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07-Jun-2021 8:43 PM (1026)

प्रसिद्ध फिल्म निर्माता, पटकथा लेखक, उपन्यासकार, नाटककार, कथाकार और पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास  का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था. उनकी मृत्यु मुंबई में 1 जून, 1987 को हुई थी. के. ए. अब्‍बास के नाम से मशहूर ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास ने 40 से अधिक फिल्में, धारावाहिक लिखे और कई फिल्मों का निर्देशन किया. उन्होंने 70 किताबें लिखीं. इनमें नाटक, उपन्यास और लेखों की श्रृंखला शामिल हैं.

राजकमल प्रकाशन ने ख्वाजा अहमद अब्बास कहानियों का संकलन 'मुझे कुछ कहना है' प्रकाशित किया है. यह संकलन काफी चर्चित रहा. उनकी जयंती के अवसर पर 'मुझे कुछ कहना है' कहानी संग्रह से प्रस्तुत है एक कहानी- 'मेरी मौत.'

कहानी- मेरी मौत

लोग समझते हैं कि सरदार जी मारे गए.
नहीं, यह मेरी मौत है.
पुराने 'मैं' की मौत. मेरी साम्प्रदायिकता की मौत. उस घृणा की मौत, जो मेरे दिल में थी.
मेरी मौत कैसे हुई, यह बताने के लिए मुझे अपनी स्मृति में 'मैं' को जीवित करना पड़ेगा.
मेरा नाम शेख़ बुरहानुद्दीन है.

जब दिल्ली व नई दिल्ली में साम्प्रदायिक हत्याओं और विध्वंस का बाज़ार गरम और मुसलमान का ख़ून सस्ता हो गया, तो मैंने सोचा, वाह री किस्मत, पड़ोसी भी मिला तो सिक्ख! पड़ोसी धर्म-निभाव और जान बचाना तो दूर, न जाने कब कृपाण भोंक दे!

बात यह है कि उस वक्त तक मैं सिक्खों पर हंसता भी था, उनसे डरता भी था और काफ़ी नफ़रत भी करता था. आज से नहीं, बचपन से. शायद मैं छह वर्ष का था जब पहली बार मैंने एक सिक्ख को देखा था, जो धूप में बैठ, अपने बालों में कंघी कर रहा था. मैं चिल्ला पड़ा—'अरे, यह देखो, औरत के मुंह पर कितनी लम्बी दाढ़ी?’

जैसे-जैसे उम्र गुज़रती गई, यह 'इस्तिजाब' एक साम्प्रदायिक अरुचि में परिवर्तित होती गई. घर की बड़ी-बूढ़ियां जब किसी बच्चे के बारे में किसी अनिष्ट बात का जि़क्र करतीं, उदाहरणत: उसे निमोनिया हो गया था या उसकी टांग टूट गई थी, तो कहतीं—'अब से दूर किसी सिक्ख या फिरंगी की टांग टूट गई थी.'

बाद में मालूम हुआ कि यह कोसना 1857 की यादगार था. जब हिन्दू-मुसलमानों की जंगे आज़ादी को दबाने में पंजाब के सिक्ख राजाओं और उनकी फ़ौजों ने फिरंगियों का साथ दिया था. मगर उस वक्त ऐतिहासिक तथ्यपरक दृष्टि नहीं थी, सिर्फ़ एक अदृश्य भय था. एक अजीब-सी नफ़रत और एक साम्प्रदायिकतापूर्ण विचार था. भय अंग्रेज़ से भी लगता था और सिक्ख से भी, मगर अंग्रेज़ से अधिक.

उदाहरणत: जब मैं लगभग दस वर्ष का था, एक रोज़ देहली से अलीगढ़ जा रहा था. सफ़र हमेशा तीसरे या ड्यौढ़ा (इंटर) में ही था. सोचा कि इस बार सैकिंड का सफ़र करके देखा जाए. टिकट ख़रीद लिया और एक ख़ाली डिब्बे में बैठकर गद्दों पर ख़ूब कूदा, बाथरूम के आईने में उचक-उचककर अपनी शक्ल देखी. सब पंखों को एक साथ चला दिया. रोशनियों को कभी जलाया, कभी बुझाया. मगर अभी गाड़ी चलने में दो-तीन मिनट बाक़ी थे कि लाल-लाल मुंह वाले चार फ़ौजी गोरे, आपस में 'डैम', 'ब्लडी' जैसी बातें करते हुए डिब्बे में आ गए. उनको देखना था कि सैकिंड क्लास में सफ़र करने का शौक़ ग़ायब हो गया और अपना सूटकेस घसीटता हुआ भागा और एक निहायत खचाखच भरे हुए थर्ड क्लास के डिब्बे में आकर दम लिया. यहां देखा तो कई सिक्ख दाढ़ियां खोले, कच्छे पहने बैठे थे, मगर उनसे डरकर मैं डिब्बा छोड़कर नहीं भागा. सिर्फ़ उनसे कुछ दूर बैठ गया.

Khwaja Ahmad Abbas

हां, तो डर सिक्खों से भी लगता था और अंग्रेज़ों से उनसे भी ज़्यादा मगर अंग्रेज़, अंग्रेज़ थे और कोट पतलून पहनते थे, जो मैं भी पहनना चाहता था और 'डैम', 'ब्लडी-फूल' वाली भाषा बोलते थे, जो मैं भी बोलना चाहता था. इसके अलावा वह हाकिम थे और मैं भी छोटा-मोटा हाकिम बनना चाहता था. इसके अलावा वे कांटे-छुरी से खाना खाते थे और मैं भी कांटे-छुरी से खाना खाने का इच्छुक था, ताकि दुनिया मुझे भी प्रगतिशील समझे. मगर सिक्खों से जो डर लगता था, वे घृणित और कितने विचित्र थे! वे सिक्ख जो पुरुष होकर भी सिर के बाल औरतों की तरह लम्बे-लम्बे रखते थे. यह और बात है कि अंग्रेज़ी फैशन की नक़ल में सिर के बाल मुंड़वाना, ख़ुद मुझे भी पसन्द नहीं था. अब्बा के हुक्म के बावजूद कि हर शुक्रवार को सिर के बाल छोटे-छोटे कटवाए जाएं, मैंने बाल ख़ूब बढ़ा रखे थे, ताकि हॉकी और फुटबॉल खेलते वक्त बाल हवा में उड़ें, जैसे अंग्रेज़ खिलाड़ियों के.

अब्बा कहते—'यह क्या औरतों की तरह पट्ठे बढ़ा रखे हैं?' मगर अब्बा तो थे ही पुराने दकियानूसी ख़याल के, उनकी बात को सुनता कौन था! उनका वश चलता तो सिर पर उस्तरा चलवाकर बचपन में भी हमारे चेहरों पर दाढ़ियां बनवा देते!...

हां, इस पर याद आया कि सिक्खों की इस विचित्रता की निशानी उनकी दाढ़ियां थीं और फिर दाढ़ी-दाढ़ी में भी फ़र्क होता है. उदाहरणत: अब्बा की दाढ़ी, जिसे नाई बड़े क़रीने से फ्रेंच-कट बनाता था या ताया अब्बा की, जो नुकीली और चोंचदार थी. मगर यह क्या कि दाढ़ी को कभी कैंची लगे ही नहीं. झाड़-झंकाड़ की तरह बढ़ती ही रहे बल्कि तेल और दही और न जाने क्या-क्या मलकर बढ़ाई जाए और जब कई फ़ीट लम्बी हो जाए तो उसमें कंघी की जाए, जैसे औरतें अपने सिर के बालों में करती हैं!...औरतें या फिर मुझ जैसे स्कूल के फैशनेबल लड़के, इसके अलावा दादाजान की दाढ़ी भी कई फ़ीट लम्बी थी और वह भी उसमें कंघी करते थे. मगर दादाजान की बात और थी. आखिर वह...मेरे दादाजान ठहरे! और सिक्ख फिर सिक्ख थे.

मैट्रिक करने के बाद मुझे पढ़ने-लिखने के लिए मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ भेजा गया. कॉलेज में जो पंजाबी लड़के पढ़ते थे, उन्हें हम दिल्ली व यूपी वाले मूर्ख, जाहिल व उजड्ड समझते थे. न बात करने का सलीका और न खाने-पीने की तमीज़. सभ्यता व संस्कृति छूकर भी नहीं गई थीं. गंवार, लट्ठ! यह बड़े-बड़े लस्सी के गिलास पीने वाले भला केवड़ेदार फ़ालूदे और लिपटन की चाय की लज़्ज़त क्या जानें! ज़बान बहुत ही गंवारू, बात करें तो मालूम हो, लड़ रहे हैं. असी, तुसी, साड्डे, तुहाड्डे...लाहोल-विला कुव्वत!!

मैं तो हमेशा इन पंजाबियों से कतराता था. मगर ख़ुदा भला करे हमारे वार्डन साहब का, जिन्होंने एक पंजाबी को मेरे कमरे में जगह दे दी. मैंने सोचा, जब साथ हो ही गया है तो थोड़ी-बहुत हद तक दोस्ती भी कर ली जाए. कुछ दिनों में काफ़ी गाढ़ी छनने लगी. उसका नाम ग़ुलाम रसूल था. रावलपिंडी का रहनेवाला था. काफ़ी मज़ेदार आदमी था और लतीफे ख़ूब सुनाता था.

अब आप कहेंगे कि जिक्र शुरू हुआ था सरदार साहब का, यह ग़ुलाम रसूल कहां से टपक पड़ा? मगर असल में ग़ुलाम रसूल का इस किस्से से गहरा ताल्लुक़ है. बात यह है कि वह जो लतीफे सुनाता था, वह आमतौर पर सिक्खों के बारे में होते थे, जिनको सुन-सुनकर मुझे पूरी सिक्ख कौम की प्रकृति व विशेषताएं, उनकी जातिगत विशेषताएं और उनके सामाजिक जीवन का ज्ञान हो गया था.

ग़ुलाम रसूल के अनुसार: सिक्ख तमाम बेवक़ूफ़ और बुद्धू होते हैं. बारह बजे तो उनकी बुद्धि बिलकुल भ्रष्ट हो जाती है. उसके सबूत में कितने ही वाक़यात बयान किए जा सकते हैं. उदाहरणत: दिन में बारह बजे, एक सरदार जी अमृतसर के माल बाज़ार से गुज़र रहे थे. चौराहे पर एक सिक्ख कांस्टेबल ने रोका और पूछा—'तुम्हारी साइकिल की लाइट कहाँ हैं?’ साइकिल सवार सरदार जी गिड़गिड़ाकर बोले—'जमादार साहब, अभी-अभी बुझ गई है, घर से तो जलाकर चला था.’ इस पर सिपाही ने चालान करने की धमकी दी. एक राह चलते सफेद दाढ़ी वाले सरदार जी ने बीच-बचाव करवाया—'चलो, भाई, कोई बात नहीं, लाइट बुझ गई है, तो अब जला लो!’

और इसी किस्म के सैकड़ों किस्से ग़ुलाम रसूल को याद थे, और उन्हें वह पंजाबी भाषा में संवाद के साथ में सुनाता था, तो सुनने वालों के पेट में बल पड़ जाते थे. असल में उनको सुनने का मज़ा पंजाबी ही में था. चूंकि सिक्खों की अजीबो-ग़रीब हरकतों को बयान करने का हक़ कुछ पंजाबी कैसी उजड्ड ज़बान में ही हो सकता था.

सिक्ख न सिर्फ़ बेवक़ूफ़ व बुद्धू थे बल्कि गन्दे भी थे. जैसा कि एक सबूत तो ग़ुलाम रसूल का (जिसने सैकड़ों सिक्खों को देखा था) यह था कि वह बाल नहीं मुंड़वाते थे. इसके विपरीत हम साफ-सुथरे नमाज़ी मुसलमानों के जो हर अठवारे जुमे-के-जुमे नहाते हैं, यह सिक्ख कच्छा बांध के सामने नल के नीचे बैठ नहाते तो रोज़ हैं मगर अपने बालों व दाढ़ी में न जाने क्या-क्या गन्दी व ग़लीज़ चीज़ें मलते हैं, मसलन दही. वैसे तो मैं भी सिर में लाइम जूस व गिलिसरीन लगाता हूं, जो किसी क़दर गाढ़े-गाढ़े दूध से मिलती-जुलती है, मगर उसकी बात और है. वह विलायत की मशहूर इत्र (परफ्यूम) बनाने वाली फैक्टरी से बड़ी ख़ूबसूरत शीशी में आती है और दही किसी गन्दे-संदे हलवाई की दुकान से.

खैर जी, हमें दूसरों के रहने-सहने से क्या लेना? मगर सिक्खों का सबसे बड़ा कुसूर यह था कि ये लोग अक्खड़पन, बदतमीज़ी और मार-धाड़ में मुसलमानों का मुकाबला करने की जुर्रत रखते थे. अब दुनिया जानती है कि अकेला मुसलमान दस हिंदुओं और दस सिक्खों पर भारी होता है. मगर फिर ये सिक्ख मुसलमानों का रौब क्यों नहीं मानते थे?

कृपाणें लटकाए, अकड़-अकड़कर मूंछों, बल्कि दाढ़ी पर भी ताव दे के चलते थे. ग़ुलाम रसूल कहता, उनकी हेकड़ी एक दिन हम ऐसी निकालेंगे कि खालसा जी याद करेंगे.

कॉलेज छोड़े कुछ साल गुज़र गए. विद्यार्थी से मैं क्लर्क और क्लर्क से हेड क्लर्क बन गया. अलीगढ़ का हॉस्टल छोड़ नई दिल्ली में एक सरकारी क्वार्टर में रहना शुरू कर दिया. शादी हो गई. बच्चे हो गए. मगर कितने लम्बे समय के बाद मुझे ग़ुलाम रसूल का वह कहना याद आया, जब एक सरदार साहब मेरे बराबर क्वार्टर में रहने को आए.

यह रावलपिंडी से बदली कराकर आए थे, क्योंकि रावलपिंडी के जिले में ग़ुलाम रसूल की भविष्यवाणी के अनुसार सरदारों की अकड़ अच्छी तरह निकाली गई थी. मुजाहिदों ने उनका सफ़ाया कर दिया. बड़े सूरमा बनते थे. कृपाणें लिये फिरते थे. बहादुर मुसलमानों के सामने इनकी एक न चली. उनकी दाढ़ियां मुंड़वाकर उनको मुसलमान बनाया गया था.

हिन्दू प्रेस अपनी आदत के अनुसार उनको बदनाम करने के लिए लिख रहा था कि सिक्ख औरतों और बच्चों को भी मुसलमानों ने क़त्ल किया है. हालांकि यह इस्लामी रीतियों के खिलाफ़ है! कोई मुसलमान मुजाहिद कभी औरत या बच्चे पर हाथ नहीं उठाता! रही औरतों और बच्चों की लाशों की तस्वीरें जो छापी जा रही थीं, वे या तो जाली थीं, और या सिक्खों ने मुसलमानों को बदनाम करने के लिए, ख़ुद अपनी औरतों और बच्चों का क़त्ल किया होगा.

रावलपिंडी और पश्चिमी पंजाब के मुसलमानों पर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने हिन्दू व सिक्ख लड़कियों को भगाया था. हालांकि वास्तविकता यह है कि मुसलमानों की जवाँमर्दी की धाक बैठी है. अगर नौजवान मुसलमानों पर हिन्दू व सिक्ख लड़कियां ख़ुद ही लट्टू हो जाएं तो उनका क्या क़सूर है कि तबलीग़-ए-इस्लाम के सिलसिले में, इन लड़कियों को अपनी पनाह में ले लें. हां, तो सिक्खों का नामनिहाद (तथाकथित) बहादुरी का भांडा फूट गया था. भला अब तो मास्टर तारा सिंह लाहौर में कृपाण निकालकर मुसलमानों को धमकियां दें? पिंडी के भागे हुए सरदारों की दुर्दशा को देखकर मेरा सीना इस्लाम की महानता से पूर्ण हो गया.

हमारे पड़ोसी सरदार जी की उम्र कोई साठ वर्ष की तो होगी. दाढ़ी बिलकुल सफेद हो चुकी थी. हालांकि मौत के मुंह से बचकर आए थे मगर यह हज़रत हर समय दांत निकाले हंसते रहते थे, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता था कि कितना बेवक़ूफ़ और बेहिस है. शुरू-शुरू में उन्होंने मुझे अपनी दोस्ती के जाल में फंसाना चाहा. आते-जाते ज़बर्दस्ती बातें करनी शुरू कर दीं. न जाने सिक्खों का कौन-सा त्यौहार था, उस दिन प्रसाद की मिठाई भी भेजी (जो मेरी बीवी ने फ़ौरन मेहतरानी को दे दी) पर मैंने मुंह न लगाया. कोई बात हुई टका-सा जवाब दे दिया, और बस!

मैं जानता था कि सीधे मुंह दो-चार बात कर ली तो पीछे ही पड़ जाएगा. आज बातें तो कल गाली-गलौज. गालियां तो आप जानते ही हैं, सिक्खों की दाल-रोटी होती हैं. कौन अपनी ज़बान गन्दी करे, ऐसे लोगों से सम्बन्ध बढ़ाकर? हां, एक इतवार की दोपहर को मैं अपनी पत्नी को सिक्खों की हिमाक़त के किस्से सुना रहा था, उसका अमली सबूत देने के लिए, मैंने अपने नौकर को ठीक बारह बजे सरदार जी के घर भेजा कि पूछकर आए कि क्या बजा है?

उन्होंने कहलवा दिया—'बारह बज कर दो मिनट हुए हैं!’ मैंने कहा—'देखा? बारह बजे का नाम लेते घबराते हैं ये!’ और हम ख़ूब हंसे! उसके बाद मैंने उनको कई बार बेवक़ूफ़ बनाने के लिए पूछा—'क्यों सरदार जी, बारह बज गए?’ वह बेशरमी से दांत फाड़कर जवाब देते—'जी, असां दे तो चौबीस घंटे बारह बजे रहते हैं.’ और यह कहकर ख़ूब हंसे, गोया यह बड़ा मज़ाक़ हुआ.

मुझे सबसे ज़्यादा डर बच्चों की ओर से था. अव्वल तो किसी सिक्ख का एतबार नहीं, कब बच्चे के गले पर कृपाण चला दे! फिर यह तो रावलपिंडी से आए थे. ज़रूर दिल में मुसलमानों की तरफ़ से कीना रखते होंगे, और बदला लेने की ताक में होंगे! मैंने बीवी को ताकीद कर दी कि बच्चे हरगिज़ सरदार जी के क्वार्टर की तरफ़ न जाने दिए जाएं! मगर बच्चे तो बच्चे ही होते हैं. चन्द रोज़ में मैंने देखा कि सरदार की छोटी लड़की मोहिनी उनके पोतों के साथ खेल रही है. यह बच्ची जिसकी उम्र मुश्किल से दस वर्ष की होगी, सचमुच मोहिनी थी. गोरी चिट्टी, अच्छा नाक-नक़्श, बड़ी ख़ूबसूरत. कम्बख्तों की औरतें काफ़ी सुन्दर होती हैं.

मुझे याद आया कि ग़ुलाम रसूल कहा करता था कि अगर पंजाब से सिक्ख मर्द चले जाएं और अपनी औरतों को छोड़ जाएं तो फिर हूरों की तलाश की ज़रूरत नहीं. हां, तो जब मैंने बच्चों को सरदाजी के बच्चों में खेलते देखा, तो मैं उन्हें घसीटता हुआ अन्दर ले आया. फिर मेरे सामने उनकी हिम्मत न हुई कि उधर की तरफ़ जाएं.

बहुत जल्दी सिक्खों की असलियत पूरी तरह ज़ाहिर हो गई. रावलपिंडी से तो डरपोकों की तरह पिटकर भागकर आए थे, पर पूर्वी पंजाब में मुसलमानों के अल्पसंख्यक होने पर, उन पर ज़ुल्म ढाहना शुरू कर दिया. हज़ारों बल्कि लाखों मुसलमानों को बलिदान देना पड़ा. इस्लामी ख़ून की नदियां बह गईं. हज़ारों औरतों को नंगा करके जुलूस निकाला गया. जब से पश्चिमी पंजाब से भागे हुए सिक्ख इतनी बड़ी संख्या में दिल्ली आने शुरू हुए थे. इस वबा का यहां तक पहुंचना यक़ीनी था.

मेरे पाकिस्तान जाने में अभी चन्द हफ्तों की देर थी, इसलिए मैंने अपने बड़े भाई के साथ अपने बीवी बच्चों को कराची भेज दिया और ख़ुद ख़ुदा पर भरोसा करके ठहरा रहा. हवाई जहाज़ में सामान तो ज़्यादा जा नहीं सकता था, इसलिए मैंने एक पूरी वैगन बुक करा ली. मगर जिस दिन सामान चढ़ाने वाले थे, उस दिन सुना कि पाकिस्तान जानेवाली गाड़ियों पर हमले हो रहे हैं, इसलिए सामान घर में ही पड़ा रहा.

15 अगस्त को आज़ादी का जश्न मनाया गया मगर मुझे इस आज़ादी में क्या दिलचस्पी थी, मैंने छुट्टी मनाई और दिन भर लेटा डान और पाकिस्तान टाइम्स को पढ़ता रहा. दोनों में निहाद आज़ादी के चिथड़े उड़ाए गए थे और साबित किया गया था कि किस तरह हिन्दुओं और अंग्रेज़ों ने मिलकर मुसलमानों का ख़ात्मा करने की साजि़श की थी. वो तो हमारे कायदे आज़म का ऐजाज़ था कि पाकिस्तान लेकर ही रहे, अगरचे अंग्रेज़ों ने हिन्दुओं और सिक्खों के दबाव में आकर अमृतसर को हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया. हालांकि दुनिया जानती है, अमृतसर ख़ालिस मुसलमानों का इस्लामी शहर है और यहां की सुनहरी मस्जिद दुनिया में प्रसिद्ध है...नहीं, वह तो गुरुद्वारा है और गोल्डन टेम्पल कहलाता है. सुनहरी मस्जिद तो दिल्ली में है. सुनहरी मस्जिद ही नहीं, जामा मस्जिद, लाल किला भी हैं. निज़ामुद्दीन औलिया का मज़ार, हुमायूं का मक़बरा, सफ़दरजंग का मदरसा, गरज़ कि चप्पे-चप्पे पर इस्लामी हुकूमत के निशान पाए जाते हैं. फिर भी आज उसी दिल्ली बल्कि उसी शाहजहानाबाद पर हिन्दू साम्राज्यवाद का झंडा बुलन्द किया जा रहा था—'रो ले अब दिल खोलकर ए दीदये खूंबार.’

और यह सोचकर मेरा दिल भर आया, कि दिल्ली जो कभी मुसलमानों का राज्य-स्तम्भ था, सभ्यता और संस्कृति का केन्द्र था, हमसे छीन लिया गया था और हमें पश्चिमी पंजाब, सिंध, बिलोचिस्तान जैसे उजड्ड और असभ्य इलाक़ों में ज़बर्दस्ती भेजा जा रहा था जहां किसी को शुद्ध उर्दू भाषा बोलनी नहीं आती. जहां सलवारों जैसी पोशाक पहनी जाती है, जिसे देखकर हंसी आती है. जहां हल्की-फुल्की पाव भर में बीस चपातियों के बजाय दो-दो सेर की नानें खाई जाती हैं. फिर मैंने अपने दिल को यह कहकर और मज़बूत किया कि कायदे आज़म और पाकिस्तान की ख़ातिर हमें यह कुरबानी तो देनी ही होगी. मगर फिर भी दिल्ली छोड़ने के ख़याल से दिल मुरझाया ही रहा.

शाम को जब मैं बाहर निकला, और सरदार जी ने दांत निकालकर कहा—'क्यों बाबूजी! तुमने आज कुछ ख़ुशी नहीं मनाई?’ तो मेरे जी में आया कि उसकी दाढ़ी में आग लगा दूं. हिन्दुस्तान की आज़ादी और दिल्ली में सिक्खशाही आखिर में रंग लाकर ही रही. अब पश्चिम पंजाब से आए शरणार्थियों की संख्या हज़ारों से लाखों तक पहुंच गई. ये लोग दरअसल पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए अपने घर-बार छोड़कर वहां से भागे थे. यहां आकर गली-कूचों में अपना रोना-रोते फिरते थे.

कांग्रेसी प्रोपेगेंडा मुसलमानों के खिलाफ़ ज़ोरों पर चल रहा था और इस बार कांग्रेसियों ने चाल यह चली कि बजाय कांग्रेस का नाम लेने के, राष्ट्रीय सेवक संघ और शहीदी दल के नाम से काम कर रहे थे. हालांकि दुनिया जानती है कि कांग्रेसी चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. चाहे दुनिया को दिखाने की ख़ातिर वे प्रकट रूप में गांधी और जवाहरलाल को गोलियां ही क्यों न देते हों.

एक दिन सुबह को ख़बर आई कि दिल्ली में क़त्ल-ए-आम शुरू हो गया. करोल बाग़ में मुसलमानों के सैकड़ों घर फूंक दिये गए. चांदनी चौक के मुसलमानों की दुकानें लूट ली गईं और हज़ारों का सफ़ाया हो गया. यह है कांग्रेस के हिन्दू राज का नमूना! खैर, मैंने सोचा कि नई दिल्ली तो काफ़ी समय से अंग्रेज़ों का शहर रहा है, लॉर्ड माउंटबेटन यहां रहता है. कमांडर-इन-चीफ यहां रहता है. कम-से-कम यहां तो मुसलमानों के साथ ऐसा ज़ुल्म नहीं होने देंगे. यह सोचकर मैं दफ्तर की ओर चला, क्योंकि उस दिन मुझे प्रॉविडेंड फंड का हिसाब करना था और इसीलिए दरअसल, मैंने पाकिस्तान जाने में देर की थी.

अभी गोल मार्किट के पास पहुंचा ही था कि दफ्तर का एक हिन्दू बाबू मिला, उसने कहा—'यह क्या कर रहे हो? जाओ! वापस जाओ. बाहर न निकलना, क्नाट प्लेस में बलवाई मुसलमानों को मार रहे हैं...मैं वापस भाग आया! अपने स्क्वायर में पहुंचा ही था कि सरदार जी से मुठभेड़ हो गई. कहने लगे—''शेख़ जी, फिकर न करना. जब तक हम सलामत हैं, तुम्हें कोई हाथ नहीं लगा सकता.’

मैंने सोचा, इसकी दाढ़ी के पीछे कितनी मक्कारी छिपी हुई है! दिल में तो ख़ुश हो रहा होगा कि चलो, अच्छा हुआ, मुसलमानों का सफ़ाया हो रहा है. मगर ज़बान से हमदर्दी दिखाकर मुझ पर अहसान कर रहा है; बल्कि शायद मुझे चिढ़ाने के लिए कह रहा है क्योंकि सारे स्क्वायर में बल्कि सारी सड़क पर मैं मात्र अकेला मुसलमान था!

पर मुझे इन काफिरों का रहम-ओ-करम नहीं चाहिए. यह सोचकर मैं अपने स्क्वायर में आ गया. मैं मारा भी जाऊं तो दस-बीस को मारकर मरूं! मैं सीधा अपने क्वार्टर में गया, जहाँ मेरे पलंग के नीचे मेरी दोनाली बन्दूक़ रखी थी. जब से फ़सादात शुरू हुए थे, मैंने कारतूसों और गोलियों का काफ़ी ज़खीरा जमा कर लिया था. पर वहां मुझे बन्दूक़ नहीं मिली. सारा घर छान मारा, पर उसका कहीं पता न चला.
'क्यूं हज़ूर, क्या ढूंढ़ रहे हैं आप?'
यह मेरा वफ़ादार मुलाजि़म ममदू था.
'मेरी बन्दूक़ क्या हुई?'
उसने कोई जवाब नहीं दिया, मगर उसके चेहरे से साफ़ ज़ाहिर था कि उसे मालूम है. शायद उसने छिपाई है या चुराई है.
''बोलता क्यों नहीं?' मैंने डांटकर कहा.
तब हक़ीक़त मालूम हुई कि ममदू ने मेरी बन्दूक़ चुराकर अपने चन्द दोस्तों को दे दी थी, जो दरियागंज में मुसलमानों की हिफ़ाज़त के लिए हथियारों का ज़खीरा जमा कर रहे थे.

'कई सौ बन्दूकें हैं हमारे पास सात मशीनगनें, दस रिवॉल्वर और एक तोप! काफिरों को भूनकर रख देंगे, सरकार, भूनकर.'
मैंने कहा, 'दरियागंज में मेरी बन्दूक़ से काफिरों को भून दिया गया तो इसमें मेरी हिफ़ाज़त कैसे होगी? मैं तो यहां निहत्था काफिरों के घेरे में फंसा हुआ हूं. यहां मुझे भून दिया गया तो कौन जि़म्मेदार होगा?' मैंने ममदू से कहा.

वह किसी तरह छिपता-छिपाता दरियागंज तक जाए और वहां से मेरी बन्दूक़ और सौ-दो सौ कारतूस ले आए. वह चला तो गया मगर मुझे यक़ीन था कि अब लौटकर नहीं आएगा.

अब मैं घर पर बिलकुल अकेला रह गया था और सामने कार्नेस पर मेरे पत्नी और बच्चों की तस्वीर ख़ामोशी से मुझे घूर रही थी. यह सोचकर मेरी आंखों में आंसू आ गए कि अब उनसे मुलाकात होगी भी कि नहीं? लेकिन यह ख़याल करके इत्मीनान भी हुआ कि कम-से-कम वे तो ठीक तरह से पहुंच गए थे. काश, मैंने प्रॉविडेंट फंड का लालच न किया होता और पहले ही चला गया होता. पर अब पछताने से क्या!

'सत श्री अकाल’...'हर हर महादेव'...दूर से आवाज़ें क़रीब आ रही थीं. ये बलवाई थे. ये मेरी मौत के हरकारे थे. मैंने ज़ख्मी हिरण की तरह इधर-उधर देखा, जो गोली खा चुका हो और जिसके पीछे शिकारी कुत्ते लगे हों! बचाव की कोई सूरत न थी. क्वार्टर के किवाड़ पतली लकड़ी के थे और उनमें शीशे लगे हुए थे. अगर मैं बन्द होकर बैठा भी रहा तो दो मिनट में बलवाई किवाड़ तोड़कर अन्दर आ सकते थे.
'सत श्री अकाल! हर हर महादेव!!'
आवाज़ें और क़रीब आ रही थीं. मेरी मौत क़रीब आ रही थी.
इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई। सरदार जी दाखिल हुए.
'शेख़ जी, तुम हमारे क्वार्टर में आ जाओ! जल्दी करो!' बगैर सोचे-समझे, अगले क्षण मैं सरदार जी के बरामदे में पड़ी चिक के पीछे था. मौत की गोली सन्न से मेरे सिर पर से गुज़र गई क्योंकि मैं वहां दाखिल ही हुआ था कि एक लारी आकर रुकी और उसमें से दस-पन्द्रह नौजवान उतरे, उनके लीडर के हाथ में एक टाइप की हुई फेहरिस्त थी : 'क्वार्टर न. 8 शेख़ बुरहानुद्दीन!'

उसने काग़ज़ पर नज़र डालते हुए हुक्म दिया और यह पूरा दल क्वार्टर पर टूट पड़ा! मेरी गृहस्थी की दुनिया मेरी आंखों के सामने उजड़ गई, लुट गई! कुर्सियां, मेज़ें, संदूक़, तस्वीर, किताबें, दरियां, कालीन, यहां तक कि मैले कपड़े, हर चीज़ लारी पर पहुंचा दी गई।
डाकू!
लुटेरे!!
क़ज़्ज़ाक़!!!
और यह सरदार जी! जो, बज़ाहिर हमदर्दी जताकर मुझे यहां ले आए थे, यह कौन-से कम लुटेरे थे?
बाहर जाकर बलवाइयों से कहने लगे—'ठहरिए साहब! इस घर पर हमारा हक़ ज़्यादा है, हमें भी इस लूट में हिस्सा मिलना चाहिए.' और यह कहकर उन्होंने अपने बेटा-बेटी को इशारा किया और वे भी लूटमार में शामिल हो गए. कोई मेरी पतलून उठाए चला आ रहा है, कोई कोट, सूटकेस. कोई मेरी बीवी-बच्चों की तस्वीरें भी ला रहा है और यह सब माल-ए-ग़नीमत सीधा अन्दर के कमरे में जा रहा था.

'अच्छा रे सरदार! जिन्दा रहा तो तुझसे भी समझूंगा!!’ पर, उस वक्त तो मैं चूं भी नहीं कर सकता था, क्योंकि हमलावर सभी हथियारबन्द थे और मुझसे चन्द गज़ के फ़ासले पर थे। अगर उन्हें कहीं मालूम हो गया कि मैं यहां हूं...
''उरे, अन्दर आओ, तुसी!’’
अचानक मैंने देखा कि सरदार नंगी कृपाण हाथ में लिये मुझे अन्दर बुला रहे हैं. मैंने एक बार उस दढ़ियल चेहरे को देखा, जो लूट-मार की भाग-दौड़ से और भी खौफ़नाक हो गया था और फिर कृपाण को जिसकी चमकीली धार मुझे मौत का न्योता दे रही थी. बहस करने का मौका नहीं था. अगर मैं कुछ भी बोलता और बलवाइयों ने सुन लिया होता, तो एक गोली मेरे सीने के पार होती. कृपाण और बन्दूक़ में एक को पसन्द करना था. मैंने सोचा, इन दस बन्दूक़ वाले बलवाइयों से कृपाण वाला बूढ़ा बेहतर है. मैं कमरे में चला गया झिझकता हुआ, ख़ामोशी से.
'इत्थे नहीं, ओस अन्दर आओ!'
मैं और अन्दर के कमरे में चला गया, जैसे क़साई के साथ बकरा जि़बाहख़ाने में दाखिल होता है. मेरी आंखें कृपाण की धार से चकाचौंध हो रही थीं.
'यह लो जी, अपनी चीज़ें संभालो!' यह कहकर सरदार जी ने वह तमाम मेरा सामान मेरे सामने रख दिया, जो उन्होंने और उनके बच्चों ने झूठ-मूठ की लूट में शामिल होकर हासिल किया था.
सरदारनी बोली, 'बेटा, हम तो तेरा कुछ भी सामान न बचा सके...'
मैं कोई जवाब न दे सका.
इतने में बाहर से कुछ आवाज़ें सुनाई दीं. बलवाई मेरी लोहे की अलमारी को बाहर निकाल रहे थे और उसको तोड़ने की कोशिश कर रहे थे.
'इसकी चाबियां मिल जातीं तो सब मामला आसान हो जाता!'
'चाबियां तो अब पाकिस्तान में मिलेंगी. भाग गया न, डरपोक कहीं का! मुसलमान का बच्चा था तो मुकाबला करता!'
नन्हीं मोहिनी मेरी बीवी के चन्द रेशमी क़मीज़ और ग़रारे, न जाने किससे छीनकर ला रही थी! उसने सुना तो बोली, 'तुम बड़े बहादुर हो! शेख़जी डरपोक क्यों होने लगे! वह तो कोई पाकिस्तान नहीं गए.'
'नहीं गया तो यहा से कहीं मुंह काला कर गया.'
'मुँह काला क्यों करते, वह तो हमारे यहां...'

मेरे दिल की हरकत एक लम्हे के लिए बन्द हो गई. बच्ची अपनी ग़लती का अहसास करते ही ख़ामोश हो गई. मगर उन बलवाइयों के लिए इतना ही काफ़ी था. सरदार जी पर जैसे ख़ून सवार हो गया. उन्होंने मुझे अन्दर के कमरे में बन्द करके कुंडी लगा दी. अपने बेटे के हाथ में कृपाण दी और ख़ुद बाहर निकल गए. बाहर क्या हुआ, यह मुझे ठीक तरह मालूम न हुआ. थपड़े की आवाज़—फिर मोहिनी के रोने की आवाज़ और उसके बाद सरदार जी की आवाज़. पंजाबी गालियां, कुछ समझ में न आया कि किसे गाली दे रहे हैं और क्यों. मैं चारों तरफ़ से बन्द था. इसलिए ठीक से सुनाई न देता था.

और फिर—गोली चलने की आवाज़—सरदारनी की चीख़, लारी रवाना होने की गड़गड़ाहट और फिर तमाम स्क्वायर पर जैसे सन्नाटा छा गया.
जब मुझे कमरे की कैद से निकाला गया, तो सरदारजी पलंग पर पड़े थे और उनके सीने के क़रीब सफेद क़मीज़ ख़ून से सुर्ख हो रही थी. उनका लड़का पड़ोसी के घर से डॉक्टर को टेलीफोन कर रहा था.
'सरदार जी, यह तुमने क्या किया?' मेरी ज़बान से न जाने यह वाक्य कैसे निकला! मैं सकते में था...
मेरी बरसों की दुनिया, ख़यालात, भावनाएं, साम्प्रदायिकता की दुनिया खंडहर हो गई थी.
'सरदार जी, यह तुमने क्या किया?'
'मुझे क़र्ज़ा उतारना था बेटा!'
'क़र्ज़ा?'
'हां! रावलपिंडी में तुम्हारे जैसे ही एक मुसलमान ने अपनी जान देकर मेरी और मेरे घरवालों की जान व इज़्ज़त बचाई थी!'
'क्या नाम था उसका, सरदारजी?'
'ग़ुलाम रसूल!'
'ग़ुलाम रसूल?'
और मुझे ऐसा लगा, जैसे किस्मत ने मेरे साथ धोखा किया हो! दीवार पर लटके हुए घंटे ने बारह बजाने शुरू किए—एक...दो...तीन...चार...पांच...

सरदार जी की निगाहें घंटे की तरफ़ फिर गईं, जैसे मुस्करा रहे हों और मुझे अपने दादा याद आ गए, जिनकी कई फ़ीट लम्बी दाढ़ी थी. सरदारजी की शक्ल उनसे कितनी मिलती थी! छह...सात...आठ...नौ...
जैसे वह हंस रहे हों, उनकी सफेद दाढ़ी और सिर के खुले बालों ने चेहरे के गिर्द एक चमकदार आभामंडल-सा बनाया हुआ था!
दस...ग्यारह...बारह.
जैसे वह कह रहे हों—'जी असां दे हां, चौबीस घंटे बारह बजे रहते हैं...'
फिर वह निगाहें हमेशा के लिए बन्द हो गईं.
और मेरे कानों में ग़ुलाम रसूल की आवाज़, दूर से, बहुत दूर से आई—
'मैं कहता न था कि बारह बजे इन सिक्खों की अक्ल ग़ायब हो जाती है और वे कोई-न-कोई हिमाक़त कर बैठते हैं. अब इन सरदारजी ही को देखो ना...एक मुसलमान की ख़ातिर अपनी जान दे दी.'
पर यह सरदार जी नहीं मरे थे. मैं मरा था!

पुस्तक- मुझे कुछ कहना है: ख्वाजा अहमद अब्बास
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
[लिप्यांतरण : डॉ. ज़ोया ज़ैदी; ख्वाजा अहमद अब्बास के मुन्ततिब अफ़साने; संकलनकर्ता : राम लाल]

(news18.com)


31-May-2021 2:47 PM (456)

कमला दास, अंग्रेजी की जानी मानी कवियित्री और लेखिका थीं. लेकिन ऐसी विद्रोही महिला, जिन्होंने अपने विचारों से सनसनी मचा दी थी. उन्होंने जिस तरह हिन्दू धर्म के कुरीतियों और महिलाओं की स्थिति को लेकर प्रहार किए, उससे दक्षिण पंथी संगठन बहुत आहत हुए. बाद में जब 65 साल की उम्र में उन्होंने मुस्लिम धर्म अपनाया तो पूरा देश सन्न रह गया.

कमला दास हिन्दू घर में पैदा हुईं. उनका नाम माधवी कुट्टी था. लेकिन अंग्रेजी साहित्य में उनकी पहचान बनी कमला दास के रूप में. 1999 में उन्होंने जब अपना धर्म बदला, तो इससे बड़ा विवाद हुआ. हालांकि इससे भी ज्यादा सनसनी वह आत्मकथा "माई स्टोरी" से पहले भी मचा चुकी थीं. जब उन्होंने मुस्लिम धर्म अपनाया और जो टिप्पणियां कीं, उससे विश्व हिंदू परिषद से लेकर कई दक्षिण पंथी संगठन बहुत कुपित हुए. उनके खिलाफ उग्र धरना प्रदर्शन होने लगे. उन्हें पुलिस सुरक्षा लेनी पड़ गई.

कमला दास 31 मार्च 1934 को केरल के पुण्याउर्रकुलम में पैदा हुईं. 31 मई 2009 को पुणे में उनका निधन हो गया. लेकिन वो अपनी जिंदगी में विवादों में ज्यादा रहीं.

प्यार के लिए बदला धर्मकनाडा के लेखक मेरिल वीजबोर्ड ने अपनी किताब "लव क्वीन ऑफ मालाबार" में लिखा कि उन्होंने धर्म इसलिए बदला क्योंकि उन्हें एक मुस्लिम नेता से प्यार हो गया था. शादी के लिए धर्म बदला और वो सुरैया बन गईं लेकिन वो मुस्लिम नेता फिर पीछे हट गया.

विवादों में घिरी फिल्म

कमला दास पर "आमी" नाम से एक फिल्म भी बनाने की घोषणा हुई लेकिन उससे पहले ही ये विवादों में घिर गई. मामला केरल हाईकोर्ट में है. आरोप है कि फिल्म में लव जेहाद को उचित ठहराया जा रहा है. पहले विद्या बालन इसमें काम करने वाली थीं लेकिन शूटिंग से पांच दिन पहले ही ये कहकर फिल्म छोड़ दी कि उन्हें कमला दास के बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं और वो डायरेक्टर के दृष्टिकोण से भी सहमत नहीं.

महिलाओं के हक में आवाज उठाने वाली लेखिका

आजादी से पहले के दौर में कमला दास को महिलाओं के हक उठाने वाली लेखिका के रूप में माना जाता है. वह मलयालम के साथ अंग्रेजी में लिखने में सिद्धहस्त थीं. अपने मलयायम पाठकों के लिए वो माधवी कुट्टी के नाम से लिखती थीं तो अंग्रेजी में कमला दास के रूप में. खासकर देश में कविता के क्षेत्र में उनका योगदान गजब का है. उन्हें आधुनिक भारतीय अंग्रेजी कविताओं की मां भी कहा जाता है. विदेशों में उन्हें पसंद करने वालों की तादाद खासी है.

साहित्य की पहचान वाला परिवार

कमला मालाबार में उस घर से ताल्लुक रखती थीं, जिसकी लिटरेरी परिवार के रूप में पहचान थी. उनकी मां बालामनी अम्मा जानी मानी कवियित्री थीं तो ग्रैंड अंकल नालापत नारायन मेनन सम्मानित लेखक. वह केवल 06 साल की उम्र में पत्रिकाओं के लिए लिखने लगीं. ये डॉल्स को लेकर सैड कविताएं होती थीं. उन कविताओं पर उनका भाई चित्र बनाया करता था.

पति को शुरू में अच्छा नहीं लगा लिखना

उनकी शादी 15 साल की उम्र में रिजर्व बैंक में काम करने वाले माधव दास से हुई. वह बाम्बे आ गईं. लेकिन पति को उनका लेखन पसंद नहीं था. उसे लगता था कि बेहतर है कि वो मां और पत्नी के दायित्व ही निभाती रहें. ये जिम्मेदारियां ज्यादा बड़ी हैं.

उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, "महिला चाहे कुछ भी बन जाए लेकिन उसे महिला होने के नाते अच्छी पत्नी और अच्छी मां के रूप में ज्यादा प्रूफ करना होता है. और इसका मतलब होता है सालों साल इंतजार में बिताते रहना. लेकिन मेरे पास इंतजार करने के लिए इतना समय नहीं था. मैं इतना धैर्य नहीं रख सकती थी. इसलिए मैने चुपचाप लिखना शुरू किया."

जब लेखन से आमदनी होने लगी तो एतराज खत्म हो गया

बाद में जब इससे उन्हें आमदनी होने लगी तो फिर उनके पति को होने वाला एतराज खत्म हो गया. उन्होंने लिखा, " मैं अपने घर, बच्चों और किचन के काम के बाद पूरी रात जागकर लिखती रही थी. इसका असर मेरी हेल्थ पर भी पड़ा. उन्होंने कविताओं के जरिए महिलाओं के दर्द, अहसासों, भावनाओं और एक मानव होने को आवाज दी. ये जताया कि महिलाएं भी पुरुषों सरीखी ही हैं."

कविता 'खिड़की का शोक'

उनकी कविता एक खिड़की का शोक में उन्होंने पुरुष वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं की फीलिंग दी

"ऐसा हमेशा से होता रहा है

ये किसकी दुनिया है, जो मेरी नहीं

मेरा पुरुष मेरे बच्चे बस यही धुरी

मैं कहां, मां और पत्नी के बीच

पहना दिया गया है उनकी आंखों पर चश्मा"

मैने शर्ट पहनी और बाल कटा दिए

उन्होंने जेंडर भूमिकाओं पर भी गहरी नाराजगी जताई. लगातार इसे तोड़ने के लिए आवाज उठाती रहीं. उन्होंने आत्मकथा में लिखा, "तब मैने एक शर्ट पहनी और साथ में ब्लैक सारोंग. मैने अपने बाल छोटे कटवा दिए और महिलाओं को लेकर बोली जाने वाली तमाम उन लाइनों को किनारे खिसका दिया." जब उनका परिवार वित्तीय दिक्कतों से गुजरा तब वह कॉलमिस्ट बन गईं, क्योंकि इसमें ज्यादा बेहतर पैसे मिलते थे.

कविताएं पीछे खिसक गईं. वह 'मलयालांडु' वीकली के लिए नियमित लिखती रहीं. अपने महिला होने के अनुभवों को शेयर करती रहीं. ये कुछ ऐसा था जो एकदम नए तरह का था. उनके पिता तब "मरुभूमि" समाचार पत्र ग्रुप में ताकतवर स्थिति में थे. उन्होंने संपादक पर दबाव बनाया कि कमला के कॉलम को बंद कर दिया जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

आत्मकथा 'माई स्टोरी'

वर्ष 1973 में उनकी आत्मकथा 'एंते कढा' (माई स्टोरी) मलयालम में जारी हुई. जो राज्य में सनसनी बन गई. पंद्रह साल बाद इसके अंग्रेजी में ट्रांसलेशन हुआ और इसमें कुछ और चैप्टर जोड़े गए. समीक्षकों ने इसे ईमानदारी से लिखी गई आत्मकथा कहा. एक महिला के अंदर से निकली सच्ची आवाज. इस किताब में उनके समाज में व्यक्तिगत के साथ प्रोफेशनल अनुभव थे. पहली बार किसी महिला लेखिका ने रजोधर्म, यौवन, प्यार, वासना, लेस्बियन एनकाउंटर, बाल विवाह, बेवफाई और शारीरिक संबंधों पर लिखा. उन्होंने फीमल सेक्सुअलिटी पर लिखा.

साहित्य में काम

उन्होंने साहित्य जगत में भी गजब का काम किया. अंग्रेजी में उन्होंने नॉवेल 'अल्फाबेट ऑफ लस्ट' (1977), शार्ट स्टोरीज पर 'पद्मावती द हर्लेोट एंड द अदर स्टोरीज' लिखी. 'समर इन कोलकाता' (1973) कविताओं की किताब है. मलयालम में भी कई किताबें लिखीं. उन्हें कई अवार्ड भी मिले. लेकिन मोटे तौर पर कमला दास को भारतीय लेखन क्षेत्र की सबसे बोल्ड और विद्रोही महिला के तौर पर याद किया जाता है.

सियासी पार्टी भी बनाई 

हालांकि वो कभी सियासी तौर पर सक्रिय नहीं रहीं लेकिन उन्होंने बेसहारा मांओं को संरक्षण देने और सेकुलिज्म को बढ़ावा देने के लिए लोकसेवा पार्टी बनाई थी. 1984 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन हार गईं.

निधन कैसे हुआ

पुणे के एक प्राइवेट हास्पिटल में सांस से जुड़ी बीमारियों के चलते उनका 76 साल की उम्र में निधन हो गया. उनके दो बेटे हैं. उनका शव उनके गृह राज्य केरल ले जाया गया. तिरुअनंतपुरम की पालायम जुमा  मस्जिद में उन्हें पूरे सम्मान के साथ दफना दिया गया. (news18.com)


22-May-2021 2:49 PM (662)

-विष्णु नागर
उससे हर 10-15 दिन में बात होती रहती थी। उससे यानी राजकुमार केसवानी से। कभी वह फोन करता, कभी मैं। पंद्रह-बीस दिन मैंने फोन किया। मोबाइल की घंटी बजती रही। फोन उठा नहीं। सोचा कहीं व्यस्त होगा। कुछ देर बाद खुद कर लेगा। पूरा एक दिन गुजर गया। दूसरे दिन फिर फोन किया। फिर घंटी बजती रही मगर कोई जवाब नहीं। ऐसा कभी होता नहीं था कि वह फोन का जवाब न दे। अक्सर तत्काल ही देता था। तब मैंने कवि- मित्र कुमार अंबुज को फोन किया। इस संबंध में, जो उसके संपर्क में रहते थे तो पता चला कि उसे कोरोना है और वह अस्पताल में भर्ती है। बीच-बीच में उसकी हालत के बारे में समाचार लेता रहा। पहले ज्ञानरंजनजी से समाचार लेता रहा, जो उसके और उसके परिवार के बेहद निकट थे। फिर अक्सर उसके बेटे से बात होने लगी। कल 21 मई की शाम को इसी सिलसिले में फोन किया था तो उसके बेटे ने रोते हुए बताया कि पापा नहीं रहे। पूछा कब हुआ यह? उसने कहा, अभी-अभी। न मैं और बातें करने की स्थिति में था, न वह समय ऐसा था, बात आगे और करने का। मैं भी भौंचक था और उस पर तो जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा था।

सोचा नहीं था कभी कि उसे श्रद्धांजलि देनी होगी। उम्र उसकी साढ़े सत्तर साल थी। मुझसे करीब छह महीने छोटा था। आज के हिसाब से यह किसी के दुनिया से जाने की उम्र नहीं होती। हालांकि सच यह है कि कोई भी उम्र किसी के कभी भी चले जाने की हो सकती है और खासकर इस समय। केसवानी कोरोना होने से पहले मेरी जानकारी में बिल्कुल स्वस्थ था। कभी उसे बुखार आया हो, यह भी नहीं सुना। शाम को आठ बजे वह बढिय़ा व्हिस्की के एक या दो पैग लगाता था। होश खोने की नौबत शायद ही कभी उसने आने दी हो। जिन्हें वह पसंद करता था, उनके साथ बैठकर पीने -खाने का आनंद भी लेता था। वरना सामने वाला कहे भी कि आज राजकुमार तेरे साथ शाम को बैठना है, तो साफ मना कर देने में उसे झिझक नहीं होती थी। वह इसके लिए कोई बहाना नहीं करता था, साफ बताता था। उसके पिता एक साल पहले ही गुजरे थे। वह सौ की उम्र के आसपास ही कहीं थे। उन्हें दूसरी या तीसरी बार राजकुमार के बेटे की करीब दो-ढाई साल पहले हुई शादी में देखा था। लगता था कि पिता से जो चीजें ली हैं, उनमें उम्र का वरदान भी उसे मिला है। कोरोना से अगर वह ठीक से उबर पाता तो शायद इस उम्र तक पहुँच जाता। बीच-बीच में जो पता चलता रहा, उससे लगता है कि कोरोना तो उसे भारी पड़ा ही, कोरोना के कारण गंभीर हालत में उस जैसे स्वस्थ रहे आदमी को अस्पताल भर्ती होना पड़ा, यह सहन करना भी उसके लिए काफी भारी पड़ा। शरीर से कमजोर आदमी की तरह इस दुनिया में रहना शायद उसकी कल्पना से बाहर था। मेरा उसके साथ अनुभव यही कहता है।

एक पत्रकार के रूप में उसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि का कारण 2-3 दिसंबर, 1984 को भोपाल के यूनियन कार्बाइड का गैस कांड था। (संयोग से मैं भी उस रात भोपाल रेलवे स्टेशन पर मरने बाल-बाल बच गया। हैदराबाद से आ रहा था। रात को रेलवे स्टेशन पर सोने की योजना थी। तभी मालवा की तरफ जाने वाली ट्रेन की घोषणा हुई और मैं उसे पकडऩे दौड़ पड़ा। उसने करीब दो साल की काफी विस्तृत खोजबीन के बाद इस कांड से लगभग दो साल पहले ही भोपाल पर मंडरा रहे इस खतरे की चेतावनी दे दी थी। उसने अपने एक छोटे से अखबार में सबसे पहले इस बारे में लिखा था। फिर जनसत्ता ने भी उसकी शायद दो रिपोर्टें छापीं। उस समय इसे किसी जिम्मेदार आदमी ने गंभीरता से नहीं लिया। नतीजा वह भयानक दुर्घटना थी। बाद में उसे इस कारण काफी मान्यता भी मिली। पत्रकारिता का प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पुरस्कार पाने वाला वह पहला इतनी कम उम्र का पत्रकार था। द न्यूयॉर्क टाईम्स में भी वह छपा। दुनिया के कई देशों की उसने इस सिलसिले में यात्राएँ भी कीं। हिंदी का पत्रकार तो वह था ही मगर अंग्रेजी की तमाम पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी उसने नियमित रूप से काम किया। विनोद मेहता आदि अंग्रेजी के बड़े संपादकों के लिए भी काम किया। एनडीटीवी में भी उसने कुछ वर्ष काम किया। उसे अपने इस काम को मान्यता मिलने की खुशी इतनी नहीं थी, जितनी यह कि काश उसकी चेतावनी को समय पर सुन लिया जाता तो सैकड़ों जानें बच सकती थीं और अनेक पीढिय़ाँ इसका दंश सहने से बच जातीं। वह स्वयं भी इसका हल्का-फुल्का शिकार हुआ था। उसने बरसों से भोपाल गैस हादसे की बरसी पर लिखना बंद कर दिया था, हालांकि दिसंबर का महीना आता और सारे मीडिया की निगाहें उस पर टिक जाती थीं। वह पत्रकारिता के इस मुकुट को पहने रहने में विश्वास नहीं करता था। वह चाहता तो इस पर एक पूरी किताब अंग्रेजी या हिंदी में लिख सकता था। उसने ऐसा नहीं किया। उसने हिंदी फिल्म संगीत और कलाकारों तक अपने को अधिक सीमित कर लिया। पत्रकारिता की दूसरी चुनौतियों-खबरों पर उसने ध्यान दिया। कुछ बरस वह दैनिक भास्कर के इंदौर संस्करण और भोपाल में उसके रविवारीय संस्करण का भी संपादक रहा। जनरुचि और स्तर को संभालते हुए उसने अच्छे अंक निकाले। वहाँ भी निर्भीक होकर उसने अपने ठाठ से काम किया।

वह एक साधारण परिवार से उठा था। वह शुरू से विद्रोही तबियत का था, इसलिए उसने जीवन चलाने के साथ कुछ अच्छा करने के लिए कई- कई तरह के उद्यम किए और अपना अनुभव, ज्ञान तथा दिलचस्पियों का क्षेत्र बढ़ाया। उसे सेक्युलर संस्कार बचपन से मिले। वह भोपाल के मुस्लिमबहुल इलाके में पला-बढ़ा था। उसके तमाम दोस्त मुसलमान थे, इसलिए इस समाज और  लोगों से उसका अंतरंग परिचय था। इस  कारण वह सुनी -सुनाई बातों में कभी नहीं आया, जो संघीय संस्कारों को बढ़ावा देते हैं और नफरत की दीवार दिल-दिमाग के भीतर चुनवा देते हैं।

उसमें गजब का आत्मविश्वास था और वह मुँहफट भी था।कोई भी उसके सामने बनने की कोशिश करता तो वह कड़ुई से कड़ुई बातें करने से चूकता नहीं था। वह पूरी तरह भोपालमय था मगर हर जगह छा जाने का, मंच को सुसज्जित करते रहने का उसे कोई शौक नहीं था। उसके खरेपन के कारण बहुत से लोग उससे डरते- घबराते भी थे। वह यारों का यार था। समय पर काम आता था। मंजूर एहतेशाम की पत्नी का कुछ महीने पहले कोरोना से निधन हो गया तो वह भोपाल में अकेला मंजूर साहब का ऐसा मित्र था, जो कब्रिस्तान तक गया। वह मंजूर साहब के लिए बहुत फिक्रमंद था कि उनका जीवन अब कैसे आगे चलेगा, क्योंकि भाभी के बिना यह आदमी एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। दुर्भाग्य से यह साबित होकर रहा। मंजूर साहब को भी कुछ समय बाद कोरोना ले बैठा। पता नहीं राजकुमार को मंजूर एहतेशाम के जाने की खबर दी गई थी या नहीं।

मेरे उससे परिचय की शुरूआत भोपाल गैस कांड के सिलसिले में तब हुई थी, जब मैं कुछ समय बाद नवभारत टाईम्स के लिए रिपोर्टिंग करने भोपाल गया था। वह मुझे गैस पीडि़तों के बीच ले गया। डॉक्टरों से भी मिलवाया। हर तरह से मेरी मदद की। इसके बाद तो ये संबंध आखिर तक चलते रहे, बने रहे और बहुत अच्छी तरह बने रहे। वह अभी कोई दो महीने पहले अपनी मुगलेआजम फिल्म पर लिखी किताब पर एक फिल्म बनाने की योजना के सिलसिले में एक निर्देशक के निमंत्रण पर दिल्ली बुलाया गया था तो वहाँ न होने की वजह से उससे मेरी भेंट न हो सकी, लेकिन फोन पर उससे काफी लंबी बात हुई। जिस पाँच सितारा होटल में वह ठहरा था, वहीं जिस निदेशक ने उसे बुलाया था, उसकी निर्माणाधीन फिल्म की टीम भी ठहरी थी। वहाँ उसकी प्रसिद्ध अभिनेता रघुवीर यादव से काफी बातें हुई थीं। बहुत देर तक वह इसी बारे में बातें करता रहा। कुछ समय तक वह राजदीप सरदेसाई के बारे में भी बात करता रहा, जो उसके मित्रों में है। उस दिन वह सरदेसाई से नाराज था, जो उसने बता दिया था। रवीश कुमार भी उसके अच्छे मित्रों में थे। मुगले आजम पर उसकी किताब से रवीश ने हिंदी संसार को एनडीटीवी इंडिया पर परिचित करवाया था। निश्चित रूप से राजकुमार हर काम बहुत मेहनत और समर्पण से करता था। जब तक वह आश्वस्त नहीं हो जाता था, छपने के लिए नहीं भेजता था।

1950 से 70 के दशक तक  की हिंदी फिल्मों और फिल्म संगीत का वह विश्वकोश था। चूँकि उसका उर्दू पर भी अच्छा अधिकार था तो उस जमाने की हिन्दी के साथ उर्दू पत्रिकाओं का भी उसके पास बड़ा भंडार था। दैनिक भास्कर में पिछले 14 साल से वह हिन्दी फिल्म और हिन्दी फिल्म संगीत पर हर रविवार को एक दिलचस्प स्तंभ लिखा करता था, जो बेहद लोकप्रिय था। मैं उस अखबार में और कुछ पढ़ूँ, न पढ़ूँ, यह स्तंभ जरूर पढ़ता था। उसे अनौपचारिक बनाने की उसकी शैली से मुझे ऐतराज था, जो मैंने उसे बताया भी था। एक और बात थी कि वह उस काल के उन व्यक्तित्वों को बड़े खुलूस से याद करता था तो उनके प्रति आलोचनात्मक दृष्टि से नहीं, प्रशंसा भाव से ही लिखता था, मगर उनके बारे में जानकारियों का वह ऐसा खजाना पेश करता था कि मैं उसके स्तंभ को पढ़े बिना रह नहीं पाता था। इसके बावजूद हम एक-दूसरे की प्रशंसा से बचते थे। हमारे अलावा करने के लिए इतनी बातें थीं कि इसके लिए हमारे पास न फुर्सत थी, न दिलचस्पी। उसके पास हिन्दी फिल्म संगीत का एक बहुत बड़ा खजाना था, जिसमें बहुत सी दुर्लभ चीजें हैं, जो वह सुनवाया भी करता था। कई ऐसे मधुर गीत जो किसी फिल्म के लिए लिखे और संगीतबद्ध किए गए लेकिन जिनका इस्तेमाल नहीं हुआ। उसके खजाने में भोपाल गैसकांड से संबंधित बहुत सी सामग्री भी थी। इस सबका अब क्या होगा, पता नहीं।

वह पत्रकार तो था ही, उसने खुद का एक साप्ताहिक पत्र भी आरंभ में निकाला था। वह मध्यप्रदेश के लगभग सभी नये-पुराने नेताओं को अच्छी तरह जानता था और वे उसे भी मगर राजनीतिक दलाली उसने कभी नहीं की। कोई नेता उसे डरा या लालच नहीं दे सका क्योंकि वह पूरी तैयारी से ही कोई काम करता था और अकाट्य तथ्यों के साथ। बीच में उसे फोटोग्राफी का भी शौक लगा था। उसने कुछ कविताएँ भी लिखी हैं और उसकी अत्यंत विनम्र और सादा पत्नी सुनीताजी भी कविताएँ लिखा करती थीं। इनमें से दोनों की एक-दो, एक-दो कभी कादम्बिनी में छपी हैं। उसकी एक कहानी पढऩे की याद भी है। एक उपन्यास पर भी वह वर्षों से काम कर रहा था, जो शायद पूर्णाहुति के करीब था और एक तरह से उसकी आत्मकथा है। ज्ञानरंजनजी के वह सबसे अधिक निकट था। उन्होंने उसे पहल से एक संपादक के रूप में जोड़ा था। उसने उसमें उर्दू की बड़ी और ऐतिहासिक शख्सियतों पर एक पूरी श्रृंखला लिखी थी, जो बाद में पुस्तकाकार आ चुकी है। उसने रूमी की कविताओं का अनुवाद भी किया था। प्रसिद्ध फिल्म मुगलेआजम पर उसने हाल ही में काफीटेबल आकार में एक पुस्तक भी छपवाई थी, जिसका कई भाषाओं में अनुवाद होने की खबर है। उसका कुछ और काम भी प्रकाशनाधीन हैं।

स्मृतियों का वह धनी था। इसका इतना बड़ा खजाना उसके पास था कि कभी खत्म नहीं होता था। उससे बात का सिलसिला एक बार शुरू होता था तो वह कहाँ से आरंभ होकर कहाँ पहुँचेगा और कब तक चलता रहेगा, इसका अंदाज़ कोई लगा नहीं सकता था और वह कभी हाँकता नहीं था। यूँ वह खूब बातें करता था, मगर मैंने एक वीडियो देखा, जिसमें दिल्ली के एक कार्यक्रम में भोपाल गैसकांड पर वह मुख्य वक्ता था, मगर उसने इस विषय पर अपनी बात पाँच या छह मिनट में खत्म कर दी। मैंने कहा, तुम इतना कम बोले तो उसने कहा कि मैं ऐसे कार्यक्रमों में संक्षिप्त ही बोलता हूँ।

वह जो भी तीसमारखाँ रहा होगा, दोस्तों के लिए वह दोस्त था। उससे बात करना आनंददायक था। वह अपने स्वर्गीय हो चुके दोस्तों में नवीन सागर और एक सरदार मित्र को उसकी शैतानियों के लिए खूब याद करता था। वैसे भोपाल और बाहर की साहित्यिक दुनिया का कोई हमउम्र शायद ही ऐसा रहा हो, जिससे उसके खट्टे- मीठे-कभी मीठे तो कभी खट्टे संबंध न रहे हों।

ऐसा कभी नहीं हुआ कि 1984 के बाद मैं कभी भोपाल गया और कम से कम एक शाम उसके साथ नहीं रहा। वह दिल्ली आया तो सुबह आकर शाम को चला गया हो तो अलग बात है वरना उससे मुलाकात होती ही थी। सिवाय आखिरी बार जब वह दिल्ली में था और मैं दिल्ली से बाहर। उसके बगैर भोपाल मेरे लिए सूना हो चुका है।


07-Apr-2021 8:35 PM (902)

-कृष्ण कल्पित

[ जब 2009 में पहल के 90 अंक निकालने के बाद ज्ञानरंजन ने इसे बंद करने की घोषणा की थी तो हिन्दी-संसार हतप्रभ रह गया था । उस समय पहल के अवसान पर बहुत लिखा गया था, यह टिप्पणी उसी समय आलोचक राजाराम भादू के आग्रह पर मैंने मीमांसा में लिखी थी जिसे लमही इत्यादि कई पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया । दूधनाथ सिंह ने इसे पहल पर लिखी सर्वश्रेष्ठ टिप्पणी कहा था । इसके बाद पहल की दूसरी शुरुआत हुई और 35 अंक और निकले । अब जबकि पहल के 125 अंकों के बाद ज्ञानजी ने इसे बंद करने की आधिकारिक घोषणा की तो, इस टिप्पणी की याद आई । पहल के 90 अंक तक मैं केवल एक बार पहल के कविता-विशेषांक 1989 में प्रकाशित हुआ और 2009 के बाद बहुत बार । पहल जैसी अप्रतिम और अब ऐतिहासिक पत्रिका के अवसान पर मैं अपनी 2009 में लिखी वह टिप्पणी प्रकाशित करता हूँ । _कृक ]

मजहब से मिरे क्या तुझे तेरा दयार और
मैं और, यार और मिरा कारोबार और !

-मीर तक़ी मीर

जिस जिस ने भी पहल के अवसान को एक साहित्यिक पत्रिका का अवसान समझकर अपनी शोकांजलियाँ अर्पित की हैं - उन कमजर्फ़ों को यह नहीं पता कि यह दूसरा ही कारोबार था । यह इस बात से भी साबित है कि जब तथाकथित लघु-पत्रिकाओं के चांदी काटने के दिन आ गए हैं - जब जनपथ और राजपथ पर अनेक विलुप्त पत्र-पत्रिकाओं को नई सज-धज के साथ विचरण करते हुए देख रहे हैं - तब दवा-ए-दिल बेचने वाले ज्ञानरंजन अपनी दूकान बढ़ा गए । 

आज से कोई चालीस साल पहले जब ज्ञानरंजन ने पहल की शुरुआत की थी तब यह पथ कंटकाकीर्ण था। तब हिन्दी की व्यावसायिक पत्रिकाओं के अलावा कल्पना थी, जिसे एक साहित्यिक अभिरुचि के सेठ बद्रीविशाल पित्ती चलाते थे । ज्ञानोदय थी, जिसे एक पूंजीपति घराने की साहित्य-सेवा कह सकते हैं । एक अजमेर से निकलने वाली लहर थी, जिसे प्रकाश जैन ने सचमुच अपार संघर्षों के बीच अपने जुनून से चलाया; लेकिन लहर की विचारहीनता ने इसे अकवितावादियों और विचार-विपथ विद्रोहियों का अड्डा बना दिया था । ऐसे माहौल में ज्ञानरंजन और उनके साथियों ने पहल को एक ख़ास मक़सद से निकाला - वैज्ञानिक चेतना और विचारधारा के साथ । इसे उन्होंने इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक की तरह प्रस्तावित किया । ध्यान रहे - पत्रिका नहीं, पुस्तक ।

आज तो साहित्यिक या लघु पत्रिका निकालना एक कैरियर या धंधा है। जिस लिटल-मैगज़ीन की तर्ज़ पर हिन्दी में लघु-पत्रिकाएँ निकलीं, वे वाक़ई प्रोटेस्ट की पत्रिकाएँ थीं। अब तो प्रोटेस्ट को सरकारी अनुदान मिलता है, उनकी सरकारी ख़रीद होती है और कुछ असफल और दोयम दर्ज़े के कवि/लेखक/पत्रकार सिर्फ़ पत्रिकाएँ निकालकर साहित्य की भूमि में जामवंत बने हुए हैं ।

यहां यह भी याद रखा जाना ज़रूरी है कि ज्ञानरंजन ने जब पहल निकालने की अपने मित्रों के साथ पहल की थी तब वे कथाकार के रूप में अपनी ख्याति के उत्कर्ष पर थे। वे पिता, अनुभव, फैंस के इधर और उधर, घण्टा और बहिर्गमन जैसी अनूठी कहानियाँ लिख चुके थे। ज्ञानरंजन ने दूधनाथ सिंह और काशीनाथ सिंह के साथ नयी कहानी के लद्धड़, मध्यवर्गीय और किंचित रूमानी गद्य के बरक्स एक ठेठ हिंदुस्तानी धूल-धक्कड़-धक्कों से लिथड़ा हुआ एक नया आवारा और बेचैन गद्य प्रस्तावित किया था - अपनी कहानियों के ज़रिए। नयी कहानी के पुरोधा और तीन-तिलंगे अभी जैनेंद्र-विजय का पूरा उत्सव भी नहीं मना पाए थे कि ज्ञानरंजन के चमकीले गद्य के सामने उनकी नयी कहानी पुरानी पड़ गई।

इस गद्य का निर्माण मिश्र-धातुओं से हुआ था, जिस पर बकौल असद ज़ैदी इतने बरसों के बाद भी ज़रा-सा भी जंग नहीं लगा है । विद्रोह की ऐसी जीवन में फंसी हुई कलात्मक भाषा इससे पूर्व कहाँ थी - इशमें धूल-धक्कड़, धुआँ, गर्द और एक शहर से घातक लगाव था । यह याद रखने लायक बात है कि ज्ञानरंजन के महाभिनिष्क्रमण के बाद ही इलाहाबाद ने साहित्यिक राजधानी की हैसियत गंवाई थी । इस आवा-जाही में ज्ञानरंजन से वह पुर्ज़ा खो गया, जिस पर इस अभूतपूर्व गद्य का कीमिया लिखा हुआ था । अब यह एक बन्द गद्य था । दीवारों से घिरा हुआ । वह दरवाज़ा जो ज्ञानरंजन से बन्द हुआ था, जिसे बाद में दूधनाथ सिंह ने, काशीनाथ सिंह ने - कुछ कुछ स्वयं प्रकाश और बाद में उदय प्रकाश ने अपनी बरसों की खट खट से खोलने का उपक्रम किया । ( यह मेरी एक विनम्र प्रस्तावना है कि ज्ञानरंजन ने छठे-दशक की शुरुआत में जिस धुंधली और बीच-बीच में तीक्ष्ण-चमत्कार वाली भाषा का आविष्कार किया था वह बीसवीं-शताब्दी के अंत में दूधनाथ सिंह के यहाँ आख़िरी कलाम में परवान चढ़ी । यह इस गद्य की परिणति है जहाँ दूधनाथ सिंह ने अपनी विदग्ध और उत्तेजक भाषा में उत्तर-भारत के सर्वप्रिय ग्रन्थ रामचरित मानस को कटघरे में खड़ा कर दिया । )

इस माहौल में ज्ञानरंजन ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं के साथ, सीमित साधनों से पेरिस रिव्यू, लंदन मैगज़ीन और क्रिटिकल इंक़व्यरी जैसी पत्रिका हिंदी में निकालने का असम्भव स्वप्न देखा था जिसे उन्होंने तमाम प्रतिकूलताओं के बावज़ूद कोई चार दशक (अब पाँच दशक) तक जारी रखा । अब तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि अगर पहल नहीं होती तो क्या होता ? समकालीन हिन्दी साहित्य का स्वरूप क्या होता ? कला-प्रतिष्ठानों, सेठ-साहूकारों, निर्वीर्य-कलावादियों और धर्मप्राण जी-हुज़ूरियों का पहल ने निरन्तर प्रतिरोध किया । आज यदि हिन्दी साहित्य का माहौल अभी भी वाम वाम वाम दिशा समय साम्यवादी बना हुआ है तो इसमें पहल का भी कुछ योगदान रहा होगा ।

असद ज़ैदी ने दस बरस की भूमिका में लिखा है : '1960 के दशक से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के वैकल्पिक मंच ने रचनात्मक साहित्यिक परम्परा के प्रकाशन और पुनरुत्थान का जो ऐतिहासिक जिम्मा निभाया है, उसकी मिसाल विश्व-सहित्य के इतिहास में शायद ही मिलती हो ।' यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इस ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी का पहल ने एक तरह से नेतृत्व किया । पहल के बाद उसकी नक़ल में बहुतेरी पत्रिकाएँ निकलीं, अब तक निकल रही हैं । शक्ल-सूरत, गेटअप और आकार-प्रकार में पहल की जितनी नक़ल हुई और हो रही है, वह इस बात का प्रमाण है कि एक तरह से पहल लघु-पत्रिकाओं की प्रतीक बन गई । इन पत्रिकाओं के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता लेकिन ऐसी अधिकतर कोशिशें सम्पादकीय महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक-विपथन से अपना वांछित प्रभाव नहीं छोड़ सकीं ।

पहल का मूल्यांकन भविष्य में होगा लेकिन अब तक के 125 अंक देखकर कहा जा सकता है कि ज्ञानरंजन ने दुनिया-भर में जो प्रतिरोध और स्वतंत्रता का साहित्य है, विचार है  - उसे पहल में समेटने की कोशिश की । इससे हिन्दी में सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिक-फ़ासीवाद के प्रतिरोध की एक मज़बूत धारा  विकसित हुई । पहल ने न केवल विश्व-साहित्य के प्रतिरोधी स्वर को बल्कि भारतीय भाषाओं के ऐसे लेखन को भी हिन्दी के समकालीन लेखन से जोड़ दिया । आज अगर पाश, लालसिंह दिल और सुरजीत पातर हमें हिन्दी के कवि लगते हैं तो इसमें पहल का बड़ा योगदान है ।  भारतीय-भाषाओं के अतिरिक्त पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी मुल्कों के समकालीन लेखन से पहल ने हमें परिचित कराया । 1980 और 1989 में निकले पहल के दो कविता विशेषांकों ने हिन्दी की समकालीन कविता की दिशा-दशा निर्धारित की । हिन्दी में समकालीन कविता के ये सर्वश्रेष्ठ विशेषांक हैं ।

पहल में छपी कोई एक यादगार कहानी, एक मौलिक वैचारिक लेख का नाम लेने की धृष्टता मैं नहीं करूँगा, क्योंकि यह सवाल नामवरजी ने अपने छोटे भाई काशीनाथ सिंह से पूछा था। ज्ञानरंजन ने अक्सर पहल में सम्पादकीय नहीं लिखे लेकिन पहल के एक-एक पृष्ठ पर ज्ञानरंजन के सम्पादन की छाप है। साहित्यिक पत्रकारिता की दृष्टि से देखें तो ज्ञानरंजन आज़ादी के बाद के सर्वश्रेष्ठ सम्पादक ठहरेंगे। नए लेखकों को बनाने में, एक नई साहित्य भाषा विकसित करने में, उनका योगदान महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकक्ष ठहरेगा। एक सम्पादक के रूप में ज्ञानरंजन हमेशा रणक्षेत्र में खड़े नज़र आते हैं । आज़ादी के बाद एक ख़ास मक़सद से की गई मिशनरी पत्रकारिता का पहल पहला और सम्भवतः अंतिम उदाहरण है।

यहाँ एक व्यक्तिगत दृष्टांत देना अनुचित नहीं होगा क्यों कि ये मुस्तनद है। 1989 के पहल कविता विशेषांक में मेरी कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं और 1990 में मेरा कविता-संग्रह 'बढ़ई का बेटा' प्रकाशित हुआ था । ज्ञानजी से थोड़ा-बहुत पत्राचार था। इसके बाद साहित्य की निर्मम, कुटिल और कृतघ्न दुनिया से मैनें भागने की कोशिशें कीं। ऐसे ही एक निर्वासन के दिन मैं बाड़मेर के सीमांत पर बिता रहा था कि एक दिन डाक से पहल का नया अंक मिला। अगरतला, पटना, जयपुर । कभी एक पैसा मैंने पहल को नहीं भेजा लेकिन हर बार मेरे नए पते पर पहल का अंक पहुंच जाता। पता नहीं ज्ञानजी को कहाँ से ख़बर लगती थी। पहल ने मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ा। आज अगर मैं साहित्य-संग्राम का एक छोटा-मोटा सिपाही बना हुआ हूँ तो इसमें पहल का भी योगदान है अन्यथा निश्चय ही मैं बाउल-गायकों में शामिल होकर चिलम में निर्वाण तलाश करता।

पहल से किसी की भी तुलना नहीं की जा सकती। मारवाड़ी सेठों, सेठानियों के चंदे से चलने वाली हंस पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने कहा कि जिन पत्रिकाओं की रचनात्मकता का स्रोत टूट जाता है, वे बन्द होने को अभिशप्त होती हैं । जाहिर है हंस और पहल की तुलना बेमेल है। पहल पुस्तक है जबकि हंस पत्रिका । हंस हर महीने रद्दी में बिकती है जबकि पहल के अंक दुर्लभ किताबों की तरह लोगों ने सम्भाल कर रखे हुए हैं। 

ऐसा नहीं कि पहल के हिस्से आलोचनाएँ नहीं आईं। कहा गया कि अखिल भारतीय सेवा के जितने अधिकारियों को पहल ने लेखक बनाया उतना किसी ने नहीं। ज्ञानरंजन की सम्पादकीय मनमानी की भी आलोचना हुई। आठवें-दशक के कवियों की परवरिश पहल-आश्रम में ही हुई । आलोचना से पहल के महत्व पर ही प्रकाश पड़ता है। किसी दूसरे हाथों में देने की मनाही के साथ अब यदि पहल पत्रिका बन्द हो रही है तो इसका अर्थ यही है कि ज्ञानरंजन पहल को किसी व्यावसायिक-ब्रांड में नहीं बदलना चाहते। जिस पत्रिका को उन्होंने अपने ख़ून-पसीने से सींचा है उसे वे अपने सामने ही नष्ट होते देखना चाहते हैं और यह उचित ही है क्योंकि सरस्वती का महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद और अभी हाल में हंस का राजेन्द्र यादव के बाद जो हश्र हुआ है, वह सबके सामने है।

ज्ञानरंजन ने एक सम्पादक के रूप में पिछले चालीस-वर्षों में जो पत्र लिखे हैं उनका यदि भविष्य में संकलन हुआ तो यह एक ज़रूरी और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ होगा। ये हिन्दी के आख़िरी पत्र भी हो सकते हैं।

ज्ञानरंजन को हम एक ऐसे सम्पादक के रूप में याद नहीं करेंगे जो पत्रिका की कमाई से शोफर-ड्रिवन गाड़ी से चलता था बल्कि वे एक ऐसे सम्पादक के रूप में याद किए जाते रहेंगे जिन्होंने मनुष्यता के पक्ष में फ़ासीवाद, साम्प्रदायिकता, पूंजीवाद, और बाज़ारवाद से अनथक संघर्ष किया और जो पहल के हर लिफ़ाफ़े पर अपने हाथ से पता लिखते थे। 

इसीलिए जैसा कि पहले कहा जा चुका है - पहल की किसी अन्य पत्रिका से और ज्ञानरंजन की किसी अन्य सम्पादक से तुलना निरर्थक है - क्योंकि ज्ञानरंजन ने पहल के माध्यम से जो किया, वह कोई और कारोबार था!


07-Apr-2021 1:42 PM (365)

-रमेश अनुपम 
मैं एम.ए.हिंदी का नियमित छात्र था। एक जुनून के तहत माना कैंप में एक प्रायमरी स्कूल में शिक्षक की नौकरी करते-करते दुर्गा कॉलेज में प्रवेश लेने का जोखिम  मैं उठा चुका था।
 
कक्षायें सुबह होती थी और मेरी नौकरी साढ़े दस बजे से शुरू होकर साढ़े पांच बजे तक चलती  थी। माना कैंप से कॉलेज 13-14 किलोमीटर दूर था। पर यह फैसला, यह जुनून मेरा अपना था इसलिए मैं खुश था।
 
उन दिनों जयस्तंभ के मालवीय रोड की ओर जाने वाले रोड पर कोटक बुक स्टाल हुआ करता था। ' कल्पना ’ और दूसरी पत्रिकाएं मैं वहीं से लेता था। वहीं मुझे एक दिन 'पहल’ भी मिल गई, 'पहल’ 3 

तब तक मैं  'पहल’ मंगवाने के विषय में उनसे चर्चा किया करता था। इसलिए उस दिन बुक स्टाल पर  'पहल’ देखकर मैं चिहुंक उठा था, लगा जैसे कोई अनमोल खजाना मिल गया हो। मैंने तुरंत  'पहल’ खरीद ली। घर लौटकर उसे पूरा पढ़कर ज्ञानरंजनजी के 763, अग्रवाल कॉलोनी, जबलपुर वाले पते पर एक चिट्ठी भी लिख मारी।

अगले दिन मैं शान के साथ 'पहल’ 3 लेकर कॉलेज पहुंचा। विभु कुमार की कक्षा थी, मैं सामने ही बैठता था उन्होंने  'पहल’ देख ली। उठा कर उलटने-पलटने लगे, उनके पास ' पहल ’ डाक से आती थी,जो अब तक नहीं आई थी। 

ज्ञानरंजन जी का जवाब मेरे पास आ गया था और हमारे बीच पत्रों का अनंत सिलसिला शुरू हो चुका था। जो ज्ञान जी को जानते हैं, उन्हें पता है कि वे हर पत्र का जिस तरह से जवाब देते थे, जिस आत्मीयता के साथ वे अपने खतों के माध्यम से हर किसी को अपना बना लेते थे, वह ज्ञान जी की अपनी फितरत है। उनके पत्रों से मुझे हर बार प्यार की खुशबू आती थी, उनके शब्दों से एक रौशनी सी फूटती दिखाई देती थी। 

मेरे जैसे भटकते हुए एक दिशाहारा पथिक को उन दिनों इसी एक चीज की तलाश रहती थी।
 
वे एम.ए. प्रथम वर्ष के दिन थे, तब मेरी उम्र कोई तेईस वर्ष की रही होगी। एक दिन कक्षा में आते ही विभु कुमार ने कहा ज्ञानरंजन जी आए हुए हैं और वे मुझे याद कर रहे हैं। यह भी कि वे विनोद कुमार शुक्ल के घर पर ठहरे हुए हैं।
 
मैं तब तक विनोदजी से उनके घर पर जाकर मिल चुका था। सो कॉलेज से छूटते ही सीधे विनोद जी के कटोरा तालाब वाले घर की ओर भागा। ज्ञानरंजन तब तक मेरे हीरो बन चुके थे। उन्हें रु-ब-रू देखना, उन्हें सुनना मेरे लिए किसी जादुई दुनिया में प्रवेश करने से कम नहीं था।

वे सन 1975-76 के प्यारे-प्यारे और सुनहरे दिन थे, जिन दिनों दिन में भी आंखों में चुपके से ख्वाब उतर आया करते थे।  'पहल’ अब मुझे डाक से मिलने लगी थी। ज्ञान जी से खतों और मोहब्बतों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था।

’पहल’ और ज्ञानरंजन दोनों ही मेरे आवारा मन को सवारने में लगे थे, मेरे भीतर की आग को सुलगाने में भी। ज्ञान जी मुझे किताबें भी भेजा करते थे। जिसमें 'लोटस’ के कुछ अंक भी शामिल हैं, जिसके कारण मैं पहली बार तुर्की के महान कवि नाजिम हिकमत और उनकी कविताओं से परिचित हो सका।
'पहल’ के बंद करने की सूचना उन्होंने मुझे 1 फरवरी को ही दे दी थी, जो मेरे लिए एक दुखद सूचना थी। ज्ञान जी ने बढ़ती हुई उम्र और अस्वस्थता को इसका कारण बताया था, जो जायज भी है। जिसे मैंने अपने मित्रो रफीक खान, मदन आचार्य और तिलक पटेल के साथ शेयर किया था।
 
'पहल’ अब अपने आप में एक इतिहास बन चुका है, एक ऐसा और शानदार इतिहास जो शायद ही भविष्य में कभी दोहराया जा सकेगा। हिंदी साहित्य में किसी साहित्यिक पत्रिका ने इतनी लंबी उम्र पाई हो, किसी एक व्यक्ति की जिद के चलते 125 अंकों के जादुई आंकड़ों को छू पाई हो, मेरी जानकारी में अब तक नहीं है।

यह अपने आप में ही एक चमत्कृत करने वाली घटना है, जिसे ज्ञानरंजन जैसा कोई धुन का पक्का और जिद्दी आदमी ही संभव कर सकता था। 
हिंदी साहित्य और हम सारे लोग  'पहल’ की इस शानदार कामयाबी के लिए ज्ञान जी को बधाई देते हैं, उनके दीर्घायु होने की कामना करते हैं। इसके साथ ही सुनयना भाभी और 'पहल’ की पूरी टीम के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करना भी एक जरूरी कर्तव्य समझते हैं।


18-Feb-2021 8:55 AM (367)

-भवेश सक्सेना

साहित्य अकादमी अवॉर्ड हो या ज्ञानपीठ का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड, कृष्णा सोबती को उनके साहित्य के हवाले से बेहतर ढंग से याद किया जाता है. मित्रो मरजानी, दिलो दानिश, डार से बिछुड़ी और ज़िंदगीनामा जैसी किताबों के नाम आपने सुने हैं, तो उनकी रचयिता कृष्णा ही हैं, जिन्हें हिंदी ही नहीं भारतीय साहित्य की एक अहम लेखिका के तौर पर अपनाया गया. अपने साहित्य से तो रहीं ही, अमृता प्रीतम के साथ सालों की लड़ाई हो या अवॉर्ड वापसी का दौर, कृष्णा अपने बोल्ड कदमों के लिए भी सुर्खियों में रहीं.

भारतीय साहित्य में 'स्त्री विमर्श' की महत्वपूर्ण लेखिका की शुरूआती किताब ही कैसे चर्चा में आई थी? इससे पहले आपको बताते हैं कि अपने समय के सबसे चहेते लेखकों में शुमार कृष्णा सोबती ने 25 साल से भी ज़्यादा समय तक कोर्ट में अमृता प्रीतम के साथ 'आत्मसम्मान' की लड़ाई लड़ी थी. एक किस्सा संघ से जुड़ी उनकी सोच को लेकर भी सुनने लायक है.

ज़िंदगीनामा : कृष्णा बनाम अमृता
कॉपीराइट को लेकर यह बवाल था. माजरा यह था कि 1925 में जन्मीं कृष्णा ने एक उपन्यास लिखा था 'ज़िंदगीनामा', जो 1979 में प्रकाशित हुआ और 1980 में इसे साहित्य अकादमी ने नवाज़ा. करीब चार साल बाद अमृता प्रीतम ने एक भूले बिसरे क्रांतिकारी चरित्र की जीवनी 'हरदत्त का ज़िंदगीनामा' के नाम से लिखी. पहले तो कृष्णा ने अमृता पर साहित्यिक नकल का आरोप लगाया, जिसे खारिज होने में देर नहीं लगी.

उसके बाद कृष्णा ने 'ज़िंदगीनामा' शब्द के इस्तेमाल को लेकर ऐतराज़ जताया और इसे कॉपीराइट उल्लंघन का मोड़ दिया. कृष्णा ने कहा कि इस तरह के शब्द का इस्तेमाल करने से प्रचार, विज्ञापन और ब्रांडिंग में नाजायज़ फायदा उठाए जाने की कोशिश की गई. मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा और 1984 में कृष्णा ने 1.5 लाख रुपये के मुआवज़े का दावा ठोका.

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अगले करीब 27 सालों तक कोर्ट में केस चलता रहा और इस बीच, कोर्ट में तो नामचीन साहित्यकारों के बीच नाटकीय बहस चलती ही रही, इस मामले पर साहित्य जगत दो खेमों में बंट गया था. कुछ कृष्णा की तरफ से बयान देते थे तो कुछ अमृता की तरफदारी करते थे. खुशवंत सिंह ने कोर्ट और पत्र पत्रिकाओं में साफ तौर पर कहा कि 'ज़िंदगीनामा' जैसे शब्द पर कोई कॉपीराइट का दावा कैसे कर सकता है?

दो खेमों में बंट गए थे राइटर्स
सिंह ने कहा था कि यह शब्द पहले फ़ारसी और उर्दू की कई किताबों के टाइटल में प्रमुख रह चुका है, इस पर कोई राइटर दावा नहीं कर सकता. अशोक बाजपेयी और खास तौर से हिंदी जगत के कुछ बड़े नाम कृष्णा के पक्ष में भी दलीलें दे रहे थे. इस बीच पंजाबी के मशहूर लेखक एस बलवंत ने दोनों नामचीन लेखिकाओं के बीच चल रहे झगड़े को सुलझाने के लिए कोशिशें की थीं. बलवंत ने कहा था :

यह केस किसी के लिए भी फायदे का सौदा नहीं है. कृष्णा जी का पैसा और ताकत इसमें बर्बाद हो रही है, तो दूसरी तरफ, अमृता नींद न आने के रोग की शिकार हो गई हैं और तमाम तरह के ज्योतिषियों के पास अपनी परेशानी का हल तलाशने लगी हैं.

बहरहाल, केस में अदालत का फैसला अमृता के गुज़रने के छह साल बाद 2011 में अमृता के पक्ष में रहा. तब कृष्णा ने खुद माना था कि इतने सालों में लड़ाई इतनी लंबी खिंच गई कि इसकी गंभीरता नहीं रही और यह मज़ाक बनकर रह गई. वहीं, इसे सिद्धांत की लड़ाई कहने वाली कृष्णा के समर्थन में तब भी बाजपेयी ने कहा था कि फैसला उन्हें मायूस करने वाला रहा.

आरएसएस से कितना चिढ़ती थीं कृष्णा?
अमृता के खिलाफ कानूनी जंग के बीच कृष्णा कई मामलों में कोर्ट केस की धमकी देने लगी थीं. एक किस्सा और सुर्खियों में था जब एक युवा लेखक कायनात काज़ी ने रिसर्च के बाद किताब 'कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज' शीर्षक से लिखी थी. किताब प्रकाशित हुई और काज़ी ने इसकी लॉंचिंग कला जगत में प्रसिद्ध सच्चिदानंद जोशी और दूरदर्शन से जुडत्रे विजय क्रांति के हाथों करवाने का कार्यक्रम आयोजित किया.

काज़ी जब निमंत्रण पत्र लेकर कृष्णा के पास गईं तो कृष्णा बुरी तरह भड़कीं. 'तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, मेरी किताब को संघियों से लॉंच करवाने की! अगर तुमने ऐसा करवाया तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. और खबरदार, ऐसे किसी कार्यक्रम में मेरा नाम भी लिया तो..' फिर कृष्णा ने काज़ी को कोर्ट केस की धमकी भी दी. बुरी तरह घबराई काज़ी ने वो कार्यक्रम रद्द करवा दिया.

कुछ और किस्से, जो याद आते हैं
कृष्णा के इसी तरह के सख़्त और तेज़तर्रार मिज़ाज से जुड़ा एक किस्सा अवॉर्ड वापसी का था. 2015 में, वो कृष्णा ही थीं जिन्होंने हिंदी साहित्यिक बिरादरी की ओर से देश में असहिष्णुता के खिलाफ आवाज़ उठाई थी. कड़े शब्दों में धार्मिक कट्टरपंथ और हिंसात्मक घटनाओं का विरोध करते हुए अपना साहित्य अकादमी अवार्ड वापस कर दिया था. इसके बाद कई साहित्यकारों ने अपने अवॉर्ड लौटाए थे.

स्वभाव ही नहीं, अपने बोल्ड लेखन से भी कृष्णा सुर्खियों में रहीं. उनका 'मित्रो मरजानी' उपन्यास जब 60 के दशक में आया, तब ऐसे उपन्यास न के बराबर लिखे जाते थे. महिलाओं को इतना बोल्ड दिखाने का साहस लेखक नहीं करते थे. लेकिन कृष्णा ने महिलाओं के नज़रिए को समाज को दिखाने की हिम्मत की. सेक्सुलिटी पर खुलकर बात की और उनके बोल्ड कैरेक्टर आज भी स्त्री विमर्श में याद किए जाते हैं. (news18.com)


10-Dec-2020 10:45 AM (701)

'पहाड़ों की यातनाएं हमारे पीछे हैं, मैदानों की हमारे आगे.' जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त की यह काव्य पंक्ति मंगलेश डबराल को बहुत प्रिय थी और अक्सर वे इसे दोहराया करते थे.

ऐसा लगता था जैसे पहाड़ों पर न रह पाने और मैदानों को न सह पाने का जो अनकहा दुख है, उसमें ये पंक्तियां उन्हें कोई दिलासा देती हों.

लेकिन अगर दुख था तो वह उनके भीतर था. वे उसे जीवन के कार्य-व्यापार में बाहर नहीं आने देते थे. कातर पड़ना जैसे उन्हें गवारा नहीं था. एक रात साढ़े तीन बजे गाज़ियाबाद के वसुंधरा के एक निजी अस्पताल में भर्ती होने से पहले जिस जनसत्ता सोसाइटी में वे मेरे पड़ोसी थे, वहां हर रोज़ सुबह मैं उन्हें एक झोला लेकर निकलते देखा करता था.

इन दिनों हमारी लगभग रोज़ बात हो रही थी. मुझे मालूम था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है. उनको भी बुखार था और उनकी पत्नी और बेटी को भी. उन्होंने बेटी की कोविड जांच कराई और जब पता चला कि उसे कोविड नहीं है तो मान लिया कि उनको भी नहीं होगा.

यह वह ज़िद थी, ख़ुद को कमज़ोर और बीमार न मानने की, जो अंतिम समय में उनके लिए आत्महंता लापरवाही में बदल गई. वसुंधरा के अस्पताल में वे क़रीब दस दिन लड़ते रहे, उसके बाद उन्हें उनके आग्रह पर एम्स ले जाया गया. लेकिन सिगरेट से पहले से छलनी उनके फेफड़ों पर कोरोना का हमला सांघातिक साबित हुआ.

फिर उनकी किडनी ने उनका साथ देना बंद किया. बुधवार की शाम डायलिसिस की कोशिश हुई, लेकिन इस बार हृदय इसे झेल न पाया. दो दिल के दौरों के साथ वह कहानी ख़त्म हो गई जो एक पहाड़ से चली, कई पहाड़ों और समंदरों के पार गई और अंततः सबको रुला गई.

लेकिन जिस आत्मघाती ज़िद ने उनकी जान ली, शायद यही वह चीज़ थी जिसे लेकर वे उत्तराखंड के गढ़वाल के काफलपानी से कभी उतरे थे और जिसे झोले की तरह लिए जैसे उम्र भर चलते रहे.

विरोध की मार्मिक आवाज़

सत्तर और अस्सी के दशकों में नक्सल आंदोलन से प्रेरित-प्रभावित हिंदी कविता को उन्होंने 'पहाड़ पर लालटेन' जैसा अद्भुत संग्रह दिया और बताया कि बहुत तीखे क्रोध और विरोध को कैसे मार्मिक और मद्धिम आवाज़ में भी पूरी तीव्रता से व्यक्त किया जा सकता है, बल्कि उसमें सुलगते-कौंधते रूपकों और बिंबों की मार्फ़त कैसे अर्थों की नई तहें पैदा की जा सकती हैं. उन अर्थों की, जो एक बहुत संवेदनशील जीवन की जुगनू जैसी ख़ुशियों और असमाप्त होते दुखों के बीच बनते थे.

अब वे हिंदी के कवि थे. दिल्ली से लेकर इलाहाबाद तक मैदानों में अपना ठिकाना तलाश रहे थे. अलग-अलग अख़बारों में काम करते हुए और अंततः 'जनसत्ता' और दिल्ली को अपना डेरा बनाते हुए.

लेकिन 'घर का रास्ता' उन्हें जैसे हमेशा पुकारता रहा. यह उनका दूसरा संग्रह था जिसे उनके पिता ने देखा तो कहा कि तूने घर का रास्ता तो लिखा, लेकिन घर का रास्ता भूल गया. इस उलाहने में जो उदासी शामिल थी, वह बेशक दूसरी तरफ़ ज़्यादा गाढ़ी थी.

लेकिन मंगलेश डबराल के निजी और सार्वजनिक जीवन की यातनाएं और परीक्षाएं और भी थीं. नब्बे के दशक की सोवियतविहीन एकध्रुवीय होती दुनिया में जब पूंजीवाद और सांप्रदायिकता के नाख़ून लगातार लंबे और तीखे हो रहे थे तो मंगलेश जी फिर अपनी कविता में इनके ख़िलाफ़ खड्गहस्त थे. वे स्मृतियों की मानवीयता के सहारे जैसे एक युद्ध लड़ने की तैयारी में थे.

'आवाज़ भी एक जगह है' की कविताएं पिछले संग्रहों से काफ़ी अलग थीं और बहुत सारी पुरानी आवाज़ों, पुराने दृश्यों को समेटने वाली थीं- उन्हें पुराने संगतकार याद आ रहे थे, लोकगायक याद आ रहे थे और वह बहुत कुछ याद आ रहा था जिसने उन्हें मनुष्य बनाया था. 'नए युग में शत्रु' तक आते-आते उनका पुराना तीखा स्वर फिर लौटता दिखता है और वे बाज़ार के आकृतिविहीन-मायावी आक्रमण की जैसे एक-एक रग को उजागर करने पर तुले हैं.

जीवनकाल का आख़िरी संग्रह

इस बीच अंतरराष्ट्रीय पटल और भारतीय परिदृश्य पर सांप्रदायिकता का ऐसा दौर शुरू हो चुका था जिसकी एक परिणति 2002 की गुजरात हिंसा के रूप में सामने आई थी. उस विह्वल-व्यथित कर देने वाली परिघटना पर हिंदी के बहुत सारे कवियों ने कविताएं लिखीं, लेकिन जो मंगलेश डबराल ने लिखा- 'गुजरात के एक मृतक का बयान'- वह जैसे हमारे भीतर एक सिहरन पैदा करने वाला था. कविता की बीच की पंक्तियां हैं-

'मेरे जीवित होने का कोई बड़ा मक़़़सद नहीं था / और मुझे मारा गया इस तरह जैसे मुझे मारना कोई बड़ा मक़़सद हो / और जब मुझसे पूछा गया तुम कौन हो? / क्या छिपाए हुए हो अपने भीतर एक दुश्मन का नाम / कोई मज़़हब कोई तावीज़ / मै कुछ कह नहीं पाया मेरे भीतर कुछ नहीं था / सिर्फ़ एक रंगरेज एक मिस्त्री एक कारीगर एक कलाकार एक मजूर था / जब मैं अपने भीतर मरम्मत कर रहा था किसी टूटी हुई चीज़़ की / जब मेरे भीतर दौड़ रहे थे एल्युमीनियम के तारों की / साइकिल के / नन्हे पहिये / तभी मुझ पर गिरी एक आग बरसे पत्थर / और जब मैंने आख़िरी इबादत में अपने हाथ फैलाये / तब तक मुझे पता नहीं था बन्दगी का कोई जवाब नहीं आता.'

फरवरी, 2020 में मंगलेश डबराल का वह संग्रह आया जो उनके जीवनकाल का आख़िरी संग्रह साबित हुआ. 'स्मृति एक दूसरा समय है.' अपने पिछले संग्रह 'नये युग में शत्रु' में मंगलेश डबराल ने बाज़ार के जिस मायावी संसार को अचूक ढंग से पहचाना था, उसके प्रतिनिधियों की शिनाख़्त इस संग्रह में भी खूब है- 'वे गले में सोने की मोटी ज़ंजीर पहनते हैं / कमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैं / और मोबाइलों पर बात करते हैं / वे एक आधे अंधेरे और आधे उजले रेस्तरां में घुसते हैं / और खाने और पीने का ऑर्डर देते हैं / वे आपस में जाम टकराते हैं / और मोबाइलों पर बात करते हैं'.

हिंदी कविता की परंपरा में मंगलेश डबराल का मोल इन संक्षिप्त उल्लेखों से नहीं समझा जा सकता. वे असंदिग्ध तौर पर राजनीतिक कवि थे, बाज़ार, पूंजीवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध थे, लेकिन उनमें एक अजब सी मानवीय ऊष्मा थी- अंग्रेज़ी में जिसे ग्रैंड ह्यूमैनिटी बोलते हैं- कुछ वैसी चीज़ जो अचानक इन कविताओं को एक सभ्यतामूलक विमर्श का माध्यम बना डालती थी.

हम पाते थे कि मंगलेश जी की कविताएं जितने राजनीतिक आशय दे रही हैं, उतने ही सांस्कृतिक, पारिवारिक, प्रेमिल और मानवीय अभिप्राय भी- ये विराट विमर्शों वाली नहीं, सूक्ष्म व्यंजनाओं वाली कविताएं हैं जो हमें चुपचाप बदल रही हैं.

मंगलेश गद्यकार भी उतने ही कमाल के थे. 'एक बार आयोवा', 'लेखक की रोटी' और ऐसी ही ढेर सारी कृतियों का विलक्षण गद्य बताता है कि हम भाषा को इस तरह कैसे बरतें कि वह हमेशा एकाधिक अर्थ प्रकाशित करती हुई सरल रेखा में बनी रहे.

उनके यात्रा संस्मरणों की हाल में आई किताब 'एक सड़क एक जगह' को पढ़ना शहरों को, देशों को, दुनिया को एक नई आंख से देखना है- ऐसी पारदर्शी नज़र से जिसमें शहरों की कायाएं ही नहीं, आत्माएं भी साफ-साफ़ दिखने लगती हैं. पेरिस के बारे में वे कुछ इस तरह लिखते हैं-

'शायद पेरिस के भीतर जितना पेरिस है उससे कहीं ज़्यादा बाहर है. पूरी दुनिया में उसकी जगहें, वस्तुएं, उसके लोग और विचार फेले हुए हैं और पेरिस उन सभी चीज़ों के भीतर फैला हुआ है. वह प्रतीकों की भाषा में बात करता है. घटनाएं, चीज़ें, जगहें, संस्कृति, रहन-सहन सबकुछ. यहां तक कि लोग और विचार भी पेरिस के ब्रांड हैं.'

संपादक और अनुवादक के रूप में

वैसे उनका कोई भी परिचय तब तक अधूरा रह जाएगा जब तक उनके संपादक और अनुवादक रूप की चर्चा न हो. वे बहुत अच्छे अनुवादक थे.

दुनिया के कई बड़े कवियों की कविताओं का उन्होंने बिल्कुल मर्म पकड़ने वाला अनुवाद किया. कुछ साल पहले अरुंधती राय के दूसरे उपन्यास 'मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस' का उनका अनुवाद भी खूब सराहा गया.

पत्रकार और संपादक भी वे विलक्षण थे. बहुत तेज़ी से कॉपी पढ़ते थे और उससे भी तेज़ी से संपादित करते थे. उनके शीर्षकों, उनकी सामग्री- सबमें एक सुचिंतित चयन दिखता. 'जनसत्ता' के बेहतरीन दिनों में जो 'रविवारी जनसत्ता' उन्होंने निकाला, उसका कोई जवाब नहीं था. बाद में 'सहारा समय' का संपादन करते हुए भी उन्होंने कई संग्रहणीय अंक निकाले.

मेरा सौभाग्य था कि वे मेरे पड़ोसी भी रहे और एक दौर के वरिष्ठ सहकर्मी भी. एक मनुष्य के रूप में, एक लेखक के रूप में और एक पत्रकार के रूप में उनको देखने के बहुत सारे अवसर मिले.

वे संवादरत रहते थे और अपने बाद की पीढ़ी के लेखकों-कवियों से उनका संवाद संभवतः दूसरे लेखकों-कवियों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा था. बेशक, उनमें कमज़ोरियां थीं जो हम सबमें होंगी, लेकिन अपने सर्वोत्तम क्षणों में उन जैसी मानवीय आभा वाला मनुष्य मिलना मुश्किल था.

इस साल कोविड ने बहुत दुख दिए, कई तरह से व्यक्ति और समाज के रूप में हमें तार-तार कर गया, लेकिन जाते-जाते इस मानवीय आभा से वंचित कर उसने ऐसा वार किया है जिससे बना ज़ख़्म कभी नहीं जाएगा.

वे जीवन के ख़ाली और खोखले होते जाने को भी पहचानते थे. अपने अंतिम कविता संग्रह की एक कविता 'समय नहीं है' में वे लिखते हैं- 'मैं देखता हूं तुम्हारे भीतर पानी सूख रहा है / तुम्हारे भीतर हवा ख़त्म हो रही है / और तुम्हारे समय पर कोई और क़ब्ज़ा कर रहा है.' (bbc)


17-Oct-2020 6:36 PM (758)

-मृणाल पाण्डे

17 अक्टूबर , सन् 1923 , विजयादशमी के दिन राजकोट स्थित प्रिन्सेज़ कालेज के प्रिन्सिपल अश्विनी कुमार पान्डे के घर उनकी पत्नी लीलावती की कोख से उनकी तीसरी पुत्री और चौथी सन्तान ने जन्म लिया। मकर राशि , मिथुन लग्न , नाम रखा गया गौरा। पितामह ने कहा साक्षात् दुर्गा आयी हैं। पिता ने कहा यह हमारी सरस्वती होगी। माँ एक और बेटी होने से तनिक खिन्न थीं, पर उनको आश्वस्त करते हुए कुल पंडित ने कहा मकर राशि की इस कन्या की जन्मकुन्डली में ग्रहों की स्थिति अद्भुत व प्रथम श्रेणी की है। नाम गौरा रखा गया और बालिका गौरा शेष परिवार के साथ अल्मोड़ा और राजकोट , अल्मोड़ा और रामपुर , अल्मोड़ा और बंगलोर की मिली जुली संस्कृतियों और भाषाई परिवेश के बीच अनेक भाषायें सुनती , घुड़सवारी और संगीत के साथ अक्षर ज्ञान पाती बड़ी हुई।

आठ वर्ष की आयु में बड़ी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ गौरा को रवीन्द्र्नाथ टैगोर की नवस्थापित शिक्षण संस्था शान्ति निकेतन के लिये रवाना किया गया। टैगोर परिवार के साथ कुछ माह बिताने के बाद हंसमुख कुशाग्र बच्चे जल्द ही मातृभाषा कुमाँउनी, तथा हिंदी और गुजराती के साथ धाराप्रवाह बाँग्ला बोलना सीखकर नये परिवेश में रम गये। गौरा ने पहली रचना बांग्ला में की, तो गुरुदेव ने कहा , पढ़ो सब भाषायें, पर लिखो अपनी ही मातृभाषा में, वही सुंदर सहज होगा। गौरा ने बात गाँठ बाँध ली।

जब लिखना शुरु किया तो उपनाम रखा मूल नाम का ही समानार्थी, शिवानी। यह वह ज़माना था जब एक स्त्री के लिये अपने नाम से छपने के लिये लिखना नाना अप्रिय टिप्पणियां न्योतना होता था। उपनाम और कुछ नहीं तो एक तिनके की ओट तो था ही। बारह साल की आयु से शुरु हुई ‘शिवानी’ की यह लेखकीय यात्रा तमाम प्रिय अप्रिय अनुभवों तथा आलोड़नों के बीच उनकी मृत्यु तक, यानी पूरे 67 वर्षों तक जारी रही।

शिवानी की कहानियाँ बीसवीं सदी के भारतीय राज समाज की, और उसके दौरान देश में आये बदलावों के बीच जनता, खासकर स्त्रियों की स्थिति की एक ऐसी विहंगम चित्रपटी हैं, जिसके अंतिम छोर को हम बीसवीं सदी के आखिरी पर्व की तरह पढ़ सकते हैं। इस महागाथा में देश के औपनिवेशिक काल के सामंती पात्रों तथा संयुक्त परिवारों के मार्मिक चित्र भी हैं और उस समय के उदात्त अपरिग्रही समाज सुधारकों तथा शांति निकेतन परिसर से जुड़े विवरण भी, युगों पुरानी रवायतों को जी रहे कुमाऊँ का पारंपरिक सरल ग्रामीण समाज है, तो लखनऊ , कोलकाता तथा दिल्ली जैसे नगरों का अनेक स्तरों पर बंटा, लोकतांत्रिक राजनीति की पेचीदगियों तथा पारिवारिक विघटन के एकदम नये अनुभवों के बीच जी रहा आधुनिक नागर समाज भी।

आज़ादी के बाद के साठ बरसों में देश में उपजे तमाम किस्म के नायक, खलनायक, अच्छे और भ्रष्ट राजनेता, विदूषक, अपराधी, वेश्यायें, दलाल और कुट्टिनियाँ, विदेश जाने को लालायित युवा और उनके पीछे छूटे अभिभावकों की मूक या मुखर व्यथा, सब इन रचनाओं में मौजूद हैं।

शिवानी का कथात्मक फलक मूलत: एक गहरे सौन्दर्य बोध तथा एक स्पष्ट पारंपरिक नैतिकता को लेकर चलता है। आप उनसे असहमत भले हों, उनकी दृष्टि की मूल ईमानदारी या कथाप्रसंग मे बड़ी सहजता से गूँथी गयी परंपरा की व्याख्या को झुठला नहीं सकते। जभी उनका साहित्य आज तक भारत के सभी वर्गों के पाठकों के साथ एक ऐसी कालातीत, तरंग और सहृदय सहभागिता रचता है, जो किसी भी लेखक के लिये स्पृहणीय है।

मूलत: एक बड़ा लेखक समालोचकों, राज्य सम्मान या पुरस्कारों को लक्ष्य बना कर कभी नहीं लिखता, अपनी अन्त: प्रवृत्तियों के दबाव से, अपनी अंतरात्मा को साक्षी मान कर लिखता है। इसलिये हर युग में सत्ता से या समाज से या दोनों से उसका टकराव हुआ है। पर यदि ईमानदार लेखन से किसी का परोक्ष समर्थन या विरोध होता दिखता भी हो, उसके लिये लेखक को निन्दा या प्रशंसा का पात्र बनाना साहित्य की अंत: प्रवृत्ति को अनदेखा करना है।

आखिर प्रेमचंद ने मार्क्स को खुश करने, निराला ने अपनी जयंती मनवाने या निर्मल वर्मा ने अनिवासी भारतीयों का चौधरी बनने को तो नहीं लिखा था। लोग बाग भले ही उनको विचारधारा विशेष का प्रतीक मानने बैठ गये हों, सच तो यही है कि इस किस्म की सीमित पक्षधरता राजनीति का गुण होती है, साहित्य का नहीं। एक साहित्यकार अगर कोई हलफनामा उठाता है, तो सिर्फ मनुष्यता के नाम। शिवानी ने भी यही किया।

शिवानी का जीवन और साहित्य दिखाते हैं कि देश में स्त्री स्वाधीनता की एक कितनी खामोश लड़ाई पिछली सदी में शुरू हो गई थी। और जिन स्त्रियों ने अगली पीढ़ी के लिये राह बौद्धिक क्षेत्र में प्रशस्त की, उन्होंने इस लड़ाई में निजी स्तर पर कितना कुछ चुपचाप सहा और झेला था। पर उन स्त्रियों की इस प्राय: पारिवारिक वजहों से मूक, लगभग अलिखित दास्तान की प्रत्यक्षदर्शी रही हर लेखिका जानती है कि यह लड़ाई पुरुषों या परिवार व्यवस्था के खिलाफ नहीं, जैसा कि प्रचारित किया गया, बल्कि उस आत्म वंचना और छद्म परंपरावाद के खिलाफ थी, जिसके पीछे तब से आज तक पुरुष निर्मित तथा पोषित धर्म, राजकीय सत्ता और अर्थनीति की बर्बर ताक़तें खड़ी हैं।

इन ताकतों की समवेत युति ने सदियों से स्त्री ही नहीं समाज के हर कमज़ोर वर्ग के लिए पराधीनता की काराएँ घर से सड़क तक रची हैं। स्त्रियों या कमज़ोर वर्गों के सशक्तीकरण के नाम पर की जाने वाली थोथी राजनैतिक तलवार भँजाई या बाज़ार की विज्ञापनी नारेबाज़ी से उन काराओं का कुछ नहीं बिगड़ सकता। उनके खिलाफ महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान और शिवानी तथा उनकी परवर्ती पीढ़ी की लेखिकाओं का साहित्य ही सही मोर्चा रचता है। स्त्री या कमज़ोर वर्गों की शक्ति का यह अपमानजनक अवमूल्यन चूँकि विद्या के, चिन्तन के क्षेत्र से उनकी लंबी बेदखली ने किया है, उसी क्षेत्र में बहाल हो चुकी स्त्रियों द्वारा उसकी सही पहचान की गयी और उसका सही प्रतिकार किया जाना संभव हुआ है।

अंतत: हर बड़ा लेखक परंपरा का महत्व स्वीकार करता है, उस परंपरा का, जिसमें न सिर्फ बुनियादी मूल्यों का स्वीकार है, बल्कि उन मूल्यों के हनन की स्वीकृति भी है जो बासी पड़ कर हटाने के क़ाबिल हो गये हैं। इस मायने में शिवानी जैसा लेखन न केवल अतीत का प्रात:स्मरण, बल्कि वर्तमान के घटिया अंशों के विरुद्ध खड़ा एक दुर्ग भी बन जाता है। वह ऊपरी जीवन के भीतर छुपा एक अन्य जीवन है, जिसके बिना भारतीय जीवन का कोई भी ब्योरा अपूर्ण और बेमानी है।

वर्ण और धर्म से परे हट कर पात्रों की मानवीयता से साक्षात्कार, शिवानी के भावबोध की विशिष्टता है। उनकी रचनाओं के विधर्मी पात्र भी : ईसाई, मुसलमान, पारसी तथा समाज के परित्यक्त व तथाकथित पथभ्रष्ट लोग : वेश्याएँ, डकैत, हत्यारे, हिजड़े, कोढ़ी तथा भिखारी, सब उनकी पूरी सहानुभूति पाते हैं। शिवानी के लेखन की सफलता यह है कि वह न तो अपने चारों ओर के यथार्थ से घृणा करता है, न भावुकता भरा प्रेम, वह जीवन को समग्रता से समझने की और उसे समझाने की एक ईमानदार कोशिश करता है, उनके प्रिय तुलसी के शब्दों में :(navjivan)


09-Oct-2020 9:37 AM (511)

ग्लिक की कविताएं मानवीय दर्द, मौत, बचपन, परिवार की पृष्ठभूमि

साहित्य के लिए इस साल का नोबेल पुरस्कार अमरीकी कवयित्री लुईस ग्लिक को दिया गया है.

नोबेल सम्मान देने वाली स्वीडिश अकादमी ने कहा कि 'ग्लिक की कविताओं की आवाज़ ऐसी है जिनमें कोई ग़लती हो ही नहीं सकती और उनकी कविताओं की सादगी भरी सुंदरता उनके व्यक्तिगत अस्तित्व को भी सार्वलौकिक बनाती है.'

अकादमी ने बताया कि जब उन्हें फ़ोन करके ये जानकारी दी गई तो वह 'आश्चर्यचकित'हो गईं.

ग्लिक का जन्म न्यूयॉर्क में साल 1943 में हुआ था. वह अमरीका के मैसेच्युसेट्स शहर में रहती हैं और फ़िलहाल येल विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर हैं.

साल 2010 से लेकर अब तक वह चौथी ऐसी महिला हैं जिन्हें साहित्य का नोबेल पुस्कार दिया गया है. नोबेल की शुरूआत साल 1901 में हुई और तब से लेकर अब तक वह ये सम्मान पाने वाली 16वीं महिला हैं.

आख़िरी बार साल 1993 में अमरीकी लेखिका टोनी मरिसन को 1993 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया था.

ग्लिक को साल 1993 में पुलित्ज़र पुरस्कार उनकी रचना 'द वाइल्ड आइरिश' के लिए दिया गया था. साल 2014 में उन्हें नेशनल बुक अवॉर्ड से नवाज़ा गया.

साल 2008 में ग्लिक को वालेस स्टीवेंस पुरस्कार, 2001 में उन्हें बोलिंजन प्राइज़ फ़ॉर पोएट्री और 2015 नेशनल ह्युमेनिटीज़ मेडल दिया गया.

ग्लिक की कविताएं मानवीय दर्द, मौत, बचपन और परिवार की पृष्ठभूमि और उनकी जटिलताओं को बयां करती हैं.

अपनी रचनाओं में वह ग्रीक पौराणिक कथाओं और उसके पात्रों, जैसे- पर्सपेफोन और एरीडाइस से भी प्रेरणा लेती हैं, जो अक्सर विश्वासघात का शिकार होते हैं.

अकादमी ने कहा कि उसका 2006 का संग्रह एवर्नो एक 'उत्कृष्ट संग्रह' था.

नोबेल पुरस्कार कमेटी के अध्यक्ष एंड्रेस ऑल्सन ने कवियत्री की तारीफ़ करते हुए कहा कि 'उनके पास बातों को कहने का स्पष्टवादी और समझौता ना करने वाला अंदाज़ है जो उनकी रचनाओं को और बेहतरीन बनाता है.'

ग्लिक 1993 में 'बेस्ट अमेरिकन पोएट्री' की संपादक रहीं थीं. उन्होंने 2003-04 से कांग्रेस की लाइब्रेरी में पोएट लिट्रेचर कंसल्टेंट के रूप में काम किया था.(bbc)


24-Sep-2020 2:09 PM (590)

-रमाकांत श्रीवास्तव

करोना काल में पढऩे और मनपसंद फिल्में देखकर समय अधिक गुजारा। सत्यजीत राय मेरे सर्वाधिक प्रिय फिल्मकार हैं। उनकी अधिकांश फिल्में मेरी देखी हुईं हैं। उन्हें दुबारा देखकर उनकी अद्भुत दृष्टि और जीवन सौंदर्य को चित्रित करने की उनकी क्षमता को और बेहतर समझने की कोशिश की। कल एक बार फिर अपनी पसंदीदा फिल्म ‘महानगर’ देखकर आंनद लिया। इस फिल्म पर दो शब्द कहने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूं।

नरेंद्र नाथ की रचना पर आधारित ‘महानगर’ फिल्म सत्यजीत राय की ही पटकथा, संगीत और उनके निर्देशन में पूर्णता प्राप्त करती है। राय ने अपनी अधिकांश फिल्मों में यह पद्धति अपनाई है। 1963 में बनी इस फिल्म को 1964 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए सिलवर बियर पुरस्कार से अलंकृत किया गया था।

राय ने हमेशा अपने समकाल और अपने परिचित परिवेश को अपनी रचना का आधार बनाया। महानगर कलकत्ता के मध्य वर्ग को केंद्र में रख कर बनाई गई महान कृति है। अनिल चटर्जी और माधवी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मजूमदार परिवार की आर्थिक मुश्किलों, अंतद्र्वंंद्व, रिश्तों की खूबसूरती को बेहद सहजता और सूक्ष्मता से चित्रित करती है। राय की अपनी कृति पर अद्भुत पकड़ आश्चर्य में डालने के साथ ही विभोर करती है। फिल्म की कहानी में घर की हालत को बेहतर बनाने में सहायक होने के लिए पत्नी एक कम्पनी में सेल्स गर्ल की नौकरी करती है। इसी बीच पति की नौकरी भी छूट जाती है। जिस बैंक में उसकी नौकरी थी वह दिवालिया हो जाता है।

घटनाओं को बेहद संक्षिप्त संकेतों में समेटते हुए दो बिंदुओं को मैं रेखांकित करना चाहता हूं। फिल्म बिना किसी अतिरिक्त सैद्धांतिक आवेग के स्त्री के साहस और सत्यनिष्ठा का चित्रण करती है। श्रीमती मजूमदार (नायिका माधवी मुखर्जी) अपनी सहयोगी एक एंग्लो इंडियन सेल्स गर्ल के प्रति बॉस के दुव्र्यवहार के विरोध में खड़ी होती है। बॉस एंग्लो इंडियन गर्ल को नापसंद करता है क्योंकि वह बंगाली नहीं है। श्रीमती मजूमदार से वह कहता भी है कि आप बंगाली होकर मेरे विरोध में उसका समर्थन कर रही हो? जब नायिका कहती है कि आप उससे माफी मांगे तब बॉस का कथन है- ऐसे सवाल टेबल के उधर से नहीं टेबल के इस तरफ से किए जाते है। श्रीमती मजूमदार अपना त्याग पत्र देकर आफिस से निकल जाती है।

फिल्म का आखरी दृश्य अनोखा हैं। नायिका जब सीढिय़ों से उतरने के लिए आफिस से बाहर आती है तब उसे लगता है कि घर की गंभीर आर्थिक स्थिति में उसकी आय ही एक मात्र संबल थी अब उसका पति नाराज होगा। वह रोती हुई नीचे उतरती है। उसका पति उसे लेने आता है। वह रोने का कारण पूछता है। पत्नी कहती है तुम जरूर मुझसे नाराज होंगे। किन्तु कारण सुनने के बाद पति कहता है कि तुमने सत्य का पक्ष लेकर विरोध किया। सही किया है इसलिए दुख मत करो। फिर महानगर की ओर देख कर कहता है- क्या इतने बड़े महानगर में हमें कोई दूसरा काम नहीं मिलेगा।

पति-पत्नी साथ-साथ भीड़ भरी सडक़ की ओर बढ़ते है। कैमरा पीछे सरकता है और लांग शॉट में वे दोनों भीड़ में समा जाते है। फिल्म संवेदनशील दर्शक के मन में सवाल छोड़ जाती है कि क्या उन्हें दूसरी नौकरी मिलेगी? क्या साहस का कोई प्रभाव होता है? क्या टेबल के इधर और उधर की स्थिति यही बनी रहेगी? 
50 साल के बाद भी ये सवाल जस के तस हैं। फिल्म के और भी कई महत्व पूर्ण पहलू हैं। मैंने केवल उसके केंद्रीय भाव को सामने रखा है। इतने वर्षों के बाद इस फिल्म को शायद तीसरी बार देख कर मन में यह ख्याल आया कि हमारा समाज आज भी कहां खड़ा है! महानगर तो छोडि़ए कस्बों, गांवों तक का आसमान इन प्रश्नों से आक्रांत है।

अंत में एक दिलचस्प बात। सत्यजीत राय ने इसका जिक्र किया है कि उनके एक प्रशंसक ने उन्हें लिखा कि अंतिम दृश्य में आपने एक अनोखा संकेत दिया है। लॉन्ग शॉट में दिखलाया गया है कि बिजली के एक खंबे के दो लाइट में एक जल रही है और एक बुझी है। राय ने मजा लेते हुए बतलाया है कि दरअसल यह तो महानगर का बिजली विभाग ही बतला सकता है कि ऐसा क्यों हुआ था।


09-Sep-2020 10:37 AM (564)

9 सितंबर 1950 में पाश का जन्म पंजाब के जालंधर में हुआ था. बीसवीं सदी के सबसे प्रभावी पंजाबी कवि माने जाने वाले पाश की कविताओं में विद्रोह के स्वर साफ सुनाई पड़ते हैं.

अपनी पहली कविता संग्रह के बाद से ही उन्हें क्रांतिकारी कवि के नाम से जाना जाने लगा था.

23 मार्च यानी भगत सिंह को जिस दिन फांसी दी गई थी, उसी दिन ख़ालिस्तानी उग्रवादियों ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी.

पाश की उनहत्तरवें जन्मदिन पर उनके करीबी मित्र रहे अमरजीत चंदन से ख़ास बातचीत की बीबीसी रेडियो संपादक राजेश जोशी ने

अमरजीत चंदन की यादों में पाश

मेरे और पाश के बीच ख़ास क़िस्म का रिश्ता रहा है. वो हमारे बेहद घनिष्ठ मित्र थे. हम आसपास ही रहते थे.

मैं तो रोज़ उन्हें किसी न किसी बहाने याद करता हूं.

मैंने कहीं लिखा भी है कि जो बड़े लोग होते हैं, जिनको बड़ी संख्या में लोग प्यार करते हैं, उनका जन्मदिन तो होता है पर मरन दिन नहीं होता.

मेरे लिए भी वो आज भी ज़िंदा हैं.


चंदन के साथ पाश

पाश की हत्या 1988 में की गई थी और उनकी वो कविता बहुत ज़्यादा प्रसिद्ध है कि "सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना..."

इस कविता की पृष्ठभूमि बहुत कम लोगों को पता है.

ये कविता पाश ने तब लिखी थी जब वो अमरीका जाकर पेट्रोल पंप में काम करने लगे थे, तब उन्हें ऐसा लग रहा था कि कहीं उनके अपने सपने मर तो नहीं रहे हैं.

जिस वक़्त हमलोगों ने लिखना शुरू किया था, वो बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था, ना सिर्फ़ पंजाब बल्कि पूरे हिंदुस्तान में.

यह छठे दशक की बात है, जब नक्सलबाड़ी की लहर चली थी. पूरे यूरोप, पेरिस और वियतनाम जंग ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्साह का माहौल बनाया था.

हम उस वक़्त में पले-बढ़े थे. क्रांति हमारे दिलो-दिमाग़ पर थी.

मैं मज़ाक़ में कहा करता हूं कि हर प्रगतिशील कवि को कम से कम दो महीने मेहनत वाला काम करवाना चाहिए, चाहे वो पेट्रोल पंप पर हो या फिर रेस्टोरेंट में.

जो क्रांति वो मन में लिए चलते हैं, समाज को बदलने का जज़्बा लिए घूमते हैं, कठिन काम करने के बाद उनके पांव ज़मीन पर पड़ते हैं.

AMARJEET CHANDAN

इस समय जो राजनैतिक और साहित्यिक स्थिति है, वो पहले से संकटग्रस्त है लेकिन मेरी नज़र में कम से कम पंजाब में कोई ऐसा कवि नहीं है जो पाश की परंपरा को आगे बढ़ा रहा हो.

पाश के देहांत के बाद मैंने उनकी याद मे एक कविता लिखी थीः

सूरज ऊंचा हो गया शिखर दोपहरे

जल विच रोवन मछियां शिखर दोपहरे

एक तारा टूंटा अंबरों शिखर दोपहरे

रात गमां दी छा गई शिखर दोपहरे

टुट्टी रांझे दी वँझली...

मैं कई बार सोचा करता हूं जॉन लेनन एक महान गीतकार थे, जिनके हत्यारे भी उनके प्रशंसक थे. पाश के हत्यारे भी प्रशंसक रहे हों, कौन जानता है?(bbc)


07-Sep-2020 9:13 AM (609)

बीबीसी की लूसी एश ने अल्बर्ट कामू के नोवल 'द प्लेग' और मौजूदा कोरोना वायरस के बीच की चौंकाने वाली समानाताओं पर नजर डाली हैं और देखा है कि कैसे अल्जीरिया राजनीतिक उथल-पुथल के बीच इस महामारी का सामना कर रहा है.

हालांकि, इसे छपे 73 साल हो चुके हैं, लेकिन 'द प्लेग' आज भी एक न्यूज बुलेटिन जैसी फीलिंग देता है. पूरी दुनिया की बुकशॉप्स पर यह किताब आज मौजूद है क्योंकि रीडर्स कोविड-19 को इस किताब के जरिए समझने की कोशिश कर रहे हैं.

मोहम्मद-बोडिआफ हॉस्पिटल में अपने दफ्तर में बैठे प्रोफेसर सालाह लेलोऊ कहते हैं कि वे बुरी तरह से थक गए हैं. ओरान में कोरोना वायरस के काफी मरीज इस अस्पताल में इलाज के लिए आते हैं.

अल्जीरिया के दूसरे शहर में टीबी के एक एक्सपर्ट के तौर पर लेलोऊ महीनों से लगातार काम कर रहे हैं. वे आधी रात से पहले शायद ही हॉस्पिटल छोड़कर जा पाते हैं.

"मरीज बेहद खराब हालात में आते थे. मरीज से लेकर स्टाफ तक हर कोई बेचैन था. हमारे लिए यह बेहद बुरा वक्त था. हमें नहीं पता कि हम इसके पीक पर पहुंच चुके हैं या नहीं, या क्या इसकी कोई दूसरी लहर भी आएगी क्योंकि फिलहाल मामलों में एक बार फिर तेजी आ रही है."

उपन्यास ने ताजा कीं डरावनी यादें

मिस्र और दक्षिण अफ्रीका के बाद तीसरे सबसे बुरी तरह प्रभावित देश के तौर पर अल्जीरिया में कोरोना के 43,016 मामले आए हैं. इससे अब तक 1,475 मौतें हुई हैं.

फरवरी अंत में संक्रमण का पहला मामला सामने आने के बाद से अल्जीरिया ने एक सख्त लॉकडाउन लागू कर दिया था और अभी भी देश के ज्यादातर हिस्से में रात का कर्फ्यू लागू है.

अपनी खिचड़ी मूछों और झड़ रहे बालों के साथ प्रो. लेलोऊ कैमस के हीरो डॉ. बरनार्ड रीअक्स से बूढ़े दिखते हैं, लेकिन वह भी अपने मरीजों को लेकर उतने ही प्रतिबद्ध हैं. ओरान में बाकी बहुत लोगों से उलट वे इस किताब से वाकिफ हैं. इस उपन्यास में उनके होमटाउन का जिक्र है और वे तकरीबन इसे डरे हुए दिखाई देते हैं.

वे कहते हैं, "इस महामारी के दौरान अल्बर्ट कैमस के 'द प्लेग' में जिक्र से हम इस बारे में सोचना बंद नहीं कर पा रहे हैं. ज्यादातर मरीज बेहद डरे हुए थे. बहुत ज्यादा अफवाहें फैल रही थीं."

राजधानी अल्जीयर्स के पूर्व में मौजूद बोइरा में एक हॉस्पिटल के डायरेक्टर को कोविड-19 से मरे एक मरीज के रिश्तेदारों ने गुस्से में घेर लिया था. वे बचने के लिए दूसरी मंजिल पर मौजूद अपने दफ्तर की खिड़की से कूद गए और उन्हें कई फ्रैक्चर आए.

'आपदा के हकदार'

प्रो. लेलोऊ कहते हैं, "कोरोना वायरस और कैमस के प्लेग में एक समानता थी. लोगों ने प्रशासन को दोषी ठहराना शुरू कर दिया था."

कामू के उपन्यास में, ओरान के बाहरी इलाके में स्थित कैथेड्रल सैकर-कोइयर- अब एक पब्लिक लाइब्रेरी- में कैथोलिक पादरी फादर पैनेलक्स ने उत्तेजक भाषण दिया था. वे इस उपन्यास में भाषण में भीड़ से कहते हैं कि वे उन पर आई इस आपदा के हकदार हैं.

कोरोना वायरस महामारी के चलते अल्जीरिया की मस्जिदें बंद हैं और शेख अब्देलकादेर हामोया जैसे धार्मिक नेताओं ने स्वास्थ्य संबंधी संदेश और तकरीरें ऑनलाइन दी हैं.

एक प्रोग्रेसिव के तौर पर उनकी प्रतिष्ठा है, लेकिन जब वे महामारी के मतलब को बताते हैं तो वे कामू के 1940 के जेसुइट पादरी के जैसे दिखते हैं.

वे कहते हैं, "जहां तक मेरी बात है, तो यह अल्लाह का उसे मानने वालों, और सभी लोगों के लिए एक संदेश है कि उसकी ओर वापस लौटें. यह जागने का संदेश है."

वायरस से विरोध प्रदर्शन रुके

कई अल्जीरियाई लोगों ने बताया है कि उन्हें कोरोना वायरस से कम डर लग रहा है और उन्हें ज्यादा डर इस बात का है कि अधिकारी इसका इस्तेमाल दूसरे मकसद हासिल करने में कर रहे हैं. महामारी के कारण पूरी दुनिया में आए ठहराव से पहले अल्जीरिया में शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहे थे.

इन्हें अरबी में हिराक या आंदोलन कहा जाता है. इसी आंदोलन की वजह से 20 साल तक सत्ता में रहने के बाद राष्ट्रपति अब्देलअजीज बोतेफ्लिका को अप्रैल 2019 में अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ गई थी.

तमाम जश्न के बावजूद उम्रदराज राष्ट्रपति की जगह भरने के लिए जितने भी उम्मीदवार थे वे सभी उनके ही पुराने वफादार थे. बड़े पैमाने पर चुनावों का बहिष्कार होने के बाद दिसंबर में एक पूर्व प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति बनाया गया.

अब्देलमादिजिद तेबोन ने वादा किया कि वे हिराक आंदोलन का समर्थन करेंगे ताकि एक नए अल्जीरिया का निर्माण का जा सके. उन्होंने सुधार की बातें कीं और "राजनीति से पूंजी को अलग करने की जरूरत" पर जोर दिया.

लेकिन, नौकरियों में कोई इजाफा नहीं होने से विरोध प्रदर्शन तेज होते गए. इस दौरान कई एक्टिविस्ट्स को गिरफ्तार कर लिया गया. अधिकारियों का कहना है कि अल्जीरिया 1990 के दशक में हुई खूनी हिंसा, जिसे ब्लैक डिकेड कहा जाता है, के खतरे में है.

संकट के दौरान

जब ऐसा लग रहा था कि यह गतिरोध अब खत्म होने की कगार पर है, तभी कोरोना वायरस आ गया. आफिफ आदेरहमान जैसे एक्टिविस्ट्स ने अस्थाई रूप से विरोध प्रदर्शनों को बंद करने पर सहमति जताई.

इस वेब डिजाइनर ने खुद को चैरिटी के काम में लगा लिया. लॉकडाउन के दौरान जरूरतमंदों और गरीब परिवारों तक खाने-पीने और दूसरी जरूरी चीजों को पहुंचाने के लिए उन्होंने संगठनों और दानदाताओं को एक वेबसाइट के जरिए एक प्लेटफॉर्म मुहैया कराया.

वे कहते हैं, "क्वारंटीन के दौरान हिराक ने खुद को एक एकजुटता के काम में बदल लिया."

'द प्लेग' में संकट के दौरान एकजुटता एक बड़ी थीम है.

आदेरहमान को आज के वक्त का कामू का कैरेक्टर जियान तारोऊ माना जा सकता है जो कि वॉलंटियर्स की सफाई करने वाली टीमों को डॉक्टरों के साथ घरों के दौरे पर भेजता है, बीमारों का इलाज कराता है और क्वारंटीन में रहने वालों की मदद करता है.

आदेरहमान कहते हैं, "हकीकत यह है कि कई अल्जीरियाई लोगों में उनके जैसी समानताएं हैं...मुश्किल वक्त में दूसरों की मदद करना."

फासीवाद और दमन

तारोऊ का सैनिटरी टीमें तैयार करना कैमस के फ्रांसीसी प्रतिरोध से मुकाबला करने के अपने अनुभव को शायद दिखता है.

दूसरे विश्व युद्ध के ठीक बाद में लिखे गए इस उपन्यास को फ्रांस पर नाजी कब्जे की कहानी के तौर पर माना जाता है. जिसमें बीमारी फैलाने वाले चूहे फासीवाद के "भूरे प्लेग" का प्रतिनिधित्व करते हैं.

लेकिन, इसकी व्याख्या हजारों तरीकों से की जा सकती है और इसमें एक तानाशाही राज्य की ज्यादतियों के सबक भी छिपे हो सकते हैं. हिराक मीम्स नाम के फेसबुक पेज को बनाने वाले युवा वालिद केचिडा को अप्रैल में राष्ट्रपति और धार्मिक अधिकारियों का मजाक बनाने के लिए पकड़ लिया गया.

हालांकि, अधिकारियों ने 5 जुलाई स्वतंत्रता दिवस पर कुछ राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया था, लेकिन, केचिडा जैसे हाई-प्रोफाइल कैदियों को रिहा नहीं किया गया.

इस महीने की शुरुआत में वरिष्ठ पत्रकार कालेद द्रारेनी को एक हथियार रहित भीड़ को उकसाने और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा पैदा करने के लिए तीन साल की सजा दी गई.

महामारी और विरोध प्रदर्शन

सरकार ने फेक न्यूज के खिलाफ एक विवादित कानून भी पास कर दिया और महामारी और विरोध प्रदर्शनों को कवर कर रही तीन वेबसाइट्स को भी ब्लॉक कर दिया. 4,000 मील दूर एक रेडियो स्टेशन सूचनाओं के इस अंतर को भरने की कोशिश कर रहा है.

रेडियो कोरोना इंटरनेशनल की नींव अब्दल्ला बेनादोदा ने रखी थी. बेनादोदा एक अल्जीरियाई पत्रकार हैं जो कि अब अमरीका के प्रोविडेंस में रहते हैं.

2014 में वे तब के राष्ट्रपति के भाई सैद बोतेफ्लिका के विरोध में खड़े हो गए. उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया, ब्लैकलिस्ट कर दिया गया और जान से मारने की धमकियों के बाद उन्होंने और उनकी पत्नी ने देश छोड़ दिया.

रेडियो स्टेशन हर मंगलवार और शुक्रवार को विरोध प्रदर्शनों के दिनों पर कार्यक्रम करता है. बेनादोदा का कहना है कि इससे उन्हें हिराक की आग को जलाए रखने में मदद मिलती है.

'द प्लेग' में एक फ्रांसीसी जर्नलिस्ट - रेमंड रैंबर्ट थे. वे ओरान में घरों के हालात पर खबरें भेजते थे. शहर के लॉकडाउन में जाने के बाद वे वहीं फंस गए. वे घर आने के लिए बेकरार थे.

बेनादोदा कैमस के इसी कैरेक्टर के जैसे हैं. वे एक जर्नलिस्ट हैं जो कि बाहर फंस गए हैं और घर वापस आना चाहते हैं. और अल्जीरिया में बढ़ते दमन के साथ उनकी बेचैनी भी बढ़ रही है.

हिंसा के खिलाफ टीका

लेकिन, अल्जीरिया के ज्यादातर लोगों की तरह से ही बेनादोदा को भी अफरातफरी पैदा होने का डर लगता है. 1990 के दशक में जब सेना ने एक इस्लामिक विद्रोह का सामना किया तो करीब दो लाख लोगों की इसमें मौत हुई और करीब 15,000 लोग जबरदस्ती गायब कर दिए गए.

ओरान के एक टीवी ड्रामा के स्टार अब्देलकादेर दीजेरियो इससे सहमत हैं. हिराक के दौरान वे अक्सर बड़ी-बड़ी भीड़ को संबोधित करते थे और पिछले साल दिसंबर में उन्हें कुछ वक्त के लिए हिरासत में भी लिया गया था.

वे कहते हैं, "ब्लैक डिकेड के हमारे अनुभव ने हमें इससे सुरक्षित कर दिया है. इससे हमें कुछ हद तक परिपक्वता मिली है कि अब हम टकराव नहीं करते और हिंसा से बचते हैं."

"महामारी ने निश्चित तौर पर चीजों को बदल दिया है. हमने देखा है कि सिविल सोसाइटी गरीबों और जरूरतमंदों की मदद कर रही है."

कामू ने दिखाया है कि जब कोई आपदा आती है तो लोग अपने असली रंग दिखाने लगते हैं.

सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर मौजूदा क्रैकडाउन हिराक की शुरुआत से पहले अल्जीरियाई लोगों को मिली हुई आजादी से बहुत अलग चीज है.(bbc)


07-Sep-2020 8:33 AM (310)

- अशोक वाजपेयी

डरावने से न डरना

भीष्म पितामह ने पाण्डव युधिष्ठिर और कौरव दुर्योधन को राजधर्म के बारे में, शर शय्या पर लेटे, यह कहा था कि राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को हर प्रकार के भय से मुक्त रखे. हमारी हालत यह है कि हमें कोरोना महामारी से लेकर अन्य अनेक प्रकार के भय घेरते जा रहे हैं और राज्य जिन्हें कर सकता है उन्हें दूर करने के बजाय स्वयं भय की वजह बन रहा है. हम लोकतंत्र से भय खाने लगे हैं क्योंकि वह बहुसंख्यकतावादी बनता जा रहा है. हम अदालतों से भय खा रहे हैं कि वे राजनीति से इस क़दर प्रभावित हो रही हैं कि उन पर अपने बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने के लिए भरोसा नहीं कर सकते. हम धर्मों से भय खा रहे हैं कि वे हमें शांति और समाधान देने के बजाय इन दिनों लगातार हिंसक हो रहे हैं. वे आपसदारी को ज़्यादा और भेदभाव को कम करने के बजाय पहले को कम और दूसरे को ज्यादा कर रहे हैं. हम संवैधानिक संस्थाओं से भय खा रहे हैं क्योंकि वे संविधान के प्रति नहीं, सत्ता के प्रति वफादार होती जा रही है. हम मीडिया से, उसके बड़े भाग से भय खा रहे हैं क्योंकि वह चौबीसों घण्टे घृणा, भेदभाव फैला रहा है. हम अपने मध्य वर्ग से भयातुर हैं कि वह सचाई के बजाय तरह-तरह के झूठों को सच मानकर भक्ति और अन्धानुकरण में रत हैं. कुल मिलाकर, हर दिशा से डरावने विद्रूप हमें घेरे हुए हैं.

इस समय भारतीय परम्परा और संस्कृति का, हमारे लम्बे स्वतंत्रता-संग्राम का, हमारे लोकतंत्र का यह तकाजा है कि हम डरावने से न डरें. गांधी और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में बरसों-महीनों क़ैद कर एक आतयायी औपनिवेशिक सत्ता ने डराने की कोशिश की. पर हजार तकलीफ उठाकर - गांधी जी की पत्नी और उनके प्रिय सचिव दोनों का देहावसान उन सभी के जेल में रहते हुए हुआ था - वे डरे नहीं. इस समय न डरना कठिन ज़रूर है पर असम्भव नहीं है. अगर भारत में सजग-निष्पक्ष-निर्भीक नागरिकता विस्तार पा जाये तो भय के सारे स्थापत्य ढह सकते हैं. ऐसी नागरिकता है यह प्रशान्त भूषण के प्रकरण से साफ़ हो गया है. जैसा व्यापक समर्थन उनके सर्वोच्च न्यायालय से डरे बिना अपनी आलोचना के लिए क्षमा मांगने से इनकार करने पर उन्हें मिला है वह इस आश्वस्ति का आधार है कि निर्भयता को कुचला-दबाया नहीं जा सकता.

हम आज ऐसी भयावह स्थिति में हैं जहां हत्यारे-हिंसक-बलात्कारी राजनीति और सत्ता दोनों से प्रश्रय पा रहे हैं. तो फिर कोई क़ानून से क्यों डरे जब वह खुद सत्ता से डरता है. ऐसे में निराशा होती है. एक क़िस्म की हार का अहसास भी होता है. पर हमें बीच-बीच में आने-वाले प्रशान्त-क्षणों से अपना हौसला बढ़ाना चाहिये. समय की गति तेज़ है और परिवर्तन भी दूर नहीं हो सकता. डरे हुए लोग, खौफ़ के मारे समूह, परिवर्तन नहीं ला सकते. हमें किसी नायक की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिये. अपने डर को दूरकर सर्जनात्मक और अहिंसक ढंग से निर्भय होकर हम जहां भी हैं इस अंधेरे के विरुद्ध एक-एक दीपशिखा जलाना चाहिये. जो इतने भयावह समय में निर्भय है वह, कहीं न कहीं, अपराजेय भी है. हमारी परम्परा यही कहती है. निराशा का एक कर्तव्य निर्भय बनाना भी है. हो सकना चाहिये.

पितृसत्तात्मकता और हिन्दुत्व

इधर हिन्दी साहित्य के स्त्री-विमर्श में पितृसत्तात्मकता को लेखिकाएं गम्भीरता और थोड़ी उचित आक्रामकता के साथ चुनौती दे रही हैं. यह एक ज़रूरी और लोकतांत्रिक संघर्ष है जो व्यापक लोकतंत्र को समतामूलक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम है. सदियों से जड़ जमाये पितृसत्तात्मक वृत्ति आसानी से शिथिल या ध्वस्त नहीं होने जा रही है. पर उसके अस्वीकार और ध्वंस के लिए एक लम्बा संघर्ष होता आया है जो, कम से कम, साहित्य में एक नये मुक़ाम पर पहुंच गया है. यह उल्लेखनीय है कि जो सामाजिक संरचना इस समय है उसमें तेज़ी से हुए कई परिवर्तनों के बावजूद यह वृत्ति रूढ़ बनी हुई है. यह एक और उदाहरण है जिसमें जो परिवर्तन साहित्य में अपने तर्क से हो रहा है उसकी जितनी सशक्त अभिव्यक्ति साहित्य में है, उतनी समाज में नहीं है. यहां साहित्य समाज में हो रहे किसी परिवर्तन से प्रेरित नहीं है बल्कि वह समाज में एक मूलगामी परिवर्तन लाने की चेष्टा कर रहा है. वह अनुकर्ता नहीं, अग्रगामी है.

दूसरी ओर, यह अनदेखा नहीं जाना चाहिये कि इस समय राजनीति, विशेषतः सत्तारूढ़ राजनीति बहुत पौरुष-केन्द्रित हो चुकी है और उसके द्वारा हिन्दू धर्म के जिस अप्रामाणिक लेकिन कॉरपोरेट क़िस्म के संस्करण - हिन्दुत्व - को पाला-पोसा-बढ़ाया जा रहा है उसमें वे सभी तत्व हैं जो स्त्रियों को समाज में समान अधिकार देने के विरुद्ध और पितृसत्ता क़ायम रखने के पक्ष में सक्रिय होंगे. इसका आशय यह है कि स्त्री-विमर्श को हिन्दुत्व का सामना भी करना पड़ेगा. चूंकि यह हिन्दुत्व धर्म कम, राजनीति अधिक है इसलिए यह विमर्श बिना गहरे राजनैतिक बोध के प्रामाणिक और सार्थक नहीं हो पायेगा. इसे भी नज़रन्दाज़ नहीं किया जा सकता कि गोदी मीडिया भी कुल मिलाकर क़िस्म-क़िस्म की रूढ़िवादिता को ही पोस और प्रसारित कर रहा है. इसलिए संघर्ष कई स्तरों पर एक साथ होगा. यह भी ध्यान में रखना होगा कि बहुत सारे फ़ेसबुकिया और लोकप्रिय लेखक इस संघर्ष में साथ नहीं देने वाले और वे शायद एक तरह का अघोषित अड़ंगा बन जायें.

साहित्य में सर्जनात्मक और आलोचनात्मक स्तरों पर इस संघर्ष के लिए कई नयी सम्भावनाएं उभर सकती हैं. संघर्ष को एक स्तर पर तीक्ष्ण-कुशाग्र बनाये रखते हुए यह ज़रूरी होगा कि उसमें साहचर्य की ऊष्मा और परस्परता के भाव भी उजागर होते रहें. हर संघर्ष अतिरंजना से काम लेता और फिर देर-सबेर उससे आगे निकल जाता है. पितृसत्ता का जड़ीभूत स्थापत्य निश्चय ही तोड़-फोड़ के बिना हटाया नहीं जा सकता. अगर यह संघर्ष साहित्य में बहुप्रतीक्षित अवॉ गार्द की तरह रूप ले सके तो उसकी अभिव्यक्ति और उपलब्धि दोनों ही टिकाऊ हो पायेंगी. यह उम्मीद करना उचित है कि ऐसी सजगता और संवेदनशीलता, साहस और कल्पनाशीलता इस संघर्ष में शामिल लेखिकाओं में है और बराबर बनी रहेगी.

दुर्बोध पर लोकप्रिय

फ्रेंच में लिखी गयी आधुनिक कविता का एक बड़ा हिस्सा दुरूह और दुर्बोध रहा है. पर वहां दुर्बोधता के कारण किसी महत्वपूर्ण कवि की लोकप्रियता प्रभावित नहीं हुई. रेने शा ऐसे ही एक कवि थे जिनका शुरू से अतियथार्थवादियों के साथ संबंध था पर बाद में उन्होंने स्वतंत्र मार्ग चुना. वे नाज़ी सत्ता के खिलाफ़ प्रतिरोध में बहुत सक्रिय रहे. मेरी फ्रांस के तबके विदेशी मंत्री और बाद में प्रधान मंत्री हुए एक व्यक्ति से दिल्ली में लंच पर मुलाकात हुई थी जिन्हें रेने शा की कई कविताएं मुखाग्र थीं. रेने शा की दो कविताएं अनुवाद में:

प्रेम में

खिड़की के कांच का हर वर्गाकार सामने की दीवार का

हिस्सा है, दीवार में चुना गया हर पत्थर सुखी एकांतवासी-

हमारी सुबहों और शामों को रंगता है स्वर्णधूलि और रेतों से. हमारा घर अपनी कथा

जीता है जिसे हवाएं तलाशती हैं चाव से.

नीचे एक संकरी गली में यह सौभाग्य ग़ायब हो जाता है-

हमारी निगाह से परे पटरी-

कोई भी जो यहां से गुज़रे

जो चाहे फिर से मांग ले.

संयम रातें

कुछ अधिक सख़्त हवा से

एक कम धुंधला लैम्प

हमें खोजना होगी चौकी

जहां रात कहेगी ‘जाओ’

और हम जानेंगे कि यह सही है

जब कांच काला हो जाता है.

ओ मिट्टी अब इतनी कोमल

मेरे पकते सुख की शाखा

आकाश का उदर सफ़ेद है.

तुम हो जो जगमगाता है

मेरा गिरना, मेरा प्रेम, मेरी पराजय.

रेने शा ने कामना की थी ‘घास में हमारे पदचिह्न अमर कर दो’. आधुनिक कविता में उनका पदचिह्न निश्चय ही अमर है.(satyagrah)


06-Sep-2020 1:29 PM (228)

तुमने जब अपनी पत्नी के

शव को कंधे पर रख
राजपथ पर पहला कदम बढ़ाया
उस समय कैलाश पर्वत पर
त्रिनेत्रधारी शिव
शैलपुत्री के साथ विहार कर रहे थे
सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा
नयी आकाशगंगाओं
का शिल्प गढ़ रहे थे
शेषशायी विष्णु क्षीरसागर में
कमल पर विराज कर
अपनी प्रिय पत्नी से
पाँव दबवाते हुए
मत्स्य कन्याओं का नृत्य देख रहे थे
देवराज इंद्र की सभा
सदैव की तरह
अप्सराओं के उद्दाम कामवेग
में हिलोरें ले रही थी
तुमने अर्धांगिनी के शव के साथ
जब दस कोस की यात्रा प्रारम्भ की
तब भद्रजन गिरिधर की भक्ति में लीन
झाँझ मजीरे बजाते हुए
गिरिराज पर्वत की पंचकोसी
परिक्रमा में थिरकते हुए
परलोक सुधारने में व्यस्त थे
लोकतंत्र की राजसभाओं में
सभासद विकास की स्वर्णाक्षरी लिखने
को गंभीर मंत्रणाओं में तल्लीन रहे
चारण और भाट समवेत स्वर में
सत्ता का विरुद गाते रहे
कवि प्रेम कवितायें
लिख लिख कर धन्य होते रहे
चित्रकार तूलिका से अमूर्त शैली में
नायिकाओं के उन्नत यौवन
रेखांकित कर नयनाभिराम चित्र बनाते रहे
संगीतकारों का अभ्यास
नए राग की रचना में
अनवरत चलता रहा
और तुम बिना थके
सृष्टि का महानतम भार
अपने कंधे पर रख चलते रहे, चलते रहे
स्वर्ग के देवताओं के पास नहीं था अवकाश
तुम्हारा आर्तनाद सुनने को
और न ही पृथ्वी के अधिनायक के पास समय
सुनो , दाना मांझी
दस कोस की इस महायात्रा में
तुम्हारे कंधे पर तुम्हारी पत्नी का नहीं
मनुष्यता का शव रखा था ।

-राकेश पाठक


04-Sep-2020 9:59 AM (368)

यह उनकी संपादकीय कुशलता का नतीजा था कि ‘धर्मयुग’ हमेशा के लिए एक किंवदंती बन गई. हालांकि इसी दौर में बतौर साहित्यकार धर्मवीर भारती कहीं पीछे छूटते गए

- कविता

कुछ लोग सबकुछ करके भी किसी एक विधा में सिद्धहस्त नहीं हो पाते तो कोई-कोई बस एक ही विधा साध पाते हैं या सिर्फ एक रचना से नाम कमा लेते हैं. पर वे लोग विरले होते हैं, जिनका सबकुछ उत्कृष्ट हो, हर कृति नई बुलंदियों को छूकर आए. धर्मवीर भारती का नाम ऐसे ही लोगों में शामिल है. जहां से भी देखो उनके साहित्यिक कद की ऊंचाई एक समान ही दिखती है.

यह हैरत की बात है कि खुद धर्मवीर भारती अपनी जिस रचना ‘गुनाहों के देवता’ को ‘कलात्मक रूप से अपरिपक्व’ मानते रहे, वही बरसों तक हिंदी की पांच सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में शुमार होती रही है. इसे ‘बकवास’ मानने वाले उपेन्द्रनाथ अश्क कहते थे – ‘यह किताब तो कोरा भावोच्छवास है’ साथ ही वे यह कहने को मजबूर होते थे, ‘इत्ती मोटी यह किताब एक सांस में खुद को पढ़ा ले जाती है. यह भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं.’ धर्मवीर भारती सफल संपादक थे, कवि थे, सिद्धहस्त उपन्यासकार और ख्यातिलब्ध साहित्यकार भी थे. संपादक के रूप में तो वे अपने जैसे अकेले माने जा सकते हैं.

‘यह भी अदा थी एक मेरे बड़प्पन की / कि जब भी गिरूं मैं, गिरूं समुद्र पार / मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक / बैठूं मैं समेटकर जहां अपने अधजले पंख... फिर मैं दिखा सकूं / कि पहला विद्रोही था मैं / जिसने सूरज को चुनौती दी थी. (आत्मकथन - संपाती)

हम बड़े जोधा थे / बड़े फौजदार थे / मगर क्या करते हम / हम दोनों ही पक्षों को अस्वीकार थे. (आत्मकथन – रुक्मी की सेना)

वैसे ये दोनों कवितांश ‘तटस्थता : तीन आत्मकथ्य’ कविता से लिए गए अंश हैं पर इनमें खुद धर्मवीर भारती की दुविधा, उनका आत्मसम्मान और दर्प साफ़-साफ़ झलक जाता है. बिलकुल आत्मस्वीकारोक्ति सा. यहां उनकी अकड़ी हुई गर्दन है तो उनके सपनों के जले हुए पंख भी. वे पंख जो जले हुए होकर भी बताते हैं कि उन्होंने सूरज को चुनौती दी थी. यानी कि आदि विद्रोही थे वे और वे दोनों ही पक्षों को अस्वीकार थे. वह चाहे पूर्व स्थापित प्रलेस (प्रगतिशील लेखक संघ) हो या फिर परिमल (साहित्यकारों द्वारा बनाया गया एक और संगठन).

धर्मवीर भारती ने धर्मयुग के अपने संपादन काल में सिर्फ नई प्रतिभाएं को ही नहीं गढ़ा, हर एक विषय को अपनी पत्रिका के सांचे में ढाला – धर्म, राजनीति, साहित्य, फिल्म, कला... कोई भी विषय उनसे अछूता नहीं था

प्रलेस में जमे रहने के लिए फ़िराक गोरखपुरी ने धर्मवीर भारती को एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया था, ‘उनके तेवर और तर्ज के एकाध गीत लिख डालो, उनकी गोष्ठियों में उन्हें वही सुनाते रहो ...और फिर खूब लिखते रहो अपने प्रेम और रोमांस वाले गीत’. पर भारती का जिद्दी मन अड़ा रहा अपनी जिद पर क्योंकि उन्हें कोई मुखौटा पसंद नहीं था. वे डटे रहे अपनी शर्तों और जिदों के साथ. तब के रचे जाने वाले अपने प्रेम गीतों के साथ. अपने इसी स्वभाव से हारकर उन्हें आखिरकार इलाहाबाद छोड़ना पड़ा था, वह प्रोफेसरी भी जिसमें उन्हें केवल सुनने के लिए दूसरे विभागों के बच्चों के हुजूम जमा हो जाते थे. मुंबई और ‘धर्मयुग’ इन्हीं दिनों उनके जीवन में आए थे.

धर्मवीर भारती ने धर्मयुग के अपने संपादन काल में सिर्फ नई प्रतिभाओं को ही नहीं गढ़ा, हर एक विषय को अपनी पत्रिका के सांचे में ढाला – धर्म, राजनीति, साहित्य, फिल्म, कला... कोई भी विषय उनसे अछूता नहीं था. वे यहां तक ही सिमटे नहीं रह गए थे. घरेलू स्त्रियों और बच्चों के लिए भी धर्मयुग में बहुत कुछ था. मतलब यह कि धर्मयुग में उस वक़्त परिवार के हर सदस्य के लिए कुछ न कुछ होता था. कुल मिलाकर यह संपूर्ण और स्तरीय पत्रिका थी जो तब ज्यादा चलन में रहे संयुक्त परिवारों को खूब भाती थी. इसकी अकूत प्रसिद्धि और भारती जी के काल में कुछ हजार से बढ़कर इसकी प्रसार संख्या का लाखों में पहुंचने का सबब भी यही था.

कार्टून जैसी विरल विधा को भी उन्होंने इतना सम्मान दिया कि 25 वर्षों तक धर्मयुग में लगातार छपने के बाद आबिद सुरती द्वारा रचा गया कार्टून ‘ढब्बू जी’ अमर हो गया. और तो और आबिद जी की प्रसिद्धि भी कार्टूनिस्ट के रूप में ही चल निकली, जबकि वे व्यंग्यकार, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार सब थे. यह उदाहरण बताता है कि किस तरह तब धर्मयुग साहित्य की विधाओं और साथ ही रचनाकारों को स्थापित कर रही थी.

हालांकि और बहुत सी बातें उन्होंने उस दौर में धर्मयुग के माध्यम से बतौर संपादक स्थापित की थीं, जिनके लिए उनकी सराहना तो बहुत कम हुई, हां आलोचना लगातार होती रही. उन्हें एक तानाशाह संपादक के रूप में माना जाने लगा. ऐसा संपादक जो बाकी लोगों से अलग उठता-बैठता था. जिससे मिलने के लिए पर्ची भेजनी पड़ती थी और उनके बुलावे पर ही कोई भीतर जा सकता था. रचना के लिए मौलिकता के स्वीकृतिपत्र को संलग्न करने का नियम और ऐसे ही न जाने कितने नियम पत्रिका प्रकाशन जगत में उनके द्वारा प्रचलित किए गए हैं.

रचना के लिए मौलिकता के स्वीकृतिपत्र को संलग्न करने का नियम और ऐसे ही न जाने कितने नियम पत्रिका प्रकाशन जगत में धर्मवीर भारती द्वारा प्रचलित किए गए हैं

हालांकि ये नियम पत्रिका के विस्तार, उसे अपना पूरा वक़्त और ध्यान देने और सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए गढ़े गए थे. पर इसने सबसे ज्यादा नुकसान धर्मवीर भारती की बेलौस और लोकतांत्रिक छवि का ही किया. उन्हें लेकर न जाने कितनी किंवदंतियां साहित्यिक समाज में चल पड़ी थीं. ठीक इसी वक़्त तब उनके मातहत रहे रवीन्द्र कालिया ने भारती को केंद्र में रखते हुए एक अभूतपूर्व कहानी लिखी थी – ‘काला रजिस्टर’. यह कहानी संपादक धर्मवीर भारती, उनके नए बनाए तौर-तरीकों का मखौल उड़ाती थी. एक तरह से देखा जाए तो न कालिया ही गलत थे, और न बतौर संपादक भारती. यह समीकरण आधिपत्य और अधीनस्थ के बीच का था, जिसने हिंदी समाज को एक बेहतरीन रचना दी.

कई बार हम किसी को सुधारकर ही नहीं गढ़ते, उसे दबाकर, कुचलकर, अपने खिलाफ करके भी रचते होते हैं. बहरहाल जो भी हो भारती की इस छवि ने उनकी पुरानी, इलाहाबादी मौज मस्ती वाली छवि को लोगों के दिल से निकाल बाहर किया था. मजाकिया, खुशमिजाज और लोगों से खूब घुलने-मिलने वाले भारती अब कहीं नहीं थे. कार्यालय में एक मोटा काला रजिस्टर अब लोगों की हाजिरी दर्ज करता हुआ घूमता फिरता, और काले चश्मे के पीछे से दो जोड़ी आंखें उन्हें देखते न देखते हुए भी हर पल घूरती रहतीं.

धर्मयुग के इन दिनों में सबसे बड़ा नुकसान रचनाकार भारती का ही हुआ. उनके द्वारा कहानियां कविताएं और उपन्यास लिखने का क्रम अब कम से कम होने लगा. धर्मयुग में इस तरह डूबने ने उन्हें बीमार कर दिया था. अपने भीतर के लेखक के प्रति बरती गई क्रूरता और उसके लिए ग्लानि और अपराधबोध इसका मुख्य कारण थे.

1993 के दौरान अपने एक मित्र को लिखे गए पत्र में वे अपनी पीड़ा जाहिर करते हैं - स्वास्थ्य इसी अर्थ में ठीक है कि दो वक़्त खा लेता हूं, और शाम को घर से बाहर थोड़ा घूम आता हूं. इससे ज्यादा शारीरिक या मानसिक मेहनत सहन नहीं कर पाता... अब आधा घंटा लिखूं तो सर चकराने लगता है. वही हाल पढ़ने का भी है. मन अंदर ही अंदर बहुत बुझ गया है. मेरा सारा जीवन व्यस्त-सक्रिय और घुमक्कड़ी वाला रहा है, यह कारागार मुझे कितना कष्ट दे रहा होगा आप सोच सकते हैं.’ कहा जाता है कि तीन गंभीर हार्ट अटैक आने के बाद उनके दिल को रिवाइव करने के लिए 700 वोल्ट के शॉक दिए गए थे. इससे उनकी जिंदगी तो जरूर बच गई लेकिन उनके हृदय को भारी क्षति पहुंची थी. इसी हालत में उन्होंने अपनी जिंदगी के तीन-चार साल और गुजारे और चार सितंबर, 1997 को उनकी मृत्यु हो गई.

धर्मवीर भारती का काव्य नाटक – ‘अंधा युग’ उनके व्यक्तित्व को समझने का बड़ा महत्वपूर्ण जरिया है. महाभारत के अंतिम दिनों की झलक दिखाती यह रचना दरअसल संशय की कथा है

धर्मवीर भारती का काव्य नाटक – ‘अंधा युग’ उनके व्यक्तित्व को समझने का बड़ा महत्वपूर्ण जरिया है. महाभारत के अंतिम दिनों की झलक दिखाती यह रचना दरअसल संशय की कथा है. यहां सभी का जीवन निरर्थक है. टुकड़े-टुकड़े में बंटा है सबका अस्तित्व. सभी यहां बौने हैं और सभी महाकाय. अपने ही भीतर छिपे मैं को चीर-फाड़कर देखना यानी उसके पोस्टमार्टम का काम यह रचना बड़े सधे ढंग से करती है. इसके लिए जो बेरहमी और बेबाकी चाहिए थी, उसके लिए एक उलझा हुआ और प्रश्नाकुल मन चाहिए था. ऐसा मन जो भिड़ता रहे अपने से, जो लगातार खुद से जिरह करता रहे.

यह एक सुलझा-सरल इंसान नहीं कर सकता. भोला-भाला तो बिलकुल नहीं. यह वही कर सकता है, जो छला भी जाए और छलने की ताकत भी रखता हो और इस छलने और छले जाने पर फूट-फूटकर रो भी सके. निसंदेह धर्मवीर भारती ठीक ऐसे ही इंसान थे. और अगर नहीं थे, तो उन्होंने खुद को इस रूप में विकसित किया.

उनके सहयोगी, तबके मित्र सेवाराम यात्री उनके इसी रूप पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, ‘रचनाकार भारती के निकट जाने पर भी उनका सूक्ष्म और संवेदनशील सर्जक आसानी से पकड़ में आनेवाला नहीं था. वे भीतर ही भीतर कई स्तरों पर द्वंद्व झेलते थे. उनकी मानसिक बुनावट बहुत ही सूक्ष्म और संश्लिष्ट थी. न कुछ लगने वाली बात भी उनके मन में फांस बनकर गड़ जाती थी. उनके भीतर एक रचनाकार और स्रष्टा का अहम भी कम नहीं था, जो गलत ढंग से छूते ही भयानक नाग की तरह फुफकार उठता था. उन्हें समर्पणशीलता से ही जीता जा सकता था. इसका उदाहरण उनके जीवन से जुड़े कितने प्रसंग रहे. पहली पत्नी कांता भारती से उनका अलगाव भी.’ इस रूप में खुद को विकसित किया जाना व्यक्ति के रूप में धर्मवीर भारती के कितने काम आया कहना मुश्किल है. पर उनकी रचनाओं के फलने-फूलने का सबब यह जरूर बना. व्यक्ति के अंतर्विरोधों उसकी शंकाओं और डर को बखूबी बयान करने का सबब भी.

कनुप्रिया से गुजरते हुए लगातार भारती जी की पहली पत्नी कांता भारती की स्मृति होती है. वे ठीक उसी राधा की तरह कांपती प्रत्यंचा, बुझी हुई राख, टूटे हुए गीत, डूबे हुए चांद और किसी रीते हुए पात्र सी दीख पड़ती हैं

भारती की जो तीन कृतियां समय के वैरूप्य को पढ़ती हैं, उसे नए सिरे से जांचती हैं, और प्रश्नों की तरह पेश करती हैं, वे हैं – ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, ‘अंधा युग’ और ‘कनुप्रिया’. ‘गुनाहों के देवता’ के सरल बहाव के ठीक विपरीत का सूरज का सातवां घोड़ा कहानी कहने के नए शिल्प गढ़ती हुई, कहानी और उपन्यास के शिल्प में कुछ अनुपम प्रयोग करती है. यहां सात स्वतंत्र कथाएं हैं, जो कहीं न कहीं एक दूसरे से मिलती हैं, वैसे ही जैसे नदिया समुद्र में जाकर. इसके पात्र एक कहानी से दूसरी कहानी में बेरोक-टोक आते-जाते मिल जाएंगे. इन तीनों रचनाओं में एक तुर्शी है, एक तीखापन और चहुंओर दिखने वाला अन्धकार है. अंधा युग के लिए उन्होंने खुद ही कहा है - गोकि यह अंधकार भी रौशनी की एक खोज ही है - यह कथा ज्योति की है, अंधों के माध्यम से’ पर यह कथा सतत खोज की ही कथा रह जाती है, ज्योति कथा उस तरह बिलकुल नहीं हो पाती. पर कई बार हम केवल अन्धकार की भी आशंका व्यक्त करते हुए उसी अन्धकार का विरोध रचते होते हैं, यह भी एक तरह से ज्योति की अनुशंसा ही है. एक ज्योतिर्मय भविष्य की चाहना भी.

कनुप्रिया से गुजरते हुए लगातार भारती जी की पहली पत्नी कांता भारती की स्मृति होती है. वे ठीक उसी राधा की तरह कांपती प्रत्यंचा, बुझी हुई राख, टूटे हुए गीत, डूबे हुए चांद और किसी रीते हुए पात्र सी दीख पड़ती हैं. उनके सवाल भी ठीक वही हैं जो कनुप्रिया की राधा के हैं – ‘मान लो मेरी तन्मयता के गहरे क्षण / रंगे हुए / अर्थहीन / बस आकर्षक शब्द थे / तो सार्थक क्या था, कनु?... क्या में एक सेतु थी / तुम्हारे लिए / लीलाभूमि और युद्ध क्षेत्र के / अलंघ्य अन्तराल में?’

कांता भारती की आत्मकथा ‘रेत की मछली’ धर्मवीर भारती के से सधे हुए लेखकीय अंदाज में न लिखे जाने के बावजूद उनके व्यक्तित्व पर, उनके आडम्बरों पर लगातार प्रहार करती है

अपने एकमात्र उपन्यास ‘रेत की मछली’ में कांता भारती भी लगातार बस इन्हीं सवालों से जूझती और लड़ती दिखती हैं. कनुप्रिया की राधा अगर एक शाश्वत प्रश्न है, न जाने कितने सवालों के साथ प्रश्नचिन्ह सी अड़ी खड़ी है तो यह आत्मकथा भी धर्मवीर भारती के से सधे हुए लेखकीय अंदाज में न लिखे जाने के बावजूद उनके व्यक्तित्व पर, उनके आडम्बरों पर लगातार प्रहार करती है. हैरत की बात यह है कि ये वही कांता थीं, जो एक समय धर्मवीर भारती का सबकुछ थीं. जिनके लिए लिखते-कहते समय भारती जी की जुबान विराम नहीं लेती थी - ‘हम थे, कांता थी और नवम्बर की दोपहर और मीलों तक सुनसान पहाड़ और जंगल... एक बात और है, कांता को पाकर बचपन पाने की अनुभूति कभी-कभी होती है. सफ़र के लिए बहुत लाजवाब साथिन है. कांता एक ब्रोनिक कैमरा ले आई थी. उसने बड़ी मजेदार तस्वीरें ली हैं. आकर दिखायेंगे...’ (धर्मवीर भारती द्वारा नैनीताल से जगदीश गुप्त को लिखे एक पत्र का अंश).

कई बार जिंदगी हमारे किसी पल के शाश्वत सत्यों को भी झुठला और बदल जाती है. कांता भारती राधा तो बन सकी थीं लेकिन रुक्मिणी होने और जीवनपर्यंत भारती जी के साथ चलने का सुख केवल पुष्पा भारती के हिस्से आया. यह एक त्रासद कथा थी, जो धर्मवीर भारती के जीवन पर ग्रहण की तरह कुछ अरसे तक छाई रही. भारती के प्रशंसकों के लिए अगर उनको जानना उदेश्य हो तो लोक भारती प्रकाशन से छपे कांता भारती के इस अनगढ़ उपन्यास को भी पढ़ा जाना बेहद जरूरी है. ताकि धर्मवीर भारती अपनी सम्पूर्णता में, अपनी प्रतिभा के साथ साथ अपनी कायरता और दुरुहता में भी दिखाई दें.(satyagrah)


26-Aug-2020 9:17 AM (322)

- अशोक वाजपेयी

कला का नील नभ

केरल के कुछ कलाकार मित्रों ने याद दिलाया कि इस महीने हीरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम बरसाने के 75 वर्ष हो रहे हैं. उन्होंने भारत की सीमा पर चीनी घुसपैठ को भी ध्यान में रखते हुए व्हाइट रोज़ कला समूह द्वारा इस अवसर पर ‘ब्लू स्काई: शेडोज़ आव् हीरोशिमा’ कला-प्रदर्शनी आयोजित की है, ऑनलाइन. मुझसे ऑनलाइन वक्तव्य द्वारा उसका उद्घाटन करने का आग्रह किया. मुझसे पहले बोलते हुए केरल के राजनेता एमए बेबीने याद दिलाया कि जिन दो विमानों से बम बरसाये गये थे उनके नाम थे ‘ग्रेट आर्टिस्ट’ और ‘नैसेसरी ईविल’.

संयोगवश इसी समय हमारे पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध को भी 21 वर्ष पूरे हुए. मैंने यह कहने की कोशिश की कि दूसरे महायुद्ध के बाद, शीत युद्ध के भी बाद से संसार तरह-तरह से युद्धग्रस्त रहा है. कई तरह की बगावतें, सशस्त्र विद्रोह, सिविल युद्ध आदि आज भी लगातार हो रहे हैं. यह व्याप्ति इतनी है कि हम युद्ध शब्द का इस्तेमाल संज्ञा और रूपक की तरह करने के अभ्यस्त हो गये हैं. वर्तमान कोरोना प्रकोप के विरुद्ध जो अभियान चल रहा है उसे युद्ध कहा जा रहा है और उससे निपटने-जूझने में लगे कर्मियों को कोरोना-योद्धा.

याद आता है कि प्राचीन और मध्यकालीन समय में युद्धरत सेनाएं अपने साथ कविता-संगीत-तमाशा आदि लेकर चलती थीं. याद यह भी करना चाहिये कि हमारे एक महाकाव्य ‘महाभारत’ में जो धर्मयुद्ध लड़ा गया वह अन्ततः, पाण्डवों की विजय के बावजूद, व्यर्थ सिद्ध हुआ. साहित्य और कलाओं में जहां युद्ध की वीरगाथाएं बखानी-गायीं-चित्रित की गयी हैं, वहां दूसरी ओर युद्ध की अन्ततः, विफलता और व्यर्थता का भी सत्यापन होता रहा है. दूसरे महायुद्ध के बाद विश्व शान्ति के लिए एक बड़ा अभियान चला था जिसमें अनेक मूर्धन्य चिन्तकों, वैज्ञानिकों, लेखकों-कलाकारों आदि ने भाग लिया था.

यूनेस्को के एक प्रसिद्ध आप्तवाक्य में यह अवधारणा की गयी थी कि युद्ध मनुष्य के मस्तिष्क में उपजते और लड़े जाते हैं और उनसे मनुष्य को मुक्त कराने का प्रयत्न होना चाहिये. युद्ध प्रायः ‘दूसरों’ को नष्ट करने, उनसे ज़मीन और साधन छीनने, उनको पराजित करने के लिए किये जाते हैं. हमारे देश में, कोरोना प्रकोप की आड़ में, एक और अघोषित युद्ध चल रहा है: लोकतांत्रिक स्वतन्त्रता, असहमति, न्याय की मांग, समता के आग्रह आदि के विरूद्ध जिसमें कई संवैधानिक संस्थाएं तक शामिल दीख पड़ रही हैं.

इस भयावह स्थिति में जब बाज़ार, धर्म, राजनीति, मीडिया आदि एक अनोखे गठबन्धन में लगातार नये ‘दूसरे’ गढ़, उन्हें बाधित-प्रताड़ित कर रहे हैं, साहित्य और कलाएं ही वे जगहें हैं जहां कोई ‘दूसरे’ नहीं हैं, किसी दूसरे को नष्ट करने का हिंसक उत्साह नहीं है. जहां नील नभ के नीचे, बिना भेदभाव के, हम स्वतंत्र, स्वायत्त, संवादरत महसूस कर सकते हैं.

हड़बड़ी का मौसम

इन दिनों काफ़ी लोगों के पास समय की कमी नहीं, अक्सर समय काटे नहीं कटता. कोरोना वायरस ने राजनीति छोड़कर सबको धीरज का पाठ सिखा दिया है. बस राजनीति में ही उठापटक की अधीरता कम नहीं हुई है. इसलिए कि काफ़ी समय है, फेसबुकिया लोग काफ़ी तेज़ी से इन दिनों तरह-तरह के झटपटिया आकलन में व्यस्त और सक्रिय हैं. सूक्तिपरक निर्णय और साहित्यिक फ़तवे जारी किये जा रहे हैं. इसका एक लाभ यह है कि ऐसे कई साहित्यकार चर्चा में हैं जिन पर अन्यथा विचार करने का विशेष अवसर न होता.

संयोगवश हिन्दी के दो मूर्धन्य और लोकप्रिय साहित्यकारों को इस समय इस आकस्मिक ध्यान की पात्रता मिली है - तुलसीदास और प्रेमचन्द. किसी कृति या किसी लेखक की किसी या कुछ रचनाओं को कूड़ा कहकर खारिज़ करने की हालिया शुरूआत नामवर सिंह ने की थी जब उन्होंने सुमित्रानन्दन पन्त की अधिकांश रचनाओं को कूड़ा कहा था. अब एक संपादक ने प्रेमचन्द की अधिकांश कहानियों को कूड़ा क़रार दिया है. तुलसीदास को दशकों पहले प्रगतिशीलों ने प्रतिक्रियावादी क़रार दिया था. बीच में उन्होंने भूल-सुधार किया. अब फिर तथाकथित जनधर्मी तुलसीदास को कुछ जुमलेबाज़ी कर अवमूल्यित करने की नयी कोशिश कर रहे हैं. इनमें से कोई भी बिना चुनौती के नहीं जाने दिया जा रहा है. इन सभी का प्रत्याख्यान भी सदलबल फ़ेसबुक पर हो रहा है.

यह नोट करना दिलचस्प है कि जो लेखक फ़ेसबुक पर इतने सक्रिय हैं और तरह-तरह के अवमूल्यन कर रहे हैं वे विधिवत् लिखकर इन स्थापनाओं को अधिकांशतः प्रमाण और तर्क के साथ, प्रस्तुत नहीं करते. साहित्य में एक वर्ग हमेशा ऐसा रहा है कि जो साहित्य को बल्कि आलोचना को अभिमत में घटाता रहा है. फ़ेसबुक की सुविधा ने इस वर्ग की सदस्य-संख्या कई गुना कर दी लगती है. कभी किसी मीर ने अपने को ही पगड़ी सम्हालने की हिदायत दी थी क्योंकि ‘शहर दिल्ली है’. अब लगता है कि हम सभी पगड़ी उछालने, उन पर कीचड़ फेंकने में एक तरह का नीच आनन्द पाते हैं. कइयों पर इसी कारण ध्यान जाता है वरना उनकी व्यापक परिदृश्य में कोई जगह या मौजूदगी नहीं है.

पर, यह भी कहना होगा कि हिन्दी में अपने बड़े लेखकों या कुछ कृतियों को लेकर जो रन्ध्रहीन भक्तिभाव है उसे भी आलोचनात्मक मूल्यांकन से उपजा नहीं कहा-माना जा सकता. सब कुछ आलोच्य है यह साहित्य के जनतन्त्र की बुनियादी मान्यता होती है और जो झटपटिया अवमूल्यन हो रहा है उसका यह आशय या संकेत है कि हिन्दी में अधिक निर्भीक आलोचना की ज़रूरत है, उसकी जगह होना चाहिये, उसे गम्भीरता से किया जाये और उतनी ही गम्भीरता से वह ज़ेरे-बहस हो. ऐसे वाद-विवाद-संवाद से साहित्य और आलोचना दोनों लोकतांत्रिक रूप से आगे बढ़ते हैं.

रंगवितान

भारत भवन के अन्तर्गत मूर्धन्य रंगकर्मी बव कारन्त ने जो मध्यप्रदेश रंगमण्डल गठित किया था वह किसी राज्य द्वारा स्थापित पहली रिपर्टरी कम्पनी भर न थी. उसमें रंगप्रशिक्षण, रंग-व्यापार, रंगप्रयोग, रंगचिन्तन इन सभी पहलुओं को बहुत कल्पनाशील ढंग से नियोजित किया गया था. रंगमण्डल में बाक़ायदा रंगप्रशिक्षित कलाकारों के साथ लोक कलाकार भी शामिल किये गये थे. प्रसिद्ध निष्णात लोक कलाकारों को प्रशिक्षण देने बुलाया जाता था. लोक और आधुनिक का ऐसा लगातार संवाद और सहकार शायद ही इससे पहले हुआ था और बाद में कभी इस गहराई और निरन्तरता का कहीं और हुआ हो. इतनी बड़ी संख्या में वरिष्ठ और विविध रंग-कर्मी प्रशिक्षण देने शायद ही किसी और रंगसंस्थान में आये होंगे जब कि रंगमण्डल प्रशिक्षण का संस्थान नहीं था. इनमें पीटर बुक, जान मार्टिन, बादल सरकार, रुद्रप्रसाद सेनगुप्त, श्यामा नन्द जालान, प्रसन्ना, इरशाद पंजतन आदि शामिल थे.

याद यह भी आता है कि कारन्त नहीं चाहते थे कि रंगमण्डल सिर्फ़ उनकी शैली में काम करे. उन्होंने बड़ी संख्या में अतिथि निर्देशक आमंत्रित किये जिन्होंने रंगमंडल के अन्तर्गत कई नाट्य प्रस्तुतियां तैयार कीं. तीन विदेशी निर्देशक पूर्वी जर्मनी, इंगलैण्ड और फ्रांस के आये थे. यह याद करने योग्य है कि इनमें से किसी को हिन्दी भाषा नहीं आती थी. फ्रिट्ज बेनेविट्ज ने शेक्सपीयर के कई नाटक हिन्दी में ‘बगरो बसन्त है’, ‘राजा लीयर’, ‘तो सम पुरुरव न मो सम नारी’ और बर्तोल्त ब्रेख़्त का ‘इन्साफ़ का घेरा’ तैयार कराये. ब्रिटिश जान मार्टिन ने रंगकार्यशाला तो ली ही, तीन ग्रीक दुखान्त’ - यूरीपिडीज़ और एस्किलस के, ‘पोलिस में हफ़ीजीनिया’, ‘ट्रोजन औरतें’ और ‘अग्मेनान’ निर्देशित किये. 1990 में फ्रांस के एक अत्यन्त प्रयोगशील रंगनिर्देशक जार्ज लवादों ने रासीन की क्लैसिक कृति ‘फ़ेद्रा’, कृष्ण बलदेव वेद के हिन्दी अनुवाद में, तैयार की. पूरी प्रस्तुति मुख्य मंच पर नहीं, ग्रीनरूम को रंगमंच में बदलकर की गयी थी.

हिन्दी की रंगसम्भावनाओं का इतना गहन अन्वेषण शायद ही पहले या बाद में कहीं और हुआ हो. कोई भारत भवन के पहले दशक का विस्तृत इतिहास लिखे तो पता चलेगा कि वहां कितना नवाचार अनेक कलाओं में पूरी निर्भीकता और कल्पनाशीलता के साथ किया गया था. कारन्त जैसा अथक रंगकर्मठ भी फिर दूसरा नहीं हुआ. न विभा मिश्र, द्वारका प्रसाद जैसे अभिनेता.(satyagrah)


22-Aug-2020 7:32 PM (452)

ज़ौक़, यानी शेख़ मुहम्मद इब्राहिम ‘ज़ौक़’. जी, हां. वही, बहादुर शाह ज़फर के उस्ताद. उनके बारे में शायरी के किसी शौकीन से बात कर लीजिए. बेसाख़्ता वह यही कहेगा, ‘अरे, वो...ज़ौक़! वो...जिनकी ग़ालिब से अमूमन अदावत रहती थी.’ या उनके चंद शेर जो उसे ज़ुबानी याद होंगे, आपको पेश कर देगा. और फिर, बात या तो ग़ालिब पर आ जायेगी या मुबाहिसा कुछ और ही हो जाएगा.

ज़ौक़ का तार्रूफ़ इतना मुख़्तसर नहीं हो सकता. उन्होंने बहुत लंबा सफ़र तय किया था. आइये जानें कैसे थे उस्ताद ज़ौक़, कैसी थी उनकी शायरी, ज़िंदगी और ग़ालिब के साथ उनकी तनातनी के क़िस्से.

एक मोहरे का सफ़र

ऐसा मोहरा जिसने हर एक ख़ाना बड़ी एहतियात से पार किया और सबसे बचते-बचाते एक रोज़ वज़ीर बन गया. ज़ौक़ के वालिद शेख़ मुहम्मद रमज़ान एक अदना सिपाही थे जो दिल्ली में काबुली दरवाज़े के पास रहते थे. इब्तिदाई तालीम हाफिज़ ग़ुलाम रसूल के मदरसे में हुई जो ख़ुद ‘शौक़’ के तख़ल्लुस से शायरी करते थे. संभव है कि शेख़ इब्राहीम ने उनसे मुतास्सिर होकर अपना तख़ल्लुस ‘ज़ौक़’ रख लिया हो.

मियां इब्राहीम के दोस्त मीर काज़िम ‘बेक़रार’ उस्ताद शाह नसीर के शागिर्द थे. इब्राहीम भी उनकी सरपरस्ती में चले गये. शाह नसीर को इब्राहीम के पैर पालने में ही दिख गए थे. पर वे अपनी औलाद को आगे बढ़ाने की जुगत में लगे रहे. इब्राहीम को जल्द ही ये बात समझ में आ गई. उन्होंने उस्ताद से तर्के ताल्लुकात कर (संबंध तोड़कर) महफ़िलों में शेर पढ़ना शुरू कर दिया और जल्द शोहरत भी हासिल हो गई.

अब उनकी मंज़िल थी कि उनकी शोहरत शाही क़िले तक पंहुचे और वहां एंट्री मिले. कुछ ताल्लुकात और कुछ मशक़्क़त और बाकी क़िस्मत, यह भी हो गया. उन दिनों अकबर शाह (दूसरा) गद्दीनशीं था. उसे तो शायरी का शौक़ न था. हां, उसका बेटा अबू ज़फर ज़रूर गहरी दिलचस्पी रखता था. कुछ ऐसे हालात बने कि अबू ज़फ़र ने इब्राहीम उर्फ़ ज़ौक़ को अपना उस्ताद क़ुबूल किया. इसी दौरान उन्हें ‘ख़ाकानी-ए-हिंद का ख़िताब मिला. पर अकबर शाह नहीं चाहता था कि अबू ज़फ़र अगला सुलतान बने.

इधर, ज़फर के बादशाह बनने का मतलब था ज़ौक़ का प्रमोशन. चेले और उस्ताद की क़िस्मत बुलंद थी और जल्द ही, जैसा दोनों चाहते थे, हो गया. अबू ज़फर, बहादुर शाह ज़फ़र बन गया और शेख़ इब्राहीम उस्ताद ‘ज़ौक़’ कहलाये जाने लगे.

ग़ालिब से कम फक्कड़ नहीं थे

यूं तो ज़ौक बादशाह के उस्ताद थे, पर क़िले के अंदर की चालबाज़ियों के चलते उसकी रहमत से मरहूम रहे. उनकी तनख्वाह महज़ चार रुपये महीना थी और मुफ़लिसी उन पर भी कहर बरपाती रही. पर उन्होंने ग़ालिब की तरह न तो कभी अपनी ग़ुर्बत का ढोल पीटा और न वजीफ़े के लिए हाथ पैर मारे. ज़फर इस हक़ीक़त से बेख़बर थे और ज़ौक़ ने उन्हें बाख़बर न किया. मुद्दतों बाद उनकी तनख्वाह 500 रूपये की गई.

ज़ौक़ ग़ालिब की तरह ऐबीले और दिलफेंक भी नहीं थे. वे सादगी पसंद थे. एक छोटे से मकान में रहते जिसका अहाता इतना छोटा कि बमुश्किल एक चारपाई आ पाए. हवेली के हुजरे (कमरे) कम और तंग थे. फिर भी उन्होंने एतराज़ न किया.

उस्तादी कांटों का ताज थी

उस्तादी तो मिलना शान की बात तो थी पर मुश्किलें भी कम नहीं थीं. ज़फर को कोई मिसरा पसंद आ जाता, तो ज़ौक़ को उसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी दे दी जाती. मिसाल के तौर पर एक दफ़ा ज़फर, ज़ौक़ और ‘मिर्ज़ा’ फ़ख़रु तालाब के किनारे सैर कर रहे थे. फ़ख़रु ने मिसरा उछाल दिया कि ‘चांदनी देखे अगर वह महजबीं तालाब पर’ और ज़ौक़ को कहा कि उस्ताद इसे शेर बनायें. ज़ौक़ ने फ़ौरन मिसरा लगाया ‘ताबे-अक्से-रुख़ से पानी फेर दे मेहताब पर.’

बादशाह को किसी राह चलते कोई जुमला पसंद आ गया तो उसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी ज़ौक़ की. हज़ारों टप्पे, ठुमरियां, गीत, ग़ज़लें ऐसे ही बनीं और बादशाह की भेंट चढ़ गईं. उनका यह शेर उनकी मुश्किल को बख़ूबी बयान करता है:

‘ज़ौक़’ मुरत्तिब क्योंकि हो दीवां शिकवाए-फुरसत किससे करें

बांधे हमने अपने गले में आप ‘ज़फ़र’ के झगड़े हैं’

शायद यही वजह भी रही कि जीते-जी वो कभी अपना दीवान नहीं छपवा पाए. और, बारहा (कई बार) ऐसा हुआ कि कभी ज़फ़र ने ज़ौक़ का कोई मिसरा सुन लिया तो उसी ज़मीन पर एक ग़ज़ल बना ली और भेज दी उनके पास इस्लाह (सुधार) के लिए. ‘मरता क्या न करता वाली बात’. बेचारे ज़ौक़ को अपनी शायरी उनके नाम करनी पड़ती. इस वजह से ज़ौक़ ज़फर से अपनी शायरी छुपाते थे. जानकारों का कहना है कि ज़फर के जो चार दीवान शाया हुए हैं उनमें ज़ौक़ की शायरी की भरमार है. अब समझ आता है कि क्यूं फैज़ अहमद फैज़ सरीखे शायर ज़फर को शायर नहीं मानते थे.

ज़ौक़ की शायरी और शख़्सियत के अलहदा रंग

फ़ारसी तरकीबों के सिलसिले में ग़ालिब और मोमिन का नाम अक्सर आता है. ज़ौक़ ने ज़्यादातर उर्दू में लिखा. और उनकी उर्दू की शायरी अपने समकालीन ग़ालिब या मोमिन से किसी दर्ज़ा कमतर नहीं है. ज़ौक पर एक किताब - ‘जौक और उनकी शायरी’ - लिखने वाले प्रकाश पंडित कहते हैं कि वे आकारवाद के शायर थे. लफ़्ज़ों के सही इस्तेमाल और नज़्म की रवानगी में उनका सानी नहीं था. और उनका कमाल ख़ूबसूरती की बयानबाज़ी में नज़र आता है. इनके कलामों में सादा ज़ुबानी, हुस्नपरस्ती और मुहब्बत की कशिश बाकमाल नज़र आती है. इसकी बानगी चंद अशआर हैं.

‘आना तो खफ़ा आना, जाना तो रुला जाना

आना है तो क्या आना, जाना है तो क्या जाना’

‘क्या आये तुम जो आये घड़़ी दो घड़ी के बाद

सीने में सांस होगी अड़ी दो घड़ी के बाद’

मैं वो मजनूं हूं जो निकलूं कुंजे-जिंदा छोड़कर

सेबे-जन्नत तक न खाऊं संगे-तिफ़ला छोड़कर’

मर्ज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे

न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे

तुम जिसे याद करो फिर उसे क्या याद रहे

न ख़ुदाई की हो परवा न ख़ुदा याद रहे

उर्दू आलोचना के उस्ताद शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का मानना है कि ग़ालिब और मीर तकी मीर एक ही तरह के शायर थे. प्रकाश पंडित कहते हैं कि ज़ौक़ पर सौदा की शायरी का असर है. यहां बताना लाज़मी है कि सौदा और मीर समकालीन थे और दोनों की तनातनी ज़ौक़ और ग़ालिब के जैसी ही थी.

ज़ौक़ बड़े अच्छे गणितज्ञ और भविष्यवेत्ता भी थे. उन्हें कुण्डलियां बनाना आता था. मौसिकी के ख़ासे जानकार, तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) के शैदाई, तारीख़ में उनकी गहरी पैठ थी. याददाश्त इतनी तेज़ कि एक बार जो पढ़ लिया वह ज़हन पर चस्पां हो गया. बताते हैं उन्होंने उस्तादों के लगभग 350 दीवान पढ़े थे.
ज़ौक़ बनाम ग़ालिब

ग़ालिब, ज़ौक़ और मोमिन की हरचंद कोशिश यह रहती कि बाक़ियों से कैसे आगे निकला जाये और बादशाह की आंख का नूर बना जाए. यह तय है कि ग़ालिब इन दोनों पर भारी पड़ते थे, पर ज़ौक़ कम-से-कम उर्दू के कलामों में ग़ालिब से कमतर नहीं साबित होते थे.

मशहूर क़िस्सा है कि बादशाह और उनकी अज़ीज़ा बेगम ज़ीनत महल के बेटे मिर्ज़ा जवां बख़्त के निकाह पर मिर्ज़ा नोशा (मिर्ज़ा ग़ालिब) को बख़्त का सेहरा पढ़ने का ज़िम्मा मिला. वहीं ज़फर की ख्व़ाहिश थी कि ज़ौक़ इस काम को अंजाम दें. ख़ैर, तय हुआ कि जवां बख्त का सेहरा ज़ौक़ और गालिब दोनों ही लिखेंगे.

ग़ालिब ने सेहरे के मक़ते (आखिरी शेर) में कहा-

‘हम सुख़नफहम हैं गालिब के तरफ़दार नहीं

देखें इस सहरे से कह दे कोई बढ़कर सेहरा’.

महफ़िल में ये साफ़ ज़ाहिर हो गया कि ग़ालिब ने ज़ौक़ पर तंज़ कसा है. बादशाह ज़फर ज़ौक़ की तरफ़ मुख़ातिब होकर बोले कि वो भी फ़ौरन से पेश्तर इसी मौज़ूं पर कुछ फ़रमाएं. आख़िर बादशाह और उनकी इज्ज़त का सवाल जो ठहरा. क्या करें, बादशाह की उस्तादी पकड़बुलावे की नौकरी है. ज़ौक़ ने भी ज़फर को मायूस न किया. उन्होंने कहा,
ऐ जवां बख़्त ! मुबारक तुझे सर पर सेहरा

आज है यम्नो-सआदत का तेरे सर पर सेहरा’

इसके मक़ते में उन्होंने ग़ालिब की बात का यूं जवाब दिया.

‘जिसको दावा हो सुख़न का ये सुना दो उनको

देख इसे कहते हैं सुख़नवर सेहरा’

कहते हैं उस दिन ज़ौक़ ने महफिल लूट ली थी. ज़फ़र ग़ालिब की इस बेहयाई से ख़ासे नाराज़ भी हुए. ग़ालिब ने अपनी सफ़ाई भी पेश की थी. पर यह क़िस्सा फिर कभी.

इसी अदावत पर एक और शेर है

‘न हुआ पर न हुआ मीर का अंदाज़ नसीब

‘ज़ौक़’ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा’

हालांकि उनकी ग़ालिब से तनातनी कभी इस तक हद न हुई कि एक दूसरे को शर्मसार करने की नौबत आये और इसमें भी ज़ौक़ का कमाल ज़्यादा था. जहां ग़ालिब नए ख़यालों पर लिखना पसंद करते और हुस्न-औ-इश्क़ पर कम तो वहीं ज़ौक़ का कमाल ख़ूबसूरती की चुस्त और दिलचस्प बयानी में था. भावना के मैदान में उन्होंने कम ही हाथ-पैर मारे हैं. ज़ौक़ आकारवाद के साधक थे, और ग़ालिब ज़हनी तलातुम (भंवर) में डुबकी लगाते रहते थे और तसव्वुफ़ की कश्ती से उसे पार करते. पर बात यह भी है कि कहीं न कहीं दोनों एक दूसरे के कायल भी थे. ग़ालिब ने एक दफ़ा कहीं यह शेर सुना:

‘अब तो घबरा के कहते हैं कि मर जायेंगे,

मर के भी चैन न पाया तो किधर जायेंगे.’

जब उन्हें मालूम हुआ कि यह ज़ौक़ का है, तो बारहा दोस्तों की महफ़िल में इसे गुनगुना देते. वहीं, ज़ौक़ ने कभी कहा था कि मिर्ज़ा (ग़ालिब) को ख़ुद अपने अच्छे शेरों का पता नहीं है, वे उनका यह शेर सुनाया करते थे;

दरिया-ए-मआसी (पाप की नदी) तुनुक-आबी (पानी की कमी) से हुआ ख़ुश्क

मेरा सरे-दामन भी अभी तर न हुआ था’.

दिल्ली से मुहब्बत

ज़ौक़ को दिल्ली से दिली मुहब्बत थी. वरना क्या बात थी कि वे भी ‘दाग़’ दहलवी या मीर के जैसे वहां से दस्तअफ्शां (जगह छोड़ना) न होते? क़िस्सा है कि दक्कन के नवाब ने अपने दीवान चन्दूलाल के हाथों उन्हें चंद ग़ज़लें इस्लाह (सुधार) के लिए भेजीं और साथ में 500 रुपये और ख़िलवत देकर वहां आने का न्यौता दे डाला.

ज़ौक़ ने ग़ज़लें तो दुरस्त कर दीं पर ख़ुद न गए. जो ग़ज़ल इस्लाह करके भेजी थी उसका मक़ता था

‘आजकल गर्चे दक्कन में है बड़ी कद्रे सुखन
कौन जाये ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियां छोड़कर

दिल्ली की गलियां तो न छोड़ीं, पर हां, वे 16 नवंबर, 1854 को दुनिया से कूच कर गए. उनका शेर था

‘लायी हयात आए क़ज़ा ले चली चले

न अपनी ख़ुशी आये, न अपनी ख़ुशी चले’

इंतकाल से तीन घंटे पहले उन्होंने यह शेर कहा था.

कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया

क्या ख़ूब आदमी था, ख़ुदा मग़फ़रत करे

जीते जी एक भी दीवान नहीं छपा. जो कुछ भी लिखा उसमें से बहुत कुछ ज़फ़र को दे दिया. बाक़ी जो बचा, 1857 के ग़दर की भेंट चढ़ गया और साथ में उनका एकलौता बेटा भी जाता रहा. जो रह गया, उसका हिसाब यह है - 167 ग़ज़लें, 194 अकेले शेर, 24 क़सीदे, 1 मसनवी, 20 रुबाइयां, 5-6 क़ते, 1 सेहरा और कुछ अधूरे क़सीदे. याद आता है उनके प्रतिद्वंदी ग़ालिब का शेर.

‘चंद तस्वीरें बुतां, चंद हसीनों के ख़तूत

बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला’(SATYAGRAH)


22-Aug-2020 9:57 AM (395)

आज परसाईजी का जन्मदिन है। परसाई जी की स्मृति को नमन करते उनके कुछ उद्धरण यहां पेश हैं:

1.इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं,पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.

2.जो कौम भूखी मारे जाने पर सिनेमा में जाकर बैठ जाये ,वह अपने दिन कैसे बदलेगी!

3.अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिये.जरूरत पडी तब फैलाकर बैठ गये,नहीं तो मोडकर कोने से टिका दिया.

4.अद्भुत सहनशीलता और भयावह तटस्थता है इस देश के आदमी में.कोई उसे पीटकर पैसे छीन ले तो वह दान का मंत्र पढने लगता है.

5.अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है.

6.चीनी नेता लडकों के हुल्लड को सांस्कृतिक क्रान्ति कहते हैं,तो पिटने वाला नागरिक सोचता है मैं सुसंस्कृत हो रहा हूं.

7.इस कौम की आधी ताकत लडकियों की शादी करने में जा रही है.

8.अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.

9.जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का खून बिना छना पी जाते हैं .

10.नशे के मामले में हम बहुत ऊंचे हैं.दो नशे खास हैं--हीनता का नशा और उच्चता का नशा,जो बारी-बारी से चढते रहते हैं.

11.शासन का घूंसा किसी बडी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बडी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूंसा पड जाता है.

12.मैदान से भागकर शिविर में आ बैठने की सुखद मजबूरी का नाम इज्जत है.इज्जतदार आदमी ऊंचे झाड की ऊंची टहनी पर दूसरे के बनाये घोसले में अंडे देता है.

13.बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है.

14.मानवीयता उन पर रम के किक की तरह चढती - उतरती है,उन्हें मानवीयता के फिट आते हैं.

15.कैसी अद्भुत एकता है.पंजाब का गेहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है और मध्यप्रदेश का चावल कलकत्ता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है.देश एक है.कानपुर का ठग मदुरई में ठगी करता है,हिन्दी भाषी जेबकतरा तमिलभाषी की जेब काटता है और रामेश्वरम का भक्त बद्रीनाथ का सोना चुराने चल पडा है.सब सीमायें टूट गयीं.

16.रेडियो टिप्पणीकार कहता है--'घोर करतल ध्वनि हो रही है.'मैं देख रहा हूं,नहीं हो रही है.हम सब लोग तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं.बाहर निकालने का जी नहीं होत.हाथ अकड जायेंगे.लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं फिर भी तालियां बज रही हैं.मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं ,जिनके पास हाथ गरमाने को कोट नहीं हैं.लगता है गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है.गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की तालियां मिलती हैं,जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा नहीं है.

17.मौसम की मेहरवानी का इन्तजार करेंगे,तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी.मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होता.वसंत अपने आप नहीं आता,उसे लाना पडता है.सहज आने वाला तो पतझड होता है,वसंत नहीं.अपने आप तो पत्ते झडते हैं.नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं.वसंत यों नहीं आता.शीत और गरमी के बीच जो जितना वसंत निकाल सके,निकाल ले.दो पाटों के बीच में फंसा है देश वसंत.पाट और आगे खिसक रहे हैं.वसंत को बचाना है तो जोर लगाकर इन दो पाटों को पीचे ढकेलो--इधर शीत को उधर गरमी को .तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसंत.

18.सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं.एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की.उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है.चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है.पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं.वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं.हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है.

19.एक और बडे लोगों के क्लब में भाषण दे रहा था.मैं देश की गिरती हालत,मंहगाई ,गरीबी,बेकारी,भ्रष्टाचारपर बोल रहा था और खूब बोल रहा था.मैं पूरी पीडा से,गहरे आक्रोश से बोल रहा था .पर जब मैं ज्यादा मर्मिक हो जाता ,वे लोग तालियां पीटने लगते थे.मैंने कहा हम बहुत पतित हैं,तो वे लोग तालियां पीटने लगे.और मैं समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसे,उसमे क्या कभी कोई क्रन्तिकारी हो सकता है?होगा शायद पर तभी होगा जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबडे टूटेंगे .

20.निन्दा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं.निन्दा खून साफ करती है,पाचन क्रिया ठीक करती है,बल और स्फूर्ति देती है.निन्दा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं.निन्दा पयरिया का तो सफल इलाज है.सन्तों को परनिन्दा की मनाही है,इसलिये वे स्वनिन्दा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं.

21.मैं बैठा-बैठा सोच रहा हूं कि इस सडक में से किसका बंगला बन जायेगा?...बडी इमारतों के पेट से बंगले पैदा होते मैंने देखे हैं.दशरथ की रानियों को यज्ञ की खीर खाने से पुत्र हो गये थे.पुण्य का प्रताप अपार है.अनाथालय से हवेली पैदा हो जाती है.

- अनूप शुक्ल


21-Aug-2020 12:22 PM (331)

-दिनेश श्रीनेत
यह जरूरी नहीं कि रचनाकार जिस मकसद से किताब लिखे, अपनी संपूर्णता में किताब उसी अर्थ को संप्रेषित करे। किशोरवस्था या जिसे हम वय:संधि कहते हैं, यानी 11-12 साल की उम्र में मैंने लियो तोलस्तोय का उपन्यास पहली बार पढ़ा था। वैसे यह उनका आखिरी उपन्यास था। उसका विषय मेरी उम्र के अनुकूल नहीं था। यही वजह थी कि मैं उसे पहली बार में समझ नहीं पाया। जब मैं थोड़ा और बड़ा हुआ तब उपन्यास पूरी तरह से मेरे समझ में आया। जब समझ में आया तो उसने मुझे एक गहरे नैतिकबोध से भर दिया।

यह उपन्यास था ‘पुनरुत्थान’ जो अंगरेजी में ‘रिसरेक्शन’ के नाम से जानी जाती है। इसका भीष्म साहनी ने बहुत सुंदर अनुवाद किया था। कहानी दो अलग-अलग समय रेखाओं में चलती है। इसकी नायिका कात्यूशा जो एक वेश्या है कभी एक मासूम युवती थी। कात्यूशा पर चलने वाले मुकदमे की ज्यूरी में मौजूद नेख्लूदोव ने कभी अपनी जवानी के दिनों में कात्यूशा के साथ जबदस्ती यौन संबंध बनाए थे और उसे गर्भवती छोडक़र चला गया था। कात्यूशा जो एक उमंगों से भरी स्त्री थी और नेख्लूदोव की वासना को अपने प्रति प्रेम समझने की भूल कर बैठी थी, उस भयानक घटना के बाद पतन की ओर बढ़ती चली जाती है। पहले काम से और घर से निकाला जाना, नवजात शिशु की मौत और अंत में वेश्यालय में शरण।

नेख्लूदोव प्रायश्चित में डूबा हुआ है। वह कात्यूशा की मदद करना चाहता है मगर उसकी भूल के लिए न तो माफी की गुंजाइश बची है और न ही कात्यूशा की त्रासद जिंदगी में वह कोई सुधार ला सकता है। उपन्यास के अंत में वह बाइबिल की शरण में जाता है। कहानी संकेत देती है कि वह अपना जीवन दूसरों की भलाई के समर्पित करने का संकल्प लेता है। तोलस्तोय को अपना यह उपन्यास अन्ना कैरेनीना तथा युद्ध और शांति से ज्यादा पसंद था। जबकि आलोचकों को उनका यह उपन्यास कमजोर लगता है। इसके चरित्र एकरेखीय लगते हैं। यहां तक आते-आते तोलस्तोय ईसाई नैतिकता की शरण में सामाजिक दुखों का हल खोजने लगे थे। इस लिहाज से भी पुनरुत्थान को कमजोर उपन्यास माना गया है।

उसी दौरान संभवत: मदनलाल मधु की आलोचनात्मक पुस्तक ‘गोर्की और प्रेमचंद’ में इन्हीं नैतिक आग्रहों की वजह से मॅक्सिम गोर्की के समक्ष तोलस्तोय को कमजोर लेखक ठहराया गया है। मुझे यह उपन्यास अपनी बारीकियों और डिटेलिंग के कारण पसंद है। इसमें तत्कालीन रूसी जीवन के करीब-करीब सभी पहलुओं को छुआ गया है। इसमें जमींदार, कुलीन वर्ग, सरकार, न्यायालय, चर्च, जेल और वेश्यावृति का बहुत विस्तार से जिक्र है। उपन्यास का अंत बाइबिल के उपदेशों से भरा है, जो मुझे भी खास पसंद नहीं आया क्योंकि अंत तक पहुँचते-पहुँचते नेख्लूदोव अपनी पीड़ा और समाज में बहुत व्यापक स्तर पर फैली विषमताओं का जैसे बहुत आसान हल निकाल लेता है।

मगर इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो इसे एक महान उपन्यास का दर्जा देता है। उपन्यास में मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया कात्यूशा के किरदार ने। यह एक भोली सी निर्दोष युवती से दृढ़ स्त्री बनने की कहानी है। सामाजिक रूप से एक अपराधी और पेशे से वेश्या महिला अपनी आंतरिक मजबूती की वजह से एक बेहद मजबूत स्त्री के रूप में उभरती है। दूसरे, अतीत के गुनाह से उपजे अपराधबोध से छुटकारा पाने के लिए नेख्लूदोव जब जेल में कात्यूशा से मिलने जाता है तो उसका सामना अन्य कैदियों से भी होता है। वह उनकी कहानियां सुनता है। धीरे-धीरे उसे यह एहसास होता है कि उसके आसपास क्रूरता, अन्याय और पीड़ा की एक बहुत बड़ी दुनिया है।

वह एक के बाद दूसरी कहानी सुनता चला जाता है। वह देखता है कि लोगों को बिना कारण जंजीर में बांधा गया है, बिना कारण पीटा जा रहा है, बहुत से लोग बिना कारण पूरा जीवन काल कोठरी में बिता रहे हैं। भीतर से बाहर की तरफ नेख्लूदोव की इस यात्रा में बहुत गहराई है। तोलस्तोय आहिस्ता-आहिस्ता नेख्लूदोव की निजी ग्लानि और अपराधबोध को तत्कालीन रूसी समाज की व्यापक पीड़ा से जोड़ देते हैं। खुद की निगाहों मे दोषमुक्त होने के लिए नेख्लूदोव एक रास्ता चुनता है और वह है खुद को लोगों की भलाई के लिए समर्पित कर देना। उपन्यास की अंतिम लाइनें हैं, ‘उस रात नेख्लूदोव के लिए एक बिल्कुल ही नया जीवन आरंभ हुआ। इसलिए नहीं कि उसके लिए जीवन की परिस्थितियां बदल गई थीं, बल्कि इसलिए कि उस रात के बाद जो कुछ भी वह करता उसका उसके लिए नया और सर्वथा भिन्न अर्थ होता। समय ही बताएगा कि उसके जीवन के इस नए अध्याय का अंत किस भांति होगा।’

कहते हैं कि ‘पुनरुत्थान’ ने मोहनदास को महात्मा गांधी बनने की राह दिखाई थी। सामाजिक जीवन की कुरूपताओं और विद्रूपताओं का चित्रण करने वाले इस उपन्यास को पढ़ते हुए आप मानव मन के कलुषित पक्ष से भी परिचित होते हैं। यह उपन्यास हमें मुक्त करता है। ज्यादा मानवीय और उदार बनाता है और यह सब कुछ मन के भीतर अंत में आई बाइबिल की प्रार्थनाओं से नहीं जगता बल्कि पाप मुक्ति की तलाश में भटकते दो मनुष्यों की कहानी से जगता है जो आपस में न तो प्रेमी थे, न शत्रु और न ही एक-दूसरे का जीवन निर्धारित करने वाले। अभिशप्त आत्माओं की तरह भटकते हुए वे अंत में जीवन को किसी उजाले की तरफ ले जाने में सफल होते हैं। (फेसबुक से)


20-Aug-2020 3:04 PM (312)

-दिनेश श्रीनेत
‘गर्म हवा’ पर ‘पहल’ में प्रकाशित आलेख का पिछले दिनों पंजाबी साहित्यिक पत्रिका ‘फिलहाल’ में अनुवाद प्रकाशित हुआ है। आज सुबह जालंधर से मेरे एक मित्र आरपी सिंह ने फोन करके इसके बारे में जानकारी दी साथ ही संपादक का फोन नंबर भी शेयर किया। पहले तो बिना सूचना अनुवाद और प्रकाशन पर थोड़ी हैरानी हुई लेकिन जब फोन किया तो पता लगा कि पत्रिका के संपादक व प्रकाशक गुरूदयाल अस्सी वर्षीय बुजुर्ग हैं और बड़ी शिद्दत के साथ अकेले ही बीते 12-13 सालों से पंजाबी की इस सम्मानित साहित्यिक पत्रिका को निकाल रहे हैं। अभी वे मोहाली, चंडीगढ़ में रहते हैं। लंबा समय दिल्ली में बिताया है और सिनेमा प्रेमी रहे हैं। विष्णु खरे और सौमित्र मोहन उनके बहुत अच्छे मित्र रहे हैं। उनका कहना है कि विभाजन की त्रासदी को पंजाब ने सबसे करीब से देखा है और आज यह फिल्म दोबारा प्रासंगिक हो गई है, इसी सोच के चलते उन्होंने इस लेख का पंजाबी अनुवाद प्रकाशित किया। मेरी किशोरावस्था का बड़ा हिस्सा हिंदी में अनुदित पंजाबी साहित्य या पंजाब के परिवेश वाला उर्दू-हिंदी साहित्य पढ़ते बीता है, जिसमें बलवंत सिंह, गुरूदयाल सिंह, कृश्न चंदर, यशपाल, भीष्म साहनी, राजिंदर सिंह बेदी शामिल हैं। इस लिहाज से पंजाबी में अपना लिखा देखना मेरे लिए कुछ ज्यादा ही सुखद था।


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