बालोद

खरीफ फसल से नुकसान की भरपाई करने नदी की रेत पर पसीना बहा रहे किसान
28-Oct-2020 7:02 PM 37
खरीफ फसल से नुकसान की भरपाई करने नदी की रेत पर पसीना बहा रहे किसान

विजय जायसवाल

बालोद, 28 अक्टूबर (छत्तीसगढ़)। बालोद जिले की तांदुला नदी किनारे बसे दर्जनों गांव के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है। तांदुला नदी पर मानसून बीतने के बाद दर्जनों गांव के लोग नदियों को संवार कर वहां खेती किसानी करते हैं।

खरीफ फसल के नुकसान की भरपाई करने के लिए किसान इन दिनों नदी की रेत पर पसीना बहा रहे हैं। रबि फसल का रकबा कम होता जा रहा है। वहीं भूमिहीन मजदूर परिवारों के लिए रेत पर बने छोटे-छोटे खेत में ग्राम पडक़ीभाट उमरादाह चरोटा सिवनी नेवारी जैसे कई गांव के लोग यहां कृषि कार्य कर अपना जीवन यापन करते हैं। बरसों से बालोद जिले के इस गांव में कृषि करने की परंपरा चली आ रही है। दर्जनों गांव के सैकड़ों परिवार यहां सब्जी की खेती कर रहे हैं। चार महीने के लिए भूमिहीन किसान भी खुद को किसान से कम नहीं समझते और मेहनत झोंक देते हैं। रेत पर पसीना बहाते हैं। तब इनका जीवन यापन होता है। यहां की सब्जियां बालोद जिले से लेकर दुर्ग और रायपुर तक बेची जाती हैं। यहां ग्रामीण बरसात के पहले खेतों में मजदूरी करते हैं। उसके बाद से नदी की रेत पर सब्जी और फल की फसल लेकर पूरे साल के लिए जीवन यापन का साधन जुटाते हैं।

रेत पर पसीना बहाने वाले इन किसानों की सुध लेने जब 'छत्तीसगढ़’ नदियों पर पहुंचा तो उनके चेहरे खिल उठे। उन्होंने बताया कि रेत पर होने वाली पैदावार से अच्छी खासी आमदनी हो जाती है यहां हम धान से अधिक मुनाफा कमा लेते हैं हमारे इन सब्जियों का बाजार में भी अच्छा दाम है। किसानों के अनुसार 3 महीने की कड़ी मेहनत से कर्ज अदा करने के बाद करीब 20 से 25000 रुपए की आमदनी होती है यहां पर भी तरह-तरह की सब्जियां उगाते हैं।

कृषक महिला तीजन बाई ने बताया कि वर्षों से रेत पर किसी करने की परंपरा चली आ रही है मानसून के बाद हम लोग अपना सारा ध्यान रेत में कृषि करने में लगाते हैं जिसका हमें फायदा भी मिलता है। उन्होंने बताया कि पूरे परिवार सहित हम सुबह से यहां आए रहते हैं और दोपहर का भोजन भी यही करते हैं और सीधे शाम दिन ढलते ही अपने घरों को वापस लौट जाते हैं।

तांदुला नदी में सबसे ज्यादा कांदे की खेती की जाती है। इसके साथ ही आलू प्याज तरबूज सहित कुछ ऐसे फसल जो कि रेत में सबसे ज्यादा उगते हैं। उन फसलों की खेती की जाती है। इसमें प्याज की भाजी और मूली आदि शामिल है। ठंड में रेत में उगे इन सब्जियों का स्वाद भी अलग रहता है और यह काफी पौष्टिक भी होता है।

यहां मौजूद किसानों ने बताया कि रेत में कृषि कार्य करने के लिए काफी मेहनत भी करना पड़ता है। सबसे पहले रेत को समतल बनाया जाता है फिर 3 गुना 30 फीट के आकार के गहरे नाले बनाए जाते हैं ताकि नदी का पानी किनारे से बहकर और खेतों को नुकसान न पहुंचा सके। इसके साथ ही खेती की शुरुआत हो जाती है और छोटे-छोटे गड्ढों के माध्यम से यहां हम खेतों के लिए सिंचाई करते हैं। यही नहीं बारिश के दिनों में बड़े-बड़े पत्थर रेत के साथ बैठकर आते हैं उन्हें भी हमें अलग करना पड़ता है।

 

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