सेहत / फिटनेस

Posted Date : 21-Jul-2018
  • नई दिल्ली, 21 जुलाई। जरा सोचिए कि कोई पौधा हानिकारक कीड़ों में यौन आकर्षण पैदा कर उन्हें अपनी तरफ खींचे और फिर उन्हें मार डाले। सुनने में भले ही यह बड़ी अजीब सी बात लगे लेकिन स्पेन के वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि वे पौधों में अनुवांशिक बदलाव कर उससे फेरोमोन्स नामक रसायन पैदा कर सकते हैं। फेरोमोन्स वहीं रसायन पदार्थ है जिसे मादा कीड़े नर कीड़ो को आकर्षित करने के लिए निकालती हैं।
    इस नए अविष्कार का मकसद उन पौधो को कीड़ों से बचाना है जिनकी बाजार में बहुत अधिक कीमत होती है। इस तकनीक के जरिए सेक्सी पौधों को विकसित किया जाएगा। हालांकि पौधों को बचाने के लिए फेरोमोन्स का इस्तेमाल पहले से हो रहा है, लेकिन इसे बहुत अधिक लागत पर प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है।
    अब एक प्रोजेक्ट के तहत पौधों को इस तरीके से विकसित किया जाएगा कि वे फेरोमोन्स बनाने में सक्षम हो सकें। इस प्रोजेक्ट का नाम ससफायर रखा गया है।
    इस योजना के एक सदस्य और वेलेंसिया में पॉलीटेक्निक यूनिवर्सिटी में शोधार्थी विसेंट नवारो ने कहा कि सोचिए कि कोई पौधा इस काबिल हो जाए कि वह कीड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करे और जब कीड़ा उन पर बैठे तो वह मर जाए, फसल को बचाने के लिए यह बेहद कारगर तरीका हो सकता है।
    जब अधिक मात्रा में फेरोमोन्स पैदा होता है तो इससे नर कीड़े परेशान हो जाते हैं और वो मादा कीड़ों को खोज नहीं पाते, यही वजह है कि इन कीड़ों के प्रजनन में भी कमी आती है। नवारो बताते हैं कि यह तकनीक तो पहले से इस्तेमाल की जा रही है लेकिन इसमें बहुत अधिक खर्च आता है।
    वो बताते हैं कि इसकी कीमत कई बार 23 हजार डॉलर से 35 हजार डॉलर और कभी-कभी तो 117 हजार डॉलर प्रतिकिलो तक पहुंच जाती है। इसका मतलब यह है कि फसल को कीड़ों से बचाने के लिए यह लागत बहुत ज्यादा है।
    ससफायर प्रोजेक्ट में स्पेन, जर्मनी, स्लोवेनिया और ब्रिटेन के वैज्ञानिक साथ काम कर रहे हैं। जब कीड़े पौधों की तरफ आकर्षित होते हैं और उन पर बैठते हैं तो कीटनाशकों के जरिए उन पर नियंत्रण किया जाता है। ससफायर प्रोजेक्ट के जरिए कीड़ों को फसल से दूर ले जाया जाएगा और फिर उन्हें बाहर ही खत्म भी कर दिया जाएगा।
    इस तरह किसी फसल में कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, इसकी जगह जिस जगह फसल लगाई गई है उसके बाहर ऐसे पौधे लगाए जाएंगे जो कीड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करें और उन पर बैठकर मर जाएं।
    इस बारे में नवारो बताते हैं कि हमने निकोटिआना बेंथामिआना प्रकार के पौधे के जरिए फेरोमोन्स बनाने में सफलता पायी है। अब हमारे सामने सवाल है कि हम इसे कुछ और सामान्य प्रकार के पौधों में बनाने में सफलता हासिल कर पाते हैं या नहीं। ऐसे जान पर खेलकर होता है कीटनाशकों का इस्तेमाल!
    सेक्सी पौधे की मदद से वैज्ञानिक कोटोनेट नामक प्रकार के कीड़े को नियंत्रित करने पर काम कर हैं, ये कीड़े खट्टे फलों को नुकसान पहुंचाते हैं।
    फिलहाल ससफायर प्रोजेक्ट की समयसीमा तीन साल तय की गई है। उसके बाद इस बात का आंकलन किया जाएगा कि अलग-अलग कंपनियां इस प्रोजेक्ट में कितनी दिलचस्पी दिखाती हैं। नवारो के अनुसार बहुत सी कंपनियों ने इस प्रोजेक्ट में अपनी इच्छा जताई है लेकिन फिलहाल इसे पूरा होने में पांच साल तो लग ही जाएंगे। वे मानते हैं कि यह सेक्सी पौधे कीटनाशकों की दुनिया में एक बड़ा बदलाव लेकर आएंगे। (बीबीसी)

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Posted Date : 20-Jul-2018
  • पीरियड्स के दौरान या लंबे समय तक बैठे रहने से महिलाओं में पेट में निचले हिस्से में दर्द की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं. 6 महीने से लंबे समय तक ये दर्द पेल्विक कंजेशन सिंड्रोम (पीसीएस) का कारण हो सकता है. 
    पीरियड्स के दौरान या लंबे समय तक बैठे रहने से महिलाओं में पेट में निचले हिस्से में दर्द की परेशानियां बढ़ती जा रही हैं. 6 महीने से लंबे समय तक ये दर्द पेल्विक कंजेशन सिंड्रोम (पीसीएस) का कारण हो सकता है. देश में हर तीन में से एक महिला अपने जीवन के किसी न किसी स्तर पर पेल्विक पेन से पीड़ित होती है.

    वसंत कुंज स्थित फोर्टिस हास्पिटल के हेड इंटरवेशनल रेडियोलोजिस्ट डॉ. प्रदीप मुले के मुताबिक, "पेट के निचले भाग में दर्द होने के कई कारण हो सकते हैं, उसमें से सबसे सामान्य कारणों में से एक है पेल्विक कंजेशन सिंड्रोम (पीसीएस). यह युवा महिलाओं में अधिक देखा जाता है. पेल्विक कंजेशन सिंड्रोम को पेल्विक वेन इनकम्पेटेंस या पेल्विक वेनस इनसफिशिएंशी भी कहते हैं." 
    उन्होंने कहा, "यह महिलाओं में होने वाली एक चिकित्सीय स्थिति है. इस स्थिति में तेज दर्द होता है जो खड़े होने पर और बढ़ जाता है, लेटने पर थोड़ा आराम मिलता है. पीसीएस जांघों, नितंब या योनि क्षेत्र की वैरिकोस वेन्स से संबंधित होता है. इसमें शिराएं सामान्य से अधिक खिंच जाती हैं."
    डॉ. प्रदीप मुले ने कहा, "जो महिलाएं मां बन चुकी हैं और युवा हैं उनमें यह समस्या अधिक होती है क्योंकि इस आयुवर्ग की महिलाएं अपने लक्षणों को नजरअंदाज करती हैं इसलिए उनमें यह समस्या अधिक बढ़ जाती है. पीसीएस का कारण स्पष्ट नहीं है. हालांकि शरीर रचना या हार्मोन्स के स्तर में किसी प्रकार की गड़बड़ी इसका कारण हो सकती है. इससे प्रभावित होने वाली अधिकतर महिलाएं 20-45 वर्ष आयुवर्ग की होती हैं और जो कई बार गर्भवती हो चुकी होती हैं." 

    उन्होंने कहा, "गर्भावस्था के दौरान हार्मोन संबंधी बदलावों, वजन बढ़ने और पेल्विक क्षेत्र की एनाटॉमी में परिवर्तन आने से अंडाशय की शिराओं में दबाव बढ़ जाता है जिससे शिराओं की दीवार कमजोर हो जाती है जिससे वह सामान्य से अधिक फैल जाती हैं."
    उन्होंने कहा कि एस्ट्रोजन हार्मोन शिराओं की दीवार को कमजोर कर देता है. सामान्य शिराओं में रक्त पेल्विस से ऊपर हृदय की ओर बहता है और शिराओं में मौजूद वॉल्व के कारण इसका वापस शिराओं में फ्लो नहीं होता है. जब अंडाशय की शिराएं फैल जाती हैं, वॉल्व पूरी तरह से बंद नहीं होता है जिससे रक्त वापस बहकर शिराओं में आ जाता है, जिसे रिफ्लक्स के नाम से भी जाना जाता है जिसके परिणामस्वरूप पेल्विस क्षेत्र में रक्त की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. 

    डा. प्रदीप मुले का कहना है कि इसका सबसे प्रमुख लक्षण पेट के निचले भाग में दर्द होना है. यह अधिक देर तक बैठने या खड़े रहने के कारण गंभीर हो जाता है. इसके कारण कई महिलाओं में पैर में भारीपन भी लगता है. 

    उन्होंने कहा, "इसके अलावा पीसीएस में निम्न लक्षण दिखाई दे सकते हैं जैसे पेल्विक क्षेत्र में लगातार दर्द होना. पेट के निचले भाग में मरोड़ अनुभव होना. पेल्विक क्षेत्र में दबाव या भारीपन अनुभव होना. शारीरिक संबंध बनाते समय दर्द होना. यूरीन या मल त्यागते समय दर्द होना. लंबे समय तक बैठने या खड़े होने में दर्द होना. सेक्स के दौरान भी दर्द हो सकता है." (एनडीटीवी)

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Posted Date : 19-Jul-2018
  • स्किन कैंसर का पता लगाने के लिए पहली बार एक ब्लड टेस्ट विकसित किया गया है. ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं का दावा है कि इससे मेलानोमा के शुरुआती चरण के बारे में पता लगाया जा सकेगा.
    मेलानोमा यानि स्किन कैंसर के बारे में अगर शुरुआती चरण में पता चल जाए तो अगले पांच वर्षों तक जीने की संभावना 90 से 99 फीसदी तक हो जाती है. एडिथ काउवान यूनिवर्सिटी में शोध का नेतृत्व कर रहे पाउलीन जाएनकर के मुताबिक, अगर शुरुआती चरण में कैंसर का पता न चले तो यह पूरे शरीर में फैलने लगता है और अगले 5 साल तक जीवित रहने की संभावना घटकर 50 फीसदी हो जाती है. फिलहाल मेलानोमा का पता लगाने के लिए डॉक्टर उसे देखकर या बायोप्सी का सहारा लेकर जांच करते हैं. नए ब्लड टेस्ट के जरिए ऑटोएंडीबॉडीज की जांच की जाती है जो मेलानोमा से लड़ने के लिए शरीर में विकसित होता है. 
    जाएनकर कहते हैं, "शरीर में जैसी ही मेलानोमा विकसित होना शुरू होता है, ये एंटीबॉडीज पैदा होने लगते हैं. इसका पता ब्लड टेस्ट के जरिए लगाया जा सकता है."
    केले की मदद से कैंसर की जांच
    शोधकर्ताओं ने मेलानोमा का पता लगाने के लिए 1,627 विभिन्न प्रकार के एंडीबॉडीज की जांच की जिसमें से 10 की पहचान हो सकी. इस ट्रायल में 105 मेलानोमा के और 104 स्वस्थ्य लोगों पर टेस्ट किया गया. करीब 79 फीसदी मामलों में मेलानोमा के शुरुआती चरण के बारे में पता चला. इस रिसर्च के बारे में ऑन्कोटारगेट जर्नल में विस्तृत लेख प्रकाशित हुआ है.
    मेलानोमा रिसर्च ग्रुप के प्रोफेसर मेल जिमान के मुताबिक, अगर यह प्रयोग सफल रहा तो हम इसे पैथोलॉजी क्लिनिक में इस्तेमाल कर सकते हैं. इस रिसर्च का उद्देश्य है कि बायोप्सी और अन्य कैंसर जांच के पहले ही मेलानोमा के बारे में पता लगाया जा सके. जिन लोगों के चेहरे पर तिल अधिक होते है, पीले रंग की चमड़ी होती है या आनुवांशिक बीमारी रहती है, उनमें स्किन कैंसर का खतरा अधिक पाया जाता है. मेलानोमा एक खतरनाक कैंसर है जो आमतौर पर यूवी लाइट या सूरज की किरणों से होता है. न्यूजीलैंड के बाद ऑस्ट्रेलिया में सबसे अधिक मेलानोमा के मरीज पाए जाते हैं. हर साल यहां औसतन 14 हजार नए मरीजों का पता चलता है और करीब दो हजार की हर साल मौत होती है.  (चेस विंटर/वीसी)

     

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Posted Date : 19-Jul-2018
  • समलैंगिक पुरुषों में एचआईवी के संक्रमण का खतरा सामान्य पुरुषों की तुलना में 28 गुना ज्यादा होता है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह हालत तब है जबकि पश्चिमी देशों में एड्स के नए मामलों में काफी गिरावट आई है. 
    संयुक्त राष्ट्र की एचआईवी के खिलाफ काम करने वाली एजेंसी यूएनएड्स ने बुधवार को यह रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट के मुताबिक एचआईवी के नए मामलों में काफी गिरावट आई है. 1996 में एचआईवी पीड़ितों की तादाद 34 लाख थी जो बीते साल घट कर 18 लाख रह गई. हालांकि इसके बाद भी समलैंगिक पुरुषों में इसके संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा है. इनके साथ ही महिला यौनकर्मी, ड्रग्स लेने वाले और ट्रांसजेंडर महिलाएं भी इसके खतरे की जद में हैं.
    उत्तर अमेरिका, पश्चिमी यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के समलैंगिक पुरुषों में आश्चर्यजनक रूप से एचआईवी संक्रमण के मामलों में बहुत गिरावट आई है. सैन फ्रांसिस्को में पिछले 3 सालों में नए संक्रमण से प्रभावित लोगों की तादाद में करीब 43 फीसदी की कमी आई है. ऑस्ट्रेलियाई प्रांत न्यू साउथ वेल्स में भी दो साल के भीतर नए मामलों 35 फीसदी गिरावट देखी गई.
    पिछले साल ब्रिटेन के एक प्रमुख समाजसेवी संगठन के साथ कोर्ट में चली लड़ाई के बाद नेशनल हेल्थ सर्विस ने तीन साल के लिए ट्रुवाडा का परीक्षण शुरू किया. यह परीक्षण 10 हजार समलैंगिक, बाइसेक्सुअल और ऐसे पुरुषों के पर किया गया जो पुरुषों से ही यौन संबंध रखते हैं.
    समाजसेवी संगठनों और एड्स के खिलाफ अभियान चलाने वाले कार्यकर्ता इन परीक्षणों की संख्या दोगुनी करने की मांग कर रहे हैं. ब्रिटेन में एचआईवी एड्स के खिलाफ काम करने वाले संगठन एनएएम के निदेशक मैथ्यू हडसन का कहना है, "हम ऐसे एक शख्स को जानते हैं जिसका परीक्षण नहीं हुआ और वह एचआईवी पॉजिटव हो गया.
    2014 में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने 2030 तक एड्स को खत्म करने का वचन दिया था. इसे टिकाऊ वकास के लिए 2030 के एजेंडे में शामिल किया गया. यूएनएड्स के मुताबिक बीते साल कम लोगों की मौत हुई. यह कमी 3 साल पहले की तुलना में करीब 10 लाख है. एड्स की चपेट में आने वाले नए लोगों की तादाद में भी काफी कमी आई है. एचआईवी से संक्रमित होने वाले लोगों की तादाद में भी 2016 से 2017 के बीच करीब एक लाख की कमी आई है और यह संख्या बीते 12 महीनों में लगभग स्थिर रही है.

    एड्स पीड़ितों के खिलाफ भेदभाव और उन्हें कलंक मानने की वजह से इसके इलाज और यौन शिक्षा में काफी बाधाएं पेश आ रही हैं. ट्रांसजेंडर महिलाओं में एड्स का जोखिम 15 से 49 वर्ष के पुरुषों की तुलना में करीब 13 फीसदी ज्यादा रहता है.
    यूएनएड्स की कार्यकारी निदेशक मिषेल सिदिबे का कहना है, "मानवाधिकार सबके लिए एक जैसा है, कोई भी इससे बाहर नहीं चाहे वो यौनकर्मी हो, समलैंगिक या फिर दूसरे पुरुष जो पुरुषों के साथ ही सेक्स करते हों, ड्रग्स लेते हों, ट्रांसजेंडर, कैदी या फिर शरणार्थी."
    उनका कहना है कि ऐसे कानून जो एचआईवी संक्रमण को आपराधिक बनाते हैं, जैसे कि देह व्यापार, ड्रग्स का निजी इस्तेमाल, यौन रुझान या सेवाओँ तक पहुंचने में बाधा बनते हैं उन्हें खत्म होना चाहिए.
     एनआर/ओएसजे(रॉयटर्स)

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Posted Date : 13-Jul-2018
  • नई दिल्ली, 13 जुलाई। दर्द निवारक दवा के तौर पर बाजार में बिकने वाले वोवेरान इंजेक्शन के उत्पादन और बिक्री पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की समिति की सिफारिश पर भारतीय दवा नियंत्रक (डीसीजीआई) ने प्रतिबंध लगा दिया है। दवा में ट्रांसक्युटोल तत्व है जो कि पूरी दुनिया में प्रतिबंधित है।
    वर्ष 2015 में ट्रोइका फार्मास्युटिकल लिमिटेड ने इस संबंध में डीजीसीआई और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को शिकायत दर्ज कराई थी। ट्रांसक्युटोल के गंभीर दुष्परिणाम मरीजों की किडनी पर देखे जाते हैं।
    शिकायत के बाद बनी समिति ने दवा में टॉक्सिक तत्व होने की बात कह कर इसे प्रतिबंधित करने की सिफारिश की थी। हालांकि, वोवेरान बनाने वाली कंपनी थेमिस मेडिकेयर ने स्वास्थ्य मंत्रालय पहुंचकर दोबारा समिति बनाकर जांच की मांग की थी। दूसरी समिति ने जांच के बाद दवा को बनाने और बेचने की इजाजत दे दी थी। जिसके बाद ट्रोइका ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था।
    एक सरकारी अधिकारी के अनुसार, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के हस्तक्षेप के बाद एक तीसरी समिति का गठन किया गया जिसके ट्रोइका के दावे को सही पाया। समिति को थेमिस और नोर्वाटिस की ओर से अपने पक्ष में कोई सबूत नहीं दिया गया। समिति ने पाया कि दवा में ट्रांसक्युटोल नाम का तत्व मिला है जो कि विश्व भर में प्रतिबंधित है।
    इस संबंध में निर्देश डीसीजीआई ने 4 जुलाई को उत्तराखंड राज्य के ड्रग कंट्रोलर और दमन एवं दीव ड्रग लायसेंस अथॉरिटी को निर्देश दिया था कि ट्रांसक्युटोल का उपयोग करके डाइक्लोफिनेक सोडियम इंजेक्शन (75 एमजी/एमएल) बनाने का थेमिस मेडिकेयर लिमिटेड को दिया लायसेंस रद्द किया जाए। डाइक्लोफिनेक इंजेक्शन मल्टीनेशनल कंपनी नोर्वाटिस द्वारा बाजार में वोवेरान 1एमएल के नाम से बेचा जाता है।
    शिकायतकर्ता गुजरात की ट्रोइका कंपनी दर्दनिवारक दवा के क्षेत्र में थेमिस की प्रतिद्वंदी कंपनी है। भारत में दर्द निवारक दवाओं का बाजार लगभग 2000 करोड़ रुपये का है। जिसमें डाइक्लोफिनेक 1एमएल की भागीदारी 260 करेड़ रुपये है। दवा बाजर शोध फर्म एआईसीओडी फार्मा ट्रेक अनुसार, ट्रोइका और नोवार्टिस दोनों मिलकर डाइक्लोफिनेक 1एमएल के 60 फीसदी बाजार हिस्से पर कमान रखते हैं। डीजीसीआई ने देश भर के बाजारों से वोवेरान को वापस मंगाने का आदेश दिया है।
    डाइक्लोफिनेक सोडियम या वोवेरान दवा का निर्माण उत्तराखंड और लक्षद्वीप में थेमिस मेडिकेयर लिमिटेड कर रही थी। जिसकी मार्केटिंग मल्टीनेशनल कंपनी नोवार्टिस और गैटफोस करती थीं। आदेशानुसार, उत्तराखंड और लक्षद्वीप की ड्रग्स लायसेंसिंग अथॉरिटी को तत्काल प्रभाव से दवा का उत्पादन रोकने के निर्देश दिए गए हैं। समिति की रिपोर्ट दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष पेश कर दी गई है। कोर्ट ने तीन जुलाई को याचिका का निस्तारण कर दिया। (भाषा)

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • नई दिल्ली, 13 जुलाई : किसी मोटे शख़्स को देखकर ज़्यादातर लोग यही सोचते हैं कि वो खाता ज़्यादा होगा. बीमारी होने के बावजूद मोटापे को गंभीरता से नहीं लिया जाता है लेकिन ये जानलेवा भी हो सकता है.
    'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' नाम के टीवी सीरियल में डॉक्टर हाथी का किरदार निभाने वाले कवि कुमार आज़ाद को कौन नहीं जानता. उनका वज़न लगभग 200 किलोग्राम था. 9 जुलाई को उनकी मौत कार्डियक अरेस्ट के चलते हो गई.
    तो क्या कार्डियक अरेस्ट का मोटापे से कोई लेना-देना है?
    दरअसल, मोटापा अपने आप में तो एक बीमारी है ही लेकिन ये कई दूसरी बीमारियों का कारण भी है और कार्डियक अरेस्ट उनमें से एक है.
    कितने लोग हैं प्रभावित ?
    मोटापा आज के दौर की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है. ओबेसिटी फाउंडेशन इंडिया के मुताबिक़, भारत में क़रीब तीन करोड़ लोग मोटापे की परेशानी से जूझ रहे हैं. एक अनुमान के मुताबिक़, आने वाले पांच सालों में ये आंकड़ा दोगुना हो जाएगा.
    अमरीका की बात करें तो हर चार में से एक अमरीकी मोटापे से पीड़ित है.
    तो क्या ओवरवेट होना और मोटापा एक ही चीज़ है?
    ओवरवेट होना भी कई तरह का होता है. इसे बॉडी मास इंडेक्स के आधार पर तय किया जाता है. अगर किसी शख़्स का बॉडी मास इंडेक्स 25 से 29.9 है तो डॉक्टरी ज़ुबान में उन्हें ओवरवेट माना जाएगा. वहीं अगर किसी व्यक्ति का बॉडी मास इंडेक्स 30 है तो उन्हें मोटापे की श्रेणी में रखा जाएगा. जैसे-जैसे बॉडी मास इंडेक्स बढ़ता जाता है मोटापे की श्रेणी भी बढ़ती जाती है.
    लेकिन अगर कोई ये सोचकर निश्चिंत है कि उसे मोटापा नहीं है और सिर्फ़ उसका वज़न अधिक है तो ये ग़लत है. ओवरवेट होते ही स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां शुरू हो जाती हैं. ओवरवेट लोगों को दिल से जुड़ी बीमारियां, स्ट्रोक, डायबिटीज़, कैंसर, यूरिक एसिड बढ़ने की वजह से जोड़ों के दर्द की परेशानी, गॉल-ब्लेडर से जुड़ी परेशानी हो सकती है. ऐसे लोगों को नींद से जुड़ी तकलीफ़ भी हो जाती है.
    बॉडी मास इंडेक्स का मक़सद यह बताना है कि कोई व्यक्ति मोटा है, पतला है या सामान्य श्रेणी में आता है. इसकी मदद से पता चलता है कि सही वज़न क्या होना चाहिए. व्यक्ति का वज़न पता कर उनकी लंबाई से भाग दे कर बॉडी मास इंडेक्स (BMI) का आसानी से पता लगाया जा सकता है. यहां ज़रूरी है कि शख्स़ की लंबाई मीटर स्क्वायर में हो.
    मोटापा होता कितने तरह का है?
    शोधकर्ताओं ने अभी तक छह प्रकार के मोटापे की पहचान की है.
    1. आनुवांशिक मोटापा
    आपने देखा होगा कि कुछ परिवारों में लगभग सभी लोग मोटे होते हैं. इसकी दो वजहें हो सकती हैं. हो सकता है कि परिवार में खाने-पीने की आदत की वजह से वो मोटे हों या फिर उनका मोटापा आनुवांशिक (जेनेटिक) हो. आनुवांशिक मोटापे से निजात पाना काफ़ी मुश्किल होता है लेकिन डाइट कंट्रोल करके इससे छुटकारा पाया जा सकता है.
    2. खाने-पीने से जुड़ा मोटापा
    मोटापे का ये सबसे जाना पहचाना प्रकार है. लाइफ़स्टाइल के चलते अक्सर इस वजह से मोटापे की आशंका बढ़ जाती है. ये मोटापे का सबसे सामान्य कारण है वहीं इससे निजात पाना भी सबसे आसान है. डाइट कंट्रोल करके इसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है.
    3. अनियमितता से जुड़ा मोटापा
    कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी भूख और संतुष्टि के बारे में समझ ही नहीं आता. अभी खाना खाए और अभी भूख लग गई. ऐसे लोगों को हर समय खाने की इच्छा होती है और यही मोटापे की वजह बनती है.
    4. नर्वस ओबेसिटी
    खाना खाने से वैसे तो दिमागी संतुष्टि मिलती है. लेकिन जिन लोगों को मनोवैज्ञानिक दिक्क़त होती है या फिर अवसाद से ग्रसित होते हैं वो खाने के दौरान अपनी ही चिंताओं में लीन रहते हैं. ऐसे में अकसर भूख से ज़्यादा खाना खाते हैं, जिसकी वजह से मोटापे के शिकार हो जाते हैं.
    5. हॉर्मोनल ओबेसिटी
    हॉर्मोन्स के असंतुलन के चलते भी मोटापा होता है और ये मोटापे का एक प्रकार है.
    6.थर्मोजेनिक ओबेसिटी
    जितना हम खाते हैं, अगर वो एनर्जी शरीर से बाहर नहीं निकले तो चर्बी के रूप में जमती चली जाती है. ये मोटापे का कारण बनता है.
    मोटापा क्यों ख़तरनाक है?
    डायटिशियन और वेलनेस एक्सपर्ट डॉक्टर शालिनी मानती हैं कि ओबिसिटी और मोटापा आज के समय की एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या है और इसका सीधा संबंध हमारे लाइफ़स्टाइल से है.
    वो कहती हैं, "इसमें कोई शक़ नहीं है कि दिल से जुड़ी बीमारियों जैसे कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक के पीछे मोटापा एक वजह है. मोटापा बढ़ने के साथ ही बीपी बढ़ने लगता है, मधुमेह हो जाता है, कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है और इन सबका संयुक्त असर कार्डियक अरेस्ट के रूप में नज़र आता है."
    डॉ. शालिनी मानती हैं कि भारतीयों के मौजूदा डाइट में फ़ैट और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बढ़ती जा रही है और प्रोटीन की मात्रा घट रही है, जिसका सीधा असर दिल पर पड़ता है. इसके अलावा शारीरिक व्यायाम कम हो गया है, ऐसे में ख़तरा तो है ही.
    ओबिसिटी फाउंडेशन की एक स्टडी के मुताबिक़, 30 से ज़्यादा बीमारियां, मोटापे से जुड़ी हुई हैं, जिनमें गठिया, अनिद्रा, कैंसर और दिल से जुड़ी बीमारियां शामिल हैं.
    इन लोगों में आकस्मिक मौत का ख़तरा बढ़ जाता है.
    डॉ. शालिनी मानती हैं कि आजकल की ज़्यादातर बीमारियों के लिए मोटापा ही ज़िम्मेदार है और मोटापे के लिए लाइफ़स्टाइल.
    अमरीकन कॉलेज ऑफ़ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, जो लोग मोटापे का शिकार होते हैं या मोटापे से पीड़ित होते हैं उनमें सडन कार्डियक अरेस्ट की आशंका बढ़ जाती है.
    ऐसे में सवाल ये उठता है कि मोटापा, दिल को कैसे नुकसान पहुंचाता है और कार्डियक अरेस्ट की वजह बनता है. पर सबसे ज़रूरी ये समझना है कि कार्डियक अरेस्ट है क्या?
    सडन कार्डियक अरेस्ट और दिल के दौरे में फ़र्क होता है. दिल का दौरा तब आता है जब दिल को पहुंचने वाले ख़ून में किसी वजह से रुकावट आ जाए. वहीं कार्डिएक अरेस्ट में किसी गड़बड़ी की वजह से दिल अचानक काम करना बंद कर देता है.
    इस स्थिति में व्यक्ति बेहोश हो जाता है, सांस चलनी बंद हो जाती है और अगर तुरंत मदद न मिले तो जान भी जा सकती है.
    मोटापा
    मोटापे से कैसे जुड़ा हुआ है कार्डियक अरेस्ट ?
    दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रमुख डॉक्टर विवेका कुमार के अनुसार मोटापा, सडन कार्डियक अरेस्ट की एक वजह हो सकता है.
    "मोटापे के चलते कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है जो सडन कार्डियक अरेस्ट की वजह बनता है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है ख़तरा बढ़ता जाता है."
    लेकिन इसका उपाय क्या है?
    डॉक्टर विवेका कुमार का मानना है कि कि इलाज से कहीं बेहतर है कि शुरू से ही सावधानी बरती जाए. "जैसे ही वज़न 4 या 5 किलो बढ़े, खुद को लेकर सतर्क हो जाएं क्योंकि अगर एक बार मोटापा बढ़ गया तो उसे कम करना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसलिए शुरू से ही ध्यान दें."
    डॉक्टर कुमार के अनुसार,
    - खाने-पीने में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा का संतुलन होना ज़रूरी है.
    - खाने में फल, सलाद की मात्रा ज़रूर रखें.
    - नियमित एक्सरसाइज़ करें.
    उन्होंने बताया कि ये आदतें सिर्फ़ दिल को ही स्वस्थ नहीं रखतीं बल्कि कई दूसरी बीमारियों से भी सुरक्षित रखती हैं.
    रोज़ व्यायाम करके शरीर का एक्स्ट्रा फ़ैट बर्न किया जा सकता है और कोलेस्ट्रॉल लेवल नियंत्रित रहता है. लेकिन मोटापे की समस्या बड़ी है तो डॉक्टर की सलाह से मेडिकल ट्रीटमेंट सही रहेगा. वैसे जिन लोगों को आनुवांशिक मोटापा होता है उन्हें भी इसकी सलाह दी जाती है.
    (बीबीसी)

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • महिलाओं की आजकल की लाइफस्टाइल में यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) आम रोग बन चुका है. इसका सबसे बड़ा कारण है गंदे शौचालयों का इस्तेमाल. यह सबसे ज्यादा वर्किंग वुमन को होता है, क्योंकि वही सबसे ज्यादा अस्वच्छ शौचालयों की गिरस्त में आती हैं. अगर इस रोग का समय का इलाज नही किया गया तो यह किडनी को प्रभावित कर सकती है. इसीलिए जरूरी है कि यूटीआर (Urinary Tract Infection) से बचने के लिए सावधानियां बरती जाएं. 

    महिलाओं के बीच यूटीआई जिसे मूत्र मार्ग संक्रमण भी कहा जाता है, का सबसे सामान्य और प्रचलित कारण वेस्टर्न स्टाइल के टॉयलेट हैं जहां इस संक्रमण का जोखिम अधिक बढ़ जाता है. 15 से 40 की उम्र के बीच यह समस्या अधिक देखी जाती है.

    गुरुग्राम स्थित नारायणा सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल के वरिष्ठ सलाहकार व निदेशक डॉ. विकास जैन (यूरोलॉजी व रीनल ट्रांसप्लांट) ने बताया, "बुनियादी तौर पर यूटीआई की समस्या मूत्रत्याग के समय किसी भी प्रकार की बाधा के कारण होती है. लेकिन शौचालय का इस्तेमाल करते वक्त स्वच्छता का ध्यान ना रखना इस संक्रमण का आम कारण है. यूटीआई का एक कारण गर्मियों में दूषित पानी का सेवन और निर्जलीकरण (डीहाइड्रेशन) और नियंत्रित डायबिटीज भी यूटीआई को बुलावा दे सकता है. 

    संक्रमण से बचाव पर बात करते हुए विकास ने बताया, "हमेशा स्वच्छ शौचालय का प्रयोग करना चाहिए, स्वच्छता किसी भी रोग से बचने का सबसे बड़ा उपाय है. चूंकि यह रोग पुरुष व महिला दोनों को प्रभावित करता है इसलिए सुरक्षित यौन संबंध इससे बचने का एक तरीका हो सकता है. अगर किसी को यूटीआई हो गया तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए क्योंकि समय रहते इलाज न होने पर यह गंभीर रोगों को दावत दे सकता है." 
    एक रिपोर्ट के अनुसार, गंदे शौचालयों या शौचालयों की कमी जैसे कारणों के साथ भारत में लगभग 50 फीसदी महिलाएं यूटीआई से पीड़ित हैं. 
    नई दिल्ली के श्रीबालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के यूरोलॉजिस्ट डॉ. अतुल गोस्वामी बताते हैं, "पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस रोग से अधिक प्रभावित होती हैं. खासतौर पर युवा महिलाओं में यूटीआई की शिकायत बहुत आम है. यह रोग किडनी पर भी दुष्प्रभाव डाल सकता है. ऐसा देखा गया है कि पुरुषों में 45 की उम्र के बाद यह परेशानी शुरू होती है और ज्यादा उम्र के पुरुषों को यह बीमारी प्रोस्टेट ग्रंथि के बड़ा होने, डायबिटीज, एचआईवी या फिर यूरिनरी ट्रैक्ट में स्टोन होने के कारण होती है. चूंकि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में यूरेथ्रा छोटा होता है, इसलिए बैक्टीरिया यूरिनरी ब्लाडर को जल्दी प्रभावित करते हैं." 

    वह कहते हैं, "इससे बचने के लिए ज्यादा से ज्यादा पानी पीना चाहिए. कम पानी पीने से न केवल डीहाइड्रेशन होता है बल्कि यूटीआई से भी पीड़ित हो सकते हैं. सार्वजनिक शौचालयों का उपयोग न करना ही बेहतर है. टॉयलेट आने पर उसे अधिक समय रोके नहीं चाहिए. गर्मियों में देश में ऑनलाइन चिकित्सीय सेवा उपलब्ध कराने वाली शीर्ष संस्था हेल्दियंस की हेड क्वालिटी विभाग से डॉ. मंजुला सरदार ने बताया, "प्रत्येक पांच महिलाओं में से एक महिला को अपने जीवन में कम से कम एक बार यूटीआई की समस्या से गुजरना पड़ता है. सार्वजनिक शौचालय का उपयोग संक्रमण के फैलाव के प्रमुख कारणों में से एक है. नौकरी पेशा के लिए सार्वजनिक शौचालयों से परेहज करना मुश्किल है ऐसी स्थिति में सबसे साधारण और जरूरी उपाय है कि महिलाओं को शौचालय उपयोग करने से पहले और बाद में शौचालय को फ्लश और शौचालय की सीट पर पानी डालकर सूख नैपकिन से साफ कर लेना चाहिए. इसके अलावा बहुत सारा पानी और संतुलित आहार हर तरह के रोग से बचाव का कारगर तरीका है." (NDTV)

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • आज विश्‍व जनसंख्‍या दिवस (World Population Day) है, जिसका मकसद जनसंख्‍या से जुड़े मुद्दों की ओर लोगों का ध्‍यान खींचना है. जहां तक इन मुद्दों पर काम करने की बात है तो इसका जिम्‍मा भी महिलाओं के कंधों पर ही है. प्रकृति ने महिलाओं को बच्‍चा जनने की ताकत दी, लेकिन हमारे समाज ने जनसंख्‍या को रोकने का काम भी उसी को दे दिया. प्रेग्‍नेंसी रोकने के लिए हर बार महिलाओं को ही परेशान होना पड़ता है. कभी पिल्स तो कभी तमाम नुस्खे. हालांकि पुरुष भी बर्थ कंट्रोल में बराबर की भूमिका निभा सकते हैं क्‍योंकि उनके लिए भी मेडिकल साइंस में कई ऑप्‍शन मौजूद हैं. इसके बावजूद पुरुष इन तरीकों को अपनाना ज़रा भी पसंद नहीं करते. और तो और पुरुष कंडोम का इस्‍तेमाल करने से भी झिझकते हैं जो कि बर्थ कंट्रोल का सबसे आसान और कारगर तरीका है. वैसे पुरुषों के लिए कंडोम के अलावा भी बर्थ कंट्रोल के कई तरीके हैं, जिनसे अनचाही प्रेग्नेंसी से बचा जा सकता है और सेक्सुअल लाइफ पर भी कोई असर नहीं पड़ता. 

    प्रेग्‍नेंसी के दौरान सेक्‍स: जानिए क्‍या है सच्‍चाई और क्‍या है झूठ?
     
    आज World Population Day 2018 के मौके पर जानिए उन 5 तरीकों के बारे में, जिनसे पुरुष अपने पार्टनर को अनचाही प्रेग्नेंसी से बचा सकते हैं.

    साल के इन तीन महीनों में दोगुनी हो जाती है मां बनने की संभावना
     
    कंडोम (Condom)
    प्रेग्नेंसी को रोकने का सबसे आसान और पॉपुलर तरीका है कंडोम (Condom). बाज़ार में महिला और पुरुष दोनों के लिए कंडोम मौजूद है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रचलित मेल कंडोम ही है. 

    खाने की इन 6 चीजों की वजह से पुरुष बन रहे हैं बांझ
     
    पुरुष नसबंदी या वासेक्टोमी (Vasectomy)
    यह एक परमानेंट बर्थ कंट्रोल है, जिसमें सर्जरी के जरिए स्पर्म को रोका जाता है और पार्टनर के प्रेग्नेंट होने का खतरा टल जाता है. इस सर्जरी के बाद भी सेक्सुअल लाइफ पहले जैसी ही रहती है. यह तरीका भारत में बेहद आम है, इसे बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने कई परामर्श केंद्र भी खोले हुए हैं, जहां वासेक्टोमी (Vasectomy) से जुड़े हर सवाल का जवाब दिया जाता है. हालांकि नसबंदी को लेकर पुरुषों में कई भ्रम हैं. उन्‍हें लगता है कि नसबंदी कराने से उनकी 'मर्दानगी' पर असर पड़ेगा. लेकिन इस बात में कोइ सच्‍चाई नहीं है. नसबंदी के बाद भी पुरुष सेक्‍सुअल लाइफ का पूरा मजा ले सकते हैं.

    Sperm को कम कर रही हैं आपकी रोज़ाना की ये 6 आदतें
     
    वैसेल जेल (Vasalgel)
    यह एक तरह का नॉन-हार्मोनल कॉन्ट्रासेप्टिक है, जिसमें वीर्यपात (ejaculation) के दौरान स्पर्म नहीं निकलते. इस जेल (Gel) को इंजेक्शन के जरिए वास डेफरेंस में डाला जाता है,जिसके बाद यह जेल स्पर्म को बाहर आने से रोक देता है. यह जैल परमानेंट नहीं होता बल्कि कुछ सालों बाद इसे फिर से वास डेफरेंस में इजेक्ट किया जाता है. इसकी शुरुआत 2018 में ही हुई है.
    RISUG
    इसका अर्थ है रिवर्सेबल इन्हीबिशन ऑफ स्पर्म अंडर गाइडेंस  (reversible inhibition of sperm under guidance). इसे IIT खड़गपुर से डॉ. सुजॉय के गुहा की टीम ने बनाया है.RISUG को भी वास डेफरेंस में इंजेक्शन के जरिए जेल डालकर स्पर्म को रोका जाता है. ठीक वैसेल जेल प्रक्रिया की तरह, लेकिन RISUG में जैल स्पर्म को रोकता नहीं बल्कि नष्ट कर देता है.
     
    विड्रॉल (Withdrawal)
    यह एक प्रकार का मेल बर्थ कंट्रोल का तरीका है, जिसे Coitus Interruptus और Pull-out method भी कहा जाता है. इसमें इंटरकोर्स (Sex) के दौरान ऑर्गेज्म से पहले ही पुरुष पीनिस (Penis) को वेजिना (Vagina) से बाहर निकाल लेता है. इससे वीर्यारोपण ( Insemination) नहीं हो पाता और प्रेग्नेंट होने के चांसेस कम हो जाते हैं. हालांकि इसका सक्‍सेस रेट काफी कम है बावजूद इसके ये सबसे ज्‍यादा प्रचलित तरीका है. (NDTV)

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Posted Date : 10-Jul-2018
  • नई दिल्ली, 10 जुलाई। रांची में मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर बच्चों को बेचने का आरोप लगा है, 14 मई 2018 को उत्तर प्रदेश के एक दंपत्ति के साथ एक लाख बीस हजार रुपये में इस बच्चे का सौदा किया गया। झारखंड पुलिस का दावा है कि गिरफ्तार की गई महिलाकर्मियों ने बच्चों को बेचने की बात स्वीकार कर ली है। इस मामले में सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि बच्चे को गोद दिए जाने में क्या नियमों की अनदेखी की गई।
    क्या बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया में पैसों का लेने-देन होता है? या फिर नियमों को ताक पर रखकर बच्चे का सौदा किया गया? अमूमन किसी संस्था से बच्चे को गोद लेने के लिए भावी मां-बाप को कई तरह की प्रक्रियाओं से गुजरना होता है।
    केन्द्र सरकार ने इसके लिए सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी गठित की है। ये संस्था महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है।
    सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी को कारा नाम से जाना जाता है। यह संस्था नोडल बॉडी की तरह काम करती है। कारा मुख्य रूप से अनाथ, छोड़ दिए गए और आत्म-समर्पण करने वाले बच्चों के अडॉप्शन के लिए काम करती है। साल 2015 में बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया के नियमों में संशोधन किया गया।
    बच्चे को गोद लेना एक लंबी कानूनी प्रक्रिया जरूर है, लेकिन इसमें कहीं भी पैसे के लेन-देन का जिक्र नहीं है। यहां तक कि गोद लेने वाले माता-पिता से नियमानुसार ये भी नहीं कहा जा सकता कि वे बच्चे के नाम पर कोई बॉन्ड लें या इनवेस्टमेंट करें।
    नियमों के मुताबिक- संभावित मां-बाप को शारीरिक रूप से, मानसिक तौर पर, भावनात्मक रूप से और आर्थिक दृष्टि से सक्षम होना जरूरी है। यह बात प्रमाणित होनी चाहिए कि संभावित अभिभावकों को कोई जानलेवा बीमारी न हो।
    कोई भी संभावित माता-पिता जिनकी अपनी कोई जैविक संतान हो या न हो, वे बच्चा गोद ले सकते हैं। बशर्ते...अगर संभावित अभिभावक शादीशुदा हैं तो उन दोनों की आपसी सहमति होना जरूरी है। एक सिंगल महिला किसी भी लिंग के बच्चे को गोद ले सकती है। जबकि एक सिंगल पुरुष सिर्फ लड़के को ही गोद ले सकता है।
    संभावित मां-बाप अगर दो साल से ज्यादा वक्त से शादीशुदा हों, तभी वो बच्चा गोद ले सकते हैं। बच्चा गोद लेने के लिए मां-बाप की उम्र एक बेहद अहम पहलू है। इसके तहत कम उम्र के बच्चे को गोद लेने के लिए मां-बाप की औसत उम्र कम होनी चाहिए।
    संभावित माता-पिता और गोद लिए जाने वाले बच्चे के बीच उम्र का फासला कम से कम 25 साल होना ही चाहिए, लेकिन यह नियम उस समय लागू नहीं होता है जब गोद लेने वाले संभावित माता-पिता रिश्तेदार हों या फिर सौतेले हों।
    जिन लोगों के पहले से ही तीन या इससे अधिक बच्चे हैं वे लोग बच्चा गोद लेने के लिए योग्य नहीं हैं। लेकिन विशेष स्थिति में वे भी बच्चा गोद ले सकते हैं। सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के मुताबिक, किसी बच्चे को गोद लेने के लिए सबसे पहले इन 10 कागजात का होना जरूरी है। इनके बिना प्रक्रिया शुरू भी नहीं हो सकती।
    ये कागजात हैं जरूरी- बच्चे को गोद लेने के इच्छुक परिवार की मौजूदा तस्वीर या फिर उस दंपत्ति और शख्स की मौजूदा तस्वीर। जो शख्स बच्चे को गोद लेना चाह रहा है, उसका पैन कार्ड। जन्म-प्रमाणपत्र या कोई भी ऐसा डॉक्यूमेंट जिससे उस शख्स की जन्मतिथि प्रमाणित हो।
    निवास प्रमाण पत्र (आधार कार्ड/ वोटर आईडी/ पासपोर्ट/ नवीनतम बिजली का बिल/ टेलीफोन बिल), उस साल के इनकम टैक्स की प्रामाणिक कॉपी। किसी सरकारी चिकित्सा अधिकारी का हस्ताक्षरित प्रमाण पत्र जिससे इस बात की पुष्टि होती हो कि जो शख्स बच्चे को गोद लेने जा रहा है, उसे किसी तरह की कोई गंभीर बीमारी तो नहीं है। गोद लेने के इच्छुक दंपत्ति को अपने-अपने मेडिकल सर्टिफिकेट जमा कराने होंगे। शादी का प्रमाण पत्र ( अगर शादीशुदा हैं तो),  अगर शख्स तलाकशुदा है तो उसका प्रमाणपत्र।
    गोद लेने के पक्ष में इच्छुक व्यक्ति से जुड़े दो लोगों का बयान, अगर इच्छुक व्यक्ति का कोई बच्चा पहले से ही है और उसकी उम्र पांच साल से अधिक है तो उसकी सहमति।
    इन कागजातों के पूरे होने के बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ती है। बच्चा गोद लेने के लिए ऑनलाइन आवेदन भी किया जा सकता है। अगस्त 2015 में बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया और नियमों में कुछ संशोधन किए गए और कोशिश की गई कि गोद लेने की प्रक्रिया को और आसान बनाया जाए।
    ये सारी योग्यताएं एक आम भारतीय नागरिक के लिए होती हैं। लेकिन गोद लेने की प्रक्रिया को कई श्रेणियों में बांटा गया है। मसलन, एनआरआई, इंटर-स्टेट, सौतेले माता-पिता या फिर रिश्तेदारों द्वारा गोद लेने के लिए अलग-अलग नियम हैं। (बीबीसी)

     

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Posted Date : 08-Jul-2018
  • एक नए शोध में पता चला है कि सूखे मेवे खाने से पुरुषों के शुक्राणुओं की गुणवत्ता बेहतर होती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन पुरुषों ने 14 हफ़्तों तक रोज़ाना दो मुट्ठी अखरोट, बादाम और हेज़ल नट खाए ना सिर्फ़ उनके शुक्राणुओं की ताक़त बढ़ गई बल्कि उनके तैरने की रफ़्तार में भी इज़ाफ़ा हुआ.
    इस शोध के नतीजे ऐसे समय में आए हैं जब पश्चिमी देशों के मर्दों के शुक्राणुओं की संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है. इसे प्रदूषण, धूम्रपान और सेहत को नुक़सान पहुंचाने वाली ख़ुराक से जोड़कर देखा जा रहा है. 
    वैज्ञानिकों का कहना है कि अच्छी और संतुलित ख़ुराक से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है. हर सात में से एक दंपति को बच्चे पैदा करने में दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है. तक़रीबन आधे जोड़ों में इसकी वजह मर्द होते हैं.
    वैज्ञानिकों ने 119 सेहतमंद पुरुषों पर शोध किया. उनकी उम्र 18 से 35 साल के बीच थी. इन मर्दों को दो समूहों में बांट दिया गया. इसमें से एक समूह को रोज़ाना 60 ग्राम सूखे मेवे खाने को दिए गए जबकि दूसरे समूह की ख़ुराक पहले जैसी ही रखी गई. इस शोध से वैज्ञानिकों ने पता किया कि मेवे खाने वाले मर्दों के शुक्राणुओं में 14 फ़ीसदी बढ़ोत्तरी हुई जबकि उनकी सेहत पहले से चार फ़ीसदी बेहतर हुई. यही नहीं, शुक्राणुओं के तैरने की ताक़त में भी छह फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ.
    विशेषज्ञों के मुताबिक इस शोध से उन दूसरे शोधों की भी पुष्टि होती है जिनके मुताबिक ओमेगा-3, फैटी एसिड और एंटी ऑक्सीडेंट से युक्त भोजन खाने से प्रजनन क्षमता बेहतर होती है. मेवों में ये सभी पोषक तत्व और अन्य पोषक तत्व होते हैं.
    शोध करने वाले स्पेन की रोवीरा वर्जीली यूनिवर्सिटी के डॉक्टर अल्बर्ट सालास ह्यूतोस कहते हैं, "वैज्ञानिक सबूत इकट्ठे कर रहे हैं कि अच्छी ख़ुराक से प्रजनन क्षमता बेहतर करने में मदद मिलती है." हालांकि वैज्ञानिकों का ये भी कहना है कि जिन मर्दों पर ये शोध किया गया है वो सेहतमंद थे और ये देखना अभी बाक़ी है कि कमज़ोर मर्दों पर इसके असर कैसे होंगे.
    यूनीवर्सिटी ऑफ़ शेफ़ील्ड के पुरुषविज्ञान विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एलन पेसी कहते हैं कि ऐसा भी हो सकता है कि मेवे खाने वाले मर्दों ने अपने जीवन में और कोई भी सकारात्मक बदलाव किए हों जिन्हें शोध में शामिल नहीं किया गया हो. प्रोफ़ेसर एलन शोधकर्ताओं में शामिल नहीं थे.
    लंदन के एक पुरुष अस्पताल में क्लीनिकल एंब्रायोलॉजिस्ट रहीं डॉ. वर्जीनिया बॉल्टन का कहना है कि शोध के नतीजे सैद्धांतिक तौर पर तो रोचक हैं लेकिन ये कहना नामुमकिन है कि उनका गर्भाधान की संभावना बढ़ाने में क्या योगदान हो सकता है. वो कहती हैं, "लेकिन जब तक हमें सभी सवालों के जवाब नहीं मिल जाते हमें अपने मरीज़ों से कहना चाहिए कि वो धूम्रपान और शराब पीना छोड़ दें, अच्छा खाएं और सेहतमंद जीवन जिएं." शोध के ये नतीजे बार्सीलोना में यूरोपियन सोसायटी ऑफ़ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एंब्रायोलॉजी की बैठक में पेश किए गए. (BBC)

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