साहित्य

26-May-2020

उत्कृष्ट साहित्य का सिलसिला, आज चर्चित लेखिका शोभा डे का एक उपन्यास-अंश
22 मार्च को भारत में हुए जनता कर्फ्यू और 24 मार्च से लगातार चल रहे लॉकडाऊन के बीच साहित्य के पाठकों की एक सेवा के लिए देश के एक सबसे प्रतिष्ठित साहित्य-प्रकाशक राजकमल, ने लोगों के लिए एक मुफ्त वॉट्सऐप बुक निकालना शुरू किया जिसमें रोज सौ-पचास पेज की उत्कृष्ट और चुनिंदा साहित्य-सामग्री रहती है। उन्होंने इसका नाम 'पाठ-पुन: पाठ, लॉकडाऊन का पाठाहार' दिया है। न्हें साहित्य के इच्छुक पाठक राजकमल प्रकाशन समूह के वॉट्सऐप नंबर 98108 02875 पर एक संदेश भेजकर पा सकते हैं। राजकमल प्रकाशन की विशेष अनुमति से हम यहां इन वॉट्सऐप बुक में से कोई एक सामग्री लेकर 'छत्तीसगढ़' के पाठकों के लिए सप्ताह में दो दिन प्रस्तुत करेंगे। आज से हम यह सिलसिला शुरू कर रहे हैं। यह सामग्री सिर्फ 'छत्तीसगढ़' के लिए वेबक्लूजिव है, इसे कृपया यहां से आगे न बढ़ाएं। 
-संपादक

'इस वॉट्सऐप बुक के लिए अशोक महेश्वरी की लिखी गई टिप्पणी पढ़ें, और इसके बाद से आज की साहित्य सामग्री।

'प्रकाशकीय कोरोना का संकट अब वैश्विक बदलाव का नया प्रस्थान बिंदु बन चुका है। इसका असर मानव जीवन पर कई रूपों में पडऩे वाला है। कुछ संकेत अब स्पष्ट रूप से दिखने लगे हैं। यह हमारी पढऩे-लिखने की आदतों पर भी अपनी छाप छोड़ेगा, ऐसा लग रहा है। अभी आप चाहते हुए भी अपनी मनचाही किताब खरीद नहीं सकते, हम आपकी कोई मदद कर नहीं सकते। जितनी ई-बुक या ऑडियो बुक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मौजूद हैं, उनमें से ही चयन करना, पढऩा और सुनना एक विकल्प है। दूसरा विकल्प है, घर में उपलब्ध पढ़ी-अनपढ़ी किताबों को इस लॉक डाउन की अवधि में पढ़ जाना। हमसे कई साहित्यअनुरागियों ने अपने ऐसे अनुभव साझा किए हैं कि उन्हें आजकल कई भूली-बिसरी रचनाएँ याद आ रही हैं। उन्हें पढऩे का मन हो रहा है। कुछ को नई किताबों के बारे में भी जानने की उत्सुकता है, जिनके बारे में चर्चा सुन रखी है। हमने इन सब स्थितियों के मद्देनजऱ जब तक लॉकडाउन है तब तक प्रतिदिन आप सबको एक पुस्तिका उपलब्ध कराने का संकल्प किया है। व्हाट्सएप्प पर नि:शुल्क पाठाहार।' 
 
'22 मार्च 2020 से हमने फेसबुक लाइव के जरिये अपने व्यापक साहित्यप्रेमी समाज से लेखकों के संवाद का एक सिलसिला बना रखा है। जब से सोशल डिस्टेंसिंग यानी संग-रोध का दूसरा दौर शुरू हुआ है, तब से हम अपनी जिम्मेदारी और बढ़ी हुई महसूस कर रहे हैं। सभी के लिए मानसिक खुराक उपलब्ध रहे, यह अपना सामाजिक दायित्व मानते हुए अब हम 'पाठ-पुनर्पाठ' पुस्तिकाओं की यह श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। ईबुक और ऑडियोबुक डाउनलोड करने की सुविधा सबके लिए सुगम नहीं है। इसलिए हम अब व्हाट्सएप्प पर सबके लिए नि:शुल्क रचनाएँ नियमित उपलब्ध कराने जा रहे हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए आप राजकमल प्रकाशन समूह का यह व्हाट्सएप्प नम्बर 98108 02875 अपने फोन में सुरक्षित करें और उसके बाद उसी नम्बर पर अपना नाम लिखकर हमें मैसेज करें। आपको नियमित नि:शुल्क पुस्तिका मिलने लगेगी। हम समझते हैं कि यह असुविधाकारी नहीं है। आप जब चाहें, पावती सेवा बंद करवा सकते हैं। जब चाहें, पुन: शुरू करा सकते हैं। जब तक लॉक डाउन है, आप घर में हैं लेकिन अकेले नहीं हैं। राजकमल प्रकाशन समूह आपके साथ है। भरोसा रखें। साथ जुड़ें, साथ पढ़ें... अशोक महेश्वरी प्रबंध निदेशक, राजकमल प्रकाशन समूह'


प्रस्तुत है चर्चित लेखिका शोभा डे के एक उपन्यास, 'सोचा न था,' का अंश। 

'सोचा न था'
-शोभा डे
(उपन्यास अंश) 

निखिल घर लौटते समय अपने स्वभाव के विपरीत चुप था। जब हम अपनी बिल्डंग के पास पहुँचे तो उसने कुछ रुखाई से मुझसे पूछा, कहाँ उतरना चाहती हो? 
मुझे घर से निकले चार घंटे से भी ज्यादा हो गए थे। मैं जानती थी कि मेरे आने का समय नोट करने के लिए आसपास कोई नहीं होगा, फिर भी मुझे चुपचाप घर में घुसने को लेकर बेचैनी हो रही थी। अगर निखिल ने मेरी भावनाओं को समझ भी लिया होगा, तब भी वह उन्हें अनदेखा कर रहा था। मैं उम्मीद कर रही थी कि वह मुझसे फिर कभी आने की बात करेगा या कम-से-कम मुझसे अगले दिन के कार्यक्रम के बारे में पूछेगा (अच्छी तरह से यह जानते हुए भी कि मेरा कोई कार्यक्रम नहीं है)। 
मैं घर से कोई आधा किलोमीटर पहले ही उसकी मोटरसाइकिल से उतर गई।
मैंने भर्राई हुई और धीमी आवाज में कहा, हाँ। कुछ ही सेकेंड बाद वह धड़धड़ाता हुआ चला गया और मैं चहल-पहल-भरी एक सड़क पर एकदम लुटी-पिटी-सी खड़ी रह गई। किसी ने मेरी तरफ जरा-सा भी ध्यान नहीं दिया। मेरी परेशान हालत का उन तमाम व्यस्त लोगों पर कोई असर नहीं हुआ जो अपने आप में खोए, भयंकर ढंग से त्योरियाँ चढ़ाए मेरे पास से निकले चले जा रहे थे। ये लोग इतनी शिद्दत के साथ क्या सोच रहे हैं? मुम्बई में हरेक शख्स इतना परेशान क्यों दिखाई देता है? क्या इसकी वजह यहाँ की घुटन है? या हर तरफ फैली सड़ाँध? या बेहद महँगा रहन-सहन?
मैं पाँव घसीटती हुई घर वापस आ गई। मेरी चाल से ज्यादा बोझिल मेरा दिल था। मेरे मुँह में बीयर का जो स्वाद बचा रह गया था, उससे मुझे वितृष्णा हो रही थी और मैं कुल्ला करना चाहती थी। मैं देर तक नहाना और कुछ देर सोना चाहती थी, और यह भी चाहती थी कि मैं किसी ऐसे शख्स के सामने न पड़ जाऊँ जो मेरे आने-जाने को निखिल के साथ जोड़ दे।
जब मैं कम्पाउंड में घुसी तो पहरेदार ने बातों ही बातों में मुझे बताया कि कई लोग मुझे पूछ रहे थे। उसने खुद मेरे फ्लैट पर जाकर कई बार घंटी बजाई थी। 
मैंने उसे रुखाई से देखा। मुझे उसकी बंदर-जैसी आँखें बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थीं। अगर घंटी सुनकर किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो जाहिर था घर में कोई नहीं है। इसमें इतना परेशान होनेवाली क्या बात है? मैंने कहा।
वह बेशर्मी से मुझे देखते हुए बोला, लेकिन मेमसाब, आप हमेशा तो घर पर ही रहती हैं। कभी कहीं जाती नहीं हैं, और साब भी शहर में नहीं हैं। इसलिए हमें थोड़ी फिक्र तो हो ही जाती है। मुम्बई जैसे शहर में कुछ भी हो सकता है। और, बाहरवालों के साथ तो और भी। आजकल कौन किस पर भरोसा कर सकता है? जब घर में कोई औरत बिल्कुल अकेली हो... 
मैंने उसे बीच में ही टोकते हुए रुखाई से कहा, तुम अपने काम से काम रखो। 
उसने कंधे उचका दिए और एक तिनके से अपने गंदे दाँत कुरेदने लगा। फिर वह बोला, मैं तो बस अपना काम करने और आपकी हिफाजत करने की ही कोशिश कर रहा हूँ। अगर आप अपने आप ही इस सबसे निपटना चाहती हैं तो ठीक है। लेकिन बाद में शिकायत मत कीजिएगा कि मैंने आपको आगाह नहीं किया।
मैंने चमड़े के अपने हैंडबैग को थपथपाकर देखा कि घर की चाभियाँ उसमें हैं या नहीं (यह बैग उन बेहतर तोहफों में से एक था जो मुझे मेरी शादी पर मिले थे)। मैं इतनी घबराई हुई थी कि बहुत सम्भव था कि मैं उन्हें ले जाना ही भूल जाती, और तब मुझे जबरन अपने अभिमान को दबाना पड़ता और मदद के लिए उसी सुअर पहरेदार के पास जाना पड़ता। और इस बात की पूरी संभावना थी कि उसने अपना बदला लेते हुए सहयोग करने से इंकार कर दिया होता। उस हालत में मुझे किसी तालेवाले की तलाश में पड़ोस में जाना पड़ता। मुझे इस बात का कोई इल्म नहीं था कि मुम्बई के ताले सुधारने वाले कैसे दिखते हैं या मैं उन्हें कहाँ ढूँढ सकती हूँ। तब मुझे किसी पब्लिक बूथ से अपनी सास को फोन करना पड़ता। 
और तब मुझे दर्जन-भर ऊटपटाँग सवालों का जवाब देना होता, जैसे—'तुम फ्लैट को अकेला छोड़कर इस समय बाहर कैसे निकल गईं?' (जैसे मेरे बाहर होने पर कोई और भी इसके अन्दर हो सकता था?), 'तुम्हारा आदमी जब शहर में नहीं है तो तुम कहाँ मटरगश्ती करती घूम रही थीं? तुम्हें पता नहीं इसमें कितना खतरा है?' (हाँ, मुझे पता है, इसीलिए तो मटरगश्ती करती फिर रही थी मैं।) 'रंजन को इस बात का पता चलेगा तो वह क्या कहेगा?' (जैसे मैं बहुत परवाह करती हूँ उसकी!), 'यह तुम्हारी बेहद गैर-जिम्मेदार हरकत है।' (तब तो मुझे अक्सर ही ऐसी हरकतें करनी चाहिए।) 
नहीं, उस स्थिति की भयावहता को शब्दों में नहीं बताया जा सकता। मैं ताले के छेद में चाभी डाल ही रही थी कि मुझे पीछे से किसी औरत की आवाज सुनाई दी। 
अरे, मिसेज मलिक, मैं सुबह से चार-पाँच बार आपके फ्लैट पर आ चुकी हूँ। देखिए, किसी ने मुझे बताया था कि आप टेक्सटाइल्स के बारे में कुछ जानती हैं—और मेरी बेटी की बड़ी ख्वाहिश है कि वह कुछ जेब खर्च जुटाने के लिए एक एक्जीबिशन-कम-सेल लगाए। सबने मुझे यही बताया था कि आप हर समय घर में ही रहती हैं। मैंने सोचा, अजी बात है! जिस दिन मैं उनसे मिलने उनके घर आई, उसी दिन वह बाहर निकल गईं। मुझे यह भी पता था कि मि. मलिक आज सुबह-सुबह एयरपोर्ट निकल गए—जब आपकी-मेरी कार साफ करने वाला छोकरा मुझे चाभियाँ वापस करने आया, तब उसने बताया। तभी मैंने सोचा कि आपको थोड़ी तकलीफ दूँगी। जानती हूँ जब आदमी लोग बाहर चले जाते हैं तो कैसा लगता है—हम औरतें कितना आजाद महसूस करती हैं! हमारा समय हमारा अपना हो जाता है। हम आराम कर सकती हैं, गपशप कर सकती हैं, अपनी पड़ोसिनों के साथ बैठकर चाय पी सकती हैं। आपको एतराज तो नहीं है न, क्यों?
मैं अब भी दरवाजे की मूठ पर हाथ रखे खड़ी थी। उस औरत ने मुझे अपना मुॅंह खोलने का भी मौका नहीं दिया था। थकी हुई मैं बोली, अंदर आ जाइए। और यह भी उम्मीद करती रही कि वह मेरा अनमनापन भाँपकर कहेगी, 'फिर कभी। अभी आप कुछ अस्वस्थ दिख रही हैं।' 
लेकिन, वह तो इसके बजाय फ्लैट में एक पाँव घुसेडऩे की हड़बड़ी में मुझे ही धकियाती अंदर आ गई। और इससे पहले कि मैं अपना बैग रख पाती या अपनी सैंडिलें उतार पाती, उसने बैठक में घूमना शुरू कर दिया। साथ ही वह अपने गले से अजीब-सी आवाजें भी निकालती जा रही थी।
मैं शर्मिंदगी में उसका नाम भी नहीं पूछ पाई—शायद मुझे उसका नाम पता होना चाहिए था, जैसे उसे मेरा नाम पता था। मैं अभी सोच ही रही थी कि कैसे उससे उसका नाम-पता पूछूँ कि उसने अपनी तीखी आवाज में कहा, वैसे, मैं लीना हूँ। लीना मेहता। ग्राउंड फ्लोर पर फ्लैट नंबर तीन में रहते हैं हम। वही वाला फ्लैट जिसमें शोख रंग के पर्दे हैं और ढेर सारे पौधे। मुझे पौधों से बहुत लगाव है, और आपको? दरअसल, मैं घर में ही इकेबाना की क्लास चलाती हूँ। बोनसाई भी सिखाती हूँ। मैं एक छोटा-सा 'प्लांट बुटीक' भी खोलना चाहती हूँ। लोग मुझसे कहते रहते हैं कि मैं उनके फार्म हाउस सजा दूँ—लैंडस्केपिंग, बागवानी, फ्लॉवर अरेंजमेंट कर दूँ, लेकिन वक्त किसके पास है?
मैं शादियाँ भी करती हूँ—मेरा मतलब है, मैं शादीवाले हॉल में अच्छी- अच्छी चीजें सजाती हूँ। लोग कहते हैं मैं थोड़ी महँगी हूँ—लेकिन जब कोई टॉप क्वालिटी की चीज माँगते हैं तो फिर उसके लिए पैसे तो खर्च करने ही पड़ते हैं। मैं शादियों पर जो सजावट करती हूँ, वो वह खास होती है, बहुत खास, और अलग भी। मैं बार-बार उन्हीं पुराने गुलाबों और लिली को इस्तेमाल नहीं करती। अरे नहीं, मैं अनूठी चीजों, खूबसूरत सामान को काम में लेती हूँ। 
मैंने उदासीन रहते हुए पूछ लिया, जैसे?
उसने हिचकिचाते हुए जवाब दिया, जैसे नारियल का छिलका, जूट, हाथ का बना कागज, शंख, पत्थर-सब कुछ कुदरती, आप तो समझती हैं।
मैंने बेचैनी से सिर हिलाया। मन-ही-मन मैं प्रार्थना करती जा रही थी कि हे भगवान, इस खिजाऊ औरत को इसी पल मेरे घर से बाहर करो। उसने घर में रखी पीतल की कुछ चीजों को उठाना शुरू किया तो मैं चौकन्नी होकर देखने लगी।
बहुत प्यारा है! अच्छा है, वह बेमतलब ही कहती रही, बंगाल का ही होगा, क्यों? मैं तो कहती हूँ कि इस तरीके से आप बंगाली लोग अपनी चीजों को सचमुच बेहद प्यार करते हैं। आपकी तहजीब, बोली, साड़ी-वगैरह सब कुछ। यहाँ तक कि सोने के गहने भी। गुजराती होने के नाते मुझे भी अपने तरीके का सोने का काम अच्छा लगता है, लेकिन मेरे पास एक बंगाली कड़ा भी है। बड़ा है, लेकिन ठोस नहीं है। आप लोग हल्के और खोखले जेवरात बनाते हैं, सही कहा न?
यह भी अच्छी बात है। लोग यही सोचते हैं कि ये असली कीमत से भी ज्यादा महँगे हैं। दिखावा होता है, और सोने की पॉलिश भी अलग किस्म की होती है। बहुत ज्यादा चमकदार और लाली लिये हुए। हम लोग पीलापन ज्यादा पसंद करते हैं—जैसा कि चोखा सोना होता है। 
बहरहाल, अपनी खुद की रुचि होना अच्छी बात है। अपने सरसों के तेल को ही ले लीजिए। हे भगवान, जिस चीज में देखो, सरसों का तेल, सरसों का तेल, सरसों का तेल! जब आप अपने पति के लिए खाना पकाती हैं तो मुझे पता चल जाता है, मुझे तो लगता है, पूरी बिल्डिंग को पता चल जाता होगा। क्या गंध होती है! और आपकी मछली! मैं आपको बताऊँ, मिसेज मलिक, इसकी गंध जब नीचे हमारे फ्लैट तक आती है तो मेरे बच्चेतो शिकायत करने लग जाते हैं। मैं उनसे कहती हूँ, 'क्या करें? पड़ोसी तो आखिर पड़ोसी ही होते हैं। क्या मैं मि. और मिसेज मलिक से कह सकती हूँ कि वे यह खाएँ और यह न खाएँ? क्या वे हमारी बात सुनेंगे ?
ओह—मेरे पास बंगाल की एक खूबसूरत साड़ी भी है—जैसी आप इस समय पहने हुए हैं, वैसी तो बेशक नहीं है। मेरीवाली तो बस खूबसूरत है। तंगैल या ऐसा ही कुछ नाम है उसका। बहुत महँगी है—वह भी सूती साड़ी। इस दाम में मैं गुजरात से पाँच साडिय़ाँ ला सकती हूँ।
लेकिन मेरी बेटियाँ कहती हैं, 'ममी, आपके पास फिल्मवालों की तरह कम-से-कम एक बंगाली साड़ी तो होनी ही चाहिए।' जवान लड़कियाँ होती ही हैं ऐसी।
मैंने मन में सोचा कि इसने कितने मजे में मुझे अपनी उम्र के लोगों में मिला लिया, हालाँकि मैं उसके बच्चों की उम्र की थी। औरतें हमेशा यही करती हैं। शादीशुदा औरतें। जैसे किसी की बीवी होते ही आपको उस क्लब की जिन्दगी-भर के लिए सदस्यता मिल जाती है जिसमें शामिल होने की आपकी बिल्कुल भी इच्छा नहीं होती। सभी उम्र की शादीशुदा औरतें एक-दूसरे की तरफ खिंची चली आती हैं, हालाँकि विवाह के वचनों को छोड़कर उनमें और कोई भी बात मेल नहीं खाती।
इस औरत ने मुझमें बैर-भाव जगा दिया। मेरे मन में आया कि उसे 'आंटी' कहूँ ताकि उसे हमारी उम्रों के फर्क का पता तो चले। लेकिन मैंने अपने शब्दों को रोक लिया, जैसे मैं अपने आँसुओं को रोके हुए थी। मैं अकेली होना चाहती थी। मैं इस सुबह को फिर से जीना चाहती थी, अपनी बातचीत को फिर से दोहराना चाहती थी, उन कीमती क्षणों को फिर से जीवंत करना चाहती थी जो निखिल ने और मैंने अभी कुछ ही देर पहले साथ-साथ बिताए थे। इस पल, मुझे इस बारे में कोई इल्म नहीं था कि हम दोनों इस तरह फिर कभी मिल भी पाएँगे या नहीं—आज हम रोमांच की जिस भावना और जिस तरह की लापरवाही से मिले थे, वह केवल हताशा से ही पैदा होती है।
मैंने यह मूर्खता ही की थी कि इस सैर-सपाटे के दौरान अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था। निखिल तो इस शर्मिंदगी को ढो रहा था कि वह अपने से बड़ी एक शादीशुदा औरतअपनी माँ की 'सहेली' के साथ देख लिया जाएगा, और मैं इस बात से चिढ़ी हुई थी। मेरी निखिल की माँ के साथ या इस बड़बोली, मनहूस औरत के साथ क्या समानता है जो इस समय मेरे घर के एक-एक कोने का मुआयना किए जा रही है। 
मैंने उसे कहते सुना, और आपके मिस्टरवह बैंक में नौकरी करते हैं, इतना तो हम सब जानते हैं, लेकिन वह मेल-जोल क्यों नहीं रखते? हम इतने बुरे तो हरगिज नहीं हैं। मेरे मिस्टर उनसे मिलकर खुश होंगे—आखिर आदमी लोग एक-दूसरे के साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं। वे लोग हमारी बातों, बातों, बातों से बोर हो जाते हैं। लेकिन मैं सोच रही हूँ कि आपके पति कम बोलने वाले हैं। शायद सभी बंगाली मर्द ऐसे ही होते हैं। लेकिन हम गुजराती—हे भगवान—हमसे तो आप बस दो काम करवा लीजिए—बोलना और खाना! हम ये दोनों काम करते हुए कभी नहीं थकते।
बताइए, आपको गुजराती खाना अच्छा लगता है? मैं आपको चखने के लिए भेज सकती हूँ। लेकिन मेहरबानी करके हमारे व्यंजनों को अपने व्यंजनों के साथ मत मिला दीजिएगा, हम लोग शुद्ध शाकाहारी हैं। मैं कुछ समय से सोच रही थी कि आपको ढकेला या और कुछ भेजूँ। फिर मैं रुक गई। साफ-साफ कहूँ तो मैं डर गई थी। कहीं अगर भूल से आपने मेरी प्लेट पर बकरे का गोश्त, मुर्गा या मछली रख दी तो? सत्यानाश! ठीक है, एक काम कीजिए—आप मुझे अपनी प्लेट भेज दीजिए। यह ज्यादा ठीक रहेगा। इस तरह से कोई परेशानी नहीं होगी, कोई सिरदर्दी नहीं होगी। आज ही मैं आपको कोई जायकेदार चीज भेजूँगी। उम्मीद है आपको पसंद आएगा—उसमें सरसों का तेल नहीं होगा। हम केवल तिल का इस्तेमाल करते हैं। यह सेहत के लिए ज्यादा अच्छा होता है।
अब मेरी आपसे जान-पहचान हो गई है तो हम अक्सर मिलते रह सकते हैं। तब, हमारे मिस्टर लोग भी मिल सकते हैं। मेरे मिस्टर तो बिजनेस करते हैं। हम लोग व्यापारी हैं, आप जानती हैं। हमारे यहाँ एल्यूमिनियम की रॉड और पाइप वगैरह का व्यापार होता है। शायद आपके पति उन्हें कोई रास्ता बताएँ। बैंक वाले बहुत स्मार्ट होते हैं—ऊपरवाले मि. वर्मा की तरह। उसी बैंक में हैं, मैं सोचती हूँ। लेकिन उनका दिखावा देखिए और अपना। आप लोग सादा ढंग से रहते हैं। उनका घर देखिए—हे भगवान—कितनी सारी इम्पोर्टेड चीजें हैं उनके यहाँ। बड़ा-बड़ा टी.वी., फ्रिज, सीडी, क्या नहीं है! लेकिन एक भी चीज हिन्दुस्तानी नहीं है। और कितने तो नौकर रख रखे हैं उन्होंने। बेशक, मिसेज वर्मा खूबसूरत औरत हैं। उनके पास कहाँ फुर्सत है अपने घर-परिवार को देखने की? हमारी तरह थोड़े हैं, बिल्कुल नहीं। हम तो पूरे समय की गृहस्थिनें हैं। मैंने सुना है, खूब कमाती हैं। और कोई टैक्स भी नहीं देतीं? सारा लेन-देन नकदी में करती हैं। मैं तो यही कहूँगी कि इन लोगों को सारे दाँव-पेच आते हैं। वह घर पर फेशल (चेहरे का मेकअप) भी करती हैं। वैक्सिंग, थ्रेडिंग, सब कुछ। आपने कभी करवाके देखा?
मैंने दुखी होकर सिर हिला दिया। मिसेज मेहता ने चिंतित होकर देखा। वह बोली, आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही। देखिए, पूरा चेहरा पसीना-पसीना हो रहा है। बैठ जाइए, बैठ जाइए। मैं आपके लिए ठंडा पानी लाती हूँ।
मैंने तुनककर कहा, कोई बात नहीं। मैं ठीक हूँ। मुझे कुछ नहीं हुआ है। 
मिसेज मेहता ने रसोई से चिल्लाकर कहा, बाप रे लगता है आपकी नौकरानी आज काम पर नहीं आई! जरा गंदे बर्तन तो देखिए। मैं अपनी नौकरानी को भेज दूँ? थोड़े फालतू रुपए लेकर वह सारा काम कर देगी। लेकिन आपको उस पर नजर रखनी पड़ेगी—उसके हाथ जो भी लगता है, चुरा लेती है। चीनी, माचिस, खाली डिब्बे, पुराने अखबार, प्लास्टिक की थैलियाँ, तार और बेशक, पैसा भी। 
वह एक गिलास पानी लेकर आई, लीजिए। पीजिए, पीजिए।
वह गौर से मेरा मुँह देख रही थी, और फिर उसकी आँखें चमक उठीं। 
वह बोली, अब मेरी समझ में आया! आप बताने में शरमा रही थीं न? खुशखबरी लगती है। हम सब सोच ही रहे थे—मिसेज मलिक कब अपना परिवार शुरू करेंगी। लगता है, यह बात हो ही गई। मना मत कीजिएगा। हाँ भी मत कहिएगा। मैं समझती हूँ। इस हालत में मैं भी बहुत अंधविश्वासी और शक्की थी। सभी लोगों की नजरें एक-सी नहीं होतीं। यह दुनिया जलने वालों की है। आज मैं आपको मुबारकबाद दे रही हूँ और कल मैं ही आपको कोस भी सकती हूँ। क्या किया जाए? क्या कोई किसी के दिल में झाँककर देख सकता है कि सच क्या है?
लेकिन मैं आपसे साफ-साफ कह रही हूँ—मैं उस किस्म की औरत नहीं हूँ। भगवान की मुझ पर दया है। मेरे पास बच्चे हैं। तन्दुरुस्त बच्चे। एक बेटा, दो बेटियाँ। मैं आपसे क्यों जलूँ? भगवान की कृपा से पति का काम भी अच्छा चल रहा है। हो सकता है हम अमीर न हों, लेकिन हमारे पास काफी है। हर कोई मेरी तरह नहीं है। इस बिल्डिंग में जलने वालों की कमी नहीं है। कोई नई कार ले आता है तो लोग कहते हैं कि उसने रुतबे का इस्तेमाल किया है। किसी को तरक्की मिलती है तो लोग कहते हैं कि उसने अपने अफसर को पैसा खिलाया है। किसी लड़की की सगाई होती है तो यहाँ की औरतें कहती हैं कि वह तो पहले से ही गर्भवती है। बहुत भयंकर हैं इस बिल्डिंग के लोग। सबसे खराब तो यहाँ के नौकर, पहरेदार और ड्राइवर हैं। मेरी सलाह मानो, किसी को बताना मत। आप और मैं बुरी नजर या काले जादू को मानें या न मानें, लेकिन मुझे कई ऐसी घटनाएँ मालूम हैं, जिनमें इन्हीं सब चक्करों से औरतों के बच्चे गिर गए।
मुझमें इतनी ताकत नहीं थी कि उसकी गलती को सही करूँ। वह जो भी सोचना चाहती है, उसे सोचने दो, मैंने मन में कहा और पानी को गटागट पी गई। मैंने सोचा, काश, निखिल यहाँ होता। मैं अपने घर की गंदगी या अपनी चीकट हालत की भी परवाह नहीं करती। मैं उसके लिए चाय बनाती, अपने लिए नींबू पानी तैयार करती और प्यार से उसके साथ बैठकर बातें करती। 
उसी पल यह बात मेरे दिमाग में आई कि निखिल के लिए इतनी चाहत के बावजूद मेरे मन में एक बार भी उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने का खयाल नहीं आया। फिर यह आकर्षण कैसा है? निश्चित तौर पर, यह बहन-भाई वाला प्यार तो नहीं है। मेरे यह मानने के बावजूद कि हमारे संबंधों में वासना नहीं है, उसके लिए मेरी चाहत कम नहीं हुई। न ही इससे मुझे कोई उलझन या परेशानी हुई। मुझे निखिल का आसपास होना अच्छा लगता है। मुझे उसके साथ अच्छा लगता है। हकीकत यही है। 
हो सकता है, यह किसी के साथ की जरूरत रही हो, उससे ज्यादा कुछ भी नहीं, क्योंकि मैं बेहद अकेला महसूस करती थी। लेकिन निखिल ने मुझे क्यों ढूँढ़ा? मुझे पक्का पता था कि उसके पास कई दोस्त थीं और मौके भी थे। कभी-कभी जब निखिल और उसके कॉलेज के साथी धड़ाधड़ सीढिय़ाँ उतरते होते थे तो मुझे हँसी की आवाजें सुनाई देती थीं। या कभी-कभी, देर रात गए मुझे निखिल की मोटरसाइकिल के बंद होते समय की फटफट सुनाई देती थी—यह वह समय होता था कि जब वह अपनी मोटरसाइकिल को अपने पिता के गैरेज में खड़ा करके सीढिय़ों पर धड़धड़ाता हुआ ऊपर जाता था। 
न चाहते हुए भी, मैंने एक बार फिर मिसेज मेहता की ओर ध्यान दिया। वह मेरी सेहत के बारे में सब कुछ भूल चुकी थी और अब एक कश्मीरी रोजवुड की छोटी मेज पर रखे कुछ फोटो फ्रेमों को देख रही थी (ये फ्रेम मेरी माँ ने जिद करके मेरे साथ भेज दिए थे)।
शादी की तस्वीरें हैं? वह चहकती हुई पूछने लगी, जबकि यह जाहिर था कि वे और कुछ नहीं हो सकती थीं। 
मैंने अनमने भाव से सिर हिला दिया। अच्छी हैं, यहाँ शादी के जोड़े में आप बहुत अच्छी दिख रही हैं। उसने स्वीकार करते हुए कहा। वह अपनी आवाज में ताज्जुब के भाव को छिपा नहीं पाई, कपड़े भी बड़े अच्छे ढंग से पहने हैं। ठेठ बंगाली दुल्हन लग रही हैं।
उसने फ्रेम को अपनी आँखों के और भी पास लाते हुए मेरे जेवरों को गौर से देखा। सोना है न, क्यों? उसने पूछा।
हाँ। मैंने कम-से-कम शब्दों में जवाब देने की कोशिश करते हुए कहा।
इन्होंने दिए या मम्मी ने? मेरा मतलब है, आपकी तरफ से हैं या ससुराल की तरफ से? मिसेज मेहता ने अपनी छानबीन जारी रखी।
इससे कोई फर्क पड़ता है क्या? मैंने पूछा।
क्यों नहीं, माई डियर—क्या कह रही हैं आप? वह बोली, वैसे तो, हम भी दहेज-शहेज में विश्वास नहीं करते, लेकिन कुछ लेना-देना तो अब भी चलता ही है—है न? मैं कैसे अपनी बेटी की शादी के सामान के लिए अभी से सोचने में लग गई हूँ? सब कुछ तय कर दिया है, साडिय़ाँ, जेवरात और यहाँ तक कि पैंटी और ब्रा भी। लंदन से। टॉप चलिटी की। आपकी माँ ने भी आपको काफी दिया होगा। इकलौती संतान हैं, या...?
मैं एकदम से उठ गई और बोली, मिसेज मेहता, माफ कीजिएगा।
मुझे बहुत सारा काम करना है। फिर सिर में दर्द भी है। मैं आपको फिर कभी बुला लूँगी, ठीक?
उसने बड़े अनमनेपन से फ्रेम वापस रखे।
अच्छा, अच्छा, अच्छा। अगली बार मैं आपकी शादी की वीडियो और सारे एलबम देखना चाहूँगी, वादा रहा न? वह बोली।
मैंने उसे दरवाजे की तरफ लगभग धकेलते हुए एकदम कहा, मेरे पास वीडियो नहीं है। हमने वीडियो फिल्म नहीं बनवाई। 
वह जाते-जाते रूक गई और पूरी घूमती हुई मुझ पर दोष लगाती हुई-सी पूछने लगी, क्यों? यह तो बहुत बड़ी बात है। आजकल जिसे देखो वही वीडियो बनवा रहा है—यहाँ तक कि नौकरानियाँ और ड्राइवर लोग भी। अभी पिछले महीने ही तीसरी मंजिल पर रहने वाले ड्राइवर की सगाई हुई। ढाई हजार रुपए-खाली वीडियो में लगा दिए। म्यूजिक, टाइटिल, सब कुछ था उसमें। बिल्कुल किसी कामर्शियल फिल्म की तरह थी। मुझे तो लगा, मैं वह हिट फिल्म 'हम आपके हैं कौन' देख रही हूँ। आपने देखी?
मैंने स्वीकार किया कि मैंने नहीं देखी। उसने अपने अँगूठे और तर्जनी से गोल घेरा बनाते हुए कहा, बहुत बढिय़ा, बहुत ही बढिय़ा फिल्म है। तीन बार देखी मैंने। घरवालों के साथ। और कितना रोई थी मैं!
क्या बहुत दुख-भरी फिल्म है? मैंने उदासीन रहते हुए पूछा।
नहीं, नहीं, नहीं, दुख-भरी तो नहीं है, लेकिन दिल को छूने वाली है।
मिसेज मेहता ने इतराते हुए कहा। उसे इस बात पर गर्व हो रहा था कि उसने कितनी अच्छी समीक्षा की, और यह कहकर वह चली गई। मैं अपने आप पर और घर में फैली गंदगी पर अफसोस करती रह गई। 
उस रात दिल्ली से रंजन का फोन आया। वह इतना खुश लग रहा था कि मैं तो एक बार को उसकी आवाज ही नहीं पहचान पाई। उसकी आवाज काफी तेज थी और वह किसी बात को लेकर बहुत ज्यादा उत्तेजित लग रहा था।
तुम ठीक हो न? उसने पूछा, या मैं मम्मी को फोन करूँ?
मेरे मन में तो आया कि कह दूँ, नहीं, मैं कतई ठीक नहीं हूँ। सच पूछो तो मैं यह सोच रही हूँ कि फोन रखने के बाद ही आत्महत्या कर लूँ।'
बेशक, मैंने ऐसा कहा नहीं, बल्कि मैं कुछ-कुछ, कुछ भी बुदबुदाती रही। पत्नियों वाली आवाजें निकालती रही। वैसे भी वह सुन नहीं रहा था।
मैं ठीक हूँ, बिल्कुल ठीक, रंजन बोलता जा रहा था, अच्छी फ्लाइट रही, बढिय़ा कमरा है। फूल हैं, फल हैं, चॉकलेट हैं। सब कुछ मुफ्त। 
उसकी इस बात पर मैं मुस्कुरा दी। रंजन सचमुच बहुत आसानी से खुश हो जाता था। तो फिर, मैंने इसके लिए खुद थोड़ी कोशिश और क्यों नहीं की? मुझे भी बस थोड़े-से गुलाब, एक बड़ी चॉकलेट, और पके केले रखने होते।
तुमने दिन-भर क्या किया? उसने पूछा, और फिर मेरे जवाब का इंतजार किए बिना ही अपने बारे में बताने लगा कि उसने अपना दिन कैसे बिताया है।
मैंने उसकी बात पूरी तरह से नहीं सुनी। एक तो यह कि मुझे नींद आ रही थी। दूसरे, मैं भूखी थी। मैंने पूरा दिन कुछ भी नहीं खाया था। यह एक तरह की मूर्खतापूर्ण तपस्या थी। भगवान जाने किस बात की सजा दे रही थी मैं अपने आपको। मेरा सिर चकरा रहा था और मेरी आँखें बन्द हुई जा रही थीं। मैंने एक-एक लाइट जलाकर छोड़ी हुई थी और टी.वी. पर तेज आवाज में फिल्मी संगीत चला रखा था।
रंजन ने थोड़ा रुककर कहा, बहुत शोर हो रहा है। क्या हो रहा है?
उसकी आवाज में चिन्ता थी।
टी.वी. चल रहा है। मैंने जवाब दिया।
थोड़ा धीमा करो। यहाँ दिल्ली तक मुझे सब कुछ साफ सुनाई दे रहा है। उसने हुक्म दिया।
मैंने कमजोर और बहुत धीमी आवाज में कहा, मुझे डर लग रहा है,
रंजन! मुझे सचमुच बहुत डर लग रहा है।
लेकिन उसने मेरी बात नहीं सुनी। मुझे बीप की आवाज सुनाई दी, जिसका मतलब था कि तीन मिनट हो गए, और फिर फोन बंद हो गया। मैंने रिसीवर को अपने गालों से सटा लिया और उसे आँसुओं की बाढ़ में डुबो दिया। एक अदाकारा टी.वी. के पर्दे पर अपने बदन को बुरी तरह से हिला रही थी और दर्शकों से कह रही थी कि वे यह जानने की कोशिश करें कि उसकी चोली के पीछे क्या है! यह एक पुराना गाना था और इसे सुनकर मुझे मेरे अच्छे दिनों की याद आ गई।
मैं नहीं जानती थी कि मैं वह रात कैसे निकाल पाऊँगी। मैं कलकत्ता में माँ को फोन करना चाहती थी। यह बात नहीं थी कि वह मेरी चिंताओं को समझ पाती, लेकिन कम-से-कम उसकी जानी-पहचानी आवाज सुनकर मुझे कुछ तसल्ली तो मिल ही जाती, जब वह सख्ती से कहती, मुद्दा यह है, तुम्हें अब बड़ा हो जाना चाहिए। तुम अब बच्ची नहीं रह गई हो। मर्द तो सफर पर जाते ही रहते हैं। यह तो उनके काम का हिस्सा है। तुम्हें इसकी आदत डालनी होगी। नहीं तो जमाई बाबू से कहो कि चौबीस घंटे की नौकरानी रख लें। अगर वह इस पर राजी न हों तो अपनी पार्टटाइम नौकरानी को ही कुछ फालतू पैसे देकर उनकी गैरहाजिरी में रात में अपने पास रोक लिया करो। इसका यही एक इलाज है। और, एक और बात—डरा मत करो। डर सबसे खराब चीज है। याद रखो, अगर तुम डरोगी तो कुछ भी ढंग से नहीं सोच पाओगी। तुम्हें यह तो पता होगा ही कि पुलिस का नंबर कैसे डायल करते हैं। सबसे नजदीकी पुलिस थाना कहाँ है? पास ही होना चाहिए। दूसरे जरूरी नंबर भी अपने पास रखना अच्छा रहता है। जैसे, फायर ब्रिगेड और एम्बुलेंस। तुम्हें कुछ नहीं होने जा रहा, लेकिन क्या पता कभी जरूरत पड़ ही जाए।
हाँ, क्या पता कभी जरूरत पड़ ही जाए। मैं डर के मारे सुन्न हो गई और मेरे दिमाग में अजीब-अजीब तरह के खयाल आने लगे। मैं बिस्तर पर एक तकिया पकड़कर बैठ गई और भयाक्रान्त आँखों से खिड़की के बाहर खड़े नीम की झूलती डालियों से बननेवाले सायों को ताकने लगी। मेरी इतनी हिम्मत भी नहीं हुई कि उठकर पंखा चला दूँ। बेशक, रंजन की गैरहाजिरी में एयरकंडीशनर चलाने का तो सवाल ही नहीं उठता था।
टी.वी. पर चल रहे एक लोकप्रिय संगीत-कार्यक्रम की मस्त एनाउंसर रूबी एक अजनबी के घर में घुसकर नौकर छोकरे से यह पूछने ही जा रही थी कि वह उससे शादी करेगा क्या? मैं उस पर भी ध्यान नहीं जमा पाई—जबकि वह मेरी मनपसंद वीजे थी। यानी, जब कभी रंजन मुझे उसका कार्यक्रम देखने देता था, तब।
मैंने कहीं पढ़ा था कि वह कमोबेश मेरी ही उम्र की थी—और फिर भी, हम दोनों की जिंदगियाँ बिल्कुल अलग-अलग थीं। मुझे उससे जलन होने लगी। उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उसे बहुत मजा आ रहा हो। उसे देखकर ऐसा भी लग रहा था जैसे उसे दुनिया में कोई चिंता ही नहीं है। मुझे उसका कपड़े पहनने, बोलने, मजाक करने और नाचने का ढंग बहुत अच्छा लगता था। मुझे यकीन था कि उसे खाना पकाने, सफाई करने या किसी को खुश करने के बारे में चिन्ता नहीं करनी पड़ती।
इस बात पर मुझे याद आया—सिंक में रखे जूठे बर्तनों को मैंने वैसा ही छोड़ दिया था, जैसे वे मुझे रखे मिले थे। और बस एक यही बात थी जिसने मुझे राहत पहुँचाई और मैं सारी रात जागती हुई एक बड़े-से परिंदे का सपना देखती रही, जो पंजे फैलाकर मुझ पर झपट्टा मार रहा था।
सुबह साढ़े तीन बजे तक मेरी समझ में आ चुका था कि जबर्दस्ती सोने की कोशिश करने में कोई तुक नहीं है। मैं इतनी ज्यादा तनावग्रस्त और डरी हुई थी कि मुझसे अपनी थकी हुई आँखें भी बंद नहीं की जा रही थीं। मैंने सब कुछ आजमा लिया—टी.वी. देखा, एक गिलास दूध भी पिया, एक नीरस किताब पढ़ डाली, यहाँ तक कि तनाव से मुक्ति दिलाने का दावा करनेवाला एक योगासन भी करके देख लिया।
चौकीदार अपने लंबे-से डंडे को एक लय में खटखटाता चक्कर लगा रहा था और मुझे उसके डंडे की वह आवाज सुनाई दे रही थी। यह खयाल तसल्ली देने वाला था कि रात की इस तपिश और चिपचिपाहट- भरी खामोशी में कोई और भी जाग रहा है। मैंने अपने आपको बेडरूम में बन्द कर रखा था और फिर भी मैं डर रही थी कि कोई चोर घुस ही न आए। मुझे तमाम तरह की परेशान करने वाली आवाजें, खासकर किसी के कदमों की आहट सुनाई देने लगी। मुझे ऐसा भी लगा कि कोई आदमी या औरत बार-बार अपना गला साफ कर रहा या रही है (ये आवाजें इतनी घुटी-घुटी थीं कि मेरे लिए यह समझना मुश्किल था कि ये किसी आदमी के गले से निकल रही थीं या औरत के)।
कमरे में रखा फर्नीचर जोर से चरमराया, और उधर बाथरूम का दरवाजा एक या दो बार इतनी जोर से खडख़ड़ाया जैसे बाहर आँधी चल रही हो। मैंने सारी लाइटों, टी.वी. और अपने छोटे-से ट्रांजिस्टर को भी चलता छोड़ दिया था। मुझे उम्मीद थी कि ये तीनों मिलकर मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाएँगे और मेरे डर को कम करेंगे, लेकिन चार बजते-बजते मुझे पता चल गया था कि इसका कोई फायदा नहीं है, इसलिए मैंने इसकी कोशिश करनी छोड़ दी थी। मैंने वह पैड उठाया जिसे मैं पलंग की 'अपनी वाली साइड' पर रखती थी और निखिल को एक खत लिखने लगी-
'प्यारे निखिल, 
बहुत रात हो चुकी है, बल्कि सुबह-सुबह का वक्त है। तुम शायद गहरी नींद में सोए अपनी मोटरसाइकिल पर अगले रोमांचक कारनामे का सपना देख रहे होगे। मुझे नहीं मालूम कि मैं तुम्हें यह खत क्यों लिख रही हूँ या तुम्हें यह खत पढऩे को भी दूँगी या नहीं। मुझे बस ऐसा लगा कि तुम्हारे साथ मेरी बातचीत अधूरी छूट गई है।
सबसे पहले तो मैं तुम्हें शुक्रिया कहना चाहती थी, एक 'बहुत खुशनुमा सुबह' के लिए। यह अहसान का विनम्र इजहार नहीं, बल्कि उससे भी गहरा कोई जज्बा होगा। मैं इस बात को सचमुच महसूस करती हूँ कि समाज की नजरों में मुझे इस समय तुम्हारे साथ सुबह का वक्त नहीं गुजारना चाहिए था, जबकि मेरे पति शहर में नहीं हैं। वैसे भी, एक शादीशुदा औरत होने की वजह से मुझे यह भी अधिकार नहीं है कि मैं तुमसे अकेले में बातें करूँ, जैसा कि मैं करती हूँ—अपने पति की जानकारी में न लाते हुए। यह गलत है, और मैं शर्मिंदा हूँ कि मैं एक ऐसे आदमी के साथ बेवफाई कर रही हूँ जो मेरे प्रति वफादार है (इस बारे में मैं आश्वस्त हूँ)।
फिर भी, जब मैं तुमसे पहली बार मिली थी (उस अटपटी मुलाकात के समय, जब तुम्हारी माँ यह जिद कर रही थीं कि तुम मुझे 'आंटी' कहो), तभी से मेरी ख्वाहिश थी कि तुम्हारे साथ कुछ वक्त गुजारूँ और तुम्हें और अच्छी तरह से जानूँ। मुझे अपने आपको उसी पल रोक लेना चाहिए था, क्योंकि मैं ऐसी आजाद औरत नहीं हूँ कि एक सयाने मर्द के साथ दोस्ती कर सकूँ। लेकिन मैं अपने साथ सख्ती नहीं कर पाई। और मुझे मालूम था कि मुझे इन मुलाकातों को अपने पति से छिपाकर रखना पड़ेगा, नहीं तो मैंने उन्हें तुम्हारे बारे में बता दिया होता। लेकिन मैं अपने आपको अपराधी मान रही थी; इसलिए नहीं कि मैंने कोई गलत काम किया था, बल्कि इसलिए कि मैं ऐसा ही महसूस कर रही थी। 
यह तो सच है कि रंजन के साथ मेरी शादी सही अर्थों में घरवालों की मर्जी से होने वाली (अरैंज्ड) शादी नहीं थी, फिर भी जब यह शादी तय हुई, उस समय मैं इन्हें जानती भी नहीं थी। मैं इनसे बस एक रस्मी समारोह में मिली थी और मैं ईमानदारी के साथ यह स्वीकार करती हूँ कि मुझे यह अच्छे लगे थे। मैं भी उन्हें अच्छी लगी थी—बस ऐसे ही हमारी शादी हो गई। 
जब हमने साथ-साथ जिंदगी की शुरुआत की तो मैं हर बात के लिए बहुत उत्सुक थी। मेरी ख्वाहिश थी कि हम मुम्बई में एक नई शुरुआत करेंगे, शहर का चप्पा-चप्पा देखेंगे, लोगों से मिलेंगे, और घर को अच्छी तरह से चलाना सीखेंगे। मैं सच कहती हूँ कि मैं इस सबके लिए अब भी बहुत उत्सुक हूँ। पति के साथ कोई गड़बड़ी नहीं है—तुम्हारे पिता तुम्हें बताएँगे कि वह (मेरे पति) कितने अच्छे आदमी हैं, और हमारे वैवाहिक रिश्तों में भी कोई गड़बड़ी नहीं है। शायद मुझमें ही कोई खराबी है कि मैं इतनी बेचैन और उदास रहती हूँ। शायद मुम्बई की जिंदगी कलकत्ता की लड़की के हिसाब से बहुत मुश्किल है। 
तुम्हारी बात अलग है—तुम यहीं पले-बढ़े हो। यह तुम्हारा शहर है। मैं यहाँ अपने ससुराल वालों और अपने मामू के अलावा और किसी को नहीं जानती। मेरे पास कोई दोस्त नहीं है, जिससे मैं बात कर सकूं। मुझे अपने माता-पिता, अपने घर, अपने माहौल, और खासकर अपनी आजादी की कमी बहुत अखरती है।
काश, किसी ने मुझे बताया होता कि शादीशुदा होने का क्या मतलब होता है। इसका मतलब यह होता है कि आप उन तमाम चीजों को छोड़ दें, जिनके साथ एक उन्मुक्त कमसिन लड़की के नाते आपका नाता था। पर किसलिए? शायद मैं भ्रमित हूँ। शायद दूसरी औरतें इस तरह से महसूस नहीं करतीं—लेकिन मुझे इस बारे में कैसे पता चल सकता है? किससे पूछ सकती हूँ मैं? अपनी माँ से तो नहीं। तुम्हारी माँ से भी नहीं। अपनी सास से भी नहीं। तो फिर किससे?
मैं इस खत को शिकायतों से नहीं भरना चाहती। जब मैंने यह कहा कि मैंने इस खत को लिखने की शुरुआत तुम्हें शुक्रिया कहने के लिए की, तो मैंने कोई झूठ नहीं बोला। तुम्हारे इस शहर में आने के बाद पहली बार मेरा मन हुआ था कि मैं हँसूँ, गाऊँ, अपने चेहरे पर थपेड़े मारती नमकीन समुद्री हवा का आनंद लूँ। मैंने आसमान की ओर देखा और खुशी महसूस की। जब गुलमोहर का कोई फूल मेरे कदमों पर आकर गिरता तो मेरा मन होता कि उसे उठाकर चूम लूँ। जब हम चौड़ी सड़कों पर फर्राटा भर रहे थे तो मेरा जी चाहा कि मैं खुशी से चिल्ला पडूँ। सब कुछ इतना अद्भुत था-लेकिन तुम इसे कैसे जानोगे? यह तो तुम्हारी रोजमर्रा की जिंदगी है-तुम्हारे लिए इसमें कोई खास बात नहीं है। लेकिन मेरे लिए तो हर पल बेशकीमती था। यह मेरी उम्र के अनुकूल था। मैं तनावमुक्त महसूस कर रही थी। मैं आजाद महसूस कर रही थी। और फिरबाद में-मैं उदास हो गई। क्योंकि मैं जानती थी कि यह अनूठा जज्बा बस आज के लिए है। यह एक बेशकीमती तोहफा था। शायद यह अनुभव अब दोबारा मुझे कभी नहीें होगा। 
और मुझे बहुत बुरा लगा कि मैंने रंजन के साथ विश्वासघात किया है। शायद इन सब चीजों के लिए मुझे उसकी इजाजत लेनी चाहिए थी। मुझे यह सोचकर बहुत अफसोस हुआ कि मैंने यह सब उसकी पीठ पीछे किया। मुझे लगा कि मैं कोई चोर हूँ। हो सकता है, दूसरी औरतें इस बारे में इतनी गंभीरता से न सोचती हों। हो सकता है, मुम्बई की औरतों को मेरी यह प्रतिक्रिया मूर्खतापूर्ण लगे। आखिर हुआ ही क्या था! 
लेकिन यह सच नहीं था। मेरे लिए तो सब कुछ हुआ था। वह सब हुआ था जो एक पति के साथ, उस मर्द के साथ होना चाहिए जिसे आप प्यार करती हैं; और तभी मैंने अपने आपसे यह सवाल किया—क्या मैं तुम्हें प्यार करती हूँ? क्या मुझे तुमसे प्यार हो चला है, निखिल?
अगर इस सवाल का जवाब 'हाँ' है तो मुझे फौरन तुमसे मिलना बंद कर देना चाहिए। इस समय, सचमुच मुझे पता नहीं है। मैं भ्रमित हूँ और अपने आपसे ढेरों सवाल पूछने से डर रही हूँ। यह मुमकिन है कि यह प्यार हो ही नहीं, महज तुम्हें जानने की जरूरत हो। तुम या और कोई भी शख्स यह सवाल कर सकता है कि जब मेरे पास मेरा पति है तो इसकी जरूरत ही क्या रह जाती है। और तुम्हारा सवाल सौ फीसदी सही होगा। हाँ, मेरे पास पति है; जैसे तुम्हारी माँ के पास तुम्हारे पिता हैं।
शायद मुझे तुम्हारे बजाय अपने पति को बेहतर ढंग से जानना चाहिए। मैं जिस जवाब की तलाश में हूँ, हो सकता है वह जवाब यही हो। अगर मैं अपनी माँ की सलाह लेती तो वह यही कहती कि यह मेरा फर्ज है कि मैं अपने पति की हरेक इच्छा पूरी करूँ और उसके नियमों को मानूँ। निखिल, मैंने ऐसा करने की कोशिश की है, मेरा विश्वास करो, और इसमें मुझे बहुत दिक्कत हुई है। शायद मैं अपने पति को उतना खुश नहीं रखती, जितना मुझे रखना चाहिए। मुझे लगता है, मेरे साथ कोई गड़बड़ है। मुझे अपने पति को समझने की और उनका दिल जीतने की और ज्यादा कोशिश करनी चाहिए। अगर अभी तक ऐसा नहीं हुआ है तो गलती मेरी है। मैं अपने मन में कहती हूँ कि मुझे शादी के मंडप में कूद पडऩे से पहले थोड़ा इंतजार करना चाहिए था। लेकिन क्या इससे कोई फर्क पड़ता? 
सच तो यह है कि मैं कलकत्ता से निकलना चाहती थी। मैं उकता गई थी। मुझे रोमांच चाहिए था। मुम्बई ने मुझे हमेशा मोहित किया है।  जब मेरे मामू ने यह लड़का बताया तो मैं तुरंत राजी हो गई। इसलिए नहीं कि मैं पहली मुलाकात में ही रंजन के प्यार में पागल हो गई थी, बल्कि इसलिए कि मैं यहाँ आकर इस शहर का एक हिस्सा बन जाने को उत्सुक थी। 
लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि, अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। अब मैं ठगी-सी और दुखी महसूस कर रही हूँ। मेरे ज्यादातर दिन यही सोचते हुए बीतते हैं कि तुम कहाँ हो और क्या कर रहे हो। मुझे इस बात से भी जलन होती है कि तुम दूसरी लड़कियों से मिल रहे हो-अपनी उम्र की, खूबसूरत, आधुनिक, हँसमुख लड़कियों से, जो बढिय़ा कपड़े पहनती हैं, सिगरेट पीती हैं, डिस्को में नाचती हैं और रात में देर से घर जाती हैं। मैंने इस तरह की जिंदगी कभी नहीं देखी है-और न ही कभी देखूँगी।
मेरे कॉलेज के दिन बिल्कुल अलग थे। मुझे सारा समय पढऩा और घर पर रहना पड़ता था। बहुत कम मौकों पर ही मुझे अपने चचेरे भाई-बहनों के साथ बाहर जाने दिया जाता था। मैं मुम्बई में जो कुछ देख रही हूँ, वह मेरे लिए बिल्कुल नया है। यहाँ लड़के-लड़कियाँ आजादी से साथ-साथ घूमते हैं, मिलते-जुलते हैं, हँसी-मजाक करते हैं, काम करते हैं और लड़ते भी हैं। कोई परवाह नहीं करता। कोई ध्यान नहीं देता। 
मेरे पति हालाँकि अमरीका में पढ़े हैं, फिर भी वह ऐसे नहीं हैं। वह पुराने जमाने के और दकियानूसी हैं। अंदर से तो मैं भी ऐसी ही हूँ, लेकिन मुझे यह भी लगता है कि वह कुछ ज्यादा ही गंभीर और मेहनती हैं। मुझे नहीं पता कि तुम्हारे पिता भी थककर घर लौटते हैं या नहीं, लेकिन तुम्हारी माँ के पास बाहर निकलने का बहाना तो है। वह अपने पार्लर जाती हैं, पैसे कमाती हैं। मेरी तरह नहीं हैं वह। शायद मुझे कोशिश करके मुम्बई में कोई नौकरी ढूँढ लेनी चाहिए। तब मेरी उदासी कम हो जाएगी। क्या तुम सोचते हो कि मेरे मसले का यही जवाब है? क्या इससे मेरी परेशानी हल हो जाएगी?
निखिल...काश, इस समय तुम यहाँ मेरे पास होते। मुझे तुम्हारी आवाज अच्छी लगती है, मुझे तुम्हारे बोलने का ढंग अच्छा लगता है। मुझे तुम्हारा गुस्सा करना भी अच्छा लगता है। लेकिन सबसे ज्यादा तो मुझे तुम्हारी हँसी अच्छी लगती है—तुम्हें पता है? तुम्हें कभी बताया मैंने? शायद नहीं, मैं बेहद संकोची जो हूँ।
तुमने शायद अंदाजा लगा लिया होगा कि मेरा कभी कोई बॉयफ्रेंड नहीं रहा, और न ही अपने पिता, चचेरे भाइयों और अंकलों के अलावा मेरी कभी किसी मर्द से जान-पहचान हुई, मुम्बई में इसे असामान्य माना जाता और मुझे एक अजूबा। लेकिन कलकत्ता में ऐसा नहीं था—मेरे कॉलेज में पढऩे वाली दूसरी लड़कियों के साथ भी यही था। मुझे तो यहाँ आने के बाद ही पता चला कि शादी से पहले ही दो, तीन या उससे भी ज्यादा बॉयफ्रेंड रखना कितनी आम बात है। शायद मुझे भी किसी से जान-पहचान रखनी चाहिए थी—लेकिन इसका मौका ही कहाँ था?
हम जिस इलाके में रहते थे, अगर वहाँ मैं किसी लड़के के साथ देख भी ली जाती तो ऐसा बतंगड़ बनता कि मेरे माता-पिता शरम में डूब जाते। मैं उन्हें कभी दुखी नहीं कर सकती थी। तुम्हें यह बात अजीब लगेगी, क्योंकि तुम तो ऐसे आधुनिक शहर में रहते हो जहाँ जवान लड़के-लड़कियाँ इतने आजाद हैं। लेकिन तब की सोचो जब मैं कलकत्ता में अपने पुराने मकान में रहती थी। बॉयफ्रेंड? नामुमकिन।
जब रंजन से मेरी शादी हुई तो सभी लोग खुश थे-और थोड़े-थोड़े जल भी रहे थे। जानते हो क्यों? क्योंकि मैं कलकत्ता छोड़कर मुम्बई आ रही थी। लोग तुम्हारे शहर के इतने दीवाने हैं-पता नहीं तुम्हें मालूम भी है या नहीं। जब मैं बड़ी हो रही थी और मुम्बई से लौटने वाले लोग हमारे घर आते थे तो मैं उन्हें ऐसा अनूठा जीव समझती थी, जैसे वे कोई अद्भुत अनुभव लेकर आए हों। उन अंतरिक्ष-यात्रियों की तरह, जो चाँद से वापस आए थे।
मुझे याद है, जब भी मेरे मामू हमारे पास कलकत्ता आते थे तो मैं उनसे तरह-तरह के मूर्खतापूर्ण सवाल पूछती थी। और, मुझे अच्छी तरह याद है, मैं मन-ही-मन कहती थी कि मैं एक दिन इस अद्भुत शहर में रहूँगी। रंजन से शादी करना मेरे लिए मुम्बई से शादी करने जैसा था। मैंने सोचा था कि मैं अपनी बस्ती की सबसे खुशकिस्मत लड़की हूँ। सचमुच, मैं ऐसी अकेली लड़की थी, जिसे विदेश में पढ़ा, मुम्बई में रहने वाला दूल्हा मिला था।
मैं अब भी मानती हूँ कि मैं बहुत किस्मत वाली हूँ जो मिसेज मलिक बनी। रंजन कोई मामूली आदमी नहीं है (तुम्हारे पिता भी तुम्हें यही बताएँगे)। उसके पास इतनी सारी डिग्रियाँ हैं और वह इतने बढिय़ा माहौल से निकला हुआ है, फिर भी वह बहुत विनम्र है। सच पूछो तो मुझे इस बात पर बहुत आश्चर्य होता है कि उसने मुझ जैसी लड़की से शादी की, जबकि उसे मुम्बई में ही कोई बढिय़ा लड़की मिल सकती थी। लेकिन रंजन कई तरह से अपने आप में सिमटा रहने वाला और पेचीदा है (तुमसे बहुत अलग)। मुम्बई ने उसे खराब नहीं किया है। उसकी मान्यताएँ अब भी पुरानी हैं। इसके लिए मैं भगवान का शुक्रिया अदा करती हूँ। मैं किसी बहुत आधुनिक आदमी की बीवी होने की कल्पना भी नहीं कर सकती, जो मुझसे अपने दोस्तों की मौजूदगी में अपने साथ बैठकर सिगरेट और शराब पीने की उम्मीद करता।
मैं जानती हूँ, तुम क्या सोच रहे हो। यही न कि अगर रंजन इतना बेहतरीन है तो आज मैं तुम्हारे साथ बाहर क्यों गई, सही कहा मैंने? तुम्हारी जगह अगर कोई और होता तो वह भी यही सोचता। और मैं ऐसा सोचने के लिए तुम्हें दोषी नहीं ठहराऊँगी। सच यह है कि मैं भ्रमित और अपने आपसे शर्मिंदा हूँ। मैं जानती हूँकि यह गलत-बहुत गलत-है कि कोई शादीशुदा औरत किसी मर्द के साथ बाहर जाए, खासकर तब जब उसके पति को इस बारे में पता नहीं है।
मेरे पास इसका कोई सीधा-साफ जवाब नहीं है। मैं तो बस यही कह सकती हूँ कि मैं बेबस थी और मैं तुम्हारे साथ जाने को बहुत बेताब थी। मेहरबानी करके मुझे गलत मत समझना और न ही मेरे बारे में कोई गलत राय बनाना। अब तक तो तुम जान ही गए हो, मैं उस तरह की औरत नहीं हूँ। मैं हरजाई नहीं हूँ। मैं कभी घटिया नहीं रही। शायद भगवान इसकी सजा मुझे देगा। लेकिन मेरा दिल जानता है कि मैंने कुछ गलत नहीं किया है। क्या बाहर निकलकर खुली हवा में साँस लेना पाप है? इसका मेरे पास कोई जवाब नहीं है। मैंने जो कुछ किया है, अगर उसकी सजा भगवान मुझे देना चाहता है तो वह जरूर देगा।
हकीकत यह है कि यह मेरी जिंदगी का एक सबसे बेहतरीन दिन था। इसलिए, मुझे अफसोस नहीं है। मुझे कोई मलाल नहीं है। और अगर आइंदा भी तुमने मुझसे अपने साथ कहीं चलने को कहा तो शायद मैं चल दूँगी। और इस बार और भी कम अपराध-बोध के साथ। क्या मैं कुछ समझदारी की बात कर रही हूँ?
प्यार, माया।'
जब मैंने खत पूरा किया, भोर होनेवाली थी। मैंने इसे दो-तीन बार फिर पढ़ा और यह मुझे बिल्कुल ठीक लगा। न तो रूमानी ही था, और न ही रूखा। लेकिन मैं यह निश्चित नहीं कर पाई कि इसे निखिल को दूँ या नहीं। मैंने तो केवल अँधेरे के डर को दूर रखने की गरज से यह खत लिखना शुरू किया। इससे कोई फर्क नहीं पडऩा था कि निखिल इसे पढ़ता है या नहीं।
मैं कुछ बत्तियों को बन्द करने लगी। मैं नहीं चाहती इस बिल्डिंग में जल्दी उठने वालों में से कोई इन्हें जलता देखे। मुझे यकीन था कि रात में चौकीदारी करने वाले ने जरूर इन बत्तियों को जलता देखा होगा और हैरान होता रहा होगा। रंजन ने अपने वादे के मुताबिक फोन नहीं किया था। उसने एसटीडी तो बंद कर ही रखी थी, इसलिए मेरे पास भी उससे सम्पर्क करने का कोई तरीका नहीं था, सिवाय इसके कि मैं कॉल बुक कराती।
मैंने चिकने तकियों पर थककर सिर टिकाया और हल्की नींद में चली गई। बाहर से शोर पसंद करने वाले कौओं के काँव-काँव करने की आवाज आ रही थी। भोर की पहली किरण मुम्बई को एक पीली गुलाबी आभा में नहला रही थी। मुझे थोड़ी नींद लेने के लिए ये पल काफी सुरक्षित लगे।
कुछ घंटे बाद जब दरवाजे की घंटी बजी तो मैंने सोचा कि मैं सपना देख रही हूँ और स्कूल में लगी आग की सूचना देनेवाली घंटी बज रही है। मैंने पलंग के पासवाली घड़ी में देखा-दस बजे हुए काफी देर हो चुकी थी। मैं बिस्तर से कूदकर उतरी और दरवाजे की तरफ भागी। मुझे पता था कि यह आज की पहली नौकरानी होगी जो बर्तन माँजने आती है।
लेकिन दरवाजा खोलने पर पता चला कि यह निखिल है, जो कहीं जाने के लिए तैयार होकर निकला था। उसने बालों को पीछे की तरफ खींचकर बनाया हुआ था, अभी-अभी इस्त्री की हुई कमीज पहनी हुई थी और अपने पिता का ढेर सारा ऑफ्टर शेव लोशन थोपा हुआ था। मुझे कैसे पता कि यह उसके पिता का ऑफ्टर शेव है, उसका नहीं? क्योंकि उसके पिता और रंजन थोड़ा-सा आगे-पीछे ही घर से निकलते थे, और अक्सर वे हमारे दरवाजे पर टकरा जाते थे; फिर वे एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर दुआ-सलाम करने के बाद साथ-साथ नीचे चले जाते थे।
मैंने एक बार रंजन से पूछा था कि क्या उसे निखिल के पिता अच्छे लगते हैं? इस पर रंजन ने बस यह जवाब दिया था, वह मेरे सीनियर हैं। उन्हें पसन्द करना मेरी मजबूरी है।
हालाँकि रंजन सीधे निखिल के पिता के प्रति जवाबदेह नहीं था, फिर भी वह उन पर अच्छा प्रभाव जमाने की हरसंभव कोशिश करता था, क्योंकि वह उससे कम-से-कम चार ओहदे ऊपर थे। मैं इस बात को समझती थी। मेरे पिता भी अपने सीनियरों के बारे में ऐसी ही भावना रखते थे। लेकिन मेरी माँ इस रवैए को यह कहते हुए खारिज कर देती थी कि जिस आदमी को अपना काम आता हो उसे अपने सीनियरों की लल्लो-चप्पो करने की कोई जरूरत नहीं है। जब भी माँ यह बयान देती, पिताजी चिढ़ जाते और यह कहते हुए अपना विरोध दर्ज करते थे कि उनका किसी की लल्लो-चप्पो करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। लेकिन सीनियरों को वाजिब इज्जत देना उनका फर्ज बनता था और बात बस इतनी-सी थी।
चल रही हो? निखिल ने अपनी मोटरसाइकिल की चाभियाँ मेरी आँखों के आगे नचाते हुए खुशी-खुशी कहा। मैंने दृढ़ता से अपना सिर हिला दिया।
नामुमकिन। मैंने उससे नजरें चुराते हुए कहा।
क्यों? चलने का मन नहीं है? निखिल ने पूछा। उसके जूते दरवाजे पर पड़े जूट के मेट पर थाप दे रहे थे।
नहीं। मैंने कहा। मैं अब भी सूनी आँखों से नीचे ताक रही थी।
झूठी! निखिल ने ताना मारा, कह दो कि तुम बाहर जाने के लिए
मरी जा रही हो। स्वीकार करो। डर लग रहा है, क्यों? चिन्ता मत करो,
किसी को भी पता नहीं चलेगा। कसम से।
ऐसा नहीं है, मैंने गरम होते हुए सफाई दी, मैं सारी रात सोई नहीं हूँ और अब मुझे थकान हो रही है।
निखिल दरवाजे की चौखट से टिक गया। बोला, तुम सोई नहीं हो? क्यों नहीं सोईं? खराब लग रहा है? उकताहट हो रही है? सड़ाँध महसूस हो रही है? अच्छा, तब तो तुम्हें जरूर इस जगह से निकलना चाहिए। फौरन। अभी। मैं तुम्हें मूवी दिखाने ले चलूँगा—हिन्दी फिल्म। सचमुच बकवास-सी कोई फिल्म। 'कुली नंबर वन' कैसी रहेगी? मैं शर्त लगा सकता हूँ कि तुमने ऐसी बकवास फिल्म कभी नहीं देखी होगी। अब नखरे छोड़ो, माया! और मैं तुम्हें दुनिया का सबसे बढिय़ा डोसा भी खिलाऊँगा। सड़क किनारे की किसी दुकान पर। मजा आ जाएगा। जींस पहन लो।
नहीं, मैंने अड़ते हुए कहा, और मेरे पास जींस नहीं है, याद है?
मैं जीन्स नहीं पहनती।
निखिल हँस दिया। बोला, तुम्हें देखकर मुझे अपनी दादी जी याद आ जाती हैं। नहीं—वह भी नहीं। वह तो खूब चुहलबाज हैं-मुझे यकीन है कि अगर मैं उनसे कहूँतो वह जींस भी पहन लेंगी! यह कैसे हो सकता है कि इस जमाने और इस उम्र में किसी के पास जींस न हो? नामुमकिन। तुम इस तरह से क्यों व्यवहार करती हो जैसे तुम दो सौ साल बूढ़ी हो? तुम्हें परेशानी क्या है?
मैंने अपनी आवाज ऊँची कर ली-बहुत ज्यादा नहीं-थोड़ी-सी।
मुझे कोई परेशानी नहीं है। परेशानी तो तुम्हें है,  मैंने कहा, तुम सोचते हो कि हर कोई उन लोगों की तरह है जिनसे तुम्हारी जान-पहचान है। अगर किसी के पास जीन्स नहीं है तो इसमें अजीब क्या है? कलकत्ता में कम-से-कम, अगर तुम मेरे जैसे माहौल से निकले होते-लड़कियाँ साड़ी पहनती हैं, जीन्स नहीं। खासतौर से शादीशुदा लड़कियाँ। और अब, निखिल मैं तुम्हें यह सलाह दूँगी कि तुम यहाँ से चले जाओ-जहाँ कहीं भी तुम्हारी तफरीह होती है, वहाँ जाओ। जाओ और अपना डोसा खाओ, मूवी देखो। जो तुम्हारे जी में आए, वह करो। मेरे पास बहुत काम है। मेरा घर साफ नहीं है, और मैं भी साफ नहीं हूँ।
उसने बस 'अच्छा ठीक है, बाई' कहा और एकदम से मुड़कर वहाँ से चला गया।
मैंने यह उम्मीद नहीं की थी। मैं तो चाहती थी कि वह मुझ पर दबाव डालता। थोड़ा और मनाता। और क्या पता, मैं नहा-धोकर तैयार हो जाती और उसके साथ चली ही जाती। लेकिन सच यह है कि मैं उसके इस आत्मविश्वास को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थी कि वह मेरे दरवाजे पर अपनी शक्ल-भर दिखाए और मुझसे अपने साथ चलने को कहे। उसने जिस ढंग से आकर बेतकल्लुफी से मुझसे अपने साथ चलने को कहा था, उसे देखकर मुझे गुस्सा आ गया था। और फिर, मैं डरी हुई भी थी—अरे हाँ, कल तो मैं बच गई थी। लेकिन आज? मुझे पता था कि अभी थोड़ी देर में मेरी सास फोन करके मुझसे पूछेगी कि उसके बेटे के बिना मैं कैसे काम चला रही हूँ।
लेकिन उससे भी ज्यादा मुझे पड़ोसियों, नौकरों और चौकीदारों की चिन्ता थी। इस ििबल्डंग में कोई भी बात आपकी अपनी नहीं रह जाती थी, और निखिल यह समझने की हल्की-सी कोशिश भी नहीं कर रहा था। मुझे यह आश्चर्य हो रहा था कि हमारी मुलाकात के बारे में वह इतना निडर, इतना खुला भी हो सकता है। मुझे यह बात भी पीड़ा पहुँचाती थी कि वह इतने आराम से चला जाता था और मैं दरवाजे के पास खड़ी उसे जाते हुए देखती रह जाती थी और यह सोचती रह जाती थी कि पता नहीं कब उसे दोबारा देख पाऊँगी या देख भी पाऊँगी या नहीं।
उस खत के बारे में चर्चा करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई थी, और अब मुझे यह भी शक होने लगा था कि मैं उसे यह खत कभी दे भी पाऊँगी या नहीं। मैंने यह उम्मीद की थी कि इससे मेरी उलझन सुलझ जाएगी-पहले भी ऐसा ही हुआ करता था। मुझे जब कभी किसी बात को लेकर परेशानी होती थी, मैं अपनी भावनाओं को एक लम्बी चि_ी में उतार देती थी और मुझे तुरन्त ही तसल्ली हो जाती थी-मानो अपने जज्बात को लिखित में बदलने का आसान-सा काम करके मेरी सारी परेशानियाँ दूर हो जाती हों।
मेरे मन में आया कि वापस अपने बेडरूम में जाऊँ और माँ को खत लिखूँ-सच्चाई के साथ। लेकिन उसके साथ मेरा इस तरह का रिश्ता नहीं था। और इस समय किया गया मेरा कोई भी इकबाल उसे चौकन्ना कर देता और उसे घबराहट के दौरे पडऩे लगते। मैंने सामने का दरवाजा बंद कर दिया और नहाने चली गई, जो मुझे बहुत पहले कर लेना चाहिए था। मैंने बाथरूम के दरवाजे को जान-बूझकर अधखुला छोड़ दिया, क्योंकि इस बीच अगर कोई नौकरानी आ जाती तो मुझे उसके लिए दरवाजा खोलने भागना पड़ता।
मुझे शॉवर से नहाने की आदत नहीं थी और इस घर में बस शॉवर ही शॉवर थे। मुझे सिर के ऊपर लगे शॉवर से रुक-रुककर टपकते पानी की पतली धार के नीचे खड़े होकर साबुन को अपने शरीर से धीरे-धीरे नीचे बहते देखने में कभी भी सफाई का अहसास नहीं होता था। कलकत्ता के मेरे घर में स्नान एक तरह का कर्मकांड होता था-गरम और ठंडे पानी की एक बाल्टी लेकर देर तक और मजे से नहाया जाता था वहाँ। नहाने का आधा मजा तो पानी को मिलाकर उसे सही ताप में लाने में ही आ जाता था, जब सही ढंग के गुनगुने पानी के लिए हम एक बार में एक लोटा लेकर पानी को एक से दूसरी बाल्टी में डाला करते थे। मुम्बई के स्नान तो हड़बड़ी वाले और कामचलाऊ होते थे और मुझमें हमेशा यह अहसास बना रह जाता था कि मैं ठीक से साफ नहीं हो पाई हूँ और मेरी चमड़ी की तहों पर थोड़ा-बहुत साबुन अब भी लगा रह गया है।
मुम्बई के तौलिए भी अलग थे। ये पानी को कम सोखने वाले थे। मुझे नहीं पता कि इन तौलियों में ऐसा क्या था, लेकिन इनसे बदन पोंछकर मुझे तसल्ली नहीं होती थी। शायद हवा में मौजूद नमी उन्हें पूरी तरह से सूखने भी नहीं देती थी, या शायद उनमें सिंथेटिक सूत की बुनाई होती थी। मुझे तो रंजन की पसन्द के कड़े, ठोस रंगीन तौलियों के मुकाबले अपनी पुरानी, मुलायम साड़ी से अपना बदन पोंछने में ज्यादा आसानी रहती थी।
उस सुबह अपने बदन पर साबुन मलते हुए मैं यह सोचने लगी कि इस बिल्डंग के बाहर निखिल की जिन्दगी कैसी होगी। मैं उससे ढेर सारी बातें पूछना चाहती थी। क्या उसके पास गर्लफ्रेंड्स हैं? क्या उसकी बहुत सारी औरतों से जान-पहचान है? बड़ी औरतों से? वह औरतों के बीच इतना निश्चिंत कैसे दिखाई देता है? वास्तव में ही बेहद निश्चिंत। उसमें उस तरह का कोई अटपटापन नहीं दिखाई देता, जैसाकि अनजान औरतों की मौजूदगी में कमसिन, कुँआरे मर्दों में देखने को मिलता है।
निखिल हमेशा बेफिक्र दिखाई देता था। उसमें आत्मविश्वास, तनाव-मुक्ति और दिलचस्पी का कुछ ऐसा भाव था जो विनम्रता-भरी उत्सुकता तक ही सीमित नहीं था। ऐसा क्यों था? या शायद ऐसा था कि कुछ आदमी अपने माहौल के साथ तालमेल की प्रवृत्ति लेकर पैदा होते हैं—भले ही वह कितना ही खराब क्यों न हो? मैं उसकी इस खूबी से उतना ही जलती थी जितना मैं उसकी इस बात से चिढ़ती थी कि वह लगातार मेरे अन्दर 'शांति की कमी' की बात करता रहता था। मेरे लिए यह एक नया और चकरा देने वाला जुमला था, जिसकी थाह पाने में मुझे खासा समय लग गया। निखिल मुझे 'अशांत' मानता है तो क्या? मैं समझती हूँ कि उसके हिसाब से मैं दकियानूस थी।
फिर, अगर मैं 'शांत' होती तो क्या रंजन मुझसे शादी कर लेता? रंजन भी 'शांत' नहीं था। इस मामले में हम एक-दूसरे से बहुत मेल खाते थे। दुख की, बहुत दुख की बात थी यह। दो अशांत व्यक्ति एक अपवित्र वैवाहिक गठबंधन में फँस गए थे।
कभी-कभी मैं अपनी शादी की रस्मों को याद करके जोर-जोर से हँस पड़ती थी। यह हास्यास्पद-सा समारोह था, जिसमें हमारी तरफ से अलग-अलग तरह के लोगों का जमघट था तो रंजन की तरफ से भी अच्छी-खासी भीड़ थी। हम कितने दयनीय दिख रहे होंगे—शायद उतने ही दयनीय जितना कि हम खुद महसूस कर रहे थे। रंजन की माँ हमें इधर से उधर हाँके फिर रही थी। हकीकत में सारी कमान उसी के हाथ में थी। एक-एक बात में उसी का हुक्म चल रहा था। लाल रंग मुझ पर बिल्कुल भी नहीं फबता था, लेकिन बेशक दुल्हन बनने पर मुझे यही रंग पहनना पड़ा था। साड़ी का कपड़ा कड़क था और इस पर सोने के तार का जो काम हुआ था, उसने मेरी चमड़ी को काटकर रख दिया था।
जो औरत मेरे माथे पर चंदन और कुमकुम का लेप करने आई थी, उसके नाखून गंदे थे, दाँतों पर पान के दाग थे, बालों में ढेरों तेल भरा  पड़ा था और शरीर से बेहद गंदी बदबू उठ रही थी। जब तक वह छपाई के ठप्पे जैसी एक छोटी-सी, नाजुक-सी चीज से मेरे माथे पर लेप करती रही, मुझे अपनी साँस या तो रोककर रखनी पड़ी या बहुत धीरे-धीरे लेनी पड़ी।
मेरी शादी के पूरे हफ्ते मेरी माँ तो बिल्कुल पस्त रही, जबकि मेरे पिता ने इस तरह से कन्नी काट रखी थी कि यह विश्वास करना ही मुश्किल था कि उनका हममें से किसी के साथ दूर का भी रिश्ता है। केवल मेरे हँसमुख मामा-मामी ही मेरे आसपास रहकर मुझे यह अहसास कराते सोचा न था रहे थे कि मैं आज एक खास शख्सियत हूँ। उन्होंने मुझे खासकर उस मौके पर बहुत सहारा दिया जब मुझे पंडाल में पेश किया गया, ताकि सब लोग मुझे देख लें और मेरे बारे में जो कहना चाहें, कह सकें।
जब प्रदीप मामा मुझे रंजन के बगल में रखी एक नीची चौकी तक ले गए तो वह गर्व के साथ मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने धीमे से मुझसे कहा था, आज के आसमान का सूरज, चंदा और तमाम तारे तुम हो।
और तब उन्होंने मेरे बचपन के प्यार के नाम से मुझे पुकारा था, बुलबुल...मैंने तुम्हारे जैसी सुन्दर दुल्हन नहीं देखी। 
हालाँकि मैंने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया था, फिर भी मुझे यह सुनकर अच्छा-सा लगा, और मेरा आत्मविश्वास उस पल के मुकाबले कुछ ज्यादा ही हो गया था, जब मेरी माँ ने मुझे मीन-मेख निकालने वाली नजर से देखते हुए हमेशा की तरह बिना लाग-लपेट के कह दिया था, यह सारा बेकार का मेकअप और लिपस्टिक और न जाने क्या-क्या, माया पर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। यह तो बस गोरे लोगों पर अच्छा लगता है। उसका रंग तो देखो—काला! वह भी आज के दिन। सब लोग यही कहेंगे, 'रंजन के लिए ऐसी काली दुल्हन क्यों छाँटी। और वह भी इतनी दूर कलकत्ता से'।
मैंने हताश होते हुए आईने में अपना अक्स देखा तो मुझे उसकी बात सही लगी थी। सचमुच मैं अपने सबसे अच्छे रूप में नहीं थी। यही नहीं, मेरे आधे चेहरे पर पड़े जालीदार लाल कपड़े के घूँघट और मेरे सिर पर बड़े बेतुके ढंग से टिके, साल की लकड़ी के पतले-से मुकुट की वजह से मैं अपने आपको कोई अजूबा-सा भी लग रही थी। मैंने माँ से कहा भी था कि कम-से-कम इस मुकुट को तो रहने दें, लेकिन मेरी माँ ने ऐसी किसी 'गैर-रिवायती' हरकत से साफ इंकार कर दिया था और सख्ती से कहा था, मुद्दा यह है, यह शादी बंगाली तरीके से होनी है, या नहीं। अगर बंगाली तरीके से होनी है तो फिर ये सारी रस्में निभानी पड़ेंगी। यह बहुत अहम है। तहजीब है। मिसेज मलिक चाहती हैं कि हर काम सही ढंग से हो, और मैं उनकी बात से सहमत हूँ। वैसे भी, हम लड़के वालों से बहस नहीं कर सकते, ऐसा नहीं किया जाता। मुकुट नहीं हटेगा।
और इस तरह मुकुट नहीं हटा था। वह मेरे मेहनत से बनाए गए बालों के ऊपर ही टिका रहा था। और उस लंबी, थका देने वाली रस्म के दौरान मेरा पूरा ध्यान मेरे बालों में लगा दिए गए उस डावाँडोल मुकुट पर ही लगा रहा था। और उसे मेरे बालों में जिन पिनों से लगाया गया था, वे मेरी खोपड़ी में छेद किए दे रही थीं।
रंजन के सिर पर जो सेहरा रखा हुआ था, वह थोड़ा दिलचस्प तो जरूर था लेकिन मुकुट मेरे जितना अजूबा नहीं था। मेरे खयाल में वह टी.वी. पर चलने वाले किसी पौराणिक धारावाहिक का पात्र लग रहा था जिसकी रंग-बिरंगी पोशाकें और गत्ते के सेट्स देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
दरअसल, रंजन उस समय जैसा दिख रहा था, उससे वह इतना खुश था कि उसने शादी की ऐसी तीन तस्वीरें फ्रेम करवा ली थीं जिनमें वह तो बहुत अच्छा दिख रहा था, लेकिन मैं बांग्लादेश से आई कोई शरणार्थी लग रही थी—जिसे ऑर्डर देकर डाक के जरिए नर्क से मँगवाया गया हो। कभी-कभार, रंजन इन तस्वीरों की तरफ एक नजर मारता था और घुन्नेपन से कहता था, सुन्दर, क्यों? अच्छे फोटोग्राफ हैं। अच्छे फोटोग्राफ हैं।
मुझे पक्का पता था कि उसने न तो इस तरफ गौर ही किया था और न ही उसे इस बात की कोई परवाह थी कि मैं उस फ्रेम में थी या नहीं। एक बार मैंने उससे कहा भी था कि इन तस्वीरों में मैं बहुत भद्दी दिख सोचा न था रही हूँ, मेरे चेहरे पर रोशनी तक नहीं है, बल्कि भद्दी छायाएँ ही हैं। इस पर उसने एक तस्वीर उठाकर गौर से उसका मुआयना किया था। शायद तब पहली बार उसे यह अहसास हुआ था कि इस तस्वीर में ठीक उसकी बगल में और कोई भी था।
ओह, उसने कहा था, हूँ, मैं समझ गया कि रोशनी न होने से तुम्हारा क्या मतलब है। लेकिन माया, क्या यह ज्यादा अच्छा नहीं है। जरा सोचो...अगर रोशनी इससे ज्यादा होती तो तुम्हारा चेहरा दिखाई दे जाता।
उसने खुश होते हुए नजर उठाकर देखा था और मेरे चेहरे पर आए भावों को पकड़ लिया था। 
वह बोला था, मेरा मतलब है, उस दिन तुम बहुत अच्छी नहीं लग रही थीं। निश्चित तौर पर नहीं...कितना तो मेकअप कर रखा था तुमने। किसने कहा था तुम्हें वह सब लगाने को? तुम्हारी माँ ने?
मैंने चुपचाप जवाब दिया था, नहीं, तुम्हारी माँ ने।
सच? रंजन ने कहा था, मुझे तो यह सुनकर हैरानी हो रही है। बहुत ज्यादा हैरानी हो रही है। मेरी माँ तो मेकअप करने वाली लड़कियों को पसन्द ही नहीं करती। उनका खयाल है कि यह बहुत बनावटी लगता है। मुझे खुद मेकअप अच्छा नहीं लगता। हूँ। माँ से जरूर पूछूँगा मैं। शायद उन्होंने सोचा होगा कि मेकअप में तुम ज्यादा अच्छी लगोगी-तुम्हारी शक्ल-सूरत सुधर जाएगी...पता है? कुछ औरतें मेकअप करके ज्यादा गोरी-बहुत ज्यादा गोरी-दिखती हैं।
तस्वीरों को और सफाई से देखने के लिए मैं भागकर खिड़की पर पहुँची थी।
मेरे रंग में ऐसी क्या बुराई है? मुझे तो यह अच्छा लगता है। मैंने अपना बचाव करते हुए कहा था।
रंजन ने बोरियत के अंदाज में नजर उठाकर देखा था और कहा था, ठीक ही है। ज्यादा काला नहीं है। अच्छा है। लेकिन उस रोज मेरी माँ कह रही थी कि अगर तुम अपना रंग साफ करना चाहती हो तो तुम्हें हल्दी का उबटन मलना चाहिए। मेरी माँ तो रोज लगाती है। यह कीटाणुओं को भी मारता है। जब मैं छोटा था तो ताजा मलाई और हल्दी से मेरी मालिश की जाती थी। तभी तो मेरे जिस्म पर इतने बाल नहीं हैं—देख रही हो? खासकर मेरी पीठ पर। ज्यादातर लोगों की टाँगों पर बहुत बाल होते हैं—और मेरी टाँगें देख लो। इन सब चीजों से फर्क पड़ता है, माया! इसे करके देखने में हर्ज ही क्या है।
मैंने गरम होकर उससे बहस की थी कि मुझमें अपनी चमड़ी के रंग को लेकर कोई ग्रन्थि नहीं है। और, अगर उसे दूध जैसी गोरी दुल्हन चाहिए थी तो उसे इसके लिए इश्तहार देना चाहिए था। तब रंजन ने मुझे बताया था कि उसने इश्तहार दिया था। कई बार दिया था।
लेकिन उनके जवाब से हम संतुष्ट नहीं हुए। उसने सफाई दी थी।
कुछ देर के लिए तो मैं ऐसी हक्का-बक्का रह गई कि कुछ बोल ही नहीं पाई।
फिर मैंने कहा, तुमने ऐसा कर कैसे लिया?
इसमें शर्म की तो कोई बात नहीं है, रंजन ने कंधे उचकाते हुए कहा था, सब लोग इश्तहार देते हैं। इसमें बुराई भी क्या है? तुम्हें तो हर बात में दोष दिखाई देता है। तुम क्या सोचती हो कि हर रोज ये जो हजारों लोग इश्तहार देते हैं वे सब पागल हैं? अखबार इन इश्तहारों से ढेरों पैसा कमाते हैं। मेरी माँ ऐसे कई घरों को जानती है जिन्हें शादी के  इश्तहार के जरिए बहुत अच्छे जीवन-साथी मिले हैं।
मैंने सिर हिलाया और जान-बूझकर अपने चेहरे पर उदासीनता का भाव ले आई। रंजन तस्वीरों में अपने आपको देखता रहा। उसकी आँखों में सराहना और गर्व की चमक थी। फिर वह चिन्तित होता हुआ मेरी तरफ मुड़ा।
क्या शादी के बाद से मैं मोटा हो गया हूँ? उसने अपने गालों को थपथपाते हुए और कमर को नोचते हुए पूछा।
नहीं...ऐसा तो नहीं है। मैंने कहा।
सच कह रही हो? ध्यान से देखो...यहाँ...ठीक यहाँ इस जगह पर, वह अपने पेट की तरफ इशारा करते हुए बोला, चलो...शायद थोड़ा- सा बढ़ा है। कोई परेशानी नहीं है। मैं चाय कम कर दूँगा।
लेकिन तुम तो बस दो ही प्याले पीते हो। मैंने कहा।
रंजन ने दबी हँसी हँसते हुए कहा था, तुम यही सोचती हो। तुम्हें पता नहीं ऑफिस में क्या होता है। तुम्हें कुछ पता नहीं।
यह बिल्कुल सच था। रंजन के घर से निकलते ही मेरे दिमाग के कपाट बंद हो जाते थे। यह बात नहीं थी कि मैं परवाह नहीं करती थी। शुरू-शुरू में तो मैंने बकौल अपनी माँ के 'सक्रिय दिलचस्पी' लेने की कोशिश की थी। पहले-पहल तो रंजन को अच्छा-सा लगा था और फिर वह इसमें मजा लेने लगा था। लेकिन, आखिर में मैंने गौर किया कि मैं जब भी उसके काम-काज के बारे में उससे 'संबंधित' सवाल करती थी तो उसके चेहरे पर अधीरता का एक जाना-पहचाना भाव आ जाता था।
मैं उसका इशारा समझ गई और मैंने इस बारे में कुछ भी कहना छोड़ दिया था। मुझे उसकी दिनचर्या या उसके ऑफिस के माहौल के बारे में बहुत ही कम पता था। वह कहता था कि वह अपने कामकाज से संबंधित चिन्ताओं को ऑफिस में ही छोड़ आता था और उन्हें घर ले आना उसे अच्छा नहीं लगता था।
इस खेल को 'रिलैक्सेशन' कहते हैं। वह घर आने के बाद अपनी पैंट उतारकर अंडरवियर में आते हुए कहता था। वह सारा दिन ऑफिस में क्या करता था, अक्सर मैं इस बारे में सोचकर हैरान होती थी। अब मुझे पता चल गया था कि वह कई प्याले ढेरों चीनी वाली चाय पीता था।
और क्या करता था वह? एक बार मैंने उसे अपनी माँ से धीमे-धीमे फोन पर बात करते सुना था। वह यह सोच रहा था कि मैं रसोई में काम कर रही हूँ। मैं नहीं चाहती थी कि वह यह सोचे कि मैं उसकी बातें सुनने की कोशिश कर रही हूँ, इसलिए मैं बेडरूम के दरवाजे से धीरे-से सरककर वापस गैस चूल्हे के पास चली गई थी। मैंने अलमारी की सबसे नीचे वाली दराज से वह झाडऩ भी नहीं लिया, जिसे लेने मैं वहाँ गई थी। मैंने बस उसकी एक-दो उत्तेजित बातें ही सुनी थीं, जिनसे यह लग रहा था कि उसे अपने ठीक ऊपर वाले बॉस के साथ कुछ दिक्कत पेश आ रही थी। यह बॉस सिन्हा नाम का एक अत्याचारी, घुन्ना बिहारी था जो हमेशा यह कहता था-'बिहार का सिन्हा, बंगाल का नहीं।' उजड्ड तौर-तरीकों; खरखराई आवाज और ठेठ बिहारी लहजे वाला।
मुझे यह बातचीत नहीं सुननी चाहिए थी, इसलिए मैं रंजन से यह नहीं पूछ पाई कि दिक्कत क्या थी। फिर भी मैंने एक रात घुमा-फिराकर यह मुद्दा छेड़ ही दिया था।
आजकल तुम कुछ तनाव में दिख रहे हो। कोई परेशानी है क्या?
रंजन ने बीबीसी वर्ल्ड न्यूज की आवाज धीमी कर दी थी, जिसमें जॉन मेजर दूसरे जॉन पर अपनी जीत के बारे में घमंड के साथ बोल रहा था। फिर उसने खूब खुलकर मुस्कुराते हुए कहा था, मैं? और तनाव में? बिल्कुल नहीं। तुम्हारे दिमाग में यह बात आई कैसे?
मैंने दबे स्वर में एक बार फिर पूछने की कोशिश की थी, तुम्हें यकीन है कि सारी चीजें ठीक चल रही हैं—ऑफिस में और बाकी सब?
रंजन ने मुझे तीखी नजरों से देखते हुए कहा था, सारी चीजें? बाकी सब? मैं कहता हूँ, ये औरतें सीधे-सीधे बातें करना कब सीखेंगी? क्या मैं कभी तुमसे इस तरह के बेहूदा सवाल करता हूँ? तुम किन 'चीजों' की बात कर रही हो? और 'बाकी सब' से तुम्हारा क्या मतलब है?
वह सीधे तनकर बैठा हुआ था। उसकी आँखें गुस्से में उबली पड़ रही थीं। आगे पूछने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। 
उसका यह दौरा भी उसी तरह से रहस्य में लिपटा हुआ था। मुझे बिल्कुल भी इल्म नहीं था कि वह बाहर क्यों जा रहा था और कहाँ जा रहा था। हाँ, उसने कुछ शहरों के नाम जरूर लिये थे। लेकिन एसटीडी फोन तो फिर एसटीडी फोन ही होता है। यह तो कहीं से भी आ सकता है—बगल के पुणे से भी।
यह बात मुझे परेशान करती थी कि रंजन अपनी कामकाजी जिंदगी के बारे में मुझसे कभी कोई बात नहीं करना चाहता था। क्या वह सोचता था कि मैं बहुत मूर्ख हूँ और कुछ समझ नहीं पाऊँगी? या मुझे इसमें दिलचस्पी ही नहीं है? ये दोनों ही बातें गलत थीं। अपने वजूद में कोई जोश, कोई उत्साह न होने की हालत को देखते हुए, मेरी यही समझ में आया कि रंजन इस मामले में पुरानी चाल का आदमी था (जैसे वह और तमाम मामलों में भी था)।
वह मुझे अँधेरे में रखता है, इस बात का मैंने इतना बुरा कभी नहीं माना होता अगर उसने इतने जाहिरा तौर पर मुझे अपनी इन बातों से अलग न रखा होता। अगर वह अपनी माँ को राज की अपनी बातें बता सकता था तो फिर मुझे क्यों नहीं बता सकता था? मैं कोई उसकी विरोधी या दुश्मन तो नहीं थी। क्या उसको मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं था?
यह सवाल मैंने उसके सामने एक 'तनावमुक्त' इतवार को रखा था, जब वह बड़े चाव से मांटे कार्लो ग्रां प्री देख रहा था और अपने मनपसंद रेसिंग कार ड्राइवर शूमाकर का हौसला बढ़ा रहा था। टी.वी. पर आँखें गड़ाए हुए ही उसने प्यार के साथ कहा था, बेशक मैं तुम पर भरोसा करता हूँ। लेकिन मेरी माँ आखिर मेरी माँ है। तुमसे ज्यादा अरसे से मैं उसे जानता हूँ। इस तरह की बातों में वक्त लगता है। शायद शादी के दस या पन्द्रह साल बाद...अभी वह समय नहीं आया है। मुझे तुम्हें और अच्छी तरह से जानना होगा।
उसने मुड़कर मुझे देखा था और शायद मुझे उदास देखकर उसने अपना हाथ बढ़ा दिया था और मुझे अपने पास खींच लिया था।
आखिरी कुछ चक्कर रह गए हैं, उसने कहा था, मुझे लगता है कमबख्त जीत जाएगा।
हाँ, मैं भी यही उम्मीद कर रही थी कि कमबख्त जीत जाएगा, ताकि हम डिनर तो समय से कर लें!
अनुवाद-मोजेज माइकेल
('सोचा न था' उपन्यास से) 


25-May-2020

महामारियों की तबाही और साहित्य पर उसका असर
-शिवप्रसाद जोशी

वैश्विक महामारियां अपने समय और भविष्य को प्रभावित करती आई है. राजनीति और भूगोल के साथ समाज और साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा है. दुनिया जब किसी विपदा में घिरी है तो सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में भी उनका असर हुआ है.

 महामारियों के कथानक पर केंद्रित अतीत की साहित्यिक रचनाएं आज के संकटों की भी शिनाख्त करती हैं. ये हमें मनुष्य जिजीविषा की याद दिलाने के साथ साथ नैतिक मूल्यों के ह्रास और मनुष्य अहंकार, अन्याय और नश्वरता से भी आगाह करती हैं. इतिहास गवाह है कि अपने अपने समयों में चाहे कला हो या साहित्य, संगीत, सिनेमा- तमाम रचनाओं ने महामारियों की भयावहताओं को चित्रित करने के अलावा अपने समय की विसंगतियों, गड़बड़ियों और सामाजिक द्वंद्वों को भी रेखांकित किया है. ये रचनाएं सांत्वना, धैर्य और साहस का स्रोत भी बनी हैं, दुखों और सरोकारों को साझा करने वाला एक जरिया और अपने समय का मानवीय दस्तावेज.

समकालीन विश्व साहित्य में महामारी पर विशद् कृति ‘प्लेग' को माना जाता है. कहा जाता है कि अल्जीरियाई मूल के विश्वप्रसिद्ध फ्रांसीसी उपन्यासकार अल्बैर कामू अपने उपन्यास ‘प्लेग' के जरिए कामू नात्सीवाद और फाशीवाद के उभार और उनकी भयानकताओं के बारे में बता रहे थे.  इसमें दिखाया गया है कि कैसे स्वार्थों और महत्वाकांक्षाओं और विलासिताओं से भरी पूंजीवादी आग्रहों और दुष्चक्रों वाली दुनिया में किसी महामारी का हमला कितना व्यापक और जानलेवा हो सकता है, कि कैसे वो खुशफहमियों और कथित निर्भयताओं के विशाल पर्दे वाली मध्यवर्गीय अभिलाषाओं को तहसनहस करता हुआ एक अदृश्य दैत्य की तरह अंधेरों और उजालों पर अपना कब्जा जमा सकता है. 

प्लेग उपन्यास का एक अंश हैः "हर किसी को पता है कि महामारियों के पास दुनिया में लौट आने का रास्ता होता है, फिर भी न जाने क्यों हम उस चीज़ पर यक़ीन ही नहीं कर पाते हैं जो नीले आसमान से हमारे सिरों पर आ गिरती है...जब युद्ध भड़कता है, लोग कहते हैं: "ये बहुत बड़ी मूर्खता है, ज़्यादा दिन नहीं चल पाएगा.” लेकिन युद्ध कितना ही मूर्खतापूर्ण क्यों न हो, ये बात उसे चलते रहने से नहीं रोक पाती है. मूर्खता के पास अपना रास्ता बना लेने का अभ्यास होता है, जैसा कि हमें देख लेना चाहिए अगरचे हम लोग हमेशा अपने में ही इतना लिपटे हुए न रहें.”   
समाज की हृदयहीनता का प्लॉट

‘प्लेग' के जरिए कामू समाज की हृदयहीनता को भी समझना चाहते थे. वे दिखाना चाहते थे कि समाज में पारस्पारिकता की भावना से विछिन्न लोग किस हद तक असहिष्णु बन सकते हैं. लेकिन वो आखिरकार मनुष्य के जीने की आकांक्षा का संसार दिखाते हैं. इसी तरह कोलम्बियाई कथाकार गाब्रिएल गार्सीया मार्केस का मार्मिक उपन्यास ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलेरा', प्रेम और यातना के मिलेजुले संघर्ष की एक करुण दास्तान सुनाता है जहां महामारी से खत्म होते जीवन के समांतर प्रेम के लिए जीवन को बचाए रखने की जद्दोजहद एक विराट जिद की तरह तनी हुई है.

प्लेग, चेचक, इन्फ्लुएंजा, हैजा, तपेदिक आदि बीमारियों ने घर परिवार ही नहीं, शहर के शहर उजाड़े हैं और पीढ़ियों को एक गहरे भय और संत्रास में धकेला है. चेचक को दुनिया से मिटे 40 साल से ज्यादा हो चुके हैं. पिछले साल दिसंबर में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बात का जश्न भी मनाया था लेकिन 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों में ये एक भीषण महामारी के रूप में करोड़ो लोगों को अपना ग्रास बना चुकी थी. रवीन्द्रनाथ टैगोर की काव्य रचना ‘पुरातन भृत्य' (पुराना नौकर) में एक ऐसे व्यक्ति की दास्तान पिरोई गई है जो अपने मालिक की देखभाल करते हुए चेचक की चपेट में आ जाता है. 1903 में टैगोर ने अपनी तपेदिक से जूझती 12 साल की बेटी को स्वास्थ्य लाभ के लिए उत्तराखंड के नैनीताल जिले के पास रामगढ़ की हवादार पहाड़ी पर कुछ महीनों के लिए रखा था लेकिन कुछ ही महीनों में उसने दम तोड़ दिया था. चार साल बाद बेटा भी नहीं रहा. टेगौर ने रामगढ़ प्रवास के दौरान ‘शिशु' नाम से अलग अलग उपशीर्षकों वाली एक बहुत लंबी कविता ऋंखला लिखी थी, 1913 में छपी इन कविताओं के संग्रह का नाम ‘अर्धचंद्र' कर दिया गया था. टैगोर की इस रचना से एक पंक्ति देखिएः अंतहीन पृथ्वियों के समुद्रतटों पर मिल रहे हैं बच्चे. मार्गविहीन आकाश में भटकते हैं तूफान, पथविहीन जलधाराओं में टूट जाते हैं जहाज, मृत्यु है निर्बंध और खेलते हैं बच्चे. अंतहीन पृथ्वियों के समुद्रतटों पर बच्चों की चलती है एक महान बैठक. 

इसी तरह निराला ने अपनी आत्मकथा ‘कुल्लीभाट' में 1918 के दिल दहला देने वाले फ्लू से हुई मौतों का जिक्र किया है. जिसमें उनकी पत्नी, एक साल की बेटी और परिवार के कई सदस्यों और रिश्तेदारों की जानें चली गयी थीं. निराला ने लिखा था कि दाह संस्कार के लिए लकड़ियां कम पड़ जाती थीं और जहां तक नजर जाती थी गंगा के पानी में इंसानी लाशें ही लाशें दिखाई देती थीं. उस बीमारी ने हिमालय के पहाड़ों से लेकर बंगाल के मैदानों तक सबको अपनी चपेट में ले लिया था. बेटी की याद में रचित ‘सरोज स्मृति' तो हिंदी साहित्य की एक मार्मिक धरोहर है. 

टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में अविजित घोष ने प्रगतिशील लेखक आंदोलन के संस्थापकों में एक, पाकिस्तानी लेखक, कवि अहमद अली के उपन्यास ‘ट्वाइलाइट इन डेल्ही' का उल्लेख किया है. उपन्यास में बताया गया है कि महामारी के मृतकों को दफनाने के लिए कैसे कब्र खोदनेवालों की किल्लत हो जाती है और दाम आसमान छूने लगते हैं, इतने बड़े पैमाने पर वो काम हो रहा था कि दिल्ली मुर्दो का शहर बन गया था. प्रगतिशील लेखक संगठन के पुरोधाओं में एक, राजिंदर सिंह बेदी की कहानी ‘क्वारंटीन' में महामारी से ज्यादा उसके बचाव के लिए निर्धारित उपायों और पृथक किए गए क्षेत्रों के खौफ का वर्णन है. यानी एक विडंबनापूर्ण और हास्यास्पद सी स्थिति ये आती है कि महामारी से ज्यादा मौतें क्वारंटीन में दर्ज होने लगती हैं.

बीमारी और अंधविश्वास में जकड़ा समाज

फणीश्वरनाथ रेणु के प्रसिद्ध उपन्यास ‘मैला आंचल' में मलेरिया और कालाजार की विभीषिका के बीच ग्रामीण जीवन की व्यथा का उल्लेख मिलता है. प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह' में हैजे का जिक्र है. ओडिया साहित्य के जनक कहे जाने वाले फकीर मोहन सेनापति की ‘रेबती' कहानी में भी हैजे के प्रकोप का वर्णन है. जानेमाने कन्नड़ कथाकार यूआर अनंतमूर्ति की नायाब रचना ‘संस्कार' में एक प्रमुख किरदार की मौत प्लेग से होती है. ज्ञानपीठ अवार्ड से सम्मानित मलयाली साहित्य के दिग्गज तकषी शिवशंकर पिल्लै का उपन्यास, ‘थोत्तियुडे माकन' (मैला साफ करने वाले का बेटा) में दिखाया गया है कि किस तरह पूरा शहर एक संक्रामक बीमारी की चपेट में आ जाता है.
उधर विश्व साहित्य पर नजर डाले तो कामू से पहले भी लेखकों ने अपने अपने समयों में बीमारियों और संक्रामक रोगों का उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है. ब्रिटेन के मशहूर अखबार द गार्जियन ने एक सूची निकाली है. जैसे डेनियल डेफो का ‘अ जर्नल ऑफ द प्लेग इयर' (1722). मैरी शैली का लिखा ‘द लास्ट मैन' (1826), और एडगर एलन पो की 1842 में लिखी कहानी ‘द मास्क ऑफ द रेड डेथ.' 1947 में कामू का ‘प्लेग', 1969 में माइकल क्रिशटन का ‘द एंड्रोमेड स्ट्रेन,' 1978 मे स्टीफन किंग का ‘द स्टैंड' और 1994 में रिचर्ड प्रेस्टन का ‘द हॉट ज़ोन' आया. नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रसिद्ध पुर्तगाली उपन्यासकार खोसे सारामायो ने 1995 में ‘ब्लाइंडनेस' नामक उपन्यास लिखा था जिसमें अंधेपन की महामारी टूट पड़ने का वर्णन है. 2007 में जिम क्रेस ने ‘द पेस्टहाउस' लिखा जिसमें लेखक ने अमेरिका के प्लेग से संक्रमित अंधेरे भविष्य की कल्पना की है. 2013 में डैन ब्राउन का ‘इंफर्नो' और मार्ग्रेट एटवुड का ‘मैडएडम' और 2014, 2015 और 2017 में लोकप्रिय ब्रिटिश लेखिका लुइस वेल्श के ‘प्लेग टाइम्स' टाइटल के तहत तीन उपन्यास प्रकाशित हैं.

आज के कोरोना समय में जब अधिकांश लेखक बिरादरी ऑनलाइन है तो दुनिया ही नहीं भारत में भी विभिन्न भाषाओं में कवि कथाकार सोशल मीडिया के जरिए खुद को अभिव्यक्त कर रहे हैं. डायरी, निबंध, नोट, लघुकथा, व्याख्यान और कविता लिखी जा रही है, कहीं चुपचाप तो कहीं सोशल नेटवर्किग वाली मुखरता के साथ. भारत में खासकर हिंदी क्षेत्र में विभिन्न लेखक संगठन, व्यक्ति और प्रकाशन संस्थान फेसबुक लाइव जैसे उपायों के जरिए लेखकों से उनकी रचनाओं और अनुभवों को साझा कर रहे हैं. हालांकि इस काम में प्रकाशित हो जाने की हड़बड़ी और होड़ जैसी भी देखी जा रही है और अपने अपने आग्रहों और पसंदों के आरोप प्रत्यारोप लग रहे हैं और वास्तविक दुर्दशाओं से किनाराकशी के आरोप भी हैं. हिंदी कवि संजय कुंदन कहते हैं कि हो सकता है जो आज सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है वो साहित्य की कसौटी पर खरा न उतरे और गुणवत्ता में कमतर रह जाए लेकिन उन्हीं के बीच से ऐसी रचनाएं भी अवश्य आएंगी जो आगामी वक्तों के लिए संघर्ष, यातना और संशय के घटाटोप से भरे इस भयावह जटिलताओं वाले समय की सबसे प्रखर और संवेदनापूर्ण दस्तावेज कहलाने योग्य होंगी.(dw.com)

 


25-May-2020

साहित्य सिर्फ नैतिक सत्ता स्थापित कर सकता है, 
यह उससे जुड़ी संस्थाएं और संगठन नहीं समझते

-अशोक वाजपेयी

ज्यादातर साहित्यिक संस्थाएं और संगठन अपनी दृष्टि से असहमत लेखकों के बहिष्कार और अपने विचारधारियों को पुरस्कार देने में ही अपनी अधिकतर ऊर्जा खर्च कर रहे हैं

सबसे पहले तो लोकतंत्र अपने हर वयस्क नागरिक को चुनने का अधिकार देकर उसे राजनैतिक बनाता है. आप वोट दें या न दें पर आप एक राजनैतिक इकाई बन जाते हैं. हमारी एक बड़ी विडम्बना यह है कि फिर हम सभी गतिविधियों को, समूचे मानव-व्यापार बल्कि अपने तक को राजनीति का हिस्सा बनाने लगते हैं. ज्ञान, आस्था, सृजन आदि अनेक क्षेत्र में जिनमें लोकतंत्र किसी राजनैतिक हस्तक्षेप या घुसपैठ के सुनिश्चय के लिए समवर्ती संस्थाएं बनाता है और एक तरह से उन्हें स्वयं को अपनी सीमाओं में, अपनी मर्यादा में रहने के लिए अधिकृत करता है. पर लोकतंत्र में राजनीति के मुंह इतना खून लग चुका होता है कि यह लगातार इन सीमाओं और मर्यादा का उल्लंघन करती रहती है. और कम से कम आज ऐसी सभी संस्थानों का इस क़दर अवमूल्यन हो चुका है कि न्याय आदि तक की संस्थाएं अब राजनीति के अनुकूल आचरण करने से गुरेज नहीं करतीं.
साहित्य अपने आप में संस्था है यह अवधारणा काफ़ी पुरानी है. यह ऐसी संस्था है जो लेखकों-पाठकों-प्रकाशकों-शिक्षकों आदि से मिलकर बनती है. पर उसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सुनिश्चय होता चलता है. हर लेखक अपना आत्म, समय, समाज, संबंध आदि लिखने की कोशिश करता है और इसके लिए स्वतंत्र होता है कि वह अपना विषय, शिल्प, शैली, भाषा आदि अपनी दृष्टि के अनुसार चुने. साहित्य सिर्फ़ संस्था ही नहीं वह एक तरह का अनौपचारिक जनतंत्र भी होता है. वहां व्यक्ति, समाज, सचाई, समय आदि को देखने-बदलने-समझने की कई दृष्टियां मुक्त भाव से सक्रिय रहती हैं और उसमें सबके लिए जगह होती है. जगह आगे-पीछे, कम-ज़्यादा होती रहती है लेकिन जगह की कमी साहित्य में कभी नहीं होती.

इस संस्था से लोकतांत्रिक और अन्य क़िस्म की सत्ताएं एक तरह की चुनौती पाती हैं. साहित्य का आग्रह नीति पर नैतिक होता है, राजकामी नहीं. साहित्य अपनी नैतिक सत्ता तो स्थापित करता है पर राज्य नहीं. इस संस्थागत ढांचे के अन्तर्गत दृष्टियों के बीच वाद-विवाद-संवाद और द्वन्द्व होते रहते हैं. इन्हें साहित्य की अपनी राजनीति कहा जाता है. कई बार कुछ लेखक अपनी सामूहिक दृष्टि के प्रक्षेपण-पोषण आदि के लिए कोई संगठन बना लेते हैं. कुछ और लेखक उनसे असहमत होकर एक ओर संगठन स्थापित करते हैं. हिन्दी साहित्य में ऐसे कई संगठन सक्रिय हैं और उनके बीच तमाम-विवाद होते रहते हैं. ये संगठन अपना वर्चस्व क़ायम करने की भी लगातार चेष्टा करते रहते हैं. अपनी दृष्टि से असहमत लेखकों और पुस्तकों का अनौपचारिक निषेध या बहिष्कार, अकादेमिक जगहों पर अपने सदस्यों को प्राथमिकता, पत्र-पत्रिकाओं द्वारा खंडन-मंडन, पुरस्कारों आदि में जोड़-तोड़ आदि हथकंडे भी अपनाये जाते हैं. लेकिन इसके बावजूद साहित्य में कुछ सार्थक विवाद भी इस राजनीति के चलते उभरते-होते रहे हैं जिनका संबंध साहित्य के उद्देश्य, उसकी सामाजिकता आदि से रहा है.

इसका निषेधात्मक पक्ष यह है कि साहित्य की यह राजनीति साहित्य की बुनियादी बहुलता को अवमूल्यित करती है और मान्यता के लिए प्रतिबद्धता का एक मंडल बना लेती है. हिन्दी में जनधर्मी संगठनों की इस भूमिका को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता. उनमें से प्रायः हरेक ने आरम्भ में बड़ी कट्टरता का बर्ताव किया और धीरे-धीरे उनमें नरमी आती गयी. लेकिन बहिष्कार और कट्टरता की नीति ने कुछ ऐसा माहौल पैदा किया जिसमें इन संगठनों का सदस्य भर होने से आप समाजधर्मी मान लिये गये और उसके बाहर के लेखक समाज-विरोधी. अज्ञेय जैसे बड़े लेखक तक इसके शिकार हुए.

साहित्य की राजनीति का व्यापक राजनीति से क्या संबंध या संवाद रहा है यह एक टेढ़ा प्रश्न है. भारतीय राजनीति में जैसे-जैसे लोकतंत्र की आयु बढ़ती गयी वैसे-वैसे उसमें भाषा, साहित्य और कलाओं के बारे में चिन्ता और सरोकार घटते गये हैं. हिन्दी अंचल में तो यह और भी सच है. वहां ऐसा परिवेश विकसित हुआ कि सत्ता के भक्त या लालची मीडियोकरों की जमातों ने पद और पुरस्कार हथियाये और साहित्य के लिए अकादेमियों आदि का जो ढांचा था वह पूरी तरह से निष्क्रिय और अप्रासंगिक हो गया. इसमें जब-तब अपवाद होते रहते हैं पर वे कुल मिलाकर लगातार अवमूल्यन का नियम ही सिद्ध करते हैं. जहां धर्मान्ध-साम्प्रदायिक-हिंसक राजनीति सत्ता में है वहां किसी पद या पुरस्कार के लिए कोई महत्वपूर्ण लेखक या कृति उन्हें नहीं मिलती! वामधर्मी और वामविरोधी कट्टरता और असहिष्णुता दोनों ने अहित किया है. ऐसे समूहों या संगठनों के विचारधारी दरोगा स्वनियुक्त हैं जो यह फ़ैसला देते हैं कि किस लेखक के पास ‘सामाजिक यथार्थ’ या ‘भारतीयता’ आदि है या नहीं. एक तरह की वैचारिक पोलिसिंग.

दूसरी और यह भी सही है कि सच्चे लेखकों को यह कट्टरता अतिक्रमित करने में कभी संकोच नहीं हुआ है और उन्होंने अपने विरुद्ध ऐसे इस्तगासों की परवाह नहीं की है. सही यह भी है कि लोकतंत्र की बुनियादी भावना और मूल्यों के अनुरूप हमारा साहित्य पिछले पचास-साठ वर्षों में, इन विचलनों और अपवादों को छोड़कर, व्यवस्था का आलोचक साहित्य ही रहा है. जो लेखक या कृतियां वैचारिक असहिष्णुता के शिकार हुए उन्होंने अपना रास्ता या दृष्टि न तो बदली, नहीं कोई समझौता किया. उनकी उपेक्षा की गयी अगर निन्दा नहीं, पर ज़्यादातर उसमें वे अप्रभावित रहे. अलबत्ता पाठकों का एक बड़ा वर्ग बरगलाया जाकर उनसे दूर जाता रहा.

दुर्भाग्य से आलोचना ने भी इसमें जो भूमिका निभायी है वह वैचारिक प्रश्नाकुलता की नहीं, साहित्य के सत्ता-प्रतिष्ठानों के पिष्टपेसण की रही है. साहित्य-संवाद इस वजह से वैचारिक रूढ़ियों में फंसकर ऊर्जस्वित नहीं, उबाऊ होता रहा है. इसका अपवाद है पर वह हाशिये पर ढकेला जाता रहा है. यह कहना अनुपयुक्त नहीं होगा कि, कम से कम मेरे लेखे, साहित्य की राजनीति अगर न होती तो साहित्य के लिए अधिक हितकर होता. लेकिन ऐसी आदर्श स्थिति सचाई में शायद कभी नहीं आती!

इन दिनों

इन दिनों सोचने का समय तो ज़रूरत से ज़्यादा मिल रहा है पर सोचना इतना नहीं होता जितना कि हालात पर बिसूरना. पढ़ते-पढ़ते आंखें, जो वैसे ही बूढ़ी हो गयी हैं, थक जाती हैं. लिखना भी कम होता जाता है. जो हो रहा है वह इतना दारूण है कि भाषा उसका बखान तक करने में नाकाफ़ी लगती है. किसने सोचा था कि यह प्रकोप इतने क्रूर-हृदयहीन-निष्करुण समय में बदल जायेगा! उससे निपटने-जूझने के लिए, लगता है, हमारे पास अब संवेदना और सहानुभूति के अलावा कुछ नहीं बचा और उन्हें भी व्यक्त करने का अवसर नहीं है. जैसे हम एक शून्य में घिर गये हैं, जो जितना समय ने रचा है उतना अपनी भूल-ग़लती से हमने भी.

घर में जैसे ज़्यादातर वक़्त चुप्पी रहती है वैसे ही निश्शब्दता भी आती जा रही है. घबराहट होती है. अपने किये-धरे की निरर्थकता का अहसास और गहरा होता जाता है. हम एक नीच ट्रैजेडी का शिकार हैं जिसका हमें कोई पूर्वाभास कभी नहीं था. हमें अपनी सजगता का गुमान था पर बहुत कुछ हमारे जाने बिना होता रहा और हम बेख़बरी में लिप्त रहे. कुमार गंधर्व सूर का एक पद गाते थे - ‘ऊधो, करमन की गति न्यारी! मूरख मूरख राजे कीन्हे, पण्डित फिरत भिखारी’. अब तो हमारा विलाप भी अरण्यरोदन है, शब्दशः. अंधेरे में चीख. ऐसा अंधेरा जो तेज़ धूप में, तपती दोपहर में भी आत्मा में, मानो, घर कर गया है.

इन दिनों लगता है कि मोबाइल फ़ोन पर आ रही लाखों मज़दूरों ग़रीबों की घर वापसी की दिल दहलाने वाली तसवीरें ही हमारे समय की सच्ची ख़बर हैं, बाक़ी सब झूठ, मक्कार और फ़रेब. सचाई बिंबाई फटे पांवों से, तरह-तरह के जुगाड़ करती हुई, अपने पांवों में कई बार जूतों-चप्पलों के बजाय ख़ाली पानी की बोतलें चिपकाये हुए, घर-गांव लौट रही है. सत्ता भले यह न माने, लेकिन हम अपने घरबन्द अन्तःकरण से यह पहचान सकते हैं कि खून-पसीने और अभूतपूर्व यन्त्रणा से रची गयी अदम्य जीवट की यह सचाई अब हमारे समय का सबसे विचलित करने वाला केन्द्रीय सच है. यह सचाई सत्ता के द्वारा उसके होने तक को, प्रशासनिक और न्यायिक दोनों ही स्तरों पर अमान्य किये जाने के बावजूद, अब कहीं और से माने-जाने का मुंह नहीं जोहती है. यह अपने अभागेपन में अकाट्य और अदम्य है.

इस सचाई ने उस विद्रूप को, असमानता की बढ़ती विडम्बना को, यकायक हमारे सामने दारुण मानवीय ढंग से प्रत्यक्ष कर दिया है. यह हमें बाध्य करेगा कि हम अपने लोकतंत्र की गति और दिशा पर फिर से विचार करना शुरू करें. अगर यह लोकतंत्र लोक के इतने बड़े हिस्से को इस क़दर बदहाली और मुफ़लिसी पर मजबूर कर रहा है तो ज़ाहिर है कि उसका तंत्र लोकमुखी होने के बजाय उसके प्रति उदासीन और जब-तब क्रूर हो रहा है. इस तंत्र को लोकोन्मुखी बनाने के लिए उसमें कई मौलिक परिवर्तन ज़रूरी हैं. उन्हें करने की हिम्मत कहां? (satyagrah.scroll.in)