आजकल

Date : 03-Jun-2019

सुनील कुमार

सोशल मीडिया की मेहरबानी से पिछले दो दिनों से अचानक एक खूबसूरत पुलिस अफसर की तस्वीर के साथ यह जानकारी चारों तरफ फैल रही है कि आईपीएस रूपा यादव ने एक सम्मान समारोह में सम्मान लेने से इसलिए इंकार कर दिया कि सम्मान देने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। इस पोस्ट में कहा गया है कि रूपा यादव ने यह कहा कि जो पार्टी ऐसी साध्वी प्रज्ञा को टिकट देती है जो कि शहीद पुलिस अफसर हेमंत करकरे को श्राप देकर मारने की बात कहती है। 
जैसा कि आज किसी भी मामूली समझदार को भी करना चाहिए, इस पोस्ट की हकीकत जानने के लिए इंटरनेट पर सर्च किया गया, तो दिखा कि यह तस्वीर कर्नाटक की एक आईपीएस अधिकारी डी.रूपा की है, और उन्होंने एक गैरसरकारी संस्था द्वारा 2018 में दिए जाने वाले एक बड़े नगद सम्मान को लेने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि उनका विवेक उन्हें यह ईनाम मंजूर करने की इजाजत नहीं देता। उन्होंने अपनी चि_ी में लिखा- हर सरकारी कर्मचारी से अपेक्षा की जाती है कि वे अर्धराजनीतिक या राजनीति से थोड़े भी संबंध रखने वाले संगठनों से सामान दूरी बनाए रखें, और साथ ही उनके प्रति तटस्थ रहें, केवल तभी लोकसेवक जनता की नजरों में अपनी निष्पक्ष छवि बनाए रख सकते हैं। 
लोगों को याद होगा कि इस महिला अधिकारी ने डीआईजी जेल रहते हुए उस वक्त खबरों में जगह पाई थी जब उन्होंने प्रभावशाली कैदियों को जेल के भीतर मिलने वाले वीआईपी ट्रीटमेंट का पर्दाफाश किया था। इसके बाद उन्हें उस कुर्सी से हटा भी दिया गया था क्योंकि जिन कैदियों को ऐसी सहूलियत पाने का भांडाफोड़ उन्होंने किया था वे सत्ता के चहेते लोग थे। 
सोशल मीडिया में झूठ के तैरने में कुछ भी नया नहीं है। और केवल गैरजिम्मेदार-लापरवाह लोग ही सोशल मीडिया की बातों को बिना जांचे-परखे आगे बढ़ाते हैं। ऐसे में इस पोस्ट के झूठे होने पर लिखने का कोई मकसद नहीं है। बल्कि लिखना इस बात पर है कि लोग जिस लापरवाही के साथ बड़ी दिलचस्पी लेते हुए सम्मान स्वीकार करते हैं, क्या वह खुद उनके ही इस सम्मान के पहले के बाकी सम्मान के लायक रहता है? लोग किसी भी राह चलती संस्था के मालिकनुमा एक-दो पदाधिकारियों की मर्जी से तय किए हुए सम्मान पाकर खुशी से फूले नहीं समाते। और लोगों के परिचय के कागज पर ऐसी लंबी लिस्ट रहती है जो उन्हें बड़ा सम्मानित साबित करती है। 
ऐसे सम्मान स्वीकार करने वाले लोग या तो इतने आत्ममुग्ध हो चुके रहते हैं कि वे अपने आपको सचमुच ही भारी सम्मान का हकदार मानने लगते हैं, या फिर उन्हें खबरों में आने के लिए, और बने रहने के लिए ऐसे सम्मान के बूस्टरडोज की जरूरत रहती है। कुछ संस्थाएं सम्मान देने को अपना पेशा बना लेती हैं, और भारत में तो राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी जालसाज संस्थाएं लगातार काम करती हैं जो देश भर में घूम-घूमकर अक्ल से खाली, और जेब से भरे लोगों की तलाश करती है, और उनके लायक कोई न कोई फर्जी सामाजिक योगदान दिखाकर उनका दिल्ली या मुम्बई के किसी समारोह में सम्मान बेच देती है। पिछले बरसों में तो देश के एक भूतपूर्व उपराष्ट्रपति ऐसे सम्मान समारोहों के पेशेवर मुख्य अतिथि होने लगे थे, और देश भर के फिजूल के मालदार लोग ऐसे सम्मान समारोह की तस्वीरें लाकर अपनी दीवारों पर सजाते हैं, और वहां मिलने वाले प्रतीक चिन्ह को सजाने के लिए अलमारियां भी बनवा डालते हैं। 
सम्मान के नाम पर हकीकत में अपमान का यह पेशा समाज के बाकी लोगों की समझ का भी एक मखौल होता है जिन्हें सिरे से बेवकूफ मानकर इस झांसे में लाया जाता है कि झांसेबाज सम्मान के हकदार लोग हैं। यह पूरा सिलसिला इतना गंदा है कि कुछ लोगों को इसकी कीचड़ के बीच कमल की तरह दिखाने के लिए उन्हें भुगतान करके सम्मान लेने के लिए तैयार किया जाता है, ताकि उनके साथ लिस्ट में वे लोग भी चमकदार दिख सकें जो कि अपनी असल जिंदगी के, अपने दायरे में महज अपमान के लायक हैं। 
किसी में जरा सा भी आत्मसम्मान हो तो उन्हें यह देखना चाहिए कि क्या उन्होंने सचमुच ही कोई ऐसा काम किया है जिस पर कोई उनका सम्मान करे? क्या उन्होंने अपने कामकाज के बीच उस कामकाज की सामान्य उम्मीदों से परे जाकर कोई इतनी बड़ी शहादत दी है कि कोई उनका सम्मान करे? लेकिन दिक्कत यह है कि जो सम्मान के लायक नहीं रहते, उन्हें जब मुफ्त में एक नाजायज सम्मान भी मिलने का आसार दिखता है, तो उनकी लार टपकने लगती है। 
जब किसी बड़े नेता, बड़े कारोबारी, या बड़े अफसर को राजनीति या सार्वजनिक जीवन में अपने महत्व को बढ़ाने की चाह रहती है, या पद्मश्री जैसा कोई सम्मान पाने के लिए वे खबरों में भी रहना चाहते हैं, और अपने बायोडाटा को भी लंबा करना चाहते हैं, तो उनके मुसाहिब और मातहत देश भर में ढूंढ-ढूंढकर ऐसी संस्थाएं निकालते हैं जो भुगतान लेकर उनका सम्मान कर सके। और फिर सम्मान देने के धंधे में लगी हुई पेशेवर संस्थाएं धीरे-धीरे यह जान जाती हैं कि ऐसे कौन से हसरती लोग हैं जो भुगतान करके सम्मान पाने के लिए खड़े हुए तैयार मिलेंगे। 
ऐसे में कुछ लोगों को चाहिए कि सार्वजनिक रूप से ये सवाल भी खड़े करें कि किसी सम्मान के पीछे संस्था की नीयत क्या है, मकसद क्या है, उसका निर्णायक मंडल कौन है, उसके पैमाने क्या हैं, और किन तमाम लोगों के नाम पर सोचा गया, और बाकी नाम किस आधार पर खारिज किए गए। और कुछ नहीं तो कम से कम सूचना के अधिकार में, या सोशल मीडिया जैसे सार्वजनिक मंच पर लोगों से और संस्थाओं से ऐसे सवाल खड़े करने चाहिए, उससे लोगों की हसरतें कम हो या न हो, पक्षपात की हकीकत जरूर उजागर हो सकती है।

 


Date : 27-May-2019

सुनील कुमार

आम चुनाव में जीत पाने मेें नाकामयाबी के बाद कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी की पहली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक इस्तीफे की खबरों से भरी रही। बैठक के पहले और बाद इस्तीफे की चर्चा रही, और यह बात भी सामने आई कि किस तरह कार्यसमिति के सभी लोगों ने राहुल के इस्तीफे को नकार दिया, और लीडरशिप जारी रखने को कहा। लेकिन एक दूसरी खबर यह आई कि राहुल ने तीन बड़े नेताओं के नाम लेकर नाराजगी जाहिर की, और कहा कि उन्होंने अपने बेटों को टिकट दिलाने और जिताने में अधिक दिलचस्पी दिखाई, बजाय पार्टी को जिताने के। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ, और एक पूर्व कांग्रेसी केन्द्रीय मंत्री रहे पी.चिदंबरम तो अपने बेटों को सांसद बना पाए, लेकिन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने बेटे को टिकट दिलाने में पूरी ताकत लगाने के बाद, उम्मीदवार बनने के बाद भी उसे जिता नहीं पाए। यह बात थोड़ी सी अटपटी लगती है कि कांग्रेस पार्टी में कोई हाईकमान के मर्जी के बिना भी, मर्जी के खिलाफ भी अपने बेटों को टिकट दिला सकते हैं। लेकिन जब राहुल ने ऐसा कहा है तो जाहिर है कि ऐसा हुआ होगा। 

दूसरी तरफ राहुल की कही इस बात को लेकर सोशल मीडिया में उम्मीद के मुताबिक तुरंत ही यह आलोचना चालू हो गई है कि सोनिया गांधी की बगल में बैठकर राहुल गांधी भला किस मुंह से यह बात कह सकते हैं? यह बात राहुल की लीडरशिप को वंशवाद का बोझ बताने वाले दूसरे भी बहुत से लोग लिख रहे हैं, और ऐसे बड़े नामी अखबारनवीसों की कमी नहीं है जो कि राहुल गांधी की जगह किसी और नेता में कांग्रेस की बेहतर संभावनाएं देखते हैं। 

हमने इसी अखबार में अभी-अभी राहुल के इस्तीफे के खिलाफ लिखा था और इस बात को बड़े खुलासे से सामने रखा था कि कांग्रेस जीती नहीं, यह तो एक अलग बात है, लेकिन वह हारी भी नहीं है क्योंकि 2014 के चुनाव के मुकाबले कांग्रेस और यूपीए की सीटें बढ़ी हैं, इसलिए इस्तीफे की कोई बुनियाद नहीं बनती। लेकिन बात इस्तीफे से अलग है, और ऊपर भी है। अब जब राहुल ने खुलकर औलादों को आगे बढ़ाने के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर ही दी है, और देश के बहुत से मीडिया में लगातार यह बात सामने आ रही है कि कांग्रेस के प्रदेशों के नेता भी किस तरह अपनी औलादों को, अपने कुनबों को आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं, तब कांग्रेस को एक कड़ा फैसला लेने की जरूरत है। 

कांग्रेस में अगर हिम्मत हो, तो वह अगले किसी चुनाव आने के पहले, आज की तारीख में ही यह घोषणा कर सकती है कि आज के बाद उसके किसी भी नेता के परिवार से एक से अधिक लोगों को विधानसभा या संसद की टिकट नहीं दी जाएगी। एक से अधिक लोग अगर टिकट चाहते हंै, तो वे घर में तय करने के बाद ही पार्टी में आवेदन करें, या फिर पार्टी की प्रत्याशी-चयन समिति के सामने कोई भी अर्जी तभी आए जब उसके साथ यह हलफनामा हो कि उनके परिवार के और कोई व्यक्ति संसद या विधानसभा में नहीं है। इस बात को अगर कांग्रेस कड़ाई से लागू कर सकती है, और अगले चुनाव में सोनिया या राहुल में से कोई एक ही चुनाव लडऩे की शर्त पर अमल करने को तैयार हों, तो देश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं और छोटे नेताओं में एक नया उत्साह आ सकता है। छत्तीसगढ़ में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में पूरे ग्यारह के ग्यारह के उम्मीदवार बदल दिए, और उनमें से नौ लोग खासे वोटों से जीतकर आए। कांग्रेस पार्टी को भी वंशवाद को कम करने के लिए ऐसा स्पष्ट पैमाना अभी से घोषित कर देना चाहिए ताकि जिन्हें पार्टी में रहना है रहें, जिन्हें जाना है वे सांसद या विधायक माता, पिता, या पति-पत्नी को कांग्रेस में छोडक़र दूसरी पार्टी चले जाएं। 

दरअसल कांग्रेस को पुराने ढर्रे से हटकर सोचना होगा वरना उसका कोई भविष्य नहीं है, सिवाय यह इंतजार करने के कि मोदी सरकार या भाजपा अपने ही कामों से जनता की नजरों में गिर जाएं, और जनता एक विकल्पहीन हाल में कांग्रेस को फिर चुन ले। ऐसा होते इसलिए नहीं दिख रहा है कि पूरे देश में एनडीए और यूपीए से परे तीसरी पार्टियां कांग्रेस-यूपीए से अधिक ताकतवर हो चुकी हंै, और बनी भी रहेंगी। इसलिए मोदी के विकल्प के रूप में कांग्रेस अपने आप विजेता हो जाएगी, यह भी सोचना ज्यादती होगी। इसलिए कांग्रेस को अगले किसी चुनाव की बारी आने के काफी पहले, शायद अगले कुछ हफ्तों में ही, ऐसी एक नीति घोषित करना चाहिए जिससे पार्टी की हर स्तर की लीडरशिप में नए लोगों को जगह मिले, नई पीढ़ी को जगह मिले, और पार्टी पर से वंशवाद के आरोप कम से कम आने वाले दिनों में तो हट जाएं। पिछले दिनों में तो कुछ हो नहीं सकता, लेकिन अगला आम चुनाव वैसे भी शायद सोनिया गांधी को एक उम्मीदवार के रूप में न देखे, और उन्हें घर बैठे पार्टी की फिक्र करते पाए। ऐसे में राहुल गांधी को दिल कड़ा करके यह तय करना होगा कि परिवार की एक मान्य परिभाषा के मुताबिक पति-पत्नी, बच्चों, भाई-बहनों में से कोई एक ही संसद या विधानसभा की टिकट पाए। 

कांग्रेस को अभी से अपने मौजूदा सांसद-विधायक के नाम देखने होंगे कि जिन परिवारों के एक से अधिक लोग आज सदनों में हैं, उनमें से एक या सभी के कौन से बेहतर विकल्प हो सकते हैं। अभी से ऐसे पैमाने को घोषित करना चाहिए, ताकि लोग अपना भविष्य तय कर सकें। इसके अलावा कांग्रेस को संगठन के जो सबसे महत्वपूर्ण पद हैं, कम से कम राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष, इन पर भी यह बंदिश लागू करनी चाहिए कि या तो ये पद पर रहें, या इनके परिवार के लोग उम्मीदवार बनने की सोचें। आज कांग्रेस पार्टी में मझले दर्जे के कार्यकर्ता भी निराश रहते हैं कि वे जितनी बन सके उतनी कोशिश कर भी लें, तो भी चुुनावी टिकट या पार्टी के पद तो गिने-चुने कुनबों में ही बंट जाएंगे। 

अभी छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कांग्रेस सरकार निगम-मंडल और आयोगों में, लाभ के और सहूलियतों के दूसरे पदों पर पार्टी के नेताओं को मनोनीत करेगी। इनको लेकर भी एक साफ पैमाना बनना चाहिए कि सांसद, विधायक, मंत्री ऐसे पदों पर मनोनीत नहीं किए जाएंगे, और न ही उनके कुनबे के दूसरे लोग ऐसी कुर्सियां पाएंगे। छत्तीसगढ़ जैसे एक प्रदेश में पार्टी के सांसद, विधायक, और दूसरे मनोनीत पद, कुल मिलाकर दो सौ के भीतर रहते हैं। और जैसा कि पार्टी दावा करती है, उसके लाखों कार्यकर्ता हैं, तो फिर गिने-चुने कुनबों से परे औरों के बीच सत्ता का विकेन्द्रीकरण क्यों नहीं होना चाहिए?

राहुल गांधी अपने पहले के फैसलों को तो अब नहीं बदल सकते, और न ही गुजर चुके कल को सुधार सकते हैं। लेकिन आने वाले वक्त को लेकर वे पार्टी की एक स्पष्ट नीति अभी से सामने रख सकते हैं, और उसके मुताबिक तैयारी कर सकते हैं। इस अकेली बात से इस पार्टी में जान नहीं आ जाने वाली है, लेकिन इस एक बात से पार्टी में नीचे तक उत्साह दौड़ पड़ेगा, और जिन राज्यों में आने वाले महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, कोई भी उपचुनाव होने हैं, या छत्तीसगढ़ की तरह म्युनिसिपल-पंचायत चुनाव होने हैं, उन सब पर अगर ऐसा पैमाना अभी से घोषित हो जाएगा तो पार्टी में बहुत से लोगों की महत्वाकांक्षा जागेगी, और लोग मेहनत करेंगे।  राहुल गांधी को पार्टी से उस वंशवाद को उखाड़ फेंकने का अभी भी मौका है, और वे ऐसा करके पार्टी के भीतर और बाहर, दोनों ही जगहों पर अपना कद बढ़ा सकेंगे। 

कांग्रेस संगठन की बाकी मरम्मत कैसे करनी है, इसकी बहुत सी जरूरतें और तरकीबें लोग सुझाएंगे, और हो सकता है कि पार्टी के खुद के दिमाग में भी ये बातें हों। लेकिन कांग्रेस को तुरंत ही जिस एक बात से नसीहत लेनी चाहिए वह यह है कि ममता बैनर्जी और नवीन पटनायक किस तरह लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में महिलाओं को उम्मीदवार बनाया, और वे किस बड़े अनुपात में जीतकर आई हैं। जिन पार्टियों को महिला आरक्षण पर सचमुच ही भरोसा है, और जो ईमानदारी से इसे लागू करना चाहती हैं, उनको आज भी अपनी पार्टी के भीतर महिला आरक्षण से भला किसने रोका है? इसलिए राहुल गांधी को आने वाले तमाम चुनावों के लिए 50 या 40 फीसदी टिकटें महिलाओं को देने की घोषणा अभी से करनी चाहिए। जो पार्टियां महिला आरक्षण के नाम पर संसद में मामले को अंतहीन टालते जा रही हैं, वे अपनी बेईमानी के दाम चुकाएंगी। ममता और नवीन पटनायक ने इस बार जो किया है, अगले चुनावों में कुछ और पार्टियों को वैसा करना सूझेगा या उनकी मजबूरी रहेगी। कांग्रेस को बिना देर किए यह काम अभी से घोषित कर देना चाहिए।

 


Date : 20-May-2019

-सुनील कुमार

छोटे बच्चों का दिल बहलाने के लिए परिवार के लोग आमतौर पर उनके सामने टीवी, कम्प्यूटर, या मोबाइल फोन पर बच्चों के गानों के वीडियो लगा देते हैं। ये गाने बच्चों के गाए हुए नहीं रहते, ये बच्चों को बहलाने के लिए खास तैयार किए गए गाने रहते हैं, और अलग-अलग आवाजों में अलग-अलग वीडियो इंटरनेट पर मुफ्त में मौजूद भी रहते हैं। नतीजा यह होता है कि दवा पिलाने से लेकर, खाना खिलाने तक, दिल बहलाने के लिए बच्चों को वीडियो के हवाले कर दिया जाता है। ऐसे बहुत से गाने अंग्रेजी में हैं, और बहुत से हिन्दी में भी। बहुत से गाने दूसरी भारतीय भाषाओं में भी वीडियो की शक्ल में मौजूद हैं, और हो सकता है कि बोलियों में भी लोकगीत हों। लेकिन इनके बारे में कुछ और गहराई से सोचने की जरूरत है। 

वैसे तो टीवी, कम्प्यूटर, और स्मार्टफोन, ये सब एक आय वर्ग से ऊपर के लोगों को ही नसीब है, लेकिन इन दिनों कई जगहों पर मुफ्त का इंटरनेट रहता है, और गरीब भी खींचतान कर किसी तरह स्मार्टफोन पा जाते हैं। ऐसे में लगता है कि जो रंगारंग वीडियो बच्चों के लिए, उनके गानों के साथ, अच्छे संगीत के साथ नजारे पेश करते हैं, वे सबसे गरीब बच्चों को कहां ले जाते हैं? यह तो ठीक है कि हर बच्चे को सपने देखने का हक होना चाहिए, परीकथाओं को पढऩे का हक होना चाहिए, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे देश में आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो अपने अंत तक ऐसे सपनों को हकीकत में तब्दील होते नहीं देख पाता। ऐसे बच्चों के लिए ऐसे गाने और ऐसे वीडियो क्या मायने रखते हैं, और उन्हें कहां ले जाकर छोड़ते हैं? 

कुछ बरस पहले का एक तजुर्बा मैंने किसी और कॉलम में शायद लिखा था। एक प्रदेश की राजधानी की महिला जेल में महिला कैदियों के साथ बंद उनके छोटे बच्चों से मिलने जब एक समाजसेवी संगठन के लोग पहुंचे, उनसे बात की, कि वे क्या सोचते हैं, क्या करना चाहते हैं, तो उनकी एक अलग ही दुनिया सामने आई। ऐसे बच्चे छह बरस की उम्र तक ही अपनी कैदी मां के साथ जेल में रहते हैं, उसके बाद उन्हें बाहर परिवार के पास भेज दिया जाता है, या सरकार के किसी दूसरे बाल संरक्षण गृह में रखा जाता है। इस शहर की महिला जेल के भीतर अहाते में से जेल के पास की एक होटल का बोर्ड दिखता था। होटल की छत पर लगा हुआ यह बोर्ड रात में भी होटल के नाम को दिखाते हुए चमचमाता था, और जेल के बच्चे उस नाम को लेकर उत्सुक थे कि वह क्या है? उनको पूछताछ से यह पता लगता था कि यह होटल है, लेकिन होटल क्या होता है, कैसा होता है, यह उनको समझ नहीं पड़ता था क्योंकि समझ आने के पहले वे जेल आ चुके थे, या जेल में ही पैदा हुए थे, और किसी होटल को देखना कभी हुआ नहीं था। इस समाजसेवी संस्था के सदस्यों ने तय किया कि वे अफसरों से इजाजत लेकर इन बच्चों को पास की ही इस होटल तक ले जाएंगे, और वहां के रेस्त्रां में खाना खिलाकर वापिस जेल छोड़ देंगे। लेकिन इस सोच पर एक प्रतिक्रिया भी आई कि जिन बच्चों को अभी कुछ बरस जेल में ही रहना है, या बाहर निकलकर भी किसी बाल संरक्षण गृह में रहना है, या बिना मां के किसी परिवार में उपेक्षित रहना है, उसे एक बार ऐसी होटल दिखाकर और वहां खाना खिलाकर उन्हें क्या दिया जाएगा? क्या महज एक बार का ऐसा तजुर्बा जिसके दुबारा होने का आसार बरसों तक शायद उनकी जिंदगी में न आए? 

कुछ ऐसा ही हाल बच्चों के लिए बनाए गए रंगबिरंगे वीडियो और गानों का भी होता है जो कि बहुत गरीब तबके के किसी बच्चे से सपनों के स्तर पर भी नहीं जुड़े रहते। वे एक ऐसी चमकीली और रंगीन, चकाचौंध करने वाली और खूबसूरत दुनिया दिखाते हैं जो फुटपाथ या झोपड़पट्टी पर बैठकर, या लेटकर सपने देखने के लायक भी नहीं होते। जाहिर है कि दुनिया के बहुत से दूसरे सामानों की तरह खूबसूरत बाल-गीतों की दुनिया भी उन्हीं के लायक, और शायद उन्हीं के लिए भी, बनाई जाती है जो कि किसी चीज के ग्राहक हो सकते हैं, चॉकलेट या खिलौनों के, कपड़ों और जूतों के, या साइकिल और तिपहिया के। ऐसे गानों के साथ इस तरह के सामानों को बेचने की एक नीयत साथ-साथ चलती है, और इन सामानों के इश्तहारों से ऐसे गानों का खर्च भी निकलते चलता है। इसलिए यह जाहिर और जायज है कि ऐसा गीत-संगीत एक न्यूनतम आय वर्ग से ऊपर के तबके के बच्चों के लिए और उनके लायक ही बनता है। महज कागजों तक सीमित कुछ गाने, गीत, और बाल कविताएं ऐसे हो सकते हैं जो कि गरीब बच्चों की कल्पनाओं से भी मेल खाते हुए हों, उनके भी काम के हों। लेकिन उनके लायक, और उनकी जिंदगी के साथ तालमेल से चलने वाले गाने कैसे हो सकते हैं, कैसे बन सकते हैं, यह एक बहुत बड़ी चुनौती भी हो सकती है। 

हो सकता है कि बाल मनोविज्ञान के जानकार यह कहें कि जिन्हें हासिल नहीं है उन्हें भी हसरत करने के लिए ऐसी रंगीन कल्पनाएं जरूरी हैं, या ठीक हैं। हो सकता है यह बात सही हो, लेकिन फिर भी यह लगता है कि इतनी रंगीन और चमकीली दुनिया को कुछ मिनट देखने के बाद क्या इन बच्चों को अपना खुद का फुटपाथ या झोपड़पट्टी का दायरा खटकता नहीं होगा? क्या उनके बीच एक हीनभावना नहीं आती होगी? न तो मैंने ऐसे तबके के बच्चों से बहुत अधिक बात की है, और न ही मुझे बाल मनोविज्ञान की कोई जानकारी है। बस महज सहज समझ से इतना लगता है कि उनकी असल जिंदगी और ऐसे चमकीले गानों के बीच का एक विरोधाभास शायद उनके लिए अच्छा न रहता हो। यहां मैं जो लिख रहा हूं, वह किसी किस्म की सलाह नहीं है क्योंकि इस विषय पर सलाह देने जितनी जानकारी और समझ मेरी नहीं है। मैं महज एक फिक्र और उत्सुकता सामने रख रहा हूं कि वंचित तबके के बच्चों के लिए क्या होना चाहिए? उनकी सपनों की दुनिया का हिस्सा बनने के लिए किस तरह के गाने और वीडियो होने चाहिए?