संपादकीय

Previous123456Next
Date : 19-Oct-2019

सोशल मीडिया पर जिंदगी, अपनी मर्जी की, या फिर...

एक जागरूक पाठक ने पिछले दिनों एक अखबारनवीस को फोन करके इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि गांधी जयंती पर इस बरस लोगों ने सोशल मीडिया पर मानो गांधी का बहिष्कार कर दिया है। लेकिन अखबारनवीस का तजुर्बा इससे ठीक उल्टा था, और उसकी नजर में इस बरस गांधी पर पहले से अधिक लिखा गया था। तजुर्बे का यह इतना बड़ा फर्क कैसे आया? दरअसल सोशल मीडिया खुली जगह पर एक बड़े बुलबुले की तरह रहता है जिसे जिस तरफ से देखा जाए, वह उसी तरफ के रंगों को अधिक दिखाता है, उसी तरफ की तस्वीर दिखाता है। होता यह है कि लोग, खासकर सोचने-समझने वाले लोग, दोस्तों का अपना दायरा अपनी विचारधारा और अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर तय करते चलते हैं। इसी आधार पर नए लोग जुड़ते जाते हैं, पुराने लोगों में से कुछ लोग घटते जाते हैं। और फिर इसके ऊपर फेसबुक या दूसरे सोशल मीडिया का अपना कम्प्यूटर एल्गोरिदम होता है जो आपकी पसंद-नापसंद को आपके बताए बिना भी समझते चलता है, और हिन्दी फिल्म के एक पुराने गाने की तरह काम करता है- जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे...।

सोशल मीडिया एक इतनी अधिक नियंत्रित दुनिया है कि जिसमें लोग अपने पसंद के लोगों से घिर जाते हैं, पसंद के मुद्दों से भी, और नापसंद लोगों को दूर रखना बड़ा आसान है उन्हें ब्लॉक करके, या उन्हें 30 दिनों के लिए नजरों से दूर करके। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि सोशल मीडिया पर तरह-तरह की विचारधाराओं के बीच अच्छी बहस की गुंजाइश रहती है, तो वह कम ही लोगों के साथ, कम ही मामलों में रहती है। अधिकतर तो एक ही विचारधारा के लोग जुटने लगते हैं, और एक-दूसरे को सुहाती बातें करने लगते हैं, क्योंकि असहमति पर दूसरे लोगों की जो प्रतिक्रिया होती है, उसे बर्दाश्त करना भी आसान होता नहीं है। फिर यह भी है कि सोशल मीडिया लोगों की जिंदगी को एक खुली किताब की तरह भी सामने रख देता है, और हिन्दुस्तान में जिस तरह सरकारों का, सत्तारूढ़ लोगों का बर्दाश्त कम होते चल रहा है, उससे भी लोगों को अपने हमख्याल लोगों के बीच रहना अधिक महफूज लगता है कि उनमें से कोई सत्ता तक उनकी शिकायत नहीं करेंगे, और आज के वक्त में सत्ता महज सत्तारूढ़ पार्टी या मंत्री-अफसर नहीं होते, समाज के कोई भी ताकतवर तबके सत्ता की एक किस्म तो होते ही हैं। 

सोशल मीडिया ने एक तरफ जहां लोगों के लिए सोचने-समझने और बातचीत की पूरी दुनिया खोल दी है, वहीं दूसरी तरफ उसने लोगों को अपनी दुनिया का आकार, उसकी किस्म, उसके लोग छांटने का जो अभूतपूर्व मौका दिया है, वैसा तो इंसान के समाज में पहले कभी भी नहीं था। लोगों को न अपने रिश्तेदार छांटने मिलते थे, न ही अपनी क्लास के बाकी बच्चे, और न ही अड़ोस-पड़ोस। लोगों को अपनी स्कूल या कॉलेज की टीम के बाकी लोग भी छांटने का मौका नहीं मिलता था, और न ही अपने साथ काम करने वाले दूसरे लोग छांटने मिलते थे। लेकिन सोशल मीडिया ने लोगों को ऐसे परले दर्जे का छंटैल बना दिया है कि वे बात-बात को छांटते चलते हैं। ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर लोगों को यह पसंद भी हासिल है कि वे किन शब्दों को देखना नहीं चाहते। फेसबुक पर कुछ दूसरे तरह का काबू हासिल है। मतलब यह कि लोग अपनी ही पसंद की दुनिया में जीते हैं, और नतीजा यह होता है कि किसी को लगता है कि सोशल मीडिया पर गांधी का बहिष्कार चल रहा है, किसी को लगता है कि मोदी का कीर्तन चल रहा है, किसी को लगता है कि गोडसे की स्तुति हो रही है, और किसी को लगता है कि किसी किस्म की नफरत फैलाई जा रही है।

लाखों बरस से इंसानों ने इस तरह के काबू को कभी देखा-सुना नहीं था। पिछले 50 हजार बरस से अधिक का इंसानों का ताजा इतिहास हाल के कुछ बरसों में, खासकर अभी के दस-बीस बरस में जिस तरह बदल गया है, उसके साथ लोग जी तो रहे हैं, लेकिन उन्होंने जीना सीख लिया है, या मान लेना भी कुछ गलत होगा। आज जिस तरह सामाजिक अंतरसंबंध बदल रहे हैं, लोगों की सोच को पल-पल हथौड़ा लग रहा है, या लोगों को सहलाया जा रहा है, वह सब भी बिल्कुल नया है। इंसान का दिमाग एकदम से ऐसे माहौल के लिए तैयार हो गया होगा, ऐसा माना नहीं जा सकता। इसलिए सोशल मीडिया से निजी सोच, निजी जीवन, और सामाजिक अंतरसंबंधों पर  क्या असर पड़ रहा है यह अंदाज लगाना आसान नहीं है। 

अभी-अभी हिन्दुस्तान के बाहर की एक महिला ने सोशल मीडिया पर लिखा कि फेसबुक पर किसी राजनीतिक दल या नेता का प्रचार इतना आसान है कि फेसबुक की बनाई हुई नीतियों की कोई रोक वहां काम नहीं करती। उसने फेसबुक पर ही एक इश्तहार डलवाया जिसमें लिखा था कि फेसबुक और उसके मालिक मार्क जुकरबर्ग ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दुबारा राष्ट्रपति बनाने के लिए अपना समर्थन दिया है। यह झूठा विज्ञापन देकर उसने साबित किया कि फेसबुक पर भुगतान करके कोई भी झूठी बात प्रचारित की जा सकती है। और आज जब लोग अपनी दुनिया को अपने बनाए हुए दायरे तक सीमित कर चुके हैं, तो वैसे में इस किस्म के नियंत्रित इश्तहारों से, जो कि कम्प्यूटरों की मेहरबानी से सीधे चुनिंदा लोगों तक पहुंचते हैं, दुनिया को काबू करना कितना आसान हो गया है। लोग समझ रहे हैं कि वे सोशल मीडिया पर अपनी दुनिया अपनी मर्जी से तय कर रहे हैं, और हकीकत यह भी है कि वहां पर भुगतान करके लोग दूसरों की सोच को इस तरह प्रभावित भी कर रहे हैं!


Date : 18-Oct-2019

महाराष्ट्र के एक बड़े सहकारी बैंक, पीएमसी के डूबने से उसमें जिंदगी भर की कमाई रखने वाले लोगों के मरने की नौबत आ गई है, बल्कि कुछ लोग मर भी गए हैं, कुछ लोगों के पास किडनी-ट्रांसप्लांट के बाद की जीवनरक्षक अनिवार्य दवाओं के लिए भी पैसे नहीं रह गए हैं, लेकिन उनकी याचिका सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है, और उन्हें हाईकोर्ट जाने के लिए कहा है। किसी भी मामले के हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचने का मतलब कुछ महीनों से लेकर कुछ बरसों तक की देरी हो सकता है, और जब लोगों को बैंक में जमा अपनी रकम नहीं मिल पा रही है तो क्या वे सचमुच ही यह इंतजार कर सकते हैं? 

देश के कानून की मामूली समझ भी बताती है कि संपत्ति का अधिकार लोगों का बुनियादी अधिकार है, और केन्द्र सरकार से, रिजर्व बैंक से लाइसेंस पाने के बाद उनके प्रति जवाबदेही के साथ, उनकी जांच और निगरानी के तहत काम करने वाले बैंकों में अगर जालसाजी होती है, तो आरबीआई और केन्द्र सरकार को सीधे जवाबदेह रहना चाहिए। आज देश में मोदी सरकार ने अपने बैंकिंग और बाकी नियम-कायदों को ऐसा बनाकर रखा है कि लोग अधिक रकम लेकर चल नहीं सकते, घर पर अधिक रकम रख नहीं सकते, किसी काम के लिए बड़ा भुगतान नगद कर नहीं सकते, इसलिए सरकार ने लोगों को घेरघारकर एक ऐसे कोने में पहुंचाया है जो कि बैंक है। वहां भी एटीएम से एक दिन में रकम निकासी की सीमा तय कर दी है, तरह-तरह की फीस लाद दी है, इन सबके चलते लोग बैंकों में ही जमा रख सकते हैं। ऐसे में जब बैंकों की रकम डूबती है, और बैंक चलाने वालों की जालसाजी से डूबती है, तो उसकी गारंटी सरकार के मत्थे ही रहनी चाहिए। लेकिन सरकार और बैंकों ने अपने हाथ धो लिए हैं कि किसी की कितनी भी रकम जमा रहे, उसमें से बस एक लाख रूपए तक की वापिसी की गारंटी है। 

जो सरकार देश में कैशलेस अर्थव्यवस्था चाहती है, जो डिजिटल भुगतान को ही अनिवार्य बना देने की कोशिश कर रही है, वह सरकार अगर बैंक-धोखाधड़ी की जिम्मेदारी से कतराती है, तो यह जनता के साथ एक गैरजिम्मेदाराना बर्ताव भी है, और शायद कानूनी रूप से गलत भी है। केन्द्र सरकार चाहे जो कानून बनाकर अपनी जिम्मेदारी से कतराए, हमारी सामान्य बुनियादी समझ यह कहती है कि ऐसे बच निकलने के कानून सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाएंगे, और केन्द्र सरकार को बैंकों की डूबत का आम लोगों का पैसा देना ही पड़ेगा, देना ही चाहिए। यह याद रखने की जरूरत है कि बैंकों की कमाई की रकम केन्द्र सरकार ने आरबीआई की बांह मरोड़कर निकाली है, और उसे बैंकों को दिया है ताकि वे नए कर्ज दे सकें। अब सवाल यह है कि जिसने जिंदगी भर की खून-पसीने की कमाई जमा की है, उसके डूबने के खिलाफ सरकार का कोई बचावतंत्र नहीं है, दूसरी तरफ जिन लोगों ने बैंकों से कर्ज लेकर उसे डुबा दिया है, या लेकर भाग गए हैं, उनकी भरपाई करने के लिए केन्द्र सरकार बैंकों को आरबीआई से लेकर रकम दे रही है। कुल मिलाकर सरकार का बैंकिंग का सिलसिला ईमानदार जमाकर्ताओं से छीनकर बेईमान कर्जदारों पर डुबाने का है, और यह सिलसिला महज संसद में कोई बैंकिंग नियम बनाकर जायज नहीं हो जाता, यह सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो जाना तय है। आज सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को चाहे तकनीकी आधार पर हाईकोर्ट ले जाने कहा है, लेकिन हाईकोर्ट संसद के बनाए कानून को पलटने की ताकत नहीं रखता है, और बैंकों में लुटे हुए जमाकर्ताओं में से बहुतों की मौत के बाद भी सुप्रीम कोर्ट इसे सुनेगा, और उस वक्त जज जैसे रहेंगे, वैसा इंसाफ होगा। आज तो सरकार नगद रखने नहीं दे रही, और बैंक डूबने पर लोगों को रकम नहीं दे रही है। इसी के लिए कहा गया है कि जबरा मारे भी और रोने भी न दे।
-सुनील कुमार


Date : 17-Oct-2019

कश्मीर से जम्मू होते हुए नीचे पहुंचने वाले सेबों पर भारतविरोधी, पाकिस्तान समर्थक, और आजादी के नारे लिखे हुए मिले हैं। ट्रक भर-भरकर आने वाले ऐसे सेब दसियों लाख होते हैं, और उनमें से कुछ पर अगर ऐसा लिखा हुआ है, तो इसमें हैरानी की कोई बात इसलिए नहीं है कि वहां तो दीवारों पर भी ऐसे नारे देखने में आते रहे हैं, और अब चूंकि पिछले दो महीने से अधिक से वहां सुरक्षा बलों का ऐसा पहरा है कि दीवारों पर भी लिखने का मौका शायद न मिला हो, फोन और इंटरनेट बंद होने से भी शायद सोशल मीडिया पर भड़ास निकालने या विरोध करने का मौका न मिला हो, और बाकी हिन्दुस्तान के साथ अपने मन की बात बांटने का यह मौका कश्मीर के कुछ लोगों को शायद पहली बार मिला, और उन्होंने ऐसे संदेश भेजे। लोगों को याद रखना चाहिए कि समंदर के पानी में तैरकर आई हुई कई बोतलों में ऐसे संदेश रहते हैं जिन्हें दस-बीस बरस पहले दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में किसी ने लिखकर बोतल में बंद करके समंदर में छोड़ दिया हो, और वे किसी और कोने में जाकर लोगों को मिलते हैं। जेलों में बंद कैदी भी तरह-तरह के रास्ते निकालकर अपनी बात बाहर भेजते हैं, स्कूल-कॉलेज के हॉस्टलों में अगर बच्चों को कड़ी निगरानी में रखा जाता है, तो वे भी अपनी बात गुमनाम चि_ियों के रास्ते बाहर भेजते हैं। अभी-अभी बस्तर में नक्सल मोर्चे पर तैनात एक सीआरपीएफ जवान ने उत्तरप्रदेश में अपने परिवार की जमीन की दिक्कत गिनाते हुए अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, और उसके बाद उसकी शिकायत की जांच शुरू हुई है। 

जहां से लोगों को अपनी बात बाहर भेजने का हक नहीं रह जाता, वहां लोग तरह-तरह के रास्ते अपनाते हैं। लोगों ने यह देखा हुआ है कि हिन्दुस्तान में लोग नोटों पर किसी के बारे में कुछ लिखकर उसे चला देते हैं, या ताजमहल जैसी इमारत की दीवार पर, नदी के किनारे चट्टान पर, या किसी किले और महल में अपने दिल की बात लिखकर मोहब्बत का इजहार करते हैं, या पखानों के बंद दरवाजों के भीतर की तरफ खरोंचकर नफरत का इजहार। ऐसे में अगर कश्मीर के कुछ लोगों ने अपने मन की बात सेब पर लिखकर भेजी है, तो इसी आधार पर वहां के सेब का बहिष्कार करने का फतवा ठीक नहीं है। किसी प्रदेश को जब देश के लोग अपना मानते हैं, तो वहां के लोगों की भावनाओं को सुनना भी लोगों की जिम्मेदारी होती है। बिना हिंसा, बिना आतंक की धमकी के अगर ऐसी बात लिखकर कुछ लोग अपने मन की भड़ास निकाल रहे हैं, तो इसे एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया मानना चाहिए, इसे हिन्दुस्तान के खिलाफ कोई धमकी मानना ठीक नहीं है। फिर इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि किसी के सचमुच ही ऐसा लिखे बिना भी किसी साजिश के तहत, कश्मीर के लोगों को बदनाम करने के लिए, उनके खिलाफ माहौल बनाने के लिए भी एक मार्कर पेन की मदद से ऐसा करने वाले लोग भी हो सकते हैं। हर वक्त आंखों के सामने जो रहता है, जो दिखता है, उसे पूरी तरह सच मान लेना भी ठीक नहीं है। कश्मीर में पाकिस्तान के हिमायती भी हमेशा से बने रहे हैं, और आतंकी भी रहे हैं जिनमें हो सकता है कि स्थानीय लोग भी हों। ऐसे लोग भी यह चाह सकते हैं कि कश्मीर को बाकी हिन्दुस्तान से काटकर, अलग-थलग करके कश्मीरियों को ऐसी बेबसी में लाया जाए कि वे एक अलग राज्य में, पाकिस्तान के साथ जुडऩे में अपना भला चाहें। इसलिए दो-चार सेब पर, या दो-चार सौ सेब पर ऐसी लिखी गई बातों को लेकर बवाल खड़ा करना ठीक नहीं है क्योंकि देश और समाज के व्यापक हित में यह जरूरी है कि साजिश की आशंका वाली ऐसी हरकतों को पहली नजर में ही सच न मान लिया जाए, और न ही यह माना जाए कि यह तमाम कश्मीरियों की सोच है। 

ऐसी छोटी-छोटी हरकतों को लेकर बड़ी-बड़ी नफरतें पाल लेना ठीक नहीं होगा। कश्मीर ही नहीं, बाकी हिन्दुस्तान में भी जब लोगों से बोलने, बात करने, लिखने का हक छीन लिया जाए, तो उनके मन की भड़ास किसी न किसी शक्ल में तो निकलेगी ही, और ऐसे नारे ऐसी भड़ास का एक अहिंसक जरिया है जिसे अधिक तूल नहीं देना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Oct-2019

छत्तीसगढ़ सरकार की एक मंत्रिमंडल उपसमिति ने तय किया है कि म्युनिसिपल के मेयर और अध्यक्षों के लिए सीधा चुनाव नहीं होगा और वे पार्षदों के बीच से चुने जाएंगे। राज्य में पिछले कुछ चुनाव मेयर के सीधे चुनाव वाले थे, और इस दौरान बहुत से शहरों ने बड़े महंगे चुनाव देखे थे। मेयर की कुर्सी के उम्मीदवारों के वार्डों में अपनी पार्टी के पार्षद प्रत्याशियों के जिताने के लिए भी खासा खर्च करना पड़ता था। जाहिर है कि इतने बड़े पूंजीनिवेश की भरपाई के लिए म्युनिसिपल की सत्ता में आते ही लोगों को बड़ी-बड़ी कारोबारी योजनाएं बनानी पड़ती थी। मेयर का चुनाव सीधे लडऩा सम्पन्नता से भी जुड़े रहता था और म्युनिसिपल दायरे में आने वाले किस्म-किस्म के कारोबारी माफिया भी मेयर-प्रत्याशी पर दांव लगाते थे। चुनाव महज पार्षदों का होने से भ्रष्टाचार का यह एक पहलू कम होगा। वैसे भी जब देश में पीएम और राज्य में सीएम विधायकों के बहुमत से चुने जाते हैं, वे स्थानीय संस्थाओं के लिए सीधे निर्वाचन की एक अधिक महंगी और अधिक भ्रष्ट व्यवस्था गैरजरूरी है।

अब चूंकि राज्य में स्थानीय संस्थाओं के चुनावों का ढांचा तय होना है इसलिए कुछ और पहलुओं पर चर्चा होना जारी है। एक विचार यह चल रहा है कि क्या पंचायतों की तरह म्युनिसिपल चुनाव भी गैरदलीय आधार पर होने चाहिए? उम्मीदवार बिना पार्टी, बिना पार्टी निशान के लड़ें जैसे कि छत्तीसगढ़ में ही पंचायतों में लड़ते आए हैं? अगर ऐसा होता है तो म्युनिसिपल चुनाव अधिक लोकतांत्रिक होंगे और पार्टी के भीतर दबदबे या चापलूसी की वजह से लोगों का पार्टी टिकट पाना खत्म होगा? अधिक लोग चुनाव लड़ सकेंगे और एक किस्म से पार्टियों के भीतर भी मुकाबला होगा। एक बात यह उठ रही है कि जब म्युनिसिपल चुनाव संसदीय प्रणाली पर हो रहे हैं, और अगर पार्टी निशान पर हो रहे हैं तो इन पर संसद या विधानसभा की तरह दलबदल विरोधी कानून लागू होना चाहिए। यह एक अच्छी सोच है कि किसी पार्टी के झंडेतले जीतकर आए लोग दलबदल न कर सकें। यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तेरह भाजपा विधायकों को फोड़कर कांग्रेस में शामिल कर लिया था और एक तिहाई से अधिक होने से वे अपात्र भी नहीं हुए। इस कानून की सबसे बड़ी हत्या यह है कि इसमें मतदाताओं के समर्थन के साथ बलात्कार पर तो सजा है, लेकिन सामूहिक बलात्कार की छूट है। पार्षदों का चुनाव अगर पार्टी निशान पर होता है तो उनके दलबदल पर अपात्रता का नियम बनना चाहिए।

यह मौका है जब छत्तीसगढ़ सरकार इन चुनावों में काले धन की माफिया-दखल भी घटा सकती है। प्रचार में होर्डिंग, बैनर, पोस्टर, पर रोक लगाकर सिर्फ छोटे पंपलेट से प्रचार करने का एक किफायती नियम लागू किया जा सकता है। इससे काले धन की दखल भी घटेगी, और पर्यावरण भी बचेगा। वार्ड का चुनाव तो घर-घर जाकर लडऩा चाहिए और इस तरीके से सही जनमत सामने आ सकेगा। इस राज्य की नई सरकार के सामने सुधार करने का एक मौका है और उसे चुनाव न्यूनतम खर्च वाला करना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 15-Oct-2019

एक भारतवंशी अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी और उनकी पत्नी एस्थर डुफ्लो के साथ एक अन्य अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर को इस बरस का नोबल पुरस्कार दिया गया है। उन्हें अर्थशास्त्र की उनकी सोच से दुनिया की गरीबी कम करने में मिली मदद की वजह से उन्हें इसका हकदार माना गया। भारत में जन्मे, कोलकाता में पढ़े, और फिर जेएनयू से अर्थशास्त्र पढऩे वाले अभिजीत बैनर्जी को दुनिया का यह सबसे बड़ा सम्मान मिलना अमरीका में उनके विश्वविद्यालयों के लिए गौरव की बात है जहां से उन्होंने पीएचडी की, और जहां वे पढ़ाते हैं। दूसरी तरफ जेएनयू को भी हाल के बरसों में देश का गद्दार होने की जो बदनामी बख्शी गई थी, उस पर भी बदनाम करने वालों को सोचने की नौबत है कि गरीबों की भलाई का अर्थशास्त्री इसी जेएनयू से निकला हुआ है, और जेएनयू के हमेशा के बागी तेवरों का प्रतिनिधि रहते हुए वह इंदिरा के राज में कुलपति विरोधी आंदोलन में दस दिन जेल में भी रह चुका है। अभिजीत बैनर्जी ने हाल ही के लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी को चुनावी घोषणापत्र के लिए गरीबों की हिमायती आर्थिक नीतियां सुझाई थीं। उनके नाम से यह भी अच्छी तरह दर्ज है कि उन्होंने भारत की नोटबंदी की कड़ी आलोचना की थी, और आज भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर वे बहुत निराश भी हैं।

हम यहां पर उनके बारे में और अधिक लिखना नहीं चाहते लेकिन उनके बहाने से इस पर चर्चा जरूर चाहते हैं कि देश की अर्थनीति गरीबों के लिए हमदर्दी की कैसे होनी चाहिए, और इस तरह अभिजीत बैनर्जी की नीतियों को पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण माना गया है, और कई देशों में गरीबी से उबरने के लिए उनके सुझाए गए कार्यक्रमों पर अमल हुआ है, उनका फायदा देखने मिला है। यहां पर हम अभिजीत की चर्चा बंद करते हुए गरीबों की चर्चा पर बात आगे बढ़ाना चाहते हैं जिनका देश के साधनों पर पहला हक होना चाहिए। आज भारत की अर्थव्यवस्था बड़े औद्योगिक घरानों की हिमायती लग रही है, और उससे परे की एक बात यह भी है कि वह पूरी तरह बेकाबू भी लग रही है। हिन्दुस्तान की सरकार गिनाने के लिए सकल राष्ट्रीय उत्पादन के नए तरीके से गढ़े गए आंकड़ों की मदद लेती है, लेकिन दुनिया के बहुत से अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऐसे गढ़े हुए आंकड़ों से कोई लंबी मदद नहीं मिलती है। अभी कल ही इसी अखबार में हमने देश के एक अर्थशास्त्री का एक लेख छापा था जिसमें उन्होंने मोदी सरकार को सुझाया है कि नेहरू के मॉडल को कोसने के बजाय उसे नरसिंह राव-मनमोहन सिंह के खड़े किए हुए आर्थिक ढांचे को अपनाना चाहिए जिससे देश की आज की हालत सुधर सके। अपने किस्म के ऐसे बहुत से लेखों से परे इस लेख का एक महत्व यह भी है कि इसके लेखक देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं। उन्होंने खुलकर ऐसा आलोचनात्मक लेख लिखा है जिसके साथ इस बात को याद रखना चाहिए कि राजनीति में आने के पहले निर्मला सीतारमण पति के साथ ही एक ही संस्था में काम करती थी। दो दिनों में ये दो बातें ऐसी आई हैं जो कि देश की अर्थनीति और आर्थिक स्थिति दोनों पर कुछ सोचने के लिए मजबूर करती हैं। मोदी सरकार के नोटबंदी से लेकर दूसरे कई किस्म के फैसलों के आलोचक को नोबल पुरस्कार मिलना, और वित्तमंत्री के पति का केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों से गहरी सहमति रखना। अब यह तो सरकार के ऊपर है कि वह इन दोनों को देश के खिलाफ मानकर उनकी बातों को खारिज कर दे, या आज की देश की मंदी और बदहाली से जूझने के लिए निंदकों और आलोचकों की बात सुनकर उससे कुछ सीखने की कोशिश करे। 

कुल मिलाकर आज हालत यह है कि पूरी दुनिया में गरीबों की हालत बेहतर बनाने वाली आर्थिक नीतियों का सम्मान हुआ है, और यह निर्विवाद रूप से माना जा रहा है कि गरीबों को साथ-साथ ऊपर लाए बिना दुनिया, कोई भी देश-प्रदेश ऊपर नहीं आ सकते। पूरे देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़ों का जोड़़ चाहे किसी देश को ऊपर जाता हुआ बता दे, लेकिन जहां आबादी का अधिकांश हिस्सा बदहाल हो, पिछड़ा हुआ हो, वहां पर जीडीपी जैसे आंकड़े कोई हकीकत नहीं बताते। अब यह मोदी सरकार पर है कि वह आलोचकों की बात सुनना चाहती है या नहीं, और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण पर है कि वे घर की बात सुनना चाहती हैं या नहीं। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Oct-2019

मद्रास हाईकोर्ट में सार्वजनिक जगहों पर अवैध बैनर, पोस्टर, होर्डिंग लगाने वालों के लिए अधिकतम सजा की मांग करने वाली याचिका पर बहस चल रही है। इस याचिका की जरूरत इसलिए पड़ी कि एक नेता के अवैध पोस्टर के गिरने से उसमें उलझी दुपहिया सवार युवती गिरी, और एक बड़ी गाड़ी के नीचे आकर मर गई। इस मामले में जिस नेता का पोस्टर था, उसे कड़ी सजा देने की मांग भी की जा रही है। इस सुनवाई के दौरान जजों ने कहा कि नेताओं को तमिलनाडु का दौरा अक्सर करते रहना चाहिए ताकि राज्य साफ-सुथरा बना रहे। दो जजों की यह बेंच हाल ही प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति के चेन्नई करीब मुलाकात करने के लिए चारों तरफ की गई भारी सफाई को देखते हुए यह तंज कस रही थी। जजों ने कहा कि नेताओं के आने से अब ये जगहें बहुत साफ हो गई हैं, और जब बड़े नेता आते हैं तभी सरकार ऐसे कदम उठाती है। उल्लेखनीय है कि चीनी राष्ट्रपति के आने के पहले मामल्लापुरम के 7वीं सदी के पल्लव वंश के स्मारकों को साफ-सफाई करके चमकाया गया, और चेन्नई हवाई अड्डे से लेकर मामल्लापुरम तक युद्ध स्तर पर सफाई और सौंदर्यीकरण का काम किया गया। 

इस साफ-सफाई के लिए भारतीय प्रधानमंत्री या तमिलनाडु की राज्य सरकार को तोहमत देना ठीक नहीं है क्योंकि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में आम और खास के बीच का यह फर्क कदम-कदम पर चीखते हुए बोलता है। बिना चीनी राष्ट्रपति के भी अगर भारतीय प्रधानमंत्री किसी शहर में जाते हैं, तो उनके सड़क सफर के सारे रास्तों की मरम्मत की जाती है, नई सड़कें बनती हैं, सड़क के बीच और किनारों पर रंग-पेंट फिर से होता है, और शहर मानो स्वागत में बिछ सा जाता है। लोगों को याद होगा कि जब पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार थी, और ब्रिटिश प्रधानमंत्री वहां आए थे, तो राजधानी कोलकाता की सड़कों के किनारे से भिखारियों को हटाकर शहर के बाहर कर दिया गया था, फुटपाथों पर जीने वाले बेघरों को हटा दिया गया था, और आमतौर पर गंदे रहने वाले इस शहर को अंग्रेज प्रधानमंत्री के स्वागत में चमकाकर पेश किया गया था। यह हिन्दुस्तान की आम संस्कृति है कि आने वाले मेहमान के लिए इतनी नकली चमक पेश कर दी जाए कि उनकी आंखें चकाचौंध रहें। इसके लिए अनुपातहीन अधिक खर्च किया जाता है, जो कि राज्य शासन या स्थानीय संस्थाओं के बाकी खर्चों में कटौती करके ही होता है। लेकिन यह तो मानवीय स्वभाव ही है कि किसी के घर पर ही कोई खास मेहमान आते हैं, तो लोग अपनी ताकत से कुछ बाहर जाकर भी घर को सजाते हैं। 

लेकिन हाईकोर्ट के जिन जजों ने तमिलनाडु की सफाई को लेकर यह तंज कसा है, उनके लिए अगर ऐसी सफाई नहीं की जाती, तो भी उनके लिए कुछ दूसरे खास इंतजाम किए जाते हैं जिनको लेकर आम जनता के मन में ऐसा ही तंज उठता है, लेकिन आम जनता की इतनी औकात नहीं रहती कि वह बड़े लोगों पर व्यंग्य कर सके इसलिए बात आई-गई हो जाती है। देश के किसी भी प्रदेश में हाईकोर्ट के जजों को सायरन बजाती हुई पुलिस गाडिय़ों के पीछे आरामदेह कार में रफ्तार से जाते हुए देखा जा सकता है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम लगातार देखते हैं कि एक-एक हाईकोर्ट जज कारों के काफिलों में चलते हैं, कुछ कारें पुलिस की होती हैं, और कुछ जिला अदालत के जजों की। यह देश दरअसल आम और खास के बीच फर्क की एक समंदर सी चौड़ी, और खाई सी गहरी दूरी को लगातार झेलता है। जिन जजों को फैसले सुनाने की ऐसी कोई हड़बड़ी नहीं रहती कि वे सायरनों के साए में, सड़क पर आम लोगों को रोकते हुए आए-जाएं, वे भी ऐसा करते हैं। भारतीय संविधान सबको बराबरी का हक देता है, और ऐसे में सड़क पर चलने वाले एक खोमचे वाले के समय का महत्व किस तरह एक हाईकोर्ट जज के समय से कम हो सकता है? उसका काम कैसे अदालत के काम से कम महत्वपूर्ण हो सकता है? लेकिन सड़कों पर आम लोगों को रोककर खास जजों के लिए एक तेज रफ्तार राह तैयार करना एक बहुत ही आम बात है। देश को इस तथाकथित वीआईपी और वीवीआईपी संस्कृति से आजाद होना चाहिए क्योंकि राजाओं के वक्त, बादशाहों के वक्त, और अंग्रेजों के वक्त तो सिंहासन पर बैठे लोग और उनके दरबारी आम लोगों से अलग थे, उनके हक भी अलग थे, अब आजाद हिन्दुस्तान में तो प्रधानमंत्री से लेकर आम इंसान तक, और जजों से लेकर अफसरों तक के हक बराबर होने चाहिए, आम नागरिकों के बराबर। जहां कहीं ऐसा फर्क दिखता है, गरीब की सिली हुई जुबान से बद्दुआ निकल तो नहीं पाती है, लेकिन उसके मन से उठती जरूर है, और उसका असर जरूर होता है। देश बिना किसी मेहमान के आए भी साफ रहना चाहिए, और मेहमान के साथ मेजबान प्रधानमंत्री की मौजूदगी में तो उनके डेरे का समुद्रतट निश्चित ही इतना साफ रहना चाहिए कि वहां प्रधानमंत्री एक थैला भरकर कचरा न पा सकें। इसी तरह जजों को आज चुभती हुई इस सादगी के साथ-साथ उनको यह भी देखना चाहिए कि उनके कौन से सामंती काफिलों की शाही सवारी आम जनता को चुभती है। देश में खास लोगों का हाल यह है कि उन्होंने आम लोगों को आम भी नहीं रहने दिया है, उन्हें चूस-चूसकर गुठली बना छोड़ा है। 
-सुनील कुमार


Date : 13-Oct-2019

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अधिक सुर्खियां पाने वाला, सोशल मीडिया पर कवरेज पाना वाला कोई दूसरा नेता आज दुनिया में नहीं है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कुछ लोगों को खबरों में अधिक दिख सकते हैं, लेकिन वे भी मोदी के सामने फीके हैं। लेकिन इसके पीछे की बड़ी ठोस वजहों को देखने-समझने की जरूरत है क्योंकि लोकतंत्र में जनधारणा-निर्माण और भ्रम की बड़ी गुंजाइश रहती है, आंखों से जो दिखता है, वह हकीकत से थोड़ा सा परे भी हो सकता है, या हो सकता है कि वह हकीकत से एकदम ही परे हो। जो भी हो, मोदी के दिलचस्प तौर-तरीकों पर हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि वे लोकतंत्र में मान्य तरीके हैं, और उन पर शोध करने की जरूरत है। 

अब जैसे तमिलनाडु में नरेन्द्र मोदी चीनी राष्ट्रपति के साथ एक बड़ी महत्वपूर्ण बैठक में दो-तीन दिन लगातार खबरों में रहे, और एक सुबह तो जब चीनी राष्ट्रपति कमरे में ही रहे होंगे, मोदी घूमने की पोशाक में समंदर की रेत पर नंगे पैर निकल पड़े, और समुद्रतट पर से कचरा बीनने लगे। उनके इस सफाई-कार्यक्रम की बड़ी हाईक्वालिटी की तस्वीरें सामने आईं, और वीडियो भी सामने आए जो कि उन्होंने खुद भी सोशल मीडिया पर डाले। कुछ दूसरे लोगों ने ऐसी तस्वीरें भी पोस्ट की हैं कि फोटोग्राफरों और वीडियोग्राफरों की इतनी बड़ी टीमें समंदर की रेत पर मोदी की फोटोग्राफी करने के लिए मौजूद थीं, और अगर वे तस्वीरें सही हैं, तो उनमें विदेशी लोग भी कैमरों के पीछे दिख रहे हैं। 

लेकिन मुद्दा देशी-विदेशी फोटोग्राफरों का नहीं है, मुद्दा है मोदी के पसंदीदा सफाई कार्यक्रम का। प्रधानमंत्री के चीनी राष्ट्रपति संग वहां पहुंचने पर जाहिर है कि काफी सफाई पहले ही हो चुकी होगी। इसके बाद भी अगर प्रधानमंत्री को गंदगी दिख रही है, या वे कूड़ा उठाते हुए दिख रहे हैं, तो इससे उनकी सफाई पसंदगी एक बार फिर प्रचार पा रही है। लेकिन ऐसे मौके पर थोड़ी सी हैरानी यह भी होती है कि क्या जमीन पर गंदगी ही इस देश में आज ऐसी गंदगी है जिसे साफ करना इतने बड़े देश के प्रधानमंत्री की प्राथमिकता होनी चाहिए? आज जब देश भर में लोगों की सोच में हिंसा और नफरत की गंदगी भर गई है, जब राज्य सरकारों में भ्रष्टाचार की गंदगी बढ़ गई है, और अधिकतर राज्यों में प्रधानमंत्री की पार्टी या उनके गठबंधन की ही सरकारें हैं, जब लोगों के बयानों में हिंसा और नफरत की गंदगी भर गई है, तब भी अगर इस देश का प्रधानमंत्री केवल सड़क और समुद्रतट की गंदगी उठाने में लगा है, तो बात कुछ खटकती है, कुछ अटपटी लगती है। 

यह कुछ उसी तरह का है कि कोई बीमार-मरणासन्न, या बुरी तरह से जख्मी अस्पताल के बिस्तर पर हो, और कोई उसके बढ़े हुए नाखूनों को काटने लगे, बालों को कतरने लगे। हर वक्त की एक प्राथमिकता होती है, और होनी चाहिए। जब मन, वचन और कर्म की गंदगी चारों तरफ हो, उसकी वजह से अगर हिंसक भीड़ धर्म और जाति के आधार पर छांट-छांटकर हत्या कर रही हो, तो भी क्या उस वक्त महज सड़क की गंदगी को साफ करना काफी हो सकता है? क्या वह प्राथमिकता हो सकती है, या होनी चाहिए? बहुत से काम तब खटकने लगते हैं जब वे दूसरे अधिक जरूरी कामों को अनदेखा करके किए जाते हैं। जब किसी इमारत में आग लगी हुई हो, तो उसी वक्त उसकी दीवारों पर लिखे गए भद्दे नारों को मिटाना कोई प्राथमिकता नहीं हो सकती, फिर चाहे वह बाकी के आम समय पर करने लायक एक जरूरी काम जरूर हो। आज हिन्दुस्तान में जितने किस्म की दिक्कतें दिख रही हैं, बाजार और कारोबार का यह मानना है कि बहुत बुरी तरह की मंदी छाई हुई है, सरकारी निगरानी में चलने वाले बैंक उसके बड़े पदाधिकारियों की धोखाधड़ी और जालसाजी से दीवालिया हो रहे हैं, और अभी वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के एक दौरे में उनके सामने एक ऐसा मरीज नकाब पहने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहा जिसकी जमा रकम ऐसे ही एक डूबे हुए बैंक में फंसी है, और जिसके पास किडनी ट्रांसप्लांट होने के बाद अब दवाईयों के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं। इस तरह की दिक्कतें देश भर में लोगों को आ रही हैं, खुद वित्तमंत्री ने जीएसटी से लोगों को होने वाली दिक्कतों को माना है। जब देश ऐसी भयानक दिक्कतों को झेल रहा है, तो प्रधानमंत्री पहले सरकार के काम की गड़बडिय़ों की सफाई में जुटें तो वह बेहतर होगा। सफाई का महत्व गांधी से लेकर आज तक बहुत से लोगों ने सामने रखा है, और मोदी अपनी लोकप्रियता के चलते अपने इस अभियान को काफी मशहूर कर भी चुके हैं, लेकिन अब वक्त है कि प्रधानमंत्री कैमरों से परे बंद कमरों में उन फैसलों पर मेहनत करें जिससे भूख और बेरोजगारी की गंदगी दूर हो, जिससे कारोबार से मंदी की गंदगी दूर हो। गंदगी हर वक्त महज सड़क पर ही नहीं रहती है, वह आज सड़क से परे फैसलों में मंदी की गंदगी है जिससे पहले निपटना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 12-Oct-2019

देश भर में प्लास्टिक की थैलियों सहित बहुत से दूसरे सामानों पर रोकथाम का माहौल बना हुआ है। छोटे-छोटे कारखाने जो ऐसे सस्ते सामान बनाते थे वे बेरोजगार सरीखे हो गए हैं, और इन सामानों के कारोबारी अपना स्टॉक खत्म करने में लगे हैं। यह तय लग रहा है कि देश में एक बार इस्तेमाल वाला प्लास्टिक सचमुच ही बंद होने जा रहा है, और ऐसा होना भी चाहिए। इसकी शुरूआत आज कारोबारियों से की जा रही है, जबकि शुरूआत कारखानों से होनी चाहिए। अभी ऐसा कानून नहीं बना है, लेकिन चूंकि माहौल बन चुका है इसलिए उसका इस्तेमाल होना चाहिए। यह मौका आगे के दस-बीस बरस की जरूरतों और संभावनाओं को देखते हुए योजना बनाने का है। 

हमने पिछले दस-पन्द्रह बरस में दर्जनों बार यह लिखा है कि राज्य सरकार को अपने प्रदेश के तीर्थस्थानों से प्लास्टिक बैग के विकल्प पेश करने की शुरूआत करनी चाहिए। वहां महिलाओं के समूहों को जूट के कपड़े और सिलाई की मशीनें मुहैय्या करानी चाहिए। कपड़े की मिलों से निकलने वाले तरह-तरह के कपड़ों के बचत टुकड़ों से भी कई आकार के थैले बनाए जा सकते हैं। राज्य सरकार अपनी योजनाओं के प्रचार-प्रसार की छपाई करवाकर इन थैलों की लागत कम करवा सकती है। तीर्थयात्रा और धर्मस्थलों के छापे वाले थैले लोग धार्मिक आस्था से भी इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन बाद में हर शहरी बाजार में ऐसे थैले पहुंच सकते हैं जिनसे हर राज्य में लाखों महिलाओं को रोजगार मिल सकता है। ऐसा व्यापक विकल्प कुछ हफ्तों में ही शुरू हो सकता है जिसमें देर नहीं करनी चाहिए।

प्लास्टिक की तुरंत फेंक दी जाने वाली बोतलों की जगह कई बार इस्तेमाल लायक बोतलों से शुरूआत करनी चाहिए, और फिर स्टील या कांच की बोतलों को जगह-जगह बढ़ाना चाहिए ताकि प्लास्टिक घटे। प्लास्टिक के ग्लास, प्लेट, चम्मच की जगह पत्तल, दोने, और मिट्टी के कुल्हड़ का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए, इससे जंगलों के आसपास बसे लोगों को एक नया कुटीर उद्योग भी मिल सकेगा। भारत में पत्तों से दोना-पत्तल बनाने की छोटी-छोटी मशीनें पच्चीस बरस से प्रचलन में है लेकिन प्लास्टिक ने उसका बाजार खा लिया था, वह बड़े पैमाने पर वापिस आ सकता है। पेड़ों के पत्ते तो हमेशा उगते रहेंगे लेकिन कुल्हड़ों के लिए मिट्टी की खदानें कब तक साथ देंगी, इसका हिसाब जरूर लगा लेना चाहिए कि इससे कोई नई परेशानी तो खड़ी नहीं हो जाएगी।

कुल मिलाकर धरती पर हजारों बरस के लिए बोझ बन गए प्लास्टिक के एक बड़े हिस्से पर रोक से धरती के बचने की एक नई संभावना भी खड़ी हो रही है और नए रोजगारों के पैदा होने की भी। भारत जैसा देश दो-ढाई दर्जन राज्यों में बंटा है और केन्द्र सरकार को चाहिए कि प्लास्टिक-विकल्प की सबसे मौलिक और कारगर योजना के लिए वह हर बरस ऐसे राज्य के लिए हजार करोड़ रूपए का एक ईनाम रखे। ऐसा भी राज्यों को चाहिए कि बिना ईनाम भी वे एक मौलिक कारनामा गढऩे की कोशिश करें। जब स्वीडन की एक स्कूली छात्रा की अक्ल की कोशिशें जब विश्व इतिहास में दर्ज हो सकती हैं तो भारत के कई प्रदेश ऐसा क्यों नहीं कर सकते? आखिर गुजरात की जमीन पर शुरू अमूल ब्रांड के पीछे का सहकारिता आंदोलन दुनिया के इतिहास का एक सबसे कामयाब आंदोलन बना है। भारत का इंडियन कॉफी हाऊस ऐसी ही दूसरी मिसाल है। भारत में प्लास्टिक-विकल्प की ऐसी शुरूआत होनी चाहिए कि बाकी दुनिया भी इसकी तरफ देखे। देश के औद्योगिक डिजाइन संस्थानों को भी सामानों की ऐसी पैकिंग, डिजाइन करनी चाहिए कि हर डिब्बा, हर बोतल बाद में इस्तेमाल का सामान बना रहे। यह सब एक बड़ी चुनौती है और बड़ी संभावना भी। बाजार में प्लास्टिक के नए सामानों और दूसरे सामानों की पैकिंग में लगने वाले डिब्बों, बोतलों, ड्रमों, और बाल्टियों के बीच एक रिश्ता बनाना होगा। इस काम में भी राज्य अपने लोगों के बीच मुकाबला करवा सकते हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 11-Oct-2019

किसी लोकतंत्र में किसी सरकार का मूल्यांकन करना हो तो लोग अर्थव्यवस्था से जुड़े दर्जन भर पैमानों का इस्तेमाल करते हैं, जिसको अब गीली मिट्टी की तरह गढ़ा जाने लगा है। लेकिन गांधी की नजर से देखें तो सरकार की हकीकत इन आंकड़ों से परे की है, और एक नजर में समझ आ जाती है। समाज के सबसे गरीब का भला करने के लिए क्या किया गया, यह एक पैमाना सरकार के मूल्यांकन की एक बड़ी बुनियाद होनी चाहिए। लेकिन इससे परे के कुछ नए पैमाने भी इन दिनों दुनिया में इस्तेमाल हो रहे हैं, जैसे हैप्पीनेस इंडेक्स। सरकारों के मूल्यांकन के कुछ और पैमाने भी होने चाहिए कि वे अपने देश-प्रदेश को किस हालत में पाकर, किस हाल में छोड़कर जाती हैं। 

कुछ ठोस शब्दों में बात करें तो समाज के सबसे गरीब लोगों की पहली जरूरत अनाज होती है, दूसरी जरूरत इलाज, तीसरी जरूरत घर और चौथी शायद बच्चों की पढ़ाई। तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ की राशन व्यवस्था देश भर में सराही गई और अब नई सरकार उसे एकदम से आगे ले जा चुकी है, गरीबी की रेखा के ऊपर के लोगों को सरकारी राशन-रियायत में शामिल करके। दिल्ली की केजरीवाल सरकार के बारे में पता लगता है कि वहां के सरकारी स्कूलों का भीतरी ढांचा देश की सबसे महंगी निजी स्कूलों के क्लासरूम से टक्कर लेता है, और इम्तिहानों में भी ये स्कूल लगातार बेहतर होते चले गए हैं। दिल्ली सरकार की ही मोहल्ला क्लीनिक योजना गरीबों का बहुत बड़ा सहारा बना है और देश में अपने किस्म का सबसे कामयाब मॉडल है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें बेघरों को घर देने में लंबे समय से लगी हुई हैं और इसे कभी इंदिरा आवास, कभी अटल आवास, कभी प्रधानमंत्री आवास, तो कभी मुख्यमंत्री आवास नाम दिया गया। देश में बेघरों के पास मकान बढ़ते चले जा रहे हैं, और सस्ती या रियायती बिजली भी आती जा रही है।

लेकिन एक पैमाने पर देश में महज दिल्ली सरकार खरी उतरी है, इलाज के मामले में। बाकी देश की राज्य सरकारों के अस्पतालों का हाल देखें तो केरल बेहतर है चूंकि पढ़ी-लिखी आम जनता की जागरूकता ने वहां कई जनसुविधाओं को बेहतर रखा है। लेकिन छत्तीसगढ़ के अखबारों में सरकार के किसी एक विभाग की नाकामयाबी-बदइंतजामी, या भ्रष्टाचार की सबसे अधिक खबरें लदी रहती हैं, तो वह स्वास्थ्य विभाग है। लेकिन यहां यह समझ लेना चाहिए कि इस विभाग की ये तीन बातें राज्य बनने से अब तक की तीनों सरकारों में चलती रहीं, आज भी जारी हैं। सरकारी अस्पतालों में कुछ घंटे गुजारकर देखा जा सकता है कि सरकार का हाल कैसा है। किसी राज्य का मूल्यांकन सड़क-पुलों, बगीचों, उसके जीडीपी से करना एक निहायत ही बाजारू सोच है। इंसानी सोच तो राशन, पोषण, इलाज, पढ़ाई, बुनियादी सहूलियतों और खुशहाली से मूल्यांकन करेगी। हर राज्य के लोगों को यह देखना चाहिए कि इन पैमानों पर उनकी सरकार कहां टिकती है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने कुछ पैमाने तय कर दिए हैं जो आगे बने ही रहेंगे, चुनौती रहेंगे। पानी-बिजली के बिल आधे, स्कूल, अस्पताल सबसे बेहतर। सरकार की सोच भी देश में नफरत फैलाने वाली नहीं है, हिंसा फैलाने वाली नहीं है।

हर राज्य सरकार को चाहिए कि वे सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले जनसंगठनों की बातें सुनने का एक खुला इंतजाम करें। ईमानदार जनसंगठन सरकारों के लिए मुफ्त के ऑडिटर की तरह भी होते हैं और उनकी कोच सरकारों को बेहतर योजनाएं बनाने में, और उन पर बेहतर अमल करने में भी मदद करती है। अच्छे जनसंगठन आमतौर पर इंसानों, दूसरे प्राणियों, और धरती के भले के लिए काम करते हैं और उनका मकसद बेहतरी, खुशहाली होता है। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के अखबार कई हफ्तों से सेक्स-जाल पर टिके एनजीओ की खबरों से भरे हुए हैं जिन्हें दोनों राज्य सरकारों ने खूब काम दिया था। लेकिन उससे परे बहुत से ईमानदार जनसंगठन हैं जो गांधी की सोच वाले पैमानों पर सरकार की मदद कर सकते हैं। जो सरकार सबसे गरीब के सबसे करीब होगी, वही सरकार बेहतर सरकार होगी।
-सुनील कुमार


Date : 10-Oct-2019

कांग्रेस के दो नेताओं के बयान दो दिनों से सुर्खियों में हैं। भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री रहे सलमान खुर्शीद ने कहा कि लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार का कोई विश्लेषण इसलिए नहीं हो सका कि कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी चुनावी नतीजों के बाद उठे और चल दिए। इसके बाद कल कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और पार्टी के एक बड़े नौजवान नेता समझे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि पार्टी को लोकसभा नतीजों पर आत्मविश्लेषण करने की जरूरत है। आज जब कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों से जूझ रही है तब ये बातें चाहे कितनी ही तर्कसंगत और जायज हों, न तो मासूम हैं, और न ही पार्टी का भला करने वाली। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का कुछ हासिल न कर पाना सोचने का मुद्दा था, है, और रहेगा, लेकिन सवाल यह है कि आज दो राज्यों के चुनावों और देश भर के उपचुनावों के बीच क्या इस शिगूफे की जरूरत थी?

कांग्रेस के भीतर कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं को यह एक जायज मौका लग सकता है कि राहुल के छोड़े गए शून्य को वे भी भर सकते हैं। सोनिया गांधी ने अनमने ढंग से, और कामचलाऊ व्यवस्था के तहत पार्टी को संभाला जरूर है लेकिन राहुल का सार्वजनिक बयान तो यही था कि पार्टी गांधी परिवार से परे का अध्यक्ष देखे। यह बात बहुत से कांग्रेस नेताओं में उम्मीद भर चुकी है कि उनका अच्छा वक्त आएगा, लेकिन समझदारी यह रहती कि किसी भी नीयत से दिए गए बयान विधानसभा चुनावों तक टाल दिए जाते तो वह एक औसत राजनीतिक समझ के हिसाब से भी ठीक होता। जो नासमझ नहीं हैं, उन्हें नासमझी की रियायत नहीं दी जा सकती।

लेकिन बेमौके के इन दो बयानों को छोड़ दें तो यह तो लगता ही है कि कांग्रेस पार्टी को कम से कम नाजुक मौके पर तो आत्ममंथन करना था। लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद की कांग्रेस कार्यसमिति राहुल के इस्तीफे में ही शुरू और खत्म हो गई और लीडरशिप के फूटे हुए ज्वालामुखी से बिखरे लावे में किसी से कुछ कहते नहीं बना। और बाद के महीनों में तो देश की तमाम गैरवामपंथी पार्टियों के नेता कूद-कूदकर भाजपा में जा रहे हैं, कांग्रेस सहित। पलायन के ऐसे दौर में भी अगर कांग्रेस पार्टी एक अनमने और कामचलाऊ नेता के भरोसे बनी रहेगी तो क्या वह एक अस्थायी संन्यास ले रही है चुनावों से?

आज देश के तमाम गैरभाजपा दलों के सामने अस्तित्व का संकट बना हुआ है, एनडीए के भीतर के भाजपा के सहयोगी-दलों के सामने भी। महाराष्ट्र में तो चुनाव चलते हुए भी भाजपा अपने सहयोगी दलों के नेताओं पर लाईन मार रही है और वे पार्टियां उलझन में हैं कि जब जेठजी ही छोटी बहू का हाथ पकड़ रहे हैं तो वे कहां जाएं। कांग्रेस के भी अनगिनत नेता देश भर में भाजपा में जा रहे हैं क्योंकि पार्टी में लीडरशिप का ठिकाना नहीं है तो उसमें उनको अपने ठिकाने का भरोसा कहां से होगा?

कुल मिलाकर कांग्रेस नेताओं के अच्छी या बुरी नीयत वाले बयान आज चाहे अनदेखा करने लायक हैं लेकिन एक पखवाड़े बाद, चुनाव निपट जाने पर कांग्रेस को आईना देखने का साहस तो जुटाना ही होगा।
-सुनील कुमार


Date : 09-Oct-2019

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश में बढ़ते हुए हिंसक तनाव के बारे में चिट्ठी लिखने वाले 50 प्रमुख कलाकारों, फिल्मकारों, और साहित्यकारों के खिलाफ बिहार में राष्ट्रद्रोह की एफआईआर दर्ज की गई है। इसके खिलाफ और लोग प्रधानमंत्री को उसी चिट्ठी को दस्तखत करके भेज रहे हैं कि उनके ऊपर भी इसे लेकर एफआईआर दर्ज करा दी जाए। यह सिलसिला उस देश में खतरनाक है जिसमें पार्टियों के भीतर एक वक्त बड़ी कड़ी असहमति रहते आई है, जिसमें राजनीतिक परिवारों के भीतर नेहरू और फिरोज गांधी किस्म की असहमति रहते आई है, और इस देश के आजादी के आंदोलन के दो सबसे बड़े नेताओं, गांधी और नेहरू के बीच भी गंभीर असहमति रहते आई है। ऐसे देश में प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने के खिलाफ अगर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जा रहा है, तो यह पूरी तरह अलोकतांत्रिक और शर्मनाक बात है। देश के बड़े-बड़े जाने-माने, और पूरी तरह से शांतिप्रिय लोगों के खिलाफ ऐसे मुकदमे दर्ज करने से पूरी दुनिया में भारत की साख खत्म होती है, और यह भी समझ लेना चाहिए कि आज भारत की न्यायपालिका की संदिग्ध हो चली विश्वसनीयता के बीच भी यह जाहिर तौर पर दिखता है कि यह मामला देश की बड़ी अदालत में एक मिनट भी नहीं टिकेगा, लेकिन शायद मामले को किसी नतीजे तक पहुंचाना मकसद भी नहीं है, और इसका मकसद बाकी लोगों को चुप करना अधिक दिखता है क्योंकि पूरी बेगुनाही के बाद भी अदालत में जाकर खड़े होने की ताकत भी हर किसी में नहीं रहती है, देश की अदालतों की भ्रष्ट व्यवस्था लोगों को तन-मन-धन से निचोड़कर रख देती है। 

अभी कुछ ही महीने पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आलोचकों का स्वागत किया था, लेकिन उनका यह बयान उनकी पार्टी और पार्टी की केन्द्र व राज्य सरकारों की कार्रवाई के ठीक खिलाफ साबित हो रहा है। मोदी की सरकार के मंत्री, और पार्टी के बड़े-बड़े पदाधिकारी सार्वजनिक बयान देते हैं कि मोदी की आलोचना करने वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए, लगातार बयानों से यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि मोदी ही देश हैं। यह सिलसिला खुद मोदी के हित में नहीं है, चाहे इसे मोदी की सहमति ही क्यों न हासिल हो। लोकतंत्र में जब आलोचना को पूरी तरह से दबा दिया जाता है, सत्ता के और लोकतंत्र के सारे पहलुओं पर एक मर्जी लाद दी जाती है, तो नतीजा यह होता है कि खुद सत्ता को देश का माहौल पता नहीं लगता। इस देश में इमरजेंसी के दौर को छोड़ दें, तो और कोई भी ऐसा वक्त नहीं रहा है जब सत्ता की आलोचना, सत्तारूढ़ पार्टी की आलोचना को सजा के लायक जुर्म ठहराया गया हो। जिस बिहार में देश के सबसे प्रमुख विचारकों में से 50 के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का जुर्म दर्ज किया गया है, वह भाजपा की गठबंधन सरकार का राज्य है, और ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता कि महीनों पहले की इस चिट्ठी पर ऐसी बड़ी कार्रवाई सरकार के सोचे-समझे फैसले के खिलाफ हुई होगी, और फैसले के पीछे की यह सोच पूरी तरह अलोकतांत्रिक भी है, और खतरनाक भी है। 

देश के आज के माहौल में यह सिलसिला पता नहीं कहां जाएगा क्योंकि सड़कों के गड्ढों से अधिक संख्या में लोगों को राष्ट्रद्रोही करार दिया जा रहा है, और लोगों को इस अंदाज में पाकिस्तान भेजने के फतवे जारी हो रहे हैं कि मानो पाकिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा पर्यटन केन्द्र हो, सबसे बड़ा शरणार्थी कैम्प हो। आजाद हिन्दुस्तान में किसी नागरिक को पाकिस्तान भेजने का हक कैसे किसी को मिल सकता है, और खासकर कैसे किसी को गद्दार कहने का हक किसी को मिल सकता है? हमारा ख्याल है कि जब तक देश की अदालत किसी को राष्ट्रद्रोही और गद्दार साबित करके सजा न दे दे, तब तक किसी को गद्दार कहना एक जुर्म से कम नहीं होता है, और आज हवा में तैरते फतवों को देखते हुए यह समझ ही नहीं पड़ता है कि यह गांधी और नेहरू वाला देश है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगर इस मुद्दे पर खुलकर सार्वजनिक रूप से नहीं बोलते हैं, तो यह उनकी सहमति से हो रही कार्रवाई लगेगी, और यह उनकी तमाम चुनावी कामयाबी को नुकसान पहुंचाने वाला माहौल रहेगा। यह लोकतंत्र ऐसे माहौल को बर्दाश्त नहीं कर सकता।
-सुनील कुमार


Date : 07-Oct-2019

पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस से दो ऐसी खूबसूरत फिल्म अभिनेत्रियां चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचीं कि उनकी तस्वीरें अब तक खबरों में रहती हैं। उनमें से एक का नाम नुसरत जहां है जिसने लोकसभा चुनाव के बाद एक जैन नौजवान से शादी की है, और पिछले दिनों बंगाल की दुर्गा पूजा में तरह-तरह की रस्में करते हुए अपनी पति के साथ नुसरत जहां की तस्वीरें भी सामने आई हैं। जब कभी किसी कामयाब मुस्लिम महिला की ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, तो कुछ कट्टरपंथी लोगों की नींद हराम होती है, और वे बयानबाजी करते हैं, उसे धर्म के खिलाफ बताते हैं। लेकिन बंगाल में दुर्गा पूजा की खूबसूरती और रौनक के पीछे कदम-कदम पर मुस्लिमों का हाथ रहता है, और प्रतिमा बनाने से लेकर प्रतिमा के कपड़े सिलने तक, शामियानों को रौशन करने तक सब जगह मुस्लिम कलाकार और कारीगर बराबरी से काम करते आए हैं। 

हिन्दुस्तान में धर्म का जाहिर तौर पर एक सांस्कृतिक पहलू है जो कि बहुत ही मजबूत है, और धर्म की कट्टरता और हिंसा भी उस पहलू को कमजोर नहीं कर पाती हैं। चाहे शादी-ब्याह की धार्मिक रस्मों के कपड़े हों, चूडिय़ां हों, सिंदूर हो, या दूल्हे की घोड़ी हो, बैंडबाजा हो, या मेहंदी लगाने वाली हो, बिना मुस्लिम शायद ही कोई हिन्दू शादी हो पाए, और शायद ही उसके धार्मिक रीति-रिवाज हो पाएं। धर्मान्ध हिंसा को अगर छोड़ दें, ऐसे हिंसक छोटे-छोटे तबकों को छोड़ दें, तो देश भर में जगह-जगह ऐसी मिसालें बिखरी हुई हैं कि बिना एक भी मुस्लिम वाले गांव में किस तरह हिन्दू ही मस्जिद को जिंदा रखे हुए हैं, या बिना हिन्दुओं वाले गांव में मुस्लिम ही मंदिर को चला रहे हैं, और भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौर में एक-दूसरे को लाखों की संख्या में मारने वाले मुस्लिम और सिक्ख भी अब हिन्दुस्तान में जगह-जगह एक-दूसरे के लिए अपने दरवाजे खोलकर रखते हैं। धर्म का सांस्कृतिक पहलू उसकी कट्टरता के मुकाबले अधिक मजबूत है, लेकिन जैसा कि किसी भी अच्छी बात के साथ होता है, वह शांत और चुप रहती है, दूसरी तरफ कट्टरता की नफरत और हिंसा दीवारों पर लिखे नारों की तरह बड़ी-बड़ी लिखावट में फैलाई जाती है, और वह अधिक दिखती है। 

आज जब देश भर में एक लंबा इतिहास सबके मिलजुलकर सबके धार्मिक त्योहारों को मनाने का है, तो कुछ लोग त्योहारों का इस्तेमाल नफरत को फैलाने के लिए करते हैं। नवरात्रि के गरबे को देखें तो वहां पहुंचने वाले लोगों के हिन्दू ही होने का फतवा जारी करते हुए धर्मान्ध और साम्प्रदायिक संगठनों ने पिछले कुछ बरसों से यह लादने की कोशिश की है कि गरबा में आने वालों के पहचान पत्र देखे जाएं ताकि कोई गैरहिन्दू वहां न आ सके। यह सिलसिला ताजा-ताजा है, और खबरों में यह जरूर दिखता है लेकिन हकीकत में इसकी कोई हैसियत नहीं है। ऐसी नफरत गिनती में कहीं नहीं टिकती, लेकिन यह एक जवाबी नफरत पैदा करने के काम आती है, और धर्म के सांस्कृतिक पहलू को खत्म करने की कोशिश करती है। हिन्दुस्तान में कट्टर हिंसा और साम्प्रदायिक नफरत को फैलाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि जिस देश में शिव के सबसे बड़े मंदिर में बैठकर बिस्मिल्ला खां पूजा की शहनाई बजाया करते थे, जहां मैहर में मां शारदा के मंदिर में अलाउद्दीन खां आरती का संगीत बजाया करते थे, जहां अनगिनत हिन्दू अजमेर और निजामुद्दीन की दरगाहों में कव्वाली गाते हैं, जहां अनगिनत मुस्लिम कवियों ने कृष्ण के गीत लिखे हैं, वहां पर नफरत एक लादी गई हिंसा है जिसे खारिज करने की जरूरत है। मीडिया सहित सामाजिक आंदोलनकारियों को चाहिए कि जहां कहीं धार्मिक उदारता, और धार्मिक सद्भावना की मिसालें खड़ी दिखती हैं, उनके बारे में भी देश के लोगों को बताया जाए क्योंकि यह देश सद्भावना की मिसालों का देश है, नफरत की मिसाइलों का देश नहीं है। 
-सुनील कुमार


Date : 06-Oct-2019

देश में एक वक्त बहुत से निजी बैंक चलते थे जो एक कारोबार की तरह थे। बाद में इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, और सारे निजी बैंक बंद हो गए। लेकिन इंदिरा की ही पार्टी के मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्री रहते हुए और प्रधानमंत्री रहते हुए लगातार निजी बैंकों का रास्ता साफ किया, और देश के बैंकिंग कारोबार का एक बड़ा हिस्सा निजी बैंकों में चला गया। इससे परे महाराष्ट्र जैसे सहकारी आंदोलन में मजबूत और आर्थिक रूप से संपन्न प्रदेश में सहकारी बैंकों का ढांचा विकसित हुआ जो कि देश के दूसरे राज्यों में भी कम या अधिक बना। अब हर किस्म के बैंक बाजार में हैं, और हर किस्म के बैंक धोखाधड़ी और जालसाजी में गले-गले तक डूबे हुए पकड़ाए जा चुके हैं। देश के एक सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर बैंक पीएनबी ने जिस बड़े पैमाने पर धांधली और जालसाजी करके नीरव मोदी जैसे लोगों पर हजारों करोड़ लुटाए, और डुबाए, वह उस बैंक की साख के साथ-साथ बैंकिंग को नियंत्रित करने वाले रिजर्व बैंक की साख को भी चौपट करने के लिए काफी था। इसके बाद निजी क्षेत्र के बैंकों में एक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई, और अब सबसे ताजा मामला यस बैंक का है, जिसके मुखिया भ्रष्टाचार और गड़बड़ी में शामिल पकड़ाए, और एक-एक को आरबीआई ने हटाया। इसके भी बाद का मामला महाराष्ट्र का है जहां पर पंजाब-महाराष्ट्र बैंक में हजारों करोड़ की संगठित लूट सामने आई है, और उसके सारे बड़े पदाधिकारी गिरफ्तार हो रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपने ही कारोबार को कर्ज दिए, और उन्हें कागजात में जालसाजी करके आरबीआई से छुपा भी लिया। इस बैंक की हालत यह थी कि इसने अपने एक पदाधिकारी से जुड़ी हुई एक कंपनी को ही पूरे बैंक के कर्ज का 70 फीसदी दे दिया था, और यह कंपनी डूबी, और बैंक डूब गया। 

देश के आर्थिक मामलों की समझ रखने वाले एक स्तंभकार ने कल ही लिखा है कि निजी बैंकों के साथ एक खतरा यह जुड़ा हुआ है कि वे अगर कारोबारियों से जुड़े हुए हैं, और उन्हीं कारोबारियों को कर्ज भी दे रहे हैं, तो खतरों को कम आंककर, खूबियों को अधिक आंककर, झूठे कागजातों के आधार पर वे रकम डुबा रहे हैं, और कुछ बरस तक छुपाने के बाद जब जालसाजी का बुलबुला फूटता है, तो बैंक की रकम पूरी तरह डूब चुकी होती है। इस सिलसिले को रोकने के लिए रिजर्व बैंक की निगरानी बिल्कुल ही कमजोर और नाकामयाब साबित हुई है, और जालसाज बैंक बरस-दर-बरस अपनी धोखाधड़ी छुपाने में कामयाब रहते हैं। अब सवाल यह है कि सरकारी नियंत्रण वाले बैंक सत्तारूढ़ नेताओं की सिफारिशों पर डूबने वाले लोन देते हैं, निजी क्षेत्र के बैंक कारोबारियों के हाथों में चले जाते हैं, और कारोबारियों को डुबाने के लिए कर्ज देते हैं, और सहकारी बैंक स्थानीय ताकतवर नेताओं, और कारोबारियों दोनों के असर में रकम डुबाते हैं। 

आज जब पंजाब-महाराष्ट्र बैंक के खातेदारों को अपनी जमा कितनी भी रकम में से महज 25 हजार निकालने की इजाजत रिजर्व बैंक से मुश्किल से मिली है, तो यह स्वाभाविक ही है कि वहां के मध्यम वर्ग के खातेदार आत्महत्या की सोच रहे हैं, और प्रधानमंत्री के नाम ऐसी ट्वीट भी कर रहे हैं। बैंकों की कुर्सियों पर बैठे हुए जो लोग सोच-समझकर जालसाजी करते हैं उनके लिए बड़ी लंबी कैद का इंतजाम भी होना चाहिए, और उनकी सारी संपत्ति को तेजी से जब्त करने का कानून भी बनना चाहिए। मोदी सरकार पिछले पांच से अधिक बरसों से लगातार विदेशों से भारत से गया कालाधन वापिस लाने की बात तो कर रही है, लेकिन अभी तक ऐसा एक रूपया भी लौटा हो वह नहीं दिख रहा है, बल्कि इन्हीं पांच बरसों में बैंकों से धोखाधड़ी करके ही कारोबारियों ने दसियों हजार करोड़ रूपए विदेशों में भेज दिए हैं, और खुद भी भागकर दूसरे देशों में बस गए हैं। यह पूरा का पूरा सिलसिला सरकार और आरबीआईकी जानकारी में हुआ है, और इसलिए हुआ है कि सरकार ने खबर मिलने पर भी समय रहते ऐसे जालसाजों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की थी। सरकार और आरबीआई सूचना के अधिकार में मांगी गई जानकारी को छुपाने में लुका-छिपी खेलने के बजाय अपनी जिम्मेदारी पूरी करें ताकि देश के आम लोगों का जो पैसा बैंकों में है वह गायब न हो, और बैंकों पर लोगों का थोड़ाबहुत भरोसा बचा रहने दिया जाए। 
-सुनील कुमार


Date : 05-Oct-2019

मुम्बई में शहर के किनारे लगी हुई आरे नाम की कॉलोनी से लगा हुआ एक बड़ा जंगल है जो कि एक किस्म से मुम्बई का फेंफड़ा भी है। लेकिन मेट्रो ट्रेन के लिए इस जंगल को काटने की योजना बनी, और मुम्बई के लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। कल मुम्बई हाईकोर्ट में विरोध करने वाली जनता के खिलाफ सरकार ने केस जीता, और रातों-रात हजारों पेड़ काट दिए। पेड़ों की यह कटाई चाहे अदालत के फैसले के मुताबिक क्यों न हो, महाराष्ट्र सरकार यह तरीका किसी जनकल्याणकारी सरकार का नहीं, मुजरिमों का है। किसी सरकार को रात के अंधेरे में पुलिस के घेरे में अपनी जनता को कुचलते हुए ऐसा काम करने की जरूरत नहीं पड़ती। और राज्य सरकार को इस बात को अनदेखा नहीं करना चाहिए था कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है, और जनता का इंसाफ के लिए आगे जाने का विकल्प सरकार ने पेड़ों की इस तरह कटाई करके खत्म कर दिया है जो कि गैरकानूनी चाहे न हो, वह इंसाफ का काम तो नहीं है। 

पूरे देश में पिछली आधी सदी का तजुर्बा यह है कि पेड़ कटते जरूर हैं, उनके नाम पर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से एडवांस में एक भरपाई रकम जमा जरूर करनी पड़ती है, लेकिन लोगों ने कहीं दुबारा जंगल बसते, कहीं दुबारा पेड़ खड़े होते देखे नहीं हैं। देश भर में राज्य सरकारों में पेड़ कटाई के मुआवजे से जो हजारों करोड़ रूपए मिलते हैं, उनको सरकारें अपना पॉकेटमनी मानकर मनमाना बेजा इस्तेमाल करती हैं, और सुप्रीम कोर्ट की नीयत धरी रह जाती है। आज देश भर में शहरीकरण और तरह-तरह की खदानों-कारखानों की योजनाओं, सड़कों और दूसरी बड़ी योजनाओं के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जारी है। यह तो वह है जो कि सरकारी रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज होती है, इससे परे भी बहुत सी कटाई ऐसी होती है जिसे आज छत्तीसगढ़ झेल भी रहा है। ओडिशा की सरहद पर छत्तीसगढ़ के जंगलों को काटकर ओडिशा से आए हुए लोग वहां पर खेत बनाकर बस रहे हैं, अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं, और जंगल हमेशा के लिए खत्म हुए जा रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि किसी राज्य में दूसरे राज्य से आए हुए लोग ही ऐसा करते हैं, राज्य के भीतर के लोग भी अपनी तरह-तरह की जरूरतों के लिए पेड़ काटते हैं। आदिवासी समुदाय आमतौर पर पेड़ों के बीच जिंदगी गुजारता है, लेकिन जब उसे यह दिखता है कि सरकारें तरह-तरह के बहाने लेकर, तरह-तरह के काम के लिए जंगल काट ही देगी, तो उस समुदाय का भरोसा भी भविष्य से उठ जाता है, और वह भी अपनी जरूरत के लिए पेड़ काटने लगता है। 

मुम्बई में राज्य सरकार ने जो किया है, वह अपराध से कम कुछ नहीं है, चाहे उसके पीछे हाईकोर्ट के एक फैसले की ताकत क्यों न हो। अपनी ही जनता के सुप्रीम कोर्ट जाने के हक को कुचलते हुए इस तरह रात के अंधेरे में, बंदूकों के साये में अगर राज्य सरकार जंगल को काटकर गिरा दे रही है, तो वह अवैध कटाई करने वाले मुजरिमों के गिरोह से कहीं भी बेहतर नहीं है। इस देश में अगर कोई अदालत अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगी, तो राज्य सरकार को इस बात के लिए कटघरे में खड़ा करेगी कि अपनी ही जनता के सुप्रीम कोर्ट जाने के मौके को उसने क्यों छीना? जनता की ऐसी कोशिश न हो सके, इसलिए रातों-रात उसने पेड़ क्यों काटे? सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इन खबरों को एक जनहित याचिका के रूप में दर्ज करना चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 04-Oct-2019

हिन्दुस्तान में धार्मिक त्यौहार आमतौर पर इतना अधिक हल्ला-गुल्ला लेकर आते हैं कि जब सड़क किनारे या सार्वजनिक जगहों पर पंडाल तनने शुरू होते हैं, आसपास के लोगों के मन दहशत से घिर जाते हैं कि अब दस दिन या नौ रात पता नहीं क्या हाल होगा। लेकिन धर्म है कि उसके हिंसक तौर-तरीके बढ़ते ही चले जा रहे हैं, और आम इंसान उसके नीचे कुचलते जा रहे हैं। अभी कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रामलीला के एक कार्यक्रम की जानकारी देने के लिए शहर के सत्तारूढ़ पार्टी के मेयर ने मीडिया से बात की, तो बताया कि पिछले दिनों हुए गणेश विसर्जन में झांकियों के साथ बजाए जा रहे म्यूजिक की आवाज इतनी तेज थी, इतनी तेज थी कि झांकियों के रास्ते में बसे मकानों में दो बुजुर्गों की इस शोर की वजह से हार्ट अटैक से मौत हो गई। इस बात में जरा भी नाटकीयता नहीं लगती है क्योंकि यह शोर हिंसा की सारी सीमाओं को पार कर चुका है, और अदालती आदेशों को अपने पैरोंतले रौंदते हुए बढ़ते चले जा रहा है। इस बात को हम इसी जगह दसियों बार लिख भी चुके हैं कि बूढ़े, बीमार, छोटे बच्चे, और पढऩे वाले छात्र-छात्राओं का जो बुरा हाल धार्मिक शोर से होता है, उससे ऐसा लगता है कि धर्म इंसानों को खत्म करने पर आमादा है। यह भी सोचने की जरूरत है कि जिन दो लोगों के दिल से दौरे से मौत की बात राजधानी के महापौर ने बताई है, उन मौतों से नीचे कितने लोगों की सेहत धार्मिक शोरगुल से बिगड़ी होगी यह समझ पाना आसान है, आंकड़ों में गिन पाना मुश्किल है। 

और यह सब तब हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट, और तकरीबन तमाम राज्यों की हाईकोर्ट ऐसे शोरगुल के खिलाफ बार-बार आदेश दे चुकी हैं, बार-बार अफसरों को चेतावनी दे चुकी हैं, और अदालतों के आदेश लुग्दी बनकर कागज कारखानों में जाकर फिर से टाइपिंग का कागज बनकर अदालतों के कम्प्यूटर-प्रिंटर तक पहुंच चुके हैं, इनका असर कुछ नहीं हुआ। अभी जो खबर सामने आई है उसके मुताबिक छत्तीसगढ़ सरकार ने शोरगुल नापने के लिए करोड़ों की मशीनें खरीदी थीं, और बिना इस्तेमाल वे पड़ी-पड़ी खराब हो गईं। आम लोगों को बिना मशीनों के भी यह मालूम है कि सड़कों पर धार्मिक शोरगुल का हाल क्या है। डीजे और लाऊडस्पीकर के साथ चलती झांकियों के बगल से जो निकलते हैं, वे अगर कारों में भी हैं, तो आवाज से पूरी की पूरी कार हिलने लगती है, उसके शीशे टूट जाने का खतरा दिखता है। इसी तरह किसी घर के बगल से जब ऐसी झांकियां निकलती हैं तो खिड़कियों के शीशे चूर-चूर हो जाने का खतरा लगता, लेकिन किसी की मजाल नहीं होती कि धार्मिक-गुंडों से हाथ जोड़कर भी कुछ अपील की जा सके। 

दरअसल जब प्रशासन और पुलिस के अफसर अपनी जिम्मेदारी को छूना भी नहीं चाहते, जब गुंडागर्दी और हिंसा को रोकने का मतलब महज चाकूबाजी रोकने का रह जाता है, तब ऐसे पुलिस-प्रशासन का कोई असर मवालियों पर नहीं बचता, अमन-पसंद आम जनता फिर भी इनको कानून का रखवाला मान लेती है। यह देखना एकदम ही शर्मनाक है कि किसी प्रदेश की राजधानी में मंत्रियों और बड़े अफसरों, राजभवन के इलाके को तो वीआईपी इलाका करार देकर वहां लाऊडस्पीकर रोक दिए जाते हैं, लेकिन बाकी शहर के इंसानों को मुर्दा मानते हुए उनके कानों पर हमले की खुली छूट दे दी जाती है। यह सोच अपने आपमें धिक्कार के लायक है कि शोरगुल से बचाने के लिए भी इंसानों में ऐसे एक तबके को वीआईपी मानकर उसके कानों के लिए राहत का इंतजाम किया जाता है, और बाकी जनता को धार्मिक गुंडागर्दी झेलने का हकदार मान लिया जाता है। शोरगुल को नापना आम जनता के लिए आसान बात नहीं है, और वैसा नापना अदालत में किसी सुबूत की तरह काम भी नहीं आएगा, इसलिए हाईकोर्ट को चाहिए कि वह अपनी जिला अदालतों के जजों को धार्मिक शोरगुल की जगहों पर भेजें जहां वे खड़े रहकर वीडियो रिकॉर्डिंग करवाएं, और देश का कानून, अदालती हुक्म लागू न करवाने वाले अफसरों को कटघरे तक ले जाएं। वोटों से चुनी जाने वाली सरकारें धर्म या जाति, या आध्यात्म की संगठित गुंडागर्दी के सामने लेट जाने का मिजाज रखती हैं, उनसे अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन अदालतों को चूंकि वोटरों के सामने नहीं जाना पड़ता, उनके सामने एक पुख्ता नौकरी रहती है, अदालतों की हिफाजत भी रहती है, इसलिए लोगों को बचाने का काम अब महज जज ही कर सकते हैं। एक निर्वाचित महापौर जब अपने शहर में धार्मिक गुंडागर्दी का यह हाल गिना रहा है, तो हाईकोर्ट को तो चाहिए कि इस महापौर को ही हलफनामे के साथ बुलाए, और उस हलफनामे के आधार पर अफसरों को कटघरे में खड़ा करे। जनता के बीच आज किसी तबके की इतनी ताकत नहीं है कि धार्मिक गुंडागर्दी के खिलाफ मुंह भी खोल सके, इसलिए जजों को ही पहल करनी होगी। 
-सुनील कुमार


Date : 03-Oct-2019

भारत की राजनीति में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे का परिवार कुछ मायनों में बड़ा अनोखा रहा है। इस परिवार से अब तक किसी ने चुनाव नहीं लड़ा था जबकि महाराष्ट्र की सरकार और मुम्बई महानगरपालिका में यह पार्टी लंबे समय से सत्ता में भागीदार रही। यह परिवार अमूमन घर के बाहर कम दिखता है, बाल ठाकरे के बाद उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने पार्टी सम्हाली, तो वे भी बहुत ही गिने-चुने समारोहों में घर या मुम्बई के बाहर जाते दिखे। यह पहला मौका है जब बाल ठाकरे की तीसरी पीढ़ी, उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे अब चुनाव लड़ रहे हैं। लोकतंत्र में जनता के बीच से जीतकर आना एक अलग अहमियत रखता है, और इसके बिना लोगों को वह सम्मान नहीं मिल सकता जो कि लड़कर हारे हुए नेता को भी मिलता है। सोनिया गांधी दूसरे देश से ब्याह कर हिन्दुस्तान आई थीं, और यहां की नागरिक होकर एक मजबूर वक्त में वे पार्टी की अध्यक्ष बनीं, बार-बार सांसद बनीं, और जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता को साबित करने से उनका एक अलग महत्व स्थापित हुआ। 

लोकतंत्र में चुनावी राजनीति में उतरने वाली पार्टियों के नेताओं को जनता के बीच अपनी पकड़ साबित करने से परहेज नहीं करना चाहिए। जो लोग घर बैठे राजनीति चलाते हैं, वे लोग पीछे की सीट पर बैठकर ड्राइविंग करने जैसा काम करते हैं। देश में कई प्रदेशों में एक-एक कुनबे के कब्जे वाली पार्टियां हैं, लेकिन उनमें से हर पार्टी के नेता चुनाव लड़ते और जीतते-हारते आए हैं। कुनबापरस्ती भारतीय राजनीति में न कोई अनोखी बात रह गई है, और न ही इसका महज कांग्रेस से कोई लेना-देना रह गया है। बहुत सी पार्टियां एक कुनबे, एक घर, और एक पीढ़ी के कब्जे में इस तरह चलने वाली पार्टियां हैं कि मानो किसी धार्मिक मठ के मठाधीश अपने बाद अपनी अगली पीढ़ी को गद्दी देकर जाएं। चुनाव आयोग के नियम भी इसे कभी काबू नहीं कर पाते क्योंकि आयोग की शर्तों को पूरा करने के लिए कुछ क्लर्क बैठकर पार्टियों के ऐसे कुनबों के चुनाव की रस्म अदायगी करते रहते हैं। धीरे-धीरे देश में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर अधिकतर पार्टियां ऐसी रह गई हैं जो कि एक घर से चलती हैं, और अब इनमें से आखिरी पार्टी, शिवसेना, भी परिवार को चुनाव में उतार रही है। 

महाराष्ट्र के भी कुछ ऐसे राजनीतिक दल हैं जो कि शरद पवार की एनसीपी जैसे एक परिवार के भीतर चलते हैं, और इनमें शिवसेना सबसे ही बड़ी और ताकतवर पार्टी है जो कि भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी चुनाव के ठीक पहले तक अपनी एक अलग सोच उजागर करने से परहेज नहीं करती है, और एनडीए का हिस्सा रहते हुए भी जिसने मोदी और भाजपा की खुली आलोचना करने, केन्द्र की एनडीए सरकार की खुली आलोचना करने से परहेज नहीं किया था, उस वक्त भी जब यह पार्टी महाराष्ट्र में भी भाजपा के साथ सत्तारूढ़ गठबंधन में थी। अब महाराष्ट्र मेें आदित्य ठाकरे के चुनाव लडऩे के साथ ही इस प्रदेश में चुनावी गठबंधन की ये दो पार्टियां एक अलग किस्म के तनाव से गुजरने जा रही हैं क्योंकि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री एक शिवसैनिक होगा। यह बात एक गठबंधन में किस तरह हो सकती है यह समझना कुछ मुश्किल है क्योंकि आज महाराष्ट्र में भाजपा अधिक सीटों पर लड़ रही है, और शिवसेना कम सीटों पर। ऐसा तभी हो सकता है जब यह गठबंधन सत्ता में आए, और गठबंधन के भीतर शिवसेना की सीटें अधिक आएं। अभी हम चुनावी अटकलों पर जाना नहीं चाहते हैं, लेकिन अगर महाराष्ट्र की अगली सरकार में शिवसेना किसी भी तरह भागीदार रहती है, तो उसके सबसे नौजवान विधायक सरकार के भीतर अपनी पार्टी के सबसे ताकतवर नेता भी रहेंगे, और ऐसे में ऐसी एक संभावित राज्य सरकार का प्रयोग देखना बड़ा दिलचस्प भी रहेगा। वक्त ने यह साबित किया है कि शिवसेना और भाजपा के बीच तनातनी चाहे कितनी ही चलती रहे, चुनाव के वक्त वे फिर एक-दूसरे के वफादार साथी बन जाते हैं, और भाजपा का यह सबसे पुराना गठबंधन चुनाव में मजबूत ही रहता है। आगे-आगे देखें होता है क्या...
-सुनील कुमार


Date : 02-Oct-2019

गांधी के जन्म के डेढ़ सौ बरस पूरे होने के मौके पर देश भर में सरकारें अलग-अलग जलसे कर रही हैं, छत्तीसगढ़ में सरकार के साथ-साथ विधानसभा ने भी दो दिनों का एक विशेष सत्र बुलाया है जिसके लिए हर सदस्य के लिए कोसे की पोशाक सिलवाई गई है। मौका गांधी का है इसलिए खादी के कपड़ों की बात हुई थी, लेकिन चूंकि विधानसभा ताकतवर लोगों की जगह है, इसलिए गांधी की काती हुई सूती खादी के बजाय महंगे कोसे में चमकते हुए तमाम पक्ष-विपक्ष के लोग सुबह से दिख रहे हैं। खैर, कोसा भी हाथ से काते हुए धागे से हाथकरघे पर बुना हुआ कपड़ा है, इसलिए गांधी की बात भी पूरी हो जा रही है, और विधायकों की चमक भी कायम है। इससे परे राज्य भर में गांधी पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चा में हैं क्योंकि राज्य सरकार ने अलग-अलग कई मंचों पर गांधी को याद किया है, और गांधी को चर्चा के केन्द्र में फिर से लाने का काम किया है। 

राज्य में किस सोच वाली पार्टी की सरकार है इससे यह फर्क तो पड़ता ही है कि उसके आयोजन किन मुद्दों पर होते हैं। भाजपा के पन्द्रह बरस में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय से लेकर दूसरे विश्वविद्यालयों तक के आयोजन हिन्दू, हिन्दुत्व, और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द घूमते रहे, और इन्हीं मुद्दों पर जीने वाले देश के उन चुनिंदा अखबारनवीसों को बार-बार बुलाया जाता रहा जो कि पत्रकारिता के लिए नहीं हिन्दुत्व और उस पर खड़ी एक राष्ट्रवादिता के लिए जाने जाते थे। गांधी और गांधी की पूरी सोच को हाशिए पर धकेल दिया गया था, और अब राज्य की भूपेश बघेल सरकार पूरी ताकत से सरकारी-गैरसरकारी आयोजनों में गांधी और गोडसे के फर्क को चर्चा में लाने का काम कर रही है। आज देश में कांग्रेस पार्टी के भीतर भी गांधी के नाम को लेकर इतने तीखे तेवरों के साथ कम ही नेता काम कर रहे हैं जिस तीखेपन के साथ भूपेश बघेल गोडसे का नाम लेकर भाजपा पर हल्ला बोल रहे हैं, और गोडसे मुर्दाबाद कहने की चुनौती भाजपा-आरएसएस को दे रहे हैं। 

किसी राज्य की सरकार की विचारधारा उस राज्य में जनमत को मोडऩे का काम कुछ हद तक तो कर ही सकती है क्योंकि सरकार के अपने आयोजन, सरकारी खर्च से होने वाले दूसरे सार्वजनिक आयोजन, और विश्वविद्यालयों जैसी सरकार-नियंत्रित कथित स्वायत्त संस्थाओं में सरकार का रूख हावी रहता ही है। और गांधी आज अगर किसी पार्टी या उसकी सरकार की ही प्राथमिकता रह गए हैं, तो यह पूरे देश के लिए फिक्र की बात है। आज इस मौके पर यह भी सोचने की जरूरत है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमरीका में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मौजूदगी के दौरान जब ट्रंप ने मोदी को भारत का पिता कहा, तो मोदी मुस्कुराते हुए बैठे रहे, उन्होंने ट्रंप की इस लापरवाह और गैरजिम्मेदार बेवकूफी की बात का कोई विरोध नहीं किया। और यह बात गांधी जयंती के हफ्ते भर पहले ही हुई जबकि मोदी सरकार ने देश भर में 150वीं जयंती के जलसे की मुनादी की हुई थी। पूरे देश के कार्टूनिस्टों को एक नए राष्ट्रपिता पर व्यंग्य करते हुए कुछ न कुछ बनाने का एक अप्रिय मौका मिला, और मोदी की इस चुप्पी के पीछे की सोच लोगों को हक्का-बक्का कर गई। अमरीका को एक बहुत ही बेवकूफ राष्ट्रपति मिला हुआ है, लेकिन मोदी से तो किसी भी जिम्मेदार हिन्दुस्तानी को ट्रंप की बात का तुरंत विरोध करने, उसे सुधारने, ट्रंप को भारत के राष्ट्रपिता के बारे में बताने की उम्मीद थी ही, जो कि टूट गई। 

यह अच्छा है कि छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार खुलकर गांधी को एक मुद्दा बना रही है, और गोडसे का भी नाम लेकर एक खुली राजनीतिक बहस कर रही है। गांधी और गोडसे दोनों की प्रतिमाओं पर माला चढ़ाना एक साथ नहीं चल सकता। जो लोग चुनाव के वक्त या वोटों के लिए सालाना जलसों में गांधी के बस नामलेवा हैं, उनको गांधी के जानलेवा गोडसे के बारे में अपनी सोच साफ करनी होगी, और गांधी को एक इंसान के रूप में ही नहीं, एक सोच के रूप में भी सामने रखकर अपनी खुद की सोच बतानी होगी। जो लोग गांधी का नाम लेना आज अपनी मजबूरी समझते हैं, उन लोगों को यह भी साफ करना होगा कि गांधी की कथनी के मुकाबले आज उनकी अपनी करनी किस किस्म की है। गांधी को लेकर गोलमाल और मिलावट इसलिए ठीक नहीं है कि लोग आज या तो गांधी के साथ हो सकते हैं, या गोडसे के साथ हो सकते हैं, इन दोनों के बीच होने की कोई सहूलियत किसी को हासिल नहीं हो सकती। राजनीतिक और चुनावी मौकापरस्ती के चलते समय-समय पर गांधी को याद करना और खादी को बढ़ावा देना लोगों के गोडसे के प्रति सम्मान भाव को छुपा नहीं सकता है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार का सरकारी पैसों से, और प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का अपनी राजनीतिक ताकत से गांधी पर कार्यक्रम करना ठीक है। इस देश में गांधी की सोच को जारी रखना, और मजबूत बनाना किसी भी सरकार, और हर सरकार के लिए एक सबसे सस्ती और सबसे अधिक असरदार सरकारी योजना हो सकती है, और छत्तीसगढ़ को इसमें पहल करनी चाहिए, एक मिसाल कायम करनी चाहिए। 
-सुनील कुमार


Date : 01-Oct-2019

दो बातों का अलग-अलग कई बार कोई महत्व नहीं होता, लेकिन जब उन्हें जोड़कर देखा जाता है, तो उनका विरोधाभास एक बड़ी तीखी तस्वीर बना देता है। सुप्रीम कोर्ट में कुछ वैसा ही हो रहा है। लाखों बरस पुराने, या सैकड़ों बरस से चले आ रहे विवाद की रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट वक्त की रफ्तार के खिलाफ तेजी से कर रहा है क्योंकि मुख्य न्यायाधीश रिटायर होने के पहले यह ऐतिहासिक फैसला लिख जाना चाहते हैं। किसी भी मामले में वक्त पर आया इंसाफ बुरा नहीं होता, और हिंदुस्तानी अदालतों की लेट-लतीफी को लेकर हमेशा ही आलोचना होती आई है। ऐसे में यह बात अच्छी है कि सुप्रीम कोर्ट एक तय समय के भीतर इस पर फैसला दे, लेकिन यह बात भी बड़ी अजीब है कि वकीलों को बहस के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा है, और उसे लेकर इसी जगह हमने दो दिन पहले लिखा भी है। लेकिन एक दूसरी बात कल हुई। कश्मीर में नेताओं को नजरबंद करने के खिलाफ लगी एक याचिका सुनने से मना करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत के पास इसके लिए वक्त नहीं है क्योंकि अभी वह अयोध्या का मामला निपटाने में व्यस्त है।

अब जिस कश्मीर में जिंदगी को डेढ़-दो महीने से थाम दिया गया है, आम जिंदगी की धड़कन थमी हुई है, वहां के लोगों की आजादी की अपील सुनने का वक्त अगर अदालत को नहीं है, तो यह बात बड़ी अजीब लगती है। अदालत की अपनी वजहें हो सकती हैं कि वहां संविधान पीठ के पास समय नहीं है, और दूसरे अकेले-दुकेले जज आजादी के बुनियादी मुद्दे को सुन नहीं सकते, लेकिन सवाल यह है कि लोगों की आवाजाही, उनकी कमाई, उनकी पढ़ाई, बाकी दुनिया से उनका संपर्क यह सब खत्म हुए लंबा वक्त हो गया है, और जिस सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इस नौबत पर सुनवाई करनी चाहिए थी, वह आज भी इसके लिए अगर याचिकाओं पर भी वक्त नहीं निकाल पा रहा है, तो इस लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से एक, न्यायपालिका के कामकाज में खासी खामी नजर आ रही है। अदालत को ऐसी असाधारण नौबत को देखते हुए और कश्मीर के दसियों लाख लोगों के बुनियादी हक को देखते हुए एक फौरी राहत देने के बारे में सोचना था, लेकिन यह गजब का सुप्रीम कोर्ट है जो कहता है कि इस पर सुनवाई का भी वक्त उसके पास नहीं है। जो अयोध्या सौ-डेढ़ सौ बरस से अदालतों में खड़ी है उसे निपटाने में सुप्रीम कोर्ट इस तरह डूब गया है कि बाकी देश के जिंदा इंसानों के बुनियादी हकों के जलते-सुलगते लोकतांत्रिक मुद्दों को भी सुनने का भी उसके पास वक्त नहीं है, तो उसे अपने कामकाज को सुधारना चाहिए, अपनी सोच को भी सुधारना चाहिए, और कश्मीरियों को इसी देश का नागरिक मानते हुए उनके बुनियादी इंसानी हक को भी देखना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का ऐसा असंतुलित रूख लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है, और हाल के बरसों में उसने अपनी साख बहुत से मामलों में खोते हुए सरकार के एक विभाग की तरह काम करने की साख हासिल की है, जिससे छुटकारा पाना किसी भी इज्जतदार अदालत के लिए जरूरी बात है। जज इस बारे में सोचें कि क्या वे कश्मीर को हिंदुस्तान मानते हैं या नहीं, और वहां के नागरिकों को इंसान मानते हैं या नहीं।
-सुनील कुमार


Date : 30-Sep-2019

गांधी के जन्म को डेढ़ सौ बरस हो रहे हैं, और भारत सरकार ने इस मौके पर बड़े खास जलसे का ऐलान भी किया है। यह एक अलग बात है कि देश में कदम-कदम पर गांधी की सोच, गांधी की नसीहतों, और गांधी के बर्दाश्त के खिलाफ माहौल बढ़ाया जा रहा है, लेकिन फिर भी सरकार है तो जलसा करना उसका हक तो है ही। लेकिन इस मौके पर एक दूसरी वजह से भी गांधी की चर्चा हो रही है। धरती के दूसरी तरफ संपन्न और विकसित योरप के एक सबसे संपन्न और विकसित देश स्वीडन में एक संपन्न परिवार की स्कूल जाती सोलह बरस की ग्रेटा थनबर्ग ने पिछले बरस धरती के जलवायु परिवर्तन के खतरों के खिलाफ एक अहिंसक आंदोलन शुरू किया जिसने एक बरस के भीतर पूरी दुनिया में जोर पकड़ लिया है, और यह हाल के दशकों में किसी एक बच्ची का शुरू किया हुआ सबसे बड़ा आंदोलन भी बन गया है जिसने कि संयुक्त राष्ट्र में जुटे पौने दो सौ से अधिक देशों के नेताओं को भी इस बच्ची को सुनने पर मजबूर कर दिया। 

इन दो बातों में एक रिश्ता जाहिर तौर पर दिखता है जो कि हो सकता है कि मौजूद न हो। गांधी ने अपनी पूरी जिंदगी सादगी और किफायत से एक ऐसी जीवनशैली को सामने रखा था, और बढ़ावा दिया था जिससे कि धरती पर सबकी जरूरतें पूरी हो सकती हैं, चाहे आबादी जितनी भी हो। अब स्वीडन की इस छात्रा ने अपने मन से इसी बात को आगे बढ़ाया है जो कि सौ बरस पहले गांधी ने शुरू की थी, और दिलचस्प बात यह है कि अभी तक की खबरों में ऐसा कहीं पढऩे नहीं मिला है कि इसने गांधी को पढ़कर इस रास्ते पर चलना तय किया, अपने पूरे परिवार को एक बहुत किफायती जिंदगी जीने पर सहमत कराया, और एक अहिंसक आंदोलन शुरू किया। आज जब इस किशोरी की इस पहल और इस ऐतिहासिक कामयाबी की खबरें आती हैं, तो जाहिर तौर पर गांधी भी याद आते हैं। ऐसे में कुछ लोगों को यह बात नाजायज लग रही है कि हम गांधी को याद करने के लिए पश्चिम की एक छात्रा के रास्ते यह काम कर रहे हैं। लेकिन जैसा कि दुष्यंत कुमार ने लिखा था, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए, अगर गांधी की सोच को कोई गांधी को जाने बिना भी आगे बढ़ा रही है, तो वह तो सचमुच ही गांधी की बेटी है, और गांधी के हिन्दुस्तानी नामलेवा, और जानलेवा, लोगों के मुकाबले गांधीवाद की असली वारिस है, फिर चाहे उसने गांधी को पढ़ा भी न हो। दरअसल किसी को जानने के लिए उस सरीखी सोच भी काफी हो सकती है, उसे जानना जरूरी नहीं होता, और स्वीडन की इस बच्ची ने यही किया है। 

आज गांधी के जन्म के देश हिन्दुस्तान में जहां कि हर बच्चे को स्कूल के शुरू के कुछ बरसों में ही कई बार गांधी को पढऩा होता है, और साल में कम से कम चार बार स्कूल के जलसों में गांधी के बारे में सुनना होता है, उन बच्चों में से भी स्कूल में रहते-रहते एक ने भी गांधीवाद के बारे में कोई असल पहल अपनी जमीनी जिंदगी में नहीं की है, तो फिर एक स्वीडिश लड़की को बिना रक्तसंबंध के भी गांधी की वारिस मानने में क्या दिक्कत है जिसने कि सचमुच ही गांधी की सोच को आगे बढ़ाया है, बिना गांधी को पढ़े, बिना गांधी को जाने, और बिना गांधी को राष्ट्रपिता पाए। दरअसल पश्चिम से ऐसा परहेज भी किसी काम का नहीं है कि गांधी की सच्ची वारिस को देखते हुए भी हम उसकी पहल के रास्ते गांधी को देखने में हीनभावना महसूस करते हैं। गांधी के लिए स्कूलों में गांधी पढऩे वाले, या सालाना उनकी याद करने वाले लोग जरा भी अहमियत नहीं रखते हैं, उनके लिए तो वे लोग मायने रखते हैं जो उनकी राह पर चलते हुए धरती को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, और धरती के साधनों पर सारे लोगों के बराबरी के हक की ओर बढ़ रहे हैं। अपनी खपत को कम करके, खुद किफायत की जिंदगी जीकर, अपनी खुद की तकलीफ से हासिल की गई मिसाल को दूसरों के सामने रखकर जो लोग गांधी को याद दिलाते हैं, वे उन लोगों से बेहतर हैं जो गांधी को सालाना जलसों में राष्ट्रपिता मानते हैं, और इन दिनों तो गांधी के कातिल की पूजा भी करने में लगे हुए हैं। 

दरअसल हिन्दुस्तान के लोगों को स्वीडन की इस छात्रा के बारे में सोचना चाहिए कि उसने गांधी से हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए, गांधी को जाने-पहचाने बिना किस तरह गांधी की सोच का डीएनए हासिल किया? यह कामयाबी छोटी नहीं है, और गांधी के नामलेवा लोगों को सोचना चाहिए कि यह पारस पत्थर उन्हें छूकर भी क्यों नहीं बदल पाया? क्यों हिन्दुस्तान नाम का यह मुल्क गांधी नाम की वल्दियत पाकर भी आज इस हालत में पहुंचा हुआ है कि कदम-कदम पर, सड़क-चौराहे पर गांधी की सोच को घेरकर उसकी भीड़त्या की जा रही है? क्या ऐसे हिन्दुस्तानियों को भी इस बात पर आपत्ति करने का कोई हक है कि किसी फिरंगी गोरी लड़की की पहल की वजह से, उसका जिक्र करते हुए हम गांधी को क्यों याद कर रहे हैं? आज शायद गांधी दूसरे देशों से होते हुए ही हिन्दुस्तान को यह याद दिला सकेंगे कि वे थे, और आज उनकी सोच को जिंदा रहने देना चाहिए, अगर इस देश को जिंदा रखना है। स्वीडन की ग्रेटा ने न सिर्फ दुनिया को भविष्य का सबसे बड़ा खतरा दिखाया है, बल्कि अनजाने ही उसने हिन्दुस्तानियों को एक आईना भी दिखा दिया है जिसमें अपना चेहरा बड़ा बदशक्ल पाकर हिन्दुस्तानी इस पश्चिमी आईने को तोडऩा चाहते हैं। 
-सुनील कुमार


Date : 29-Sep-2019

हिन्दुस्तान में धार्मिक रीति-रिवाज कानून को तोडऩे का एक बड़ा मुद्दा रहते हैं। जब अपने रिवाजों को गुंडागर्दी के साथ बाकी सारे समाज पर थोपने की नौबत आती है, तो लोग अदालती फैसलों और कानून को पांवोंतले कुचलने लगते हैं। भोपाल से भाजपा की सांसद बनी साध्वी प्रज्ञा ने कल ही बयान दिया है कि नवरात्रि पर शोरगुल को लेकर किसी अदालत का कोई आदेश नहीं माना जाएगा, और लाउडस्पीकर भी बजेंगे, और डीजे भी। खुला और सार्वजनिक बयान अदालत के मुंह पर एक तमाचे की तरह है कि जिस अदालत की जो औकात हो वह करके देख ले, धर्म कानून को कुचलते ही रहेगा। इधर छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट जिलों को नोटिस ही जारी कर रहा है कि धार्मिक कार्यक्रमों में शोरगुल न हो, लेकिन हाल ही में गुजरे गणेशोत्सव को देखें तो शोरगुल पिछले बरसों के मुकाबले और ज्यादा हुआ, और सरकार मानो आरती की थाली घुमाते हुए खड़ी हुई थी। एक मोहल्ले में वहां के रहने वालों ने नवरात्रि पर आधी रात के बाद तक चलने वाले गरबा के खिलाफ मोर्चा खोला है कि वे इन 9 दिनों न अपने घर तक अपनी गाड़ी ले जा पाते, और न ही रात एक बजे तक सो पाते, इसलिए गरबा कॉलोनी के बीच न होने दिया जाए। और बात महज हिन्दू धर्म की नहीं है, जब जिस धर्म को मौका मिलता है, वह अपना बाहुबल दिखाने पर आमादा हो जाता है, उतारू रहता है, और हिंसा की अपनी सीमा को हर बार खुद ही हराता चलता है। और फिर एक धर्म के देखादेखी दूसरे धर्म के लोग अराजकता के मुकाबले में और ऊंची छलांग लगाने में लगे रहते हैं। 

धर्म जिसका असर इतना अधिक है कि उसका अगर सही इस्तेमाल होता तो वह दुनिया का बहुत कुछ भला भी कर सकता था। लेकिन आज धर्म दुनिया में सबसे अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार हो गया है, दुनिया में सबसे अधिक ऐसे प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हो गया है जिससे अर्थव्यवस्था नहीं चलती। धर्म ने लोगों को अपने बच्चों से पोलियो ड्रॉप्स को दूर रखवाकर उन्हें विकलांग होने की तरफ धकेलने की धर्मान्धता दी है, धर्म ने अड़ोस-पड़ोस के लोगों का गला काटने का हौसला दिया है, और जैसा कि हिन्दुस्तान के कुछेक दंगों में सामने आया, धर्म ने लोगों को इतना हिम्मती बना दिया कि उन्होंने विधर्मी गर्भवती महिला की कोख चीरकर अजन्मे बच्चे को भी निकाल बाहर फेंका। ऐसे असरदार धर्म को लेकर महाराष्ट्र का ताजा इतिहास बताता है कि किस तरह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव की शुरुआत अंग्रेजी राज के खिलाफ जनता में एक राजनीतिक जागरूकता पैदा करने के लिए, और आजादी की चाह वाला राष्ट्रवाद पैदा करने के लिए की थी। आज वह जागरूकता और वैसा राष्ट्रवाद खत्म हो गया है, और गणेश के नाम पर बेतहाशा शोर वाली अराजकता काबिज हो गई है। सरकारों में वोटों की चाह में इतना हौसला नहीं बचा है कि वे धार्मिक गुंडागर्दी और धार्मिक हिंसा को छू भी सकें। नतीजा यह है कि हर त्यौहार जिंदगी को मुश्किल, और अधिक मुश्किल बनाते चल रहा है, जीना हराम, और अधिक हराम करते चल रहा है। 

लेकिन जिन समाजों में राजनीतिक जागरूकता रहती है, वहां पर धर्म का इस्तेमाल कुछ बेहतर कामों के लिए भी किया जाता है। अभी मुस्लिमों का दुख का एक त्यौहार आया था, मुहर्रम। इस मौके पर आमतौर पर निकलने वाले परंपरागत जुलूसों में धर्म के इतिहास की तकलीफदेह शहादत को याद करके लोग अपने को जंजीरों से, हथेलियों और चाकुओं से पीट-पीटकर लहू-लुहान करते हैं। इस बार कुछ जगहों की तस्वीरें सामने आईं कि लहू को ऐसा बहाने के बजाय उस दिन मुस्लिम समाज के बहुत से युवक-युवतियों ने जाकर रक्तदान किया ताकि उनका खून किसी के काम आ सके। आज ही ट्विटर और फेसबुक पर एक चित्र सामने आया है जिसमें, शायद बंगाल के, एक चित्रकार सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय ने असम में नागरिकता-विहीन करार दिए गए लोगों की दहशत को दिखाया है। वहां 20 लाख ऐसे लोगों पर डिटेंशन कैम्प जाने का खतरा मंडरा रहा है, और इस तस्वीर में देवी दुर्गा को अपने बच्चों, गणेश, सरस्वती वगैरह को लेकर डिटेंशन कैम्प जाते हुए दिखाया गया है। धर्म का ऐसा इस्तेमाल करने के लिए कलाकारों में एक हौसला भी होना चाहिए। धर्म महज बुरी चीज नहीं है, अगर उसके इस्तेमाल से किसी जागरूकता को लाया जा सके। अगर धर्म से जुड़े हुए संन्यासी-स्वामी, और पादरी-मौलवी बलात्कार में लगे रहने के बजाय अगर कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दे को उठाते, प्लास्टिक-प्रदूषण के खिलाफ धार्मिक रीति-रिवाज खड़े करते, अगर पेड़ों को कटने से बचाते, और उनकी जगह खुद कटने के लिए खड़े हो जाते, तो उनके ईश्वर की बनाई हुई इस धरती का कुछ भला होता। लेकिन धर्म से जुड़े हुए लोग जिस बड़े पैमाने पर बलात्कारी पाए जा रहे हैं, और अभी पकड़े जाने से बचे हुए हैं, उससे धर्म की साख भी अब ऐसी नहीं रह गई है कि धार्मिक वर्दी में घूमने वाले स्वघोषित दिग्गज लोगों की बात का कोई अधिक असर हो। 

ऐसे में धार्मिक आयोजन करने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि वे धर्मान्धता को बढ़ाकर महज धर्म की साख चौपट कर रहे हैं, उसका कुछ भला कुछ नहीं कर रहे, और न ही अपने बच्चों को कोई सुरक्षित दुनिया दे रहे हैं। बेहतर यह होगा कि धर्म का इस्तेमाल आस्थावानों के ईश्वर की बनाई गई दुनिया को बेहतर करने में हो, न कि उसे बर्बाद करने में। अगर ईश्वर का नाम लोगों को जागरूक न कर सके, बेहतर इंसान न बना सके, तो फिर उस ईश्वर का न रहना ही बेहतर होगा। 
-सुनील कुमार


Previous123456Next