राष्ट्रीय

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28-Nov-2020 3:34 PM 21

कार के गठन के बाद विधान परिषद में पहले सत्र का आखिरी दिन काफी हंगामेदार रहा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) को जहां पूर्व सीएम राबड़ी देवी ने रोजगार के मसले पर घेरा, तो वहीं पूर्व सीएम काफी मुखर रहीं. राज्यपाल के अभिभाषण के बाद वाद-विवाद में सीएम नीतीश कुमार के सामने राबड़ी देवी (Rabri Devi) ने कहा, 19 लाख नौकरी की बात राज्यपाल की भाषण में क्यों नहीं थी. 19 लाख लोगों को नौकरी दिए जाने की बात का जिक्र क्यों नहीं किया गया.

राबड़ी देवी ने कहा कि बिहार में आज रोजगार क्यों नहीं है. लोगों को सरकार नौकरियां क्यों नहीं दे रही है. आज लालू शासन को जंगलराज कहा जाता है, लेकिन मैं पूछती हूं कि आज किस पर आरोप नही है? कौन ऐसा व्यक्ति है जिस पर दाग नहीं लगा हुआ है. राबड़ी देवी द्वारा सभी को दागी कहने पर परिषद में हंगामा हुआ. बिहार सरकार के मंत्री व भाजपा नेता मंगल पांडेय ने राबड़ी के बयान का विरोध किया. सदन में हंगामा होने लगा तो बीच में ही किसी ने राबड़ी देवी को 'अनपढ़' कह दिया. इस पर वह बेहद भावुक हो गईं.

'अनपढ़' कहे जाने पर भावुक हो गईं राबड़ी
'अनपढ़' कहे जााने पर राबड़ी देवी ने कहा, पहले के दिनों में स्कूल नहीं था, इसलिए नहीं पढ़े. हमारे बाप दादा ने नहीं पढ़ा या पढ़ाया तो हमारी क्या गलती? लालू ने आवाज दी तो आज सबलोग पढ़ रहे हैं. आज बिहार के लोग परेशान हैं. पिछले 15 सालों में बिहार में सिर्फ झूठा विकास हुआ है.

राबड़ी देवी ने कहा, हमारे 15 सालों के शासन को चलने नहीं दिया गया. चारा घोटाला में साजिश के तहत फंसाया गया. जब चारा घोटाला पहले से हो रहा था फिर 1990 से जांच क्यों? आज आरजेडी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है. सरकार ने साजिश के तहत कई सीटें हराई गईं. अगर नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव जीते तो जेडीयू को 42 सीट क्यों है. (hindi.news18.com)

 


28-Nov-2020 3:27 PM 13

नई दिल्ली, 28 नवंबर | देश में बाल विवाह एक अपराध है। सबसे हैरान करने वाली बात है कि दिल्ली जैसे शहर में भी अभी तक बच्चियों को बोझ समझकर नाबालिग उम्र में उनका विवाह करवाया जा रहा है। ऐसी ही एक मामला दिल्ली के कल्याणपुरी इलाके से सामने आया है जहां एक करीब 16 वर्षीय किशोरी का विवाह जबरन करवाया जा रहा था।

दिल्ली महिला आयोग को एक अज्ञात कॉल के जरिए जानकारी मिली कि लड़की का विवाह समारोह चल रहा है। शिकायतकर्ता से जानकारी मिलते ही आयोग ने तुरंत एक टीम मौके पर भेजी। वहां पहुचने पर पाया गया कि लड़की के विवाह का कार्यक्रम चल रहा था और कार्यक्रम में काफी लोग शामिल थे।

आयोग की टीम ने तुरंत पुलिस को सूचित किया और पुलिस के साथ विवाह स्थल पर पहुंची। जब लड़की के परिवार वालों से लड़की के प्रमाण पत्र मांगे गए तो वो कागज दिखाने में काफी समय तक हिचकिचाते रहे। उसके बाद जब टीम ने लड़की के कागज देखे तो टीम ने पाया कि लड़की नाबालिग है और उसका विवाह गैर कानूनी है।

टीम द्वारा लड़की और उसके परिवार वालों को कल्याणपुरी पुलिस स्टेशन ले जाया गया और वहां सभी के बयान दर्ज किए गए। बयान के बाद लड़की का मेडिकल कराया गया और घटना की जानकारी बाल कल्याण समिति को दी गई।

आयोग की कार्यवाही के बाद लड़की को शेल्टर होम में छोड़ा गया और अब लड़की को बाल कल्याण समिति के सामने प्रस्तुत किया जाएगा जिसके बाद समिति के आदेशों के बाद पुलिस आगे की कार्यवाही करेगी।

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा, "इस मामले की जानकारी हमें हमारी हेल्पलाइन 181 से मिली। शिकायतकर्ता ने बताया कि लड़की को बचाने के लिए बहुत कम समय है क्योंकि उसका जबरन विवाह करवाया जा रहा है। हमारी टीम जरा भी देर न करते हुए तुरंत मौके पर पहुंची और लड़की का विवाह रुकवाया।"

उन्होंने कहा, "बड़ा दुख होता है जब छोटी बच्चियों को इस प्रकार शादी के बंधन में बांध दिया जाता है। दिल्ली महिला आयोग सतर्क है और दिन रात दिल्ली में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा की लड़ाई लड़ रहा है।"  (आईएएनएस)


28-Nov-2020 2:52 PM 20

मुंबई, 28 नवंबर। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्य की गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ठाकरे सरकार को एक साल की उनकी नाकामियों पर कोर्ट से फटकार मिली है। पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्धव ठाकरे को उनकी कथित धमकियों को लेकर भी घेरा। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता फडणवीस ने कहा, मैंने कभी ऐसा मुख्यमंत्री नहीं देखा, जो इतनी धमकियां देता हो। उद्धव ठाकरे ने शिवसेना के मुखपत्र सामना को दिए एक इंटरव्यू में भाजपा को तीखे हमले किए थे।

फडणवीस ने अभिनेत्री कंगना रनौत और रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी के मामले में कोर्ट से मिली फटकार पर भाजपा ने महाराष्ट्र सरकार पर निशाना साधा है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शनिवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि उद्धव ठाकरे सरकार को अर्णब और कंगना के मामले में गलत तरीके से निपटने के साथ उनकी एक साल की नाकामियों को सामने ला दिया।

फडणवीस ने कहा, उद्धव ठाकरे के एक साल को कोर्ट के दो निर्णयों से समझा जा सकता है। कोर्ट ने ध्यान से इन मामलों को सुना। सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तगड़ी चोट करने वाला फैसला सुनाया। ऐसा लगता है कि सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा था।  सुप्रीम कोर्ट ने अर्णब गोस्वामी को जमानत देते हुए महाराष्ट्र सरकार की जल्दबाजी पर सवाल उठाए थे। वहीं बांबे हाईकोर्ट ने कंगना रनौत के बंगले पर की गई कार्रवाई को गलत ठहराते हुए मुआवजे का आकलन करने का निर्देश दिया है।
 
महाराष्ट्र में शिवसेना के एनसीपी-कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार के एक साल पूरे होने को लेकर फडणवीस ने यह प्रेस कान्फ्रेंस की।फडणवीस ने कहा, हम अर्णब गोस्वामी या कंगना रनौत के साथ हर बात हर वक्त सहमत नहीं हो सकते हैं। लेकिन जिस तरह से सरकार ने उनसे व्यवहार किया, उसको लेकर हम उनके साथ खड़े हैं। गठबंधन को महाराष्ट्र विकास अघाडी कहा जाता है। (khabar.ndtv.com)


28-Nov-2020 2:31 PM 36

चंडीगढ़, 28 नवंबर | हरियाणा के मुरथल के प्रसिद्ध अमरीक सुखदेव ढाबे ने विरोध प्रदर्शन करने दिल्ली जा रहे किसानों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। वे किसानों को मुफ्त में भोजन करा रहे हैं और इसके लिए उन्हें खासी सराहना मिल रही है।

इंडियन नेशनल कांग्रेस की यूथ विंग ने माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर अंबाला-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित इस ढाबे की एक क्लिप साझा की है। ट्वीट में कहा गया है, "यह मेरा भारत है! इसे सलाम। दिल्ली हरियाणा बॉर्डर पर मुरथल का अमरीक सुखदेव ढाबा किसानों को मुफ्त में खाना परोस रहा है।"

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी), महाराष्ट्र राज्य समिति ने इस ढाबे को 'लाल सलामी' दी।

सीपीआई-एम महाराष्ट्र ने ट्वीट कर कहा, "ये कहानियां हैं जो हमारे समाज को जीने और जीने के लिए एक खूबसूरत जगह बनाती हैं .. अमरीक सुखदेव ढाबा को लाल सलाम।"  (आईएएनएस)
 


28-Nov-2020 2:30 PM 30

हैदराबाद, 28 नवंबर | तेलंगाना के हकीमपेट एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करने के लिए मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव को आमंत्रित नहीं किए जाने की खबरों के बीच अधिकारियों ने यह पुष्टि की है कि राव पीएम नरेंद्र मोदी की अगवानी करने एयरपोर्ट नहीं जा रहे हैं। मुख्यमंत्री के कार्यालय के एक अधिकारी ने आईएएनएस को बताया, "मुख्यमंत्री पीएम मोदी की अगवानी करने नहीं जा रहे हैं।"

नरेंद्र मोदी कोरोना वैक्सीन के विकास को देखने के लिए हैदराबाद सहित तीन शहरों के दौरे पर हैं।

हालांकि मिली रिपोर्टों के अनुसार, राव को प्रधानमंत्री के इस दौरे से अलग रखा गया है, जबकि राज्यपाल और मुख्यमंत्री के लिए प्रधानमंत्री को रिसीव करना मानक प्रोटोकॉल का हिस्सा है।

तेलंगाना के मुख्य सचिव सोमेश कुमार और सीएम के प्रमुख सचिव नरसिंग राव ने सीएम को आमंत्रित नहीं किए जाने की बात की पुष्टि नहीं की है।

मोदी कोविड वैक्सीन की प्रगति पर काम को देखने को देखने के लिए भारत बायोटेक का दौरा करेंगे। (आईएएनएस)
 


28-Nov-2020 2:09 PM 17

हैदराबाद, 28 नवंबर | तेलंगाना में कोरोना के 753 नए मामले सामने आने के बाद राज्य में शनिवार को कुल मामलों की संख्या 2.68 लाख हो गई। सरकार के दैनिक बुलेटिन के अनुसार, तेलंगाना में सक्रिय मामले अब 10,637 हैं। पिछले 24 घंटों में 952 मरीज ठीक हुए, जिसके बाद रिकवर हुए मरीजों की कुल संख्या 2.56 हो गई।

वहीं, 3 और मौतों के बाद मरने वालों की कुल संख्या 1,451 हो गई। देश की औसत मृत्यु दर 1.5 प्रतिशत के मुकाबले राज्य में मृत्युदर 0.54 प्रतिशत है।

राज्य में इस दौरान 41,991 सैंपलों की जांच की गई है, जिससे इसकी संख्या बढ़कर 53.7 हो गई है (आईएएनएस)
 


28-Nov-2020 2:08 PM 36

बुलंदशहर, 28 नवंबर | केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन को योगी आदित्यनाथ सरकार के वन तथा पर्यावरण मंत्री अनिल शर्मा ठीक नहीं मानते हैं। शर्मा का मानना है यह प्रदर्शन करने वाले किसान नहीं, बल्कि गुंडे हैं। किसान तो अपने काम में लगा है। चंद लोग एकत्र होकर उनको गुमराह करने के प्रयास में लगे हुए हैं।

किसानों के सड़क पर बैठ हाईवे जाम कराने के सवाल पर वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री अनिल शर्मा ने कहा, "यह प्रदर्शन तथा विरोध आम किसान नहीं कर रहे हैं। आम किसान को अपनी व्यस्त दिनचर्या के कारण बेकार के काम करने की फुर्सत ही नहीं है। मेरा तो मानना है कि किसी भी किसान ने यह प्रदर्शन नहीं किया है। यह सिर्फ कुछ गुंडे हैं जो प्रदर्शन कर रहे हैं।"

शर्मा ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार लगातार किसानों के हित में काम कर रही है। चीनी मिलों को समय से चलवाने के साथ किसानों के गन्ना का समय से भुगतान और गेंहू तथा धान की बड़ी पैमाने पर समय से खरीद का काम सरकार की वरीयता में हैं। इस बार तो सरकार ने मक्का भी खरीदा है। इससे पहले प्रदेश में मक्का को कभी किसी भी सरकार ने नहीं खरीदा था। उत्तर प्रदेश की सरकार लगातार किसानों के हित में काम कर रही है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली का घेराव करने पर आमादा पंजाब तथा हरियाणा सहित देश के अन्य प्रांत के किसानों को भारतीय किसान यूनियन का भी समर्थन मिल रहा है।  (आईएएनएस)
 


28-Nov-2020 2:06 PM 24

बुराड़ी, 28 नवंबर | कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने टिकरी और सिंघु बॉर्डर पर अपना डेरा बनाया हुआ है। हालांकि पंजाब से दिल्ली आए किसानों को बुराड़ी के निरंकारी मैदान पर प्रदर्शन की अनुमति दे दी गई है और आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्डा ने आकर निरंकारी मैदान में हो रही व्यवस्थाओं का जायजा लेने पहुंचे हुए हैं। आप नेता राघव चड्डा ने कहा कि "मोदी सरकार इसे अहम की लड़ाई न बनाए। केजरीवाल सरकार दिल्ली में किसानों का स्वागत कर रही है।"

निरंकारी मैदान में आम आदमी पार्टी ने सुबह ही अपने बैनर लगवा दिए हैं। इस मसले पर चड्डा ने आईएएनएस से कहा, "अगर कोई व्यक्ति अपने मन से लगा है वह एक अलग विषय है, हम लोग सिर्फ किसानों की मेजबानी कर रहे हैं।"

किसानों के लिए टेंट, शेल्टर, चलते-फिरते टॉइलट उपलब्ध कराए जा रहे हैं। चड्डा ने आईएएनएस से कहा, "हमें मुख्यमंत्री केजरीवाल की तरफ से निर्देश दिए गए हैं कि निरंकारी मैदान में सभी व्यवस्थाएं बनाए रखनी है। जहां-जहां किसान जाकर धरना करना चाहते हैं उन्हें पूरी आजादी होनी चाहिए। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को अपनी अहम की लड़ाई नहीं बनाना चाहिए।"

उन्होंने कहा, "किसान जहां जाना चाहे उन्हें अनुमति होनी चाहिए। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल किसानों के मेजबान होंगे और किसानों की पूरी मेजबानी करेंगे। पानी हो, रहने की व्यवस्था हो, खाने पीने की व्यवस्था हो सरकार करेगी और हम किसानों का दिल्ली में स्वागत करते हैं।"

निरंकारी मैदान पर किसानों के लिए बेसिक आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके तहत सबसे पहले यहां किसानों के लिए पेयजल की व्यवस्था की गई। जिसके लिए दिल्ली सरकार ने अपने विधायक एवं दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष राघव चड्ढा को बुराड़ी भेजकर व्यवस्था का जायजा लेने भेजा हैं, वहीं बीते कल भी राघव चड्डा निरंकारी मैदान पहुंचे थे। (आईएएनएस)
 


28-Nov-2020 2:05 PM 15

बुराड़ी, 28 नवंबर | कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने टिकरी और सिंघु बॉर्डर पर अपना डेरा बनाया हुआ है। हालांकि पंजाब से दिल्ली आए कुछ संगठन बुराड़ी के निरंकारी मैदान में पहुंच चुके हैं, वहीं किसानों ने अपने खाने पीने की व्यवस्था भी कर रखी है। किसानों ने जमीन पर गढ्ढे खोद चूल्हे बना रखे हैं,ि जसपर सब्जियां बन रही हैं। वहीं तवा लगाकर रोटियां भी सेकी जा रही हैं, ताकि किसानो के साथ आए उनके साथियों को परेशानी न हो।

दरअसल किसानों को बुराड़ी के निरंकारी मैदान पर प्रदर्शन की अनुमति दे दी गई है। जहां उनके ठहरने और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था की जा रही है।

दिल्ली टिकरी और सिंघु बॉर्डर पर किसान अभी भी बॉर्डर पर जमे हुए है। हालांकि कुछ किसान रात भर में मैदान में भी आ चुके हैं। विभिन्न किसान संगठन इस वक्त बुराड़ी के निरंकारी मैदान में मौजूद है और अपने गाड़ियों और ट्रैक्टरों में किसान सोए हुए हैं। करीब 6 महीने का राशन भी किसान साथ लेकर आए हुए हैं।

पंजाब से भारतीय किसान यूनियन राजेवाल बैनर तले आए जसवीर सिंह ने आईएएनएस को बताया, "6 महीने का राशन लेकर आए हैं। चाहे हमें कितना भी वक्त बैठा रहना पड़े, अगर उसके बाद भी नहीं मानते तो हम पंजाब से आने वाले खाने की सभी चीजों को बंद कर देंगे। हम पैदा करते हैं तो हम दिल्ली में भेजने से रोक भी सकते हैं।"

निरंकारी मैदान पर किसानों के लिए बेसिक आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। वहीं सुबह से कई एनजीओ भी किसानों की मदद करने के लिए उतरे हुए हैं।  (आईएएनएस)

 


28-Nov-2020 2:02 PM 14

नई दिल्ली, 28 नवंबर| भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) का कहना है कि किसान आंदोलन अब सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें अब पूरा देश शामिल है क्योंकि यह पूरे देश के किसानों का सवाल है।

भाकियू के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि अब यह सिर्फ पंजाब के किसानों आंदोलन नहीं है बल्कि इसमें पूरे देश के किसान शामिल हैं, लेकिन आंदोलन की रणनीति वही होगी जो पंजाब के किसान संगठनों के नेता तय करेंगे।

केंद्र सरकार द्वारा लागू नये कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का विरोध प्रदर्शन शनिवार को तीसरे दिन जारी था। पंजाब और हरियाणा से आए प्रदर्शनकारी किसान दिल्ली की सीमा पर जुटे हैं और वे नये कृषि कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

गुरनाम सिंह ने बताया कि विरोध प्रदर्शन में पंजाब के करीब 30 किसान संगठनों के नेता यहां जुटे हैं और आगे की रणनीति बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि बहरहाल आंदोलन की वही दिशा व रणनीति रहेगी जो पंजाब के किसान तय करेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पूरे देश के किसान नेता भी इसके बाद मिलेंगे और आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श करेंगे।

किसानों के मसले को लेकर सरकार से बातचीत को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि सरकार की अपनी शर्तें हैं।

बता दें कि शुक्रवार को आईएएनएस से बातचीत में कृषि एवं खाद्य सचिव सुधांशु पांडेय ने कहा कि किसानों को बातचीत के लिए पहले ही आमंत्रित किया गया है और पूर्व में सरकार के साथ हुई बातचीत में पंजाब के किसाना नेताओं ने आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति भी जताई थी। उन्होंने कहा कि मसले का हल बातचीत के जरिए ही निकल सकता है और सरकार बातचीत के लिए तैयार है, ऐसे में विरोध-प्रदर्शन का तो कोई आधार ही नहीं बनता है।

इस संबंध में पूछे गए सवाल पर गुरनाम सिंह ने कहा कि पिछली बार बातचीत बेनतीजा रही, इसलिए उन्हें सड़कों पर उतरना पड़ा। (आईएएनएस)


28-Nov-2020 2:01 PM 31

नई दिल्ली, 28 नवंबर| सीबीआई ने अवैध कोयला खनन मामले को लेकर चार राज्यों के 45 स्थानों पर छापेमारी की। इसकी जानकारी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने शनिवार को दी। सीबीआई के अनुसार, ईस्ट बंगाल फील्ड्स लिमिटेड के अधिकारियों और कुछ अन्य व्यक्तियों के साथ पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में छापेमारी चल रही है।

सीबीआई के एक सूत्र ने आईएएनएस को बताया, "कोयला माफियाओं के परिसरों सहित 4 राज्यों के 45 स्थानों पर सुबह से ही तलाशी जारी है। आपराधियों की तलाश की जा रही है।"

हालांकि, सूत्रों ने इस विषय में ज्यादा नहीं बताया है। (आईएएनएस)


28-Nov-2020 1:51 PM 11

आलोक जोशी

इतिहास में पहली बार भारत में आर्थिक मंदी आ गई है. जुलाई से सितंबर के बीच भारत की अर्थव्यवस्था साढ़े सात फीसदी घटी है.

इससे पहले की तिमाही में यह गिरावट 24.9 फीसदी थी. उसके मुक़ाबले आज हालत अच्छी है, चिंताजनक है या फिर चिंताजनक होते हुए भी उम्मीद से भरी है? इसका जवाब इस बात पर निर्भर है कि आप इसे किस नज़रिए से देखना चाहते हैं.

24.9 फीसदी की ऐतिहासिक गिरावट के बाद यह गिरावट थमकर साढ़े सात फीसदी ही रह गई ये - तो इस नज़रिए से ये अच्छी ख़बर हुई न!

सरकार की तरफ से इस दलील को रखने वाले यही समझा रहे हैं. उनका कहना है कि कोरोना के भयानक झटके के बाद अब जो आंकड़ा आया है वो आशंका से कम है और इस बात का संकेत है कि आगे हालात बेहतर होंगे.

यहां यह याद रखना चाहिए कि कुछ ही दिन पहले रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने आर्थिक भविष्यवाणी की नई व्यवस्था नाउकास्टिंग यानी वर्तमानवाणी शुरू की है. उसने इस तिमाही में जीडीपी में 8.6 फीसदी गिरावट होने की आशंका जताई थी.

उससे कुछ ही पहले मॉनिटरी पॉलिसी के वक़्त रिजर्व बैंक को यह गिरावट 9.8 फीसदी रहने की आशंका थी.

क़रीब-क़रीब उसी वक्त अर्थशास्त्रियों के एक सर्वे में यह आंकड़ा साढ़े दस परसेंट तक रहने का अनुमान था. उस लिहाज़ से देखेंगे तो ख़बर राहत की है.

और आर्थिक मोर्चे पर भारत सरकार के लिए सबसे असुविधाजनक आंकड़े और तथ्य सामने रखने के लिए मशहूर सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने भी जीडीपी का तिमाही आंकड़ा सामने आने के कुछ ही घंटे पहले कुछ ऐसा कहा जो सरकार को काफी अच्छा लगा होगा.

सीएमआईई ने कहा कि देश तकनीकी तौर पर मंदी में चला गया है इसके बावजूद पहली तिमाही में अब तक की सबसे तेज़ गिरावट के मुकाबले इस तिमाही का आंकड़ा खासे सुधार का संकेत तो है.

उनका कहना है कि इसके लिए मुख्यरूप से औद्योगिक क्षेत्र ज़िम्मेदार है जो पिछली तिमाही में 35.7 फीसदी तक गिरने के बाद इस तिमाही इस गिरावट को 3.4 फीसदी पर ही बांधने में कामयाब रहा.

मुसीबत ख़त्म होने की बात मानना जल्दबाज़ी
लेकिन इससे यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी कि मुसीबत ख़त्म हो गई है या जल्दी ही मुसीबत ख़त्म होने के आसार हैं.

यहां तक कि सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यन का भी कहना है कि बेहतरी की उम्मीद के साथ सजग रहना ज़रूरी है. मतलब साफ है कि सावधानी का दामन छोड़ना ख़तरनाक हो सकता है.

हालांकि रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास एक दिन पहले ही उम्मीद जता चुके थे कि हालात बेहतर हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि कोरोना के भयानक झटके के बाद जिस रफ्तार से सुधार की उम्मीद थी भारतीय अर्थव्यवस्था उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से पटरी पर लौट रही है.

लेकिन अगर थोड़ा बारीक़ी से देखें तो हालात दरअसल इतने अच्छे भी नहीं हैं. अच्छे तो कोई कह भी नहीं सकता क्योंकि जीडीपी में साढ़े सात परसेंट की गिरावट भी कम नहीं होती.

लेकिन ख़ास बात यह है कि साढ़े सात परसेंट की यह गिरावट पिछली तिमाही यानी उस तिमाही के मुक़ाबले नहीं है जिस तिमाही में देश की जीडीपी ने 24.9 परसेंट का गोता लगाया था. बल्कि यह गिरावट पिछले साल की इसी तिमाही या जुलाई से सितंबर के बीच के समय की तुलना में है.

समस्या यह है कि उस तिमाही में भी भारत की जीडीपी उससे पिछले साल की इसी तिमाही के मुक़ाबले सिर्फ 4.4 परसेंट ही बढ़ी थी.

याद करें यह वो वक़्त था जब भारत भर में यह बहस छिड़ चुकी थी कि देश में मंदी है या स्लोडाउन. स्लोडाउन का तर्जुमा कुछ अर्थ कम राजनीति ज़्यादा पढ़ानेवाले जानकारों ने किया -धीमापन.

हिंदी में मंदी और धीमेपन का फर्क समझना भी मुश्किल है. लेकिन अर्थशास्त्र में मंदी की एक परिभाषा है. जब तक लगातार दो तिमाही कोई अर्थव्यवस्था निगेटिव ग्रोथ न दिखाए, यानी बढ़ने के बजाय सिकुड़ती न दिखे, तब तक उसे मंदी नहीं कहते हैं.

जब रिजर्व बैंक ने अपने नाउकास्ट में 8.6 फीसदी की गिरावट की आशंका जताई तब साथ में उसने यह भी कहा कि भारत में 'टेक्निकल रिसेशन' यानी तकनीकी मंदी आ सकती है.

नकारने की कोशिश
इस बार जीडीपी आंकड़ा आने के साथ ही टेक्निकल शब्द पर ज़ोर बढ़ गया दिखता है. मानो मंदी है नहीं, बस तकनीकी तौर पर साबित हो गई है.

इसके पीछे एक ओर तो यह भाव है कि जल्दी ही मंदी पर पार पा लिया जाएगा. लेकिन दूसरी तरफ इस बात को नकारने की कोशिश भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक गंभीर संकट से गुज़र रही है जिससे निपटने के लिए 'भागीरथ प्रयत्न' की ज़रूरत है.

यह गंभीर संकट समझने के लिए ही ज़रूरी है कि पिछले साल की उस परिस्थिति को समझा जाए जब कोरोना का ख़तरा सामने न होने के बावजूद देश में मंदी की आशंका ज़ाहिर करनेवाले स्वर बढ़ रहे थे और लगातार ऐसे आंकड़े आ रहे थे जो अर्थव्यवस्था में कमज़ोरी के संकेत दे रहे थे.

और जीडीपी बढ़ने की रफ्तार क़रीब दो साल से गिर रही थी. साफ़ है कि जीडीपी का आंकड़ा एक कमज़ोर स्थिति के मुक़ाबले की तस्वीर दिखा रहा है. यानी चिंता जितनी दिख रही है उससे कहीं बड़ी है.

दूसरी चिंता की बात प्राइवेट कंज़ंप्शन यानी सरकार के अलावा दूसरे लोगों या व्यापारों में होनेवाली खपत में गिरावट है.

हालांकि पिछले दिनों बड़ी-बड़ी सेल में भारी बिक्री और नवरात्रि पर जमकर गाड़ियां बिकने की ख़बरों ने काफ़ी उत्साह जगाया लेकिन खपत में ग्यारह परसेंट से ज़्यादा की गिरावट एक चिंताजनक संकेत है.

ऐसा ही एक और ख़तरनाक संकेत है कि निजी कंपनियों का मुनाफ़ा तो दो साल पहले के स्तर पर वापस पहुंच गया है, लेकिन उनकी कमाई और उनका खर्च उसके मुक़ाबले दस से पंद्रह परसेंट नीचे दिख रहे हैं. ज़ाहिर है यह मुनाफ़ा, कमाई का नहीं खर्च में भारी कटौती का नतीजा है.

यह आंकड़े राहत का संकेत ज़रूर हैं, लेकिन अगर अर्थव्यवस्था को तेज़ी से वापस पटरी पर लाना है तो सरकार को अब अपनी तरफ से कुछ और बड़े कदम उठाने होंगे.

ऐसे कदम जिनसे लोग खर्च करने निकलें, बाज़ार में मांग बढ़े, कंपनियां ज़्यादा माल बनाएं और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को काम मिले और आगे कमाई बढ़ने की उम्मीद भी बढ़े. ऐसा होने पर ही वो हाथ खोलकर खर्च करेंगे और आर्थिक तरक्की का चक्का तेज़ी से घूमेगा. 
(bbc.com)


28-Nov-2020 1:50 PM 23

लखनऊ, 28 नवंबर। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा प्रस्तावित धर्मांतरण संबंधी अध्यादेश को शनिवार को राज्यपाल ने मंजूरी दे दी है। उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश के मसौदे को राज्यपाल से अनुमोदन के लिए बुधवार को राजभवन भेजा गया था। कैबिनेट की मंजूरी के बाद इस अध्यादेश के मसौदे को राज्यपाल के पास भेजा गया था। 

योगी आदित्यनाथ मंत्रिपरिषद की बैठक में मंगलवार को धर्मांतरण कानून के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद बुधवार को इसको राज्यपाल के पास अनुमोदन के लिए भेजा गया था। राज्यपाल से मंजूरी मिलते ही यह अध्यादेश के रूप में यूपी में लागू हो गया है और अब ऐसा अपराध गैर जमानती माना जाएगा। 

अध्यादेश के अनुसार, किसी एक धर्म से अन्य धर्म में लडक़ी का धर्म परिवर्तन सिर्फ एकमात्र प्रयोजन शादी के लिए किया जाता है तो ऐसा विवाह शून्य (अमान्य) की श्रेणी में लाया जा सकेगा। राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद अब इस अध्यादेश को छह माह के भीतर विधानमंडल के दोनों सदनों में पास कराना होगा।

ज्ञात हो कि अध्यादेश के अनुसार एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन के लिए संबंधित पक्षों को विहित प्राधिकारी के समक्ष उद्घोषणा करनी होगी कि यह धर्म परिवर्तन पूरी तरह स्वेच्छा से है। संबंधित लोगों को यह बताना होगा कि उन पर कहीं भी, किसी भी तरह का कोई प्रलोभन या दबाव नहीं है। अध्यादेश में धर्म परिवर्तन के सभी पहलुओं पर प्रावधान तय किए गए हैं। इसके अनुसार धर्म परिवर्तन का इच्छुक होने पर संबंधित पक्षों को तय प्रारूप पर जिला मजिस्ट्रेट को दो माह पहले सूचना देनी होगी। इसका उल्लंघन करने पर छह माह से तीन वर्ष तक की सजा हो सकती है। 

उत्तर प्रदेश में आज से महज शादी के लिए अगर लडक़ी का धर्म बदला गया तो ऐसी शादी अमान्य घोषित होगी। इसके साथ ही धर्म परिवर्तन कराने वालों को 10 वर्ष तक जेल भी भुगतनी पड़ सकती है। गैर जमानती अपराध के मामले में प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के न्यायालय में मुकदमा चलेगा। दोष सिद्ध हुआ तो दोषी को कम से कम एक वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष की सजा भुगतनी होगी।  (आईएएनएस)


28-Nov-2020 1:40 PM 10

ज़ुबैर अहमद

महाराष्ट्र में औरंगाबाद ज़िले के कपास के काश्तकार दिनेश कुलकर्णी अपने 50 प्रतिशत कपास उत्पादन की बिक्री न होने के कारण हताश हैं.

वो कहते हैं, "पिछले साल बारिश का मौसम काफ़ी लंबा चला और इस साल महामारी शुरू होने के कारण मेरा पिछले साल का कपास पूरा नहीं बिक सका."

दिनेश कुलकर्णी की तरह कपास के हज़ारों किसानों का उत्पादन पूरी तरह से मंडी से उठ भी नहीं पाया. खुले बाज़ार में मांग कम है और दाम ज़्यादा.

वहीं, महामारी के कारण सरकार भी एपीएमसी (कृषि उपज मंडी समिति) के अंतर्गत न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइस) के हिसाब से अपने कोटे का हिस्सा ख़रीद नहीं सकी.

कपास के किसानों के लिए ये एक संकट का समय है और ऊपर से हाल में भारत सरकार ने तीन विवादास्पद कृषि सुधार क़ानून पारित किए हैं, जिसके विरोध में धान और गेहूं उगाने वाले किसान पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सड़कों पर उतर आए हैं. कृषि क़ानूनों को लेकर ये किसान केंद्र सरकार से नाराज़ हैं.

आंदोलन केवल उत्तर भारत में ही क्यों?
लेकिन खेती में हो रहे नुक़सान को बाद भी दिनेश कुलकर्णी और उनके राज्य के किसान सड़कों पर क्यों नहीं उतरे? उनके राज्य में विरोध प्रदर्शन न के बराबर क्यों है?

इसके जवाब में दिनेश कुलकर्णी कहते हैं कि नए क़ानूनों के कुछ पहलुओं का विरोध उनके राज्य के किसान भी कर रहे हैं लेकिन सड़कों पर उतर कर नहीं बल्कि सरकार से बातचीत के ज़रिए.

उन्होंने बताया, "हम पाँच जून से केंद्र सरकार से लगातार बातचीत कर रहे हैं. सरकार ने क़ानून पारित कर दिया, हमारी बात अब तक नहीं मानी है लेकिन हम मायूस नहीं हुए हैं."

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लाखों किसानों की सदस्यता वाले भारतीय किसान संघ के सदस्य दिनेश कुलकर्णी ये स्वीकार करते हैं कि किसानों के मसले उत्तर भारत और पश्चिमी-दक्षिण भारत में एक जैसे हैं.

वो कहते हैं, "किसानों की समस्या हर जगह एक जैसी है. केंद्र और राज्य की सरकारें एपीएमसी (कृषि उपज मंडी समिति) के अंतर्गत जो हमारे उत्पादन खरीदती हैं वो पूरे देश में इसका औसत 10 प्रतिशत ही होता है. बाक़ी 90 प्रतिशत किसानों को खुले बाज़ार में डिस्ट्रेस सेल (मजबूरी में बेचना) पड़ता है."

कुलकर्णी के अनुसार खुले बाज़ार में जो ख़रीदार (व्यापारी और कंपनी) आते हैं, वो किसानों का शोषण करते हैं. इसलिए किसानों की समस्या हर जगह समान है. वो ये भी मानते हैं कि नए क़ानून से उत्तर भारत के किसानों को अधिक नुक़सान उठाने की आशंका पैदा हो सकती है.

...इसलिए पंजाब में स्थिति अलग है
एपीएमसी के अंतर्गत सरकार की तरफ़ से पहले से तय हुए दाम में ख़रीददारी का राष्ट्रीय औसत 10 प्रतिशत से कम है, लेकिन इसका उलट पंजाब में 90 प्रतिशत से अधिक है.

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उपजाऊ ज़मीनों पर उगने वाले अनाज को राज्य सरकारें एपीएमसी की मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइस) देकर किसानों से ख़रीद लेती हैं. इसका मतलब खुले बाज़ार में केवल 10 प्रतिशत उत्पादन की बिक्री की गुंजाइश रह जाती है.

photo by Piyush Nagpal BBC

दूसरी तरफ़, देश के लगभग 6,000 एपीएमसी में से 33 फीसदी अकेले पंजाब में ही हैं.

नए कृषि क़ानून के तहत पंजाब का कोई किसान अपने उत्पादन को खुली मंडी में अपने राज्य या राज्य से बाहर कहीं भी बेच सकता है. लेकिन विरोध करने वाले छोटे किसान कहते हैं कि वो एपीएमसी के सिस्टम से बाहर जा कर अपना माल बेचेंगे तो प्राइवेट व्यापारी उनका शोषण कर सकते हैं.

इसीलिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान एपीएमसी को हटाना नहीं चाहते.

हर राज्य में खेती का अलग सिस्टम
केरल में सीपीआई(एमएल) के एक पूर्व विधायक कृष्णा प्रसाद, ऑल इंडिया किसान सभा के वित्तीय सचिव हैं. वो दिल्ली में हैं और क़ानून के विरोध में पूरी तरह से शामिल हैं.

हमने उनसे पूछा कि किसानों की इतनी ज़बरदस्त नाराज़गी पंजाब और हरियाणा में ही क्यों दिख रही है? पश्चिम और दक्षिण राज्यों में क्यों नहीं?

इस पर उनका कहना था, "हरित क्रांति के कारण कृषि और आर्थिक सिस्टम सभी प्रांतों में अलग-अलग हैं. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दो ख़ास अनाज उगाये जाते हैं- धान और गेहूं."

"देश के 6,000 एपीएमसी मंडियों में से 2,000 से अधिक केवल पंजाब में है. इस सिस्टम के अंतर्गत यहाँ के किसानों को गेहूं और चावल के दाम बिहार, मध्य प्रदेश और दूसरे कई राज्यों से कहीं अधिक मिलते है. इस सिस्टम के अंतर्गत सरकार किसानों को न्यूनतम सपोर्ट दाम देने के लिए बाध्य है."

कृष्णा प्रसाद कहते हैं कि इन किसानों को डर इस बात का है कि अब नए क़ानून के तहत एपीएमसी को निजी हाथों में दे दिया जाएगा और सरकार के फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (एफसीआई) जैसे गल्ला गोदामों का निजीकरण कर दिया जाएगा.

छोटे किसानों की हालत सबसे ख़राब
दरअसल, देश भर में कुल किसानों की आबादी में छोटे किसानों का हिस्सा 86 प्रतिशत से अधिक है और वो इतने कमज़ोर हैं कि प्राइवेट व्यापारी उनका शोषण आसानी से कर सकते हैं.

देश के किसानों की औसत मासिक आय 6,400 रुपये के क़रीब है. किसान कहते हैं नए क़ानूनों में उनकी आर्थिक सुरक्षा तोड़ दी गयी हैं और उन्हें कॉर्पोरेट के हवाले कर दिया गया है.

कृष्णा प्रसाद कहते हैं कि नए कृषि क़ानून में दो ऐसी बातें हैं, जिनसे भारत में कृषि और किसानों का भविष्य अंधकार में पड़ता दिखाई देता है.

वो कहते हैं, "ये एपीएमसी और कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग या ठेके पर की जाने वाली खेती सबसे घातक है. कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ एक तालुका या गांव के सभी किसानों की ज़मीने ठेके पर ले सकती हैं और एकतरफ़ा फ़ैसला कर सकती हैं कि कौन-सी फ़सल उगानी है. किसान इनके बंधुआ मज़दूर बन कर रह जाएँगे."

कृष्णा प्रसाद के मुताबिक़, "सरकार ने नए क़ानून लाकर कृषि क्षेत्र का निगमीकरण करने की कोशिश की है और इसे भी 'अंबानी-अडानी और मल्टीनेशनल कंपनियों के हवाले' कर दिया है."

वो कहते हैं, "समझने की बात ये है कि निजी कॉर्पोरेट कंपनियां जब आएँगी तो उत्पाद में मूल्य संवर्धन करेंगी, जिसका लाभ केवल उन्हें होगा. छोटे किसानों को नहीं. आप जो ब्रैंडेड बासमती चावल खरीदते हैं वो मूल्य संवर्धन के साथ बाज़ार में लाए जाते हैं."

"किसान को एक किलो के केवल 20-30 रुपये ही मिलेंगे लेकिन मार्किट में वो मूल्य संवर्धन के बाद 150 रुपये से लेकर ब्रैंड वाले बासमती चावल का दाम 2,200 प्रति किलो तक जा सकता है. लेकिन बेचारे ग़रीब किसान को एक किलो के केवल 20 रुपये ही मिल रहे हैं."

भारत के कुछ राज्यों में कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग का रिवाज़ नए क़ानून के पारित किये जाने से पहले से मौजूद है और कृषि के निजीकरण के उदाहरण भी मिलते हैं. लेकिन अभी ये बहुत छोटे पैमाने पर है.

photo by Piyush Nagpal BBC केरल मॉडल सबसे बढ़िया?

केरल के एक किसान नारायण कुट्टी ने हमें बताया कि उनके राज्य में किसान 50-60 की संख्या में कुछ जगहों पर प्रदर्शन ज़रूर कर रहे हैं लेकिन अधिकतर किसानों ने नए क़ानून का समर्थन किया है.

वो कहते हैं, "केरल में 82 प्रतिशत कोऑपरेटिव्स हैं और वहाँ किसान इस मॉडल को पसंद करते हैं."

असल में केरल में खेती की सब से अच्छी मिसाल छोटी किसान महिलाओं के कोऑपरेटिव्स में मिलती है, जिसे राज्य में कुदुम्बश्री के नाम से जाना जाता है. इसे राज्य सरकार ने 20 साल पहले शुरू किया था.

आज इस योजना में चार लाख के क़रीब महिला किसान शामिल हैं जो 14 ज़िलों में 59,500 छोटे समूहों में विभाजित की गई हैं. ये सब्ज़ी, धान और फल उगाती हैं. चार से 10 सदस्यों का एक समूह होता है जो उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा मंडी में या तो सरकार को बेच देता है या खुली मंडी में.

केरल के कृषि मंत्री सुशील कुमार ने जुलाई में राज्य के कृषि मंत्रिओं की एक कॉफ़्रेंस में दावा किया था कि कॉर्पोरेट द्वारा कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग के बजाय उनका राज्य सहकारी समितियों और सामुदायिक नेटवर्क द्वारा सामूहिक खेती को बढ़ावा दे रहा है, जिसके बहुत अच्छे नतीजे सामने आ रहे हैं.

 BBC

राजनीति या किसानों के असल हमदर्द?
भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों के मुताबिक़ किसानों का आंदोलन पंजाब तक सीमित इसलिए है कि राज्य में कांग्रेस की सरकार है और कांग्रेस इस आंदोलन को स्पॉन्सर कर रही है.

वो कहते हैं, "कांग्रेस सिर्फ़ सियासत कर रही है. हम जो क़ानून लेकर आये हैं, वो कांग्रेस पार्टी के 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में आपको मिल जाएगा. पंजाब सरकार केंद्रीय कृषि बिल को नकारने के लिए अलग क़ानून लाई है, जो उनके अनुसार किसानों की मांगों को पूरा करता है. तो अब आंदोलन किस बात का?"

महाराष्ट्र के किसान दिनेश कुलकर्णी और केरल के किसान नारायण कुट्टी से बातें करके समझ में आया कि उन्हें भी आंदोलन के पीछे कांग्रेस पार्टी का हाथ लगता है.

हालाँकि केरल के पूर्व विधायक कृष्णा प्रसाद कहते हैं कि सियासत बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियाँ कर रही हैं. उनके अनुसार जब मोदी जी विपक्ष में थे तो उनकी पार्टी ने कांग्रेस सरकार के ऐसे प्रस्तावों का कड़ा विरोध किया था और अब सत्ता में आकर उन्होंने कांग्रेस के ही प्रस्तावों को लागू कर दिया है तो अब कांग्रेस परेशान हो रही है.

कृष्णा प्रसाद का कहते हैं, "सच तो ये है कि केवल मोदी जी की आलोचना करना सही नहीं है. कृषि क्षेत्र का निगमीकरण कांग्रेस पार्टी ने 1991 में ही शुरू कर दिया था."  (bbc.com)


28-Nov-2020 1:30 PM 9

-दीप्ति बथिनी

लोकसभा चुनाव 2019 में तेलंगाना में चार सीटें जीतने का जश्न मनाते बीजेपी कार्यकर्ता

हैदराबाद में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव काफी दिलचस्प हो गए हैं. ये निकाय चुनाव इसलिए भी ख़ास बन गए हैं क्योंकि एक के बाद एक बीजेपी के कई बड़े नेता हैदराबाद में चुनावी रैलियां कर रहे हैं.

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में 150 पार्षद चुने जाने हैं जिन पर शहर में प्रशासन और आधारभूत ढांचे के निर्माण की ज़िम्मेदारी होती है.

इमारत व सड़क निर्माण, कूड़े का निपटारा, सरकारी स्कूल, स्ट्रीट लाइट, सड़कों का रखरखाव, शहर योजना, साफ-सफाई और स्वास्थ्य ऐसे मसले हैं जो नगर निगम संभालता है.

इस समय 1,122 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. एक दिसंबर को मतदान किया जाएगा और चार दिसंबर को नतीजों की घोषणा होगी.

दुब्बका उपचुनाव में टीआरएस के ख़िलाफ़ बड़ी जीत के बाद बीजेपी निकाय चुनाव में पूरी ताक़त के साथ उतर आई है.

बीजेपी ने स्मृति ईरानी, जेपी नड्डा, अमित शाह, प्रकाश जावड़ेकर, योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडनवीस, तेजस्वी सूर्या जैसे नेताओं को निकाय चुनावों के लिए मैदान में उतारा है.

नेताओं के बीच बयानबाज़ी शुरू हो गई है. इसी बीच तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ आपात बैठक की है. उन्होंने खुफ़िया सूचना के आधार पर राज्य में अराजक तत्वों के सांप्रदायिक हिंसा फैलाने को लेकर चेतावनी है.

राष्ट्रवाद, अवैध प्रवासी, जिन्ना, वंशवाद की राजनीति और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कुछ मसले चुनाव अभियान का एजेंडा बन गए हैं.

लेकिन, बीजेपी के स्टार प्रचारक अपने भाषणों में शायद ही किसी स्थानीय मुद्दे का ज़िक्र कर रहे हैं.

टीआरएस और एमआईएम पर हमला
स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, तेजस्वी सूर्या, देवेंद्र फडनवीस हैदराबाद में प्रचार कर चुके हैं.

प्रकाश जावड़ेकर ने टीआरसी सरकार के ख़िलाफ़ चार्जशीट जारी की. इस चार्जशीट में सरकार पर 60 आरोप लगाए गए जिनमें एक लाख नौकरियों का वादा पूरा ना करना और ग़रीबों को दो बेडरूम का घर देने में विफल होना शामिल हैं.

तेजस्वी सूर्या ने 'चेंज हैदाराबाद' अभियान की शुरुआत की है. उन्होंने जय श्रीराम के नारे के साथ अपना भाषण शुरु किया.

हैदराबाद में भाषण के दौरान तेजस्वी सूर्या ने कहा कि सत्ताधारी टीआरसी पार्टी राज्य के नहीं बल्कि सिर्फ़ चंद्रशेखर राव के परिवार के विकास के लिए काम कर रही है.

देवेंद्र फडणवीस ने हैदराबाद में पार्टी का घोषणापत्र जारी किया.

प्रचार के दौरान तेजस्वी सूर्या सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति और असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) पर लगातार तीखे हमले कर रहे हैं.

'चेंज हैदराबाद' अभियान की शुरुआत करते हुए तेजस्वी सूर्या ने मीडिया से कहा, ''ओवेसी को दिया गया हर वोट भारत के और उस सबके ख़िलाफ़ होगा जिसके लिए भारत खड़ा है.''

उन्होंने अपने सभी भाषणों में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के बीच 'अपवित्र गठबंधन' होने की बात कही. इनमें से एक भाषण ओसमानिया यूनिवर्सिटी के आर्ट्स कॉलेज में दिया गया था.

उन्होंने ये भी कहा कि ''ओवैसी मोहम्मद अली जिन्ना के अवतार हैं. हमें उन्हें हराना होगा.''

उन्होंने कहा, ''ओवैसी हैदराबाद में रहते हैं लेकिन ये शहर हमारा है. ये शहर जय श्री राम के नारे से गूंज उठा है. टीआरएस और एमआईएम जय श्री राम के नारे से डरते हैं. हमें इस ताक़त को बढ़ाने की ज़रूरत है.''

''ओवैसी बंधुओं ने हैदराबाद के विकास को 'पुराने शहर' में प्रवेश नहीं करने दिया. उन्होंने वहां सिर्फ़ एक चीज़ आने दी और वो हैं रोहिंग्या मुसलमानों.''

रोहिंग्या बने मुद्दा
तेजस्वी सूर्या अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जो टीआरएस और एमआईएम पर हमला बोल रहे हैं.

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बी संजय कहते हैं, ''टीआरएस ने राज्य में रोहिंग्याओं के ख़िलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. यहां तक कि उन्हें वोटर आईडी दे दिया गया है. एमआईएम ने पिछला चुनाव रोहिंग्याओं के कारण जीता है. हैदराबाद में कई बांग्लादेशी और पाकिस्तानी अवैध रूप से रह रहे हैं और एमआईएम को उनका वोट मिल रहा है.''

बी संजय ने कहा कि अगर बीजेपी को निकाय चुनाव में जीत मिलती है तो पार्टी पुराने शहर से सभी अवैध अप्रवासियों को बाहर निकालने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक करेगी.

हालांकि, ये बयान टीआरएस और एमआईएम के लिए भी रास्ता बना रहे हैं.

टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामाराव ने ट्विटर पर बी संजय के बयानों की निंदा की है. उन्होंने ट्वीट किया, ''भाजपा नेता कुछ वोटों और सीटों के लिए पूरी तरह पागल हो गए हैं.''

केटीआर ने कहा कि बीजेपी धर्म का मुद्दा उठाकर हैदराबाद की शांति और ताने-बाने को बिगाड़ने की कोशिश कर रही है.

ओवैसी ने भी बेजीपी नेताओं के बयानों का जवाब दिया है. उन्होंने कहा, ''बीजेपी विकास के मुद्दे पर बात नहीं करना चाहती. वो जिस पर सर्जिकल स्ट्राइक करना चाहती है. वो सभी भारतीय हैं. उन्हें पहले चीनी सेना पर सर्जिकल स्ट्राइक करनी चाहिए जिसने भारतीय इलाक़े में अतिक्रमण किया है. वो सरकार में रहने के बावजूद इतने कमज़ोर हैं. अगर यहां पर पाकिस्तानी हैं तो गृह मंत्री अमित शाह को उनकी सूची देनी चाहिए.''

मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने भी बीजेपी के हमलों पर पलटवार किया है. उन्होंने पुलिस के साथ आपात बैठक में राज्य में सांप्रदायिक तनाव पैदा किए जाने की खुफिया रिपोर्ट होने की बात कही.

उन्होंने कहा, ''निकाय चुनाव के दौरान कुछ नेता साजिशों के ज़रिए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें एहसास हो गया है कि पैसा बहाकर हैदराबाद में चुनाव जीतने का तरीक़ा काम नहीं आया. अब वो हैदराबाद में सांप्रदायिक हिंसा फैलाकर और नीचे गिर गए हैं और इसका राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं.''

चंद्रशेखर राव ने कहा, ''वो करीमनगर, वारंगल, खमाम और अन्य इलाक़ों में सांप्रदायिक टकराव पैदा करना चाहते हैं और इसके लिए हैदराबाद में अभियान चला रहे हैं. वो हैदाराबाद में कोई परेशानी खड़ी करना और फिर उस पर सांप्रदायिक रंग चढ़ाना चाहते हैं और वो पूजा स्थलों पर भी तनाव पैदा करना चाहते हैं. वो ऐसी सांप्रदायिक अशांति फैलाना चाहते हैं जिससे कि निकाय चुनाव हो ही नहीं या टल जाएं. यही उनकी असली योजना है. राज्य सरकार के पास इसे लेकर पक्की जानकारी है.''

TWITTER/@TEJASVI_SURYA

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पूरी सख्ती से इन साज़िशों को नाकाम करेगी.

हालांकि, इस दौरान हैदराबाद की सड़कों पर कार्यकर्ता पूरे जोर-शोर से अपनी-अपनी पार्टियों की जीत के लिए प्रचार करते नज़र आ रहे हैं.

2016 के निकाय चुनावों में टीआरएस ने 99, एमआईएम ने 44, बीजेपी ने चार और कांग्रेस ने दो सीटें जीती थीं.

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह

हालांकि, इस बार साफ़ दिख रहा है कि बीजेपी निकाय चुनाव में अपनी पकड़ बनाना चाहती है.

अभिनेता से राजनेता बने पवन कल्याण ने बीजेपी को समर्थन करने के लिए अपनी पार्टी जन सेना के उम्मीदवारों की सूची वापस ले ली है.

सत्ताधारी टीआरएस हैदराबाद में किए गए विकास के कार्यों के लिए वोट मांग रही है.

बीबीसी से बात करते हुए केटीआर ने कहा कि हालांकि, हैदराबाद के लिए किए गए वादों को पूरा करने में अब भी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है, लेकिन, टीआरएस हैदराबाद में निवेश लेकर आई है और सुनिश्चित किया है कि ये 'सुरक्षित शहर' बने.

हालांकि, टीआरएस पर अक्टूबर में आई बाढ़ के दौरान राहत कार्यों का प्रबंधन ठीक से ना किए जाने के आरोप लगे हैं. बीजेपी और कांग्रेस ने इसे चुनाव का मुख्य एजेंडा बनाया है. कांग्रेस ने सत्ता में आने पर राहत के तौर पर और ज़्यादा वित्तीय मदद देने की घोषणा की है.

वहीं, बीजेपी टीआरएस और एमआईएम के गठबंधन पर सवाल उठा रही है. बीजेपी नेताओं को भलीभांति पता है कि इन चुनावों में पार्टी को विपक्ष की आवाज़ बनाना कितना ज़रूरी है.

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बी संजय ने एक रैली के दौरान कहा, ''ये चुनाव अभियान सिर्फ़ हैदराबाद निकाय चुनाव के लिए नहीं हैं. ये आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भी हैं.''

कुकाटपल्ली प्रभाग से बीजेपी उम्मीदवार पवन एन ने बीबीसी से बात की. उन्होंने कहा कि 'चेंज हैदराबाद' अभियान हैदराबाद को पूरी तरह भाग्यनगरम यानी एक समावेशी शहर (जो सबका है) में बदल देगा.

उन्होंने कहा, ''पिछले छह सालों में टीआरएस हैदराबाद के विकास के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करती रही है लेकिन बाढ़ ने हैदराबाद के विकास और टीआरएस के प्रचार के बुलबुले की हक़ीक़त खोलकर रख दी. सच तो ये है कि अलग राज्य बनने के छह सालों बाद भी मूल मुद्दों पर काम होना बाक़ी है. बीजेपी हैदराबाद को कुशल और प्रभावी स्थानीय शासन वाले वैश्विक शहर के तौर पर विकसित करेगी.''

वहीं, बीजेपी के आरोपों, टीआरएस और एमआईएम के पलटवारों के बीच कांग्रेस का चुनाव अभियान सड़कों पर कुछ खास नज़र नहीं आ रहा है. (bbc.com)


28-Nov-2020 1:16 PM 17

जफर अब्बास 

नई दिल्ली, 28 नवंबर| एक तरफ जहां दिल्ली पुलिस दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर सिंघु और टिकरी में प्रवेश/निकास बिंदुओं पर प्रदर्शनकारी किसानों से निपटने में व्यस्त हैं, वहीं दूसरी तरफ शनिवार को यह जानकारी मिलने के बाद कि दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर भी किसान एक अलग मोर्चे का आह्वान कर सकते हैं, पुलिस को सतर्क रहने की चेतावनी दी गई है।

केंद्र द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के रद्द करने की मांग को लेकर पंजाब और हरियाणा से किसान राजधानी की ओर प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे हैं, जिसके चलते दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा पर प्रवेश और निकास बिंदुओं का बैरिकेडिंग कर बंद कर दिया गया है और पुलिस व अर्धसैनिक बलों की तैनाती भी कर दी गई है, ताकि आसपास के राज्यों से किसानों के प्रवेश को हरसंभव तरीके से रोका जा सके।

डीसीपी ईस्ट जसमीत सिंह ने आईएएनएस को बताया, "हमने यूपी की तरफ से किसानों के प्रवेश को रोकने के लिए गाजीपुर और चिल्ला सीमा सहित सीमावर्ती क्षेत्रों में पर्याप्त व्यवस्था की है। हम किसानों के विरोध के मद्देनजर उत्तर प्रदेश पुलिस के लगातार संपर्क में हैं।"

भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के समर्थकों और किसानों द्वारा शुक्रवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में हरियाणा और पंजाब के प्रदर्शनकारी किसानों के समर्थन में राजमार्ग अवरुद्ध कर दिए गए। बीकेयू के कार्यकताओर्ं और किसानों ने सड़कों पर भीड़ लगाकर यमुना एक्सप्रेस-वे पर जाम लगा दिया। एक शादी की बारात कई घंटों तक इस जाम में फंसी रही।

सड़कों में जमा हुई इस भीड़ के चलते आगरा से मथुरा जाने वाली सड़क पर यातायात बाधित हुई।

बागपत, मुजफ्फरनगर, मेरठ और बिजनौर में भी किसानों के इस प्रदर्शन के चलते कई जगह राजमार्गों पर यातायात बाधित हुई।

बीकेयू नेता राकेश टिकैत ने कहा, "उत्तर प्रदेश में किसान पंजाब और हरियाणा में अपने समकक्षों का पूरा समर्थन कर रहे हैं और हमारा विरोध जारी रहेगा।" (आईएएनएस)


28-Nov-2020 1:13 PM 19

श्रीनगर, 28 नवंबर| केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख की राजधानी लेह में रात को पारा शून्य से नीचे 12.9 डिग्री सेल्सियस नीचे पहुंचा, जिससे यहां कड़ाके की ठंड ने पूरे क्षेत्र को ठिठुरा दिया है। इधर, जम्मू-कश्मीर में भी पारे में गिरावट दर्ज की गई है। मौसम विभाग ने यहां गुरुवार तक वातावरण के शुष्क रहने की भविष्यवाणी की है।

श्रीनगर में न्यूनतम पारा शून्य से नीचे 2.2, पहलगाम में 5.2, गुलमार्ग में 5.6 और कारगिल में 9.2 डिग्री सेल्सियस पर दर्ज किया गया।

मौसम विभाग के एक अधिकारी ने बताया, "रात में आसमान के साफ रहने के चलते जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के न्यूनतम तापमान में आज गिरावट दर्ज की गई है। दोनों ही संघ शासित प्रदेशों में अगले पांच दिनों तक मौसम के सामान्य तौर पर शुष्क बने रहने की संभावना है।"

जम्मू, कटरा, बटोत, बनिहाल और भदेरवाह में न्यूनतम तापमान क्रमश: 8.6, 9.4, 6.9, 5.2 और 0.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। (आईएएनएस)


28-Nov-2020 12:47 PM 14

ग्रेटर नोएडा, 28 नवंबर | यमुना एक्सप्रेसवे पर आज सुबह एक दर्दनाक हादसा हुआ, जिसमें 4 लोगों की मौत हो गई जबकि एक अन्य घायल हो गया।

हादसा सुबह 6.45 बजे के आसपास का है, जब आगरा से नोएडा एक्सप्रेस वे पर एक रोडवेज बस के पीछे इनोवा कार ने टक्कर मार दी। कार में 5 व्यक्ति बैठे हुए थे, इसमें 4 व्यक्तियों की मौके पर ही मृत्यु हो गई, वहीं एक गंभीर रूप से घायल हो गया।

पुलिस द्वारा जानकारी दी गई, "सुबह 6.45 बजे थाना बीटा-2 क्षेत्रान्तर्गत आगरा से नोएडा आने वाली लेन एक्सप्रेसवे पर एचपी पेट्रोल पंप के पास जीरो पॉइंट से लगभग डेढ़ किलोमीटर पहले रोडवेज बस के पीछे इनोवा कार ने टक्कर मार दी, जिसमें बैठे 5 व्यक्तियों में से चार व्यक्तियों की मौके पर ही मृत्यु हो गई, एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल है।"

पुलिस ने आगे बताया कि हादसे में घायल हुए व्यक्ति को थाना बीटा-2 पुलिस द्वारा अस्पताल में एडमिट करा दिया गया है जिसका इलाज जारी है। वहीं मृतकों के पोस्टमार्टम हेतु आवश्यक कार्यवाही की जा रही है।

इस घटना की जानकारी मृतकों के परिजनों को दे दी गई है। मृतक आगरा, हरयाणा, महाराष्ट्र और गाजियाबाद के हैं। वहीं घायल फरीदाबाद निवासी है।(आईएएनएस)
 


28-Nov-2020 12:46 PM 20

नई दिल्ली, 28 नवंबर| हरियाणा और पंजाब के हजारों किसान दिल्ली चलो यात्रा शुरू कर चुके हैं और वे एनसीआर की सीमाओं तक पहुंच चुके हैं। लेकिन इसने नियमित तौर पर ट्रक से माल ढोने वाले ड्राइवरों को रोक दिया है।

राष्ट्रीय राजधानी की टिकरी सीमा 3 कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों के कारण बंद है और इसका खामियाजा ट्रक चालकों को भुगतना पड़ रहा है। पिछले दो दिनों से लंबी दूरी की यात्रा के लिए निकले अधिकांश ट्रक सीमाओं पर अटके हुए हैं।

ट्रक चालक राजिंदर सोलंकी ने आईएएनएस से कहा, "मैं शुक्रवार सुबह 6 बजे से यहां फंसा हुआ हूं। मैं अहमदाबाद जा रहा था लेकिन सीमाओं के बंद होने के कारण यहीं फंस गया हूं।" उन्होंने कहा कि अन्य ड्राइवरों के साथ उन्हें निर्देश दिया गया है कि वे अपने वाहनों को न छोड़ें।

एक अन्य ड्राइवर नरेश कुमार ने कहा कि वह पिछले दो दिनों से यहां फंसे हुए हैं जबकि उन्हें प्लास्टिक के पैकेज लेकर राजस्थान पहुंचना था। उन्होंने कहा, "भोजन की कोई व्यवस्था नहीं है और हम बहुत परेशान हैं।" (आईएएनएस)


28-Nov-2020 12:29 PM 15

स्कॉटलैंड ने फैसला लिया है कि पीरियड्स से जुड़ा सब सामान देश में मुफ्त में मिला करेगा. क्या भारत में भी कभी ऐसा होगा? कब आएगा वो वक्त जब सैनिटरी पैड को लड़कियों का हक समझा जाएगा?

  डॉयचे वैले पर ईशा भाटिया सानन का लिखा - 

सोचिए आप सुबह उठें और आपका बिस्तर खून में लथपथ हो. सोचिए, कैसा हो अगर आप खून से भरे कपड़ों को किसी तरह छिपाते फिरें. जरा सोच कर देखिए, आपको अपनी टांगों के बीच एक फटा पुराना गंदा कपड़ा ले कर घूमना पड़ रहा हो.

अगर आप पुरुष हैं और ये सब पढ़ कर आपको घिन आ रही है, तो बता दूं कि आपके इर्दगिर्द मौजूद लड़कियों के लिए ये सब उनकी जिंदगी का हिस्सा है. भारत में ज्यादातर लड़कियों के लिए यह हर महीने की कहानी है.

मुझे याद है जब मैं छोटी थी, मेरी नानी ने मेरे हाथ में एक भद्दी सी कतरन पकड़ा दी थी. आप इतने मैले कपड़े को धो कर पोछा तक नहीं बनाएंगे. लेकिन नानी का तर्क तो साफ था, "पीरियड्स गंदे होते हैं, तो कपड़ा भी तो गंदा ही होना चाहिए ना. और फिर उसे कूड़े में ही तो जाना है, तो फिर साफ होने की क्या तुक हुई भला?"

भारत में पीरियड्स (मासिक धर्म) से जुड़े कई शोध हुए हैं. इनमें से एक बताता है कि देश में आज भी 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं पीरियड्स को "गंदा" मानती हैं. मेरी नानी भी इन्हीं में से एक थीं. जिंदगी भर उन्होंने मैला कपड़ा इस्तेमाल किया. इसलिए कोई हैरानी की बात नहीं कि आगे चल कर उन्हें सर्वाइकल कैंसर हुआ. वो नहीं जानती थीं कि वो मैला कपड़ा एक दिन उनकी जान ले लेगा.

ईशा भाटिया सानन

वैसे भी, भारत में महिलाओं में 70 फीसदी से अधिक स्त्री रोग संबंधी समस्याओं की जड़ पीरियड्स के दौरान साफ सफाई का ख्याल ना रखना ही है. पर फिर भी कोई खुल कर इस बारे में बात करने को तैयार नहीं है. पढ़े लिखे घरों में भी महिलाओं की सेहत से जुड़ी बातें नहीं होती. इस पूरे मामले पर चुप्पी ऐसी है कि हिंदी में रिप्रोडक्टिव डिजीज, मेंस्ट्रुअल हाइजीन जैसे शब्द ही नहीं हैं जो आम बोलचाल का हिस्सा हों. यही वजह है कि नानी के कैंसर के इलाज के दौरान मैंने कभी गर्भाशय, अंडाशय जैसे किसी शब्द को कभी सुना ही नहीं. नानी को क्या हुआ है, घर पर यह पूछने तक की इजाजत नहीं थी.

कब तक करेंगे "व्हिस्पर्स"?
पीरियड्स महिलाओं के शरीर में होने वाली सबसे कुदरती बात है. बावजूद इसके आज 2020 में भी भारत की महज 18 फीसदी महिलाएं ही सैनिटरी पैड इस्तेमाल कर पाती हैं. बाकी सबका वही हश्र होता है, जो मेरी नानी का हुआ. वो जिंदगी भर अलग अलग बीमारियों से जूझती हैं लेकिन यह समझ नहीं पातीं कि मैला कपड़ा उनसे उनकी जिंदगी छीन रहा है.

पीरियड्स पर हुए अलग अलग शोध की जहां तक बात है तो एक शोध यह भी बताता है कि देश में दो तिहाई लड़कियों को पहली बार पीरियड होने तक तो उसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं होती है. मेरे साथ भी ऐसा ही था. कितनी अजीब बात है कि जिंदगी के इतने साल कभी किसी ने मुझसे इसका कोई जिक्र ही नहीं किया. पीरियड्स पर चुप्पी ऐसी है कि लड़कियां अपनी सहेलियों से भी अपने तजुर्बे बांटते हुए शर्माती हैं.

कुछ बात अगर होती भी है तो कानाफूसी में. इसीलिए तो, कोई हैरानी की बात नहीं है कि भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाले सैनिटरी पैड का नाम है "व्हिस्पर्स". ब्रांड खुद ही आपसे कहता है कि खुल के कुछ मत बोलो.

स्वच्छ भारत चाहिए, स्वच्छ महिलाएं नहीं?
पिछले एक दशक में हालात कुछ सुधरे जरूर हैं. कई एनजीओ सैनिटरी पैड पर लगने वाले टैक्स के खिलाफ खड़े हुए. अक्षय कुमार की पैडमैन से नेटफ्लिक्स की "पीरियड्स. एंड ऑफ सेंटेंस" तक, इस विषय पर लोगों को जागरूक करने के लिए फिल्में बनी हैं. जागरूकता जरूरी भी है लेकिन जब सैनिटरी पैड तक पहुंच ही नहीं होगी, तो फिर जागरूक हो कर भी क्या बदल जाएगा?

सैनिटरी पैड के एक पैकेट की कीमत 100 से 250 रुपये के बीच होती है. कम आय वाले घरों के लिए यह "फिजूल खर्च" है जिसे वो नहीं उठा सकते. कुछ एनजीओ दस-दस रुपये में भी पैकेट उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन इनकी पहुंच सीमित है. ये किसी भी तरह देश के कोने कोने तक नहीं पहुंच सकते.

इसलिए ये जिम्मेदारी सरकार की बनती है कि देश भर की लड़कियों और महिलाओं को पीरियड्स के दौरान अपना हक मिले. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार बार "स्वच्छ भारत" पर जोर दिया है. महिलाओं की स्वच्छता का अधिकार स्वच्छ भारत का हिस्सा क्यों नहीं बना?

भारतीय सरकार दशकों से सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में कंडोम और गर्भनिरोधक गोलियां देती आई है ताकि जनसंख्या को काबू में रखा जा सके. तो क्यों ना इसी इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने के लिए भी किया जाए? लड़कियों को क्यों उनके इस हक से महरूम रखा जाए?


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