विष्णु नागर

31-Jul-2020 12:04 PM

-विष्णु नागर

प्रधानमंत्री बीच- बीच में कुछ अच्छे काम भी करते रहते हैं, जिन पर उनके आलोचकों की दृष्टि नहीं जाती।कोरोना की वजह से ही सही प्रधानमंत्री इस बीच विदेश तो गए ही नहीं, देश में भी एक जगह गये पश्चिम बंगाल के बाढग़्रस्त क्षेत्रों का दौरा करने। असम और बिहार की बाढ़ देखने भी नहीं गए। सोचा होगा सारी बाढ़ें एक जैसी होती हैं। इनमें कोई सेंसेशन नहीं है। छड्डो जी, वेख कर भी की होणा ए। अब कोरोना के आगमन के बाद पहली बार वह विशिष्ट जनता के बीच जाएँगे -अयोध्या में रामलला का मंदिर बनवाने- खतरा उठाते हुए।भगवान राम के लिए वह स्वास्थ्य तो क्या जीवन भी बलिदान कर सकते हैं।

इस बीच प्रधानमंत्री ने कहीं न जाकर देश का सैकड़ों करोड़ रुपया बचाया है, इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए थी मगर उनके मंत्रियों तक ने ऐसा नहीं किया तो विरोधियों से ही क्या अपेक्षा रखना! राहुल गाँधी से तो बिल्कुल ही नहीं। शायद मैं पहला व्यक्ति हूँँ, जो इसकी प्रशंसा करने की हिम्मत कर रहा है। शाबाश पट्ठे विष्णु नागर। इसके बावजूद मुझे मालूम है कि इसके लिए मेरी तारीफ स्वयं मोदीजी तो क्या, उनका कोई चंगूमंगू भी नहीं करेगा मगर कोई बात नहीं। अब आदत सी हो गई है इस सबकी। कोरोना की तरह, यह भी एक मजबूरी है। चलिए फिर भी अपन ने अपना धर्म निभा दिया। ऊपरवाले मेरी तरफ से आँख मत मीच लेना, याद रखना मेरे इस योगदान को।

अब मोदीजी का दूसरा अच्छा काम। इधर राममंदिर बन रहा है, उधर पाँच राफेल लड़ाकू विमान भी धूमधाम से भारत पधार गए हैं।मुझे खुशी होती अगर प्रधानमंत्री स्वयं उनका स्वागत करने जाते। नहीं गए, यह मेरे खयाल से गलत हुआ। पर वे प्रधानमंत्री हैं, गलती भी वही करेंगे, उनकी तरफ से मैं तो नहीं कर सकता! एलाऊ भी नहीं है। यह उनका अधिकार क्षेत्र है। राफेल में परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता भी है। यानी मोदीजी, भगवान के भरोसे भी हैं और राफेल के भरोसे भी। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि उन्हें भगवान से अधिक भरोसा राफेल पर है। प्रशंसक बताते हैं कि इससे बढिय़ा लड़ाकू विमान पाकिस्तान तो क्या चीन के पास भी नहीं है। इसका नाम सुनते ही चीन के होश उड़ गए हैं तो पाकिस्तान का हाल क्या हुआ होगा, आप समझ ही सकते हैं। मोदीजी और गोदी चैनलों के एंकर-एंकरानियाँ, इस पर तो होना चय्ये बल्ले-बल्ले। घर-घर दिए जलने चय्ये थे मगर लोग भी गलती कर रहे हैं। यथा राजा, तथा प्रजा।

वैसे अब ये सब क्या याद करना गलत है कि मनमोहन सरकार 126 राफेल विमानों का सौदा कर रही थी और मोदीजी 36 से ही संतुष्ट कैसे हो गए, यह सीक्रेट है। वैसे कहते हैं, संतोषी सदा सुखी।इस बहाने एक कंगाल उद्योगपति की भी मदद हो गई, अच्छी बात है। वैसे भी मोदीजी को बैंकों को कंगाल करनेवाले मगर खुद संपन्न होकर विदेश भाग जानेवाले उद्योगपतियों को ज्यादा पसंद करते हैं।

ऐसों पर भी वह कृपा करते हैं, जो देशभक्त रहे, लूट कर भागे नहीं। कायर नहीं थे। और ऐसों पर तो उन्हें विशेष कृपा करना चाहिए, जो भागे नहीं मगर देशी-विदेशी बैंकों का पैसा जीम कर यहीं बैठे हैं। वैसे मोदीजी की दयालुता विश्व प्रसिद्ध है। सुना है कि अब यह ब्रह्मांड प्रसिद्ध भी होने जा रही है।इससे भारत का गौरव बहुत बढ़ेगा।इस पर सभी भारतीयों को गर्व होना चाहिए और इसकी अभिव्यक्ति भी गीत, संगीत, नृत्य, कविता, फिल्मों आदि माध्यमों से होना चाहिए।मेरा काम सुझाव देना था, दे दिया। बाकी आपकी इच्छा।मैं अवसर के अनुकूल कविता नहीं लिख पाता हूँ। इस मामले में मैं दिव्यांग हूँ वरना मैं भी पीछे रहनेवालों में नहीं हूँ।

राममंदिर पर तो उत्साह का इजहार मैं पिछले ही हफ्ते कर चुका था। अब फिर से करना चाहता था मगर इस बीच मन पर उदासी की छाया पड़ चुकी है। पता चला कि आडवाणी जी के भगीरथ प्रयत्नों से जो बाबरी मस्जिद गिराई गई थी और दंगे हुए थे (या कराए गए थे), उसके 18 साल बाद जिस मंदिर का शिलान्यास मोदीजी करने जा रहे हैं, वह भव्य तो होगा मगर इतना भव्य भी नहीं होगा कि विश्व का सबसे भव्य और दिव्य मंदिर कहलाने की योग्यता पा सके। और तो और भारत का भी सबसे भव्य-दिव्य कहला सके, इस काबिल भी नहीं हो सकेगा। यह विश्व का पाँचवा और भारत का दूसरा बड़ा मंदिर होगा। सुना है कि यह सुनकर मोदीजी के प्रति भक्तों का विश्वास डोलने लगा है।वे कह रहे हैं, अच्छा हुआ, हमें नहीं बुलाया गया वरना मोदीजी को तो अपनी बदनामी की परवाह नहीं मगर हमें तो अपनी इज्ज़त की परवाह है! खत्म होने दो कोरोना संकट, विरोधस्वरूप अब हम स्वयंसेवक अंगकोरवाट मंदिर जाएँगे, अयोध्या नहीं। उनकी इस बात से तो मैं भी इत्तफाक रखता हूँ और मैंने भी अटैची तैयार रखी है।मैं भी वहीं जाऊँगा।

डिसकस तो मोदीजी की अन्य उपलब्धियों को भी करना चाहता था मगर बहते आँसुओं के बीच मुझसे लिखा नहीं जा रहा। वैसे जाते -जाते इतना कह दूँ कि मोदीजी ने कोरोना को ‘‘जन आंदोलन’’ बना कर अच्छा किया। इस कारण ही शायद रोज पचास हजार लोग इसकी चपेट में रहे हैं। ‘जनांदोलन’ बनाए बिना यह संभव नहीं था। यह भी कमाल है कि उन्होंने अपने बंगले में बैठे- बैठै इसे ‘जनांदोलन’ बना दिया!


26-Jul-2020 5:23 PM

विष्णु नगर 

वैसे तो भगवान श्री राम की किरपा से सभी कुछ बहुत ठीक है।बस यहाँ मंदिरों की कमी अब बहुत खलने लगी है। भव्य मंदिर तो पूरे देश में एक भी नहीं और भगवान श्री राम का तो अखंड भारत में भी नहीं।अयोध्या तक में भव्य तो छोड़ो,टपरिया वाला मंदिर भी नहीं है।ऐसे में अतीव प्रसन्नता की बात है कि अब माननीय प्रधानमंत्री 32 सेकंड के अत्यंत शुभ अभिजीत मुहूर्त में उसकी आधारशिला रखने जा रहे हैंं ,जो अगले आम चुनाव से ठीक पहले तैयार हो जाएगा और मोदी जी द्वारा एक नायाब तोहफे के रूप में राष्ट्र को समर्पित कर दिया जाएगा।ताली।भगवान श्रीराम की जय।मोदी जिंदाबाद।

यह सही है कि इस देश में सरकारी स्कूल भी बहुत हैं,कालेज तो खैर बहुत हैं ही।शिक्षा का आलम यह है कि वहाँ से हर छात्र मोदीजी की तरह योग्य होकर बाहर आ रहा है। अस्पताल तो प्रधानमंत्री ने एक से एक, बढ़िया से बढ़िया गाँव -गाँव में खुलवा दिए हैं। जनता अब बीमार पड़ना सीख चुकी है,ताकि विश्वस्तरीय चिकित्सा सेवा को सफल बनाने में अपना विनम्र योगदान देकर भारत की कीर्ति चहुंओर फैला सके।खेतों में बारह महीने फसलें लहराने लगी हैं। किसान काट- काट कर परेशान भी हैं और खुशहाल भी।फसलों का न्यूनतम क्या अधिकतम मूल्य उन्हें मिल रहा है।कारखानों के मजदूर कमा- कमा कर मोटे और शक्तिशाली हो रहे हैं। इतना अधिक उत्पादन हो रहा है कि चीन-अमेरिका और यूरोप के देश भी हीनभावना से ग्रस्त हो गए हैं।सब तरफ इंडिया का यानी मोदी जी का डंका बज रहा है बल्कि बजानेवाले इतने अधिक हैं कि डंकों का अभाव हो गया है।भारत ने आश्वासन दिया है कि अंबानी-अडाणी प्राइवेट लिमिटेड जल्दी ही डंकों के अभाव की आपूर्ति कर देगी।एक भी प्राणी को डंके के अभाव में मरने नहीं दिया जाएगा।पशु-पक्षी भी माँग करेंगे तो उन्हें भी प्राथमिकता के आधार पर आपूर्ति की जाएगी।एक ही शर्त है कि पेमेंट आनलाइन हो।

इस बीच चीन ने ' मेड इन चाइना ' डंकों की आपूर्ति करने का प्रयास किया था मगर पूरी दुनिया ने इन्हें रिजेक्ट कर दिया।सबने कहा कि जो बात ' न्यू इंडिया ' के मोदी ब्रांड डंके मेंं है, वह शी ब्रांड चीनी डंके में कहाँ! चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सिर पकड़ कर बैठे गा रहे हैं कि क्या से क्या हो गया बेवफा.. और उन्हें कोई दिलासा दे नहींं रहा।मोदीजी ने ही मानवीयता के नाते उन्हें फोन पर कहा, अब मत करना कभी हमारी जमीन पर कब्जा करने की बदत्तमीजी!करोगे तो घुस के मारूँगा समझे लल्लू! ।फौरन पाँच सेकंड में हमारी जमीन खाली कर दो।नो चूँँ -चाँ।आराम से बैठोगे तो तुम्हारे डंकों पर 'मेड इन इंडिया' की मोहर लगवाकर दुनिया भर में सप्लाई करवा दूँगा।मंजूर हो तो बात करो।उसका नाम मगर मोदी डंका रखना पड़ेगा,वरना तुम जानते हो मुझे।

उधर शी जिनपिंग का इतना बुरा हाल है,इधर भारत सॉरी ' न्यू इंडिया ' में सब तरफ समृद्धि का आलम है।भूख- बीमारी की तो अब याद भी नहीं आती।कोरोना तो लंगोट छोड़कर भाग चुका हैै। मोदीजी ने पिछले छह साल में इतना अधिक कर दिया है कि लोग कह रहे हैं,मोदी जी अब और प्रगति नहीं।अब तो आप एक ठो राममंदिर अयोध्या में बनवा दो और आप बनवाओगे तो भव्य से कम तो बनवा ही नहीं सकतेे! अब देखो चीन की मदद से आपने नर्मदा किनारे, गुजरात में सरदार पटेल की कितनी शानदार और भव्य मूर्ति बनवाई है।इतनी भव्य कि इस कोरोना काल में भी विदेशी पर्यटक भारत सरकार से विशेष अनुमति लेकर स्पेशल फ्लाइट से उसे देखने के लिए टूटे पड़ रहे हैं।एकदूसरे के सिर पर पाँव रख कर पटेल साहब की मूर्ति देखने का आनंद ले रहे हैं।कह रहे हैं कि कोरोना-फोरोना से क्या डरना, अगर जीवन सार्थक करना है तो सरदार पटेल की प्रतिमा देखना जरूरी है। इसके बाद जान भी चली जाए तो वांदा नहीं।रोज दो- चार विदेशी इस भगदड़ में मृत्यु को प्राप्त होकर स्वर्ग का सुख भोगने के लिए धरा से प्रयाण कर रहे हैं मगर किसी को कोई शिकायत नहीं। इस कारण सभी भारतीयों को तो छोड़ो,गुजरातियों तक का वहाँ नंबर नहीं आ रहा है मगर नो प्राब्लम।डालर अतिथि देवो भव।

इधर आप भव्य संसद भवन भी बनवा रहे हो।आपके होते हुए कंगाली भी भव्यता के आड़े नहीं आ सकती।आपकी प्रतिज्ञा है कि इधर संसदीय व्यवस्था को मटियामेट करूँगा,उधर संसद भवन को भव्य बनवाऊँगा। क्या दूरदृष्टि है, क्या पक्का इरादा है! ब्रहमा, विष्णु, महेश सब आपकी अभ्यर्थना कर रहे हैं। पृथ्वी नामक ग्रह पर भारत नामक देश का नाम आपने इतना उज्जवल कर दिया है कि उसकी रोशनी से देवताओं की आँखों चुँधिया रही हैं।उनके अँधे होने का संकट पैदा हो गया है।कृपा करो हे मोदी देव की प्रार्थना वे कर रहे हैं।

तो ऐसे मोदी- राज में एक नहीं,दस करोड़ मंदिर भारत में बनेंगे। एक से एक भव्य और दिव्य। मंदिर ही भारत को जगत गुरु बनाने की असली कुंजी होगी। भारत पहले जगतगुरु था ही इसलिए कि भारत की हर गली,हर कूचे में एक मंदिर हुआ करता था। वह तो विदेशी आक्रांताओं ने सारे ध्वस्त कर दिए और देश में मंदिरों का ऐसा भयंकर अकाल पड़ गया कि लोगों को खेती और उद्योग धंधों में परिश्रम करने को विवश होना पड़ा।अब अयोध्या से नये विश्व गुरू काल का उद्भव हो रहा है। भविष्य में सब वर्णाश्रम धर्म के अनुसार मंदिर की सेवा करेंगे और इस तथा उस जीवन को अर्थवत्ता प्रदान करेंगे।
फिर से तालियाँ।


23-Jul-2020 12:34 PM

-विष्णु नागर

जब रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था

तो मैंने ही कहा था- ‘वाह-वाह, क्या बात है सम्राट’
जब रोम जल रहा था
और गरीब रोमनों को जलाकर
उन्हें मशालों में तब्दील किया जा रहा था
तो इसके आर्तनाद और चीख के बीच
खाने -पीने का सबसे ज्यादा आनंद
मैंने ही उठाया था
जिसे दो हजार साल बाद भी भूलना मुश्किल है
मैं आज भी सुन रहा हूँ नीरो की बाँसुरी
वही गिलास और वही प्लेट मेरे हाथ में है
वैसा ही है रोशनी का प्रबंध
सम्राट ने अभी पूछा मुझसे : ‘कैसी चल रही है पार्टी
कैसा है प्रबंध, कुछ और पीजिए, कुछ और खाइये’
नीरो मरने के लिए पैदा नहीं होते
न उसकी पार्टी में शामिल होने वाले लोग
अभी कहाँ जला है पूरा रोम
अभी तो मेरा घर भी खाक होना बाकी है
बुझती मशालों की जगह
नई मशालें लाई जा रही हैं
अभी तो पार्टी और भी रंगीन होने वाली है!


22-Jul-2020 1:36 PM

-विष्णु नागर 

एक मित्र ने याद दिलाया कि संसद परिसर में एक बुजुर्ग महिला ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का कालर पकड़ कर उनसे पूछा था:' भारत आजाद हो गया, तुम देश के प्रधानमंत्री बन गए, मुझ बुढ़िया को क्या मिला?' नेहरू जी का जवाब था:' आपको ये मिला कि आप प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़ कर खड़ी हैं।'

ऐसी बातें याद मत दिलाया करो मित्रो, रोना आ जाता है। इस युग में बता रहे हो कि आजाद भारत ने इसके नागरिकों को प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़ने तक की आजादी दी है। अब बता रहे हो,जब आज के राजनीतिक शिखर -पुरुष को अपना पुरुषार्थ नेहरू जी के बारे में अल्लमगल्लम झूठ फैलाने में नजर आ रहा है, जब पाठ्यक्रम से भी धर्मनिरपेक्षता गायब की जा रही है। पता नहीं है क्या कि अब यह देशद्रोह की श्रेणी में आता है ! जेल जाना चाहते हो क्या? इस युग में तो अगर कोई सपने में भी प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़ ले तो उसके सपने की स्कैनिंग हो जाएगी और बीच चौराहे पर उसका काम तमाम कर दिया जाएगा और सब उसके वीडियो फुटेज को ' एनज्वाय ' करेंगे।प्रत्यक्षदर्शी उस आदमी की यह हालत होते देख कर हँसेगे, ताली-थाली बजाएँँगे। खुशी से पागल हो जाएँँगे,मिठाई बाँटेंगे ,पटाखे फोड़ेंगे। एक दूसरे के मुँह और सिर पर गुलाल मलेंगे।दिये जलाएँँगे। मोदी जी के जयकारे लगाएँगे, 'जय मोदी हरे' आरती गाएँँगे। और यह सब टीवी चैनलों पर गौरवपूर्वक प्राइम टाइम में दिखाया जाएगा। सिर्फ़ यह नहीं दिखाया जाएगा कि उसकी बीवी दहाड़े मार कर रो रही है, कि उसके बच्चों को समझ में नहीं आ रहा है कि यह आखिर हुआ क्या है,पापा को जमीन पर क्यों लेटाया गया है!इनकी तबीयत खराब है तो इन्हें अस्पताल क्यों नहीं ले जाते? और मृतक की माँँ गश खाकर गिर पड़ी है।

लोग किसी भी तरह के सपना देखने से डरने लगेंगे- चाहे वह 'कौन बनेगा करोड़पति' में सात करोड़ रुपये जीतने का सपना हो!आज अच्छा सपना आया तो कल गिरेबान पकड़नेवाला सपना भी आ सकता है,जैसे उसे आया था! और कोई जरूरी है कि सपना उतना ही भयंकर आए,उससे भयंकर नहीं आएगा!लोग सपने से इतने डरेंगे कि कोई भी सपना आए, लोग रात को उठ बैठेंगे,पसीने -पसीने हो जाएँगे।ईश्वर या अल्लाह से दुआ माँगेंगे कि आइंदा कोई भी सपना न आए। लोग डाक्टर के पास जाएँगे कि डाकसाब ऐसी दवा दो कि नींद आए मगर अच्छे या बुरे सपने न आएँ! सुन कर डाक्टर खुल कर हँसेगा।कहेगा, यही तो मेरी भी समस्या है,मेरी भी बीमारी है,तुमको इसका क्या इलाज बताऊँ!ईश्वर में आस्था रखो,सोने से पहले रात को उसका स्मरण कर लिया करो,मैं भी यही करता हूँ।इसीसे ऊपरवाला बेड़ा पार करेगा तो करेगा वरना मझधार हिम्मत रखो।

मत दिलाया करो इस तरह कि याद बंधु,अब तो आडवाणी भी उनके कंधे पर हाथ रख कर खड़े नहीं हो सकते।वे भी सुरक्षा के लिए खतरा मान लिए जाएँगे और पता नहीं, उनका बाकी जीवन कहाँ और कैसे बीते!

मत रुलाया करो बंधु,मत रुलाया करो।रोने को बहुत कुछ है और अब भी पता नहीं क्यों कोई गाँधी, कोई नेहरू, कोई अंबेडकर, कोई भगत सिंह,कोई लालबहादुर शास्त्री , कोई सीमांत गाँधी,कोई मौलाना आजाद की बातें याद दिला देता है।देखो आजकल 'न्यू इंडिया' बनाया जा रहा है,यह उन सब बातों को भूलने का समय है। बंधु, अतीत में ले जाना बंद करो।ले ही जाना हो तो सभी मुगलों,सभी मुसलमानों के मुँँह पर कालिख पोतने के लिए ले जाओ।ले जाना हो तो इतने पीछे ले जाओ कि सोमनाथ मंदिर तोड़ने का दर्द हरा हो जाए और 2002 का दर्द भूल जाएँ।याद दिलाना हो तो ऐसे तमाम किस्से याद दिलाओ कि हम किस प्रकार उस समय जगद्गुरु थे,जब हमें पता भी नहीं था कि जगत् होता क्या है,हाँ गुरु का पता था!

इस तरह तुम याद दिलाते रहे तो फिर तुम पूरे स्वतंत्रता संघर्ष की याद भी दिलाने लगोगे! मत करो ऐसे उल्टे काम।आज तो वे तुम्हें और हमें शायद माफ कर दें, कल ऐसी याद को वे कानूनन गुनाह घोषित कर देंगे।'झूठ' फैलाने और 'सांप्रदायिक सौहार्द' खत्म करने के आरोप में तुम्हें -हमें अंदर कर देंगे और कोई यानी कोई भी बाहर नहीं ला पाएगा।लोकतंत्र अब हमारे यहाँ बहुत ही अधिक ' विकसित' हो चुका है, बहुत ही ज्यादा।इतना ज्यादा कि दुनिया दाँतों तले ऊँगली दबा रही है और मोदीजी चेतावनी दे रही है कि अरे -अरे, तुम यह क्या कर रहे हो,इतना ' लोकतंत्र ' भी ठीक नहीं है और जरा उस अमित शाह से भी कहो कि गृहमंत्री होकर भी वह क्यों लोकतंत्र का इतना 'विकास' और ' विस्तार ' कर रहा है,क्यों वह आपके और अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहा है? रोको उसे और खुद भी रुक जाओ। कदम पीछे की ओर ले जाओ।लोगों को सिखाओ कि पीछे की ओर देखे बिना कदमताल कैसे किया जाता है और इसे देशप्रेम कैसे समझा जाता है!

ये गिरेबान पकड़ने वाली बातें साझा मत किया करो बंधु, और गिरेबान पकड़ने की याद दिलाते हो तो यह बता दिया करो कि ये हकीकत नहीं, किस्से-कहानियाँँ हैं,लोककथाएँ हैं, गप हैं,ये वे सपने हैं,जो तब लोग देख लिया करते थे।ये सच नहीं था।तब भी यही निजाम था,अब भी यही है।आगे भी यही रहेगा।सच अगर कुछ है तो यही है।


22-Jul-2020 1:35 PM

-विष्णु नागर

जिस दिन यह टिप्पणी लिख रहा हूँ उस दिन पता नहीं क्यों सुबह से ही हेमंत कुमार का गाया और बचपन में और विशेषकर स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस पर कई बार सुना यह गाना मन में बारबार गूँजता रहा- ‘इन्साफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के’। कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं है इसका, फिर भी न जाने क्यों मेरे साथ उस दिं ऐसा हुआ। ऐसा भी नहीं है कि इसे पहली बार रेडियो या टीवी पर सुना हो, इसलिए यह मन में गूँज रहा हो। कभी-कभी मेरे साथ ऐसा होता है। कभी मौका मिला तो ऐसी चीजें यू ट्यूब पर सुन लेता हूँ हालांकि उसे कई-कई बार सुनकर भी मन नहीं भरता लेकिन आज इस गाने के मन में गूँजने का कारण क्या यह है कि मैं किसी संयोग से अपने बचपन में लौट आया हूँ? लगता तो नहीं मगर पता नहीं। 1961 में जब दिलीप कुमार-वैजयंती माला की फिल्म ‘गंगा जमुना’ आई थी-जिसका यह गाना है- तब मैं 11 साल का था और मेरे कस्बे में फिल्म का प्रचार करने के लिए स्थानीय अमीन सयानी साहब नई आई फिल्म की खूबियों का बखान करते हुए गली-गली में तांगे में घूमा करते थे। वे थे, तो लगभग अनपढ़ मगर फिल्म के प्रचार का अंदाज उनका इतना जोरदार होता था कि ऐसा हो नहीं सकता था कि उनके प्रचार के बाद कोई सड़ी से सड़ी फिल्म देखने से भी अपने को बचा पाए।

तब पता नहीं था कि यह गाना सुकूनभरी और भरोसा दिलानेवाली आवाज में किसने गाया है और इसे लिखा किसने है, उस उम्र में यह जानने की उत्सुकता भी नहीं होती थी लेकिन शायद हेमंत कुमार की आवाज से भी ज्यादा या यूं कहें कि उनकी आवाज के साथ शकील बदायूंनी के ये बोल बहुत अपील करते थे, इसलिए भी कि यह गाना खासकर बच्चों को संबोधित था। तब स्कूलों में पंडित नेहरू को चाचा नेहरू कहलवाया जाता था और नारा लगवाया जाता था- चाचा नेहरू जिंदाबाद। मुझे तब सचमुच लगता था कि नेहरूजी मेरे चाचा हैं, भले ही मैंने उन्हें दूर से भी कभी देखा नहीं था और शाजापुर जैसे छोटे से पिछड़े कस्बे में उनके आने की कोई उम्मीद भी नहीं थी। जब नेहरूजी नहीं रहे तो पड़ोसी के रेडियो पर उनकी शव यात्रा का वर्णन सुनकर मैं खूब रोया था-शायद किसी नेता के लिए पहली और आखिरी बार। तब लगता था कि जैसे यह गाना नेहरूजी की ओर से हमें दिया गया संदेश है, इसलिए बहुत द्रवित करता था।

अभी-अभी फिर से इसे सुना तो यह गाना फिर से बहुत अच्छा लगा, जबकि पंडित प्रदीप के लिखे और लता मंगेशकर द्वारा गाये जिस गाने को सुनकर नेहरू खूब रोये थे- ‘ओ मेरे वतन के लोगो जरा आँख मे भर लो पानी’ वह गाना न तब मुझे अपील करता था, न अब, जबकि उसी दौरान हुए चीनी हमले के समय मैंने अपने तीन-चार दोस्तों के साथ जूते पालिश करके सेना के जवानों के लिए चंदा जमा करके राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में जमा किया था। पिछले न जाने कितने वर्षों से देशभक्ति के बहुत से गीत फालतू लगने लगे हैं। ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरा-मोती’ टाइप गीत तो क्षमा कीजिए न तब बर्दाश्त होते थे, न अब। मनोज कुमार ने भावुकताभरी फिल्मी देशभक्ति से नाम बहुत कमाया मगर उनकी सिनेमाई देशभक्ति कभी अच्छी नहीं लगी। उसके बाद भी नकली देशभक्ति का व्यावसायिक उछाल बहुत आता रहा, जिसने चिढ़ को और बढ़ाया ही।

बहरहाल ‘जब इन्साफ की डगर पे’ गीत प्रचलित था, उस दौर में जो बच्चे थे या किशोर थे, उनमें से कई आज इस देश के भाग्यविधाता बने हुए हैं। उस दौर के मोदीजी तो आज देश के प्रधानमंत्री हैं। इन सबने मिलकर देश को जहाँ पहुँचा दिया है, उस जगह पर आकर आज के बच्चों को यह गीत शायद हास्यास्पद ही लगेगा और वे कहेंगे कि क्या पापा (मम्मी) आप बोर कर रहे हो। इस गाने में शकील बदायूं ने नेहरू युग के स्वप्नों, आकांक्षाओं को पिरोया है। इस गीत से पता चलता है कि तब नेता होना गंदी बात नहीं मानी थी, इसीलिए शायद बच्चों से कहा गया है- ‘नेता तुम्हीं हो कल के’। आज तो फिल्मी गानों में भी नेता बनने की बात व्यंग्य में ही कही जा सकती है। आज नेता गली-गली में हैं, उन्होंने डटकर-बेखटके कमाया है, खूब ठाठ हैं उनके, वे चुनाव भी बार-बार जीत जाते हैं मगर जनता के मन में उनके प्रति धेलेभर की भी इज्जत नहीं है। उस दौर के जिन बच्चों से शकील बदायूंनी और हेमंत कुमार ने ‘इन्साफ की डगर पे’ चलने की उम्मीद की थी, उनके लिए जुल्म की डगर पर चलना ही असली इन्साफ है, सच्चाइयों के बल पे आगे बढऩे की जिनसे उम्मीद आशा थी, वे झूठ और बेईमानी का हाथ मजबूती से पकड़ चुके है। जिन्हें संसार को बदलना था, उन्हें संसार ने बदल दिया है पूँजी की सेवा करने के लिए।जिन्हें तनमन की भेंट देकर भारत की लाज बचाना था, वे अपनी इज्जत लुटाने में लगे हैं। अपनों के लिए तो ठीक है मगर परायों के लिए, सबके लिए, न्याय की बात करना उनके लिए असंभव है। इन्सानियत के सर पर इज्जत का ताज नहीं कचरा रखा जा रहा है। बहुत कुछ इस बीच खो गया है, इसलिए इस बीच यह गीत भी खो गया है और इन्साफ की डगर भी।


22-Jul-2020 1:33 PM

विष्णु नागर

अगले साल दिसंबर में सोवियत संघ के पतन और बिखराव के तीन दशक पूरे हो जाएँगे।ऐसा क्यों और कैसे हुआ, इस पर विद्वानों ने बहुत लिखा है और आगे भी लिखेंगे। विद्वत्ता मेरा क्षेत्र नहीं है, इसलिए यहाँ उस विस्तार में जाना मेरा उद्देश्य नहीं। मैं कहना चाहता हूँ कि जो भी हुआ-अच्छा या बुरा-वह तो हो चुका है मगर हम साहित्य के अनौपचारिक विद्यार्थी उसके आज तक बहुत ऋणी हैं। चूँकि सोवियत संघ खत्म हो चुका, उसके खत्म होने का दुनिया में बहुत जश्न भी मनाया जा चुका है, इसलिए उसके एकाध ऋण को भी भूल जाना अनैतिक होगा।उसने इस अर्थ में काफी बड़ा काम किया था कि हमारी अपनी हिंदी और अन्य अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अपने देश का महान (और विचाराधारात्मक भी)साहित्य विपुलता से उपलब्ध करवाया था।इतना बड़ा काम न पहले किसी और देश ने कभी किया था,न अब कोई कर रहा है।

सोवियत संघ ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में यह साहित्य बेहद सस्ते दामों पर और बहुत अच्छे कागज पर उपलब्ध करवाया था। विशेषता यह भी रही कि उसने ये अनुवाद रूसी से सीधे हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में करवाए। बीच में अंग्रेजी को यथासंभव नहीं आने दिया। यही माक्र्स-लेनिन आदि की किताबों के मामले में किया। बाल साहित्य के बारे में भी यही किया। विज्ञान आदि विषयों की पुस्तकों के साथ किया। जो पुस्तकें अंग्रेजी में भी आज तक नहीं आई हैं,उन्हें उसने हिंदी में उपलब्ध करवाया।उदाहरण के लिए मेरा बड़ा बेटा अमेजन पर रसूल हमजातोव का ‘मेरा दागिस्तान’ का अंग्रेजी संस्करण ढूँढ रहा था तो उसे नहीं मिला लेकिन हिंदी की यह लोकप्रिय किताब रही है।

हमारी पीढ़ी और उससे पहले तथा बाद की पीढिय़ाँ इस साहित्य से बहुत लाभान्वित हुई हैं। सोवियत संघ ने ये किताबें कुछ खास शहरों में ही उपलब्ध नहीं करवाई थीं, बल्कि छोटे से छोटे कस्बों में अपनी वैन से हासिल करवाईं। अपने महान साहित्य का प्रसार भी एक राजनीतिक कर्म है, इसे सोवियत नेताओं ने समझा था। यह अलग बात है कि सोवियत संघ का टिका रहना इन किताबों के प्रचार-प्रसार पर निर्भर नहीं था मगर एक राज्य न टिका मगर उसने जो साहित्य हमें उपलब्ध करवाया, वह जरूर टिकाऊ था और आज भी है। उसकी सांस्कृतिक कूटनीति के अन्य सकारात्मक पक्ष भी थे लेकिन वे यहाँ हमारे विषय नहीं। उसने प्रेमचंद आदि बडे लेखकों को रूसी में उपलब्ध करवाया,यह भी एक पक्ष है। हम लोगों की दो- चार कविताओं को भी रूसी के एक संकलन में शामिल किया गया था, आदि।

उस जमाने में तब की महंगाई के हिसाब से हिंदी की किताबें आमतौर पर महंगी थीं, हालांकि उतनी महंगी नहीं थीं, जितनी आज हो चुकी हैंं।उस जमाने में हम जैसों ने ढेर सारी सोवियत किताबें खरीदीं,जो प्रगति प्रकाशन या रादुगा से छप कर आती थीं। अपने बच्चों के लिए भी ये सस्ती और सुंदर किताबें खरीदीं।एक किताब तो मुझे भी बहुत प्रिय थी-‘पापा जब बच्चे थे’।

तोल्सतोय के महाउपन्यास ‘युद्ध और शांति’ से लेकर उनके आरंभिक उपन्यास ‘कज्जाक’ तक और ‘पुनरुत्थान’ तक उपलब्ध हुआ। ‘अन्ना केरनिन्ना’ जैसा उपन्यास न जाने क्यों इनमें नहीं था। इसके अलावा तुर्गनेव, गोगोल, पुश्किन, दास्तोयेव्स्की, गोर्की, चेखव आदि न जाने कितने महान लेखक अक्सर अच्छे अनुवादों में हासिल हुए। ‘पुनरुत्थान’ का अनुवाद तो भीष्म साहनी ने किया था। और भी अच्छे अनुवादक थे।मुनीश सक्सेना,  राजीव सक्सेना, नरोत्तम नागर,मदन लाल मधु आदि।कविताओं के अनुवाद लगभग नहीं हुए या अच्छे नहीं हुए। मसलन ‘मेरा दागिस्तान’ में लेखक की कविताओं के मदनलाल मधु के अनुवाद बेढब हैं।

पत्रकार के नाते हम जैसे पत्रकारों का एक भला सोवियत संघ ने किया कि उसकी लगभग रोज विज्ञप्तियाँ हिंदी में आती थीं।कागज बढिय़ा होता था तो उसकी पीठ पर लिखना सुखकर था। सोवियत कागजों का यह उपयोग अधिक किया। बाकी कुछ लेखकों को पुरस्कार भी मिले,रूस की यात्रा का सुख भी मिला वगैरह मगर हमें जो मिला, वह भी कम न था। 

चीन ने रूस के मुकाबले दस प्रतिशत भी इस मामले में नहीं किया।तथाकथित कम्युनिस्ट देश उत्तरी कोरिया अपने ‘महान’ किम उल सुंग के विचारों के प्रचार में लगा रहा,जिनकी आज किसी को परवाह नहीं। अमेरिका ने अपनी महानता और आधुनिक होने के गुण बहुत गाए। उसका साहित्य से इतना ही वास्ता रहा कि उसने आर्थर केसलर की किताब ‘द्दशस्र ह्लद्धड्डह्ल द्घड्डद्बद्यद्गस्र’ का हिंदी संस्करण शायद ‘पत्थर के देवता’ नाम से उपलब्ध करवाया था,जो शाजापुर के दिनों में किसी से लेकर पढ़ा था।बाद में कहीं नहीं दिखा।


22-Jul-2020 1:26 PM

विष्णु नागर 

हमारे देश में बेचने-खरीदने वाले का धंधा कोरोना काल में भी जोरों पर है। इसमें इतना उछाल आया हुआ है कि कामधंधे भले चौपट हो गए मगर सेंसेक्स ऊपर और ऊपर और ऊपर ही चढ़ता जा रहा है। मैंने सेंसेक्स को दोस्त समझकर कहा कि ए, ताऊ, इस हालत में तो इतना ऊपर मत जा, गिरेगा तो तेरे कलपुर्जे भी नहीं मिलेंगे। उसने कहा, ‘अबे हट, बे कलमघिस्सू। तू क्या जाने हमारा खेल! तूने तो कभी एक पैसा भी शेयर बाजार में नहीं लगाया है।कायर कहीं के, बुझदिल, मुझे शिक्षा देता है! तेरी ये मजाल! तू है क्या चीज।आदमी का चोला पाकर तू मुझसे भिडऩे आया है। तू समझता है, तू मुझसे ताकतवर है? बेट्टा मेरे सामने पूरा बाजार, सारे मंत्री-प्रधानमंत्री शीश नवाते हैं जबकि तेरे ऊपर गली का खजेला कुत्ता भी भोंकने को भी तैयार नहीं होगा। जा पहले गंदे नाले के पानी में अपनी शकल धोकर आ, फिर आकर बात करना। हट जा, मेरी नजरों के सामने से वरना तेरा कत्ल कर दूँगा।

क्यों रे गधे, जब देश बेचनेवाले, देश बेच रहे हैं। बेच-बेच कर एमएलए, मंत्री और सरकारें खरीद रहे हैं, तब तू मुझसे कह रहा है, ज्यादा उछल मत। क्यों नहींं उछलूँ? तुझसे पूछ कर उछलूँगा क्या? और नीचे धड़ाम से गिरा भी तो तेरे पिता श्री का क्या जाता है बे। तू अपने काम से काम रख।

सही कहा, ताऊ तुमने। मैं क्षमा माँगता हूँ। क्षमा बडऩ को चाहिए, छोटन को उत्पात। इतना कह कर मैंने मामला शांत करना चाहा।यह सुन कर उसने कहा, अबे ये कौनसी छोटन-बडऩ भाषा बोल रहा है, हिंदी बोल, हिंदी। अंग्रेजी आती हो तो अंग्रेजी बोल।

खैर मैंने किसी तरह राम-राम करते मामला सुलझाया। संकट टलने के पंद्रह मिनट बाद दिमाग थोड़ा शांत हुआ तो सोचा, वाकई ताऊ सही कह रह था। जब बेचनेवाले बैंक बेच रहे हैं, बीमा कंपनियाँँ बेच रहे हैं, तेल कंपनियाँ, विमान सेवा, हवाई अड्डे, ओनजीसी, भारतीय रेल बेच रहे हैं। एयर इंडिया न बिके तो लोहेलंगर के भाव बेचने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे मैं भी सेंसेक्स बेचारा न उछले तो क्या सुस्त पड़ा रहे?

अरे जब एक सुपर स्टार तेल से लेकर ऐप तक सबकुछ बेच चुका और अभी भी उसका बेचने का हौसला बुलंदी पर है तो सेंसेक्स क्यों मृतप्राय: रहे? अभी वह कोरोना पॉजिटिव हो गया तो इसे भी उसने एक प्राइवेट अस्पताल का विज्ञापन करके भुना लिया। नाम और कमा लिया, नामा इसी से मिलेगा। किसी ने कभी सोचा था कि बेचने वाला स्टार अगर कोरोना पाजिटिव भी हो जाए तो घबराता नहीं, इसे भी बेच देता है! यह पक्का है कि अस्पताल से बाहर आकर, वह कोरोना से लडऩे का अपना ‘साहस’ भी ऊँची कीमत में बेचेगा।इस बीच कोरोना का टीका बन गया तो उसे भी बेचेगा। कोरोना का ब्रांड एंबेसडर वही बनेगा। प्रधानमंत्री की ‘उज्ज्वल छवि’ उसने पहले भी बेची है अब और भी जोरशोर से बेचेगा।

कहानी इन दो पर ही खत्म नहीं होती। क्रिकेट खिलाड़ी तो सरेआम बिकते हैं। फिर उनकी कैप, उनकी शर्ट, उनकी पैंट के घुटने भी बिकती है। बल्ला भी बिकता है।खेल का मैदान भी बिकता है। फिर तरह -तरह के सामान बेचना रह जाता है, तो उसे भी ये खिलाड़ी बेचने लगते हैं। ‘भारतरत्न’ पा जाएँ तो भी ईश्वर की कृपा के वशीभूत होकर ये बेचते रहते हैं।

अभी कुछ युवा कांग्रेसी नेताओं ने भाजपा को अपनी धर्मनिरपेक्षता आस्था बेच दी और सांप्रदायिकता खरीद ली। साथ में राज्यसभा की सीट भी हासिल कर ली। इतना ही नहीं, अपनों को अपने राज्य में मंत्री पद दिलवाकर, अब खुद भी केंद्र में मंत्री बनेंगे। फिर न जाने क्या-क्या खरीदेंगे-बेचेंगे। गैरभाजपाई नेता और एमएलए तो भाजपा मंडी में थोक के भाव खरीदती है। सुनते हैं कि हर विधायकी की कीमत तीस-पैंतीस करोड़ तक है। पचास करोड़ भी हो सकती है और एक राजस्थानी नेता तैयार बैठे हैं। जीवनभर में भी जितनी काली कमाई नहीं होती, वह एक झटके में हो जाती है।ईमान ही तो बेचना होता है, मतदाताओं को धोखा ही तो देना होता है। ईमान कोई कीमती चीज तो है नहीं, दस रुपये के नोट बराबर इसकी वैल्यू है। और धोखा देना तो खैर आज की राजनीतिक शैली है।

खरीदनेवाले में यह आत्मविश्वास होता है कि सबकुछ खरीदा जा सकता है। यह दुनिया एक बाजार के सिवाय कुछ नहीं है। यहाँ न्याय भी खरीदा जा सकता है, गवाह, वकील, जज भी। धर्म, ईमान, इंसानियत सब खरीदे जा सकते हैंं। उन्हें ताज्जुब होता है कि इस दुनिया में ऐसा भी कुछ होता है, जो बिकशनशील नहीं होता, जो खरीदा नहीं जा सकता! उधर जो जितनी जल्दी बिक जाता है, जितनी जल्दी ऊँची सीढिय़ाँ चढ़ जाता है, वह उतना ही ज्यादा गरीबों का हमदर्द होने की घोषणाएँ भी करता रहता है। खुद गरीबी से, पिछड़ी जाति से आने की मुनादी इतनी बुलंद आवाज में करता है कि दूसरे किसी की आवाज सुनाई नहीं देती।वह सत्ता को खरबपतियों को बेच कर आराम से 18-18 घंटे सोता है। वह सोने को ही जागना घोषित कर देता है। हाँ जब कोई अडाणी-अंबानी मोबाइल पर उसे याद करता है तो आधी रात को भी जी सर, कहते-कहते बिस्तर से उठकर खड़ा हो जाता है। जी, जी बस हो गया आपका काम।सुबह हम बेच देंगे, शाम को आप खरीद लेना। नमस्ते-नमस्ते, गुडनाइट, गुडनाइट।