श्रवण गर्ग

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10-Jan-2021 4:33 PM 6

अभी अंतिम रूप से स्थापित होना बाक़ी है कि डॉनल्ड ट्रम्प हक़ीक़त में भी राष्ट्रपति पद का चुनाव हार गए हैं। इस सत्य की स्थापना में समय भी लग सकता है जो कि वैधानिक तौर पर निर्वाचित बायडन के चार वर्षों का कार्यकाल 2024 में ख़त्म होने तक जारी रह सकता है।संयोग से भारत में भी उसी साल नई लोकसभा के चुनाव होने हैं और मुमकिन है तब तक हमारी राजधानी के ‘रायसीना हिल्स’ इलाक़े में नए संसद भवन की भव्य इमारत बनकर तैयार हो जाए।ट्रम्प अभी सिर्फ़ सत्ता के हस्तांतरण के लिए राज़ी हुए हैं ,बायडन को अपनी पराजय सौंपने के लिए नहीं।ट्रम्प अपनी लड़ाई यह मानते हुए जारी रखना चाहते हैं कि उनकी हार नहीं हुई है बल्कि उनकी जीत पर डाका डाला गया है।मुसीबतों के दौरान ख़ुफ़िया बंकरों में पनाह लेने वाले तानाशाह अपनी पराजय को अंत तक स्वीकार नहीं करते हैं।

वर्ष 2020 के आख़िर में हुए अमेरिकी चुनावों को दुनिया भर में दशकों तक याद रखा जाएगा।वह इसलिए कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब हारने वाला व्यक्ति अपने करोड़ों समर्थकों के लिए एक ‘पूर्व राष्ट्रपति’ नहीं बल्कि एक ‘विचार’ बनने जा रहा है।कल्पना करना कठिन नहीं कि एक हारने वाला उम्मीदवार अगर अपने हिंसक समर्थकों की ताक़त पर देश की संसद को बंधक बना लेने की क्षमता रखता है तो हक़ीक़त में भी जीत जाने पर दुनिया की प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं को वह किस तरह की आर्थिक ग़ुलामी में धकेल सकता था।

ट्रम्प ने पहला ऐसा राष्ट्रपति बनने का दर्जा हासिल कर लिया जिसने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति को ‘विचारपूर्वक’ दो फाड़ कर दिया। ट्रम्प ने अमेरिका में ही अपने लिए एक नए देश का निर्माण कर लिया—उस अमेरिका से सर्वथा भिन्न जिसकी 528 साल पहले खोज वास्तव में तो भारत की तलाश में समुद्री मार्ग से निकले क्रिस्टोफ़र कोलंबस ने की थी। ट्रम्प की हार का बड़ा कारण यह बन गया कि उनके सपनों के अमेरिका में जगह सिर्फ़ गोरे सवर्णों के लिए ही सुरक्षित थी।उनके सोच में अश्वेतों, मुस्लिमों, ग़रीबों, महिलाओं ,नागरिक अधिकारों और मानवीय उत्पीड़न के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी।

ट्रम्प ने अपने राष्ट्रवाद के नारे को राजनीतिक उत्तेजना के इतने ऊँचे शिखर पर प्रतिष्ठित कर दिया है कि किन्ही कमज़ोर क्षणों में वे उससे अगर अपने को आज़ाद भी करना चाहेंगे तो उनके भक्त समर्थक ऐसा नहीं होने देंगे।इसीलिए अमेरिकी प्रशासन में इस समय सबसे ज़्यादा ख़ौफ़ इस आशंका को लेकर व्यक्त किया जा रहा है कि अपने शेष बचे बारह दिनों के बीच निवृत्तमान राष्ट्रपति कोई ऐसा कदम नहीं उठा लें जो देश की सुरक्षा को ही ख़तरे में डाल दे। इन आशंकाओं में उनके हाथ परमाणु बटन पर चले जाना भी शामिल है।

ट्रम्प अगर मानकर चल रहे थे कि उनका विजयी होना तय है तो उसमें अतिशयोक्तिपूर्ण कुछ भी नहीं था।अमेरिका में बसने वाले कोई पचास लाख भारतीयों में अधिकांश की गिनती हार-जीत का ठीक से अनुमान लगाने वालों में की जाती है।ये अप्रवासी भारतीय अगर ट्रम्प की जीत के प्रति आश्वस्त नहीं होते तो देश के अड़तालीस राज्यों से पचास हज़ार की संख्या में ह्यूस्टन पहुँचकर ‘अबकी बार ,फिर से ट्रम्प सरकार ‘ का नारा लगाने की जोखिम नहीं मोल लेते।उप राष्ट्रपति पद के लिए कमला हैरिस के नाम की घोषणा होने के पहले तक तो डेमोक्रेटिक पार्टी भी बायडन की उम्मीदवारी को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थी।

ट्रम्प की विजय सुनिश्चित थी अगर वे अपने प्रथम कार्यकाल में ही सभी लोगों को एकसाथ दुश्मन नहीं बना लेते। कुछेक लोगों और संस्थाओं को दूसरे कार्यकाल के लिए सुरक्षित रख लेते ; फिर से सत्ता में आने तक के लिए बचा लेते।सत्ता में आते ही उन्होंने ‘वैश्वीकरण’ का मज़ाक़ उड़ाते हुए ‘राष्ट्रवाद’ को अमेरिका का भविष्य घोषित कर दिया।जनता ने तालियाँ बजाते हुए स्वीकार कर लिया।अमेरिकियों के रोज़गार को बचाने के लिए उनके वीज़ा प्रतिबंधों का भी किसी ने विरोध नहीं किया।अवैध तरीक़ों से अमेरिका में प्रवेश करने वालों के लिए मेक्सिको के साथ सीमा पर दीवार खड़ी करने को भी मंज़ूरी मिल गई।कुछ मुस्लिम देशों के लोगों के अमेरिका आने पर लगी रोक का भी आतंकी हमले की स्मृति में जनता द्वारा स्वागत कर दिया गया।

पर हरेक तानाशाह की तरह ट्रम्प भी अपने अतिरंजित आत्म-विश्वास के चलते ग़लतियाँ कर बैठे।वे पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की ग़रीबों को मदद करने वाली ‘हेल्थ केयर योजना’ पर ताला लगाने में जुट गए ; देश के मीडिया को निरकुंश तरीक़े से तबाह करने लगे ;चुनावी साल होने के बावजूद क्रूरतापूर्ण तरीक़े से बर्दाश्त कर लिया कि किस तरह एक गोरे पुलिस अफ़सर ने बिना किसी अपराध के एक अश्वेत नागरिक की गर्दन को अपने घुटने के नीचे आठ मिनट से ज़्यादा तब तक दबाकर रखा जब तक कि उसकी मौत नहीं हो गई ।और उसके बाद उठे अश्वेत नागरिकों के देशव्यापी आंदोलन से उभरे क्रोध ने ट्रम्प को ‘व्हाइट हाउस’ में ज़मीन के भीतर बने बंकर में मुँह छुपाने के लिए बाध्य कर दिया।इतना ही नहीं, अपनी जीत के प्रति पूरी तरह से निश्चिंत राष्ट्रपति ने कोरोना से बचाव के सिलसिले में लाखों लोगों की जान की भी कोई परवाह नहीं की।वे अपने समर्थकों को मास्क न पहनने और किसी भी तरह के अनुशासन का पालन न करने के लिए भड़काते रहे।कहा जा सकता है कि ट्रम्प ने अपने ही समर्थकों को हरा दिया।

अमेरिका की प्रजातांत्रिक संस्थाएं और दुनिया के बचे-ख़ुचे प्रजातंत्र इसे अपने लिए तात्कालिक तौर पर सौभाग्य का विषय मान सकते हैं कि ट्रम्प जिस राष्ट्रवाद की स्थापना करना चाहते थे वह हिटलर के जर्मनी की तरह संगठित नहीं था।ट्रम्प के राष्ट्रवाद की अंदर की परतों में छुपी हुई हिंसा का ‘कैपिटल हिल’ पर हमले के रूप में शर्मिंदगीपूर्ण तरीक़े से दुनिया की आँखों के सामने विस्फोट हो गया।इस विस्फोट ने न सिर्फ़ आम अमेरिकी नागरिक को बल्कि ट्रम्प की पार्टी के लोगों को भी हिलाकर रख दिया।

ट्रम्प को बायडन के लिए विशाल ‘व्हाइट हाउस’ अंततः ख़ाली करना पड़ेगा।वे उसके बाद कहाँ रहने जाएँगे किसी को कोई जानकारी नहीं है ।पर वे जहां भी जाएँगे अपने लिए कोई न कोई बंकर ज़रूर तलाश कर लेंगे।पर तब तक के लिए तो दुनिया को अपनी साँसे रोककर ‘एक बीमार’ राष्ट्रपति के आख़िरी कदम की प्रतीक्षा करनी ही पड़ेगी।
 


06-Jan-2021 12:09 PM 5

कोई चालीस दिनों से देश के एक कोने में चल रहे आंदोलन, कड़कती ठंड के बीच भी किसानों, महिलाओं और बच्चों की मौजूदगी, अश्रु गैस के गोले और पानी की बौछारें, हरेक दिन हो रही एक-दो मौतें और इतने सब के बावजूद सरकार की अपने ही नागरिकों की बात नहीं मानने की हठधर्मी और अहंकारी-आत्मविश्वास के पीछे कारण क्या हो सकते हैं?

पहला कारण तो सरकार का यह मानना हो सकता है कि गलती हमेशा नागरिक करता है, हुकूमतें नहीं। दूसरा यह कि जनता सब कुछ स्वीकार करने के लिए बाध्य है। वह कोई विरोध नहीं करती ऐसी ही उसे उसके पूर्व-अनुभवों की सीख भी है। नोटबंदी, आपातकाल की तरह ही, राष्ट्र के नाम एक संदेश के साथ आठ नवम्बर 2016 को लागू कर दी गई थी ।तब के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बाद में दावा किया कि सिर्फ़ तीन बैंक कर्मियों और एक ग्राहक समेत कुल चार लोगों की इस दौरान मौतें हुईं। विपक्ष ने नब्बे से ज़्यादा लोगों की गिनती बताई। करोड़ों लोगों ने तरह-तरह के कष्ट और अपमान चुपचाप सह लिए। सरकार की आत्मा पर कोई असर नहीं हुआ। उसका सीना और चौड़ा हो गया।

कोरोना के बाद देश भर में अचानक से लॉक डाउन घोषित कर दिया गया। लाखों प्रवासी मज़दूरों को भूखे-प्यासे और पैदल ही अपने घरों की तरफ़ निकलना पड़ा। वे रास्ते भर लाठियाँ खाते रहे, अपमान बर्दाश्त करते रहे। सरकार के ख़िलाफ़ कहीं कोई नाराज़गी नहीं ज़ाहिर हुई। सरकार का सीना और ज़्यादा फूल गया। संसद के सत्र छोटे कर दिए गए अथवा ग़ायब कर दिए गए। विपक्ष की असहमति की आवाज़ दबा दी गई। जनता की ओर से कहीं कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई गई। सरकार ने मान लिया कि जनता सिर्फ़ उसी के साथ है। जो लोग आंदोलनकारियों के साथ हैं वह जनता ही नहीं है। सरकार अब जो चाहेगी वही करेगी। वह ज़रूरत समझेगी तो देश को युद्ध के लिए भी तैयार कर सकती है।

किसान आंदोलन को लेकर सरकार के रवैये में व्यक्त हो रहे एकतंत्रवादी स्वरों की आहटें अगर 2014 में ही ठीक से सुन ली गईं होतीं तो आज स्थितियाँ निश्चित ही भिन्न होतीं।मई 2014 में पहली बार सत्ता में आने के केवल कुछ महीनों बाद ही (दिसम्बर 2014) मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण से सम्बंधित एक अध्यादेश जारी कर दिया था। उसका तब ज़बरदस्त विरोध हुआ था और उसे किसान-विरोधी बताया गया। अध्यादेश के चलते सरकार की छवि ख़राब हो रही थी फिर भी वह उसे वापस लेने को तैयार नहीं थी। कारण तब यह बताया गया कि ऐसा करने से प्रधानमंत्री की एक मज़बूत और दृढ़ नेतृत्व वाले नेता की उस छवि को झटका लग जाएगा जिसके दम पर वे इतने ज़बरदस्त बहुमत के साथ सत्ता में आए हैं।

विधेयक को क़ानून की शक्ल देने के लिए सरकार डेढ़ वर्ष तक हर तरह के जतन करती रही। विधेयक को दो बार संसद में पेश किया गया, तीन बार उससे सम्बंधित अध्यादेश लागू किया गया, कई बार उस संसदीय समिति का कार्यकाल बढ़ाया गया जो उसकी समीक्षा के लिए गठित की गई थी, तमाम विरोधों के बावजूद उसे लोकसभा में पारित भी करवा लिया गया। पर राज्य सभा में बहुमत न होने के कारण यह सम्भव नहीं हो सका कि उसे क़ानूनी शक्ल दी जा सके।
देश को जानकारी है कि जो सरकार एक किसान-विरोधी एक विधेयक को 2016 में क़ानून में तब्दील नहीं करवा पाई उसने 2020 आते-आते कैसे एक पत्रकार उपसभापति के मार्गदर्शन में तीन विधेयकों को राज्य सभा में आसानी से पारित करवा लिया। कहा नहीं जा सकता कि जिस किसान-विरोधी विधेयक को सत्ता में आने के कुछ महीनों बाद ही सरकार ने अपनी नाक का सवाल बना लिया था पर वह उसे क़ानून में नहीं बदलवा पाई वह आगे किसी नए अवतार में प्रकट होकर पारित भी हो जाए। अब तो स्थितियाँ और भी ज़्यादा अनुकूल हैं।

सरकार ने पिछले चार वर्षों के दौरान अपनी छवि को लेकर सभी तरह के सरोकारों से अपने आपको पूरी तरह आज़ाद कर लिया है।प्रधानमंत्री ने जैसे ‘अपने’ और ‘अपनी जनता’ के बीच उपस्थित तमाम व्यक्तियों और संस्थाओं को समाप्त कर सीधा संवाद स्थापित कर लिया है, वे उसी तरह कृषि क़ानूनों के ज़रिए किसानों और कार्पोरेट ख़रीददारों के बीच से तमाम संस्थाओं और व्यक्तियों को अनुपस्थित देखना चाहते हैं। अगर 2014 का अध्यादेश राष्ट्रीय स्तर पर नाक का सवाल बन गया था तो 2020 के कृषि क़ानून अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की प्रतिष्ठा के सवाल बना दिए गए हैं।

लोगों ने पूछना प्रारम्भ कर दिया है कि आगे क्या होगा ? क्या सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा? हो सकता है ऐसा ही हो। सब कुछ ऐसे ही चलता रहे। अब आठवें दौर की बातचीत होने वाली है। उसके बाद नौवें, दसवें और ग्यारहवें दौर की चर्चाएँ होंगी। फिर ‘गणतंत्र दिवस’ की परेड होगी ।सलामी ली जाएगी। किसानों की भी ट्रैक्टर परेड निकलेगी? सरकार के सामने आर्थिक, सामाजिक और कृषि सहित सैंकड़ों सुधारों की लम्बी-चौड़ी फ़ेहरिस्त पड़ी है। किसान या आम नागरिक अब उसकी पिक्चर में नहीं है। आधुनिक भारत के उसके सिंगापुरी सपने में फटेहाल किसान और शाहीन बाग़ फ़िट नहीं होते।

किसानों ने जिस लड़ाई की शुरुआत कर दी है वह इसलिए लम्बी चल सकती है कि उसने व्यवस्था के प्रति आम आदमी के उस डर को ख़त्म कर दिया है जो पिछले कुछ वर्षों के दौरान दिलों में घर कर गया था। जनता का डर अब सरकार का डर बनता जा रहा है। लड़ाई किसानों की माँगों के दायरे से बाहर निकल कर व्यापक नागरिक अधिकारों के प्रति सरकार के अहंकारी रवैये के साथ जुड़ती जा रही है। आंदोलन का एक निर्णायक समापन किसान-विरोधी क़ानूनों का भविष्य ही नही यह भी तय करने वाला है कि नागरिकों को देश में अब कितना लोकतंत्र मिलने वाला है। लोग समझने लगे हैं कि ज़िंदा रहने के लिए केवल कोरोना की वैक्सीन ही नहीं, लोकतंत्र का टीका भी ज़रूरी है।


01-Jan-2021 12:20 PM 5

नए साल का स्वागत हमें खुशियाँ मनाते हुए करना चाहिए या कि पीड़ा भरे अश्रुओं के साथ? लोगों की ताजा और पुरानी याददाश्त में भी कोई एक साल इतना लंबा नहीं बीता होगा कि वह खत्म होने का नाम ही नहीं ले! इतना लंबा कि जैसे उसके काले और घने साये आने वाली कई सुबहों तक पीछा नहीं छोडऩे वाले हों। याद कर-करके रोना आ रहा है कि एक अरसा हुआ जब ईमानदारी के साथ हंसने या खुश होकर तालियाँ बजाने का दिल हुआ होगा।

यह जो उदासी छाई हुई है वह हरेक जगह मौजूद है, दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों, कोनों और दिलों में। काफी कुछ टूट या दरक गया है इस बीच। जिन जगहों पर बहुत ज़्यादा रोशनी होने का भ्रम हो रहा है हो सकता है वहाँ भी अंदर ही अंदर घुटता कोई अव्यक्त अंधेरा ही मौजूद हो। कई बार ऐसा होता है कि अंधेरों में जिंदगियाँ हासिल हो जाती है और उजाले सन्नाटे भरे मिलते हैं। चेहरों के जरिए प्रसन्नता की खोज के सारे अवसर वर्तमान पीड़ाओं ने जबरदस्ती करके हमसे हड़प लिए हैं।

मुमकिन है इस नए साल की सुबह हर बार की तरह बहुत सारे लोगों से मिल या बातें नहीं कर पाए हों। हम जानते हैं कि खिलखिला कर खुशियाँ बिखेरने वाली कुछ आत्मीय आवाजें अब हम अपने बीच लगातार अनुपस्थित महसूस करने वाले हैं। उपस्थित प्रियजनों को नए साल की शुभकामनाएँ देते समय भी हमारे गले उस अव्यक्त संताप से भरे हो सकते हैं जो पीछे तो गुजर चुका है पर उसके आगे का डर अभी खत्म नहीं हुआ है। चमकीली उम्मीदें जरूर आसमान में क़ायम हैं।

नए साल के ‘गणतंत्र दिवस’ पर हमेशा की तरह ही दिल्ली के भव्य ‘राजपथ’ पर चाँदनी चौक और उससे सटे ग़ालिब के ‘बल्ली मारान’ की गलियों की उदासियों के बीच राष्ट्र के वैभव का भव्य प्रदर्शन देखने वाले हैं। दुनिया को बताने वाले हैं कि हम व्यक्तियों की व्यक्तिगत उदासियों को राष्ट्र की सार्वजनिक मुस्कान पर हावी नहीं होने देते हैं। एक विदेशी मेहमान की मौजूदगी में हम अपनी सामरिक क्षमता और सांस्कृतिक विरासत का दुनिया भर की आँखों के सामने प्रदर्शन करेंगे। हो सकता है हमारे कोरोना के आँकड़े तब तक सवा करोड़ और उससे मरने वालों की संख्या डेढ़ लाख से ऊपर और दुनिया भर में बीस लाख के नज़दीक पहुँच जाए। खबरें डराती हैं कि महामारी अमेरिका में हर बारह मिनट एक व्यक्ति को निगल रही है। वहाँ अब तक करीब साढ़े तीन लाख लोगों की जानें जा चुकी हैं। पर हम अब मृत्यु के प्रति भय पर भी काबू पाते जा रहे हैं। इन उम्मीदों से भरे हुए जीना चाहते है कि बीते साल के साथ ही वह सब कुछ भी जिसे हम व्यक्त नहीं करना चाह रहे हैं, अब अंतिम रूप से गुजर चुका है।

ब्रिटेन के राजकुमार प्रिन्स हैरी की पत्नी मेगन मार्केल ने पिछले दिनों अमेरिकी अखबार  ‘न्यूयॉर्क टाईम्स’ के लिए एक भावपूर्ण घटना का चित्रण करते हुए संस्मरण लिखा था। किशोरावस्था के दौरान मेगन एक टैक्सी की पिछली सीट पर बैठी हुई न्यूयॉर्क के व्यस्ततम इलाके मैन्हैटन से गुजर रहीं थीं। टैक्सी से बाहर की दुनिया का नजारा देखते हुए उन्होंने एक अनजान महिला को फोन पर किसी से बात करते हुए आंसुओं में डूबे देखा। महिला पैदल चलने के मार्ग पर खड़ी थी और अपने निजी दु:ख को सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर रही थी।

मेगन ने टैक्सी ड्रायवर से पूछा कि अगर वह गाड़ी रोक दे तो वे उतरकर पता करना चाहेंगीं कि क्या महिला को किसी मदद की जरूरत है! ड्रायवर ने किशोरी मेगन को भावुक होते देख विनम्रतापूर्वक जवाब दिया कि न्यूयॉर्क के लोग अपनी निजी जिंदगी शहर की सार्वजनिक जगहों पर ही जीते हैं। हम शहर की सडक़ों ही पर प्रेम का इजहार कर लेते हैं, सडक़ों पर ही आंसू बहा लेते हैं, अपनी व्यथाएँ व्यक्त कर लेते हैं, और हमारी कहानियाँ सभी के देखने के लिए खुली होती हैं। चिंता मत करो! सडक़ के किसी कोने में खड़ा कोई न कोई शख्स उस आंसू बहाती महिला के पास जाकर पूछ ही लेगा—‘सब कुछ ठीक तो है न,’ टैक्सी ड्रायवर ने मेगन से कहा।

कुछ ऐसा अद्भुत हुआ है कि पिछले नौ-दस महीनों के दौरान सारी दुनिया ने भी बिना कहीं रुके और किसी से उसके सुख-दु:ख के बारे पूछताछ किए जीना सीख लिया है। हम याद भी नहीं करना चाहेंगे कि आखिरी बार किस शव-यात्रा अथवा फिर शहर के किस अस्पताल या नर्सिंग होम में अपने किस निकट के व्यक्ति की तबीयत का हाल-चाल पूछने पहुँचे थे! शहरों के कई मुक्तिधामों में अस्थिकलशों के ढेर लगे हुए हैं और पवित्र नदियों के घाट उनके प्रवाहित किए जाने की प्रतीक्षा में सूने पड़े हैं।

खुशखबरी यह है कि इतनी उदासी के माहौल के बीच भी लोगों ने मुसीबतों के साथ लडऩे के अपने जज़्बे में कमी नहीं होने दी है। लोग संकटों से लड़ भी रहे हैं और और न्यूयॉर्क के उस टैक्सी ड्रायवर के कहे मुताबिक कोई ना कोई उनसे पूछ भी रहा है-‘सब कुछ ठीक तो है न’! अगर लडऩे का जज़्बा क़ायम नहीं होता तो लाखों की संख्या में हजारों-लाखों भूखे-प्यासे प्रवासी मजदूर अपने घरों को पैदल चलते हुए कैसे वापस पहुँच पाते? वे हजारों लोग जो महामारी से संघर्ष में अस्पतालों के निर्मम और मशीनी एकांतवास को लम्बे अरसे तक भोगते रहे हैं वापस अपनी देहरियों पर कैसे लौट पाते?और अब ये जो हजारों की तादाद में किसान अपने सारे दु:ख-दर्द भूलकर कडक़ती ठंड में देश की राजधानी की सडक़ों पर डेरा डाले हुए हैं वे भी तो कुछ उम्मीदें लगाए हुए होंगे कि नए साल में सब कुछ ठीक होने वाला है। उनके लिए यह भी क्या कम है कि देश की जनता उनसे बार-बार पूछ रही है -‘सब कुछ ठीक तो है न’! नए साल में ख़ुश रहने के लिए अब हमें किसी का इतना भर पूछ लेना भी काफी मान लेना होगा कि-‘नया साल मुबारक, सब कुछ ठीक तो है न!’


27-Dec-2020 12:31 PM 11

देश में सबसे अधिक शिक्षित माने जाने वाले राज्य केरल में कोट्टायम स्थित एक कैथोलिक कॉन्वेंट की सिस्टर अभया को उनकी नृशंस तरीके से की गई हत्या के 28 साल और 9 महीने बाद क्रिसमस की पूर्व संध्या पर ‘न्याय’ मिल गया। अभया की लाश अगर कॉन्वेंट परिसर के कुएँ से नहीं मिलती तो वे इस समय 47 वर्ष की होतीं और आज क्रिसमस के पवित्र त्यौहार पर किसी गिरजाघर में आँखें बंद किए हुए अपने यीशु की आराधना में लीन होतीं। सिस्टर अभया की हत्या किसी विधर्मी ने नहीं की थी! वे अगर अपनी ही जमात के दो पादरियों और एक ‘सिस्टर’ को 27 मार्च 1992 की अल सुबह कॉन्वेंट के किचन में आपत्तिजनक स्थिति में देखते हुए पकड़ नहीं ली जातीं तो निश्चित ही आज जीवित होतीं।

दोनों पादरियों और आपत्तिजनक आचरण में सहभागी ‘सिस्टर’ ने मिलकर अभया की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी और उनकी लाश को कुएँ में धकेल दिया। अभया तब केवल उन्नीस वर्ष की थीं और इतनी सुबह अपनी बारहवीं कक्षा की परीक्षा की पढ़ाई करने बैठने के पहले पानी पीने के लिए किचन में पहुँचीं थीं।केवल एक औरत को न्याय मिलने में लगभग तीन दशक लग गए। इस दौरान वह सब कुछ हुआ जो हो सकता था। जैसा कि कठुआ, उन्नाव, हाथरस और अन्य सभी जगह हो रहा है। एक जघन्य हत्या को आत्महत्या में बदलने की कोशिशों से लगाकर समूचे प्रकरण को बंद करने के दबाव। इनमें तीन-तीन बार नई जाँच टीमों का गठन भी शामिल है। तीनों आरोपियों को अभया की हत्या में संलिप्तता के आरोप में नवम्बर 2008 में गिरफ्तार भी कर लिया गया था पर सिर्फ दो महीने बाद ही सब ज़मानत पर रिहा हो गए और पिछले 11 वर्षों से आजाद रहते हुए चर्च की सेवा में भी जुटे हुए थे।

विडम्बना इतनी ही नहीं है कि एक 19 वर्षीय ईसाई सिस्टर की इतनी निर्ममता के साथ हत्या कर दी गई, बल्कि यह भी है कि अभया को जब हत्या के इरादे से ‘पवित्र पुरुषों ‘और उनकी सहयोगी ‘सिस्टर’ द्वारा भागते हुए पकड़ा गया होगा तब वे या तो चीखी-चिल्लाई ही नहीं होंगी  या फिर उनकी चीख कॉन्वेंट में मौजूद कोई सवा सौ रहवासियों द्वारा, जिनमें कि कोई बीस ‘नन्स’ भी शामिल रही होंगी, अनसुनी कर दी गई जैसे कि इस तरह की आवाजें ‘आई रात ‘ की बात हो। इस बात का शक इससे भी होता है कि कुएँ से अभया की लाश के प्राप्त होने के बाद भी कॉन्वेंट में कोई असामान्य किस्म की बेचैनी या असुरक्षा की भावना महसूस नहीं की गई। सार्वजनिक तौर पर तो उन सिस्टरों द्वारा भी नहीं जो अभया की साथिनें रही होंगी। पादरियों द्वारा यीशु की अच्छाई के सारे उपदेश भी इस दौरान यथावत जारी रहे।अभया की हत्या की रात कॉन्वेंट में ताम्बे के तारों की चोरी के इरादे से घुसे एक शख्स की गवाही और एक गरीब सामाजिक कार्यकर्ता की लगभग तीन दशकों तक धार्मिक माफिया के खिलाफ लड़ाई अगर अंत तक कायम नहीं रही होती तो किसी भी अपराधी को सजा नहीं मिलती। थिरुवनंथपुरम की सी बी आई अदालत ने एक पादरी और ‘सिस्टर’ को उम्रकैद की सजा सुनाई है पर आगे सब कुछ होना संभव है।

एक अनुमान के मुताबिक, लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी वाले कैथोलिक समाज में पादरियों और ननों की संख्या डेढ़ लाख से अधिक है। कोई पचास हजार पादरी हैं और बाकी नन्स हैं।ऊ परी तौर पर साफ-सुथरे और महान दिखने वाले चर्च के साम्राज्य में कई स्थानों पर नन्स के साथ बंधुआ मजदूरों या गुलामों की तरह व्यवहार होने के आरोप लगाए जाते हैं। ईश्वर के नाम पर होने वाले अन्य भ्रष्टाचार अलग हैं। दुखद स्थिति यह भी है कि चर्च से जुड़ी अधिकांश नन्स या सिस्टर्स सब कुछ शांत भाव से स्वीकार करती रहती हैं। अगर कोई कभी विरोध भी करता है तो उसे अपनी लड़ाई अकेले ही लडऩी पड़ती है जैसा कि एक अन्य प्रकरण में केरल में ही पिछले दो वर्षों से हो रहा है। यौन अत्याचार की शिकार एक नन आरोपित पादरी के खिलाफ अकेले लड़ रही है। केरल के ही एक विधायक ने तो संबंधित नन को ही ‘प्रोस्टिट्यूट’ तक कह दिया था। पीडि़त नन के साथ चर्च की महिलाएँ भी नहीं हैं। यीशु अगर पादरी नहीं बने और एक साधारण व्यक्ति ही बने रहे तो उसके पीछे भी जरूर कोई कारण अवश्य रहा होगा।

उक्त प्रकरण पर केंद्रित दो वर्ष पूर्व प्रकाशित एक आलेख की शुरुआत मैंने अपनी एक कविता से की थी- ‘वह अकेली औरत कौन है  जो अपने चेहरे को हथेलियों में भींचे और सिर को टिकाए हुए घुटनों पर उस सुनसान चर्च की आखिरी बैंच के कोने पर बैठी हुई सुबक-सुबक कर रो रही है? वह औरत कोई और नहीं है हाड़-माँस का वही पुंज है जो यीशु को उनके ‘पुरुष शिष्यों’ के द्वारा अकेला छोड़ दिए जाने के बाद उनकी ढाल बनकर अंत तक उनका साथ देती रही जो उनके ‘पुनरुज्जीवन’ के वक्त भी उपस्थित हुई उनके साथ और वही औरत आज उन्हीं ‘पुरुष शिष्यों’ के बीच सर्वथा असुरक्षित है और हैं अनुपस्थित यीशु भी!’
हमें केवल वृंदावन के आश्रमों में कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाली परित्यक्ताओं अथवा किसी जमाने की देवदासियों के दारुण्यपूर्ण जीवन की कहानियाँ या फिर महिलाओं के लिए निर्धारित मनुस्मृति में उद्धृत ‘उचित स्थान’ के वर्णन ही सुनाए जाते हैं। उन तथाकथित सभ्य प्रतिष्ठानों में महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले शोषण के बारे में बाहर ज़्यादा पता नहीं चलता, जिन्हें सबसे अधिक सुरक्षित समझा जाता है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उच्च पदस्थ धर्म गुरुओं द्वारा किए जाने वाले सभी तरह के यौन दुराचारों के किस्से इस समय दुनिया भर के देशों में उजागर हो रहे हैं।

‘अभया’ को अंतिम रूप से न्याय मिल गया है यह उसी तरह का भ्रम है जैसा कि ‘निर्भया’ या उसके जैसी हजारों-लाखों बच्चियों और महिलाओं को इस ‘पित्र-सत्तात्मक’ समाज में प्राप्त होने वाले न्याय को लेकर बना हुआ है। ‘निर्भया’ और ‘अभया’ दोनों के ही शाब्दिक अर्थ भी एक जैसे हैं और व्यथाएँ भी!


20-Dec-2020 6:50 PM 34

-श्रवण गर्ग

सरकार ने अब अपने ही नागरिक भी चुनना प्रारम्भ कर दिया है। सत्ताएँ जब अपने में से ही कुछ लोगों को पसंद नहीं करतीं और मजबूरीवश उन्हें देश की भौगोलिक सीमाओं से बाहर भी नहीं धकेल पातीं तो उन्हें अपने से भावनात्मक रूप से अलग करते हुए अपने ही नागरिकों का चुनाव करने लगती है।बीसवीं सदी के प्रसिद्ध जर्मन कवि, नाटककार और नाट्य निर्देशक बर्तोल्त ब्रेख़्त की 1953 में लिखी गई एक सर्वकालिक कविता की पंक्तियाँ हैं :’ सत्रह जून के विप्लव के बाद /लेखक संघ के मंत्री ने /स्तालिनाली शहर में पर्चे बाँटे/ कि जनता सरकार का विश्वास खो चुकी है /और तभी पा सकती है यदि दोगुनी मेहनत करे/ ऐसे मौक़े पर क्या यह आसान नहीं होगा /सरकार के हित में / कि वह जनता को भंग कर कोई दूसरी चुन ले !’’ ऐसा ही हो भी रहा है। लगभग सभी स्थानों पर।

समाचार हैं कि सरकार ने अब अपने किसान संगठन भी खड़े कर लिए हैं। मतलब कुछ किसान अब दूसरे किसानों से अलग होंगे ! जैसे कि इस समय देश में अलग-अलग नागरिक तैयार किए जा रहे हैं। धर्म को परास्त करने के लिए धर्म और नागरिकों को परास्त करने के लिए नागरिकों का उपयोग किया जाता है। किसानों को भी किसानों के ज़रिए ही कमज़ोर किया जाएगा। लोहा ही लोहे को काटता है की तजऱ् पर। अब ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ नाम की कोई बात नहीं बची। नागरिकता क़ानून का मूल स्वर यही स्थापित करना था कि देश का ‘असली’नागरिक किसे माना जाएगा !

पड़ौसी  मुल्कों से आने वाले कुछ ख़ास धर्मों के शरणार्थियों को ही नागरिकता दी जा सकेगी और बाक़ी को नहीं। नागरिकता के अभाव में किन और कितने लोगों को देश छोडऩा पड़ेगा, साफ़ नहीं किया गया है।और यह भी कि देश छोडक़र जाने वालों को अपने लिए नयी ज़मीन कहाँ तलाशना होगी !

हरेक चीज़ को पालों और हदों में बांटा जा रहा है। एक पाले में वे तमाम लोग हैं जो हरेक परिस्थिति में तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ जुड़े रहते हैं। दूसरे वे हैं जो हर किस्म की हदों से अपने को बाहर रखते हैं और इसी को वे अपनी नियति भी मानते हैं। अब तीसरे वे हैं जिनके पाले सत्ताएँ तय कर रही हैं।हरेक चीज और इबारत का ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में दिखाई देना ज़रूरी कर दिया गया है। चाहे नागरिक हों, मीडिया हो अथवा अदालतें हों। सत्ताओं के साथ नहीं होने का अर्थ नई व्यवस्था में देश और धर्म विरोधी करार दिया गया है। नागरिकता क़ानून के बाद भाजपा-शासित राज्यों में धर्मांतरण, लव जिहाद आदि को लेकर बनने वाले क़ानूनों के तेवर नागरिकों को क़बीलाई संस्कृति में बाँटने के ही नए उपक्रम माने जा सकते हैं किसी आधुनिक भारत के निर्माण के लिए मील के पत्थर नहीं।कहा जा सकता है कि अब ‘ऑनर किलिंग’ की सुपारी कट्टरपंथी खाप पंचायतों अथवा परिवारों के हाथों से निकालकर सत्ताओं के हाथों में पहुँच गई है।

कोरोना महामारी के चलते न सिफऱ् कई नागरिक अधिकारों पर आरोपित ‘स्वैच्छिक’ रोक लग गई है, न्यायपालिका को भी सार्वजनिक रूप से सलाह दी जा रही है कि उसे अपने फ़ैसलों के ज़रिए ऐसा कोई कार्य करने से बचना चाहिए जिससे कार्यपालिका के मार्ग में अवरोध उत्पन्न हों।संसद के शीतकालीन सत्र को स्थगित कर दिया गया है पर सरकारी पार्टी की धार्मिक संसदें चालू हैं। हालात ऐसे ही रहे तो एक दिन स्थिति ऐसी भी आ सकती है कि लोग संसद की ज़रूरत के प्रति ही संज्ञा शून्य हो जाएँ, वे संसद की ओर कान लगाकर कुछ सुनने के बजाय उसकी नई इमारत की ओर आँखें गाडक़र उसके वास्तु सौंदर्य के गुणगान करने लगें।

जमाने लद गए हैं जब चीन ,रूस, उत्तरी कोरिया आदि देशों में लोकतंत्र की कमी और एक पार्टी की शासन व्यवस्था को लेकर चिंतित होते हुए हम अपने देश के भरपूर लोकतंत्र के प्रति गर्व महसूस किया करते थे। इस समय हमें न सिफऱ् यह बताया जा रहा है कि देश की तरक्क़ी में लोकतंत्र का आधिक्य न सिफऱ् बाधक बन रहा है यह भी ‘समझाया’जा रहा है हमारे यहाँ जैसे आंदोलन अगर वहाँ होते तो उनके साथ कैसा सलूक किया जाता। कृषि क़ानूनों के पक्ष में सरकार की तरफ़दारी करते हुए अंग्रेज़ी दैनिक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में हाल में प्रकाशित आलेख में आर्थिक विषयों के जानकार स्वामीनाथन अंक्लेसरिया अय्यर ने डराया है कि चीन जैसी एकतंत्रीय व्यवस्थाओं में ऐसे आंदोलनों को तबाह कर दिया जाता है पर लोकतंत्र ऐसे आंदोलनकारियों को ‘शूट’ नहीं करते।आलेख के शीर्षक की प्रधानमंत्री को यही सलाह है वे मख़मली दस्ताने पहनकर इस्पाती हाथों से किसान आंदोलन से निपटें।

भारत की धर्मप्राण राजनीतिक प्रयोगशाला में इस समय प्रयोग यह चल रहा हैं कि बहुसंख्यक नागरिकों को लोकतंत्र की ज़रूरत के प्रति कैसे संवेदनशून्य कर दिया जाए। उनके मन में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की आवश्यकता के प्रति इतनी धिक्कारपूर्ण भावना पैदा करदी जाए कि वे उसे सरकार के ‘सुशासन’ के मार्ग में बाधा मानने लगें। दूसरे अर्थों में कहें तो नागरिकों को ही विपक्ष का विपक्षी बना दिया जाए।किसी सशक्त राजनीतिक विपक्ष की अनुपस्थिति में नागरिकों को भी विपक्ष की भूमिका निभाने से रोकने के लिए उन्हें भी आपस में बाँट दिया जाए और वे एक दूसरे पर हमला करने को ही असली राष्ट्रीयता मानने लगें।

 कडक़ती ठंड में भी राजधानी दिल्ली की सडक़ों पर जमा कुछ हज़ार नागरिकों की मौजूदगी से 135 करोड़ नागरिकों की मालिक सरकार पिछले छह वर्षों में पहली बार इतनी चिंतित और डरी हुई नजऱ आ रही है कि उनसे हाथ जोडक़र अपने घरों को लौटने की अपील कर रही है। देश में ‘कुछ ज़्यादा लोकतंत्र’ को क़ायम रखने की जि़म्मेदारी जब जनता  सरकार और कमज़ोर विपक्ष से छीनकर अपने कंधों पर लेने लगती है तब ऐसा ही होता है।


12-Dec-2020 2:14 PM 8

नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत (भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1980 बैच के अधिकारी) का कहना है कि भारत में कड़े सुधारों को लागू करना बहुत मुश्किल है। हमारे यहां लोकतंत्र कुछ ज़्यादा ही है। राष्ट्रीय स्तर की सर्वोच्च संस्था से जुड़ा व्यक्ति जब इस आशय की कोई बात कहता है और वह भी ठीक उस समय जब कृषि क़ानूनों को लेकर किसानों का राष्ट्र्व्यापी विरोध चल रहा हो तो निश्चित ही उसके ‘पीछे’ काफ़ी वज़न होना चाहिए। माना जाना चाहिए कि बात एक व्यक्ति नहीं बल्कि ऐसी संस्था की ओर से कही जा रही है जिसे ‘भारत को बदलने के लिए राष्ट्रीय संस्थान’ के रूप में पैंसठ साल पुराने ‘योजना आयोग’ को ख़त्म करके बनाया गया था।

देश की तरक़्क़ी के लिए अगर हक़ीक़त में ही तेज रफ़्तार वाले सुधारों की ज़रूरत है और मौजूदा ‘कुछ ज़्यादा ही ‘लोकतंत्र उसमें बाधक बन रहा है तो फिर 93 साल पुराने संसद भवन के स्थान पर लगभग हज़ार करोड़ खर्च करके नई इमारत बनाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। इतनी बड़ी धन राशि का उपयोग तो नए कारावासों के निर्माण, पुरानों की क्षमता बढ़ाने और कुछ खुली जेलों की स्थापना के लिए भी किया जा सकता है।

लोकतंत्र की ज़रूरत जैसे-जैसे कम होती जाती है, कारावासों, न्यायालयों और अस्पतालों, आदि की मांग बढ़ने लगती है। एक स्थिति के बाद तो पूरा देश ही एक खुली जेल में बदल जाता है जैसी कि स्थिति हमारे कुछ नज़दीकी मुल्कों में है। इनमें वे भी शामिल हैं जिनसे हम आर्थिक विकास के क्षेत्र में टक्कर लेना चाहते हैं। नागरिक जब लोकतंत्र को कम किए जाने का विरोध करने लगते हैं उनके साथ वैसा ही व्यवहार होता है जैसा वर्तमान में चीन द्वारा हांग कांग में लोकतंत्र-समर्थकों के साथ किया जा रहा है। हमारी नज़रें इस समय चीन द्वारा की जा रही तेज रफ़्तार आर्थिक प्रगति पर ही है वहां हो रही लोकतंत्र की समाप्ति पर नहीं।

कहा तो यह भी जा सकता है कि लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों, संवैधानिक संस्थानों की स्वायत्तता, बोलने की आज़ादी और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर नागरिक भी ‘फुगावे’ में हैं। फुगावे से मतलब उस तरह के भ्रम से है जैसा आर्थिक सम्पन्नता के दावों को लेकर हर्षद मेहता के साम्राज्यवाद ने पैदा कर दिया था। नक़ली ‘बबल’ के फूटते ही लाखों लोग और घर तबाह हो गए थे। अभी अनुमान आना बाक़ी है कि कृषि सम्बन्धी क़ानूनों के कारण किसान-आत्महत्याओं के आँकड़ों में कमी आ जाएगी या वे और बढ़ जाएंगे ! पता नहीं कि किसानों के साथ आढ़तिए और छोटे अनाज व्यापारी भी आंकड़ों में शामिल हो जाएँगे !
जब अमिताभ कांत भारत में ज़्यादा लोकतंत्र होने की बात करते हैं तो यह नहीं बताते कि वह हक़ीक़त में कितना अधिक है ! मसलन, स्वीडन स्थित संस्था वी-डेम इंस्टीट्यूट द्वारा दुनिया के अलग-अलग देशों में लोकतंत्र की स्थिति को लेकर जारी की गई रिपोर्ट में जो कुछ कहा गया है उसे अमिताभ कांत के नज़रिए में विश्वसनीय नहीं माना जाना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में लोकतंत्र कमज़ोर पड़ रहा है। संस्थान द्वारा तैयार 179 मुल्कों की सूची के उदार लोकतंत्र सूचकांक में हमें नब्बे वें स्थान पर रखा गया है।

स्वीडिश संस्थान के तरीक़े की रपटों अथवा प्रतिकूल टिप्पणियों से हम न सिर्फ़ अप्रभावित रहते हैं, उन्हें दृढ़तापूर्वक ख़ारिज भी कर देते हैं। नागरिक अधिकारों की अवमानना अथवा सीमित होती धार्मिक आज़ादी की घटनाओं को लेकर प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की रपटों में की जाने वाली आलोचनाओं को देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया जाता है। हम केवल विदेशी पूंजी निवेश के ‘हस्तक्षेप’ का ही खुली बाहों के साथ स्वागत करना चाहते हैं, बाक़ी किसी क्षेत्र में नहीं। देश की जनता कोरोना की महामारी से संघर्ष करती हुई जिस समय अपनी जानें बचाने में जुटी हुई है, सरकार भी उसी समय अपने सारे सुधारों के खेत बो लेना चाहती है।

पिछले दिनों मनाए गए ‘संविधान दिवस’ के अवसर पर वेंकैया नायडू के कथन को उद्धृत करते हुए प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, उपराष्ट्रपति ने कहा था कि न्यायपालिका द्वारा विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप किया जा रहा है, ऐसी चिंताएं हैं। सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कुछ माह पूर्व कोरोना के संदर्भ में विचार व्यक्त किया था कि देश के उच्च न्यायालयों के ज़रिए कुछ लोग समानांतर सरकार चला रहे हैं।

देश में इस समय जो कुछ भी चल रहा है और प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तरीक़े से उसे व्यक्त किया जा रहा है उस सब का सीधा सम्बंध लोकतंत्र से है। नीति आयोग के एक प्रमुख व्यक्ति (सीईओ) के विवादास्पद कथन पर आश्चर्यजनक रूप से सत्ता के किसी भी कोने से कोई बेचैनी नहीं प्रकट हुई। प्रधानमंत्री नीति आयोग के अध्यक्ष हैं। एक मित्र ने आपातकाल के दौरान तब के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशिभूषण द्वारा इंदिरा गांधी के बचाव में की गई टिप्पणी की ओर ध्यान दिलाया है कि : 'देश में एक सीमित तानाशाही ज़रूरी है।’ नीति आयोग के शीर्ष पुरुष जब लोकतंत्र की अधिकता से विचलित होते दिखाई पड़ते हैं तो सोचना पड़ेगा वे किस बात की तरफ़ संकेत कर रहे हैं। वे भी कहीं शशि भूषण की तरह ही सीमित अधिनायकवाद के वास्तुकार की भूमिका तो नहीं अदा कर रहे हैं?

 


03-Dec-2020 12:25 PM 17

कांग्रेस के भविष्य को लेकर इस समय सबसे ज़्यादा चिंता व्याप्त है। यह चिंता भाजपा भी कर रही है और कांग्रेस के भीतर ही नेताओं का एक समूह भी कर रहा है। दोनों ही चिंताएँ ऊपरी तौर पर भिन्न दिखाई देते हुए भी अपने अंतिम उद्देश्य में एक ही हैं। सारांश में यह कि पार्टी की कमान गांधी परिवार के हाथों से कैसे मुक्त हो ? आज की परिस्थिति में कांग्रेस को बचाने का आभास देते हुए उसे ख़त्म करने का सबसे अच्छा प्रजातांत्रिक तरीक़ा भी यही हो सकता है। जहां भाजपा की राष्ट्रीय मांग देश को कांग्रेस से मुक्त करने की है। कांग्रेस पार्टी के एक प्रभावशाली तबके की मांग फ़ैसलों की ज़िम्मेदारी किसी व्यक्ति (परिवार !) विशेष के हाथों में होने के बजाय सामूहिक नेतृत्व के हवाले किए जाने की है। सामूहिक फ़ैसलों की मांग में मुख्य रूप से यही तय होना शामिल माना जा सकता है कि विभिन्न पदों पर नियुक्ति और राज्य सभा के रिक्त स्थानों की पूर्ति के अधिकार अंततः किसके पास होने चाहिए !

एक सौ पैंतीस साल पुरानी कांग्रेस को ‘प्रजातांत्रिक’ बनाने की लड़ाई एक ऐसे समय खड़ी की गई है कि वह न सिर्फ़ ‘प्रायोजित’ प्रतीत होती है, उसके पीछे के इरादे भी संदेहास्पद नज़र आते हैं। कांग्रेस-मुक्त भारत की स्थापना की दिशा में इसे पार्टी के कुछ विचारवान नेताओं का सत्तारूढ़ दल को ‘गुप्तदान’ भी माना जा सकता है। राजनीति में ऐसा होता ही रहता है। बेरोज़गार बेटों को मां-बाप से शिकायतें हो ही सकती है कि वे कमाकर नहीं ला रहे हैं इसीलिए घर में ग़रीबी है।

क्या किसी प्रकार का शक नहीं होता कि बंगाल चुनाव के ठीक पहले बिहार में उम्मीदवारों की हार को मुद्दा बनाकर जिस समय वरिष्ठ नेता कांग्रेस नेतृत्व को घेर रहे हैं,भाजपा के निशाने पर भी वही एक दल है ? दो विपरीत ध्रुवों वाली शक्तियों के निशाने पर एक ही समय पर एक टार्गेट कैसे हो सकता है ? इसी कांग्रेस के नेतृत्व में जब दो साल पहले तीन राज्यों में चुनाव जीतकर सरकारें बन गईं थीं तब तो वैसी आवाज़ें नहीं उठीं थीं जैसी आज सुनाई दे रही हैं!

एक देश, एक संविधान और एक चुनाव की पक्षधर भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर केवल एकमात्र राजनीतिक दल के रूप में पहचान स्थापित करने के लिए ज़रूरी है कि कांग्रेस को एक क्षेत्रीय पार्टी की हैसियत तक सीमित और दिल्ली की तरफ़ खुलने वाली राज्यों की खिड़कियों को पूरी तरह से सील कर दिया जाए। जो प्रकट हो रहा है वह यही है कि सोनिया गांधी की अस्वस्थता को देखते हुए उनकी उपस्थिति में ही पार्टी-नेतृत्व का बँटवारा कर लेने की मांग  उठाई जा रही है। राहुल गांधी ने सवाल भी किया था कि तेईस लोगों ने चिट्ठी उस वक्त ही क्यों लिखी जब सोनिया गांधी का अस्पताल में इलाज चल रहा था ?

स्पष्ट है कि जिस समय कांग्रेस को ही अपनी कमजोरी से निपटने के लिए इलाज की ज़रूरत है, नेतृत्व से जवाब-तलबी की जा रही है कि वह भाजपा की टक्कर में दौड़ क्यों नहीं लगा पा रही है ! सारे सवाल कांग्रेस को लेकर ही हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त छह और भी हैं पर उनकी कहीं कोई चर्चा नहीं है ! वे सभी दल क्षेत्रीय पार्टियाँ बन कर रह गए हैं।

इसमें शक नहीं कि एक मरणासन्न विपक्ष को इस समय जिस तरह के नेतृत्व की कांग्रेस से दरकार है वह अनुपस्थित है।ऐसा होने के कई कारणों में एक यह भी है कि कोरोना प्रबंधन के पर्दे में न सिर्फ़ नागरिकों की गतिविधियों को सीमित कर दिया गया है, विपक्षी दलों और उनकी सरकारों की चिंताओं की सीमाएँ भी तय कर दी गईं हैं। किसान आंदोलन के रूप में जो प्रतिरोध व्यक्त हो रहा है उसे बजाय किसानों की वास्तविक समस्याओं को लेकर फूटे आक्रोश के रूप में देखने के केंद्र के ख़िलाफ़ पंजाब की अमरिंदर सिंह सरकार द्वारा समर्थित राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। अगर यह सही है तो फिर कांग्रेस के बग़ावती नेता इसे पार्टी के जनता के साथ जुड़ने की ओर कदम भी मान सकते हैं जिसकी कि शिकायत उन्हें वर्तमान नेतृत्व से है।

भारतीय जनता पार्टी के एकछत्र शासन के मुक़ाबले देश में एक सशक्त (या कमज़ोर भी) राष्ट्रीय विपक्ष की ज़रूरत के कठिन समय में कांग्रेस नेतृत्व को अंदर से ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें कई सवालों को जन्म देती हैं। चूंकि  इस तरह की परिस्थितियाँ कांग्रेस के लिए पहला अनुभव नहीं है, लोग यह अनुमान भी लगाना चाहते हैं कि इंदिरा गांधी आज अगर होतीं तो मौजूदा संकट से कैसे निपटतीं और उनकी बहू होने के नाते सोनिया गांधी को ऐसा क्या करना चाहिए जो वे नहीं कर पा रही हैं? क्या उनके द्वारा तमाम बग़ावती नेताओं को यह सलाह नहीं दी जा सकती कि वे भी ममता, शरद पवार और संगमा की तरह ही विद्रोही कांग्रेसियों की एक और पृथक ‘कांग्रेस’ बना लें ? बाक़ी छह राष्ट्रीय दलों में तीन तो इन्हीं लोगों की बनाई हुई ‘कांग्रेस’ ही हैं। बाक़ी तीन में दो साम्यवादी दल और बसपा है। इनमें किसी की भी हालत देश से छुपी हुई नहीं है।

और अंत में : कांग्रेस के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला द्वारा प्रधानमंत्री की इस बात के लिए आलोचना किए जाने कि दिल्ली में किसानों के आंदोलन के वक्त वे कोरोना वैक्सीन के प्रयोग स्थलों की यात्रा पर थे अगले ही दिन पार्टी के दूसरे प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने मोदी की तारीफ़ करते हुए ट्वीट किया कि उनका (प्रधानमंत्री का) यह कदम भारतीय वैज्ञानिकों के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है। इससे अग्रिम पंक्ति के कोरोना योद्धाओं का मनोबल बढ़ेगा। आनंद शर्मा का नाम उन तेईस लोगों में शामिल है जो कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं। हालांकि शर्मा ने बाद में अपना फैलाया हुआ रायता समेटने की कोशिश भी की पर तब तक देर हो चुकी थी।

-श्रवण गर्ग


22-Nov-2020 12:37 PM 23

मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी देश की चुनावी राजनीति में जो कुछ भी कर रहे हैं वह यह कि लगातार संगठित और मजबूत होते हिंदू राष्ट्रवाद के समानांतर अल्पसंख्यक स्वाभिमान और सुरक्षा का तेज़ी से ध्रुवीकरण कर रहे हैं। यह काम वे अत्यंत चतुराई के साथ संवैधानिक सीमाओं के भीतर कर रहे हैं। मुमकिन है उन्हें कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों के उन उन अल्पसंख्यक नेताओं का भी मौन समर्थन प्राप्त हो जिन्हें हिंदू राष्ट्रवाद की लहर के चलते इस समय हाशियों पर डाला जा रहा है। बिहार के चुनावों में जो कुछ प्रकट हुआ है उसके अनुसार, ओवैसी का विरोध अब न सिर्फ भाजपा के हिंदुत्व तक ही सीमित है, वे तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनीति को भी अल्पसंख्यक हितों के लिए ख़तरा मानते हैं। बिहार चुनाव में भाजपा के खिलाफ विपक्षी गठबंधन को समर्थन के सवाल पर वे इस तरह के विचार व्यक्त कर भी चुके हैं।

पृथक पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना के अविभाजित भारत की राजनीति में उदय को लेकर जो आरोप तब कांग्रेस पर लगाए जाते रहे हैं वैसे ही इस समय ओवैसी को लेकर भाजपा पर लग रहे हैं। जिन्ना की तरह ओवैसी अल्पसंख्यकों के लिए किसी अलग देश की माँग तो निश्चित ही नहीं कर सकेंगे पर देश के भीतर ही उनके छोटे-छोटे टापू खड़े करने की क्षमता अवश्य दिखा रहे हैं। कहा जा सकता है कि जिन्ना के बाद ओवैसी मुस्लिमों के दूसरे बड़े नेता के रूप में उभर रहे हैं। जिन्ना की तरह ही ओवैसी ने भी विदेश से पढ़ाई करके देश की मुस्लिम राजनीति को अपना कार्यक्षेत्र बनाया है। ओवैसी ने भी क़ानून की पढ़ाई लंदन के उसी कॉलेज ( Lincoln's Inn London) से पूरी की है जहां से जिन्ना बैरिस्टर बनकर अविभाजित भारत में लौटे थे। ओवैसी का शुमार दुनिया के सबसे प्रभावशाली पाँच सौ मुस्लिम नेताओं में है। उनकी अभी उम्र सिर्फ इक्यावन साल की है । भारत में नेताओं की उम्र देखते हुए कहा जा सकता है कि ओवैसी एक लम्बे समय तक मुस्लिम राजनीति का नेतृत्व करने वाले हैं।

बिहार में मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की पाँच सीटें जीतने के बाद ओवैसी के पश्चिम बंगाल के चुनावों में भाग लेने के फैसले से ममता बनर्जी का चिंतित होना ज़रूरी है पर वह बेमायने भी हो गया है। क्योंकि ओवैसी बंगाल में वही करना चाह रहे हैं जो ममता बनर्जी इतने सालों से करती आ रहीं थीं और अब अपने आपको को मुक्त करने का इरादा रखती हैं। ओवैसी तृणमूल नेता को बताना चाहते हैं कि बंगाल के अल्पसंख्यकों का उन्होंने यकीन खो दिया है। इसका फायदा निश्चित रूप से भाजपा को होगा पर उसकी ओवैसी को अभी चिंता नहीं है।भाजपा ने ममता की जो छवि 2021 के विधान सभा चुनावों के लिए प्रचारित की है वह यही कि राज्य की मुख्यमंत्री मुस्लिम हितों की संरक्षक और हिंदू हितों की विरोधी हैं।इस तर्क के पक्ष में वे तमाम निर्णय गिनाए जाते हैं जो राज्य की सत्ताईस प्रतिशत मुस्लिम आबादी के लिए पिछले सालों में ममता सरकार ने लिए हैं।

देखना यही बाक़ी रहेगा कि बंगाल के मुस्लिम मतदाता ओवैसी के साथ जाते हैं या फिर वैसा ही करेंगे जैसा वे पिछले चुनावों में करते रहे हैं। मुस्लिम मतदाता ऐसी परिस्थितियों में ऐसे किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में अपना वोट डालते रहें हैं जिसके कि भाजपा या उसके द्वारा समर्थित प्रत्याशी के विरुद्ध जीतने की सबसे ज़्यादा सम्भावना हो वह चाहे ग़ैर-मुस्लिम ही क्यों न हो।बिहार के मुस्लिम मतदाताओं ने 2015 के चुनाव में ओवैसी के बजाय नीतीश का इसलिए समर्थन किया था कि वे तब भाजपा के खिलाफ राजद के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे। उन्होंने इस बार विपक्षी महगठबंधन का भी इसलिए समर्थन नहीं किया कि उसमें शामिल कांग्रेस ने नागरिकता कानून, तीन तलाक और मंदिर निर्माण आदि मुद्दों को लेकर अपना रुख़ स्पष्ट नहीं किया।

भाजपा को ओवैसी जैसे नेताओं की उन तमाम राज्यों में जरूरत रहेगी जहां मुस्लिम आबादी का एक निर्णायक प्रतिशत उसके विपक्षी दलों के वोट बैंक में सेंध लगा सकता है।इनमें असम सहित उत्तर-पूर्व के राज्य भी शामिल हो सकते हैं। ओवैसी अपने कट्टरवादी सोच के साथ मुस्लिम आबादी का जितनी तीव्रता से ध्रुवीकरण करेंगे उससे ज़्यादा तेजी के साथ भाजपा को उसका राजनीतिक लाभ पहुँचेगा।भाजपा सहित किसी भी बड़े राजनीतिक दल ने अगर बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान ओवैसी के घोषित-अघोषित एजेंडे पर प्रहार नहीं किए तो उनकी राजनीतिक मजबूरियों को समझा जा सकता है। ममता बनर्जी मुस्लिम मतदाताओं से खुले तौर पर यह नहीं कहना चाहेंगीं कि वे अगर तृणमूल के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ ओवैसी की पार्टी को वोट देंगे तो वे फिर से मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी और इससे उनके ही (मुस्लिमों के) हितों पर चोट पड़ेगी।

बिहार में अपने उम्मीदवारों की जीत के बाद ओवैसी ने कहा था कि नतीजे उन लोगों के लिए संदेश है जो सोचते हैं कि उनकी पार्टी को चुनावों में भाग नहीं लेना चाहिए।’क्या हम कोई एन.जी.ओ. हैं कि हम सिर्फ सेमीनार करेंगे और पेपर पढ़ते रहेंगे ?हम एक राजनीतिक पार्टी हैं और सारे चुनावों में भाग लेंगे।’ अत: अब काफी कुछ साफ हो गया है कि ओवैसी का एजेंडा भाजपा के खिलाफ मुस्लिमों द्वारा उस विपक्ष को समर्थन देने का भी नहीं हो सकता जो अल्पसंख्यक मतों को बैसाखी बनाकर अंतत: बहुसंख्यक जमात की राजनीति ही करना चाहता है। कांग्रेस के कमजोर पड़ जाने का बुनियादी कारण भी यही है। बंगाल चुनावों के नतीजे ना सिर्फ भाजपा का ही भविष्य तय करेंगे, तृणमूल कांग्रेस की कथित अल्पसंख्यक परक नीतियों और सबसे अधिक तो ओवैसी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए निर्णायक साबित होंगे। भाजपा अगर एक विपक्ष-मुक्त भारत के निर्माण में लगी है तो उसमें निश्चित ही ओवैसी की पार्टी को शामिल करके नहीं चल रही होगी ! 

-श्रवण गर्ग


01-Nov-2020 10:07 AM 47

सात माह बाद खुला अचानकमार अभयारण्य

'छत्तीसगढ़' संवाददाता 
बिलासपुर, 1 नवंबर। अचानकमार टाइगर रिजर्व आज से पर्यटकों के लिये खोल दिया गया है। कोरोना संक्रमण काल के कारण इसे बीते अप्रैल माह से ही बंद कर दिया गया था।

अचानकमार में वन विभाग द्वारा एक 20 सीटर बस और सात जिप्सियों की व्यवस्था भ्रमण के लिये तय की गई है। यहां के विश्रामगृह और वाहनों का आरक्षण ऑनलाइन भी कराया जा सकता है।  इसके लिये http://www.tigersofachanakmar.org लिंक पर जाना होगा।

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-श्रवण गर्ग

नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ इस समय एक ज़बरदस्त माहौल है।कहा जा रहा है कि इस बार तो उनकी पार्टी काफ़ी सीटें हारने वाली है और वे चौथी बार मुख्यमंत्री नहीं बन पाएँगे।प्रचारित किया जा रहा है कि ‘सुशासन’ बाबू ने बिहार को अपने राज के पंद्रह सालों में ‘कुशासन’ के अलावा और कुछ नहीं दिया।(हालाँकि भाजपा नेता सुशील मोदी भी इस दौरान एक दशक से ज़्यादा समय तक उनके ही साथ उप-मुख्यमंत्री रहे हैं)।क्या ऐसा तो नहीं है कि मतदाताओं, जिनमें कि लाखों की संख्या में वे प्रवासी मज़दूर भी शामिल हैं, जो अपार अमानवीय कष्टों को झेलते हुए हाल ही में बिहार में अपने घरों को लौटे हैं, की नाराज़गी की बारूद का मुँह मोदी सरकार की ओर से हटाकर नीतीश की तरफ़ किया जा रहा है ? नीतीश के मुँह पर भाजपा से गठबंधन का मास्क चढ़ा हुआ है और वे इस बारे में कोई सफ़ाई देने की हालत में भी नहीं हैं।

सवाल इस समय सिर्फ़ दो ही हैं : पहला तो यह कि आज अगर बिहार में राजनीतिक परिस्थितियाँ पाँच साल पहले जैसी होतीं और मुक़ाबला जद (यू)-राजद के गठबंधन और भाजपा के बीच ही होता तो चुनावी नतीजे किस प्रकार के हो सकते थे ? दूसरा सवाल यह कि नीतीश को देश में ग़ैर-कांग्रेसी और ग़ैर-भाजपाई विपक्ष के किसी सम्भावित राजनीतिक गठबंधन के लिहाज़ से क्या कमज़ोर होते देखना ठीक होगा ?और यह भी कि क्या तेजस्वी यादव ( उनके परिवार की ज्ञात-अज्ञात प्रतिष्ठा सहित ) नीतीश के योग्य राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जा सकते हैं ?

पहला सवाल दूसरे के मुक़ाबले इसलिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि मई 2014 में हिंदुत्व की जिस 'विराट' लहर पर सवार होकर मोदी पहली बार संसद की चौखट पर धोक देने पहुँचे थे, उसके सात महीने बाद पहले दिल्ली के चुनावों और फिर उसके आठ माह बाद 2015 के अंत में बिहार के चुनावों में भाजपा की भारत-विजय की महत्वाकांक्षाएँ ध्वस्त हो गई थीं। इस समय तो हालात पूरी तरह से बेक़ाबू हैं, भाजपा या मोदी की कोई लहर भी नहीं है , मंदिर-निर्माण के भव्य भूमि पूजन के बाद भी। वर्ष 2018 के अंत और उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में कई राज्यों में ग़ैर-भाजपा सरकारों का बनना और हाल के महीनों में महाराष्ट्र का घटनाक्रम भी काफ़ी कुछ साफ़ कर देता है। पिछले चुनाव में जद (यू)-राजद गठबंधन की जीत के बाद शिवसेना ने नीतीश कुमार को ‘महानायक’ बताया था। उस समय तो शिवसेना एनडीए का ही एक हिस्सा थी।

मुद्दा यह भी है कि नीतीश के ख़िलाफ़ नाराज़गी कितनी ‘प्राकृतिक’ है और कितनी ‘मैन्यूफ़्रैक्चर्ड’ ।और यह भी कि भाजपाई शासन वाले राज्यों के मुक़ाबले बिहार की स्थिति कितनी ख़राब है ?किसी समय मोदी के मुक़ाबले ग़ैर-कांग्रेसी विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के विकल्प माने जाने वाले नीतीश कुमार को इस वक्त हर कोई हारा हुआ क्यों देखना चाहता है ! इस समय तो एनडीए में शामिल कई दल भाजपा का साथ छोड़ चुके हैं।क्या ऐसा नहीं लगता कि जद(यू) की भाजपा के मुक़ाबले कम सीटों की गिनती या तो नीतीश को मोदी के ख़िलाफ़ ग़ैर-कांग्रेसी विपक्ष की ओर से आ सकने वाली किसी भी चुनौती को समाप्त कर देगी या फिर ‘सुशासन बाबू’ को बिहार का उद्धव ठाकरे बना देगी ?

कोई भी यह नहीं पूछ रहा है कि बिहार में नीतीश कुमार का कमज़ोर होना, क्या दिल्ली में नरेंद्र मोदी सरकार को 2024 के (या उसके पूर्व भी) चुनावों के पहले और ज़्यादा ‘एकाधिकारवादी’ तो नहीं बना देगा ? भाजपा चुनावों के ठीक पहले ‘चिराग़’ लेकर बिहार में क्या ढूँढ रही है ? चिराग़ ने सिर्फ़ नीतीश की पार्टी के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ ही अपने लोग खड़े  किए हैं, भाजपा के ख़िलाफ़ नहीं। चिराग़ अपने आपको मोदी का ‘हनुमान’ बताते हुए नीतीश को रावण साबित करना चाह रहे हैं और प्रधानमंत्री मौन हैं। चिराग़ की पार्टी भी एनडीए में है और नीतीश की भी।

चुनाव परिणाम आने के बाद अगर नीतीश भाजपा को चुनौती दे देते हैं कि या तो वे (नीतीश) एनडीए में रहेंगे या फिर चिराग़ तो मोदी क्या निर्णय लेना चाहेंगे ? प्रधानमंत्री ने जब 23 अक्टूबर को रोहतास ज़िले के सासाराम से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत ही अपने ‘प्रिय मित्र’ राम विलास पासवान को श्रद्धांजलि देते हुए की, तब उनके साथ मंच पर बैठे हुए नीतीश कुमार ने कैसा महसूस किया होगा ? क्या ऐसा होने वाला है कि बिहार में जीत गए तो मोदी के ‘नाम’ के कारण और हार गए तो नीतीश के ‘काम’ के कारण ?

बिहार में राजनीतिक दृष्टि से इस समय जो कुछ भी चल रहा है, वह अद्भुत है, पहले कभी नहीं हुआ होगा ! वह इस मायने में कि भाजपा का घोषित उद्देश्य और अघोषित एजेंडा दोनों ही अलग-अलग दिखाई दें ! घोषित यह कि नीतीश ही हर हाल में मुख्यमंत्री होंगे (‘चाहे हमें ज़्यादा सीटें मिल जाएँ तब भी’- जे.पी.नड्डा )। और अघोषित यह कि तेजस्वी के मार्फ़त लालू की हर तरह की वापसी को भी रोकना है और नीतीश पर निर्भरता को भी नियंत्रित करना है। इसमें यह भी शामिल हो सकता है कि भाजपा, नीतीश की राजनीतिक ज़रूरत बन जाए जो कि अभी उल्टा है।

नीतीश कुमार की तमाम कमज़ोरियों, विफलताओं और मोदी के शब्दों में ही गिनना हो तो ‘अहंकार’ के बावजूद इस समय उनका (नीतीश का) राष्ट्रीय पटल पर एक राजनीतिक ताक़त के रूप में बने रहना ज़रूरी है।अगर अतीत के लालू-पोषित ‘जंगल राज’ के ख़ौफ़ से मतदाताओं को वे मुक्त कर पाएँ तब भी तेजस्वी यादव केवल नीतीश के ‘परिस्थितिजन्य’ अस्थायी बिहारी विकल्प ही बन सकते हैं ‘आवश्यकताजन्य’ राष्ट्रीय विकल्प नहीं। इस समय ज़रूरत एक राष्ट्रीय विकल्प की है, जो कि ममता का उग्रवाद नहीं दे सकता। नीतीश को राजनीतिक संसार में मोदी का एक ग़ैर-भाजपाई, ग़ैर-कांग्रेसी प्रतिरूप माना जा सकता है।

दस नवम्बर के बाद बिहार में बहुत कुछ बदलने वाला है।इसमें राजनीतिक समीकरणों का उलट-फेर भी शामिल है। याद किया जा सकता है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा पिछली बार बिहार में अंतिम चरणों के मतदान के ठीक पहले आरक्षण के ख़िलाफ़ व्यक्त किए गए विचारों ने नतीजों को भाजपा के विरुद्ध और नीतीश के पक्ष में प्रभावित कर दिया था।अच्छे से जानते हुए भी कि आरक्षण को लेकर संघ और भाजपा के विचार पिछले चुनाव के बाद से बदले नहीं हैं ,केवल गठबंधनों के समीकरण बदल गए हैं ,नीतीश कुमार ने भाजपा को नाराज करते हुए अगर आबादी के अनुसार आरक्षण देने का इस समय मुद्दा उठा दिया है तो उन्होंने ऐसा उसके राजनीतिक परिणामों पर विचार करके ही किया होगा।चुनावी नतीजों के बाद हमें उनके राजनीतिक परिणामों की भी प्रतीक्षा करना चाहिए।


27-Oct-2020 1:59 PM 35

क्या चिंता केवल यहीं तक सीमित कर ली जाए कि कुछ टीवी चैनलों ने विज्ञापनों के जरिए धन कमाने के उद्देश्य से ही अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए उस बड़े फर्ज़ीवाड़े को अंजाम दिया होगा जिसका कि हाल ही में मुंबई पुलिस ने भांडाफोड़ किया है? या फिर जब बात निकल ही गई है तो उसे दूर तक भी ले जाया जाना चाहिए? मामला काफी बड़ा है और उसकी जड़ें भी काफी गहरी हैं। यह केवल चैनलों द्वारा अपनी टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) बढ़ाने तक सीमित नहीं है।

पूछा जा सकता है कि इस भयावह कोरोना काल में जब दुनियाभर में राष्ट्राध्यक्षों की लोकप्रियता में सेंध लगी पड़ी है, डोनाल्ड ट्रम्प जैसे चतुर खिलाड़ी भी अपने से एक अपेक्षाकृत कमज़ोर प्रतिद्वंद्वी से ‘विश्वसनीय’ ओपीनियन पोल्स में बारह प्रतिशत से पीछे चल रहे हैं, हमारे यहाँ के जाने-माने मीडिया प्रतिष्ठान द्वारा करवाए जाने वाले सर्वेक्षण में प्रधानमंत्री मोदी को 66 और राहुल गांधी को केवल आठ प्रतिशत लोगों की पसंद बतलाए जाने का आधार आखऱि क्या है ? मोदी का पलड़ा निश्चित ही भारी होना चाहिए, पर क्या उनके और राहुल के बीच लोकप्रियता का गड्ढा भी अर्नब के ‘रिपब्लिक’ और दूसरे चैनलों के बीच की टीआरपी के फर्क की तरह ही संदेहास्पद नहीं माना जाए? इस बात का पता कहाँ के पुलिस कमिश्नर लगाएँगे कि प्रभावशाली राजनीतिक सत्ताधारियों की लोकप्रियता को जाँचने के मीटर देश में किस तरह के लोगों के घरों में लगे हुए हैं ?

जनता को भ्रम में डाला जा रहा है कि टीआरपी का फर्जीवाड़ा केवल विज्ञापनों के चालीस हजार करोड़ के बड़े बाजार में अपनी कमाई को बढ़ाने तक ही सीमित है। हकीकत में ऐसा नहीं है। दांव पर और कुछ इससे भी बड़ा लगा हुआ है। इसका संबंध देश और राज्यों में सूचना तंत्र पर कब्जे के जरिए राजनीतिक आधिपत्य स्थापित करने से भी हो सकता है। देशभर में अनुमानत: जो बीस करोड़ टीवी सेट्स घरों में लगे हुए हैं और उनके जरिए जनता को जो कुछ भी चौबीसों घंटे दिखाया जा सकता है, वह एक खास किस्म का व्यक्तिवादी प्रचार और किसी विचारधारा को दर्शकों के मस्तिष्क में बैठाने का उपक्रम भी हो सकता है।वह विज्ञापनों से होने वाली आमदनी से कहीं बड़ा और किसी सुनियोजित राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा हो तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं।

क्या कोई बता सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत मामले में मुंबई पुलिस को बदनाम करने के लिए हजारों (पचास हजार?) फेक अकाउंट सोशल मीडिया पर रातों-रात कैसे उपस्थित हो गए और इतने महीनों तक सक्रिय भी कैसे रहे? इतने बड़े फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद सत्ता के गलियारों से अभी तक भी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने क्यों नहीं आई? सोशल मीडिया पर इतनी बड़ी संख्या में फर्जी अकाउंट क्या देश की किसी बड़ी राजनीतिक हस्ती या दल के खिलाफ इसी तरह से रातों-रात प्रकट और सक्रिय होकर ‘लाइव’ रह सकते हैं ? निश्चित ही इतने बड़े काम को बिना किसी संगठित गिरोह की मदद के अंजाम नहीं दिया जा सकता। चुनावों के समय तो ये पचास हज़ार अकाउंट पचास लाख और पाँच करोड़ भी हो सकते हैं ! हुए भी हों तो क्या पता ! ‘रिपब्लिक’ या गिरफ्त में आ गए कुछ और चैनल तो टीवी स्क्रीन के पीछे जो बड़ा खेल चलता है, उसके सामने कुछ भी नहीं हैं। वह खेल और भी बड़ा है और उसके खिलाड़ी भी बड़े हैं। उसके ‘वार रूम्स’ भी अलग से हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर नामी हस्तियों के लिए जिस तरह से ‘फर्जी’ फॉलोअर्स और ‘लाइक्स’ की खऱीदी की जाती है, वे चैनलों के फर्ज़ीवाड़े से कितनी अलग हैं? एक प्रसिद्ध गायक (रैपर) द्वारा यू ट्यूब पर अपना रिकार्ड बनाने के लिए फ़ेक ‘लाइक्स’ और ‘फॉलोइंग’ खरीदने के लिए बहत्तर लाख रुपए किसी कम्पनी को दिए जाने की हाल की कथित स्वीकारोक्ति, क्या हमें कहीं से भी नहीं चौंकाती? ऐसी तो देश में हजारों हस्तियाँ होंगी, जिनके सोशल मीडिया अकाउंट बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही संचालित करती हैं और इसी तरह से उनके लिए ‘नकली फालोअर्स’ की फौज भी तैयार की जाती है।

सवाल यह भी है कि एक खास किस्म की विचारधारा, दल विशेष या व्यक्तियों को लेकर सच्ची-झूठी ‘खबरों’ की शक्ल में अखबारों तथा पत्र-पत्रिकाओं में ‘प्लांट’ की जाने की सूचनाएँ और उपलब्धियाँ दो-तीन या ज़्यादा चैनलों द्वारा टीआरपी बढ़ाने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों से कितनी भिन्न हैं ? सरकारें अपने विकास कार्यों की संदेहास्पद उपलब्धियों के बड़े-बड़े विज्ञापन जारी करती हैं और मीडिया संस्थानों में उन्हें लपकने के लिए होड़ मची रहती है। राज्यों में मीडिया (पर नियंत्रण) के लिए विज्ञापनों का बड़ा बजट होता है, जिस पर पूरी निगरानी ‘ऊपर’ से की जाती है। लिखे, छपे, बोले और दिखाए जाने वाले प्रत्येक शब्द और दृश्य की कड़ी मॉनीटरिंग होती है और उसी से विज्ञापनों की शक्ल में बाँटी जाने वाली राशि तय होती है। बताया जाता है कि ‘सुशासन बाबू' के बिहार में सूचना और जन-सम्पर्क विभाग का जो बजट वर्ष 2014-15 में लगभग 84 करोड़ था, वह पाँच सालों (2018-19) में बढक़र 133 करोड़ रुपए से ऊपर हो गया। चालू चुनावी साल का बजट कितना है अभी पता चलना बाक़ी है। अनुमानित तौर पर इतनी बड़ी राशि का साठ से सत्तर प्रतिशत प्रचार-प्रसार माध्यमों को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर खर्च होता है। हाल में सरकार की ‘उपलब्धियों’ का नया वीडियो भी जारी हुआ है और वह ख़ूब प्रचार पा रहा है।

कोई भी चैनल या प्रचार माध्यम, जिनमें अख़बार भी शामिल है, कभी यह नहीं बताता या स्वीकार करता कि पिछले साल भर, महीने या सप्ताह के दौरान कितनी अपुष्ट और प्रायोजित खबरें प्रसारित-प्रकाशित की गईं, कितने लोगों और समुदायों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई गई, साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने में क्या भूमिका निभाई गई! तब्लीगी जमात को लेकर जो दुष्प्रचार किया गया, वह तो अदालत के द्वारा बेनकाब हो भी चुका है। दिल्ली के दंगों में मीडिया की भूमिका का भी आगे-पीछे खुलासा हो जाएगा। एक चैनल पर बहस के बाद एक राजनीतिक दल से जुड़े प्रवक्ता की मौत ने क्या एंकरों की भाषा, जुबान और आत्माएँ बदल दी हैं या फिर सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है? कोरोना सहित बड़े-बड़े मुद्दों को दबाकर महीनों तक केवल एक अभिनेत्री और उसके परिवार को निशाने पर लेने का उद्देश्य क्या हकीकत में भी सिर्फ अपनी टीआरपी बढ़ाना था या फिर उसके कोई राजनीतिक निहितार्थ भी थे? ‘रिपब्लिक‘ चैनल या अर्नब जैसे ‘पत्रकार/एंकर’ कभी भी अकेले नहीं पडऩे वाले हैं! न ही मुंबई पुलिस द्वारा पर्दाफाश किए गए किसी भी फर्जीवाड़े में किसी को भी कभी कोई सजा होने वाली है। मारने वालों से बचाने वाले के हाथ काफी लंबे और बड़े हैं।

-श्रवण गर्ग


18-Oct-2020 2:35 PM 13

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जब महाराष्ट्र से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका से अपने साक्षात्कार में कहा होगा कि पूरी दुनिया में भारत के मुस्लिम ही सबसे ज़्यादा संतुष्ट हैं, तब वे निश्चित ही कल्पना नहीं कर पाए होंगे कि एक राष्ट्रभक्त पारसी समूह और दक्षिण भारत के एक सार्वजनिक उपक्रम द्वारा संयुक्त रूप से संचालित आभूषण बनाने वाली कम्पनी तनिष्क द्वारा जारी किए जाने वाले वीडियो विज्ञापन के बाद राष्ट्रवादियों के झुंड उनके कहे की इस तरह से धज्जियाँ उड़ा देंगे ! इस हिंदी पत्रिका का नाम ‘विवेक’ बताया जाता है और भागवत का साक्षात्कार प्रकाशित होने के कोई पाँच दिन बाद ही ‘तनिष्क’ के खिलाफ मचे ‘सोशल बवाल’ ने देश में हिंदू-मुस्लिम संबंधों के ‘ज़मीनी विवेक’ की ‘गोदाई’ कर दी।

भारतीय त्योहारों के अवसर पर जारी किए जाने वाले अनूठे विज्ञापनों की तनिष्क की एक लम्बी श्रंखला है। विवाद का मुद्दा बनाए गए वीडियो विज्ञापन में एक ऐसी गर्भवती हिंदू महिला की ‘गोद भराई’ की रस्म के अत्यंत ही भावपूर्ण दृश्य हैं, जिसका विवाह एक मुस्लिम परिवार में हुआ है। ससुराल में हिंदू परम्परा के दृश्य से अभिभूत महिला जब अपनी मुस्लिम सास से सवाल करती है कि ऐसी रस्म तो उनके यहाँ नहीं होती तो वह (सास) जवाब देती है कि बेटी को ख़ुश रखने की रस्म तो हर घर में होती है।बवाल मचाने वालों ने अपनी ‘जनता ट्रायल’ में विज्ञापन को ‘लव-जिहाद’ को बढ़ावा देने वाला ठहरा दिया।

विरोध से घबराकर ‘तनिष्क’ ने अपने कर्मचारियों की हिफाजत के हित में विज्ञापन को वापस ले लिया।जिन लोगों ने विरोध किया वे उस छब्बीस-ग्यारह की बर्बरता को भूल गए, जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने इसी टाटा समूह के मुंबई स्थित ‘ताज होटल’ को खून की होली का मैदान बना दिया था और उसके सभी वर्गों के कर्मचारियों ने अपनी जानों की क़ुर्बानी देकर मेहमानों की जानें बचाई थीं।

मोहन भागवत एक बहुत ही विचारशील व्यक्ति हैं। ऐसा माना जाता है कि वे काफ़ी सोच-विचारकर ही कुछ कहते हैं, जिसमें यह भी शामिल होता है कि उनके कहे के बाद उसकी धार्मिक-राजनीतिक प्रतिक्रिया क्या हो सकती है! पर सवाल यह भी है कि भागवत या अन्य कोई विचारक कभी भी यह दावा क्यों नहीं करते कि दलित और पिछड़े वर्गों के लोग भी सबसे ज़्यादा भारत में ही संतुष्ट हैं ?

जब किसी प्रतिष्ठित हिंदू संगठन के सम्मानित व्यक्ति द्वारा केवल एक समुदाय विशेष को लेकर ही इस तरह का कोई दावा किया जाता है तो उससे जो ध्वनि निकलती है, वह कुछ अलग तरह से महसूस की जाती है। और वह यह कि जिन लोगों की संतुष्टि की बात कही जा रही है, उन्हें तो वास्तव में भारत देश में उस तरह से निवास करने की नैतिक पात्रता ही नहीं है, जैसी कि बाकी वर्गों और समुदायों को है। इस सवाल को तो खैर कोई उठा ही नहीं सकता कि सभी हिंदू भी वास्तव में संतुष्ट हैं या नहीं जबकि भारत को ‘मूलत:’ उन्हीं का देश माना जाता है। ऐसा मानकर चला जाता है कि अगर रहवासी बहुसंख्यक समुदाय का है तो उसके असंतुष्ट होने का तो कभी कोई कारण हो ही नहीं सकता।

हकीकत यह है कि लगभग सभी राजनीतिक दल, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, स्वतंत्रता प्राप्ति के सात दशकों से ज़्यादा समय बाद भी करोड़ों की एक बड़ी आबादी को कोई ‘आत्माधारी’ शरीर नहीं बल्कि एक ‘विषय’ (सब्जेक्ट) मानते हैं। इन दलों के सामने सवाल इस आबादी को विकास (या विज्ञापनों में भी!) बराबरी की भागीदारी प्रदान कराने का नहीं बल्कि यह है कि उसे अपने आपको देश की ‘मुख्यधारा’ में शामिल होने के बारे में सोचना चाहिए। उस मुख्यधारा में जो कि उसके लिए अदृश्य बना दी गई है।भारत को इस आबादी का देश ही नहीं माना जाता। उसे एक ऐसा मेहमान या शरणार्थी समझा जाता है, जो या तो ट्रेन छूट जाने के कारण अपने लिए निर्धारित वतन को रवाना नहीं हो पाया या फिर वह जान-बूझकर ही विलम्ब से स्टेशन पर पहुँचा।यह कोई नहीं बताता कि ‘मुख्यधारा’ आखिर किस कसौटी या बलिदान को माना जाएगा ! तनिष्क के विज्ञापन की बात करें तो उसकी एक परिभाषा यही निकलती है कि बहू अगर मुस्लिम और सास हिंदू होती तो ‘गोद भराई’ देश की मुख्यधारा में शामिल मान ली जाती।

दलित महिलाओं के साथ उच्च वर्गों से संबंध रखने वाले अपराधियों द्वारा बलात्कार, रात के अंधेरे में उनका प्रशासन द्वारा शव-दाह और  सत्ताओं में बैठे लोगों (उत्तरप्रदेश ,राजस्थान, मध्यप्रदेश, ओडिशा आदि सभी शामिल हैं) द्वारा उनका बचाव-यह देश की कौन सी मुख्यधारा है, जिसके जरिए हम दुनिया की महाशक्ति बनना चाह रहे हैं ?

चिंता इस बात की नहीं है कि एक पारसी मालिक के आधिपत्य वाली कम्पनी द्वारा जारी विज्ञापन का इतने आक्रामक तरीके से विरोध किया गया ( गांधीधाम, गुजरात में तो धमकियों के बाद ‘तनिष्क’ के एक शोरूम के बाहर एक माफीनामा उसके मैनेजरों को गुजराती भाषा में चिपकाना पड़ा) कि उसे आनन-फानन में वापस लेना पड़ा और टाटा समूह की समूची देशभक्ति कठघरे में खड़ी कर दी गई, ज़्यादा क्षोभ यह है कि सत्ता और संगठनों के उच्च पदों पर बैठे लोगों ने भी इस नए कि़स्म के राष्ट्रवाद पर अपनी कोई आपत्ति या प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की।

सवाल यह भी है कि जब अति विशिष्ट लोगों के द्वारा इस तरह के दावे किए जाएँ कि मुस्लिम सबसे ज़्यादा संतुष्ट हैं, महिलाएँ सबसे ज़्यादा सुरक्षित हैं, दलितों और पिछड़ों के सम्मान की पूरी रक्षा की जाएगी तो उस पर कोई सवालिया निशान क्या केवल उन लोगों के द्वारा ही लगाए जाने चाहिए जो कि वास्तव में पीडि़त हैं या फिर उनके द्वारा भी जो राजनीतिक शोषण की समूची व्यवस्था को मज़बूत करने में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं ?

-श्रवण गर्ग


14-Oct-2020 6:16 PM 72

क्या चिंता केवल यहीं तक सीमित कर ली जाए कि कुछ टीवी चैनलों ने विज्ञापनों के ज़रिए धन कमाने के उद्देश्य से ही अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए उस बड़े फर्ज़ीवाड़े को अंजाम दिया होगा जिसका कि हाल ही में मुंबई पुलिस ने भांडाफोड़ किया है ? या फिर जब बात निकल ही गई है तो उसे दूर तक भी ले जाया जाना चाहिए ? मामला काफ़ी बड़ा है और उसकी जड़ें भी काफ़ी गहरी हैं। यह केवल चैनलों द्वारा अपनी टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) बढ़ाने तक सीमित नहीं है।

पूछा जा सकता है कि इस भयावह कोरोना काल में जब दुनियाभर में राष्ट्राध्यक्षों की लोकप्रियता में सेंध लगी पड़ी है, डोनाल्ड ट्रम्प जैसे चतुर खिलाड़ी भी अपने से एक अपेक्षाकृत कमज़ोर प्रतिद्वंद्वी से ‘विश्वसनीय’ ओपीनियन पोल्स में बारह प्रतिशत से पीछे चल रहे हैं, हमारे यहाँ के जाने-माने मीडिया प्रतिष्ठान द्वारा करवाए जाने वाले सर्वेक्षण में प्रधानमंत्री मोदी को 66 और राहुल गांधी को केवल आठ प्रतिशत लोगों की पसंद बतलाए जाने का आधार आखऱि क्या है ? मोदी का पलड़ा निश्चित ही भारी होना चाहिए, पर क्या उनके और राहुल के बीच लोकप्रियता का गड्ढा भी अर्नब के ‘रिपब्लिक’ और दूसरे चैनलों के बीच की टीआरपी के फक़ऱ् की तरह ही संदेहास्पद नहीं माना जाए? इस बात का पता कहाँ के पुलिस कमिश्नर लगाएँगे कि प्रभावशाली राजनीतिक सत्ताधारियों की लोकप्रियता को जाँचने के मीटर देश में किस तरह के लोगों के घरों में लगे हुए हैं ?

जनता को भ्रम में डाला जा रहा है कि टीआरपी का फर्ज़ीवाड़ा केवल विज्ञापनों के चालीस हज़ार करोड़ के बड़े बाज़ार में अपनी कमाई को बढ़ाने तक ही सीमित है। हक़ीक़त में ऐसा नहीं है। दांव पर और कुछ इससे भी बड़ा लगा हुआ है। इसका सम्बंध देश और राज्यों में सूचना तंत्र पर क़ब्ज़े के ज़रिए राजनीतिक आधिपत्य स्थापित करने से भी हो सकता है। देशभर में अनुमानत: जो बीस करोड़ टीवी सेट्स घरों में लगे हुए हैं और उनके ज़रिए जनता को जो कुछ भी चौबीसों घंटे दिखाया जा सकता है, वह एक ख़ास कि़स्म का व्यक्तिवादी प्रचार और किसी विचारधारा को दर्शकों के मस्तिष्क में बैठाने का उपक्रम भी हो सकता है। वह विज्ञापनों से होनेवाली आमदनी से कहीं बड़ा और किसी सुनियोजित राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा हो तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं।

क्या कोई बता सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत मामले में मुंबई पुलिस को बदनाम करने के लिए हज़ारों (पचास हज़ार ?) फ़ेक अकाउंट सोशल मीडिया पर रातों-रात कैसे उपस्थित हो गए और इतने महीनों तक सक्रिय भी कैसे रहे? इतने बड़े फर्ज़ीवाड़े के सामने आने के बाद सत्ता के गलियारों से अभी तक भी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने क्यों नहीं आई? सोशल मीडिया पर इतनी बड़ी संख्या में फज़ऱ्ी अकाउंट क्या देश की किसी बड़ी राजनीतिक हस्ती या दल के खिलाफ इसी तरह से रातों-रात प्रकट और सक्रिय होकर ‘लाइव’ रह सकते हैं ? निश्चित ही इतने बड़े काम को बिना किसी संगठित गिरोह की मदद के अंजाम नहीं दिया जा सकता। चुनावों के समय तो ये पचास हज़ार अकाउंट पचास लाख और पाँच करोड़ भी हो सकते हैं !हुए भी हों तो क्या पता ! ‘रिपब्लिक’ या गिरफ़्त में आ गए कुछ और चैनल तो टीवी स्क्रीन के पीछे जो बड़ा खेल चलता है, उसके सामने कुछ भी नहीं हैं। वह खेल और भी बड़ा है और उसके खिलाड़ी भी बड़े हैं। उसके ‘वार रूम्स’ भी अलग से हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्मों पर नामी हस्तियों के लिए जिस तरह से ‘फज़ऱ्ी’ फ़ॉलोअर्स और ‘लाइक्स’ की खऱीदी की जाती है, वे चैनलों के फर्ज़ीवाड़े से कितनी अलग हैं ? एक प्रसिद्ध गायक (रैपर) द्वारा यू ट्यूब पर अपना रिकार्ड बनाने के लिए फ़ेक ‘लाइक्स’ और ‘फ़ॉलोइंग’ खऱीदने के लिए बहत्तर लाख रुपए किसी कम्पनी को दिए जाने की हाल की कथित स्वीकारोक्ति, क्या हमें कहीं से भी नहीं चौंकाती ? ऐसी तो देश में हज़ारों हस्तियाँ होंगी, जिनके सोशल मीडिया अकाउंट बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही संचालित करती हैं और इसी तरह से उनके लिए ‘नक़ली फ़ालोअर्स’ की फ़ौज भी तैयार की जाती है।

सवाल यह भी है कि एक ख़ास कि़स्म की विचारधारा, दल विशेष या व्यक्तियों को लेकर सच्ची-झूठी ‘खबरों’ की शक्ल में अख़बारों तथा पत्र-पत्रिकाओं में ‘प्लांट’ की जाने की सूचनाएँ और उपलब्धियाँ दो-तीन या ज़्यादा चैनलों द्वारा टीआरपी बढ़ाने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों से कितनी भिन्न हैं ? सरकारें अपने विकास कार्यों की संदेहास्पद उपलब्धियों के बड़े-बड़े विज्ञापन जारी करती हैं और मीडिया संस्थानों में उन्हें लपकने के लिए होड़ मची रहती है। राज्यों में मीडिया (पर नियंत्रण) के लिए विज्ञापनों का बड़ा बजट होता है, जिस पर पूरी निगरानी ‘ऊपर’ से की जाती है। लिखे, छपे, बोले और दिखाए जाने वाले प्रत्येक शब्द और दृश्य की कड़ी मॉनीटरिंग होती है और उसी से विज्ञापनों की शक्ल में बाँटी जाने वाली राशि तय होती है। बताया जाता है कि ‘सुशासन बाबू’ के बिहार में सूचना और जन-सम्पर्क विभाग का जो बजट वर्ष 2014-15 में लगभग 84 करोड़ था, वह पाँच सालों (2018-19) में बढक़र 133 करोड़ रुपए से ऊपर हो गया।चालू चुनावी साल का बजट कितना है अभी पता चलना बाक़ी है। अनुमानित तौर पर इतनी बड़ी राशि का साठ से सत्तर प्रतिशत प्रचार-प्रसार माध्यमों को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर खर्च होता है।हाल में सरकार की ‘उपलब्धियों’ का नया वीडियो भी जारी हुआ है और वह ख़ूब प्रचार पा रहा है।

कोई भी चैनल या प्रचार माध्यम, जिनमें अख़बार भी शामिल है, कभी यह नहीं बताता या स्वीकार करता कि पिछले साल भर, महीने या सप्ताह के दौरान कितनी अपुष्ट और प्रायोजित खबरें प्रसारित-प्रकाशित की गईं, कितने लोगों और समुदायों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई गई, साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने में क्या भूमिका निभाई गई ! तब्लीगी जमात को लेकर जो दुष्प्रचार किया गया, वह तो अदालत के द्वारा बेनक़ाब हो भी चुका है। दिल्ली के दंगों में मीडिया की भूमिका का भी आगे-पीछे खुलासा हो जाएगा। एक चैनल पर बहस के बाद एक राजनीतिक दल से जुड़े प्रवक्ता की मौत ने क्या एंकरों की भाषा, ज़ुबान और आत्माएँ बदल दी हैं या फिर सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है? कोरोना सहित बड़े-बड़े मुद्दों को दबाकर महीनों तक केवल एक अभिनेत्री और उसके परिवार को निशाने पर लेने का उद्देश्य क्या हक़ीक़त में भी सिफऱ् अपनी टीआरपी बढ़ाना था या फिर उसके कोई राजनीतिक निहितार्थ भी थे? ‘रिपब्लिक’ चैनल या अर्नब जैसे ‘पत्रकार/एंकर’ कभी भी अकेले नहीं पडऩे वाले हैं! न ही मुंबई पुलिस द्वारा पर्दाफाश किए गए किसी भी फर्जीवाड़े में किसी को भी कभी कोई सजा होने वाली है। मारने वालों से बचाने वाले के हाथ काफी लम्बे और बड़े हैं।

-श्रवण गर्ग


09-Oct-2020 1:32 PM 8

लोक नायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की आज पुण्यतिथि है और तीन दिन बाद  ग्यारह अक्टूबर को उनकी जयंती ।सोचा जा सकता है कि वे आज अगर हमारे बीच होते तो क्या कर रहे होते ! 1974 के ‘बिहार आंदोलन’ में जो अपेक्षाकृत छोटे-छोटे नेता थे, आज वे ही बिहार और केंद्र की सत्ताओं में बड़ी-बड़ी राजनीतिक हस्तियाँ हैं। कल्पना की जा सकती है कि जेपी अगर आज होते और 1974 जैसा ही कोई आह्वान करते (‘सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है ‘) तो कितने नेता अपने वर्तमान शासकों को छोड़कर उनके साथ सड़कों पर संघर्ष करने का साहस जुटा पाते ! ऐसा कर पाना शायद उस जमाने में काफ़ी आसान रहा होगा!

चौबीस मार्च, 1977 को मैं उस समय दिल्ली के राजघाट पर उपस्थित था, जब एक व्हील चेयर पर बैठे हुए अस्वस्थ जेपी को गांधी समाधि पर जनता पार्टी के नव-निर्वाचित सांसदों को शपथ दिलवाने के लिए लाया गया था। वर्तमान की मोदी सरकार में शामिल कुछ हस्तियाँ भी तब वहाँ प्रथम बार निर्वाचित सांसदों के रूप में मौजूद थीं। जेपी के पैर पर पट्टा चढ़ा हुआ था। आग्रह किया जा रहा था कि उनके पैरों को न छुआ जाए। वह दृश्य आज भी याद आता है, जब भीड़ के बीच से निकल कर उनके समीप पहुँचने के बाद मैंने उन्हें प्रणाम किया तो वे हलके से मुस्कुराए और मैं स्वयं को रोक नहीं पाया ... उनके पैरों के पास पहुँचकर हल्के से स्पर्श कर ही लिया। उन्होंने मना भी नहीं किया।

जेपी ने (और शायद दादा कृपलानी ने भी) सांसदों को यही शपथ दिलवाई थी कि वे गांधी का कार्य करेंगे और अपने आप को राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित करेंगे।राजघाट पर हज़ारों लोगों की उपस्थिति थी।अभिनेता देव आनंद भी वहाँ पहुँचे थे।प्रशंसकों ने उन्हें अपने पैर ज़मीन पर रखने ही नहीं दिए। अपने कंधों पर ही उन्हें बैठाकर पूरे समय घुमाते रहे।शत्रुघ्न सिन्हा भी शायद वहाँ थे। अदभुत दृश्य था। राजघाट की शपथ के बाद के दिनों में दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में जे पी की उपस्थिति में ही सत्ता के बँटवारे को लेकर बैठकों का जो दौर चला उसका अपना अलग ही इतिहास है। राजघाट की आशाभरी सुबह के कोई ढाई वर्षों के बाद आज के ही दिन जेपी ने देह त्याग कर दिया।वे भी तब उतने ही निराश रहे होंगे जैसे कि आज़ादी प्राप्ति के बाद गांधी जी रहे होंगे। कांग्रेस, बापू को और जनता पार्टी जेपी को जी नहीं पाईं। जेपी के निधन तक उनका जनता पार्टी का प्रयोग उन्हें धोखा दे चुका था।

याद पड़ता है कि जेपी को सबसे पहले राजगीर(बिहार) में 1967 के सर्वोदय सम्मेलन में दूर से देखने का अवसर मिला था। तब तक उनके बारे में केवल सुन-पढ़ ही रखा था। जेपी की देखरेख में ही सम्मेलन की सारी तैयारियाँ हुईं थीं। दलाई लामा भी उसमें आए थे।संत विनोबा भावे तो उपस्थित थे ही, पर जेपी के विराट स्वरूप को पहली बार नज़दीक से देखने का मौक़ा अप्रैल 1972 में मुरैना के जौरा में हुए चम्बल घाटी के दस्युओं के आत्म-समर्पण और फिर उसके अगले माह बुंदेलखंड के दस्युओं के छतरपुर के निकट हुए दूसरे आत्म समर्पण में मिला था। उनका जो स्नेह उस दौरान प्राप्त हुआ, वही बाद में मुझे 1974 में बिहार आंदोलन की रिपोर्टिंग के लिए पटना ले गया।तब मैं दिल्ली में प्रभाष जोशी जी और अनुपम मिश्र के साथ ‘सर्वोदय साप्ताहिक’ के लिए काम करता था। पटना गया था केवल कुछ ही दिनों के लिए पर जे पी ने अपने पास ही रोक लिया उनके कामों में मदद के लिए। पटना में तब जेपी के कदम कुआ स्थित निवास स्थान पर केवल एक ही कमी खटकती थी और वह थी प्रभावती जी की अनुपस्थिति की। वे 15 अप्रैल, 1973 को जेपी को अकेला छोड़कर चली गईं थीं।
जे पी और प्रभावती जी के साथ केवल दो ही यात्राओं की याद पड़ती है।पहली तो तब की जब अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी के विमान में दोनों को लेने लिए दिल्ली से पटना गया था और वहाँ से हम तीनों बुंदेलखंड के दस्युओं के आत्म समर्पण के लिए खजुराहो के हवाई अड्डे पर पहुँचे थे। दूसरी बार (शायद) उसी वर्ष किसी समय जेपी और प्रभावती जी के साथ रेल मार्ग द्वारा दिल्ली से राजस्थान में चूरू की यात्रा और वहाँ से वापसी। चूरू में तब अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता आचार्य तुलसी की पुस्तक ‘अग्नि परीक्षा’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया था।

जेपी के मित्र प्रभुदयाल जी डाबरीवाला लोक नायक को आग्रह करके चूरू ले गए थे, जिससे कि वहाँ साम्प्रदायिक सौहार्द स्थापित हो सके। जेपी ने कहलवाया कि मुझे उनके साथ चूरू की यात्रा करनी है और मैं तुरंत तैयार हो गया। चूरू की वह शाम भूले नहीं भूलती है, जब जे पी ने पूछा था उनके साथ टहलने हेतु जाने के लिए ... और मैं भाव-विभोर हो चूरू के एकांत में उस महान दम्पति के साथ घूमने चल पड़ा था। तब दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र बाँटे जा रहे थे। मैंने उनसे इस दौरान किए गए कई सवालों के बीच यह भी पूछ लिया था कि: 'क्या सरकार आपको स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती ?’ जेपी शायद कुछ क्षण रुके थे फिर धीमे से सिर्फ़ इतना भर कहा कि :’हो सकता है, शायद ऐसा ही हो।’ मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने तब जेपी से कितने सवाल किए होंगे और उन्होंने क्या जवाब दिए होंगे।क्योंकि मैं तो उस समय अपने इतने निकट उनकी  आत्मीय उपस्थिति के आभा मण्डल में ही पूरी तरह से खो गया था।जिस तरह से गांधी नोआख़ली में दंगों को शांत करवाकर चुपचाप दिल्ली लौट आए थे, वैसे ही जेपी भी चूरू से लौट आए।

मुझे अच्छे से याद है कि हम दिल्ली के रेल्वे स्टेशन पर चूरू जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में खड़े थे। जेपी थे, प्रभावती जी थीं, उनके सहायक गुलाब थे और मैं था। शायद प्रभुदयाल जी भी रहे हों। लम्बे प्लेटफ़ार्म पर काफ़ी लोगों की उपस्थिति के बावजूद कोई जेपी को बहुत विश्वास के साथ पहचान नहीं पा रहा था। उनकी तरफ़ लोग देख ज़रूर रहे थे। हो सकता है कि किसी को उनके वहाँ इस तरह से उपस्थित होने का अनुमान ही नहीं रहा होगा। पर जेपी के चेहरे पर किसी भी तरह की अपेक्षा या उपेक्षा का भाव नहीं था। वे निर्विकार थे। बेचैनी मुझे ही अधिक थी कि ऐसा कैसे हो रहा है ! याद पड़ता है कि सर्वोदय दर्शन के सुप्रसिद्ध भाष्यकार दादा धर्माधिकारी ने एक बार जेपी को संत और विनोबा को राजनेता निरूपित किया था।ऐसा सच भी रहा हो ! स्मृतियाँ तो कई और भी हैं पर फिर कभी। जेपी की स्मृति को प्रणाम।

-श्रवण गर्ग


06-Oct-2020 12:10 PM 6

हाथरस की घटना का केंद्र की मोदी और राज्य की योगी सरकार की राजनीतिक जरूरतों के नजरिए से विश्लेषण किए बिना उसकी गंभीरता का अनुमान लगाना संभव नहीं होगा। इस तरह की घटनाओं में पीडि़त वर्ग और उस पर अत्याचार करने वाले तबके को प्राप्त होने वाले सभी तरह के संरक्षण को सत्तारूढ़ दल की चुनावी आवश्यकताओं के संदर्भों में देखा जाए तो इस बात की आलोचना की निरर्थकता से साक्षात्कार होने लगेगा कि राज्य की कट्टर हिंदूवादी सरकार के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई करने में केंद्र की हुकूमत के हाथ क्यों बंधे हुए हैं।

उत्तर प्रदेश में सिर्फ सोलह महीनों के बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 14 मार्च 1922 को समाप्त होने जा रहा है। अगले चुनाव तक न तो कोरोना का प्रकोप पूरी तरह से समाप्त होना है और न ही प्रदेश की अर्थव्यवस्था ही पटरी पर आने वाली है। भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में योगी सरकार की आक्रामक तरीके से वापसी इसलिए जरूरी है कि उसके ठीक बाद लोकसभा चुनाव की तैयारियाँ प्रारंभ हो जाएँगी। पिछले लोकसभा चुनाव में 2014 के मुकाबले भाजपा की नौ सीटें राज्य में कम हो गईं थीं। देश को जानकारी है कि एनडीए सरकार के लिए इस बार लोकसभा का चुनाव किस तरह की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच होने वाला है और दांव पर क्या कुछ लगने वाला है! भाजपा के लिए उसकी बड़ी उम्मीदों का एकमात्र राज्य उत्तर प्रदेश ही है, जहां सबसे ज्यादा (80) सीटें हैं और वर्तमान में विपक्ष के नाम पर वहाँ घुप्प अंधेरा है। ऐसे हालात और किसी भी राज्य में नहीं हैं। हो सकता है कि बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले प्राप्त हों।

अत: उत्तरप्रदेश को जीतने के लिए साम्प्रदायिक और जातिगत ध्रुवीकरण को और ज्यादा मजबूत करना जरूरी हो गया है। हाथरस कांड के आरोपियों के समर्थन में खुलेआम सभाएँ हो रही हैं, उनसे (आरोपियों) मिलने क्षेत्र के निर्वाचित प्रतिनिधि जेल पहुँच रहे हैं और दूसरी तरफ पीडि़ता के परिजनों को प्रतिबंधों के बीच जीवन जीना पड़ रहा है। राहुल-प्रियंका की यात्रा से कितना फर्क पड़ेगा, वहाँ के डीएम ही बता सकते हैं। इस सबका उद्देश्य यही समझा जा सकता है कि दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों तथा उच्च जाति के मतदाताओं के बीच वैमनस्य के ध्रुवीकरण को किसी दीर्घकालिक रणनीति के तहत ही बढ़ावा दिया जा रहा है। 
उत्तरप्रदेश की अनुमानित चौबीस करोड़ आबादी में लगभग अस्सी प्रतिशत जनसंख्या हिंदुओं की बताई जाती है। हाथरस की घटना को अगर राजनीतिक रूप से सवर्ण समाज के अस्तित्व के लिए दलितों की ओर से चुनौती बना दिया जाए तो उसकी चमत्कारिक चुनावी संभावनाओं को लेकर ओपिनियन पोल भी करवाया जा सकता है।

हाथरस की घटना का एक अन्य पहलू यह है कि प्रियंका और राहुल गांधी के नेतृत्व में जो कांग्रेस अभी तक प्रदेश के सवर्णों के बीच अपनी पैठ बनाने में लगी थी, उसे योगी सरकार ने सफलतापूर्वक मायावती और अखिलेश के वोट बैंक से टक्कर लेने के लिए पीछे धकेल दिया है। मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पकड़ कांग्रेस पहले ही कमजोर कर चुकी है। उत्तरप्रदेश में लड़ाई को पीडि़ता के प्रति न्याय के बजाय दलित बनाम सवर्णों के बीच शक्ति-परीक्षण में बदला जा रहा है। कथित आरोपियों को सजा दिलाने के संकल्प का मतलब अब यही होगा कि सरकार अपने राजनीतिक अस्तित्व को ही दांव पर लगा दे। और फिर ,सत्ता की राजनीति में प्रत्येक गाड़ी नहीं पलटाई जा सकती।

उत्तर प्रदेश की ओर से हाथरस का संदेश यही माना जा सकता है कि इस तरह की सभी घटनाओं के प्रति उठने वाली आवाज़ों को सख़्ती से दबा दिया जाएगा। साथ ही यह भी मान लिया जाए कि ‘जिन्हें अपराधी बताया जा रहा है, वे तो वास्तव में अपराध को रोकने में लगे थे।अपराध की घटना के लिए अज्ञात लोग जिम्मेदार हैं या फिर सरकार को बदनाम करने के लिए विदेशी आर्थिक मदद से षड्यंत्र रचा गया है।’ कल्पना की जा सकती है कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की रिपोर्ट में (सुशांत सिंह की) हत्या के संदेह की कोई संकरी सी गली भी छोड़ दी जाती तो महाराष्ट्र और बिहार की राजनीति में अब तक कितने बड़े राजनीतिक भूचाल आ जाते। एक प्रिय अभिनेता की कथित आत्महत्या को कथित हत्या में बदलने की निर्मम कोशिशें और एक निर्दोष दलित युवती की ज़्यादतियों के बाद हुई मौत को ‘ऑनर किलिंग’ बताने तथा उसके शव को रात के अंधेरे में असंवेदनशील तरीके से जला देने, दोनों ही घटनाएँ वर्तमान राजनीति के एक अत्यंत ही घिनौने चेहरे को सार्वजनिक रूप से नंगा करती हैं।

हम केवल ऊपरी तौर पर ही अनुमान लगा रहे हैं कि हाथरस जिले के एक गाँव में एक दलित युवती के साथ हुए नृशंस अत्याचार और उसके कारण हुई मौत से सरकार डर गई है। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सरकारें इस तरह से डर कर काम नहीं करतीं। ऐसी ही कुछ और घटनाएँ हो जाने दीजिए। हम लोग हाथरस को भूल भी जाएँगे और ज़्यादा डरने भी लगेंगे-अपराधियों और सरकार-दोनों से!

-श्रवण गर्ग 


27-Sep-2020 12:17 PM 8

-श्रवण गर्ग

सोच-सोचकर तकलीफ होती है, पर ऐसा हकीकत में हो रहा है और हम उसे रोक नहीं पा रहे हैं। अपनी इस असहाय स्थिति का हमें अहसास भी नहीं होने दिया जा रहा है। वह यह कि क्या लोगों को ठीक से जानने के लिए अब उनका चले जाना जरूरी हो गया है ? हम लोगों को, उनके काम के बारे में, उनके मानवीय गुणों के बारे में, जो कहीं दबे पड़े होंगे, उनके चले जाने के बाद ही क्यों जान पा रहे हैं ? हमें संभल पाने का मौक़ा भी क्यों नहीं मिल रहा है? एक शोक से उबरते हैं कि दूसरा दस्तक देने लगता है! हो सकता है कि हम जो अभी कायम हैं, हमारे बारे में भी कल ऐसा ही हो।

लोगों की जिंदगियाँ जैसे शेयर बाजार के सूचकांक की शक्ल में बदल गयी हैं। सूचकांक के घटने-बढऩे से जैसे बाजार की माली हालत की लगभग झूठी जानकारी मिलती है, लोगों के मरने-जीने की हकीकत भी असली आँकड़ों की हेरा-फेरी करके पेश की जा रही हैं। देखते ही देखते, जीते-जागते इंसान मौत के आँकड़ों में बदल रहे हैं। हमें सही खबर मिलना अभी बाकी है कि कितने शहर अब तक कितने खाली हो चुके हैं। अभी केवल इतना भर पता चल रहा है कि अस्पताल और उनके मुर्दाघर अब छोटे पडऩे लगे हैं।

कई लोग ऐसे हैं जिनसे हम मिलना चाहते थे पर महीनों से मिल नहीं पाए थे। फोन पर भी बात नहीं कर पाए जबकि हमारे और उनके भी फोन खाली पड़े थे। उन्हें ठीक से याद भी नहीं कर पाए क्योंकि हम बार-बार अपनी नकाबों को ही उतारते-चढ़ाते रहे या फिर अपने हाथों को माँजते रहे। हमारे हाथ इतने साफ पहले कभी नहीं रहे होंगे। अपमानित महसूस करने के कारण भी बनते हैं कि हमारे आसपास इतने सारे लोग जीती-जागती कविताओं और सत्य कथाओं के रूप में टहलते रहे और हमें पता ही नहीं चल पाया। वे दबे पाँव चले भी गए। अंतिम समय में भी कोई उनके पास नहीं था। उनके चेहरे भी ढके हुए थे।

दुनिया भर में महामारी के कारण मरने वालों का बताया जाने वाला आंकड़ा थोड़े दिनों में दस लाख को पार करने जा रहा है। मध्यम आकार के एक भरे-पूरे शहर जितने कुल लोग। चंडीगढ़ जैसे खूबसूरत शहर की आबादी लगभग इतनी ही है। कैसा लगे कोई सुबह-सुबह खबर करके बताए कि एक जाना-पहचाना शहर चार-पाँच महीनों के दौरान ही अपनी जगह से अचानक गायब हो गया है? किसी राज्य को ही अनुपस्थित होते देखना हो तो सिक्किम की आबादी सात लाख और मिजोरम की लगभग 11 लाख है। देश को देखना हो तो भूटान की आठ लाख के कऱीब है। हम अंदाजा ही नहीं लगा पा रहे हैं कि आखिरी हो क्या रहा है और हमें किस ओर धकेला जा रहा है।

जो हुकूमतों में हैं क्या उन्हें डर ही नहीं लग रहा है कि उनकी आबादी की गिनती लगातार कम हो रही है और जो लोग अभी कायम हैं मौत का खौफ अब एक साये की तरह उनका भी हर जगह पीछा कर रहा है ? पलक झपकते ही जगहें ख़ाली नजऱ आने लगती हैं ! एक भले डॉक्टर मित्र ने सलाह दी कि मुसीबत कब आ जाए कुछ पता नहीं। एक कागज पर कुछ डिटेल्स लिखकर हमेशा तैयार रखें कि कभी भी ऐसी कोई स्थिति बन जाए तो दस-पंद्रह सबसे ज़रूरी काम क्या करने हैं, सबसे पहले किन-किन से सम्पर्क करना है जो मदद के लिए तुरंत खड़ा हो जाएगा। दिन में ऐसा हो तो क्या करना है, और आधी रात हो जाए तो क्या करना है! लिखने बैठे तो पहला सबसे जरूरी काम और पहला नाम ही पूरे भरोसे के साथ ध्यान में नहीं आया।

हम इस खतरे को लेकर अभी भी पूरी तरह से सचेत नहीं हैं कि जनता के डर का इस्तेमाल दुनिया भर में कितनी चीजों के लिए उन प्रभावशाली लोगों के द्वारा किया सकता है जिन्हें लोगों के इस तरह से चले जाने, एक व्यक्ति, एक शहर, एक राज्य या एक देश की आबादी के नक्शे और गिनती से गायब हो जाने से कोई भी फर्क  ही नहीं पड़ता। कहीं भी किसी तरह का दु:ख या शोक व्यक्त करने की सुगबुगाहट भी नहीं है। लोगों की जीवित स्मृतियों में तो गुजरे सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ कि लोगों का भीड़ की तरह इस्तेमाल करने के बाद उन्हें अचानक से नितांत अकेले कर दिया गया हो, सांत्वनाओं के स्तर पर भी ‘आत्मनिर्भर’ बना दिया गया हो।

कहा जा रहा है कि धीरे-धीरे सब कुछ खुल जाने वाला है। पर लोगों को पता है कि अब पहले जैसे कुछ भी नहीं रहने वाला है। रह भी कैसे सकता है? वे अभागे जो असमय ही अपनी अनंत की यात्राओं पर रवाना हो चुके हैं, कैसे लौटकर आएँगे? वैसे तो हमें पहले से ही आगाह कर दिया गया है कि महामारी के बाद हमारे जीने का तरीका बदल जाने वाला है ।क्या इस बात की आशंका नजर नहीं आती कि कोरोना के बाद के जिस ‘बाद’ की बात कही गई है वह भी कभी आए ही नहीं! क्या ऐसा असम्भव है कि हमें जिस स्थान पर इस समय रोक दिया गया है वही अब हमारा पक्का ठिकाना भी घोषित कर दिया जाए जिसमें कि घर, दफ्तर ,दुकान, स्कूल, बाजार और अकेलेपन से जूझने की सारी सुविधाएँ भी कायम हो जाएँ। ऐसा होने भी लगा है और हम इस नई व्यवस्था के कितने अभ्यस्त हो चले हैं, हमें पता ही नहीं चल पाया।

क्या हमें इस बात का भी कोई डर नहीं है कि आगे चलकर नागरिकों के किसी भीड़ की शक्ल में शोक व्यक्त करने के लिए जमा होने को भी व्यवस्था के प्रति विद्रोह के षडय़ंत्र की आशंकाओं से देखा जाने लगे। हम जिस तरह की राजनीतिक गतिविधियों, सामाजिक-धार्मिक समारोहों और सार्वजनिक रूप से प्रसन्नता और आक्रोश व्यक्त करने के प्रति अभ्यस्त हो चुके हैं, क्या उसकी कोई कमी हमें महसूस नहीं हो रही है? हम शायद ठीक से जवाब नहीं दे पाएँगे कि इस समय हमें सबसे ज़्यादा डर किस बात का लग रहा है! महामारी के अलावा भी हम किन्ही और चीजों को लेकर भी चिंतित हैं पर बताना नहीं चाहते हैं। सभ्यताएँ जब समाप्त होने का तय कर लेतीं हैं तो सारी शुरुआतें इसी तरह से होती है।

और हाँ! हमें पता है न कि आज से ठीक 28 दिन बाद विजय दशमी और उसके बीस दिन बाद दीपावली का पर्व है? क्या हमारे ‘मन’ त्योहारों का सामना करने को पूरी तरह से तैयार हैं?


24-Sep-2020 11:54 AM 8

- श्रवण गर्ग
हरिवंश नारायण सिंह के ‘सभापतित्व ‘में राज्यसभा का कुछ ऐसा इतिहास रच गया है कि पत्रकारिता और सत्ता की राजनीति के बीच के घालमेल को लेकर पीछे मुडक़र देखने की ज़रूरत पड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू की अध्यक्षता में गठित प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया का एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से नामांकित मैं भी एक सदस्य था। बात अब लगभग दस साल पुरानी होने को आयी। जस्टिस काटजू मीडिया की आज़ादी को लेकर तब बहुत ही आक्रामक तरीक़े से काम कर रहे थे। इस सम्बंध में कई राज्यों से शिकायतें आ रहीं थीं। बिहार में मीडिया पर नीतीश सरकार के दबाव को लेकर प्राप्त शिकायतों के बाद एक समिति का गठन कर उसे बिहार भेजा गया और एक रिपोर्ट तैयार होकर काउन्सिल के समक्ष प्रस्तुत की गई। कि़स्सा इतना भर ही नहीं है !

वे तमाम लोग जो नीतिपरक (एथिकल ) पत्रकारिता की मौत और चैनलों द्वारा परोसी जा रही नशीली खबरों को लेकर अपने छाती-माथे कूट रहे हैं, उन्हें हाल में दूसरी बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए खाँटी सम्पादक-पत्रकार हरिवंश नारायण सिंह को लेकर मीडिया में चल रही चर्चाओं पर नजऱ डालने के बाद अपनी चिंताओं में संशोधन कर लेने चाहिए। वैसे यह बहस अब पुरानी पड़ चुकी है कि कैसे उस ‘काले’ रविवार (बीस सितम्बर) को लोकतंत्र की उम्मीदों का पूरी तरह से तिरस्कार करते हुए देश के कोई करोड़ों किसानों और खेतिहर मज़दूरों को सडक़ों पर उतरने के लिए मज़बूर कर दिया गया।

यह आलेख मूलत: उन सुधी पाठकों के लिए है, जो पत्रकारिता और राजनीति के बीच गहरी होती जा रही साठगाँठ को अंदर से समझना चाहते हैं। बिहार की वर्तमान राजनीति के महत्वाकांक्षी नायक नीतीश कुमार के आधिपत्य वाली जद (यू ) की ओर से वर्ष 2014 में राज्यसभा में पहुँचने के पहले तक हरिवंश नारायण सिंह की उपलब्धियाँ एक निर्भीक और वैचारिक रूप से पारदर्शी समाजवादी पत्रकार की रही हैं। मेरा भी उनके साथ कोई दो दशकों से इसी रूप में परिचय रहा है। उनके साथ पत्रकारों के दल में एक-दो विदेश यात्राएँ भी की हैं। उनके अख़बार ‘प्रभात खबर’ के एक बड़े समारोह में पत्रकारिता पर बोलने के लिए राँची भी गया हूँ और उसके लिए लिखता भी रहा हूँ। पर हाल में काफ़ी कुछ हो जाने के बाद भी उन्हें लेकर पुरानी छबि में अभी पूरी दरार क़ायम नहीं हुई है। एक-दो झटके और ज़रूरी पड़ेंगे।

पिछले रविवार को हरिवंश के ‘सभापतित्व’ में राज्यसभा में जो कुछ हुआ उसे लेकर दो-तीन सवाल इन दिनों मीडिया की चर्चाओं में हैं। पहला तो यह कि एक पत्रकार के रूप में क़ायम अपनी छबि के अनुसार हरिवंश अगर अपने अख़बार के लिए उस दिन के ऐसे ही घटनाक्रम की रिपोर्टिंग कर रहे होते और ‘सभापति’ की कुर्सी पर कोई और बैठा हुआ होता तो वे क्या कुछ लिखना चाहते ? दूसरा सवाल यह कि अगर ऐसे ही किसी और (महत्वाकांक्षी) पत्रकार को राजनीति में इसी तरह से नायक बनकर उभरने के अवसर प्राप्त हो जाएँ तो पाठकों को उससे अब किस तरह की उम्मीदें रखी जानी चाहिए ? तीसरा यह कि कुर्सी पर उस दिन एक पत्रकार की आत्मा के बजाय किसी अनुभवी राजनीतिक व्यक्तित्व का शरीर उपस्थित होता तो क्या वह भी इतने ज़बरदस्त हो-हल्ले के बीच इतने ही शांत भाव और ‘कोल्ड ब्लडेड’ तरीक़े से कागज़़ों में गर्दन समेटे ध्वनिमत से सबकुछ सम्पन्न कर देते या फिर जो सांसद मत विभाजन की माँग कर रहे थे, उनकी ओर भी नजऱें घुमाकर देखते ? इस बहस में जाने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है कि मत विभाजन (वोटिंग) अगर हो जाता तो ‘विवादास्पद’ कृषि विधेयकों और सरकार की स्थिति क्या बनती ? क्या एक पत्रकार दिमाग़ की शांत सूझबूझ से स्थिति सरकार के पक्ष में नहीं हो गई ?

हरिवंश नारायण सिंह के ‘सभापतित्व ‘में राज्यसभा का कुछ ऐसा इतिहास रच गया है कि पत्रकारिता और सत्ता की राजनीति के बीच के घालमेल को लेकर पीछे मुडक़र देखने की ज़रूरत पड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू की अध्यक्षता में गठित प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया का एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से नामांकित मैं भी एक सदस्य था। बात अब लगभग दस साल पुरानी होने को आयी।जस्टिस काटजू मीडिया की आज़ादी को लेकर तब बहुत ही आक्रामक तरीक़े से काम कर रहे थे। इस सम्बंध में कई राज्यों से शिकायतें आ रहीं थीं। बिहार में मीडिया पर नीतीश सरकार के दबाव को लेकर प्राप्त शिकायतों के बाद एक समिति का गठन कर उसे बिहार भेजा गया और एक रिपोर्ट तैयार होकर काउन्सिल के समक्ष प्रस्तुत की गई। कि़स्सा इतना भर ही नहीं है !

कि़स्सा यह है कि प्रेस काउन्सिल की समिति द्वारा तैयार की गई तथ्यपरक रिपोर्ट को चुनौती तब प्रभात खबर के सम्पादक हरिवंश नारायण सिंह द्वारा दी गई। काउन्सिल के सदस्यों को आश्चर्य हुआ कि रिपोर्ट को एकतरफ़ा और मनगढ़ंत नीतीश सरकार नहीं, बल्कि एक प्रतिष्ठित पत्रकार करार दे रहा है। हरिवंश ने रिपोर्ट के खिलाफ़ अख़बार में बड़ा आलेख लिखा और उसके निष्कर्षों को झूठा करार दिया। वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित की गई नोटबंदी के समर्थन में जिन कुछ पत्रकारों ने प्रमुखता से आलेख लिखे उनमें हरिवंश भी थे। इसके साल भर के बाद तो जद(यू)-भाजपा की आत्माएँ मिलकर एक हो गईं और उसके एक साल बाद हरिवंश राज्यसभा में उप-सभापति बन गए।

राज्यसभा में जो कुछ हुआ उसका क्लायमेक्स यह है कि हरिवंश सोमवार सुबह धरने पर बैठे आठ निलम्बित सांसदों के लिए चाय-पोहे लेकर पहुँच गए जिसका कि उन्होंने (सांसदों ने )उपयोग नहीं किया । उसके अगले दिन हरिवंश ने राष्ट्रपति के नाम एक मार्मिक पत्र लिखकर स्थापित कर दिया कि वास्तव में तो पीडि़त वे हैं और अपनी पीड़ा में एक दिन का उपवास कर रहे हैं।प्रधानमंत्री ने न सिफऱ् हरिवंश के निलम्बित सांसदों के लिए चाय ले जाने की ट्वीटर पर तारीफ़ की ,उनके द्वारा राष्ट्रपति को लिखे पत्र को भी जनता के लिए ट्वीटर पर जारी करके बताया कि कैसे उसके(पत्र के) एक-एक शब्द ने लोकतंत्र के प्रति ‘हमारे विश्वास को नया अर्थ दिया है।’ समूचे घटनाक्रम के ज़रिए अब जो कुछ भी प्राप्त हुआ है उसे हम एक ऐतिहासिक दस्तावेज मानकर पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों के लिए उपयोग में ला सकते हैं।

हरिवंश राजनीतिक रूप से तीन लोगों के काफ़ी कऱीब रहे हैं और उसके कारण उन्हें कभी पीछे मुडक़र नहीं देखना पड़ा ये हैं : चंद्र शेखर, नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी। तीनों के ही व्यक्तित्व, स्वभाव और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ लगभग एक जैसी रही हैं।अत: असीमित सम्भावनाएँ व्यक्त की जा सकती हैं कि अपनी शांत प्रकृति, प्रत्यक्ष विनम्र छबि और तत्कालीन राजनीति की जरूरतों पर ज़बरदस्त पकड़ के चलते हरिवंश आने वाले समय में काफ़ी ऊँचाइयों पर पहुँचेंगे। सोचना तो अब केवल उन पत्रकारों को है जो फि़लहाल तो जनता की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, पर कभी सत्ता की रिपोर्टिंग के भी आमंत्रण मिलें तो उन्हें क्या निर्णय करना चाहिए !


17-Sep-2020 2:09 PM 7

-श्रवण गर्ग

सहज जिज्ञासा है कि लोग पूछ रहे हैं- ‘अब क्या करना चाहिए?’ एक विशाल देश और उसके एक दूसरे से लगातार अलग किए जा रहे नागरिक जिस मुकाम पर आज खड़े हैं, वे जानना चाह रहे हैं कि उन्हें अब किस दिशा में आगे बढऩा चाहिए? आम आदमी की साँसों को प्रभावित करने वाला ऐसा कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है, जिसमें अभावों के साथ-साथ बाकी सभी चीजें भी अपने निम्नतम स्तरों पर नहीं पहुँच गई हों। होड़ मची हुई है कि कौन ज़्यादा नीचे गिर सकता है। संविधान निर्माता सात दशक पहले के काल में वर्तमान परिदृश्य की कल्पना नहीं कर पाए होंगे वरना वे कुछ तो लिखकर अवश्य जाते।

हमने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया कि हमारे आसपास की चीज़ें कितनी तेजी से फास्ट-फ़ॉरवर्ड हो रही हैं और पलक झपकते ही पुरानी के स्थान पर नई आकृतियाँ प्रकट हो रही हैं। केवल एक उदाहरण ले लें क्या हमने नोटिस किया कि मॉब-लिंचिंग जैसी घटनाएँ अचानक बंद हो गई हैं, जैसे किसी ने स्विच ऑफ करके ऐसा न करने का फरमान जारी कर दिया हो। इसका यह मतलब कतई नहीं कि वे तत्व जो इस तरह की कार्रवाईयों में जुटे थे, उनका कोई हृदय परिवर्तन हो गया है और वे एक नेक इंसान बन गए हैं। न ही कुछ ऐसा हुआ है कि जो घटनाएँ अतीत में घट चुकी हैं, उनके दोषियों को पर्याप्त सजाएँ और पीडि़त परिवारों को न्याय और राहत नसीब हो चुकी है।

लोग तकलीफ के साथ महसूस कर रहे हैं कि इस समय जो कुछ चल रहा है, वह और भी ज़्यादा डराने वाला है। ऐसा इसलिए कि इस नए खेल में जो हिस्सा ले रहे हैं, उनका संबंध समाज के सम्पन्न लोगों की जमात से है। असीमित सम्पन्नता के बोझ से जन्मा यह नया उग्रवाद मॉब लिंचिंग या धार्मिक आतंकवाद के मुकाबले ज्यादा खतरनाक इसलिए है कि इसे स्थानीय सत्ताओं का राजनीतिक संरक्षण और प्रश्रय प्राप्त है। इसे राजनीति ने सत्ता की जरूरत का नया हथियार बना लिया है। इसका भयभीत करने वाला चेहरा एक ही देश के भीतर कई देशों का विकसित हो जाना है। इस खेल में उन अस्सी करोड़ लोगों की कोई भागीदारी नहीं है, जिन्हें राशन की कतारों में खड़ा कर दिया गया है, जो करोड़ों की तादाद में बेरोजग़ार हैं अथवा इलाज के अभाव में अस्पतालों की सीढिय़ों पर दम तोड़ रहे हैं।

प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘द इकानमिस्ट‘ ने पिछले दिनों रूस के सम्बन्ध में प्रकाशित अपने एक अग्रलेख में कहा है कि लोगों का पेट जैसे-जैसे तंग होने लगता है, सरकारों के पास उन्हें देने के लिए राष्ट्रवाद और विषाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचता। अग्रलेख में यह भी कहा गया है कि जो सरकारें अपनी जनता के ख़िलाफ़ भय का इस्तेमाल करके शासन करती हैं, वे अंतत: खुद भी भय में ही रहने लगती हैं। लगभग पच्चीस करोड़ की आबादी वाले उत्तरप्रदेश में इस समय जो चल रहा है वह बताता है और इशारा भी करता है कि आपातकाल लगाने के लिए अब किसी औपचारिक घोषणा की जरूरत नहीं रहेगी।
उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना के अनुसार अब राज्य के किसी भी व्यक्ति को बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति और वारंट के गिरफ़्तार किया जा सकेगा। बिना सरकार की इजाज़त के कोर्ट भी ऐसी कार्रवाई करने वाले किसी अधिकारी के खिलाफ संज्ञान नहीं ले सकेगा। माना जा सकता है कि आगे या पीछे और सरकारें भी उत्तर प्रदेश से प्रेरणा ले सकती हैं। क्योंकि जो चिंताएँ देश की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य की हो सकती हैं, वे और प्रदेशों की भी तो हो सकती हैं। सवाल यह है कि उत्तरप्रदेश की इस ‘व्यवस्था’ को नागरिकों के सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया कदम माना जाए या फिर किसी अन्य आशंका और अज्ञात भय की दृष्टि से देखा जाना चाहिए ?

मेरे पिछले आलेख (‘कोरोना पर भारी पड़ गई कंगना’) को लेकर कई मित्रों की जो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं हैं, उनमें केवल दो का उल्लेख करना चाहूँगा। दोनों के सवाल एक जैसे ही हैं।ग्वालियर के कवि-मित्र पवन करण ने कहा-‘दुखद है। क्या किया जाए!’ और शिवपुरी के डॉ. महेंद्र अग्रवाल की प्रतिक्रिया है कि सही कहा, पर क्या होगा ?’ सवाल जायज़ हैं और हरेक व्यक्ति जानना भी चाहता है कि परिस्थितियों के प्रति मन में क्षोभ हो और अहिंसक तरीकों से भी नाराजगी को ज़ाहिर करने के खिलाफ सडक़ों पर अवरोध खड़े कर दिए जाएँ तो फिर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवेदनशील नागरिकों को क्या करना चाहिए? (हमें यह जानकर थोड़ा आश्चर्य हो सकता है कि दुनिया के कोई एक चौथाई से ज़्यादा यानी साठ देशों में इस समय नागरिक अपनी माँगों अथवा सरकारों के कामकाज के खिलाफ सडक़ों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें तानाशाही हुकूमतें भी शामिल हैं। अमेरिका के तो सभी राज्यों में 25 मई के बाद से ऐसा हो रहा है।)

महात्मा गांधी ने वैसे तो अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रतिकार के कई रास्ते बताए हैं, पर उनका पालन हमारे लिए कठिन है। दूसरा यह कि इस समय हमारे पास गांधीजी जैसा कोई व्यक्तित्व भी नहीं है। अब यह भी संभव नहीं कि केवल एक या कुछ व्यक्ति ही बोलते रहें और बाकी मौन रहें। सरकारों को सुविधाजनक लगता है कि कुछ लोग विरोध करते रहें और बाक़ी खामोशी ओढ़े रहें। इससे दुनिया में भी संदेश चला जाता है कि देश में बोलने पर कोई पाबंदी नहीं है और कहीं कुछ बदलता भी नहीं।

प्रतिष्ठापूर्ण नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करने वाली अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने शांतिपूर्ण प्रतिकारों के क्षेत्र में कई तरीके ईजाद किए हैं। ये तरीके अधिनायकवादी हुकूमतों पर भी असर डालते हैं और लोकतांत्रिक सरकारों को भी जवाब देने के लिए बाध्य करते हैं। एमनेस्टी की पहल पर कई देशों में जेलों में बंद सत्ता-विरोधी लोग रिहा हुए हैं और मौत की सजाएँ भी रद्द हुई हैं। एमनेस्टी के काम करने के कई और तरीकों में एक यह भी है कि वह नागरिकों को प्रेरित करती है कि व्यवस्थाओं के प्रति अपना प्रतिरोध व्यक्त करने के लिए वे शासन-प्रमुखों के नाम  चिट्ठियां और मेल लिखें या अन्य साधनों से संदेश प्रेषित करें।

हमारे यहाँ तो सवाल उन कतिपय मीडिया संस्थानों का भी है, जो राष्ट्रीय स्तर पर अराजकता फैला रहे हैं। नागरिक चाहें तो यह काम लगातार कर सकते हैं और ऐसे सभी लोगों, संस्थाओं और शासन में बैठे जि़म्मेदार व्यक्तियों को अपने विरोध और असहमति से अवगत करा सकते हैं, जिन्होंने लोकतंत्र को एक मजाक बनाकर रख दिया है। नागरिकों में अगर किसी भी तरह का विरोध या असहमति व्यक्त करने का साहस ही नहीं बचा है तो फिर उन्हें जो कुछ चल रहा है, उसे चुपचाप स्वीकार करते रहना चाहिए। अभी ऐसा ही हो रहा है कि गिने-चुने लोग ही बोल रहे हैं और बहुसंख्या में मौन। 


12-Sep-2020 2:12 PM 10

-श्रवण गर्ग
पटना और मुंबई के बीच सत्रह सौ किलो मीटर की जितनी दूरी है लगभग उतनी ही शिमला और मुंबई के बीच भी है। दोनों ही राज्यों में इस समय एक ही पार्टी के दबदबे वाली हुकूमतें भी हैं। बिहार और हिमाचल दोनों का मौसम और मिजाज अलग-अलग किस्म का है पर राजनीतिक जरूरतों ने दोनों की आत्माओं को एक कर दिया है। एक राज्य की सरकार को चुनाव जीतने के लिए अपने सितारा बेटे की मौत का इंसाफ चाहिए और दूसरे ने अपनी सितारा बेटी के सम्मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी उठा ली है। उधर मुंबई में भी एक सितारा बेटी की जिंदगी दांव पर लगी हुई है और एक राजनीतिक मराठा बेटे ने महाराष्ट्र के गौरव की रक्षा करने का दायित्व अपनी तलवार की धार पर धारण कर लिया है। चूँकि दोनों ही सितारा बेटियाँ बॉलीवुड से जुड़ी हुई हैं, फिल्मी हस्तियों की जिंदगियों से जुड़े तमाम अंतर्वस्त्रों को फिल्मी नगरी की सडक़ों पर पताकाओं की तरह लहराया जा रहा है।
दूसरी ओर, अपनी टीआरपी को हर कीमत पर बढ़ाने में जुटा मीडिया इन दृश्यों को बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के नशे की गोलियों की तरह बेच रहा है। इस काम में भी कुछ ख्याति प्राप्त ‘बेटियाँ’ भी सितारा वस्त्रों को मार्केट की जरूरत के मुताबिक ठीक से धोकर टीवी स्क्रीन के रंगीन पर्दों पर सुखाने में मदद कर रही हैं।चैनलों पर चल रही ‘मीडिया ट्रायल’ के नशे में खोए हुए देश की कोई एक चौथाई आबादी ने तलाश करना बंद कर दिया है कि कोरोना के  ‘वैक्सीन की ट्रायल’ की ताज़ा स्थिति क्या है ! मुंबई में महामारी के दस लाख के आँकड़े और तीस हज़ार को छूने जा रही मौतों के बीच रंगीन खबरों के जो 24@7 रक्तहीन विस्फोट हो रहे हैं उन्हें देश में प्रशिक्षित दस्ते ही अंजाम दे रहे हैं और उनके असली हैंडलर्स कौन हैं किसी को भी आधिकारिक जानकारी नहीं है।

देश के नागरिक कथित तौर पर चीन के द्वारा निर्यात की गई कोरोना की महामारी का मुक़ाबला करने में तो आत्मनिर्भर हो सकते हैं और ‘भगवान’ के कोप के कारण अवतरित हुए आर्थिक संकट के खिलाफ भी भूखे पेट पर पवित्र शिलाएँ बांध सकते हैं ,पर उस मानव-निर्मित त्रासदी का मुकाबला नहीं कर सकते जिससे कि वे इस समय मुखातिब हैं।एक ऐसी त्रासदी जिसे प्रांतवाद के नाम पर ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ के मार्फत अंजाम दिया जा रहा है। इसमें खरीदने का कोई काम ही नहीं है, सबकुछ बेचा ही जाना है। अब तक कहा जाता रहा है कि प्यार में सबकुछ जायज है ,पर इस समय जो नाजायज है सिर्फ उसे ही ढूँढा जा रहा है। ताजा घटनाक्रम की किरदार सभी हस्तियों के मामले में यही हो रहा है। कहना मुश्किल है कि आज अगर सुशांत सिंह जीवित होते तो चुनावी पोस्टरों के लिए किसके चेहरे को ढूँढा जाता और अगर बाला साहब ‘मातोश्री’ की अपनी शानदार कुर्सी पर बिराजे हुए होते तो क्या शिव सेना में ‘आ कंगना मुझे मार’ जैसा कुछ भी संभव हो पाता ?

महामारी और बेरोजगारी से जूझ रही देश की औद्योगिक और वित्तीय राजधानी को अपने संकट से उबरने के लिए शिव सेना किसी सोनू सूद से भी मदद की माँग नहीं कर सकती।उन्हें भी पहले ही हडक़ाया जा चुका है। ‘महाराष्ट्र किसी के बाप का नहीं’ कंगना के कहने के कारण नहीं बल्कि अब इसलिए लगने लगा है कि इतने बड़े राज्य का कोई ‘माई-बाप’ ही नहीं बचा लगता है। कोरोना संकट से अपने आपको सफलता पूर्वक बचा लेने वाले धारावी के भले रहवासी भी शायद ऐसा सोचते होंगे कि एक नई और बड़ी संभ्रांत झोपड़ पट्टी का निर्माण उनके इलाकै के बाहर महानगर में हो रहा है।

क्या विडम्बना है कि संसद की बैठकों के ‘प्रश्न काल ‘को भी कोरोना का संक्रमण हो गया है और किसी को भी उसके इलाज की नहीं पड़ी है। सारे ‘प्रश्न’ केवल एक ही आदमी सडक़ों पर उठा रहा है जिसे उस मीडिया ने राजनीतिक ताश की गड्डी का ‘पप्पू’ बना रखा है जो कंगना के दफ्तर के बाहर खड़े होकर एक पोस्टमैन से सवाल पूछ रहा है कि बीएमसी के द्वारा ‘मणिकर्णिका’ के कि़ले में तोडफ़ोड़ क्यों की गई? कभी कोई ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हो जाए कि थोड़े लम्बे समय के लिए राष्ट्रीय पावर ग्रिड में ‘ब्रेक डाउन ‘ हो जाए या फिर युद्ध की परिस्थितियों का अभ्यास करने के लिए ‘ब्लैक आउट’ लागू करना पड़ जाए तो पता नहीं कितनी बड़ी आबादी पागल होकर सडक़ों पर थालियाँ कूटने लगेगी !

देश का पूरा ध्यान एक अभूतपूर्व संकट से सफलतापूर्वक भटका दिया गया है। चालीस सालों में पहली बार इतना बड़ा आर्थिक संकट, करोड़ों लोगों की बेरोजगारी, महामारी से प्रतिदिन संक्रमित होने वालों के आँकड़ों में दुनिया में नंबरवन बन जाना, चीन द्वारा सीमा पर चार महीनों से दादागीरी के साथ लगातार अतिक्रमण और जानकारी के नाम पर सरकार द्वारा देशवासियों को झूला-झूलाते रहना सब कुछ धैर्यपूर्वक बर्दाश्त किया जा रहा है। हमें बिल्कुल भी डरने नहीं दिया रहा है कि हर महीने कोई सोलह हजार लोग कोरोना की भेंट चढ़ रहे हैं।

कथित तौर पर अवसाद और नशे की लत में पड़े एक सुदर्शन अभिनेता की मौत सरकारों को तो हिला देती है पर लॉकडाउन से उपजे अभावों और बेरोजगारी से पैदा हुए अवसाद के कारण हुई सैंकड़ों आत्महत्याओं की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। मैंने दक्षिण भारत के चार राज्यों-आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में अपने पत्रकार मित्रों से बात की तो पता चला कि सुशांत-रिया-कंगना को लेकर वहाँ खबरों का कोई नशा नहीं बिक रहा है। वहाँ सरकारें और लोग अपनी दूसरी समस्याओं को लेकर चिंतित हैं। इसे हिंदी (मराठी भी) भाषी राज्यों का दुर्भाग्य ही माना जाना चाहिए कि एक ऐसे समय जबकि अधिकतर इलाकों में महामारी के साथ-साथ वर्षा और बाढ़ के कारण उत्पन्न हुई कठिनाइयों के घने बादल छाए हुए हैं, हमारा राजनीतिक नेतृत्व मीडिया के एक वर्ग की मदद से पापड़-बड़ी बनाकर सडक़ों पर सुखा रहा है। वह थोड़ी सी जनता जो इस तमाशे का हिस्सा नहीं है इसी कशमकश में है कि जो कुछ चल रहा है उसके लिए खुद शर्मिंदगी महसूस करे या उन्हें शर्मिंदा करने के अहिंसक और शांतिपूर्ण उपाय तलाशे जो इस दुरावस्था के असली जिम्मेदार हैं !


08-Sep-2020 11:38 AM 12

-श्रवण गर्ग

आज से केवल छप्पन दिनों के बाद भारत सहित पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली घटना के परिणामों को लेकर अब हमें भी प्रतीक्षा करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। इस बात पर दु:ख व्यक्त किया जा सकता है कि मीडिया ने एक महत्वपूर्ण समय में जनता का पूरा ध्यान जान बूझकर गैरजरूरी विषयों की तरफ़ लगा रखा है। इस बातचीत का सम्बंध अमेरिका में तीन नवम्बर को महामारी के बीच एक युद्ध की तरह सम्पन्न होने जा रहे राष्ट्रपति पद के चुनावों और जो कुछ चल रहा है उसके साथ नत्थी हमारे भी भविष्य से है।

पिछले सितम्बर की ही बात है। अपनी सात-दिवसीय अमेरिका यात्रा के दौरान ह्यूस्टन में आयोजित भव्य ‘हाउडी मोदी’ रैली में वहाँ के सभी राज्यों से पहुँचे कोई पचास हज़ार लोगों की उपस्थिति से अभिभूत होकर प्रधानमंत्री मोदी ने दस भारतीय भाषाओं में उस देश में बसने वाले भारतीय मूल के लगभग पचास लाख नागरिकों को आश्वस्त किया था कि वे क़तई चिंतित नहीं हों। भारत में सब कुछ ठीक चल रहा है। ‘ऑल इज वेल।’ (देश के एक सौ तीस करोड़ नागरिक ही अब अपने सीने पर हाथ रखकर इस ऑल इज़ वेल’ की हक़ीक़त बता सकते हैं)। पर यहाँ हमारी बातचीत का सम्बंध किसी और विषय से है :
भारत के प्रधानमंत्री ने ह्यूस्टन की रैली में अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति में जो एक और ज़बरदस्त बात कही वह यह थी कि : ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार।’ रैली में उपस्थित लोगों ने जोरदार ध्वनि के साथ मोदी के नारे का स्वागत किया था। मोदी और ट्रम्प दोनों ही ने तब नहीं सोचा होगा कि साल भर से कम वक्त में दोनों देशों की तस्वीरें इस तरह से बदल जाएँगी ! अमरीकियों के साथ-साथ ही भारतीय मूल के लाखों नागरिक अपने अब तक के सबसे बड़े धर्म संकट में हैं कि ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ होना चाहिए या नहीं !

बताने की ज़रूरत नहीं कि भारतीय मूल के लोगों का फ़ैसला अमेरिकी चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहता है। ट्रम्प और उनके प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रैट जो बायडन दोनों ही भारतीयों को रिझाने में लगे हुए हैं। बायडन ने तो भारतीय मूल की माँ की अश्वेत संतान कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया है। उद्देश्य ट्रम्प से नाराज़ अश्वेत नागरिकों और भारतीय मूल के लोगों दोनों को ही अपने पक्ष में लेना है। मुद्दा यह है कि इस बार के अमेरिकी चुनावों में दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ है और वहाँ भी परिस्थितियाँ लगभग वैसी ही हैं जैसी कि भारत में हैं। इसे महज़ संयोग ही माना जा सकता है कि चुनावों के ठीक पहले सार्वजनिक हुए व्हाइट हाउस के टेप्स में पूर्व रिपब्लिकन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को अत्यंत ज़हरीले अन्दाज़ में यह कहते हुए बताया गया है कि भारतीय महिलाएँ दुनिया में सबसे अधिक अनाकर्षक हैं। भारतीय महिलाओं की सेक्स सम्बन्धी क्षमताओं पर भी उन्होंने घटिया टिप्पणी की है। भारत के सपनों के अमेरिका को इस समय जिन कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ रहा है उसकी पूरी जानकारी हमें प्राप्त नहीं हो रही है। वहाँ अब संकट सिर्फ़ कोरोना संक्रमण के बढ़ते हुए आँकड़ों या मौतों तक सीमित नहीं रह गया है। वहाँ की सडक़ों पर कई महीनों से हिंसा की घटनाएँ हो रही हैं। सरकार के खिलाफ़ ज़बरदस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। पुलिस पर पक्षपातपूर्ण नस्लवादी हिंसा के आरोप लगाए जा रहे हैं (जैसा कि हमारे यहाँ भी होता है !)। आरोप हैं कि वहाँ नस्लवादी भेदभाव को सरकार का समर्थन प्राप्त है। अमेरिकी समाज इस समय दो फाड़ नजऱ आ रहा है। खऱाब आर्थिक स्थिति, बेरोजग़ारी की समस्याएँ अलग से हैं। चुनाव तय करने वाले हैं कि चमड़ी के रंग के आधार पर पनप रहे नस्लवाद और अल्पसंख्यकों (अश्वेतों) के समान अधिकारों को लेकर अमेरिकी समाज का क्या रुख है? ट्रम्प की पार्टी को सवर्णों (गोरी चमड़ी वालों) की समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ट्रम्प की सत्ता में वापसी अमेरिका में लोकतंत्र को समाप्त कर देगी। यह भी आरोप है कि ट्रम्प अमेरिका को पुतिन के रूस की तरह चलना चाहते हैं। और यह भी कि पिछली बार की तरह ही रूस इस बार भी वहाँ हस्तक्षेप करेगा।

अमेरिका के चुनावी नतीजे न सिर्फ़ दुनिया में भविष्य के व्यापार की दिशा, सैन्य समझौते, लड़ाइयाँ और उनमें होने वाली मौतों, शांति वार्ताओं और समझौतों को तय करते हैं बल्कि उन हुकूमतों को भी प्रभावित करते हैं जहां किसी न किसी तरह का लोकतंत्र अभी क़ायम है। भारत की समस्याएँ भी वे ही सब हैं जो अमेरिका में हैं। अमेरिकी सवर्णों के पक्षधर नस्लवाद को लेकर जो आरोप ट्रम्प के खिलाफ़ हैं वही हमारे यहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों को लेकर भाजपा सरकार के विरुद्ध भी हैं। वहाँ जैसा ही विभाजन यहाँ भी है। यहाँ भी सरकार की मूल ताक़त बहुसंख्यक समुदाय ही है।भारत के समझदार नागरिक कमला हैरिस की उम्मीदवारी को लेकर तो गर्व महसूस कर रहे हैं पर वहाँ के चुनाव परिणामों के भारत के लोकतंत्र पर पड़ सकने वाले प्रभावों से पूरी तरह बेख़बर हैं। ट्रम्प अगर दावा कर रहे हैं कि ; ‘मोदी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं ,भारतीय-अमेरिकी मेरे लिए वोट करेंगे’ तो हो सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस प्रतीक्षा में भी हों कि प्रधानमंत्री उनके पक्ष में ह्यूस्टन रैली जैसी कोई अपील एक बार फिर से कर देंगे।

ओपीनियन पोल्स में बताया जा रहा है कि जो बायडन राष्ट्रपति ट्रम्प से आगे हैं पर यह छलावा और भुलावा भी साबित हो सकता है। कोई चमत्कार ही ट्रम्प को हरा सकता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव लडऩे के लिए अगर दो अवधि की संवैधानिक बाध्यता नहीं हो (जैसी कि स्थिति हमारे यहाँ है) तो ट्रम्प भी पुतिन की तरह ही राज करने की क्षमता रखते हैं। अमेरिकी सडक़ों पर हिंसा जितनी बढ़ती जाएगी, मतदाता ट्रम्प की वापसी के पक्ष में बढ़ते जाएँगे। शाहीन बाग का अनुभव हम याद कर सकते हैं कि किस तरह से धरने पर बैठी महिलाओं की लड़ाई से हमदर्दी रखने वाले मुस्लिम नेता बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे और यह आरोप भी लगे कि समूचा विरोध-प्रदर्शन सत्तारूढ़ दल द्वारा ही प्रायोजित था। यह संदेह अब दूर हो जाना चाहिए कि सरकारें अपनी जनता को वास्तव में ही जागरूक देखना चाहती हैं। सरकारों की कल्पना के लोकतंत्रों की हिफाजत के लिए तो जनता को लम्बे समय तक मूर्ख बनाए रखना बेहद जरूरी है और यह काम वे उन्हीं तत्वों की मदद से कर सकतीं हैं जिनके जिम्मे नागरिकों को सही जानकारी देने का काम है।


02-Sep-2020 12:01 PM 14

-श्रवण गर्ग

बहस का विषय इस समय यह है कि वकील प्रशांत भूषण अगर अपने आपको वास्तव में ही निर्दोष मानते हैं तो उन्हें बजाय एक रुपए का जुर्माना भरने के क्या तीन महीने का कारावास नहीं स्वीकार कर लेना चाहिए था? सवाल बहुत ही वाजिब है। पूछा ही जाना चाहिए। प्रशांत भूषण ने भी अपनी अंतरात्मा से पूछकर ही तय किया होगा कि जुर्माना भरना ठीक होगा या जेल जाना ! प्रशांत भूषण के ट्वीटर अकाउंट पर सत्रह लाख फालोअर्स के मुकाबले एक सौ सत्तर लाख से अधिक फालोअर्स की हैसियत रखने वाले ‘चरित्र’ अभिनेता अनुपम खेर ने भी अपना सवाल ट्वीटर पर ही उठाया है :’एक रुपया दाम बंदे का ! और वह भी उसने अपने वकील से लिया !! जय हो !! ’। निश्चित ही लाखों लोग अब इसी तरह के सवाल प्रशांत भूषण से पूछते ही रहेंगे और उनका जीवन भर पीछा भी नहीं छोड़ेंगे। वे अगर चाहते तो जुर्माने या सजा पर कोई अंतिम फैसला लेने से पहले पंद्रह सितम्बर तक की अवधि खत्म होने तक की प्रतीक्षा कर सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। हो सकता है वे न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के सेवा निवृत होने के पूर्व ही प्रकरण को समाप्त करना चाह रहे हों !

मैंने अपने हाल ही के एक आलेख (‘प्रशांत भूषण को सजा मिलनी ही चाहिए और वे उसे स्वीकार भी करें’) में गांधीजी से सम्बंधित जिस प्रसंग का उदाहरण दिया था उसे ताजा संदर्भ में दोहरा रहा हूँ। वर्ष 1922 में अंग्रेजों के खिलाफ अपने समाचार पत्र ‘यंग इंडिया’ में लेखन के आरोप में (तब ट्वीटर की कोई सुविधा नहीं थी) गांधीजी को अहमदाबाद स्थित उनके साबरमती आश्रम से गिरफ्तार करने के बाद छह वर्ष की सजा हुई थी। गांधीजी तब आज के प्रशांत भूषण से ग्यारह वर्ष कम उम्र के थे। कहने की जरूरत नहीं कि वे तब तक एक बहुत बड़े वकील भी बन चुके थे। हम इस कठिन समय में न तो प्रशांत भूषण से गांधीजी जैसा महात्मा बन जाने या किसी अनुपम खेर से प्रशांत भूषण जैसा व्यक्ति बन जाने की उम्मीद कर सकते हैं। गांधीजी पर आरोप था कि वे विधि के द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ घृणा उत्पन्न करने अथवा असंतोष फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। अब इसी आरोप को प्रशांत भूषण के खिलाफ उनके द्वारा की गई सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के संदर्भ में भी पढ़ सकते हैं। गांधी जी ने अपने ऊपर लगे आरोपों और अंग्रेज जज द्वारा दी गई छह वर्ष की सजा को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया था।

प्रशांत भूषण को अगर सजा सिर्फ इतने तक सीमित रहती कि या तो वे एक रुपए का जुर्माना भरें या तीन महीने की जेल काटें तो निश्चित रूप से वे कारावास को प्राथमिकता देना चाहते। पर अदालत ने (कानून की व्याख्या और बार कौंसिल ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए) जैसा कि कहा है प्रशांत भूषण अगर जुर्माना नहीं भरते हैं तो उन्हें तीन महीने की जेल के साथ ही तीन वर्ष के लिए वकालत करने पर प्रतिबंध भी भुगतना पड़ेगा। बातचीत का यहाँ मुद्दा यह है कि अंग्रेज जज एन. बू्रफफील्ड अगर गांधीजी की सजा के साथ यह भी जोड़ देते कि वे सजा के छह वर्षों तक सरकार के खिलाफ किसी भी प्रकार का लेखन कार्य भी नहीं करेंगे तो फिर महात्मा क्या करते?

क्या यह न्यायसंगत नहीं होगा कि प्रशांत भूषण द्वारा एक रुपए का जुर्माना भरकर मुक्त होने के मुद्दे को करोड़ों लोगों की ओर से जनहित के मामलों में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने से तीन वर्षों के लिए वंचित हो जाने की पीड़ा भुगतने से बच जाने के रूप में लिया जाए? अनुपम खेर या उनके जैसे तमाम लोग इस मर्म को इसलिए नहीं समझ पाएँगे कि प्रशांत भूषण किसी फिल्मी अदालत में ‘अपने निर्देशकों’ द्वारा पढ़ाई गई स्क्रिप्ट नहीं बोलते। और न ही जनहित से जुड़ी किसी कहानी में भी स्क्रिप्ट की माँग के अनुसार नायक और खलनायक दोनों की ही भूमिकाएँ स्वीकार करने को तैयार बैठे रहते हैं।

प्रशांत भूषण का पूरे विवाद से सम्मानपूर्वक बाहर निकलना इसलिए जरूरी था कि नागरिकों की जिंदगी और उनके अधिकारों से जुड़े कई बड़े काम सुप्रीम कोर्ट से बाहर भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। बिना किसी अपराध के जेलों में बंद लोगों को इस समय उनकी कानूनी सहायता और सांत्वना की सख्त जरूरत है, जो कि ट्वीटर हैंडल पर उनके खिलाफ ट्रोल करने वाले कभी प्रदान नहीं कर सकते।साथ ही इसलिए भी जरूरी था कि अब प्रशांत भूषण उन तमाम लोगों का अदालतों में बचाव कर सकेंगे, जो अपने सत्ता-विरोधी आलोचनात्मक ट्वीट्स या लेखन के कारण अवमाननाओं के आरोप झेल सकते हैं।

जिस तरह की परिस्थितियाँ इस समय देश में है उसमें तीन साल तक एक ईमानदार वकील के मुँह पर ताला लग जाना यथा-स्थितिवाद विरोधी कई निर्दोष लोगों के लिए लम्बी सजाओं का इंतजाम कर सकता था। किन्ही दो-चार लोगों के आत्मीय सहारे के बिना तो केवल वे ही सुरक्षित रह सकते हैं, जो शासन-प्रशासन की खिदमत में हर वक्त हाजिर रहते हैं। प्रशांत भूषण को अगर जुर्माने और सजा के बीच फैसला करते वक्त अपनी अंतरात्मा के साथ किंचित समझौता करना पड़ा हो तो भी उन्होंने करोड़ों लोगों की आत्माओं को अब और ज़्यादा आजादी के साथ साँस लेने की स्वतंत्रता तो उपलब्ध करा ही दी है। क्या हमारे लिए इतनी उपलब्धि भी पर्याप्त नहीं है?


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