सेहत / फिटनेस

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Posted Date : 14-Nov-2018
  • नई दिल्ली, 14 नवम्बर । बिजली की बढ़ती मांग के बीच भारत 2030 तक अमरीका को पीछे छोड़ते हुए कार्बन डाई ऑक्साइड का दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक हो जाएगा। यह दावा पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने किया है। आईईए के मुताबिक 2040 तक भारत में बिजली की खपत आज के मुकाबले तीन गुना बढ़ जाएगी जिससे कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में करीब 80 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी होगी। इस बीच चीन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करने वाले देशों में शीर्ष पर बना रहेगा।
    इस रिपोर्ट के मुताबिक, बिजली की मांग और उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी के बाद भी भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत दुनिया में सबसे निचले स्तर पर ही रहेगी। आईईए ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 2040 तक भारत और दक्षिण पूर्व एशिया में बिजली की बढ़ती मांग कोयले से ही पूरी होगी और इसका कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में सबसे अहम योगदान होगा। (सत्याग्रह)

     

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Posted Date : 14-Nov-2018
  • दुनियाभर में डायबिटीज़ एक ऐसी बीमारी के रूप में उभर रही है जो बेहद तेज़ी से बच्चों से लेकर युवाओं को अपना निशाना बना रही है.
    विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, दुनिया भर में इस समय 42.2 करोड़ लोग डायबिटीज़ यानी मधुमेह से पीड़ित हैं.
    बीते तीस सालों में मधुमेह पीड़ितों की संख्या में चार गुना वृद्धि हुई है.
    डायबिटीज़ से पीड़ित लोगों को हार्ट अटैक (दिल का दौरा) और हार्ट स्ट्रोक (हृदयाघात) हो सकता है.
    इसके साथ-साथ डायबिटीज़ से किडनी फेल और पैरों के निष्क्रिय होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.
    लेकिन इसके बाद भी आम लोगों में इस बीमारी के लक्षणों, बचाव और कारणों को लेकर जागरुकता नहीं है.
    आख़िर क्या होती है डायबिटीज़?
    जब हमारा शरीर खून में मौजूद शुगर की मात्रा को सोखने में असमर्थ हो जाता है तो ये स्थिति डायबिटीज़ को जन्म देती है.
    दरअसल, हम जब भी कुछ खाते हैं तो हमारा शरीर कार्बोहाइड्रेट को तोड़कर ग्लूकोज़ में बदलता है.
    डायबिटीज़इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
    इसके बाद पेंक्रियाज़ से इंसुलिन नाम का एक हारमोन निकलता है जो कि हमारे शरीर की कोशिकाओं को ग्लूकोज़ को सोखने का निर्देश देता है.
    इससे हमारे शरीर में ऊर्जा पैदा होती है.
    लेकिन जब इंसुलिन का फ़्लो रुक जाता है तो हमारे शरीर में ग्लूकोज़ की मात्रा बढ़ना शुरू हो जाती है.
    टाइप 1, टाइप 2 डायबिटीज़ क्या होती है?
    डायबिटीज़ के कई प्रकार होते हैं लेकिन टाइप 1, टाइप 2 और गेस्टेशनल डायबिटीज़ से जुड़े मामलों की अधिक पाए जाते हैं.
    टाइप 1 डायबिटीज़ में आपके पेंक्रियाज में हारमोन इंसुलिन बनना बंद हो जाता है. इससे हमारे खून में ग्लूकोज़ की मात्रा बढ़ने लगती है.
    अब तक वैज्ञानिक ये पता लगाने में सफल नहीं हुए हैं कि ऐसा क्यों होता है.
    लेकिन इसे आनुवंशिकता और वायरल इन्फेक्शन से जोड़कर देखा जाता है.
    इससे पीड़ित लोगों में से लगभग दस फीसदी लोग टाइप 1 डाटबिटीज़ से पीड़ित होते हैं.
    वहीं, टाइप 2 डायबिटीज़ में पेंक्रियाज में ज़रूरत के हिसाब से इंसुलिन नहीं बनता है या हारमोन ठीक से काम नहीं करता है.
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    टाइप 2 डायबिटीज़ इन लोगों को हो सकता है -
    अधेड़ और वृद्ध लोग
    मोटे और शारीरिक श्रम न करने वाले युवा
    दक्षिण एशियाई देशों में रहने वाले लोग
    वहीं, कुछ गर्भवती महिलाएं जेस्टेशनल डायबिटीज़ से पीड़ित हो सकती हैं.
    इसमें महिलाओं का शरीर उनके और बच्चे के लिए पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन बनाना बंद कर देता है.
    अलग-अलग मानदंडों के आधार पर किए गए अध्ययनों में सामने आया है कि छह से 16 फीसदी महिलाओं के जेस्टेशनल डायबिटीज़ से पीड़ित होने की संभावना है.
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    गर्भवती महिलाओं को इससे बचने के लिए अपनी डाइट को नियंत्रण में रखकर शुगर लेवल को नियंत्रित रखना चाहिए.
    इसके साथ ही इंसुलिन के प्रयोग से इसे टाइप 2 डायबिटीज़ में बदलने से रोका जा सकता है.
    कुछ लोग प्री-डायबिटीज़ से भी पीड़ित हो सकते हैं, खून में ग्लूकोज़ की अधिक मात्रा आगे चलकर डायबिटीज़ में बदल सकती है.
    डायबिटीज़ के लक्षण क्या हैं?
    प्यास ज़्यादा लगना
    सामान्य से ज़्यादा पेशाब होना, विशेषकर रात में
    थकान महसूस होना
    बिना प्रयास किए वज़न गिरना
    मुंह में अक्सर छाले होना
    आंखों की रोशनी कम होना
    घाव भरने में समय लगना
    ब्रिटिश नेशनल हेल्थ सर्विस के मुताबिक़, टाइप 1 डायबिटीज़ के लक्षण काफ़ी कम उम्र में ही दिखना शुरू हो जाते हैं.
    वहीं, टाइप 2 डायबिटीज़ अधेड़ उम्र के लोगों (दक्षिण एशियाई लोगों के लिए 25 वर्ष की आयु) परिवार के किसी सदस्य के डायबिटीज़ से पीड़ित होने पर और दक्षिण एशियाई देशों, चीन, एफ्रो-कैरिबियन, अफ्रीका से आने वाले अश्वेतों को ये बीमारी होने का ख़तरा ज़्यादा होता है.
    क्या आप डायबिटीज़ से बच सकते हैं?
    डायबिटीज़ आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारकों पर आधारित होती है.
    लेकिन आप अपने खून में ग्लूकोज़ की मात्रा को नियंत्रित करके खुद को डायबिटीज़ से बचा सकते हैं.
    और संतुलित डाइट और व्यायाम करने से ऐसा किया जा सकता है.
    वहीं, इसकी जगह आप अपनी रोजाना की डाइट में सब्जियां, फल, फलियां, और साबुत अनाज शामिल कर सकते हैं.
    इसके साथ-साथ सेहतमंद तेल, बादाम के साथ-साथ सार्डाइंस, सालमन और मेकेरल जैसी मछलियों को भी अपने आहार में शामिल कर सकते हैं क्योंकि इनमें ओमेगा 3 तेल की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है.
    शारीरिक व्यायाम से भी ब्लड सुगर लेवल को कम किया जा सकता है.
    ब्रिटिश नेशनल हेल्थ सिस्टम के मुताबिक़, लोगों को एक हफ़्ते में लगभग ढाई घंटे एरोबिक्स एक्सरसाइज़ करनी चाहिए जिसमें तेज गति से टहलना और सीढ़ियां चढ़ना शामिल है.
    अगर आपके शरीर का वज़न नियंत्रण में है तो आप ब्लड शुगर लेवल को आसानी से कम कर सकते हैं.
    वहीं, अगर आप वज़न गिराना चाहते हैं तो एक हफ़्ते में 0.5 किलोग्राम से 1 किलोग्राम के बीच गिराएं.
    इसके साथ ही ये भी ज़रूरी है कि सिगरेट न पिएं और दिल की बीमारी से बचने के लिए कोलेस्ट्रॉल लेवल की जांच कराते रहें.
    डायबिटीज़ से क्या हो सकता है?
    अगर आपके शरीर में ब्लड शुगर लेवल की अधिकता है तो इससे आपके खून की नसों को नुकसान पहुंच सकता है.
    अगर आपके शरीर में खून सही ढंग से प्रवाहित नहीं होगा तो ये शरीर के उन हिस्सों में नहीं पहुंचेगा जहां इसकी ज़रूरत है.
    ऐसे में खून की नसों को नुकसान हो सकता है और आपको दर्द की अनुभूति होना बंद हो सकती है.
    इसके साथ ही आंखों की रोशनी कम होने के साथ-साथ पैरों में इन्फेक्शन हो सकता है.
    साल 2016 में, लगभग 16 लाख लोगों की मौत डायबिटीज़ की वजह से हुई थी.
    साल 1980 में 18 साल से ज़्यादा उम्र वाले डायबिटीज़ से पीड़ित युवाओं का प्रतिशत 5 से कम था.
    लेकिन 2014 में ये आंकड़ा 8.5% तक पहुंच चुका है.
    अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज़ फेडरेशन ने एक अनुमान लगाया है कि निम्न और मध्यम आयवर्ग वाले देशों के लगभग 80 फीसदी युवाओं के खाने-पीने की आदतों में बदलाव हो रहा है.
    वहीं, विकसित देशों में डायबिटीज़ गरीब और सस्ता खाना खाने के लिए विवश वर्ग को अपना निशाना बनाता है.
    (बीबीसी)

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Posted Date : 11-Nov-2018
  • भोपाल, 11 नवम्बर। मध्य प्रदेश में जीका वायरस अब तेजी से फैल रहा है। लगातार इसके मामले सामने आ रहे हैं। राजधानी भोपाल में 24 मामलों सहित पूरे मध्य प्रदेश में एक ही दिन में 50 मामले सामने आए हैं।
    एक ही दिन में 50 मामले आमने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। विभाग ने तत्काल पूरे प्रदेश में अलर्ट जारी कर दिया है। राजधानी भोपाल के अलावा विदिशा, सीहोर और सागर जीका से प्रभावित हैं। सभी जिलों में जीका वायरस को लेकर बुखार के मरीजों और लार्वा का सर्वे किया जा रहा है।
    इस दौरान गर्भवती महिलाओं का अलग से सर्वे किया जाता है। भोपाल में किए जा रहे सर्वे में हर दिन करीब 80 गर्भवती महिलाएं मिल रही हैं। शुक्रवार को भी इतनी ही महिलाएं मिली थीं।
    भारत में राजस्थान सहित कई राज्यों में अब तक जीका वायरस के कई मामले सामने आ चुके हैं। यह वायरस जानलेवा है। यह वायरस गर्भवती महिलाओं के लिए यह बेहद खतरनाक है। भारत सरकार की ओर से भी कहा गया है कि जीका विषाणु से पीडि़त महिलाओं में गर्भधारण के दौरान समस्याएं पैदा होने की संभावना है।
    राजस्थान, गुजरात और दिल्ली में जीका वायरस के कई मरीज सामने आ चुके हैं। आशंका जताई जा रही है कि यह कुछ और राज्यों में फैल सकता है। जीका वायरस का असर फिलहाल दुनिया के 86 देशों में फैल चुका है। (न्यूज 18)

     

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Posted Date : 10-Nov-2018
  • मुकुंद झा 
    नई दिल्ली, 10 नवंबर । देश के हर इलाके में आपको एक लेबर चौक जरूर मिलेगा जहाँ सुबह 8 से 10 के बीच भरी चहल पहल दिखती है। मुख्यत: यह ऐसी जगह होती है जहाँ भवन निर्माण का कार्य करने वाले दिहाड़ी मजदूर रोज काम की तलाश में आते हैं, लेकिन दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से इन चौकों की रौनक गायब है। यहाँ आपको कोई भी मजदूर नहीं मिलेगा, आप सोचोगे कि मजदूर आजकल त्योहार में व्यस्त होंगे या अपने गांव-घर गए होंगे, इसलिए कोई काम करने नहीं आ रहा होगा पर ऐसा नहीं है। मजदूर अभी कोई त्योहार नहीं मना रहे बल्कि इन मजदूरों के सामने तो दो वक्त की रोटी का भी संकट हो गया है।
    जी हां, जब त्योहारों पर आप पकवान खा रहे हैं, इन मजदूरों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। अब आप कहंगे कि फिर ये काम करने क्यों नहीं आ रहे हैं?    
    भवन निर्माण के मजदूर एक तरह से रोज कुआं खोदकर पानी पीते हैं, लेकिन उन्हें पिछले कई दिनों से कोई काम नहीं मिल रहा है। वजह? वजह है हमारा प्रदूषण और प्रदूषण से निपटने की हमारी आधी-अधूरी नीतियां। दरअसल दिल्ली सरकार ने बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए दिल्ली में सभी तरह के निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध कर दिया है, बिना इसका कोई इंतजाम किए कि दिहाड़ी मजदूर क्या करेगा, क्या खाएगा। (न्यूजक्लिक)

     

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Posted Date : 10-Nov-2018
  • नई दिल्ली, 10 नवम्बर । बीते साल भारत में पांच साल से कम उम्र के 2.6 लाख बच्चों की न्यूमोनिया के चलते मौत हो गई। अमरीका स्थित जॉन हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के हवाले से इस मामले में भारत की स्थिति को बहुत खराब बताया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यूमोनिया का कारण माने जाने वाले रोटा वायरस का संक्रमण रोकने के लिए देश में टीकाकरण उन 15 देशों में सबसे कम है, जिन्होंने इसे पिछले साल शुरू किया था। पूरी दुनिया में निमोनिया और डायरिया से पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के 70 फीसदी मामले भारत में दर्ज किए गए हैं। (हिंदुस्तान टाईम्स)

     

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Posted Date : 09-Nov-2018
  • दिल्ली पिछले कुछ वक्त से स्मॉग की चपेट में है। मौसम इतना खतरनाक है कि डॉक्टर्स इसे मेडिकल इमरजेंसी बता रहे हैं। सरकार किसी तरह स्मॉग से निपटने के जतन में लगी हुई है। बेशक, इसी समय पर पर्यावरण पर चर्चाएं भी जोर-शोर से चल रही हैं जिनमें पेड़ों का जिक्र आना भी लाजिमी है। यानी कि इस समझाइश का लेन-देन भी चल रहा है कि जितनी गुंजाइश हो हमें अपने आसपास पेड़ लगाने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन दिल्ली जैसे शहर में जहां परिवार फ्लैटों में बसते हैं वहां पर कौन, कहां पेड़ लगाएगा और कैसे अपना पर्यावरण बचाएगा। इसलिए फिलहाल साफ-सुथरी सांस के लिए फौरी उपाय के तौर पर, घर के बाहर - ब्रीदिंग मास्क और अंदर - इंडोर प्लांट्स, को अपनाया जा रहा है। दिल्ली में स्मॉग बढऩे के बाद से इंडोर प्लांट्स की चर्चा और बिक्री दोनों ही बढ़ गई है।
    हो सकता है, आपको यह सुनकर एक जोर का झटका लगे कि इंडोर प्लांट्स हवा को शुद्ध करने में उतनी बड़ी भूमिका नहीं निभाते हैं, जितना बीते कुछ दिनों में आपको बताया गया है। लेकिन इससे पहले इस बात की चर्चा कर ली जाए कि इंडोर प्लांट्स का चलन शुरू कहां से और कैसे हुआ। दरअसल, इंडोर प्लांट्स को एयर प्यूरिफायर मानने का यह मिथक भी कई और बातों की तरह हमारे यहां पश्चिम से आया है। कई यूरोपियन और अमरीकन देशों में कड़ाके की सर्दियां शुरू होते ही ज्यादातर घर एयरटाइट डिब्बों में बदल जाते हैं और उनमें वेंटिलेशन की गुंजाइश नहीं के बराबर रह जाती है। ऐसे में घर की हवा को साफ-सुथरा रखने के सस्ते उपाय के तौर पर यहां पर इंडोर प्लांट्स का इस्तेमाल किया जाता है।
    इंडोर प्लांट्स के बारे में इस मिथक की शुरूआत सन 1989 में जारी नासा के एक शोध पत्र से हुई। नहीं, शोध पत्र में कोई गलत जानकारी नहीं दी गई थी। दरअसल इसे रिपोर्ट करने वाले ज्यादातर पत्रकारों ने रिपोर्ट को अच्छी तरह से पढऩे की बजाय ऊपर-ऊपर से समझ में आई जानकारी के आधार पर इंडोर प्लांट्स के तमाम फायदे गिनवा दिए। उदाहरण के लिए इन पौधो के बारे में बताया गया कि ये कमरे में मौजूद 90 प्रतिशत प्रदूषकों को, मात्र 24 घंटे में खत्म कर देते हैं, या लगभग 100 वर्ग फीट एरिया में हवा की सफाई के लिए केवल एक ही पौधा काफी है। कुछ रिपोर्टों में आपको यह गिनती 10 से 20 के बीच भी मिल सकती है और कुछ में ऐसा करने वाले पौधों के नामों की लिस्ट भी। यह सही है कि इन पौधों की उपस्थिति कमरे में थोड़ी मात्रा में ऑक्सीजन बढ़ाने में मददगार होती है लेकिन उनसे वातावरण में कोई महसूस किया जा सकने वाला फर्क आ जाए, ऐसा संभव नहीं है।
    नासा की इस रिपोर्ट में एक्टिवेटेड कार्बन प्लांट फिल्टर का जिक्र किया गया है। एक्टिवेटेड कार्बन यानी चारकोल में प्रयोग के लिए उगाए गए पौधों को एक्टिवेटेड कार्बन प्लांट फिल्टर कहा जाता है। इन्हें छोटे-छोटे चैंबरों में रखकर यह परीक्षण किया गया था। इन चैंबरों में कुछ रासायनिक प्रदूषकों जैसे बेंजीन, फार्मल्डिहाइड और ट्राइक्लोरोएथिलीन इंजेक्ट किए गए जिनकी मात्रा 24 घंटे के बाद लगभग 58 प्रतिशत तक कम हो चुकी थी। यह जांच करने के लिए कि यह कमाल पौधे का है या एक्टिवेटेड कार्बन का, प्रयोग के अगले चरण में पौधों की सारी पत्तियां हटा दी गईं। लेकिन इस बार भी प्रदूषकों की मात्रा लगभग पहले जितनी ही (50 फीसदी) कम हो गई थी। इस आधार पर वैज्ञानिकों ने माना कि यह एक्टिवेटेड कार्बन यानी चारकोल था जो प्रदूषण को कम कर रहा था।
    इंडोर प्लांट्स के फायदे गिनाते हुए इस बात का भी जिक्र किया जाता है कि यह सभी तरह के प्रदूषकों पर काम करता है। लेकिन नासा ने शोध में केवल तीन तरह के प्रदूषकों पर ही यह अध्ययन किया था। यानी सभी तरह के प्रदूषक कम होने की बात का कोई आधार ही नहीं है। जहां तक कमरे से 90 प्रतिशत प्रदूषक कम करने का सवाल है, वह तो और भी बड़ा जुमला लगता है। क्योंकि प्रयोग के दौरान आदर्श परिस्थितियों में भी केवल 50 से 58 प्रतिशत तक ही प्रदूषक कम हुए थे, वह भी किसी और वजह से। इसके अलावा इस प्रयोग में चैंबर में केवल एक ही बार प्रदूषक इंजेक्ट किए गए थे जबकि घरों में हर सेकंड वायु प्रदूषकों की गिनती बढ़ती रहती है। ये प्रदूषक साफ-सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनों, मच्छर भगाने वाले कॉइल-लिक्विड या फर्नीचर पर इस्तेमाल होने वाले फैब्रिक वगैरह से लगातार निकलते रहते हैं।
    इसके अलावा एक कमरे के लिए भी एक ही पेड़ काफी होने की बात भी सही नहीं मानी जा सकती क्योंकि नासा का प्रयोग करीब दो फीट की लंबाई-चौड़ाई वाले एक चैंबर में किया गया था। यानी कि एक एक्टिवेटेड कार्बन प्लांट फिल्टर एक बहुत छोटे से क्षेत्रफल में फैले प्रदूषण को ही सही कर पा रहा था। कुछ वैज्ञानिकों की राय है कि एक दस फीट लंबाई-चौड़ाई वाले कमरे की हवा में फर्क लाने के लिए कम से कम सौ पौधों की जरूरत होगी।
    ऐसा नहीं है कि हाउस प्लांट से जुड़े सारे प्रयोग सिर्फ छोटे चैंबर्स में ही किए गए हैं। सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलजी के कुछ वैज्ञानिकों ने अलग-अलग ऑफिस बिल्डिंग्स में एक, तीन और छह पौधे प्रयोग के लिए रखे और पाया कि पौधों की उपस्थिति के बाद भी वहां मौजूद प्रदूषकों की मात्रा में कोई विशेष अंतर नहीं आया था। यानी कि बिना एक्टिवेटेड कार्बन के, व्यावहारिक परिस्थितियों में किए गए प्रयोग का नतीजा सिफर ही रहा। नेशनल ज्योग्राफिक की यह रिपोर्ट भी इस तरह के कई दावों को नकारती है और स्पष्टता से कहती है कि घर की साधारण मिट्टी में लगाए चुनिंदा पौधे आपके कमरे की हवा साफ करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। (सत्याग्रह)

     

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Posted Date : 05-Nov-2018
  • दिवाली में पटाखों की धूम नहीं हो तो शायद कुछ कमी सी लगती है, लेकिन अगर पटाखें हमारे स्वास्थ्य को नुकसान व पर्यावरण को हानि पहुंचा रहे हैं तो हमें इनके इस्तेमाल के बारे में सही से सोचने की जरूरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हाल के फैसले में पटाखों का प्रयोग करने की इजाजत दिवाली की रात आठ से 10 बजे के बीच दे दी। इस दौरान दिल्ली व दूसरे महानगरों में प्रदूषण का स्तर निश्चित ही बढ़ा रहेगा। दिवाली की धूम-धड़ाम के बीच स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से अपने को किस तरह से बचें व पटाखों से किस तरह बुजुर्ग व बीमार लोग अपनी स्वास्थ्य की देखभाल करें। 
    जेपी हॉस्पिटल के पल्मोनरी व क्रिटिकल केयर मेडिसिन के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. ज्ञानेंद्र अग्रवाल ने यह पूछने पर कि दमा के मरीज या आम व्यक्तियों पर पटाखों के धुएं का असर कैसे होता है? डॉ. अग्रवाल ने कहा कि रोशनी का त्योहार दिवाली अपने साथ बहुत सारी खुशियां लेकर आता है, लेकिन दमा, सीओपीडी या एलर्जिक रहाइनिटिस से पीडि़त मरीजों की समस्या इन दिनों बढ़ जाती है। पटाखों में मौजूद छोटे कण सेहत पर बुरा असर डालते हैं, जिसका असर फेफड़ों पर पड़ता है।
    1. पटाखों के धुंए से फेफड़ों में सूजन आ सकती है, जिससे फेफड़े अपना काम ठीक से नहीं कर पाते और हालात यहां तक भी पहुंच सकते हैं कि ऑर्गेन फेलियर और मौत तक हो सकती है। ऐसे में धुएं से बचने की कोशिश करें।
    2. पटाखों के धुएं की वजह से अस्थमा या दमा का अटैक आ सकता है। हानिकारक विषाक्त कणों के फेफड़ों में पहुंचने से ऐसा हो सकता है, जिससे व्यक्ति को जान का खतरा भी हो सकता है। ऐसे में जिन लोगों को सांस की समस्याएं हों, उन्हें अपने आप को प्रदूषित हवा से बचा कर रखना चाहिए।
    3. पटाखों के धुएं से हार्टअटैक और स्ट्रोक का खतरा भी पैदा हो सकता है। पटाखों में मौजूद लैड सेहत के लिए खतरनाक है, इसके कारण हार्टअटैक और स्ट्रोक की आशंका बढ़ जाती है। जब पटाखों से निकलने वाला धुंआ सांस के साथ शरीर में जाता है तो खून के प्रवाह में रुकावट आने लगती है। दिमाग को पर्याप्त मात्रा में खून न पहुंचने के कारण व्यक्ति स्ट्रोक का शिकार हो सकता है। 
    4. बच्चे और गर्भवती महिलाओं को पटाखों के शोर व धुएं से बचकर रहना चाहिए। पटाखों से निकला गाढ़ा धुआं खासतौर पर छोटे बच्चों में सांस की समस्याएं पैदा करता है। पटाखों में हानिकर रसायन होते हैं, जिनके कारण बच्चों के शरीर में टॉक्सिन्स का स्तर बढ़ जाता है और उनके विकास में रुकावट पैदा करता है। पटाखों के धुंऐ से गर्भपात की संभावना भी बढ़ जाती है, इसलिए गर्भवती महिलाओं को भी ऐसे समय में घर पर ही रहना चाहिए।
    5. पटाखे को रंग-बिरंगा बनाने के लिए इनमें रेडियोएक्टिव और जहरीले पदार्थों का इस्तेमाल किया जात है। ये पदार्थ जहां एक ओर हवा को प्रदूषित करते हैं, वहीं दूसरी ओर इनसे कैंसर की आशंका भी रहती है।
    6. धुएं से दिवाली के दौरान हवा में पीएम बढ़ जाता है। जब लोग इन प्रदूषकों के संपर्क में आते हैं तो उन्हें आंख, नाक और गले की समस्याएं हो सकती हैं। पटाखों का धुआं, सर्दी जुकाम और एलर्जी का कारण बन सकता है और इस कारण छाती व गले में कन्जेशन भी हो सकता है।
    7. दिवाली के दौरान पटाखों के कारण हवा में प्रदूषण बढ़ जाता है। धूल के कणों पर कॉपर, जिंक, सोडियम, लैड, मैग्निशियम, कैडमियम, सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड गैसें जमा हो जाती हैं। इन गैसों के हानिकारक प्रभाव होते हैं। इसमें कॉपर से सांस की समस्याएं, कैडमियम-खून की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम करता है, जिससे व्यक्ति एनिमिया का शिकार हो सकता है। जिंक की वजह से उल्टी व बुखार व लेड से तंत्रिका प्रणाली को नुकसान पहुंचता है। मैग्निशियम व सोडियम भी सेहत के लिए हानिकारक है।
    8. छोटे बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को अपने आप को बचा कर रखना चाहिए। दिल के मरीजों को भी पटाखों से बचकर रहना चाहिए। इनके फेफड़ें बहुत नाजुक होते हैं। कई बार बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति पटाखों के शोर के कारण दिल के दौरे का शिकार हो जाते हैं। कुछ लोग तो शॉक लगने के कारण मर भी सकते हैं। छोटे बच्चे, मासूम जानवर और पक्षी भी पटाखों की तेज आवाज से डर जाते हैं। पटाखे बीमार लोगों, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए खतरनाक हैं।
    9. पटाखों से ध्वनि प्रदूषण भी होता है, इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए? इस पर अग्रवाल कहते हैं कि शोर का मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। शोर या आवाज हवा से फैलती है। इसे डेसिबल में नापा जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि 100 डेसिबल से ज्यादा आवाज का बुरा असर हमारी सुनने की क्षमता पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शहरों के लिए 45 डेसिबल की आवाज अनुकूल है। लेकिन भारत के बड़े शहरों में शोर का स्तर 90 डेसिबल से भी अधिक है। मनुष्य के लिए उचित स्तर 85 डेसिबल तक ही माना गया है। अनचाही आवाज मनुष्य पर मनोवैज्ञानिक असर पैदा करती है।
    10. शोर तनाव, अवसाद, उच्च रक्तपचाप, सुनने में परेशानी, टिन्नीटस, नींद में परेशानी आदि का कारण बन सकता है। तनाव और उच्च रक्तचाप सेहत के लिए घातक है, वहीं टिन्नीटस के कारण व्यक्ति की याददाश्त जा सकती है, वह अवसाद/ डिप्रेशन का शिकार हो सकता है। ज्यादा शोर दिल की सेहत के लिए अच्छा नहीं। शोर में रहने से रक्तचाप पांच से दस गुना बढ़ जाता है और तनाव बढ़ता है। ये सभी कारक उच्च रक्तचाप और कोरोनरी आर्टरी रोगों का कारण बन सकते हैं।
    11. ऐसे में दिवाली के दौरान पटाखों व प्रदूषण से बचने के लिए क्या सावधानियां बरतें? इस सवाल पर डॉ. अग्रवाल ने कहा कि कोशिश रहे कि पटाखें न जलाएं या कम पटाखे फोड़ें। पटाखों के जलने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड जैसी गैसें निकलती हैं जो दमा के मरीजों के लिए खतरनाक हैं। हवा में मौजूदा धुंआ बच्चों और बुजुर्गों के लिए घातक हो सकता है। उन्होंने सलाह दी कि प्रदूषित हवा से बचें, क्योंकि यह तनाव और एलर्जी का कारण बन सकती है। एलर्जी से बचने के लिए अपने मुंह को रूमाल या कपड़े से ढक लें। दमा आदि के मरीज अपना इन्हेलर अपने साथ रखें। अगर आपको सांस लेने में परेशानी हो तो तुरंत इसका इस्तेमाल करें और इसके बाद डॉक्टर की सलाह लें। त्योहारों के दौरान स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। अगर आपको किसी तरह असहजता महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें। (आईएएनएस)

     

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Posted Date : 05-Nov-2018
  • दिवाली पर पटाखों से सेहत हो सकते हैं क्या-क्या नुकसान, जानिए यहांनई दिल्ली: दिवाली में पटाखों की धूम नहीं हो तो शायद कुछ कमी सी लगती है, लेकिन अगर पटाखें हमारे स्वास्थ्य को नुकसान व पर्यावरण को हानि पहुंचा रहे हैं तो हमें इनके इस्तेमाल के बारे में सही से सोचने की जरूरत है. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हाल के फैसले में पटाखों का प्रयोग करने की इजाजत दिवाली की रात आठ से 10 बजे के बीच दे दी. इस दौरान दिल्ली व दूसरे महानगरों में प्रदूषण का स्तर निश्चित ही बढ़ा रहेगा. दिवाली की धूम-धड़ाम के बीच स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से अपने को किस तरह से बचें व पटाखों से किस तरह बुजुर्ग व बीमार लोग अपनी स्वास्थ्य की देखभाल करें. 
    जेपी हॉस्पिटल के पल्मोनरी व क्रिटिकल केयर मेडिसिन के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. ज्ञानेंद्र अग्रवाल ने यह पूछने पर कि दमा के मरीज या आम व्यक्तियों पर पटाखों के धुएं का असर कैसे होता है? डॉ. अग्रवाल ने कहा कि रोशनी का त्योहार दिवाली अपने साथ बहुत सारी खुशियां लेकर आता है, लेकिन दमा, सीओपीडी या एलर्जिक रहाइनिटिस से पीड़ित मरीजों की समस्या इन दिनों बढ़ जाती है. पटाखों में मौजूद छोटे कण सेहत पर बुरा असर डालते हैं, जिसका असर फेफड़ों पर पड़ता है.
    1. पटाखों के धुंए से फेफड़ों में सूजन आ सकती है, जिससे फेफड़े अपना काम ठीक से नहीं कर पाते और हालात यहां तक भी पहुंच सकते हैं कि ऑर्गेन फेलियर और मौत तक हो सकती है. ऐसे में धुएं से बचने की कोशिश करें.
    2. पटाखों के धुएं की वजह से अस्थमा या दमा का अटैक आ सकता है. हानिकारक विषाक्त कणों के फेफड़ों में पहुंचने से ऐसा हो सकता है, जिससे व्यक्ति को जान का खतरा भी हो सकता है. ऐसे में जिन लोगों को सांस की समस्याएं हों, उन्हें अपने आप को प्रदूषित हवा से बचा कर रखना चाहिए.
    3. पटाखों के धुएं से हार्टअटैक और स्ट्रोक का खतरा भी पैदा हो सकता है. पटाखों में मौजूद लैड सेहत के लिए खतरनाक है, इसके कारण हार्टअटैक और स्ट्रोक की आशंका बढ़ जाती है. जब पटाखों से निकलने वाला धुंआ सांस के साथ शरीर में जाता है तो खून के प्रवाह में रुकावट आने लगती है. दिमाग को पर्याप्त मात्रा में खून न पहुंचने के कारण व्यक्ति स्ट्रोक का शिकार हो सकता है. 
    4. बच्चे और गर्भवती महिलाओं को पटाखों के शोर व धुएं से बचकर रहना चाहिए. पटाखों से निकला गाढ़ा धुआं खासतौर पर छोटे बच्चों में सांस की समस्याएं पैदा करता है. पटाखों में हानिकर रसायन होते हैं, जिनके कारण बच्चों के शरीर में टॉक्सिन्स का स्तर बढ़ जाता है और उनके विकास में रुकावट पैदा करता है. पटाखों के धुंऐ से गर्भपात की संभावना भी बढ़ जाती है, इसलिए गर्भवती महिलाओं को भी ऐसे समय में घर पर ही रहना चाहिए.
    5. पटाखे को रंग-बिरंगा बनाने के लिए इनमें रेडियोएक्टिव और जहरीले पदार्थों का इस्तेमाल किया जात है. ये पदार्थ जहां एक ओर हवा को प्रदूषित करते हैं, वहीं दूसरी ओर इनसे कैंसर की आशंका भी रहती है.
    6. धुएं से दिवाली के दौरान हवा में पीएम बढ़ जाता है. जब लोग इन प्रदूषकों के संपर्क में आते हैं तो उन्हें आंख, नाक और गले की समस्याएं हो सकती हैं. पटाखों का धुआं, सर्दी जुकाम और एलर्जी का कारण बन सकता है और इस कारण छाती व गले में कन्जेशन भी हो सकता है.
    7. दिवाली के दौरान पटाखों के कारण हवा में प्रदूषण बढ़ जाता है. धूल के कणों पर कॉपर, जिंक, सोडियम, लैड, मैग्निशियम, कैडमियम, सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड गैसें जमा हो जाती हैं. इन गैसों के हानिकारक प्रभाव होते हैं. इसमें कॉपर से सांस की समस्याएं, कैडमियम-खून की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम करता है, जिससे व्यक्ति एनिमिया का शिकार हो सकता है. जिंक की वजह से उल्टी व बुखार व लेड से तंत्रिका प्रणाली को नुकसान पहुंचता है. मैग्निशियम व सोडियम भी सेहत के लिए हानिकारक है.
    8. छोटे बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को अपने आप को बचा कर रखना चाहिए. दिल के मरीजों को भी पटाखों से बचकर रहना चाहिए. इनके फेफड़ें बहुत नाजुक होते हैं. कई बार बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति पटाखों के शोर के कारण दिल के दौरे का शिकार हो जाते हैं. कुछ लोग तो शॉक लगने के कारण मर भी सकते हैं. छोटे बच्चे, मासूम जानवर और पक्षी भी पटाखों की तेज आवाज से डर जाते हैं. पटाखे बीमार लोगों, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए खतरनाक हैं.
    9. पटाखों से ध्वनि प्रदूषण भी होता है, इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए? इस पर अग्रवाल कहते हैं कि शोर का मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. शोर या आवाज हवा से फैलती है. इसे डेसिबल में नापा जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि 100 डेसिबल से ज्यादा आवाज का बुरा असर हमारी सुनने की क्षमता पर पड़ता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शहरों के लिए 45 डेसिबल की आवाज अनुकूल है. लेकिन भारत के बड़े शहरों में शोर का स्तर 90 डेसिबल से भी अधिक है. मनुष्य के लिए उचित स्तर 85 डेसिबल तक ही माना गया है. अनचाही आवाज मनुष्य पर मनोवैज्ञानिक असर पैदा करती है.
    10. शोर तनाव, अवसाद, उच्च रक्तपचाप, सुनने में परेशानी, टिन्नीटस, नींद में परेशानी आदि का कारण बन सकता है. तनाव और उच्च रक्तचाप सेहत के लिए घातक है, वहीं टिन्नीटस के कारण व्यक्ति की याददाश्त जा सकती है, वह अवसाद/ डिप्रेशन का शिकार हो सकता है. ज्यादा शोर दिल की सेहत के लिए अच्छा नहीं. शोर में रहने से रक्तचाप पांच से दस गुना बढ़ जाता है और तनाव बढ़ता है. ये सभी कारक उच्च रक्तचाप और कोरोनरी आर्टरी रोगों का कारण बन सकते हैं.
    ऐसे में दिवाली के दौरान पटाखों व प्रदूषण से बचने के लिए क्या सावधानियां बरतें? इस सवाल पर डॉ. अग्रवाल ने कहा कि कोशिश रहे कि पटाखें न जलाएं या कम पटाखे फोड़ें. पटाखों के जलने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड जैसी गैसें निकलती हैं जो दमा के मरीजों के लिए खतरनाक हैं. हवा में मौजूदा धुंआ बच्चों और बुजुर्गों के लिए घातक हो सकता है. उन्होंने सलाह दी कि प्रदूषित हवा से बचें, क्योंकि यह तनाव और एलर्जी का कारण बन सकती है. एलर्जी से बचने के लिए अपने मुंह को रूमाल या कपड़े से ढक लें. दमा आदि के मरीज अपना इन्हेलर अपने साथ रखें. अगर आपको सांस लेने में परेशानी हो तो तुरंत इसका इस्तेमाल करें और इसके बाद डॉक्टर की सलाह लें. त्योहारों के दौरान स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं. अगर आपको किसी तरह असहजता महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें. (आईएएनएस)

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Posted Date : 03-Nov-2018
  • 3 नवम्बर :  लहसुन हमारी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। लहसुन हमारे खाने का अहम हिस्सा रहा हैं। लहसुन का इस्तेमाल कई चाजों में किया जाता है, लेकिन क्या आपने कभी लहसुन का इस्तेमाल अपनी खूबसूरती बढ़ाने के लिए किया है। जी हां सही सुना, लहसुन से केवल सेहत को ही नहीं बल्कि त्वचा को भी तंदरुसत रखा जा सकता है।लहसुन को छीलकर उसका रस निकाल लीजिए। मुंहासों की जगह पर इस पेस्ट को लगाइए और 5 मिनट तक छोड़ने के बाद धुल लीजिए। इससे दाग-धब्बे हटाने में मदद मिलती है।लहसुन की एक कली को आधे टमाटर के साथ मिलाइए और इस पेस्ट को अपने चेहरे पर लगाइए। 10 मिनट पर चेहरा धुल लीजिए, इससे आपकी त्वचा के छिद्र खुलते हैं और आपकी त्वचा साफ होती है।

    लहसुन के रस को जैतून के तेल के साथ मिक्स कीजिए और गर्म तेल को अपने स्ट्रेच मार्क पर लगाइए। कुछ दिनों तक ऐसा करें और आप देखेंगे कि आपके स्ट्रेच मार्क कम होते जा रहे हैं।

    कुछ लोगों की स्किन पर लाल-लाल धब्बे हो जाते हैं। लहसुन पेस्ट लगाने से इन निशानों से भी छुटकारा मिल सकता है, क्योंकि लहसुन में एंटी इन्फ्लैमेटरी गुण होते हैं।

    इसके अलावा लहसुन एंटी एजिंग का भी काम करता है। सुबह उठने के बाद लहसुन को शहद और नींबू के साथ खाने पर झुर्रियां जल्दी नहीं आती हैं। (हिंदी खबर)

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Posted Date : 03-Nov-2018
  • सेहतमंद रहने के लिए हर कोई अपनी डाइट से लेकर व्यायाम तक का खास ध्यान रखता है। कुछ लोग तो अच्छी सेहत को बरकरार रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा फलों का सेवन करते हैं। फलों का सेवन आपको बीमारियों से बचाने के साथ-साथ शरीर को अंदरूनी ताकत भी देता है। ऐसे में आज हम आपको ३ ऐसे फलों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका सेवन करने से आप हमेशा हैल्दी रहेंगे। स्वस्थ रहने के लिए डॉक्टर और डाइटीशियन भी इन फलों का सेवन करने की सलाह देते हैं। अगर आप भी स्वस्थ रहना चाहते है तो रोजाना इन फलों का सेवन करें।
    स्ट्रॉबेरी

    प्रोटीन, कैलोरी, फाइबर, आयोडीन, फोलेट, ओमेगा ३, पौटाशियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, विटीमिन बी और सी के गुणों से भरपूर स्ट्रॉबेरी का सेवन आपके शरीर को बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है। इसके अलावा इसका सेवन इम्यून सिस्टम को बढ़ाने में मदद करता है, जिससे दिनभर आपके शरीर में एनर्जी बनी रहती है। रोजाना १ कप स्ट्रॉबेरी का सेवन आपको कई बीमारियों से दूर रखता है।

    केला

    १ केले में करीब १५ ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, जोकि सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। पोटेशियम और मैग्नीशियम से भरपूर केला ब्लड प्रेशर को भी कंट्रोल करता है। फाइबर, कैल्शियम और विटामिन सी से भरपूर रोज १ केला खाने से इंस्टेंट एनर्जी, स्वस्थ डाइजेशन और बल्ड में हीमोग्लोबिन का लेवल बढ़ता है। इसके अलावा स्वस्थ रहने के लिए आप आम, चीकू या पाइनएपल भी खा सकते हैं।

    फाइबर युक्त फ्रूट्स

    स्वस्थ रहने के लिए शरीर को सबसे ज्यादा जरूरत फाइबर की होती है। ऐसे में अपनी डाइट में ज्यादा से ज्यादा फाइबर युक्त फूट्स को शामिल करें। फाइबर युक्त फ्रूट्स जैसे- आड़ू, जामुन, सेब, नाशपाती, पपीता, तरबूज और खरबूजे आदि का सेवन आपको कई बड़ी बीमारियों से बचाता है।

    डायबिटिक मरीज भी खाएं फल

    डायबिटीज मरीजों के लिए फलों का सेवन बहुत फायदेमंद होता है आप सोचते होंगे कि फल खाने से आपकी रक्त शर्करा या ब्लड शुगर बढ़ सकती है लेकिन इन फलों में शर्करा और चीनी की मात्रा बहुत कम होती है। इसलिए आप बिना किसी डर के इन फलों का सेवन कर सकते हैं। जहां ये फल डायबिटिज मरीजों के लिए फायदेमंद। वहीं, इनका सेवन हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग से भी बचाव करता है। (नारी)

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Posted Date : 03-Nov-2018
  • नई दिल्ली, 3 नवम्बर :  आपने विटामिन-ई के बारे में कई बार सुना होगा कई फलों, तेलों और ड्रायफ्रूट्स में विटामिन-ई पाया जाता है और यह सेहत के साथ-साथ सौंदर्य के लिए भी बेहद लाभदायक होता है। खासतौर पर सोयाबीन, जैतून, तिल के तेल, सूरजमुखी, पालक, ऐलोवेरा, शतावरी, ऐवोकेडो के अलावा कई चीजों में वि‍टामिन-ई की मात्रा मौजूद होती है।

    बेहतरीन क्लिंजर - विटामिन-ई का उपयोग कई तरह के सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है। इसका अहम कारण है, कि यह एक बेहतरीन क्लिंजर है, जो त्वचा की सभी परतों पर जमी गंदगी और मृत कोशिकाओं की सफाई करने में सहायक है।

    आरबीसी निर्माण - शरीर में रेड ब्‍लड सेल्‍स यानि लाल रक्‍त कोशिकाओं का निर्माण करने में विटामिन-ई सहायक है। प्रेग्‍नेंसी के दौरान विटामिन- ई का सेवन बच्‍चे को एनीमिया यानि खून की कमी से बचाता है।

    मानसिक रोग - एक शोध के अनुसार विटामिन-ई की कमी से मानसिक रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। शरीर में विटामिन-ई की पर्याप्‍त मात्रा मानसिक तनाव और अन्य समस्‍याओं को कम करने में मदद करती है।

    एंटी एजिंग - विटामिन-ई में भरपूर एंटी ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो त्वचा पर बढ़ती उम्र के असर को कम करते हैं। इसके अलावा यह झुर्रियों को भी कम करने और रोकने में बेहद प्रभावकारी है।हृदय रोग शोध के अनुसार जिन लोगों के शरीर में विटामिन ई की मात्रा अधिक होती है, उन्हें दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है। यह मेनोपॉज के बाद महिलाओं में होन वाले हार्ट स्ट्रोक की संभावना को भी कम करता है।

    प्राकृतिक नमी - त्वचा को प्राकृतिक नमी प्रदान करने के लिए विटामिन-ई बेहद फायदेमंद है। इसके अलावा यह त्वचा में कोशिकाओं के नवनिर्माण में भी सहायक है।

    यूवी किरणों से बचाव - सूरज की हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने में विटामिन-ई महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सनबर्न की समस्या या फोटोसेंसेटिव होने जैसी समस्याओं से विटामिन-ई रक्षा करता है। 

    विटामिन-ई का प्रयोग करने पर अल्जाइमर जैसी समस्याओं का खतरा कम होता है, इसके अलावा यह कैंसर से लड़ने में भी आपकी मदद करता है। एक शोध के अनुसार जिन लोगों को कैंसर होता है, उनके शरीर में विटामिन-ई की मात्रा कम होती है।

    विटामिन ई की पर्याप्त मात्रा डायबिटीज के खतरे को कम करने में मदद करती है। यह ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, इम्यून सिस्टम को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ एलर्जी से बचाव में भी उपयोगी होता है।

    यह कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम करता है और शरीर में वसीय अम्लों के संतुलन को बनाए रखने में सहायता करता है। इसके साथ ही यह थायराइड और पिट्यूटरी ग्रंथि‍ के कार्य में होने वाले अवरोध को रोकता है।  (वेब दुनिया)

     

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Posted Date : 02-Nov-2018
  • 2 नवम्बर : हंसना हमारी सेहत के लिए अच्छा होता है, इस बात को तो हम सब अच्छे से जानते हैं, लेकिन क्या आपको मालूम है कि जैसे हंसना हमारी सेहत के लिए अच्छा होता है उसी तरह रोना भी हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होता है। आइए जानते हैं रोने से हमें क्या-क्या फायदे होते हैं...

    जब कभी हमारे आस-पास कोई रोता है तो हम उसे चुप करा देते हैं। उसे रोने से रोकते हैं। लेकिन आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि हाल ही में एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि जिस तरह हमारे शरीर से यूरीन और पसीना आना जरूरी होता है, क्योंकि यह हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलने का काम करते हैं, ठीक ऐसा ही आंसू के माध्यम से भी होता है। जिस वजह से रोना भी हमारी सेहत के लिए अच्छा है। तो अगली बार अपने किसी करीबी को रोने से न रोके। उसे रोकर हल्का होने दें।

    हमारी आंखों में जो मेमब्रेन होती है अगर वह सूख जाती है तो उसका सीधा असर हमारी आंखों की रोशनी पर पड़ता है, लेकिन आंसू मेमब्रेन को हमेशा भरा रखते हैं जो हमारी आंखों के लिए अच्छा होता है, क्योंकि अगर हमारा मेमब्रेन सही बना रहता है तो आखों की रोशनी लंबे समय तक ठीक रहती है।

    आपको बता दें, टेंशन में रोना और आंखों में से किसी परेशानी के चलते पानी निकलना दो अलग चीजें हैं। जब कभी हम परेशान होकर रोते हैं तो हमारे शरीर से ड्रेनोकॉर्टिकोट्रोपिक और ल्यूसीन नामक स्ट्रेस हॉर्मोन बाहर निकलते हैं, लेकिन आंखों में से जब पानी निकलता है तो ऐसा कुछ नहीं होता। 

    हमारी आंखों में एक लाइसोजाइम नामक तत्व होता है, जो बाहरी बैक्टीरिया को खत्म करने में मदद करता है। इससे हमारी आंखों को इंफेक्शन से तो दूर रखता ही है साथ ही हमारी आंखे स्वस्थ भी रहती हैं। जब हम रोते हैं तभी लाइसोजाइम आंखों से निकलता है।

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Posted Date : 02-Nov-2018
  • 2 नवम्बर : अपने आसपास ऐसे कई पौधे और फूल होते हैं, ज‍िन्‍हें हम केवल अपने घर के आसपास सुंदरता बढ़ाने के लिए ही उपयोग में लाते हैं। लेक‍िन इनमें कई पौधे व फूल ऐसे भी होते हैं, जो आसानी से भी मिल जाते हैं और उनमें आैषधीय गुण भी भरपूर होते हैं। इनमें ही एक फूल ऐसा भी है, जो शायद आपके आंगन या बाग में भी हो, आपने इसे महज एक फूल ही समझा हो, लेक‍िन यह फूल कई बिमारियों के इलाज में रामबाण साब‍ित हो रहा है। इस फूल का नाम गुड़हल है।

    गुड़हल का पौधा व इसकी टहनियों में लगे लाल रंग के फूल हर घर की शोभा बढ़ा रहे हैं, लेकिन इस पौधे के गुणों से लोग अनभिज्ञ हैं, जबकि इसकी पत्तियां व फूल जीवनदायनी हैं। गुड़हल की पत्तियों व फूलों के सेवन से अनेकों बीमारियों को घर में ही काबू किया जा सकता हैं। यह एक फूल होने के साथ कई तरह से स्वास्थ्यवर्धक गुणों से भी परिपूर्ण होता है। गुड़हल के फूल में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, आयरन, खनिज, शरीर को कई बीमारियों से राहत दिलाने में रोगी की मदद करते हैं। इसमें विटामिन सी की मात्रा भी प्रचुर मात्रा में होती है। इस फूल का शरबत व चाय बनाकर भी पी सकते हैं। गुड़हल का फूल हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक है। 

    आयुर्वेद‍िक च‍िक‍ित्‍सकों के परामर्श के अनुसार इसकी चाय व शरबत का सेवन करना चाह‍िए। इससे त्‍वचा संबंधी कई रोगों में मदद म‍िलती है। इससे झुर‍िरयों की समस्‍या भी दूर होती है। यह त्वचा की नमी को दोबारा वापिस लाने में मदद करता हैं। गुड़हल के फूल का प्रयोग घाव को भरने में भी काफी लाभदायक माना जाता है।

    गुड़हल में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण कई तरह की बीमारियों से राहत दिलाने में मदद करते हैं। एटिऑक्सीडेंट हमारे शरीर में मौजूद ऊतकों में फ्री रेडिकल को निष्क्रिय करते हैं ताकि शरीर को कई बीमारियों से बचाया जा सके।

    गुड़हल हाई ब्लड प्रेशर को ठीक करने में भी प्रयोग होता है। इसके साथ का एक सबसे प्रभावी उपाय है। इसके साथ ही हाई कोलेस्ट्रॉल को भी कम करने में मदद करता है। गुड़हल में विटामिन सी और खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह बालों की कई परेशानियों से निजात दिलाने में सहायता करता है। गुड़हल के फूलों व पत्तियों का प्रयोग बालों उपचार के लिए किया जाता है। इससे प्राकृति पैक मास्क व तेल बनाया जाता है जो बालों की समस्याओं को दूर करता है। यह बालों को कैमिकल के दुष्प्रभावों को बचाने में मदद करता है।

    इसके अलावा गुड़हल की जड़े चबाने से मुहं के छालों से भी राहत म‍िलती है। इसे सफेद दाग के रोग में प्रयोग क‍िया जा रहा है। गुड़हल के फूलों का शरबत हृदय तथा मस्तिक को शक्ति प्रदान करता है। इसका शरबत प्रतिदिन लेने से शरीर को शीतलता देता है तथा ज्वर, प्रदर, नाक से खून आना, सिरर्दद, दाद आदि रोगों को नाश करता है। (जागरण)

     

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Posted Date : 02-Nov-2018
  • 2 नवम्बर : आयुर्वेदिक दृष्टि से मेथी की तासीर गर्म होती है। इसका प्रयोग मसाले तथा दवाई के रूप में किया जाता है। सरसों का तेल चर्म रोगों के लिए बेहद उपयोगी है। आयुर्वेदिक पाक-कला में मसालों का समुचित उपयोग करना जरूरी है। इसके लिए मसालों के गुणधर्म का ध्यान रखना आवश्यक है।

    मेथी के दाने मसाले तथा दवाई के रूप में काम आते हैं और इसके पौधे के पत्ते सब्जी बनाने के काम आते हैं। आयुर्वेद की दृष्टि से इसकी तासीर गर्म होती है और इसका स्वाद कड़वा होता है। यह मसाला नजाकती स्वादों के साथ प्रयोग नहीं किया जाता। यह वात्-विकार दूर करने में सहायक होता है। प्रसव के बाद स्त्री को मेथी दी जाती है, जिससे नवजात शिशु के लिए दूध अधिक उतरे। यह स्नायु-तंत्र को सबल बनाती है।

    समूचे विश्व में प्रचलित सरसों का पौधा तीन फुट का होता है। इसकी एक किस्म 'राई' भी होती है। भारत के कुछ भागों में इस पौधे की सब्जी भी बनती है। ये स्वाद में कड़वी होती है। सरसों का तेल खाना पकाने और दवा के काम भी आता है, क्योंकि इससे मांसपेशियों का दर्द कम होता है, यह संक्रमणरोधी होता है। चमड़ी के दोषों में सरसों का तेल उपयोगी होता है। आयुर्वेद की दृष्टि से सरसों गर्म तासीर वाली होती है। इसे अन्य मसालों के साथ मिलाकर प्रयोग किया जाता है। (संजीवनी टुडे)

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Posted Date : 01-Nov-2018

  • आपने तुलसी, दूध, ब्लैक-टी या नींबू की चाय तो बहुत बार पी होगी लेकिन आज हम आपको प्याज की चाय के बारे में बताने जा रहे हैं। आप भी सोच रहे होंगे कि प्याज की चाय भला कौन पीता है लेकिन आपको बता दें कि इसका सेवन सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन्स, पोटैशियम, मैग्नीशियम, मिनरल्स और फाइबर जैसे गुणों से भरपूर प्याज की चाय का रोजाना सेवन ब्लड शुगर, अनिद्रा और हाइपरटेंशन के साथ कैंसर जैसी घातक बीमारियों के लिए रामबाण इलाज है। तो चलिए जानते हैं प्याज की चाय बनाने का तरीका और इसके फायदों के बारे में।
    प्याज की चाय बनाने की रेस्पी

    इस हर्बल चाय को बनाने के लिए सबसे पहले प्याज को धोकर बारीक काट लें। इसके बाद १० मिनट के लिए ऐसे ही छोड़ दें ताकि इससे पानी निकल आए। अब एक पैन में इसे डालकर उसे हल्की आंच पर गर्म करके ठंडा होने के लिए छोड़ दें। इसके बाद १ कप में इसे छानकर इसमें नींबू का रस या शहद मिलाएं। बीमारियों से बचने के लिए रोजाना खाली पेट इस चाय का सेवन करें।

     कैंसर का उपचार
    हाल में किए गए एक शोध के मुताबिक, प्याज की चाय कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकती है। प्याज में घुलनशील फाइबर होते हैं जो कि त्‍वचा और आंत से टॉक्सिन को बाहर निकालकर कैंसर सेल्स को पनपने से रोकते हैं। इससे आप कैंसर के खतरे से बचे रहते हैं।
     सर्दी-जुकाम से राहत

    बदलते मौसम में सर्दी-जुकाम की समस्या आम देखने को मिलती है लेकिन इस चाय का सेवन आपको इससे भी बचाता है। प्याज में मौजूद फायटोकेमिकल्स और विटामिन ष्ट रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं, जिससे आप सर्दी-जुकाम और दूसरे संक्रमण से बचे रहते हैं।
     हाइपरटेंशन से निजात

    प्याज में पाए जाने वाला क्वेरसेटिन नाम का पिग्मेंट, ब्‍लड क्‍लॉट बनने से रोकता है, जिससे हाइपरटेंशन का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। इसके अलावा खून का थक्का जमने से रोकने में भी यह चाय काफी फायदेमंद होती है।
    अनिद्रा की समस्या

    अगर आपको नींद न आने की समस्या तो रोज १ कप प्याज की चाय का सेवन करें। इसमें मौजूद औषधीए गुण आपके दिमाग को शांत करेगी, जिससे आपकी अनिद्रा की समस्या दूर हो जाएगी। इसके लिए दिन में एक बार प्याज की चाय का सेवन जरूर करें।

     डायबिटीज में राहत
    प्याज ग्लूकोज की प्रतिक्रिया को बेहतर करके इंसुलिन रेजिटेंट को बढ़ाता है, जिससे टाइप-२ डायबिटीज का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा इस चाय को पीने से शरीर में रुष्ठरु यानि बैड-कोलेस्ट्रॉल लेवल भी नहीं बढ़ता।
    पेट की समस्याएं

    प्याज में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। ऐसे में इस चाय का सेवन आपकी पेट जुड़ी समस्याएं जैसे कब्ज, एसिडिटी, पेट दर्द और पेट में गैस बनना जैसी समस्याओं को दूर करता है।

    वजन कम करने में मददगार

    इस चाय का सेवन वजन कम करने में भी बेहद मददगार होता है। अगर आप तेजी से कैलोरी बर्न करना चाहते हैं तो रोज खाली पेट इस चाय का सेवन करें। कुछ समय में ही आपको इसका फर्क दिखने लगेगा। (नारी)

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Posted Date : 01-Nov-2018
  • आ रहा है झमाझम बरसात का मौसम, रिमझिम बारिश में भुट्टा न खाया जाए, ऐसा संभव ही नहीं... सिके हुए देशी भुट्टे हों या फिर स्टीम में पके अमेरिकन कॉर्न...दोनों का अपना ही मजा है। स्वाद तो इनका मजेदार होता ही है, सेहत के फायदे भी

    सबसे पहली बात तो यह है कि बड़ों को साथ-साथ बच्चों को भी भुट्टे अवश्य खिलाने चाहिए इससे उनके दांत मजबूत होते हैं।

    दूसरी बात कि जब आप भुट्टे खाएं तो दानों को खाने के बाद जो भुट्टे का भाग बचता है उसे फेंकें नहीं बल्कि उसे बीच से तोड़ लें और उसे सूंघें। इससे जुकाम में बड़ा फायदा मिलता है। बाद में इसे जानवर को खाने के लिए डाल सकते हैं।

    अगर आप इसे जानवर को नहीं देते हैं तो उन्हें सूखाकर रखें फिर इन्हें जलाकर राख बना कर रख लें। सांस के रोगों में यह बड़ा कारगर इलाज है। इस राख को प्रतिदिन गुनगुने पानी के साथ फांकने से खांसी का इलाज होता है। खांसी कैसी भी हो यह चूर्ण लाभ देता ही है। यहां तक कि कुकर खांसी में भी बड़ी राहत मिलती है।


    आयुर्वेद के अनुसार भुट्टा तृप्तिदायक, वातकारक, कफ, पित्तनाशक, मधुर और रुचि उत्पादक अनाज है। इसकी खासियत यह है कि पकाने के बाद इसकी पौष्टिकता और बढ़ जाती है। पके हुए भुट्टे में पाया जाने वाला कैरोटीनायड विटामिन-ए का अच्छा स्रोत होता है।

    भुट्टे को पकाने के बाद उसके 50 प्रतिशत एंटी-ऑक्सीअडेंट्स बढ़ जाते हैं। यह बढती उम्र को रोकता है और कैंसर से लड़ने में मदद करता है। पके हुए भुट्टे में फोलिक एसिड होता है जो कि कैंसर जैसी बीमारी में लड़ने में बहुत मददगार होता है।

    इसके अलावा भुट्टे में मिनरल्स और विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। भुट्टे को एक बेहतरीन कोलेस्ट्रॉल फाइटर माना जाता है, जो दिल के मरीजों के लिए बहुत अच्छा है।

    बच्चों के विकास के लिए भुट्टा बहुत फायदेमंद माना जाता है। ताजे दूधिया (जो कि पूरी तरह से पका न हो) मक्का के दाने पीसकर एक खाली शीशी में भरकर उसे धूप में रखिए। जब उसका दूध सूख कर उड़ जाए और शीशी में केवल तेल रह जाए तो उसे छान लीजिए। इस तेल को बच्चों के पैरों में मालिश कीजिए। इससे बच्चों का पैर ज्यादा मजबूत होगा और बच्चा जल्दी चलने लगेगा।
    इस तेल को पीने से शरीर शक्तिशाली होता है। हर रोज एक चम्मच तेल को चीनी के बने शर्बत में मिलाकर पीने से बल बढ़ता है। ताजा मक्का के भुट्टे को पानी में उबालकर उस पानी को छानकर मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन व गुर्दों की कमजोरी समाप्त हो जाती है।
    टीबी के मरीजों के लिए मक्का बहुत फायदेमंद है। टीबी के मरीजों को या जिन्हें टीबी होने की आशंका हो हर रोज मक्के की रोटी खाना चाहिए। इससे टीबी के इलाज में फायदा होगा।

     (सिल्क) का उपयोग पथरी रोगों की चिकित्सा मे होता है। पथरी से बचाव के लिए रात भर सिल्क को पानी मे भिगोकर सुबह सिल्क हटाकर पानी पीने से लाभ होता है। पथरी के उपचार में सिल्क को पानी में उबालकर बनाये गये काढ़े का प्रयोग होता है।

    यदि गेहूं के आटे के स्थान पर मक्के के आटे का प्रयोग करें तो यह लीवर के लिए अधिक लाभकारी है। यह प्रचूर मात्रा में रेशे से भरा हुआ है इसलिए इसे खाने से पेट अच्छा रहता है। इससे कब्ज, बवासीर और पेट के कैंसर के होने की संभावना दूर होती है।

    भुट्टे के पीले दानों में बहुत सारा मैगनीशियम, आयरन, कॉपर और फॉस्फोरस पाया जाता है जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। एनीमिया को दूर करने के लिए भुट्टा खाना चाहिए क्योंकि इसमें विटामिन बी और फोलिक एसिड होता है।

    खुजली के लिए भी भुट्टे का स्टॉर्च प्रयोग किया जाता है। वहीं इसके सौंदर्य लाभ भी कुछ कम नहीं है। इसके स्टार्च के प्रयोग से त्वचा खूबसूरत और चिकनी बन जाती है।

    भुट्टा दिल की बीमारी को भी दूर करने में सहायक है क्योंकि इसमें विटामिन सी, कैरोटिनॉइड और बायोफ्लेवनॉइड पाया जाता है। यह कोलेस्ट्रॉल लेवल को बढ़ने से बचाता है और शरीर में खून के प्रवाह को भी बढ़ाता है।
    इसका सेवन प्रेगनेंसी में भी बहुत लाभदायक होता है इसलिए गर्भवती महिलाओं को इसे अपने आहार में जरुर शामिल करना चाहिए। क्योंकि इसमें फोलिक एसिड पाया जाता है जो गर्भवती के लिए बेहद जरूरी है।

     

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Posted Date : 31-Oct-2018
  • सर्दियों की शुरूआत हो चुकी है। इस मौसम में बालकनी या फिर घर के बाहर बैठकर धूप सेंकना भला किसे पसंद नही होता? सूर्य की रोशनी वैसे भी हमारे लिए एक वरदान की तरह है। रोजाना कुछ देर सेकी गई धूप रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने, दिमाग को स्वस्थ रखने और दमा रोगियों के लिए उपयोगी है। इसके अलावा भी सर्दियों की धूप शरीर के लिए बेहद लाभकारी होती है। 

    तो आइए जानते हैं कि सर्दी की धूप सेंकने से होने वाले फायदों के बारे में। 

    १. विटामिन ष्ठ 
    सूरज की रोशनी विटामिन ष्ठ का प्रमुख स्त्रोत है। रोजाना सिर्फ १०-१५ मिनट सुबह और शाम की धूप सेंकने से शरीर में विटामिन डी की मात्रा ९० प्रतिशत तक बढ़ जाती है। 
    २. फंगल इंफेक्शन से बचाव
    फंगल इंफेक्शन से राहत पाने के लिए सुबह की ताजी धूप लेना बहुत फायदेमंद होता है। इसके साथ ही नमी की वजह से होने वाले कीटाणुओं के संक्रमण से बचाव में धूप लाभकारी है। 
    ३. त्वचा के लिए फायदेमंद
    अक्सर सर्दियों में सोरायसिस, एक्जिमा, मुंहासे आदि त्वचा संबंधी कई समस्याएं हो जाती है। इन समस्याओं से राहत पाने के लिए दिन में कम से कम १०-१५ मिनट धूप में जरूर बैठे। 
    ४. सीजनल डिप्रेशन 
    बहुत से लोग सर्दियों में कम रोशनी व धुंध के कारण सीजनल डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए कुछ देर धूप सेकना बहुत जरूरी है ताकि सीजनल डिप्रेशन की समस्या दूर रहें।
    ५. अच्छी नींद
    बहुत सारी स्टडी इस बात की पुष्टि करती हैं कि रोजाना कम से कम १५ मिनट धूप सेंकने से शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर धीरे-धीरे बढ़ जाता है, जिससे सुकून भरी नींद आती है।
    ६. ध्यान रखने योग्य बातें
    पसीना आने के बाद कभी भी धूप में ना बैठें। इसके साथ ही साथ ही दोपहर के १२ से लेकर ३ बजे तक की धूप को सीधा सिर पर ना पड़ने दें। सुबह की कोमल धूप सेंकना सेहत के लिए अच्छा होता है।  

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Posted Date : 31-Oct-2018
  • 31 अक्टूबर: मधुमेह एक ऐसी बिमारी है जिसमें व्यक्ति का रक्त शर्करा का स्तर बहुत बढ़ जाता है. यह बीमारी दिन-ब-दिन पूरे विश्व में तेजी से बढ़ रहीी है. इसका कारण अनियमित जीवनशैली और अस्वस्थ खान-पान भी हो सकता है. डायबिटीज के कारण कई तरह की शारीरिक परेशानियां शुरू हो जाती हैं और याददाश्त कमजोर होने लगती है.  Types of Diabetes: डायबिटीज दो प्रकार का होता है - टाइप 1 (Type 1 Diabetes) और टाइप 2 (Type 2 Diabetes) डायबिटीज. टाइप 1 डायबिटीज ((Diabetes type 1) में इंसुलिन का बनना कम हो जाता है या फिर इंसुलिन बनना बंद हो जाता है, और इसे काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है. जबकि टाइप 2 डायबिटीज से प्रभावित लोगों का ब्लड शुगर का स्‍तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है जिसको नियंत्रण करना बहुत मुश्किल होता है.

    डायबिटीज टाइप 1 (Diabetes type 1) की बीमारी किसी को भी बचपन से हो सकती है. डायबिटीज टाइप 1 में खासतौर पर 6 से 18 साल तक की अवस्था में कम ही देखते को मिलती है. आमतौर पर यह बीमारी बच्चों में ज्यादा होती है.

    डायबिटीज टाइप 2 (Diabetes type 2) दिन भर की भागदौड़ भरी जिदंगी में लोगों का खान-पान दिन ब दिन बिगडता जा रहा है. और स्वास्थ्य के हिसाब से न खाकर पेट भरने के लिए फास्ट फूड का ज्यादा प्रयोग करते है. फास्ट फूड का ज्यााद प्रयोग डायबिटीज टाइप 2 में नुकसान दायक हो सकता है. डायबिटीज टाइप 2 की बीमारी पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा है. (एनडीटीवी इंडिया)

     

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Posted Date : 31-Oct-2018
  • 31 अक्टूबर: अगर आपके मस्तिष्क में अधिक कोशिकाएं हैं तो आपको मस्तिष्क कैंसर होने का खतरा ज्यादा होता है. एक अध्ययन में कहा गया है कि बड़े दिमाग का मतलब है अधिक मस्तिष्क कोशिकाएं और जितनी अधिक कोशिकाएं होती है उनमें उतना ही विभाजन होता है. विभाजन के समय उनमें दोष भी पैदा हो सकता है और किसी जीन के डीएनए में स्थायी परिवर्तन यानी म्यूटेशन हो सकता है जिससे कैंसर होता है. नॉर्वीजन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलजी में पीएचडी कर रहे इवेन होविग फ्लिनजेन ने कहा, तेजी से फैलने वाला मस्तिष्क कैंसर दुर्लभ तरह का कैंसर होता है लेकिन एक बार यह आपको हो जाये तो इससे बचने की संभावना बहुत कम हो जाती है.

    उन्होंने कहा, कई अध्ययनों में यह पता चला है कि कैंसर के पैदा होने में विभिन्न अंगों का आकार एक महत्वपूर्ण कारक होता है. उदाहरण के लिए बड़े स्तन वाली महिलाओं में स्तन कैंसर होने का खतरा ज्यादा रहता है.

    हम यह जांच करना चाहते थे कि क्या मस्तिष्क के ट्यूमर के मामले में भी ऐसा ही होता है. हजारों लोगों के रक्त के नमूनों और स्वास्थ्य के आंकड़ों का इस्तेमाल कर एक अध्ययन किया गया.

    शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के आकार को मापने के लिए एमआरआई का इस्तेमाल किया. अध्ययन में यह भी पाया गया कि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में ब्रेन ट्यूमर ज्यादा होता है.

    फ्लिनजेन ने कहा, पुरुष का मस्तिष्क महिलाओं के मुकाबले बड़ा होता है क्योंकि पुरुषों का शरीर आमतौर पर बड़ा होता है. इसका यह मतलब नहीं है कि पुरुष ज्यादा बुद्धिमान होते है बल्कि बड़े शरीर को नियंत्रित करने के लिए अधिक मस्तिष्क कोशिकाओं की जरूरत पड़ती है.

    शोधकर्ताओं ने कहा कि यह पाया गया कि बड़े मस्तिष्क वाले पुरुषों की तुलना में बड़े मस्तिष्क वाली महिलाओं को मस्तिष्क कैंसर होने का खतरा ज्यादा रहता है. ) (प्रभात खबर)

     

     

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Posted Date : 30-Oct-2018
  • 30 अक्टूबर :  अश्वगंधा एक आयुर्वेदिक औषधि है जो कई लाइलाज बीमारियों को ठीक करने की क्षमता रखती है. अश्वगंधा का प्रयोग कई बीमारियों में दवा के रूप में किया जाता है. अश्वगंधा दवा, चूर्ण, कैप्सूल के रूप में आपको आसानी से बाजार में मिल जाएगी. कई रोगों में तो अश्वगंधा रामबाण की तरह है. सदियों से अश्वगंधा को जड़ी-बूटी के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इस जड़ी-बूटी के बड़े ही असरकारी परिणाम हैं. अश्वगंधा के क्या फायदे हैं और क्या नुकसान बताएगें आपको अश्वगंधा से जुड़ी हर जानकारी.

    अश्वगंधा में मौजूद ऑक्सीडेंट आपके इम्युन सिस्टम को मजबूत बनाने का काम करता है. जो आपको सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियों से लडने की शक्ति प्रदान करता है. अश्वगंधा वाइट ब्लड सेल्स और रेड ब्लड सेल्स दोनों को बढ़ाने का काम करता है. जो कई गंभीर शारीरिक समस्याओं में लाभदायक है.

    अश्वगंधा मानसिक तनाव जैसी गंभीर समस्या को ठीक करने में लाभदायक है. एक रिर्पोट के अनुसार तनाव को 70 फिसदी तक अश्वगंधा के इस्तेमाल से कम किया जा सकता है. दरअसल आपके शरीर और मानसिक संतुलन को ठीक रखने में असरकारी है. इससे अच्छी नींद आती है.अश्वगंधा कई सम्स्याओं से छुटकारा दिलाने का काम कर सकता है. 

    महिलाओं में सफेद पानी की वजह से उनका शरीर कमजोर होने लगता है.जिसका असर उनके गर्भाशय में भी पडता है.लेकिन अश्वगंधा के सेवन से महिलाओं को इस रोग से निजात मिल सकती है. 
     कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी में बहुत असरकारी है अश्वगंधा का इस्तेमाल.  कई रिसर्च में यह बताया गया है कि अश्वगंधा कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकता है और कैंसर के नए सेल्स नहीं बनने देता.यह शरीर में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज का निर्माण करता है. जो कैंसर सेल्स को खत्म करने और कीमोथेरपी से होने वाले साइड इफेक्ट्स से भी बचाने का काम करता है.

    अश्वगंधा का इस्तेमाल आपकी आंखो की रोशनी को बढ़ाने का काम करता है. रोज दूध  के साथ लेंने से आंखो के अलावा स्ट्रेस से भी बचा जा सकता है.

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