राजनीति

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06-Mar-2021 9:44 PM 15

नई दिल्ली, 6 मार्च : बीजेपी ने पहले दो चरणों की सीटों के लिए 57 उम्मीदवारों की सूची जारी की है. मोयना सीट से पूर्व तेज गेंदबाज अशोक डिंडा को टिकट दिया गया है. पहली सूची में नंदीग्राम से शुभेन्दु अधिकारी का नाम सबसे प्रमुख है, जो तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे. BJP की पहली सूची में कई महिला उम्मीदवारों के भी नाम हैं.

पुरुलिया से सुदीप मुखर्जी,गोसावा से चित्ता प्रमाणिक, पथप्रतिमा से आशीष हलदर, काकद्वीप से दीपांकर जना, छठना से सत्यनारायण मुखर्जी, रानीबांध (एसटी) सीट से खुदीराम टुडू, रायपुर (एसटी) से सुधांग्शू हंसदा, साल्टोरा (एससी) सीट से चंदना बाउरी, रघुनाथपुर (एससी) सीट से एडवोकेट विवेकानंदा बाउरी, मनबाजार (एसटी) गौरी सिंह सदार, बिनपुर (एसटी) से पालन सरीन, मेदिनीपुर से शमित दास, केशरी (एसटी) सोनाली मुर्मू, खड़गपुर से तपन भुइयां, गर्बेटा से मदद रुईदास, सालबोनी से राजीव कुंडू को टिकट दिया गया है.

सूची में कहा गया है कि बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति की 4 मार्च को पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की अगुवाई में बैठक हुई थी. बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और चुनाव समिति के अन्य सदस्य मौजूद थे. चुनाव समिति ने 57 नामों पर अपनी मुहर लगाई है. सोनामुखी से दिवाकर, हल्दिया से तापसी मंडल, सागर से विकास को टिकट दिया गया है. नंदकुमार से नीलांजन अधिकारी को प्रत्याशी बनाया गया है.  (ndtv.in)


05-Mar-2021 9:03 PM 12

नई दिल्ली, 5 मार्च | कांग्रेस महासचिव प्रभारी प्रियंका गांधी सात मार्च को गत वर्ष सरकार द्वारा लागू किए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ मेरठ में एक किसान पंचायत को संबोधित करने वाली हैं। यह किसानों की दुर्दशा को उजागर करने के लिए पार्टी द्वारा आयोजित बैठकों की श्रृंखला का एक हिस्सा है। उन्होंने हाल ही में मथुरा जिले में एक किसान पंचायत को संबोधित किया था, जो तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 27 जिलों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की एक श्रृंखला का हिस्सा है।

उसने पिछले महीने मथुरा में कहा था, "भगवान कृष्ण ने भगवान इंद्र के अहंकार को तोड़ दिया था और यहां के लोगों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया था। यह सरकार भी अहंकारी हो गई है और जो देश को जिंदा रखते हैं, उन किसानों के क्रोध से यह सरकार बच नहीं पाएगी।"

पार्टी राज्य में मिलों द्वारा गन्ना के भुगतान के लिए प्रदर्शन और पंचायत का आयोजन करेगी, जिसमें कांग्रेस महासचिव भाग लेंगी।

किसानों द्वारा कृषि कानूनों को वापस लेने की उनकी मांग के लिए केएमपी एक्सप्रेसवे पर आंदोलन करने का फैसला करने के एक दिन बाद यह बैठक निर्धारित की गई है, क्योंकि किसान तीन महीने से अधिक समय से दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हैं और कोई सफलता नहीं मिली है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, गन्ना किसानों को 2019-20 का बकाया नहीं मिला है। 2020-21 के विपणन वर्ष में, सामान्य किस्म के लिए एसएपी 315 रुपये प्रति क्विंटल पर अपरिवर्तित रहा है, जबकि शुरूआती किस्म और गन्ने की अस्वीकृत किस्म के लिए कीमतें क्रमश: 325 रुपये और 310 रुपये प्रति क्विंटल बनी रहेगी।

यह तीसरा सीधा वर्ष है जब राज्य सरकार ने गन्ने के मूल्य में वृद्धि नहीं करने का निर्णय लिया है। 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद एसएपी को 2017 में 10 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ा दिया गया था।

किसान नई एसएपी को 325 रुपये से बढ़ाकर 450 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग कर रहे हैं। (आईएएनएस)

 


05-Mar-2021 9:01 PM 11

नई दिल्ली, 5 मार्च : असम में विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी और सहयोगी दलों के बीच सीटों का बंटवारा हो गया है. बीजेपी के राष्‍ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह ने बताया कि केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक गुरुवार को हुई‍, जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी ,गृहमंत्री अमित शाह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के अलावा असम प्रदेश अध्‍यक्ष रंजीत दास भी मौजूद थे. बीजेपी ने शुक्रवार को 70 सीटों के लिए प्रत्‍याशियों के नाम घोषित कर दिए हैं.बैठक में सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बारे में फैसला लिया गया. सीएम सर्वानंद सोनोवाल मांजुली से चुनाव लड़ेंगे. बीजेपी ने असम में तीन चरणों में होने वाली जा रही वोटिंग के तहत पहले दो चरणों की सीटों के लिए प्रत्‍याशियों के नाम का ऐलान कर दिया है.

सीएम सोनोवाल चुनाव में माजुली सीट से प्रत्‍याशी होंगे जबकि पूर्वोत्‍तर में बीजेपी के रणनीतिकार के तौर पर पहचान रखने वाले और सोनोवाल सरकार में स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री हिमांता बिश्‍व सरमा जालुकबरी सीट से उम्‍मीदवार होंगे. हिमांता फिलहाल इसी सीट से विधायक हैं. सूत्रों के अनुसार, हिमांता बिश्‍व शर्मा चुनाव लड़ने के इच्‍छुक नहीं थे लेकिन पार्टी ने फैसला किया है कि इस बार सर्बानंद सोनोवाल को सीएम के तौर पर प्रोजेक्‍ट नहीं किया जाएगा. बीजेपी इस बार का असम विधानसभा चुनाव सोनोवाल और बिश्‍व सरमा के संयुक्‍त नेतृत्‍व में लड़ा जाएगा. 

127 सदस्‍यों वाली असम विधानसभा के लिए चुनाव के तहत पहले चरण में 27 मार्च को 47 सीटों पर वोटिंग होगी जबकि दूसरे चरण में 1 अप्रैल को 39 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. तीसरे और अंतिम चरण के अंतर्गत 6 अप्रैल 40 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. बीजेपी की ओर से घोषित उम्‍मीदवारों की सूची में 11 विधायकों के टिकट काटे गए हैं. क्षेत्रीय सहयोगी असम गण परिषद (AGP) ने पार्टी को बेरहामपुर सीट से लड़ने की इजाजत दी है, इस सीट से AGP के संस्‍थापक अध्‍यक्ष प्रफुल्‍ल कुमार महंता चुनाव लड़ते आए हैं. बीजेपी असम में AGP और यूनाइटेड पीपुल्‍स पार्टी लिबरल (UPPL) के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी. एजीपी 26 सीटों पर प्रत्‍याशी उतारेगी जबकि UPPL  आठ सीटों पर चुनाव लड़ेगी. कांग्रेस के सत्‍ता से बाहर होने के बाद यह राज्‍य में पहला चुनाव होगा. बीजेपी के सामने इस चुनाव में अपनी सत्‍ता को बरकरार रखने की चुनौती है. (ndtv.in/india-news)


05-Mar-2021 8:05 PM 12

काठमांडू, 5 मार्च| सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिद्वंद्वी गुट के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली को चेतावनी देते हुए कहा कि या तो वह रविवार तक अपना पद छोड़ दें, नहीं तो संसद में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने के लिए तैयार रहें। प्रधानमंत्री ओली द्वारा 20 दिसंबर को सदन भंग करने और चुनाव कराए जाने की घोषणा के बाद, नेपाल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी राजनीतिक रूप से दो गुटों में विभाजित हो गई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी को ओली के फैसले को पलट दिया और सरकार को उसके फैसले के 13 दिनों के भीतर सदन को बुलाने का निर्देश दिया।

ओली और प्रचंड की अगुवाई वाले दो धड़े नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के लिए दावा ठोक रहे हैं और दोनों का कहना है कि उनके पास केंद्रीय समिति के साथ-साथ संसदीय दल में भी अधिकांश सदस्य हैं।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के दो गुटों के बीच अनबन तब और भी बढ़ गई, जब दोनों पक्षों के शीर्ष नेताओं को एक-दूसरे के गुटों से निकाल दिया गया।

बाद में 24 जनवरी को प्रचंड गुट ने पार्टी के एक सामान्य सदस्य के रूप में ओली को बाहर कर दिया। प्रचंड गुट ने गुरुवार को संसद सचिवालय को पत्र लिखकर ओली को संसदीय दल के नेता के रूप में मान्यता नहीं देने का आग्रह किया।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, सरकार ने रविवार के लिए सदन का सत्र बुलाया है।

प्रचंड के नेतृत्व वाले गुट की एक संसदीय दल की बैठक में शुक्रवार को ओली के इस्तीफे की मांग करने या अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने का फैसला किया गया। प्रचंड ने बैठक के बाद इसकी जानकारी दी।

प्रचंड ने कहा, "अगर ओली ने पद से इस्तीफा नहीं दिया, तो आने वाले दिन उनके लिए मुश्किल होंगे। उन्होंने कहा कि जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने सदन को बहाल करने का फैसला किया, हमने उनके इस्तीफे की मांग की, लेकिन उन्होंने पद छोड़ने से इनकार कर दिया। आज, अधिकांश सांसदों ने संसदीय दल के नेता के रूप में मुझे चुना है।" 

उन्होंने कहा, "इसका मतलब है कि ओली पार्टी में अल्पमत में हैं। यदि वह इस्तीफा नहीं देते हैं, तो हम उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएंगे। हम ओली के व्यवहार के कारण अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए मजबूर हैं।"

लेकिन प्रचंड खेमे के पास अविश्वास प्रस्ताव के जरिए ओली को बाहर निकालने के लिए जरूरी संख्या 173 नहीं है। गुट को नेपाली कांग्रेस जैसे अन्य दलों के समर्थन की जरूरत है, जो सदन में प्राथमिक विपक्ष है।

नेपाली कांग्रेस को ओली और प्रचंड दोनों गुटों से प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्ताव मिला है, लेकिन पार्टी ने अभी तक तय नहीं किया है कि वह किसका समर्थन करेगी।

प्रचंड के नेतृत्व वाले गुट ने नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को पहले ही प्रधानमंत्री पद की पेशकश कर दी है। लेकिन देउबा इस बात पर जोर देते रहे हैं कि उनकी पार्टी किसी भी गुट का समर्थन नहीं करेगी, जब तक कि सत्ताधारी पार्टी तकनीकी रूप से विभाजित नहीं होती है और दो अलग-अलग संगठनों में विभाजित नहीं हो जाती है। (आईएएनएस)


04-Mar-2021 8:09 PM 16

काईद नाजमी 

मुंबई, 4 मार्च |
शिवसेना ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी न उतारने और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी का समर्थन करने फैसला किया है। 

शिवसेना सांसद और पार्टी के मुख्य प्रवक्ता संजय राउत ने कहा कि चूंकि पश्चिम बंगाल के चुनाव दीदी बनाम ऑल (ममता बनाम बाकी सभी) की तरह हो रहे हैं, ऐसे में शिवसेना ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है, लेकिन पार्टी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ एकजुटता से खड़ी रहेगी।

उन्होंने स्पष्ट किया कि शिवसेना अध्यक्ष और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से चर्चा के बाद यह निर्णय लिया गया है।

संजय राउत ने अपने बयान में कहा, "बहुत सारे लोगों को यह जानने की जिज्ञासा है कि क्या शिवसेना पश्चिम बंगाल में विधानसभा का चुनाव लड़ेगी या नहीं? पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के साथ बैठक में इस बारे में जो फैसला लिया गया है, वो मैं आपको बता देता हूं। इस समय पश्चिम बंगाल में जो सियासी हालात हैं, उसे देखकर लगता है कि चुनावी जंग में एक तरफ दीदी और दूसरी तरफ बाकी सब हैं।"

उन्होंने कहा, "सभी एम फैक्टर जैसे- मनी, मसल और मीडिया का इस्तेमाल ममता दीदी को हराने के लिए किया जा रहा है। इसलिए शिवसेना ने पश्चिम बंगाल चुनाव न लड़ने और ममता बनर्जी को समर्थन देने का फैसला लिया है। हमें विश्वास है कि ममता बनर्जी विधानसभा चुनाव में एक गर्जना भरी जीत हासिल करेंगी, क्योंकि दीदी रियल बंगाल टाइग्रेस (बंगाल की असली शेरनी) हैं।"

हालांकि, एमवीए के सूत्रों ने कहा कि ये कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि पश्चिम बंगाल चुनावों में मतों का विभाजन न हो और तृणमूल की संभावनाओं को भाजपा की वजह से कोई नुकसान न पहुंचे। हालांकि इससे पहले शिवसेना प्रदेश की लगभग 60 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रही थी।

संपूर्ण भारतीय राजनीति में अपनी उपस्थिति हासिल करने की रणनीति के तहत, जनवरी में शिवसेना ने पश्चिम बंगाल में चुनावी बिगुल बजाने की योजना की घोषणा की थी, जहां उसने 2016 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव लड़े थे, लेकिन वह कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी थी।

इससे पहले शिवसेना ने पश्चिम बंगाल के अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर और गोवा सहित विभिन्न राज्यों में विभिन्न चुनाव लड़े हैं। फिलहाल शिवसेना राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और कांग्रेस के साथ गठबंधन में महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ पार्टी है।

संयोग से शिवसेना के सत्तारूढ़ सहयोगी राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले ममता बनर्जी को समर्थन देने के लिए राष्ट्रीय और राज्य के विपक्षी दलों के साथ महागठबंधन बनाने की योजना के तहत कोलकाता का दौरा करेंगे।

इसी तरह, राजनीतिक स्रोत भी महाराष्ट्र में एमवीए जैसे प्रयोग की बंगाल में पुनरावृत्ति की संभावना से इनकार नहीं करते हैं। यानी यहां भी शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस जैसी अलग-अलग विचारधाराओं वाले दल हाथ मिला सकते हैं। पश्चिम बंगाल में अगर किसी को भी पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तब ऐसी स्थिति में अन्य विपरीत विचारधारा वाले दलों की अहमियत भी बढ़ जाती है।

राज्य के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "महाराष्ट्र में अकल्पनीय हुआ और यह सुचारु रूप से काम भी कर रहा है। कुछ भी संभव है। यह पश्चिम बंगाल में भी संभव है।" (आईएएनएस)


04-Mar-2021 5:26 PM 16

नई दिल्ली, 4 मार्च | पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने कमर कस ली है। गुरुवार को चुनावों के मद्देनजर भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के आवास पर महत्वपूर्ण बैठक चल रही है। बंगाल चुनाव पर बैठक करीब 4 घंटे चली, जिसके बाद बैठक में शामिल गृह मंत्री अमित शाह यहां से रवाना हो गए। असम चुनाव को लेकर उम्मीदवारों पर मंथन करने के लिए मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल जेपी नड्डा के घर पर मौजूद हैं। इस वक्त नड्डा के आवास पर अब तक असम के चुनाव पर चर्चा के लिए मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, असम प्रभारी बैजयन्त पांडा और सह प्रभारी पवन शर्मा के साथ साथ बीजेपी पार्टी के आला नेता मौजूद हैं।

बीजेपी केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक से पहले जेपी नड्डा के आवास पर हो रही बैठक में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार कर ली जाएगी।

असम में 27 मार्च से छह अप्रैल के बीच तीन चरणों में मतदान संपन्न होगा, पहले चरण के तहत राज्य की 47 विधानसभा सीटों पर 27 मार्च को, दूसरे चरण के तहत 39 विधानसभा सीटों पर एक अप्रैल और तीसरे व अंतिम चरण के तहत 40 विधानसभा सीटों पर छह अप्रैल को मतदान संपन्न होगा। 

गुरुवार शाम बीजेपी मुख्यालय में भाजपा केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक होगी, जिसमें प्रधानमंत्री भी शामिल हो सकते हैं। (आईएएनएस)


04-Mar-2021 1:14 PM 17

मनोज पाठक

पटना, 4 मार्च|
बिहार की राजनीति में अपनी खास पहचान बना चुके लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के संस्थापक रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके पुत्र और जमुई के सांसद चिराग पासवान सियासत में तन्हा नजर आने लगे हैं। पिछले साल हुए बिहार विधानसभा में लोजपा के साथ गलबहियां करने वाले उनके अपने तो उनका साथ छोड़ ही रहे हैं, जो फिलहाल साथ हैं उनके भी बिछड़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। 

बिहार विधान परिषद में लोजपा की एकमात्र प्रतिनिधित्व करने वाली नूतन सिंह ने अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का कमल थाम लिया है।

पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में चिराग खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 'हनुमान' बताकर चुनावी मैदान में अपनी पार्टी को उतारा था। ऐसी स्थिति में भाजपा के नेताओं ने यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने बिहार दौरे में यह कहा था कि राजग में सिर्फ भाजपा, जदयू, विकासशील इंसान पार्टी और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा शामिल है। 

माना जाता है कि इसके बावजूद लोजपा मतदाताओं में भ्रम पैदा करने में सफल रही थी। यही कारण है कि चुनाव में लोजपा भले ही एक सीट पर विजयी हुई हो लेकिन जदयू को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाया था। हालांकि चिराग के लिए यह दांव अब उल्टा पड़ गया लगता है। 

बिहार में एकसाथ सरकार चला रही भाजपा जदयू के दबाव में लोजपा के संस्थापक रामविलास पासवान के निधन के बाद खाली हुई राज्यसभा सीट पर लोजपा के किसी अन्य नेता को नहीं भेजकर भाजपा ने पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को भेजकर लोजपा को यह स्पष्ट संदेश दे दिया था, कि राजग में लोजपा की स्थिति अब वैसी नहीं रही। 

विधानसभा चुनाव में जदयू राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है। जदयू के नेता इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार लोजपा को मानते हैं। ऐसे में हालांकि जदयू के नेता लोजपा को लेकर खुलकर तो कुछ नहीं बोलते हैं, लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि लोजपा के विषय में भाजपा को सोचना है। 

वैसे, जदयू लोजपा से बदला लेने को लेकर कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ रही है। जदयू ने लोजपा के 200 से अधिक नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। इधर, लोजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके पूर्व विधायक रामेश्वर चौरसिया को भी लोजपा से मोहभंग हो गया और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। लोजपा के एकमात्र विधायक राजकुमार सिंह के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने के बाद भी अटकलों का दौर जारी है। 

इधर, मंगलवार को लोजपा के प्रदेश, जिला व प्रखंड के कई दिग्गज नेताओं सहित सैकड़ों कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो गए। बेतिया में आयोजित एक मिल समारोह में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि भाजपा एक परिवार है और यहां भाई की तरह सम्मान मिलेगा। पूर्व में लोजपा-भाजपा का मजबूत गठबंधन रहा। चंपाारण भाजपा का गढ़ है, लोजपा नेताओं के भाजपा में शामिल होने के बाद अब अभेद्य किला बन गया है।

उघर, लोजपा के प्रवक्ता अशरफ अंसारी दावे के साथ कहते हैं कि जदयू में गए लोग ही भाजपा में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोजपा मजबूती के साथ अपने मुहिम में आगे बढ़ रही है। 

उन्होंने चिराग के अकेले पड़ जाने के संबंध में पूछे जाने पर कहा कि जदयू के नेता की सुबह और शाम चिराग के नाम से होती है। उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि अगर चिराग अकेले पड़ गए हैं, लोजपा समाप्त हो गई है, तो उनके नेता प्रतिदिन चिराग का नाम क्यों ले रहे हैं। 

लोजपा के नेता का दावा है कि पार्टी बिहार फस्र्ट, बिहारी फस्र्ट मुहिम को लेकर आगे बढ़ रही है। 

बहरहाल, सभी पार्टी के नेताओं के अपने दावे हैं लेकिन इतना तय है कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद लोजपा में दिन प्रतिदिन दरार चौड़ी हो रही है और उनके साथ वाले नेता छिटक रहे हैं।  (आईएएनएस)


02-Mar-2021 10:10 PM 20

- सलमान रावी
क्या कांग्रेस पार्टी और उसके अंदर के विक्षुब्ध वरिष्ठ नेताओं का संमूह यानी 'जी 23' टकराव की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहा है? दोनों तरफ़ से हो रही बयानबाज़ी को देखते हुए, राजनीतिक हलकों में ऐसे ही क़यास लगाए जा रहे हैं.

कांग्रेस हाई कमान की तरफ़ इसको लेकर कोई प्रतिक्रया नहीं दी गई है. चाहे सोनिया गाँधी हों या पार्टी में गाँधी परिवार के वफ़ादार माने जाने वाले नेता हों - किसी ने भी न तो जी-23 के नेताओं की पिछले साल लिखी गई चिठ्ठी को लेकर कोई प्रतिक्रिया दी है और न ही जम्मू में इन जी-23 के नेताओं के कार्यक्रम को लेकर ही कुछ कहा है.

लेकिन, विश्लेषकों को लगता है कि जम्मू में आयोजित कार्यक्रम के दौरान जी-23 के नेताओं द्वारा प्रकट किए गए विचार और ट्विटर पर लोक सभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी और आनंद शर्मा के बीच छिड़े वाक् युद्ध से तो टकराव के संकेत अब स्पष्ट होकर सामने आने लगे हैं.

जम्मू में जी-23 के नेता जम्मू में राज्य सभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद के रिटायर होने के मौके पर जमा हुए थे और उन्होंने इस दौरान कहा कि कांग्रेस का संगठन बहुत कमज़ोर होता चला जा रहा है.

वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने कहा था कि, "हम यहाँ क्यूँ जमा हुए हैं ? सच ये है कि हम कांग्रेस को कमज़ोर होता हुआ देख रहे हैं. हम पहले भी जमा हुए हैं. हमें कांग्रेस को मज़बूत करना होगा."

जी-23 गुट के नेता
अगले दिन एक अन्य कार्यक्रम में बोलते हुए आज़ाद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए कहा कि "एक समय में मोदी ने चाय बेच कर गुज़ारा किया है. मगर वो अपने अतीत को छुपाते नहीं हैं."

कांग्रेस के खेमे में जी-23 गुट के नेताओं के जमा होने पर नाराज़गी दिख तो रही है, मगर कोई इन नेताओं के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोल रहा है.

अलबत्ता पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर अभिषेक मनु सिंघवी ने सिर्फ़ इतना कहा कि जी 23 के सभी नेता कांग्रेस के संगठन का अभिन्न अंग हैं.

अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने सिर्फ इतना कहा, "हम उन सब की बहुत इज्ज़त करते हैं. लेकिन ये और भी ज़्यादा अच्छा होता अगर ये सब पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में पार्टी की मदद कर रहे होते."

जी-23 में वैसे तो कांग्रेस पार्टी के वो 23 वरिष्ठ नेता शामिल हैं जिन्होंने पिछले साल पार्टी आलाकमान को नेतृत्व के सवाल पर चिठ्ठी लिखी थी. इन नेताओं में केरल से कांग्रेस सांसद शशि थरूर के अलावा कांग्रेस पार्टी के कई बड़े नाम भी शामिल थे जैसे जितिन प्रसाद, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान, गुलाम नबी आज़ाद, कपिल सिब्बल, राज बब्बर, मनीष तिवारी, भूपिंदर सिंह हुड्डा और विवेक तनखा शामिल थे.

TWITTER@SHASHITHAROOR

आनंद शर्मा का बयान
लेकिन इनमें से जितिन प्रसाद को पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनावों के लिए पार्टी की 'स्क्रीनिंग कमिटी' में शामिल किया गया जबकि पृथ्वीराज चौहान को असम चुनावों के लिए बनाई गयी पार्टी की 'स्क्रीनिंग कमिटी' का अध्यक्ष बनाया गया है.

नई ज़िम्मेदारी मिलते ही नेताओं के रुख में बदलाव देखने को भी मिल रहा है. जम्मू में हुए जी-23 के कार्यक्रम में कई बड़े नता थे जो शामिल नहीं हुए.

जी-23 के प्रमुख नेता आनंद शर्मा न सोमवार को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में हुई कांग्रेस, वाम दलों और इंडियन सेकुलर फ्रंट की रैली की आलोचना करते हुए ट्वीट किया और कहा कि इंडियन सेकुलर फ्रंट जैसे संगठनों से कांग्रेस को दूर रहना चाहिए.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस का चरित्र हमेशा से ही धर्म निरपेक्षता का रहा है इस लिए उसे हर तरह की साम्प्रदायिक शक्ति से खुद को दूर रखना चाहिए.

शर्मा ने अपने ट्वीट में कहा, "आईएसएफ और ऐसे अन्य दलों से साथ कांग्रेस का गठबंधन पार्टी की मूल विचारधारा, गांधीवाद और नेहरूवादी धर्म निरपेक्षता के खिलाफ है, जो कांग्रेस पार्टी की आत्मा है. इन मुद्दों को लेकर कांग्रेस कार्य समिति में चर्चा होनी चाहिए थी."

TWITTER@ANANDSHARMAINC

अधीर रंजन चौधरी बनाम आनंद शर्मा
शर्मा का ये भी कहना था कि सांप्रदायिकता के खिलाफ़ लड़ाई में 'कांग्रेस दोहरा मापदंड नहीं अपना सकती है.'

उनका कहना था कि फुरफुरा शरीफ़ के धर्म गुरु के नेतृत्व वाला संगठन - 'इंडियन सेकुलर फ्रंट' - जिस कार्यक्रम में शामिल था उसमे पश्चिम बंगाल के "प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की उपस्थिति और समर्थन शर्मनाक" है.

हालांकि शर्मा के ट्वीट के बाद अधीर रंजन चौधरी ने भी ट्विट्टर के ज़रिये ही जवाब दिया. उन्होंने शर्मा को संबोधित करते हुए कहा कि जो गठबंधन पश्चिम बंगाल में बना है उसका नेतृत्व वाम मोर्चे के पास है जिसका कांग्रेस भी एक हिस्सा है.

उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, "मैं इन चुनिन्दा कांग्रेस नेताओं से आग्रह करूंगा कि वो निजी फायदे से ऊपर उठें और प्रधानमंत्री की तारीफ़ करने में अपना समय ना बर्बाद करें. पार्टी को मज़बूत करना उनका कर्तव्य है न की उस पेड़ को काटना जिसने उन्हें इतने सालों तक फल और छाया दी है."

TWITTER@JITINPRASADA

जी-23 के लिए बड़ा झटका
कुछ दिनों पहले तक जी-23 में शामिल जितिन प्रसाद ने भी शर्मा को जवाब देते हुए कहा कि गठबंधन के फैसले संगठन और कार्यकर्ताओं के हित को देखते हुए ही लिए जाते हैं. उनका कहना था कि इस समय सबको एक साथ आकर कांग्रेस को चुनावी राज्यों मज़बूत करने का काम करना चाहिए.

ये जी-23 के लिए बड़ा झटका था और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई ने बीबीसी से बात कर्ट हुए कहा कि उन्हें लगता है कि कांग्रेस का हाई कमान इन नेताओं को लेकर कोई प्रतिक्रया सिर्फ चुनावों को देखते हुए नहीं दे रहा है.

उनका कहना था कि सिर्फ एक केरल को छोड़ कर बाक़ी जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां कांग्रस की स्थिति कमज़ोर हुई है. ऐसे में असम और केरल में कांग्रेस चाहे तो बेहतर प्रदर्शन के लिए ज़ोर लगा सकती है.

वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस हाई कमान, जी-23 के नेताओं के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही कर उन्हें मजबूती प्रदान करेगा. इसी लिए पार्टी की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रया नहीं दी जा रही है. पिछले साल जी-23 के नेताओं द्वारा लिखी गई चिठ्ठी पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई."

TWITTER@RAHULGANDHI

प्रदेश इकाई का फ़ैसला
किदवई का कहना है कि अलबत्ता कांग्रेस हाई कमान ने ही जी-23 के नेताओं क बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश की जब जितिन प्रसाद और पृथ्वीराज चौहान को चुनाव की कमिटियों का प्रभारी बना दिया गया. वो कहते हैं कि जम्मू की बैठक में भी जी-23 के सभी नेता शामिल नहीं हुए थे.

लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीके हरी प्रसाद ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि राज्यों में विधानसभा के चुनावों के लिए किये जाने वाले गठबंधन के लिए प्रदेश की कांग्रेस इकाई को ही अधिकृत किया जाता है.

प्रसाद कहते हैं, "ये फैसले प्रदेश स्तर पर ही होते हैं जिसका आला कमान से कोई लेना देना नहीं है. प्रदेश इकाई को ही बेहतर पता रहता है कि क्षेत्रीय स्तर पर किसके साथ गठबंधन करना पार्टी के लिए सबसे अच्छा विकल्प साबित हो सकता है."

वैसे जी-23 के नेताओं के बयानों का ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं कि राजनीतिक दलों में ऐसा चलता रहता है और नेता अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र होते हैं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से जो कुछ हो रहा है उसपर उन्होंने कहा, "ये सबकुछ अच्छे टेस्ट में नहीं हो रहा है." (bbc.com/hindi)


01-Mar-2021 8:53 PM 25

नई दिल्ली, 1 मार्च। दिल्ली के राजेंद्र नगर के विधायक राघव चड्ढा की उपस्थिति में सोमवार को मिस इंडिया दिल्ली-2019 मानसी सहगल आम आदमी पार्टी में शामिल हो गईं. मनसी सहगल इंजीनियर, टेडएक्स स्पीकर और एक उद्यमी हैं. उनका अपना एक स्टार्टअप है. मिस इंडिया दिल्ली प्रतियोगिता में दिए गए अपने परिचय में उन्होंने खुद को परोपकारी और अंग दान में अपनी गहरी रुचि के बारे में बताया था. इस मौके पर राघव चड्ढा ने कहा कि "मुझे खुशी है कि आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल युवाओं में राजनीति से जुड़ने और लोगों की सेवा करने का विश्वास जगाते हैं. 'आप' परिवार दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है. मैं मानसी का आप परिवार में स्वागत करता हूं."

आम आदमी पार्टी में शामिल होने पर मानसी सहगल ने कहा कि ''मैं समाज के लिए बहुत कम उम्र से कुछ अच्छा करना चाहती थी. किसी भी राष्ट्र की समृद्धि के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा दो मुख्य आधार हैं और मैंने पिछले कुछ वर्षों में सीएम केजरीवाल के नेतृत्व में इन क्षेत्रों में जबरदस्त बदलाव देखा है.''

मानसी सहगल ने कहा कि ''सीएम अरविंद केजरीवाल के शासन और विधायक राघव चड्ढा की मेहनत से प्रेरित होकर मैंने आम आदमी पार्टी में शामिल होने का फैसला किया और मुझे लगता है कि स्वच्छ राजनीति के माध्यम से हम दुनिया में एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं.'' उन्होंने कहा कि ''मैं युवाओं और विशेष रूप से हमारी महिलाओं से आग्रह करूंगी कि वे हमारे साथ शामिल हों और राजनीति को बदलें.'' 

राघव चड्ढा ने कहा कि  सीएम अरविंद केजरीवाल के जन शासन मॉडल से प्रेरित होकर मेरे नारायणा क्षेत्र के कई प्रतिष्ठित लोग आज आप परिवार में शामिल हुए, जिसमें मिस इंडिया दिल्ली 2019 मानसी सहगल भी शामिल थीं. (khabar.ndtv.com)


27-Feb-2021 8:19 PM 38

नई दिल्ली, 27 फरवरी। केरल में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए तारीखों का एलान हो गया है. चुनावों की तारीख सामने के बाद तमाम पार्टियां राज्य में सत्ता हासिल करने की कोशिशों में लग गई हैं. इस बीच एबीपी न्यूज़ ने सी वोटर के साथ मिलकर राज्य के वोटरों की नब्ज़ टटोलने की कोशिश की है. ओपिनियन पोल में ये जानने का प्रयास किया गया है कि क्या मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन एक बार फिर अपनी अगुवाई में एलडीएफ को सत्ता पर काबिज़ कराने में कामयाब होते हैं या केरल की जनता कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) को मौका देती है.

किसे कितने फीसदी वोट ?
एबीपी न्यूज़ सी-वोटर के ओपिनियन पोल में सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को 40 फीसदी वोट मिलता नज़र आ रहा है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के खाते में 33 फीसदी वोट जा रहा है. जबकि बीजेपी को 13 फीसदी और अन्य को 15 फीसदी वोट मिलने की संभावना है.

किसे कितनी सीटें ?
सीटों के लिहाज़ से देखें तो ओपिनियन पोल कहता है कि एलडीएफ के खाते में इस बार 83-91 सीटें जा सकती हैं और यूडीएफ को 47-55 सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है. जबकि बीजेपी को महज़ 0-2 सीटें ही मिलती दिख रही हैं. अन्य को भी 0-2 सीटें ही मिलती नज़र आ रही हैं.

सीएम पद की पहली पसंद कौन?
ओपनियिन पोल में ये भी सवाल किया गया कि राज्य में लोग सीएम के तौर पर सबसे ज्यादा किसे पसंद करते हैं. इस सवाल पर 38.5 फीसदी लोगों ने सीएम के तौर पर पिनराई विजयन को अपनी पहली पसंद करार दिया. जबकि 27 फीसदी लोगों ने कांग्रेस के ओमान चांडी को अपनी पहली पसंद बताया.

पिछले चुनाव में कैसे थे नतीजे?
केरल की 140 विधानसभा सीटों पर 6 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होना है. चुनावी नतीजें 2 मई को आएंगे. इस वक्त केरल में सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की सरकार है. पिनाराई विजयन राज्य के मुख्यमंत्री हैं. साल 2016 के चुनाव में एलडीएफ को 91 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने 47 सीटें हासिल की थी. यहां बहुमत के लिए 71 सीटें चाहिए.

कैसे हुआ सर्वे? 
5 राज्यों में चुनाव का एलान हो चुका है. abp न्यूज के लिए सी वोटर ने ओपिनियन पोल किया है. इस ओपिनियन पोल में सभी पांच राज्यों की 824 विधानसभा सीटों पर 70 हजार 608 लोगों से बात की गई है. 21 फरवरी तक का ये सर्वे पिछले 6 हफ्तों में किया गया है. इस सर्वे में मार्जिन ऑफ एरर प्लस माइनस तीन से प्लस माइनस पांच फीसदी तक का है. (abplive.com)


25-Feb-2021 12:59 PM 34

पिछले चुनावों के आंकड़े बता रहे तृणमूल के पक्ष में रही है वहां परिस्थितियां

  तृणमूल से भाजपा में शामिल हुए कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा- 50 हजार से नहीं हराया तो राजनीति से लूंगा संन्यास  

बिकास के शर्मा

कोलकाता, 25 फ़रवरी। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पूर्व ममता बनर्जी बनर्जी के द्वारा दक्षिण बंगाल के नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की घोषणा ने एक बार फिर आंदोलन की भूमि नंदीग्राम को राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। भूमि आंदोलन के कारण वर्ष 2009 में नंदीग्राम पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना और अब इसी सीट से विधायक रहे शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने के बाद तृणमूल सुप्रीमो सुश्री बनर्जी को यहाँ से चुनाव में 50 हजार वोटों से पराजित करने की चुनौती प्रस्तुत की है। श्री अधिकारी के चैलेंज को मुख्यमंत्री सुश्री बनर्जी ने स्वीकार भी कर लिया है, जिससे चुनावी माहौल और भी गर्म हो गया है। पूरे पश्चिम बंगाल विशेषकर दक्षिण बंगाल के जिलों पूर्व मेदनीपुर, पश्चिम मेदनीपुर, आसनसोल, पुरुलिया एवं बांकुड़ा में लोगों एवं राजनीतिक पंडितों की निगाहें नंदीग्राम सीट पर गड़ी हैं।

पूर्व मेदिनीपुर जिले में स्थित नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र लोकसभा चुनाव में तमलुक संसदीय क्षेत्र अंतर्गत आता है और वर्ष 2019 के संसदीय चुनाव में तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी एवं शुभेंदु के भाई दिब्येंदु अधिकारी ने भाजपा के सिद्धार्थ नस्कर को दो लाख मतों के अंतर से पराजित किया था। नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र भौगोलिक रूप से तीन हिस्सों में बंटा है। दो ग्रामीण ब्लॉक इलाका तथा एक शहरी इलाका है।

नंदीग्राम क्षेत्र की 96.65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण तथा 3.35 फीसदी शहरी है। वर्ष 2019 के संसदीय चुनाव के आंकड़ों के अनुसार कुल मतदाताओं की संख्या 2,46,434 थी और विधानसभा क्षेत्र में अनुसूचित जाति की आबादी 16.46 फीसदी तथा अनुसूचित जनजाति की आबादी मात्र 0.1 फीसदी है। नंदीग्राम प्रखंड एक में अल्पसंंख्यक 34 फीसदी, नंदीग्राम प्रखंड दो में अल्पसंख्यक 12.1 फीसदी तथा शहरी इलाकों में अल्पसंख्यक 40 फीसदी हैं। साथ ही प्रत्येक चुनाव में अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं और मतदान भी अच्छा होता है। पिछले संसदीय चुनाव में 84.18 फीसदी मतदान हुआ वहीँ वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में 86.97 फीसदी मतदान हुआ था।

दो दशक से दक्षिण बंगाल में पत्रकारिता कर रहे डॉ प्रदीप सुमन की मानें तो अल्पसंख्यकों की भूमिका का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2006 के विधानसभा चुनाव में जब सीपीआई तथा तृणमूल कांग्रेस ने अल्पसंख्यक प्रत्याशी उतारे थे तो सीपीआई को मात्र 3.4 फीसदी मतों के अंतर से जीत मिली थी। डॉ सुमन ने आगे बताया कि वर्ष 2011 में जब तृणमूल ने अल्पसंख्यक और सीपीआई ने सामान्य प्रत्याशी मैदान में उतारा तो तृणमूल की जीत का अंतर बढ़ कर 26 फीसदी हो गया। इसी तरह वर्ष 2016 में खुद शुभेंदु तृणमूल के प्रत्याशी बनने से जीत के अंतर में उन्होंने 7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी और की, यही कारण है कि शुभेंदु वहां से ममता जैसी नेत्री को चुनौती दे पा रहे हैं।

संसदीय आम चुनाव 2019  में विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल ने भाजपा को 68 हजार मतों के अंतर से हराया था। भाजपा के मतों में 30 फीसदी की बढ़त हुई थी। वृद्धि तृणमूल से न होकर सीपीएम के खाते से 25.79 फीसदी तथा कांग्रेस के खाते से 1.09 फीसदी हुई थी। यानी 27 फीसदी मत वाम और कांग्रेस के खाते से शिफ्ट हुए थे।

तृणमूल नेता सह कैबिनेट मंत्री मलय घटक ने कहा कि पिछले चुनाव की स्थिति एवं ममता बनर्जी द्वारा राज्य में किये गए विकास कार्यों के आधार पर नंदीग्राम पार्टी के लिए काफी सुरक्षित सीट है। यह पूछे जाने पर कि खुद शुभेंदु के चुनाव लड़ने से कोई फर्क तृणमूल को पड़ेगा, तो उन्होंने कहा कि पिछली विधानसभा चुनाव में 80 हजार मतों की बढ़त शुभेंदु की निजी बढ़त न होकर ममता दीदी एवं तृणमूल के नाम पर मिली थी, इसलिए चाहे शुभेंदु खड़े हों या फिर खुद अमित शाह, ममता बनर्जी जैसी जन प्रिय नेत्री को उससे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ेगा।

गौरतलब हो कि नंदीग्राम विधानसभा सीट वर्ष 1952 में हुए पहले आम चुनाव से ही अस्तित्व में रही है। साल 1952, 1957 तथा 1962 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम नॉर्थ तथा नंदीग्राम साउथ विधानसभा क्षेत्र में पृथक रूप से चुनाव हुए, किन्तु 1967 के बाद नंदीग्राम में एक ही विधानसभा सीट बनी।
तीन दशकों के चुनावों का अध्ययन करने से पता चलता है कि साल 1991 में सीपीआई के शक्ति प्रसाद पाल ने लगातार दूसरी जीत दर्ज की। वर्ष 1996 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी देवी शंकर पांडा ने सीपीआई के निवर्त्तमान विधायक श्री पाल को हरा कर नई इबारत लिखी। वर्ष 2001 में सीपीआई ने शेख इलियास मोहम्मद को प्रत्याशी बनाया और तृणमूल प्रत्याशी को हरा कर जीत दर्ज की। वर्ष 2006 के भी चुनाव में निवर्त्तमान विधायक शेख इलियास मोहम्मद ने अपनी जीत दुहराई। नंदीग्राम आंदोलन के दौरान रिश्वत लेने के आरोप में जनवरी 2009 में उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। वर्ष 2009 में उपचुनाव में तृणमूल की फिरोजा बीबी ने सीपीआई के परमानंद भारती को हराया। वर्ष 2011 में भी यही स्थिति बरकरार रही।  वर्ष 2016 में शुभेंदु अधिकारी तृणमूल प्रत्याशी बने तथा 81 हजार मतों से चुनाव जीते। साल 2009 के उपचुनाव में तृणमूल ने 40 हजार, वर्ष 2011 में तृणमूल ने 40 हजार तथा वर्ष 2016 में तृणमूल ने 80 हजार मतों के अंतर से इस सीट पर जीत दर्ज की।

(मूलतः पश्चिम बंगाल के निवासी लेखक युवा पत्रकार हैं और आईसीएफजे के फेलो रहे हैं)


22-Feb-2021 9:13 PM 37

पटना, 22 फरवरी| लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को सोमवार को एक और झटका लगा, जब विधान परिषद में लोजपा की एकमात्र सदय नूतन सिंह भाजपा में शामिल हो गईं। 

भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित एक समारोह में नूतन सिंह और पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उदय प्रताप सिंह भाजपा में शामिल हुए। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने दोनों को भाजपा की सदस्यता दिलाई। 

नूतन सिंह के पति और बिहार सरकार में मंत्री नीरज कुमार बबलू भी इस मौके पर मौजूद रहे। नूतन सिंह दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की भाभी हैं। 

इस मौके पर नूतन सिंह ने कहा कि मेरे पति भाजपा में हैं, इस कारण मैंने लोजपा को छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है, जिससे हम दोनों मिलकर साथ काम कर सकें।

उल्लेखनीय है कि पिछले साल नवंबर में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव के बाद कई नेता लोजपा को छोड़कर अन्य दलों में शमिल हो चुके हैं। पिछले चुनाव में लोजपा केवल एक सीट जीत सकी थी। पूर्व विधायक रामेश्वर प्रसाद चौरसिया भी पिछले सप्ताह लोजपा से इस्तीफा दे दिया था। लोजपा के कई नेता कुछ दिन पूर्व ही जदयू में शामिल हो चुके हैं।  (आईएएनएस)


20-Feb-2021 12:55 PM 69

अगरतला, 20 फ़रवरी : नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के मुद्दे पर मतभेद के बाद दो साल पहले कांग्रेस से अलग हुए त्रिपुरा के शाही शख्स प्रद्योत माणिक्य देब बर्मन ने अब राज्य की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को बड़ा झटका दिया है. उन्होंने सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल एक दल  के साथ नया गठबंधन बनाया है. यह तब हुआ है जब त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल  के चुनाव होने वाले हैं.

देब बर्मन ने पूर्वोत्तर राज्य में आदिवासी परिषद चुनावों से पहले बीजेपी के सहयोगी इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा  के साथ मिलकर त्रिपुरा इंडीजीनस पीपुल्स रीजनल अलायंस बनाया है. TTAADC के चुनाव मूल रूप से पिछले साल 17 मई को निर्धारित किए गए थे, लेकिन कोरोना  महामारी के कारण उसे रोक दिया गया था.

अब प्रद्योत माणिक्य देब बर्मन की अगुवाई में ये गठबंधन TTAADC चुनाव लड़े जाएंगे. शुक्रवार को 42 वर्षीय प्रद्योत ने  आधिकारिक तौर पर ऐलान किया कि टिपरलैंड राज्य पार्टी और आईपीएफटी का विलय  त्रिपुरा इंडीजीनस पीपुल्स रीजनल अलायंस में हुआ है.

राज्य की सतातरूढ़ पार्टी बीजेपी को तब और झटका लगा जब राज्य की लगभग सभी आदिवासी राजनीतिक पार्टियां TIPRA के साथ आने का फैसला किया. हालांकि, IPFT ने अभी तक राज्य की बिप्लब देब सरकार से अपना समर्थन वापस नहीं लिया है, जहां उनके दो मंत्री हैं.

प्रद्योत माणिक्य देब बर्मन, जो पहले कांग्रेस के त्रिपुरा प्रदेश अध्यक्ष थे, ने 2019 में पार्टी छोड़ दी थी. उनकी प्रमुख मांग त्रिपुरा में स्वदेशी आदिवासी समुदायों के लिए एक अलग राज्य "ग्रेटर टिपरलैंड" के लिए रही है. आईपीएफटी ने भी 2009 के बाद से अलग राज्य की मांग करके राजनीतिक प्रसिद्धि प्राप्त की है. (khabar.ndtv.com)
 


16-Feb-2021 7:35 PM 51

जयपुर. किसान आंदोलन के समर्थन में कांग्रेस द्वारा किसान महापंचायतों का दौर जारी है. सचिन पायलट खेमे द्वारा लगातार जगह-जगह किसान महापंचायतों के आयोजन के जरिए शक्ति प्रदर्शन किया जा रहा है. अब 19 फरवरी को कोटखावदा में बड़ी किसान महापंचायत रखी गई है. चाकसू विधायक और कांग्रेस के प्रदेश महासचिव वेद सोलंकी द्वारा इस किसान महापंचायत का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें पूर्व पीसीसी चीफ सचिन पायलट शामिल होंगे.

सोलंकी ने आज प्रेसवार्ता कर बताया कि हजारों की संख्या में किसान इस महापंचायत में शामिल होंगे. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के आह्वान के तहत इस किसान महापंचायत का आयोजन किया जा रहा है जिसमें शामिल होने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा समेत अन्य नेताओं को भी निमंत्रण दिया गया है. उन्होंने कहा कि बॉर्डर पर बैठे किसानों के समर्थन में यह किसान महापंचायत की जा रही है.

गौरतलब है कि वेद सोलंकी सचिन पायलट खेमे के विधायक हैं. महापंचायत में सचिन पायलट खेमे के कई विधायक शामिल होंगे. राहुल गांधी के राजस्थान दौरे के बाद कांग्रेस की यह पहली किसान महापंचायत होगी. इससे पहले सचिन पायलट खेमे द्वारा दौसा और भरतपुर में किसान महापंचायतों का आयोजन किया जा चुका है. राहुल गांधी की सभा के दौरान हुए दो वाकये भी इन दिनों चर्चा में हैं. पहला वाकया खाट टूटने का है जो चर्चा में बना हुआ है साथ ही सचिन पायलट समेत अन्य नेताओं को ट्रैक्टर रैली के दौरान मंच से उतारने का भी मामला सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है. सचिन पायलट खेमे का मानना है कि इन घटनाओं का उन्हें फायदा मिलेगा और किसान उनके साथ ज्यादा संख्या में जुड़ेंगे. (news18.com)


09-Feb-2021 1:45 PM 47

नई दिल्ली, 9 फ़रवरी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस जगन मोहन रेड्डी की बहन वाई एस शर्मिला अपनी नई क्षेत्रीय पार्टी का जल्द ऐलान कर सकती हैं। वाईएसआरसी के एक वरिष्ठ नेता ने इस बात की पुष्टि की है कि वाई एस शर्मिला ने मंगलवार को अपने 30-35 भरोसेमंद लोगों के साथ अपने आवास पर एक बैठक बुलाई है। यह बैठक हैदराबाद के लोटस पॉन्ड में स्थित उनके आवास पर बुलाई गई है और इसमें नई पार्टी की रूपरेखा को लेकर चर्चा होगी। 

The Yuvajana Sramika Rythu Congress Party के नेता का कहना है कि वाई एस शर्मिला नई पार्टी के गठन को लेकर दिलचस्पी ले रही है। हो सकता है कि इस बैठक में वो इस पर अपनी राय रखें। हमें उम्मीद है कि बैठक के बाद यह साफ हो जाएगा कि क्या वो एक नई पार्टी बनाना चाहती हैं या फिर उनकी रणनीति कुछ और है। 

सोमवार से सोशल मीडिया पर वाई एस शर्मिला का एक पोस्टर भी काफी वायरल हो रहा है। इस पोस्टर में शर्मिला के अलावा उनके पिता स्वर्गीय वाई एस राजशेखर रेड्डी भी नजर आ रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि यह पोस्टर उनके आवास पर भी लगाए जाएंगे। इस पोस्टर पर स्लोगन भी लिखे गये हैं। इसमें लिखा हुआ है कि वाईएसआर के कल्याणकारी कार्य सिर्फ शर्मिला के साथ ही संभव हैं। इसमें शर्मिला की मां विजयलक्ष्मी की तस्वीर भी नजर आ रही है। 

इस पोस्टर के वायरल होने के बाद यह कहा जा रहा है कि शर्मिला तेलंगाना में अपनी नई पार्टी को लॉन्च करने पर काम कर रही है। हालांकि अभी इसे लेकर आंध्र प्रदेश की सीएम की बहन की तरफ से कुछ भी नहीं कहा गया है। 

बहरहाल इस मुद्दे पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री K Chandrasekhar Rao ने कहा है वाई एस शर्मिला का नाम लिये बिना कहा कि इस बात की राज्य में काफी चर्चा हो रही है कि नई क्षेत्रीय पार्टी का गठन किया जाएगा। लेकिन आज के दौर में एक राजनीतिक पार्टी को चलाना इतना आसान नहीं है। नई पार्टी को लॉन्च करने में बड़ी तनाव झेलना पड़ता है। हमने तेलंगाना में पहले कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को लॉन्च होते हुए देखा है। लेकिन यह सभी धूल में मिल गए। टीआरएस ही एक ऐसी पार्टी है जो टीडीपी के बाद टिक सकी। (jansatta.com)


08-Feb-2021 3:18 PM 55

गाजीपुर बॉर्डर, 8 फरवरी | उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ के तपोवन इलाके में ग्लेशियर टूटने के कारण आई आपदा में कई लोगों की मृत्यु हो चुकी है, वहीं 150 से अधिक लोग लापता हैं, ऐसे मे कृषि कानून के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान नेताओं का कहना है कि, हमने किसानों को राहत कार्य मे जुटने के लिए अपील की है और हम लोगों की मदद करेंगे। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा, उत्तराखंड में आई आपदा में किसान मदद करेंगे, उत्तराखंड में त्रासदी जिलों में प्रशासन को जिस चीज की जरूरत हो वो बताएं, हर मोर्चे से किसान उनकी मदद करेंगे, पहले भी हुई त्रासदी में लोगों ने मदद की थी।

हालांकि रविवार को हरियाणा के चरखी दादरी में आयोजित हुई महापंचायत में भी किसान नेताओं की तरफ से राहत कार्यों में जुटने के लिए अपील की गई थी।

दरअसल रविवार सुबह ग्लेशियर टूटने के बाद अलकनंदा और धौलीगंगा नदियों में विकराल बाढ़ आ गई। बाढ़ ने अपनी चपेट में गांव के गांव को ले लिया जिसके कारण हजारों लोग बेघर हो गए, वहीं कई घर इस बाढ़ में बह गए।

उत्तराखंड में फिलहाल अभी भी बचाव कार्य जारी है और बाढ़ में बह गये कई लोगों को निकाला भी जा चुका है। दूसरी ओर सरकार की तरफ से भी मृतकों और घायलों को मुआवजा देने की घोषणा भी कर दी गई है।

सोमवार सुबह भी उत्तराखंड के राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) बचाव कार्य कर रहा है। एसडीआरएफ टीम नदी का जल स्तर नीचे होने का इंतजार कर रहे हैं ताकि सुरंग में फंसे हुए लोगों को निकालने का अभियान शुरू किया जा सके। (आईएएनएस)
 


04-Feb-2021 8:19 PM 61

भोपाल, 4 फरवरी | मध्य प्रदेश के युवाओं में बढ़ती नशे की लत पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चिंता जताते हुए नेशनल कैडेट कोर (एनसीसी) और राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) की गतिविधियों में नशा मुक्ति अभियान को भी सम्मिलित करने पर जोर दिया है। गणतंत्र दिवस समारोह नई दिल्ली में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले एनसीसी कैडेट्स व एनएसएस के छात्रों को मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित समारोह में सम्मानित करते हुए मुख्यमंत्री चौहान ने कहा है कि नेशनल कैडेट कोर युवा वर्ग में देश भक्ति, संस्कार, मेहनत, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, लक्ष्य के प्रति समर्पण और अनुशासन विकसित करने का सशक्त माध्यम है। इसका विस्तार प्रदेश की अधिक से अधिक शालाओं और महाविद्यालयों में किया जाएगा।

मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि युवा वर्ग में फैलती ड्रग्स की आदत युवा पीढ़ी को खोखला कर रही है। नेशनल कैडेट कोर एनसीसी और एनएसएस को अपनी गतिविधियों में नशा मुक्ति अभियान को भी सम्मिलित करना आवश्यक है।

मुख्यमंत्री चौहान ने एनसीसी और एनएसस के छात्रों द्वारा कोरोना काल में अपनी जान जोखिम में डालकर किए गए सेवा कार्यो की सराहना की। रीवा के एनसीसी सीनियर अंडर ऑफिसर योगेश चतुर्वेदी को गणतंत्र दिवस परेड में बेस्ट कैडेट ऑफ ईयर चयनित होने पर बधाई दी तथा मेडल व दस हजार रुपये का चेक पुरस्कार स्वरूप प्रदान किया।

मुख्यमंत्री चौहान ने गणतंत्र दिवस परेड में सम्मिलित 34 एनसीसी कैडेट्स और राष्ट्रपति द्वारा एनएसएस पुरस्कार 2018-19 से सम्मानित भोपाल की मानसी तीर्थानी तथा उज्जैन की मेहरान जाफरी सहित एनएसएस के 14 प्रतिभागियों को सम्मानित किया। साथ ही एनसीसी की ई-पत्रिका श्युवा स्पंदन के 56वें संस्करण का विमोचन भी किया।

एनसीसी के मेजर जनरल संजय शर्मा ने बताया कि मध्यप्रदेश के 52 और छत्तीसगढ़ के 28 जिलों में एनसीसी की गतिविधियां संचालित हैं। मध्यप्रदेश के 400 स्कूल तथा 900 कॉलेज में एक लाख 14 हजार युवा एनसीसी में भाग ले रहे हैं, जिनमें 30 प्रतिशत बालिकाएं हैं। इसी प्रकार मध्यप्रदेश में एनएसएस के एक लाख 50 हजार विद्यार्थी बेटी बचाओ, रक्तदान, ग्रामीण विकास, स्वच्छता तथा अन्य जन-कल्याणकारी गतिविधियों में सक्रिय हैं। (आईएएनएस)

 


03-Feb-2021 6:46 PM 65

-भवेश सक्सेना

आंध्र प्रदेश में मंदिरों पर लगातार हमले का मुद्दा राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के बीच त्रिकोणीय जंग का रूप ले चुका है. एक बहस जारी है, जिसमें हर पार्टी दूसरी को ज़िम्मेदार ठहरा रही है. पिछले डेढ़ साल से राज्य में मंदिरों पर लगातार हो रहे हमलों पर केंद्र से एक्शन लिये जाने की मांग करते हुए भाजपा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव ने मुद्दा उठाया. वायएस जगनमोहन रेड्डी इस मामले के केंद्र में इसलिए हैं क्योंकि मई 2019 से ही वो राज्य की सत्ता में आए. पूरा मामला सिलसिलेवार ढंग से समझिए और तय कीजिए कि कौन किस तरफ है.

दिसंबर 2020 के आखिर में रामतीर्थम में जब भगवान राम की मूर्ति को तोड़ा गया और मंदिर के पुजारी को रोता देखा गया, तबसे आंध्र में मंदिरों पर हमले का मुद्दा तेज़ी से गर्म होता चला गया. इस पूरे मुद्दे को, पीछे की कहानी को और इस पर चल रही राजनीति को ठीक से समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि मुद्दा संवेदनशील है.

क्या कह रहा है आंकड़ा?
सबसे पहले तो आंध्र में मंदिरों पर हमले का मुद्दा इतना बड़ा क्यों है? यह जानने के लिए कुछ आंकड़े देखिए. राव ने संसद में आरोप लगाया कि राज्य में पिछले 19 महीनों में मंदिरों में तोड़फोड़ या मूर्ति भंग किए जाने के 140 से ज़्यादा केस सामने आ चुके हैं राज्य सरकार ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं. वहीं राज्य के डीजीपी डी गौतम सवांग ने दो हफ्ते पहले कहा कि अंतर्वेदी रथ यात्रा में आगज़नी स​मेत 44 प्रमुख मामलों में से 28 को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम सुलझा चुकी.

यही नहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी अशोक गजपति राजू ने पिछले दिनों कहा कि बीते 19 महीनों में 128 मंदिरों पर हमले की घटनाएं हुईं. एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पिछले साल सितंबर से अब तक राज्य में मंदिरों के खिलाफ कम से कम 20 बड़ी घटनाएं हुई हैं. यानी मुद्दा बहुत गंभीर और संवेदनशील हो चुका है.

कौन किस तरह है पार्टी?
आग की तरह राज्य में फैल चुके इस मुद्दे के बीच कौन किस तरह की भूमिका में है? इस सवाल के जवाब से आपको त्रिकोणीय राजनीतिक जंग का अंदाज़ा भी लग जाएगा, जो YSRCP, टीडीपी और भाजपा के बीच जारी है. इस केस को पार्टीवार समझना बेहतर है.

सत्तारूढ़ YSRCP की भूमिका : ज़ाहिर है राज्य में इतने बड़े तांडव से सबसे ज़्यादा आरोपों के घेरे में वायएसआर कांग्रेस पार्टी ही है. डैमेज कंट्रोल करते हुए पार्टी ने तीन मंदिर ट्रस्टों के चेयरमैन रहे राजू को सुरक्षा में लापरवाही का आरोप लगाकर पद से हटाया, लेकिन सवाल यह खड़ा हो गया कि बाकी जिन मंदिरों पर हमले हुए, उनके ट्रस्ट पदाधिकारी क्यों नहीं हटाए गए?

YSRCP पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह ईसाइयों को केंद्र में रखने वाली पार्टी है और राज्य की ईसाई गृह मंत्री मेकातोती सुचारिता के हाथ में इस मामले की कमान होने के चलते ही दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई. वहीं, सत्तारूढ़ पार्टी का जवाब है कि उसकी सरकार बनने और कल्याणकारी योजनाएं लागू होने के बाद से ही ये हमले होने लगे हैं. यह सरकार की छवि खराब करने के लिए राजनीतिक सा​ज़िश है. राज्य की सांप्रदायिक फिज़ा को बिगाड़ने के साथ ही YSRCP का आरोप है कि इन हमलों के पीछे तेलुगु देशम पार्टी का हाथ हो सकता है.

टीडीपी की भूमिका : चंद्रबाबू नायडू की यह पार्टी मुस्लिमों को केंद्र में रखने वाली सियासत को तरजीह देने के आरोप झेलती रही है. तेदेपा ने अपने कार्यकाल के दौरान 2016 में कृष्णा नदी पर विकास कार्यों और सड़क को बड़ा करने के काम के चलते दर्जनों मंदिर गिरवाए थे. इस बात को भी रेड्डी की पार्टी ने मुद्दा बनाकर न केवल आरोप लगाया है, बल्कि रेड्डी ने डैमेज कंट्रोल के एक और अहम कदम के तौर पर बीती 8 जनवरी को ऐसे 30 मंदिरों के पुनरुद्धार के लिए शिलान्यास भी किया.

बीजेपी की भूमिका : मंदिरों पर हमले की राजनीति में भाजपा का क्या लेना देना है? पहले तो यह याद रखिए कि तेदेपा की राज्य सरकार के समय भाजपा का समर्थन था और तेदेपा के मंदिर तोड़े जाने के वक्त भाजपा ने कोई स्टैंड नहीं लिया था. एमआर सुब्रमणि के लेख में भाजपा के पक्ष वाले राजनीतिक विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि राज्य में हिंदुओं को ही अपने पूजास्थल तोड़ने का दोषी ठहराया जा रहा है.

अन्य विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि जब नायडू सरकार में मंदिरों को तोड़ने पर कोई हंगामा नहीं हुआ तो हिंदू विरोधी तत्वों को शह मिली और इस सरकार में यह सिलसिला और तेज़ी से बढ़ गया. लेकिन अब भाजपा हिंदुओं के पक्ष और राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रही है, जबकि यहां तेदेपा से अलग होने के बाद से अपरोक्ष रूप से भाजपा रेड्डी सरकार की समर्थक ही रही.

तो कौन है दोषी?
अब सवाल खड़े होते हैं कि तेदेपा दोषी है तो राज्य सरकार ने विरोधी पार्टी के सदस्यों की गिरफ्तारी क्यों नहीं की? भाजपा पर साज़िश में शामिल होने के आरोप हैं तो इनका आधार क्या है? सिर्फ राजू को पद से क्यों हटाया गया? क्या हिंदू ही हिंदू मंदिरों को तोड़ रहे हैं? इन सब सवालों के जवाब में रेड्डी सरकार का जवाब यही रहा है कि यह 'सियासी गुरिल्ला युद्ध' है, जो राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए विरोधी अंजाम दे रहे हैं.

विश्लेषकों का एक बड़ा आरोप यह भी है कि भले ही सुचारिता ने हमलों की घटनाओं के लिए माफी मांगी हो, लेकिन महीनों तक इन संवेदनशील मामलों में कोई गिरफ्तारी या एक्शन न होने का मतलब यही है कि रेड्डी सरकार किस तरह इस मुद्दे पर रुख रखती है. यह भी कहा गया कि रेड्डी सरकार ने हमलों की निंदा तक नहीं की, जिससे हमलावरों को और शह मिली.

क्या है सियासी व सामाजिक माहौल?
आपको याद हो तो हैदराबाद में निकाय चुनाव नज़दीक थे, तो वहां भी सांप्रदायिक हंगामे और बयानबाज़ी की झड़ी थी. तिरुपति में अस्ल में, उप चुनाव के वातावरण में यह पूरा मुद्दा खड़ा हुआ है जिसमें सीधे तौर YSRCP और TDP एक दूसरे पर आरोप की राजनीति कर रही हैं तो तीसरे मोड़ पर BJP इस पूरे मुद्दे को भुनाना चाह रही है. राज्य में 'आंध्र में तालिबान' और 'बाइबल पार्टी' बनाम 'भगवद्गीता पार्टी' जैसे नारे लग रहे हैं. और लोगों से कहा जा रहा है कि आप किस तरफ हैं? (news18.com)


22-Jan-2021 7:38 PM 91

गांधीनगर, 22 जनवरी | गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने शुक्रवार को घोषणा की कि राज्य पुलिस के रैपिड रिस्पांस (आरआर) सेल को समाप्त कर दिया जाएगा।

साल 1995 से सक्रिय आरआर सेल का मुख्य कार्य राज्य में संगठित अपराध के कार्य पर नजर रखना था।

रूपाणी ने कहा, "हमने आज से पुलिस विभाग के आरआर सेल को खत्म करने का फैसला किया है। यह निर्णय इसलिए लिया गया है, क्योंकि प्रौद्योगिकी और गतिशीलता के नए युग में इस तरह के सेट-अप की कोई आवश्यकता नहीं है।"

वहीं एक प्रश्न के जवाब में गृह राज्य मंत्री (एमओएस) प्रदीप सिंह जडेजा ने कहा, "आरआर सेल को समाप्त करने का निर्णय हाल की घटना से संबंधित नहीं है, जिसमें एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने आरआर सेल के सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) को 50 लाख रुपये रिश्वत लेने के लिए पकड़ा था।"

गौरतलब है कि 31 दिसंबर, 2020 को आनंदनगर के विद्यानगर में एक भोजनालय में रिश्वत लेते हुए एएसआई प्रकाशसिंह रावल को एसीबी ने रंगे हाथों पकड़ा था।

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आरआर सेल का काम राज्य में संदिग्ध अवैध गतिविधियों पर नजर रखना था।

यह राज्य के सात रेंज डिवीजनों में कार्यात्मक था।

लेकिन सूत्रों के अनुसार, यह सेल अपने मूल उद्देश्य से भटक गया था और इसका उपयोग पुलिसकर्मियों के बीच और भ्रष्टाचार के लिए व्यक्तिगत लाभ के लिए अधिक किया जाने लगा था।

मुख्यमंत्री ने कहा, "अब हम जिला पुलिस अधीक्षक (एसपी) को और शक्तियां देंगे, ताकि वे बेहतर प्रदर्शन कर सकें।"  (आईएएनएस)

 


21-Jan-2021 8:13 PM 83

जयपुर, 21 जनवरी | राजस्थान में टीकाकरण अभियान 16 जनवरी से शुरू होने के बाद से अब तक धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, जिसपर राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चिंता जताई है। स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, 16 जनवरी को, रेगिस्तान राज्य में टीकाकरण अभियान की कुल दर 73.79 प्रतिशत थी, जबकि 18 जनवरी को यह घटकर 68.72 प्रतिशत पर आ गई और 19 जनवरी को, दर और घटकर 54 प्रतिशत हो गई।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दवा कंपनियों भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के बीच विवाद को घटते टीकाकरण दर के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

बुधवार को अपने ट्वीट में, गहलोत ने टीकाकरण की धीमी दर पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "कुछ संख्या में स्वास्थ्य कार्यकर्ता टीकाकरण के लिए आए हैं। कम संख्या वाणिज्यिक कारणों के लिए दो टीका निर्माताओं के बीच बयानबाजी के कारण भी है। कल, भारत बायोटेक ने अपने वैक्सीन के बारे में दिशानिर्देश जारी किए हैं। यदि ये दिशानिर्देश पहले ही जारी किए गए होते, तो लोगों को वैक्सीन पर अधिक भरोसा होता।"

मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य कर्मियों को टीकाकरण के लिए आगे आने का आह्वान भी किया।

उन्होंने कहा, "मैं स्वास्थ्य कर्मचारियों से अपील करता हूं कि वे टीका लगवाने के लिए आगे आएं।"

गहलोत गुरुवार को अपने निवास पर शाम 7:30 बजे कोविड -19 की समीक्षा और टीकाकरण के संबंध में एक बैठक करेंगे।

(आईएएनएस)

 


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