राजनीति

Previous12345Next
22-Sep-2020 2:57 PM

संदीप पौराणिक  
भोपाल, 22 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव में कांग्रेस का सारा दारोमदार नई टीम पर रहने वाला है। इस नई टीम में पिछड़े और आरक्षित वर्ग के नेताओं की भरमार है। इस तरह कांग्रेस उप-चुनाव में मतदाताओं को लुभाने ते लिए जाति का सहारा ले रही है।

राज्य में 28 विधानसभा क्षेत्रों में उप चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस इन उप-चुनाव के जरिए सत्ता में वापसी का सपना संजोए हुए है। यही कारण है कि कग्रेस कई रणनीतियों पर एक साथ काम कर रही है। राज्य के इन 28 विधानसभा क्षेत्रों में पिछड़ा वर्ग और आरक्षित वर्ग की जनसंख्या को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने इस वर्ग से जुड़े नेताओं को पहली कतार में रखना शुरू कर दिया है।

राज्य में कांग्रेस की ओर से उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ ही एकमात्र चेहरा रहने वाले हैं। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं। पिछले दिनों उन्होंने ग्वालियर का दौरा किया, जिसमें यह बात नजर भी आई। वहीं दूसरी ओर पिछड़े और आरक्षित वर्ग के जनाधार वाले नेताओं में से पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एन.पी. प्रजापति, पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा, सचिन यादव और लाखन सिंह यादव को आगे रखकर चुनावी रणनीति पर काम तेज कर दिया है।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस ने पिछड़ा और आरक्षित वर्ग की आबादी को ध्यान में रखकर ही अपनी रणनीति बनाई है और उसी के मददेनजर इन नेताओं को आगे किया जा रहा है। इनका अपने-अपने क्षेत्र में जनाधार तो है ही साथ में समाज में गहरी पैठ भी है।

राजनीतिक विश्लेषक रविंद्र व्यास का कहना है कि चुनाव में राजनीतिक दल हर दांव-पेच आजमाते हैं जिसके जरिए उन्हें जीत मिल जाए। अब कांग्रेस अगर जातिगत आधार पर नेताओं को जिम्मेदारी सौंप रही है तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए। कांग्रेस ने भले ही कुछ भी रणनीति बना ली हो मगर वास्तव में क्या यह नेता मतदाताओं को अपने तरीके से लुभाने में कामयाब हो पाएंगे, यह तो बड़ा सवाल रहेगा ही। वहीं दूसरी ओर अभी तक भाजपा ने अपने पत्ते खोले नहीं हैं इसलिए कांग्रेस की इस रणनीति पर हाल-फि लहाल ज्यादा कयास लगाना ठीक नहीं हेागा। हां, इतना जरुर कहा जा सकता है कि उप-चुनाव राज्य की सियासत में एक पटकथा जरुर लिखेंगे।


22-Sep-2020 12:29 PM

लखनऊ , 22 सितंबर (आईएएनएस)| बिहार विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को समर्थन करेगी। सपा ने इसकी जानकारी अपने अफि शियिल ट्विटर हैंडल के जरिये दी है। सपा ने अपने ट्विटर के माध्यम से लिखा कि, "आगामी बिहार विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी किसी भी पार्टी से गठबंधन ना करते हुए राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवारों का समर्थन करेगी।"

बिहार विधानसभा में चुनाव की तारीखों की घोषणा जल्द होने वाली है। इस समय वहां के सभी राजनीतिक दल अपने कील कांटे दुरूस्त करके मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। बिहार की मुख्य लड़ाई एनडीए बनाम महागठबंधन के बीच में है। विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए सपा ने यह ऐलान किया है। तेजस्वी यादव के लिए बड़ी खुशखबरी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लेकर आए हैं। 

महागठबंधन में शामिल राजद, कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर लगातार बातचीत जारी है। ऐसे में समाजवादी पार्टी का आरजेडी को समर्थन मिलना महागठबंधन के लिए एक अच्छा संकेत माना जा रहा है। हालांकि बिहार की राजनीति में समाजवादी पार्टी का प्रभाव उतना नहीं है। फि र भी समाजवादी पार्टी कुछ न कुछ फोयदा जरूर पहुंचा सकती है। 

महागठबंधन में शामिल राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर लगातार बातचीत जारी है। ऐसे में समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय जनता दल को समर्थन मिलना महागठबंधन के लिए भी एक अच्छा संकेत माना जा रहा है।

बिहार विधानसभा के लिए 243 सीटों पर चुनाव होने हैं। माना जा रहा है कि चुनाव की तिथियों का जल्द ऐलान हो जाएगा। लेकिन अन्य राज्यों की तरह बिहार में भी कोरोना वायरस के संक्रमण की स्थिति को देखते हुए चुनाव आयोग के सामने चुनाव कराना बड़ी चुनौती है।


21-Sep-2020 3:02 PM

संदीप पौराणिक
भोपाल, 21 सितम्बर (आईएएनएस)|
मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव में कांग्रेस ने अपने से अलग हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इसके लिए राहुल गांधी के करीबियों को चुनाव प्रचार के मैदान में उतारा जा सकता है।

राज्य में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव सियासी तौर पर कांग्रेस के पूर्व नेता और वर्तमान में भाजपा के सांसद ज्योतिरादित्यसिंधिया के लिए सबसे अहम माने जा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा तो कमल नाथ की सरकार गिर गई और भाजपा को फिर से सत्ता संभालने का मौका मिला।

राज्य में जिन 28 विधानसभा सीटों पर उप-चुनाव होने वाले हैं उनमें से 16 सीटें ग्वालियर-चंबल इलाके से आती हैं और इन क्षेत्रों की हार-जीत सिंधिया के राजनीतिक भविष्य से जुड़ी हुई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ग्वालियर-चंबल इलाके को सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इस इलाके में भारी बढ़त मिली थी।

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने सिंधिया को घेरने के लिए युवाओं की टीम चुनाव प्रचार में उतारने का मन बनाया है। इस टीम में राहुल गांधी के करीबियों में शामिल सचिन पायलट, आर.पी.एन सिंह, जितेंद्र सिंह सहित कई युवा नेताओं को प्रचार में आगे किया जा सकता है। कांग्रेस युवा नेताओं की जरिए सिंधिया को घेरना चाहती है और उसके लिए कभी सिंधिया के करीबी रहे साथी सबसे ज्यादा उपयोग के लायक लग रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बीते रोज प्रदेशाध्यक्ष कमल नाथ के दिल्ली दौरे के दौरान भी चुनाव प्रचार की रणनीति पर चर्चा हुई है। राज्य में कई विधानसभा क्षेत्रों में गुर्जर मतदाता है और वे चुनावी नतीजों को भी प्रभावित करते है। लिहाजा कमल नाथ चाहते हैं कि पायलट को उप-चुनाव के प्रचार में उनका उपयोग किया जाए। कमल नाथ पायलट को प्रचार के लिए राज्य में लाकर दूसरे नेताओं के प्रभाव को भी पार्टी के भीतर कम करना चाह रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मिश्रा का मानना है कि कांग्रेस में सचिन पायलट की पहचान उर्जावान और अपनी बात को बेवाक तरीके से कहने वाले नेता की तो है ही, साथ ही आमजन के बीच भी पायलट को पसंद किया जाता है। सिंधिया के जाने से कांग्रेस को नुकसान हुआ है, उप-चुनाव में सिंधिया के प्रभाव को रोकने में कांग्रेस का नए और चमकदार चेहरे का उपयोग कारगर हो सकता है। कांग्रेस अगर ऐसा करने में सफ ल होती है तो चुनाव और भी रोचक हो जाएंगे।

कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सियासत के नए समीकरण बन रहे हैं। प्रदेशाध्यक्ष कमल नाथ चाहते हैं कि राज्य के उन नेताओं को ही सक्रिय किया जाए जो उनके करीबी हैं, वही दूसरे राज्यों के उन नेताओं को राज्य में प्रचार के लिए भेजा जाए जिनकी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से नजदीकियां हैं।

कुल मिलाकर राज्य में आगामी विधानसभा के उपचुनाव में नई कांग्रेस देखने को मिल सकती है। वैसे भी उपचुनाव के लिए पार्टी हाईकमान ने चार सचिवों की पहले ही तैनाती की है और वे कमल नाथ के साथ पार्टी हाईकमान के बीच रहकर चुनावी रणनीति को जमीनी स्तर पर उतारने में लगे हैं।


21-Sep-2020 12:43 PM

भोपाल, 21 सितंबर (आईएएनएस)| मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का खुद को टेंपरेरी मुख्यमंत्री कहने वाला बयान सियासी गलियारों में चर्चा का विषय है। ये बयान सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहा है। इस बयान को लेकर कांग्रेस ने भी तंज कसा है। मुख्यमंत्री चौहान रविवार को मंदसौर जिले के सुवासरा विधानसभा क्षेत्र के सीतामऊ में थे। उन्होंने यहां विकास कार्यों का लोकार्पण किया, सुवासरा में आगामी समय में उप-चुनाव भी होने वाले हैं और भाजपा के संभावित उम्मीदवार हरदीप सिंह डंग होंगे जो अभी हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए है। डंग शिवराज सरकार में मंत्री भी हैं। 

इस मौके पर चौहान ने जनसमुदाय को संबोधित करते हुए खुद को टेंपरेरी मुख्यमंत्री बताया। उन्होंने कहा कि "अभी टेंपरेरी मुख्यमंत्री हूं, उप-चुनाव में जीत नही मिली तो टेंपरेरी मुख्यमंत्री ही रह जाऊंगा, यहां की जीत के बाद परमानेंट मुख्यमंत्री हो जाऊंगा।"

चौहान का यह बयान सोशल मीडिया पर तो वायरल हो ही रहा है, कांग्रेस ने भी हमला बोला है। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कमल नाथ के मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा का कहना है, "शिवराज सिंह चौहान ने आखिर मान ही लिया कि अभी वो अस्थायी मुख्यमंत्री हैं इसलिये अभी उनकी ओर से की गयी सारी घोषणाएं भी उनकी तरह से अस्थायी होकर झूठी, चुनावी हवा-हवाई है। यह पूरी नहीं हो सकती क्योंकि वो खुद अस्थायी हैं। उपचुनाव के बाद तो कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की स्थायी सरकार बनेगी।"


19-Sep-2020 4:00 PM

पटना, 19 सितंबर (आईएएनएस)| बिहार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शनिवार को अभिनेत्री और सांसद जया बच्चन के सदन में दिए गए बयान को लेकर तंज कसा है। बिहार भाजपा के प्रवक्ता डॉ़ निखिल आनंद ने कहा कि बॉलीवुड की थाली में छेद की चिंता करने वाले लोग देश की थाली में छेद करके बेशर्म बने घूमने वालों पर चुप्पी साध लेते हैं।

आनंद ने यहां शनिवार को कहा कि बॉलीवुड में बड़े नामवाले अपने नाम की बुनियाद पर आरोप लगने के बावजूद भी छूटना चाहते है, लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि कानून की नजर में सभी बराबर है।

उन्होंने कहा कि करण जौहर हों या कोई भी जिनपर सवाल उठेगा उन सबकी जांच होनी चाहिए। अभिनेता सुशांत सिंह राजूपत की संदेहास्पद मृत्यु के बाद सीबीआई जांच शुरू हुई, फिर एनसीबी और ईडी की जांच में भी बातें सामने आ रही है और चेहरे बेनकाब हो रहे है।

उन्होंने कहा, "अब पता चल रहा है कि ये जो ख्वाबों की दुनिया वाली बॉलीवुड है उसके जन्नत की हकीकत ही कुछ और है। बलीवुड में बाबा- बेबी, मूवी माफिया, ड्रग माफिया और अंडरवर्ल्ड सबके तार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन सभी समाज विरोधी और देश विरोधी तत्वो और उनकी गतिविधियों की जांच होनी चाहिए।"

भाजपा नेता ने आरोप लगाते हुए कहा कि महाराष्ट्र सरकार नहीं चाहती की सुशांत और उनकी पूर्व मैनेजर दिशा सालियान के मामले की हकीकत सामने आए, यही कारण है कि महाराष्ट्र सरकार मामले को दूसरा रंग देकर भटकाने में लगी हुई है।


17-Sep-2020 4:53 PM

संदीप पौराणिक 
भोपाल 17 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल की पटकथाएं लिखने का दौर जारी है। आने वाले कुछ दिनों में कई नेताओं के दल-बदल की संभावनाएं बढ़ चली हैं।

राज्य में दल-बदल की शुरुआत मार्च में हुई थी, तब 22 तत्कालीन कांग्रेस विधायकों के पाला बदलने के कारण ही कमल नाथ के नेतृत्व वाली सरकार गिरी थी और भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला। इसके बाद कांग्रेस के तीन और विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया।

राज्य में आगामी समय में होने वाले विधानसभा के उपचुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दल एक दूसरे को बड़ा झटका देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। दोनों ही दलों के नेताओं की असंतुष्टों से बातचीत चल रही है, और आगामी दिनों में दल-बदल की संभावनाओं को भी नहीं नकारा जा सकता।

राज्य सरकार के मंत्री विश्वास सारंग कहते हैं कि, "कांग्रेस के कई विधायक भाजपा में आना चाहते हैं, मगर अभी भाजपा ने उन्हें पार्टी में शामिल करने से रोक रखा है। विधायकों के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस की कहीं ऐसी स्थिति न हो जाए कि, गिनती के विधायक ही कमलनाथ के साथ रह जाएं।"

वहीं कांग्रेस के प्रवक्ता दुर्गेश शर्मा का कहना है कि, "भाजपा का सारा जोर खरीद फरोख्त पर है, और जो लोग इसमें भरोसा रखते हैं, वे ही कांग्रेस छोड़कर गए हैं। आगामी चुनाव में जनता बिकाऊ लोगों को सबक सिखाने में पीछे नहीं रहेगी।"

राजनीति की जानकारों का मानना है कि आगामी विधानसभा के उप-चुनाव काफी अहम हैं, एक तरफ कमल नाथ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, तो दूसरी ओर शिवराज सिंह चौहान व ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपना जनाधार साबित करना है। लिहाजा दोनों ही ओर से हर तरह के दाव पेंच आजमाए जा रहे हैं। यही कारण है कि दल-बदल पर दोनों दल जोर लगाने में पीछे नहीं है। इसकी भी वजह है, क्योंकि पार्टियों को लगता है कि दल-बदल से वह अपने वोटबैंक को बढ़ा सकती हैं।


17-Sep-2020 4:52 PM

नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)| कांग्रेस पार्टी के संगठन में हुए फेरबदल के बाद उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी महासचिव हरीश रावत को पंजाब का प्रभार दिया गया है। प्रभार लेने के बाद रावत ने पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से मुलाकात की। रावत ने आईएएनएस को बताया कि नवजोत सिंह सिद्धू पार्टी के लिए एक संपत्ति (असेट) हैं। रावत ने बताया कि उन्होंने अमरिंदर सिंह को पार्टी के घोषणापत्र को लागू करने पर बात की। उनसे ये भी कहा कि जो वादे पूरे नहीं किए गए हैं, वो कैसे पूरे होंगे। रावत ने बताया कि उन्होंने पंजाब में कोविड स्थिति के बारे में भी बात की और इसके चलते पैदा हुई चुनौतियों पर भी चर्चा की।

पंजाब में पार्टी के विभिन्न गुटों के बारे में पूछे गए सवाल के बारे में रावत ने बताया कि अमरिंदर सिंह पंजाब में पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। नवजोत सिंह पार्टी की एक संपत्ति (असेट) हैं जिनकी उपयोगिता पंजाब में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में है। अगर पार्टी के विभिन्न नेताओं में समन्वय बनाने की बात है तो सभी मिल कर इस बात पर चर्चा करेंगे। बता दें कि मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू एक-दूसरे के विरोधी हैं।

उन्होंने कहा कि वो राज्य का दौरा करेंगे और पार्टी के विभिन्न नेताओं से बात कर जो भी समस्या है उसे सुलझाएंगे।

मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को हटाने को लेकर पार्टी में उठ रही मांग पर रावत ने कहा कि ऐसी कोई मांग नहीं है। अगर कुछ नेताओं में मतभेद हैं तो उसे मिल-बैठकर दूर कर लिया जाएगा।

राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने को लेकर पूछे गए सवाल पर हरीश रावत ने कहा कि वो तो पहले से ही केंद्र सरकार को घेरने में सबसे आगे हैं। वो पार्टी अध्यक्ष तो नहीं हैं, लेकिन विपक्ष का मुख्य चेहरा हैं।


17-Sep-2020 3:54 PM

संदीप पौराणि
भोपाल, 17 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव से पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के ग्वालियर दौरे ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। भाजपा जहां कमलनाथ के दौरे पर तंज कस रही है, वहीं कांग्रेस जनता के बढ़ते रुझान का दावा कर रही है।

राज्य की 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है और इनमें सबसे ज्यादा 16 सीटें ग्वालियर-चंबल इलाके से आती हैं। यही कारण है कि दोनों राजनीतिक दलों -- भाजपा व कांग्रेस का सबसे ज्यादा जोर इसी इलाके पर है। यह पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र भी माना जाता है। यही कारण है कि भाजपा लगातार सक्रियता बढ़ा रही है तो दूसरी ओर कांग्रेस भी सक्रिय हो चली है।

कमल नाथ का दो दिवसीय ग्वालियर दौरा शुक्रवार से शुरू हो रहा है। कांग्रेस इसे मेगा-शो बता रही है, जिसमें कमल नाथ रोड शो करेंगे और इस अंचल की 36 सीटों के कार्यकर्ताओं और नेताओं से संवाद करेंगे। लगभग दो साल में कमल नाथ का यह पहला ग्वालियर दौरा है।

कांग्रेस प्रवक्ता अजय सिंह यादव सियासी तौर पर कमल नाथ के इस दौरे को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है, पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के बाद इस क्षेत्र की जनता की कांग्रेस और कमल नाथ से आशाएं बढ़ी है। वास्तव में इस इलाके का मतदाता और आम जनता का बड़ा वर्ग सिंधिया को नापसंद करता है, यह बात बीते कुछ दिनों में सामने भी आ गई है। सिंधिया खुद छह माह तक ग्वालियर नहीं गए और जब गए तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ। इस दौरे के दौरान सिंधिया को भारी विरोध का सामना भी करना पड़ा। इससे साबित होता है कि सिंधिया के खिलाफ जनता में कितना आक्रोश है।

वहीं, भाजपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने कमल नाथ के ग्वालियर दौरे पर कहा, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की जनता से झूठ बोला है, क्षेत्र के साथ अन्याय किया है। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के दम पर ही बनी थी और जनता ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री देखना चाहती थी। लेकिन दिग्विजय-कमलनाथ ने इस क्षेत्र के साथ छल किया और कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए। अब इस क्षेत्र की जनता पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ से यह जानना चाहती है कि उन्होंने ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के विकास के लिए क्या काम किया? क्यों इस क्षेत्र के विकास और सम्मान की पीठ में छूरा भोंका?

पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के दौरे पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कमल नाथ का यह दौरा क्षेत्र की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र सिंधिया के प्रभाव का है, कमल नाथ सत्ता में रहते ग्वालियर आए नहीं, अब आ रहे है। कांग्रेस की पहली कतार भाजपा में जा चुकी है, कमल नाथ के सामने नई कतार खड़ी करने की चुनौती है, कमल नाथ का यह दौरा आने वाले उप-चुनावों की तस्वीर पर से कुछ धुंध हटाने वाला हो सकता है।


17-Sep-2020 3:53 PM

मनोज पाठक 
पटना, 17 सितम्बर (आईएएनएस)|
निर्वाचन आयोग की एक टीम बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियों की समीक्षा कर वापस लौट गई है तथा संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही चुनाव की तिथियों की घोषणा भी कर दी जाएगी, लेकिन राज्य के दोनों गठबंधनों में अब तक सीट बंटवारे को लेकर घटक दलों में असमंजस कायम है।

घटक दलों के नेताओं में क्षेत्रों को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में अभी भी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और जनता दल (युनाइटेड) में सीट बंटवारे को लेकर तानातनी बरकरार है।

लोजपा की बुधवार को नई दिल्ली में हुई बैठक में 143 सीटों पर चुनाव लड़ने के संकेत देकर राजग की बेचैनी बढ़ा दी है। हालांकि, बिहार के सियासी हलकों को इसे केवल दबाव की राजनीति बताई जा रही है।

इधर, भाजपा और जदयू ने भी अभी सीट बंटवारे को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। बिहार भाजपा प्रदेष अध्यक्ष संजय जायसवाल कहते हैं कि भाजपा अपनी परंपरागत सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि गठबंधन को लेकर कहीं कोई असमंजस नहीं है।

उन्होंने कहा कि पिछले दिनों पार्टी के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा बिहार दौरे पर मुख्यमंत्री और जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार से मिलकर स्पष्ट कर चुके हैं कि गठबंधन में कहीं कोई समस्या नहीं है।

इधर, विपक्षी दलों के महागठबंधन में सीटों को लेकर अभी भी तानातनी बनी हुई है। महागठबंधन में शामिल छोटे दल -- विकासशील इंसान पार्टी और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (रालोसपा) 'वेट एंड वाच' की भूिमका में है।

सूत्रों के मुताबिक, सीट बंटवारे को लेकर अभी तक राजद के नेता तेजस्वी यादव ने बातचीत भी शुरू नहीं की है। घटक दलों के नेता राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह से बात कर रहे हैं।

महागठबंधन में शामिल कांग्रेस के एक नेता ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि पार्टी के हिस्से कौन सी सीटें आएगी, यह भी कांग्रेस को पता नहीं है। ऐसे में प्रत्याशी अपने पसंदीदा क्षेत्र में क्या तैयारी करेंगे। उन्होंने रोष प्रकट करते हुए कहा कि सीट बंटवारे में हुई देरी के कारण ही लोकसभा में महागठबंधन की बुरी तरीके से हार हुई थी, इस चुनाव में भी फि र से वही स्थिति बन रही है।

रालोसपा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी सीट बंटवारे में हो रही देरी पर अपनी नाराजगी जताते हुए कह चुके हैं कि सीट बंटवारा जितना जल्दी हो जाए वह अच्छा होगा। पहले ही इसमें काफी देरी हो चुकी है।

उल्लेखनीय है कि महागठबंधन में समन्वय समिति की मांग नहीं माने जाने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा पहले ही महागठबंधन को छोड़कर राजग में शामिल हो चुकी है।

बहरहाल, बिहार विधानसभा चुनाव के अक्टूबर और नवंबर महीने में होने की संभावना है। फि लहाल बनी परिस्थितियों में माना जा रहा है कि चुनाव में मुख्य मुकाबला दोनों गठबंधनों के बीच होगा, लेकिन अभी तक सीटों के बंटवारे को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से दोनों गठबंधनों के नेताओं में मायूसी है।


16-Sep-2020 1:34 PM

मनोज पाठक 
पटना, 16 सितम्बर (आईएएनएस)|
बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा अब तक नहीं हुई है, लेकिन सभी प्रमुख राजनीतिक दल उन चुनावी मुद्दों की तलाश में जुटे हैं जो उन्हें बिहार की सत्ता के करीब पहुंचाने में मदद कर सके। लेकिन सबसे बड़ी बात है कि इस चुनाव में मुद्दा क्या होगा? 

बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में आम लोग जहां क्षेत्रीय समस्याओं को अपने स्तर पर चुनावी मुद्दा बनाने में लगे हैं वहीं कई दल अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार मतदाताओं को आकर्षित करने के जुगाड़ में लगे हुए हैं। 

वैसे बिहार में जातीय समीकरण के आधार पर जोड़-तोड की राजनीति कोई नई बात नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) विकास के मुद्दे पर चुनावी मैदान में उतरा था, लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा सामने नहीं था। इस बार राजग नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनावी मैदान में उतरने की घोषणा कर चुकी है। 

वैसे इस चुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में परिस्थितियां बदली हुई हैं, जद (यू) एक बार फि र राजग में शामिल हो गई है वहीं राष्ट्रीय लेाक समता पार्टी (रालोसपा) विपक्षी दलों के महागठबंधन में कांग्रेस और राजद के साथ है। 

राजनीतिक विश्लेषक सुरेन्द्र किशोर का मानना है कि इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का जीरो भ्रष्टाचार का दावा राजग के लिए प्रमुख मुद्दा होने की संभावना है। 

उन्होंने कहा, इसके अलावे राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पुरानी समस्याओं के निपटारे को भी राजग के नेता मतदाताओं के बीच लेकर जाएंगें। इसके अलावा बिहार में राजग की सरकार में किए गए विकास कायरें और केंद्र सरकार की मिल रही मदद के जरिए भी राजग के नेता मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश करेंगे। 

इधर, राजद नेतृत्व वाले महागठबंधन के नेता कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों को मदद नहीं करने और बेरोजगारी को मुद्दा बनाने में जुटी है। 

किशोर भी मानते हैं कि विपक्ष बेरोजगारी को मुद्दा बनाकर सत्ता पक्ष को घेरने की कोशिश करेगा। 

उन्होंने कहा कि महागठबंधन कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों के पैदल आने और उचित सहायता नहीं देने को लेकर चुनाव मैदान में जरूर उतरेगा, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि राजग के नेता आक्रामक रूप से इसका जवाब भी देंगे। 

किशोर यह भी कहते हैं कि राजग के नेता एक बार फि र से बिहार में 'जंगलराज' की याद दिलाते हुए नजर आएंगें। 

वैसे माना जाता है कि राजग के नेता चुनावी समर में यह भी कहते नजर आएंगे कि बिहार में भी उसी की सरकार बननी चाहिए जिसकी सरकार केंद्र में है। इससे आपसी तालमेल के जरिए विकास करना आसान हो जाता है।

माना जाता है कि विकास के पैमाने पर नीतीश और नरेंद्र मोदी दोनों खरे उतरते हैं। दोनों के राजनीतिक करियर में यही एक समानता है कि जब भी इन्हें मौका मिला, इन्होंने अपने नेतृत्व से विकास की एक ऐसी लकीर खींची, जिसके आम लोगों के साथ-साथ विरोधी भी प्रशंसा करते रहे हैं। 

वैसे, कहा यह भी जा रहा है कि राज्य के कई क्षेत्र में स्थानीय मुद्दे भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाते नजर आएंगे।

बहरहाल, अब देखना होगा कि कौन सा मुद्दा यहां के मतदाताओं को आकर्षित करने में सफ ल होता है। 


15-Sep-2020 1:30 PM

संदीप पौराणिक  
भोपाल, 15 सितम्बर (आईएएनएस)|
मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव के जरिए पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की राज्य की सियासत में वापसी के आसार बनने लगे हैं। लंबे अरसे बाद उनकी एक बार फि र राज्य में सक्रियता बढ़ी है, साथ में भाजपा के चुनावी मंच पर भी नजर आने लगी हैं।

राज्य में अब 28 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होने हैं और भाजपा की कोशिश है कि इन उप-चुनाव में ज्यादा से ज्यादा स्थानों पर जीत दर्ज की जाए और इसके लिए वह हर रणनीति पर काम कर रही है। उसी क्रम में भाजपा ने अब पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की राज्य में सियासी हैसियत का लाभ उठाने की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है।

उमा भारती की अगुवाई में भाजपा ने वर्ष 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी और वह मुख्यमंत्री भी बनी थी मगर हुगली विवाद के चलते उन्हें अपने पद से इस्तीफो देना पड़ा था। उसके बाद उमा भारती ने अलग पार्टी बनाई और उनकी प्रदेश की सियासत से दूरी बढ़ती गई। उमा भारती की भाजपा में वापसी हुई मगर राज्य की सियासत से उनका दखल लगातार कम होता गया और उन्हें भाजपा ने उत्तर प्रदेश से विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ाया और उनमें उन्होंने जीत भी दर्ज की।

उमा भारती को भाजपा की ओर से उत्तर प्रदेश का नेता स्थापित करने की कोशिशें हुई मगर वे खुद मध्य प्रदेश की सियासत में सक्रिय रहना चाहती रही है, परंतु उन्हें यह अवसर सुलभ नहीं हो पाया। राज्य के विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा, सभी में उमा भारती की राज्य से दूरी जगजाहिर रही। अब राज्य की सियासत में नए समीकरण बनने लगे हैं और इन स्थितियों ने शिवराज सिंह चौहान की उमा भारती के बीच नजदीकियां भी बढ़ा दी हैं। इस बात के संकेत उपचुनाव के दौरान नजर आने लगे हैं। बीते एक दशक में कम ही ऐसे अवसर आए है जब चौहान और उमा भारती ने एक साथ चुनाव प्रचार के लिए मंच साझा करते नजर आए हों, मगर अब दोनों की नजदीकी बढ़ी और वे मुंगावली व मेहगांव की सभा में दोनों नेताओं ने एक दूसरे की जमकर तारीफ की।

चौहान ने उमा भारती की तारीफ करते हुए कहा कि आत्मनिर्भर भारत के साथ हमारा संकल्प है कि हम आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश बनायेंगे। राज्य की संबल योजना पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के 'पंच ज' कार्यक्रम पर आधारित है और आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश का ग्राफ भी उमा भारती तैयार करेंगी।

इसी तरह उमा भारती ने भी चौहान की सराहना की और कहा कि प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऐसा नेतृत्व चाहिए, जो आत्मविश्वास से भरा हो। केंद्र की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए एक सक्षम हाथ चाहिए। शिवराज िंसंह चौहान में ये सभी खूबियां मौजूद हैं और विकास के काम में कोई कसर बाकी नहीं रखना उनका स्वभाव है। इसलिए प्रदेश को आत्मनिर्भर और मॉडल स्टेट बनाने के लिए आप आने वाले चुनाव में शिवराज को आशीर्वाद दें।

भाजपा के सूत्रों का कहना है की राष्ट्रीय स्तर के कुछ नेताओं के निशाने पर शिवराज सिंह चौहान और उमा भारती हैं, लिहाजा दोनों नेताओं को एक दूसरे के सहयोग और सहारे की जरूरत है। पार्टी के भीतर उभर रहे नए नेतृत्व ने इन नेताओं की चिंता बढ़ा दी है और यही कारण है कि अब चौहान और उमा भारती की नजदीकियां बढ़ गई हैं। अब तक चौहान ही उमा भारती को राज्य में सक्रिय होने से रोक रहे थे। वहीं भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष बी.डी. शर्मा की उमा भारती से काफी नजदीकियां है।

राजनीतिक विश्लेषक शिवम राज पटेरिया का कहना है कि भाजपा में सिर्फ दो पुराने ही ऐसे चेहरे हैं जिनकी राज्य के हर हिस्से में स्वीकार्यता है और वो है चौहान व उमा भारती। उन्हें कोई पसंद करे, नापसंद करें मगर नजरअंदाज (ग्इग्नोर) नहीं किया जा सकता। पार्टी के भीतर जो नए विकल्प सामने आ रहे हैं उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरोत्तम मिश्रा, कैलाश विजयवर्गीय और विष्णु दत्त शर्मा जैसे नाम हैं मगर ये सभी क्षेत्रीय नेताओं के तौर में पहचाने जाते हैं।

राज्य में विधानसभा के उप-चुनाव में पिछड़ा वर्ग मतदाता नतीजों में बड़ी भूमिका निभा सकता है, लिहाजा उमा भारती पिछड़ा वर्ग का बड़ा चेहरा हैं, पार्टी इसका लाभ लेना चाहती है, यही कारण है कि उन्हें राज्य में सक्रिय किया जा रहा है। सियासी तौर पर चर्चा तो यहां तक है कि उमा भारती बड़ा मलेहरा विधानसभा क्षेत्र से उप-चुनाव भी लड़ सकती हैं, क्योंकि उमा भारती के करीबी प्रद्युम्न सिंह लोधी ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफो देकर भाजपा का दामन थामा है। प्रद्युम्न को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया जा चुका है। पार्टी का कोई भी नेता इस मसले पर बात करने को तैयार नहीं है।


15-Sep-2020 1:28 PM

मनोज पाठक 
पटना, 15 सितम्बर (आईएएनएस)|
बिहार में अक्टूबर-नवंबर में संभावित विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ गई है। इधर, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेतृत्व वाले विपक्षी दलों के महागठबंधन में अभी तक सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बनी है, लेकिन महागठबंधन के 'थिंकटैंक' गठबंधन के कुनबे को बढ़ाने में जुटे हैं।

कहा जा रहा है इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में वामपंथी दल तो महागठबंधन के घटक दलों में शामिल होंगे ही, झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) भी महागठबंधन में शामिल होकर चुनाव मैदान में उतरने वाली है, जिसके संकेत झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद दे चुके हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दो दिन पूर्व रांची में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद से मिलने के बाद कह चुके हैं कि झामुमो बिहार में राजद के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरेगी।

उल्लेखनीय है कि झारखंड में झामुमो, कांग्रेस और राजद की सरकार है। सूत्र बताते हैं कि कई छोटे दलों को बड़े दलों में मर्ज करने के लिए भी दबाव बनाया जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि राजद राज्य के सभी 243 सीटों पर घटक दलों के प्रभाव और क्षेत्रों में उम्मीदवारों की लोकप्रियता का भी आकलन कर रही है। कहा जा रहा है कि राजद इस चुनाव को प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रही है, यही कारण है कि राजद महागठबंधन में शामिल सभी घटक दलों से इच्छुक सीटों की सूची भी मांग रही है।

राजद नेतृत्व घटक दलों को स्पष्ट संकेत भी भेज चुका है कि इस चुनाव में जिताउ उम्म्ीदवारों को ही चुनाव मैदान में उतारा जाए।

राजद के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी भी कहते हैं कि महागठबंधन का आकार अभी और बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि कई दलों से अभी बात हो रही है। इधर, सूत्र कहते हैं कि राजद ऐसे दलों को ही महागठबंधन में शामिल करना चाहता है जो राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के उतराधिकारी उनके छोटे पुत्र तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री उम्मीदवार को लेकर उंगली नहीं उठा पाए।

राजद प्रवक्ता तिवारी स्पष्ट कहते हैं कि राजद महागठबंधन में सबसे बड़ा दल है। राजद पूर्व में ही घोषणा कर चुकी है कि पार्टी तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरेगी और तेजस्वी ही मुख्यमंत्री के उम्मीदवार होंगे।

उल्लेखनीय है कि पिछले विधनसभा चुनाव में महागठबंधन में शामिल कांग्रेस, राजद और जदयू बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरे थे और राजद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी।

इस चुनाव में जदयू राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल है। ऐसे में कहा जा रहा है कि राजद इस चुनाव में किसी भी हाल में पिछले चुनाव की तुलना में अधिक सीटों पर जीतने की योजना बना रही है, जिससे कोई भी तेजस्वी के नेतृत्व पर उंगली नहीं उठा सके।

सूत्रों का कहना है कि राजद नेतृत्व बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को भी महागठबंधन में लाने को लेकर प्रयासरत है।

बहरहाल, महागठबंधन का नेतृत्व भले ही अपना कुनबा बढ़ाकर खुद को और मजबूत करने में जुटी है, लेकिल कुनबा बढ़ने के बाद सभी की सहमति से सीट बंटवारा हो जाए, यह आसान नहीं होगा।
 


15-Sep-2020 1:27 PM

नई दिल्ली, 15 सितम्बर (आईएएनएस)| समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव और कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने मंगलवार को राज्यसभा में बेरोजगारी के कारण लोगों के आत्महत्या करने का मुद्दा उठाया। यादव ने मांग की कि नौकरी गंवाने वाले लोगों को प्रति माह 15,000 रुपये दिए जाएं।

यादव की मांग का समर्थन करते हुए, कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा ने कहा कि केंद्र को इस मामले को देखना चाहिए और ऐसे लोगों को वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए।

कांग्रेस लॉकडाउन के दौरान प्रवासियों की मौतों का कोई आंकड़ा नहीं होने के लिए पहले ही सरकार की आलोचना कर चुकी है।

कांग्रेस नेता पी.एल. पुनिया ने भी मनरेगा मजदूरों के मामले को उठाया और मांग की कि मजदूरी को बढ़ाकर 300 रुपये प्रतिदिन किया जाए, जबकि कांग्रेस की एक अन्य सदस्य छाया वर्मा ने मनरेगा में एक साल में काम के दिनों की संख्या बढ़ाकर 200 करने की मांग की।

कांग्रेस ने पिछले हफ्ते एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट के हवाले से सरकार पर निशाना साधा था, जिसमें अनुमान लगाया गया है कि कोरोनावायरस के प्रसार के छह महीने में देश में बेरोजगारी की दर 32.5 प्रतिशत होने की आशंका है। इसके आगे, एक रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन महीनों में युवा बेरोजगारी की दर 29.5 प्रतिशत होगी। 2019 में यह दर 23.3 प्रतिशत थी।

वहीं, सरकार ने दावा किया कि मनरेगा योजना के तहत, जून में देश भर में औसतन 3.42 करोड़ लोगों को रोजाना काम मिला, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 83.87 प्रतिशत अधिक है।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, मई में मनरेगा के तहत औसतन 2.51 करोड़ लोगों को काम मिला, जो पिछले साल की इसी अवधि के 1.45 करोड़ के औसत आंकड़े से 73 प्रतिशत अधिक है। इसलिए, इस योजना के तहत मई में रोजगार में 73.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई।


15-Sep-2020 12:18 PM

नई दिल्ली, 15 सितंबर। समाजवार्टी पार्टी की सांसद और दिग्गज अभिनेत्री जया बच्चन ने एक्टर-राजनेता रवि किशन के सोमवार को संसद में दिए बयान पर निशाना साधा। जया बच्चन ने कहा कि सोशल मीडिया पर फिल्म इंडस्ट्री को बदनाम किया जा रहा है। इससे पहले, कल गोरखपुर से बीजेपी सांसद रवि किशन ने कहा था कि ड्रग्स की लत का शिकार बॉलीवुड भी है। सुशांत सिंह राजपूत मामले की जांच में ड्रग्स का एंगल सामने आने के बाद बॉलीवुड में ड्रग्स की चर्चा तेज हो गई है।

जया बच्चन ने आज राज्यसभा में बीजेपी सांसद के बयान को लेकर कहा, कुछ लोगों की वजह से, आप पूरी इंडस्ट्री की छवि खराब नहीं कर सकते हैं। मुझे कल बहुत बुरा लगा जब लोकसभा के एक सदस्य, जो खुद इंडस्ट्री से ताल्लुक रखते हैं, ने फिल्म इंडस्ट्री के बारे में खराब बोला। जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं।

बॉलीवुड में ड्रग्स के मुद्दे की गूंज सोमवार को संसद में भी सुनाई दी। भोजपुरी सुपरस्टार और बीजेपी सांसद रवि किशन ने इस मुद्दे को सदन में उठाया। मानसून सत्र में कार्यवाही के दौरान रवि किशन ने कहा कि ड्रग्स की तस्करी और युवाओं द्वारा इसका सेवन करना हमारे देश के सामने नई चुनौती बनकर सामने आया है। युवाओं को भटकाने के लिए चीन और पाकिस्तान साजिश के तहत पंजाब और नेपाल के जरिए यह ड्रग्स पूरे देश में फैलता है।
 
सांसद रवि किशन ने कहा कि ड्रग्स की लत का शिकार बॉलीवुड भी है। एनसीबी बहुत अच्छा काम कर रहा है। मैं केंद्र सरकार से अनुरोध करुंगा कि दोषियों को जल्द से जल्द पकडक़र सख्त सजा दी जाए ताकि पड़ोसी देशों की साजिश का अंत हो सके।  (khabar.ndtv.com)


14-Sep-2020 3:36 PM

संदीप पौराणिक 
भोपाल 14 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची जारी होते ही कांग्रेस में असंतोष के स्वर मुखरित होने लगे हैं। प्रमुख नेता मंच से पार्टी के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं।

राज्य में 27 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है, इनमें से 15 सीटों के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची कांग्रेस द्वारा जारी कर दी गई है। इस सूची में दो पूर्व कांग्रेसी जो भाजपा से होते हुए वापस आए हैं, उन्हें उम्मीदवार बनाया गया है, तो वहीं तीन बसपा की पृष्ठभूमि वाले लोगों को मैदान में उतारने का फैसला हुआ है। इसी के चलते पार्टी के भीतर असंतोष पनपने लगा है।

दतिया जिले की भांडेर विधानसभा में आयोजित एक सभा में दावेदारों में से एक पूर्व गृह मंत्री महेंद्र बौद्घ ने पार्टी द्वारा फूल सिंह बरैया को उम्मीदवार बनाए जाने पर सख्त एतराज जताया। उन्होंने बरैया के भांडेर से चुनाव लड़ने पर सवाल उठाए और कहा कि वे भिंड के निवासी हैं, ग्वालियर से चुनाव लड़ चुके हैं, अन्य किसी स्थान से उन्हें लड़ाए जा सकता था क्योंकि वह राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं, मगर भांडेर से उम्मीदवार बनाया जाना न्याय उचित नहीं है। इस मंच पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी मौजूद थे।

इसी तरह के मामले कई अन्य विधानसभा क्षेत्रों से भी सामने आने लगे है, क्योंकि कई नेता दूसरे दल छोडकर कांग्रेस में शामिल हुए हैं और उन्हें इस पार्टी ने उम्मीदवार बना दिया है और आगामी समय में कई दल-बदल करने वालों को उम्म्मीदवार बनाया जा सकता है।

कांग्रेस के पनप रहे असंतोष के मसले पर प्रदेश इकाई के प्रवक्ता अजय सिंह यादव का कहना है कि कांग्रेस लोकतांत्रिक दल है, यहां सभी को अपनी बात कहने की आजादी है लिहाजा नेता अपनी बात कहते हैं। यह स्थिति भाजपा में नहीं है। कोई नेता अपनी बात कह भी नहीं सकता। कांग्रेस पार्टी सर्वेक्षण कराने के बाद उम्मीदवार तय कर रही है और आगामी उप चुनाव में यह नजर भी आएगा कि पार्टी के फैसले कितने सही थे।

राजनीतिक विष्लेशक रवींद्र व्यास का कहना है कि कांग्रेस का बड़ा हथियार भाजपा पर हमला करने का दल-बदल है, अब वह भी दल बदल करने वालों को उम्मीदवार बना रही है, ऐसे में पार्टी के भीतर जहां असंतोष पनपना लाजिमी है वहीं भाजपा को हमला करने का भी मौका मिलेगा, साथ ही कांग्रेस के दल-बदल के हमले की धार भी कमजोर होगी।


13-Sep-2020 3:52 PM

संदीप पौराणिक 

भोपाल 13 सितंबर (आईएएनएस)| मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव में कांग्रेस के वोट बैंक में बहुजन समाज पार्टी सेंधमारी कर सकती है। इस सेंधमारी को रोकने की कांग्रेस ने बड़ी रणनीति बनाते हुए कभी बसपा मे रहे कई प्रमुख नेताओं को अपना उम्मीदवार बना दिया है।

राज्य के ग्वालियर-चंबल इलाके में बसपा का वोट बैंक है। यहां कई सीटें ऐसी हैं जहां बसपा भले ही चुनाव न जीते, मगर नतीजों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बसपा ने राज्य में होने वाले 27 विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में से आठ क्षेत्रों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं यही कारण है कि कांग्रेस ने बसपा की सेंधमारी को रोकने के लिए ऐसे जनाधार वाले नेताओं को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया है, जो कभी बसपा में हुआ करते थे।

राज्य में 27 सीटों पर होने वाले विधानसभा के उपचुनाव में से 15 सीटों के लिए कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। इनमें से नौ उम्मीदवार ग्वालियर-चंबल अंचल के है, इन नौ उम्मीदवारों में से तीन विधानसभा क्षेत्र करैरा से प्रागी लाल जाटव, भांडेर से फूल सिंह बरैया और अंबाह से सत्य प्रकाश संखवार को उम्मीदवार बनाया है। यह तीनों नेता कभी बसपा में रहे हैं और उनका क्षेत्र में जनाधार भी है।

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस ने आगामी चुनाव में बसपा से होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई के लिए कभी बसपा में रहे नेताओं को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया है। इसका कांग्रेस को लाभ मिल सकता है इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह नेता क्या बतौर कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीत सकेंगे, यह बड़ा सवाल है। नतीजे आने पर ही सारी तस्वीर सामने आएगी कि कांग्रेस की रणनीति कितनी कारगर रही।

ज्ञात हो कि कांग्रेस ने उम्मीदवार चयन के लिए तीन बार सर्वे कराया है, जिस भी व्यक्ति के समर्थन में सर्वे रिपोर्ट आई है, उसे कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाने का ऐलान पहले ही किया था। उसी के मुताबिक, कांग्रेस ने अपनी पहली सूची जारी की है। इस सूची में कई नए चेहरों के नाम भी सामने आए है, वहीं बसपा छोड़कर कांग्रेस में आए नेताओं के पक्ष में भी माहौल होने की बात सामने आने पर उन्हें उम्मीदवार बनाया गया है ।

कांग्रेस की प्रदेश इकाई के सचिव श्रीधर शर्मा का कहना है कि कांग्रेस जनाधार वाले नेताओं को चुनाव मैदान में उतार रही है, उप-चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में जनता का रुख है। कमल नाथ एक बार फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे। जहां तक बसपा से आए लोगों को उम्मीदवार बनाने की बात है तो वर्तमान में जो नेता कांग्रेस में है उन्हें ही तो उम्मीदवार बनाया गया है, मीडिया उसका आंकलन किसी भी तरह से कर सकता है, मगर उनके जनाधार को नकारा नहीं जा सकता।

पूर्व मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के नजदीकी और विधानसभा चुनाव प्रचार अभियान समिति के समन्वयक रहे मनीष राजपूत का कहना है कि सिंधिया और उनके समर्थकों के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने से कांग्रेस के सामने उम्मीदवारों का संकट खड़ा हो गया। कई क्षेत्रों में तो कांग्रेस को उम्मीदवार खोजना मुश्किल हो गया, यही कारण है कि वे बसपा या भाजपा से आ रहे नेताओं को उम्मीदवार बनाने पर मजबूर है। आखिर कांग्रेस को उम्मीदवार तो मैदान में उतारना ही होगा, कई क्षेत्रों में यह महज खाना पूर्ति से आगे ज्यादा कुछ नहीं है।

बीते उप-चुनावों में बसपा ने कभी भी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारे, मगर इस बार उप-चुनाव में उम्मीदवार उतार रही है, इसे बसपा और भाजपा के आपसी तालमेल से जोड़कर देखा जा रहा है। इस कारण से कांग्रेस की मुश्किलें कुछ ज्यादा हो गई है। इससे उबरने के लिए ही कांग्रेस ने बसपा के पूर्व नेताओं को मैदान में उतारने की रणनीति पर काम किया है, इससे दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में इन नेताओं के प्रभाव को भुनाया जा सकता है।


11-Sep-2020 9:40 PM

कांग्रेस के 15 प्रत्याशी घोषित
2018 के चुनाव की तरह इस बार भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने अपने प्रबंधन से भाजपा को चौंकाया, बीजेपी ‘गद्दार’ से परेशान, कांग्रेस ने चुनावी मैदान में मारी बाजी 

-पंकज मुकाती

इंदौर, 11 सितंबर। मध्यप्रदेश में उपचुनाव की सरगर्मी तेज है। कांग्रेस लगातार बढ़त बनाती हुई दिख रही है। भाजपा को लगातार एक के बाद एक मुद्दे पर घेरने वाली कांग्रेस ने शुक्रवार को एक और बाजी मार ली। उप चुनाव वाली 27 सीटों में से 15 पर कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए। इससे नैतिक तौर पर कांग्रेस के प्रत्याशियों को बल मिलेगा। जनता के बीच भी कांग्रेस प्रत्याशी को ज्यादा मौका मिलेगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने 2018 के विधानसभा चुनाव में भी इसी तरह की रणनीति से भाजपा को परास्त कर दिया था। इस बार भी नाथ उतने ही आक्रामक दिख रहे हैं, और प्रत्याशी चयन इसकी गवाही है। सरकार बनाकर खुद को इक्कीस बताने में जुटी भाजपा अभी अपने प्रत्याशियों की जीत को लेकर संदेह में है। समीक्षा बैठकों में भी ये उभरकर सामने आया है कि भाजपा के पक्ष में उनके चुनाव प्रभारी तक नहीं है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के जिस चेहरे से भाजपा को बड़ी उम्मीद थी वो भी तमाम सभाओं में गद्दार के नारों का सामना कर रहा है। भाजपा अभी तक सिंधिया कुनबे और भाजपा के बीच तालमेल में ही लगी है। 

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने 2018 में भी चौकाने वाले परिणाम निकाले थे, इस बार भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। कांग्रेस की पहली सूची में युवा और अनुभवी दोनों का जोड़ है। सांवेर से राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी प्रेमचंद गुड्डू का मुकाबला तुलसी सिलावट से होगा। ऐसे ही आगर से विपिन वानखेड़े हैं। वानखेड़े जुझारू और युवा चेहरा है।]इलाके में पिछले चुनाव के बाद से ही सक्रिय है। बमोरी में अनुभवी नेता और पूर्व मंत्री कन्हैयालाल अग्रवाल है, उनके सामने सिंधिया समर्थक महेंद्र सिंह सिसोदिया रहेंगे। कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आये सिसोदिया से लोग बेहद नाराज है। सिसोदिया अपने करीबी लोगों में खुद स्वीकार चुके है कि चुनाव जीतना मुश्किल है। कांग्रेस के अग्रवाल पुराने नेता है और इलाके में जड़ों तक पकड़ हैं।  अधिकांश नामों को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री और कमलनाथ की सहमति के बाद ही शामिल किया गया है। 

पार्टी का प्रत्याशी चयन कमलनाथ ने खुद बेहद बारीकी से जमीनी रिपोर्ट के बाद किया है। हाटपिपल्या से राजबीर सिंह बघेल मैदान में हैं। ये राजनीतिक परिवार से हैं इनका चुनाव लडऩे और जीतने का तगड़ा अनुभव है। भाजपा में पूर्व मंत्री दीपक जोशी इस सीट पर अपनी ही पार्टी के खिलाफ खड़े दिखाई दे रहे हैं। 

कांग्रेस ने भांडेर से फूलसिंह बरैया को टिकट देकर कई निशाने साधे हैं। बरैया की इलाके में मजबूत पकड़ है, वे कई सीटों पर दलित वोट को कांग्रेस के पक्ष में करने का दम रखते हैं। इसी तरह से साँची से मदनलाल चौधरी मैदान में हैं। चौधरी का मुकाबला प्रभुराम चौधरी से होना है। इस सीट पर भी दूसरी सीट की तरह भाजपा में बगावत है। वरिष्ठ नेता गौरीशंकर शेजवार और इलाके से जुड़े विधायक उमाकांत शर्मा भी कांग्रेस से भाजपा में आये प्रभुराम चौधरी के पक्ष में नहीं है। 

भाजपा भी के पास उम्मीदवार बदलने का  विकल्प नहीं 
भारतीय जनता पार्टी को सिंधिया समर्थकों  टिकट दिन मजबूरी है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशियों को देखकर उनकी ताकत के हिसाब से भी भाजपा अपने प्रत्याशी बदलने की स्थिति में नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस के पहले टिकट घोषित कर देने से भाजपा के सामने मुश्किलें और बढ़ गई है। खुद शिवराज कई मौके पर कह चुके है कि सरकार चली जाएगी, तो कुछ नहीं बचेगा। इस वक्त भाजपा में जो बगावत है उसका भी  कांग्रेस को बड़ा लाभ मिलेगा। 

उम्मीदवारों की सूची
दिमनी- राघवेंद्र सिंह तोमर
अंबाह (सुरक्षित)- सत्यप्रकाश सिकरवार
गोहद (सुरक्षित)- मेवाराम जाटव
ग्वालियर- सुनील शर्मा
डबरा- सुरेश राजे
भांडेर- फूल सिंह बरैया
करेरा (सुरक्षित)- प्रगीलाल जाटव
बमोरी- कन्हैयालाल अग्रवाल
अशोकनगर- आशा दोहरे
अनूपपुर (सुरक्षित)- विश्वनाथ सिंह कुंजाम
सांची (सुरक्षित)- मदनलाल चौधरी
आगर (सुरक्षित)- विपिन वानखेड़े
हाटपिपल्या- राजवीर सिंह बघेल
नेपानगर  (सुरक्षित)- राम किशन पटेल
सांवेर (सुरक्षित)- प्रेमचंद गुड्डू

(POLITICSWALA.COM)


10-Sep-2020 2:32 PM

मनोज पाठक
पटना, 10 सितंबर (आईएएनएस)|
आगामी विधानसभा चुनाव में चुनावी मैदान में उतरने के लिए करीब सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारी को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। राजनीतिक दल इस चुनाव में कई ऐसे नए नारे भी गढ़े हैं, जिससे वे ना केवल मतदाताओं को आकर्षित कर सकें, बल्कि इन नारों के जरिए ही खुद को लोगों का सबसे बड़ा शुभचिंतक साबित कर सकें।

ऐसा नहीं कि कोई एक दल नारों के जरिए खुद को बेहतर साबित करने की तैयारी कर रहा है। सभी राजनीतिक दल ऐसा करने की तैयारी कर रहे हैं।

कहा तो जा रहा है कि कई दलों ने तो इसके लिए बजाप्ता एक अलग से टीम बना रखी है, जो चुनाव के समय के बढ़ने के साथ समय-समय पर नए नारे संबंधित दलों को उपलब्ध कराएंगे।

पिछले कई चुनावों से नारे और कार्यक्रम चर्चा का विषय बनते रहे हैं। राजनीतिक दलों का भी मानना है कि अच्छे और आसान चुनावी नारे और कार्यक्रम लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं, जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ संबंधित पार्टियों को मिलता है।

सूत्रों कहना है कि कोरोना काल में होने वाले इस चुनाव में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के कारण बड़ी रैलियां नहीं होनी है, ऐसे में सभी राजनीतिक दल प्रचार के लिए नारों का सहारा लेने की तैयारी में हैं।

बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल (युनाइटेड) पिछले चुनाव 'बिहार में बहार है, नीतीषे कुमार है' जैसे चर्चित नारों की तरह फि र से नए नारों के साथ चुनावी मैदान में उतरने जा रही है।

जदयू ने इस बार नये नारे 'न्याय के साथ तरक्की, नीतीश की बात पक्की' के सााथ चुनावी मैदान में उतरने जा रही है। इसके अलावे जदयू 'नीतीश के काम, नीतीश में विश्वास बिहार में विकास और विकसित बिहार' के पंच लाइन के साथ ही यह सरकार के विकास कार्यक्रमों को भुनाने में जुटी है।

भाजपा अभी तक 'भाजपा है तैयार, आत्मनिर्भर बिहार' लेकर सामने आ चुकी है। भाजपा इसी नारों के साथ चुनावी रथ मैदान में उतारने जा रही है।

सोशल मीडिया प्रदेश प्रमुख मनन कृष्ण कहते हैं कि 12 सितंबर के बाद और कई नारे सामने आएंगे, जो पार्टी की नीतियों और विकास कायरें से जुडे होंगे। जैसे-जैसे चुनाव का दौर बढ़ता जाएगा, नए नारे भी सामने आएंगें। उन्होंने कहा कि नारे से लोग सीधे तौर पर जुड़ते हैं।

इधर, राजद भी इस चुनाव में नारा गढ़ने में पीछे नहीं है। सरकार के खिलाफ कई नारों को गढ़कर राजद निशाना साध रही है। राजद इस चुनाव में 'लौटेगा बिहार का सम्मान-जब थामेंगे तेजस्वी कमान', 'शिक्षा क्षेत्र का हाल-भ्रष्ट सरकार ने किया बेहाल', 'बंद पड़े उद्योग चलाएंगे, नया बिहार बनायेंगे' जैसे नारों के साथ चुनावी मैदान में उतर चुकी है।

कांग्रेस ने इस चुनाव में सरकार के बदलने के आह्वान के साथ 'बोले बिहार- बदलें सरकार' के चुनावी नारे के साथ मैदान फ तह करने में उतर चुकी है।

अब देखना है कि नए नारों के जरिए कौन पार्टी मतदाताओं को पसंद आती है।
 


06-Sep-2020 12:09 PM

अमिता वर्मा 

लखनऊ, 6 सितम्बर (आईएएनएस)| कांग्रेस एक और 'लेटर बम' के साथ पार्टी में होने वाले धमाके के लिए तैयार है, इस बार यह उत्तर प्रदेश (यूपी) से है। 

पिछले साल पार्टी से निष्कासित नौ वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र भेजा है, जिसमें कहा गया है कि वह पार्टी को महज 'इतिहास' का हिस्सा बनकर रह जाने से बचा लें। 

प्रियंका गांधी वाड्रा, जो कि यूपी की प्रभारी व पार्टी महासचिव हैं, उन्हें परोक्ष रूप से निशाने पर लेते हुए, चार पन्नों के पत्र में सोनिया गांधी से परिवार से ऊपर उठने का आग्रह किया गया है। पत्र में लिखा गया है, 'परिवार के मोह से ऊपर उठें' और पार्टी की लोकतांत्रिक परंपराओं को पुनस्र्थापित करें । 

पूर्व सांसद संतोष सिंह, पूर्व मंत्री सत्यदेव त्रिपाठी, पूर्व विधायक विनोद चौधरी, भूधर नारायण मिश्रा, नेकचंद पांडे, स्वयं प्रकाश गोस्वामी और संजीव सिंह के दस्तखत वाले पत्र में कहा गया है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। 

पत्र में कहा गया है, "इस बात की आशंका है कि आपको राज्य मामलों के प्रभारी द्वारा मौजूदा स्थिति से अवगत नहीं कराया जा रहा है। हम लगभग एक साल से आपसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट की मांग कर रहे हैं, लेकिन मना कर दिया जाता है। हमने अपने निष्कासन के खिलाफ अपील की थी जो अवैध था लेकिन केंद्रीय अनुशासन समिति को भी हमारी अपील पर विचार करने का समय नहीं मिला।"

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने आगे दावा किया कि पार्टी के पदों पर उन लोगों का कब्जा है जो वेतन के आधार पर काम कर रहे हैं और पार्टी के प्राथमिक सदस्य भी नहीं हैं।

पत्र में कहा गया है, "ये नेता पार्टी की विचारधारा से परिचित नहीं हैं, लेकिन उन्हें यूपी में पार्टी को दिशा देने का काम सौंपा गया है।"

इसमें आगे कहा गया है कि ये लोग उन नेताओं के प्रदर्शन का आकलन कर रहे हैं जो 1977-80 के संकट के दौरान कांग्रेस के साथ चट्टान की तरह खड़े थे। लोकतांत्रिक मानदंडों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है, अपमानित किया जा रहा है और निकाला जा रहा है। वास्तव में, हमें मीडिया से हमारे निष्कासन के बारे में पता चला था, जो राज्य इकाई में नई कार्य संस्कृति की बात करता है। 

पत्र में आरोप लगाया गया है कि नेताओं और पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच संवाद की कमी है।

इन्होंने आगे कहा कि यूपी में एनएसयूआई और युवा कांग्रेस निष्क्रिय से हो गए हैं। 

नेताओं ने कांग्रेस आलाकमान से वरिष्ठ नेताओं के साथ संवाद को बढ़ावा देने का आग्रह किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर यह मौजूदा मामलों की ओर आंख मूंद लेता है, तो कांग्रेस को यूपी में तगड़ा नुकसान होगा, जो कभी पार्टी का गढ़ हुआ करता था।

यह पत्र ऐसे समय में आया है जब पार्टी उत्तर प्रदेश में पहले से ही गुटबाजी, मतभेदों का सामना कर रही है।


05-Sep-2020 4:36 PM

पटना, 5 सितंबर। बिहार इलेक्शन 2020 से पहले सूबे में दलित वोटबैंक पर सियासत तेज है। मुख्यमंत्री और जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार के दलित दांव पर विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने ओबीसी कार्ड चला है। शनिवार को उन्होंने ऐलान किया कि अगर चुनाव में उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो वे लोग करीब 4.5 लाख पदों पर फौरन बहाली करेंगे। 

तेजस्वी पत्रकारों से बोले, चूंकि, चुनाव नजदीक हैं। नीतीश कुमार ने बिहार में मारे गए एससी/एसटी लोगों के बच्चों को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया। पर ओबीसी या फिर सामान्य वर्ग के जो लोग मारे गए, उनकी संतानों को नौकरी क्यों नहीं दी जा रही? यह एससी/एसटी लोगों की हत्या को प्रोत्साहित करने जैसा है। बकौल राजद नेता, बिहार की बेरोजगारी दर लगभग 46 फीसदी है, जो भारत में सबसे अधिक है। राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में लगभग 4.5 लाख पद रिक्त हैं। अगर मौका दिया जाता है, तो हमारी सरकार सभी रिक्त पदों को भरेगी और जनसंख्या के अनुपात में नई रिक्तियों का निर्माण करेगी।  इससे पहले, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम के तहत लंबित मामलों को 20 सितंबर तक निपटाने के आदेश दिए। 

साथ ही उन्होंने अधिकारियों को असमय मृत्यु से संबंधित मामलों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी एवं एसटी) के आश्रितों को अनुकंपा आधार पर नौकरी देने के लिए नियम बनाने के भी निर्देश दिए। एक आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक, कुमार ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के सचिव प्रेम कुमार मीणा को मामलों के त्वरित निपटान के लिए संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ संपर्क में रहने का भी निर्देश दिया। 

मुख्यमंत्री ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम 1995 के अंतर्गत गठित राज्य स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति की बैठक को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। इस दौरान, वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के मंत्री रमेश ऋषिदेव, सांसदों विजय मांझी, पशुपति कुमार पारस, प्रिंस राज और आलोक कुमार सुमन के अलावा विधायकों और अन्य जन प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। (jansatta.com)
 


Previous12345Next