सेहत / फिटनेस

Posted Date : 23-May-2018
  • 'संडे हो या मंडे रोज़ खाओ अंडे'. ये लाइन अक्सर आपने सुनी होगी. कई लोगों ने अंडे खाने के फ़ायदे और नुकसान भी आपको बताए होंगे.
    लेकिन क्या आपको पता है कि अच्छी सेहत के लिए एक दिन में कितने अंडे खाने चाहिए और इन्हें पकाने का सही तरीका क्या है?
    चीन में करीब 10 लाख लोगों पर की गई एक स्टडी बताती है कि दिन में एक अंडा खाने से दिल की बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है.
    विशेषज्ञ अच्छी सेहत के लिए अंडे खाने की सलाह देते हैं. लेकिन ये भी कहते हैं कि ज्यादा अंडे खाना नुकसानदेह हो सकता है.
    कितने अंडे खाएं?
    ज्यादातर डॉक्टर अपने खाने में अंडों को शामिल करने की सलाह देते हैं क्योंकि अंडे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं. इनमें विटामिन ए, डी, बी और बी12 के अलावा लूटीन और ज़ीएज़ेनथीन जैसे पोषक तत्व होते हैं. ये तत्व आंखों के लिए काफी फायदेमंद हैं.
    ब्रिटेन के डाइटीशियन डॉ फ्रेंकी फिलिप्स का कहना है कि, "एक दिन में एक या दो अंडे खाए जा सकते हैं."
    वो ये कहते हैं कि ज्यादा अंडे खाने में भी कोई डर की बात नहीं है. लेकिन ये बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि कोई भी फूड अगर बहुत ज्यादा खाया जाता है तो हमें उन दूसरे खानों के पोषक तत्व नहीं मिलेंगे जिन्हें हम नहीं खा पा रहे.
    इसलिए डाइटीशियन अक्सर बैलेंस डाइट लेने पर ज़ोर देते हैं.
    "अंडे प्रोटीन का अच्छा ज़रिया हैं लेकिन हमें ये भी ध्यान रखना चाहिए कि हम खाने में काफी प्रोटीन पहले से लेते हैं. ज़रूरत से दो या तीन गुना ज्यादा प्रोटीन किडनी पर बुरा असर डाल सकता है."
    अंडों में जब कॉलेस्ट्रॉल होने के सबूत मिले तो ब्रिटिश हार्ट फॉउंडेशन ने 2007 में एक हफ्ते में तीन अंडे ही खाने की सलाह दी थी.
    नेशनल हेल्थ सर्विस की हालिया सलाह के मुताबिक, "हालांकि अंडों में कुछ कॉलेस्ट्रॉल होता है, लेकिन उसकी मात्रा हमारे खून में सेचुरेटेड वसा से आए कॉलेस्ट्रॉल से कम होती है."
    दूसरे शब्दों में कहें तो अंडों का कॉलेस्ट्रॉल ज्यादा बड़ी समस्या नहीं है. बल्कि सेचुरेटेड फैट से बना कॉलेस्ट्रॉल ज्यादा बड़ी मुसीबत है.
    हार्ट यूके के मुताबिक एक अंडे में करीब 4.6 ग्राम यानी एक चम्मच वसा होता है. लेकिन इसका सिर्फ एक चौथाई हिस्सा ही सेचुरेटेड होता है. यानी देखा जाए तो अंडे की वजह से हमारे शरीर के कॉलेस्ट्रॉल लेवल पर ज्यादा असर नहीं पड़ता.
    हां अगर उस अंडे में मक्खन या क्रीम मिला दी जाए तो मामला कुछ और हो जाता है.
    ब्रिटेन की पूर्व हेल्थ मिनिस्टर एडविना कुरी ने दिसंबर 1988 में कहा था कि ब्रिटेन में प्रोड्यूस होने वाले ज्यादातर अंडों में साल्मोनेला बेक्टेरिया होता है.
    इस बेक्टेरिया को सेहत के लिए खतरनाक बताया जाता है. इसलिए उनके इस बयान से ब्रिटेन में हड़कंप मच गया था.
    जिसके बाद एडविना को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.
    हालांकि उस वक्त अंडों में साल्मोनेला की कुछ समस्या ज़रूर थी. 1990 तक अंडों का उत्पादन करने वालों ने एक वेक्सिनेशन प्रोग्राम शुरू कर दिया था.
    अब तीस साल बाद ब्रिटेन के अंडे दुनिया में सबसे ज्यादा सुरक्षित हैं - कम से कम सोल्मोनेला के मामले में तो ज़रूर ही.
    वहां मार्केट में मिलने वाले ज्यादातर अंडो पर अब लॉयन मार्क लगा होता है, जो ये बताता है कि जिस मुर्गी ने ये अंडा दिया है उसे सोल्मोनेला से बचने का इंजेक्शन दिया गया था.
    पिछले साल ही लॉयन मार्क वाले अंडों को गर्भवति महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित घोषित कर दिया गया था.
    विशेषज्ञों का कहना है कि अब अंडों में खतरनाक बेक्टेरिया का खतरा बहुत ही कम है. "इसलिए डरने की कोई बात नहीं."
    अंडों को किस तरह पकाएं?
    जहां तक अंडों को पकाने की बात है तो इसे बहुत साधे तरीके से बनाना चाहिए या उबले रूप में खाना चाहिए.
    ज्यादातर डाइटिशियन सलाह देते हैं कि अंडों को तलना नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसे इसमें फैट और कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ जाती है.
    कच्चे और हल्के तौर पर पकाए गए अंडे, जैसे मायोनिस और आईसक्रीम में डाले जाते हैं, सही होते हैं. क्योंकि ब्रिटेन में उनपर लॉयन मार्क होता है और ये भी पक्के तौर पर बताया जाता है कि वो अंडे मुर्गी के ही हैं.
    अगर फिर भी आपको फूड पॉइसनिंग का डर है तो अंडे को पूरी तरह पकाकर खा सकते हैं.
    अंडों को स्टोर कैसे करें?
    कभी भी टूटे हुए या क्रेक अंडे ना खरीदें. क्योंकि ऐसे में उनमें मिट्टी या बेक्टेरिया जाने का खतरा रहता है.
    बीबीसी गुड फूड की सलाह है कि अंडों को फ्रिज में ढककर रखना चाहिए.
    अंडों के सफेद हिस्से को डब्बे में डालकर तीन हफ्तों तक फ्रिज में स्टोर करके रखा जा सकता है, जबकि उसके पीले हिस्से को तीन दिनों तक रखा जा सकता है.
    दोनों को चिपटने वाली फिल्म से ढककर रखना चाहिए. दोनों को फ्रीज़ करके दो महीने तक रखा जा सकता है.
    अंडा फ्रेश है या नहीं ये चेक करने की ट्रिक भी कई लोगों को पता होगी. ठंडे पानी का एक कटोरा लीजिए. उसमें अंडे को डालिए. अगर अंडा डूब जाता है तो वो फ्रेश है. अगर नहीं डूबता तो वो कम फ्रेश है.
    मुर्गी के अंडे देने के दिन से 28 दिन तक वो सही रहते हैं.
    इसी के साथ ही उस जगह का भी साफ होना ज़रूरी है जहां अंडे बनाए जा रहे हैं.
    अंडों से एलर्जी?
    कई लोगों को अंडों से एलर्जी भी होती है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों को ये शिकायत ज्यादा होती है.
    अंडो से एलर्जी के कुछ लक्षण:
    मुंह के आस-पास लाल होना और सुजन आना
    पेट में दर्द
    उल्टी आना
    दस्त होना
    लेकिन कम ही ऐसा होता है कि ये रिएक्शन जानलेवा साबित हो. लेकिन एलर्जी होने पर हमेशा डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.
    आखिर में डॉ फिलिप्स कहते हैं, "जिसे ऐसी कोई एलर्जी नहीं है. वो किसी भी रूप में अंडे को खा सकते हैं, लेकिन अंडे को कैसे बनाया जा रहा है इसे ध्यान में रखना ज़रूरी है."(bbc)

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Posted Date : 23-May-2018
  • घर में प्रवेश से पहले जूते उतारने से व्यक्ति के चुस्त-दुरुस्त रहने में मदद मिल सकती है क्योंकि यह हार्मोन में बदलाव लाने वाले रसायनों को घर के भीतर एकत्रित होने से रोकता है. हाल में जारी एक अध्ययन के निष्कर्ष में यह सुझाया गया है. दुनिया भर के करोड़ों लोगों में मोटापे का खतरा बढ़ा है. कम उम्र के बच्चे भी इससे अछूते नहीं रह गए हैं. हमारे शरीर में वसा एकत्रित करने वाले और उनके प्रसंस्करण के लिए जिम्मेदार रसायनों को ‘ओबसोजिन्स’ कहा जाता है. इन रसायनों को ही मोटापे के बढ़ते मामलों के लिए संभावित तौर पर जिम्मेदार बताया जाता है.  पुर्तगाल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एवियरो एवं यूनिवर्सिटी ऑफ बेयारा इंटीरियर के अनुसंधानकर्ताओं ने पहले से किये गए अध्ययनों की समीक्षा की और बताया कि भोजन, घरों की धूल और साफ-सफाई, रसोई या साज-सज्जा में प्रयुक्त रसायनों जैसे दैनिक इस्तेमाल की वस्तुओं के जरिये ये ओबसोजिन्स घर में पहुंचते हैं. लिस्बन विश्वविद्यालय की अना कैटरीना सोसा ने कहा , ‘‘ओबसोजिन्स किसी भी जगह मिल सकता है। हमारा खाना इसका सबसे बड़ा स्रोत है क्योंकि कुछ कीटाणुनाशक और कृत्रिम मीठे पदार्थ ओबजिन्स हैं.’’  सोसा ने कहा , ‘‘इसी प्रकार वे प्लास्टिक और घरेलू सामानों में विद्यमान होते हैं. इसलिए पूरी तरह उसके संपर्क से बाहर होना बहुत मुश्किल है लेकिन उल्लेखनीय रूप से उसमें कमी लाना ना सिर्फ मुमकिन है बल्कि बहुत आसान भी है. ’’ इस अध्ययन के आधार पर अनुसंधानकर्ताओं ने घर में प्रवेश करते समय जूते खोलने का सुझाव दिया ताकि ऐसे दूषित पदार्थ जूते के सोल के जरिये घर में ना पहुंच सकें. उन्होंने समय-समय पर सफाई करने और घर या कार्यस्थल पर कम-से-कम कारपेट बिछाने के लिए भी कहा है. अनुसंधानकर्ताओं ने लोगों को ताजा खाना खाने और ऑर्गेनिक फलों को तरजीह देने का परामर्श दिया. (भाषा)

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Posted Date : 22-May-2018
  • -ऐमन ख़्वाजा
    हर साल रमजान के दिनों में लाखों मुसलमान सूर्योदय से सूर्यास्त तक 30 दिनों के लिए रोज़ा रखते हैं.
    हाल के दिनों में, उत्तरी गोलार्ध में रमज़ान गर्मियों के दिनों में पड़ा, जो बहुत लंबे और गर्म होते हैं. इसका मतलब है कि नॉर्वे जैसे कुछ देशों में लोग हर दिन 20 से अधिक घंटे रोज़ा करते देखे जाएंगे.
    क्या रोज़ा आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छा है?
    जब आप 30 दिनों के लिए रोज़ा रखते हैं तो आपके शरीर पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है.
    रोज़ा के दौरान आपका शरीर ऊर्जा के लिए पहले लीवर में जमा ब्लड शुगर का इस्तेमाल करता है
    सबसे कठिन हैं- शुरुआती कुछ दिन
    तकनीकी रूप से अंतिम बार भोजन करने के आठ घंटे या उसके भी कुछ समय बाद तक आपका शरीर उपवास की दशा में नहीं आता है. यह आपकी आंत के भोजन से पोषक तत्वों को अवशोषित करने का समय है.
    इस अवधि के तुरंत बाद, हमारा शरीर लीवर में जमा ग्लूकोज और मांसपेशियों से ऊर्जा पाने लगता है.
    उपवास के दौरान या बाद में, ग्लूकोज के भंडार ख़त्म होने के बाद, शरीर के लिए ऊर्जा का अगला स्रोत वसा बन जाता है.
    रोज़ा के शुरुआती कुछ दिन मुश्किल होते हैं, जब शरीर लंबी अवधि के लिए भूखे रहने का अभ्यास करता है
    जब शरीर से वसा कम होना शुरू होता है, तो इससे वज़न घटता है, कोलेस्ट्रोल की मात्रा घटती है और यह डायबिटीज़ के जोखिम को भी कम करता है.
    हालांकि, ब्लड शुगर का स्तर कम होना कमज़ोरी और सुस्ती का कारण बन सकती है. आपको सिर में दर्द, चक्कर आना, उल्टी और सांस की कमी जैसा भी अनुभव हो सकता है.
    यह तब होता है जब आपकी भूख अपने सबसे तीव्र स्तर पर होती है.
    रहमतों का महीना है रमज़ान
    3 से 7 दिनः शरीर में पानी की कमी से रहें सावधान
    जैसे ही आपका शरीर रोज़ा का अभ्यस्त होने लगता है, वसा टूटने लगते हैं और यह ब्लड शुगर में बदल जाते हैं.
    रोज़ा के दौरान तरल पदार्थ नहीं लिया जाता है. लिहाजा शरीर में पानी की कमी न हो इसके लिए दो रोज़ों के बीच के वक्त में इस कमी को पूरा कर लिया जाना चाहिए नहीं तो पसीने की वजह से शरीर में पानी की कमी का कारण बन सकता है.
    उपवास के बीच में शरीर में पानी की कमी नहीं होने देनी चाहिए
    आपके खाने में पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेड और कुछ वसा जैसे एनर्जी फूड होने चाहिए. इस दौरान कुछ प्रोटीन, नमक और पानी युक्त संतुलित आहार का लेना ज़रूरी है.
    08 से 15 दिनः रोज़ा की आदत
    तीसरा चरण आने तक आपको अपनी मनोदशा में सुधार दिखने लगेगा क्योंकि अब आपके शरीर को रोज़ा रखने की आदत पड़ गई है.
    कैम्ब्रिज में एडेनब्रूक के एक अस्पताल के एनेस्थेसिया और इंटेंसिव केयर मेडिसीन में सलाहकार रज़ीन महरूफ़ कहते हैं कि इसके अन्य फ़ायदे भी हैं.
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    बहुत ज़्यादा कैलरी खाने से आप अपने शरीर के संक्रमण से लड़ने की क्षमता को कमज़ोर करते हैं
    डॉ. महरूफ़ कहते हैं, "रोज़ाना हम अपने दैनिक जीवन में बहुत अधिक कैलरी खाते हैं और यह आपके शरीर को अन्य कार्यों को करने से रोक सकता है, जैसे कि खुद की मरम्मत करना."
    "रोज़ा के दौरान इसे सही किया जाता है, जिससे कि शरीर अन्य कार्यों पर ध्यान दे सके."
    "तो रोज़ा स्वस्थ बनाने, संक्रमण रोकने और इससे लड़ने के लिए शरीर को फायदा पहुंच सकता है."
    16 से 30 दिनः डीटॉक्सिंग
    रमजान के आखिरी आधे हिस्से के दौरान, आपका शरीर उपवास प्रक्रिया के अनुरूप ढल जाता है. इस दौरान आपके मलाशय, लीवर, किडनी और त्वचा डीटॉक्सिफिकेशन के दौर से गुजरते हैं.
    ये पांच चीज़ें आपको मोटा बना सकती हैं
    डॉ. रज़ीन महरूफ़ कहते हैं कि लगातार और लंबी अवधि का उपवास वज़न घटाने का अच्छा तरीका नहीं है
    डॉ. महरूफ़ कहते हैं, "स्वास्थ्य के मामले में इस चरण में शरीर के अंगों को कार्य करने की अधिकतम क्षमता पर लौट आना चाहिए. आपकी याददाश्त और एकाग्रता बढ़ सकती है और आपमें और अधिक एनर्जी आ सकती है."
    "ऊर्जा के लिए आपके शरीर को प्रोटीन का रुख नहीं करना चाहिए. ये वो वक्त है जब वह भुखमरी के मोड़ में आने लगता है और ऊर्जा के लिए आपकी मांसपेशियों का इस्तेमाल करने लगता है. यह तब होता है जब आपका उपवास कई दिनों या हफ़्तों तक चलता रहता है."
    "चूंकि रमजान में रोज़ा केवल सुबह से शाम तक चलता है, इसलिए हमारे पास ऊर्जा देने वाले खाद्य पदार्थों और तरल पदार्थों से खुद को भरने का पर्याप्त अवसर होता है. यह मांसपेशियों को बरकरार रखता है लेकिन साथ ही वज़न घटाने में भी मदद करता है."
    तो, क्या रोज़ा रखना हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा है?
    डॉ. महरूफ़ कहते हैं, "हां, लेकिन एक शर्त के साथ."
    "उपवास हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा है क्योंकि इससे हमें क्या और कब खाते हैं, इस पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है. हालांकि, एक महीने का रोज़ा तो ठीक हो सकता है लेकिन इसे लंबी अवधि के लिए करते रहने की सलाह देना उचित नहीं है."
    "लगातार उपवास रखना लंबे समय तक वज़न घटाने के लिए अच्छा साधन नहीं है क्योंकि अंत में आपका शरीर वसा को ऊर्जा में बदलने के प्रक्रिया को रोक देगा और इसके बजाय उन्हें मांसपेशियों में बदल देगा. यह अस्वास्थ्यकर है और इसका मतलब है कि आपका शरीर अब 'भुखमरी मोड' में जा रहा है."
    कुछ-कुछ देर पर उपवास से ज़्यादा फ़ायदा
    रमजान के दिनों में रोज़ा के दौरान आपको खुद में ऊर्जा भरने के लिए पर्याप्त अवसर मिल जाता है, इसलिए आपके शरीर को मांसपेशियों से ऊर्जा लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती
    डॉ. महरूफ़ सलाह देते हैं कि रमज़ान के अलावा कुछ अवधि का उपवास या 5:2 डाइट (स्वस्थ खाने के दिनों के बीच, हफ़्ते में कुछ दिनों के लिए उपवास) एक स्वस्थ विकल्प होगा.
    वो कहते हैं, "रमजान के दौरान सही तरीके से किया गया रोज़ा, आपको हर दिन अपने शरीर में ऊर्जा भरने की अनुमति देता है, जिसका मतलब यह हो सकता है कि आप अपने शरीर में महत्वपूर्ण मांसपेशियों को जलाए बिना अपना वज़न कम कर सकते हैं." (बीबीसी)

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Posted Date : 22-May-2018
  • एक नये अध्ययन में सामने आया है कि वाद्य यंत्र को सीखने और एक नई भाषा को बोलना सीखने से आपका दिमाग ज्यादा प्रभावी तरीके से काम करने में सक्षम हो सकता है. अध्ययन में पाया गया कि संगीतज्ञों और द्विभाषी लोग में काम की याद्दाश्त बेहतर होती है. न्यूयॉर्क एकेडमी ऑफ साइंसेज के जर्नल एन्नल्स में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा कि संगीत या एक से ज्यादा भाषाओं की जानकारी की पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति विभिन्न दिमागी नेटवर्क सक्रिय करते हैं और उनकी दिमागी गतिविधि कम होती है. 
    कनाडा में बेक्रेस्ट्स रॉटमैन रिसर्च इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक क्लाउडे अलेन ने कहा , ‘‘ये नतीजे दिखाते हैं कि समान काम करने के लिये संगीतकारों और द्विभाषियों को कम प्रयास करने पड़ते हैं , यह ज्ञान संबंधी गिरावट के खिलाफ भी उनका बचाव करती है और डिमेंशिया के खतरों को भी टालती है. ’’ अलेन ने कहा , ‘‘हमारे नतीजे यह भी दिखाते हैं कि एक व्यक्ति के अनुभव , जो एक वाद्य यंत्र बजाना सीखता है या एक अन्य भाषा सीखता है , यह तय कर सकते हैं कि दिमाग कैसे काम करता है और किस नेटवर्क का इस्तेमाल होता है. 
    संगीतकार और द्विभाषी लोग दिखाते हैं कि उनमें काम को लेकर बेहद अच्छी याद्दाश्त, चीजों को दिमाग में रखने की बेहतर क्षमता जैसे फोन नंबरों, निर्देशों को याद रखना, और दिमागी गणित की अच्छी क्षमता होती है. (भाषा)

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Posted Date : 21-May-2018
  • गुरुग्राम, 21 मई। आर्टेमिस अस्पताल में रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर से पीडि़त 30 वर्षीय महिला की रोबोट से सर्जरी की गई। डॉ. आदित्य गुप्ता ने कहा कि ट्यूमर पहले चरण में था, लेकिन अगर इसका इलाज नहीं किया जाता, तो इसके कारण शरीर का एक तरफ का हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता।
    मरीज की रोबोट सर्जरी की गई, जिसमें 40 मिनट लगा और रोगी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। ऐसे मरीजों को रेडियोग्राफिक रिपोर्टों से पता चला कि स्वस्थ कोशिकाओं को प्रभावित किए बिना पहले सत्र के बाद ट्यूमर पूरी तरह से कम हो गया था।
    डॉ. गुप्ता ने कहा, रीढ़ की हड्डी के ट्यूमर के इलाज के लिए भारत में अब भी एक चुनौती बनी हुई है। जिसके कारण इसके इलाज के लिए सीमित तकनीक उपलब्ध है। समय पर जांच नहीं होना, गंभीर बीमारी बन जाती है और मरीज का इलाज संभव नहीं रहता है। इस महिला की बीमारी शुरुआती दौर में पता चलने से बेहतर इलाज होना संभव हुआ। (जागरण)

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Posted Date : 20-May-2018
  • दुनिया में पानी के बाद चाय सबसे ज्यादा पिये जाने वाला पेय पदार्थ है. ज्यादा चाय का सेवन करना सेहत के लिए हानिकारिक रहता है लेकिन चाय के सीमित सेवन से कई फायदे भी होते हैं. सर्दियों के मौसम में चाय से शरीर में जहां गर्माहट लाई जा सकती है तो वहीं चाय से शरीर की थकान को भी दूर किया जा सकता है.

    आइए जानते हैं चाय पीने से होने वाले फायदों के बारे में...
    थकान
    चाय पीने से थकान दूर हो जाती है. इसके साथ ही चाय पीने से शरीर में ताजगी आ जाती है, जिससे थके हुए शरीर को राहत का अहसास होता है.
    गर्माहट
    सर्दियों के मौसम में चाय पीने से शरीर को गर्माहट मिलती है. ठंड के दिनों में चाय के साथ तुलसी मिला कर पीने से शरीर को जरूरी गर्माहट के साथ कई समस्याओं से भी छुटकारा मिल जाता है.
    सरदर्द
    सरदर्द से आराम पाने के लिए चाय का सेवन करना चाहिए. चाय के सेवन से सरदर्द कुछ ही देर में छूमंतर किया जा सकता है.
    मुहासें से छुटकारा
    चाय अलग-अलग किस्म की होती है. इनमें ग्रीन टी भी चाय का ही प्रकार है. ग्रीन टी पीने से मुहासों और दाग-धब्बों को दूर किया जा सकता है.
    आखों की सूजन
    अगर आंखों में सूजन है तो चाय से आंखों की सूजन को भी दूर किया जा सकता है. ग्रीन टी में एंटीऑक्सीडेंट गुण शामिल होते है. जिससे आंखों की सूजन को कम किया जा सकता है. इसके लिए ग्रीन टी बैग्स को ठंडे पानी में डुबोकर निचोड़े और अपनी आंखों पर रख लें.
    कॉलेस्ट्रोल
    चाय एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर होती है. जिसके कारण ये कॉलेस्ट्रोल को कम करने में मदद करती है.
    जुकाम से निजात
    चाय के सेवन से जुकाम जैसी समस्याओं से निजात दिलाई जा सकती है. अदरक की चाय पीने से सर्दियों में जुकाम से आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है. (ndtv)

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Posted Date : 18-May-2018
  • मछली एक सुपर फूड है और यह आपकी हेल्‍थ के लिए बेहद गुणकारी है. हफ्ते में दो बार मछली खाने से दिल का दौरा कम होता है और दिल को हेल्‍दी रखने में मदद मिलती है. दरअसल, मछली में भरपूर मात्रा में ओमेगा 3 फैटी एसिड पाए जाते हैं जो आपके दिल की देखभाल के लिए बेहद जरूरी हैं. 
    अमेरिकी हार्ट एसोसिएशन की वैज्ञानिक सलाह में यह दावा किया गया है. 
    अमेरिका में हावर्ड टी एच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर ऐरिक बी रिम ने बताया, 'कई साइंटिफिक स्‍टडी में ओमेगा 3 फैटी एसिड में, सी फूड खाने से होने वाले फायदे की बात सामने आई है.'
    अमेरिकी हार्ट एसोसिएशन ने साढ़े तीन औंस बिना तली मछली का सेवन या तीन चौथाई कप के बराबर भुनी मछली हफ्ते में दो दफा खाने की अपील की है.
    शोधकर्ताओं ने कहा है कि उन मछलियों को खाना चाहिए जिसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड ज्‍यादा पाया जाता है.
    आहार विशेषज्ञों के पैनल के 'सर्कुलेशन जनरल' में छपी सलाह में मछली के बारे में स्‍टडी सामने आई है. इसमें मछली में पाये जाने वाले पारे (मरकरी) पर फिर से स्‍टडी की बात सामने आई है.
    शोधकर्ताओं ने बताया कि ज्‍यादातर सी फूड में पारा पाया जाता है. लेकिन बड़ी मछलियों में यह ज्‍यादा मात्रा में होता है जो आपकी हेल्‍थ के लिए बेहद फायदेमंद है.
    उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि हालांकि दूषित पारे का संबंध नवजात बच्‍चों में गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से हो सकता है. हालांकि वयस्कों में दिल की बीमारियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता. (एनडीटीवी)

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Posted Date : 18-May-2018
  • नीता कई दिनों से परेशान थी। उसे सर्वाइकल की प्रॉब्लम नहीं थी, लेकिन फिर भी उसके कंधों और पीठ की मसल्स में बेहद दर्द था। एक्स-रे कराने के बाद भी कोई प्रॉब्लम निकलकर नहीं आई। इसके बाद डॉक्टर ने उससे पूछा कि आप दिनभर में मोबाइल पर कितना समय बिताती हैं तो उसने अपने पूरे दिनभर के शेड्यूल पर नजर डाली, तो पता चला कि वह दिन में 4 से 5 घंटे मोबाइल यूज करती थी। 

    वहीं, रोहित का तो काम ही ऐसा था कि उसे मोबाइल फोन पर रह वक्त ऐक्टिव रहना पड़ता था। उसने भी जब डॉक्टर को अपने दर्द के बारे में बताया, तो यही बात निकलकर आयी कि घंटों मोबाइल फोन यूज करने की वजह से ही उन्हें इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। 
    गर्दन झुकाकर लंबे समय तक काम न करें, होंगे ये नुकसान :

    230 लोगों की रिसर्च में खुलासा 
    ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में 230 लोगों पर की गई एक रिसर्च के बाद पता चला है कि जब आप मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं तो उस वक्त आपकी गर्दन झुकी और पीठ सिकुड़ी हुई होती है, जिससे बॉडी में कई जगह दर्द होना शुरू हो जाता है। इसे ही टेक्स्ट सिंड्रोम या टेक्स्ट नेक कहा जाता है। रिसर्च में यह निकलकर आया कि इस बीमारी से पीड़ित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। यहां तक कि अब तक 50 फीसदी लोग टेक्स्ट नेक के शिकार हो चुके हैं। आमतौर पर लोगों को लगता है कि उनकी गर्दन और कंधों में दर्द है, लेकिन वह लंबे समय तक यह नहीं समझ पाते कि वे टेक्स्ट नेक के शिकार हैं। 

    50 फीसदी लोग टेक्स्ट नेक के शिकार 
    स्मार्टफोन का लगातार इस्तेमाल लोगों को बीमार करता जा रहा है। 25 साल के रोहित को पता नहीं था कि फोन से भी वह बीमार हो सकते हैं। स्मार्टफोन पर घंटों वक्त बिताने के कारण वह अपनी गर्दन को इधर-उधर घुमा नहीं पा रहे थे। गर्दन और कंधों की ऐंठन से निजात पाने के लिए उन्हें कई दिनों तक फिजियोथेरपी भी करवानी पड़ी। डॉक्टर्स के मुताबिक, शरीर में तनाव के कारण स्पाइन और गर्दन में थकान हो जाती है, जिसकी वजह से ऐंठन हो जाती है। 

    कौन बिताता है कितना घंटा? 
    - भारत में हर व्यक्ति मोबाइल पर औसतन 3 घंटे का समय बिताता है। 
    - अमेरिका में यह अवधि 5 घंटे तक है। 
    - वहीं चीन में लोग 3 से 4 घंटे का वक्त मोबाइल पर बिताते हैं। 

    कई तरह की बीमारियां 
    डॉक्टर अखिल श्रीवास्तव कहते हैं कि टेक्स्ट-नेक सिंड्रोम का इलाज न करने से रीढ़ की हड्डी कमजोर होने लगती है, मसल्स में अकड़न और दर्द रहता है, यहां तक कि हाथों के सुन्न होने और हाथ में सनसनाहट होने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। वह बताते हैं कि टेक्स्ट करने के लिए गर्दन को लंबे समय तक आगे की ओर झुकाए रखने से सर्वाइकल की समस्या हो सकती है। खराब पॉश्चर के कारण गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर बार-बार तनाव पड़ने से हड्डियों की प्रॉब्लम बढ़ जाती है। शुरुआत में सिरदर्द और कंधे-गर्दन में दर्द की शिकायत होती है। धारे-धीरे दर्द का असर रीढ़ की हड्डी में टेढ़ेपन में बदलने लगता है। अगर शुरुआत में इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो स्लिप डिस्क की समस्या भी हो सकती है। 

    फिजियोथेरपी या सर्जरी 
    टेक्स्ट नेक के ज्यादातर मामलों में फिजियोथेरपी और दवाओं के जरिए इलाज हो जाता है लेकिन कई मामलों में सर्जरी तक करने की जरूरत पड़ सकती है। सिर का वजन गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर होता है। ऐसे में अगर सिर को आगे की ओर झुकाए रखने से गर्दन और स्पाइन पर भी खासा असर पड़ता है और उनमें टेढ़ापन आ जाता है।  (नवभारत टाइम्स)

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Posted Date : 16-May-2018
  • नींबू, कटहल के संग भी दूध हानिकारक
    दूध अपने आप में सम्पूर्ण आहार है इसलिए हम इसका सेवन करते हैं। दूध में मौजूद विटामिन्स और मिनरल्स की वजह से अक्सर लोग किसी भी समय इसे पी लेते हैं। लेकिन आयुर्वेद के नियमों के अनुसार दूध के साथ कुछ आहारों का सेवन वर्जित माना गया है। इन आहारों के साथ में सेवन करने से शरीर को नुकसान पहुंच सकता है। आइए आपको बताते हैं क्या हैं वो आहार...
    उड़द की दाल और दूध, ना बाबा ना
    दूध के साथ नींबू, कटहल करेला या फिर नमक का कभी भी एक साथ सेवन नहीं करना चाहिये । ये आपको लाभ पंहुचाने की बजाए नुकसान पंहुचा देगा। जिससे कि आपको शारीरिक परेशानी हो सकती है। इसको खाने से सबसे ज्यादा स्किन इंफेक्‍शन होने की आशंका रहती है। यहां तक कि दाद, खाज ,खुजली, एग्जिमा, सोरायसिस, आदि हो सकते हैं।
    दूध के संग ना खाएं मूली
    दूध को कभी भी नमकीन और खट्टी चीजों के साथ नहीं लेना चाहिए। इसके अलावा यदि किसी खाद्य पदार्थ में मूली का प्रयोग किया गया है तो इसके तुरंत बाद दूध नहीं पीना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दूध विषैला हो सकता है साथ ही त्वचा संबंधी रोग होने की आशंका रहती है। मूली से बनी चीजें खाने के कम से कम दो घंटे के बाद ही दूध पिएं।
    मछली के साथ दूध
    दूध की तासीर ठंडी होती है। इसे किसी भी गर्म चीज के साथ नहीं लेना चाहिए। वहीं मछली की तासीर काफी गर्म होती है, इसलिए इसे दूध और दही के साथ नहीं खाना चाहिए। ऐसा करने से गैस, एलर्जी और त्वचा संबंधी बीमारी हो सकती है। दही के अलावा शहद को भी गर्म चीजों के साथ नहीं खाना चाहिए।
    ना लें दूध के साथ फल
    दूध के साथ फल लेते हैं तो दूध के अंदर का कैल्शियम फलों के कई एंजाइम्स को एड्जॉर्ब (खुद में समेट लेता है और उनका पोषण शरीर को नहीं मिल पाता) कर लेता है। संतरा और अनानास जैसे खट्टे फल तो दूध के साथ बिल्कुल नहीं लेने चाहिए। व्रत वगैरह में बहुत से लोग केला और दूध साथ लेते हैं, जोकि सही नहीं है। केला कफ बढ़ाता है और दूध भी कफ बढ़ाता है। दोनों को साथ खाने से कफ बढ़ता है और पाचन पर भी असर पड़ता है।

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Posted Date : 14-May-2018
  • नई दिल्ली, 14 मई । पिछले करीब 19 दिनों तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहने के बाद सोमवार को इसमें इजाफा किया गया है। इसके बाद अब राजधानी दिल्ली में आज पेट्रोल के दाम 74.80 रुपए प्रति लीटर और मुंबई में पेट्रोल के दाम 82.65 रुपए प्रति लीटर हो चुका है। चेन्नई में पेट्रोल की कीमत 77.61 रुपये प्रति लीटर जबकि डीजल 69.79 रुपये प्रति लीटर, कोलकाता में पेट्रोल 77.50 रुपये प्रति लीटर जबकि डीजल 68.68 रुपये प्रति लीटर हो गयी है। 
    क्रूड ऑयल में आ रहे उबाल के कारण बढ़ती कीमतों से आम आदमी को राहत देने और कर्नाटक चुनाव के मद्देनजर सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को 20 दिन तक अपरिवर्तित रखा। गौरतलब है कि 16 जून 2017 से ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में रोजाना संशोधन हो रहा है। इससे पहले सरकारी तेल विपणन कंपनियां ईंधन की कीमतों की महीने में दो बार समीक्षा किया करती थीं।
    पिछले कुछ दिनों में अगर देखें तो करीब 20 दिन पेट्रोल की कीमतें देशभर में अपरिवर्तित रही हैं। 24 अप्रैल 2018 को दिल्ली में पेट्रोल के दाम 74 रुपए 63 पैसे प्रति लीटर थे। ये दाम 13 मई 2018 तक बरकरार रहे। पेट्रोल की कीमतों में 21वें दिन यानी तीन हफ्ते बाद परिवर्तन हुआ है। (लाइव हिन्दुस्तान)

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Posted Date : 14-May-2018
  • -एलेक्स थेरियन
    जल्दी और देर से सोने वाले लोगों की सेहत पर एक नया अध्ययन हुआ है जिसके नतीजे 'निशाचरों' को परेशान कर सकते हैं. इस अध्ययन में सामने आया है कि देर रात तक जागने वालों को जल्दी मौत का ख़तरा होता है. इसके अलावा उन्हें मनोवैज्ञानिक रोग और सांस लेने संबंधी दिक़्कतें भी हो सकती हैं. लेकिन क्या देर रात तक जागना वाक़ई आपके लिए बुरा है? क्या इसका मतलब है कि 'रात के उल्लुओं' को अपनी आदत बदलकर सुबह की गौरैया बन जाना चाहिए?
    अच्छी नींद में छुपा है आपकी ख़ूबसूरती का राज़
    दफ़्तर के दिनों में कमबख़्त अलार्म की कर्कश ध्वनि आपको बिस्तर से उठाकर अलग कर देती है. शनिवार आते-आते आप नींद के मारे थक चुके होते हैं और फिर अपने रोज़ के समय से ज़्यादा सोते हैं. यह सुनने में सामान्य लगता है, लेकिन यह इस बात का संकेत है कि आपको पर्याप्त नींद नहीं मिल रही और आप 'सोशल जेट लैग' के शिकार हैं.
    'सोशल जेट लैग' हफ़्ते के दिनों के मुक़ाबले छुट्टी के दिन में आपकी नींद का अंतर है, जब हमारे पास देर से सोने और देर से उठने की 'सहूलियत' होती है.
    सोशल जेट लैग जितना ज़्यादा होगा, सेहत की दिक्क़तें उतनी ज़्यादा होंगी. इससे दिल की बीमारी और मेटाबॉलिक परेशानियां हो सकती हैं.
    म्यूनिख की लुडविग-मैक्समिलन यूनिवर्सिटी में क्रोनोबायोलॉजी के प्रोफ़ेसर टिल रोएनबर्ग के मुताबिक, "यही वो चीज़ है जिसके आधार पर ऐसे अध्ययन सुबह देर से उठने वालों के लिए सेहत से जुड़े ख़तरे ज़्यादा बताते हैं." स्लीप एंड सर्कैडियन न्यूरोसाइंस इंस्टीट्यूट और नफ़ील्ड लेबोरेट्री ऑफ़ आप्थलमोलॉजी के प्रमुख रसेल फ़ोस्टर कहते हैं कि अगर आप सुबह जल्दी उठने वालों से देर रात तक काम करवाएं तो उन्हें भी स्वास्थ्य की दिक़्कतें होंगी.
    आपको कितने घंटों की नींद चाहिए?
    'यह इंसान का जीव विज्ञान है'
    तो देर रात जागने वाले क्या करें?
    क्या वीकएंड पर मिलने वाली अपनी बेशक़ीमती लंबी नींद का त्याग कर दें?
    प्रोफेसर रोएनबर्ग कहते हैं, "यह सबसे ख़राब बात होगी."
    वह मानते हैं कि देर रात तक जागना अपने आप में बीमारियां पैदा नहीं करता.
    वह कहते हैं, "अगर आप पांच दिनों तक कम सोए हैं तो आप अपनी नींद की भरपाई करेंगे ही और ऐसा आप तभी कर पाएंगे जब आपके पास वक़्त होगा."
    ऐसा इसलिए भी है कि हमारे सोने-जागने का समय सिर्फ़ आदत या अनुशासन का मसला नहीं है. यह हमारी बॉडी क्लॉक पर निर्भर करता है जिसका 50 फ़ीसदी हिस्सा हमारे जीन तय करते हैं.
    बाकी 50 फ़ीसदी हिस्सा हमारा पर्यावरण और उम्र तय करती है. इंसान बीस की उम्र में देर से सोने के चरम पर होता है और उम्र बढ़ने के साथ हमारा बॉडी क्लॉक पहले की ओर खिसकता जाता है.
    यूनिवर्सिटी ऑफ़ सरे में क्रोनोबायोलॉजी के प्रोफेसर मैल्कम वॉन शांत्ज़ कहते हैं, "हमने ये मान लिया है कि देर तक जागने वाले लोग किसी काम के नहीं होते और आलसी होते हैं, लेकिन असल में यह इंसानी जीवविज्ञान है."
    यही विज्ञान है जो उल्लुओं और सुबह चहचहाने वाले पक्षियों को भी प्रभावित करता है.
    आपकी नींद भी आपको मोटा बना सकती है
    इस तरह दें बॉडी क्लॉक को गच्चा
    सुबह की रोशनी शरीर को मिले तो देर रात तक जागने वालों को समय से नींद आ सकती है
    जानकार मानते हैं कि वीकएंड पर जल्दी उठ जाने से आप अपनी जेनेटिक प्रवृत्तियों से नहीं उबर पाएंगे बल्कि इससे आप अपनी नींद से और वंचित ही होते रहेंगे.
    इसके बजाय अपने बॉडी क्लॉक को भ्रमित करने का बेहतर तरीक़ा रोशनी से जुड़ा है. हमारा बॉडी क्लॉक सूरज के उगने और छिपने से प्रभावित होता है, लेकिन हम में से बहुतों को दिन में कम सूरज की रोशनी नसीब होती है और रात में कृत्रिम प्रकाश ज़्यादा मिलता है.
    इससे हमें नींद जल्दी नहीं आती. यह देर रात तक जागने वालों की आम समस्या है, जो पहले से ही अपने जीव विज्ञान के चलते 'देरी' के शिकार होते हैं.
    सुबह सूरज की रोशनी लेकर और रात में कृत्रिम रोशनी - ख़ास तौर पर हमारे फोन और लैपटॉप से आने वाली नीली रौशनी- से ख़ुद को बचाकर हम अपने बॉडी क्लॉक को जल्दी नींद बुलाने की ट्रेनिंग दे सकते हैं.
    चैन और रातों की नींद उड़ा सकता है इंटरनेट
    नींद पर वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले कहते हैं कि इसमें दफ़्तरों, स्कूलों और समाज की भी ज़िम्मेदारी बनती है कि वे रात में जागने वालों को स्वीकार करें.
    इसकी शुरुआत इस तरह हो सकती है कि ज़्यादा कर्मचारियों को शाम से देर रात तक काम करने की इजाज़त दी जाए.
    इसके अलावा प्रोफेसर फॉस्टर के मुताबिक, लोग अपने बॉडी क्लॉक के हिसाब से दफ़्तरों में काम करेंगे तो यह ज़्यादा तर्कपूर्ण होगा.
    इससे कर्मचारियों का प्रदर्शन भी बेहतर होगा और चौबीस घंटे चलने वाले कारोबार को इससे फ़ायदा ही होगा.
    प्रोफेसर रोएनबर्ग एक क़दम आगे बढ़कर कहते हैं, "यह समाज का काम है कि वह इसका ख़्याल रखे. यह समाज का काम है कि वह इमारतों में और रोशनी बढ़ाए, साथ ही नीली रोशनी को कम करे ताकि लोग अपने बॉडी क्लॉक को बदले बिना टीवी देख सकें."  (स्वास्थ्य संवाददाता, बीबीसी न्यूज़)

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Posted Date : 13-May-2018
  • तरबूज में पानी की मात्रा अधिक पाई जाती है. इसके ज्यादा सेवन से शरीर में पानी की मात्रा जरूरत से ज्यादा हो सकती है. शरीर में पानी के बढ़े हुए स्तर के कारण शरीर से कई बार पानी बाहर नहीं निकल पाता.
    गर्मियों के मौसम में फलों के सेवन से शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है. इन फलों में तरबूज भी काफी अहम फल के तौर पर देखा जाता है. तरबूज खाने में स्वादिष्ट होता है और यह स्वस्थ और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ है. इसमें फैट की मात्रा नहीं पाई जाती और विटामिन ए, विटामिन बी-6, विटामिन सी के साथ मिनरल्स जैसे पोटेशियम, लाइकोपीन की मात्रा भी अच्छी होती है.
    वहीं तरबूज का सेवन शरीर में पानी की पूर्ति करने के लिए भी किया जाता है. इसमें 92 फीसदी पानी होता है, इससे शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद मिलती है. तरबूज के फायदे अनेक हैं लेकिन अधिक मात्रा में तरबूज का सेवन करना शरीर के लिए नुकसान भी पैदा कर सकता है.
    100 ग्राम तरबूज में लगभग 30 कैलोरी और 6 ग्राम शुगर पाई जाती है. दिनभर में 400-500 ग्राम तरबूज का सेवन करना ठीक रहता है. लेकिन इससे अधिक मात्रा में तरबूज का सेवन करना शरीर पर बुरा प्रभाव डाल सकता है. आइए जानते हैं अधिक मात्रा में तरबूज का सेवन करने से होने वाले नुकसान के बारे में...
    हाइड्रेशन
    तरबूज में पानी की मात्रा अधिक पाई जाती है. इसके ज्यादा सेवन से शरीर में पानी की मात्रा जरूरत से ज्यादा हो सकती है. शरीर में पानी के बढ़े हुए स्तर के कारण शरीर से कई बार पानी बाहर नहीं निकल पाता, जिसके कारण शरीर में ब्लड वॉल्यूम बढ़ जाता है. इससे थकान, पैरों में सूजन जैसी कई परेशानियां हो जाती है.
    पाचन संबंधी समस्या
    तरबूज में पानी के साथ-साथ डाइटरी फाइबर की मात्रा भी काफी पाई जाती है. डाइटरी फाइबर का ज्यादा सेवन करने से पेट से संबंधित कई समस्याओं से सामना हो सकता है. इन समस्याओं में गैस, पेट फूलना और डायरिया जैसी समस्याएं हैं.
    ग्लूकोज का स्तर
    तरबूज में ग्लाइसेमिक इंडेक्स की मात्रा काफी पाई जाती है. जिसके कारण तरबूज का ज्यादा सेवन करने से शरीर में ग्लूकोज के स्तर में इजाफा हो सकता है. इसलिए मधुमेह के रोगियों को तरबूज का सेवन नियंत्रित मात्रा में करने की सलाह दी जाती है. (ndtv)

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Posted Date : 10-May-2018
  • वाशिंगटन, 10 मई । भारतीय मूल के एक सर्जन की अगुवाई में विश्व में रोबोट के जरिये पहली सर्जरी की गयी। इसमें एक मरीज की गर्दन से दुर्लभ किस्म के ट्यूमर को सफलतापूर्वक निकाला गया। कॉर्डोमा कैंसर का एक दुर्लभ प्रकार है जो खोपड़ी और रीढ़ की हड्डी में होता है। कॉर्डोमा का ट्यूमर बहुत धीरे-धीरे गंभीर रूप अख्तियार करता है और कई वर्षों तक इसका कोई लक्षण देखने को नहीं मिलता। 
    अमरीका के 27 वर्षीय नोआ पर्निकॉफ 2016 में एक कार हादसे में जख्मी हो गए थे। मामूली चोट से उबरने के बाद उनके गर्दन में काफी दर्द होने लगा था। इसके बाद एक्सरे कराया गया, जिसमें उसके गर्दन में चिंतनीय क्षति का पता चला। ये जख्म दुर्घटना से संबंधित नहीं थे और उन्हें लगी चोट की तुलना में बहुत अधिक चिंता पैदा करने वाले थे। 
    इसके बाद उस स्थान की बॉयोप्सी की गयी। इसमें व्यक्ति के कॉर्डोमा से पीडि़त होने की बात निकलकर सामने आई। पर्निकॉफ ने कहा , मैं बहुत खुशनसीब हूं कि उन्होंने बहुत पहले इसका पता लगा लिया। बहुत से लोगों में इसका पता जल्द नहीं लग पाता है और इस कारण शीघ्र उपचार भी मुमकिन नहीं हो पाता है। कॉर्डोमा के इलाज के लिए सर्जरी सबसे उपयुक्त विकल्प होता है लेकिन पर्निकॉफ के मामले में यह बहुत मुश्किल था। ऐसे में उनके पास प्रोटोन थेरिपी का दूसरा विकल्प सामने था।
    कॉर्डोमा काफी दुर्लभ है। हर साल दस लाख लोगों में कोई एक इससे प्रभावित होता है। पर्निकॉफ के मामले में कॉर्डोमा सी 2 कशेरुका में था। यह और भी दुर्लभ है और इसका उपचार चुनौतीपूर्ण होता है। अमरीका के पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के अस्पताल में पिछले साल अगस्त में पर्निकॉफ की रोबोट के जरिये सर्जरी हुई। रोबोट का इस्तेमाल तीन चरणों में की गयी सर्जरी के दूसरे हिस्से में किया गया। 
    सहायक प्रोफेसर नील मल्होत्रा की अगुवाई वाली टीम ने यह सर्जरी की। पर्निकॉफ की सर्जरी तीन चरणों में हुई। पहले दौर में न्यूरोसर्जन ने मरीज के गर्दन के पिछले हिस्से में ट्यूमर के पास रीढ़ की हड्डी को काट दिया ताकि दूसरे चरण में ट्यूमर को मुंह से निकाला जा सके। पहले चरण की सफलता के बाद सर्जिकल रोबोट के इस्तेमाल के जरिये डॉक्टरों की टीम ने उसके गर्दन से मुंह तक के हिस्से को साफ किया ताकि मल्होत्रा ट्यूमर और रीढ़ की हड्डी के हिस्से को निकाल सकें। अंतिम चरण में टीम ने पर्निकॉफ की रीढ़ की हड्डी को उसके पूर्व के स्थान पर फिट किया। सर्जरी के नौ माह बाद पर्निकॉफ काम पर लौट चुके हैं। (भाषा)

     

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