाओं तक अगर आगे बढ़ेगा तो तकरीबन तमाम मर्द किसी न किसी किस्म की दिक्कत में आ जाएंगे। 
    लेकिन जैसा कि हमने इस मुद्दे पर लिखते हुए पहले भी लिखा है कि ऐसे मौके समाज को आत्ममंथन का एक मौका भी देते हैं कि उसकी भाषा, उसके मुहावरे, उसकी कहावतें, और उसके शब्द किस तरह बेइंसाफी की बात करते हैं, किस तरह वे महिलाओं के खिलाफ हिंसक रहते हैं। यह सिलसिला लगातार जागरूकता पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल होना चाहिए, न सिर्फ महज भांडाफोड़ के लिए, बल्कि महिलाओं के लिए काम की जगहों पर, समाज में एक सुरक्षित माहौल बनाने के लिए, बल्कि समाज की भाषा को भी सुधारने के लिए। मीडिया जो कि आमतौर पर पढ़ा-लिखा माना जाता है, उसे भी यह समझने की जरूरत है कि इज्जत बलात्कारी की लुटती है, न कि बलात्कार की शिकार महिला की। अखबारी भाषा का यह मर्दाना रुझान बदलना चाहिए, और आज लोगों की जिंदगी में खासे हावी हो चुके मीडिया को अपने राजनीतिक-शिक्षण की फिक्र भी करनी चाहिए।
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 26-Oct-2018
  • चुनाव के वक्त अकसर मन में एक बात उठती है कि अच्छी पार्टी के बुरे कैंडीडेट और बुरी पार्टी के अच्छे कैंडीडेट गर आमने-सामने हों तो किसे वोट दिया जाए? यह दुविधा तब भी कोई कम नहीं होती जब एक तरफ साम्प्रदायिक विचारधारा की पार्टी का कोई अच्छा जनसेवक उम्मीदवार हो और दूसरी तरफ घोषित रूप से अपने को धर्म निरपेक्ष पार्टी का कहने वाला, लेकिन भीतर से उतना ही साम्प्रदायिक, भू-माफिया या भ्रष्टï उम्मीदवार हो। जिन लोगों को विचारधारा की फिक्र होती है उनकी भावनाओं से भी जब पार्टी खिलवाड़ करते हुए बहुत ही लुच्चे को पार्टी प्रत्याशी बनाती है, तो वह मतदाताओं की संवेदनशीलता को चुनौती होती है।
    आज भी लोगों को दो चीजों का एक जोड़ा ही चुनना होता है। पार्टी और प्रत्याशी, इनको साथ-साथ चुनना होता है, या साथ-साथ इनको छोड़ देना होता है। आज जिस तरह किसी भी प्रत्याशी को वोट न देने के लिए वोटरों के पास नोटा नाम का एक विकल्प आ गया है, क्या उसी तरह का कोई एक ऐसा विकल्प कभी आएगा कि लोग पार्टी को अलग वोट दें, और उम्मीदवार को अलग? ऐसा होने पर पार्टियों को अपने उम्मीदवारों के बारे में जनता की सोच का पता भी लगेगा। वैसे यह सोच बहुत असंभव नहीं है। ऐसा इंतजाम करके यह भी किया जा सकता है कि विधानसभा या संसद की कुछ सीटें पार्टियों को मिलने वाले वोटों के अनुपात में मनोनयन के लिए अलग से रखी जा सकें, और विधायक या सांसद सीधे निर्वाचित हो जाने के बाद पार्टियां अपने को मिले लोकप्रिय वोटों के अनुपात में कुछ गिने-चुने लोगों को और सदन में भेज सकें। 
    लेकिन वोटर की जिस दोहरी जिम्मेदारी से यह बात शुरू की गई है, उसे देखें तो यह बात आसान नहीं रहती कि वह एक अच्छे प्रत्याशी को बुरी पार्टी के निशान पर वोट दे, या फिर बुरे प्रत्याशी को अच्छी पार्टी के निशान पर वोट दे। ऐसी एक काल्पनिक स्थिति अगर सच में ही सामने आ जाए कि हर वोटर दो वोट अलग-अलग डाले, एक वोट स्थानीय उम्मीदवार को, और दूसरा वोट पार्टी को, तो भी मतदाता की असली पसंद सामने आ पाएगी। हालांकि आज तक भारतीय चुनावों के संदर्भ में ऐसी कोई बात सोचने में भी नहीं आई है, लेकिन अगर हम मतदाताओं की असली और खरी पसंद की बात करें, तो यह एक बेहतर चुनाव का जरिया होगा। आज भी राजनीतिक दल अपने सांसदों और विधायकों की कुल गिनती के अनुपात में राज्यसभा में अपने कुछ उम्मीदवार भेजते हैं। यह तरीका सीधे जनता से चुनकर आए हुए मनोनीत सदस्यों का होगा, जिनकी गिनती तो जनता के वोटों से निकलेगी, लेकिन उन पर चेहरे तय करने का हक पार्टी का होगा। 
    आज जब देश में एक साथ चुनाव पर चर्चा चल रही है, और लोग इस सोच के मुरीद भी हो रहे हैं, और इसे खारिज भी कर रहे हैं, तब ऐसी सैद्धांतिक चर्चा भी होनी चाहिए जो कि संसद और विधानसभाओं में जनता के वोट के अधिक से अधिक ईमानदार प्रतिनिधित्व का रास्ता निकाल सके। आज जिस तरह देश में होने वाले बहुत से चुनावी सर्वे नेता और पार्टी दोनों पर जनता की अलग-अलग सोच पूछते हैं, भारत का चुनाव ऐसा कुछ नहीं पूछता है। होना तो यही चाहिए कि वोटिंग मशीन पर हर चुनाव क्षेत्र में वोटर दो बटनों को दबाए, एक तो पसंद के उम्मीदवार के नाम वाली, और दूसरी पसंद की पार्टी वाली। ऐसा होने पर ही पार्टी को यह समझ आएगा कि कौन सा उम्मीदवार उससे कम या अधिक लोकप्रिय है। 
    फिलहाल जब तक ऐसा कोई क्रांतिकारी फेरबदल भारत की चुनाव प्रणाली में नहीं होता, तब तक के लिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनके सामने आज जोड़े से जो विकल्प आते हैं, उनमें से वे किसको चुनें? अगर उम्मीदवार और पार्टी दोनों उनकी पसंद के हैं, तब तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अगर दोनों में से कोई एक गड़बड़ है, तो उन्हें बहुत ध्यान से वोट डालना चाहिए। हमारा यह कहना अधिक आसान है, लेकिन ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि जब लोग विधानसभा चुनाव में विधायक चुनने के लिए भी वोट डालते हैं, तो उस पल उनके ध्यान में संभावित मुख्यमंत्री का चेहरा भी रहता है कि उनका वोट आखिर किसे मुख्यमंत्री बनाएगा? तो क्या एक ऐसी चुनाव प्रणाली हो सकती है जो कि एक वोटिंग मशीन पर तीन बटनें रखे, जिससे लोग अपने स्थानीय विधायक या सांसद चुने, दूसरी बटन से पसंदीदा पार्टी को वोट दें, और तीसरी बटन से वे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुनें? एक चुनाव में ऐसी तीन बटनें क्या जनता की असली पसंद साबित करेंगी? 
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 25-Oct-2018
  • सीबीआई में पिछले तीन दिनों से जो चल रहा है, उससे देश हक्का-बक्का है। इसके सबसे ऊपर के दो अफसर एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए सरकार तक दौड़ लगा रहे थे, और एक-दूसरे के खिलाफ कथित सुबूत भी पेश कर रहे थे। ऐसे में देश की इस सबसे बड़ी जांच एजेंसी की साख चौपट हो रही थी, और हमने दो दिन पहले इसी जगह लिखा था कि इन दोनों अफसरों को हटा दिया जाना चाहिए, तभी जांच की विश्वसनीयता बनी रहेगी। लेकिन इन्हें हटाने के तरीके कानून में लिखे हुए हैं, और जिस तरह से सीबीआई प्रमुख को सरकार ने छुट्टी पर भेजा है, उसे लेकर वे सुप्रीम कोर्ट गए हैं कि उन्हें गैरकानूनी तरीके से कुर्सी से हटाया गया है। देश में यह सनसनीखेज बात भी चल रही है कि पिछले दिनों प्रशांत भूषण और अरूण शौरी ने जिस तरह सीबीआई प्रमुख से मिलकर रफाल विमान खरीदी में भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कागजात उन्हें दिए थे, वह बात भी सरकार को पसंद नहीं आई थी। और अब जब सीबीआई प्रमुख को छुट्टी पर भेज दिया गया है, तो ये आरोप सामने आ रहे हैं कि वे इस विमान खरीदी मामले की जांच की तरफ आगे बढ़ सकते थे, इसलिए उन्हें हटाया गया है। इसके साथ ही दूसरे आरोप ये भी हैं कि सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना, जिनके खिलाफ डायरेक्टर आलोक वर्मा ने जुर्म दर्ज करवाया था, वे गुजरात से आए हुए मोदी के पसंदीदा अफसर थे। ऐसे भी आरोप हैं कि आधी रात के बाद जिस अंदाज में सीबीआई के दफ्तर में इन दोनों बड़े अफसरों के कमरों को सील किया गया, वहां से जब्ती की गई, या उनके जांच अफसरों को ट्रांसफर करके बाहर भेजा गया, वह सब कुछ अभूतपूर्व है, और कानूनी तौर-तरीकों से परे है। 
    यह पूरा मामला चूंकि सुप्रीम कोर्ट में है, इसलिए इसके पहलुओं की संवैधानिकता आने वाले दिनों में स्थापित हो जाएगी। पहली नजर में यह नौबत मोदी सरकार की छवि और उसकी साख को चौपट करने वाली है। देश में एक ऐसी तस्वीर बनी हुई है कि केन्द्र सरकार मोदी की मजबूत पकड़ के तहत ही काम करती है, और ऐसे में देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी, जो कि सरकार के प्रति जवाबदेह है, सरकार के काबू में है, और स्वायत्त नहीं है, उसमें ऐसा सब कुछ हो जाना, लोगों को हक्का-बक्का करता है। बहुत से लोगों ने सोशल मीडिया और दूसरी जगहों पर यह भी लिखा है कि मोदी लगातार उन मुद्दों पर बोल रहे हैं जो कि देश के असल मुद्दे नहीं हैं, और महत्व से परे के हैं। दूसरी तरफ लोग लंबे समय से यह भी कहते आए हैं कि मोदी ज्वलंत मुद्दों पर जरूरत रहते हुए भी चुप रहते हैं, और ऐसा समझ नहीं पड़ता है कि वे सचमुच ही तमाम चीजों पर काबू रख रहे हैं। कहने के लिए यह भी कहा जा सकता है कि सीबीआई पर काबू न रखना, और ऐसी खराब नौबत आने देने की छूट देना सरकार की साख की बात है कि वह इस जांच एजेंसी पर काबू नहीं रखती। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह भी है कि इस जांच एजेंसी सहित देश की तमाम दूसरी एजेंसियों और संवैधानिक संस्थाओं पर मोदी की मजबूत पकड़ बनी हुई है। 
    आज यह नौबत भारतीय लोकतंत्र के लिए भारी फिक्र की है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी में परले दर्जे का भ्रष्टाचार है, और वहां से अफसरों को सरकार या तो इस तरह से हटा रही है, या उसे इस तरह से हटाना पड़ रहा है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि जब सरकार के फैसले बुरी तरह गलत होते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट को दखल देने का एक मौका मिलता है और उसकी दखल सरकारी गलतियों को, गलत कामों को सुधार भी पाती है। यह पूरा मामला बड़ा उलझा हुआ है, और उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जवाबदेही के रास्ते सरकार को भी अपनी बात कहने मिलेगी, कहनी पड़ेगी, और यह भी साबित हो सकेगा कि सीबीआई के अफसरों में सही कौन है, और गलत कौन है, या फिर दोनों ही गलत हैं, और पूरी संस्था में ही बड़ी मरम्मत की जरूरत है। अभी सतह पर तैरती हुई जानकारियों को लेकर हम किसी नतीजे पर पहुंचना बेहतर नहीं समझते क्योंकि दो-चार दिनों के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट में खुलासा होने जा रहा है। 
    - सुनील कुमार 

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