श्रवण गर्ग

30-Jul-2020 10:43 AM

हमारे अब तक के अनुभव यही रहे हैं कि जब-जब भी बाहरी ताक़तों की तरफ़ से देश की संप्रभुता पर आक्रमण हुआ है ,समूचा विपक्ष अपने सारे मतभेदों को भूलकर तत्कालीन सरकारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो गया है। जिस चर्चित ‘कारगिल युद्ध ‘को लेकर हाल ही में विजय दिवस मनाया गया उसकी भी यही कहानी है।सम्पूर्ण भारत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व के साथ खड़ा हुआ था।आश्चर्यजनक रूप से इस समय पिछले अनुभवों की सूची से कुछ भिन्न होता दिखाई पड़ रहा है।

देश की सीमाओं पर पड़ोसी देश चीन की ओर से हस्तक्षेप और अतिक्रमण हुआ है ,उससे निपटने को लेकर चल रही तैयारियाँ भी नभ-जल-थल पर स्पष्ट दिखाई दे रही हैं पर सरकार चीनी हस्तक्षेप को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने को तैयार नहीं है।छोटी-छोटी बात पर आए-दिन सरकारों को मुँह चिढ़ाने वाला विपक्ष भी इस समय तटस्थ भाव से खामोशी की मास्क मुँह पर लटकाए हुए कोरोना से लड़ाई में अपनी व्यस्तता जता रहा है।जनता को तो जैसे कुछ भी पता ही नहीं है या फिर सब कुछ जानते हुए भी वह अनजान बनी रहना चाहती है।पर एक शख़्स है जो अपनी आधी-अधूरी पार्टी के सहारे और अपने राजनीतिक भविष्य की कोई चिंता किए बग़ैर चीन के द्वारा भारतीय सीमा में किए गए अनधिकृत प्रवेश को लेकर सरकार को लगातार कठघरे में खड़ा कर रहा है।

राहुल गांधी नाम का यह शख़्स जो इस समय लगातार सवाल उठा रहा है उसे उसके जवाब तो नहीं मिल रहे हैं ,उल्टे उससे दूसरे प्रश्न पूछे जा रहे हैं।ये प्रश्न भी प्रधानमंत्री स्वयं नहीं कर रहे हैं।उनकी पार्टी के अन्य लोग कर रहे हैं।सही भी है। प्रधानमंत्री के सामने राहुल गांधी की हैसियत का भी सवाल है।वे हैं तो केवल एक साधारण सांसद ही और वह भी सुदूर केरल प्रांत से ,उत्तर प्रदेश में हारे हुए। राहुल गांधी के सरकार से सवाल कोई लम्बे-चौड़े नहीं हैं।उन्हें उठाने के पीछे भावना भी ईमानदारी और देशभक्ति की ही है जिसकी कि अपेक्षा प्रधानमंत्री देश के नागरिकों से अक्सर ही करते रहते हैं।यह भी तय है कि राहुल जो कुछ भी कर रहे हैं उसके कारण अमेठी में उनके वोट और कम ही होने वाले है।वे फिर भी कर रहे हैं।

राहुल सरकार से कह रहे हैं कि चीनी सैनिकों ने भारत की ज़मीन के एक भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया है ।इस तथ्य को छुपाना और ऐसा होने देना दोनों ही देश-हित के विरुद्ध है।उसे लोगों के संज्ञान में लाना राष्ट्रीय कार्य है। ‘अब आप अगर चाहते हैं कि मैं चुप रहूँ और अपने लोगों से झूठ बोलूँ जबकि मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूँ ; मैंने सैटेलाइट फ़ोटो देखे हैं ,पूर्व सैनिकों से बात करता हूँ ।आप अगर चाहते हैं कि मैं झूठ बोलूँ कि चीनी सैनिकों ने हमारे क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया है,तो मैं झूठ बोलने वाला नहीं।मैं ऐसा बिलकुल नहीं करूँगा।मुझे परवाह नहीं अगर मेरा पूरा करियर तबाह हो जाए।’

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि अगर राहुल गांधी झूठ बोल रहे हैं तो सरकार उस झूठ को इस तरह से क्यों छुपा रही है कि वह उसका खंडन करने को तैयार नहीं है ? इसका परिणाम यही हो रहा है कि राहुल जो कह रहे हैं वह सच नज़र आ रहा है।राहुल गांधी के सवालों का न सिर्फ़ कोई भी विपक्षी दल खुलकर समर्थन करने को तैयार नहीं है ,पूर्व रक्षा मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार तो इस मामले में पूरी तरह से सरकार के ही साथ हैं।उनका कहना है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।पवार का इशारा इस बात की तरफ़ भी है कि देश ने चीन के हाथों ज़मीन 1962 के युद्ध में खोई थी।प्रधानमंत्री का इस सम्बंध में कथन अभी तक यही है कि न तो कोई हमारी ज़मीन पर घुसा है और न किसी भारतीय ठिकाने (पोस्ट) पर क़ब्ज़ा किया है।

क्या मान लिया जाए कि देश की जनता ने अपने जानने के बुनियादी अधिकार और विपक्षी दलों ने अपने सवाल करने के हथियार के इस्तेमाल को सरकार की अनुमति के अधीन कर दिया है ? सवाल यह भी है कि कहीं राहुल खुद की पार्टी में भी तो अकेले नहीं पड़ते जा रहे हैं ? पता नहीं चलता कि उनकी पार्टी के कितने सीनियर नेता इस समय उनके साथ बराबरी से खड़े हैं ? तो फिर ऐसी स्थिति में इस लड़ाई को राहुल गांधी एक नेता के रूप में और एक सौ पैंतीस साल पुरानी कांग्रेस एक संगठन के तौर पर कितनी दूरी तक निभा पाएगी ? चिंता यहाँ केवल एक व्यक्ति के करियर को लेकर ही नहीं बल्कि एक स्थापित राजनीतिक संगठन के बने रहने की ज़रूरत की भी है।चाहे एक मुखौटे के तौर पर ही सही ,देश में लोकतंत्र के लिए उसका बने रहना ज़रूरी है।साथ ही ,पिछले सात वर्षों से कांग्रेस-मुक्त भारत के जो सपने देखे जा रहे हैं उनके हक़ीक़त में बदले जाने को लेकर उठने वाली चिंताएँ राहुल गांधी के करियर से कहीं ज़्यादा बड़ी हैं।पूछा जा सकता है कि जब देश को ही सरकार से कुछ जानने की ज़रूरत नहीं पड़ी है तो फिर राहुल गांधी अकेले को चीनी हस्तक्षेप और पीएम कैयर्स फंड आदि की जानकारी को लेकर अपना करियर और कांग्रेस का भविष्य दांव पर क्यों लगाना चाहिए ? तो क्या फिर राहुल गांधी को सामूहिक रूप से यही सलाह दी जानी चाहिए कि वे उसी तरह से बोलना बंद कर दें जैसे कि हम सब ने बंद किया हुआ है ? तब तो पूरे देश में केवल एक व्यक्ति की आवाज़ ही गूंजती रहेगी।अभी तो दो लोग बोल रहे हैं ! और अंत में यह कि : ‘राहुल गांधी द्वारा पूछे जा रहे ग़ैर-राजनीतिक सवालों से सहमत होने लिए उनकी राजनीतिक विचारधारा से भी ‘सहमत’ होना क़तई ज़रूरी नहीं है !’

-श्रवण गर्ग


27-Jul-2020 9:56 AM

दल बदलने वालों के घर हो !

-श्रवण गर्ग

राजस्थान में भी कांग्रेस की सरकार अगर अंततः गिरा ही दी जाती है तो उसका ‘ठीकरा’ किसके माथे पर फूटना चाहिए ? मध्य प्रदेश को लेकर यही सवाल अभी हवा में ही लटका हुआ है।मार्च अंत (या उसके पहले से भी ) से मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का गांधी परिवार के साथ मंत्रणा करते हुए कोई चित्र अभी सार्वजनिक नहीं हो पाया है।महाराष्ट्र में अजित पवार भी फड़नवीस के साथ ताबड़तोड़ शपथ लेने के पहले सचिन पायलट की तरह ही किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे।महाराष्ट्र का भाजपा प्रयोग तब सफल हो जाता तो शरद पवार की उम्र भर की राजनीतिक कमाई स्वाहा हो जाती।वे दोनों कांग्रेसों को बचा ले गए।इतना ही नहीं ,शिव सेना का भी उन्होंने कांग्रेसी शुद्धीकरण कर दिया है।अब उद्धव ने मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा को फिर से वैसा ही कोई प्रयोग करके दिखाने की चुनौती दी है।

अशोक गहलोत मुख्यमंत्री होने के अलावा एक बड़े जादूगर भी हैं।उनकी सरकार भी अब किसी बड़े जादू से ही बच सकती है।बहुत मुमकिन है पायलट के पास विधायकों की गिनती पूरी होने तक विधान सभा क्वॉरंटीन में ही रहे।राजस्थान में संकट की शुरुआत ‘सोने की छुरी पेट में नहीं घुसेड़ी जाती’ के प्रचलित राजस्थानी मुहावरे से हुई थी और उसका आंशिक समापन :’जनता राजभवन घेर ले तो फिर मुझे मत कहिएगा’, से हुआ था।मुख्यमंत्री ने अब कहा है कि ज़रूरत(?) पड़ी तो वे अपने विधायकों के साथ राष्ट्रपति से भी मिलेंगे या प्रधानमंत्री निवास के सामने धरना देंगे।मुख्यमंत्री को अभी अपनी उस चिट्ठी का जवाब प्रधानमंत्री से नहीं मिला है जिसमें उन्होंने राजस्थान में लोकतंत्र बचाने की अपील की थी।गेहलोत अपनी सत्ता बचाने के उनके संघर्ष को जनता के अधिकारों की लड़ाई में बदलना चाहते हैं। जनता जब महामारी और अभावों से मुक़ाबला कर रही हो,सत्ता की लड़ाई में उससे भागीदारी की उम्मीद करना वैसा ही है जैसी कि प्रधानमंत्री से मदद की माँग करना।

हो यह रहा है कि सभी जनता को बेवक़ूफ़ बनाना चाहते हैं। जनता भी कई बार अपना परिचय इसी प्रकार देने में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करती है। वह जानती है कि भाजपा लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर चुनी हुई सरकारों को गिराने और कांग्रेस उन्हें बचाने के काम में लगी है।जनता के विवेक पर किसी का कोई भरोसा नहीं है। ऐसा नहीं होता तो विधायकों का समर्थन जुटाने के लिए करोड़ों की बोलियां नहीं लगतीं और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि अपने आप को सितारा होटलों के कमरों में ‘दासों’ की तरह बंद नहीं कर लेते।
जनता के नाम पर सारा नाटक चल रहा है और जनता मूक दर्शकों की तरह थिएटर के बाहर खड़ी है ।अंदर मंच पर केवल अभिनेता ही दिखाई देते हैं ।सामने का हाल पूरा ख़ाली है।प्रवेश द्वारों पर सख़्त पहरे हैं।

मध्य प्रदेश में कोरोना काल का पूरा मार्च महीना एक चुनी हुई सरकार को गिराने में खर्च हो गया।जिसके बारे में मुख्यमंत्री ने ही ,बाद में वायरल हुए आडियो के अनुसार, स्वीकार किया कि सब कुछ केंद्र के इशारे पर किया गया था।उसी केंद्र के इशारे पर जिसके प्रधानमंत्री को अपनी सरकार बचाने के लिए गेहलोत ने चिट्ठी लिखी है।शिवराज सिंह के शपथ लेने के तीन महीने बाद पूरे मंत्रिमंडल का गठन हुआ और अभी कुछ दिन पहले ही काफ़ी जद्दोजहद के बाद मंत्रियों को विभागों का बँटवारा हुआ।अब ज़्यादातर नए मंत्री उप-चुनाव जीतने की तैयारी में लग गए हैं।मुख्यमंत्री को कोरोना हो गया है ।प्रदेश फिर भी चल रहा है।लोकतंत्र भी देश की तरह मध्य प्रदेश में भी पूरी तरह सुरक्षित है।एक सरकार कोरना में बन गई दूसरी को कोरोना की आड़ में ज़िंदा नहीं रहने दिया जा रहा है।

देश एक ऐसी व्यवस्था की तरफ़ बढ़ रहा है जिसमें सब कुछ ऑटो मोड पर होगा। धीरे-धीरे चुनी हुई सरकारों की ज़रूरत ही ख़त्म हो जाएगी।जनता की जान की क़ीमत घटती जाएगी और ग़ुलामों की तरह बिकने को तैयार जन प्रतिनिधियों की नीलामी-बोलियाँ बढ़ती जाएँगी।अमेरिका और योरप में इन दिनों उन बड़े-बड़े नायकों की सैंकड़ों सालों से बनीं मूर्तियाँ ,जिनमें कि कोलंबस भी शामिल हैं,इसलिए ध्वस्त की जा रहीं हैं कि वे कथित तौर पर ग़ुलामी की प्रथा के समर्थक थे।हमारे यहाँ इस तरह के नायकों के चित्र ड्रॉइंग रूम्स और कार्यालयों में लगाए जा रहे हैं और गांधी जी के पुतलों पर गोलियाँ चलाई जा रही हैं।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिस जनता की लड़ाई का दम भरा जा रहा है उसमें अस्सी करोड़ तो पाँच किलो गेहूं या चावल और एक किलो दाल लेने के लिए क़तारों में लगा दिए गए हैं और बाक़ी पचास करोड़ कोरोना से बचने के लिए बंटने वाली सरकारी वैक्सीन का अपने घरों में इंतज़ार कर रहे हैं। गेहलोत और कमलनाथ को वास्तव में घेराव राज भवन और प्रधानमंत्री आवास का नहीं बल्कि उन लोगों के घरों का करना चाहिए जो भुगतान की आसान किश्तों पर सत्ता की प्राप्ति के लिए अपनी पार्टी और नेतृत्व के प्रति स्व-आरोपित असहमति व्यक्त करने के लिए तैयार हो गए।और यह भी कि इस ‘असहमति’ के लिए उस मतदाता की कोई ‘सहमति’ नहीं ली गई जिसकी उम्मीदों को सरे आम धोखा दिया जा रहा है ?


24-Jul-2020 11:30 AM

-श्रवण गर्ग

देश की राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बीस जुलाई को एक बेकसूर पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या पर पत्रकारिता के शीर्ष संस्थानों जैसे एडिटर्स गिल्ड, भारतीय प्रेस परिषद आदि की ओर से किसी औपचारिक भी प्रतिक्रिया का आना अभी बाकी है। ये संस्थान और बड़े सम्पादक अभी शायद यही तय कर रहे होंगे कि जो व्यक्ति मारा गया, वह वास्तव में भी कोई पत्रकार था या नहीं। यह भी कहा जा रहा है कि वह गुंडों के खिलाफ अपनी किसी प्रकाशित रिपोर्ट को लेकर तो नहीं मारा गया। उसकी हत्या तो अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ के खिलाफ की गई पुलिस रिपोर्ट की वजह हुई। ऐसे लोगों को विक्रम जोशी के अपनी छोटी-छोटी बेटियों की आँखों के सामने मारे जाने या उसके पत्रकार होने या न होने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता ! ये जानते हैं कि दिल्ली और अन्य गाँव-शहरों में रोजाना ही लोगों को सडक़ों पर मारा जाता है और कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिलता।मैं विक्रम जोशी को नहीं जानता। वे गाजियाबाद के किस स्थानीय अखबार में काम करते थे यह भी पता नहीं। मेरे लिए इतना जान लेना ही पर्याप्त था कि वे एक बहादुर इंसान रहे होंगे। और यह भी कि अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ को लेकर पुलिस तक जाने की हिम्मत कोई पत्रकार ही ज़्यादा कर सकता है। आम आदमी पुलिस और गुंडों दोनों से ही कितना डरता है, सबको जानकारी है।

विक्रम जोशी की हत्या तो देश की राजधानी की नाक के नीचे हुई इसलिए थोड़ी चर्चा में भी आ गई, पर सुनील तिवारी के मामले में तो शायद इतना भी नहीं हुआ होगा। मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड क्षेत्र के निवाड़ी जिले के गाँव पुतरी खेरा में पत्रकार तिवारी की दबंगों द्वारा हाल ही में हत्या कर दी गई। सुनील तिवारी ने भी पुलिस अधीक्षक को आवेदन कर उन दबंगों से अपनी सुरक्षा का आग्रह किया था, जिनके खिलाफ वे लिख रहे थे और और उन्हें धमकियाँ मिल रहीं थीं।कोई सुरक्षा नहीं मिली।तिवारी का वह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है जिसमें वे बता रहे हैं कि उन्हें और उनके परिवार को किस तरह का खतरा है।निश्चित ही अब पूरी कोशिश यही साबित करने की होगी कि तिवारी पत्रकार थे ही नहीं।आरोप यह भी है कि तिवारी जिस अखबार के लिए उसके ग्रामीण संवाददाता के रूप में काम करते थे उसने भी उन्हें अपना प्रतिनिधि मानने से इनकार कर दिया है।आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए।

क्या पत्रकार होना न होना भी पत्रकारिता जगत की वे सत्ताएँ ही तय करेंगी जो मीडिया को संचालित करती हैं, जैसा कि अभिनेता के रूप में पहचान स्थापित करने के लिए फिल्म उद्योग में जरूरी है? अगर आप सुशांत सिंह राजपूत हैं तो वे लोग जो बालीवुड की सत्ता चलाते हैं आपको कैसे अभिनेता मान सकते हैं ! ऐसा ही अब मीडिया में भी हो रहा है। पहले नहीं था। गाजियाबाद या निवाड़ी या और छोटी जगह पर होने वाली मौतें इसीलिए बिना किसी मुआवजे के दफ्न हो जातीं हैं कि मौजूदा व्यवस्था आतंक के नाम पर केवल विकास दुबे जैसे चेहरों को ही पहचानती है। वह भी उस स्थिति में अगर आतंक से प्रभावित होने वालों का सम्बन्ध व्यवस्था से ही हो।

गाजियाबाद के विक्रम जोशी या निवाड़ी के सुनील तिवारी को व्यक्तिगत तौर पर जानना जरूरी नहीं है। ज़्यादा जरूरी उन लोगों को जानना है जिनके जिम्मे उनके जैसे लाखों-करोड़ों के जीवन की सुरक्षा की जवाबदारी है और इनमें बिना चेहरे वाले कई छोटे-छोटे पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता शामिल हैं। वर्ष 2005 से अब तक कोई 68 आरटीआई कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं और छह को आत्महत्या करनी पड़ी है। इस सिलसिले में ताजा मौत 38-वर्षीय पोयपिन्हुँ मजवा की है जो बीस मार्च को मेघालय में हुई है। व्यवस्था के साथ-साथ ही उस समाज को भी अब जानना जरूरी हो गया है जिसके भरोसे संख्या में अब बहुत ही कम बचे इस तरह के लोग अभी भी तराज़ू के भारी पलड़े की तरफ बिना देखे हुए अपने काम में ईमानदारी से में लगे हुए हैं और समाज हरेक ऐसी मौत को अपनी ही एक और साँस का उखड़ जाना नहीं मानता।

विक्रम जोशी की हत्या को लेकर मैंने एक ट्वीट किया था। उसकी प्रतिक्रिया में सैकड़ों लोग मेरे द्वारा व्यक्त चिंता के समर्थन में आ गए। पर कुछ उनसे अलग भी थे जिनके विचारों का उल्लेख यहाँ इसलिए जरूरी है कि देश किस तरह से चलना चाहिए ये ही लोग तय करते हैं। जैसे : (1)’ सही कह रहे हैं श्रीमानजी ! अधिकांश मीडिया जगत के पास साँसों के अलावा कुछ भी नहीं बचा। कलम तो पहले ही बिक चुकी है, अब साँसों का भी संकट खड़ा हो गया है ‘, (2)’ पिछली सरकार में तो पत्रकारों को जेड प्लस सुरक्षा थी। कोई भी पत्रकार की हत्या नहीं हुई, लिस्ट भेजूँ क्या ?’, (3) ‘विक्रम जोशी की हत्या उनके द्वारा पत्रकार की हैसियत से किसी रिपोर्ट के प्रकाशन के कारण नहीं हुई है।’ ऐसे और भी कई ट्वीट।

एक घोषित अपराधी विकास दुबे की पुलिस के हाथों ‘संदेहास्पद’ एंकाउंटर में हुई मौत की जाँच तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है, पर गुंडों के हाथों सामान्य नागरिकों, पत्रकारों, आरटीआई कार्यकर्ताओं, आदि की आए दिन होने वाली हत्याएँ तो सभी तरह के संदेहों से परे हैं। फिर भी अपराधियों को सजा क्यों नहीं मिलती? क्या हमें इसी तरह की हिंसक अराजकता के बीच जीना पड़ेगा?