बस्तर

संस्कृति व पुरातत्व संपदा को सहेजने में संग्रहालय की महत्वपूर्ण भूमिका
09-Mar-2021 7:56 AM 41
संस्कृति व पुरातत्व संपदा को सहेजने में संग्रहालय की महत्वपूर्ण भूमिका

  दो दिवसीय पुरातात्विक संगोष्ठी में ३१ शोधार्थियों ने पढ़ा शोधपत्र   

   शोधार्थियों ने दी दर्जनों नए पुरातात्विक स्थलों की जानकारी   

जगदलपुर, 8 मार्च। जिला पुरातत्व संग्रहालय में बस्तर का पुरातात्विक वैभव पर आयोजित दो दिवसीय शोध संगोष्ठी के दूसरे दिन सोमवार को बस्तर संभाग के विभिन्न स्थलों से दर्जनों नए पुरातात्विक स्थलों की जानकारी सामने आई। संगोष्ठी के दूसरे सत्र में १७  शोधार्थियों ने अपना शोध प्रस्तुत किया।

 इस मौके पर पुरातत्व वेत्ताओं ने कहा कि संस्कृति और पुरातत्व संपदा को सहेजने में संग्रहालय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए दुर्लभ प्रतिमाओं का संरक्षण बेहद जरूरी है। शोधार्थियों द्वारा चिन्हित नए पुरातात्विक स्थलों पर लेखन व उन स्थलों का संरक्षण भी किया जाना चाहिए।

 दूसरे सत्र के मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त प्राचार्य गोपाल सिम्हा ने कहा कि बस्तर के पुरातात्विक धरोहरों को सहेजे बगैर बस्तर को वांछित पहचान दिलाना मुश्किल है। बस्तर के बस्ते में छुपी संपदा अब शोधार्थियों के माध्यम से बाहर आने लगी हैं। यह खुशी की बात है। कार्यक्रम अध्यक्ष नरेन्द्र पाढ़ी ने कहा कि बस्तर संस्कृति और लोककला पश्चात बस्तर का पुरातात्विक वैभव पर शोध संगोष्ठी हो चुकी है। इसी क्रम में हमें बस्तर की अन्य विधाओं पर भी शोध संगोष्ठी करना चाहिए। डॉ एसके तिवारी ने कहा कि दलपत सागर तथा इसके मध्य शिवालय को राज्य पुरातत्विक धरोहर घोषित किया जाना चाहिए।  कोंडागांव से पहुंचीं डॉ. जयमनी कश्यप ने कहा कि अमरावती समीप कोटगढ़ ऐतिहासिक स्थल व मंगला माता मूर्ति स्थल को संरक्षित करते हुए पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

 शोध संगोष्ठी में आए शोधार्थियों अतिथियों व श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उप संचालक व संग्रहाध्यक्ष एके पैकरा ने कहा कि बस्तर के पुरातात्विक वैभव की जानकारियां जन सामान्य तक पहुंचाने तथा नई पीढ़ी को पुरातत्व संपदा का संरक्षण दायित्व सौंपने के उद्देश्य से यह संगोष्ठी आयोजित की गई है। संगोष्ठी में प्राप्त शोधपत्रों का विभाग द्वारा प्रकाशन किया जाएगा। दो दिवसीय शोध संगोष्ठी में कुल ३१ शोध पत्र प्रस्तुत किए गए हैं। इस मौके पर विशेष रूप से बंशीलाल विश्वकर्मा, डॉ. सतीश जैन, गंगाराम कश्यप आदि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन भवन दीवान, अफजल अली और ज्वाएस लारेंस सिंह ने बारी- बारी से किया।

पढ़े गए १७ शोधपत्र

 दो दिवसीय शोध संगोष्ठी के दौरान सोमवार को दूसरे सत्र में शिवकुमार पांडे ने नारायणपुर क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व के अवशेष एवं मूर्तियां, रूद्रनारायण पानीग्राही ने बस्तर की स्थापत्य कला में गजलक्ष्मी, डॉ. प्रमोद कुमार शुक्ला करपावंड ने आलेख महिमा पंथ और उसका विस्तार, गंगाराम कश्यप ने केशलूर का पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक महत्व, हेमंत कश्यप ने बस्तर का ऐतिहासिक दलपत सागर, तीजूराम बघेल अंतागढ़ ने उत्तर बस्तर के ऐतिहासिक ग्राम तथा धार्मिक आस्था केंद्र, डॉ. जयमनी कश्यप ने अमरावती का पुरातत्व स्थल कोटगढ़, तुलसीराम पाणिग्राही ने नहरनी का पखनाखंडी शिव मंदिर, डेंसनाथ पांडे ने जगन्नाथ मंदिर का ऐतिहासिक महत्व, सोमारुराम कश्यप दरभा ने तीरथगढ़ में विलय नाला की आत्मकथा, नरेंद्र कुमार यादव ने छत्तीसगढ़ के अनेक चिन्हों की पहचान, चंदो मंडावी बाघमोहलई ने ग्राम परिवेश में बिखरी पुरातात्विक  संपदा, जगन्नाथ बघेल ने बस्तर के ऐतिहासिक मड़ई मेला, प्रेमसागर चौबे ने बस्तर का विश्व प्रसिद्ध दशहरा, आशीष दीवान ने बारसूर के ऐतिहासिक मंदिर, राम कश्यप ने बस्तर जनजीवन पर विभिन्न धर्मों का प्रभाव विषय  पर शोध पत्र प्रस्तुत किया।

नीलाराम का सम्मान

   वर्ष २०१८ में सुकमा जिला के किंदरवाड़ा गांव में मिट्टी खुदाई के दौरान ग्रामीण नीलाराम को सोने के १७७ सिक्के मिले थे। उसने पूरी ईमानदारी के साथ यह सिक्के जिला पुरातत्व संग्रहालय के संग्रहाध्यक्ष एके पैकरा को सौंप दिया था। लीलाराम की ईमानदारी की तारीफ करते हुए शोध संगोष्ठी के दौरान प्रशस्ति पत्र व पुष्प गुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया।

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