साहित्य/मीडिया

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'रंग आ जाते मुट्ठी में जुगनू बन कर...' पढ़ें अफ़ज़ाल फ़िरदौस के शेर
30-Nov-2021 10:04 AM (21)

अक्सर ज़िंदगी में कई तरह के हालातों का सामना करना पड़ता है. कभी खुशी, तो कभी गम महसूस करना लेकिन उस अहसास को बयान न कर पाना, ऐसा बहुत लोगों के साथ होता है. जब बेचैनियों का बोझ ज्यादा बढ़ जाता है तो हालात से मिलते-जुलते अल्फ़ाज़ और उनसे बुना जाल मरहम का काम करता है. कई ऐसे बेहतरीन शायर हैं जो अलग-अलग हालातों को बयान करने का काम बहुत बखूबी करते हैं. आज पढ़ें, पाकिस्तानी उर्दू शायर अफ़ज़ाल फ़िरदौस कि कुछ क्लासिक चुनिंदा शेर-ओ- शायरियां 

जिस को मेरी हालत का एहसास नहीं उस को दिल का हाल सुना कर रोना क्या

इस तरह सताया है परेशान किया हैगोया कि मोहब्बत नहीं एहसान किया है

दीवारों में दर होता तो अच्छा थाअपना कोई घर होता तो अच्छा था

ऐ मेरे मुसव्विर नहीं ये मैं तो नहीं हूँये तू ने बना डाली है तस्वीर कोई और

रंग आ जाते मुट्ठी में जुगनू बन करख़ुशबू का पैकर होता तो अच्छा था

अब अश्क तिरे रोक नहीं पाएँगे मुझ कोअब डाल मिरे पाँव में ज़ंजीर कोई और

(news18.com)

'ये इल्म का सौदा ये रिसाले...' पढ़ें मोहब्बत को नया आयाम देती इश्क़िया शायरियां
28-Nov-2021 4:32 PM (28)

जाँ निसार अख़्तर का जन्म 08 फरवरी 1914 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था. उनका मूल नाम सय्यद जाँ निसार हुसैन रिज़वी है. 'अख्तर' को साल 1976 में साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया गया था. जाँ निसार साल 1914-1976 के प्रगतिशील आंदोलन में सक्रिय थे. उनका नाम प्रमुख शायरों की फेहरिस्त में शामिल है. मशहूर शायर जाँ निसार अख़्तर ने इश्क़िया शायरी को नया आयाम दिया. ये फ़िल्मों के जाने-माने गीतकार भी रहे. मशहूर फ़िल्म लेखक व गीतकार जावेद अख़्तर जाँ निसार अख़्तर के बेटे हैं. पढ़ें जाँ निसार के चुनिंदा शेर

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम होसाया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो.

आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगेये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं.

जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाएहै यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए.

सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगीतुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी.

लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ सेतेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से.

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबेंइक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं. 

(news18.com)

'कहते हैं कि उम्मीद पे जीता है ज़माना...' पढ़ें अच्छे-बुरे हालातों को बयान करने वाले चुनिंदा शेर
27-Nov-2021 12:39 PM (38)

 

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदेंइन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो- निदा फ़ाज़ली

इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न होमुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो- नरेश कुमार शाद

एक चराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासाउस के बा'द तो जो कुछ है वो सब अफ़्साना है- इफ़्तिख़ार आरिफ़

मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूँमुझे किसी पे भी अब कोई ए'तिबार नहीं- जव्वाद शैख़

कहते हैं कि उम्मीद पे जीता है ज़मानावो क्या करे जिस को कोई उम्मीद नहीं हो- आसी उल्दनी

किस से उम्मीद करें कोई इलाज-ए-दिल कीचारागर भी तो बहुत दर्द का मारा निकला- लुत्फ़ुर्रहमान 

(news18.com)

त्रिलोचन शास्त्री की कविताएं, 'हाथों के दिन आएंगे, कब तक आएंगे, यह तो कोई नहीं बताता'
26-Nov-2021 11:36 AM (38)

हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाने वाले कवि त्रिलोचन शास्त्री (Trilochan Shastri) ने अपनी रचनाओं में आम आदमी, मध्यवर्गीय समाज, किसान, मजदूर और गरीब को जगह दी है. त्रिलोचन शास्त्री ने भाषा शैली और विषयवस्तु सभी में अपनी अलग छाप छोड़ी. वे सहज भाषा और बोलचाल की भाषा में कविता बुनते थे. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ चुनिंदा रचनाएं-

आज मैं अकेला हूं

आज मैं अकेला हूं
अकेले रहा नहीं जाता

जीवन मिला है यह
रतन मिला है यह
धूल में
कि
फूल में
मिला है
तो
मिला है यह
मोल—तोल इसका
अकेले कहा नहीं जाता

सुख आए दुख आए
दिन आए रात आए
फूल में
कि
धूल में
आए
जैसे
जब आए
सुख-दुख एक भी
अकेले सहा नहीं जाता

चरण हैं चलता हूं
चलता हूं चलता हूं
फूल में
कि
धूल में
चलाता
मन
चलता हूं
ओखी धार दिन की
अकेले बहा नहीं जाता
[‘धरती’ से]

आजकल लड़ाई का जमाना है

आजकल लड़ाई का ज़माना है
घर, द्वार, राह और खेत में
अपढ़-सुपढ़ सभी लोग
लड़ाई की चर्चा करते रहते हैं

जिन्हें देश-काल का पता नहीं
वे भी इस लड़ाई पर अपना मत रखते हैं
रूस, चीन, अमेरिका, इंग्लैंड का
जर्मनी, जापान और इटली का
नाम लिया करते हैं
साथियों की आंखों में आंखें डाल-डालकर
पूछते हैं, क्या होगा

कभी यदि हवाई जहाज़ ऊपर से उड़ता हुआ जाता है
जब तक वह क्षितिज पार करके नहीं जाता है
तब तक सब लोग काम-धाम से अलग होकर
उसे देखा करते हैं

अंडे, बच्चे, बूढ़े या जवान सभी
अपना-अपना अटकल लड़ाते हैं :
कौन जीत सकता है
कभी परेशान होकर कहते हैं :
आखिर यह लड़ाई क्यों होती है
इससे क्या मिलता है

हाथ पर हाथ धरे हिन्दुस्तान की जनता बैठी है
कभी-कभी सोचती है : देखो, राम या अल्लाह
किसके पल्ले बांधते हैं हम सबको
हिन्दुस्तान ऐसा है
बस जैसा-तैसा है।
[‘धरती’ से]

तुम्हें जब मैंने देखा

पहले पहल तुम्हें जब मैंने देखा
सोचा था
इससे पहले ही
सबसे पहले
क्यों न तुम्हीं को देखा

अब तक
दृष्टि खोजती क्या थी
कौन रूप क्या रंग
देखने को उड़ती थी
ज्योति पंख पर
तुम्हीं बताओ
मेरे सुन्दर
अहे चराचर सुन्दरता की सीमा-रेखा
[‘तुम्हें सौंपता हूँ’ से]

हाथों के दिन आएंगे

हाथों के दिन आएंगे। कब तक आएंगे,
यह तो कोई नहीं बताता। करने वाले
जहां कहीं भी देखा अब तक डरने वाले
मिलते हैं। सुख की रोटी वे कब खाएंगे,
सुख से कब सोएंगे, उसको कब पाएंगे
जिसको पाने की इच्छा है। हरने वाले,
हर-हर कर अपना अपना घर भरने वाले,
कहां नहीं हैं। हाथ कहां से क्या लाएंगे।

हाथ कहां हैं, वंचक हाथों के चक्के में
बन्धक हैं, बंधुए कहलाते हैं। धरती है
निर्मम पेट पले कैसे। इस उस मुखड़े की
सुननी पड़ जाती है, धौंसों के धक्के में
कौन जिए। जिन सांसों में आया करती है
भाषा, किसको चिन्ता है उनके दुखड़े की।
[‘फूल नाम है एक’ से]

(साभार- राजकमल प्रकाशन)

(news18.com)

कमाठीपुरा की गलियों ने बताया किसी जगह पर आप क्यों गलत साबित हो सकते हैं- शिरीष खरे
26-Nov-2021 11:36 AM (44)

Hindi Sahitya News: राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली से प्रकाशित पत्रकार शिरीष खरे की पुस्तक ‘एक देश बारह दुनिया’ बाजार में आते ही छा गई. तमाम मीडिया संस्थानों में इस पुस्तक की चर्चा हुई. दरअसल, इस किताब के भीतर महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, कर्नाटक, बुंदेलखंड और राजस्थान के थार से जुड़े तरह-तरह के अनुभव मिलते हैं. वहीं, देश के कुछ जनजातीय अंचलों में स्थानीय लोगों के साथ बिताए गए समय से जुड़ी रोचक और भावनात्मक घटनाएं हैं.

‘एक देश बारह दुनिया’ यानी एक ही देश के भीतर बारह तरह की दुनियाएं हैं जिन्हें शिरीष ने पत्रकारिता के अपने अनुभवों को एक पुस्तक की शक्ल देते हुए यह नाम दिया है. असलियत में यह पुस्तक हाशिये पर छूटे असल भारत की तस्वीर है.

‘एक देश बारह दुनिया’ के दुर्गम मार्गों से गुजरते हुए पत्रकार शिरीष खरे ने अलग-अलग राज्यों से करीब दर्जन भर जगहों की असल तस्वीर को शब्द देने के प्रयास किए हैं.

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वरिष्ठ लेखक और समीक्षक आशुतोष कुमार ठाकुर ने पुस्तक के बारे में शिरीष खरे से विस्तार से चर्चा की. प्रस्तुत हैं उसी चर्चा के प्रमुख अंश-

आशुतोष- ‘एक देश बारह दुनिया’ नाम बड़ा रोचक है, लेकिन जिज्ञासा पैदा करने वाली इस नॉन-फिक्शन पुस्तक में क्या कुछ है?

शिरीष- सामान्यत: एक देश की अलग-अलग जगह तो एक-सी नजर आती हैं, पर जब हम किसी अदृश्य संकटग्रस्त जगह पर कुछ दिनों तक ठहरकर वहां के ज्वलंत मुद्दे पर कई असल पात्रों की छोटी-छोटी मार्मिक कहानियां जोड़ते हैं, स्थानीय पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए सामयिक घटनाओं के विवरण लिखते हैं, तो एक समान विषय होते हुए भी वहां की दुनिया हमें बाकी देश से एकदम भिन्न नजर आने लगती है. जैसे विदर्भ में मेलघाट की चोटी पर जब हम कोरकू जनजातियों की बीच पसरी भूख के संकट पर लिखते हैं तो उसकी सच्चाई मुंबई की भूख से अलग न होते हुए भी मुख्यत: भूख की जड़ में पहुंचने की कोशिश करती है. और यह पड़ताल करती है कि कैसे जनजातियों के जीवन को जब जंगल से काटा गया तो मेलघाट से मुंबई तक उनकी दुनिया नर्क होती चली गई.

आशुतोष- बतौर पत्रकार आपने मेलघाट की बात की और नर्मदा नदी के किनारे लंबी यात्रा करते हुए एक नदी पर आ रहे नए संकटों पर भी लंबा लिखा. क्या ऐसा संभव था कि आप किसी एक ही जगह के बारे में पूरी एक पुस्तक लिखते, बारह अलग-अलग जगहों पर लिखने की बजाय?

शिरीष- मैं तो कहूंगा कि यह बारह अलग-अलग दुनिया होने के बावजूद हैं तो एक ही महादेश की कथाएं. यहां से आप जब किसी एक मुद्दे को अलग-अलग जगहों पर पहुंचकर अलग-अलग आयामों से देखेंगे तो आपको असल भारत की तस्वीर और अधिक साफ, और अधिक बड़ी नजर आ सकती है.

मन्नू भंडारी एकदम सहज थीं, दूसरों की स्वतंत्रता का खयाल रखती थीं- अशोक महेश्वरी

उदाहरण देकर बताता हूं- मेलघाट यानी पहली दुनिया से लेकर बाहरवीं दुनिया यानी छत्तीसगढ़ के अछोटी गांव तक पूरे सफरनामे में आपको दोहराव नजर न आए तब भी कुछ सूत्र हैं जो शुरू से आखिरी तक हर पड़ावों को आपस में गूंथते हुए चलते हैं. जैसे कि मेलघाट से लेकर अछोटी तक सूखे के चिन्ह. एक जंगल तो दूसरी कृषि आधारित दो बिल्कुल अलग मानें जाने वाले समुदायों की दुनिया एक न होते हुए भी सूखे के चिन्ह या ऐसी ही कुछ चीजों से यहां जुड़ती हुई लगती है.

आशुतोष- मुंबई के रेडलाइट एरिया कमाठीपुरा की दुनिया को आपने फिक्शन जैसा लिखना चाहा है. वहां की जगह को क्या सोचते हुए आपने अपनी पुस्तक में जगह दी?

शिरीष- दस-ग्यारह साल पहले मैंने वहां से एक रिपोर्ट लिखी थी- ‘ग्रीनलाइट के इंतजार में जिंदगी’. उसे लिखते हुए मेरे दिमाग में यह बात घूम रही थी कि जो दृश्य मैं देख रहा हूं, जो विवरण मैं जुटा रहा हूं, जो मुझ पर बीत रही है, उन बातों को रिपोर्ट से बाहर जाकर फिक्शन या नॉन-फिक्शन में लिखूं. क्योंकि ऐसी बातें रिपोर्ट में लिखीं सूचनाओं से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं. इसलिए मैंने इसमें और अन्य दूसरे रिपोर्ताज में लेखन की एक शैली तैयार करने की कोशिश की, जो भाषा और प्रस्तुति के स्तर पर तो साहित्यिक रहे, लेकिन मैं मूलत: एक पत्रकार हूं, इसलिए घटनाओं से जुड़े तथ्य और विवरणों को ज्यों का त्यों रखते हुए वहां की हकीकत को और करीब से बताने की कोशिश की है.

आशुतोष- कमाठीपुरा को करीब से बताने की कोशिश का खुद आपके भीतर भी असर हुआ है?

शिरीष- इस कोशिश में मेरे कई माइंड-सेट टूटे, कैसे तो ये बातें पुस्तक में हैं. दरअसल उस जगह और वहां सेक्सवर्कर्स की जिंदगियों को समझने के लिए मैंने उनसे कई अनौपचारिक साक्षात्कार किए थे. तब मुझे पता चला कि जो कुछ भी मैं पहले सोचता रहा था, वैसा तो वहां था ही नहीं. शायद कई धारणाएं पुस्तक लिखने के बाद भी मेरे दिमाग में हों, इसलिए इस पुस्तक को मैं सीखने की प्रक्रिया के रुप में देख रहा हूं. कोई कहे कि यहां आप सही नहीं हो तो वहां मैं उससे नया जानने की कोशिश करूंगा और सही लगा तो खुद में सुधार लाने की कोशिश भी करूंगा, क्योंकि कमाठीपुरा की गलियां ने मुझे बताया है कि किसी जगह पर क्यों आप गलत साबित हो सकते हैं.

आशुतोष- इसी तरह से क्या कोई व्यक्ति है जिसकी कही बात आपके दिमाग में घर कर गई हो और आप अपनेआप के बारे में सोचने के लिए मजबूर हो गए हो?

शिरीष- कई सारे, जैसे महाराष्ट्र के कनाडी बुडरुक गांव की तिरमली बस्ती के भूरा गायकवाड़ की वह बात याद आती है जिसमें भूरा कहते हैं कि लौटने के लिए हर एक के दिमाग में एक घर घूमता है. लेकिन घुमंतु जमात वालों के दिमाग में लौटने के लिए कोई घर नहीं घूमता है. उनकी बात सुन मेरे दिमाग में तब देर तक एक घर घूमा था और मैं सोचने लगा था कि कोई यात्रा पूरी करके घर की तरफ लौटना किसी किताब को पूरा पढ़ लेने जैसी राहत देता है. पर यात्राओं से लौटते हुए मैं अक्सर अलग-अलग शहरों के अलग-अलग घरों की ओर लौटता हूं, फिर भोपाल, मुंबई, दिल्ली, जयपुर, बड़वानी और पुणे के घरों के पते बदल जाते हैं. उन किराए के घरों के बारे में सोचते हुए आखिर मुझे भी मेरे गांव मदनपुर का घर ही याद आने लगता है, जो मेरा स्थायी पता है.

आशुतोष- आपके रिपोर्ताज में कनाडी बुडरुक गांव के तिरमली जमात को भी मुख्यधारा के समाज के बीच लंबे संघर्ष के बाद आखिर अपना पता मिल जाता है. यह परिवर्तन काफी है?

शिरीष- जो जमात पुलिस से घबराए, बसों में बैठने के लिए कतराए, यदि उसी जमात के लोगों के संघर्ष से उनकी अगली पीढ़ी का कोई आदमी इंस्पेक्टर बने, या कोई लड़की राज्य परिवहन बस में कंडक्टर हो जाए तब भी संभव है कि बाहरी समुदाय को पहली नजर में यह परिवर्तन ही न लगे. लेकिन, उनके संघर्ष को वहां से देखें जहां उनके बुजुर्गों को गांव वाले अपने गांव के आसपास ज्यादा दिन टिकने नहीं देते थे और खदेड़ते ही रहते थे.

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दूसरी तरफ, पता तो महाराष्ट्र के ही आष्टी कस्बे के सैय्यद मदारियों को भी मिल गया है, फिर भी सड़कों पर मदारी का खेल दिखाने वाली इस जमात की नई पीढ़ी एक द्वंद का शिकार हो चुकी है. यही हाल महादेव बस्ती के पारधी बच्चों का है. इन कहानियों को पढ़ते समय आपको यह भी लग सकता है कि क्या उन जगहों पर होने वाले परिवर्तन नए खतरे के संकेत दे रहे हैं.

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आशुतोष- ‘गन्ने के खेतों में चीनी कड़वी’ रिपोर्ताज में शोषण की फसल के बावजूद आपने खेत मजदूर को जाल के भीतर फंसा बताया है, लेकिन विकल्प नहीं बताया है?

शिरीष- क्योंकि, वह शिकारी को पहचानने के बावजूद जीने की रणनीति के तहत सब कुछ जानते हुए भी जाल में फंसने के अलावा कोई चारा नहीं ढूंढ़ पाता है. मैंने भी पहली बार सुना तो अजीब लगा कि मराठवाड़ा के मस्सा गांव की तरह आसपास के सैकड़ों गांवों के खेत मजदूर अपने नजदीक ही चीनी फैक्ट्री और गन्ने के खेत होने के बावजूद कर्नाटक के अलग-अलग खेतों में छह से आठ महीनों के लिए पलायन क्यों करते हैं. या फिर उन जगहों पर जोड़ा बनाने के लिए बच्चों की कम उम्र में विवाह क्यों कर दिए जाते हैं.

आशुतोष- बस्तर को लेकर आपके पास नया कहने के लिए क्या है?

शिरीष- नए की बात तो अपनी जगह ठीक हो सकती है, लेकिन जब खुद को अभिव्यक्त करना पहले से ज्यादा असहज होता जा रहा है, तब दोहराना भी कहीं जरूरी लगने लगता है.

रायपुर में प्रेस रिलीज लिखते समय एक चरित्र ऐसा था, जो मुझसे कभी नहीं मिला. लेकिन मैंने उससे बातचीत की और उस समय एक छोटी कविता लिखी, उसका नाम था मीना खलको. पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में जिसे मार दिया गया था. बाद में उसकी मौत पर कई प्रश्न उठे. फिर अखबार के लिए रिपोर्टिंग के दौरान मुझे कुछ समय बस्तर जिले के जगदलपुर में रहने और आसपास की कुछ जगहों को घूमने का मौका मिला. अखबार के ऑफिस में संपादकीय सहयोग के समय मैंने अखबार की पुरानी फाइलों को पढ़ा तो लगा कि कई खबरों को फ्रंट पर होनी चाहिए थीं, पर वे डबल या ट्रिपल कॉलम में समेट दी गई थीं.

मतलब यह कि जो खबरें बस्तर से बाहर के आदमी के लिए बड़ी बन गई थीं, वे वहां के लिए सामान्य रह गई थीं. जैसे कि अबूझमाड़ के एक गांव में दो दर्जन से ज्यादा परिवार राशन पाने के लिए छह रातें रास्ते में पैदल चलते हुए बिताते हैं और सातवें दिन जब वे जगदलपुर पहुंचते हैं, तो कर्मचारी उन्हें कोई तकनीकी कारण बताकर राशन नहीं देता है. उसके बाद मैंने जगदलपुर की आसपास की जगहों से शिक्षा जैसे विषयों पर रिपोर्टिंग की और वहां के बाजार वगैरह घूमे तो मुझे बाहरी होने की वजह से जो नया लगा वही नयापन आप मान सकते हैं.

(news18.com)

'कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ...' पढ़ें परवीन शाकिर के क्लासिक शेर
25-Nov-2021 12:43 PM (46)

Parveen Shakir Shayari: परवीन शाकिर का जन्म 24 नवंबर 1952 को कराची में हुआ था. उनका मूल स्थान बिहार का ज़िला दरभंगा में स्थित लहरियासराय है. उनके पिता शाकिर हुसैन साक़िब विभाजन के बाद कराची में रहने लगे थे. परवीन कम उम्र से ही शायरी करने लगी थीं. परवीन ने मैट्रिक रिज़विया गर्ल्स स्कूल कराची से और बी.ए सर सय्यद गर्ल्स कॉलेज से की. साल 1972 में उन्होंने कराची यूनीवर्सिटी से एम.ए इंग्लिश की डिग्री हासिल की. इसके बाग भाषा विज्ञान में भी एम.ए किया. बाद में उन्होंने अबदुल्लाह गर्ल्स कॉलेज कराची में बतौर टीचर पढ़ाया. परवीन महिला शायरों में अपने अनोखे लब-ओ-लहजे के लिए मशहूर रहीं. पढ़ें उनके लिखे कुछ मशहूर शेर 

हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँदो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं.

चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दियाइश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया.

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस नेबात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की.

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहींअब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई.

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भीदिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी.

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगामसअला फूल का है फूल किधर जाएगा.

(news18.com)

मन्नू भंडारी एकदम सहज थीं, दूसरों की स्वतंत्रता का खयाल रखती थीं- अशोक महेश्वरी
24-Nov-2021 7:31 PM (45)

मन्नू भंडारी एक ऐसी रचनाकार थीं जिन्होंने मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया. उन्होंने जो महसूस किया वह लिखा. साधारण की महिमा का जो एक अभियान आज की आधुनिकता में चला है, उसकी वह मुकाम थीं. वह एक बड़ी लेखिका थीं लेकिन उनमें इसको लेकर कभी अभिमान नहीं रहा. उन्होंने ‘आपका बंटी’ जैसा उपन्यास तब लिखा जब लोग संबंधों के बारे में खुलकर कहने से संकोच करते थे. उनकी कृतियां हमेशा पढ़ी जाएंगी हमें फक्र है कि हम मन्नू भंडारी युग में जिये.

ये बातें जानी-मानी कथाकार मन्नू भंडारी की स्मृति में आयोजित सभा में आये उनके प्रशंसकों ने कहीं. साहित्य अकादेमी के सभागार में दिवंगत कथाकार मन्नू भंडारी की स्मृति सभा का आयोजन ‘राधाकृष्ण प्रकाशन’ और ‘हंस पत्रिका’ परिवार की और से किया गया था.

मन्नू भंडारी की यादें साझा करते हुए वरिष्ठ कथाकार मृदुला गर्ग ने कहा- ‘मन्नूजी उन बिरले इनसानों में थीं जिनमें अहंकार बिल्कुल नहीं था. एक बार उन्होंने कहा था कि मुझे जितना प्यार-सम्मान मिला उतना मैंने लिखा नहीं. यह उनकी विनम्रता थी. उन्होंने किसी विचारधारा या विमर्श के दबाव में नहीं लिखा, स्वेच्छा से जो चाहा वही लिखा.’

कथाकार-पत्रकार मृणाल पांडे ने कहा- ‘मन्नूजी ने लेखन और जीवन में सत्यनिष्ठता की कीमत चुकाई, पर इसका कोई हल्ला नहीं मचाया. वह ईमानदार थीं. मैं उनकी ईमानदारी की कायल थी. वह हमारी अग्रजा और स्नेही मित्र थीं. मूल्यों से समझौता नहीं करना उनका स्वभाव था.

मृणाल पांडे ने कहा कि उनकी मां शिवानी मन्नूजी की बहुत बड़ी फैन थीं. हमें फक्र है कि हम मन्नू भंडारी युग में जिये.

वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने कहा, ‘मेरी नजरों में मन्नू भंडारी की एक सौम्य छवि बनी हुई है. साधारण की महिमा का जो एक अभियान हमारी आधुनिकता में चला है, उसकी वह मुकाम थीं. उनका उत्तर जीवन शुरू हो गया है और यह जीवन उनके भौतिक जीवन से भी लंबा होगा यही कामना करते हैं.’

सुपरिचित रंगकर्मी अमाल अल्लाना ने अपने संदेश में मन्नूजी के उपन्यास ‘महाभोज’ के नाट्य रूप की प्रस्तुति की यादें साझा करते हुए कहा, ‘उस उपन्यास के नाट्य रूपांतर के समय हर बैठक में वे आईं और मुझे पूरा सहयोग दिया. एक युवा निर्देशक के प्रति उनकी यह उदारता मुझे हमेशा याद रही. हमेशा याद रहेगी.’

कथाकार गीतांजलि श्री ने कहा, ‘मन्नू जी का लेखन फेमिनिज्म के संदर्भ में हमारी पीढ़ी को एक अलग दृष्टि देने वाला साबित हुआ. उनकी दृढ़ता और स्पष्टता ने हमें काफी प्रेरणा दी.’

वरिष्ठ ममता कालिया ने कहा, ‘एक लेखक का सबसे बड़ा जीवन यह होता है कि पाठक उसके लेखन को पढ़ते रहें. मन्नू जी ऐसी ही लेखक थीं. वे सहज सरल और क्षमाशील थीं. बहुत ही सहज और उदार इंसान थीं. उन्हें अपने आप पर बड़ी लेखिका होने पर कभी अभिमान नही था.’

ममता ने कहा, ‘मन्नू जी ने ‘आपका बंटी’ जैसा उपन्यास तब लिखा जब लोग संबंधों को गोपनीय रखते थे, उन्होंने ‘महाभोज’ तब लिखा जब हिंदी में दलित लेखन का चलन नहीं हुआ था.’

राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि हमें अपने ‘राधाकृष्ण प्रकाशन’ से मन्नू भंडारी का समस्त लेखन प्रकाशित करने का सौभाग्य मिला.. मन्नू जी स्नेह भी बहुत करती थीं, चिंता भी बहुत करती थीं और नाराज भी बहुत होती थीं. सब ऐसे ही सहज जैसे एक माँ करती है. मुझे लगता है कि मन्नू जी को बिना स्त्रीवादी हुए स्त्रीवाद के लिए बिना लोकप्रिय साहित्य लिखे पाठक प्रिय रचनाओं के लिए और इस सबसे ज्यादा अपने लेखकीय आत्मविश्वास और सहजता के लिए याद किया जाता रहेगा.

जाने माने रंगकर्मी देवेंद्रराज अंकुर ने मन्नू भंडारी को याद करते हुए कहा, ‘मन्नू जी ने जमकर लिखा और जमकर जीवन जिया. उनके उपन्यास ‘महाभोज’ को मैंने ही 1981 में पहली बार मंचित किया था, यह एक महत्वपूर्ण रचना थी खासकर राजनीति को लेकर. मन्नू जी के शांत सहज व्यक्तित्व से लगता नहीं था कि वे इस तरह राजनीति की गुत्थियों को अपनी रचना में उतार सकती हैं.’

अंकुर ने कहा- ’40 वर्षो के हिन्दी रंगमंच में ‘महाभोज’ कई बार मंचित हुआ और देश की कई भाषाओं में मंचित हुआ.’

स्मृति सभा में मन्नू भंडारी पर केंद्रित एक डॉक्यूमेंट्री के अंश भी दिखाये गए. इसके बाद शास्त्रीय गायक विद्या शाह ने कबीर, सूर आदि संत कवियों के पदों का गायन किया.

मन्नू भंडारी
बता दें कि मन्नू भंडारी का 15 नवंबर को निधन हो गया था. मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल, 1931 को मध्य प्रदेश के भानपुरा में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई अजमेर, राजस्थान में हुई. कोलकाता एवं बनारस विश्वविद्यालयों से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की. पेशे से अध्यापक मन्नू जी ने लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में अध्यापन किया.

हिन्दी साहित्य के अग्रणी लेखकों में गिनी जाने वाली मन्नू भण्डारी ने बिना किसी वाद या आंदोलन का सहारा लिए हिन्दी कहानी को पठनीयता और लोकप्रियता के नए आयाम दिए. ‘यही सच है’ शीर्षक उनकी कहानी पर आधारित बासु चटर्जी निर्देशित फिल्म ‘रजनीगंधा’ ने साहित्य और जनप्रिय सिनेमा के बीच एक नया रिश्ता बनाया. बासु चटर्जी के लिए उन्होंने कुछ और फिल्में भी लिखीं. उनकी कई कहानियों का नाट्य-मंचन भी हुआ. ‘महाभोज’ उपन्यास का उनका नाट्य-रूपांतरण आज भी देश भर में अनेक रंगमंडलों द्वारा खेला जाता है.

उनके उपन्यास ‘आपका बंटी’ को दाम्पत्य जीवन तथा बाल-मनोविज्ञान के संदर्भ में एक अनुपम रचना माना जाता है. जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने ‘एक कहानी यह भी’ नाम से अपनी आत्मकथा भी लिखी जिसे मध्यवर्गीय परिवेश में पली-बढ़ी एक साधारण स्त्री के लेखक बनने की दस्तावेजी यात्रा के रूप में पढ़ा जाता है.

हिन्दी के लब्ध-प्रतिष्ठ कथाकार एवं संपादक राजेन्द्र यादव की जीवन-संगिनी रहीं मन्नू जी ने अपने लेखन में स्वतंत्रता-बाद की भारतीय स्त्री के मन को एक प्रामाणिक स्वर दिया और परिवार की चहारदीवारी में विकल बदलाव की आकांक्षाओं को रेखांकित किया.

मन्नू भंडारी कुछ समय से अस्वस्थ थीं और एक सप्ताह उपचाराधीन रहने के उपरांत 15 नवंबर को अस्पताल में ही उन्होंने अंतिम सांस ली थी. (news18.com)

विभाजन की त्रासदी का खाका है अलका सरावगी का 'कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए'
19-Nov-2021 12:19 PM (49)

Hindi Sahitya News: अलका सरावगी के उपन्यास ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ में दोहरे विभाजन की स्मृति है. कहानी कोलकाता से शुरू होती है, लेकिन कहानी है बांग्लादेश के कुष्टिया जिले की, जहां से पहले 1947 में और फिर 1971 में हिंदू परिवार भाग कर कोलकाता आ रहे हैं. कुष्टिया में व्यापार और सौदे में बहुत होशियार माना जाने वाला कुलभूषण कोलकाता आकर मानो बिखर जाता है.

Kulbhooshan Ka Naam Darj Keejiye: “गजब बात है!” कहकर कुलभूषण मुस्कराया. सड़क के किनारे पत्थर पर बैठे हुए उसे मुस्कराते हुए किसी ने नहीं देखा. देखता भी तो शायद पागल समझकर आगे बढ़ जाता. यों इस टूटी-फूटी दुनिया में सड़क पर बठैकर रोते या हंसते या अपने-आप से बात करते हुए चलते लोगों की कोई कमी नहीं है. शायद जो लोग उसकी तरह घरों के अन्दर ऐसा नहीं कर पाते, वे बाहर निकलकर आज़ाद हो जाते हैं. उसके मुस्कुराने का कारण यह था कि अभी-अभी कुलभूषण को एक नयी बात का पता चला था. वह भी ऐसे, जैसे कि अपना चश्मा पॉकेट में रखा हो और कोई उसे घर के कोने-कोने में खोजता फिरे.

उसके बेटे प्रशान्त और उसकी पाली हुई बेटी मालविका के आपस में क्या सम्बन्ध थे? क्या वे सम्बन्ध समाज के माने हुए दायरों के बाहर चले गये थे? क्या मालविका ने इसीलिए जीने के बजाय मरना चुना? कुलभूषण ने अपने दिमाग़ को तकलीफ़ की इस भूलभुलैया में भटकने से बचाने के लिए भूलने का बटन दबा दिया था. पर जाने उसे क्या हुआ कि वह बार-बार भूलने का बटन दबाता चला गया था. तभी उसने देखा कि उसका दिमाग़ पीछे और पीछे जाता गया. जैसे पृथ्वी ने उल्टे चक्कर लगा लिए हों और समय उस जगह चला गया हो जब उसके जीवन में न मालविका थी और न प्रशान्त.

कुलभूषण ने अपने दिल में गहरा सुकून महसूस किया जैसे कि कई दशकों का बोझ उसकी आत्मा से उतर गया हो. काश कि भूलने के बटन की इस व क़ाबिलियत का पता लगाने में उसे व करीब-करीब पचास साल न लगे होते.

वह किस साल के किस महीने में मां को लेकर हमेशा के लिए कुष्टिया छोड़कर यहां चला आया था? आज तक न जाने क्यों उसने यह सब याद नहीं किया था. उसे याद आया कि जिस दिन वह लाटैने वाला था, उसके पहले दिन वह गोर्राइ के तट पर घण्टों अकेला बैठा रहा था. अचानक उसे लगा था कि उसकी व क़मीज की कॉलर गीली है. तब उसे पता चला कि वह रो रहा था.

आज तक जब भी उसे रुलाई आयी थी, उसने भूलने का बटन दबा दिया था. पर उस दिन उसे पता ही नहीं चला था. शायद नदी का वह किनारा अब तक उसके आंसुओं से नमकीन होगा. उसे याद आया कि कैसे उसने अपने आंसुओं को दूसरों की निगाहों से देखा था.

श्यामा साथ होता तो सोचता कि वह अपने हृदय में अमला के लिए जागे उस अद्भुत प्रेम के लिए रो रहा है जिसका कोई किनारा कभी मिलनेवाला नहीं है. यदि मां और पिताजी देखते तो शायद सोचते कि वह अपने काम-काज, घर-द्वार छूटने आरै भाईयों-भाभियों के साथ के जीवन के बारे में सोच कर रो रहा है. पर कुलभूषण जैन ही जानता था कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ईस्ट बंगाल की अपनी गंगा-‘गोराई’ नदी के लिए रो रहा है. गोराई के बिना उसका जीवन वैसे ही सूना होगा जैसे कलकत्ते के ढाकापट्टी की तंग गलियाँ बिना पेड़ों की हरियाली के निपट सूनी हैं.

जब कुछ छूटने वाला होता है, तभी पता चलता है कि उसके बिना जीना क्या होगा. गोराई नदी के पास से गुज़रती रेल लाइन के दोनों तरफ़ दुर्गा-पूजा के ठीक पहले उगनेवाले सफ़ेद कास घास के लहराते झुरमुट उसने फिर कभी नहीं देखे. क्या दुनिया में उससे सुन्दर कोई दृश्य हो सकता है? बचपन से सुबह-शाम दोनों वक़्त गोराई में छलांग लगाकर दूर तैरते हुए नहाना और लाइन लगाकर चौक के मकान के सामूहिक गुसलख़ाने में नहाना क्या कभी एक हो सकता है?

गोराई नदी ही उसके सारे सुख-दुख की साथी थी। जब कभी ग़ायब होने पर उसकी खोज होती, वह वहीं बैठा मिलता.

पिताजी कई बार कहते-‘पिछले जनम में तुम गोराई में हिलसा मछली रहे होगे.’

पिताजी जैसे बनियों के लिए नदी उनके व्यापार का माल आने-जाने का रास्ता भर रही होगी. पर कुलभूषण के लिए गोराई उसकी आत्मा में बहती थी. उसकी आंखें नदी के पानी को, उसमें बहती छोटी-बड़ी नावों को और मांझियों को, नदी के किनारे में छोटे-से द्वीप पर उगे पेड़ों और जाड़े में उन पर भर जानेवाली प्रवासी हंसचीलों को देखते-देखते कभी नहीं थकती थीं. बारिश में उफन रही गोराई हो या जाड़े में नीले आकाश को झलकाती शान्त गोराई हो, उसे गोराई हर बार पहले से ज़्यादा अद्भुत लगती.

अलका सरावगी
अलका सरावगी हिन्दी की प्रसिद्ध कथाकार हैं. वे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं. कोलकाता में जन्मी अलका ने हिन्दी साहित्य में एमए और ‘रघुवीर सहाय के कृतित्व’ विषय पर पीएच.डी की उपाधि हासिल की है. “कलिकथा वाया बाइपास” उनका चर्चित उपन्यास है, जो अनेक भाषाओं में ट्रांसलेट हो चुके हैं. अलका का पहला कहानी संग्रह 1996 में ‘कहानियों की तलाश में’ आया. इसके बाद ही उनका पहला उपन्यास ‘काली कथा, वाया बायपास’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ. (news18.com)

बाल साहित्य: अलका सिन्हा की कहानी 'वह बड़ा हो गया था…'
15-Nov-2021 7:43 PM (29)

Bal Diwas 2021: जन्मदिन की गहमा-गहमी के बीच भी वरुण का मन उदास था. हर बार की तरह घर बेहतरीन सजावट जा रही थी. सुबह से ही उसे जन्मदिन की शुभकामनाएं और खूबसूरत तोहफे मिल रहे थे. आज उसे स्कूल ड्रेस पहनने से छूट मिली थी और वह अपनी नई ड्रेस में स्कूल गया था. स्कूल असेंब्ली में प्रिंसीपल मैम ने उसके नाम की स्पेशल प्रेयर की थी. उन्होंने जीसस से कामना की थी कि वरुण अपनी मंजिल को पाए और एक समझदार व्यक्ति बने. वह बड़ा हो रहा है, मदर मेरी उसे अच्छी समझ दें.

इस प्रेयर के बाद से ही वह किसी सोच में डूबा है. क्या बड़े होने का मतलब यही होता है कि वह मस्ती करना छोड़ दे और लगातार कुछ सोचता रहे? उसके पापा ने उसके जन्मदिन के अवसर पर स्कूल के एक गरीब बच्चे की सालभर की पढ़ाई और उसकी किताबों का खर्च भी डोनेट किया था. सब कुछ तो बढ़िया था. ऊपरी तौर पर तो वह भी ठीक ही दिख रहा था मगर भीतर कहीं कुछ खाली था.

वह अपने पैरों की ‘किक’ से एक छोटा-सा पत्थर उछालता है. पत्थर लगभग उसकी ऊंचाई तक जाकर गिर जाता है। उसकी निगाह भी उस ऊंचाई को नाप कर नीचे लौट आती है. अपनी ही धुन में खोया वह घर लौट आता है.

शाम नजदीक आती जा रही है, उसके दोस्त और मम्मी-पापा के मेहमान आते ही होंगे. आज जम कर पार्टी होगी. हर उम्र के लिहाज से कई तरह के गेम होंगे, मैन्यु में कई तरह के व्यंजन और उसके दोस्तों के लिए रिटर्न गिफ्ट भी. हर कोई कहेगा, ‘क्या खूब पार्टी की है वढ़ेरा साहब ने,’ या फिर, ‘पार्टी तो वढ़ेरा साहब की होती है!’

शाम रात में बदलने लगी है. थोड़ी ही देर में घर की सजावट जगमगा उठेगी. सामने की लॉन में ठीक बीचोंबीच सजी मेज पर शानदार केक होगा. वह उन पर सजी मोमबत्तियां बुझाएगा और संगीत की धुन पर सभी एक स्वर में बर्थ डे गीत गाएंगे.

अचानक दादा-दादी को दरवाजे से बाहर निकलते देख उसकी तंद्रा भंग हुई. दोनों मंदिर जाने के लिए तैयार होकर निकल रहे रहे हैं. दादी के हाथ में वह साजी है जिसमें पूजा का सामान रख कर वे मंदिर जाती हैं.

वरुण जैसे नींद से जागा. इस बार भी वही सब होगा. उसके दादा-दादी ऐन उस वक्त वहां नहीं होंगे जब वह केक काट रहा होगा, जब उसके लिए बर्थ-डे सॉंग गाया जा रहा होगा. उसे एक चुभन महसूस हुई, यही वह फांस थी जो उसे भीतर-ही-भीतर गड़ रही थी. हर रोज वह स्कूल से लौट कर दादा-दादी के साथ कितनी बातें करता है. उसे खाना खिलाते हुए दादी उससे दिन भर की कहानी सुनती है, प्यार से समझाती है कि उसने क्या सही किया और क्या गलत. दादाजी उसके साथ खेलते हैं, उसका होमवर्क कराते हैं. तभी तो उसकी रिपोर्ट इतनी अच्छी रहती है. जिनके साथ उसकी हर दोपहर बीतती है, ऐन उसके जन्मदिन पर वे उसके साथ क्यों नहीं होते? यह उसे अच्छा नहीं लगता. वह समझ गया, यही वह कमी है जो उसे लगातार बेचैन किए हुए है. वह अपनी जिंदगी का यह खास दिन उनकी अनुपस्थिति में नहीं बिताना चाहता है.
नहीं, इस बार वह ऐसा नहीं होने देगा.

“दादाजी, इस बार आप कहीं नहीं जाएंगे,” वह दौड़कर दादाजी के पास पहुंच गया.
उसकी आवाज पर दादाजी ने चौंक कर उसकी ओर देखा.
“आज मेरा जन्मदिन है और मैं चाहता हूं, आज आप मेरे साथ रहें!”
“तुम्हारा जन्मदिन है, इसीलिए तो हम मंदिर जा रहे हैं. ईश्वर से तुम्हारी दीर्घ आयु और यश-कीर्ति की प्रार्थना करने के लिए.” दादा जी अपनी छड़ी बढ़ाते हुए चलने लगे.
“आप ही तो कहते हैं न, भगवान सब जगह होते हैं. तो फिर आज यहीं कर लो न अपनी पूजा.” वरुण लाड़ से दादाजी के सामने आ खड़ा हुआ.

दादी ने वरुण के सिर पर हाथ फेरते हुए समझाया, “तुम बच्चे हो, अपने दोस्तों के बीच खुशी मनाओ, मस्ती करो…”
“मैं बच्चा नहीं हूं. समझ रहा हूं कि आप लोग जान-बूझ कर मेरी हर बर्थ-डे पार्टी पर मौजूद नहीं रहते. हर बार कहीं और चले जाते हो…”

वह दादा-दादी का रास्ता रोक कर खड़ा रहा, “मैं अपना बर्थ-डे आप लोगों के साथ मनाना चाहता हूं!”

दादाजी ने हार कर हथियार डाल दिए, “बेटे तुम लोगों के जमाने की पार्टी हमें समझ नहीं आती और हम भी तो वहां कितने अजीब लगेंगे…!” दादा जी ने अपने धोती-कुरते की ओर देखते हुए कहा.

“और मैं भी तो उलटे पल्ले की साड़ी, सिर पर आंचल…” दादी आंचल मुंह में दबाकर हंस पड़ी,“चल, अब जाने दे हमें…!”
“आप जैसे चाहते हैं, मैं वैसे ही अपना जन्मदिन मनाऊंगा… पर मनाऊंगा आपके साथ ही!” वरुण ने ऐलान कर दिया.
“मुझे अपने जन्मदिन पर आपसे यही तोहफा चाहिए, वरना मैं अपना जन्मदिन मनाऊंगा ही नहीं!”

दादा जी के दिल की धड़कन बढ़ गई थी. वरुण की जिरह-बहस में पार्टी का समय हो चला था. मेहमानों का आना शुरु हो चुका था. वरुण के पापा-मम्मी आगे बढ़कर आगंतुकों का स्वागत कर रहे थे. घर के सामने, लॉन में शामियाना लगा था जिसके अलग-अलग हिस्सों में तरह-तरह के खेलों की सजावट थी. हवा भरे मिकि-माउस पर चढ़ते-उतरते हुए बच्चे बार-बार गिर पड़ते और बच्चों का ठहाका गूंज जाता. सरप्राइज के तौर पर इस बार पापा ने एक मेजीशियन यानी जादूगर को भी बुलाया था जो कभी किसी के बालों से पैसे निकालता तो कभी उसकी जेब का बॉल पेन किसी और की जेब से निकालता. बच्चे हंस-हंस कर दोहरे हो रहे थे. बाईं तरफ बने डांस-फ्लोर पर बड़ों का जमावड़ा था. पाश्चात्य धुनों पर सबके पैर ऐसे थिरक रहे थे मानो पहले से इसकी तैयारी कर रखी हो. हवा के पोर-पोर में खुशियों की किलकारी गूंज रही थीं.

दादा-दादी के लिए यह सब बिलकुल अनूठा था. उन्होंने अपने गांव के मेलों में जो कुछ देखा था, यह सब उसकी संकल्पना में दूर-दूर तक कहीं नहीं ठहरता था. वे दोनों एक पल को भूल ही गए कि वे इसी दुनिया का हिस्सा हैं. तभी सुनहरी ट्रॉली पर खूबसूरती से सजाया दो मंजिला केक मैदान के बीचोंबीच सरकने लगा. सभी का ध्यान कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण की तरफ खिंचने लगा और सभी अतिथि बीच में सजी मेज की तरफ बढ़ने लगे.

“वरुण! वरुण!! ” मम्मी-पापा पुकार रहे थे.
“आप चलेंगे, तभी मैं भी चलूंगा,” उधर वरुण अपनी बात पर कायम था.
आखिर दादा जी को वरुण की जिद के आगे हार माननी पड़ी. वे उसका हाथ थामे लॉन की तरफ बढ़ने लगे.
महंगे-महंगे कपड़ों में लिपटे आगंतुकों की उस भीड़ में दादा जी खुद को बहुत असहज अनुभव कर रहे थे. दूसरी ओर माथे पर आंचल रखे, दादी भी संकोच से गड़ी जा रही थी.

वरुण ने बीचोबीच सजे मंच के पास आकर सभी का अभिवादन किया और मेहमानों से अपने दादा-दादी का परिचय कराया. उसने ऐलान किया कि इस बार का जन्मदिन वह अपने दादा-दादी की पसंद और उनके तरीके से मनाएगा.

चारों ओर एक स्तब्धता-सी व्याप्त थी. दादा-दादी भी किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े थे. वरुण के मम्मी-पापा और सभी मेहमान हैरानी से देख रहे थे कि आखिर माजरा क्या है. मगर वरुण और उसके दोस्तों की दिलचस्पी बढ़ गई थी. उन्होंने दादाजी को घेर लिया, ‘दादा जी, दादी जी!’ सभी उत्साह से उनकी ओर देख रहे थे.

दादा जी ने देखा जब वरुण और उसके दोस्त, यानी यह नई पीढ़ी उनके तरीके से जन्मदिन मनाने को उत्सुक है तो वही पीछे क्यों रहें. उन्होंने दादी के हाथ में टंगी मंदिर ले जाने वाली साजी से डिब्बी निकाल कर वरुण के माथे पर चंदन-रोली का तिलक कर दिया.

‘शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यम् धनसंपद: शत्रु बुध्दि विनाशाय, दीप जोतिर नमोस्तुते’ वे गदगद कंठ से अपने पौत्र पर शुभकामनाओं की बौछार कर रहे थे, उधर दादी दीपक जला कर वरुण की आरती उतार रही थीं.

पाश्चात्य धुनें शांत हो गई थीं, उन धुनों पर थिरकते कदम, सम्मोहित-से उनकी तरफ बढ़ते आ रहे थे.। सभी अवाक् देख रहे थे, दादा जी के उल्लसित स्वर में वरुण के स्वस्थ और यशस्वी जीवन की मंगलकामना धरती से आकाश तक गूंज रही थीं.
वरुण की खुशी का ठिकाना नहीं था. उसे लग रहा था जैसे देवता आकाश से फूल बरसा रहे हैं. वह महसूस कर रहा था कि इस बार वह सचमुच बड़ा हो गया था… (news18.com)

संबंधों की सूक्ष्म पड़ताल करता महेन्द्र भल्ला का उपन्यास 'एक पति के नोट्स'
11-Nov-2021 10:24 AM (43)

– डॉ श्रद्धा श्रीवास्तव

महेन्द्र भल्ला द्वारा लिखित उपन्यास “एक पति के नोट्स” का उल्लेख हिंदी उपन्यास के इतिहास में जरूर होता है. महेंद्र भल्ला अपने इस पहले उपन्यास से ही काफ़ी चर्चित हो गए थे. हिंदी साहित्य में वह मनुष्य-मन व प्रकृति की सूक्ष्म अंतर्ध्वनियों को सुन पाने की क्षमता व संवेदना के कारण याद किए जाते हैं और किए जाते रहेंगे.

एक तो शीर्षक कौतुहल जगाता है दूसरा, भाव जगता पढ़कर देखें कि क्यों यह चर्चित उपन्यास चर्चित हुआ होगा. एक ही बैठक में पढ़ा जा सकने वाला बिल्कुल छोटा सा उपन्यास है. बिल्कुल सामान्य-सा लगने वाला कथानक एक घर, पति-पत्नी, पास-पड़ोस और डेली रूटीन.

यह उपन्यास तात्कालिक अनुभवों (क्षण तथा भोग) को कथानक में ढालता है, जिसे प्रायः हमारे यहां लोग कहते नहीं हैं. देह-भोग का यह चित्रण हिंदी के पारंपरिक पाठकों को चौंकाता है.

यह एक पति के नोट्स हैं – जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है जीवन में इस अक्षमता को जान लेना कि ऐसे ही जीते रहना ही जीवन होता है. जीवन ऐसा नहीं वैसा होना चाहिए का बोझ नायक अविनाश अंत में उतार फेंकता है.

उपन्यास के पहले ही पन्ने पर नायक लालसा व्यक्त करता है- पत्नी सीता का चेहरा मीठा लग रहा है. वह कहता है “अगर वह पत्नी न होती तो उसे जरूर चूम लेता या चूमने की इच्छा को दबाता इसका कड़वा मज़ा लेता. वह मज़ा लेने के लिए संध्या की ओर आकर्षित ज़रूर होता है पर उसके साथ सेक्स करते हुए इस निर्णय पर पहुंचता है संध्या “रबर की सी, रबर और मिटटी की बनी, बे-असर बदसूरती के नमूने लिए हुए है. उफ़!’’

दरअसल वहां भी वह उसी निरर्थकता को पाता है. प्यार और घृणा परस्पर दो विरोधी भावनाएं हैं और इन दोनों के साथ हमें जीना होता है. इस दर्शन-बाजी को नायक अविनाश किशोरी से कहता है- “आदमी को पशु भी रहना पड़ेगा जो वह मूलतः है और अत्यंत सभ्य भी.”

नायक अपने जान-पहचान के सभी दम्पतियों के संबंधों को अच्छी तरह से जांचता है, उलट-पलट कर देखता है. नंगा करके देखता है और अपने इस ख़याल को निहायत घिनौना भी बताता है. कमीनापन भी कहता है. वह खुद अपने और अपने आस-पास के लोगों के व्याक्तिगत जीवन को कुरेद-कुरेद कर देखना चाहता हैं. वह किशोरी और संध्या को करीब से देखता है और पाता है संध्या का पति किशोरी वनमानुष की तरह सख्त और ताकतवर था .वह बहुत ही भद्दे ढंग से बोलता, चलता, कपडे पहनता है. संध्या इसके साथ कैसे रहती होगी?

यह उपन्यास एक मामले में अलग है कि वो मार्क्सवाद के महामानव और न ही अस्तिववाद के लघु-मानव को प्रतिष्ठित न कर एक मामूली आदमी के मनोविज्ञान को व्यक्त करता है. उसका यह कहना -“न अच्छा हूं न बुरा हूं. मामूली हूं. जो मामूली नहीं है वे अजूबे हैं, हिसाब के बाहर के हैं. ’’

एक बात पति नोटिस करता है कि उसकी पत्नी एकरसता के साथ कैसे जी लेती है. वह सब काम चुपचाप बिना शिकायत के कैसे कर लेती है – “रोटी बनाना, नौकर को डांटना, घर साफ रखना. दत्तचित होके. मतलब बेमतलब से परे. वह उसके साथ बोरियत को दूर करने घर से बाहर जाता है. तब भी मन का सूनापन कम नहीं होता.

“सजे सजाये टेबल पर बैठते हैं वे दो ही थे. दोनों खाली तरफों पर सूनापन था. कभी लगता है हम सिर्फ दो ही हैं बाकी दुनिया नहीं है. शादी के बाद भी उसे खालीपन का अहसास होता है. दरअसल मैं वहीं था जहां से शुरूं हुआ था. कोरा. नहीं, न आगे न पीछे. वही.

उपन्यास में देह-भोग के चित्रण के लिए जिस भाषा को आजमाया है वो अपनी शैली में खिलंदड़ी और नयापन लिए है. जैसे – “जब मैंने शादी की तो उत्साह और ख़ुशी के मारे पहली बार फेल हो गया था. सीता का यह कहना –“आज आप अजीब थे.” यहीं पर बुलबुल या कुत्तों का खेलने वाले विवरण महेंद्र भल्ला के अनोखे शिल्प से आपका परिचय करवाते हैं. बुलबुल के आने को इतना बारीकी से देखते हैं. “काला सिर ,धूसर पूंछ, नीचे का हिस्सा लाल, बाकि मैली सी नफासत में गढ़ी. वह बुलबुल को देखकर मीर का शेर गुनगुना सकता है मीर का शेर गुनगुनाता है.

गुलशन में आग लग गई रंगे-गुल से मीर
बुलबुल पुकारी देख के साहिब, परे परे !

औरत के बारे कुछ बात और नोट करता है- जैसे कि “नए कपड़े पहनी औरतों में एक अजीब जीवनभरी खुशबू होती है. जब पत्नी अपने मायके वाले से बतियाती हुई अपने बचपन और कुंवारेपन में खो जाती है तो पति को वितृष्णा होती है.

उपन्यास- एक पति के नोट्स
लेखक- महेन्द्र भल्ला
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष- 1967
मूल्य 50/-

(news18.com)

कलिंग साहित्य महोत्सव 10 दिसंबर से भुवनेश्वर में, जुटेंगे 300 से अधिक लेखक और कलाकार
07-Nov-2021 8:19 PM (52)

Kalinga Literary Festival: किताबें पढ़ने-पढ़ाने वालों का बड़ा उत्सव 8वां कलिंग साहित्य महोत्सव 10 दिसंबर से भुवनेश्वर में आयोजित किया जाएगा. इस बार का महोत्सव की थीम इंडिया एट 75 : कॉमेमोरेटिंग द रिपब्लिक ऑफ लेटर्स होगी और इस महोत्सव में 300 से ज्यादा लेखक, कवि, कलाकार और अन्य वक्ता भी शामिल होंगे.

कलिंग साहित्य महोत्सव के संस्थापक रश्मि रंजन परिदा ने बताया कि कलिंग लिटरेरी फेस्टिवल में साहित्यकारों, कलाकारों, पाठकों और अन्य लोगों को कई नए अनुभव मिलेंगे. समारोह के दौरान राम कथा, कविता पाठ, लघु कहानी, गीत पर सत्र भी होंगे. इस महोत्सव के दौरान कलिंग बुक अवॉर्ड्स भी प्रदान किए जाएंगे.

रश्मि रंजन ने बताया कि ‘कलिंग साहित्य महोत्सव’ (केएलएफ) के साथ ही छठे ‘कलिंग कला महोत्सव’ का भी आयोजन किया जाएगा. महोत्सव का आयोजन भुवनेश्वर के स्वोस्ती प्रीमियम होटल में किया जाएगा.

रश्मि रंजन परिदा ने बताया कि इस बार महोत्सव में देश और दुनिया के जाने-माने लेखक और कलाकार शामिल हो रहे हैं. इनमें संदीप बामजई, अरुण कमल, अलका सरावगी, ममता कालिया, अरुणव सिन्हा, प्रतिभा रे, हलधर नाग, नमिता गोखले, मालाश्री लाल, गोपालकृष्ण गांधी, दिव्या दत्ता, अमर पटनायक, प्रियंका चतुर्वेदी, गुलजार, शिरीष खरे, यतींद्र मिश्रा, रशीद किदवई, रुचिरा चौधरी, रंजीत राय, प्रो. प्रभाकर सिंह, कावेरी बामजई, अमेय प्रभु, साईं स्वरूपा अय्यर, विक्रम संपत, अतुल ठाकुर, अनिंदिता घोष, मीना के. अय्यर, पूजा चंगोईवाला, अनु चौधरी, देबासिस सामंत्रे, रंजन मल्लिक, रोहित सुपकर, शिबानी सिब्बल, युगल जोशी और नेहा सिन्हा शामिल हैं.

केएलएफ बुक अवॉर्ड (KLF Book Awards)
रश्मि रंजन परिदा ने बताया कि कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल में बुक अवॉर्ड को इसी वर्ष से शामिल किया गया है. केएलएफ बुक अवार्ड्स विभिन्न शैलियों में साहित्यिक प्रतिभाओं को पहचानने, उन्हें प्रोत्साहित करने और सम्मान करने के अवसर प्रदान करता है.

नॉन-फिक्शन किताबें
– संदीप बमज़ाई की पुस्तक ‘प्रिंसिस्तान: हाउ नेहरू, पटेल एंड माउंटबेटन मेड इंडिया’ (रूपा पब्लिकेशन- 2020)
– शशि थरूर और समीर सरन की पुस्तक ‘द न्यू वर्ल्ड डिस्ऑर्डर एंड द इंडियन इंपेरेटिव’ (एलेफ बुक कंपनी- 2020)
– विनय सीतापति की पुस्तक ‘जुगलबंदी: द बीजेपी बिफोर मोदी’ (पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया- 2020)
– पवन कुमार वर्मा की ‘द ग्रेट हिंदू सिविलाइजेशन: अचीवमेंट, नेगलेक्ट, बायस एंड द वे फॉरवर्ड’ (वेस्टलैंड-2021)
– टीएम कृष्णा की पुस्तक ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मृदंगम मेकर्स’ (कॉन्टेक्स्ट, वेस्टलैंड- 2020)
– प्रेम प्रकाश की पुस्तक ‘रिपोर्टिंग इंडिया’ (पेंग्विन रैंडम हाउस-2020)
– आशुतोष भारद्वाज की पुस्तक ‘द डेथ स्क्रिप्ट’ (हार्पर कोलिंस इंडिया- 2020)

फिक्शन
– जाह्नवी बरुआ का उपन्यास ‘अंडरटो’ (पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया- 2020)
– नमिता गोखले और मालाश्री लाल की पुस्तक ‘बिट्रेड बाय होप: ए प्ले ऑन द लाइफ ऑफ माइकल मधुसूदन दत्त’ (हार्पर कोलिंस इंडिया- 2020)
– तराना हुसैन खान की पुस्तक ‘द बेगम एंड द दास्तान’ (वेस्टलैंड- 2021)
– अश्विनी सांघी की पुस्तक ‘द वॉल्ट आफ विष्णु’ (वेस्टलैंड- 2020)
– अशोक कौल की पुस्तक ‘अंडरकवर इन बांदीपोरा’ (वितास्ता पब्लिकेशन-2020)

काव्य-गज़ल संग्रह
– गुलज़ार का काव्य संग्रह ‘ए पोएम ए डे’ (हार्पर कोलिंस इंडिया- 2020)
– ग्रेटा राणा की पुस्तक ‘फ्रॉम कैसलफ़ोर्ड टू काठमांडू’ (वज्र बुक्स, काठमांडू- 2021)
– अभय कुमार के दो संग्रह ‘कालिदास: मेघदूत- द क्लाउड मैसेंजर’ और ‘कालिदास: ऋतुसंहारम- द सिक्स सीज़न्स’ (ब्लूम्सबरी-2021)
– बसन्त चौधरी का गज़ल संग्रह ‘अनेक पल और मैं’ (वाणी प्रकाशन- 2021)

हिंदी की किताबें
– नीलाक्षी सिंह की पुस्तक ‘खेला’ (सेतु प्रकाशन- 2021)
– अलका सरावगी की पुस्तक ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ (वाणी प्रकाशन- 2020)
– ममता कालिया की पुस्तक ”अंदाज़-ए-बयाँ उर्फ़ रवि कथा’ (वाणी प्रकाशन- 2020)
– प्रवीण कुमार झा की पुस्तक ‘वाह उस्ताद’ (राजपाल एंड सन्स- 2020)
– शिरीष खरे का रिपोतार्ज ‘एक देश बारह दुनिया’ (राजपाल एंड सन्स 2021)

विशेष आकर्षण
कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के सह-निदेशक आशुतोष कुमार ठाकुर ने बताया कि कलिंग साहित्य महोत्सव को और ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए इस बार कुछ खास कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इनमें मिस्टिकमिस्टिक वॉक, मिस्टिक पौधारोपण और कई प्रतियोगिताएं शामिल हैं.

उन्होंने बताया कि मिस्टिक वॉक का आयोजन एकमरा क्षेत्र के आसपास किया जाएगा. एकमरा मंदिरों के शहर भुवनेश्वर का एक प्राचीन नाम है. इस क्षेत्र में बिंदु सागर झील और विश्व प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर, हर्बल गार्डन, मुक्तेश्वर मंदिर, राजरानी मंदिर समेत 200 से अधिक मंदिर हैं.  (news18.com)

CV Raman Birthday: बच्चों वाले छोटे सवाल के जवाब से हुई बड़ी खोज
07-Nov-2021 10:10 AM (42)

सीवी रमन का नाम दुनिया को रमन प्रभाव देने के लिए ही नहीं,  बल्कि भारत में विज्ञान की शिक्षा के क्षेत्र में भी अपने विशेष योगदान के लिए जाना जाता है. इसीलिए जिस दिन उन्होंने रमन प्रभाव की खोज की थी उनके सम्मान में उस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है. उन्होंने अपनी वैज्ञानिक खोज के अलावा देश में वैज्ञानिक शिक्षा को भी बढ़ाने में विशेष योगदान दिया है और देश के कई बड़े वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा स्रोत बने. 7 नवंबर को देश उनके जन्मदिन पर उन्हें याद कर रहा है.

बचपन से ही पढ़ाई में तेज थे रमन
सर चंद्रशेखर वेंकट रमन का जन्म 7 नवंबर 1888 में मद्रास प्रेसिडेंसी के तिरुचिरापल्ली के हिंदू तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता अच्छी खासी आय वाले स्कूल शिक्षक थे, जो बाद में विशाखापत्तनम के एक कॉलेज में भौतिकी के प्रोफेसर नियुक्त हो गए.  13 साल की उम्र में ही उन्होंने हायर सेकंड्री की शिक्षा पूरी कर ली थी और 16 साल की उम्र में उन्होंने मद्रास यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंसी के कॉले में ऑनर्स के साथ भौतिकी में शीर्ष स्थान हासिल करते हुए अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली.

शुरु में ध्वनिकी और प्रकाशिकी
मास्टर्स की डिग्री हासिल करने केबाद उनका पहला शोधपत्र प्रकाश के विवर्तन विषय पर था. पहले उन्होंने कोलकाता के भारतीय वित्तीय सेवा में असिस्टेंट अकाउंटेंट जनरल की नौकरी की और बाद में वे इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस से जुड़े जहां उन्हें अपने शुरुआती शोध करने का अवसर मिला. यहां उन्होंने ध्वनिकी और प्रकाश विज्ञान में प्रमुख योगदान दिया.

वह छोटा सवाल जो बन गया बहुत खास
जब साल 1921 में सीवी रमन पहली बार लंदन गए थे. उस समय तक वे ध्वनिकी  और प्रकाशिकी के विशेषज्ञ के रूप में मशहूर हो चुके थे. उन्हें विशेष तौर पर तारयुक्त वाद्यों की आवाजों और कंपनों के अध्ययन के लिए जाना जाता था. लंदन से बम्बई के लिए लौटते समय की यात्रा के दौरान एक दिन वे शाम को डॉक पर चिंतन करते समय उन्हें भूमध्यसागर के गहरे नीले रंग ने उनका ध्यान खींचा और उनके मेन में सवाल उठा कि आखिर यह रंग नीला ही क्यों है.

फिर पता लगाया इसका कारण
इसी प्रश्न के उत्तर की खोज करते हुए उन्होंने सफलता पूर्वक दर्शाया कि समुद्र का नीला रंग वास्तव में सूर्य के प्रकाश का पानी के अणुओं के द्वारा किए गए बिखराव (प्रकीर्णन) के कारण है. इसी प्रभाव के कारण आसमान का रंग भी नीला दिखता है जहां हवा के कण सूर्य से आने वाले प्रकाश का बिखराव कर देते हैं. सीवी रमन ने प्रकाश प्रक्रीर्णन का प्रक्रिया पर गहन अध्ययन किया और साल 1928 में रमन इफेक्ट का सिद्धांत दिया.

1930 में नोबेल पुरस्कार
यह प्रकाश के प्रकीर्णन की वह प्रक्रिया है जिसमें प्रकाश के कण जब किसी माध्यम में प्रवेश करते हैं तो प्रकाश की ऊर्जा का कुछ हिस्सा माध्यम के अणु ले लेते हैं जिससे प्रकाश की वेवलेंथ (तरंग दैधर्य) में बदलाव आ जाता है और प्रकाश का एक हिस्सा अपनी दिशा बदल लेता है. इसी सैक्ट्रिंग ऑफ लाइट यानि प्रकाश के विकीर्णन (बिखराव) के सिद्धांत के लिए रमन को 1930 में नोबेल पुरस्कार दिया गया था जिसे रमन प्रभाव या रमन इफेक्ट कहते हैं. और वे विज्ञान में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले वे पहले भारतीय ने.

रमन रेखाएं और रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी
रमन ने सपैक्ट्रम विश्लेषण के जरिए प्रकाश के बर्फ से गुजरने के बाद स्पैक्ट्रम में बदलाव की पहचान की जो रमन रेखाओं के नाम से जानी जाती हैं. इन बदलावों का आधार भी रमन प्रभाव ही है. रमन इफेक्ट के सिद्धांत से ही रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी की शुरुआत हुई. इस रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का उपयोग बाद में अंतरिक्ष विज्ञान का खूब हुआ. इसके जरिए चंद्रयान एक ने चंद्रमा पर पहली बार  चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में बर्फ के रूप में पानी की खोज की.

रमन ने 1926 में इंडियन जनरल ऑफ फिजिक्स की शुरुआत की. इसके बाद साल 1933 में बेंगलुरू पहुंचे और भारतीय विज्ञान संस्थान के पहले निदेशक बन. उन्होंने उसी साल भारतीय विज्ञान अकादमी की स्थापना की. आजादी के बाद अपने अंतिम दिनों में, 1948 में उन्होंने रमन अनुसंधान संस्थान की स्थापना की जहां उन्होंने अपने जीवन के अंत तक काम किया.(news18.com)

'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो...' पढ़ें मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी के दिल को छूने वाले शेर
07-Nov-2021 9:39 AM (47)

Kaifi Azmi Shayari: कैफ़ी आज़मी उर्दू के मशहूर शायर और गीतकार हैं. उनका असल नाम सैयद अतहर हुसैन रिज़वी था. 'कैफ़ी' का जन्म 14 जनवरी, साल 1918 को उत्तर प्रदेश के मौज़ा मजवां ज़िला आज़मगढ़ में हुआ था. आपको बता दें कि आर्थिक दिक्कतों की वजह से कैफ़ी ने फ़िल्मों के लिए गीत लिखे. उन्होंने सबसे पहले शाहिद लतीफ़ की फ़िल्म 'बुज़दिल' में 2 गाने लिखे. उन्होंने कई कहानियां और स्क्रिप्ट भी लिखीं थी. फ़िल्म इंडस्ट्री में कैफ़ी आज़मी का नाम बहुत अदब से लिया जाता है. जानकारी के मुताबिक 'काग़ज़ के फूल', 'गर्म हवा', 'हक़ीक़त' और 'हीर रांझा', जैसी फ़िल्मों में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है. साल 1975 में उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाजा गया था. पढ़ें उनके चुनिंदा मशहूर और क्लासिक शेर

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहींदबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहींदो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनोडूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ

मेरा बचपन भी साथ ले आयागाँव से जब भी आ गया कोई

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगेफिर वहीं लौट के आ जाता हूँ

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे होक्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

(news18.com)

'कैसे रिश्तों को समेटें ये बिखरते हुए लोग...' पढ़ें चुनिंदा शायरों के बेहतरीन शेर
05-Nov-2021 7:41 PM (42)

आपसी रिश्तों की ख़ुशबू को कोई नाम न दोइस तक़द्दुस को न काग़ज़ पर उतारा जाए- महेंद्र प्रताप चाँद

रिश्तों का बोझ ढोना दिल दिल में कुढ़ते रहनाहम एक दूसरे पर एहसान हो गए हैं- मुसव्विर सब्ज़वारी

रिश्तों का ए'तिबार वफ़ाओं का इंतिज़ारहम भी चराग़ ले के हवाओं में आए हैं- निदा फ़ाज़ली

वक़्त ख़ामोश है टूटे हुए रिश्तों की तरहवो भला कैसे मिरे दिल की ख़बर पाएगा- इन्दिरा वर्मा

हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताबपढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने-मेराज फ़ैज़ाबादी

कैसे रिश्तों को समेटें ये बिखरते हुए लोगटूट जाते हैं यही फ़ैसला करते हुए लोग- तारिक़ क़मर

कोरोना से करुणा तक का सफर कराती है कैलाश सत्यार्थी की नई किताब
04-Nov-2021 5:12 PM (212)

-अनुराग अन्वेषी

Book Review: दुर्गापूजा के बाद दिल्ली-एनसीआर समेत देश के तमाम हिस्सों में कोरोना संक्रमण के जितने मामले सामने आ रहे हैं, उससे तीसरी लहर की आशंका गहरा रही है. अभी दीपावली, कालीपूजा और छठ जैसे सामूहिक आयोजन वाले पर्वों का आना बाकी ही है. जाहिर है कि हम अपनी लापरवाहियों के खिलाफ सजग नहीं हुए तो इस सदी की यह सबसे खतरनाक महामारी जाने कौन-सा रूप ले ले.

नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने कोरोना की पहली लहर के शुरू होने के बाद और दूसरी लहर की संभावित आशंकाओं के बीच इसके खतरों को लेकर हमें आगाह किया था. उन्होंने कहा था कोविड-19 का संकट महज स्वास्थ्य का संकट नहीं है, बल्कि यह संकट ‘सभ्यता का संकट’ है.

कैलाश सत्यार्थी की यह बात उनकी नई किताब ‘कोविड-19 : सभ्यता का संकट और समाधान‘ में दर्ज है. सत्यार्थी की यह किताब दो खंडों में है. पहले खंड में उन्होंने कोविड-19 की वजह से सभ्यता पर छाए संभावित संकटों को रेखांकित किया है और दूसरे खंड में उन्होंने इसके समाधान सुझाए हैं.

पहले खंड में कैलाश सत्यार्थी लिखते हैं ‘हम आशा और अपेक्षा कर रहे थे कि इतिहास की सबसे बड़ी साझा त्रासदी से सबक लेकर पूरे विश्व समुदाय में साझेपन की सोच जन्म लेगी, लेकिन इस बात के संकेत अभी तक नजर नहीं आ रहे. असलियत तो यह है कि दुनिया में पहले से चली आ रही दरारें, भेदभाव, विषमताएं और बिखराव उजागर होने के साथ-साथ और ज्यादा बढ़ रहे हैं. महामारी खत्म होने और आर्थिक संकट से उबर जाने के बाद भी दुनिया पहले की तरह नहीं रहेगी. मैं कई कारणों से इस त्रासदी को सिर्फ स्वास्थ्य और आर्थिक संकट न मानकर सभ्यता के संकट की तरह देख रहा हूं.’

कोरोना महामारी को सभ्यता पर संकट की तरह देखते हुए कैलाश सत्यार्थी याद करते हैं मानवीय रिश्ते और सामाजिक दायित्वों के क्षरण से उपजे उन दृश्यों को, जिनकी वजह से असंगठित क्षेत्र के मजदूर भुखमरी की हालत में अपने-अपने गांव लौट रहे थे.

वे याद करते हैं चीन के 16 साल के विकलांग शख्स चैंग को, जो हुवेई शहर के अपने घर में व्हीलचेहर पर भूख-प्यास से मृत पड़े मिले थे. चैंग की देखभाल करने वाले पिता जब बीमार पड़े तो उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था. तब घर में चैंग की देखभाल करनेवाला कोई नहीं रह गया. पड़ोसियों ने भी चैंग की कोई सुध नहीं ली और वह व्हीलचेयर पर बैठ-बैठे मर गए. सत्यार्थी मानते हैं कि चैंग को किसी बीमारी ने नहीं मारा, बल्कि समाज की संवेदनहीनता, एहसान-फरामोशी और मतलबपरस्ती ने उनकी हत्या की.

सत्यार्थी याद करते हैं दक्षिण अफ्रीका के उन सैकड़ों बाल मजदूरों को जो सोने की एक खदान में फंसे पड़े थे, जिनके मालिक उन्हें उनके हाल पर छोड़कर भाग गए थे. वे याद करते हैं थाईलैंड की उस खबर को जिसके मुताबिक, तीन लाख से ज्यादा सेक्स वर्कर लॉकडाउन के दौरान दाने-दाने की मोहताज हो गई थीं और दस्तावेज न होने के कारण वे मजदूरों को मिल सकनेवाली सरकारी सहायता से भी वंचित थीं.

इन तमाम दुखद दृश्यों को याद करते-करते कैलाश सत्यार्थी अपनी इस किताब में लॉकडाउन के दौरान घरों में बंद लोगों की स्थितियों की चर्चा करते हैं. वे बताते हैं कि लोगों में मानसिक तनाव, अवसाद, निराशा, एकाकीपन, घरेलू हिंसा और तलाक के मामले बढ़े हैं. दोस्तों, शिक्षकों, रिश्तेदारों, खेल के मैदानों से दूर हुए बच्चों में झुंझलाहट, गुस्सा और जिद बढ़े हैं और एकाग्रता में कमी आई है.

वे उस एक साल के बच्चे का उदाहरण देते हैं, जिसके माता-पिता कोरोनाकाल में घर से ही काम कर रहे थे और बच्चे को भी घर में ही रख रहे थे. इस दौरान बच्चे को टीका लगवाने के लिए बस दो बार वे अस्पताल गए. फिर जब बच्चे ने थोड़ा-थोड़ा बोलना शुरू किया तो उसने बाहर निकलने से इनकार कर दिया यह कहते हुए कि बाहर लोग उसे सुई चुभो देते हैं.

इन स्थितियों की चर्चा करते हुए सत्यार्थी बताते हैं कि ये स्थितियां सभ्यता के संकट के लक्षण हैं. किसी भी सभ्यता की बुनियाद सामूहिकता होती है. सामूहिक अनुभव, सामूहिक मान्यता-परंपरा, सामूहिक विचार, व्यवहार और परस्पर समर्पण से ही सभ्यता का निर्माण होता है. लेकिन लॉकडाउन के दौरान समाज में इन चीजों की कमी साफ तौर पर दिखी, बल्कि वीभत्स रूप में ये कमियां और बढ़ीं.

इस किताब में सत्यार्थी ध्यान दिलाते हैं कि जो प्रवासी मजदूर खौफजदा, लाचार, हताश, बेबस और बेसब्र होकर अफरातफरी की स्थिति में अपने गांवों की तरफ भागे, वह सिर्फ करोना वायरस का डर नहीं था, बल्कि वह उनका उस शहरी समाज से पूरी तरह मोहभंग हो जाना था, जिसमें राजकीय तंत्र और उनके रोजगार दाता तक शामिल थे. उन खौफजदा मजदूरों ने देखा कि शहरी सभ्य समाज ने उनके साथ भरोसे के रिश्ते रखे ही नहीं थे. कैलाश सत्यार्थी मानते हैं कि लोगों का एक-दूसरे पर भरोसे का इस कदर टूटना, मोहभंग की पीड़ा से गुजरना ही सभ्यता पर असल संकट है, जिसे दूर किए जाने की बेहद आवश्यकता है. इस किताब के दूसरे हिस्से में कैलाश सत्यार्थी ने वे सुझाव दिए हैं, जिनसे सभ्यता पर आए इस संकट से हम निकल सकते हैं, सभ्यता का पुनर्निमाण कर सकते हैं.

सभ्यता के पुनर्निमाण के अपने सुझाव को कैलाश सत्यार्थी ‘चौमुखी पहल’ का नाम देते हैं और बताते हैं कि करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता ही अब नई सभ्यता रच सकते हैं. हालांकि इस सुझाव को देते हुए सत्यार्थी यह भी स्वीकारते हैं कि वे कोई नई बात नहीं कह रहे. सभ्यता की जड़ों में ये चारों चीजें कहीं-न-कहीं पहले से मौजूद हैं. दुनिया के हर हिस्से में बहुत से लोग इन्हें अपने जीवन में जीते हैं, लेकिन ज्यादातर मामले में ये बातें खोखला उपदेश बनकर रह गई हैं.

करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता सही मायने में मनुष्यता की ऊंचाइयां हैं. अब के आपाधापी वाले दौर में इन ऊंचाइयों की इस समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है. कोरोना महामारी के आक्रमण से पहले ही समाज और हमारी सभ्यता का क्षरण होने लगा था. मौकापरस्ती, संवेदनहीनता, एहसान-फरामोशी और मतलबपरस्ती जैसी तमाम चीजें घुसपैठ बनाने लगी थीं. इन्सान रहन-सहन के स्तर पर जितना धनी होता गया, इन्सानीयत उसकी बौनी पड़ती गई. ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हमने आसमान में तारे टांक दिए हों भले, पर हमारी संवेदनाएं धूल चाटती नजर आईं. और ऐसे समय में जब कोरोना महामारी हमारे बीच से हर रोज लोगों को उठा-उठाकर मौत के जबड़े में डाल रही थी, तो हमारी तमाम बुराइयों का सबसे विकृत रूप हमें दिखा. अपने-अपने राज्यों की ओर बदहवास भाग रहे मजदूरों का इस समाज में इन्सानीयत के बिखराव की कहानियों को रेखांकित कर रहे थे. कोरोनाकाल से पहले ही इस समाज को करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता के बल पर फिर से गढ़ने की जरूरत थी, पर संक्रमण के आक्रमण के बाद तो इसकी जरूरत पूरे तीखेपन के साथ महसूस होने लगी.

कैलाश सत्यार्थी लिखते हैं ‘किसी पर रहम करना, सहानुभूति दिखाना, संवेदना प्रकट करना अथवा दूसरे के दुख में दुखी हो जाना अच्छे मानवीय गुण हैं, परंतु करुणा नहीं. दूसरे के दुख को महसूस करना सहानुभूति होती है. किसी के दुख में खुद भी दुखी हो जाना संवेदना है, जबकि किसी के भी दुख और कष्ट को अपने दुख की तरह महसूस करते हुए उसी प्रकार से उस दुख को दूर करने की कोशिश का भाव करुणा होता है. करुणा वह अकेला भाव है, जो अलगाव को खत्म करके खुद की तरह दूसरे से जोड़ता है और उसकी परेशानी का समाधान करने की प्रेरणा, साहस और ऊर्जा पैदा करके मनुष्य को क्रियाशील बनाता है.’

जीवन, समाज और सभ्यता के लिए करुणा की अहमियत बताते हुए कैलास सत्यार्थी बुद्ध, ईसा मसीह, हजरत मोहम्मद, महावीर स्वामी, पैगंबर अब्राहिम, गुरुनानक देव सरीखे देवदूतों के जीवन प्रसंग की ओर ले जाते हैं और स्थापित करते हैं कि इन सबने समाज के लिए जो कुछ भी रचा, जिस भी पंथ की राह दिखाई, उसकी बुनियाद करुणा थी.

यह सच है कि अब के दौर में भी धर्म के अनुयायियों की कमी नहीं, बल्कि अब के पंथ और संप्रदाय के अनुयायियों ने धर्म की मूल आत्मा करुणा को भुला दिया है. बाहरी आडंबरों में उलझ कर धर्म का प्रचार-प्रसार बेहद आक्रमक तरीके से हो रहा है. ठीक वैसे ही जैसे अब के कई नेता कौमी एकता बरकरार रखने के लिए शांति की अपील करते हैं अपनी पूरी गुर्राहट के साथ.

इस तरह हम देखते हैं कि करुणा की जगह अपने पंथ की पहचान और ताकत बढ़ाने के लिए दूसरे पंथों की पहचान और अस्तित्व को नष्ट करने की कवायद को धर्मयुद्ध मान लिया गया है. ऐसी स्थिति महसूस कर कैलाश सत्यार्थी लिखते हैं ‘मेरे विचार से मतों और पंथों की बाहरी पहचानों के प्रति आसक्ति, आग्रह और अहंकार सारे फसाद की जड़ हैं. पहचानें हमें अलग-अलग करती हैं, जबकि करुणा जोड़ने का काम करती है. इसलिए करुणा ही मानवता का धर्म है.’

सचमुच, धर्म और पाखंड के मिट रहे अंतर, रोशनी के नाम पर फैलाए जा रहे अंधकार, इन्सानीयत के पैमाने पर हैवानीयत की ओर बढ़ते समाज और प्रेम को विस्थापित करती घृणा के इस दौर में कैलाश सत्यार्थी की किताब ‘कोविड-19: सभ्यता का संकट और समाधान’ पढ़ते हुए संदेश मिलता है कि चलो, इन्सानीयत की जड़ों की ओर लौटें.

किताब के इस दूसरे हिस्से में कैलाश सत्यार्थी ने कई प्रसंगों, शोधों और प्रयोगों की चर्चा करते हुए सभ्यता के पुनर्निमाण में करुणा, कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और सहिष्णुता की जरूरत को बार-बार रेखांकित किया है. इन मानवीय गुणों को नए सिरे से परिभाषित किया है, इन्हें पुनः अपनाए जाने पर बल दिया है. कहा जाना चाहिए कि इस खौफजदा दौर में कैलाश सत्यार्थी एक सुचिंतित विचार के साथ सभ्यता के पुनर्निमाण की आस्था का जरूरी दीया लेकर आए हैं.

इस पठनीय किताब में प्रकाशक ने कई जगहों पर रेखाचित्रों का इस्तेमाल किया है. ये रेखाचित्र संदीप राशिनकर ने बनाए हैं. विषय के अनुकूल माहौल रचने के लिए राशिनकर की तारीफ की जानी चाहिए. हालांकि यह किताब महज 128 पन्ने की है, जो एक बैठकी में ही पढ़ी जा सकती है. लेकिन अगर आपके पास इतना भी वक्त नहीं तो प्रकाशक ने इस किताब के हर पन्ने पर लेख के जरूरी हिस्से बड़े फोंट साइज में कोट किए गए हैं – आप अगर कोट किए गए इन हिस्सों को भी पढ़ लें, तो आपको समाज की दशा को दिशा देने वाली कैलाश सत्यार्थी की दृष्टि की एक झलक जरूर मिल जाएगी.

पुस्तक : कोविड-19: सभ्यता का संकट और समाधान
लेखक : कैलाश सत्यार्थी
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन
कीमत : 250 रुपये

खास अंदाज में मनाएं त्योहार, सोशल मीडिया पर पोस्ट करें दिवाली स्पेशल कविताएं
04-Nov-2021 2:32 PM (64)

Diwali 2021 Special Hindi Poems: त्योहारों के मौसम में लोग मैसेज या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपने दोस्तों या जान-पहचान वाले लोगों को शुभकामनाएं देते हैं. कई लोग इंटरनेट पर कोई शायरी या कविता ढूंढने में कोई कसर नहीं छोड़ते. कुछ ही दिनों बाद दीपावली का पावन पर्व है. हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष दिवाली का पावन पर्व कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है. इस साल कार्तिक अमावस्या 04 नवंबर (गुरुवार) को है. दिवाली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश और धन के देवता कुबेर  पूजा की जाती है.

दीपावली खास मौके पर हिंदी साहित्य जगत में चार चांद लगाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी, माखनलाल चतुर्वेदी और सोहनलाल द्विवेदी की दिवाली स्पेशल कविताएं पढ़कर अपनी जिंदगी में त्योहारों का रंग घोल लीजिए.

अटल बिहारी वाजपेयी की ‘आओ फिर से दिया जलाएं’
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें
बुझी हुई बाती सुलगाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्त्तमान के मोह-जाल में
आने वाला कल न भुलाएं।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएं।
आओ फिर से दिया जलाएँ

माखनलाल चतुर्वेदी की ‘दीप से दीप जले’
सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें
कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें।

लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में
लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में
लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में
लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में
लक्ष्मी सर्जन हुआ
कमल के फूलों में
लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में।।

गिरि, वन, नद-सागर, भू-नर्तन तेरा नित्य विहार
सतत मानवी की अँगुलियों तेरा हो शृंगार
मानव की गति, मानव की धृति, मानव की कृति ढाल
सदा स्वेद-कण के मोती से चमके मेरा भाल
शकट चले जलयान चले
गतिमान गगन के गान
तू मिहनत से झर-झर पड़ती, गढ़ती नित्य विहान।

उषा महावर तुझे लगाती, संध्या शोभा वारे
रानी रजनी पल-पल दीपक से आरती उतारे,
सिर बोकर, सिर ऊँचा कर-कर, सिर हथेलियों लेकर
गान और बलिदान किए मानव-अर्चना सँजोकर
भवन-भवन तेरा मंदिर है
स्वर है श्रम की वाणी
राज रही है कालरात्रि को उज्ज्वल कर कल्याणी।

वह नवांत आ गए खेत से सूख गया है पानी
खेतों की बरसन कि गगन की बरसन किए पुरानी
सजा रहे हैं फुलझड़ियों से जादू करके खेल
आज हुआ श्रम-सीकर के घर हमसे उनसे मेल।
तू ही जगत की जय है,
तू है बुद्धिमयी वरदात्री
तू धात्री, तू भू-नव गात्री, सूझ-बूझ निर्मात्री।

युग के दीप नए मानव, मानवी ढलें
सुलग-सुलग री जोत! दीप से दीप जलें।
सोहनलाल द्विवेदी की ‘जगमग-जगमग’

हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,
नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,
कैसी उजियाली है पग-पग,
जगमग जगमग जगमग जगमग!

छज्जों में, छत में, आले में,
तुलसी के नन्हें थाले में,
यह कौन रहा है दृग को ठग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

पर्वत में, नदियों, नहरों में,
प्यारी प्यारी सी लहरों में,
तैरते दीप कैसे भग-भग!
जगमग जगमग जगमग जगमग!

राजा के घर, कंगले के घर,
हैं वही दीप सुंदर सुंदर!
दीवाली की श्री है पग-पग,
जगमग जगमग जगमग जगमग!

(news18.com)

सौ वर्ष की आयु में भी मैथिली भाषा और साहित्य सेवा में सक्रिय हैं पंडित गोविंद झा
03-Nov-2021 4:38 PM (43)

– डॉ. के. एम. ठाकुर

Maithili Sahitya News: मैथिली और संस्कृत के वरेण्य विद्वान पंडित गोविंद झा मिथिला के विद्वानों में शिखर पुरुष हैं. इन्होंने अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश किया है. इस उम्र में भी वे साहित्यिक सांस्कृतिक लेखन में रचनारत रहते हैं.

पंडित गोविंद झा का जन्म 10 अगस्त, 1922 को बिहार के मिथिला में मधुबनी जिला के इसहपुर (सरिसब-पाही) नामक एक संभ्रांत तथा विद्वानों से भरे-पूरे गांव में हुआ. इनका पैतृक परिवार संस्कृत वांग्मय में संपूर्ण रूप से रचा बसा परिवार था.

पंडित गोविंद झा के पिता महा वैयाकरण पंडित दीनबंधु झा स्वयं संस्कृत और मैथिली के पारगामी विद्वान माने जाते थे. उनके पैतृक परिसर का मिथिला के शिक्षा एवं साहित्य-संस्कृति में उल्लेखनीय योगदान था.

गोविंद झा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में ही पूर्ण किया. इसके बाद आपने व्याकरणाचार्य, साहित्यरत्न, साहित्याचार्य, वेदाचार्य आदि परीक्षा पास किया. इसी दौरान इन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, प्राकृत, बांग्ला, उर्दू, असमिया नेपाली आदि भाषाओं का भी विधिवत अध्ययन किया.

अध्ययन के साथ-साथ आपने परिवार के भरण-पोषण हेतु आजीविका भी शुरू की. इसकी शुरूआत आपने 1950 में न्यूज़ पेपर्स एंड पब्लिकेशन, पटना के साथ शब्दकोश-सहायक के रूप में की. 1951-1978 तक आपने बिहार सरकार के राजभाषा पदाधिकारी के रूप अपनी सेवाएं दीं. 1978-1985 तक बिहार सरकार के मैथिली अकादमी पटना के उपनिदेशक भी रहे और यहीं से सेवानिवृत्ति भी ली. सेवानिवृत्ति के उपरांत भी इन्होंने वर्ष 1988 तक सुलभ इंटरनेशनल पटना दिल्ली के लिए पुस्तक आरक्षक के पद को सुशोभित किया.

पंडित गोविंद झा के 100 वर्ष के जीवनकाल में 75 वर्षों से अधिक का लेखन काल रहा. आपने 3 उपन्यास, 3 कथा-संग्रह, 7 नाटक, एक कविता संग्रह, 6 आलोचनात्मक निबंध संग्रह, दो जीवनी-विनिबंध, 13 भाषा-ग्रंथ, 4 कोष-ग्रंथ, 8 संपादित-ग्रंथ, 8 अनुवाद सहित बिब्लियोग्रैफी ऑफ इंडियन लिटरेचर (मैथिली प्रभाग) और इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन लिटरेचर के निर्माण में भी अपना योगदान दिया. इस प्रकार इन्होंने अब तक कुल 56 पुस्तकों की रचना की है.

लीक से हट कर लिखी रचनाएं समाज को विकासोन्मुख बनाती हैं- मनीष सिसोदिया

पाणिनि के व्याकरण की व्याख्या करते हुए गोविंद झा ने एक तरफ संस्कृत के भाषा-विज्ञान और भाषिक विकास के प्राचीन अर्वाचीन अविष्कारों को सम्मिलित किया वहीं पाश्चात्य भाषा विज्ञान को भी आदर सहित अपनी व्याख्या में स्थान दिया.

अपने साहित्य लेखन में गोविंद झा ने कथा, कविता, नाटक आदि रचना में समकालीन मिथिला के सामाजिक-सांस्कृतिक शैक्षणिक कुरीतियों-पाखंडों को बड़ी ही निर्ममता के साथ उजागर किया. उपन्यास लेखन में मिथिला के इतिहास-प्रसिद्ध नायकों को स्थान दिया. इतिहास लेखन के इस शैली में इन्होंने सदैव अनुसंधानपरक एवं विज्ञान सम्मत लेखन को प्रश्रय दिया.

शब्दकोश निर्माण के क्रम में इन्होंने मैथिली सहित हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला, नेपाली, अवहट्ट, प्राकृत आदि भाषाओं के लिए भी प्रशंसनीय कार्य किए. संपादन के क्रम में इन्होंने मिथिला के कर्मकांड, धर्मशास्त्र इतिहास, साहित्य, काव्य आदि प्रभागों में अपनी बौद्धिक क्षमता एवं परिपक्वता दिखाई.

विद्यापति के विभिन्न आयाम को इन्होंने अपने अन्वेषण और संपादन में पुनर्मूल्यांकन किया. आपने विद्यापति के मैथिली गीतों का संकलन-संपादन पुनर्मूल्यांकन आदि कार्य भी किया है. इसमें मिथिला के विद्यापतिकालीन समाज का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है.

हिंदी के प्रति जिम्मेदारी ही हिंदी को और सशक्त बना सकती है- स्वानंद किरकिरे

पंडित गोविंद झा के साहित्य-रंगमंच के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पुरस्कार सम्मान प्राप्त हुए हैं. इसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1993), साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार (1993), कामिल बुल्के पुरस्कार (1988), ग्रियर्सन पुरस्कार (2001), प्रबोध साहित्य सम्मान (2005), चेतना समिति सम्मान (1989), ज्योतिरीश्वर रंग-शीर्ष सम्मान, विश्वंभर साहित्य सम्मान (2019) आदि प्रमुख हैं.

भारतीय लेखकों में शतायु लेखक जो आज भी लेखनरत हैं इनका अभाव है. ऐसे में मैथिली भाषा में पंडित गोविंद झा अपने शतायु वर्ष में भी लेखनरत हैं, निरंतर सृजनरत हैं. इसी वर्ष इनकी 57 वीं किताब ‘भाषाक गाछ तर’ प्रकाशित हुई हैं. पंडितजी जैसे बहुमुखी-बहुभाषी-बहुआयामी और बहुविधावादी रचनाकार का अपने शतायु वर्ष में भी रचनाशील रहना मैथिली और मिथिला के भाषा-साहित्य के लिए निश्चय ही गर्व का विषय है. (news18.com)

'हो गई है पीर पर्वत सी...' पढ़ें दुष्यंत कुमार की क्लासिक और मशहूर रचनाएं
01-Nov-2021 9:14 AM (58)

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता,एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं,मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिएइस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है 

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'सारी दुनिया से दूर हो जाए...' पढ़ें रूमानी शायर फ़ैज़ अहमद फै़ज़ के चुनिंदा शेर
30-Oct-2021 1:13 PM (58)

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है,लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब,आज तुम याद बे-हिसाब आए

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी,सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

सारी दुनिया से दूर हो जाए,जो ज़रा तेरे पास हो बैठे

दिल से तो हर मोआमला कर के चले थे साफ़ हम,कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई

अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें,रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम

(news18.com)

पुस्तक समीक्षा: निजी संबंधों पर खुलकर बात करता राजकमल चौधरी का उपन्यास 'मछली मरी हुई'
27-Oct-2021 8:51 PM (59)

-डॉ. श्रद्धा श्रीवास्तव

‘मछली मरी हुई’ राजकमल चौधरी का चर्चित उपन्यास है. खासकर इसलिए भी क्योंकि यह समलैंगिकता पर लिखा गया उपन्यास है. अब भारत में धारा-377 को खत्म कर दिया गया यानी समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. समलैंगिकता को बीमारी समझना बंद होना चाहिए. इस उपन्यास के बहाने से इस विषय पर बात की जा सकती है.

राजकमल चौधरी के इस उपन्यास का नायक निर्मल पद्मावत लेस्बियन को बीमारी मानकर कल्याणी की बेटी प्रिया के साथ बलात्कार करता है और अपने लॉजिक से उसे ठीक ठहराता है. प्रिया का पिता (डॉक्टर रघुवंश श्रेष्ठ सर्जन) जाने कैसा है जो बलात्कार के बाद कुछ कहता नहीं, इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने के बजाए आत्महत्या कर लेता है. आत्महत्या के पहले लिखा पत्र बहुत सी ग्रंथियों का खुलासा भी करता है.

निर्मल सेक्स के मामले में ‘मेल एडजस्टेड’ है. बीमार है. डॉक्टर कल्याणी के बारे में पत्र में लिखता है, कल्याणी जैसी औरतें ही प्यार कर सकती हैं. असाधारण बनना, ‘एब्नार्मल’ बनना, अधिक कठिन नहीं है. आदमी शराब की बोतल पीकर असाधारण बन सकता है. दौलत का थोड़ा-सा नशा, यौन-पिपासाओं की थोड़ी-सी उच्छृंखलता, थोड़े-से सामाजिक-अनैतिक कार्य आदमी को ‘एब्नॉर्मल’ बना देते हैं. कठिन है साधारण बनना, कठिन है अपनी जीवन-चर्या को सामान्यता-साधारण में बाँधकर रखना.

यह उपन्यास बड़े ही ड्रामेटिक स्टाइल में लिखा गया है. उपन्यास के सभी पात्र असाधारण लगेंगे. निर्मल पद्मावत के जीवन का ग्राफ देखना अद्भुत है. उत्तर बिहार का लड़का कराची से सियालकोट प्याला धोने का काम करता है. मौलवी साहब से उर्दू पढ़ता है. कानून, धर्म, विज्ञान, राजनीति के बारे में जानता है, स्वतंत्रता आन्दोलन में जेल जाता है. मुंबई माल जहाज का बैरा होकर पूरी दुनिया का सफ़र करता है. अमेरिका जाकर अर्थव्यवस्था को समझता है और कलकत्ता में तीस मंजिल का स्काई स्क्रैपर कल्याणी मेंशन बनवाता है, वही रहता है.

वह बुद्धिमान है, ईमानदार है. सादगी, आभिजात्य और कुटिलता उसके व्यक्तित्व में घुलीमिली है. स्पष्ट और फिर भी अप्रकट. एक जगह वह कहता है जो व्यवस्था आदमी को दरिद्र करे ,अपाहिज करे, उसे तोड़ देना चाहिए. अरस्तु और कार्लमार्क्स सही आदमी था.

वह कुशल व्यापारी है ताकतवर है पर मोहब्बत के मायने में निर्मल इनडिसीसिव है, निर्णयहीन है. वह मोहब्बत करता है. शीरी विशु मेहता की बीबी होने के बावजूद निर्मल के पास आ जाती है.

कल्याणी से निर्मल ने प्रेम किया था. कल्याणी ने निर्मल को स्वीकार नहीं किया, अपनी सारी दौलत उसके चरणों में रखने के बावजूद. उस रात की स्मृति निर्मल के साथ ता-उम्र रहती है. सेक्स के मामले में कल्याणी के सामने अपने को कमजोर पाता है. यही तीर अपने कलेजे में लिए भटकता रहता है. वह उसके पौरुष पर चोट करती है. कल्याणी कटी पतंग है. कल्याणी जिसने दूसरे लोगों और अपने शरीर में रस लिया. रस की लालसाओं को वह कभी अपने अन्तरंग और बहिरंग से मिटा नहीं पायी. वह प्रिया को जन्म देकर मर जाती है. पर प्रिया शीरीं में वो घुली-मिली होती है. शीरीं भी अजीब लड़की है. सभी पात्र अपनी अपनी जिंदगी के कैदखाने में अकेले हैं. करुणा सहानुभूति दया और ममता की तलाश सभी को है.

सभी अपने-आपसे अजनबी हैं. सभी पात्रों का अपना दुखदायी अतीत है. शीरीं की बड़ी बहन ने समझाया दो औरतें भी शरीर के सुख को भोग सकती हैं. खुशी, पागलपन और बेहोशी! इस बेहोशी में शीरीं को धर्म या पाप का या किसी बात का डर नहीं लगता था. उसे सबसे बड़ा डर था, वह गर्भवती हो जाएगी, इसीलिए वह जान-बूझकर किसी पुरुष के पास नहीं जाती थी.

शीरीं के शरीर पर निर्मल का नैतिक अधिकार, धार्मिक अधिकार सामाजिक अधिकार है फिर भी निर्मल उस अधिकार का लाभ उठा नहीं पाता. शीरीं मरी हुई मछली है. शीरीं बीमार है भूखी है, न्यूरोटिक है. होमोसेक्सुअल है. उपन्यास के अंत इस प्रकार से होता है –
‘‘बरसात हुई. जल भर आया..
सूखी पड़ी नदी में फिर जल भर आया…
नीली मछली मरी हुई,
जी उठी. प्राण में प्यार, प्यार में प्यास,
प्यास से मरी हुई नीली मछली
के लिए
नदी में जल भर आया.

शीरीं मरी हुई मछली थी लेकिन पानी भर जाने से जी उठी है, यह पानी दरअसल करुणा का पानी है. शीरीं ऊपर उठ रही है. सतह से.

जर्मन दार्शनिक कांट कहते हैं, हम लोगों ने चश्मा लगा रखा है अज्ञान का, परिवेश का, संस्कार का, संस्कृति का. इसलिए सत्य को देख नहीं पाते. यह उपन्यास एक व्यक्ति के अंतर्विरोधों को बखूबी दिखाता है. उत्तर आधुनिक का व्यावहारिक पक्ष इस उपन्यास में दिखता है. उसके अनुसार “अपने-अपने तरीके से दुनिया का हर आदमी अपना एक निजी ईश्वर, निजी प्रणय और अपनी मृत्यु की निजी तिथि तय करता है.”


उपन्यासः मछली मरी हुई
लेखकः राजकमल चौधरी
प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स
मूल्यः 125रुपए
पृष्ठः 172

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'दिल मोहब्बत से भर गया...' पढ़ें बेख़ुद देहलवी के बेहतरीन शेर
27-Oct-2021 7:14 PM (62)

Bekhud Dehlvi Classic Urdu Shayari: अक्सर जिंदगी में कई ऐसे हालातों से इंसान को गुजरना पड़ता है कि वो न कुछ समझ पाता है और न ही कुछ कह पाता है. ऐसे में कई लोग किताबों को सोशल मीडिया पर अपने जज्बातों को बयान करने के लिए शेय-ओ-शायरी ढूंढते हैं. जख्मों पर लफ्जों का मरहम लगाने वाले शायर बेख़ुद देहलवी की शायरियां बहुत लोगों को पसंद आती हैं. बेख़ुद देहलवी का जन्म 21 मार्च 1863 को राजस्थान के भरतपुर में हुआ था. उनका असली नाम सय्यद वहीद-उद-दिन अहमद है. पढ़िए, उनके कुछ चुनिंदा शेर और कर दीजिए अपना हाल-ए-दिन बयां

राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझेआदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद

बात वो कहिए कि जिस बात के सौ पहलू हों,कोई पहलू तो रहे बात बदलने के लिए

दिल तो लेते हो मगर ये भी रहे याद तुम्हेंजो हमारा न हुआ कब वो तुम्हारा होगा

मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंददोनों हैं ख़ुद-ग़रज़ मुझे दोनों हैं ना-पसंद

चश्म-ए-बद-दूर वो भोले भी हैं नादाँ भी हैंज़ुल्म भी मुझ पे कभी सोच-समझ कर न हुआ

दिल मोहब्बत से भर गया 'बेख़ुद'अब किसी पर फ़िदा नहीं होता

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वरिष्ठ कवि और लेखक भारत यायावर का निधन
23-Oct-2021 9:11 AM (80)

Bharat Yayavar: वरिष्ठ कवि और आलोचक भारत यायावर का आज निधन हो गया. हिंदी के दिग्गज लेखक ‘फणीश्वर नाथ रेणु’ पर भारत यायावर का शोध चर्चा में रहा है. उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु की खोई हुई और दुर्लभ 8 पुस्तकों का संपादन किया है. भारत यायावर के पुत्र ने सोशल मीडिया पर उनके निधन की सूचना दी है.

झारखंड में हजारीबाग के रहने वाले यायावर के कविता संग्रह ‘झेलते हुए’ और ‘मैं यहाँ हूँ’ बहुत चर्चित रहे हैं. उन्हें ‘नागार्जुन पुरस्कार’ से अलंकृत किया गया.

29 नवंबर, 1954 को जन्में भारत यायावर विनोवा भावे विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक भी रहे हैं. उन्होंने कई कविता-संग्रह लिखे हैं. एक ही परिवेश (1979), झेलते हुए (1980) मैं हूं, यहां हूं (1983), बेचैनी (1990) एवं हाल-बेहाल (2004) कविता-संग्रह शामिल हैं. यायावर ने महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली का संपादन भी किया है.

मैं हूँ
जहाँ हूँ
जहाँ रहूंगा
मैं नहीं हूँ
जहाँ नहीं हूँ
नहीं रहूँगा

इसलिए क्यों करते हो कोशिश
मेरे सहचर !
लौटने की
अपने धरातल से
कैसे लौट सकता हूँ ?

मैं नहीं चाहता
एक सिंहासन
एक सोने का हिरण
मैं नहीं चाहता
एक बाँसुरी
एक वृन्दावन
मेरे सहचर !

चाहता हूँ भटकना मीलों-मील
धूल में, रेत में
धूप में, ठंड में
चाहता हूँ जीना
संघर्ष में
प्यास में
आग में

मैं हूँ
यहाँ हूँ
यहीं रहूंगा।

(news18.com)

हर दौर में सत्ता और सिस्टम को चुनौती देती रहेंगी अदम गोंडवी की रचनाएं
22-Oct-2021 8:58 PM (58)

-राजकुमार पांडेय

समय और परिवेश के प्रति जो जितना जागरूक है, वो उतना ही आधुनिक भी है. यही आधुनिकता प्रासंगिक होने की पहली शर्त भी है. इस लिहाज से अदम गोंडवीबहुत ही प्रासंगिक और आधुनिक रचनाकार के तौर पर हमेशा याद रहेंगे. यही वजह है कि उनकी कुछ रचनाओं ने तो नारों की शक्ल अख्तियार कर ली. बात चाहे प्लेट में भुने काजुओं की हो या फिर फाइलों में झूठे आंकडों की. अदम की रचना सीधे नश्तर सी लगती हैं –

काजू भुने पलेट में, ह्विस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में
या फिर
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम बहुत गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे ये दावा किताबी है.

पगडंडियों का रचनाकार
लखनऊ और फैजाबाद से लगे गोंडा के रामनाथ सिंह यानी अदम गोंडवी का परिचय बहुत सारे नेताओं से रहा. सभी जानते पहचानते थे. जो उन्हें नहीं भी जानते थे उन्होंने भी राजनीति के चौबारे की सीढ़ियां चढ़ने के लिए अदम साहेब की रचानाओं का इस्तेमाल नारों की तरह किया था. लेकिन उन्हें कोई पद्म सम्मान नहीं मिला. सम्मान मिला तो धरती से लोगों से. अदम भी शायद ये समझते रहे इसी वजह से उन्होंने गांव की पगडंडियां पकड़ी और फटा पुराना पहनने वाले को अपना विषय बनाया.

दरअसल, अदम ने दिल्ली की चमक दमक और लखनऊ की दबंगई देखी थी. देखा था कि कैसे चौबीस घंटों की उलझन में आम आदमी टूट जाता है, कैसे व्यवस्था अमरबेल की तरह लिपट कर उसका खून चूस लेती है. ये सब देख कर ‘सत्यमेव जयते’ से जैसे उनका यकीन हिल सा गया और उन्होंने लिख दिया –

लोगों ने गैरहाजिरी में भी सुना अदम को

गांव की पगडंडियों ने भी अदम को खूब समझा और दुलारा भी. मुझे याद आता है, एक साहित्यानुरागी महात्मा अंगदजी महाराज ने इलाहाबाद के माघ मेले में अदम साहेब की किताब के पुनरप्रकाशन के बाद उसके विमोचन का कार्यक्रम रखा. साथ में महाराज जी ने मुनव्वर राणा को भी कार्यक्रम में बुला रखा था. मुनव्वर साहेब दूर दक्षिण के किसी शहर से आने वाले थे. लिहाजा देर हो गई. फिर भी मेले में धर्म-कर्म कर कल्पवास करने आए श्रोताओं की भीड़ डटी रही. ये वो लोग थे जो मेले में अलग-अलग महात्माओं के शिविर में जा कर प्रवचन सुनते हैं या रामलीला वगैरह देखते हैं.

मुनव्वर साहेब तकरीबन आधी रात को पहुंचे. इस दौरान अस्वस्थ से चल रहे अदम साहेब खुद ही सो गए. फिर भी उनके चाहने वाले अंगद जी महाराज की आवाज में अदम साहेब की रचनाएं सुनते रहे.

बाबा नागार्जुन पसंद थे अदम को

दरअसल, अदम साहेब लोक के कवि थे. उस परंपरा के रचनाकार थे जो लोक को छूता है. या कहा जाए बाबा नागार्जुन की परंपरा है. जहां विद्रोह है, जहां कागजी हरी पत्तियों फूलों से सजाए बगैर सच की परछाईं ज्यों की त्यों इबारत में उकेर दी जाती है. अदम साहेब को बाबा बहुत पसंद भी थे. उनकी तारीफ में उन्होंने एक रचना भी की –

ख़ास इतना है कि सर-आँखों पे है उसका वजूद
मुफ़लिसों की झोंपड़ी तक आम है नागार्जुन
इस यकीं के साथ कि इस बार हारेगा यजीद
कर्बला में युद्ध का पैगाम है नागार्जुन

मजलूमों की आवाज
अदम साहेब को जानने वाले जानते हैं कि उनका नाम रामनाथ सिंह था. मतलब वे उस समुदाय के परिवार में जन्मे थे जिस पर अत्याचार के आरोप वे खुद ही लगाते रहे. उनकी रचना ‘मैं चमारों की गली में ले चलूंगा आपको’, अपने आप में बेहद अनूठी है. इस दलित परिवारों की व्यथा कथा से लेकर पुलिस के अत्याचार और जमींदारनुमा दबंग जातियों के लोगों के अनाचार की पूरी कथा है. इसमें अदम साहेब का सौंदर्यबोध भी सामने आता है.उन्हें सावलें या काले रंग की गांव की युवती किस कदर सुंदर लगती है कि उसे सीधे वो मोनालिसा कह देते हैं –

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा.

कितने आजाद थे अदम
ये भी एक संयोग है कि अदम साहेब 15 अगस्त को देश आजाद होने के बाद 22 अक्टूबर को पैदा हुए. और वे आजाद थे भी. इस हद तक आजाद कि उन्हें देश की हालत देखते हुए इस आजादी पर ही शक होने लगा-

सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है,
दिल पे रखके हाथ कहिए देश क्या आजाद है.

दौर की तरक्की को वे बाखूबी समझ रहे थे, लेकिन आदमियत की गिरती स्थिति पर वे लगातार चिंतित रहते थे. बैठकबाजी का खूब शौक था लेकिन आदमियत और शख्शियत उन्हें बुलंद चाहिए होती थी.

चाँद है ज़ेरे क़दम. सूरज खिलौना हो गया
हाँ, मगर इस दौर में क़िरदार बौना हो गया

तंगहाली में रहा जीवन
ये भी एक कारण था कि उनके बहुत से ऐसे दोस्त नहीं बन सके जो मुशायरों या कवि सम्मेलनों में उनकी मदद करते. एक बड़ी दिक्कत ये थी कि मुशायरों में वीर रस की कविता पाकिस्तान के खिलाफ तो लोग सुनना पसंद करते हैं, लेकिन सारी व्यवस्था पर करारा हमला करा कर व्यवस्था से भिंडना शायद कम ही लोगों को अच्छा लगता हो. इस कारण भी अदम साहेब को कवि सम्मेलनों में वहीं बुलाया जाता जहां आयोजक बहुत सच बहुत आजाद हों. इस वजह से अदम साहेब का जीवन आर्थिक तौर पर बहुत तकलीफ में रहा.

“घर में ठन्डे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है”

“ज़ुल्फ़-अंगडाई-तबस्सुम-चाँद-आईना-गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब”

भविष्य देखने समझ वाली नजर
कुछ प्रशंसक और मित्र जरूर बहुत ही सम्मान के साथ अदम साहब की मदद करते रहे. उसी से उनका काम चलता रहा. हालांकि बाद में स्वास्थ्य खराब होने के कारण 18 दिसंबर, 2011 को गरीबों मजलूमों की बात करने वाला अद्भुत कवि और शायर इस दुनिया से विदा हो गया, लेकिन धोती-रंगीन मोटा कुर्ता और अंगोछा डाले अदम साहेब की तस्वीर हर उस आदमी के जेहन में हमेशा कायम रहेगी जिसने उन्हें एक बार भी देखा हो. उनके चाहने वाले भी चाहते हैं कि अदम की ये लाइनें गलत हो जाएं लेकिन हालते हाजरा देख कर लगता है कि गांव के इस रचनाकार को कोई इल्म था जिससे वो दूर तक की हकीकत देख लेते थे-

पार कर पाएगी ये कहना मुकम्मल भूल है,
इस अहद की सभ्यता नफ़रत के रेगिस्तान को। 

(news18.com)

'ज़माना हो गया ख़ुद से मुझे लड़ते-झगड़ते...' पढ़ें इफ़्तिख़ार आरिफ़ के शेर
22-Oct-2021 10:18 AM (60)

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है, ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है

तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं, जान बहुत शर्मिंदा हैं

दिल पागल है रोज़ नई नादानी करता है, आग में आग मिलाता है फिर पानी करता है

ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं,फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं

वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बेवफ़ाई में भी,मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी

ज़माना हो गया ख़ुद से मुझे लड़ते-झगड़ते,मैं अपने आप से अब सुल्ह करना चाहता हूँ 

(news18.com)

पुस्तक अंश: अनामिका का उपन्यास 'बिल्लू शेक्सपियर : पोस्ट-बस्तर'
21-Oct-2021 9:53 AM (54)

उपन्यास ‘बिल्लू शेक्सपियर पोस्ट बस्तर’ में आपको अनामिका की लेखनी का एक नया तेवर देखने को मिलेगा. आदिवासी क्षेत्रों में आधुनिक शिक्षा तंत्र के ताने-बानों पर रचा यह उपन्यास एक विवाहित महिला मान्यता टंडन और उसके मित्र आशिष मुखर्जी के इर्द-गिर्द घूमता हुआ आपको समूचे सिस्टम से रूबरू कराता है.

उपन्यास के केंद्र में आदिवासी युवक विलियम किंडो उर्फ बिल्लू किंडो, दिवंगत कामरेड शशिशेखर, प्रोफेसर आशिष मुखर्जी, मान्यता मैडम, उनके पति डॉ टंडन, शेफालिका और ललिता हैं. मान्यता आत्महत्या कर लेती है. अनामिका ने इस कृति में शिक्षा प्रबंधन, राजनीति, षडयंत्र और संघर्ष को बड़े ही सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है.

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन से आए उपन्यास ‘बिल्लू शेक्सपियर : पोस्ट-बस्तर‘ का एक अंश-

अटकन-चटकन दही चटाकन

सारांश यह कि छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय के पत्राचार-कार्यक्रम के लिए मान्यता मैडम और आशिष सर कई तरह का संवादी पाठ्यक्रम तैयार कर रहे थे जहां शेक्सपियर के कानों में कालिदास कुछ कह रहे हों, जॉन डन के कानों में कबीर, डिकेन्स और चेखव के कानों में प्रेमचन्द और यशपाल, शास्त्रीय कविता के कन्धे पर आदिवासी लोकगाथाओं के हाथ हों. जिन दिनों पाठ्यक्रम तैयार हो रहा था, आशिष सर फ्रेम के बाहर थे, यानी सोआस में, और कुलपति की चिर-तृषित पुरुष-दृष्टि मान्यता मैडम से जुड़े प्रवादों के रास्ते उनके अन्तरंग वृत्तों तक पहुंचकर उनका शिकार खेल जाने के सपने संजो रही थी!

ओजपूर्ण ढंग से बोलती हुई सुन्दर स्त्री एक ‘मज़ेदार और दिलचस्प तमाशा’ तो होती ही है-‘कोई कपि वन जाये सहज सम्भाव्य है!’ कपि यानी बन्दर बनकर हज़ार उछल-कूद मचा लेने के बावजूद यदि किसी और हाथ में पड़ा ठोंगा हाथ न आया तो जगता है अन्दर का भेड़िया जो एकदम से शिकार पर टूट पड़ता है.

कुलपति से अन्तरंग ‘मैत्री’ का आमन्त्रण साम-दाम-दंड-भेद से मान्यता मैडम ने नकारा और फिर आशिष सर भी ‘फ्रेम’ में चले आये. तब तक पाठ्यक्रम तो पास हो चुका था, पर पाठ-संस्तुति की प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं हुई थी. भाषा-विभाग के डीन कुलपति की मुट्ठी में थे.

‘बिनु काज दाहिने-बायें’ करने वाले सिर्फ़ दुष्ट ही नहीं होते, चाटुकार भी होते हैं! जिस धीरज से गली का कुत्ता कसाई के पारे के आसपास मंडराता रहता है कि कभी तो कोई ‘टुकड़ा’, कोई ‘हड्डी’ छिटककर पास आयेगी, बिन मांगे मोती मिलेगा, वे प्रभुत्व सम्पन्न लोगों के दरवाज़े बैठे रहते हैं- वहां की मिट्टी सूंघते हुए, बीच-बीच में एकाध लात लग जाये तो उसे भी ईश्वरीय प्रसाद मानकर ग्रहण करते हुए.

कामदग्ध व्यक्ति तो क्रोधदग्ध व्यक्ति से भी ज़्यादा फुर्तीला हो जाता है-चाहे पांव क़ब्र में ही क्यों न पड़े हों! जिस फुर्ती से उन्होंने मान्यता मैडम के आस-पास जाल बुनने शुरू किये थे, उसी फुर्ती के साथ उनके ‘आचरण’ और उनकी ‘कूबत’ के ख़िलाफ़ वक्तव्य देने शुरू किये, पहले तो चापलूसों की दारू-पार्टियों में, फिर स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में. एक बार तो उन्होंने सब स्त्री कार्यकर्ताओं को ‘मादक विषकन्याएं’ कह दिया.

बाल साहित्य: डॉक्टर अजय गोयल की कहानी ‘नन्हीं उंगलियों का विद्रोह’

“भाइयों और पतियों की प्रतिक्रिया अक्सर ऐसे मौक़ों पर उस परितप्त स्त्री के विरुद्ध ही जाती है जिसे लोक-प्रवाद में घसीट लिया गया हो. “कहा था न औरत, औरत की तरह रहो, घर की देहली न लांघो, लांघो तो हमारे संरक्षण में” जैसा कुछ व्यक्त-अव्यक्त हुंकार में गूंजता है! गैंग-रेप की शिकार कामकाजी लड़की हो या कुटिल टिप्पणियों की शिकार वयस्क कार्यकर्ता-‘जले पर नमक’ वाले मुहावरे का मर्म ख़ूब समझती है. जिसे आज तक कुर्सी-टेबल समझा गया, उसकी यह मजाल कि वह अपनी लय में बढ़ना चाहे! जिस कुर्सी पर मैं ही अभी बैठा हूं, यदि मुझे गुदगुदाकर कहे-‘अब उठो, मुझे जाना है बाहर’ तो खुन्दक चढ़ेगी ही! “जब तक कोई अगले को संवेदनहीन, प्राणहीन, उपयोगी ‘वस्तु’ समझता रहेगा-सामरस्य होगा ही कैसे, कैसे होगा तादात्म्य, जो कि इगैलिटेरियन समाज का आधारभूत प्रमेय है!”-आशिष सर हमें अक्सर समझाते!

विषकन्या-प्रकरण पर बहुतेरे स्त्री-संगठनों ने अपने-अपने ढंग से प्रतिवाद व्यक्त किये, पत्राचार-महाविद्यालय के हम छात्रों ने दौड़-धूपकर कुछ विरोध-प्रदर्शन भी आयोजित किये और इसका जवाब यह कि हम सब को मनगढ़न्त आरोपों पर रेस्टिकेड कर दिया गया!

मैंने जिस लड़की को देखा भी न था, सिर्फ़ फेस-बुक पर जिससे दो-एक बार की बातचीत थी-उसने अचानक मेरे ख़िलाफ़ एफ.आई.आर. दर्ज कर दिया कि मैंने उसे अभद्र प्रस्ताव भेजे हैं.

दरअसल वह कुलपति साहब के पी.ए. की बेटी थी और मैं उसकी स्थिति समझ सकता था! मेरे मित्र को यह कहकर जेल भेज दिया गया कि उसने एक पोस्टर फाड़ा जिस पर अम्बेडकर की तस्वीर थी! वह बेचारा, मिथिला का सहमा-सा, पढ़ाकू लड़का, पढ़ाई की मेज से उठता ही तब जब बाथरूम जाना होता या क्लास, कभी भरमुंह किसी से बोलता भी नहीं, लगातार इसी चिन्ता में घुला करता कि घर का क़र्ज़ कैसे सधेगा, बहनों की शादी कैसे होगी, समाज वर्ण-वर्ग-लिंग-नस्ल आदि की घेरेबन्दियों से ऊपर कैसे उठेगा (इसी वरीयता क्रम में उसकी चिन्ताएं घुमड़ती थीं, पहले पर्सनल, फिर पोलिटिकल, पर घुमड़ती थीं एक साथ) उसे जीवन में कोई शॉर्टकट नहीं चाहिए था! गणित में बी.ए. करने के बाद वह साहित्य में एम. ए. करने आया था कि नौकरी न भी मिली तो गणित के ट्यूशन पढ़ाकर और महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के अनुवाद करता हुआ वह कामचलाऊ पैसे तो उगाह ले!

उसे जब परीक्षा देने से ‘डिबार’ कर दिया गया तो उसका चेहरा नीला पड़ गया! हम तो कुछ हल्बाबाज़ थे भी, वह बेचारा सचमुच ही जौ के साथ पिसा हुआ घुन था! फ़रियाद लेकर वह कुलपति के पास गया तो कुलपति ने माफ़ीनामे की बात कही. यह कहा कि उनके ख़िलाफ़ जितने एफ.आई.आर. उसके साथियों ने किये हैं और जितने वक्तव्य इधर-उधर देते फिरे हैं-वे सब वापस लें तो उन्हें विश्वविद्यालय वापस लिया जायेगा. आशिष सर के समझाने-बुझाने पर हम समझौता-वार्ता के लिए राज़ी हो गये, पर कुलपति-निवास पर तो और ही तरह की खिचड़ी पक रही थी.

हमारी यह शर्त तो मान ली गयी कि मान्यता मैडम और उन सब स्त्रियों से कुलपति साहब माफ़ी मांग लें जिनके ख़िलाफ़ उन्होंने अभद्र टिप्पणी की है, पर बदले में हमसे भी बहुतेरे काग़ज़ातों पर दस्तख़त लिए गये और कुछ इतनी अफरा-तफरी में, यह कहते हुए कि एक विदेशी शिष्ट-मंडल आने वाला है, कि हम ठीक से सारे काग़ज़ पढ़ भी न पाये…उन्हीं काग़ज़ों में कुछ ऐसे काग़ज़ भी थे जिनसे बाद में हमारी नकेल कुलपति के हाथ में आ गयी. उन काग़ज़ों के अनुसार हमारा विश्वविद्यालय छोड़ना अनिवार्य हो गया, वे यह सिद्ध करते थे कि हमने जाली काग़ज़ों के आधार पर जेएनयू में एम. फिल. के लिए आवेदन किया था.

इस तरह के कई दलदल काटने के फिराक में जुलुमिया पुलिसिया से लगातार लुकाछिपी खेलते, दाने-दाने को मोहताज, हम जंगलों में भटकते और सपने देखते, गाने गाते, मन गिरने लगता तो नाटक भी खेलते, कभी कोई खाना दे देता तो हंसकर खा लेते!

मान्यमा मैडम की हत्या के आरोप में आशिष सर का जेल जाना आन्दोलन के आर्थिक अवलम्बों पर एक अप्रत्याशित कुठाराघात था. हमारी और कोई फंडिंग एजेन्सी तो थी नहीं- शेक्सपियर, ब्रेष्ट, कालिदास, भिखारी ठाकुर और उन लोकवृत्तों के सिवा जिनका अक्षय कोष हमें कभी विपन्न होने ही नहीं देता था.

एक बार कुलपति ने राजीव को बुलाकर चुटकी ली-
“अब तो बच्चू, तुम गये! जेएनयू, में पढ़ने का ख़्वाब तो गया चूल्हेभाड़ में। …एक-एक को अलग छिटका दूंगा. अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ता.”
“लेकिन उड़कर वह भड़भूजे की आंख ज़रूर फोड़ सकता है”, राजीव आहिस्ते से बोला और इस तरह उठकर खड़ा हुआ कि कुलपति कचकचाकर रह गये. (news18.com)

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