संपादकीय

Posted Date : 26-May-2018
  • दिल्ली में एक निजी कंपनी बिजली सप्लाई करती है। उसने ग्राहकों के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि वे अपने पुराने एसी देकर नए एसी आधे दाम पर ले सकते हैं। पहली नजर में खबर अटपटी लगती है, लेकिन है सही। ऐसा लगता है कि बिजली बेचने वाली कंपनी की दिलचस्पी अधिक बिजली बेचने में होनी चाहिए जो कि पुराने एयरकंडीशनरों के चलते हुए अधिक आसान है। नए एयरकंडीशनर ऊंची ग्रीन-रेटिंग वाले आते हैं, जो कि बिजली कम खाते हैं। वे महंगे जरूर रहते हैं, लेकिन कुछ बरसों में अपना दाम चुका देते हैं। ऐसे में अगर एसी बनाने वाली कंपनियों के साथ मिलकर बिजली सप्लाई कंपनी ग्राहकों को कम खपत वाले उपकरणों की तरफ ले जाने की कोशिश कर रही है तो यह एक दिलचस्प बात है। कुछ राज्यों की सरकारें पहले भी ऐसा करते आई हैं कि वे बल्ब, ट्यूबलाईट, और पंखे कम दामों पर ग्राहकों को देकर पुराने अधिक खपत वाले सामान हटवा रही हैं। 
    अब बाजार और सरकार, इन दोनों को मिलकर भी ऐसी पहल करनी चाहिए कि लोग अधिक खपत के बल्ब-पंखे, फ्रिज-एसी बदलने की सोच सकें। इससे दो किस्म के फायदे हो सकते हैं। पहला फायदा तो देश की अर्थव्यवस्था को हो सकता है कि कंपनियों को सामान बनाने का एक नया मौका मिलेगा, और बाजार को बढ़ावा मिलेगा। दूसरा फायदा इससे बिजली ग्राहकों को होगा जो कि कम खपत के सामान पाएंगे, बिजली बिल बचाएंगे। और तीसरा फायदा देश का और धरती का होगा कि इससे बिजलीघरों पर बोझ घटेगा, या जहां अंधेरा छाया है वहां के लिए बिजली बच सकेगी, और कोयले का प्रदूषण भी बच सकेगा। बिजली की खपत घटने के साथ ही देश में कार्बन उत्सर्जन घटता है, और उससे पूरी धरती का फायदा होता है। 
    आज जब लोगों को नए उपकरण खरीदना भारी पड़ता है, तब सरकार और बाजार को दखल देकर ऐसा अनुदान या ऐसी रियायत या ऐसा कर्ज देना चाहिए जिससे ग्राहकों का उत्साह बढ़े। संपन्न तबके के बहुत से लोग फैशन के तहत भी नए-नए सामान ले लेते हैं, और इस बहाने भी उनके घर के एसी या फ्रिज बदल जाते हैं, और बिजली की खपत कम से कम उन कुछ उपकरणों पर तो घटती ही है। इसे बड़े पैमाने पर फैलाने की जरूरत है क्योंकि भारत की अधिकतर आबादी आज ऐसी आर्थिक स्थिति में नहीं है कि वह अपने पुराने उपकरण बदलने का खर्च कर सके, बल्कि हकीकत तो यह है कि लोग अभी तक बाजार में पुराने उपकरणों को खरीदते घूमते रहते हैं। जिस तरह प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक ने दखल देकर भारत के बड़े शहरों से पुरानी गाडिय़ों को हटाने का एक रास्ता दिल्ली की मिसाल से बनाया है, और जिसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे शहर में भी लागू किया जा रहा है, उसी तरह बिजली की खपत को कम करने का काम भी हो सकता है। 
    दरअसल भारत में पुराने उपकरणों की मरम्मत करने वाले लोग बहुत हैं, और यहां की जुगाड़-तकनीक पूरी दुनिया में मशहूर है कि किस तरह एक मैकेनिक सामान जुटा-जुटाकर किसी भी मशीन या उपकरण की जिंदगी बहुत लंबी खींच देते हैं। ऐसे में लोग नए सामानों की तरफ बढऩे का नहीं सोचते जो कि कम बिजली खाते हैं, या कम ईंधन खाते हैं। ऐसे में धरती को बचाने के लिए, प्रदूषण से लोगों को बचाने के लिए कम खपत की ओर बढऩा जरूरी है। आज लोगों ने अपनी जो जरूरतें बना ली हैं, वे जरूरतें तो किसी गांधीवादी अंदाज में कम हो नहीं सकतीं। यही हो सकता है कि उन जरूरतों पर बिजली-ईंधन का खर्च कम हो, और नई टेक्नालॉजी ने यह मुमकिन भी कर दिया है। 
    दिल्ली में बिजली कंपनी की यह पहल अच्छी है, और इसे सरकार को बड़े पैमाने पर ले जाना चाहिए, इससे देश में छाई हुई आर्थिक मंदी भी कुछ हद तक दूर हो सकती है, और सरकार नई तकनीक से बने सामानों पर या तो कुछ टैक्स-रियायत दे सकती है, या फिर ब्याज में छूट दे सकती है, ताकि ग्राहकों से लेकर देश और धरती तक सबका दीर्घकालीन भला हो सके। इसे एक पर्यावरणशास्त्री, एक अर्थशास्त्री, और एक गृहिणी, इन सबके नजरिए से देखने की जरूरत है, और यह सबके भले का एक काम हो सकता है। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 25-May-2018
  • सार्वजनिक जीवन में किसी बात की शुरूआत चाहे किसी एक सीमित मकसद से हो, लेकिन वह आगे बढ़ती है तो फिर नए-नए मकसद तलाश लेती है। अब जैसे चार दिन पहले केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री और ओलंपिक विजेता राज्यवर्धन राठौर ने सोशल मीडिया पर अपने एक फिटनेस वीडियो के साथ एक चुनौती डाली, और दूसरे लोगों से कहा कि वे भी अपने वीडियो पोस्ट करें। उन्होंने जिन लोगों को यह चुनौती दी थी, उनमें से एक विराट कोहली ने अपनी फिटनेस-तस्वीरें डालकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना वीडियो पोस्ट करने कहा है। दुनिया में जगह-जगह समय-समय पर ऐसा होता है और लोगों को याद होगा कि समाजसेवा के लिए पैसे जुटाने को पश्चिम के देशों में एक वक्त आईस-बकेट चैलेंज भी चला था जिसमें दान जुटाने के लिए लोग दूसरों पर बर्फ और पानी की बाल्टी पलटते थे, और दूसरों को इसकी चुनौती भी देते थे। इस तरह से जुटा हुआ दान समाज के काम आता था। अब राज्यवर्धन राठौर से होते हुए विराट कोहली के बाद अब यह नरेन्द्र मोदी तक पहुंच आया। 
    लेकिन राहुल गांधी ने इसके मजे लेते हुए नरेन्द्र मोदी के लिए पोस्ट किया है कि वे उन्हें पेट्रोल-डीजल सस्ता करने की चुनौती देते हैं। अब अगर सोचा जाए तो ऐसी चुनौती हर सार्वजनिक व्यक्ति को दी जा सकती है जिससे उनकी कोई कमजोरी या मजबूरी उजागर होने लगे। कल के दिन हो सकता है कोई राहुल गांधी को यह चुनौती दे कि वे अपने कुनबे से परे किसी को अध्यक्ष बनाकर दिखाएं। कोई और किसी दूसरे नेता को गाडिय़ों का काफिला छोटा करने की चुनौती दे सकते हैं, कोई यह चुनौती दे सकते हैं कि लोग अपने सरकारी बंगलों में लगे हुए एयरकंडीशनों की गिनती घटाएं। अरबपति सांसदों को लोग चुनौती दे सकते हैं कि वे संसद से मिलने वाले वेतन और भत्ते छोड़ें। जिसको जरूरत न हो, वे सरकारी खजाने पर बोझ न बनें। अब जैसे छत्तीसगढ़ में ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव की अपने राजघराने की दौलत सैकड़ों करोड़ रूपए उन्हीं की घोषित की हुई है। ऐसे में उन्हें कोई भी सरकारी सहूलियत क्यों लेना चाहिए? तो हो सकता है कल के दिन सोशल मीडिया पर देश के ऐसे संपन्न सांसद-विधायकों के बारे में ऐसा कोई अभियान छिड़ जाए। 
    लोकतंत्र में शिष्टाचार की सीमा में ऐसे कई अभियान छिडऩे भी चाहिए। जो नेता अंग्रेजी भाषा के खिलाफ हैं, उनसे पूछना चाहिए कि उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल-कॉलेज में तो नहीं जाते? जो जनता के पैसों पर इलाज कराते हैं, उनके लिए सवालों का अभियान छिडऩा चाहिए कि वे सरकारी अस्पताल के बजाय निजी अस्पताल क्यों जाते हैं? यह सार्वजनिक जीवन में एक नए किस्म की जवाबदेही का सिलसिला है। विराट कोहली की चुनौती के जवाब में मोदी ने जब यह लिखा कि वे जल्द ही अपना फिटनेस-वीडियो पोस्ट करेंगे, तो लोगों ने मजा लेते हुए यह लिखा कि लोगों को अपनी डिग्री के साथ अपनी फोटो पोस्ट करना चाहिए, और दूसरों से भी ऐसी मांग करनी चाहिए, और उससे शायद नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी जैसे लोगों का डिग्री का विवाद खत्म भी हो जाएगा। 
    फिटनेस की चुनौती तो इसलिए भी ठीक है कि लोग अपने आसपास के लोगों को देखकर भी अपनी सेहत का ख्याल रखना शुरू करते हैं। एक के देखादेखी दूसरे भी सैर पर निकलते हैं, कसरत करते हैं। आसपास के लोगों से महज बुरी आदतें नहीं सीखी जातीं, कई अच्छी बातें भी सीखी जाती हैं। इसलिए फिटनेस की चुनौती का यह सिलसिला तो अच्छा है, लेकिन इसका विस्तार बाकी दायरों तक भी होना चाहिए। आज ही किसी ने सोशल मीडिया पर मोदी की एक ट्वीट दुबारा पोस्ट की है जिसमेें उन्होंने अमरीका की एक स्कूल में गोलीबारी में हुई मौतों पर अफसोस जाहिर किया था। उन्हें चुनौती दी गई है कि वे तमिलनाडू में दो दिन पहले पुलिस गोली से मारे गए दर्जन भर से अधिक कारखाना-विरोधियों के लिए भी हमदर्दी की ट्वीट करें। अब सोशल मीडिया की वजह से लोगों की सार्वजनिक जवाबदेही पहले के मुकाबले अधिक है, और यह बढ़ती चली जानी चाहिए। ऐसा होने पर लोगों की चुप्पी भी सिर चढ़कर बोलने लगेगी।
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 24-May-2018
  • कल कर्नाटक में कांगे्रस-जेडीएस गठबंधन सरकार के शपथग्रहण को देखें तो ऐसा लगता है कि मानो यह नई सत्ता का शपथग्रहण नहीं हो रहा है, नए विपक्ष का शपथग्रहण हो रहा है। जगह तो बेंगलुरू थी, लेकिन नजारा देश की राजधानी जैसा था। दर्जनभर विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने जिस तरह हाथ मिलाया, और जिस अंदाज में एक-दूसरे से शायद पहली बार ही इस तरह बात की, वह भारतीय चुनावी राजनीति में एक नया मोड़ है। हमने दो-चार दिन पहले ही इसी जगह पर लिखा था कि कर्नाटक में गैरभाजपाई एकता भाजपा और एनडीए के लिए महज एक राज्य का नुकसान नहीं है। जिस तरह बिल्ली किसी घर से दूध पीकर चली जाती है, तो वह नुकसान महज दूध का नहीं होता है, वह बिल्ली के घर देख लेने का अधिक बड़ा नुकसान होता है। कर्नाटक में भाजपा ने अपनी गलती या अपने गलत काम से बाकी विपक्ष को उसकी ताकत के एहसास का एक अभूतपूर्व मौका दिया है और यह मौका एक दूसरे मौके पर भी सामने आया है, मोदी सरकार के चार बरस पूरे होने के मौके पर। 
    और फिर मानो भाजपा-विरोधी पार्टियों को खुदकर अपनी इस अभूतपूर्व लेकिन हमेशा से छिपी हुई ताकत का एहसास न रहा हो, मीडिया ने चुनावी नतीजों के आंकड़ों से यह विश्लेषण करके सामने रख दिया कि किस तरह ये विपक्षी पार्टियां अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग गठबंधन करके भी दर्जन भर राज्यों की सैकड़ों लोकसभा सीटों पर नतीजे बदल सकती हैं। ऐसे किसी एक विश्लेषण में तो शायद लोकसभा में बहुमत के लिए जरूरी गिनती से भी सौ-पचास अधिक सीटें शिनाख्त करके बताई गई हैं। कल कर्नाटक में जिस उत्साह के साथ एक ही मंच पर ममता और वामपंथी थे, अखिलेश यादव और मायावती थे, कांगे्रस और लालू के बेटे थे, खुद सोनिया और राहुल थे, और वे जिस तरह के उत्साह में थे, उससे ऐसा लग रहा था कि कहानियों में कोई सोया हुआ विशाल मानव जागकर करवट बदल रहा हो।
    कई बार किसी छोटे मौके का बेजा इस्तेमाल भी जरूरत से अधिक बड़ा नुकसान दे जाता है। भाजपा के साथ कर्नाटक में यही हुआ है। यह बात सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट के भीतर तक हर जगह अच्छी तरह स्थापित हो गई कि एक पुराने भाजपाई राज्यपाल ने अपने अधिकारों का खुला बेजा इस्तेमाल करते हुए एक नाजायज न्यौता भाजपा को सरकार बनाने के लिए दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार के वकील को फटकार लगाने के साथ राज्यपाल के शक्तिपरीक्षण के वक्त को भी बदल दिया, और एक संवैधानिक बेईमानी खारिज कर दी। इससे एक लोकतांत्रिक बेइंसाफी तो टली ही, लेकिन उसके साथ-साथ गैरभाजपा, गैरएनडीए पार्टियां एक नए उत्साह में भी आग गईं। आज देश के आम चुनाव के साल भर पहले, और कई राज्यों के आमसभा चुनावों के बस कुछ ही महीने पहले कांगे्रस सहित देश की दर्जन भर पार्टियों को एका करने का एक ऐसा मौका कर्नाटक ने दे दिया है। लोगों को याद होगा कि आपातकाल के दौरान जब कांगे्रस ने तमाम विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया था, तो जेल में कृष्ण के जन्म की तरह जनता पार्टी का जन्म हुआ था, और इस नवजात ने पहली बार नेहरू की बेटी को हरा दिया था। सामान्य जीवन की एक सहज समझदारी यह कहती है कि बिना वजह लोगों को घेरकर मारते हुए किसी कोने में इस तरह नहीं लाना चाहिए कि वे एक होकर पलटवार करें। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 23-May-2018
  • राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पिछले कई मौकों पर अपनी सज्जनता दिखाई है जिससे देश के बाकी नेताओं को, और नौकरशाहों को, और शायद जजों को भी कुछ नसीहत लेने की जरूरत है। अभी उनके शिमला प्रवास के दौरान स्थानीय प्रशासन ने स्कूलों की आधे दिन की छुट्टी कर दी थी, और सड़कों पर गाडिय़ों को रोक दिया था। उन्होंने उसी दिन हुए एक समारोह में मंच से ही इस बात के लिए अफसोस जाहिर किया, और हिमाचल की जनता से माफी मांगी। वे अपनी तरफ से तो शिमला के बाजार में पैदल चलते हुए दुकानों पर गए, और परिवार सहित वहां के एक रेस्त्रां में बैठकर चाय-काफी भी पी। जो खरीददारी की, उसका भुगतान भी खुद ही किया। देश के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद ऐसी सादगी कुछ तो कम ही बच जाती है, और फिर कुछ आसपास के मुसाहिब अफसर सादगी रहने भी नहीं देते। नतीजा यह होता है कि राष्ट्रपति तो दूर, छोटे-छोटे से नेता भी अपनी ताकत की शान दिखाते हुए जनता को कुचलते हुए चलते हैं। और चूंकि तकरीबन तमाम राजनीतिक दलों में नेताओं का मिजाज ऐसा ही रहता है, इसलिए जनता यह बात भूल सी गई है कि नेताओं का सादगी या सज्जनता से कोई लेना-देना होता है। आम जनता तो चीखते सायरनों वाले सत्ता के काफिलों के लिए छिटककर किनारे होकर रास्ता देने के इतने आदी हो गए हैं कि अब उन्हें शायद इसका बुरा भी नहीं लगता। 
    हम राष्ट्रपति की कुछ और बातों की वजह से भी यह लिख रहे हैं। अभी दो दिन हुए जब उन्होंने एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मानद उपाधि लेने से मना कर दिया। जबकि हालत यह है कि दीक्षांत समारोह में शामिल होने वाले तमाम किस्म के नेता उन्हें मिलने वाली मानद उपाधियों को तुरंत मंजूर कर लेते हैं। यह एक अच्छा सिलसिला है कि राष्ट्रपति ने मानद उपाधि के इस पाखंड को खत्म करने की कोशिश की है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने इसी जगह एक से अधिक बार पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की एक पहल को लिखा था कि उन्होंने अपने नाम के साथ महामहिम शब्द का इस्तेमाल बंद करवा दिया था। लोकतंत्र में ऐसे सामंती पाखंड की कोई जगह होनी भी नहीं चाहिए। उनके देखादेखी बाद में देश भर में राज्यपालों को भी उनके फैसले के मुताबिक अपने राजभवनों को महामहिम शब्दावली से मुक्त करना पड़ा था। 
    राष्ट्रपति का जैसा रूख दिख रहा है, उन्हें खुद ही पहल करके एक ऐसी बैठक बुलानी चाहिए जिसमें सरकार, अदालत, और संसद से जुड़े हुए सभी निर्णायक तबके मौजूद रहें, और जिस बैठक में यह चर्चा हो सके कि सत्ता के कौन-कौन से सामंती प्रतीक खत्म किए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह लोकतंत्र में समानता की सोच के खिलाफ एक गैरबराबरी खड़ी करने वाली बात है। दूसरी बात यह भी है कि ऐसे सारे प्रतीक आम जनता के कंधों पर ही ढोए जाते हैं, और इनका खर्च जनता ही उठाती है। आज देश भर में न कोई अपने बंगले छोडऩा चाहते, न कोई शान-शौकत की जिंदगी छोडऩा चाहते, और यह सब जनता के खजाने को लुटाकर किया जाता है। इसलिए राष्ट्रपति को यह चाहिए कि वे सार्वजनिक जीवन में सादगी के लिए कोशिश करें, और खुद अपने इंतजाम में कटौती करते चलें, अपने खुद के निजी खर्च को सरकार पर न आने दें। रामनाथ कोविंद एक दलित और गरीब परिवार से आए हुए हैं, और वे भारत के गरीबों की हकीकत औरों के मुकाबले शायद कुछ अधिक समझते होंगे। इसलिए उनको ऐसे तमाम राजकीय और शासकीय इंतजाम खत्म करने का माहौल बनाना चाहिए जो कि जनता के पैसों पर ही किए जाते हैं। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 22-May-2018
  • भारत के ताजा इतिहास में पेट्रोल और डीजल में इस तरह की आग पहले कभी लगी हो यह याद नहीं पड़ता है। और दूसरी बात यह है कि मोदी सरकार आने के बाद से अब तक लगातार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल पिछली मनमोहन सरकार के दस बरसों के मुकाबले खासा सस्ता मिलते आया है। इसके बावजूद सरकार ने पेट्रोल, डीजल, और रसोई गैस पर लगातार तरह-तरह की ड्यूटी, टैक्स, और सेस लगाकर उसके दाम आसमान पर रखे। अंतरराष्ट्रीय बाजार के सस्ते रेट का फायदा भारत के ग्राहकों को मिलना तो दूर रहा, भारत के लोगों पर टैक्स इतना बढ़ाया गया कि अब उनका सब्र जवाब दे रहा है। केन्द्र सरकार के टैक्स, ड्यूटी, सेस के अलावा राज्य सरकार के टैक्स भी उसके ऊपर जुड़ जाते हैं, और पेट्रोलियम पर यह नकली महंगाई खड़ी करके केन्द्र और राज्य दोनों भरपूर कमाई कर रहे हैं। कल ही पेट्रोलियम मंत्री का यह बयान सामने आया है कि डीजल-पेट्रोल पर टैक्स कम नहीं किया जाएगा क्योंकि यह रकम ग्रामीण विकास के लिए खर्च की जा रही है। 
    वैसे तो किसी देश की सरकार टैक्स देने की क्षमता वाले एक तबके से वसूली करके उसे दूसरे जरूरतमंद तबके पर खर्च करती है, और केन्द्र सरकार के बजट का एक मकसद यह भी रहता है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि आज डीजल-पेट्रोल की खपत बड़ी-बड़ी निजी गाडिय़ों तक सीमित नहीं है, इनकी महंगाई से सारा सार्वजनिक परिवहन भी महंगा हो रहा है, कारोबारी गाडिय़ां महंगी हो रही हैं, और शहरी मध्यम-निम्न वर्ग भी आज अपनी निजी दुपहिया पर चलते हैं, और उन पर भी इस अभूतपूर्व और अस्वाभाविक महंगाई की मार पड़ रही है। सरकार इस अंदाज में पेट्रोलियम पर ड्यूटी, टैक्स, और सेस लगाते और बढ़ाते जा रही है कि मानो उनकी खपत महज उच्च आय वर्ग में है। आज गांव के किसान, गांव के कारीगर, और गांव से शहर काम करने आने वाले लोग भी निजी या कारोबारी गाडिय़ों का इस्तेमाल करते हैं, और हर किस्म का सफर महंगा हो गया है। सामानों की आवाजाही महंगी हो गई है, और खेतों के डीजल पंप, ट्रैक्टर, खेती की और मशीनें, सब कुछ का इस्तेमाल महंगा हो गया है। 
    केन्द्र सरकार को लोगों के सब्र का और इम्तिहान नहीं लेना चाहिए। शहरी फैशनेबुल लोगों से लेकर कारीगरों और मजदूरों तक, सबको डीजल-पेट्रोल की जरूरत पड़ती है। केन्द्र सरकार एक बार भी इस बारे में कोई सफाई नहीं दे पाई है कि सत्ता में आने के बाद पूरे चार बरस से वह सस्ती अंतरराष्ट्रीय खरीदी करके सबसे महंगी घरेलू बिक्री क्यों कर रही है। यह सिलसिला बेइंसाफी का है। आज जब हम यह लिख रहे हैं, तो उसी वक्त देश के कारोबारी तबकों से भी यह मांग उठ रही है कि पेट्रोलियम पर से वैट और एक्साईज ड्यूटी को कम किया जाए। सरकार की इस अंधाधुंध महंगाई से देश में पेट्रोलियम की कीमतों पर से सरकारी नियंत्रण खत्म होने की बात भी फर्जी साबित होती है। कहने के लिए पेट्रोलियम कंपनियां अपना दाम तय कर रही हैं, लेकिन उसके बाद केन्द्र सरकार उस पर टैक्स-ड्यूटी बढ़ाने का अपना काम बढ़ाते चल रही है, और इसका खुले बाजार से कुछ भी लेना-देना नहीं है। 
    देश के गांवों के लिए अगर बजट की जरूरत है, तो सरकार को किसी सक्षम और संपन्न तबके से वसूली-उगाही करनी चाहिए। डीजल-पेट्रोल की छोटी गाडिय़ों को, और मुसाफिर गाडिय़ों को इस बढ़ोत्तरी से अलग रखना चाहिए। अगर सरकार सिर्फ बड़ी गाडिय़ों वाले लोगों से डीजल-पेट्रोल पर अधिक टैक्स लेना चाहती है, तो वह पेट्रोल पंपों पर नहीं लिया जा सकता। उसके लिए ऐसी गाडिय़ों की बिक्री के वक्त ही उन पर एक सालाना टैक्स इतना लगाया जा सकता है कि जिससे उनकी ईंधन की औसत खपत पर टैक्स वसूली हो जाए। आज पन्द्रह बरस का टैक्स सभी गाडिय़ों पर लिया जाता है, सरकार बड़ी और आलीशान गाडिय़ों, महंगे दुपहियों पर इस टैक्स को बढ़ा सकती है ताकि उनको पेट्रोल-डीजल एक किस्म से महंगा पड़े। चूंकि देश में पेट्रोल-डीजल के दो किस्म के रेट केवल चोरी बढ़ाएंगे, इसलिए ऐसी वसूली गाड़ी लेते वक्त ही हो सकती है। लेकिन आज छोटी गाडिय़ों वाले लोगों को और डीजल-पेट्रोल के छोटे ग्राहकों को जो भारी टैक्स देना पड़ रहा है, वह बिल्कुल ही नाजायज है।
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 21-May-2018
  • गुजरात में साल दो साल पहले उना नाम की जगह पर दलितों को बुरी तरह से पीटने का वीडियो सामने आया था, और दुनिया का दिल दहल गया था कि सार्वजनिक जगह पर, सड़क पर दलितों को किस तरह से मारा जा रहा था। अभी एक दूसरा वीडियो सामने आया है जो गुजरात के राजकोट में एक कारखाने के अहाते में कचरा बीनने गए पति-पत्नी को पीटने का है। फैक्ट्री के लोगों ने मार-मारकर इस दलित नौजवान की जान ले ली, और इसमें फैक्ट्री के कर्मचारी भी शामिल थे, और मालिक भी। जिस तरह उसे बांधकर कोड़े की छड़ से उसको पीटा गया, वह देखते ही नहीं बनता। यह नौजवान मारा गया और उसकी बीवी बुरी तरह से जख्मी है। 
    यह हालत देश के बहुत से राज्यों में दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गरीबों, और महिलाओं-बच्चों की है। ये तमाम वे तबके हैं जिनकी हिफाजत के लिए देश में अलग से कानून बना हुआ है। और ऐसे कानून के चलते हुए भी जब दलित-आदिवासी रात-दिन कहीं न कहीं हत्या-बलात्कार के शिकार होते हैं, किसी दलित दूल्हे के घोड़ी पर चढऩे पर दंगा होने लगता है, जहां पर कल ही मध्यप्रदेश में गोहत्या की आशंका में एक मुस्लिम को पीट-पीटकर मार डाला गया, और दूसरा बुरी तरह जख्मी है, वहां पर यह सोचना पड़ता है कि यह देश जा किधर रहा है? यह नौबत बहुत ही खराब है, और यह सुधरते दिख नहीं रही है। 
    देश में कानून की किसी को परवाह नहीं रह गई है, और कानून लागू करने वाली एजेंसियां, मुजरिमों को पकडऩे वाली एजेंसियां, इन सब पर भारी राजनीतिक दबाव दिखता है, और सत्ता को जो नापसंद हैं, उन पर तो कार्रवाई दिखती है, लेकिन बाकी लोगों पर अधिक से अधिक वक्त तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। एक दूसरी दिक्कत यह है कि पुलिस और बाकी जांच एजेंसियां जब लगातार राजनीतिक दबावतले काम करती हैं, तो वे भ्रष्ट भी होने लगती हैं। पुलिस को लगता है कि जब भेदभाव ही करना है, चुनिंदा मुजरिमों के साथ रियायत ही करनी है, तो ऐसी रियायत करते हुए वे खुद भी अपने फायदे के लिए कुछ और लोगों से रियायत क्यों न कर लें? ऐसी सोच धीरे-धीरे काम करने की क्षमता को घटाते चलती है, और लोगों का भरोसा कानून के राज पर से उठने लगता है। 
    कई बार एक लतीफा बाजार में आता है कि एक जज से खुश होकर एक बुजुर्ग उसे दुआ देता है कि बेटा अगले जनम में दारोगा बनना। जज हैरान होकर बताता है कि वह तो आज भी दारोगा से बहुत बड़ा है, और फिर ऐसी दुआ क्यों दी जा रही है? तो वह बुजुर्ग कहता है कि आपने इस फैसले में दस बरस लगा दिए, दारोगा तो कहता था कि लाख रूपए ले आओ, दस दिन में मामला निपटा देगा। जब ऐसे किस्से लोगों की असल तकलीफों का असल बखान हो, तो फिर यह सोचना पड़ता है कि इस बिगड़ी हुई व्यवस्था को आखिर कौन सुधारेंगे, और क्या यह सचमुच ही कभी सुधर भी पाएगी? आज जब सार्वजनिक जगहों पर लोग मार-मारकर, पीट-पीटकर दूसरों की जान ले लेते हैं, और उनको यह अहसास भी रहता है कि हो सकता है कि कोई इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे हों। इसके बावजूद लोगों को कत्ल करने में हिचक नहीं होती अगर जान किसी दलित-आदिवासी की हो, या किसी गरीब की हो। आज जब हम इस बात को लिख रहे हैं उसी वक्त दिल्ली की एक खबर है कि झारखंड से वहां घरेलू कामकाज के लिए ले जाई गई एक नाबालिग लड़की ने जब तनख्वाह मांगी, तो मालिक ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अब यह हाल जिस देश की राजधानी का हो, उस देश का फिर भगवान ही मालिक है। 
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 20-May-2018
  • कर्नाटक विधानसभा में कल बहुमत साबित करने के पहले ही भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने इस्तीफे की घोषणा कर दी, और इधर राष्ट्रगान बजते रहा, उधर वे अपने विधायकों के साथ राजभवन रवाना हो गए ताकि उस राज्यपाल को इस्तीफा दे सकें जिसने नाजायज तरीके से उन्हें न्यौता देकर शपथ दिलाई थी। यह इस्तीफा कई किस्म का था। यह भाजपा की तैयारी का इस्तीफा भी था, और सबसे बड़ा इस्तीफा तो यह राज्यपाल का अपनी जिम्मेदारियों से था। जिस राज्यपाल को असीमित अधिकार दिए गए हैं कि वह किसे सरकार बनाने न्यौता दे, उस राज्यपाल ने उसका असीमित बेजा इस्तेमाल करके एक ऐसी सरकार बनवाई जो बिना दल-बदल या खरीद-फरोख्त के बहुमत साबित नहीं कर सकती थी। इसलिए सामाजिक जीवन की मर्यादा यह मांगती है कि ऐसा राज्यपाल बिना देर किए इस्तीफा दे। 
    कहने के लिए राज्यपाल और भाजपा के सामने कई किस्म की मिसालें जुट जाएंगी कि जब केन्द्र पर कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार था तब बहुत से राज्यपालों ने बहुत से राज्यों में कैसा-कैसा बर्ताव किया था, और तब किसने इस्तीफा दिया था। वैसी तमाम बातें इतिहास की किताबों में अच्छी तरह दर्ज होंगी, लेकिन हमारे सरीखे रोजाना के अखबारनवीसों की नसीहत या मांग उस दिन की जरूरत पर रहती है जिस दिन वह अखबार छपना है। इसलिए इतिहास को देखने की एक सीमा रहती है, और वर्तमान की यह मांग रहती है कि भविष्य को और अधिक तबाह होने से बचाया जाए। इसलिए भाजपा एक पार्टी के रूप में चाहे जैसा बर्ताव करे, जिस राज्यपाल को संविधान की रक्षा की शपथ दिलाई गई थी, और जिसका दर्जा निर्वाचित राज्य सरकार से ऊपर रहता है, उसे अपने ऐसे बेईमान बर्ताव के बाद तुरंत कुर्सी छोड़ देना चाहिए। और यह पैमाना बाकी राज्यपालों पर भी, बाकी मामलों में भी लागू होना चाहिए। लोगों को याद होगा कि बीच-बीच में कुछ लोग राज्यपाल के ओहदे को ही बेईमानी के खतरों से भरा हुआ, और निहायत गैरजरूरी बताते आए हैं। हम खुद इस अखबार मे इसी जगह पर बरसों से यह लिखते आए हैं कि ऐसी सामंती व्यवस्था खत्म होनी चाहिए जो कि एक निर्वाचित सरकार और मुख्यमंत्री के ऊपर एक अनैतिक नियंत्रण के लिए अंग्रेजी राज की बनाई हुई दिखती है। भारत में राज्यपालों की व्यवस्था में लोकतंत्र के साथ बेईमानी ही अधिक की है, न कि कोई संवैधानिक योगदान दिया है। 
    जहां तक कल की भाजपा की शिकस्त का सवाल है तो वह कर्नाटक से अधिक है, और कर्नाटक से दूर-दूर तक है। कल का नुकसान बेंगलुरू शहर तक सीमित नहीं रहने वाला है, यह देश भर में भाजपा के खिलाफ गैरएनडीए पार्टियों की एक नई एकजुटता की संभावना की शुरुआत हो सकता है। जब बिल्ली किसी घर में घुसकर दूध पी जाती है, तो वह नुकसान महज दूध का नहीं होता, बड़ा और असल नुकसान यह होता है कि बिल्ली ने घर देख लिया, और दूध का बर्तन पहचान लिया। इसी तरह आज गैरएनडीए पार्टियों ने एक नई संभावना की शिनाख्त कर ली है जो कि देश के दर्जन भर राज्यों में जगह-जगह आगे बढ़ सकती है जहां पर कि कांग्रेस या दूसरी पार्टियां चुनाव के पहले या चुनाव के बाद एक गठबंधन या तालमेल बना सकती हैं, और भाजपा-एनडीए के सामने एक सचमुच की चुनौती बन सकती हैं। जैसा कि कर्नाटक को लेकर कुछ लोगों का यह मानना है कि भाजपा के भीतर कुछ लोग ऐसे भी थे जो सरकार बनाने का ऐसा दुस्साहसी दावा करने के खिलाफ थे, और चाहते थे कि कांग्रेस-जेडीएस मिलकर सरकार बनाएं, एक-दूसरे को गिराएं, और तब भाजपा के लिए एक बेहतर मौका सामने आएगा। लेकिन वैसा हुआ नहीं, और सुप्रीम कोर्ट की दखल के अंदाज के बिना भाजपा ने एक पखवाड़े के वक्त को जुगाड़ के लिए काफी मान लिया। अपनी मर्जी का राज्यपाल होने का भी यह नुकसान हुआ कि अपनी ताकत और संभावना तौलने की जरूरत सूझी ही नहीं। अब देश में जगह-जगह कांग्रेस हो सकता है कि क्षेत्रीय पार्टियों के साथ एक बेहतर तालमेल को अच्छा समझे, और अपनी सीमित रह गई औकात की हकीकत जानकर, मानकर, छोटी-छोटी भागीदारियों को इज्जत का मुद्दा न बनाकर जिंदा रहना सीखे। कर्नाटक से भारत की क्षेत्रीय पार्टियों को भी कांग्रेस के साथ मिलकर बात करने की एक संभावना दिखेगी, और यही बेंगलुरू की विधानसभा से निकला हुआ संदेश है। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 19-May-2018
  • कर्नाटक में इस वक्त विधानसभा में जो नाटक चल रहा है, उसे देखकर देश भर के लोगों के मन में भारतीय संसदीय राजनीति के लिए हिकारत बढ़ती जा रही है। यह पहला मौका नहीं है कि लोगों के मन में राजनीति के लिए नफरत हुई हो, इसके पहले भी कई ऐसे मौके आए, कई ऐसी पार्टियां आईं जिन्होंने खरीद-बिक्री का काम किया। कई बार पार्टियों ने खरीद-बिक्री नहीं की, तो सांसदों ने खुद ही अपने स्तर पर संसद में सवाल पूछने के लिए अपनी आत्मा को बेचने का काम किया, कैमरे पर कैद हुए, और संसद की सदस्यता गई, जेल शायद बाकी है। ऐसे में जब पिछले दो-चार दिनों से यह चर्चा चल रही है कि किस तरह कर्नाटक में एक-एक विधायक की खरीदी के लिए सौ-सौ करोड़ रूपए की बोली लग रही है, तो लोगों को लग रहा है कि क्या ऐसे चुनावों में वोट देने जाने का कोई मतलब है जिसमें बेईमान ही चुने जाएं, और वे अपने से बड़े बेईमान के हाथ बिककर पांच बरस तक राज्य को लूटने का ठेका दे दें? 
    ऐसे मौके पर जब देश की अदालत को देखें, तो लगता है कि वह महज तकनीकी आधार पर छोटे-छोटे आदेश कर रही है, और अपनी छवि बचाने में कामयाब हो रही है। लेकिन जो बड़ी बेइंसाफी, बड़ी बेईमानी सामने दिख रही है, उस पर या तो सुप्रीम कोर्ट का कोई काबू नहीं है, या फिर सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी से कतरा रही है, और राजनीतिक भ्रष्टाचार की परंपरा में दखल देने से बच रही है। इन दोनों में से चाहे जो बात हो, देश की आम जनता बहुत ही निराश है कि जब संसदीय संस्थाएं इस किस्म की मंडी बन गई दिख रही हैं, जब अदालतें बेबस हैं, जब सरकार का कोई रोल ऐसी नौबत में रह नहीं गया है, जब मीडिया भरोसेमंद नहीं रह गया है, तो अकेली जनता ही भला किस भरोसे पर, और भला किस उम्मीद में वोट देने जाती रहे? 
    हमने छत्तीसगढ़ की पहली सरकार के वक्त भाजपा के दर्जन भर विधायकों को मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जेब में जाते देखा था। उसके बाद जब राज्य के पहले चुनाव हुए, तो बहुमत से आई भाजपा से सरकार बनाने का मौका लूटने की कोशिश करते फिर जोगी को देखा था, और छत्तीसगढ़ के लोगों को अच्छी तरह याद है कि इस तमाम खरीद-बिक्री की रिकॉर्डिंग किस तरह नोटोंभरे बैग के साथ अरूण जेटली ने रायपुर में प्रेस कांफ्रेंस में सुनाई थी। वह शायद भारतीय राजनीति का पहला मौका था जब कोई मुख्यमंत्री अपनी ही कांग्रेस पार्टी से निलंबित किया गया था। इसलिए आज जब भाजपा पर खरीद-बिक्री की तोहमत लगती है, तो छत्तीसगढ़ में इस तोहमत को दोहराते हुए राहुल गांधी या कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि अपने संपन्न दिनों में कांग्रेस ने ऐसी बहुत सी खरीदी की हुई है। अब आज शायद विधायक-सांसद महंगे इतने अधिक हो गए हैं, और कांग्रेस इतनी कंगाल हो गई है कि वह थोक में खरीद-बिक्री कर नहीं पा रही है। 
    भारतीय संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता इतनी बुरी तरह बर्बाद होने का एक नुकसान यह हुआ है कि लोग चुनाव के वक्त अपने वोट बेचने में कुछ भी बुरा नहीं मानते क्योंकि उनको मालूम है कि उनके वोट पाकर जो सांसद या विधायक बनेंगे वो बाद में हो सकता है कि अपनी आत्मा ऊंचे दाम पर बेचने को मंडी में एक पैर पर खड़े रहें। इसका दूसरा नुकसान यह है कि देश में नेता और राजनीति सबके भ्रष्ट हो जाने की तस्वीर ऐसी बन गई है कि लोग अब सरकार को कोई भी टैक्स देना नहीं चाहते कि चोरों के हाथ क्यों कुछ दिया जाए। यह नौबत लोकतंत्र में आस्था की कमी का एक ऐसा बड़ा खतरा है जो कि जल्द दूर नहीं होने वाला है। अगर देश में कोई ईमानदार नेता, ईमानदार पार्टी आ भी जाए, तो भी उसकी ईमानदारी की साख बनते कई बरस लगेंगे। जनता दूध की जली हुई है, और वह छांछ भी फूंक-फूंककर पिएगी। 
    अब से कुछ घंटों में कर्नाटक का फैसला आ जाएगा। अभी उसके बारे में हम कोई अटकल लगाना नहीं चाहते लेकिन इस चुनाव में बड़े-बड़े दिग्गज और प्रामाणिक भ्रष्ट लोगों का जैसा बोलबाला देखने मिला है, उससे ही देश में लोकतंत्र की साख कमजोर हुई है। अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को एक खुली सुनवाई करके इस बारे में विचार करना चाहिए कि क्या देश में लोकतंत्र को एक बार फिर साख दिलवाई जा सकती है? 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 18-May-2018
  • अमरीकी विदेश विभाग ने एक सवाल के जवाब में कहा है कि पाकिस्तान में जमात-उद-दावा के सरगना, हाफिज सईद के सिर पर अमरीकी सरकार ने ईनाम रखा हुआ है और वह पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहा है जो कि अमरीका के लिए बड़ी फिक्र का मामला है। पिछले हफ्ते नवाज शरीफ द्वारा मुंबई हमले के हमलावर आतंकियों के पाकिस्तान से जाने पर हामी भरने पर अमरीकी विदेश विभाग से पूछा गया था, और उसके जवाब में यह बात कही गई। 
    अमरीका का यह कहना निहायत फिजूल बात है क्योंकि पाकिस्तान का आतंकी हमलों में शामिल होना, वहां पर घरेलू मोर्चे पर आतंकियों का बोलबाला, वहां पर समय-समय पर लोकतंत्र में फौज की दखल जैसे कई मुद्दे अमरीका के सामने आधी सदी से चले आ रहे हैं। दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा आतंकी हमला अमरीका पर करने वाला ओसामा-बिन-लादेन पाकिस्तान में ही बसा हुआ था, और अब तक ऐसे कोई सुबूत नहीं आए हैं कि उसकी खबर पाकिस्तान सरकार को नहीं थी। खुद अमरीका को पाकिस्तान में घुसकर लादेन को मारना पड़ा था, और पाकिस्तान से उसे अपनी इस फौजी कार्रवाई को छुपाकर भी रखना पड़ा था। जब अमरीका का पाकिस्तान से ऐसे तजुर्बे का एक लंबा इतिहास है, तो फिर सवाल यह उठता है कि उस पाकिस्तान को एक लंबी-चौड़ी फौजी मदद और आर्थिक मदद देना अमरीका क्यों जारी रखता है? 
    अमरीका का इतिहास अगर देखें तो वह हमेशा से दुनिया के अलग-अलग देशों में आतंकी ताकतों की मदद करते आया है। कहीं पर वह तालिबानों को बढ़ावा देता है, तो कहीं किसी और गुरिल्ला संगठन की फौजी मदद करता है ताकि वह अपने देश की लोकतांत्रिक सरकार को गिरा सके। अमरीका कुछ राष्ट्रप्रमुखों के कत्ल का गुनहगार भी है, और पूरी दुनिया में तरह-तरह की बर्बादी में उसका बड़ा हाथ रहते आया है। उसने दुनिया में दर्जनों देशों में लोकतंत्र को कमजोर करने का काम किया है, और अपना पि_ू सरकारों को बिठाया है ताकि वहां का तेल अमरीका को मिल सके, या फिर रूस और चीन जैसे देशों के मुकाबले उसे दुनिया के उस हिस्से में फौजी ठिकाना मिल सके। पाकिस्तान की शक्ल में अमरीका को ऐसा ही एक फौजी ठिकाना हिन्द महासागर के इस इलाके में मिला हुआ है, और अमरीका उसी का भुगतान करता है। चीन की सरहद से लगे हुए पाकिस्तान में अमरीका आतंक-विरोधी कार्रवाई कहते हुए तमाम किस्म की फौजी हरकतें भी करता है। और मजे की बात यह है कि जिस पाकिस्तान ने अमरीका ने अपने इतिहास के सबसे बड़े दुश्मन ओसामा-बिन-लादेन को टीकाकरण अभियान की आड़ में जासूसी करके ढूंढा और मारा, उसी अमरीका का एक ईनामी-आतंकी हाफिज सईद अमरीका को पाकिस्तान में खुले घूमते दिख रहा है, और उसे मारने के बजाय अमरीका बयानबाजी कर रहा है। लादेन और हाफिज के बीच अमरीका की नीति-रणनीति में ऐसा फर्क क्यों है? 
    दुनिया के आतंक के मोर्चे पर, देशों के गृहयुद्धों के मोर्चे पर, लोकतंत्र के सत्ता पलट के मोर्चे पर अमरीका से अधिक बदनाम दुनिया में कोई देश नहीं है। खुद अमरीका के विद्वान विचारक अपने देश को दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी करार देते हैं। और यह देश तोप की नोंक पर ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों को हमलों में अपने गिरोह में शामिल कर लेता है। इसलिए भारत को सुहानी लगने वाली अमरीकी-बकवास किसी काम की नहीं है। अगर अमरीका को हाफिज सईद किसी फिक्र का सामान लगता है, तो वह मिनटों में पाकिस्तान में उसका कत्ल करवा सकता था। हम तो किसी भी कत्ल के हिमायती नहीं हैं, लेकिन जो अमरीका सरकारी तौर पर ऐसे कत्ल मंजूर करता है, और दुनिया भर में जगह-जगह अपनी फौज या सीआईए से करवाता है, भाड़े के हत्यारे रखकर करवाता है, उस अमरीका को हाफिज सईद पर ईनाम रखने के बाद, पाकिस्तान को हर किस्म की मदद जारी रखने के बाद बयानबाजी का कोई हक नहीं है। उसकी बयानबाजी महज धोखा है, वरना अगर वह अपनी जमीन से परे भी कहीं आतंक का विरोधी होता, तो मुंबई हमले के बाद वह पाकिस्तान की मदद बंद कर देता। इसलिए अमरीकी बयानों पर किसी हिन्दुस्तानी को खुश नहीं होना चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 17-May-2018
  • जिंदगी में कई ऐसे मौके आते हैं जब हालात नाजुक रहते हैं, और फैसले लेने वाले लोगों से समझदारी की उम्मीद की जाती है। ऐसा माना जाता है कि जिम्मेदार लोग हालात देखते हुए गैरजरूरी हरकतों से बचेंगे, और मौके को अच्छी तरह निपट जाने देंगे। लेकिन असल जिंदगी में लोगों की समझदारी जाने कहां चली जाती है, और लोग बिना किसी उकसावे या भड़कावे के ऐसा कर बैठते हैं, या ऐसा करते हैं जिससे हासिल तो कुछ नहीं होता, लेकिन संभावनाओं की बर्बादी बहुत होती है। 
    कुछ ऐसा ही आज अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच चल रहा है। अभी दो-तीन दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा था कि किस तरह उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों का खतरा खत्म करने के जो आसार बन रहे हैं, उन्हें देखते हुए दुनिया के मीडिया में ऐसी भी चर्चा हो रही है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इसके लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिल सकता है। और इस चर्चा को शुरू हुए चार दिन भी नहीं हुए हैं कि अब ऐसा खतरा मंडरा रहा है कि उत्तर कोरिया का सनकी तानाशाह शायद अमरीका के साथ तय हुई बातचीत से ही पीछे हट जाए। उसने दक्षिण कोरिया के साथ अपनी दशकों की दुश्मनी को खत्म करते हुए अभी पिछले पखवाड़े ही वहां जाकर पड़ोसी से जंग का खतरा खत्म किया था, और आज ऐसी नौबत है कि वह अपने ही भाई-देश से बातचीत तोड़ रहा है। इसके पीछे एक निहायत ही गैरजरूरी वजह खड़ी की गई है। अमरीका और दक्षिण कोरिया मिलकर एक फौजी कसरत करने जा रहे हैं जो कि उत्तर कोरिया को उकसा रही है, और इससे बौखलाकर उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच कुछ समय बाद होने वाली बातचीत भी खतरे में पड़ते दिख रही है। 
    आज जब दुनिया के ऊपर सबसे बड़ा खतरा करार दिए जा रहे उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों के खत्म होने की एक संभावना बन रही थी, तब उसके बीच ही अमरीका ने दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर एक निहायत ही फिजूल की, और निहायत ही नाजायज फौजी कवायद शुरू की है, जो कि दुनिया के इतिहास में एक चूक की तरह दर्ज होगी। और जब ट्रंप जैसे बददिमाग और बेदिमाग नेता कोई काम करते हैं, तो उसमें वह काम चूक होने की गुंजाइश कम होती है, बददिमागी की गुंजाइश अधिक होती है। आज जब तीसरे विश्वयुद्ध के खतरे का सामान बनने वाला उत्तर कोरिया किसी बातचीत के लिए तैयार हुआ था, तो वैसे वक्त पर फौजी कसरत का यह नाटक परले दर्जे की बेवकूफी और बददिमागी दोनों की मिलीजुली शक्ल है।
    जब किसी के घर बारात लगने को हो, तो लड़की का पिता पड़ोसी से पुराने झगड़े की किसी वजह को फिर खड़ा नहीं करता। लोग ऐसे नाजुक मौके को ठीक से पार हो जाने देना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप की बुद्धि कम है, और अहंकार अधिक है। ट्रंप ने जिंदगी में जनता के बीच अपने कारोबार के सिवाय और कोई काम नहीं किया है। इसलिए तजुर्बे की कमी, और बददिमागी मिलकर टं्रप की कमअक्ल के साथ भागीदारी में एक ऐसा खतरनाक धंधा खड़ा कर चुकी हैं कि जिससे तीसरा विश्वयुद्ध भी छिड़ सकता है। पता नहीं इस अमरीकी राष्ट्रपति को अक्ल देने का काम उन बड़े देशों में से किसी के मुखिया भी नहीं कर रहे हैं जो कि सीरिया पर हमला करने के लिए ट्रंप के अमरीकी गिरोह में शामिल होकर बमबारी कर रहे हैं।
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 16-May-2018
  • कर्नाटक में कल चुनावी नतीजे साफ हो जाने के बाद दो बातें खुलकर स्थापित हो गई हैं। पहली बात यह कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद अपने दम पर सरकार नहीं बना सकती, और न ही बाकी कहीं से उसे ईमानदारी से कोई विधायक मिल सकते। बाकी दोनों पार्टियां मिलकर जरूरी वोटों से ज्यादा विधायकों वाली हैं, और उन्होंने मिलकर सरकार बनाने की घोषणा भी कर दी है, राज्यपाल को लिखकर दे भी दिया है। अब राज्यपाल के नाम पर केन्द्र सरकार जो फैसले लेती है, उन अघोषित फैसलों में आज एक बड़ी दुविधा की नौबत मोदी सरकार के सामने है। पिछले एक बरस में गोवा और मणिपुर जैसे तीन राज्य रहे, जहां पर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन राज्यपालों ने भाजपा को दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने का न्यौता दिया, और एक बार सरकार बन जाने पर विधानसभा में बहुमत साबित करना अधिक मुश्किल नहीं रह गया। नतीजा यह है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस इन तीनों राज्यों में सरकार बनाने का मौका भी नहीं पा सकी। अब अगर उसी पैमाने और परंपरा को कर्नाटक पर लागू किया जाए, तो यहां एक स्पष्ट गठबंधन सरकार बनाने के लिए सामने है, और वही एक विकल्प है जिससे विधायकों की खरीद-फरोख्त के बिना, दल-बदल और अनैतिक कहे जाने वाले तौर-तरीकों के बिना एक सरकार बन सकती है। लेकिन ऐसा लगता है कि बेंगलुरू में कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों में से कुछ का शिकार हो जाएगा, और कुछ बाजार में खड़े होकर अपनी अंतरात्मा बेचने के लिए तैयार होंगे। 
    सरकार बनाना किसी भी राजनीतिक दल की एक और शायद पहली प्राथमिकता हो सकती है, लेकिन इसके लिए कितने किस्म के और किस दर्जे के कितने समझौते किए जाएं, इस बारे में भी सोचना चाहिए। लोकतंत्र के भीतर खरीद-फरोख्त की काफी गुंजाइश कानून में रखी गई है, लेकिन लोकतंत्र जिन और जैसी परंपराओं से विकसित होता है, वे भी इतिहास में नेताओं और पार्टियों के नाम के साथ अच्छी तरह दर्ज होती हैं। भारत जैसे मजबूत और विशाल लोकतंत्र को एक विशाल हृदय की जरूरत भी है जिससे कि तात्कालिक नफा-नुकसान छोड़कर दीर्घकालीन गौरवशाली परंपराएं कायम हो सकें। एक तो चुनावों के ठीक पहले होने वाले दल-बदल की दलदल से देश वैसे भी बदनाम होता है, और फिर चुनाव प्रचार के दौरान जो जहरीली गंदगी फैलती है, वह भी देश को बड़ी शर्मिंदगी दिलाती है। इसके बाद अब अगर मतदाताओं के फैसले को अनदेखा करके खरीद-बिक्री से सरकार बनाई जाए, तो वह जनतंत्र के नाम पर धनतंत्र की हिंसा के अलावा और कुछ नहीं होगा। आज की नौबत देखकर एक कार्टून सही लगता है जो कि आज ही आया है। इसमें मतदाता के लिए कहा जा रहा है कि वह इस खुशफहमी में रहता है कि सरकार वह बनाता है। 
    कर्नाटक सभी किस्म की राजनीतिक खरीद-फरोख्त के लिए एक बड़ा बदनाम राज्य है। यहां पर इस चुनाव में भी जिस किस्म के माफिया लोगों को राजनीति में जगह मिली है, उससे भी भारतीय लोकतंत्र नाकामयाब लगता है, और ऐसा लगता है कि महज चुनावतंत्र को लोकतंत्र मान लिया गया है। तमाम राजनीतिक दलों को ऐसी गंदगी से ऊपर उठने की जरूरत है। चुनाव जीतना और राज्यों में सरकार बनाना तो ठीक है, लेकिन इतनी अनैतिक जोड़तोड़ ठीक नहीं है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 15-May-2018
  • भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र में किसी भी चुनाव के बाद उसका विश्लेषण बड़ा आसान हो जाता है क्योंकि नतीजों को लेकर कई घिसे-पिटे विशेषणों का इस्तेमाल करके यह साबित किया जा सकता है, और जाता है, कि यह जीत कैसे हासिल हुई, या यह हार हुई तो कैसे हुई। कर्नाटक के चुनाव को लेकर टीवी चैनलों में मतदान के बाद जो सर्वे करवाए, उनमें अधिक का अंदाज भाजपा की जीत का था, लेकिन कुछ सर्वे ऐसे भी थे जो कांगे्रस की जीत बताते थे। इस प्रदेश के चुनाव को कुछ महीनों बाद के छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान के विधानसभा चुनावों के पहले के रूख से भी जोड़कर देखा जा रहा था और दूसरी तरफ यह भी देखा जा रहा था कि क्या यह मोदी लहर के दक्षिण प्रदेश का सुबूत साबित होगा। अभी जब ये नतीजे आ ही रहे हैं, ऐसा दिखाई दे रहा है कि भाजपा अकेले अपने बूते पर सरकार बनाने के करीब पहुंच रही है, कांगे्रस सर्वे की अटकलों से कम सीटों के साथ दूसरे नंबर पर है और जेडीएस को अंदाज से कुछ अधिक सीटें मिल रही हैं।
    कर्नाटक में अभी तक जो आसार दिख रहे हैं, उनके मुताबिक परंपरा के अनुसार भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का न्यौता मिलना चाहिए। लेकिन कांगे्रस और जेडीएस की सीटें मिलाकर अभी भाजपा से अधिक हैं, और ऐसे में जोड़-तोड़ की राजनीति में कुछ भी हो सकता है। हम सरकार को लेकर दोपहर एक बजे यह लिखते हुए कोई अटकल लगाना नहीं चाहते, लेकिन चुनावी नतीजों में भाजपा की जो कामयाबी स्थापित हुई है, उस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। देश के बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात को लिखा और कहा है कि भाजपा चुनाव जीतने की एक ऐसे कामयाब मशीन हो गई है जो कि हर कीमत पर चुनाव जीतने और सरकार बनाने की नीयत के साथ मैदान पर उतरती है, और अमूमन जीतती है। लोगों ने यह भी कहा है कि कर्नाटक को जीतने के लिए भाजपा ने जिस तरह वहां एक वक्त भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए येदियुरप्पा को भावी सीएम का चेहरा बनाकर पेश किया और देश के सबसे बड़े खनिज घोटालेबाज रेड्डी भाईयों के करीबी लोगों को आधा दर्जन से अधिक सीटें दीं, प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार पर जितना वक्त लगाया, उन सबका मिलाजुला नतीजा यह जीत है। और यह जीत भाजपा को बहुत से समझौते करने के बाद हासिल हुई है, यह कोई आसान जीत नहीं है।
    अभी विश्लेषकों के जो आंकड़े टीवी स्क्रीन पर तैर रहे हैं, उनके मुताबिक कर्नाटक में भाजपा की इस ताजा जीत के बाद देश में एनडीए मतदाताओं की सबसे बड़े हिस्से पर राज कर रही है, और कांगे्रस का राज अगर कर्नाटक से हट जाता है, तो वह अपने सहयोगियों के साथ मिलकर भी देश में कुल ढाई फीसदी मतदाताओं पर ही राज कर रही है। इन आंकड़ों के महत्व को कम आंकना इसलिए ठीक नहीं है कि देश में एक-एक कर तकरीबन सारे ही राज्यों को खोने के बाद कांगे्रस पार्टी के पास अब खोने को कुछ बचा भी नहीं है। गिनेचुने एक-दो राज्यों में जिन सहयोगी दलों के साथ कांगे्रस का तालमेल है, वहां भी नरेन्द्र मोदी की आंधी और अमित शाह का राजनीतिक-चुनावी मैनेजमेंट कांगे्रस के साथियों को शायद अधिक वक्त तक साथ न रहने दें। 
    इस चुनाव का रूख प्रचार के बीच में कब बदला इसे लेकर भी कुछ विश्लेषकों ने एक अटकल पेश की है। उनका मानना है कि जब राहुल गांधी ने यह कहा कि 2019 के चुनाव में अगर कांगे्रस का बहुमत आता है, तो वे भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, या बनेंगे। हालांकि राहुल ने यह बात एक बंद कमरे की बैठक में एक सवाल के जवाब के रूप में ही कही थी, लेकिन अखबार और टीवी की सुर्खियां कभी पूरी बात पर तो बनती भी नहीं हैं, सबसे नाटकीय गिनेचुने शब्दों को लेकर मीडिया दौड़ पड़ता है, और वैसा ही राहुल के इस बयान के साथ भी हुआ। भाजपा को इस बयान के बाद कांगे्रस पर हमले का एक बड़ा मौका हाथ लगा, और उसने फिर कोई कसर बाकी नहीं रखी। चुनाव तो किसी रियायत वाला खेल होता नहीं है, और इसके बीच में राहुल जैसी चूक कोई गलत बात चाहे न हो, गलत मौके पर कही गई एक आम बात जरूर थी जो कि आत्मघाती साबित हुई। फिर भी हम अकेली इसी लापरवाह बात को कांगे्रस की शिकस्त के लिए जिम्मेदार नहीं मानते, और देश को अब कम से कम आज तो यह मानने की जरूरत है कि कांगे्रस अप्रासंगिक हो गई है, और भाजपा नरेन्द्र मोदी की शोहरत, और अमित शाह के मैनेजमेंट की लहरों पर सवार है। 
    मोदी-शाह ने भारत की चुनावी राजनीति को एक बिल्कुल ही नया तेवर दे दिया है, और उसे समझे बिना उससे निपटना किसी पार्टी के लिए मुमकिन नहीं है। जो लोग अपने पुराने तजुर्बे को लेकर इस नए दौर का चुनाव लडऩे के लिए अपने को काबिल मानते हैं, उनके दिन गिनेचुने ही बचे हैं। एक वक्त भारत पर हमला करने वाले लोग बारूद लेकर आए थे, और उस नए हथियार का सामना करने के लिए भारतीय राजाओं के पास महज तलवार-भाले थे। आज मोदी-शाह के मुकाबले बाकी पार्टियों के पुराने हथियार औजार जितने भी नहीं रह गए हैं। कांगे्रस ने कर्नाटक में भाजपा विरोधी जेडीएस और बसपा के साथ चुनाव के पहले किसी तरह का तालमेल नहीं किया, और उसका यह एक फैसला मतदान से पहले और मतगणना के बाद दोनों ही वक्त उसके लिए नुकसानदेह साबित हुआ। यहां एक लाईन यह बताना जरूरी है कि कर्नाटक से बहुत दूर बैठी हुईं ममता बैनर्जी ने कांगे्रस को यह सुझाव दिया भी था।
    अभी आंकड़े चढ़-उतर रहे हैं, और आने वाले घंटे यह साबित करेंगे कि सरकार बनाने का न्यौता किसे मिलेगा, सरकार बनेगी किसकी, लेकिन अभी इस बीच हमने भाजपा की जीत और कांगे्रस की हार पर ही आज की बात सीमित रखी है। आगे-आगे देखें, होता है क्या? 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 14-May-2018
  • भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बिगाडऩे के लिए तो बहुत सी ताकतें लगी रहती हैं, लेकिन जो ताकतें सरहद पर अमन बनाए रखने के लिए दोनों तरफ के लोगों की गालियां सुनती हैं, जब उन पर सरकार भी वार करती है, तो नौबत बहुत तकलीफदेह रहती है। यह लिखने की ताजा वजह एक खबर है जिसके मुताबिक भारत में होने जा रहे पन्द्रहवें एशिया मीडिया समिट में आईं एक पाकिस्तानी को दिल्ली से बैरंग लौटा देना है। पाकिस्तान के एक सबसे मशहूर शायर, फैज अहमद फैज, की बेटी मोनीजा हाशमी जो कि एक प्रमुख मीडियाकर्मी हैं, इस समिट में एक वक्ता थीं, और उन्हें निमंत्रण भेजकर बुलाया गया था, और इस कार्यक्रम में भारत सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी भागीदार था। जब वे दिल्ली पहुंचीं तो भारत सरकार के अफसरों ने आयोजकों को कहा कि न तो उन्हें होटल में ठहराया जाए, और न ही कार्यक्रम में कुछ बोलने दिया जाए। कार्यक्रम में शामिल न करने की चेतावनी के साथ उन्हें तुरंत वापिस रवाना भी कर दिया गया। लोगों को यह याद दिलाया जा सकता है कि फैज ने पाकिस्तान में फौजी हुकूमत का जमकर विरोध किया था, और वे अमन के शायर थे। उनकी बेटी ने भारत सरकार के इस सुलूक के खिलाफ कुछ कहने से इंकार कर दिया है, और महज इतना कहा है कि उनका कहा हुआ रिश्तों को और बिगाड़ेगा, इसलिए वे कुछ कहना नहीं चाहतीं। मोनीजा हाशमी के बेटे ने यह वाक्या ट्विटर पर भारत के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री के लिए लिखा है, और अब तक सरकार का कोई जवाब इस पर नहीं आया है। 
    जाहिर तौर पर इसकी एक वजह दिखती है कि दो ही दिन पहले नवाज शरीफ ने यह मंजूर किया कि मुंबई हमला करने वाले आतंकी पाकिस्तान की जमीन से हिन्दुस्तान आए थे। उनके यह कहने के बाद हिन्दुस्तान में भाजपा से लेकर कांग्रेस तक बहुत से तबके पाकिस्तान के खिलाफ जमकर जंग की बातें करने लगे हैं। हो सकता है कि भारत सरकार ने पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद यह बेहतर माना हो कि वहां से आई एक मीडियाकर्मी को इस तरह वापिस किया जाए, लेकिन ऐसी कोई बात सरकार की ओर से औपचारिक रूप से कही नहीं गई है। दूसरी बात यह कि भारत और पाकिस्तान में अखबारनवीस, कलाकार, संगीतकार, और खिलाड़ी, ये तो ऐसे तबके हैं जिनकी वजह से दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर बनते हैं, दोस्ती बढ़ती है, और तनाव घटता है। अगर दोनों देशों के बीच तनातनी रखना जरूरी ही हो, तो भी इन तबकों को तो इस तनाव से दूर रखना चाहिए। ये तबके सरकार से परे के हैं, और अपने-अपने देश के खरे प्रतिनिधि रहते हैं। लेकिन इस सिलसिले को तोड़ते हुए जिस तरह फैज की बेटी को दिल्ली से बैरंग लौटाया गया, उससे भारत सरकार की छवि भी खराब हुई है, और लोगों का हौसला भी पस्त हुआ है। फिर इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी उठता है कि एशिया-स्तर का कोई अंतरराष्ट्रीय आयोजन अगर किसी देश में हो रहा है, और वहां पर कोई विवादहीन प्रतिनिधि आमंत्रित किए गए हैं, तो उन्हें कैसे लौटाया जा सकता है? इससे भारत की लोकतांत्रिक छवि को भी धक्का लगा है।
    फैज पूरी जिंदगी पाकिस्तान में फौज और कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ते रहे। वे मजहब पर भरोसा नहीं करते थे, और वे एक वामपंथी नेता थे, वे मजदूरों के शायर थे, वे जम्हूरियत के शायर थे। उनकी परंपरा उनकी बेटी अपने दम पर आगे बढ़ा रही हैं, और उनको इस तरह बेइज्जत करके लौटाने की कोशिश से उनकी कोई बेइज्जती नहीं हुई, भारत की ही एक तौहीन हुई है। इस पूरे सिलसिले में दो दिन पहले की ही इस वारदात को याद करने की जरूरत है कि किस तरह इंडोनेशिया में एक कट्टरपंथी परिवार के आधा दर्जन लोगों ने अपने बच्चों तक को साथ लेकर तीन ईसाई चर्चों पर हमला किया, और दर्जन भर लोगों को मार डाला। धार्मिक उन्मादी और कट्टरपंथी लोग जिस तरह की हिंसा कर रहे हैं, उनके बीच इस उन्माद के खिलाफ लडऩे वाले अखबारनवीस और शायर, कलाकार और लेखक पूरी दुनिया के काम आ सकते हैं, लेकिन ऐसी अंतरराष्ट्रीय समझदारी को दरकिनार करते हुए भारत सरकार ने जो किया है, उससे दुनिया भर की अमन-पसंद ताकतों को चोट लगी है। फिर यह भी दिखता है कि भारत के प्रधानमंत्री और खासकर भारत की विदेश मंत्री जिस तरह चौबीसों घंटे ट्विटर पर लोगों को जवाब देती हैं, वे अपने नाम पर पोस्ट इस मामले कुछ क्यों नहीं बोल रहे हैं? जब चुप रहने के लिए और कम बोलने के लिए बदनाम लोग चुप्पी रखें, तब तो समझ आता है। लेकिन जब पल-पल बोलने वाले, और खासा अधिक बोलने वाले लोग भी अपने फैसलों पर कुछ न कहें, तो वह चुप्पी और चीख-चीखकर बोलती है। यह बहुत खराब बात हुई है, और इससे अमन-पसंद लोगों को अपना हौसला पस्त नहीं करना चाहिए। सरकारें इस किस्म के बहुत से गलत और खराब फैसले लेती हैं, यह तो समझदार जनता होती है जो एक-दूसरे के साथ होती है। इस मामले से निराश हुए बिना भारत और पाकिस्तान के समझदार आम लोगों को अपने रिश्ते बेहतर रखने के लिए कोशिशें जारी रखनी चाहिए, फिर चाहे फौजें, सरकारें, और आतंकी, ये तमाम लोग अपनी-अपनी तरफ से तबाही की कोशिशें क्यों न करते रहें।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 13-May-2018
  • जो लोग राजनीति में किसी के भविष्य को लेकर ऐसी भविष्यवाणी करते हैं कि वे आसमान पर पहुंच जाएंगे, या मिट्टी में मिल जाएंगे, उनके समझदार होने के लिए बहुत सी मिसालें सामने आती हैं, और लोगों को उनको देखकर अपनी अटकलबाजी पर थोड़ा सा काबू भी लगाना चाहिए। अभी पिछले चार दिनों से दुनिया मेें एक ऐसी चर्चा शुरू हुई है जिसे पखवाड़े भर पहले अगर किसी ने छेड़ा होता, तो उसे बावला कहा जाता। आज उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर जिस तरह की रोक लग रही है और अमरीका के साथ उत्तर कोरिया के शासक की अगले हफ्ते जो बातचीत होने जा रही है, उसे लेकर दुनिया हक्का-बक्का हैं। अभी कुछ हफ्ते पहले की ही बात थी जब ऐसा लग रहा था कि तीसरा विश्व युद्ध शुरू होने वाला है, और अब हाल यह है कि उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम बंद करने की घोषणा हो चुकी है, और ट्रंप और किम सिंगापुर में बातचीत करने वाले हैं, सारा तनाव खत्म होता दिख रहा है, और यह चर्चा शुरू हुई है कि क्या उत्तर कोरिया का परमाणु खतरा दुनिया पर से हटाने में कामयाब होने पर ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार भी दिया जा सकता है, या दिया जाना चाहिए? ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार, अभी कुछ ही हफ्ते पहले तक जिसे अमरीका का तानाशाह सा माना जाता था, आज एक कामयाबी उसे कहीं से कहीं पहुंचा दे रही है। 
    लोगों को याद होगा कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद उस वक्त के वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को तुरंत हटाने की बात हो रही थी, वह बात धरी रह गई, और मोदी जनता के बीच से लगातार चुनाव जीतकर गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे। जब पूरी दुनिया ने उनको अछूत मानकर वीजा देने से मना कर दिया था, तो वे आगे बढ़ते-बढ़ते दुनिया की एक ऐसी कुर्सी पर पहुंचे कि उन्हें अब दुनिया के किसी देश जाने के लिए वीजा की जरूरत भी नहीं रही, और अब वे देशों के न्यौते पर उनके मेहमान होकर वहां जाते हैं। दुनिया में कौन ऐसी कल्पना भी कर सकते थे, लेकिन ऐसा हुआ। भाजपा के भीतर जो बड़े-बड़े नेता थे, वे मोदी की शोहरत और कामयाबी की सुनामी में बहकर हाशिए पर ऐसे पहुंचे कि वे पार्टी के सालाना जलसों के गुलदस्ते होकर रह गए हैं, और अब कोई उनका नामलेवा भी नहीं है। 
    इस बात की चर्चा इसलिए जरूरी लग रही है कि जब-जब कोई चुनाव सामने आते हैं, किसी देश या प्रदेश में लोग किसी पार्टी या उम्मीदवार के लिए अंधाधुंध भविष्यवाणियां करने लगते हैं, इतने विशेषण इस्तेमाल होते हैं कि अगर बात ठीक से दर्ज रहे, तो राजनीतिक विश्लेषकों को बाद में मुंह दिखाने में भी थोड़ी सी दिक्कत हो। यह बात महज राजनीति के लिए नहीं है, कारोबार के लिए भी है। आज ही एक खबर है कि मुंबई में रिलायंस उद्योग समूह की अनिल अंबानी वाली कंपनी अपने घाटे को पूरा करने के लिए अपने मुख्यालय को खाली करके दूसरे सस्ते इलाके में जा रही है, और मुख्यालय की इमारत छोड़कर अनिल अंबानी भी दूसरी जगह बैठने जा रहे हैं। एक वक्त था जब हिन्दुस्तान में टाटा-बिड़ला के बाद सिर्फ अंबानी का नाम रहता था, और अब अंबानियों में एक आसमान पर है, और एक जमीन पर। इसलिए लोगों को अपने निष्कर्ष निकालते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि बहुत सी बातें कल्पना से परे की भी होती हैं, ऐसी स्थितियां आ जाती हैं जिनके बारे में किसी ने देखा-सुना न हो। जिंदगी के हालात हमेशा काबू में नहीं रहते, और लोगों को भविष्यवाणी करते हुए किसी नतीजे पर ऐसे छलांग नहीं लगाना चाहिए जैसे कि किसी मेंढक ने लगाई हो। लोगों को अचानक कूदकर किसी जगह पहुंचने की खूबी मेंढक पर छोड़ देनी चाहिए, और अपने नतीजों में हमेशा ही संभावना और आशंका की गुंजाइश बाकी रखनी चाहिए। आज दुनिया के बड़े नेताओं में सबसे अधिक सनकी, और बदचलन, और घटिया इंसान दिख रहा डोनाल्ड ट्रंप नोबल शांति पुरस्कार का हकदार भी समझा जा रहा है, और इससे अधिक हैरान करने वाला फेरबदल कुछ हफ्तों के भीतर और क्या हो सकता था? अनुपम खेर का एक टीवी कार्यक्रम याद पड़ता है जिसमें वे बार-बार कहते हैं कि कुछ भी हो सकता है।
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 12-May-2018
  • इधर कर्नाटक में चुनाव प्रचार खत्म हुआ, और उधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस तरह नेपाल पहुंचे कि मानो वे भारत में ही हैं, और कर्नाटक में चुनावी जीत के लिए प्रार्थना करने एक के बाद दूसरे मंदिर जा रहे हैं, कहीं ढोल बजा रहे हैं, कहीं झांझ बजा रहे हैं। और कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठाया, लेकिन लोकतंत्र का यह लचीलापन ही उसकी खूबी है कि नियम-कायदों के बीच किस तरह फायदा उठाया जा सकता है। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के अकेले हिन्दू राष्ट्र रहे नेपाल में जाकर जो कुछ कर रहे हैं, वह चुनाव आयोग के नियम-कायदे से परे की बात है। अब यह तो भारतीय मीडिया की मजबूरी है कि मोदी दूसरे देशों में जो करें, उसे भारत में दिखाएं, क्योंकि मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो हिन्दुस्तानी निजी मीडिया को अपने साथ विदेश नहीं ले जाते। पहले के तमाम प्रधानमंत्री अपने विमान में चुनिंदा पत्रकारों को ले जाते थे, लेकिन उससे भी उन्हें उतना कवरेज नहीं मिलता था जितना मोदी को बिना किसी को ले जाए मिलता है। इसलिए अगर कर्नाटक चुनाव पर मोदी के नेपाल प्रवास का कोई असर पडऩा है, तो उसमें वे क्या कर सकते हैं? हम तो महज यही कह सकते हैं कि मोदी इतने चतुर हैं कि उन्होंने कर्नाटक प्रचार खत्म होने के बाद और मतदान चलने तक ऐसा देश चुना जो कि कर्नाटक के हिन्दू मतदाताओं को सुहाए। 
    भारतीय लोकतंत्र में चुनावी फायदा पाने का यही एक तरीका नहीं है, ऐसे और भी बहुत से दूसरे तरीके हैं जो कि चुनाव प्रचार न लगते हुए भी मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। 2014 के चुनाव में जब नरेन्द्र मोदी एक ऐतिहासिक बहुमत के साथ जीतकर आए थे, उसके ठीक पहले के महीनों को अगर देखें तो कम से कम हिन्दी मनोरंजन-टीवी पर कई ऐसे सीरियल चल रहे थे जो कि भारत की पुरानी ऐतिहासिक कहानियों की कल्पना पर गढ़े गए थे, और जो मुगलों या मुस्लिमों की ज्यादतियां बताते थे, या कि जो हिन्दू-इतिहास की गौरवगाथा बताते थे। हम इसे कोई अनायास जुट गया संयोग नहीं मानते, और बाजार-कारोबार जिस तरह से मोदी के साथ था, तो उसमें कोई हैरानी नहीं है कि अदानी-अंबानी जैसे बड़े घरानों से जुड़े चैनलों या टीवी निर्माताओं के साथ मिलकर ऐसी कोई योजना बनाई गई हो। लेकिन लोकतंत्र में इन तमाम बातों की छूट है, और जो पार्टी आधी सदी से ज्यादा इस देश पर राज कर चुकी है, उस कांग्रेस पार्टी में अगर इतनी समझबूझ और इतनी चतुराई नहीं है, तो यह उसका दीवालियापन है। 
    हमने कांग्रेस के इतिहास में आपातकाल को देखा हुआ है कि उस दौर में मीडिया और  फिल्मों को इस्तेमाल करके जनमत को किस तरह प्रभावित करने की कोशिश की गई थी। किस तरह किस्सा कुर्सी का नाम की फिल्म को जलाया गया था, बर्बाद किया गया था, और वे सारी सरकारी-कांग्रेसी साजिशें बाद के जांच आयोग में सामने भी आईं थीं। इसलिए भारतीय चुनावी लोकतंत्र को चतुराई या धूर्तता से परे का कोई पवित्र सामान मान लेना ठीक नहीं है, यह लोकतंत्र सभी किस्म के प्रभावों की गुंजाइश रखकर ही चलता है। अब मोदी ने नेपाल के मंदिरों का कार्यक्रम रातों-रात तो बना नहीं लिया, कई दिनों पहले से यह तय किया गया होगा, और नेपाल की सीता और भारत के राम की कहानी का अगर कर्नाटक चुनाव के वक्त इस्तेमाल करने की समझ किसी प्रधानमंत्री में हैं तो फिर वह प्रधानमंत्री उसका चुनावी फायदा पाने का हकदारभी है। कांग्रेस को इस मुद्दे पर रोना-पीटना छोड़कर अपने दिमाग का बेहतर इस्तेमाल करना सीखना चाहिए। 
    - सुनील कुमार 

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