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कोरोना का डर, अंतिम संस्कार में भी नहीं पहुंच रहे परिवार
05-May-2021 5:29 PM (50)
कोरोना का डर, अंतिम संस्कार में भी नहीं पहुंच रहे परिवार

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बैकुंठपुर (कोरिया), 5 मई।
कोरिया जिले में कोरोना का प्रकोप बढऩे से अब मरने के बाद भी लोगों की अंतिम क्रिया में दिक्कतें आ रही है। संक्रमित मरीज की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार करना मुश्किल हो रहा है। मृतक के परिजन भी मृत शरीर का दाह संस्कार करने से डर रहे हैं। यदि कोई अंतिम संस्कार कर भी रहा है तो उसके बाद अस्थि विसर्जन के लिए अस्थि श्मशान से नहीं ले जा रहे हैं। कोरोना के इस दौर ने जीवित लोगों को तो दूर किया ही है। अब मरने के बाद भी कोई अपना या पराया पास नहीं आ रहा है।

जिंदगी से विदाई के बाद विधि-विधान पूर्वक अंतिम संस्कार सभी धर्मों में हर व्यक्ति का अधिकार माना गया है, लेकिन कोरोना के कहर के चलते संक्रमित लोगों से यह अधिकार भी छिन सा गया है। फिलहाल इस समय जितनी भी मौत कोरोना के कारण हो रही हैं, उन मृतकों के संक्रमित शवों को अंतिम संस्कार और शव यात्राएं भी नसीब नहीं हो रही है। आलम यह है कि मौत के बाद परिजन तक शव के अंतिम संस्कार के लिए सामने नहीं आ रहे है। तो कुछ अपनों की विदाई देना भी चाहते है तो कोरोना के नियम आड़े आ रहे है। कई ऐसे हैं जो संक्रमण के खौफ से मुक्तिधाम में अपनों के शवों के पास भी नहीं जाना चाहते। 

कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर की बात करें तो महिने में एक्का-दुक्का मौत के बाद यहां स्थित मुक्तिधाम में शव का अंतिम संस्कार किया जाता था, परन्तु अब हर दिन 2 से 3 शव का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। बीते 15 अप्रैल से 4 मई तक 61 मौत हो चुकी है, कोविड अस्पताल में मौत होने के बाद ज्यादातर शवों को अंतिम संस्कार यहीं किया जाता है। अपै्रल के दूसरे पखवाड़े से लगातार मौत का आंकड़ा बढ़ा है। इस दौरान कोविड अस्पतालों में कोविड से मृत व्यक्तियों के कई परिजन भी शव लेने नहीं पहुंच रहे है। इस दौरान ऐसे कई मामले सामने आ रहे है, जिसमें कोविड अस्पताल में संक्रमितों की मौत के बाद परिजन का पता नहीं रहता।

अपनों का नहीं मिल रहा साथ
कोरोना के संक्रमण के कारण अपनों से दूर होने की सामाजिक मजबूरी के बावजूद इलाज और व्यवस्थाओं के अभाव में अपना जीवन गंवाने वाले मृतकों को अंतिम समय में भी अपनों का साथ नहीं मिल रहा है। दरअसल अस्पताल से लेकर श्मशान घाट तक महामारी का खौफ इस कदर है कि अपनों को गंवाने के बाद खुद की सुरक्षा की मजबूरी के कारण लोग शवों को 4 लोगों का कंधा तक नसीब नहीं हो पा रहा है। ऐसी तमाम मौतों के मामलों में न तो शव यात्राएं निकल पा रही हैं, न ही श्मशान में विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार हो पा रहा है। 
अस्पतालों से सीधे संक्रमित शव श्मशान में भेजे जा रहे हैं। उनके साथ इक्का-दुक्का परिजन ही मौजूद रहते हैं। कई स्थानों पर स्थिति ऐसी बन रही है कि मृतकों के परिजन श्मशान के कर्मचारियों को ही दाह संस्कार का बोलकर संक्रमण के डर से श्मशान के गेट से अंदर ही नहीं आ रहे हैं। यह स्थिति देखकर अब तक श्मशान में अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कराने वाले कर्मकांडी पंडित भी दुखी है।

परिजन बना रहे दूरी
जानकारी के अनुसार गत दिवस बनारस उप्र का एक व्यक्ति कोरिया जिला मुख्यालय बैकुंठपुर में अपनी बेटी के पास आया था और वह कोरोना की चपेट में आ गया जिसके बाद व्यक्ति को कोविड सेंटर में भर्ती किया गया। जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। तब उक्त व्यक्ति के शव को लेकर सिर्फ उसकी बेटी ही शव लेने पहुंची परन्तु बाहर से कोई भी अन्य रिश्तेदार उनकी मौत के बाद नहीं आए। 

इसी तरह कंचनपुर कोविड अस्पताल में एक अन्य व्यक्ति की मौत संक्रमण के चलते उपचार के दौरान मौत हो गई, लेकिन परिजन शव लेने ही नहीं पहुंचे। ऐसे में प्रशासन द्वारा शव का अंतिम संस्कार कराया गया। 

इस तरह के कई मामले कुछ दिनों से कोविड हास्पिटल में देखने को मिल रहा है। कोविड मृतक के परिजन शव लेने नहीं आ रहे हंै और आ भी रहे हंै, तो पुत्र-पुत्री ही आ रहे हैं। कोरोना संक्रमण को लेकर भय लोगों के मन में इतना बना हुआ है कि संक्रमण के बाद यदि किसी की मौत हो जाती है, तो उनके परिजन ही उनसे दूरी बना ले रहे हैं। इस संकट की घड़ी में मृतक का अपने परिवार के लोग ही अंतिम वक्त में साथ दे रहे है। बाकि अन्य परिजन व शुभचिंतक कोई पास नहीं पहुंच रहे है। 

अस्थियों के विसर्जन में कई परेशानियां
कोरिया जिला मुख्यालय में बीते 2 सप्ताह से स्थिति ऐसी है कि संक्रमित शवों को जलाए जाने के बाद लोग उनका विधि-विधान से ना तो अस्थि इकट्ठा कर रहे हैं, और ना ही वर्तमान दौर में नदियों में अस्थि विसर्जन कर पाने की स्थिति में हैं। हालांकि कुछ तीसरे दिन आकर अस्थियां एकत्रित करते देखे जा रहे हैं, बाद में उन्हें प्रयागराज ले जाकर विसर्जन करने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
 

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