सेहत / फिटनेस

Posted Date : 26-Apr-2018
  • लॉस एंजिलिस : डार्क चॉकलेट खाने वालों के लिए यह एक अच्छी खबर हो सकती है कि उनकी पसंदीदा चॉकलेट न केवल तनाव को कम कर सकती है बल्कि मूड, याददाश्त और प्रतिरोधक क्षमता को भी दुरुस्त कर सकती है.
    वैज्ञानिकों ने बताया कि सभी यह जानते हैं कि कोको फ्लेवनॉयड का मुख्य स्रोत है लेकिन यह पहली बार है जब यह जानने का प्रयास किया गया है कि यह मनुष्य के दिमाग, हृदय एवं रक्तवाहिनी संबंधी तंत्रिका तंत्र को कैसे प्रभावित करता है और कैसे इनके स्वास्थ्य को बेहतर बना सकता है.
    फ्लेवनॉयड एक प्राकृतिक पोषक तत्व है जो फलों, सब्जियों और अनाजों में पाया जाता है. अमेरिका की लोमा लिंडा यूनिवर्सिटी के ली एस बर्क ने कहा, वर्षाें तक हमने यह अध्ययन किया कि डार्क चॉकलेट की शुगर की मात्रा का तंत्रिका संबंधी कार्यों पर क्या असर पड़ता है.
    अधिक चीनी खाने से हम ज्यादा खुश होते हैं. बर्क ने कहा, यह पहली बार था जब हमने मनुष्यों में एक नियमित आकार के चॉकलेट बार के रूप में कोको की अधिक मात्रा के प्रभाव का आकलन लंबे समय तथा कम समय के लिए किया और हम इसके नतीजों से बहुत उत्साहित हुए.
    बर्क ने दो नये शोध अध्ययनों में प्रमुख जांचकर्ता के रूप में कार्य किया, जिसमें पाया गया कि कोको की अधिकता से स्मरण शक्ति, मनोदशा, प्रतिरक्षा पर अधिक सकारात्मक प्रभाव पड़ा.
    कोको में पाये जाने वाले फ्लेवनॉयड्स बेहद शक्तिशाली प्रतिरोधक और सूजन रोधी होते हैं, जो दिमाग, हृदय तथा अन्य अंगों के लिए लाभकारी होते हैं. (प्रभात खबर)

    ...
  •  


Posted Date : 25-Apr-2018
  • जेम्स गैलाघर
    प्रस्तुतकर्ता, द सेकंड जीनोम, 
    मल ट्रांसप्लांट यानी एक व्यक्ति का मल (पॉटी) दूसरे व्यक्ति के शरीर में डालना शायद मेडिकल प्रक्रियाओं में सबसे बदबूदार और अजीब प्रक्रिया होगी. ज़ाहिर है इसे अंजाम देना भी उतना ही मुश्किल होता होगा.
    लेकिन सवाल है कि ऐसा किया ही क्यों जाता है? क्या इससे हमारे पाचन तंत्र को कोई फ़ायदा हो सकता है? क्या इससे किसी की ज़िंदगी बचाई जा सकती है?
    ये प्रक्रिया सबित करती है कि जीवाणुओं की हमारे शरीर में बड़ी अहम भूमिका होती है. इनसे हमारी सेहत की दशा और दिशा जुड़ी होती है.
    हमारी आंत की दुनिया में अलग-अलग प्रजातियों के जीवाणु पाए जाते हैं और ये सभी एक दूसरे से जुड़े होते हैं.
    इनका संपर्क हमारे ऊतकों से भी होता है.
    जिस तरह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को दुरुस्त रखने में जंगल और बारिश की भूमिका होती है वैसे ही हमारी अंतड़ियों में भी एक पारिस्थितिकी तंत्र काम करता है जिससे चीज़ें नियंत्रण में रहती हैं.
    लेकिन कोलस्ट्रिडियम डिफिसाइल (सी. डिफिसाइल) एक ऐसा जीवाणु है जो हमारी आंत पर अपना नियंत्रण कर लेता है.
    ये बैक्टीरिया एंटिबायटिक दवाई लेने वाले व्यक्ति पर हमला करता है और पेट की समस्याएं पैदा कर सकता है.
    आधुनिक समय में एंटिबायटिक दवाइयां किसी चमत्कार से कम नहीं है लेकिन ये जंगल की आग की तरह अच्छे और बुरे दोनों जीवाणुओं को नष्ट कर देती हैं नतीजतन पेट के भीतर सी. डिफिसाइल के पनपने के लिए ज़मीन तैयार हो जाती है.
    अपने शरीर को समझें
    आप एक मानव से ज़्यादा जीवाणु हैं. अगर अपने शरीर में कोशिकाओं की गिनती करेंगे तो पाएंगे कि आप 43 फ़ीसदी ही मनुष्य हैं.
    इसके अलावा हमारे शरीर में जीवाणु, विषाणु, कवक और कोषीय जीवाणु हैं.
    इंसान की अनुवांशिकता का सीधा संबंध जीन से होता है और जीन्स डीएनए से बनता है. हमारे शरीर में 20 हज़ार जीन्स होते हैं.
    लेकिन अगर इसमें हमारे शरीर में मिलने वाले जीवाणुओं के जीन्स भी मिला दिए जाएं तो ये आंकड़ा करीब 20 लाख से ले कर 200 लाख तक हो सकता है और इसे सेकंड जीनोम कहते हैं.
    सी. डिफिसाइल का संक्रमण होने पर व्यक्ति को हर दिन में कई बार पतले दस्त हो सकते हैं और कभी-कभी मल में ख़ून भी आ सकता है. साथ ही घातक संक्रमण होने पर पेट में दर्द और बुखार हो सकता है.
    इसके इलाज के लिए जो विकल्प मौजूद हैं उनमें सबसे बेहतर है एंटीबायटिक जो फिर से सी. डिफिसाइल संक्रमण के लिए रास्ता बनाती है. यानी एक कुचक्र है.
    मल का ट्रांसप्लांट या फिर कहें 'मल में मौजूद बैक्टीरिया के ट्रांसप्लांट' के ज़रिए मरीज़ की आंतों में फिर से अच्छे बैक्टीरिया डाले जा सकते हैं जिनसे स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है.
    इस काम के लिए आम तौर पर व्यक्ति के रिश्तेदार के मल का इस्तेमाल किया जाता है.
    ये माना जाता है कि उनके पेट में समान बैक्टीरिया होंगे. इसके लिए एक "नमूना" तैयार किया जाता है जिसे पानी में मिलाया जाता है.
    कुछ अन्य तकनीक में मल को हाथ से मिलाया जाता है जबकि कुछ मामलों में एक ब्लेंडर का इस्तेमाल किया जाता है.
    इसे दो तरीकों से मरीज़ के शरीर के भीतर पहुंचाया जाता है, एक मुंह के ज़रिए या फिर मलद्वार के ज़रिए.
    अमरीका के वॉशिंगटन में पेसिफ़िक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी में माइक्रोबियल इकोलॉजिस्ट डॉ जेनट जेनसन उस टीम का हिस्सा थीं जो ये साबित करने की कोशिश कर रही थीं कि मल ट्रांसप्लंट काम कर सकता है.
    उनकी 61 साल की मरीज़ लगातार आठ महीनों तक पेट की समस्या और दस्त से परेशान रहीं और इस कारण उनका 27 किलो वज़न कम हो गया.
    डॉ जेनसन कहती हैं, "वो सी. डिफिसाइल के संक्रमण से परेशान हो चुकी थीं और वो मौत की कग़ार पर पहुंच गई थीं. उन पर कोई एंटीबायटिक असर नहीं कर रहा था."
    उनके शरीर में उनके पति से लिया गय स्वस्थ मल ट्रांसप्लांट किया गया. डॉ जेनसन ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अपनी सफलता पर हैरानी हुई.
    वे कहती हैं, "आश्चर्यजनक तौर पर दो दिन के बाद वे सामान्य हो गई और उनका पेट भी सही हो गया. वे ठीक हो गई थीं."
    परीक्षणों में पता चला है कि ये प्रक्रिया लगभग 90 फ़ीसदी तक असरदार हो सकती है.
    इस तकनीक में सकारात्मक नतीजे आने से कुछ लोगों को ख़ुद से अपने शरीर पर ये प्रक्रिया आज़माने का उत्साह मिला है.
    अमरीका में ओपनबायोम जैसे समूहों का गठन किया गया है जो मल रखने और ट्रांसप्लांट के लिए बांटने का एक सार्वजनिक बैंक है.
    खुद मल ट्रांसप्लांट कैसे करें
    लेकिन क्या सी. डिफिसाइल के इलाज के अलावा मल ट्रांसप्लांट का कोई और मेडिकल उपयोग भी है?
    लगभग सभी बीमारियों में हमारे इंसानी शरीर और शरीर में मौजूद जीवाणु के बीच के संबंध को जांचा जाता है.
    सी. डिफिसाइल के कारण आंत में सूजन, पेट की बीमारी, मधुमेह और पार्किन्संस की बीमारी हो सकती है. इस कारण कैंसर की दवा का असर भी कम हो सकता है और व्यक्ति को डिप्रेशन और ऑटिज़्म हो सकता है.
    लेकिन इसका मतलब ये भी है कि मल के ट्रांसप्लांट के नतीजे हमेशा सकारात्मक ही होंगे.
    साल 2015 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार एक महिला में उनकी बेटी के मल का ट्रांसप्लांट किया गया जिसके बाद उनका वज़न 16 किलो तक बढ़ गया और उन्हें मोटा क़रार दिया गया.
    एक मोटे इंसान का मल किसी चूहे में ट्रंसप्लांट करके उसे मोटा या पतला बनाया जा सकता है. हालांकि अभी भी इस बात को लेकर सहमति नहीं बन पाई है कि ऐसा ही नतीजा इंसानों में आएगा या नहीं.
    साथ ही इस ट्रांसप्लांट के साथ ख़तरनाक बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु के ट्रांसप्लांट होने का अधिक जोखिम भी होता है.
    यही कारण है कि वैज्ञानिकों की कोशिश है कि सीधे मल ट्रांसप्लांट करने की बजाय बैक्टीरिया का कॉम्बिनेशन ट्रांसप्लांट किया जा सके.
    वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट के डॉ ट्रेवोर लॉली कहते हैं आने वाले समय के लिए ऐसे इलाज को और अधिक परिष्कृत किया जाना चाहिए.
    वो कहते हैं, "मल का ट्रांसप्लांट किया जाना एक नए तरह की प्रक्रिया है और जब आप पहली बार कोई दवा तैयार करते हैं तो ये ज़रूरी है कि मरीज़ की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता दी जाए."
    "हमें अब पता है कि इसके ज़रिए किस तरह के जीवाणु शरीर में डाले जाते हैं और इसलिए यदि आपके पास कोई ऐसा मिश्रण है जो सुरक्षित साबित हो चुका है तो इस समस्या से निपटा जा सकता है."
    हो सकता है कि ये जीवाणुओं के लिए दवाओं का भविष्य हो यानी इंसान के शरीर में जीवाणु के कारण होने वाली समस्या पहचानना और फिर उसका इलाज करना. (बीबीसी)

    ...
  •  


Posted Date : 25-Apr-2018
  • लौंग के तेल की महक से मच्छर भागते हैं। इसलिए नारियल के तेल में लौंग का तेल मिलाकर शरीर पर लगाएं। इससे आपको मच्छर नहीं काटेंगे। तेल का यह मिश्रण ओडोमॉस की तरह काम करता है।
    गेंदे के फूलों से घर महक उठता है। इसके पौधे अपने घर में लगाएं। गेंदे के फूलों की खुशबू से मच्छरों को भगाने में भी मदद मिलती है। यानी घर आपका घर सुगंध से भरा रहेगा और मच्छर भी नहीं आएंगे।
    मच्छरों से बचने के लिए कपूर का इस्तेमाल कर सकते हैं। कपूर की एक टिकिया जलाकर कमरे में रखें। इससे निकलने वाली सुगंध से मच्छर भाग जाते हैं। यह नुस्खा सबसे बढिय़ा और आसान है।
    घरों में मच्छर को भगाने के लिए प्रयोग होने वाले लिक्विड के रिफिल में नींबू का रस डालकर यूज कर सकते हैं। इससे सभी मच्छर मर जाते हैं। यह प्रयोग सप्ताह में दो बार कर सकते हैं। आप चाहें तो नीलगिरी के तेल में नींबू का रस मिलाकर हाथ-पैर पर लगा सकते हैं।
    नीम के पत्तों से घर में धुआं कर सकते हैं। सप्ताह में एक बार घर में आधा घंटे धुआं जरूर करें। इससे जहां सारे मच्छर मर जाएंगे, वहीं दूसरे कीड़े-मकोड़े भी भाग जाएंगे। अगर घर में किसी को सांस संबंधी समस्या हो, तो सावधानी बरतें। (एजेंसी)   

    ...
  •  


Posted Date : 24-Apr-2018
  • सड़क किनारे 10 रुपये में मिलने वाला गन्ने का जूस प्यास बुझाएगा और फायदेमंद है तो ये सोचना गलत है, आप बड़े खतरे में हैं, संभल जाएं।
    हकीकत यह है कि गन्ने का रस और बर्फ दोनों के प्रभाव अलग है। यदि आप जरा-सी सावधानी बरतेंगे तो बीमारी से बच सकते हैं। गन्ने का रस पीने से पहले एक बार देखिए कि वह बनता कैसे है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कई बार गन्ने की सफाई नहीं की जाती। गन्ने की सफाई न होने की वजह से उस पर काली फफूंद लग जाती है।
    इसके अलावा हो सकता है कि जिस गन्ने का जूस आप पी रहे हों, उस पर खेतों की मिट्टी न हटाई गई हो। या नींबू धब्बेदार हो या फिर उसके बीज भी नहीं निकाले गए हो। इसके आलावा क्या आपने कभी यह चेक किया कि जिन हाथों से ऐसा किया जा रहा है वह साफ हैं या नहीं। उन्हीं हाथों से गन्ना पकड़ा जाता है, जनरेटर चलाया जाता है मशीन को घुमाया जाता है। हाथ कभी धोए नहीं जाते। बस यहीं से बीमारी के सारे लक्षण शुरू हो जाते हैं।
    बॉटनी एक्सपर्ट डॉ. अवनीश पाण्डेय के अनुसार, गन्ने में अगर लालिमा है तो इसके रस मत पीजिए। उसे गन्ने की सड़ांध या रेड रॉट डिजीज कहा जाता है। यह एक तरह का फंगस है, जो गन्ने के रस को लाल कर देता है। इससे जूस की मिठास भी कम हो जाती है। फफूंद से हेपेटाइटिस ए, डायरिया और पेट की बीमारियां होती हैं। इसी प्रकार गन्ने की मिट्टी से भी पेट संबंधी बीमारियां होती हैं। ऐसा गन्ना सस्ता मिलता है और सेहत के लिए नुकसानदायक होता है।
    जनरल फिजिशियन डॉ. मनीष जैन कहते हैं कि अगर गन्ने का रस बनाते समय साफ सफाई का ध्यान न रखा जाए तो ज्वाइंडिस, हेपेटाइटिस, टायफायड, डायरिया जैसी बीमारियां हो सकती हैं। अक्सर जहां से आप गन्ने का रस लेते हैं वहां गन्नों की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता। रास्तों में खड़ी किसी भी रेहड़ी से गन्ने का जूस न पीयें, इससे संक्रमण होने का खतरा होता है।
    पेट में दर्द आदि समस्या भी हो सकती है। गन्ने का जूस पीते वक्त दुकान की साफ सफाई का ध्यान रखें। कहीं दुकान में बहुत ज्यादा मक्खियां हुई तो ऐसी दुकानों से गन्ने का जूस पीने से बचें। गन्ने का रस निकालने के लिए ज्यादातर दुकानें मशीन का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन आपको शायद नहीं पता कि मशीनों को चलाने का एक खास किस्म के तेल का उपयोग होता है। ये तेल यदि पेट में चला जाए तो इसका बुरा असर हमारे स्वास्थ्य पर साफ देखने को मिल सकता है।

    ...
  •  


Posted Date : 23-Apr-2018
  • मोटा पेट यानी कि पेट की चर्बी न सिर्फ आपके फिगर को खराब करती है बल्‍कि ये आपके दिल के लिए भी खतरनाक है. अगर आपके पेट में एक्‍सट्रा फैट जमा हो रहा है तो आपको दिल की हेल्‍थ के खातिर बिना समय गंवाए डॉक्‍टर से म‍िलना चाहिए. 
    अमेरिका के मिनेसोटा के मेयो क्लिनिक से शोध के लेखक जोस मेडिना-इनोजोसा ने कहा, 'भले ही बीएमआई के अनुसार वे मोटे हो, लेकिन पेट पर बिना फैट वाले लोगों की तुलना में सामान्य वजन के साथ पेट पर फैट वाले लोगों में दिल की बीमारियां होने की आशंका ज्‍यादा रहती है.'
    मेडिना-इनोजोसा ने कहा, 'शरीर का यह शेप एक आलसी लाइफस्‍टाइल, कम मांसपेशीय द्रव्यमान और बहुत से परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट के खाने का संकेत देता है.'
    बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) किग्रा/मीटर वर्ग में ऊंचाई के सापेक्ष वजन है. इसका इस्तेमाल वयस्कों को कम वजन, सामान्य वजन, ज्यादा वजन या मोटापे की श्रेणी में वर्गीकृत करने के लिए होता है. हालांकि, बीएमअई वसा और मांसपेशी के वितरण व मात्रा के लिए जिम्मेदार नहीं है.
    बेली फैट यानी शरीर के बीच में एक्‍सट्रा फैट का जमा हो जाना है और यह एक्‍सट्रा फैट वितरण का परिचायक है.

    ...
  •  


Posted Date : 22-Apr-2018
  • नई दिल्ली, 22 अप्रैल। अंगदान करने वालों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन फिर भी अंगों की कमी बनी रहती है। असल में बड़ी दिक्कत अंगों को स्टोर करने की है। फ्रिज में स्टोर करने पर लीवर जैसे अंग खराब हो जाते हैं और इस्तेमाल के लायक नहीं रहते।
    अंगदान के जरिए मिलने वाले ज्यादातर लीवरों को फिलहाल बर्फीले तापमान से कुछ ऊपर रखकर स्टोर किया जाता है। लेकिन इस वजह से ज्यादातर लीवर खराब हो जाते हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक कोंस्टाटिन कौसियोस के मुताबिक, बीते साल ब्रिटेन में ही मौत से पहले अंगदान करने वाले लोगों के 500 लीवर ट्रांसप्लांट नहीं किए जा सके। कई अंगदाताओं के अंग ऐसी हालत में थे कि वे आइसबॉक्स में रखने के बाद काम नहीं कर पाए। प्रत्यारोपण तकनीक में कई नई खोजें होने के बावजूद अंगों को सुरक्षित ढंग से स्टोर रखने के तरीके में बीते 30 साल में शायद ही कोई बदलाव हुआ है।
    लेकिन अब कोंस्टाटिन कौसियोस और उनकी टीम ने दावा किया है कि अगर लीवर को शरीर के सामान्य तापमान पर ही एक लाइफ सपोर्ट सिस्टम में स्टोर किया जाए तो हालत बदल सकते हैं। शरीर का सामान्य तापमान आम तौर पर 37 डिग्री सेल्सियस (98.6 फारेनहाइट) होता है। इसी तापमान पर लाइफ सपोर्ट सिस्टम के जरिए लीवर को स्टोर करने पर कोशिकाओं को बहुत कम नुकसान पहुंचता है। सपोर्ट सिस्टम के चलते यकृत में ऑक्सीजन से भरे खून की सप्लाई बनी रहती है, इसके चलते कोशिकाओं को पर्याप्त पोषण मिलता रहता है।
    कोंस्टाटिन कौसियोस की टीम ने अंगदान के चलते मिले 220 लीवरों पर शोध करने के बाद यह दावा किया है। 100 लीवरों को उन्होंने आइसबॉक्स में रखा और 120 को बॉडी टेम्प्रेचर के साथ लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर। लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखे गए लीवरों में 50 फीसदी कम नुकसान मिला। उन्हें ज्यादा समय तक स्टोर भी किया जा सका।
    लाइफ सपोर्ट सिस्टम के जरिए अंगों को सुरक्षित रखने के तरीके को 2016 में ऑर्गनओएक्स नाम से ट्रेडमार्क भी कर दिया गया। कोंस्टाटिन कौसियोस ऑर्गनओएक्स के तकनीकी डायरेक्टर भी है। उनके मुताबिक यूके, भारत और कनाडा में अब उनका तरीका अमल में लाया जा रहा है।
    ऑस्ट्रिया के इंसबुर्ग मेडिकल कॉलेज के श्टेफान श्नीबेर्गेर भी इस खोज को अहम सफलता बता रहे हैं, लाइफ सपोर्ट सिस्टम में लीवर को मशीन से खुराक मिलती है, उस पर नजर रखी जाती है। अगर वह अच्छा प्रदर्शन करता है तो उसे तुरंत ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। अगर प्रदर्शन ठीक न हो तो ट्रांसप्लांट से पहले उसे दुरुस्त किया जा सकता है। कौसियोस चाहते हैं कि उनके शोध पर ज्यादा से ज्यादा रिसर्च हो ताकि इस तकनीक को किफायती बनाया जा सके। (एएफपी)

    ...
  •  


Posted Date : 21-Apr-2018
  • न्यूयॉर्क, 21 अप्रैल। महिलाओं के लिए बाजार में मौजूद गर्भनिरोधक गोली की तरह अब पुरुषों के लिए भी गोली जल्द उपलब्ध होगी। शोधकर्ताओं ने ऐसे यौगिक की खोज की है जो शुक्राणु की गतिशीलता पर नियंत्रण रख सकता है। यह निषेचन की क्षमता को कम कर सकता है। इसका इस्तेमाल करके पुरुषों के लिए भी अब निरोध की गोली बनाई जा सकती है जो आबादी नियंत्रण के लिए कारगर उपाय साबित हो सकती है। ईपी055 नामक यह यौगिक शुक्राणु की गतिशीलता को शिथिल कर देता है और इससे हारमोन पर भी कोई असर नहीं होता है।
    जर्नल पीएलओएस वन में प्रकाशित इस शोध में दावा किया गया है कि इस यौगिक से 'पुरुष-गोलीÓ बनाई जा सकती है जो जन्म दर को नियंत्रित करने में कारगर साबित होगा और इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं होगा। वर्तमान में पुरुषों के लिए कंडोम और नसबंदी के उपाय उपलब्ध हैं। परीक्षण के तौर पर इसका उपयोग नर बंदरों पर किया गया, जिसमें कोई दुष्प्रभाव नहीं पाया गया। इसकी शोधकर्ता अमेरिका के ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी स्थित ओरेगन नेशनल प्राइमेट रिसर्च सेंटर की मेरी जेलिंस्की ने कहा, उपयोग के 18 दिन बाद सभी लंगूरों में पूरी तरह से सुधार के लक्षण पाए गए।
    दुनिया भर में हर साल अनुमानत: 5.6 करोड़ गर्भपात असुरक्षित तरीके से होते हैं, जिससे प्रति वर्ष कम से कम 22,800 महिलाओं की मौत हो जाती है। यह जानकारी पिछले एक दशक में वैश्विक गर्भपात ट्रेंड्स पर गुटमेचर इंस्टीट्यूट की सबसे व्यापक रिपोर्ट में दी गई है। गर्भपात पर प्रतिबंध लगाने से महिलाओं को गर्भावस्था समाप्त करने से नहीं रोका जा सकता, बल्कि ऐसी स्थिति में वे अवांछित गर्भ को गिराने के लिए खतरनाक तरीकों का सहारा ले सकती हैं, जिससे जोखिम बढ़ जाता है। लिहाजा ऐसे में महिलाओं के अलावा पुरुषों के लिए अब गर्भनिरोधक गोली तैयार होनी शुरू हो गई हैं। (आईएएनएस)

    ...
  •  


Posted Date : 20-Apr-2018
  • गर्मियों में ये आपके शरीर की पानी की कमी को तो पूरा करता ही है साथ ही कई पोषक तत्व भी देता है। आपको बता दें कि तरबूज में कैलोरी कम और फाइबर ज्यादा होता है। यही वजह है कि यह आपकी बॉडी को डिटॉक्सी फाई कर देता है। इसके अलावा तरबूज में विटामिन ए, आयरन, कैल्शियम और लाइकोपिन होता है जो आपकी स्किन और बालों के लिए भी बहुत अच्छा है। इसे अलावा यह दिल की बीमारियों के खतरे कम करता है और पाचन तंत्र को सही रख इंफ्लामेशन बढ़ाता है।  
    दऱअसल तरबूज में पानी की मात्रा 92 फीसदी पाई जाती है जिसकी वजह से पानी की पूर्ति तो होती ही है साथ ही पेट भरा-भरा लगता है। वजन कम करने के लिए तरबूज डिटॉक्स डाइट भी होती है जिसमें 4-5 दिन तक सिर्फ तरबूज ही खाना होता है। न्यूट्रीशनिस्ट राहिला हसन के अनुसार इस डाइट का सिर्फ शार्टटर्म बेनिफिट होता है। दरअसल डिटॉक्सिफिकेशन बहुत लंबा प्रोसेस है। दूसरे एक्सपर्ट की मानें तो 3 दिनों तक केवल तरबूज खाना कहीं से भी सही नहीं है। इस कारण आपके शरीर को जरूरी पोषक तत्त्व नहीं मिल पाते। इसलिए तरबूज खाने का सही समय है दोपहर 12 से 1 बजे के बीच। (हिन्दुस्तान)
    --

    ...
  •  


Posted Date : 19-Apr-2018
  • नई दिल्ली, 19 अप्रैल। दुनिया में प्रदूषण से होने वाली मौतों का आकलन करने वाली रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। खबरों के मुताबिक अमरीका स्थित संस्था हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट ने 'स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2018Ó जारी की है। इसके अनुसार 2016 में पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण से 60 लाख लोगों की असमय मौत हो गई, जिनमें से आधे लोग चीन और भारत के रहने वाले थे। यही नहीं, इन दोनों देशों में पार्टिकुलेट मैटर-2.5 (बहुत महीन कण, जो फेफड़ों में जमा हो जाते हैं) से मरने वाले लोगों की संख्या भी दुनिया में सबसे ज्यादा रही।
    रिपोर्ट के मुताबिक भारत और चीन में घरेलू वायु प्रदूषण का सामना करने वालों की संख्या भी सबसे ज्यादा रही। साल 2016 में ऐसे लोगों की संख्या भारत में 56 करोड़, जबकि चीन में 41 करोड़ थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों में 25 फीसदी घरों के भीतर मौजूद वायु प्रदूषण से होती है, जबकि चीन में यह आंकड़ा 20 फीसदी है। यही नहीं, भारत में पीएम 2.5 की कुल मात्रा के 24 फीसदी हिस्से के लिए घरों में इस्तेमाल होने वाले जैव ईंधन को जिम्मेदार बताया गया है। हालांकि, हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट के उपाध्यक्ष बॉब ओ कीफे ने भारत में घरेलू रसोई गैस और विद्युतीकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों से घरों के भीतर वायु प्रदूषण में घटने की उम्मीद जताई है।
    इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2010 के बाद से भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देशों में वायु प्रदूषण की समस्या तेजी से बढ़ी है। यही नहीं, दुनिया की 95 फीसदी आबादी ऐसे इलाकों में रहती है, जहां की हवा सांस लेने के लिए असुरक्षित है। इस रिपोर्ट में गरीब तबकों को वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित बताया गया है। (सत्याग्रह)

    ...
  •  


Posted Date : 19-Apr-2018
  • भरत शर्मा
    सवेरे नहाकर तैयार हुए, बाल ठीक किए, घड़ी पहनी, मोबाइल चेक किया और कंघी-पर्स रखकर दफ्तर या दुकान जाने के लिए तैयार। दुनिया के ज्यादातर पुरुषों की सुबह कुछ इसी तरह गुजरती है। मोबाइल के अलावा इन सभी में एक और ऐसी चीज है, जिसे भूल जाएं तो दिन भर बड़ा अधूरा सा लगता है। वो है पर्स या बटुआ।
    इस पर्स में रुपए-पैसे, फोटो, क्रेडिट-डेबिट कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और दूसरे जरूरी पहचान पत्र सहेजे जाते हैं। जाहिर है, इतनी सारी चीज एक ही जगह पर रखी जाती हैं तो पर्स के जिम्मे काफी जिम्मेदारी भी होती है। इसी वजह से वो काफी मोटा भी हो जाता है। और ये पर्स कहां रखा जाता है? ज्यादातर पीछे वाली जेब में।
    और यही आदत खतरनाक बन सकती है। अगर आप कुछ पलों के लिए पर्स पीछे वाली जेब में रखते हैं तो इससे कोई खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर वो पूरा दिन या फिर कई घंटे आपकी बैक-पॉकेट में आराम फरमाता है तो आपको सोचने की जरूरत है।
    सोशल मीडिया पर कुछ लोग बात कर रहे हैं कि पीछे वाली जेब में मोटा पर्स रखने से रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाती है। क्या ये सच है? और हमारे यहां वैसे भी ये आदत देखी जाती है कि पर्स जितना ज्यादा मोटा होगा, रुआब उतना ज्यादा पड़ेगा।
    मेंसहेल्थ में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें यूनिवर्सिटी ऑफ वाटरलू के प्रोफेसर ऑफ स्पाइन बायोमेकेनिक्स स्टुअर्ट मैकगिल ने बताया कि ये पर्स कुछ देर के लिए रखने के लिए होता है लेकिन अगर आप कार्ड, बिल और सिक्कों के गठ्ठर पर कई घंटे बैठेंगे तो इससे हिप जॉइंट और कमर के निचले हिस्से में दर्द होने लगेगा।
    ये दिक्कत शुरू होती है सियाटिक नर्व के साथ, जो ठीक हिप जॉइंट के पीछे होती है। मोटा पर्स रखने की वजह से यही तंत्रिका बटुए और हिप के बीच में दबती है और मुसीबत खड़ी हो सकती है।
    ये गंभीर मामला इसलिए है क्योंकि दर्द भले हिप से शुरू होता है लेकिन ये पैरों के निचले तक भी जा सकता है। डॉ मैकगिल ने पीठ के दर्द को स्टडी करने के लिए एक प्रयोग किया जिसमें एक हिप के नीचे छोटे आकार के वॉलेट रखा।
    पिछली जेब में मोटा पर्स रखने की वजह से पेल्विस (कूल्हा) भी एक तरफ झुका रहता है जिसकी वजह से रीढ़ की हड्डी पर और ज्यादा दबाव पड़ता है। सीधे बैठने के बजाय कमर के निचले हिस्से में इंद्रधनुष जैसा आकार बन जाता है।
    और पर्स जितना ज्यादा मोटा होगा, शरीर उतना ज्यादा एक तरफ झुकेगा और उतना ही ज्यादा दर्द होगा। लेकिन दिक्कत ये है कि मोटे पर्स को आगे वाली जेब में भी रखना मुश्किल होता है क्योंकि ऐसा करने से आगे भी दर्द हो सकता है।
    कुछ डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ मोटा पर्स रखने से रीढ़ की हड्डी या स्पाइन में टेढ़ापन आ जाएगा, ये भले सच न हो लेकिन अगर स्पाइन में पहले से कोई दिक्कत है तो ये काफी मुसीबत ला सकता है।
    दिल्ली के प्राइमस अस्पताल में हड्डियों के डॉक्टर कौशल कांत मिश्रा से जब पूछा गया कि क्या पिछली जेब में पर्स रखने से क्या दिक्कत होती है, आदर्श स्थिति में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। अगर स्पाइन सामान्य है तो कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन इस मामले में रीढ़ की हड्डी का सामान्य होना जरूरी है।
    क्या फिर ये मान लिया जाए कि पिछली जेब में मोटा पर्स रखने से कोई दिक्कत नहीं होगी, उन्होंने कहा, ऐसा भी नहीं है। अगर आप कुछ वक्त के लिए ऐसा करते हैं तो कोई बात नहीं है लेकिन अगर कई घंटे ऐसा करते हैं तो दर्द तो होगा ही।
    उन्होंने कहा, अगर कई घंटे कोई बटुआ पीछे वाली जेब में रखकर बैठता है तो इससे रीढ़ की हड्डी का आकार नहीं बदलेगा लेकिन साइटिका जरूर हो सकता है।
    डॉ मिश्रा ने बताया, ये रेडिएटिंग पेन होता है मतलब ऐसा दर्द जो एक ही जगह न होकर, बार-बार लोकेशन बदलता है। और इस दर्द से कैसे निपटा जा सकता है?
    घुटने मोड़ें और जमीन पर लेट जाएं। घुटने नीचे ले जाते वक्त दायीं तरफ ले जाएं जबकि कंधे और हिप जमीन पर बनाए रखें और बायीं ओर ले जाएं। इससे आपको कमर के निचले हिस्से काफी आराम महसूस होगा।
    जमीन पर लेट जाएं और घुटनों को छाती से लगा लें और पैरों का बाहरी हिस्सा पकड़ लें। कमर के ऊपरी हिस्से को आधार बनाकर रोल करें और आप देखेंगे कि पीठ का दर्द काफी हद तक ठीक हो रहा है।
    आपको बटुआ कैसे रखना चाहिए?
    पैसे रखने वाली क्लिप या फिर पतले स्टाइल वाला वॉलेट रख सकते हैं, जो आसानी से आगे वाली पॉकेट में समा जाए।
    ऐसा बटुआ भी खरीद सकते हैं जिसके साथ चाबियां जोड़कर रखी जा सकें। ऐसा करने से जब कभी आप बटुआ पीछे वाली जेब में रखकर बैठना चाहेंगे तो चाबी चुभेंगी और आप उसे आगे रखने के लिए मजबूर होंगे।
    अगर आप खाकी पेंट या ड्रेस पेंट पहनते हैं तो उसका बटन बंद कर लीजिए ताकि पीछे वॉलेट रखने की आदत ही न बने। अगर संभव हो तो बटुआ रखना ही छोड़ दीजिए। बहुत से ऐसे लोग हैं जो पतले कार्डहोल्डर और पैसा आगे की जेब में रख लेते हैं। अपने बटुए या फिर मोबाइल फोन को पीछे वाली जेब से निकालकर रखिए और इसे एक चैलेंज के रूप में देखिए। (बीबीसी)

    ...
  •  


Posted Date : 17-Apr-2018
  • लॉस एंजेलिस, 17 अप्रैल। मिलावटी मेकअप उत्पाद में पशुओं का मल होने का पता चला है। अमरीकी पुलिस को मिलावटी मेकअप उत्पाद में पशुओं का मल होने का पता चला है। भारत में इसका बाजार 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। सीएनएन के मुताबिक, जिन ब्रांड्स में पशु मल के अंश पाए गए हैं, उनमें मशहूर मॉडल काइली जेनर का ब्रांड काइली कॉस्मेटिक्स भी शामिल है। लॉस एंजेलिस पुलिस विभाग ने कहा कि उसने ऐसे सौंदर्य उत्पादों को जब्त कर लिया है, परीक्षण में जिनमें बड़ी मात्रा में जीवाणु और पशु मल होने की पुष्टि हुई है।
    लॉस एंजेलिस पुलिस विभाग के कप्तान मार्क रीना ने कहा कि सेंटी एली में 21 जगहों पर की गई छापेमारी के बाद करीब 7 लाख डॉलर का मिलावटी मेकअप उत्पाद जब्त किया गया है। डिटेक्टिव रिक इशितानी ने सीएनएन से संबद्ध केएबीसी को बताया कि गेराज या बाथरूम में बनाए जा रहे उत्पादों में किसी तरह से मल मिश्रित हो जाता है। 
    काइली की बहन किम कर्दशियां वेल्ट ने इस छापेमारी को लेकर ट्वीट कर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि लॉस एंजेलिस पुलिस विभाग द्वारा जब्त काइली लिप किट्स में परीक्षण में मल होने की पुष्टि हुई है। कभी भी मिलावटी उत्पाद मत खरीदें।   (आईएएनएस)

    ...
  •  


Posted Date : 17-Apr-2018
  • वजन कम करना जिस तरह एक मुश्किल प्रयास है वैसे ही वजन बढ़ाना भी एक कठिन काम है। बहुत से लोग वजन न बढ़ने पर प्रोटीन सप्लीमेंट्स लेना शुरू करते हैं। इसके कई तरह के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। ऐसे में इसका सेवन सेहत के लिए पूरी तरह से सही नहीं है। ऐसे में आपके पास प्राकृतिक फूड्स के सेवन द्वारा वजन बढ़ाने का विकल्प होता है। आज हम आपको कुछ ऐसे फूड्स के बारे में बताने वाले हैं जिनका सेवन करने से तेजी से वजन बढ़ाने में मदद मिलती है। तो चलिए जानते हैं कि वे फूड्स कौन-कौन से हैं –
    अंडे – अंडे में उच्च मात्रा में पोषक तत्व होते हैं। यह पोषक तत्व शरीर में गुड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को बढ़ा देते हैं। वजन बढ़ाने के लिए यह एक अच्छा उपाय है। एक अंडे में लगभग 75 कैलोरी होती है जो वजन बढ़ाने में मददगार होते हैं। अंडे का सलाद, नाश्ते में कभी भी सेवन कर सकते हैं।
    केला – केले में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्व होते हैं। इस वजह से वजन बढ़ाने के लिए रोजाना केला खाने की सलाह दी जाती है। केले का सेवन कई कॉम्बीनेशन के साथ किया जा सकता है। एक केले में लगभग 100 कैलोरी होती है जो वजन बढ़ाने में मदद करती हैं।
    आलू – आलू में उच्च मात्रा में कार्बोहाइड्रेट और कॉम्प्लेक्स शुगर होता है। इस वजह से जिनका वजन कम होता है उन्हें आलू खाने की सलाह दी जाती है। वजन बढ़ाने के लिए किसी भी तरह से आलू का सेवन कर सकते हैं। बस फ्राइड चिप्स और प्रोसेस्ड फूड्स का सेवन ना करें क्योंकि इसमें अनसैचुरेटिड ट्रांस फैट होते हैं।
    चावल – चावल में उच्च मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होने की वजह से यह वजन बढ़ाने के लिए एक अच्छा विकल्प है। खासकर तब जब आपको बहुत कम भूख लगती हो। ऐसे में अगर तमाम कोशिशों के बाद भी अगर आपका वजन नहीं बढ़ रहा तो आप चावल का ज्यादा सेवन करना शुरू करें।
    स्मूदी – वजन बढ़ाने के लिए डाइट में अतिरिक्त कैलोरी को शामिल करने के लिए स्मूदी सबसे अच्छा विकल्प है। स्मूदी बनाने के लिए नट्स, फल, दही, नारियल पानी सभी का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह स्वस्थ तरीके से वजन बढ़ाने में मदद करते हैं। (जनसत्ता)

    ...
  •  


Posted Date : 16-Apr-2018
  • अगर किसी को सिर और गले का कैंसर है तो उन्हें खाने-पीने का बहुत ध्यान रखना चाहिए। ऐसे लोगों के खाने में अगर कार्बोहाइड्रेट और शुगर की मात्रा ज्यादा होगी तो उन्हें दोबारा कैंसर हो सकता है। यही नहीं कैंसर मौत का कारण बन सकता है। यह बात एक रिसर्च में सामने आई है।
    रिसर्च में पाया गया है कि कैंसर के इलाज से पहले के साल में जिन्होंने कार्बोहाइड्रेट और सुक्रोज, फ्रक्टोज, लैक्टोज और माल्टोज के रूप में शुगर ज्यादा लिया, उनमें मौत का खतरा ज्यादा होता है। 
    इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर में प्रकाशित अध्ययन में कैंसर के 400 मरीजों में 17 फीसदी से अधिक मरीजों में कैंसर की पुनरावृत्ति दर्ज की गई, जबकि 42 फीसदी की मौत हो गई। 
    अरबाना शैंपैन स्थित इलिनोइस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और प्रमुख शोधकर्ता अन्ना ई। आर्थर ने बताया कि कार्बोहाइड्रेट खाने वाले मरीजों और अन्य मरीजों में कैंसर के प्रकार और कैंसर के चरण में अंतर पाया गया।  हालांकि उपचार के बाद कम मात्रा में वसा और अनाज, आलू जैसे स्टार्च वाले भोजन खाने वाले मरीजों में बीमारी की पुनरावृत्ति और मौत का खतरे कम हो सकता है। (आईएएनएस)

    ...
  •  


Posted Date : 16-Apr-2018
  • क्लाउडिया हैमंड

    अगर आप खुद को फ़िट रखना चाहते हैं और आपकी पिछली कोशिशें फेल हो चुकी हैं तो आपको एक्सरसाइज़ से जुड़ी अपनी सोच पर ध्यान देने की ज़रूरत है.
    अमरीका की स्टेनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि एक्सरसाइज़ को लेकर लोगों की सोच और उनकी सेहत के बीच गहरा संबंध होता है.
    मन में छुपा है तंदरुस्ती का राज
    अमरीका की स्टेनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 21 साल के समय में 61 हज़ार व्यस्क लोगों की मौत से जुड़े आंकड़ों पर शोध किया.
    इसमें इन लोगों की एक्सरसाइज़ के आंकड़े, विशेषकर उनका अपनी एक्सरसाइज़ और अपने साथियों द्वारा की गई एक्सरसाइज़ को लेकर नज़रिये पर ध्यान दिया गया. और ये भी देखा गया कि ऐसे लोगों की मौत उम्र के किस पड़ाव में हुई.
    रिसर्च के नतीजे बेहद हैरान करने वाले थे. अपने हमउम्रों के मुकाबले कम एक्सरसाइज़ करने की सोच रखने वाले लोगों की मौत अपने हमउम्रों से पहले हुई जबकि दोनों बराबर ही एक्सरसाइज़ करते थे.
    ये असर तब भी दिखा जब वैज्ञानिकों ने इन लोगों की सेहत और सिगरेट पीने जैसी चीजों को शामिल कर लिया.
    एक्सरसाइज़ है दवा जैसी लेकिन
    इसमें कोई दो राय नहीं कि एक्सरसाइज़ करने से उम्र में इज़ाफ़ा होता है. लेकिन एक्सरसाइज़ को लेकर हमारी सोच बड़ा फ़र्क़ पैदा कर देती है.
    इस मुद्दे पर रिसर्च करने वाली ऑक्टेविया ज़ाहर्ट कहती हैं कि जब वो अपनी पढ़ाई के सिलसिले में कैलिफॉर्निया पहुंची तो वहां उन्होंने देखा कि हर व्यक्ति एक्सरसाइज़ कर रहा है. हालांकि, ऑक्टेविया ख़ुद भी एक्सरसाइज़ पर काफ़ी ध्यान देती थीं. लेकिन अचानक उन्हें लगने लगा कि वो दूसरों के मुक़ाबले कम सेहतमंद हैं. क्योंकि, वो उतनी एक्सरसाइज़ नहीं करती जितनी उनके आसपास के लोग कर रहे हैं. इसका असर उनकी सेहत पर पड़ने लगा.
    फिटनेस से जुड़े मैसेज़ देते हैं तनाव
    आज हर चीज़ का बाज़ारीकरण हो गया है. फ़ोन और ईमेल पर हेल्थ से जुड़े इतने मैसेज आते हैं कि लोगों को लगने लगता है कि हम तो ख़ुद को फिट रखने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं.
    जबकि हम मामूली और ज़रूरत के मुताबिक़ कसरत कर रहे होते हैं. इस तरह के मैसेज दिमाग़ के किसी कोने में फ़िक्र और तनाव को जन्म देते हैं. इसका सीधा असर सेहत पर पड़ता है.
    तोंद निकल आई है, ज़रूर कुछ गड़बड़ है
    किसी भी काम में कामयाबी के लिए सकारात्मक सोच रखना पहली शर्त है.
    आप जितनी भी एक्सरसाइज़ करें उसे सकारात्मक सोच के साथ करें.
    जिम में पसीना बहाने से बनेगी सेहत?
    कसरत शरीर के लिए दवा का काम करती है. अगर ये मान लिया जाए कि फलां दवा से हमें फ़ायदा होगा ही नहीं, तो यक़ीनन उसका फ़ायदा हमें कभी नज़र ही नहीं आएगा.
    इसी तरह अगर हम हमेशा यही सोचते रहेंगे कि हम दूसरों के मुक़ाबले कम कसरत करते हैं या उस तरह नहीं कर रहे हैं जैसा कि हमारे साथी करते हैं तो यक़ीनन हमारी कसरत का हम पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
    जिम में जाकर पसीना बहाना ही मेहनत या कसरत में शामिल नहीं होता. हम दिन भर बहुत से ऐसे काम करते हैं, जिसमें अच्छी ख़ासी मेहनत लगती है.
    लेकिन हम उसे कसरत की फ़ेहरिस्त में शामिल नहीं करते. मिसाल के लिए किसी होटल में रख-रखाव का काम करने वाला शख्स दिन भर सीढ़ियां चढ़ने, साफ़-सफ़ाई करने जैसे कामों में मसरूफ़ रहता है.
    इस मेहनत से उसके शरीर को फ़ायदा भी पहुंचता है. लेकिन 2007 में की गई रिसर्च के मुताबिक़ इसे वर्ज़िश नहीं कहा जा सकता.
    होटल में काम करने वाले ऐसे ही मुलाज़िमों पर एक रिसर्च की गई. उन्हें समझाया गया कि उनकी मेहनत जिम में जाकर पसीना बहाने वाली मेहनत से कम नहीं है. चार हफ़्ते बाद जब उनका मुआएना किया गया, तो पता चला कि उन कर्मचारियों का ना सिर्फ़ वज़न कम हो गया बल्कि ब्लड प्रेशर भी नॉर्मल हो गया. यानी उन्होंने अपनी सोच बदली. उन मुलाज़िमों ने अपने ज़हन में ये बात बैठाई कि वो भी जिम में जाने वालों की तरह ही कसरत करते हैं.
    बुढ़ापा है एक मानसिक सोच
    इसी तरह की सोच का ताल्लुक़ उम्र से है. बहुत से लोग कहते हैं बुढ़ापा 60 की उम्र में शुरू होता है.
    ऐसे लोग अपनी सेहत की हालत मद्देनज़र रखते हुए ये बात कहते हैं. और इसीलिए वो एक्सरसाइज़ भी कम कर देते हैं.
    उनके दिमाग़ मे ये सोच घर कर लेती है कि वो अब बुढ़ापे की ओर चल पड़े हैं. जबकि जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करते हैं, वो खुद को ज़्यादा फिट महसूस करते हैं और इसीलिए वो ख़ुद को कभी बूढ़ा नहीं मानते. दरअसल ये सब सिर्फ़ समझ का फेर है.
    अच्छी बात है कि इंसान को अपनी सोच का दर्ज़ा ऊंचा रखना चाहिए. लेकिन कभी तुलना नहीं होनी चाहिए.
    हर इंसान अपनी कुव्वत के मुताबिक़ ही काम करता है, और कर सकता है.
    कसरत सेहत के लिए ज़रूरी है. इसे अपनी आदत बनाइए. लेकिन, ये सोचे बग़ैर कि आपके दोस्त कहीं आपसे ज़्यादा कसरत तो नहीं कर रहे. (बीबीसी)

    ...
  •  


Posted Date : 13-Apr-2018
  • नई दिल्ली, 13 अप्रैल। गोरा बनाने और दाद-खाज में काम आने वाली स्टेरॉयड युक्त क्रीम की खुली बिक्री पर जल्द ही रोक लगाने की तैयारी है। भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीजीसीआई) ने गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि इस बारे में जल्द ही दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। इसके बाद केवल डॉक्टर के पर्चे पर ही इस तरह की क्रीम और दवाई मिलेंगी। इससे पहले हाई कोर्ट में एक याचिका के जरिए इन पर रोक लगाने की मांग की गई थी। (हिंदुस्तान टाईम्स)

    ...
  •  


Posted Date : 12-Apr-2018
  • नई दिल्ली, 12 अप्रैल । ब्यालीस वर्षीय सुष्मिता सेन अक्सर अपनी फिटनेस को लेकर चर्चाओं में बनी रहती हैं। पिछले दिनों एक्ट्रेस ने नकल पुशअप करते हुए वीडियो साझा कर अपने फैन्स को चौंकाया था। इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए एक्ट्रेस ने अपना नया वर्कआउट वीडियो शेयर किया है, जिसमें वह जिमनास्टिक रिंग्स के साथ पुशअप करती दिखाई दे रही हैं। सुष्मिता का यह वर्कआउट देखने में भले ही आसान लगता हो, लेकिन उनकी मानें तो इसे करना काफी मुश्किल भरा है। 1 दिन पहले साझा किए इस वीडियो को 2 लाख 8 हजार से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं।
    वीडियो शेयर करते हुए सुष्मिता ने लिखा, जिमनास्टिक रिंग्स के साथ पहली बार पुशअप किया। इसने मुझे अहसास कराया कि नकल पुशअप करना ज्यादा आसान है। रिंग के साथ खुद को नियंत्रित करना अपने आप में विजय है।
    हफतेभर पहले एक्ट्रेस ने नकल पुशअप करते हुए अपना वीडियो जारी किया था। नकल पुश-अप्स में मार्शल आर्ट या मुक्केबाजी करने वाले अपने उंगली के गांठों को मजबूत करने के लिए करते हैं। अपने शरीर के ऊपरी हिस्से के वजन को उठाने के लिए वे हथेली की जगह पर उंगली के गांठों का सहारा लेते हैं। इसे करना बेहद मुश्किल होता है। सुष्मिता ने इस मुश्किल काम को भी पूरा कर लिया। उनके इस वीडियो को 9 लाख से ज्यादा व्यूज मिले।
     गौरतलब है कि, साल 1994 में सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स का क्राउन जीतने वाली पहली भारतीय बनी थीं, इस टाइटल से पहले सुष्मिता ने ऐश्वर्या राय को मिस इंडिया कॉन्टेस्ट में हराया था। मिस यूनिवर्स के तौर पर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बाद सुष्मिता ने 1996 की फिल्म, दस्तक, से बॉलीवुड में कदम रखा। बीवी नंबर 1, मैंने प्यार क्यों किया, मैं हूं न, फिलहाल, बंगाली फिल्म निर्बाक उनकी चर्चित फिल्मों में शामिल हैं। साल 2010 से 2013 तक सुष्मिता ने, आई एम शी, पीजेंट का आयोजन किया, जिसके जरिए मिस यूनिवर्स के लिए भारत के प्रतिनिधि का चयन किया जाता था। (एनडीटीवी)

    ...
  •