संपादकीय

Posted Date : 19-Jan-2019
  • मध्यप्रदेश में बसे हुए, और हिन्दू संगठनों, पार्टियों के बीच खासे लोकप्रिय रहे आध्यात्मिक गुरू कहे जाने वाले भय्यूजी महाराज का अंत जिस तरह हुआ है उसने संत और गुरू नाम की नस्लों के बारे में लोगों को एक बार फिर सोचने का मौका दिया है। आध्यात्म और धर्म, संतई और गुरुडम के नाम पर अथाह दौलत इक_ी करना, वैध-अवैध संबंध रखना, ब्लैकमेल करना या ब्लैकमेल होना, और आखिर में अपने ही कर्मों से घिरकर आत्महत्या कर लेना! जिसकी खुद की ऐसी दुर्गति हुई हो उनको बड़े-बड़े राजनीतिक दल और बड़े-बड़े नेता मध्यस्थता करने के लिए सम्मान देते आए हैं। लेकिन हाल के बरसों में बापू कहा जाने वाला आसाराम, बाबा कहा जाने वाला रामपाल, बाबा कहा जाने वाला राम-रहीम, और महाराज कहे जाने वाले भय्यूजी की जो कहानियां सामने आई हैं उनसे आस्थावान लोगों की अक्ल थोड़ी सी तो लौटनी चाहिए, लेकिन हो सकता है कि न भी लौटे, और वे अब तक न पकड़ाए, अब तक जेल न गए किसी और चोगाधारी से अपनी तबाही का सामान जुटाते रहें। 

    धर्म और आध्यात्म के नाम पर होने वाली जालसाजी और धोखाधड़ी बड़ी भयानक है। लोग ईश्वर, गुरू, या संत कहे जाने वाले पर ऐसी अंधश्रद्धा रखने लगते हैं कि आस्था के ऐसे केन्द्रों का तबाह होना आसान होने लगता है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ऐसी ही आस्था की एक दुकान बड़ी करते-करते एक आदमी के हाथ इतने लंबे हो गए कि उसने विश्वविद्यालय खोल लिया, और उसके पैरों पर बड़े-बड़े अफसर, जज, और मंत्री पड़े दिखते थे। आस्था के ऐसे बुलबुले फूटने में वक्त लगाते हैं, लेकिन अमूमन फूट ही जाते हैं। इस बीच वे मध्यस्थता के नाम पर कई किस्म की दलाली करते हैं। जिनके नाम पर विश्वविद्यालय चलता है उनकी दलाली का हाल यह है कि सबसे बुरे मुजरिमों को अदालतों से छुड़वाने के लिए वे जज के साथ मध्यस्थता कर लेते हैं, और पुलिस के आला अफसरों के साथ मध्यस्थता करते हैं ताकि अदालत तक पहुंचने वाला केस ही कमजोर हो जाए। ऐसी भी चर्चा है कि वे मध्यप्रदेश में अपने ठिकाने से मुजरिमों को बंदूकें भाड़े पर देते हैं, और अपने पैरों पर पड़े मंत्रियों से सरकारी कामकाज में जुर्म की दलाली भी करते हैं। 

    यह देश किस्मत पर भरोसा करने वाले भाग्यवादियों से भरा हुआ है, और वे अपने काम पर भरोसा करने के बजाय इस तरह के पाखंडों पर भरोसा करते हैं जो कि उनके घर की महिलाओं की इज्जत लूटते हैं, बच्चों का देह शोषण करते हैं, दलाली, भ्रष्टाचार, और जुर्म से अरबपति-खरबपति हो जाते हैं, और लोगों के दिल-दिमाग को गुलाम भी बनाकर रखते हैं। अंधविश्वास रखने वाले लोग किसी न किसी पाखंड की तलाश में रहते हैं ताकि अपनी सब दिक्कतों को उस पर डाल देने, और उनके हल हो जाने की खुशफहमी में जिंदा रह सकें। आत्मविश्वास की कमी, कोशिशों की कमी, और भाग्यवादी होना, ऐसी तमाम बातों को लेकर लोग ऐसे कमजोर दिल-दिमाग के होने लगते हैं कि फीस देकर एक निर्मल बाबा के पास चले जाते हैं, और उसका बताया इलाज करने के लिए बाहर आकर बुधवार को काली बकरी को मीठी चटनी वाला गुपचुप खिलाकर अपने भाग्य के उदय का इंतजार भी करते हैं। अनगिनत ऐसे लोग रहते हैं जो अपने नाबालिग बच्चों की देह भी ऐसे पाखंडियों के हवाले कर देते हैं, यह जानते हुए कि उनके साथ बलात्कार हो रहा है, और वे इसे स्वर्ग तक पहुंचने की राह मान लेते हैं। 

    दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तानियों की सोच से वैज्ञानिक समझबूझ को तो सोच-समझकर भारी कोशिशों से मिटाया गया है, उनकी अपनी सामान्य समझबूझ और प्राकृतिक तर्कशक्ति भी पाखंडियों के आभामंडल में खो चुकी है। जिनकी उम्र मेहनत करने की है वे घंटों तक रोज ईश्वर के सामने बैठे रहते हैं, उसी ईश्वर के सामने जो कि बच्चियों से बलात्कार को देखता हुआ चुप बैठे रहता है, और जिसे अपने को सर्वज्ञ, सर्वत्र, और सर्वशक्तिमान कहलाने में भी कोई शर्म नहीं आती है। जिन लोगों का जी ऐसे ईश्वरों से नहीं भरता है, वे उसके जीते-जागते दलाल या एजेंट ढूंढ लेते हैं, और अपने मन की कमजोरियों को इन दलालों के साये में आत्मविश्वास में बदलने की खुशफहमी पाल लेते हैं। हर समझदार इंसान की यह जिम्मेदारी है कि अपने आसपास के ऐसे नासमझ अंधविश्वासियों को बार-बार याद दिलाए कि उनकी आस्था के केन्द्र किस तरह बलात्कारी हैं, भ्रष्ट हैं, और अरबपति-खरबपति होते हुए भी आसपास के गरीब भक्तों को किस तरह लूटते हैं। जो बेवकूफ लोग हजारों की टिकट खरीदकर किसी बाबा से यह सुनने जाते हैं कि भूरे चावलों की खीर बनाकर इतवार को उसे काले कुत्ते को खिलाने से भाग्योदय हो जाएगा, उन बेवकूफों की मदद करना समाज के बाकी लोगों की जिम्मेदारी है, खीर और कुत्ते से नहीं, उन्हें अक्ल देकर। फिलहाल लोग भय्यूजी महाराज जैसे चर्चित आदमी के सेक्स और ब्लैकमेल की कहानियों को पढ़कर, मजा लेकर उनकी खुदकुशी पर अफसोस जाहिर कर सकते हैं। दिक्कत यह है कि ऐसी पूरी कहानी को छापने के लिए एक वक्त की बड़ी मशहूर अपराध-पत्रिका मनोहर कहानियां आज शायद निकलती नहीं है। 

    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 18-Jan-2019
  • महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार के समय से डांस बार पर रोक लगाने की जो नीयत शुरू हुई थी, वह वहां पर अब भाजपा-शिवसेना सरकार के चलते हुए भी उसी तरह जारी है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट एक से अधिक बार इस मामले में फैसला दे चुका है, और डांस बार शुरू करने के अदालती आदेश के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार ने कानून बनाने जैसा काम भी किया ताकि उसे लागू न करना पड़े। अभी कल सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला सामने आया है उसमें एक बार फिर डांस बार को इजाजत दी गई है, और कुछ किस्म की बंदिशें लगाई गई हैं जो कि सरकारी तर्क को मानना भी है, और डांस बार चलाने वाले लोगों के तर्क को मानना भी है। अदालत ने यह रोक लगाई है कि लोग डांसरों पर नोट नहीं लुटा सकेंगे, लेकिन उन्हें टिप दे सकेंगे। दूसरी तरफ महाराष्ट्र सरकार की इस बात को अदालत ने खारिज कर दिया कि डांस बार के भीतर कैमरे लगाए जाएंगे, और पास के थाने में टीवी स्क्रीन पर उनकी रिकॉर्डिंग को देखा जा सकेगा। अदालत ने इसे निजता के खिलाफ माना, और इसकी इजाजत नहीं दी। दूसरी तरफ डांस देखते हुए शराब पीने की छूट दी गई है। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट ने डांस बार को कानूनी माना, उन्हें चलाने की छूट दी, और नोट लुटाने पर रोक जैसी कुछ छोटी-मोटी बंदिशें जरूर लगाई हैं। 

    अब इस रोक की बात करें, तो लगता है कि हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट के पास आखिर वक्त कितना है कि वह डांस बार में डांस करती वयस्क महिला पर वयस्क लोगों द्वारा नोट लुटाने या उन्हें टिप देने में फर्क कर रहा है? सोशल मीडिया पर आए दिन ऐसे वीडियो तैरते हैं जिनमें उत्तर भारत के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में बहुत ही कम कपड़ों में नाचती हुई किसी लड़की या महिला पर वहां के कोई नेता नोट लुटा रहे हैं। यह भारत के एक बड़े हिस्से की संस्कृति है। इससे परे कव्वाली के जितने सार्वजनिक कार्यक्रम होते हैं, उनमें यह एक सांस्कृतिक हिस्सा ही है कि लोग कोई शेर पसंद आने पर चलकर-जाकर स्टेज के पास खड़े होकर कव्वाल या कव्वालन को नोट देते जाते हैं। कुछ कार्यक्रमों में तो यह एक मजेदार नजारा रहता है कि नोटों से लबालब प्रशंसक सामने खड़े रहते हैं, और एक-एक कर खासी देर तक नोट देते जाते हैं। गुजरात और राजस्थान के ऐसे बहुत से वीडियो सामने आते हैं जिनमें किसी कीर्तन या धार्मिक संगीत के आयोजन में लोग खड़े होकर नोट लुटाते हैं, और आखिर में ऐसे आंकड़े भी आते हैं कि एक आयोजन में किस तरह दसियों लाख रूपए इक_े हुए, और उन्हें समाज सेवा के किस काम में लगाया गया। इससे परे सड़कों पर निकलती बारातों में देखा जा सकता है कि किस तरह दूल्हे पर से नोट उतारे जाते हैं, या लुटाए जाते हैं। और तो और हिन्दुओं में जब अर्थी निकलती है, तो उसके ऊपर से भी सिक्के लुटाए जाते हैं, और शवयात्रा के साथ-साथ गरीब बच्चे दौड़-दौड़कर उन सिक्कों को उठाते दिखना एक आम बात है। 

    अब सवाल यह है कि वयस्क मनोरंजन की एक रोजी-रोटी में लगी हुई महिला को अगर उस पर लुटाए गए कुछ नोट मिल जाएं, तो इस पर सुप्रीम कोर्ट को कोई दिक्कत आखिर क्यों होनी चाहिए? अगर देश की मुद्रा को इस तरह हवा में उछालना मुद्रा का अपमान है, तो फिर वह कीर्तनों पर भी लागू करने लायक रोक है, महज डांस बार पर क्यों? सुप्रीम कोर्ट का फैसला मोटे तौर पर एक अच्छा फैसला है जो लोगों की वयस्क मनोरंजन की जरूरतों को मान्यता देता है, और ऐसे मनोरंजन से महिलाओं को रोजी-रोटी कमाने को भी। लेकिन फिजूल की छोटी-छोटी बातों में सुप्रीम कोर्ट को नहीं जाना चाहिए, और मोहब्बत या खुदा के नाम पर होने वाली कव्वाली में, ईश्वर के नाम पर होने वाले कीर्तन में नोटों को लुटाना या थमाना अगर जायज है, तो डांस बार से मजदूरी कमाने वाली महिला के लिए वैसी बख्शीश क्यों नाजायज होनी चाहिए? 

    हम पिछले बरसों में कई बार महाराष्ट्र की डांस-बार-रोक के खिलाफ लिख चुके थे, और यह भी कहा था कि इस तरह दसियों हजार महिलाओं से सुरक्षित मनोरंजन का यह रोजगार छीनकर महाराष्ट्र सरकार ने किस तरह उनको देह बेचने के धंधे की तरफ धकेला था। अब सुप्रीम कोर्ट की कई बार की दखल के बाद इस सरकारी बददिमागी को खत्म मानना चाहिए जो कि कांग्रेस सरकार से लेकर भाजपा-शिवसेना सरकार तक जारी है। वयस्क मनोरंजन की जरूरत को मानने से इंकार करना एक पाखंड से परे कुछ नहीं है, और इक्कीसवीं सदी में भी सरकारी पाखंड को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट की दखल का जरूरी होना निहायत शर्मिंदगी की बात है, और लोकतंत्र में परिपक्वता की कमी की बात भी है। इस देश के इतिहास में सदियों से नृत्यांगनाओं के रोजगार की परंपरा रही है, और यह आज की वयस्क मनोरंजन की जरूरत भी है। 

    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 17-Jan-2019
  • भारतीय क्रिकेट टीम के दो खिलाड़ी, हार्दिक पंड्या और के.एल. राहुल को कॉफी विद करण नाम के एक कार्यक्रम में अपने सेक्स जीवन और महिलाओं के प्रति हिकारत की गंदी बातों की वजह से टीम से हटा दिया गया है। यह सजा वैसे तो दो मैचों के लिए दी गई है, लेकिन इससे परे भी उनका एक नुकसान यह हुआ है कि करोड़ों के मॉडलिंग के काम उनसे छीन लिए गए हैं। यह बवाल इस कार्यक्रम के प्रसारण के बाद हुआ, और अब तक खत्म होते दिख नहीं रहा है। 

    दरअसल जिन लोगों ने इस कार्यक्रम को पहले भी देखा है वे जानते हैं कि करण जौहर मुम्बई की फिल्मी दुनिया में सबसे बड़े अफवाहबाज का तमगा अपने लिए कई लोगों के मुंह से सुनते हुए भारी खुश होते हैं, और एक फिल्म निर्माता-निर्देशक या टीवी-जज की हैसियत से वे पूरे फिल्म उद्योग के बीच रहते हैं, और लोगों की निजी जिंदगी, आपसी रिश्तों की हकीकत और अफवाह से अच्छी तरह वाकिफ रहते हैं। नतीजा यह होता है कि उनका कार्यक्रम फिल्मी सितारों की निजी जिंदगी की ऐसी परतें उधेडऩे की ताकत रखता है जिसे आम जनता सुनना चाहती है। अब अगर इन दो क्रिकेट खिलाडिय़ों पर कार्रवाई न हुई होती, तो उस कार्यक्रम को देखने वाले अधिकतर लोगों ने उसे भारी सनसनीखेज मजे वाला पाया होगा। फिर जब कुछ जागरूक लोगों ने उसके खिलाफ हल्ला किया, तो लोगों को लगा होगा कि अरे उसमें कुछ गलत भी था। सच तो यह है कि इंसानी मिजाज उन वर्जित चीजों के बारे में अधिक सुनना, अधिक देखना, और उन्हें अधिक करना चाहता है जिससे उसे सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से रोका गया है। हिन्दुस्तानी समाज में जिस तरह सेक्स की चर्चा को एक वर्जित विषय बना दिया गया है, उसका एक नतीजा यह भी निकला है कि लोग इस वर्जित विषय के बारे में रद्दी से रद्दी तरह से सोचते हैं, और बातें करते हैं। हिन्दुस्तान की आम सेक्स-चर्चा, सेक्स के जुर्म, उसकी विकृति, और उसके नकारात्मक पहलुओं तक सीमित रह जाती है। ऐसा सेक्स-कुंठित समाज जब करण जौहर जैसे शो में सितारों की निजी अफवाहों को सनसनीखेज तरीके से सुनता है, तो वह बंधा रह जाता है। 

    यह तो ठीक है कि सार्वजनिक जीवन के जो घोषित पैमाने होते हैं, उन पर खोटा उतरने के बाद इन दो क्रिकेट खिलाडिय़ों को दो मैचों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया, लेकिन लोगों को उनकी उत्तेजक सेक्स-चर्चा से जो मजा पाना था, वे पा चुके, और करण जौहर के इस शो को जो अतिरिक्त शोहरत हासिल होनी थी, वह भी हो चुकी। यह सजा गलत नहीं है, लेकिन समाज के बहुत ही कम लोगों को इस कार्यक्रम को देखते हुए यह अहसास रहा होगा कि यह सजा के लायक है। कुछ जागरूक लोगों ने सार्वजनिक रूप से जब ऐसी गंदी चर्चा पर आपत्ति की, तो फिर उसके बाद क्रिकेट बोर्ड के सामने सिवाय सजा देने के और कोई विकल्प बचा नहीं था। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि फिल्मी सितारे, संगीत या क्रिकेट सितारे अपने आसपास के मंत्रमुग्ध प्रशंसकों के साथ आए दिन शोषण का ऐसा बर्ताव करते हैं, और उनके आभा मंडल से बावले हो गए लोग उनके सामने अपने कपड़े भी खुद होकर ही शायद उतार देते हैं। ऐसे में भारत की सार्वजनिक चर्चा को लेकर यह सोचने की जरूरत है कि क्या वर्जित विषयों पर बातचीत इस हद तक खत्म हो जानी चाहिए कि उसे निजी स्तर तक उधेड़कर लोग टीवी पर दर्शकों को बांधने का कारोबार करें? क्या इस देश में वयस्क विषयों पर वयस्क लोगों के बीच गंभीर और परिपक्व चर्चा की गुंजाइश नहीं है? और तो और हिन्दुस्तान में वयस्क विषयों पर किसी पत्रिका की गुंजाइश भी कभी नहीं निकल पाई, और घटिया पोर्नोग्राफी को ही वयस्क सामग्री मान लिया गया। 

    अंग्रेजों के वक्त चर्च के थोपे गए वर्जित विषयों के पैमानों से उसके पहले तक परिपक्व रहते आए भारत को अपनी वयस्क जरूरतों को बेहतर समझने की जरूरत क्या नहीं है? 

    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 16-Jan-2019
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से परसों ट्विटर पर उनकी एक तस्वीर के साथ एक सम्मान उन्हें मिलने की जानकारी डाली गई। एक के बाद एक कई तस्वीरों, और कई ट्वीट में बताया गया कि नरेन्द्र मोदी फिलिप कोटलर प्रेसीडेंशियल अवार्ड पाने वाले पहले व्यक्ति हैं। इसके बाद केन्द्रीय मंत्रियों और भाजपा के नेताओं द्वारा बधाईयों का सैलाब आना स्वाभाविक और जायज दोनों ही था। लेकिन कुछ खोजी पत्रकारों ने पता लगाने की कोशिश की कि अब तक अनदेखा और अनसुना यह सम्मान आखिर क्या है, कहां से आया है, किसने इसे तय किया है? काफी तलाश के बाद मीडिया के हाथ जो जानकारी हासिल लगी उसके मुताबिक फिलिप कोटलर नाम के एक मार्केटिंग गुरू की एक मार्केटिंग संस्था ने यह सम्मान शुरू किया है, और इसका कोई निर्णायक मंडल नहीं है, इसके कोई सार्वजनिक पैमाने नहीं हैं, और न ही सम्मान के लिए सोचे गए नामों का कोई पैनल है जिसमें से किसी एक को छांटा गया हो। हिन्दुस्तान में मार्केटिंग पर एक कांफ्रेंस चल रही है, जिसके चलते फिलिप कोटलर नाम के इस अमरीकी प्रोफेसर ने अमरीका में बैठे हुए यह तय किया कि मोदी इसके हकदार हैं। और यह बात भी सम्मान के समय नहीं बताई गई, बाद में अपने नाम पर रखे गए इस सम्मान को लेकर इस प्रोफेसर ने ट्वीट किया कि वे मोदी को सम्मान देने खुद भारत नहीं आ पाए थे, इसलिए उनके साथियों ने यह सम्मान दिया। 

    इससे कुछ बातें उठती हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। क्या भारत जैसे विशाल लोकतंत्र का प्रधानमंत्री किसी ऐसे सम्मान से सचमुच ही सम्मानित होता है जो कि एक मार्केटिंग कंपनी के मार्केटिंग सम्मेलन में एक मार्केटिंग गुरू के नाम पर रखा गया है, और वह स्वनामधन्य प्रोफेसर इसे देने आने की जहमत भी नहीं उठाता? और फिर इस मार्केटिंग सम्मेलन के रिपब्लिक टीवी और पातंजलि जैसी कंपनियां प्रायोजक हैं, जो कि घोषित तौर पर नरेन्द्र मोदी की पक्षधर हैं, और उनकी समर्थक मानी जाती हैं। दुनिया का सबसे बड़ा यह लोकतंत्र क्या अपने मुखिया के लिए मार्केटिंग शब्द से जुड़े हुए संगठन और आयोजन के ऐसे किसी सम्मान से सम्मानित हो सकता है जिसका कुल जमा मकसद मार्केटिंग है? क्या ऐसे सम्मान से लोगों को मोदी के बारे में पहले से कही जा रही ये बातें दुबारा याद नहीं पड़ती हैं कि वे अपनी मार्केटिंग करते हैं, और दुनिया में जहां जाते हैं वहां हिन्दुस्तानियों के बीच उनके आयोजन मार्केटिंग की कामयाबी रहते हैं?

    यह पूरा सिलसिला बड़ा बदमजा है। सार्वजनिक जीवन के लोगों को ऐसे किसी भी सम्मान से बचना चाहिए जिसके पीछे बहुत ही सम्मानित, विश्वसनीय, और निष्पक्ष संगठन या संस्थाएं न हों। जिसके लिए पहले से घोषित निर्णायक मंडल और चयन प्रक्रिया न हों। जिसके लिए एक से अधिक नामों पर विचार न किया गया हो,  और चयन के पैमाने घोषित न किए गए हों। ऐसे किसी सम्मान से सिवाय अपमान के और कुछ नहीं बढ़ता। यह बात महज मोदी के बारे में नहीं है, और न ही इस सम्मान के बारे में है। सवाल यह है कि केवल मार्केटिंग पर केन्द्रित एक संस्था और उसका आयोजन क्यों ऐसे किसी सम्मान को शुरू कर रहे हैं जो कि बिना किसी पूर्व घोषणा के, बिना किसी निर्णायक मंडल के महज एक मार्केटिंग-प्रोफेसर के तय किए हुए दिया जा रहा है? यह पूरा सिलसिला भारत के प्रधानमंत्री की शान को बढ़ाने वाला नहीं है, बल्कि घटाने वाला है, और मार्केटिंग के कारोबारियों से ऐसा सम्मान पाने से नरेन्द्र मोदी को बचना भी चाहिए था। 

    हम पहले पत्रकारों के बारे में भी यह बात लिखते आए हैं कि उन्हें कोई सम्मान मंजूर करने से बचना चाहिए, तब तक, जब तक कि उसके लिए पहले से घोषित कोई निर्णायक मंडल न हो, निर्णय के पैमाने घोषित न हों, चयन प्रक्रिया घोषित न हों, और लोगों को अपने या दूसरे लोगों के नाम उसके लिए भेजने की छूट न हो। इसके अलावा सम्मान करने या देने वाली संस्था की साख, विश्वसनीयता, निष्पक्षता, और नीयत सब कुछ साफ न हो, तब तक किसी को भी ऐसे सम्मान से बचना चाहिए। अखबारनवीसों के मामले में यह बात खासकर इसलिए लिखी थी कि उनके पेशे की ताकत के चलते बहुत सी संस्थाएं, और बहुत से संगठन उनका ऐसा सम्मान करके आगे-पीछे उनका साथ और समर्थन पाने का धंधा करते हैं। जब अखबारनवीसी के पेशे के काम के लिए कोई ऐसा पुरस्कार हो जिसमें लोग अपने लिखे हुए को या अपनी तस्वीरों-कार्टून को भेज सकें, और फिर उनके काम का एक पारदर्शी मुकाबला हो, और उसके बाद ईमानदारी और विश्वसनीयता से विजेता तय हो, तो वह एक अलग बात है। 

    फिलहाल भारतीय प्रधानमंत्री जैसा भी सम्मान चाहें, जैसा भी सम्मान ठीक समझें, उसे लेने का हक रखते हैं, लेकिन बात-बात में आजाद भारत के प्रधानमंत्रियों की चर्चा इन दिनों चूंकि आम है, इसलिए एक बार लोगों को यह तुलना तो सूझती ही है कि जवाहरलाल नेहरू से लेकर एक्सीडेंटल प्राईम मिनिस्टर तक कितने प्रधानमंत्रियों ने ऐसा मार्केटिंग-सम्मान लिया होता?  

     

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Posted Date : 15-Jan-2019
  • लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े उस कमेटी में थे जिसमें प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को हटाना तय किया था। खडग़े ने इसका विरोध किया था, और अपने लिखित तर्क कमेटी के सामने रखे थे। उन्होंने बाद में अपनी उस लंबी चि_ी को सार्वजनिक भी कर दिया था जिसमें कहा गया था कि वर्मा को हटाना गलत होगा। अब उन्होंने प्रधानमंत्री को एक चि_ी लिखी है, और कहा है कि वर्मा को हटाने से जुड़े हुए सारे दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं, और इस बैठक का ब्यौरा भी जनता के सामने रखा जाए ताकि मतभेद वाले इस फैसले की बातें लोग खुद देखें, और तय करें कि सही क्या और गलत क्या है। 
    खडग़े की बात कोई नई नहीं है, और समय-समय पर देश में यह बात उठते रही है कि ऐसे तमाम दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए जिन्हें गोपनीय रखना सरकार के कारोबारी हितों के लिए, या देश की सुरक्षा के लिए गोपनीय रखना जरूरी न हो। मोटे तौर पर बात यह है कि उन तमाम दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए जो सूचना के अधिकार के तहत पाने का अधिकार जनता रखती है, या जिन्हें गोपनीय रखने का अधिकार सरकार को नहीं दिया गया है। हम पहले भी सूचना के अधिकार को लेकर यह बात लिखते आए हैं कि यह कानून एक दूसरे नजरिए से देखा जाना चाहिए। लोकतंत्र में सूचना पाना जनता का अधिकार नहीं होना चाहिए, बल्कि सूचना देना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। आज सरकार से कोई जानकारी पाने में माहौल यह रहता है कि जनता की मांग को तरह-तरह से रोकने की कोशिश जारी रहती है, और सूचना अधिकारियों के पद पर बैठे लोग, सूचना आयोगों में बैठे हुए भूतपूर्व अफसर लगातार यह कोशिश करते हैं कि किसी जानकारी को कैसे लपेटकर गोपनीय रखा जाए। भारत में दिक्कत यह है कि सूचना आयोगों को रिटायर्ड आला-अफसरों के पुनर्वास केन्द्र की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। और अंग्रेजों के वक्त से अब तक भारतीय नौकरशाही का नजरिया सूचना पर बपौती का रहा है। लोग अपनी किसी भी फाईल में किसी दूसरे को झांकने नहीं देना चाहते। नतीजा यह होता है कि सरकारी ढांचा गलत काम करते हुए, भ्रष्टाचार करते हुए भी उसे छुपाने में कामयाब रहता है। बहुत से मामलों में तो प्रदेश से ऊपर राष्ट्रीय स्तर पर सूचना आयोग तक जाकर लोगों को संघर्ष करना पड़ता है, और उसके बावजूद लोगों को प्रधानमंत्री या किसी केन्द्रीय मंत्री की डिग्री जैसी मामूली जानकारी भी बरसों तक नहीं मिलती है। 
    लोगों को याद होगा कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जब अपनी संपत्ति घोषित करने से मना कर दिया था, और उसके खिलाफ कोई दिल्ली हाईकोर्ट गया था, तो हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट जजों की मनमानी के खिलाफ आदेश दिया था, और कहा था कि उन्हें संपत्ति घोषित करनी होगी। यह एक शर्मनाक नौबत थी जब सुप्रीम कोर्ट के जज अपनी निजी हैसियत से इस सार्वजनिक जवाबदेही से बचना चाह रहे थे, और उनके मातहत एक हाईकोर्ट उनकी मनमानी के खिलाफ आदेश दे रहा था। खडग़े ने अभी जो मांग की है वह मांग जायज इसलिए है कि सीबीआई प्रमुख किसे बनाया जाए, या किसे उस कुर्सी से हटाया जाए, इससे कोई राष्ट्रीय सुरक्षा जुड़ी हुई नहीं है, और न ही कोई सरकारी कारोबार इससे प्रभावित हो रहा है। सूचना का अधिकार अपनी भावना में सरकार पर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह खुद होकर जनता के सामने तमाम जानकारियों को रखे। आज जब देश में सुप्रीम कोर्ट के जजों और सीबीआई प्रमुख जैसे नाजुक ओहदों पर लोगों की तैनाती शक के घेरे में है, जब लोगों के बीच यह बात खुलकर सामने आती है कि इनमें से कई लोग किस खेमे के हैं, किस तरह वे पहले सत्ता पर काबिज लोगों पर अहसान कर चुके हैं, या आगे करने की गुंजाइश है, तो फिर लोगों के  सामने इनके चयन को लेकर तमाम बातें खुलकर सामने आनी चाहिए। ऐसी तमाम संस्थाओं की साख, और इन पर लोगों के चयन के जिम्मेदार लोगों की साख के लिए भी यह जरूरी है कि कुछ भी गोपनीय न रखा जाए। 
    हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने इस मुद्दे पर लिखते हुए पहले भी अमरीका की मिसाल दी है जहां पर ऐसे किसी भी बड़े और नाजुक ओहदे पर किसी को छांटते हुए संसद की कमेटी की खुली सुनवाई होती है, और उसका जीवंत प्रसारण भी होता है। सांसद एक-एक राज को पूछते हुए संभावित जजों, या ऐसे दूसरे संभावित लोगों की निजी जिंदगी की धज्जियां उड़ा देते हैं, उनकी सोच, उनकी विचारधारा के बारे में कई-कई दिनों तक सवाल करते हैं। यह सिलसिला भारत में भी सोचा जाना चाहिए कि दबे-छुपे बंद कमरों में दो-चार लोग ऐसा फैसला किस बुनियाद पर लेते हैं, उसे लेकर लोगों के मन में शक होने के बजाय लोगों के सामने यह पूरा सिलसिला पारदर्शी रहना चाहिए। 
    -सुनील कुमार

     

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Posted Date : 14-Jan-2019
  • छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए जिस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बहुमत से पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया, वही ताकत और वही रफ्तार पिछले कुछ हफ्तों की इस सरकार के फैसलों में दिख रही है। कुछ बहुत पुराने मामलों में जिस तरह जांच के आदेश हुए हैं, और अफसरों को जिस तरह हटाया गया है, कुछ अफसरों को बिना काम बिठाया गया है, कुछ को जैसी जांच का जैसा जिम्मा दिया गया है, उससे पूरी सरकार में एक हड़कम्प है। डेढ़ दशक से सत्ता से बाहर रही कांग्रेस, और जोगी-कार्यकाल में भी उपेक्षित रहे भूपेश बघेल अभी जिस रफ्तार से फैसले ले रहे हैं, उनके पीछे उनका आत्मविश्वास भी झलक रहा है, और ऐसा लग रहा है कि मतदान के बाद और शपथ ग्रहण के पहले का वक्त भी उन्होंने बहुत से सरकारी कामों की तैयारी में लगाया था। 

    राज्य में जितने विवादित और बड़े-बड़े अफसरों से लेकर मामलों तक की जांच शुरू हुई है, उनमें से किसी बात की उम्मीद जनता भाजपा सरकार बनने पर सोच भी नहीं सकती थी। और अभी तो मामलों का निकलना शुरू ही हुआ है, ऐसा लगता है कि अलग-अलग बहुत से विभागों में कई किस्म के भ्रष्टाचार सामने आएंगे, और उनसे जिन अफसरों-नेताओं की सेहत पर असर पड़ेगा, वे मौजूदा नई सरकार से लेकर आने वाली सरकारों तक के लिए एक सबक भी साबित होंगे। यह देखकर यह भी लगता है कि किसी भी सरकार को आने के बाद पिछली सरकार के खिलाफ चले आ रहे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए एक कमेटी बिठानी चाहिए। यह बात हम पिछले बरसों में कई बार लिख चुके हैं, और राजनीति में कई लोग इसे विच हंटिंग कहते हुए इससे परहेज की सलाह देते हैं, लेकिन हम इसे एक अनिवार्य जिम्मेदारी मानते हैं। लोकतंत्र में संविधान की शपथ लेने के बाद किसी को किसी दूसरे को माफ करने का हक नहीं मिलता है, बल्कि सही या गलत कामों पर कार्रवाई करने का जिम्मा मिलता है। 

    सरकारें कुछ-कुछ समय बाद बदलती रहें, और जांच होती रहे, कार्रवाई होती रहे, तो काई इतनी मोटी नहीं जम सकती। दस-बीस बरस पहले से चले आ रहे गंभीर आरोपों को लेकर जिस तरह की जांच अभी शुरू हो रही है, उससे आज सरकार में बैठे हुए छोटे-बड़े सभी लोग सहम भी गए हैं, और संभल भी गए हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जिस विशाल बहुमत के साथ जीतकर आए हैं, और पार्टी के भीतर कड़े मुकाबले में वे जिस तरह मुख्यमंत्री बने हैं, उनसे इन दो कामयाबियों के बाद कोई अधिक बहस नहीं कर सकते। फिर उनके तकरीबन सभी फैसले अब तक ठीक दिख रहे हैं, इसलिए वे सवालों के घेरे में भी नहीं हैं। लेकिन इतनी ताकत से मिली सत्ता से जब बहुत रफ्तार से काम होता है, तो किसी चूक का खतरा भी रहता है। प्रदेश की कांग्रेस सरकार को यह सावधानी बरतनी चाहिए कि उसके कार्यकाल में ऐसे काम न हों जिनसे पांच बरस बाद जाकर वह खुद घिरे। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 13-Jan-2019
  • भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर बनी हुई एक फिल्म इन दिनों खबरों में है, कांग्रेस के नौजवान जगह-जगह इस फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि ऐसी जनधारणा है कि इसमें मनमोहन सिंह को बहुत खराब तरीके से दिखाया गया है, और उन्हें एक किस्म से सोनिया गांधी का गुलाम बताया गया है। दूसरी तरफ कांग्रेस की किसी भी प्रदेश सरकार ने इस फिल्म पर रोक लगाने से मना कर दिया है, हालांकि कांग्रेस के विरोधी लोग लगातार ऐसी फेक न्यूज बनाकर फैलाते रहे कि मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ ने इस फिल्म पर रोक लगा दी है। इसके अलावा कुछ और ऐसी फिल्में लगातार आ रही हैं जिनमें फौज के बहाने या किसी और बहाने राष्ट्रवाद के मुद्दे को हवा दी जा रही है, देश के दुश्मन या देश के गद्दार गिनाए जा रहे हैं। अगले आम चुनाव के पहले ऐसी कुछ और फिल्में, ऐसे कुछ और सीरियल आ भी सकते हैं, और पिछले आम चुनाव के पहले भी यही तरीका देखने में आया था। 

    दरअसल राजनीति, चुनाव, और बाजार का कारोबार, इन सबने हाथ में हाथ डालकर काम करना सीख लिया है। बाजार अपने हितों को देखते हुए किसी नेता या किसी पार्टी को बढ़ावा देने की तरकीबें निकाल लेता है जो कि चंदा देने के अलावा रहती हैं। दूसरी तरफ देश के सबसे बड़े कारोबारियों के हाथ में आज न सिर्फ अखबार और समाचार चैनल हैं, बल्कि फिल्म और टीवी के मनोरंजन का प्रोडक्शन भी धीरे-धीरे उनके हाथों में हैं, पुरानी फिल्मों और टीवी सीरियलों के अधिकार भी उनके हाथों में हैं, और चुनाव के वक्त लोगों की भावनाओं को उभारने या भड़काने के लिए उनका भरपूर इस्तेमाल अब भारतीय चुनावी राजनीति में एक आम बात मान लेनी चाहिए। इस चुनावी औजार या हथियार में न तो कुछ गैरकानूनी, और न ही कुछ अलोकतांत्रिक है, लेकिन फिर भी इससे चुनाव में शक की संतुलन को भरपूर बदला जा सकता है। 

    अमरीका में पिछले तीन बरस से यही बहस चल रही है कि रूस ने किस तरह वहां के चुनावों को प्रभावित किया, और हिलेरी क्लिंटन के हारने में अपना असर दिखाया। इसकी जांच चल ही रही है, और इस बीच ब्रिटेन सहित कुछ और यूरोपीय देशों में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं कि रूस ने वहां के चुनाव भी प्रभावित किए। भारत के चुनावों को अभी तक देश के बाहर से विदेशी ताकतों ने प्रभावित किया हो, ऐसा तो सुनाई नहीं पड़ा है, लेकिन विदेशों में बसे हुए भारतीय जरूर इस कोशिश में लगे रहे, और उनमें से अधिकतर खुलकर भाजपा का साथ देने वाले लोग हैं। यह बात भी लोकतांत्रिक है, और इसके खिलाफ भी कोई तर्क नहीं दिया जा सकता, सिवाय इसके कि भाजपा से परे के बाकी राजनीतिक दल भी इस किस्म की तरकीबों का महत्व समझें, और उसका इस्तेमाल करें। पिछले बरसों में भारतीय चुनावों में लगातार सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, और मोदी-भाजपा की शुरुआती बढ़त के बाद अब बाकी पार्टियां भी धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ रही हैं। 

    लेकिन राजनीतिक दलों के सीधे और घोषित प्रचार-अभियानों से परे जब चुनाव के कुछ महीने पहले से कुछ खास किस्म की किताबें आने लगें, फिल्में आने लगें, और टीवी पर ऐसे ऐतिहासिक मुद्दों को लेकर सीरियल आने लगें कि जिनसे वोटरों की सोच को प्रभावित किया जा सके, तो यह बाजार से साथ मिलने के बिना होने वाला काम नहीं है। धीरे-धीरे कुछ चुने हुए कारोबारियों के हाथ में जिस तरह से प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, फिल्म और मनोरंजन, टेलीफोन और डिजिटल सेवा, घर पहुंच टीवी सेवा, जिस तरह से ये तमाम चीजें कुछ गिने-चुने हाथों में पहुंच चुकी हैं, उनसे जनमत पर असर का एकाधिकार खड़ा हो गया है। यह सिलसिला खासा खतरनाक है, लेकिन अभी तक भारत में इस पर अधिक सार्वजनिक चर्चा हो नहीं रही है। चुनाव के पहले के महीनों में हो सकता है कि कई पुरानी फिल्में, और कई पुराने सीरियल निकालकर उन्हें दुबारा दिखाने का एक ऐसा सैलाब सामने आएगा जो कि चुनाव को प्रभावित करने की ताकत रखेगा। सरकार तक पहुंचने के लिए कारोबार की यह मदद लोकतंत्र को बाजार की मोहताज बनाकर रख देगी, शायद रख चुकी है।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 12-Jan-2019
  • पिछले दो दिनों में देश की सबसे बड़ी केन्द्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच फुटबॉल की तरह किक खाई है, वह नौबत तकलीफदेह है। केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की सिफारिश का नाम लेकर सीबीआई के डायरेक्टर, आलोक वर्मा, को हटाया था जिन पर भ्रष्टाचार की कुछ तोहमत उनके एक ऐसे मातहत अफसर ने लगाई थी जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर दर्ज है, और जिसे हाईकोर्ट ने कोई राहत देने से मना कर दिया है। दूसरी तरफ आलोक वर्मा मोदी सरकार की सबसे विवादास्पद और सबसे संदिग्ध रफाल लड़ाकू विमान खरीदी को लेकर एक जांच की तरफ बढ़ते दिख रहे थे, और शायद इसीलिए उन्हें तेजी से हटाया गया, और नए अफसर ने बिजली की रफ्तार से वर्मा के तैनात तमाम जांच अफसरों का दूर-दूर तबादला कर दिया। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने तमाम आरोप देखने के बाद वर्मा को वापिस बहाल किया, और साथ ही कहा कि सीबीआई डायरेक्टर को चुनने वाली कमेटी उनके मामले को देखे। इस कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, और मुख्य न्यायाधीश रहते हैं, लेकिन मुख्य न्यायाधीश इसमें जाने से कतराए और उन्होंने एक दूसरे जज को भेजा जिसने कमेटी में मोदी का साथ दिया, और बहाली के अगले ही दिन वर्मा को सीबीआई से फिर हटा दिया गया। 
    सीबीआई के इस पूरे सिलसिले से दो बातें लगती हैं कि अगर वर्मा के खिलाफ आरोप ऐसे थे जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने प्रधानमंत्री वाली कमेटी में बैठकर उन्हें हटाना तय किया, तो फिर सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश वाली बेंच ने वर्मा को बहाल कैसे किया था, क्यों किया था? या तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कोई चूक थी, या फिर प्रधानमंत्री वाली कमेटी ने हड़बड़ी में वर्मा को हटाया। इन दोनों में से एक बात होना तो तय है, और यह सिलसिला बड़ा अटपटा और बदमजा है। अदालत के फैसले बिल्कुल साफ और अमल के लायक होने चाहिए। दूसरी तरफ सरकार या कोई भी दूसरी संवैधानिक कमेटी बड़ी साफ नीयत की होनी चाहिए, और उनमें हितों का टकराव नहीं होना चाहिए। आलोक वर्मा के मामले में रफाल डील जांच के आसार थे, और उससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व्यक्तिगत रूप से जुड़े हुए हैं। ऐसे में ऐसी सर्वोच्च संवैधानिक कमेटी में उनका बैठना भी ठीक नहीं था, क्योंकि जहां खुद की जांच का खतरा सामने खड़ा हो वहां पर न सिर्फ नरेन्द्र मोदी बल्कि कोई भी इंसान कैसे निष्पक्ष और तटस्थ होकर कोई फैसला ले सकते हैं? 
    आज सुप्रीम कोर्ट के तौर-तरीके को लेकर देश हैरान है कि कैसे वह ऐसा फैसला ले सकता है जिससे कोई पहले दिन बहाल हो, और दूसरे दिन हटा दिया जाए। दूसरी तरफ सीबीआई प्रमुख की इस चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश के खुद के कतराने और दूसरे जज के पीएम के साथ चले जाने का सिलसिला भी लोगों को बड़ा अटपटा और खराब लग रहा है। इंसाफ न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। दुनिया के राजनीतिक इतिहास में एक पुरानी कहावत चली आती है कि राजा को संदेह से ऊपर रहना भी चाहिए, और दिखना भी चाहिए। इस एक मामले में भारत का प्रधानमंत्री का ओहदा साख खोते दिख रहा है। जिस बिजली की रफ्तार से इस कमेटी की बैठक रखी गई, और बीस दिन बाद रिटायर होने वाले आलोक वर्मा को हटाया गया, उसे देखकर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि केन्द्र सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए जिस लोकायुक्त को बनाने की बात भाजपा ने अपने चुनाव अभियान में बार-बार कही थी, उस लोकायुक्त को छांटने के लिए साढ़े चार बरस में केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के उलाहनों के बावजूद कुछ नहीं कर पाई। ऐसे में घोंघे की रफ्तार से लोकायुक्त तलाशती सरकार बुलेट ट्रेन की रफ्तार से सीबीआई प्रमुख को बर्खास्त करने दौड़ती है तो वह बात अटपटी तो लगती ही है। सरकारें प्रक्रिया की आड़ लेकर बहुत से गलत काम दबा जाती हैं, लेकिन जनधारणा को दबाना लोकतंत्र में मुमकिन नहीं होता। जनता के बीच सीबीआई प्रमुख को ऐसी रफ्तार से हटाने को लेकर एक गहरा संदेह उठ रहा है, जिससे निपटना प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को भारी भी पड़ेगा। 
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 10-Jan-2019
  • अभी सुप्रीम कोर्ट और देश के एक, तमिलनाडू के, हाईकोर्ट के दो आदेश बाकी राज्यों को भी देखने चाहिए। हो सकता है कि अभी ये फैसले की शक्ल में सामने नहीं आए हैं, और मामले की सुनवाई के दौरान अदालत का एक हिस्सा हैं, या अदालत की लगाई रोक हैं, लेकिन देश के बाकी राज्यों में भी ऐसे अदालती नजरिये से चीजों को तौल लेने की जरूरत है ताकि बर्बादी होने के बाद उसमें सुधार और मरम्मत की मशक्कत न करनी पड़े। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले जिंदगी भर देने के खिलाफ एक आदेश किया था। यह आदेश जब बिहार में नहीं माना गया, तो पटना उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एक नोटिस जारी करके कहा है कि भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को किस आधार पर बंगले दिए गए हैं? जब अदालत के सामने इनकी हिफाजत का तर्क रखा गया तो जज ने नाराज होते हुए कहा कि ऐसा है तो भूतपूर्व मुख्यमंत्री जमीन के नीचे बंकर बना लें। 

    हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश देश के सभी राज्यों पर लागू होता है, चाहे वह किसी एक राज्य के संदर्भ में ही क्यों न दिया गया हो। यह मामला ऐसा नहीं है जो कि किसी एक राज्य की स्थानीय परंपरा का हो। हर राज्य में भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए बंगलों की एक महंगी समस्या है जिसका बोझ गरीब जनता को ही उठाना पड़ता है। देश में गरीबी का हाल यह है कि अभी कल जब अनारक्षित तबके के भीतर गरीबों के लिए आरक्षण की बात आई, तो यह बात भी उठी कि इस पैमाने पर तो अनारक्षित तबके के नब्बे फीसदी लोग आ जाएंगे। जिस देश में सामान्य तबके में गरीबी का यह हाल है उस प्रदेश में किसी भी वर्तमान को भी महंगे बंगलों का कोई हक नहीं होना चाहिए। दूसरी तरफ भूतपूर्व तो संख्या में बढ़ते चल सकते हैं, और हर पांच बरस में एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री का जन्म हो सकता है। ऐसे में इन सब लोगों को, या इसी किस्म की पात्रता वाले विधानसभा अध्यक्षों, या दूसरे लोगों को कब तक और क्यों सरकारी सहूलियतें दी जाएं? 

    चेन्नई हाईकोर्ट ने तमिलनाडू सरकार के एक फैसले पर रोक लगाई है जिसमें हर राशन कार्ड पर एक हजार रूपए पोंगल उपहार दिया जाना था। इसके खिलाफ एक जनहित याचिका दायर हुई जिसमें कहा गया कि सरकारी पैसे का इस्तेमाल गैरगरीबों के लिए कैसे किया जा सकता है? कैसे गरीबी की रेखा के ऊपर के लोगों को सरकारी पैसे पर कोई उपहार दिया जा सकता है? इस फैसले को लेकर छत्तीसगढ़ में दो सवाल उठते हैं। पिछली रमन सरकार ने प्रदेश के सारे नागरिकों के लिए स्वास्थ्य-बीमा लागू किया था। इसमें संपन्न तबके के लोगों को भी इसका फायदा लेने की छूट थी। अब इसका भुगतान तो जनता के पैसों से हो रहा था, और उसमें संपन्न लोगों को कैसे कोई राहत-रियायत दी जा सकती थी? दूसरा मुद्दा जो छत्तीसगढ़ पर लागू होता है वह है मौजूदा भूपेश-सरकार का किसान-कर्जमाफी का। इसके तहत गरीब-अमीर सभी तरह के वे किसान राहत पा चुके हैं जिन्होंने सहकारी बैंकों से अल्पकालीन कर्ज लिया था। अब सवाल यह उठता है कि कर्जमाफी की पात्रता तो गरीबों को ही होनी चाहिए, और गरीबों के खजाने से सरकार अमीर किसानों की कर्जमाफी कैसे कर सकती है? 
    इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास देने की मौजूदा व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ दिखती है जिसमें उसने बंगलों का ऐसा आबंटन असंवैधानिक करार दिया था। जब बिहार सरकार के वकील ने पटना हाईकोर्ट को सहमत कराने की कोशिश की कि राज्य में एक कानून बनाकर पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास दिए गए हैं, तो अदालत ने कहा कि यह कानून पहली नजर में ही संविधान के खिलाफ दिखता है। छत्तीसगढ़ में भी जिन लोगों को उनके कार्यकाल के बाद इस तरह से मकान दिए गए हैं, वे असंवैधानिक लगते हैं, और इस बारे में सरकार को जांच-परख कर लेनी चाहिए। हमने इसी कॉलम में कुछ समय पहले यह लिखा भी था कि गरीब जनता के पैसों पर सत्तारूढ़ लोगों को अपने लिए ऐशोआराम नहीं जुटाने चाहिए। उसके साथ ही यह बात भी लिखी थी कि मीसाबंदी पेंशन जैसी जो सुविधाएं बहुत से नेता लेते हैं, उन्हें भी गैस सब्सिडी की तरह ऐसी रियायतें, ऐसे फायदे छोडऩे चाहिए जो कि गरीब जनता के पैसों से दिए जाते हैं। 
    जिस तरह छत्तीसगढ़ में रियायती चावल के लिए गरीबी का एक पैमाना तय किया गया है, उसी तरह स्वास्थ्य-बीमा या कर्जमाफी के लिए गरीब होना या जरूरतमंद होना एक अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। जो नेता अपने खुद के दम पर करोड़पति हैं, उन्हें किसी भी तरह के सरकारी ऐशोआराम नहीं मिलने चाहिए। इसके लिए जनता के बीच से एक ऐसा आंदोलन भी शुरू हो सकता है जो कि लोगों को नाजायज हक छोडऩे कहे, और जायज हक के लिए भी जरूरत के पैमाने को लागू करे। आज जिसे, जितना, जब तक मुफ्त मिल सके, वह हसरत खत्म ही नहीं होती है, फिर चाहे उसे पूरा करते हुए कितने ही गरीब खत्म न हो जाएं। 
    -सुनील कुमार

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Posted Date : 09-Jan-2019
  • कल एक खबर आई थी कि किस तरह अमरीका में एक लड़की ने अपने जन्म के तीस बरस बाद नामालूम पिता को इंटरनेट पर अपना डीएनए डालकर ढूंढ निकाला। इन दिनों इंटरनेट पर डीएनए से वंशवृक्ष बनाने की बहुत सी वेबसाइटें काम करती हैं जिनसे लोग अपने पुरखों और रिश्तेदारों को ढूंढ सकते हैं। लेकिन टेक्नालॉजी का एक खतरा किस तरह रहता है, यह खबर आज सामने आई है। एक ऐसे स्कूल शिक्षक को अमरीका में अभी उम्रकैद हुई है जिसने एक बलात्कार, और उसके बाद कत्ल किया था। मौके पर पुलिस को मिले डीएनए की जांच करते हुए दशकों बाद पुलिस को वह डीएनए वंशवृक्ष वाली एक वेबसाइट पर एक ऐसी युवती के डीएनए से मैच करता हुआ मिला, जो कि हत्यारे की बहन निकली। पुलिस पहले उस डीएनए से बहन तक पहुंची, और फिर बहन के रास्ते उस बलात्कारी-हत्यारे तक। हत्यारे ने तो कोई ऐसी सीधी चूक नहीं छोड़ी थी जिससे पुलिस उस तक पहुंच जाती, लेकिन हत्यारे की बहन का डीएनए वेबसाइट पर था, और पुलिस ने इंटरनेट पर मौजूद लोगों के डीएनए से मेल कर-करके यह तलाश पूरी की। 

    टेक्नालॉजी तरह-तरह के सुराग छोड़ती है, और सुराग ढूंढती भी है। एक एसएमएस, या एक टेलीफोन कॉल के रास्ते लोग जिस तरह मुजरिम तक पहुंच जाते हैं, वह देखना हक्का-बक्का करता है, और याद दिलाता है कि दुनिया का एक सबसे बड़ा आतंकी-हमलावर, ओसामा-बिन-लादेन, इतने बरस इसलिए अमरीका की सारी ताकत से बचा रहा कि उसने कोई फोन-इंटरनेट इस्तेमाल नहीं किया था। जिस अमरीकी तकनीक की बात हम यहां कर रहे हैं, वह भारत में आम लोगों के इस्तेमाल के लिए भी यहां की भुगतान-क्षमता के मुकाबले कुछ महंगी है, और यहां की जांच एजेंसी की क्षमता से कुछ परे भी है। लेकिन भारत में भी आधार कार्ड, मोबाइल के सिमकार्ड, मोबाइल हैंडसेट, लैपटॉप, सोशल मीडिया अकाऊंट, एटीएम या क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल जैसी बहुत सी बातें हैं जिनसे मुजरिम पकडऩे में आसानी हो जाती है। दूसरी तरफ शहरों में जिस रफ्तार से चौराहों पर कैमरे लग रहे हैं, आधुनिक और बड़ी इमारतों में कैमरे लग रहे हैं, उनसे भी टेक्नालॉजी जुर्म पकडऩे में मदद कर रही है। यह सिलसिला निजी जिंदगी की निजता को तो घटा रहा है, लेकिन जुर्म सुलझाने की संभावना बढ़ा भी रहा है। 

    सार्वजनिक जगहों पर, जिनमें अब सोशल मीडिया भी शामिल है, लोग ऐसे सुबूत छोड़ देते हैं जिससे जांच एजेंसियां उनके बारे में जानकारी जुटा लेती हैं, और उन्हें घेर पाती हैं। विकसित देशों में आज जब लोग अपनी कंपनी से छुट्टी लेते हैं, या किसी इलाज-बीमा कंपनी से इलाज का भुगतान लेते हैं, तो उनके सोशल मीडिया अकाऊंट देखकर कंपनियां बहुत से मामलों में उनका झूठ पकड़ लेती हैं, क्योंकि जिन दिनों में वे अपने को बीमार बताते हैं, उन्हीं दिनों में वे अपने सैर-सपाटे की तस्वीरें भी पोस्ट करते हैं। डीएनए-वंशावली या वंशवृक्ष के रास्ते अपने पुरखों को ढूंढना, अपने रिश्तेदारों तक पहुंचना, या मुजरिमों तक पहुंचना एक नया सिलसिला है जो कि आगे चलकर जोर पकडऩे वाला है। अब मुजरिम खुद अपना डीएनए इंटरनेट पर पोस्ट न भी करे, उसके रिश्तेदार अपना डीएनए पोस्ट करते हैं, तो उससे भी सुबूतों के डीएनए की मैचिंग हो सकती है, हो रही है, और उस बुनियाद पर सजा भी हो रही है। टेक्नालॉजी आज सामने आ रही है, लेकिन लोग अपने जुर्म या अपने गलत काम के सुबूत इसका अंदाज हुए बिना दस-बीस बरस पहले छोड़ चुके थे, और वे अब पकड़ में आ रहे हैं। आज जिस टेक्नालॉजी की आम लोगों को कल्पना नहीं है, वह टेक्नालॉजी भी दस-बीस बरस बाद सामने आ सकती है, इसलिए बेहतर यही है कि लोग आज भी अपनी हरकतों को ठीक रखें।


    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 08-Jan-2019
  • -सुनील कुमार

    केन्द्र की मोदी सरकार ने कल एक अभूतपूर्व हड़बड़ाहट में यह तय किया है कि अनारक्षित तबके के भीतर के आर्थिक-कमजोर लोगों को पढ़ाई के दाखिले और सरकारी नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। आज शायद संसद में इसे लेकर मोदी सरकार एक संविधान संशोधन ला रही है जिसके बाद सामान्य कहे जाने वाले अनारक्षित वर्ग के गैरगरीब लोगों के लिए स्कूल-कॉलेज और सरकारी नौकरियों में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के तहत बचे पचास फीसदी अवसरों में से चालीस फीसदी रह जाएंगे, और दस फीसदी सामान्य-सीटें गरीबों के लिए आरक्षित रहेंगी। अनारक्षित वर्ग के भीतर आरक्षण का यह एक बिल्कुल ही नया फार्मूला है जो कि आर्थिक आधार पर बनाया गया है। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार आज देश के किसानों के बीच कांग्रेस की एकदम से बढ़ी साख से हड़बड़ाई हुई है, और देश का चौकीदार रफाल विमानों की खरीदी पर उठे सवालों से भी कुछ असुविधा में है। शायद इसलिए भी सौ दिन बाद खड़े चुनाव में अपनी हालत सुधारने के लिए एनडीए सरकार यह एक बड़ा फैसला ले रही है जिससे सवर्ण तबके के भीतर के निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों को ऐसा लगेगा कि उनके लिए कुछ किया गया है। 

    सरकार द्वारा कल दी गई जानकारी के मुताबिक आठ लाख रूपए सालाना से कम आय के परिवारों को इस सवर्ण-आरक्षण का फायदा मिलेगा। इस आय वर्ग को तय करने के लिए खेती की जमीन या शहरी मकान की जमीन के कुछ पैमाने भी तय किए गए हैं, और वह सारी जानकारी समाचार में है, इसलिए यहां पर उसे खुलासे से लिखना जरूरी नहीं है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि केन्द्र का यह आरक्षण किस तबके के भीतर के कितने हिस्से पर लागू होगा? आज सरकार ने ऐसी कोई जानकारी दी नहीं है, लेकिन मोटे तौर पर इस तस्वीर को समझने के लिए ऐसा एक अंदाज लगाना ठीक होगा कि अनारक्षित तबके के भीतर का यह दस फीसदी आरक्षण अनारक्षित तबके के भीतर के तकरीबन नब्बे फीसदी लोगों पर लागू होगा। आज अनारक्षित तबके के भीतर भी कुल दस फीसदी लोग ही आठ लाख रूपए सालाना कमाई से अधिक वाले होंगे, या जमीन-मकान का जो पैमाना है, उसे पूरा करने वालेह होंगे। ऐसे में अनारक्षित तबके के उन तमाम कमजोर लोगों को इस दस फीसदी का फायदा मिलेगा जो बाकी संपन्न अनारक्षित लोगों के मुकाबले दाखिले या नौकरी की तैयारी नहीं कर पाते। आज अनारक्षित तबके के भीतर जो पहली बेचैनी इस दस फीसदी आरक्षण को लेकर दिख रही है, वह अपने लिए संभावनाओं के कम होने की है, और जायज भी है, लेकिन सामाजिक न्याय के लिए पहली नजर में ऐसा लगता है कि अनारक्षित तबके के लिए संभावनाओं पर से दस फीसदी हिस्से से क्रीमीलेयर को हटाना बहुत बड़ा बेइंसाफ नहीं लग रहा है, खासकर तब जब वह शायद नब्बे फीसदी आर्थिक कमजोर लोगों को फायदा पहुंचाएगा। 

    मोदी सरकार का यह फैसला अपने गुण-दोष पर विश्लेषण पाने के बजाय, नीयत और वक्त को लेकर विश्लेषण पा रहा है। यह लोकतंत्र में एक संपूर्ण बहस के लिए तो ठीक है, लेकिन उस बहस के बाद, उस बहस से परे यह भी देखने की जरूरत है कि अनारक्षित तबके के भीतर नब्बे फीसदी आबादी को दस फीसदी हिस्से पर आरक्षण देना किस तरह की सोच है। हम पहले भी इस बात को बार-बार लिखते आए थे कि दलित, आदिवासी, या ओबीसी, किसी भी किस्म के आरक्षित तबके के भीतर से क्रीमीलेयर को आरक्षण के फायदों से परे करना जरूरी है। एक सीमा से अधिक आय, एक सीमा से अधिक संपत्ति, एक सीमा से ऊपर का सरकारी या राजनीतिक ओहदा, लोगों को आरक्षण के फायदे से बाहर करने का होना चाहिए। आज हालत यह है कि सारे आरक्षित तबकों के भीतर आरक्षण का अधिकतर फायदा उन तबकों की वह क्रीमीलेयर ले जाती है जो अपनी संपन्नता और ताकत की वजह से दाखिले और मुकाबले के इम्तिहानों के लिए बेहतर तैयारी कर पाती है। जिस सामाजिक समानता की नीयत से आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई थी, वह इससे शिकस्त पा रही है, और घूम-फिरकर एक छोटा तबका ही आरक्षण के अधिकतर फायदों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पा रहा है। लेकिन क्रीमीलेयर को आरक्षण के फायदों से वंचित करने की बहस इसलिए जोर नहीं पकड़ पाती क्योंकि सरकार और संसद में, न्यायपालिका और मीडिया में, राजनीतिक दलों और दूसरे ताकतवर तबकों में इसी क्रीमीलेयर का काबू है, और इसे फायदे से बाहर करने का मतलब किसी बड़े जज, किसी भी सांसद या विधायक, किसी भी आईएएस-आईपीएस, किसी भी करोड़पति दलित-आदिवासी-ओबीसी के बच्चों को आरक्षण के फायदों से परे करना होगा। इसलिए आज नीति बनाने, उस पर फैसला लेने, और उस पर अदालती नुक्ताचीनी करने वाले तमाम लोगों के लिए क्रीमीलेयर को हटाना आत्मघाती होगा, और इसीलिए उस पर कोई चर्चा नहीं हो पाती है।  

    पिछले विधानसभा चुनाव में खासकर मध्यप्रदेश और राजस्थान में सवर्ण तबके की यह नाराजगी मोदी सरकार के खिलाफ मुखर थी कि एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटकर केन्द्र सरकार ने फिर से कड़े प्रावधान लागू किए थे जिनके खिलाफ सवर्ण तबका हमेशा से बोलते आ रहा था। चुनाव में ऐसा माहौल बना कि सवर्णों ने भाजपा के खिलाफ वोट डाला। इसलिए भी सवर्ण तबके की बहुसंख्यक आबादी को खुश करने के लिए अनारक्षण में आरक्षण का यह नया फैसला लिया गया है। पहली नजर में यह फैसला सैद्धांतिक रूप से हमें ठीक लग रहा है, और यह आरक्षण की अदालती या संवैधानिक सीमा के बाहर जाएगा, या नहीं, यह तो आने वाले दिनों में अदालत में ही साबित होगा। इसके लिए जो संविधान संशोधन होना है, उसे सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ सही पाएगी या नहीं, यह भी आगे की बात है। फिलहाल सरकार की नीयत की जो बात है, उस पर राजनीतिक और चुनावी बहस जारी है। लेकिन इस बीच हम क्रीमीलेयर को दस फीसदी संभावनाओं से दूर करने को ठीक फैसला पाते हैं। 

    अब यह भी देखना होगा कि आठ लाख रूपए सालाना आय या जमीन-मकान के मालिकाना हक के लिए भ्रष्ट सरकारी मशीनरी से जो सर्टिफिकेट लोगों को लगेंगे, वे कितने सही होंगे, और कितने गलत होंगे? दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तान में आज नौकरीपेशा लोग तो आठ लाख रूपए की सालाना कमाई को छुपा नहीं सकते, सरकार या गैरसरकारी कंपनियों में लोगों की कमाई अच्छी तरह दर्ज रहती है, लेकिन कारोबारियों की कमाई, स्वरोजगार में लगे लोगों की कमाई का कोई ठीक हिसाब-किताब रहता नहीं है। ऐसे में संगठित वेतनभोगी सबसे पहले क्रीमीलेयर में गिनाएंगे, और अपने बच्चों को इस आरक्षण का फायदा दिलाने के लिए लोग जमीन-मकान को भी दूसरों के नाम करने लगेंगे। चूंकि देश की व्यवस्था इतनी भ्रष्ट है, इसलिए ऐसी तमाम तिकड़में मुमकिन बनी रहेंगी। इसके बीच ही किस तरह आरक्षण लागू हो पाएगा, और सही हकदार ही उस तक पहुंच पाएंगे, यह देखना होगा। हम इस मौके पर एक बार फिर यह दुहराना चाहेंगे कि हर आरक्षित तबके के भीतर क्रीमीलेयर को अपात्र बनाने के लिए पैमाने तय करके संविधान संशोधन करना चाहिए ताकि गिने-चुने चुनिंदा लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी फायदा न पाते रहें, और उन तबकों के बाकी लोगों को उसका फायदा मिल सके।

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Posted Date : 07-Jan-2019
  • उत्तरप्रदेश में एक बहुत चर्चित, और मशहूर रही आईएएस अफसर बी.चन्द्रकला पर सीबीआई का छापा पड़ा है जिसे कुछ पार्टियों ने उत्तरप्रदेश में अखिलेश सरकार के वक्त के कुछ मामलों से जोड़कर राजनीतिक मकसद से डाला गया छापा कहा है। दूसरी तरफ सीबीआई का तर्क यह है कि चन्द्रकला ने बिना कर्ज लिए 22 लाख रूपए की एक जमीन खरीदी थी। अब एक लाख रूपए महीने की तनख्वाह वाली अधिकारी की अगर यह खरीदी सीबीआई छापे की अकेली वजह है तो अलग बात है, वरना यह बात कुछ अटपटी लगती है। सीबीआई इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश पर अवैध खनन घोटाले की जांच कर रही है, और उसमें इस महिला अफसर को भी आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। 

    लेकिन इस एक मामले से परे अगर देखें तो कुछ खबरें ऐसा भी बताती हैं कि यह अफसर सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों के लिए अतिचर्चित रही है, और उसने हर कुछ देर में अपनी फोटो पोस्ट करने के लिए कर्मचारी भी रखे हुए हैं। सोशल मीडिया पर अपने अकाउंट को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए भुगतान करके भी उसने लोकप्रियता पाई है, ऐसी भी खबरें हैं। हमने छत्तीसगढ़ में भी कुछ समय पहले ऐसे अफसर देखे हैं जो कि सरकारी कुर्सी पर रहते हुए भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर भुगतान करके अपने पेज को अधिक लोगों तक पहुंचाते थे, और जिस तरह कोई नेता तारीफ खरीदते हैं, उस तरह अफसर भी तारीफ खरीदते थे। यह सिलसिला राजनीति से शुरू होकर कब शासन-प्रशासन में पहुंच गया, पता ही नहीं चला। पिछले साढ़े चार बरस में भाजपा ने लगातार अपने सांसदों, विधायकों, और बाकी नेताओं के लिए सोशल मीडिया पर मौजूदगी और लोकप्रियता की शर्तें लादी थीं, और इसके लिए लोग भुगतान करके फर्जील लोकप्रियता भी खरीदते थे। पार्टी की उम्मीदवारी के लिए भी इसे एक अनिवार्य शर्त बताया गया था, और धीरे-धीरे अफसरों ने भी ऐसा करना शुरू कर दिया। 

    अधिकारियों की निजी प्रचार की चाह खतरनाक होते जाती है। वह धीरे-धीरे सरकारी जिम्मेदारियों से ऊपर अपनी लोकप्रियता को बिठा देती है, और जिस तरह राजनीति में लोग व्यक्तित्व के करिश्मे को स्थापित करने में लगते हैं, उसी तरह प्रशासन में भी लोग करने लगे हैं। हालांकि सीबीआई का यह छापा इस अफसर के मशहूर होने की वजह से नहीं है, लेकिन इस अफसर पर छापा बड़ी खबर इसीलिए बना है, और इसीलिए हम अफसरी के इस पहलू पर लिख रहे हैं। नेताओं के आभा मंडल में आगे बढऩे के लिए बहुत से अफसर सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ता की तरह गलत कामों में हिस्सेदार हो जाते हैं, और ऐसे कुछ मामले अभी छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में भी सामने आ रहे हैं। उत्तरप्रदेश से ऐसी चर्चा है कि इस महिला अफसर ने अखिलेश सरकार के वक्त इसी तरह सत्तारूढ़ राजनीति के साथ कदमताल किया था। 

    अगर सचमुच ही ऐसा गलत किया गया है, तो इस पर कार्रवाई एक मिसाल बननी चाहिए ताकि अफसरों को यह समझ आए कि न तो राज्य में किसी एक पार्टी की सरकार हमेशा नहीं बनी रहती, और न ही केन्द्र की सरकार उसी पार्टी की रहना जरूरी होता है। ऐसे में राजनीतिक नीयत से कई अफसरों पर कार्रवाई हो सकती है, और यह भी हो सकता है कि उन्हें मिला हुआ राजनीतिक संरक्षण खत्म हो जाए, और वे ईमानदार नीयत से शुरू जांच और कार्रवाई के घेरे में आ जाएं। इसलिए देश की नौकरशाही को कमाई करने के लिए, या चर्चित होने के लिए सत्तारूढ़ दल के साथ ऐसी भागीदारी नहीं करना चाहिए। 

    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 06-Jan-2019
  • छत्तीसगढ़ में दो दिन पहले एक खबर आई कि एक तांत्रिक क्रिया करने के लिए बेटे ने मां को मार डाला, और उसके बदन के टुकड़े करके उसका खून पीते रहा। दूसरी तरफ तकरीबन हर हफ्ते अंधश्रद्धा खत्म करने के लिए अपने अकेले के दम पर लगातार एक मुहिम छेडऩे वाले डॉ. दिनेश मिश्रा गांव-गांव जाते हैं, और लोगों को मन से अंधविश्वास हटाने का खतरा उठाते हैं। ऐसे ही लोग देश भर में जगह-जगह धर्मान्ध, अंधविश्वासियों की हिंसा के शिकार भी होते हैं, और ऐसे खतरे के बावजूद वे अपने खर्च से इस मुहिम में लगे रहते हैं। 
    अब सवाल यह है कि लोगों की सोच में जो अंधविश्वास कूट-कूटकर भरा जा रहा है, और नेहरू की साख चौपट करने की कोशिश में, देश को एक झूठे पौराणिक गौरव के नशे में डुबाने के लिए जिस तरह वैज्ञानिकता को खत्म किया जा रहा है, उसका ऐसा नतीजा होना ही था। और अंधविश्वास के चलते ऐसा कत्ल तो फिर भी दिख जाता है, कत्ल जैसी वारदात से कम हिंसक अंधविश्वास तो सामने भी नहीं आता। जब देश के सबसे बड़े विज्ञान-जलसे में बड़े-बड़े वैज्ञानिक और प्रोफेसर, वाइस चांसलर और अँतरिक्ष विज्ञानी, पुराण को विज्ञान बताते हुए कौरवों को टेस्ट ट्यूब बेबी विज्ञान का सुबूत बताते हैं, गुरुत्वाकर्षण शक्ति के सिद्धांत को खारिज करते हैं, तो पूरे देश की सोच एक अंधेरे गड्ढे में जाना तय हो जाती है। 
    आज यह देश पुराणों को इतिहास मानने लगा है, और एक नामौजूद भूतकाल को अपना गौरवशाली भविष्य साबित करने पर उतारू हो गया है। आज जब देश में समझदारी की बात करना, तर्क और न्याय की बात करना, वैज्ञानिक सोच की बात करना, राष्ट्रद्रोह और देश के साथ गद्दारी करार दी जा रही है, तो ऐसे में बेटे अगर मां को मारकर किसी साधना को पूरा करने का सपना देख रहे हैं, तो इसमें कोई हैरानी नहीं है। आजाद हिन्दुस्तान में लगातार समाज सुधारकों ने अंधविश्वास को खत्म करने के लिए लगातार लड़ाई लड़ी थी, नेहरू सरीखे नेताओं ने धर्मान्ध लोगों की नाराजगी झेलने की कीमत पर भी वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया था, उन तमाम कोशिशों पर पिछले चार बरस में पानी फेर दिया गया है, और समाज में कट्टरता को देशप्रेम साबित किया जा रहा है। 
    यह बात समझने की जरूरत है कि जब लोगों की सोच अवैज्ञानिक होने लगती है, तो कुछ बरसों में ही पटरी से उतरी हुई इस गाड़ी को वापिस पटरी पर पहुंचने में कई पीढिय़ां भी लग सकती हैं। हिन्दुस्तान एक बहुत खतरनाक दौर से गुजर रहा है जिसमें लोगों की सोच को खत्म करना एक चुनावी मकसद रह गया दिखता है। वोटों की खातिर इस तरह की हिंसा, इस तरह की हरकत को बढ़ावा देने के लिए ऐसी हिंसा के फतवे नहीं देने पड़ते, महज लोगों की सोच को अवैज्ञानिक बनाना होता है। नेहरू ने जिस मेहनत से हिन्दुस्तानी समाज को आधुनिक और प्रगतिशील बनाया था, उसका यह बेहाल, पांच बरस की सरकार जाने के बाद भी रातोंरात सुधर नहीं पाएगा।
    - सुनील कुमार 

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Posted Date : 05-Jan-2019
  • संसद में राफेल लड़ाकू विमान खरीदी को लेकर बड़ी बहस चल रही है, और राहुल गांधी के तेवर अभूतपूर्व हैं, आक्रामक हैं। सरकार के पास आंकड़ों के अपने जवाब तो हैं, लेकिन पिछले साल दो साल से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गांधी-नेहरू परिवार, और साठ बरस की सरकारों को लेकर, नेहरू से देश को पहुंचे नुकसानों का आरोप लगाते हुए जो रोजाना का हमला चलाए हुए थे, उसके दिन राफेल ने खत्म कर दिए। अब सरकार सुप्रीम कोर्ट के कटघरे से तो बाहर है, लेकिन जनता के कटघरे में जरूर आ गई है जहां लोगों को बढ़े हुए दाम की बात समझ नहीं आ रही, अंबानी की बात समझ नहीं आ रही, और जहां मोदी सरकार की ईमानदारी दिल्ली की धुंध में बुरी तरह घिरी हुई दिख रही है। ऐसे बड़े, गोपनीय, और जटिल फौजी खरीदी के सौदे की हकीकत को समझना तो आसान नहीं है, लेकिन इस देश का इतिहास है कि यहां एक छोटे से बोफोर्स-सौदे को लेकर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था, और राजीव गांधी की सरकार निपट गई थी। उस वक्त कहीं किसी एक बच्चे ने नारा लगा दिया था कि गली-गली में शोर है राजीव गांधी चोर है। आज भारत की राजनीति में भाजपा जिसे बच्चा कहते थकती नहीं है, जिसे बच्चा साबित करने के लिए सोशल मीडिया पर दसियों हजार लोगों को नौकरी दी गई है, राजनीति के उसी अधेड़-बच्चे ने नारा लगाया है कि देश का चौकीदार चोर है, और वह नारा गूंजना खत्म नहीं हो रहा है। 

    दरअसल लोकतंत्र की एक दिक्कत यह भी रहती है कि जनधारणा को बनाने में हकीकत काम भी आती है, और हकीकत की बुनियाद कुछ कमजोर भी रहे, तो भी उस पर जुमलों का रंग-रोगन लगाकर कमी पूरी की जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तकरीबन अपने हर भाषण में शब्दों का कोई न कोई जुमला जरूर उछालते हैं, और उन्हीं की पार्टी के दिग्गजों ने अच्छे दिनों के उनके नारे को बाद में एक जुमला करार देते हुए अच्छे दिन लाने की जिम्मेदारी से हाथ धो लिए थे। लेकिन कुछ सकारात्मक जुमले भी लोकतंत्र में असर डालते दिखते हैं। छत्तीसगढ़ में अभी हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का एक जुमला था, वक्त है बदलाव का, और इस जुमले ने बात की बात में जोर पकड़ा लिया, और जो लोग पिछली सरकार के काम को अच्छा मानते थे उनको भी लगा कि एक बार बदलाव हो सकता है कि मौजूदा से बेहतर हो जाए, और यह जुमला ऐसा आगे बढ़ा, उसने ऐसा जोर पकड़ा कि वह भाजपा को रौंद गया, उसे ढंग का विपक्ष बनने लायक भी नहीं छोड़ा। 

    आज देश भर में रफाल को लेकर, अंबानी को लेकर लोगों के मन में शक बड़ा गहरा है। दूसरी तरफ राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने पिछले साढ़े चार बरस की आज तक की सबसे बड़ी ताकत हासिल की है। 2019 के आम चुनाव के नतीजे चाहे जो हों, राहुल गांधी ने एक बड़ा मोर्चा खोलकर, खुलकर हमलावर तेवर अपनाकर एक बड़ा काम किया है कि मोदी के मुकाबले विपक्ष को एक करने की संभावनाओं को बढ़ाया है। यह नौबत लोकतंत्र के लिए इसलिए अच्छी है कि बेपनाह ताकत सत्ता को कैसे बर्बाद कर सकती है यह छत्तीसगढ़ में चुनावों में पहले साबित हुआ है, और उसके बाद अब सरकार की फाईलों से निकले हुए भूत उसका सुबूत दे रहे हैं। कुछ ऐसा ही देश में मोदी सरकार के साथ हुआ है जिसकी ताकत के सामने सारे लोकतांत्रिक संस्थान, तमाम संवैधानिक संस्थान चौपट हो गए हैं, और ऐसी बेइंतहा ताकत ने देश को डरा दिया है, सहमा दिया है। ठीक ऐसे ही वक्त राहुल गांधी ने इस सरकार को कटघरे में भी खड़ा किया है, और सैकड़ों-हजारों करोड़ की लागत से उनका पप्पू नाम का जो पुतला भाजपा-एनडीए ने बनाया था, उस पुतले को भी उन्होंने धराशायी कर दिया है। यह भारतीय राजनीति में चुनाव के कुछ महीने पहले एक बड़ा दिलचस्प मोड़ है, और आने वाले महीने मोदी के लिए 2014 की तरह के मोटे कालीन पर मजे से चलते हुए प्रधानमंत्री दफ्तर पहुंचने जैसे आरामदाह तो कम से कम नहीं रहेंगे। आगे-आगे देखें होता है क्या।
    - सुनील कुमार 

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