संपादकीय

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Posted Date : 25-Apr-2019
  • फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार ने दो दिन पहले जब ट्विटर पर लिखा कि वे एक नए रोल में सामने आने वाले हैं, तो लोगों ने आनन-फानन उनके भाजपा में शामिल होने, और चुनाव लडऩे की अटकल लगा ली। पिछले बरसों में अक्षय ने लगातार जिस तरह मोदी के उठाए हुए शौचालय जैसे मुद्दों से लेकर राष्ट्रवाद में फिट बैठने वाले मुद्दों तक पर बड़ी फिल्मों में काम किया, और अपनी एक ऐसी छवि बनाई जो कि भाजपा और राष्ट्रवाद के अनुकूल है, तो उनके ट्वीट से ऐसी अटकल स्वाभाविक ही थी। लेकिन हुआ कुछ और। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक ऐसा वीडियो इंटरव्यू लिया जो कि एक हिसाब से पूरी तरह गैरराजनीतिक था, मोदी की निजी जिंदगी, निजी पसंद-नापसंद के अनछुए मुद्दों को उघाडऩे वाला था, लेकिन साथ-साथ यह मोदी के भविष्य के सबसे नाजुक और महत्वपूर्ण राजनीतिक मौके पर लिया गया एक ऐसा इंटरव्यू था जो कि चुनाव प्रचार के उफान के बीच मानो लहरों पर सर्फिंग करता हुआ आया, और तमाम चैनलों और अखबारों पर छा गया। मोदी की छोटी-छोटी गैरराजनीतिक बातें लोककथाओं की तरह चर्चा में आईं, और फिर भक्तों की एक फौज ने उसके हिस्सों को बाकी देश तक फैला दिया। न तो अक्षय कुमार पत्रकार होने का दावा करते, न ही यह इंटरव्यू पत्रकारिता है, इसलिए यह महज प्रचार का एक ऐसा नमूना है जिसकी संभावना बाकी नेताओं और पार्टियों के सामने भी बनी हुई थी। यह अलग बात है कि मोदी ने जो जवाब दिए हैं, उनका सच-झूठ तलाशते हुए इस बार का यह चुनाव तो निपट ही जाएगा। 

    अब भारतीय लोकतंत्र की सीमाओं और संभावनाओं को देखें, तो इस इंटरव्यू में नाजायज क्या है? न तो अक्षय कुमार कोई पत्रकार हैं कि उन्होंने तीखे और पैने सवाल क्यों नहीं किए? न ही चुनाव के बीच ऐसे किसी इंटरव्यू पर कोई रोक है, और न ही बीते बरसों में अक्षय कुमार की शौचालय से लेकर सेना और जंग तक की छवि बनाने में कोई बात गलत है। दरअसल मोदी-शाह की अगुवाई में भाजपा ने अपने आपको छवि बनाने, ब्रांडिंग करने, प्रचार करने, मार्केटिंग करने की एक ऐसी शानदार मशीन बना लिया है कि देश की बाकी तमाम विपक्षी पार्टियां उस तरह से सोच भी नहीं पा रही हैं जब तक भाजपा असर डालकर आगे बढ़ चुकी होती है। भारतीय लोकतंत्र ऐसा लचीला है कि वह ऐसी तमाम कोशिशों को छूट देता है, यह एक अलग बात है कि चुनाव के दौरान मोदी और भाजपा इतने किस्म की नाजायज कोशिशों में लगे हुए हैं, और इन पर चुनाव आयोग को शिकायतें की गई हैं, और इन पर चुनाव आयोग मोटेतौर पर अनदेखी दिखा रहा है। एक पुरानी, और अलोकतांत्रिक कहावत है कि मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज होता है। इसी पर अमल करते हुए भारतीय चुनावों में भी सब कुछ जायज की तर्ज पर चुनाव प्रचार होता है, और भाजपा ने पिछले बरसों में टीवी सीरियलों से लेकर फिल्मों तक, मोदी के नाम पर शुरू किए गए नमो टीवी चैनल तक, और इस किस्म के कहने को गैरराजनीतिक, लेकिन राजनीतिक-चुनावी अग्निपरीक्षा के बीच ऐसे इंटरव्यू तक, भाजपा ने हर औजार-हथियार का गजब का इस्तेमाल किया है। हम पांच बरस पहले के चुनाव के ठीक पहले के ऐसे टीवी सीरियलों की बात उस वक्त भी उठा चुके हैं जो कि चुनावी वक्त पर हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी धर्म के लोगों की ज्यादती की कहानी पर बनाए गए थे। और उनका प्रसारण पूरा होने का वक्त अनायास ही चुनाव के ठीक पहले का नहीं था। कहने के लिए कांग्रेस पार्टी की लीडरशिप भाजपा की लीडरशिप से एक पीढ़ी छोटी दिखती है, अधिक नौजवान दिखती है, लेकिन राजनीति के बाजारूकरण की तरकीबों और तकनीकों में वह मोदी-शाह के मुकाबले कहीं नहीं टिकती है। 

    जिस अंदाज में भारत के राजनीतिक दलों ने घोषित और अघोषित चंदा इकट्ठा किया है, जिस अंदाज में विदेशी और देशी प्रचार-विशेषज्ञों का इस्तेमाल किया है, जिस तरह चुनाव के मौके पर हर नाजुक मुद्दे को दुहा है, वह गजब का है, और ऐसा लगता है कि राजनीतिक खूबी और खामी से परे चुनावी जीत एक ऐसे मैनेजमेंट का खेल हो गया है जिसमें बाकी पार्टियां भाजपा को छू भी नहीं पा रही हैं। अब ऐसे में चुनावी नतीजे चाहे जो हों, वे भाजपा की तकनीक और तरकीब से बहुत हद तक प्रभावित रहेंगे यह तय है। अब भारतीय लोकतंत्र महज खरे और खोटे, अच्छे और बुरे, काबिल और नाकाबिल के बीच का चुनाव, असली और नकली मुद्दों के बीच का चुनाव नहीं रह गया है। यह चुनाव तो आधे से अधिक गुजर चुका है, और कुछ हफ्तों में नई सरकार का फैसला सामने आ जाएगा। लेकिन उसके बाद भी ऐसे कई चुनाव आगे आएंगे जिनमें इन तकनीकों और तरकीबों का दखल रहेगा ही रहेगा, और बढ़ता भी चलेगा।
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 24-Apr-2019
  • भाजपा सांसद, और देश के एक चर्चित दलित नेता, उदित राज आज सुबह कांग्रेस में शामिल हो गए। वे जेएनयू से पढ़े हुए, और आईआरएस अफसर रहे हुए हैं, और 2003 में सरकारी नौकरी छोड़कर इंडियन जस्टिस पार्टी बना चुके हैं। 2014 में वे भाजपा में शामिल हुए थे, और लोकसभा चुनाव में भाजपा टिकट मिलने पर उन्होंने घोषणा की थी कि दलितों का भाजपा में बेहतर भविष्य है। अब पिछले कुछ दिनों से भाजपा उन्हें इस चुनाव दुबारा टिकट देते नहीं दिख रही थी, और उन्होंने कल लिखा था कि मेरे टिकट की घोषणा में देर होने से पूरे देश में मेरे दलित समर्थकों में रोष है, और जब मेरी बात पार्टी नहीं सुन रही, तो आम दलित कैसे इंसाफ पाएगा। उन्होंने यह भी लिखा था कि मैं टिकट की राह देख रहा हूं जो न मिली तो मैं भाजपा को अलविदा कह दूंगा। और हुआ वही। उनकी सीट से दूसरे को टिकट दे दी गई और आज सुबह वे कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके साथ-साथ यह चर्चा भी शुरू हो गई कि कांग्रेस उन्हें उत्तरप्रदेश से उम्मीदवार बना सकती है। आज देश में लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं, मतदान के कई दौर हो चुके हैं, कुछ दौर बाकी हैं, और आधी लोकसभा सीटों पर वोट डलने के बाद बाकी सीटों पर कहीं-कहीं नामांकन बाकी है, और उन्हीं सीटों को लेकर यह आखिरी वक्त तक का दल-बदल चल रहा है। 

    भारत में एक दिक्कत यह भी है कि दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, या और किसी धर्म या जाति के नेता अपने आपको मिलने वाले महत्व को अपने समुदाय को महत्व मिलने के बराबर बताने लगते हैं, या अपने हाशिए पर चले जाने को समुदाय को हाशिए पर धकेल दिया जाना बताते हैं। ऐसे लोग अपने समुदाय के ऐसे ठेकेदार रहते हैं जो कि समुदाय की प्रतिबद्धता को, समुदाय के समर्थन को ऐसे फाइनांसर के हाथों आनन-फानन बेच देते हैं जो उन्हें चुनाव में एक टिकट, या मंत्री का एक ओहदा, या संगठन में कोई बड़ा पद दे देते हैं। उनके लिए उनका निजी भला ऐसा होता है जिसे कि वे समुदाय को अपना भला मान लेने को कहते हैं, और हो सकता है कि उनका समुदाय किसी आस्था या झांसे के चलते ऐसा मान भी लेता हो। ऐसे लोग अपने समुदाय की गिनती, और उसके वोटों को अपने मालिकाना हक के रेवड़ की भेड़ों की तरह गिनवाने लगते हैं, और मंडी में खड़े-खड़े उन भेड़ों की बोली भी लगवा देते हैं। ऐसा महज एक दलित नेता के बारे में नहीं लिखा जा रहा है, ऐसा दूसरी जातियों, दूसरे धर्मों के लोगों के साथ भी होता है, और वे ऊपर खरीददार को अपने एक विशाल जनाधार होने का झांसा देते रहते हैं, और नीचे बिकने को तैयार की गई भीड़ को अपने पीछे चलने को ही उद्धार का झांसा भी देते हैं। 

    यह रूख, दोनों तरफ का यह रूख देश भर में जगह-जगह देखने मिलता है, और इसीलिए भारतीय राजनीति में बहुत से धर्मों की गद्दियां सम्हाले हुए लोगों को सरकारी और संवैधानिक कुर्सियां नसीब होती हैं, और जनता को लूटकर कमाने का मौका भी दिया जाता है। अगर हिन्दुस्तान के दलितों की बुनियादी दिक्कतें ऐसी हैं कि जिनका सबसे बड़ा समाधान बीती शाम तक भाजपा के हाथ में था, और आज सुबह कोई ऐसा ईश्वरीय चमत्कार हो गया कि वह समाधान कांग्रेस के हाथ आ गया, तब तो उदित राज का फैसला जायज माना जा सकता है। वरना तो यह बात साफ है कि बाकी दूसरे बहुत से नेताओं की तरह, धार्मिक और सामाजिक मुखियाओं की तरह उदित राज भी अपने निजी नफे-नुकसान के लिए उनके समर्थक बताए जा रहे समुदाय के हितों को कभी इस हाथ बेच रहे हैं, तो कभी उस हाथ। अपने करीब के छत्तीसगढ़ में भी हमने बीती आधी सदी में ऐसे बहुत से नेताओं को देखा है जो अपनी जाति के ठेकेदार की तरह बर्ताव करते हैं, अपने धर्म के ठेकेदार की तरह बर्ताव करते हैं। 

    बात महज उदित राज और उनके आज कांग्रेस में शामिल होने की नहीं है। हो सकता है कि शाम तक कांग्रेस का कोई नेता भाजपा में शामिल हो जाए, इस झांसे के साथ कि उसके साथ, उसके पीछे उसका पूरा समुदाय खड़ा है। हम पिछले महीनों में कई बार यह बात लिख चुके हैं कि चुनाव के वक्त दल-बदल का यह धंधा खत्म करने के लिए चुनाव सुधार में एक ऐसे फेरबदल की जरूरत है जो कि नामांकन के छह महीने पहले, या एक साल पहले से दल-बदल पर ऐसी रोक लगाए कि नई पार्टी की ओर से दलबदलू को उम्मीदवार न बनाया जा सके। यह एक बहुत बुनियादी और मामूली फेरबदल होगा लेकिन इससे सौदेबाजी और दलबदल की गंदगी खत्म हो जाएगी। लोगों को भी यह समझ आएगा कि वे रातोंरात अपनी निष्ठा बदलकर नीचता नहीं कर सकते। ये दोनों शब्द उच्चारण में बड़े आसपास के हैं, और इन दोनों शब्दों को किसी भी धर्म या जाति से परे सभी के लिए लागू करके देखने की जरूरत है क्योंकि लोकतंत्र अगर दलबदल की इजाजत देता है, तो संसदीय परंपराएं राजनीतिक खरीद-बिक्री, मोलभाव, और ब्लैकमेलिंग के खिलाफ मजबूत भी होना जरूरी है। 
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 23-Apr-2019
  • सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ उनकी एक भूतपूर्व अस्थाई कर्मचारी द्वारा लगाए गए सेक्स-शोषण के आरोप की बात आगे बढ़ती चली जा रही है। इस पर हमने दो दिन पहले  विरोध किया था कि मुख्य न्यायाधीश को कोई हक नहीं था कि वे अपने पर लगे ऐसे आरोप के खिलाफ खुद अपनी अदालत में सुनवाई करें, और सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार से अपनी बेकसूरी का बयान जारी करवाएं, और शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ जवाबी आरोप लगाएं। खैर, इस बारे में हम काफी खुलासे से लिख चुके हैं, और आज चूंकि कुछ नए मुद्दे हैं, इसलिए दो दिन पहले की बातों को यहां दुहराना मुमकिन नहीं है। इस आरोप के बाद सुप्रीम कोर्ट बार ऐसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश का साथ देते हुए उन्हीं की जुबान में इसे एक साजिश करार दिया था। मुख्य न्यायाधीश का मानना है कि यह न्यायपालिका को अस्थिर करने की एक साजिश है। फिर अचानक एक ऐसे वकील का हलफनामा आता है जो कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी एक साजिश को बयां करते हुए बताता है कि दाऊद इब्राहीम से लेकर हिंदुस्तान के एक बहुत बड़े कारोबारी तक ऐसी साजिश में शामिल हैं, और यह बात उसे एक ऐसे आदमी ने बताई है जो कि मुख्य न्यायाधीश को इस्तीफे के लिए मजबूर करने के एवज में डेढ़ करोड़ रुपये का प्रस्ताव लेकर आया था।

    यह पूरा सिलसिला बहुत भयानक रूप से नाटकीय हो चला है। मुख्य न्यायाधीश और उनकी बेंच में बैठे दो दूसरे जजों ने अब तक महिला की सेक्स-शोषण की शिकायत को किसी जांच कमेटी को नहीं भेजा है जो कि एक अनिवार्य जरूरत है। कानून के इस प्रावधान को किनारे रखकर सुप्रीम कोर्ट की यह बेंच मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में उस वकील से पूछताछ कर रही है जिसने यह सनसनीखेज आरोप लगाया है। ऐसे आरोप के सच्चे या झूठे होने के बारे में हम कोई अटकल लगाना नहीं चाहते क्योंकि दुनिया का कारोबार ऐसी कई साजिशों से भरा रहता है। दुनिया में मर्जी के फैसलों के लिए जजों को खरीदा भी जाता है, और उन्हें धमकाया भी जाता है। उन्हें ब्लैकमेल भी किया जाता है, और उन्हें लालच देकर मर्जी के फैसले लिए भी जाते हैं। इसलिए किसी भी किस्म के आरोप पर हम अपना दिमाग तय करना नहीं चाहते हैं, सिवाय इसके कि जब एक महिला ने ऐसा हलफनामा दिया है, तो उसकी शिकायत पर कानून के मुताबिक तुरंत जांच होनी चाहिए, और इस काम में इसलिए देर करना नाजायज होगा कि शिकायत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ है, जिनके खाते में महज सात लाख रुपये से कम हैं, जिनके साथ उस महिला ने बहुत कम काम किया था, या जिसके परिवार के ऊपर कई तरह के आरोप लगे हुए हैं, या कि मामले दर्ज हैं। हमारे हिसाब से मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले में न सिर्फ अनैतिक और कानून के खिलाफ शुरूआत की है, बल्कि उन्होंने अदालत और जजों से पारदर्शिता की जो उम्मीद की जाती है, उसे भी कुचलकर रख दिया है। हो सकता है कि वे किसी साजिश के शिकार हों, लेकिन ऐसी आशंका उनको सेक्स-शोषण के बुनियादी आरोप से कोई बचाव नहीं देती है।
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 22-Apr-2019
  • हिन्दुस्तान में प्रचलित जुबान में बहुत से शब्द लोगों को हक और जिम्मेदारी का एहसास नहीं करने देते। कानून जिन्हें पब्लिक सर्वेंट कहता है, उनको सरकार की हिन्दी भाषा अधिकारी कहती है। नतीजा यह होता है कि सरकारी अफसरों के सिरों पर सारे वक्त उनके अधिकार चढ़े रहते हैं, और उनकी जिम्मेदारियां, यानी जनता के अधिकार, अफसरों के बूटों तले रहते हैं। कुछ ऐसा ही हाल वोट डालने की जिम्मेदारी का है। लोकतंत्र में अच्छी सरकार चाहने वाले लोगों के लिए वोट डालना एक जवाबदेही और जिम्मेदारी होनी चाहिए। लेकिन वोट के लिए हिन्दी में मतदान शब्द का इस्तेमाल होता है, जिसका मतलब भी दान करना होता है। इसलिए दान, जो कि मर्जी से किया जा सकता है, और नहीं भी किया जा सकता है, वही हिन्दुस्तानी सोच पर हावी हो गया है। हालत यह है कि मतदान को अनिवार्य करने की बात करनी पड़ रही है क्योंकि वोट डालने के बजाय लोग घर बैठे रहते हैं, और आमतौर पर जीतने वाले उम्मीदवार के वोट भी, घर बैठे वोटरों की गिनती से कम रहते हैं। यानी जितने वोट पाकर कोई सांसद या विधायक बन जाते हैं, उससे अधिक वोट डलते ही नहीं। नतीजा यह होता है कि नालायक वोटरों के निकम्मेपन से हो सकता है कि एक नालायक जीत जाए, और काबिल उम्मीदवार हार जाए। 

    लोगों को याद होगा कि एक वक्त भारत में समाजवादी सोच के सबसे बड़े नेता राममनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। उनका यह कहना शायद इस सिलसिले में था कि संसद या विधानसभा अपना कार्यकाल पूरा करने के पहले दुबारा चुनाव में जाने की नौबत कई बार झेलती हैं, और लोग इसे चुनाव की मेहनत की बर्बादी मानते हैं। लोहिया का कहना था कि जरूरत पडऩे पर आ खड़े हुए ऐसे चुनाव में नुकसान नहीं है, क्योंकि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं कर सकतीं। लेकिन हिन्दुस्तान में वोट न डालने वाले एक तिहाई से अधिक वोटरों को क्या कहा जाए? इनको जिंदा गिना जाए, या मुर्दा कहा जाए? सोचने-समझने और महसूस करने वाली कौमें तो ऐसी होती हैं जो कि दो चुनावों के बीच भी बेसब्र हो जाती हैं, और ऐसी ही बेसब्री के लिए भारतीय लोकतंत्र में एक अधिकार जोडऩे की बात हो रही है, मांग हो रही है, चुने हुए प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने की। तो एक तरफ इस देश में राईट-टू-रीकॉल की चर्चा होती है, दूसरी तरफ हाथ में टीवी का रिमोट कंट्रोल लिए मौजूदा राईट (अधिकार) पर सोते हुए एक तिहाई से अधिक हिन्दुस्तानी वोटर हैं। 

    दरअसल दिक्कत जुबान की भी है। मतदान, रक्तदान, नेत्रदान, देहदान, जैसी बहुत सी सामाजिक जवाबदेही, और इंसानी जिम्मेदारी को एक दान का दर्जा देकर लोगों को इनकी तरफ से बेफिक्र कर दिया गया है। लोग अपने मरने के बाद अपने देह को, और मरने के पहले अपने खून को, इस तरह अपनी दौलत मान लेते हैं, मानो वे उन्हें कुदरत से खरीदकर लाए हों। कुदरत से मुफ्त में मिली देह को भी कुदरत की दुनियादारी में दुबारा लौटाने की सोच हिन्दुस्तान में नहीं है। इसी दुनिया से कमाई गई दौलत को भी समाजसेवा में लौटा देने की सोच हिन्दुस्तान में बहुत कम लोगों में है। 

    खैर, आज हम यहां पर बहुत दार्शनिक अंदाज में इस बात को बिखराना नहीं चाहते, और मुद्दे की बात पर आना चाहते हैं। जो लोग मतदान की जिम्मेदारी को दान करने का अधिकार मानते हैं, वे लोग सबसे खराब सरकार के हकदार खुद भी होते हैं, और अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए वे अपनी दौलत तो विरासत में छोड़ जाते हैं, घर-मकान तो बच्चों के नाम कर जाते हैं, लेकिन साथ-साथ एक घटिया लोकतंत्र  की गारंटी भी अपनी अगली पीढिय़ों के नाम कर जाते हैं। वोट का दान न करना लोकतंत्र की इमारत में, चौखटों और बाकी लकडिय़ों में दीमक छोड़कर जाने जैसा है। ताजा भारतीय इतिहास में ऐसी अनगिनत दीमकें देश को खोखला करते सामने आ चुकी हैं। क्या हिन्दुस्तानी वोटर अपने बच्चों के लिए ऐसे मकान वसीयत में छोड़कर जाना चाहते हैं, जिसमें हर तरफ दीमक लगी हो? 

    आज यह मौका है कि पांच बरस में एक बार दीमकों का इलाज, वोटरों के हाथ है। आज भी जो अपने वारिसों को एक दीमकमुक्त मकान नहीं देंगे, वे मरने के बाद, ऊपर, स्वर्ग या नर्क में जहां कहीं भी, बैठे हुए अपनी पीढिय़ों को एक खोखले लोकतंत्र में तकलीफ पाते देखने की तकलीफ पाते रहेंगे। इसलिए लोगों को आज जिंदा रहने का, जिंदा होने का एक सुबूत देना होगा, और लाख-लाख वोट वाले चुनाव क्षेत्र में सौ-सौ वोटों के लिए साजिशें करने वाले लोगों को सबक सिखाने के लिए सामने आना होगा। यह नौबत वोट का हक रखने वालों के लिए शर्मनाक है, शर्मिंदगी की है कि उनके हाथ दीमक खत्म करने की दवा है, और दीमक है कि वह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को हमेशा के लिए खोखली करती चल रही है। यह मतदान का अधिकार नहीं है, वोट देने की जिम्मेदारी है। और दुनिया में कोई भी अधिकार बिना जिम्मेदारी के नहीं आते। इसलिए हर वोटर को हर चुनाव में दीमक मारने निकलना चाहिए, जरा सा वक्त निकालना चाहिए, वरना कब इमारत खोखली होकर उन पर गिर पड़ेगी, इसका कोई ठिकाना नहीं है।  
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 21-Apr-2019
  • सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर देह शोषण का आरोप हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बार लगा है। अमूमन यह माना जाता है कि रात-दिन इंसाफ की बात सोचने वाले, बड़े-बड़े मामलों से लदे रहने वाले, और बेइंसाफी के खतरों को अच्छी तरह समझने वाले बड़े जजों का चाल-चलन काबू में रहता होगा, लेकिन कल जो आरोप लगे हैं, वे उसके ठीक खिलाफ हैं। जैसा कि सड़क पर चलता कोई आम बलात्कारी भी उस पर लगे आरोपों को गलत बताता ही है, जिस तरह तमाम नेता बलात्कार या छेडख़ानी के आरोपों को गलत बताते ही हैं, उसी तरह सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस रंजन गोगोई ने इन आरोपों को खारिज किया है। जब शिकायतकर्ता महिला ने इस आरोप के साथ लंबा-चौड़ा खुलासा करते हुए हलफनामा या शिकायत सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को भेजी, तो ऐसी उम्मीद की जाती थी कि जस्टिस गोगोई अपने आपको इस शिकायत की जांच के लिए पेश कर देंगे, और अपने आपको इस जांच से अलग रखेंगे। लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा। उन्होंने खुद होकर इस मामले की सुनवाई शुरू की, खुद बेंच में बैठे, जज की कुर्सी पर बैठकर उन्होंने न सिर्फ आरोपों को झूठा बताया, बल्कि अदालत की इस कार्रवाई में उन्होंने रिकॉर्ड पर यह बात कही कि यह सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ एक साजिश है, उसे अस्थिर करने की कोशिश है, उसकी विश्वसनीयता खत्म करने की कोशिश है, और ऐसा इसलिए किया जा रहा हो सकता है कि अगले हफ्ते वे कुछ ऐसे बड़े मामलों की सुनवाई करने वाले हैं जिनको लोग रोकना चाहते हैं। कुल मिलाकर उन्होंने शिकायतकर्ता महिला को झूठा करार देने के साथ-साथ उसकी एक साजिश में हिस्सेदारी की बात भी कही, उस महिला की साख के खिलाफ बातें कहीं, और अपने पर हुए इस हमले को उन्होंने पूरे सुप्रीम कोर्ट पर हमला करार दिया। 

    हिन्दुस्तान में किसी भी संस्था में जब कोई महिला देह शोषण की शिकायत करती है, तो उसकी जांच की एक प्रक्रिया बनी हुई है। और उसे सरकार ने तय नहीं किया है, खुद सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है। इस प्रक्रिया के तहत ही मुख्य न्यायाधीश को उन पर लगा यह गंभीर आरोप सुप्रीम कोर्ट की एक जांच कमेटी को भेज देना था, और अपने आपको किसी भी जांच, किसी भी कार्रवाई से परे कर लेना था। चूंकि मुख्य न्यायाधीश से ऊपर सुप्रीम कोर्ट में कुछ नहीं होता, इसलिए उनको इस मामले पर कुछ कहने से भी बचना था क्योंकि उनका कहा हुआ कुछ भी जांच करने वाले संभावित जजों को प्रभावित करने से कम और कुछ नहीं माना जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार से इन आरोपों पर एक सूचना जारी करवाई जिसमें इस असाधारण सुनवाई की बात तो थी ही, उस महिला की शिकायत को पूरी तरह खारिज भी उसमें किया गया था, और हमारे हिसाब से सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार के अधिकार, और उसकी जिम्मेदारियों में ऐसे आरोपों के किसी तरह के खंडन की बात नहीं आती है, और सुप्रीम कोर्ट संस्था का ऐसा इस्तेमाल एक पूरी तरह बेजा इस्तेमाल था। 

    मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कल इस मामले में जो कुछ किया है, वह पूरी तरह अवांछित और नाजायज दोनों ही हैं, पूरी तरह न्याय के खिलाफ है, जांच प्रक्रिया के खिलाफ है, और देश के मुख्य न्यायाधीश के एक बेजा घमंड का सुबूत भी है कि वे जज की कुर्सी पर बैठकर शिकायतकर्ता महिला के चाल-चलन पर तोहमत लगा सकते हैं, और अपने आपको पाक साफ होने का सर्टिफिकेट दे सकते हैं। उनकी यह बात भी निहायत बोगस है कि उनके खाते में महज कुछ लाख रूपए हैं, जिससे अधिक तो सुप्रीम कोर्ट के चपरासी के खाते में होंगे। इस बात को सेक्स-शोषण के खिलाफ एक ढाल की तरह इस्तेमाल करना एक परले दर्जे का घटिया तर्क है क्योंकि जिनके खातों में 6 लाख से कम रूपए हों, क्या वे सेक्स-शोषण नहीं कर सकते? या जिनके खातों में करोड़ों हैं, क्या महज वे ही सेक्स-शोषण करते हैं? 

    जस्टिस रंजन गोगोई का विचलित होना तो जायज है, क्योंकि वे गुनहगार हों, तो भी उन्हें एक यह भरोसा तो रहा ही होगा कि उनके खिलाफ भला कौन शिकायत की हिम्मत कर सकते हैं? और अगर वे बेगुनाह हों, तो भी वे विचलित तो हुए ही होंगे। लेकिन इन आरोपों के सामने आने के बाद उनका आचरण सुप्रीम कोर्ट का मुखिया बने रहने के लायक नहीं है, और उनको अपने आपको तुरंत ही इस पद से अलग कर लेना चाहिए। अभी हम उनके इस्तीफे की बात नहीं करते क्योंकि उन पर लगे आरोपों की जांच होना अभी बाकी है, लेकिन इस महिला की शिकायत में पुलिस की असाधारण सक्रियता की बहुत सी बातें लिखी गई हैं जो कि जज के महिला पर हमले के बाद उस महिला के परिवार के साथ हुई हैं। वे तमाम बातें जांची-परखी जा सकती हैं, और चूंकि देश के सबसे बड़े जज पर यह सबसे बुरा आरोप लगा है, इसलिए इस शिकायत के एक-एक शब्द को अग्निपरीक्षा से गुजारना चाहिए, पुलिस सक्रियता और पुलिस कार्रवाई की जांच करनी चाहिए कि उन्होंने किस प्रभाव में इस महिला के कुनबे को इतना परेशान किया, अगर किया तो। 

    यह एक ऐसा मामला है जो देश की अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर तोहमत लगा रहा है, उसे शक के घेरे में ला रहा है, ऐसे में इसे एक मिसाल बनाकर ऐसी बारीक जांच करनी चाहिए कि देश की बाकी न्यायपालिका, देश की बाकी संवैधानिक संस्थाओं, सरकारों, सभी पर काबिज लोगों को एक सबक मिले। यह शिकायत अगर बारीकी से देखी जाए तो यह महज एक जज के बयान और उसके खिलाफ एक महिला के बयान तक सीमित नहीं है। उस महिला ने अपने परिवार के साथ पुलिस और सरकारी ज्यादती के जितने मामले गिनाए हैं, उनकी जांच से भी हकीकत सामने आ सकती है, और लानी ही चाहिए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने अपने खुद पर लगे आरोपों को लेकर जो रूख दिखाया है, वह न तो न्यायसंगत है, न ही तर्कसंगत। आखिर में हक्का-बक्का करने वाली एक बात का जिक्र जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट के जज जो कि बहुत से लिखे गए फैसलों में भी एक-दूसरे से असहमत रहते हैं, एक-दूसरे के विरोध का हौसला दिखाते हैं जिनमें से कुछ ने पिछले बरस मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ एक सामूहिक प्रेस कांफ्रेंस ली थी जिसमें खुद रंजन गोगोई शामिल थे, आज उनकी इस नाजायज सुनवाई के खिलाफ उस बेंच पर बैठे हुए दो दूसरे जज, जस्टिस अरूण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना, ने असहमति जाहिर नहीं की यह भी हैरानी की बात है। चूंकि ऐसी नौबत पहली बार आई है, इसलिए कानून की हमारी सीमित समझ ठीक-ठीक अंदाज नहीं लगा पा रही है कि जस्टिस रंजन गोगोई की यह हरकत उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए काफी है या नहीं? हो सकता है कि उस महिला के आरोप जस्टिस गोगोई के खिलाफ एक साजिश का हिस्सा हो, लेकिन अपने मामले में खुद सुनवाई करके जवाबी आरोप लगाकर जस्टिस गोगोई ने महाभियोग के लायक तो अपने आपको बना ही लिया है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट जज पर महाभियोग संसद में बड़ी संख्या में सांसदों की जरूरत मांगता है, इसलिए यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि नई संसद में इसके लिए सांसद जुटेंगे या नहीं? या फिर पार्टियां जजों को लेकर अपनी पसंद-नापसंद पर टिकी रहेंगी? संविधान के जानकार लोग संसद के बाहर भी शायद जस्टिस गोगोई से उनकी इस कार्रवाई को लेकर इस्तीफा मांगेंगे, या उन्हें मांगना चाहिए। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 20-Apr-2019
  • छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, और गृहमंत्री के अपने जिले में मुख्यमंत्री के हैलीपैड से ड्यूटी करके लौटते एक पुलिस जवान की बस में दिल का दौरा पडऩे के बाद अस्पताल में मौत हो गई। उसका पिता भी पुलिस में था जो ड्यूटी के दौरान गुजर गया था, और उसकी जगह पर इस बेटे को बाल आरक्षक बनाया गया था जो कि अब आरक्षक था। वैसे तो इस मौत में कोई बहुत अटपटी बात नहीं दिख रही है, लेकिन ऐसी दूसरी कई खबरों को देखें तो लगता है कि सरकार और पुलिस को अपने तौर-तरीकों को कुछ सुधारना चाहिए। पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों में लगातार आत्महत्या, या साथियों और सीनियरों की हत्या के मामले सामने आते हैं, और खबरों में आकर चले भी जाते हैं, उन्हें देखते हुए कुछ होता नहीं है। छत्तीसगढ़ में पिछली भाजपा सरकार के वक्त पुलिस-परिवार ने पुलिस के काम की बेहतर स्थितियों की मांग को लेकर आंदोलन किया था, और उससे हड़बड़ाए हुए पुलिस विभाग ने पूरी ताकत लगाकर उसे कुचल दिया था। बाद में कांग्रेस ने इसे एक चुनावी वायदा बनाया था, और नई सरकार ने एक कमेटी बनाकर उससे पुलिस कर्मचारियों की बेहतरी की कुछ बातों पर सोचा तो है, लेकिन उन पर अमल शुरू हुआ हो ऐसा पता नहीं चला है। आज ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एक न्यूज छपी है कि किस तरह एक गुजर गए पुलिसवाले की पत्नी को अनुकम्पा नियुक्ति देने की फाईल पर पुलिस मुख्यालय तीन बरस तक बैठा रहा। अब हाईकोर्ट ने तुरंत नौकरी देने कहा है। अपने ही विभाग के गुजर गए लोगों के परिवार के साथ अगर विभाग का यह रूख है, तो यह पुलिस हिरासत में प्रताडऩा के बराबर ही है। 

    दूसरी तरफ देश या प्रदेश के नेताओं का इंतजाम हो, किसी राजनीतिक या धार्मिक जलसे और जुलूस का इंतजाम हो, या किसी भी दूसरे मेले-ठेले की बात हो, पुलिस को जिस अंदाज में झोंक दिया जाता है, उस पर सरकार को, खासकर पुलिस विभाग को एक बार फिर सोच लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से दूसरे राज्य भी होंगे जिनमें बिना किसी खतरे वाले लोगों को, सत्ता पर मंडराने वाले छोटे-छोटे नेताओं को हथियारबंद पुलिस हिफाजत ऐसे मिलती है कि अगर पास से बंदूक हटी तो हत्या घटी। ऐसा इंतजाम अफसरों के बंगलों पर, नेताओं के बंगलों पर, काफिलों में, और नेता-अफसर के परिवारों तक बिखरा हुआ है, और छोटे कर्मचारियों को किसी खम्भे की तरह घंटों तक तपती धूप या बरसते पानी में खड़ा कर दिया जाता है, तब तक, जब तक कि नेताजी आकर लौट न जाएं। न पानी का इंतजाम, न खाने का, और न तैनाती की जगह से हिलने की गुंजाइश। बात-बात में बड़े अफसरों की बदसलूकी, और सस्पेंड हो जाने का खतरा। ये तमाम बातें पुलिस का आत्मसम्मान कुचलकर रख देती हैं, और अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करने का मनोबल उनमें बचता नहीं है। 

    छत्तीसगढ़ में पुलिस-हालात सुधार के कागजात तैयार पड़े हैं, लेकिन वे महज हफ्ते की एक छुट्टी की बात करते हैं। पुलिस के बेजा निजी इस्तेमाल के खिलाफ कोई बात इसलिए नहीं है कि कागजों पर तो सिपाहियों की तैनाती कहीं और होती है, और यह एक अलग बात है कि वे बड़े अफसरों और नेताओं के कुत्ते घुमाते, उनके घर खाना पकाते या जूठन उठाते नौकरी गुजारते हैं। अगर किसी सरकार में सरकारी पैसों की बर्बादी खत्म करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, और दिखावे के तामझाम को घटाने का हौसला हो, तो राज्य में एक चौथाई पुलिस का लगातार घरेलू इस्तेमाल और अपमान खत्म हो सकता है। यह बात न सिर्फ सरकारी किफायत के खिलाफ है, बल्कि साथी इंसान के आत्मसम्मान के खिलाफ भी है कि पुलिस होते हुए उनका घरेलू नौकरों सरीखा इस्तेमाल हो, या बड़े नेताओं के इंतजाम में उन्हें बांस-बल्ली की तरह बांधकर खड़ा कर दिया जाए। 

    अगर मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाओं में रीढ़ की हड्डी होती, और इन संस्थाओं में बैठे हुए लोग उन्हें मिलने वाले नमक की जिम्मेदारी पूरी करने के लिए जागरूक हों, तो वे खुद होकर भी पुलिस के ऐसे राजनीतिक और प्रशासनिक घरेलू इस्तेमाल के खिलाफ नोटिस जारी कर सकते हैं, लेकिन ऐसी संस्थाओं में बैठे लोग खुद भी शायद पुलिस का घरेलू नौकरों जैसा इस्तेमाल कर रहे होंगे। यह पूरा सिलसिला तब तक ऐसे ही चलता रहेगा जब तक कोई पुलिस जवान कुंठा और प्रताडऩा के बाद बंगले की तैनाती में किसी किस्म की हिंसा न कर बैठे। ऐसा अगर कुछ होगा, तो ही बाकी लोगों की नींद खुलेगी, वरना सरकार का एक बड़ा हिस्सा इंसानी दर्जे से नीचे की जिंदगी जीते हुए पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसी तरह खत्म होता रहेगा। इन लोगों के लिए जिम्मेदार बड़े पुलिस और शासकीय अफसर चूंकि खुद भी ऐसे बेजा इस्तेमाल में लगे रहते हैं, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी अर्दली के काम के लिए पुलिस सुहाती है, आने-जाने के लिए पुलिस की सायरन गाड़़ी सामने चलती सुहाती है, इसलिए छोटे पुलिस कर्मचारियों को किसी भी कोने से इंसाफ मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। इसीलिए उनमें से कोई खुद अपने ऊपर गोली चलाते हैं, कोई परिवार पर गोली चलाते हैं, और कोई अपने अफसरों पर। यह नौबत खतरनाक है। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 19-Apr-2019
  • राजनीति बड़ी अजीब जोडिय़ां बनाती है। और खासकर हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में यह दूसरे देशों के मुकाबले अधिक हैरतअंगेज दर्जे का सिलसिला है। अमरीका या ब्रिटेन में दलबदल, या दलों का विचित्र, अस्वाभाविक, अप्राकृतिक गठबंधन सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन हिन्दुस्तान में हर चुनाव के पहले के छह महीने इतिहास के कई किस्म के गठबंधन दर्ज करते हैं। अब आज ही जैसे उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के चुनाव क्षेत्र मैनपुरी में बसपा की मुखिया मायावती प्रचार करने को पहुंचीं, तो करीब चौथाई सदी बाद ये दोनों नेता एक मंच पर एक साथ नजर आए। इसके पहले उत्तरप्रदेश में एक कुख्यात रेस्ट हाऊस कांड हुआ था जिसमें मायावती के साथ मुलायम के मवालियों ने बदसलूकी की थी, और उसके बाद दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते सांप-नेवले सरीखे हो गए थे। पिछले बरस जब मुलायम के विरोध के बावजूद अब पार्टी सम्हाल रहे बेटे अखिलेश यादव ने मायावती से गठजोड़ किया था तो खुद मुलायम को ऐसे दिन का अंदाज नहीं था कि मायावती उनके लिए वोट मांगने उनकी सीट पर आएंगी, और वे मंच से कहेंगे कि वे इस अहसान को कभी नहीं भूलेंगे। कुल मिलाकर भाजपा के खिलाफ ये दो पार्टियां आज जिस तरह मिलकर उत्तरप्रदेश में चुनाव लड़ रही हैं, वे पिछले चुनाव की कटुता के ठीक खिलाफ है, और इन दोनों पार्टियों के सामाजिक समीकरण के हिसाब से ठीक भी है। इन दोनों की जमीन पिछड़ों, दलितों, और अल्पसंख्यकों के बीच है, और इन वोटों के बंटने से यूपी में योगीराज आ गया था, जो हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में शिकस्त पाए। 

    लेकिन दूसरी तरफ दिल्ली में एक दूसरे मामले में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने पार्टी के तमाम पदों से, और सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है क्योंकि उत्तरप्रदेश में उनके साथ बदसलूकी के बाद निलंबित पार्टी के कुछ नेताओं को चुनाव के इस मौके पर पार्टी में वापिस ले लिया गया है। यह बात गिनाते हुए प्रियंका ने कांग्रेस छोड़ दी, और आज शिवसेना में शामिल हो गई हैं। अब कांग्रेस और शिवसेना में भला ऐसा क्या हो सकता है कि प्रवक्ता जैसे वैचारिक जिम्मेदारी वाले ओहदे की महिला एक पार्टी छोड़ दूसरे में जाए! कांग्रेस और शिवसेना के सारे मूल्य एक-दूसरे के खिलाफ हैं, रीति-नीति एक-दूसरे के खिलाफ है, और साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर दोनों आमने-सामने हैं। ऐसे में महज एक बात इन दोनों पार्टियों में एक सरीखी है कि इनका इतिहास, वर्तमान, और भविष्य, एक-एक कुनबे की लीडरशिप पर टिके हुए हैं। लेकिन जो प्रियंका चतुर्वेदी पिछले दस बरस से लगातार साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलती आ रही थीं, वे अब शिवसेना की जुबान बोलेंगी! खैर, भारतीय लोकतंत्र में ऐसा होते रहता है क्योंकि लंबे समय तक शिवसेना की तेजाबी जुबान बोलने वाले संजय निरूपम उस पार्टी को छोड़कर सीधे कांग्रेस में आए थे। 

    हिन्दुस्तान की राजनीति का राष्ट्रीय और प्रादेशिक इतिहास ऐसे ही दलबदल से, गठबंधन और चुनावी तालमेल से भरा हुआ है। अब कल का दिन ही देखें, तो अभी दो हफ्ते पहले तक भाजपा के सांसद रहे शत्रुघ्न सिन्हा पहले तो कांग्रेस में आए, और कल वे सपा में गई अपनी पत्नी का चुनाव प्रचार करने के लिए कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ मंच पर पहुंच गए। वे खुद पटना से कांग्रेस उम्मीदवार हैं, और अपनी पत्नी के अलावा वे समाजवादी-परिवार के अखिलेश-डिम्पल के लिए भी प्रचार करने जाने को तैयार हैं। भारतीय लोकतंत्र का यह लचीलापन दूसरे बहुत से देशों में देखने नहीं मिलता, जहां पर दलबदल और दिलबदल इतना आम नहीं है। लेकिन हिन्दुस्तानी वोटर भी इस किस्म से खाल बदल-बदलकर आने वाले उम्मीदवारों को देखने के आदी हैं, और वे इन्हीं के बीच से अपनी पसंद तय करने की खूबी भी रखते हैं। 

    हम पहले भी लिखते आए हैं कि राजनीति की गंदगी को कम करने के लिए चुनाव के आधे या एक बरस पहले से दलबदल पर ऐसी रोक लगनी चाहिए कि इन महीनों में पार्टी बदलने वाले नई पार्टी से उम्मीदवार न बन सकें। लेकिन अपनी राजनीतिक निष्ठा को आधी रात सबसे बड़ी बोली बोलने वाले के हाथ नीलाम करने पर उतारू नेता क्या कभी ऐसा चुनाव सुधार होने देंगे? 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 18-Apr-2019
  • ओडिशा के चुनावी दौरे पर गए हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काफिले की तलाशी लेने की कोशिश करने वाले, कर्नाटक के एक आईएएस अधिकारी को चुनाव आयोग ने निलंबित कर दिया है। वे चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में तैनात थे, और आयोग की तरफ से जांच के बाद बताया गया है कि एसपीजी सुरक्षा प्राप्त लोगों की तलाशी न लेने के निर्देशों को न मानने की वजह से इस अफसर को निलंबित किया गया है। चुनाव नियमों के तहत प्रधानमंत्री को न सिर्फ विशेष सुरक्षा जारी रहती है, बल्कि वे वायुसेना के विमानों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। ऐसी हालत में उनका एक अलग दर्जा रहता है, और उनके काफिले की तलाशी को आयोग ने गलत माना है।
     
    अभी दो-चार दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक हवाई दौरे का एक वीडियो सामने आया था जिसमें उनके हेलीकॉप्टर से निकालकर एक बड़ा सा काला बक्सा लेकर कई सुरक्षा कर्मचारी दौड़ते हुए एक इंतजार करती निजी कार तक पहुंचे थे, और वीडियो में ही यह भी दिखता है कि वह कार बक्सा लेकर वहां से रवाना हो गई थी। बाद में दूसरी पार्टियों ने चुनाव आयोग को शिकायत करके इसकी जांच की मांग की थी कि उस बक्से में क्या था? और यह सवाल इस हिसाब से जायज लगता है कि जिस भारत में आतंकी हमलों में अपने दो-दो प्रधानमंत्रियों को खोया है, उनके हेलीकॉप्टर में इतना बड़ा कोई सामान क्यों ढोया जा रहा है? चुनाव के वक्त जब कालाधन नगद शक्ल में लेकर आवाजाही होती है, और छत्तीसगढ़ में तो सरकारी एम्बुलेंस में भी पिछले विधानसभा चुनाव में एक कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ नगद रकम ढोने के आरोप सामने आए थे, आज जब देश भर में जगह-जगह करोड़ों रूपए की नगद पकड़ा रही है, तब प्रधानमंत्री को मिली विशेष हिफाजत के बीच एक ऐसी पारदर्शिता रखने की जरूरत भी है कि उनके सामानों में इतना बड़ा बक्सा क्यों चल रहा है? प्रधानमंत्री के साथ जो लोग चलते हैं, उनका आना-जाना जो लोग देखते हैं, उन्हें कभी भी ऐसा कोई सामान देखने नहीं मिलता। 

    अब सवाल यह है कि चुनाव आयोग का पर्यवेक्षक ऐसी शिकायतों के बाद अगर काफिले की तलाशी लेना चाहता है, तो वह अफसर देश का एक वरिष्ठ आईएएस अफसर भी है, और वह सुरक्षा कर्मचारियों की मदद से ही तलाशी लेता। प्रधानमंत्री अपनी पार्टी के प्रचारक भी हैं, और चुनावी उम्मीदवार भी रहेंगे। ऐसे में उन्हें हिफाजत देना ठीक है, लेकिन जांच से रियायत देना न्यायसंगत नहीं लगता, और न ही उसकी कोई जरूरत होनी चाहिए। दुनिया के राजपाट के पुराने सिद्धांतों में यह कहा जाता है कि राजा को संदेह से ऊपर जीना चाहिए। अब जब यह संदेह सामने आ चुका है कि इतना बड़ा संदिग्ध बक्सा इस तरह प्रधानमंत्री के काफिले में क्यों हवाई सफर कर रहा था, और उसे इस तरह दौड़कर ले जाकर किसी गाड़ी में क्यों रखा गया, सुरक्षा कर्मचारियों का कुलियों की तरह इस्तेमाल क्यों किया गया? तो ऐसे में सबसे पहले तो पीएम की तरफ से स्पष्टीकरण आना चाहिए था, और उसके बाद उन्हें खुद होकर पारदर्शिता बरतना था कि उनके काफिले की भी जांच हो। 

    अभी तक जितने किस्म की छूट चुनाव आयोग की तरफ से नेताओं और पार्टियों को मिली हुई है, वह जरूरत से अधिक है, और यह दो दिन पहले तब साबित हुआ जब सुप्रीम कोर्ट की लताड़ के बाद आयोग की नींद खुली, और उसने बकवासी नेताओं पर कार्रवाई की। चुनाव आयोग को शिकायतों और संदिग्ध गतिविधियों को इस तरह अनदेखा नहीं करना चाहिए। आयोग में जिन लोगों को बिठाया गया है उनके पास भारत की संवैधानिक व्यवस्था में आगे पाने के लिए कुछ नहीं है। इसलिए उनको ईमानदारी के साथ काम करना चाहिए, अपनी साख बचानी चाहिए। एक वक्त था जब चुनाव आयोग से सत्ता भी घबराती थी, और विपक्ष भी घबराता था। अब चुनाव आयोग का रंग-ढंग एक सरकारी विभाग की तरह होकर रह गया है जो कि सत्तारूढ़ नेताओं के मातहत काम कर रहा है। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 17-Apr-2019
  • फ्रांस में 12वीं सदी के एक ऐतिहासिक, और उस देश के सबसे प्रमुख चर्च में आग लगने से इमारत की खूब तबाही हो गई। लकड़ी से बनी हुई छत जलकर राख हो गई, और दुनिया भर के आस्थावान लोगों से परे भी दूसरे लोग इससे बड़े विचलित हुए क्योंकि वह आर्किटेक्चर का एक नायाब नमूना भी था। बात की बात में फ्रांस की कंपनियों और वहां के रईसों ने दान की घोषणा की, और चौबीस घंटे के भीतर ही सत्तर करोड़ डॉलर इक_ा भी हो गए। जाहिर है कि इस चर्च के पुनर्निर्माण के लिए जितनी भी रकम लगेगी, लोगों से ही जुट जाएगी। यह एक अच्छी पहल भी है कि किसी बर्बाद हो चुकी इमारत को दुबारा बनाने के लिए सरकार को अपनी रकम खर्च नहीं करनी पड़ रही है, और लोग सामने आ रहे हैं। 

    इसी वक्त इन खबरों को आते हुए कुछ बरस हो रहे हैं कि किस तरह एक अफ्रीकी देश यमन में दुनिया में इस्लाम के मेजबान देश सऊदी अरब की नाकाबंदी के चलते ऐसी भुखमरी आ गई है कि रोजाना कम से कम एक सौ तीस बच्चे मर रहे हैं और एक अंदाज यह है कि पौने दो करोड़ से अधिक जनता की जिंदगी भूख की वजह से खतरे में है, तैंतीस लाख से अधिक बच्चे और गर्भवती महिलाएं भयानक कुपोषण के शिकार हैं। शरणार्थी कैंप चला रहे एक अंतरराष्ट्रीय संगठन का कहना है कि ऐसे भूखे लोगों के बीच हैजा फैल रहा है और रोजाना पांच हजार नए मरीज बन रहे हैं। यूनिसेफ का कहना है कि सऊदी अरब की अगुवाई में एक गठबंधन यमन की जलप्रणाली पर हवाई हमले कर रहा है, और वहां के अनाज गोदामों पर भी। एक दूसरा अंदाज बताता है कि यह  दुनिया के पिछले सौ बरस के इतिहास की सबसे बड़ी भुखमरी है। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि इस्लाम के तहत मुस्लिमों के सबसे बड़े तीर्थ स्थान सऊदी अरब में ही हैं और वह दुनिया में धर्म का एक सबसे बड़ा इंतजामअली भी है।

    अब सवाल यह उठता है कि धर्म के नाम पर जिस रफ्तार से आनन-फानन सत्तर करोड़ डॉलर एक चर्च की मरम्मत के लिए रातों-रात जुट गए, वैसे इंसानी जिंदगी को बचाने के लिए क्यों नहीं जुट पाते? जिस तरह लोग जलते हुए चर्च को देखकर सड़क किनारे रोते-रोते बैठ गए और बैठे-बैठे रोते रहे, वैसा रोना भूखे बच्चों की अनगिनत मौतों को खबरों, तस्वीरों, और वीडियो पर देखकर भी क्यों नहीं हो पाता है? जो आस्थावान लोग हैं वे अपने-अपने ईश्वरों से यह सवाल कर सकते हैं कि उसकी बनाई धरती पर एक मुल्क में लोग खतरनाक मोटापे के ऐसे शिकार हैं कि वे ऑपरेशन करवाकर अंतडिय़ों को कटवा रहे हैं ताकि पेट में खाना ही कम टिके। दूसरी तरफ खाने के बिना इस तरह, और इस हद तक इतनी बड़ी संख्या में बच्चे मारे जा रहे हैं, लेकिन किसी संपन्न-आस्थावान का ईश्वर मदद के लिए उनकी बांह मरोडऩे नहीं आता।

    दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चर्बी और भूख का ऐसा भयानक फासला एक बहुत बड़ा सुबूत है कि ईश्वर कहीं है नहीं, और बहस के लिए मान भी लें कि वह है, तो वह निहायत ही बेइंसाफ और कू्रर है। अगर सर्वज्ञ, सर्वत्र, और सर्वशक्तिमान ईश्वर सचमुच होता, तो वह आज ही यह हुक्म जारी कर देता कि वह बिना छत के चर्च में रह लेगा, और इस रकम को यमन में दम तोड़ते बच्चों को भेज दिया जाए। ईश्वर सऊदी अरब के भीतर रहते हुए वहां की सरकार को यह कह चुका होता कि वह इस तरह यमन के बेकसूर बच्चों और बड़ों को मारना जारी रखते हुए ईश्वर का मेजबान नहीं बने रह सकता। आज दुनिया के लोगों को यमन के बच्चों के लिए अपनी सीमा की मदद के बारे में भी सोचना चाहिए, और यह भी सोचना चाहिए कि धर्म और ईश्वर का बेकसूर बच्चों और भुखमरी से उनकी मौत पर क्या रूख है?
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 16-Apr-2019
  • चीन की एक मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनी को लेकर कनाडा से अमरीका तक, और ब्रिटेन तक में खलबली मची हुई है। कनाडा में इस कंपनी की एक सबसे बड़ी अफसर को गिरफ्तार भी किया गया है, और पश्चिमी देशों का आरोप है कि यह कंपनी चीन की खुफिया एजेंसियों के लिए काम कर रही है। इसके समर्थन में ये सरकारें चीन के अभी दो-तीन बरस पहले के एक कानूनी-फेरबदल को गिनाती हैं जिसके मुताबिक चीन की हर कंपनी को वहां की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मदद करना एक कानूनी जिम्मेदारी बताया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर चीनी सरकार वहां की कंपनियों को अपने उपकरणों से दूसरे देशों की जासूसी करने कहे, तो ये कंपनियां कानूनी रूप से उसकी मनाही नहीं कर सकतीं। यह चीनी कंपनी न सिर्फ मोबाइल बनाती है, बल्कि संचार उपकरण भी बनाती है, और ब्रिटेन जैसे देश में इसके बनाए हुए बहुत से मोबाइल एक्सचेंज काम कर रहे हैं, और नई 5-जी टेक्नालॉजी के लिए इस कंपनी को कई देशों ने ऑर्डर दिए हुए हैं। अब अगर इसके उपकरणों पर जासूसी का शक है, तो ये तमाम पश्चिमी देश अपनी संचार व्यवस्था में एक लंबी देरी का सामना भी कर सकते हैं, अगर वे दूसरी कंपनी को छांटेंगे। 

    आज टेक्नालॉजी के मामले में चीन से अधिक सस्ता सामान बनाने वाला कोई देश नहीं रह गया है। आज ही अमरीका के एक भूतपूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर का यह बयान सामने आया है कि चीन ने 1979 से अब तक कोई युद्ध नहीं किया है, और अपनी तमाम ताकत आर्थिक मोर्चे पर अपने आपको आगे बढ़ाने में लगा दी। नतीजा यह है कि चीन आज दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है, और टेक्नालॉजी के कई दायरों में वह निर्विवाद रूप से नंबर-1 है। जिमी कार्टर ने यह बात अमरीका के लगातार किसी न किसी जंग में शामिल होने को लेकर की है, लेकिन उसे दूसरे नजरिये से भी देखा जाना चाहिए। हिन्दुस्तान में जब चीन के खिलाफ नफरत और बहिष्कार के फतवे हवा में तैरते हैं, तो लोग यह बात नहीं समझ पाते कि चीनी सामानों का अगर ईमानदारी से बहिष्कार होना है तो महज दीवाली के पटाखों और रौशनी की लड़ों पर बात नहीं रूकेगी, सिर्फ होली की पिचकारी पर बात नहीं रूकेगी, चीन का पूरा बहिष्कार करने पर भारत में पल भर में अंधेरा छा जाएगा क्योंकि भारत के सैकड़ों बिजलीघर चीन की टेक्नालॉजी से, या वहां से बनकर आई मशीनों से चल रहे हैं। क्या हिन्दुस्तानी लोग बिजली और मोबाइल फोन के पूरे बहिष्कार के लिए तैयार हैं? यही हाल पश्चिम के देशों का है जो आज अगर एक या अधिक चीनी कंपनी का बहिष्कार करते हैं, तो उनके पास छांटने को ऐसी कंपनी नहीं बचती है जो कि चीनी पुर्जों या सामानों के बिना मोबाइल एक्सचेंज और दूसरे उपकरण बनाती हो। इसलिए जो दिक्कत और खतरा आज पश्चिम के सामने है, वही हिन्दुस्तान के भी सामने हैं। 

    यह भी समझने की जरूरत है कि आज देशों की जो परंपरागत फौजें किसी जंग के लिए तैयार की जाती हैं, वे हो सकता है कि असल जंग में बैरकों में ही बैठी रहें, और जंग खत्म भी हो जाए। आज पूरी दुनिया के बीच सबसे बड़ा हथियार कम्प्यूटरों पर हमला करने वाला है, और यही आगे भी बना रहेगा। इसी चीनी कंपनी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए पश्चिमी देश इस दहशत में भी हैं कि आज भी उनकी सुरक्षा व्यवस्था, उनकी संचार व्यवस्था में इस कंपनी के जो उपकरण लगे हुए हैं, वे शायद अभी भी जासूसी कर रहे हों, और जिस दिन चीन चाहे पल भर में इन देशों के बैंकों, एयरलाईंस, शहरी ट्रैफिक, और बिजलीघरों को ठप्प कर सकता है। यह एक फिल्मी कहानी सरीखी दहशत दिखती है, लेकिन हॉलीवुड में पिछले दस-बीस बरस में ऐसी फिल्में बनते आई हैं, और आज के वक्त में टेक्नालॉजी फिल्मों से मुकाबला करते  आगे बढ़ रही है। हिन्दुस्तान में न तो इस किस्म के साइबर खतरे की कोई चर्चा होती है, न यहां पर साइबर हिफाजत को लेकर कोई फिक्र दिखाई पड़ती है। लोग अपने घरों में हर इलेक्ट्रॉनिक सामान चीन का बना हुआ लगाते हैं क्योंकि वह सबसे सस्ता है। अब घरों के टीवी, वहां के स्पीकर, वहां के इंटरनेट-उपकरण, ये सब कितनी जासूसी कर रहे हैं, इसका न तो किसी को अंदाज है, न ही फिक्र है। 

    लेकिन चीन दूसरे देशों में अपनी फौजें भेजकर वहां जंग में शामिल होने जैसी हमलावर-बेवकूफी पर भरोसा नहीं करता। वह अपने घर बैठे पूरी दुनिया पर नजर रखने, और काबू करने की ताकत हासिल करते चल रहा है। यह सिलसिला किसी तीसरे विश्वयुद्ध की नौबत आने पर चीन को एक अभूतपूर्व और अनोखी हमलावर-ताकत देगा, और उस वक्त आज के बेखबर, बेपरवाह देशों को सम्हलने का मौका भी नहीं मिलेगा। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 15-Apr-2019
  • उत्तरप्रदेश के गंदी जुबान वाले समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने इस बार फिर सार्वजनिक जीवन की सीमाओं के पार छलांग लगाते हुए भाजपा उम्मीदवार जयप्रदा के खिलाफ एक गंदा बयान दिया है कि उनकी अंडरवियर खाकी है। इस बात को लिखे बिना यह बतला पाना नामुमकिन है कि इस बुजुर्ग नेता की समझ कैसी घटिया है, इसलिए इस लाईन को हम खबर और यहां पर लिख रहे हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार की शिकार एक लड़की के खिलाफ बहुत ही भद्दी बात कहने पर आजम खान को नोटिस देकर बुलाया था, और अदालत में उनसे बिना शर्त माफी मंगवाई थी। उस वक्त भी हमने इसी जगह इस नेता के दिल-दिमाग और जुबान की गंदगी के खिलाफ लिखा था, और सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के पहले ही लिखकर यह सुझाया था कि हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को ऐसे बयान पर खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन किसी अदालत का कोई डर ऐसे नेताओं को दिख नहीं रहा है, और गंदी जुबान, झूठी जुबान, साम्प्रदायिक जुबान, और भड़काऊ, उकसाऊ, सभी किस्म की जुबानों के नमूने चुनाव के इस मौसम में सामने आ रहे हैं। बीते पांच बरसों में स्वच्छ भारत अभियान ने हिन्दुस्तान में जितनी सफाई नहीं की होगी, उससे अधिक गंदगी इस चुनाव का यह लंबा दौर फैला रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'हम' वाले साम्प्रदायिक बयान से लेकर राहुल गांधी के अडवानी को जूता मारकर मंच से उतारने वाले बयान तक, कई किस्म के गंदे बयान सामने आए हैं, लेकिन आजम खान सरीखे लोग अश्लील बयान देने में अपना एकाधिकार कायम रखते हैं। इसी सिलसिले में यह नहीं भूलना चाहिए कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अली और बजरंग बली के बीच एक साम्प्रदायिक दंगल करवाने पर आमादा हैं, और वे यह होश भी खो बैठे हैं कि आज यूपी में किसी भी साम्प्रदायिक तनाव के लिए, और उस पर, मुख्यमंत्री की हैसियत से वे खुद जिम्मेदार रहेंगे। 

    अब ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में, खासकर चुनाव के मौसम में, चुनाव आयोग के आम नियम-कायदों की इज्जत गुठली जितनी भी नहीं रह गई है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी अदालत को खुद होकर दखल देना चाहिए, और चौबीस घंटे के भीतर ऐसे नेताओं को अदालत में पेश करवाना चाहिए, और इनमें से जिस-जिस के बयान जितने गंदे हों, उन्हें उतने ही दिन की कैद देकर चुनाव में और गंदगी फैलाने से रोकना चाहिए। चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट से ऊपर नहीं है, और यह किसी का हक नहीं है कि वे देश की हवा को इस कदर जहरीला करें कि लोग इस लोकतंत्र में रहने से डरने लगें, और अपने बच्चों के लिए इस लोकतंत्र को खतरनाक मानने लगें। जो लोग ऐसे खतरे का अहसास करते हैं, उनके लिए पिछले बरसों में गद्दारी का तमगा तो राष्ट्रवादी ताकतों ने ढालकर तैयार रखा ही है। ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तानी चुनाव यहां के लोगों, खासकर नेताओं, के भीतर से सैकड़ों पीढ़ी पहले की अलोकतांत्रिक हिंसा को उनके डीएनए से खींचकर बाहर निकाल लेते हैं, और लोग इस हद तक जुबानी-जुर्म पर आमादा रहते हैं कि मानो चुनाव के बाद नतीजे आने के दिन ही इस देश को खत्म हो जाना है, इसलिए नफरत का तमाम हिसाब उसके पहले ही निपटा लिया जाए, अपने मन की तमाम हिंसा को पहले बाहर निकाल लिया जाए, और अपनी हर किस्म की हैवानियत को कैमरों के सामने दर्ज करवा दिया जाए। 

    इस लोकतंत्र के जो चुनाव कहने के लिए सबसे बड़ी संसदीय-पंचायत बनाने जा रहे हैं, उस संसदीय परंपरा और मूल्यों के साथ बलात्कार करते हुए नेता उसकी देहरी तक पहुंचकर माथा टेकना चाहते हैं, और यह सोच एक से अधिक पार्टियों में, उनके दर्जनों नेताओं के सिर चढ़कर बोलती है। सुप्रीम कोर्ट को तुरंत ही इस नौबत को अपने काबू में लेना चाहिए, और ऐसे हर बकवासी मुंह को चुनाव निपट जाने तक जेल में डाल देना चाहिए। जब संसद अपने आपको बेहतर न बनाने, और लगातार घटिया बनाने की सुपारी उठा चुकी हो, जब मीडिया को ऐसी गंदगी में मजा आ रहा हो, तब सब कुछ अदालत के कंधों पर आकर टिका है। हिन्दुस्तान का चुनाव आयोग एक मशीनी पुर्जे से अधिक कुछ नहीं रह गया है, और यह नौबत अदालत के सीधे और तुरंत दखल देने की है। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 14-Apr-2019
  • हिन्दुस्तान के आम चुनाव के भाषणों को देखें तो लगता है कि नेताओं और पार्टियों में जो लोग जस्टिस मार्क न्डेय काटजू की बातों को सही नहीं मानते, और अक्सर उनकी आलोचना करते हैं, वे भी कम से कम उनकी एक बात पर गंभीरता से भरोसा करते हैं, और अपना सारा चुनाव अभियान, बयान और भाषण, उसी मुताबिक तय करते हैं। जस्टिस काटजू ने कुछ अरसा पहले लिखा था कि 90 फीसदी हिन्दुस्तानी बेवकूफ हैं। आज नेताओं के चुनावी बयान और भाषण देखें तो लगता है कि वे तमाम लोग काटजू की बात पर पूरा भरोसा करते हैं। भला तकरीबन पूरी जनता को पूरी तरह बेवकूफ न समझते होते तो बड़े-बड़े नेता वीडियो कैमरों के सामने रिकॉर्ड होते हुए इतनी फर्जी और इतनी फरेबी बातों को इतने-इतने जोर से, इतनी-इतनी बार कैसे बोलते होते? इसलिए जस्टिस काटजू का गणित नेताओं के बीच खासा लुभावना और लोकप्रिय दिखता है, और हिन्दुस्तानी चुनाव में नेता बाकी 10 फीसदी लोगों की परवाह नहीं करते कि वे ऐसी फरेबी बातों के लिए क्या सोचेंगे? इसलिए कि बचे 90 फीसदी लोगों में से हर किसी को वोट का उतना ही हक है जितना कि इन 10 फीसदी लोगों में से हर किसी को है। 

    आज इस देश के मीडिया में एक छोटा तबका लगातार इस फरेब का पर्दाफाश करने में लगा रहता है, लेकिन यह तबका कुछ अधिक ही छोटा है। दूसरी तरफ मीडिया का एक बड़ा तबका लगातार इस फरेब को एक सच साबित करने में लगे रहता है, और इस मिलेजुले फरेब को आगे बढ़ाने के लिए मुफ्त या भुगतानप्राप्त लोगों की इतनी बड़ी फौज हासिल है कि वे बात की बात में फरेब से सार्वजनिक जीवन को, लोगों के फोन को, सोशल मीडिया को पाटकर रख देते हैं। नतीजा यह होता है कि जब चारों तरफ एक ही फरेब दिखता है, तो जाहिर है कि काटजू के पैमाने के 90 फीसदी लोग उस पर भरोसा भी कर बैठते हैं। अभी दो दिन पहले ही किसी का लिखा हुआ पढऩे में आया है कि आज का सोशल मीडिया अगर हिटलर के वक्त में होता, तो वह इस पर फिदा हो चुका होता। आज के सोशल मीडिया में लोगों के दिमाग को चारों तरफ से बंद कर देने की ऐसी ताकत विकसित कर ली है कि उसके मुकाबले लोकतंत्र एक बहुत ही कमजोर औजार बनकर रह गया है। 

    भारतीय लोकतंत्र में धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर, नोटों के आधार पर, झांसों के आधार पर, उकसावों के आधार पर, नफरत के आधार पर वोट इस कदर प्रभावित होते हैं कि यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि हिन्दुस्तानी वोटर किस आधार पर देश की सरकार तय करते हैं। इतने किस्म की लहरें बताई जाती हैं, इतने किस्म का रूझान गिनाया जाता है, कुछ नेताओं के इतने करिश्मे चर्चा और खबरों में रहते हैं कि वोट किस असर में पड़ा, इसे दुनिया से परे की कोई अनोखी ताकत ही सुलझा सकती है। फिलहाल इस देश के वोटरों को नेता काटजू के चश्मे से देखते हैं, और उसी मुताबिक हर दिन झूठ और फरेब का सैलाब तय करते हैं। लोग इन झूठों को ठीक उसी तरह सच मानने पर आमादा रहते हैं जिस तरह समझदार हो चुके बच्चे भी क्रिसमस पर सांताक्लॉज के आने और तोहफे लाने की बात पर भरोसा करने पर आमादा रहते हैं। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 13-Apr-2019
  • सुप्रीम कोर्ट में चुनावी-बांड को लेकर दायर की गई एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार के वकील ने अदालत के सामने एक बड़ा दिलचस्प तर्क रखा। अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि राजनीतिक दलों को कहां से और कितना पैसा मिला है इस बारे में मतदाताओं को जानने की क्या जरूरत है? उन्होंने कहा कि मतदाताओं को उम्मीदवारों के बारे में जानने का हक है लेकिन उन्हें यह जानने की क्या जरूरत है कि पार्टियों को पैसा कहां से मिल रहा है? 

    आज इक्कीसवीं सदी के भारतीय लोकतंत्र में इससे अधिक बेशर्मी की कोई बात सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में कम ही आई होगी। एक तरफ तो छोटे-छोटे सरकारी मुलाजिमों पर यह कानूनी बंदिश है कि वे अपनी, अपने जीवनसाथी की, और अपने नाबालिग बच्चों की सारी संपत्ति की हर बरस घोषणा करें, और उसे सार्वजनिक भी कर दिया जाता है, कोई भी व्यक्ति जाकर किसी भी सरकारी कर्मचारी की यह जानकारी मांग सकते हैं। सूचना का अधिकार उन तमाम मामलों पर लागू किया गया है जो सरकार के कारोबारी मामले नहीं हैं, या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए नहीं हैं। इसके बावजूद कुछ बरस पहले सुप्रीम कोर्ट के जज इस बात पर अड़ गए थे कि उनकी संपत्ति की जानकारी उजागर नहीं की जाए। और यह बड़ी अजीब नौबत थी जब दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले पर फैसला दिया था कि सुप्रीम कोर्ट जजों को यह जानकारी देनी ही होगी। सत्ता में सबसे ऊपर बैठे हुए लोग अपने पूरे बदन को इतने बड़े तौलिए से ढांककर रखना चाहते हैं कि वह तौलिया नहीं दिखता, एक बुर्का दिखता है। राजनीतिक दलों को इतना पैसा कहां से मिल रहा है इसे छुपाने के पीछे यही एक नीयत है। 

    अब इस नियम और इस बहस से परे अगर जमीनी हकीकत पर आएं, तो अदालत में यह बताया गया है कि 221 करोड़ के चुनावी-बांड में से 210 करोड़ के बांड केवल भाजपा के लिए खरीदे गए हैं, बाकी 11 करोड़ में बाकी तमाम पार्टियां हैं। अगर अदालत में पेश ये आंकड़े सही हैं, तो यह भी एक वजह हो सकती है कि भाजपा की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार राजनीतिक चंदा-उगाही को ढंका-छुपा रखना चाहती है। लेकिन हम लगातार चुनाव सुधार, और राजनीति में कालेधन के इस्तेमाल के खिलाफ लिखते हैं, और इस तरह से चुनावी बांड के मार्फत पार्टियों को मिला हुआ चंदा अगर जनता की नजरों से छुपाकर रखा जाएगा, तो यह राजनीति में कालेधन के इस्तेमाल से अलग कैसे होगा? इसलिए केन्द्र सरकार के इस बहुत ही रद्दी तर्क को कूड़े की टोकरी में फेंककर सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि चुनाव और राजनीति में चंदे का यह धंधा उजागर करे, और सत्तारूढ़ पार्टी को चंदा देकर सरकार से फायदा पाने की मजबूत परंपरा को तोड़े। सूचना का अधिकार शब्दों का खेल नहीं होना चाहिए कि जिससे कमजोर को तो नंगा कर दिया जाए, और ताकतवर-सत्तारूढ़ को फौलादी ढाल दे दी जाए। सामान्य समझबूझ के किसी इंसान के लिए भी यह सोचना कुछ मुश्किल बात है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने केन्द्र सरकार ऐसे बेशर्म तर्क रख सकती है। यह तो भला हो जनहित याचिकाओं का जो कि बार-बार सरकारों के ओछेपन को उजागर करती हैं, और यह भी साबित करती हैं कि भारतीय लोकतंत्र में जहां संसद कामकाज की नहीं रह गई है, सरकारें अपने आपको रहस्य के पर्दे में छुपाकर गलत कामों में डूबी रहना चाहती हैं, वहां पर एक अदालत ही है जो कि सरकार की बांह मरोड़ पाती है चाहे वह चुनावी चंदे का मामला हो, या फिर रफाल विमान खरीदी के दस्तावेजों का। 

    हिन्दुस्तान में सूचना के अधिकार का नाम बदलकर सूचना की जिम्मेदारी रखना जरूरी है, और जो मामले भी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए नहीं हैं, उन सबको सार्वजनिक इंटरनेट पर खुद होकर उजागर करने की जिम्मेदारी सरकार, सार्वजनिक संस्थाओं, और संवैधानिक संस्थाओं की होनी चाहिए। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 12-Apr-2019
  • छत्तीसगढ़ के बस्तर में मतदान के लिए सुबह से लगी बड़ी लंबी-लंबी कतारों की तस्वीरें रोंगटे खड़े कर देती हैं, अगर बस्तर के हालात को याद रखें। जहां एक बड़े इलाके में नक्सलियों ने विस्फोटक बिछा रखे हैं। जहां अभी तीन दिन पहले ही ऐसे ही एक धमाके में भाजपा के एक विधायक की चुनाव प्रचार करते मौत हुई, कई सुरक्षा कर्मचारी भी मारे गए, वहां पर वोट डालने गांव के गांव उमड़ पड़े और मृत विधायक के बूढ़े मां-बाप ने भी वोट डाला। ऐसे हालात में 57 फीसदी वोट सुरक्षित शहरों के 97 फीसदी वोटों के बराबर माने जाने चाहिए। इन्हीं बस्तर में नक्सली जगह-जगह मतदान के बहिष्कार करके पर्चे भी फेंकते आए हैं और कुछ इलाकों में उनका राज पुलिस से अधिक है। कई दिनों से वे जिन इलाकों में दीवारों पर बहिष्कार के नारे लिख रहे थे, वहां भी खूब वोट पड़े। 

    सुरक्षित शहरों में वोटरों को अगर क्रिकेट मैच देखने मिल जाए तो बहुत से वोटर वोट डालने न जाएं। बहुत से वोटर ऑटोरिक्शा मुफ्त मिलने पर ही वोट डालने जाते हैं। ऐसे में जिंदगी जोखिम में डालकर नक्सली-जंगलों के जो लोग दूर-दूर तक जाकर वोट डालते हैं वे ही लोकतंत्र को जिंदा रखने की मिसाल बनते हैं। लंबे वक्त पहले, इमरजेंसी के दौर में बस्तर जैसे आदिवासी इलाकों में कोई टीवी नहीं था, वोटर-पीढ़ी की पढ़ाई नहीं के बराबर थी, अखबारों की पहुंच भी बड़ी सीमित थी और वे भी इंदिरा-संजय के अनुशासन पर्व के गीत गा रहे थे। लेकिन उस दौर में भी समूचे बस्तर ने एकमुश्त होकर नेहरू की बेटी को खारिज कर दिया था। शहरी लोकतंत्र के पैमानों पर इन आदिवासियों के पास न गोली है, न बोली है, लेकिन इनका फैसला हौसले के साथ सामने आता है। 

    यह बात कुछ अजीब सी भी लगती है कि कांग्रेस और भाजपा, इन्हीं दो पार्टियों की सरकारों ने कम या अधिक समय तक बस्तर पर राज किया है। इन्हीं के अफसरों, कर्मचारियों और नेताओं ने आदिवासियों को लूटा है, बेदखल किया है। लेकिन इन्हीं दो के बीच जब चुनने की बात आती है, तो भी बस्तर के आदिवासी हौसले और उत्साह से वोट देते हैं। जिनसे पिछली आधी से अधिक सदी से महज छीना ही गया है, जिन्हें खदेड़ कर राज्य के बाहर कर दिया गया, जिनके गांव पुलिस ने जला दिए, जिनके बेकसूर लोगों को नक्सली कहकर मारा, जिनकी महिलाओं से नियमित रूप से बलात्कार किया गया, वे भी आखिर क्या पन्ने के लिए हर चुनाव में वोट देते हैं? कम बुरे को चुनने के लिए? 

    बस्तर के एक हिस्से का नाम अबूझमाड़ है। अबूझ इलाका, लेकिन वोट डालने में बस्तर की दिलचस्पी को देखें तो समूचा बस्तर अबूझ लगता है। यहां इतने वोट पडऩे को कुछ बाहरी आंखों से देखने की जरूरत है। इस देश-प्रदेश के लोग तो मानो खतरों और लाशों के बीच वोट डालना इनकी जिम्मेदारी मान चुके हैं, बाहर के कोई समाजशास्त्री शायद इसे बेहतर समझ सकें।  
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 11-Apr-2019
  • मध्यप्रदेश में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने तीन हजार करोड़ रू. के ई-टेंडरिंग घोटाले पर निजी कंपनियों और अज्ञात नेताओं-अफसरों पर जुर्म कायम कर लिया है। यह घोटाला मप्र की पिछली भाजपा सरकार के समय ही उजागर हुआ था लेकिन तब शिवराज-सरकार ने इस पर कार्रवाई करने के बजाय गड़बड़ी पकडऩे वाले बड़े अफसर का ही तबादला कर दिया था। उसके बाद भी जब पुख्ता भांडाफोड़ जारी रहा तो इसकी प्रारंभिक जांच के आदेश तो हुए, लेकिन कोई जुर्म दर्ज नहीं हुआ। प्रदेश की नई कांग्रेस सरकार ने भी कई महीनों की जांच के बाद यह जुर्म दर्ज किया है। 

    इंटरनेट पर ऑनलाईन भरे जाने वाले टेंडरों में धोखाधड़ी कोई नई बात नहीं है। छत्तीसगढ़ सहित दूसरे कई राज्यों में धड़ल्ले से यह सिलसिला जारी है। पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ में भी लगातार सरकारी सर्वर और वेबसाईटों पर छेडख़ानी करके टेंडर छुपा देना, सर्वर डाऊन कर देना, और चुनिंदा टेंडरों को ही जमा होने देना, उनके मुकाबले के टेंडरों को रोक देने जैसे बहुत से काम नियमित और संगठित रूप से हुए। तालाब में रहकर मगरमच्छ से बैर कौन करे- यह सोचकर बाकी लोग भी- गिरोहबंदी में शामिल होते रहे और सरकार को चूना लगाते रहा। आज छत्तीसगढ़ में नई कांग्रेस सरकार कई मामलों की जांच कर रही है, लेकिन हजारों करोड़ के ऐसे टेंडर घोटाले अभी भी दबे पड़े हैं। मध्यप्रदेश में सरकार ने महीनों बाद अब जुर्म कायम किया है। जिसे मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी लोगों पर इंकमटैक्स के छापों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। जो भी हो, किसी भी सरकार, नेता, या अफसर, जिसके भी गलत काम हो, उन पर कार्रवाई होनी ही चाहिए।

    जब से ई-टेंडरिंग का सिलसिला शुरू हुआ है, कागजी टेंडरों के वक्त की गुंडागर्दी तो खत्म हो गई है, लेकिन अब घोटाला कम्प्यूटरों पर बैठकर होने लगा है और पूरी तरह से सरकार के हाथ में चाबी आ गई है। मध्यप्रदेश में कम्प्यूटरों की फोरेंसिक जांच में भी उनसे छेडख़ानी के सुबूत मिल गए हैं। अब टेंडरों में बिना तलवार चलाए कत्ल होने लगे हैं। छत्तीसगढ़ की वर्तमान सरकार को पिछली सरकार के वक्त के ई-टेंडरिंग घोटाले की जांच करवानी चाहिए। आज दरअसल कम्प्यूटर और ऑनलाईन को ताबीज की तरह चमत्कारी मान लिया गया है जो पूरी तरह से नाजायज भरोसा है। यह अंधविश्वास पूरी तरह गलत है। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 10-Apr-2019
  • छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक बार फिर नक्सल हमले में एक बड़े जनप्रतिनिधि की जान गई है। पूरे बस्तर से भाजपा के अकेले निर्वाचित विधायक भीमा मंडावी की जान चली गई है और उनकी सुरक्षा में तैनात चार जवान भी शहीद हुए हैं। शुरुआती खबरों में सरकार ने कहा है कि विधायक बुलेट प्रूफ गाड़ी में थे और उनके साथ बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी थे। विधायक को एक रास्ते पर जाने को मना भी किया गया था लेकिन वे सीमित सुरक्षाकर्मियों को लेकर उस रास्ते पर चले गए और नक्सल विस्फोट में गाड़ी के चिथड़े उड़ गए, पांच लोग मारे गए। 

    चुनाव के दौर से गुजर रहा बस्तर पिछले कुछ दिनों से नक्सल हिंसा का एक नया दौर देख रहा है। कुछ महीने पहले विधानसभा चुनाव ऐसी कड़ी हिंसा के बिना हो गए थे, लेकिन इस बार मतदान के ठीक पहले के इस विस्फोट में एक विधायक सहित कई गुजर गए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पिछले दिनों नक्सलियों से हिंसा छोड़कर बातचीत के लिए आगे आने कहा था, और नक्सलियों की ओर से भी सुरक्षाबलों की तैनाती हटाने पर बातचीत की पेशकश की थी। दोनों तरफ की शर्तें भी हैं और दोनों तरफ अविश्वास भी, इसलिए बात शुरू होने का माहौल बन नहीं रहा है। 

    ऐसे हालात में भी बातचीत की कोशिश जारी रखनी चाहिए। दोनों तरफ की बंदूकें तो दसियों बरस से आग उगल ही रही है, दोनों तरफ के लोग मारे जा रहे हैं। केन्द्रीय सुरक्षा बलों के जवानों के ताबूत बस्तर से देश भर में जा रहे हैं। ऐसे में जब दोनों ही पक्ष बंदूकें छोडऩे को तैयार नहीं हैं, तो वे मोर्चों पर डटे रहें, लेकिन लोकतंत्र के हिमायती लोग बातचीत के लिए दोनों पक्षों को मनाने की कोशिश करें। नक्सल मोर्चे के इतिहास से यही साबित होता है कि तमाम पुलिस और सुरक्षा बल मिलकर भी नक्सल हिंसा को एक सीमा के बाद रोके नहीं पा रहे हैं। जिस तरह कैंसर के इलाज में कीमोथैरेपी के अलावा रेडियोथैरेपी भी लगती है और कई मामलों में सर्जरी भी जरूरी  हो जाती है। उसी तरह लोकतंत्र के भीतर अपने ही हथियारबंद उग्रवादियों, आतंकवादियों से निपटने के लिए गोली के अलावा, या गोली के साथ-साथ बोली को भी एक दीर्घकालीन उपाय मानना चाहिए। बोली के बजाय गोली का रास्ता सरकार के लोगों को बेहतर और आसान लगता है,लेकिन वह एक किस्म से लोकतंत्र की नागामी भी होती है।

    छत्तीसगढ़, या दूसरे नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारें बंदूकों को अपना काम करने दें, और गैर सरकारी मध्यस्थ लोगों के मार्फत बातचीत भी शुरू करनी चाहिए। दूसरे कई राज्यों में ऐसा हुआ भी है और दुनिया के देश आपस में ऐसी अनौपचारिक बातें करते ही हैं। सरकार अपने लोगों को बातचीत में न लगाए, लेकिन मध्यस्थ जरूर ढूंढें। बंदूकें लाशें गिरा सकती हैं लेकिन लोकतंत्र की कामयाबी लाश नहीं वोटर होते हैं।
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 09-Apr-2019
  • यह अखबार लोगों के हाथों में पहुंचने के एक-दो दिन बाद वोट डालना शुरू हो जाएगा। इन वोटों से अगले पांच बरस के लिए लोग अपने इलाके के सांसद छांटेंगे और पाएंगे। और फिर उन सांसदों से  केंद्र की सरकार चुनी जाएगी जो कि मतदाताओं, और वोट न डालने वाले छत्तिसगढिय़ों पर भी राज करेगी। हमारी इस बात पर थोड़ा सा मतभेद हो सकता है कि वह राज करेगी, या सेवा करेगी। किसी पार्टी को सत्ता मिलती है, या सेवा करने का मौका मिलता है, यह उस पार्टी की अपनी सोच, और उसके नेताओं की सोच पर टिका रहता है। छत्तीसगढ़ में जनता को वोट डालते हुए जिन बहुत सी बातों पर सोचना-विचारना है उनमें से एक बात यह भी है कि वह सांसद चुनने जा रही है, या कि केंद्र  की सरकार चुनने, या फिर केंद्र की सरकार का मुखिया? 

    मामला बहुत उलझन वाला है, और जनता के वोट देने के हक से इस मौके पर हमको कोई जलन नहीं होती। जिसके दिल-दिमाग पर इतने जटिल फैसले का बोझ हो, उससे भला ईष्र्या कैसे हो सकती है? यह वोट डालने का हक नहीं है, यह वोट डालने की जिम्मेदारी है। और फिर वोट की मशीन को देखें, तो उसमें उम्मीदवार का तो नाम होगा, लेकिन निशान तो पार्टी का होगा। एक अच्छी पार्टी के बुरे उम्मीदवार को, या बुरी पार्टी के अच्छे उम्मीदवार को, जनता कैसे चुनेगी, इस पर लंबे-चौड़े शोध हो सकते हैं, और उसके नतीजे दिलचस्प हो सकते हैं। वोटों की गिनती से तो सिर्फ यही पता लगेगा कि लोगों ने किस नाम और निशान की जोड़ी को वोट दिया है, यह तो कभी पता नहीं लगेगा कि उम्मीदवार को कितने वोट मिले, और कितने वोट पार्टी के निशान को मिले। इसलिए यह पढऩे के बाद जब जनता को वोट देना है, तो उसे अपने सामने आने वाले कई नामों, और कई निशानों के, उसे पेश होने वाले जोड़ों के बारे में सोचना होगा। इसके साथ-साथ उसे यह भी सोचना होगा कि उसका वोट देश को कैसा और कौन सा प्रधानमंत्री देगा। 

    मतदाताओं के भीतर सतह के नीचे जो एक लहर चलती है, उसका अंदाज कम से कम हम तो नहीं लगा पाते। इसलिए किस सीट पर किसकी फतह होगी, इस अटकलबाजी में हम नहीं पड़ते। लेकिन लोगों को अपने मन की, अपनी समझ की, सुनते हुए, अपने अनुभवों को याद करते हुए, चेहरों के बारे में सोचते हुए, वोट जरूर डालना चाहिए। और जिन लोगों की ताकत मतदान केन्द्र तक एक फेरा लगाने से अधिक हो, उनको अपने आसपास के कमजोर तन वालों को, और खासकर कमजोर मन वालों को, जरूर साथ ले जाकर उनके वोट भी डलवाने की कोशिश करनी चाहिए।  भ्रष्ट और दुष्ट नेताओं और पार्टियों को, लोकतंत्र की ऐसी बदहाली को अक्ल सिखाने के लिए वोटरों को जागना होगा, वोटिंग मशीन की बटन दबाने वाली अपनी उंगलियों को फन की तरह इन लोगों को दिखाना होगा, तभी जाकर लोकतंत्र का हाल सुधरेगा। 

    एक-दो दिन बाद के वोट के बारे में इस बात को पढ़ते ही सोचना शुरू करना चाहिए, आसपास के लोगों से इस पर बात करनी चाहिए, उनकी राय सुननी चाहिए, अपनी राय उनके साथ बांटनी चाहिए, और यह तय करना चाहिए कि अधिक से अधिक लोग जाकर वोट डालें। जो पार्टी ठीक लगे, उसमें वोट डालें, या जो उम्मीदवार ठीक  लगे, उसे वोट दें, या फिर जिसे अगला प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं, उसकी पार्टी के निशान पर वोट दें। अगर आपके इलाके के सारे नामों, और सारे निशानों से आप की नापसंदगी हो, तो भी एक नया बटन इस बार की वोटिंग मशीन पर रहेगा, और जाकर इनमें से कोई नहीं के लिए बनाए गए नोटा नाम के बटन पर उंगली दबाएं। जाएं जरूर, अपने साथ के लोगों को, आसपास के लोगों को ले जाएं जरूर, और किसी को इस बात पर खुश न होने दें कि चूंकि आप मुर्दा हैं, इसलिए वे आसानी से जीत सकते हैं। जो  वोट नहीं डालेंगे, उनको अगले पांच बरस झींकने का कोई हक भी नहीं रहेगा। इसलिए जो वोट डालने की जिम्मेदारी पूरी करते हैं, उन्हीं को अगले पांच बरस कुछ बोलने का हक भी रहता है। मुर्दों को कब्र से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती। 
    -सुनील कुमार
     

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Posted Date : 08-Apr-2019
  • कांग्रेस के बाद अब भाजपा का चुनाव घोषणापत्र भी आ गया है, और उसमें भाजपा की पहले की एक महत्वपूर्ण घोषणा जारी रखी गई है जिसके तहत किसानों को हर बरस छह हजार रुपये दिए जाएंगे। इसके अलावा भाजपा ने छोटे किसानों और छोटे व्यापारियों के लिए पेंशन की घोषणा भी की है। दूसरी तरफ लोगों को अभी कांग्रेस घोषणापत्र की सुर्खी याद है कि देश के बीस फीसदी गरीब परिवारों को छह हजार रुपये महीने दिए जाएंगे। कांगे्रस ने विधानसभा चुनावों में कर्जमाफी की घोषणा की थी, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में अधिकतर कर्ज माफ हो भी गया है। इसलिए कांग्रेस से किसानों को यह उम्मीद भी हो सकती है कि उसकी सरकार केंद्र में रहेगी तो किसानी का कर्ज माफ होते चलेगा। लेकिन भाजपा ने छोटे किसानों और छोटे दुकानदारों को पेंशन देने की जो घोषणा की है, उसके दायरे में भी तकरीबन ऐसी ही बड़ी संख्या फायदा पाएगी, और दोनों ही पार्टियों ने अपने अर्थशास्त्रियों के साथ बैठकर यह हिसाब जरूर लगाया होगा कि कितने फीसदी आबादी उनकी रियायतों और उनके तोहफों का फायदा पाएगी।

    जब अपने-अपने गठबंधन या सहयोगी दलों के साथ मिलकर सत्ता पर पहुंचना ही सबसे बड़ा मुद्दा हो, तो फिर घोषणापत्र से परे भी हर किस्म की नैतिक-अनैतिक कोशिश आम बात है। वह चल भी रही है। लेकिन देश के आने वाले बरसों को जो बात पूरी तरह प्रभावित करेगी, वह सरकारी खजाने से जनता को दिए जाने वाले तोहफों की है। इस मामले में कांगे्रस और भाजपा के पैमाने अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों ही पार्टियों ने बुनियादी रूप से यह मान लिया है कि आबादी के एक बड़े हिस्से को आर्थिक उपहार दिए बिना चुनाव जीतने का और कोई जरिया नहीं है। छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के वक्त जब राज्य की भाजपा केंद्र के अपने संगठन के सामने धान-बोनस देने के लिए गिड़गिड़ाती रही, और दिल्ली ने उसे पूरी तरह खारिज ही कर दिया, तो चुनाव पर उसका भी बड़ा असर पड़ा। इसलिए इस बार के देश के चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने कुछ अलग पैमानों पर किसानों के लिए रियायतें रखी हैं, और छोटे दुकानदारों का एक बड़ा तबका शामिल किया है।

    यह समझना अभी थोड़ा सा मुश्किल है कि किसानों और छोटे दुकानदारों की शिनाख्त के पैमाने किस तरह तय होंगे, और यही हाल कांग्रेस की सरकार बनने पर उसके सामने भी रहेगा कि सबसे गरीब बीस फीसदी लोग कैसे छांटे जाएंगे। इसके अलावा एक बड़ी बात यह भी है कि इन बड़े-बड़े तबकों से परे कई ऐसे छोटे-छोटे तबके भी होंगे जो न किसान होंगे, न व्यापारी होंगे, लेकिन जो मदद के जरूरतमंद होंगे, और उनके लिए भाजपा के घोषणापत्र में तो कोई पैमाना नहीं है, कांग्रेस के घोषणापत्र में बिना तबकों के एक बड़ा पैमाना सबसे गरीब बीस फीसदी का रखा गया है। अब यह तो आने वाले चुनाव के नतीजों के बाद अटकल का सामान रहेगा कि नतीजों का कितना फीसदी किस वजह से किसके पक्ष या विपक्ष में गया है। दरअसल भारतीय चुनावी नतीजे अगर किसी सुनामी की तरह किसी एक पार्टी के ही पक्ष में न चले जाएं, तो अलग-अलग प्रदेशों में बिखरी पार्टियों और गठबंधनों के असर का हिसाब लगाना बहुत बड़ी पहेली रहता है। यह भी समझना कुछ मुश्किल है कि मतदान शुरू होने के दो दिन पहले आए इस घोषणापत्र का कितना विश्लेषण जनता तक पहुंच पाएगा क्योंकि कुछ घंटों के बाद चुनाव प्रचार का पहला दौर बंद भी होने जा रहा है। फिलहाल जनता का जो तबका घोषणापत्रों को गंभीरता से लेता है, उसे कांग्रेस और भाजपा दोनों के इस बार के घोषणापत्र की आपस में तुलना तो करनी ही चाहिए, साथ-साथ इन्हीं पार्टियों के घोषणापत्र से भी उनके ताजा दस्तावेज मिलान करने चाहिए। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 07-Apr-2019
  • मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी अफसर और सलाहकार रहे लोगों पर बीती रात आयकर विभाग ने छापा मारा। कमलनाथ के एक भांजे कारोबारी हैं, उन पर भी छापा पड़ा। अभी मिलीजुली खबरें आ रही हैं जिनमें 16 करोड़ रूपए नगद मिलने की खबर है, लेकिन आयकर विभाग की अधिकृत जानकारी यह नहीं बता रही है कि किस ठिकाने से, किसके पास से कितनी नगदी मिली है। इतना जरूर कहा गया है कि हवाला के मार्फत रकम आने-जाने पर रखी गई निगरानी के चलते ये छापे डाले गए हैं। 

    इस बात में किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए कि मुख्यमंत्री के करीबी लोग चुनाव के दौरान नगद रकम का लेन-देन कर रहे थे। वामपंथियों को छोड़ देश की अधिकतर पार्टियां इसी तरह काम करती हैं, और पार्टी के उम्मीदवारों से लेकर मीडिया तक को रूपयों का लेन-देन मुख्यमंत्रियों के करीबी अफसर करते हैं। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के प्रभामंडल में काम करते-करते निष्ठावान अफसर जगह-जगह इस्तीफा देकर भी उनके साथ जुड़े रहते हैं, या रिटायर होने के बाद उनके साथ लगे रहते हैं। जो लोग ऐसी प्राथमिकताओं वाले हैं, वे अगर सरकारी नौकरी में रहते हुए भी पीएम-सीएम के राजनीतिक काम करते हैं तो यह मानवीय स्वभाव के मुताबिक ही एक बात है, और इसमें कोई हैरानी नहीं है। अब दिक्कत यह है कि ऐसी प्राथमिकताओं वाले अफसर सरकार में रहते हुए राजनीतिक प्रतिबद्धता से परे कैसे रखे जाएं? यह तो कालेधन की जब्ती के साथ आने वाली खबर है जो कि ऐसी प्रतिबद्धता बता रही है, लेकिन बहुत से मामलों में अधिकारी मुख्यमंत्री के साथ रहते हुए उनकी इतनी सेवा करते हैं, ऐसी-ऐसी सेवा करते हैं कि रिटायर होने के बाद वे उसी राज्य में बड़े-बड़े सुविधाभोगी या मलाईदार पद पा जाते हैं। 

    हम बरसों से इस बारे में लिखते आए हैं कि रिटायरमेंट के बाद अधिकारियों का उसी राज्य में मनोनयन से किसी किस्म का पुनर्वास नहीं होना चाहिए। जब राज्य में ऐसी परंपरा रहती है तो बहुत से अफसर आखिरी के बरसों में अपनी जिम्मेदारी और नियम-कानून से समझौता करते हुए राजनीतिक मुखिया की चाकरी और चापलूसी में जुट जाते हैं ताकि रिटायर होने के बाद भी उनकी सहूलियतें जारी रहें, सम्मान का पद जारी रहे। हर राज्य में कुछ ऐसे संवैधानिक पद भी होते हैं जिन पर हाईकोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की ही नियुक्ति हो सकती है, और ऐसा पद पाने के लिए भी जजों को अदालत में बैठते हुए सरकार का ख्याल रखने की अच्छी खासी चर्चा रहती है। यह पूरा सिलसिला सुप्रीम कोर्ट द्वारा खत्म किया जाना चाहिए कि किसी भी राज्य के किसी भी ऐसे पद पर अगर अदालती या सरकारी तजुर्बे वाले लोगों की जरूरत है, तो उन्हें दूसरे राज्यों से लाया जाए, न कि अपने ही राज्यों के लोगों को उनकी सेवाओं के बदले इनाम के रूप में ये दफ्तर दिए जाएं। राजनेताओं के आसपास तैनात होने वाले अधिकारियों को लेकर भी कोई नीति बनाने की जरूरत है क्योंकि बहुत से नेता अपने करीबी लोगों, और रिश्तेदारों को अपने निजी स्टॉफ में रख लेते हैं, और वे संविधानेत्तर सत्ता बनकर काम करते हैं। छत्तीसगढ़ में तो अभी एक मंत्री ने अपनी शासकीय चिकित्सक पत्नी को ही अपना ओएसडी बना लिया था जिसे विरोध के बाद हटाना पड़ा। लेकिन बहुत से दूसरे मंत्री अपनी औलादों को, या अपने रिश्तेदारों को निजी स्टॉफ में रखकर विभाग को घर की खेती की तरह चला रहे हैं। 

    जिस मुद्दे से आज की बात शुरू हुई थी, उस पर लौटें, तो छत्तीसगढ़ में आज की सरकार पिछली रमन सरकार के ऐसे बहुत से करीबी और चहेते अफसरों के कामकाज की जांच में जुटी हुई है जो कि सरकारी ताकत का बेजा इस्तेमाल करते आ रहे थे। इस सिलसिले को खत्म करने के लिए ऐसा पुख्ता इंतजाम करना चाहिए कि रिटायर होने के बाद लोगों को उस राज्य में न तो मनोनयन से कोई जगह मिले, न ही संविदा नियुक्ति से। सरकार को अपने नियमित ढांचे से काम करवाना चाहिए, बजाय इसके कि मुख्यमंत्री अपने पसंदीदा लोगों को पूरी जिंदगी किसी न किसी हैसियत से सरकारी खर्च पर रखे। कालाधन अगर किसी के पास पकड़ाया है, तो वह देश के कानून के तहत सरकार के प्रति जवाबदेह है, और यह बात चाहे कितनी ही आम क्यों न हों, माफ नहीं की जा सकती। यह एक अलग बात है कि जिस सरकार के हाथ में जांच एजेंसियां रहती हैं, वह सरकार अपने चुनिंदा निशानों को घेरे में लाती हैं, और बाकी लोगों को जानबख्शी देकर चलती है। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 06-Apr-2019
  • भारत जैसे लोकतंत्र की राजनीति में लोग जब बोलना शुरू करते हैं, तो फिर रूकना कुछ मुश्किल लगता है। कुछ लोग कॉलेज के मेहनती प्राध्यापकों की तरह 40 या 45 मिनट तक लगातार बोलते हैं, तो कुछ लोग मजमे का अंदाज देखकर कम-ज्यादा करते रहते हैं। लेकिन जब बोलना बहुत अधिक होता है, तो धीरे-धीरे उसमें कुछ चूक होने का खतरा बढऩे लगता है। अभी मोदी सरकार और भाजपा के भीतर इस बात को लेकर तेज आंच महसूस की ही जा रही थी कि पार्टी के एक ऐतिहासिक नेता लालकृष्ण अडवानी ने एक ब्लॉग लिखकर किस तरह बिना नाम लिए पांच बरसों के मोदी, और पांच बरसों की भाजपा की खासी आलोचना कर दी है। इस बीच ही मीडिया खुद होकर अडवानी की कही बातों पर लिख रहा था, टीवी चैनलों पर चर्चा हो रही थी, और अडवानी के लिखे हुए का थोड़ा-बहुत जो भी चुनावी असर होना था, वह हो रहा था, कि इसी बीच कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ ऐसी अटपटी बात कह दी जो कि अनावश्यक भी थी, और अवांछित भी। उन्होंने कहा कि मोदी अपने गुरू अडवानी के सामने हाथ भी नहीं जोड़ते, स्टेज से उठाकर फेंक दिया अडवानीजी को, जूता मार के अडवानीजी को उतारा स्टेज से, और हिन्दू धर्म की बात करते हैं। हिन्दू धर्म में कहां लिखा है कि लोगों को मारना चाहिए? इस पर मोदी सरकार की एक उपेक्षित मंत्री, और अडवानी-खेमे की मानी जाने वाली, सुषमा स्वराज ने लिखा- राहुलजी, अडवानीजी हमारे पिता तुल्य हैं, आपके बयान ने हमें बहुत आहत किया है, कृपया भाषा की मर्यादा रखने की कोशिश करें। 

    जब लालकृष्ण अडवानी ने अपने ब्लॉग पर मोदी-अमित शाह की सरकार और पार्टी के तौर-तरीकों पर परोक्ष हमला करते हुए यह लिखा था कि अपनी स्थापना के बाद से ही भाजपा ने उन्हें कभी भी शत्रु नहीं माना, राष्ट्रविरोधी नहीं कहा, जो राजनीतिक रूप से हमसे असहमत थे। उनकी यह बात खासी धारदार थी, और जो लोग उनकी बात को गंभीरता से ले रहे थे, वे उसे आगे भी बढ़ा रहे थे। ऐसे में जब भाजपा के भीतर से ही, उसके ऐतिहासिक नेता के मुंह से मोदी-शाह के लिए ऐसी तीखी परोक्ष आलोचना निकल रही थी, तो उसी बीच में राहुल ने अपनी लापरवाह बात से सार्वजनिक चर्चा को अपने खिलाफ मोड़ दिया। उन्हें न सिर्फ राजनीति, बल्कि सामान्य जिंदगी की इस सामान्य समझ को याद रखना था कि जब दुश्मन खेमा अपने आपमें तलवारबाजी कर रहा हो, तो किसी समझदार को उसमें नहीं कूदना चाहिए। देश में वैसे ही मोदी के सामने एक याचक की मुद्रा में हाथ जोड़े खड़े अडवानी की तस्वीरें संदर्भ से परे जाकर भी असर डाल रही थीं, अडवानी घर बैठे मोदी-शाह का नाम लिए बिना उनके खिलाफ ब्लॉग लिख रहे थे, ऐसे में एक चुनावी मंच से राहुल गांधी ने जिस जुबान में, जैसे विशेषणों और शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मोदी पर हमला किया, वह हमला दरअसल उन पर खुद पर हो गया। उन्होंने अपनी ही टीम के गोलपोस्ट में गोल दाग दिया, और इसका नुकसान राहुल और उनकी पार्टी को हर जगह होगा। यह नुकसान कितना होगा इसे जांचने-परखने का कोई जरिया है नहीं, क्योंकि चुनावी नतीजे बहुत सी बातों का मिलाजुला असर होते हैं। लेकिन यह बात बदमजा थी, और किसी भी अच्छे इंसान को ऐसी लापरवाही नहीं दिखाना चाहिए। मोदी को कोसना कांग्रेसाध्यक्ष की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन खराब बात को नापसंद करना भी समझदार जनता की जिम्मेदारी होती है। अभी चूंकि कुछ महीनों का चुनाव अभियान बाकी ही है, इसलिए राहुल गांधी को अपने शब्दों को वापिस लेना चाहिए। अपनी गलती को वापिस लेने, खेद जाहिर करने से कोई नुकसान नहीं होता, अपनी गलती पर अड़े रहने से वह एक गलत काम के रूप में दर्ज हो जाती है। राहुल को बिना देर किए अपने शब्दों पर अफसोस जाहिर करना चाहिए, उसी के साथ यह मुद्दा दफन हो सकता है, वरना उनके इन शब्दों का वीडियो चारों तरफ फैलते ही जा रहा है। उनकी इस बात से तो लोग सहमत हो सकते हैं कि मोदी अडवानी के नमस्ते का भी जवाब नहीं देते, पर उनकी इस बात से भला कौन सहमत हो सकता है कि मोदी ने अडवानी को जूते मारकर स्टेज से निकाल दिया?
    -सुनील कुमार

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