सेहत / फिटनेस

Posted Date : 18-Sep-2018
  • गोविंद पाटनी
    नैनीताल के रामनगर के पास भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा संचालित आयुर्वेदिक और यूनानी दवाएं बनाने वाली कंपनी अब दम तोड़ती हुई नजर आ रही है। मोहान में इण्डियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को 1978 में केंद्रीय उद्योग मंत्री एडी तिवारी ने स्थापित किया था। भारत सरकार की यह एकमात्र कंपनी है जो प्राचीन पद्धति से दुर्लभ आयुर्वेद और यूनानी दवाएं बनाती है।
    आईएमपीसीएल के कर्मचारी यूनियन के सचिव पनीराम ने बताया कि इस कंपनी से साल 1982 में दवा निर्माण का काम शुरू हुआ था। पहले साल इस कंपनी ने करीब 67 लाख रुपये का टर्न ओवर किया था, जो बढ़ते-बढ़ते आज 98 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। प्राचीन पद्धति से बनने वाली इन दवाओं का असर भी जादुई बताया जाता है।
    आईएमपीसीएल के कर्मचारी नेताओं का कहना है कि यह कंपनी अब रसातल की ओर अग्रसर है, जिसका कारण यहां व्याप्त भ्रष्टाचार है। कंपनी के कर्मचारी नेताओं की माने तो यहा प्रबंधन स्तर पर बहुत बड़ा गोलमाल किया जा रहा है, जिसके चलते कंपनी का प्रबंध तंत्र अपने निजी हित साधने में जुटा है।
    कर्मचारियों का कहना है कि कंपनी अब मरणासन्न स्थिति में पहुंच गई है। बताया जा रहा है कि कागजों में इस कंपनी के समानांतर हरिद्वार में भी एक ब्रांच खोली गई है, जिसके लिए वहां एक छोटा सा भवन 25 लाख रुपये प्रतिमाह किराये पर लिया गया है। कर्मचारियों की चिंता है कि प्रबंध तंत्र अब इक कंपनी को बर्बाद करने पर तुले हैं।
    पहले में किए गये कार्यों के लिए भारत सरकार ने इस कंपनी को मिनी रत्न के खिताब से भी नवाजा है, लेकिन भ्रष्टाचार के दीमक के चलते यह कंपनी अब बंदी के कगार पर पहुंच गई है। इसके बंद होने के इस कंपनी से जुड़े करीब 5 हजार लोगों के हाथ से रोजगार छिन जाएगा। हैरानी की बात यह है कि कंपनी का इतना बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर होने के बावजूद प्रबंधन हरिद्वार में इसकी ब्रांच खोलकर वारे-न्यारे करने का मन बना रही है। (न्यूज 18)

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Posted Date : 16-Sep-2018
  • कई बार हम चाहे जितनी भी कोशिश क्यों ना कर लें, कुछ चीजें हमारे दिमाग से कभी निकलती ही नहीं हैं। जैसे कहा जाता है कि आफ माफ कर सकते हैं लेकिन भुला नहीं सकते हैं। 
    हालांकि अगर आप बार-बार उन पुरानी यादों को दिमाग में दोहराएंगे तो दिमाग के लिए नयी यादें बनाना उतना ही मुश्किल हो जाएगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर हम उन यादों से कैसे छुटकारा पाएं जिसने हमारी जिंदगियों को रोक कर रख दिया हो। विज्ञान कहता है कि इसका जवाब आपके भीतर ही है।
    हम सभी को पता है कि अभ्यास से हर इंसान धीरे-धीरे परफेक्ट बनता चला जाता है, चाहे क्रिकेट हो, पियानो हो या डांस हो। आप किसी चीज को जितनी बार दोहराते जाएंगे, आप उतने ही बेहतर तरीके से उस चीज को कर पाएंगे। 
    यही बात यादों पर भी लागू होती है। अगर आप किसी याद को बार-बार दोहराते हैं तो फिर वह आपके अंदर उतनी ही गहराई से बैठता जाएगा और फिर उसे डिलीट करना कठिन हो जाएगा।
    आप कल्पना कीजिए कि आफका दिमाग किसी सब्जी का बगीचा है जहां टमाटर, आलू, प्याज और बहुत सारी सब्जियां और फल उगे हुए हैं। अंतर बस इतना है कि आपके दिमाग में सब्जियों की जगह न्यूरॉन्स के बीच सिनैप्टिक कनेक्शन पैदा हो रहे हैं। इन्हीं कनेक्शन के जरिए दिमाग तक चीजें पहुंचती हैं।
    जैसे आपको अपने बगीचे को सुंदर बनाए रखने के लिए पौधों की कटाई-छटाई करनी पड़ती है वैसे ही दिमाग के साथ भी करना पड़ेगा। दिमाग में भी ग्लियाल कोशिकाएं होती हैं जो आपके सिस्टम से खराब या कड़वी यादों को हटाती जाती हैं और दिमाग के किसी कोने में फेंकती रहती है, आपकी पहुंच से बहुत दूर। 
    तो अब सवाल आता है कि इन कोशिकाओं को सक्रिय कैसे करें?
    पूरी नींद लीजिए- क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपका दिमाग भर गया है। जब आप पर्याप्त मात्रा में नींद नहीं लेते हैं तो आपका दिमाग स्टैंडबाई मोड में चला जाता है और अधिकतर हर तरह की मेमोरीज को इकठ्ठा करना शुरू कर देता है बिना बुरी और अच्छी यादों को अलग किए हुए। ठीक से नींद ना लेने पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। मान लीजिए कि ऑफिस में आपका किसी के साथ झगड़ा हुआ हो और आपको एक अहम प्रोजेक्ट भी खत्म करना है तो आपका दिमाग प्रोजेक्ट के बजाए ऑटोमैटिकली ऑफिस में हुई लड़ाई के बारे में सोचने लगेगा।
    लेकिन अगर आपने आराम कर लिया है तो आपकी ग्लियाल सेल्स अच्छी और बुरी मेमोरी में फर्क कर पाएंगी और खराब यादों को सिस्टम से बाहर फेंक देंगी। यही नहीं, आपके दिमाग में खुद पूरी क्लीनिंग प्रोसेस हो जाती है। जब आफ सोते हैं तो दिमाग की कोशिकाएं करीब 60 फीसदी तक सिकुड़ जाती हैं ताकि ग्लियाल कोशिकाओं के लिए स्पेस बन सके और आपके दिमाग का कूड़ा बाहर निकाला जा सके।
    खुद को बिजी रखना एक और जरूरी चीज है। दिन में करीब 6-7 घंटे तक काम करने के बाद आपका दिमाग इतना थक जाता है कि वह फालतू की चीजों के बारे में सोच ही नहीं पाता। काम करना और खुद को व्यस्त रखना आपके दिमाग को नई यादें बनाने में मदद करता है और इश तरह पुरानी यादें खत्म होती जाती हैं।
    केवल आपका शरीर ही नहीं बल्कि दिमागी एक्सरसाइज करना भी जरूरी है। याद है कैसे आप दिन-रात सुडोकू खेलकर एक्सपर्ट बन जाते थे। इसी तरह बॉडी और माइंड से एक्सरसाइज करने से आपके दिमाग की कोशिकाएं अपना काम ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से काम करती हैं। (आज तक)

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Posted Date : 15-Sep-2018
  • चर्चा है कि बॉलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा बल्जिंग डिस्क नाम की बीमारी से जूझ रही हैं। जानिए क्या है बल्जिंग डिस्क बीमारी होने की वजह और इसके लक्षण।  
    बल्जिंग डिस्क बीमारी में रीढ़ की हड्डी समेत शरीर के कई अंगों में दर्द होता है। इससे मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। यह बीमारी ज्यादातर उन लोगों को होती है जो एक ही जगह पर बैठकर काम करते हैं।
    बल्जिंग डिस्क दो तरह की होती है, अगर ये लोअर बैक में हो तो दर्द नितंबों के साथ-साथ जांघों में होता है। बल्जिंग डिस्क गर्दन में हो तो कंधे और हाथ में दर्द बढऩे लगता है। फिजियोथेरेपी से इसके इलाज की सलाह दी जाती है। बल्जिंग डिस्क को हर्नियेटेड डिस्क के नाम से भी जाना जाता है। यह नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है। (न्यूज 18)

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Posted Date : 13-Sep-2018
  • नई दिल्ली, 13 सितंबर। मोबाइल का अधिक इस्तेमाल शरीर में बीमारियों और कई जैविक बदलावों के लिए जिम्मेदार हो सकता है।  दिल्ली स्थित एम्स और काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के एक अध्ययन में यह दावा किया गया है। इसमें पाया गया कि मोबाइल का अधिक इस्तेमाल करने से सुनने और प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है। साथ ही, व्यक्ति की एकाग्रता में कमी के साथ हायपरएक्टिविटी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। आईसीएमआर के वैज्ञानिक डॉ. आरएस शर्मा का कहना है कि एम्स में चल रहे इस अध्ययन के अंतिम नतीजे आने में और तीन-चार साल का वक्त लग सकता है। इससे पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मोबाइल का 10 से 15 साल तक इस्तेमाल करने से कैंसर होने की बात कही थी।  (नवभारत टाईम्स)

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Posted Date : 08-Sep-2018
  • - नेहा फरहीन
    कुछ लोगों को रातभर पैरों में ऐंठन रहती है, जिस वजह से लोग ठीक से सो तक नहीं पाते हैं। रात के समय पैरों में होने वाली इस ऐंठन को नॉक्टर्नल लेग क्रैम्प भी कहते हैं। 
    ये ऐंठन ज्यादातर पैर के पंजे में होती है, लेकिन कई बार इसका असर जांघों पर भी पड़ता है। पैरों में होने वाला ये दर्द आपको रातभर सोने नहीं देता है, साथ ही इससे मांसपेशियों पर भी बुरा असर पड़ता है।
    हेल्थ एक्सपर्ट का मानना है कि पैरों में होने वाली ये ऐंठन सर्दियों से ज्यादा गर्मी के मौसम में होती है। दरअसल, मांसपेशियों में होने वाली ये ऐंठन नसों की वजह से होती है। इसके अलावा सर्दी के मुकाबले गर्मी के मौसम में शरीर को ज्यादा विटामिन डी मिलता है, जिस वजह से गर्मी के मौसम में नसों की वृद्धि और मरम्मत की प्रक्रिया अधिक होती है। यही पैरों के दर्द का कारण बनता है।  
    जब शरीर में विटामिन डी का स्तर सबसे अधिक होता है तो शरीर में खुद से ही रिपेयर की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिस वजह से भी गर्मी के मौसम में पैरों में ज्यादा ऐंठन होती है। 
    डिहाइड्रेशन की वजह से भी पैरों में ऐंठन होने लगती है। एक्सपर्ट के मुताबिक, डिहाइड्रेशन की वजह से ब्लड में इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बिगड़ जाता है, जिस वजह पैरों में ऐंठन होने लगती है। अगर अब कभी भी रात के समय आपको पैरों में ऐंठन महसूस होने लगे तो पानी पिएं। 
    ज्यादातर लोगों को शरीर में न्यूट्रिएंट्स की कमी की वजह से भी पैरों में ऐंठन और दर्द होने लगता है। इसलिए अपनी डाइट में ऐसी चीजों को शामिल करें जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटेशियम मौजूद होता है। 
    एक स्टडी के मुताबिक, मांसपेशियों पर ज्यादा प्रेशर डालने और थकान महसूस होने की वजह से भी पैरों में ऐंठन होने लगती है।  अगर आप दिन में अधिकतर समय खड़े रहते हैं, तो रात के समय आपके पैरों में दर्द होने की संभावना बेहद ज्यादा होती है। 
    अगर आपकी उम्र 50 या इससे ज्यादा है और आपको अक्सर पैरों में दर्द का एहसास होता है, तो इसका मुख्य कारण आपकी बढ़ती उम्र हो सकती है। दरअसल, बढ़ती उम्र के साथ शरीर में कमजोरी बढ़ जाती है जिस कारण लोगों को पैरों में दर्द की शिकायत रहती है।
    इसके अलावा डायबिटीज, आर्थराइटिस, अधिक तनाव भी ऐंठन का कारण हो सकता है।  स्टडी के मुताबिक, इन बीमारियों के कारण नसों में बदलाव होने लगता है, जो पैरों में दर्द और ऐंठन का कारण बनता है। 
    प्रेग्नेंसी- प्रेग्नेंसी के दौरान भी महिलाओं को पैरों में दर्द की शिकायत रहती है। दरअसल, प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा वजन और असंतुलित ब्लड सर्कुलेशन इसका एक बड़ा कारण है।  इसका मुख्य कारण ये है कि जब आप ज्यादा समय तक खड़े रहते हैं, तो शरीर में मौजूद ब्लड और पानी शरीर के निचले हिस्से में जमा हो जाता है, जिस कारण शरीर में मौजूद तरल पदार्थ का संतुलन बिगड़ जाता है और पैरों में दर्द और ऐंठन होने लगती है। अमरीकन प्रेग्नेंसी एसोसिएशन के मुताबिक, गर्भ में पल रहे बच्चे की वजह से नसों पर प्रेशर पड़ता है। ये भी पैरों में दर्द और ऐंठन का अहम कारण हो सकता है।  (आज तक)

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Posted Date : 04-Sep-2018
  • स्वीडन, 4 सितंबर। इंसानों के लिए कुत्तों को सबसे वफादार जानवरों में से एक माना जाता है और इस बात से सभी लोग वाकिफ हैं ही। लेकिन क्या आपको यह भी मालूम है कि कुत्ता पालने वाले लोगों को दिल संबंधी बीमारियां होने का खतरा कम रहता है और जो लोग कुत्ता पालते हैं उनमें तनाव का स्तर भी कम पाया जाता है।
    इन बातों का दावा एक अध्ययन में किया गया है। स्वीडन के एक चिकित्सा विज्ञानी टोव फाल के नेतृत्व 40 से 80 साल की उम्र के करीब 34 लाख लोगों पर हुए अध्ययन से ये बातें साबित हुई है। टोव फाल के मुताबिक, कुत्ता पालने वाले लोगों का सामाजिक संवाद का दायरा बड़ा होता है और ऐसे लोग कहीं अधिक सक्रिय भी होते हैं। कुत्ता पालने की वजह से आम लोगों की तुलना में ऐसे लोग कहीं अधिक पैदल चलते हैं। इस वजह से इन्हें दिल संबंधी बीमारियां होने का खतरा कम रहता है।
    टोव का यह भी कहना है, कुत्ता पालने वालों को किसी बीमारी की वजह से अगर अस्पताल में दाखिल होना पड़े उन्हें अपने पालतू की वजह से वापस अपने घर लौटने के लिए भी प्रेरणा मिलती है। इस अध्ययन के मुताबिक यूरोप के दूसरे देशों की तुलना में स्वीडन में कुत्ता पालने वालों की संख्या काफी कम है। टोव को उम्मीद है कि कुत्ता पालने के लाभों के बारे में पता चलने के बाद लोगों में इसके प्रति दिलचस्पी बढ़ेगी।  (इंडियन एक्सप्रेस)

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