राजनीति

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Posted Date : 17-Nov-2018
  • हैदराबाद, 17 नवम्बर ।  आम चुनाव और तेलंगाना विधानसभा चुनाव से पहले अपनी दोस्ती को मजबूत करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू एकसाथ रैली करते हुए नजर आ सकते हैं। सूत्रों के अनुसार दोनों नेताओं की संयुक्त रैली नवंबर के आखिरी सप्ताह में हैदराबाद में होगी, जिसमें दोनों पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व हिस्सा लेगा।
    तेलंगाना में 7 दिसंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों में टीआरएस के खिलाफ लडऩे के लिए कांग्रेस, टीडीपी, तेलंगाना जन समिति और सीपीआई ने मिलकर महागठबंधन का निर्माण किया है। कांग्रेस जहां राज्य की अधिकतर सीटों पर चुनाव लड़ रही है वहीं टीडीपी 14, टीजेएस आठ और सीपीआई तीन सीटों पर चुनाव मैदान में है।
    संयुक्त रैली का आयोजन, 2019 के आम चुनावों में बीजेपी विरोधी गठबंधन बनाने के लिए विपक्षी दलों की होने वाली अहम बैठक के दौरान हो सकता है। चंद्रबाबू नायडू इस तरह के गठबंधन को बनाने की कोशिश में लगे हैं और हाल के सप्ताह में ममता बनर्जी, देव गौड़ा, केडी कुमारस्वामी और एमके स्टालिन से मुलाकात कर चुके हैं। अब तक, कांग्रेस, टीडीपी, आम आदमी पार्टी, जेडी (एस), एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस बैठक में जाने के लिए हामी भर चुके हैं।
    आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न दिए जाने से खफा होकर चंद्रबाबू नायडू ने इस साल अपनी पार्टी को एनडीए से अलग कर लिया था। उन्होंने कहा कि मीटिंग में सभी पार्टी भविष्य की कार्रवाई पर चर्चा करेंगी। (न्यूज 18)

     

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Posted Date : 17-Nov-2018
  • भोपाल, 17 नवम्बर । मध्य प्रदेश में कांग्रेस 15 साल का अपना ‘सत्ता वनवास’ खत्म करने को बेकरार है। इसके लिए पार्टी हर वह कदम उठान को तैयार है जिससे उसकी सत्ता में वापसी की संभावना मजबूत होती हो। फिर चाहे वह परंपरागत प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी की रणनीति को ही अपनाने का कदम क्यों न हो। सूत्रों ने कुछ इसी तरह के संकेत वाली खबर दी है।
    भाजपा ने उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए जो रणनीति अपनाई थी, वही कुछ अंशों में कांग्रेस मध्य प्रदेश में अपना सकती है। इसी में से एक है- मतदाताओं में जोश भरने के लिए गाना तैयार करना। भाजपा ने 2017 में उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के लिए जैसा गाना तैयार कर जारी किया था उसी तरह कांग्रेस भी अगले हफ़्ते मध्य प्रदेश के लिए कर सकती है। खबर की मानें तो यह गाना तैयार हो चुका है और इसके बोल हैं, आ रही है कांग्रेस, परिवर्तन मांगे मध्य प्रदेश।
    इस प्रक्रिया के जुड़े कांग्रेस के एक नेता इसकी पुष्टि करते हैं। उन्होंने बताया, मध्य प्रदेश के लोग परिवर्तन के मूड में हैं लेकिन उन्हें यह भरोसा नहीं है कि कांग्रेस अगली सरकार बना पाएगी। इसीलिए उनमें पार्टी के प्रति भरोसा जगाने के लिए यह गाना तैयार किया गया है। यह गाना पार्टी की प्रचार गाडिय़ों और चुनावी सभाओं के साथ एफएम रेडियो, टीवी चैनलों आदि पर भी प्रसारित किया जाएगा। इसके अलावा कांग्रेस मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके विज्ञापन अभियान को भी मुद्दा बनाने वाली है।
    पार्टी के एक अन्य नेता के मुताबिक, वे (भाजपा) हर महीने विज्ञापन पर लगभग 300 करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं। हमारा खर्च उनके मुकाबले महज 10 फीसद ही है। जाहिर तौर पर मीडिया और चुनाव मैदान में वे हमसे ज्यादा दिख रहे हैं। लेकिन अब हम इसी को हथियार बनाने वाले हैं। लोगों को बताने जा रहे हैं कि यह जनता की गाढ़ी कमाई है जिसे भाजपा विज्ञापनों में उड़ा रही है। इसमें हमारा नारा होगा- जनता की कमाई, विज्ञापन में उड़ाई। साथ ही हम बताएंगे- कांग्रेस का वादा, विज्ञापन कम काम ज्यादा। (इकॉनॉमिक टाईम्स)

     

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Posted Date : 17-Nov-2018
  • भोपाल, 17 नवम्बर ।  मध्य प्रदेश में मतदान के लिए सिर्फ दो हफ्ते का समय बचा है और इस बीच यहां नेताओं की बयानबाजी में अब हर दिन तीखापन बढ़ रहा है। इस कड़ी में कांग्रेस के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर पौराणिक किरदारों के जिक्र के साथ निशाना साधा है। 
    ज्योतिरादित्य सिंधिया ने महाभारत के ‘कंस’ और ‘शकुनि’ के साथ उनकी तुलना करते हुए उन्हें कलयुगी ‘मामा’ बताया है। सिंधिया के मुताबिक, ‘शिवराज सिंह चौहान खुद को मध्य प्रदेश के लोगों का मामा कहते हैं। भाजपा उन्हें हिंदू धर्म का रक्षक बताती है ....लेकिन आप खुद सोचिए कि हमारी धार्मिक किताबों में मामा की क्या परिभाषा बताई गई है?
    उन्होंने आगे कहा, एक कंस मामा थे जिन्होंने अपने भांजे कृष्ण को मार देने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। दूसरे मामा शकुनि हुए जिन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य को तबाह कर डालने के लिए सब कुछ किया। और अब कलयुग में तीसरे मामा हुए हैं जो भोपाल के वल्लभ भवन (मध्य प्रदेश का सचिवालय) में बैठे हुए हैं।
    शिवराज ‘मामा’ के नाम से लोकप्रिय हैं और बड़ी संख्या में वहां के लोग उन्हें मामा कहकर भी बुलाते हैं। दरअसल खुद चौहान अपने पूरे कार्यकाल के दौरान दावा करते रहे हैं कि राज्य की महिलाओं-कन्याओं के उत्थान व भलाई के लिए उन्होंने एक भाई के तौर पर काम किया है इसीलिए प्रदेश के लोग प्रेमपूर्वक उन्हें मामा कहकर पुकारते हैं। (एनडीटीवी)

     

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Posted Date : 16-Nov-2018
  • नरेंद्र नाथ
    मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भोपाल की एक सीट बीजेपी के लिए 2019 लोकसभा चुनाव की प्रयोगशाला बनी हुई है। सूत्रों के मुताबिक भोपाल उत्तर की इस मुस्लिम बहुल सीट पर मुस्लिम महिला उम्मीदवार को उतारकर बीजेपी सियासी प्रयोग कर रही है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो 2019 में मुस्लिम बहुल सीटों पर इसे दोहराया जा सकता है। यही वजह है कि यह सीट और इस सीट से चुनाव लड़ रहीं बीजेपी प्रत्याशी फातिमा रसूल सिद्दीकी दोनों ही चर्चा में हैं। फातिमा इसलिए भी चर्चा में हैं कि वह बीजेपी की तरफ से सूबे में अकेली मुस्लिम महिला प्रत्याशी हैं।  
    भोपाल उत्तर की इस सीट पर से बीजेपी उम्मीदवार फातिमा के चुनावी कार्यालय का उद्घाटन गुरुवार को खुद सीएम शिवराज सिंह चौहान ने किया। एक उम्मीदवार के चुनावी कार्यालय में सीएम का आना ही इस सीट की अहमियत बता देता है। इस सीट का महत्व इसलिए है कि यहां कांग्रेस और बीजेपी, दोनों के उम्मीदवार मुस्लिम हैं। 
    मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में बीजेपी की अकेली मुस्लिम प्रत्याशी फातिमा के सामने यहां पांच बार के विधायक आरिफ अकील मैदान में हैं। इस क्षेत्र में लगभग 50 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। पिछली बार भोपाल जिले में एकमात्र यही सीट थी, जिसे जीतने में कांग्रेस सफल रही थी। बीजेपी को लगता है कि ट्रिपल तलाक और मुस्लिम महिलाओं से जुड़े दूसरे मुद्दों पर चुनाव को बदला जा सकता है। कांग्रेस उम्मीदवार आरिफ अकील की अपनी छवि ही उनकी ताकत है। 
    पिछले चार चुनाव से लगतार जीत रहे आरिफ की पहचान जरूरत पडऩे पर हमेशा उपलब्ध रहने वाले नेता की है। हिंदू और मुस्लिम, दोनों की बीच पकड़ है। सुलेमान अहमद के मुताबिक यह कहना गलत होगा कि वह मुस्लिम वोटरों की मदद से जीतते हैं। उनकी बात का समर्थन चाय बेचने वाले बलराम सिंह भी करते हैं। अपनी दुकान के सामने बनी सड़क को दिखाते हुए बलराम कहते हैं कि पिछली बार जब सड़क पर पानी लगा तो आरिफ ने धरना देकर सड़क बनवाई, जबकि उनके मुहल्ले में सिर्फ हिंदू रहते हैं। 
    1984 में भोपाल गैस त्रासदी के बाद सबसे अधिक प्रभावित यही इलाका हुआ था। कांग्रेस विधायक ने त्रासदी के बाद इस इलाके में एक बड़ा मुहल्ला बसा दिया। आज वह मुहल्ला उनके नाम से ही जाना जाता है- आरिफ नगर। स्थानीय लोगों के बीच पकड़ होने के बावजूद इस बार बीजेपी की बदली रणनीति से उनके सामने नई चुनौती है। लंबे समय से विधायक रहने के बाद एक स्वाभाविक ऐंटी इनकंबेंसी भी वह झेल रहे हैं। (नवभारत टाईम्स)

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Posted Date : 16-Nov-2018
  • रजनीश कुमार
    1980 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 320 में से 246 सीटें जीती थीं। मुख्यमंत्री के पद के लिए अर्जुन सिंह और आदिवासी नेता शिवभानु सोलंकी में कड़ी टक्कर थी। तीसरी दावेदारी कमलनाथ की थी।
    प्रणब मुखर्जी को तब पार्टी ने पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था। तीनों के बीच कड़ा मुकाबला हुआ और ज्यादातर विधायकों ने सोलंकी के पक्ष में हामी भरी, लेकिन कमलनाथ ने अपना समर्थन अर्जुन सिंह को दे दिया। अर्जुन सिंह 9 जून 1980 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और शिवभानु सोलंकी उपमुख्यमंत्री। अगर शिवभानु सोलंकी मुख्यमंत्री बनते तो मध्य प्रदेश को पहला आदिवासी मुख्यमंत्री मिलता।
    दिग्विजय सिंह के राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह रहे हैं, लेकिन 1993 में अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह को नहीं बल्कि सुभाष यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। आखिरकार दिग्विजय सिंह ही मुख्यमंत्री बने। अगर सुभाष यादव मुख्यमंत्री बनते तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस को पहला ओबीसी मुख्यमंत्री बनाने का श्रेय मिलता। 2003 में बीजेपी ने उमा भारती को बनाकर ये श्रेय अपने नाम किया।
    सुभाष यादव मध्य प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता माने जाते थे। उनके बेटे अरुण यादव इस विधानसभा चुनाव में बुधनी विधानसभा क्षेत्र से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ चुनाव मैदान हैं। कांग्रेस ने अरुण यादव को बुधनी से गैर-किरार ओबीसी वोटों के देखते हुए उतारा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किरार जाति से ताल्लुक रखते हैं।
    मध्य प्रदेश में दलित, आदिवासी और ओबीसी बहुसंख्यक हैं फिर भी कांग्रेस ने इस समुदाय से किसी को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया? अरुण यादव ने बीबीसी से इस सवाल के जवाब में कहा, निश्चित तौर पर ओबीसी की आबादी ज्यादा है। एससी-एसटी को भी मिला दें तो कोई मुकाबला नहीं रह जाता। पर अब उन पुरानी बातों में जाने से क्या हासिल होगा। अब नहीं हो पाया तो क्या किया जाए। मेरे पिताजी ने भी कोशिश की थी पर सफल नहीं हो पाए।
    मध्य प्रदेश में कांग्रेस 42 वर्षों तक सत्ता में रही। इन 42 वर्षों में 20 साल ब्राह्मण, 18 साल ठाकुर और तीन साल बनिया (प्रकाश चंद्र सेठी) मुख्यमंत्री रहे। यानी 42 वर्षों तक कांग्रेस राज में सत्ता के शीर्ष सवर्ण रहे। एक अनुमान के मुताबिक, मध्य प्रदेश में सवर्णों की आबादी 22 फीसदी है। दलित 15.2 फीसदी, आदिवासी 20.3 फीसदी और बाकी ओबीसी और अल्पसंख्यक हैं। देश आजाद होने के तत्काल बाद सभी हिन्दी भाषी प्रदेशों में दलितों और आदिवासियों का समर्थन कांग्रेस के साथ रहा।
    जेएनयू में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं सुधा पाई ने अपनी किताब डेवलपमेंटल स्टेट एंड द दलित क्वेश्चन इन मध्य प्रदेश: कांग्रेस रिस्पॉन्स में लिखा है कि मध्य प्रदेश में 1960 के दशक के आखिर से कांग्रेस ने अपनी नीतियों को दलित और आदिवासी केंद्रित रखना शुरू किया। सुधा पाई का कहना है कि कांग्रेस समझ गई थी कि उसके एकछत्र राज को चुनौती मिलने जा रही है इसलिए वो पहले से ही तैयार थी।
    सुधा पाई ने लिखा है, मध्य प्रदेश में आजादी के बाद कांग्रेस छोटे विपक्षी धड़ों को अपने भीतर समाहित करने में कामयाब रही लेकिन औपनिवेशिक काल में बनी हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मजबूत जड़ों से निकले जनसंघ के साथ ऐसा करने में नाकाम रही। इसका नतीजा यह हुआ कि आजादी के बाद पहले दो दशक तक सामाजिक और क्षेत्रीय विभाजन की मजबूत मौजूदगी के कारण कांग्रेस के एकछत्र राज को चुनौती मिली। जनसंघ से प्रतिस्पर्धा को देखते हुए कांग्रेस 1970 के दशक में ही और प्रगतिशील छवि अपनाने के लिए प्रेरित हुई। कांग्रेस ने आक्रामक समाजवादी एजेंडों को अपनाया और इसके तहत साक्षरता बढ़ाने, गरीबी खत्म करने और देसी रियासतों के अंत के लिए खुलकर सामने आई।
    डॉ कैलाशनाथ काटजू के बाद अर्जुन सिंह मध्य प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री बने जिन्होंने पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया। अर्जुन सिंह चुरहट के जागीरदार परिवार से थे, लेकिन वो अपनी प्रगतिशील नीतियों के लिए जाने जाते हैं।
    भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार और माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान के संस्थापक और संयोजक विजयदत्त श्रीधर कहते हैं, अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीतिक शख्सियत को मध्य प्रदेश में स्वतंत्र वर्गीय पहचान देने का काम सबसे पहले अर्जुन सिंह ने ही किया। जब मंडल आयोग की सिफारिशें धूल खा रही थीं तो अर्जुन सिंह ने पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने के लिए महाजन आयोग का गठन किया और उसकी सिफारिशों पर चुनाव से पहले फैसला भी ले लिया।
    विजयदत्त श्रीधर कहते हैं, यह अर्जुन सिंह की ही दूरदर्शिता थी कि महाजन आयोग का गठन कर पिछड़े वर्ग को कांग्रेस के साथ जोड़ा। उन्होंने संदेश दिया कि कांग्रेस पिछड़ों के हितों के लिए प्रतिबद्ध है। महाजन आयोग की सिफारिशें लागू कीं। यही वजह रही कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और बिहार में लालू यादव जैसी मध्य प्रदेश में कोई तीसरी ताकत खड़ी नहीं हो पाई। विजयदत्त श्रीधर कहते हैं कि अर्जुन सिंह भले ठाकुर थे, लेकिन वो सवर्णों के बीच अपनी नीतियों के कारण किसी विलेन से कम नहीं देखे गए।
    अर्जुन सिंह ने 9 जून 1080 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद खुद पर सामंत होने के आरोप का जवाब देते हुए कहा था, अगर मैंने अपने 23 साल के सार्वजनिक जीवन में सामंती हितों का पोषण किया हो, या कोई मेरे खिलाफ सामंती रवैया अपनाने का एक आरोप भी सिद्ध कर दे तो आज ही अपने पद से त्यागपत्र देने को तैयार हूं। 
    जहां तक सामंत के घर में जन्म लेने का आरोप है तो वह मेरे बस की बात नहीं और न मैं उसका खंडन कर सकता हूं। लेकिन मैंने अपने जीवन में कभी सामंती मनोवृत्ति को स्थान नहीं दिया।
    सुधा पाई अर्जुन सिंह के इन कदमों को बीजेपी से मुकाबला करने के लिए सूजबूझ भरा कदम मानती हैं। वो कहती हैं, कांग्रेस ने 1980 में सत्ता में वापसी की तो उसे लगा कि नवनिर्मित बीजेपी को चुनौती देने के लिए और दलितों आदिवासियों में गिरते जनाधार को थामने के लिए कुछ ठोस और विवेकपूर्ण फैसले लेने की जरूरत है। अस्सी के दशक के मध्य में बिहार और उत्तर प्रदेश में दलितों के उभार से कांग्रेस के पसीने छूट रहे थे। इन्हीं कारणों को देखते हुए अर्जुन सिंह ने साहसिक फैसले लिए और कई कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया। मंडल आंदोलन से पहले आरक्षण को लागू कर देना अपने-आप में यह क्रांतिकारी फैसला था। दूसरी तरफ यूपी-बिहार में दलित और पिछड़ों के उभार के बावजूद राज्य की सरकारें इन नीतियों को लागू नहीं कर पाईं और उनका निजी राजनीतिक स्वार्थ सबसे ऊपर रहा।
    यही कारण है कि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी 1993 के मध्य प्रदेश चुनाव में कांग्रेस जीती और भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। राजघरानों की रियासत गई पर सियासत तो है!
    दिग्विजय ने कैसे संभाली विरासत
    अर्जुन सिंह की विरासत को दिग्विजय सिंह ने भी आगे बढ़ाया। भूमिहीन दलितों को जमीन मुहैया कराने और पंचायती राज को प्रभावी बनाने का काम किया। जनवरी 2002 में तो दिग्विजय सिंह ने भोपाल दस्तावेज कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया और इसमें दलितों से जुड़े कई एजेंडों को पास किया गया। भोपाल दस्तावेज कॉन्फ्रेंस की कई सिफारिशें काफी विवादित हुईं।
    दक्षिण और पश्चिम भारत की तरह औपनिवेशिक काल में हिन्दी भाषी प्रदेशों में बड़े पैमाने पर कोई जाति विरोधी आंदोलन शुरू नहीं हुआ था। तुलनात्मक रूप से इन इलाकों में दलित चेतना देर से आई। हिन्दी भाषी प्रदेशों में दलित, आदिवासी और पिछड़ों के बीच राजनीतिक चेतना और पहचान का बोध लंबे समय तक मंद रहा इसलिए राजनीतिक व्यवस्था में इनकी भागीदारी दक्षिण और पश्चिम भारत की तुलना में कम रही।
    हिन्दी भाषी राज्यों में कांग्रेस की राजनीतिक लामबंदी का तरीका लगभग एक जैसा रहा जिसमें वोट बैंक बनाने के लिए संरक्षक की तरह व्यवहार किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि दलित और आदिवासी नेताओं या आंदोलन को कांग्रेस पार्टी ने खुद में समाहित कर लिया।
    हालांकि 1980 के दशक के मध्य से दलितों का सवाल इस इलाके में मजबूती से उठा। हिन्दी भाषी राज्यों में दलित का उभार हुआ और इससे उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा खुलकर सामने आई। इन्होंने सत्ता में भागीदारी की मांग की। पहचान आधारित निचली जातियों की पार्टी- मायावती की बहुजन समाज पार्टी, मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल का उभार हुआ। इन दलों ने पहचान की राजनीति को आगे बढ़ाया और बहुदलीय राजनीति का उभार हुआ। इसके साथ ही इन राज्यों में कांग्रेस पार्टी सिमटती गई।
    उत्तर प्रदेश और बिहार में बीएसपी, एसपी और आरजेडी ने पिछड़ी जातियों और दलितों की राजनीतिक लामबंदी को रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया और राज्यों में अपनी सरकारें बनाईं। इन पार्टियों ने मर्यादा और आत्मसम्मान को मुद्दा बनाया और साथ ही प्रतीकात्मक नीतियों के सहारे हाशिए के लोगों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश की।
    दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश में दलितों और आदिवासियों का पहचान की राजनीति से जुड़ा कोई आंदोलन सामने नहीं आया। आखिर ऐसा क्यों हुआ? सुधा पाई कहती हैं कि अर्जुन सिंह ने इन जातियों के विकास के लिए जिस मॉडल को आगे बढ़ाया था उसे दिग्विजय सिंह ने भी आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और यही कारण था कि कांग्रेस ने इन आंदोलनों की जमीन पहले ही खत्म कर दी।
    12-13 जनवरी 2002 को दिग्विजय सिंह ने भोपाल में दलितों को मुख्यधारा में बराबरी की हिस्सेदारी देने के लिए एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इसमें जिन एजेंडों पर काम करने का संकल्प लिया गया वो बहुत ही आक्रामक थे।
    दिग्विजय सिंह ने इन एजेंडों को लागू करना भी शुरू कर दिया था। सबसे पहले आरक्षित वर्गों की बैकलॉग भर्तियां शुरू की गईं। भोपाल दस्तावेज को लागू करने के दौरान मध्य प्रदेश के सवर्णों में व्यापक बेचैनी देखी गई। गांवों में चरनोई यानी पशुओं के चारागाहों और खाली पड़ी सरकारी जमीन को कुल रकबे का दो प्रतिशत कर दिया गया। पहले 10 प्रतिशत था जिसे अर्जुन सिंह ने साढ़े सात प्रतिशत किया था और दिग्विजय सिंह ने इसे दो प्रतिशत कर भूमिहीन दलितों को जमीन देना शुरू किया।
    विजयदत्त श्रीधर कहते हैं कि इसे लेकर मध्य प्रदेश के कई इलाकों में हिंसक टकराव भी हुए। वो कहते हैं, दलित एजेंडा को लागू करने में सबसे बड़ी खामी यही थी कि उसमें ठोस काम कम और शोरगुल ज्यादा हुआ। अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोगों ने अपनी गणना दलितों के साथ किए जाने पर भी आपत्ति जताई। सबसे अहम यह था कि भोपाल दस्तावेज के पृष्ठ संख्या 38 पर साफ लिखा था कि जब तक दलित हिन्दू धर्म के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं आते तब तक मुक्ति का कोई युद्ध नहीं जीता जा सकता।
    2019 के लिए क्या है कांग्रेस का रोडमैप?
    इस बात को बीजेपी ने हाथोहाथ लिया और हिन्दू समाज में फूट डालने का आरोप लगाया। दिग्विजय सिंह की इन नीतियों से मध्य प्रदेश के सवर्णों में काफी आक्रोश था तो दूसरी तरफ आरएसएस और बीजेपी ने भोपाल दस्तावेज को हिन्दू समाज को बांटने वाला बताया और दिग्विजय सिंह पर हिन्दू विरोधी होने का इल्जाम लगाते हुए धार्मिक गोलबंदी शुरू की। विजयदत्त श्रीधर मानते हैं कि 2003 में दिग्विजय सिंह की हार का मुख्य कारण भोपाल दस्तावेज भी बना।
    2003 के बाद कांग्रेस सत्ता में नहीं लौटी। मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को मतदान है और शिवराज सिंह चौहान अपने हर भाषण में कह रहे हैं कि कांग्रेस राजाओं की पार्टी है। जाहिर है उनका निशाना दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ की ओर है।
    ज्योतिरादित्य सिंधिया
    सिंधिया और दिग्विजय सिंह का ताल्लुक राजघरानों से है तो कमलनाथ भी अपने इलाके के बड़े कारोबारी हैं। तीनों में से कोई दलित, आदिवासी और पिछड़ी जाति का नेता नहीं है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी पिछले पंद्रह साल से सत्ता में है और उसने सारे मुख्यमंत्री पिछड़ी जाति के लोगों को बनाए।
    इस बार के चुनाव में भी दोनों पार्टियों ने जातीय समीकरण का खास ख्याल रखा है। कांग्रेस नेताओं ने बीबीसी को बताया कि 148 गैर-आरक्षित सीटों पर कुल 40 फीसदी उम्मीदवार ओबीसी से हैं, 27 फीसदी ठाकुर और 23 फीसदी ब्राह्मण हैं। दूसरी तरफ बीजेपी ने भी 39 फीसदी ओबीसी, 24 फीसदी ठाकुर और 23 फीसदी ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। बीजेपी के साथ खास बात यह है कि उसका नेतृत्व भी ओबीसी के पास है जबकि कांग्रेस में शीर्ष के सारे नेता सवर्ण हैं। (बीबीसी)

     

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Posted Date : 16-Nov-2018
  • राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी भाजपा के प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद मंत्री सुरेंद्र गोयल, विधायक हबीबुर्रहमान, पूर्व पार्टी महासचिव कुलदीप धनकड़ और सांसद हरीश मीणा ने पार्टी छोड़ दी है।
    राजस्थान से डीजीपी रह चुके सांसद हरीश मीणा ने भाजपा छोड़ कांग्रेस ज्वाइन कर लिया। हरीश मीणा पूर्व केंद्रीय मंत्री नमो नारायण मीणा के छोटे भाई हैं। जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे तो हरीश मीणा पुलिस महानिदेशक थे और गहलोत के काफी करीबी थे। लेकिन 2014 के चुनाव के पहले उन्होंने भाजपा ज्वाइन करके सभी को हैरान कर दिया था।
    दिलचस्प यह भी रहा कि हरीश मीणा ने अपने बड़े भाई नमो नारायण मीणा के खिलाफ दौसा से चुनाव लड़ा और उन्हें हरा दिया था। लेकिन भाजपा में उपेक्षित होने की वजह से हरीश मीणा ने कांग्रेस में शामिल होने का निर्णय लिया। कांग्रेस ने भी चुनाव में जातीय समीकरण साधने के लिए उन्हें पार्टी में शामिल किया है।
    इसी तरह भाजपा के पांच बार विधायक रह चुके हबीबुर्रहमान ने पार्टी छोड़ दी है और माना जा रहा है कि वे कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। वे टिकट न मिलने से नाराज हैं। भाजपा अब राजस्थान में 200 सीटों वाली विधानसभा चुनाव के लिए 163 नामों की घोषणा कर चुकी है। इन 163 लोगों में एक भी मुस्लिम नहीं हैं।
    किसी भी मुस्लिम को टिकट नहीं देने से राजस्थान भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे के उपाध्यक्ष एम सादिक खान भी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के अन्य शीर्ष नेताओं को पत्र लिखकर कहा है कि किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट न देने के बाद वे किस मुंह से अल्पसंख्यक समाज के लोगों के पास जाकर भाजपा को वोट देने के लिए कहें।
    भाजपा के पूर्व महासचिव कुलदीप धनकड़ ने भी पार्टी छोड़ दी है। उपेक्षित होने के कारण सोमवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया। धनकड़ जयपुर ग्रामीण की विराट नगर सीट से अपना दावा ठोंक रहे थे। अब वो भी निर्दलीय चुनाव लडऩे की बात कह रहे हैं।
    राज्य की वसुंधरा सरकार में मंत्री सुरेंद्र गोयल ने भाजपा की पहली सूची जारी होने के बाद राजस्थान भाजपा इकाई के अध्यक्ष मदनलाल सैनी को इस्तीफा सौंप दिया। गोयल ने इस्तीफे में कहा है कि वह भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहे हैं। वह भाजपा से पांच बार विधायक रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह आगामी चुनाव में जयतरण सीट से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतरेंगे।
    इससे पहले राजस्थान भाजपा के एक अन्य विधायक मानवेंद्र सिंह ने अक्टूबर में कांग्रेस का दामन थाम लिया था। मानवेंद्र सिंह भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के बेटे हैं।
    इसके अलावा कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि स्वास्थ्य मंत्री काली चरण सर्राफ, परिवहन मंत्री यूनुस खान और उद्योग मंत्री राजपाल सिंह शेखावत और मंत्री राजकुमार रिणवां का भी नाम उम्मीदवारों की सूची में नहीं है और आशंका है कि ये सभी भाजपा से किनारा करके उसकी मुसीतब बढ़ा सकते हैं।
    इन नेताओं के इस्तीफे पर राजस्थान भाजपा के चुनाव प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने कहा कि मतभेदों को समाप्त करने के लिए जो हो सकता है, पार्टी करेगी। मतभेदों को दूर करने के लिए हम बातचीत की प्रक्रिया में हैं। हमारे नेता उनसे मिलने और उनसे बात करने का प्रयास कर रहे हैं। हम उनमें से किसी को पार्टी नहीं छोडऩे देंगे।
    कांग्रेस प्रवक्ता प्रतापसिंह खाचरियावास ने कहा, इतनी बड़ी संख्या नेताओं का कांग्रेस में आना यह संकेत है कि राजस्थान में भाजपा की स्थिति बहुत कमजोर है। उनकी स्थिति कमजोर होने के कारण कांग्रेस में भाजपा नेताओं की संख्या बढ़ रही है। भाजपा को जनता का समर्थन नहीं मिल रहा है। लोग इस बात को जानते हैं कि भाजपा किसी भी कीमत पर दोबारा सत्ता में नहीं आने वाली है। इसलिए भाजपा के बड़े नेता कांग्रेस में आ रहे हैं।
    कोटा के रामगंज मंडी सीट से विधायक चंद्रकांता मेघवाल ने भी टिकट न मिलने के बाद भी निर्दलीय चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। सादड़ी सीट से विधायक गौतम दक, सागवाड़ा से अनीता कटारा, किशनगढ़ से भागीरथ चौधरी और डूंगरपुर से देवेंद्र कटारा भी बगावत पर उतर आए हैं।
    वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं, जो लोग आज भाजपा से कांग्रेस में जा रहे हैं उनकी महत्वाकांक्षा से वफादारी थी। ये नेताओं का अवसरवाद है। उन्हें लग रहा है कि हवा कांग्रेस की है और भाजपा की हालत खराब है इसलिए वे कांग्रेस में आ रहे हैं। उनको लग रहा है कि यह ट्रेंड आगे भी जा सकता है, इसलिए उनका भाजपा से मोह भंग हो गया है।
    उन्होंने कहा, आज की भाजपा में निराशा का वातावरण है। पहले भाजपा की पूंजी मानी जाती थी कि उनमें एक पारिवारिक वातावरण होता है, आपसी संपर्क होता है। अब ऐसा नहीं है। सब कुछ बहुत मैकेनिकल हो गया है। अब उनको लगता है कि भाजपा में उनका भविष्य ठीक नहीं है। आगे पांच साल कांग्रेस रहेगी।
    इसके लिए वे भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं, भाजपा ने प्रदेश में पांच साल ऐसी राजनीति की है कि अगर आप सरकार से बना कर नहीं चलेंगे तो आपका जीवन निर्वाह मुश्किल है। चाहे आप गृहस्थ हैं, चाहे आप नौकरी पेशा हैं, चाहे आप व्यापारी हैं। अगर आप सरकार से असहमति रखते हैं तो आपका जीवन निर्वाह मुश्किल है। इसलिए लोगों को लगता है कि अगर पांच साल कांग्रेस सरकार में रहेगी तो उन्हें मुश्किल नहीं होगी, उनका व्यापार या करियर सुरक्षित रहेगा। 
    इसलिए वे भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जा सकते हैं।
    भाजपा ने पहली सूची में 131 प्रत्याशियों की घोषणा की थी, जिनमें से 85 पुराने चेहरों को ही मौका दिया गया, जबकि 25 मौजूदा विधायकों का टिकट काट दिया है। जिन लोगों को टिकट नहीं मिल पाया उनमें से ज्यादातर नाराज हैं।
    भाजपा की दूसरी सूची जारी हुई है जिसमें 31 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की गई। इस सूची में तीन मंत्रियों समेत 16 मौजूदा विधायकों का टिकट काट दिया गया है। स्थानीय पत्रकार संदीपन शर्मा का कहना है, जमीन पर भाजपा की हालत खराब है। सत्ता विरोधी लहर के कारण वह पुराने चेहरों पर दांव लगाना नहीं चाहती। लेकिन पुराने चेहरे बगावत पर उतर आए हैं। राजस्थान की अधिकांश सीटों पर भाजपा बगावत झेल रही है। यह उसके लिए मुसीबत खड़ी करेगा।
    नारायण बारेठ कहते हैं, दरअसल भाजपा ने जो बोया है, वही काट रही है। अभी और लोग भी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में जा सकते हैं। हरीश मीणा का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, हरीश मीणा अशोक गहलोत के समय पुलिस महानिदेशक रहे। गहलोत ने उन्हें नियमों को दरकिनार करके नियुक्त किया था। जैसे ही भाजपा की सरकार आई, वसुंधरा ने उनको पद से हटा दिया। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली और भाजपा से सांसद बन गए। अब वे कांग्रेस में आ गए।
    यानी जो सत्ता में रहे, उसी से करीबी बनाकर रखने के लिए यह भगदड़ मची है। बारेठ कहते हैं कि ऐसा माहौल है कि हर किसी को सत्ता के संरक्षण की जरूरत है। यह घुटन नाम की बीमारी हर पांच साल में आती है। जब पार्टी हारने लगती है तो उनको घुटन होने लगती है। अब कांग्रेस आ रही है तो उनको भाजपा से घुटन होने लगी है। जब भाजपा सत्ता में आएगी तो उनको कांग्रेस से घुटन होने लगेगी।
    भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ये इस्तीफे पार्टी के सत्ता में वापसी के अवसर को कम कर देंगे। राजस्थान भाजपा के चुनाव प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने दिप्रिंट से फोन पर बातचीत में कहा, ृहम लोग अपने ढंग से सबको समझा हैं। सभी पार्टी के महत्वपूर्ण कार्यकर्ता हैं। हमारा प्रयास है कि हम किसी को पार्टी छोड़कर जाने नहीं देंगे। (दिप्रिंट )

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Posted Date : 16-Nov-2018
  • अनिल चमडिय़ा

    निकट भविष्य में चुनाव आयोग पेड न्यूज पर रोक लगाने के लिए कुछ नए गाइडलाइंस जारी कर सकता है। इस आशंका की सबसे बड़ी वजह तो यही है कि चुनाव मैदान में उम्मीदवार और मीडिया संस्थान मौजूदा प्रावधानों को बेमानी बना देंगे।
    इतिहास बताता है कि उम्मीदवारों और मीडिया के बीच पेड न्यूज के लिए बना गठजोड़ चुनाव आयोग के हर नए दिशा-निर्देश के बाद भी एक नई खोज कर लेता है। यह गठजोड़ इस कहावत में भरोसा करता है कि तू डाल-डाल तो मैं पात-पात।
    पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोती ने आयोग से अपनी विदाई से पूर्व अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा था कि संस्थाएं, राजनीतिक पार्टियां और उम्मीदवार चुनाव और स्थापित नियम कायदों का उल्लंघन करने के लिए नए नए रास्ते और चालाकियों की खोज कर लेते हैं।
    दिसंबर, 1997 के आखरी हफ्ते में चुनाव आयोग से राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों ने ये शिकायत की कि टेलीविजन चैनलों द्वारा प्रसारित मतदान पूर्व सर्वेक्षण और मतदान के तत्काल बाद सर्वेक्षण से मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है और यह स्वतंत्र चुनाव संपन्न कराने के सिद्धांतों के खिलाफ है। लेकिन यह उन पार्टियों के लिए आंसू जैसा था जो मीडिया का अपने पक्ष में इस्तेमाल करने से चूक गई थी।
    चुनाव आयोग ने इन शिकायतों के तत्काल बाद जनवरी, 1998 के दूसरे हफ्ते में निजी और सरकारी चैनलों के प्रतिनिधियों के अलावा टेलीविजन के लिए समसामयिक विषयों पर कार्यक्रम तैयार करने वाले प्रोड्यूसरों को भी आमंत्रित किया था और उनके सामने यह चुनौती पेश की थी कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार की खबरों को लेकर संतुलन बनाया जाना चाहिए।
    लेकिन व्यावसायिक कंपनियों द्वारा किए जाने वाले मतदान पूर्व और बाद के सर्वेक्षण महज पेड न्यूज की बीमारी का एक लक्षण साबित हुए। लगभग हर चुनाव के बाद मीडिया युद्ध में आहत राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग के सामने ये शिकायत लेकर पहुंचती रही हैं कि उनकी प्रतिद्वंद्वी पार्टियों में पेड न्यूज की बीमारी के कौन-कौन से नए लक्षण देखे गए हैं।
    इसके बाद चुनाव आयोग अपने पुराने दिशा-निर्देशों में उस लक्षण के भी उपचार की जरूरत पर बल देने की औपचारिकता पूरी करता रहा है और यह छूत की बीमारी फैलती गई है।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का कहना है कि हाल के दिनों में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी मतदान के लिए अगर कोई सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने दिखता है तो वह मीडिया के उल्लंघनों की प्रवृति है। मतदान को प्रभावित करने वाले टेलीविजन जैसे माध्यम भारत के लिए नए थे और चुनाव आयोग का फोकस टेलीविजन चैनलों की तरफ रहा तो मीडिया मैनेजमेंट कंपनियों ने राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों को उससे पुरानी तकनीक रेडियो का रास्ता दिखा दिया।
    तब चुनाव आयोग ने भी मतदान को प्रभावित करने वाले तौर-तरीकों पर बंदिशें लगाने वाले अपने पुराने दिशा-निर्देशों में अप्रैल 2004 में रेडियो को भी शामिल कर लिया। चुनाव आयोग के जून 2010 के एक परिपत्र के अनुसार आयोग ने प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खतरे के निशान की तरफ बढ़ते पेड न्यूज की प्रथा को खत्म करने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधानों का अधिकतम इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है।
    तब तक चुनाव आयोग के सामने प्रिंट मीडिया में पेड न्यूज का इतना ही रूप रंग दिखाई दिया था कि किसी पार्टी और उसके उम्मीदवार की तरफ रेंगते समाचार आधारित लेख व रिपोर्ट प्रकाशित किए जाते हैं अथवा प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों की बेवजह इस तरह रगड़ाई की जाती है ताकि मतदाताओं को प्रभावित किया जा सके।
    पांच विधानसभाओं के मौजूदा चुनाव प्रचार के दौरान मीडिया की भूमिका पर नजर रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि अब तो प्रिंट ने पेड न्यूज की चालाकियों का जाल सा बिछा लिया है कि उसे पाठकों के भीतर उठने वाले भावों के अलावा किसी अन्य तरह से प्रमाणित करना मुश्किल है।
    पाठक अखबार में उम्मीदवार की खबर को पढ़कर बेसाख्ता कह सकता है कि यह पेड न्यूज है और सबूत के तौर पर बस उसके पास इतना ही होता है। कमोबेश इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी खबरें देखने के बाद ही ये महसूस हो सकता है कि ये पेड न्यूज है।
    2012 में चुनाव आयोग ने ये पाया कि पेड न्यूज की बीमारी को खत्म करने के लिए उसकी ओर से अब तक जितने उपचार सामने आए हैं उनमें सिनेमा हॉल को भी शामिल किया जाना चाहिए। इसी इरादे से उसने अपने पुराने और 21 नवंबर 2008 को जारी दिशा निर्देश पत्र में संशोधन करने का फैसला लिया।
    चुनाव आयोग मीडिया के संभावित दुरुपयोग की आशंका के मद्देनजर कार्रवाई नहीं कर सकता है। चुनाव आयोग जैसी संस्था पुलिस की तरह शिकायतों पर कार्रवाई करती है। दूसरी तरफ भारत में तकनीक का आयात इस तेजी के साथ हुआ है कि चुनावों में जीतने की शर्त को पूरा करने के लिए राजनीतिक पार्टियां और उम्मीदवार पैसों की ताकत से उन्हें खरीद लेती हैं और चुनाव आयोग तक शिकायत होने से पहले चुनावों में उनका इस्तेमाल कर चुकी होती हैं। चुनाव आयोग ने अभी तक प्रकाशित और प्रसारित होने वाले पेड न्यूज के आठ फॉर्मेट को वर्गीकृत किया है।
    2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इस लेखक को चुनाव आयोग के महानिदेशक प्रसन्न कुमार दास ने बताया कि अभी 40 ऐसे तरीके हैं जिनके जरिए उम्मीदवार धन का दुरुपयोग करते हैं। उनमें गली-मोहल्ले में शराब बांटने से लेकर गाडिय़ां बांटने तक के मामले शामिल हैं।
    बम पिस्तौल से हिंसा के रूप तो गिने-चुने हैं, लेकिन धन के दुरुपयोग के रूपों का कोई अंत नहीं दिखता है। महानिदेशक दास के अनुसार अब जो चालीस तरीकों से धन का दुरुपयोग किया जाता है, वह आने वाले दिनों में बढ़ेगा ही।
    सोशल मीडिया की तकनीक ने तो चुनाव आयोग द्वारा पेड न्यूज के निगरानी तंत्र को एक विशाल ढांचे में तब्दील करने के लिए बाध्य-सा कर दिया है। यह दावा किया जा सकता है कि देश के पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर 11 अक्तूबर 2018 को चुनाव आयोग ने मीडिया कवरेज के संबंध में जो प्रेस नोट जारी किया है, वह हनुमान की पूंछ की तरह लंबा होते जाने का एक उदाहरण कहा जा सकता है। लोकतंत्र की रक्षा के उद्देश्य से चुनाव आयोग निर्देशों का एक सिद्धांत जारी करता है, लेकिन राजनीतिक पार्टियां और उनके मनोनीत उम्मीदवार एक वकील की तरह पेड न्यूज के बचाव के लिए नई चालाकी की खोज कर लेते हैं।

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Posted Date : 16-Nov-2018
  • शिवम् विज

    दिसंबर में हमने वास्तविकता की जांच करने की एक आदत विकसित की है। लेकिन नए साल की पूर्व संध्या से हम इसे भूल जाते हैं, फिर अगले दिसंबर में हम इस पर विचार करते हैं।

    पिछले दिसंबर गुजरात विधानसभा चुनाव ने पूरे देश का ध्यान ग्रामीण संकट की तरफ खींचा था। जीएसटी और पटेलों की नाराजगी के बावजूद शहरी गुजरात भाजपा के साथ खड़ा था, लेकिन ग्रामीण गुजरात इससे बिल्कुल अलग दिखा।
    ऐसे समय जब राष्ट्रीय मीडिया में राम, राफेल, सीबीआई, आरबीआई, मोदी और राहुल छाए हुए हैं, सबसे बड़ी स्टोरी भारत का ग्रामीण संकट है। हमें फिर से 11 दिसंबर को ग्रामीण भारत की दिक्कतों के बारे में एक रिमाइंडर मिल सकता है। यह सिर्फ भाजपा शासित राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की नहीं, बल्कि टीआरएस के नेतृत्व वाले तेलंगाना की भी यही कहानी है। इन चुनावों में मुख्य मुद्दा ग्रामीण संकट है।
    इस बात से अलग कि इन चुनावों में कौन जीत हासिल करता है या कौन हारता है, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण सीटों पर मतदान कैसे हुआ है। पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के लिए 11 दिसंबर को परिणाम आएगा। अगर 11 दिसंबर के परिणामों में साफ-साफ ग्रामीण और शहरी विभाजन दिखता है तो यह 2019 में नरेंद्र मोदी की संभावनाओं पर असर डालेगा।
    अब तक, भाजपा के मतदाता प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच ब्रांड मोदी और भारतीय जनता पार्टी के बीच का अंतर कर रहे हैं। कोई भी ऐसा भाजपा शासित राज्य नहीं है जहां यह कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री की तुलना में अधिक लोकप्रिय हैं- यहां तक कि मध्य प्रदेश में 'मामाÓ शिवराज भी नहीं।
    अगर 11 दिसंबर गांव से टूटे हुए कनेक्शन की चेतावनी लेकर आता है तो यह 2019 में मोदी के दोबारा चुने जाने की संभावनाओं पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा। ग्रामीण गुजरात द्वारा दी गई चेतावनी के बावजूद केंद्र और भाजपा की राज्य सरकारों ने ग्रामीण भारत की बेहतर आर्थिकी के लिए कुछ खास नहीं किया है। अभी इसके लिए राज्य सरकारों को दोष दिया जा सकता है लेकिन एक अच्छा मौका है कि लोग नरेंद्र मोदी से यह सवाल पूछना शुरू दें।
    आंकड़ों पर विचार करें
    शहरी और ग्रामीण दोनों भारत आर्थिक मंदी की चपेट में हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में समस्या गंभीर है। ग्रामीण मजदूरी वृद्धि दर तीन वर्षों में सबसे न्यूनतम स्तर पर है। मुद्रास्फीति को समायोजित करने के बाद वास्तविक मजदूरी वृद्धि वर्तमान में नकारात्मक है। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्रामीण भारतीयों के पास अभी बहुत कम क्रय शक्ति है। वास्तव में वास्तविक ग्रामीण मजदूरी वृद्धि दर 10 वर्षों में सबसे न्यूनतम है।
    2016 में जब ग्रामीण आय में इजाफा होता दिख रहा था तब मोदी सरकार ने नोटबंदी की घोषणा कर दी। उसके कुछ समय बाद सरकार ने जीएसटी लागू कर दिया। इन दोनों का प्रभाव ग्रामीण मजदूरी पर बुरी तरह से हुआ।
    इन सबके बीच ग्रामीण भारत के लोगों के लिए राहत की बात कम मुद्रास्फीति है जो कि उनके क्रय शक्ति में वृद्धि की कमी को दर्शाता है और शहरी भारत की तुलना में ग्रामीण भारत में मुद्रास्फीति तेजी से कम हो रही है। जबकि ईंधन की कीमतों में वृद्धि ने मुद्रास्फीति में वृद्धि की है लेकिन खाद्य कीमतों में गिरावट जारी है।
    खाद्य मुद्रास्फीति विशेष रूप से कम रही है, यह कम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को दर्शाता है और अब जो वृद्धि भी हुई है, किसानों को उसका फायदा नहीं मिला है।
    इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि ग्रामीण भारत में भाजपा के समर्थन में धीरे-धीरे कमी आ रही है लेकिन सर्वेक्षणों में तेजी से गिरावट आई है। खाद्य मुद्रास्फीति में कमी से शहरी गरीब खुश हो सकते हैं लेकिन इसकी कीमत किसानों के जेब से जा रही है। अंतरराष्ट्रीय वस्तुओं की कम कीमतों ने खाद्य निर्यात में मदद नहीं की है।
    धान और कपास के अलावा, उत्पादन लागत के 1.5 गुना के एमएसपी की घोषणा केवल कागजों पर किया गया वादा है। वादे और वास्तविक बाजार की कीमतों के बीच के अंतर को भरने के प्रयास अभी तक विफल ही रहे हैं।
    भारत में इस साल मानसून के सामान्य रहने के बावजूद 640 जिलों में से 200 जिले सूखे का सामना कर रहे हैं। इसमें मध्य प्रदेश और राजस्थान के जिले भी शामिल हैं।
    इतिहास खुद को दोहराता है
    एक ऐसे समय जब कृषि अर्थव्यवस्था बहुत ही खराब दौर से गुजर रही है तो ग्रामीण भारत के लोग फैक्टरी में नौकरियों के लिए भी पलायन नहीं कर पा रहे हैं। मेक इन इंडिया सिर्फ सपना ही रह गया है। मोदी सरकार ने नरेगा पर ध्यान नहीं दिया जिसने भूमिहीन मजदूरों के जीवन को और कठिन बना दिया है।
    हम यह पिक्चर पहने भी देख चुके हैं। मोदीनॉमिक्स कुछ-कुछ बाजपेयीनॉमिक्स जैसी है। 2004 में कृषि वृद्धि दर और वास्तविक ग्रामीण मजदूरी में कमी हो रही थी। सरकार ने कृषि आय के बजाय बड़े बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करना चुना। हम जानते हैं कि उसका क्या प्रभाव हुआ।
    पिछले दिसंबर में भाजपा ने ग्रामीण सीटों के हाथ से निकल जाने के बावजूद गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। इसका कारण है कि गुजरात की लगभग 43 प्रतिशत जनता (जनगणना 2011 के अनुसार) शहरी इलाकों में रहती है।
    मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा सिर्फ 28 फीसदी, राजस्थान में 25 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 23 प्रतिशत है। अगर इन तीनों राज्यों की ग्रामीण जनता ने पिछले दिसंबर में हुए गुजरात चुनाव की तरह भाजपा को नकार दिया तो पार्टी इन तीनों राज्यों में हार जाएगी। (केसीआर को इस मामले में थोड़ी राहत मिल सकती है क्योंकि राज्य की करीब 40 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्रों में है।) क्या ब्रांड मोदी ग्रामीण भारतीयों को 2022 तक धैर्य रखने के लिए मना सकता है? हम 11 दिसंबर को जान लेंगे। (दिप्रिंट)

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Posted Date : 16-Nov-2018
  • नई दिल्ली, 16 नवम्बर (द हिंदू)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार जब से केंद्र में आई है तभी से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उसका टकराव होने की खबरें लगातार सुनने-पढऩे में आ रही हैं। यानी अगर ये कहें कि यह टकराव अब स्थायी सा सिलसिला हो चला है तो भी शायद ज्यादा गलत नहीं होगा। और अब इसी में एक अगली कड़ी जुडऩे की संभावना बन रही है। सूत्रों के अनुसार यह अगला मामला पश्चिम बंगाल का नाम बदलने से संबंधित हो सकता है।

    ममता बनर्जी काफी समय से इस कोशिश में हैं कि पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर 'बांग्लाÓ कर दिया जाए। लेकिन चूंकि यह काम केंद्र सरकार ही कर सकती है इसलिए राज्य की सरकारी मशीनरी ने विधानसभा से एक प्रस्तावित कर उसके पास भेजा। यह बात है इसी साल 16 जुलाई की। सूत्र बताते हैं कि राज्य विधानसभा से इस बाबत प्रस्ताव पारित कर इसलिए केंद्र के पास भेजा गया क्योंकि 2016 के ऐसे ही प्रस्तावित मसौदे को केंद्रीय गृह मंत्रालय खारिज कर चुका था।
    उस वक्त पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर हिंदी में 'बंगालÓ, बंगाली में 'बांग्लाÓ और अंग्रेजी में 'बेंगॉलÓ किए जाने का प्रस्ताव केंद्र के पास भेजा गया था। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कह दिया कि भिन्न भाषाओं में अलग-अलग नाम रखे जाने संभव नहीं हैं। लिहाजा सभी भाषाओं में समान रूप से 'बांग्लाÓ किए जाने का प्रस्ताव केंद्र के पास भिजवा दिया गया। लेकिन सूत्रों पर यकीन करें तो यह ताजा प्रस्ताव भी केंद्र सरकार खारिज कर सकती है। यह कहते हुए कि ऐसा करना 'राष्ट्रहित में नहीं है।Ó
    केंद्र के एक वरिष्ठ अधिकारी इसकी पुष्टि करते हैं। उनके मुताबिक 'पश्चिम बंगाल का नाम बदले जाने संबंधी प्रस्ताव पर विदेश मंत्रालय से भी मशविरा किया गया है। वहां से इसको लाल झंडी दिखाई जा सकती है क्योंकि प्रस्तावित नाम पश्चिम बंगाल के पड़ोस से लगने वाले बांग्लादेश से मिलता-जुलता है। इस मिलते-जुलते नाम की वजह से अवैध घुसपैठियों को भारत की सीमा में घुसने का प्रोत्साहन मिलेगा। यह एक नई तरह की दिक्कत हो सकती है। हालांकि अभी सूत्र यह भी जोड़ते हैं कि विदेश मंत्रालय ने अपनी कोई आधिकारिक राय नहीं दी है। इसलिए इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला होने में भी कुछ वक्त लग सकता है। 

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Posted Date : 16-Nov-2018
  • रजनीश कुमार

     

    भोपाल से, 16 नवम्बर (बीबीसी)। अमित भोपाल में चिनार पार्क के सामने कांग्रेस की प्रचार सामग्रियां बेच रहे हैं। बगल में ही कांग्रेस कार्यालय है। शाम का वक्त है और अचानक दिलीप भैया जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे।
    ये नारे किसी स्थानीय नेता के समर्थन में कांग्रेस के कार्यकर्ता लगा रहे हैं। इन्होंने दिलीप भैया को माला पहनाई और साथ में सेल्फी ली।
    अमित के बगल में रघुनाथ भी प्रचार सामग्री बेच रहे हैं। अमित के स्टॉल के सामने एक कार रुकती है और उसमें बैठे लोग कांग्रेस के झंडे की कीमत पूछते हैं। कार में बैठे लोग कहते हैं कि कपड़ा ठीक नहीं और कीमत ज्यादा है। अमित झंडे को वापस मोड़कर रख लेते हैं। अमित का कहना है कि आज धंधा बहुत मंदा रहा।
    वहीं खड़े एक युवक ने कहा कि बीजेपी का भी बेचो। अमित ने उस सज्जन को कहा कि यहां से मेरी दुकान उखड़वाएंगे क्या?
    रघुनाथ का कहना है कि जब कमलनाथ आते हैं तो बिक्री बढ़ जाती है। वो प्रचार सामग्री ज्यादा नहीं बिकने की एक वजह ये भी बताते हैं, कांग्रेस के पास पैसा कहां है। 15 साल से तो बीजेपी है। पैसा तो उन लोगों के पास है। उस युवक ने तभी तपाक से कहा, इसीलिए तो कह रहा हूं कि बीजेपी का बेचो। रघुनाथ कुछ जवाब नहीं देते हैं।
    यहां के कांग्रेस दफ्तर का नाम इंदिरा भवन है। दफ्तर के बाहर इंदिरा गांधी की बड़ी सी मूर्ति लगी है। तीसरे फ्लोर पर राज्य के चुनाव प्रभारी दीपक बाबरिया एक बंद हॉल में कांग्रेस नेताओं से घिरे हैं। कुछ जिला अध्यक्ष बनाने की गुजारिश कर रहे हैं तो कुछ लोग जिला अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष।
    वहीं बैठे एक सज्जन बुंदेलखंड के लिए गाड़ी की मांग कर रहे हैं और वो चाहते हैं कि गाड़ी वीआईपी हो। दीपक बाबरिया ने अपने बैग से कागज निकाला और कहा कि नीचे चले जाइए। कुछ ही मिनट में वो फिर वापस आए गए और उनके साथ आया दूसरा आदमी बताने लगा कि गाड़ी क्यों नहीं दे सकते। तीनों के बीच बात हुई लेकिन कोई रास्ता नहीं निकला।
    कांग्रेस का कहना है कि वो 2003, 2008 और 2013 के चुनावों में वो एकजुट नहीं थी और इस बार पूरी तरह से एकजुट है। हालांकि कांग्रेस की समस्या केवल एकजुटता में कमी नहीं है। प्रदेश में कांग्रेस संगठन की कमजोरी और लंबे समय से सत्ता से बाहर होने के कारण आर्थिक तंगी से भी जूझ रही है। इसके साथ ही कांग्रेस के पास प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की तरह लोकप्रिय चेहरा नहीं है।
    दीपक बाबरिया इस बात को स्वीकार करते हैं लेकिन कहते हैं कि प्रदेश की वर्तमान सरकार के खिलाफ इतना गुस्सा है कि कांग्रेस सभी चुनौतियों से निपट लेगी। वो कहते हैं कि शिवराज सिंह चौहान के जवाब में पार्टी ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुना है। बाबरिया का कहना है कि इन्हीं दोनों में से एक को कांग्रेस चुनाव के बाद आगे करेगी।
    लेकिन क्या कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर के भरोसे ही बैठी है?
    वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर कहते हैं, मध्य प्रदेश में इस बार का चुनाव पिछले तीन चुनावों से बिल्कुल अलग है। ये बात सही है कि पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस एकजुट नहीं थी। इस बार तो दिग्विजय सिंह को राहुल गांधी ने सबसे बड़ा काम दिया है। मुझे लगता है कि यह काम उनके अलावा कांग्रेस में कोई कर भी नहीं सकता है। वो हर दिन पार्टी के बागियों को पकड़ दफ्तर लाते हैं और कमलनाथ के पास भेज देते हैं। दिग्विजय सिंह की खूबी ये है कि प्रदेश के हर जिले में उनके लोग हैं और उनमें लोगों को मनाने की काबिलियत भी है।
    श्रीधर मानते हैं कि इस बार के चुनाव में कांटे की टक्कर है। वो कहते हैं कि लोगों को समस्या शिवराज सिंह चौहान से नहीं है बल्कि मंत्रियों और विधायकों से है।
    कांग्रेस के दफ्तर में दिग्विजय सिंह, सिंधिया और कमलनाथ के अलग-अलग कमरे हैं। सिंधिया रैलियां कर रहे हैं इसलिए दफ्तर में कम ही दिखते हैं। वहीं दिग्विजय सिंह का आना जाना लगा रहता है। कांग्रेस कार्यकर्ता भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि दिग्विजय सिंह ने कई बागियों को मनाया है।
    कांग्रेस बीजेपी के 15 साल के शासनकाल की जमकर आलोचना तो करती है लेकिन जैसे ही दिग्विजय सिंह के 10 साल के शासनकाल की बात आती है तो कोई मुकम्मल जवाब नहीं दे पाती है। हालांकि बुधनी में शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ कांग्रेसी उम्मीदवार अरुण यादव ने बातों-बातों में कह ही दिया कि उसी का खामियाजा पार्टी पिछले 15 वर्षों से भुगत रही है।
    दीपक बाबरिया और शोभा ओझा से यही सवाल पूछा कि दिग्विजय सिंह ने 10 साल में ऐसा क्या कर दिया था कि कांग्रेस 15 साल तक सत्ता में नहीं लौटी?
    शोभा ओझा कहती हैं कि फंड की कमी थी और छत्तीसगढ़ बनने के बाद ऊर्जा के सारे स्रोत वहीं चले गए थे। हालांकि छत्तीसगढ़ साल 2000 में बना था और दिग्विजय सिंह की सरकार 2003 में चली गई थी। दूसरी बात यह कि तब छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की ही सरकार थी। दीपक बाबरिया पार्टी में एकजुटता के अभाव को कारण मानते हैं।
    मध्य प्रदेश में चुनावों पर नजर रखने वाले इस बात को स्वीकार करते हैं कि कांग्रेस इस बार एकजुट है। लेकिन इनका कहना है कि कांग्रेस के पास शिवराज के टक्कर का कोई नेता नहीं है। कमलनाथ और सिंधिया के बारे में इनकी राय है कि ये पूरे प्रदेश को ठीक से नहीं जानते हैं और जो दिग्विजय सिंह जानते हैं उनकी छवि ठीक नहीं है।
    श्रीधर भी कहते हैं कि कांग्रेस के साथ इस चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती यही है। वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया का भी यही मानना है कि शिवराज सिंह को चुनौती देने की काबिलियत दिग्विजय सिंह में ही है, लेकिन उनकी छवि को खराब करने में बीजेपी ने बड़ी सफलता हासिल की है।
    बीजेपी के प्रवक्ता भी नाम न छापने की शर्त पर दबी जुबान में यह कहते हैं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास असली नेता दिग्विजय सिंह ही थे। एक भाजपा प्रवक्ता ने कहा, कांग्रेस के बड़े नेता तो दिग्विजय सिंह ही हैं। ऐसा इसलिए कि उनकी पकड़ प्रदेश के हर जिलों में ही नहीं बल्कि ब्लॉक स्तर तक उनके लोग हैं। लेकिन उनकी छवि ठीक नहीं है और कांग्रेस तो उनसे रैलियां भी नहीं करवा रही है।
    शाम के 6 बजे चुके हैं और दीपक बाबरिया अब भी उसी बंद हॉल में हैं। लोगों की संख्या और बढ़ गई है। इस बार दीपक थोड़ा झल्ला कर बोलते हैं और कहते हैं कि अभी केवल चुनाव प्रचार की बात करो। उसी दौरान एक साथी पत्रकार ने दीपक से सवाल पूछ लिया कि इस बार कांग्रेस मुसलमानों को टिकट देने से बचती दिखी। वहां बैठे कुछ मुस्लिम नेता उनके जवाब सुनने के लिए पूरी तरह से सतर्क हो गए और उनके चेहरे देखने से साफ लग रहा था कि यह उनका पसंदीदा सवाल था।
    बाबरिया न चाहते हुए भी जवाब देते हैं, कांग्रेस को लोकतंत्र के मूल्यों और चुनावी राजनीति की मजबूरियां जैसी चुनौतियों से टकराना होता है। जाहिर है आज की चुनावी राजनीति में दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। हमारे सामने विपक्षी पार्टी की रणनीति के कारण ये दुविधा होती है।
    बीजेपी के दफ्तर जाएं तो साफ अहसास होता है कि उनके पास कोई दुविधा नहीं है। बीजेपी से पूछिए कि आपने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया तो उनका साफ जवाब होता है, हम जीतने वाले उम्मीदवार को टिकट देते हैं न कि धर्म के आधार पर।

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • दिनेश गुप्ता
    साल 2003 में मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने वाली उमा भारती का वनवास इस विधानसभा चुनाव में खत्म होता नजर आ रहा है। पिछले पंद्रह साल में उमा भारती का राजनीतिक ग्राफ घटता-बढ़ता रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विरोध के कारण वे पिछले आठ साल से मध्यप्रदेश की सक्रिय राजनीति से दूर थीं। इस चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों के पक्ष में उमा भारती जिस तरह से प्रचार कर रहीं हैं, उससे लगता है कि वे अगले लोकसभा चुनाव में अपने गृह राज्य मध्यप्रदेश की किसी सीट से चुनाव लड़ सकतीं हैं।
    साल 2003 में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर भारतीय जनता पार्टी पहली बार विधानसभा के चुनाव मैदान में उतरी थी। उमा भारती के चेहरे को ही आगे रखकर पार्टी ने दिग्विजय सिंह के दस साल के शासन को पलट दिया था।
    उमा भारती राज्य की मुख्यमंत्री बनीं लेकिन, कर्नाटक की हुवली में दर्ज एक आपराधिक मामले के चलते उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उमा भारती के स्थान पर बाबूलाल गौर को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था। इस घटनाक्रम के बाद उमा भारती तिरंगा यात्रा पर निकल गई थीं। तिरंगा यात्रा समाप्त होने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री के पद पर अपनी वापसी के लिए पार्टी पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष वैंकेया नायडू से भी उमा भारती की पटरी नहीं बैठती थी। प्रमोद महाजन जैसे ताकतवर नेता शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में थे।
    उमा भारती ने पार्टी संसदीय बोर्ड के निर्णय के बाद भी मध्यप्रदेश बीजेपी की विधायक दल की बैठक में शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाए जाने का विरोध भी किया। उमा भारती ने पार्टी से बगावत कर भारतीय जनशक्ति पार्टी के नाम से एक नया राजनीतिक दल गठित कर लिया। साल 2008 के विधानसभा चुनाव में उमा भारती ने अपने उम्मीदवार भी चुनाव मैदान में उतारे थे। उमा भारती की पार्टी के मैदान में होने का लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला था। राज्य में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में दूसरी बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। उमा भारती पिछले पंद्रह वर्षों में दो बार बीजेपी से अलग हुई हैं। जून 2011 में उनकी बीजेपी में वापसी इस शर्त पर हुई थी कि वे मध्यप्रदेश की राजनीति से अपने आपको दूर रखेंगी।
    उत्तरप्रदेश की राजनीति में उमा भारती ने चरखारी विधानसभा सीट से शुरुआत की थी। मध्यप्रदेश में साल 2013 में हुए विधानसभा के आम चुनाव में भी पार्टी ने उमा भारती को दूर ही रखा था। उमा भारती साल 2014 में झांसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंच गईं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में उन्हें जल संसाधन और गंगा सफाई मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। बाद में उन्हें पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय दे दिया गया। इसी बीच मध्यप्रदेश में उजागर हुए व्यापमं घोटाले में उनका नाम भी सामने आ गया। उमा भारती ने इसे राजनीतिक षडयंत्र बताते हुए गिरफ्तारी देने की तैयारी कर ली। किसी तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बात को संभाला। लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम से शिवराज-उमा के बीच तनाव काफी गहरा हो गया।
    पिछले कुछ महीने में राजनीतिक हालात काफी बदले हैं। इन बदले हालातों में शिवराज सिंह चौहान ने भी उमा भारती से अपने रिश्तों को सुधारना शुरू कर दिया। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को भोपाल में आवंटित किए गए बंगलों को खाली कराने का आदेश दिया था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस आदेश के बाद भी उमा भारती का बंगला खाली नहीं कराया। विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण के दौरान जब यह खबरें चलीं कि उमा भारती ने टिकट के लिए अपनी एक अलग सूची दी है, तो उन्होंने तत्काल प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष राकेश सिंह को पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया कि मैने कोई नाम नहीं दिए हैं।
    मध्यप्रदेश विधानसभा के इस चुनाव में उमा भारती की सक्रियता लोगों को हैरान करने वाली है। उमा भारती विधानसभा अध्यक्ष डॉ सीताशरण शर्मा का पर्चा भरवाने के लिए होंशगाबाद पहुंच गईं। वहां डॉ शर्मा का मुकाबला बीजेपी के बागी सरताज सिंह से हो रहा है। सरताज सिंह को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया है। निर्वाचन अधिकारी के कक्ष में ही उमा भारती का सरताज सिंह से आमना-सामना हो गया। सरताज सिंह ने उमा भारती के पैर छुए।
    उमा भारती ने सरताज सिंह से कहा कि वे नामंकन पत्र दाखिल न करें और कांग्रेस को टिकट लौटा दें। बीजेपी उम्मीदवार सीताशरण शर्मा, उमा भारती के समर्थक माने जाते हैं। उमा भारती कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश विजयवर्गीय का चुनाव प्रचार करने के लिए भी इंदौर गईं। कैलाश विजयवर्गीय, उमा भारती मंत्रिमंडल में काफी ताकतवर मंत्री रहे थे। बाद में दोनों के बीच दूरी भी बनी। आकाश विजयवर्गीय इंदौर तीन से चुनाव लड़ रहे हैं।
    पार्टी ने उमा भारती का नाम स्टार प्रचारकों की सूची में भी रखा है। उमा भारती, बुंदेलखंड क्षेत्र में भी प्रचार के लिए सक्रिय हैं। उमा भारती इस सक्रियता का अर्थ यह निकाला जा रहा है कि वे विधानसभा चुनाव के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सक्रिय भूमिका में नजर आ सकती हैं। (फस्र्टपोस्ट)

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • सैयद मोजिज इमाम, स्वतंत्र पत्रकार
    हरियाणा में ताऊ देवीलाल के परिवार में लड़ाई तेज हो गई है। आईएनएलडी ने पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला के बड़े बेट अजय चौटाला को पार्टी से निकाल दिया है। पार्टी के भीतर लड़ाई चरम पर है। इससे पहले पार्टी अजय चौटाला के दोनों पुत्र दिग्विजय और दुष्यंत चौटाला को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा चुकी है। जिसके बाद पार्टी के दो फाड़ होने की आशंका जताई जाने लगी है। ओम प्रकाश चौटाला के दोनों पुत्र अजय चौटाला और अभय चौटाला के बीच राजनीतिक विरासत की लड़ाई सड़क पर है। इस लड़ाई में दोनों के परिवार भी आमने-सामने हैं। जाहिर है कि पार्टी टूट के कगार पर है। इस पारिवारिक लड़ाई में सुलह कराने के लिए अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल प्रयास कर रहे हैं।
    अकाली दल के सुप्रीमो प्रकाश सिंह बादल और ताऊ देवीलाल के बीच गहरे परिवारिक रिश्ते रहे हैं। प्रकाश सिह बादल को परिवार के अभिभावक के तौर पर देखा जाता है। परिवार में कोई भी उनकी बात को काटता नहीं है। हालांकि चौटाला परिवार में कई लोगों से बातचीत हो रही है। बताया जाता है कि बादल जल्दी ही अजय और अभय चौटाला से बातचीत करने वाले हैं।
    अजय चौटाला जेबीटी स्कैम में जेल में थे, लेकिन अभी पैरोल पर बाहर है। हालांकि मध्यस्थता के सवाल पर दिग्विजय चौटाला का कहना है कि ताऊ देवीलाल के बाद प्रकाश सिंह बादल का सम्मान है लेकिन उनकी मध्यस्थता का कोई सवाल नहीं उठता। जाहिर है कि सुलह का फॉर्मूला प्रकाश सिंह बादल को निकालना पड़ेगा, जिससे दोनों खेमे संतुष्ट हो जाएं और झगड़े का अंत हो जाए।
    क्या हो सकता है फॉर्मूला?
    परिवार के बीच विरासत की जंग चाचा और भतीजे के बीच है। आईएनएलडी के मुखिया ओम प्रकाश चौटाला और अजय चौटाला जेबीटी स्कैम में सजायाफ्ता हैं, इसलिए ये दोनों लोग कोई सरकारी पद नहीं ले सकते हैं। अभय चौटाला पार्टी का सारा कामकाज देख रहे हैं। यही बात अजय चौटाला के सासंद पुत्र दुष्यंत चौटाला को नागवार गुजर रही है। दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला दोनों भाई चाहते हैं बड़े बेटे अजय चौटाला के सुपुत्र होने की वजह से उनका विरासत पर अधिकार बनता है। दोनों को एक टेबल पर लाना सबसे बड़ा काम है। फिर फार्मूला क्या हो सकता है ये बड़ा सवाल है?
    दुष्यत चौटाला चाहते हैं कि उनको सीएम का उम्मीदवार बना दिया जाए, इस मांग पर सुलह का रास्ता निकल सकता है। पहला फॉर्मूला ये निकल सकता है कि दुष्यंत चौटाला की मांग मान ली जाए और अभय चौटाला को पार्टी का कामकाज सौंप दिया जाए। इसके अलावा अभय चौटाला और दुष्यंत चौटाला को पार्टी में बराबर की हिस्सेदारी दी जाए तभी बात बन पाएगी, नहीं तो पार्टी में बिखराव भी हो सकता है।
    17 नंवबर को जींद में अजय चौटाला ने पार्टी के पूर्व सांसदों और विधायकों की बैठक बुलाई है। जिसमें पार्टी के पदाधिकारियों को आमंत्रित किया गया है। इस बैठक की वजह से ही अजय चौटाला का निष्कासन हुआ। इस बैठक को पार्टी ने असंवैधानिक करार दिया है। बहरहाल अजय चौटाला अपनी ताकत का अंदाजा लगाना चाहते हैं, रैली के जरिए ताकत दिखाना भी चाहते हैं। ये रैली और बैठक भविष्य की रणनीति तय करेगी। अगर इस रैली का मामला सटीक बैठता है तो अजय चौटाला नई राह अख्तियार कर सकते हैं। ऐसा नहीं हुआ तो सुलह की कोशिश कामयाब हो सकती है।
    ओम प्रकाश चौटाला के बड़े बेटे अजय चौटाला की विधायक पत्नी नैना चौटाला ने आरोप लगाया है कि 15-20 लोग पार्टी को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। इससे लग रहा है कि कुछ लोग सीनियर चौटाला और अभय चौटाला को भड़का रहे हैं, लेकिन वो लोग कौन हैं इसका खुलासा नहीं ह़ो पाया है।
    इस परिवार का ड्रामा मुलायम सिंह परिवार की तर्ज पर चल रहा है। जिस तरह मुलायम परिवार में रार है,उस तरह की ही लड़ाई यहां भी चल रही है,फर्क ये है कि वहां चाचा भतीजे के बीच लड़ाई थी।
    यहां दो सगे भाई लड़ रहे हैं। हालांकि दोनों ही जगह लड़ाई का मकसद एक ही है, पार्टी पर कंट्रोल किसका होना चाहिए?
    हरियाणा में 2019 में ही विधानसभा के चुनाव हैं। आईएनएलडी में किसी भी फूट से बीजेपी को सीधे राजनीतिक फायदा हो सकता है। कुछ फायदा कांग्रेस को भी मिल सकता है। दरअसल हरियाणा में जाट वोट में अभी ज्यादा हिस्सा ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी को ही मिलता है। बचा हुआ वोट कांग्रेस और बीजेपी में बंट जाता है। बीजेपी और कांग्रेस चौटाला के परिवार में झगड़े का राजनीतिक लाभ उठाने की फिराक में हैं। इसलिए दोनों दलों को इस झगड़े के अंत का इंतजार है।
    दोनों भाइयों के बीच लड़ाई की शुरुआत ओम प्रकाश चौटाला के सामने शुरू हुई थी। जब दुष्यत चौटाला के समर्थकों ने अभय चौटाला की हूटिंग की थी। दुष्यंत के समर्थक सीनियर चौटाला से दुष्यंत को सीएम उम्मीदवार बनाने की मांग कर रहे थे। इसके बाद अंदरूनी लड़ाई सतह पर आ गई। दो नंवबर को दोनों भाइयों दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला को पार्टी से निकाल दिया गया। दुष्यंत चौटाला ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया है। जाहिर है कि हरियाणा के इस परिवार की राजनीतिक लड़ाई को रोकना मुश्किल लग रहा है।
    इतिहास की बात- ताऊ देवीलाल के परिवार में इस तरह की लड़ाई पहले भी हुई है। जिसमें ओम प्रकाश चौटाला विजयी हुए थे। बाकी परिवार के लोग पीछे रह गए थे। ये राजनीतिक विरासत की लड़ाई ताऊ के सामने शुरू हुई थी। अब यही सवाल ओम प्रकाश चौटाला के सामने है। आखिर राजनीतिक विरासत किसे सौंपते हैं। हालांकि तब ताऊ हरियाणा के मुख्यमंत्री थे,और कांग्रेस के खिलाफ एक मजबूत धुरी थे। लेकिन अब स्थिति अलग है। ओम प्रकाश चौटाला अपोजिशन में हैं,और जेल में भी हैं, जिससे मामले को अपने हिसाब से हल करना मुश्किल है। (फस्र्टपोस्ट)

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • राहुल गांधी के भाषण के दौरान खाली कुर्सियां

    हेमंत कुमार पाण्डेय
    कांग्रेस के लोग कुर्सी के लिए आपस में लड़ते हैं। चांपा का विधायक पांच साल में एक बार भी नहीं आया यहां। और यहीं उसका घर है। कोई काम नहीं करता है। यहां का आदमी अपने काम के लिए यहां-वहां भटक रहा है, लेकिन कोई सुन नहीं रहा है। जनता उसके साथ नहीं जाएगी।
    हम छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा में हैं। ये बातें किसी भाजपा समर्थक ने नहीं कही हैं। अपनी नाराजगी जाहिर करने वाले ये शख्स 55 साल के गणेशराम लहरे हैं। वे करीब 35 साल से कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं और यहीं एक स्टील फैक्ट्री में काम करते हैं।
    गणेशराम लहरे से हमारी मुलाकात मंगलवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की जनसभा शुरू होने से पहले होती है। वे कहते हैं, कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी में जिसको पसंद नहीं करते उसी को हराने का काम करते हैं। इसके बाद वे इससे जुड़ी एक घटना का जिक्र भी करते हैं। हम उनसे पूछते हैं कि क्या इसे रोकने के लिए राहुल गांधी कुछ नहीं करते। गणेशराम का जवाब आता है, राहुल गांधी दिल्ली में बैठे हैं। उनको क्या पता चलेगा। आए, भाषण दिए, चले गए।
    कांग्रेसी कार्यकर्ता गणेशराम केंद्र में पिछली यानी मनमोहन सिंह सरकार की विफलताओं की ही चर्चा नहीं करते, राज्य की रमन सिंह सरकार की तारीफ भी करते हैं। वे कहते हैं, चावल बांटने की वजह से एक भिखारी मोहल्ले में नहीं मिलेगा। पहले भिखारियों का लाइन लगा रहता था। क्या दिक्कत है? सबको चावल मिल रहा है। सबको पेंशन मिल रहा है। यही तो विकास है। नेताओं को महल चाहिए। करोड़ों-अरबों की संपत्ति चाहिए। आम जनता को क्या चाहिए?
    हालांकि धीरे-धीरे वे समस्याओं पर भी आ जाते हैं। खेती-किसानी के बारे में पूछने पर गणेशराम कहते हैं, तीन साल से बारिश सही नहीं हो रहा है। सिंचाई की सुविधा नहीं है। नहर निकला हुआ है, लेकिन खेत में पानी नहीं पटता है। अपनी-अपनी सुविधा से लोग सिंचाई करते हैं। किसानों का आधा फसल बर्बाद हो गया है।
    इन बातों से कड़ी धूप में एक पेड़ की छांव तले बैठी कुछ महिलाएं भी सहमति जताती हैं। हालांकि वे गणेशराम के विकास के दावे को खारिज कर देती हैं। उनके शिकायतों के तार खेती के साथ रोजगार और शराब से भी जुड़ते हैं। किसान परिवार से आने वाली रेणु धमधे गुस्से में कहती हैं, चावल मिलने से क्या होगा! हर चीज महंगा हो गया है। इसके बाद चावल लाने जाओ तो कहते हैं, इसका फोटो (कॉपी) करवा कर लाओ, ये लाओ-वो लाओ। बैंक जाओ तो कहते हैं, ये कागज लाओ-वो कागज लाओ, कल आना, परसों आना। एक ही फोटो कॉपी 15 बार करवाते हैं। इसके बाद भी काम नहीं होता है।
    50 वर्षीय रेणु आगे जोड़ती हैं, सरकार गैस (कनेक्शन) तो फ्री में दे दी है। लेकिन इसे (सिलिंडर) भरवाने में 1,000 से ऊपर खर्च हो जाता है। बड़ा परिवार हो तो एक सिलिंडर 15 दिन भी नहीं चलता है। पेट्रोल का दाम बढ़ता है। हर चीज महंगा हो गया है। उनके बगल में बैठी नानवे बंजारे कहती हैं, चावल तो मिल गया है लेकिन, इसे चटनी में थोड़े ही खाया जाएगा।
    इसके आगे वे धान बेचने में होने वाली परेशानी का भी जिक्र करती हैं। नानवे कहती हैं, 'अमीर आदमी का मंडी है। पर्ची के बिना मंडी में धान नहीं बिकता। पंजीकरण और नवीनीकरण (जमीन के कागजात का) होने पर मंडी में धान बिकता है। व्यापारी लोग गांव-गांव से धान खरीदकर मंडी में बेचते हैं।Ó उनके मुताबिक अगर उन्हें धान बेचना होता है तो वे आस-पास की दुकानों पर बेचते हैं जहां ये 1,000 रु प्रति क्विंटल की दर से बिकता है। यहां याद दिला दें कि सामान्य किस्म के धान के लिए भी सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,750 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।
    परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। जैसा सत्याग्रह की एक रिपोर्ट में जिक्र हुआ है। छत्तीसगढ़ की कमाई शराब में डूब रही है, महिलाएं इसका भी जिक्र करती हैं। यहां तक कि उनके हाव-भाव से यह लगता है कि वे सभी सबसे अधिक शराब को लेकर ही परेशान हैं। 30 वर्षीय ललिता मिरी गृहस्थ हैं और एक स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हुई हैं। वे ऊंची आवाज में कहती हैं, 'सब नौजवान लोग दारू पीकर भटक रहे हैं। वही नशे के हालत में लड़का लोग का एक्सीडेंट हो जाता है। पढ़ाई चला जाता है। सरकार ही खोल दी है तो अब कौन सुनेगा?Ó हम उन्हें बताते हैं कि सरकार शराब बंद करने की बात कह रही है। इस पर वे झल्लाकर कहती हैं, वो तो नोट कमाने के लिए ऐसा कर रही है। वह क्यों बंद करेगी? लोग खाने के लिए मजदूरी करते हैं, पैसे से खाना न खाकर दारू पीते हैं। इसके बाद सभी महिलाएं जनसभा स्थल की ओर बढ़ जाती हैं।
    चुनावी जनसभा स्थल को लेकर जिस तरह की तैयारी भाजपा में दिखती है, उसका कांग्रेस में अभाव दिखता है। होर्डिंग और झंडे कम दिखते हैं। वहीं, पार्टी प्रत्याशी के कई कटऑउट तो दिखते हैं लेकिन, राहुल गांधी के नहीं। बड़ी संख्या में कुर्सियां लगाई गई हैं। लेकिन इनमें से कई राहुल गांधी के भाषण के दौरान भी खाली रहती हैं। वहीं, सुरक्षा को लेकर कोई अधिक ताम-झाम नहीं दिखता। लोगों को आसानी से अंदर आने दिया जा रहा है।
    हालांकि, लोगों को कड़ी धूप से बचाने की कोई व्यवस्था नहीं है। मैदान में उडऩे वाली धूल भी लोगों की परेशानी बढ़ा रही है। इस अव्यवस्था के बारे में जब हम एक स्थानीय नेता से पूछते हैं तो उनका जवाब आता है, 'धूल और धूप को क्यों देख रहे हैं, यह देखिए न कि इन परेशानियों की बाद भी कितनी जनता आई हुई है।Ó इसी जनता में धनेश्वरी पंडित भी हैं जो एक महीने के नवजात को गोद में लेकर राहुल गांधी को देखने के लिए आई हैं।
    मंगलवार को चार चुनावी सभाएं करने वाले राहुल गांधी लोगों की परेशानी को और बढ़ाते हैं। वे तय वक्त से करीब एक घंटे की देरी से सभा स्थल पहुंचते हैं। अपने भाषण की शुरुआत में वे इसके लिए माफी भी मांगते हैं। इस पर तालियों की आवाज भी सुनाई देती है। हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष सूबे के लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों की जगह पहले से तय मुद्दों पर ही बातें करते हैं। वे हमेशा की तरह अनिल अंबानी, नीरव मोदी और विजय माल्या को लेकर मोदी सरकार पर हमले करते हैं। साथ ही, वे पार्टी कार्यकर्ताओं से 'चौकीदार चोर हैÓ के नारे भी लगवाते हैं।
    इसके अलावा राहुल गांधी खेती की बात तो करते हैं लेकिन, उनका सारा जोर केवल कर्ज माफी और बोनस पर होता है। वहीं, रोजगार पर वे कहते हैं कि विजय माल्या को दिया गया 10,000 करोड़ रुपये इन्हें (एक कांग्रेसी कार्यकर्ता का नाम लेकर) मिला होता तो कई लोगों को रोजगार मिलता। इसके अलावा वे कथित रफाल घोटाले को भी सरल शब्दों में समझाने की कोशिश करते हैं। लेकिन, यह ज्यादातर लोगों के पल्ले नहीं पड़ता। जनसभा में मौजूद एक महिला सिपाही भी कहती हैं कि उन्हें कुछ समझ नहीं आया।
    इस बीच, राहुल गांधी के भाषण के दौरान ही कई महिलाएं उठकर जाने लगती हैं। इसके बाद जल्दी-जल्दी में राहुल गांधी भी अपना भाषण खत्म करते हैं। शाम का वक्त हो चुका है और उन्हें रायगढ़ में भी एक सभा को संबोधित करना है। 
    हालांकि, वहां मौजूद अधिकांश लोगों को घर जाने की कोई जल्दबाजी नहीं। वे राहुल गांधी के हेलिकॉप्टर को देखने के लिए उसके आंखों से ओझल होने तक अपनी जगह पर टिके रहते हैं। फिर कुछ धीमे और कुछ तेज कदमों से अपने-अपने रास्ते चल पड़ते हैं।  (सत्याग्रह)

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • नारायण बारेठ
    जयपुर से, 15 नवम्बर । राजस्थान में कांग्रेस ने लंबे समय तक चली अनिश्चितता के बाद ऐलान किया है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट दोनों विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे। कांग्रेस ने यह घोषणा ऐसे समय पर की, जब इन दोनों नेताओ के बीच मतभेद की खबरें आ रही थीं। 
    प्रेक्षक कहते है कांग्रेस ने तस्वीर स्पष्ट करने में देरी की है और इससे उसे थोड़ा नुकसान हुआ है। मगर पार्टी ने अब भी यह संशय बरकरार रखा है कि चुनाव में जीत की स्थिति में मुख्यमंत्री कौन होगा। वहीं सत्तारूढ़ बीजेपी इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरती रही है।
    पार्टी के इस ऐलान से कांग्रेस के सियासी पटल पर छाया कुछ कुहासा तो दूर हुआ है मगर नेता कौन होगा इस सवाल पर अब भी धुंधलका बना हुआ है। पिछले दो महीने से कहा जा रहा था कि पार्टी के प्रमुख नेताओं को चुनाव नहीं लडऩा चाहिए। पार्टी में कुछ जानकार कहते हैं कि इसे गहलोत को चुनाव लडऩे से दूर रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा था।
    पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने कभी भी अपनी इस मंशा को छिपाया नहीं कि वे अपने पारम्परिक चुनाव क्षेत्र जोधपुर के सरदारपुरा से चुनाव लडऩा चाहते हैं। बल्कि जब-जब ऐसी खबरें आईं, गहलोत ने एक स्थानीय मुहावरे मैं थांसे दूर नहीं का इस्तेमाल किया और कहा कि वो अपनी अवाम से दूर नहीं होंगे। राज्य में जब सत्ता के लिए सत्तारूढ़ बीजेपी और कांग्रेस में चुनावी लड़ाई तेज हुई तो कांग्रेस को लगा कि उसकी सियासत के पटल पर छाया यह कुहासा अब छंटना चाहिए।
    लिहाजा कांग्रेस ने बुधवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके तस्वीर साफ करने की कोशिश की। पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस माहौल की तोहमत बीजेपी पर मढ़ी और कहा कि राजस्थान में न केवल वो खुद बल्कि पायलट समेत सभी प्रमुख नेता चुनाव लड़ेंगे और बीजेपी को शिकस्त देंगे।
    गहलोत ने कहा, कांग्रेस में कोई फूट नहीं है। बीजेपी जरूर यह माहौल बनाने का प्रयास कर रही थी। अब बीजेपी को जवाब मिल गया है। गहलोत के चुनाव क्षेत्र जोधपुर के सरदारपुरा में पार्टी के सदस्य और हमदर्द इस घोषणा का इंतजार कर रहे थे। क्योंकि गहलोत ने लंबे समय तक पहले संसद और फिर विधानसभा में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है।
    गहलोत दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। उनके समर्थक कहते हैं कि अगर गहलोत चुनाव नहीं लड़ते तो यह मान लिया जाता कि उन्हें मुख्यमंत्री की दौड़ से दूर कर दिया गया है। मगर अब ऐसा नहीं हो सकता।
    इसके साथ ही सचिन पायलट ने भी विधानसभा चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। यह पहला मौका होगा जब पायलट विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। अभी यह साफ नहीं है कि वो किस विधानसभा क्षेत्र से चुनावी अखाड़े में उतरेंगे। पायलट ने कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के निर्देश और गहलोत के आग्रह पर चुनाव लड़ेंगे और बीजेपी को सत्ता से बाहर करेंगे।
    प्रेक्षक कहते हैं कि इस फैसले में देरी करने से कांग्रेस को थोड़ा नुकसान हुआ है। विश्लेषक राजेश असनानी कहते हैं, कांग्रेस ने इस उहापोह से निकलने में काफी वक्त लिया। इससे पार्टी कार्यकर्ताओ और उसके समर्थक वर्ग में गलत संदेश गया। पर अभी देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर कांग्रेस ने कुछ तस्वीर साफ की है। मगर बीजेपी के पास अब भी यह कहने का मौका है कि कांग्रेस में फूट है और मुख्यमंत्री के लिए उसके पास कोई चेहरा नहीं है।
    इधर सत्तारूढ़ बीजेपी कहती रही है कि कांग्रेस में गुटबाजी है और मुख्यमंत्री पद के लिए घमासान मचा है। बीजेपी ने मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे को अपना नेता घोषित किया है और अगर चुनाव में कामयाबी मिली तो राजे ही मुख्य मंत्री होगी, बहरहाल कांग्रेस ने तस्वीर का एक रुख तो साफ कर दिया। मगर जीत की सूरत में मुख्यमंत्री का सेहरा किसके माथे बंधेगा, इस सवाल के रुख पर अब भी नकाब रखा हुआ है।(बीबीसी)

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • सुदीप श्रीवास्तव

    साल 2000 में मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद से ही छत्तीसगढ़ में चुनावी गणित लगातार बदलता रहा है। इन 18 वर्षों में कांग्रेस और बीजेपी के पारंपरिक वोट कम हुए हैं और हर चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी होते गए हैं।
    छत्तीसगढ़ में 31 फीसदी एसटी, 11.6 फीसदी एससी, 45 फीसदी ओबीसी और करीब 10 फीसदी अगड़ी जाति के लोग हैं। आमतौर पर एसटी उत्तरी और दक्षिणी छत्तीसगढ़ में रहते हैं और एससी मूल रूप से महानदी के मैदानी इलाके में रहते हैं। ओबीसी लोग लगभग पूरे प्रदेश में फैले हुए हैं।
    साल 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना उस वक्त कांग्रेस के पास 90 में से 48 सीटें थीं। इनमें से 22 सीटें आदिवासी बहुल वाले सरगुजा और बस्तर इलाकों से थीं। इसका ये अर्थ है कि आदिवासी इलाकों की 26 सीटों में से 22 सीटें कांग्रेस के पास थीं। इनमें से सिर्फ एक सीट छोड़कर बाकी की सारी सीटें एसटी के लिए आरक्षित थीं। बिलासपुर, रायपुर और दुर्ग क्षेत्रों की कुल 64 सीटों में से बीजेपी के पास 32 और कांग्रेस के पास 29 सीटें थीं।
    लेकिन 2003 में माहौल बिल्कुल बदल गया। बीजेपी को सरगुजा-बस्तर क्षेत्र के आदिवासी बहुल इलाके वाले 26 सीटों में से 20 मिल गईं जबकि कांग्रेस ने बिलासपुर, रायपुर और दुर्ग क्षेत्र में बढ़त हासिल की। 2008 में भी लगभग यही हालत रही। पर 2013 के चुनाव में स्थितियां फिर से बदल गईं। सरगुजा-बस्तर क्षेत्र में कांग्रेस ने अपनी खोई हुई शक्ति को फिर से कुछ हद तक हासिल की। कांग्रेस को इस इलाके की 26 सीटों में से 15 सीटें मिलीं। लेकिन वह अपनी काफी मौजूदा सीटों को बचाने में नाकामयाब रही। अपनी मौजूदा 37 सीटों में 26 सीटें कांग्रेस हार गई। स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी लहर के कारण बीजेपी को भी नुकसान हुआ और पांच मंत्रियों समेत बीजेपी के कई विधायक चुनाव हार गए।
    छत्तीसगढ़ में पिछले 18 वर्षों में हुए इस तरह के राजनीतिक परिवर्तन को समझने के लिए लोकसभा चुनावों के पैटर्न को भी समझना होगा, 2004, 2009 और 2014 के चुनाव में कुल 11 सीटों में से 10 सीटें कांग्रेस या बीजेपी के खाते में गई। इन चुनावों में लोगों ने या तो बीजेपी या कांग्रेस को वोट दिया। लेकिन विधानसभा चुनाव में स्थिति अलग थी। काफी सीटों पर कांग्रेस या बीजेपी से अलग किसी अन्य पार्टी के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी।
    2018 में स्थितियां और भी बदल गई हैं। लगभग हर सीट पर बीजेपी और कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है। यहां तक कि जोगी-बीएसपी गठबंधन या अरविंद केजरीवाल की पार्टी के उम्मीदवार भी ऐसे हैं जिनकी स्थानीय स्तर पर काफी पकड़ है।
    अब अगर ये माना जाए कि रमन सिंह सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है तो कांग्रेस के पास सीएम के पद के लिए कोई विकल्प नहीं है। इसलिए सत्ता विरोधी फैक्टर भी स्थानीय स्तर पर ही काम करेगा। जिसकी वजह से यह बात काफी महत्वपूर्ण हो जाती है कि जमीनी स्तर पर किसी उम्मीदवार की कितनी पकड़ है। उदाहरण के लिए बीजेपी ने बेलतरा से वहां के मौजूदा पार्टी के विधायक को टिकट देने के बजाय पार्टी के जिलाध्यक्ष रजनीश सिंह को टिकट दिया है। कांग्रेस ने भी एक ओबीसी उम्मीदवार को टिकट दिया है। जोगी-बीएसपी गठबंधन ने पंजाबी ब्राह्मण को टिकट दिया है जिसकी वजह से बीजेपी का पारंपरिक वोट कट सकता है। बीएसपी का समर्थन होने के कारण कांग्रेस का दलित वोट भी कट सकता है।
    अलकतरा में जोगी की पुत्रवधू बीएसपी के टिकट पर लड़ रही हैं और उन्हें जनता का काफी अच्छा समर्थन भी मिल रहा है। हालांकि यहां बीजेपी का उम्मीदवार भी काफी मजबूत है। अब यहां जीत का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस के मौजूदा विधायक किस तरह से प्रदर्शन करते हैं। अब अगर वह कांग्रेस के पारंपरिक वोटों को अपने पक्ष में रख पाने में कामयाब रह पाते हैं तो बीजेपी को फायदा हो सकता है लेकिन अगर वो ऐसा नहीं कर पाते तो अजीत जोगी की पुत्रवधू को फायदा हो सकता है। हालांकि इस त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस को फायदा पहुंच सकता है।
    खैरागढ़ में कांग्रेस ने वहां के मौजूदा विधायक को मैदान में उतारा है लेकिन जोगी-बीएसपी गठबंधन ने पूर्व कांग्रेस विधायक देवव्रत को टिकट दिया है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में एक विधानसभा चुनाव के बजाय कुल 90 सीटों पर अलग-अलग चुनाव हो रहे हैं।  (न्यूज 18)
    (लेखक वकील और राजनीतिक जानकार हैं। व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं)

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • नई दिल्ली, 15 नवंबर । राजस्थान में विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने अपने 31 उम्मीदवारों की दूसरी सूची जारी कर दी। इस सूची में बीजेपी ने 15 विधायक और 3 मंत्रियों के टिकट काटकर नए चेहरों को मैदान में उतारा है। बीजेपी ने जिन विधायकों और मंत्रियों के टिकट काटे हैं, उनमें अपने बयानों को लेकर विवादों में रहने वाले ज्ञानदेव आहूजा समेत धनसिंह रावत और राजकुमार रिणवा समेत अन्य शामिल हैं।
    बीजेपी विधायक ज्ञानदेव आहूजा वही हैं, जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में रोज 3000 कंडोम मिलने का दावा किया था। साल 2016 में विवादित बयान देते हुए आहुजा ने कहा था कि जेएनयू में रोजाना 50 हजार हड्डी के टुकड़े, 3 हजार इस्तेमाल किए हुए कंडोम और 500 इस्तेमाल किए हुए अबॉर्शन इंजेक्शन मिलते हैं। उन्होंने जेएनयू में हर रोज 10 हजार सिगरेट के बट मिलने और छात्रों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नग्न डांस करने का भी आरोप लगाया था।
    राजस्थान सरकार में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज राज्यमंत्री धनसिंह रावत का हमेशा से ही विवादों से नाता रहा है। वे अपने बयानों को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहे हैं। हाल ही में धनसिंह रावत ने बांसवाड़ा की सभा में कांग्रेस को मुसलमानों और भाजपा को हिन्दुओं की पार्टी बताया था। इस दौरान उन्होंने हिन्दुओं से सनातन धर्म की रक्षा के लिए भाजपा के समर्थन में प्रचंड मतदान करने की अपील की थी।
    इससे पहले पिछले साल नवंबर में उन्होंने बांसवाड़ा में अधिकारियों को मुर्गा बनाने का विवादित बयान दिया था। इसके अलावा उन्होंने जिला परिषद की साधारण बैठक में विकास अधिकारियों के लिए कहा था कि ये अरबी घोड़े हैं, इनको चाबुक मारो। हाल ही में एक वीडियो सामने आया था, जिसमें रावत का बेटा सड़क में एक कार चालक को पीटते दिखा था।
    राजस्थान सरकार में खाद्य मंत्री बाबूलाल वर्मा से भी बीजेपी नाराज चल रही थी। हाल ही में उन्होंने कहा था कि अब मोदी लहर नहीं हैं। लिहाजा चुनाव जीतना आसान नहीं है। वर्मा पर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने का भी आरोप है।
    वसुंधरा राजे सरकार में मंत्री राजकुमार रिणवा ने हाल ही में पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि पर विवादित बयान दिया था। रिणवा ने कहा था कि बाढ़ आ रही है, उसमें पैसे नहीं लगते हैं क्या? उन्होंने यह भी कहा था कि पेट्रोल की कीमतों में तेजी तो सबको दिख रही है, लेकिन बाढ़ के खर्चे नहीं दिख रहे हैं।
    इस दौरान रिणवा ने भारतीयों के चरित्र पर भी उंगली उठाई थी। उन्होंने कहा था, यहां नेशनल कैरेक्टर नाम की कोई चीज ही नहीं है। दूसरे देशों में प्राकृतिक आपदा आने या पेट्रोल की कीमतें बढऩे पर खर्चे कम कर देते हैं, लेकिन हमारे यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं है।
    इन तीन मंत्रियों के कटे टिकट
    बीजेपी की दूसरी सूची से जिन मंत्रियों के नाम गायब हैं, उनमें मंत्री राजकुमार रिणवा, मंत्री बाबूलाल वर्मा और मंत्री धन सिंह रावत शामिल हैं। देवस्थान मंत्री राजकुमार रिणवा चुरू जिले की रतनगढ़ सीट से विधायक हैं, लेकिन इस बार उनका टिकट काटकर अभिनेष महर्षि को उतारा गया है।
    गौरतलब है कि मंत्री बाबूलाल वर्मा बूंदी के केशवराय पाटन से विधायक हैं। इनकी जगह कोटा से रामगंज मंडी से विधायक चंद्रकांता मेघवाल को टिकट दिया गया है। इसके अलावा मंत्री धनसिंह रावत बांसवाड़ा से बीजेपी विधायक हैं। हालांकि इस बार इन तीनों को बीजेपी ने टिकट नहीं दिया है।
    बीजेपी की दूसरी सूची में वर्तमान मंत्रियों के साथ जिन विधायकों के टिकट कटे हैं, उनमें सबसे चर्चित नाम अलवर जिले के रामगढ़ से विधायक ज्ञानदेव आहूजा का है।
    आहूजा के अलावा किशनाराम नाई विधायक डूंगरगढ़, लक्ष्मीनारायण बैरवा विधायक चाकसू, आरसी सुनेरीवाल विधायक डग, जीतमल खांट विधायक गढ़ी, रानी कोली विधायक बसेड़ी, शैतान सिंह विधायक पोकरण, तरुण राय कागा विधायक चौहटन, छोटू सिंह भाटी विधायक जैसलमेर, कृष्ण कड़वा विधायक संगरिया, गीता वर्मा विधायक सिकराय, राजकुमारी जाटव विधायक हिण्डौन, मंगला राम विधायक कठूमर, रानी सिलोटिया विधायक बसेड़ी और शिमला बावरी विधायक अनूपगढ़ शामिल हैं।
    खास बात यह है कि बीजेपी की दूसरी सूची में भी किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया गया है। वहीं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी और सरकार में नंबर दो यूनुस खान का नाम भी डिडवाना सीट से अभी तय नहीं हुआ है।(आजतक)

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • पुलकित भारद्वाज
    राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन का दूसरा दिन बीत जाने के बाद भी कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रत्याशियों की कोई सूची सामने नहीं आई है। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें से एक यह भी था कि पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत इस चुनावी दंगल में ताल ठोकना चाहते थे जबकि पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट को ऐसा करने में झिझक महसूस हो रही थी। लेकिन, बुधवार को दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अशोक गहलोत ने बयान दिया है कि वे और सचिन पायलट दोनों ही इन चुनावों में मैदान में उतरेंगे।
    जाहिर तौर पर अशोक गहलोत ने यह घोषणा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की मंजूरी के बाद ही की है। सचिन पायलट ने भी बयान जारी इस बात की पुष्टि कर दी है। लेकिन वे इससे खुश शायद ही हों!
    विश्लेषकों के मुताबिक पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी अजमेर सीट पर फतेह हासिल करने में नाकाम रहे सचिन पायलट अपने लिए कोई ऐसी सीट नहीं तलाश पाए हैं जहां से वे आंख मूंद कर दांव खेल सकें। अजमेर से भाजपा सांसद सांवरलाल जाट के निधन के बाद वहां बीती जनवरी में हुए उपचुनाव में भी पायलट ने खुद सामने आने के बजाय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रघु शर्मा को आगे कर दिया था। हालांकि कई राजनीतिकारों के अनुसार यह निर्णय लेकर सचिन पायलट ने अपने रणनैतिक कौशल का परिचय दिया था। लेकिन राजस्थान के राजनैतिक हलकों में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष के इस कदम के पीछे उनके कम आत्मविश्वास की भी चर्चा खूब हुई।
    अब जब विधानसभा चुनाव की बारी आई तो एक बार फिर कयास लगने लगे थे कि सूबे में कांग्रेस के बहुमत साबित करने तक सचिन पायलट कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते। उनके डर के पीछे 2008 के विधानसभा चुनावों को भी वजह के तौर गिनाया जाता है जब कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी नाटकीय ढंग से एक वोट से चुनाव हारकर राज्य के मुखिया की रेस से बाहर हो गए और यह ताज अशोक गहलोत के सर सजा। जोशी समर्थक उनकी हार के लिए जिम्मेदार कारणों का जिक्र करते हुए अशोक गहलोत की तरफ प्रमुखता से उंगलियां उठाते रहे हैं।
    प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि चुनाव में कांग्रेस के बढ़त हासिल करने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद पर आमराय बनाने के लिए आयोजित बैठक में जीते हुए विधायक होंगे, प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट होंगे और दिल्ली से आने वाले दो पर्यवेक्षक शामिल रहेंगे। ऐसे में पायलट शायद मान कर चल रहे थे कि चूंकि अशोक गहलोत न तो प्रदेश संगठन में किसी पद पर हैं और विधानसभा चुनाव न लड़ पाने पर वे तब विधायक भी नहीं होंगे, तो उन्हें इस बैठक से दूर रख वे अपने पक्ष में आसानी से माहौल बना पाएंगे। कुछ राजनीतिकारों की मानें तो इसे देखते हुए ही अशोक गहलोत जानबूझकर लगातार चुनाव लडऩे की इच्छा जाहिर कर पिछले कुछ महीनों से पायलट पर दवाब बनाते रहे थे।
    सूत्रों के मुताबिक इस चुनौती से पार पाने के लिए सचिन पायलट ने मध्य प्रदेश की ही तर्ज पर पार्टी हाईकमान के सामने दलील दी कि न सिर्फ उन्हें बल्कि गहलोत और सीपी जोशी जैसे कद्दावर नेताओं को बजाय एक क्षेत्र में ही सीमित करने के पूरे प्रदेश में पार्टी को संभालने की बागडौर सौंपी जानी चाहिए। बताया जाता है कि इस तर्क के जवाब में गहलोत का कहना था कि वे पांच बार लोकसभा में और चार बार विधानसभा चुनावों में पार्टी द्वारा दी गई प्रदेश स्तरीय जिम्मेदारी संभालने के साथ अपने क्षेत्र में विजय पताका फहराने में भी सफल रहे हैं। ऐसे में पार्टी के दिग्गज नेताओं को कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए झिझकने की बजाय फ्रंट फुट पर आकर खेलना चाहिए।
    कांग्रेस से जुड़े एक विश्वसनीय सूत्र के शब्दों में 'रविवार देर रात भाजपा की तरफ से जारी की गई प्रत्याशियों की पहली सूची में शामिल मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नाम को भी सचिन पायलट के तर्क की काट के तौर पर इस्तेमाल किया गया, कि एक तरफ भाजपा की सिपहसालार खुलकर सामने आ चुकी हैं और कांग्रेस के मुखिया हैं कि पीछे हटने के तमाम बहाने बना रहे हैं। नतीजतन सचिन पायलट को चुनाव लडऩे के लिए बेमन से अपनी सहमति जतानी पड़ी।Ó
    विश्लेषकों का कहना है कि इस घोषणा के बाद जहां गहलोत और उनके समर्थकों के चेहरे से खुशी साफ तौर पर देखी जा सकती है, वहीं सचिन पायलट और उनके करीबियों का तनाव भी आसानी से महसूस किया जा सकता है। दरअसल, इस बात से एक संदेश यह भी गया है कि पायलट की तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस हाईकमान राजस्थान में गहलोत की राय के विपरीत कदम नहीं उठाना चाहता है। जानकारों की मानें तो दिल्ली में सचिन पायलट को लगातार दो दिन में यह दूसरा झटका लगा है। इससे पहले मंगलवार को राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष और अब तक पायलट के करीबी माने जाने वाले रामेश्वर डूडी ने उनकी पसंद के उम्मीदवारों के नाम पर आपत्ति जताते हुए कथित तौर पर उनसे कहा था कि वे यदि राजनीति को कल छोड़ते हों, तो आज ही छोड़ दें।  (सत्याग्रह)

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • हैदराबाद, 15 नवम्बर। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के मुखिया और सूबे के पहले मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव अमीर किसान हैं और उनके पास करीब 22 करोड़ की संपत्ति है। पर, करोड़पति होने के बावजूद राव के पास अपनी खुद की कोई कार नहीं है। हालांकि उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह कार जरूर है। बुधवार को टीआरएस प्रमुख ने गजवेल विधानसभा क्षेत्र से अपना नामांकन दाखिल किया।  
    नामांकन पत्र के साथ भरे गए हलफनामे में राव ने खुद को किसान बताते हुए 91.5 लाख रुपये वार्षिक इनकम की जानकारी दी है। इसके साथ ही टीआरएस चीफ ने चुनाव आयोग को बताया है कि बेटे केटी रमा राव पर 84 लाख रुपये और बहू के. शैलिमा पर 24 लाख रुपये की उनकी देनदारी भी है। 
    वर्ष 2014 में जब चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना से पहला चुनाव लड़ा था, उस समय भी अपने हलफनामे में उन्होंने कार नहीं होने का जिक्र किया था। सत्ता संभालने के बाद राव ने एक ज्योतिषी की सलाह पर अपने काफिले में शामिल 6 गाडिय़ों में से तीन गाडिय़ों का रंग भी काले से सफेद करवा दिया था। साल 2015 में उनकी सरकार ने सीएम के काफिले में करीब एक करोड़ की बुलेट प्रूफ चार गाडिय़ां उनके काफिले में शामिल कीं। 
    2014 में नामांकन पत्र भरते समय हलफनामे में राव ने खुद को बिजनसमैन और किसान दोनों बताया था। इस बार उन्होंने सिर्फ किसान बताया है। देश के कुछ चुनिंदा महत्वपूर्ण नेताओं में राव एक हैं, जो ना तो फेसबुक पर हैं और ना ही ट्विटर पर। 
    राव के पास 2014 में करीब 37 एकड़ जमीन थी, जो अब बढ़कर 54 एकड़ हो गई है। साल 2014 में उनकी कुल संपत्ति 15 करोड़ थी। अब उनकी संपत्ति 22 करोड़ है। उनके पास कोई बैंक लोन नहीं है। हालांकि कुछ निजी कंपनियों और पार्टी के एक नेता से उन्होंने जरूर कुछ कर्ज लिए हैं। टीआरएस चीफ के पास करीब 2.4 लाख कीमत की सोने की जूलरी है जबकि उनकी पत्नी के पास करीब 93 लाख की जूलरी है। केसीआर पर करीब 63 आपराधिक मामले भी दर्ज हैं।  (टाईम्स न्यूज)

     

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Posted Date : 15-Nov-2018
  • नई दिल्ली, 15 नवम्बर। मिजोरम विधानसभा चुनाव में बुधवार को नाम वापसी के अंतिम दिन तीन उम्मीदवारों के चुनावी जंग से हटने के बाद अब 201 प्रत्याशी चुनाव मैदान में बचे हैं। मुख्यमंत्री लल थनहवला समेत आठ प्रत्याशी दो-दो सीटों से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
    अधिकारियों के मुताबिक जांच के दौरान सभी नामांकन पत्र वैध पाए गए। तीन उम्मीदवारों ने बुधवार को अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। इससे पहले मंगलवार को सभी 204 उम्मीदवारों द्वारा दायर नामांकन पत्र सही पाये गए और उन्हें स्वीकार कर लिया गया।
    मिजोरम में आठ उम्मीदवारों ने दो-दो सीटों के लिए नामांकन दाखिल किये थे। इनमें मुख्यमंत्री लल थनहवला, जोराम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार लालदुहोमा, पीपुल्स रिप्रेसेंटेशन फॉर आइडेंटिटी एंड स्टेटस आफ मिजोरम (पीआरआईएसएम) अध्यक्ष वनलालरूआता शामिल हैं।
    प्रदेश की 40 विधानसभा सीटों के लिए 212 लोगों ने नामांकन पत्र दाखिल किया था। चम्पाई उत्तर सीट के लिए नामांकन पत्रों की जांच में कुछ देरी हुई, क्योंकि एक उम्मीदवार को एक पुराना नामांकन पत्र दे दिया गया था लेकिन मामले को मंगलवार को सुलझा लिया गया।
    म्यामां की सीमा से लगे इस विधानसभा क्षेत्र से छह उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। मिजोरम में 28 नवम्बर को वोट डाले जाएंगे। मतगणना 11 दिसम्बर को होगी।  (आज तक)

     

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Posted Date : 14-Nov-2018
  • राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के बीच उम्मीदवारों के चयन को लेकर तीखी नोक-झोंक की खबर है...

    - पुलकित भारद्वाज
    राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन भरने के पहले दिन यानी सोमवार के बीत जाने के बाद भी कांग्रेस अपने प्रत्याशियों के नाम फाइनल नहीं कर पाई है। कयास लगाए जा रहे थे कि पार्टी सोमवार को अपने 150 उम्मीदवारों की सूची जारी कर देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उधर, तमाम अंदरूनी रस्साकशी के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने रविवार देर रात को अपने 131 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी कर दी थी। कांग्रेस की तरफ से हो रही इस देर के पीछे उसके प्रमुख नेताओं की आपसी सिरफुटव्वल को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। इसकी ताजा बानगी के तौर पर पार्टी की केन्द्रीय चुनाव समिति (सीईसी) की कथित अंतिम दौर की बैठक को देखा जा सकता है। सोमार देर रात हुई इस बैठक में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के बीच तीखी नोक-झोंक हो गई।
    सूत्रों की मानें तो करीब आधा दर्जन सीटों अपनी पसंद के प्रत्याशियों को मौका दिए जाने की बात पर शुरू हुई यह गहमागहमी इतनी बढ़ गई कि प्रदेशाध्यक्ष पायलट ने अपनी बात न माने जाने पर राजनीति ही छोड़ देने की बात कह दी। सूत्रों के मुताबिक पायलट के जवाब में डूडी का कहना था, यदि तुम कल राजनीति छोड़ते हो तो आज ही छोड़ दो। और इसके बाद वे अपने साथ लाए कागज फेंक कर बैठक से बाहर चले गए। इसके बाद संगठन महासचिव अशोक गहलोत और स्क्रीनिंग कमेटी की चेयरपर्सन कुमारी शैलजा की समझाइश के बाद चर्चा बहाल हो सकी। हालांकि मीडिया के सामने डूडी समेत बैठक में मौजूद सभी नेताओं ने इस तरह की किसी भी घटना से इन्कार किया है।
    वैसे यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस की भीतरी रस्साकशी की खबरें सामने आई हैं। कुछ दिन पहले भी डूडी और पायलट के बीच ऐसे ही कुछ विवाद की बात सामने आई थी। लेकिन तब भी दोनों ने इन खबरों का खंडन किया था। प्रदेश के राजनीतिकारों की मानें तो यह अंदरूनी कलह कांग्रेस के लिए एक तरह से थाली में सजे विधानसभा चुनाव का जायका बिगाड़ सकती है।
    ऐसा नहीं है कि सिरफुटौव्वल की यह स्थिती सिर्फ कांग्रेस में ही है। भाजपा में भी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पार्टी शीर्ष नेतृत्व के बीच की तनातनी समय-समय में सुर्खियों में बनी रहती है। इसके अलावा पार्टी की तरफ से जारी की गई लिस्ट से पत्ता कटने के बाद सुरेंद्र गोयल जैसे कई दिग्गज नेता भी बगावत पर उतर आए हैं। लेकिन राजस्थान में पहले से कई धड़ों में बंटी कांग्रेस ऐसी इस मामले में भाजपा से इक्कीस साबित हुई है। इससे पहले प्रदेश विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी द्वारा शुरू किए गए 'मेरा बूथ, मेरा गौरवÓ अभियान के कार्यक्रम नेताओं के लिए अखाड़े बन गए थे जिनमें मारपीट से लेकर कुर्सियां तक फेंके जाने की खबरें सामने आई थीं।
    प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, किसी भी प्रदेश के राजनैतिक संगठनों में में चुनाव नजदीक आने पर सीटों को लेकर अंदरूनी तनाव पैदा होना आम बात है, लेकिन राजस्थान कांग्रेस इसके चरम पर पहुंच जाती है। वे आगे जोड़ते हैं, ऐसे मामलों की संख्या खास तौर पर तब ज्यादा बढ़ जाती है जब राज्य में कांग्रेस सत्ता से बाहर होती है। क्योंकि तब यह लगभग तय माना जाता है कि चुनाव-दर-चुनाव सत्ता बदलने वाले राजस्थान में अगली सरकार उसी की बननी है। ऐसे में संगठन के नेता जबरदस्त महत्वाकांक्षा और असुरक्षा के मिले-जुले भावों के चलते अपना सब्र खो देते हैं।
    राजस्थान में भाजपा की तुलना में कांग्रेस में भीतरी कलह कहीं ज्यादा होने के पीछे जानकार प्रदेश संगठन के शीर्ष नेतृत्व को भी बड़ा जिम्मेदार मानते हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत के जमाने से ही प्रदेश भाजपा में मोटे तौर पर एक ही नेता का वर्चस्व रहा है जिसे राज्य की मौजूदा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया बखूबी बरकरार रखने में सफल रही हैं। लिहाजा पार्टी में ऊपर से लेकर नीचे तक गुटबाजी होने की संभावना बहुत कम रहती है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं है। आजादी के बाद से ही संगठन में हर स्तर पर बराबर के कद वाले कई नेताओं की मौजूदगी से पैदा हुई आपसी प्रतिद्वंदिता और गुटबाजी की स्थिति आज तक बनी हुई है।
    मौजूदा दौर की बात करें तो प्रदेश कांग्रेस में नेताओं का एक बड़ा समूह पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पीछे है और दूसरा प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी जैसे नेताओं का भी अपना अलग समर्थक वर्ग है। इनके अलावा भी प्रदेश कांग्रेस कई अन्य छोटे-बड़े समूहों में बंटी हुई मानी जाती है। इनमें से अभी तक डूडी सचिन पायलट के करीब होते हुए भी सभी नेताओं से संतुलित रिश्ते बनाए हुए थे। लेकिन हालिया घटना ने सूबे के कई विश्लेषकों को चौंकाया है। (सत्याग्रह)
    जानकार कांग्रेस की इस स्थिति को उसके लिए आत्मघाती मानते हैं। उनका अनुमान है कि इन विधानसभा चुनावों में परिस्थितियां पिछले चुनावों जैसी नहीं रहने वालीं। दरअसल इस साल की शुरुआत में राज्य की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव हारने के बाद से प्रदेश भाजपा कहीं ज्यादा मुस्तैद होती दिखी है। वहीं टिकट वितरण में पूरी तरह वसुंधरा राजे को तरजीह देने के पीछे कई कारणों में से एक यह भी है कि भाजपा हाईकमान चुनावों के दौरान किसी भी तरह के बड़े भितरघात या आपसी द्वंद से बचना चाहता है। लेकिन कांग्रेस रणनैतिक तौर पर इस मामले में कमजोर दिख रही है।
    इससे पहले राजस्थान में भेजे गए चार सह प्रभारियों- विवेक बंसल, तरुण कुमार, देवेंद्र यादव और काजी निजामुद्दीन पर पैसे लेकर टिकट देने के आरोपों के चलते भी कांग्रेस की जमकर किरकिरी हुई। हालांकि बाद में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इन चारों के पैनल को निरस्त कर इन नेताओं को टिकट वितरण प्रक्रिया से बाहर का रास्ता दिखाकर स्थिति संभालने की कोशिश की थी। इसके अलावा भी गांधी समय-समय पर गहलोत और पायलट को भी सार्वजनिक मंचों पर एक साथ लाकर प्रदेश में पार्टी की एकजुटता का संदेश देने की कोशिश करते रहे हैं ताकि चुनावों में संगठन किसी हाल में कमजोर न होने पाए। देखने वाली बात होगी कि राजस्थान कांग्रेस के मुख्य स्तंभ कहे जाने प्रमुख नेता अपने अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए अपनी महत्वाकांक्षाओं के अश्वों को थामने में कितना सफल हो पाते हैं। (सत्याग्रह)

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