राजनीति

28-Nov-2020 1:14 PM 28

मनोज पाठक
पटना, 28 नवंबर|
बिहार विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की रणनीति भले ही असफल हो गई हो लेकिन राजद किसी भी हाल में सियासत के खेल में सत्ता पक्ष को खुला मैदान देना नहीं चाहती है। राजद राज्यसभा के लिए भी अलग रणनीति बनाने में जुटी है। राजद राज्यसभा उपचुनाव में अपना उम्मीदवार उतारने पर विचार कर रही है। दीगर बात है कि विधानसभा में संख्या बल के द्वारा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के प्रत्याशी के रूप में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का नाम घोषित कर दिया है।

केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के निधन से खाली हुई राज्यसभा सीट से भाजपा ने सुशील मोदी का नाम तय कर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में लाने के कयासों पर अपनी मुहर लगा दी है। संख्या बल को देखते हुए सुशील मोदी का चुना जाना भी तय माना जा रहा है। इस रिक्त हुए सीट के लिए तीन दिसंबर तक नामांकन होगा। वहीं 14 दिसंबर को चुनाव होगा।

राजद के सूत्रों का कहना है कि राजद में राज्यसभा के लिए दो नामों की चर्चा तेज है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह और वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दिकी को पार्टी राज्यसभा भेजना चाहती है। सिद्दिकी हाल ही में विधानसभा चुनाव हार गए थे। दोनों नेता राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के विश्वास पात्र माने जाते हैं।

वैसे सूत्र यह भी कह रहे हैं राजद दिग्गज नेताओं के अलावा, अन्य नेता को भी चुनाव मैदान में उतार सकती है, जिससे हारने की स्थिति में आलोचना से बचा जा सके।

वैसे, राजद ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं। संख्या बल के हिसाब से देखा जाए राजग का पलड़ा भारी है। राजग के पास जहां 125 विधायक हैं वहीं राजद नेतृत्व वाले महागठबंधन के पास 110 विधायक है। दो दिन पूर्व बिहार विधानसभा अध्यक्ष के पद पर भी महागठबंधन ने अपना उम्मीदवार खड़ा किया था, जिसे हार का मुंह देखना पड़ा था।

इधर, भाजपा के प्रवक्ता मनोज शर्मा कहते हैं, "सुशील कुमार मोदी अनुभवी नेता रहे हैं। बिहार की उन्होंने काफी दिनों तक सेवा दी है अब पार्टी उनके अनुभव को राष्ट्रीय स्तर पर लेना चाहती है। उन्होंने कहा कि विपक्ष लाख कोशिश कर ले, लेकिन उसे कुछ मिलने वाला नहीं है, उनकी हार तय है।"

इधर, राजद के एक नेता कहते हैं कि पार्टी इस मामले पर विचार कर रही है।

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के निधन के बाद इस खाली हुई सीट पर लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) पासवान की पत्नी रीना पासवावन को भेजने की मांग की गई थी। बिहार चुनाव में लोजपा के अकेले चुनाव मैदान में उतर जाने के बाद इस स्थिति में लोजपा के बदले भाजपा ने मोदी को भेजने का निर्णय लिया है। (आईएएनएस)
 


27-Nov-2020 12:11 PM 14

शैरोन थम्बाला 
अमरावती, 27 नवंबर|
ऐसे समय में जब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, राजमुंदरी के पूर्व सांसद हाल ही में पार्टी में फिर से शामिल हो गए।

अमालपुरम के पूर्व सांसद 61 साल के हर्ष कुमार केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी, आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष शैलजानाथ, तेलंगाना कांग्रेस के नेता वी. हनुमंत राव की उपस्थिति में दूसरी बार कांग्रेस में शामिल हुए और गांधी परिवार के प्रति अपनी निष्ठा जताई।

उन्होंने पार्टी में वापसी के दौरान कहा, "मैं कांग्रेस का प्रॉडिगल बेटा हूं। यह सच है और पार्टी ने मुझे ऐसे अपनाया जैसे वह प्रॉडिकल बेटे का पिता हो।"

उन्होंने कहा कि सुलह में राव ने सक्रिय भूमिका निभाई है, इसके बाद राजू ने भी उनके प्रति बहुत प्यार दिखाया, जो राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं।

अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र के दो बार के सांसद ने कहा, "कोप्पुला राजू, मैं उनके प्यार को नहीं भूल सकता। उनके प्रोत्साहन से मैं पार्टी में वापस आ सका।"

कुमार के अनुसार, 2014 में कांग्रेस के सत्ता गंवाने के बाद, देश में गरीब लोग मुश्किलों से गुजर रहे हैं।

कुमार आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. रेड्डी की विरासत को कमजोर करने के लिए राव के साथ कांग्रेस के पहले व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने अपनी लंबी पदयात्रा के साथ राज्य में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इसके बाद, 2 सितंबर, 2009 के बाद, जब रेड्डी की एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई, तो कुमार ने दावा किया कि उन्होंने रेड्डी की फोटो के साथ नहीं बल्कि सोनिया गांधी की तस्वीर के साथ अमलापुरम संसदीय चुनाव जीता था।

बाद में कुमार जयसमैक्यआंध्र पार्टी में शामिल हो गए।

हालांकि, तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने 2014 के चुनावों में कुमार की तरह कई उम्मीदवारों को हराते हुए जीत हासिल की।

2019 चुनावों से पहले, कुमार ने फिर से पार्टी बदल ली और तेदेपा में शामिल हो गए। कुमार ने नारा चंद्रबाबू नायडू के पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया।

हालांकि वह 2019 के चुनाव में तेदेपा के टिकट के लिए आतुर थे लेकिन नायडू ने उनका साथ नहीं दिया।

2019 के चुनाव के लगभग डेढ़ साल बाद, कुमार ने कांग्रेस में वापस आने का मन बना लिया और आखिरकार घर वापसी कर ली।(आईएएनएस)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


25-Nov-2020 10:45 PM 32

कोलकाता, 25 नवंबर| पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला बोला और अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी पार्टी को चुनौती देते हुए कहा कि वह तृणमूल कांग्रेस की जीत हर हाल में सुनिश्चित करेंगी, भले ही उन्हें जेल क्यों न भेज दिया जाए। बांकुड़ा जिले में एक रैली में ममता ने कहा कि भाजपा कोई राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि ये तो महज एक 'झूठ का कचरा' है।


उन्होंने कहा, "अगर भाजपा में हिम्मत है, तो उन्हें मुझे गिरफ्तार करने दीजिए। मैं जेल से ही चुनाव में तृणमूल की जीत सुनिश्चित करूंगी। मैं उन्हें स्पष्ट बता दूं कि मैं उनसे और उनकी एजेंसियों से नहीं डरती।"

ममता ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद का जिक्र करते हुए कहा कि जेल में बंद होने के बावजूद उनकी पार्टी ने हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है।

मुख्यमंत्री ने कहा, "लालू प्रसाद को सलाखों के पीछे डाल दिया गया, लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी के अच्छे चुनावी प्रदर्शन को सुनिश्चित किया। बिहार में भाजपा की जीत सरासर चालाकी से हुई है, न कि किसी लोकप्रिय जनादेश के जरिए।"

ममता ने किसी का नाम लिए बिना कहा कि भाजपा तृणमूल नेताओं और विधायकों को प्रलोभन देने की कोशिश कर रही है, क्योंकि कुछ लोग इस भ्रम में हैं कि भाजपा बंगाल में सत्ता में आएगी और इसीलिए वे मौके की तलाश में हैं।

उन्होंने कहा, "चुनाव के समय वे तृणमूल नेताओं को डराने-धमकाने के लिए नारद स्टिंग ऑपरेशन और शारदा चिटफंड घोटाले जैसे मुद्दों को सामने लाते हैं। वे हमारे नेताओं को पैसे का लालच दे रहे हैं।"

ममता ने कहा, "आपको एक बात याद रखनी होगी कि वे बाहरी हैं। सत्ता में आने पर वे बंगाल को लूट लेंगे। इसीलिए उन्होंने बंगाल में कांग्रेस और मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के साथ सांठगांठ की है।"

उन्होंने कहा कि भाजपा के पास राज्य में सत्ता में आना का कोई भी मौका नहीं है। ममता बोलीं, "हम एक बार फिर बंगाल के लोगों के जनादेश के साथ सत्ता में आएंगे।"

294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए चुनाव अगले साल अप्रैल-मई में होने वाले हैं।

ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस वर्ष 2011 से लगातार राज्य में सत्तारूढ़ है। कांग्रेस से निकली हुई इस पार्टी ने बंगाल में 34 साल से सत्ता पर काबिज वाम मोर्चे को मात दी थी। (आईएएनएस)

 


23-Nov-2020 7:55 PM 26

भोपाल 23 नवंबर | मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उप-चुनाव के बाद हर वर्ग का दिल जीतने की जुगत में लग गए हैं। बीते दस दिनों में मुख्यमंत्री ने कई महत्वपूर्ण फैसले लेने के साथ जनता के करीब पहुंचने का अभियान शुरू कर दिया है। लगभग दो साल पहले हुए विधानसभा के चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस विधायकांे की बगावत के कारण भाजपा को फिर से सत्ता मिल गई। बहुमत में रही कसर उप-चुनाव के नतीजों से पूरी हो गई है।


उप-चुनाव के नतीजे आने के बाद से मुख्यमंत्री चौहान नए अंदाज में हैं। एक तरफ नई योजनाओं को अमली जामा पहना रहे हैं। उनका सारा ध्यान रोजगार, किसान और महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित है। साथ ही वे जमीनी हकीकत को जानने के अभियान में लग गए हैं।

मुख्यमंत्री चौहान ने सोमवार को राजधानी में विभिन्न कार्यालयों तक पहुंचे। उन्होंने भोपाल नगर के निरीक्षण में सबसे पहले कलेक्ट्रेट स्थित लोक सेवा केंद्र पहुंचकर आमजन से भेंट की। आवेदकों से भी चर्चा की, जिसमें जानकारी प्राप्त हुई कि उनके कार्य एक दिन में हो रहे हैं, लेकिन दस्तावेज की प्रति के लिए पांच रुपये प्रति दस्तावेज शुल्क भी देना होता है।

मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि लोक सेवा केंद्रों पर लगने वाले इस शुल्क में कमी के लिए नई नीति बनाई जाएगी। लोक सेवा केंद्रों का उद्देश्य आमजन की समस्याओं का त्वरित निराकरण करने के साथ ही आमजन को इन कार्यो पर लगने वाले शुल्क के आर्थिक बोझ से भी बचाना है।

मुख्यमंत्री चौहान ने भोजताल के पास कोहेफिजा अहमदाबाद क्षेत्र में नवनिर्मित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निरीक्षण किया। उन्होंने प्लांट की निर्माण अवधि में विलंब की जानकारी प्राप्त की, जिसमें यह तथ्य प्रकाश में आया कि इसका निर्माण वर्ष 2019 में पूर्ण होना था।

मुख्यमंत्री चौहान ने रायसेन रोड स्थित कोकता क्षेत्र में नगर-निगम भोपाल द्वारा प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत निर्मित किए जा रहे आवास गृहों का भी निरीक्षण किया। उन्होंने कहा कि झुग्गीवासियों को भी स्वच्छ आवास में रहकर मुस्कराने का अधिकार है। आवास हर आदमी की जरूरत है। प्रदेश में सभी गरीबों को अपनी छत देने का लक्ष्य पूर्ण किया जाना है। पूर्व सरकार द्वारा प्रधानमंत्री आवास योजना के क्रियान्वयन के प्रति गंभीर रुख न अपनाने से कई स्थानों पर आवासों के निर्माण में देरी हुई है।

मुख्यमंत्री चौहान ने कोरोना से बचाव के लिए जनता को जागरूक करने के लिए भोपाल की अब्बास नगर बस्ती जाकर बच्चों और बड़ों को मास्क वितरित किए।

बताया गया है कि चौहान आने वाले दिनों में विभिन्न नगरों और ग्रामीण इलाकों में पहुंचकर लोगों से सीधे संवाद करेंगे और उनकी समस्या से रूबरू होंगे। (आईएएनएस)

 


23-Nov-2020 1:34 PM 46

देहरादून, 23 नवंबर। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पंजाब प्रभारी हरीश रावत ने अपनी राजनीतिक पारी को लेकर बड़ा ऐलान किया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हरीश रावत ने 2024 में संन्यास का ऐलान किया है। सोमवार सुबह हरीश रावत ने अपने फेसबुक पेज पर इसका ऐलान किया। हरीश रावत ने कहा कि वो 2024 में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के बाद राजनीति से संन्यास ले लेंगे। साथ ही उन्होंने अपने विरोधियों पर तीखा प्रहार भी किया है।

क्या बोले हरीश रावत?
हरीश रावत ने विरोधियों पर वार से लेकर अपने संन्यास को लेकर लंबा संदेश लिखा है। उन्होंने इस संदेश में कहा, महाभारत के युद्ध में अर्जुन को जब घाव लगते थे, वो बहुत रोमांचित होते थे। राजनैतिक जीवन के प्रारंभ से ही मुझे घाव दर घाव लगे, कई-कई हारें झेली, मगर मैंने राजनीति में न निष्ठा बदली और न रण छोड़ा। मैं आभारी हूं, उन बच्चों का जिनके माध्यम से मेरी चुनावी हारें गिनाई जा रही हैं, इनमें से कुछ योद्धा जो आरएसएस की क्लास में सीखे हुए हुनर, मुझ पर आजमा रहे हैं। वो उस समय जन्म ले रहे थे, जब मैं पहली हार झेलने के बाद फिर युद्ध के लिए कमर कस रहा था, कुछ पुराने चकल्लस बाज हैं जो कभी चुनाव ही नहीं लड़े हैं और जिनके वार्ड से कभी कांग्रेस जीती ही नहीं, वो मुझे यह स्मरण करा रहे हैं कि मेरे नेतृत्व में कांग्रेस 70 की विधानसभा में 11 पर क्यों आ गई। ऐसे लोगों ने जितनी बार मेरी चुनावी हारों की संख्या गिनाई है, उतनी बार अपने पूर्वजों का नाम नहीं लिया है, मगर यहां भी वो चूक कर गये हैं।

उन्होंने आगे लिखा, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत व बागेश्वर में तो मैं सन 1971-72 से चुनावी हार-जीत का जिम्मेदार बन गया था, जिला पंचायत सदस्यों से लेकर जिलापंचायत, नगर पंचायत अध्यक्ष, वार्ड मेंबरों, विधायकों के चुनाव में न जाने कितनों को लड़ाया और न जाने उनमें से कितने हार गये, ब्यौरा बहुत लंबा है मगर उत्तराखंड बनने के बाद सन् 2002 से लेकर सन् 2019 तक हर चुनावी युद्ध में मैं नायक की भूमिका में रहा हूं, यहां तक कि 2012 में भी मुझे पार्टी ने हैलीकॉप्टर देकर 62 सीटों पर चुनाव अभियान में प्रमुख दायित्व सौंपा।

राहुल के पीएम बनने के बाद लूंगा संन्यास- रावत
हरीश रावत ने आगे कहा कि चुनावी हारों के अंकगणित शास्त्रियों को अपने गुरुजनों से पूछना चाहिए कि उन्होंने अपने जीवन काल में कितनों को लड़ाया और उनमें से कितने जीते? यदि अंक गणितीय खेल में उलझे रहने के बजाय आगे की ओर देखो तो समाधान निकलता दिखता है। श्री त्रिवेंद्र सरकार के एक काबिल मंत्री जी ने जिन्हें मैं उनके राजनैतिक आका के दुराग्रह के कारण अपना साथी नहीं बना सका, उनकी सीख मुझे अच्छी लग रही है। मैं संन्यास लूंगा, अवश्य लूंगा मगर 2024 में, देश में राहुल गांधी जी के नेतृत्व में संवैधानिक लोकतंत्रवादी शक्तियों की विजय और राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही यह संभव हो पायेगा, तब तक मेरे शुभचिंतक मेरे संन्यास के लिये प्रतीक्षारत रहें। (abplive.com)


22-Nov-2020 9:44 PM 44

धारवाड़, 22 नवंबर | कर्नाटक में दीपावली के बाद 17 नवंबर को डिग्री कॉलेजों को फिर से शुरू कर दिया गया है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के. सुधाकर ने रविवार को कहा कि अगर राज्य में कोरोनावायरस मामलों में वृद्धि होती है तो इसे फिर से बंद कर दिया जाएगा। सुधाकर ने पत्रकारों से कहा, "जैसा कि डिग्री, इंजीनियरिंग और पॉलिटेक्निक कॉलेजों ने अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए आठ महीने से अधिक समय के बाद कॉलेजों को खोला है। यदि राज्य में कोरोनावायरस के मामले बढ़ते हैं तो इसे फिर से बंद कर दिया जाएगा, क्योंकि छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा ऑफलाइन कक्षाओं की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।" कॉलेजों को फिर से खुलने के बाद इसमें प्रवेश से पहले छात्रों के लिए आरटी-पीसीआर की निगेटिव रिपोर्ट के अलवा माता-पिता से सहमतिपत्र और फेस मास्क का उपयोग अनिवार्य है। (आईएएनएस)

 


22-Nov-2020 9:43 PM 33

नवनीत मिश्र 

नई दिल्ली, 22 नवंबर | तमिलनाडु में अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा संगठन के विस्तार में जुटी है। बीते छह महीने में तमिलनाडु के मुख्य विपक्षी दल डीएमके के दो बड़े नेताओं को तोड़ने में मिली सफलता से उत्साहित भाजपा की नजर अन्य असंतुष्ट नेताओं पर है।

भाजपा ने राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि को इस मोर्चे पर लगाया है। बतौर तमिलनाडु प्रभारी सीटी रवि ने बीते 21 नवंबर को डीएमके के पूर्व सांसद डॉ. केपी रामालिंगम की भाजपा में ज्वाइनिंग कराकर राज्य में सियासी सरगर्मी पैदा कर दी है। इससे पूर्व मई में डीएमके के डिप्टी जनरल सेक्रेटरी पद से हटाए जाने पर वी.पी. दुरैसामी ने भाजपा का दामन थाम लिया था। भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि आने वाले वक्त में डीएमके के कुछ और नेता भाजपा में जुड़ सकते हैं।

डीएमके के अंदरखाने इस वक्त दो प्रमुख कारणों से नेताओं की नाराजगी चल रही है। कुछ नेता डीएमके में पार्टी मुखिया स्टालिन के बेटे उधयनिधि के बढ़ते वर्चस्व से चिंतित हैं। स्टालिन अपने बेटे उधयनिधि को लगातार प्रमोट करने में जुटे हैं।

सूत्रों का कहना है कि इससे पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता नाराज चल रहे हैं। उधयनिधि के हवाले डीएमके के यूथ विंग की कमान है। हाल में उधयनिधि ने डीएमके के लिए सौ दिन का आउटरीच प्रोग्राम तैयार किया। इसके लिए 15 वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई। मगर, संबंधित नेताओं को ऐन वक्त पर इस कार्यक्रम के बारे में बताया गया। वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि उधयनिधि संगठन से जुड़े फैसलों में आम रायशुमारी करने में ज्यादा यकीन नहीं रखते।

दलबदल कर आने वाले नेताओं को संगठन में जगह मिलने से भी पार्टी का एक धड़ा परेशान है। एआईएडीएमके से आने वाले पूर्व मंत्री राजा कनप्पन, डॉ. विजय और डॉ. लक्ष्मणन को स्टालिन ने डीएमके में अहम जिम्मेदारियां मिलने से पार्टी के पुराने नेता नाराज चल रहे हैं।

सत्ताधारी एआईएडीएमके ने भाजपा के साथ गठबंधन कर तमिलनाडु में वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में उतरने का फैसला किया है। तमिलनाडु में इधर भाजपा ने हिंदुत्व के एजेंडे को धार देना शुरू किया है। एक तरफ एआईएडीएमके का जनाधार है तो दूसरी तरफ बीजेपी का बढ़ता प्रभाव है। इससे डीएमके के कई नेताओं को लगता है कि गठबंधन के कारण बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना फायदेमंद हो सकता है। ऐसे में चुनाव लड़ने के इच्छुक डीएमके के नेता भाजपा में आ सकते हैं।(आईएएनएस)

 


21-Nov-2020 8:11 PM 34

पटना, 21 नवंबर| बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार बन गई, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल (युनाइटेड) के बीच जुबानी जंग थम नहीं रही है। जदयू ने शनिवार को कहा कि राजद के नेता तेजस्वी यादव को भ्रष्टाचार पर बोलने का अधिकार नहीं है। जदयू ने मेवालाल चौधरी के मंत्री पद से इस्तीफा मामले पर तेजस्वी को घेरते हुए जदयू के नेताओं ने कहा कि जिसका परिवार भ्रष्टाचार में डूबा हुआ हो, उनको अधिकार किसने दिया है वे दूसरों पर सवाल खड़ा करें। 

जदयू प्रदेश कार्यालय में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि मेवालाल चौधरी ने मंत्री पद से इस्तीफा देकर एक बड़ा ही अच्छा उदाहरण पेश किया है। 

सिंह ने कहा, "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने राजनैतिक शुचिता का बराबर ध्यान रखा है, सार्वजनिक जीवन में कभी-कभी विवादास्पद मौके आते भी हैं। उसकी व्याख्या भी होती है। जब भी ऐसे मौके पर सवाल उठा है नैतिकता का परिचय देते हुए मुख्यमंत्री ने ऐसे आरोपियों से इस्तीफा लिया है।" 

उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए सवाल किया, इस मामले में तेजस्वी यादव मुखर थे, लेकिन उन्हें बोलने का नैतिक पक्ष कहां है? कहां सार्वजनिक जीवन की प्रतिबद्धता और उसकी ऊंचाई, उसकी शुचिता उस पर पर भी उन्हें बोलने का अधिकार है, क्या?"

पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक चौधरी ने कहा कि, "हमारे नेता नीतीश कुमार ने हमेशा दो बातों की चर्चा की है कि हम कभी भ्रष्टचार, अपराध से समझौता नहीं करेंगे और न हम किसी को फंसाते हैं और न हम किसी को बचाते हैं। इसका स्पष्ट उदाहरण मेवालाल चौधरी का मामला है।" 

प्रदेश प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा कि, "नीतीश कुमार के कार्यकाल में जितने भी विधायक, मंत्रियों या अन्य नेताओं पर आरोप लगा, उन्हें इस्तीाफा देना पड़ा, लेकिन हम तेजस्वी यादव से पूछना चाहते हैं कि जिसका परिवार भ्रष्टाचार में डूबा हुआ हो, उनको अधिकार किसने दिया है कि दूसरों पर सवाल खड़ा करें।" 

विधानपार्षद नीरज कुमार ने कहा कि, "लालू परिवार से राजनीति में नैतिकता की उम्मीद नहीं की जा सकती है, लेकिन हमारी उम्मीद इतनी भर है कि सदन के सदस्य होने के नाते जब तेजस्वी यादव शपथ लें तो आरोपी होने की धाराएं जरूर लोगों को बताएं।" 

जदयू नेता डॉ. अजय आलोक ने कहा कि, "मेवालाल चौधरी पर अभी तक अभियोजन नहीं हुआ है, अभियोजन होने से चार्जशीट होने तक एक प्रक्रिया होती है, तब जाकर चार्जशीट होगी। लेकिन उससे पहले ही इस्तीफा ले लिया गया। यह राजनीतिक शुचिता का उच्च मापदंड प्रदर्शित करता है।" 

उल्लेखनीय है कि मेवालाल चौधरी को मंत्री पद की शपथ लेने के तीन दिनों के अंदर ही भ्रष्टाचार के आरोप होने के कारण मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।  (आईएएनएस)


20-Nov-2020 8:03 PM 36

नई दिल्ली, 20 नवंबर | कांग्रेस ने शुक्रवार को केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते को फ्रीज करने के फैसले पर केंद्र को आड़े हाथों लिया और कहा कि यह डूबती अर्थव्यवस्था का एक और संकेत है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट करते हुए कहा है कि खाद्य पदार्थों में मुद्रास्फीति 11 फीसदी से ज्यादा हो गई है, लेकिन मोदी सरकार केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) के कर्मचारियों का महंगाई भत्ता (डीए) बढ़ाने की बजाय फ्रीज कर रही है। उन्होंने कहा कि "एक ओर सरकारी कर्मचारियों की हालत पस्त है और दूसरी ओर पूंजीपति 'मित्र' मुनाफा कमाने में मस्त हैं।"

राहुल ने ट्वीट किया, "खाद्य पदार्थो की महंगाई दर 11.1 फीसदी पार! लेकिन मोदी सरकार सेंट्रल पीएसयू कर्मचारियों का डीए बढ़ाने की बजाय फ्रीज कर रही है। सरकारी कर्मचारियों की हालत पस्त, पूंजीपति 'मित्र' मुनाफा कमाने में मस्त!"

वहीं पार्टी नेता सुप्रिया श्रीनेत ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, "अर्थव्यवस्था नियंत्रण से बाहर है और हर कोई परेशानी में है। यह सिर्फ असंगठित क्षेत्र नहीं है जो परेशानी झेल रहा है, बल्कि सरकारी कर्मचारी भी भारतीय अर्थव्यवस्था की अक्षमता का खामियाजा भुगत रहे हैं।"

कांग्रेस नेता ने कहा कि दिक्कतें सिर्फ असंगठित क्षेत्र में ही नहीं है, बल्कि यहां तक कि सरकारी कर्मचारी भी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन का खामियाजा भुगत रहे हैं।

उन्होंने कहा, "तेजी से बढ़ती महंगाई ने मुश्किलें और भी बढ़ा दी हैं। अक्टूबर माह में महंगाई दर में 7.61 फीसदी की वृद्धि, विशेष रूप से खाद्य पदार्थों में 11.6 फीसदी की वृद्धि गहन चिंता का कारण है।"(आईएएनएस)

 


17-Nov-2020 1:00 PM 43

विवेक त्रिपाठी 
लखनऊ, 17 नवंबर|
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) उपचुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद अपने संगठनिक ढांचे को नए सिरे से मजबूत करने में लग गयी हैं। अब उनका फोकस दलित और अति-पिछड़ा है। प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर राजभर समाज के व्यक्ति को बैठा कर पार्टी ने साफ संकेत दे दिया है कि वह वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में इसी जातीय समीकरण के आधार पर मैदान में उतरेगी।

प्रदेश अध्यक्ष पद से मुनकाद अली को हटाने के बाद अब निचले स्तर पर बड़े बदलाव की तैयारी है। इसके साथ वर्ष 2022 के आम चुनाव से पहले सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कार्ययोजना भी तैयार की है। अगले वर्ष होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के जरिये सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत किया जाएगा। इसके लिए समीक्षा हो रही है। मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के वोट छिटकने पर चिंता व्यक्त की गयी है।

राज्यसभा चुनाव के बाद से बसपा सुप्रीमो के बयान का असर भी पड़ा है। उनको लगता है कि मुस्लिम अब उनके पाले में आसानी से नहीं आएगा। ऐसे में उन्होंने इस वर्ग के बजाए पिछड़े-अति पिछड़े वोट बैंक पर अपनी नजरें गड़ानी शुरू कर दी हैं।

पार्टी के एक पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अभी तक अन्य पिछड़ा वर्ग द्वारा बसपा से दूरी बनाने के बाद मुस्लिम भी अपने पाले से खिसकने लगे हैं। पिछले तीन चुनावों का अनुभव देंखे तो पार्टी केवल दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण गठजोड़ बनाए रखने पर अधिक दिनों तक नहीं चल सकेगी। जब तक अन्य पिछड़ों को फिर से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक मुस्लिमों को संभाले रखना संभव न होगा। यह बसपा का पुराना बेस वोट रहा है। इस कारण कई प्रकार की रणनीति में फेरबदल हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि अभी पार्टी का मुख्य फोकस है कि अपने बिखर चुके वोट बैंक को कैसे संजोय और संभाले। इसी को लेकर पार्टी नेतृत्व नए-नए प्रयोग आजमा रहा है।

नेता के अनुसार पार्टी के गिरते वोट बैंक को लेकर अच्छी खासी चिंता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को औसत 23.62 प्रतिश्त वोट मिले थे। जो कि उपचुनाव में 18.97 ही रह गये हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल कहते हैं कि बसपा को अब तक दलित, ब्राम्हण और मुस्लिम वोटों के जरिए सफलता मिली है। 2014 के बाद से भाजपा ने दलित वोटों पर सेंधमारी की है। उससे बसपा का आधार खिसक रहा है। बसपा को एक नया क्षेत्र चाहिए। जिससे वह अपना आधार मजबूत कर सके। ऐसे में उन्होंने छोटा ही सही एक वर्ग ढूंढा है। क्योंकि भाजपा के निकटता के कारण मुस्लिम उनकी ओर नहीं आएंगे। अब मुस्लिमों पर उनका भरोसा नहीं होगा। दलित और पिछड़ों के बीच अति-पिछड़ा बचा है। इस पर अभी किसी पार्टी का कोई खास ध्यान नहीं है। इसी कारण बसपा ने इस वर्ग को खोजा है जहां वह अपने को मजबूती से स्थापित कर सके।

उन्होंने कहा कि बसपा के लिए समाज के किसी एक वर्ग का समर्थन मिलना बहुत जरूरी है। नहीं तो उनके अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। क्योंकि उन्हें बड़े वर्ग का समर्थन मिल पाना मुश्किल है। सर्वणों का समर्थन मिलेगा नहीं। मुस्लिम अब जाएगा नहीं। पिछड़ों का अभी भी सपा एक बेहतर विकल्प है। बसपा की सत्ता पर कोई भागीदारी नहीं है। ऐसे में एक वर्ग की तलाश है। इसी कारण मायावती ने रणनीति के तहत यह कदम उठाया है। उपचुनाव के नतीजों ने यह तस्वीर साफ कर दी है कि उनकी तरफ किसी बड़े वर्ग का समर्थन अब बचा नहीं है। इसी कारण उन्होंने इस ओर फोकस करना शुरू किया है। (आईएएनएस)
 


16-Nov-2020 12:09 PM 27

बिहार बीजेपी के नेता और कटिहार से नवनिर्वाचित विधायक तारकिशोर प्रसाद को बीजेपी के विधानमंडल दल (विधानसभा और विधान परिषद) का नेता चुना गया है. केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने तारकिशोर प्रसाद को बीजेपी दल का नेता बनाए जाने की घोषणा की.

64 साल के तारकिशोर प्रसाद 2005 से कटिहार विधानसभा से विधायक हैं. इस बार उन्होंने आरजेडी के राम प्रकाश महतो को क़रीब दस हज़ार मतों से हराया है.

तारकिशोर प्रसाद का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से पुराना रिश्ता रहा है. उनका परिवार मूलरूप से सहरसा ज़िले के तलखुआ गांव का रहने वाला है. वो कलवार वैश्य समाज से आते हैं जिसे बिहार में पिछड़ा वर्ग का दर्जा प्राप्त है.

मूलरूप से व्यापारिक परिवार से जुड़े तारकिशोर प्रसाद के पिता कपड़े का कारोबार करते हैं. उन्होंने मेडिकल स्टोर का संचालन भी किया है. 2001 में वो कटिहार में चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के अध्यक्ष भी रहे.

कटिहार में कशिश न्यूज़ के संवाददाता रितेश रंजन के मुताबिक शहर के व्यापारिक वर्ग में उनकी अच्छी पकड़ है और बीजेपी विधानमंडल का अध्यक्ष बनाए जाने और डिप्टी सीएम बनने के कयासों से कटिहार के व्यावसायिक समाज में ख़ुशी की लहर है.

तारकिशोर प्रसाद ने पहली बार साल 2005 में चुनाव लड़ा और बेहद नज़दीकी मुकाबले में डॉ. राम प्रकाश महतो को 165 वोट से हरा दिया था.
इसके बाद 2010 और फिर 2015 का विधानसभा चुनाव उन्होंने भारी अंतर से जीता.

रितेश रंजन के मुताबिक इस बार माहौल तारकिशोर प्रसाद के ख़िलाफ़ था, बावजूद इसके वो दस हज़ार के भारी अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे.
रितेश बताते हैं, "कटिहार में इस बार भारी बारिश हुई और बाढ़ से लोग प्रभावित रहे. लोग जलजमाव की समस्या से परेशान थे. कटिहार के एक इलाके में तो लोगों ने वोटों का बहिष्कार तक कर दिया था. इस बार तारकिशोर प्रसाद का जीतना मुश्किल माना जा रहा था लेकिन अंततः ये दस हज़ार वोट से जीते हैं."

रेणु देवी
तारकिशोर प्रसाद के साथ-साथ बेतिया से विधायक रेणु देवी को विधानमंडल दल का उप नेता चुना गया है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस बार तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को बिहार में उप-मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. ये दोनों ही नेता वैश्य समुदाय से हैं.

तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी दोनों ही बिहार बीजेपी के पुराने नेता हैं. दोनों ही नेता स्वयंसेवक संघ के भी करीबी रहे हैं.

रेणु देवी

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "बीजेपी के कई नेता ये कह रहे हैं कि अब लगता है कि बिहार बीजेपी में सभी पदों पर बनिया समुदाय के नेताओं का वर्चस्व हो गया है. बीजेपी में ही अब ये बात उठने लगी है कि नए नेताओं के नाम की घोषणा करते हुए जातीय संतुलन का ख्याल नहीं रखा गया है."

मणिकांत ठाकुर के मुताबिक तारकिशोर प्रसाद कटिहार की छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे. लेकिन उनकी पहचान एक ऐसे जननेता की नहीं है जिसके पीछे भीड़ खड़ी हो जाए.

तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी के आगे आने का मतलब ये भी है कि अब नीतीश के डिप्टी सीएम रहे बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी को पीछे हटना पड़ेगा.
मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "आम लोगों और बिहार भाजपा के नेताओं में ये राय बनने लगी थी कि सुशील मोदी अपनी पार्टी से ज़्यादा नीतीश कुमार के वफ़ादार हैं. उनकी अपनी पार्टी में उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठने लगी थी इसी वजह से सुशील मोदी बिहार में सर्वमान्य नेता नहीं बन पा रहे थे. अब लगता है कि एनडीएन की नई सत्ता में सुशील कुमार मोदी को जगह नहीं दी जा रही है."

कयास लगाए जा रहे हैं कि सुशील कुमार मोदी की भूमिका बिहार बीजेपी में सीमित करके उन्हें कहीं और जगह दी जाए.

तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी के उभार की वजह बताते हुए ठाकुर कहते हैं, "यदि नीतीश की चल रही होती तो बीजेपी नेतृत्व बिहार से सुशील मोदी को हटाने में कामयाब नहीं हो पाता. ये इस बात का भी संकेत है कि बीजेपी बिहार की सत्ता पर मज़बूत पकड़ चाहती है." (bbc.com/hindi)


12-Nov-2020 9:21 PM 32

पटना, 12 नवंबर। बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल (युनाइटेड) के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने गुरुवार को कहा कि बिहार की जनता ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को बहुमत दिया है। चुनाव में राजग की सफलता के बाद पहली बार पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि राजग की बैठक में तय होगा कि मुख्यमंत्री कौन होगा। पटना में जदयू कार्यालय में नवनिर्वाचित विधायकों और चुनाव में प्रत्याशियों के साथ बैठक के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि राजग विधायक दल की बैठक को लेकर अभी कोई तिथि तय नहीं हुई है। इस बैठक में मुख्यमंत्री कौन होगा तय कर लिया जाएगा। 

उन्होंने कहा कि संभव है कि शुक्रवार को राजग के घटक दलों के नेता आपस में बैठेंगे, उसके बाद राजग के विधायक दल की बैठक की तारीख तय की जाएगी। शपथ ग्रहण समारोह के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि अभी इसकी कोई तारीख तय नहीं हुई है। 

जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने बिना किसी के नाम लिए हुए लोजपा और राजद को निशाने पर लेते हुए कहा, "अगर हमारे काम करने के बावजूद भी कोई भ्रमित करने में कामयाब होता है और लोग भ्रमित होकर वोट करते हैं तो ये उनका अधिकार है। मैंने लोगों की सेवा किया है।" 

उन्होंने कहा कि कुछ ने लोगों को भ्रमित करने का पूरा प्रयास किया और कामयाब भी हुए। जदयू को कम सीट आने पर उन्होंने कहा, "हमलोगों की सीट पर कैसे वोट बांटा गया वो देख रहे हैं। गठबंधन और पार्टी के लोग देख रहे हैं कि कहां क्या हुआ है।" 

बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन बनेगा, का जवाब देते हुए नीतीश ने कहा, "मैं कहां कोई दावा कर रहा हूं? निर्णय राजग द्वारा लिया जाएगा। हमारा अभियान पूरे राजग के लिए था, लेकिन प्रत्याशी नहीं होने के बावजूद ढूंढ़-ढूंढ़कर सिर्फ हमारी ही सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर नुकसान पहुंचाया गया।" 

उन्होंने कहा कि यह भाजपा को देखना है। हालांकि यह भी कहा कि एक-एक सीटों पर विश्लेषण किया जा रहा है। 

नीतीश ने एकबार फिर क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म से समझौता न करने की बात करते हुए कहा कि राजग की सरकार बनने के बाद तय किया जाएगा कि काम कैसे किया जाएगा, इसकी योजना बनाई जाएगी। 

उन्होंने कहा कि काम करनेवाले को अगर कोई अपमानित करेगा, तो बिना काम करनेवाले आएंगे, तो क्या होगा। इस चुनाव में कई ऐसी चीजें भी प्रचारित की गई जो कभी पूरी हो ही नहीं सकी।

एक प्रश्न के उत्तर में नीतीश कुमार ने कहा कि राजग को बहुमत है, सरकार चलाने में कोई परेशानी नहीं होगी।  (आईएएनएस)


12-Nov-2020 1:37 PM 33

पटना, 12 नवंबर। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। महागठबंधन में 70 सीटों पर चुनाव लड़ रही यह पार्टी महज 19 सीट ही जीत पाई। अब राज्य में इस खराब प्रदर्शन पर कांग्रेस के अंदरखानों में विरोध के स्वर उठने लगे हैं। कई वरिष्ठ नेताओं ने तो पार्टी की सीटों में गिरावट के लिए गांधी परिवार तक पर निशाना साधा। ऐसे ही एक असंतुष्ट नेताओं के गुट का कहना है कि कांग्रेस की वजह से महागठबंधन की साथी पार्टी- राजद और लेफ्ट पार्टियां भी नीचे आ गईं। 

महागठबंधन ने कुल 110 सीटें जीती हैं। इनमें 144 सीटों पर राजद लड़ी थी और तेजस्वी के नेतृत्व वाली इस पार्टी ने अपने दम पर ही 75 सीटों पर जीत हासिल की। इतना ही नहीं 19 सीटों पर लड़ी सीपीआई-एमएल ने भी 12 सीटों पर जीत हासिल की। यानी कांग्रेस के सीट जीतने का औसत महागठबंधन की पार्टियों में सबसे कम रहा। बिहार कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि पार्टी ने गलत टिकट बंटवारा किया। साथ ही एआईएमआईएम फैक्टर और आखिरी फेज में वोटों के धु्रवीकरण की वजह से उन्हें नुकसान हुआ। 

अन्य नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को 13 ऐसी सीटें मिली थीं, जिन पर उसने कभी चुनाव नहीं लड़ा। मतदान के पहले दो फेजों में पार्टी का प्रदर्शन काफी बेहतर था। कांग्रेस ने 26 ऐसी सीटों पर भी चुनाव लड़ा, जिन पर पिछले तीन दशक में महागठबंधन का कोई भी साथी चुनाव नहीं जीता था। वहीं, कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं ने पार्टी के कुप्रबंधन को चुनाव में हार का कारण करार दिया। कई नेताओं का कहना है कि उन्हें पार्टी के चुनाव अभियान से ही दूर रखा गया और नई दिल्ली से कुछ अयोग्य नेताओं को बिहार में कार्यभार संभालने भेजा गया। इसके चलते बिहार में बैठे कांग्रेस के नेताओं को ही नजरअंदाज कर दिया गया।
 
दूसरे नेताओं का कहना है कि बिहार चुनाव को अलग से देखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस का यही हाल हुआ है। मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के उपचुनाव इसका उदाहरण रहे। बिहार में एकमात्र वरिष्ठ नेता जिसने प्रचार अभियान में हिस्सा लिया, वह थे राहुल गांधी। लेकिन उन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निजी हमले ही जारी रखे, जबकि महागठबंधन के बाकी नेता राज्य में बेरोजगारी और नीतीश सरकार के शासन पर सवाल उठा रहे थे। (jansatta.com)


12-Nov-2020 1:04 PM 60

मनोज पाठक
पटना, 12 नवंबर|
बिहार चुनाव में कई युवा वैसे तो चुनाव जीत कर विधानसभा तक पहुंचने में सफल रहे हैं, लेकिन कई युवा ऐसे भी हैं जो अपने विधानसभा क्षेत्रों में वोट तो अच्छी खासी ले आए, लेकिन वे अंतिम तक बढ़त नहीं बना सके और उनका विधानसभा पहुंचने का सपना टूट गया। ऐसे में राजद नेतृत्व वाले महागठबंधन के कई युवा हैं।

महागठबंधन में शामिल कांग्रेस ने इस चुनाव में 70 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, लेकिन 19 प्रत्याशी ही जीत सके। कई युवा चेहरों को इस चुनाव में मात खानी पड़ी। कांग्रेस के एक नेता ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि कांग्रेस को 70 सीटें दी गई। दरअसल, कांग्रेस केवल 45 सीटों पर ही लड़ रही थी, शेष 25 सीटों को तो महागठबंधन के सभी घटक पहले से ही हारी जा चुकी मान रहे थे, इनमें से कई भाजपा के गढ़ थे।

कांग्रेस ने सोचा कि आगे आने वाले समय में पार्टी के विस्तार को ध्यान में रखते हुए उसे अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए।

आंकडों पर गौर करें तो सुल्तानगंज क्षेत्र से कांग्रेस ने कई चुनावों के बाद अपने उम्मीदवार उतारे। कांग्रेस ने इस चुनाव में वहां से युवक कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ललन कुमार को प्रत्याशी बनाया। कांग्रेस के ललन कुमार को जहां 61,017 मत मिले वहीं जदयू के प्रत्याशी ललित नारायण मंडल को 72,620 मत प्राप्त हुए। मतगणना के कई दौर के बाद ललन आगे भी रहे, लेकिन अंत में वे पिछड़ गए।

इधर, इस चुनाव में कांग्रेस भागलपुर के कहलगांव से नौ बार विधानसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके सदानंद सिंह के पुत्र शुभानंद मुकेश को टिकट थमाया। यहां से भाजपा के पवन कुमार यादव ने शानदार जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी शुभानंद मुकेश को 42,893 वोटों से हराया। पवन यादव को 1,15,326 वोट मिले, वहीं शुभानंद मुकेश को 72,379 वोट ही मिल सके और वे कांग्रेस का किला नहीं बचा सके।

इसी तरह बेलदौर में भी कांग्रेस के युवा चेहरा चंदन यादव को कड़े मुकाबले में हार का मुंह देखना पड़ा। चंदन कांग्रेस कमिटि के सचिव हैं। चंदन को 51,064 वोट मिले जबकि जदयू के पन्ना लाल पटेल को 56,353 वोट मिले।

दिग्गज समाजवादी नेता शरद यादव की पुत्री सुभाषिनी यादव को भी इस चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा। सुभाषिनी की जीत के लिए यहां कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी पहुंचकर वोट देने की अपील की थी, लेकिन वे जीत नहीं सकी। यहां से सुभाषिनी को 61,650 वोट पर संतोष करना पड़ा जबकि जदयू के निरंजन कुमार मेहता को 81,109 मत मिले।

कुल मिलाकर देखा जाए तो इस चुनाव में कांग्रेस के कई दिग्गज युवा नेता चुनाव हारे। ऐसे में अब उन्हें संगठन में जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी चल रही है। वैसे, कांग्रेस इस चुनाव के मतगणना में गड़बड़ी का भी आरोप लगा रही है। (आईएएनएस)


11-Nov-2020 8:03 PM 94

भोपाल, 11 नवंबर| मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा क्षेत्रों में हुए चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद पूर्व मुख्यमंत्री व प्रदेशाध्यक्ष कमल नाथ व पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय िंसंह के खिलाफ आवाज उठने लगी है। कांग्रेस नेता और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हरपाल सिंह ठाकुर ने कमल नाथ से इस्तीफा देने और दिग्विजय सिंह को परामर्शदाता की भूमिका में आने की मांग की है। ठाकुर ने एक बयान जारी कर लोकसभा चुनाव में हुई हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि पार्टी हाईकमान ने राज्य के उप-चुनाव कमल नाथ व दिग्विजय सिंह को फ्रीहैंड लड़ने का मौका दिया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पूरी ताकत लगाई, मेहनत की। 

उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं की तमाम मेहनत के बाद कांग्रेस उप-चुनाव हार गई, इसलिए पार्टी का जो सिद्धांत है, जिसे राहुल गांधी ने स्थापित किया, वही सिद्धांत राज्य में कमल नाथ को भी पालन करना चाहिए। उन्हें प्रदेशाध्यक्ष व नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देना चाहिए। कमल नाथ व दिग्विजय सिंह को हार की जिम्मेदारी लेना चाहिए। खिलाड़ी का भावना का परिचय देते हुए दोनों को परामर्शदाता की भूमिका में आना चाहिए। साथ ही राज्य में नए नेतृत्व को मौका दिया जाना चाहिए। (आईएएनएस)


11-Nov-2020 12:54 PM 59

नई दिल्ली, 11 नवंबर| कांग्रेस ने बिहार विधानसभा चुनाव में 70 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन वह केवल 19 सीटें ही जीत सकी। यही वजह रही कि महागठबंधन 122 के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच सका। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने ये बात कही है। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि 70 सीटों पर उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के बजाय पार्टी कम संख्या में चुनाव लड़ सकती थी, खास कर ऐसी जगहों पर जहां उसकी उपस्थिति मजबूत थी। स्थानीय कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वे पार्टी के केंद्रीय नेताओं को सीधे भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने के बारे में आगाह करते रहे हैं।

पार्टी के नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के लिए ज्यादा सीटों पर लड़ने के बजाय छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करना ज्यादा बेहतर होता। आखिरकार छोटी पार्टियों -- हम और वीआईपी ने राजग को जादुई आंकड़े तक पहुंचने में मदद की।

कांग्रेस, हालांकि, हार के लिए और वोट काटने के लिए एआईएमआईएम को जिम्मेदार ठहराती है।

पार्टी के नेता अधीर चौधरी ने कहा, "वो ओवैसी हैं जो धर्मनिरपेक्ष दलों को हराने में भाजपा की मदद कर रहे हैं।"

सीमांचल में, जहां महागठबंधन अपने प्रदर्शन को दोहरा नहीं सका, एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीतीं और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता - अब्दुल जलील मस्तान और तौसीफ आलम - एआईएमआईएम उम्मीदवारों से हार गए।

कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री शकीलउजमान अंसारी ने कहा, "हमने स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष अविनाश पांडे को सही उम्मीदवारों को टिकट देने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया।"

अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि कांग्रेस नेताओं ने पार्टी को मजबूत करने के लिए जमीनी स्तर पर काम नहीं किया और कोविड के कारण भी पार्टी समय पर लोगों तक पहुंच नहीं बना सकी।

कांग्रेस अगर अपने पिछले प्रदर्शन 27 सीटें जीतने को दोहरा लेती तो महागठबंधन को सत्ता में पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकती थी। लेकिन महागठबंधन से आरएलएसपी, वीआईपी और हम के बाहर जाने का इतना बड़ा नुकसान होगा ये किसी ने नहीं सोचा था। जबकि हम और वीआईपी ने राजग की झोली में आठ सीटें डाली हैं।

विपक्षी महागठबंधन के खाते में 110 सीटें आईं। राष्ट्रीय जनता दल ने 75 सीटें जीतीं, कांग्रेस ने 19 और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी (लिबरेशन) ने 12 सीटें जीतीं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्‍सवादीने दो-दो सीटें जीतीं।

शेष सीटों में से असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने पांच, जबकि बहुजन समाज पार्टी ने एक सीट जीती और एक निर्दलीय ने जीता। (आईएएनएस)


10-Nov-2020 10:05 PM 35

बिहार विधानसभा के लिए तीन चरणों में हुए चुनाव में बिहार में एनडीए सरकार की वापसी का रास्ता साफ हो गया है. मंगलवार को हुई मतगणना में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) को 126 तो प्रतिद्वंदी महागठबंधन को 109 सीटें मिली हैं.
    

    डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट-

पटना, 10  नवंबर : तीन चरणों में 28 अक्टूबर, तीन व सात नवंबर को हुए बिहार चुनाव के परिणामों ने पिछली विधानसभा चुनाव की तरह ही एक बार फिर एक्जिट पोल के नतीजे को नकार दिया है. 2020 के इस विधानसभा चुनाव में 74 सीटों पर विजयी होकर भारतीय जनता पार्टी तेजस्वी यादव के आरजेडी के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. कांटे की टक्कर में कभी कोई आगे जाता दिखा तो कभी कोई पीछे. बिहार में एकबार फिर नीतीश कुमार सरकार के मुखिया बनेंगे. एनडीए ने यह चुनाव ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा था. पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर व जयप्रकाश नारायण के शिष्य रहे 69 वर्षीय नीतीश कुमार ने अपना पहला चुनाव जनता पार्टी के टिकट पर 1977 में लड़ा था. करीब 32 फीसद वोट हासिल करने के बाद भी वे निर्दलीय प्रत्याशी भोला सिंह से चुनाव हार गए थे. दूसरी बार उन्होंने 1980 में चुनाव लड़ा लेकिन वे फिर हार गए.

दो बार की हार से विचलित हुए बिना नीतीश 1985 में लोकदल के उम्मीदवार बने और भारी मतों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे. उन्हें करीब 54 प्रतिशत वोट मिले थे. इसके बाद नीतीश कुमार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. यह जरूर है कि साल 1989 में उनके राजनीतिक जीवन में खासा उछाल आया. 1989 में बाढ़ (पटना) लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर अप्रैल 1990 से नवंबर, 1991 तक वे केंद्रीय कृषि मंत्री रहे. 1991 में वे फिर लोकसभा के लिए चुने गए. 1995 में जार्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर उन्होंने समता पार्टी बनाई. फिर 1996 में भी वे सांसद चुने गए. 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वे रेल मंत्री बने. 1999 में फिर 13वीं लोकसभा के लिए चुने गए और फिर केंद्रीय मंत्री बने.

सात दिन के मुख्यमंत्री
नीतीश कुमार पहली बार तीन मार्च, 2000 को बिहार के मुख्यमंत्री बने किंतु उनका यह कार्यकाल महज सात दिनों का यानी दस मार्च तक रहा. 2004 में वे छठी बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. इसके बाद वे फिर 24 नवंबर, 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बने. 2010 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर बिहार सरकार के मुखिया बने किंतु लोकसभा चुनाव में हुई हार की वजह से उन्होंने इस्तीफा देकर 20 मई, 2014 को जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया. मांझी 20 फरवरी, 2015 तक मुख्यमंत्री रहे.

तेजस्वी ने दी कड़ी टक्कर

नीतीश कुमार ने 2015 में एनडीए से नाता तोड़ लिया और उसके बाद अपने विरोधी राजद व कांग्रेस के साथ मिलकर उन्होंने महागठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़ा और 22 फरवरी, 2015 को पुन: उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. हालांकि 18 महीने तक सरकार चलाने के बाद 2017 में महागठबंधन से अलग होकर वे एक बार फिर अपने पुराने सहयोगी एनडीए के साथ आ गए और बीजेपी तथा अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई.

नीतीश की पार्टी को नुकसान
2020 के चुनाव परिणाम में जो एक खास बात सामने आई है, वह है जदयू के सीटों की संख्या में कमी आना. एनडीए में जदयू अब तक बड़े भाई की भूमिका में था जबकि भाजपा छोटे भाई की. इस बार जदयू के सीटों की संख्या में खासी कमी आ गई. इस चुनाव में भाजपा को 74 तथा जदयू को 44 सीटें मिलीं. 2015 में जदयू को 71 तथा भाजपा को 53 सीटें मिलीं थीं. इसकी सबसे बड़ी वजह लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) रही. लोजपा राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए की घटक है किंतु बिहार विधानसभा चुनाव में उसने एनडीए के साथ दोस्ताना लड़ाई लड़ी.

लोजपा प्रमुख ने उन सभी जगहों पर अपने उम्मीदवार दिए जहां से जदयू के प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे. चुनाव प्रचार में भी उन्होंने नीतीश कुमार पर तीखा हमला किया. यहां तक की उन्हें जांच के बाद जेल भेजने की बात कही. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि लोजपा की वजह से वोटों का बिखराव हुआ. जिन जगहों पर भाजपा थी वहां तो जदयू का वोट भाजपा को ट्रांसफर हुआ किंतु उन जगहों पर जहां जदयू के उम्मीदवार थे वहां भाजपा के वोटों का बिखराव हुआ.

कांग्रेस नहीं दिखा पाई कमाल

नीतीश मुख्यमंत्री रहेंगे या नहीं
अब जब नीतीश कुमार की पार्टी जदयू व भाजपा की सीटों का फासला काफी है इसलिए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे या कोई और? पत्रकार सुमन शिशिर कहते हैं, "यही तो भाजपा की रणनीति थी और वह नीतीश कुमार का कद छोटा करने में सफल भी रही. इसलिए लोजपा को एक मायने में छूट ही दी गई थी." वाकई राजनीतिक गलियारे से अब यह चर्चा जोर पकड़ रही कि क्या मुख्यमंत्री भाजपा का होगा या नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे. ऐसे भाजपा के बड़े से बड़े नेता कहते रहे हैं कि नीतीश कुमार ही हमारे मुख्यमंत्री होंगे और भाजपा जैसी बड़ी पार्टी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि मुख्यमंत्री के नाम पर वह किसी भी रूप में पुनर्विचार करेगी. जहां तक नीतीश कुमार को जानने वाले लोगों का कहना है कि भाजपा तो अपनी ओर से ऐसा कुछ नहीं कहने जा रही किंतु सीटों के फासले को देखते हुए संभव है कि नीतीश कुमार खुद ही कोई फैसला ले सकते हैं.

वाकई, कोरोना संकट के दौरान हुआ यह विधानसभा चुनाव सत्तारूढ़ दल के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था. कोरोना के कारण लॉकडाउन के कारण प्रवासियों की स्थिति को लेकर भी बिहार सरकार की किरकिरी हुई थी और प्रदेश में आई बाढ़ ने भी कोढ़ में खाज का काम किया. फिर तेजस्वी यादव के दस लाख सरकारी नौकरी देने, कांट्रैक्ट पर नियुक्त विभिन्न सेवा संवर्ग के लोगों के मानदेय में इजाफा करने तथा समान काम के लिए समान वेतन जैसी लोकलुभावन घोषणाओं ने एनडीए को काफी मुश्किल में डाला. किंतु, परिणामों ने यह साबित कर दिया कि लोग नीतीश कुमार को एक और मौका देना चाहते हैं और शायद इसलिए कांटे की टक्कर होते हुए भी एनडीए को विजयश्री हासिल भी हुई.


10-Nov-2020 7:59 PM 19

पटना, 10 नवंबर | भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा चुनावों में मंगलवार को पांच सीटों पर जीत हासिल कर ली है और वह 68 सीटों पर आगे चल रही है। चुनाव परिणाम के रुझानों में भाजपा राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। चुनाव आयोग की ओर से मिली हालिया जानकारी के अनुसार, अब तक कुल 4.10 करोड़ मतपत्रों में से 2.30 करोड़ से अधिक मतों की गिनती हो चुकी है और बाकी मतमत्रों की गिनती जारी है।


भाजपा की ओर से जीती गई पांच और अन्य 12 सीटों पर चुनाव आयोग ने शाम 5.54 बजे तक नतीजे घोषित कर दिए हैं।

12 घोषित सीटों में से सात पर तेजस्वी यादव की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने जीत हासिल की है। इसके अलावा वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल-युनाइटेड(जदयू) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सहयोगी विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने दो-दो सीटें हासिल की हैं, जबकि कांग्रेस के खाते में एक जीत आई है।(आईएएनएस)

 


10-Nov-2020 7:56 PM 22

पटना, 10 नवंबर| नीतीश कुमार की पार्टी जदयू से चुनाव लड़ने वाले तेजप्रताप यादव के ससुर चंद्रिका राय अपनी परसा सीट नहीं बचा पाए। उन्हें 17 हजार से भी अधिक वोटों से राजद प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा। 2015 में वह परसा सीट पर राजद के टिकट से जीत दर्ज की थी। परसा सीट से जदयू प्रत्याशी चंद्रिका राय को कुल 50799 वोट मिले, जबकि राजद प्रत्याशी छोटे लाल राय को 67746 वोट मिले। इस प्रकार कुल 17293 वोटों से चंद्रिका राय को हार का सामना करना पड़ा। इस सीट से लड़ने वाले लोक जनशक्ति पार्टी के प्रत्याशी राकेश कुमार सिंह को 12137 वोट मिले।


खास बात है कि परसा विधानसभा सीट पर चंद्रिका राय के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी प्रचार किया था। वहीं उनकी बेटी और लालू यादव की बहू ऐश्वर्या ने भी काफी कैंपेनिंग की। बावजूद इसके राजद के बागी नेता चंद्रिका राय अपनी सीट बचा नहीं पाए। चुनाव रुझानों की बात करें तो इस वक्त कुल 243 सीटों में भाजपा 65, राजद 67, जदयू 36 और कांग्रेस 18 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। एनडीए और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। (आईएएनएस)

 


10-Nov-2020 7:54 PM 29

गांधीनगर, 10 नवंबर| गुजरात में आठ सीटों पर हुए उपचुनाव में संभावित हार की ओर बढ़ रही कांग्रेस ने कहा कि पार्टी आने वाले दिनों में उपचुनाव में हार को लेकर आत्म अवलोकन करेगी। गुजरात प्रदेश कांग्रेस समिति (जीपीसीसी) के प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा ने मंगलवार को कहा, "ये चुनाव राज्यसभा में एक और सीट जीतने के भाजपा की लालच की वजह से यहां की जनता पर थोपे गए थे। इस चुनाव के दौरान, हमने उम्मीद की थी कि लोग दल-बदलुओं को करारा जवाब देंगे। लेकिन दुर्भाग्य से, जनादेश दल-बदलू उम्मीदवारों के पक्ष में चला गया। लेकिन हमने लोगों के जनादेश को स्वीकार कर लिया है और हम उपचुनाव में हार के कारणों की समीक्षा करेंगे।"

चावड़ा ने कहा, "निश्चित ही इन नतीजों से हमारा उत्साह कम हुआ है। अब हम आत्म अवलोकन करेंगे और अपने उत्साह को बढ़ाएंगे। हम लगातार लोगों की आवाज उठाते रहेंगे और लोगों के लिए काम करते रहेंगे।" (आईएएनएस)