दुर्ग

कोरोनाकाल में दुर्ग ग्रामीण से अधिक शहरी बच्चे हुए प्रभावित
24-Nov-2020 9:51 PM 65
कोरोनाकाल में दुर्ग ग्रामीण से अधिक शहरी बच्चे हुए प्रभावित

लेखराम सोनवानी

उतई, 24 नवंबर(‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)।  कोरोना वायरस के कारण लंबे चले लॉकडाउन से दुर्ग शहर के हर 10 में से 8 पालकों का मानना है कि कोरोनाकाल से  बच्चों की मानसिकता प्रभावित हुई है। उनकी दिनचर्या में भी परिवर्तन आया हैं, जबकि दुर्ग ग्रामीण पालकों का मानना है कि कोरोनाकाल का उसके बच्चों के मानसिकता पर कोई ज्यादा प्रभाव नहीं हुआ है बल्कि कोविड 19 काल में उनके बच्चे अधिक हेल्दी एवं स्वस्थ हुए हैं।

दुर्ग के पालक पियूष सर्वा का कहना है कि ज्यादातर घर पर ही रहने से बच्चे मानसिक रूप से अवश्य प्रभावित हुए हैं, अब उनको स्कूल जाने का मन नहीं करता, छोटी-छोटी बातों पर रोने लगते हैं, तो कभी उदास हो जाते हैं। इस प्रकार उनकी मानसिकता में परिवर्तन दिखा है।

बैंक ऑफ इंडिया के अफसर पालक तासियुस तिर्की  ने बताया कि शुरू-शुरू के एक-दो हफ्ते हफ्ते तक बच्चे खुश थे, लेकिन जैसे-जैसे घर में ही रहने का समय बढ़ता गया, बच्चों की दिनचर्या में परिवर्तन आता गया, उनके सोने का कोई टाइम नहीं है, ना उठने का और ना ही खाने-पीने का और न ही नहाने का, इस प्रकार से उसके दिनचर्या में भारी परिवर्तन हुआ है। 

उतई केपार्षद व पालक राकेश साहू का कहना है कि आजकल के बच्चे अपने माता-पिता  से ज्यादा स्मार्ट हो रहे हैं। बच्चों की दिनचर्या अब मोबाइल से शुरू होती है  और मोबाइल में ही खत्म हो रही है। जबकि पहले बच्चे सोकर उठते ही खेलने कूदनेे में लग जाते थे, जिससे उनकी दिनचर्या भी बेहद व्यस्त होती थी, और स्वास्थ्य भी तन्दरुस्त रहता था।  अब बच्चे खेलना कूदना भूल रहे हैं।

उमरपोटी के पालक दिवाकर गायकवाड़ के अनुसार कोरोना काल में बच्चों की मानसिकता अवश्य प्रभावित हुई है। अधिक दिनों तक घर पर ही रहने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, अधिक गुस्सा करना जैसी मानसिकता बढ़ रही है, इसे डिप्रेशन के रूप में देखा जा रहा है।  स्कूलों द्वारा की जा रही ऑनलाइन पढ़ाई पर केवल मां-बाप ध्यान देते दिखाई दे रहे हैं, बच्चे ध्यान ही नहीं दे रहे हैं।

डूमरडीह के हरिश यादव का कहना कि कोरोना काल में उनके बच्चे हेल्दी एवं स्वस्थ हुए हैं क्योंकि बच्चों को माता पिता का भरपूर साथ मिलने के साथ, घर का ताजा व हेल्दी खाना पान मिल रहा है।

डॉ. दानी मनोरोग विशेषज्ञ जिला चिकित्सालय दुर्ग का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों पर मानसिक रूप से कम प्रभाव पड़ा है।  शहरी क्षेत्र में देखे तो प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहर में अधिक देखा गया हैं तथा सही समय पर मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान न देने से यह खतरा व्यस्कता तक बढ़ सकता है और इससे शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। आज देखने में आ रहा है कि पूर्णबंदी के दौरान घरों में कैद रहने के कारण ज्यादातर बच्चों में अवसाद के लक्षण पैदा हो गए। बाहर निकलने, दोस्तों से मेल-मुलाकात करने, खेलने-कूदने जैसी सारी गतिविधियों के बंद हो जाने से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा हैं

लॉकडाउन में यूं रखें बच्चों का ध्यान

दुर्ग के डॉ.प्रमोद गुप्ता मनोरोग विशेषज्ञ सेंट्रल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज का कहना है कि पालक थोड़ा समय बच्चों को भी दें। उनके साथ खेलें, उनसे कहानियां सुनें भी और सुनाएं भी। जिस तरह आप अपनी नानी-दादी से सुनते थे। वे बहुत कुछ अपने पेरेंट्स से कहना चाहते हैं ,सभी व्यस्त होने के कारण बोल नहीं पाते। उन्हें बोलने के लिए प्रेरित भी करें खुल कर बोलने भी दें।  नई-नई एक्टिविटी में व्यस्त रखें, जैसे पेंटिंग और ब्रेन गेम्स इत्यादि स्ट्रेस होने पर बच्चों में अलग-अलग लक्षण दिखते हैं। जैसे बहुत ज्यादा गुस्सा करना, बिस्तर पर पेशाब करना, परेशान दिखना, खुद को हर चीज से अलग कर लेना। ऐसे बदलाव दिखने पर पेरेंट्स को अलर्ट होने की जरूरत है। ऐसी स्थिति में उनकी हर बात को ध्यान से सुनें। समय-समय पर उनसे बात करते रहें और उनके हर सवाल का जवाब प्यार और धैर्य के साथ दें। संभव हो तो उनके साथ समय बिताएं और इंडोर गेम्स खेलें। कोशिश करें कि ऐसी स्थिति में बच्चे पेरेंट्स या घर के मेंबर के साथ ही रहें या केयरटेकर मौजूद हो तो वह इनका खास ध्यान रखें।अगर बच्चे से दूर हैं तो उनसे मोबाइल से कनेक्ट रहें। कुछ घंटों के अंतराल बात करते रहें। जितना हो सके, उन्हें सामान्य माहौल जैसा ही महसूस कराएं। उनके मन में डर का माहौल न बनने दें।

दुर्ग जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.गंभीर सिंह ठाकुर का कहना है कि पढऩे लिखने वाले बच्चों को स्कूल बंद होने से बहुत आघात हुआ है। पढ़ाई लिखाई नहीं हो पा रही है तो हम आगे कैसे बढ़ेगें, यह सोच सोच कर  उनका मनोबल टूट सा गया है। कोरोना का डर उनके दिलो दिमाग पर घर कर गया, बच्चे के मन पर यह डर बैठ गया है कि कोरोना एक भयानक बीमारी है, इससे बचना अतिआवश्यक है। अगर इससे नही बचें तो जान भी जा सकती हैं। यह बच्चों के लिए ठीक नहीं है। इस डर को उनके दिमाग से निकलना जरूरी है।

उन्हें बताएं कि बच्चों को कोरोना वायरस का खतरा न के समान है। उदाहरण के तौर पर दुर्ग जिला में 1000 में एकाध बच्चों को हुआ भी है और जल्द ही ठीक भी हो गया है, क्योंकि बच्चों में रोगों से लडऩे की क्षमता अधिक होती है।

 मैं सभी माता-पिता  से आग्रह करूंगा कि अगर उनके बच्चे घर पर है तो उसे बराबर प्रोत्साहन दे पढ़ाई लिखाई के लिए उत्साहित भी करें व सजग भी करें। रामायण, कहानी, उपन्यास  पढऩे को कहें, अच्छे नेता अभिनेता व खिलाडिय़ों के बारे में बताएं कि वे विभिन्न परिस्थितियों में मेहनत कर कैसे सफल हुए हैं।

(यह सर्वे मिडिया कलेक्टीव फॉर चाइल्ड राइट्स (एमसीसीआर) फेलोशिप के अंतर्गत किया गया है।)

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