राष्ट्रीय

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Date : 19-Oct-2019

प्रशांत चाहल
हरियाणा में आजकल कुछ लोग किसी से बात करते हुए उसकी जाति पता करने की कोशिश में लगे रहते हैं क्योंकि जाति ही तय कर रही है कि उनके बीच क्या और कितनी बात होगी।
हरियाणा के स्थानीय पत्रकार और बीबीसी के सहयोगी सत सिंह धनखड़ ये बताते हुए अपने मोबाइल पर आए कुछ भडक़ाऊ वॉट्सऐप मैसेज दिखाते हैं जिनका मजमून लोगों को 35 बनाम 1 के नारे की याद दिलाना है। इस नारे का मतलब है कि समाज की सभी 35 बिरादरियाँ जाटों के खिलाफ खड़ी हो जाएं।
हमें बताया गया कि इसी तरह के भडक़ाऊ संदेश वॉट्सऐप और सोशल मीडिया पर लोकसभा चुनाव-2019 के दौरान भी शेयर हो रहे थे।
माना जाता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कुछ विवादित नेताओं द्वारा राजनीतिक मंचों से इस नारे का इस्तेमाल शुरु हुआ था जो अब हरियाणा में जाति आधारित ध्रुवीकरण करने वाला सबसे मजबूत हथियार बन गया है।
इस नारे को किसने शुरू किया, ये जरूर विवाद का एक विषय हो सकता है, लेकिन मौजूदा समय में निश्चित रूप से इसका राजनीतिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिलता दिखाई देता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक की पहचान के साथ सूबे के मुख्यमंत्री पद पर पहुँचे मनोहर लाल खट्टर के बारे में शुरुआती दिनों में कहा जाता था कि ये पाँच साल सरकार कैसे चला पाएंगे? लेकिन खट्टर ने ना सिफऱ् बाबा रामपाल, जाट आंदोलन और बाबा राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद हुए हंगामों को मैनेज करते हुए अपने पाँच साल पूरे किए, बल्कि राज्य में एक ऐसी पॉलिटिकल टोन सेट की जिसके दम पर इस चुनाव में उनकी पार्टी सबसे आगे मानी जा रही है।
हरियाणा के अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी ने गुजरात में पटेलों और महाराष्ट्र में मराठों के साथ जो किया, वही वो हरियाणा में सबसे बड़ी और राजनीतिक रूप से सक्रिय जाति जाटों के साथ कर रही है। जबकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि हरियाणा अपने राजनीतिक इतिहास को दोहरा रहा है। लेकिन इस बार जाट-गैर जाट की राजनीति करने वाली और उससे लाभ उठाने वाली पार्टी का नाम बदल गया है।
क्या है 35 बनाम एक के पीछे की कहानी और क्या कहता है हरियाणा में जाति आधारित राजनीति का इतिहास, हमने इसकी पड़ताल की।
ये नारा बना कैसे?
हरियाणा के ग्रामीण अंचल में ये एक पुरानी सामाजिक कहावत रही है कि समाज में 36 बिरादरी होती हैं और सबको मिलकर रहना चाहिए। गाँव की पंचायतों में आज भी भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने के लिए बुजुर्गवार ये कहावत कहते मिल जाते हैं। किसी आधिकारिक डेटा के आधार पर इन 36 बिरादरियों को कभी नहीं गिना गया। ये भारतीय परिप्रेक्ष्य में चलने वाले हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में हैं भाई-भाई जैसे नारे की तरह है। चूंकि हरियाणा में यूपी और बिहार की तरह धर्म के आधार पर राजनीति नहीं की जा सकती क्योंकि यहाँ मुस्लिम आबादी सिर्फ मेवात क्षेत्र की 4-5 सीटों तक ही सीमित है। इसलिए इस सामाजिक कहावत/भाईचारे को तोडक़र 35 बनाम एक का नारा बनाया गया है यानी समाज की 35 जातियों को किसी एक जाति के खिलाफ लामबंद करने की ये कोशिश है।
यहाँ वो एक जाति जाट है जिसका हरियाणा में लंबे समय तक राजनीतिक वर्चस्व कायम रहा है और खट्टर सरकार से पहले सूबे में साढ़े 18 वर्ष तक इसी जाति के मुख्यमंत्री रहे।
2016 में जमकर हुआ 
इस नारे का प्रयोग
करीब दो दशक से हरियाणा में राजनीति कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बलवंत तक्षक बताते हैं, 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान इस नारे का खुलकर इस्तेमाल हुआ था। जाट आंदोलन से बाकी जातियों को ऐसा लगा कि जाट हमेशा सत्ता में रहना चाहते हैं और जब सत्ता से बाहर होते हैं तो आंदोलन करके, हिंसा करके किसी सरकार को चलने नहीं देना चाहते।
इसी दौरान भाजपा सांसद राजकुमार सैनी ने आह्वान किया कि 35 बिरादरी के लोग एक हो जाएं और मिलकर इस एक जाति का बहिष्कार करें। इसे लेकर उन्होंने कई सम्मेलन किए। इसमें उनका साथ दे रहे थे गुर्जर समुदाय से आने वाले पूर्व विधायक रोशन लाल आर्य जो जगह-जगह जाकर लोगों को जाटों के ख़ात्मे की शपथ दिलाते थे।
 वो कहते थे कि जाटों की दुकान से कोई सामान ना खरीदें, उनसे ताल्लुक ना रखें और रोज़ पाँच बार पाँच मिनट जाट जाति के नाश के लिए कामना करें। इन दोनों नेताओं के वीडियो सोशल मीडिया पर 2016 में बहुत वायरल हुए और इनकी चर्चा होने लगी। लेकिन बयानबाज़ी दूसरी तरफ से भी हो रही थी।
चालीस वर्षों से हरियाणा की राजनीति को कऱीब से देख रहे लेखक और वरिष्ठ पत्रकार पवन बंसल कहते हैं, हरियाणा में सैनी और आर्य का राजनीतिक कद कुछ भी नहीं था। लेकिन जब उन्होंने जाटों को गालियाँ देनी शुरू कीं, उनके वर्चस्व को नकारा, तो वो सुर्खियों में आए। एक तरफ हरियाणा के ये दो नेता थे तो दूसरी तरफ यूपी से आयातित नेता यशपाल मलिक लगातार जाट आंदोलन के मंचों पर दिख रहे थे और वो दावे कर रहे थे कि जाट आंदोलन उनके नेतृत्व में चल रहा है।
बंसल के अनुसार, कुछ लोग मानते हैं कि मलिक जाटों का मार्गदर्शन नहीं कर रहे थे बल्कि उन्हें भडक़ा रहे थे। ये भी माना जाता है कि यशपाल बीजेपी के इशारे पर ही काम कर रहे थे क्योंकि देशद्रोह जैसे मुकदमों के बाद भी बीजेपी सरकार ने कभी मलिक को गिरफ्तार नहीं किया। वो 35 बनाम 1 के खिलाफ बयानबाजी करते रहे, सूबे में घूमते रहे। ऐसी स्थिति में समाज दो धड़ों में टूटना तय था।
बंसल मानते हैं कि हरियाणा में गैर-जाट समुदायों के बीच उस वक्त 35 बनाम एक के नारे को इसलिए तेजी से स्वीकार किया गया क्योंकि लोगों को हुड्डा का विवादित बयान भी याद था।
हुड्डा की बड़ी ग़लती!
जुलाई 2013 में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने दिल्ली में हुए अखिल भारतीय जाट महासभा सम्मेलन में कहा था कि वो मुख्यमंत्री बाद में हैं, जाट पहले हैं। प्रदेश में उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई और राजनीतिक विश्लेषक इसे हुड्डा की एक बड़ी ग़लती मानते हैं।
बंसल कहते हैं, कौन नहीं जानता था कि वो जाति से जाट हैं। लेकिन संवैधानिक पद पर बैठकर ऐसी बात उन्हें नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि अन्य जातियों के बीच इससे बड़ा खऱाब संदेश गया। वो बिना सोचे-समझे ऐसा कर रहे थे, ये भी नहीं माना जा सकता क्योंकि देवीलाल परिवार के साथ लगने वाले जाट वोटों को वो अपनी तरफ आकर्षित करना चाहते थे।
हुड्डा 2004 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उनके पास आक्रामक समझे जाने वाले देसवाली (सोनीपत, रोहतक, झज्जर जिले) जाटों का वोट बैंक तो था, पर बांगड़ (हिसार जिले के आसपास का क्षेत्र) के जाटों का वोट चौटाला परिवार के पास था। ये दोनों अलग क्षेत्रों के नेता हैं। ऐसे में हुड्डा ने ये कोशिश की कि सभी जाटों को अपनी तरफ खींचा जाए। इसके लिए साल 2014 में चुनाव से पहले उन्होंने बिश्नोई, त्यागी, रोड़ जाति समेत जाटों को दस परसेंट आरक्षण की घोषणा की। ये माँग कई सालों से लंबित थी। इस दौरान वो आक्रामक बयानबाज़ी कर रहे थे और दिल्ली वाला बयान इसी सिलसिले का एक हिस्सा था।
लेकिन इससे अन्य समुदायों में क्या संदेश गया, इस बारे में बलवंत तक्षक कहते हैं, जाटों को आरक्षण की घोषणा से दक्षिण हरियाणा (अहीरवाल क्षेत्र) में हलचल पैदा हुई और गुर्जर-यादव बहुल इस इलाक़े में ये चर्चा फैली कि जाट उनका हिस्सा खा जाएंगे। बाकी हरियाणा की तुलना में अहीरवाल क्षेत्र वैसे भी आर्थिक रूप से पिछड़ा इलाका है और इस क्षेत्र के लोग तुलनात्मक रूप से कम समृद्ध हैं। वो कहने लगे कि सीएम भी जाट होगा, नौकरियाँ भी वो लेंगे तो ये तो राज करेंगे। जबकि हुड्डा ने जाटों को अलग से आरक्षण देने की बात की थी जो कि 27 परसेंट ओबीसी के आरक्षण से अलग था और बाद में कोर्ट में ये आरक्षण टिक भी नहीं पाया। नतीजा ये हुआ कि अहीरवाल क्षेत्र की सभी 11 सीटें उस चुनाव में बीजेपी को मिल गईं।
बलवंत कहते हैं कि 90 सीटों की विधानसभा में एकतरफा 11 सीटों की बढ़त बहुत बड़ी बात थी। राज्य में जाट-गैर जाट की राजनीति के लिए बीजेपी को हुड्डा की ऐसी ही किसी गलती का इंतज़ार था। हुड्डा ने चुनाव के नजदीक पहुँचकर लोगों को समझाने की काफी कोशिश भी की, पर उनके स्पष्टीकरण काम नहीं आए।
हरियाणा में भाजपा ने शुरू की जाट-गैर जाट की राजनीति?
हरियाणा के कुछ हलकों में रिपोर्टिंग के दौरान हमने लोगों से सुना कि जब से राज्य में बीजेपी आई है, तभी से जाति की ये गंदी राजनीति शुरु हुई, वरना राज्य में सभी बिरादरियों का भाईचारा था। लेकिन इतिहास का हवाला देकर कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस बात को गलत साबित करते हैं।
हरियाणा के राजनैतिक इतिहास पर पॉलिटिक्स ऑफ चौधर नाम की किताब लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार सतीश त्यागी कहते हैं, जाट-गैर जाट की राजनीति का प्रारम्भ मौजूदा दशक में, ख़ासकर 2014 के चुनाव से हुआ हो, ऐसा नहीं है। आज़ादी से पहले भी इस क्षेत्र में ये चीज़ें मौजूद थीं। जब रहबरे हिन्द की उपाधि प्राप्त चौधरी छोटू राम का इस क्षेत्र में राजनीतिक दौर था, उसके इर्द-गिर्द भी ये चीजें आ गई थीं। जाट समुदाय से आने वाले छोटू राम पंजाब प्रांत में एक प्रभावशाली नेता थे और इस इलाके में कांग्रेस कमेटी के मुख्य पदों पर भी रहे थे। लेकिन जैसे ही राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी का बहुत ज़्यादा प्रभाव बढ़ा तो इस इलाके में आंदोलन की बागडोर वैश्यों और ब्राह्मणों के हाथ में चली गई।
पंडित श्री राम शर्मा इस इलाके से राष्ट्रीय आंदोलन के बड़े चेहरे के रूप में उभरे। तो छोटू राम को यह महसूस हो गया कि वैश्यों और ब्राह्मणों के नेतृत्व के रहते खेतों में काम करने वाली जातियों का एजेंडा वो स्थापित नहीं कर पाएंगे और उन्होंने अपनी धारा बदल ली। कई जगह आप देखते हैं कि वो गांधी की आलोचना भी करते हैं। इसके बाद के इतिहास पर नजऱ डालें तो पाएंगे कि इस क्षेत्र में पंडित श्री राम शर्मा बनाम चौधरी छोटू राम की राजनीति चलती रही है।
1962 के चुनाव के दौरान इसी राजनीति को एक नया मोड़ दिया कांग्रेस नेता भगवत दयाल शर्मा ने जिन्होंने जाट बहुल क्षेत्र झज्जर में प्रोफेसर शेर सिंह जैसे कद्दावर जाट नेता को चुनौती दी। भगवत दयाल शर्मा को संयुक्त पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह कैरों का आशीर्वाद प्राप्त था और कैरों चाहते थे कि हरियाणा (अंबाला डिवीजन) में कोई समान्तर जाट नेतृत्व ठीक से ना उभरे। उस दौर में देवी लाल और प्रोफेसर शेर सिंह नामी जाट चेहरों के तौर पर पहचान बना रहे थे।
इसलिए उनके कद को कम करने के लिए कैरों ने भगवत दयाल शर्मा का इस्तेमाल किया। इस चुनाव में शर्मा ने भरपूर कोशिश की थी कि समाज में ध्रुवीकरण हो और वोट दो हिस्सों में टूट जाएं। एक तरफ जाट हों और दूसरी तरफ अन्य समुदाय के लोग। इसका नतीजा भी वो पहले से जानते थे और वही हुआ। हरियाणा से केंद्र में मंत्री बनने वाले पहले नेता और तीन बार के विधायक प्रोफेसर शेर सिंह को भगवत दयाल शर्मा ने पछाड़ दिया और जाति आधारित राजनीति ने अपना काम किया।
त्यागी कहते हैं कि भगवत दयाल शर्मा ने इसके बाद एक काम और किया कि नया सूबा (हरियाणा) बनते ही जो चुनाव हुए उनमें अपनी ही पार्टी के उन सभी लोगों को उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी खड़े करके हरवा दिया जो सीएम की दौड़ में उनके प्रतिद्वंद्वी हो सकते थे। जब इसकी पोल खुली तो उनके खिलाफ एक मोर्चा बना जिसमें वो सब नेता शामिल हुए जिन्हें शर्मा ने हरवाया था। इनका नेतृत्व जाट नेता देवी लाल और यादवों के नेता राव बिरेंद्र सिंह कर रहे थे। इस मोर्चे के बारे में कहा गया था कि खेतों में काम करने वाली जातियाँ एक ब्राह्मण के नेतृत्व को ख़ारिज कर रही हैं। लेकिन उस समय इतनी खुलकर बातें नहीं होती थीं। सोशल मीडिया था नहीं। फिर भी समाज में एक समझ बनी कि कौन किसके वर्चस्व को ललकार रहा है।
80 का दशक और 
भजन लाल का दौर
पवन बंसल बताते हैं कि हरियाणा की राजनीति में जातियों के बीच का संघर्ष गैर जाट नेता के तौर पर मशहूर हुए भजन लाल बिश्नोई के दौर में भी खुले तौर पर दिखाई देता था। भजन लाल चाहते भी थे कि जाट-गैर जाट की राजनीति प्रदेश में चले जिसमें वो काफी हद तक सफल भी रहे।
उन्होंने बताया, 1982 में शेरे हरियाणा कहे जाने वाले चौधरी देवीलाल सिहाग को हटाकर भजन लाल बिश्नोई के मुख्यमंत्री बनने से जाति का झगड़ा फिर शुरू हुआ। 1982 के चुनाव में देवीलाल और जनता पार्टी का गठबंधन था और कुछ निर्दलीय विधायकों को जोडक़र बहुमत भी उनके साथ था। लेकिन राज्य के पूर्व गवर्नर गणपत राव देवजी तपासे ने तय वक़्त से पहले भजन लाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। भजन लाल जोड़तोड़ कर सरकार बनाने में सफल हो गए। पर उनके इस राजनीतिक स्टाइल से सूबे का सबसे बड़ा वोट बैंक यानी जाट समुदाय उनसे नाराज हो गया।पेज 7 से आगे
अपनी हाजिर जवाबी के लिए चर्चा में रहने वाले भजन लाल ने हरियाणा में अपनी राजनीति की शुरुआत यह कहकर की थी कि बिश्नोई भी तो जाट ही होते हैं। वो काफी समय तक ख़ुद को जाट सिद्ध करने में लगे रहे और वो इसे लेकर गंभीर भी थे। वो हवाला देते थे कि हरियाणा के रेवेन्यु रिकॉर्ड में बिश्नोई समुदाय को जाट ही लिखा जाता है। लेकिन जाट कहते रहे कि बिश्नोइयों और जाटों में सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर है, इसलिए उन्होंने भजन लाल को स्वीकार नहीं किया।
वो बताते हैं, भजन लाल जब खुलकर जाट नेता देवीलाल के सामने आए तो उन्होंने कहना शुरू किया कि वो भी शरणार्थी हैं, पाकिस्तान के बहावलपुर से आए हैं। वो खुद को पंजाबियों और अन्य पिछड़ी जातियों का नेता कहने लगे थे। लेकिन हरियाणा में जाति आधारित राजनीति का वो दौर इतना उग्र नहीं था जितना अब है।
इसका एक कारण तो ये है कि सूबे में अन्य जातियाँ आज की तुलना में राजनीतिक रूप से कम सक्रिय थीं और 1987 के चुनाव में देवीलाल ने सबको साथ लेकर चुनाव लड़ा, तो सामाजिक टूट दिखाई देनी बंद हो गई। इसके बाद राज्य में जो चुनाव हुए, उनमें सरकारों की नीतियों की आलोचना तो हुई पर जाति के आधार पर राजनीति खुलेतौर पर नहीं दिखी। 2014 में इस फ़ॉर्मूले को दोबारा आज़माया गया।
हरियाणा में चुनावी कवरेज के दौरान जब हमने जाट समुदाय के कुछ प्रभावशाली लोगों से बात की तो उन्होंने कहा कि बीजेपी के नेता जाट समुदाय को हरियाणा का मुसलमान बना रहे हैं यानी जिस तरह देश में हिंदुओं के वोटों को एक तरफ करने के लिए वो मुसलमानों के खिलाफ बयानबाजी करते हैं, हरियाणा में जाटों के खिलाफ कर रहे हैं। इसके लिए जाट समुदाय के अधिकांश लोग राजकुमार सैनी जैसे नेताओं को कसूरवार ठहराते हैं और कहते हैं कि बीजेपी ने सैनी के खिलाफ कभी कोई एक्शन नहीं लिया। लेकिन सैनी को तो बीजेपी के अन्य वरिष्ठ नेता भी गैरजिम्मदाराना बयानबाजी करने वाला नेता मानते हैं।
पत्रकार बलवंत तक्षक ने बताया, साल 2016 में जब राजकुमार जाटों के खिलाफ तीखी बयानबाजी कर रहे थे, तब वो कुरुक्षेत्र से बीजेपी के सांसद थे। उस दौरान बीजेपी कहती रही कि सैनी के बयानों से पार्टी का कोई वास्ता नहीं, ये उनके व्यक्तिगत बयान हैं। लेकिन ये भी सच है कि तमाम आग उगलने के बाद भी राजकुमार सैनी को पार्टी से बाहर नहीं किया गया। बीजेपी ने उन्हें बदनाम होने दिया और जब उनके रास्ते बंद होने लगे तो उन्हें अपने खेमे में सबसे पीछे की कतार में बैठाना शुरु कर दिया।
सैनी ने 1996 में पहली बार कोई चुनाव जीता था। वो हरियाणा विकास पार्टी (बंसी लाल) की सरकार में परिवहन मंत्री रहे। जब वो पार्टी टूटी तो चौटाला के साथ चले गए और 2019 के लोकसभा चुनाव में ऐलान किया कि उनकी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी को बीएसपी का समर्थन प्राप्त है, लेकिन वो कुछ हासिल नहीं कर पाए।
सैनी अब जाटों के साथ-साथ बीजेपी के खिलाफ भी बयानबाजी करते हैं और कहते हैं कि बीजेपी ने उनका इस्तेमाल किया।
वहीं 35 बनाम 1 के नारे को तूल देने के लिए लगभग सभी राजनीतिक पार्टियाँ, जाट समुदाय और तो और बीजेपी के प्रवक्ता भी आज राजकुमार सैनी को ही दोषी ठहराते हैं।
बीबीसी ने इस बारे में राजकुमार सैनी से बात की। उन्होंने कहा, 53 साल के हरियाणा में पाँच मुख्यमंत्रियों ने करीब 40 साल तक राज किया जो एक ही समाज के हैं। इन लोगों ने जमकर जातिवाद फैलाया। 50 परसेंट से ज़्यादा रोजगार इन्होंने अपने लोगों को दिए। जबकि दलितों और अन्य पिछड़ों को सिर्फ 25 परसेंट हिस्सेदारी मिली। तो इन दो वर्गों का जो रोष था, हमने उसे आवाज दी। 35 बनाम 1 का जो नारा है वो इनकी गुंडागर्दी को एक अल्टिमेटम था कि हम तुम्हें ठिकाने लगाएंगे।
जब हम सूबे की सबसे बड़ी जाति को ललकार रहे थे तो बीजेपी साथ खड़ी रही। लेकिन जब पार्टी में हमने अपनी हिस्सेदारी माँगी तो हमें नकार दिया गया। 2014 में बीजेपी मोदी को लाई बैकवर्ड का नेता बनाकर, उसने भी कुछ नहीं किया। 27 परसेंट के रिजर्वेशन के बाद और 50 परसेंट हिस्सेदारी की मंडल कमीशन की सिफारिशों के बाद भी हमारी हिस्सेदारी नहीं बढ़ी। इसलिए पिछड़े वर्ग में बीजेपी के खिलाफ और उन पाँच जाट मुख्यमंत्रियों के ख़िलाफ़ आक्रोश है।
राजकुमार सैनी कहते हैं कि बीजेपी ने 2014 के विधानसभा चुनाव में मिडिल ऑर्डर की जातियों (अहीर, गुर्जर और यादव) को बड़े ख्वाब दिखाए थे पर उन्हें धोखा ही मिला और इसका असर इस चुनाव में दिखेगा।
जाट और बीजेपी, क्या दोनों को एक-दूसरे से नफरत है?
अगर 35 बनाम एक के नारे को संदर्भ में रखें, तो जाटों के सामने हरियाणा के गैर जाट समुदाय की कौनसी जातियाँ हैं जो राजनीतिक रूप से जाटों के सामने हैं?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार सतीश त्यागी ने कहा, जाटों के नेतृत्व को चुनौती देने वालों में इस वक्त पंजाबी समुदाय सबसे आगे है। भजन लाल बिश्नोई के बाद मनोहर लाल खट्टर के रूप में इस समुदाय को एक चेहरा मिला है और राजनीतिक रूप से कम सक्रिय समझे जाने वाले इस समुदाय की हरियाणा में नई राजनीतिक पहचान बनी है।
दूसरे नंबर पर ब्राह्मणों की जमात है जिन्हें यहाँ राजनीतिक रूप से महत्वकांक्षी समझा जाता है। भदवत दयाल शर्मा के बाद राम विलास शर्मा जैसे ब्राह्मण चेहरे बीजेपी के साथ रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में जाट समुदाय के मक्का कहे जाने वाले रोहतक संसदीय क्षेत्र से बीजेपी के ब्राह्मण प्रत्याशी डॉक्टर अरविंद शर्मा को जीत मिली तो हुड्डा खेमे के लिए इसे अब तक का सबसे बड़ा झटका माना गया क्योंकि इससे यह संदेश और भी मज़बूती से गया कि जाटों को उनके गढ़ में भी हराया जा सकता है।
त्यागी कहते हैं कि बीजेपी ने प्रदेश में इन दो जातियों को ज़्यादा तरजीह दी है, इसका ये मतलब नहीं है कि पार्टी ने जाटों से किनारा कर लिया है।
वो कहते हैं, बीते वर्षों में बीजेपी की छवि ग़ैर-जाट पार्टी की बनी है। पार्टी चाहती है कि ये छवि बनी रहे। लेकिन पार्टी ये भी चाहती है कि जाट समुदाय उनसे विमुख ना हो। यही वजह है कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जाट हैं और सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे कुछ विधायक भी जाट समुदाय से आते हैं।
वो कहते हैं कि पहलवान बबीता फ़ोगाट जैसे अन्य नामी जाट चेहरों की बीजेपी में एंट्री, फिर भी साधारण बात है। लेकिन गाँवों में असाधारण तरीक़े से जाटों का वोट बीजेपी के पक्ष में झुका है। इनमें वो घर-परिवार शामिल हैं जो ये सवाल उठाते हैं कि हुड्डा और चौटाला ने उन्हें क्या दिया? स्थानीय स्तर पर बीजेपी के कार्यकर्ता और नेता ऐसे ही जाट परिवारों की निशानदेही कर, उन्हें सहलाने का काम कर रहे हैं।
सत सिंह कहते हैं कि हरियाणा के निर्माण के समय से ही जाट समुदाय राजनीति में हावी रहा है। इस वजह से भी जाटों में सत्ता के करीब रहने की ललक है। सभी लोग पार्टियों में चुनावी टिकट लेने नहीं जाते। बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनका सत्ता के करीब रहकर अपने काम निकालने और राजनीतिक सहुलियतें लेने का स्वभाव बन चुका है क्योंकि उनका व्यवसाय, उनकी नौकरियाँ, उनके तबादले, इन सब पर सत्ताधारी दल का अंकुश होता है। तो ऐसे जाट भी सत्ताधारी दल की तरफ शिफ्ट हुए हैं।
अंत में हरियाणा के लेखक भीम सिंह दहिया की किताब पावर पॉलिटिक्स इन हरियाणा का हवाला देकर सत सिंह कहते हैं, जाट ज़्यादा समय तक सत्ता की ताक़त से दूर नहीं रह सकते और उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो प्रभावशाली भूमिका में रहने के लिए किसके साथ गठबंधन करते हैं। अगर आप उनको कम महत्व वाली भूमिका में शिफ्ट करेंगे, तो वो या तो गठबंधन तोड़ देंगे या उस पार्टी को ही तोडऩे लगेंगे। खट्टर के मुख्यमंत्री बनने पर जाटों में नाराजगी की यही वजह थी और अब जिन परिवारों में टूट-फूट हो रही है, वहाँ भी कारण यही है।
इन सभी राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि 35 बनाम 1 के नारे से और सूबे की अन्य जातियों के राजनीतिक तौर पर सक्रिय होने के कारण राज्य की 90 में से करीब 18 सीटें ही अब ऐसी बची हैं जहाँ जाटों का वोट निर्णायक है। वरना 


Date : 19-Oct-2019

नई दिल्ली, 19 अक्टूबर (लाइव हिंदुस्तान)। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने शनिवार को कहा कि वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) की चेतावनी से पाकिस्तान पर दबाव बढ़ेगा और वे आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मजबूर होंगे। आतंकवाद को मुहैया कराए जाने वाले धन की निगरानी करने वाली अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था एफएटीएफ ने शुक्रवार (18 अक्टूबर) को पाकिस्तान को अगले साल फरवरी तक के लिये अपनी ग्रे सूची में रख दिया है। धन शोधन (मनी लॉड्रिंग) और आतंकवाद को धन मुहैया कराए जाने के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई करने में इस्लामाबाद के नाकाम रहने को लेकर यह कदम उठाया गया।
वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) की पेरिस में पांच दिवसीय पूर्ण बैठक संपन्न होने के बाद यह फैसला लिया गया। इसमें इस बात का जिक्र किया गया कि पाकिस्तान को लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों पर नकेल कसने के लिये दी गई 27 सूत्रीय कार्ययोजना में इस्लामाबाद सिर्फ पांच पर ही काम करने में सक्षम रहा। उल्लेखनीय है भारत में सिलसिलेवार हमलों के लिये ये दोनों आतंकी संगठन जिम्मेदार रहे हैं।
बैठक में यह आमराय रही कि इस्लामाबाद को दी गई 15 महीने की समय सीमा समाप्त होने के बावजूद पाकिस्तान ने 27 सूत्री कार्य योजना पर खराब प्रदर्शन किया। अधिकारियों ने कहा कि पाकिस्तान को उसकी ग्रे सूची में कायम रखते हुए एफएटीएफ ने धन शोधन और आतंकवाद को मुहैया कराये जा रहे धन को रोकने में नाकाम रहने को लेकर इस्लामाबाद को कार्रवाई की चेतावनी दी। एफएटीएफ पाकिस्तान की स्थिति के बारे में अगले साल फरवरी में अंतिम फैसला लेगा।
एफएटीएफ ने पाकिस्तान पर अपना फैसला सार्वजनिक करते हुए वैश्विक वित्तीय संस्थानों को नोटिस दिया है कि वे फरवरी 2020 में किसी अकस्मात स्थिति के लिये अपनी प्रणालियों को तैयार रखें। उल्लेखनीय है कि यदि पाकिस्तान को 'ग्रे सूची' में कायम रखा जाता है या डार्क ग्रे सूची में डाला जाता है, तो उसकी वित्तीय हालत कहीं अधिक जर्जर हो जाएगी। ऐसी स्थिति में इस देश को अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ), विश्व बैंक और यूरोपीय संघ से वित्तीय मदद मिलनी बहुत मुश्किल हो जाएगी।
एफएटीएफ एक अंतर-सरकारी संस्था है। धन शोधन, आतंकवाद को धन मुहैया कराये जाने और अन्य संबद्ध खतरों का मुकाबला करने के लिये 1989 में इसकी स्थापना की गई थी। पेरिस के इस निगरानी संगठन ने पिछले साल जून में पाक को ग्रे सूची में रखा था और उसे एक कार्य योजना सौंपते हुए उसे अक्टूबर 2019 तक पूरा करने, या ईरान और उत्तर कोरिया के साथ काली सूची में डाले जाने के जोखिम का सामना करने को कहा गया था। 

 


Date : 19-Oct-2019

नई दिल्ली, 19 अक्टूबर । सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के कर्मचारियों को दिवाली से पहले सबसे बड़ा गिफ्ट दिया है। ईपीएफओ के बी और सी श्रेणी के कर्मचारियों को 60 दिन का दिवाली बोनस दिया जाएगा। इसे लेकर श्रम मंत्रालय की तरफ से अधिसूचना जारी कर दी गई है। अधिसूचना के मुताबिक ग्रुप बी और ग्रुप सी के कर्मचारियों को प्रोडक्टिविटी लिंक्ड बोनस स्कीम के तहत 60 दिन का बोनस दिया जाएगा।

इतना मिलेगा बोनस
सरकार ने 60 दिन का बोनस देने का निर्णय लिया है। ऐसा माना जा रहा है कि इससे प्रत्येक कर्मचारी को औसतन 7000 रुपये की बोनस मिलेगा। ये बोनस एक फॉर्मूले के तहत निकाला जाता है। प्रोडििक्ट्वटी लिंक्ड बोनस के तहत 25 फीसदी राशि कर्मचारी के सैलरी एकाउंट और बाकी पीएफ अकाउंट में जाएगी। 
अंशधारकों को भी मिला रहा है ब्याज
ईपीएफओ ने छह करोड़ से अधिक सदस्यों को वित्त वर्ष 2018-19 के लिए 8.65 प्रतिशत की दर से जल्द ब्याज पीएफ खातों में आने लगा है। वाला है। भविष्य निधि निकासी दावों के तहत ईपीएफओ 2018-19 के लिए 8.65 प्रतिशत की दर से ब्याज का भुगतान कर रही है। वहीं, वित्त वर्ष 2017-18 के लिए ईपीएफ जमा पर 8.55 प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज दिया गया था। (लाइव हिन्दुस्तान)
 


Date : 19-Oct-2019

औरंगाबाद, 19 अक्टूबर। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार आज खत्म हो जाएगा। इससे ठीक पहले ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के चीफ असदुद्दीन ओवैसी का एक अलग रूप देखने को मिला है। असदुद्दीन ओवैसी का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में ओवैसी रैली खत्म करने के बाद मंच से उतरते हुए एक गाने पर ठुमके लगाते दिखाई दे रहे हैं।
दरअसल असदुद्दीन ओवैसी की कल महाराष्ट्र के औरंगाबाद में चुनावी रैली थी। औरंगाबाद के पैठान गेट इलाके में एक रैली को संबोधित करने के बाद मंच से उतरते वक्त ओवैसी ने डांस करना शुरू कर दिया। इस दौरान वह काफी उत्साहित और जोश में दिख रहे थे।
रैली में साधा मोदी सरकार पर निशाना
इससे पहले असदुद्दीन ओवैसी ने रैली में मोदी सरकार पर हमला बोला। ओवैसी ने कहा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 1993 मुंबई दंगों पर श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट को लागू करना चाहिए। मोदी ने मुंबई धमाकों के पीडि़तों से न्याय नहीं किया।’ उन्होंने आरोप लगाया कि पीएम मोदी अपने चुनावी भाषणों में विवादास्पद विषयों को उठाकर एक खास वर्ग को संदेश देने में लिप्त है।’
ओवैसी ने पूछा, ‘‘मामले बंद हो गए, आरोपियों को सजा दे दी गई, लेकिन मुंबई दंगों पर श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं की गई.  प्रधानमंत्री मोदी कब इस पर काम करेंगे?’’ (एबीपी)
 


Date : 19-Oct-2019

श्याम सुमन
नई दिल्ली, 19 अक्टूबर । उच्चतम न्यायलय की ओर से नियुक्त जस्टिस एके पटनायक जांच समिति ने देश के मुख्य न्यायाधीश पर यौन उत्पीडऩ के आरोप लगाने वाली महिला कोर्टकर्मी को शीर्ष अदालत और मुख्य न्यायाधीश को बदनाम करने की साजिश में शामिल होने के मामले में क्लीन चिट दे दी है। समिति ने कहा है कि बेंच फिक्सिंग में भी उसका हाथ नहीं है। उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री को पिछले दिनों सौंपी गई रिपोर्ट में जस्टिस एके पटनायक समिति ने कहा कि कोर्ट को बदनाम करने की साजिश में महिला शामिल नहीं है। इस महिला (कोर्ट सहायक) ने मुख्य न्यायाधीश पर यौन शोषण के आरोप लगा हलचल मचाई थी। महिला ने उच्चतम न्यायालय में शपथपत्र देकर कहा था कि उसके आरोपों की जांच करवाई जाए। महिला को रजिस्ट्री ने बाद में बर्खास्त कर दिया था। 
इनहाउस समिति ने गोगोई को दे दी थी क्लीन चिट 
उच्चतम न्यायालय ने आरोपों की इनहाउस समिति से जांच करवाई, जिसने छह मई को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को क्लीन चिट दे दी थी। समिति के अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के सबसे वरिष्ठ जज जस्टिस एसए बोबडे थे, जिन्होंने लडक़ी को बुलाकर बयान लिए थे। समिति के सदस्यों में उच्चतम न्यायालय की जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा व इंद्रा बनर्जी शामिल थीं। इसके बाद एक वकील उत्सव बैंस ने उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर कर उच्चतम न्यायालय को बदनाम करने की बड़ी साजिश का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि महिला का इस्तेमाल कर कुछ नीहित स्वार्थ देश की सर्वोच्च अदालत को बदनाम कर रहे हैं और जजों को डराकर बेंच बदलवा (र्फिंक्सग) रहे हैं।  
कोर्ट रिपोर्ट पर जल्द सुनवाई करेगा 
अपनी रिपोर्ट में जस्टिस पटनायक ने कहा है कि सीबीआई, खुफिया ब्यूरो और दिल्ली पुलिस की मदद से की गई गहन जांच, फोन कॉल डिटेल्स और अन्य संपर्कों से की बारीक तहकीकात से साजिश का कोई पता नहीं चला है। इस रिपोर्ट पर कोर्ट जल्द सुनवाई करेगा। गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय में जस्टिस अरुण मिश्रा की पीठ ने 25 अप्रैल को बैंस की याचिका पर शीर्ष अदालत, मुख्य न्यायाधीश और उनके दफ्तर को बदनाम/अस्थिर करने की साजिश का पता लागने के लिए सर्वोच्च अदालत के पूर्व जज जस्टिस पटनायक की अध्यक्षता में समिति गठित की थी।(लाइव हिन्दुस्तान)
 


Date : 19-Oct-2019

ठाणे, 19 अक्टूबर । भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बंद एनसीपी के मौजूदा विधायक रमेश कदम के एक सहयोगी के यहां से 53 लाख रुपये से ज्यादा कैश बरामद हुआ है। हैरान करने वाली बात यह है कि फ्लैट में एनसीपी विधायक कदम भी मौजूद थे, जबकि उन्हें जेल में होना चाहिए था। इस मामले में पुलिस ने फ्लैट के मालिक राजू खरे को गिरफ्तार कर लिया है। 
दरअसल, शुक्रवार को कदम ने जेल में बेचैनी की शिकायत की थी, जिसके बाद उन्हें जेजे अस्पताल में मेडिकल जांच के लिए लाया गया था। जांच में वह स्वस्थ पाए गए जिसके बाद उन्हें अस्पताल से ठाणे सेन्ट्रल जेल लाया जा रहा था। रास्ते में विधायक ने अपने साथ तैनात पुलिसवालों को ठाणे के घोड़बंदर रोड इलाके में अपने एक दोस्त यहां ले जाने के लिए कहा। पुलिसवाले भी उन्हें जेल ले जाने के बजाय दोस्त के फ्लैट पर लेकर चले गए। 
फ्लैट में विधायक के होने की सूचना पर छापा 
जब पुलिस और चुनाव आयोग की टीम को यह पता चला कि विधायक रमेश कदम को जेल न ले जा करके, उनके एक दोस्त के फ्लैट ले जाया गया है तो हडक़ंप मच गया। एक अधिकारी ने बताया कि कदम के अवैध रूप से फ्लैट में जाने की गुप्त सूचना मिलने के बाद ठाणे पुलिस की एक टीम ने वहां छापा मारा तो विधायक कदम, फ्लैट मालिक राजू खरे और पुलिसकर्मियों को 53.43 लाख रुपये नकदी के साथ वहां पाया गया। अधिकारी ने कहा कि खरे को देर रात गिरफ्तार कर लिया गया जबकि कदम को ठाणे केन्द्रीय कारागार भेज दिया गया। एक अधिकारी ने बताया कि इस आचरण के लिए पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा रही है। 
2015 में गिरफ्तार हुए थे रमेश कदम 
सोलापुर के मोहोल से एनसीपी विधायक कदम को सरकार द्वारा संचालित अन्नाभाउ साठे विकास निगम का अध्यक्ष रहते हुए 150 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं के लिये अगस्त 2015 में गिरफ्तार किया गया था। इस बार भी वह चुनाव मैदान में हैं। (नवभारत टाईम्स)
 


Date : 19-Oct-2019

भुवनेश्वर, 19 अक्टूबर । राष्ट्रीय स्वयंसेवसक संघ ने शुक्रवार को उम्मीद जताई कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आएगा। आरएसएस के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने यहां संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की तीन दिवसीय बैठक के समापन के बाद संवाददाता सम्मेलन में कहा कि संघ राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के लिए गणना का समर्थन करता है और सभी राज्यों को राष्ट्र के कल्याण के लिए इसे अपनाना चाहिए। इस मौके पर आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत भी मौजूद थे। यह बैठक पहली बार ओडिशा में हुई। जोशी ने कहा, ‘हम आशावान हैं कि उच्चतम न्यायालय का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आएगा। उनसे सवाल पूछा गया था कि जब उच्चतम न्यायालय का फैसला आएगा तब क्या आरएसएस उसे स्वीकार करेगा। राजनीतिक रूप से संवेदनशील अयोध्या मामले की सुनवाई बुधवार को समाप्त हो गयी और उच्चतम न्यायालय ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। 
इस मामले में अदालत के बाहर समझौता करने की कोशिशों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘यहां लंबे समय से मध्यस्थता के जरिए हल निकालने की कोशिशें की गई लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। अगर ऐसा होता तो मामला अदालत में नहीं गया होता।' उन्होंने कहा कि आरएसएस लंबे समय से अयोध्या में प्रस्तावित श्री राम मंदिर के निर्माण से पहले बाधाओं को हटाने की हिमायत कर रही है। हालांकि ऐसा हुआ नहीं और अदालत में कार्यवाही चलती रही। विवादित एनआरसी पर एक सवाल के जवाब में जोशी ने कहा, ‘हालांकि एनआरसी की कवायद केवल असम में हुई लेकिन सभी राज्यों को इसे अपनाना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि घुसपैठियों के कारण भारतीय नागरिक अपने अधिकारों से वंचित न हो। देश के कल्याण और उसकी सुरक्षा के लिए राज्यों को इसे अपनाना चाहिए। देश और राज्य के पास अपने नागरिकों की असल स्थिति होनी चाहिए। 
आरएसएस के सरकार्यवाहक ने कहा कि यह किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह राज्य में अपने नागरिकों की असल स्थिति को जाने और शरणार्थियों की पहचान करें तथा प्रशासन को सुनिश्चित करना चाहिए कि राष्ट्र विरोधी गतिविधियां रोकी जाए। जोशी ने कहा, ‘एनआरसी जैसी प्रक्रिया अनिवार्य बन गयी है क्योंकि कुछ राज्यों में बाहरी लोगों की संख्या अधिक है जो राष्ट्र विरोधी ताकतों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और हिंदुओं के खिलाफ काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘बढ़ते जनसांख्यिकी असंतुलन और देश की सुरक्षा के खतरे से निपटने के लिए पड़ोसी देशों से घुसपैठियों की पहचान करने के लिए भी एनआरसी अनिवार्य है।  उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में हिंदुओं का जातीय सफाया किया गया और उन्होंने इस पर चिंता जतायी। उनसे इस महीने दुर्गा पूजा के दौरान मुर्शिदाबाद में एक स्कूल शिक्षक के परिवार के तीन सदस्यों की हत्या पर सवाल पूछा गया था।(एनडीटीवी) 
 


Date : 19-Oct-2019

अंकारा, 19 अक्टूबर । अमेरिकी मध्यस्थता के बाद 124 घंटे की शांति विराम पर तुर्की कायम नहीं रह सका। उसने अपने वादे को तोड़ते हुए कुर्द बलों पर हमला शुरू कर दिया है। इसके चलते शुक्रवार को भी उत्तर सीरिया में संघर्ष जारी रहा। रास अल अयान के आसपास गोलीबारी की आवाजें सुनाई पड़ी।
अमेरिकी उप राष्ट्रपति माइक पेंस ने गुरुवार को घोषणा की थी कि उत्तर सीरिया में पांच दिनों तक कोई सैन्य ऑपरेशन नहीं करेगा। तुर्की के इस ऐलान के बाद अमेरिका ने बहुत राहत की सांस ली थी। इस घोषणा के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चेहरा खिल गया था। माइक पेंस ने कहा था कि उत्तर सीरिया में युद्ध विराम के लिए तुर्की के राष्ट्रपति के साथ समझौता हुआ है। कुर्दिश लड़ाकों के वापस जाने तक तुर्की 120 घंटे तक उत्तर सीरिया में अपने सभी सैन्य अभियानों को रोक देगा।
तुर्की के इस ऐलान के बाद कि वह पांच दिनों तक सीरिया पर हमला नहीं करेगा। इस समझौते के बाद राष्ट्रपति ट्रंप की बड़ी सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई थी। ट्रंप ने कहा था कि यह सौदा तीन दिन पहले तक नहीं हो सकता था। इसे पूरा करने के लिए कुछ सख्त प्रेम का इजहार करना पड़ा था। यह हम सबके लिए सुखद है। इस फैसले से हम सभी को गर्व है। ट्रंप ने कहा उनके लिए यह महान दिन है। अमेरिका के लिए यह गर्व की बात है। इस समझौते के लिए कई साल से कोशिश चल रही थी। तुर्की के इस फैसले से करोड़ों जिंदगियां बच जाएंगी। सभी को बधाई।
शांति के लिए ट्रंप ने लिखा था कठोर खत 
उत्तर सीरिया में शांति के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने तुर्की के समकक्ष रेसेप तैयब एर्दोगन को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी। ट्रंप ने अपने पत्र में लिखा था कि मूर्ख मत बनो.. होश में आ जाओ.. वरना सजा भुगतने को तैयार रहो। राष्ट्रपति ट्रंप ने यह पत्र उस वक्त खत लिखा है जब रूस के राष्ट्रपति  व्लादिमीर पुतिन ने फोन करके एर्दोगन को सीरिया संघर्ष सुलझाने की नसीहत दी थी। इस बाबत उन्होंने मॉस्को आने का न्योता भी दिया था। ट्रंप के इस कड़े पत्र के बाद तुर्की की यह पहल सामने आई कि वह 124 घंटे तक उत्तर सीरिया पर हमला नहीं करेगा।(जागरण)
 


Date : 19-Oct-2019

ठाणे, 19 अक्टूबर। भ्रष्टाचार के मामले में जेल की सजा काट रहे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक रमेश कदम के एक करीबी के फ्लैट से 53 लाख रुपए बरामद हुआ है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि फ्लैट में खुद विधायक भी मौजूद थे, जबकि उन्हें जेल में होना चाहिए था। पुलिस को कदम के फ्लैट में होने की सूचना मिली थी। इसी के बाद छापेमारी की गई।
2015 में पुलिस ने कदम को किया था गिरफ्तार
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि कदम ने बेचैनी की शिकायत की थी। इसके बाद उन्हें जेजे अस्पताल में मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया। यहां से ठाणे सेंट्रल जेल लौटते वक्त उन्होंने अपने साथ तैनात पुलिसकर्मियों को ठाणे के घोड़बंदर रोड इलाके में अपने एक मित्र के यहां ले जाने के लिए कहा। सोलापुर के मोहोल से एनसीपी विधायक कदम को सरकार द्वारा संचालित अन्नाभाउ साठे विकास निगम का अध्यक्ष रहते हुए 150 करोड़ रुपए की कथित अनियमितताओं के लिए अगस्त 2015 में गिरफ्तार किया गया था।
बेचैनी की शिकायत के बाद गए थे अस्पताल
ठाणे पुलिस के एक अधिकारी ने कहा, कदम को बेचैनी की शिकायत के बाद ठाणे केंद्रीय कारागार से जेजे अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उनका स्वास्थ्य सही पाया। कदम अपने दोस्त राजू खरे से मिलने के लिए घोड़बंडर रोड पर एक फ्लैट में जाना चाहते थे।
पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी हो रही कार्रवाई
अधिकारी ने कहा कि कदम के अवैध रूप से फ्लैट में जाने की गुप्त सूचना मिलने के बाद ठाणे पुलिस की एक टीम ने वहां छापा मारा तो विधायक, खरे और पुलिसकर्मियों को 53.43 लाख रुपये नकदी के साथ वहां पाया। अधिकारी ने कहा कि खरे को देर रात गिरफ्तार कर लिया गया जबकि कदम को ठाणे केंद्रीय कारागार भेज दिया गया। एक अधिकारी ने बताया कि इस आचरण के लिए पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा रही है। (न्यूज 18)
 


Date : 19-Oct-2019

लखनऊ, 19 अक्टूबर। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने राज्य के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। उत्तर प्रदेश में उच्चतर शिक्षा निदेशालय द्वारा इस संबंध में एक सर्कुलर जारी किया गया है। सर्कुलर में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के अंदर मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। छात्रों को अब विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के अंदर मोबाइल फोन लेकर आने या उपयोग करने की अनुमति नहीं होगी।  यह प्रतिबंध राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के शिक्षकों पर भी लागू होगा।
निदेशालय ने राज्य के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों के लिए बेहतर शिक्षा वातावरण सुनिश्चित करने के लिए यह फैसला किया है। सरकार ने पाया कि कॉलेजों में छात्र और शिक्षक बड़ी संख्या में पढ़ाई के समय मोबाइल फोन पर अपना कीमती समय व्यतीत करते हैं। 
इसके साथ ही योगी आदित्यनाथ ने आधिकारिक बैठकों के दौरान भी मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है, जिसमें कैबिनेट बैठकें भी शामिल हैं। कुछ मंत्रियों और अधिकारियों द्वारा महत्वपूर्ण बैठकों के दौरान व्हाट्सएप पर संदेश पढऩे में व्यस्त पाए जाने के बाद यह निर्णय लिया गया। (एनडीटीवी)
 


Date : 19-Oct-2019

नई दिल्ली, 19 अक्टूबर । परीक्षा के समय बच्चे किसी भी तरह की कोई नकल ना कर सकें उसके लिए स्कूल और कॉलेज क्या-क्या नहीं करते। कभी रोल नंबर में बदलाव तो कभी सीटिंग की ऐसी व्यवस्था की जाती है कि बच्चे किसी दूसरे की कॉपी में से कुछ ना देख सके। कर्नाटक में तो परीक्षा में बच्चों को नकल से रोकने के लिए अनोखा तरीका निकाला गया है।
कर्नाटक के हावेरी स्थित भगत प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज में बच्चे नकल ना कर सकें इसलिए उनके सिर पर गत्ते के डिब्बे पहना दिए हए। ये गत्तों के डिब्बों सामने की तरफ खुले हुए थे। जिससे बच्चे देख सकें और अपना पेपर लिख सकें।
सोशल मीडिया पर भी परीक्षा के दौरान की तस्वीरें खबू वायरल हो रही हैं। तस्वीरें वायरल होने के बाद लोग हंस-हंस कर लोटपोट हो गए। तस्वीरों में आप भी साफ देख सकते हैं कि जिस टीचर की परीक्षा के दौरान ड्यूटी लगी थी। वह खुद भी हस रही थी। परीक्षा के समय एक दूसरे को देखकर बच्चे भी काफी हंसते हुए नजर आए।
राज्य सरकार ने जारी किया नोटिस
खबरों के अनुसार, राज्य सरकार ने अब मामले सामने आने के बाद कॉलेज को एक नोटिस जारी कर दिया है। इस मामले के बारे में जानकारी देते हुए सार्वजनिक निर्देश विभाग के उप निदेशक एसएस पीरजे कहा कि हमने नोटिस जारी करते हुए कॉलेज प्रबंधन को एक लिखित स्पष्टीकरण देने के लिए भी कहा है। इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में इस तरह की घटना दोबारे संज्ञान में आती है तो विभाग स्कूल का लाइसेंस भी रद कर सकता है।(एजेंसी)
 


Date : 19-Oct-2019

संजय राय 
मुम्बई, 19 अक्टूबर। जनता के अच्छे दिन भले ही नहीं आये हों और किसानों की उपज के दाम दोगुना न हुए हों, देश और प्रदेश की जीडीपी का ग्राफ़ भले ही घटकर नीचे आ गया हो लेकिन सरकार के मंत्रियों की संपत्ति कई गुना बढ़ गयी है। या यूं कह लें कि प्रदेश में 16 हजार से ज्यादा किसानों ने भले ही आत्महत्या कर ली हो, पिछले तीन साल से प्रदेश के अधिकाँश जिलों में सूखा पड़ा हो लेकिन महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के मंत्रियों के पिछले पांच साल बहुत मजे के रहे। 
सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि किसान खेती में हो रहे नुकसान और उसकी वजह से बढ़ते कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या कर रहा है लेकिन अधिकांश नेताओं ने अपनी संपत्ति में वृद्धि का कारण खेती से होने वाली आय को बताया है।
कृषि आय पर आयकर की छूट रहती है इसलिए इस सुविधा के सबसे बड़े लाभार्थी भी हमारे नेता ही बन रहे हैं। और शायद यही वजह हो सकती है कि नेताओं को बाज़ार में छाई मंदी की बातों पर विश्वास नहीं होता है और वे ‘अच्छे दिन आ गए हैं’ की बातें करते हैं। कोई सवाल खड़ा करता है तो कहते हैं कि जब सिनेमा की टिकटें करोड़ों रुपयों की बिक जा रही हैं तब मंदी कैसी! 
एक ओर किसानों की हालत बेहद खऱाब है दूसरी ओर नेताओं की संपत्ति बढ़ती जा रही है और इसे लेकर सवाल खड़े होने लाजिमी हैं। देवेंद्र फडणवीस के मंत्रिमंडल के 18 नेताओं की कुल संपत्ति जो उन्होंने 2014 में चुनाव का नामांकन भरते समय बताई थी वह 179 करोड़ 80 लाख थी जो साल 2019 के चुनाव के नामांकन के समय दी गयी जानकारी के अनुसार बढक़र 332 करोड़ 50 लाख हो गयी है। यानी पिछले पांच सालों में इनकी संपत्ति करीब 142 करोड़ 50 लाख रुपये बढ़ गई है।
बबनराव, पंकजा मुंडे की संपत्ति बढ़ी
प्रदेश के पेयजल आपूर्ति मंत्री बबनराव लोणीकर की संपत्ति में सर्वाधिक वृद्धि हुई है। पिछले पांच सालों में उनकी संपत्ति में 27 करोड़ 10 लाख रुपये की वृद्धि दर्ज हुई है। साल 2014 में उनकी घोषित संपत्ति 2 करोड़ 30 लाख थी, जो 2019 में बढक़र 29 करोड़ 40 लाख हो गयी। इसके बाद दूसरा नंबर बीजेपी के दिग्गज नेता रहे गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे का आता है। पंकजा प्रदेश की महिला व बालविकास मंत्री हैं और पांच सालों में उनकी संपत्ति में 21 करोड़ 70 लाख की वृद्धि हुई है। 2014 में पंकजा की कुल घोषित संपत्ति 13 करोड़ 70 लाख रुपये की थी जो 2019 में बढक़र 35 करोड़ 40 लाख हो गयी। 
सरकार में मुख्यमंत्री के बाद दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले राजस्व मंत्री चंद्रकांत पाटिल की संपत्ति में इन पांच सालों में करीब 10 गुणा की वृद्धि हुई है। साल 2014 में जब उन्होंने नामांकन भरा था तब उनकी संपत्ति 3 करोड़ 2 लाख रुपये थी जो 2019 के चुनावी हलफनामे के अनुसार बढक़र 29 करोड़ 3 लाख हो गयी है।  (सत्या हिन्दी)
 


Date : 19-Oct-2019

मुम्बई, 19 अक्टूबर । पवार पर प्रहार करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, ‘पवार विदर्भ में अपनी रैलियों में किसानों की आत्महत्या की बात कर रहे हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि जब किसानों ने आत्महत्या करना शुरू किया तब महाराष्ट्र में सत्ता में कौन था।’
उन्होंने कहा, ‘आपने ही विदर्भ क्षेत्र को पानी की आपूर्ति रोकी। आप केंद्र में मंत्री थे और आप पिछले 15 साल (1999-2004) तक महाराष्ट्र में सत्ता में थे। आपके भ्रष्ट तरीकों से ही विदर्भ के किसानों से जुड़ी राशि की हेराफेरी हुई। आपने ही इस क्षेत्र में सिंचाई धीमी कर दी, किसान आत्महत्या करने के लिए बाध्य हो गये।’(बिजनेस स्टैंडर्ड)


Date : 19-Oct-2019

नई दिल्ली, 19 अक्टूबर। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने आईएनएक्स मीडिया मामले में अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी है। खास बात यह है कि सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में इंद्राणी मुखर्जी को बड़ी राहत दी है। सीबीआई ने दिल्ली में स्पेशल कोर्ट के सामने दाखिल की गई अपनी चार्जशीट में इंद्राणी को क्षमा करने की बात कही है। बता दें कि दिल्ली की कोर्ट ने इसी साल जुलाई में उस याचिका को स्वीकृति दे दी थी जिसमें इंद्राणी मुखर्जी को सरकारी गवाह बनाने की बात कही गई थी। 
सीबीआई ने चार्जशीट में पी चिदंबरम करीब 10 लाख रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगाया है। सीबीआई ने स्पेशल कोर्ट में दाखिल अपनी चार्जशीट में कहा है कि पी चिदंबरम ने 2008 में यह पैसे लिए थे। सीबीआई के अनुसार पी चिदंबरम ने रिश्वत के तौर पर कुल 9।96 लाख रुपये लिए थे।
सीबीआई ने पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के नेता पी चिदंबरम, उनके बेटे कार्ति चिदम्बरम और कंपनियों समेत कुल 15 लोगों व निकायों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया है। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भ्रष्टाचार के इस मामले की जांच जारी है। उसने बताया कि सिंगापुर एवं मॉरीशस को भेजे गए आग्रह पत्र (लैटर्स रोगेटरी) पर जवाब का इंतजार किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में पी चिदंबरम की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है।
आईएनएक्स मीडिया मामले में पी चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई ने आरोप पत्र दाखिल कर दिया है। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मामले में चार्जशीट दाखिल हो गई है। उन्हें गिरफ्तार करने के लिए नहीं बल्कि पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया गया। आज इस मामले में चार्जशीट दाखिल करने का आखिरी दिन था। इस मामले में चिदंबरम, उनके बेटे, अफसरों व कंपनियों समेत 15 लोगों को आरोपी बनाया गया है।
सीबीआई ने कहा कि चिदंबरम गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। एक गवाह ने प्रभावित करने की कोशिश की बात कही है। उसकी जानकारी सील कवर में सीबीआई कोर्ट को दी गई है। वह गवाह इंद्राणी मुखर्जी नहीं है। सीबीआई ने कहा कि चिदंबरम को जमानत नहीं दी जानी चाहिए इससे गवाहों को प्रभावित करने की गंभीर आशंका है। एसजी तुषार मेहता ने कहा कि इस मामले में भ्रष्टाचार हुआ है और मनी लॉन्ड्रिंग भी चल रही है। सरकार की करप्शन को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति है।
सीबीआई ने कहा कि इस मामले में अफसर सिंधुश्री खुल्लर को भी आरोपी बनाया गया है। सीबीआई ने कहा कि उनकी फ्लाइट रिस्क बरकरार है। कई उदाहरण हैं कि देश में संपत्ति होने के बावजूद लोग भाग गए। चिदंबरम को जमानत नहीं मिलनी चाहिए। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि केवल आईएनएक्स ही एक ऐसा मामला नहीं है जिसकी जांच चल रही है बल्कि पी चिदंबरम जब वित्त मंत्री थे उस दौरान की सभी एफआईपीबी के एप्रूवल को लेकर जांच चल रही है।
पी चिदंबरम के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि भले ही इस मामले में चार्जशीट दाखिल हो गई हो लेकिन वो जमानत ना देने का आधार नहीं हो सकता है। सिब्बल ने कहा कि अगर इनके आरोप-पत्र के हिसाब से मैं दोषी हूं तो ये निचली अदालत में साबित करें। इस बात को जमानत की सुनवाई के दौरान लाने का कोई मतलब नहीं है। मैं सभी सवालों का जवाब ट्रायल के दौरान दूंगा। सिब्बल ने 2-जी मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि 2-जी मामले में भी गंभीर आरोप लगे थे लेकिन परिणाम क्या हुआ? सिब्बल ने कहा कि इसको लेकर कोर्ट का फैसला है।
पी चिदंबरम के वकील सिब्बल ने कहा कि चिदंबरम का वजन जेल में रहने के दौरान लगातार घट रहा है। उनका वजन 73 किलो से 68.5 किलोग्राम हो गया है। घर के खाने के बावजूद उनकी सेहत गिर रही है। सर्दियों में उनको डेंगू होने का भी खतरा भी है। उनको जेल में रखकर एजेंसी को कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। सीबीआई के पास चिदंबरम के खिलाफ सीधा कोई सबूत नहीं है। सिर्फ प्रताडि़त करना ही एजेंसी का मकसद है क्योंकि चिदम्बरम गवाहों को प्रभावित नहीं कर सकते। वैसे भी गवाहों की सुरक्षा का जि़म्मा सरकार का ही है। पी चिदंबरम की जमानत याचिका पर सुनवाई पूरी होने पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। (एनडीटीवी)

 


Date : 18-Oct-2019

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर । मंदिरों के प्रशासन से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि क्या उत्तर प्रदेश में जंगलराज है? जो वहां के वकीलों को पता ही नहीं है कि किस नियम के तहत काम किया जा रहा है। अदालत ने इसी के साथ ये भी पूछा है कि सरकार किस कानून के तहत मंदिर और उनकी संस्थाओं की निगरानी कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट की इन तीखी टिप्पणियों के सामने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील की बोलती बंद ही रही। वकील की ओर से लिखित हलफनामा दायर करने के लिए सर्वोच्च अदालत से कुछ समय मांगा गया है। वकील ये भी नहीं बता पाए कि उत्तर प्रदेश में किस कानून के तहत मंदिरों के प्रशासन को देखा जाता है।
ये मामला बुलंदशहर के एक मंदिर से जुड़ा है, जहां मंदिर प्रशासन पर दान के दुरुपयोग का आरोप लगा है। जब ये आरोप लगे थे तब उत्तर प्रदेश की सरकार ने मंदिर को चलाने के लिए एक बोर्ड बनाया था, लेकिन बात नहीं बन पाई और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया।
सुप्रीम कोर्ट में मंदिर की ओर से उत्तर प्रदेश की सरकार के खिलाफ याचिका दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि उत्तर प्रदेश की सरकार का ये निर्णय गलत है और मंदिर का बोर्ड बनाने में किसी कानून का पालन नहीं किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान ये भी पूछा कि सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार का कोई अधिकारी अदालत में मौजूद क्यों नहीं है, जो वकील को जानकारी दे सके और सुप्रीम कोर्ट के सवालों का जवाब भी दे पाए।
पिछले दो महीने से कम समय में सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी बार उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई है। इससे पहले पिछले महीने एक मुस्लिम लडक़ी की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि महिलाओं और बाल अधिकारों के प्रति आप गंभीर नहीं है।(आजतक)
 


Date : 18-Oct-2019

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर। आईएनएक्स मीडिया केस में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी है। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम समेत 14 लोगों को आरोपी बनाया है। इस मामले में दिल्ली के कोर्ट में 21 अक्टूबर को सुनवाई होगी।
सीबीआई की चार्जशीट में पीटर मुखर्जी, कार्ति चिदंबरम, भास्कर, पी चिदंबरम, सिंधुश्री खुल्लर, अनूप पुजारी, प्रबोध सक्सेना, आर प्रसाद, आईएनएक्स मीडिया, एएससीएल और शतरंज प्रबंधन का नाम है। चार्जशीट में वित्त मंत्रालय के चार पूर्व अफसरों का भी नाम है। (आजतक)
 

 


Date : 18-Oct-2019

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर। अयोध्या केस में  सुन्नी वक्फ़ बोर्ड में मतभेद की खबर आ रही है। बताया जा रहा है कि अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने बयान जारी कर कहा है कि हमें किसी की भी मध्यस्थता मंजूर नहीं है। वकीलों ने कहा, न हमें, न मुख्य हिंदू पक्षकारों को मध्यस्थता मंज़ूर है। सिर्फ जफर फारुकी और धर्मदास ने हिस्सा लिया। पैनल सदस्य श्रीराम पंचू और जफ़ऱ फारूकी में तालमेल नजऱ आ रहा है। रिपोर्ट से सहमत नहीं हूं। रिपोर्ट लीक होने के समय पर भी सवाल है।
बुधवार के दिन जब अंतिम सुनवाई चल रही थी कि इस मामले में गठित मध्यस्थता समिति ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है। सूत्रों का कहना था कि इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मुस्लिम पक्ष विवादित जमीन पर दावा छोडऩे के लिए तैयार हो गया है साथ में यह भी कहा है सरकार अयोध्या में बाकी मस्जिदों का पुनरुद्धार कराए और मस्जिद बनाने के लिए जमीन मुहैया कराई जाए। 
ऐसी ही  सुन्नी वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता शाहिद रिज़वी ने भी कहा था। उन्होंने कहा, हमने मध्यस्थता पैनल को अपने विचार दिए हैं लेकिन हम अदालत में प्रस्तुत किए गए निपटारण योजना का खुलासा नहीं कर सकते हैं। यह सकारात्मक है और सभी लोग, हिंदू और मुसलमान खुश होंगे। यह पूछने पर कि क्या दोनों पक्ष समझौते से खुश होंगे, रिज़वी ने कहा, यह हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए एक जीत की स्थिति है।
माना जा रहा है कि पैनल की यह रिपोर्ट 134 साल पुराने इस विवाद को सुलझाने में अहम कड़ी साबित हो सकती है। लेकिन अब वकीलों के आज आए बयान के बाद ऐसा लग रहा है कि मध्यस्थता के जरिए इस मसले को सुलझना मुश्किल हो सकता है। मध्यस्थता पैनल में सुप्रीम कोर्ट रिटायर जज एफएम कलीफुल्ला, श्री श्रीरविशंकर और वरिष्ठ वकील श्री राम पंचू शामिल हैं।  (एनडीटीवी)
 


Date : 18-Oct-2019

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर। भारत के प्रमुख न्यायाधीश रंजन गोगोई ने नए चीफ जस्टिस के लिए न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे का नाम केंद्र सरकार को प्रस्तावित किया। सूत्रों के मुताबिक सीजेआई ने  चिटठी लिख कर यह जानकारी केंद्र को दी। वर्तमान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं। जस्टिस बोबड़े को अगला मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है। बतौर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस  बोबड़े 18 नवंबर को शपथ लेंगे। जस्टिस बोबड़े 47 वें मुख्य न्यायाधीश होंगे।
साल 1956 में जन्मे एसए बोबडे ने बीए एलएबी की डिग्री नागपुर से हासिल की है। 1978 में वह बार काउंसिल के सदस्य बने और बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में प्रैक्टिस करने लगे। साल 2010 में उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट का अतिरिक्त जज बनाया गया। साल 2012 मे वह मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। साल 2013 में उनको सुप्रीम कोर्ट में जज बने। वह 23 अप्रैल 2021 को रिटायर हो जाएंगे।
अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई बुधवार को पूरी हो चुकी है। इस पर 17 नंवबर से पहले फैसला सुनाया जा सकता है क्योंकि इसी तारीख को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई रिटायर हो रहे हैं। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई में 5 जजों की संविधान पीठ इस मामले ने लगातार 40 दिन तक सुनवाई की है। इस बेंच में सीजेआई रंजन गोगाई  के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नज़ीर शामिल हैं। यह संविधान पीठ इलाहाबाद हाइकोर्ट के 2010 में दिए गए उस फैसले को  चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी। (आजतक)
 


Date : 18-Oct-2019

नई दिल्ली, 18 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट ने असम में एनआरसी लिस्ट को अपडेट करने का काम देख रहे आईएएस अधिकारी प्रतीक हजेला का तुरंत प्रभाव से ट्रांसफर करने का आदेश जारी किया है। सुनवाई के दौरान सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि हाजेला को लंबे समय के लिए डेप्यूटेशन पर भेजा जा रहा है। खास बात यह है कि ष्टछ्वढ्ढ रंजन गोगोई ने हजेला को ट्रांसफर कर मध्य प्रदेश भेज दिया है। कोर्ट के इस आदेश पर सरकार के वकील अटॉर्नी जरलन केके वेणुगोपाल ने जब कोर्ट से पूछा कि क्या इस ट्रांसफर की कोई वजह है तो चीफ जस्टिस ने सख्त लहजे में जवाब देते हुए कहा कि हां, इसकी वजह है। हाजेला 1995 बैच के असम और मेघालय काडर आईएएस अधिकारी हैं। 
गौरतलब है कि एनआरसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कड़ा रुख अपनाता रहा है। कुछ महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने असम के एनआरसी संयोजक प्रतीक हजेला से डिटेल मांगी थी। हजेला ने कहा था कि हमें कुछ गड़बडिय़ां मिली थीं। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि हमें मालूम है कि हमारे आदेशों पर हर पल सभी बहस और आलोचना करते रहे। जिसको जो करना है करे लेकिन हम 31 अगस्त तक एनआरसी का प्रकाशन चाहते हैं।
वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि सन 1971 से पहले जिनका जन्म हुआ उनका जन्म प्रमाणपत्र भी मान्य हो। जो विदेश चले गए थे लेकिन वे या उनके बच्चे अब लौटकर आ गए हैं तो उनको भी एनआरसी में शामिल होने से मना न किया जाए। इस पर प्रतीक हजेला ने कहा था कि सन 1971 तक जिन लोगों के परिजन देश के किसी भी हिस्से में बसे होने का सबूत पेश कर देंगे उन्हें हम एनआरसी में शामिल कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अंतिम एनआरसी को 31 अगस्त या उससे पहले प्रकाशित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने एनआरसी समन्वयक को विवादास्पद मुद्दों पर एक नोट देने को कहा और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट अगले सप्ताह आदेश पारित करेगा।सुप्रीम कोर्ट ने कोआर्डिनेटर हजेला से कहा था कि वे अपनी रिपोर्ट शुक्रवार तक सुप्रीम कोर्ट में दें। मंगलवार को कोर्ट इस पर आदेश जारी करेगा। (आजतक)
 


Date : 18-Oct-2019

आजमगढ़, 18 अक्टूबर । सेक्स की लत ने एक बेटे को इतना हैवान बना दिया कि पहले उसने अपनी दो सगी बहनों का रेप किया। इस बात की खबर मां को लगी तो उसने बेटियों को मायके भेज दिया। इससे बेटे की हैवानियत और बढ़ गई और उसने मां को ही शिकार बनाना चाहा। तब मां और उसके दूसरे बेटे ने मिलकर इस कलयुगी बेटे का अंत कर दिया। समाज को झकझोर कर रख देने वाली यह घटना उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की है। 
आजमगढ़ में रानी की सराय थाना अंतर्गत घोर कलयुग की एक ऐसी कहानी जिसमें हैवान बन चुके एक बेटे की उसकी मां और सगे भाई ने ही हत्या कर दी। उसकी डेड बॉडी को बोरे में बंद कर एक नहर के किनारे फेंक दिया। अज्ञात बॉडी मिलने के बाद पुलिस ने इसकी जांच शुरू की तो वह वह इस मामले की तह तक पहुंची। 
पुलिस को जांच में पता चला कि सगे भाई और मां ने ही उसकी हत्या की थी तो वह हैरान रह गई। उससे भी हैरानी और चौंका देने वाला हत्या का कारण था। 
मृतक अपनी विचित्र हालत में अपनी ही सगी दो बहनों के साथ बलात्कार कर चुका था। लोक-लाज और शर्मिंदगी के मारे मां ने अपनी दोनों सगी बेटियों को मायके भेज दिया। उसके कुछ दिन बाद हैवान बने बेटे ने अपनी सगी मां को भी हवस का शिकार बनाना चाहा।
बेटे की यह हालत देखकर मां भी वहां से अपने मायके चली गई लेकिन कब तक वह मायके में रहती। परिवार के सारे लोगों ने बैठकर यह प्लान किया कि इसे मौत के घाट उतार दिया जाए और इस कलयुगी बेटे से निजात पाई जाए। 
परिवार ने ऐसा ही किया। रात में सोने से पहले मृतक को नींद की दवा दी जाती है और जब वह गहरी नींद में सो जाता है तो मां ने उसका गला घोंट कर हत्या कर दी। फिर उसे एक बोरे में बंद कर ले जाकर नहर किनारे लाश को फेंक दिया। इस काम में उसके दूसरे बेटे ने साथ दिया। 
जब इस बात की चर्चा चारों तरफ फैली और अज्ञात लाश मिलने पर पुलिस जांच में जुटी तो शिनाख्त होने के बाद मामला घर तक पहुंचा। पुलिस की पूछताछ में मां ने सारे घटनाक्रम को पुलिस के सामने कबूल कर लिया जिस पर पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर आरोपी मां और बेटे को जेल भेज दिया। (आजतक)
 


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